जब हिन्दू विरोधी नेहरू ने सनातन प्रेमी जाने-माने उद्योगपति डालमिया को झूठे मुकदमों में फंसाकर कंगाल बना दिया


कुछ बातें विरासत में मिलती हैं। जिस कांग्रेस को हिन्दू हिन्दूहितैषी मान सिरमौर बनाए हुए है वह घोर हिन्दू विरोधी है। आज का तथाकथित गाँधी परिवार जिस तरह कोट पर जनेऊ पहन हिन्दू होने का स्वांग रचना, पुरुषोत्तम श्रीराम को काल्पनिक बताना, चुनावी हिन्दू बन हिन्दुओं को गुमराह करना तो हिन्दुओं को जातियों में बाँटना आदि कोई नई बात नहीं। किसी भी INDI गठबंधन पार्टी में किसी और मजहब का जातियों में बाँटने की हिम्मत नहीं। खैर।
डालडा और नेहरू आप सोच रहे होंगे डालडा और नेहरू का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर है, बहुत गहरा।
डालडा हिन्दुस्तान लिवर का देश का पहला वनस्पति घी था
जिसके मालिक थे स्वतन्त्र भारत के उस समय के सबसे धनी सेठ रामकृष्ण डालमिया
टाटा, बिड़ला और डालमिया ये तीन नाम बचपन से सुनते आए है।
मगर डालमिया घराना अब न कही व्यापार में नजर आया और न ही कहीं इसका नाम सुनाई देता है।
डालमिया घराने के बारे में जानने की बहुत इच्छा थी -
नेहरू के जमाने मे भी 1 लाख करोड़ के मालिक डालमिया को साजिशो में फंसा के नेहरू ने कैसे बर्बाद कर दिया।
राष्ट्रवादी खरबपति सेठ रामकृष्ण डालमिया जिसे नेहरू ने झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेज दिया तथा कौड़ी-कौड़ी का मोहताज़ बना दिया।
वास्तव में डालमिया जी ने स्वामी करपात्री जी महाराज के साथ मिलकर गौहत्या एवम हिंदू कोड बिल पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर नेहरू से कड़ी टक्कर ले ली थी।
लेकिन नेहरू ने हिन्दू भावनाओं का दमन करते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध भी नही लगाई तथा हिन्दू कोड बिल भी पास कर दिया और प्रतिशोध स्वरूप हिंदूवादी सेठ डालमिया को जेल में भी डाल दिया तथा उनके उद्योग धंधों को बर्बाद कर दिया।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस व्यक्ति ने नेहरू के सामने सिर उठाया उसी को नेहरू ने मिट्टी में मिला दिया।
देशवासी प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बाबू के साथ उनके निर्मम व्यवहार के बारे में वाकिफ होंगे मगर इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपनी ज़िद के कारण देश के उस समय के सबसे बड़े उद्योगपति सेठ रामकृष्ण डालमिया को बड़ी बेरहमी से मुकदमों में फंसाकर न केवल कई वर्षों तक जेल में सड़ा दिया बल्कि उन्हें कौड़ी-कौड़ी का मोहताज कर दिया।
जहां तक रामकृष्ण डालमिया का संबंध है, वे राजस्थान के एक कस्बा चिड़ावा में एक गरीब अग्रवाल घर में पैदा हुए थे और मामूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने मामा के पास कोलकाता चले गए थे।
वहां पर बुलियन मार्केट में एक salesman के रूप में उन्होंने अपने व्यापारिक जीवन का शुरुआत किया था।
भाग्य ने डटकर डालमिया का साथ दिया और कुछ ही वर्षों के बाद वे देश के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए।
उनका औद्योगिक साम्राज्य देशभर में फैला हुआ था जिसमें समाचारपत्र, बैंक, बीमा कम्पनियां, विमान सेवाएं, सीमेंट, वस्त्र उद्योग, खाद्य पदार्थ आदि सैकड़ों उद्योग शामिल थे।
डालमिया सेठ के दोस्ताना रिश्ते देश के सभी बड़े-बड़े नेताओं से थी और वे उनकी खुले हाथ से आर्थिक सहायता किया करते थे।
इसके बाद एक घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया।
कहा जाता है कि डालमिया एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे और उनके विख्यात हिन्दू संत स्वामी करपात्री जी महाराज से घनिष्ट संबंध थे।
करपात्री जी महाराज ने 1948 में एक राजनीतिक पार्टी 'राम राज्य परिषद' स्थापित की थी।
1952 के चुनाव में यह पार्टी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और उसने 18 सीटों पर विजय प्राप्त की।
हिन्दू कोड बिल और गोवध पर प्रतिबंध लगाने के प्रश्न पर डालमिया से नेहरू की ठन गई
पंडित नेहरू हिन्दू कोड बिल पारित करवाना चाहते थे जबकि स्वामी करपात्री जी महाराज और डालमिया सेठ इसके खिलाफ थे।
हिन्दू कोड बिल और गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वामी करपात्रीजी महाराज ने देशव्यापी आंदोलन चलाया जिसे डालमिया जी ने डटकर आर्थिक सहायता दी।
नेहरू के दबाव पर लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पारित हुआ जिसमें हिन्दू महिलाओं के लिए तलाक की व्यवस्था की गई थी।
कहा जाता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू कोड बिल के सख्त खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने इसे स्वीकृति देने से इनकार कर दिया।
ज़िद्दी नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा और इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पुनः पारित करवाकर राष्ट्रपति के पास भिजवाया। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति को इसकी स्वीकृति देनी पड़ी।
इस घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया।
कहा जाता है कि नेहरू ने अपने विरोधी सेठ राम कृष्ण डालमिया को निपटाने की एक योजना बनाई।
नेहरू के इशारे पर डालमिया के खिलाफ कंपनियों में घोटाले के आरोपों को लोकसभा में जोरदार ढंग से उछाला गया।
इन आरोपों के जांच के लिए एक विविन आयोग बना।
बाद में यह मामला स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिसमेंट (जिसे आज सी बी आई कहा जाता है) को जांच के लिए सौंप दिया गया।
नेहरू ने अपनी पूरी सरकार को डालमिया के खिलाफ लगा दिया।
उन्हें हर सरकारी विभाग में प्रधानमंत्री के इशारे पर परेशान और प्रताड़ित करना शुरू किया।
उन्हें अनेक बेबुनियाद मामलों में फंसाया गया।
नेहरू की कोप दृष्टि ने एक लाख करोड़ के मालिक डालमिया को दिवालिया बनाकर रख दिया।
उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिन्दुस्तान लिवर और अनेक उद्योगों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ा।
अदालत में मुकदमा चला और डालमिया को तीन वर्ष कैद की सज़ा सुनाई गई।
तबाह हाल और अपने समय के सबसे धनवान व्यक्ति डालमिया को नेहरू की वक्र दृष्टि के कारण जेल की कालकोठरी में दिन व्यतीत करने पड़े।
व्यक्तिगत जीवन में डालमिया बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे।
उन्होंने अच्छे दिनों में करोड़ों रुपये धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए दान में दिये।
इसके अतिरिक्त उन्होंने यह संकल्प भी लिया था कि जब तक इस देश में गोवध पर कानूनन प्रतिबंध नहीं लगेगा वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे।
उन्होंने इस संकल्प को अंतिम सांस तक निभाया।

गौवंश हत्या विरोध में 1978 में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। 

पंजाब में AAP राज में 6 पेपर लीक: भगवंत मान के झूठ और कुशासन की खुली पोल

पंजाब में ‘बदलाव’ का रंगीन सपना दिखाकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। दिल्ली वाले अपने राजनीतिक आका अरविंद केजरीवाल के नक्शेकदम पर चलते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी जनता को गुमराह करने और सफेद झूठ बोलने में महारत हासिल कर ली है। साढ़े चार साल में छह से अधिक बड़े पेपर लीक होने, संगठित परीक्षा माफिया के हावी होने और हाई कोर्ट की करारी फटकार के बावजूद सीएम भगवंत मान का यह दावा करना कि ‘पंजाब में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ’, न केवल हास्यास्पद है बल्कि पंजाब के लाखों मेहनती, योग्य और राष्ट्रभक्त युवाओं के भविष्य पर सीधा प्रहार है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पंजाब की जनता के साथ मुस्तैदी से खड़ी है और मान सरकार की इस नाकामी, झूठ की राजनीति तथा शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस के इस्तीफे की मांग को लेकर निर्णायक संग्राम लड़ रही है।

दिल्ली मॉडल का असली चेहरा: झूठ और छलावे पर टिकी आप सरकार
अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर भगवंत मान ने भी पंजाब में भ्रम और झूठ की राजनीति को अपना मुख्य हथियार बना लिया है। जिस प्रकार दिल्ली में झूठे वादों का महल खड़ा किया गया, ठीक वही छलावा अब पंजाब की जनता के साथ किया जा रहा है। प्रशासनिक अनुभवहीनता और दृष्टि के अभाव में आम आदमी पार्टी ने पंजाब को पूरी तरह प्रशासनिक अराजकता में ढकेल दिया है।

मुख्यमंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान: सफेद झूठ की पराकाष्ठा
26 जुलाई 2026 को दिए अपने बयान में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ढिंडोरा पीटा कि उनके साढ़े चार साल के शासन में राज्य में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। जब पूरा पंजाब परीक्षा घोटालों की आग में झुलस रहा है, तब मुख्यमंत्री का यह बयान केवल एक राजनीतिक दांव-पेच नहीं, बल्कि अपनी असफलताओं को छिपाने का एक ढीठ और गैर-जिम्मेदाराना प्रयास है।

कानून बनाने के बजाय इनकार की मुद्रा:  टालमटोल वाला रवैया
जब देश के अन्य राज्य और केंद्र की मोदी सरकार पेपर लीक रोकने के लिए सख्त से सख्त कानून बना रही है, तब पंजाब के मुख्यमंत्री यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं कि समस्या मौजूद है। भगवंत मान को पंजाब की जनता को जवाब देना चाहिए कि वे माफिया पर नकेल कसने के लिए कड़ा कानून बनाने से पीछे क्यों हट रहे हैं?

नैतिक जवाबदेही से भागते शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस 
जब भी शासन-प्रशासन की साख पर धब्बा लगता है, तो नैतिक जवाबदेही तय होना पहला कदम होता है। लेकिन पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस कुर्सी से चिपके हुए हैं। एक के बाद एक 6 बड़े पेपर लीक होने के बावजूद शिक्षा मंत्री का चुप्पी साधे रखना और पद न छोड़ना यह साबित करता है कि आप सरकार में नैतिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है।

अरविंद केजरीवाल के सफेद झूठ और ढोंग का पर्दाफाश
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, जो अन्य राज्यों में शिक्षा क्रांति की डींगें हांकते नहीं थकते, पंजाब के पेपर लीक मामले पर पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं। केजरीवाल खुद सार्वजनिक मंचों से यह झूठा दावा कर रहे थे कि ‘आज पंजाब शिक्षा के क्षेत्र में नंबर 1 पर है’ और आप सरकार के कार्यकाल में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। उन्होंने घोटालों पर लीपापोती करते हुए धोखाधड़ी की इतनी गंभीर घटनाओं को महज ‘डिजिटल पेन से नकल की छिटपुट कोशिश’ बताकर टालने का प्रयास किया। एक तरफ केजरीवाल केंद्र सरकार और अन्य राज्यों से इस्तीफे मांगते घूमते हैं, वहीं दूसरी तरफ पंजाब में साढ़े चार साल में 6 बड़े पेपर लीक होने के बावजूद अपने ही मुख्यमंत्री भगवंत मान और शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस का बचाव कर रहे हैं। केजरीवाल का यह दोहरा चरित्र और झूठा प्रचार साबित करता है कि उन्हें पंजाब के युवाओं के भविष्य से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि वे केवल अपनी पार्टी की धूमिल होती साख को बचाने में लगे हैं।

पहला पेपर लीक: पंजाब फार्मेसी भर्ती परीक्षा में हाई-टेक धांधली
19 जुलाई 2026 को बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेस (BFUHS) द्वारा आयोजित 454 फार्मेसी ऑफिसरों की भर्ती परीक्षा विवादों के घेरे में आ गई। परीक्षा शुरू होने के महज 15 मिनट बाद ही हाई-टेक डिवाइसेज से पर्चा बाहर पहुंच गया और 7,000 अभ्यर्थियों की मेहनत पर पानी फिर गया।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का चाबुक: फार्मेसी भर्ती पर स्टे
फार्मेसी भर्ती परीक्षा में हुई धांधली इतनी उजागर हुई कि मामला हाई कोर्ट पहुंच गया। केशव कंबोज और अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी है। कोर्ट के इस कड़े कदम ने मुख्यमंत्री के उस खोखले दावे की पोल खोल दी कि पंजाब में सब निष्पक्ष हो रहा है।

ब्लूटूथ पेन और गैंग का साम्राज्य: मान सरकार में प्रशासनिक विफलता
मुख्यमंत्री भले ही इसे सिर्फ एक साधारण ‘ब्लूटूथ चीटिंग’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करें, लेकिन 35 अभ्यर्थियों का पकड़ा जाना और 11 सदस्यीय बाहरी गैंग की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि पंजाब में परीक्षा माफिया का तंत्र कितना मजबूत हो चुका है।

दूसरा पेपर लीक: नायब तहसीलदार भर्ती परीक्षा घोटाला
आप सरकार के शुरुआती दौर में ही नायब तहसीलदार परीक्षा में ब्लूटूथ और इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स के माध्यम से नकल कराने का बड़ा मामला सामने आया था। इसमें जमकर धांधली हुई, जिससे पूरे राज्य की प्रशासनिक चयन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया।

तीसरा पेपर लीक: पंजाब पुलिस सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती धांधली


पंजाब के युवाओं का सपना पुलिस बल में शामिल होकर देश और राज्य की सेवा करना होता है। लेकिन आप सरकार ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को भी घोटाले की भेंट चढ़ा दिया, जिससे आक्रोशित अभ्यर्थियों को सड़कों पर उतरने के लिए विवश होना पड़ा।

चौथा पेपर लीक: पटवारी और राजस्व विभाग परीक्षा में अनियमितताएं
राजस्व विभाग में पटवारी पदों के लिए हुई परीक्षा में भी पर्चा लीक होने और आंसर-शीट में हेरफेर की शिकायतें आईं। पारदर्शी व्यवस्था का ढोंग रचने वाली आप सरकार के राज में परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त पाई गई।

पांचवां पेपर लीक: असिस्टेंट प्रोफेसर एवं लेक्चरर भर्ती घोटाला
उच्च शिक्षा क्षेत्र को भी भगवंत मान सरकार के कुप्रबंधन ने नहीं बख्शा। असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती में प्रश्नपत्र लीक होने और चहेतों को लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे, जिसने पंजाब के शैक्षणिक स्तर और मेधावी युवाओं के भरोसे को करारा झटका दिया।

छठा पेपर लीक: पशुपालन और अन्य तकनीकी विभागों की भर्ती परीक्षाएं
पशुपालन विभाग एवं अन्य प्राविधिक (तकनीकी) पदों की भर्ती परीक्षाओं में भी पर्चा समय से पहले लीक हुआ और संगठित गिरोहों ने इसे हल किया। साढ़े चार साल में 6 भर्ती परीक्षाओं में सेंधमारी सरकार की असफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मनीष सिसोदिया का उलटा पड़ा दांव: केजरीवाल और मान के वादे की खुली हवा
आप नेता मनीष सिसोदिया ने खुद बयान दिया था कि अगर पंजाब में एक भी पेपर लीक होता है तो अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान खुद पंजाब के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लेंगे। लेकिन आज लगातार 6 पेपर लीक होने और छात्रों के सड़कों पर उतरने के बावजूद न तो केजरीवाल ने इस्तीफा मांगा और न ही भगवंत मान ने कोई कदम उठाया। सिसोदिया का यह दावा अब आम आदमी पार्टी के दोहरे रवैये और राजनीतिक पाखंड का सबसे बड़ा सबूत बन गया है। 

‘कट्टर ईमानदार’ होने का जुमला
खुद को ‘कट्टर ईमानदार’ बताने वाली आम आदमी पार्टी के शासन में लगातार 6 पेपर लीक होना यह सिद्ध करता है कि ईमानदारी का यह नारा केवल वोटों की ठगी के लिए गढ़ा गया एक राजनीतिक जुमला था।

मोदी की एक बात से छुपे हुए सांप बिलों से खुद बाहर निकल पड़े; “अर्बन नक्सल” नहीं, ये असली नक्सल ही हैं

सुभाष चन्द्र

स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बस इतना ही तो कहा था कि हमने नक्सलवाद को ख़त्म कर दिया और अब बस दिमागी  नक्सलवाद से निपटना बाकी है। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया कि कौन हैं दिमागी नक्सल

लेकिन छुपे हुए सांप अपने बिलों से स्वयं बाहर निकल पड़े और होड़ लग गई अपने को “दिमागी नक्सल” साबित करने की सबसे पहले पी चिदंबरम बोला उसे “दिमागी नक्सल” होने पर गर्व है जिसने हिंदुओं को आतंकवादी कहा वो दिमागी तौर पर ही नहीं असल में नक्सली है

उधर महुआ मोइत्रा भी बोली वो भी दिमागी नक्सल है तुम्हारी सरकार ने तो 15 साल में पूरे बंगाल को नक्सलबाड़ी बना दिया इसलिए तुम्हारी तो पूरी पार्टी ही नक्सलियों की है

जो महबूबा मुफ़्ती कश्मीर में तिरंगा उठाने वालों की खून की नदियां बहाने की बात करती थी, वो दिमागी नहीं बल्कि पाकिस्तानी नक्सल है

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
केजरीवाल ने तो खुद कहा था कि वो अराजकतावादी है  उसकी तो रग रग में नक्सलवाद बसा है और उसका संजय सिंह देखने में भाषा से आतंकी लगता है

एक और असली नक्सली है योगेंद्र यादव उर्फ़ सलीम मियां उनके बयान ही बताते हैं कि वो परले दर्जे का नक्सली है कुछ बयान सलीम मियां के देखिये -

“मैं राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियों के नेताओं को बोलते बोलते थक गया हूँ कि चुनाव प्रक्रिया से मोदी और भाजपा को हरा नहीं पाएंगे नेपाल और बांग्लादेश की तरह जनता को लेकर सड़कों पर उतरना पड़ेगा

कॉकरोच बहुत अच्छा खेले इतना तो हम भी नहीं कर पाते परंतु जिस तरह जल्दबाजी में आंदोलन का अंत हुआ, उससे बहुत दुख हुआ, 10-12 दिन और टिक जाते तो धर्मेंद्र की जगह नरेंद्र भी लपेटे आता प्रधान की जगह प्रधानमंत्री को भी इस्तीफ़ा देना पड़ता 

अब यह देश लोकतंत्र से नहीं, सड़क से चलेगा”

सलीम मियां को पता नहीं कि उसी नेपाल में लगता है कोई विराथु पैदा हो गया है जो हिंदुओं पर अत्याचार करने वालों को ठोक रहा है 

इसके बयान काफी है इसे UAPA में गिरफ्तार करने के लिए

ये जो ‘दिमागी नक्सल” होने पर गुरुर कर रहे हैं, उनका इलाज भी नरेंद्र मोदी के दिमाग में होगा उनकी विदेशी फंडिंग पर सरकार की नज़र होगी और जो अभी अमेरिका से दीपके जैसे कॉकरोच आयात किये गए थे, उनकी भी हवा ख़राब होगी सुना है दीपके अमेरिका भागने के चक्कर में था लेकिन एयरपोर्ट पर ही दबोच लिया गया और उसे लिखत में दे दिया गया है कि तुम देश छोड़ कर तब तक नहीं जा सकते, जब तक तुम्हारे कानूनी मामले सुलझ न जाएं

नरेंद्र मोदी कोई काम जल्दबाजी में नहीं करते दूर की सोचते है जहां तक हम नहीं सोच सकते 

बेहतर होगा इंडी गठबंधन का नाम अब  “नक्सली गठबंधन” कर दिया और सबसे बड़े “दिमागी नक्सल” को उसका अध्यक्ष बना दिया जाए

राहुल गाँधी की तरह अमेरिका के डीप स्टेट का मोहरा थे सोवियत संघ (USSR) के अंतिम राष्ट्रपति "मिखाईल गोरवाचौव"

 

इन्हे जानते हैं, कौन है ये ?

ये सोवियत संघ (USSR) के अंतिम राष्ट्रपति "मिखाईल गोरवाचौव" हैं । इनकी खूबी ये थी कि अभी का रूस जो तब अविभाजित सोवियत संघ हुआ करता था, को 7 टुकड़ो में खंड खंड कर बाँटने का श्रेय जाता है..।
ये अमेरिका के डीप स्टेट का मोहरा थे जिन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च पद तक पहुँच गया और उसे खंडित कर डाला था। 15 वर्षों तक इनको पाल-पोस कर अमेरिका ने राष्ट्रपति के पद तक पहुँचवाया था। उसके बाद देश छोड़ भाग गया था,अमेरिका ने ही शरण देकर गोरवाचौव को अपने यहाँ के एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की नौकरी भी दी और अंत में वहीँ मरे।
डीप स्टेट अब भारत में भी एक प्यादे को संसद के नेता विपक्ष की कुर्सी तक पहुँचवा पाने में सफल हो चुके हैं। भारत के दुश्मन और वो सतत प्रयासरत है, देश को जातियों मे बाँटने में, कभी चुनी सरकार पर मिथ्या आरोप, कभी न्यायलायों पर आरोप, अब निर्वाचन आयोग, चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ षड़यंत्र कर झूठा आरोप लगा तमाशा कर रहा है आजकल।
बाकी अब विचार आपको करना है इस विदेशी गर्भ से उत्पन्न औलाद पर..क्या यह देश भक्त हो सकता है?
गौरतलब है कि रौउल विंची के ब्रिटिश नागरिक होने का केस दिल्ली और इलाहबाद हाई कोर्ट में पेंडिंग है जिस पर जल्द सुनवाई होनी है । कांग्रेस गिरोह और उसके दिहाड़ी वाले चमचों बेलचो ने इस पर एकदम मौन साध रखा है।
मित्रो सावधान रहिए, ये भारत मिखाईल गोरवाचौव है । कही ये भारत को भी बर्बादी की राह पर न ले जाए।

कांग्रेस एक बार फिर देश को विभाजित करने पर आमादा है

सुभाष चन्द्र

15 अगस्त को जिस तरह सोनिया गांधी, राहुल विंची और खड़गे ने वंदे मातरम का कांग्रेस कार्यालय में अपमान किया, उसे देख कर लगता है कांग्रेस एक बार फिर भारत को विभाजित करना चाहती है। उसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लालकिले में भाषण का खड़गे और राहुल विंची ने बहिष्कार किया और यह दूसरा मौका था जब वे वहां नहीं गए। पिछले साल भी बहिष्कार किया था। हकीकत यह कि इस परिवार को लगता है कि हमें किसी भी सरकारी कार्यक्रम में पहली पंक्ति में जगह मिले जिस तरह यूपीए के समय मिलती थी।  

लेखक
चर्चित YouTuber 
 

लगता है कांग्रेस स्वतंत्रता दिवस समारोह को भी भाजपा का समारोह समझने लगी है जो बहिष्कार करती है कांग्रेस के राशिद अल्वी ने कारगिल युद्ध को भाजपा का युद्ध कह कर उस पर जश्न मनाने से मना कर दिया था और अब स्वतंत्रता दिवस भी इनके लिए भाजपा का समारोह हो गया। दिक्कत यह है कि मोदी-योगी-अमित का विरोध करते करते देश विरोध पर कांग्रेस उतर आयी है और महामूर्ख विपक्ष पिच्छलग्गू बन कांग्रेस का साथ दे रहा है।    

उसके बाद कांग्रेस कार्यालय में वंदे मातरम के दौरान राहुल, खड़गे और सोनिया गांधी आपस में बातचीत कर रहे थे और सोनिया गांधी वंदे मातरम का तीसरा छंद शुरू होने पर नाराज़ दिखाई दे रही थी, वह राष्ट्रगीत का घोर अपमान था 

जयराम रमेश सफाई दे रहे हैं कि सोनिया जी खड़गे के लिए कुर्सी का प्रबंध करने की कोशिश कर रही थीं क्योंकि उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था ऐसे प्रबंध समारोह से पहले ही कर लिए जाते हैं लेकिन नहीं किए गए

पवन खेड़ा अपना राग अलाप रहा है कि 1937 में कांग्रेस अधिवेशन में निर्णय हो गया था कि गीत के पहले 2 छंद ही गाए जाएंगे अरे भाई 90 साल पुराना राग क्यों सुना रहे हो, जो संसद का पास किया हुआ कानून राष्ट्रपति ने 4 दिन पहले साइन किया है, उसकी बात करो 

असली भांडा तो कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष ने फोड़ दिया जिसने माना कि उनकी नेता वंदे मातरम रोकने के लिए कह रही थी लेकिन फिर भी हमने पूरा गीत गाया और इस तरह हमने राष्ट्रगीत का कोई अपमान नहीं किया

भाजपा के सदस्य विग्नेश शिशिर ने सोनिया गांधी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं पर केस दर्ज करने की बात कही है

वंदे मातरम पर विवाद मुस्लिमों ने 1937 कांग्रेस अधिवेशन में उठाया उसके पहले क्या मुस्लिमों को इस्लाम का ज्ञान नहीं था जो वंदे मातरम गाते थे गूगल पर दिया गया है इस्लाम क्या कहता है? 

इस्लाम में अपने वतन (मादरे वतन) से प्रेम करना और उसका सम्मान करना एक स्वाभाविक भावना है इसे ईमान (विश्वास) का हिस्सा माना गया है हदीस में पैगंबर मुहम्मद साहब के मदीना प्रेम का उल्लेख मिलता है

वतन प्रेम के मुख्य बिंदु

वतन से मोहब्बत: पैगंबर मुहम्मद ने अपने जन्म स्थान मक्का और कर्मभूमि मदीना से गहरा प्रेम दिखाया;

ईमान का हिस्सा: अपनी जन्मभूमि के प्रति वफादारी और उसकी रक्षा करना अच्छे चरित्र की निशानी है;

सुरक्षा और भलाई: देश की शांति, सुरक्षा और उन्नति के लिए प्रयास करना हर नागरिक का कर्तव्य माना गया है

फिर वो कौन से मुसलमान थे जो 1937 के पहले वंदे मातरम गाते रहे 1920 के खिलाफत और Non Cooperation में (खिलाफत का भारत से कुछ लेना देना नहीं था) प्रख्यात मुस्लिम नेता कांग्रेस के अधिवेशनों में भाग लेते थे जहां वंदे मातरम गाया जाता था एक देश भक्ति की भावना को लेकर और धार्मिक सोच को अलग रख कर (Theological Concerns) 

1937 के अधिवेशन में नेहरू मुस्लिमों के आगे नतमस्तक हो गए और गीत के केवल 2 छंद गाने पर राजी हो गए झुकना था तो पूरा ही झुक जाते और वंदे मातरम के गाने को पूरी तरह रोक देते नेहरू ने तो एक देश में दो विधान और दो निशान दे दिए और लगता है अब कांग्रेस फिर से देश को तोडना चाहती है जिसके लिए मुस्लिमों को भड़का रही है

नेहरू के तुष्टिकरण की नीति पर कांग्रेस आज दो कदम आगे चल रही है वंदे मातरम एक तरफ है, मुस्लिम तो आज हर चीज़ का विरोध करते हैं मोदी सरकार की योजनाओं--BPL, आयुष्मान, प्रधानमंत्री आवास, उज्जवला आदि-- का लाभ लेने के अलावा मोदी का कौन सा कार्य है जो मुस्लिमों को पसंद है।  

राहुल गांधी की ओछी मानसिकता और बदजुबानी से शर्मसार हुआ देश

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 13 अगस्त 2026 को ‘रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय सम्मेलन’ के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ जिस अमर्यादित और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया, उसने संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को गंभीर आघात पहुंचाया है। संवैधानिक इतिहास में शायद ही किसी नेता प्रतिपक्ष ने देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रति ऐसी निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग किया हो। सेना के शौर्य पर बेबुनियाद सवाल खड़े करना और लगातार झूठ फैलाकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करना उनकी हताशा और मानसिक दिवालियापन को उजागर करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी लगातार ‘बिलो द बेल्ट’ हमले कर भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का एक मनोवैज्ञानिक खेल खेल रहे हैं। इस नैरेटिव की राजनीति का जवाब देने के लिए अब हर झूठ का तथ्यपरक और unapologetic तरीके से पर्दाफाश करना जरूरी हो गया है।

इटली की प्रधानमंत्री पर भद्दी टिप्पणी और महिला सम्मान पर हमला

राहुल गांधी ने सम्मेलन के दौरान इटली की महिला प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर अत्यंत अशोभनीय, फूहड़ और द्विअर्थी टिप्पणी की। मंच पर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को गले लगाने के बाद यह कहना कि “मैं अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा हूं”, एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश की महिला राष्ट्राध्यक्ष का सरेआम अपमान है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति जैसे गंभीर विषय को इस तरह सड़क छाप और ओछे स्तर पर घसीटना उनकी महिला-विरोधी और विकृत मानसिकता को साफ तौर पर उजागर करता है। यह केवल एक विदेशी नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में महिलाओं के प्रति कांग्रेस की सोच का शर्मनाक प्रदर्शन है। इस तरह के कुकृत्य से पूरे देश का सिर शर्म से झुक जाता है और यह साबित होता है कि उनमें एक जिम्मेदार राजनेता जैसी कोई गरिमा नहीं बची है।

इटली दूतावास की कड़ी आपत्ति: राहुल गांधी की ओछी बयानबाजी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत शर्मसार

राहुल गांधी की अमर्यादित और फूहड़ राजनीति का खामियाजा अब देश को वैश्विक कूटनीतिक मोर्चे पर भुगतना पड़ रहा है। नई दिल्ली स्थित इटली के दूतावास ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर की गई अशोभनीय टिप्पणी पर आधिकारिक बयान जारी कर कड़ी निंदा और गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। दूतावास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन भारत की आंतरिक राजनीति में इटली की लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाना और उनका अपमान करना कतई स्वीकार्य नहीं है। दूतावास ने याद दिलाया कि भारत और इटली के संबंध आपसी सम्मान और गरिमा पर आधारित हैं। राहुल गांधी के इस गैर-जिम्मेदाराना आचरण ने एक मित्र राष्ट्र के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों में असहज स्थिति पैदा कर दी है। नेता प्रतिपक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठकर वैश्विक मंचों पर भारत की साख को बट्टा लगाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को शर्मसार करना उनकी अदूरदर्शी और विनाशकारी मानसिकता को पूरी तरह उजागर करता है।

 राष्ट्रगान के दौरान घूमना और हाथ मिलाना: देश के सर्वोच्च सम्मान की अवहेलना

सम्मेलन से सामने आया एक वीडियो कांग्रेस नेतृत्व की राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संवेदनहीनता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। जब सभागार में राष्ट्रगान बज रहा था, उस समय सावधान की मुद्रा में खड़े होकर सम्मान देने के बजाय राहुल गांधी मंच पर इधर-उधर टहलते और नेताओं से हाथ मिलाते दिखाई दिए। राष्ट्रगान देश की आन, बान और शान का प्रतीक है तथा हर भारतीय नागरिक का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह इसके सम्मान में खड़ा हो। इसके बावजूद नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसा गैर-जिम्मेदाराना और अपमानजनक आचरण उनके देश-विरोधी रवैये और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति घोर अनादर को साबित करता है।
‘घटिया स्टैंडअप कॉमेडी’: सोशल मीडिया पर फूटा जनता का आक्रोश
सोशल मीडिया पर आम जनता और प्रबुद्ध वर्ग ने राहुल गांधी के इस आचरण को ‘सड़क छाप व्यवहार’ और ‘सस्ती स्टैंडअप कॉमेडी’ करार देते हुए भारी रोष व्यक्त किया है। यूजर्स का कहना है कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचकर भी वे गंभीर नीतिगत और राष्ट्रीय विमर्श करने के बजाय बचकानी और फूहड़ हरकतों में व्यस्त रहते हैं। राजनीतिक आलोचकों ने सवाल उठाया कि जो नेता गंभीर संवैधानिक मंचों पर मसखरे जैसा व्यवहार करता हो, वह देश का नेतृत्व करने का दावा कैसे कर सकता है। जनता यह साफ देख रही है कि वे नेता प्रतिपक्ष की गरिमा को पूरी तरह खो चुके हैं और सिर्फ अपनी हताशा मिटाने के लिए स्तरहीन हरकतें कर रहे हैं।
गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ असंसदीय भाषा का प्रयोग
राहुल गांधी ने देश के गृह मंत्री अमित शाह के लिए ‘तड़ीपार’ और ‘भाग गया’ जैसे अपमानजनक और असंसदीय शब्दों का प्रयोग कर राजनीतिक मर्यादा की सीमाएं लांघ दीं। एक संवैधानिक पद पर बैठे नेता द्वारा देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले गृह मंत्री के खिलाफ ऐसी सड़क छाप शब्दावली का प्रयोग करना यह दर्शाता है कि कांग्रेस नेतृत्व बुनियादी राजनीतिक शालीनता खो चुका है। जब कांग्रेस के पास सरकार की नीतियों और विकास कार्यों का कोई ठोस जवाब नहीं होता, तो वे इसी तरह के घटिया व्यक्तिगत हमलों पर उतर आते हैं। देश की जनता ऐसे स्तरहीन और अमर्यादित बयानों को भली-भांति देख और समझ रही है।
‘सोने नहीं देंगे, पागल कर देंगे’: राजनीतिक विमर्श में खुलेआम धमकियां
राहुल गांधी ने खुले मंच से अराजक और धमकी भरे लहजे में कहा कि जब तक प्रधानमंत्री और गृह मंत्री इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक वे उन्हें सोने नहीं देंगे और “पागल कर देंगे”। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा प्रचंड बहुमत से चुनी गई सरकार के खिलाफ इस तरह की हिंसक और अशालीन भाषा का इस्तेमाल किसी जिम्मेदार विपक्ष का काम नहीं हो सकता। यह बयान उनकी गहरी कुंठा और राजनीतिक हताशा को दर्शाता है, जिसमें वे लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करने के बजाय अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार की भाषा यह साबित करती है कि वे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से कितने दूर जा चुके हैं।
पुलिस और मीडिया के नाम पर झूठी और मनगढ़ंत कहानियां
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में एक और काल्पनिक कहानी गढ़ते हुए दावा किया कि प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने के दौरान एक पुलिसकर्मी ने उनके कान में आकर सरकार विरोधी बात कही थी। इतना ही नहीं, उन्होंने मीडियाकर्मियों के नाम पर भी सहानुभूति बटोरने के लिए यह मनगढ़ंत नैरेटिव पेश किया कि वे मजबूरी में काम कर रहे हैं। बिना किसी प्रमाण या तथ्य के देश के कर्तव्यनिष्ठ सुरक्षा बलों और पत्रकारों के नाम पर इस प्रकार की झूठी कहानियां सुनाना उनकी पुरानी कार्यशैली का हिस्सा है। जनता के बीच भ्रम फैलाने और अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए वे लगातार ऐसे झूठे प्रपंचों का सहारा लेते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था और विरोधियों को ‘जोकर्स का झुंड’ बताना
राहुल गांधी ने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और अपने वैचारिक विरोधियों को ‘बंच ऑफ जोकर्स’ और ‘क्लाउन्स’ कहकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया। भारतीय संस्कृति, प्राचीन दर्शन और राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा करने वाले संगठनों पर इस तरह की ओछी टिप्पणी करना यह साबित करता है कि वे भारत की वास्तविक आत्मा और जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं। जो व्यक्ति करोड़ों भारतीयों की आस्था और विचारधारा का सम्मान नहीं कर सकता, वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा कैसे कर सकता है। उनका यह बयान उनके भीतर भरे वैचारिक अहंकार और असहिष्णुता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
अमेरिका-ईरान संकट पर हास्यास्पद दावा और विदेश नीति का अल्पज्ञान
विदेश नीति पर अपनी समझ का प्रदर्शन करते हुए राहुल गांधी ने दावा किया कि अमेरिका-ईरान तनाव के समय यदि इंदिरा गांधी होतीं तो दोनों देशों की दोस्ती करा देतीं, लेकिन पाकिस्तान यह मौका ले गया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के अत्यंत संवेदनशील और जटिल मामलों पर इस तरह का अपरिपक्व और बेतुका विश्लेषण उनके विदेश नीति संबंधी अल्पज्ञान को उजागर करता है। वे यह भूल जाते हैं कि आज मोदी सरकार के सशक्त नेतृत्व में भारत वैश्विक स्तर पर शांति और कूटनीति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। जमीनी हकीकत को समझे बिना केवल अपने परिवार का महिमामंडन करने के लिए ऐसे हास्यास्पद दावे करना उनकी राजनीतिक नासमझी को दिखाता है।
गलवान और अरुणाचल पर सेना के पराक्रम पर फिर उठाए झूठे सवाल
राहुल गांधी ने एक बार फिर चीन सीमा, गलवान और अरुणाचल प्रदेश में सेना की पेट्रोलिंग को लेकर सरासर झूठे, भ्रामक और देश-विरोधी दावे किए हैं। सीमा पर मुस्तैद भारतीय सेना के अदम्य साहस, पराक्रम और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों को नकारते हुए सरकार पर खबरें दबाने का मनगढ़ंत आरोप लगाना सीधे तौर पर वीर जवानों के शौर्य का अपमान है। जब पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देकर पीछे धकेला, तब राहुल गांधी द्वारा इस तरह का झूठा प्रलाप करना सीधे-सीधे दुश्मन देश के नैरेटिव को मजबूत करने का काम करता है। अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर लगातार झूठ फैलाना और सेना के मनोबल पर प्रहार करना कांग्रेस की पुरानी देश-विरोधी रणनीति बन चुकी है।
संसद से कांग्रेस के मंच तक कुंठा और अराजकता 
संसद के सत्र को उद्दंडता, उच्छृंखलता और सनक के बल पर पूरी तरह बाधित करने के बाद कांग्रेस के औपचारिक मंच से राहुल गांधी द्वारा प्रयुक्त असभ्य शब्दावली उनके भीतर पनप रही कुंठा की पराकाष्ठा को उजागर करती है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुके राहुल गांधी जिस तरह देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह उनके मानसिक भटकाव का स्पष्ट प्रमाण है। सम्मेलन के मंच पर दो चेहरों की जुगलबंदी ने कांग्रेस की असलियत को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। एक तरफ संदीप दीक्षित, जिन्होंने भारतीय थल सेना प्रमुख को ‘सड़क छाप गुंडा’ कहकर पूरे सैन्य बल का अपमान किया था, और दूसरी तरफ राहुल गांधी, जो जेएनयू जाकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के देश-विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में खड़े हुए थे। सेना का अपमान करने वाले और अलगाववादी सोच की ढाल बनने वाले ये दोनों नेता मिलकर आज मां भारती के सपूत प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभद्र प्रलाप कर रहे हैं। देश की प्रबुद्ध जनता को यह भली-भांति समझना होगा कि यह केवल एक कुंठित और ईर्ष्या से ग्रस्त नेता की बचकानी हरकत है या फिर सीमा पार से जुड़े किसी सुनियोजित और गहरे राष्ट्र-विरोधी षड्यंत्र का खतरनाक हिस्सा।
नेहरू के ब्लंडर्स पर चुप्पी और मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलताओं पर हमला
विदेश नीति पर भाजपा को घेरने का प्रयास करने वाले राहुल गांधी अपने परदादा पंडित जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक ब्लंडर्स को पूरी तरह भूल जाते हैं। नेहरू के 17 वर्षों के विदेश मंत्री कार्यकाल में भारत ने 38,000 वर्ग किलोमीटर का अक्साई चिन गंवाया, कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण कर नासूर बनाया और पाकिस्तान के पक्ष में एकतरफा सिंधु जल समझौता किया। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में भारत ने अनुच्छेद 370 को समाप्त किया, सीमावर्ती इंफ्रास्ट्रक्चर को अभूतपूर्व मजबूती दी और दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया। अपने पुरखों की ऐतिहासिक गलतियों पर पर्दा डालकर मोदी सरकार की सफलताओं पर उंगली उठाना राहुल गांधी के खोखलेपन को साबित करता है।
गले मिलने की कूटनीति पर राहुल का दोहरा मापदंड: इंदिरा और प्रियंका का इतिहास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक नेताओं के साथ आत्मीय और कूटनीतिक शिष्टाचार का उपहास उड़ाने वाले राहुल गांधी को अपने ही परिवार का इतिहास देखना चाहिए। इतिहास साक्षी है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो से आत्मीयता से मुलाकात की थी और उनकी बहन प्रियंका गांधी भी सार्वजनिक मंचों पर वरिष्ठ नेताओं से इसी तरह मिलती रही हैं। जब उनके परिवार के सदस्य ऐसा करते हैं तो वह कूटनीति कहलाती है, लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी देश के हितों को साधने के लिए वैश्विक नेताओं से आत्मीय संबंध बनाते हैं, तो कांग्रेस को इसमें राजनीति दिखने लगती है। यह दोहरा रवैया उनके पाखंड को बेनकाब करता है।
राहुल गांधी भूल गए राजीव गांधी का दौर: आतंकवाद के जनक जिया उल हक को लगाया था गले
विदेश नीति पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को शायद अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौर का इतिहास याद नहीं है। अस्सी के दशक में जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद कश्मीर को लहूलुहान कर रहा था, कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हो रहा था और वहां के सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक ने खुलेआम अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने स्वीकार किया था कि वे कश्मीर में जेकेएलएफ को ट्रेनिंग और हथियार देकर आतंकवाद फैला रहे हैं, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कोई कठोर कदम नहीं उठाया। इसके विपरीत, तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल के. सुंदर जी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ के तहत सीमा पर ऐतिहासिक सैन्य जमावड़ा किया, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाकर सीमा पार आतंकवाद को हमेशा के लिए समाप्त करना और रणनीतिक बढ़त बनाना था। भारतीय सेना के इस अप्रत्याशित पराक्रम से घबराकर जनरल जिया उल हक अचानक ‘क्रिकेट डिप्लोमेसी’ के बहाने भारत पहुंचे। देश के स्वाभिमान को ताक पर रखते हुए राजीव गांधी ने सोनिया गांधी के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर उस तानाशाह का भव्य स्वागत किया, उसे गले लगाया और जयपुर में साथ बैठकर मैच देखा। इसके तुरंत बाद भारतीय सेना को अपनी चौकियों से वापस बैरकों में लौटने का आदेश दे दिया गया, जिससे सेना के मनोबल को भारी आघात पहुंचा और पाकिस्तान के हौसले बुलंद हुए। ऐसे शर्मनाक कूटनीतिक इतिहास को दबाकर आज मोदी सरकार की मजबूत और स्वाभिमानी विदेश नीति पर सवाल उठाना राहुल गांधी के खोखलेपन को ही दर्शाता है।  
कपड़ों के रंग से कूटनीति की व्याख्या: राहुल गांधी का हास्यास्पद ‘लीडरशिप लेसन’
‘रचनात्मक कांग्रेस’ के मंच से नेतृत्व और विदेश नीति पर लंबा भाषण देने वाले राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी के अमेरिका दौरे का एक बेतुका किस्सा सुनाकर खुद को हास्य का पात्र बना लिया। उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की पत्नी नैन्सी रीगन ने जानबूझकर इंदिरा गांधी की साड़ी के रंग से मिलती-जुलती ड्रेस पहनी थी, जिससे इंदिरा जी नाराज हो गईं कि अमेरिकी उन्हें ‘कलर मैचिंग’ के जरिए अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी ने मंच पर ठहाके लगवाते हुए इसे कूटनीतिक ‘लीडरशिप’ का बड़ा पाठ बताया। जबकि ऐतिहासिक तथ्यों और तस्वीरों से साफ है कि दोनों के परिधानों के रंगों में कोई मेल ही नहीं था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, भू-राजनीतिक समीकरणों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों को कपड़ों के रंग और बचकाने घरेलू किस्सों तक सीमित कर देना नेता प्रतिपक्ष के सतही बौद्धिक स्तर को उजागर करता है। विश्व के राष्ट्राध्यक्षों के कूटनीतिक शिष्टाचार को ‘समझौता’ और ‘कलर मैचिंग’ जैसी फूहड़ व्याख्याओं में बांधना यह साबित करता है कि राहुल गांधी के पास नेतृत्व की न तो कोई ठोस समझ है और न ही कोई दृष्टि।
अभिव्यक्ति की आजादी पर पाखंड: दिल्ली में ढोंग, राज्यों में दमन
राहुल गांधी ने दिल्ली के मंच से यह दावा किया कि वे आरएसएस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, जबकि ठीक उसी दिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर संघ और अन्य संगठनों की गतिविधियों को रोकने वाला बिल पेश कर दिया। आपातकाल थोपने वाली और प्रेस की आजादी पर ताला लगाने का इतिहास रखने वाली कांग्रेस पार्टी का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह पाखंड देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। कांग्रेस शासित राज्यों में सोशल मीडिया क्रिएटर्स और आलोचकों पर लगातार मुकदमे दर्ज कर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। राहुल गांधी का दोहरा चेहरा यह साफ करता है कि वे केवल भाषणों में लोकतंत्र की बात करते हैं, हकीकत में नहीं।
आरएसएस के इतिहास पर कांग्रेस का अचानक यू-टर्न
दशकों तक जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कांग्रेस पार्टी ने हर मंच से बदनाम किया, चरमपंथी बताया और अनर्गल आरोप लगाए, आज राहुल गांधी अचानक दावा कर रहे हैं कि संघ मूल रूप से सुनारों और छोटे व्यापारियों का संगठन था। बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण के अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार अपने ही दशकों पुराने स्टैंड से पूरी तरह पलट जाना कांग्रेस की वैचारिक कंगाली को दर्शाता है। जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या कांग्रेस इतने सालों से संघ के बारे में झूठ बोल रही थी या आज राहुल गांधी नया भ्रम फैला रहे हैं। यह यू-टर्न उनकी दिशाहीन राजनीति का सबसे बड़ा सबूत है।
खुद के कार्यक्रम का सही नाम तक नहीं ले पाए राहुल गांधी
अपनी पार्टी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे राहुल गांधी मंच से अपने ही कार्यक्रम का नाम ठीक से उच्चारित नहीं कर सके। वे पूरे भाषण के दौरान ‘रचनात्मक’ शब्द का सही उच्चारण न करते हुए उसे बार-बार ‘रचनातक’ बोलते रहे, जिससे मंच पर मौजूद नेता भी असहज नजर आए। जो व्यक्ति अपनी ही पार्टी के कार्यक्रम के शीर्षक और विषय के प्रति सजग नहीं है, वह देश की जटिल समस्याओं और नीतियों को कैसे समझ सकता है। यह छोटी सी घटना भी उनकी गंभीरता और बुनियादी समझ की भारी कमी को दर्शाने के लिए काफी है।
51 कार्टन बॉक्स और नेहरू के गुप्त पन्नों पर रहस्यमयी चुप्पी
विदेश नीति पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने वाले राहुल गांधी इस बात का कोई जवाब नहीं देते कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के 51 कार्टन बॉक्स पत्रों पर अब तक पर्दा क्यों पड़ा हुआ है। कांग्रेस का प्रथम परिवार इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से क्यों बचता रहा है, जिनमें एडविना माउंटबेटन और नेहरू के बीच हुए संवाद भी शामिल हैं। अपनी पार्टी और परिवार के संदेहास्पद इतिहास को छिपाकर मोदी सरकार की पारदर्शी नीतियों पर लांछन लगाना कांग्रेस के पाखंड का सबसे बड़ा प्रमाण है।
नेहरू की ‘गले पड़ने’ वाली कूटनीति और सेना की उपेक्षा: जब चीन ने हड़प ली थी देश की जमीन
कूटनीति और गले मिलने के शिष्टाचार पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को अपने नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर की आत्मघाती नीतियों का स्मरण करना चाहिए। 1957 में जब तिब्बत पर अवैध कब्जा करने के बाद चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई भारत आया, तब नेहरू ने प्रोटोकॉल और सामरिक संवेदनशीलता को दरकिनार कर जबरन उन्हें गले लगाया था। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के खोखले नारों के बीच चाऊ एन लाई को देश की संवेदनशील ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का दौरा तक करवाया गया, जहां सैन्य हथियारों और गोला-बारूद के उत्पादन की जगह कपड़े और मोजे बनाने की शांतिवादी नीतियां दिखाई गईं। देश की रक्षा तैयारियों और सेना की इस उपेक्षा को भांपकर ही चीन ने भारत के खिलाफ आक्रामकता की योजना बनाई, जिसका दुष्परिणाम 1962 में अक्साई चिन और हजारों वर्ग किलोमीटर भारतीय भूभाग गंवाने के रूप में सामने आया। इसके बावजूद उस समय संसद में यह तर्क देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की गई कि उस जमीन पर ‘घास का एक तिनका भी नहीं उगता’, जिस पर तत्कालीन सांसद महावीर त्यागी ने तीखा प्रतिवाद किया था। अपने पुरखों की इन ऐतिहासिक रणनीतिक भूलों पर पर्दा डालकर आज मोदी सरकार की मजबूत रक्षा और कूटनीतिक नीति पर सवाल उठाना राहुल गांधी के दोहरे चरित्र और अज्ञान को ही उजागर करता है।
कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के नाम पर बेबुनियाद भ्रम फैलाने की पुरानी आदत
राहुल गांधी जब भी नीतिगत मुद्दों पर घिरते हैं, तो वे बिना किसी तथ्य के उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों के नाम पर अनर्गल आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने देश के आर्थिक विकास में योगदान देने वाले उद्यमों पर बेबुनियाद हमले किए और आरोप लगाया कि सरकार का पूरा ढांचा केवल चंद लोगों से लाभ लेने के लिए काम कर रहा है। देश के औद्योगिकीकरण और विकास यात्रा को बदनाम कर भ्रम की राजनीति फैलाना कांग्रेस की नकारात्मक सोच को दिखाता है।
कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का साइकोलॉजिकल वार: नैरेटिव युद्ध की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी द्वारा लगातार शीर्ष नेतृत्व पर व्यक्तिगत और अमर्यादित हमले करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे ‘बिलो द बेल्ट’ हमलों के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ना चाहते हैं, ताकि बार-बार बोले गए झूठ को सच के रूप में स्थापित किया जा सके। इस परसेप्शन और नैरेटिव की राजनीति का मुकाबला करने के लिए भाजपा को भी आक्रामक, संगठित और पूरी मजबूती के साथ इन झूठे प्रचारों की हवा निकालनी होगी।
खोखले दावे बनाम मोदी सरकार का ठोस जमीनी रिकॉर्ड
राहुल गांधी विदेश नीति, मेक इन इंडिया, किसान कल्याण, आंतरिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे तमाम गंभीर विषयों पर केवल मनगढ़ंत आरोप लगाते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जबकि तथ्य और जमीनी आंकड़े यह गवाही देते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता आई और सीमावर्ती ढांचा पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ। राहुल गांधी के झूठे नारों और राजनीतिक ड्रामे के सामने मोदी सरकार का ठोस रिपोर्ट कार्ड और विकास के कार्य पूरी मजबूती से खड़े हैं।
विजनविहीन राजनीति: सिर्फ मोदी-विरोध के सहारे टिकने की नाकाम कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि राहुल गांधी के पास देश के भविष्य, युवाओं के रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए कोई सकारात्मक विजन या ठोस कार्ययोजना नहीं है। वे अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा और समय केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्द कहने, व्यक्तिगत आक्षेप लगाने और सस्ती बयानबाजी करने में नष्ट कर रहे हैं। लोकतंत्र में जनता एक सकारात्मक और जिम्मेदार विकल्प चुनती है, न कि केवल निराधार विरोध और गाली-गलौज करने वाले नेतृत्व को। जब तक वे इस नकारात्मक राजनीति से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक वे देश के लिए केवल एक राजनीतिक बोझ बने रहेंगे।
संसदीय मर्यादा और संवैधानिक आचरण का लगातार हनन
नेता प्रतिपक्ष का पद एक अत्यंत गरिमामयी और महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व होता है, जिसमें सरकार की नीतियों की आलोचना तर्कों, तथ्यों और संसदीय मर्यादा के दायरे में रहकर की जाती है। लेकिन राहुल गांधी लगातार संसद के भीतर और बाहर सार्वजनिक मंचों पर अभद्र, अमर्यादित और अलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग कर लोकतांत्रिक संवाद के स्तर को गिराने का काम कर रहे हैं। नीतिगत बहस करने के बजाय व्यक्तिगत हमलों पर उतरना यह साबित करता है कि वे इस संवैधानिक पद की गंभीरता और महत्व को समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं।
विदेशी मंचों पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र
राहुल गांधी का यह गैर-जिम्मेदाराना आचरण सिर्फ देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विदेशी दौरों और वैश्विक मंचों पर भी भारत की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका और चुनाव प्रणाली पर बेबुनियाद सवाल उठाते रहे हैं। अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए देश की वैश्विक प्रतिष्ठा, संप्रभुता और कूटनीतिक साख को दांव पर लगाना अत्यंत निंदनीय और अक्षम्य है। देश की जनता भली-भांति देख रही है कि कैसे सत्ता की चाह में वे राष्ट्रीय हितों से समझौता करने से भी पीछे नहीं हटते।
नकारात्मकता और अमर्यादित भाषा कभी नहीं बन सकती राष्ट्रीय विकल्प
राहुल गांधी के हालिया बयानों और आचरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे नेता प्रतिपक्ष जैसे उच्च संवैधानिक पद की गरिमा और उत्तरदायित्व को निभाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में विपक्ष का काम नीतियों की तथ्यपरक समीक्षा करना और जनता के समक्ष एक सकारात्मक, ठोस और सशक्त वैकल्पिक विजन प्रस्तुत करना होता है। इसके विपरीत, राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक अस्तित्व सिर्फ व्यक्तिगत द्वेष, अपशब्दों, विदेशी नेताओं पर भद्दी टिप्पणियों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर झूठ फैलाने तक सीमित होकर रह गया है।
लगातार झूठ बोलकर और देश की संस्थाओं पर आक्षेप लगाकर कोई भी नेता जनविश्वास हासिल नहीं कर सकता। भारतीय लोकतंत्र परिपक्व है और देश की जनता भली-भांति जानती है कि फूहड़ स्टैंडअप कॉमेडी, देश-विरोधी नैरेटिव और गटर-स्तरीय राजनीति के बल पर 140 करोड़ भारतीयों के भविष्य का नेतृत्व नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी जब तक इस स्तरहीन नकारात्मकता से बाहर निकलकर राष्ट्रहित की राजनीति नहीं करेंगे, तब तक वे भारतीय राजनीति में केवल एक अप्रासंगिक और गैर-जिम्मेदार चेहरे के रूप में ही देखे जाएंगे।