टोक्यो ओलंपिक्स में महिला शक्ति से घबराए मोदी विरोधी

2 अगस्त की सुबह हर कोई हमेशा याद रखेगा। क्योंकि इस दिन टोक्यो ओलंपिक्स में भारतीय महिला टीम ने इतिहास रचा है। टीम ने क्वॉर्टर-फाइनल मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया को 1-0 से हराकर सेमी-फाइनल्स में जगह बना ली है। आज से पहले भारतीय महिला हॉकी टीम ने कभी भी ओलंपिक्स के सेमी फाइनल में जगह नहीं बनाई थी. और इस बार उन्होंने तीन बार के ओलंपिक्स गोल्ड मेडलिस्ट को हराकर ये कारनामा कर दिखाया है. इस क्वॉर्टर-फाइनल से पहले भारतीय टीम अपने ग्रुप में चौथे नंबर पर थी और ऑस्ट्रेलिया की टीम अपने ग्रुप में टॉप पर थी. ग्रुप स्टेज की बात करें तो भारतीय टीम ने 14 गोल खाए थे और सिर्फ सात गोल किए थे. वहीं ऑस्ट्रेलिया ने ग्रुप स्टेज में 13 गोल किए थे और सिर्फ एक गोल खाया था. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रानी रामपाल की कप्तानी वाली इस टीम ने कितनी बड़ी जीत हासिल की है.

भारतीय टीम के लिए एकमात्र गोल गुरजीत कौर ने किया. गुरजीत के अलावा टीम की जीत में अहम भूमिका रही टीम के डिफेंडर्स की, और गोलकीपर सविता पूनिया की. सविता दीवार की तरह खड़ी रहीं. ऑस्ट्रेलिया के सात पेनल्टी कॉर्नर को रोका और एक भी गोल नहीं होने दिया.

इस वक्त पूरा देश इस टीम को बधाई दे रहा है. सबसे ज्यादा चर्चा रानी रामपाल, सविता और गुरजीत के नाम पर हो रही है. सबसे पहले बताते हैं रानी रामपाल के बारे में. हरियाणा के शाहबाद मारकंडा की रहने वाली हैं. परिवार बेहद गरीब था. पिता घोड़ा गाड़ी चलाते थे. किसी तरह घरवालों ने स्कूल में दाखिला करवाया था. जब 6-7 साल की थीं, तब स्कूल से आते-जाते वो खेल के मैदान को देखती थीं. लड़के वहां हॉकी खेलते थे. उन्हें वो खेल अच्छा लगता था. रानी ने अपने पिता से कहा कि वो भी हॉकी खेलना चाहती हैं. रानी का परिवार चूंकि गरीब था, दूसरा तब लड़कियों का हॉकी खेलना ‘बड़ी’ बात थी, इसलिए पहले तो पिता ने मना कर दिया. फिर रानी की ज़िद के आगे घुटने टेक दिए. किसी तरह शाहबाद हॉकी एकेडमी में उनका दाखिला करवाया. और आज यही रानी रामपाल इतिहास रचने वाली टीम की कप्तान हैं.

अब बात गुरजीत कौर की. पंजाब के अमृतसर के मियादी कलां गांव से हैं. गुरजीत और उनकी बहन जब छोटी थीं, तब गांव में एक सरकारी स्कूल था, लेकिन आप जानते ही हैं कि अधिकतर सरकारी स्कूलों के क्या हाल होते हैं. गुरजीत के पिता चाहते थे कि उनकी बच्चियों को अच्छी शिक्षा मिले, इसलिए गांव से 13 किलोमीटर दूर एक प्राइवेट स्कूल में उनके पिता ने बेटियों का दाखिला करवाया. वो साइकिल से उन्हें छोड़ने और लेने जाते थे. पढ़ाई के दौरान ही गुरजीत का हॉकी में इंटरेस्ट पैदा हुआ और उन्होंने परिवार को इसके बारे में बताया. पिता ने सपोर्ट किया और फिर गुरजीत ने हॉकी खेलना शुरू किया. और आज उन्होंने जो किया, वो आप जानते ही हैं.

सविता पूनिया की अगर बात करें, तो वो हरियाणा के सिरसा के जोधकान गांव से हैं. ‘डीडी न्यूज़’ को दिए एक इंटरव्यू में सविता ने बताया था कि उन्हें बचपन में हॉकी में कोई ज्यादा इंटरेस्ट नहीं था, लेकिन उनके ग्रेंडफादर चाहते थे कि वो हॉकी खेलें. सविता के कोच ने उनका खेल देखने के बाद उनके पिता से कहा कि वो गोलकीपर अच्छी बन सकती हैं. इसके बाद उनके पिता ने गोलकीपर का सारा सामान खरीदा. सविता ने इंटरव्यू में बताया था कि उनके घर की आर्थिक हालत ठीक-ठाक थी, लेकिन उतनी अच्छी भी नहीं थी, ऐसे में जब उन्होंने देखा कि उनके पिता ने इतना महंगा किट खरीदा है, तो उन्होंने फैसला कर लिया कि वो अपना बेस्ट करके दिखाएंगी. और बस इसी फैसले ने सविता को आज हॉकी टीम की दीवार बना दिया.

भारतीय हॉकी टीम की कई खिलाड़ियों की कहानी ऐसी है, जो आपको हर दम आगे बढ़ते रहने का सबक देती हैं. टीम का सेमी-फाइनल मैच 4 अगस्त को है, उम्मीद करते हैं कि इसमें भी हमें जीत मिलेगी.

हॉकी के अलावा किस टीम ने किया कमाल 

टोक्यो ओलंपिक्स में भारत की महिला खिलाड़ी कमाल कर रही हैं. बीती शाम एक और कमाल किया बैडमिंटन प्लेयर पी.वी. सिंधु ने. 1 अगस्त को उन्होंने टोक्यो ओलंपिक्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. इसके साथ ही सिंधु दो ओलंपिक्स मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला भी बन गईं हैं. उन्होंने 2016 के ओलंपिक्स में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीता था. सिंधु के नाम BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप में पहले से पांच मेडल्स हैं. और यह दो ओलंपिक्स मेडल मिला दें तो पूरी दुनिया में किसी भी महिला खिलाड़ी ने उनसे ज्यादा ओलंपिक्स और वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल्स नहीं जीते हैं. और ओलंपिक्स में तो उनसे ज्यादा सिंगल्स मैच किसी भारतीय बैडमिंटन स्टार ने जीते ही नहीं हैं. सिंधु की इस खास उपलब्धि के लिए पूरा देश उन्हें बधाई दे रहा है.

सिंधु के अलावा एक और मेडल पक्का किया है लवलीना बोरगोहेन ने. टोक्यो ओलंपिक्स 2020 में विमिंस वेल्टरवेट मुकाबले में भारत की बॉक्सर लवलीना सेमी-फाइनल में पहुंच चुकी हैं और इसी के साथ ही उन्होंने कम से कम ब्रॉन्ज़ मेडल पक्का कर ही लिया है. क्वॉर्टर फाइनल में उन्होंने ताइपे की बॉक्सर को 4-1 से हराया था, ये लवलीना के बॉक्सिंग करियर की सबसे बड़ी जीत है. उनका अगला मुकाबला 4 अगस्त को होगा.

इन लड़कियों में एक और नाम जुड़ा है कमलप्रीत कौर का. उन्होंने डिस्कस थ्रो में 64 मीटर की थ्रो के साथ फाइनल के लिए क्वालीफाई किया था. कमलप्रीत के ग्रुप की बात करें तो उन्होंने अपने ग्रुप बी में दूसरा स्थान प्राप्त किया है. उन्होंने पहले प्रयास में 60.25 मीटर का स्कोर हासिल किया. जिसके बाद दूसरे प्रयास में उन्होंने 63.97 मीटर का स्कोर पाया. लेकिन तीसरे और आखिरी प्रयास में तो उन्होंने इतना शानदार खेल दिखाया कि वो 64 मीटर स्कोर कर गईं. इस मैच में वो क्रोएशिया की गोल्ड मेडलिस्ट सेंड्रा परकोविक और क्यूबा की वर्ल्ड चैम्पियन यामे परेज़ से भी आगे रहीं. हालांकि आज हुए मुकाबले में कमलप्रीत छठे नंबर पर रहीं और मेडल से चूक गईं. उन्होंने  63.70 मीटर दूर फेंका था डिस्कस.

पहला मैडल दिलवाया मीरा ने 

टोक्यो ओलंपिक्स में पहला मेडल भारत को दिलाया था मीराबाई चानू ने. वेटलिफ्टिंग में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता. वेटलिफ्टिंग में ये भारत का सबसे बड़ा पदक है. मीरबाई से पहले वेटलिफ्टिंग में कर्णम मल्लेश्वरी ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था. 49kg वर्ग में मीराबाई ने ये मेडल जीता है. 2016 रियो ओलंपिक में खिताब जीतने से चूक गई थीं. लेकिन इस ओलंपिक्स में उन्होंने ये कसर पूरी कर दी.

मोदी विरोधियों ने मचानी शुरू कर दी गंदगी 

भारत की बहुत सारी महिला खिलाड़ी और एथलीट्स टोक्यो ओलंपिक्स में कमाल कर रही हैं. ज़ाहिर है उनकी तारीफ भी हो रही है, होनी ही चाहिए, क्योंकि वो इसकी हकदार हैं. लेकिन इस तारीफ के चक्कर में कुछ लोग हद से ज्यादा नीचे भी गिर रहे हैं. ट्विटर पर हैशटैग real women empowerment के साथ लोग ट्वीट कर रहे हैं और बॉलीवुड एक्ट्रेस के साथ इन खिलाड़ियों की तस्वीरों का कोलाज शेयर कर रहे हैं. और कह रहे हैं कि असली महिला सशक्तिकरण ओलंपिक्स में महिलाओं द्वारा मेडल जीतना है, न कि बॉलीवुड में काम करना. ये एक पोस्टर देखिए. इसमें आपको एक्ट्रेस ताप्सी पन्नू, सोनम कपूर और स्वरा भास्कर दिख रहे हैं, इनकी तस्वीरों के नीचे यही लिखा है कि ये असल महिला सशक्तिकरण नहीं है. इन तीन तस्वीरों के नीचे लगी है मीराबाई चानू की तस्वीर, जिस पर लिखा है- ये असल महिला सशक्तिकरण है. हमारे गौरव मीराबाई चानू को सिल्वर मेडल जीतने पर बधाई.

महिलाओं की तारीफ भी कर रहे हैं, साथ ही साथ दो अलग-अलग प्रोफेशन की महिलाओं को एक-दूसरे के खिलाफ भी खड़ा कर रहे हैं. स्वरा भास्कर की तस्वीर के साथ टेबल टेनिस प्लेयर मनिका बत्रा की तस्वीर शेयर की जा रही है. स्वरा के लिए कहा जा रहा है कि ये फेक फेमिनिज़्म है, और मनिका की तस्वीर पर लिखा जा रहा है कि ये असल फेमिनिज़्म है. कुछ लोग सोशल मीडिया पर डांस के रील्स बनाने वाली औरतों को भी टारगेट कर रहे हैं, कह रहे हैं कि ये कोई महिला सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि दुनिया की नंबर दो खिलाड़ी को हराना सशक्तिकरण है.

इसी बीच कुछ लोग “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की मुहीम तक लेकर आ गए हैं. ये लॉजिक दिया जा रहा है कि देश की बेटियां मेडल्स ला रही हैं, अब तो बेटियों को बचाओ. उन्हें पढ़ाओ और खिलाओ, ताकि वो देश के लिए मेडल्स लाएं. बेटियों को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए क्लिशे सा लॉजिक दिया जा रहा है. इसके साथ ही लड़के बनाम लड़की का नैरेटिव भी फिर से शुरू हो गया है.

मेडल्स के बीच दहेज प्रथा पर भी बातें हो रही हैं. जोक्स चल रहे हैं. ये पोस्टर देखिए. इस पर लिखा है-

भले ही ये बात मज़ाक के तौर पर की जा रही है, लेकिन आप ओलंपिक्स में मेडल जीतने को दहेज जैसी कुप्रथा से कैसे कम्पेयर कर सकते हैं. कुछ लोग तो इसके एक कदम आगे भी बढ़ गए. आपस में हो रही चैट में एक ने लिखा-

“गोल्ड डिगर्स के बारे में क्या है? वो भी तो बहुत सारा सोना लेकर आते हैं.”

बेसिरपैर की बहस हो रही है. कहीं पर कोई लड़कियों को गोल्ड डिगर्स कह रहा है, तो कोई दहेज वाला मुद्दा उठाकर ला रहा है, तो कोई बेटी बचाओ के लिए अजीब से तर्क दे रहा है, तो कोई लड़का बनाम लड़की के नैरेगिव पर आ गया है. इन सबके बीच जो बात सबसे ज्यादा खटक रही है, वो है ‘असल महिला सशक्तिकरण’ वाला लॉजिक. आप सोचिए कि अगर कोई पुरुष अभी मेडल जीतकर आए तो क्या सोशल मीडिया पर किसी बड़े एक्टर की तस्वीर पर ये लिखा जाएगा कि ‘ये असल पुरुष नहीं हैं, बल्कि मेडल जीतने वाला असल पुरुष” है. नहीं. और मान लीजिए कि अगर किसी ने ऐसा पोस्टर बना भी दिया, तो भी वो उस कदर वायरल नहीं होगा, जिस कदर ये पोस्टर्स वायरल हो रहे हैं.

किसी खेल में जीतने वाली महिला की तारीफ आप दूसरी महिलाओं की बुराई या उन्हें नीचे दिखाए बिना भी कर सकते हैं. दोनों औरतें अलग-अलग फील्ड में हैं, आप उन्हें कैसे कम्पेयर कर सकते हैं. आपके ऐसे तारीफ प्लस आलोचना वाले पोस्टर्स बता रहे हैं कि आप कहीं न कहीं औरतों की कामयाबी को हज़म नहीं कर पा रहे हैं. और ये पूरी तरह से पैट्रिआर्कल सोसायटी की उपज है. माने पुरुष प्रधान सोसायटी की उपज. जिस सोच का शिकार न केवल आदमी हैं, बल्कि औरतें भी हैं. अभी लोग बड़े प्राउडली मीराबाई चानू की, लवलीना की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन फिर यही लोग नॉर्थईस्ट की लड़कियों पर रेसिस्ट कमेंट्स करने से भी पीछे नहीं हटते. और यही लोग मौका आने पर महिला खिलाड़ियों की स्कर्ट पर कमेंट करने से भी पीछे नहीं हटते. इन्हें सशक्तिकरण की परिभाषा भी ठीक से नहीं पता. अपने फैसले जब एक औरत अपनी मर्ज़ी से बिना डरे लेने लगे, तो वो होता है सशक्तिकरण. रही बात बेटी बचाने की, तो वो मेडल लाए चाहे न लाए, आप उनके जीने का हक और पढ़ने का हक नहीं छीन सकते.

ये सभी लड़कियां, साथ ही वो लड़कियां जो ओलंपिक्स तक गईं, भले ही मेडल न जीती हों, वो हीरो हैं. क्योंकि हमारे समाज में जहां उनको मोटिवेट करने से 10 गुना ज्यादा उनको हतोत्साहित करने के साधन मौजूद हैं, ऐसे हालात से लड़कर वो ओलंपिक्स तक पहुंचीं, यानी वो पहले ही जीत चुकी हैं.

1 comment:

Unknown said...

बहुत ही प्रेरणादायक सारगर्भित प्रस्तुती