अपराधी और नाबालिग “गटर Z”(CJP) के आंदोलन में कैसे पहुंचे; अपराधी अगर बेल पर थे, तो उनकी हिंसा के लिए अदालतें भी जिम्मेदार हैं


सुभाष चंद्र 

जुलाई 28 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के पकड़े गए बच्चों को साधारण बांड पर तुरंत रिहा किया जाए अगर उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।  कोर्ट ने निष्पक्ष की जांच की बात करते हुए पुलिस पर हुए हमलों को भी शामिल करने की बात कही और पुलिस ने जो FIR दर्ज की हुई हैं, वह उन पर जांच जारी रख सकती है लेकिन छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी ( मतलब गिरफ्तार नहीं किया जाएगा) कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से कोई संरक्षण नहीं मिलेगा लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं आदेश दिया कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए घटिया अपशब्द बोलने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए जिसे बेशर्म सौरव दास “हल्का फुल्का” मजाक बता रहा है

लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र करा कर हवा में उड़ रहे “गटर Z” के सर्वेसर्वा अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका कह रहे हैं कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं मानेंगे इतनी बड़ी हठधर्मी कि सर्वोच्च न्यायलय को भी ठोकर में रखना चाहते हैं और इनके पीछे खड़ा है कपिल सिब्बल

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नाबालिगों को रिहा करने के निर्णय पर मैं कहना चाहता हूँ कि पहले सुप्रीम कोर्ट को इस विषय पर गहन विचार करना चाहिए था कि आखिर नाबालिग बच्चे आंदोलन में कैसे पहुंचे? 18 वर्ष से कम आयु का बच्चा अगर 10+2 ही कर ले तो बड़ी बात है उन्होंने कौन सी NEET की परीक्षा दे दी और Neet से उनका क्या मतलब था?

वैसे भी आजकल तो नाबालिग हर जुर्म कर रहे हैं चाहे वह हत्या हो, लूट हो या बलात्कार अक्सर बहुत से नाबालिग लड़के ट्रेन की पटरी उखाड़ते मिल सकते हैं, पटरियों पर पत्थर रखते दिखाई दे सकते हैं, वंदे भारत ट्रेनों पर और हिंदुओं की शोभा यात्राओं पर पत्थर मारते दिख सकते हैं। इसलिए उन्हें नाबालिग मान कर छोड़ देना उचित नहीं है जब तक वो आंदोलन में जाने का मकसद ने साबित कर दें 

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए यह था कि आंदोलन में शामिल समस्त नाबालिकों को उसी तरह दण्डित किया जाए जिस तरह किसी व्यस्क को। क्योकि अगर किसी तरह इनमें से किसी एक भी मौत हो गयी होती आन्दोलनजीवी और इनके आकाओं ने आसमान सिर पर उठा लिया होता और सुप्रीम कोर्ट भी सरकार और पुलिस को जिम्मेदार ठहराती। कहती देखो कितनी अत्याचारी है सरकार। महिलाएं और बच्चे ही आन्दोलनजीविओं के nuclear है। केंद्र सरकार, पुलिस और निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। अदालतों को इनकी पैरवी करने वाले वकीलों को अड़े हाथों लेना चाहिए।  

कोर्ट ने कहा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से छूट नहीं मिलेगी दिल्ली पुलिस ने बताया है कि 2873 अपराधी आंदोलन के दंगों में शामिल थे जिनमें 101 पर हत्या करने के केस हैं; 294 पर Dacoity/ Robbery के केस दर्ज हैं; 229 पर Arms Act के और 1894 पर Other IPC/BNSS & Spl Laws में केस दर्ज हैं इसके अलावा: 

हत्या की कोशिश, बलात्कार, पॉक्सो, Molestation of Women, Chain Snatching अपहरण, ड्रग तस्करी के केस भी दर्ज हैं

सवाल यह उठता है कि 2873 अपराधी आंदोलन में कैसे पहुंचे? क्या वो कभी गिरफ्तार ही नहीं हुए और हुए तो क्या उन्हें मंदिर के प्रसाद की तरह जमानत वितरित कर दी गई मेरे अनुमान से गंभीर अपराधों के लिए तो उन्हें जमानत मिली हुई होगी ऐसे में उनकी जमानत तुरंत रद्द कर जेल में डाल देना चाहिए और इस दंगे का केस अगल से शुरू होना चाहिए लेकिन अब उन्हें या किसी भी अपराधी को सोच समझ कर जनमत दी जाए और Bail is a rule/Jail is an exception की थ्योरी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है  

No comments:

Post a Comment