झीरम घाटी के नक्सली हमले में 10 को मृत्युदंड सुनाया गया लेकिन कांग्रेस को इससे भी चैन नहीं है

सुभाष चन्द्र

मई, 2013 में कांग्रेस छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार को बदलने के लिए “परिवर्तन यात्रा” निकाल रही थी। 25 मई को झीरम घाटी में नक्सलियों ने घात लगा कर हमला किया जिसमे 32 लोगों की मौत हुई और 38 घायल हुए। मरने वालों में नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार और योगेंद्र शर्मा शामिल थे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्या चरण शुक्ला गंभीर रूप से घायल हुए और उनकी मौत 11 जून, 2013 को हुई। 

अब 16 सितंबर को NIA कोर्ट के विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत ने 10 माओवादियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है लेकिन कांग्रेस संतुष्ट नहीं है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक बुला कर कहा है कि आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा क्योंकि पूरा न्याय नहीं हुआ है और NIA का दुरूपयोग बताया है।

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2014 तक कांग्रेस की UPA सरकार थी। दो दिन बाद 27 मई को NIA ने केस रजिस्टर किया और कांग्रेस सरकार की विदाई के बाद 25 सितंबर, 2014 को गिरफ्तार 9 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। 28 सितंबर को 30 और लोगों के खिलाफ supplementary Chargesheet दाखिल की गई।

ये झीरम घाटी का खेल कांग्रेस का ही रचा हुआ था क्योंकि अजीत जोगी का काफिला अलग मार्ग से बाद में गया और जिस काफिले में VC Shukla थे उसे पहले ही अलग दुर्गम मार्ग से भेजा गया। अजीत जोगी को जैसे पता था वहां क्या होगा। कांग्रेस के कुकर्म के लिए अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाने का काम मोदी सरकार में NIA ने किया। 

षड़यंत्र अजीत जोगी का था जो इस बात से साबित होता था कि वह अलग काफिले में गया शुक्ला जी के साथ नहीं गया। मरे भी कांग्रेसी और अब दोषियों को मृत्युदंड मिला तब भी खुश नहीं है कांग्रेस। मतलब कांग्रेस का हाथ आतंकियों के साथ।

कांग्रेस अपने समय को याद करे जब 6 अप्रैल, 2010 को दंतेवाड़ा में माओवादियों ने 76 CRPF जवानों की निर्मम हत्या की थी और JNU में वामपंथियों ने जश्न मनाया था लेकिन राहुल गांधी या कांग्रेस ने निंदा नहीं की। उन जश्न मनाने वालों में कन्हैया कुमार अब कांग्रेस में है।

दंतेवाड़ा नरसंहार का मामला कांग्रेस सरकार ने NIA को सौंपा तक नहीं और नरसंहार के किसी दोषी को सजा नहीं हुई। जनवरी, 2013 में ट्रायल कोर्ट ने सभी गिरफ्तार 10 अभयुक्तों को बरी कर दिया due to a lack of sufficient evidence and a failure by the prosecution to prove involvement beyond a reasonable doubt. 

उसके बाद हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी।

आज NIA द्वारा झीरम घाटी में हुए नरसंहार के लिए 10 माओवादियों को मृत्युदंड से भी कांग्रेस संतुष्ट नहीं है तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि दंतेवाड़ा का केस केंद्र की कांग्रेस सरकार ने NIA को क्यों नहीं दिया जबकि उसके लिए राज्य सरकार की सिफारिश की जरूरत भी नहीं होती। 

क्या कांग्रेस अब न्याय पूरा न होने के नाम पर मृत्युदंड पाए लोगों को बचाने का कोई मार्ग तलाश रही है क्योंकि कांग्रेस राज में माओवादी हिंसा चरम पर थी और अब मोदी सरकार ने माओवादियों सफाया कर दिया है? 

‘लोकतंत्र की हत्या’ के मिशन पर राहुल गांधी को सवालों ने ऐसा किया बेआबरू, अपनी ही प्रेस कांफ्रेंस में हुए शर्मसार

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश पर ऊँगली उठाकर राहुल गाँधी ने साबित कर दिया है कि वह नेता प्रतिपक्ष नहीं बल्कि उपद्रवी नेता है। राहुल ने अब तक जितने भी मुद्दे उठाए हैं उनमे राष्ट्र और जनहित कम उपद्रव ज्यादा झलकता है। दूसरे, परिवार की सबसे ज्यादा तड़प सत्ता से दूर रहने की है। राहुल द्वारा बेसिर पैर की बातों से सत्ता के पास भी पहुंचना बहुत मुश्किल है। INDI गठबंधन में शामिल जितनी भी पार्टियां हैं उनको अपनी प्रतिष्ठा को देखते हुए कांग्रेस से दूरी बनाना उनके ही हित होगा, वरना राहुल कांग्रेस को तो डुबो रहे हैं साथ में उनको भी। नगर निगम से लेकर संसद तक कांग्रेस के जितने भी सदस्य हैं सभी गठबंधन में शामिल पार्टियों की बदौलत हैं।     
आप क्रोनोलॉजी समझिए.....

* सोनिया गांधी की शादी राजीव गांधी से 1968 मे होती है...तब वो इटालियन नागरिक थीं।
* 1970 मे राहुल गांधी का जन्म होता है....तब भी वो इटालियन नागरिक थीं।
* 1972 मे प्रियंका वाड्रा का जन्म होता है...तब भी वो इटालियन नागरिक थीं।
* 1980 के चुनाव मे नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की वोटर लिस्ट मे उनका नाम शामिल होता है, उनकी वोट डालने तस्वीर सबने देखी है,लेकिन तब भी वो इटालियन नागरिक ही थीं ।
* सोनिया गांधी अपनी शादी के 15 साल बाद 1983 मे भारत की नागरिक बनीं और 1980 मे उनका नाम वोटर लिस्ट मे था, उन्होंने वोट भी डाला।
* इसके खिलाफ पिछले साल 2025 के अगस्त मे दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट मे पहली सुनवाई हुई, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग हुई।
* सितंबर 2025 मे कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
* दिसंबर 2025 मे याचिकाकर्ता ने रिवीजन याचिका दायर की।
* 22 सितंबर 2026 को सेशंस कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के पुराने आदेश को रद्द कर मामले की नए सिरे से सुनवाई का आदेश जारी कर दिया ।
* अगले ही दिन 23 सितंबर को Indian Express में Propaganda स्पेशलिस्ट अखबार में चुनाव आयोग के खिलाफ एक खबर छापी जाती है कि ज्ञानेश कुमार अपनी मर्ज़ी से फैसले करते हैं।
                                                           साभार: सोशल मीडिया 
चुनाव आयोग 3 सदस्यों की संस्था है किसी को Veto पावर नहीं है जो भी फैसले होते हैं majority से यानि 2-1 या 3-0 से होते हैं। मीटिंग मे एक दूसरे से सहमति असहमति तो हर बोर्ड मे होती है। यही तरीका होता है किसी निर्णय पर पहुंचने का।
भारत का चुनाव आयोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए जाना जाता है। लेकिन चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर बार-बार सवाल उठाना और विभिन्न मंचों पर भारतीय चुनावी प्रणाली को कटघरे में खड़ा करने से देश के लोकतंत्र की साख को नुकसान पहुंचाता है। इस तरह देश की करोड़ों जनता द्वारा निर्वाचित सरकार और पूरी चुनाव प्रक्रिया को अवैध बताना जनादेश का अपमान है। अपनी राजनीतिक हार स्वीकार करने के बजाय जनता में भ्रम और अविश्वास फैलाने से देश में असंतोष बढ़ सकता है, जिससे लोकतांत्रिक स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो सकता है और अराजकता पैदा हो सकती है। लेकिन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए राहुल गांधी चुनाव आयोगी की विश्वसनीयता खत्म कर भारतीय लोकतंत्र की हत्या करने के मिशन पर काम कर रहे हैं।

चुनाव आयोग की छवि खराब करने की सुनियोजित साजिश 
किसी भी बहु-सदस्यीय निकाय में विचारों का मतभेद या आंतरिक बहस एक स्वाभाविक और स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे “धांधली” के रूप में पेश करना भ्रामक है। द इंडियन एक्सप्रेस में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपने साथियों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश नहीं की। इस रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर विचार के दौरान सवाल उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। लेकिन ऐसी टिप्पणी को औपचारिक असहमति यानी डिसेंट नहीं माना जा सकता। आयोग के मुताबिक, जिन आदेशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।

 

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और EC पर राहुल के सवाल
चुनाव आयुक्तों को लेकर सामने आई द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए। राहुल गांधी ने कथित मतभेद की रिपोर्ट को आधार बनाकर एक बार फिर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्च खोल दिया। आंतरिक मतभेदों की रिपोर्टों का हवाला देते हुए राहुल गांधी ने आयोग के कामकाज की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। गुरुवार (24 सितंबर) की शाम को राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग की। इस दौरान उन्होंने ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बन जाने की सलाह दी। राहुल गांधी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश ने वोट चोरी की है। वे देशद्रोही हैं। मैंने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था, लेकिन सरकार ने मेरी बात नहीं मानी।

पत्रकारों के सवालों ने राहुल गांधी की खोली पोल
राहुल गांधी ने गुरुवार (24 सितंबर) को दिल्ली के इंदिरा भवन में एक 55 मिनट का प्रेजेंटेशन दिया। इस प्रेजेंटेशन का शीर्षक ‘Destroyers of Democracy’ था। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री शाह समेत 19 लोगों की तस्वीरें दिखाईं। उन्होंने कहा कि यह सभी लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि लोकतंत्र को खत्म करने वालों को सजा मिलनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जांच होनी चाहिए। राहुल ने अमित शाह का वह वीडियो दिखाया, जिसमें उन्होंने भाजपा की 14 से 30 साल तक सरकार रहने की बात कही थी। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी का ‘400 पार’ वाला बयान दिखाया। लेकिन प्रेजेंटेशन के आखिर में सवाल और जवाब का दौर चला, जिसमें पत्रकारों के तीखे सवालों ने ‘लोकतंत्र की हत्या’ के मिशन पर निकले राहुल गांधी की पोल खोल दी।

वोट चोरी मामले में राहुल ने इंदिरा गांधी को किया बेनकाब 

सवाल नंबर 1: राहुल जी आपने कहा कि पिछले तीन वर्षों से इस इश्यू को उठा रहे हैं, वोट चोरी को लेकर नए नए खुलासे भी हो रहे हैं। तो आपको कब और क्यों महसूस हुआ कि वोट चोरी की जा रही है?

राहुल गांधी: देखिए, फील मैं आपको बताता हूं। जब मैं 7 साल का था, 1977 में इंदिरा गांधी पीएम थीं। हर कोई जानता था, खुद उनको भी पता की वह हार जाएंगी। महसूस हो जाता है कि आप हार जाएंगे। आपकी फीलिंग एक बार गलत हो सकती है, दो बार गलत नहीं हो सकती। दो-तीन चुनाव ऐसे थे जब हम टेक्निकली देख रहे थे। धीरे-धीरे वोट चोरी का शक बढ़ने लगा। फिर हम उस पर काम करने लगे।

सड़कों पर उतरने के सवाल पर बरगलाने लगे राहुल गांधी

सवाल नंबर 2: आपने कहा कि ज्ञानेश कुमार को तुरंत हटाया जाना चाहिए। इस्तीफा होना चाहिए। अपने अप्रूवर (गवाह) की सलाह दी है। अगर उन्होंने आपकी सलाह नहीं मानी तो क्या आप सड़कों पर उतरेंगे? जिस तरह आप सीजेपी आंदोलन के दौरान उतरे थे।

राहुल गांधी: देखिए, जैसे मैंने पहले कहा कि ये जो सिचुएशन है। ये हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं हुआ है। हम नई जगह पहुंच गए हैं। ये जो चेन टूटी है। ये हिन्दुस्तान की मॉडर्न हिस्ट्री में कभी नहीं टूटी है। हमने अचानक पाया कि देश में वोट, कानून, संस्था और संविधान के बीच की कड़ी टूट गई है। सबको पता है कि सिस्टम डैमेज हो चुका है।

सवाल नंबर 3: क्या कोई ऐसा वक्त आएगा जब आप चुनावों का बहिष्कार करेंगे?

राहुल गांधी: धन्यवाद, धन्यवाद…मैं Distraction में नहीं जाऊंगा। मैं ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से बचता हूं। बहुत बहुत धन्यवाद…।

सवाल नंबर 4: राहुल जी आपने कहा कि वोट डिस्ट्रॉय हो रहे हैं। एक प्रोसेस चल रहा है SIR, उस प्रोसेस में एक तरफ जहां करोड़ों लोग बाहर हो रहे हैं, वहीं जेन-जी के लिए अपना नाम जुड़वाना मुश्किल हो रहा है। रजिस्ट्रेशन में दिक्कत आ रही है। तो उसपर आप क्या कहेंगे।

राहुल गांधी: भाजपा को पता है कि जेन-जी इनके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और वो उन्हें वोट नहीं देना चाहते। वो हो रहा हैं। लेकिन एक और खतरनाक चीज हो गई है कि चुनाव आयोग का वोटर लिस्ट से कंट्रोल खत्म हो गया है। उसकी विश्वसनीयता खत्म हो गई है। वे भी इसे मान भी रहे हैं। और मुझे उनके बीच आपस की बातचीत की जानकारी है।

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सारा बवाल ज्ञानेश कुमार पर काट रही कांग्रेस तो फिर वो खुद कैसे जीतती रही राज्यों में; खुद गांधी
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सारा बवाल ज्ञानेश कुमार पर काट रही कांग्रेस तो फिर वो खुद कैसे जीतती रही राज्यों में; खुद गांधी
सुभाष चन्द्र राहुल गाँधी को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कीजड़ फेंकने से पहले देश में हुए पहले चुनाव को याद ..... 

सवाल नंबर  5 : सर, आपने कहा कि आपके पास पुख्ता सबूत है। ब्लैक और ह्वाइट सबूत है। तो क्या चुनाव आयोग अभी जवाब नहीं देता है तो कोर्ट का रूख करेंगे। क्या ये विकल्प है आपके पास, जाएंगे ?

राहुल गांधी: देखिए, मैंने कहा कि मेरा काम एक विपक्ष के नेता के रूप में नॉर्मल सिचुएशन में मेरा काम ऑपोजिशन का रोल है। सरकार पर प्रेसर डालने का रोल है। मेरा काम हिन्दुस्तान के लोकतंत्र को बचाने का नहीं है। मैं वो काम कर रहा हूं। स्टेज पर मैं वो काम कर रहा हूं।

सवाल नंबर 6: आप लगातार वोट चोरी का खुलासा कर रहे हैं। पर इसके जो नतीजे हैं उसमें देखने को मिल रहा है कि एसआईआर दर एसआईआर और जो बिहार का एसआईआर हुआ उसमें अगस्त से लेकर अक्टूबर तक का समय हमारे पास उपलब्ध था। क्या कारण था कि एक भी जो आपत्ति है इस दौरान नहीं उठाई गई और आप जिस तरह से कह रहे हैं कि ये लोकतंत्र के लिए खतरा है। तो वोट चोरी रुकेगी कैसे?

राहुल गांधी: मैम, वोटर लिस्ट की निष्ठा (सटीकता) बनाए रखना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं है। अगर वोटर लिस्ट गलत है, तो यह मेरी समस्या नहीं है। यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह वोटर लिस्ट की निष्ठा की गारंटी दे। मैं जाकर कह सकता हूँ कि मुझे लगता है यह गलत है, मुझे लगता है वह गलत है। लेकिन अंतिम अथॉरिटी चुनाव आयोग ही है।

सारा बवाल ज्ञानेश कुमार पर काट रही कांग्रेस तो फिर वो खुद कैसे जीतती रही राज्यों में; खुद गांधी सरनेम चोरी किया हुआ है और इल्जाम वोट चोरी का लगाते हो

सुभाष चन्द्र

राहुल गाँधी को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कीजड़ फेंकने से पहले देश में हुए पहले चुनाव को याद कर लेना चाहिए था जब जवाहर लाल नेहरू ने इतिहासिक वोट चोरी कर रामपुर से हिन्दू महासभा के 6000 वोटों से निर्वाचित विशन सेठ को अपने लाडले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को जितवाने के लिए खुलेआम वोट चोरी कर विशन सेठ को जलूस से अगवा कर उनके सामने उनके वोट आज़ाद के खाते में डाल हारे हुए आज़ाद को विजयी घोषित किया था। राहुल और इसे समर्थन दे रही पार्टियां जवाब दो "वोट चोर कौन कांग्रेस या चुनाव आयोग?"  

2014 लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस की UPA सरकार के बनाए हुए मुख्य चुनाव आयुक्त थे VS Sampat जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को 30 वर्ष बाद पूर्ण बहुमत मिला और कांग्रेस को मात्र 44 सीट मिली। तब यह आरोप क्यों नहीं लगाया कि वोट चोरी हुई।

-फरवरी, 2017 में कांग्रेस पंजाब चुनाव जीती - CEC थे नसीम ज़ैदी;

-दिसंबर, 2018 में कांग्रेस छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान चुनाव जीती - तब CEC थे सुनील अरोड़ा;

-2022 और 2023 में कांग्रेस हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के चुनाव जीती - CEC थे राजीव कुमार;

-2019 और 2024 में गठबंधन के साथ कांग्रेस झारखंड चुनाव जीती -तब भी CEC राजीव कुमार थे;

-2015 और 2020 के चुनाव भी महागठबंधन जीता लेकिन तब किसी को वोट चोरी याद नहीं आई;

-2026 में तो केरल में ज्ञानेश कुमार के रहते कांग्रेस चुनाव जीती, फिर भाजपा या ज्ञानेश कुमार ने वोट चोरी क्यों नहीं की।

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लोकतंत्र और चुनावी जवाबदेही पर एक सवाल

 इन राज्यों में कांग्रेस की आखिरी सरकार:
• तमिलनाडु – 1967
• पश्चिम बंगाल – 1977
• सिक्किम – 1984
• उत्तर प्रदेश – 1989
• बिहार – 1990
• गुजरात – 1995
• ओडिशा – 2000
• आंध्र प्रदेश – 2014
 ज्ञानेश कुमार फरवरी 2025 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) नियुक्त किए गए।
अब सवाल यह है:
जब कांग्रेस दशकों से कई राज्यों में सत्ता से बाहर है, तो हर चुनावी हार के लिए मोदी, EVM या चुनावी व्यवस्था को दोष क्यों दिया जाता है?
पार्टी के नेतृत्व, नीतियों, जनसमर्थन और बदलती हुई मतदाता प्राथमिकताओं की भी समीक्षा क्यों नहीं की जाती?
लोकतंत्र में चुनाव जीतना और हारना प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनावी धांधली के आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत होने चाहिए और राजनीतिक दलों को अपने चुनावी प्रदर्शन की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए।

अब SIR को लेकर ज्ञानेश कुमार के खून के प्यासे हो गए और कपिल सिब्बल, ममता बनर्जी, राहुल गांधी उन्हें गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं और महाभियोग लाना चाहते हैं। किसने रोका है, दम है तो महाभियोग चलाओ। जिसके SIR को डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में लागू करना चाहता है, उस ज्ञानेश कुमार का चरित्र हनन करते हुए लाज नहीं आती। और तो और कॉकरोच भी धमकी दे रहे हैं आंदोलन की। 

2014 के बाद वैसे वोट चोरी के अलावा EVM में दोष निकालते रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में 45 याचिकाएं दायर की गई लेकिन सब ख़ारिज हो गई। अब सीधा निशाना बनाया है ज्ञानेश कुमार को और यह तय है कि संसद का आने वाला शीतकालीन अधिवेशन भी बर्बाद करने की तैयारी हो गई है।

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सोनिया गांधी की बढ़ीं मुश्किलें, मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द, वोटर लिस्ट मामले में नए सिरे से होगी स
सोनिया गांधी की बढ़ीं मुश्किलें, मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द, वोटर लिस्ट मामले में नए सिरे से होगी स
 

ज्ञानेश कुमार के परिवार को निशाना बनाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनकी बेटियां/ दामाद सभी 2014 के बाद IAS/IRS बने हैं। इससे तो ये लोग UPSC को भी निशाना बना रहे हैं। 

ज्ञानेश कुमार के परिवार में -

मेधा रूपम (बड़ी बेटी): मेधा रूपम 2014 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की IAS अधिकारी हैं, वर्तमान में वे गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी (DM) के पद पर तैनात हैं;

मनीष बंसल (बड़े दामाद) (मेधा रूपम के पति) भी 2014 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं- वे वर्तमान में आगरा के जिलाधिकारी (DM) के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं;

अभिश्री कुमार (छोटी बेटी): अभिश्री 2018 बैच की भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं;

अक्षय लाबरू (छोटे दामाद- (अभिश्री के पति) 2017 बैच के IAS अधिकारी हैं;

मनीष कुमार (भाई - IRS)पद/कैडर: ज्ञानेश कुमार के छोटे भाई मनीष कुमार भी भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं;

उपेंद्र कुमार जैन (बहनों के पति/जीजाजी - IPS)पद/कैडर: वे 1991 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ IPS अधिकारी हैं। 1991 में कैसे नियुक्त हो गए अगर 2014 के बाद के आरोप हैं।

मेधा रूपम और उसके पति 23-24 साल की आयु में IAS बने और अपनी योग्यता के आधार पर बने। अगर कोई पक्षपात किया जाता तो आज मेधा नोएडा में और उसका पति आगरा में Posted न होते, बल्कि साथ एक स्टेशन पर होते। अगर मोदी ने IAS/IRS बनवा दिया तो ज्ञानेश कुमार तो 1988 के IAS हैं जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। तो क्या राजीव गांधी ने उन्हें IAS बना दिया।

Eligibility age for IAS 21 से 32 वर्ष है। ये क्या UPSC में भी पेपर लीक का मुद्दा उठाना चाहते हैं?

कांग्रेसी भूल जाते है कि विजयलक्ष्मी पंडित शिक्षित नहीं थी लेकिन बड़े बड़े पदों पर बिठाया उन्हें नेहरू ने।

गली का कुत्ता हर किसी पर भौंकता है वह भी बिना वजह और अपने साथ औरों को जोड़ लेता है। आज विपक्ष की हालत ऐसी ही है। जिस परिवार ने “गांधी सरनेम” चुराया हुआ है, वह वोट चोरी की बात कर रहा है।

सोनिया गांधी की बढ़ीं मुश्किलें, मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द, वोटर लिस्ट मामले में नए सिरे से होगी सुनवाई

आज कांग्रेस और इसकी गुलाम पार्टियां द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त का विरोध करने की असली वजह सोनिया गाँधी गाँधी द्वारा भारत की नागरिक नहीं होते हुए वोट डालने के अधिकार के दुरूपयोग किये जाने के मुद्दे से ध्यान भटकाना है। यानि कांग्रेस ने सत्ता में रहते किस-किस तरह सत्ता, संविधान और सरकारी संस्थाओं का दुरूपयोग किया।  
लोकतंत्र और चुनावी जवाबदेही पर एक सवाल
 इन राज्यों में कांग्रेस की आखिरी सरकार:
• तमिलनाडु – 1967
• पश्चिम बंगाल – 1977
• सिक्किम – 1984
• उत्तर प्रदेश – 1989
• बिहार – 1990
• गुजरात – 1995
• ओडिशा – 2000
• आंध्र प्रदेश – 2014
 ज्ञानेश कुमार फरवरी 2025 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) नियुक्त किए गए।
अब सवाल यह है:
जब कांग्रेस दशकों से कई राज्यों में सत्ता से बाहर है, तो हर चुनावी हार के लिए मोदी, EVM या चुनावी व्यवस्था को दोष क्यों दिया जाता है?
पार्टी के नेतृत्व, नीतियों, जनसमर्थन और बदलती हुई मतदाता प्राथमिकताओं की भी समीक्षा क्यों नहीं की जाती?
लोकतंत्र में चुनाव जीतना और हारना प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनावी धांधली के आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत होने चाहिए और राजनीतिक दलों को अपने चुनावी प्रदर्शन की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। 
                                                                         साभार: सोशल मीडिया  

देश की सत्ता पर लंबे समय तक कांग्रेस यानी नेहरू-गांधी परिवार का नियंत्रण रहा। इस दौरान नियम, कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं। राजनीतिक प्रभाव और सरकारी तंत्र पर एकाधिकार की वजह से लोकतंत्र और देश की सुरक्षा को ताक पर रखकर मनमाना फैसला किया गया। चुनाव आयोग का भी अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस की आलाकमान सोनिया गांधी के भारतीय नागरिक बनने से पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज होना “सत्ता के दुरुपयोग” का एक क्लासिक उदाहरण है। लेकिन इस मामले ने 46 साल बाद एक बार फिर देश की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल पैदा कर दी। जब सोमवार (21 सितंबर) को दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने अपने एक आदेश से सोनिया गांधी को मुश्किल में डाल दिया।

राउज एवेन्यू कोर्ट का नए सिरे से सुनवाई का आदेश
दरअसल, राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार को मजिस्ट्रेट कोर्ट के वर्ष 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी का भारतीय नागरिकता मिलने से पहले मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के आरोपों की जांच से इनकार किया गया था। विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने मामले को वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट में भेजते हुए शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई करने और कानून के अनुसार कारणों के साथ आदेश पारित करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में इस बात पर उचित चर्चा नहीं की गई कि शिकायत में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि आदेश में तथ्यों और कानून पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

शिकायत में सोनिया गांधी पर जालसाजी का आरोप
यह मामला राउज एवेन्यू कोर्ट की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से दाखिल शिकायत से जुड़ा है। अधिवक्ता विकास त्रिपाठी ने राउज एवेन्यू कोर्ट के मजिस्ट्रेट के समक्ष एक याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि सोनिया गांधी का नाम वर्ष 1980 में नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया था, जबकि उन्होंने आधिकारिक तौर पर 30 अप्रैल 1983 को भारत की नागरिकता प्राप्त की थी। याचिका में यह भी दावा किया गया कि 1982 में उनका नाम सूची से हटाया गया और 1983 में नागरिकता मिलने से पहले इसे फिर से जोड़ा गया, जो कथित तौर पर धोखाधड़ी या जालसाजी की ओर इशारा करता है।

धोखाधड़ी या जालसाजी हुई या नहीं, देखना जरूरी- कोर्ट
अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने कहा कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता संसदीय लोकतंत्र में हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची में छेड़छाड़, किसी व्यक्ति का फर्जी तरीके से नाम शामिल करने, गैर-नागरिक का नाम जोड़ने या गलत घोषणा अथवा दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे आरोपों पर यह देखना जरूरी है कि क्या धोखाधड़ी या जालसाजी का संज्ञेय अपराध बनता है। कोर्ट ने कहा कि अब मजिस्ट्रेट शिकायत, पुलिस की रिपोर्ट और दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर कानून के मुताबिक कारणयुक्त आदेश पारित करेंगे। विशेष न्यायाधीश ने यह साफ किया कि पुनरीक्षण अदालत खुद मजिस्ट्रेट की भूमिका नहीं निभा सकती। इसलिए वह सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती। एफआईआर के लिए शिकायत पर निर्णय लेने का अधिकार संबंधित मजिस्ट्रेट के पास ही रहेगा।

पुलिस अधिकारी को नहीं सुना, थाने से रिपोर्ट भी नहीं मंगाई
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इस धारा के तहत मजिस्ट्रेट संज्ञेय अपराध की जांच के लिए पुलिस को निर्देश दे सकता है। कोर्ट के मुताबिक संबंधित पुलिस अधिकारी की दलीलें नहीं सुनी गईं और संबंधित थाने से स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं मंगाई गई। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दो कानूनी विकल्प थे। पहला, प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देना और दूसरा, बीएनएसएस की धारा 223 के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान लेकर आगे की कार्यवाही करना। लेकिन इन दोनों विकल्पों पर उचित विचार नहीं किया गया।

नाम शामिल करने और हटाने पर चर्चा नहीं की गई- कोर्ट
विशेष अदालत ने खास तौर पर इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि पुराने आदेश में 1980, 1982 और 1983 की मतदाता सूचियों में सोनिया गांधी के नाम शामिल होने, हटाए जाने और फिर शामिल किए जाने के क्रम पर पर्याप्त चर्चा नहीं की गई। अदालत के मुताबिक, शिकायत में लगाए गए आरोपों को देखते हुए यह स्पष्ट किया जाना जरूरी था कि इन घटनाक्रमों का कानूनी महत्व क्या है और शिकायत को पूरी तरह खारिज करने का आधार क्या था।

विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट के फैसले पर उठाया सवाल
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को इस स्तर पर केवल यह देखना था कि शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है या नहीं और क्या पुलिस जांच की जरूरत है। इसके बजाय आदेश में नागरिकता के मुद्दे पर चर्चा की गई, जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विषय है। अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की शक्तियां होने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस को मतदाता सूची में कथित फर्जी तरीके से नाम शामिल करने या गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल की जांच करने से रोका जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने मूल दायित्व के तहत शिकायत में संज्ञेय अपराध के खुलासे पर विचार नहीं किया। इसी आधार पर पुराने आदेश को रद्द कर मामला वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया गया।

ACJM ने खारिज की थी सोनिया गांधी के खिलाफ शिकायत
11 सितंबर 2025 को एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) ने इस शिकायत को खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट का तर्क था कि इस मामले में धोखाधड़ी या जालसाजी के बुनियादी कानूनी तत्वों का अभाव है और मतदाता सूची तैयार करना या उसमें संशोधन करना पूरी तरह से चुनाव आयोग (ECI) का अधिकार क्षेत्र है। मजिस्ट्रेट ने वर्ष 1980 की मतदाता सूची के जिस अंश पर भरोसा किया गया था, उसे भी बिना प्रमाणित कॉपी की फोटोकॉपी बताया था।

अब आगे क्या होगा?
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने मामले को वापस एसीजेएम अदालत के पास भेज दिया है। अब वहां शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई होगी। मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी की बात सुनने और जरूरी जांच के बाद इस सवाल पर कारणों के साथ आदेश देंगे कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। मामला अब 29 सितंबर को एसीजेएम के सामने सूचीबद्ध होगा। अदालत ने फिलहाल सिर्फ पुराने आदेश को रद्द करते हुए मामले पर कानून के मुताबिक नए सिरे से फैसला लेने को कहा है। इसलिए वर्तमान स्थिति में यह कहना सही होगा कि आरोप की न्यायिक जांच का रास्ता फिर खुल गया है।

सोनिया गांधी की व्यक्तिगत भूमिका की होगी जांच
सोनिया गांधी की नागरिकता प्राप्त करने से पहले मतदाता सूची में नाम होने का आरोप गंभीर संवैधानिक और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा सवाल उठाता है। लेकिन यह निर्धारित करना कि मतदाता सूची में नाम किसने, किस दस्तावेज के आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत शामिल कराई तथा इसमें सोनिया गांधी की कोई व्यक्तिगत भूमिका थी या नहीं—यह जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है। इसके तहत उस समय का मूल मतदाता सूची का रिकॉर्ड, पंजीकरण आवेदन, घोषणा और संबंधित निर्वाचन अधिकारियों की फाइलों की जांच जरूरी होगी।

बीजेपी ने राहुल गांधी और कांग्रेस से पूछा सवाल
सोनिया गांधी की 1980 की वोटर-लिस्ट एंट्री पर राउज एवेन्यू कोर्ट की टिप्पणी के बाद, बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने नए सवाल उठाए…

  • क्या कांग्रेस और गांधी-वाड्रा परिवार ने फर्जी डॉक्यूमेंट के जरिए सोनिया गांधी, जो 1980 में भारत की नागरिक नहीं थी उनको वोट डलवाया ? 
  • क्या सोनिया गांधी को वोट डलवाने के लिए कांग्रेस और गांधी-वाड्रा परिवार ने फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनाए? फर्जी डॉक्यूमेंट्स अगर कोई बनाता है तो भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 337 के तहत इसमें 7 साल की सजा भी हो सकती है।
  • जिस संविधान की कॉपी लेकर राहुल गांधी घूमते हैं, जिसको उन्होंने कभी नहीं पढ़ा, उनको जवाब देना चाहिए कि आपकी माताजी ने 1980 में वोट कैसे डाला? किसने उनको फर्जी डॉक्यूमेंट बनवाने में मदद की?
  • उस वक्त इंदिरा जी की सरकार थी। क्या इंदिरा गांधी की सरकार ने ऐसी मदद की? इस सवाल का जवाब राहुल गांधी को देना चाहिए।