खामेनेई का ‘परमाणु फतवा’ : ईरान के उस न्यूक्लियर प्रोग्राम की कहानी जिसकी वजह से युद्ध के मुहाने पर खड़ा मिडिल ईस्ट

      ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया (साभार- perplexityAI)
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल और अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने मध्य पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। इसके बावजूद ईरान अपने परमाणु ढाँचे को फिर से खड़ा करने की पुकजोर कोशिश में है।

यूँ तो मिडिल ईस्ट में ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से तनाव का केंद्र रहा है पर अब ये अब खुलेआम युद्ध की शक्ल ले चुका है। इजरायल और अमेरिका की हालिया स्ट्राइक्स ने नतांज जैसी प्रमुख सुविधाओं को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन ईरान का कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

ताजा हालात: न्यूक्लियर फैसिलिटी का क्या हुआ?

ईरान की प्रमुख न्यूक्लियर साइट नतांज पर हाल ही में भारी क्षति हुई है। 1 और 2 मार्च 2026 को लिए गए सैटेलाइट इमेजेस से पता चलता है कि कम्प्लेक्स के अंदर कम से कम दो छोटी बिल्डिंग्स को गंभीर नुकसान पहुँचा, जो एक दिन पहले बिल्कुल सुरक्षित दिख रही थीं।

ईरान के एटॉमिक एनर्जी चीफ मोहम्मद एस्लामी ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर अमेरिका और इजरायल पर दो हमलों का आरोप लगाया। यह नुकसान जून 2025 के युद्ध के बाद आया, जब इजरायल की ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ और अमेरिका की ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ ने नतांज, इस्फहान और फोर्डो जैसी साइट्स को निशाना बनाया था।

अमेरिका ने दावा किया कि कार्यक्रम ‘ऑब्लिटरेट’ यानी खत्म हो गया, लेकिन सैटेलाइट इमेजेस दिखाते हैं कि ईरान पुनर्निर्माण कर रहा है। फरवरी 2026 में अमेरिका की ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजरायल की ‘ऑपरेशन रोअरिंग लायन’ ने फिर से न्यूक्लियर और मिसाइल साइट्स को टारगेट किया।

               ईरान में न्यूक्लियर फैसिलिटी में हो रहे काम की सैटेलाइट तस्वीर, साभार- The times of Israel

IAEA का अनुमान है कि ईरान के पास 440 किलो 60% यूटेनियम स्टॉक है, जो 10 बम बना सकता है, लेकिन इसकी लोकेशन अज्ञात है। नतांज ईरान का मुख्य संवर्धन केंद्र था, जहाँ हजारों सेंट्रीफ्यूज लगे थे, लेकिन हमलों के बावजूद IAEA को इंस्पेक्शन में बाधाएँ आ रही हैं। ईरान ने नए अंडरग्राउंड बंकर्स बना लिए हैं, जो हमलों से सुरक्षित हैं।

US-इजरायल की चिंताएँ और बयानबाजी

इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अगर हमला न होता, तो ईरान का कार्यक्रम ‘महीनों में इम्यून’ हो जाता, क्योंकि वे अंडरग्राउंड बंकर्स बना रहे थे। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि जून 2025 के हमलों के बाद ईरान ने नए साइट्स बनाए, जो मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम को सुरक्षित कर देते। नेतन्याहू ने इसे ‘क्विक एंड डिसाइसिव’ बताया और कहा कि यह रीजिम चेंज यानी ईरान की सत्ता के पतन की स्थितियाँ पैदा करेगा।

अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ट्रंप का लक्ष्य ईरान का ‘माइंडसेट’ बदलना है, ताकि वे कभी न्यूक्लियर वेपन न बनाएँ। उन्होंने जून 2025 के हमलों को सफल बताया, लेकिन कहा कि नेगोशिएशंस नाकाम रहीं क्योंकि ईरान नहीं माना।

यूएस स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने खुलासा किया कि ईरानी नेगोशिएटर्स ने दावा किया था कि उनके पास 460 किलो 60% एंरिच्ड यूटेनियम है, जो 11 बम बना सकता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए स्ट्राइक्स किए।

CFR के अनुसार, इजरायल ईरान को एक्जिस्टेंशियल थ्रेट मानता है, क्योंकि न्यूक्लियर ईरान मिडिल ईस्ट को डेस्टेबलाइज करेगा। अमेरिका ने JCPOA से 2018 में बाहर निकलने के बाद सैंक्शंस लगाए, और अब 2026 में ओमान में बातचीत जारी है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम: शुरुआत से आज तक

1950-1970: ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू किया।
1979: ईरानी क्रांति के बाद कार्यक्रम धीमा पड़ा।
2002: नतांज़ और अराक में गुप्त परमाणु स्थलों का खुलासा हुआ।
2015: JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) हुआ, जिसमें ईरान ने यूरेनियम संवर्धन सीमित करने का वादा किया।
2018: अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलकर कठोर प्रतिबंध लगाए।
2025: इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी की।

ईरान न्यूक्लियर हथियार क्यों चाहता है?

ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ के तहत अमेरिकी मदद से शुरू हुआ था। 1979 की इस्लामिक रेवोल्यूशन के बाद सस्पेंड हुआ, लेकिन 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक वॉर में केमिकल अटैक्स के बाद रिवाइव हो गया। ईरान इसे ‘पीसफुल’ बताता है, लेकिन वेस्टर्न एनालिस्ट्स कहते हैं कि यह वेपन रिसर्च है।

इसके पीछे ईरान का मकसद इजरायल के न्यूक्लियर आर्सेनल और अमेरिकी थ्रेट्स के खिलाफ खुद को मजबूत करना है। ईरान के पास मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल आर्सेनल है, जो 2000 किमी तक मार कर सकता है। न्यूक्लियर वेपन से वे रीजनल पावर बनेंगे, प्रॉक्सीज (हिजबुल्लाह, हूती) को स्ट्रॉन्ग करेंगे। IAEA रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान ने 60% एंरिचमेंट बढ़ाया, जो वेपन्स-ग्रेड (90%) के करीब है।

ईरान के अधिकारी कहते हैं कि ‘कॉर्नर्ड कैट’ होने पर डॉक्ट्रिन चेंज कर सकते हैं। ‘कॉर्नर्ड कैट’ (घिरी हुए बिल्ली) का मतलब है कि जब कोई जीव खतरे में घिर जाता है, तो वह आक्रामक हो जाता है – यानी ईरान भी अस्तित्व पर संकट दिखने पर अपनी नीति बदल सकता है।

अप्रैल 2024 में IRGC के न्यूक्लियर सिक्योरिटी कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद हग्तलाब ने कहा कि अगर इजरायल ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमला करता है या धमकी देता है तो ईरान अपना ‘न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन रिवाइज’ (परमाणु नीति संशोधित) कर सकता है।

अप्रैल 2024 के इजरायल पर ड्रोन-मिसाइल हमले के बाद उन्होंने धमकी देते हुए कहा था, “हमारे पास इजरायल की न्यूक्लियर साइट्स की जानकारी है, और जवाबी मिसाइल हमले तैयार हैं।”

इजरायल-अमेरिका क्यों रोकना चाहते हैं?

इजरायल के लिए ईरान एक्जिस्टेंशियल थ्रेट है। नेतन्याहू कहते हैं कि 95% मिडिल ईस्ट की परेशानियाँ ईरान से हैं। न्यूक्लियर ईरान सऊदी, UAE जैसे देशों को आर्म्स रेस में धकेलेगा। इजरायल ने पहले इराक (1981), सीरिया (2007) के रिएक्टर्स बम किए।

अमेरिका ईरान को US इंटरेस्ट्स के खिलाफ मानता है। ट्रंप ने 2018 में JCPOA छोड़ा क्योंकि यह अस्थायी था। 10-15 साल बाद खत्म हो जाता, एंरिचमेंट फिर शुरू हो जाता।

ट्रंप इसे कमजोर मानते थे, इसलिए अधिक से अधिक सैंक्शंस लगाए। उनका कहना था कि नई डील ‘इंडेफिनिट’ यानी हमेशा के लिए होनी चाहिए। उनका लक्ष्य ये है कि कोई न्यूक्लियर वेपन नहीं हो, मिसाइल प्रोग्राम खत्म किया जाए और प्रॉक्सी सपोर्ट मिलना बंद हो।

ट्रंप के स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने कहा कि ईरान ने ‘इनएलियनेबल राइट’ माँगी, लेकिन US ने कहा कि हम रोकेंगे। रीजिम चेंज यानी सत्ता में बदलाव से पीस डील्स होंगी। रीजिम चेंद को लेकर ईरान में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते आए हैं। इस दौरान खामेनेई ने हजारों लोगों को मरवा दिया।

ट्रंप ने जनवरी 2026 में इसे लेकर खामेनेई को चेतावनी भी दी थी कि ईरान प्रोटेस्टर्स की हत्या बंद करे, वरना मिलिट्री एक्शन लिया जाएगा।

क्या है ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन

ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन सरल शब्दों में यही कहता है कि ईरान परमाणु बम या हथियार कभी नहीं बनाएगा। यह खामेनेई के फतवे पर टिका है, जो इस्लामिक नियमों से आता है। ईरान का दावा है कि उसका प्रोग्राम बिजली और मेडिकल के लिए है। NPT संधि में शामिल होने से उन्हें यूरेनियम संवर्धन (3-5%) का अधिकार है। लेकिन वे इसमें 60% तक पहुँच गए, जो बम के करीब (90%) है।

ईरान ने न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन 2015 के JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) समझौते के बाद उसने कई उल्लंघन किए हैं। IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) का कहना है कि ईरान ने पर्छिन और लाविसान-शियन साइट्स जैसी जगहों पर गुप्त अनुसंधान किया है।

डॉक्ट्रिन के अनुसार ईरान का कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है, लेकिन 60% तक यूरेनियम संवर्धन (सिविल उपयोग के लिए सामान्यतः 3-5% पर्याप्त) ने संदेह पैदा कर दिया है।

खामेनेई के ‘परमाणु फतवा’ की सच्चाई 

खामेनेई का फतवा ईरान द्वारा दुनिया को परमाणु हथियारों को ‘हराम’ यानी इस्लामिक नियमों में निषिद्ध के तौर पर बताकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, लेकिन असल में यह एक फर्जी नैरेटिव है।

अटलांटिक काउंसिल के विश्लेषण के अनुसार, 2004 में तत्कालीन न्यूक्लियर नेगोशिएटर हसन रूहानी ने यूरोपीय देशों को बताया कि खामेनेई ने फतवा जारी किया है, जो NPT से ज्यादा मजबूत है।

2003 में इराक इनवेजन के बाद खामेनेई ने कहा, ‘हम बॉम्ब नहीं चाहते।’ 2004 में रूहानी ने EU को बताया कि फतवा है। लेकिन खामेनेई ने कभी लिखित फतवा नहीं जारी किया।

उनके भाषणों में भी ‘उपयोग’ को हराम कहा गया, प्रोडक्शन या स्टोरेज पर कोई बात नहीं की गई।उनकी वेबसाइट पर 85 बयानों में सिर्फ उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

यह नैरेटिव 2003 इराक इनवेजन के बाद शुरू हुआ, जब ईरान ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसे इस्तेमाल किया। अब अगर बात करें शिया लॉ की तो शिया कानून में फतवा स्थायी नहीं बल्कि रिवर्सिबल (बदलने योग्य) है, जैसे 1890s टोबैको फतवा। अधिकारी जैसे अली अली (2021) ने कहा: “कॉर्नर्ड कैट अलग व्यवहार करेगी।”

शिया लॉ में फतवा रिवर्सिबल है। अलवी ने कहा, ‘कॉर्नर्ड कैट अलग बिहेव करेगी।’ साइंटिस्ट्स कहते हैं कि खामेनेई कल स्टांस चेंज कर सकते हैं। यह पॉलिटिकल टूल है, जैसे 1890 के दशक में जारी हुआ तंबाकू फतवा।

तंबाकू फतवा की कहानी ऐसी है कि काजर सत्ता में नासिर अल-दीन शाह ने 1890 में ब्रिटेन को तंबाकू व्यापार का एकाधिकार दे दिया। इसके बाद धर्मगुरु मिर्जा हसन शिराजी ने दिसंबर 1891 में फतवा जारी किया, “तंबाकू का उपयोग इमाम महदी के खिलाफ युद्ध है।” इसके बाद लाखों ईरानियों ने तंबाकू पीना बंद कर दिया।

ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम की पूरी कहानी

ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1957 में अमेरिका की मदद से शुरू हुआ था, जब शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ योजना के तहत सहयोग हुआ। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह कार्यक्रम निलंबित हो गया, लेकिन 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान इसे पुनर्जनन मिला। 2000 के दशक में नतांज और फोर्डो जैसी गुप्त साइटों का खुलासा होने पर IAEA ने सवाल उठाए।

2015 में JCPOA समझौते से यूरेनियम संवर्धन सीमित (3.67%) हुआ और IAEA निरीक्षण बढ़े। 2018 में ट्रंप ने इससे बाहर निकल गए और कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में ईरान ने ब्रेकआउट टाइम (बम बनाने की अवधि) कम कर दिया।

2024 में ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला किया। जून 2025 में इजरायल-अमेरिका ने नतांज, इस्फहान पर स्ट्राइक्स किए, और IAEA ने नवंबर 2024 में 182 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम का अनुमान लगाया। फरवरी 2026 में फिर हमले हुए।

इस कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा कर दिया। इजरायल-ईरान के बीच टकराव अब बढ़ गया है और प्रॉक्सी वॉर तेज हुए हैं। सऊदी अरब ने कहा है कि ईरान को हथियार मिले तो हमें भी बनाने होंगे। सबसे चिंताजनक बात ये है कि IAEA को ईरान के स्टॉक की जगहों का पता नहीं है जो सबसे बड़ा खतरा है।

मिडिल ईस्ट का क्या है भविष्य: रीजिम चेंज या आर्म्स रेस?

ईरान के न्यूक्लियर संकट को लेकर भविष्य देखा जाए तो दो मुख्य रास्ते दिख रहे हैं। पहला, या तो रीजिम चेंज हो यानी ईरानी सरकार का पतन होगा और या फिर मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस शुरू होगी। इसमें देशों के बीच हथियारों की होड़ लगेगी और स्थिति और बदतर होती चली जाएगी।

हालिया इजरायल-अमेरिकी स्ट्राइक्स ने ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम का मटेरियल और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स अभी भी ईरान के पास बरकरार है।

इसके अलावा ओमान में चल रही डिप्लोमेटिक टॉक्स फेल हो चुकी हैं, जिससे अब पूरी तरह से क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ गई है। ईरान IAEA निरीक्षण के बिना ही अपने कार्यक्रम का पुनर्निर्माण करेगा। इसके कारण ये मिडिल ईस्ट में और अधिक असुरक्षा का माहौल पैदा करेगा।

दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप का रीजिम चेंज का आह्वान इराक (2003) और लीबिया (2011) की तरह जोखिम भरा हो सकता है, जहाँ सरकार गिरने से अराजकता फैल गई। इससे मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस का खतरा मंडरा रहा है, जहां सऊदी अरब जैसे देश भी हथियार बनाने पर उतर आएँगे।

बंगाल : ममता के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे Rahul, चुनाव से पहले इंडी गठबंधन टूटा


पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने वामपंथी दलों के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया है। इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। अब तक विपक्षी राजनीति में जो संभावित तालमेल दिखता था, वह अचानक बिखरता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस रणनीतिक फैसले से किसे लाभ होगा और किसे नुकसान? राहुल गांधी के इस कदम का कांग्रेस पार्टी को फायदा हो या ना हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को जरूर नुकसान होने वाला है। क्योंकि कांग्रेस को जो भी वोट मिलेगा, वह तृणमूल कांग्रेस के हिस्से का होगा। ऐसे में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की एकला चलो की लड़ाई का फायदा बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव में मिलने जा रहा है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का दांव का क्या उसके लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं होगा? कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में जीरो सीट मिली थी। ऐसे में अगले चुनाव में जीरो से शुरुआत करने वाली कांग्रेस का बिना किसी राजनीतिक बैसाखी के अपना सफर तय कर पाएगी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी समीकरण फिर उफान पर

राज्य से तृणमूल कांग्रेस सरकार का कुशासन हटाने और बीजेपी का सुशासन लाने के लिए नौ अलग-अलग स्थानों कूचबिहार, कृष्णानगर, कुल्टी, गरबेटा, रैदिघी, इस्लामपुर, हसनाबाद, संदेशखाली और आमता से BJP की परिवर्तन यात्रा का शानदार आगाज हो गया है। यात्रा को मिले जनता-जनार्दन के अपार समर्थन ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक नए जोश से भर दिया है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक तीन और चार मार्च को ‘डोल यात्रा’ और 4 मार्च को ‘होली’ के कारण कहीं रैली का आयोजन नहीं होगा। परिवर्तन यात्रा इसके बाद पांच मार्च से फिर से शुरू होगी। यह पश्चिम बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने के बाद पूरी होगी। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने राज्यव्यापी ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत कर चुनावी रणभूमि को नई दिशा दे दी है। नौ दिशाओं से एक साथ यात्रा का आगाज को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं,  बल्कि एक व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। यह पहल बीजेपी के लिए संगठनात्मक ऊर्जा, राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति तीनों का संगम बनती दिखाई दे रही है।

कांग्रेस की बड़ी चुनौती खोए जनाधार को पुनर्जीवित करना
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शून्य सीटों पर सिमटना पड़ा था। यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का संकेत भी था। ऐसे में, शून्य से शुरुआत करने वाली पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने खोए हुए जनाधार को पुनर्जीवित करना है। बिना मजबूत गठबंधन के मैदान में उतरना, कुछ विश्लेषकों के अनुसार, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम भी साबित हो सकता है। क्योंकि फिलहाल तो पार्टी मतदाताओं को ठोस विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करती नजर नहीं आती। ऐसे में कांग्रेस का वामपंथी दलों से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरना बेहत चुनौतीपूर्ण निर्णय है। यह तर्क भी अपने आप में ही दिलचस्प है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी और पश्चिम बंगाल में राज करने के बाद भी अब स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस को किसी सहारे के साथ नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए लड़ना पड़ रहा है। “एकला चलो” की यह रणनीति जितनी चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं ज्याद जोखिम भरी भी है। आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि “एकला चलो” की रणनीति कांग्रेस के लिए कितनी आत्मघाती साबित होती है। इतना निश्चित है कि बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले से अधिक रोचक और प्रतिस्पर्धी हो चुका है।

तृणमूल कांग्रेस बनान कांग्रेस का असर ममता बनर्जी पर
कांग्रेस के अलग रास्ता चुनने से सबसे अधिक असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को मिलने वाला हर अतिरिक्त वोट कहीं न कहीं तृणमूल के संभावित समर्थन आधार से कटेगा। बंगाल में विपक्षी वोटों का बिखराव पहले भी निर्णायक साबित हुआ है। यदि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक विशेषकर कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक और पारंपरिक समर्थकों को वापस खींचने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल की सीटों पर पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति में केवल वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि उसका वितरण अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में 5–10 प्रतिशत वोट भी जुटा लेती है, तो वह परिणामों को प्रभावित कर सकती है। भले ही उसे सीटें न मिलें, पर उसका वोट शेयर बीजेपी की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार तय कर सकता है। यही कारण है कि गठबंधन टूटने को केवल कांग्रेस का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य में संभावित बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

कांग्रेस और टीएमसी के “एकला चलो” से बीजेपी को लाभ
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच “एकला चलो” की प्रतिस्पर्धा का लाभ भाजपा को मिल सकता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच माना जा रहा है। यदि विपक्षी वोटों में विभाजन होता है, तो भाजपा को कई सीटों पर सीधे लाभ की संभावना बन सकती है। बहुकोणीय मुकाबले में अक्सर वह दल आगे निकल जाता है, जिसका कोर वोट बैंक अपेक्षाकृत स्थिर और संगठित हो। भाजपा ने बूथ लेवल पर अपना कोर वोटर बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को पुनर्जीवित करने की है। बिना मजबूत बूथ स्तर की संरचना के, केवल राजनीतिक संदेश के सहारे चुनावी सफलता हासिल करना कठिन होता है। कांग्रेस को पहले अपने पुराने कार्यकर्ताओं को पुनः सक्रिय करना होगा और युवाओं को जोड़ने की कवायद करनी होगी। क्योंकि आज की राजनीति के दौर में महिला और युवा वर्ग पूरी तरह से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है।

केरल में अलग समीकरण, बंगाल में पड़ेगा बहुत गहरा असर
हालाँकि केरल और बंगाल दोनों राज्यों में गठबंधन टूटने की खबर है, लेकिन दोनों जगह राजनीतिक समीकरण भिन्न हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं और सत्ता का सीधा मुकाबला करते रहे हैं। वहीं बंगाल में परिस्थिति अधिक जटिल है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख शक्ति है और भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभरी है। ऐसे में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना बंगाल में अधिक जोखिमपूर्ण माना जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद तृणमूल कांग्रेस को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक खिसके नहीं। साथ ही, भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए उसे अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना होगा। कांग्रेस और वाम दलों की मौजूदगी से कई सीटों पर बहु-कोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है, जो चुनावी गणित के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जाएगा।

नौ दिशाओं से एक संदेश: सत्ता परिवर्तन की तूफानी तैयारी
राज्य के नौ अलग-अलग हिस्सों से एक साथ शुरुआत करने का निर्णय प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों है। इससे भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की आकांक्षाओं को समेटने का प्रयास है। उत्तर से दक्षिण और ग्रामीण से शहरी इलाकों तक समानांतर रैलियाँ संगठन की व्यापकता और चुनावी गंभीरता को रेखांकित करती हैं। यात्रा में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी इसे और अहम बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित कोलकाता रैली, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से यह स्पष्ट है कि पार्टी बंगाल को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर भाजपा ने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। अब वह उसी आधार को विधानसभा चुनाव में व्यापक समर्थन में बदलने जा रही है। चुनावी अभियान को सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों के साथ संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है। इसी के चलते दो दिन के विराम के बाद पांच मार्च से रैलियों का पुनः आरंभ कर अभियान को और तेज गति दी जाएगी।

मतदाता सूची संशोधन में 63 लाख फर्जी नाम हटने का मिलेगा फायदा
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद संशोधित मतदाता सूची के प्रकाशन के तुरंत बाद यात्रा का आरंभ होना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। लगभग 63 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता संरचना में बदलाव आया है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने समर्थन आधार को पुनर्गठित करने में जुटे हैं। भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह नए मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करे। राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए युवा और महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा रोजगार, स्टार्टअप, कौशल विकास और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस को तुष्टिकरण और बढ़ते महिला अपराध और भ्रष्टाचार के आरोपरों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में दोनों दलों के बीच यह प्रतिस्पर्धा चुनावी दंगल को और रोचक बनाएगी।

राज्यसभा चुनाव - महाराष्ट्र की सांसद “वो कौन थी”

सुभाष चन्द्र

भाजपा ने अभी महाराष्ट्र से 7 में से 4 सीटों के लिए नाम घोषित किए हैं और बिहार से 5 में 2 नाम आए हैं जिनमें पार्टी अध्यक्ष नितिन नबिन भी है। 

एक खबर में “आज तक” ने शीर्षक दिया है “विपक्ष की किन वोटों पर NDA की नज़र? बिहार में राज्यसभा चुनाव की आसान नहीं डगर” चैनल ने आगे विस्तार में लिखा है कि NDA 4 सीटें आसानी से जीत सकती है, लेकिन पांचवीं सीट के लिए उसे विपक्षी खेमे के तीन विधायकों का समर्थन जुटाना होगा”

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
आज तक चैनल की यह कैसी पत्रकारिता है जो 5 में से 4 सीट जीतने की संभावना के बाद भी कह रहा है कि ‘बिहार राज्यसभा चुनाव की डगर आसान नहीं है” यानी एक सीट से पूरा चुनाव कठिन बता दिया अगर 3 या 4 सीट पर कड़ा मुकाबला होता तो भी डगर कठिन हो सकती थी लेकिन एक सीट से चुनाव कठिन बता देना मूर्खता है

उधर महाराष्ट्र में 7 में से 6 सीट NDA को आसानी से मिल जाएगी सातवीं सीट के लिए अभी तक MVA कोई फैसला नहीं कर सकी है उद्धव के 20, कांग्रेस के 16 और शरद पवार के पास 10 विधायक है जबकि एक सीट जीतने के लिए 41 विधायक चाहिए सबके अपने अपने दावे हैं लेकिन सुना है चचासुर शरद पवार फिर से राज्यसभा जाना चाहते हैं जबकि उनके पास 10 विधायक है और वो बाकी दोनों दलों पर दबाव डालने की हालत में भी नहीं हैं उद्धव 20 विधायकों के साथ सीट चाहते है और कांग्रेस तो राष्ट्रीय पार्टी के नाते दावा ठोक रही है। लगता है इस बंदरबांट में वो सीट भी NDA ले जाएगी

याद कीजिए जब लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी की सीट घेर कर कांग्रेस की 8 महिलाओं ने स्वांग रचा था, तब यह कहा गया था कि वह प्लान शिवसेना (उद्धव) की एक सांसद के सामने जाहिर कर दिया गया था और उसने स्पीकर ओम बिरला को उसकी सूचना दे दी थी

सवाल यह उठता है कि शिवसेना (उद्धव) की महिला “वो कौन थी” उद्धव की पार्टी की राज्यसभा और लोकसभा में केवल एक महिला सांसद है प्रियंका चतुर्वेदी क्या वही थी जिसने स्पीकर को सूचना दी शायद उसने अपना जुगाड़ राज्यसभा के लिए तो नहीं लगाया था क्योंकि उसका टर्म अब 2026 में ख़त्म हो रहा है और शिवसेना (उद्धव) या MVA से तो राज्यसभा जाना संभव नहीं है। लेकिन अभी तक उसका नाम तो भाजपा से नहीं आया है 

मैंने पहले भी कहा था और फिर कहता हूं बंगाल और केरल में विधानसभा के चुनाव होने से पहले दोनों राज्यों से राज्यसभा के चुनाव कराना नीतिसंगत नहीं है

‘भ$वा*# करो… तू जा भो$@%’ : कांग्रेस प्रवक्ता ने टीवी डिबेट में ‘कर्नल’ को दी गाली, सैनिक बोले- पार्टी इसे निलंबित करे

                    कांग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा (बाएँ) और कर्नल दानवीर सिंह (दाएँ) (फोटो साभार: News18)
कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक शर्मा का मार्च 3 को एक टीवी डिबेट के दौरान सेना के रिटायर्ड कर्नल दानवीर सिंह को गाली देने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। News18 इंडिया पर यह डिबेट इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को लेकर हो रही थी, इस बीच आलोक शर्मा भड़क गए और कर्नल के साथ अपशब्दों का प्रयोग करने लगे। कर्नल दानवीर ने खुद इस डिबेट के एक हिस्से का वीडियो शेयर किया है।

इस वीडियो में आलोक शर्मा कह रहे हैं, “आप डिबेट कराइए, $वा*# कराइए, दलाली कराइए इनसे आप।” इस पर कर्नल दानवीर ने कहा, “अबे जा”, तुरंत आलोक शर्मा चिल्लाकर कर्नल से बोले, “तू जा भो$@%।” कर्नल दानवीर ने वीडियो शेयर करते हुए X पर लिखा, “उम्मीद है राहुल गाँधी जी आलोक शर्मा को आप कांग्रेस से निलंबित करेंगे। जयहिंद।”

इस डिबेट के एंकर अमिश देवगन ने भी इस बहस का एक वीडियो शेयर किया है जिसमें आलोक शर्मा और कर्नल दानवीर एक-दूसरे से उलझते नजर आ रहे हैं। वीडियो में जहाँ आलोक शर्मा ‘कोर्ट मार्शल’ की बात कर रहे हैं तो वहीं कर्नल दानवीर ‘छपरी’ कहते नजर आ रहे हैं।

अमिश देवगन ने वीडियो शेयर करते हुए X पर लिखा, “डिबेट में विरोध हो सकता है। लेकिन इस स्तर की भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती। पूरा देश फौजियों का सम्मान करता है। मैंने भी आलोक शर्मा की भाषा पर घोर आपत्ति जताई।”

बीजेपी प्रवक्ता राधिका खेड़ा ने कांग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लिया है। राधिका ने X पर वीडियो शेयर कर लिखा, “राहुल गाँधी संसद में गुंडागर्दी करते हैं, युवा कांग्रेस अंतरराष्ट्रीय मंच पे नंगई। नेता PM की ‘बोटी-बोटी’,’कब्र खोदने’ की धमकी देते है, सोशल मीडिया हेड महिला सांसद की मंडी में बोली लगाती है और प्रवक्ता सेना को भद्दी गालियाँ देते हैं।” उन्होंने आगे लिखा, “मोहब्बत की दुकान नहीं, ‘राहुल की नफरत का गोदाम’।”

सोशल मीडिया पर यह वीडियो जमकर शेयर किया जा रहा है और कांग्रेस प्रवक्ता की भाषा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। डिबेट में तर्क-वितर्क ठीक है, कई बार नाराजगी भी जायज है लेकिन इस तरह की भाषा कतई ठीक नहीं है और लोग अब कांग्रेस से माँग कर रहे हैं कि आलोक शर्मा के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

खामेनेई की मौत पर रोने वाली सोनिया गाँधी 'गद्दाफी, सद्दाम और बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्याओं पर क्यों खामोश रहीं?


कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर मोदी सरकार की चुप्पी को लेकर केंद्र पर निशाना साधा
 उन्होंने कहा कि सरकार का ये रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है सोनिया गांधी के इस हमले पर बीजेपी ने पलटवार किया है। 2011 में लीबिया में गद्दाफी की मौत के समय यूपीए की सरकार थी, लेकिन तब सरकार ने गद्दाफी की मौत पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया था और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई थी

"2011 में जब लीबिया में नाटो हमलों के बीच भागते समय मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हुई थी, तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी उस समय भारत और लीबिया के बीच मजबूत संबंध थे वर्ष 2004 से 2007 के बीच भारत के सात मंत्रियों ने लीबिया का दौरा किया था, जिनमें तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे इसके बावजूद गद्दाफी की मृत्यु पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई उस समय न तो 'नैतिक जिम्मेदारी' पर भाषण दिए गए और न ही 'सभ्यतागत संबंधों' का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया "


विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति का संचालन भावनात्मक या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर किया जाता है भारत ने वर्तमान संकट के दौरान संयम, संप्रभुता के सम्मान और तनाव कम करने की अपील लगातार दोहराई है यह कहना कि भारत चुप है, तथ्यों का सरलीकरण है कूटनीति सार्वजनिक मंचों पर आक्रामक बयान देने का नाम नहीं, बल्कि परदे के पीछे संतुलित और सावधान संवाद की प्रक्रिया है

कहा गया कि आज खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक रह रहे हैं इनमें बड़ी संख्या केरल से है उनकी सुरक्षा, रोजगार और परिवारों की स्थिरता भारत सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय है क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण कुछ स्थानों पर सीबीएसई स्कूलों की परीक्षाएं स्थगित होने की खबरें भी सामने आईं, जिससे भारतीय छात्रों के शैक्षणिक जीवन पर असर पड़ा ऊर्जा क्षेत्र और समुद्री परिवहन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के सामने भी प्रत्यक्ष जोखिम की स्थिति बनी ऐसे में कोई भी गैर-जिम्मेदाराना बयान सीधे भारतीय समुदाय को प्रभावित कर सकता है

कांग्रेस नेतृत्व पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह चुनिंदा मुद्दों पर ही मुखर होता है आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के समय वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं दिखी, जैसी आज सरकार की कूटनीतिक भाषा पर दिखाई जा रही है. विदेश नीति को सांप्रदायिक या चुनावी नजरिए से देखना क्या उचित है, यह भी बहस का विषय बना हुआ है

ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई का रिकॉर्ड भी चर्चा में है बीते वर्षों में उन्होंने कई बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की दिल्ली दंगों को लेकर बयान, कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर टिप्पणियां, तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम पर प्रतिक्रिया—इन सब पर भारत ने सार्वजनिक आक्रामकता से बचते हुए संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया 2017 में उन्होंने कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की अपील की थी इसके बावजूद भारत ने संबंधों को पूरी तरह से तनावपूर्ण दिशा में नहीं जाने दिया

2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी तेहरान की प्रतिक्रिया को लेकर भारत में निराशा रही थी उस समय की रिपोर्टों में संकेत मिले थे कि ईरानी मीडिया के कुछ हिस्सों ने पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति दिखाई थी इसके बावजूद भारत ने संवाद के दरवाजे बंद नहीं किए

इतिहास के एक और अध्याय की ओर इशारा किया जा रहा है यूपीए सरकार के दौरान भारत ने 2005, 2006 और 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ मतदान किया था उस समय भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर वार्ता चल रही थी और भारत ने पश्चिमी देशों के साथ कदम मिलाया तब “सभ्यतागत संबंधों” की चर्चा उतनी प्रमुख नहीं थी, जितनी आज की राजनीतिक बहसों में दिखाई देती है

वैश्विक परिप्रेक्ष्य भी महत्वपूर्ण है. मौजूदा घटनाक्रम पर दुनिया के अधिकांश प्रमुख देशों ने अत्यधिक तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है रूस जैसे देश, जिन्हें ईरान का करीबी माना जाता है, उन्होंने भी संतुलित भाषा का प्रयोग किया है यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने भी संयम बरता है ऐसे में भारत पर यह अपेक्षा करना कि वह सबसे मुखर और आक्रामक बयान दे, क्या व्यावहारिक है?

विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश नीति को “चयनात्मक आक्रोश” के आधार पर नहीं चलाया जा सकता राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होती है भारत की ऊर्जा जरूरतें, खाड़ी देशों के साथ आर्थिक संबंध और वहां बसे करोड़ों भारतीयों का भविष्य किसी भी बयान से जुड़ा होता है

अंततः यह बहस ईरान या लीबिया से अधिक घरेलू राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है सवाल यह है कि क्या विदेश नीति को नैतिकता की सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनाया जाए या रणनीतिक संतुलन का उपकरण समझा जाए? 2011 में भी भारत ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी थी और आज भी वही सिद्धांत लागू होता दिखाई देता है

भारत कब और कैसे बोलेगा, यह उसका संप्रभु निर्णय है हर स्थिति में ऊंची आवाज ही प्रभावी कूटनीति का प्रमाण नहीं होती कई बार संयम ही सबसे सशक्त संदेश होता है। यही राज्यकला है, और यही परिपक्व कूटनीति की पहचान भी

सोनिया गांधी जो प्रधानमंत्री मोदी के ईरान पर कुछ ना बोलने पर विलाप कर रही है, उसका जवाब यह है: भारत की चुप्पी ही इस युद्ध में सबसे ऊँचा बयान है

सुभाष चन्द्र

"2011 में जब लीबिया में नाटो हमलों के बीच भागते समय मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हुई थी, तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। उस समय भारत और लीबिया के बीच मजबूत संबंध थे वर्ष 2004 से 2007 के बीच भारत के सात मंत्रियों ने लीबिया का दौरा किया था, जिनमें तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे इसके बावजूद गद्दाफी की मृत्यु पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई उस समय न तो 'नैतिक जिम्मेदारी' पर भाषण दिए गए और न ही 'सभ्यतागत संबंधों' का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया"

खामनेई अब नहीं रहे

अमेरिका और इजरायल ने मध्य-पूर्व की तस्वीर बदल दी

और भारत? कुछ नहीं बोला

न हमलों की निंदा,

न खामनेई के लिए शोक-संदेश,

न “हम ईरान के साथ हैं” का बयान

पूर्ण मौन

लोग पूछ रहे हैं: क्यों?

लेखक 
चर्चित YouTuber 
यह है असहज करने वाला सच

ईरान कभी भारत का मित्र नहीं था कभी भी नहीं

उसने मित्रता का अभिनय किया

मेज़ पर मुस्कुराया

चाबहार में भारत के निवेश का लाभ उठाया

दशकों तक भारत की सद्भावना को अपने हित में इस्तेमाल किया

और फिर क्या?

हर बार जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों ने भारतीय धरती पर भारतीयों का नरसंहार किया, ईरान मौन रहा

हर बार जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की, ईरान ने ओआईसी में भारत की निंदा की

कश्मीर के मुद्दे पर?

ईरान हर बार पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ

हर एक बार

चालीस वर्षों तक ईरान ने इस्लामी एकजुटता को हथियार की तरह इस्तेमाल किया

और उस हथियार का निशाना अक्सर भारत ही रहा

भारत ने हर बार यह याद रखा

यह चुप्पी कूटनीति नहीं है

यह स्मृति है

वह शासन, जिसने भारत की आतंकरोधी कार्रवाई को “आक्रामकता” कहा, अब समाप्त हो चुका है

वह सर्वोच्च नेता, जिसने 1.4 अरब भारतीयों के साथ आतंकवाद के विरुद्ध कभी खुलकर साथ नहीं दिया, अब नहीं रहा

और मोदी ने एक भी कूटनीतिक आँसू नहीं बहाया

यह कोई चूक नहीं है, यह एक निर्णय है

जो मौन में सुनाया गया — किसी भी प्रेस विज्ञप्ति से अधिक मुखर

लेकिन अधिकांश विश्लेषक एक बात समझ नहीं पा रहे हैं

भारत केवल इस युद्ध को देख नहीं रहा है

भारत उस स्थिति की रूपरेखा तैयार कर रहा है जो इसके बाद बनेगी

एक कठोर सत्य है, जिसे नकारना आसान नहीं

यह लेख किसी का whatsapp पर मिला है 

खामनेई का खुद का बयान भी सुनिए -

20 अगस्त 2018 को खामेनेई का ट्विटर पर संदेश

“प्रिय हज यात्रियों,

इस्लामिक उम्माह (मुस्लिम समुदाय) के लिए,

सीरिया, इराक, फिलिस्तीन, अफ़ग़ानिस्तान, यमन, बहरीन, लीबिया, पाकिस्तान, कश्मीर और म्यांमार तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में पीड़ित लोगों के लिए दुआ करना न भूलें

और आप अल्लाह से प्रार्थना करें कि वह अमेरिका और अन्य घमंडी शक्तियों तथा उनके समर्थकों के हाथ काट दे”

आज ईरान स्वयं इराक और बहरीन पर हमले कर रहा है

ऐसे में भारत का चुप रहना क्या गलत है?

कहीं खामेनेई के नाम पर रोना, कहीं लाशें बिछाने की धमकी: होली से पहले माहौल बिगाड़ने की तैयारी में फिर से इस्लामी कट्टरपंथी

                 होली में हिंदुओं को निशाना बनाने वाली घटनाएँ (प्रतीकात्मक फोटो साभार: AI-ChatGPT)
होली का त्योहार खुशियों, रंगों और मेल-मिलाप का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस बार माहौल सामान्य नहीं दिख रहा है। होली नजदीक आते ही कुछ जगहों पर अलग तरह की हलचल देखने को मिल रही है। कहीं ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई का रोना लेकर सड़कों पर उतरने की अपील की जा रही है, तो कहीं होली को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है। इसके मद्देनजर पुलिस प्रशासन भी सख्ती बरत रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी हिंदू त्योहार के आसपास तनाव खड़ा करने की कोशिश हुई हो। पिछले सालों में भी होली के समय हिंदुओं को निशाना बनाकर हिंसा फैलाई जाती रही है। कभी धमकियों से काम चलाया जाता है, तो कभी होली मना रहे हिंदुओं पर सीधा हमला किया जाता है। इसीलिए बीते कुछ सालों की घटनाओं को समझना जरूरी है, ताकि इसके पीछे कट्टरपंथियों का मकसद समझा जा सके।

दुनिया में जंग के बीच भारत में कट्टरपंथी बना रहे माहौल

जहाँ आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता का माहौल है, वहीं भारत शांति और सौहार्द के साथ होली की तैयारी कर रहा है। यह अपने आप में किसी अच्छे दिन से कम नहीं है। लेकिन कुछ कट्टरपंथी और वामपंथी समूहों को शायद यही बात खटक रही है। उन्हें यह स्वीकार नहीं हो पा रहा कि भारत में त्योहार शांति से मनाए जा रहे हैं, इसलिए होली से ठीक पहले माहौल बिगाड़ने की कोशिशें तेज होती दिख रही हैं।

अमेरिका और इजरायल के हमले में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत को लेकर कुछ समूहों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। दिल्ली के जामिया नगर, जंतर मंतर से लेकर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, लखनऊ और जम्मू-कश्मीर में बुर्का पहने महिलाएँ और कुर्ता-पायजामा पहने मर्द खामेनेई को ‘रहबर’ बताकर आँसू बहा रहे हैं और दूसरी तरफ अपने प्रधानमंत्री मोदी को गाली दे रहे हैं।

इस बीच सरकार ने संभावित हिंसा की आशंका को देखते हुए सतर्कता बढ़ा दी है। राज्य सरकारों को निर्देश दिए गए हैं कि ईरान-समर्थक कट्टरपंथियों की पहचान करें। इसके अलावा प्रो-ईरान कट्टरपंथी संगठनों, वैश्विक आतंकी संगठनों जैसे ISIS और अल-कायदा से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल्स पर भी कड़ी निगरानी रखने को कहा गया है।

होली के मद्देनजर नूहं में 600 जवान तैनात

हरियाणा के नूहं का नाम बीते कुछ सालों में कई बार तनाव और सांप्रदायिक हिंसा की खबरों के कारण चर्चा में रहा है। खासकर मजहबी जुलूसों के दौरान यहाँ माहौल बिगाड़ने की घटनाएँ सामने आई थीं, जिसके बाद प्रशासन को कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और भारी पुलिस बल की तैनाती जैसे कदम उठाने पड़े थे। इन घटनाओं ने नूहं को संवेदनशील श्रेणी में ला खड़ा किया, जहाँ हर बड़े त्योहार से पहले अतिरिक्त सतर्कता जरूरी मानी जाती है।

इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए साल 2026 की होली से पहले भी नूहं में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस के 600 जवान तैनात किए गए हैं। संवेदनशील इलाकों में ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी की तैयारी है और अफवाहों पर नजर रखने के लिए साइबर टीम को सक्रिय किया गया है।

मथुरा की होली पर भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए 9 यूट्यूबरों पर FIR

मथुरा की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार और लड्डूमार होली को लेकर सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 9 यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। इन लोगों ने पिछले साल के विवादित वीडियो क्लिप्स को इस साल 2026 की होली से जोड़कर वायरल किए।

इन एडिटेड वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि बरसाना और नंदगाँव की होली के दौरान अव्यवस्था और अभद्रता हुई है। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(2) (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाना) और 353(2) के साथ-साथ IT ऐक्ट की धारा 67/67A के तहत मामला FIR दर्ज की है।

होली पर हिंदुओं को जान से मारने की धमकी

इसी तरह साल 2025 की होली में भी माहौल खराब करने का प्रयास किया गया था। उत्तर प्रदेश के बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र से 22 फरवरी 2025 को खबर आई थी कि वहाँ कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू युवकों को धमकी दी कि अगर उन्होंने होली मनाई तो उनकी लाशें बिछा दी जाएँगी। जब मामला उठा तो पुलिस ने मामले की जाँच की और इस केस में अयान, सलमान, अमन, रेहान, समेत कई के खिलाफ एक्शन लिया गया।

AMU में हिंदुओं को होली मनाने से इनकार, बाद में मिली परमिशन

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदू छात्रों ने होली मनाने की परमिशन माँगी थी, लेकिन प्रशासन ने ये कहकर साफ इनकार कर दिया कि वो नियमों में बदलाव नहीं करेंगे और जिसे होली मनानी है वो हॉस्टल में रहकर मनाए। हालाँकि, बाद में खबर आई कि वहाँ मशक्कत के बाद हिंदू छात्रों को होली खेलने की परमिशन दी गई।

हिंदू पिता और बेटी पर फैजान ने फेंका खौलता पानी

इसी तरह, साल 2024 में मध्यप्रदेश के धार के घाटाबिल्लोद गाँव से होली वाले दिन हिंदू बेटी-पिता पर खौलता पानी डालने का मामला प्रकाश में आया था। दरअसल, गाँव में पायल तिवारी नाम की लड़की और उसके पिता राकेश तिवारी ने अपने पड़ोसी फैजान से रंग धुलने के लिए पानी माँगा था, उस समय फैजान ने पानी देने की बजाए उनके ऊपर खौलता पानी डाल दिया था।इस घटना में लड़की का चेहरा बुरा तरह जल गया था।

‘नमाज के वक्त नहीं बज सकते गाने’

एक अन्य घटना 25 मार्च 2024 की है। तेलंगाना के मेडचल-मलकजगिरी जिले के चेंगिचेरला इलाके में होली का त्योहार मनाते समय हिंदुओं पर मुस्लिमों की भीड़ ने धावा बोल दिया था और धमकी देकर हिंदुओं को कहा गया था कि नमाज के वक्त कोई गाने नहीं बजा सकते। इस हमले के वक्त भीड़ ने महिलाओं को भी निशाना बनाया था।

होली के वक्त पथराव

साल 2024 में होली पर हिंदुओं को निशाना बनाने का एक मामला आगरा के रकाबगंज से भी आया था। इस घटना में मुस्लिम समुदाय के लगभद दो दर्जन उपद्रवियों ने जमील नामक व्यक्ति के नेतृत्व में हिंदुओं पर पथराव किया था जिसमें कई लोग घायल हुए थे। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए जमील, सलीम, रहीस, शौकत समेत 34 नामजद और 50 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।

AMU में होली पर हमला

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इस बार हिंदुओं को जहाँ पहले होली मिलन समारोह आयोजित करने से ही मना कर दिया गया था। वहीं, 2024 में 21 मार्च को जब एएमयू में हिंदुओं ने परिसर में होली खेलने का प्रयास किया था तो उस दिन उनपर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा बड़ा हमला कर दिया गया था। इस घटना में अलीगढ़ पुलिस ने मिसवा, जाकीउर्ररमान, जैद, शेरबानी, शाहरुख सबरी और अन्य मुस्लिम छात्रों पर एफआईआर भी की थी।

चंदा वसूली के दौरान टूटे इस्लामी कट्टरपंथी

2023 की बात करें तो होलिका दहन के दिन उत्तर प्रदेश के मेरठ में चंदा वसूली के दौरान हालात बिगड़े थे। उस समय चंदा इकट्ठा करने गए हिंदुओं पर मुस्लिम समूह ने न केवल होलिका पर लात मारी थी बल्कि हिंदुओं पर हमला किया था और फिर जमकर पत्थरबाजी हुई थी। पुलिस ने इस विवाद के बाद तीन लोगों को हिरासत में लेकर अपनी कार्रवाई की थी।

रंग लगने पर भड़का शब्बीर, दोस्त को पेट्रोल डाल जलाया

तेलंगाना के मेदक के मारापल्ली गाँव से विवाद 2023 में भी होली पर उठा था। उस समय होली के दिन एक मोहम्मद शब्बीर नामक मुस्लिम व्यक्ति ने रंग लगने से नाराज होकर दोस्त अंजैया को पेट्रोल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया था।

खामेनेई का अंत और इतिहास की परिक्रमा

डॉ राकेश कुमार आर्य
अमेरिका और इजरायल ने अपनी संयुक्त रणनीति के अंतर्गत काम करते हुए ईरान के राष्ट्रपति खामेनेई का अंत कर दिया है। अमेरिका ने एक बार फिर दिखाया है कि वह अपने शत्रु का अंत करके ही रुकता है। अबसे पहले उसने ओसामा बिन लादेन, कर्नल गद्दाफी जैसे एक नहीं अनेक तानाशाहों या आतंकियों को ठिकाने लगाकर ही दम लिया है। खामेनेई इस समय अमेरिका और इजरायल के निशाने पर था। इसराइल ने भी अपने राष्ट्रीय पराक्रम का परिचय दिया है और संसार के लिए नया संदेश दिया है कि शत्रु चाहे कितना ही बड़ा हो, यदि आपके हौसले बुलंद हैं तो शत्रु का मिटना निश्चित है।
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता
तनिक याद कीजिए 1979 से 1989 के बीच का वह दौर, जब ईरान पर आयतुल्लाह खुमैनी का शासन हुआ करता था। उस दौर में वहां पर शासन के द्वारा ही हजारों लोगों की हत्या की गई थी। अभी जनवरी 2026 में भी वहां पर हजारों की संख्या में उन लोगों की हत्या कर दी गई जो खामेनेई शासन का विरोध कर रहे थे। इस प्रकार आयतुल्लाह खुमैनी और उनके उत्तराधिकारी के द्वारा बड़ी संख्या में अपने ही देश के लोगों का नरसंहार किया गया। इस प्रकार के नरसंहार पर भारत का कोई भी राजनीतिक दल, मुस्लिम संगठन या कोई भी राजनीतिक नेता कुछ भी नहीं कह रहा है। लगता है यह सब कुछ वैधानिक ढंग से हुआ और जिन लोगों की हत्याएं आयतुल्लाह परिवार के शासनकाल में की गईं, वे सचमुच अपराधी थे ?
अपने मूल विषय पर आने से पहले हम यह भी कहना चाहते हैं कि क्या यहूदियों , पारसियों या किसी भी अन्य मजहब के व्यक्ति को किसी मुस्लिम देश में रहने का अधिकार नहीं है ? क्या उन्हें इस धरती पर भी रहने का अधिकार नहीं है ? यदि है तो हमारी सोच में दोगलापन क्यों है कि हमें एक की हत्या पर आंसू बहाते हैं और दूसरे की हजारों हत्याओं को भी हम मानवता के हित में किया गया पुण्य कार्य मान लेते हैं ? यहूदी लोगों ने अपनी जान हथेली पर रखकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी है। आज भी लड़ रहे हैं और उनके पराक्रमी स्वभाव को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि वह भविष्य में भी तब तक लड़ते रहेंगे, जब तक वह अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं कर लेंगे या किन्हीं शक्तियों के द्वारा उनका अस्तित्व पूर्णतया मिटा नहीं दिया जाएगा । क्या अस्तित्व के लिए लड़ना भी पाप है या उनका अल्पसंख्यक होना केवल उन्हें मृत्यु का अधिकारी बना देता है ?
जो लोग इस प्रकार की सोच से ग्रसित हैं कि यहूदियों के लिए केवल मौत ही एकमात्र ईलाज है, वह मानवता के शत्रु हैं और जो लोग इन मानवता के शत्रुओं का मौन रहकर या स्पष्ट शब्दों में समर्थन करते हैं वह और भी बड़े अपराधी हैं।
आज जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला , वहां की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सहित कुछ दूसरे मुस्लिम संगठन ,राजनीतिक दलों के नेता और कुछ दूसरे सेक्युलरिस्ट जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति खामेनेई की हत्या पर छाती पीट रहे हैं या कठोर टिप्पणी देकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं और कह रहे हैं कि यह नाइंसाफी है, उन्हें ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के पापों को देखना चाहिए। उसके परिवार के द्वारा किए गए अपराधों को देखना चाहिए ,उसके शासन में मानवता के विरुद्ध हुए अपराधों की जांच पड़ताल करनी चाहिए। इजरायल ईरान के इस युद्ध में यह देखना चाहिए कि मानवता के विरुद्ध अपराध कौन कर रहा है ? अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाला इसराइल या दूसरे के अस्तित्व को मिटाने के लिए कृतसंकल्प ईरान?
किसी भी देश को और संसार को सांप्रदायिक मान्यताओं के आधार पर हांका नहीं जा सकता । यदि सांप्रदायिक मान्यताओं के आधार पर संसार को हांकने का प्रयास किया गया तो जंगलराज आना स्वाभाविक है । वैसे हमें इस प्रकार के जंगलराज के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जहां-जहां सांप्रदायिकता अपना नंगा नाच दिखा रही है, वहां-वहां पर जंगलराज स्थापित हो चुका है। जितने भर भी युद्ध हो रहे हैं वह सभी सांप्रदायिक शक्तियों के द्वारा लड़े जा रहे हैं। यहां तक कि शासन में बैठे लोगों को भी हमें निष्पक्ष शासक वर्ग नहीं समझना चाहिए। उनकी सोच भी उस समय सांप्रदायिक हो जाती है. जब वह अपने देश की जनता की सांप्रदायिक भावनाओं के अनुरूप दूसरे देशों को डराते धमकाते हैं या किसी दूसरे मजहब के लोगों के अस्तित्व को मिटाने के लिए अपना खुला या मौन समर्थन देते हैं। शासन में बैठे लोगों का राजधर्म यह नहीं होता कि वह जनता की सांप्रदायिक भावनाओं के अनुसार चलें। इसके विपरीत उनका राजधर्म होता है कि वह अपने देश की जनता को संस्कारवान और चरित्रवान बनाएं। संसार भर में दूसरे मजहबों के लोगों को भी जीने का अधिकार देने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें। इस दिशा में कदम उठाते हुए ईरान के अयातुल्लाह खुमैनी परिवार ने क्या अपने देश में कोई भी ऐसी यूनिवर्सिटी स्थापित की, जिसमें चरित्रवान, ज्ञानवान और संस्कारवान समाज बनाने पर बल दिया जाए ? लोगों को दूसरे लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए ? दूसरों के जीवन का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए ? और संसार को स्वर्ग बनाने के लिए एक वृहद योजना पर काम किया जाए ? यदि इस दिशा में एक भी काम नहीं किया गया है तो फिर ऐसे किसी भी तानाशाह का मर जाना ही अच्छा होता है जो लोगों को खूनी जंग में भेजने के अतिरिक्त कुछ दूसरा काम ही न कर पाए।
जो राजा जनता के अधिकारों पर हावी होकर शासन करता हो अर्थात रक्तपात में विश्वास करता हो, वह राजा नहीं होता।
जितनी सांप्रदायिक शक्तियां अर्थात देश की सेना और देश के शासनाध्यक्ष या राष्ट्राध्यक्ष इस प्रकार की लड़ाई को अपना समर्थन दे रहे हैं, उन सबके बारे में समझ लेना चाहिए कि वे सभी के सभी आतंकवादी हैं। जो मजहबी मान्यताओं से संसार को हांकने का उपक्रम कर रहे हैं , उनका यह उपक्रम संसार को मिटाने के लिए किया जाने वाला कार्य समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि आतंकवाद की कमर टूटनी ही चाहिए।
भारत में जो लोग ईरान के राष्ट्रपति की हत्या पर छाती पीट रहे हैं उन्हें ईरान के शहरों में हो रहे उन प्रदर्शनों की ओर भी ध्यान देना चाहिए जिनमें सम्मिलित लोग अपने राष्ट्रपति की हत्या के उपरांत उत्सव मना रहे हैं। कॉलेजों में पढ़ रही लड़कियों ने अपने हिजाब फेंक दिए हैं और वह अब अपने आप को आजाद अनुभव कर रही हैं। इधर भारत में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत पर कहा है, "हमें यह भी पक्का करना चाहिए कि जम्मू और कश्मीर में जो लोग शोक मना रहे हैं, उन्हें शांति से शोक मनाने दिया जाए. पुलिस और प्रशासन को बहुत संयम बरतना चाहिए और बल या रोक लगाने वाले तरीकों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। "
इन्हीं उमर अब्दुल्ला ने अपने ही प्रदेश से जबरन निकाले गए उन लाखों हिंदुओं के बारे में कुछ नहीं कहा है जो आज देश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और जिन्हें उनके ही पिता के शासनकाल में जम्मू कश्मीर से निकाल दिया गया था। इन्हें यहूदियों के मारे जाने पर भी कोई शिकायत नहीं है, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मारे गए लाखों करोड़ों हिंदुओं का दर्द भी इन्हें दर्द दिखाई नहीं देता। जब शासन में बैठे लोग भी हर चीज को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखने लगते हैं तो जनसाधारण की जिंदगी बहुत सस्ती हो जाती है। उनका खून भी पानी के भाव सड़क पर बहने के लिए विवश हो जाता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में मारे गए लाखों करोड़ों हिंदुओं की हत्या पर या उनके साथ की ज्यादतियों पर यदि भारत के मुस्लिम संगठनों, नेताओं से कुछ बोलने के लिए कहा जाता है तो कह देते हैं कि यह उन देशों का अंदरूनी मामला है। इस पर हम कुछ नहीं बोलेंगे और जब ईरान का राष्ट्रपति मारा जाता है तो भारत में प्रदर्शन करने के लिए इसे एक अच्छा हथियार बनाया जाता है। तब कहा जाता है कि यह इंसानियत का मामला है, यानी हिंदू का मामला इंसानियत का मामला नहीं है, मुसलमान का मामला इंसानियत का मामला है।
पीडीपी नेता और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने ईरान के राष्ट्रपति की मृत्यु पर कहती हैं, "आज इतिहास में एक बहुत ही दुखद और शर्मनाक मोड़ आया है, जब इसराइल और अमेरिका ईरान के प्रिय नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर शेखी बघार रहे हैं।"
उनका कहना है, "इससे भी ज़्यादा शर्मनाक और चौंकाने वाली बात यह है कि मुस्लिम देशों ने खुले तौर या ख़ामोशी से इसका समर्थन किया, जिन्होंने ज़मीर के बजाय सुविधा और फ़ायदे को चुना। इतिहास इस बात का सबूत होगा कि किसने न्याय के लिए लड़ाई लड़ी और किसने ज़ालिमों की मदद की।"
ध्यान रहे कि महबूबा मुफ्ती ने भी आज तक जम्मू कश्मीर से निकाले गए लाखों हिंदू पंडितों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए एक शब्द भी नहीं कहा है। जिनकी सोच में मजहब रहता है, जिनके कार्य में मजहब रहता है, जिनकी नीतियों में मजहब रहता है, उनसे आप इस प्रकार की सांप्रदायिक सोच के अतिरिक्त दूसरी बातों की अपेक्षा भी नहीं कर सकते।
वास्तव में जिन लोगों ने पिछली कई शताब्दियों में दूसरे मजहबों के लोगों पर अत्याचार किए हैं,उनके घरों में आज भी शांति नहीं है। अतीत में किए गए पाप उन्हें चैन से सोने नहीं दे रहे हैं। वह आज भी हिंसा में संलिप्त हैं और बुरी मौत मारे जा रहे हैं। ब्रिटेन जो कभी 1947 में भारत को सांप्रदायिक आधार पर बांट कर गया था और मुसलमानों का हितैषी बनता था, आज इस्लामिक आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित है। वहां की सड़कों पर इस्लाम को मानने वालों ने वहां के मूल निवासियों का निकलना बंद कर दिया है। इतिहास जब अपनी परिक्रमा पूर्ण करता है तो वह बड़ी भयानक होती है। इसी को नियति कहते हैं।  

लड़ाई के लिए उकसाने वाले सऊदी अरब पर चुप्पी क्यों? शिया उबल रहे हैं लेकिन सुन्नी क्यों खामोश हैं जबकि ईरान सुन्नी देशों पर हमले कर रहा है; कांग्रेस एक बार फिर नग्न हुई

सुभाष चन्द्र

ईरान-अमेरिका-इजराइल लड़ाई ने नूपुर शर्मा विवाद को ताज़ा कर दिया। नूपुर ने वही कहा जो इनकी इस्लामिक किताबों में लिखा है और उस बात को बोलने के उकसाने वाले तास्सुबी तस्लीम पर सभी मुस्लिम कट्टरपंथियों ने चुप्पी साध ली और हिन्दू नूपुर को कसूरवार ठहरा दिया। ठीक वही हालत ईरान-अमेरिका-इजराइल लड़ाई में सामने आयी है। मार्च 2 को टीवी पर जमी चौपालों(परिचर्चाओं) में सऊदी अरब का नाम सामने आया, जिसके उकसाने पर ईरान पर हमला हुआ। लेकिन महामूर्ख अमेरिका और इजराइल को कसूरवार बता मुस्लिम मुल्क सऊदी अरब के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा, क्यों? गैर-मुस्लिम को दोषी बताकर असली दोषी मुस्लिम मुल्क सऊदी अरब को बचाया जा रहा है, क्यों? आखिर दोगलेपन की भी हद होती है। बिना सच्चाई जाने क्यों गैर-मुस्लिमों को कसूरवार ठहराया जाता है?     

अमेरिका और इज़रायल का ईरान पर हमला हुआ जिसमें सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत हो गई लेकिन कांग्रेस की बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिए कि इस हमले के लिए भी मोदी को दोष दे रहे हैं क्योंकि हमला मोदी की इज़रायल यात्रा ख़त्म होने के अगले दिन शुरू हुआ ओवैसी मोदी से पूछ रहा है कि आपने बताया क्यों नहीं कि इज़रायल हमला करेगा ऐसे सवाल कांग्रेस के ढक्कन भी कर रहे हैं। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नेतन्याहू और ट्रंप क्या मोदी को बता कर हमला करते और मोदी को अगर हमले की भनक थी भी तो क्या उससे उम्मीद करते हो कि वो ढोल बजा कर ऐलान करता कि कल ईरान को पेला जाएगा वह भी तब, जब ईरान के साथ भी हमारे संबंध ख़राब नहीं हैं वह बात अलग है कि खामनेई Operation Sindoor में पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा था

ईरान के लिए भारत में टसुए बहाने वालों को यह मालूम होना चाहिए कि ईरान एक बार नहीं बार बार ऐलान कर चुका है और उसने आज भी कहा है कि वो इज़रायल को दुनिया के नक़्शे से मिटा देगा और उसी के लिए वह एटम बम बना रहा है ऐसे में क्या इज़रायल हाथ पे हाथ धरे बैठा रह सकता है ईरान की पहुंच अमेरिका तक सीधे तो नहीं है और इसलिए वह अमेरिका के गल्फ देशों में उसके ठिकानों को निशाना बना रहा है, साथ में इज़रायल को भी पहले ही दिन ईरान खामनेई के साथ 40 वरिष्ठ लीडर भी खो चुका है वो 40 लोग कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे क्योंकि उनके साथ खामनेई गुप्त बैठक कर रहा था जब हमले में सब मारे गए जिनमें खामनेई के परिजन भी शामिल थे

कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा है कि “हम भारत के लोग मोदी, नेतन्याहू और ट्रंप के खिलाफ खड़े हैं” कांग्रेस अपने को भारत के लोग कैसे समझ बैठी और कल तक तो ट्रंप के लिए ताली बजाता था राहुल गांधी जब उसने भारत की इकोनॉमी को डेड कहा था कांग्रेस ने अमेरिका और इज़रायल के हमले को शिया मुसलमानों पर हमला बताया है। कांग्रेस केवल भारत के खिलाफ है

शायद इसलिए ही कश्मीर और लखनऊ में शिया मुसलमान छातियां पीट रहे हैं और खामनेई की मौत पर मातम मना रहे हैं इधर दिल्ली में भी धरना प्रदर्शन किया है शियाओं ने और कुछ महिलाएं कह रही हैं कि मोदी उन्हें इज़ाज़त दे कि वो ईरान जाकर इज़रायल और अमेरिका से लड़ सकें सारे शिया जाएं कौन रोकता है, गाज़ा तो कोई नहीं गया पहले देख लो ऐसे माहौल में ईरान वीसा भी देगा

लेकिन सवाल यह उठता है कि शियाओं का खामनेई मारा गया तो वो उबल रहे हैं मगर सुन्नी क्यों चुप है जब शिया ईरान सुन्नी देशों पर हमले कर रहा है Bahrain, Kuwait, Qatar, UAE, Jordan, Qatar और Oman सब पर ईरान हमले कर रहा है और सभी सुन्नी देश हैं, फिर भारत के सुन्नी मुसलमानों का खून ईरान के खिलाफ क्यों नहीं उबल रहा क्या उन्हें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता

जो कश्मीर, लखनऊ और दिल्ली में शिया मुसलमान विलाप कर रहे हैं, उन्हें सोचना पड़ेगा कि उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी पर कैसे विश्वास किया जा सकता है मतलब साफ़ है कि कल को अगर ईरान ही भारत पर हमला कर दे तो ये लोग तो भारत के खिलाफ ही लड़ेंगे

Jammu Kashmir Students Association ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की है कि वो ईरान में फंसे 1200 कश्मीरी छात्रों को निकालने का प्रबंध करें यहां से ईरान जाकर लड़ने की बात कर रहे हैं शिया तो उन्हें लाने का क्या फायदा

एक बात और, POJK में भी शिया आबादी ज्यादा है और वहां के मुसलमान हंगामा कर रहे हैं ट्रंप और नेतन्याहू के खिलाफ फिर POJK ऐसे मुसलमानों के साथ भारत में मिलाने से क्या फायदा क्योंकि वो और कश्मीर के शिया दोनों मिलकर भारत के विरुद्ध ही लड़ेंगे इसलिए POJK लेना है तो बिना वहां की आवाम के जिन्हें पाकिस्तान में धकेल देना चाहिए

 

US-इजरायल ने ईरान में 30 ठिकानों को बनाया निशाना, राष्ट्रपति के आवास और इंटेलिजेंस मुख्यालय पर भी हमला: ‘सुरक्षित ठिकाने’ पर छिपे खामेनई

                                            ईरान के 30 ठिकानों पर हमला (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
अमेरिका और इजरायल ने शनिवार (28 फरवरी 2026) को ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया। राजधानी तेहरान में एक के बाद एक कई जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं जिससे पूरे शहर में दहशत का माहौल बन गया। US और इजरायल ने ईरान में एक साथ 30 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन हमलों में ईरानी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास और एक खुफिया मुख्यालय को भी निशाने पर लिया गया है। हमले इतने व्यापक थे कि कुछ ही घंटों में कई प्रमुख जगहों पर धमाकों की खबरें सामने आईं। वहीं, रॉयटर्स को एक सूत्र ने बताया कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनई तेहरान में नहीं हैं और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया गया है।

ईरानी अखबार Shargh की रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान के उस इलाके से धुआँ उठता दिखाई दिया है जहाँ ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई रहते हैं। तेहरान के कई स्थानीय निवासियों ने भी बताया कि उसी क्षेत्र से धुआँ उठता देखा गया जहाँ राष्ट्रपति भवन और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का मुख्यालय भी स्थित है।

ये हमले शनिवार सुबह हुए उस समय हुए जब लाखों लोग अपने काम पर थे और बच्चे स्कूल में मौजूद थे। तेहरान के लोगों ने शहर में अफरातफरी और दहशत जैसे हालात होने की बात कही है। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका की ओर से दर्जनों हवाई हमले किए जा रहे हैं। इन हमलों को मध्य पूर्व के विभिन्न सैन्य ठिकानों और एक या उससे अधिक विमानवाहक पोतों से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमानों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई पिछले साल जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए अमेरिकी हमलों से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है।