हिंदुओं पर अत्याचार के 1000+ मामलों के साथ UN में एक्टिविस्ट ने खोला बांग्लादेश सरकार का काला चिट्ठा

बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर UNCHR में बताया गया है
5 अगस्त 2024 वह दिन था जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को बिना किसी औपचारिकता के सत्ता से हटा दिया गया। यही दिन हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और गरिमा के अंत का प्रतीक भी बन गया क्योंकि इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं को चुन‑चुनकर मारने, लूटने और बलात्कार करने के लिए निशाना बनाना शुरू कर दिया। साथ ही उनके मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा‑फोड़ा और अपवित्र किया गया।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) द्वारा आयोजित ‘फोरम ऑन माइनॉरिटी इश्यूज’ के 18वें सत्र में बोलते हुए बांग्लादेशी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता दिपन मित्रा ने इस्लामियों द्वारा बांग्लादेशी हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों की घटनाओं को उजागर किया।

28 नवंबर को आयोजित इस सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान, ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष दिपन मित्रा ने कहा कि 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से ही हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यक समुदाय लगातार राज्य और समाजिक स्तरों पर भेदभाव का सामना करते रहे हैं।

हालाँकि अब स्थिति ने ‘भयावह रूप’ ले लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी समुदायों के ‘जातीय सफाए’ की एक व्यवस्थित प्रक्रिया चल रही है।

हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं का रेप और जबरन धर्मांतरण

 बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे इस्लामी अपराधों को उजागर करते हुए दिपन मित्रा ने बताया कि पिछले एक वर्ष में 183 से अधिक हिंदुओं की हत्या की गई है। 219 हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है।

हजारों हिंदू घरों और व्यवसायों पर हमले हुए, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया और आग के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा, हिंदू और बौद्ध समुदाय की 78 लड़कियों का जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया।

उन्होंने कहा कि ईशनिंदा के आरोप लगाकर हिंदुओं पर हमले, हिंदू मठों और मंदिरों पर कब्जा और हिंदू व्यापारियों से वसूली बांग्लादेश में रोजमर्रा की घटनाएँ बन चुकी हैं। उन्होंने कहा, “ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब हिंदुओं की संपत्ति जब्त न की जाए, घरों पर हमला न हो, तोड़फोड़ और आगजनी न की जाए।”

अगस्त 2024 में ऑपइंडिया ने कई मामलों पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिनमें मुस्लिम भीड़ ने हिंदू मंदिरों और घरों पर हमले किए थे। उस समय, अल जजीरा, न्यूयॉर्क टाइम्स और DW जैसे वामपंथी मीडिया संस्थानों ने हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को ‘राजनीतिक बदला’ बताकर कमतर दिखाने की कोशिश की थी, यह कहते हुए कि हिंदू समुदाय ने अवामी लीग का समर्थन किया था।

हालाँकि वास्तविकता यह है कि कुछ घटनाओं में भीड़ ने अवामी लीग के हिंदू नेताओं को निशाना बनाया, लेकिन हमले केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या बदले तक सीमित नहीं थे। हिंदू मंदिरों पर नाटोर, ढाका के धामराई, पाटुआखाली के कलापारा, शरियतपुर और फरीदपुर में हमले हुए।

जेसोर, नोआखाली, मेहरपुर, चांदपुर और खुलना में हिंदू घरों को निशाना बनाया गया। दिनाजपुर में 40 हिंदू दुकानों को तोड़ा‑फोड़ा गया। ये घटनाएँ तब सामने आईं जब 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को भारत भागने पर मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद से जब से मोहम्मद यूनुस ने गैर‑निर्वाचित अंतरिम सरकार के सलाहकार के रूप में पदभार संभाला है, हिंदुओं पर नफरत, उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार और लूट के मामले लगातार बढ़ते गए हैं। इस्लामवादी समूह पहले से कहीं अधिक साहस के साथ हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं को जबरन नौकरियों से हटाया जा रहा

सम्मेलन में दिपन मित्रा ने यह भी बताया कि हिंदू अधिकारियों और शिक्षकों को व्यवस्थित रूप से नौकरी से हटाने का अभियान चल रहा है। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग के सचिव अशोक कुमार देबनाथ, प्राथमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक उत्तम कुमार दास, प्रेस काउंसिल के सचिव श्यामल चंद्र कर्मकार, कोलकाता स्थित उप‑राजदूतावास के प्रेस सचिव रंजन सेन और कनाडा स्थित उच्चायोग की काउंसलर अपर्णा रानी पाल को पद से हटा दिया गया है।”

BHRJ अध्यक्ष ने आगे कहा कि पिछले एक वर्ष में 176 हिंदू शिक्षकों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से इस्तीफा देने या हटाए जाने पर मजबूर किया गया। उन्होंने कहा, “इसके अलावा, 100 से अधिक हिंदू पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किया गया, जिनमें कृष्णपद रॉय भी शामिल हैं। 2024 में राजशाही सरदा पुलिस अकादमी में चुने गए 252 सब‑इंस्पेक्टरों में से 99 हिंदू, 2 बौद्ध और 1 ईसाई को हटा दिया गया।”

उन्होंने बताया कि मोहम्मद युनुस की सरकार में गृह मंत्रालय ने पुलिस प्रमुख बहारुल आलम को निर्देश दिया है कि किसी भी हिंदू को पुलिस में नियुक्त न किया जाए। भेदभाव अर्धसैनिक बलों तक भी पहुँच गया है। 2025 में बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) में 693 लोगों की भर्ती हुई, लेकिन उनमें एक भी अल्पसंख्यक नहीं था।

हिंदू डॉक्टरों को भी अस्पतालों के महत्वपूर्ण पदों से हटाया जा रहा है। यहाँ तक कि प्रसिद्ध डॉक्टर समंतलाल सेन पर झूठा हत्या का मामला दर्ज किया गया। उन्होंने कहा, “यहाँ तक कि बांग्लादेश के प्रसिद्ध डॉक्टर समंतालाल सेन को भी झूठे मर्डर केस में फँसा दिया गया है।”

पिछले वर्ष ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि इस्लामी समूहों ने हिंदू बुद्धिजीवियों और पेशेवरों को परेशान कर नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया। कई लोगों को सिर्फ अपनी धार्मिक पहचान के कारण बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। सिर्फ अगस्त 2024 में ही 60 हिंदू शिक्षक, प्रोफेसर और सरकारी अधिकारी इस्तीफा देने पर मजबूर हुए।

समय के साथ स्थिति और भी खराब होती गई। अक्टूबर में हिंदू पत्रकार लिटन कुमार चौधरी पर सिटाकुंडा में भीड़ ने हमला किया। उस पर असद बहिनी के ग्रुप के लोगों ने हमला किया था। मुस्लिम हमलावरों ने लिटन कुमार चौधरी को ‘अवामी लीग एजेंट’ कहकर बदनाम किया और उन पर ‘फेक न्यूज फैलाने’ का आरोप लगाया।

इस वर्ष जुलाई में, बांग्लादेश के चिटगाँग विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों ने एक हिंदू प्रोफेसर डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती को परेशान किया और उनकी पदोन्नति रोक दी। छात्र पहले से योजना बनाकर कार्यालय भवन के बाहर इकट्ठा हुए और हंगामा शुरू कर दिया।

इनमें से कई छात्र इस्लामी छात्र शिबिर (ICS) के सदस्य थे, जो बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का छात्र संगठन है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार दबाई जा रही है। नास्तिकों, लेखकों और ब्लॉगर्स की हत्या की जा रही है या उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष ने आगे कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अधिकार नहीं है। संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रोकने के लिए दबाव डाला जा रहा है और सभी प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों को बंद कराया जा रहा है।

नवंबर में यह रिपोर्ट किया गया कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में संगीत और शारीरिक शिक्षा के सहायक शिक्षकों के पदों को खत्म कर दिया। यूनुस शासन का यह फैसला साफ तौर पर मुस्लिमों को खुश करने का प्रयास था, क्योंकि बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन लंबे समय से संगीत शिक्षकों की जगह इस्लामी स्कॉलर्स की भर्ती की माँग कर रहे थे।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के विश्लेषण के अनुसार, 2013 से अब तक बांग्लादेश में कई धर्मनिरपेक्ष नास्तिकों, लेखकों, ब्लॉगर्स और प्रकाशकों की आतंकवादियों द्वारा हत्या की गई है या वे गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

2023 से अब तक कम से कम 12 स्वतंत्र विचारकों और ब्लॉगर्स की हत्या की गई है। सैकड़ों धर्मनिरपेक्ष नास्तिक, लेखक और ब्लॉगर्स अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़कर विदेश भागने पर मजबूर हुए हैं।

यूनुस जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर बांग्लादेश को इस्लामी देश बनाना चाहते हैं, भारत ही आखिरी उम्मीद”- ऑपइंडिया से बोले BHRJ अध्यक्ष

ऑपइंडिया से बातचीत में दिपन मित्रा ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति दिन‑प्रतिदिन खराब होती जा रही है। उनके अनुसार, यूनुस सरकार के तहत हिंदू ‘सबसे अधिक असुरक्षित’ स्थिति में हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष में एक भी हिंदू को किसी महत्वपूर्ण सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया गया। मित्रा ने कहा कि इस्लामवादी हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बना रहे हैं, जबकि मोहम्मद यूनुस बार‑बार भारत और भारतीय मीडिया को दोष देते हैं और हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘बढ़ा‑चढ़ाकर पेश करने’ की बात कहकर खारिज करते हैं।

उन्होंने कहा, “यूनुस पूरी तरह इस्लामवादी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं को निशाना बना रहा है। मुझे नहीं लगता कि वह अगले साल चुनाव होने देगा और अगर होने भी दिए, तो वह सुनिश्चित करेगा कि जमात‑ए‑इस्लामी और उसके सहयोगी सत्ता में आएँ। उसका लक्ष्य बांग्लादेश को एक इस्लामी देश बनाना है।”

यूनुस के इस्लामी एजेंडे पर आगे कहते हुए मित्रा ने ऑपइंडिया को बताया कि शेख हसीना की अवामी लीग को अगले चुनावों से प्रतिबंधित करने के बाद, अंतरिम सरकार का सलाहकार अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को भी सत्ता की दौड़ से बाहर करने की कोशिश कर रहा है।

गौरतलब है कि यूनुस के कार्यकाल में प्रतिबंधित, भारत‑विरोधी और इस्लामवादी संगठन जमात‑ए‑इस्लामी को फिर से वैध कर दिया गया, इस्लामवादी नेताओं को जेल से रिहा किया गया, जबकि अवामी लीग के नेताओं पर कार्रवाई और तेज कर दी गई।

दिपन मित्रा ने यह भी कहा कि यूनुस ने बीमार पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के बेटे और BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारीक रहमान को अपनी माँ से मिलने के लिए बांग्लादेश आने की अनुमति नहीं दी।

रहमान वर्तमान में ब्रिटेन में रहते हैं। मित्रा के अनुसार, यूनुस शासन केवल दिखावे के लिए उनकी वापसी की बात करता है, लेकिन असल में उनकी वापसी को कभी संभव नहीं होने देता।

मित्रा ने भारतीय सरकार से अपील की कि वह यूनुस शासन पर दबाव बनाए और हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बजाय इसके कि वह इस्लामवादियों के साथ खड़ा हो या जवाबदेही से बचता रहे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए अब भारत और भारतीय सरकार ही अंतिम आशा हैं।

उन्होंने कहा, “भारत हमारी आखिरी उम्मीद है। भारत चुप नहीं रह सकता। बहुत देर होने से पहले भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। इस्लामवादी या तो सभी हिंदुओं को मारना चाहते हैं या उन्हें धर्मांतरित करना चाहते हैं। अफगानिस्तान कभी हिंदू था, पाकिस्तान में हिंदू आज भी जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब बांग्लादेश भी उसी दिशा में जा रहा है। भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं को बचाने के लिए पहल करनी ही होगी।”

चिन्मय कृष्णा दास को फर्जी मामले में जेल भेजा गया

UNHCR फोरम में दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास के मामले को विशेष रूप से उठाया। चिन्मय कृष्ण दास एक ISKCON भिक्षु हैं, बांग्लादेश के सनातन जागरण मंच के प्रवक्ता हैं और चिटगाँग स्थित पुंडरीक धाम के प्रमुख भी हैं।

उन्हें संदिग्ध और मनगढ़ंत ‘राजद्रोह’ के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। जबकि असलियत यह है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू अधिकारों की वकालत कर रहे थे और देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मित्रा ने फोरम का ध्यान हिंदुओं और अन्य गैर‑मुस्लिम समुदायों के धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की ओर भी आकर्षित किया।

उन्होंने कहा, “एक निर्दोष ISKCON भिक्षु, चिन्मय कृष्ण दास प्रभु, को बिना किसी आरोप के एक साल से जेल में रखा गया है। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने अल्पसंख्यक हिंदुओं और बौद्धों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया। बांग्लादेश में गैर‑मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं बची है। पिछले एक वर्ष में सैकड़ों मठों और धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया है और आग के हवाले किया गया है। 23 जनवरी को वर्ल्ड सूफी ऑर्गनाइजेशन ने नेशनल प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि अगस्त 2024 से अब तक कम से कम 99 धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं।”

दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की माँग की। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब चुप नहीं रह सकता। दुनिया को आगे आकर बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठानी होगी और उनके सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

नवंबर में, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के प्रसिद्ध बाउल गायक अबुल सरकार को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक संगीत प्रस्तुति के दौरान इस्लाम और अल्लाह के खिलाफ ‘ईशनिंदा’ वाले बयान दिए।

यह गिरफ्तारी मुफ़्ती मोहम्मद अब्दुल्ला की शिकायत पर हुई। गिरफ्तारी के बाद, अबुल सरकार को ‘तौहीदी जनता’ और ‘आलिम‑उलमा’ जैसे संगठनों से जुड़े उग्र मुस्लिम भीड़ों ने अदालत परिसर के बाहर घेर लिया। माणिकगंज की सड़कों पर ‘एकটা দুইটা বাউল ধর, ধইরা ধইরা জবাই কর’ (एक‑एक बाउल को पकड़ो और मार डालो) जैसे नारे गूंजते रहे।

एक अन्य घटना बांग्लादेश में बढ़ती इस्लामी कट्टरता और असहिष्णुता को दर्शाती है। कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों ने 19वीं सदी के महान सूफी‑संत और लोककवि फकीर लालन शाह के सम्मानित समाधि‑स्थल को ध्वस्त करने की सार्वजनिक धमकी दी। लालन शाह की समन्वयवादी (syncretic) दर्शनशैली लंबे समय से इस क्षेत्र में सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक रही है।

बांग्लादेश में बढ़ता ‘आतंकवाद’

बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता और उग्रवाद पर भी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने आगे बात की। उन्होंने बताया कि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश की विभिन्न जेलों से सैकड़ों उग्रवादी और अपराधी फरार हो गए थे। उन्होंने कहा, भागे हुए कैदियों में से 70 आतंकियों के साथ 700 अपराधियों को अब तक गिरफ्तार नहीं किए जा सका है।

पहाड़ी जनजातियों को मिटाने के एजेंडे पर काम कर रहे इस्लामवादी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस्लामी जिहादी और बांग्लादेशी सेना मिलकर आदिवासी समुदायों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं। दिपन मित्रा ने एक विशेष घटना का उल्लेख किया, जिसमें बंगाली मुस्लिम बसने वालों और सेना ने खागड़चारी और रंगामाटी में पहाड़ी जनजातियों पर हिंसक हमला किया।

उन्होंने कहा, “इस बर्बर हमले में 8 आदिवासी लोगों की हत्या कर दी गई और 100 से अधिक घायल हुए। सभी पहाड़ी जनजातियों से थे।” उन्होंने आगे बताया कि दीघिनाला में 175 दुकानें और रंगामाटी में कम से कम 200 छोटे‑बड़े व्यवसाय क्षतिग्रस्त हुए।

इस्लामवादियों ने रंगामाटी स्थित चिटगाँग हिल ट्रैक्ट्स रीजनल काउंसिल के कार्यालय पर भी हमला किया और 9 कारों और 1 मोटरसाइकिल को आग लगा दी। इसके अलावा, इस्लामवादियों ने बौद्ध धार्मिक संस्था मैत्री विहार में तोड़फोड़ और लूटपाट की।

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