झूठ और अफवाह के उस्ताद केजरीवाल: अब फैलाया हवा में फ्लाइट बंद होने का डर!

अरविन्द केजरीवाल लोगों में ग़लतफ़हमी फैलाकर आखिर क्या साबित करना चाहता है? आखिर झूठ की हद होती है। सियासत करनी है तो मुद्दों पर क्यों नहीं की जाती, विदेशी फंडिंग पर ये गन्दा खेल कब तक खेला जाता रहेगा? अपनी गिरती साख को बचाने कॉकरोचों को ले आए। लेकिन इसका नुकसान बीजेपी को नहीं विपक्ष को होगा। झूठ बोलकर पहले कांग्रेस के वोट पर डाका मारा और अब झूठ और उपद्रव कर अपने साथ सारे विपक्ष को चारों खाने चित करने जा रहे हो। 

आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक करियर तथ्यों से परे सनसनीखेज दावों और मनगढ़ंत आरोपों पर टिका रहा है। राजनीति में शुचिता और बदलाव का वादा लेकर आए केजरीवाल ने समय-समय पर जनमानस में भय, भ्रम और अराजकता फैलाने के लिए कई भ्रामक बयान दिए हैं।

विमान सुरक्षा से लेकर महामारी नियंत्रण और रोजगार के आंकड़ों तक, केजरीवाल का हर बड़ा प्रशासनिक व राजनीतिक दावा केवल सुर्खियों में रहने का स्टंट साबित हुआ है। तथ्य-जांच और कानूनी कार्यवाहियों के सामने जब भी इन दावों की पोल खुली, तो सच्चाई सामने आते ही जनता के सामने उनके झूठ बेनकाब हुए।

 हवा में फ्लाइट बंद होने का मनगढ़ंत डर

केजरीवाल ने 6 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि केंद्र सरकार एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) में एथेनॉल मिलाने जा रही है, जिससे विमानों के इंजन हवा में बंद हो सकते हैं। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और केंद्रीय मंत्री के. राम मोहन नायडू ने इस दावे को पूरी तरह से भ्रामक और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया। सरकार ने स्पष्ट किया कि ATF में एथेनॉल मिलाने का कोई प्रस्ताव नहीं है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों के तहत सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे  
केजरीवाल ने 3 अक्टूबर 2016 को एक वीडियो संदेश जारी करते हुए भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के दावों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत सार्वजनिक करने की मांग की थी। उनके इस बयान को पाकिस्तान के मीडिया और राजनेताओं द्वारा भारत के खिलाफ ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिसकी देश भर में कड़ी आलोचना हुई थी।
विधानसभा में फर्जी मशीन से EVM हैकिंग का नाटक
केजरीवाल ने 9 मई 2017 को दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में धांधली और हैकिंग का सार्वजनिक प्रदर्शन करवाया था। चुनाव आयोग (ECI) ने उसी दिन इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जिस मशीन पर प्रदर्शन किया गया था, वह चुनाव आयोग की असली EVM नहीं बल्कि केवल उसकी तरह दिखने वाला एक खिलौना या डुप्लीकेट गैजेट था। आयोग ने इसे जनता को भ्रमित करने वाला स्टंट करार दिया था।
‘सिंगापुर स्ट्रेन’ का सनसनीखेज और काल्पनिक दावा
केजरीवाल ने 18 मई 2021 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के माध्यम से दावा किया कि सिंगापुर में कोरोना का एक नया और बेहद खतरनाक स्ट्रेन आया है, जो बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से सिंगापुर की सभी उड़ानें तुरंत रद्द करने की मांग कर दी। इस बयान पर सिंगापुर सरकार और भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ा ऐतराज जताया और साफ किया कि सिंगापुर में ऐसा कोई नया स्ट्रेन नहीं था।
ऑक्सीजन मांग का 4 गुना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया 
केजरीवाल ने 25 अप्रैल 2021 से 10 मई 2021 के दौरान कोरोना की दूसरी लहर के संकट में दिल्ली के लिए भारी मात्रा में ऑक्सीजन की मांग रखी थी। इसके बाद 25 जून 2021 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ऑक्सीजन ऑडिट समिति की अंतरिम रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, जिसमें यह खुलासा हुआ कि दिल्ली सरकार ने अपनी वास्तविक आवश्यकता से लगभग 4 गुना अधिक ऑक्सीजन की मांग प्रस्तुत की थी। इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये से अन्य राज्यों की आपूर्ति प्रभावित हुई थी।
10 लाख नौकरियां देने के आंकड़े का झूठा ढोल
केजरीवाल ने 21 फरवरी 2022 से 26 मार्च 2022 के दौरान पंजाब चुनाव प्रचार के समय दावा किया था कि दिल्ली में 10 लाख युवाओं को नौकरियां दी गई हैं। बाद में 24 मार्च 2022 को उन्होंने यह संख्या बढ़ाकर 12 लाख बता दी, जबकि उनके ही उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने 26 मार्च 2022 को विधानसभा में यह आंकड़ा 1.78 लाख बताया। RTI से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, दिल्ली सरकार ने 7 वर्षों में केवल 3,246 पक्की नौकरियां दी थीं।
SYL नहर और पानी के मुद्दे पर यू-टर्न
केजरीवाल ने 8 अप्रैल 2022 को पंजाब चुनाव जीतने के बाद जल संकट पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। पंजाब विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने वादा किया था कि सत्ता में आते ही वे पंजाब को 24 घंटे पानी उपलब्ध कराएंगे। लेकिन चुनाव जीतते ही जब सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर पर विवाद बढ़ा, तो 8 अप्रैल 2022 को उन्होंने बयान दिया कि जल संकट का समाधान करना केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है।
देश का पहला ‘वर्चुअल स्कूल’ खोलने का फर्जी दावा
केजरीवाल ने 31 अगस्त 2022 को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर घोषणा की कि दिल्ली में देश का पहला ‘वर्चुअल स्कूल’ (DMVS) शुरू हो रहा है। यह दावा तुरंत झूठा साबित हुआ क्योंकि उत्तराखंड में बीजेपी सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वर्ष 2020 में ही देहरादून में भारत के पहले वर्चुअल स्कूल का उद्घाटन कर दिया था। इसके अलावा केंद्र सरकार का NIOS भी पहले से वर्चुअल ओपन स्कूल चला रहा था।
स्वदेशी कोरोना वैक्सीन को लेकर फैलाई थी भ्रांतियां  
केजरीवाल ने 16 जनवरी 2021 को भारत में राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद भारत बायोटेक की स्वदेशी ‘कोवैक्सीन’ (Covaxin) की सुरक्षा और प्रभावकारिता पर सवाल उठाकर जनता में भ्रम फैलाया था। उन्होंने चरणबद्ध परीक्षण आंकड़ों का हवाला देकर वैक्सीन पर संशय जताया था और केंद्र सरकार से इसकी जगह विदेशी टीकों को लाने की वकालत की थी। यह भी कहा था कि इस तरह लोगों को टीके लगाने में दो साल लग जाएंगे। बाद में जब वैज्ञानिक परीक्षणों और आंकड़ों से कोवैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित व असरदार साबित हुई, तो केजरीवाल के इस बयान की देश भर के वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कड़ी निंदा की थी।
कोविड योद्धाओं के मुआवजे पर RTI से खुला झूठ
केजरीवाल ने 30 सितंबर 2022 से पहले दावा किया था कि उनकी सरकार ने 31 पहले और 28 हाल ही में मिलाकर कुल 59 मृत कोरोना योद्धाओं के परिवारों को 1-1 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया है। लेकिन 30 सितंबर 2022 को RTI कार्यकर्ता कन्हैया कुमार द्वारा मांगी गई जानकारी में उजागर हुआ कि सरकार को कुल 54 आवेदन मिले थे, जिनमें से केवल 17 को मंजूरी दी गई थी, 7 खारिज हुए थे और 30 लंबित थे।

FCRA बिल को लेकर खलबली, Sergio Gor समेत सब काम पर लगे हैं; कैथोलिक चर्च यहां धर्म परिवर्तन चाहता है और अमेरिका/अन्य देशों में पादरियों/बिशप्स के यौन अपराधों पर पर्दा डालता है

सुभाष चन्द्र

FCRA बिल भारत में संशोधित होने से भारत विरोधी विदेशियों और उनकी कठपुतली बना विपक्ष साबित करता है कि बिल कितना भारत के हित में है। 

भारत में अमेरिकी राजदूत Sergio Gor के हमारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मिलने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन इसके लिए या तो भारत सरकार की अनुमति लेनी चाहिए या उसे सूचित किया जाना चाहिए लेकिन लगता है ऐसा नहीं किया गया जिन विषयों पर उन्होंने तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों से कथित तौर पर बात की है, वे सब केंद्र सरकार के विषय हैं और इसलिए यह माना जा सकता है कि Sergio Gor उन मुख्यमंत्रियों के जरिए FCRA बिल को रुकवाने के लिए दबाव बनाने के लिए कह रहे है। 

Sergio Gor - 

-22 जून, 2026 को तमिलनाडु के CM से मिले;

-05 अगस्त को तेलंगाना के CM से मिले;

-08 अगस्त को केरल के CM से मिले। और 8 अगस्त को ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति J D Vance प्रधानमंत्री मोदी को फ़ोन करते हैं बात कुछ भी हुई हो लेकिन FCRA का जिक्र घुमाफिरा कर जरूर हुआ होगा

उसके पहले 4 अगस्त को रिपब्लिकन सांसद ने FCRA पर ऐतराज करते हुए कहा इसके पास होने से ईसाईयों पर बुरा असर पड़ेगा और भारत अमेरिका के रिश्ते ख़राब होंगे 

लेखक 
चर्चित YouTuber 

उससे भी पहले The Catholic Bishops’ Conference of India के अधिकारियों ने 10 जुलाई को और फिर अगस्त के शुरू में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की

ऐसा नहीं है भारत में ये कोई नया कानून आ रहा है, बस उसे Regulate करने का प्रयास हो रहा है अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और EU में  इससे भी कड़े कानून हैं लेकिन भारत में नहीं होने चाहिए क्योंकि हिंदुओं का धर्म परिवर्तन आसान होता है ऐसा धर्म परिवर्तन ये ईसाई मिशनरीज इस्लामिक देशों में नहीं सकती क्योंकि वहां के कानून बहुत सख्त है और इसलिए भारत एक Soft Target है ईसाइयों के अलावा इस्लामिक संगठन भी इस कानून के विरोध में खड़े हैं

कैथोलिक चर्च भारत में धर्म परिवर्तन कर ईसाइयत को फैला रहा है लेकिन अपने Bishops/Priests के Child Sexual Abuse पर पर्दा डालने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करता है ऐसा अनुमान है अमेरिका 4 Billion Dollar पिछले कुछ वर्षों में पीड़ितों को समझौता राशि दे चुका है। वहां के राज्यों के कुछ उदाहरण हैं -

-लॉस एंजिल्स का 2024 का $880 million समझौता 1,353 पीड़ितों से संबंधित था और उसे उस समय अमेरिका में सबसे बड़ा एकल यौन-शोषण समझौता बताया गया। इसके पहले लॉस एंजिल्स 'प्रधान पादरी क्षेत्र’ ( Archdiocese) लगभग $740 million का भुगतान कर चुका था, जिससे दोनों बड़े समझौतों की राशि $1.5 billion से अधिक हो जाती है;

-न्यूयॉर्क आर्चडायोसीज़ ने 2026 में लगभग $800 million के प्रस्तावित समझौते का समर्थन किया है, जिसमें लगभग 1,300 लोगों के दावे शामिल हैं;

-जर्मनी में 2023 की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 1,839 आवेदन प्राप्त हुए थे और 1,809 मामलों में भुगतान स्वीकृत हुआ था; कुल राशि लगभग €40 million (उस समय लगभग $43.5 million);

-कनाडा में सरकार और चर्च संस्थाओं ने Indian Residential Schools से जुड़े मामलों में कुल मिलाकर 4.6 billion dollar मुआवजा दिया;

-आयरलैंड में धार्मिक संस्थाओं पर अभी भी लगभग €755 million की redress obligations बकाया है;

हमारे देश में तो Bishop Franco Mulakkal केरल की नन का लगातार रेप करने के आरोपों से 2022 में बरी हो गया और पोप ने उसका इस्तीफा मंजूर कर लिया बरी होने के खिलाफ अभी अपील हाई कोर्ट में लंबित है

हमारे कानून की चिंता न करे चर्च क्योंकि भारत में धर्म परिवर्तन की दुकान अब बंद होकर रहेगी आप अपने Bishops/Priests को संभालें

‘F*cking Old Man तुम्हें थप्पड़ पड़ेगा’: कौन है PM मोदी को गाली देने और मारने की बात करने वाली CEO मुग्धा प्रधान

      मुग्धा प्रधान, जो पीएम मोदी को थप्पड़ मारने की इच्छा रखती है (फोटो साभार : ithrive & thenewsminute)
विश्व में भारत एक ऐसा अनूठा देश है जहाँ प्रधानमंत्री गाली देना शायद आम बात हो गयी है। जितनी गालियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिली है विश्व में किसी भी प्रधानमंत्री को नहीं। यदि विदेश में किसी प्रधानमंत्री को मिल रही होती जितने भी गालीबाज है जेलों में होते। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर iThrive की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में यह महिला पीएम मोदी और केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर काफी गुस्से में नजर आती दिखाई दे रही है। इसी दौरान मुग्धा प्रधान वीडियो में कहती हैं कि अगर वह पीएम मोदी से मिलेंगी तो उन्हें ‘एक थप्पड़’ देंगी। बता दें कि जंतर-मंतर पर हुई उग्र प्रदर्शन और हिंसा को मुग्धा प्रदान सपोर्ट करती नजर आती है और गालीबाजों पर कार्रवाई को लेकर ये भड़क जाती है, जिसके बाद इनकी भड़ास वीडियो में साफ दिखाई देती है।

वीडियो में मुग्धा प्रधान अन्य मुद्दों को भी कहती नजर आती है। इसके अलावा, वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का गुस्सा फूट पड़ा है। लोग इस महिला की आलोचना कर रहे हैं। मुग्धा प्रधान कोई सामान्य सोशल मीडिया यूजर नहीं हैं। वह हेल्थ और वेलनेस कंपनी iThrive की फाउंडर और CEO हैं। वह फंक्शनल न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम करती हैं। उनके पास फूड साइंस और न्यूट्रिशन में मास्टर डिग्री है। इतनी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी गाली देने वालों को ये सपोर्ट करती है और भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ बयानबाजी करती है। आईए जानते हैं, मुग्धा प्रधान ने क्या-क्या कहा है।

वीडियो में क्या भड़ास निकाल रही है मुग्धा प्रधान?

Viral Video में मुग्धा प्रधान काफी गुस्से में नजर आ रही है, ऐसा लग रहा है कि वीडियो से बाहर निकलते ही किसी ना किसी को लपेट ही देंगी। वीडियों में मुग्धा प्रधान कहती हैं, मैं उन सभी बूढ़े आदमियों को थप्पड़ मारना चाहती हूँ जो सोचते हैं कि उन्हें औरतों और बच्चों के गुस्से को दबाने का हक है। जरा देखिए लोग क्या-क्या कर जाते हैं। आपको गाली गंदी लगती है, पर इस देश की सड़कें देखिए, जिन्हें मिसाल बनना चाहिए। मैं प्रकृति के बीच टहलने गई थी और एक पेड़ के नीचे कचरे के ढेर लगे थे। आप उस गंदगी को साफ़ क्यों नहीं कर सकते? आपको वह गंदगी क्यों नहीं दिखती? बेवकूफ लोग।”
इससे आगे मुग्धा प्रधान कहती है, “आपके अंदर ही गंदगी है तो आपको बाहर की गंदगी कैसे दिखेगी? प्रकृति में जो कुछ भी दिख रहा है, उसे एक गंदा शब्द कहा जा रहा है और मुझे लगता है कि आख़िरकार कोई आपको वह सच कह रहा है जिसके आप हकदार हैं और इसीलिए आपको इतना बुरा लग रहा है कि देश के PM होकर आप बैठकर कह रहे हैं कि आप माफ कर रहे हैं। अगर मैं आपसे मिली तो मैं आपको एक ‘माफ करने वाला’ थप्पड़ जरूर मारूँगी। एक बूढ़ा आदमी जिसे वहाँ नहीं होना चाहिए, निकल जाओ, मेरे देश से निकल जाओ, अपनी सत्ता से हट जाओ, निकल जाओ, अब समय आ गया है कि युवा लोग जिम्मेदारी संभालें।”
मुग्धा प्रधान ने पहले भी पीएम मोदी को लेकर एक वीडियो जारी किया था। इसमें ये बार-बार गाली देने वालों को सपोर्ट करती नजर आ रही है और पीएम मोदी के खिलाफ अपनी भड़ास निकालती दिख रही है।

कौन हैं PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान?

मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान पुणे से जुड़ी फंक्शनल न्यूट्रिशनिस्ट हैं। वह हेल्थ और वेलनेस के क्षेत्र में काम करती हैं। मुग्धा प्रधान ने iThrive नाम की कंपनी शुरू की। आज वह इसी कंपनी की CEO भी हैं।
iThrive का काम हेल्थ, न्यूट्रिशन और वेलनेस से जुड़ा है। कंपनी लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर फंक्शनल न्यूट्रिशन का तरीका अपनाने की बात करती है। इसमें सिर्फ बीमारी के लक्षणों पर ध्यान देने के बजाय उसके पीछे के कारणों को समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन मुग्धा की इस वीडियो को देखकर लगता है कि उन्हें खुद ट्रीटमेंट की जरूरत है।
iThrive की वेबसाइट के मुताबिक, मुग्धा प्रधान के पास MSc फ़ूड साइंस और न्यूट्रिशन की डिग्री है। उन्होंने 2001 में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर में भी काम किया। वह Flipkart की शुरुआती HR टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। बाद में उन्होंने हेल्थ और न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम शुरू किया।
मुग्धा प्रधान साल 2017 में तीन बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुकी है। मुग्धा ने क्लिनिकल डिप्रेशन, मोटापे और Hashimoto’s thyroiditis यानी एक ऑटोइम्यून बीमारी का जिक्र भी किया है।
मुग्धा प्रधान की प्रोफाइल में उन्हें दो बार TEDx स्पीकर बताया गया है। वह ‘Health, Inc.’ नाम की किताब की लेखिका भी हैं। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, यह किताब ग्लोबल हेल्थकेयर सिस्टम और उसके काम करने के तरीके पर आधारित है।

 मोदी पर टिप्पणी करने वाली मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का फूटा गुस्सा

वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने सिर्फ मुग्धा प्रधान के बयान पर ही सवाल नहीं उठाए। कुछ लोगों ने iThrive के कारोबार और उसकी छवि को भी चर्चा में ला दिया। कुछ यूजर्स का कहना है कि हेल्थ और वेलनेस कंपनी के प्रमुख व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवहार कंपनी की छवि पर असर डाल सकता है। कुछ पोस्ट में लोगों से पूछा गया कि क्या वे ऐसी कंपनी के उत्पाद खरीदना चाहेंगे जिसकी CEO इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करती हैं।
एक यूजर लिखते हैं, iThrive कंपनी की सीईओ PM मोदी को बुरा-भला कहने में लगी हुई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें खुद ही बेहतर सप्लीमेंट्स की ज़रूरत है। सोचने वाली बात यह है कि जब कंपनी की सबसे बड़ी अधिकारी सबके सामने इतनी ज़्यादा नफ़रत और संयम की कमी दिखाती हैं, तो इससे उस ब्रांड की समझदारी और विश्वसनीयता के बारे में क्या पता चलता है?”
अभिजीत मजूमदार लिखते हैं, ” पीएम मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाली मुग्धा प्रदान को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मदद की बहुत जरूरत है। वह बहुत परेशान और अस्थिर लग रही हैं। क्या कोई उनके ब्रांड और उसके प्रोडक्ट्स पर भरोसा कर सकता है?”
राकेश कृष्णन सिंहा लिखते हैं, “एक और पाखंडी से मिलिए। हेल्थ और वेलनेस कंपनी ‘iThrive’ की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान, जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कह रही हैं। इस गंदी ज़बान वाली महिला को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह किसी गटर में ही पैदा हुई हो। ये सभी नकली लोग FCRA की वजह से बहुत हताश हैं। FCRA जैसे जवाबदेही कानूनों के कारण, बकवास करने और भोले-भाले लोगों को ठगने के उनके सपने पूरे करना मुश्किल होता जा रहा है। उनकी स्पीच, उनकी बेकाबू हताशा भरी बकवास और उनकी साइट पर लिखी बातों को देखिए – सब कुछ एक-दूसरे के बिल्कुल उलट है। ‘सत्-चित्-आनंद’ तो कुछ ही सेकंड में फुस्स हो गया।”
एक यूजर ने फंडिंग को लेकर भी आरोप लगाया है, जिसमें दावा किया है, “iThrive की इस महिला को हांगकांग स्थित ‘फंग स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से निवेश मिला है। यही वजह है कि वह हमारे माननीय प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं। ऐसा लगता है कि वह चीन की एक ‘एसेट’ (मोहरा) हैं। कृपया उचित कानूनी कार्रवाई करें।”
‘iThrive’ की सीईओ मुग्धा प्रधान की कंपनी को हांगकांग की एक फर्म ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से पैसा मिलता है। जाँच करने पर पता चलता है कि ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ (जिसे फंग इन्वेस्टमेंट्स भी कहते हैं) कोई आम कंपनी नहीं है। यह हांगकांग के बहुत अमीर फंग परिवार का निजी पारिवारिक निवेश दफ्तर है, जो उनके विशाल ‘फंग ग्रुप’ के लिए काम करता है। इस पूरी संस्था के मुख्य मालिक और फैसले लेने वाले डॉक्टर विक्टर के फंग (चेयरमैन) और डॉक्टर विलियम फंग (डिप्टी चेयरमैन) हैं, जो दोनों आपस में भाई हैं। यह फंग ग्रुप मुख्य रूप से सामान सप्लाई करने के व्यापार से जुड़ा हुआ है।

CJP के प्रदर्शन में PM मोदी को दी गई गालियाँ, उन्होंने किया था माफ

हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक और अन्य मुद्दों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान कुछ नाबालिग बच्चों और युवाओं द्वारा PM मोदी और उनकी दिवंगत माता को गालियाँ तक दी गई थीं।

गाली गलौज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद काफी विवाद हुआ और एक नाबालिग लड़की के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। विवाद बढ़ने और बच्ची द्वारा अपनी गलती पर रोते हुए देश से माफी माँगने के बाद, PM मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो संदेश जारी किया। इस वीडियो में उन्होंने इन युवाओं को माफ करने का ऐलान किया था।

उन्होंने कहा था, “एक कल्चरल शौक है कि हमारी बेटियाँ इस प्रकार की भाषा कैसे बोल सकती है? लेकिन समय है इन बच्चों को गले लगा के राह दिखाने का। एक गुमराह बच्चे हैं। उनको राह दिखाना हमारा काम है। मेरे मन में एक ही भाव है। कभी-कभी दाँतों तले हमारी जीभ आ जाती है। खून निकल आता है। लेकिन हम दाँत तोड़ते नहीं है। क्योंकि दाँत भी हमारे हैं। जीभ भी हमारी है। बच्चे भी हमारे हैं। उन्हें राह दिखाना हमारा काम है।”

AAP के ‘पालतुओं’ से सावधान ! मालिक ने दिया युवाओं को गुमराह करने का टास्क; आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी के रिश्ते दो जिस्म और एक जान



आम आदमी पार्टी बनने पर अरविन्द केजरीवाल ने कहा था 'मै anarchy हूँ', जिसे यदाकदा साबित करते रहते हैं। चुनावों में जब इनके अधिकतर उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाते, फिर भी किसी तरह दिल्लीवासियों को रेवड़ियां बांट सत्ता में आ गए। दिल्ली से सत्ता मुक्त होने पर पंजाब में सरकार बनाने में सफल तो हो गए लेकिन इस बार संभावनाएं जाहिर की जा रही है कि पंजाब भी हाथ से निकल रहा है। पंजाब भी हाथ से निकल जाने के बाद केजरीवाल के हाथ कुछ भी नहीं रहेगा। यानि शहंशाही जिंदगी जीना दुश्वार होने के डर से कॉकरोच पार्टी का गठन किया। ताकी देश में अराजकता फैलाते रहे। अगर 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने संयम से काम नहीं किया होता इस कॉकरोच पार्टी ने नेपाल और बांग्लादेश वाले हालत कर दिए थे। यह सब ऐसे ही नहीं हुआ था सारा खेल FCRA का विरोध करना है। INDI गठबंधन की जो पार्टियां इन आन्दोलनजीवियों को समर्थन दे रही है उनके हाथ कुछ नहीं आने वाला सारी मलाई केजरीवाल खा अपनी शहंशाही ज़िन्दगी का आनंद लेंगे। और इस कॉकरोच पार्टी के हाथ भी कुछ नहीं आने वाला। केजरीवाल का सारा खेल अपने निजी स्वार्थ के लिए है। सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन INDI गठबंधन को केजरीवाल की इन चालों से दूरी बनाने में ही फायदा है।  
साभार : सोशल मीडिया 

राजनीति का कड़वा सच यह है कि यहां जो बाहर से दिखता है, वह असलियत नहीं होती और जो असलियत होती है, उसे पर्दे के पीछे छिपा कर रखा जाता है। मौजूदा हालात में राजनीति के इसी कड़वे सच को डिकोड करना जरूरी है, ताकि देश की जनता, खासकर युवा सावधान रहें और AAP के ‘पालतुओं’ से खुद को बच सकें। आप हैरान होंगे कि आखिर ऐसा क्यों कहा जा रहा है। दरअसल, बात आम आदमी पार्टी के उन ‘पालतुओं’ की हो रही है, जो कॉकरोच जनता पार्टी के रूप में देखने में तो अलग है, लेकिन वास्तव में AAP का ही दूसरा रूप है। इनको अपने मालिक अरविंद केजरीवाल के इशारे पर बड़े-बड़े कांड करने में महारत हासिल है। अपने मालिक की वफादारी में 20 जुलाई,2026  को ‘चल संसद’ मार्च के दौरान, जो खतरनाक मिसाल पेशी, वो पूरा देश देख चुका है। अब ये देश के युवाओं को गुमराह करने के खतरनाक मिशन पर काम कर रहे हैं, जिसका खुलासा करना जरूरी है, ताकि देश के ‘जेन जी’ (Gen Z या जनरेशन जेड) को फिर से गुमारह होने से बचाया जा सके।

CJP के 14 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति का औपचारिक ऐलान
दरअसल, आम आदमी पार्टी ने भारत की राजनीति में फिर एक नया प्रयोग किया है। इस प्रयोग में ‘आप’ ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से ही एक नई पार्टी बना दी है, जिसका नाम कॉकरोच जनता पार्टी है। इस पार्टी ने 6 अगस्त, 2026 को अपनी पहली राष्ट्रीय कार्यसमिति का औपचारिक ऐलान किया। पार्टी ने 14 सदस्यीय राष्ट्रीय नेतृत्व टीम की घोषणा करते हुए आने वाले छह महीनों में पूरे देश में संगठन विस्तार की योजना भी शेयर की है। पार्टी की ओर से जारी संगठनात्मक दस्तावेज के अनुसार, अभिजीत दीपके को संस्थापक एवं राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त किया गया है। वहीं आशुतोष रांका और सौरभ दास को सह-संयोजक बनाया गया है। इसके अलावा, राष्ट्रीय टीम में विभिन्न जिम्मेदारियां भी सौंपी गई हैं।

CJP के जोनल लीडरशिप की भी घोषणा
कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यसमिति में अजिंक्य शिंदे को राष्ट्रीय संगठन प्रभारी, दीपक बलियान को संगठन सह-प्रभारी, आफरीन नवाज को राष्ट्रीय महासचिव, विजय रेड्डी मल्लांगी को मीडिया प्रमुख, रत्ना सिंह को लीगल अफेयर्स प्रमुख, वैष्णवी गौर को रिसर्च एवं पॉलिसी प्रमुख, रोहन देशपांडे को टेक्नोलॉजी प्रमुख और योगेश इंगले को फाइनेंस प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही पार्टी ने चारों जोनों के लिए भी नेतृत्व घोषित किया है। उत्तर जोन की जिम्मेदारी दीपक बलियान, दक्षिण जोन की विजय रेड्डी मल्लांगी, पूर्व और उत्तर-पूर्व जोन की अंकित भारद्वाज तथा पश्चिम जोन की योगेश इंगले को सौंपी गई है।

कॉकरोच जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के साथ ही नेताओं में कितनी समानता है… 

AAP और CJP में समानता : केजरीवाल और दीपके राष्ट्रीय संयोजक 
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपनी राष्ट्रीय कार्य समिति की घोषणा करते हुए संस्थापक अभिजीत दीपके को राष्ट्रीय संयोजक (National Convener) नियुक्त किया है, जो आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के पद के समान है। दरअसल, केजरीवाल आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं और उसी तरह अभिजीत दीपके को भी कॉकरोच जनता पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि अभिजीत दीपके का अतीत में कनेक्शन आम आदमी पार्टी से रहा है और वे उनकी सोशल मीडिया टीमों का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में दीपके को सीजेपी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया जाना चर्चा का विषय बन गया है।

AAP और CJP में समानता : नेता और कार्यकर्ता दो जिस्म और एक जान
आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी के रिश्ते दो जिस्म और एक जान का है। दोनों पार्टियों की धड़कन एक है, क्योंकि दोनों ही पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता एक है। आम आदमी पार्टी (AAP) और हाल ही में चर्चा में आए युवा-आधारित संगठन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के कई नेता और कार्यकर्ता पूर्व में एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। CJP की नेशनल वर्किंग कमेटी और विभिन्न पदों पर ऐसे कई चेहरों को नियुक्त किया गया है जो पूर्व में AAP के छात्र विंग या सोशल मीडिया विंग के पदाधिकारी रह चुके हैं। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके और कई प्रमुख पदाधिकारी पहले AAP के सोशल मीडिया व जमीनी अभियानों का हिस्सा रह चुके हैं।

AAP और CJP में समानता : दीपके AAP की सोशल मीडिया टीम का सदस्य
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके साल 2020 से 2023 के बीच AAP की सोशल मीडिया टीम के सदस्य थे। दीपके आम आदमी पार्टी के ट्वीटर हैंडल को संचालित करते थे। उन्होंने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान डिजिटल कैंपेन और मीम-आधारित कंटेट तैयार करने में काम किया था और दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग के लिए संचार सलाहकार के रूप में भी सेवाएं दी थीं।

AAP और CJP में समानता : AAP का व्हाट्सएप्प टीम देखते थे आशुतोष रांका 
CJP के सह-संयोजक/प्रवक्ता आशुतोष राका ने खुद स्वीकार किया है कि वो आम आदमी पार्टी के व्हाट्सएप्प टीम देखते थे। इसके बाद राजस्थान में AAP के विभिन्न सांगठनिक दायित्वों और दिल्ली चुनावों के दौरान जमीनी रणनीतियों से जुड़े रहे। 30 दिसंबर 2025 को राजस्थान आम आदमी पार्टी के प्रभारी धीरज टोकस और सह प्रभारी घनेंद्र भारद्वाज ने प्रदेश कार्यकारिणी में कुछ नियुक्तिों का ऐलान किया था। इसमें भी आशुतोष रांका का नाम शामिल था। आशुतोष रांका को इंटिलेक्चुअल विंग का स्टेट सेक्रेट्री नियुक्त किया गया था। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के मंच से कई मुद्दों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते भी दिखते थे।

AAP और CJP में समानता : सौरभ दास का AAP के लीगल मामलों से जुड़ाव 
सह संयोजक और सीजेपी आंदोलन के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे सौरभ दास भले ही ‘आप’ के सदस्य नहीं हैं, लेकिन वह अरविंद केजरीवाल की पार्टी का समय-समय पर समर्थन करते रहे हैं। जस्टिस स्वर्ण कांता के खिलाफ जब अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने मोर्चा खोला तो सौरभ दास भी उनके साथ थे। दास ने जस्टिस स्वर्ण कांता को लेकर कई दावे किए जिन्हें आधार बनाकर ‘आप’ नेताओं ने जज पर सवाल खड़े किए थे। जस्टिस स्वर्ण कांता की अवमानना मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं के साथ पत्रकार/प्रवक्ता सौरभ दास का नाम भी शामिल है। सौरव दास जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़े आपराधिक अवमानना केस में बुरी तरह से घिरते नजर आ रहे हैं। उन्हें आपराधिक अवमानना के केस में जवाब देने के लिए नोटिस तो जारी किया ही गया है, उनपर इस मामले से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मिटाने का भी आरोप लगा है।

AAP और CJP में समानता : AAP के अजिंक्य शिंदे बने राष्ट्रीय संगठन प्रभारी
अंजिक्य शिंदे को अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी मिली है। इसके बाद वह सुर्खियों में आ गए हैं। अजिंक्य शिंदे को CJP में राष्ट्रीय संगठन प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। अजिंक्य शिंदे के संबंध सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से जुड़े हुए हैं। वह आम आदमी पार्टी की महाराष्ट्र युवा विंग के संयोजक और पार्टी की राष्ट्रीय संगठन निर्माण टीम के सदस्य के रूप में सक्रिय रहे हैं। उनकी अरविंद केजरीवाल और AAP के दूसरे नेताओं के साथ सैकड़ों तस्वीरें हैं।

AAP और CJP में समानता : वकील रत्ना सिंह और केजरीवाल की मुलाकात
CJP ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में वकील और पूर्व लीगल जर्नलिस्ट रत्ना सिंह को लीगल मामलों की जिम्मेदारी दी है। सोशल मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक चर्चाओं में यह दावा किया गया है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े सौरव दास ने ग्रेटर कैलाश-1 (GK-1) स्थित अपने फ्लैट पर एक दिवाली पार्टी होस्ट की थी, जिसमें अरविंद केजरीवाल और रत्ना सिंह के शामिल होने की बात सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि वकील रत्ना सिंह अरविंद केजरीवाल की समर्थक है और आम आदमी पार्टी को परोक्ष रूप से कानूनी मामलों में सलाह देती रही हैं।

AAP और CJP में समानता : AAP के नेता विजय रेड्डी बने CJP के मीडिया प्रमुख
विजय रेड्डी मल्लांगी को CJP का मीडिया प्रमुख बनाया गया है। विजय रेड्डी मल्लांगी ने आम आदमी पार्टी के साथ सक्रिय रूप से काम किया है। उन्होंने तेलंगाना में पार्टी के लिए एक प्रमुख राजनीतिक नेता और नागरिक कार्यकर्ता के रूप में सेवाएं दीं, जिसमें उन्होंने तेलंगाना राज्य युवा इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष और हैदराबाद में जुबली हिल्स निर्वाचन क्षेत्र के नेता जैसे पदों को संभाला। AAP के साथ अपने जुड़ाव के समय, उन्होंने ‘झाड़ू चलाओ यात्रा’ जैसे स्थानीय अभियानों का नेतृत्व किया और नागरिक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिसमें “सेव केबीआर” (Save KBR) पर्यावरण विरोध प्रदर्शन शामिल हैं।

AAP और CJP समानता : दोनों पार्टियों के ‘मालिक’ एक
आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं को देखकर कहा जा सकता है कि दोनों ही पार्टियों के ‘पापा’ यानी असली जन्मदाता अरविंद केजरीवाल हैं। उन्होंने अभिजीत दीपके को अमेरिका से भारत लाने, जंतर-मंतर पर धरने पर बैठाने, सोनम वांगचुक को आंदोलन से जोड़ने, कार्यकर्तओं को जुटाने, संसाधन मुहैया कराने और प्रदर्शन को सफल बनाने की पूरी रणनीति तैयार की थी। इसलिए उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से 20 जुलाई के प्रदर्शन में शामिल होने की अपील थी। उन्होंने कहा था कि ज्यादा से ज्याद संख्या में यहां पर आएंगे। 20 तारीख के आंदोलन को, इनके कॉल को, पार्लियामेंट तक की जो यात्रा है उसको सफल बनाना है। ज्यादा से ज्यादा संख्या में आना है।

एक राष्ट्रीय टीम/कार्यकारिणी के माध्यम से काम 
आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी, दोनों ही संगठन एक राष्ट्रीय टीम/कार्यसमिति के माध्यम से काम करते हैं, जिसमें अलग-अलग जिम्मेदारियों (जैसे संयोजक, महासचिव, संगठन प्रभारी, लीगल अफेयर्स, मीडिया आदि) के लिए विशिष्ट पदाधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। दोनों ही मामलों में संयोजक की सहायता और संगठन के प्रबंधन के लिए सह-संयोजकों का प्रावधान/नियुक्ति देखने को मिलती है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपनी पहली 14 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा की है। वहीं आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी के सक्रिय सदस्यों में से सर्वसम्मति से चुने गए अधिकतम 30 सदस्य होते हैं, यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो बहुमत से चुने गए सदस्यों की संख्या 12 होगी, जिसमें से कम से कम 7 महिलाएं और 5 छात्र होंगे।

राजनीतिक दल नहीं, प्रेशर ग्रुप के रूप में काम करेंगे
‘आप’ का गठन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (IAC) नामक एक जन आंदोलन और प्रेशर ग्रुप के विचार से ही हुआ था। CJP ने भी अपने बयान में स्पष्ट किया है कि वह सीधे एक पारंपरिक राजनीतिक दल के बजाय फिलहाल एक जन आंदोलन और प्रेशर ग्रुप के रूप में काम करेगी। CJP के सह-संयोजक सौरभ दास ने कहा, “लोग चाहते हैं कि सीजेपी एक राजनीतिक दल बने। लेकिन इस समय एक और राजनीतिक दल जोड़ना उपयोगी नहीं होगा। वहां ऊर्जा खर्च करने के बजाय, हम धरातल पर काम करेंगे क्योंकि जागरूकता वहीं से आती है। हम फिलहाल सीजेपी को राजनीतिक दल में नहीं बदलेंगे।” अब सवाल उठता है कि जन आंदोलन और प्रेशर ग्रुप के रूप में किसके लिए काम करेंगे। दरअसल, ये अपने विदेशी आकाओं और फंड देने वालों के लिए काम करेंगे, ताकि उनके मुताबिक भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सके। ये आम आदमी पार्टी के लिए राजनीतिक माहौल और जमीन तैयार करेंगे, ताकि केंद्र की सत्ता में परिवर्तन हो सके। गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल ने भी अन्ना आंदोलन के दौरान अपने बच्चों की कसम खाकर कहा था कि राजनीति में नहीं जाएंगे और कोई पद नहीं लेंगे। लेकिन बाद में राजनीति में आए, पार्टी बनाई, पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक बने और दिल्ली मुख्यमंत्री बने।

 

अन्ना और वांगचुक बने राजनीतिक लॉन्चपैड
अरविंद केजरीवाल ने 2011 में जिस तरह अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को अपनी राजनीतिक लॉन्चपैड के रूप में इस्तेमाल किया था, वैसे ही अभिजीत दीपके और अन्य लोगों ने सोनम वांगचुक के चेहरे और अनशन का उपयोग किया। अन्ना हजारे के बताये रास्ते पर चलने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल राजनीतिक दल बनाने के बाद अन्ना को भूल गए। इसी तरह सोनम वांगजुक के अनशन तोड़ने पर अभिजीत दीपके और उसके साथियों ने वागचुक से मुंह मोड़ लिया। यहां तक कि सोनम वांगचुक द्वारा भारतीय रेल जैसे विकास कार्यों की प्रशंसा करने और सीजेपी के नेताओं को जीत के बाद संयम व विनम्रता रखने की नसीहत देने पर उनकी आलोचना करने लगे।

पूरे देश में संगठन विस्तार का लक्ष्य
आम आदमी पार्टी की तरह ही कॉकरोच जनता पार्टी ने भी शुरुआत में ही राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार और देश के अलग-अलग जोनों/राज्यों में इकाइयां गठित करने की योजना पर जोर दिया है। सीजेपी ने अपने देशव्यापी विस्तार के तहत उत्तर, दक्षिण, पूर्व-उत्तर और पश्चिम जोनों के लिए जोनल प्रभारियों की नियुक्ति की है और राष्ट्रीय कार्यसमिति का ऐलान किया है। पार्टी द्वारा जारी दस्तावेज के अनुसार, अगले छह महीनों के भीतर विभिन्न राज्यों में स्टेट कोऑर्डिनेशन कमेटियों, लोकसभा स्तर और शहर स्तर की समन्वय इकाइयों का गठन किया जाएगा। 

युवाओं की भूमिका पर जोर 
आम आदमी पार्टी (AAP) के राजनीतिक सफर और आंदोलनों में युवाओं की भूमिका हमेशा से मुख्य और निर्णायक रही है। पार्टी की शुरुआत ही भ्रष्टाचार विरोधी जन-आंदोलन और इंडिया अगेंस्ट करप्शन से हुई थी, जिसमें देश भर के युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। सीजेपी ने अपनी पहली नेशनल टीम की जो घोषणा की है उसके सभी पदाधिकारियों की उम्र 26 से 35 साल के बीच है। राष्ट्रीय कार्यसमिति की घोषणा के बाद पार्टी संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सभी नव-नियुक्त पदाधिकारियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत की करीब 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, इसलिए अब युवाओं की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि नई टीम का उद्देश्य देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में युवाओं के मुद्दों को लाना है।

डिजिटल जुड़ाव और सोशल मीडिया
शुरुआती दिनों में आम आदमी पार्टी ने जनलोकपाल आंदोलन के दौरान फेसबुक, ट्विटर और डिजिटल कैम्पेन के माध्यम से युवाओं और कार्यकर्ताओं को सीधे जोड़ा था। कॉकरोच जनता पार्टी का आधार ही पूरी तरह से डिजिटल और मीम्स-आधारित संस्कृति पर है। इसके संस्थापक अभिजीत दीपके (जो पहले AAP के सोशल मीडिया और अभियानों से जुड़े रहे हैं) ने इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवाओं को सीधे जोड़ा है।

क्राउड फंडिंग की अपील
क्राउड फंडिंग (जनता से चंदा जुटाने) की अपील का यह तरीका राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा समय-समय पर अपनाया जाता रहा है। अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत से ही पारदर्शी और ईमानदारी की राजनीति का दावा करते हुए कई बार आम जनता से क्राउड फंडिंग की अपील की है। वहीं दूसरी ओर, गैर-राजनीतिक युवा संगठन होने का दावा करने वाली सीजेपी ने भी अपने आंदोलनों और प्रदर्शनों के दौरान कानूनी सहायता (Legal Aid Fund) व अन्य गतिविधियों के लिए क्राउड फंडिंग व सार्वजनिक योगदान का सहारा लेने की घोषणा की है।

जिस कांग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

साभार 
कांग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कांग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कांग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कांग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।