राष्ट्रपति को “आतंकवादी आदेश” देने वाला मामला बंद नहीं होना चाहिए, आइए सब मिल कर परदीवाला और महादेवन के आदेश वापस लेने और उनके त्यागपत्र की मांग करें

सुभाष चन्द्र 

सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस बीआर गवई की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति के 14 प्रश्नों पर अपनी  राय देते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति या राज्यपालों को किसी बिल को पारित करने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती और इस राय ने साफ़ कर दिया कि जस्टिस परदीवाला और जस्टिस महादेवन ने राष्ट्रपति को 3 महीने में बिलों को पारित करने की समय सीमा तय करके अपनी न्यायिक शक्तियों का अतिक्रमण किया था और स्वयं लंबित बिलों को पारित कर न्यायिक मर्यादाओं का उल्लंघन करके Judicial Terrorism का घ्रणित उदाहरण पेश किया था। 

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कुछ लोगों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की राय से राष्ट्रपति को दिए गए आदेश का फैसला रद्द हो गया लेकिन ऐसा नहीं है, वह फैसला अभी भी लागू है और तब तक लागू रहेगा जब तक दोनों जजों की बेंच उसे वापस न ले ले निर्णय को वापस लेने के लिए गवई को स्वयं दोनों जजों को कहना चाहिए था जैसा उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज के विरुद्ध दिए गए निर्णय के लिए किया था और परदीवाला और महादेवन ने अपना निर्णय वापस ले लिया था 

अब नए चीफ जस्टिस सूर्यकांत को चाहिए कि वे न्यायपालिका की मर्यादाओं की रक्षा के लिए परदीवाला और महादेवन से राष्ट्रपति को आदेश देने वाले अपने निर्णय को वापस लें अन्यथा वे स्वतः संज्ञान लेकर एक अन्य 5 जजों की संविधान पीठ बना कर दोनों के फैसले को पलट दें और इसमें कोई ज्यादा समय नहीं लगना चाहिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अपनी स्पष्ट राय दे चुका है कि वह निर्णय उस राय के विरुद्ध था

इस बीच हमें भी इस मामले में पहल कर दोनों से निर्णय वापस लेने, राष्ट्रपति और देश से माफ़ी मांगने और त्यागपत्र देने की मांग करनी चाहिए आप सभी मित्रों से अनुरोध है कि नीचे लिखा गया प्रस्ताव कुछ फेसबुक पेजों पर पोस्ट करें और सुप्रीम कोर्ट को ईमेल करें:

“जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस महादेवन से हम मांग करते हैं कि वे राष्ट्रपति को आदेश देने वाले अपने निर्णय को वापस लें जिसमें उन्हें समय सीमा में राज्यों के बिल पारित करने के लिए कहा था और लंबित बिल स्वयं पास कर दिए थे जिसका उन्हें कोई संवैधानिक अधिकार नहीं था जो सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं अपनी राय में स्पष्ट कर दिया है; अतः हम मांग करते हैं कि दोनों जज न केवल अपना निर्णय वापस ले बल्कि राष्ट्रपति से, जो संविधान प्रमुख हैं और देश से माफ़ी मांगे और तुरंत त्यागपत्र दें क्योंकि उन्होंने अपनी न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण कर राष्ट्रपति और संविधान का अपमान किया है और चीफ जस्टिस सूर्यकांत उन्हें ऐसा करने के आदेश दें क्योंकि वह आदेश राष्ट्रपति के अधिकारों को कुचलने वाला एक ‘आतंकवादी आदेश’ था”

इस प्रस्ताव को हर कोई मित्र Law Beat, Live Law, Bar & Bench, Supreme Rights, PMO India, President of India, Vice President of India, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, अमित शाह के फेसबुक पेज पर पोस्ट करें और सुप्रीम कोर्ट को उनके ईमेल एड्रेस 

supremecourt@nic.in पर ईमेल करें -

आशा करता हूं सभी मित्र इस काम में सहयोग करेंगे

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