अपने ही जाल में फंस रहे ट्रम्प; मोदी सरकार का सख्त संदेश, नहीं लेंगे अमेरिकी F-35 फाइटर, एसबीआई रिसर्च- ट्रंप टैरिफ से USA को ज्यादा नुकसान


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सात अगस्त से भारत के खिलाफ 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का पैंतरा खुद उनके लिए ही उल्टा पड़ने वाला है! ट्रंप जिस F-35 फाइटर जेट की जबरन खरीद के लिए टैरिफ के माध्यम से भारत पर दबाव बना रहे थे, उसके बारे में भारत ने अमेरिकी अधिकारियों को स्पष्ट रूप से बता दिया है कि उसकी फाइटर जेट खरीदने में दिलचस्पी नहीं है। ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है। दूसरी ओर एसबीआई रिसर्च में यह भी साफ तौर पर सामने आया है कि ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी का नुकसान भारत से ज्यादा अमेरिका और उसके नागरिकों को ही होने वाला है। रिपोर्ट के अनुमान के अनुसार भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला अमेरिका के लिए महंगा साबित होगा। टैरिफ के कारण हर अमेरिकी उपभोक्ता को सालाना औसतन 2,400 डॉलर (करीब दो लाख रुपए) का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। अमेरिका में कम आय वाले परिवारों पर इसका असर तीन गुना तक हो सकता है। रिसर्च यह भी बताता है कि ट्रंप टैरिफ से डॉलर कमजोर हो सकता है। इसके अलावा अमेरिका की जीडीपी में भारत से कहीं ज्यादा गिरावट का अनुमान है।

अमेरिका के दबाव का भारत ने रणनीतिक कूटनीति से दिया जवाब
इस बीच वैश्विक मंच पर भारत की कूटनीति एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिका के बार-बार दबाव बनाने के बावजूद भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखने का फैसला किया है। यह कदम न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की रणनीति को दर्शाता है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का भी परिचायक है। हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नाटो महासचिव मार्क रूट ने भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों को रूस से तेल खरीदने के खिलाफ चेतावनी दी थी। ट्रंप ने तो 25 प्रतिशत टैरिफ और रूसी तेल खरीदने पर अतिरिक्त जुर्माने की घोषणा तक कर दी। फिर भी, भारत ने साफ कर दिया कि वह अपनी ऊर्जा नीति को राष्ट्रीय हितों और बाजार की ताकतों के आधार पर तय करेगा और किसी बाहरी दबाव में नहीं आएगा।

रूस से सस्ता तेल खरीदने से भारत को अरबों डॉलर की बचत
अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए तेल और गैस की बिक्री पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और झूठा दावा किया कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि भारत की ऊर्जा नीति पारदर्शी है और यह राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी स्पष्ट किया कि अगर रूसी तेल पर प्रतिबंध लगता है तो भारत गुयाना, ब्राजील और कनाडा जैसे अन्य आपूर्तिकर्ताओं से तेल आयात करेगा।

पीएम मोदी की नीति से घरेलू  महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिली

यह दर्शाता है कि भारत ने वैकल्पिक रास्तों की तैयारी पहले से कर रखी है। बता दें कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी ऊर्जा जरूरतें विशाल हैं। फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिसके चलते रूसी तेल की कीमतें वैश्विक बाजार में कम हो गईं। तब भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया। मई 2025 में भारत ने रूस से 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का 38% से अधिक था। इससे भारत ने न केवल अरबों डॉलर की बचत की, बल्कि घरेलू स्तर पर महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिली।

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में उत्पादन की शर्त पर ही डिफेंस डील
भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति को तगड़ा झटका देते हुए साफ कर दिया है कि वह उससे F-35 फाइटर जेट नहीं खरीदेगा। F-35अमेरिका का 5वीं जेनरेशन का लड़ाकू विमान है। इसे लॉकहीड मार्टिन कंपनी ने डेवलप किया है। ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से ये जानकारी दी है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि मोदी सरकार निकट भविष्य में अमेरिका के साथ कोई बड़ा रक्षा सौदा करने का मन नहीं बना रही है। सरकार रक्षा उपकरण बनाने वाली साझेदारी में ज्यादा दिलचस्पी रखती है। यानी, भारत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और देश में उत्पादन की शर्त पर डिफेंस डील चाहता है। इस साल फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्हाइट हाउस दौरे के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को फाइटर जेट बेचने की पेशकश की थी। इसके बाद अप्रैल में भारत दौरे पर आए अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी भारत को F-35 खरीदने का ऑफर दिया था।

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