हरियाणा की एक मस्जिद में लगा आतंकी हाफिज सईद के लश्कर-ए-तैयबा का पैसा


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक तरफ पाकिस्तान गम्भीर वित्तीय संकट में है, तो दूसरी तरफ हाफिज सईद की पार्टी भारत के हरियाणा में मस्जिद बनवा देता है, जो शायद इस बात को सिद्ध करता है कि पाकिस्तान वित्तीय संकट का शोर मचाकर विश्व को यह संकेत देने का प्रयास कर रहा है कि "जो देश वित्तीय संकट में हो, आतंकवाद को बढ़ावा कैसे दे सकता है?" वास्तव में पाकिस्तान IMF के आलावा दूसरे देशों से आर्थिक मदद लेकर भारत के विरुद्ध आतंकवाद को बढ़ावा देने के अलावा पाकिस्तान समर्थकों की सहायता से मस्जिदें निर्मित कर साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने में प्रयत्नशील है। कश्मीर विचारक सुशील पंडित का कहना बिल्कुल ठीक है, कि "पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत भारत में मौजूद सैकड़ों पाकिस्तान और समर्थकों का होना है।"   
दिल्ली से सटे हरियाणा के पलवल जिले में बनी एक मस्जिद सुरक्षा एजेंसियों की जांच के घेरे में आ गई है। पलवल के उटावड़ गांव में खुलाफा-ए-रशीदीन मस्जिद की जांच में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के संस्थापक और वर्तमान में जमात-उद-दावा से संबंधित खूंखार आतंकी हाफिज सईद का नाम सामने आया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि इस मस्जिद में कथित रूप से पाकिस्तान में रह रहे हाफिज सईद के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का फंड लगा हुआ है।
पलवल के उटावड़ गांव में खुलाफा-ए-रशीदीन मस्जिद की जांच इसी महीने की 3 अक्टूबर को एनआइए अधिकारियों ने की थी। इसमें पता चला था कि इस मस्जिद का नक्शा भी दुबई में बना था। ऐसे में माना जा रहा है कि मस्जिद को बनाने में पैसा भी दुबई से आया होगा। एनआइए इस पहलू की जांच में जुट गई है।
एनआइए पहले ही टेरर फंडिंग के इस मामले में नई दिल्ली में मस्जिद के इमाम मोहम्मद सलमान सहित तीन लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। बता दें कि सलमान (52), मोहम्मद सलीम और सज्जाद अब्दुल वानी को 26 सितंबर को लाहौर स्थित फलाह-ए-इंसानियायत फाउंडेशन (FIF) से फंड प्राप्त करने के लिए गिरफ्तार किया गया था।
आसपास के लोगों को कहना है कि मस्जिद जिस जमीन पर बनी है, वो पहले से ही विवादित है। सलमान को लेकर यहां के लोगों को कहना है कि वह नहीं जानते कि वह किसी आतंकी संगठन से जुड़ा हुआ है। फलाह-ए-इंसानियायत फाउंडेशन की स्थापना हफीज सईद के जमात-उद-दावा (लश्कर का मूल संगठन) द्वारा की गई थी।
दुबई में तैयार हुआ था मस्जिद का नक्शा
दिल्ली से सटे हरियाणा के पलवल जिले के मुस्लिम (मेव) बहुल गांव उटावड़ में बन रही मरकजी मस्जिद का नक्शा दुबई में तैयार हुआ था। इस नक्शे को के आरोपित मोहम्मद सलमान ने ही बनवाया था। सलमान इसके निर्माण का जायजा लेने हर जुमे (शुक्रवार) को निजामुद्दीन (दिल्ली) से उटावड़ आता था। पलवल के हथीन उपमंडल में आने वाले इस पिछड़े गांव के लोग मेहनत-मजदूरी करके गुजर-बसर करते हैं।

इस गांव या आसपास के इलाके में मरकजी मस्जिद जैसी पहले कोई मस्जिद तो क्या कोई निजी भवन भी नहीं है। मोहम्मद सलमान इस मस्जिद का निर्माण जामा मस्जिद के अनुरूप करवा रहा था। गांव के कुछ लोगों और मस्जिद के निर्माण में जुटे कारीगरों के अनुसार सलमान इसके निर्माण में बेहतरीन सामग्री इस्तेमाल करवा रहा था। इसका नाम भी सलमान ने खुलफा-ई-राशिदीन रखा है।
मोहम्मद सलमान 25 सितंबर से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की गिरफ्त में है। एनआइए के अधिकारियों ने सलमान के दुबई में कई आतंकी संगठनों से संबंधों की पुष्टि की है। एनआइए की गिरफ्त में होने के कारण मरकजी मस्जिद में पिछले दो बार से जुमे की नमाज बिना सलमान के पढ़ी गई है। इसके पहले आठ साल में हर जुमे की नमाज उसकी मौजूदगी में पढ़ी गई।
गांव के लोग बताते हैं कि सलमान ने यहां अपने लिए एक कमरा भी बनवाया है। वह उसी में ठहरता था। उससे आसपास के गांवों के लोग भी मिलने आते थे।
अख्तर हुसैन (पूर्व सरपंच, उटावड़) का कहना है कि सलमान पर लगे आरोप उटावड़ गांव सहित मेवात क्षेत्र के लोगों के गले नहीं उतर रहे हैं । मरकजी मस्जिद के निर्माण का जिम्मा सलमान को 2010 में तब सौंपा गया था जब गांववासी इसे पूरा करने में असमर्थ हो रहे थे। गांव के कुछ प्रमुख लोग सलमान को निजामुद्दीन से बुलाकर लाए थे। उसे बुलाने की वजह यह थी कि उसके पिता मौलवी दाऊद का जन्म उटावड़ में हुआ था। गांववासियों को विश्वास है कि जांच में सलमान बेकसूर साबित होगा।
गौरतलब है कि संदिग्ध आतंकी हाफिज सलमान की गिरफ्तारी के बाद चर्चा में आई पलवल के उटावड़ क्षेत्र की मरकजी मस्जिद को आतंकी फंडिंग की आशंका पर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनआइए) की टीम ने 3 अक्टूबर को मस्जिद को चंदे से मिले धन से जुड़े रजिस्टर व बैंक दस्तावेज कब्जे में ले लिए थे। 
3 अक्टूबर को उटावड़ पहुंची एनआइए की चार सदस्यीय टीम ने हरियाणा पुलिस की मौजूदगी में पांच घंटे तक मस्जिद परिसर में जांच- पड़ताल की और मस्जिद प्रबंधन से जुड़े लोगों के बयान लिए हैं। रजिस्टर और बैंक खाते जब्त किए डीसीपी अशोक डागर की अगुआई में टीम ने सबसे पहले मस्जिद प्रबंधन कमेटी से जुड़े लोगों से निर्माण खर्च बजट का आंकलन किया था।
बारीकी से रजिस्टरों को जांचा व चंदे के माध्यम से आई धनराशि व बैंक खातों का विवरण लिया। करीब पांच घंटे तक चली कार्रवाई के दौरान एनआइए ने एक रजिस्टर, दो पॉकेट डायरी तथा कुछ कागजातों को कब्जे में लिया है। दिल्ली से गिरफ्तार हुआ था सलमान मूल रूप से उटावड़ निवासी सलमान व उसके दो साथियों को एनआइए की टीम ने विदेशी फंडिंग के मामले में दिल्ली से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के समय वह दिल्ली के निजामुद्दीन में रहता था। सलमान की ही देखरेख में उटावड़ मोड़ पर मस्जिद का निर्माण हो रहा था। निर्माण वर्ष 2010 में शुरू हुआ था।
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आरोप है कि सलमान का संपर्क पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगना हाफिज सईद द्वारा चलाए जा रहे संगठन के एक सदस्य से था, जो दुबई में रहता है। उससे सलमान की फोन पर बातें होती थीं। सूत्रों के अनुसार सलमान व उसके दो साथियों से पूछताछ में मस्जिद को दुबई निवासी उक्त व्यक्ति द्वारा फंडिंग करने की बात सामने आई, उसी के बाद टीम जांच के लिए पहुंची।
आलोक मित्तल (महानिरीक्षक, राष्ट्रीय जांच एजेंसी) ने बताया कि सलमान से पूछताछ के आधार पर जांच चल रही है। पलवल के गांव उटावड़ में बनाई गई मस्जिद में दुबई के एक नागरिक के माध्यम से पैसा लगाने की बात सामने आई है। छानबीन शुरू कर दी गई है। जल्द ही सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।
यहां पर बता दें कि पिछले महीने 26 सितंबर को एनआइए ने मेवात से दिल्ली के एक हवाला डीलर को गिरफ्तार किया था। खुफिया एजेंसियों का आरोप है कि सलमान लश्कर के जुड़े पाकिस्तानी संगठन फलाह-ए-इंसानियत से फंड लेता था।
खुफिया सूचना पर 27 सितंबर को एनआइए ने एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया था। कार्रवाई के तहत दिल्ली के दरियागंज, निजामुद्दीन और कूचा घासीराम इलाके में एजेंसी ने छापा मारा था। इस छापे में टेरर फंडिंग मॉड्यूल का पर्दाफाश किया गया था।

गौरतलब है कि फलाह-ए-इंसानियत पाकिस्तान के लाहौर का एक संगठन है। इस जमात-उद-दावा ने स्थापित किया है और UAPA के अंतरगत आतंकी संगठन के श्रेणी में रखा गया है। NIA ने यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया है।

मेरे खिलाफ हो रहा प्रोपेगैंडा, केजरीवाल को बताया जिम्मेदार-- दिल्ली भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद रमेश बिधूड़ी ने सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश-बिहार के लोगों को भगाने वाले वायरल वीडियो और फर्जी खबर को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा है। रमेश बिधूड़ी ने कहा कि जिस जगह का ये जिक्र कर रहे हैं कि महिपालपुर में मैंने पूर्वांचल के लोगों को लेकर कुछ कहा, यह सरासर गलत है 
भाजपा नेता ने कहा कि जिस तरह मीडिया में एक ओर फेक न्यूज़ चलाई गई उसकी शिकायत हमने पुलिस से कर दी है। चूंकि देश में चुनावी मौहाल है, इसलिए मीडिया का फायदा उठाकर केजरीवाल सरकार दिल्ली के शांतिपूर्ण मौहाल को खराब करने की कोशिश कर रही है। बहरहाल रमेश बिधूड़ी पहले भी कई बार ट्वीट कर खबर की क्लिपिंग पर सफाई दे चुके हैं 
सत्ता की लोलूपता में लोग कितना गिर सकते हैं, अभी मुझे जानकारी मिली कि सोशल मीडिया पर मेरे नाम से यूपी,बिहार निवासियों के लिए बयान दिया बताया जबकि ना किसी अखबार का नाम दिया गया और ना छापने वाले का, ऐसा 25 जून को भी अखबार की फ़र्ज़ी कटिंग को आप के प्रवक्ता ने चलाया था परिणाम
वहीं बीजेपी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि भले ही कई लोगों ने झूठी खबर के लिए माफी मांगी है, लेकिन हम पुलिस से भी गुजारिश करेंगे कि वह ऐसे लोगों पर सख़्त कदम उठाए 


सत्ता की लोलूपता में लोग कितना गिर सकते हैं , अभी मुझे जानकारी मिली कि सोशल मीडिया पर मेरे नाम से यूपी,बिहार निवासियों के लिए बयान दिया बताया जबकि ना किसी अखबार का नाम दिया गया और ना छापने वाले का, ऐसा 25 जून को भी अखबार की फ़र्ज़ी कटिंग को आप के प्रवक्ता ने चलाया था परिणाम(1/3)
जिस खबर को लेकर रमेश बिधूड़ी के खिलाफ साजिश की गई उसका पर्दाफाश हो गया है। जिस फेक प्रिंट को मीडिया में फैलाया गया उससे साफ हो गया है कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस किस तरह दिल्ली में भी गुजरात के जैसा दंगा कराने की साजिश को नाकाम कर दिया है। राहुल गांधी और केजरीवाल एक तरह सांप ओर जोंक की तरह हैं.
असल में, सोशल मीडिया पर एक अखबार की खबर शेयर की जा रही हैं जिसमें रमेश बिधूड़ी को उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के खिलाफ बयान देते हुए बताया गया है। लेकिन बाद में रमेश बिधूड़ी बयान जारी कर इस वायरल खबर को फर्जी बताया। इस संबंध में बीजेपी सांसद की तरफ से केस भी दर्ज करा दिया गया हैगुजरात के अब दिल्ली में आग लगाने का प्रयास किया जा रहा है। जो अख़लाक़, गो-हत्या, दलित उत्पीड़न आदि की तरह मतदान समाप्त होते ही किसी कालकोठरी में बंद कर दिया जाएगा। 
दिल्ली से लेकर कश्मीर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक विपक्ष प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध कोई लगाए गए हर आरोप को सिद्ध करने में पूर्णरूप से नाकाम होने के कारण भाजपा  अन्य नेताओं को मोहरा बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। प्रत्यक्ष को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी में कोई कमी नहीं है, गुजरात का मुख्यमन्त्री रहते मोदी ने केन्द्र सरकार के जिन निर्णयों का विरोध किया था, उन्हें ही सीढ़ी बनाकर सफलता की ओर अग्रसर हैं। दरअसल पिछली सरकार ने निर्णय तो ले लिए लेकिन उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाई। जैसे नोटबंदी, जीएसटी, आधार कार्ड, आतंकवाद पर लगाम, कश्मीर से धारा 370 और 35A को समाप्त करना, मुस्लिम महिलाओं में तीन तलाक प्रथा को समाप्त करना,अयोध्या, काशी और मथुरा  आदि आदि के लम्बी सूची है। लेकिन मोदी ने अपनी इच्छाशक्ति से इन कार्यों पर काम किया।    
भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की स्थापना से लेकर आज तक इस पार्टी के लिए एक कथन है "जो कहते तो करते हैं", जबकि इस पार्टी की विरोधी उसी काम करने के लिए तुष्टिकरण और समाज को बाँटने की नीति अपनाकर इस पार्टी के कन्धे पर बन्दूक रखकर करते हैं।  

क्या मध्य प्रदेश में भाजपा को विपक्ष के बिखराव का लाभ मिल पाएगा?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जैसे मध्य प्रदेश में चुनाव तारीख पास आती जा रही है, मप्र की राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियों की स्थिति अभी भी मजबूत नहीं हो पाई है। यहाँ भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों के अलावा किसी अन्य पार्टी का प्रभाव बेहद कम रहा है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अलावा किसी भी दूसरे क्षेत्रीय दल को कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। पिछले चुनावों के नतीजों को अगर देखें तो यह बात सामने आती है कि राज्य के कुल वोट में से सिर्फ 19 फीसदी पर ही क्षेत्रीय दल सिमट कर रह गए। इस साल बसपा, गोंगपा, आप और सपा राज्य में तीसरे मोर्चे के रूप में काम कर रहे हैं। वर्तमान स्थिति में इनका कोई मजबूत जनाधार नजर नहीं आ रहा, लेकिन फिर भी यह पार्टियां काफी हद तक चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं।
राज्य में चुनाव के दौरान सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा है। इस बार के चुनाव में भी क्षेत्रीय दलों की कोई बड़ी भूमिका नजर नहीं आ रही है। भाजपा के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी है। 15 साल से पार्टी शासन में है और चौथी पारी को लेकर एक संशय की स्थिति नजर आ रही है। कांग्रेस अंतरकलह का शिकार है। बसपा और कांग्रेस में गठबंधन की संभावना कहीं नज़र नहीं आ रही। आम आदमी पार्टी का कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में शरद यादव तीसरे मोर्च की कवायद में जुटे हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में छोटे दलों को जोड़कर तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद शुरू हो गई है। इसकी पहल पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव कर रहे हैं। 2 अगस्त को भोपाल में आयोजित सम्मेलन में छोटे दल के नेता एक मंच पर दिखे। जिन दलों के तीसरे मोर्चे में आने की संभावना है, उनके पास फिलहाल कोई सीट तो नहीं है। पर चुनाव में उलटफेर करने की हैसियत ये रखते हैं।
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2013 के चुनाव में इन दलों ने 3.5 प्रतिशत से अधिक वोट कबाड़े थे। ऐसे में जब भाजपा और कांग्रेस के कुछ विधायकों के जीत का आंकड़ा महज 2-3 हजार का था, इन दलों के वोट काटने से इस बार भी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। तीसरे मोर्चे में जिन दलों के साथ आने का दावा किया जा रहा है, उनमें गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी है। इसे 2013 में 1.5 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। इसके अलावा जनता दल यूनाइटेड, शरद यादव गुट, राष्ट्रवादी कांग्रेस, शिवसेना, बहुजन संघर्ष दल, समानता दल, महान दल, अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी, भारतीय शक्ति चेतना पार्टी तीसरे मार्चे के घटक में शामिल होने की संभावना है। लेकिन मोर्चे में शामिल होने वाले संभावित दलों में से गोंगपा ने अलग राह पकड़ ली है।
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राज्य में भाजपा और कांग्रेस इन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों का वोटिंग प्रतिशत लगातार गिर रहा है। यही वजह है कि राज्य की सियासत में कोई भी राजनीतिक दल तीसरी ताकत बनकर नहीं उभर पाया है। राज्य में हर बार पांच राष्ट्रीय, करीब आधा दर्जन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ ही पांच दर्जन के करीब गैरमान्यता प्राप्त पार्टियां भाग्य आजमाती हैं। इस बार दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी प्रदेश में भाग्य आजमाएगी।
इस बार कांग्रेस बसपा और सपा के साथ गठबंधन की कोशिश कर रही थी, लेकिन अभी तक गठबंधन के आसार नजर नहीं आते दिख रहे हैं। उधर, इस बार चुनाव के लिए गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन किया है। गोंगपा ने 1998 में हुए चुनाव में एक सीट हासिल की थी। पार्टी के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष हीरा सिंह मरकाम चुनाव जीतकर विधायक बने थे, लेकिन राज्य गठन के बाद हुए तीन चुनावों में गोंगपा के हाथों कोई सफलता नहीं लगी। अब इस बार समाजवादी पार्टी के साथ गोंगपा ने गठबंधन किया है, लेकिन इसका कोई विशेष जनाधार यहां नजर नहीं आ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान कई सीटों पर त्रिकोणीय व बहुकोणीय मुकाबला नजर आता है, लेकिन ज्यादातर सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सीधी टक्कर होती है। बाकी पार्टियों के अधिकांश प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाते हैं।
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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हो चुका है। 12 और 20 नवंबर दो चरणों में 90 सीटों के लिए मतदान होगा। 11 दिस...

भाजपा में भी खींचतान कम नहीं 
यदि कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान रुकने का नाम नहीं ले रही तो भाजपा में भी शिवराज और प्रदेशाध्यक्ष को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। जिसका लाभ विपक्ष उठा रहा है। यही कारण है कि राज्य में खुली छोटी-छोटी दुकानें यानि पार्टियाँ जिनका मतदाताओं पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं, भाजपा को डराने में पीछे नहीं। 
प्रदेश भाजपा संगठन में बदलाव की चर्चा
इन सबके बीच नरोत्तम मिश्रा का नाम प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर तेजी से सामने आया है। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के अलावा गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह के नाम भी चर्चा में है। ऐसा माना रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अपने किसी करीबी को अध्यक्ष बनवाना चाहते हैं। वैसे तो प्रदेश भाजपा संगठन में बदलाव की चर्चा कई दिनों से सियासी हलकों में जोर पकड़े हुए है, लेकिन अक्टूबर 8 को संघ और प्रदेश बीजेपी के नेताओं की मुलाकात से चर्चा को बल मिला है।
शिवराज सिंह नागपुर के लिये हुये रवाना
अक्टूबर 10 को दिन भर मध्यप्रदेश भाजपा की कमान नये नेता को सौंपे जाने की चर्चा चलती रही। चर्चा ये थी कि नये नाम का फैसला हो चुका है, सिर्फ संघ की सहमति के बाद हाइकमान औपचारिक घोषणा कर देगा। इसी बीच देर शाम मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अचानक नागपुर के लिए रवाना हुए तो कयासों को मजबूती मिली और नए प्रदेशाध्यक्ष के नामों पर चर्चा चलने लगी। सीएम शिवराज सिंह नसरूल्लागंज के दौरे के बाद शाम 5 बजे तक राजधानी भोपाल में थे।
भाजपा की कमान के लिये उभरे कई नाम
सीएम शिवराज सिंह चौहान के नागपुर दौरे के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर नरोत्तम मिश्रा का नाम तेजी से उभरा है। इसके अलावा गृहमंत्री और मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह के विश्वस्त भूपेंद्र सिंह का नाम चर्चा में है। एबीवीपी से भाजपा में आये वीडी शर्मा, जबलपुर राकेश सिंह का नाम भी चर्चा में है। लेकिन केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की सक्रियता और पिछले चुनाव के अनुभव के आधार पर पलड़ा भारी नजर आ रहा है।
बैठक में चुनाव की तैयारियों को लेकर हुयी लंबी मंत्रणा
मुख्यमंत्री की पहली पसंद भी नरेन्द्र सिंह तोमर माने जा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने की चर्चा इसलिए भी जोरों पर है क्योंकि, अक्टूबर 8 को राजधानी में कोरग्रुप की बैठक हुई थी। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल के अलावा संघ के पदाधिकारियों के साथ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की भी मुलाकात हुई थी। इस बैठक में चुनाव की तैयारियों को लेकर लंबी मंत्रणा हुई थी।
मध्यप्रदेश में सरकार के खिलाफ असंतोष से संघ चिंतित
बैठक में संघ की ओर से कृष्ण गोपाल, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री रामलाल, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, उपाध्यक्ष प्रभात झा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस समन्वय बैठक में हिस्सा लिया। मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि, यह समन्वय बैठक थी, इसका एजेंडा किसी को पता नहीं होता, इस बैठक में प्रदेशाध्यक्ष पर कोई चर्चा नहीं हुई।
अन्य वर्ग सरकार के फैसलों से खुश नहीं 
ज्ञात हो कि राज्य में सरकार के तमाम फैसले उलटे पड़ रहे हैं। कर्मचारी, किसान, मजदूर और अन्य वर्ग सरकार के फैसलों से खुश नहीं हो पाए हैं। आंदोलनों का दौर चल रहा है। वहीं पिछले दिनों हुए दो विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। इससे पहले अटेर व चित्रकूट का उपचुनाव भी भाजपा हार गई थी। 
सरकार की योजनाएं, सुविधाओं का किया जिक्र
सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में संगठन के लोगों ने अपनी बात रखी, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार की योजनाएं और लोगों को दी जा रही सुविधाओं का जिक्र किया। वहीं संघ का सवाल था कि, इतना कुछ होने के बाद भी सरकार के खिलाफ असंतोष क्यों पनप रहा है? आगामी रणनीति पर भी चर्चा हुई।

मीडिया ने तहसीन का नाम छिपाया क्यों?

कहते हैं कि दिल्ली की मीडिया का एक बड़ा तबका आज भी गांधी परिवार के साथ अपनी वफादारी निभा रहा है। लगता है कि ये वफादारी गांधी परिवार ही नहीं, बल्कि वाड्रा परिवार के लिए भी उतनी ही है। यही वजह है कि जैन मुनि तरुण सागर के खिलाफ भद्दी टिप्पणी करने वाले विशाल डडलानी की तो चैनलों और अखबारों ने खूब खिंचाई की, लेकिन तहसीन पूनावाला का जिक्र गायब ही रहा। हो सकता है कि कांग्रेस के इस प्रवक्ता को आम लोग नहीं जानते हों, लेकिन मीडिया अच्छी तरह जानती है कि तहसीन पूनावाला प्रियंका वाड्रा का ननदोई है। तहसीन पूनावाला इससे पहले भी सोशल मीडिया पर देश और हिंदू धर्म के खिलाफ लिखता रहा है।

मीडिया ने तहसीन का नाम छिपाया क्यों?

तहसीन पूनावाला और मोनिका वाड्रा की शादी के वक्त की एक फैमिली फोटो। इसमें प्रियंका वाड्रा और उनकी बेटी को भी देखा जा सकता है। Courtesy: Indian Express
तहसीन पूनावाला और मोनिका वाड्रा की शादी के वक्त की एक फैमिली फोटो। इसमें प्रियंका वाड्रा और उनकी बेटी को भी देखा जा सकता है। Courtesy: Indian Express
विशाल डडलानी और तहसीन पूनावाला के ट्वीट पर सोशल मीडिया पर हंगामा मचा हुआ था। इसके करीब 24 घंटे के बाद चैनलों पर विशाल डडलानी का नाम चलना शुरू हुआ। वो भी खबर के साथ अरविंद केजरीवाल के बयान के साथ। लेकिन तहसीन पूनावाला का नाम लेने में भी चैनलों को झिझक हो रही थी। ज्यादातर चैनलों और अखबारों ने तो तसहीन पूनावाला का नाम तक नहीं बताया। अगर आपको इस बात पर भरोसा नहीं है तो खुद गूगल पर ये दोनों नाम अलग-अलग सर्च कर लें। पता चल जाएगा कि कई अखबारों और चैनलों ने तो अपनी खबरों में तहसीन पूनावाला का जिक्र भी नहीं किया।

कौन है तहसीन पूनावाला?

CNjffNRUwAArwx2दरअसल तहसीन पूनावाला गांधी-वाड्रा परिवार का मेंबर है। तहसीन ने रॉबर्ट वाड्रा की बहन और प्रियंका वाड्रा की ननद मोनिका वाड्रा से शादी की है। टीवी चैनलों पर वो अक्सर कांग्रेस के प्रवक्ता की तरह दिखाई देता रहता है। आम तौर पर उसकी बातें और बयान अजीबोगरीब किस्म के होते हैं। बिल्कुल उतने अजीब जितने अजीब वो ट्वीट्स करता है। पिछले साल सितंबर में उसने भगवान गणेश के नाम पर यह अपमानजनक ट्वीट किया था। तब सोशल मीडिया पर थोड़ा बहुत हंगामा हुआ था, लेकिन बात दब गई थी।
CbL3idOW0AAmNBGदरअसल तहसीन पूनावाला की ये जिहादी हरकतें पुरानी हैं। वो खुद को नास्तिक बताता है, लेकिन उसे जानने वालों के मुताबिक वो एक कट्टर मुसलमान है। आज तक उसे कभी भी इस्लाम या उसके त्योहारों के खिलाफ कुछ भी बोलते नहीं देखा गया है। जबकि पिछले साल रक्षाबंधन पर उसने यह ट्वीट किया था।
CRTH8pVVAAAUU1mइस साल 14 फरवरी की रात मुंबई में मेक इन इंडिया के प्रोग्राम के दौरान जब मंच में आग लग गई थी तो तहसीन पूनावाला बहुत खुश हो गया था। उसने ट्विटर पर अपनी खुशी जाहिर भी की थी। उसके लिए उसे देश भर से गालियां पड़ी थीं। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने अपने दामाद के दामाद को कभी ऐसी हरकतें करने के लिए मना नहीं किया।
हिंदू धर्म और देश के अलावा तहसीन पूनावाला के टारगेट पर सुभाषचंद्र बोस भी रहे हैं। पिछले साल 14 अक्टूबर को उसने ये ट्वीट करके आजादी की लड़ाई में बोस के योगदान पर सवाल खड़े किए थे।
ऐसे में यह सवाल तो उठेगा ही कि विशाल डडलानी को लेकर मीडिया में हंगामा मचा, लेकिन लगभग उसी अपराध के लिए तहसीन पूनावाला को क्यों बख्श दिया गया। क्या कोई पुरानी वफादारी थी या किसी किस्म का दबाव, जो कई चैनलों और अखबारों ने उसके नाम का जिक्र तक जरूरी नहीं समझा। क्योंकि राजनीति के हिसाब से विशाल डडलानी के मुकाबले तहसीन पूनावाला का कद कहीं ज्यादा बड़ा माना जाएगा।

दो हीरोइनों की ‘कैट-फाइट’ में फंस गए हैं राहुल गांधी!

बायीं तस्वीर दिव्या स्पंदना उर्फ रम्या की है। बीच में राहुल गांधी और दायीं तस्वीर स्वरा भास्कर की है।
चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी के अंदर मची घमासान से जुड़ी कुछ जानकारियां सामने आई हैं। दरअसल पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी की सोशल मीडिया सेल की प्रमुख दिव्या स्पंदना उर्फ रम्या ने पद से इस्तीफा दे दिया था। रम्या साउथ की फिल्मों की जानी-मानी हीरोइन रही हैं। न्यूज़लूज़ को कांग्रेस पार्टी की आईटी सेल में काम कर रहे एक व्यक्ति से मिली जानकारी के मुताबिक दिव्या स्पंदना की नाराजगी दरअसल अपनी अनदेखी के कारण है। उन्हें लगता है कि राहुल गांधी उनके काम को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं और इसके पीछे एक दूसरी हीरोइन स्वरा भास्कर का हाथ है। ऐसी खबरें हैं कि कांग्रेस के सोशल मीडिया अभियान से जुड़ी कुछ अहम जिम्मेदारियां स्वरा भास्कर को भी दी गई हैं। यही बात दिव्या स्पंदना को हजम नहीं हुई और उन्होंने पद से इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने की चाल चल दी। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी ने औपचारिक तौर पर यह मानने से इनकार कर दिया कि दिव्या स्पंदना ने पद से इस्तीफा दिया है।
दिव्या स्पंदना के पर कतरने की तैयारी!
कांग्रेस के अंदरखाने में खबर यही है कि पार्टी हाईकमान दिव्या स्पंदना के पर कतरने की तैयारी में है। अब तक कांग्रेस का सोशल मीडिया विभाग स्वतंत्र रूप से काम करता था, जबकि दूसरे विभागों महासचिवों को रिपोर्ट करना होता था। यह बात कांग्रेस के कई सीनियर नेताओं को खटक रही थी। जिसके बाद उन्होंने हीरोइन स्वरा भास्कर और निखिल अल्वा को सोशल मीडिया से जुड़े कई असाइनमेंट सौंपने शुरू कर दिए। निखिल अल्वा कांग्रेस की सीनियर नेता मारग्रेट अल्वा का बेटा है। पिछले कुछ हफ्तों से कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से ऐसे कई ट्वीट किए गए जो पार्टी की नीतियों से मैच नहीं खाते थे। इनकी वजह से कांग्रेस की जमकर फजीहत भी हुई। लेकिन दिव्या स्पंदना ने ट्विटर पर पीएम नरेंद्र मोदी की एक फोटोशॉप तस्वीर शेयर की, जिसमें उनके सिर पर चोर लिखा हुआ दिखाया गया तो विरोधी गुट को मौका मिल गया। इस ट्वीट के लिए कांग्रेस की हर तरफ कड़ी आलोचना हो रही है और दिव्या स्पंदना के खिलाफ पुलिस में केस भी दर्ज हो चुका है। संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने इसे मुद्दा बना लिया और अंदरूनी बैठक में इसका कड़ा विरोध किया। जिसके बाद तय हुआ कि दिव्या स्पंदना अपने ट्वीट्स और दूसरे कंटेंट सीनियर नेताओं से चेक करवाएंगी। इसके लिए जयराम रमेश का नाम तय भी कर दिया गया।
काम की नहीं, अहम की लड़ाई
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक दिव्या स्पंदना राहुल गांधी के अलावा किसी दूसरे सीनियर नेता को रिपोर्ट करने को कतई तैयार नहीं हैं। इसके अलावा स्वरा भास्कर को काम सौंपे जाने के कारण दिव्या स्पंदना पहले से ही भड़की हुई थीं।  इस सारे झगड़े के पीछे एक बड़ा एंगल रणदीप सिंह सुरजेवाला का भी है। सुरजेवाला कांग्रेस के कम्युनिकेशन विभाग के प्रमुख हैं। पार्टी के औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयान उन्हीं की तरफ से जारी किए जाते हैं। माना जाता है कि सोशल मीडिया पर दिव्या स्पंदना की आजादी सुरजेवाला को कतई पसंद नहीं थी, लिहाजा वो काफी समय से उनके काम में कमियां निकालने में जुटे थे। स्वरा भास्कर और निखिल अल्वा को सोशल मीडिया से जुड़े काम सौंपे जाने के पीछे भी उन्हीं का दिमाग माना जाता है। पिछले 2 महीने के इस सारे घटनाक्रम से दिव्या स्पंदना अंदर ही अंदर नाराज चल रही थीं। खास तौर पर स्वरा भास्कर से उनकी बिल्कुल भी नहीं बनतीं। कांग्रेस हाईकमान की मुश्किल यह है कि सोशल मीडिया से जुड़ी पूरी टीम दिव्या स्पंदना की विश्वासपात्र है, उन्हें सीधे तौर पर हटाने से पार्टी के अभियान को नुकसान पहुंचने का डर है। लिहाजा पिछले दरवाजे से दूसरी हीरोइन को एंट्री दिलाई गई। लेकिन जिस तरह से झगड़े ने दूसरा रंग ले लिया आने वाले दिनों में कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए ये किसी बुरी खबर से कम नहीं है। 
दिव्या स्पंदना ने अभी तक अपनी नाराजगी को लेकर सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। दूसरी तरफ स्वरा भास्कर का मामला पूरी तरह से अनौपचारिक है। हालांकि सोशल मीडिया में उनके नाम की चर्चा जोरों पर है। अब देखने वाली बात है कि राहुल गांधी इन दो हीरोइनों के झगड़े से खुद को कैसे बाहर निकाल पाते हैं।(साभार)

मातृशक्ति दुर्गा वाहिनी का दिल्ली में पथ संचालन


दिल्ली रविवार 14 अक्टूवर 2018 ।  विश्व हिन्दू परिषद् की महिला युवा इकाई दुर्गा वाहनी द्वारा दुर्गा अश्टमी, दुर्गा वाहनी स्थापना दिवस के शुभ अवसर पर, एक जैसे वस्त्र, हाथों में भगवा ध्वज लेकर अश्व तथा बुलेट पर सवार होकर जब अक्टूबर 14 को मातृशक्ति दुर्गा वाहिनी के पथ संचलन में शामिल हुई तो हर कोई देखने को आतुर हो गया। घोष की धुन पर शक्ति का स्वरूप बन बालिकाएं घोड़ो,और मोटरसाइकल पर सवार हाथों में तलवार,  दंड लेकर चल रही थी। इस शक्ति प्रदर्शन के साथ युवतियों ने यह भी बता दिया कि वे हर परिस्थिति से निपटने का सामथ्र्य रखती है। क्षेत्र के लोगो द्वारा अपने घरों दुकानों से बहार आकार दुर्गाओं का पुष्पो द्वारा भव्य स्वागत किया गया। द्वारिका फ्लाईओवर से आरंभ हुआ यह पथ संचलन क्षेत्र के प्रमुख मार्ग विजय एन्क्लेव, जिंदल पब्लिक स्कूल   से होते हुए लगभग 4 किलोमीटर चलकर बारात घर पर  पहुची जहां समापन किया गया। संचलन में हजारों की संख्या में युवतियां तथा बालिकाएं शामिल हुईं।
यह उन लोगों को भी जवाब था, जो कहते हैं कि संघ में महिलाओं को कोई स्थान नहीं मिलता। शायद आरोप लगाने से पूर्व उन्हें ही नहीं मालूम कि संघ में महिलाओं की कुल कितनी संख्या है और महिला समर्थित कितनी संस्थाएं हैं ? उन्हें शायद यह भी ज्ञात नहीं की ये संस्थाएं समाज में कितनी सक्रिय हैं?
मातृशक्ति इस देश की सबसे बड़ी ताकत है जो स्वयं में झांसी की रानी है। आज समाज दूषित हो रहा है इसलिए हम अपनी बहन बेटियों को शस्त्र चलाना भी सिखाते है हमारी बहनो के एक हाथ में शस्त्र और एक हाथ में शास्त्र होना चाहिए यह बात प्रांत मंत्री श्री बचन सिंह जी ने अपने बौद्धिक में मुख्य अतिथि के रूप में कही।
मुख्य वक्ता के रूप में डॉ, इंदु राव जी दुर्गा वाहनी प्रान्त संयोजिका ( हरियाणा प्रान्त) ने कहा आज समय आ गया है हमें अपने अधिकारों के लिए मजबूत होना होगा उन्होंने कहा नारी अबला नहीं सबला है विधर्मियो द्वारा शोचि समझी साजिश के तहत लव जिहाद करके हिन्दू  बहन बेटियों को बहलाने के जो षडयंत्र रचा जा रहा है उसे दुर्गावहनी कभी बर्दास्त नहीं करेगी और इसका यथाशक्ति विरोध करते रहेगी ।
दिल्ली  दुर्गा वाहिनी प्रांत संयोजिका सुश्री कुसम चौहान  ने अपने संबोधन में कहा कि दुर्गा वाहिनी का मुख्य उद्देश्य सेवा, सुरक्षा, संस्कार के माध्यम से समाजिक कार्य करना व वर्तमान परिस्थितियों से निपटने की लिए संगठित होना है।
प्रान्त प्रचार प्रसार प्रमुख महेंद्र रावत जी के अनुसार मंच संचालन विभाग सह मंत्री श्री भारत बत्रा जी ने किया इसअवशर पर दिल्ली प्रान्त के पालक श्री अशोक कुमार जी,श्री मन राजवीर जी,विभाग संयोजिका दुर्गा वाहनी सुश्री वंदना जी की गरिमामय उपस्थिति रही
महेंद्र रावत
विहिप प्रचार प्रसार प्रमुख दिल्ली

प्रत्याशियों को 3-3 बार बताने होंगे अपने अपराध

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कोई प्रत्याशी अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों पर पर्दा नहीं डाल पाएगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने इस संबंध में गाइडलाइन जारी कर दी है। अब हर प्रत्याशी को अपने खिलाफ दर्ज ऐसे मामलों की जानकारी तीन-तीन बार प्रदेश के बड़े अखबारों और न्यूज चैनलों में जारी करना होगी।
राजस्थान के मुख्य निर्वाचन अधिकारी आनंद कुमार ने जयपुर में बताया कि हर प्रत्याशी को नाम वापस लेने की आखिरी तारीख से लेकर मतदान की तारीख के बीच अलग-अलग दिनों में तीन बार प्रदेश के प्रमुख अखबारों और समाचार चैनलों में विज्ञापन जारी कर अपने खिलाफ दर्ज मामलों की जानकारी सार्वजनिक करना होगी।
साथ ही प्रत्याशी को नामांकन फॉर्म में अपनी चल-अचल सम्पत्ति और शैक्षणिक योग्यता के बारे में भी बताना होगा। चुनाव आयोग ने इन बातों को ध्यान में रखते हुए नामांंकन पत्र के फॉर्म नंबर 26 में बदलाव कर दिए हैं।
विधानसभा चुनाव के परिणामों में विजयी प्रत्याशियों को परिणाम जारी होने के 30 दिन के अंदर यह प्रमाण चुनाव आयोग के समक्ष पेश करना होगा कि उन्होंने किन-किन अखबारों और न्यूज चैनलों में अपने आपराधिक मामलों की जानकारी सार्वजनिक की थी।
हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में गया था मामला
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने दिल्ली हाई कोर्ट से मांग की थी कि चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों का ऐलान तो कर दिया है, लेकिन राजनीति का आपराधिकरण रोकने और पारदर्शिता लाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का पालन कैसे होगा, इस पर कोई गाइडलाइन जारी नहीं की है। इसलिए तत्काल आदेश जारी कर हर प्रत्याशी के लिए अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को सार्वजनिक करने संबंधी निर्देशों का पालन अनिवार्य किया जाए।
हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी थी। याचिका में मांग की गई है कि प्रत्याशी के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी उसके प्रचार के लिए लगाए गए बैनर और हॉर्डिंग्स पर भी होना चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से इसका एक फॉर्मेट भी हाई कोर्ट के समक्ष पेश किया गया है, जो इस तरह है -
मांग की गई है कि प्रत्याशी को अपनी हर प्रचार सामग्री के 33 फीसदी हिस्से पर उक्त फॉर्मेट में जानकारी देना होगी। यदि प्रचार में कोई वीडियो या ऑडियो इस्तेमाल किया जा रहा है तो उसका भी 33 फीसदी हिस्सा इसी तरह की जानकारी पर खर्च करना होगा। यदि कोई प्रत्याशी ऐसा नहीं करता है तो उसका नामांकन रद्द करने की मांग भी हाई कोर्ट से की गई है।