उत्तर प्रदेश : सपा के सचेतक कमाल अख्तर ने पहले किया MP रुचि वीरा को बेईज्जत, अब दिया पद से इस्तीफा: कुछ दिन पहले विशंभर यादव ने MP कृष्णा पटेल को सिखाई थी ‘तमीज’, क्या फँस रहे अखिलेश?

                 अखिलेश यादव के आगे हाथ जोड़ खड़े होने वाले कुँवर रेवती रमण सिंह स्टूल पर पैर फैलाये बैठे 
उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने जो जख्म दिए है योगी ने तो उसका पासंग भी वसूल नहीं किया। पंचायत से लेकर लोक सभा और राज्य सभा में अधिकतर सदस्य मुलायम सिंह परिवार से हैं। इस पार्टी ने अपने परिवार के अलावा किसी का भला नहीं किया। हिन्दू त्यौहारों पर इतनी पाबंदियां थी कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के निकट रहने वाले हिन्दू खुलकर अपना त्यौहार नहीं मना सकते थे, लेकिन आज खुलकर मनाते हैं।  

उत्तर प्रदेश में सियासत नितरोज हिचकोले ले रही है जिसे समझना बहुत मुश्किल हो रहा है। इधर अखिलेश यादव राममन्दिर चढ़ावे की चोरी को लेकर योगी आदित्यनाथ और बीजेपी को घेर रहे हैं तो उधर इनकी ही समाजवादी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रभु श्रीराम की अगर यही लीला रही 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव में अखिलेश की नैया डूबने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। सूत्रों के हवाले से इस चुनाव में MY(मुस्लिम-यादव) भी नाकाम हो रहा है। जिस तरह 2017 से मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने सनातन पर कीजड़ फेंके जाने अन्य हिन्दुओं के अलावा यादव समाज भी समाजवादी पार्टी से नाराज है। दूसरे, योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि "अखिलेश यादव मथुरा मन्दिर पर खुलकर बोलकर दिखाएं।"         

कुँवर रेवती रमण सिंह ने अखिलेश यादव को उनकी औक़ात दिखा दी है। किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा होगा।
'व्हाइट हाउस' में रहने वाले सामंतवादी अखिलेश यादव जब उनसे मिलने प्रयागराज पहुँचे तो रेवती रमण सिंह ने एक स्टूल मँगाया। उस स्टूल को अखिलेश यादव के सामने रखा गया। फिर कुँवर साहब ने उसी पर पाँव रखा।
इसके पीछे भी कारण है। अब चुनाव है तो अखिलेश यादव उनके दरवाजे पर हाजिरी लगा रहे हैं।
ये वही अखिलेश यादव हैं जिन्होंने 2024 में कुँवर साहब की जगह राम मंदिर के विरोध में केस लड़ने वाले कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजा था।
इसके बाद सिंह परिवार ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी, जबकि कुँवर रेवती रमण सिंह सपा के सह-संस्थापक रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को पहली बार औक़ात तब दिखाई जब उन्होंने अपने बेटे को न केवल कांग्रेस का टिकट दिलवाया बल्कि प्रयागराज लोकसभा क्षेत्र से जिता भी दिया। 42 साल बाद इस सीट पर कांग्रेस जीती।
अखिलेश यादव को याद रखना चाहिए कि जब उनके पिता मुलायम सिंह यादव की कोई औक़ात नहीं हुआ करती थी, तब कुँवर साहब संयुक्त उत्तर प्रदेश में नेता-प्रतिपक्ष हुआ करते थे। 'जनता दल' के स्तम्भ थे। स्वयं 8 बार विधायक, 2 बार लोकसभा सांसद रहे। मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता को हराया। राज्यसभा सांसद बने। बेटे को भी विधायक, मंत्री और सांसद बनाया।
अखिलेश यादव को इस बेइज़्ज़ती के बाद अब याद करना चाहिए कि कैसे 2 वर्ष पूर्व जब कुँवर रेवती रमण सिंह लखनऊ में अस्पताल में भर्ती थे तब यही अखिलेश यादव उनका हालचाल तक लेने नहीं गए थे। प्रयागराज गए तो उनसे मिले नहीं।

अब चिड़िया चुग गई खेत तो...

समाजवादी पार्टी के अंदरखाने बीते एक हफ्ते में प्रदेश के अलग-अलग जिलों में समाजवादी पार्टी के नेता कभी मुखिया अखिलेश यादव के सामने अनाप-शनाप बातें तो कभी उनके खिलाफ नारेबाजी करते दिख रहे हैं। पार्टी में MY समीकरण हावी हो रहा है। इसके 2 हालिया उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें सपा की महिला सांसदों को यादव-मुस्लिम नेताओं के हाथों सार्वजनिक रूप से बेईज्जत होना पड़ा।

पिछले हफ्ते पीडीए की बैठक में मुरादाबाद से सांसद रुचि वीरा को न बुलाने और कार्यक्रम में पोस्टर और बैनर से उनका फोटो हटाने का विवाद गरमाया। इसके बाद लखनऊ में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बैठक बुलाई जिसमें मुरादाबाद के 5 बड़े नेताओं को शामिल किया गया।

बैठक में शामिल राज्यसभा सांसद जावेद अली, पूर्व मंत्री और विधायक कमाल अख्तर, जिला अध्यक्ष जयवीर यादव और पूर्व विधायक युसूफ अंसारी के सामने सांसद रुचि वीरा ने अपनी शिकायत रखी और इसके पीछे कमाल अख्तर की भूमिका की बात भी कह डाली।

हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैठक में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ही रुचि वीरा और कमाल अख्तर के बीच तीखी बहस हुई। इसके बाद रुचि वीरा ने कमाल अख्तर पर कार्रवाई की माँग कर डाली।

हालाँकि इसके बाद मंगलवार (30 जून 2026) को कमाल अख्तर ने अपने मुख्य सचेतक के पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे ने एक बार फिर यह जता दिया कि रुचि वीरा के साथ हुए उनके विवाद केवल बहस नहीं थी, बल्कि यह मामला अब संगठनात्मक स्तर तक पहुँच चुका है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के बांदा में समाजवादी पार्टी की बैठक हुई, जिसमें सांसद कृष्णा देवी और विधायक विशंभर यादव के बीच विवाद हो गया। इस दौरान विधायक ने सांसद कृष्णा देवी को उंगली दिखाते हुए तमीज से बात करने का ज्ञान दे डाला। लगभग आधे घंटे तक चली इस गहमागहमी दौरान सपा कार्यकर्ता दोनों को शांत करने की जद्दोजहद में लग रहे।

बांदा वाला मामला अब तक ठंडा नहीं हुआ था कि तीसरा मामला प्रयागराज से आ गया। जहाँ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पहुँचने पर अंजान आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाये और ‘गो बैक’ के नारे लगाए।

इसके बाद सपा के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने गुंडई दिखानी शुरू कर दी और काला झंडा दिखा रहे अंजान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आशीष दुबे और भदोही के जिला अध्यक्ष की जमकर पिटाई कर दी। पुलिस के पहुँचने पर मामला शांत हुआ।

यह सभी घटनाएँ समाजवादी पार्टी के अंदर चल रही उठापटक को जनता के सामने लेकर आ रही हैं। रुचि वीरा और सांसद कृष्णा देवी के साथ चल रहे विवाद समाजवादी पार्टी के लिहाज से इस बात को जनता के सामने लेकर आ रहे हैं कि सपा में महिला जनप्रतिनिधि की भूमिका कुछ खास बेहतर स्थिति में नहीं है।

छोटे से वानुअतू ने तोड़ा ‘ड्रैगन’ का गुरूर, कहा- अपनी जमीन का नहीं करने देंगे सैन्य इस्तेमाल: ऑस्ट्रेलिया के साथ की खास डील, बौखलाया चीन


ऑस्ट्रेलिया और वानुअतू ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसे नाकामल समझौता कहा जा रहा है। समझौते को चीन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि अब वानुअतू अपनी जमीन को चीनी मिलिट्री बेस के लिए इस्तेमाल करने नहीं देगा।

वानुअतू के एयरपोर्ट और पावर ग्रिड जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को किसी भी विदेशी सैन्य हस्तक्षेप या अनधिकृत पहुँच से मुक्त रखा जाएगा। चीन अक्सर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के बहाने छोटे देशों में अपनी दखलअंदाजी बढ़ाने में लगा हुआ है। वह प्रशांत महासागर के छोटे-छोटे द्वीप देशों में अपना नौसैनिक ठिकाना बनाने की कोशिश कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया में वानुअतू के प्रधानमंत्री जोथम नापत के साथ ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री अल्बानीज ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बानीज ने कहा, “यह समझौता ऑस्ट्रेलिया को यह आश्वासन देता है कि वानुअतू में कोई भी विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित नहीं किया जाएगा।”

प्रधानमंत्री अल्बानीज ने कहा कि दोनों पक्ष सामूहिक सुरक्षा, प्रत्येक राष्ट्र की सुरक्षा के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया और वानुअतू दोनों की संप्रभुता की रक्षा के उद्देश्य से ‘संतुलित समझौते’ पर पहुँचे हैं।

ऑस्ट्रेलिया लगातार इस बात पर चिंता जताता रहा है कि चीन दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में दीर्घकालिक मौजूदगी को बनाए रखने के लिए मिलिट्री बेस बनाने में लगा हुआ है। चीनी नौसेना ने भी बार-बार वानुअतू के बंदरगाहों पर जहाज भेजे हैं।

वानुअतू के प्रधानमंत्री ने कहा कि यह समझौता बुनियादी ढाँचे के सैन्यीकरण को रोकने के लिए देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा, “एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में, हमने संसद में एक कानून पारित किया है। इसके तहत किसी भी महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

एएफपी के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य ‘सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना और प्रशांत द्वीपीय देशों की संप्रभुता की रक्षा करना’ है

नए समझौते के तहत, ऑस्ट्रेलिया और वानुअतू पुलिस प्रशिक्षण और उपकरण, कानून प्रवर्तन, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और बुनियादी ढाँचागत विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करेंगे।

पाकिस्तान में छिपे ISIS आतंकियों को अफगान फोर्स ने चुन-चुनकर मारा, कई जगह बम बरसाकर ठिकाने किए तबाह


आतंकवादियों का अड्डा बना पाकिस्तान आखिर कब तक आतंकवाद को पालता रहेगा? वैसे इसका कारण भी है कि इन्ही आतंकियों के लालन-पालन के नाम पर पाकिस्तान हाथ में कटोरा लिए घूमता रहता है। और आतंकवाद को गुप्त समर्थन देने वाले भीख देते रहते हैं। ओसामा बिन लादेन को घर में छिपाए रखने के बावजूद उसे ढूंढने के नाम पर अमेरिका से माल खींचता रहा, आखिर में मिला पाकिस्तान में ही और अमेरिका ने 72 हूरों के पहुंचा दिया।    

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव की वजह से हालात तनावपूर्ण हैं। अफगान वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर ISIS के ठिकानों पर हमला किया है। उन्होंने कहा है कि ‘हम हर खतरे को निशाना बनाएंगे’।

अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने दावा किया है कि पाकिस्तान में मौजूद आईएसआईएस के ठिकानों से अफगानिस्तान में हमले की साजिश रची जा रही थी। अफगानिस्तान का ये हमला पाकिस्तानी हवाई हमले के दो दिन बाद किया गया है।

तालिबान का कहना है कि ये कार्रवाई बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में की गई है। तालिबानी हवाई हमले में खैबर पख्तूनख्वा के एक स्कूल को टारगेट किया गया क्योंकि यहाँ आईएसआईएस-के आतंकियों के छिपे होने की बात कही जा रही थी। अफगानिस्तान का दावा है कि इस हमले में कई आतंकी ढेर हुए हैं, लेकिन नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है।

अफगानिस्तानी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि बलूचिस्तान के पिशिन जिला स्थित सरनान इलाके में आईएसआईएस के ज्वाइंटर सेंटर को इस एयरस्ट्राइक के दौरान तबाह कर दिया गया है। इतना ही नहीं, अफगान फाइटर जेट्स् ने पाकिस्तान में चित्राल की शाह सलीम घाटी में मौजूद आईएसआईएस ठिकानों को बम से उड़ा दिया है। इससे आतंकियों को काफी नुकसान हुआ है।

पाकिस्तान ने अभी तक इस हमले को लेकर बयान जारी नहीं किया है। इससे पहले पाकिस्तान ने 29 जून 2026 को अफगानिस्तान पर एयरस्ट्राइक किया था, जिसमें 36 नागरिकों की मौत हो गई थी और 160 से ज्यादा घायल हो गए थे। अफगानिस्तान ने ताजा हमलों को इसका जवाब कहा है।

राम मंदिर से कथित चोरी पर वो छातियां पीट रहे हैं जो कहते थे मंदिर नहीं बनने देंगे; दक्षिण भारत के मंदिरों से तो सरकार लूटती हैं पैसा; उन मंदिरों से चोरी हुए सोने की बात नहीं करते सेकुलर नेता

सुभाषचन्द्र

आज रामविरोधियों का एकजुट होकर चील-कौओं की तरह इसलिए चिल्ला रहे हैं क्योकि कांड बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश में हुआ है। लेकिन गैर-शासित राज्यों और यूपीए कार्यकाल में मन्दिरों से चोरी हुए सोने पर सब ऐसे चुप रहते हैं जैसे उनके घर कोई मातम हो गया है। कल(30 जून) को Republic Bharat पर एंकर राम मोहन शर्मा ने अपने शो महाभारत में दिल्ली की जामा मस्जिद और अजमेर में चिश्ती की मजार पर सवाल करने पर मुस्लिम कट्टरपंथी शो के आखिर तक टालते रहे। सवाल था: यहाँ आने वाला चढ़ावा कहां जा रहा है?        

किसी की नानी कहती थी कि मस्जिद तोड़ कर जो मंदिर बनाया गया उसमे जाना पाप है और आज वह गिरा हुआ आदमी उसी मंदिर में माथा रगड़ रहा है और अमृतसर में सीता माता और लव-कुश मंदिर बनाने का झांसा दे रहा है। जबकि जब तक मंदिर बनना शुरू होगा, तब तक मान सरकार का अंतिम संस्कार हो चुका होगा

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जो अखिलेश छाती ठोक कर कहता था कि “किसी हाल में राम मंदिर नहीं बनने देंगे” वो आज सबसे ज्यादा बवाल काट रहा है लेकिन रामालय ट्रस्ट के गबन की बात नहीं करता। जो राहुल गांधी भगवान राम को काल्पनिक कहता था, कांग्रेस ने वकीलों की फ़ौज खड़ी कर दी सुप्रीम कोर्ट में मंदिर निर्माण  रोकने के लिए और उसके वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मंदिर की सुनवाई रोकने की दलील दी, उस राहुल की पार्टी आज दहाड़ें मार रही है

मंदिर में कथित चोरी का आरोप सबसे पहले Mahipal Singh (a former supervisor of the temple trust's accounting team) ने लगाया लेकिन उसने यह नहीं बताया कि कितना पैसा चोरी हुआ? फिर अखिलेश ने किस आधार पर कह दिया कि 7 करोड़ की चोरी हुई? क्या महिपाल सिंह ने उसे गुप्त सूचना दी अगर नहीं तो अखिलेश को बताना चाहिए उसे रकम के बारे में कैसे पता चला?

जो वकील आज सुप्रीम कोर्ट गए है राम मंदिर की चोरी के मामले को लेकर, वो बताएं कि क्या वे सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में मंदिर के पक्ष में खड़े थे या विरोध में?

दूसरी तरफ SIT ने मंदिर ट्रस्ट में CEO नियुक्त करने की सलाह देकर मंदिर प्रशासन को कार्यपालिका के सुपुर्द करने का अभियान चला दिया? दक्षिण भारत के मंदिरों में ऐसे ही राज्य सरकार Administrator (CEO जैसे) नियुक्त करके रखती है और उनके जरिए मंदिरों से जब मर्जी जितना मर्जी धन निकाल कर अपनी योजनाओं, मस्जिदों और चर्चों के लिए इस्तेमाल करती है। ये मंदिरों से चोरी नहीं बल्कि सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से “वैध डकैती” है जिसके बारे में आज सेक्युलर नेता खामोश हैं

दक्षिण भारत में केरल के पद्मनाभ मंदिर से 2016 में 776 किलो सोना गायब हुआ। मुख्यमंत्री थे पिनराई विजयन। यह CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा लेकिन उसे गलत करार दे दिया गया। वर्ष 2026 में भी मंदिर परिसर में भारी सुरक्षा चूक और लगभग 78 ग्राम सोने के बिस्कुट/सिक्के और कुछ कीमती पुरावशेष (एंटीक) गायब होने के नए मामले सामने आए, जिसकी जांच चल रही है। मुख्यमंत्री थे विजयन;

र्ष 2016 में ही तमिलनाडु के कांचीपुरम के एकंबरनाथ मंदिर से 5.75 किलो सोना चोरी हुआ सरकार थी AIADMK की; तमिलनाडु सरकार की endowment trust के कमिश्नर M Veera shanmuga Moni और एक विदेशी पुजारी को गिरफ्तार किया गया लेकिन हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी क्यों? अभी chargesheet को रद्द करने के केस चल रहे हैं जैसे कोई चोरी हुई ही न हो

वर्ष 2019 में सबरीमाला मंदिर 2019 -4.5 किलो सोना गायब हुआ। मुख्यमंत्री विजयन;

वर्ष 2022 में तमिलनाडु के विरुथागिरीश्वर (शिव मंदिर) मंदिर से 900 किलो के कलश चोरी हुए लेकिन 49 साल के पी संतोष को गिरफ्तार किया गया और उससे वो कलश बरामद हो गए  

इन मंदिरों में चोरी के मामले बताने का मेरा अभिप्राय यह है कि चोरी CEO/Administrator नियुक्त करने के बाद भी हो सकती है और कल को कोई उत्तर प्रदेश में “सेक्युलर सरकार” आ गई तो वह तो राम मंदिर के धन को लूट खाएगी जैसे लूट दक्षिण भारत के मंदिरों में होती है। अभी जो राम मंदिर ट्रस्ट है वो चाहे तो संगठन में बदलाव करे लेकिन उसमें CEO बिठाना ठीक नहीं है 

दिल्ली में शुरू हो गया SIR… 13000+ BLO घर-घर जाकर भरवाएँगे फॉर्म: 29 जुलाई तक चलेगा पहला चरण


राजधानी दिल्ली में मंगलवार (30 जून 2026) से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके लिए दिल्ली में 13 हजार से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों (SIR) की ड्यूटी लगाई गई है। पहले चरण के तहत आज से एन्यूमरेशन फॉर्म बाँटे जाएँगे। पहला चरण 29 जुलाई को खत्म होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (29 जून 2026) को दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) अशोक कुमार ने एक महीने तक चलने वाली इस SIR प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी। दिल्ली की 70 विधानसभाओं में 13,033 BLO और राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त BLA घर-घर जाकर सर्वे करेंगे।

 BLO एन्युमरेशन फॉर्म की दो कॉपियाँ देंगे, जिसको भरने के बाद एक BLO को वापस करनी होगी और दूसरी अपने पास रहेगी। इस फॉर्म के साथ कोई भी पहचान पत्र या दस्तावेज जमा नहीं करना है। BLO को आदेश है कि अगर घर पर कोई नहीं मिलता है तो वह फॉर्म को घर में डालकर चला जाए और फिर कम से कम तीन बार चक्कर लगाए।


कश्मीर : जब गैंगरेप करके सड़क पर फेंकी गई हिंदू नर्स की क्षत-विक्षत लाश… सरला भट्ट केस में 36 साल बाद आतंकी यासीन मलिक समेत 5 के खिलाफ चार्जशीट दायर

                     यासीन मलिक पर सरला भट हत्याकांड में चार्जशीट दायर (फोटो साभार- दैनिक भास्कर)
वो भी क्या दिन थे जब शेख जी फाख्ता उड़ाते थे यानि आतंकवाद को बढ़ावा, सेना के जवानों को मारने और हिन्दुओं को मारने वालों को कांग्रेस से लेकर यूपीए(यानि वर्तमान INDI गठबंधन) बहुत सम्मान दिया करते थे, प्रधानमंत्री आवास में किसी सम्मानित की तरह आओभगत होती थी। वक़्त का चक्र ऐसा घुमा आज जेल में ज़िंदगी काटने को मजबूर।

टेरर फंडिंग के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा जेकेएलएफ का पूर्व प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ 36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्याकांड में बड़ी कार्रवाई हुई है। जम्मू-कश्मीर की एसआईए ने 36 साल पुराने मामले में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें उसे मुख्य आरोपितों में शामिल किया है।

इसके तीन आरोपितों, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है। चौथा आरोपित मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है और उसके पीओके में छिपे होने की आशंका है। सरला को उसी ने गोली मारी थी। चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने अप्रैल 1990 में सरला भट्ट को अगवा किया और उसकी हत्या की साजिश रची।

सरला भट्ट कौन थी?

कश्मीरी पंडित सरला भट्ट उस वक्त श्रीनगर के शेर ए कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (SKIMS) में स्टाफ नर्स थीं। 36 साल पहले उनका अपहरण किया गया। उन्हें यातनाएँ दी गईं। बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। सरला अनंतगाग की रहने वाली थी।

18 अप्रैल 1990 को सरला ड्यूटी पर जा रही थीं। इसी दौरान अस्पताल परिसर के पास से उन्हें उठा लिया गया। चार दिन तक अलग-अलग जगह रख कर बुरी तरह टॉर्चर किया गया। बाद में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका शव श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में मिला। शरीर पर गोलियों के साथ साथ उन यातनाओं के भी निशान थे, जो चार दिनों तक उन्हें दिए गए।

शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उसे ‘सुरक्षाबलों का मुखबिर’ होने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं सरला के परिवार वालों पर भी जुल्म ढाए गए। उसके घर पर ग्रेनेड से हमला किया गया और कश्मीर से पलायन के लिए मजबूर किया गया। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि इस हत्या का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों में भय पैदा करना था, ताकि उनका घाटी से पलायन तेज हो।

एसआईए ने 737 पन्नों की चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल की। इसमें यासीन मलिक सहित 5 लोगों को आरोपी बनाया गया। चार्जशीट में प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, मेडिकल और फॉरेंसिक सामग्री तथा नई जाँच के आधार पर आरोप तय किए गए।

यासीन मलिक पर अब तक किन-किन मामलों में कार्रवाई हुई?

यासीन मलिक आतंकियों की फंडिंग का दोषी है। इस मामले में उसे उम्रकैद की सजा मिली है। NIA ने 2017 में यह मामला दर्ज किया था। उसने घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए हवाला के जरिए धन जुटाया। 2022 में यासीन मलिक ने अदालत में कई आरोप स्वीकार किए। दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।

उस पर आतंकवाद, आपराधिक साजिश और UAPA के तहत भी कई मामले दर्ज हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप है।

इन मामलों में भी उन्हें दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई।

जनवरी 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के जवानों पर हुए हमले के मामले में भी यासीन मलिक का नाम आया था।

इस मामले में भी NIA ने कार्रवाई की है और मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया में है।

1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के मामले में भी यासीन मलिक का नाम जाँच के दौरान आया। इस मामले में भी अदालत में मुकदमा चल रहा है और अंतिम फैसला नहीं आया है।

1990 के दशक में उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुई थीं। जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ दर्जनों आपराधिक और आतंकवाद संबंधी मामले अलग-अलग वक्त पर दर्ज हुए हैं। इनमें से कुछ में वह दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कुछ अभी भी न्यायालय में लंबित हैं।

फिलहाल यासीन मलिक आतंकवाद फंडिंग मामले में तिहाड़ में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। NIA ने उनकी सजा बढ़ाकर मृत्युदंड किए जाने की भी अपील की है, जिस पर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। सरला भट्ट हत्याकांड की नई चार्जशीट उनके खिलाफ एक अलग और महत्वपूर्ण कानूनी कार्रवाई है, जिसकी सुनवाई आगे होगी।

पंजाब : भगवंत मान सरकार में केजरीवाल के गुलाम AAP विधायकों ने कबूला, बिना पढ़े बनाया बेअदबी कानून

दिल्ली से लेकर पंजाब तक अरविन्द केजरीवाल ने साबित कर दिया कि उसे राज से नहीं उपद्रव से मतलब है। और उपद्रव होने पर उसका इल्जाम बीजेपी पर थोप कर अपने आपको ईमानदार बनने का ढोंग रच दिया जायेगा और जनता भी सच मान लेती है। लेकिन सच्चाई ज्यादा दिन छिपी नहीं रहती। काली करतूतें अपने आप केजरीवाल पार्टी को बेनकाब कर रही है। दूसरे राज्यों में जहां सत्ता में नहीं होते हुए भी केजरीवाल के तथाकथित नेता किसी न किसी घोटाले में शामिल होने पर कानून की गिरफ्त में आ रहे हैं।  

खैर, पंजाब की राजनीति में कई बार ऐसे अवसर आए हैं, जब धार्मिक संस्थाओं और निर्वाचित सरकारों के बीच मतभेद हो गए। लेकिन बहुत कम अवसर ऐसे रहे हैं, जब सत्तारूढ़ दल के मंत्री, विधायक और जनप्रतिनिधि नंगे पैर अकाल तख्त की चौखट पर पहुंचकर अपने ही बनाए कानून के लिए स्पष्टीकरण देने को विवश हुए हों। मुख्यमंत्री भगवंत मान की आप सरकार के कार्यकाल में यह अनोखा रिकॉर्ड बना है। श्री अकाल तख्त साहिब के सामने  सोमवार यानि 29 जनवरी को पंजाब के 78 सिख विधायकों और 9 सिख मंत्रियों को तलब हुए।  

दरअसल, जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2026 को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने केवल एक कानून की तकनीकी खामियों का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि यह भी दिखाया कि धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर राजनीतिक जल्दबाजी कितनी भारी पड़ सकती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सुनवाई के दौरान कई आम आदमी पार्टी के विधायकों ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने इतने संवेदनशील विधेयक को बिना पढ़े ही पारित कर दिया था। किसी भी संसदीय लोकतंत्र में इससे अधिक गंभीर स्वीकारोक्ति शायद ही हो सकती है। यह केवल आप विधायकों की व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि पूरी विधायी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न है। अकाल तख्त ने आप सरकार को एक महीने के भीतर कानून में संशोधन करने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है। इसके साथ ही स्पष्ट संकेत दिया है कि सिख पंथ से जुड़े विषयों पर केवल राजनीतिक बहुमत पर्याप्त नहीं, बल्कि धार्मिक परामर्श और पंथ की मर्यादा का सम्मान भी अनिवार्य है।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम और शाश्वत गुरु का दर्जा दिया

दरअसल, पंजाब सरकार ने हाल ही में गुरुग्रंथ साहिब और गुरुओं की बेअदबी की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से एक कानून पारित किया है। इस कानून में श्री गुरु ग्रंथ साहिब, भगवद्गीता, कुरआन और बाइबिल सहित विभिन्न पवित्र ग्रंथों के अपमान पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। सरकार ने इसे सभी धर्मों की आस्था की रक्षा का प्रयास बताया है, लेकिन अकाल तख्त की आपत्ति इसी समान श्रेणीकरण पर है। अकाल तख्त और कई सिख विद्वानों का तर्क है कि सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ साहिब कोई पुस्तक मात्र नहीं, बल्कि साक्षात जीवित गुरु परंपरा हैं। सिख परंपरा में दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम और शाश्वत गुरु का दर्जा दिया था। ऐसे में किसी कानून में गुरु ग्रंथ साहिब को अन्य धार्मिक पुस्तकों के साथ “पवित्र ग्रंथ” की श्रेणी में रखकर उल्लेख करना, अकाल तख्त के अनुसार, गुरुओं द्वारा प्रदान की गई सर्वोच्च स्थिति को कमतर करने जैसा है।

बिना किसी विमर्श के सरकार ने बनाया बेअदबी कानून

पंजाब विधानसभा ने अप्रैल 2026 में इस कानून को पारित किया था। इसका घोषित उद्देश्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों में कठोर दंड सुनिश्चित करना था। संशोधन के तहत बेअदबी को गंभीर अपराध मानते हुए आजीवन कारावास सहित कड़े दंड का प्रावधान किया गया। इतने अहम और धार्मिक रूप से संवेदनशील कानून बनाने से पहले पंजाब की भगवंत मान सरकार ने अकाल तख्त, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और सिख पंथक संगठनों से इस बारे में राय लेने की जरूरत भी नहीं समझी। उलटे इसके बारे में सीएम ने वीडियो में गलतबयानी कर दी। जिसके तुरंत बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), अकाल तख्त और अनेक पंथक संगठनों ने आपत्ति जताई कि सरकार ने कानून बनाने से पहले न तो पंथ से व्यापक संवाद किया और न ही धार्मिक संस्थाओं की राय ली। उनका तर्क था कि दंड कठोर होना पर्याप्त नहीं है; कानून की भाषा, परिभाषाएं और अधिकार-क्षेत्र भी सिख मर्यादा के अनुरूप होने चाहिए।

सिखों के धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या ही सही नहीं

अकाल तख्त का सबसे मूलभूत एतराज यही था कि इतना महत्वपूर्ण कानून बिना व्यापक पंथक विमर्श के पारित किया गया। सिख परंपरा में गुरु ग्रंथ साहिब केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवित गुरु का स्वरूप हैं। इसलिए उनसे संबंधित किसी भी कानून को बनाने से पहले पंथक संस्थाओं, विद्वानों और धार्मिक प्रतिनिधियों से सलाह लेना आवश्यक माना जाता है। अकाल तख्त का मत था कि विधानसभा विधायी संस्था अवश्य है, लेकिन धार्मिक सिद्धांतों की अंतिम व्याख्या उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसी कारण कानून को पंथ की सहमति के बिना पारित करना मूल प्रक्रिया की त्रुटि माना गया।

आप विधायकों ने बिना पढ़े कानून पारित कर दिया

सुनवाई का सबसे हैरतअंगेज पहलू वह स्वीकारोक्ति रही, जिसमें कई आप विधायकों ने माना कि उन्होंने विधेयक को पढ़े बिना ही समर्थन दे दिया था। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि इतने संवेदनशील कानून में आखिर क्या प्रावधान हैं। लोकतंत्र में विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं और प्रत्येक कानून पर विचार कर मतदान करना उनका संवैधानिक दायित्व है। यदि स्वयं विधायक स्वीकार करें कि उन्होंने कानून का अध्ययन नहीं किया, तो यह केवल राजनीतिक लापरवाही नहीं, बल्कि संसदीय उत्तरदायित्व की विफलता भी है। यही कारण था कि अकाल तख्त ने इसे गंभीरता से लिया और विधायकों से आत्ममंथन करने को कहा।

बेअदबी कानून में अकाल तख्त के छह प्रमुख एतराज

जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने कानून पर छह व्यापक आपत्तियां दर्ज कीं। अकाल तख्त ने सरकार को एक महीने में इन आपत्तियों का समाधान करने का निर्देश दिया। अकाल तख्त के छह एतराज इस प्रकार हैं…
(1) कानून में प्रयुक्त कई शब्द और परिभाषाएं सिख धार्मिक शब्दावली तथा मर्यादा के अनुरूप नहीं हैं।
(2) गुरु ग्रंथ साहिब से जुड़े धार्मिक विषयों का अंतिम निर्णय विधानसभा नहीं कर सकती।
(3) कानून बनाने से पहले पंथ और एसजीपीसी से समुचित परामर्श नहीं लिया गया।
(4) कानून की कुछ धाराएं धार्मिक अधिकार-क्षेत्र और राज्य के अधिकार-क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट नहीं करतीं
(5) सरकार को कानून लागू करने से पहले पंथक सुझावों को शामिल करना चाहिए।

(6) जब तक संशोधन नहीं हो जाता, कानून के विवादित प्रावधानों पर आगे कार्रवाई रोकने की सलाह दी गई।

मुख्यमंत्री मान के दो वीडियो पर इसलिए भड़का अकाल तख्त

सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े दो वीडियो भी चर्चा का विषय बने। यह विवाद उन वायरल वीडियो से जुड़ा है जिनके बारे में अकाल तख्त ने दावा किया कि दो फोरेंसिक जांचों में वीडियो को छेड़छाड़ या एआई-जनित नहीं पाया गया, जबकि मुख्यमंत्री की ओर से पहले इन्हें फर्जी या एआई आधारित बताए जाने की बात सामने आई थी। इसी विरोधाभास को लेकर अकाल तख्त ने नाराजगी जताई और कहा कि यदि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामले में तथ्यात्मक स्थिति को लेकर भिन्न दावा किया है, तो उसे स्पष्ट स्पष्टीकरण देना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अपना लिखित पक्ष देने की बात कही। इस विषय पर विभिन्न पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। अधिकतर का मानना है कि मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद पर होने के दौरान मान को धार्मिक मामलों में इस तरह के वक्तव्य नहीं देने चाहिए।

भगवंत मान का वीडियो फोरेंसिक लैब की जांच में प्रामाणिक

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने अमृतसर में ‘पांच सिंह साहिबानों’ की बैठक के बाद अकाल तख्त की फसील (मंच) से यह आदेश सुनाया। भगवंत मान पर ‘गुरु की गोलक’ (गुरुद्वारे के दान पात्र) पर आपत्तिजनक टिप्पणी, सिख गुरुओं के अपमान का आरोप है। ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने दावा किया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वह वीडियो, जिसमें एक व्यक्ति मुख्यमंत्री भगवंत मान जैसा दिखाई देता है, वो फोरेंसिक लैब की जांच में प्रामाणिक पाया गया है। उन्होंने कहा कि वीडियो के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई और न ही यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किया गया है। गर्गज ने बताया कि जनवरी में अकाल तख्त सचिवालय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर वीडियो की जांच के संबंध में संपर्क किया था। उस समय भगवंत मान ने स्वयं कहा था कि वह वीडियो की फोरेंसिक जांच के लिए तैयार हैं। हालांकि, सचिवालय को उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

अकाल तख्त सचिवालय ने वीडियो की दो लैब से जांच करवाई

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज के अनुसार इसके बाद अकाल तख्त सचिवालय ने वीडियो की दो अलग-अलग लैब से जांच करवाई। ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने कहा, “मुख्यमंत्री का पद सम्मानजनक होता है, लेकिन भगवंत सिंह मान ने अकाल तख्त के समक्ष वीडियो के मामले में झूठ बोला।” उन्होंने कहा कि पांच सिंह साहिबानों ने सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री को ‘गुरु दोषी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित किया है। बेअदबी विरोधी कानून के मुद्दे पर अकाल तख्त के जत्थेदार ने कहा कि ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ के संबंध में सभी सिख विधायक और पंजाब मंत्रिमंडल को 29 जून को अकाल तख्त के समक्ष उपस्थित होना होगा।

सरकार ने धार्मिक विषय पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई

इस सारे मामले पर माफी और स्पष्टीकरण की नौबत इसलिए आई, क्योंकि सीएम, कैबिनेट और विधायकों ने पहले इस धार्मिक विषय पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दरअसल, अकाल तख्त के समक्ष पेशी केवल औपचारिकता भर नहीं है। आप सरकार के सिख मंत्री और विधायक नंगे पैर पहुंचे, लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया और माफी के साथ पंथ की भावनाओं का सम्मान करने की बात कही। यह दृश्य अपने आप में असाधारण रहा। इसका कारण केवल कानून की भाषा नहीं है, बल्कि यह भावना भी है कि सरकार ने धार्मिक विषय पर वह सोच और विजन नहीं दिखाया, जिसकी दरकार रही। राजनीतिक दृष्टि से यह स्वीकारोक्ति कि संवाद की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है और सिख पंथ की आशंकाओं को पहले दूर किया जाना चाहिए था।

आस्था से जुड़े विवाद का विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर

राजनीतिक दृष्टि से यह विवाद आम आदमी पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। 2022 में पार्टी ने पंजाब में भारी बहुमत सामाजिक बदलाव और नई राजनीति के वादे पर हासिल किया था। यदि सिख समाज के एक प्रभावशाली वर्ग में यह धारणा बनती है कि सरकार ने धार्मिक मामलों में जल्दबाजी या पर्याप्त परामर्श के बिना निर्णय लिए, तो अगले विधानसभा चुनाव में आप के खिलाफ माहौल बन सकता है। विपक्ष पहले ही इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है, जो चुनाव में भी गूंजेगा। शिरोमणि अकाली दल पहले से ही स्वयं को पंथक राजनीति का प्रतिनिधि बताता रहा है। कांग्रेस के पास भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के अलावा की चारा नहीं। भाजपा ने पहले ही इस बेअदबी कानून को सिख समुदाय की आस्था और धार्मिक भावनाओं के विपरीत बताया है।

भगवंत मान का मकसद सिर्फ राजनीति करना – मजीठिया

अकाली नेता बिक्रम मजीठिया ने कहा कि जब जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 – तैयार किया जा रहा था, तब श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार साहिब ने स्पष्ट निर्देश और एक आदेश जारी किया था। उन्होंने आदेश दिया था कि अगर श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज के मामले से जुड़ा कोई बिल या कानून बनाया जाना है, तो उसका मसौदा श्री अकाल तख्त साहिब, शिरोमणि जत्थेबंदी, अन्य सिख संस्थाओं और पूरी गुरु नानक नाम लेवा संगत की मंजूरी लेने के बाद ही तैयार किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी महत्वपूर्ण बात छूट न जाए। भगवंत मान और केजरीवाल का एकमात्र मकसद राजनीति करना है। बैसाखी के दिन जो बिल तैयार किया गया वह पूरी तरह से और केवल राजनीति के लिए बनाया गया था। संगत इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती क्योंकि इसमें ऐसी धाराएं और फैसले शामिल किए गए हैं जो संगत को गुरु ग्रंथ साहिब महाराज से दूर करने की साजिश जैसे लगते हैं। आप गुरु नानक नाम लेवा संगत को साथ लिए बिना किसी चीज को पारित करने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? अकाल तख्त की मंजूरी के बिना इसे पारित करने का तो सवाल ही नहीं उठता।

जर्मनी में भी UK जैसे ग्रूमिंग गैंग: नाबालिग लड़कियों को ड्रग्स के बहाने फँसाकर किया यौन शोषण, कई सीरियाई-पाकिस्तानी गिरफ्तार

                                            जर्मनी में ग्रूमिंग गैंग एक्टिव (फोटो साभार-alamy)
जर्मनी के नूर्नबर्ग में महिलाओं और लड़कियों का यौन शोषण करने और उन्हें ड्रग्स के धँधे में फँसाने के आरोप में दो पाकिस्तानी नागरिकों को जर्मनी की पुलिस ने गिरफ्तार किया है। मिडिल फ्रैंकोनिया पुलिस मुख्यालय के अनुसार, अब तक कुल छह लोगों को इस मामले में हिरासत में लेकर पूछताछ की गई फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें दो पाकिस्तानी और 4 सीरियाई शामिल हैं।

ये लोग नूर्नबर्ग रेलवे स्टेशन के आस-पास के इलाकों में लड़कियों और महिलाओं का भरोसा जीतते थे और फिर उन्हें ड्रग्स की धंधे में धकेल देते थे। ये लोग उनका यौन शोषण भी करते थे और फिर ड्रग्स की आदत लगा कर उनसे ड्रग्स की सप्लाई करवाते थे।

इससे पहले तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, इनलोगों ने नूर्नबर्ग सेंट्रल स्टेशन के आस-पास लड़कियों और युवतियों का भरोसा जीता और फिर उन्हें नशे की लत में धकेल दिया।

जर्मनी में फलता-फूलता ग्रूमिंग रिंग’ और नशे की चपेट में लड़कियाँ

मई 2026 में गोस्टेनहोफ जिले के एक अपार्टमेंट में पुलिस ने ऐसे ही ग्रूमिंग गैंग के 2 आरोपितों को गिरफ्तार किया। ये दोनों सीरिया के नागरिक हैं। इनकी उम्र मात्र 26 साल और 24 साल है। 26 साल का ग्रूमिंग गैंग का व्यक्ति नाबालिगों को नशीले पदार्थ सप्लाई करता था। उसके अपार्टमेंट की तलाशी के दौरान अधिकारियों को क्रिस्टल मेथ और कोकीन जैसी चीजें मिलीं। साथ ही करीब 2000 यूरो नकद भी बरामद हुए।

पुलिस रिपोर्ट से पता चलता है कि दूसरा सीरिया का 24 वर्षीय नागरिक बच्चों के खिलाफ यौन शोषण का दोषी पाया गया है। उसे शक के आधार पर हिरासत में लिया गया था। मामले की जाँच करने वाले जज ने दोनों लोगों के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया। नूर्नबर्ग सेंट्रल स्टेशन के आस-पास ‘ग्रूमिंग गैंग’ से निपटने के लिए उसका बही खाता निकालने में पुलिस जुट गई है। इसके लिए मई महीने में जाँच आयोग का गठन किया था।

पाकिस्तान, सीरिया, गाजा, सर्बिया के नागरिकों पर पैनी नजर

यह जाँच उन शरणार्थियों पर केन्द्रित है जो पिछले कुछ सालों में सीरिया, पाकिस्तान, सर्बिया और गाजा पट्टी से आए हैं। संदिग्धों की उम्र 18 से 35 साल के बीच है। ये लोग नाबालिगों को गैर-कानूनी तरीके से नशीले पदार्थ सप्लाई करते हैं। इस मामले में कम से कम एक साल जेल की सजा हो सकती है।
जाँच में यौन अपराध भी शामिल हैं, खासकर 14 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों का यौन शोषण और बलात्कार का मामला, जो तेजी से देश में बढ़ा है। जाँचकर्ताओं का मानना है कि पीड़ितों की संख्या शुरुआती अनुमान से अधिक हो सकती है। फिलहाल अधिकारियों ने कितनी लड़कियाँ या महिलाएँ इस गैंग का शिकार बनीं, इसका अंतिम आधिकारिक आँकड़ा जारी नहीं किया है। यूरोप के कई देशों खासकर जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और बेल्जियम में पिछले कुछ सालों से संगठित ग्रूमिंग नेटवर्क सामने आया है। इन मामलों में सामान्य पैटर्न यह पाया गया है कि ये लोग कमजोर, गरीब, असुरक्षित नाबालिगों को पहले विश्वास में लेते हैं, उन्हें प्रेमजाल में फँसाते हैं, फिर नशे, धमकी या भावनात्मक दबाव के जरिए उनका शोषण किया जाता है।

लपेटे में आएगा सपाचार्य अविमुक्तेश्वरानंद; रामालय ट्रस्ट का सोना और पैसा कहां गायब हुआ?

सुभाष चन्द्र

योगी-मोदी विरोधियों ने लगता है राममन्दिर में चढ़ावे की चोरी करवाकर अपने पतन की पटकथा लिख दी है। इन राम विरोधियों शायद को नहीं मालूम कि एक योगी है तो दूसरा तपस्वी। इनके विरुद्ध रची हर साज़िश/षड़यंत्र का भंडाभोड़ हुआ है फिर भी कालनेमि हिन्दुओं को इन्हें वोट देने में जरा गैरत नहीं आती। पुरुषोत्तम श्रीराम का भव्य मन्दिर अनगिनत कष्ट झेलने के बाद निर्मित हुआ है। पुरुषोत्तम ने कभी अपने अंधभक्तों का साथ नहीं छोड़ा सच्चाई सामने लाने के लिए सभी का मार्गदर्शन करते रहे। और अब जो चोरी से योगी सरकार या बीजेपी को बदनाम करने का जो घिनौना काम किया है श्रीराम इन चोरों और इनके आकाओं को इनकी असली जगह पहुंचाएंगे। प्रभु धैर्य और संयम रखने की शिक्षा देते हैं जिसका उन्होंने स्वयं पालन भी किया था। ये चोरी ऐसे ही नहीं हुई है बहुत गहरा षड़यंत्र है। जिसको सामने आने में समय लगेगा।      

राम मंदिर से चोरी प्रकरण में स्वरूपानंद सरस्वती के बनाए हुए रामालय ट्रस्ट से सोने और धन का मामला भी उजागर हुआ है अगर संजय सिंह के 2020 के जमीन सौदों की गड़बड़ के आरोप की जांच SIT कर सकती है तो रामालय ट्रस्ट के धन और सोना कहां गया इसकी भी जांच कर सकती है और उसमें सपाचार्य अविमुक्तेश्वरानंद भी नप सकता है 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
स्वरूपानंद के शिष्य स्वामी गोविंदानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद पर आरोप लगाया है उसने रामालय ट्रस्ट के नाम पर 1000 गांवों से अवैध तरीके से सोना, हीरे और कॅश इकठ्ठा किया जबकि सरकार द्वारा आधिकारिक ट्रस्ट की स्थापना कर दी गई थी 

वर्ष 2020 में सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट की स्थापना के बाद रामालय ट्रस्ट द्वारा “स्वर्ण संग्रह सपर्या” अभियान चलाया गया जिससे 1008 किलो सोना गांवो से इकट्ठा करना था मकसद था अस्थाई “बाल मंदिर और स्वर्ण मंदिर” बनाना लेकिन वो तो बना नहीं, तो फिर इसकी ट्रस्ट का धन कहां गया?

गोविंदानंद ने रामालय ट्रस्ट के द्वारा एकत्र किए गए पैसे, सोने और हीरों के गबन की जांच SIT से कराने की मांग की है जबकि अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोपों को सिरे से नकार दिया और कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंददेव गिरी महाराज की जिम्मेदारी है कि मंदिर को दिए गए दान का ब्यौरा दें मंदिर को मिले दान में गड़बड़ की तो जांच हो रही है और उसका हिसाब भी गोविंदगिरि दे रहे है लेकिन तुमने पैसा कहां गायब किया, इसका जवाब तो तुम्हें ही देना पड़ेगा  

अविमुक्तेश्वरानंद कुछ ज्यादा ही श्याणे हैं गोविंदानंद बात कर रहे हैं रामालय ट्रस्ट की ये खलीफा बात कर रहे हैं मंदिर को मिले दान की गोविंदगिरि गिरी तो तब जवाबदेह थे जब अविमुक्तेश्वरानंद की रामालय ट्रस्ट ने एकत्र किया हुआ पैसा, सोना और हीरे मंदिर के ट्रस्ट के सुपुर्द किये होते

अब समझ आया ये अविमुक्तेश्वरानंद मोदी और योगी पर कुकुर के तरह क्यों भौंकता फिरता है?

इसे लगता है आभास हो गया था कि योगी को इसके गड़बड़झाले की खबर लग गई थी और क्यों इसकी निकटता अखिलेश यादव से बढ़ रही है? ऐसा भी कह सकते हैं अपनी ट्रस्ट का पैसा ये अखिलेश की पार्टी को अगले चुनाव के लिए दे रहा है

कुल मिलाकर लगता है, ये भी लपेटे में आएगा जो होता है सब समय से होता है ये चारों खाने चित हो जाएगा

चीन से फंडिंग होने पर पहलगाम आतंकी हमले पर UN रैपोर्टियर बेन सॉल ने दिए थे भारत विरोधी बयान, ऑपइंडिया ने उसी समय उठाए थे सवाल: जाँच में हुआ खुलासा

                       यूएन वॉच रिपोर्ट में बेन सॉल पर गंभीर आरोप। (फोटो साभार - UNOG न्यूजरूम)
दुनिया में अंतरराष्ट्रीय भिखारियों की कमी नहीं। भीख लो और भारत के खिलाफ बयानबाज़ी करो। आखिर UNO और मानवाधिकार वाले ऐसे लोगों को क्यों नहीं ब्लैकलिस्ट करते? या यूँ कहा जाए इन लोगों की मिलीभगत से भारत के विरुद्ध ये खेल खेला जा रहा है? अगर ये संस्थाएं ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते UNO और Human Rights Commission को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। फंडिंग पर गलत बयान देने से भारत में माहौल ख़राब हो गया होता उसका कौन जिम्मेदार होता? ऐसे लोग चाहे किसी भी पद पर हो भिखारी से भी बदतर हैं। 
चीन जिस तरह चालें चल रहा है भारतीयों को हर चीनी उत्पाद का बहिष्कार करना चाहिए।  
UN वॉच की एक रिपोर्ट ने आतंकवाद-रोधी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर बेन सॉल पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सॉल को चीनी सरकार से फंडिंग मिल रही है।

स्काई न्यूज के अनुसार, जिनेवा स्थित इस समूह की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सॉल में पश्चिम-विरोधी और इजरायल-विरोधी पक्षपात है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सॉल ने अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठन अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य और आतंकवादी नेता अयमान मोहम्मद रबी अल-जवाहिरी की हत्या की निंदा की थी।

यूएन वॉच के कार्यकारी निदेशक हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से बात करते हुए कहा, “उन्हें एक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) नहीं होना चाहिए, उन्हें एक अकादमिक होना चाहिए। हमें विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण देखने को मिलना चाहिए।”

नोयर ने कहा  “संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ को सबसे पहले हमास के आतंकवादियों का विरोध करना चाहिए, ईरान के इस्लामी शासन का विरोध करना चाहिए, लेकिन बेन सॉल ईरान के इस्लामी शासन और उसके आतंकवादी सहयोगियों की बातों को दोहराते हुए दिखाई देते हैं।”

रिपोर्ट का हवाला देते हुए नोयर ने कहा कि सॉल को चीनी कम्युनिस्ट शासन से 1,50,000 डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने यह भी कहा कि सॉल ने रिपोर्ट की सामग्री का कोई खंडन नहीं किया है। नोयर ने कई ऐसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का नाम लिया, जिनके कार्यालयों को चीन से फंडिंग मिली है।

हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से कहा, “वह खुद को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ बताते हैं। वह सिडनी में कानून के प्रोफेसर हैं और खुद को स्वतंत्र विशेषज्ञ कहते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि जब उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से 1,50,000 डॉलर मिल रहे हैं, तो वह स्वतंत्र विशेषज्ञ कैसे हो सकते हैं? मैं स्पष्ट कर दूँ। कोई यह नहीं कह रहा कि यह पैसा उनकी निजी जेब में जा रहा है ताकि वह कोई फेरारी खरीद सकें, लेकिन यह उनके कार्यालय को जा रहा है। वही कार्यालय जिसने कभी भी चीन द्वारा आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के नाम पर दस लाख उइगरों को शिविरों में रखने की निंदा नहीं की, जबकि यही वह विषय है जिसके वह विशेषज्ञ होने का दावा करते हैं।”

उन्होंने कहा कि जबरदस्ती के उपायों (कोअर्सिव मेजर्स) पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टियर एलेना दोहान के कार्यालय को रूस, चीन और कतर से 13 लाख डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य विशेषज्ञ जॉर्ज कैट्रूगालोस का भी नाम लिया, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के कार्यालय के अध्यक्ष हैं।

नोयर ने कहा कि उनके कार्यालय को चीन से 1,00,000 डॉलर मिले थे, उसी वर्ष जब उन्होंने एथेंस में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पुस्तक के प्रचार के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया था।

UN वॉच ने संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों द्वारा चीन, कतर, रूस जैसे देशों से संदिग्ध फंडिंग प्राप्त करने और मानवाधिकारों के नाम पर विशेष वैचारिक हितों को बढ़ावा देने के कई मामलों को चिन्हित किया है। संगठन का आरोप है कि ये विशेषज्ञ आतंकवादी घटनाओं और इस्लामी आतंकवाद के पीड़ितों की स्थिति की अनदेखी करते हैं।

बेन सॉल समेत UN रिपोर्टर्स ने पहलगाम हमले पर भारत को घेरा

सॉल उन आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष रैपोर्टियरों में शामिल थे, जिन्होंने पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा अपनाए गए आतंकवाद-रोधी उपायों को लेकर मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक संयुक्त प्रेस बयान जारी किया था।
ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि संयुक्त राष्ट्र के इस विशेष विशेषज्ञ ने आतंकवादी हमले की निंदा तो की थी, लेकिन भारत के आतंकवाद-रोधी अभियानों को, जिनमें अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट सेवाओं का निलंबन और 8000 सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक करना शामिल था, असंगत (डिसप्रोपोर्शनेट) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन बताया था।
भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों को सामूहिक दंड (कलेक्टिव पनिशमेंट) बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने दावा किया कि अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों से जुड़े परिवारों के घरों, व्यवसायों और संपत्तियों को बिना किसी न्यायालयी आदेश या विधिक प्रक्रिया के मनमाने ढंग से ध्वस्त कर दिया।
UN वॉच की रिपोर्ट के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि बेन सॉल, जिनसे आतंकवादी कृत्यों की निंदा करने की अपेक्षा की जाती है, पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई की आलोचना क्यों कर रहे थे।
किसी तरह संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियानों को भी पहलगाम हमले के बाद देशभर में चलाए गए कार्रवाई अभियान से जोड़ दिया। उनका तर्क था कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमानों को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उनका धर्म पहलगाम हमले के आरोपियों जैसा है।
जबकि असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय से चल रही है, जिनमें मुख्य रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा कर मजार या दरगाह बनाने वाले इस्लामवादी तत्वों तथा अवैध रूप से भूमि पर कब्जा करने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या शामिल हैं। ये अतिक्रमण-रोधी अभियान एक वर्ष से भी अधिक समय से जारी हैं।
हालाँकि इनका पहलगाम हमले से कोई संबंध नहीं था। गुजरात में पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद जो एकमात्र ध्वस्तीकरण अभियान चला, वह सरकार द्वारा चंडोला झील और उसके आसपास बने अवैध ढाँचों को हटाने के लिए था, जिसे अवैध बांग्लादेशियों का केंद्र माना जाता है। यह कार्रवाई भी गुजरात हाई कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद की गई थी।
इसके अलावा, यह दावा भी गलत बताया गया कि ‘निर्दोष कश्मीरी नागरिकों’ के घर गिराए गए। अधिकारियों ने घरों को ध्वस्त किया था, लेकिन वे निर्दोष नागरिकों के नहीं थे।
अधिकारियों ने केवल प्रमाणित आतंकवादियों के घरों को ही गिराया। सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों का इस्तेमाल कर आतंकवादी शाहिद अहमद कुट्टे के शोपियाँ स्थित घर, कुलगाम में सक्रिय जिहादी जाकिर के घर, पुलवामा के मुरन में एहसान-उल-हक शेख के घर, जो 2018 में पाकिस्तान गया था और इसी वर्ष घाटी में घुसपैठ कर लौटा था, फारूक तीवड़ा के घर, जो 1990 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान चला गया था और कभी वापस नहीं लौटा, तथा लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों आदिल हुसैन ठोकर (बीजबेहड़ा, अनंतनाग) और आसिफ शेख (त्राल, पुलवामा) के घरों को ध्वस्त किया। लेख के अनुसार, इनमें से कोई भी व्यक्ति निर्दोष या शांतिप्रिय नागरिक नहीं था।


US-इजरायली हमले के बाद भारतीयों ने खुलकर की ईरान की मदद, लेकिन ईरानी जला रहे तिरंगा झंडा: Video पर भड़के आम लोग, नमकहरामी का लगा रहे आरोप

                                                         साभार: एक्स @SouleFacts
ईरान के लिए छाती पीटने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों और खुलकर मदद करने वालों अगर जरा भी शर्म बची है तो कहीं डूब मरो। जिन नमकहरामों के लिए तुमने मदद भेजी देखो तुम्हारे ही देश के झंडे को जलाया जा रहा है। क्या भारतीय झंडे के अपमान के लिए ईरान के लिए छाती पीट रहे हो और अपनी मेहनत की कमाई लुटा रहे हो? यहाँ तो बोलते हो हम गरीब हैं, मजलूम हैं और आतंकवाद को पालने वाले को मदद भेज रहे हो? क्या किसी ने ईरान उच्चायोग से विरोध जताया?      

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भारत में कई कट्टरपंथियों ईरान के समर्थन में आवाज उठाई थी। सोशल मीडिया पर ईरान के पक्ष में पोस्ट किए गए, मदद की अपील की गई और कुछ लोगों ने आर्थिक सहायता भेजने की भी बात कही। लेकिन अब X पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो भारतीय यूजर्स के बीच नाराजगी की वजह बन गए हैं।

वायरल वीडियो में कुछ लोग भारत का झंडा जलाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन्हें लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कई यूजर्स का कहना है कि भारत ने कभी ईरान पर हमला नहीं किया और न ही अमेरिका-इजरायल के सैन्य अभियान का हिस्सा बना, फिर भी भारत का झंडा जलाना समझ से परे है।

पहले वायरल पोस्ट में एक यूजर ने लिखा, “हिंदुओं और हिंदू धर्म से अब्राहमिक पंथों के लोग स्वाभाविक रूप से नफरत करते हैं।” ऐसे ही एक दूसरे पोस्ट में सवाल उठाया गया कि जब भारत ने ईरान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, तब आखिर भारतीय तिरंगे को क्यों जलाया जा रहा है।

यूजर ने कहा कि भारत कभी भी अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने वालों में शामिल नहीं रहा। एक अन्य पोस्ट में एक यूजर ने दावा किया कि ऐसे वीडियो साबित करते हैं कि भारत विरोधी मानसिकता रखने वाले लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पोस्ट में कहा गया कि भारत के प्रति नफरत कुछ लोगों की स्वाभाविक सोच बन चुकी है।

ऐसे ही एक यूजर ने लिखा कि भारतीयों ने ईरान की मदद के लिए धन और समर्थन दिया, लेकिन बदले में भारतीय झंडे का अपमान देखने को मिला।

यूजर ने इसे नमकहरामी बताते हुए उन लोगों की आलोचना की जो अभी भी ईरान के प्रति सहानुभूति जता रहे हैं।

क्या अमेरिका-ईरान युद्ध के पीछे Gulf Nations को बर्बाद करने का षड़यंत्र तो नहीं? ‘अब नहीं करेंगे और हमले, सुलझाएँगे हॉर्मुज स्ट्रेट का विवाद’ : अमेरिका-ईरान ने दोहराई फिर पुरानी बात, अब कतर में होगी बैठक


ईरान और US ने एक-दूसरे पर हाल में किए हमले के बाद एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर साइन किए गए। इसके बाद अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमला बंद करने और होर्मुज स्ट्रेट पर अपने विवाद को सुलझाने के लिए सहमत हो गए हैं।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी का हवाला देते हुए अमेरिकी मीडिया ने रिपोर्ट दी है कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर हमले रोकने पर सहमत हो गए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अपने विवाद को सुलझाने के लिए मंगलवार (30 जून 2026) को कतर की राजधानी दोहा में बैठक करेंगे।

दरअसल होर्मुज स्ट्रेट में कमर्शियल जहाजों पर हमले के बाद ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया। US ने ऑयल टैंकरों और दूसरे जहाजों को धमकियाँ देने और अमेरिकी मिलिट्री साइट्स पर बमबारी के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया।

हालाँकि ईरान ने शुरुआती हमले से इनकार किया, लेकिन कुवैत और बहरीन में अमेरिकी मिलिट्री केन्द्र को निशाना बनाया और इसे US के ईरान पर किए जा रहे हमलों का जवाब कहा।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल के अमेरिकी हमलों को यूएन चार्टर और एमओयू दोनों का उल्लंघन बताया। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी हमलों का बचाव किया और कहा कि ईरान के सीजफायर तोड़ा है, जिसके बाद अमेरिकी सेना ने ईरानी मिसाइल, ड्रोन और रडार को निशाना बनाया था।

नए सिरे से शुरू हुए इन हमलों को लेकर मिडिल ईस्ट और दुनिया भर में चिंता व्यक्त की गई।

आखिरकार दोनों पक्ष हमले रोकने और इसे सुलझाने के लिए कतर में मिलने जा रहे हैं। एक सीनियर US अधिकारी ने एक्सियोस को बताया, “हमने सभी काइनेटिक एक्टिविटी को रोकने का फ़ैसला किया है।” काइनेटिक एक्टिविटी का मतलब है मिलिट्री हमले समेत हर तरह के हमले।

क्या अमेरिका-ईरान युद्ध के पीछे Gulf Nations को बर्बाद करने का षड़यंत्र तो नहीं?

पिछले महीने से सारी दुनिया अमेरिका-ईरान युद्ध देख रही है और इनकी लड़ाई से उत्पन्न संकटों को भी झेल रहा है। लेकिन चर्चा है कि कहीं अमेरिका और ईरान Gulf Nations को बर्बाद कर तेल पर अपना एकाधिकार करने की योजना पर तो काम नहीं कर रहे? शंका इसलिए होती है कि अमेरिका हमला करता है ईरान पर, लेकिन ईरान अमेरिका पर पलटवार करने की बजाए सऊदी अरब, क़तर या अन्य Gulf Nations पर करता है। अगर ईरान इतना ताकतवर है तो क्यों नहीं अमेरिका धरती पर सीधे हमला क्यों नहीं कर रहा? अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही Gulf Nations की? यह Gulf Nations को बर्बाद की गुप्त मंत्रणा तो नहीं? लेकिन इसे शिया बनाम सुन्नी बनाया जा रहा है। हमला कर रहा अमेरिका लेकिन जवाब झेल रहे Gulf Nations, क्या दाल में काला नहीं दिखता? जब ईरान इजराइल पर हमला कर सकता है फिर अमेरिका पर क्यों नहीं? इस सच्चाई को जानना होगा। क्या कर रहा है मुस्लिम संगठन OIC? क्या OIC भी शिया सुन्नी में भेदभाव करता है?           

दिल्ली : मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार का बड़ा फैसला, 265 करोड़ रूपए से 75 CM श्री स्कूलों का होगा कायाकल्प; लेकिन स्वच्छ पीने योग्य पानी कब?


दिल्ली सरकार ने राजधानी के सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढाँचे को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए लगभग 75 सीएम श्री (CM SHRI) स्कूलों के व्यापक उन्नयन को मंजूरी दे दी है। करीब 265 करोड़ रुपए की इस परियोजना का उद्देश्य स्कूल परिसरों को सुरक्षित, आधुनिक और तकनीक-सक्षम शिक्षण केंद्रों में बदलना है।

यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में आयोजित व्यय वित्त समिति (EFC) की बैठक में पारित किया गया। बैठक में लोक निर्माण विभाग मंत्री प्रवेश साहिब सिंह, शिक्षा मंत्री आशीष सूद और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

स्कूल भवनों, खेल सुविधाओं और बुनियादी ढाँचे का होगा नवीनीकरण

परियोजना के तहत स्कूलों की जर्जर हो चुकी संरचनाओं को सुधारा जाएगा और विभिन्न सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। इसमें सीमा दीवारों का निर्माण व मरम्मत, सीपेज और नमी से प्रभावित कक्षाओं की मरम्मत, भवनों की रंगाई-पुताई तथा परिसर का सौंदर्यीकरण शामिल है।

सभी सीएम श्री स्कूलों के प्रवेश द्वारों को नए स्वरूप में विकसित किया जाएगा, जहाँ स्कूल के नाम के साथ नया सीएम श्री लोगो भी प्रदर्शित किया जाएगा। इसके अलावा शौचालय, पेयजल व्यवस्था, ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम, बहुउद्देशीय हॉल, खेल मैदान और बास्केटबॉल कोर्ट को भी आवश्यकता के अनुसार उन्नत किया जाएगा।

सुरक्षा, तकनीक और समावेशी शिक्षा पर विशेष जोर

सरकार इस परियोजना के जरिए स्कूलों में सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं को भी मजबूत करेगी। अग्नि सुरक्षा उपायों को बेहतर बनाया जाएगा तथा खराब एलईडी लाइट, पंखे और सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली बदली जाएगी। कंप्यूटर लैब और बहुउद्देशीय हॉल में एयर कंडीशनिंग, एलईडी साइनबोर्ड, आरओ वाटर कूलर, नई वायरिंग और इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी।

दिव्यांग छात्रों के लिए रैंप, टैक्टाइल पाथवे और हैंडरेल विकसित किए जाएंगे। साथ ही सीसीटीवी निगरानी, कंपाउंड लाइटिंग और खेल परिसरों का भी आधुनिकीकरण किया जाएगा। सरकार ने इस पूरी परियोजना को वर्ष 2027 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया है।

लेकिन यमुना को साफ करने के लिए किए बड़े-बड़े वायदे ठंठे बस्ते में आराम फरमा रहे हैं। दिल्ली में पानी की समस्या बढ़ती जा रही है। जहां पानी आता है बिना RO के पीया नहीं जा सकता, मानों RO कंपनी और पानी माफिया से दिल्ली सरकार का कोई गुप्त समझौता हो। जिस दिन जनता को स्वच्छ जल मिलना शुरू हो जाएगा कि जनता को RO प्रयोग ही नहीं करना पड़े, 80 प्रतिशत पानी की समस्या ख़त्म हो जाएगी क्योकि जितना पानी RO फ़िल्टर कर RO टंकी में देता है उससे ज्यादा पानी बेकार होकर नालियों में चला जाता है।    



 

राम मंदिर SIT ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया; चम्पत राय जी का मीडिया ट्रायल बंद होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से जनता इस भ्रमजाल में है कि मीडिया मोदीभक्त हो गयी है। मीडिया आज भी विपक्ष के हाथ का खिलौना है। शायद यही वजह है कि मीडिया राममन्दिर चंदा चोरी को ऐसा उछाल रहा है जैसे इसके अलावा किसी मजहब में कोई घोटाला नहीं हो रहा है। किसी मीडिया वाले ने माँ का दूध नहीं पिया जो उन पर अपना मुंह तक खोल सके चर्चा तो बहुत दूर की बात है। SIT और मीडिया को विपक्ष से खासतौर से अखिलेश यादव से पूछना चाहिए कि किन सूत्रों से उन्हें घोटाले की जानकारी मिली, देखिए उसी दिन दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। ये सारा खेल योगी को बदनाम कर सत्ता से हटाने का है।  

विभिन्न चैनलों पर घुमा फिर कर राम मंदिर चोरी प्रकरण में चंपत राय जी को लपेट कर मीडिया ट्रायल किया जा रहा है। जो भी पत्रकार ऐसा कर रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि जितनी उन लोगों की आयु है उससे ज्यादा समय तो चंपत राय जी समाज, देश और श्री राम मंदिर को दे चुके हैं उनका जन्म 1946 का है और युवा अवस्था से ही वे संघ के प्रचारक बन गए थे शादी नहीं की घर बार सब छोड़ दिया इसलिए उनके बारे में प्रश्न खड़े करते हुए अपनी शब्दावली पर पत्रकारों को लगाम लगानी चाहिए  एक चैनल ने हैडिंग दिया - “मंदिर से चोरी का पैसा लेकर कौन चम्पत हुआ? यह प्रश्न ही उन पर ऊँगली उठा रहा हैं 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
उत्तर प्रदेश सरकार ने जो SIT का गठन किया इसके सदस्य हैं -

-विजय विश्वास पंत (Divisional Commissioner of Lucknow (SIT के मुखिया);

-किरन एस (Inspector General of Police - IG Range, Lucknow; और 

-नील रतन (Special Secretary of the Finance Department)

SIT को कार्य दिया गया था वह था -

-कॅश की गणना कैसे होती है उसको Audit करना, कर्मचारियों का verification process, CCTV Surveillance और दान की राशि कैसे मंदिर से ट्रस्ट और बैंकों को भेजी जाती है, इसकी जांच करना;

-कीमती वस्तुओं जैसे गोल्ड, सिल्वर और हीरों के लॉग्स का निरीक्षण करना और कमियों को ढूंढना; और 

-अंतरिम रिपोर्ट एक हफ्ते में और अंतिम रिपोर्ट 15 दिन में जमा करना (जो आज तक जमा हो जानी चाहिए थी)

इस कार्यक्षेत्र में यह कहीं नहीं कहा गया कि SIT ट्रस्ट के पुनर्गठन और CEO की नियुक्ति की भी अनुशंसा (Recommendation) करेगी लेकिन SIT ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में ऐसी अनुशंसा करके अपने कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण  और इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार को इस अनुशंसा को स्वीकार नहीं करना चाहिए जो कुछ भी कदम उठाने हैं वे ट्रस्ट पर ही छोड़ देने चाहिए। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में केवल महासचिव चंपत राय ही मंदिर प्रशासन के लिए जिम्मेदार नहीं थे ट्रस्ट में 15 सदस्य हैं और यह सबकी सामूहिक जिम्मेदारी थी 

ट्रस्ट की जिम्मेदारी थी मंदिर निर्माण और मंदिर की प्रशासनिक जिम्मेदारी को देखना

सबसे बड़ी बात यह है कि इस ट्रस्ट में निम्नलिखित IAS पद के Ex-Officiao अधिकारी भी शामिल थे वो चोरी प्रकरण को होता देख कर क्या घुईया छील रहे थे

-नृपेंद्र मिश्रा (1967 बैच के IAS जो  प्रधानमंत्री के भी मुख्य सचिव रह चुके हैं;

-शशांक त्रिपाठी - 2016 बैच के IAS जो अयोध्या के जिलाधिकारी हैं;

-संजय प्रसाद - 1995 बैच के IAS जो उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि हैं; और 

-प्रशांत लोखंडे - 2001 बैच के IAS जो केंद्र सरकार के प्रतिनिधि हैं

इन सभी IAS अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी थी और क्या उनसे SIT ने पूछताछ की अकेले चंपत राय को कटघरे में कैसे खड़ा किया जा रहा है  जबकि चंपत राय ने पहले ही दिन SIT सब Procedure दिखा दिया था इस बारे में किसी मीडिया चैनल ने बात नहीं की 

सुना है नृपेंद्र मिश्रा जी ने कहा है कि क्योंकि चंपत राय जी के पास प्रशासनिक अनुभव नहीं है, इसलिए CEO की नियुक्ति होनी चाहिए मिश्रा जी आपके और अन्य IAS अधिकारियों के पास किस प्रशासनिक अनुभव की कमी थी जो सब कुछ हुआ और आप सभी Administration के एक्सपर्ट चुपचाप देखते रहे ट्रस्ट के पास मंदिर के प्रशासन की जिम्मेदारी थी तो आप लोग क्या कर रहे थे

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए SIT की अनुशंसा को स्वीकार नहीं करना चाहिए और न ही चंपत राय जी के त्यागपत्र को स्वीकार करना चाहिए

जो है हाय तौबा अखिलेश यादव मचा रहे हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए 8 गिरफ्तार लोगों में मनीष यादव और रमाशंकर यादव उर्फ़  टिन्नू यादव दोनों यादव हैं कल को इनके तार आपके यादव परिवार से जुड़े न मिल जाएं