क्या 30 दिन के बाद पाकिस्तान पानी से बेहाल होने वाला है? सिंधु के पानी को लेकर पाकिस्तान के मंत्री इशाक डार ने European Union के सामने दुखड़ा रोया

सिंधु के पानी को लेकर पाकिस्तान के मंत्री इशाक डार ने EU के सामने दुखड़ा रोया (साभार- Business Today/profit by pakistan today)
पाकिस्तान ने हाल ही में यूरोपियन यूनियन (EU) की मीटिंग में सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty – IWT) को लेकर अपना दुखड़ा सुनाया है। पाकिस्तान का दावा है कि उनके पास सिर्फ 30 दिनों का पानी बचा है। पाकिस्तान इसका जिम्मेदार भारत को कह रहा है। इतना ही नहीं अभी अफगानिस्तान की तरफ से भी पाकिस्तान पर मुसीबत आने वाली है। 

पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल संधि की गोलबंदी और भारत के पानी रोकने के कारण पाक में जल संकट की स्थितियाँ बनी हैं। इस मुद्दे को लेकर 2025 की IEP (इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट) में भी चेतावनी दी गई है।

इसमें लिखा गया है कि पाकिस्तान की कृषि प्रणाली लगभग 80% सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर है और वर्तमान में ये गंभीर जल संकट के खतरे में है। इस पूरे मुद्दे को भारत-पाकिस्तान के इतिहास, सिंधु जल संधि के प्रावधानों और हालिया विवादों के साथ समझे जाने की जरूरत है।

IEP की 2025 की रिपोर्ट में क्या हैं प्रमुख दावे

ऑस्ट्रेलिया के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकनॉमिक्स एंड पीस (IEP) द्वारा जारी ‘इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट 2025’ में कहा गया कि सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र गंभीर जल संकट के खतरे का सामना कर रहा है। इसके अनुसार, भारत के बाँध प्रबंधन में मामूली बदलाव भी पाकिस्तान के लिए गंभीर नुकसान पहुँचाने वाला साबित हो सकता है।
रिपोर्ट में जल संकट को व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक खतरा बताया गया है जो पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। पानी की कमी के कारण सिंधु बेसिन में खाद्य उत्पादन, रोजगार, और आर्थिक गतिविधियां गहरे संकट में आ सकती हैं। रिपोर्ट ने भारत और पाकिस्तान दोनों को बेहतर संवाद और जल प्रबंधन पर ध्यान देने की सलाह दी है।

भारत के जल प्रबंधन की रणनीति और जियोपॉलिटिकल विवाद

भारत ने अपनी जल संरचनाओं में इजाफा किया है। इसमें ब्यास नदी को गंगा से और सिंधु को यमुना से जोड़ने वाली नई नहर परियोजनाएँ, जल संचयन सुविधाओं का विकास और सिंधु बेसिन के जल अधिकारों पर रणनीतिक नियंत्रण शामिल है।
भारत का तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती कृषि माँग के मद्देनजर जल की अपनी जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। भारत ने सिंधु जल संधि के प्रावधानों की दोबारा समीक्षा करने की माँग की है।
इस समीक्षा में जल संसाधनों के न्यायसंगत और संतुलित उपयोग (Equitable and Reasonable Utilization – ERU) और किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने (No-Harm Rule) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत शामिल हो सकते हैं। भारत ने जल सुरक्षा के पहलुओं को भी प्रमुखता दी है और यह भी कहा है कि उसकी परियोजनाएँ संधि के तकनीकी मानकों के अनुरूप हैं।

पाकिस्तान के लिए सिंधु जल संकट के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांत को देश का ‘अन्न भंडार’ कहा जाता है। ये दोनों सिंधु नदी जल पर काफी निर्भर हैं। जल संकट के कारण खेत सूखाग्रस्त हो रहे हैं, फसलों का उत्पादन गिर रहा है, और खाद्य सुरक्षा संकट गहरा रहा है।
कपास, गेहूं, चावल जैसी प्रमुख फसलों की उपज में भारी कमी आ रही है, जो पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर सकती है। इसके साथ ही, जल संकट से ग्रामीण रोजगार में कमी, खाद्य कीमतों में वृद्धि और सामाजिक उथल-पुथल की आशंका भी बढ़ रही है।
जल संकट को कभी-कभी ‘जल आतंकवाद’ के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें जल संसाधन के नियंत्रण को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

क्या था भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का इतिहास

सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी एक संधि है। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी से निकलने वाले जल का बँटवारा सुनिश्चित करती है।
सिंधु नदी में तीन पश्चिमी नदियाँ सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को आवंटित की गईं जबकि तीन पूर्वी नदियाँ रावी, बीस और सतलज भारत के पाले में आई। संधि के अनुसार, भारत के पास पश्चिमी नदियों के जल पर नियंत्रण करने का अधिकार नहीं था, लेकिन भारत अपने बांध और जल प्रबंधन परियोजनाओं के लिए पूर्वी नदियों के जल का उपयोग कर सकता था।
इस समझौते में यह भी प्रावधान था कि भारत पाकिस्तान के जल आपूर्ति को बिना प्रभावित किए पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग सीमित मात्रा में कर सकता है। विश्व बैंक ने संधि की निगरानी और विवाद समाधान में सहायता की जिम्मेदारी भी ली थी।
सिंधु जल संधि इसलिए ऐतिहासिक रूप से भारत-पाकिस्तान के बीच सीमांत जल विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण समझी जाती रही है। हालाँकि 2023 से 2025 के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और खासकर 26 अप्रैल 2025 पहलगाम आतंकी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला किया।
इससे पाकिस्तान में जल संकट बढ़ गया। पाकिस्तान की इंडस रिवर सिस्टम अथॉरिटी (IRSA) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सिंधु नदी बेसिन से मिले पानी की मात्रा में हर वर्ष औसतन 13.3% की कमी आ रही है। इसके कारण पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र में काफी परेशानी हो रही है।
सिंधु नदी की दो प्रमुख जलाशयों तरबेला और मंगला का जलस्तर डेड स्टोरेज लेवल पर पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि पानी की आपूर्ति लगभग खत्म होने वाली है। इस कमी के कारण कपास की खेती समेत कई अहम फसलों की उपज में गिरावट देखने को मिली है।
पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को दोबारा स्थापित करने और पानी बँटवारे में अपने ‘न्याय’ के लिए विश्व बैंक से फिर से मध्यस्थता की माँग की, मगर विश्व बैंक ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद पाकिस्तान ने यूरोपीय संघ सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ अपना रोना रोया। उसने दावा किया कि जल संकट की वजह से पाकिस्तान की किसानी और जीविका पर भारी असर पड़ा है। साथ ही, पाकिस्तान की ओर से इस संकट को ‘जल संकट आपातकाल’ कहा जा रहा है।

संधि का वर्तमान स्वरूप और विवाद के क्या हैं समाधान

सिंधु जल संधि विश्व में जल विवादों के लिए एक ऐसा उदाहरण रही है जिसे दोनों देशों ने विवाद के समाधान के लिए अपनाया था। हालाँकि, वर्तमान स्थिति में यह संधि संकट में है।
दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और राजनीतिक तनाव के कारण संधि के पालन और वाटर शेयरिंग पर असहमति गहरी हो गई है। विश्व बैंक की मध्यस्थता और तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति के बावजूद विवाद नहीं सुलझ पाया है।
जल संकट को लेकर भारत और पाकिस्तान के संवाद के बिना समाधान की राहें अभी दूर हैं। जल अधिकारों पर नए नियम, जल उपयोग के तकनीकी सुधार और क्षेत्रीय जल प्रबंधन के नए ढाँचे की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए दोनों को संयुक्त प्रयास, संघर्ष कम करना, और परस्पर भरोसा स्थापित करना होगा।
सिंधु जल संधि का संघर्ष और जल संकट क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और जल संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील मामला है। पाकिस्तान EU समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी दिक्कतों को रखकर गम्भीर संकट की स्थिति दिखलाने और उशका पीड़ित बनने की कोशिश कर रहा है।
वहीं, भारत जल संसाधन प्रबंधन और राष्ट्रीय हितों के तहत अपनी रणनीति को मजबूती दे रहा है। इस जटिल विवाद का दीर्घकालिक समाधान द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संवाद, जल कानूनों के आधुनिकरण, पर्यावरणीय स्थिरता और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही संभव है। सिंधु जल संधि की वर्तमान स्थिति बताती है कि जल को लेकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का टकराव भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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