नेताओं की तरह सूर्यकांत जी ने सफाई दी

सुभाष चन्द्र

यह तो राजनेताओं का चलन है कि जहां उनके बयान की छीछलेदार होती, तो वे तुरंत सफाई देते हैं कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है भले ही वह बयान मीडिया के वीडियो में साफ़ सुनाई दे रहा हो एक बात और कह देते हैं राजनेता कि उनके बयान से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची है तो उसके लिए मुझे खेद है। 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी राजनेताओं की तरह पलटी खाई और सफाई दी कि “मीडिया के एक वर्ग द्वारा उनकी मौखिक टिप्पणी को गलत तरीके से पेश किया गया है” उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना देश के युवाओं के खिलाफ नहीं थी, बल्कि फर्जी डिग्री के सहारे विभिन्न पेशों में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ थी लेकिन नेताओं की तरह बस “खेद” व्यक्त नहीं किया

Live Law ने सूर्यकांत जी के बयान को इस भाषा में प्रकाशित किया था 

“There are youngsters like Cockroaches, who don’t get any employment and don’t  have any place in the profession. Some of them become media, some of them become social media, some of them become RTI activist, some of them become other activists and they start attacking everyone”.

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इस बयान में कहीं यह स्पष्ट नहीं है कि आप केवल वकालत जैसे नोबल प्रोफेशन में फर्जी डिग्री धारकों की बात कर रहे हैं जैसा अब आप स्पष्टीकरण दे रहे हैं आपने तो सारे बेरोजगार युवाओं को एक लाठी हाँक दिया था विभिन्न पेशों में फर्जी डिग्रियों के सहारे घुसे लोगों की बात होती तो आप सभी की डिग्रियों की जांच की बात करते जबकि आपने केवल दिल्ली के सभी वकीलों की डिग्रियों की CBI से जांच की बात की

अब सूर्यकांत जी स्पष्टीकरण दे रहे हैं कि “मुझे न केवल हमारे वर्तमान युवा और भविष्य के मानव संसाधन पर गर्व है, बल्कि भारत का हर युवा मुझे प्रेरित करता है और यह भी कहा कि हमारे युवा विकसित भारत के स्तम्भ हैं और वे देश के युवाओं का बहुत सम्मान और आदर करते हैं”

मैंने कल लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल 2023 को रिटायर्ड जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय समिति बनाई थी 25 लाख वकीलों और जजों की डिग्रियों के सत्यापन के लिए और समिति को 31 अगस्त, 2023 तक रिपोर्ट देने को कहा था मैंने यह भी बताया था कि कैसे मुझे सुप्रीम कोर्ट के CPIO ने रिपोर्ट के स्टेटस की जानकारी देने से मना करते हुए यहां तक कहा कि आपको तो सूचना मांगने का अधिकार ही नहीं है क्योंकि आप केस में पार्टी नहीं हो 

क्या किसी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट के बारे में सूचना मांगने का भी अधिकार नहीं है यदि वह केस में पार्टी नहीं है? इस तरह का उत्तर कोई “परजीवी” अधिकारी ही दे सकता है 

करीब तीन साल से डी के गुप्ता समिति ने कोई अंतरिम रिपोर्ट भी नहीं दी है जबकि honorarium बराबर मिल रहा होगा किसकी जेब से पैसा खर्च हो रहा है पहले उस समिति से अभी तक सत्यापित की डिग्रियों की रिपोर्ट तो तलब कीजिए शायद उसमे ही दिल्ली के वकीलों की जानकारी निकल आए और CBI जांच की जरूरत ही न पड़े और हां, डी के गुप्ता समिति को यथाशीघ्र काम पूरा करने के लिए कहा जाए 

हो सकता है आपकी मंशा वह न रही हो जैसा मीडिया में बताया लेकिन नूपुर शर्मा को तो आपने जस्टिस परदीवाला के साथ पूरी तरह सोच समझ कर अपमानित किया था जबकि विदेशी शक्तियां तक उसके कथित बयान पर सरकार को घेर रही थी और आपने आग में घी डालने का काम किया नूपुर को सारे फसाद की जड़ बता कर आप दोनों जज छोटे नहीं हो जाते अगर आप उससे अपने शब्दों के लिए अफ़सोस ही प्रकट कर देते

चलिए आपने तो स्पष्टीकरण दे दिया लेकिन यह भी सत्य है कि कई बार जजों द्वारा अवांछनीय टिप्पणियां की जाती है को judicial decorum को शोभा नहीं देती

बंगाल में योगी मॉडल लागू करेगी BJP सरकार, उपद्रवियों से वसूला जाएगा नुकसान: डायमंड हार्बर से बोले मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी


पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शनिवार (16 मई 2026) को डायमंड हार्बर क्षेत्र में एक अहम प्रशासनिक बैठक कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की।

यह इलाका लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिए कि अब राज्य में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और हिंसा या तोड़फोड़ की कीमत सीधे आरोपियों को चुकानी पड़ेगी।

आसनसोल में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए सुवेंदु ने कहा, “आसनसोल में जो अप्रिय घटना हुई थी, उस पर हमारी सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है। पुलिस ने अब तक इस मामले में संलिप्त 15 उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया है। तोड़-फोड़ और हिंसा के लिए जिम्मेदार इन सभी आरोपियों को पुलिस हिरासत, रिमांड और कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ेगा।”

उन्होंने कहा कि राज्य में किसी भी स्थिति में अराजकता फैलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और पुलिस को पूरी सख्ती के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

‘योगी मॉडल’ की तर्ज पर भरपाई की नीति, सीएम ने कहा- एजेंसियों को दी जाएगी खुली छूट

मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की तर्ज पर नई नीति लागू करने का संकेत देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों से पूरी क्षतिपूर्ति वसूली जाएगी। उन्होंने कहा, “किसी को भी बंगाल में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “आसनसोल घटना या भविष्य में होने वाली किसी भी ऐसी तोड़फोड़ के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई सीधे आरोपियों के निजी फंड और संपत्तियों से कराई जाएगी। यह कदम राज्य में कानून का राज स्थापित करने के लिए बेहद जरूरी है।”

अंत में सुवेंदु कहा, “पूर्ववर्ती व्यवस्था के दौरान CID और अन्य राज्य स्तरीय जाँच एजेंसियों का कानून-व्यवस्था सुधारने में पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया था। हमारी सरकार अब इन पेशेवर एजेंसियों को खुली छूट देगी ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई कर सकें।”

वाह शुभेंदु अधिकारी वाह ! दिल जीत लिया

कांग्रेस के हटते ही धीरे धीरे नर्क में बदले जा रहे बंगाल में 50 बरस बाद लागू कर दिया योगी मॉडल! सोमवार से सभी स्कूलों में वन्देमातरम अनिवार्य। धर्मस्थलों से हटेंगे लाउडस्पीकर। गौ हत्या और गौ कटान पर पूरी तरह प्रतिबंध। गरीबों और मजदूरों के लिए 5 रूपए में माछ भात । सीमावर्ती तमाम जिलों में बॉर्डर पर फैंसिंग के लिए 6 महीनों के भीतर लैंड ट्रान्सफर। मदरसों की गतिविधियों की पड़ताल, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर सख्त एक्शन। गुंडा माफियाओं के खिलाफ ऑपरेशन लंगड़ा। घुसपैठियों को चुनचुनकर निकालने की तैयारी।

80 साल बाद बंगाल में खुशियों की बहार। छह दिनों में ही शुभेंदु के ताबड़तोड़ फैसलों से ममता बनर्जी इतनी बौखलाई कि वकीलों की ड्रेस और काला कोट पहनकर हाईकोर्ट पहुंच गई। छह ही दिनों में सरकार पर आरोपों की बौछार कर दी। अरी दीदी सब्र करो थोड़ा धीरज धरो। अभी शुभेंदु के पास 5 साल ही नहीं हैं, लंबा भविष्य भी है। बंगाल की जनता ममता से इसकदर ऊब चुकी है कि उनकी सूरत नहीं देखनी चाहते। तभी तो ममता जैसे ही कोर्ट से बाहर निकलीं, लोगों ने चोर चोर के नारे लगाने शुरू कर दिए। याद कीजिए ऐसे ही नारे अभी हाल ही में महुआ मोइत्रा के विरुद्ध भी लगे जब वे प्लेन में कोलकाता से दिल्ली पहुंची। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बंगाल बार से ममता के लाइसेंस की बाबत रिकॉर्ड तलब किया है।
तृणमूल को अभी यह झेलना होगा, ममता समझ लें। थोड़ा रुकिए ममता दीदी, आपके भतीजे अभिषेक को अभी काफी भुगतना है। अपने भ्रष्टाचार, कटमनी, तोलाबाजी और धमकियों के लिए अभिषेक को अभी जेलें भी काटनी हैं। यही नहीं घुसपैठियों की बदौलत बंगाल की डेमोग्राफी बदलने वाली ममता को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय जांच एजेंसियों को बंधक बनाने लेने के लिए काफी कुछ झेलना है। अभिषेक को मुख्यमंत्री पद देकर दिल्ली की राजनीति करते हुए प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न तो चकनाचूर हुआ। हां सब ठीक चला तो वे राज्यसभा के रास्ते दिल्ली पहुंचकर दिल्ली में इंडी का नेतृत्व संभाल सकती हैं। बशर्ते कि ममता से मुंह फेर चुके राहुल गांधी अपना सपना वापस ले लें।
तो ममता बनर्जी, आपका खेल खत्म हो चुका है। वामपंथियों ने 35 साल और अपने 15 साल बड़े जुल्म ढहाए। इस बॉर्डर स्टेट को भारत से अलग करने का षड्यंत्र किया, राज्यपाल को कुछ नहीं समझा। आपकी तमन्ना थी कि केन्द्र सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा दे ताकि आप सहानुभूति का वोट हासिल कर लें। लेकिन दीदी आप शाह मोदी को अब तक गलत पहचानती रही। आ जाएगा, जल्द समझ आ जाएगा कि देश के सिस्टम के ख़िलाफ़ जाना भी देशद्रोह के समान है। बंगाल के साथ साथ पूरे देश की जनता समझ गई है कि आपके समर्थन में बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? समझ जाओ दीदी वक्त बदल गया है।

ममता बनर्जी 75 मुस्लिम जातियों को बनाना चाहती थी OBC, सरकार ने बदला फैसला: SC से वापस लेगी याचिका, 1.69 करोड़ जाति प्रमाण पत्रों की होगी जाँच


पश्चिम बंगाल में नई BJP सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बड़ा फैसला लिया गया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस याचिका को वापस लेने का निर्णय किया है, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने 75 मुस्लिम और 2 हिंदू समुदायों समेत कुल 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द कर दिया था।

22 मई 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इन समुदायों को बिना उचित सामाजिक और शैक्षणिक सर्वे के केवल धार्मिक आधार पर OBC सूची में शामिल किया गया था, जो संविधान के खिलाफ है। ये समुदाय 2010 से 2012 के बीच पहले वाम मोर्चा सरकार और बाद में TMC सरकार के दौरान OBC सूची में जोड़े गए थे।

जबकि मुसलमानों में शिया, सुन्नी, पठान, अहमदी, वहाबी और पासमांदा आदि अनेकों फिरकों में इतना ज्यादा भेदभाव है कि कोई एक दूसरे की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकता दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकने के अलावा जातियों को मानते ही नहीं फिर सिर्फ वोट की सियासत में यह काम एकदम गलत है।      

कोर्ट ने 2010 के बाद जारी सभी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य कर दिया था और नौकरी व एडमिशन में उनके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके तुरंत बाद ममता बनर्जी की सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेने की तैयारी

आनंदबाजार पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार के वकील कुनाल मिमानी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर इस मामले को वापस लेने की अनुमति माँगी है। सरकार ने मामले की जल्द सुनवाई की भी माँग की है। इस फैसले से 2010 के बाद जारी हुए करीब 5 लाख OBC प्रमाणपत्र प्रभावित हो सकते हैं।

इससे पहले वाम मोर्चा सरकार ने 42 मुस्लिम समुदायों और TMC सरकार ने 35 अन्य समुदायों को OBC सूची में शामिल किया था। बाद में 2023 में OBC रिजर्वेशन एक्ट भी लाया गया था।

1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों की होगी दोबारा जाँच

नई सरकार ने इसके साथ ही 2011 के बाद जारी सभी SC, ST और OBC प्रमाणपत्रों की दोबारा जाँच का आदेश भी दिया है। इसमें करीब 1.69 करोड़ दस्तावेज शामिल हैं। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अधिकारी सभी प्रमाणपत्रों की जाँच करें और फर्जी या अनियमित पाए जाने पर कार्रवाई करें।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष तपस राय ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा, “TMC सरकार ने मनमाने ढंग से काम किया। उसने किसी कानून, संविधान या नियम का पालन नहीं किया। ओबीसी आरक्षण के मामले में भी यही हुआ है। नई सरकार ने सही कदम उठाया है।”

वहीं TMC प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा है, “पिछली सरकार ने जनता के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाए थे। पार्टी नेतृत्व द्वारा नई सरकार के इस फैसले की कानूनी स्तर पर जाँच की जाएगी।”

भाजपा ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘वोट बैंक की राजनीति’ और पिछली सरकार के दौरान हुई अनियमितताओं का अंत बताया है। सरकार ने संकेत दिया है कि OBC सूची को संशोधित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचे, एक नया, संवैधानिक रूप से अनुपालन करने वाला पिछड़ापन सर्वेक्षण कराया जाएगा।

बंगाल : TMC के गुंडों से राधा गोविंद मंदिर मुक्त, कब्जा कर बना लिया था पार्टी कार्यालय, BJP आई तो फिर शुरू हुई पूजा-अर्चना


पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आते ही बीरभूम जिले के रामपुरहाट स्थित श्री श्री राधा गोविंद मंदिर के भोगघर से तृणमूल कांग्रेस (TMC)  का कब्जा हटा दिया गया है। BJP कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की मदद से वहाँ चल रहा पार्टी कार्यालय बंद कराया गया और जगह को दोबारा मंदिर समिति को सौंप दिया गया है।

कब्जा हटने के बाद परिसर में फिर से पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो गए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1990 में इलाके के लोगों ने चंदा जुटाकर की थी। मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। बाद में मंदिर के पास भोगघर का निर्माण शुरू किया गया था।

आरोप है कि TMC के कुछ कार्यकर्ताओं ने निर्माण कार्य रुकवाकर उस जगह पर कब्जा कर लिया और वहाँ पार्टी कार्यालय खोल दिया। इस घटना को लेकर इलाके में लंबे समय से नाराजगी बनी हुई थी। श्रद्धालुओं और मंदिर समिति का कहना था कि धार्मिक स्थल का उपयोग राजनीतिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। अब कब्जा हटने और मंदिर को उसकी पुरानी पहचान वापस मिलने के बाद स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है।

WHO की ‘इंटरनेशनल वॉर्निंग’: इबोला वायरस का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन बरपा रहा कहर, कांगो-युगांडा से लेकर केन्या तक अलर्ट

                                                                                                                             साभार - आज तक
कांगो में इबोला वायरस तेजी से कहर बरपा रहा है। यहाँ इस वायरस के चलते करीब 80 लोगों की मौत हुई है और इसे देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी सतर्क हो गया है। WHO ने इसे इंटरनेशनल पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया है। हालाँकि, WHO का कहना है कि अभी यह महामारी की श्रेणी में नहीं है।

यह बीमारी बंडिबुग्यो स्ट्रेन से फैल रही है, जो बेहद खतरनाक मानी जाती है और शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है।

कांगो में सबसे ज्यादा असर, सैकड़ों केस सामने आए

कांगो के इतुरी प्रांत के बुनिया, रवामपारा और मोंगब्वालू जैसे इलाकों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। यहाँ करीब 80 संदिग्ध मौतें और 246 से ज्यादा संदिग्ध केस दर्ज किए गए हैं, जबकि 8 मामलों की लैब में पुष्टि हुई है। अफ्रीका CDC के अनुसार, कुल मौतों की संख्या 87 तक पहुँच गई है और संक्रमण अब समुदाय के भीतर फैल रहा है, जिससे रोकथाम मुश्किल हो रही है।

बुनीया में लोगों के बीच डर और चिंता का माहौल बना हुआ है। स्थानीय निवासी जीन मार्क असिम्वे ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से लगातार लोगों की मौत हो रही है। कई बार एक ही दिन में दो-तीन या उससे अधिक लोगों का अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रकोप एक नर्स के मामले से शुरू हुआ और धीरे-धीरे कई इलाकों में फैल गया। मोंगब्वालू में सक्रिय केस ज्यादा होने से ट्रैकिंग और इलाज की प्रक्रिया और कठिन हो गई है।

हालात तब और चुनौतीपूर्ण हो गए जब पड़ोसी देश युगांडा में भी एक मामला सामने आया, जहाँ संक्रमित व्यक्ति की मौत हो चुकी है। हालाँकि सरकारें और स्वास्थ्य एजेंसियाँ स्क्रीनिंग, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और निगरानी बढ़ाकर इसे रोकने की कोशिश कर रही हैं।

अफ्रीका की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ने चेतावनी दी है कि यह बीमारी युगांडा और दक्षिण सूडान तक फैल सकती है। वहीं, क्षेत्र में लोगों की लगातार आवाजाही को देखते हुए केन्या ने भी सतर्कता बढ़ा दी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत भड़के; बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह होते हैं

सुभाष चन्द्र 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एक वकील की वरिष्ठ वकील  का दर्जा की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जिसमें चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की - “कुछ युवा कॉकरोच की तरह होते हैं, जिन्हे न तो कुछ रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई जगह, उनमें से कुछ इंटरनेट मीडिया पर चले जाते हैं, कुछ RTI कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं; काले वस्त्र पहने हजारों लोग घूम रहे हैं जिनकी डिग्रियों पर गंभीर संदेह है, हम इसकी जांच CBI से कराने पर विचार कर रहे हैं”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
हम आपका सम्मान करते हैं लेकिन यह कहना आप भूल गए कि ऐसे ही कुछ वकील हाई कोर्ट के जज भी बन जाते हैं इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने राष्ट्रपति को लिखे एक पत्र में ऐसा ही कुछ इशारा किया है एसोसिएशन ने “हाईकोर्ट में दिल्ली सहित अन्य जगहों से प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की जज के रूप में नियुक्ति पर आपत्ति जताई है 

एसोसिएशन का कहना है कि हाल के वर्षों में कई ऐसे वकीलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज नियुक्त किया गया है, जिनका यहां नियमित प्रैक्टिस या फाइलिंग का अनुभव नहीं रहा” क्या इसका मतलब यह नहीं निकलता कि “कॉकरोच जैसे वकील हाई कोर्ट के जज बनाए जा रहे हैं” जिस वकील को फाइलिंग का भी अनुभव नहीं है वह कैसे हाई कोर्ट का जज बनने लायक है बार एसोसिएशन ने कहा है तो उसमें कुछ तो सच्चाई होगी

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि “मैं किसी मामले का इंतज़ार कर रहा हूँ, मैं चाहता हूँ CBI दिल्ली के सभी वकीलों की डिग्रियों की जांच करे तीस हजारी में फलां-फलां वकील जिस तरह फेसबुक पर पोस्ट और चीज़ें डाल रहे हैं क्या उन्हें लगता है कि हम देख नहीं रहे हैं?”

लेकिन आपने तो कभी कहा था कि हम सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होते इसका मतलब आप सोशल मीडिया को देखते हैं

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा “SHOW ME EVEN A SINGLE PROJECT WHERE THESE SO CALLED ENVIRONMENTAL ACTIVISTS HAVE SAID THAT WE WELCOME THIS PROJECT”. लेकिन जनाब, पर्यावरण के नाम पर प्रोजेक्ट्स को चुनौती देने वाले कोई आम वकील नहीं होते, रिकॉर्ड उठा कर देख लीजिए, विगत में उन प्रोजेक्ट्स को चुनौती सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों ने ही दी है

आप CBI से जांच कराने की बात कर रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल 2023 को रिटायर्ड जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय समिति बनाई थी 25 लाख वकीलों और जजों की डिग्रियों के सत्यापन के लिए और समिति को 31 अगस्त, 2023 तक रिपोर्ट देने को कहा था लेकिन समिति की रिपोर्ट आज तक नहीं सुप्रीम कोर्ट को जमा नहीं हुई है

मैं कोई RTI activist नहीं हूँ लेकिन मैंने सुप्रीम कोर्ट से RTI में पूछा था कि दीपक गुप्ता समिति की रिपोर्ट का क्या स्टेटस है मुझे कोर्ट के रजिस्ट्रार ने 10 नवंबर 2023 को अपने जवाब में कहा कि -

“As ascertained from concerned branch of the registry, you are not a party in the below mentioned case ➖

Writ Petition (Civil) No 82 of 2023 

Ajay Shankar Srivastava verses Bar Council of India & Anr.

“No report has been received in the concerned judicial file”

तीन साल में क्या अंतरिम रिपोर्ट भी नहीं सकती ?

हाई कोर्ट एक जज ने एक बच्ची के बलात्कारी की सजा केवल इसलिए कम कर दी थी कि वो 5 वक्त की नमाज पढता है मतलब नमाज पढ़ते हुए बलात्कार करना जायज था लेकिन नमाज पढ़ने से सजा कम हो सकती है सुप्रीम कोर्ट में भी एक जज ने एक बच्ची के बलात्कारी और हत्यारे की फांसी की सजा यह कह कर उम्र कैद में बदल दी कि EVERY SINNER HAS A FUTURE”.  एक हाई कोर्ट के जज ने कहा Skin to Skin contact नहीं हुआ तो बलात्कार नहीं माना जा सकता एक हाई कोर्ट के जज ने कहा -” योनि के ऊपर लिंग रख कर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं है” ऐसे फैसले क्या किसी “परजीवी” जज के नहीं माने जा सकते?

‘हम भी सनातन को खत्म करने मैदान में आए हैं’ : उदयानिधि स्टालिन के बाद TVK के मुस्तफा ने जाहिर की हिंदू घृणा

तमिलनाडु में जिस तरह चुनावों में सेकुलरिज्म के गुमराह करने वाले नारों का इस्तेमाल कर सनातन विरोधियों ने सत्ता हथियाई उससे हिन्दुओं को आंखें खोलने चाहिए। बहुत कलाकार को मुख्यमंत्री बनाने का नशा चढ़ा था। अब 5 साल भुगतना। मोदी-योगी-अमित से रहम की भीख मत मांगना। हिन्दू किसी भी राज्य का हो उसे सेकुलरिज्म और जातिगत सियासत के नशे से बाहर आना होगा। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजी। सनातन को अपमानित करने वाली DMK पार्टी को वोट देने वालों पर शर्म आती है। मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट वोट करता है और हिन्दू जातिगत सियासत में फंस पागलों की तरह सेकुलरिज्म के नशे में डूब वोट करता है। योगी ने ठीक कहा था "बंटे तो कटे"। बंगाल में जब तक विभाजित रहा ममता की ज्यादतियों का शिकार हुआ और एकजुट हुआ राहत की साँस ली। 

तमिलनाडु में डीएमके के उदयानिधि स्टालिन के बाद तमिलनाडु मुस्लिम लीग (TNML) के संस्थापक और मदुरै सेंट्रल से TVK विधायक वीएमएस मुस्तफा ने सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान दिया है।

पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी राजनीति में ‘सनातन धर्म को खत्म करने’ के उद्देश्य से उतरी है। उन्होंने कहा, “हमारे पास पेरियार और आंबेडकर की विचारधारा है और हम सनातन को समाप्त करने के लिए मैदान में आए हैं।”

मुस्तफा ने मदुरै सेंट्रल सीट पर जीत हासिल की है। जहाँ हिंदुओं का विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर स्थित है। यह देखते हुए उनके बयान पर राजनीतिक विवाद और गहरा गया गया है। भाजपा नेता के अन्नामलाई ने ऐसी प्रतिक्रियाओं पर सवाल खड़े किए हैं और कहा है कि ये लोग ध्यान रखे हिंदू धर्म कोई पंचिंग बैग नहीं है।

इससे पहले, 12 मई 2026 को तमिलनाडु विधानसभा में उदयानिधी स्टालिन ने भी सनातन धर्म पर अपनी पुरानी टिप्पणी दोहराते हुए कहा, “जो सनातन लोगों को बाँटता है, उसे समाप्त किया जाना चाहिए।” इस भाषा के वक्त सदन में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय भी मौजूद थे और उन्होंने भाषण के बाद उदयनिधि का अभिवादन भी किया था किया।


तमिलनाडु चुनाव से पहले घुसे भारत में, नकली डॉक्यूमेंट दिखाकर वोटिंग की: मदुरै एयरपोर्ट पर 25 विदेशी गिरफ्तार, जाँच एजेंसियाँ पड़ताल में जुटीं

    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदान के आरोप में करीब 25 विदेशी नागरिक अरेस्ट (फोटो साभार: न्यूज 18)
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के दौरान फर्जी दस्तावेजों के जरिए वोट डालने का मामला उजागर हुआ है। पुलिस ने इस संबंध में अब तक करीब 25 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है।

पुलिस और इमिग्रेशन विभाग की संयुक्त कार्रवाई में चेन्नई, मदुरै और अन्य हवाई अड्डों पर इन लोगों को उस समय पकड़ा गया, जब वे भारत छोड़कर विदेश जाने की तैयारी में थे। इन विदेशी नागरिकों की उँगलियों पर वोटिंग के बाद लगाई जाने वाली पक्की स्याही (Indelible ink) के निशान पाए गए, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की गई।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि गिरफ्तार किए गए लोगों में अधिकांश श्रीलंकाई नागरिक हैं, जबकि कुछ ब्रिटेन और कनाडा के पासपोर्ट धारक भी शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, कई संदिग्ध चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद तमिलनाडु पहुँचे थे और मतदान के बाद कुछ दिनों तक राज्य में रुके रहे ताकि उनकी उँगलियों पर लगी स्याही मिट जाए।

अधिकारियों ने बताया कि कई विदेशी नागरिक अभी भी भारत में मौजूद हो सकते हैं और जाँच एजेंसियाँ उन सभी लोगों का डेटा खंगाल रही हैं, जो मतदान से पहले भारत आए और अब तक वापस नहीं लौटे। पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और अन्य संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई शुरू कर दी है।

चुनाव आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट

 पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट चुनाव आयोग को भेज दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों की जाँच पहले भी सामने आ चुकी है। वर्ष 2025 में इमिग्रेशन अधिकारियों ने चुनाव आयोग से लगभग 100 विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाने का अनुरोध किया था।

जाँच के दौरान पाया गया था कि विदेशी नागरिकों के पास मतदाता पहचान पत्र (EPIC) मौजूद थे और उन्होंने गलत पते के आधार पर मतदान अधिकार हासिल कर लिए थे। इस वर्ष भी करीब 60 विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।

चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार केवल वही ‘ओवरसीज इलेक्टर’ मतदान कर सकता है, जिसने किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण न की हो। NRI मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराने के लिए भारतीय नागरिकता बनाए रखना और मतदान के समय मूल भारतीय पासपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

क्या इस्लाम मूर्तियों के आगे नमाज पढ़ने की इजाजत देता है? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना


विश्व में भारत एक ऐसा अनोखा देश है जहाँ हिन्दुओं को अपने धार्मिक स्थलों को वापस लेने के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण करते हर हिन्दू धार्मिक स्थल को विवादित बना मुसलमानों को पागल बना वोट लेता रहा और मुसलमान हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन समझता रहा।

कल(मई 15) को एक राष्ट्रीय चैनल पर चर्चा के दौरान एक इस्लामिक विद्वान ने कहा कि अगर मुसलमान एक दिन नमाज पढ़ ले तो गंगा-जमुनी तहजीब की एक अच्छी मिसाल होगी। चर्चा में भाग ले रहे एक सहयोगी ने कहा बहुत अच्छी बात है फिर तो हिन्दुओं को भी मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ने की इजाजत होनी चाहिए। इतना ही नहीं, मुसलमानों को किस तरह पागल बनाया जाता है और वह भी गुलामों की तरह कट्टरपंथी मौलानाओं की बात मान हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझने लगता है। जब इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है फिर भोजशाला में स्तम्भों और दीवारों पर बनी मूर्तियों के आगे नमाज कैसे पढ़ी जा सकती है? ठीक यही स्थिति रामजन्मभूमि मन्दिर की थी।     

     

राम अगर काल्पनिक थे फिर लीला स्थलों पर कांग्रेसी क्यों जाते थे?  

अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर मुद्दा इसलिए उलझा रहा कि कांग्रेस साक्ष्यों को छिपाती रही। और मुसलमानों के बीच हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को बदनाम करने का काम करती रही। रामसेतु और राम को काल्पनिक बताना, लेकिन हिन्दुओं को पागल बनाने दशहरे पर रामलीला मंचो पर माल बटोरने पहुंचना। अगर राम काल्पनिक थे फिर राम मंचन स्थलों पर क्यों जाते थे?  
भारत की महान सभ्यता केवल पुस्तकों में दर्ज कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि वह धरती की परतों में भी सांस लेती है। जब पुरातत्वविद जमीन की गहराइयों में उतरते हैं, तो वे केवल ईंट-पत्थर नहीं खोजते, बल्कि इतिहास की धड़कन को सुनते हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यह निरंतरता ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। एएसआई की खोज और तथ्यों के आधार पर अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार की भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। शुक्रवार को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा, हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। ASI एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना है। ऐतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। केंद्र सरकार और ASI यह फैसला लें कि भोजशाला मंदिर का मैनेजमेंट कैसा रहेगा।

पुरातात्विक-ऐतिहासिक तथ्य और अयोध्या केस को भी आधार माना

न्यूज वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला में सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के साक्ष्य पाए गए हैं। कोर्ट ने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई सर्वे के साथ अयोध्या केस को भी आधार माना। कोर्ट ने कहा- हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले प्राचीन स्मारकों और मंदिरों की सुरक्षा निश्चित करे। साथ ही गर्भगृह और धार्मिक आस्था से जुड़ी देव प्रतिमाओं का भी संरक्षण करे। अदालत ने ASI का 2003 का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें ASI ने भोजशाला में हिंदुओं को पूजा का अधिकार नहीं दिया था। उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का अधिकार दिया गया था।

 मुस्लिम पक्ष फैसले की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट जाएगा

हाई कोर्ट ने भोजशाला को कमाल मौला मस्जिद बताने वाले मुस्लिम पक्ष को सरकार से मस्जिद के लिए अलग जमीन मांगने को कहा है। धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। अब फैसले की समीक्षा की जाएगी, इसके बाद मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा। वहीं जैन समाज की ओर से पैरवी कर रहीं एडवोकेट प्रीति जैन ने कहा कि सुनवाई के दौरान यह दावा किया गया था कि तीर्थंकरों की मूर्तियों के अवशेष आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में मौजूद हैं और उन्हें उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर जैन समाज भी सुप्रीम कोर्ट जाएगा।
हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की, हमको भी सुनें
हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल भोजशाला के मुख्य गेट पर बैरिकेड्स लगाकर परिसर को बंद कर दिया गया है। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है। भोजशाला विवाद मामले में हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है। याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह विशेन की ओर से अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा ने कैविएट दाखिल की। इसमें कहा गया है कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर किसी भी अपील पर हिंदू पक्ष को सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।

भोजशाला: 2100 पन्नों की रिपोर्ट में 500 से अधिक तस्वीरें

इससे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में मध्यप्रदेश में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि हमारी हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला मस्जिद में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ है।  मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। एएसआई ने 2100 पन्नों की रिपोर्ट को 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण 1265 ईस्वी के आसपास का बताया गया है। इस अंतर को यूं समझ सकते हैं कि 1265 ईस्वी एक विशिष्ट वर्ष है जो 13वीं शताब्दी (1201-1300) का हिस्सा है, जबकि 12वीं शताब्दी 1101-1200 ईस्वी के बीच की अवधि है। यानि 1265 से लगभग 65 से 165 साल पहले की अवधि है। 1265 ईस्वी में सुल्तान बलबन का शासन था, जबकि 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत से पहले राजपूत राजाओं का शासन था। यह तथ्य ऐतिहासिक क्रम को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी साफ संकेत मिलता था कि पहले भोजशाला बनी और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।

मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।

मंदिर स्थापत्य के संकेत, विज्ञान-तकनीक से इतिहास की पड़ताल
एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत पाए गए। इन प्रतीकों को सनातन परंपरा से जोड़ा जाता है। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड के मंदिर निर्माण की परंपराओं से मेल खाती है। हालांकि यह विषय न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन पुरातात्विक दृष्टि से यह अध्ययन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एएसआई ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूमिगत संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई के दौरान दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया गया। यह दर्शाता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए यह पद्धति निर्णायक सिद्ध हो रही है।

मंदिर के हिस्सों में बनाई मस्जिद, सनानत धर्म से जुड़े प्रतीक मिले
भोजशाला विवाद को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल करके मस्जिद बनाई गई है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर में सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का विवरण दिया गया है। मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए हैं। यह 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के बताए जा रहे हैं

सनातन संस्कृति यानि अनादि और अनंत शक्ति की निरंतरता
इन खोजों का साझा सूत्र निरंतरता है। चाहे मंदिर स्थापत्य हो, शिलालेख हों, मूर्तियां हों या नगर नियोजन, सदियों से एक सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती दिखती है। सनातन शब्द का अर्थ ही है, जो अनादि और अनंत है। पुरातात्विक प्रमाण इस सांस्कृतिक निरंतरता को ठोस आधार प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति की महत्ता को समझने के लिए अब तथ्यपरकत खोज हो रही है। भारत की सनातन संस्कृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धरोहर है। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक फैले पुरातात्विक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यह परंपरा सदियों से विकसित होती रही है। मंदिर स्थापत्य, नदी किनारे बसे नगर, शिलालेख और मूर्तियां, ये सब उस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं जो आज भी जारी है। इन खोजों का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। जब नई पीढ़ी इन साक्ष्यों को देखती है, तो उसे अपनी पहचान पर गर्व का अनुभव होता है। इतिहास की हर खुदाई हमें यही बताती है कि यह सभ्यता क्षणिक नहीं, बल्कि कालजयी है। सनातन संस्कृति की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि वह समय के प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखती है, और हर युग में नए प्रमाणों के साथ स्वयं को पुनः स्थापित करती है।

अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।

पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए
दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।

पौराणिक गाथा : बरमावस्या पर विशेष; ज्येष्ठ मास की महिमा" जब यमराज को भी लौटना पड़ा खाली हाथ!

 
एक बड़ी घटना ज्येष्ठ मास में घटती है जब यमराज को एक पतिव्रता नारी की भक्ति के आगे झुकना पड़ा था।

ज्येष्ठ मास की एक अत्यंत प्रभावशाली और शास्त्रसम्मत कथा है जो यमराज और मृत्यु पर विजय से जुड़ी है। यह कथा है 'सती सावित्री और सत्यवान' की, जिसे 'वट सावित्री व्रत कथा' के रूप में ज्येष्ठ मास की अमावस्या को पूरे भारत में सुना जाता है।
​प्रणाम मित्रों! जिस प्रकार वैशाख मास में यमराज चिंतित हुए थे, उसी प्रकार ज्येष्ठ मास वह समय है जब एक नारी की भक्ति ने यमराज के विधान को ही बदल दिया था। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को होने वाली यह कथा शास्त्रसम्मत और परम कल्याणकारी है।

​ शास्त्रसम्मत प्रमाण
​स्कंद पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार, ज्येष्ठ मास की अमावस्या और पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस महीने की तपती गर्मी में किया गया व्रत 'अक्षय' फल देता है।
​"ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पूर्णिमायां विशेषतः।
वटमूलं समाश्रित्य सावित्री व्रतमाचरेत्॥"
​(अर्थ: ज्येष्ठ मास के पक्ष में वट वृक्ष के मूल में बैठकर सावित्री व्रत का पालन करना समस्त सुखों को देने वाला है।)
​ कथा: सती सावित्री और यमराज का संवाद
​शास्त्रों के अनुसार, ज्येष्ठ मास की इसी भीषण तपन में माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण बचाने के लिए यमराज का पीछा किया था। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, तो सावित्री भी उनके पीछे चल दीं।
​यमराज ने उन्हें बहुत डराया, ज्येष्ठ की गर्मी और दुर्गम रास्तों का भय दिखाया, लेकिन सावित्री की भक्ति अडिग थी।

​सावित्री ने यमराज से तर्कपूर्ण और धर्मसम्मत बातें कीं, जिससे यमराज अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सावित्री को तीन वरदान दिए, लेकिन सावित्री ने अपनी चतुर भक्ति से यमराज को ऐसा बांधा कि अंततः यमराज को सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े।
​यह ज्येष्ठ मास की महिमा ही है कि इसमें की गई साधना मृत्यु के देवता को भी प्रसन्न कर देती है। इसीलिए ज्येष्ठ मास में वट (बरगद) के वृक्ष की पूजा की जाती है, क्योंकि इसी वृक्ष के नीचे सावित्री को उनका सुहाग वापस मिला था।
भावुक अपील: क्या आपकी भक्ति में इतनी शक्ति है?
​मेरे प्रिय धर्म-प्रेमियों, सावित्री की यह कथा हमें सिखाती है कि ज्येष्ठ की गर्मी हो या जीवन की कठिन परीक्षा, अगर संकल्प अटूट हो तो विधाता का लेख भी बदला जा सकता है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का एक तरफ बड़प्पन है तो दूसरी तरफ केजरीवाल का नंगापन; जो घर न देखा हो, वह अच्छा लगता है

सुभाष चन्द्र

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने शराब घोटाले मामले में CBI की अपील पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया और कहा कि अगर मैं इस मामले की सुनवाई जारी रखती हूँ, तो केजरीवाल और अन्य को लग सकता है कि मेरे मन में उनके प्रति कोई दुर्भावना है। इसलिए उस मामले को किसी और पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेज दिया लेकिन केजरीवाल और 5 अन्य के खिलाफ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के आदेश देकर कहा कि इसकी सुनवाई वे खुद करेंगी 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
एक तरह से केजरीवाल का मकसद हल हो गया वह चाहता था कि शराब घोटाले मामले से जस्टिस शर्मा हट जाएं और वो हट गई एक तरफ जस्टिस शर्मा की महानता है कि वो सुनवाई से अलग हो गई तो दूसरी तरफ केजरीवाल का नंगापन है जो कह रहा है कि “सत्य की जीत हुई, गांधी जी के सत्याग्रह की एक बार फिर जीत हुई” उसकी नेता आतिशी मार्लेना ने भी कहा कि “केजरीवाल के लिए यह एक बड़ी जीत है क्योंकि अंततः जस्टिस शर्मा ने आबकारी नीति मामले से खुद को अलग कर लिया”

ASG तुषार मेहता ने जस्टिस शर्मा से आग्रह किया कि वे सुनवाई जारी रखें लेकिन उन्होंने मना कर दिया 

जस्टिस शर्मा ने कहा कि - 

-“अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अदालत के अधिकार को कम करने की जान-बूझकर की गई कोशिश की अनुमति नहीं दी जा सकती केजरीवाल ने कानूनी उपायों का सहारा लेने की बजाय न सिर्फ मेरी प्रतिष्ठा को धूमिल करने की कोशिश की, बल्कि न्यायपालिका के विरुद्ध अविश्वास के बीज बोन का प्रयास किया;

-मुझे निष्पक्ष आलोचना और असहमति को स्वीकार करने की ट्रेनिंग मिली है, लेकिन कभी कभी चुप रहना न्यायिक संयम नहीं होता;

-इसका अर्थ यह होगा कि यदि किसी व्यक्ति को कोई न्यायाधीश पसंद नहीं, तो वह उस पर पक्षपात का आरोप लगा सकता है, पत्र और वीडियो प्रसारित कर सकता है, इससे तो अराजकता फ़ैल जाएगी और अदालतों को काम करना मुश्किल हो जाएगा;

उन्होंने केजरीवाल और 5 अन्य के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई शुरू करते हुए कहा कि इन प्रतिवादियों ने इंटरनेट मीडिया पर उनके खिलाफ अपमानजनक और मानहानिकारक सामग्री प्रसारित की, जो अदालत की अवमानना है केजरीवाल ने एक तरफ अदालत में उनके प्रति सम्मान प्रकट किया, जबकि बाहर सुनियोजित अभियान चलाया इस अवमानना मामले की सुनवाई वह खुद करेंगी कुछ यूटूबर के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है

केजरीवाल का मुख्य मकसद येन केन प्रकारेण जस्टिस शर्मा को केस से अलग करना था जो पूरा हो गया लेकिन परंपरा तो गलत पड़ गई

कहते है जो घर न देखा हो, वह अच्छा लगता है केजरीवाल को क्या पता जिस नए जज के पास केस भेजा जाएगा, वो जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से भी खतरनाक साबित हो लगता है पहले केजरीवाल उस नए जज की भी हिस्ट्री खंगालेगा कि वो कौन सी सभाओं में जाता है, उसके बच्चे क्या करते हैं आदि आदि और अगर केजरीवाल को उसमे भी कुछ गड़बड़ लगी तो उस पर भी ऊँगली उठा देगा

वैसे स्वर्ण कांता ने शराब केस से अपने आपको अलग कर एक गलत परम्परा का बीज बो दिया जो आने वाले समय में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के लिए नुकसानदेह साबित होगी। यानि आरोपी जब चाहे किसी भी जज को अपने केस से हटवाने के लिए कह सकता है। वैसे ऐसा हो भी चुका है लेकिन न्यायसंगत तरीके से, जिस वजह से उसकी चर्चा तक नहीं हुई। लेकिन जो तरीका केजरीवाल ने अपनाया है वह न्यायसंगत नहीं और केजरीवाल को सबक सिखाने स्वर्ण कांता को अलग नहीं करना चाहिए था 

जहां तक कोर्ट की अवमानना का केस है, उसकी सुनवाई जस्टिस शर्मा ने खुद करने को कहा है लेकिन यह आवश्यक नहीं है और कोई अन्य जज भी सुन सकता है मुझे लगता है, अवमानना की सुनवाई के लिए भी केजरीवाल जस्टिस शर्मा द्वारा सुनवाई करने पर आपत्ति कर देगा

लेकिन बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी 

अवमानना मामले में 6 महीने तक की जेल हो सकती है जो इनके लिए बड़ी बात नहीं है इज़्ज़त की परवाह नहीं हैं क्योंकि पहले ही बाजार में ये लोग नंगे हैं

केजरीवाल जस्टिस शर्मा से माफ़ी मांग लेगा। लेकिन वे उसे किसी हाल में माफ़ न करें और अधिकतम सजा दें

NEET लीक केस : 30 लाख रूपए लाओ, मेडिकल में सीट पाओ: RJD का नेशनल सेक्रेट्री संतोष जायसवाल गिरफ्तार, फ्लैट पर मिले ‘Question Paper’

दिल्ली पुलिस ने NEET UG एग्जाम के पेपर लीक मामले में RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को किया गिरफ्तार (फोटो साभार: एक्स @PNRai1)
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET UG 2026 में फर्जीवाड़े और पेपर लीक नेटवर्क को लेकर दिल्ली पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है। इस मामले में RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को गिरफ्तार किया गया है, जिसे जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड मान रही हैं।

पुलिस ने उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के एक होटल और फ्लैट से कई छात्रों को रेस्क्यू किया है। इनमें कुछ नाबालिग भी बताए जा रहे हैं। जाँच के दौरान पुलिस को 149 पन्नों का एक कथित ‘स्पेशल क्वेश्चन सेट’, खाली साइन किए हुए चेक, छात्रों के मूल दस्तावेज और कई संदिग्ध रिकॉर्ड मिले हैं।

दिल्ली पुलिस के अनुसार यह गिरोह मेडिकल सीट दिलाने और परीक्षा में सफलता का झाँसा देकर छात्रों और अभिभावकों से 20 से 30 लाख रुपए तक वसूलता था। आरोप है कि छात्रों को परीक्षा से पहले अलग-अलग होटल और फ्लैटों में रखा जाता था, जहाँ उन्हें महत्वपूर्ण प्रश्न याद कराए जाते थे।

सूरत से मिला इनपुट और दिल्ली में शुरू हुई बड़ी कार्रवाई

दिल्ली पुलिस की जाँच के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क का पहला बड़ा सुराग 2 मई 2026 को मिला, जब गुजरात के सूरत से संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी साझा की गई। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने महिपालपुर इलाके के कई होटल्स में छापेमारी की। जाँच के दौरान पुलिस को ऐसे समूह मिले जिनमें छात्र परीक्षा से पहले एक साथ ठहराए गए थे।

कार्रवाई के दौरान पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया। उनसे पूछताछ के बाद संतोष जायसवाल का नाम सामने आया। इसके बाद पुलिस ने दिल्ली में उसे गिरफ्तार किया। उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के एक फ्लैट और होटल से 18 से अधिक छात्रों को मुक्त कराया गया। इनमें कई छात्र नाबालिग बताए जा रहे हैं।

मोतिहारी से दिल्ली तक संतोष जायसवाल कैसे बना परीक्षा नेटवर्क का बड़ा चेहरा

संतोष जायसवाल बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी स्थित बसवरिया गाँव का रहने वाला है। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद संतोष आगे की शिक्षा के लिए पटना गया। वहीं उसकी मुलाकात कथित तौर पर पुराने परीक्षा माफिया नेटवर्क से हुई।

धीरे-धीरे वह उस गिरोह का हिस्सा बना और फिर खुद सेटिंग नेटवर्क खड़ा करने लगा। उसने पटना से अपना नेटवर्क बढ़ाया और बाद में दिल्ली को ऑपरेशन का मुख्य केंद्र बना लिया। आज उसके पास दिल्ली के पॉश इलाके ईस्ट ऑफ कैलाश में आलीशान बंगला होने की बात कही जा रही है।

इसके अलावा कई अन्य संपत्तियों की भी जाँच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि उसने दिल्ली में मेडिसिन कारोबार की आड़ में अपना नेटवर्क खड़ा किया और उसी के जरिए मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं से जुड़ा अवैध कारोबार फैलाया।

परिवार, राजनीति और RJD कनेक्शन की भी जाँच

संतोष जायसवाल RJD में राष्ट्रीय सचिव के पद पर था। पुलिस अब यह भी खंगाल रही है कि क्या उसके राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल नेटवर्क को बचाने या विस्तार देने में हुआ।जानकारी के मुताबिक, संतोष ने पहले अपने भाई को बिहार विधानसभा चुनाव लड़वाने की कोशिश की थी। बाद में उसने खुद भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की।

वह लगातार राजनीतिक संपर्क मजबूत करने में जुटा हुआ था और दिल्ली स्थित पार्टी कार्यालय में भी उसकी सक्रिय मौजूदगी रहती थी। उसके परिवार में दो भाई डॉक्टर हैं जबकि एक बैंक अधिकारी है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में संतोष जायसवाल के अलावा डॉ अखलाक आलम, संत प्रताप सिंह और विनोद पटेल को गिरफ्तार किया है।

कर्नाटक : भगवा से नफरत करने वालों ने फिर बुर्का/हिजाब उछाला सियासत के बाजार में

                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: ChatGPT)
कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम कर ध्रुवीकरण खुद करती है फिर कहती है वोट चोरी हो गया। शाहबानो केस पार्लियामेंट से पलट तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का मिला "हार", दुनिया कहां जा रही है लेकिन कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं को रूढ़िवाद में फंसा अपनी रोटियां सेंकने में लगी रहती है। और कट्टरपंथी इनकी रौ में बहने लगती है। उसका अंजाम क्या होता है यह टीवी पर जमने वाली चौपालों के अच्छी तरह देखा जा सकता है। यानि जब बुर्का/हिजाब के हक़ में बोलने वालों से पूछा जाता है कि "तुम्हारे घरों में कितनी महिलाएं 
बुर्का/हिजाब जवाब नहीं में मिलता है। यानि मुद्दे को उछालो और खुद मालपुए खाओ और जनता को हिन्दू-मुस्लिम झगडे में लड़ने दो। इतना ही नहीं वो बातें सामने आती है जिन्हे आज तक कट्टरपंथी मौलानाओं से जनता से छिपाया। अगर ये बातें सनातन में होती सनातन विरोधी खूब शोर मचाते, लेकिन एक मुसलमान है जो चुपचाप उन कुरीतियों को झेल रहा है।         

कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अब खुलकर इस्लामी तुष्टिकरण पर उतर आई है। इसके लिए कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का जैसे इस्लामी मजहबी पहनावे पर बैन लगा दिया गया था। इसकी जगह कांग्रेस सरकार ने चुपचाप वो फैसला लागू किया है, जिसमें कलावा, जनेऊ, माला, रुद्राक्ष पहनने की भी अनुमति देने की आड़ ली गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने राज्य के शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता लाने के लिए हिजाब और बुर्के जैसे मजहबी पहनावे पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार ने बुधवार (13 मई 2026) को जारी अपने नए आदेश के जरिए ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित पहचान चिह्नों’ के नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब की राह फिर से खोल दी है।

इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गिरते हुए वोटबैंक को बचाने के लिए की गई ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित, गिरता हुआ वोटबैंक और तुष्टीकरण की वह पराकाष्ठा है, जिसने कर्नाटक के शैक्षणिक माहौल को एक बार फिर वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है।

साल 2022 का आदेश क्या था और क्यों जरूरी था?

दरअसल, फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट आदेश दिया था कि जहाँ यूनिफॉर्म निर्धारित है, वहाँ छात्रों को वही (यूनिफॉर्म) पहनना अनिवार्य है। कोई धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म को बदल या प्रभावित नहीं कर सकता। उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद पूरे राज्य में फैल गया था। मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर क्लास में घुसने की जिद पर अड़ी रहीं। विरोध प्रदर्शन हुए, स्कूल बंद हुए।

कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने भी साल 2022 में साफ कहा था कि हिजाब कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। यह व्यक्तिगत विश्वास का मुद्दा है, लेकिन स्कूल-कॉलेज जैसे सार्वजनिक संस्थानों में यूनिफॉर्म और अनुशासन पहले आते हैं। कोर्ट ने कहा, शिक्षा संस्थान वैज्ञानिक सोच, समानता और जॉतिवाद-निरपेक्षता सिखाने का केंद्र हैं, धार्मिक पहचान का नहीं। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। फिर भी सिद्धारमैया सरकार ने बिना कोर्ट का इंतजार किए, चुपके से 2022 का आदेश वापस ले लिया। यह न्यायपालिका का मजाक है।

सीमित प्रतीकों की आड़ में कट्टरपंथ को न्योता

कांग्रेस सरकार द्वारा जारी नए सर्कुलर के बिंदु संख्या 3 और 4 को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो सिद्धारमैया सरकार की मंशा साफ हो जाती है। आदेश में कहा गया है कि छात्र ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित प्रतीकों’ को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ पहन सकते हैं। इसमें पेटा (पगड़ी), जनेऊ, शिवदारा, रुद्राक्ष और ‘सिर का कपड़ा’ (हिजाब) शामिल हैं।

पहली नजर में यह आदेश सर्वधर्म समभाव जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की चालाकी को समझना जरूरी है। जनेऊ, रुद्राक्ष या कलावा जैसे प्रतीक सदियों से हिंदू छात्र पहनते आए हैं और ये कभी भी ‘यूनिफॉर्म’ के लिए बाधा नहीं बने। लेकिन इनकी आड़ लेकर हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सीधे तौर पर उस कट्टरपंथी एजेंडे को खाद-पानी देना है, जिसे 2022 में कोर्ट और तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था। यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि कक्षाओं के भीतर धार्मिक पहचान का संस्थानीकरण (Institutionalization) है। स्कूल वह स्थान हैं जहाँ बच्चों के दिमाग मुक्त, जिज्ञासु और समान होने चाहिए, न कि ऐसी जगह जहाँ राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा दें।

पहचान का संकट, जनेऊ बनाम हिजाब का तर्क

कांग्रेस सरकार ने इस आदेश को लागू करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया है, वह बेहद चालाकी भरा है। सरकार ने कहा है कि छात्रों को जनेऊ, कलावा, माला और रुद्राक्ष जैसे पारंपरिक चिह्न पहनने की अनुमति दी जाएगी और इसी की आड़ में हिजाब को भी शामिल कर लिया गया। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है।

जनेऊ, कलावा और रुद्राक्ष ऐसे धार्मिक प्रतीक हैं जो व्यक्ति की पहचान को कभी नहीं छिपाते। जनेऊ वस्त्रों के भीतर पहना जाता है, कलावा कलाई पर बंधा एक साधारण धागा होता है और रुद्राक्ष भी गले में कमीज के नीचे रहता है। इनसे न तो छात्र की पहचान संदिग्ध होती है और न ही कक्षा के अनुशासन में कोई बाधा आती है। इसके विपरीत, हिजाब और बुर्का सीधे तौर पर छात्र की पहचान को ढक लेते हैं।

दुनिया के कई विकसित और धर्मनिरपेक्ष देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले पहनावे पर प्रतिबंध है। इसका कारण धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ (Public Security) और ‘समानता’ है। लेकिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने इन वैश्विक मानकों और सुरक्षा चिंताओं को ताक पर रखकर केवल इस्लामी वोटबैंक को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।

जनेऊ और कलावा की आड़ में हिजाब का खेल

इस आदेश के बैकग्राउंड में अप्रैल 2026 की एक घटना के बारे में बताना जरूरी है। दरअसल, कांग्रेस सरकार ने अप्रैल 2026 में हुई उस घटना का हवाला दिया जिसमें एक हिंदू छात्र का जनेऊ उतरवा लिया गया था। असल में वह घटना ‘हिंदू घृणा’ का सीधा उदाहरण थी, क्योंकि जनेऊ एक पवित्र धागा है जो कपड़ों के नीचे रहता है।

लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस जन-आक्रोश का समाधान करने के बजाय, इसे एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया। सरकार ने जनेऊ उतरवाने की घटना पर दिखावे का दुख जताया और फिर ‘समानता’ का ढोंग करते हुए हिजाब को भी अनुमति दे दी। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी की उंगली कटने पर मरहम लगाने के बहाने आप उसके दूसरे हाथ को ही काट दें। जनेऊ की आड़ में हिजाब को वैध करना कांग्रेस की उस ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसमें हिंदुओं की भावनाओं को केवल तुष्टीकरण के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

उस विवाद को ढाल बनाकर सरकार ने हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिला दिया, जो कि विशुद्ध रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की एक कोशिश है।

न्यायपालिका की अवमानना और वैधानिक संकट

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हिजाब का मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। इससे पहले, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने फैसले में कहा था कि ‘हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है’। जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन है, तो आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सिद्धारमैया सरकार को मई 2026 में ही यह आदेश जारी करना पड़ा?

यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है, बल्कि उस संवैधानिक गरिमा पर भी प्रहार करता है जिसका गुणगान राहुल गाँधी और कांग्रेस के नेता हर मंच से करते हैं। मुख्यमंत्री ने अदालती प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय अपनी कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर ध्रुवीकरण का रास्ता चुना है। यह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा अपनाए गए उसी खतरनाक रास्ते की तरह है, जहाँ वोट के लिए संस्थानों की शुचिता को दाँव पर लगा दिया जाता है।

चुनावी हार का डर और तुष्टीकरण का सहारा

इस फैसले की टाइमिंग पर गौर करना बेहद जरूरी है। आगामी शनिवार, यानी 16 मई 2026 को बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों और एसडीपीआई (SDPI) की एक बहुत बड़ी रैली होने वाली है। यह रैली किसी और के खिलाफ नहीं, बल्कि कांग्रेस सरकार के ही खिलाफ आयोजित की गई है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है।

दरअसल, इस फैसले के पीछे का असली खेल ‘नंबर गेम’ है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को जो झटका लगा, उसने सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की रातों की नींद हराम कर दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को मुस्लिम समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।

वहाँ एसडीपीआई (SDPI) ने भारी सेंधमारी की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब कांग्रेस को अपनी जागीर नहीं मान रहे हैं। मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार की मुश्किल से हुई जीत और एसडीपीआई को मिले भारी वोटों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक अब उसके हाथ से खिसक रहा है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा डर शनिवार (16 मई 2026) को होने वाली बेंगलुरु की विशाल रैली है। चूँकि अब कांग्रेस को डर है कि अगर यह रैली सफल हो गई, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसका ‘मुस्लिम वोटबैंक’ पूरी तरह बिखर जाएगा। इसी रैली की हवा निकालने के लिए और कट्टरपंथियों को यह संदेश देने के लिए कि ‘कांग्रेस उनकी सबसे बड़ी हितैषी है’, यह हिजाब वाला आदेश चुपचाप लागू किया गया। यह एक राजनीतिक ‘रिश्वत’ (Political Bribe) है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर दी गई है।

टीएमसी के बंगाल फॉर्मूले की राह पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार

कांग्रेस कर्नाटक को उसी रास्ते पर ले जा रही है जिस पर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को पहुँचाया है। तुष्टीकरण की यह राजनीति शुरू में तो फायदे का सौदा लगती है, लेकिन अंत में यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। स्कूलों को धार्मिक पहचान का प्रदर्शन स्थल बनाकर कांग्रेस आने वाली पीढ़ी के मन में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना पैदा कर रही है।

हिंदू छात्रों के प्रतीकों (जनेऊ, कलावा) का उपयोग केवल एक ‘शील्ड’ के रूप में किया जा रहा है ताकि कोई उन पर सीधा आरोप न लगा सके। लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू प्रतीकों को तो स्कूलों में हमेशा से हतोत्साहित किया गया है। सीईटी (CET) परीक्षा के दौरान जिस तरह जनेऊ उतरवाए गए, वह कांग्रेस की असली मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ हिंदू प्रतीकों के प्रति ‘असहिष्णुता’ और दूसरी तरफ हिजाब के लिए ‘असीम प्रेम’ यह विषमता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक वास्तुकला (Architecture) है।

क्या 2028 में उलट जाएगा दाँव?

कांग्रेस को उम्मीद है कि हिजाब की वापसी से वह 16 मई की रैली के प्रभाव को कम कर देगी और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से रिझा लेगी। लेकिन यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है। कर्नाटक की जनता देख रही है कि किस तरह एक खास समुदाय को खुश करने के लिए शिक्षा के स्तर और स्कूलों के अनुशासन से समझौता किया जा रहा है।

अगर इस फैसले के खिलाफ राज्य का हिंदू समाज एकजुट होता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से कर्नाटक भी निकल जाएगा। जनता यह समझ रही है कि जो सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीति का मोहरा बना सकती है, वह राज्य का भला कभी नहीं कर सकती। ‘इव नम्मव’ (यह हमारा है) का नारा देने वाली सरकार ने असल में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना ली है।

कर्नाटक सरकार का यह आदेश समावेशिता के नाम पर समाज को बाँटने वाला कदम है। शिक्षा के अधिकार और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन बनाने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने असल में तुष्टीकरण की वेदी पर ‘संवैधानिक समानता’ की बलि चढ़ा दी है। स्कूलों में हिजाब की वापसी केवल एक वस्त्र की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की वापसी है जो आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय मध्यकालीन पहचान को प्राथमिकता देती है। अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक की जनता तुष्टीकरण की इस राजनीति को स्वीकार करेगी या 2028 में इसका निर्णायक जवाब देगी।