नॉर्वे की प्रोपेगेंडाबाज Helle Lyng ने खुद कबूला- मुझे पता था ज्वाइंट ब्रीफिंग में पत्रकारों को नहीं पूछना सवाल

                                                                                              साभार - हेले लिंग का सोशल मीडिया हैंडल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान हेले लिंग (Helle Lyng) नाम की पत्रकार की करतूत ने खूब चर्चा बटोरी। उसकी एक वीडियो के कारण भारत के वामपंथी उसे ‘हीरो’ बताने लगे और ऐसा फैलाया जैसे पीएम मोदी उसके पूछे सवालों से भागे हों। अब उसी हेले ने बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में खुद अपनी हरकत के पीछे की सच्चाई को बताया है।

हेले लिंग ने साफ कहा कि उन्हें पहले से पता था कि यह कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं बल्कि सिर्फ जॉइंट स्टेटमेंट था और दोनों देशों के प्रधानमंत्री सवाल नहीं लेने वाले थे। उन्होंने कहा, “मुझे अच्छी तरह पता था कि यह सिर्फ ज्वाइंट ब्रीफिंग है और कोई सवाल नहीं लिया जाएगा।”

दरअसल पीएम मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर की संयुक्त उपस्थिति के दौरान पत्रकारों के सवाल पूछने का कार्यक्रम तय नहीं था। बाद में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की अलग टीम ने मीडिया के सवाल लिए।

पहले से पता था कि सवाल नहीं लिए जाएँगे

BBC हिन्दी से बातचीत में हेले लिंग ने माना कि पत्रकारों को पहले ही बता दिया गया था कि दोनों नेता सवाल नहीं लेंगे। इसके बावजूद उन्होंने पीएम मोदी के मंच से उतरते समय आवाज लगाई, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे आजाद प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते?”

पीएम मोदी बिना जवाब दिए अपने नॉर्वेजियन समकक्ष के साथ आगे बढ़ गए। बाद में हेले लिंग ने खुद कहा कि उन्हें पहले से उम्मीद थी कि पीएम मोदी उनके सवाल का जवाब नहीं देंगे।

हेले लिंग ने सफाई दी कि उन्हें यह करना था क्योंकि पत्रकार के रूप में ये उनका काम है। वो किसी विदेशी नेता को उनके देश में लोकतंत्र के बारे में बात करने की अनुमति नहीं दे सकतीं।

उनकी यही हरकत वजह रही कि सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। कुछ लोगों ने इसे प्रेस की आजादी का मुद्दा बताया, जबकि कई लोगों ने कहा कि पत्रकार ने जानबूझकर तय प्रोटोकॉल तोड़कर सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश की।

मानवाधिकार रिपोर्टों और एक्टिविज्म पर भी उठे सवाल

इंटरव्यू में हेले लिंग ने यह भी कहा कि भारत में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर उनकी जानकारी का बड़ा स्रोत एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएँ हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उन पर पक्षपातपूर्ण सोच रखने का आरोप लगाया।

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नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल
नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल
 

जानकारी के अनुसार, हेले लिंग नॉर्वे के छोटे मीडिया संस्थान डगसाविसेन से जुड़ी हैं। घटना से पहले उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर ज्यादा सक्रियता नहीं थी और फॉलोअर्स की संख्या भी काफी कम थी। लेकिन, पीएम मोदी से सवाल पूछने के बाद अचानक उन्हें भारत में बड़ी पहचान, समर्थन, आलोचना और मीडिया इंटरव्यू मिलने लगे।

मोदी ने जॉर्जिया मेलोनी को गिफ्ट की ‘Melody’ टॉफी, इटली की प्रधानमंत्री मुस्कुराते हुए बोलीं- Thank You

                                     मोदी और जॉर्जिया मेलोनी (फोटो साभार: X/@GiorgiaMeloni)
इटली दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी इटैलियन समकक्ष जॉर्जिया मेलोनी को भारत की एक खास मिठास से रूबरू कराया। पीएम मोदी ने मेलोनी को मशहूर भारतीय टॉफी ‘मेलोडी’ गिफ्ट की जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

मेलोनी ने इस खास पल का वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा करते हुए लिखा, “गिफ्ट के लिए धन्यवाद।” वीडियो में पीएम मोदी के हाथ में ‘मेलोडी’ टॉफी का पैकेट दिखाई देता है। बातचीत के दौरान मेलोनी मुस्कुराते हुए कहती हैं, “प्रधानमंत्री मोदी मेरे लिए एक बहुत-बहुत अच्छी टॉफी गिफ्ट लेकर आए हैं।” इसके बाद पीएम मोदी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “मेलोडी।”

दोनों नेताओं के बीच का यह हल्का-फुल्का और दोस्ताना अंदाज लोगों को काफी पसंद आ रहा है। सोशल मीडिया पर यूजर्स इसे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और भारतीय स्वाद की अनोखी झलक बता रहे हैं।


नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल


अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में शब्दों का चयन, मंच की मर्यादा और संवाद की प्रकृति बहुत मायने रखती है। दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों या प्रधानमंत्रियों की आधिकारिक बैठकों के दौरान होने वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई टीवी डिबेट नहीं होती, जहां अचानक सवालों की बौछार कर दी जाए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इतने सालों तक सांसद रहने और राजनीतिक जीवन जीने के बावजूद इतनी भी जानकारी नहीं है कि इन कार्यक्रमों का स्वरूप पहले से तय होता है। वक्तव्य निर्धारित होते हैं और कई बार प्रश्न पूछने की व्यवस्था भी सीमित या नियंत्रित रहती है। दुनियाभर के लगभग सभी बड़े लोकतांत्रिक देशों में यह सामान्य प्रक्रिया है। इसके बावजूद नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के बहाने राहुल गांधी ऐसे नकारात्मक ट्वीट करते हैं तो साफ पता चलता है कि वे भी इस सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा हैं। क्योंकि जब बात भारत और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आती है, तब कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार और भारत के भीतर बैठे राजनीतिक विरोधी हर सामान्य प्रक्रिया को “लोकतंत्र के संकट” का रंग देने लगते हैं। पत्रकार हेले लिंग का विवादित सवाल इसी रणनीति का ताजा उदाहरण है।
                                                                                                    साभार : सोशल मीडिया 

कूटनीतिक मंच को राजनीतिक रंग देने की कोशिश

दरअसल, नॉर्वे में आयोजित संयुक्त प्रेस कार्यक्रम के दौरान पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से अचानक सवाल पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?” पहली नजर में यह सामान्य प्रश्न लग सकता है, लेकिन सवाल का तरीका, उसका समय, उसके पीछे की मंशा और उसके बाद हेले के ट्वीट सारे सुनियोजित नैरेटिव की ओर साफ-साफ इशारा कर देते हैं। क्योंकि यह कोई स्वतंत्र मीडिया संवाद कार्यक्रम नहीं था। यह दो देशों के बीच आधिकारिक कूटनीतिक कार्यक्रम था। ऐसे आयोजनों में आमतौर पर कई बार कोई प्रश्नोत्तर सत्र होता ही नहीं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, जापान समेत दुनिया के अनेक देशों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहां राष्ट्राध्यक्ष बिना सवाल लिए मंच से चले गए। लेकिन उन मौकों पर “लोकतंत्र खतरे में है” जैसा वैश्विक शोर नहीं मचाया गया। स्पष्ट है कि यहां उद्देश्य जवाब पाना कम और एक राजनीतिक मसौदा तैयार करना ज्यादा था। हेले जिस नार्वे की प्रेस को दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रे बता रही हैं, वहीं के पीएम ने पत्रकारों के सवालों पर चुप्पी साथ ली थी।

सवाल पूछने से ज्यादा ट्विटर पोस्ट का था हेले का मकसद

एक छोटे से जिस अखबार Dagsavisen के लिए पत्रकार हेले लिंग काम करती हैं, उसके फॉलोवर्स 50 हजार भी नहीं हैं। इसलिए साफ है कि ऐसे टुच्चे मीडिया संस्थान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवादित सवाल पूछकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करते हैं। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि भारत से जुड़े मुद्दों पर पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। यह विवाद तब और गहरा हो गया जब प्रेस कार्यक्रम के बाद हेले लिंग ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की। यदि उनका उद्देश्य सिर्फ पत्रकारिता था, तो सवाल पूछने के बाद मामला वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन सोशल मीडिया पर राजनीतिक शैली में टिप्पणी करना यह संकेत देता है कि पूरा प्रकरण केवल पेशेवर पत्रकारिता तक सीमित नहीं था।

मोदी विरोधी द वायर को फोलो करती है हेले

यहीं से यह मामला एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देने लगता है। पहले सार्वजनिक मंच पर सवाल उछालो। जहां पहले से ही पता है कि इसका जवाब देने प्रोटोकॉल में ही नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर उसे वैचारिक रंग दो और उसके बाद भारत विरोधी समूहों तथा राजनीतिक दलों द्वारा उसे amplify कराया जाए। यही पैटर्न वर्षों से दिखाई देता रहा है। हालांकि नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने मंगलवार को नॉर्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई अपनी टिप्पणियों के बाद हुई आलोचना और ऑनलाइन हमलों का जवाब देते हुए कहना ही पड़ा कि वह “किसी भी तरह की विदेशी जासूस नहीं हैं”। यह भी तथ्य है कि हेले ट्वीटर पर जिनको फोलो करती है, उनमें एकमात्र भारतीय डिजिटल कंपनी द वायर भी है, जिसके मोदी विरोधी होने पर कोई शक नहीं है। The Wire ने नरेंद्र मोदी सरकार की कई नीतियों जैसे नागरिकता कानून, मीडिया स्वतंत्रता, पेगासस जासूसी विवाद, चुनावी बॉन्ड, नोटबंदी, संस्थागत स्वायत्तता आदि पर लगातार नेगेटिव रिपोर्टिंग की है।

राहुल गांधी की राजनीति और विदेशी मंचों का सहारा

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को तुरंत राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने विदेशी मंचों, विदेशी रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों का सहारा लेकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाने की कोशिश की हो। राहुल गांधी कभी विदेशी विश्वविद्यालयों में जाकर भारतीय लोकतंत्र पर टिप्पणी, कभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों का हवाला, तो कभी विदेशी पत्रकारों के बयान, यह सब एक लगातार चलने वाली राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।

भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करते हैं राहुल गांधी

विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना जरूर है, लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर हों और उस समय विदेशी मीडिया द्वारा उठाए गए राजनीतिक नैरेटिव को भारत के भीतर का विपक्ष और राहुल गांधी आगे बढ़ाने लगें, तब सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। क्या यह सिर्फ सरकार का विरोध है या फिर भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास भी है? वास्तविकता यह है कि भारत में प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना प्रतिदिन टीवी बहसों, अखबारों, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया पर खुले तौर पर होती है। विपक्ष सरकार पर लगातार हमले करता है। सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र है, चुनाव आयोग सक्रिय है और जनता हर चुनाव में अपना निर्णय खुलकर देती है। ऐसे देश को “लोकतंत्र संकट” के फ्रेम में फिट करने की कोशिश वस्तुतः वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाती है।

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हेले का सवाल नहीं एजेंडा, उसका पिछला ट्वीट दो साल पहले

नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल पूछने पर विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैला रही हैं। उनका सवाल एजेंडे से प्रेरित था। जबकि कुछ लोग इसे प्रेस की आजादी बता रहे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पश्चिमी देशों के कुछ मीडिया संस्थान भारत की छवि को लेकर पहले से तय नैरेटिव के साथ काम करते हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि पत्रकार हेल्ले लिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आखिरी पोस्ट 10 अप्रैल 2024 को किया था। इसके बाद उनका अगला पोस्ट प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ही था।

हेले की नीयत पर भी सवाल कि पत्रकारिता या प्रोपेगेंडा?

पत्रकार हेले लिंग भले ही कुछ भी सफाई दे लेकिन वो भारत को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित महसूस हो रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत में भी कई पत्रकार पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। क्योंकि हेले लिंग ने जहां प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछा असल में वो एक पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं था बल्कि वो एक ऐसा प्रेस कॉन्फ्रेंस था जहां दोनों देशों के नेता समझौतों के बारे में आधिकारिक बातें बताते हैं। किसी भी देश में ऐसे कार्यक्रम में अमूमन सवाल जवाब नहीं होते हैं। इसीलिए हेले लिंग की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उन्होंने सवाल पूछने के लिए एक ऐसे मंच को क्यों चुना जहां पारंपरिक तौर पर सवाल जवाब नहीं होते हैं।

वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी

यह भी समझना होगा कि नरेंद्र मोदी आज केवल भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक मंचों पर उसकी मजबूत उपस्थिति, जी-20 की सफल मेजबानी, रूस-यूक्रेन जैसे मुद्दों पर संतुलित कूटनीति और विकसित भारत का विजन, इन सबने भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत किया है। ऐसे समय में भारत विरोधी नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशें भी तेज हुई हैं। कभी मानवाधिकार के नाम पर, कभी प्रेस स्वतंत्रता के नाम पर, तो कभी लोकतंत्र के नाम पर। उद्देश्य एक ही दिखाई देता है कि भारत की उभरती हुई वैश्विक छवि को संदेह के घेरे में खड़ा करना। भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से का रवैया लंबे समय से चयनात्मक रहा है। जिन देशों में प्रेस पर खुला नियंत्रण है, वहां अक्सर यही मीडिया बेहद नरम दिखाई देता है। लेकिन भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र, जहां हजारों समाचारपत्र, सैकड़ों टीवी चैनल, अनगिनत डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकार की आलोचना करने वाले असंख्य पत्रकार सक्रिय हैं, वहां “प्रेस की आजादी खत्म” होने का नैरेटिव गढ़ा जाता है।

पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच की महीन रेखा

यह सही है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सवाल पूछना है, लेकिन पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच एक महीन रेखा भी होती है। जब कोई पत्रकार प्रश्न पूछने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करने लगे और उसका उपयोग विपक्षी दल अपने एजेंडे के लिए करने लगें, तब निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं है। बल्कि इसमें राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने के सुनियोजित साजिश भी नजर आती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है, लेकिन सवालों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपेगेंडा के औजार की तरह करना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। दुर्भाग्य यह है कि आज दुनिया के कुछ हिस्सों में भारत को देखने के लिए उसी चश्मे का इस्तेमाल करते है, जिसे राहुल गांधी ने धारण किया हुआ है।

भारत को लेकर बदली हुई वैश्विक मानसिकता

दुनियाभर के सामने अब यह शीशे की तरह साफ हो गया है कि आज का भारत 15 साल पहले वाला भारत नहीं है। भारत अब दबाव में आने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि अपने हितों और अपनी आवाज को मजबूती से रखने वाला आत्मविश्वासी देश है। यही आत्मविश्वास कई वैश्विक शक्तियों और वैचारिक समूहों को असहज करता है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। यही कारण है कि भारत विरोधी नैरेटिव बनाने की हर छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। हेले लिंग प्रकरण भी उसी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होता है, जहां एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया को “लोकतंत्र बनाम तानाशाही” जैसी अतिरंजित बहस में बदलने की कोशिश की गई। 

नॉर्वेजियन पत्रकार Helle Lyng के फेर में यूट्यूबर दलाल पत्रकार अभिसार शर्मा की पोल खुली, गौतम अडानी से मिलकर माँगना चाहता था माफी: कांग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला ने किया खुलासा

         अभिसार शर्मा और तहसीन पूनावाला ( फोटो साभार-x@abhisarsharma,x@tahseenpoonawala)
इस देश को सबसे ज्यादा नुकसान अगर पहुंचा रहे हैं तो विदेशों में बैठे भारत विरोधी नहीं बल्कि इनके उनके दलाल। इसमें विरोधी तो शामिल हैं ही कुछ पत्रकार भी शामिल हैं। ये वही दलाल पत्रकार जिनके कहने पर 2014 से पहले की सरकारों में मंत्री और संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां होती थी। लेकिन वर्तमान मोदी सरकार ऐसे किसी दलाल को घास तक नहीं डालती।  
सरकार की कार्यशैली की आलोचना करना गलत नहीं है, करनी चाहिए लेकिन भारत विरोधियों की मंशा पूरी करने के लिए नहीं। देश का दुर्भाग्य है कि दलाल पत्रकारों की फ़ौज जनता की समस्याओं की नहीं बल्कि विदेशों में बैठे अपने आकाओं की जी-हजूरी कर पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं।   

इतना ही नहीं, चर्चा थी कि जिस नॉर्वेजियन पत्रकार Helle Lyng की अभिसार शर्मा दलाली करता घूम रहा है उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी कुछ प्रश्न करने की इच्छा जाहिर की थी लेकिन मोदी ने भी इसे घास नहीं डाली। 

 

कांग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला ने खुलासा किया है कि यूट्यूबर अभिसार शर्मा ने गौतम अडानी से मिलकर उनसे रहम की भीख माँगी थी।इस मुद्दे पर मंगलवार (19 मई 2026) को सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला और यूट्यूबर अभिसार शर्मा के बीच तीखी बहस छिड़ गई।

दरअसल नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बदसलूकी और विदेश मंत्रालय (MEA) की प्रेस ब्रीफिंग में की गई टिप्पणियों से जुड़े विवाद को लेकर पूनावाला ने भारत के रुख का समर्थन किया था।

हेले लिंग को संबोधित अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा- “मैं भारत में विपक्ष की आवाज में से एक हूँ और रोजाना टेलीविजन और सोशल मीडिया पर सरकार पर हमला करता हूँ, प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों की कड़ी आलोचना करता हूँ, लेकिन आज तक किसी ने मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। मुझे यह बात बेहद आपत्तिजनक लगती है कि आप मेरे देश की प्रेस की स्वतंत्रता की तुलना अमीरात या क्यूबा से कर रहे हैं… बेशक, सभी भारतीय अभिव्यक्ति की और भी अधिक स्वतंत्रता चाहेंगे, लेकिन भारत में मीडिया की स्वतंत्रता की तुलना उन शासन व्यवस्थाओं से करना, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाती हैं, सरासर गलत और दुर्भाग्यपूर्ण है।”

इस पर यूट्यूबर शर्मा ने पोस्ट कर पूनावाला पर बीजेपी के लिए काम करने और विपक्षी रुख को छोड़ने का आरोप लगाया। शर्मा ने कहा, “विपक्ष की आवाज होने का दिखावा करना बंद करो। तुम भाजपा और उसके समर्थकों की नफरत को नॉर्मल बना रहे हो। तुम सत्ता प्रतिष्ठान के चाटुकार के सिवा कुछ नहीं हो। विपक्ष की आवाज होने का यह ढोंग बंद करो,”

सोशल मीडिया पर हो रही बहस के बीच एक यूजर ने पूनावाला पर अडानी एजेंट होने का आरोप लगाया। इसका जवाब देते हुए पूनावाला ने अभिसार शर्मा पर पलटवार किया।

पूनावाला ने आरोप लगाया कि शर्मा ने खुद अडानी ग्रुप ने जो कानूनी कार्रवाई शुरू की थी, उस सिलसिले में उद्योगपति गौतम अडानी से मिलने का समय माँगा था। उन्होंने कहा कि शर्मा सार्वजनिक टिप्पणियों में अक्सर अडानी ग्रुप पर निशाना साधते हैं। इसके बावजूद गौतम अडानी से संपर्क करने की कोशिश की थी।

दिलचस्प बात यह है कि शर्मा का आत्मविश्वास जल्द ही गायब होता दिखा और उन्होंने पूनावाला के दावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

माना जा रहा है कि यह विवाद अभिसार शर्मा और ब्लॉगर राजू पारुलेकर के खिलाफ अडानी ग्रुप के किए गए आपराधिक मानहानि मामले से जुड़ा है।

सितंबर 2025 में अडानी ग्रुप ने शर्मा और पारुलेकर के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद गाँधीनगर की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें नोटिस जारी किए थे। अडानी ग्रुप के वकील संजय ठक्कर ने कथित तौर पर कहा कि ये नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 के तहत जारी किए गए थे। इसके मुताबिक किसी अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है।

शिकायतों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 356(1-3) के तहत प्रावधानों का हवाला दिया गया, जो पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता के तहत मानहानि प्रावधानों के अनुरूप हैं।

अडानी ग्रुप ने आरोप लगाया कि शर्मा ने एक वीडियो अपलोड किए थे, जिसमें असम में भूमि आवंटन और कथित राजनीतिक पक्षपात के संबंध में आपत्तिजनक दावे किए गए थे, जबकि परुलेकर पर कथित ‘घोटालों’ और ‘राजनीतिक पक्षपात’ का जिक्र करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट करने का आरोप लगाया गया था। अडानी ग्रुप ने इन आरोपों को ‘बेबुनियाद और भ्रामक’ बताया था और दोनों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था।

सुप्रीम कोर्ट कैसे केंद्र को अपमानित करता है?

सुभाष चन्द्र

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की एक सभा में  Justice B.V. Nagarathna ने कहा कि केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें देश में मुकदमेबाजी की सबसे बड़ी जनक हैं और वे लगातार सामान्य मामलों तथा अपीलों को अंत तक लड़कर अदालतों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ाती है। 

* सबसे बड़ी वादी (Primary Litigant):

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
सरकार केवल न्याय व्यवस्था की सहभागी नहीं है, बल्कि मुकदमेबाजी की सबसे बड़ी वजह भी है। केंद्र और राज्य सरकारें देश में सबसे अधिक मुकदमों के लिए जिम्मेदार हैं;

* लगातार अपीलें (Relentless Appeals):

हालाँकि सरकार सार्वजनिक रूप से अदालतों में लंबित मामलों पर चिंता व्यक्त करती है, लेकिन वही सरकार नियमित मामलों और अपीलों को अंतिम स्तर तक लड़कर इस लंबित बोझ को और बढ़ाती है;

* “मॉडल लिटिगेंट” का विरोधाभास:

 राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह संयमित तरीके से मुकदमे लड़े और एक “आदर्शवादी” की तरह व्यवहार करे, लेकिन न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि व्यवहार में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है;

* संस्थागत कारण (Institutional Drivers):

 उन्होंने कहा कि अक्सर नौकरशाही में जवाबदेही और जांच के भय के कारण ये अपीलें की जाती हैं। अधिकारी विवादों को सुलझाने के बजाय अदालतों में मामला जारी रखना अधिक सुरक्षित समझते हैं, ताकि उन पर लापरवाही का आरोप न लगे;

कुछ दिन पहले जस्टिस नागरत्ना ने कहा है कि “Judges who are unable to live within their known source of income and fall prey to greed and temptation must be weeded out of the system” - मतलब साफ है जज भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं

उसके भी पहले कहा था -“नोटबंदी से काला धन सफ़ेद में बदला; हम सब जानते हैं कि 8 नवंबर 2016 को क्या हुआ था, कालेधन का खत्म कहां हुआ? यह कालेधन को सफ़ेद बनाने का एक अच्छा तरीका था” यानी सीधे मोदी जी को चुनौती दी थी

यह कोई नया राग नहीं है जो जस्टिस नागरत्ना ने अलापा है

इसके पहले भी 11th August, 2023 को Justices BR Gavai, PS Narasimha, and Prashant Kumar Mishra की पीठ ने कहा था करीब 70% सरकार के केस Frivolous होते हैं सरकार litigation policy को क्रियान्वित करने की बात करती है लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है

मई, 2023 में भी जस्टिस गवई की बेंच ने कहा था करीब 40% केंद्र और राज्य सरकारों के केस आधारहीन होते हैं

मैंने एक RTI में सुप्रीम कोर्ट से जस्टिस गवई की बेंच की टिप्पणी पर पूछा था कि केंद्र सरकार कितने cases में पार्टी है मुझे 10 नवंबर, 2023 के जवाब में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हैरान करने वाली जानकारी दी गई जिसमें बताया गया कि केंद्र सरकार 11349 मामलों में Petitioner है और 35601 मामलों में Respondent है यानी 46950 मामलों में मात्र 24% केस में सरकार वादी है मतलब केवल 24% केस सरकार ने फाइल किये हुए थे

जाहिर है 11349 मामलों में सरकार की अपील भी शामिल होंगी जो हाई कोर्ट के उसके खिलाफ फैसलों के विरुद्ध फाइल की गई होंगी और इसलिए गवई बेंच का सरकार के cases को frivolous कहना उचित नहीं था

इसका मतलब साफ़ है केंद्र सरकार मुख्य Litigant है वो भी frivolous cases में कहना सही नहीं है 

ऐसा ही  सर्टिफिकेट जस्टिस नागरत्ना ने भी दे दिया क्या सरकार को किसी मामले में अपील करने का भी अधिकार नहीं है? उदाहरण के लिए क्या ट्रायल कोर्ट के शराब घोटाले में केजरीवाल गैंग को डिस्चार्ज करने के खिलाफ भी अपील नहीं करनी चाहिए? और अगर हाई कोर्ट सरकार की अपील खारिज करती है तो क्या उसे सुप्रीम कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं है?

बंगाल : TMC विधायक दिलीप मंडल फरार: पुलिस ने उनके बेटे और अन्य लोगों को अवैध हथियार रखने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया

TMC विधायक दिलीप मंडल ने बिष्णुपुर सीट से चुनाव जीतने के बाद BJP कार्यकर्ताओं को धमकी दी थी।

उन्होंने कहा था, "जाओ और शुभेंदु से पूछो कि दिलीप मंडल कौन है। जाओ अर्जुन सिंह से पूछो कि दिलीप मंडल कौन है।"
बाद में पुलिस ने FIR दर्ज की और उनके घर पर छापा मारा। मंडल पिछले दरवाज़े से भाग निकले और भागते समय एक नाले के ऊपर से कूद गए गिरते पड़ते भागे।
पिछले चार दिनों से वह फ़रार हैं।
पुलिस ने उनके बेटे और चार अन्य लोगों को अवैध हथियार रखने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया है।
यह वही विधायक हैं जिनके आलीशान घर के वीडियो, जिसमें एक स्विमिंग पूल भी था, पहले वायरल हुए थे।
आपको बताते चलूँ की मण्डल ममता बनर्जी के करीबी हैं बात इनके शान ओ शौकत की करें तो माशा अल्ला वो तो इनके पेट से बड़ी है 3 तो अलीशान महलनुमा घर नही रिज़ॉर्ट हैं अत्याधुनिक सुविधाओ से लैस। तीनो की वैल्यू कम से कम 400 करोड़ तो होगी ही।
बाकी इनके पास क्या क्या होगा अंदाज़ लगा लीजिये।
उसके बावजूद आजतक दलित शोषित वंचित हैं बेचारे दलितों का माल हक और अधिकार खाकर मोटे हो गए हैं उसके बावजूद उनका खून चूसने मे ये भी पीछे नहीं हैं
क्या भारतीय संविधान इसकी इजाजत देता है?
आप लखपति नही करोड़पति नही अरबपति नही खरबपती हो अथवा CM,PM, PRESIDENT,
IAS, PCS या जज मतलब कोई भी पद पा जाओसैकड़ों करोड़ बना जाओ फ़िर भी आप आरक्षण का आनंद लीजिये बस आप SC ST OBC हो।
यही लोग ज्यादा चिल्लाते हैं की देखो देखो पण्डित जी राजपूत साहेब तुम्हारा आरक्षण हक अधिकार खा रहे हैं संविधान बचाओ लोकतंत्र बचाओ ये बचाओ वो बचाओ
ये तो नहीं न कहेंगे हमसे खुद को बचाओ? असली दलित पिछड़े बेचारे इनको मसीहा समझते हैं।
अगर ऐसे लोग मसीहा हैं तो फ़िर लुटेरा कौन है?

बंगाल : TMC के जहाँगीर खान ने फाल्टा सीट पर मतदान से 2 दिन पहले ही नाम वापस लिया, कहा था- पुष्पा झुकेगा नहीं: चुनाव के दौरान यहीं पर EVM पर चिपकाए थे टेप

                       अभिषेक बनर्जी और TMC उम्मीदवार जहाँगीर खान (फोटो साभार : News18)
ममता के सत्ता में रहते बहुत बड़े खलीफा बन रहे जहांगीर खान चुनाव से पहले ही खुद ही हो गया चारों खाने चित। 21 तारीख को वोटिंग होनी है। यानि प्रशासक अगर सख्त हो अच्छे से अच्छा खलीफा पानी पीता नज़र आता है। ममता के राज में गुंडागर्दी मचाने वाले आज पनाह मांग रहे हैं। पश्चिम बंगाल की फालता विधानसभा सीट से एक बड़ी खबर सामने आई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवार जहाँगीर खान ने चुनावी मैदान छोड़ दिया है। जहाँगीर खान ने मतदान से महज दो दिन पहले अपना नाम वापस ले लिया है।

प्रचार खत्म होने के कुछ ही घंटे पहले हुए इस हैरान करने वाले फैसले से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जहाँगीर खान ने साफ किया है कि अब वह इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रहेंगे।

बीजेपी नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि TMC को अपनी करारी हार का अंदाजा हो चुका है। नेताओं का कहना है कि इसी डर से उम्मीदवार ने मैदान छोड़ दिया है। फाल्टा विधानसभा सीट पिछले 15 सालों से TMC का मजबूत गढ़ रही है।

बता दें कि बंगाल चुनाव के दौरान EVM पर बीजेपी के बटन पर टेप चिपकाए गए थे, जिससे कोई बीजेपी को वोट ना दे सके। बाद में चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान कराने का फैसला किया था। 

वर्जिन बच्चियों से निकाह के लिए तालिबान ने सुनाया फरमान, कहा- इनकी चुप्पी को ‘हाँ’ समझो: चुप्पी साधे बैठा रहा भारत का लिबरल गैंग

तालिबान सरकार ने वर्जिन लड़कियों की चुप्पी को माना मंजूरी, निकाह के लिए नया फरमान (फाइल फोटो साभार: The Conversation)
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया फैमिली लॉ लागू किया है और इस कानून की एक लाइन को लेकर पूरी दुनिया में बहस शुरू हो गई है। इस नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई ‘कुँवारी लड़की’ (वर्जिन लड़की) निकाह के प्रस्ताव पर कुछ नहीं बोलती, तो उसकी चुप्पी को ही उसकी मंजूरी यानी कंसेंट माना जाएगा। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठन, महिला अधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे औरतों और बच्चियों की आजादी पर एक और बड़ा हमला बता रही हैं।

क्या है तालिबान का नया फैमिली लॉ?

तालिबान ने 31 आर्टिकल वाला एक नया फैमिली रेगुलेशन जारी किया है, जिसका नाम ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस’ रखा गया है। इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। यह कानून निकाह, तलाक, नाबालिगों का निकाह, मियां-बीवी के अलगाव और पारिवारिक विवादों से जुड़े नियम तय करता है। लेकिन सबसे विवादित हिस्सा वही है, जिसमें ‘कुँवारी लड़की’ की चुप्पी को उसकी मंजूरी माना गया है।

क्या है ‘खियार अल बुलूघ’ का नियम?

इस कानून में ‘खियार अल बुलूघ‘ नाम का एक इस्लामी कानूनी सिद्धांत भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है ‘बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार।’ इसके तहत अगर किसी बच्चे का निकाह कम उम्र में तय कर दिया गया है, तो वह बालिग होने के बाद उस निकाह को खत्म करने की माँग कर सकता है।
लेकिन यहाँ एक बड़ी शर्त भी रखी गई है। निकाह खत्म करने के लिए मजहबी अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। यानी सिर्फ लड़की की इच्छा से निकाह खत्म नहीं होगा, बल्कि तालिबान की अदालत फैसला करेगी कि निकाह रद्द किया जाए या नहीं।
कानून में यह भी कहा गया है कि अगर शौहर निकाह के लिए सही नहीं माना जाता या दहेज को लेकर बहुत ज्यादा फर्क होता है, तो उस निकाह को मान्यता नहीं दी जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कौन ‘सही लड़का है’, इसका फैसला भी तालिबान की मजहबी अदालतें ही करेंगी।

नाबालिग बच्चों के निकाह को लेकर क्या कहता है कानून?

इस नए कानून में ‘बाल विवाह’ को लेकर कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में नाबालिग लड़के और लड़कियों के निकाह को मान्यता दी जा सकती है। कानून में अब्बा और दादा को बच्चों का निकाह तय करने का अधिकार दिया गया है। यानी परिवार के बड़े पुरुष यह फैसला कर सकते हैं कि लड़की का निकाह किससे और कब होगा।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर रिश्तेदारों द्वारा तय किए गए निकाह में लड़का ‘सामाजिक रूप से उपयुक्त’ माना जाता है और दहेज भी मजहबी मानकों के मुताबिक है, तो उस निकाह को वैध माना जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो अगर परिवार और मजहबी अदालत को रिश्ता सही लगता है, तो कम उम्र में हुए निकाह भी स्वीकार किए जा सकते हैं।

निजी जिंदगी में भी बढ़ेगा तालिबान सरकार का दखल

इस कानून में सिर्फ निकाह ही नहीं बल्कि कई निजी मामलों में भी तालिबान की अदालतों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। अगर किसी औरत पर व्यभिचार यानी अवैध संबंध का आरोप लगाता है, अगर कोई धर्म परिवर्तन करता है, अगर शौहर लंबे समय तक गायब रहता है या ‘जिहार’ जैसी स्थिति बनती है, तो तालिबानी जज फैसला ले सकेंगे।

‘जिहार’ इस्लामी कानून का एक पुराना सिद्धांत है जिसमें शौहर अपनी बीवी की तुलना ऐसी औरत रिश्तेदार से करता है जिससे निकाह करना मजहबी रूप से मना होता है। ऐसे मामलों में अदालत मियां-बीवी को अलग करने, जेल भेजने या दूसरी सजा देने का आदेश भी दे सकती है।

क्यों खतरनाक माना जा रहा कानून?

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी निकाह में लड़की की साफ और खुली सहमति जरूरी होती है। लेकिन अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई छठी क्लास के बाद बंद कर दी गई। औरतों को यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया। कई नौकरियों में औरतों के काम करने पर पाबंदी है और उनके अकेले यात्रा करने पर भी सख्त नियम लागू हैं।

ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की डर, दबाव या परिवार की वजह से चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ मान लेना जबरन निकाह का रास्ता खोल सकता है। जिस समाज में औरतों को खुलकर बोलने की आजादी ही नहीं हो, वहाँ ‘चुप्पी ही सहमति है’ जैसा नियम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

दुनिया भर में हो रही कानून की आलोचना

एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि निकाह में सहमति हमेशा साफ, खुली और बिना दबाव के होनी चाहिए। किसी लड़की का डर या मजबूरी में चुप रहना सहमति नहीं माना जा सकता।

कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तालिबान जिस तरह इन नियमों को मजहबी आधार पर सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वह इस्लाम की आधुनिक और व्यापक व्याख्याओं से मेल नहीं खाता। उनके मुताबिक मजहब के नाम पर औरतों की आवाज दबाना और उन्हें फैसले लेने के अधिकार से दूर रखना मानवाधिकारों के खिलाफ है।

यही कारण है कि तालिबान का यह नया कानून सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब इसे दुनिया भर में औरतों की आजादी और अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के तौर पर देखा जा रहा है।

लड़कियों की ‘चुप्पी’ पर तालिबान का कानून, लेकिन लिबरल चेहरे खामोश क्यों?

यह कानून साफ तौर पर महिला विरोधी है। यह लड़कियों से उनका सबसे बुनियादी अधिकारी यानी उनकी शादी पर फैसला लेने का हक तक छीन लेता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में खुद को लिबरल, प्रोग्रेसिव और महिला अधिकारों का समर्थक बताने वाले कई नामी इस्लामी अकाउंट्स और एक्टिविस्ट इस मुद्दे पर चुप हैं।

ये वही लोग हैं जो भारत में किसी भी मुद्द पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं और नारीवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। विदेशी मजहबी मुल्कों में मुस्लिमों से जुड़ा कोई भी मामला हो, तो सबसे पहले यही लोग आवाज उठाते नजर आते हैं। लेकिन अफगानिस्तान में लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी जाए, महिलाओं को घरों तक सीमित कर दिया जाए और अब लड़की की चुप्पी को ही शादी की मंजूरी मान लिया जाए, तब इनकी टाइमलाइन लगभग खाली नजर आती है।

न कोई बड़ा कैंपेन दिखता है, न लगातार ट्वीट्स, न रीट्वीट और न ही वैसी नाराजगी, जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। कहीं ‘सेव वूमेन’ की बात नहीं होती, कहीं ‘फेमिनिज्म’ की बहस नहीं होती और न ही महिलाओं की आजादी पर लंबे थ्रेड लिखे जाते हैं।

यही दोहरापन सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। अगर महिलाओं के अधिकार सच में सबसे ऊपर हैं, तो फिर अफगानिस्तान की लड़कियाँ भी उतनी ही अहम होनी चाहिए जितनी भारत की महिलाएँ। लेकिन अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की एक्टिविज्म और नारीवाद की आवाज सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाती है।

‘छूट मिले या न मिले, रूस से खरीदते रहेंगे तेल’: मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव को दिखाया ठेंगा


मोदी सरकार ने सोमवार (18 मई 2026) को साफ कहा कि भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा, चाहे अमेरिका की तरफ से कोई छूट मिले या नहीं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव (मार्केटिंग और ऑयल रिफाइनरी) सुजाता शर्मा ने कहा, “अमेरिका की तरफ से रूस पर छूट को लेकर मैं यह साफ करना चाहती हूँ कि भारत पहले भी रूस से तेल खरीदता था। छूट के दौरान भी खरीदता रहा और अब भी खरीद जारी रहेगी।”

उन्होंने कहा कि भारत के लिए तेल खरीदने में सबसे अहम बात आर्थिक मजबूती और व्यापारिक फायदा है। सुजाता शर्मा ने यह भी बताया कि देश में कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है और भारत से ही पर्याप्त मात्रा में तेल की व्यवस्था कर रखी है।

उन्होंने कहा, “तेल खरीदने का फैसला पूरी तरह व्यापारिक समझ और फायदे को देखकर लिया जाता है। कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है। पर्याप्त मात्रा में तेल की व्यवस्था बार-बार की गई है, इसीलिए छूट मिले या नहीं मिले इससे हमारी सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

ट्रंप प्रशासन ने इससे पहले मार्च में रूस से समुद्री रास्ते से आने वाले तेल की खरीद से जुड़ा 30 दिनों का लाइसेंस जारी किया था। बाद में इस छूट की अवधि 16 मई तक बढ़ा दी थी। खास बात यह है कि भारत ने कभी भी रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया। साल 2022 में रूस से सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने के बाद भारत ने बड़ी मात्रा में खरीद शुरू की थी और तब से खरीद में बढ़ोतरी या कमी सप्लाई और आर्थिक स्थिति के हिसाब से होती रही है।

अमेरिका के इस दावे के बावजूद कि उसने भारत को रूसी तेल खरीदने से रोक दिया है। फरवरी 2026 में भारत ने अपने कुल कच्चे तेल का 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रूस से आयात किया। भारत सरकार कई बार, यहाँ तक कि संसद में भी साफ कर चुकी है कि किसी भी देश से कच्चा तेल खरीदना भारत का संप्रभु फैसला है, जो देशहित को ध्यान में रखकर लिया जाता है। भारत अपने जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, इसीलिए जहाँ तेल सस्ता मिलता है भारत वहीं से खरीदता है।

इतना ही नहीं, ट्रंप प्रशासन ने खुद माना था कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने से दुनिया में तेल की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं। पिछले साल भारत के विदेश मंत्रालय ने भी बताया था कि अमेरिकी सरकार ने भारत से कहा था कि वह रूस से तेल खरीदना जारी रखे, ताकि वैश्विक तेल बाजार स्थिर बना रहे। हालाँकि, बाद में अमेरिका ने अपना ही रुख बदलते हुए रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया।

भारत ने साफ संकेत दिए हैं कि मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के बीच भी देश की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हित उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता बने रहेंगे।