पप्पू यादव के खिलाफ दिल्ली में दर्ज हुई FIR, संसद में राम मंदिर चंदा चोरी को लेकर किया था गंदा नाटक: लोकसभा अध्यक्ष ने दी गरिमा बनाए रखने की चेतावनी

                             राम मंदिर प्रदर्शन पर पप्पू यादव FIR। (फोटो साभार - जागरण/एनडीटीवी)
संसद परिसर में विपक्षी दलों ने शुक्रवार (31 जुलाई) को राम मंदिर चंदा चोरी मामले को लेकर नाटक किया था। इस नाटक में पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव पुजारी बनकर चंदा लूटते हुए नजर आए थे। Video वायरल होने के बाद अब विवाद बढ़ गया है। नाटक कर रहे पप्पू यादव के खिलाफ FIR दर्ज हुई है।

पप्पू यादव ने संसद भवन में भगवा वस्त्र पहनकर और पुजारी का भेष धारण कर चंदा चोरी करने का नाटक किया। इसमें पप्पू यादव ये दर्शाने की कोशिश कर रहे थे, कि हिंदू पुजारी ही राम मंदिर से चंदा चोरी कर रहे हैं। इसके बाद देशभर से संतों ने इस नाटक पर विरोध जताया था। अब दिल्ली के जहाँगीरपुरी थाने में सूर्य मैथिल नामक व्यक्ति ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। 

संसद के बाहर किए गए नाटक में विपक्ष के अन्य सांसद और राहुल गाँधी भी श्रद्धालु बनकर दानपेटी में पैसे डालते दिखे और पप्पू यादव उन पैसों को उठाकर अपनी जेब में रखने का अभिनय कर रहे थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेताओं के खिलाफ FIR पर DCP काशी जोन गौरव बंसवाल ने बताया है कि संतों की तहरीर पर तीनों नेताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर अग्रिम कार्रवाई की जा रही है।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान धार्मिक प्रतीकों का गलत इस्तेमाल हुआ और भगवान रामलला की तस्वीर के अनादर से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। इसी आधार पर पुलिस में मामला दर्ज कराया गया है।

संसद में इस तरह वेश बदलकर प्रदर्शन करने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने संसद में कहा कि कुछ सदस्य जिस तरह से भेष बदल-बदलकर आ रहे हैं, वह सदन की मर्यादा और परंपराओं के खिलाफ है। ओम बिरला ने चेतावनी देते हुए कहा कि संसद भवन परिसर की पवित्रता और गरिमा बनी रहनी चाहिए और इस तरह के प्रदर्शनों पर सख्त रुख अपनाया जाएगा।

राहुल गाँधी, डिंपल यादव समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने भी लिया नाटक में भाग

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी समेत कई विपक्षी सांसद भी इस सांकेतिक प्रदर्शन में शामिल हुए और दान पेटी में पैसे डालकर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन के दौरान चंदा चोर, गद्दी छोड़, जवाब तुमको देना होगा और अमित शाह, सदन में आओ जैसे नारे भी लगाए गए।
शिकायतकर्ता का यह भी दावा है कि इस प्रदर्शन को राहुल गाँधी, डिंपल यादव, अवधेश प्रसाद समेत INDIA गठबंधन के कई सांसदों का समर्थन प्राप्त था। शिकायत मिलने के बाद दिल्ली पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया के तहत पप्पू यादव के खिलाफ FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।
पुलिस का कहना है कि मामले से जुड़े वीडियो, शिकायत और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच की जा रही है। जाँच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार की जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ी नाराजगी जताई।
उन्होंने कहा कि संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है और उसकी गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कुछ सांसद अलग-अलग भेष बदलकर संसद परिसर में आ रहे हैं, जो संसद की परंपराओं और मर्यादा के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि संसद परिसर की पवित्रता और गरिमा को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।

पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु बालक दास के नेतृत्व में संतों के प्रतिनिधिमंडल ने गौरव बंसवाल से मुलाकात की थी। जगद्गुरु बालक दास ने बताया कि संसद में जिस तरह से पप्पू यादव ने भगवान राम का और सनातन का अपमान किया वह अक्षम्य है। वहीं, महंत जगदीश्वरनाथ ने कहा, “संत समाज शांत है तो कुछ भी करोगे। हिम्मत है तो कभी सिर पर टोपी पहनकर कुछ करो तो जानें। सिर तन से जुदा न हो जाए तो कहना।”

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने भी पप्पू यादव के इस कृत्य की घोर निंदा की है। संतों ने उनसे सार्वजनिक रूप से माफी माँगने को कहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए साधु-संतों की छवि धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है और इसे संत-समाज कभी सफल नहीं होने देगा। उन्होंने कहा कि बिहार में उनके संसदीय क्षेत्र तक जाकर संत समाज लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराएगा।

मथुरा में भी साधु-संतों ने एकजुट होकर पप्पू यादव का कड़ा विरोध किया है। संतों ने गोवर्धन क्षेत्र के ग्राम जुल्हेदी स्थित एक आश्रम पर यादव को ‘कंस’ का रूप बताते हुए उनके पोस्टर लगाए और पुतले का दहन किया और उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी की है। चित्रगुप्त पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने कहा कि भगवा, सनातन धर्म और लोगों की आस्था का मजाक उड़ाने वाले जनप्रतिनिधियों को संसद में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। साथ ही, उनकी संसद सदस्यता रद्द करने की माँग की गई है। संतों ने उनकी तस्वीर पर चप्पलें तक बरसाईं हैं।

इसके अलावा दिल्ली में भी पप्पू यादव के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। दिल्ली के जहाँगीरपुरी थाने में सूर्य मैथिल नामक व्यक्ति ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान धार्मिक प्रतीकों का गलत इस्तेमाल हुआ और भगवान रामलला की तस्वीर के अनादर से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। इसी आधार पर पुलिस में मामला दर्ज कराया गया है।

‘बरेली में 320 करोड़ रूपए का वक्फ घोटाला’: मौलाना शहाबुद्दीन ने प्रशासन को 100 पन्नों के दस्तावेज सौंपे, निष्पक्ष जाँच की माँग की

                          मौलाना शहाबुद्दीन ने दिया सबूत, जाँच की उठाई माँग (फोटो साभार: News 18)
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने वक्फ संपत्तियों में बड़ा घोटाला होने का आरोप लगाया है। उन्होंने जिला प्रशासन को इस घोटाले से जुड़े कई पक्के सबूत सौंपे हैं। मौलाना शहाबुद्दीन का दावा है कि बरेली में करीब 320 करोड़ रुपए की वक्फ संपत्ति में गड़बड़ी की गई है।

मौलाना शहाबुद्दीन ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच कराने की माँग की है ताकि दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो सके। मौलाना शहाबुद्दीन 31 जुलाई को सीधे कलेक्ट्रेट पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपर जिलाधिकारी यानी ADN (प्रशासन) से मुलाकात की और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा।

मौलाना शहाबुद्दीन ने प्रशासन को लगभग 100 पन्नों के दस्तावेज दिए हैं। इन कागजों में जमीनों से जुड़े पुराने रिकॉर्ड, राजस्व विभाग की जानकारियाँ और घोटाले के ठोस प्रमाण शामिल हैं। मौलाना शहाबुद्दीन ने बताया कि उन्होंने इस मामले की शिकायत पहले मुख्यमंत्री को भी भेजी थी। मुख्यमंत्री तक बात पहुँचने के बाद प्रशासन ने उनसे इस मामले के सबूत माँगे थे।

अब मौलाना शहाबुद्दीन ने सभी संबंधित दस्तावेज और सबूत अधिकारियों के सामने रख दिए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि प्रशासन इन सबूतों के आधार पर जल्द ही सख्त और निष्पक्ष जाँच शुरू करेगा।

दो स्थानों की जमीनों को बनाया जाँच का आधार, निष्पक्ष जाँच और कार्रवाई की माँग

मौलाना ने दावा किया कि बरेली जिले की बहेड़ी तहसील के जाम सामंत क्षेत्र में करीब 1400 बीघा वक्फ भूमि से जुड़ी गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं। उनके अनुसार, इस जमीन की मौजूदा बाजार कीमत लगभग 220 करोड़ रुपए है। इसके अलावा सदर तहसील के चंद्रपुर बिचपुरी क्षेत्र की वक्फ भूमि का भी उन्होंने उल्लेख किया, जिसकी कीमत करीब 100 करोड़ रुपए है।

उनका आरोप है कि इन संपत्तियों के लेनदेन में नियमों की अनदेखी की गई और वक्फ की जमीन को नुकसान पहुँचाया गया। मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि वक्फ की संपत्तियां समाज और जरूरतमंद लोगों के हितों के लिए होती हैं, इसलिए यदि उनमें किसी तरह की अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे को उठाने के बाद उन्हें धमकियां भी मिल रही हैं, लेकिन वह पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने प्रशासन से पूरे मामले की विस्तृत जाँच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की है। साथ ही कहा कि उनके द्वारा सौंपे गए दस्तावेज जाँच एजेंसियों को मामले की सच्चाई तक पहुँचने में मदद करेंगे।

उनका आरोप है कि इन संपत्तियों के लेनदेन में नियमों की अनदेखी की गई और वक्फ की जमीन को नुकसान पहुँचाया गया। मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि वक्फ की संपत्तियां समाज और जरूरतमंद लोगों के हितों के लिए होती हैं, इसलिए यदि उनमें किसी तरह की अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे को उठाने के बाद उन्हें धमकियां भी मिल रही हैं, लेकिन वह पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने प्रशासन से पूरे मामले की विस्तृत जाँच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की है। साथ ही कहा कि उनके द्वारा सौंपे गए दस्तावेज जाँच एजेंसियों को मामले की सच्चाई तक पहुँचने में मदद करेंगे।

इससे पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने कहा था, कि वक्फ की जमीनों में सबसे ज्यादा गड़बड़ियाँ समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान हुईं और पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भी भेजा था।

जंतर-मंतर हिंसा: शांतिपूर्ण आंदोलन के दावों के बीच लहूलुहान वर्दी का सच; आयोजकों को हिरासत में लेकर पूछा जाए "गुंडों को किसने बुलाया?"


देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर, जो लंबे समय से जन-आंदोलनों और असहमति की आवाज़ उठाने का केंद्र रहा है, हाल ही में एक भीषण हिंसात्मक टकराव का गवाह बना। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने पेपर लीक को लेकर आयोजित इस विरोध-प्रदर्शन को पूरी तरह से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक बताया था। हालांकि, ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान उग्र हुई भीड़ और उसके बाद सामने आए तथ्यों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जब तक आयोजकों को हिरासत में लेकर सख्ती से यह नहीं पूछा जाए कि छात्रों के प्रदर्शन में गुंडों का क्या काम था? किसके कहने पर गुंडे आए? दिल्ली हिन्दू दंगा के आरोपितों की रिहाई की आवाज़ किसके कहने पर उठी थी? ये प्रदर्शन NEET को लेकर हुआ था या इन आरोपियों की रिहाई के लिए? क्या ये प्रदर्शन सनातन को बदनाम करने के लिए था? क्योकि जिस तरह की हिंसा हुई वह कोई साधारण हिंसा नहीं थी, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए हंगामे की तरह ही था। पुलिस तो अपना काम कर रही है लेकिन निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इस प्रायोजित हिंसा को हल्के में नहीं लेना चाहिए।     

प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों पर जानलेवा हमले हुए, जिनमें 180 से अधिक पुलिसकर्मी और दर्जनों प्रदर्शनकारी घायल हो गए। इस दौरान भारी सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़े गए, पत्थरबाजी हुई और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया। इस पूरी घटना ने उस समय एक नया और संवेदनशील मोड़ ले लिया, जब ड्यूटी पर घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने मीडिया के सामने आकर अपनी आपबीती साझा की।

 घायलों के परिजनों ने आरोप लगाया कि छात्रों के अधिकारों की आड़ में आए उपद्रवियों द्वारा ऑन-ड्यूटी सुरक्षा बलों पर बर्बर हमले किए गए और बाद में सोशल मीडिया पर पुलिस को ही खलनायक बनाकर पेश करने की कोशिश की गई। पीड़ितों के परिवारों का कहना है कि वर्दी पहनने का मतलब मानवाधिकारों का त्याग करना नहीं होता। इस मामले में अब पुलिस कर्मियों के परिवारों ने भी देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया है, जिससे इस मुद्दे ने सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक रूप से एक बड़ा आकार ले लिया है।

घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की आपबीती: “जब खून से लथपथ घर पहुंचे हमारे अपने”
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान परिजनों ने अपनी आपबीती साझा की। सेवानिवृत्त सैनिकों के बच्चों, अधिकारियों की पत्नियों और युवा छात्रों ने मीडिया के सामने घटना वाले दिन के जो संस्मरण रखे, वे दिल दहला देने वाले थे।

मरीन कमांडो रहे सब-इंस्पेक्टर की बेटी: “पिता की लिंचिंग की कोशिश की गई”
नेवी में 15 वर्षों तक मरीन कमांडो के रूप में देश सेवा करने के बाद दिल्ली पुलिस में कार्यरत सब-इंस्पेक्टर (SI) की बेटी ने भावुक होकर बताया कि उनके पिता मुख्य बैरिकेड्स पर तैनात थे। उन्होंने कहा: “मेरे पिता अक्सर कहते थे कि यह केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रह गया है, इसमें कई असामाजिक तत्व शामिल हो चुके हैं। 25 तारीख को दोपहर लगभग 2 बजे जंतर-मंतर मंच के पास उग्र भीड़ ने मेरे पिता को घसीटा और उनकी लिंचिंग की कोशिश की। वह RML अस्पताल में चार घंटे तक बेहोश रहे और जब देर रात उनके साथी उन्हें घर लाए, तो उनकी वर्दी खून से सनी हुई थी… जब मैंने सोशल मीडिया खोला, तो देखा कि मेरे ही पिता को क्रिमिनल कहा जा रहा था। जिन लोगों ने उन पर हमला किया, वही सुप्रीम कोर्ट चले गए। इसलिए हमने भी न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।”

सब-इंस्पेक्टर की बेटी ने यह भी दोहराया कि उनके पिता अक्सर घर आकर यह चिंता जताते थे कि आंदोलन को उग्र तत्वों द्वारा हायजैक कर लिया गया है। 25 तारीख को हुए लिंचिंग के प्रयास और 4 घंटे तक बेहोश रहने के बाद जब उन्हें घर लाया गया, तो परिवार पूरी तरह सदमे में था।

घायल एसीपी (ACP) की पत्नी: “दो साल की बच्ची और मेरे लिए वह पल दर्दनाक था”
20 जुलाई की घटना का जिक्र करते हुए एक घायल एसीपी की पत्नी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा: 20 जुलाई की देर रात जब मेरे पति घायल अवस्था में घर लौटे, तो वह क्षण मेरे और हमारी दो साल की बेटी के लिए बेहद दर्दनाक था। हम यहां अपने परिवार का दर्द साझा करने आए हैं क्योंकि पुलिसकर्मियों के परिवारों का भी इस देश में न्याय पाने का बराबर अधिकार है।”

युवा पीढ़ी की अपील: “हम भी जेन-जी हैं, हमारी बात भी सुनी जाए”
हिंसा में घायल जवानों के बच्चों, जो स्वयं छात्र और जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी का हिस्सा हैं, ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने देश के नागरिकों और मीडिया से अपील की कि वे हिंसा का शिकार हुए पुलिसकर्मियों के बच्चों का दर्द भी समझें।

1971 युद्ध के दिग्गज के पोते व ASI के बेटे का बयान: “अचानक हुआ जानलेवा पथराव”
चार वीरता पुरस्कार प्राप्त कर चुके एक एएसआई (ASI) के बेटे लक्ष्य सिंह बिष्ट ने बताया कि उनके दादाजी BSF में थे और उन्होंने 1971 के युद्ध में भाग लिया था। उन्होंने बताया: “मेरे पिता बैरिकेड्स पर तैनात थे। अचानक उग्र भीड़ ने बिना किसी उकसावे के पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे थे, तभी एक भारी पत्थर उनके सिर पर लगा। जब मैंने अस्पताल में उनकी तस्वीर देखी, तो उनके सिर पर चार टांके लगे थे।”

33 साल से सेवारत ASI की पत्नी: “गमले और कांच की बोतलें फेंकी गईं”
33 वर्षों से पुलिस सेवा में कार्यरत एक अन्य एएसआई की पत्नी ने बताया कि उनके पति 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए तैनात थे। “शाम को मुझे खबर मिली कि वे LNJP अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने बताया कि भीड़ में शामिल उपद्रवियों ने पुलिसकर्मियों पर गमले, पत्थर, जूते और कांच की बोतलें फेंकी और सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ डाले।”

राहुल गांधी से पूछा गया सवाल, तो कहा: “आप बीजेपी से हैं”
घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जब मीडियाकर्मियों ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से इस संबंध में प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो एक नया विवाद खड़ा हो गया। परिजनों ने सवाल उठाया था कि जिस संसद की रक्षा करते हुए पुलिसकर्मी घायल हुए, उन्हें ‘गुंडे’ कैसे कहा जा सकता है। हालांकि, जब एक पत्रकार ने इस बाबत राहुल गांधी से सवाल किया, तो उन्होंने सवाल का जवाब देने के बजाय पत्रकार पर ही तंज कसते हुए कह दिया कि “आप बीजेपी से हैं।” आलोचकों और सोशल मीडिया पर यह तर्क दिया जा रहा है कि जब भी कोई सवाल राजनीतिक रूप से असुविधाजनक होता है, तो पत्रकारों पर किसी खास पार्टी का होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। इस वाकये के बाद प्रेस की आजादी के बड़े-बड़े दावे करने वाली विपक्षी राजनीति और उनकी कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

CJP का दावा बनाम पुलिस का पक्ष
जंतर-मंतर पर घटित इस घटनाक्रम ने आयोजकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दावों और पुलिस प्रशासन द्वारा प्रस्तुत किए गए जमीनी तथ्यों के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा कर दिया है।

CJP और आयोजकों का दावा: आयोजकों का तर्क है कि उनका आंदोलन परीक्षा प्रणाली में सुधारों और छात्र हितों को लेकर पूरी तरह अहिंसक और लोकतांत्रिक था। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिससे छात्र घायल हुए।

दिल्ली पुलिस प्रशासन का आधिकारिक पक्ष: पुलिस जांच और डिजिटल सर्विलांस के आंकड़ों के अनुसार, भीड़ की आड़ में कई उग्र तत्व शामिल थे। पुलिस का कहना है कि जब भीड़ ने संसद भवन की ओर जबरन बढ़ने और सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास किया, तब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनुपातिक बल प्रयोग अनिवार्य हो गया था।

सुरक्षा बलों के मानवाधिकार और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी कार्यवाही
जंतर-मंतर हिंसा का मामला अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले ने सुरक्षा बलों के मानवाधिकारों पर एक राष्ट्रीय कानूनी बहस शुरू कर दी है:

अनुच्छेद 21 और ऑन-ड्यूटी जवानों के अधिकार: याचिका में कहा गया है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और शारीरिक सुरक्षा का अधिकार) जितना आम नागरिकों पर लागू होता है, उतना ही ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों पर भी लागू होता है। भीड़ द्वारा जानलेवा हमला करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि घटना से जुड़े सभी सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, ड्रोन फुटेज और बॉडी-वर्न कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखा जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने हिंसा की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर जोर दिया है।

आयोजकों की जवाबदेही: कोर्ट इस पहलू पर भी विचार कर रहा है कि यदि अनुमति प्राप्त प्रदर्शन हिंसक रूप लेता है, तो आयोजकों की नागरिक व आपराधिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए ताकि भविष्य में आंदोलनों की आड़ में कानून-व्यवस्था को नुकसान न पहुंचाया जा सके।

US की अगुवाई में गाजा की ‘पीस व्यवस्था’ संभालेगी इंटरनेशनल फोर्स, हमास समेत सभी आतंकी संगठन डालेंगे हथियार: डोनाल्ड ट्रंप ने किया ऐलान

                               बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो साभार: AFP)
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को दावा किया कि उनके नेतृत्व में बने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने गाजा में हमास और बाकी सभी आतंकी संगठनों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर एक ‘ऐतिहासिक समझौता’ कर लिया है। ट्रंप ने इसे मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम बताया। हालाँकि, इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं, क्योंकि न तो इजरायल ने आधिकारिक मंजूरी दी है और न ही हमास ने ट्रंप के दावे की पूरी तरह पुष्टि की है।

ट्रंप ने यह घोषणा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर की। उन्होंने लिखा, “आज बोर्ड ऑफ पीस ने गाजा में हमास और अन्य सभी हथियारबंद समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर ऐतिहासिक समझौता किया है। यह स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में एक बेहद बड़ा कदम है।”

ट्रंप ने बताया कि इस समझौते के बाद गाजा पर अब हमास का शासन नहीं रहेगा। इसकी जगह एक नई फिलिस्तीनी सरकार बनाई जाएगी, जो बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी और गाजा के लोगों के लिए प्रशासन चलाएगी। ट्रंप ने कहा कि इससे एक तरफ फिलिस्तीनियों को नया प्रशासन मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ इजरायल को वह सुरक्षा मिलेगी जिसकी वह लंबे समय से माँग करता रहा है। उनका कहना है कि अब गाजा का इस्तेमाल इजरायल पर आतंकी हमलों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

कई चरणों में लागू होगा पूरा प्लान

ट्रंप ने बताया कि यह समझौता एक साथ लागू नहीं होगा, बल्कि इसे कई चरणों में पूरा किया जाएगा। जैसे-जैसे हमास और बाकी संगठनों का निरस्त्रीकरण पूरा होगा, वैसे-वैसे IDF यानी इजरायली सेना गाजा से अपनी वापसी शुरू करेगी।

इसके बाद गाजा की सुरक्षा की जिम्मेदारी एक इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स (International Stabilization Force) और नई बनाई जाने वाली फिलिस्तीनी पुलिस के हाथों में जाएगी। इन दोनों का काम होगा कि गाजा अपने नागरिकों और पड़ोसी देशों के लिए सुरक्षित बना रहे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित योजना के तहत हमास के हथियार, रॉकेट, भारी हथियार, सुरंगों और सैन्य ढाँचे को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा। पूरा निरस्त्रीकरण लगभग 200 से 350 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालाँकि, इसके लिए अभी कोई डेडलाइन तय नहीं मानी जा रही है।

ट्रंप ने इसे बताया ‘Trump 20-Point Plan’ का बड़ा पड़ाव

ट्रंप ने कहा कि यह समझौता उनके ‘Trump 20-Point Plan’ को लागू करने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। यह वही योजना है, जिसे गाजा युद्ध खत्म करने, वहाँ नई सरकार बनाने, सुरक्षा व्यवस्था बदलने और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण के लिए तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा कि एक साल पहले गाजा में भीषण युद्ध चल रहा था, मानवीय संकट चरम पर था और बंधकों को कैद करके रखा गया था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। हालाँकि ट्रंप ने यह भी माना कि अभी ‘बहुत काम बाकी है।’

मिस्र, कतर और तुर्किये का किया आभार

ट्रंप ने इस समझौते के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये की मध्यस्थता की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों ने बातचीत आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने अपनी बातचीत करने वाली टीम की भी तारीफ करते हुए कहा कि उनकी लगातार मेहनत की वजह से यह ऐतिहासिक सफलता मिली।

7 अक्टूबर जैसे हमले दोबारा नहीं होंगे: ट्रंप

अपने बयान में ट्रंप ने 7 अक्टूबर 2023 के हमले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “7 अक्टूबर को गाजा से जो खतरा पैदा हुआ था, उसे दोबारा कभी खड़ा नहीं होने दिया जाएगा।”

उन्होंने कहा कि समझौते के बाद गाजा पूरी तरह ऐसी नई फिलिस्तीनी सरकार के हाथ में होगा, जो वहाँ के लोगों के लिए काम करेगी, न कि आतंकवादी गतिविधियों के लिए।

अंत में ट्रंप ने इस समझौते के लिए सभी को बधाई दी और अपने विरोधियों को जवाब देते हुए कहा, “जिसके बारे में सब कहते थे कि इसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता।”

इजरायल और हमास की मंजूरी नहीं

हालाँकि ट्रंप ने इसे ऐतिहासिक सफलता बताया है, लेकिन इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमास ने अभी तक ट्रंप के दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। Reuters को हमास के सूत्रों ने बताया कि यह अभी एक मसौदा है और किसी भी तरह का निरस्त्रीकरण तभी शुरू होगा, जब इजरायल पहले गाजा से सेना हटाएगा।

दूसरी तरफ, इजरायल ने भी इस समझौते पर आधिकारिक सहमति नहीं दी है। इजरायल के एक अधिकारी ने Reuters को बताया कि इस समझौते को लेकर ट्रंप के ऐलान से पहले इजरायल इस प्रस्ताव को खारिज कर चुका है।

इजरायली अधिकारियों का कहना है कि उनकी माँग हमास के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह खत्म करना है और ट्रंप जिस 15 सूत्रीय दस्तावेज की बात कर रहे हैं, उसमें इन माँगों का जवाब नहीं दिया गया है और इसीलिए इजरायल इसे नहीं मान रहा है।

पेपर चोरी करना भी क्या मौलिक अधिकार था जो कोर्ट ने यश यादव को NEET Re Exam देने की अनुमति दे दी उसका मौलिक अधिकार बता कर; अब दिपके का क्या होगा?

सुभाष चन्द्र

एक छात्र यश यादव है जो NEET 2026 पेपर लीक मामले में 13 में से एक है जो गिरफ्तार होकर जेल में पड़ा है। इस व्यक्ति ने किसी शुभम से पेपर 13 लाख रुपए में खरीदा और आगे जयपुर के मांगीलाल को 10 लाख रुपए में बेचा क्योंकि उसका बेटा भी NEET परीक्षा दे रहा था CBI को इसके पैसे के लेन देन के सबूत मिल चुके हैं यानी Money Trail पकड़ी गई है वह भी गंभीर मुद्दा है। 

यह महाशय यश यादव को जेल में अपने मौलिक अधिकार याद आ गए और Rouse Avenue कोर्ट में अर्जी लगाई कि उसे NEET Re Exam में बैठने की अनुमति दी जाए क्योंकि परीक्षा देना उसका मौलिक अधिकार है और अभी तक उनके खिलाफ आरोप भी साबित होना बाकी है

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अब आप सोचिए कोर्ट के जज साहब को क्या करना चाहिए था आप में से हर व्यक्ति कहेगा कि ये उन चोरों में शामिल था जिसकी वजह से लाखों छात्रों को भुगतना पड़ा और 17 बच्चो ने आत्महत्या भी कर ली 

लेकिन हमारी कोर्ट तो मौलिक अधिकारों की विशेषज्ञ है  Rouse Avenue कोर्ट के जज साहब ने परीक्षा में बैठना उसका मौलिक अधिकार समझा और उसे Re - Exam में जेल के संरक्षण में बैठने की अनुमति दे दी और एक मिनट भी यह नहीं सोचा कि यह व्यक्ति लाखों छात्रों की पीड़ा के लिए जिम्मेदार है उसके क्या मौलिक अधिकार हो सकते हैं? अगर आपको लगता था कि आरोप सिद्ध न होने तक वह निर्दोष है तो सीधी बेल ही दे देते

गूगल सर्च किया मैंने जिसमे बताया गया कि यश यादव ने Re Exam पास नहीं किया क्योंकि NTA ने उसके रिजल्ट को रोक लिया अब कल को वह यह भी याचिका लगा सकता है कि परीक्षा का नतीजा जानना उसका मौलिक अधिकार है और अगर वो पास होता है तो जुडिशल कस्टडी में ही उसे Counselling का भी अधिकार है

पिछले 12 साल में मौलिक अधिकारों की जिसमें उलजुलूल बोलने का अधिकार और प्रदर्शन का अधिकार मुख्यतः शामिल है, अदालतों द्वारा पुरजोर वकालत की रही है कोर्ट ने यश यादव को Re Exam में बैठने के मौलिक अधिकार की मांग को देख यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि क्या पेपर लीक करना भी तुम्हारा मौलिक अधिकार था?

अब कई वीडियो आ रहे हैं जिनमें प्रधानमंत्री मोदी, सेना और पुलिस के लिए गलियां देने वाले माफ़ी मांगते नज़र आ रहे हैं उनकी माफ़ी पर उनसे  पूछना चाहिए कि तुम्हे ऐसी अश्लील बकवास करने के लिए किसने कहा था? सौरव दास कहता है वो तो प्रधानमंत्री पर हल्का फुल्का मजाक था और यह उनका मौलिक अधिकार है उनके वीडियो मीडिया से हटाना Censorship लगाना होगा फिर वह कैसे कहता है कि जंतर मंतर पर जो हुआ उसके लिए “गटर Z” जिम्मेदार नहीं है?

आज एक खबर और भी है कि अभिजीत दिपके, कुणाल कामरा और सोनम वांगचुक के खिलाफ चंडीगढ़ कोर्ट में एक याचिका दायर उन पर FIR दर्ज करने की मांग की गई है क्योंकि उन्होंने हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया और हिंदू देवी देवताओं का मजाक उड़ाया कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 18 अगस्त तारीख तय की है दिपके और वांगचुक कुणाल कामरा के भगवान राम और सीता माता पर मजाक उड़ाने पर हंस कर उसका समर्थन कर रहे थे

सबका नंबर लगेगा! 

जंतर-मंतर पर मोदी-मेलोनी के लिए गंदी गालियाँ बकने वाली रुचिका पर FIR, परिवार के साथ हुई फरार, नोएडा में वकील की शिकायत पर दर्ज हुआ केस

          जंतर मंतर पर पीएम पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली युवती पर एफआईआर दर्ज (फोटो साभार-abp)
उत्तर प्रदेश के नोएडा एक्सप्रेसवे पुलिस स्टेशन में एक युवती के खिलाफ जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोपित के खिलाफ जीरो FIR भी ग्रेटर नोएडा में ही दर्ज कराई गई है।
क्रांतिकारी कॉकरोच सपरिवार फरार चल रही है खुद के साथ साथ अपने परिवार को भी रोड पर ले आई है। क्या कोई CJP या जिसके कहने पर आंदोलन में आकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, खड़ा दिख रहा है? सभी अपनी चादर बचाने में लगे हुए हैं।   
जिन माता पिता को हम वो सम्मान नहीं दे पा रहे है जिसकी वो हकदार है तो हम उनके लिए ऐसा भी असम्मान पैदा नहीं होने देंगे जिससे वो हमारे प्रति निराश हो जाए

इस लड़की की वजह से इसका परिवार ही परेशान नहीं है इसके समाज में इसके रिश्ते नातेदार भी इसे कोस रहे होंगे, जिसने एक झटके में मान सम्मान सब छीन लिया समाज में प्रतिष्ठा भी धूमिल कर दी

जिस हिसाब से इसने अपने गटर जैसे मुखारबिंद से मोदी जी के लिए अपमानजनक शब्द कहे वो माफी के काबिल तो बिल्कुल भी नहीं है ऊपर से इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को घसीटा उनके लिए अनर्गल वकबास की वो तो और भी शर्मिंदा करने वाला था

अगर मोदी जी इसे माफ भी कर दें तो भी इसे कोई भी शरीफ इंसान तो नौकरी नहीं देगा जो भी नौकरी देगा लोग उसे भी टारगेट करेंगे नौकरी देने वाले तक का दिवाला निकल जाएगा

ये कॉकरोच पार्टी की कैसी क्रांति थी जिसमें ये अपनी लड़ाई तो जीत गए मगर इस आंदोलन में गए लोग माफी मांग रहे है खुद तो शर्मिदा है ही अपने परिवार को भी शर्मिंदा कर दिया है ऐसी परवरिश के लिए लोग इनके माता पिता को दोषी मान रहे है

गाजियाबाद के इंदिरापुरम में रहने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील स्मृति सिंह की शिकायत के आधार पर नोएडा सेक्टर 168 की रहने वाली रुचिका सिंह के खिलाफ BNS 2023 के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। बताया जाता है कि रुचिका सिंह ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। उसका आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल होने का दावा किया जा रहा है।

शिकायत में जानबूझकर विद्वेष फैलाना, सामाजिक तनाव पैदा करने और शांति भंग करने का आरोप है। अभी तक आरोपित रुचिका सिंह को पुलिस ने हिरासत में नहीं लिया है। पुलिस फिलहाल वीडियो फुटेज और दूसरे सबूतों की जाँच कर रही है और इसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस रुचिका सिंह की सोशल मीडिया एकाउंट भी खँगाल रही है। मैलोनी का भी इसने वीडियो में जिक्र किया और पीएम मोदी को भद्दी भद्दी गालियाँ दी थी। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था।

ये मामला सार्वजनिक जगह पर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है इसके लिए कानून में आईपीसी की धाराओं के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएँ भी लगाई जा सकती है।

वकील स्मृति सिंह का कहना है कि पीएम का पद राष्ट्र की गरिमा से जुड़ा हुआ है। वे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और आपत्तिजनक बयान देकर गरिमा को ठेस पहुँचाया गया है। इससे जनभावनाएँ आहत हुई हैं।

जंतर मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान कई लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। इतना ही नहीं बैनर और पोस्टर पर भी आपत्तियाँ जताई गई।

एफआईआर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास ने आपत्ति जताई है। उन्होने इसे वादाखिलाफी माना है और केन्द्र से पूछा है कि जब एफआईआर दर्ज नहीं करने की बात हुई थी तो क्यों किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई अपमाजनक भाषा का इस्तेमाल करता है तो उसपर सिविल मानहानि का केस हो सकता है लेकिन प्रदर्शनकारियों पर आपराधिक मामला दर्ज करना बेहद गलत है।

राहुल गाँधी & पार्टी ने संसद में उड़ाया हिंदू धर्म का मजाक, राम मंदिर की आड़ में की नौटंकी: पुजारी बने पप्पू यादव दानपात्र ‘चुराकर’ दौड़े, देखें Video

   राम मंदिर चंदा चोरी की आड़ में पप्पू यादव और राहुल गाँधी ने संसद के बाहर की नौटंकी (फोटो साभार : Video SS)
संसद के मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार (31 जुलाई) एक बेहद हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला। विपक्षी सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार के बाहर एक घटिया नाटक और नौटंकी की। इस नाटक के जरिए विपक्ष ने राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर जमकर हंगामा किया। इस पूरी नौटंकी में पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने मुख्य भूमिका निभाई। पप्पू यादव साधु और पुजारी का वेश बदलकर संसद परिसर में बैठ गए थे। उनके सामने एक दानपात्र रखा गया था ताकि सभी विपक्षी नेता आकर उसमें पैसे डाल सकें।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी इस ड्रामे में पीछे नहीं रहे। राहुल गाँधी खुद आगे बढ़कर उस दानपात्र में पैसे डालने पहुँचे। जैसे ही राहुल गाँधी ने पैसे डाले, पुजारी बने पप्पू यादव ने वे सारे पैसे अपनी जेब में रख लिए। समाजवादी पार्टी के सांसदों ने भी इस नौटंकी में हिस्सा लिया। इस घटिया नाटक के जरिए विपक्षी नेताओं ने यह दर्शाने की कोशिश की कि राम मंदिर में कथित तौर पर चढ़ावा चोरी हो रहा है।

इस दौरान विपक्षी सांसदों ने ‘चोर-चोर’ और ‘चढ़ावा चोर’ के नारे भी लगाए। संसद जैसे पवित्र स्थान पर इस तरह का नाटक करके विपक्ष ने राम मंदिर, वहाँ के पुजारियों और देश के करोड़ों राम भक्तों का खुला मजाक उड़ाया है।

राम मंदिर के विरोध का इतिहास और विपक्ष की दोरंगी नीति

 हकीकत यह है कि जब देश में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा था, तब इस विपक्ष ने कभी कोई मेहनत या सहयोग नहीं किया। इसके विपरीत, पिछली सरकारों और इन विपक्षी दलों ने हमेशा राम सेवकों पर अत्याचार और हिंसा को बढ़ावा दिया था। उस समय इन लोगों ने राम मंदिर के निर्माण को रोकने के लिए हर संभव कानूनी और राजनीतिक बाधाएँ पैदा की थीं।

आज जब अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिला है, तो यही लोग एकजूट होकर संसद में नौटंकी करने पर आतारू हो गए हैं। अयोध्या की पावन भूमि और भगवान श्रीराम के नाम पर ये लोग केवल अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं। राम मंदिर के पुजारियों और संतों का इस तरह सरेआम मजाक उड़ाना इनकी ओछी मानसिकता को साफ दिखाता है।

मोदी की ‘एडिटेड वीडियो’ मामले में फँसे META इंडिया के हेड, हैदराबाद में हुई FIR


जंतर मंतर पर CJP का आंदोलन ख़त्म जूं-जूं दिन बीत रहे हैं, इसे हवा देने वाले बेनकाब होने लगे हैं। Meta जिसे बहुत ही विश्वसनीय माना है जब वह किसी प्रधानमंत्री के वीडियो को एडिटेड करने की हिम्मत कर सकता, इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि "वह क्या नहीं कर सकता?" क्या Meta की ये भयंकर गलती Meta पर भारी सकती है? क्या अब 'खतरों के खिलाडी' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने वैज्ञानिकों को Meta का विकल्प तैयार करने को कह सकते हैं? क्योकि मामला बहुत गंभीर है।       

हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के AI तकनीक की मदद से तैयार किए गए फर्जी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए जाने के मामले में मेटा (Meta) इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास और कुछ सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई उन वीडियो के सामने आने के बाद की गई है, जो हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘छात्र प्रदर्शन’ के दौरान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए थे।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, इन वीडियो को इस तरह तैयार किया गया था कि वे असली लगें, जबकि उनमें AI तकनीक का इस्तेमाल कर प्रधानमंत्री की छवि से छेड़छाड़ की गई थी। शुरुआती जाँच में सामने आया है कि ये वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे मेटा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में साझा किए गए। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन वीडियो को सबसे पहले किसने तैयार किया, उन्हें किसने अपलोड किया और बाद में किन लोगों ने उन्हें बड़े स्तर पर फैलाया।

इस मामले में 29 जुलाई 2026 को बीजेपी समर्थकों की शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT एक्ट) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। जाँच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था ऐसे AI आधारित भ्रामक कंटेंट को समय रहते रोकने में विफल रही। इसी वजह से मेटा इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास का नाम भी FIR में शामिल किया गया है।

इससे पहले भी हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने मेटा के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया था। उस दौरान कंपनी के प्रतिनिधियों से यह जानकारी माँगी गई थी कि AI से बनाए गए फर्जी वीडियो, ऑनलाइन धोखाधड़ी, नकली विज्ञापनों और अन्य भ्रामक सामग्री की पहचान कर उन्हें हटाने के लिए कंपनी किस तरह की व्यवस्था अपनाती है। मेटा की ओर से एक प्रतिनिधि पुलिस के सामने पेश हुआ था और उसने कंपनी की कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली व नियमों के पालन से जुड़ी प्रक्रिया की जानकारी दी थी।

इससे ही जुड़े एक अन्य मामले में दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में एक महिला के खिलाफ भी ग्रेटर नोएडा में जीरो FIR दर्ज की गई है।

मोदी और सनातन के खिलाफ आग उगलने वाली अमेरिकी पत्रकार शिखा डालमिया को ईनाम, स्पॉन्सर की गई चीन ट्रिप: रहा है भारत विरोधी इतिहास

                                           शिखा डालमिया (फोटो साभार: Illiberalism.org)
हाल ही में सबस्टैक (Substack) पर प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कुछ प्रमुख अमेरिकी पत्रकारों को चीन-यूनाइटेड स्टेट्स एक्सचेंज फाउंडेशन (CUSEF) की ओर से चीन की प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन यात्राओं का मकसद अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में माहौल बनाना था।

यह रिपोर्ट नताली विंटर्स ने लिखी है। इसमें उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम भी बताए गए हैं, जिन्होंने ये प्रायोजित यात्राएँ की थीं। इस सूची में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखक और नीति विश्लेषक शिखा डालमिया का नाम भी शामिल है।

यह रिपोर्ट अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत दाखिल दस्तावेजों पर आधारित हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक, CUSEF ने वॉशिंगटन की कुछ लॉबिंग फर्मों को इस उद्देश्य से नियुक्त किया था कि अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में सकारात्मक खबरें और संदेश बढ़ाए जा सकें।

नताली विंटर्स के मुताबिक, FARA के दस्तावेजों में उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम सीधे नहीं लिखे गए थे, जिन्हें चीन की ओर से प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया था। इन पत्रकारों की पहचान करने के लिए उन्होंने FARA के रिकॉर्ड का मिलान पुरानी यात्रा सूची, कार्यक्रमों के ब्रोशर और लॉबिंग से जुड़े दस्तावेजों से किया।

उन्होंने चीन एक्सचेंज कार्यक्रमों में शामिल लोगों की पुरानी सूची देखी, मीडिया से जुड़े आंतरिक दस्तावेजों की जाँच की और उन पत्रकारों के आर्टिकल भी पढ़े, जो उन्होंने चीन यात्रा के बाद लिखे थे। विंटर्स के मुताबिक, इन आर्टिकल में चीन को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाई देता है।

इन आर्टिकल्स में शिखा डालमिया का एक आर्टिकल भी शामिल था, जिसकी हेडलाइन है- “China Bashing is for Losers“,यह लेख फोर्ब्स (Forbes) में प्रकाशित हुआ था। शिखा डालमिया ने यह लेख उसी साल लिखा था, जिस साल उन्होंने चीन की यात्रा की थी। इस आर्टिकल में उन्होंने कहा था कि उस समय चुनावी माहौल में चीन की आलोचना करना अमेरिका की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक तरह का ‘राजनीतिक चलन’ बन गया था।

                                                                   Forbes का स्क्रीनशॉट

उन्होंने लिखा, “रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही चीन विरोधी रुख अपनाकर अपने ही नुकसान की नींव रख रहे हैं। चीन को लगातार निशाना बनाने के बजाय उन्हें उसके साथ व्यापार के फायदों पर बात करनी चाहिए। चीन को लेकर ज्यादा समझदारी वाला नजरिया अपनाने के पक्ष में सिर्फ मजबूत आर्थिक वजह ही नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक वजह भी हैं।”

इससे पहले आर्टिकल में शिखा डालमिया ने विस्तार से यह तर्क दिया था कि चीन की लगातार आलोचना करना अमेरिकी नेताओं और देश, दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

कौन है शिखा डालमिया?

शिखा डालमिया भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखर और नीति विश्लेषक हैं। उनके लेख Reason, The Week, The New York Times, The Wall Street Journal, USA Today और Bloomberg Opinion जैसे प्रकाशनों में छप चुके हैं।

शिखा डालमिया अपने उन आर्टिकल्स के लिए भी जानी जाती हैं, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की है। उन्होंने कई आर्टिकल्स में यह भी दावा किया कि मोदी सरकार ने भारत के उदार लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया, धार्मिक बहुलता को नुकसान पहुँचाया और बहुसंख्यक राजनीति को बढ़ावा दिया।

फरवरी 2020 में, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर आए थे, तब शिखा डाल्मिया ने “While Trump Was Praising Modi for Religious Freedom, Modi-Supporting Hindus Slaughtered Muslims in the Streets” हेडलाइन के साथ एक आर्टिकल लिखा था।

उस आर्टिकल में उन्होंने दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के बारे में लिखा और दंगों का अपना ही तोड़-मरोड़कर और लीपा-पोती किया हुआ वर्जन पेश किया। उन्होंने दावा किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों और ‘हिंदू उग्रवादियों’ के बीच झड़प हुई थी।

उस आर्टिकल में शिखा डालमिया ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐसी योजना बताया, जिसका उद्देश्य “भारत के 14 करोड़ मुस्लिमों में से बड़ी संख्या को नागरिकता के अधिकार से वंचित करना औऱ संभवत: उन्हें डिटेंशन कैंपों में भेजना” था।

                                                         Reason का स्क्रीनशॉट

डालमिया ने लिखा, “हिंदू उग्रवादियों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मुस्लिमों के घरों पर पेट्रोल बम फेंके, एक मस्जिद में आग लगा दी और उस पर हिंदू झंडा फहरा दिया। साथ ही मुस्लिमों की दुकानों में लूटपाट की।”

इसके अलावा डालमिया ने लिखा कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद “भारत में मुस्लिम विरोधी हिंसा एक दुखद लेकिन आम बात बन गई है।” उन्होंने यह भी आलोचना की कि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत यात्रा के दौरान देश में कथित रूप से बिगड़ते मानवाधिकारों के मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना नहीं की।

इससे एक महीने पहले, जनवरी 2020 में, उन्होंने “Indian Prime Minister Modi’s Lawless Reign of Terror” हेडलाइन से एक और आर्टिकल लिखा था। इसमें उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘गुजरात मॉडल’ को पूरे देश में लागू किया है।

आर्टिकल में डालमिया ने आरोप लगाया कि 2002 के गुजरात दंगों के दौरान इसी मॉडल के कारण “कुछ ही दिनों में 1,000 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, की हत्या हुई।” गुजरात दंगों के लिए पीएम मोदी को दोषी ठहराना डालमिया की उस तथाकथित वामपंथी-उदारवादी लॉबी की एक अजीब विशेषता है, जिसका वह खुद हिस्सा हैं।

                                                Reason का स्क्रीनशॉट

इसके बाद शिखा डालमिया ने जेएनयू (JNU) में हुई छात्र हिंसा को प्रधानमंत्री मोदी के ‘निजी उग्रवादियों’ की कार्रवाई बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के सदस्य कैंपस में हिंसा पर उतर आए और उन्होंने मुस्लिम छात्रों व अपने कमरों में डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर रखने वाले छात्रों को निशाना बनाया।

प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ही नहीं, बल्कि शिखा डालमिया ने अपने कई आर्टिकल्स में हिंदुत्व विचारधारा की भी आलोचना की है। “Hinduism sheds its gentle image in the name of nationalism” हेडलाइन वाले एक आर्टिकल में डालमिया ने दावा किया कि ‘हिंदुत्व-हिंदू राष्ट्रवाद’ की वजह से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ रहा है।

                                                    The Times का स्क्रीनशॉट

इसके बाद शिखा डालमिया ने एक और दावा किया कि भारत के विभाजन के बाद से “हिंदू उग्रवादी” लगातार मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा करते रहे हैं। उन्होंने इस दावे को अपने आर्टिकल में तथ्य के तौर पर पेश किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति डालमिया की आलोचना 2014 में और तेज हो गई, जब मोदी भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री चुने गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की अमेरिका यात्रा पर भी डालमिया ने निराशा जताई। डालमिया ने दावा किया कि यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने के लिए नहीं थी, बल्कि उनके मुताबिक यह प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता हासिल करने, खुद की छवि को बढ़ाने और अपने अहंकार को संतुष्ट करने की कोशिश थी।

                                                    The Week का स्क्रीनशॉट

एक इंटरव्यू में, जिसमें उनके साथ वाम-उदारवादी विचारों वाले सिद्धार्थ वरदराजन भी शामिल थे, शिखा डालमिया ने सबसे पहले यह कहते हुए हैरानी जताई कि ‘ मोदी जैसे व्यक्ति’ भारत के प्रधानमंत्री कैसे बन गए।

इसके बाद उन्होंने अपनी राय रखते हुए दावा किया कि भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसी हो गई है, जहाँ अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार कम हो रहे हैं। डालमिया और सिद्धार्थ वरदराजन ने मिलकर प्रधानमंत्री मोदी के शासन में भारत में आए बदलावों की आलोचना की और कहा कि उनके अनुसार देश की स्थिति पहले से खराब हुई है।

अपराधी और नाबालिग “गटर Z”(CJP) के आंदोलन में कैसे पहुंचे; अपराधी अगर बेल पर थे, तो उनकी हिंसा के लिए अदालतें भी जिम्मेदार हैं


सुभाष चंद्र 

जुलाई 28 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के पकड़े गए बच्चों को साधारण बांड पर तुरंत रिहा किया जाए अगर उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।  कोर्ट ने निष्पक्ष की जांच की बात करते हुए पुलिस पर हुए हमलों को भी शामिल करने की बात कही और पुलिस ने जो FIR दर्ज की हुई हैं, वह उन पर जांच जारी रख सकती है लेकिन छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी ( मतलब गिरफ्तार नहीं किया जाएगा) कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से कोई संरक्षण नहीं मिलेगा लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं आदेश दिया कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए घटिया अपशब्द बोलने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए जिसे बेशर्म सौरव दास “हल्का फुल्का” मजाक बता रहा है

लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र करा कर हवा में उड़ रहे “गटर Z” के सर्वेसर्वा अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका कह रहे हैं कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं मानेंगे इतनी बड़ी हठधर्मी कि सर्वोच्च न्यायलय को भी ठोकर में रखना चाहते हैं और इनके पीछे खड़ा है कपिल सिब्बल

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नाबालिगों को रिहा करने के निर्णय पर मैं कहना चाहता हूँ कि पहले सुप्रीम कोर्ट को इस विषय पर गहन विचार करना चाहिए था कि आखिर नाबालिग बच्चे आंदोलन में कैसे पहुंचे? 18 वर्ष से कम आयु का बच्चा अगर 10+2 ही कर ले तो बड़ी बात है उन्होंने कौन सी NEET की परीक्षा दे दी और Neet से उनका क्या मतलब था?

वैसे भी आजकल तो नाबालिग हर जुर्म कर रहे हैं चाहे वह हत्या हो, लूट हो या बलात्कार अक्सर बहुत से नाबालिग लड़के ट्रेन की पटरी उखाड़ते मिल सकते हैं, पटरियों पर पत्थर रखते दिखाई दे सकते हैं, वंदे भारत ट्रेनों पर और हिंदुओं की शोभा यात्राओं पर पत्थर मारते दिख सकते हैं। इसलिए उन्हें नाबालिग मान कर छोड़ देना उचित नहीं है जब तक वो आंदोलन में जाने का मकसद ने साबित कर दें 

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए यह था कि आंदोलन में शामिल समस्त नाबालिकों को उसी तरह दण्डित किया जाए जिस तरह किसी व्यस्क को। क्योकि अगर किसी तरह इनमें से किसी एक भी मौत हो गयी होती आन्दोलनजीवी और इनके आकाओं ने आसमान सिर पर उठा लिया होता और सुप्रीम कोर्ट भी सरकार और पुलिस को जिम्मेदार ठहराती। कहती देखो कितनी अत्याचारी है सरकार। महिलाएं और बच्चे ही आन्दोलनजीविओं के nuclear है। केंद्र सरकार, पुलिस और निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। अदालतों को इनकी पैरवी करने वाले वकीलों को अड़े हाथों लेना चाहिए।  

कोर्ट ने कहा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से छूट नहीं मिलेगी दिल्ली पुलिस ने बताया है कि 2873 अपराधी आंदोलन के दंगों में शामिल थे जिनमें 101 पर हत्या करने के केस हैं; 294 पर Dacoity/ Robbery के केस दर्ज हैं; 229 पर Arms Act के और 1894 पर Other IPC/BNSS & Spl Laws में केस दर्ज हैं इसके अलावा: 

हत्या की कोशिश, बलात्कार, पॉक्सो, Molestation of Women, Chain Snatching अपहरण, ड्रग तस्करी के केस भी दर्ज हैं

सवाल यह उठता है कि 2873 अपराधी आंदोलन में कैसे पहुंचे? क्या वो कभी गिरफ्तार ही नहीं हुए और हुए तो क्या उन्हें मंदिर के प्रसाद की तरह जमानत वितरित कर दी गई मेरे अनुमान से गंभीर अपराधों के लिए तो उन्हें जमानत मिली हुई होगी ऐसे में उनकी जमानत तुरंत रद्द कर जेल में डाल देना चाहिए और इस दंगे का केस अगल से शुरू होना चाहिए लेकिन अब उन्हें या किसी भी अपराधी को सोच समझ कर जनमत दी जाए और Bail is a rule/Jail is an exception की थ्योरी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है  

जंतर-मंतर के आंदोलन का ‘मास्टरप्लान’ का काला सच


CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब छात्रों के नाम पर हुए जंतर मंतर पर हुए हर हंगामे का पर्दाफाश होते ही INDI गठबंधन चारों खाने चित हो रहा है। क्योकि जब किसी महल की नींव मजबूत नहीं होने पर महल ताश के पत्तों की मिट्टी में मिल जाता है, ठीक वही हालत मोदी सरकार के खिलाफ होने वाले आंदोलनों का है।   
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन का शोर तो अब थम चुका है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे छिपा राजनीतिक सच अब परत-दर-परत बेनकाब हो रहा है। निष्पक्ष और छात्र-हितैषी आंदोलन का दावा करने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और इसके प्रमुख चेहरों की असली मंशा पर अब गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। जिस तरह से देश के मासूम युवाओं के आक्रोश और ‘पेपर लीक’ जैसे संवेदनशील मुद्दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकी गईं, उसने इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की गहरी साजिश को जगजाहिर कर दिया है।

अमर्यादित भाषा और दागियों का साथ  
प्रदर्शन के दौरान सौरभ दास जैसे प्रमुख चेहरों का असली चरित्र उस समय सामने आया, जब प्रधानमंत्री के खिलाफ भद्दी और अमर्यादित भाषा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों का उन्होंने खुलेआम बचाव किया। हद तो तब हो गई जब जंतर-मंतर पर दागियों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले असामाजिक तत्वों को न्यौता देने पर सवाल उठे, तो आयोजकों ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के स्पष्ट आदेशों और गाइडलाइंस को मानने से साफ इनकार कर दिया।

‘सिलेक्टिव नरेटिव’ और दोहरे रवैये की खुली पोल
लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के इस तंत्र का दोहरा रवैया भी देश के सामने आ चुका है। यह स्वयंभू टोली केवल भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर (FIR) वापस लेने की मांग तो जोर-शोर से उठाती रही, लेकिन जब वैसी ही प्रशासनिक कार्रवाई वामपंथी सरकार वाले राज्य केरल या अन्य विपक्षी शासित प्रदेशों में हुई, तब इनकी जुबान पर ताला लग गया। यह ‘सुविधाजनक विरोध’ उनके निष्पक्ष होने के खोखले दावों की धज्जियां उड़ाता है।

आंदोलनकारियों की नीयत का पर्दाफाश !
आंदोलनकारियों की नीयत का सबसे बड़ा पर्दाफाश तब हुआ, जब उन्होंने कैमरे पर खुद स्वीकार किया कि ‘पेपर लीक’ और धांधली की समस्याएं हर दौर और हर सरकार के कार्यकाल में होती रही हैं, लेकिन उनका सीधा निशाना केवल और केवल भाजपा और केंद्र सरकार है। इस कबूलनामे ने साफ कर दिया कि इस पूरे तमाशे की मूल प्रेरणा छात्रों का भविष्य सुधारना नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और मोदी विरोध था।

युवाओं के सामने खड़ा बड़ा ‘यक्ष प्रश्न’
जंतर-मंतर से भले ही तंबू-कनात उखड़ चुके हों और सड़कों का शोर शांत हो गया हो, लेकिन इस आंदोलन ने देश के लाखों छात्रों के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है। प्रश्न यह है कि क्या युवा वाकई अपने हक और परीक्षा सुधारों की लड़ाई लड़ रहे थे, या फिर वे किसी के गुप्त राजनीतिक ‘मास्टरप्लान’ में केवल ढाल और मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर लिए गए? कानून, संविधान और न्यायपालिका के सम्मान को ताक पर रखकर अपनी सहूलियत से विरोध का रास्ता चुनने वाले इन चेहरों का लक्ष्य कभी भी छात्रों का भला करना नहीं था।

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट की ‘इनसाइड स्टोरी’

‘विपक्ष का पिछलग्गू’: रणनीतिकार अभिजीत दिपके पर उठते सवाल
आंदोलन के मुख्य सूत्रधार अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke) की भूमिका पूरी तरह कटघरे में है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे दिपके ने खुद को ‘गैर-राजनीतिक’ बताकर आंदोलन शुरू किया था। लेकिन जिस तरह उन्होंने बीजेपी के खिलाफ ऑनलाइन पोल चलाए, पंजाब-कर्नाटक के पेपर लीक पर चुप्पी साधी और कांग्रेस के दिग्गज कानूनी सलाहकारों का सहारा लिया, उससे उनकी तटस्थता का ढोंग बेनकाब हो गया।

दलित राजनीति का ढोंग और ‘क्रीमी लेयर’ पर रहस्यमयी चुप्पी
एक शिक्षित दलित पृष्ठभूमि से आने के कारण अभिजीत दिपके के पास ‘राष्ट्र-प्रथम’ की सोच के साथ देश का बड़ा जननेता बनने का स्वर्णिम अवसर था। यदि वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने के ऐतिहासिक स्टैंड का समर्थन करते—ताकि अंतिम पायदान के वंचित दलितों को अधिकार मिले—तो वे एक सच्चे समाज सुधारक बनते। लेकिन उन्होंने दूरगामी सामाजिक सुधार के बजाय तात्कालिक राजनीतिक विरोध का आसान रास्ता चुना।

अन्ना आंदोलन जैसा नैतिक बल नहीं, केवल राजनीतिक अवसरवाद
यदि इस आंदोलन का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि दिपके और CJP की यह लहर किसी नैतिक विचार या सामाजिक बदलाव की उपज नहीं थी। वर्ष 2011 के ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन के विपरीत, जहाँ एक नैतिक आधार था, यह पहल केवल सरकार की कमियों पर रोटियां सेकने का राजनीतिक अवसरवाद भर थी। नतीजतन, देश के युवाओं के हाथ केवल निराशा और छलावा ही आया।

न्यायपालिका पर अविश्वास और अराजकता को बढ़ावा
जंतर-मंतर पर जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताया गया, तो इससे आयोजकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था की पोल खुल गई। देश की सर्वोच्च अदालत को चुनौती देकर अपनी शर्तों पर भीड़ तंत्र चलाने की कोशिश करना सीधे तौर पर अराजकता को न्यौता देना है। छात्रों के अधिकारों की आड़ में देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना इस ‘मास्टरप्लान’ का सबसे खतरनाक हिस्सा था।

‘टूलकिट इकोसिस्टम’ और अंतरराष्ट्रीय साजिश का संदेह
जिस तेज़ी से आंदोलन का रुख परीक्षा सुधारों से हटकर केंद्र सरकार के तख्तापलट और प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत घृणा की ओर मोड़ा गया, उसने ‘टूलकिट इकोसिस्टम’ की सक्रियता को उजागर किया। सोशल मीडिया बॉट्स, प्रायोजित हैशटैग्स और विदेशी मीडिया आउटलेट्स द्वारा इस विरोध को अचानक हवा देना यह साबित करता है कि युवाओं के भोलेपन का इस्तेमाल भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करने के लिए किया गया।

लाखों निर्दोष छात्रों के करियर और भविष्य के साथ खिलवाड़
इस पूरे ड्रामे का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि देश के लाखों मेहनती और ईमानदार छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आंदोलन खत्म होते ही मुख्य रणनीतिकार अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे और महत्वाकांक्षाओं को साधकर सुरक्षित निकल गए, जबकि कई निर्दोष युवाओं पर कानूनी मुकदमे (FIR) दर्ज हो गए और उनका बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ। CJP के लिए छात्र केवल ‘पॉलीटिकल माइलेज’ का जरिया बनकर रह गए।

सकारात्मक समाधानों को नकारने की हठधर्मिता
जब केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों ने परीक्षा सुधारों के लिए उच्चस्तरीय समितियों का गठन किया और पारदर्शी व्यवस्था का रोडमैप पेश किया, तब भी आंदोलनकारियों ने बातचीत का दरवाजा बंद रखा। किसी भी सुधार या समाधान को स्वीकार न करना और केवल ‘इस्तीफे’ व ‘अस्थिरता’ की जिद पर अड़े रहना यह साबित करता है कि उनका मकसद समस्या हल करना था ही नहीं, बल्कि माहौल खराब रखना था।

‘अर्बन नक्सल थ्योरी’ और वामपंथी ताकतों की वापसी
जंतर-मंतर के मंच का इस्तेमाल जिस तरह से देशविरोधी और अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया गया, उसने ‘अर्बन नक्सल’ नरेटिव को फिर से हवा दे दी। परीक्षा सुधार के नाम पर जुटाए गए मंच पर जब वामपंथी विचारधारा से प्रभावित विवादित चेहरों और संगठनों को संरक्षण दिया जाने लगा, तो यह साफ हो गया कि यह मंच छात्रों का नहीं, बल्कि वामपंथी इकोसिस्टम को दोबारा जिंदा करने का अखाड़ा बन चुका था।

‘विक्टिम कार्ड’ और मीडिया में भ्रामक नरेटिव गढ़ने की साजिश
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सोशल मीडिया पर एक प्रायोजित ‘नरेटिव वॉर’ चलाया गया। जमीनी सच्चाइयों को दरकिनार कर कटी-छांटी क्लिप्स और फर्जी खबरों के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश हुई। जब भी निष्पक्ष पत्रकारों ने आंदोलन के नेताओं से कड़े सवाल पूछे, वे जवाब देने से भागते नजर आए और तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर विक्टिम बनने का नाटक करने लगे।

संसदीय लोकतंत्र और जनमत का खुला अनादर
आंदोलन के नाम पर जिस तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और 140 करोड़ जनता द्वारा चुनी गई सरकार की वैधता को खारिज करने की धमकियां दी गईं, वह चिंताजनक है। बिना किसी व्यापक जनाधार के, मुट्ठी भर लोगों द्वारा संसद का घेराव करने और मनमाने ढंग से सरकार गिराने की बातें करना भारतीय संसदीय लोकतंत्र का अपमान है। सुधार के नाम पर अराजकता का यह मॉडल पूरी तरह विफल साबित हुआ, जिसे देश की समझदार जनता ने खारिज कर दिया।