ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया (साभार- perplexityAI)
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल और अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने मध्य पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। इसके बावजूद ईरान अपने परमाणु ढाँचे को फिर से खड़ा करने की पुकजोर कोशिश में है।
यूँ तो मिडिल ईस्ट में ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से तनाव का केंद्र रहा है पर अब ये अब खुलेआम युद्ध की शक्ल ले चुका है। इजरायल और अमेरिका की हालिया स्ट्राइक्स ने नतांज जैसी प्रमुख सुविधाओं को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन ईरान का कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
ताजा हालात: न्यूक्लियर फैसिलिटी का क्या हुआ?
ईरान की प्रमुख न्यूक्लियर साइट नतांज पर हाल ही में भारी क्षति हुई है। 1 और 2 मार्च 2026 को लिए गए सैटेलाइट इमेजेस से पता चलता है कि कम्प्लेक्स के अंदर कम से कम दो छोटी बिल्डिंग्स को गंभीर नुकसान पहुँचा, जो एक दिन पहले बिल्कुल सुरक्षित दिख रही थीं।
ईरान के एटॉमिक एनर्जी चीफ मोहम्मद एस्लामी ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर अमेरिका और इजरायल पर दो हमलों का आरोप लगाया। यह नुकसान जून 2025 के युद्ध के बाद आया, जब इजरायल की ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ और अमेरिका की ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ ने नतांज, इस्फहान और फोर्डो जैसी साइट्स को निशाना बनाया था।
अमेरिका ने दावा किया कि कार्यक्रम ‘ऑब्लिटरेट’ यानी खत्म हो गया, लेकिन सैटेलाइट इमेजेस दिखाते हैं कि ईरान पुनर्निर्माण कर रहा है। फरवरी 2026 में अमेरिका की ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजरायल की ‘ऑपरेशन रोअरिंग लायन’ ने फिर से न्यूक्लियर और मिसाइल साइट्स को टारगेट किया।
ईरान में न्यूक्लियर फैसिलिटी में हो रहे काम की सैटेलाइट तस्वीर, साभार- The times of IsraelIAEA का अनुमान है कि ईरान के पास 440 किलो 60% यूटेनियम स्टॉक है, जो 10 बम बना सकता है, लेकिन इसकी लोकेशन अज्ञात है। नतांज ईरान का मुख्य संवर्धन केंद्र था, जहाँ हजारों सेंट्रीफ्यूज लगे थे, लेकिन हमलों के बावजूद IAEA को इंस्पेक्शन में बाधाएँ आ रही हैं। ईरान ने नए अंडरग्राउंड बंकर्स बना लिए हैं, जो हमलों से सुरक्षित हैं।
US-इजरायल की चिंताएँ और बयानबाजी
इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अगर हमला न होता, तो ईरान का कार्यक्रम ‘महीनों में इम्यून’ हो जाता, क्योंकि वे अंडरग्राउंड बंकर्स बना रहे थे। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि जून 2025 के हमलों के बाद ईरान ने नए साइट्स बनाए, जो मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम को सुरक्षित कर देते। नेतन्याहू ने इसे ‘क्विक एंड डिसाइसिव’ बताया और कहा कि यह रीजिम चेंज यानी ईरान की सत्ता के पतन की स्थितियाँ पैदा करेगा।
अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ट्रंप का लक्ष्य ईरान का ‘माइंडसेट’ बदलना है, ताकि वे कभी न्यूक्लियर वेपन न बनाएँ। उन्होंने जून 2025 के हमलों को सफल बताया, लेकिन कहा कि नेगोशिएशंस नाकाम रहीं क्योंकि ईरान नहीं माना।
यूएस स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने खुलासा किया कि ईरानी नेगोशिएटर्स ने दावा किया था कि उनके पास 460 किलो 60% एंरिच्ड यूटेनियम है, जो 11 बम बना सकता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए स्ट्राइक्स किए।
CFR के अनुसार, इजरायल ईरान को एक्जिस्टेंशियल थ्रेट मानता है, क्योंकि न्यूक्लियर ईरान मिडिल ईस्ट को डेस्टेबलाइज करेगा। अमेरिका ने JCPOA से 2018 में बाहर निकलने के बाद सैंक्शंस लगाए, और अब 2026 में ओमान में बातचीत जारी है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम: शुरुआत से आज तक
1950-1970: ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू किया।
1979: ईरानी क्रांति के बाद कार्यक्रम धीमा पड़ा।
2002: नतांज़ और अराक में गुप्त परमाणु स्थलों का खुलासा हुआ।
2015: JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) हुआ, जिसमें ईरान ने यूरेनियम संवर्धन सीमित करने का वादा किया।
2018: अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलकर कठोर प्रतिबंध लगाए।
2025: इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी की।
ईरान न्यूक्लियर हथियार क्यों चाहता है?
ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ के तहत अमेरिकी मदद से शुरू हुआ था। 1979 की इस्लामिक रेवोल्यूशन के बाद सस्पेंड हुआ, लेकिन 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक वॉर में केमिकल अटैक्स के बाद रिवाइव हो गया। ईरान इसे ‘पीसफुल’ बताता है, लेकिन वेस्टर्न एनालिस्ट्स कहते हैं कि यह वेपन रिसर्च है।
इसके पीछे ईरान का मकसद इजरायल के न्यूक्लियर आर्सेनल और अमेरिकी थ्रेट्स के खिलाफ खुद को मजबूत करना है। ईरान के पास मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल आर्सेनल है, जो 2000 किमी तक मार कर सकता है। न्यूक्लियर वेपन से वे रीजनल पावर बनेंगे, प्रॉक्सीज (हिजबुल्लाह, हूती) को स्ट्रॉन्ग करेंगे। IAEA रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान ने 60% एंरिचमेंट बढ़ाया, जो वेपन्स-ग्रेड (90%) के करीब है।
ईरान के अधिकारी कहते हैं कि ‘कॉर्नर्ड कैट’ होने पर डॉक्ट्रिन चेंज कर सकते हैं। ‘कॉर्नर्ड कैट’ (घिरी हुए बिल्ली) का मतलब है कि जब कोई जीव खतरे में घिर जाता है, तो वह आक्रामक हो जाता है – यानी ईरान भी अस्तित्व पर संकट दिखने पर अपनी नीति बदल सकता है।
अप्रैल 2024 में IRGC के न्यूक्लियर सिक्योरिटी कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद हग्तलाब ने कहा कि अगर इजरायल ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमला करता है या धमकी देता है तो ईरान अपना ‘न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन रिवाइज’ (परमाणु नीति संशोधित) कर सकता है।
अप्रैल 2024 के इजरायल पर ड्रोन-मिसाइल हमले के बाद उन्होंने धमकी देते हुए कहा था, “हमारे पास इजरायल की न्यूक्लियर साइट्स की जानकारी है, और जवाबी मिसाइल हमले तैयार हैं।”
इजरायल-अमेरिका क्यों रोकना चाहते हैं?
इजरायल के लिए ईरान एक्जिस्टेंशियल थ्रेट है। नेतन्याहू कहते हैं कि 95% मिडिल ईस्ट की परेशानियाँ ईरान से हैं। न्यूक्लियर ईरान सऊदी, UAE जैसे देशों को आर्म्स रेस में धकेलेगा। इजरायल ने पहले इराक (1981), सीरिया (2007) के रिएक्टर्स बम किए।
अमेरिका ईरान को US इंटरेस्ट्स के खिलाफ मानता है। ट्रंप ने 2018 में JCPOA छोड़ा क्योंकि यह अस्थायी था। 10-15 साल बाद खत्म हो जाता, एंरिचमेंट फिर शुरू हो जाता।
ट्रंप इसे कमजोर मानते थे, इसलिए अधिक से अधिक सैंक्शंस लगाए। उनका कहना था कि नई डील ‘इंडेफिनिट’ यानी हमेशा के लिए होनी चाहिए। उनका लक्ष्य ये है कि कोई न्यूक्लियर वेपन नहीं हो, मिसाइल प्रोग्राम खत्म किया जाए और प्रॉक्सी सपोर्ट मिलना बंद हो।
ट्रंप के स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने कहा कि ईरान ने ‘इनएलियनेबल राइट’ माँगी, लेकिन US ने कहा कि हम रोकेंगे। रीजिम चेंज यानी सत्ता में बदलाव से पीस डील्स होंगी। रीजिम चेंद को लेकर ईरान में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते आए हैं। इस दौरान खामेनेई ने हजारों लोगों को मरवा दिया।
ट्रंप ने जनवरी 2026 में इसे लेकर खामेनेई को चेतावनी भी दी थी कि ईरान प्रोटेस्टर्स की हत्या बंद करे, वरना मिलिट्री एक्शन लिया जाएगा।
क्या है ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन
ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन सरल शब्दों में यही कहता है कि ईरान परमाणु बम या हथियार कभी नहीं बनाएगा। यह खामेनेई के फतवे पर टिका है, जो इस्लामिक नियमों से आता है। ईरान का दावा है कि उसका प्रोग्राम बिजली और मेडिकल के लिए है। NPT संधि में शामिल होने से उन्हें यूरेनियम संवर्धन (3-5%) का अधिकार है। लेकिन वे इसमें 60% तक पहुँच गए, जो बम के करीब (90%) है।
ईरान ने न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन 2015 के JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) समझौते के बाद उसने कई उल्लंघन किए हैं। IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) का कहना है कि ईरान ने पर्छिन और लाविसान-शियन साइट्स जैसी जगहों पर गुप्त अनुसंधान किया है।
डॉक्ट्रिन के अनुसार ईरान का कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है, लेकिन 60% तक यूरेनियम संवर्धन (सिविल उपयोग के लिए सामान्यतः 3-5% पर्याप्त) ने संदेह पैदा कर दिया है।
खामेनेई के ‘परमाणु फतवा’ की सच्चाई
खामेनेई का फतवा ईरान द्वारा दुनिया को परमाणु हथियारों को ‘हराम’ यानी इस्लामिक नियमों में निषिद्ध के तौर पर बताकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, लेकिन असल में यह एक फर्जी नैरेटिव है।
अटलांटिक काउंसिल के विश्लेषण के अनुसार, 2004 में तत्कालीन न्यूक्लियर नेगोशिएटर हसन रूहानी ने यूरोपीय देशों को बताया कि खामेनेई ने फतवा जारी किया है, जो NPT से ज्यादा मजबूत है।
2003 में इराक इनवेजन के बाद खामेनेई ने कहा, ‘हम बॉम्ब नहीं चाहते।’ 2004 में रूहानी ने EU को बताया कि फतवा है। लेकिन खामेनेई ने कभी लिखित फतवा नहीं जारी किया।
उनके भाषणों में भी ‘उपयोग’ को हराम कहा गया, प्रोडक्शन या स्टोरेज पर कोई बात नहीं की गई।उनकी वेबसाइट पर 85 बयानों में सिर्फ उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
यह नैरेटिव 2003 इराक इनवेजन के बाद शुरू हुआ, जब ईरान ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसे इस्तेमाल किया। अब अगर बात करें शिया लॉ की तो शिया कानून में फतवा स्थायी नहीं बल्कि रिवर्सिबल (बदलने योग्य) है, जैसे 1890s टोबैको फतवा। अधिकारी जैसे अली अली (2021) ने कहा: “कॉर्नर्ड कैट अलग व्यवहार करेगी।”
शिया लॉ में फतवा रिवर्सिबल है। अलवी ने कहा, ‘कॉर्नर्ड कैट अलग बिहेव करेगी।’ साइंटिस्ट्स कहते हैं कि खामेनेई कल स्टांस चेंज कर सकते हैं। यह पॉलिटिकल टूल है, जैसे 1890 के दशक में जारी हुआ तंबाकू फतवा।
तंबाकू फतवा की कहानी ऐसी है कि काजर सत्ता में नासिर अल-दीन शाह ने 1890 में ब्रिटेन को तंबाकू व्यापार का एकाधिकार दे दिया। इसके बाद धर्मगुरु मिर्जा हसन शिराजी ने दिसंबर 1891 में फतवा जारी किया, “तंबाकू का उपयोग इमाम महदी के खिलाफ युद्ध है।” इसके बाद लाखों ईरानियों ने तंबाकू पीना बंद कर दिया।
ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम की पूरी कहानी
ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1957 में अमेरिका की मदद से शुरू हुआ था, जब शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ योजना के तहत सहयोग हुआ। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह कार्यक्रम निलंबित हो गया, लेकिन 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान इसे पुनर्जनन मिला। 2000 के दशक में नतांज और फोर्डो जैसी गुप्त साइटों का खुलासा होने पर IAEA ने सवाल उठाए।
2015 में JCPOA समझौते से यूरेनियम संवर्धन सीमित (3.67%) हुआ और IAEA निरीक्षण बढ़े। 2018 में ट्रंप ने इससे बाहर निकल गए और कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में ईरान ने ब्रेकआउट टाइम (बम बनाने की अवधि) कम कर दिया।
2024 में ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला किया। जून 2025 में इजरायल-अमेरिका ने नतांज, इस्फहान पर स्ट्राइक्स किए, और IAEA ने नवंबर 2024 में 182 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम का अनुमान लगाया। फरवरी 2026 में फिर हमले हुए।
इस कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा कर दिया। इजरायल-ईरान के बीच टकराव अब बढ़ गया है और प्रॉक्सी वॉर तेज हुए हैं। सऊदी अरब ने कहा है कि ईरान को हथियार मिले तो हमें भी बनाने होंगे। सबसे चिंताजनक बात ये है कि IAEA को ईरान के स्टॉक की जगहों का पता नहीं है जो सबसे बड़ा खतरा है।
मिडिल ईस्ट का क्या है भविष्य: रीजिम चेंज या आर्म्स रेस?
ईरान के न्यूक्लियर संकट को लेकर भविष्य देखा जाए तो दो मुख्य रास्ते दिख रहे हैं। पहला, या तो रीजिम चेंज हो यानी ईरानी सरकार का पतन होगा और या फिर मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस शुरू होगी। इसमें देशों के बीच हथियारों की होड़ लगेगी और स्थिति और बदतर होती चली जाएगी।
हालिया इजरायल-अमेरिकी स्ट्राइक्स ने ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम का मटेरियल और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स अभी भी ईरान के पास बरकरार है।
इसके अलावा ओमान में चल रही डिप्लोमेटिक टॉक्स फेल हो चुकी हैं, जिससे अब पूरी तरह से क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ गई है। ईरान IAEA निरीक्षण के बिना ही अपने कार्यक्रम का पुनर्निर्माण करेगा। इसके कारण ये मिडिल ईस्ट में और अधिक असुरक्षा का माहौल पैदा करेगा।
दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप का रीजिम चेंज का आह्वान इराक (2003) और लीबिया (2011) की तरह जोखिम भरा हो सकता है, जहाँ सरकार गिरने से अराजकता फैल गई। इससे मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस का खतरा मंडरा रहा है, जहां सऊदी अरब जैसे देश भी हथियार बनाने पर उतर आएँगे।



