आयकर की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से दिमागी नक्सलियों के नेटवर्क की परतें खुलीं, GenZ की वायरल रील ने भी खोली पोल

विदेशी भीख पर देश में माहौल करने की जो कोशिश हो रही है, समय आ गया है हर देशप्रेमी को इनसे होशियार रहने की जरुरत है और जरुरत पड़ने पर पुलिस की सहायता करनी चाहिए। CAA से लेकर अब कॉकरोचों के हुए प्रदर्शन में सभी ने देखा कि किस तरह आन्दोलनजीवियों को खाना सप्लाई किया जा रहा था, जबकि झाड़खंड में भी छात्र प्रदर्शन/धरना दे रहे थे लेकिन वहां कोई दानवीर नहीं पहुंचा, क्यों? मतलब साफ है बीजेपी शासित राज्यों में तिल का ताड़ बनाकर अशांति फैलानी है। सरकार और पुलिस तो अपना काम कर रहे हैं लेकिन जनता को ऐसे लोगों से होशियार रहने की जरुरत है।    

आयकर विभाग ने एक बार फिर देशव्यापी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शुरू की है। इससे पहले आयकर विभाग ने नोटबंदी के समय काले धन को बाहर निकालने के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शुरू की थी। इस बार निशाने पर वे कंपनियां हैं जो अपने आयकर रिकॉर्ड में या तो बहुत कम कारोबार दिखा रही हैं, अथवा कोई वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि नहीं दिखातीं, लेकिन इसके बावजूद बहुत बड़ी रकम विदेश भेज रही हैं। विभाग को इन विदेशी प्रेषणों और घोषित कारोबार के बीच स्पष्ट असंगति मिली है। दरअसल, ये वो दिमागी नक्सली हैं, जो देश में रहकर भी देश के साथ गद्दारी करने में लगे हुए हैं। आयकर विभाग ने ऐसे ही दिमागी नक्सलियों के खिलाफ देशव्यापी वैरीफिकेशन एक्सरसाइज की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार अलग डेटा-विश्लेषण में 6,422 नई पहचानी गई संस्थाओं से कुल 1.29 लाख करोड़ रुपए के विदेशी भुगतान का ट्रेल सामने आया है। प्राथमिक जांच में लगभग 394 संस्थाओं को सत्यापन के दायरे में लिया गया है। इनमें 117 संस्थाएं उन राज्यों में स्थित हैं जो भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमि सीमाओं से लगे हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 36 पेशेवरों, विशेष रूप से उन लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में है, जिन्होंने विदेशी भुगतान से जुड़े प्रमाणपत्र जारी किए।

दिमागी नक्सलियों से सावधान रहने की जरूरत- पीएम मोदी
‘दिमागी नक्सल’ कोई संगठन नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 15 अगस्त 2026 के लाल किले के भाषण में इस्तेमाल किया गया राजनीतिक और वैचारिक शब्द है। पीएम मोदी ने हथियारबंद नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के संदर्भ में कहा कि अब समाज में ऐसी नक्सली मानसिकता रखने वालों को पहचानने और अलग-थलग करने की जरूरत है, जो अराजकता या देश की एकता के विरुद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने आगाह किया कि भले ही हथियारबंद नक्सली चले गए हैं, लेकिन ‘दिमागी नक्सली’ (माओवादी और देश विरोधी सोच रखने वाले लोग) अभी भी मौजूद हैं और वे लगातार मौके की तलाश में रहते हैं। इसके बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने दिमागी नक्सली की व्याख्या करते हुए कहा कि ये वो लोग हैं, जो माओवाद का समर्थन करते हैं और संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं या अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं, अथवा ‘चिकन नेक’ के जरिए पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात करते हैं।

समझते हैं कि दिमागी नक्सली कौन हैं और इनके खतरनाक मंसूबे क्या हैं…

विदेश जा रहे 1.29 लाख करोड़ रुपए और कागजों पर गायब कारोबार
इस बीच आयकर विभाग ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से दिमागी नक्सलियों के संदिग्ध नेटवर्क की परतें खोली हैं। देश की अर्थव्यवस्था जब दुनिया की बड़ी और तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रही है, तब देश की कमाई को संदिग्ध रास्तों से बाहर ले जाने की दिमागी नक्सलियों की कोशिशें केवल कर चोरी का मामला नहीं रह जातीं। यह उस आर्थिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार और देश से गद्दारी है, जिसमें करोड़ों ईमानदार करदाता अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे समय में आयकर विभाग की देशव्यापी सत्यापन कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें सवाल केवल इस बात का नहीं है कि कितना पैसा विदेश गया, बल्कि यह भी है कि किसके पास से गया, किस कारोबार के नाम पर गया, किसे गया और उसके पीछे वास्तविक आर्थिक गतिविधि थी भी या नहीं। ताजा जांच में 1.29 लाख करोड़ के विदेशी भुगतान का बड़ा ट्रेल सामने आया है, जबकि 394 संस्थाएं कार्रवाई के दायरे में हैं।

फ्रेट, सॉफ्टवेयर आयात और कंसल्टेंसी के नाम पर हो रहा खेल
आयकर विभाग के प्रारंभिक मैदानी सत्यापन में कई ऐसी दिमागी नक्सली संस्थाओं की पहचान हुई, जिनका घोषित कारोबार बेहद छोटा था या जिन्होंने आयकर रिटर्न तक दाखिल नहीं किया था। इसके बावजूद उनके माध्यम से विदेशों में बड़ी रकम भेजी गई। सबसे बड़ा सवाल यहीं पैदा होता है कि यदि किसी कंपनी का घोषित कारोबार मामूली है, तो उसके विदेशी भुगतान इतने बड़े कैसे हो गए? विभाग के अनुसार कई मामलों में घोषित टर्नओवर और विदेश भेजी गई रकम के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं दिखा। विदेशी भुगतान अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। भारतीय कंपनियां वैध रूप से माल आयात करती हैं, सॉफ्टवेयर खरीदती हैं, कंसल्टेंसी सेवाएं लेती हैं और विदेशों में अन्य कारोबारी भुगतान करती हैं। समस्या तब शुरू होती है जब लेन-देन का घोषित उद्देश्य, कंपनी की वास्तविक गतिविधि और भुगतान की रकम आपस में मेल न खाएं। आयकर विभाग ने ऐसे मामलों में फ्रेट भुगतान, सॉफ्टवेयर आयात और कंसल्टेंसी जैसी बताई गई वजहों और वास्तविक रकम के बीच असंगति पाई है।

वास्तविक पते पर कारोबारी गतिविधियों का कोई अता-पता ही नहीं
इनकम टैक्स विभाग की जांच का एक और गंभीर पहलू सामने आया है। जब जांच की गई तो पता चला कि वास्तविकता में कुछ संस्थाएं उन पतों पर संचालित ही नहीं हैं, जो उनके सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है। यानी कागजों पर कंपनी मौजूद, बैंकिंग चैनल मौजूद, विदेशी भुगतान मौजूद है, लेकिन जिस पते पर उसका कारोबार होना चाहिए, वहां वास्तविक कारोबारी गतिविधि का कोई अता-पता ही नहीं है। यदि आगे की जांच इन आशंकाओं को प्रमाणित करती है, तो यह केवल टैक्स चोरी का मामला नहीं, बल्कि फर्जी कारोबारी संरचनाओं के इस्तेमाल से धन स्थानांतरण की संभावित बड़ी कहानी बन सकता है। प्रारम्भिक जांच में 394 संस्थाओं का आंकड़ा इस कार्रवाई की शुरुआत का महत्वपूर्ण संकेत है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार आयकर जांच में 6,422 नई पहचानी गई संस्थाओं द्वारा 1.29 लाख करोड़ विदेश भेजे जाने का ट्रेल सामने आया है। इनमें से 394 फर्मों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है और व्यापक नेटवर्क में कंपनियों तथा व्यक्तियों की भूमिका भी जांची जा रही है। इसका अर्थ है कि सत्यापन की परतें खुलने के साथ दायरा बढ़ सकता है।

चीन समेत पांच प्रमुख देशों में गई 1.29 लाख करोड़ की रकम
विदेशों में भेजी गई इतनी धनराशि की जांच में कई गंभीर तथ्य भी सामने आए हैं। Economic Times के अनुसार कुल 1.29 लाख करोड़ रुपए में से 72.3 प्रतिशत धनराशि पांच प्रमुख देशों चीन, सिंगापुर, यूएई, हांगकांग और मॉरीशस भेजी गई है। अकेले सिंगापुर को 41,885 करोड़, UAE को 18,331 करोड़ और हांगकांग को 18,064 करोड़ भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका भौगोलिक दायरा है। करीब 117 संस्थाएं उन राज्यों में स्थित हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सीमावर्ती राज्य की हर संस्था संदिग्ध है; बल्कि आयकर विभाग ने वहां स्थित उन संस्थाओं को भी सत्यापन में शामिल किया है, जिनसे बड़े विदेशी भुगतान जुड़े पाए गए। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में वित्तीय नेटवर्क की वास्तविकता की जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ धन के अवैध प्रवाह की संभावित कड़ियों को अलग-अलग एजेंसियां गंभीरता से देखती हैं।

असल कहानी कंपनियों की नहीं, दिमागी नक्सलियों की है
इस पूरे मामले का सबसे अहम पक्ष 36 ऐसे पेशेवर हैं, जिन्हें साफ तौर पर दिमागी नक्सली कहा जा सकता है। आयकर विभाग ने उन दिमागी नक्सलियों की भूमिका भी सत्यापन के दायरे में रखी है, जिन्होंने विदेशी भुगतान से संबंधित प्रमाणपत्र जारी किए हैं। इसके साथ ही चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को Form 15CB/Form 146 जारी करते समय सावधानी बरतने की चेतावनी दी है। दरअसल, Form 15CB कोई सामान्य कागज नहीं है। इसका उद्देश्य विदेशी भुगतान की कर-देयता और संबंधित कर अनुपालन का निर्धारण करना है। आयकर विभाग के अनुसार प्रमाणपत्र जारी करने वाले अकाउंटेंट को संबंधित खातों और दस्तावेजों के आधार पर भुगतान की कर-स्थिति की जांच करनी होती है। अब यदि एक ही छोटे समूह के द्वारा बड़ी संख्या में ऐसे प्रमाणपत्र जारी किए जाने और विदेश भेजी गई रकम में संदिग्ध पैटर्न दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं कि क्या हर प्रमाणपत्र वास्तविक लेन-देन की पर्याप्त जांच के बाद जारी हुआ था?

फर्जी चैरिटेबल ट्रस्ट: सवाल पैसा भेजने का नहीं, हिसाब देने का है
किसी भारतीय कंपनी का विदेश में पैसा भेजना अपने आप में अपराध नहीं है। असली सवाल है कि क्या वह पैसा वास्तविक कारोबार के बदले गया? क्या उसके पीछे वास्तविक सेवा या वस्तु थी? क्या टैक्स कानूनों का पालन हुआ? क्या दस्तावेज सही थे? क्या जिस कंपनी ने पैसा भेजा, उसका कारोबार वास्तव में उतना था? और क्या प्रमाणपत्र जारी करने वाले पेशेवरों ने पर्याप्त जांच की? इन सवालों के जवाब ही इस पूरे ऑपरेशन की असली तस्वीर सामने लाएंगे। इस जांच का एक दूसरा सिरा कथित फर्जी चैरिटेबल ट्रस्टों के खिलाफ हुई कार्रवाई से जुड़ता है। आयकर विभाग के अनुसार एक तलाशी अभियान में ऐसे कथित फर्जी ट्रस्टों का नेटवर्क सामने आया, जिन पर फर्जी दान और योगदान के बदले accommodation entries देने के आरोप हैं। इसी व्यापक डेटा और ग्राउंड इंटेलिजेंस ने विदेशी भुगतानों की संदिग्ध श्रृंखला की ओर ध्यान खींचा है।

अब ‘मास्टरमाइंड’ दिमागी नक्सलियों तक पहुंचना होगा
गौरतलब है कि 2016 में नोटबंदी के बाद काले धन के खिलाफ आयकर कार्रवाइयों को तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने “surgical strike” कहे जाने की बात कही थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने नोटबंदी को काले धन, आतंक और ड्रग मनी के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताया था। Economic Times के मुताबिक 394 संस्थाओं की पहचान अंत नहीं, शुरुआत है। आयकर विभाग ने खुद कहा है कि ऐसे मामलों में ऑपरेशन का वास्तविक तौर-तरीका आगे की जांच से स्पष्ट होगा। इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण चरण यह जानना है कि कागजी कंपनियों के पीछे वास्तविक लाभार्थी कौन हैं? पैसा किस स्रोत से आया? किस उद्देश्य से गया ? किन विदेशी संस्थाओं तक पहुंचा और इस पूरी श्रृंखला में किसकी क्या भूमिका थी? ऐसी जांच का उद्देश्य और इसका एक बड़ा लाभ यह भी है कि इससे ईमानदारी से कारोबार करने वाली कंपनियों का भरोसा मजबूत होता है। यदि कोई कंपनी नियमों के अनुसार आयात करती है, विदेशी सेवाओं का भुगतान करती है और उसके पास हर लेन-देन का स्पष्ट दस्तावेज है, तो मजबूत सत्यापन व्यवस्था उसके लिए परेशानी नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच बन सकती है।भीख 

समाज को कहां ले जाना चाहती है न्यायपालिका?

सुभाष चन्द्र

हाल ही में कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने tution center में छात्राओं से कथित छेड़छाड़ और स्थानीय लोगों पर हमले के मामले में FIR दर्ज करने से मना करते हुए कहा कि छात्राओं से छेड़छाड़ के मामले सामान्य है और किसी विशेष घटना या पीड़िता का उल्लेख नहीं किया गया है। ऐसे में व्यापक आरोपों से संघये अपराध का पता नहीं चलता मतलब छात्राओं से छेड़छाड़ आम बात है

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चर्चित YouTuber 
 
अगस्त 20 को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है लिव-इन रिलेशनशिप शादी जैसा है, उसमे माता पिता दखल नहीं दे सकते मर्जी से शादी करने वाले बालिगों को जाति, पंथ, रंग, धर्म और आस्था से परे मान्यता दी जाती है और सामाजिक नैतिकता व पूर्वाग्रहों के कारण उनके मौलिक अधिकारों को कम करना किसी को व्यक्तिगत पहचान से वंचित करना है 

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा बालिग होने के नाते मर्जी से साथ रहने की स्थिति भी शादी जैसी ही होती है 

आप शादी करने वालों के मौलिक अधिकारों की बराबरी लिव-इन रिलेशन में रहने वालों से कैसे कर सकते हैं?

लेकिन फिर लिव-इन में रहने वाली लड़कियों को कई साल बाद बलात्कार का आरोप तो नहीं लगाना चाहिए जो आजकल अक्सर देखने को मिल रहे हैं

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुईया के पास ऐसा ही एक रेप का केस आया जिसमें लड़की ने लिव-इन रिलेशन में रहने के बाद रेप का आरोप लगाया था जजों ने कहा 'यह सहमति से होता है। हम पुराने जमाने के हो सकते हैं, लेकिन शादी से पहले लड़का और लड़की बिल्कुल अजनबी होते हैं। उन्हें शादी से पहले फिजिकल रिलेशनशिप बनाने में सावधानी बरतनी चाहिए जिस महिला की बात हो रही है, वह शख्स के साथ दुबई जाने के लिए कैसे मान गई, जहां दोनों के बीच फिजिकल रिलेशनशिप बने? ये द्वापर युग नहीं जहां तथाकथित गंधर्व विवाह करने वाली शकुंतला को महलों में प्रवेश मिल जाए और उसके बेटे को सिंहासन मिले  

बिना जाने कि गंधर्व कौन होते हैं आज कल अदालत लिव-इन रिलेशन को गंधर्व विवाह के समान बता देते हैं माननीय जजों को यह इल्म नहीं है कि शकुंतला ने अपना रिश्ता निभाया लेकिन आजकल के कथित गंधर्व विवाह करने वालो का एक साल का भी भरोसा नहीं कब कौन छोड़ कर चला जाए 

आजकल हर अदालत लिव-इन रिलेशन पर अपनी अपनी समझ से निर्णय दे रही हैं इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 20 मार्च, 2026  को एक फैसले में कहा “तलाक़ के बिना लिव-इन में रहना अपराध है” और उसी हाई कोर्ट ने 25 मार्च को एक अन्य फैसले में कहा कि “शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अपराध नहीं है” अब बताइए क्या सही है?

गुजरात हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि “सात फेरे की रस्म नहीं निभाई गई हैं तो सर्टिफिकेट होने के बावजूद हिंदू विवाह मान्य नहीं होगा”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्य समाज द्वारा जारी किए गए शादी के प्रमाणपत्र कानूनी और वैधानिक रूप से मान्य नहीं हैं आर्य समाज को Marriage Certificate जारी करने का अधिकार नहीं है बेशक सात फेरे ही क्यों न हो गए हों लेकिन यह नियम काजी द्वारा निकाह पढ़वाने पर लागू नहीं किये हकीकत यह है कि सनातन पद्धति पर ऊँगली उठाना आसान है लेकिन इस्लाम पर कुछ बोलने पर अदालतों में भी लगभग लकवा लग जाता है। 

एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा चाहे बच्चा पत्नी के अवैध संबंधों से पैदा हुआ हो उसका भरण पोषण पत्नी के पति को ही करना पड़ेगा एक दूसरे केस में पुरुष ने बच्चा अपना मानने से इंकार कर दिया और निजता भंग होने का आधार बना कर DNA सैंपल देने से मना कर दिया उस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता से ज्यादा जरूरी है बच्चे के पिता का पता होना

अब बताइए, जो बच्चा अवैध संबंधों से हुआ, उसका भरण पोषण बाप करेगा जबकि पता है वो उसका बच्चा नहीं है और दूसरी तरफ आप DNA टेस्ट चाहते हैं पता करने के लिए कि बच्चा अवैध है या नहीं 

विपक्ष का एक ही एजेंडा ! संसद चलने मत दो! जनता जाए भाड़ में


विपक्ष को जनता का डर नहीं लगता या जनता को मूर्ख समझ लिया है?
कुछ समय से विपक्ष का एक ही एजेंडा दिखाई दे रहा है! संसद चलने मत दो!
अरे भाई, जनता ने आपको संसद में नारे लगाने और हंगामा करने के लिए नहीं भेजा है। सरकार से सवाल है तो पूछिए, सरकार से असहमति है तो बहस कीजिए, कोई गंभीर मुद्दा है तो उसके तथ्य रखिए।
लेकिन संसद ही नहीं चलने देंगे तो फिर जनता पूछेगी।
आपको संसद में बहस करने का जनादेश मिला है या संसद को बंधक बनाने का?
दिलचस्प बात यह है कि जो लोग हर वक्त लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देते हैं, वही संसद की कार्यवाही रोकने को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि समझ रहे हैं।
शायद उन्हें लगता है कि जनता कुछ देखती-सुनती नहीं है और उसे आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है।
लेकिन अब जनता पहले वाली जनता नहीं है। वह देख रही है कि कौन काम करना चाहता है, कौन सवाल पूछना चाहता है और कौन सिर्फ हंगामा करके कैमरे में दिखना चाहता है।
अगली बार चुनाव में जनता जब हिसाब-किताब करेगी, तब शायद समझ आएगा कि संसद को ठप करना विपक्ष की जीत नहीं, जनता के भरोसे की हार है।
राहुल गांधी के अहितकारी कार्यों की लंबी फेहरिस्त
पिछले दस वर्षों में देश ने विकास के कई नए आयाम देखे हैं, लेकिन विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके समर्थक एक भी ठोस कार्य गिनाने में असमर्थ रहते हैं जो देशहित में किया गया हो, लेकिन अहित की सूची इतनी लंबी है कि एक लेख कम पड़ जाए।
पहली फेहरिस्त है - सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा पर अविश्वास। जब देश की सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके दुश्मन को सबक सिखाया, तब राहुल गांधी ने सबसे पहले सबूत मांग कर सेना के शौर्य का अपमान किया। गलवान में हमारे वीर जवानों के बलिदान के बाद भी उन्होंने सेना के बजाय चीन के नैरेटिव को मजबूत करने वाले बयान दिए। यह देश की सुरक्षा के साथ सीधा अहित है।
दूसरा बड़ा अहित है - विदेशी धरती पर भारत को बदनाम करना। लंदन, अमेरिका और यूरोप के मंचों से उन्होंने बार-बार कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, संसद में बोलने नहीं दिया जाता, अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश का वे सांसद हैं, उसी देश की छवि को विदेशों में धूमिल करना किस श्रेणी का देशहित है?
तीसरा है - हर जनहितकारी योजना का बिना वजह विरोध। चाहे वह धारा 370 हटाना हो, राम मंदिर निर्माण हो, जीएसटी हो, नोटबंदी हो, तीन तलाक पर कानून हो या CAA हो - उन्होंने हर फैसले का विरोध केवल विरोध के लिए किया, समाज में भ्रम और विभाजन फैलाया। धारा 370 हटने से जम्मू-कश्मीर में शांति आई, लेकिन कांग्रेस ने आज तक उसका समर्थन नहीं किया।
चौथा है - झूठ और भ्रम की राजनीति। राफेल जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर उन्होंने "चौकीदार चोर है" जैसा नारा दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया। बाद में उन्हें माफी तक मांगनी पड़ी। ऐसे झूठे प्रचार से देश की रक्षा सौदों की विश्वसनीयता को चोट पहुंचती है।
पांचवां है - टुकड़े-टुकड़े गैंग और अराजक तत्वों को समर्थन। JNU में देश-विरोधी नारे लगने पर वहां पहुंच कर समर्थन देना, किसानों के नाम पर हुए आंदोलन में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप पर चुप रहना, यह सब उनके राजनीतिक एजेंडे को दिखाता है।
दस साल में देश आगे बढ़ा है, पर राहुल गांधी की राजनीति वहीं अटकी है - नकारात्मकता, वंशवाद, और केवल मोदी विरोध। देशहित में एक कार्य पूछो तो सन्नाटा है, और अहित की गिनती करो तो फेहरिस्त खत्म होने का नाम नहीं लेती।
वही आंदोलन है, वही जेनजी, वही मांगे... ऊपर के आदेश से बंधे वही पुलिसवाले... लाठी भी वही, पानी की बौछारें भी वही, अश्रुगैस के गोले भी वैसे ही... अटल जी ने कहा था, "सत्ता का चरित्र लगभग एक सा ही होता है।" ठीक ही तो कहा था। पर इन सब के बीच कुछ है जो अलग है...
लाठी खाने के बाद भी बच्चे मुख्यमंत्री की मां को गाली नहीं दे रहे। पुलिस के जवानों का भद्दा मजाक नहीं उड़ाया जा रहा है। उन्हें घेर कर मारा पीटा नहीं जा रहा है। इंस्टा की रील के लिए नंगे नाचने वाले कथित इन्फ्लुएंसर अपने बाप से अधिक उम्र के किसी पुलिस वाले के ऊपर अभद्र टिप्पणियां नहीं कर रहे। क्यों? क्योंकि लड़कों ने आंदोलन में बामी अभद्रों का प्रवेश नहीं होने दिया।
आधी रात को हुए लाठी चार्ज में अनेक बच्चों की हड्डियां टूटी हैं। रांची के अस्पतालों में छात्रों की कराह गूंज रही है। उसके बाद भी कहीं गाली गलौज नहीं है, अश्लील पोस्टर नहीं हैं।
पिछले दिनों पटना में लड़कों पर पानी की बौछार हुई थी, तब वे नाच रहे थे। झारखंड वाले बच्चे भी पानी की बौछारों पर नाचने लगे थे। यह खुश होने की बात तो नहीं है पर एक हल्की मुस्कुराहट तैर गई थी। जवानी का उत्साही मन, पीड़ा में आनंद ढूंढ लेने वाला भारत भाव... सरकारों को इन बच्चों की बात सुन लेनी चाहिए। वैसे भी ये न किसी का इस्तीफा मांग रहे हैं, न मुख्यमंत्री को हटा कर खुद गद्दी पर बैठने का ख्वाब लेकर गए हैं। परीक्षा की गड़बड़ी का मामला है, बात इतनी भी बड़ी नहीं कि न सुनी जा सके।
जंतर मंतर के आंदोलन के समय उग्र हो गए वामी झारखंड के बच्चों के लिए नहीं बोलेंगे। बोलते, पर आंदोलन की डोर उनके हाथ में होती तब बोलते... आंदोलन शिक्षा से हट कर LGBTQ के विशेषाधिकारों पर, आजादी मांगने पर, पाकिस्तानी प्रेम पर, देश तोड़ने के नारे लगाने वालों के समर्थन पर, सनातन परम्पराओं को गाली देने पर होता तब बोलते... लेकिन झारखंड के बच्चों ने उनके एजेंट को खदेड़ दिया, वे अड़ गए कि यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं को केंद्र में रख कर ही होगा, फिर वे क्यों ही बोलें। उनका भी दोष नहीं, यह उनका मामला ही नहीं है।
एक प्रश्न हम जैसों से भी हो सकता है कि हम जंतर मंतर वालों के साथ नहीं थे तो इनके साथ क्यों है? इसका उत्तर बहुत सहज है। ये बच्चे भी कल उसी अभद्र भाषा पर उतर जाएं, वैसी ही गालीबाजी करने लगें तो इनके साथ भी कोई संवेदना नहीं रहेगी। वैसी भाषा जब हम अपने बच्चों की नहीं चाहते, अपने छात्रों से नहीं चाहते, तो दूसरे बच्चों की अभद्र भाषा का समर्थन कैसे कर सकते हैं?
झारखंड के बच्चों पर कल खूब लाठियां चली हैं। चलवाने वाले प्रसन्न ही होंगे। राहुल जी मंचो पर छात्रों से संवाद की नौटंकी कर रहे हैं, उनकी पुलिस निहत्थे बच्चों को लाठी से तोड़ रही है। यही राजनीति है...
केंद्र हो या राज्य, पेपर लीक और परिक्षाओं की अनियमितता माथे के कलंक जैसा है। इसका हल निकालना ही होगा... बाकी झारखंड के जेनजी को धन्यवाद कि उन्होंने विश्वास दिलाया, "देश का युवा अभद्र, अश्लील, फूहड़ नहीं है... जो थे, वे अपवाद थे।"

जनता को मूर्ख समझने की भूल मत कीजिए।  

कैसा लोकतंत्र है अमेरिका में? मोहन भागवत जी के अमेरिका जाने में भी तकलीफ हो रही है; ट्रंप और गोर कुछ बोल रहे हैं और USCIRF नफरत का एजेंडा चला रहा है

सुभाष चन्द्र 

INDI गठबंधन से लेकर विदेशों में बैठे इनके आका आरएसएस पर जो हमले कर रहे हैं, यह एक सोंची-समझी साज़िश है। गौरतलब, 1947 में भारत के टुकड़े हुए थे तब पाकिस्तान के बहुचर्चित समाचार पत्र Dawn ने लिखा था कि आरएसएस 1925 से पहले बन गया होता हिन्दुस्तान का बटवारा नहीं होता। तभी से संघ भारत विरोधियों की आँखों में घटकता रहता है। देश में किसी भी विपत्ति के आने पर ये संघ ही है जो सबसे पहले राहत कार्य में जुटता है। जबकि देश में इतने NGOs और लगभग हर पार्टी का सेवा दल है, कोई नहीं आता। सब इन सेवा दलों के नाम पर अपनी तिजोरियां भर ऐश कर जनता को गुमराह ही नहीं पागल बनाते हैं और अक्लबंध इन पार्टियों को हितकारी समझती है। वैसे इसमें हमारी मीडिया भी पीछे नहीं। जब आरएसएस के ऑफिस पर तिरंगा नहीं फहराने की बात होती है तो किसी एंकर ने माँ का दूध नहीं पिया किया कि 2014 में मोदी सरकार से पहले किसी को तिरंगा फहराने की इजाजत नहीं थी तो संघ कैसे फहराता?      

अमेरिका की एक संस्था है USCIRF (US Commission on International Religious Freedom)। उसके कमिश्नर Gene Mills और चेयरमैन Asif Mahmood ने कहा है कि 29 अगस्त को मोहन भागवत जी के न्यूयॉर्क आने के खिलाफ Sanctions लगाई जाए, उनके लिए कोई राजनयिक शिष्टाचार न दिखाया जाए और अमेरिकी अधिकारियों को उनसे न मिलने दिया जाए

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आसिफ महमूद ने कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के सदस्य हैं और RSS एक Umbrella Organization है जिसके subgroups अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करते हैं ऐसा दुष्प्रचार भारत के लिए यह संस्था अपनी हर रिपोर्ट में करती है और लगता है यही संगठन अमेरिका में यहूदियों की खिलाफ भी आंदोलन में भूमिका निभाता है Asif Mahmood नाम ही काफी है इस संगठन की RSS और हिंदुओं के प्रति नफरत समझने के लिए, वैसे भी यह व्यक्ति originally एक पाकिस्तानी है और इसलिए अंधा हुआ रहता है 

संघ प्रमुख 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर होंगे और 29 अगस्त को Madison Square में Universal Oneness Celebration वे लोगों को संबोधित करेंगे

ये कैसा लोकतंत्र है अमेरिका में कि जिसे तुम पसंद नहीं करते उसे अपने देश में आने भी नहीं दोगे? जिस मोदी पर Asif Mahmood RSS का टैग लगा रहा है, उस पाकिस्तानी हरामखोर को पता नहीं कि कल ही अमेरिका के राजदूत Sergio Gor ने जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया है और वहां की कानून व्यवस्था की प्रशंसा की है ये काम RSS सदस्य मोदी के राज में हुआ है जैसे Sergio Gor के बयान पर पाकिस्तान सुलग रहा है, वैसे ही Asif Mahmood भी सुलग रहा होगा?

उसे यह भी नहीं पता कि दो दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा की है और भारत की तरह अमेरिका में भी वोटर पहचान पत्र बना कर EVM से चुनाव कराने को कहा है

ये USCIRF POJK में पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे दमन पर खामोश है और बांग्लादेश में हुए हिंदुओं के कत्लेआम पर भी खामोश था इसे बलूचिस्तान दिखाई नहीं देता और न चीन के उइघर मुसलमान दिखाई देते इसने कभी 7 अक्टूबर, 2023 के हमास के इज़रायल पर बर्बर हमले की भी निंदा नहीं की इस संस्था को अगस्त में पाकिस्तान के भारत में आतंकी हमले की साजिश भी नज़र नहीं आई जिसे विफल कर दिया गया और 250 से ज्यादा आतंकी पकड़े गए मुझे तो लगता है अमेरिका में बैठ कर ये एक पाकिस्तानी हैंडलर का काम कर रहा है

इसे बस भारत में मुस्लिमों की हालत ख़राब नज़र आती है जबकि RSS का सदस्य प्रधानमंत्री मोदी बिना किसी भेदभाव मुस्लिमों को सभी सुविधाएं दे रहा है

इस संगठन की बातों को हलके में नहीं लेना चाहिए क्योंकि यह अमेरिकी सरकार की संस्था है और सरकार के दिमाग में भारत और इज़रायल के लिए जहर घोलती है इस संस्था का नजरिया अमेरिका के Democrats का लगता है

अगर मोहन भागवत जी के आने पर आपत्ति है तो फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अमेरिका में मत आने दिया करो क्योंकि वह भी तो उसी RSS का सदस्य है जिसके प्रमुख मोहन भागवत हैं 

कांग्रेस राज में हिमाचल दिवालिया! पहली बार बजट में कटौती और कर्ज 1 लाख करोड़ पार, IAS,IPS,IFS अधिकारियों को वेतन देने के पैसे नहीं

हिमाचल प्रदेश में सत्ता बदलने पर बीजेपी के सत्ता में आने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी सरकारी कर्मचारियों और बिकाऊ लोगों को जमाकर सरकार के खिलाफ हंगामा करवाएंगे। कोई अक्ल का अंधा ये नहीं देख रहा कांग्रेस कितना नुकसान कर रही है। इस समय मजा आ रहा है और बीजेपी गवर्नमेंट बनने पर चिल्लाएंगे हमारे घर का चूल्हा नहीं जल रहा। जनता को उन आन्दोलनजीवियों से सावधान रहने की जरुरत है।  

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने राज्य को दिवालिया बना दिया है। वित्तीय कुप्रबंधन, मुफ्त की योजनाओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के चुनावी वादों (‘रेवड़ी कल्चर’) के कारण राज्य का खजाना खाली हो गया है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि सरकार को मंत्रियों और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है, जिसकी वजह से कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए कांग्रेस की सुक्खू सरकार तरह तरह के हथंकडे अपना रही है। अब सरकार ने राज्य में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और भारतीय वन सेवा (IFS) के काडर की स्वीकृत संख्या को कम करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का निर्णय लिया है, ताकि प्रशासनिक खर्चों और भारी भरकम प्रशासनिक तंत्र के बोझ को कम किया जा सके।

खर्च में कटौती का नया हथकंडा, कैडर कटौती का प्रस्ताव

आईएएस (IAS) पद: स्वीकृत संख्या 153 से घटाकर 130 करने का प्रस्ताव, (यानी 23 अधिकारियों की कमी)

आईएफएस (IFS) पद: स्वीकृत संख्या 118 से घटाकर 83 करने का प्रस्ताव, (यानी 35 अधिकारियों की कमी)

आईपीएस (IPS) पदों की संख्या में भी कटौती पर विचार, फिलहाल 96 IPS पद

सुक्खू ने बनाया अवश्यकता से अधिक अधिकारियों का बहाना 
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य सरकार के मुफ्त की योजनाओं में कटौती की जगह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या में कमी करने का फैसला लिया है। उन्होंने दलील दी है कि IAS, IPS और IFS के बहुत अधिक पद हिमाचल प्रदेश में है। इतने अधिक अधिकारियों की हिमाचल प्रदेश को जरूरत नहीं है। हिमाचल प्रदेश में 153 IAS अफसर हैं। हमने IAS कैडर को 153 से 130 करने की कोशिश की है। मेरा विचार इसे 110 करना है लेकिन पहले 130 किया है। इससे सरकार के राजस्व खर्चे में 100-150 करोड़ की कमी आई है। बड़े कैडर को बनाए रखने पर राज्य को हर साल करीब 200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुनने की इजाज़त देती रहेगी और उन्हें तुरंत जाने की मंजूरी भी देगी।

 

जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा प्रस्ताव
अधिकारियों के मुताबिक, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या कम करने का एक औपचारिक प्रस्ताव जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। अभी 20 से ज्यादा आईएएस अधिकारी और 12 से ज्यादा आईपीएस और आईएफएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं, जिनमें से कुछ राज्य में गैर संवर्ग पदों पर हैं। हिमाचल की सुक्खू सरकार ने केंद्र सरकार से अपील करने का फैसला किया है कि केंद्र सरकार राज्य को और ज्यादा केंद्रीय सेवा अधिकारी आवंटित न करे, क्योंकि अनुमान है कि हर अधिकारी पर सालाना खर्च 40 से 50 लाख रुपये के बीच होता है जिसमें वेतन, महंगाई भत्ता, उनसे जुड़े कर्मी और दूसरी सुविधाएं शामिल हैं।

नई भर्ती और नया काम नहीं, 30% संस्थानों को बंद करने का सुझाव
फरवरी 2026 में सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वित्त विभाग से एक प्रेजेंटेशन तैयार करने को कहा था। उस प्रेजेंटेशन में हिमाचल के खजाने की सारी स्थितियों को स्पष्ट करने के लिए कहा था। प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवीर के प्रजेंटेशन में कहा था कि कोई नई भर्ती की स्थिति में सरकार नहीं है। मौजूदा स्थिति में जो स्टाफ है, उसी का युक्तिकरण करना होगा, जो संस्थान हैं, उनमें से 30 फीसदी बंद किए जाएं, कोई भी नए काम शुरू करने की स्थिति में सरकार नहीं है। हिमाचल की स्थिति ये है कि नया पे-स्केल तो छोड़ दें, हम पे-रिवीजन का भी नहीं सोच सकते। एचआरटीसी को कोई सब्सिडी नहीं दे पाएंगे। पानी-बिजली के बिल चार्ज करने की सलाह है। एमआईएस की सब्सिडी भी जीरो करनी पड़ेगी।

अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का 20-30% छह महीने के लिए स्थगित  
वित्त विभाग द्वारा अप्रैल 2026 में जारी एक अधिसूचना के अनुसार, वित्तीय संसाधनों के कुशल प्रबंधन के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा छह महीने के लिए स्थगित कर दिया गया। ये कटौती 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगी। अधिसूचना के अनुसार, यह स्थगन मई 2026 से प्रभावी हुआ। मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों, पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के वेतन का तीस प्रतिशत स्थगित किया गया। इसके अलावा सचिवों, विभागाध्यक्षों, पुलिस महानिरीक्षकों, उप पुलिस महानिरीक्षकों, पुलिस अधीक्षकों, एसपी स्तर तक के पुलिस अधिकारियों, मुख्य वन संरक्षकों, वन संरक्षकों और जिला वन अधिकारी स्तर तक के अन्य वन अधिकारियों के वेतन का बीस प्रतिशत स्थगित कर दिया गया।

कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित, सोशल मीडिया में तंज 
हिमाचल प्रदेश में इस समय कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित है। यदि सारा डीए देना हो तो सरकार के खजाने में करीब दस हजार करोड़ रुपए की रकम इसी मद में चाहिए। गौरतलब है कि
केंद्र सरकार के कर्मचारी 60% डीए पा रहे हैं, जबकि हिमाचल के कर्मचारियों को 45% ही मिल रहा है। फिर कर्मचारी एक्ट खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीनियोरिटी से उपजे वित्तीय लाभ भी करीब-करीब इतने ही होंगे। यानी इन दो मदों में ही 20 हजार करोड़ रुपए चाहिए। यदि चरणबद्ध तरीके से भी भुगतान किया जाए तो भी सरकार को कुछ न कुछ अतिरिक्त इंतजाम करना होगा। वहीं हिमाचल सर्व अनुबंध कर्मचारी संघ ने 15 अगस्त,2026 से पहले सोशल मीडिया में पोस्ट करते हुए लिखा, ‘क्या 15 अगस्त को हिमाचल के कर्मचारियों को डीए मिल जाएगा? आप सबको कितनी उम्मीद है’ इसके जवाब में नसीब सैनी ने लिखा ‘ओपीएस मिल गई…डीए भूल जाओ’ 

15 अगस्त को भी कर्मचारियों के उम्मीदों पर फिरा पानी
15 अगस्त,2026 के आगमन से पहले ही सोशल मीडिया पर कर्मचारी ग्रुप्स में डीए व एरियर को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं थीं। कुछ को उम्मीद थी कि कम से कम तीन फीसदी की किश्त मिल जाएगी, लेकिन बहुत से लोग ये मान कर चल रहे थे कि डीए की घोषणा नहीं होगी। न्यू पेंशन स्कीम कर्मचारी महासंघ के नेता राजिंद्र मन्हास ने कर्मचारियों से सवाल किया था कि कितने साथियों को मेरी तरह लगता है कि डीए की घोषणा नहीं होगी? उसमें कमेंट बॉक्स में अधिकांश का मत यही था कि डीए मिलने के आसार न के बराबर हैं। जैसे ही 15 अगस्त को सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का संबोधन खत्म हुआ, सोशल मीडिया कर्मचारियों के तंज से भर गया।

खजाना खाली, डीए फ्रीज करने और OPS की जगह UPS का सुझाव
प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवरी 2026 के प्रेजेंटेशन में सभी आंकड़ों को स्पष्ट करते हुए राज्य सरकार को सलाह दी थी कि अभी स्थिति ऐसी है कि डीए फ्रीज करना होगा और एरियर की देनदारी संभव नहीं है। यही नहीं, ओपीएस की जगह यूपीएस का विकल्प देखने की बात भी देवेश कुमार ने कही थी। देवेश कुमार ने याद दिलाया कि ओपीएस जब लागू की थी तो हिमाचल को 1800 करोड़ रुपए के एडिशनल लोन की कटौती का सामना करना पड़ा था। देवेश कुमार ने प्रेजेंटेशन में बताया था कि कर्मचारियों व पेंशनर्स के लिए पिछले वेतन आयोग के एरियर का 8500 करोड़ रुपए बकाया है। इसके अलावा पांच हजार करोड़ रुपए का डीए व डीआर एरियर बकाया है, सरकार ये नहीं दे पाई है। वित्त सचिव ने इसी दौरान टिप्पणी की-सर, मैं यहां कहना चाहूंगा कि ये रकम हम दे भी नहीं पाएंगे। क्योंकि हमारे पास धन ही नहीं है। इसके साथ ही आगे भी डीए व डीआर देने की स्थिति में नहीं है। 

इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती 
फरवरी में प्रधान वित्त सचिव ने अपनी प्रेजेंटेशन में खजाने की दयनीय हालत का वर्णन किया और फिर मार्च महीने में सुक्खू सरकार के बजट में उसका असर दिख गया। हिमाचल के इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती की गई। गौरतलब है कि इस बार वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सीएम सुक्खू ने 54,928 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। जबकि पिछली बार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 58,514 करोड़ का बजट था। इस हिसाब से ये अंतर 3586 करोड़ रुपये का था। यही नहीं, सीएम, कैबिनेट मिनिस्टर्स व अफसरों-कर्मियों की सेलेरी भी स्थगित (डेफर) की गई।

इतिहास में पहली बार कर्ज 1 लाख करोड़ के पार 
हिमाचल सरकार की बजट रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक हिमाचल प्रदेश की कुल देनदारियां 1 लाख 4 हजार 410 करोड़ रूपए तक पहुंच गई हैं, जो राज्य के इतिहास में पहली बार 1 लाख करोड़ के पार गई। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा 96 हजार 522 करोड़ रूपए था, जिससे साफ है कि कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में राज्य का सार्वजनिक कर्ज भी बढ़कर 75 हजार 554 करोड़ रुपये हो गया है, जबकि एक साल पहले यह 70 हजार 369 करोड़ था। वर्ष 2024–25 के दौरान सरकार ने 26 हजार 622 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया और 18 हजार 168 करोड़ की अदायगी की, जिससे कुल कर्ज में शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई। कैग (Comptroller and Auditor General of India) की रिपोर्ट के अनुसार कुल राजस्व का लगभग 79% केवल वेतन, पेंशन, और कर्ज के ब्याज के भुगतान में चला जाता है।

हिमाचल प्रदेश पर कैसे बढ़ा कर्ज का बोझ?

पुरानी पेंशन योजना (OPS) :  पुरानी पेंशन योजना (OPS) को पुनः लागू करने के कारण राज्य सरकार के बजट पर अतिरिक्त वार्षिक वित्तीय बोझ पड़ा है, जिससे प्रतिबद्ध देनदारियां बढ़ गई हैं। ओपीएस बहाल होने से राज्य के लगभग 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ मिला, लेकिन कैग (CAG) और रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में पेंशन का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। 

महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह : राज्य की लाखों महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने के वादे से सरकारी खजाने पर सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। सीमित राजस्व संग्रह के कारण इस योजना को पूरी तरह लागू करने में सरकार को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

मुफ्त बिजली और पानी : राज्य में घरेलू उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली और ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ्त पानी देने से राज्य बिजली बोर्ड (HPSEB) और जल शक्ति विभाग का घाटा काफी बढ़ गया। सब्सिडी का भुगतान समय पर न होने से इन बोर्डों की वित्तीय स्थिति चरमरा गई।

कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी:  कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी योजनाओं ने भी राज्य के बजट में गैर-उत्पादक व्यय (Non-Developmental Expenditure) को बढ़ाया।

वेतन, पेंशन और सब्सिडी पर बढ़ते खर्च :  राजस्व स्रोत सीमित होने के कारण, राज्य इन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए उधार पर तेजी से निर्भर हो गया है। प्रदेश का सालाना वेतन और पेंशन का भुगतान लगभग 27,000 करोड़ रुपये है, जबकि अपने स्रोतों से कुल राजस्व करीब 18,000 करोड़ रुपये ही आता है।

आंतरिक आय के साधन सीमित : पर्यटन, जलविद्युत और कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण राज्य के आंतरिक आय के साधन सीमित हैं, जबकि कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों का दबाव लगातार बना हुआ है।

बढ़ता बजट घाटा (Budget Deficit) : हिमाचल सरकार की सलाना आय – 42 हजार करोड़ रुपये, सलाना खर्च – 48 हजार करोड़ रुपये और हर साल 6000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट घाटा।

हिमाचल में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का खटाखट मॉडल बना खटारा मॉडल


हिमाचल प्रदेश का आर्थिक संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। इसको ठीक करने के गंभीर प्रयास की जगह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सिर्फ केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ कर अपने जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया में लिखा कि हिमाचल प्रदेश में राहुल गांधी जी व प्रियंका गांधी जी का खटाखट मॉडल अब खटारा मॉडल बन चुका है।

हिमाचल में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राज्य सरकार की तरफ़ से की गई सेस के माध्यम से बढ़ोत्तरी आम आदमी की जेब पर हमला है। जब से कांग्रेस सरकार आई है, जनता की जेब पर लगातार अतिरिक्त भार ही डाल रही है। कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के महज दो महीनों में ही वैट में लगातार वृद्धि की गई, डीजल पर वैट बढ़ाकर 10.40 रुपए कर दिया गया… उसके बाद अतिरिक्त 5 रुपए का सेस भी लगाया गया।

ये हिमाचल के इतिहास की सबसे विफल सरकार है जिसने प्रदेश के हर वर्ग को सिर्फ़ ठगने और जनता पर महंगाई का बोझ डालने का काम किया है। पहले पेट्रोल, डीजल, बस किराए व सीमेंट के दामों में बढ़ोत्तरी के बाद अब फिर एक बार पेट्रोल डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी करके हिमाचलवासियों की परेशानी बढ़ाने व उन पर आर्थिक बोझ लादकर उनका मासिक बजट खराब कर दिया है। आज हिमाचल में ट्रक ड्राइवर, किसान, व्यापारी व आम आदमी पेट्रोल और डीजल की इस बढ़ी कीमत से कराह रहे हैं, मगर यह सरकार बेसुधी की चादर ताने सो रही है।