बलात्कार के सजायाफ्ता मुजरिम को केवल बरी क्यों किया मीलॉर्ड, उसे इनाम भी देना चाहिए था ; ट्रायल कोर्ट/हाई कोर्ट को बंद ही कर दीजिए; मीलॉर्ड, मानव जीवन भी बड़ी मुश्किल से मिलता है

सुभाष चन्द्र

उत्तर प्रदेश सरकार को मुख्यतः निशाने पर रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र के नियम बनाते हुए कहा था कि किसी का घर जीवन में एक बार बड़ी मुश्किल से बनता है, उसे ऐसे ही नहीं तोडा जा सकता लेकिन मीलॉर्ड भूल गए कि मनुष्य को जीवन भी बड़ी मुश्किल से मिलता है (84 लाख योनियों के बाद), उसे भी बलात्कार करके बर्बाद करने और हत्या करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता 

बुलडोज़र पर रोक लगाने से अपराधियों के हौसले बुलंद हुए हैं जिसका प्रमाण है कि सबसे ज्यादा अखिलेश यादव खुश हुआ था इस फैसले से शायद इसलिए कि उसके लोग सबसे ज्यादा फंस रहे थे उसने कहा था “बुलडोज़र अब गैराज में खड़े होंगे)

अभी 3 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने उत्तर प्रदेश के एक सजायाफ्ता अपराधी को 10 वर्षीय नाबालिग से बलात्कार और हत्या के आरोप से “पर्याप्त साक्ष्यों” के अभाव में बरी कर दिया और कहा कि आपराधिक मुक़दमे में स्वयं के बचाव और कानूनी सहायता प्राप्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 में मौलिक अधिकार है। 

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अभियुक्त अशोक ने अपना कोई वकील नहीं किया था और उसे वकील सरकार की तरफ से मिला था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गवाह के बयान दर्ज होते हुए अभियुक्त की तरफ से कोई वकील नहीं था और आरोप तय होने के वक्त भी उसका कोई वकील नहीं था

ट्रायल कोर्ट ने अशोक को फांसी की सजा सुनाई थी और हाई कोर्ट ने उस सजा को जीवन पर्यन्त कैद में बदल दिया था सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई 2022 को उसे 13 साल जेल भुगतने के आधार पर जमानत दे दी थी, यानी जिसे उम्र भर की कैद हुई जघन्य अपराध के लिए, उसे केवल इसलिए जमानत दे दी कि वह 13 साल जेल में काट चुका है

सुप्रीम कोर्ट ने लगता है तथ्यों पर न जाकर (merits) तकनीकी आधार पर कि उसके साथ वकील नहीं था, मान लिया कि साक्ष्यों का अभाव है तो क्या ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने जज बेवकूफ थे जिन्हें साक्ष्य दिखाई नहीं दिए? साक्ष्य को मानना और न मानना या कानून की व्याख्या अलग अलग जज पर निर्भर करती है सुप्रीम कोर्ट को ही हर केस में फैसले करने हैं तो ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को बंद ही का दीजिए और हर मुक़दमे के ट्रायल सुप्रीम कोर्ट में ही कर लिया करो ऐसे  अनेक मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों को खारिज करते हुए बलात्कारियों को छोड़ देता है और कभी कभी तो कहता है “Every Sinner Has A Future” 

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था कि यदि किसी को गलत सजा हो जाती है और आरोपी को जेल में रहना पड़ता है तो उसके नुकसान की भरपाई कैसे होगी, इस पर विचार होना चाहिए आपको तो अभियुक्त अशोक को बरी करते हुए इनाम के तौर पर कम से कम 10 लाख का मुआवजा और एक घर भी देना चाहिए था और तभी सही न्याय हुआ माना जा सकता था

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