हिंसक भाषा बोलते केजरीवाल, पुलिसकर्मी को पिटते विधायक

                                                                                     साभार : सोशल मीडिया  

जब तर्कों की धार खत्म हो जाती है, तो नेता अक्सर भाषा में हिंसा की धार तेज करने की कोशिश करते हैं। जो आम आदमी पार्टी जन-आंदोलन और जन-संवाद के दम पर खड़ी हुई थी, वह आज गुंडों और अराजक तत्वों की पार्टी बनकर रह गई है। जब पार्टी का नेतृत्व आलोचना की जगह “मार-पीट” और हिंसात्मक भाषा बोलता है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत नहीं बल्कि खोखला करता है। ऐसे नेतृत्व से बुनियादी ढांचे और शासन की गुणवत्ता पर संवाद की उम्मीद करना ही बेमानी है। 28 सितंबर को दिल्ली के तिलक नगर में नव-निर्मित सड़क का निरीक्षण करने पहुचे अरविंद केजरीवाल राजनीतिक मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते नजर आए। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर लोग सड़कों पर उतर आएं, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रियों को “दौड़ा-दौड़ा कर पीटेंगे”।

अरविंद केजरीवाल के सामने हेड कांस्टेबल की पिटाई
जब पार्टी का सर्वोच्च नेता ही इस तरह हिंसा की भाषा बोलेगा, तो उसके विधायकों और समर्थकों से सड़क पर क्या संयम की उम्मीद की जा सकती है? शीर्ष नेतृत्व का यह हिंसक रुख पार्टी के विधायकों के लिए एक ‘ओपन लाइसेंस’ जैसा बन जाता है। इसलिए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता, नेता और विधायक संयम के बजाय आक्रामक होने और मारपीट करने में गर्व महसूस करते हैं। जब तिलक नगर में अरविंद केजरीवाल सड़क का निरक्षीण कर रहे थे, तो उनकी मौजूदगी में AAP समर्थकों की भीड़ ने ड्यूटी के दौरान सादे कपड़ों में वीडियोग्राफी कर रहे हेड कांस्टेबल को घेर लिया और उस पर हमला कर दिया। आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह ने ड्यूटी कर रहे हेड कांस्टेबल से मारपीट की।

मारपीट की वजह से हेड कांस्टेबल को लगीं चोटें
वीडियो में भीड़ हेड कांस्टेबल को धक्का देते और उसके साथ बदसलूकी करते नजर आ रही है। हेड कांस्टेबल ने जींस और शर्ट पहन रखी थी। पुलिसकर्मी को फ्लाईओवर के नीचे ले जाया गया और उसे वहां से जाने नहीं दिया गया। वर्दी में मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने भीड़ से अपने साथी को बाहर निकालने की कोशिश की। इस हमले से हेड कांस्टेबल को चोटें आईं। पुलिस ने बताया कि हेड कांस्टेबल का मेडिकल टेस्ट कराया गया, जिसमें चोट लगने की पुष्टि हुई। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी से मारपीट के मामले में FIR दर्ज की गई है।

विधायक जरनैल सिंह और सौरभ भारद्वाज पर FIR दर्ज 
मंगलवार 29 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने आप नेता सौरभ भारद्वाज, जरनैल सिंह और कुछ आप कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। इस मामले में साहिब सिंह के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई। सरकारी कर्मचारी को उसके काम में बाधा डालने और उस पर हमला करने से जुड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस इस मामले की आगे जांच कर रही है। विधायक जरनैल सिंह के खिलाफ दो दिन में दो अलग-अलग मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई।

PWD इंजीनियरों की शिकायत पर जरनैल सिंह पर FIR
इससे पहले, पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने AAP विधायक जरनैल सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। जरनैल सिंह के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने, डराने-धमकाने और कर्मचारियों के साथ कथित अभद्रता से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश वर्मा ने भी आरोप लगाया था कि सरकारी काम को बाधित करने व अधिकारियों पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। प्रवेश वर्मा ने केजरीवाल को चेतावनी दी कि सरकारी काम रोकने वाले AAP नेताओं और समर्थकों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए थे सौरभ भारद्वाज
इससे पहले बीत सोमवार को दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी (आप) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और पार्टी के कई विधायकों व पार्षदों को हिरासत में ले लिया था। जब पुलिस सौरभ भारद्वाज को हिरासत में ले रही थी, तब ‘आप’ के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच खींचतान देखने को मिली। ये सभी PWD मंत्री प्रवेश वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। दरअसल, दो दिन पहले, 27 सितंबर को दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा ने एक युवक को थप्पड़ मारा था।

पुलिसकर्मी से मारपीट करने वाले ने प्रवेश वर्मा से की थी बदसलूकी
पुलिसकर्मी से मारपीट मामले में साहिब सिंह के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है। बता दें कि साहिब सिंह वही शख्स है जो प्रवेश वर्मा के तिलक नगर दौरे के दौरान वीडियो बना रहा था। बताया गया है कि साहिब सिंह ‘आप’ से जुड़ा हुआ है और उसके खिलाफ पहले से एक मामला दर्ज है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, साहिब सिंह इस साल जून में एमसीडी के एक कर्मचारी के साथ हुई मारपीट के मामले में आरोपी है। उसे इस मामले में गिरफ्तार किया गया था और बाद में जमानत मिल गई थी। 

जरनैल सिंह का सोशल मीडिया हैंडल करता है साहिब सिंह
पुलिस के मुताबिक, MCD कर्मचारी से कथित मारपीट की घटना उस समय सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई थी। इस पुराने मामले की FIR की प्रति भी सामने आई है। पुलिस के अनुसार, साहिब सिंह AAP विधायक जरनैल सिंह के सोशल मीडिया का काम संभालता है। साहिब सिंह ने खुद स्वीकार किया है कि वे विधायक जरनैल सिंह के सोशल मीडिया कार्यों और प्रचार से जुड़े हैं तथा घटना के वक्त लाइव रिकॉर्डिंग कर रहे थे। उनके और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ की तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल हो रही हैं।

AAP विधायक ने काम में बाधा डाली, कमीशन मांगा- प्रवेश वर्मा
यह पूरा विवाद हाल ही में सड़क निर्माण में कथित भ्रष्टाचार के खुलासे और उसके बाद हुए हंगामे से जुड़ा है। दिल्ली के पीडब्ल्यूडी (PWD) मंत्री प्रवेश वर्मा तिलक नगर में एक नई बनी सड़क का निरीक्षण करने पहुंचे थे। इस दौरान आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक जरनैल सिंह और स्थानीय लोगों ने सड़क की खराब गुणवत्ता का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि सड़क हाथों से उखड़ रही है। विरोध प्रदर्शन और बहस के दौरान, जब जरनैल सिंह के सहयोगी साहिब सिंह इस पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे, तो मंत्री प्रवेश वर्मा ने कथित तौर पर उनका फोन नीचे गिराकर उन्हें थप्पड़ मार दिया। प्रवेश वर्मा ने आरोप लगाया है कि साहिब सिंह ने वीडियो बनाने के दौरान उनसे बदसलूकी की। उनके परिवार के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह पर कमीशन मांगने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगाया।

केजरीवाल बोले- हाथ से छूने पर सड़क टूट रही
थप्पड़ कांड के बाद अरविंद केजरीवाल सोमवार को तिलक नगर पहुंचे। उनके साथ AAP सांसद संजय सिंह, स्थानीय विधायक जरनैल सिंह और पार्टी के अन्य नेता भी मौजूद थे। अरविंद केजरीवाल ने खुद सड़क का निरीक्षण किया। उन्होंने दिल्ली की भाजपा सरकार पर इलाके में बनी नई सड़क की खराब गुणवत्ता का आरोप लगाया। केजरीवाल ने कहा कि सड़क कुछ दिन पहले ही बनी थी, लेकिन हाथ से छूने पर ही टूट रही है। उन्होंने कहा कि उनकी पिछली AAP सरकार के दौरान ऐसे कामों पर 5 साल की गारंटी होती थी।

केजरीवाल को बीजेपी विधायक रविंदर नेगी की चुनौती
दिल्ली के तिलक नगर में सड़क निर्माण और कथित थप्पड़ कांड के विवाद के बीच, पटपड़गंज से भाजपा विधायक रविंदर सिंह नेगी (रवि नेगी) ने अरविंद केजरीवाल पर पलटवार किया। हथौड़ा लेकर तिलक नगर पहुंचे रविंदर नेगी ने अरविंद केजरीवाल को खुली चुनौती दी। नेगी ने नवनिर्मित सड़क की गुणवत्ता जांचने के लिए खुद हथौड़ा चलाया। उन्होंने केजरीवाल पर झूठ बोलने का आरोप लागते हुए कहा कि 15 साल काम नहीं किया, जब काम हो रहा है तो उसमें अड़ंगा लगा रहे हैं। पंजाब में बच्चे पुलिस से पीट रहे हैं और यहां दिल्ली की सड़कों पर ये ड्रामा कर रहे हैं। 

तिलक नगर के लोगों ने खोली केजरीवाल की पोल
अरविंद केजरीवाल और विधायक जरनैल सिंह के दावे का फैक्ट चेक स्थानीय लोग कर रहे हैं। स्थानीय लोगों ने कहा कि जरनैल सिंह ने 12 घंटे पहले बनी सड़क को उखाड़ कर बताया कि सड़क खराब बनी हैं। 12 साल में विधायक जरनैल सिंह ने कोई सड़क नहीं बनवाई। जब सड़क बन रही है तो उसे उखाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कैमरे के सामने जब सड़क को उखाड़ने की कोशिश की गई तो सड़क नहीं उखड़ी। स्थानीय लोगों का कहना है कि 12 घंटे के बाद सड़क सख्त हो चुकी है। साइंटिफिक रूप से सोचना चाहिए कि अगर सड़क बनी है तो सूखने में टाइम भी लगता है।

केजरीवाल के सामने जरनैल सिंह ने बीजेपी सांसद मनोज तिवारी से की थी मारपीट
जब दिल्ली में चल रहे सीलिंग मुद्दे पर बैठक के लिए बीजेपी का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पहुंचा तो बीजेपी नेताओं के साथ केजरीवाल के गुंडों ने मारपीट की थी। इस घटना के बाद बीजेपी के तत्कालीन दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी और अन्य नेताओं ने थाने पहुंचकर केजरीवाल एवं उनके गुर्गों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मनोज तिवारी ने आरोप लगाया था ‌कि वे समय लेकर वहां पहुंचे थे, लेकिन केजरीवाल ने उनसे अभद्र भाषा में बात की और अपमानित किया। मनोज तिवारी ने आरोप लगाया कि केजरीवाल के सामने आम आदमी पार्टी के नेता जरनैल सिंह ने उनके साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की। आप विधायक जितेंद्र तोमर ने उनका अपमान किया।

बिना सोचे समझे कुछ भी बोलना ठीक नहीं होता

सुभाष चन्द्र

अक्टूबर 3 को एक व्यक्ति ने पोस्ट किया जिसमें एक पूर्व मुख्यमंत्री के पंजाब में तस्करी की ड्रग्स से करोड़ों की कमाई करने का आरोप लगाया था। उस पर एक महिला मित्र ने (जो मोदी की घोर विरोधी है) एक लाइन लिखी “बॉर्डर का 50 किलोमीटर एरिया BSF के पास है, इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूँगी”। यानी BSF का मुंह काला कर दिया एक लाइन लिख कर। मैं उस महिला मित्र को जानता हूँ, उसने बताता था उसके पति ऐसे विभाग में काम करते हैं जिसका वह नाम नहीं बता सकती और ना उनका नाम। ऐसे कमेंट से किसी पर कुछ भी मुश्किल आ सकती है।

उस महिला मित्र ने कभी गूगल देखने की कोशिश नहीं की जिससे पता चले कि BSF बॉर्डर के Areas में क्या करती है। उसके लिए और सभी के लिए यह जानकारी दे रहा हूँ कि BSF ने क्या काम किया है :- 

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BSF की 50 किलोमीटर सीमा अधिकारिता

सीमा सुरक्षा बल (BSF) के लिए 50 किलोमीटर की सीमा अधिकारिता पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात और राजस्थान में लागू है।

50 किलोमीटर BSF अधिकारिता वाले राज्य

पंजाब: 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर;

पश्चिम बंगाल: 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर;

असम: 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर;

गुजरात: 80 किलोमीटर से घटाकर 50 किलोमीटर;

राजस्थान: 50 किलोमीटर पर यथावत।

नोट: BSF का अधिकार क्षेत्र मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे क्षेत्र में भी है।

50 किलोमीटर की अधिकारिता का उद्देश्य-

सीमा-पार अपराधों पर रोक: 

-BSF मवेशियों और ड्रग्स की तस्करी रोकने का काम।

- जासूसी तथा हथियार गिराने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ड्रोन और मानव रहित वाहनों (UAVs) के खतरों से निपटना।

-BSF के लिए समान रूप से 50 किलोमीटर सीमा तय की गई है जिससे वह हिरासत में लिए गए संदिग्ध व्यक्तियों से प्रारंभिक पूछताछ 24 घंटे में स्थानीय पुलिस को सौंप सके। 

समग्र सीमा-पार मादक पदार्थों की बरामदगी (2014–2026)

गृह मंत्री द्वारा जारी मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मादक पदार्थों के विरुद्ध कार्रवाई के परिणामस्वरूप कुल मिलाकर 1.18 करोड़ किलोग्राम से अधिक अवैध मादक पदार्थ जब्त किए गए हैं, जिनका मूल्य ₹1.84 लाख करोड़ है।

इन उच्च-मूल्य वाली जब्तियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन सक्रिय BSF अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों में हुआ है।

भारत-पाकिस्तान सीमा

(पंजाब, राजस्थान और गुजरात)

इस सीमा क्षेत्र में BSF द्वारा हर वर्ष सैकड़ों किलोग्राम उच्च शुद्धता वाली हेरोइन बरामद की जाती है। अकेले पंजाब में देशभर में होने वाली कुल हेरोइन जब्ती का 44.5% हिस्सा दर्ज होता है।

2025 के अंत तक, BSF पंजाब फ्रंटियर ने एक वर्ष की अवधि में सीमा पार से आने वाले 272 ड्रोन को रोकने और 367 किलोग्राम से अधिक हेरोइन जब्त करने की सूचना दी थी।

चूंकि उच्च गुणवत्ता वाली अंतरराष्ट्रीय हेरोइन का अनुमानित बाजार मूल्य लगभग ₹5 करोड़ से ₹7 करोड़ प्रति किलोग्राम होता है, इसलिए पंजाब-राजस्थान सीमा क्षेत्र में BSF द्वारा की जाने वाली वार्षिक जब्ती का मूल्य नियमित रूप से हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।

भारत-बांग्लादेश सीमा

(पश्चिम बंगाल और असम)

पूर्वी सीमा पर BSF का मुख्य ध्यान गांजा, फेंसिडिल कफ सिरप और याबा टैबलेट जैसे मादक पदार्थों की बड़ी तस्करी करने वाले गिरोहों पर रोक लगाने पर रहता है।

पश्चिम बंगाल को कवर करने वाले दक्षिण बंगाल फ्रंटियर में सीमा-पार प्रतिबंधित वस्तुओं की जब्ती का मूल्य तेजी से बढ़ा - BSF द्वारा जब्त किए गए सामान का मूल्य:

2022: ₹349 करोड़

2023: ₹431 करोड़

2024: ₹461 करोड़

असम में राज्य प्रशासन और BSF के समन्वित प्रयासों के तहत 2021 से अब तक मादक पदार्थों की कुल बरामदगी ₹3,253 करोड़ से अधिक हो चुकी है।

महादेव की कृपा ने अपने भक्त मोदी पर जो स्मित मछार बनकर रक्षा की; लेकिन यह याद रहे कांग्रेस के हाथ बहुत लंबे हैं

सुभाष चन्द्र

विपक्ष ताक में बैठा रहता है कि कैसे मोदी पर हमला करने और उसे बदनाम करने का मौका मिले। अगर दुर्भाग्य से स्मित मछार यात्रियों को न बचा पाता तो कांग्रेस और सारा विपक्ष उसे हिंदू आतंकी बना देता और दोष मोदी पर मढ़ देता। इसलिए ही मेरा मानना है कि भगवान भोले नाथ ने अपने भक्त नरेंद्र मोदी पर असीम कृपा की है। 

इस मामले में यह भी याद रखना चाहिए कि कांग्रेस के हाथ बड़े लंबे हैं, वो कहां कैसा षड़यंत्र कर दे कह नहीं सकते क्योंकि उसका हाथ तो हमेशा आतंकियों के साथ रहता है। मोसाद और अन्य जांच एजेंसियों को राहुल गांधी की 3 मई, 2026 की ओमान यात्रा को भी खंगालना चाहिए। उसके जाने का मकसद क्या था और वह वहां किस किस से मिला? यह भी याद रहे राहुल गांधी वो शख्स है जिसने इज़राली लोगों के बचने पर और स्मित मछार पर एक शब्द नहीं बोला है।

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राहुल गांधी सोरोस और पाकिस्तान, चीन और अन्य विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर जब बड़े बड़े टूल किट बना सकता है तो कोई भी षड्यंत्र कर सकता है।

जो फिलिस्तीन का बैग लेकर संसद में जाती है, उसने भी एक शब्द नहीं बोला जैसे यहूदियों के बचने का बेहद अफ़सोस हो रहा हो।

राहुल ही क्या किसी सेक्युलर पार्टी के नेता ने एक शब्द नहीं बोला और जो उनका मुस्लिम वोट बैंक हैं, उसके भी किसी नेता ने घटना की निंदा नहीं की क्योंकि घटना को अंजाम देने वाला मुस्लिम था और निशाने पर यहूदी थे।

दूसरी अरफ़ा खानुम की ईरान यात्रा की भी जांच होनी चाहिए। ऐसा कैसे हुआ कि ईरान ने अकेली केवल अरफ़ा पत्रकार को खामनेई के अंतिम संस्कार में बुलाया वह भी ईरान के अपने खर्चे पर? किसी अन्य भारतीय पत्रकार को नहीं बुलाया। ऐसा क्या संबंध है अरफ़ा का ईरान के साथ?

एक राणा अय्यूब है, वो विदेश के उन अख़बारों में लिखती है जो इस घटना को केवल दो पायलटों के बीच का झगड़ा बता रहे हैं। उस पर वैसे भी शायद मनी लॉन्ड्रिंग का केस चल रहा है?

कुछ चूक UAE की तरफ से भी हुई और शायद कुछ मोसाद की तरफ से भी जो उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इज़रायल कोई ऐसा पायलट नहीं जा सकता जिसके देश के इज़रायल के साथ डिप्लोमेटिक रिश्ते न हों और ओमान के रिश्ते इज़रायल के साथ नहीं हैं। फिर UAE ने ऐसे पायलट को कैसे उड़ान में भेज दिया और मोसाद ने उस पर क्यों नहीं ध्यान दिया?

आज प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत में स्मित मछार ने कहा कि वह घटना के समय हनुमान चालीसा पढ़ रहा था, ये सुनकर तो सेक्युलर कीड़ों के दिलों में आग लग गई होगी?

अरफ़ा खानुम कहती है कि मोदी राज में मुसलमानों को कौन नौकरी देगा और उसे भी यह घटना दो पायलटों के बीच का झगड़ा लगा है। अरफ़ा पहले यह सोचे कि जब काम ऐसे करेंगे तो नौकरी कैसे मिलेगी और क्यों मिलनी चाहिए? अल फलाह यूनिवर्सिटी के तो डॉक्टर ही आतंकी बन गए। ऐसी हरकतें देख जब संस्थाएं मुसलमानों को नौकरी देना बंद कर देंगे ये ही गजवा-ए-हिन्द की वकालत करने वाले छातियां पीटते सडकों पर उतर आएंगे, अदालतों में भागेंगे। और अदालतें काली करतूतों को नज़रअंदाज कर इनकी हमदर्द बन कानून का रौब दिखायेगी।    

फिर भी अरफ़ा की जानकारी के लिए बता दूं कि भारत में 26,000 रजिस्टर्ड पायलट्स में 1,700 मुस्लिम पायलट हैं और 3,500 महिला पायलटों में से 34 मुस्लिम हैं।

लेकिन अब यात्री को अपना पायलट चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और इसलिए एयरलाइन को टिकट बुक करते हुए बताना चाहिए कि प्लेन के पायलट कौन होंगे और कौन अन्य Crew Member होंगे।

सुप्रीम कोर्ट के जजों का अहंकार मानवों का नहीं दानवों का होता जा रहा है; एक कथित गलती के लिए आप 4 लाख लोगों की उप्र पुलिस को भंग करना चाहते हैं

सुभाष चन्द्र

कुछ दिन पहले 10 सितंबर को मैंने लिखा था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिनेश चंद्र सामंत ने एक महिला समेत 4 लोगों को देवरिया पुलिस द्वारा अवैध हिरासत में रखने के आरोप में कहा कि “उत्तर प्रदेश पुलिस ‘झूठों झुंड’ है’। और चारों को थानाध्यक्ष के वेतन से 65 हजार रुपए मुआवजा देने का भी आदेश दिया। 

65 हजार का जुर्माना लगाया, आपकी नज़र में ठीक था लेकिन एक गलती के लिए हाई कोर्ट के जजों ने उत्तर प्रदेश की पूरी पुलिस को बदनाम करने के लिए टैग लगा दिया “झूठों का झुंड” है। 

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सितम्बर 30 को सुप्रीम कोर्ट ने तो और भी हदें पार कर दी। एक व्यक्ति को घर में घुसकर मारपीट और छेड़छाड़ करने के मामले में कहा कि जब आरोपी को मौके पर गिरफ्तार कर लिया था, फिर भी अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा ने कहा कि “बेहतर हो कि उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग कर सभी मामले सीबीआई को दे दिए जाएं”। 

इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर पुलिस ने आरोपी का नाम chargesheet में दर्ज कर दिया था लेकिन पीड़ित पक्ष संतुष्ट नहीं था और सुप्रीम कोर्ट चला गया। यह मामला बुलंदशहर की एक महिला से मोटर साइकिल सवार द्वारा छेड़छाड़ का था।

चाहे सुप्रीम कोर्ट को कुछ भी गलती लगी हो लेकिन यह टिप्पणी करने का अधिकार क्या आपको केवल इसलिए है कि आप सुप्रीम कोर्ट हैं। किसी एक स्थान की पुलिस की गलती के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों का पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस को भंग करने की बात कहने का क्या औचित्य है? उत्तर प्रदेश पुलिस में 4 लाख के करीब पुलिस कर्मी काम करते हैं। किस कानून में सुप्रीम कोर्ट किसी प्रदेश की पुलिस को भंग कर सकता है। 

क्या ऐसी गलतियां किसी और राज्य में नहीं होती या सभी राज्यों में पुलिस सही तरीके से काम करती है? ऐसा संभव नहीं है क्योंकि कमियां हर जगह होती हैं तो फिर ऐसी ओछी टिप्पणी केवल उत्तर प्रदेश के लिए क्यों?

क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अगले चुनाव से पहले विपक्ष को खाद पानी देना चाहते हैं? पिछले चुनाव में भी चंद्रचूड़ ने ऐसा किया था जब धमकी देकर पहले चरण के चुनाव के बाद योगी सरकार को दंगाइयों के खिलाफ जुर्माना वसूल न करने के लिए बाध्य किया था। लेकिन योगी फिर भी जीत गए थे। 

अदालतों की ऐसी भाषा अहंकार के सिवा कुछ नहीं और अहंकार भी किसी मानव का नहीं बल्कि अपने को पृथ्वी का भगवान समझने वाले किसी दानव में होता है। ऐसी टिप्पणियां करने से जजों को बचना चाहिए। 

सवाल यह उठता है कि एक हाई कोर्ट के फैसले को अगर सुप्रीम कोर्ट पलट देता है तो हाई कोर्ट के गलत फैसले के लिए क्या पूरे हाई कोर्ट को भंग कर सभी अधिकार सुप्रीम कोर्ट को दे देने चाहिए जैसे आप उप्र पुलिस को भंग कर सभी मामले सीबीआई को देने की बात कर रहे हैं। सीबीआई के पास क्या इतने लोग हैं जो पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस का काम देख सकें? यह व्यावहारिक ही नहीं हैं और आप तो सीबीआई की काम में कमियां निकालने में पीछे नहीं रहते।

कैप्टन स्मित मछार के अदम्य साहस को नमन; 169 यहूदियों की जान बचाने वाले की नेतन्याहू और मोदी ने प्रशंसा की लेकिन विपक्ष के नेता लगभग चुप हैं

सुभाष चन्द्र

फ्लाई दुबई के विमान को ओमान के को-पायलट के हाईजैक कर इज़रायल में क्रैश करने के मंसूबे को भारतीय पायलट स्मित मछार ने छुरे का हमला खा कर भी अदम्य सहस दिखाते हुए प्लेन की इमरजेंसी लैंडिंग सऊदी अरब के तबूक में करा दी। प्लेन में सवार 172 यात्रियों में से 169 इज़रायल के नागरिक थे। 

आतंकवादियों, Palestine और हमास जैसे आतंकी संगठनों को समर्थन देने वालों से हिन्दुत्व का नाम रोशन करने वालों की तारीफ करने की कोई उम्मीद करना दीवार से सिर फोड़ने से कम नहीं। शर्म तो कांग्रेस को वोट देने वाले हिन्दुओं को आनी चाहिए।  

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इज़रायल ने इसे आतंकी हमला बताया है लेकिन प्रश्न यह है कि इसके पीछे कौन सा संगठन/देश है - कहीं यह ईरान, हिज़्बुल्लाह या हूतियों की साजिश तो नहीं थी। यह तो जांच के बाद पता चलेगा। ओमानी को-पायलट सऊदी पुलिस के कब्जे में है और उससे पूछताछ हो रही है। यह घटना 9/11 को दोहराने जैसी थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने मछार की तारीफ में कहा कि “ गंभीर खतरे का सामना करने और खुद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कैप्टन स्मित मछार ने दूसरों की जान बचाने के लिए अदम्य साहस और अटूट संकल्प का परिचय दिया। उनकी बहादुरी और सूझबूझ से सैकड़ों यात्रियों की जान बची और एक बहुत बड़ी त्रासदी टल गई। उन्हें 'हीरो' (नायक) बताया और कहा कि भारत को उन पर गर्व है”।

उधर नेतन्याहू ने कहा कि “भारतीय पायलट स्मित मछार ने घायल होने के बावजूद अदम्य साहस का परिचय देते हुए न केवल इज़राली नागरिकों की जान बचाई बल्कि एक बहुत बड़ी आपदा टाल दी। स्मित मछार वास्तव में एक सच्चे नायक हैं, मैं उन्हें मैं सलाम करता हूँ।

एक आतंकी पायलट से जूझने वाले भारतीय पायलट के अदम्य साहस को विदेशी मीडिया में तारीफ का कोई एक भी शब्द नहीं मिला। CNN, The New York Times, AFP News Agency, The Wall Street Journal, Sky News और BBC News (World) ने केवल इस घटना को दो पायलटों के बीच झगड़ा बताया और कहा है कि उसकी वजह से प्लेन को Tel Avive गंतव्य से divert करना पड़ा। लगता है विदेशी मीडिया को भी इज़रायली नागरिकों के बचने की कोई ख़ुशी नहीं हुई। वो भारतीय पायलट द्वारा किए गए कार्य को downplay बेशक कर दें लेकिन सत्य तो सत्य है।

कांग्रेस के खड़गे जी ने कई घंटे बाद X पर बयान देकर स्मित मछार की तारीफ की है और विपक्ष की तरफ़ से हेमंत सोरेन ने उसकी प्रशंसा की है। राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य कॉकरोचों को शायद फुर्सत नहीं मिली। अन्य किसी विपक्षी नेता का कोई बयान नहीं है अलबत्ता कुछ पार्टियों के प्रतिनिधि शाम की टीवी बहस में अपना ज्ञान देंगे। वैसे मृणाल पांडेय का X पर घटिया बयान बता रहा है कि वह उच्च कोटि की पागल है और उसकी बातों में विपक्ष की भी मंशा नज़र आती है जिसमें उसने पीएम मोदी पर निशाना साधा है।

एक बड़ी बात गूगल से पता चली कि स्मित मछार का परिवार मुंबई में रहता है लेकिन वास्तव में वह गुजराती परिवार है कि वह Brahmakshatriya (also spelled Brahma-Kshatriya) है which is historically defined in the Hindu varna system as a community possessing a dual identity combining the attributes of both Brahmins (scholars/priests) and Kshatriyas (warriors/rulers).

शायद उसका गुजराती होना भी एक कारण हो सकता है कि ज्यादा विपक्षी नेताओं ने चुप्पी साध ली लेकिन इज़रायल और भारत के संबंधों में इस घटना से नया आयाम जुड़ गया।

कांग्रेस को मुसलमान और मुसलमान को कांग्रेस कहने वाले रेवंत रेड्डी को भगवान शिव और भगवान राम का मतलब ही नहीं पता जो इनमें भेद पैदा कर रहा है

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस के इतिहास को देखने पर मालूम होता है कि कांग्रेस अपनी स्थापना से आज तक हिन्दू धर्म के खिलाफ रही है। जितने बदलाव कांग्रेस ने सनातन में किये है किसी दूसरे मजहब में करने की हिम्मत नहीं कर पायी। जबकि उन मजहबों में सनातन से कहीं ज्यादा कमियां हैं। फिर भी मंदबुद्धि हिन्दू कांग्रेस और सनातन विरोधियों को वोट देकर इन्हे सुरमा भोपाली बनाये हुए हैं। 

कांग्रेस के नेताओं की मति भ्रष्ट हो गई है जो पहले सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राम एक काल्पनिक चरित्र हैं लेकिन वो काल्पनिक चरित्र कांग्रेस को लोकसभा में 44 सीट पर ले आया और मोदी जैसे राम भक्त को पूर्ण बहुमत दे दिया।  

आज तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भगवान शिव और भगवान राम को ही अलग कर दिया। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के लोग द्रविड़ हैं और शिव के भक्त हैं, जबकि उत्तर भारत के लोग आर्य हैं और वे भगवान राम के भक्त हैं। आज कम से कम रेड्डी ने भगवान राम का अस्तित्व तो स्वीकार कर लिया और मान लिया कि राम कोई काल्पनिक चरित्र नहीं है। 

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रेड्डी ने पागलपन की सीमाएं तोड़ते हुए यह भी कहा कि भगवान शिव गरीबों के भगवान हैं और भगवान राम अमीरों के और सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेता मंचों से "हर हर महादेव" का उद्घोष क्यों नहीं करते जबकि जय श्रीराम और हर हर महादेव का नारा तो हमेशा लगाया जाता है। 

तुम बताओ कि अगर तुम भगवान शिव के भक्त हो तो कभी अपनी सभा/रैली में "हर हर महादेव" का जयकारा लगाते हो क्या? कभी नहीं लगाते क्योंकि मुसलमान नाराज़ हो सकते हैं। तुम तो बड़े फ़क्र से कहते हो कि "कांग्रेस मुसलमान है और मुसलमान कांग्रेस है। फिर तो कांग्रेस भारत के किसी भी प्रान्त में हो, वह न तो शिव की भक्त है और न राम की। 

राहुल गांधी तो उत्तर भारत का है लेकिन वो तो कहता है कि वो राम को नहीं मानता लेकिन शिव को मानता है। दक्षिण भारत की DMK के नेता सनातन धर्म को डेंगू मलेरिया कह कर उसे समाप्त करने की बात करते हैं तो क्या वो भगवान शिव को भी सनातन धर्म से अलग मानते हैं, फिर शिव के भक्त कैसे हो सकते हैं? लेकिन उनका हश्र क्या हुआ चुनाव में?

कांग्रेस के अमेरिका में बैठे एक बुढऊ नेता सैम पित्रोदा ने कहा था कि दक्षिण भारत के लोग अफ्रीकी लगते हैं, जबकि उत्तर भारत के लोग गोरे हो सकते है और पूर्वी भारत के लोग चीनी लगते हैं तथा पश्चिम के लोग अरेबियन लगते हैं। यह मानसिकता लिए कांग्रेस चल रही है और आज तो सभी सीमाएं लांघ लगाया रेवंत रेड्डी।

भगवान शंकर और भगवान राम का क्या संबंध है, यह उन्होंने खुद बताया "रामेश्वरम" की परिभाषा देते हुए।

“रामस्य ईश्वरः इति रामेश्वरः: जो भगवान राम के ईश्वर हैं, अर्थात भगवान शिव;

रामः ईश्वरः यस्य सः रामेश्वरः: राम जिनके ईश्वर हैं, अर्थात भगवान शिव खुद को राम का दास मानते हैं”।

जो भगवान शंकर नित राम कथा करते हैं उन्हें भगवान राम से अलग करते हुए लाज नहीं आती। हमारी कथाओं में भगवान शिव को भगवान राम और भगवान कृष्ण के बाल रूप के दर्शन के लिए जाते हुए बताया गया है। अब रेवंत रेड्डी किसी दिन कहीं भगवान कृष्ण को भी गालियां न दे दे - राम मंदिर तो बनने नहीं दिया था और कृष्ण मंदिर को भी समर्थन नहीं देना चाहते।

रेवंत रेड्डी तुमको याद होना चाहिए भगवान राम के लिए शंकर जी ने रावण के सिर से अपने आशीर्वाद का हाथ हटा लिया था। तुम्हारे नाम “रेवंत” का अर्थ है “सूर्य का पुत्र” और भगवान राम सूर्यवंशी थे। तो क्या अपने कुल को ही गाली दे रहे हो?

लगता है कांग्रेस अपनी और ज्यादा दुर्गति देखना चाहती है। तथास्तु 

SIR या आयोग विवाद नहीं, ज्ञानेश कुमार से इसलिए चिढ़े हैं राहुल गांधी और विपक्ष, जानिए इन 8 बिंदुओं में असली हकीकत

                                                                     साभार : सोशल मीडिया 
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवादों के केंद्र में हैं। इस विवाद की तत्काल वजह भले ही SIR और चुनाव आयोग के कथित मतभेद हों, लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में आने से पहले उन कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा रहे, जो देश की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बेहद संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। ज्ञानेश कुमार का लगभग तीन दशक से अधिक लंबा प्रशासनिक करियर उन महत्वपूर्ण सरकारी जिम्मेदारियों से भरा है, जिनमें जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, कानून निर्माण, रक्षा उत्पादन, सहकारिता और संसदीय कार्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल रहे हैं। वह चाहे जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की प्रक्रिया हो, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन हो, तीन तलाक से जुड़ा कानून हो या अयोध्या मामले के बाद राम मंदिर ट्रस्ट के गठन की प्रशासनिक प्रक्रिया हो। 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने केरल में सब-कलेक्टर से लेकर केंद्र सरकार के सचिव तक की जिम्मेदारियां निभाईं हैं।

कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण और ज्ञानेश के करियर के अहम अध्याय
                                                                                            साभार : सोशल मीडिया 

आज की सियासत में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक करियर के कई अध्याय ऐसे फैसलों से जुड़े रहे हैं, जिन्हें भाजपा और उसके समर्थक लंबे समय से अपने प्रमुख वैचारिक एवं राजनीतिक एजेंडे की उपलब्धियों के रूप में देखते रहे हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस और विपक्ष इन मुद्दों को सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण के नजरिए से ही देखते रहे हैं। इसलिए आज जब राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, तो इसे केवल SIR की तकनीकी प्रक्रिया या चुनाव आयोग के मौजूदा विवाद तक सीमित करके देखना अधूरी तस्वीर होगी। विपक्ष के आरोपों और उसके राजनीतिक रुख को उसके अपने बयानों में ही परखना होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि ज्ञानेश कुमार का पूर्व प्रशासनिक रिकॉर्ड 370 से लेकर अयोध्या और तीन तलाक तक, आज की राजनीतिक बहस की पृष्ठभूमि में मौजूद है।

आंतरिक असहमति चुनाव में धांधली या वोट बदलने का प्रमाण नहीं

इंडियन एक्सप्रेस की हालिया जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर संस्थागत मतभेद सामने रखे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम-से-कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की, जिनमें मतदाता पंजीकरण, मतदाता डेटाबेस और SIR से जुड़े निर्णय शामिल थे। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर कांग्रेस और विपक्ष अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और राहुल गांधी के पुराने वोट चोरी वाले आरोपों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यहां तथ्य और राजनीतिक निष्कर्ष को अलग रखना जरूरी है। रिपोर्ट में दर्ज आंतरिक असहमति अपने आप में चुनाव में धांधली या किसी पार्टी के पक्ष में वोट बदलने का प्रमाण नहींहै। यह आयोग के भीतर निर्णय-प्रक्रिया और अधिकारों को लेकर मतभेद का संकेत हो सकती है। ऐसे मतभेद किसी भी संस्था या आयोग की बैठकों में उनके सदस्यों के बीच हो सकते हैं। इसलिए कांग्रेस का यह निष्कर्ष कि मीडिया रिपोर्ट ने “वोट चोरी” या चुनाव परिणामों में हेरफेर को सिद्ध कर दिया, बिल्कुल गलत और नितांत मनगढ़ंत तर्क है।

किन अहम कारणों की वजह से राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त से चिढ़े हुए हैं…

अनुच्छेद 370 के फैसले में अहम प्रशासनिक भूमिका

ज्ञानेश कुमार के करियर का सबसे चर्चित अध्याय जम्मू-कश्मीर से जुड़ा है। मई 2016 में उन्हें गृह मंत्रालय के जम्मू-कश्मीर डिविजन में संयुक्त सचिव बनाया गया था। 2019 में, जब अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक बदलाव और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी, तब वे इसी क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक की ड्राफ्टिंग में भूमिका निभाई थी। इससे जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खात्मे की जमीन तैयार हुई। इस विधेयक के जरिए तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।

तीन तलाक कानून की तैयारी बनाम कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण

गृह मंत्रालय में रहते हुए ज्ञानेश कुमार का काम केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रहा था। 2019 में तीन तलाक को अपराध बनाने वाले कानून की तैयारी में भी उन्होंने अहम योगदान दिया था। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वे तीन तलाक संबंधी कानून की ड्राफ्टिंग से जुड़े अधिकारियों में शामिल रहे हैं। यानी एक ही दौर में वे देश के दो अत्यंत संवेदनशील विधायी और सामाजिक मुद्दों से जुड़े प्रशासनिक काम का हिस्सा रहे। कांग्रेस के लिए यह दोनों ही मुद्दे उसकी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ थे।

अयोध्या मामले और राम मंदिर ट्रस्ट की प्रक्रिया का अहम हिस्सा

रामजन्मभूमि अयोध्या में राम लला का मंदिर दशकों से भाजपा का अहम मुद्दा रहा है। अयोध्या मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम था श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन। 2020 में गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार उस विशेष व्यवस्था से जुड़े थे, जिसके तहत अयोध्या मामले से संबंधित दस्तावेजों और केंद्र सरकार की जिम्मेदारियों को संभाला गया। विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका निभाई।

पश्चिम बंगाल चुनाव में पहली बार हिंसा-रहित, भाजपा जीती

पश्चिम बंगाल में चुनाव हमेशा ही हिंसा और बवाल से भरे हैं। लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग की ओर से हिंसा, डराने-धमकाने और चुनावी दबाव के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति घोषित की। आयोग ने व्यापक वेबकास्टिंग और सुरक्षा व्यवस्था पर जोर दिया। पश्चिम बंगाल में ज्ञानेश कुमार ने अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के नाम हटाने और मतदाता सूची को पूरी तरह से शुद्ध किया। मतदान के बाद राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान कोई मौत और बड़े पैमाने की हिंसा नहीं हुई। शांतिपूर्ण हुए इस चुनाव भाजपा ने बहुमत प्राप्त किया, जो कांग्रेस और इंडी गठबंधन को रास नहीं आया।

दुनिया के सबसे बड़े चुनाव के प्रबंधन में सहभागिता की 

ज्ञानेश कुमार 31 जनवरी 2024 को सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद कुमार मार्च 2024 में चुनाव आयोग के सदस्य बने। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया में चुनाव आयोग के सदस्य के रूप में काम किया। IIT कानपुर की आधिकारिक प्रोफाइल पर भी दर्ज है कि उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े चुनाव के रूप में 2024 लोकसभा चुनाव प्रबंधन का काम पूरी कुशलता से देखा। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के फेयर इलेक्शन की बाद में अमेरिका तक ने सराहना की, लेकिन कांग्रेस और विपक्ष को इसमें भी खोट नजर आई। चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और जहां ठोस प्रमाण हों, उनकी जांच भी होनी चाहिए। लेकिन कांग्रेस हार के कारणों की पड़ताल करते समय संगठन, नेतृत्व, स्थानीय राजनीति, गठबंधन और जनता के विरोध को नजरअंदाज करती रही है।

सहकारिता मंत्रालय में तीन नए राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना

इतना ही नहीं, ज्ञानेश कुमार का एक महत्वपूर्ण कार्यकाल सहकारिता मंत्रालय में सचिव के रूप में भी रहा है। उनके कार्यकाल में मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज (संशोधन) अधिनियम, 2023 के साथ तीन राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं, भारतीय बीज सहकारी समिति, नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड और नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट लिमिटेड के गठन की दिशा में काम हुआ। सहकारिता मंत्रालय में रहते हुए ज्ञानेश कुमार सहारा समूह की सहकारी समितियों के जमाकर्ताओं के पैसे लौटाने की व्यवस्था से भी जुड़े रहे। 2023 में लॉन्च किए गए CRCS-सहारा रिफंड पोर्टल के जरिए पात्र जमाकर्ताओं के दावों की ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू हुई। तत्कालीन सहकारिता सचिव ज्ञानेश कुमार सहित मंत्रालय के अधिकारियों ने रिफंड प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में काम किया।

SIR के बावजूद कांग्रेस और दूसरे दल कैसे बना रहे सरकार

चुनाव आयोग के अनुसार 2024 के बाद पहले चरण में बिहार में SIR हुआ, जबकि दूसरे चरण में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गोवा, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी शामिल थे। यानी पहले दो चरणों में कुल 13 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में एसआईआर हुआ। इनमें विधानसभा चुनाव के बाद उपलब्ध तस्वीर भी महत्वपूर्ण है। 2026 में SIR वाले पांच राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में चुनाव हुए। असम में भाजपा 82 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और सत्ता बरकरार रही। केरल में कांग्रेस 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस-नेतृत्व वाला UDF सत्ता में आया। तमिलनाडु में कांग्रेस केवल 5 सीटें जीत सकी और सरकार TVK के नेतृत्व में बनी। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने सरकार बनाई, जबकि पुडुचेरी में AINRC सबसे बड़ी पार्टी बनी और भाजपा ने 4 सीटें जीतीं। इसलिए यह कहना कि भाजपा ने अपने हित में एसआईआर कराया या वोट काटे, बिल्कुल सटीक नहीं होगा। क्योंकि SIR वाले चुनावी राज्यों में भाजपा सिर्फ असम और पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई। कांग्रेस ने केरल में सरकार बनाई, तमिलनाडु और पुडुचेरी में क्रमशः TVK और AINRC प्रमुख रहे। बिहार में SIR के बाद 2025 में NDA सत्ता में लौटा।

दशकों से कई राज्यों में कांग्रेस वापसी नहीं हुई तो क्या आयोग दोषी

अगर आज हर चुनावी हार का कारण “वोट चोरी” बताया जा रहा है, तो इस दावे को 2024 से पहले के कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास की कसौटी पर भी परखना होगा। ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयुक्त बनने से पहले जिन राज्यों में कांग्रेस दशकों तक सत्ता से बाहर रही, वहां की हर हार के लिए कौन जिम्मेवार है। तमिलनाडु में कांग्रेस 1967 के बाद सत्ता में नहीं लौटी। पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद कांग्रेस की सरकार नहीं बनी। उत्तर प्रदेश में 1989 के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर है। गुजरात में भी 1990 के चुनाव ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। त्रिपुरा में 1993 के बाद कांग्रेस सत्ता में नहीं लौटी। ओडिशा में 2000 के बाद उसका शासन समाप्त हो गया। नागालैंड में 2003 में कांग्रेस की दस साल पुरानी सरकार चली गई और गोवा में 2012 के चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इन राज्यों में कांग्रेस की हार का लंबा इतिहास उस समय का है, जब न ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्त थे और न आज की तरह भाजपा केंद्र की सत्ता में थी। इसलिए लोकतांत्रिक राजनीति में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या दशकों से अलग-अलग राज्यों में मतदाताओं के कांग्रेस को नकारने को ईवीएम की खामी या वोट चोरी से कैसे जोड़ा जा सकता है।

 चुनाव आयोग की छवि खराब करने की सुनियोजित साजिश 

भारत का चुनाव आयोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए जाना जाता है। लेकिन चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर बार-बार सवाल उठाना और विभिन्न मंचों पर भारतीय चुनावी प्रणाली को कटघरे में खड़ा करने से देश के लोकतंत्र की साख को नुकसान पहुंचाता है। इस तरह देश की करोड़ों जनता द्वारा निर्वाचित सरकार और पूरी चुनाव प्रक्रिया को अवैध बताना जनादेश का अपमान है। अपनी राजनीतिक हार स्वीकार करने के बजाय जनता में भ्रम और अविश्वास फैलाने से देश में असंतोष बढ़ सकता है, जिससे लोकतांत्रिक स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो सकता है और अराजकता पैदा हो सकती है। लेकिन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए राहुल गांधी चुनाव आयोगी की विश्वसनीयता खत्म कर भारतीय लोकतंत्र की हत्या करने के मिशन पर काम कर रहे हैं।
पत्रकारों के सवालों ने राहुल गांधी की खोली पोल
राहुल गांधी ने गुरुवार (24 सितंबर) को दिल्ली के इंदिरा भवन में एक 55 मिनट का प्रेजेंटेशन दिया। इस प्रेजेंटेशन का शीर्षक ‘Destroyers of Democracy’ था। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री शाह समेत 19 लोगों की तस्वीरें दिखाईं। उन्होंने कहा कि यह सभी लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि लोकतंत्र को खत्म करने वालों को सजा मिलनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जांच होनी चाहिए। राहुल ने अमित शाह का वह वीडियो दिखाया, जिसमें उन्होंने भाजपा की 14 से 30 साल तक सरकार रहने की बात कही थी। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी का ‘400 पार’ वाला बयान दिखाया। लेकिन प्रेजेंटेशन के आखिर में सवाल और जवाब का दौर चला, जिसमें पत्रकारों के तीखे सवालों ने ‘लोकतंत्र की हत्या’ के मिशन पर निकले राहुल गांधी की पोल खोल दी।

सुप्रीम कोर्ट अगर फालतू याचिकाएं सुनेगा तो लंबित केस तो बढ़ेंगे ही; सोचिए क्या सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड कर सकता है, नहीं, तो फिर याचिका क्यों?

सुभाष चंद्र 

आजकल जो लोग चुनाव आयोग की निष्पक्षता और ईवीएम (EVM) पर दिन-रात ज्ञान बांटते फिर रहे हैं, वे जरा इस तस्वीर को ध्यान से देखें। यह 1991 की वो ऐतिहासिक तस्वीर है, जब नई दिल्ली में सोनिया गांधी जी वोट डालने पहुंची थीं। जरा देखिए कि कैसे उनके साथ राजीव गांधी, चुनाव के उम्मीदवार राजेश खन्ना और समर्थकों का पूरा लश्कर सीधे मतपेटी तक ही पहुंच गया था! "लोकतंत्र के 'सुनहरे दिन' और 'सामूहिक' वोटिंग का यह अद्भुत ऐतिहासिक नजारा! 
क्या गजब का 'सहयोगात्मक लोकतंत्र' था, जहां गुप्त मतदान की गोपनीयता पर वीआईपी नेताओं का रसूख भारी पड़ता था। आज के चुनाव आयोग ने तो नियम-कायदे बनाकर सारा खेल ही बदल दिया है। अब एक नागरिक को अकेले बूथ में भेजकर वोट डलवाया जाता है। जिन लोगों को पूरे लाव-लश्कर के साथ 10-15 लोगों की भीड़ जुटाकर एक साथ मतपेटी में पर्ची सरकाने की पुरानी आदत रही हो, उन्हें आज की ये सख्त और पारदर्शी व्यवस्था भला कैसे हजम होगी? आखिर बिना भीड़ के वोट डालने में वो पुराना स्वाद कहां!

सितम्बर 29 को सुप्रीम कोर्ट में किसी राकेश कुमार सिंह ने याचिका दायर की और उसके वकीलों विकास सिंह, सुदीप चंद्र और मुदित गुप्ता ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत से तुरंत सुनवाई की अर्जी लगाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट CEC ज्ञानेश कुमार के, याचिका पर सुनवाई तक के लिए काम करने पर रोक लगाए। याचिका में ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त होने के नाते किए गए कामों के खिलाफ आरोप लगाए और उनके निलंबन किए जाने की मांग की।

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सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका (जो अपने आप में तुच्छ -Frivolous, है) लिस्ट करने और जल्द सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली।

सुप्रीम कोर्ट के पास CEC को पद से हटाने या सस्पेंड करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। CEC को संसद में महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है जैसे संविधान के अनुच्छेद 324(5) में सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जा सकता हैं। सुप्रीम कोर्ट केवल ऐसी याचिकाओं की सुनवाई कर सकता है जिनमें चुनाव आयोग के प्रशासनिक कार्यों की वैधता को चुनौती दी गई हो या किसी कार्य को करने पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई हो।

कल को कोई याचिका राष्ट्रपति के पास लगा दी जाए कि चीफ जस्टिस को सस्पेंड किया जाए तो क्या राष्ट्रपति उस पर कार्रवाई करेंगे? नहीं, क्योंकि यह कानून सम्मत नहीं है। फिर चीफ जस्टिस सूर्यकांत को CEC को सस्पेंड करने की मांग करने वाली याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने का क्या औचित्य है? सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी शक्तियां नहीं हैं, यह बात वकील विकास सिंह (जो SCBA अध्यक्ष भी रहे हैं) और चीफ  जस्टिस को भी पता है, फिर भी याचिका में मांग की गई और याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार भी कर ली गई। 

ऐसी ही याचिकाएं स्वीकार होने की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित केसों की संख्या बढ़ रही है।

आजकल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट बिना वजह उसका हिस्सा बन रहा है। मुझे यह पता है सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड करने के आदेश न दे सकता है और न देगा तो फिर याचिका को admission stage पर ही ख़ारिज कर देना चाहिए था। ऐसे कोर्ट का समय बर्बाद करने का क्या फायदा है? 

मुश्किल में AAP: ओपिनियन पोल में पंजाब की सियासत में बड़े बदलाव की दस्तक; त्रिशंकु विधानसभा के आसार


पंजाब में भगवंत मान की आप सरकार से जनता का विश्वास उठ रहा है। युवाओं से लेकर कर्मचारियों तक और किसानों से लेकर नारीशक्ति तक आप सरकार के वादे पूरे ना करने से निराश हैं। जनता-जनार्दन का आप सरकार के खिलाफ यही आक्रोश हाल ही में हुए एक ओपिनियन पोल में साफ-साफ नजर आया है। इस पोल के मुताबिक वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ‘एक मौका’ के नारे पर 117 में से 92 सीटों की ऐतिहासिक प्रचंड जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए अगले साल विधानसभा चुनाव किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा। इस नए सर्वे के अनुसार, पंजाब में अगले चुनाव में आप की सीटें घटकर आधे से भी कम रह सकती हैं। पोल के मुताबिक हालात ऐसे हैं कि राज्य में किसी भी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है, जिससे राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की मजबूत संभावना बनती दिख रही है। जहां एक तरफ जनता का सत्ताधारी दल से मोहभंग होता दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी कांग्रेस भी पूर्ण बहुमत का भरोसा जीतने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया है।

पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा के आसार, आप की सीटें आधी

दरअसल, हाल ही में जारी हुए News Leader-Matrize ओपिनियन पोल ने पंजाब की राजनीतिक फिजा में एक नया सस्पेंस पैदा कर दिया है। इस ओपिनियन पोल के मुताबिक, पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से बहुमत के लिए जरूरी 59 सीटों के जादुई आंकड़े तक कोई भी दल अकेले पहुंचता नहीं दिख रहा है। सर्वे के अनुसार, आम आदमी पार्टी को पिछले चुनाव से आधी से भी कम यानि 40-45 सीटें ही मिल सकती हैं। वहीं, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस 35 से कम सीटों पर सिमट सकती है। दरअसल, पंजाब की जनता ने जब 2022 में आम आदमी पार्टी को एकतरफा और अभूतपूर्व जनादेश दिया था, तो उसके पीछे पारंपरिक राजनीतिक दलों के प्रति भयंकर नाराजगी और बदलाव की एक गहरी तड़प थी। लेकिन आप सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी।

बदलाव की प्रचंड लहर, भाजपा हो सकती है मजबूत

केंद्रीय सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) पंजाब में अपनी जमीन मजबूत करते हुए 30 से ज्यादा सीटें हासिल कर सकती है। जबकि पारंपरिक क्षेत्रीय दल शिरोमणि अकाली दल को 15 से 25 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। अन्य और निर्दलीयों के खाते में 5 से 10 सीटें जा सकती हैं। पोल के मुताबिक वोट शेयर की बात करें तो आम आदमी पार्टी को 30% और कांग्रेस को 27% वोट मिलने का अनुमान है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 2022 की एकतरफा लहर अब एक बेहद कड़े और बहुकोणीय मुकाबले में तब्दील हो चुकी है, जहां हर सीट पर चुनावी समीकरण बेहद पेचीदा हो गए हैं।

जनता की उम्मीदों पर खरा साबित न होने से एंटी-इंकंबेंसी

पिछले विधानसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी और जनता की उम्मीदें दोनों सातवें आसमान पर थीं। हालांकि, सत्ता संभालने के बाद सरकार के लिए उन उम्मीदों पर तुरंत खरा उतरना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ। बेरोजगारी को दूर करने, युवाओं को रोजगार के व्यापक अवसर देने और सरकारी तंत्र में अमूल्य सुधार करने के जो वादे किए गए थे, वे धरातल पर बदल पाए। इस प्रशासनिक लापरवाही के कारण आम जनता में एक स्वाभाविक ‘एंटी-इंकंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) पैदा होने लगी। वादों और दावों के बीच का यह फासला आज मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या यह बदलाव वाकई उतना क्रांतिकारी था, जितना चुनाव के वक्त महसूस हो रहा था। यही कारण है कि ‘आप’ की सीटों का ग्राफ 92 से गिरकर 40-45 के आसपास सिमटता दिख रहा है।

पंजाब की जनता संदेश दे चुकी है कि सरकारें बदलने से हिचकिचाती नहीं

पंजाब की राजनीति हमेशा अपेक्षाओं और असंतोष के बीच झूलती रही है। कांग्रेस और अकाली दल के लंबे शासन से निराश होकर जनता ने आम आदमी पार्टी को जिताया। आज वही जनता यह मूल्यांकन कर रही है कि क्या मान सरकार में शासन शैली वास्तव में बदली है या केवल राजनीतिक चेहरे बदले हैं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सरकार की उपलब्धियों या विफलताओं पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अगले डेढ़-दो वर्षों में सरकार कई सारे लंबित मुद्दों पर कितनी निर्णायक प्रगति दिखा पाती है। यदि किसानों, युवाओं, महिलाओं और कर्मचारियों के बीच विश्वास मजबूत नहीं होता है और कानून-व्यवस्था और नशे जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम सामने नहीं आते हैं, तो आम आदमी पार्टी की वापसी नामुमकिन है। यदि वर्तमान असंतोष व्यापक जनमत में बदल गया, धार्मिक विवादों की गूंज बनी रही, आर्थिक चुनौतियां गहराती गईं और चुनावी वादों पर सवाल कायम रहे, तो 2022 जैसा एकतरफा जनादेश दोहराना सरकार के लिए अत्यंत कठिन होगा। पंजाब की जनता अतीत में कई बार यह संदेश दे चुकी है कि वह सरकारें बदलने से हिचकिचाती नहीं है।

नशे के खिलाफ जंग का वादा खोखला, चुनौतियां बरकरार

नशा पंजाब की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने ड्रग्स माफिया के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का वादा किया था। सरकार बनने के बाद पंजाब पुलिस ने दिखावे के लिए एनडीपीएस एक्ट में कुछ गिरफ्तारियां की। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की समस्या केवल पुलिस कार्रवाई से समाप्त नहीं होगी। इसके लिए पुनर्वास केंद्रों, युवाओं को रोजगार, खेल संस्कृति और सीमा पार तस्करी पर कड़ी निगरानी की समानांतर आवश्यकता है। विपक्ष का तर्क है कि जब तक गांवों और कस्बों में ड्रग्स की उपलब्धता पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तब तक नशे के खिलाफ जंग के सरकारी दावे खोखले ही साबित होंगे। दरअसल, केवल गिरफ्तारियों से यह साबित नहीं होता कि नशे की समस्या समाप्त हो गई है। समय-समय पर ओवरडोज से मौतों की घटनाएं सामने आती रही हैं। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान राज्य में ड्रग्स की चुनौती पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और सरकार को प्रभावी रणनीति बनाने के निर्देश दिए हैं। राजनीतिक ही नहीं सामाजिक दृष्टि से भी यह मुद्दा अहम है। क्योंकि नशे से प्रभावित लगभग हर परिवार सीधे या परोक्ष रूप से इस समस्या से जुड़ा है।

गैंगस्टर, ड्रोन और बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल

भगवंत मान सरकार के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती कानून-व्यवस्था रही है। चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि वह पंजाब को गैंगस्टर और माफिया संस्कृति से मुक्त करेगी। यह दावा सिर्फ कागजी साबित हुआ। राज्य में गैंगवार, फिरौती, लक्षित हत्याएं और सीमा पार से हथियार तथा नशीले पदार्थ भेजने की घटनाएं नियंत्रित नहीं हो सकीं। पाकिस्तान सीमा से ड्रोन के माध्यम से हथियार और ड्रग्स भेजे जाने की घटनाएं लगातार सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। पंजाब पुलिस और सीमा सुरक्षा बल ने बड़ी संख्या में ड्रोन, हथियार और हेरोइन बरामद की है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि इतनी बरामदगी स्वयं यह संकेत देती है कि नशे का नेटवर्क अभी भी कितना ज्यादा सक्रिय है। व्यापारियों और उद्योगपतियों के बीच रंगदारी और सुरक्षा को लेकर समय-समय पर उठने वाली चिंताओं ने भी विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दिया। विपक्ष का आरोप है कि निवेश तभी आएगा जब उद्योग सुरक्षित महसूस करेगा। सच्चाई भी यही है कि कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि जनता-जनार्दन के बीच सुरक्षा की भावना से होता है। 

दुष्यंत दवे बोले जैसे खुद दूध के धुले हो; घोर हिंदू विरोधी वकील रहे दवे आज सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों की पोल खोल रहे हैं

सुभाष चन्द्र

अपने 22 सितंबर के लेख “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार,कानूनी रूप से वैध हो गया” में मैंने लिखा था कि किस तरह न्यायपालिका में भ्रष्टाचार व्याप्त है। आज सुप्रीम कोर्ट में वकील रहे दुष्यंत दवे कह रहे हैं कि “भारत में न्याय व्यवस्था ताकतवर लोगों के पक्ष में झुक गई है और ऐसी कार्यपालिका का समर्थन कर रही है जो पहले से ताकतवर हो गई है। दवे ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में इतने भ्रष्ट जज रहे हैं, जिनकी गिनती भी याद नहीं, उसने न्याय व्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचाया है”।

दुष्यंत दवे चंद्रचूड़ पर कहा है कि “वह खुद को उदारवादी बताते थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने जिन 17 जजों की नियुक्ति की, उसमें एक भी महिला नहीं थी”। दवे ने कहा कि “देश की न्याय व्यवस्था पर ‘अमीर और ताकतवर लोगों का कब्जा’ हो गया है। अदालतों में उनके मामलों की तेजी से सुनवाई होती है। उन्हें अपने पक्ष में फैसले भी मिल जाते हैं”।

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कुछ और बातें भी कही दुष्यंत दवे ने जिससे लगता है वह विपक्ष की भाषा बोल रहे हैं। उन्होंने “न्यायपालिका पर आरोप लगाया कि वह कार्यपालिका (यानी सरकार) को सपोर्ट कर रही है। वो भी ऐसी सरकार को जो पहले ही काफी ताकतवर हो गई है। भारत का सुप्रीम कोर्ट भी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी ही देश में ज्यादतियों के लिए जिम्मेदार थी। पिछले 12 सालों से देश में जो हो रहा है, उससे हालात सच में बेकाबू होते जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों को लागू करवाना होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट दखल देने को तैयार नहीं है।

यह नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला है जैसे राहुल गांधी और विपक्ष करता है। दवे ने इस कड़ी में SIR पर उंगली उठाते हुए कहा कि “चुनाव आयोग के वोटर्स लिस्ट की सफाई वाले SIR अभियान पर सुप्रीम कोर्ट के रवैये की भी दवे ने कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की वजह से वयस्क मताधिकार खतरे में है”।

दवे ने प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि “12 साल में मोदी ने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की जिससे मीडिया उनसे कोई मुश्किल सवाल न पूछ सके”। 

इस दाल-भात में मुसड़चंद को आज सुप्रीम कोर्ट के बारे में ऐसा ब्रह्मज्ञान कैसे हो गया जिसका यह खुद 48 वर्ष तक हिस्सा रहा है। इस मक्कार को SIR और मोदी पर बोलने के लिए कांग्रेस से हिदायत मिली लगती है।

यह व्यक्ति आज कह रहा है कि न्याय व्यवस्था पर अमीर और ताकतवर लोगों का कब्ज़ा हो गया है लेकिन उसने कोर्ट फ़िक्सर वकीलों की बात नहीं की जो ये खुद भी था और इसके केस भी वरीयता पर सुने जाते थे। 

दुष्यंत दवे तुम जैसे घटिया आदमी को यह इल्म भी है कि जिस मोदी की तुम निंदा कर रहे हो, उसने 25 साल से तुम्हारी कांग्रेस की कितनी निंदा और गलियां झेली हैं। तुम यह चाहते हो प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी मोदी का अपमान किया जाये जिसे 36 देश अपना सर्वोच्च सम्मान दे चुके हैं।

यह दवे कितना बड़ा हिंदू विरोधी है उसका पता इस बात से चलता है कि इसने अयोध्या मामले में मुसलमानों का पक्ष रखा; कर्नाटक हिज़ाब बैन इसने मुस्लिमों की तरफ से लड़ा; जहांगीरपुरी के Demolition के खिलाफ यह खड़ा हुआ सुप्रीम कोर्ट में और एक दिन में स्टे लगवा लिया; anti-conversion law के खिलाफ ये मुसलमानों और ईसाइयों के पक्ष में खड़ा हुआ।

सुप्रीम कोर्ट में कितने भ्रष्ट जज हैं उनमें से कम से कम 5 के नाम बताने की हिम्मत करो। यह मत भूलो कि जजों को खरीदने का धंधा तुम भी करते रहे होंगे।