एअर इंडिया में हिन्दू कर्मियों के बिंदी-सिंदूर-तिलक-मंगल सूत्र पर रोक, वायरल हुआ ग्रूमिंग पॉलिसी का डॉक्यूमेंट


लेन्सकार्ट कंपनी में ड्रेस कोड को लेकर छिड़े विवाद के बाद अब एअर इंडिया की ड्रेसिंग पॉलिसी पर भी सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि एअर इंडिया के केबिन क्रू हैंडबुक में बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा जैसे हिंदू धर्म के चिन्हों पर रोक लगाई गई। इसको लेकर इंटरनेट पर बहस तेज हो गई है और कई लोग इसे हिंदू पहचान छीनने से जोड़ रहे हैं।
वैसे अगर देखा जाए तो किसी भी एयर लाइन्स के किसी भी महिला क्रू को अपनी सनातनी पहचान में नहीं देखा। क्या कोई क्रू हिन्दू महिला विवाहित नहीं? अगर विवाहित है तो मांग में सिन्दूर और गले में मंगलसूत्र क्यों नहीं? दूसरे, एयरलाइन्स ही नहीं जितने भी सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय चैनल तक यही रोना है। सिन्दूर लगाया जाता है मांग में लेकिन लगाया जाता है छोटा-सा वह भी बालों में छिपा कर, क्यों? महिलाओं को मालूम होना चाहिए कि मांग में सिन्दूर का कितना बड़ा धार्मिक महत्व होता है। महिलाओं को इस कटु सच्चाई को जानना होगा।       
हिन्दू राष्ट्र या सेकुलरिज्म की बात करने वालों को इस गंभीर मुद्दे पर महिला आयोग, महिला वेलफेयर ओर्गनइजेशन्स और पुरोहितों से चर्चा करनी चाहिए।   

एक ‘एक्स’ यूजर ने कुछ स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं, जिनमें ऐसे नियम बताए गए हैं। इसके बाद कई लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर एक भारतीय एयरलाइन अपने कर्मचारियों की धार्मिक पहचान को क्यों सीमित कर रही है। कुछ यूजर्स ने इसे वेस्टर्न स्टैंडर्ड का असर बताया, तो कुछ ने कहा कि ज्यादातर कॉर्पोरेट में ऐसे नियम होते हैं।

हालाँकि, एअर इंडिया ने इन दावों को खारिज करते हुए साफ किया कि कर्मचारी बिंदी पहन सकते हैं और जो तस्वीरें वायरल हो रही हैं, वे पुराने मैनुअल की हैं जो अब लागू नहीं है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर बहस जारी है, जहाँ लोग धार्मिक स्वतंत्रता, कॉर्पोरेट नियम और समानता जैसे मुद्दों पर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं।

दंगा नियंत्रण कानून : हिंदुओं के विनाश वाला काला बिल जिसे काँग्रेस ने दो बार 2005 और 2011मे संसद मे पेश किया, परन्तु आज भी यह पेंडिंग है, सुनिए वीडियो

कांग्रेस जिसे हिन्दू देशभक्त और समाजवाद का चेहरा मान अपना सिरमौर बनाए रहा वास्तव में यह पार्टी मुस्लिम लीग से कहीं ज्यादा हिन्दू विरोधी है। और हिन्दुओं को सेकुलरिज्म की शराब में डुबोए रही। सेकुलरिज्म एक तरफ़ा नहीं होता जिस तरह कभी एक हाथ से ताली नहीं बजती। लेकिन सेकुलरिज्म के नशे में डूबा हिन्दू एक ही हाथ से ताली बजाता रहा।
कांग्रेस का हिन्दू विरोधी चेहरा सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद से सामने आना हो गया। लेकिन हिन्दू सोनिया को देश की बहु बताकर बचाव करने में लगे रहे। परिवार ने अपने दो सदस्यों ने देश के लिए शहीद हुए। इंदिरा गाँधी हो या राजीव गाँधी हों दोनों की हत्या हुई थी, सीमा पर देश के लिए लड़ते मरने वालों को शहीद का सम्मान दिया जाता है हत्या में मरने वालों को नहीं।
दूसरे, देखिए जिस सोनिया को देश की बहु कहकर सिरमौर बनाये हुए हैं किस तरह हिन्दुओं को प्रताड़ित करने का खेल खेला गया। हिंदू समाज के लिए फांसी का फंदा, बहुत से लोगों को दंगा नियंत्रण कानून बिल के बारे में पता होगा, 2011 में इस बिल की रुपरेखा को सोनिया गाँधी की विशेष टीम ने बनाया था जिसे NAC भी कहते थे, इस टीम में दर्जन भर से ज्यादा सदस्य थे और सब वही जिन्हें आजकल अर्बन नक्सली कहा जाता है..
कांग्रेस का कहना था की इस बिल के जरिये वो देश में होने वाले दंगों को रोकेंगे। अब इस बिल में कई प्रावधानो पर जरा नजर डालिए:--
अगर कोई अल्पसंख्यक सिर्फ यह आरोप लगा दे कि मुझसे भेदभाव किया गया है तो पुलिस को अधिकार था आपके पक्ष को बिना सुने आपको जेल में डालने का हक होगा और इन केसों में जज भी अल्पसंख्यक ही होगा..
अगर आपके घर में कोई कमरा खाली है और कोई मुस्लिम आपके घर आता है उसे किराए पर मांगने के लिए तो तो आप उसे कमरा देने से इंकार नहीं कर सकते थे क्योंकि उसे बस इतना ही कहना था कि आपने उसे मुसलमान होने की वजह से कमरा देने से मना कर दिया यानि आपकी बहन बेटी को छेड़ने वाले किसी अल्पसंख्यक के खिलाफ भी हम कुछ नहीं कर सकते थे। मतलब कि अगर कोई छेड़े तो छेड़ते रहने दो वर्ना वो आपके खिलाफ कुछ भी आरोप लगा देता…..आपकी सीधी गिरफ़्तारी और ऊपर से जज भी अल्पसंख्यक..
देश के किसी भी हिस्से में दंगा होता, चाहे वो मुस्लिम बहुल इलाका ही क्यों न हो, दंगा चाहे कोई भी शुरू करता पर दंगे के लिए उस इलाके के वयस्क हिन्दू पुरुषों को ही दोषी माना जाता और उनके खिलाफ केस दर्ज कर जांचें शुरू होती। और इस स्थिति में भी जज केवल अल्पसंख्यक ही होता ऐसे किसी भी दंगे में चाहे किसी ने भी शुरू किया हो..
अगर दंगों वाले इलाके में किसी भी हिन्दू बच्ची या हिन्दू महिला का रेप होता तो उसे रेप ही नहीं माना जाता । बहुसंख्यक है हिन्दू इसलिए उसकी महिला का रेप रेप नहीं माना जायेगा और इतना ही नहीं कोई हिन्दू महिला बलात्कार की पीड़ित हो जाती और वो शिकायत करने जाती तो अल्पसंख्यक के खिलाफ नफरत फ़ैलाने का केस उस पर अलग से डाला जाता..
इस एक्ट में एक और प्रस्ताव था जिसके तहत आपको पुलिस पकड़ कर ले जाती अगर आप पूछते की आपने अपराध क्या किया है तो पुलिस कहती की तुमने अल्पसंख्यक के खिलाफ अपराध किया है, तो आप पूछते की उस अल्पसंख्यक का नाम तो बताओ, तो पुलिस कहती – नहीं शिकायतकर्ता का नाम गुप्त रखा जायेगा
कांग्रेस के दंगा नियंत्रण कानून में ये भी प्रावधान था की कोई भी इलाका हो बहुसंख्यको को अपने किसी भी धार्मिक कार्यक्रम से पहले वहां के अल्पसंख्यकों का NOC लेना जरुरी होता यानि उन्हें कार्यक्रम से कोई समस्या तो नहीं है। ऐसे हालात में अल्पसंख्यक बैठे बैठे जजिया कमाते क्योकि आपको कोई भी धार्मिक काम से पहले उनकी NOC लेनी होती, और वो आपसे पैसे की वसूली करते और आप शिकायत करते तो भेदभाव का केस आप पर और ऐसे हालात में जज भी अल्पसंख्यक
और भी अनेको प्रावधान थे कांग्रेस के इस दंगा नियंत्रण कानून में जिसे अंग्रेजी में # Communal Violence Bill भी कहते है
सुब्रमण्यम स्वामी ने इस बिल का सबसे पहले विरोध शुरू किया था और उन्होंने इस बिल के बारे में लोगों को जब बताया था तो 2012 में हिन्दू काँप उठे थे तभी से कांग्रेस के खिलाफ हिन्दुओं ने एकजुट होना शुरू कर दिया था। सुब्रमण्यम स्वामी का पूरा लेक्चर इस #**Communal_Violence_Bill पर आज भी मौजूद है, 45 मिनट से ज्यादा का है। आप चाहे तो *YOUTUBE* पर सर्च कर लें, और अच्छे से सुन लें
*अब इस के बाद भी जो हिन्दू कांग्रेस को support करता है वे जाने अनजाने अपने ही लोगो के लिए नरक का द्वार खोल रहे हैं।

नीदरलैंड के नेता गीर्ट विल्डर्स के भाषण का हिंदी अनुवाद

सुभाष चन्द्र

कुछ समय पहले विल्डर्स ने अमेरिका में भाषण दिया उसकी बातें अमेरिका ही नहीं भारत और अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए आज भी प्रासंगिक हैं जो उन्होंने कहा वह मैंने इंस्टाग्राम पर उनके भाषण से लिया है। 

जिस अमेरिकी सांसद ने भारत को “नरक” कहा, ये बातें उसे जरूर सुननी चाहिए क्योंकि विल्डर्स अमेरिका के जल्द ही नरक बनने की चेतावनी दे रहे हैं

“वे जो कुछ आपसे कहते हैं, उसका हर शब्द गंभीरता से लीजिए और उन्हें शाब्दिक रूप से समझिए

क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो यही होने वाला है

वे करेंगे — और मैं बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रहा हूँ — वे आपके समाज को जला देंगे वे आपकी सड़कों के बीचों-बीच स्वयं को विस्फोट से उड़ा देंगे

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चर्चित YouTuber 
ये कट्टरपंथी अमेरिका से नफरत करते हैं वे अमेरिकी सपने का हिस्सा नहीं बनना चाहते, वे उसे समाप्त करना चाहते हैं और यही उनका एजेंडा है

मेरे मित्रों, संयुक्त राज्य अमेरिका में 2700 से अधिक मस्जिदें बन चुकी हैं, जिनमें से 300 तो  यहीं टेक्सास में हैं और उन प्रत्येक मीनारों को क्षेत्र पर दावे के रूप में देखा जाता है, और हर अज़ान (Prayer) को विजय के संकेत के रूप में

हर वर्ष दर्जनों नई मस्जिदें बनाई जा रही हैं, और केवल प्रार्थना स्थल के रूप में नहीं, जैसा हमने देखा है, बल्कि इस्लाम की विजय और दूसरों को पीछे हटाने की निशानी के रूप में और मैं आपसे पूछता हूँ, यह सब यहाँ कैसे पहुँचा?

वे, मुझे यह कहते हुए दुख है, आपके मुख्य द्वार से अंदर आए लेकिन यह द्वार खुला किसने रखा? कट्टर वामपंथ ने, जिसमें आपके राष्ट्रपति, आपके पूर्व राष्ट्रपति ओबामा भी शामिल थे

वे जागरूक अभिजात वर्ग, जो अपनी स्वतंत्रता से अधिक अपनी विरासत से घृणा करते हैं

उन्होंने इस्लाम के साथ आत्मघाती समझौता कर लिया है उन्होंने भेड़िए को बच्चों के कक्ष में बुला लिया और बच्चों को सहिष्णु बनना सिखाया उन्होंने आपके बच्चों को अपने इतिहास पर शर्म करना सिखाया, जबकि उन लोगों का स्वागत किया जो उसे समाप्त करना चाहते हैं

जैसा कि चार्ली ने सही कहा, और मैं उद्धृत करता हूँ चार्ली को:

“इस्लाम एक तलवार है, जिसका उपयोग वामपंथ अमेरिका का गला काटने के लिए कर रहा है”

कांग्रेस के नेता आते हैं, तब तक तो ठीक था, अब “आप” के भी आ रहे, ये तो कमाल है; कहीं ये शराब घोटाले में तो नहीं शामिल थे?

सुभाष चन्द्र

केजरीवाल ने, जब से उसकी “आम आदमी पार्टी” बनी, तब से वह संस्थापक सदस्यों को मिलाकर 25 से ज्यादा नेताओं को या तो निकाल चुका था या उन्हें निकलने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन आज एक ही बार में उसके 7 राज्यसभा सांसदों पार्टी छोड़ कर केजरीवाल को ऐसा झटका दिया कि उसकी कमर तोड़ दी। और उससे भी बड़ी बात ये सारे भाजपा में शामिल हो गए 

कांग्रेस से नेता भाजपा में आ रहे थे, तब तक तो ठीक था लेकिन 10 में से 7 “आप” राज्यसभा सांसद भाजपा में आ गए, ये तो कमाल है केजरीवाल ममता से कह रहा था कि अबकी बार भी आप ही जीतेंगी और मोदी की हार होगी लेकिन यहां उसका काफिला उसके अपनों ने ही लूट लिया। आ तो गए हैं लेकिन मंत्री शायद ही कोई बन पाए

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चर्चित YouTuber 
बीजेपी अध्यक्ष नबीन ने भ्रष्ट पार्टी के सांसदों को पार्टी में शामिल जरूर कर लिया है, लेकिन दूरी बनाए रखना जरुरी है। यूँ ही कारवां नहीं लूटता। एक साथ भ्रष्ट पार्टी को छोड़ने के पीछे कोई न कोई बहुत गहरा राज है, जिसे ये लोग आसानी से नहीं कबूलेंगे। लगता है दिल्ली हाई कोर्ट जस्टिस शर्मा की शराब घोटाले पर सख्त टिप्पणी की आंच में तो नहीं झुलस रहे ये थे ये सांसद कि अपना दामन बचाने के लिए बीजेपी की गोदी में? स्वाति मालीवाल की पिटाई में कितने लोग मालीवाल के साथ खड़े थे? चर्चा यह भी है, पुष्टि नहीं हो पायी है, कि राघव की भी मुर्गा बनाकर पिटाई होने पर आंख पर लगी चोट का इलाज करवाने विदेश भागे थे? यह भी समाचार था कि केजरीवाल राघव को अपना दामाद बनाना चाहते थे।        

वैसे ये आने वाले लोगों में कुछ को छोड़ कर, सब केजरीवाल के पाप में भागीदार रहे हैं राघव चढ़ा भी कोई दूध का धुला नहीं है हरभजन सिंह एक ऐसा व्यक्ति था जिसके “आप” में जाने पर मैं हैरान था लेकिन अब वह भी निकल आया अशोक मित्तल पर अभी कुछ दिन पहले ED का छापा पड़ा था उसके लिए कह सकते हैं कि वो डर कर निकला लेकिन ऐसा अन्य के साथ तो नहीं था

10 में 7 सांसदों का एक साथ निकलना कोई छोटी बात नहीं है इसके लिए अत्यधिक गुप्त रणनीति बनाई गई होगी जिसमें हो सकता है भाजपा का भी कोई नेता शामिल रहा होगा

7 सदस्यों के एक साथ निकलने ने उन्हें दल बदल कानून से बचाव मिल गया लेकिन संजय सिंह केवल 3 के लिए कह रहा है (जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में थे) कि उन्हें अयोग्य घोषित करना चाहिए और इसके लिए वो सभापति को पत्र लिखेगा और सभापति न माने तो हाई कोर्ट, सुप्रीम चले जाना लेकिन सिंघवी की फीस कहां से दोगे?

अन्ना हजारे के आंदोलन से निकली “भ्रष्टों” की पार्टी ने दिल से जनता को लूटा और अब खुद टूट गई ये अन्ना हजारे को बता कर पार्टी नहीं बनाए थे लेकिन अन्ना के दिल में अभी भी केजरीवाल के लिए दर्द है जो उनके आज के बयान से प्रकट हो रहा है 

उन्होंने 2 विपरीत बातें कही हैं - पहली, निजी हितों के लिए इन 7 ने पार्टी छोड़ी होगी; और दूसरी बात, पार्टी में दोष होगा, तब ही पार्टी छोड़ी” केजरीवाल के सत्ता से बाहर होने के बाद ये लोग क्या निजी हित साध रहे होंगे, यह कह कर क्यों केजरीवाल का बचाव कर रहे हो अन्ना जी और पार्टी की किस कमी की बात कर रहे हो जब आप के केजरीवाल के हर भ्रष्टाचार पर आप खामोश रहे

एक बार भगवंत मान सरकार और निपट जाए, फिर केजरीवाल का “मुफ्त” के हवाई जहाजों में घूमने की मौज मस्ती ख़त्म लोगो को “मुफ्त” के रेवड़ियां बांटता था और खुद “मुफ्त” की रेवाड़ी खा रहा है भगवंत मान के हवाई जहाजों में सैर सपाटा करके

केजरीवाल के 10 में से 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल


आम आदमी पार्टी (AAP) के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी से अलग होने का ऐलान कर दिया। राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि वे अकेले नहीं, बल्कि राज्यसभा में ‘AAP’ के दो-तिहाई सांसदों के गुट के साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने जा रहे हैं।

राघव चड्ढा ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने अपने खून-पसीने से इस पार्टी को सींचा था, लेकिन अब यह अपने बुनियादी मूल्यों और नैतिकता से पूरी तरह भटक चुकी है। राघव चड्ढा ने खुद को ‘गलत पार्टी में सही आदमी’ बताते हुए कहा कि पार्टी अब देश के हित के बजाय निजी फायदे के लिए काम कर रही है।

राघव चड्ढा के साथ हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, संदीप पाठक और अशोक मित्तल जैसे प्रमुख सांसदों ने भी समर्थन के संकेत दिए हैं। राज्यसभा में पार्टी के 10 सांसदों में से 7 के साथ होने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि वे संविधान के प्रावधानों के तहत यह कदम उठा रहे हैं।

राघव चड्ढा के इस फैसले से आम आदमी पार्टी के भीतर एक बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है, जो आने वाले समय में दिल्ली की सत्ता समीकरणों को बदल सकता है।

आत्मघाती इतिहास और वर्तमान का धैर्य क्यों बंधे हैं मोदी-शाह के हाथ? क्योकि हिन्दुओं से कही ज्यादा समझदार मुसलमान है जो बीजेपी को हराने एकजुट वोट देता है लेकिन हिन्दू आरक्षण और सेकुलरिज्म के नशे में जातिगत सियासत में डूबा रहता है

इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन विडंबना देखिए कि हम इतिहास से सीखने के बजाय बार-बार वही गलतियां दोहराने में गर्व महसूस करते हैं। आज जो लोग सोशल मीडिया पर बैठकर पूछते हैं कि "मोदी-शाह कड़ा फैसला क्यों नहीं लेते?" उन्हें एक बार 1992 और 2004 के आईने में अपनी तस्वीर देख लेनी चाहिए।
जिस दिन मोदी ने कड़े फैसले लेने शुरू कर दिए, कोई यह सोंचकर मोदी सरकार को वापस लाने की बात नहीं करेगा कि इसने देश को कहां से कहां पहुंचा दिया, आतंकवाद और इसके समर्थकों को नेस्ताबूत किया जा रहा है, किस तरह तीन तलाक और हलाला के नाम मुस्लिम महिलाओं का शोषण किया जा रहा था, किस तरह जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का दुरुपयोग हो रहा था, कल तक जो अनाज गोदामों में सड़ता था और किसी काम का नहीं रहता था उसे BPL के नाम पर उपयोग किया जा रहा है, किस तरह सनातन को धूमिल किया जा रहा था आदि आदि एक लम्बी सूची है मुस्लिम महिलाएं तो क्या हिन्दू भी भूल कर विरोधियों को वोट देने में देर नहीं करेगा।
कल्याण सिंह: शौर्य का वह उपहार, जिसे 'अपनों' ने ठुकराया
1992 में अयोध्या में कलंक का ढांचा गिरा, तो कल्याण सिंह ने एक क्षण की भी परवाह किए बिना अपनी सत्ता का बलिदान दे दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि "राम मंदिर के लिए एक नहीं, सौ सरकारें कुर्बान।" लेकिन इसके बाद क्या हुआ? जिन कारसेवकों पर मुलायम सिंह ने गोलियां चलवाई थीं, उन्हीं को हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से ने 'जाति' के नाम पर वोट देकर सत्ता की दहलीज पार करा दी। यह वही दौर था जब "मिले मुलायम-कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम" के नारों ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान की कमर तोड़ दी थी।
अटल बिहारी वाजपेयी: विकास को 'व्यक्तिगत लालच' की भेंट चढ़ाया
2004 का चुनाव भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा 'धोखा' था। अटल जी ने देश को सड़कों का जाल दिया, परमाणु शक्ति बनाया और अर्थव्यवस्था को गति दी। लेकिन जनता ने क्या दिया? छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों और विपक्षी 'गठबंधन' के भ्रमजाल में फंसकर एक तपस्वी को सत्ता से बाहर कर दिया। परिणाम? 10 साल का वह रिमोट कंट्रोल शासन, जिसने देश को भ्रष्टाचार और आतंकवाद के गहरे गर्त में धकेल दिया। बारूद के ढेर पर बैठे भारत में इस्लामिक आतंकियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु/संत और साध्वियों को जेल में डाल भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद के नाम पर हिन्दुओं को बदनाम किया जा रहा था। और हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में धुत होकर झूठ को सच मान रहा था।
लालबहादुर शास्त्री :
लालबहादुर शास्त्री की अकाल मृत्यु का असली कारण था 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान देश में छुपे गद्दारों पर कार्यवाही। आज कितने नेता शास्त्री जी का नाम लेते हैं? इस बौने प्रधानमंत्री ने अपने साहसिक कार्यों से नेहरू के 18 सालों को अपने अल्प 18 महीने के कार्यकाल से दाब दिया था। अगर शास्त्री जी के काम उजागर किये जाएं तो देश स्तब्ध रह जाएगा की ऐसा था हमारा "बौना" प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री।
आज मोदी और शाह के सामने दुश्मन केवल बाहर नहीं, बल्कि भीतर की 'जातिवादी दीवारों' के रूप में खड़ा है।
खालिस्तानी और वामपंथी संगठन: ये संगठन जानते हैं कि वे सीधे तौर पर मोदी सरकार से नहीं लड़ सकते। इसलिए वे क्या करते हैं? वे 'किसान', 'दलित' या 'पिछड़ा' कार्ड खेलते हैं।
हिंदुओं की कमजोरी: दुर्भाग्य यह है कि जब भी राष्ट्रवाद की बात आती है, विपक्ष एक ऐसी 'जातिगत ढाल' आगे कर देता है जहाँ हिंदू बिखर जाता है। जैसे ही हिंदू अपनी 'जाति' में सिमटता है, मोदी और शाह की वह ताकत आधी हो जाती है जो 'तांडव' करने की क्षमता रखती है
2026 का सच: मलाई बनाम राष्ट्रवाद
आज 2026 में भी स्थिति वही है। दशकों तक जिन्होंने सिस्टम की मलाई खाई, जिनके लिए भ्रष्टाचार ही ऑक्सीजन था, उन्हें आज सूखी हड्डी भी नसीब नहीं हो रही। इसीलिए ये 'बलवा' का रास्ता चुन रहे हैं। कभी डकैत संगठनों के नाम पर, कभी विदेशी फंडिंग के दम पर अराजकता फैलाई जा रही है। मोदी-शाह का धैर्य उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी 'मजबूरी' है, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने कड़ा कदम उठाया, तो उनका अपना ही 'हिंदू भाई' किसी अफवाह या जातिगत राजनीति के कारण फिर से 2004 न दोहरा दे।
2014 चुनाव के बाद जिस बात को मुसलमान, मुस्लिम कट्टरपंथी और इनको समर्थक देने वाली पार्टियां समझ गयी कि बीजेपी को हराना है तो एकजुट होकर वोट दो। लेकिन हिन्दू आरक्षण और जातिगत सियासत से बाहर नहीं आ पाया। अगर हिन्दू आरक्षण और जातिगत सियासत से बाहर आ गया होता जातियों पर आधारित चाहे वह सत्ता में हैं या विपक्ष में कभी इन पार्टियों को वोट नहीं देता। रामायण को फाड़ने की और सनातन को कलंकित करने की किसी की हिम्मत नहीं होती।
जब तक हिंदू 'वोटर' रहेगा, 'नागरिक' नहीं बनेगा...जब तक हिंदू खुद को 'ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, जाट या दलित' के खांचे में रखकर देखेगा, तब तक देश के दुश्मनों को ऑक्सीजन मिलती रहेगी। मोदी-शाह को 'फ्री हैंड' कानून नहीं देता, बल्कि जनता की अटूट एकजुटता देती है।
अगर हम चाहते हैं कि देशद्रोहियों के खिलाफ 'तांडव' हो, तो पहले हमें अपनी 'जातिवादी ढालों' को तोड़कर एक मजबूत सनातनी दीवार बनना होगा। वरना इतिहास फिर से वही लिखेगा—कि नायक लड़ते रहे, और हम स्वार्थ में अपनों को ही धोखा देते रहे। मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिशर्स अपने साथ फौज नहीं लेकर आए थे उनको मालूम था भारत में थोक के भाव में बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र मिल जाएंगे।

बंगाल के प्रथम चरण के चुनाव के लिए चुनाव आयोग, सुरक्षाबल, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट बधाई के पात्र हैं

सुभाष चन्द्र

बंगाल में प्रथम चरण के चुनाव में रिकॉर्ड 92.88 % छुटपुट घटनाओं को छोड़ कर शांतिपूर्ण मतदान के लिए चुनाव आयोग (खासकर ज्ञानेश कुमार जी), सुरक्षा बल और केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट बधाई के पात्र हैं। 

वास्तव में तत्कालीन चुनाव आयुक्त TN Seshan ने जो गति चुनाव आयोग को दी उसे वर्तमान आयुक्त ने कहीं आगे बढ़ा दिया। शेषन से ज्यादा विरोध ज्ञानेश का हुआ। लेकिन अपनी सीमाओं में रहते हर काम को बखूबी निभा रहे हैं।  

चुनाव आयोग ने जिस तरह SIR का काम संभाला और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आयोग को पूरा समर्थन मिला उसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है चुनाव में आयोग ने केंद्र सरकार से जितने भी सुरक्षा बल मांगे शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए वे उसे मिले 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
केंद्र सरकार ने पैरामिलिट्री संगठनों को मिला कर एक अलग संगठन बनाया Central Armed Police Forces (CAPF) और इसमें शामिल BSF, CRPF, SSB, ITBP और CISF के प्रमुखों ने कोलकाता में बैठ कर सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा की

CAPF की 2500 कंपनियां तैनात की गई और एक कंपनी में 100 से 110 सुरक्षाकर्मी होते हैं, मतलब कुल मिलाकर 2.5 लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई शायद इसलिए ही 92.88% रिकॉर्ड मतदान हुआ जो पिछले चुनाव के 82.30% से 10% ज्यादा है इसका श्रेय आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सुरक्षाबलों, मोदी सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट को भी जाता है 

सुरक्षाबलों की वजह से मतदाता भयमुक्त होकर मतदान कर सके

अभी दूसरे चरण का चुनाव होना शेष है लेकिन पिछले चुनावों से तुलना की जाए तो हम देखते हैं ममता को 2016 के मुकाबले 2021 में मात्र 3.11% वोट ज्यादा मिले थे (यानी 48.02%) और सीट बढ़ी थी केवल 4 दूसरी तरफ भाजपा को 2016 के मुकाबले 2021 में 28% वोट ज्यादा मिले थे (यानी 38.15%) लेकिन सीट बढ़ी थी 74 (3 से 77 हो गई)

2011 में 84.33% मतदान भी रिकॉर्ड था और ममता CPM को हटा कर सत्ता में आई थी अब रिकॉर्ड मतदान के बाद भाजपा भी ममता को सत्ता से हटा कर सत्ता में आ सकती है

अगर दूसरे चरण में भी यही स्थिति रहती है और भाजपा के वोट 38% से 6-7% भी बढ़ गए तो सत्ता की चाबी उसके हाथ में होगी एक फैक्टर और नज़र आया है कि हुमायूँ कबीर का जिस तरह टकराव हुआ है TMC के साथ, उसे देख कर लगता है मुस्लिम वोट निश्चित रूप से बंटा है, जबकि हिंदू वोट एकजुट हुआ है SIR में 91 लाख वोट कटने से ममता का वोट गिरना तय है लेकिन कितना गिरेगा यह समय ही बताएगा 

चुनाव आयोग के काम में कोलकाता हाई कोर्ट की तरफ से वोटिंग के एक दिन पहले अड़ंगा लगाया गया जब कोर्ट ने आयोग द्वारा चुनाव में गड़बड़ी फ़ैलाने वाले 800 संदिघ्द लोगो के लिए आदेश पर रोक लगा दी और सुनवाई की तारीख 30 जून तक के लिए उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी उससे क्या फर्क पड़ना था जब भारी सुरक्षाबल तैनात हैं 30 जून का क्या मतलब है जब चुनाव 29 अप्रैल को संपन्न हो जाना है

कुल मिलाकर अनुमान यही लगाया जा सकता है बंगाल से ममता की विदाई तय है 

पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाई कोर्ट से बड़ा झटका, अंतरिम जमानत याचिका खारिज


सुप्रीम कोर्ट के बाद अब कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाई कोर्ट से भी बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट ने खेड़ा की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है।

दरअसल, पवन खेड़ा ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रिंकी सरमा पर कई पासपोर्ट रखने और विदेश में संपत्तियाँ होने के आरोप लगाए थे। इसके बाद रिंकी सरमा ने उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कराया।

मामले की सुनवाई के दौरान खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह ज्यादा से ज्यादा मानहानि का मामला है और उनके मुवक्किल के फरार होने की कोई आशंका नहीं है, इसलिए गिरफ्तारी से राहत दी जानी चाहिए। वहीं, असम सरकार की तरफ से महाधिवक्ता देवजीत सैकिया ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मामला गंभीर है और इसमें जालसाजी जैसे आरोप शामिल हैं।

अवलोकन करें:-

गिरफ़्तारी से बचने हैदराबाद भागा पवन खेड़ा: असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा, कांग्रेस नेता
गिरफ़्तारी से बचने हैदराबाद भागा पवन खेड़ा: असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा, कांग्रेस नेता
 

करीब तीन घंटे चली बहस के बाद जस्टिस पार्थिव ज्योति सैकिया की एकल पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे अब सुनाते हुए कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद पवन खेड़ा की गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गई है।

‘लाहौर में कंपनी खोल ले, भारत में काहे को मर रहा है’: बाबा बागेश्वर ने लेंसकार्ट को सुनाई खरी-खरी


आईवियर कंपनी लेंसकार्ट में कर्मियों को कलावा और तिलक ना लगाने देने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने लेंसकार्ट के मालिक पर जमकर भड़ास निकाली है और कंपनी को भारत छोड़कर पाकिस्तान के लाहौर जाने की सलाह दी है। प्रयागराज में कार्यक्रम के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शात्री ने यह टिप्पणी की है।

उन्होंने कहा, “एक कंपनी है उसका नाम लेंसकार्ट है, उसने अपने वर्करों को बोला है कि हमारे यहाँ कोई तिलक लगा के नहीं आ सकता, मंगलसूत्र पहन के नहीं आ सकता, सिंदूर लगा के नहीं आ सकता। तू अपनी कंपनी लाहौर में खोल ले, भारत में काहे को मर रहा है। तेरे कक्का का भारत है क्या, हमारे तो बाप का भारत है।”

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बाबा बागेश्वर ने कहा कि जिनको तिलक-चंदन-राम-हनुमान से दिक्कत है वो पतली गली पकड़ कर लाहौर निकल ले। उन्होंने कहा, “लेंसकार्ट वालों से कहेंगे कि बेटा गड़बड़ हो गए हो तुम, अभी भी मौका है सुधर जाओ, वरना भारत का कानून सुधार भी देता है और यूपी की पुलिस तो वैसे भी फेमस है।”

जो ममता ने IPAC में किया, वो कोई आम आदमी करता तो अभी तक जेल में होता; इसलिए “कानून सबके लिए समान है” ये एक मज़ाक है

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 22 को स्पष्ट कहा है कि ED की जांच में कोई मुख्यमंत्री बाधा नहीं डाल सकता और इसका मतलब साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट के विचार में ममता बनर्जी ने ED के काम में बाधा डाली

हंसी आती है उन वरिष्ठ पत्रकारों पर जो टीवी पर बैठ ममता को बहुत मजबूत नेत्री कहते हैं। ममता नेत्री नहीं बल्कि किसी मवाली से कम नहीं। महिला होकर उन गालियों को देती है जो गली-कूचे में गुंडे देते हैं। अभी तीन/चार पहले ही प्रधानमंत्री मोदी के लिए किन आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, जो साबित करता है कि ममता कोई नेत्री नहीं मवाली है। वैसे पहले भी अभद्र(मर्द गुप्तांग) भाषा का इस्तेमाल कर चुकी है। हैरानी होती है ऐसी मवाली आदत की नेत्री को वोट देने वालों पर। क्या वह भी इसी बिरादरी से आते हैं?       

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अगर ऐसा किसी आम आदमी ने किया होता तो ED स्वयं ही उसे गिरफ्तार कर लेती और वह अभी जेल में होता इसलिए यह कहना कि “कानून सबसे के लिए समान है” एक मज़ाक ही प्रतीत होता है। 

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा कि “यह एक असाधारण मामला है; यह केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों में बाधा डालने से संबंधित है; जब कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है, तो इसे केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं कहा जा सकता; यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य है, जो संयोगवश मुख्यमंत्री भी है, जिसने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को ही खतरे में डाल दिया; कभी ऐसी कल्पना नहीं की गई थी कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री वहां पहुंच जाए”

पुलिस अधिकारियों की वकील मेनका गुरुस्वामी ने तो ED के आर्टिकल 32 में याचिका को भी गलत ठहरा दिया और कहा कि मामला केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद है तब जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा कि इसमें राज्य का कौन सा अधिकार शामिल है, किसी राज्य का मुख्यमंत्री चल रही जांच में आकर लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकता इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जा सकता 

पता नहीं कहां सही है लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि मेनका गुरु स्वामी ने कोर्ट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट “महारानी” के काम पर टिप्पणी नहीं कर सकता और इस पर एक जज ने पूछा “कौन है रानी” 

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‘मुझे झाँ* फर्क नहीं पड़ता’: ममता बनर्जी ने मोदी के लिए किया अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल; और कितनी
‘मुझे झाँ* फर्क नहीं पड़ता’: ममता बनर्जी ने मोदी के लिए किया अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल; और कितनी
 

सुप्रीम कोर्ट का कहना कि मुख्यमंत्री ने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया 

अब यह तो सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं माना है कि ममता ने ED की जांच में बाधा डाली ममता ने खुद माना था कि वह वहां पार्टी अध्यक्ष के नाते गई थी जो फाइल और अन्य दस्तावेज़ वह वहां से जबरन ले गई थी वे भी अभी तक ED को नहीं लौटाए है सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में ममता का अपराध सिद्ध हो गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट सख्त टिप्पणियां तो कर रहा है लेकिन उसके लिए सजा का ऐलान नहीं कर रहा वह सजा का मामला कहीं ट्रायल कोर्ट के पास न भेज दिया जाए 

सरकारी काम में बाधा डालने के लिए सजा के प्रावधान हैं -

-Whoever voluntarily obstructs any public servant in the discharge of their public functions can be punished with:

Imprisonment of either description (simple or rigorous) for a term that may extend to three months, OR

Fine that may extend to five hundred rupees (increased to ₹2500 under BNS 221), OR

Both

If the interference involves more than simple obstruction, heavier penalties apply: 

Assault or Criminal Force to Deter Duty (IPC 353): If a person assaults or uses criminal force to prevent an official from doing their job, the sentence can be up to 2 years imprisonment, a fine, or both.

ममता का अपराध use of criminal force की श्रेणी में आता है

हो सकता है सुप्रीम कोर्ट भी 4 मई के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहा हो अगर ममता हार गई तो मामला तुरंत निपटा दिया जाएगा