कर्नाटक : कांग्रेस की दादागिरी : ‘VIP हैं हम, जनता की लाइन में थोड़े न लगेंगे’: कांग्रेस MLA ने दिखाई IPL वालों को आँख, स्पीकर का आदेश- हर विधायक को दो 4 टिकट


कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और सरकार ने आईपीएल के सामने अपनी हनक दिखाई है। एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले आईपीएल मैचों के लिए कॉम्प्लिमेंटरी टिकट की माँग ने विवाद खड़ा कर दिया है। विधानसभा स्पीकर यू.टी. खादेर ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर विधायक को कम से कम चार प्रीमियम टिकट सुनिश्चित किए जाएँ।

यह मुद्दा तब सामने आया जब कांग्रेस विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (केएससीए) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आईपीएल 2026 सीजन के शुरूआती मैच 28 मार्च को बेंगलुरु में होने वाले हैं लेकिन केएससीए ने विधायकों और मंत्रियों को टिकट नहीं दिए।

हुंगुंड विधानसभा क्षेत्र से विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा, “28 मार्च को आईपीएल मैच है लेकिन केएससीए ने विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दिए हैं। वे सरकार से सभी सुविधाएँ लेते हैं लेकिन विधायकों का सम्मान नहीं करते। हम वीआईपी हैं, हम लाइन में लगकर थोड़े न टिकट लेंगे। पिछली बार हम लाइन में खड़े हुए थे और फिर आम जनता के साथ सामान्य गैलरी में बैठना पड़ा। यह फिर नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ऑनलाइन टिकट बिक्री से ब्लैक मार्केटिंग बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “टिकट ₹5000 में बिक रहे हैं लेकिन उन्हें ₹35000 में बेचा जा रहा है। वे विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दे रहे बल्कि ऑनलाइन बुकिंग करने को कह रहे हैं। हम जानते हैं कि ऑनलाइन बुकिंग कैसे ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा देती है।”

काशप्पनावर ने माँग की कि केएससीए हर विधायक को कम से कम पाँच कॉम्प्लिमेंटरी टिकट, अलग सीटिंग व्यवस्था और डेडिकेटेड लाउंज उपलब्ध कराए। उन्होंने बताया कि यह मुद्दा पहले विपक्षी नेता आर. अशोक ने विधानसभा में उठाया था।

इस माँग पर स्पीकर यू.टी. खादेर ने उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को निर्देश दिया कि वे केएससीए से सीधे बात करें और हर विधायक को कम से कम चार वीआईपी टिकट सुनिश्चित करें। शिवकुमार ने कहा कि वे केएससीए अध्यक्ष वेंकटेश प्रसाद से बात करेंगे और विधायकों द्वारा ऐसी सुविधाएँ माँगने में कुछ गलत नहीं है।

इस बीच भाजपा नेता और सांसद तेजस्वी सूर्या ने कांग्रेस विधायक पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “विधायक का बयान गलत है और सच कहें यह आश्चर्यजनक भी नहीं है। सबसे पहले यह उनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है। जब राज्य के असली मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है तब विधानसभा में इस तरह का मुद्दा उठाना खुद ही बहुत कुछ बताता है। अगर स्पीकर इस पर कार्रवाई करते हैं तो इससे विधान सौधा की गरिमा कम होती है।”

तेजस्वी सूर्या ने आगे कहा, “मूल सवाल यह है कि केएससीए या कोई भी खेल संगठन विधायकों को फ्री टिकट क्यों दे? उन्हें ऐसा क्या देना चाहिए? यह साफ तौर पर उत्पीड़न है, सामंती सोच है। एक विधायक जो फ्री टिकट, अलग गैलरी माँगता है और आम जनता के साथ बैठने से इनकार करता है वह यह मानता है कि वह उन लोगों से ऊपर है जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है। यही समस्या है। अगर आम नागरिकों को टिकट खरीदना पड़ता है तो विधायकों को भी खरीदना चाहिए। सरल बात है। जब तक हम इसे स्पष्ट रूप से नहीं चुनौती देंगे तब तक उत्पीड़न की संस्कृति को बढ़ावा मिलता रहेगा जो आधुनिक, समान और लोकतांत्रिक समाज के बिल्कुल विपरीत है। यह गलत है और इसका विरोध किया जाना चाहिए।”

बता दें कि चिन्नास्वामी स्टेडियम में बीते साल हुई भगदड़ में 11 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद चिन्नास्वामी स्टेडियम में क्रिकेट मैचों के आयोजन पर रोक लगा दी गई थी। हालाँकि इस सत्र के लिए चिन्नास्वामी स्टेडियम को न सिर्फ आईपीएल की मेजबानी मिली है, बल्कि 2 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों का आयोजन भी यहाँ होगा।

नेपाल :Gen-Z हिंसा मामले में बालेन शाह सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को किया गिरफ्तार

  नेपाल ने नए PM बालेन शाह(बाएँ), पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा (दाएँ) (साभार : News18 & Prabhatkhabar)
नेपाल में शनिवार (28 मार्च 2026) तड़के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को पुलिस ने उनके घरों से गिरफ्तार कर लिया। बालेन शाह के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक एक दिन बाद हुई इस कार्रवाई ने पूरे देश को चौंका दिया है।

यह गिरफ्तारियाँ पिछले साल सितंबर में हुए ‘Gen-Z’ आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और 77 लोगों की मौत के मामले में ‘आपराधिक लापरवाही‘ को लेकर की गई हैं। नेपाल के गृह मंत्री सुधन गुरुंग ने ओली और रमेश लेखक की गिरफ्तारी पर प्रतिक्रिया दी है। सुधन गुरुंग ने कहा, “वादा, वादा होता है। कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। हमने ओली और रमेश लेखक को हिरासत में ले लिया है। यह किसी के खिलाफ प्रतिशोध नहीं है बल्कि न्याय की शुरुआत है।”

कानूनी शिकंजा और चीन की चिंता

दोनों नेताओं पर राष्ट्रीय दंड संहिता की धारा 181 और 182 के तहत केस दर्ज किया गया है, जिसमें दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल हो सकती है। केपी ओली की गिरफ्तारी से चीन की टेंशन भी बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें बीजिंग का करीबी माना जाता है।
आयोग ने सिर्फ नेताओं ही नहीं, बल्कि तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग, गृह सचिव गोकर्ण मणि दवाडी और सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजू अर्याल समेत कई बड़े अफसरों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की है। प्रशासन अब इन हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियों के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हाई अलर्ट पर है।

क्यों हुई गिरफ्तारी?

सितंबर 2025 में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा था। इस आंदोलन में व्यापक हिंसा हुई, संसद जलाई गई और अरबों की संपत्ति स्वाहा हो गई। पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की के जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ओली और रमेश लेखक को दोषी पाया।
रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया जानकारी होने के बावजूद प्रशासन ने लापरवाही बरती, जिससे हालात बेकाबू हुए। शुक्रवार रात कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को लागू करने का फैसला लिया, जिसके बाद कोर्ट से वारंट जारी हुए।

भगवान राम और माता कौशल्या पर अपमानजनक टिप्पणी करने वाला समाजवादी पार्टी नेता यदुनंदन गिरफ्तार, रात में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कराई परेड

सपा नेता यदुनंदन गिरफ्तार
देर आए दुरुस्त आए जो कदम उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस ने अब उठाया है यह कदम बहुत पहले उठा लेना चाहिए था। कालनेमि हिन्दू अपने मुस्लिम वोटबैंक को साधने सनातन धर्म पर कीजड़ उछालने से बाज नहीं आते। जनता को भी ऐसे लोगों और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम और माता कौशल्या पर शर्मनाक और आपत्तिजनक करने वाले समाजवादी पार्टी के नेता यदुनंदन लाल राजपूत (वर्मा) को हरदोई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। हरदोई पुलिस ने शुक्रवार (27 मार्च 2026) रात यदुनंदन की गिरफ्तार की एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है जिसमें वह पुलिसकर्मियों के साथ रात में सड़क पर चलता दिख रहा है।

हरदोई पुलिस ने X पर पोस्ट में लिखा, “हरपालपुर पुलिस द्वारा धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करने वाली अभद्र, अश्लील एवं अमर्यादित टिप्पणी करने वाले अभियुक्त के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही करते हुए सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर उसे गिरफ्तार किया गया है।”

मंच से उगला जहर, Video वायरल होते ही मचा हड़कंप

यह पूरा विवाद हरदोई के सांडी इलाके के अंटवा खेरवा गाँव में सम्राट अशोक की जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम से शुरू हुआ। आरोप है कि मंच से भाषण देते हुए यदुनंदन लाल ने भगवान राम और उनकी माता कौशल्या के खिलाफ ऐसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे सुनकर वहाँ मौजूद लोग भी सन्न रह गए।

जैसे ही इस भाषण का Video सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, न केवल हरदोई बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया। लोग सड़कों पर उतर आए और आरोपित की तुरंत गिरफ्तारी की माँग करने लगे।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत के समय में सुप्रीम कोर्ट में एक भी जज नियुक्त नहीं हुआ; ये भी खबर बन गई, है न कमाल की बात

सुभाष चन्द्र

SCO सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर ने आज ये भी खबर बना दी कि सूर्यकांत जी के चीफ जस्टिस बनने के बाद उनके 122 दिन के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट का एक भी जज नियुक्त नहीं हुआ 

अब यह ऐसी बात तो नहीं है कि खबर बना दी जाए सुप्रीम कोर्ट के जजों के स्वीकृत पद 34 हैं और 24 नवंबर 2025 को जब सूर्यकांत जी चीफ जस्टिस बने, उस दिन 33 जज काम कर रहे थे और आज भी 33 ही हैं केवल एक जज की vacancy है अगर नहीं भरी गई तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं हो गई पहले भी कई जजों की रिक्तियां रही हैं और सुप्रीम कोर्ट काम करता रहा है। 

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सूर्यकांत जी जबरदस्ती क्या जज बना सकते हैं उनका कॉलेजियम किसी की सिफारिश करता है और सरकार नियुक्ति नहीं करती, तब तो कोई एतराज कर सकता है लेकिन जब कॉलेजियम ही एक vacancy भरने के लिए सिफारिश न करे तो सरकार क्या करेगी 

SCO एक बात भूल गया कि सूर्यकांत जी के समय में हाई कोर्ट के 5 जजों की इलाहाबाद हाई कोर्ट में Contractual Basis पर नियुक्ति की गई है ऐसी नियुक्तियों के लिए सरकार से अनुमति शायद नहीं ली गई और इतिहास में इसके पहले ऐसी नियुक्ति केवल 3 बार हुई हैं, 2 बार 1972 में और एक 2021 में ऐसी नियुक्तियों के पीछे कारण दिया जाता रहा हैं कि हाई कोर्ट पर काम के दबाव को कम करने के लिए किया गया लेकिन यह काम का दबाव तो हर हाई कोर्ट में है जहां सभी जगह वर्षों तक मामले लटके रहते हैं लालू यादव के मामले तो 12 साल से लटके हैं

सूर्यकान्त जी के समय में इस वर्ष 2026 में सुप्रीम कोर्ट के 3 जज रिटायर होंगे उन्हें मिला कर 4 जजों की नियुक्ति वे समय आने पर करेंगे लेकिन चाहे जजों की strength पूरी भी हो, मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट अपनी मर्जी से ही करता है

प्रधानमंत्री मोदी फिर बने दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता: 68% अप्रूवल रेटिंग्स के साथ टॉप पर, ट्रंप 14वें नंबर पर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय और विश्वसनीय नेता बने हुए हैं। पिछले 12 वर्षों से लगातार सत्ता में बने रहने के बावजूद उनकी वैश्विक साख, प्रतिष्ठा और लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि यह बढ़ती ही जा रही है। पीएम मोदी का यह रुतबा देखकर पूरी दुनिया हैरान है। अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय एजेंसी मॉर्निंग कंसल्ट की ताजा ग्लोबल अप्रूवल रेटिंग में नरेन्द्र मोदी को एक बार फिर विश्व के शीर्ष नेता के रूप में स्थान मिला है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जैसे विश्व नेता उनके सामने कहीं नहीं टिक पा रहे हैं।

लोकप्रियता का राज: जनता के दिलों पर राज

मॉर्निंग कंसल्ट Morning Consult की ताजा ग्लोबल अप्रूवल रेटिंग में प्रधानमंत्री मोदी को 68 प्रतिशत लोगों की मंजूरी मिली है, जो उन्हें वैश्विक नेताओं की सूची में टॉप पर बनाए हुए है। स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाय पारमेलिन और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग दोनों 62 प्रतिशत की अप्रूवल रेटिंग के साथ दूसरे स्थान हैं, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सिर्फ 39 प्रतिशत अप्रूवल के साथ 14वें नंबर पर हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यह उच्च रेटिंग बताती है कि वे जनता के विश्वास को लगातार बरकरार रखे हुए हैं। यह अप्रूवल न केवल उनकी घरेलू शक्ति को दर्शाता है, बल्कि उनकी वैश्विक छवि और कूटनीतिक पहचान को भी मजबूत करता है। इस रिपोर्ट ने एक बार फिर साबित किया है कि प्रधानमंत्री मोदी जनता के दिलों पर राज करना जारी रखते हैं—देश में ही नहीं, बल्कि वैश्विक परिदृश्य में भी।

वैश्विक भरोसा: भारत, अमेरिका और चीन से आगे

इस सर्वे में यह भी सामने आया है कि दुनिया भर के लोगों का भारत के नेतृत्व पर भरोसा अमेरिका और चीन से ज्यादा है। यह एक ऐतिहासिक कूटनीतिक और रणनीतिक बदलाव है, जो भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साख को दर्शाता है। मॉर्निंग कंसल्ट के सर्वे में शामिल 24 देशों के वैश्विक नेताओं में पीएम मोदी सबसे आगे रहे।

दुनिया का नया विश्वास: भारत के नेतृत्व में

ताजा ग्लोबल अप्रूवल रेटिंग से संदेश साफ है: जब दुनिया के अन्य बड़े नेता जनता का भरोसा खो रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी की साख लगातार बुलंद हो रही है। भारत के नेतृत्व पर वैश्विक भरोसा अमेरिका और चीन से भी ऊपर पहुंच चुका है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव है। अब दुनिया सिर्फ भारत के उदय को नहीं देख रही- वह भारत के नेतृत्व में अपना विश्वास जता रही है, पहले से कहीं अधिक। यह भारत की अंतरराष्ट्रीय साख के लिए एक ऐतिहासिक पल है।

मोदी अब तक के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री 

प्रधानमंत्री मोदी देश के अब तक के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं। ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे में एक महत्वपूर्ण सवाल था कि भारत का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री कौन है? इसके जवाब में 47 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री बताया। वहीं, अटल बिहारी बाजपेयी को 16 प्रतिशत लोगों ने वोट दिए। सर्वे में शामिल 12 प्रतिशत लोगों ने इंदिरा गांधी को अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री बताया। वहीं, मनमोहन सिंह को 8 प्रतिशत और जवाहर लाल नेहरू को 4 प्रतिशत वोट मिले।

इंडिया टुडे-सीवोटर सर्वे: 53 प्रतिशत लोगों की पसंद पीएम मोदी

इंडिया टुडे-सीवोटर सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी सबसे ज्यादा पसंदीदा चेहरा हैं। सर्वे में वो 53 प्रतिशत वोटों के साथ सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में हैं। प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी के बीच वोटों का अंतर काफी ज्यादा है। उन्हें सिर्फ 9 प्रतिशत वोट मिले हैं। वहीं, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 6 प्रतिशत वोटों के साथ तीसरे नंबर पर हैं। 

सुनो ओवैसी, मुनीर ने शियाओं को कह दिया पाकिस्तान उसके बाप का है, अब भारत के लिए मत कहा करो कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है; 90 लाख कश्मीरी मुसलमान ईरान को 500 करोड़ दे सकते है तो उन्हें क्या समझा जाए

सुभाष चन्द्र

असदुद्दीन ओवैसी और कई अन्य मुस्लिम नेता ताल ठोक कर कहते हैं कि हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है। लेकिन यह पूछने से पहले भूल जाते है कि हिंदुस्तान से सब कुछ लेकर भी पाकिस्तान और दूसरे इस्लामिक देशों की गीत गाते रहेंगे तो कोई तो क्रोध में कहेगा कि फिर वही चले जाओ

पाकिस्तान के “फेल्ड मार्शल” असिम मुनीर ने शिया मुस्लिम नेताओं के साथ इफ्तार पार्टी में खुल कर कह दिया कि अगर ईरान से इतना ही प्यार है तो आप लोग ईरान चले जाएं ओवैसी और अन्य मुस्लिम नेताओं ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जो कि देनी चाहिए थी क्योंकि जैसे पाकिस्तान के शिया ईरान के लिए तड़प रहे हैं वैसे ही भारत के भी शिया ईरान के लिए कश्मीर और कई अन्य स्थानों पर हंगामा कर रहे हैं 

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कश्मीर में मुसलमानों की आबादी 90 लाख है और लद्दाख में करीब एक लाख यानी 90-92 लाख मुसलमानों ने ईरान के लिए 500 करोड़ इकठ्ठा कर लिया इसका मतलब एक व्यक्ति ने एक करोड़ दे दिया कहां से आया इतना पैसा जबकि कहने को कश्मीरी आवाम गरीब है भारत के किसी युद्ध में कश्मीर के ही क्या किसी प्रान्त के मुसलमानों ने कोई योगदान नहीं दिया और अगर दिया होता तो ईरान की मदद जैसे जरूर ढोल पीटा गया होता

बात बात पर ओवैसी और मुस्लिम नेता कहते हैं कि मुसलमानों की देश के लिए वफ़ादारी पर शक नहीं किया जाना चाहिए उन्होंने मौलाना साजिद रशीदी का बयान नहीं सुना जिसमें उसने साफ़ कहा है कि अगर भारत और ईरान के बीच कोई युद्ध होता है तो भारत के मुसलमान ईरान के लिए लड़ेंगे वो सबूत दे रहा है कि भारत के मुसलमानों की वफ़ादारी संदेहास्पद है

उधर पाकिस्तान के शिया नेताओं ने मुनीर की बखिया उधेड़ दी उन्होंने कहा पाकिस्तान की सेना में 6 लाख सुन्नी हैं तो 3 लाख शिया हैं मतलब साफ़ धमकी दे दी कि मुनीर की बातें सेना में बगावत पैदा कर सकती हैं

कांग्रेस के ढक्कन नेता कह रहे है कि भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं है क्योंकि पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है उन्हें पता भी नहीं है ईरान और इज़रायल ने पाकिस्तान को बीच में लेने से साफ़ मना कर दिया है मजे की बात है ईरान खुद अपने में उलझा हुआ है और कह रहा है कि वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के झगड़े को सुलझाने के लिए तैयार है

पाकिस्तान तो सब तरफ से गिरा हुआ है अमेरिका उसे अपनी सेना गाज़ा में भेजने को कह रहा है, अफगानिस्तान ठोक रहा है और बलूचिस्तान ने पाकिस्तान की हालत ख़राब कर रखी है उधर POJK वाले भी बगावत कर रहे हैं पाकिस्तान के पास एक ही रास्ता है कि वह भारत के साथ युद्ध छेड़ दे जिससे उसे बहाना मिल जाए गाज़ा में सेना न भेजने के लिए क्योंकि पहले ही वह अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से उलझा हुआ है

कांग्रेस को बस एक ही काम है कि किसी तरह ईरान इज़रायल और अमेरिका के युद्ध में मोदी को नीचा दिखाए सुप्रिया श्रीनेत ने कहा है कि आतंकी पैदा करने वाला पाकिस्तान जैसा देश कैसे मध्यस्थता कर सकता है आज पाकिस्तान आतंकी देश दिखाई दे रहा है लेकिन जब वह भारत पर आतंकी हमला करता है तो कांग्रेस इसका सबूत मांगती है कैसा दोहरा चरित्र है इस पार्टी का?

सोनिया गांधी का इलाज किसी दलित डॉक्टर से ही होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

यह बात केवल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि राहुल गांधी हर जगह दलित आदिवासी या OBC ढूढ़ता फिरता है। उसने अडानी की कंपनी के लिए भी पूछा था कि कंपनी में कितने दलित आदिवासी या OBC काम करते हैं किसी भी भवन निर्माण के लिए कहता है यह दलित आदिवासी या OBC ने बनाया लेकिन वे इसमें रहते नहीं 

अब सोनिया गांधी सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती हैं राहुल गांधी को चाहिए कि वह अस्पताल के प्रबंधन से कहे कि सोनिया जी का इलाज केवल किसी दलित आदिवासी या OBC डॉक्टर से ही किया जाए या सोनिया गांधी को इलाज के लिए ईरान भेजना चाहिए क्योंकि ईरान के लिए कांग्रेस बहुत तड़प रही है

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क्या राहुल हॉस्पिटल प्रबंधन से सोनिया का इलाज किसी OBC, Adivasi या SC/ST डॉक्टर से करवाने को नहीं कहते हैं फिर OBC, Adivasi या SC/ST कार्ड खेलकर जनता को पागल बनाना छोड़ दे और इन समाजों को भी राहुल और कांग्रेस से पूछना चाहिए कि क्यों नहीं हमारे समाज के डॉक्टर से सोनिया का इलाज करवाते? राहुल और कांग्रेस को बेनकाब करने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा।   

राजनीति बाहर मत खेलो, अब उस राजनीति को अपने घर में करो अगर हिम्मत है, राहुल गांधी को अस्पताल से पूछना चाहिए कि अस्पताल के बनाने में अगर दलित आदिवासी और OBC ने काम किया तो उन समुदायों के कितने लोग अस्पताल में  काम करते हैं और कितने डॉक्टर दलित आदिवासी या OBC समुदाय के हैं, नहीं हैं तो क्यों नहीं? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?

हिंदू सिख बौद्ध धर्म छोड़ कर ईसाई या मुसलमान बनने पर SC/ST का लाभ नहीं मिल सकता: सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में कोई नई बात नहीं कही; फिर आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों को मिल रहे 4% आरक्षण का मामला 16 साल से क्यों लिए बैठा है सुप्रीम कोर्ट

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि अगर कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत केस नहीं कर सकता

पीठ ने कहा “जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा, किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर SC का दर्जा ख़त्म हो जाता है”

एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद ने अक्काला रामिरेड्डी के खिलाफ SC/ST एक्ट में केस दर्ज किया और FIR भी रेड्डी हाई कोर्ट चला गया और कहा कि आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है और उसका SC दर्जा ख़त्म हो गया है। हाई कोर्ट ने रेड्डी के पक्ष में फैसला दिया इसके खिलाफ पादरी सुप्रीम कोर्ट चला गया लेकिन वहां भी उसकी याचिका ख़ारिज हो गई

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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा अगर कोई दूसरे धर्म में जाने के बाद वापस हिंदू, सिख या बौद्ध हो जाता है तो कुछ शर्तो के साथ ही उसे SC का लाभ मिल सकता है उसे साबित करना होगा कि वह मूल रूप से उस जाति से संबंधित था जिसे Constitution (Scheduled Caste) Order 1950 के तहत अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है दूसरा, उसे साबित करना होगा कि जिस धर्म में वह गया था, उसे वह पूरी तरह त्याग चुका है और मूल धर्म को अपना कर उसकी परम्पराओं, रीति रिवाजों, प्रथाओं और धार्मिक कर्तव्यों का वास्तविक रूप से पालन कर रहा है

तीसरी बात कोर्ट ने यह भी कही कि मूल धर्म में वापसी के बाद उसके समुदाय को भी उसे अपने सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी

लोग कानूनी दाव पेच में लगे रहते है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कुछ नया नहीं है सरकार के Brochure on Reservation for SC/ST में ये सब नियम पहले से ही दिए हुए हैं यह मुझे इसलिए भी पता है क्योंकि मैंने अपनी नौकरी में रहते हुए Corporate level पर Reservation मामले पर 10 वर्ष काम किया है - कुछ लोग ग़लतफ़हमी में आरक्षण का लाभ लेने के लिए शादी भी SC/ST से कर लेते हैं जबकि आरक्षण का लाभ किसी गैर SC/ST को शादी करने के बाद भी नहीं मिलता पिता की जाति से ही बच्चो की जाति तय होती है और अगर कोई लड़की SC है लेकिन उसका पति SC नहीं है तो उसके बच्चो को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दे दिया है कि ईसाई या इस्लाम के मानने वाले को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता तो फिर आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को 4% पिछड़े वर्ग का होने के बहाने आरक्षण कैसे दिया जा रहा है हाई कोर्ट ने उसे गैर कानूनी घोषित किया था लेकिन  सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले

यानी आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण 16 साल से मिल रहा है और अब कल के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार वह आरक्षण रद्द होता है तो कोर्ट क्या ऐसे गैर कानूनी रूप से भर्ती लोगों को नौकरी से  कैसे निकालेगा

इस विषय को 16 साल से लटकाना अपने आप में एक फ्रॉड सा लगता है कल की पीठ ने एक वर्ष में फैसला दे दिया लेकिन 4% आरक्षण का मामला 16 साल से लटकाया हुआ है एक मामला प्रशांत भूषण भी लड़ रहा है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण मिलते रहना चाहिए जो अभी लंबित है

ममता को झटका : बंगाल में ओवैसी-कबीर का नया गठबंधन, बहुकोणीय मुकाबले में मुस्लिम मतों का बंटना तय


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम चीफ प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की मुश्किलें बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली है। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के चर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय और जटिल रही है, जहां जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक रणनीति एक साथ मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नये आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम वोट बैंक की पुनर्संरचना कर परिणामों को प्रभावित करेगा। खासकर उस राज्य में, जहां करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है, वहां इस नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राज्य की सौ से अधिक सीटों पर इस गठबंधन का टीएमसी को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खामियाजा ममता बनर्जी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा।

मुस्लिम वोट बैंक: पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर निर्णायक

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है, जो राज्य की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और कुछ हद तक नदिया जैसे जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक यह वोट बैंक काफी हद तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा है, जिसने खुद को अल्पसंख्यकों के भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकालकर ममता ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और अपने वोट बैंक को नाराज कर लिया है। हुमायूं कबीर अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में मस्जिद बनवा रहे हैं, जिसका नाम भी उन्होंने बाबरी मस्जिद ही रखा है। हुमायूं कबीर और ओवैसी का गठबंधन ममता बनर्जी के इसी स्थिर समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है।

 ओवैसी की एंट्री: रणनीतिक सेंधमारी खिलाएगी नया गुल

ओवैसी की राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है, जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है। बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एआईएमआईएम की मुस्लिम वोटों में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दी है। ओवैसी-कबीर की जोड़ी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर जाता है, तो यह सीधे तौर पर तृणमूल के नुकसान और विपक्ष, खासकर भाजपा, के लिए लाभ का कारण बन सकता है।
हुमायूं कबीर फैक्टर: स्थानीय प्रभाव और असंतोष की राजनीति
हुमायूं कबीर का राजनीतिक महत्व उनके स्थानीय प्रभाव और टीएमसी से अलगाव के कारण बढ़ जाता है। टीएमसी से निष्कासन के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाकर खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दावा कि ममता की टीएमसी में मुस्लिम समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा, एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकती है। उनके द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं।
मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों को उठाकर हुमायूं कबीर ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को सीधे छूने की कोशिश की है। यह मुद्दा भावनात्मक रूप से कुछ वर्गों को प्रभावित कर सकता है। यह तो तय है कि इसका सियासी चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। लेकिन यह कितना व्यापक असर डालेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। बंगाल की राजनीति परंपरागत रूप से धार्मिक मुद्दों पर भी आधारित रही है। एक ओर जहां हिंदू समुदाय की मां दुर्गा में आस्था है, वहीं दूसरे धर्म के लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। यहां सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित जरूर करते हैं।
ममता के मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भाजपा को मिलेगा लाभ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुस्लिम धर्म के आधार पर नया गठबंधन आने से यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन एकजुट मुस्लिम वोटिंग ने टीएमसी को बढ़त दिलाई। अब अगर यही वोट बैंक विभाजित होता है, तो इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जहां वह पहले मामूली अंतर से पीछे रह गई थी। इसके अलावा एंटी एन्कंबेंसी फैक्टर भी ममता बनर्जी की टीएमसी को मुश्किलों में डाल सकता है।
बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता बंगाल का विधानसभा चुनाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया गठबंधन चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से बदल पाएगा। इसका जवाब कई कारकों पर निर्भर करता है। गठबंधन की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, और मतदाताओं का वास्तविक रुझान। अभी तक के संकेत बताते हैं कि यह गठबंधन सीधे सत्ता परिवर्तन का कारण भले न बने, लेकिन कई सीटों पर “स्पॉइलर” की भूमिका निभा सकता है। दरअसल, बड़े तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। अब ओवैसी-कबीर के गठबंधन के भी आ जाने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन इस बदलाव का प्रतीक है, जो चुनावी समीकरणों को जटिल बना सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मतदाता ही करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव टीएमसी को झटका देने वाला हो सकता है।
पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।
राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

ममता राज का हिंदू विरोध फिर उजागर, ‘जिहादियों’ ने भगवान राम की मूर्ति का सिर काटा, TMC नेता बोले- राम केवल उत्तर भारत के देवता


पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।

राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

राम केवल उत्तर भारतीयों के देवता, हम काली के भक्त – सिन्हा
नंदीग्राम में प्रभु श्रीराम की मूर्ति का सिर काटने की घटना इसलिए और चिंताजनक हो गई है, क्योंकि टीएमसी सरकार इसकी परवाह करने की बजाए प्रभु श्रीराम का अपना भगवान ही नहीं मानती। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने जहां इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेता औरे पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के बयान ने आग में घी का काम किया है। सिन्हा ने अपने विवादित बयान में कहा है कि रामचंद्र तो केवल उत्तर भारत के देवता हैं। सिन्हा ने उल्टे भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में रामचंद्र नहीं चलेगा। बंगाल के लोग तो मां काली के भक्त हैं। भाजपा नेताओं ने सिन्हा की बयान की आलोचना करते हुए इसे भगवान श्रीराम का अपमान बताया है। ऐसे में हर स्तर पर मुख्यमंत्री, सरकार और प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आस्था का सम्मान बना रहे और कानून-व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत हो।

ममता का राज हिंदू विरोधी घटनाओं के लिए रहा है कुख्यात
पश्चिम बंगाल में समय-समय पर धार्मिक स्थलों या प्रतीकों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मंदिरों में तोड़फोड़, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने या धार्मिक जुलूसों के दौरान तनाव जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन घटनाओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएं सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बनती हैं। इसलिए इनका समाधान केवल राजनीतिक विमर्श से नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई से ही संभव है। लेकिन ममता सरकार ने अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते इनमें लापहवाही ही दिखाई है। किसी भी राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना होती है। चाहे घटना किसी भी धर्म से जुड़ी हो, प्रशासन को निष्पक्षता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। दोषियों की पहचान, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है, ताकि यह संदेश जाए कि ऐसी घटनाओं को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति की हदें पार कीं

पश्चिम बंगाल पिछले डेढ़ दशक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति का गवाह रहा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए खुलकर खजाना खोला है और इसमें राज्य की माली हालत की भी चिंता नहीं की है। अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए ममता सरकार ने सारी सीमाएं ही लांघ ली है और आंखें बंद कर इन पर पैसा लुटाया जा रहा है। इसका अंदाजा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2010-11 में राज्य का जो अल्पसंख्यक बजट मात्र 472 करोड़ था, वह आज 5,600 करोड़ को पार कर चुका है। अल्पसंख्यक युवाओं का वोट बैंक पक्का करने के लिए करोड़ों रुपये का ऋण दिया गया है। खास बात यह कि तृणमूल सरकार ने इनसे ऋण वापसी पर कोई फोकस नहीं किया है। इतना ही नहीं इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक मानदेय में भी कई गुना की वृद्धि की गई है। दूसरी ओर प्रभु श्रीराम के नाम से लेकर हिंदुत्व और सनातन विरोध के कई उदाहरण ममता बनर्जी के हैं। इससे यह शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल सरकार ने अल्पसंख्यकों और घुसपैठियों को खूब पाला-पोसा है।

राम नाम मास्क बांटने पर बीजेपी नेता गिरफ्तार
राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है।

हिंदू-सिख-बौद्ध ही हो सकते हैं SC: धर्म बदलते ही खत्म हो जाएगा दर्जा: धर्म में वापस आने के बाद मिल सकता है अनुसूचित जाति का लाभ :सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 मार्च 2026) को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा पा सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में बदल जाता है, तो उसका SC दर्जा खत्म हो जाएगा।

इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने की। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत केस नहीं कर सकता। यह टिप्पणी कोर्ट ने एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद की अपील पर सुनवाई करते हुए की। उन्होंने साल 2025 में आए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

चिन्थाडा आनंद ने आरोप लगाया था कि उनके साथ अक्काला रामिरेड्डी ने जातिगत भेदभाव किया। इसके बाद उन्होंने SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज कराया और पुलिस ने उनकी शिकायत पर FIR भी दर्ज की।

इसके बाद अक्काला रामिरेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जाकर इस केस को रद्द करने की माँग की। उनका कहना था कि चिन्थाडा आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए उनका SC दर्जा खत्म हो चुका है। हाई कोर्ट ने रामिरेड्डी के पक्ष में फैसला दिया।

इसके बाद पादरी चिन्थाडा आनंद सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। मंगलवार (24 मार्च 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, “जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर SC का दर्ज खत्म हो जाता है।”

धर्म में वापस आने के बाद मिल सकता है अनुसूचित जाति का लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में जाने के बाद दोबारा हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में लौटने का दावा करता है और अनुसूचित जाति (SC) का लाभ लेना चाहता है तो उसे इसके लिए सख्त और स्पष्ट शर्तों को पूरा करना होगा।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल दावा करना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि तीनों शर्तों को एक साथ और पूरी तरह साबित करना अनिवार्य होगा। इनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं होने पर दावा मान्य नहीं होगा।

क्या हैं सुप्रीम कोर्ट की तीन अनिवार्य शर्तें?

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पहली शर्त बताई है कि व्यक्ति के पास यह स्पष्ट और पुख्ता प्रमाण होना चाहिए कि वह मूल रूप से उस जाति से संबंधित था जिसे Constitution (Scheduled Castes) Order 1950 के तहत अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है।

दूसरी शर्त के तौर पर कोर्ट ने कहा है कि व्यक्ति को यह भी साबित करना होगा कि उसने जिस धर्म को पहले अपनाया था उससे उसने पूरी तरह और बिना किसी संदेह के त्याग कर दिया है। इसके साथ ही यह भी दिखाना जरूरी होगा कि उसने अपने मूल धर्म (हिंदू, सिख या बौद्ध) को सच्चे मन से दोबारा अपनाया है और उस धर्म की परंपराओं, रीति-रिवाजों, प्रथाओं और धार्मिक कर्तव्यों का वास्तविक रूप से पालन कर रहा है। कोर्ट ने इसे ‘बोनाफाइड रिकन्वर्जन’ यानी वास्तविक और ईमानदार पुनः धर्म-ग्रहण बताया है।

तीसरी और सबसे अहम शर्त यह बताई गई कि व्यक्ति को अपनी मूल जाति और समुदाय द्वारा स्वीकार किया जाना जरूरी है। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल खुद को उस जाति का बताना पर्याप्त नहीं है बल्कि संबंधित समुदाय को भी उसे अपने सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी और उसे सामाजिक रूप से स्वीकार करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ये तीनों शर्तें अनिवार्य और एक साथ लागू (cumulative) हैं। यानी अगर कोई व्यक्ति इनमें से एक भी शर्त को साबित नहीं कर पाता है तो उसका फिर से अनुसूचित जाति का दावा खारिज कर दिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन सभी बातों को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (burden of proof) उस व्यक्ति पर ही होगी, जो फिर से धर्म में वापसी और SC दर्जे का दावा कर रहा है।

ट्रंप के ईरान पर U-Turn से 20 मिनट में 840 करोड़ रूपए की कमाई, किसने बनाया अमेरिकी राष्ट्रपति के दाँव से मोटा पैसा?


वैश्विक बाजारों में सोमवार(23 जनवरी 2026) को एक बेहद चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के पावर प्लांट पर हमलों को 5 दिनों के लिए रोकने के ऐलान किया तो उससे ठीक पहले भारी और असामान्य ट्रेडिंग देखी गई। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस पूरे घटनाक्रम में महज 20 मिनट के भीतर करीब 840 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया गया।

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूयॉर्क समय के अनुसार सुबह 6:50 बजे (भारत में शाम 4:20 बजे), CME पर S&P 500 E-mini फ्यूचर्स में अचानक ट्रेडिंग वॉल्यूम कई गुना बढ़ गया। इसी दौरान तेल बाजार में भी बड़ी हलचल दिखी। यह समय सामान्य नहीं माना जाता क्योंकि प्री-मार्केट में आमतौर पर कम ट्रेडिंग और कम लिक्विडिटी होती है।

करीब 15 मिनट बाद यानी सुबह 7:05 बजे डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर पोस्ट कर बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत हुई है और फिलहाल ऊर्जा ढाँचे पर हमले टाल दिए गए हैं लेकिन तब तक बड़े ट्रेड पहले ही किए जा चुके थे।

ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म अनयूजुअल व्हेल्स (Unusual Whales) के अनुसार, इन ट्रेड्स में दो बड़े दाँव लगाए गए। पहला करीब 1.5 बिलियन डॉलर (लगभग 12,600 करोड़ रुपए) के S&P 500 फ्यूचर्स खरीदे गए जिससे बाजार में तेजी का फायदा उठाया जा सके। दूसरा करीब 192 मिलियन डॉलर (लगभग 1,615 करोड़ रुपए) के तेल फ्यूचर्स बेचे गए ताकि कीमत गिरने पर लाभ कमाया जा सके।

सिर्फ एक मिनट में लगभग 6,200 ब्रेंट और WTI फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स का लेन-देन हुआ जो सामान्य से 4-6 गुना ज्यादा था। ट्रंप के ऐलान के बाद S&P 500 फ्यूचर्स में 2.5% से ज्यादा तेजी आई जबकि ब्रेंट क्रूड 109 डॉलर से गिरकर 92 डॉलर और WTI करीब 6% टूट गया। हेज फंड मैनेजर मेट विलियम ने इसे 25 साल में सबसे असामान्य पैटर्न बताया। उनका कहना है कि बिना किसी बड़े डेटा या संकेत के इतने बड़े ट्रेड संदेह पैदा करते हैं।

अब सवाल उठ रहा है कि ट्रंप के ऐलान से पहले इतनी सटीक जानकारी किसके पास थी। हालाँकि, अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (US SEC) ने अभी तक इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

तेजस्वी यादव और राहुल गांधी ने भुगता, अब अखिलेश यादव भी भुगतेगा; कालचक्र किसी को नहीं छोड़ता

सुभाष चन्द्र

मोदी-योगी-अमित विरोध में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उम्मा को चूमने के लिए सनातन संस्कृति को कलंकित करने का कोई मौका नहीं चूक रहे। अगर हिन्दू संस्कृति इतनी बुरी है तो इस्लाम क्यों नहीं कबूल कर लेते?    

गंगा नदी में मुस्लिमों ने जानबूझकर इफ्तार पार्टी की और पवित्र गंगा में चिकेन और मांस के झूठे टुकड़े फेंके उन्हें पता था हिंदू इसे कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे वैसे हिंदू त्योहारों पर मुस्लिम म्यूजिक बजने पर भड़कते हैं और पत्थरबाजी करते हैं लेकिन गंगा की इफ्तार में सब कुछ किया लेकिन कूद कर अखिलेश और कांग्रेस उनके समर्थन में खड़े हो गए। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अखिलेश यादव और कांग्रेस का हिंदू विरोध जगजाहिर है लेकिन मोक्षदायिनी माँ गंगा को अपवित्र करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं जो बताता है मुस्लिम वोटो के लिए ये लोग किस कदर पागल हैं और मुस्लिम हिंदुओं को उकसाने के लिए तैयार रहते हैं अखिलेश ने कहा गंगा में इफ्तार क्यों नहीं हो सकती? तो फिर सड़कों पर इफ्तार क्यों करते हो? वैसे भी मुस्लिमों के दिल में गंगा के लिए कोई सम्मान हो, ऐसा कभी देखने को नहीं मिलता इसलिए ही उन्हें महाकुम्भ से दूर रखा गया था

अखिलेश तो और आगे बढ़ गया उसने कहा इफ्तार करने वालों ने पुलिस वालो और DM को अच्छा खाना नहीं खिलाया होगा और उनकी हथेली गर्म नहीं की होगी  हथेली गरम पुलिस नरम, ये तो आम बात है। यानि अखिलेश के राज में उत्तर प्रदेश में यही होता रहा है। 

अखिलेश यादव अपनी ये बाते याद रखना गंगा माँ है वो अगर पाप धोती है तो दंड भी देती है और जो पाप आपने किया वह धुल भी नहीं सकता कुछ याद कीजिए तेजस्वी यादव की करतूत जिसका परिणाम उसे मिला माँ भगवती से

तेजस्वी यादव ने 9 अप्रैल, 2024 को नवरात्री के पहले दिन हेलीकाप्टर में मुकेश सहनी के साथ चटकारे ले ले कर मछली पार्टी करते हुए वीडियो पोस्ट किया था लेकिन जब भाजपा ने ऐतराज किया तो कह दिया कि वो तो एक दिन पहले 8 अप्रैल का वीडियो था मगर वीडियो पोस्ट तो  जानबूझकर नवरात्री के पहले दिन किया बाप लालू यादव भगवान राम का अपमान करता है और बेटे ने माँ भगवती का अपमान कर दिया

दूसरी तरफ दत्तात्रेय राहुल गांधी भी दिसंबर, 25 में मछली पार्टी उड़ा रहा था और उसकी रैली में मोदी की दिवंगत माताश्री के नाम से मोदी को माँ की गाली दी गई लेकिन राहुल गांधी खामोश रहा मोदी तेरी कब्र खुदेगी कांग्रेस ये नारे खुल कर लगाती है

नतीजा क्या हुआ? तेजस्वी की पार्टी 75 से 25 सीट पर आ गई, राहुल की कांग्रेस 18 से 6 सीट पर और उपमुख्यमंत्री बनने वाले मुकेश सहनी की पार्टी का खाता भी बिहार चुनाव में नहीं खुला

और उड़ाओ हिंदू भगवानों का मजाक - 

बस अब अखिलेश यादव इस सबकी दुर्दशा को याद कर ले और अपनी पिछली 111 की एक तिहाई यानी 37 सीट अभी से अगले चुनाव में अपने खाते में लिख ले माँ भगवती का रौद्र रूप तो तेजस्वी & कंपनी ने देख लिया और माँ गंगा का रौद्र रूप देखने के लिए अखिलेश तैयार रहे

बाद में चुनाव नतीजों की समीक्षा करते मत करते फिरना जैसे अपनी किस्मत तेजस्वी & कंपनी ने खुद लिख ली थी, वैसे ही अखिलेश ने लिख ली है अखिलेश के खाते में तो सनातन धर्म के अनेक अपमान लिखे हैं 

दिल्ली HC के आदेश पर पुलिस ने UNI न्यूज एजेंसी का ऑफिस किया सील

      दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद UNI ऑफिस सील कर दिया गया (साभार -द हिंदू, एआईआर और न्यूज़क्लिक)
राष्ट्रीय राजधानी में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब देश की सबसे पुरानी समाचार एजेंसियों में से एक यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के दफ्तर पर पुलिस कार्रवाई की गई। शुक्रवार (20 मार्च 2026) की शाम दिल्ली पुलिस के अधिकारी अर्धसैनिक बलों के साथ रफी मार्ग स्थित UNI के कार्यालय पहुँचे और अदालत के आदेश के बाद वहाँ खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दफ्तर में मौजूद करीब 50 पत्रकारों और कर्मचारियों को तुरंत परिसर खाली करने के लिए कहा गया। यह भी सामने आया कि कार्रवाई के दौरान कुछ कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाला गया।

इस मामले पर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा ने कहा कि पुलिस केवल सरकारी अधिकारियों की मदद के लिए वहाँ मौजूद थी। उन्होंने बताया, “हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार हम L&DO अधिकारियों को सुरक्षा देने पहुँचे थे और UNI के स्टाफ से परिसर खाली करने को कहा गया।”

यह पूरी कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा UNI की उस याचिका को खारिज किए जाने के कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें जमीन आवंटन रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। इसके तुरंत बाद अधिकारियों ने संपत्ति को सील कर दिया, जिसके बाद प्रेस की आजादी और सरकारी कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई।

                                                                 साभार – TIE

UNI के खिलाफ कार्रवाई को ‘प्रेस की आजादी’ पर हमला बताकर जनता को किया जा रहा गुमराह

इस घटना के बाद कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग, एक्टिविस्ट और खुद को पत्रकार बताने वाले लोग सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने लगे। कई लोगों ने कहा कि यह कदम भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए कम होती जगह को दिखाता है।

कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ता श्रीनिवास ने इस स्थिति की तुलना एक तानाशाही व्यवस्था से की और कहा कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा है। उन्होंने लिखा, “बधाई हो, भारत में उत्तर कोरिया पैदा हो गया…”

पत्रकार ममता त्रिपाठी ने भी इस मामले पर चिंता जताई और आरोप लगाया कि मीडिया इंडस्ट्री पर नियंत्रण किया जा रहा है। उन्होंने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “क्या लाला जी अब UNI पर भी कब्जा कर लेंगे? आज दिल्ली पुलिस ने UNI के दफ्तर पर छापा मारा!! पूरे न्यूज इंडस्ट्री को अपनी मुट्ठी में कर रखा है।”

इसी तरह पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना की और सामने आए दृश्य को परेशान करने वाला बताया। उन्होंने लिखा, “दिल्ली पुलिस ने UNI पर छापा मारा है। ‘द स्टेट्समैन’ अखबार भी इसी समूह का हिस्सा है। यह शर्मनाक दृश्य है।”

वहीं एक अन्य पत्रकार नमिता शर्मा ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि सिस्टम खुद मीडिया को निशाना बना रहा है। उन्होंने लिखा, “कोई गोली से मरता है, कोई भूख से… तो कोई सिस्टम से मरेगा, सब मरेंगे, दिल्ली पुलिस द्वारा UNI न्यूज पर रेड… मीडिया के लिए साफ संदेश है, जो चाटेगा, वो काटा जाएगा। आज UNI की बारी है, कल आपकी होगी, चापलूसी करने वाली पत्रकारिता ने भ्रष्ट सरकारों को महान बना दिया है…”

राजनीतिक नेताओं ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी। पी संतोष कुमार ने इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताया।

इसी बीच गुजरात के एक अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता सरल पटेल ने इस कार्रवाई को अघोषित आपातकाल जैसा बताया और अधिकारियों पर सख्ती से काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “मोदी बीजेपी सरकार के पिछले 12 सालों के अघोषित आपातकाल की एक झलक है यह। भारत की सबसे पुरानी न्यूज एजेंसी UNI के दफ्तर पर दिल्ली पुलिस ने ऐसे छापा मारा और सील कर दिया, जैसे किसी आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई हो रही हो। कर्मचारियों को अपना सामान तक लेने का समय नहीं दिया गया। यह प्रेस की आजादी पर खुला हमला है!”

इन प्रतिक्रियाओं ने इस नैरेटिव को और हवा दी है कि प्रेस की आजादी खतरे में है। हालाँकि, कुछ अन्य लोगों का मानना है कि इस तरह के बयान बिना पूरे कानूनी और न्यायिक संदर्भ को समझे अनावश्यक घबराहट और डर का माहौल पैदा कर रहे हैं।

कार्रवाई की वजह क्या थी? कानूनी बैकग्राउंड

इस पूरे विवाद के केंद्र में UNI और सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) के बीच लंबे समय से चला आ रहा जमीन का विवाद है, जो आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आता है।

यह संपत्ति केंद्रीय दिल्ली के 9 रफी मार्ग पर स्थित है और इसे बेहद कीमती सार्वजनिक जमीन माना जाता है। UNI को यह जमीन कई दशक पहले इस साफ शर्त के साथ दी गई थी कि वह तय समय के भीतर यहाँ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के साथ मिलकर एक संयुक्त कार्यालय भवन बनाएगा।

लेकिन सरकार और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, यह शर्त कभी पूरी नहीं की गई। अपने हालिया आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने UNI के खिलाफ कड़ी टिप्पणियाँ कीं। न्यायमूर्ति सचिन दत्त ने कहा कि संगठन ने वर्षों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी किए बिना ही कीमती सार्वजनिक जमीन पर कब्जा बनाए रखा।

अदालत ने कहा, “इस मामले के तथ्य दिखाते हैं कि एक ऐसी स्थिति बनी हुई थी, जहाँ एक लाइसेंसी ने दशकों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं और कीमती सार्वजनिक जमीन को जैसे बंधक बनाकर रखा।”

अदालत ने आगे कहा कि इस तरह का व्यवहार “सार्वजनिक जमीन के आवंटन की व्यवस्था की बुनियाद पर चोट करता है” और यह निष्कर्ष निकाला कि “आवंटन रद्द किया जाना पूरी तरह सही और कानूनी रूप से अनिवार्य था।”

दशकों से नियमों का पालन न करना और डेडलाइन चूकना

यह मामला नया नहीं है, बल्कि 45 साल से भी ज्यादा पुराना है। UNI को रफी मार्ग स्थित जमीन पहली बार 1979 में इस योजना के साथ दी गई थी कि यहाँ कई मीडिया संस्थानों के लिए एक साझा ऑफिस कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा, लेकिन यह परियोजना कभी शुरू ही नहीं हो सकी।

इसके बाद 1986, 1999 और 2000 में कई बार संशोधित आवंटन पत्र जारी किए गए, जिनमें हर बार भवन निर्माण की शर्त दोहराई गई। इसके बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हुई। यहाँ तक कि 2012 में निर्माण की मंजूरी मिलने के बाद भी परियोजना ठप ही रही।

साल 2023 में, कारण बताओ नोटिस जारी करने और संतोषजनक जवाब न मिलने के बाद, L&DO ने लीज की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए आवंटन रद्द कर दिया। UNI ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि “45 साल से अधिक समय तक लगातार काम न करने” को इस आधार पर माफ नहीं किया जा सकता कि अब संगठन कार्रवाई करने को तैयार है।

इस बीच UNI की आर्थिक समस्याओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया। एजेंसी दिवालियापन प्रक्रिया से गुजरी और 2025 में द स्टेट्समैन लिमिटेड ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार का तर्क था कि इस स्वामित्व परिवर्तन से आवंटी की प्रकृति बदल गई, क्योंकि यह जमीन मूल रूप से एक गैर-लाभकारी संस्था को दी गई थी, न कि किसी निजी व्यावसायिक संगठन को।

न्यायालय ने जनहित पर जोर दिया

अदालत ने एक और अहम बिंदु यह उठाया कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। जिस जमीन की बात हो रही है, उसकी कीमत करीब 409 करोड़ रुपए आंकी गई है, जिससे यह एक बहुत ही कीमती सार्वजनिक संसाधन बन जाती है।
अदालत ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक जमीन को निजी संपत्ति की तरह नहीं माना जा सकता। उसने कहा, “सार्वजनिक जमीन को ऐसे किसी डिफॉल्टर लाइसेंसी के पास बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता, जिसने उस उद्देश्य को ही पूरा नहीं किया, जिसके लिए लाइसेंस दिया गया था।”
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए जमीन आवंटन की शर्तों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इस तरह की लंबी देरी और दुरुपयोग न हो।

सरकार की भूमिका: हाई कोर्ट के आदेश को लागू करना

इस पूरे विवाद में एक बड़ा सवाल यह भी है कि सरकार ने यह कार्रवाई अपने स्तर पर की या फिर सिर्फ अदालत के निर्देशों का पालन किया। घटनाक्रम को ध्यान से देखने पर लगता है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद की गई, जिसमें साफ तौर पर अधिकारियों को “तुरंत जमीन का कब्जा लेने” के लिए कहा गया था।
पुलिस अधिकारियों ने भी कहा है कि उनकी भूमिका केवल खाली कराने की प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा देने तक सीमित थी। यह पूरी कार्रवाई L&DO के समर्थन में की गई, जो सरकारी जमीन के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार की कार्रवाई मनमानी नहीं, बल्कि अदालत के निर्देशों के अनुरूप दिखाई देती है।

मामला कानूनी कार्रवाई का है, प्रेस की आजादी का नहीं

UNI विवाद ने एक बार फिर प्रेस की आजादी को लेकर बहस को सुर्खियों में ला दिया है। जहाँ कुछ एक्टिविस्ट और पत्रकार इस घटना को मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, वहीं कानूनी रिकॉर्ड एक ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करता है।
यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई, बल्कि जमीन के इस्तेमाल को लेकर दशकों पुराने विवाद का नतीजा है। दिल्ली हाईकोर्ट की विस्तृत टिप्पणियाँ बताती हैं कि UNI लगातार अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रहा।
साथ ही, सरकार एक इम्प्लीमेंटेशन एजेंसी के रूप में अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होती है। ऐसे निर्देशों को नजरअंदाज करना शासन और कानून के राज पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
जहाँ एक ओर प्रेस की आजादी को लेकर चिंताएँ किसी भी लोकतंत्र में अहम होती हैं, वहीं कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक नैरेटिव के बीच फर्क करना भी उतना ही जरूरी है। इस मामले में उपलब्ध तथ्यों से यही संकेत मिलता है कि UNI के खिलाफ की गई कार्रवाई एक न्यायिक फैसले पर आधारित थी, न कि मीडिया पर किसी स्वतंत्र कार्रवाई का हिस्सा।
हालाँकि, इस घटना ने साफ तौर पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया है और मीडिया की आजादी, सरकारी कार्रवाई और जवाबदेही को लेकर चर्चा आने वाले दिनों में जारी रहने की संभावना है।