पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती ही नजर आ रही हैं। विपक्ष के निशाने छोड़िए तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो अपनी ही पार्टी के नेताओं के वाणों से बच नहीं पार रही है। एक के बाद एक टीएमसी के विधायक ममता सरकार को मुश्किलों में डालने में लगे हैं। पहले दो विधायक कबीर और इस्लाम में ममता की धड़कनें बढ़ाईं तो अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ही विधायक मनोरंजन बापरी ने पश्चिम बंगाल की सियासत में हलचल मचा दी है। उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट पोस्ट ने चुनावी माहौल में टीएमसी की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इसमें उन्होंने भाजपा और सीपीआई(एम) दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं की विनम्रता और दरियादिली तहेदिल से तारीफ की है। हुगली जिले के बालागढ़ से टीएमसी विधायक बापरी ने अपनी पोस्ट में उन्होंने दो निजी अनुभवों का जिक्र किया है। एक में भाजपा कार्यकर्ता शामिल थे और दूसरे में सीपीआई(एम) के युवा कार्यकर्ता। यह बताने के लिए कि बीजेपी में शिष्टाचार और उदारता जैसे मूल्य राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर होते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उनके निशाने पर टीएमसी है, जिसमें ऐसी विचारधारा दूर-दूर तक नजर नहीं आती।भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताने का नैरेटिव तोड़ा
ममता बनर्जी की सियासी मुश्किलें अब विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी ही पार्टी की ज़ुबान से बढ़ रही हैं। तृणमूल के विधायक मनोरंजन बापरी का भाजपा कार्यकर्ताओं की “विनम्रता और दरियादिली” की खुलेआम तारीफ करना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली चेतावनी है। इससे पहले हुमायूं कबीर और मोनिरुल इस्लाम जैसे विधायक अपने बयानों और कृत्यों से मुख्यमंत्री की किरकिरी करा चुके हैं। अब बापरी का यह सार्वजनिक बयान उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताया जाता रहा। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही विरोधी की छवि चमकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ रही है।
बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना गर्व और सम्मान की बातटीएमसी विधायक बापरी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में जिस पहली घटना का जिक्र किया है, वह कुछ साल पहले की है। वह सेंट्रल कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक पार्टी मीटिंग से लौट रहे थे। वापस आते समय डंकुनी टोल प्लाजा पर भाजपा कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शन के कारण उनकी गाड़ी रोक दी गई। बापारी ने अपनी पोस्ट में कहा, ‘मेरे असिस्टेंट पार्थ ने मुझसे गाड़ी से बाहर ना निकलने को कहा। मैंने उनकी बात नहीं मानी और मैं गाड़ी से बाहर निकला और भाजपा समर्थकों से उनके विरोध का कारण पूछा। उन्होंने मुझे पहचान लिया. बहुत ही नरमी से उन्होंने मुझसे माफी मांगी और मुझे आगे बढ़ने को कहा। मैं उनका कट्टर विरोधी हूं, इसके बावजूद विपक्षी बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना मेरे लिए बहुत ही गर्व और सम्मान की बात थी।’
‘मैंने तो बस अपनी पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया’विधायक बापरी यह भी कहा कि ऐसे समय में जब अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के बीच झड़पें आम बात हो गई हैं। वे बिना किसी सुरक्षा के पूरे राज्य में घूमते हैं और कभी-कभी तो पब्लिक गाड़ियों में भी सफर करते हैं। मुझ पर कभी किसी ने हमला नहीं किया। मुझे नहीं लगता कि कोई कभी ऐसा करेगा। मैंने पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया है। दूसरी घटना जो उन्होंने बताई, वह रविवार की है, जब वह कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर से पब्लिक गाड़ी से लौट रहे थे। यह समझते हुए कि हाल ही में घुटने की सर्जरी की वजह से मुझे खड़े होने में दिक्कत हो रही है। गाड़ी में बैठे तीन युवाओं में से एक ने मेरे लिए अपनी सीट खाली कर दी। शर्मिंदा होकर मैंने मना कर दिया। फिर उनमें से एक ने मुझसे कहा कि उसने मुझे पहचान लिया है। उसने यह भी कहा कि एक पक्के सीपीआई(एम) युवा कार्यकर्ता होने के नाते, वह और उसके दो दोस्त अक्सर मेरे अलग-अलग सोशल मीडिया पोस्ट पर मेरे साथ राजनीतिक चर्चा करते हैं। इसके बाद उनके साथ काफी देर तक बातचीत हुई। मैं उनकी कुछ बातों से सहमत हुआ और वे भी मेरी कुछ बातों से सहमत हुए। जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया, वह यह थी कि यह जानते हुए भी कि मैं तृणमूल कांग्रेस का विधायक हूं, उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी और मेरी तारीफ भी की।
सत्ता-संतुलन में खिसकने और सियासी खिचड़ी पकने के संकेतयह घटनाक्रम केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन में खिसकन का संकेत है। राजनीतिक प्रेक्षकों की “सियासी खिचड़ी” वाली आशंका यूं ही नहीं उठी—टीएमसी के भीतर असंतोष, गुटबाज़ी और अवसरवाद अब खुले मंच पर दिखने लगे हैं। भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित संजीवनी है, जो उसके कद को ऊंचा करती है और ममता बनर्जी को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल देती है। चुनावी मौसम से पहले पार्टी-अनुशासन का यह क्षरण बताता है कि ममता की ताकत अब विरोधियों से नहीं, अपने ही विधायकों की बयानबाज़ी से चुनौती पा रही है। सत्ता जब अपने ही शब्दों से कटने लगे, तो सियासत में उसका हिसाब जनता तय करती है। ममता की पार्टी के विधायक ने आगे दावा किया कि हालांकि उन्हें नहीं पता कि एक विधायक के तौर पर वह कितने सफल रहे, लेकिन उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि वह सम्मान है जो उन्हें आम लोगों से मिला है। चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी रही हो।
टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल- ‘चुनाव आयोग को कब्र से बाहर खींच लाने’ की धमकी
दरअसल, आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।
बाबरी मस्जिद विवाद: तुष्टिकरण की राजनीति का बोझपश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति के लिए पिछला कुछ समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला साबित हो रहा है। पहले देशभर में चर्चित हुए संदेशखाली यौन प्रकरण में टीएमसी नेता का ही नाम आने से ममता बनर्जी को बगलें झांकने को मजबूर होना पड़ा था। एक बार फिर ममता के लिए मुश्किल की शुरुआत टीएमसी के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने पिछले माह छह दिसंबर को पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद के निर्माण का शिलान्यास करा दिया। यह कोई साधारण कदम नहीं था, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट था, जिसने ममता बनर्जी को असहज कर दिया। वर्षों से तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे सत्ता संभालने वाली मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर न तो खुलकर विरोध कर सकीं और न ही समर्थन करने का साहस दिखा पाईं। विरोध करतीं तो अपने वोट बैंक से नाराजगी का डर, समर्थन करतीं तो संवैधानिक और राजनीतिक संकट के साथ-साथ बहुसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी। परिणामस्वरूप, चुप्पी को रणनीति बना लिया गया।
फरक्का विधायक का जहर और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला
ममता बनर्जी की यही चुप्पी ही उनके गले की हड्डी बन गई है। उनकी पार्टी के नेता ही ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो उनके लिए चुनाव में काफी मुश्किलों का कारण बन सकती हैं। दरअसल, अब यह संकट एक और टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल से एक बड़े स्तर पर पहुंच चुका गया है। फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम ने सीधे-सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को कब्र से खींच लाने की धमकी दे डाली है। दरअसल, मोनिरुल इस्लाम की खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। यह वही चुनाव आयोग है, जिसे लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, लेकिन बंगाल में उसे खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है।
चुनाव आयोग के खिलाफ ममता सरकार का पुराना नैरेटिव
टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम का यह अनर्गल आरोप है कि चुनाव आयोग बंगाल के लोगों को परेशान कर रहा है। जबकि चुनाव आयोग सिर्फ एसआईआर का अपना काम कर रहा है, जिसे अदालत बने भी सही ठहराया है। लेकिन इसको लेकर तृणमूल सरकार के नेता और विधायक ऊल-जलूल बयानबाजी पर उतर आए हैं। दरअसल, यह वही पुराना नैरेटिव है, जिसे ममता बनर्जी बार-बार दोहराती रही हैं। हर संवैधानिक संस्था को ‘बाहरी हस्तक्षेप’ बताना, हर जांच को ‘राजनीतिक साजिश’ कहना। लेकिन जब यही भाषा धमकी और डंडे के जोर पर काम कराने तक पहुंच जाए, तो सवाल उठता है कि क्या यह सरकार लोकतंत्र में विश्वास रखती है या भीड़तंत्र में। ममता बनर्जी खुद भी कुछ दिन पहले आई-पैक पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे के दौरान भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर मौके पर जा पहुंची थी, और वहां के ग्रीन फाइल समेत कई अहम कागजात उठाकर ले आईँ थीं। इस पर कोर्ट ने भी नाराजगी जताई थी।
विडंबना यह है कि एक महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार डराने वाले होते जा रहे हैं। यौन शोषण, बलात्कार, तस्करी और हिंसा के मामलों में पश्चिम बंगाल बार-बार सुर्खियों में रहा है। लेकिन ममता सरकार की प्रतिक्रिया या तो इनकार में होती है या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है। सत्ता के संरक्षण में पनपता अपराध और उस पर सरकारी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि शासन का संवेदनशील चेहरा अब खोखला हो चुका है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी, राशन घोटाला—ये कोई आरोप नहीं, बल्कि वे मामले हैं जिनमें ममता सरकार के मंत्री, विधायक और शीर्ष नेता जांच एजेंसियों के घेरे में आ चुके हैं। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि शासन का स्थायी चरित्र बनता जा रहा है। ऐसे में पार्टी नेताओं की बेलगाम बयानबाज़ी सरकार की कमजोरियों को और उजागर करती है।
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