यमलोक के द्वार पर बहने वाली 'वैतरणी नदी' का रहस्य

जो भी धरती पर आया है उसे मृत्युलोक को प्राप्त करना है इसका लेखाजोखा यमराज के पास होता है। लेकिन उसके पाप-पुण्य का निर्णय धर्मराज चित्रगुप्त जी महाराज करते हैं। लेकिन धरती से लेकर धर्मराज तक पहुँचने में आत्मा को अनेक पड़ाव से गुजरना पड़ता है। इन पड़ावों में कई दुर्गम पड़ाव ऐसे होते हैं जिन्हे आत्मा अपने जीवनकाल में किये दान-पुण्यों और बड़ों को दिए जाने पर हृदय से निकले आशीर्वाद के कारण सुगमता से पार करने में सक्षम कर देते हैं। इसीलिए शास्त्र बड़ों का सम्मान करने की शिक्षा देते हैं। माँ के चरणों में अगर स्वर्ग है तो उसका द्वार पिता के चरणों में होता है। घर में आए किसी भी अतिथि(परिचित अथवा अपरिचित) का आदर-सम्मान देने से परमपिता को प्रसन्न करना होता है। अगर घर पर किसी भी अतिथि पर अगर जल भी दिया तो जो घूंट गले से उतरता है दिल से निकला आशीर्वाद कर्म में लिखा जाता है। पता नहीं कब से उसने पानी या कुछ अन्न नही लिया है। यह सब निर्भर करता है संस्कारों पर।
हमारे शास्त्रों (गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण) में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी यात्रा के दौरान नरक लोक और यमलोक की सीमा पर एक भयानक नदी स्थित है, जिसे 'वैतरणी' कहा जाता है।
कैसी होती है यह नदी?
यह कोई सामान्य जल की नदी नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, यह रक्त, कीचड़, पीप, और विषैले पदार्थों से भरी है। इसका 'जल' तेजाब के समान खौलता रहता है। इसमें भयंकर साँप, बिच्छू और मगरमच्छ जैसे जीव आत्माओं को कष्ट देने के लिए रहते हैं।
इस नदी में कौन गिरता है?
गरुड़ पुराण के अनुसार, अपने जीवन में कुकर्म करने वाले लोग इस नदी में धकेले जाते हैं:
माता-पिता, गुरु और साधुओं का अपमान करने वाले।
झूठ, छल-कपट और धोखा देने वाले।
गौ-हत्या या गौ-अपमान करने वाले।
लोभी और दान न करने वाले व्यक्ति।
वैतरणी पार कैसे होती है? (गौदान का महत्त्व)
यहीं पर 'गौदान' का सबसे बड़ा महत्व बताया गया है। जिसने जीवन में निस्वार्थ भाव से गौदान किया हो, मृत्यु के पश्चात वह गाय उस आत्मा को इस भयानक नदी से पार लगाती है।
क्या है वैतरणी दान?
मृत्यु के समय या श्राद्ध पक्ष में किया जाने वाला एक विशेष दान, जिससे आत्मा को यह नदी पार करने में सहायता मिलती है।
सामग्री: काले रंग की गाय (या प्रतीकात्मक), तिल, लोहा, कंबल, जल पात्र आदि।
बचाव का मार्ग (आध्यात्मिक संदेश)
वैतरणी नदी केवल भय का प्रतीक नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। इससे बचने का उपाय है—जीवन में धर्म, करुणा, सत्य और गौ-सेवा का मार्ग अपनाना।
अच्छे कर्म ही परलोक में साथी बनते हैं।

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