PETA और मेनका गांधी ईद पर होने वाली बकरों और अन्य जानवरों की हत्या पर खामोश क्यों हैं? जीवित भी हैं या मर गए?

सुभाष चन्द्र

जब भी हिन्दू त्यौहार आते हैं, सड़क पर गऊओं पर PETA और मेनका गाँधी के साथ-साथ तथाकथित सेक्युलरिस्ट्स ज्ञान देने लगते हैं लेकिन मुस्लिम त्यौहारों पर सबको सांप सूंघ जाता है क्या? मुस्लिम हलकों में घूमते बकरे नहीं दिखाई पड़ते। शहरों से गौशालाएं बंद करवा दीं इन सनातन विरोधियों ने। जबकि सनातन में पहली रोटी गौ माता की और परिवार में मृत्यु पर तेरवीं तक सुबह शाम एक रोटी/पूरी गाय की निकलती है अब उस ग्रास को इनके मुंह में ढुँसे?   

People for the Ethical Treatment of Animals(PETA) और People for Animals(PFA) चलाने वाली मेनका गांधी सुप्रीम कोर्ट के आवारा कुत्तों के लिए दिए गए आदेश पर बिफर रहे थे 

PFA मेनका गांधी ने 1994 में शुरू किया था और PETA वर्ष 2000 में शुरू हुआ था और इन दोनों संगठनों का पशु प्रेम ऐसा है कि ये ईद पर बकरों और अन्य जानवरों की होने वाली हत्याओं पर कभी उफ़ नहीं करते

मेनका गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की निंदा करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी हाई कोर्टों की तरफ सरका रहा है और कुत्तों को इस तरह पकड़ कर shelter homes में भेजना व्यावहारिक नहीं है मेनका ने कहा था कि Gandhi “mass implementation of the Animal Birth Control (ABC) rules and sterilization drives are the only effective, permanent solutions to manage the stray dog population. 

दूसरी तरफ PETA ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को "impractical, illogical, and illegal” कह दिया था। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर कुत्तों को पकड़ कर हटाना Animal Birth Control के नियमों के खिलाफ है और कोर्ट/सरकार से मांग की थी कि बड़े पैमाने पर Sterlisation (Spay/Neuter) और vaccination किया जाए नाकि कुत्तों को पकड़ा जाए

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इन दोनों संगठनों का पशु प्रेम selective होता है जबकि कथित उद्देश्य सभी पशुओं के लिए प्रेम से है ईद पर पशु हत्या इन संगठनों के अनुसार पशुओं के प्रति नैतिकता का प्रमाण है (Ethical) है

लेकिन ईद उल जुहा पर जब बकरों, गायों, ऊंटों और अन्य पशुओं की हत्या की जाती है, तब ये संगठन secularism का लबादा ओढ़ कर खामोश हो जाते हैं मेनका गांधी की तो राजनीति में अब कोई औकात नहीं रह गई है फिर किस कारण चुप रहती है जबकि PETA को तो विदेशों से भी धन मिलता है और शायद विदेशी एजेंडा के कारण वह भी ईद पर खामोश रहता है ईद पर कटने वाले पशुओं से उनको कोई सहानुभूति नहीं है 

आप गूगल सर्च कीजिए आपको पता चलेगा कुर्बानी इस्लाम में हर किसी के लिए आवश्यक भी नहीं है आज कुछ मौलाना कह रहे हैं कि ईद पर गायों की कुर्बानी न दी जाए लेकिन कुछ के बोलने का कोई महत्व नहीं है गाय और उसके बछड़े का भक्षण किया ही इसलिए जाता है क्योंकि गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय है कुछ मौलाना यह भी कह रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाए अब ऐसी मांग करने का क्या उद्देश्य है, पता नहीं लेकिन अगर ऐसा कर दिया जाता तो सबसे पहले विरोध करने वाले भी मुस्लिम ही होंगे 

जिन राज्यों में गोवध पर प्रतिबंध है, शायद उन्हें देख कर ही राहुल गांधी कहता है कि भाजपा लोगों के खाने पीने पर भी रोक लगा रही है

सरकार अगर कहती है कि कुर्बानी नियत स्थानों पर की जानी चाहिए, तो उसमे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए लेकिन मुंबई की मीरा रोड, घाटकोपर और गोरेगांव की Housing Societies में पशुओं को पकड़ा गया है जो बलि के लिए लाए गए थे अनुमान लगाइए 40-50 बकरे एक सोसाइटी में कटेंगे तो कितना खून बहेगा और आस पास के लोगों का जीना कैसे हराम न होगा? लेकिन पशु प्रेमी PETA और PFA आंखे बंद किये बैठे हैं

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