भारत में ‘रिजीम चेंज’ के लिए खूनी क्रांति की धमकी, बांग्लादेश जैसा हिंदू जेनोसाइड की खौफनाक प्लानिंग


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में विकास हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी और भारत का दबदबा बढ़ रहा है। भारत अमेरिका की शर्तों के सामने झुकने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश भारत को उभरती हुई महाशक्ति और प्रतिद्वंदी मानने लगा है। अमेरिका को लग रहा है कि अगर भारत को अभी रोका नहीं गया तो आने वाले कुछ ही वर्षों में वो चीन की तरह उसको चुनौती दे सकता है। इसलिए अमेरिका पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत में एक ऐसी कठपुतली सरकार बनाना चाहता है, जो उसके इशारों पर काम कर सके। इस मकसद को पूरा करने के लिए भारत के विपक्षी दलों को आर्थिक मदद देकर देश में रिजीम चेंज की कोशिश की जा रही है।

भारत में ‘खूनी क्रांति’ के जरिए रिजीम चेंज की कोशिश
विदेशी फंडिंग पर पलने वाले कांग्रेस और तमाम विपक्षी दल के सामने मुश्किल यह है कि वो संवैधानिक तरीके से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को हटा नहीं सकते, क्योंकि उन्हें पता है कि संसद में उनके पक्ष में संख्या बल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट से उन्हें उम्मीद नहीं है, क्योंकि ‘वोट चोरी’ का कोई ठोस सबूत नहीं है। इसलिए वो लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को संसद की जगह सड़क से अपदस्त करना चाहते हैं। विदेशों से सुपारी लेकर सड़क पर ‘लोकतंत्र की डकैती’ करना चाहते हैं। इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। ‘वोट चोरी’ के नाम पर एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का विरोध कर रहे हैं। सड़क पर अराजकता फैलाकर खूनी क्रांति करना चाहते हैं।

सड़क पर अराजकता और ‘लोकतंत्र की डकैती’ की कोशिश 
विपक्षी दलों ने सड़क पर ‘लोकतंत्र की डकैती’ को अंजाम देने के लिए एक टूलकिट तैयार किया है, जिसमें एक-एककर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता खत्म करना शामिल है। यह साबित करना है कि देश की सभी संस्थाएं सरकार की कठपुतली बन चुकी हैं। इसका मकसद जनता में असंतोष पैदा कर उनका समर्थन हासिल करना है। कॉकरोच जनता पार्टी को मोहरा बनाकर युवाओं खासकर ‘जेन-जी’ को भड़काना है, ताकि बांग्लादेश और नेपाल की तरह सड़क पर अराजकता पैदा किया जा सके। पुलिस पर हमला, सुरक्षा एजेंसियों और राष्ट्रवादी मीडिया को बदनाम करना इनकी रणनीति का हिस्सा है।

प्रशांत भूषण की रिजीम चेंज करने की खुलेआम धमकी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर जो राजनीतिक और सीजेपी का प्रदर्शन शुरू हुआ है उसकी मंशा पर यूं तो पहले से सवाल खडे होते रहे हैं। लेकिन अब यह खुलकर सामने आ गया है कि कुछ संगठन दिल्ली में बांग्लादेश जैसी हिंसा की स्थिति पैदा कर सत्ता परिवर्तन करना चाहते थे। 15 अक्टूबर,2026 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने खुले तौर पर रिजीम चेंज का एलान किया। उन्होंने कहा,“हां, हम चाहते हैं सत्ता परिवर्तन हो, खुले तौर पर कह रहा हूं ये सत्ता परिवर्तन की लड़ाई है। हम लोग सत्ता परिवर्तन कराकर रहेंगे “

प्रशांत भूषण की खूनी क्रांति के जरिए रिजीम चेंज की योजना
इससे पहले 13 अक्टूबर,2026 को प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया ग्रुप में बातचीत के दौरान खूनी क्रांति की बात कही थी। उन्होंने कहा, “हमारे सामने विकल्प क्या है ? हमारे पास विकल्प है कि क्रांति के जरिए कुछ करा लें। अब उस क्रांति में बहुत खून-खराबा होगा। क्योंकि ये लोग अभी पुलिस इस्तेमाल कर रहे हैं। अर्धसैनिक बल इस्तेमाल कर रहे हैं। इन लोगों ने अभी बंदूकें इस्तेमाल नहीं की हैं। वो सभी यूज करेंगे। आर्मी को भी बुला सकते हैं।”

बांग्लादेश की तरह भारत में हिन्दुओं का नरसंहार की प्लानिंग
प्रदर्शन की पोस्टर गर्ल बनी वामपंथी छात्र संगठन आईसा (एआईएसए) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने खुद बांग्लादेश की तरह भारत में भी सत्ता परिवर्तन का खुलासा किया है। सोशल मीडिया फेसबुक पर नेहा खुलकर बता रही हैं कि भारत में शुरू हुए जेनजी आंदोलन की शुरूआत बांग्लादेश से हुई थी। उन्होंने कहा रास्ता दिखाने और इस देश के युवाओं के साथ एकजुटता दिखाने के लिए आपको बधाई। नेहा बोरा के इस बयान से स्पष्ट है कि वो बांग्लादेश के युवाओं से प्रेरणा ले रही है। जिस तरह बांग्लादेश के युवाओं ने हिन्दुओं के खिलाफ हिंसक अभियान चलाकर उनका नरसंहार किया, उसी तरह नेहा बोरा भी हिन्दू राष्ट्रवादियों का नरसंहार कर देश में सत्ता परिवर्तन करना चाहती है।

नाहिद इस्लाम ने भारत के प्रदर्शनकारियों को दिया समर्थन 
ध्यान देने की बात है कि तीन दिन पहले ही बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने वाले नाहिद इस्लाम ने भारत में प्रदर्शन कर रहे युवाओं के समर्थन में बयान जारी किया और चुनावी जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे भारतीय युवाओं के साथ एकजुटता जताई थी।

ध्रुव राठी पर सेना और पुलिस को भड़काने का आरोप
यूट्यूबर ध्रुव राठी के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज की गई है। यह शिकायत दिल्ली के एक वकील विवेक गर्ग ने पुलिस कमिश्नर, नार्थ DCP और रूप नगर थाना प्रभारी को दी है। आरोप है कि ध्रुव राठी ने इंटरव्यू में भारतीय सेना और पुलिस को सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उकसाया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि ध्रुव राठी के बयान देश और केंद्र सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश तथा साजिश से जुड़े हैं। शिकायत में सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो का हवाला दिया गया है। शिकायतकर्ता ने ध्रुव राठी के आर्थिक स्रोतों और कथित संपर्को की जांच करने के साथ उनका पासपोर्ट जब्त करने की भी मांग की है।

देश का भविष्य चुनावों से तय नहीं होगा, प्रतिरोध से तय होगा- योगेंद्र यादव
जुलाई 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च के दौरान आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव ने कहा था कि इस देश का फ्यूचर संसद से नहीं सड़क से तय होगा। योगेंद्र यादव ने कहा था, “अब इस देश में लोकतंत्र का भविष्य संसद से तय नहीं होगा बल्कि सड़क से तय होगा। चुनावों से तय नहीं होगा, प्रतिरोध से तय होगा। और 20 तारीख़ को उसकी एक झलक, हमने देखी।” गौरतलब है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के खून में ही गद्दारी है। दोनों ने अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी बनाई थी, लेकिन केजरीवाल ने अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पार्टी से निष्कासित कर दिया था।

 

सड़कों पर 30,000 पुलिसकर्मी तैनात किए जाएं- राहुल
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी रिजीम चेंज के इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहते हैं। इसलिए वो भी सड़क पर उतर कर लोकतंत्र की हत्या करने की कोशिश में लग गए हैं। 12 अक्टूबर,2026 को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा था, “हम चाहते हैं कि सड़कों पर 20,000 से 30,000 पुलिसकर्मी तैनात किए जाएं। सरकार बहुत बड़ी गलती कर रही है, क्योंकि हम देश को दिखाना चाहते हैं कि मोदी जी ज्ञानेश कुमार को बचा रहे हैं… उन्हें जितनी ज़्यादा सुरक्षा मिलेगी, हम आखिरकार उनके कंट्रोलर तक उतनी ही आसानी से पहुंच पाएंगे”

जो भी कहना होगा, सड़क पर कहूंगा- राहुल गांधी
राहुल गांधी ने हाल ही में कहा था कि वे पुलिस और प्रशासन के दबाव से डरने वाले नहीं हैं और जनता के अधिकारों की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरेंगे। उनका कहना है कि सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को रोकने के लिए बैरिकेड्स और पुलिस बल का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन वे और उनका विपक्ष जनता की आवाज को सड़क से लेकर संसद तक उठाते रहेंगे। उन्होंने कहा, “हां, सरकार से मेरी बातचीत हो रही है, लेकिन मुझे फ़ोन कॉल की ज़रूरत नहीं है। मैं जो कहना चाहता हूं, वह सड़कों पर कहता हूं।”

सोशल और विदेशी मीडिया के माध्यम से प्रोपेगैंडा
सोशल मीडिया के माध्यम से मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव चलाया जा रहा है, ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार अलोकप्रिय और तानाशाही हो चुकी है। उसका जनाधार खत्म हो चुका है। इससे उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाना और आसान हो जाएगा। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया गिद्ध की तरह नजर गड़ाए बैठी हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंचों से सरकार के खिलाफ और प्रदर्शन के समर्थन में बयान जारी हो रहे हैं। इससे मोदी सरकार पर देश के बाहर से भी दबाव बनाने और सत्ता परिवर्तन की कोशिशें की जा रही हैं।

    अवलोकन करें:-
प्रशांत भूषण के खिलाफ शिकायत

प्रशांत भूषण के खिलाफ शिकायत

सुभाष चन्द्र

प्रशांत भूषण के देश विरोधी खुलेआम बयान देने पर Bar Council of India क्यों खामोश है? क्यों नहीं इस पर कोई कार्यवाही की गयी? क्या Bar Council of India प्रशांत के इस बयान को अप्रयत्क्ष अपना समर्थन दे रही है?   

यह शिकायत मैंने Bar Council of India ( bciinfo21@gmail.com) को भेजी है और उसकी प्रतिलिपि Delhi Police Commissioner को cpdelhi@delhipolice.gov.in भेजते हुए लिखा है “सूचनार्थ तथा इस विषय में दिल्ली पुलिस के वैधानिक अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले किसी भी पहलू पर विचार करने हेतु, यदि उपलब्ध सामग्री एवं साक्ष्य से कोई संज्ञेय अपराध प्रथम दृष्टया प्रकट होता हो”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
आप सभी से अनुरोध है कि आप भी ये शिकायत BCI को भेजें और कॉपी दिल्ली पुलिस आयुक्त को उपरोक्त शब्दों के साथ भेजें। मेरे नाम की जगह अपना नाम लिख दीजिए।

सेवा में,

अध्यक्ष महोदय,

बार काउंसिल ऑफ इंडिया

नई दिल्ली।

विषय: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ‘सत्ता परिवर्तन’ संबंधी व्यापक रूप से प्रसारित वक्तव्य की जाँच तथा कानून के अनुसार उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु अभ्यावेदन।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं आपका ध्यान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रशांत भूषण के उस कथित वक्तव्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ, जिसमें मीडिया में प्रकाशित एवं टेलीविजन पर प्रसारित समाचारों के अनुसार उन्होंने कहा कि “यह सत्ता परिवर्तन की लड़ाई है और हम इसे हासिल करेंगे” अथवा इसी आशय की बात कही।

किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना करना, नीतियों का विरोध करना और चुनावों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की माँग करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। परंतु यदि किसी वक्तव्य का वास्तविक आशय लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक प्रक्रिया के स्थान पर हिंसा, विद्रोह अथवा असंवैधानिक तरीकों से निर्वाचित सरकार को हटाने के लिए लोगों को उकसाना हो, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।

श्री प्रशांत भूषण एक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान, कानून के शासन तथा न्यायपालिका की गरिमा के प्रति विशेष जिम्मेदारी का निर्वहन करें। यदि किसी अधिवक्ता द्वारा ऐसे आचरण या वक्तव्य का प्रमाण मिलता है जो कानून और संवैधानिक व्यवस्था के प्रतिकूल हो, तो केवल उनके पेशेवर पद या प्रतिष्ठा के कारण उस पर विचार करने से बचा नहीं जाना चाहिए।

मैं यह अभ्यावेदन किसी व्यक्ति की सरकार की आलोचना करने अथवा शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन का समर्थन करने के अधिकार को सीमित करने के उद्देश्य से नहीं दे रहा हूँ। मेरी चिंता यह है कि कहीं उक्त वक्तव्य में हिंसा, विद्रोह या असंवैधानिक कार्रवाई के लिए उकसाने का कोई तत्व तो नहीं है। इसका निर्णय मीडिया की सुर्खियों या किसी पूर्वधारणा के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे वक्तव्य, उसकी प्रामाणिक रिकॉर्डिंग, संदर्भ और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच के बाद किया जाना चाहिए।

अतः आपसे विनम्रतापूर्वक अनुरोध है कि:

उक्त वक्तव्य की पूरी, बिना काट-छाँट वाली रिकॉर्डिंग अथवा प्रमाणित प्रतिलेख प्राप्त कर उसके संदर्भ सहित जाँच कराई जाए।

यह निर्धारित किया जाए कि क्या उपलब्ध सामग्री से अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के अंतर्गत पेशेवर अथवा अन्य कदाचार के संबंध में प्रथम दृष्टया कार्यवाही का आधार बनता है।

यदि जांच में कदाचार प्रमाणित होता है, तो कानून के अनुसार उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। जहां कानून अनुमति देता हो, वहाँ गंभीरता के अनुरूप निलंबन अथवा अधिवक्ताओं की सूची से नाम हटाने जैसी कार्रवाई पर भी विचार किया जाए।

यदि सामग्री से किसी संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया संकेत मिलता हो, तो उसे उचित कानूनी कार्रवाई के लिए संबंधित कानून-प्रवर्तन प्राधिकारी के संज्ञान में लाया जाए।

मुझे इस अभ्यावेदन पर की गई कार्रवाई अथवा लिए गए निर्णय से अवगत कराने की कृपा की जाए।

मेरा स्पष्ट मत है कि संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध हिंसा या असंवैधानिक कार्रवाई के लिए उकसाने के आरोप, यदि साक्ष्यों से समर्थित हों, तो उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साथ ही, प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष जाँच, अपना पक्ष रखने और कानून के अनुसार निर्णय पाने का अधिकार भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

मुझे आशा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया इस अभ्यावेदन पर निष्पक्षता, गंभीरता और कानून के अनुरूप विचार करेगी।

धन्यवाद,

भवदीय,

सुभाष चंद्र

दिल्ली में राहुल की सियासी नौटंकी, उधर पंजाब में अमरिंदर के इस्तीफे और पायलट-परगट की नियुक्ति से गुटबाजी चरम पर पहुंची


एक ओर दिल्ली में राहुल गांधी के विरोध-प्रदर्शनों की सियासी नौटंकी करने में मस्त हैं, दूसरी ओर पंजाब कांग्रेस में राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद अंदरूनी गुटबाजी चरम पर पहुंच गई है। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक साख बचाने और पंजाब जैसे अहम राज्य में बिखरते संगठन को एकजुट रखने की दोहरी चुनौती ने कांग्रेस आलाकमान को बेहद मुश्किल मोड़ पर खड़ा कर दिया है। पंजाब कांग्रेस का अंदरूनी घमासान इस समय उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां पार्टी की हर नई करवट और फैसला सुलह कराने के बजाय दरारों को और चौड़ा कर रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी कांग्रेस ने गुटबाजी को खत्म करने के लिए सचिन पायलट को प्रदेश प्रभारी बनाया और लंबे आंतरिक घमासान के बाद अमरिंदर सिंह की जगह पूर्व ओलंपियन परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि इन हाई-प्रोफाइल नियुक्तियों के बाद पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी थमने के बजाय और तेज हो गई है। एक तरफ प्रभारी सचिन पायलट खुद अपने गृह राज्य राजस्थान में इसी गुटबाजी के चक्रव्यूह में उलझकर मुख्यमंत्री की कुर्सी से चूक गए थे, वहीं दूसरी ओर परगट सिंह की अपनी छवि भी पूर्व में एक ‘बागी’ नेता की रही है। ऐसे में इन दोनों के लिए पंजाब के दिग्गज क्षत्रपों के अहं और स्वार्थ को शांत करना ‘लोहे के चने चबाने’ के समान बन गया है।

तीन दिग्गजों चन्नी, वड़िंग और रंधावा के त्रिकोण में फंसी कांग्रेस
पंजाब कांग्रेस की इस दिनों-दिन बर्बाद होती कहानी में तीन प्रमुख किरदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व लोकसभा सांसद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा। राजा वड़िंग के अध्यक्ष रहते हुए चन्नी और रंधावा गुट ने उनके खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल रखा था। अंदरूनी बैठकों में वड़िंग समर्थकों द्वारा विरोधी गुट को ‘पार्टी विरोधी’ तक कहे जाने के बाद चन्नी और रंधावा ने प्रभारी पायलट के सामने साफ कह दिया था कि वे वड़िंग के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते। यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि राजस्थान में कांग्रेस पार्टी में गहलोत वर्सेज पाटलट के घमासान के दौरान यही सुखजिंदर सिंह रंधावा प्रदेश प्रभारी बनकर राजस्थान आए थे। लेकिन गुटबाजी को खत्म नहीं करा पाए थे। अब पायलट को पंजाब में रंधावा और अन्य कांग्रेस दिग्गजों की गुटबाजी को दूर करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

पायलट की रिपोर्ट पर अमरिंदर को हटाने से गुटबाजी और तेज
पंजाब कांग्रेस प्रदेश प्रभारी पायलट की रिपोर्ट के बाद भले ही आलाकमान के हस्तक्षेप से राजा वड़िंग की विदाई हो गई हो, लेकिन यह आग बुझने के बजाए और तेज हो गई है। चन्नी खुद को दलित चेहरे के रूप में पेश कर 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद की दावेदारी ठोक रहे हैं, जबकि राजा वड़िंग का खेमा अपनी इस संगठनात्मक हार को आसानी से पचाने को तैयार नहीं है। अमरिंदर के समर्थकों को लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में टिकटों के वितरण में उन्हें फायदा होगा। लेकिन चुनाव से पहले ही अमरिंदर की कुर्सी छिन जाने से समर्थकों में काफी रोष है। वहीं सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे कद्दावर नेता अपनी वरिष्ठता और प्रभाव के दम पर किसी भी नए समीकरण को चुनौती देने की ताकत रखते हैं। यह तीनों गुट मिलकर पंजाब कांग्रेस को एक ऐसा अखाड़ा बना चुके हैं जहां दुश्मन बाहरी दल नहीं, बल्कि पार्टी के ही साथी हैं।

सचिन पायलट अपने राज्य में ही गुटबाजी के चक्रव्यूह में फंसे रहे
इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए आलाकमान ने जिन दो चेहरों को आगे किया है, उनकी अपनी सीमाएं और राजनीतिक इतिहास इस लड़ाई को और पेचीदा बनाता है। पायलट के प्रदेश प्रभारी बनने के बाद पंजाब में उनके विरोधी नेता उन पर यह तंज कसने से नहीं चूकते कि जो नेता अशोक गहलोत के ‘जादू’ के सामने अपनी राजनीतिक जमीन पूरी तरह नहीं बचा पाया और डिप्टी सीएम से आगे नहीं बढ़ सका, वह पंजाब के दिग्गज नेताओं को कैसे अनुशासित करेगा? पंजाब में पायलट की भूमिका एक निष्पक्ष पंच की जरूर है, लेकिन गुटों के इस दलदल में न्यूट्रल दिखना उनके लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। यह वाकई तार्किक सवाल है कि जो नेता खुद अपने ही राज्य राजस्थान की आंतरिक गुटबाजी और सत्ता संघर्ष (अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट) के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाया, वह पंजाब कांग्रेस में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, चरणजीत सिंह चन्नी प्रताप सिंह बाजवा जैसे धुरंधरों के बीच की गहरी खाई को कैसे पाट पाएगा? कांग्रेस आलाकमान द्वारा पिछले माह में सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के पीछे यही सबसे बड़ी चुनौती है। पंजाब प्रभारी बनने के बाद उन्होंने बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के सामूहिक नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने की बात कही है, लेकिन यह सीएम पद के दावेदार नेताओं के गले नहीं उतर रही है।

खुद राजनीतिक विद्रोही रहे परगट कैसे संभालेंगे पार्टी में बगावत
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की लगातार बढ़ती आंतरिक गुटबाजी के बीच आलाकमान ने पूर्व हॉकी प्लेयर परगट सिंह को पंजाब कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया है। कांग्रेस ने जिनको पार्टी में विद्रोह को थामने की जिम्मेदारी सौंपी है, वो परगठ सिंह खुद ही कभी राजनीतिक विद्रोही रह चुके हैं। दरअसल, भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कप्तान रह चुके परगट सिंह ने 2012 में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनावी राजनीति में कदम रखा और सीट जीत ली। लेकिन अगले कुछ वर्षों में पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंध बदतर होते गए। उनके राजनीतिक विद्रोह के चलते 2016 में उन्हें शिअद से निलंबित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए नवजोत सिंह सिद्धू और बैंस बंधुओं के साथ मिलकर आवाज-ए-पंजाब बनाई। लेकिन यह मोर्चा भी मतभेदों के चलते ज्यादा समय तक नहीं चला। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले परगट कांग्रेस में शामिल हो गए। अब करीब एक दशक बाद उन्हें पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। सवाल यही है कि बगावती तेवरों वाले परगट सिंह पार्टी में गुटबाजी का थाम पाएंगे, या फिर अपना एक और गुट बनाएंगे।

चन्नी बनाम वड़िंग खेमे में सीधा टकराव: परगट सिंह को पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का बेहद करीबी माना जाता है। चन्नी की सिफारिश पर ही परगट सिंह को कमान मिली है, जिससे चन्नी खेमा मजबूत हुआ है। ऐसे में राजा वड़िंग के समर्थक इस नए नेतृत्व को आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
समानांतर शक्ति केंद्रों का टकराव: जुलाई 2026 में हाईकमान ने वड़िंग को अध्यक्ष बनाए रखा था और चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया था। अब संगठन का नेतृत्व बदलने से दोनों गुटों के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई और ज्यादा खुलकर सामने आ गई है।
संगठनात्मक ढांचे में फेरबदल का डर: राजा वड़िंग ने अपने कार्यकाल के दौरान पंजाब के कई जिलों में अपने करीबी नेताओं को जिला अध्यक्ष नियुक्त या बरकरार रखा था। नए अध्यक्ष परगट सिंह के आने के बाद इन पदों पर बदलाव की पूरी संभावना है, जिससे जमीनी स्तर के नेताओं में असंतोष बढ़ेगा।
प्रताप सिंह बाजवा की भूमिका: पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा का भी राज्य कांग्रेस में अपना एक अलग मजबूत आधार है। पहले वड़िंग और बाजवा के बीच तालमेल की कमी की खबरें थीं, और अब चन्नी-परगट गुट के हावी होने से त्रिकोणीय सत्ता संघर्ष (चन्नी बनाम बाजवा बनाम वड़िंग) तेज हो सकता है।
विधानसभा के लिए टिकटों की होड़: पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। नया नेतृत्व आने से अब सभी धड़े अपने-अपने समर्थकों को टिकट दिलवाने के लिए लॉबिंग तेज करेंगे, जिससे टिकट बंटवारे के दौरान अंदरूनी कलह चरम पर पहुंच सकती है।

पुराने-नए नेताओं का वैचारिक मतभेद: परगट सिंह और चन्नी का गुट पार्टी में अलग रणनीति चाहता है, जबकि कैप्टन अमरिंदर सिंह के जाने के बाद से ही कांग्रेस में पुराने वफादारों और नए उभरे नेताओं के बीच एक अदृश्य जंग चल रही है जो इस बदलाव से और भड़क सकती है।
एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ना: 2022 की विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। राजा वड़िंग के इस्तीफे को वड़िंग विरोधी खेमा अपनी जीत के रूप में देख रहा है, जिससे वड़िंग समर्थक बदला लेने की फिराक में रहेंगे।
हाईकमान के हस्तक्षेप पर नाराजगी: प्रभारी सचिन पायलट की रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी के निर्देश पर राजा वड़िंग को हटाया गया है। पंजाब कांग्रेस के एक धड़े का मानना है कि दिल्ली दरबार स्थानीय समीकरणों को समझे बिना फैसले ले रहा है, जिससे अंदरूनी असंतोष और गहरा गया है। आलाकमान ने उस नेता की रिपोर्ट पर एक्शन लिया है, जो अपने राज्य में गुटबाजी से पार नहीं पा पाया था।
कैडर और कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति: राजा वड़िंग ने हाल ही में सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद (साप्ताहिक संवाद) शुरू किया था। अचानक नेतृत्व बदलने से जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि वे किस धड़े के प्रति अपनी वफादारी दिखाएं।
विपक्षी दलों के लिए रास्ता साफ: कांग्रेस की इस निरंतर अंदरूनी खींचतान का सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है, क्योंकि राज्य में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के खिलाफ एंटी इन्क्मबेंसी दिख रही है। जब पार्टी के बड़े नेता आपस में लड़ेंगे, तो असंतुष्ट नेताओं का दूसरे दलों में जाने का सिलसिला और तेज हो सकता है, जो गुटबाजी का सबसे बड़ा दुष्परिणाम होगा।

क्या विधानसभा चुनाव से पहले थमेगा कांग्रेस पार्टी का बवंडर?
अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में दोनों नेताओं की हालिया संयुक्त यात्रा के जरिए पार्टी ने एकजुटता दिखाने का कुछ औपचारिक प्रयास तो किया है, लेकिन अंदरूनी लावा अभी उबल रहा है। दरअसल, राजनीति में तस्वीरें जितनी सहज दिखती हैं, धरातल पर परिस्थितियां उतनी ही जटिल होती हैं। पंजाब कांग्रेस में नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ और अहं की लड़ाई इस स्तर पर है कि यहां कई नेता खुद को भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण के समय यह असंतोष और बड़े धमाके के रूप में सामने आ सकता है। यदि पायलट और परगट इन दिग्गज क्षत्रपों के व्यक्तिगत हितों को पार्टी के हित के पीछे झुकाने में नाकाम रहते हैं, तो पंजाब में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीदें इस अंतहीन गुटबाजी की भेंट चढ़ जाएंगी।

राहुल गांधी की आज फैली हुई अराजकता के लिए सिर्फ सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है; अभी “दामाद जी” के एक केस पर फिर रोक लगा दी

सुभाष चन्द्र

इसमें कोई शक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट आज राहुल गांधी के उद्दण्ड बर्ताव के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। क्या हुआ अगर आज सुप्रीम कोर्ट ने उसे कोर्ट के बाहर प्रदर्शन ने लिए फटकार लगा दी? ऐसा करने का साहस भी तो उसे सुप्रीम कोर्ट ने ही दिया जो राहुल गांधी का हर केस उसे “दामाद” समझ कर रोक देता है। अब भुगतो उसकी कारगुजारी।

कहते हैं ना कि जब आग की लपटें अपने ऊपर आती हैं तभी मालूम होता है आग क्या है। सुप्रीम कोर्ट पर उद्दण्ड़ होने पर सुप्रीम कोर्ट को मालूम हुआ कि विपक्ष द्वारा CAA से लेकर पहलवानों के हंगामे को कभी कोर्ट ने गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अब वर्तमान उद्दण्ड जब सुप्रीम कोर्ट के अंदर पहुँचने पर होश आया। रविवार को क्यों खोली कोर्ट?  

लेखक 
चर्चित YouTuber 
सुप्रीम कोर्ट के  Justices B.R. Gavai, P.S. Narasimha, and Sanjay Kumar ने मोदी सरनेम वाले केस में राहुल गांधी की दोषसिद्धि पर रोक लगा कर उसे उद्दंड बना दिया। गवई ने शुरू में ही कह दिया था कि वो कांग्रेस परिवार से आते हैं। भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी को तभी उनके बेंच में बैठने पर ऐतराज उठा देना चाहिए था। गवई ने राहुल को 4 अगस्त 2023 को जीवनदान दे दिया।

उसके बाद से राहुल गांधी देश में ही नहीं विदेशों में भी भारत को बदनाम करने में लग गया। और अब वोट चोरी के और ज्ञानेश कुमार के विरोध के नाम पर देश में अराजकता फैला रहा है। गवई ने अगर न छोड़ा होता तो अभी और कई साल सांसद भी न होता।

जो भी केस राहुल गांधी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, उसे बर्फ में लगा दिया गया। सावरकर के अपमान का केस तो खारिज ही कर दिया और सेना के अपमान का केस लटका हुआ है। CBI/ED की राहुल गांधी की संपत्ति की जांच पर रोक लगा दी। सोनिया गांधी का नाम वोटर लिस्ट में बिना नागरिकता जुड़ने के केस की सुनवाई 29 सितंबर को ACJM कोर्ट में होनी थी लेकिन सेटिंग ऐसी हुई कि सुनवाई हुई ही नहीं और कुछ पता भी नहीं कब होगी।

राहुल गांधी को भरोसा हो गया कि सुप्रीम कोर्ट उसे हर मामले में बचा लेगा और इसलिए ही वह आपे से बाहर हो रहा है।

पिछले महीने 8 सितंबर, 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट जस्टिस एनआर बोरकर ने राहुल गांधी को 2019 में मजिस्ट्रेट कोर्ट के समन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “2019 में मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई गैर कानूनी बात नहीं मिली”। मामला भाजपा सदस्य एमएच श्रीश्रीमल की मानहानि की शिकायत पर दर्ज हुआ था कि राहुल गांधी ने 2018 राफेल सौदे को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को “चोरों का सरदार” (Commander in Thief”) कहा था। ध्यान दीजिए हाई कोर्ट में समन के मामले में आदेश 7 साल बाद हुए।

फिर क्या था राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ। जैसा पहले होता आया है, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता को 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी कर दिया और ट्रायल कोर्ट में कार्रवाई पर रोक जारी रखने के आदेश दे दिए। राहुल गांधी का वकील था सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक मनु सिंघवी।

ये 4 सप्ताह का नोटिस कितना लंबा होगा, कह नहीं सकते, ये 4 महीने भी चल सकता है और 40 महीने भी क्योंकि सिंघवी पक्का तिकड़मी वकील है।

सारा लफड़ा यह है कि सुप्रीम कोर्ट ट्रायल कोर्ट में फैसला होने की नौबत ही नहीं आने देता। बस मोदी सरनेम में फैसला हुआ और वो भी सुप्रीम कोर्ट ने गंगा जी में बहा दिया। और इसलिए ही राहुल गांधी अनाप शनाप बोलता है। उसे जैसे सुप्रीम कोर्ट से अभय दान मिला हुआ है।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व निष्क्रिय और भ्रष्ट, पार्टी बदले अपना नेता: मुख्यमंत्री योगी की सलाह – अराजकता छोड़ दें कांग्रेसी, वरना जो बचा है वो भी गँवा देगी

                 योगी आदित्यनाथ का कांग्रेस पर तीखा हमला, बोले- अराजकता की राजनीति छोड़ दे पार्टी
कांग्रेस की राजनीति पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 12 अक्टूबर 2026 को तीखा हमला बोला। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अब
अराजकता का दूसरा नाम बन चुकी है। योगी ने साफ चेतावनी दी कि अगर कांग्रेस ने यही रवैया जारी रखा तो जनता उसका बचा-खुचा राजनीतिक वजूद भी खत्म कर देगी।

मुख्यमंत्री योगी का कहना था कि कांग्रेस हार से सबक लेने की जगह लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को ही कठघरे में खड़ा करने में लगी है। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को जनता बार-बार ठुकरा रही है, उसे यह समझना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। भारत की जनता लोकतांत्रिक मामलों में जागरूक है और अराजक आचरण को ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं करेगी।

पहचान का संकट… फिर भरोसा भी गँवाया

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने गैर-जिम्मेदाराना रवैये से देश में अराजकता का माहौल बना दिया है। उनके मुताबिक पार्टी ने पहले देश के भीतर पहचान का संकट पैदा किया और फिर अपने भ्रष्ट इरादों की वजह से जनता का विश्वास खो बैठी। 

योगी ने कहा कि इसके बाद भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के तौर-तरीके नहीं बदले। जनता के लगातार नकारने की वजह खोजने के बजाय वे चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश में जुटे हैं।

उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को नसीहत दी कि अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने से पहले आईने में देखें और अपने आचरण पर आत्ममंथन करे।

उत्तर प्रदेश ने 41 साल पहले ही दिखा दिया था बाहर का रास्ता

कांग्रेस के सिकुड़ते जनाधार की बात करते हुए योगी ने याद दिलाया कि उत्तर प्रदेश की जनता ने 41 साल पहले ही इस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया था। 1985 के बाद पार्टी प्रदेश की सत्ता में कभी वापस नहीं लौट पाई। 

उन्होंने कहा कि यही कहानी बाकी राज्यों में भी दोहराई गई, जहाँ एक-एक करके जनता का कांग्रेस से मोहभंग होता चला गया। फिर भी पार्टी नेतृत्व यह मानने को तैयार नहीं कि समस्या जनता में नहीं, उसकी अपनी राजनीति में है।

दिल्ली में अव्यवस्था फैलाने का आरोप

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि बीते कई दिनों से कांग्रेस देश की राजधानी दिल्ली में लगातार अव्यवस्था फैला रही है, जिससे आम लोग परेशान हो रहे हैं। उन्होंने इसे संवैधानिक संस्थाओं की साख पर सवाल उठाने की घटिया कोशिश बताया। 

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध की जगह है, पर इसके नाम पर जनता को तंग करना और संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाना किसी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जीते तो अपना पुरुषार्थ, हारे तो EVM और चुनाव आयोग दोषी

कांग्रेस के दोहरे रवैये पर तंज कसते हुए सीएम योगी ने कहा कि चुनाव जीत जाएँ तो यह उनका पुरुषार्थ होता है, लेकिन हारते ही EVM और चुनाव आयोग गुनहगार हो जाते हैं। 

अदालत अगर मेरिट के आधार पर फैसला दे दे तो न्यायपालिका को भी कटघरे में खड़ा करने और धमकाने की कोशिश होती है। सीएम योगी के अनुसार यही बर्ताव बाकी संवैधानिक संस्थाओं के साथ भी दिखता है। गाली-गलौज, संस्थाओं की साख पर सवाल और अव्यवस्था फैलाना कांग्रेस की राजनीतिक आदत बन चुका है।

CM का सुझाव- नेतृत्व बदलने पर विचार करे कांग्रेस 

मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेताओं से अपने शीर्ष नेतृत्व की निष्क्रियता और भ्रष्ट आचरण पर विचार करने को कहा। उनका कहना था कि जिस नेतृत्व पर जनता का भरोसा ही नहीं बचा, उसे बदलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हार का दोष मढ़ने से खोई हुई जमीन वापस नहीं मिलेगी। साथ ही उन्होंने कांग्रेस को जनता और खासकर युवाओं को गुमराह करने से बाज आने की सलाह दी।

योगी ने कहा कि कांग्रेस के लिए बेहतर यही होगा कि वह अराजकता छोड़कर मुद्दों पर और मेरिट के आधार पर बहस करे और स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बनें। उनके मुताबिक यही देश, लोकतंत्र और जनता, तीनों के हित में है।

सुप्रीम कोर्ट में एक काल्पनिक सुनवाई: यह अपनी तरह का एक व्यंग है

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस और करीब दस दलों ने सुप्रीम कोर्ट में 12 अक्टूबर को चुनाव आयोग द्वारा किए गए SIR के खिलाफ याचिका दायर की और उसी दिन इन सभी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला। 10 अक्टूबर के CJP के प्रदर्शन को समर्थन देने वाले दल “आप”CPI और TMC शामिल थे जबकि याचिका दायर करने वालों में “आप” नहीं थी, CPI और TMC थी। 

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अब काल्पनिक सुनवाई का नज़ारा देखिए - 

सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच के सामने 20 से ज्यादा बड़े बड़े वकील खड़े हो गए और चेले चपाटे 100 से ज्यादा थे।

चीफ जस्टिस ने पूछा आप किसलिए आए हैं क्या मामले हैं आपके?

एक वकील बोला - जनाब चुनाव आयोग ने SIR में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की है, लाखों लोगो के नाम बिना वजह मतदाता सूची से हटा दिए। उसके खिलाफ ही हम फरियाद लेकर आए हैं।

चीफ जस्टिस बोले - आपकी बात हम बाद में देखेंगे, उसके पहले हमारी बातों का जवाब दीजिये। 

वकील - जी जनाब कहिए क्या पूछना है?

चीफ जस्टिस - जब आपने 12 अक्टूबर को याचिका दायर कर दी जो Defective थी, तो फिर उसी दिन सुप्रीम कोर्ट तक आप सभी का मार्च निकालने का क्या मतलब था, क्या आप हमें मार्च निकाल कर डराने की कोशिश कर रहे थे? आपके नेता तो अपने लोगों के साथ आकाशवाणी भवन में घुसने की कोशिश कर रहे थे? 

वकील - नहीं जनाब, प्रदर्शन करना तो हमारा मौलिक अधिकार है।

चीफ जस्टिस - फिर प्रदर्शन से मामला सुलझा लीजिए हमने क्या मतलब है?

इसके बाद चीफ जस्टिस ने सभी से पूछा कि “क्या आप मर्द हैं” 

वकील जी जनाब हम में अधिकतर मर्द हैं।

चीफ जस्टिस - फिर 10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन में इस नारे का क्या मतलब था “एक कचौरी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा”? इसका जवाब CPI और TMC के वकील दें जो CJP के आंदोलन को समर्थन दे रहे थे। इस नारे का CEC को हटाने से क्या मतलब है ?

कोर्ट में सन्नाटा छा गया -

फिर चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या हम महिला वकीलों को कोर्ट में practice के लिए ड्रेस कोड की जगह “Undergarments” में आने की इजाजत दे दें क्योंकि प्रदर्शन में लड़कियां “Undergarments” में थी और कह रही थी कि अगर लड़के चड्डी बनियान में घूम सकते हैं तो हम क्यों नहीं? इस बात का CEC को हटाने से क्या मतलब था ?

कोर्ट में सन्नाटा छाया रहा।

फिर चीफ जस्टिस एक और बड़े वकील पर बरसे और कहा कि “आप तो कहते हो अब सुप्रीम कोर्ट जाने का दिल नहीं करता क्योंकि अब कोर्ट पर भरोसा नहीं रहा” तो फिर यहां क्या तेल लेने आए हो ?

वकील की घिग्घी बंध गई।

फिर चीफ जस्टिस दूसरे वकील पर बरसे - आप तो bloodshed से Revolution की बात कर रहे थे कल, फिर सुप्रीम कोर्ट से क्या मतलब है?

वकील दाएं बाएं देखने लगा और बोला, जनाब मेरी बात का गलत मतलब निकाला गया।

चीफ जस्टिस गरजे - हमें बेवकूफ समझ रखा है, इस बात पर हम तुम्हारी practice पर बैन लगा सकते हैं।

चीफ जस्टिस ने फिर वकीलों से पूछा कि आपको SIR से परेशानी है और वोट चोरी का आरोप लगा रहे हो तो फिर आपकी पार्टियां तमिलनाडु और केरल में कैसे जीत गई? 

कोर्ट में फिर सन्नाटा छा गया।

एक सवाल और किया चीफ जस्टिस ने कि आप में से कोई भी वकील बता सकता है कि एक 14 साल की लड़की का NEET आंदोलन से क्या मतलब था और वो वहां मोदी की तेरहवीं के समोसे और खाना बांट रही थी और उसका ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से क्या मतलब है जबकि उसका तो वोट ही नहीं है?

सुई पटक सन्नाटा छाया रहा कोर्ट में।

चीफ जस्टिस ने पूछा कांग्रेस का वकील कौन है - एक बोला, जनाब मैं हूँ।

CJI भड़क गए - तुम्हें मेरा इस्तीफ़ा चाहिए, बोलो, क्या यहां तुम्हारे हाथ में सौंप दू क्या? तुम्हारी औकात है क्या नया चीफ जस्टिस बनाने की? 

वकील खामोश।

फिर चीफ जस्टिस ने सुनवाई स्थगित कर दी - अगली तारीख बता दी जाएगी।

राहुल गांधी को ‘इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर’! कांग्रेसी सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक हुए गुस्से का शिकार


भारत में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों ने लगभग 60 वर्षों तक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शासन किया है। इसलिए
नेहरू- गांधी परिवार का हर सदस्य भारत पर राज करने का “जन्मसिद्ध अधिकार” मानता है। इससे कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी को ‘बॉर्न टू रूल’ सिंड्रोम की बीमारी हो गई। यह बीमारी समय के साथ बढ़ती गई। पूर्व कांग्रेसी प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने इसे ‘ईसीएस-एंटाइटल्ड चाइल्ड सिंड्रोम’ का नाम दिया। यह ऐसी बीमारी होती है, जिसमें व्यक्ति बिना मेहनत किए सब कुछ मेरा है और मेरी हर जिद तुरंत पूरी होनी चाहिए की मानसिकता रखता है। अपनी हर मांग या इच्छा को तुरंत पूरा होते देखना चाहता है। अपनी गलतियों या कम नंबरों के लिए दूसरों (जैसे शिक्षकों या माता-पिता) को दोष देता है। जब व्यक्ति बार-बार असफल होने लगता है तो ‘ईसीएस-एंटाइटल्ड चाइल्ड सिंड्रोम’ की बीमारी ‘इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर’ में बदल जाती है। इस समय राहुल गांधी में इस बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।

क्या है इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर (IED) ?
यदि किसी व्यक्ति में बार-बार अचानक अत्यधिक गुस्सा या हिंसक outbursts आते हैं (चाहे वह भीड़ में हो या अकेले), तो इसे चिकित्सकीय भाषा में ‘इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर’ (Intermittent Explosive Disorder – IED) कहा जाता है। यह एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है जिसमें व्यक्ति को अचानक और बिना किसी उकसावे के गुस्से या हिंसा के छोटे दौरे पड़ते हैं। बहुत छोटी या सामान्य बात पर भी व्यक्ति अचानक बहुत अधिक चिल्लाने, चीखने या हिंसक होने लगता है। कई बार इस तरह के गुस्से के फटने से ठीक पहले व्यक्ति को अंदरूनी तनाव, बेचैनी, मूड में बदलाव या ऊर्जा के स्तर में उतार-चढ़ाव महसूस हो सकता है। इसमें व्यक्ति अपना और पराया नहीं देखता है। किसी भी व्यक्ति पर भड़क जाता है।

इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर से पीड़ित हैं राहुल गांधी 
राहुल गांधी ने खुद व्यक्तिगत तौर पर केवल एक बार लोकसभा चुनाव हारा है। राजनीतिक आंकड़ों और भारतीय जनता पार्टी तथा राजनीतिक विश्लेषकों के दावों के अनुसार, उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी अलग-अलग राज्यों के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में करीब 99 बार हार चुकी है। इससे राहुल गांधी का आत्मविश्वास और धैर्य खत्म हो चुका है। वो मानसिक रूप से काफी असंतुलित हो चुके हैं। 12 अक्टूबर, 2026 को दिल्ली के बाराखंभा से सुप्रीम कोर्ट तक कांग्रेस के ‘चलो दिल्ली’ मार्च के दौरान राहुल गांधी के व्यवहार में जो आक्रामकता देखने को मिली, उससे पता चलता है कि वो ‘इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर’ के शिकार हो चुके हैं। जिस तरह उन्होंने भीड़ के बीच अपना व्यक्तिगत नैतिकता या विवेक खोया, उसकी अपेक्षा किसी जिम्मेदार सांसद और नेता प्रतिपक्ष से नहीं की जा सकती।

राहुल ने सीएम डी.के. शिवकुमार का कॉलर पकड़कर खींचा
कांग्रेस के ‘चलो दिल्ली’ मार्च के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। भीड़ और हलचल के बीच सामने आए वीडियो में राहुल गांधी कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का कुर्ता/कॉलर पकड़कर उन्हें जबरदस्ती पीछे खींचते हुए नजर आए। इसके अलावा उनके सुरक्षाकर्मियों (गार्ड्स) द्वारा भी धक्का-मुक्की किए जाने का दावा किया गया। राहुल गांधी को अच्छे से पता था कि उनके बगल में दक्षिण भारत के एक प्रमुख राज्य के सीएम चल रहे हैं, फिर भी उन्होंने ऐसा किया। इस घटना को लेकर दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक की राजनीति गरमा गई। बेंगलुरू साउथ सीट से बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने एक्स पर वह वीडियो शेयर किया, जिसमें राहुल गांधी की हरकत को उन्होंने कर्नाटक की सात करोड़ जनता का अपमान बताया।

राहुल गांधी ने दीपेंद्र हुड्डा को गाड़ी से नीचे उतारा
सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि राहुल गांधी ने दीपेंद्र हुड्डा को ट्रक से नीचे उतार दिया। वीडियो में देखा जा सकता है कि मार्च के दौरान ट्रक पर मौजूद राहुल गांधी अचानक पीछे मुड़ते हुए दिखाई देते हैं। पीछे खड़े दीपेंद्र हुड्डा के कंधे पर हाथ रखकर नीचे जाने का इशारा करते हैं। इस दौरान दीपेन्द्र हुड्डा उनसे बात करने की कोशिश करते हैं। इसके बाद हुड्डा नीचे की ओर चले जाते हैं। इस घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। कुछ लोग इसे दीपेंद्र हुड्डा के राजनीतिक कद से जोड़कर देख रहे हैं। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कांग्रेस और हुड्डा परिवार पर निशाना साधा।

 

राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ता को मारी कोहनी 
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को कोहनी मारने में एक्सपर्ट है। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए पैदल मार्च के दौरान राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को भी नहीं छोड़ा। एक और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें राहुल गांधी ने भीड़ के बीच रास्ते से हटने के लिए अपने ही पार्टी कार्यकर्ता को कोहनी मारी। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि भीड़भाड़ वाले रास्ते से निकलते समय राहुल गांधी का हाथ या कोहनी पास चल रहे एक व्यक्ति से टकराते हुए दिखाई देती है। राहुल गांधी के ‘दिमाग’ की क्या हालत है, उसका अंदाज़ा आप इस वीडियो से लगा सकते हैं।

अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को दिया धक्का
कांग्रेस के ‘चलो दिल्ली’ मार्च के दौरान राहुल गांधी भीड़ में काफी असहज दिखाई दे रहे थे। कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने बीच राहुल गांधी को पाकर काफी जोश में थे, लेकिन राहुल गांधी ने उनके उत्साह पर उस समय पानी फेर दिया, जब वो उनके पास आने की कोशिश कर रहे थे। राहुल गांधी ने ना सिर्फ कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई, बल्कि उन्हें धक्के देकर अपमानित किया। कार्यकर्ताओं के साथ राहुल गांधी का यह बर्ताव उनके अहंकार को साबित करता है, जो कार्यकर्ताओं के बीच भी खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। हैरानी की बात यह है कि जो व्यक्ति अपने कार्यकर्ताओं को संभाल नहीं सकता, वो देश संभालने का स्वप्न देख रहा है।

राहुल गांधी ने महिला पत्रकार को दिया धक्का
दिल्ली में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट के मार्च के दौरान बिहार की एक प्रेग्नेंट महिला पत्रकार ऋचा परासर के साथ बदसलूकी का मामला गरमा गया है। महिला पत्रकार ने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट के अंदर थी और गेट के पास खड़ी थी कि जब यहां से निकलेंगे तो राहुल गांधी की बाइट ले लूंगा। मैं कोई इनफ्लुएंशर नहीं हूं। राहुल गांधी आते हैं, मैंने जैसे ही माइक बढ़ाया। उन्होंने मेरा माइक हटा दिया। जब बाकी लोग माइक लगाने लगे तो मैंने फिर लगाया। मेरे कैमरामैन मेरे पीछे थे। राहुल गांधी ने मेरा हाथ पकड़ा और आगे की तरफ खींचा। तब तक उनके बॉडीगार्ड्स ने खींचकर धक्का दे दिया। मैं मुंह के बल सीढ़ियों पर गिर गई। सबसे पहले राहुल गांधी ने पकड़ा। इसका वीडियो है। राहुल गांधी ने खुद मेरे कैमरा पर्सन को धक्का दिया। उन्होंने फोन दिखाते हुए कहा, मेरा फोन भी टूट गया।”

3 महीने की गर्भवती हैं महिला पत्रकार
ऋचा ने बताया कि वह 3 महीने की गर्भवती हैं और इस घटना के बाद सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती हैं। फिलहाल उनकी हालत ठीक है, लेकिन इस घटना से वह काफी आहत हैं। यह घटना उनके लिए दिल दहलाने वाली है। एक गर्भवती महिला पत्रकार के साथ इस तरह के व्यवहार के बाद कोई संवेदनहीन व्यक्ति ही राहुल गांधी के साथ खड़ा हो सकता है। कांग्रेस की तरफ से इस घटना को लेकर कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। वहीं बीजेपी ने इस मामले में राहुल गांधी पर हमला बोला है और उन पर गुंडों जैसा बर्ताव करने का आरोप लगाया है। भीड़ में राहुल गांधी का यह अराजक व्यवहार बताता है कि वो ‘इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर’ से पीड़ित है।

प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने पैरों में फेंका संविधान
कांग्रेस का तर्क है कि चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन के माध्यम से संविधान को बचाने की वैचारिक लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन संविधान बचाने की लड़ाई की सच्चाई 7 अक्टूबर, 2026 को दिल्ली की सड़कों पर सामने आई, जब राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर चल रहे प्रदर्शन में संविधान को अपने पैर के पास नीचे फेंक दिया। राहुल गांधी की इस अपमानजनक हरकत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें देखा जा सकता है कि राहुल गांधी संविधान फेंक कर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का अपमान कर रहे हैं।

अनुरोध करता रहा पुलिस अधिकारी, नहीं माने राहुल 
राहुल गांधी ने संविधान फेंक कर संदेश दिया है कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर के विचारों को भी अपने पैरों तले रौंद दिया है। अब संविधान और लोकतंत्र बचाना उनका मकसद नहीं है। उन्होंने संविधान फेंकर अपने हाथों में विदेशी ताकतों का ‘टूलकिट’ (ऐसी पुस्तिका, जिसमें आंदोलन की कार्ययोजना हो) थाम लिया है, जिसमें भारत की बर्बादी की पटकथा लिखी हुई है। हाल के दिनों में राहुल गांधी इसी पटकथा के मुताबिक दिल्ली की सड़कों पर अराजकता पैदा करते नजर आ रहे हैं। अपने विदेशी आकाओं को खुश करने के लिए कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं। दिल्ली पुलिस का अधिकारी बार-बार अनुरोध करता रहा, “मैं आप से रिक्वेंस्ट कर रहा हूं, हजारों की भीड़ है, किसी को चोट लग जाएगी। आप बताएं कैसे होगा? आप कोऑपरेट कीजिए सर…।’ इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी जिद पर अड़े रहे और राजशाही मानसिकता और अहंकार का परिचय देते रहे।

राहुल गांधी ने महिला पुलिसकर्मी के साथ की बदसलूकी
राहुल गांधी ने प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की एक महिला कांस्टेबल को गलत तरीके से छूने की कोशिश की। उन्होंने महिला कांस्टेबल को धक्का दिया और उससे बदसलूकी की। राहुल गांधी ने महिला कांस्टेबल को तब धक्का दिया, जब वह अपनी टीम के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर बुधवार 7 अक्टूबर को प्रदर्शन में शामिल एक महिला प्रदर्शनकारी को हटाने की कोशिश कर रही थी। दिल्ली पुलिस ने वायरल वीडियो की जांच शुरू कर दी है और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से मारपीट, धक्का-मुक्की और महिलाकर्मियों पर हमले के संबंध में विभिन्न थानों में एफआईआर (FIR) दर्ज की हैं। पुलिस यह भी देख रही है कि प्रदर्शन के दौरान किन लोगों की ओर से पुलिसकर्मियों के साथ कथित तौर पर मारपीट या ड्यूटी में बाधा डालने की घटना हुई।

राहुल ने खोया मानसिक संतुलन, हिंसक होता बर्ताव
दरअसल, लगातार हार से कांग्रेस खेमे में हताशा और निराशा है। राहुल गांधी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। तथ्यहीन और काल्पनिक आरोपों के आधार पर चुनाव आयोग पर हमले कर रहे हैं। अगर उनके पास ‘वोट चोरी’ का सबूत है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सबूत पेश करना चाहिए। लेकिन वो ऐसा नहीं करना चाहते हैं। उनका मकसद संवैधानिक संस्थाओं का तमाशा बनाकर उनकी विश्वसनीयता खत्म करना है, ताकि असंवैधानिक तरीके से सत्ता पर काबिज हो सके। राहुल गांधी की बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि वो अपना धैर्य खो चुके हैं। वो आम चुनाव के लिए ढाई साल तक इंतजार नहीं करना चाहते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल करने की जगह अराजकता और अफरातफरी का माहौल बना कर बांग्लादेश और नेपाल की तरह तुरंत सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। उनके अंदर की हिंसक मनोवृति और इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर को इस वीडियो में देखा जा सकता है।