राहुल "वोट चोरी नौटंकी" में मस्त उधर कर्नाटक में राजस्थान वाला ढाई साल का सियासी नाटक विस्फोट के ढेर पर

राहुल गाँधी "वोट चोरी नौटंकी" की मस्ती में कर्नाटक में अपनी सरकार को बचाने से बेखबर है। फिर शोर मचाया जाएगा "सरकार चोरी हो गयी"। हकीकत यह है कि राहुल ने अपनी इमेज "पार्ट टाइमर" और अराजकता फ़ैलाने वाले नेता की बनाए जाने की वजह से कांग्रेस को slow poision दिया जा रहा है। इसकी जिम्मेदार बीजेपी नहीं बल्कि गाँधी परिवार है। जब अध्यक्ष खड़के स्वयं कोई फैसला नहीं ले सकते फिर क्यों अध्यक्ष बनने की नौटंकी मचा रखी है? जब किसी विवाद का फैसला परिवार ने ही करना है फिर तुम्हारा क्या काम? क्या उनका आत्मविश्वास मर चुका है? आखिर गुलामी की भी एक सीमा होती है। जितना यह परिवार सक्रीय रहेगा बीजेपी उतनी तेजी से आगे बढ़ती रहेगी। राहुल की इन हरकतों को देख INDI गठबंधन ने भी कांग्रेस से दूरी बनानी शुरू कर दी है।     

कर्नाटक जनता भी शिवकुमार की ओर टकटकी लगाए देख रही है कि "अपनी बात पर टिके रहकर मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर परिवार के आगे चारों खाने चित होंगे?" उनके लिए आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति है।   

कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारैमया सरकार 20 नवंबर को ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। इसके साथ ही सत्ता-संघर्ष का तापमान इतना बढ़ गया है कि मंत्रालयों से ज्यादा गर्मी अब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच के सियासी लड़ाई सीएम की कुर्सी पर काबिज होने को लेकर हो रही है। कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति के नाटक में अब वही स्क्रिप्ट खुलकर सामने आने लगी है जो राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खुलेआम चली थी। ढाई साल का फार्मूला, कुर्सी को लेकर अविश्वास, समर्थकों का ध्रुवीकरण और दिल्ली दरबार में लॉबिंग…वही सब अब कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक नजर आने लगा है। फर्क बस इतना है कि कर्नाटक में यह सब और भी ज्यादा सार्वजनिक, ज्यादा तेज और ज्यादा विषाक्त रूप ले रहा है। दरअसल, यह राहुल गांधी की वही कांग्रेस है जो हर चुनाव में स्थिरता का नारा तो लगाती है और सत्ता मिलते ही खुद को अस्थिर करने में लग जाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान राज्य की जनता को उठाना पड़ता है। राजस्थान यह भुगत चुका है और अब कर्नाटक की बारी है।

खतरे में राहुल-सोनिया और प्रियंका की तिकड़ी की विश्वसनीयता

कर्नाटक में आने वाले महीनों में सत्ता परिवर्तन हो या न हो, एक बात स्पष्ट है कि कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व क्षमता आज सबसे कमजोर स्थिति में है। राहुल-सोनिया और प्रियंका की तिकड़ी की विश्वसनीयता राज्यों के अपनी पार्टी के नेताओं पर ही असर डालने में असफल हो चुकी है। बिहार की हार ने यह और स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस न तो गठबंधन खड़ा कर सकती है, न जनादेश को प्रभावित कर सकती है, और न ही आंतरिक कलह को रोक सकती है। कर्नाटक का यह ढाई साल वाला नाटक, दिल्ली में डीके समर्थकों की लामबंदी, और बिहार में चुनावी हार तीनों मिलकर एक ही बात साबित करते हैं कि कांग्रेस आज भी उसी पुरानी बीमारी से ग्रस्त है— नेतृत्व की अस्पष्टता, निर्णय लेने की अयोग्यता और सत्ता की अंदरूनी लड़ाई।
दिल्ली दरबार में लगातार अपना दबाब बढ़ा रहे हैं डीके समर्थक
कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सत्ता ही नहीं, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की क्षमता भी कठघरे में है। राजस्थान में जो ढाई साल का नाटक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हुआ था, वही दृश्य अब दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में रिपीट हो रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां स्क्रिप्ट वही है, बस कलाकार अलग हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी के लिए संघर्ष उतना ही तीखा और खुला है। सत्ता संतुलन अब स्पष्ट रूप से बदल रहा है। डीके शिवकुमार समर्थक दिल्ली में सक्रिय हैं और पार्टी हाईकमान पर दबाव बढ़ा रहे हैं कि “ढाई साल बाद सत्ता हस्तांतरण” का वादा निभाया जाए। सिद्धारमैया इसे अनुभव बनाम युवाशक्ति का संघर्ष बताते हैं, तो डीके गुट का मानना है कि हाईकमान अपने वादे पर खरा उतरे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि डीके कैंप लगातार दिल्ली में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। क्योंकि उसे पता है कि कर्नाटक की सत्ता की चाबी बेंगलुरु में नहीं, बल्कि तुगलक रोड, दिल्ली में रखी हुई है।

राहुल-सोनिया के दफ्तरों के बाहर डीके के सैकड़ों समर्थक जुटे
दिल्ली में हाल ही में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के दफ्तरों के बाहर जिस तरह डीके के सैकड़ों समर्थक जुटे, वह सिर्फ शक्ति-प्रदर्शन नहीं बल्कि हाईकमान की कमजोरी को दुनिया के सामने रखने जैसा है। कांग्रेस के कार्यकर्ता तक मानने लगे हैं कि लगातार हार और बिहार में शर्मनाक हार के बाद हाईकमान अब निर्णय लेने की क्षमता खो चुका है। भाजपा के खिलाफ लड़ाई तो दूर, अपनी ही सरकार को स्थिर रखने का जज़्बा कांग्रेस के दिल्ली दरबार के बड़े नेताओं के पास नहीं बचा है। राहुल गांधी सिर्फ अपने कुछ चुनिंदा सलाहकारों के बीच घिरे हुए हैं। वे इसलिए भी निर्णय नहीं ले पा रहे हैं, क्योंकि राहुल गांधी की स्थिति पहले जैसी नहीं रही। 96 हार के बाद किसी भी नेता का और उस नेता पर से कार्यकर्ताओं का विश्वास डगमगाना लाजिमी है। कर्नाटक में जो स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, वह कोई नया नाटक नहीं है। कांग्रेस की यही स्क्रिप्ट है, उसमें बस राजनीति के अभिनेता बदलते रहते हैं।

सिद्धारमैया ने शुरू से ही डीके को सीमित रखने की कोशिश की
इधर जहां तक कर्नाटक के नाटक का सवाल है तो सिद्धारमैया ने शुरू से ही डीके को सीमित रखने की कोशिश की है। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस हाईकमान यानि राहुल गांधी ने जो समझौता कराया था। ढाई साल बाद सत्ता परिवर्तन सिद्धारमैया ने तब तो अंदरखाते सत्ता के लिए इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन अशोक गहलोत की तरह कभी भी खुले तौर इसे नहीं माना। ठीक सचिन पायलट की तरह ही अब डीके शिवकुमार ने इसे अपनी सार्वजनिक प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। अब जब ढाई साल का समय पूरा हो चुका है, डीके के समर्थक दिल्ली पहुंच चुके हैं। ये वही समर्थक हैं जो पिछले छह महीनों से कहते आए हैं कि “शक्ति हम पर है, सरकार उनकी वजह से है, और बिना डीके कर्नाटक में कोई कांग्रेस नहीं।” यह संदेश अब स्पष्ट है कि ढाई साल में मुख्यमंत्री बदले, वरना कर्नाटक में पार्टी टूट का खतरा वास्तविक है।

कर्नाटक को राहुल गांधी ने नहीं, स्थानीय नेतृत्व की शक्ति ने जीता
कर्नाटक का संकट राहुल गांधी की उसी राजनीतिक कमजोरी का परिणाम है। कांग्रेस कर्नाटक में जीत गई, लेकिन वह जीत किसी रणनीति की नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व डीके शिवकुमार की संगठन क्षमता और सिद्धारमैया की लोकप्रियता की देन थी। यह कोई राष्ट्रीय रणनीति का चमत्कार नहीं था। यह जमीन पर बनाए गए स्थानीय समीकरणों का खेल था। राहुल गांधी ने न तो कैडर को प्रेरित किया, न चुनाव की रणनीति को दिशा दी। यही कारण है कि विजय के बाद सत्ता वितरण में भी वे निर्णायक भूमिका निभाने में असफल रहे। इसी शून्य का लाभ लेकर सिद्धारमैया और डीके दोनों अपनी-अपनी परछाई बढ़ाने में लगे हैं।

सिद्धारमैया बनाम डी.के. शिवकुमार: शीत युद्ध अब सतह पर
कर्नाटक में सत्ता का यह संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि कर्नाटक कौन चलाएगा? अनुभवी सिद्धारमैया या संसाधन-संपन्न और युवा शक्ति पर पकड़ रखने वाले डीके शिवकुमार? कांग्रेस के भीतर यह धारणा फैलती जा रही है कि सिद्धारमैया अपने पद से हटने के पक्ष में नहीं और डीके का अस्तित्व पद मिलने पर ही टिकेगा। यह द्वंद्व उस समय और खतरनाक हो जाता है जब हाईकमान कमजोर हो और उसके पास समाधान का कोई फार्मूला न बचे। दिल्ली में डीके समर्थकों की पुरजोर आवाजें बताती हैं कि यह मेहनत सिर्फ राजभवन तक सीमित नहीं रहेगी। यह आने वाले दिनों में संगठन और सत्ता को पूरी तरह दो फाड़ कर सकती है।

बिहार हार का सीधा संदेश- राहुल का नेतृत्व जनता को स्वीकार्य नहीं
कर्नाटक में सत्ता संघर्ष का यह नाटक कांग्रेस हाईकमान की अव्यवस्था का दर्पण है। राहुल गांधी बिहार में बुरी तरह से हारकर पहले ही निशाने पर हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की राय साफ है कि बिहार हार का सीधा संदेश है कि राहुल नेतृत्व जनता को स्वीकार्य नहीं हो रहा। विपक्षी गठबंधन में वे विश्वसनीय नेता के तौर पर उभरने का दावा खो चुके हैं। जब राष्ट्रीय स्तर पर ही नेतृत्व कमजोर दिखे, तब राज्यों में मुख्यमंत्री बदलने जैसे निर्णय और भी कठिन हो जाते हैं। कांग्रेस में सत्ता हस्तांतरण कभी सुगमता से नहीं हुआ। हर बार बगावत, नाराजगी या टूट का खतरा साथ लेकर आता है। यही स्थिति अब कर्नाटक में है। डीके शिवकुमार कई बार कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री बनने के योग्य हैं और सिद्धारमैया को वादा निभाना होगा। दूसरी ओर सिद्धारमैया अपनी छवि, कद और अपनी जातीय-पैठ के दम पर डीके को सीमित करने का हर प्रयास करते दिखते हैं।

हाईकमान कमजोर, राज्य नेताओं के भिड़ने से मिली जनता से हार
सत्ता का यह संघर्ष व्यक्तिगत अहंकार की टक्कर से कहीं अधिक जातीय राजनीति, क्षेत्रीय प्रभाव और संगठन के नियंत्रण की लड़ाई बन चुका है। इसकी गूंज दिल्ली तक इसलिए पहुंची है, क्योंकि राहुल गांधी किसी भी पक्ष का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं। सालों से कांग्रेस की राजनीति में यही कहानी दोहराई जाती रही है। हाईकमान कमजोर, राज्य नेता आपस में भिड़े, और अंत में जनता से हार। राजस्थान में यह कहानी लंबे समय तक चली, पंजाब में यह कहानी सरकार गिराकर खत्म हुई और अब कर्नाटक में यह कहानी तेज हो चुकी है। कर्नाटक कांग्रेस एक ऐसी सरकार चला रही है जो अपने ही दो शीर्ष नेताओं की रस्साकशी में उलझी है। इस संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान जनता और प्रशासन दोनों को होता है, लेकिन कांग्रेस इस नुकसान को भी हजम करने की आदत डाल चुकी है।


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