मोदी को गोली मारने वाले, इजरायल को उड़ाने वाले ‘Time Bomb’ नहीं लेकिन योगी को खिलौना देने वाली बच्ची ‘हिंदू आतंकी’: क्यों वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना बनी यशस्विनी

                       योगी बच्ची संग (बाएँ), प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा (दाएँ), (साभार : PTI & crickettimes)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।

बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”

मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।

आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’

लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”

आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”

वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”

एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”

इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।

जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं

ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।

यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।

आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।

आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।

बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’

आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।
यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?

आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए

आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।

आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।

कांग्रेस के नंगो का हमाम : दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज किया AICC General Secretary KC Venugopal और MP Kodikunnil Suresh के खिलाफ

सुभाष चन्द्र

हरियाणा महिला कांग्रेस नेता सुचित्रा और उनके पति गौरव कुमार ने वेणुगोपाल और सुरेश पर हरियाणा चुनाव में टिकट के लिए 7 करोड़ लेने का आरोप लगाया है। दिल्ली पुलिस ने अब दोनों के खिलाफ FIR (No.11/2026) दर्ज की है वैसे दिल्ली पुलिस किसी नतीजे पर पहुंचेगी, मुझे इसमें संदेह है नरवणे की किताब को छापने वाले पेंगुइन का मामला ठंडे बस्ते में दब गया। इस मुद्दे का ठंडे बस्ते में जाना शुभ संकेत नहीं। समझ नहीं आता कि गाँधी परिवार के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामले जरुरत से ज्यादा धीमी गति से चल रहे हैं, क्यों? 

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
वेणुगोपाल ने आरोपों को गलत बताया है और कहा है कि अगले विधानसभा चुनावों से पहले ये भाजपा के कहने पर किया गया है ये “fabricated scandal” है और उन्हें किसी जांच से कोई डर नहीं लगता

ये पैसे के लेनदेन से टिकट मिलना कांग्रेस क्या कई दलों में आम बात है लेकिन कांग्रेस की तो कहानी ही कुछ और है उनके तो विधायक भी राज्यसभा चुनाव में गैर कांग्रेसी उम्मीदवार को वोट दे देते हैं और फिर पार्टी उन्हें सस्पेंड कर देती है अभी असम कांग्रेस के गौरव गोगोई पाकिस्तान से संबंधों को लेकर फंसे हुए हैं और खुद राहुल गांधी विदेशी नागरिकता के आरोप में अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट में फंसा है उसके अलावा भी न जाने कितने केस राहुल गांधी पर चल रहे है लेकिन धमकी दे रहा है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता विश्व शर्मा चुनाव के बाद जेल में होंगे पहले अपनी तो खैर मना लो भाई, कब किस केस में अंदर हो जाओ, पता नहीं  

सत्ता में आने पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लोग बड़ी बड़ी धमकिया देते हैं ऐसी ही धमकी कभी कपिल सिब्बल ने 2019 चुनाव से पहले दी थी CBI और ED के अधिकारियों को लेकिन धमकी देने वाले कभी सत्ता में नहीं पहुंचते

वेणुगोपाल ने जरूर कहा है कि उसके खिलाफ आरोप मिथ्या हैं लेकिन एक प्रश्न यह भी उठता है कि सुचित्रा और उसके पति गौरव के पास 7 करोड़ रुपए आये कहां से जबकि सुचित्रा और उसके पति गौरव कभी विधायक नहीं रहे और उनका केवल एक छोटा से फैमिली व्यवसाय है क्या 7 करोड़ इस उम्मीद से दिए थे कि चुनाव जीतने के बाद वह 15 करोड़ कमा लेगी?

चोटिल होने, मिडिल ईस्ट वॉर, फ्यूल संकट और ‘लॉकडाउन’ की राजनीति: डर फैलाकर वोट बटोरने की जुगत में ममता बनर्जी

                                                 ममता बनर्जी (फोटो साभार: AI ChatGPT)
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने की खबरों ने वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, स्वाभाविक रूप से सतर्क हो गए हैं।

इसी बीच देश के भीतर एक अलग ही बहस छिड़ गई कि क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है? क्योंकि ममता बनर्जी ने लॉकडाउन लगने की अफवाहों को फैलाना का काम जोरदार तरीके से किया। हालाँकि केंद्र सरकार ने उनकी इन हरकतो के सफल होने से पहले ही जनता तक संदेश पहुँचा दिया है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें।

ममता बनर्जी का लॉकडाउन बयान: आशंका या सियासत?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार फ्यूल संकट के बहाने देश में लॉकडाउन लगा सकती है।

ममता बनर्जी ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में चुनाव प्रचार करते हुए कहा, “वे (केंद्र सरकार) लॉकडाउन लगा सकते हैं। लोग घरों में बंद रहेंगे। 2021 में लॉकडाउन के समय मैंने लड़ाई लड़ी थी, अब भी लड़ सकती हूँ।” उन्होंने LPG सिलेंडर की बुकिंग 25-35 दिन बाद मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ गए। पेट्रोल की कीमत बढ़ गई। क्या केंद्र सरकार फिर लॉकडाउन की तैयारी कर रही है?

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने खारिज किए अफवाह

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “लॉकडाउन की अफवाहें पूरी तरह झूठी हैं। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। हम ऊर्जा, सप्लाई चेन और जरूरी चीजों पर नजर रख रहे हैं। लोग शांत रहें, जिम्मेदार रहें।”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, “मैं लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूँ कि कोई लॉकडाउन नहीं होगा। कुछ नेता बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। कोविड जैसा लॉकडाउन कभी नहीं होगा।”

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने खुद पैनिक न करने को कहा है। जमाखोरी पर चेतावनी दी गई है। राज्य सरकारें होर्डिंग न करें। पूरी स्थिति केंद्र के नियंत्रण में है।

तो फिर डर क्यों फैला रही हैं ममता बनर्जी?

राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में ममता डर फैला रही हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ईंधन संकट का मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा साबित हो रहा है। वे लोगों में डर पैदा करके कह रही हैं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन लगा रही है, LPG 25 दिन बाद मिलेगा, खाना कैसे पकाएँगे, ट्रांसपोर्ट कैसे चलेगा।

लेकिन असल में केंद्र सरकार पहले से ही एक्शन ले रही है, जिसमें एक्साइज ड्यूटी कम की, एक्सपोर्ट पर ड्यूटी लगाई, सप्लाई चेन को मजबूत किया।

दरअसल, ममता का मकसद साफ है, वो है- आम जनता को भड़काना, मोदी सरकार को बदनाम करना और टीएमसी के वोट बैंक को मजबूत करना। वे जानती हैं कि डर का माहौल बन गया तो लोग सोचेंगे ‘मोदी सरकार फेल हो गई’।

दरअसल, ममता खुद के राज्य में LPG और पेट्रोल की सप्लाई सुधारने में कुछ नहीं कर रही। सिर्फ आरोप लगा रही हैं। चुनावी फायदे के लिए लोगों को अनावश्यक चिंता में डालना गलत है। आम आदमी पहले से परेशान है, उस पर ममता का ये डर और बढ़ा रहा है।

ममता बनर्जी ने पहले भी लोगों को भड़काया, वो हैबिचुएल ऑफेंडर

ममता बनर्जी का ये तरीका नया नहीं। वे हर मुद्दे को राजनीति बना लेती हैं। वो डर की राजनीति करती रही हैं शुरुआत से। कभी वामपंथ का डर दिखाकर, कभी कॉन्ग्रेस का डर दिखाकर, कभी बीजेपी का डर दिखाकर, तो कभी हिंदुओं का डर दिखाकर। देखें- कैसे लोगों को भड़काकर वोट बटोरती रही हैं ममता बनर्जी-

CAA के नाम पर: जब नागरिकता संशोधन कानून आया तो ममता ने पूरे बंगाल में हंगामा मचा दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि मुसलमानों के अधिकार छिन जाएँगे। उन्होंने पूरे बंगाल में शाहीन बाग स्टाइल में प्रदर्शन तक करवाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है। इसके बावजूद ममता ने सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भ्रम फैलाया और अब तक वो इस मुद्दे पर भ्रम ही फैला रही हैं।

SIR के नाम पर: एसआईआर के दौरान जब कुछ जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं तो ममता ने इसे भी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि आम मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं। ममता ने इसे राजनीतिक हथियार बनाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और दिल्ली तक प्रदर्शन कर डाले।

कोरोना के नाम पर: बता दें कि साल 2021 के चुनाव के समय आंशिक लॉकडाउन चल रहा था। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने दावा करते हुए कहा कि केंद्र ने कुछ नहीं किया, सिर्फ टीएमसी लड़ रही है। लेकिन असल में केंद्र ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, फंड सब दिया। ममता ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए किया।

केंद्रीय योजनाओं के नाम पर: पीएम आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर ममता हमेशा हमला करती हैं। कहती हैं केंद्र कुछ नहीं दे रहा। लेकिन हकीकत ये है कि बंगाल में लाखों लोग इन योजनाओं से फायदा ले रहे हैं। ममता सिर्फ क्रेडिट लेने के चक्कर में विरोध करती हैं।

इस तरह ममता हर बार डर और भ्रम फैलाकर वोट बटोरती हैं।

ममता की ये राजनीति आम आदमी को पहुँचा रही है नुकसान

आज ईंधन संकट है तो हर राज्य प्रभावित है। केरल, तमिलनाडु, असम के मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। लेकिन वे मीटिंग में समाधान ढूँढ रहे हैं। ममता अकेली हैं जो लॉकडाउन का डर दिखा रही हैं। उनका बयान सुनकर लोग पैनिक खरीदारी कर रहे हैं। LPG सिलेंडर की होर्डिंग बढ़ रही है। छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट वाले, गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता का रिकॉर्ड क्या है- संदेशखाली, टीएमसी के गुंडागर्दी, भर्ती घोटाले। अब ईंधन संकट को भी वोट में बदलने की कोशिश। लेकिन इस बार लोग समझ रहे हैं।

ममता का डर लोगों को नहीं, खुद को बचाने का है

ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। लेकिन असल में बंगाल की जनता महँगाई, बेरोजगारी, अपराध से परेशान है। ईंधन संकट राष्ट्रीय समस्या है। इसमें सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ममता अगर सच में चिंतित हैं तो राज्य में होर्डिंग रोकें, सप्लाई सुधारें, केंद्र के साथ मिलकर काम करें। लेकिन नहीं, वे तो बस डर फैलाकर वोट माँग रही हैं।

आम जनता के लिए सबसे जरूरी है कि वह अफवाहों से दूर रहे और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करे। क्योंकि संकट के समय घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। वैसे भी, ममता बनर्जी की हरकतों को पूरा देश देख रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता भी देख रही है। डर की राजनीति अब पुरानी हो गई है। अब विकास और समाधान की राजनीति चाहिए। मोदी सरकार पहले की तरह इस संकट से भी देश को निकाल लेगी। ममता का डर सिर्फ चुनावी चाल है। लोग अब समझ चुके हैं।

असम : चुनाव से पहले घर में रहस्यमयी विस्फोट से दहशत: नूर मोहम्मद के शरीर के उड़े चिथड़े, नाबालिग बेटे की भी मौत


असम के जोरहाट में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक रहस्यमयी विस्फोट ने पूरे इलाके को हिला दिया। शनिवार (28 मार्च 2026) को एक किराए के घर में हुए इस धमाके में दो लोगों की मौत हो गई जबकि एक बच्ची गंभीर रूप से घायल है।

यह घटना 28 मार्च को दोपहर करीब 3:30 बजे जोरहाट शहर के राजा मैदाम न्यू कॉलोनी में हुई। मृतकों की पहचान नूर मोहम्मद और उनके 8 वर्षीय बेटे मोहम्मद इकबाल के रूप में हुई है। धमाका इतना भीषण था कि नूर मोहम्मद की मौके पर ही मौत हो गई और उनका शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया। उनके बेटे इकबाल ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।

वहीं, इकबाल की 7 साल की एक बहन इस हमले में गंभीर रूप से घायल है और जोरहाट मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (JMCH) में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रही है। इसके अलावा, पड़ोस की एक महिला भी इस विस्फोट में घायल हुई है जिसे उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। शुरुआत में स्थानीय लोगों को लगा कि यह विस्फोट LPG सिलेंडर फटने से हुआ है लेकिन बाद में जाँच में पता चला कि वहां कोई एलपीजी सिलेंडर नहीं था और न ही विस्फोट के बाद आग लगी थी।

धमाका इतना तेज था कि कमरे के अंदर नूर मोहम्मद के शरीर के अंग बिखर गए और दीवारें भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। फर्श पर एक छोटा गड्ढा भी बन गया था जिससे विस्फोट की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि यह परिवार नगाँव का रहने वाला था और जोरहाट में अंसारी मलिक के मकान में किराए पर रह रहा था।

जानकारी के मुताबिक, घटना के समय घर के अंदर कोई सामान खोला जा रहा था तभी यह विस्फोट हुआ। हालाँकि, वह क्या सामान था और विस्फोट का असली कारण क्या है इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है और जाँच जारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नूर मोहम्मद एक कबाड़खाने में काम करते थे और वे कोई चीज घर लाए थे जिसे हथौड़े से तोड़कर खोलने की कोशिश कर रहे थे।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँच गई और मामले की गहन जाँच शुरू कर दी है। गौरतलब है कि असम की 126 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में मतदान होना है, जबकि नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे।

ISIS-अलकायदा आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़, 12 गिरफ्तार : लादेन की देखते थे वीडियो, गेमिंग ऐप से करते थे आका से संपर्क, पाकिस्तान जाने का था प्लान

                                           आतंकरोधी अभियान के तहत पकड़े गए 12 आतंकी
देश के विभिन्न राज्यों में चलाए गए एक बड़े आतंकरोधी अभियान के तहत सुरक्षा एजेंसियों ने ISIS-अलकायदा से जुड़े आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। जानकारी सामने आई है कि आंध्र प्रदेश और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुए अंतर-राज्यीय ऑपरेशन में 12 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया।

इन 12 आतंकियों की पहचान मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ (आंध्र प्रदेश), मिर्जा सोहेल बेग (आंध्र प्रदेश), मोहम्मद दानिश (आंध्र प्रदेश), शादमान दिलकुश (बिहार), अजमनुल्लाह खान (बिहार), लकी अहमद (दिल्ली), मीर आसिफ अली (पश्चिम बंगाल), जीशान (राजस्थान), अब्दुल सलाम (कर्नाटक), शाहरुख खान (महाराष्ट्र), शियाक पियाज उर रहमान (महाराष्ट्र) और सईदा बेगम (तेलंगाना) के रूप में हुई है।

                                        साभार : सोशल मीडिया 
पुलिस की छानबीन में इनके संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) और ISIS से जुड़े सामने आए हैं। जाँच में ये भी पता चला है कि ये आतंकी एक गेमिंग ऐप के जरिए विदेशी हैंडलरों के संपर्क में थे और इनके तार ISIS से संबंध रखने वाले Benex Com नामक एक समूह से भी जुड़े थे।

पुलिस के अनुसार, ये लोग सोशल मीडिया पर भड़काऊ गतिविधियों में शामिल थे। इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया, ISIS के झंडे का समर्थन किया और भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने की बात कही। आगे इनकी योजना पाकिस्तान जाकर आतंकी प्रशिक्षण लेने की थी और साथ ही अपने साथ अन्य युवाओं को भी जिहाद के लिए प्रेरित करने की थी।

इनमें से तीन- मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ, मोहम्मद दानिश और मोहम्मद सोहेल बेग ने तो ‘अल-मलिक इस्लामिक यूथ’ नाम से ग्रुप भी बनाया था। इसके जरिए ये युवाओं को भड़काने और जिहाद के लिए तैयर करने का काम करते थे।

वहीं अन्य लगातार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए जिहाद से जुड़े प्रचार में सक्रिय थे और ओसामा बिन लादेन के वीडियो देखकर आतंकी-कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दे रहे थे।

पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जाँच कर रही है और सभी डिजिटल साक्ष्यों व संपर्कों की पड़ताल की जा रही है, ताकि इस आतंकी साजिश के हर पहलू का खुलासा किया जा सके।

अब जस्टिस भुइयां UAPA पर भी रोक लगाना चाहते हैं क्या? अपराधियों को छोड़ दिया जाए? विकसित भारत क्या सुप्रीम कोर्ट बनाएगा?

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुइयां ने हाल ही में कहा है कि UAPA के अत्यधिक उपयोग से हासिल नहीं हो सकता विकसित भारत का लक्ष्य उन्होंने कहा कि 2019 से 2023 के बीच इस एक्ट में दोषसिद्धि मात्र 5% है हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन आरोप सिद्ध नहीं हो सके

जस्टिस भुइयां ने सीधे कानून बनाने वाली संस्था संसद को चुनौती दी है।  यह कानून मोदी सरकार ने नहीं बनाया, यह 1967 में बना था 2004, 2008, 2012 और 2019 में इसमें संशोधन किये गए यानी 3  बार संशोधन तो कांग्रेस ने ही किया था 2 अगस्त, 2019 में सरकार ने संगठनों के साथ साथ व्यक्तियों को भी आतंकी श्रेणी में शामिल किया था 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
NIA अपनी पूरी शक्ति से आरोपियों के खिलाफ सबूत जुटाती है और अगर वे कोर्ट को पसंद न आए तो इसका मतलब यह नहीं है कि कानून ही बेकार है

क्या आसिया अंद्राबी के खिलाफ UAPA लागू नहीं करना चाहिए था जिसे अभी कुछ दिन पहले उम्र कैद की और उसकी दो साथियों को 30-30 साल की सजा हुई है क्या यासीन मलिक पर UAPA नहीं लगना चाहिए था जिसे 2022 में उम्र कैद की सजा हुई थी? उस पर अभी TADA में एयरफोर्स के अधिकारियों की हत्या का मुकदमा चल रहा है यह TADA कानून 1987 में नरसिम्हा राव ने निरस्त कर दिया था जो 1995 में ख़त्म हुआ लेकिन जो मुक़दमे दर्ज थे, उन्हें जारी रखने दिया गया था 

उमर खालिद और शरजील इमाम पर भी क्या UAPA नहीं लगना चाहिए था जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से मना कर दिया? उन पर दिल्ली दंगे भड़काने का आरोप है याद रहे इमाम ने चिकन नैक काट कर भारत से अलग करने की बात की थी

आप UAPA में 5% दोषसिद्धि को लेकर कानून पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन CBI का Success Rate तो 76% होने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह CBI के कार्यों की समीक्षा करेंगे मतलब 5% भी पसंद नहीं और 76% भी पसंद नहीं

पिछले दिनों जस्टिस भुइयां ने कॉलेजियम की सिफारिशों के लिए केंद्र सरकार पर उंगली उठाते हुए कहा था कि केंद्र को कॉलेजियम की सिफारिशें खारिज करने का अधिकार नहीं है

बड़ी विडंबना है, पुलिस को सुप्रीम कोर्ट फटकार मारता है, प्रशासन को नहीं छोड़ता, सेना के कार्य में कमी निकालता है, केंद्र और राज्य सरकारों की तो बात ही छोड़ दो जब सभी में कमी निकालनी हैं तो सत्ता में आने का तरीका ढूंढिए

एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को विकसित देश बनाने में लगा है और आपने एक UAPA को लेकर कह दिया कि इससे विकसित देश नहीं बन सकता प्रधानमंत्री की मेहनत पर ऐसे तो पानी फेरना उचित नहीं है विकसित देश क्या सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के राष्ट्रपति को गैर कानूनी आदेश देने से बनेगा 

आत्मचिंतन करने की जरूरत है और Individual Judges को सरकार और उसकी एजेंसियों पर बोलने से बचना चाहिए जस्टिस भुइयां के बयान से यह तो स्पष्ट हो गया कि कोई मामला UAPA का उनकी अदालत में चला गया, तो न्याय तो नहीं होगा 

कर्नाटक : कांग्रेस की दादागिरी : ‘VIP हैं हम, जनता की लाइन में थोड़े न लगेंगे’: कांग्रेस MLA ने दिखाई IPL वालों को आँख, स्पीकर का आदेश- हर विधायक को दो 4 टिकट


कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और सरकार ने आईपीएल के सामने अपनी हनक दिखाई है। एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले आईपीएल मैचों के लिए कॉम्प्लिमेंटरी टिकट की माँग ने विवाद खड़ा कर दिया है। विधानसभा स्पीकर यू.टी. खादेर ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर विधायक को कम से कम चार प्रीमियम टिकट सुनिश्चित किए जाएँ।

यह मुद्दा तब सामने आया जब कांग्रेस विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (केएससीए) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आईपीएल 2026 सीजन के शुरूआती मैच 28 मार्च को बेंगलुरु में होने वाले हैं लेकिन केएससीए ने विधायकों और मंत्रियों को टिकट नहीं दिए।

हुंगुंड विधानसभा क्षेत्र से विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा, “28 मार्च को आईपीएल मैच है लेकिन केएससीए ने विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दिए हैं। वे सरकार से सभी सुविधाएँ लेते हैं लेकिन विधायकों का सम्मान नहीं करते। हम वीआईपी हैं, हम लाइन में लगकर थोड़े न टिकट लेंगे। पिछली बार हम लाइन में खड़े हुए थे और फिर आम जनता के साथ सामान्य गैलरी में बैठना पड़ा। यह फिर नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ऑनलाइन टिकट बिक्री से ब्लैक मार्केटिंग बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “टिकट ₹5000 में बिक रहे हैं लेकिन उन्हें ₹35000 में बेचा जा रहा है। वे विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दे रहे बल्कि ऑनलाइन बुकिंग करने को कह रहे हैं। हम जानते हैं कि ऑनलाइन बुकिंग कैसे ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा देती है।”

काशप्पनावर ने माँग की कि केएससीए हर विधायक को कम से कम पाँच कॉम्प्लिमेंटरी टिकट, अलग सीटिंग व्यवस्था और डेडिकेटेड लाउंज उपलब्ध कराए। उन्होंने बताया कि यह मुद्दा पहले विपक्षी नेता आर. अशोक ने विधानसभा में उठाया था।

इस माँग पर स्पीकर यू.टी. खादेर ने उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को निर्देश दिया कि वे केएससीए से सीधे बात करें और हर विधायक को कम से कम चार वीआईपी टिकट सुनिश्चित करें। शिवकुमार ने कहा कि वे केएससीए अध्यक्ष वेंकटेश प्रसाद से बात करेंगे और विधायकों द्वारा ऐसी सुविधाएँ माँगने में कुछ गलत नहीं है।

इस बीच भाजपा नेता और सांसद तेजस्वी सूर्या ने कांग्रेस विधायक पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “विधायक का बयान गलत है और सच कहें यह आश्चर्यजनक भी नहीं है। सबसे पहले यह उनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है। जब राज्य के असली मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है तब विधानसभा में इस तरह का मुद्दा उठाना खुद ही बहुत कुछ बताता है। अगर स्पीकर इस पर कार्रवाई करते हैं तो इससे विधान सौधा की गरिमा कम होती है।”

तेजस्वी सूर्या ने आगे कहा, “मूल सवाल यह है कि केएससीए या कोई भी खेल संगठन विधायकों को फ्री टिकट क्यों दे? उन्हें ऐसा क्या देना चाहिए? यह साफ तौर पर उत्पीड़न है, सामंती सोच है। एक विधायक जो फ्री टिकट, अलग गैलरी माँगता है और आम जनता के साथ बैठने से इनकार करता है वह यह मानता है कि वह उन लोगों से ऊपर है जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है। यही समस्या है। अगर आम नागरिकों को टिकट खरीदना पड़ता है तो विधायकों को भी खरीदना चाहिए। सरल बात है। जब तक हम इसे स्पष्ट रूप से नहीं चुनौती देंगे तब तक उत्पीड़न की संस्कृति को बढ़ावा मिलता रहेगा जो आधुनिक, समान और लोकतांत्रिक समाज के बिल्कुल विपरीत है। यह गलत है और इसका विरोध किया जाना चाहिए।”

बता दें कि चिन्नास्वामी स्टेडियम में बीते साल हुई भगदड़ में 11 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद चिन्नास्वामी स्टेडियम में क्रिकेट मैचों के आयोजन पर रोक लगा दी गई थी। हालाँकि इस सत्र के लिए चिन्नास्वामी स्टेडियम को न सिर्फ आईपीएल की मेजबानी मिली है, बल्कि 2 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों का आयोजन भी यहाँ होगा।

नेपाल :Gen-Z हिंसा मामले में बालेन शाह सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को किया गिरफ्तार

  नेपाल ने नए PM बालेन शाह(बाएँ), पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा (दाएँ) (साभार : News18 & Prabhatkhabar)
नेपाल में शनिवार (28 मार्च 2026) तड़के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को पुलिस ने उनके घरों से गिरफ्तार कर लिया। बालेन शाह के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक एक दिन बाद हुई इस कार्रवाई ने पूरे देश को चौंका दिया है।

यह गिरफ्तारियाँ पिछले साल सितंबर में हुए ‘Gen-Z’ आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और 77 लोगों की मौत के मामले में ‘आपराधिक लापरवाही‘ को लेकर की गई हैं। नेपाल के गृह मंत्री सुधन गुरुंग ने ओली और रमेश लेखक की गिरफ्तारी पर प्रतिक्रिया दी है। सुधन गुरुंग ने कहा, “वादा, वादा होता है। कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। हमने ओली और रमेश लेखक को हिरासत में ले लिया है। यह किसी के खिलाफ प्रतिशोध नहीं है बल्कि न्याय की शुरुआत है।”

कानूनी शिकंजा और चीन की चिंता

दोनों नेताओं पर राष्ट्रीय दंड संहिता की धारा 181 और 182 के तहत केस दर्ज किया गया है, जिसमें दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल हो सकती है। केपी ओली की गिरफ्तारी से चीन की टेंशन भी बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें बीजिंग का करीबी माना जाता है।
आयोग ने सिर्फ नेताओं ही नहीं, बल्कि तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग, गृह सचिव गोकर्ण मणि दवाडी और सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजू अर्याल समेत कई बड़े अफसरों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की है। प्रशासन अब इन हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियों के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हाई अलर्ट पर है।

क्यों हुई गिरफ्तारी?

सितंबर 2025 में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा था। इस आंदोलन में व्यापक हिंसा हुई, संसद जलाई गई और अरबों की संपत्ति स्वाहा हो गई। पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की के जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ओली और रमेश लेखक को दोषी पाया।
रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया जानकारी होने के बावजूद प्रशासन ने लापरवाही बरती, जिससे हालात बेकाबू हुए। शुक्रवार रात कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को लागू करने का फैसला लिया, जिसके बाद कोर्ट से वारंट जारी हुए।

भगवान राम और माता कौशल्या पर अपमानजनक टिप्पणी करने वाला समाजवादी पार्टी नेता यदुनंदन गिरफ्तार, रात में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कराई परेड

सपा नेता यदुनंदन गिरफ्तार
देर आए दुरुस्त आए जो कदम उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस ने अब उठाया है यह कदम बहुत पहले उठा लेना चाहिए था। कालनेमि हिन्दू अपने मुस्लिम वोटबैंक को साधने सनातन धर्म पर कीजड़ उछालने से बाज नहीं आते। जनता को भी ऐसे लोगों और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम और माता कौशल्या पर शर्मनाक और आपत्तिजनक करने वाले समाजवादी पार्टी के नेता यदुनंदन लाल राजपूत (वर्मा) को हरदोई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। हरदोई पुलिस ने शुक्रवार (27 मार्च 2026) रात यदुनंदन की गिरफ्तार की एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है जिसमें वह पुलिसकर्मियों के साथ रात में सड़क पर चलता दिख रहा है।

हरदोई पुलिस ने X पर पोस्ट में लिखा, “हरपालपुर पुलिस द्वारा धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करने वाली अभद्र, अश्लील एवं अमर्यादित टिप्पणी करने वाले अभियुक्त के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही करते हुए सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर उसे गिरफ्तार किया गया है।”

मंच से उगला जहर, Video वायरल होते ही मचा हड़कंप

यह पूरा विवाद हरदोई के सांडी इलाके के अंटवा खेरवा गाँव में सम्राट अशोक की जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम से शुरू हुआ। आरोप है कि मंच से भाषण देते हुए यदुनंदन लाल ने भगवान राम और उनकी माता कौशल्या के खिलाफ ऐसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे सुनकर वहाँ मौजूद लोग भी सन्न रह गए।

जैसे ही इस भाषण का Video सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, न केवल हरदोई बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया। लोग सड़कों पर उतर आए और आरोपित की तुरंत गिरफ्तारी की माँग करने लगे।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत के समय में सुप्रीम कोर्ट में एक भी जज नियुक्त नहीं हुआ; ये भी खबर बन गई, है न कमाल की बात

सुभाष चन्द्र

SCO सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर ने आज ये भी खबर बना दी कि सूर्यकांत जी के चीफ जस्टिस बनने के बाद उनके 122 दिन के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट का एक भी जज नियुक्त नहीं हुआ 

अब यह ऐसी बात तो नहीं है कि खबर बना दी जाए सुप्रीम कोर्ट के जजों के स्वीकृत पद 34 हैं और 24 नवंबर 2025 को जब सूर्यकांत जी चीफ जस्टिस बने, उस दिन 33 जज काम कर रहे थे और आज भी 33 ही हैं केवल एक जज की vacancy है अगर नहीं भरी गई तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं हो गई पहले भी कई जजों की रिक्तियां रही हैं और सुप्रीम कोर्ट काम करता रहा है। 

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सूर्यकांत जी जबरदस्ती क्या जज बना सकते हैं उनका कॉलेजियम किसी की सिफारिश करता है और सरकार नियुक्ति नहीं करती, तब तो कोई एतराज कर सकता है लेकिन जब कॉलेजियम ही एक vacancy भरने के लिए सिफारिश न करे तो सरकार क्या करेगी 

SCO एक बात भूल गया कि सूर्यकांत जी के समय में हाई कोर्ट के 5 जजों की इलाहाबाद हाई कोर्ट में Contractual Basis पर नियुक्ति की गई है ऐसी नियुक्तियों के लिए सरकार से अनुमति शायद नहीं ली गई और इतिहास में इसके पहले ऐसी नियुक्ति केवल 3 बार हुई हैं, 2 बार 1972 में और एक 2021 में ऐसी नियुक्तियों के पीछे कारण दिया जाता रहा हैं कि हाई कोर्ट पर काम के दबाव को कम करने के लिए किया गया लेकिन यह काम का दबाव तो हर हाई कोर्ट में है जहां सभी जगह वर्षों तक मामले लटके रहते हैं लालू यादव के मामले तो 12 साल से लटके हैं

सूर्यकान्त जी के समय में इस वर्ष 2026 में सुप्रीम कोर्ट के 3 जज रिटायर होंगे उन्हें मिला कर 4 जजों की नियुक्ति वे समय आने पर करेंगे लेकिन चाहे जजों की strength पूरी भी हो, मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट अपनी मर्जी से ही करता है

प्रधानमंत्री मोदी फिर बने दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता: 68% अप्रूवल रेटिंग्स के साथ टॉप पर, ट्रंप 14वें नंबर पर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय और विश्वसनीय नेता बने हुए हैं। पिछले 12 वर्षों से लगातार सत्ता में बने रहने के बावजूद उनकी वैश्विक साख, प्रतिष्ठा और लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि यह बढ़ती ही जा रही है। पीएम मोदी का यह रुतबा देखकर पूरी दुनिया हैरान है। अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय एजेंसी मॉर्निंग कंसल्ट की ताजा ग्लोबल अप्रूवल रेटिंग में नरेन्द्र मोदी को एक बार फिर विश्व के शीर्ष नेता के रूप में स्थान मिला है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जैसे विश्व नेता उनके सामने कहीं नहीं टिक पा रहे हैं।

लोकप्रियता का राज: जनता के दिलों पर राज

मॉर्निंग कंसल्ट Morning Consult की ताजा ग्लोबल अप्रूवल रेटिंग में प्रधानमंत्री मोदी को 68 प्रतिशत लोगों की मंजूरी मिली है, जो उन्हें वैश्विक नेताओं की सूची में टॉप पर बनाए हुए है। स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाय पारमेलिन और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग दोनों 62 प्रतिशत की अप्रूवल रेटिंग के साथ दूसरे स्थान हैं, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सिर्फ 39 प्रतिशत अप्रूवल के साथ 14वें नंबर पर हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यह उच्च रेटिंग बताती है कि वे जनता के विश्वास को लगातार बरकरार रखे हुए हैं। यह अप्रूवल न केवल उनकी घरेलू शक्ति को दर्शाता है, बल्कि उनकी वैश्विक छवि और कूटनीतिक पहचान को भी मजबूत करता है। इस रिपोर्ट ने एक बार फिर साबित किया है कि प्रधानमंत्री मोदी जनता के दिलों पर राज करना जारी रखते हैं—देश में ही नहीं, बल्कि वैश्विक परिदृश्य में भी।

वैश्विक भरोसा: भारत, अमेरिका और चीन से आगे

इस सर्वे में यह भी सामने आया है कि दुनिया भर के लोगों का भारत के नेतृत्व पर भरोसा अमेरिका और चीन से ज्यादा है। यह एक ऐतिहासिक कूटनीतिक और रणनीतिक बदलाव है, जो भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साख को दर्शाता है। मॉर्निंग कंसल्ट के सर्वे में शामिल 24 देशों के वैश्विक नेताओं में पीएम मोदी सबसे आगे रहे।

दुनिया का नया विश्वास: भारत के नेतृत्व में

ताजा ग्लोबल अप्रूवल रेटिंग से संदेश साफ है: जब दुनिया के अन्य बड़े नेता जनता का भरोसा खो रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी की साख लगातार बुलंद हो रही है। भारत के नेतृत्व पर वैश्विक भरोसा अमेरिका और चीन से भी ऊपर पहुंच चुका है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव है। अब दुनिया सिर्फ भारत के उदय को नहीं देख रही- वह भारत के नेतृत्व में अपना विश्वास जता रही है, पहले से कहीं अधिक। यह भारत की अंतरराष्ट्रीय साख के लिए एक ऐतिहासिक पल है।

मोदी अब तक के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री 

प्रधानमंत्री मोदी देश के अब तक के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं। ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे में एक महत्वपूर्ण सवाल था कि भारत का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री कौन है? इसके जवाब में 47 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री बताया। वहीं, अटल बिहारी बाजपेयी को 16 प्रतिशत लोगों ने वोट दिए। सर्वे में शामिल 12 प्रतिशत लोगों ने इंदिरा गांधी को अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री बताया। वहीं, मनमोहन सिंह को 8 प्रतिशत और जवाहर लाल नेहरू को 4 प्रतिशत वोट मिले।

इंडिया टुडे-सीवोटर सर्वे: 53 प्रतिशत लोगों की पसंद पीएम मोदी

इंडिया टुडे-सीवोटर सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी सबसे ज्यादा पसंदीदा चेहरा हैं। सर्वे में वो 53 प्रतिशत वोटों के साथ सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में हैं। प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी के बीच वोटों का अंतर काफी ज्यादा है। उन्हें सिर्फ 9 प्रतिशत वोट मिले हैं। वहीं, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 6 प्रतिशत वोटों के साथ तीसरे नंबर पर हैं। 

सुनो ओवैसी, मुनीर ने शियाओं को कह दिया पाकिस्तान उसके बाप का है, अब भारत के लिए मत कहा करो कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है; 90 लाख कश्मीरी मुसलमान ईरान को 500 करोड़ दे सकते है तो उन्हें क्या समझा जाए

सुभाष चन्द्र

असदुद्दीन ओवैसी और कई अन्य मुस्लिम नेता ताल ठोक कर कहते हैं कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है। लेकिन यह पूछने से पहले भूल जाते है कि हिंदुस्तान से सब कुछ लेकर भी पाकिस्तान और दूसरे इस्लामिक देशों की गीत गाते रहेंगे तो कोई तो क्रोध में कहेगा कि फिर वही चले जाओ

पाकिस्तान के “फेल्ड मार्शल” असिम मुनीर ने शिया मुस्लिम नेताओं के साथ इफ्तार पार्टी में खुल कर कह दिया कि अगर ईरान से इतना ही प्यार है तो आप लोग ईरान चले जाएं ओवैसी और अन्य मुस्लिम नेताओं ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जो कि देनी चाहिए थी क्योंकि जैसे पाकिस्तान के शिया ईरान के लिए तड़प रहे हैं वैसे ही भारत के भी शिया ईरान के लिए कश्मीर और कई अन्य स्थानों पर हंगामा कर रहे हैं 

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कश्मीर में मुसलमानों की आबादी 90 लाख है और लद्दाख में करीब एक लाख यानी 90-92 लाख मुसलमानों ने ईरान के लिए 500 करोड़ इकठ्ठा कर लिया इसका मतलब एक व्यक्ति ने एक करोड़ दे दिया कहां से आया इतना पैसा जबकि कहने को कश्मीरी आवाम गरीब है भारत के किसी युद्ध में कश्मीर के ही क्या किसी प्रान्त के मुसलमानों ने कोई योगदान नहीं दिया और अगर दिया होता तो ईरान की मदद जैसे जरूर ढोल पीटा गया होता

बात बात पर ओवैसी और मुस्लिम नेता कहते हैं कि मुसलमानों की देश के लिए वफ़ादारी पर शक नहीं किया जाना चाहिए उन्होंने मौलाना साजिद रशीदी का बयान नहीं सुना जिसमें उसने साफ़ कहा है कि अगर भारत और ईरान के बीच कोई युद्ध होता है तो भारत के मुसलमान ईरान के लिए लड़ेंगे वो सबूत दे रहा है कि भारत के मुसलमानों की वफ़ादारी संदेहास्पद है

उधर पाकिस्तान के शिया नेताओं ने मुनीर की बखिया उधेड़ दी उन्होंने कहा पाकिस्तान की सेना में 6 लाख सुन्नी हैं तो 3 लाख शिया हैं मतलब साफ़ धमकी दे दी कि मुनीर की बातें सेना में बगावत पैदा कर सकती हैं

कांग्रेस के ढक्कन नेता कह रहे है कि भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं है क्योंकि पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है उन्हें पता भी नहीं है ईरान और इज़रायल ने पाकिस्तान को बीच में लेने से साफ़ मना कर दिया है मजे की बात है ईरान खुद अपने में उलझा हुआ है और कह रहा है कि वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के झगड़े को सुलझाने के लिए तैयार है

पाकिस्तान तो सब तरफ से गिरा हुआ है अमेरिका उसे अपनी सेना गाज़ा में भेजने को कह रहा है, अफगानिस्तान ठोक रहा है और बलूचिस्तान ने पाकिस्तान की हालत ख़राब कर रखी है उधर POJK वाले भी बगावत कर रहे हैं पाकिस्तान के पास एक ही रास्ता है कि वह भारत के साथ युद्ध छेड़ दे जिससे उसे बहाना मिल जाए गाज़ा में सेना न भेजने के लिए क्योंकि पहले ही वह अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से उलझा हुआ है

कांग्रेस को बस एक ही काम है कि किसी तरह ईरान इज़रायल और अमेरिका के युद्ध में मोदी को नीचा दिखाए सुप्रिया श्रीनेत ने कहा है कि आतंकी पैदा करने वाला पाकिस्तान जैसा देश कैसे मध्यस्थता कर सकता है आज पाकिस्तान आतंकी देश दिखाई दे रहा है लेकिन जब वह भारत पर आतंकी हमला करता है तो कांग्रेस इसका सबूत मांगती है कैसा दोहरा चरित्र है इस पार्टी का?

सोनिया गांधी का इलाज किसी दलित डॉक्टर से ही होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

यह बात केवल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि राहुल गांधी हर जगह दलित आदिवासी या OBC ढूढ़ता फिरता है। उसने अडानी की कंपनी के लिए भी पूछा था कि कंपनी में कितने दलित आदिवासी या OBC काम करते हैं किसी भी भवन निर्माण के लिए कहता है यह दलित आदिवासी या OBC ने बनाया लेकिन वे इसमें रहते नहीं 

अब सोनिया गांधी सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती हैं राहुल गांधी को चाहिए कि वह अस्पताल के प्रबंधन से कहे कि सोनिया जी का इलाज केवल किसी दलित आदिवासी या OBC डॉक्टर से ही किया जाए या सोनिया गांधी को इलाज के लिए ईरान भेजना चाहिए क्योंकि ईरान के लिए कांग्रेस बहुत तड़प रही है

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क्या राहुल हॉस्पिटल प्रबंधन से सोनिया का इलाज किसी OBC, Adivasi या SC/ST डॉक्टर से करवाने को नहीं कहते हैं फिर OBC, Adivasi या SC/ST कार्ड खेलकर जनता को पागल बनाना छोड़ दे और इन समाजों को भी राहुल और कांग्रेस से पूछना चाहिए कि क्यों नहीं हमारे समाज के डॉक्टर से सोनिया का इलाज करवाते? राहुल और कांग्रेस को बेनकाब करने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा।   

राजनीति बाहर मत खेलो, अब उस राजनीति को अपने घर में करो अगर हिम्मत है, राहुल गांधी को अस्पताल से पूछना चाहिए कि अस्पताल के बनाने में अगर दलित आदिवासी और OBC ने काम किया तो उन समुदायों के कितने लोग अस्पताल में  काम करते हैं और कितने डॉक्टर दलित आदिवासी या OBC समुदाय के हैं, नहीं हैं तो क्यों नहीं? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?

हिंदू सिख बौद्ध धर्म छोड़ कर ईसाई या मुसलमान बनने पर SC/ST का लाभ नहीं मिल सकता: सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में कोई नई बात नहीं कही; फिर आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों को मिल रहे 4% आरक्षण का मामला 16 साल से क्यों लिए बैठा है सुप्रीम कोर्ट

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि अगर कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत केस नहीं कर सकता

पीठ ने कहा “जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा, किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर SC का दर्जा ख़त्म हो जाता है”

एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद ने अक्काला रामिरेड्डी के खिलाफ SC/ST एक्ट में केस दर्ज किया और FIR भी रेड्डी हाई कोर्ट चला गया और कहा कि आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है और उसका SC दर्जा ख़त्म हो गया है। हाई कोर्ट ने रेड्डी के पक्ष में फैसला दिया इसके खिलाफ पादरी सुप्रीम कोर्ट चला गया लेकिन वहां भी उसकी याचिका ख़ारिज हो गई

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चर्चित YouTuber 
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा अगर कोई दूसरे धर्म में जाने के बाद वापस हिंदू, सिख या बौद्ध हो जाता है तो कुछ शर्तो के साथ ही उसे SC का लाभ मिल सकता है उसे साबित करना होगा कि वह मूल रूप से उस जाति से संबंधित था जिसे Constitution (Scheduled Caste) Order 1950 के तहत अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है दूसरा, उसे साबित करना होगा कि जिस धर्म में वह गया था, उसे वह पूरी तरह त्याग चुका है और मूल धर्म को अपना कर उसकी परम्पराओं, रीति रिवाजों, प्रथाओं और धार्मिक कर्तव्यों का वास्तविक रूप से पालन कर रहा है

तीसरी बात कोर्ट ने यह भी कही कि मूल धर्म में वापसी के बाद उसके समुदाय को भी उसे अपने सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी

लोग कानूनी दाव पेच में लगे रहते है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कुछ नया नहीं है सरकार के Brochure on Reservation for SC/ST में ये सब नियम पहले से ही दिए हुए हैं यह मुझे इसलिए भी पता है क्योंकि मैंने अपनी नौकरी में रहते हुए Corporate level पर Reservation मामले पर 10 वर्ष काम किया है - कुछ लोग ग़लतफ़हमी में आरक्षण का लाभ लेने के लिए शादी भी SC/ST से कर लेते हैं जबकि आरक्षण का लाभ किसी गैर SC/ST को शादी करने के बाद भी नहीं मिलता पिता की जाति से ही बच्चो की जाति तय होती है और अगर कोई लड़की SC है लेकिन उसका पति SC नहीं है तो उसके बच्चो को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दे दिया है कि ईसाई या इस्लाम के मानने वाले को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता तो फिर आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को 4% पिछड़े वर्ग का होने के बहाने आरक्षण कैसे दिया जा रहा है हाई कोर्ट ने उसे गैर कानूनी घोषित किया था लेकिन  सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले

यानी आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण 16 साल से मिल रहा है और अब कल के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार वह आरक्षण रद्द होता है तो कोर्ट क्या ऐसे गैर कानूनी रूप से भर्ती लोगों को नौकरी से  कैसे निकालेगा

इस विषय को 16 साल से लटकाना अपने आप में एक फ्रॉड सा लगता है कल की पीठ ने एक वर्ष में फैसला दे दिया लेकिन 4% आरक्षण का मामला 16 साल से लटकाया हुआ है एक मामला प्रशांत भूषण भी लड़ रहा है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण मिलते रहना चाहिए जो अभी लंबित है

ममता को झटका : बंगाल में ओवैसी-कबीर का नया गठबंधन, बहुकोणीय मुकाबले में मुस्लिम मतों का बंटना तय


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम चीफ प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की मुश्किलें बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली है। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के चर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय और जटिल रही है, जहां जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक रणनीति एक साथ मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नये आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम वोट बैंक की पुनर्संरचना कर परिणामों को प्रभावित करेगा। खासकर उस राज्य में, जहां करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है, वहां इस नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राज्य की सौ से अधिक सीटों पर इस गठबंधन का टीएमसी को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खामियाजा ममता बनर्जी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा।

मुस्लिम वोट बैंक: पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर निर्णायक

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है, जो राज्य की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और कुछ हद तक नदिया जैसे जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक यह वोट बैंक काफी हद तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा है, जिसने खुद को अल्पसंख्यकों के भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकालकर ममता ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और अपने वोट बैंक को नाराज कर लिया है। हुमायूं कबीर अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में मस्जिद बनवा रहे हैं, जिसका नाम भी उन्होंने बाबरी मस्जिद ही रखा है। हुमायूं कबीर और ओवैसी का गठबंधन ममता बनर्जी के इसी स्थिर समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है।

 ओवैसी की एंट्री: रणनीतिक सेंधमारी खिलाएगी नया गुल

ओवैसी की राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है, जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है। बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एआईएमआईएम की मुस्लिम वोटों में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दी है। ओवैसी-कबीर की जोड़ी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर जाता है, तो यह सीधे तौर पर तृणमूल के नुकसान और विपक्ष, खासकर भाजपा, के लिए लाभ का कारण बन सकता है।
हुमायूं कबीर फैक्टर: स्थानीय प्रभाव और असंतोष की राजनीति
हुमायूं कबीर का राजनीतिक महत्व उनके स्थानीय प्रभाव और टीएमसी से अलगाव के कारण बढ़ जाता है। टीएमसी से निष्कासन के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाकर खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दावा कि ममता की टीएमसी में मुस्लिम समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा, एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकती है। उनके द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं।
मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों को उठाकर हुमायूं कबीर ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को सीधे छूने की कोशिश की है। यह मुद्दा भावनात्मक रूप से कुछ वर्गों को प्रभावित कर सकता है। यह तो तय है कि इसका सियासी चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। लेकिन यह कितना व्यापक असर डालेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। बंगाल की राजनीति परंपरागत रूप से धार्मिक मुद्दों पर भी आधारित रही है। एक ओर जहां हिंदू समुदाय की मां दुर्गा में आस्था है, वहीं दूसरे धर्म के लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। यहां सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित जरूर करते हैं।
ममता के मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भाजपा को मिलेगा लाभ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुस्लिम धर्म के आधार पर नया गठबंधन आने से यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन एकजुट मुस्लिम वोटिंग ने टीएमसी को बढ़त दिलाई। अब अगर यही वोट बैंक विभाजित होता है, तो इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जहां वह पहले मामूली अंतर से पीछे रह गई थी। इसके अलावा एंटी एन्कंबेंसी फैक्टर भी ममता बनर्जी की टीएमसी को मुश्किलों में डाल सकता है।
बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता बंगाल का विधानसभा चुनाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया गठबंधन चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से बदल पाएगा। इसका जवाब कई कारकों पर निर्भर करता है। गठबंधन की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, और मतदाताओं का वास्तविक रुझान। अभी तक के संकेत बताते हैं कि यह गठबंधन सीधे सत्ता परिवर्तन का कारण भले न बने, लेकिन कई सीटों पर “स्पॉइलर” की भूमिका निभा सकता है। दरअसल, बड़े तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। अब ओवैसी-कबीर के गठबंधन के भी आ जाने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन इस बदलाव का प्रतीक है, जो चुनावी समीकरणों को जटिल बना सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मतदाता ही करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव टीएमसी को झटका देने वाला हो सकता है।
पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।
राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।