जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध


भारत में हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बाद 500 साल मुगलों ने.. 200 साल अंग्रेजों ने और 70 साल कांग्रेस ने शासन किया फिर 770 साल दलितों का शोषण सवर्णों ने कैसे किया? हमारे देश में ऐसा नेता है जो महाज्ञानी रावण को बदनाम कर रहा है जिसके पीछे चन्द्रशेखर "रावण" लगता है। रावण एक ऐसा महाज्ञानी पंडित था जिसने माता सीता को छुआ तक नहीं और एक ये कलयुग का "रावण" है जिसने एक दलित बेटी का बार बार शोषण किया है। आज ये जिस प्रकार दलितों को बली का बकरा बना कर शांति दूतों से क*ट*वा रहा है। और एक शब्द तक नहीं बोलता क्योंकि कहीं इसके वोट बैंक को बुरा न लग जाए। 
भारत में जब मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिश आये थे अपने साथ कोई फौज नहीं लेकर आए थे क्योकि उनको मालूम था कि भारत में बिकाऊ जयचन्दों और मीर ज़ाफरों की कोई कमी नहीं। एक ठूंठोंगे हज़ार मिल जाएंगे। वही भूमिका हमारे कुछ सांसद और पार्टियां निभा रही है। जो देश को जाति और मजहब के नाम पर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। किसी में यह कहने की हिम्मत नहीं कि सभी भारतीय हैं और सबको समान अधिकार मिलने चाहिएं। 

दूसरे, आंबेडकर की माला जपने वाले देश को बताएं कि क्या आंबेडकर ने आरक्षण मांगने पर इसके दुरूपयोग होते देख ख़त्म करने के लिए नहीं बोला था? फिर उसी आरक्षण पर इतना बवाल क्यों? इसमें दोषी जनता भी है जो जाति आधारित पार्टियों को वोट देती है। इतना ही नहीं जितनी भी पार्टियां है सभी इस जहर को परोस रही हैं। देश में ऐसी कौन-सी पार्टी है जिसने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ नही बनाया हुआ। किसी भी पार्टी में इन प्रकोष्ठों को बंद करने की हिम्मत नहीं। जब हमाम में सभी नंगे है फिर एक-दूसरी पार्टी पर दोषारोपण क्यों? फिर कहते हैं कि हम भारतीय हैं। जब सभी भारतीय हैं तो इन प्रकोष्ठों की नौटंकी क्यों? आखिर इस नौटंकी की कब राम नाम सत्य होगी।        

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।

उन्होंने कहा कि आरक्षण इन लोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।  

नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एक मात्र व्यवहार्य समाधान है।”

दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।

संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”

1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधान सभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।

इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।

अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।

संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

साभार- संविधान सभा की बहसें (खंड 8) (स्रोत: constitutionofindia.net)

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।

पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए

पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।
भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।

गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद

महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना ​​था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।
उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।

पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान

24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।
दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।
अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।
हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।
भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।
हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।
समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।
बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान का हिस्सा: क्या यह स्थायी है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

              इजरायली फौज द्वारा बनाई गई येलो लाइन, बेंजामिन नेतान्याहू (साभार: X_IDF/AI ChatGPT)
पूरी दुनिया जब अप्रैल 2026 के बीच में इजरायल-लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम पर नजर टिकाए हुए थी, तभी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक नई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) या ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ बना दी। इजरायली रक्षा बल (IDF) ने खुद एक नक्शा जारी कर बताया कि दक्षिणी लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर गहरी यह सैन्य जोन अब उनके नियंत्रण में है। पाँच डिवीजनों की ताकत के साथ इजरायली सैनिक इस लाइन के दक्षिण में तैनात हैं।

आईडीएफ ने कहा है कि उसके सैनिक हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करने और उत्तरी इजरायल पर हमले रोकने के लिए मैदान में डटे हैं। हालाँकि लेबनान और हिजबुल्लाह इसे संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा बताते हुए इस कदम का विरोध किया है। एक तरफ अभी युद्धविराम की स्याही सूखी भी नहीं है कि दूसरी तरफ इजरायली बुलडोजर दक्षिणी लेबनान के भीतर बसे गाँवों में घरों को तोड़ रहे थे, तोपें चल रहे थे और हवाई हमले हो रहे थे। हालाँकि अभी युद्धविराम लागू है, लेकिन छिटपुट हमले दोनों तरफ से हो रहे हैं।

लेबनान के दक्षिणी हिस्सा में घट रही यह घटना महज एक स्थानीय तनाव नहीं है। यह मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक नक्शे में एक नया अध्याय जोड़ रही है। इजरायल ने पहले भी लेबनान पर कब्जा किया था, जिसमें 1982 से 2000 तक 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर कब्जा रखा था। तब भी उसने लिटानी नदी तक पहुँचने का सपना देखा था और आज फिर वही रणनीति इजरायल की तरफ से दोहराई जा रही है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या इजरायल का यह कब्जा स्थायी होगा? या उसका ये कदम अमेरिका-ईरान वार्ता में सौदेबाजी का हथियार बनेगा। 

येलो लाइन का जन्म और युद्धविराम का मजाक

मध्य पूर्व में एक बार फिर सीमाओं की लकीरें स्याही से नहीं, बल्कि टैंकों के टायरों और सैन्य चौकियों से खींची जा रही हैं। इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में बनाई गई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य घेराबंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जो दशकों पुराने विवादों को नया रंग दे रही है।

दरअसल, अमेरिका की मध्यस्थता में 16 अप्रैल 2026 को इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का युद्धविराम शुरू हुआ है। करीब 46 दिन के इजरायली हमलों और जमीनी ऑपरेशन के बाद यह समझौता हुआ। लेकिन कुछ घंटों में ही IDF ने दक्षिणी लेबनान में ‘येलो लाइन’ की घोषणा कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा, “हम लेबनान में 10 किलोमीटर गहरी मजबूत सुरक्षा पट्टी में रहेंगे। यह पहले से कहीं ज्यादा ठोस, निरंतर और मजबूत है। हम यहाँ से नहीं जाएँगे।”

IDF के बयान में कहा गया कि लाइन के दक्षिण में पाँच डिवीजनों के सैनिक हिजबुल्लाह के आतंकी ढाँचे को तोड़ रहे हैं। जिसकी वजह से 55 लेबनानी गाँवों और कस्बों में निवासियों को वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई।

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम शुरू होते ही इजरायली सेना ने हनीन गाँव में घर उड़ाए, बेत लिफ, अल-कांतारा और तौल पर तोपें दागीं। बुलडोजर से जमीन साफ की जा रही है। गाजा में इसी येलो लाइन मॉडल का इस्तेमाल हो रहा है, जहाँ का 60 प्रतिशत इलाका इजरायली नियंत्रण में है और सैकड़ों घर ध्वस्त किए गए। अब लेबनान में भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।

 हिजबुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने कहा, “युद्धविराम एकतरफा नहीं हो सकता। अगर इजरायल उल्लंघन करेगा तो हम जवाब देंगे। हमारे लड़ाके मैदान में हैं, ट्रिगर पर उँगली रखे हुए।” हिजबुल्लाह इसे देश का अपमान मान रहा है और पूर्ण वापसी की माँग कर रहा है।

इजरायल ने कब कब बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा?

इजरायल का विस्तारवाद नया नहीं है। साल 1918 में डेविड बेन-गुरियन और यित्जाक बेन-ज्वी ने ‘एरेट्स यिसराइल’ किताब में लिखा कि यहूदियों का देश लिटानी नदी तक फैला होना चाहिए। इसके बाद 1919 में वर्ल्ड जियोनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ने पेरिस शांति सम्मेलन में लिटानी नदी को उत्तरी सीमा बताते हुए नक्शा पेश किया गया।

इजरायल की आजादी के बाद साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के 15 गाँवों पर कब्जा कर लिया। हालाँकि बाद में साल 1949 में आर्मिस्टिस समझौते के तहत इसमें से सात गाँवों को इजरायल को सौंप दिए गए।

इसके बाद साल 1978 में ऑपरेशन लिटानी के तहत इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वो साल 1982 में ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली में बेरूत तक पहुँच गए। और फिर करीब 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा बना रहा। हालाँकि साल 2000 में यूनिफिल और हिजबुल्लाह के दबाव में इजरायल ने वहाँ से वापसी की, लेकिन शेबा फार्म्स पर कब्जा आज भी जारी है।

वहीं साल 1967 के छह दिन युद्ध में गोलान हाइट्स (सीरिया) पर कब्जा कर लिया, जिसे साल 1981 में इजरायल ने अपने आप में मिला लिया। यही नहीं, वेस्ट बैंक और गाजा पर उसका साल 1967 से ही कब्जा है। और अब 2026 में लेबनान में फिर वही पैटर्न दिख रहा है, जिसमें पहले सुरक्षा जोन, फिर स्थायी नियंत्रण।

इजरायल का तर्क हमेशा ‘सुरक्षा’ रहा है। लेकिन आलोचक इसे ‘ग्रेटर इजरायल’ का हिस्सा मानते हैं, जिसमें लिटानी नदी, गोलान और वेस्ट बैंक शामिल हैं। अभी 2026 के जमीनी ऑपरेशन में इजरायल ने पहले ही दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में बफर जोन बना लिया था। जिसे अब येलो लाइन संस्थागत रूप दे रही है।

क्या यह स्थाई कब्जा है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कब्जा अस्थायी नहीं होगा। चूँकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साफ कह चुके हैं कि इजरायली सेना ‘क्लियर और सिक्योर’ पोजीशंस को छोड़ने वाली नहीं है। इसके साथ ही गाजा मॉडल की तरह लेबनान में भी सफाई अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।

हालाँकि दक्षिणी लेबनान का यह इलाका (जिस पर अभी इजरायली सेना मौजूद) भविष्य की बातचीत (ईरान या लेबनान के साथ) में ‘लीवरेज’ (दबाव का हथियार) बन सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

दरअसल, इस इलाके का और खासकर हिज्बुल्लाह का ईरान से जुड़ाव और गहरा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका-ईरान वार्ता का पूर्व शर्त है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में ईरान ने कहा कि जब तक इजरायल लेबनान से नहीं हटेगा, कोई समझौता नहीं होगा। ईरान के इस स्टैंड के बाद ही इजरायल-लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, लेकिन अब जब ईरान बातचीत की टेबल पर आएगा तो उसके बाद सिर्फ हॉर्मूज ही नहीं दक्षिणी लेबनान का हिस्सा भी जोर-आजमाइश के लिए मौजूद रहेगा।

इस बीच, हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल नहीं हटा तो वे जवाब देंगे। लेबनानी सेना और सरकार भी संप्रभुता की बात कर रही है। यूएनएफआईएल (UNIFIL) पहले से ही रेजोल्यूशन 1701 का हवाला दे रही है, जिसमें इजरायल को ब्लू लाइन के दक्षिण में रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलेगी या मिलेगी हमेशा की तरह निंदा?

इतिहास गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के कब्जों को कभी मान्यता नहीं दी है। गोलान हाइट्स पर 1981 के एनेक्सेशन को यूएन ने अवैध घोषित किया। वेस्ट बैंक पर बस्तियों को भी वो अवैध कहता है। लेबनान भी रेजोल्यूशन 1701 (2006) के तहत इजरायल से पूर्ण वापसी की माँग करता रहा है। तो यूएन एक्सपर्ट्स ने इजरायल के बमबारी को ‘एथनिक क्लिंजिंग’ और ‘डोमिसाइड’ (घरों का विनाश) बताया है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यूएन की ताकत बहुत सीमित है। यूएन में इजरायल के लिए उठ रही किसी भी समस्या पर अमेरिका तुरंत वीटो कर देता है। ऐसे में साल 2026 में भी यूएन सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव तो आ सकते हैं, लेकिन कुछ भी लागू होना मुश्किल है। हालाँकि फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों ने ‘येलो लाइन’ की निंदा की है, लेकिन इजरायल ‘आत्मरक्षा’ का हवाला देकर कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में अगर यूएन कोई निंदा प्रस्ताव लाता भी है, तो भी इजरायल पर कोई खास फर्क पड़ेगा, ये अभी तो नहीं देखा जा रहा।

भविष्य में होगी शांति या खुलेगा वॉर का नया फ्रंट?

अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान की बातचीत सफल हुई तो लेबनान से इजरायली वापसी हो सकती है। हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल न सिर्फ लेबनान बल्कि सीरिया में भी क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति अपना रहा है। क्योंकि भविष्य की किसी भी बातचीत में यह जमीन ‘लीवरेज’ बनेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जबरन कब्जा भी ज्यादा समय तक टिकता नहीं है।

चूँकि इजरायल पहले भी 18 साल के कब्जे के बाद साल 2000 में दक्षिणी लेबनान से हटा था, ऐसे में किसी समझौते और स्थाई सुरक्षा गारंटी के नाम पर वो फिर से अपने कदम वापस खींच भी सकता है। बशर्ते उस पर अमेरिकी दबाव बना रहे।

क्या हो सकती हैं संभावनाएँ?

फिलहाल, इस मामले में अभी दो ही संभावित रास्ते दिखते हैं-

रास्ता A (बड़ा समझौता): अगर अमेरिका ईरान को कुछ बड़ी आर्थिक राहत देता है और बदले में ईरान हिजबुल्लाह को सीमा से पीछे हटने के लिए मना लेता है, तो एक ‘अस्थाई डील’ हो सकती है। इसमें ‘येलो लाइन’ को हटाकर वहाँ लेबनानी सेना या एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय फोर्स को तैनात किया जा सकता है।

रास्ता B (लंबा संघर्ष): यह ज्यादा संभव लग रहा है। इजरायल जिस तरह से 55 गाँवों को खाली कराकर वहाँ बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रहा है, उससे लगता है कि वह वहाँ ‘स्थाई सुरक्षा चौकियाँ’ बनाना चाहता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर गुरिल्ला वॉर शुरू करेगा, जिससे यह संघर्ष महीनों या सालों तक खिंच सकता है।

लेबनान में इजरायल की सैन्य उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी सीमाएँ अब सिर्फ कागज पर रह गई हैं। यह कब्जा न केवल लेबनान की भौगोलिक स्थिति को बदल रहा है, बल्कि यह ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले ‘ग्रैंड बार्गेन’ का भविष्य भी तय करेगा।

बहरहाल, दशकों से युद्ध का मैदान बन चुका मिडिल ईस्ट अब भी दहक रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर यह ‘ग्रेटर इजरायल’ vs ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (ईरान-हिजबुल्लाह-हमास) की जंग है। इन सबके बीच हकीकत यही है कि मिडिल ईस्ट का नक्शा सचमुच बदल रहा है। ऐसे में इजरायल का यह ताजा विस्तार स्थाई होता है या अस्थाई, ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि इसका फौरी जवाब किसी के पास नहीं है। चूँकि अब पूरा मामला सौदेबाजी, समय और कूटनीतिक चालों में उलझ चुका है, ऐसे में इस समस्या को लेकर आगे क्या बदलाव आते हैं, इस पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।

महिला सशक्तीकरण के नाम पर बीजेपी को सत्ता पाने की लालसा तो कर्नाटक में 6 लाख सरकारी कर्मचारियों को वेतन के लाले

                                 सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका (AI फोटो साभार: Dall-E)
एक तरफ राज्यों में होने वाले चुनावों में सत्ता पाने के लिए बीजेपी महिला सशक्तिकरण बिल से महिलाओं को लुभाने में लगी है तो कर्नाटक में सरकारी कर्मचारी अपने वेतन के लिए तरस रहे हैं। ये फ्री की रेवड़ियों से कितना नुकसान हो रहा है जिसे विपक्ष की राज्य सरकारों में साफ-साफ देखा जा सकता है। ये वही मुफ्त की रेवड़ियां है जिनके लिए अरविन्द केजरीवाल का सभी पार्टियों ने विरोध जिन दुष्परिणामों को बता किया था, लेकिन सत्ता पाने की लालसा में उसी मकड़जाल में सभी पार्टियां फंस गयीं। बीजेपी शासित राज्यों में दुष्प्रभाव इसलिए नहीं दिख रहा कि केंद्र में भी बीजेपी सरकार है। दूसरे, बीजेपी जानती थी कि महिला बिल पास नहीं होगा उसके बावजूद बिल पेश करना क्या महिला वोट लेने का लालच नहीं? वर्तमान में आरक्षित करने में क्यों दर्द हो रहा है? जिस चुनाव में जिस पार्टी ने फ्री की रेवड़ियों को बंद करने की बात कही उसी पार्टी का सूपड़ा साफ होना तय है, चाहे बीजेपी ही क्यों न हो। 

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मुफ्त रेवड़ियों के वादे किए, लेकिन सत्ता में आने के दो साल बाद भी यह बोझ आम आदमी की झेल रहा है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका हुआ है। हालात यह है कि लाखों कर्मचारी अप्रैल का आधा महीना गुजरने के बाद भी मार्च 2026 के वेतन का इंतजार कर रहे हैं।

मामला सीधे तौर पर राज्य के करीब 6 लाख कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें हर महीने की तरह अप्रैल के पहले हफ्ते में वेतन मिल जाना चाहिए था। लेकिन इस बार 10 अप्रैल तक भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समस्या एक-दो विभाग तक सीमित नहीं है। शिक्षा, राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के कर्मचारी इस देरी से प्रभावित हुए हैं। यानी पूरा प्रशासनिक ढाँचा ही इसकी चपेट में आ गया है।

सरकारी कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस देरी की दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं। पहली- फंड की कमी और दूसरी- ट्रेजरी और प्रोसेसिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें। अधिकारियों का कहना है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने के समय भुगतान का दबाव बढ़ जाता है, जिससे देरी हो जाती है।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। राज्य की कांग्रेस सरकार पर पर आरोप सामने आए हैं कि सरकार ने करीब 6000 करोड़ रूपए की रकम अपनी गारंटी स्कीम्स, खासकर ‘गृहलक्ष्मी योजना’ की ओर डायवर्ट की है, जिससे वेतन भुगतान पर असर पड़ा।

वहीं राज्य के वित्तीय विभाग के अधिकारियों से एक और अहम बात सामने आई है। कई जगह ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDOs) ने समय पर बिल प्रोसेस नहीं किए, जिसकी वजह से भुगतान और अटक गया। यानी समस्या सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढिलाई की भी है।

वेतन में देरी का असर?

हालाँकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि हर साल मार्च-अप्रैल के दौरान 2-3 दिन की देरी सामान्य मानी जाती है, लेकिन इस बार 10 दिन से ज्यादा देरी हो चुकी है, जो असामान्य है। यही वजह है कि कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है।

जमीनी स्तर पर इसका सीधा असर दिख रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि सैलरी न मिलने से EMI, बच्चों की फीस, किराया और रोजमर्रा के खर्च प्रभावित हो रहे हैं। कई लोगों को उधार लेने की नौबत आ गई है।

कुल मिलाकर, यह सिर्फ वेतन में देरी का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ सरकार की गारंटी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, दूसरी तरफ 6 लाख कर्मचारियों की सैलरी समय पर नहीं देना प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ाने वाला संकेत है।

राज्य में जीत को कांग्रेस ने किए थे ‘रेवड़ी’ वादे

2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने पाँच गारंटी दी थी। इन्हें ‘रेवड़ी’ कहा गया था। कांग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। इसे गृह ज्योति योजना का नाम दिया गया था। इसके अलावा गृह लक्ष्मी नाम की योजना का भी एक वादा किया गया था। इसके अंतर्गत कांग्रेस ने वादा किया था कि वह राज्य की महिलाओं को 2000 रूपए प्रतिमाह देगी।

कांग्रेस ने कर्नाटक की आर्थिक स्थिति और मुफ्त सुविधाओं के वादों से अर्थव्यस्था पर पड़ने वाले बोझ को दरकिनार करते हुए हर परिवार को 10 किलो अनाज देने का भी वादा किया था, इसे अन्न भाग्य योजना का नाम दिया गया था। कांग्रेस ने राज्य में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का भी वादा किया था। इसके अलावा राज्य के बेरोजगार युवाओं को भी 1500 रूपए देने की बात कही गई थी। इनमें से कुछ योजनाएँ पूरी तरह से लागू कर दी गई हैं तो कुछ को आंशिक रूप से लागू किया गया है।

कांग्रेस के इन ‘रेवड़ी’ वादों का असर अब राज्य के खजाने पर दिख रहा है और वह राजस्व बढ़ाने के लिए नई-नई जुगत भिड़ा रही है। वह राज्य की आम जनता को अब नए कर और बढ़े करों से लादना चाह रही है। साथ ही वह कमाई के नए जुगाड़ भी लगा रही है। सरकारी कर्मचारियों का लटका वेतन भी इसी का असर है।

डीजल-पेट्रोल के बाद पानी और बसों के किराए बढ़ाने की तैयारी

इससे पहले भी कांग्रेस सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए जनता पर बोझ डाला है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे। कांग्रेस सरकार ने राज्य में पेट्रोल और डीजल पर सेल्स टैक्स बढ़ाया था। इसके अंतर्गत पेट्रोल और डीजल के दाम राज्य क्रमशः 3 रूपए और 3.50 रूपए बढ़ गए थे। इसको लेकर कॉन्ग्रेस सरकार की खूब आलोचना हुई थी। यह निर्णय लोकसभा चुनाव के आने के तुरंत बाद लिया गया था।

पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने से भी कांग्रेस सरकार का खजाना पूरा नहीं पड़ा कि फिर कांग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु में पानी आपूर्ति के दाम बढ़ाने का ऐलान कर दिया था। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार का दावा है कि बेंगलुरु का जल आपूर्ति विभाग अपना बिजली का बिल और कर्मचारियों की तन्ख्वाह तक नहीं दे पा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि कावेरी नदी से पानी लेने वाले बाशिंदों के लिए पानी की कीमतें 40% बढ़ाए जाने की तैयारी की।

खड़गे और पप्पू यादव सटक गए लगते हैं :पाकिस्तानी आतंकी हमलों के सबूत मांगो और मोदी को आतंकवादी कह रहे खड़गे; पप्पू यादव ने बता दिया महिलाएं क्या है?

सुभाष चन्द्र

पप्पू यादव के इस बयान से याद आता है फिल्म "दुल्हन वही जो पिया मन भाये" से चर्चित हुई नायिका रामेश्वरी की। रामेश्वरी ने जब इसी तरह का दिया बयान इतना भारी पड़ा कि फिल्म जगत से ही धूमिल हो गयी। वैसे #Metoo में ऐसे समाचार आते रहते हैं। क्या कार्यवाही हुई कुछ नहीं।   

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सोच समझ कर प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्द कहते है।  पिछले एक चुनाव में उन्हें “जहरीला नाग” कहा था कुछ दिन पहले मुसलमानों को भड़काया था कि नमाज़ छोड़ कर सामने जाते हुए सांप को मारो और भाजपा और RSS सांप हैं, उन्हें मारो यह आतंकवाद बढ़ाने वाला प्रवचन नहीं है क्या और प्रधानमंत्री मोदी को “आतंकवादी” कह दिया खड़गे ने साफ़ शब्द प्रयोग किया “ मोदी Terrorist है” लेकिन पाकिस्तान के आतंकियों के सबूत मांगते हैं

लेकिन आज चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस तो दिया है लेकिन कांग्रेस के नेता इतने चिकने घड़े हैं कि इन पर किसी बात का कोई असर नहीं होने वाला अब खड़गे लीपापोती कर रहे हैं कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है उनका तो मतलब था कि मोदी विपक्षी दलों को ED और CBI से आतंकित करते हैं मतलब लोग तो मूर्ख हैं न जो आपका मतलब नहीं समझते

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राहुल गांधी मोदी को जादूगर बोला वह भी लोकसभा में और ट्रंप का गुलाम कहता है प्रधानमंत्री के लिए तू-तड़ाक की भाषा बोलता है और ऑपरेशन सिंदूर को भी जादू बता दिया

उधर पवन खेड़ा ने हिमंता विश्वा सरमा की पत्नी पर 3 देशों के पासपोर्ट रखने का आरोप लगा दिया लेकिन दिल्ली, गुवाहाटी कोर्ट नहीं गया, तेलंगाना हाई कोर्ट गया अब भागता फिर रहा है क्योंकि गुवाहाटी कोर्ट ने कह दिया कि गैर जमानती वारंट की जरूरत नहीं है, पुलिस उसे गिरफ्तार कर सकती है क्योंकि उनके कथित अपराध इस श्रेणी में आते हैं

अब पप्पू यादव ने और गज़ब कर दिया उसने तो महिलाओं की घनघोर बेज्जती करते हुए कहा कि पुरुषों के कमरे में बिना जाए 90% महिलाएं राजनीति में नहीं आ सकती पुरुषों के कमरों से मतलब साफ़ है “bedroom” में जाती हैं पप्पू यादव के बयान से बता दिया महिला आरक्षण का विरोध कांग्रेस ने क्यों किया था

सियासत में जितनी भी महिलाएं हैं और महिला आयोग को पप्पू यादव द्वारा महिलाओं लगाए आरोपों के सबूत मांगने चाहिए और सबूत नहीं देने पर बिना किसी अगर-मगर के सीधा जेल और कोई जमानत नहीं। जमानत देने वाले जज-पुरुष हो या महिला-सख्त कार्यवाही की मांग करनी चाहिए।   

जब बिहार महिला राज्य महिला आयोग ने नोटिस जारी कर 3 दिन में जवाब मांगा तो “बीमार” हो गया और अस्पताल में भर्ती हो गया लालू यादव भी यही करता है जो कोर्ट में जाने से पहले व्हीलचेयर पर चलना शुरू कर देता है और जब जब उसे सजा हुई वह अस्पताल में रहा

कितनी गंदगी फैला दी इन लोगों ने राजनीति में ऐसी मर्यादाहीन शब्दावली पिछले 12 साल से पहले कम ही उपयोग की गई है वैसे तो मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए भी ये लोग अनाप शनाप बकते थे लेकिन अब तो सारी सीमाएं पार कर चुके हैं

एक और मैडम आजकल बहुत फुदक रही है कभी मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाली मधुकिश्वर आजकल मोदी के खिलाफ अनर्गल बकबक कर रही है चंडीगढ़ पुलिस ने केस दर्ज कर दिया है अब सबूत देने पड़ेंगे उस वीडियो के जो उसने मोदी के लिए जारी किया था 

कांग्रेस और विपक्ष के इतने विलाप के बाद भी मोदी की लोकप्रियता 68% पर बनी हुई है। इनकी बातों से और बढ़ती जाएगी

चंद्रशेखर हिम्मत है तो ईसाईओं और मुसलमानों को जातियों में विभाजित करके दिखाओ


हिन्दुओं को जातियों में बाँटने वाले किसी भी जीवट नेता में मुस्लिमों को जातियों में बाँटने की हिम्मत है? किसी ने माँ का दूध नहीं पिया। हिन्दुओं को विभाजित करने में इसलिए सफल हो जाते हैं क्योंकि हिन्दू पागलों की तरह इनकी भड़काऊ चालों में आ जाता है जबकि मुसलमान नहीं। इन विघटनकारी नेताओं को वोट देने वालों की सोंच पर हैरानी होती है। इन कालनेमि हिन्दू नेताओं को वोट देने वाले हिन्दुओं देश को अंधकार मत लेकर जाओ। योगी आदित्यनाथ की बात मत भूलो "बंटे तो कटे"
। जिन हिन्दुओं ने कटने की कसम खा ली है जरूर इन तुष्टिकरण करने वालो को वोट दो, फिर मत रोना, सरकार से मदद मत मांगना और जब तुम कट रहे होंगे इन नेताओं में से कोई तुम्हे बचाने आगे नहीं आएगा उल्टे दोषियों को बचाने तुम्हे ही दोषी बताएंगे। उन्हें भटका हुआ, गरीब, मज़लूम, दिमाग से पागल आदि कहने के अलावा दुष्प्रचार करेंगे कि मुसलमान होने की वजह से उन पर जुल्म किया जा रहा है।    

हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने वाले नेताओं हिन्दुओं में चाहे जितनी भी जातियां हो फिर भी जाते सब एक ही मन्दिर और शमशान में जबकि ईसाई और मुस्लिमों में सब जातियों के अलग चर्च, मस्जिद और कब्रिस्तान हैं। कोई दूसरे के चर्च या मस्जिद में नहीं जा सकता और न ही कब्रिस्तान में अपना मुर्दा दफ़न कर सकता है।        

संसद में परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के एक बयान ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। चंद्रशेखर ने दलितों के लिए ‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ (अलग निर्वाचक मंडल) की माँग उठाई।

इसका सीधा मतलब यह है कि देश में ऐसी सीटें बनाई जाएँ जहाँ केवल दलित उम्मीदवार खड़े हों और उन्हें वोट देने का अधिकार भी सिर्फ दलित मतदाताओं को ही हो। इस माँग के सामने आते ही सोशल मीडिया पर चंद्रशेखर का Video वायरल हो गया है और आलोचक इसकी तुलना 1916 में मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा की गई मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र की माँग से कर रहे हैं।

क्या है चंद्रशेखर की माँग और क्यों मचा है बवाल?

संसद में अपनी बात रखते हुए चंद्रशेखर आजाद ने दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में दलित प्रतिनिधि अपनी कौम के प्रति कम और अपनी राजनीतिक पार्टियों के प्रति ज्यादा वफादार रहते हैं।

चंद्रशेखर ने डॉ अंबेडकर और कांशीराम की ‘चमचा युग’ अवधारणा का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब तक दलितों को अपना प्रतिनिधि खुद चुनने का स्वतंत्र अधिकार (सेपरेट इलेक्टोरेट) नहीं मिलता, उनका असली सशक्तिकरण नहीं हो सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘पूना पैक्ट’ के कारण दलितों की स्वतंत्र राजनीति की आवाज छीन ली गई थी।

जिन्ना के मॉडल और विभाजन की आशंका

चंद्रशेखर की इस माँग पर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। जानकारों का कहना है कि इसी तरह की माँग 1916 में जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए की थी, जिसकी परिणति अंततः देश के विभाजन के रूप में हुई। आजाद भारत के संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर इस व्यवस्था को ठुकराया था क्योंकि यह समाज को जोड़ने के बजाय धर्म और जाति के आधार पर राजनीतिक रूप से तोड़ती है। आलोचकों का मानना है कि केवल एक विशेष वर्ग को वोट का अधिकार देना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है और यह देश को एक नए बँटवारे की ओर धकेलने जैसी ‘देशद्रोही’ सोच है।

दलित और मुस्लिम महिलाओं के हक की बात

वायरल वीडियो में चंद्रशेखर ने महिला आरक्षण के भीतर भी आरक्षण की बात की। उन्होंने सवाल उठाया कि 33% आरक्षण में एससी, एसटी, ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा (कोटा भीतर कोटा) क्यों नहीं है? उन्होंने कहा कि बिना इसके इन वर्गों की सबसे वंचित महिलाएँ कभी संसद तक नहीं पहुँच पाएँगी। उनके भाषण में दलित और मुस्लिम एकजुटता का सुर साफ दिखाई दिया, जिसे लेकर अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह न्याय की माँग है या तुष्टीकरण और समाज को बाँटने वाली राजनीति।

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस तेजस कारिया केजरीवाल मामले की सुनवाई से क्यों हटे?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल से जुड़े एक मामले में नया मोड़ आ गया है। दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस तेजस कारिया ने अदालत की अवमानना ​​की कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है
 इस कारण केजरीवाल और अन्य के खिलाफ याचिका पर सुनवाई टल गई है यह मामला अदालत का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने से जुड़ा है यह मामला बुधवार(अप्रैल 22) को चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था इस मामले की सुनवाई अब गुरुवार को एक अलग पीठ द्वारा की जाएगी

यह मामला उस जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं और वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की मां की गई है आरोप है कि इन लोगों ने एक्साइज नीति मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर साझा किए यह याचिका वकील वैभव सिंह द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग और उसे सार्वजनिक करना नियमों का उल्लंघन है याचिका में यह भी मांग की गई है कि इन वीडियो को सोशल मीडिया से हटाया जाए इस मामले में केवल केजरीवाल और रविश कुमार ही नहीं, बल्कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य नेताओं के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई है

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रवीश कुमार-केजरीवाल-दिग्विजय सिंह के खिलाफ दिल्ली HC में याचिका, कोर्ट का वीडियो शेयर करने पर का

जस्टिस स्वर्णकांता ने खुद को नहीं किया अलग

इससे पहले सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट से एक अन्य मामले में केजरीवाल को झटका लगा था हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार करते हुए केजरीवाल और अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था एक घंटे से अधिक समय तक हुई सुनवाई में जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी भी वादी को बिना किसी सबूत के जज पर फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है और जज किसी वादी के पूर्वाग्रह के निराधार डर को दूर करने के लिए खुद को मामले से अलग नहीं कर सकते हैं उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक नेता को बिना किसी आधार के किसी संस्था को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि किसी जज पर व्यक्तिगत हमला न्यायपालिका पर ही हमला होता है जस्टिस शर्मा ने निष्कर्ष निकाला कि उन्हें मामले की सुनवाई से हटाने की याचिकाओं में वर्णित विवरण अनुमानों और कथित झुकावों पर आधारित था जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह अदालत अपने और संस्था के लिए खड़ी रहेगी… मैं खुद को इस मामले से अलग नहीं करूंगी

पहलगाम याद रहे पाकिस्तान को और 6 मई का ऑपरेशन सिंदूर भी याद रखे जो स्थगित है, जब मर्जी शुरू हो सकता है

सुभाष चन्द्र

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आज 22 अप्रैल है, पहलगाम नरसंहार का दिन जब पाकिस्तानी दरिंदों ने धर्म पूछ कर 26 हिंदुओं की हत्या की थी। उस नरसंहार में प्राण गंवाए सभी हिंदुओं को नमन और श्रद्धांजलि

उस नरसंहार का न्याय करने के लिए 6 मई को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर कर पाकिस्तान की कमर तोड़ दी थी और जो अभी स्थगित है 

पाकिस्तान बस आज का दिन भी याद रखे और ऑपरेशन सिंदूर भी याद रखे जिसे कभी भी भारत अपनी इच्छानुसार शुरू कर सकता है क्योंकि पहलगाम का न्याय अभी अधूरा है 

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में उस दिन चारों ओर खून बिखरा पड़ा था और चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। इस जघन्य हमले की पहली बरसी की पूर्व संध्या पर भारतीय सेना ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट कर ऑपरेशन सिंदूर को याद किया। सेना ने लिखा- जब इंसानियत की हदें पार होती हैं, तो जवाब भी निर्णायक होता है। न्याय मिल गया। भारत एकजुट है। इसके साथ ही एक ग्राफिक भी था, जिस पर लिखा था- कुछ हदें कभी पार नहीं की जानी चाहिए। भारत भूलता नहीं है।

आतंकी ठिकानों का काम तमाम

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान पर निर्णायक कार्रवाई की थी। भारतीय सेना ने पाकिस्तान और गुलाम जम्मू-कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों पर हमला किया। इस दौरान नौ बड़े आतंकी लॉन्चपैड को नष्ट कर दिया गया और लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन के ठिकानों को निशाना बनाया गया।

सेना ने100 से ज्यादा आतंकियों को 72 हूरों के पास पहुँचाया 

सेना की इस कार्रवाई में 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए थे। इसके बाद दोनों देशों के बीच 4 दिन तक संघर्ष चला और भारी नुकसान झेलने के बाद पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारत के डीजीएमओ को फोन कर सीजफायर की गुजारिश की। 10 मई को दोनों पक्षों में सहमति बन गई।

नोएडा हिंसा : ‘X Storm’ से निकली चिंगारी, पुलिस को मिला फर्जी खबरें फैलाने वाला 274 लोगों का वॉट्सऐप ग्रुप

                                                                                                                    साभार: इंडियन एक्सप्रेस
राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में हुए हिंसक प्रदर्शनों की जाँच कर रही पुलिस ने दावा किया है कि सोशल मीडिया के जरिए एक संगठित नेटवर्क ने तनाव बढ़ाने और हिंसा भड़काने का काम किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘X Storm’ नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप सामने आया है जिसमें 274 लोग शामिल थे। पुलिस का कहना है कि यह ग्रुप खास तौर पर मजदूरों के आंदोलन के दौरान भड़काऊ वीडियो और गलत जानकारी फैलाने के लिए बनाया गया था। आदित्य आनंद को इस ग्रुप का एडमिन और बनाने वाला बताया जा रहा है।

इस वॉट्सऐप ग्रुप के बारे में पुलिस को तब पता चला जब वह 13 अप्रैल की हिंसा के मुख्य आरोपित आदित्य आनंद से पूछताछ कर रही थी। शुरुआत में यह प्रदर्शन मजदूरों की बेहतर वेतन की माँग को लेकर शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में यह तेजी से हिंसक हो गया। इस दौरान आगजनी, पत्थरबाजी और हमले की घटनाएँ हुईं जिसमें कई औद्योगिक इकाइयों और दफ्तरों पर हमला किया गया और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।

पुलिस ने कहा है कि ‘X Storm’ वॉट्सऐप ग्रुप ने बिना पुष्टि वाले कंटेंट को फैलाने और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को भड़काने में अहम भूमिका निभाई। अधिकारियों को शक है कि कई वॉट्सऐप ग्रुप मिलकर संगठित तरीके से भड़काऊ सामग्री फैलाने और बड़े स्तर पर अशांति फैलाने की कोशिश कर रहे थे। इस ग्रुप के अन्य सदस्यों की भी पहचान की जा रही है और डिजिटल सबूतों की जाँच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस हिंसा की योजना और साजिश में कोई बाहरी तत्व शामिल थे या नहीं।

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फर्जी वीडियो शेयर करने से नोएडा हिंसा में RJD नेताओं का भी हाथ, प्रियंका भारती और कंचना यादव के खि
फर्जी वीडियो शेयर करने से नोएडा हिंसा में RJD नेताओं का भी हाथ, प्रियंका भारती और कंचना यादव के खि
 

नोएडा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने शनिवार (18 अप्रैल 2026) को आदित्य आनंद को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी गौतम बुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट और उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की संयुक्त टीम ने की थी।