इस्लामियों ने 5 करोड़ रूपए चंदे का देखा था सपना, ‘उम्माह’ से 1.5 करोड़ रूपए भी नहीं मिला: अयोध्या में ‘बड़ा मस्जिद’ बनाने का सपना टूटा, अब बनेगी छोटी सी इमारत


बाबरी मस्जिद के नाम पर मुसलमानों ने करोड़ों रूपए फूंक दिए। ईरान को मदद देने 18 करोड़ इकठे करने वाला मुसलमान अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिली जमीन पर मस्जिद बनाने के लिए किसी मुस्लिम मुल्क से मदद नहीं मिल रही। भारत का इस्लामिक कट्टरपंथी भारत की तरह उम्माह और दूसरे मुस्लिम संगठनों को भी बेवकूफ समझता है। वो भी समझता है कि आज की तारीख में भारत का मुसलमान इतना गरीब नहीं कि मस्जिद के लिए खैरात/जकात देने की हैसियत नहीं। राममन्दिर बनकर तैयार हो गया लेकिन इस्लामी हाथ में कटोरा लिए घूम रहा है।   

अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धन्नीपुर में बनने वाली मस्जिद परियोजना का पूरा ढांचा ही ध्वस्त हो गया है। भव्य राम मंदिर के निर्माण पर तमाम तरह की बयानबाजी करने वाले और राम विरोधियों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि अब मुस्लिम समुदाय की बेरुखी और चंदे के महासंकट के कारण इस मस्जिद का आकार बेहद छोटा कर दिया गया है।

इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) ने अस्पताल और लाइब्रेरी जैसी बड़ी योजनाओं को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया है। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में 5 एकड़ जमीन आवंटित की थी। यह जगह राम मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर लखनऊ-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।

इस जमीन पर पहले एक बेहद भव्य मस्जिद बनाने का बड़ा दावा किया गया था। इस परियोजना में मुख्य मस्जिद के साथ-साथ एक 300 बिस्तरों का मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, एक समृद्ध केंद्रीय पुस्तकालय और कम्युनिटी किचन बनाने का पूरा खाका तैयार था। लेकिन खुद मुस्लिम समुदाय ने ही इस परियोजना से पूरी तरह मुँह मोड़ लिया। अपनों की इस भारी बेरुखी के कारण अब यह पूरा भव्य प्रोजेक्ट औंधे मुँह गिर गया है।

चंदे की भारी किल्लत, तिजोरी में नहीं बचा पैसा

जो लोग भव्य राम मंदिर को लेकर आए दिन मीडिया में बड़ी-बड़ी बयानबाजी करते थे, आज उनके खुद के प्रोजेक्ट के लिए चंदे का बड़ा अकाल पड़ गया है। फाउंडेशन के सचिव अतहर हुसैन ने साफ किया कि अब इस जगह पर केवल एक ‘छोटी मस्जिद’ का निर्माण किया जाएगा।

इस छोटी सी मस्जिद को बनाने के लिए भी कम से कम 3 करोड़ से 5 करोड़ रुपए के फंड की जरूरत है। लेकिन असलियत यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी फाउंडेशन अब तक सिर्फ 1.5 करोड़ रुपए का ही चंदा जुटा पाया है। यह रकम इस योजना के लिए पूरी तरह नाकाफी साबित हुई है, जिसके कारण ट्रस्ट को घुटने टेकने पड़े हैं।

खुद के फायदे के लिए सरकारी फंड के इस्तेमाल पर टिकी निगाहें

मुस्लिम समुदाय से अपेक्षित चंदा और सहयोग न मिलने के कारण अब ट्रस्ट की हालत खराब है। सूत्रों के अनुसार, चंदा इकट्ठा करने में नाकाम रहने के बाद अब अंदरखाने सरकारी सहायता और फंड को अपने तरीके से इस्तेमाल करने की जुगत लगाई जा रही है।

आईआईसीएफ के अध्यक्ष जुफर अहमद फारूकी ने खुद माना कि समुदाय की ओर से इस प्रोजेक्ट को लेकर भारी उदासीनता और अरुचि देखी जा रही है। लोगों ने इस काम के लिए बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाई, जिससे चंदे का यह संकट खड़ा हुआ है।

प्रशासनिक लेटलतीफी और नक्शे का पेंच

परियोजना के समय पर शुरू न हो पाने के पीछे केवल पैसों की कमी ही नहीं थी। ट्रस्ट की प्रशासनिक और तकनीकी कमियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार रहीं। अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) से मस्जिद और पूरे परिसर का नक्शा पास कराने की प्रक्रिया में ट्रस्ट को लंबा वक्त लग गया।

शुरुआत में इस 5 एकड़ की जमीन के लैंड यूज (भू-उपयोग) को बदलने में पेंच फँसा। इसके बाद विकास शुल्क (डेवलपमेंट चार्ज) के रूप में एक बड़ी सरकारी राशि जमा करने की तकनीकी बाध्यता सामने आई। हालाँकि बाद में विकास प्राधिकरण ने इस नक्शे को मंजूरी दे दी थी, लेकिन तब तक बजट का संकट इतना बढ़ गया कि ट्रस्ट जमीन पर कोई भी काम शुरू नहीं कर सका।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ बदहाली

अयोध्या का यह विवाद दशकों पुराना रहा है। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पूरे देश में बड़े दंगे हुए थे, जिसमें करीब 2,000 लोग मारे गए थे। इसके बाद साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी जमीन का मालिकाना हक हिंदुओं को सौंपते हुए भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था।

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को पूरा करते हुए उस पवित्र स्थान पर एक बेहद भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले इस मंदिर का भव्य उद्घाटन भी किया था।

राम मंदिर को लेकर छिड़ा ताजा राजनीतिक घमासान

एक तरफ जहाँ मस्जिद का काम पूरी तरह ठप हो चुका है, वहीं राम मंदिर का प्रबंधन भी इस समय राजनीतिक हमलों का सामना कर रहा है। मंदिर के चंदे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के कुछ आरोपों के बाद हाल ही में इसके प्रबंधन और नेतृत्व में बड़ा फेरबदल किया गया है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसे देखते हुए विपक्षी दल इस मामले को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तमाम विवादों के बीच, मस्जिद का भव्य सपना टूटना और इसका आकार बेहद छोटा होना अब सबसे बड़ी सच्चाई बन चुका है।

उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का खात्मा ‘एक देश, एक शिक्षा’ का शंखनाद, 6 अल्पसंख्यक समुदायों के लिए 6 प्रमुख अधिकार


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। देवभूमि का यह ऐतिहासिक फैसला मात्र एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि तुष्टीकरण की राजनीति पर करारा प्रहार है। मदरसा बोर्ड के स्थान पर 1 जुलाई 2026 से ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) लागू कर दिया गया है। यह कदम देश की मुख्यधारा से कटी हुई शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक साहसिक क्रांति की शुरुआत है। दशकों से धार्मिक तुष्टीकरण की छांव में फल-फूल रहे समानांतर शिक्षा तंत्र पर यह अब तक का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रहार है। 

उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने एक विशेष समुदाय के लिए बने अलग बोर्ड को उखाड़ फेंका है। इस ऐतिहासिक फैसले का प्रभाव देश के अन्य राज्यों में भी धीरे-धीरे होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि आधुनिक भारत में शिक्षा का आधार मध्यकालीन मजहबी संकीर्णता नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र निर्माण और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ही हो सकता है।

धामी सरकार की मदरसा बोर्ड को खत्म करने की असली वजह
उत्तराखंड सरकार का यह कदम राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की उन चिंताओं और रिपोर्टों का सीधा नतीजा है, जिसमें देश भर के मदरसों में बच्चों को बुनियादी और आधुनिक शिक्षा के अधिकारों से वंचित रखने की बात कही गई थी। सरकार का यह मानना है कि मदरसा बोर्ड के तहत बच्चे केवल धार्मिक किताबों और भाषाओं तक सीमित होकर रह जाते थे, जिससे वे डॉक्टर, इंजीनियर, सीए या प्रशासनिक अधिकारी बनने की दौड़ में पिछड़ जाते थे। दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि कई मदरसों में अपारदर्शिता और कथित अवैध गतिविधियों की जानकारियां भी सामने आईं। राज्य में कई ऐसे गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे चल रहे थे, जिनकी फंडिंग और पाठ्यक्रम का कोई अता-पता नहीं था। ‘वन नेशन, वन एजुकेशन (एक राष्ट्र, एक शिक्षा) के विजन को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने इस विशेष रियायत को समाप्त करना ही उचित समझा।

राज्य के हजारों मदरसों की मनमानी अब पूरी तरह बंद होगी
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य में पंजीकृत कुल 452 से 456 मदरसों का ढांचा रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन उनके संचालन के नियम जरूर पूरी तरह बदल जाएंगे। अब कक्षा 8वीं तक के मदरसों को जिला स्तर पर और कक्षा 9वीं से 12वीं तक के मदरसों को ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड’ से संबद्धता लेनी होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब मदरसों की मनमानी समाप्त होगी। उन्हें राज्य के शिक्षा विभाग द्वारा तय मानकों जैसे, बुनियादी ढांचा, शिक्षकों की योग्यता और प्रशासनिक पारदर्शिता का कड़ाई से पालन करना होगा। जो मदरसे इन मानकों को पूरा नहीं करेंगे, वे बंद कर दिए जाएंगे, जैसा कि पूर्व में भी मानकों का उल्लंघन करने वाले 250 से अधिक मदरसों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

विशेष धर्म के शिक्षण संस्थानों का वीआईपी ट्रीटमेंट बंद होगा
मदरसा बोर्ड की जगह ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) के अस्तित्व में आने से सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि अब किसी एक विशेष धर्म के शिक्षण संस्थानों का अलग वीआईपी ट्रीटमेंट बंद हो जाएगा। अब तक केवल मुस्लिम समुदाय के मदरसों के लिए विशेष नियम और सहूलियतें थीं, लेकिन अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक संस्थान एक ही छत के नीचे आएंगे। यह प्राधिकरण एक वैधानिक और संप्रभु निकाय के रूप में काम करेगा, जो किसी भी संस्थान की मान्यता पर अंतिम फैसला लेगा। सबसे क्रांतिकारी बदलाव यह होगा कि अब इन संस्थानों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत एनसीईआरटी (NCERT) का पाठ्यक्रम अनिवार्य रूप से लागू होगा।

इस नए नवेले उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के मुख्य कार्य और अधिकार 

  1. नियमन और संचालन: यह प्राधिकरण राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के नियमन (Regulation), मान्यत (Recognition) और संचालन की जिम्मेदारी संभालेगा।
  2. अनिवार्य संबद्धता: सभी अल्पसंख्यक स्कूलों और मदरसों को शिक्षा विभाग से संबद्धता दिलाने की निगरानी करना।
  3. तीन वर्षीय मान्यता प्रणाली: मानकों की जांच के बाद केवल 3 साल के लिए ऑनलाइन मान्यता प्रमाण पत्र जारी करना।
  4. धार्मिक शिक्षा के लिए अलग पंजीकरण: यदि कोई संस्थान धार्मिक शिक्षा देना चाहता है, तो उसे अलग से पंजीकरण कराना होगा और तय शुल्क (8वीं तक 5000 रुपये और 12वीं तक 7500 रुपये) देना होगा।
  5. जबरन धार्मिक गतिविधियों पर रोक: प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि किसी भी छात्र या स्टाफ को उसकी मर्जी के बिना धार्मिक प्रथाओं में शामिल होने के लिए मजबूर न किया जाए।
  6. निरीक्षण और ऑडिट: सरकारी और केंद्रीय योजनाओं (जैसे पीएम-पोषण या मिड-डे मील) के क्रियान्वयन की सख्त निगरानी और फंड का ऑडिट करना।
इन समुदायों को प्राधिकरण से क्या बड़ा फायदा मिलेगा?
उत्तराखंड सरकार का यह कदम वास्तव में समावेशी और धर्मनिरपेक्ष है, क्योंकि इसके तहत केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों को एक समान कानूनी दायरे में लाया गया है। इस प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में मुस्लिमों के साथ-साथ अब सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को भी शामिल किया गया है। अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक दर्जे और उससे मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का बड़ा हिस्सा केवल एक विशेष समुदाय (मदरसा तंत्र) तक सीमित था। इस नए प्राधिकरण के गठन से सिखों के स्कूल, ईसाइयों के कॉन्वेंट, जैन, बौद्ध और पारसी संस्थानों को भी समान अवसर और कानूनी मान्यता की पारदर्शी व्यवस्था मिलेगी। सबसे बड़ा फायदा छात्रों को होगा।
पांचों अल्पसंख्यक समुदायों ने इस फैसले का किया स्वागत
यह स्वाभाविक है कि किसी भी स्थापित और पारंपरिक व्यवस्था को बदलने पर प्रतिरोध होता है। इस फैसले के बाद कुछ मुस्लिम धार्मिक संगठनों, विशेषकर जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने इस नई व्यवस्था पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं और इसे मदरसों के अस्तित्व पर संकट बताया है। कुछ विपक्षी नेता और मौलवी इसे मुस्लिम समुदाय को लक्षित करने वाला कदम बता रहे हैं। लेकिन विचारणीय पहलू यह है कि प्राधिकरण के दायरे में आने वाले अन्य पांचों अल्पसंख्यक समुदायों (सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी) ने इस फैसले का स्वागत किया है। विरोध केवल उन तत्वों द्वारा किया जा रहा है जो शिक्षा के नाम पर धार्मिक एकाधिकार और अपारदर्शिता बनाए रखना चाहते हैं। आम और प्रगतिशील मुस्लिम परिवार, जो अपने बच्चों का आधुनिक भविष्य चाहते हैं, वे इस बदलाव को एक सकारात्मक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
उत्तराखंड का यह फैसला अन्य राज्यों के लिए ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होगा
उत्तराखंड का यह साहसिक फैसला देश की राजनीति और शिक्षा नीति में एक बहुत बड़ा ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होने जा रहा है। असम सरकार पहले ही सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने का कानून ला चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी मदरसों के सर्वे और एनसीपीसीआर की सिफारिशों के बाद इस दिशा में तेजी से मंथन चल रहा है। उत्तराखंड द्वारा देश का पहला ऐसा वैधानिक मॉडल प्रस्तुत करने के बाद, निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी शासित अन्य राज्यों पर भी यह दबाव बढ़ेगा कि वे मजहबी शिक्षा बोर्डों को भंग कर एक समान ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन करें। यह कदम देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) की तरह ‘समान शिक्षा संहिता’ की दिशा में बढ़ने वाला पहला और सबसे मजबूत कदम है, जिसने अन्य राज्यों के मदरसा बोर्डों की उल्टी गिनती की पटकथा लिख दी है।
असम ने 1281 मदरसों का नाम बदलकर किया था मिडिल इंग्लिश स्कूल 
उत्तराखंड का यह आक्रामक और क्रांतिकारी फैसला देश की राजनीति में एक ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होने जा रहा है। असम सरकार ने भी दिसंबर 2023 में राज्य के 31 जिलों में कम से कम 1281 मदरसों का नाम बदल दिया है और उन्हें सामान्य स्कूलों में बदल दिया था। तब राज्य के शिक्षा मंत्री रनोज पेगु ने अपने एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी साझा की थी। उन्होंने लिखा, “माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, असम (एसईबीए) के तहत सभी सरकारी और प्रांतीय मदरसों को सामान्य स्कूलों में परिवर्तित करने के परिणामस्वरूप स्कूल शिक्षा विभाग, असम ने आज एक अधिसूचना द्वारा 1281 एमई मदरसों के नाम बदलकर मिडिल इंग्लिश (एमई) स्कूल कर दिया है।” असम सरकार द्वारा सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने के बाद, अब उत्तराखंड द्वारा वैधानिक रूप से पूरे मदरसा बोर्ड को ही जमींदोज कर दिया है।
अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिलेगी
देश के अन्य भाजपा-शासित राज्यों के लिए भी यह एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी गैर-मान्यता प्राप्त और संदिग्ध मदरसों के खिलाफ लगातार जांच और कार्रवाई चल रही है। उत्तराखंड के इस फैसले ने देश के सामने यह साबित कर दिया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो तुष्टीकरण के दशकों पुराने ढांचे को पलक झपकते ही ढहाया जा सकता है। निश्चित रूप से, आने वाले समय में देश के कई अन्य राज्यों में भी एकांगी और मजहबी मदरसा बोर्डों की उल्टी गिनती शुरू होना तय है, और भारत के सभी बच्चे एक समान, आधुनिक तथा राष्ट्रवाद से प्रेरित शिक्षा प्रणाली की ओर तेजी से कदम बढ़ाएंगे। मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अब कंप्यूटर, विज्ञान, गणित और अंग्रेजी की आधुनिक शिक्षा मिलेगी। वे राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बैठने के योग्य बनेंगे। उनके प्रमाणपत्रों को देश-विदेश में मान्यता मिलेगी, जिससे वे रोजगार की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे।

नरेंद्र मोदी को 35 देशों का सर्वोच्च सम्मान; भारत के कुछ लोग और पाकिस्तान हज़म नहीं कर पा रहे; मोदी परायों को अपना बना लेता है लेकिन यहां देश में अपने ही बेगाने हैं

सुभाष चन्द्र 

कुछ समय पहले केजरीवाल विधानसभा में 4थी पास राजा की कहानी सुनाता था और पब्लिक में भी कहता था कि देश के राजा को कम से कम चौथी पास तो होना चाहिए लेकिन मोदी की डिग्री के केस में गुजरात की अदालतों में भागता फिर रहा है। दम है तो ठोक कर कोर्ट में साबित करे कि जो उसने मोदी की कथित फर्जी डिग्री के लिए कहा वह सच है डर कर भागता क्यों है?

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अब उसके ही पैदा किए हुए “कॉकरोच” एक ही बात बार बार कह रहे हैं कि मोदी की कैबिनेट में मोदी समेत सभी मंत्री 5वीं छठी फेल हैं बस लोगों को झूठ से बरगलाना ही काम है इन लोगों का क्योंकि उन्हें पता है यह सच नहीं है केजरीवाल और ये कॉकरोच कभी गूगल करके देख लें कि मोदी के 80% मंत्री ग्रेजुएट और उससे भी ज्यादा बड़ी डिग्री लिए हुए हैं Out of them many individuals have advanced degrees, such as doctorates (Ph.D) and specialised professional degrees in Law(LLB), medicine, and engineering.

केवल 15% मंत्रियों ने (15%) ने अपनी शिक्षा 12वीं बताई है और प्रधानमंत्री समेत कोई भी मंत्री 5वीं छठी फेल नहीं है लेकिन कहते हैं न कि कुत्तों को भौकने से कौन रोक सकता है

एक नरेटिव मोदी के खिलाफ चलाया हुआ है कि वो Teleprompter पर पढ़ कर भाषण देता है यह सवाल पूछने वाला पॉडकास्ट में इतनी सी बात भी पढ़ कर पूछ रहा था इन मूर्खों को पता नहीं कि Teleprompter पर पढ़ते हुए व्यक्ति के नज़रें एक जगह यानी Teleprompter पर टिकी होती है जबकि मोदी की नज़रे भाषण देते हुए सब तरफ घूमती हैं हां किसी शिखर वार्ता में या विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के साथ joint statement देते हुए पढ़ना पड़ता है क्योंकि वहां इन सवाल उठाने वालों की तरह बकवास नहीं करनी होती अंतराष्ट्रीय मंच पर एक एक शब्द नाप तोल कर बोलना होता है

अमेरिका की संसद तक में मोदी ने Extempore भाषण दिया था और वह भाषण देने के अंदाज से पता चलता है कल इंडोनेशिया में भारतीयों के सामने दिया हुआ भाषण ऐसे ढक्कन ध्यान से देखें और बताएं teleprompter कहां लगा था? बड़े बड़े धार्मिक व्याख्यान वह स्वयं देते हैं बिना किसी मदद के

अब चलते हैं मोदी को विदेशों से मिले 35 सर्वोच्च सम्मानों की तरफ जुलाई 7 को इंडोनेशिया मोदी को अपना सर्वोच्च सम्मान देने वाला 35 वां देश बन गया और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति Prabowo Subianto ने कहा कि वे मोदी जी के कार्यों का अनुसरण करते हैं (I COPY YOUR CAREER) और सबसे बड़ी बात जो उन्होंने दोहराई वह थी कि मेरा DNA भारतीय है

कोई भी देश अपना सर्वोच्च सम्मान खैरात में नहीं देता वह उसकी सरकार का निर्णय होता है और मोदी ने हर देश के साथ आत्मीय संबंध बनाए हैं मोदी ने कोरोना में 100 से ज्यादा देशों की मदद की और हाल ही में वेनेजुएला में आए भूकंप में विनाश से उबरने के लिए भारी भरकम मदद भेजी जिसके लिए वेनेजुएला सरकार ने कहा Thank You Prime Minister Modi. मोदी को मिलने वाले सर्वोच्च सम्मानों से चिढ़ने वालों को याद नहीं होगा कि  Prime Minister of Papua New Guinea, James Marape ने मोदी के चरण स्पर्श किये थे

लेकिन जैसे पाकिस्तान का रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ मोदी को मिले अवार्ड पर विश्वसनीयता का प्रश्न चिन्ह लगा रहा है, वैसे ही पाकिस्तान के सुर सुर मिलाते हुए राहुल विन्ची भी कह रहा है कि ये अवार्ड किसी जूरी के निर्णय से नहीं मिले, ये manipulated हैं

विपक्ष के नेता राहुल विन्ची समेत कोई भी हों, पाकिस्तानी हो या कोई कॉकरोच हो मोदी के चरणों के धूल के एक कण की भी बराबरी नहीं कर सकते

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का विरोध कांग्रेस अपने “पापा” चीन के हित के लिए कर रही है; वैसे भी मोदी सरकार की कोई ऐसी नीति नहीं है जो कांग्रेस के निशाने पर न रही हो

सुभाष चन्द्र 

नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य होता है देशहित की बात करे नाकि अहित की। समय आ गया है जब राहुल गाँधी को वोट देने वालों को अपनी खतरनाक गलती पर पछताना होगा। राहुल द्वारा अडानी का विरोध करने का अंजाम यह हुआ कि गौतम अडानी को केन्या में मिला प्रोजेक्ट चीन को मिल गया यानि भारत को नुकसान। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं राहुल गाँधी है।  

नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद जो भी कानून पास किए, उनमें कोई ऐसा नहीं है जिसका कांग्रेस और विपक्ष ने विरोध न किया हो चाहे उस विरोध के कारण देश को कितना भी नुकसान उठाना पड़ा हो

अब सबसे ज्यादा तड़प कांग्रेस को 92000 करोड़ के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से हो रही है क्योंकि इस प्रोजेक्ट से चीन के हितों को नुकसान हो सकता है जो कांग्रेस को कतई बर्दाश्त नहीं है कभी पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने प्रोजेक्ट के खिलाफ पर्यावरण के नाम मोर्चा खोला हुआ है और कहते है अभी तक वो 39 पोस्ट X पर डाल चुके हैं एक वाहियात दलील दे रहे हैं कांग्रेसी कि इस प्रोजेक्ट के लिए 1.5 करोड़ पेड़ काट दिए जाएंगे सोनिया गांधी लेख लिखती हैं और जो राहुल गांधी विदेशों में घूमता फिरता है, वह भी अंडमान निकोबार हो आया

लेखक 
चर्चित YouTuber 
कांग्रेस को पता होना चाहिए यदि किसी प्रोजेक्ट से पर्यावरण को कोई नुकसान हो सकता है तो इसका आकलन NGT करता है लेकिन उसने तो प्रोजेक्ट को स्वीकृति देते हुए कहा “NO GOOD GROUND TO INTERFERE WITH THE PROJECT DUE TO ITS NATIONAL AND STRATEGIC IMPORTANCE’.

कांग्रेस का आरोप है यह प्रोजेक्ट वहां रहने वाले शोम्पेन और निकोबारी आदिवासियों के हितों के खिलाफ है जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार शोम्पेन जनजाति की अनुमानित जनसंख्या 229 है और सरकार पागल नहीं है जो उनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं करेगी

कांग्रेस को बस देश की विकास यात्रा में बाधा पहुंचानी है और ऐसा नहीं है भारत के विकास प्रोजेक्ट का विदेशी शक्तियां अब ही विरोध कर रही है कांग्रेस द्वारा अपने समय में 2012 में तमिलनाडु के कुडनकुलम नुक्लेअर प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट में घसीटा गया था नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध को भी लटकाया गया जो आज कई राज्यों की प्यास बुझा रहा है   

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का Infrastructure के लिए क्या महत्व है और इसमें क्या क्या बनाया जाना है -

-इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गलाथिया बे (Galathea Bay) में एक गहरा बंदरगाह, जहां बड़े मालवाहक जहाज अपना सामान उतार सकेंगे;

-ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: एक नया हवाई अड्डा, जिसे नागरिक और रक्षा (नौसेना) दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाएगा; और 

-टाउनशिप और पावर प्लांट: 450 मेगावाट का बिजली संयंत्र और कर्मचारियों व निवासियों के लिए एक नया शहर बसाया जाना है

यह प्रोजेक्ट चीन के लिए उसकी सबसे बड़ी कमजोरी 'मलक्का दुविधा' (Malacca Dilemma) को बढ़ा देता है

मलक्का जलडमरूमध्य पर निगरानी: ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य [Strait of Malacca] के बेहद करीब स्थित है चीन का लगभग 70-80% कच्चा तेल और भारी मात्रा में व्यापार इसी रूट से गुजरता है

रणनीतिक बढ़त: इस प्रोजेक्ट के बन जाने से भारतीय नौसेना की इस रूट पर सीधी और मजबूत नजर रहेगी जरूरत पड़ने पर भारत इस महत्वपूर्ण चोकपॉइंट (Chokepoint) के जरिए चीनी जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित या बाधित कर सकता है

व्यापारिक प्रभुत्व में कमी: भारत अभी ट्रांसशिपमेंट के लिए श्रीलंका (कोलंबो) और सिंगापुर के बंदरगाहों पर निर्भर है, जिससे चीन को फायदा मिलता है इस हब के बनने से भारत का अपना कार्गो हैंडल हो सकेगा और चीन के क्षेत्रीय व्यापारिक एकाधिकार को चुनौती मिलेगी 

कांग्रेस से बस “पापा” चीन को होने वाला यह नुकसान बर्दाश्त नहीं हो रहा कांग्रेस तो रामसेतु के आस पास का 10 लाख टन का थोरियम भंडार बेचने की कोशिश कर रही थी 

कांग्रेस चीन के नमक का हक़ अदा नहीं कर पाएगी क्योंकि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट तो पूरा होकर रहेगा

‘आधी रात को निकाले हजारों प्रवासी’: बांग्लादेशी घुसपैठियों पर भारत की सख्त पुश-बैक नीति के खिलाफ Financial Times का विलाप

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार-chatgpt)

भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद मानने वालों की कमी नहीं। विपक्ष तो यह काम कर ही रहा है, लेकिन कुछ मीडिया वाले भी पीछे नहीं। जो समाचार-पत्र घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए विलाप करता हो उसके राष्ट्रहित समाचार प्रकाशित करने पर भी शंका होती है। क्या घुसपैठियों पर विलाप करने के लिए उनके दामादों के आकाओं ने किसी रूप में इनाम दिया है? क्या दामाद घुसपैठियों का विलाप करने वाले समाचारपत्र को नहीं मालूम कि ये दामाद किस तरह भारत की अर्थव्यवस्था में दीमक का काम कर रहे हैं?      

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।

नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।

दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक ​​कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।

घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट

1 जुलाई 2026 को Financial Times ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 

लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।

कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”

इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।

लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”

आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।

इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”

बेशक Financial Times ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।

धार्मिक रंग देने की कोशिश

लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।
असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।

आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।

संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।

Financial Times ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।

अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।

बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।

न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले

शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।

गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”

असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।

दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन

अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।

स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।

लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।

दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।

एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।

Financial Times के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।

कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।

यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।

भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

पाकिस्तान की Beauty Cream, भारत में महिलाओं को फैला रही किडनी की गंभीर बीमारी: जानें- क्या है महाराष्ट्र का ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ विवाद और किन देशों में लग चुका है बैन

           पाकिस्तान की गोरा करने वाली क्रीम से महिलाओं की किडनी हुई खराब (फोटो साभार : ChatGPT)
हर कोई खूबसूरत और गोरा दिखना चाहता है। इसी चाहत में लोग अक्सर बिना सोचे-समझे बाजार में मिलने वाली कोई भी ब्यूटी क्रीम चेहरे पर लगाने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी गोरा होने का यही शौक जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। हाल ही में भारत में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया। पाकिस्तान में बनी एक मशहूर ब्यूटी क्रीम को लगाने से भारत की कई महिलाओं की सेहत पूरी तरह बिगड़ गई। इस क्रीम ने न सिर्फ महिलाओं के चेहरे को खराब किया, बल्कि सीधे उनकी किडनी पर इतना बुरा असर डाला कि वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं।

इस पूरे हंगामे की वजह पाकिस्तान की ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (Goree Beauty Cream) है। इस क्रीम को लेकर दावा किया जाता था कि इसे लगाने से चेहरा तुरंत गोरा हो जाता है, लेकिन अब इसके पीछे का जहरीला सच सबके सामने आ चुका है। महाराष्ट्र के नागपुर में जब कई महिलाओं ने इस क्रीम को लगाया, तो उन्हें सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएँ होने लगीं। जब इसकी शिकायतें डॉक्टरों और सरकार तक पहुँचीं, तो जाँच टीमें तुरंत अलर्ट हो गईं। लैब में इस क्रीम की बारीकी से जाँच की गई, जिसमें खतरनाक केमिकल मिले। इसके बाद भारत सरकार और महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने सच का पता लगाकर इस क्रीम को भारत में पूरी तरह बैन कर दिया है।

नागपुर से हुई जहरीले सच की शुरुआत

यह मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र के नागपुर में कई महिलाओं की तबीयत अचानक खराब होने लगी। जब वे डॉक्टरों के पास पहुँचे, तो पता चला कि ये सभी महिलाएँ पिछले दो साल से गोरा होने के लिए एक ही ब्रांड की क्रीम लगा रही थीं। जाँच में सामने आया कि इस क्रीम की वजह से उनकी किडनी खराब हो चुकी थी और उनके शरीर में खतरनाक जहर फैल गया था।

डॉक्टरों ने जब गहराई से जाँच की, तो मालूम पड़ा कि ये सभी 18 महिलाएँ इंटरनेट और सोशल मीडिया से खरीदकर ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (जो पाकिस्तान की है) इस्तेमाल कर रही थीं। यह बात पता चलते ही डॉक्टरों ने तुरंत इसकी जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों और प्रशासन को दी। इसके बाद सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए बाजार से इस क्रीम को जब्त कर लिया और जांच के लिए लैब में भेज दिया ताकि पता चल सके कि इसमें कौन से खतरनाक केमिकल मिलाए गए हैं।

प्रयोगशाला की जाँच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

जब महाराष्ट्र के सरकारी विभाग (FDA) ने इस ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ की लैब में जाँच की, तो नतीजे बहुत डराने वाले थे। जाँच में पता चला कि इस क्रीम में पारा (Mercury) और शीशा (Lead) जैसे बेहद खतरनाक और जहरीले केमिकल मिले हुए थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसमें पारे (Mercury) की मात्रा तय कानूनी सीमा से 752 गुना ज्यादा थी।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के मुताबिक, कंपनियाँ इस पारे का इस्तेमाल इसलिए करती हैं ताकि त्वचा का रंग बहुत जल्दी गोरा और साफ दिखने लगे। लेकिन यह गोरापन कोई असली निखार नहीं होता, बल्कि केमिकल्स के कारण त्वचा को पहुँचने वाला नुकसान होता है। यह खतरनाक पारा स्किन के छोटे-छोटे छेदों (रोमछिद्रों) के रास्ते बहुत आसानी से शरीर के अंदर चला जाता है और धीरे-धीरे अंदरूनी अंगों को खराब करने लगता है।

किडनी पर सीधा हमला और ‘मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी’ का खतरा

रोज इस प्रतिबंधित (बैन) क्रीम को लगाने की वजह से महिलाओं के शरीर में यह खतरनाक पारा जमा होता गया, जिसने सीधे उनकी किडनी को नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि त्वचा के रास्ते शरीर में पहुँचा यह जहर अंदरूनी अंगों को खराब करता है और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यून सिस्टम) को बिगाड़ देता है। इससे किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर सकती है, जिसका इलाज बहुत मुश्किल और महँगा होता है।

मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, ऐसे ज्यादा पारे वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से किडनी की एक गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी में किडनी का फिल्टर करने वाला हिस्सा खराब हो जाता है, जिससे शरीर का जरूरी प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर बहने लगता है। नागपुर की पीड़ित महिलाओं में भी ठीक यही बीमारी और लक्षण पाए गए, जो लंबे समय तक इस जहरीली क्रीम को लगाने की वजह से हुए थे।

भारतीय प्रशासनिक तंत्र और सरकार का कड़ा एक्शन

इस बड़े खतरे को देखते हुए भारत सरकार और महाराष्ट्र के विभाग (FDA) ने तुरंत कड़ा एक्शन लिया है। प्रशासन ने ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ के साथ दो और खराब ब्यूटी प्रोडक्ट्स- ‘फेस फ्रेश गोल्ड’ (क्रीम और सीरम) और ‘कॉस्मेटिक गोल्डन स्टार ब्यूटी क्रीम’ को पूरी तरह असुरक्षित घोषित कर दिया है। अब इन पर पूरी तरह बैन लगा दी गई है और लोगों से अपील की गई है कि वे इन्हें भूलकर भी न खरीदें।

इसके साथ ही, पूरे महाराष्ट्र में नकली और खराब कॉस्मेटिक्स बेचने वालों के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया गया है। FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की देखरेख में सिर्फ जून के महीने में ही 34 जगहों पर छापे मारे गए। इस कार्रवाई में 4 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकली दवाएँ और खतरनाक ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब्त किए गए हैं। साथ ही, नियम तोड़ने वाले दुकानदारों के खिलाफ 9 FIR दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

नियमों का सरेआम उल्लंघन और मुंबई में क्रिमिनल केस

जाँच करने वाले अधिकारियों को पता चला कि इन पाकिस्तानी क्रीमों के पैकेट पर कानून के मुताबिक कोई भी जरूरी जानकारी नहीं लिखी थी। पैकेट पर न तो बनाने वाली कंपनी का नाम-पता था, और न ही यह लिखा था कि क्रीम कब बनी है और कब खराब (Expire) होगी। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन था, जिससे ग्राहकों को धोखे में रखकर उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा था।

इसी बीच, मुंबई पुलिस ने चेंबूर इलाके के एक दुकानदार पर केस दर्ज किया है। इस दुकानदार पर आरोप है कि पाकिस्तान से सामान मँगाने पर रोक होने के बावजूद, वह छिपकर यह खतरनाक ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ बेच रहा था। अब पुलिस और एजेंसियाँ इस बात की गहराई से जाँच कर रही हैं कि रोक होने के बाद भी यह प्रतिबंधित क्रीम भारतीय बाजारों और दुकानों तक किस रास्ते से पहुँच रही थी।

ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत में एंट्री

इस मामले में एक और बड़ी चिंता की बात यह है कि रोक होने के बाद भी यह पाकिस्तानी क्रीम लोगों के घरों तक कैसे पहुँची। जाँच में पता चला कि इसे बेचने के लिए इंस्टाग्राम पेजों, रील्स और इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा था। यहाँ तक कि मीशो (Meesho) जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी कुछ बाहरी दुकानदारों (थर्ड-पार्टी सेलर्स) द्वारा यह खतरनाक क्रीम धड़ल्ले से बेची जा रही थी, जहाँ से आम महिलाओं ने इसे आसानी से ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया।

सोशल मीडिया पर इसके विज्ञापनों और झूठे दावों को देखकर सीधी-सादी महिलाएँ इसके जाल में फँस गईं और इसे चेहरे के लिए बहुत अच्छा मान बैठीं। इंटरनेट पर इस क्रीम से बहुत जल्दी गोरा होने का झूठा प्रचार किया गया था, जिसे देखकर लोगों ने इसे खरीदा। अब सरकार ने सभी ऑनलाइन वेबसाइटों और छोटे-बड़े दुकानदारों को सख्त चेतावनी दी है कि वे इस क्रीम को तुरंत बेचना बंद कर दें, वरना उनके खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लग चुके हैं इस क्रीम पर प्रतिबंध

इस पाकिस्तानी क्रीम का यह सच सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सामने आ चुका है। यह ब्रांड विदेशों में भी अपनी बदनामी के लिए जाना जाता है। साल 2021 में न्यूजीलैंड की सरकारी दवा संस्था ने अपने लोगों को चेतावनी देते हुए इस क्रीम को लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, क्योंकि वहाँ की लैब जाँच में भी इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में जहरीला पारा और शीशा पाया गया था।

इसके बाद, साल 2025 में फिलीपींस सरकार ने भी इस क्रीम के सभी प्रोडक्ट्स को सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए चेतावनी जारी की थी। फिलीपींस सरकार का कहना था कि इस क्रीम को देश में बेचने की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी। दुनिया भर में बार-बार बैन होने के बाद भी, यह पाकिस्तानी ब्रांड तस्करी और इंटरनेट के गलत रास्तों के जरिए दुनिया के बाजारों में छिपकर बिकने की कोशिश कर रहा है।

सोशल मीडिया पर दिखा भारी आक्रोश और जनता का रिएक्शन

इस खुलासे के बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग बहुत गुस्से में हैं और इस पर बड़ी बहस छिड़ गई है। इस मामले को सबसे पहले ‘X’ (ट्विटर) पर चिराग बरजात्या नाम के एक व्यक्ति ने पोस्ट शेयर करके सामने लाया था, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई। इस पोस्ट को देखकर हजारों लोगों ने गुस्सा जताया और इसे भारतीयों के खिलाफ एक तरह का ‘केमिकल हमला’ (केमिकल टेररिज्म) कहा।

लोग न सिर्फ इस पाकिस्तानी क्रीम को कोस रहे हैं, बल्कि भारत की ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने बिना जाँच-पड़ताल के इसे अपनी साइट पर कैसे बिकने दिया। लोगों का कहना है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स को कोई भी विदेशी सामान बेचने से पहले उसकी सरकारी मंजूरी और लैब रिपोर्ट जरूर चेक करनी चाहिए। इसके साथ ही, लोग इंटरनेट पर अभियान चलाकर अपील कर रहे हैं कि अपने रिश्तेदारों और घर के काम करने वाले सहायकों को इसके बारे में सावधान करें, और अगर किसी के पास भी यह क्रीम दिखे, तो उसे तुरंत कचरे के डिब्बे में फेंक दें।

गोरेपन का जानलेवा भ्रम और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

पाकिस्तानी क्रीम का यह मामला दिखाता है कि गोरा होने की चाहत, टीवी-इंटरनेट के झूठे विज्ञापन और हमारी आज की आदतें कितनी खतरनाक हो सकती हैं। कुछ ही दिनों में गोरा करने का दावा करने वाली ये क्रीम असल में खूबसूरती बढ़ाने की चीज नहीं, बल्कि बोतलों में बंद धीमा जहर हैं, जो धीरे-धीरे हमारे शरीर के अंगों को खराब कर रही हैं। इस घटना से साफ है कि बिना डॉक्टर की सलाह या बिना सरकारी मंजूरी के इंटरनेट से कोई भी क्रीम या कॉस्मेटिक खरीदना जानलेवा हो सकता है।

अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठें, बल्कि खुद भी सोचें। हमें यह समझना होगा कि जैसा हमारा प्राकृतिक रंग है, वही सबसे अच्छा और सेहतमंद है। गोरा होने की अंधी दौड़ में पड़कर अपनी जान जोखिम में डालना बहुत बड़ी बेवकूफी है। सरकार का इस क्रीम को बैन करना और छापे मारना बहुत अच्छा कदम है, लेकिन यह समस्या तभी पूरी तरह खत्म होगी जब हम खुद समझदार बनेंगे, झूठे विज्ञापनों के बहकावे में नहीं आएँगे और चोरी-छिपे आने वाले ऐसे जहरीले विदेशी सामानों को पूरी तरह ना कह देंगे।

इराक क्यों ले जाया जा रहा है ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा?

अयातुल्लाह खामेनेई को कई महीनों बाद किया जा रहा है सुपुर्द-ए-खाक (फोटो साभार: X/Government of Islamic Republic of Iran)
लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।

नजफ और करबला की मजहबी अहमियत

शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।

इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।

खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।

अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश

खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।

इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी

इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।

इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।

यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।

सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।

खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।

वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।

13 की बच्ची से 2 सप्ताह में 32 लोगों द्वारा बलात्कार: क्या इस जघन्य अपराध का भी सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान नहीं ले सकता?

सुभाष चन्द्र

राजस्थान के श्रीगंगानगर (सवाई माधोपुर) में एक 13 साल की बच्ची के साथ 32 लोगों द्वारा किए गए बलात्कार का किस्सा किसी का भी दिल दहला सकता है। यह केस सुप्रीम कोर्ट की आत्मा को झकझोरने के लिए उपयुक्त था लेकिन कोर्ट ने इस पर स्वत संज्ञान लेने की जरूरत नहीं समझी 

जहां judicial activism दिखाने के जरूरत है वहां सुप्रीम कोर्ट खामोश रहता है लेकिन कभी कभी बच्चियों के बलात्कारी को यह कह कर सजा कम कर देता है कि Every Sinner Has A Future. मेरे विचार से सुप्रीम कोर्ट को स्वत संज्ञान लेकर इस पर ट्रायल कोर्ट को ज्यादा से ज्यादा 2 महीने में निर्णय करने के आदेश देने चाहिए विशाल तिवारी जैसा वकील भारत तिवारी के मामले को सीधा सुप्रीम कोर्ट ले गया लेकिन इस मामले को ले जाने की जरूरत नहीं समझता 

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बच्ची 2 सप्ताह पहले एक रिक्शा चालक बच्ची के संपर्क में आई और उसने उसे तीन होटलों के संचालकों को बेच दिया बेचते समय तय हुआ कि बारी बारी से बच्ची को होटलों में रख कर दुष्कर्म करवाएंगे पुलिस जांच में सामने आया कि तीनों होटलों में कुल 32 लोगों ने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया 23 जून को पुलिस ने एक मुखबिर की सूचना के आधार पर खुंगर होटल से बच्ची को मुक्त कराया जहां उसे बंधक बना कर रखा गया था होटलों के संचालक और मैनेजर दुष्कर्म करने के लिए पैसे लेते थे

होटल खुंगर, जाप इन और सफायर को पुलिस बल की तैनाती के बीच 30 जून को बुलडोज़र चला कर ध्वस्त कर दिया गया

अभी तक केवल 14 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा सका है ये दरिंदे इतने गिरे हुए कमीने थे कि बच्ची के साथ एक बार में 3 से 4 या उससे भी ज्यादा लोग अपनी हवस मिटाते थे और उसे शराब पीने के लिए मजबूर करते थे

सच में यह मामला अत्यंत गंभीर है जिसमें रिक्शा चालक, होटल के मैनेजर और स्टाफ गिरफ्तार हो चुके हैं इस केस का फैसले शीघ्र होना चाहिए लेकिन अपील में हाई कोर्ट और जरूरत पड़े तो सुप्रीम कोर्ट को भी फुर्ती दिखानी चाहिए ऐसा न हो कि ट्रायल कोर्ट सजा दे दे और अपील में मामला 15-20 साल लटका रहे अभी कुछ दिन पहले पुणे में एक ट्रायल कोर्ट ने 3 साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोप में 65 वर्ष के आरोपी भीमराव कांबले को 60 दिन में फांसी की सजा सुनाई है इस सजा की अपील लटकी नहीं रहनी चाहिए

मैं फिर आग्रह करता हूं कि श्रीगंगानगर मामले का सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान ले और शीघ्र न्याय दिलाने के लिए कदम उठाए है कोई वकील जो विषय के लिए सुप्रीम कोर्ट में PIL लगाए? 

दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बना वॉशिंगटन, ट्रंप सरकार ने फ्रीडम 250 पर फोड़े थे 8.5 लाख पटाखे: आसपास के शहर भी हुए प्रभावित


अमेरिका के 04 जुलाई को 250वें स्वतंत्रता दिवस के बाद वॉशिंगटन दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। IQAir ने इसके पीछे ट्रंप सरकार के ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम को बताया, जिसके तहत शहर में 8.50 लाख से ज्यादा पटाखे फोड़े गए।

ट्रंप सरकार ने जिस ‘पायरोटेक्निको’ कंपनी को ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम का जिम्मा दिया था, उस कंपनी ने 40 मिनट में 8.5 लाख आतिशबाजी के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का टारगेट रखा था। लेकिन इस आतिशबाजी के बाद कुछ घंटों के लिए वॉशिन्गटन दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उस वक्त वॉशिन्गटन में बारीक कणों से होने वाला प्रदूषण 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। आसपास के वर्जीनिया और मैरीलैंड जैसे क्षेत्रों को कोड पर्पल अलर्ट ने चपेट में ले लिया, ये हवा की ऐसी गुणवत्ता का संकेत देते हैं जिसे सिर्फ जोखिम वाले समूहों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए हानिकारक माना जाता है।

 

मीडिया और विपक्ष बेनकाब: सोने की रामचरितमानस, चाँदी की ईंटें, हार और काकभुशुंडि… राम मंदिर में ‘चोरी’ के दावे के बाद ट्रस्ट ने दिया पाई-पाई का हिसाब, कोषाध्यक्ष बोले- 2800 चीजें पूरी तरह सुरक्षित

              राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के बाद ट्रस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाया सबूत (फोटो साभार : Aajtak)
राममन्दिर चढ़ावे की चोरी का जब से मुद्दा उठा है मीडिया विपक्ष द्वारा प्रायोजित खबरे प्रसारित कर सनातन विरोधी एजेंडा चलाकर अपनी TRP  बढ़ाने में लगी रही। लेकिन कल(जुलाई 6) को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सबको बेनकाब कर दिया है। अभी जितनी परतें खुलेंगी सारे राम विरोधी चारों खाने चित होंगे। लेकिन इतनी मुस्तैदी से अजमेर शरीफ में हुए घोटाले पर चर्चा करने किसी ने माँ का दूध नहीं पिया। सिर्फ अजमेर शरीफ ही नहीं जितनी भी दरगाहें और मस्जिदें कोई ऐसी नहीं जहाँ घोटाला नहीं हो। 
 
अयोध्या के राम मंदिर में दान का सामान गायब होने के आरोपों पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने करारा जवाब दिया है। ट्रस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में 5 करोड़ रुपए की सोने की रामचरितमानस, चाँदी की ईंटें और भगवान के चरण चिन्ह सबके सामने रख दिए।

कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने साफ कहा कि दान का एक-एक सामान पूरी तरह सुरक्षित है और चोरी की बातें झूठी हैं। दान में मिली सभी 2800 वस्तुओं का रजिस्टर गोविंद देव जी ने दिखाया। पूर्व IAS अधिकारी एस लक्ष्मीनारायणन ने आरोप लगाया था कि उनकी दी हुई सोने की रामचरितमानस गायब है।

इसकी कीमत करीब 5 करोड़ रुपए है। ट्रस्ट ने इस विवाद को खत्म करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस कीमती रामचरितमानस को सबके सामने रख दिया। साथ ही भगवान के सोने के चरण चिन्ह, हार और काकभुशुंडि को भी मीडिया को दिखाया गया।

SIT जाँच में सच आया सामने

सोशल मीडिया पर अफवाहें उड़ने के बाद स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने इस मामले की जाँच की। जाँच की शुरुआती रिपोर्ट में सामने आया कि श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई करीब 38 किलो और 22.5 किलो चाँदी की ईंटें ट्रस्ट के रिकॉर्ड में बिल्कुल सही सलामत दर्ज हैं।

जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, दान में मिली चाँदी की ईंटों को बाद में गला दिया गया था। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए ‘सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिन्टिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ भेजा गया था। इसका पूरा कानूनी रिकॉर्ड मौजूद है। इसी तरह मुंबई के कारोबारी और सिंधी समाज द्वारा दी गई 200 किलो चाँदी भी ट्रस्ट के पास पूरी तरह सुरक्षित पाई गई है।

चंपत राय का इस्तीफा मंजूर, नए चेहरे शामिल

राम मंदिर परिसर में करीब 3 घंटे तक ट्रस्ट की अहम बैठक चली। इस बैठक में महामंत्री चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। अब कृष्ण मोहन को अंतरिम महामंत्री बनाया गया है। बैठक में कुल 9 में से 7 स्थाई सदस्य मौजूद थे, लेकिन इसमें चंपत राय और अनिल मिश्रा शामिल नहीं हुए।

ट्रस्ट की अगली बैठक 22 जुलाई को बुलाई गई है। तब तक SIT की फाइनल रिपोर्ट भी आ जाएगी। इस अगली बैठक में मंदिर के लिए नए प्रशासनिक अधिकारियों, नए पदाधिकारियों और कुछ नए न्यासियों की नियुक्ति पर आखिरी फैसला लिया जाएगा।

चोरी और सीनाजोरी: 50 करोड़ नहीं थी रकम तो कितनी थी? कमाल है चोरी का पैसा दान करेंगी टिन्नू की पत्नी? क्या दहेज़ का माल है?

सुभाष चन्द्र

टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट के अनुसार टिन्नू यादव की पत्नी पूनम यादव मंदिर ट्रस्ट पर आरोप लगाते हुए कह रही है कि असली गुनहगारों को बचाने के लिए उनके पति को जानबूझकर बलि का बकरा बनाया जा रहा है।  

पूनम यादव ने उनके परिवार के पास 50 करोड़ की अवैध संपत्ति और लग्ज़री कारण होने के आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया और चुनौती दी कि अगर जांच में हमारे पास से 50 करोड़ की संपत्ति मिलती है, तो उसमें से 45 करोड़ रुपए तुरंत मंदिर ट्रस्ट को दान कर दूंगी और केवल 5 करोड़ अपने पास रखूंगी। तुम 45 करोड़ दान कर 5 करोड़ रख लोगी और मामला बंद हो जाएगा?

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क्या सपना है? फिर जेल कौन जाएगा मंदिर में चोरी करने के लिए टिन्नू का बाप या उसका ससुर और पैसा क्या तुम्हारे दहेज़ में आया था जो दान कर दोगी और अपने पास भी रख लोगी? 

ये होती है चोरी और सीनाजोरी। चलो 50 करोड़ की संपत्ति और लग्ज़री कारण नहीं है तो बता दो कितने की संपत्ति और पैसा है? या टिन्नू यादव पाक साफ है और एक पैसे का भी गबन नहीं किया

चोरी का एक पैसा भी मिलेगा तो उस पर तुम्हारा क्या अधिकार है और तुम धन्ना सेठानी बनकर 50 करोड़ में 45 करोड़ दान करने की बात कर रही हो। और 5 करोड़ खुद रखने की बात कह कर बात तो ऐसे कर रही है टिन्नू यादव की पत्नी जैसे खुद ही जज बन गई हो और फैसला सुना दिया

ये भी खुल कर बताओ कि असली गुनहगार कौन है? क्या उनके लिए टिन्नू यादव ने चोरी की अगर ऐसा है तो कलंक लिए क्यों बैठा है जेल में? असली गुनहगारों के नाम बता कर जेल से बाहर आ जाए। लेकिन अब तो ये भी बताना पड़ेगा कि अखिलेश यादव से 998 बार फ़ोन पर क्या बात की टिन्नू नहीं बताएगा तो पुलिस कॉल डिटेल्स निकाल कर खुद पता कर लेगी और तब उसकी पत्नी भी मुंह छुपाती फिरेगी

 

टिन्नू यादव की पत्नी को तो खामोश रहना चाहिए क्योंकि कल को उस पर भी गिरफ़्तारी की तलवार लटक सकती है क्योंकि तुम लोगों के घर से नकदी, प्रॉपर्टी के दस्तावेज़, सोने और चांदी के जेवर बरामद हुए हैं। टिन्नू यादव ने पैसा अपनी पत्नी के नाम प्रॉपर्टी खरीदने में लगाया ऐसे आरोप है और इसलिए पूनम यादव से भी पूछताछ हो सकती है और फिर गिरफ़्तारी भी

जो लोग भी पकड़े गए हैं और चोरी के अपराधी हैं, उन्हें अपने पाप को कम करने के लिए ईमानदारी से पुलिस को साफ़ सच बता दें कि कितना चुराया, कहां छुपाया और कहां बट्टे खाते लगाया? उन्हें ये भी बताना चाहिए कि उनके पीछे कौन है लेकिन सब कुछ सबूतों के साथ बताएं, हवाबाजी में नहीं। शायद उनके पाप कुछ कम हो जाएं वरना कानून से तो दंड मिलेगा, साथ में  प्रभु श्रीराम से भी दंड मिलेगा

निजता का अधिकार केवल पत्नी को है पति को नहीं, क्या ये कानूनी भेदभाव नहीं है? व्यभिचार का कानून तो सुप्रीम कोर्ट ने ही ख़त्म किया था

सुभाष चन्द्र

दिल्ली के एक अदालत ने कहा है देर रात किसी पुरुष से बात करने पर पत्नी के चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता पति ने घरेलू हिंसा के मामले में उसकी पत्नी के और एक अन्य व्यक्ति की सीडीआर को सुरक्षित रखने की मांग की थी लेकिन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शुनाली गुप्ता ने उसकी मांग ठुकरा दी।  

जज ने कहा कि भारतीय समाज अब ऐसा पिछड़ा समाज नहीं है जहां किसी पुरुष से बात करने वाली महिला को गलत माना जाता है इसके बारे में कोई पुख्ता सबूत भी नहीं है महिला की काल डिटेल रिकॉर्ड को सुरक्षित करने की मांग करके उसकी निजता में दखल को सही नहीं ठहराया जा सकता जब तक महिला पर अवैध या विवाहेतर संबंध होने का आरोप नहीं लगाया गया हो, तब तक उसके चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता

ऐसे अवैध संबंध का आरोप लगाने के लिए कॉल डिटेल्स का होना जरूरी है लेकिन उसे निजता के अधिकार के तहत रोक दिया कोर्ट ने कौन जानता है वह किससे बात करती थी और क्या बात करती थी यह नहीं भूलना चाहिए कि चंद्रचूड़ ने महिलाओं को sexual autonomy दी थी व्यभिचार के कानून को रद्द करते हुए जिसका मतलब था महिला की इच्छा है वो किसी से भी संबंध बनाए 

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कल सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “व्यभिचार आरोपित पति को “राइट टू प्राइवेसी” की ओट नहीं है और महिला को सबूत जुटाने का अधिकार है कोर्ट ने फैसला दिया कि तलाक़ के मामले में शादी के बाहर अवैध संबंध (व्यभिचार) रखने वाले पति को अपनी बेवफाई छिपाने के लिए निजता के अधिकार का सहारा नहीं मिलेगा पत्नी ने पति की बेवफाई साबित करने के लिए उसके होटल बुकिंग और कॉल डिटेल्स जैसे सुबूत जुटाने की दिल्ली हाई कोर्ट ने अनुमति दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन और जस्टिस विनोद चंद्रन ने बरक़रार रखा

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा था कि यद्यपि संविधान निजता के अधिकार की रक्षा करता है, लेकिन यह अधिकार असीमित या पूर्ण नहीं है और इस पर उचित सख्ती आवश्यक है, विशेषकर तब जब यह जनहित में हो

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि निजता का अधिकार फिर बराबर रूप से महिला और पुरुष पर लागू क्यों न होने दिया जाए पत्नी को अगर पति के खिलाफ सबूत जुटाने का अधिकार दे रहे हैं आप तो ये अधिकार पति को क्यों दिए जा सकते संविधान ऐसा भेदभाव करने की तो अनुमति नहीं देता लेकिन न्यायाधीश अपने विवेक से इसे तोड़ मरोड़ देते हैं

इटली में रहने वाले NRI Joseph Shine की PIL पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में फैसला दिया था कि अगर किसी पुरुष के एक शादी शुदा महिला से उसके पति की मर्जी के बिना भी Sexual relation होते हैं तो वह अपराध नहीं है साथ में कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी पति की निजी संपत्ति नहीं है और उसे शादी के बाहर अपनी मर्जी से संबंध बनाने की Sexual Autonomy है अलबत्ता विवाहेतर संबंध तलाक़ का कारण बन सकते है

यह निर्णय देकर सुप्रीम कोर्ट ने समाज के Institution of marriage के तानेबाने को तोड़ कर रख दिया और आज अनेक मामले हैं जो ऐसे ही विवादों में उलझे हुए हैं भला कौन से परिवार में यह स्वीकार किया जा सकता है कि घर की बहु पति को छोड़ कर किसी गैर-मर्द के साथ संबंध बनाए और कोई पत्नी भी यह कभी नहीं चाहेगी कि उसके पति के संबंध किसी और महिला के साथ हों लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी

अब समय आ गया है कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार करे और तब तक पुरुष और महिला दोनों को बराबर अधिकार दिए जाएं कानून का पलड़ा केवल महिलाओं के पक्ष में अदालत को जानबूझकर नहीं झुकाना चाहिए