बंगाल : सत्ता बदलते ही 1600 करोड़ रूपए का घोटालेबाज़ महफूज आलम कानपुर भागा : उत्तर प्रदेश पुलिस ने दबोचा

                   1600 करोड़ के फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड महफूज आलम गिरफ्तार (साभार: इंडिया टूडे)
तृणमूल कांग्रेस(TMC) के संरक्षण में बंगाल के कोलकाता में छिपे 1600 करोड़ रुपए के हवाला कारोबार के सरगना महफूज आलम उर्फ पप्पू छुरी को कानपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। 24 लाख रुपए की लूट की जाँच के दौरान जिस बड़े हवाला नेटवर्क का खुलासा हुआ था।

महफूज ने गरीब और जरूरतमंद लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी बैंक खातों का विशाल जाल खड़ा किया और उन्हीं खातों के जरिए करोड़ों रुपए के अवैध लेनदेन को अंजाम दिया। पुलिस जाँच में अब तक करीब 1600 करोड़ रुपए के संदिग्ध ट्रांजेक्शन के सीधे प्रमाण मिले हैं, जबकि कुल लेनदेन 3200 करोड़ रुपए से अधिक बताया जा रहा है।

गरीबों के दस्तावेजों से खुलते थे फर्जी खाते

पुलिस जाँच में सामने आया है कि महफूज मजदूरों, रिक्शा चालकों, ठेला लगाने वालों और बेरोजगार युवकों को लोन दिलाने या आर्थिक मदद का झाँसा देकर उनके आधार, पैन और अन्य दस्तावेज जुटाता था। इसके बाद अलग-अलग बैंकों में उनके नाम पर खाते खुलवाए जाते थे।

पुलिस का दावा है कि इस पूरे नेटवर्क में कुछ बैंक कर्मचारियों की भी मिलीभगत थी, जिनकी मदद से करोड़ों रुपए का लेनदेन बिना शक के चलता रहा। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, आरोपित ने 16 बैंकों में 100 से ज्यादा खातों का इस्तेमाल किया।

आरती इंटरप्राइजेज और राजा इंटरप्राइजेज जैसी कई फर्जी कंपनियों के जरिए हवाला कारोबार संचालित किया गया। पुलिस को इस नेटवर्क के तार GST फ्रॉड और स्लॉटर हाउस से जुड़े आर्थिक अपराधों से भी जुड़े मिले हैं।

ससुराल बना ‘सेफ हाउस’, TMC के संरक्षण में था आरोपित, सत्ता बदलते धराया

पुलिस के अनुसार, महफूज लंबे समय से फरार चल रहा था और कोलकाता में अपनी ससुराल में छिपा हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उसे वहाँ कुछ TMC नेताओं का संरक्षण भी मिला हुआ था, जिसकी वजह से वह लगातार गिरफ्तारी से बचता रहा। कानपुर पुलिस उसकी लोकेशन ट्रैक करने के लिए कोलकाता पुलिस के संपर्क में भी थी।

पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलने और गिरफ्तारी का खतरा बढ़ने के बाद महफूज ने कानपुर लौटने का फैसला किया। पुलिस पहले ही उसकी गतिविधियों पर नजर रखे हुए थी और शहर पहुँचते ही उसे गिरफ्तार कर लिया। एसीपी अभिषेक पांडे के मुताबिक, पता लगाया जा रहा है कि फरारी के दौरान वह किन लोगों के संपर्क में था और किन-किन ठिकानों पर छिपा रहा।

ED, RBI और आयकर विभाग भी जाँच में जुटे

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब कई केंद्रीय एजेंसियाँ भी जाँच में शामिल हो गई हैं। पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED), आयकर विभाग और RBI पूरे नेटवर्क की वित्तीय जाँच कर रहे हैं। पुलिस अब इस एंगल से भी जाँच कर रही है कि कहीं हवाला के जरिए टेरर फंडिंग या अन्य संगठित अपराधों को पैसा तो नहीं पहुँचाया गया।

इस मामले में महफूज के बेटे मासूम और साले महताब आलम को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। वहीं उसकी बीवी समेत नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश जारी है। पुलिस के मुताबिक, अब तक आरोपित के खिलाफ पाँच गंभीर मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं और आने वाले दिनों में इस घोटाले में कई और बड़े नाम सामने आ सकते हैं।

TCS नासिक कांड : 25 दिनों से फरार निदा खान को महाराष्ट्र पुलिस ने संभाजी नगर से गिरफ्तार किया; कोर्ट से नहीं मिली जमानत

दंगाई हों, बलात्कारी हों, पत्थरबाज हों या फिर मजहब बदलने वाले/वाली हो भांडा फूटने पर छिपे-छिपे फिरते है, क्यों? अदालतों को चाहिए कि इन उपद्रवियों को तलाशने में जो खर्चा हुआ है उसकी वसूली करनी चाहिए। इन उपद्रवियों को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं छीन लेनी चाहिए।        
TCS धर्मांतरण मामले में फरार चल रही आरोपित निदा खान को आखिरकार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। नासिक पुलिस की विशेष जाँच टीम (SIT) ने करीब 25 दिनों तक तलाशी अभियान चलाने के बाद उसे गुरुवार (7 मई 2026) को छत्रपति संभाजीनगर से पकड़ा।

पुलिस आयुक्त संदीप कर्णिक के अनुसार, गिरफ्तारी स्थानीय पुलिस की मदद से की गई। मामले में पहले ही कई प्राथमिकी दर्ज हो चुकी हैं और अब तक आठ आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। गौरतलब है कि TCS से जुड़े BPO यूनिट के भीतर मुस्लिम कर्मचारियों द्वारा संगठित तरीके से हिंदू महिला कर्मचारियों का शोषण किए जाने के आरोप सामने आए थे।

पीड़िताओं ने यौन उत्पीड़न, मानसिक दबाव, धार्मिक भावनाएँ आहत करने और धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। वहीं निदा खान महिलाओं को हिजाब और बुर्का पहनने, इस्लामी तौर-तरीके अपनाने और मजहबी सामग्री देखने के लिए प्रेरित करती थी।

जाँच में यह भी सामने आया कि पीड़िता को कुछ मोबाइल एप और मजहबी कंटेंट भेजे गए थे और उसका नाम बदलने की योजना तक बनाई जा रही थी।

कोर्ट से नहीं मिली राहत, SIT ने बताए कई अहम लिंक

गिरफ्तारी से पहले निदा खान ने नासिक कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। उसने कोर्ट को बताया था कि वह गर्भवती है और मुंबई में रह रही है, इसलिए उसे गिरफ्तारी से राहत दी जाए। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि महाराष्ट्र में अलग से कोई धर्मांतरण विरोधी कानून लागू नहीं है और जबरन धर्मांतरण के आरोप बेबुनियाद हैं।

हालाँकि कोर्ट ने उसकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया और अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि मामले में डिजिटल साक्ष्य, गवाहों के बयान और कई संवेदनशील जानकारियाँ सामने आई हैं, इसलिए आरोपित से हिरासत में पूछताछ जरूरी है।

SIT ने कोर्ट को यह भी बताया कि जाँच का दायरा नासिक से आगे बढ़कर मालेगाँव और यहाँ तक कि मलेशिया तक पहुँच गया है। जाँच एजेंसियों को शक है कि विदेश में नौकरी के अवसरों का इस्तेमाल कथित तौर पर लालच देने के लिए किया गया हो सकता है।

कई धाराओं में केस दर्ज, लगातार बदल रही थी ठिकाने

पुलिस के अनुसार प्राथमिकी दर्ज होने के बाद से ही निदा खान फरार चल रही थी और उसके मोबाइल फोन समेत कुछ रिश्तेदारों के फोन भी बंद पाए गए थे। पुलिस ने उसके शौहर से पूछताछ के बाद कई संभावित ठिकानों पर छापेमारी की, लेकिन हर बार पुलिस को बंद मकान ही मिले। इसके बाद राज्यभर में तलाश अभियान तेज किया गया।

मामले में निदा खान पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की यौन उत्पीड़न, मानहानि और धार्मिक भावनाएँ आहत करने से जुड़ी धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। चूँकि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से है, इसलिए उसके खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएँ भी लगाई गई हैं।

भरी फ्लाइट में TMC सांसद महुआ मोइत्रा की फजीहत, ‘पिशी चोर(आंटी चोर)’, ‘भाइपो चोर (भतीजा चोर), तृणमूल के सब चोर… यात्रियों ने जोर-जोर से की नारेबाजी: Video

                                                           TMC MP महुआ मोइत्रा
बंगाल में हुई ममता बनर्जी की करारी हार और बीजेपी की जीत की गूंज सिर्फ भारत ही नहीं विदेशों में बैठे भारत विरोधियों और भारत में बैठे उनके sleeper cells की नींद हराम करने वाली है। विदेशों में बैठे मुस्लिम कट्टरपंथियों और भारत के विरुद्ध षड़यंत्र रचने वालों को चारों खाने चित कर दिया है। ममता के राज में जिस तरह सनातन को रोंदने की कोशिश हो रही थी वह साबित करती है ममता इन सनातन विरोधियों की कठपुतली बन सबकुछ कर रही थी। इस गंभीर घटनाक्रम पर समूचा मीडिया खामोश है, क्यों?    

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी की नेता महुआ मोइत्रा की एक वीडियो वायरल हो रही है। इस वीडियो में वह फ्लाइट में बैठी हुई हैं और कुछ लोग उनके खिलाफ जोर-जोर से नारे लगा रहे हैं।

वीडियो में लोग उन्हें ‘पिशी चोर (आंटी चोर)’, ‘भाइपो चोर (भतीजा चोर)’ और ‘तृणमूल के सब चोर’ जैसे नारे लगाते सुनाई दे रहे हैं। इसके साथ ही ‘जय श्रीराम’, ‘जय माँ दुर्गा’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे भी लगाए जा रहे हैं। देख सकते हैं कि जिस समय ये घटना घटी उस वक्त महुआ मोइत्रा फ्लाइट के अंदर खड़ी थीं और चुपचाप बाहर निकलने का इंतजार कर रही थीं।

अवलोकन करें:-

बंगाल में BJP की जीत से विदेशों में बैठे मुस्लिम कट्टरपंथियों और भारत विरोधियों के मंसूबों पर पा
बंगाल में BJP की जीत से विदेशों में बैठे मुस्लिम कट्टरपंथियों और भारत विरोधियों के मंसूबों पर पा
 

घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने यह वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शेयर किया। उन्होंने केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू को टैग करते हुए माँग की कि नारेबाजी करने वाले यात्रियों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ कार्रवाई हो। उन्होंने एयरलाइन से भी यात्रियों की जानकारी देने को कहा। 

बंगाल में BJP की जीत से विदेशों में बैठे मुस्लिम कट्टरपंथियों और भारत विरोधियों के मंसूबों पर पानी फिरा, NYT-अल जजीरा-गार्डियन ने फैलाया झूठ: किसी ने मुस्लिमों के लिए बहाए आँसू तो किसी ने हिंदू राष्ट्रवाद को कोसा

इस्लामिक कट्टरपंथियों और भारत विरोधी ताकतों को मालूम होना चाहिए कि भारत तपस्वियों की धरती है। साधु-संतों-ऋषि और मुनियों की कठिनतम तपस्या से सनातन अमर था, है और रहेगा। इन महाऋषियों की तपस्या व्यर्थ नहीं जाएगी। ये इन महाऋषियों की तपस्या का प्रताप था कि चुनाव आयोग को इतना सख्त होकर चुनाव करवाना पड़ा। ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है 
सनातन के विरुद्ध काम करने सरकार को जड़ से उखाड़ने के लिए कोई देवी-शक्ति चुनाव आयोग के रूप में काम कर रही थी। बंगाल का ऐसा चुनाव था जहाँ स्थानीय पुलिस को मतदान केंद्र से दूरी पर रखा गया था। ऐसा अपने जीवन में पहली बार देखा। दूसरे मुसलमानों द्वारा एकजुट होकर बीजेपी के खिलाफ वोट देना भी किसी काम नहीं आया। समय आ गया है कि सनातन प्रेमियों को कालनेमि हिन्दुओं को नकारना चाहिए। जिस दिन हिन्दू इन कालनेमियों को दरकिनार करना शुरू कर देगा कोई भारत विरोधी और मुस्लिम कट्टरपंथी इन्हे घास नहीं डालेगा।    
बंगाल में पहली बार बीजेपी का पताका आसमान की बुलंदियों को छू रहा है। विधानसभा चुनाव 2026 के ऐतिहासिक नतीजों ने न सिर्फ भारत के विपक्ष को सकते में ला दिया है, बल्कि दुनिया भर के इस्लामी वामपंथी ग्रुप को परेशान कर दिया है। जो साबित करता है कि यदि इस चुनाव में बंगाल पर देवी आशीष नहीं होता बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता। यही स्थिति 2014 लोकसभा चुनाव में हुई। अगर भारत पर देवी-देवताओं का शुभाशीष प्राप्त हो रहा है हिन्दुओं को कालनेमि हिन्दुओं और सनातन विरोधियों को धूल चटानी होगी। संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले भारत विरोधियों के हाथ की काठपुतली हैं। संविधान के स्वरुप को बिगाड़ने वाले ये ही लोग हैं।    
साभार : सोशल मीडिया 

इससे पहले बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण का दाँव चलता था और 15 साल ममता बनर्जी से पहले करीब 35 साल लेफ्ट और उससे पहले कॉन्ग्रेस का शासन था। पहली बार हिन्दू एकजुट हुए और बीजेपी को वोट किया। यही वजह है कि बीजेपी को 294 में से 205 सीटों की प्रचंड जीत मिली।

लेकिन विदेशी मीडिया इस जीत को अलग चश्मे से देख रही है। कई विदेशी मीडिया ने BJP की जबरदस्त जीत को कवर किया, लेकिन इसे ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ सोच, ‘मुस्लिम अल्पसंख्यक को खतरा’ के तौर पर पेश करने में जुट गई। इतना ही नहीं, चुनाव से पहले SIR के माध्यम से की गई वोटर वैरिफिकेशन को लेकर भी झूठ फैलाया गया।

बंगाल का इतिहास हिन्दुओं के साथ अत्याचार से पटा हुआ है। बंगाल विभाजन और 1946 में हिन्दुओं का नरसंहार हुआ। आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला। बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए बंगाल सबसे सुलभ रहा। बांग्लादेश से सटे जिलों में तो हाल बुरा है।

ऐसे हालात में 2014 में नरेन्द् मोदी के नेतृत्व में बनी केन्द्र की एनडीए सरकार ने हालात पर नजर रखी। बीजेपी धीरे-धीरे लोगों को गोलबंद करने लगी। ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ हिन्दुओं को जागरूक किया। संदेशखाली और आरजीके केस ने महिला सुरक्षा की कलई खोलकर रख दी।

सुनियोजित तरीके से हिन्दुओं के साथ होने वाले अत्याचार ने सबका ध्यान खींचा। सबसे बड़ी बात है कि दबले कुचले बहुसंख्यक आबादी के मन से उस खौफ को हटाया, कि अगर ममता नहीं जीतीं, तो उनका कत्लेआम निश्चित है। बीजेपी को फर्श से अर्श तक पहुँचने में 12 साल लगे।

भाजपा की जीत के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स यानी NYT, अल जजीरा, और द गार्डियन जैसे विदेशी मीडिया आउटलेट्स ने कवरेज के दौरान झूठ फैलाने की कोशिश की। जीत को हिन्दू राष्ट्रवाद का विस्तार बताया और अल्पसंख्यकों में भय फैलने जैसी बातें कही गई।

NYT ने बंगाल की जीत को मोदी के ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ का विस्तार कहा

बंगाल के चुनावी जीत को ‘लोकतांत्रिक जनादेश’ के रूप में दिखाने के बजाय इसे अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा की जीत’ कहा।

एंटी इंडिया और एंटी हिन्दू विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए लेख में लिखा गया है कि यह प्रधानमंत्री मोदी के हिन्दू फर्स्ट राजनीति का विस्तार है। लेख का शीर्षक है – ‘मोदी के हिंदू राष्ट्रवादियों ने भारत के विपक्ष के गढ़ पर कब्जा किया’। इतना ही नहीं NYT ने SIR पर सवाल उठाते हुए यह भी कह दिया कि चुनाव आयोग और बीजेपी में साँठ-गाँठ है। दरअसल विपक्ष के आधारहीन बयानों और तर्कों को सही मानते हुए भारतीय लोकतंत्र पर सवाल खड़े करने की कोशिश की।

अखबार ने पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर झूठ परोसा और दावा किया कि 90 लाख वोटरों के नाम हटा दिए। इनमें कई मुस्लिम थे। NYT ने न सिर्फ SIR को BJP के पक्ष में किया गया चुनावी इंजीनियरिंग कहा, बल्कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार की ईमानदारी पर भी सवाल उठाए और ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया।

जबकि SIR में सबसे ज्यादा जिन जिलों में सबसे ज्यादा वोटरों के नाम हटे, उनमें मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना शामिल हैं। जिन 20 विधानसभा सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, उनमें से 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी ने ही जीत हासिल की है। वहीं, BJP को इनमें से 6 और कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1 सीट मिली है। इसके बावजूद एसआईआर को ‘विलेन’ बताकर चुनावी हार को उसके मत्थे डालने की कोशिश NYT समेत तमाम विदेशी मीडिया आउटलेट्स ने की है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि NYT, अलजजीरा जैसे अखबार ने दावा किया है कि चुनाव आयोग ने बंगाल में SIR करने का मकसद अल्पसंख्यक वोटरों को हटाना था। जबकि सच्चाई यह है कि आयोग ने दिसंबर 2025 में 58.25 लाख वोटर्स के नाम हटा दिए थे। यह वे वोटर्स थे जो मर गए थे, अपने घरों में मौजूद नहीं थे या शिफ्ट हो गए थे अथवा जिनका नाम दो जगहों पर था। चुनाव आयोग की इस कवायद की वजह से वोटरों की कुल संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ हो गई थी। फाइनल लिस्ट में फरवरी 2026 में 5 लाख और नाम हटा दिए गए।

शुरू में जिन 60.06 लाख वोटर्स के नाम तय किए गए थे, उनमें से लगभग आधे अयोग्य पाए गए। सबसे ज़्यादा नाम मुस्लिम-बहुल मुर्शिदाबाद में हटाए गए। मुर्शिदाबाद, मालदा जैसे जिलों की सीमा बांग्लादेश से मिलती है। यहाँ घुसपैठ बड़े पैमाने पर हुए हैं। घुसपैठ और क्राइम यहाँ चुनावी मुद्दे रहे।

इस पर NYT ने लिखा, करीब 90 लाख वोटरों का नाम हटा, जिसमें कई मुस्लिम थे। चुनाव आयोग ने ऐसी शिकायतों को खारिज कर दिया।

पीएम मोदी की विचारधारा पर सवाल उठाए गए

 NYT में दावा किया गया है कि पीएम मोदी उस स्कूल में पढ़कर निकले हैं, जहाँ भारत को हिन्दू राष्ट्र कहा जाता है। हालाँकि यहाँ हजारों साल तक मुस्लिम शासन रहा। इसमें कहा गया है कि बंगाल में 19वीं सदी से कभी भी किसी धर्म का राज्य नहीं रहा। ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर बंगालियों को नाज रहा है। अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में भी इनका अहम योगदान रहा। बंगाल में कम्यूनिस्ट पार्टी का शासन 34 साल था और फिर ममता सरकार 15 साल तक रही।

लेकिन NYT, अल जजीरा जैसे अखबार जब इतिहास की बात करते हैं तो उन्हें अच्छे से पता है कि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, न कि किसी ओर आधार पर। बंग-भंग के दौरान हिन्दू मुस्लिम दंगे और हजारों हिन्दू महिलाओं के साथ रेप, उन्हें जिंदा जला दिया जाना इतिहास में दर्ज है। इस खूनी संघर्ष को कभी नहीं भूलाया जा सकता। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता की बात कहते हुए बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी कहना काफी हास्यास्पद लगता है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने बड़ी आसानी से पीएम नरेंद्र मोदी को ‘एंटी-सेक्युलरिस्ट’ दिखाया। भारत एक हिंदू बहुल राष्ट्र है। यहाँ की धर्मनिरपेक्षता हिन्दुओं को हाशिए पर रख कर नहीं हो सकती। भारतीय सभ्यता में सनातन जन्मी है। यही सच्चाई है। बीजेपी या उसकी ‘राष्ट्रवादी विचारधारा’ में दूसरे धर्मों के लिए वैमन्ष्यता नहीं है। यहाँ तक कि हजारों सालों तक शासन करने वाले इस्लाम से भी नफरत नहीं है। हालाँकि ये लोग बाहर से आए और हिंदुओं और गैर-मुसलमानों पर ज़ुल्म ढाया। उन्हें मारा-पीटा और धर्मांतरण के लिए मजबूर किया। हिन्दुओं के मंदिरों को लूटा, उन्हें तोड़ा और मस्जिद में तब्दील कर दिया। इस्लाम कबूल करने के लिए अत्याचार किए गए। इसके बावजूद हिन्दू आस्था टिकी रही, तो ये गर्व की बात है।

लेकिन इस्लामी वामपंथी प्रोपेगैंडा फैलाने वाले इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ बताते हैं। इतिहास में इस्लामी शासकों के अत्याचार की जगह उनके गुणगान किए जाते हैं। हिन्दुओं के प्रति उनके नफरत की चर्चा नहीं की जाती।

ममता बनर्जी को गरीबों का मसीहा दिखा रहे प्रोपेगेंडा बाज

NYT ने ममता बनर्जी को गरीबों और दबे-कुचले के मसीहा के तौर पर दिखा रही है। ममता बनर्जी ने लेफ्ट को हरा कर सत्ता संभाली थी।

NYT ने लिखा है कि कॉर्पोरेट हितों का विरोध कर, वेलफेयर स्कीमों का प्रचार किया और एक धर्मनिरपेक्ष के तौर पर अपनी पहचान बनाई, जिससे वह मुसलमानों और लिबरल लोगों के बीच खास तौर पर पॉपुलर हो गईं।

लेकिन ममता बनर्जी के राज में सोशल वेलफेयर स्कीम घटे। घोटालों का जोर बढ़ा। नौकरी पाने के लिए बंगाल में टीएमसी से जुड़ना जरूरी बन गया था। पुलिस का काम ममता के कैडर कर रहे थे। उन्हें नजरअंदाज कर न तो कोई राज्य में टिक सकता था और न ही नौकरी कर सकता था। राज्य का इकोनॉमिक ग्रोथ गिर गया। राज्य में इतनी अराजकता थी कि कंपनियाँ बंगाल छोड़ कर भाग गईं।

बंगाल जो कभी बौद्धिक राज्य माना जाता था। उसकी हालत दूसरे राज्यों में मजदूरी करने वालों की हो गई। न सड़कें, न काम और गरीबी में जीने के लिए मजबूर जनता का आखिरकार ममता बनर्जी से विश्वास डगमगाया और उन्हें उखाड़ फेंका। 15 साल का शासन राज्य को विकसित करने और कानून व्यवस्था को दुरुस्त कर पटरी पर लाने के लिए कम नहीं थे। लेकिन ममता बनर्जी ने सिर्फ वोटबैंक की चिंता की और उसके लिए घुसपैठियों को शरण दी। बंगाल को कर्ज के जाल में धकेल दिया। नेशनल GDP में पश्चिम बंगाल का हिस्सा कम हो गया, प्रति व्यक्ति आय कम हो गई।

ममता बनर्जी ने कई वेलफेयर स्कीम चलाईं। इससे बंगाल की माली हालत और खराब हुई। ममता सरकार ने बंगाल के इंडस्ट्रियल माहौल को इस हद तक बर्बाद कर दिया कि 2011 से अब तक 110 लिस्टेड फर्मों समेत 6,600 से ज़्यादा कंपनियों ने अपना ऑफिस कोलकाता में बंद कर दूसरे राज्यों की ओर रुख किया।

हिन्दुओं के प्रति ममता बनर्जी का रवैया दमनकारी रहा। 2023 में पश्चिम बंगाल के मालदा के कालियाचक में दुर्गा मंदिर को ब्लॉक और बैरिकेड किया गया था, क्योंकि उस रास्ते से मुहर्रम का जुलूस जाने वाला था। इतना ही नहीं ममता बनर्जी ने 2016 और 2017 में मुहर्रम के जुलूसों के लिए दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर रोक लगा दी थी। इसकी प्रतिक्रिया बंगाल में दिखी भी थी।

असल में ममता बनर्जी ने मुसलमानों को खुश कर उन्हें वोटबैंक बनाया और हिंदुओं को दबाया। इसलिए वह और उनकी पार्टी लिबरल लोगों की नजर में ‘सेक्युलर’ और ‘लिबरल’ बनी रहीं।

बंगाल जीत को हिन्दू बहुसंख्यक की जीत कहा

ब्रिटेन की समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बंगाल और असम में BJP की चुनावी सफलता को हिंदू बहुसंख्यक की जीत कहा। उसके मुताबिक बीजेपी हिन्दू बहुमत को लुभाने की रणनीति में सफल रही। वहीं आगे कहा गया है कि बीजेपी के पास विपक्ष के मुकाबले ज्यादा धन-संसाधन हैं। एजेंसी ने कहा है कि एसआईआर जैसे कारण है, जिसके चलते लाखों लोग, खास कर मुस्लिम बड़ी संख्या में वोट नहीं डाल पाए। ये लोग टीएमसी के समर्थक थे। लेकिन चुनाव आयोग ने पूरी प्रक्रिया को संविधान सम्मत बताया है।

दिल्ली स्थित थिंकटैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा के हवाले से एजेंसी ने लिखा, ‘बीजेपी के पास एक करिश्माई राष्ट्रीय नेता है, पार्टी बेहद संगठित है, उसके पास संसाधनों काफी ज्यादा हैं, जो कई दलों के पास नहीं है। एक स्पष्ट वैचारिक नैरेटिव है- ये सभी मिलकर हिंदुओं को एकजुट करने में मदद करते हैं। ‘

विदेशी मीडिया की आदत है कि वे BJP को ‘हिंदू नेशनलिस्ट’ पार्टी, ‘हिंदू हार्डलाइनर’, ‘हिंदुत्व संगठन’ बताते हैं। ये चाहते हैं कि पाठक इसे कट्टरपंथी पार्टी मान ले। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश की हिंदू बहुसंख्यक को अपील करने की PM मोदी की रणनीति जीत की वजह बनी।

BJP के यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का साथ देने वाले इस्लामी वामपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म ‘सेक्युलरिज़्म’ का राग अलापते हुए बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी कहती है।

BJP के यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का साथ देने वाले इस्लामी वामपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म ‘सेक्युलरिज़्म’ का राग अलापते हुए बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी कहती है।

हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडे को मिलेगी गति-बीबीसी

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टर के अनुसार, 10 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले बंगाल की जीत पीएम मोदी के हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को नई गति देगी और पूर्वी भारत में BJP का विस्तार पूरा करेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई सालों तक पश्चिम बंगाल राज्य केन्द्र में नरेंद्र मोदी की राजनीतिक बढ़त के बावजूद एक बड़ा अपवाद बना रहा। 2026 में बीजेपी की बंगाल फतह मोदी के 12 साल के शासन के सबसे अहम राजनीतिक सफलताओं में एक गिनी जाएगी।

द गार्डियन ने उठाए सवाल

UK के अखबार ‘द गार्डियन’ ने बंगाल और असम में बीजेपी की जीत को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की जीत बताया। हिन्दू विरोधी रूख के लिए मशहूर द गार्डियन ने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की बात कही और ‘सेक्युलरिज्म खतरे में’ वाला नैरेटिव सेट करने की कोशिश की। इससे पहले भी उसने 2014 में बीजेपी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ‘सिम्बोलिक खतरे’ के तौर पर पेश किया था।
बंगाल और असम विजय पर इस बार भी उसने वही राग अलापा। 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत की राजनीति BJP के इर्द-गिर्द घूम रही है। पीएम मोदी की व्यापक लोकप्रियता का प्रमाण है कि केन्द्र में लगातार तीसरी बार और 20 से ज्यादा राज्यों में बीजेपी गठबंधन सत्तासीन है। इसको नकारते हुए वामपंथी लिबरल ग्रुप धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए आरोप लगाता रहा है कि बीजेपी भारत को सेक्युलर देश के बजाय हिंदू देश बनाना चाहती है।

भारतीय गणतंत्र पर गंभीर खतरा- प्रथम आलो

बांग्लादेश का अखबार प्रथम आलो ने बंगाल में जीत पर शीर्षक दिया- पश्चिम बंगाल चुनाव, सिर्फ राज्य का नहीं बल्कि भारतीय गणतंत्र का भविष्य खतरे में।
इसमें कहा गया है कि बंगाल चुनाव भारत के चुनावी इतिहास में याद रखा जाएगा क्योंकि एसआईआर के माध्यम से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम काटे गए और केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों की अभूतपूर्व तैनाती रही। हालाँकि अखबार मान रहा है कि बंगाल में इस बार हिंसा कम हुई। अखबार के मुताबिक बंगाल में बीजेपी ध्रुवीकरण की वजह से जीती। बंगालियों के अंदर भी हिन्दुत्व पैर जमा चुका है। अखबार लिखता है कि बंगाली लंबे समय से समन्वयवादी हिन्दू परंपरा के लिए जाने जाते हैं।
जबकि पाकिस्तानी दैनिक डॉन ने एएफपी की एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि मोदी ने पश्चिम बंगाल में ‘रिकॉर्ड’ जीत का दावा किया।
इसमें कहा गया है कि ये परिणाम मोदी को 2029 में होने वाले आम चुनाव से पहले उच्च बेरोजगारी दर और लंबित अमेरिकी व्यापार समझौते सहित कई आर्थिक और विदेश नीति संबंधी चुनौतियों से निपटने में मजबूती प्रदान करेंगे।
विदेशी मीडिया ने भारत में हो रहे सकारात्मक सामाजिक-राजनीतिक बदलावों की बातें नहीं की, बल्कि एक नकारात्मक और एकतरफा नैरेटिव पेश किया है। यह वास्तविक पत्रकारिता नहीं है, बल्कि इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगेंडा है।

सिब्बल ने पढ़ाया ममता को पाठ लेकिन विधानसभा भंग होने के बाद ममता विधायक भी नहीं रही, बेइज्जत हुई वो अलग; ये पाठ केजरीवाल ने नहीं पढ़ा, वरना वो भी अपने को CM कहता

सुभाष चन्द्र

खिसाई बिल्ली खम्बा नोचे, ठीक वही हालत ममता बनर्जी की है और उसको फर्ले पर चढ़ाने वालों की भी कमी नहीं। ममता हार से इतना बौखला गयी है कि अपने आत्मसम्मान को भी भूल गयी। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने में फिर सम्मान था लेकिन विधान सभा भंग होने पर मुख्यमंत्री जाना बहुत बड़ी बेइज्जती है।  

दरअसल ममता बनर्जी को यह पाठ कपिल सिब्बल ने पढ़ाया लगता है कि मैं हारी नहीं हूँ मुझे हराया गया है, इसलिए मैं इस्तीफा नहीं दूंगी। यह बयान आज सिब्बल का X पर आया है और उसने कहा है कि 25 लाख वोटरों को वोट देने से वंचित किया गया, इसलिए ममता को भाजपा ने नहीं चुनाव आयोग ने हराया है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
कपिल सिब्बल, तुम कानून के कद्दू जानकार हो, तुम्हे इतना भी नहीं पता कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद विधानसभा स्वतः ही भंग हो जाती है बंगाल की विधानसभा का कार्यकाल मई 7 को चुनाव आयोग की अधिसूचना के साथ समाप्त हो गया और वह भंग हो गई विधानसभा के भंग होते ही ममता बनर्जी अब विधायक भी नहीं रही, मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा अपने पर्स में रखे घूमती फिर

सिब्बल कुछ मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ममता सरकार की तरफ से लड़ रहा था और कुछ को TMC अध्यक्ष के तौर पर ममता की तरफ से लड़ रहा था 2 मई को भी वो पार्टी की तरफ से कोर्ट में था हो सकता है उसे और अन्य वकीलों को अभी तक पार्टी और सरकार से फीस न मिली हो अगर नहीं मिली तो पार्टी की फीस तो पार्टी देगी लेकिन सरकार की तरफ से लड़ने वाले वकीलों को आने वाली भाजपा सरकार फीस देने से मना कर सकती है और कर भी देनी चाहिए क्योंकि ममता सरकार संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध लड़ रही थी जिससे भाजपा सरकार का कोई सरोकार नहीं था अब अपनी फीस की चिंता करो कपिल सिब्बल 

ये पाठ अभिषेक मनु सिंघवी ने केजरीवाल को नहीं पढ़ाया कि “मैं हारा नहीं हूं मुझे हराया गया है, मैं इस्तीफा नहीं दूंगा” 

ममता पहली मुख्यमंत्री थी जिसने सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने की कोशिश की और वहां अपनी दलीलें भी दी ऐसे ही केजरीवाल भी हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने पेश हुआ

केजरीवाल ने जेल में रह कर भी त्यागपत्र देने से मना कर दिया और हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर सके उन्होंने कह दिया कि वो किसी मुख्यमंत्री को नहीं हटा सकते अब ममता ने भी त्यागपत्र देने से मना कर दिया दोनों का आचरण “अराजकतावादी” है। फिर कहते फिरते हैं कि मोदी संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म कर रहा है यानि चोर मचाये शोर, संविधान की धज्जियाँ पूरा INDI गठबंधन उड़ा रहा है।   

ममता बनर्जी की सबसे बड़ी गलती थी कि उसने SIR के खिलाफ हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट में पूरी शक्ति लगा दी और बंगाल में ही नहीं पूरे देश में धारणा (Perception) बना दी कि वह बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को बचा रही है 12 राज्यों में SIR हुआ लेकिन कहीं कोई समस्या नहीं हुई बंगाल के सिवाय 

ममता के SIR विरोध ने हिंदू वोटर को एकजुट होने के लिए प्रेरित किया और ऐतिहासिक जीत मिली भाजपा को जबकि एक सत्य सामने यह भी आया है कि 20 सीटों पर सबसे ज्यादा वोट कटे, जिनमें से 13 सीट ममता की पार्टी ने जीती अगर विरोध न किया होता तो परिणाम कुछ और मिल सकता था लेकिन सिब्बल जैसे वकीलों ने माल कमाने के लिए ममता को भड़काए रखा कि वो चुनाव आयोग की सुप्रीम कोर्ट में ऐसी तैसी कर देंगे लेकिन यह नहीं पता था कि सामने ज्ञानेश कुमार है जो उनसे भी बड़ा खिलाड़ी है

पिछली बार ममता नंदीग्राम से हार कर मुख्यमंत्री बने रहने के लिए भवानीपुर से लड़ी थी लेकिन अबकी तो मुख्यमंत्री बन नहीं सकती और इसलिए हो सकता है अब कोई चुनाव न लड़े

ममता ने हार कर इस्तीफा न देने की जिद करके और ज्यादा बदनामी मोल ली है और उससे भी ज्यादा दोष चन्द्रनाथ रथ की हत्या का लगेगा, बेशक ममता का उससे कोई संबंध न हो लेकिन सुवेंदु अधिकारी का PA होने के नाते दोष ममता पर ही आएगा

पंजाब : AAP नेता के करीबी नितिन बजाज ने ED को देख 9वीं मंजिल से फेंका 21 लाख रूपए से भरा बैग, नीचे ‘कैच’ करने को तैयार था ड्राइवर

                                                                                                                        साभार: इंडियन एक्सप्रेस

पंजाब में गुरुवार (7 मई 2026) को ED ने हवाला मनी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़े लोगों के ठिकानों पर छापेमारी की। मोहाली के खरार इलाके में ED की टीम ने आईटी प्रोफेशनल नितिन बजाज के घर पर भी रेड डाली। इस दौरान बिल्डिंग से नकदी से भरा बैग फेंके जाने का वीडियो भी सामने आया है।

नितिन बजाज को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के करीबी सहयोगी और OSD से जुड़ा माना जाता है। पंजाब सरकार के प्रवक्ता के अनुसार, “टीम को आते देख किसी ने इमारत की नौवीं मंजिल से नकदी से भरा बैग नीचे फेंक दिया, जिसे नीचे खड़े एक ड्राइवर ने उठा लिया। हालाँकि टीम ने घटना को भांप लिया और भाग रहे ड्राइवर को बैग के साथ पकड़ लिया।”

बिक्रम सिंह मजीठिया के अनुसार, उनके पास से लगभग 21 लाख रुपए नकद बरामद हुए। मजीठिया ने दावा किया कि बरामद की गई रकम पंजाब सीएम के OSD के करीबी सहयोगियों और रिश्तेदारों की है। हालाँकि ED की ओर से अभी तक आधिकारिक तौर पर जब्त रकम या मामले के पूरे विवरण का खुलासा नहीं किया गया है।

मोहाली में बिर देविंदर सिंह के ठिकानों पर भी जाँच एजेंसी पहुँची, जिन्हें भी AAP से जुड़े एक प्रभावशाली पदाधिकारी का करीबी बताया जा रहा है। पूरा मामला हवाला लेनदेन, संदिग्ध फंडिंग और वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़ा माना जा रहा है। फिलहाल ED की जाँच जारी है।

गैर-मुस्लिमों पर हिंसा के लिए उकसाती थी जो Islamic Ethics of Warfare मजहबी किताब, दिल्ली की रेखा सरकार ने जब्त करवाया

      दिल्ली सरकार ने 'इस्लामिक एथिक्स ऑफ वॉरफेयर' नाम की किताब को किया जब्त (साभार: ANI/Amazon)
"चलो देर आए दुरुस्त आए" यानि जो काम कई साल हो जाना चाहिए था चलो उसकी शुरुआत हो गयी है। दिल्ली की बीजेपी सरकार ने इस्लामिक कट्टरपंथी और उनके आकाओं पर जो कुठाराघात करने का काम किया है वह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। जिन बातों का उल्लेख मुस्लिम लेखक अनवर शेख ने अपनी किताबों में किया था Islamic Ethics of Warfare तो सिर्फ एक हल्की-सी झांकी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता अभी फिल्म का ट्रेलर और पूरी फिल्म बाकी है। 

अयातुल्लाह खेमैनी सलमान रुश्दी के खिलाफ तो फतवा देने की हिम्मत कर सका लेकिन अनवर शेख पर नहीं। जबकि खेमानी की जिंदगी में अनवर ने 2 या 3 किताबों का प्रकाशन कर दिया था। अगर भारत एवं अन्य सरकारों ने अनवर को गंभीरता से लिया होता शायद आतंकवाद नहीं होता। गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार नहीं होते। लेकिन सभी तुष्टिकरण कर मालपुए खाने में लगे रहे। उसी का अंजाम है कि आतंकवाद एक नासूर बन चूका है। बस संक्षेप में इतना ही कहना है कि अनवर शेख के अधूरे काम को पूरा कर रही है अली सीना की किताब Understanding Mohammad And Muslim, इसके खिलाफ भी फतवा देने की किसी में अब तक हिम्मत नहीं। मेरे अनुभव से अली सीना की किताब अनवर शेख की किताबों का संकलन है। किताब के Preface में सीना का कहना है कि किताब पढ़कर मुसलमान इस्लाम छोड़ रहे हैं जबकि कहा ये जा रहा है कि अनवर शेख को पढ़कर। 

खैर, इस अति गंभीर मुद्दे पर सरकार को बहुत काम करना है। बहुत छापेमारी भी करनी है। जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भिड़ के छत्ते को छेड़ा है तो केन्द्रीय गृह मंत्री और सुप्रीम कोर्ट को पत्थरबाजों पर blind firing के आदेश और इसके खिलाफ खड़े होने वाले दलाल वकीलों पर भी सख्त आदेश देने के लिए बोलिए।       

दिल्ली की बीजेपी सरकार ने ‘इस्लामिक एथिक्स ऑफ वॉरफेयर’ नाम की किताब को जब्त करने के आदेश दिए हैं। सरकार का कहना है कि यह किताब मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाती है और सशस्त्र विद्रोह करने को उकसाती है। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किताब को जब्त किया है। 

दिल्ली सरकार के गृह विभाग से जारी आदेश में कहा गया, “सरकार के ध्यान में बात आई है कि ‘इस्लामिक एथिक्स ऑफ वॉरफेयर’ नाम की किताब लोगों, खासकर विशेष समुदायों के लोगों को हथियार उठाने और हिंसक सोच की तरफ भड़काती है। यह किताब कट्टर विचारधारा को बढ़ावा देती है, जिससे देश की सुरक्षा और जनता की शांति को खतरा हो सकता है।”

आदेश में यह भी कहा गया है कि सबूतों और जाँच में यह साफ पता चला है कि इस किताब में मजहबी बातों का गलत इस्तेमाल करके हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की गई है, इसीलिए तुरंत कार्ऱवाई करना जरूरी है। इसीलिए दिल्ली सरकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 98 के तहत किताब और इसकी सारी कॉपियों को जब्त किया है।

किताब में क्या लिखा?

दिल्ली सरकार के आदेश के मुताबिक, यह किताब सिर्फ इस्लाम को सबसे श्रेष्ठ मानती है और दूसरे धर्मों के खिलाफ लड़ाई की बात करती है। इसमें दूसरे धर्मों की मान्यताओं पर हमला करके अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच नफरत और दुश्मनी फैलाई गई है। साथ ही इस किताब में लोगों को कट्टर बनाने के लिए कुरान और अन्य मजहबी किताबें को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। इससे लोगों में अलगाव की भावना पैदा की गई और हिंसा व आतंकवाद की सोच को बढ़ावा दिया गया है।

इसके अलावा यह भी पाया गया कि यह किताब भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ गलत और भ्रामक जानकारी फैलाती है। इसीलिए किताब पर BNS, 2023 की धारा 196, 197(1)(c), 197(1)(d) भी लागू की गई है।

फिर पनौती साबित हुए अखिलेश यादव और तेजस्वी; जिन-जिन दलों के लिए प्रचार, दिया समर्थन, सबका बैठ गया भट्ठा

      अखिलेश और तेजस्वी ने जिसका किया प्रचार, अंत में हारी वहीं पार्टी, BJP ने किया बेहतरीन प्रदर्शन (साभार: AI)
"जहां जहां पांव पड़े कम्बख्त के, वहीं बंटाधार", कहावत चरितार्थ हो रही है अखिलेश और तेजस्वी यादव पर। युगों-युगों प्राचीन जिस सनातन का विरोध अन्य मजहब तो क्या कालनेमि हिन्दू भी कर रहे हैं। इन कालनेमि हिन्दुओं को नहीं मालूम कि हिन्दुओं ग्रंथ राजनीति ही नहीं जीवनशैली भी सिखाते हैं। 
देखिए महाभारत का सन्देश जिसे सिर्फ हिन्दुओं को नहीं हर उस सनातन विरोधी को भी गंभीरता से लेना होगा : महाभारत का सार सिर्फ़ नौ लाइनों में समझें, जिसमें पाँच लाख श्लोक हैं....
आप किसी भी धर्म के हों, चाहे आप औरत हों या मर्द, चाहे आप गरीब हों या अमीर, चाहे आप अपने देश में हों या विदेश में,
संक्षेप में...
अगर आप इंसान हैं, तो महाभारत के ये 9 अनमोल मोती ज़रूर पढ़ें और समझें....
1. अगर आप समय रहते अपने बच्चों की बेवजह की मांगों और इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं करेंगे, तो आप ज़िंदगी में लाचार हो जाएँगे... 'कौरव'
2. आप कितने भी ताकतवर क्यों न हों, अगर आप अधर्म का साथ देंगे, तो आपकी ताकत, हथियार, हुनर और आशीर्वाद सब बेकार हो जाएँगे... 'कर्ण'
3. अपने बच्चों को इतना बड़ा न बनाएँ कि वे अपने ज्ञान का गलत इस्तेमाल करके पूरी तबाही मचा दें...   'अश्वत्थामा'
4. कभी ऐसे वादे न करें कि आपको अधर्मियों के आगे झुकना पड़े...  'भीष्म पितामह'
5. अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल *धन, शक्ति, अधिकार और गलत लोगों का साथ आखिर में पूरी बर्बादी की ओर ले जाता है... 'दुर्योधन'
6. कभी भी सत्ता की बागडोर किसी अंधे व्यक्ति को मत दो, यानी जो स्वार्थ, धन, घमंड, ज्ञान, मोह या वासना में अंधा हो, क्योंकि वह बर्बादी की ओर ले जाएगा... 'धृतराष्ट्र'
7. अगर ज्ञान के साथ समझदारी है, तो आप ज़रूर जीतेंगे... 'अर्जुन'
8. धोखा आपको हर मामले में सफलता नहीं दिलाएगा... 'शकुनि'
9. अगर आप नैतिकता, नेकी और कर्तव्य को सफलतापूर्वक बनाए रखते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकती।   'युधिष्ठिर'
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सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः    
चुनावी राजनीति में बयान देना, माहौल बनाना और जीत का दावा करना आम बात है, लेकिन जब यही दावे लगातार अलग-अलग राज्यों में दोहराए जाएँ और हर बार नतीजे उसके उलट आएँ, तो मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। वह यह दिखाता है कि आपका बोलना सही नहीं है क्योंकि आप कर कुछ पा नहीं रहे और ‘पनौती’ साबित हो रहे सो अलग। पिछले कुछ चुनावों में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ यही होता नजर आ रहा है।

दोनों नेताओं ने खुद को विपक्षी राजनीति के अहम चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने बंगाल से लेकर तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार तक अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दलों के समर्थन में न सिर्फ प्रचार किया, बल्कि बार-बार दावा कर विपक्षी पार्टियों के लिए जीत लगभग तय बताई।

हालाँकि जब वास्तविक नतीजे सामने आए तो लगभग हर जगह पर तस्वीर इतनी उलट थी कि इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे। इस पूरे सिलसिले को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह सिर्फ हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गैप की कहानी है जो राजनीतिक दावों और जमीनी नतीजों के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है।

बंगाल: ममता को लेकर किया ‘एक अकेली लड़ जाएगी’ का दावा, जीती BJP

इस पैटर्न की सबसे ताजा कड़ी पश्चिम बंगाल में देखने को मिली। यहाँ अखिलेश यादव ने खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में सोशल मीडिया पर लिखा, “एक अकेली लड़ जाएगी, जीतेगी और बढ़ जाएगी।” यह बयान महज औपचारिक समर्थन नहीं था, बल्कि भविष्यवाणी जैसा था। इसमें संदेश साफ था कि ममता बनर्जी के लिए कोई चुनौती नहीं है और उनकी जीत तय है।

हालाँकि जैसे ही मतगणना के रुझान सामने आने लगे, यह दावा जमीनी हकीकत से टकराता नजर आया। पश्चिम बंगाल में BJP ने इतिहास रच दिया। बीजेपी ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार को 15 साल के बाद उखाड़ फेंका है। यहाँ बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली है।

तमिलनाडु: ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ का नारा लगातीं तेजस्वी की रैलियाँ पर वोट पर नहीं पड़ा असर

तमिलनाडु में तेजस्वी यादव की सक्रियता इस पूरे पैटर्न का अगला बड़ा उदाहरण है। तेजस्वी ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ के लिए खूब पसीना बहाया था। उन्होंने एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए उन इलाकों में प्रचार किया जहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी और मजदूरों की संख्या अधिक है।

उनके भाषणों में ‘सामाजिक न्याय’ और ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ की बात प्रमुखता से उठाई गई। यह स्थानीय राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश के साथ एक सोची-समझी रणनीति थी।

रैलियों में थोड़ी-बहुत भीड़ भी दिखी, मीडिया कवरेज भी मिला, लेकिन जब नतीजों के रुझान आए तो यह साफ हो गया कि यह रणनीति अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाई। जिन सीटों पर तेजस्वी ने विशेष ध्यान दिया था, वहाँ भी DMK गठबंधन पिछड़ता नजर आया।

कई जगह मुकाबला AIADMK और TVK के बीच सिमट गया, जिससे यह संकेत मिला कि स्थानीय मुद्दे और एंटी-इंकम्बेंसी की लहर, बाहरी प्रचार से कहीं ज्यादा प्रभावी रही। यानी मंच पर जो भीड़ दिखाने की कोशिश हो रही थी, वह वोट में तब्दील नहीं हो सकी। आँकड़ों की बात करें तो TVK ने अब तक 36 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए मजबूत बढ़त बना ली है और 72 सीटों पर आगे चल रही है।

दूसरी ओर सत्तारूढ़ DMK ने 17 सीटों पर जीत हासिल की है और 45 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ने अब तक 1 सीट पर जीत दर्ज की है और 4 सीटों पर आगे है, जबकि AIADMK ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की और वह 30 सीटों पर आगे चल रही है।

दिल्ली: अखिलेश यादव का ’70 में 70 हार जाएगी भाजपा’ वाला दावा, लेकिन हकीकत उलट

दिल्ली में अखिलेश यादव ने अरविंद केजरीवाल के साथ रोड शो करते हुए कहा था कि भाजपा सभी 70 सीटें हार सकती है और आम आदमी पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी। यह बयान चुनावी भाषण से आगे बढ़कर एक तरह की पूरी चुनावी तस्वीर पेश करता था, जहाँ इनकी ओर से तो मुकाबला लगभग खत्म माना जा रहा था।

हालाँकि दिल्ली की राजनीति इतनी सीधी नहीं होती। हर सीट पर अलग समीकरण, स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव और संगठन की ताकत चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। दिल्ली में BJP ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के किले को ढहाते हुए अपनी सरकार बनाई। यहाँ BJP ने लगभग 40 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया।

हरियाणा: इतिहास रचने का दावा और नतीजों में अचानक बदलाव

हरियाणा में भी अखिलेश यादव ने INDI गठबंधन को लेकर बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि विपक्ष की एकजुटता भाजपा को हराकर नया इतिहास लिख सकती है।

शुरुआती रुझानों में कॉन्ग्रेस की बढ़त ने इस दावे को कुछ समय के लिए सही साबित किया, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदल गई। भाजपा ने बढ़त बनाई और निर्णायक जीत दर्ज की।

यह बदलाव यह दिखाने के लिए काफी था कि चुनावी रणनीति सिर्फ शुरुआती माहौल पर नहीं टिकी होती, बल्कि अंत तक संगठन ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यहाँ विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

महाराष्ट्र: विपक्षी उम्मीदों के बीच सत्ता पक्ष की मजबूत वापसी

महाराष्ट्र में भी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीतिक लाइन विपक्षी एकजुटता के जरिए सत्ता परिवर्तन का दावा करने वाली रही। अलग-अलग मंचों और बयानों में यह लगातार कहा गया कि राज्य में सत्ता के खिलाफ माहौल है और गठबंधन मिलकर चुनावी तस्वीर बदल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में भी वही पैटर्न दिखा जो दूसरे राज्यों में नजर आया।

लेकिन जब मतदान और उसके बाद के रुझान सामने आए, तो तस्वीर दावों से अलग नजर आई। बीजेपी और उसके सहयोगियों के गठबंधन ने 288 में से करीब 235 सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत हासिल किया। अकेले बीजेपी ने 130 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। अंततः यह साफ हुआ कि सिर्फ राजनीतिक संदेश और मंचीय भाषण चुनाव नहीं जिताते।

बिहार: सबसे मजबूत गढ़ में सबसे बड़ी हार

इस पूरे पैटर्न का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक उदाहरण बिहार है। यहाँ तेजस्वी यादव खुद चुनावी लड़ाई के केंद्र में थे और अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में सक्रिय थे। ‘वोटर अधिकार यात्रा’, एमवाई समीकरण और PDA फॉर्मूले के जरिए यह दावा किया गया कि इस बार सत्ता परिवर्तन तय है, लेकिन जब नतीजे सामने आए, तो यह पूरा नैरेटिव बिखर गया।

NDA ने प्रचंड जीत हासिल की जबकि महागठबंधन लगभग 40 सीटों पर सिमट गया। यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक झटका था जिसने यह दिखा दिया कि जमीन पर वोटर का मूड उस नैरेटिव से पूरी तरह अलग था जो बनाया जा रहा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह हार उसी राज्य में हुई जहाँ तेजस्वी यादव की सबसे मजबूत पकड़ मानी जाती है।

दावों और नतीजों के बीच बढ़ती दूरी

अगर इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ होता है कि एक ही तरह का पैटर्न बार-बार दोहराया जा रहा है। जहाँ अखिलेश और तेजस्वी जाते हैं, वहाँ माहौल बनता है, दावे किए जाते हैं, जीत की तस्वीर पेश की जाती है। लेकिन जब नतीजे आते हैं, तो वही तस्वीर बदल जाती है।

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति आज भी चर्चा में रहती है, लेकिन हालिया चुनावी नतीजे यह दिखाते हैं कि उनके दावों और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

जब एक ही कहानी बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार जैसे अलग-अलग राज्यों में दोहराई जाए, तो इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता। अब अखिलेश और तेजस्वी यादव को अपनी ‘जीत की भविष्यवाणी’ करने वाली रणनीति में बदलाव लाने पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जरूर है।

ईसाई TVK नेता विजय जोसफ के चुनावी वादे भारत विरोधियों और महंगाई को खुला निमंत्रण

सुभाष चन्द्र

अरविन्द केजरीवाल ने जो फ्री की रेवड़ियों की शुरुआत की उसे हर बीजेपी विरोधी अपना रहा है। जिसका विरोध सभी ने किया था लेकिन सत्ता पाने के लिए सभी ने इस कुरीति को अपनाने में गुरेज नहीं किया। अगर इसका नकारात्मक रूप देखें तो ये फ्री की रेवड़ियां उन भारत विरोधी ताकतों को खुला निमंत्रण है भारत पर कब्ज़ा करना है तो किसी फ़ौज की जरुरत नहीं बल्कि यहाँ की लालची, कामचोर और हराम का खाने वाली पब्लिक को मुफ्त में हर परिवार को मुफ्त में राशन-पानी और अन्य सुविधाएं देना शुरू कर दो भारत की लालची जनता दुम हिलाते तुमको समर्थन देने में पीछे नहीं रहेगी और हम भारत पर कब्ज़ा कर लेंगे। यह जनता पर आरोप नहीं कटु सच्चाई है। सच स्वीकार करना होगा।  
तमिलनाडु के 2026 - 27 के बजट में राज्य का Outstanding Debt Rs.10.71 लाख करोड़ होने का अनुमान है जो 2025 -26 में 9.52 करोड़ था तमिलनाडु आज की तारीख में सबसे बड़ा कर्जदार राज्य है

इसके बावजूद TVK नेता Joseph Vijay Chandrasekhar के अभी हुए चुनाव में किए हुए वादे देखिए -

लेखक 
चर्चित YouTuber 
महिलाओं के लिए 2,500 रूपए प्रतिमाह;

दुल्हनों के लिए 8 ग्राम सोना और एक रेशमी साड़ी;

प्रति वर्ष 6 मुफ्त एलपीजी सिलेंडर;

200 यूनिट मुफ्त बिजली;

महिलाओं के लिए 5 लाख रूपए तक ब्याज-मुक्त ऋण;

बेरोजगारी सहायता: स्नातकों के लिए 4,000 रूपए/माह और डिप्लोमा धारकों के लिए 2,500 रूपए/माह;

5 लाख नई नौकरियां;

कामराजर विशेष आवासीय स्कूल और 20 लाख रूपए तक बिना गारंटी के शिक्षा ऋण;

5 एकड़ से कम भूमि रखने वाले किसानों के लिए ऋण;

एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य):

धान के लिए 3,500 रूपए प्रति क्विंटल और गन्ने के लिए 4,500 रूपए प्रति टन, जो अभी 2369/- और 2389/ है;

अर्थव्यवस्था/स्वास्थ्य:

परिवार के लिए 25 लाख रूपए तक स्वास्थ्य बीमा कवर, जो अभी प्रधानमंत्री योजना में 5 लाख है;

हर वर्ष लगभग 7 लाख विवाह होने पर, केवल सोने पर ही वार्षिक बजट लगभग 8 लाख रूपए करोड़ होगा- 

इसे कहते हैं कर्ज लेकर घी पीना

तमिलनाडु वित्तीय संकट की ओर बढ़ रहा है

MK Stalin सरकार की तरह इनकी भी नज़र मंदिरों के धन पर रहेगी जिससे मुफ्त की रेवड़ियां बाटने में आसानी हो स्टालिन की तरह यह भी कहीं सनातन धर्म को ख़त्म करने न निकल पड़े क्योंकि है तो ये भी स्टालिन की तरह ईसाई ही है, अलबत्ता शायद द्रविड़ संस्कृति से कोई खास लगाव नहीं लगता इसका

वैसे केंद्र के साथ संबंध कैसे रखता है, यह देखना होगा क्योंकि कांग्रेस के चुने गए 5 विधायकों का साथ इसे मिल गया है विजय ने बयान दिया था कि जब वह मुख्यमंत्री बनेगा तो केंद्र का कोई राज्यपाल तमिलनाडु में नहीं होगा मतलब अपने आप ही शपथ ग्रहण कर कुर्सी पर बैठ जाएगा आगे आगे देखिए क्या होता है 

मैं इस्तीफा नहीं दूंगी!!!

सुभाष चन्द्र

में हार गई तो क्या हुआ, पर में इस्तीफा नहीं दूँगी!

में भले ही ख़ुद की सीट भी हार गई पर में इस्तीफा नहीं दूँगी!

में साजिश से हार गई पर नैतिक रूप से जीत गई हूँ!

में तो हार ही नहीं सकती ना तो में इस्तीफा नहीं दूँगी!

में तो आजाद चिड़िया हूँ, जहाँ चाहूँ जा सकतीं हूँ!

में चाहे ये करूँ, में चाहे वो करूँ, मेरी मर्ज़ी!

में तो किंम जोंग की तरह मुख्तार बनी रहूँगी!

तुम मानो या ना मानो पर में तो मुख्यमंत्री हूँ तो में इस्तीफा नहीं दूँगी!

जनता जनार्दन ने भले ही मुझे ठुकरा दिया पर में जय श्री राम नहीं बोलूंगी!

जबरदस्त हार के बाद भी जबरदस्ती मुख्यमंत्री बनी रहूँगी!

हकीकत में भले ही मुख्यमंत्री ना रहूँ पर सपने में भी कोई मुझे पदभ्रष्ट कर नहीं सकता!

"रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे,

रहा तृणमूल तो फ़िर मिलेंगे!"

तुम चाहे कुछ भी कहो पर में सपने में भी इस्तीफा नहीं दूँगी!

में इस्तीफा नहीं दूँगी! में इस्तीफा नहीं दूँगी!

इंशाअल्लाह!!!

प्रीति जागीरदार

05/05/2026

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बंगाल : TMC नेता सलाउद्दीन सरदार के दफ्तर में मिले धारदार हथियार, गोला-बारूद भी बरामद


पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। घुटियारी शरीफ के नारायणपुर में TMC कार्यालय पर छापा मारा गया। इस दौरान पुलिस ने वहाँ से भारी मात्रा में धारदार हथियार बरामद किए हैं।

यह दफ्तर स्थानीय TMC नेता सलाउद्दीन सरदार का बताया जा रहा है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि पार्टी कार्यालय में हथियार छिपाकर रखे गए हैं।

छापेमारी के दौरान पुलिस ने वहाँ से 18 धारदार हथियार जब्त किए। इसके साथ ही भारी मात्रा में गोला-बारूद भी बरामद होने की खबर है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि चुनाव के बीच इतनी बड़ी संख्या में हथियार वहाँ क्यों जमा किए गए थे। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

यूँ ही नहीं खुद को ‘मुस्लिमों की पार्टी’ कहती है कांग्रेस : असम में जीते 19 विधायकों में केवल 1 हिंदू, बंगाल में दोनों मुस्लिम


2018 में उर्दू अखबार ‘इंकलाब’ ने एक खबर छापी जिसमें राहुल गाँधी का एक बयान था जिसमें कहा गया था कि ‘कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है’। तब कांग्रेस पार्टी ने इस बयान को झुठलाने की कोशिश की लेकिन पार्टी के ही तब के अल्पसंख्यक मोर्चा के चेयरमैन ने इस बयान की पुष्टि की थी। इस बात को 8 साल बीत गए हैं।
कांग्रेस पार्टी वास्तव में मुस्लिमों की पार्टी है इस सच्चाई को जानने के लिए राहुल गाँधी से लेकर मोतीलाल नेहरू तक की असलियत जानना जरुरी है। हो सकता है सच्चाई सामने आने पर परिवार भक्त/गुलाम उपद्रव मचाएं। मचेगा उसे कोई रोक नहीं पाएगा। आखिर परिवारभक्ति की कीमत जो चुकानी है। शायद यही वजह है कि सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का हथोड़ा हिन्दू समाज पर चला लेकिन उस समाज के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं हुई जिसमे हिन्दू समाज से कहीं अधिक कुरीतियां हैं।  

दूसरे, इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने हिन्दू धर्म को बदनाम करने "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" का जहर फैलाया गया। और बेशर्म हिन्दू भी इस जहर को पीकर आनंदित होता रहा। सच्चाई को जानने की कोशिश नहीं की। मुस्लिम समाज को एकजुट रखने के लिए हिन्दुओं को जातिगत सियासत में बाँटने का घिनौना खेल आज तक खेला जा रहा है। है किसी में हिम्मत जो ईसाई और मुसलमानों की जातियों में खतरनाक भेदभाव को दूर करने के लिए मुंह सके। सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को गुमराह किया जाता रहा है एक बात याद रखनी चाहिए कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। लेकिन यहाँ एक हाथ से ही ताली बजाई जा रही है।    

अब सोमवार(4 मई 2026) को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। कांग्रेस के उस दावे में कितना सच था या नहीं थे इस थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और नतीजों से कांग्रेस के मौजूदा स्वरूप को समझने की कोशिश करते हैं। बात करते हैं, असम और पश्चिम बंगाल की, इन दोनों राज्यों में बीजेपी सत्ता में आई है।

बंगाल में टक्कर TMC-BJP के बीच थी तो कांग्रेस की गर्त में जाना लगभग तय था, हुआ भी वही। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी के आक्रामक प्रचार ने राज्य में पार्टी की जीत की हैट-ट्रिक लगा दी।

कांग्रेस को असम और पश्चिम बंगाल में कुल जमा 21 विधानसभा सीटें मिलीं। असम में पार्टी ने 19 सीटें जीतीं जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के खाते में 2 सीटें आईं। इसमें एक दिलचस्प बात जो सामने आई वो उस 2018 के अखबार की उस रिपोर्ट की ही याद दिला रही थी जो राहुल गाँधी ने तब कथित तौर पर कहा था।

असम में जीते कांग्रेस के 19 विधायकों में केवल 1 विधायक हिंदू है। असम की नोबोइचा सीट से जीते जोय प्रकाश दास राज्य में कांग्रेस के इकलौते हिंदू विधायक हैं बाकी विधायकों के नाम आप इस लिस्ट में देख सकते हैं।

                              असम में जीते कांग्रेस के विधायक (साभार: ECI Result)

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस का हुआ। पश्चिम बंगाल के फरक्का में कांग्रेस के मोताब शेख और रानीनगर में जुल्फीकार अली ने जीत दर्ज की है।

                                             पश्चिम बंगाल में जीते कांग्रेस के विधायक (साभार: ECI Result)

वहीं, केरल में कांग्रेस उस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ गठबंधन में सरकार बनाने जा रही है जिसकी कट्टरपंथी विचार किसी ने छिपे नहीं है। इस कट्टरपंथी और हिंदू विरोधी पार्टी को राहुल गाँधी सेकुलर तक बता चुके हैं।

भले ही IUML यह दावा करती है कि उसका गठन 1948 के बाद हुआ लेकिन असल में यह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की ही एक शाखा है। AIML वही पार्टी थी जिसे पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बनाया था। देश के बँटवारे के बाद AIML की जगह पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने ले ली।

IUML का गठन AIML की सोच और विचारधारा को जिंदा रखने के लिए किया गया था। इसका एक बड़ा उदाहरण यह है कि IUML के पहले अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल खुद देश के बँटवारे के आंदोलन में शामिल थे और पाकिस्तान बनने के समर्थक थे।

कांग्रेस का मुस्लिम घुसपैठियों से भी प्रेम बताता है कि उसकी आज की दशा क्या हो गई है। असम और बंगाल दोनों ऐसे राज्य हैं जो घुसपैठ और डेमोग्राफी परिवर्तन से जूझ रहे हैं लेकिन कांग्रेस को ना ये अवैध घुसपैठिए नजर आते हैं, ना ही डेमोग्राफी में बदलाव नजर आता है। वो जमीनी हकीकत को भी जानते समझते हुए भी केवल वोट के लिए या कहें तो मुस्लिम वोट के लिए इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखती है।

अब भले ही 2018 में राहुल गाँधी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताया हो या ना बताया हो लेकिन पार्टी के कृत्य तो इस बात को स्थापित करते ही हैं। बाकी अभी इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के करीब 95% चुने गए विधायक मुस्लिम हैं, आगे ये आँकड़ा और कांग्रेस की राजनीति कहाँ जाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।