स्वीडन दंगे : आगजनी के बाद अब नॉर्वे की राजधानी में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने किया दंगा

नॉर्वे में मुस्लिमों का उग्र प्रदर्शन
नॉर्वे में मुस्लिमों का उग्र प्रदर्शन (साभार: Amy Mek)
उत्तरी यूरोप में स्वीडन नाम का एक देश है। एक ख़ुशनुमा देश की आपकी कल्पना में जो-जो चीजें हो सकती हैं, उनमें से ज़्यादातर गुण हैं स्वीडन में। एक अच्छी इकॉनमी।अच्छा जीवनस्तर, प्रफेशनल और पर्सनल ज़िंदगी के बीच बैलेंस, अच्छी हेल्थकेयर सुविधाएं, बुजुर्गों की देखभाल, बच्चे की पैदाइश पर मां-बाप के लिए 480 दिनों की पेड लीव, नागरिकों के लिए मुफ़्त स्कूली शिक्षा, पर्यावरण को लेकर सजगता, लैंगिक समानता, मज़बूत लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आज़ादी, स्वतंत्र मीडिया, सामाजिक जीवन में अनुशासन, पारदर्शी सिस्टम, सुरक्षित माहौल, आपसी सहमति से चीजें तय करने की संस्कृति। ऐसी ही बातों के कारण दुनिया के सबसे तरक्कीपसंद और शांति-अमन वाले देशों में गिनती होती है स्वीडन की
Sweden: Riots break out after anti-immigration group burns Quran
एक फ़साद की कहानी. ऐसा फ़साद, जो स्वीडन से ज़्यादा भारत में रिपोर्ट हुआ। इसे लेकर स्वीडन से कहीं ज़्यादा हाय-तौबा बाहर के देशों में मची। क्या मामला है,
स्वीडन के मोल्मो शहर में हिंसा और आगजनी के अगले दिन 30 अगस्त, 2020 को मुस्लिम कट्टरपंथियों ने नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में भी इस तरह दंगे को अंजाम दिया। स्‍टॉप इस्‍लामाइजेशन ऑफ नॉर्वे (SIAN) की रैली के प्रदर्शनकारियों से मुस्लिम भीड़ के टकराव के कारण यह हालात पैदा हुए।
रिपोर्ट के अनुसार, ओस्लो में अगस्त 29 को संसद भवन के पास एक इस्लाम विरोधी रैली का आयोजन किया गया था। लेकिन, इन प्रदर्शनकारियों की भिड़ंत इस रैली के जवाब में मुसलमानों के प्रदर्शन से हो गई।




SIAN की रैली के दौरान, मुस्लिम भीड़ ओस्लो की सड़कों पर जमा होकर ड्रम बजाने, गाने और नारे लगाने लगी। मुस्लिम भीड़ में शामिल कुछ लोग पुलिस वैन को लात मारते और गाड़ी के ऊपर चढ़ते हुए भी देखे गए।
Norway Riot : Quran Pages Torn -After Sweden Riotsपॉलिटिकल पार्टी के लोगों ने क़ुरान की एक प्रति में आग लगा दी?
स्वीडन के दक्षिणी हिस्से में एक शहर है- मालमो. 28 अगस्त को मुस्लिम भीड़ द्वारा किए गए झड़प के बाद ओस्लो की सड़कों पर तनाव बढ़ गया। वहीं इस झड़प से नाराज SIAN की एक महिला सदस्य ने कुरान के पन्नों को फाड़ दिया और उन पर थूक दिया।
कथित तौर पर फैनी ब्रेटन नाम की महिला ने कुरान को फाड़ते हुए कहा, “देखो, अब मैं कुरान को अपवित्र कर रही हूँ।” इसके बाद महिला पर तुरंत मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया।
वहीं पुलिस ने स्थिति को बेकाबू होते देख मुस्लिम भीड़ और प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आँसू गैस और स्प्रे का इस्तेमाल किया। मुस्लिम भीड़ की हिंसा को मद्देनजर रखते हुए पुलिस ने पहले SIAN द्वारा आयोजित रैली को समाप्त कर उन्हें हाँ से खदेड़ा।
पुलिस ने इस मामले में बैरिकेड्स से कूदने की कोशिश करने वालों और SIAN के प्रदर्शन में बाधा डालने वाले कुछ नाबालिगों सहित लगभग 29 लोगों को गिरफ्तार किया। कथित तौर पर इन लोगों ने पत्थर और अंडे पुलिस पर फेंके थे।
Bhawna 🇮🇳 on Twitter: ".... Be it Delhi, Bangalore or Sweden Riots and  Violence has a Single Source Different Countries Same Religion.…  https://t.co/56lE0JSqcK"
नॉर्वे में विरोध-प्रदर्शन शुक्रवार को स्वीडिश शहर माल्मो में हुई एक ऐसी ही घटना के बाद में हुआ। वहाँ भी कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ ने स्वीडन के नागरिकों को निशाना बनाया था और माल्मो की सड़कों पर सरकार और वहाँ के लोगों की संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया था।
इससे पहले स्वीडन में ‘स्ट्राम कर्स’ समूह के लोगों द्वारा कुरान की कॉपी को जलाने के बाद अल्लाह हू अकबर के नारों के साथ मुस्लिम भीड़ ने वहाँ की सड़कों पर हिंसक दंगे को अंजाम दिया था। कथित तौर पर डेनमार्क एन्टी- इमीग्रेशन राजनीतिक दल के नेता रास्मुस पालुदान की गिरफ्तारी के विरोध में उनके समर्थकों ने कुरान को जला दिया था। इसके जवाब में कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने सड़कों पर उतर हिंसा की। दंगाइयों ने सड़क के किनारे खड़ी कई कारों के टायर में आग लगा दी। पुलिस पर भी पथराव किया।
15+ Trending of Sweden Riots Burning Malmo Hindi Memesकौन थे ये लोग? ख़बरों के मुताबिक, ये स्ट्राम कुर्स नाम की एक पॉलिटिकल पार्टी के लोग थे.
अब यहां एक ट्विस्ट है. ये ट्विस्ट समझाने के लिए हमें आपको स्वीडन के पड़ोसी देश डेनमार्क लेकर चलना होगा। क्यों? क्योंकि स्ट्राम कुर्स स्वीडन की पार्टी नहीं है। वो डेनमार्क की पॉलिटिकल पार्टी है। इस पार्टी के मुखिया का नाम है रासमुस पालुदान। पालुदान की पॉलिटिक्स का मूल है- इस्लाम और इमिग्रेंट्स का कट्टर विरोध। रासमुस और उनकी पार्टी मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलाती है। ये लोग मुसलमानों को यूरोप से निकाल फेंकने की वकालत करते हैं। सोशल मीडिया पर भड़काऊ विडियो डालते हैं। मुस्लिमों के नरसंहार की अपील करते हैं। इसी मुस्लिम विरोधी अजेंडे पर चलते हुए स्ट्राम कुर्स ने जून 2019 के डेनमार्क चुनाव में भी हिस्सा लिया। मगर इन्हें कुछ गिने-चुने ही वोट मिले
बाद में पता चला कि चुनाव में हिस्सा लेने के लिए इन्होंने धोखाधड़ी की थी। इस आधार पर स्ट्रास कुर्स के ऊपर तात्कालिक पाबंदी लगा दी गई। इस पाबंदी से बचने के लिए स्ट्रास कुर्स ने अपना नाम बदलकर ‘हार्ड लाइन’ कर लिया और अपना मुस्लिम-विरोधी अजेंडा चलाते रहे
इस ऐंटी-इस्लाम पॉलिटिक्स का आधार क्या है?
ये आधार जुड़ा है मुस्लिम शरणार्थियों के साथ। इन शरणार्थियों की कहानी जुड़ी है मिडिलईस्ट से। 2011-12 में मिडिलईस्ट के भीतर बड़े स्तर पर हिंसा शुरू हुई। पहले अरब स्प्रिंग और फिर आतंकवाद के कारण यहां ख़ूब मारकाट मची। जान बचाने के लिए यहां के लोग विदेश पलायन करने लगे। शरणार्थियों का एक बड़ा हिस्सा यूरोप भी पहुंचा। इन्हें पनाह देने वालों में जर्मनी और स्वीडन जैसे देश आगे थे
शरणार्थियों के साथ मानवीयता दिखाने के लिए इन देशों की काफी तारीफ़ हुई। मगर इनके यहां एक छोटा धड़ा इन शरणार्थियों से खुश नहीं था। ये धड़ा मुस्लिमों को शंका की नज़र से देखता था। इनका मानना था कि मुस्लिम कट्टर होते हैं। अपने तौर-तरीकों के प्रति लचीले नहीं होते। ये मुस्लिम उनके लिबरल और सेक्युलर सिस्टम का इस्लामीकरण कर देंगे। इनके कारण हिंसा, अव्यवस्था और कट्टरता बढ़ जाएगी। मुसलमानों से जुड़ी इस शंका को भड़काने का काम किया दक्षिणपंथी पॉलिटिक्स ने। यूरोप के कई हिस्सों में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए सपोर्ट बढ़ने लगा। रासमुस पालुदान और उसकी स्ट्राम कुर्स पार्टी इसी ऐंटी-मुस्लिम राजनीति के उभार की एक मिसाल हैं
यूरोप की तरफ से स्वीडन में घुसने का एंट्री पॉइंट है मालमो
ये सारा बैकग्राउंड बताने के बाद अब दोबारा चलते हैं मालमो शहर। ये शहर स्वीडन और डेनमार्क की सीमा के पास बसा है। आप 40 मिनट में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन से मालमो पहुंच सकते हैं। जैसे हमारे यहां दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा और गुड़गांव में आना-जाना होता है, वैसा ही मामला यहां भी है। दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे के शहरों में काम करते हैं

मालमो शहर में एक और ख़ास बात है, यूरोप की तरफ से स्वीडन में घुसने का एंट्री पॉइंट है। फिर चाहे आप रेल से आएं या सड़क के रास्ते। आप पर्यटक हों या फिर इमिग्रेंट, इसी रास्ते से स्वीडन में दाखिल होंगे। ऐसे में स्वीडन आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों की एक अच्छी-खासी तादाद रहती है यहां। इन इमिग्रेंट्स की मौजूदगी के कारण ये शहर ऐंटी-मुस्लिम पॉलिटिक्स के फ़ोकस में रहता है। यहां पर हुई छोटी से छोटी घटना, जिसका लिंक मुस्लिम इमिग्रेंट समुदाय से हो, मिसाल बना दी जाती है
मालमो शहर की ये डेमोग्रफी। उसका भूगोल। डेनमार्क के साथ उसके नज़दीकी सामाजिक-आर्थिक रिश्ते।इन वजहों से मालमो में होने वाली घटनाओं के ज़्यादा हाइलाइट होने की संभावना रहती है। हाइलाइट होने की इसी उम्मीद के कारण  स्ट्राम कुर्स ने मालमो शहर पर फोकस किया। सोचा, यहां ऐंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट भड़काकर डेनमार्क में फ़ायदा कैश करेंगे
इसी पृष्ठभूमि में आई 25 अगस्त की तारीख़
इस रोज़ रासमुस ने स्वीडिश अथॉरिटीज़ से एक रैली की परमिशन मांगी। रासमुस ने अपने आवेदन में लिखा कि वो 28 अगस्त को मालमो की एक मस्जिद के बाहर एक रैली करना चाहते हैं। इस रैली में रासमुस जो भाषण देने वाले था, उसका मुद्दा था- नॉर्डिक देशों में हो रहा इस्लामीकरण। नॉर्डिक देश माने डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड और आइसलैंड। स्वीडिश पुलिस की वेबसाइट पर इस आवेदन से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है। इसमें लिखा है-
रासमुस ने अपने आवेदन में मस्जिद के बाहर खड़े होकर इस्लाम के खिलाफ प्रदर्शन करने की इजाज़त मांगी
इस आवेदन पर 26 अगस्त को स्वीडिश पुलिस का जवाब आया। उन्होंने प्रदर्शन की इजाज़त देने से इनकार कर दिया। पुलिस का कहना था कि इस सभा से पब्लिक ऑर्डर प्रभावित हो सकता है। 27 अगस्त को रासमुस की पार्टी स्ट्राम कुर्स ने एक और आवेदन दिया। मगर पुलिस ने ये आवेदन भी खारिज़ कर दिया।स्वीडन की अडमिनिस्ट्रेटिव कोर्ट ने भी पुलिस के इस फैसले को सही बताया
रासमुस के स्वीडन आने पर दो साल की पाबंदी भी लगा दी गई
आवेदन खारिज़ किए जाने के बाद भी रैली के आयोजक अड़े रहे। 28 अगस्त को रैली करने की मंशा से रासमुस डेनमार्क से स्वीडन आने के लिए निकले। स्वीडिश अथॉरिटीज़ ने उन्हें सीमा पर ही रोक दिया। ख़बरों के मुताबिक, स्वीडिश पुलिस को भनक लगी थी कि रासमोस और उनके समर्थक क़ुरान जलाने की प्लानिंग कर रहे हैं। ऐसा होता, तो तनाव भड़क सकता था. इसीलिए स्वीडन ने रासमुस को बॉर्डर से ही लौटा दिया।रासमुस के विवादित रेकॉर्ड को देखते हुए उनके स्वीडन आने पर दो साल की पाबंदी भी लगा दी गई
रासमुस को सीमा से ही लौटाए जाने पर मालमो में उनके समर्थक बौखला गए। इनमें से कुछ लोग पुलिस की नज़रों से बचकर एक सुनसान इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंचे। यहां उन्होंने क़ुरान की एक प्रति में आग लगाई।फिर उसका विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। ये लोग यहीं नहीं रुके. रैली की इजाज़त नहीं होने के बावजूद इन्होंने मालमो में एक सभा की। वहां क़ुरान की एक प्रति को पैर से मारकर ज़मीन पर फेंका। इस हरकत का भी विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला गया
Malmo Riots
मुस्लिम इमिग्रेंट्स ने प्रशासन के साथ मिलकर सफ़ाई करवाई
जब मालमो के मुस्लिम समुदाय में क़ुरान के अपमान की बात फैली, तो उनमें नाराज़गी पैदा हुई। कई लोग प्रोटेस्ट के लिए जमा होने लगे। शाम साढ़े सात बजे ऐसे ही एक प्रोटेस्ट ने दंगे का रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों ने पटाखे जलाए. टायरों में आग लगाई।पुलिस के ऊपर भी चीजें फेंकी। रात पौने नौ बजे तक भीड़ बड़ी हो गई। इस भीड़ ने कई कारों को फूंक दिया। मगर स्वीडिश पुलिस के मुताबिक, ये लोग क़ुरान के अपमान से भड़ककर उत्पात करने वालों के ही साथ थे, ये कन्फर्म नहीं है
स्वीडिश पुलिस वेबसाइट के मुताबिक, रात 3 बजे तक ये सारा उत्पात ख़त्म हो गया। जिन इलाकों में फ़साद हुआ था, वहां रहने वाले मुस्लिम इमिग्रेंट्स घरों से बाहर निकले। उन्होंने प्रशासन के साथ मिलकर सफ़ाई करवाई
इस घटना पर स्वीडन में क्या हुआ?
इसका जवाब है, कुछ भी बहुत बड़ा नहीं। यहां तक कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी दंगाइयों को सपोर्ट नहीं किया। उन्होंने दंगा-फ़साद करने वालों की मजम्मत की। कहा कि उपद्रव करने वाले अराजक तत्व हैं
ये तो बात हुई मुस्लिम समुदाय की. बाकी पब्लिक की क्या प्रतिक्रिया रही इस पर? बहुसंख्यक स्वीडिश जनता क़ुरान जलाए जाने को फ़साद भड़कने की वजह मान रही है। लोगों का कहना है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने तनाव भड़काने के लिए क़ुरान जलाया। इसके जवाब में दूसरे समुदाय के कुछ उपद्रवी ऐलिमेंट्स ने दंगा-फ़साद किया। स्वीडिश जनता का कहना है कि ये बेवकूफ़ाना हरक़ते हैं




जनता के अलावा स्वीडन के नेताओं ने भी जिम्मेदारी दिखाई
यहां सत्ता में है सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी। उसके किसी नेता ने इस घटना पर बयान नहीं दिया। बयान न देने का मतलब ये नहीं कि उन्हें देश की कोई परवाह नहीं. बयान न देने का कारण स्वीडन की संस्कृति है। यहां नेता ऐसे मामलों में जिम्मेदारी दिखाते हैं। उन्हें लगता है कि कोई बयान दिया और मीडिया ने उन्हें ग़लत कोट कर दिया, तो कहीं हालात और न बिगड़ जाएं। ऐसे में नेता ग़ैर-ज़रूरी टिप्पणी से बचते हैं और संबंधित विभाग को अपना काम करने देते हैं
स्वीडिश पुलिस ने इस मामले में दोनों तरफ के लोगों को अरेस्ट किया है। धार्मिक तनाव भड़काने वाले और जवाबी प्रतिक्रिया में हिंसा करने वाले, दोनों पर ही कार्रवाई हुई है। वहां इसे लॉ ऐंड ऑर्डर सिचुएशन की तरह डील किया गया है। इसके अलावा इस मामले में कोई बड़ा अपडेट नहीं है। यहां तक कि स्वीडिश मीडिया ने भी 24 घंटे बाद इस मामले की रिपोर्टिंग बंद कर दी। अब वो कोरोना और इकॉनमी जैसे मुद्दों पर बात कर रहे हैं
स्वीडन में भले ये मामला बहुत न उछला हो, मगर बाहर के कई देशों में ये काफी रिपोर्ट हुआ। हमारे यहां भी सोशल मीडिया पर इस दंगे पर ख़ूब चीजें लिखी गईं। ज़्यादातर पोस्ट्स में इस बहाने समूचे मुस्लिम वर्ग को टारगेट किया जा रहा है। ऐसे में ज़रूरी बात ध्यान रखनी चाहिए। रासमुस और उनके जैसे दक्षिणपंथी नेता केवल मुस्लिम-विरोधी नहीं हैं। उन्हें किसी भी विदेशी के अपने यहां आने से दिक्कत है। उनका मानना है कि उनके देश में बस उनकी ही नस्ल के लोग रहें। आज मुस्लिम इमिग्रेंट ज़्यादा हैं, तो ये क़ुरान जला रहे हैं।अगर ये अपने अजेंडे में कामयाब रहे, तो केवल मुस्लिम विरोध तक नहीं रहेंगे। उनका फ़ोकस बाकी धर्मों के इमिग्रेंट्स पर भी शिफ़्ट हो सकता है। ऐसा हुआ, तो वहां रहने वाले भारतीय समुदाय के लोग भी निशाना बन सकते हैं(एजेंसीज इनपुट्स सहित)

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