कर्नाटक : भगवा से नफरत करने वालों ने फिर बुर्का/हिजाब उछाला सियासत के बाजार में

                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: ChatGPT)
कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम कर ध्रुवीकरण खुद करती है फिर कहती है वोट चोरी हो गया। शाहबानो केस पार्लियामेंट से पलट तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का मिला "हार", दुनिया कहां जा रही है लेकिन कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं को रूढ़िवाद में फंसा अपनी रोटियां सेंकने में लगी रहती है। और कट्टरपंथी इनकी रौ में बहने लगती है। उसका अंजाम क्या होता है यह टीवी पर जमने वाली चौपालों के अच्छी तरह देखा जा सकता है। यानि जब बुर्का/हिजाब के हक़ में बोलने वालों से पूछा जाता है कि "तुम्हारे घरों में कितनी महिलाएं 
बुर्का/हिजाब जवाब नहीं में मिलता है। यानि मुद्दे को उछालो और खुद मालपुए खाओ और जनता को हिन्दू-मुस्लिम झगडे में लड़ने दो। इतना ही नहीं वो बातें सामने आती है जिन्हे आज तक कट्टरपंथी मौलानाओं से जनता से छिपाया। अगर ये बातें सनातन में होती सनातन विरोधी खूब शोर मचाते, लेकिन एक मुसलमान है जो चुपचाप उन कुरीतियों को झेल रहा है।         

कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अब खुलकर इस्लामी तुष्टिकरण पर उतर आई है। इसके लिए कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का जैसे इस्लामी मजहबी पहनावे पर बैन लगा दिया गया था। इसकी जगह कांग्रेस सरकार ने चुपचाप वो फैसला लागू किया है, जिसमें कलावा, जनेऊ, माला, रुद्राक्ष पहनने की भी अनुमति देने की आड़ ली गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने राज्य के शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता लाने के लिए हिजाब और बुर्के जैसे मजहबी पहनावे पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार ने बुधवार (13 मई 2026) को जारी अपने नए आदेश के जरिए ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित पहचान चिह्नों’ के नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब की राह फिर से खोल दी है।

इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गिरते हुए वोटबैंक को बचाने के लिए की गई ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित, गिरता हुआ वोटबैंक और तुष्टीकरण की वह पराकाष्ठा है, जिसने कर्नाटक के शैक्षणिक माहौल को एक बार फिर वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है।

साल 2022 का आदेश क्या था और क्यों जरूरी था?

दरअसल, फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट आदेश दिया था कि जहाँ यूनिफॉर्म निर्धारित है, वहाँ छात्रों को वही (यूनिफॉर्म) पहनना अनिवार्य है। कोई धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म को बदल या प्रभावित नहीं कर सकता। उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद पूरे राज्य में फैल गया था। मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर क्लास में घुसने की जिद पर अड़ी रहीं। विरोध प्रदर्शन हुए, स्कूल बंद हुए।

कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने भी साल 2022 में साफ कहा था कि हिजाब कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। यह व्यक्तिगत विश्वास का मुद्दा है, लेकिन स्कूल-कॉलेज जैसे सार्वजनिक संस्थानों में यूनिफॉर्म और अनुशासन पहले आते हैं। कोर्ट ने कहा, शिक्षा संस्थान वैज्ञानिक सोच, समानता और जॉतिवाद-निरपेक्षता सिखाने का केंद्र हैं, धार्मिक पहचान का नहीं। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। फिर भी सिद्धारमैया सरकार ने बिना कोर्ट का इंतजार किए, चुपके से 2022 का आदेश वापस ले लिया। यह न्यायपालिका का मजाक है।

सीमित प्रतीकों की आड़ में कट्टरपंथ को न्योता

कांग्रेस सरकार द्वारा जारी नए सर्कुलर के बिंदु संख्या 3 और 4 को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो सिद्धारमैया सरकार की मंशा साफ हो जाती है। आदेश में कहा गया है कि छात्र ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित प्रतीकों’ को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ पहन सकते हैं। इसमें पेटा (पगड़ी), जनेऊ, शिवदारा, रुद्राक्ष और ‘सिर का कपड़ा’ (हिजाब) शामिल हैं।

पहली नजर में यह आदेश सर्वधर्म समभाव जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की चालाकी को समझना जरूरी है। जनेऊ, रुद्राक्ष या कलावा जैसे प्रतीक सदियों से हिंदू छात्र पहनते आए हैं और ये कभी भी ‘यूनिफॉर्म’ के लिए बाधा नहीं बने। लेकिन इनकी आड़ लेकर हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सीधे तौर पर उस कट्टरपंथी एजेंडे को खाद-पानी देना है, जिसे 2022 में कोर्ट और तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था। यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि कक्षाओं के भीतर धार्मिक पहचान का संस्थानीकरण (Institutionalization) है। स्कूल वह स्थान हैं जहाँ बच्चों के दिमाग मुक्त, जिज्ञासु और समान होने चाहिए, न कि ऐसी जगह जहाँ राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा दें।

पहचान का संकट, जनेऊ बनाम हिजाब का तर्क

कांग्रेस सरकार ने इस आदेश को लागू करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया है, वह बेहद चालाकी भरा है। सरकार ने कहा है कि छात्रों को जनेऊ, कलावा, माला और रुद्राक्ष जैसे पारंपरिक चिह्न पहनने की अनुमति दी जाएगी और इसी की आड़ में हिजाब को भी शामिल कर लिया गया। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है।

जनेऊ, कलावा और रुद्राक्ष ऐसे धार्मिक प्रतीक हैं जो व्यक्ति की पहचान को कभी नहीं छिपाते। जनेऊ वस्त्रों के भीतर पहना जाता है, कलावा कलाई पर बंधा एक साधारण धागा होता है और रुद्राक्ष भी गले में कमीज के नीचे रहता है। इनसे न तो छात्र की पहचान संदिग्ध होती है और न ही कक्षा के अनुशासन में कोई बाधा आती है। इसके विपरीत, हिजाब और बुर्का सीधे तौर पर छात्र की पहचान को ढक लेते हैं।

दुनिया के कई विकसित और धर्मनिरपेक्ष देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले पहनावे पर प्रतिबंध है। इसका कारण धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ (Public Security) और ‘समानता’ है। लेकिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने इन वैश्विक मानकों और सुरक्षा चिंताओं को ताक पर रखकर केवल इस्लामी वोटबैंक को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।

जनेऊ और कलावा की आड़ में हिजाब का खेल

इस आदेश के बैकग्राउंड में अप्रैल 2026 की एक घटना के बारे में बताना जरूरी है। दरअसल, कांग्रेस सरकार ने अप्रैल 2026 में हुई उस घटना का हवाला दिया जिसमें एक हिंदू छात्र का जनेऊ उतरवा लिया गया था। असल में वह घटना ‘हिंदू घृणा’ का सीधा उदाहरण थी, क्योंकि जनेऊ एक पवित्र धागा है जो कपड़ों के नीचे रहता है।

लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस जन-आक्रोश का समाधान करने के बजाय, इसे एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया। सरकार ने जनेऊ उतरवाने की घटना पर दिखावे का दुख जताया और फिर ‘समानता’ का ढोंग करते हुए हिजाब को भी अनुमति दे दी। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी की उंगली कटने पर मरहम लगाने के बहाने आप उसके दूसरे हाथ को ही काट दें। जनेऊ की आड़ में हिजाब को वैध करना कांग्रेस की उस ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसमें हिंदुओं की भावनाओं को केवल तुष्टीकरण के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

उस विवाद को ढाल बनाकर सरकार ने हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिला दिया, जो कि विशुद्ध रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की एक कोशिश है।

न्यायपालिका की अवमानना और वैधानिक संकट

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हिजाब का मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। इससे पहले, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने फैसले में कहा था कि ‘हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है’। जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन है, तो आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सिद्धारमैया सरकार को मई 2026 में ही यह आदेश जारी करना पड़ा?

यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है, बल्कि उस संवैधानिक गरिमा पर भी प्रहार करता है जिसका गुणगान राहुल गाँधी और कांग्रेस के नेता हर मंच से करते हैं। मुख्यमंत्री ने अदालती प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय अपनी कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर ध्रुवीकरण का रास्ता चुना है। यह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा अपनाए गए उसी खतरनाक रास्ते की तरह है, जहाँ वोट के लिए संस्थानों की शुचिता को दाँव पर लगा दिया जाता है।

चुनावी हार का डर और तुष्टीकरण का सहारा

इस फैसले की टाइमिंग पर गौर करना बेहद जरूरी है। आगामी शनिवार, यानी 16 मई 2026 को बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों और एसडीपीआई (SDPI) की एक बहुत बड़ी रैली होने वाली है। यह रैली किसी और के खिलाफ नहीं, बल्कि कांग्रेस सरकार के ही खिलाफ आयोजित की गई है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है।

दरअसल, इस फैसले के पीछे का असली खेल ‘नंबर गेम’ है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को जो झटका लगा, उसने सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की रातों की नींद हराम कर दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को मुस्लिम समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।

वहाँ एसडीपीआई (SDPI) ने भारी सेंधमारी की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब कांग्रेस को अपनी जागीर नहीं मान रहे हैं। मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार की मुश्किल से हुई जीत और एसडीपीआई को मिले भारी वोटों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक अब उसके हाथ से खिसक रहा है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा डर शनिवार (16 मई 2026) को होने वाली बेंगलुरु की विशाल रैली है। चूँकि अब कांग्रेस को डर है कि अगर यह रैली सफल हो गई, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसका ‘मुस्लिम वोटबैंक’ पूरी तरह बिखर जाएगा। इसी रैली की हवा निकालने के लिए और कट्टरपंथियों को यह संदेश देने के लिए कि ‘कांग्रेस उनकी सबसे बड़ी हितैषी है’, यह हिजाब वाला आदेश चुपचाप लागू किया गया। यह एक राजनीतिक ‘रिश्वत’ (Political Bribe) है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर दी गई है।

टीएमसी के बंगाल फॉर्मूले की राह पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार

कांग्रेस कर्नाटक को उसी रास्ते पर ले जा रही है जिस पर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को पहुँचाया है। तुष्टीकरण की यह राजनीति शुरू में तो फायदे का सौदा लगती है, लेकिन अंत में यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। स्कूलों को धार्मिक पहचान का प्रदर्शन स्थल बनाकर कांग्रेस आने वाली पीढ़ी के मन में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना पैदा कर रही है।

हिंदू छात्रों के प्रतीकों (जनेऊ, कलावा) का उपयोग केवल एक ‘शील्ड’ के रूप में किया जा रहा है ताकि कोई उन पर सीधा आरोप न लगा सके। लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू प्रतीकों को तो स्कूलों में हमेशा से हतोत्साहित किया गया है। सीईटी (CET) परीक्षा के दौरान जिस तरह जनेऊ उतरवाए गए, वह कांग्रेस की असली मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ हिंदू प्रतीकों के प्रति ‘असहिष्णुता’ और दूसरी तरफ हिजाब के लिए ‘असीम प्रेम’ यह विषमता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक वास्तुकला (Architecture) है।

क्या 2028 में उलट जाएगा दाँव?

कांग्रेस को उम्मीद है कि हिजाब की वापसी से वह 16 मई की रैली के प्रभाव को कम कर देगी और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से रिझा लेगी। लेकिन यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है। कर्नाटक की जनता देख रही है कि किस तरह एक खास समुदाय को खुश करने के लिए शिक्षा के स्तर और स्कूलों के अनुशासन से समझौता किया जा रहा है।

अगर इस फैसले के खिलाफ राज्य का हिंदू समाज एकजुट होता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से कर्नाटक भी निकल जाएगा। जनता यह समझ रही है कि जो सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीति का मोहरा बना सकती है, वह राज्य का भला कभी नहीं कर सकती। ‘इव नम्मव’ (यह हमारा है) का नारा देने वाली सरकार ने असल में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना ली है।

कर्नाटक सरकार का यह आदेश समावेशिता के नाम पर समाज को बाँटने वाला कदम है। शिक्षा के अधिकार और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन बनाने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने असल में तुष्टीकरण की वेदी पर ‘संवैधानिक समानता’ की बलि चढ़ा दी है। स्कूलों में हिजाब की वापसी केवल एक वस्त्र की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की वापसी है जो आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय मध्यकालीन पहचान को प्राथमिकता देती है। अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक की जनता तुष्टीकरण की इस राजनीति को स्वीकार करेगी या 2028 में इसका निर्णायक जवाब देगी।

हमास की क्रूरता : प्राइवेट पार्ट में चाकू घोंपकर किया बलात्कार, भाई बहन को आपस में सेक्स करने को कहा; आतंकियों ने इजरायलियों पर किए कितने अत्याचार, सामने आई 300 पन्नों की रिपोर्ट

         हमास ने यौन अपराधों का जश्न मनाया था। (फोटो साभार- द इकोनॉमिस्ट, साइलेंस नो मोर/बोस्टन हेराल्ड)
इजरायल के एनजीओ ‘द सिविल कमीशन’ ने ‘साइलेंस्ड नो मोर‘ यानी ‘अब और चुप नहीं’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया है। इसमें 7 अक्टूबर को योजनाबद्ध तरीके से हमास द्वारा रेप और यौन उत्पीड़न के सबूत दिए गए हैं। इसकी टैगलाइन ‘सेक्सुअल टेरर अनवील्ड: 7 अक्टूबर के अनकहे अत्याचार और कैद में बंधकों के खिलाफ’ है।

7 अक्टूबर 2023 इजरायल के इतिहास का सबसे खूनी दिवस था। उस दिन हमास ने नेतृत्व में फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों ने इजरायल के मासूम बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं को अपना निशाना बनाया था। इस हमले में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए। हमलावरों ने घरों, सड़कों, बस्तियों, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और एक संगीत समारोह में आतंक मचाया। इस दौरान करीब 251 लोगों को अगवा कर गाजा ले जाया गया। घटना का वीडियो बनाकर पूरी दुनिया में इसको प्रसारित किया गया।

इस दौरान इजरायली नागरिकों के साथ अभूतपूर्व यौन हिंसा किया गया। इस दिल दहला देने वाली घटना के गवाहों ने जब दुनिया को जानकारी दी, तो लोग सन्न रह गए।

इजरायल की गैर लाभकारी संगठन ‘द सिविल कमीशन’ ने 12 मई 2026 को ‘साइलेंस्ड नो मोर’ यानी ‘अब और चुप नहीं’ शीर्षक से करीब 300 पेज की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट का शीर्षक है ‘यौन आतंक का पर्दाफाश: 7 अक्टूबर की अनकही क्रूरताएँ और बंधकों के खिलाफ अत्याचार’।

यौन हिंसा, अपमान और क्रूरता की दास्ताँ

दो साल के रिसर्च के आधार पर आयोग ने जो निष्कर्ष निकाला, उसमें कहा गया है कि यौन और लिंग आधारित हिंसा सुनियोजित, व्यापक और अहम थी। हमास और उसके सहयोगियों ने हमले के दौरान कई जगहों पर और कई फेज में पीड़ितों के साथ यौन शोषण किया और उन्हें यातनाएँ दी। उनका अपहरण, स्थानांतरण किया गया और जेल में डाला गया। इन अपराधों में अत्यधिक क्रूरता और गंभीर मानवीय पीड़ा देखी गई, जिन्हें पीड़ितों को डराने और अपमानित करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया था।

हमले के चश्मदीदों और पीड़ितों के बयान, साक्षात्कार, तस्वीरें, वीडियो, सरकारी दस्तावेज और अन्य प्राथमिक सामग्रियों का उपयोग निष्कर्ष निकालने में किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा किए गए डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि पीड़ित 52 अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के थे, जो अपराधों के अंतर्राष्ट्रीय दायरे और उनके प्रभाव को रेखांकित करता है।” गाजा में हिरासत में लिए गए लोगों में विदेशी या दोहरी इजरायली और विदेशी नागरिकता वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा था।

इसमें कहा गया है कि सबूतों और सामग्रियों की तुलना और अपराधियों के तौर-तरीकों के विस्तृत विश्लेषण के आधार पर आयोग ने कई स्थानों पर की गई यौन और लिंग आधारित हिंसा की 13 पुनरावृत्तियों की पहचान की। इन पुनरावृत्तियों से पता चलता है कि ये अपराध एक व्यापक और सुनियोजित कार्यप्रणाली का हिस्सा थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि आतंकवादियों ने हमले में खुद को दिखा कर और यौन उत्पीड़न को डिजिटल माध्यमों से प्रसार कर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने हमले, अपमान और हत्या के फुटेज प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया और पीड़ितों की व्यक्तिगत ऑनलाइन प्रोफाइल का दुरुपयोग किया। परिवार के सदस्यों को अपनों की मृत्यु के बारे में सबसे पहले हमलावरों द्वारा कई बार साझा की गई तस्वीरों या वीडियो के माध्यम से पता चला।

आतंकवादियों ने गोप्रो और बॉडी-वियर कैमरे लगा रखे थे या यह सुनिश्चित किया था कि उनके कृत्यों को रिकॉर्ड किया जाए और सार्वजनिक किया जाए। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि इसी वजह से सभी साइटों पर वीडियो में सशस्त्र समूहों और फिलिस्तीनी नागरिकों को हमलों का जश्न मनाते हुए, प्रसन्न और उत्साहित दिखाया गया। डिजिटल मीडिया के इस दुरुपयोग ने जघन्य क्राइम को मनोवैज्ञानिक युद्ध के हथियार में बदल दिया। इसका लक्ष्य न केवल पीड़ित थे, बल्कि उनके परिवार और पूरा समाज भी था।

पीड़ितों को गाजा पट्टी में घसीट कर ले जाने के बाद भी उन्हें दंडित करने, अपमानित करने और यौन हिंसा का शिकार बनाया गया। आतंक का यह एक सुनियोजित अभियान था। नवजात बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को भी नहीं बख्शा गया। महिलाओं और पुरुषों को घोर अपमान और यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। परिवारों को अलग कर दिया गया और बुनियादी चिकित्सा उपचार से वंचित कर दिया गया। दरअसल इन कैदियों के तन-मन पर लगे गहरे चोट का इस्तेमाल प्रचार और दबाव के हथियार के रूप में किया गया।

रिपोर्ट में इन कृत्यों को हमले का ‘केन्द्र’ बताया गया है। इसमें कहा गया है, “महिलाओं और लड़कियों, और कई मामलों में पुरुषों और लड़कों को बलात्कार, यौन यातना, अंग-भंग, जबरन नग्नता और शवों के अपमान का शिकार बनाया गया। माता-पिता की उनके बच्चों के सामने हत्या कर दी गई, भाई-बहनों पर एक-दूसरे के सामने हमला किया गया, पीड़ितों को निर्वस्त्र किया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उनका वीडियो बनाया गया और प्रदर्शित किया गया। ये आवेश में किए गए अपराध नहीं थे। ये सुनियोजित और योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे ताकि यौन प्रकृति के अपराधों की क्रूरता को और भी बढ़ाया जा सके।”

परिजनों के सामने यौन उत्पीड़न, मृतकों को भी नहीं बख्शा- पीड़ित

रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने हमले की व्यापक रणनीति के एक अंतर्निहित हिस्से के रूप में जानबूझकर और व्यवस्थित रूप से यौन और लिंग आधारित हिंसा (एसजीबीवी) का इस्तेमाल किया। महिलाओं और बंधकों को निशाना बनाया। नाबालिगों को भी इस तरह की हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया।” जिहादियों ने लोगों को उनके परिवारों की उपस्थिति में हृदयविदारक रूप से यातना दी।

जांच में पता चला कि पीड़ितों को क्रूरता के इंतहा तक तड़पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, “पीड़ितों को जलाना, अंग-भंग करना, बलात्कार, बांधना, प्राइवेट पार्ट में जबरन वस्तुएँ डालना, चेहरे और प्राइवेट पार्ट पर गोली मारना, परिवार के सदस्यों के सामने हत्याएँ और दुर्व्यवहार करना और फाँसी देना शामिल थे। कई पीड़ितों को हथकड़ी लगाए हुए और बंधक के रूप में बरामद किया गया था। लंबे समय तक बंधक बनाए गए लोगों के खिलाफ यौन उत्पीड़न आम रहे। इन पीड़ितों में महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी शामिल थे।”

यातनाओं की वजह से जीवित बचे लोगों को गंभीर और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षति पहुँची। शवों के पोस्टमार्टम में यौन शोषण, अपमान के सबूत मिले।

जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ितों को हथकड़ी लगाना, बंधक बनाए हुए दिखाना, महिलाओं और बच्चों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना और परेड कराना। माताओं और बच्चों का अपहरण। परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में यौन हिंसा करना, उसका वीडियो बनाना और डिजिटल प्रसार करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना शामिल है। जबरन विवाह की धमकियाँ भी दी गई। लड़कों और पुरुषों के अंग-भंग करना, बलात्कार और यौन हिंसा के भी सबूत मिले।

एक ही परिवार के लोगों और खून के रिश्ते वाले पीड़ितों को जानबूझकर आपस में यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। इसमें एक विशेष मामले का जिक्र जाँच रिपोर्ट में किया गया है। इसके अलावा परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे की उपस्थिति में यौन उत्पीड़न या अपमानित किया गया। इससे पूरा परिवार आतंकित रहता था। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से हमास की कैद के दौरान देखी गई।”

चरमपंथियों ने खुद को कैमरे पर रिकॉर्ड किया और महिलाओं, बच्चों और पूरे परिवारों को पीटते, अपमानित करते, अपहरण करते और उनकी हत्या करते हुए और शवों का अपमान करते हुए वीडियो अपलोड किए। उन्होंने महिलाओं और उनके शवों को युद्ध की लूट के रूप में प्रदर्शित किया। कुछ क्लिप में आतंकवादियों और गाजावासियों को जश्न मनाते हुए दिखाया गया।

इसके अलावा, फुटेज में बेरहमी से क्षत-विक्षत और जलाए गए शव दिखाए गए। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने घायल महिलाओं, लड़कियों और बुजुर्ग महिलाओं के हिंसक रूप से अपमानित और अपहरण किए जाने के फुटेज भी प्रसारित किए। हमले का समय सुबह-सुबह होने के कारण इनमें से कई पीड़ितों को उनके रात के कपड़ों में ही ले जाया गया, जिससे वे ज्यादा कष्ट महसूस कर रहे थे।”

रिपोर्ट में नोवा संगीत समारोह में बचे एक व्यक्ति का बयान भी शामिल किया गया। उसने बताया कि उन लोगों ने एक महिला को वाहन से बाहर निकाला, उसके कपड़े जबरदस्ती उतार दिए और उसके साथ बलात्कार किया। उन्होंने उसे बार-बार चाकू मारा, जिससे उसकी मौत हो गई। उसकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने उसके साथ बलात्कार करना जारी रखा। यह क्रूरता और हिंसा की भयावहता को दर्शाता है।

एक चश्मदीद राज कोहेन ने बताया, “मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा। बलात्कार करते समय हमने उसकी चीखें सुनीं। फिर उन्होंने उसकी हत्या कर दी और उसके बेजान हो जाने के बाद भी उसके साथ दोबारा बलात्कार किया। मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा।”

यहूदी राज्य को झकझोर देने वाला वह क्रूर हमला

शुरुआती हमलों में दो गर्भवती महिलाएँ, 28 वर्षीय नित्जान रहुम और 23 वर्षीय एस अबू-रशीद भी निशाना बनीं। अबू-रशीद तो बच गईं, लेकिन उनका बच्चा, रहुम और उनका अजन्मा बच्चा, तीनों ही मारे गए। हमले के तुरंत बाद यौन उत्पीड़न के बारे में गवाहों के बयान और विवरण सामने आए।

रिपोर्ट में बताया गया है, “शुरुआती दिनों से ही पीड़ितों, बचाव कर्मियों, चिकित्सा विशेषज्ञों और मुर्दाघर के कर्मचारियों की रिपोर्टों से संकेत मिल रहे थे कि इन हमलों में यौन हिंसा शामिल है। कई पीड़ित को मौत के बाद ही इन अपराधों से मुक्ति मिली। अनेक मामलों में, पीड़ितों की हत्या हमलों के दौरान या बाद में की गई, और उनके शव क्षत-विक्षत, अधजली अवस्था में बरामद किए गए। यह असाधारण क्रूरता से भरी यौन हिंसा के पैटर्न को दर्शाता है।”

रिपोर्ट में एक घटना के बारे में बताया गया है। इसमें कहा गया है, “22 वर्षीय शानी लूक एक पिकअप ट्रक के पीछे मुँह के बल लेटी हुई, आंशिक रूप से नग्न, घायल अवस्था में थी। उसे गाजा की सड़कों पर सशस्त्र अपराधियों ने उसी अवस्था में घुमाया। इस दौरान उसके शरीर पर थूकते और नारे लगाते हुए अपराधी देखे गए।”

हमले के बाद के महीनों में हमास ने अनगिनत वीडियो जारी किए । इनमें निर्दोष बंदी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते या शव दिखाते नजर आए। उन्होंने कुछ मामलों में पीड़ितों के परिवार वालों से सीधे संपर्क किया, जिससे उनका दुख और बढ़ गया। इन कार्रवाइयों ने आतंकी हमले के प्रभाव को और बढ़ा दिया, जिससे दर्द और सदमा और भी गहरा गया।

शवों का अंतिम संस्कार करने वाले शेरोन लॉफर के मुताबिक, कई बार इन खूबसूरत युवतियों की आंखों में गोली मारी जाती थी, जिससे उनके चेहरे विकृत हो जाते थे। उनकी मौत इससे नहीं होती थी, बल्कि दिल में गोली लगने से होती थी।

रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के अनुमान वाले रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसमें आतंकवादियों द्वारा किए गए यौन शोषण और हिंसा सहित अपराधों की गंभीरता को रेखांकित किया गया है। इसमें खुलासा किया गया है कि हमास को अगस्त 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ब्लैकलिस्ट में शामिल किया गया था, जिसमें उन पक्षों की पहचान की जाती है जिन पर सशस्त्र संघर्ष के दौरान व्यवस्थित बलात्कार और अन्य प्रकार की यौन हिंसा करने या उसके लिए जिम्मेदार होने के पक्के सबूत होते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, “इस सूची में शामिल होने का मतलब यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी 7 अक्टूबर के हमलों के दौरान और बंधकों के खिलाफ हमास द्वारा किए गए ऐसे उल्लंघनों के पर्याप्त सबूतों की पुष्टि की है।”

आयोग ने अपहरणकर्ताओं को पीड़ितों को नियंत्रित करने, नागरिक क्षेत्रों में घुसपैठ करने और हिब्रू भाषा में निर्देश जारी करने के तरीके बताने वाले विभिन्न सामरिक नियमावली, नोटबुक, चेकलिस्ट, नक्शे, किताबें और दूसरे संसाधनों की जाँच की। इन सामग्रियों में धार्मिक हिंसा और घृणा परोसा गया था।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर डाला गया है कि “इन सामग्रियों में अरबी से हिब्रू में अनुवादित वाक्यांशों की सूचियाँ भी शामिल हैं, जिनमें आदेशात्मक और अपमानजनक निर्देश (उदाहरण के लिए पीड़ितों को अपनी पैंट उतारने या अपने कपड़े उतारने, लेट जाने, अपने पैर फैलाने का आदेश देना) शामिल हैं।”

रिपोर्ट के मुताबिक, “इन वैचारिक सामग्रियों में यहूदी लोगों और इजरायली नागरिकों, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, के खिलाफ एक अंतर्निहित अमानवीय कथा शामिल थी, जिन्हें कुछ ग्रंथों और बयानों में हिंसा के वैध शिकार के रूप में दर्शाया गया था।” दरअसल हमास यहूदी समुदाय के खिलाफ हिंसा का समर्थन करता है।

इस नरसंहार और घृणित कृत्यों को न केवल फिल्माया गया, बल्कि धार्मिक अभिव्यक्तियों और जोश के साथ महिमामंडित भी किया गया।

इस्लामी आतंकवाद का भयंकर चेहरा

पीड़ितों और गवाहों ने इस्लामी आतंकवाद की कहानी बयान की। नोवा संगीत समारोह में मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने हमले के दौरान सात अन्य लोगों के साथ छिप कर जान बचाई। उसने बताया कि उसने अपने छिपने की जगह के पास तीन अलग-अलग स्थानों से बलात्कार की तीन घटनाओं को देखा।

उन्होंने चीखते-चिल्लाते पीड़ितों को एक-दूसरे को सौंप दिया और फिर उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी और फिर जश्न मनाया। चश्मदीद के मुताबिक, “मुझे नहीं पता कि सामान्य बलात्कार क्या होता है, लेकिन वहाँ जो आवाजें सुनाई दे रही थीं, वे वैसी नहीं थीं। वहाँ हँसी-मज़ाक हो रहा था। चुटकुले चल रहे थे। वे एक-दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे। यह सब मजे के लिए किया जा रहा था। वे जश्न मना रहे थे। वे सचमुच इस बात का जश्न मना रहे थे,”

उन्होंने आगे बताया, “एक और घटना यह थी कि मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना, ‘उसे मत छुओ, ऐसा मत करो,’ और फिर उन्होंने उसकी प्रेमिका के साथ उसकी आँखों के सामने बलात्कार किया।” इसके बाद उस जोड़े का भी वही हश्र हुआ।

उन्होंने आगे बताया, “एक और घटना यह थी कि मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना, ‘उसे मत छुओ, ऐसा मत करो,’ और फिर उन्होंने उसकी प्रेमिका के साथ उसकी आँखों के सामने बलात्कार किया।” इसके बाद उस जोड़े का भी वही हश्र हुआ।

काल चक्र कैसे पूरा होता है आज के चुनाव बाद की हिंसा के लिए ममता बनर्जी खुद हाई कोर्ट पहुंच गई जबकि 2021 चुनाव के बाद की हिंसा का मामला अभी तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित है

सुभाष चन्द्र 

ममता बनर्जी आज कोलकाता हाई कोर्ट के समक्ष खुद वकील के तौर पर पेश हुई। मामला था 4 मई को आए चुनाव नतीजों के बाद हो रही हिंसा का और हाई कोर्ट ने बंगाल सरकार को आदेश भी दे दिए कि कानून व्यवस्था बनाए रखी जाए

ममता बनर्जी भूल गई 2021 चुनाव नतीजों के बाद किस तरह उनकी पार्टी के लोगों ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की थी लोगों को बेघर कर दिया गया 80 हजार लोग असम की तरफ  पलायन कर गए, महिलाओं का बलात्कार किया गया लेकिन वह मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी तक लंबित है कोलकाता हाई कोर्ट ने तो ममता सरकार को क्लीन चिट दे दी थी और कहा था वह सरकार हिंसा रोकने के ठीक उपाय कर रही है

लेखक 
चर्चित YouTuber 
आज ममता का खुद कोर्ट में पेश होना क्या बताता है क्या उसके पास वकीलों की फीस देने के लिए पैसे नहीं है या यह पब्लिसिटी स्टंट है कपिल सिब्बल को क्यों नहीं खड़ा किया शायद इसलिए कि अब उसकी भारी भरकम फीस सरकार की जेब से तो जाएगी नहीं 

कोर्ट में वकीलों ने ममता के खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी की नारे लगाए गए - “पिशी चोर, भाईपो चोर” - और यह भी पता चला है कि बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) ने कोलकाता बार कौंसिल को पत्र लिख कर पूछा है कि ममता को लाइसेंस किसने दिया, कब दिया, रजिस्ट्रशन कब हुआ और प्रैक्टिस का रिकॉर्ड क्या है?

ममता परेशान है अवैध कब्जो पर बुलडोज़र से उनका कहना है की TMC के दफ्तर जलाए जा रहे हैं और लोगों के घरो पर बुलडोज़र चलाए जा रहे हैं ममता को यह ख्याल नहीं है कि TMC ने कांग्रेस और सी.पी.एम. के दफ्तरों पर कब्ज़ा किया हुआ था और हो सकता उनके ही लोग अब TMC के दफ्तर जला रहे हों

चंद्रचूड़ - ने अर्बन नक्सल्स का पक्ष लेते हुए कहा था

"Dissent is the safety valve of democracy. If dissent is not allowed, then the pressure cooker may burst".

ममता बनर्जी ने हिंदुओं के खिलाफ जो अत्याचार किए उसी से प्रेशर कुकर फट गया और हिंदुओं ने एकजुट होकर भाजपा को वोट दिया ममता ने जो हिंदुओं के खिलाफ किया, उसके कुछ उदाहरण ये हैं -

-भगवान शंकर के तारकेश्वर डेवलपमेंट बोर्ड का पहली बार एक मुस्लिम, फिरहाद हाकिम को अध्यक्ष बनाया फिरहाद हाकिम नारद स्टिंग केस में आरोपी रहा है; 

एक बार अखिलेश ने भी ऐसे ही आज़म खान को महाकुम्भ आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया था 

-ममता की सांसद सायानी घोष ने शिवलिंग को कंडोम पहने हुए फोटो ट्विटर पर डाली;

-मुहर्रम के लिए दुर्गा पूजा पर रोक लगा दी;

-सरस्वती पूजा पर रोक लगा दी और जिन बच्चियों ने पूजा की उन्हें पुलिस ने डंडे मारे;

-हनुमान जयंती पर पाबंदी लगाई;

-जय श्री राम के उद्घोष पर रोक लगा दी गिरफ़्तारी की गई ममता खुद लोगो के पीछे दौड़ी;

-इस्लाम के प्रचार के लिए मौलवियों को सरकार से सैलरी देनी शुरू की

आज भी ममता मुस्लिमों के लिए दीवानी है, क्योंकि 80 में से 34 विधायक मुस्लिम है और 2021 में कुल 44 मुस्लिम विधायकों में से 43 ममता की पार्टी के थे 

अबकी उसे आभास नहीं था हिंदू एकजुट होकर वोट दे देगा और 15 साल में काल चक्र पूरा हो जाएगा

सच्चाई छिपाने पर दिल्ली हाई कोर्ट की The Wire के सिद्धार्थ वरदराजन को फटकार, वकील को भी नहीं बक्शा; वकील की मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार

दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने प्रोपेगेडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन (Siddharth Varadarajan) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के एक पुराने आदेश को ‘छिपाने’ के लिए कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushendra Kumar Kaurav) की पीठ ने गुरुवार (14 मई 2026) को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही में तथ्यों को दबाना एक बेहद गंभीर मामला है और इसके दूरगामी कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
साभार :Bar and Bench 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला तब सामने आया जब वरदराजन ने अपनी विदेश यात्रा की अनुमति के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने 2020 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला दिया। उस आदेश में वरदराजन को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जा सकते।

अदालत ने पाया कि वरदराजन ने अपनी याचिका में इस महत्वपूर्ण शर्त का उल्लेख नहीं किया था। इस पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति कौरव ने कहा, “यह बहुत गंभीर मुद्दा है और इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह याचिकाकर्ता की (इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष) जमानत अर्जी से जुड़ा मामला है। जमानत आदेश में लगाई गई शर्तों को इस अदालत के संज्ञान में नहीं लाया गया।”

न्यायाधीश ने आगे तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें आपकी रिट याचिका खारिज करनी होगी। कुछ सख्त कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है… मैं वरदराजन की वकील नित्या रामकृष्णन द्वारा माँगी गई माफी पर केवल कार्रवाई न करने की हद तक विचार कर सकता हूँ, लेकिन जानकारी छिपाने के कारण वह अदालत से किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।

वरदराजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रिकॉर्ड पर न रखने के लिए अदालत से बिना शर्त माफी माँगी। हालाँकि पीठ ने इस मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील और कानूनी पेचीदगियों वाले मामले में केवल मौखिक दलीलें काफी नहीं हैं।

परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने सिद्धार्थ वरदराजन को औपचारिक नोटिस जारी किया है और सात दिनों के भीतर हलफनामे के माध्यम से अपनी इस चूक पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने अपने उन सभी पिछले आदेशों को वापस ले लिया (Recall) है, जिनसे वरदराजन को राहत मिली थी।

सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अदालत ने अप्रैल 2026 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा वरदराजन का ओसीआई (OCI) कार्ड रद्द करने के फैसले को क्वैश (निरस्त) किया गया था। इसका अर्थ है कि अब उनका ओसीआई कार्ड मामला फिर से कानूनी संकट में फंस गया है।

ईसाइयत के आगे सरेंडर, राहुल के लाडले वेणुगोपाल को नकारा; ईसाइयत का प्रचार करने वाली किताब के लेखक वीडी सतीशन को कांग्रेस ने चुना केरलम् का CM: खुद बाइबल के हैं फैन-चर्च है इनका फैन

                                         केरलम् के नए मुख्यमंत्री होंगे वीडी सतीशन (फोटो साभार: Facebook)
केरलम् में विधानसभा चुनाव के नतीजे को आए 10 दिन बीत चुके हैं। अब जाकर कांग्रेस नेतृत्व वाले UDF गठबंधन ने मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान किया है। केरलम् के नए मुख्यमंत्री वीडी सतीशन होंगे। कांग्रेस नेता वीडी सतीशन बाइबल के फैन हैं और खुद भी ईसाई से जुड़ी किताब Aadham Ni Evide Akunnu लिख चुके हैं यानी ‘एडम’ ही वह है जो सत्य को सिद्ध करता है। ईसाइयत में ‘एडम’ को दुनिया का रचयिता माना जाता है।

दरअसल, केरलम् में अन्य राज्यों की तरह ही 4 मई 2026 को चुनाव की नतीजे घोषित किए जा चुके हैं। राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की। यह एक ऐतिहासिक जीत की तरह देखा गया क्योंकि राज्य में पिछले करीब 50 सालों से लेफ्ट की सरकार रही है।

केरलम् में नतीजे जारी होने के बावजूद भी मुख्यमंत्री पद की घोषणा नहीं की गई थी, जबकि अन्य राज्यों में मुख्यमंत्रियों का शपथग्रहण भी हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी वजह राज्य में जीते UDF गठबंधन के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर टकराव था। सीएम पद की रेस में पहले केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथाला का नाम था। हालाँकि, जमीनी स्तर के नेता रहे वीडी सतीशन को हाई कमान ने मु्ख्यमंत्री बनाया। तमिलनाडु में ईसाई मुख्यमंत्री को समर्थन और अब केरलम में ईसाई मुख्यमंत्री। 

अब देखना यह है कि वेणुगोपाल मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने पर क्या कदम उठाते हैं या फिर गुलाम बन जी-हजूरी करते रहेंगे? यह अंदरखाने कुछ रंग दिखाएगी। क्योकि वेणुगोपाल को केरलम का चेहरा माना रहा है। अब वामपंथी अपने हाथों गयी सत्ता का बदला वेणुगोपाल को मोहरा बनाकर लेंगे या फिर मूकदर्शक बन बैठे रहेंगे। वैसे वामपंथी आसानी से चुपचाप बैठने वाले नहीं, क्योकि केरलम से सत्ता जाना देश से वामपंथ का समाप्त होना। सिर्फ केरलम ही ऐसा राज्य था जिसके बलबूते वामपंथी उछलते रहते थे। 

बड़बोले राहुल का केरलम में मुस्लिम-ईसाई वोटबैंक के आगे surrender; नहीं चुन पा रहे मुख्यमंत्री; हिंदू समीकरण और बीजेपी के बढ़ते असर ने बढ़ाया दबाव

                                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार - AI)
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए आज 11 दिन बीत चुके हैं लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं हो पाई है। चुनाव जीतने वाला कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर अंतिम फैसला नहीं कर सका है। जबकि सारा विपक्ष INDI गठबंधन के एकजुट होने का ढोल पीटता नज़र आता है, लेकिन केरलम में सब एक दूसरे के दुश्मन। कोई राहुल प्रियंका की बात तक सुनने को तैयार नहीं। क्योकि राहुल की सुई के सी वेणुगोपालन पर अटकी है। स्थानीय कांग्रेस वेणुगोपालन को नहीं चाहती। इस लड़ाई में राहुल और प्रियंका के खिलाफ आवाज़ बुलंद हो गयी है। इस हिसाब से लगता है अगर मुख्यमंत्री चुन भी लिया तो सरकार का अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल होगा और वामपंथी भी कांग्रेस की हर चाल पर गिद्ध की नज़र रखे हुए है।  

आमतौर पर स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद राजनीतिक दल तेजी से नेतृत्व तय कर लेते हैं ताकि जनता के बीच स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश जाए। लेकिन केरल में कांग्रेस की स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण कांग्रेस मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बना पा रही। 

केरल की राजनीति में सामाजिक संतुलन और कांग्रेस की चुनौती

केरलम उन राज्यों में है जहाँ राजनीति सीधे सामाजिक समीकरणों से जुड़ी हुई है। यही सामाजिक समीकरण कांग्रेस का सिर दर्द बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने जो केरल चुनाव जीती है वो मुस्लिमों और ईसाइयों के दम पर जीता है। इसे आँकड़ों से भी समझने की कोशिश करते हैं।

अगर आँकड़ों की बात करें तो 140 सदस्यीय केरलम विधानसभा में इस बार कुल 35 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जो लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा UDF गठबंधन के पास है, जिसमें कांग्रेस और IUML मिलाकर कुल 30 मुस्लिम विधायक हैं, यानी करीब 85.7 प्रतिशत।

अकेले IUML के 22 और कांग्रेस के 8 विधायक इस आँकड़े में शामिल हैं। दूसरी तरफ LDF गठबंधन के पास कुल 5 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक शामिल है, यानी करीब 14.3 प्रतिशत।

अगर पार्टीवार देखें तो कॉन्ग्रेस के कुल 63 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक हैं, जो लगभग 12.7 प्रतिशत है। IUML के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं।

यहाँ हिंदू आबादी लगभग 54 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 26 प्रतिशत और ईसाई आबादी लगभग 18 प्रतिशत मानी जाती है। ये आँकड़े जनगणना और विभिन्न आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आते रहे हैं।

अब कांग्रेस के सामने इसी समीकरण को साधना सबसे बड़ी चुनौती है। यानी वो चुनाव मुस्लिम और ईसाइयों के दम पर जीती है तो ऐसे में ये गुट अपने समुदाय का मुख्यमंत्री होने को लेकर जोर लगा रहे हैं और कांग्रेस भी इनसे दबाव में है। लेकिन वो अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि अगर वो मुस्लिम या ईसाई को मुख्यमंत्री चुनती है तो उसके लिए राज्य के सबसे बड़े समुदाय यानी हिंदुओं को साधना मुश्किल हो जाएगा।

वहीं, अगर वो हिंदू मुख्यमंत्री चुनती है, जो शायद वो चुने भी तो फिर अल्पसंख्यकों का भरोसा कांग्रेस से एक बार फिर उठता दिखेगा और वो भी फिर CPM की और जा सकते हैं। वोटों की इस लड़ाई में बीजेपी का एक अहम खिलाड़ी बनते जाना कांग्रेस की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी ने कांग्रेस की चिंता बढ़ाई

कई सालों तक केरलम को ऐसा राज्य माना जाता रहा जहाँ बीजेपी चुनावी तौर पर सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर धीरे-धीरे बदली है। बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ा है।
2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की। भले ही सीटों के हिसाब से बीजेपी को बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन वोट प्रतिशत और संगठनात्मक विस्तार ने बाकी दलों को सतर्क जरूर किया है।
इसके पीछे RSS की लंबे समय से चली आ रही जमीनी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केरलम उन राज्यों में रहा है जहाँ RSS ने दशकों तक कैडर आधारित नेटवर्क तैयार किया।
यही नेटवर्क अब बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में मददगार माना जाता है। बीजेपी फिलहाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही बल्कि वह खुद को कांग्रेस और वाम दलों के बीच तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्षी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
यही कारण है कि कांग्रेस कोई ऐसा राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती जिससे बीजेपी को नए वोटरों के बीच जगह बनाने का मौका मिले। और ऐसे वक्त में कांग्रेस अगर किसी ईसाई या मुस्लिम चेहरे को आगे बढ़ाती है तो BJP का यह नैरेटिव और मजबूत होगा कि कांग्रेस हिंदुओं को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा कुछ नहीं देना चाहती। ये बीजेपी के विस्तार से लिए एक फर्टाइल जमीन तैयार करना होगा।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण कांग्रेस को क्यों परेशान करता है

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर विजय भी कांग्रेस को परेशान कर रही हैं। इसे पीछे एक खास वजह भी है, वो है 3 का आँकड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने केरल में 3 सीटें जीते हैं, ये उतनी ही सीटें हैं जितनी BJP ने 2016 के बंगाल चुनाव में जीती थीं। 10 सालों में BJP में अपनी तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस बार बीजेपी ने बंगाल में 293 में से 207 सीटें जीती हैं।
कांग्रेस का मुख्यमंत्री चुनने का कन्फ्यूजन बीजेपी की बढ़ती ताकत से और अधिक गंभीर हो रहा है। कांग्रेस ऐसा कोई मौका BJP या वामपंथियों को नहीं देना चाहती है जिससे उसके लिए संकट आए लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होना लगभग असंभव है।
अब केरल में कांग्रेस के सामने एक तरफ पारंपरिक अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी तरफ हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत रखने की जरूरत है। इसके साथ बीजेपी का बढ़ता राजनीतिक विस्तार और बदलता चुनावी माहौल कांग्रेस की मुश्किल को और बढ़ा रहा है।
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असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
आने वाले समय में कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा करती है, यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से बचा पाती है और बदलती भारतीय राजनीति में खुद को किस तरह ढालती है। अगर देखा जाए तो कांग्रेस के सामने असली परीक्षा सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं बल्कि अपने पूरे सामाजिक गठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है।

‘तमिलनाडु में मोदी की हार, सनातन की हार’: कांग्रेस विधायक JMH मौलाना ने उगला हिंदुओं के खिलाफ जहर, कहा- राज्य में नहीं रहेगा ये धर्म

                                                      तमिलनाडु कांग्रेस नेता मौलाना
तमिलनाडु के वेलाचरी से विधानसभा चुनाव जीते कांग्रेस विधायक जेएमएच आसान मौलाना ने सनातन धर्म पर हमला बोला है। उनका कहना है कि राज्य की सत्ता से पलनीस्वामी बाहर है मतलब पीएम मोदी बाहर हैं। इसका मतलब है कि सनातन धर्म तमिलनाडु से बाहर हो चुकी है और राज्य में यह हार गई है।

एक समय था जब कांग्रेस दक्षिण भारत के बलबूते केंद्र में सरकार बनाकर सुरमा भोपाली बनती थी आज उसी दक्षिण में कांग्रेस लगभग शून्य है। और अब वर्तमान तमिलनाडु चुनाव में सिर्फ 5 सीट जीत सुरमा भोपाली बन सनातन के विरुद्ध बकवास कर रही है। सच्चाई यह है कि अन्य प्रदेशों की भांति तमिलनाडु में भी हिन्दू जातिगत सियासत में जकड़ा हुआ है, जबकि हिन्दू बहुसंख्यक है। और जिस दिन हिन्दू इस जकड़न से बाहर हुआ जितने भी सनातन विरोधी हैं सभी चारों खाने चित होंगे जिस तरह बंगाल में। यह लगता है एक या दो चुनाव की बात है जब तमिलनाडु, केरलम आदि राज्यों में सनातन पताका फहराएगी।    

उनके बयान का वीडियो सामने आने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया सामने आ रही है। कई लोग इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला और हिन्दू विरोधी करार दिया है।

तमिलनाडु में कांग्रेस ने 5 विधानसभा सीटें जीती हैं और विजय सरकार का समर्थन कर रही है। 

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असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
 

असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने वाले भाग गए और मांगने वाले रुके रहे भारत में

                                                                                    साभार: सोशल मीडिया  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से अपने भाषणों में लगातार एक बात कहते रहे हैं कि कांग्रेस अब एमएलसी यानी ‘मुस्लिम लीगी कांग्रेस’ बनती जा रही है। कांग्रेस के युवराज और अन्य नेता इसे चुनावी जुमला कहकर खारिज करता रहे हैं, लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस की राजनीति की ऐसी तस्वीर साफ-साफ पेश कर रहे हैं। जनता-जनार्दन द्वारा दिए गए जनादेश में अब कांग्रेस के लिए भी इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। 

याद करो, आज़ादी से पहले जब मुस्लिम लीग की मांग पर भारत खंडित हुआ था तब भारत को खंडित करने वाले पाकिस्तान नहीं गए, पाकिस्तान भागे पाकिस्तान नहीं मांगने वाले। दूसरे, भारत के खंडित होने पर मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था "पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों का नारा है 'हंस के लिया पाकिस्तान लड़के लेंगे हिंदुस्तान' तो मुस्लिम लीग को हिन्दुस्तान में बैन कर दो लेकिन मुस्लिम वोट की भूखी कांग्रेस ने बैन करने की बजाए सिर्फ केरल तक सीमित रखा लेकिन इंदिरा गाँधी उसी विभाजनकारी लीग को केरल से बाहर ले आयी। और आज कांग्रेस नेहरू और इन्दिरा की मुस्लिम वोटबैंक सियासत को अपना कर सनातन का अपमान करती आ रही है और गुलाम हिन्दू कांग्रेस की सेकुलरिज्म की शराब में डूबा है।  

भारत का संविधान बनाने में संविधान सभा में 23 सदस्य ऐसे थे जो 1946 में पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग की टिकट पर जीते थे,

लेकिन जब इन्होंने पाकिस्तान बना लिया तो उसके बाद यह बड़ी होशियारी से पाकिस्तान नहीं गए और फिर नेहरू गांधी ने इनको भारत का संविधान बनाने का जिम्मा भी दे दिया, इन सब ने भी अपना संविधान बनाया है।
इन लोगों ने पाकिस्तान के नाम पर पंजाब के टुकड़े कर दिए और जहां पंजाब के हिन्दू सिख बहुतायत में थे वहां पाकिस्तान बनने के बाद लाखों हिन्दू सिखों को तलवार के दम पर ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाया गया। हिन्दुओं की हालत वहां सिखों से थोड़ी अच्छी थी, क्योंकि सिखों के साथ ऐसा व्यवहार करने का एक बहुत बड़ा कारण था जिसकी सजा आज भी सिखों को मिल रही है। कांग्रेस और इसके पाकिस्तानी साथियों ने सिखों का ही ज्यादा नरसंहार किया था पार्टीशन के वक्त।

अम्बेडकर भी ऐसे ही इन लोगों का विरोध नहीं करता था और इसी विरोध के कारण कांग्रेस ने उसको भी अपने रास्ते से हटा दिया और मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण में जुट गई। कांगड़ी का वोट बैंक एकजुट माइनॉरिटी और बिखरा हुआ हिन्दू रहा है जिसके लिए सेक्युलर शब्द बनाया गया जो न हिन्दू था और न मुस्लिम। जो इनके बीच का (हिजड़ा) था वह सेक्युलर था।

यह सिर्फ भारत में मुल्ला नेहरू और गांधी ही कर सकते थे कि जिनको गद्दारी का चार्ज लगाकर जेल में सड़ाना था, उन जेहादियों को ही सीधे संविधान बनाने की जिम्मेदारी दे दी। इनमें से ये केवल कुछ नाम हैं...

इनमें से बाद में बहुत सारे लोग केंद्र और राज्यो में मंत्री और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर तक बने....

from Madras

१ Mohamed Ismail Sahib

२ K.T.M. Ahmed Ibrahim·

३ Mahboob Ali Baig Sahib Bahadur·

४ B Pocker Sahib Bahadur from mubai

५ Abdul Kadar Mohammad Shaikh

६ Abdul Kadir Abdul Aziz Khan from Asam

७ Muhammad Saadulla,

८ Abdur Rouf from Up

९ Begum Qudsia Aijaz Rasul nbab of hardoi

१० Syed Fazl-ul-Hasan harshat mohani of AMU

११ Nabab ismail khan of meerut who

became chancellor of AMU

१२ ZH LARI from Bihar

१३ Husaain imam from gaya

१४ Saiyid Jafar Imam·

१५ Latifur Rahman·

१६ Mohammad Tahir

आज इनके वंशज बड़े-बड़े नेता बनकर बोल रहे हैं कि हमारा भी खून शामिल है इस देश की मिट्टी में...


सबसे बड़ा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब इन्टरनेट पर पूरा खोजा कि इनके नाम मिल जाएँ, तो किसी भी वेबसाइट पर किसी भी तथाकथित हिन्दूवादी पार्टी या संगठन ने इनका नाम तक गूगल पर नहीं डाला है। खोज खोज कर नाम ढूँढे हैं। हम राष्ट्रवादियों को विचारधारा और शत्रुबोध के स्तर पर अभी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है। इस्लामिक जिहादी मुस्लिम हमसे इस मामले में हजार गुना आगे हैं कि इन सब करतूतों के बाद भी देश में अपनी इतने बड़े तथाकथित देशभक्त की इमेज बनाये हुए हैं।

आज जहां पूरी दुनियाँ की ऑंखें खुल रही हैं, वहीँ कट्टर सनातन तथा हिन्दू विरोधी और देशद्रोही कॉंग्रेस के दोगले, बिकाऊ, लालची, स्वार्थी, कायर, सेक्युलर, नपुंसक, चमचे सो रहे हैं.

इन तीन राज्यों की कुल 654 विधानसभा सीटों पर 433 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से कांग्रेस केवल 35 सीटें जीत पाई, यानी कांग्रेस का जीत का प्रतिशत करीब 8 फीसदी ही रहा। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 35 विधायकों में से 21 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी कांग्रेस के कुल विजयी विधायकों में लगभग 60 प्रतिशत तो मुस्लिम ही हैं। और यह संयोग नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने इन तीन राज्यों में करीब 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। अर्थात जिन मुस्लिम उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा, उनमें लगभग आधे चुनाव जीत गए। यह आंकड़ा किसी व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राष्ट्रीय पार्टी का कम और एक विशेष मुस्लिम समुदाय केंद्रित राजनीति करने वाली पार्टी का अधिक प्रतीत होता है।

तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे दलों की वैचारिक दिशा और सामाजिक स्वीकार्यता का भी आईना बनते हैं। असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के सामने ऐसा ही असहज दर्पण खड़ा कर दिया है, जिसमें पार्टी का चेहरा अब “सर्वधर्म समभाव” वाली राष्ट्रीय पार्टी से अधिक एक सीमित वोट बैंक पर निर्भर संगठन जैसा दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्षों से कांग्रेस पर “एमएलसी” यानी “मुस्लिम लीगी कांग्रेस” बताते रहे हैं। इन तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने ही पीएम मोदी की बात को सच साबित कर दिखाया है।

असम: कांग्रेस की असमिया अस्मिता की बजाए मुस्लिम राजनीति
असम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकेत लेकर आए हैं। राज्य में कांग्रेस लंबे समय से खुद को “संतुलित” विकल्प दिखाने की कोशिश करती रही थी, लेकिन हालिया चुनावों में उसका टिकट वितरण और जीत का पैटर्न कुछ और ही कहानी कहता है। कांग्रेस ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और पार्टी की जीत का बड़ा हिस्सा उन्हीं सीटों से आया जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि कांग्रेस अब व्यापक असमिया अस्मिता की राजनीति के बजाय विशेष समुदाय आधारित गणित पर निर्भर होती जा रही है। यही कारण है कि ऊपरी असम, चाय बागान क्षेत्रों और राष्ट्रवादी वोटरों में कांग्रेस का आधार तेजी से सिकुड़ता गया। भाजपा ने इसी “तुष्टिकरण बनाम विकास” की बहस को धार दी और कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। असम के परिणाम यह बताते हैं कि कांग्रेस की रणनीति उसे सीमित पॉकेट्स तक तो बचा सकती है, लेकिन पूरे राज्य की पार्टी नहीं बना सकती। यहां बीजेपी ने फिर से प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई है।

पश्चिम बंगाल: हिंदू मतदाता की दूरी और मुस्लिम निर्भरता
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति और भी अधिक गंभीर दिखाई दी। कभी बंगाल की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ रही कांग्रेस अब मुस्लिम बहुल इलाकों तक सिमटती जा रही है। पार्टी जिन सीटों पर प्रभावी रही, वहां उसका सामाजिक आधार लगभग पूरी तरह अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कांग्रेस को हिंदू समाज में स्वीकार्यता क्यों नहीं मिल रही? क्या कारण है कि पार्टी को टिकट वितरण में भी मुस्लिम चेहरे अधिक “सुरक्षित” लगते हैं? बंगाल में कांग्रेस का यह स्वरूप उसे तृणमूल कांग्रेस की “सॉफ्ट सेक्युलर” राजनीति और वामपंथ की पुरानी लाइन के बीच फंसा देता है। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने कभी बंगाल में बंकिम, विवेकानंद और नेताजी की विरासत की बात की थी, आज वही पार्टी चुनावी अस्तित्व बचाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले सीमित समीकरणों पर निर्भर दिखाई देती है। यही कारण है कि पार्टी की सीटें घटती गईं और उसका प्रभाव भी सिमटता गया।

तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति में कांग्रेस की पहचान का संकट
तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के सहारे चुनाव लड़ती है, इसलिए वहां उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पहले ही कमजोर हो चुकी है। लेकिन इस चुनाव में भी कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का अनुपात और उनकी जीत दर ने बहस को जन्म दिया। कांग्रेस ने यहां भी ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों पर अधिक फोकस किया जहां धार्मिक ध्रुवीकरण उसके पक्ष में काम कर सके। समस्या केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब अपने पारंपरिक हिंदू, दलित, पिछड़े और मध्यमवर्गीय वोटरों का भरोसा पूरी तरह खो चुकी है? तमिलनाडु के परिणाम यही संकेत देते हैं। कांग्रेस की राजनीति अब सहयोगी दलों के एजेंडे और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, जबकि राज्य का बड़ा वर्ग उसे केवल “डीएमके की परछाई” मानने लगा है।

कांग्रेस की सर्व समाज से “विशेष समाज” तक की यात्रा
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत कभी उसकी समावेशी छवि थी। पार्टी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग सभी की राजनीतिक आकांक्षाओं का मंच मानी जाती थी। लेकिन अब उसकी राजनीति में संतुलन कम और तुष्टिकरण के प्रति झुकाव अधिक दिखाई देता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी का मुस्लिम लीगी कांग्रेस कहना केवल चुनावी नारा भर नहीं रह गया, बल्कि विपक्ष के भीतर भी चर्चा का विषय बन चुका है। इन चुनाव परिणामों ने तो इसे साबित भी किया है। इन चुनावों ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए कई बार हिंदू उम्मीदवारों से अधिक “बेहतर” मुस्लिम उम्मीदवार नजर आते हैं, जबकि दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस में उन्हीं चेहरों को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं जो उनकी सामुदायिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हों। यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए खतरनाक संकेत है, क्योंकि इससे पार्टी का सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और वह धीरे-धीरे व्यापक जनाधार खोने लगती है।

अब जनता चाहती है विकास, सुशासन और स्थिरता
अगर कांग्रेस इसी दिशा में चलती रही, तो उसकी स्थिति भविष्य में और सीमित हो सकती है। वह कुछ विशेष क्षेत्रों और विशेष समुदायों तक सिमटकर रह जाएगी। तब “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” का “राष्ट्रीय” स्वरूप केवल नाम तक सीमित रह जाएगा। तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने कठोर प्रश्न रख दिए हैं। सवाल केवल सीटों की हार का नहीं है, बल्कि राजनीतिक चरित्र के बदलने का है। और शायद यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस को तय करना होगा कि वह फिर से “सर्व समाज” की पार्टी बनना चाहती है या “विशेष समाज” की राजनीति में खुद को स्थायी रूप से सीमित कर लेना चाहती है। केवल भाजपा विरोध को राजनीति का आधार बनाकर पार्टी लंबे समय तक नहीं चल सकती। उसे यह समझना होगा कि भारत की जनता अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, स्थिरता, सुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास चाहती है।

एक विशेष वोट बैंक तक सीमित राजनीति खतरे की घंटी
कांग्रेस की आज की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में 18 मुस्लिम होना केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि पार्टी की बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दोनों विजेता मुस्लिम समुदाय से हैं। सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम उम्मीदवार क्यों जीते। लोकतंत्र में हर नागरिक को समान अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी राजनीति को एक विशेष वोट बैंक तक सीमित करती जा रही है? विडंबना यही है कि कांग्रेस स्वयं को “समावेशी” पार्टी कहती है, लेकिन उसके टिकट वितरण और चुनावी रणनीति के आंकड़े इसके उलट कहानी कह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए हिंदुओं से ज्यादा “बेहतर विकल्प” मुस्लिम उम्मीदवार दिखाई दे रहे हैं, और दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं को वोट देने के लिए कांग्रेस में सबसे भरोसेमंद चेहरा केवल मुस्लिम प्रत्याशी ही नजर आ रहा है। यह प्रवृत्ति किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कही जा सकती। राष्ट्रीय दल तब मजबूत बनते हैं जब वे समाज के हर वर्ग में समान स्वीकार्यता रखते हैं, न कि तब जब उनका सामाजिक आधार सिमटकर पहचान आधारित राजनीति में बदलने लगे।