सेना युद्ध में, RSS सेवा मोर्चे पर: 1947 से 71 तक युद्ध में राष्ट्रसेवा की कहानी जिसे वाम इतिहास ने किया अनदेखा, नेहरू ने भी संघ को रिपब्लिक डे परेड के लिए भेजा था न्योता

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुस्लिम कट्टरपंथी और उनका समर्थन करने वाली सियासतखोर पार्टियां क्यों विरोध करती हैं, सच्चाई जानने के लिए थोड़ा-सा पीछे जाकर इतिहास को खोलना चाहिए। 1947 में बटवारे के बाद पाकिस्तान के बहुचर्चित दैनिक इंग्लिश Dawn ने लिखा था कि "अगर आरएसएस 1925 से पहले बन जाती तो शायद बटवारा नहीं होता।" दूसरे, हर वो संस्था इन पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स और मुस्लिम कट्टरपंथियों की दुश्मन है जो इनके रास्ते का पत्थर बनता है। अगर घमंडी तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने संघ के खिलाफ कि "बीजेपी को संघ की जरुरत नहीं..." नहीं बोला होता बीजेपी 400 पार कर गयी होती।

मुस्लिम लीग के अरमानों पर पानी फेरने बनी आरएसएस की तर्ज पर कांग्रेस ने भी कांग्रेस सेवा दल बनाया, लेकिन किन्ही कारणों से धूमिल हो गयी, लेकिन संघ बराबर चर्चित हो रहा है। 

1963 चीन-इंडो युद्ध के दौरान वामपंथियों ने सैनिकों के खून देने से मना कर दिया था, लेकिन संघ जनसेवा के साथ-साथ जवानों के लिए खून देने में भी पीछे नहीं रहा। संघ की इस सेवा भावना से तत्कालीन नेहरू कांग्रेस सरकार और फ़ौज ने संघ की तारीफों के पुल बांधते नहीं थके। 

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने शताब्दी वर्ष में है। संघ का राष्ट्रसेवा का 100 साल का लंबा सफर संघर्षों वाला रहा है और इस मौके पर संघ से जुड़े कई पुराने किस्से फिर से चर्चा में हैं। उन्हीं में एक किस्सा संघ की 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में भागीदारी से जुड़ा है। दिलचस्प बात यह कि इस भागीदारी का निमंत्रण किसी और ने नहीं बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिया था। वामपंथी इतिहास के दौर में RSS से जुड़ी ऐसे किस्सों पर धूल जम गई, उन्हें यादों से मिटाने की पूरी कोशिशें की गईं। जानिए युद्धकाल में संघ की सेवा की कहानी-

1962 का युद्ध और RSS की मदद

1962 का भारत-चीन युद्ध देश के लिए एक कठिन दौर था। नेहरू चीन को पक्का दोस्त माने बैठे तो वहीं RSS के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर देश को चेता चुके थे। गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ के अध्याय ‘Fight to Win‘ में लिखा था कि चीन का इतिहास विस्तारवाद से भरा रहा है। उन्होंने नेपोलियन और स्वामी विवेकानंद के उन कथनों का उल्लेख किया जिनमें चीन को भविष्य में मानवता और भारत के लिए खतरा बताया गया था।

1962 में गुरुजी की आशंका सच साबित हुआ और चीन ने भारत पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद जहाँ सैनिक चीन से लोहा ले रहे थे तो वहीं RSS के स्वयंसेवक पूरे देश में सेवा कार्यों में जुट गए। कहीं वे ट्रैफिक व्यवस्था संभाल रहे थे, तो कहीं सिविल डिफेंस में मदद कर रहे थे। बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने रक्तदान किया और सैनिकों के परिवारों की सहायता की। पूर्वोत्तर भारत में जहाँ युद्ध का सीधा असर पड़ा था वहाँ RSS के स्वयंसेवक सेना और स्थानीय लोगों की मदद के लिए बड़ी संख्या में पहुँचे।

स्वयंसेवकों की अनुशासित कार्यप्रणाली और बिना किसी स्वार्थ के की गई सेवा ने सरकार और आम लोगों दोनों पर गहरा असर डाला। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से RSS के राजनीतिक मतभेद रहे, फिर भी 1962 के युद्ध के दौरान संघ की सेवा को उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया।

इसी कारण एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया। वर्ष 1963 के गणतंत्र दिवस पर RSS के स्वयंसेवकों को परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक खास क्षण था, जब सरकार ने पहली बार सार्वजनिक रूप से RSS की भूमिका और योगदान को मान्यता दी।

गणतंत्र दिवस परेड में पहुँचे संघ के स्वयंसेवक

RSS की वेबसाइट के मुताबिक, 26 जनवरी को दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में RSS को भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। बहुत कम समय की सूचना के बावजूद 3000 स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश और बैंड के साथ इस परेड में शामिल हुए थे।

                      तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के आग्रह पर 1963 गणतंत्र परेड में RSS          

उस दिन की याद करते हुए विजय कुमार ने ऑर्गनाइजर को बताया कि वे उस समय शाहदरा के फर्श बाजार में रहते थे और मंडल कार्यवाह की जिम्मेदारी निभा रहे थे। उनके अनुसार, पंडित नेहरू सरकार की ओर से मार्च-पास्ट में शामिल होने का निमंत्रण आया था।

उन्होंने कहा, “उस समय सोहन सिंह पूरे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के संभाग प्रचारक थे। जब सरकारी प्रतिनिधि यह प्रस्ताव लेकर पहुँचे, तो सोहन सिंह ने साफ कहा कि RSS स्वयंसेवक पूरे गणवेश, दंड और घोष के साथ ही परेड में शामिल होंगे। सरकार की ओर से इस शर्त पर विचार करने की बात कहकर प्रतिनिधि लौट गए।”

विजय कुमार बताते हैं कि परेड में RSS को पूर्ण गणवेश में शामिल होने की अनुमति की सूचना केवल 24 घंटे पहले मिली। इसके बाद सोहन सिंह जी ने पूरी रात फोन कर-करके स्वयंसेवकों को सूचना दी और बसों की व्यवस्था करवाई। उस दौर में फोन और यातायात के साधन बहुत सीमित थे फिर भी स्वयंसेवकों ने रातभर मेहनत कर सभी को तैयार किया।

उन्होंने बताया, “निर्धारित समय से पहले सभी बसें भर गईं और कई स्वयंसेवक जगह न मिलने के कारण पीछे रह गए। फिर भी लगभग 3000 स्वयंसेवक सुबह 8 बजे तक परेड स्थल पहुँच गए। RSS का दस्ता सबसे अंत में मार्च करने वाला था लेकिन इंतजार के दौरान कोई भी बोर नहीं हुआ क्योंकि शाखाओं की तरह सभी देशभक्ति के गीत जा रहे थे। जब RSS का दस्ता संघ बैंड की धुन पर आगे बढ़ा, तो कमेंटेटर ने कहा कि ‘आप इन अनुशासित लोगों को अच्छी तरह जानते हैं’ यह टिप्पणी स्वयंसेवकों के लिए बेहद प्रेरणादायक थी।”

‘विश्वकर्मा संकेत’ के संपादक के.एल. पाथेला भी उस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी थे। पाथेला बताते हैं कि 26 जनवरी 1963 का दिन वे आज भी नहीं भूले हैं। जब जनकपुरी शाखा के स्वयंसेवकों को परेड में शामिल होने की खबर मिली तो सभी रोमांचित हो उठे। जब RSS का दस्ता सलामी मंच से गुजरा तो दर्शकों ने जोरदार तालियों से स्वागत किया। वे इंडिया गेट तक मार्च करते हुए गए।

पाथेला के अनुसार, 1962 के युद्ध के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। वे गोलाबारी के बीच भी बंकरों तक पहुंचे और जवानों को खीर परोसी। दिल्ली के स्वयंसेवकों ने जवानों के लिए धन इकट्ठा किया, फल खरीदे और रेलवे स्टेशन पर जाकर सैनिकों में वितरित किए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघ को परेड में बुलाने पर कई लोगों ने नेहरू की आलोचना भी की थी। इस पर नेहरू ने कहा, “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”

देश सेवा और सुरक्षाबलों के प्रति संघ के समर्पण की यह इकलौती कहानी नहीं है। जब-जब भारत संकट में रहा था, तब-तब संघ के स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर राष्ट्रसेवा में योगदान दिया है। 1947 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध से लेकर 1965, 1971 और कारगिल वॉर तक, संघ के स्वयंसेवक हमेशा देश सेवा में जुटे रहे हैं।

1947 में पाकिस्तान का कश्मीर पर हमला और संघ की भूमिका

अक्टूबर 1947 से ही संघ के स्वयंसेवक बिना किसी सैन्य प्रशिक्षण के कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए थे। यह काम न तत्कालीन नेहरू सरकार कर रही थी और न ही महाराजा हरिसिंह की रियासत सरकार।

22 अक्टूबर 1947 को जब पाकिस्तान प्रायोजित कबीलाइयों के लश्करों ने मुज्जफराबाद के रास्ते श्रीनगर की ओर बढ़ना शुरू किया, तब संघ के स्वयंसेवक हरीश भनोट ने इस हमले की सटीक जानकारी बलराज मधोक तक पहुँचाई। बलराज मधोक ने तत्काल महाराजा हरिसिंह को स्थिति से अवगत कराया। उस समय मुस्लिम सैनिकों की बगावत के कारण महाराजा के पास कबीलाइयों का सामना करने के लिए पर्याप्त सेना नहीं बची थी।

भारतीय सेना के पहुँचने में देरी को देखते हुए महाराजा हरिसिंह ने संघ से सहायता माँगी। एक संकेत पर 200 से अधिक स्वयंसेवक तुरंत कश्मीर पहुँचे। इन्हें बादामीबाग छावनी ले जाया गया, जहाँ उस समय उपयोग में आने वाली .303 राइफलों को चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। बताया जाता है कि ये युवा स्वयंसेवक रियासत की सेना के साथ मोर्चे पर तब तक डटे रहे जब तक भारतीय सेना कश्मीर नहीं पहुँच गई।

भारतीय सेना द्वारा मोर्चा संभालने के बाद भी संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता में लगातार लगे रहे और इस दौरान कई स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी।

कश्मीर का संपर्क भारत से बनाए रखने के लिए श्रीनगर एयरस्ट्रिप पर हर हाल में कब्जा जरूरी था। दिल्ली के निर्देश पर बर्फ हटाने के लिए मजदूरों को लगाने की कोशिश हुई लेकिन भय और अनिश्चितता के कारण कोई तैयार नहीं हुआ। हालात की गंभीरता देखते हुए सेना ने RSS से मदद माँगी। 150 स्वयंसेवकों की माँग पर संघ ने मात्र आधे घंटे में 500 स्वयंसेवक भेज दिए। कड़ाके की ठंड में रात डेढ़ बजे काम शुरू हुआ और कुछ ही घंटों में पूरा रनवे साफ कर दिया गया जिससे एयरस्ट्रिप चालू रह सकी।

सरदार पटेल ने RSS की तारीफ करते हुए गुरुजी को लिखा था, “भारत के लोगों ने अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की वास्तविक प्रकृति और उसकी गतिविधियों को समझ लिया है। विशेष रूप से कश्मीर से जुड़े अभियानों तथा पंजाब और बंगाल में संघ द्वारा किए गए कार्यों ने यह साबित किया है कि RSS एक सुव्यवस्थित और अनुशासित संगठन है, जो देश की सेवा में बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम है।”

1965 के युद्ध में संघ के सेवा कार्य

पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध के बीच प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया गया और इस सम्मेलन में RSS के सरसंघचालक गुरुजी को भी निमंत्रण दिया गया। गुरुजी ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए सरकार को हर प्रकार से पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। यह आश्वासन केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा बल्कि युद्ध के पूरे कालखंड में जमीन पर उसका असर देखने को मिला।

युद्ध के 22 दिनों तक दिल्ली में संघ के स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण काम संभाले। राजधानी में यातायात नियंत्रण जैसे आवश्यक नागरी कार्यों में स्वयंसेवक सक्रिय रूप से जुटे रहे। इसका सीधा लाभ यह हुआ कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को इन कार्यों से मुक्त कर सेना और युद्ध-संबंधी कामों में लगाया जा सका। उस समय दिल्ली की सड़कों पर यातायात व्यवस्था बनाए रखना, भीड़ नियंत्रण और आपात स्थितियों में त्वरित सहयोग जैसे कार्य स्वयंसेवकों द्वारा अनुशासन के साथ किए गए।

युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की सहायता के लिए रक्त की आवश्यकता एक बड़ी चुनौती थी। इस समय सबसे पहले आगे आकर रक्तदान करने वालों में संघ के स्वयंसेवक शामिल रहे। स्वयंसेवकों ने आवश्यक स्थानों पर रक्तदान किया। केवल राजधानी ही नहीं बल्कि युद्ध से सीधे प्रभावित क्षेत्रों में भी स्वयंसेवकों की भूमिका सामने आई। कश्मीर में हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का कठिन कार्य भी संघ के स्वयंसेवकों ने किया।

1971: जब फील्ड मार्शल करियप्पा ने की संघ की तारीफ

1971 तक पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान के दमन ने एक भीषण मानवीय संकट को जन्म दिया। हालात इतने खराब हो गए कि लाखों लोग जान बचाकर भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। इस संकट की घड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने राहत और सेवा कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। RSS के स्वयंसेवकों ने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में शरणार्थी शिविर बनाए। इन शिविरों में विस्थापित परिवारों को भोजन, रहने की व्यवस्था और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। इन सेवाओं से लाखों शरणार्थियों को राहत मिली।

1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी RSS स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका सामने आई। स्वयंसेवकों ने देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी सेवाएँ देने की पेशकश की। बताया जाता है कि 1971 में सबसे पहले रक्तदान करने वालों में RSS के स्वयंसेवक शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने सेना की सहायता के लिए खाइयाँ खोदने जैसे कार्यों में भी सहयोग किया। इन प्रयासों की सराहना करते हुए तत्कालीन फील्ड मार्शल करियप्पा ने RSS को लेकर कहा, “RSS मेरा हृदय का कार्य है, देश को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है।”

देश पर जब-जब संकट आया, तब-तब संघ के स्वयंसेवक बिना किसी बुलावे सबसे पहले मैदान में दिखाई दिए। बाढ़ हो या भूकंप, चक्रवात हो या महामारी संघ के स्वयंसेवकों ने इसे कभी ‘सरकारी जिम्मेदारी’ कहकर टालने का प्रयास नहीं किया। उनके लिए यह सवाल कभी नहीं रहा कि कौन बुला रहा है बल्कि यह रहा कि देश को हमारी जरूरत है।

आपदाओं के समय, जब व्यवस्थाएँ चरमराने लगती हैं और संसाधन सीमित हो जाते हैं, तब संघ के स्वयंसेवक राहत शिविर लगाते हैं, भोजन पहुँचाते हैं, घायल लोगों को अस्पताल तक पहुँचाते हैं, शवों के अंतिम संस्कार से लेकर अनाथ हुए बच्चों की देखभाल तक का दायित्व निभाते हैं। कोविड महामारी इसका ताजा उदाहरण है, जब स्वयंसेवकों ने ऑक्सीजन, दवाइयों, भोजन और रक्तदान के माध्यम से लाखों लोगों की सहायता की।

देश की जरूरत के वक्त संघ की यह निरंतर उपस्थिति यह बताती है कि राष्ट्रसेवा कोई अवसरवादी चीज नहीं बल्कि एक संस्कार है। एक ऐसा संस्कार, जो शाखा से समाज तक और समाज से राष्ट्र तक की यात्रा करता है।

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