केजरीवाल को महान क्रांतिकारी बताने वाले पुण्य प्रसून बाजपेयी की फिर हो रही फजीहत

कौन पत्रकार किसे समर्थन देता और क्यों, यह उसका व्यक्तिगत विषय है, किसी को तर्क-वितर्क नहीं करना चाहिए। परन्तु जब कोई सीमाओं का उल्लंघन कर पत्रकारिता करे, उस स्थिति में उसकी पत्रकारिता पर उंगली उठना सही है। 

पुण्य प्रसून एक्सपोज़ उस समय ज्यादा हुए जब नरेंद्र मोदी लहर की फुस निकालने के लिए अरविन्द केजरीवाल को महान क्रांतिकारी सिद्ध करने वाले साक्षात्कार की क्लिपिंग लीक होने से आजतक चैनल की भी बहुत किरकिरी हुई थी। 
अब फिर कांग्रेस के करीबी पक्षकार पुण्य प्रसून बाजपेयी को सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर यूजर्स लताड़ रहे हैं। असल में पुण्य प्रसून बाजपेयी ने किसान आंदोलन को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिए बगैर एक ट्वीट किया। पुण्य प्रसून बाजपेयी के ट्वीट करते ही यूजर्स उन्हें ट्रोल करने लगे। आप भी देखिए…

 

                             केजरीवाल को क्रांतिकारी सिद्ध करने वाला लीक साक्षात्कार 
प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में अपनी पत्रकारिता का वजूद तलाशते पुण्य प्रसून बाजपेयी

प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विरोध की हवा को बनाए रखना, पत्रकारों के एक खास समूह की आदत बन गई है। इन पत्रकारों को प्रधानमंत्री मोदी का हर मुद्दे पर विरोध करने में ही सच्ची पत्रकारिता नजर आती है और इस काम में वे दिन-रात लगे रहते हैं। ऐसे ही एक पत्रकार हैं पुण्य प्रसून बाजपेयी, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में हाथों को मसलते हुए टीवी पर एंकरिंग करने में बड़ा ही मजा आता है। ऐसा न करने पर इस एजेंडा पत्रकार को अपना अस्तित्व खतरे में दिखाई पड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में अपना वजूद तलाशने वाले टीवी एंकर पुण्य प्रसून बाजपेयी की सोशल मीडिया पर टिप्पणियों को पढ़ने से लगता है कि वे प्रधानमंत्री मोदी से हद दर्जे तक नफरत करते हैं। आइए, आपको भी पुण्य प्रसून बाजपेयी की उस पत्रकारिता से रूबरू कराते हैं, जिसमें उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से नफरत करने में ही अपने अस्तित्व का अहसास होता है।

मोदी विरोध में पत्रकारिता के वजूद की तलाश-1 
13 दिसंबर 2017 को पुण्य प्रसून बाजपेयी ने Twitter पर प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में जिस अमर्यादित तरीके से नफरत भरी टीप्पणी की उसे पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि इस पत्रकार की सोच असंतुलित ही नहीं, घृणा से भरी है। आप भी उस Tweet को देखिए-

2. एजेंडा पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी हर किसी मुद्दे पर कोई न कोई कुतर्क गढ़कर प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने में अपनी शान समझते हैं। गुजरात चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की सोच को उचित परिपेक्ष्य में देखने की जगह, अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए 12 दिसंबर के Tweet में लिखा-


3. 
पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के 23 जनवरी के Tweet को देखकर लगता है कि दावोस में भी प्रधानमंत्री मोदी का जाना इनको नागवार गुजरा और इनके शैतानी दिमाग के कुतर्क पढ़कर हैरानी हुई कि यह पत्रकार प्रधानमंत्री मोदी के विरोध के लिए कुछ भी लिख सकता है। उस Tweet को आप भी पढ़िए-

4. किसी भी स्वाभाविक घटना को पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसा एजेंडा पत्रकार किस तरह से प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने के औजार के रुप में प्रयोग करता है, इसे उस Tweet को पढ़कर समझा जा सकता है, जो उन्होंने 1 फरवरी को वित्तमंत्री अरुण जेटली के बजट पेश करने पर किया था। वित्त मंत्री अरुण जेटली की हिन्दी बोलने में यदा-कदा लड़खड़ाहट को जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के विरोध के लिए इस्तेमाल किया, उससे साफ अंदाजा लग जाता है कि इनका एकमात्र काम ही यही है-

5. एजेंडा पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का मौका तलाश लेते हैं। 7 दिसंबर के Tweet में अपने कुतर्कों के सहारे झूठ को सच के रुप में पेश किया। इस Tweet को पढ़कर लगता है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी, कहीं की ईंट कहीं के रोड़े को इकट्ठा करके भानुमति का कुनबा बनाने में माहिर हैं-

6. 20 जनवरी को पुण्य प्रसून बाजपेयी ने Twitter पर प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में एक और ट्वीट किया। इस ट्वीट से यह साफ हो जाता है कि उनका एक मात्र मकसद है, कोई भी समस्या हो उसे प्रधानमंत्री मोदी से जोड़ दो।

7. एजेंडा पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी खुद को अन्य सभी से हर मामले में उच्च मानते हैं, यहां तक कि पत्रकार बिरादरी में भी किसी को अपने पांव के नाखून के बराबर भी नहीं समझते। अपने इस अहंकार में डूबे पुण्य प्रसून ने 14 दिसंबर को एक Tweet में प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने के लिए सभी राजनेताओं, पत्रकारों और संपादकों पर अमर्यादित टिप्पणी करते हुए लिखा-

8. 19 सितंबर को एजेंडा पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में अमर्यादित टिप्पणी करते हुए लिखा-

जिस देश में पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे एजेंडा पत्रकार प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में अपने वजूद की तलाश करते हों, उस देश के विकास में पत्रकारिता की कितनी सकारात्मक भूमिका होगी, इसका उत्तर किसी से छिपा नहीं है।

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