राहुल गांधी का एक और कछुए की चाल से चलने वाला केस देखो; 7 साल लगा दिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन रद्द करने की याचिका ख़ारिज करने में

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी के खिलाफ 2018 में गिरगांव मजिस्ट्रेट कोर्ट में भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल ने एक आपराधिक  मुकदमा दर्ज किया था राहुल गांधी पर आरोप था कि उसने राफेल मामले में राजस्थान की रैली में।    

प्रधानमंत्री मोदी को “चोरों का सरदार” (“Commander-in-Thief) कहा था

गिरगांव मजिस्ट्रेट ने 28 अगस्त, 2019 को राहुल गांधी को समन जारी किए थे जिन्हें राहुल गांधी ने 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी (writ petition No 4391 of 2021) 

अब 8 सितंबर, 2026 को हाई कोर्ट के जस्टिस NR Borkar ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “the court did not find any ‘perversity and illegality’ in the magistrate’s order and hence no reason to interfere”.

अब आप हिसाब लगा लीजिए कैसे कछुए की चाल से चलते हैं राहुल गांधी के खिलाफ केस 28 अगस्त, 2019 के समन पर फैसला होने में 7 साल लग गए स्वयं हाई कोर्ट ने राहुल की याचिका पर निर्णय देने में 5 साल लगा दिए

जस्टिस बोरकर ने यह भी कहा कि वो अपने 2021 के आदेश को बरकरार रखते हैं जिसमें मजिस्ट्रेट को सुनवाई 6 हफ्ते के लिए टालने के लिए कहा गया था जिससे राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें 2021 का कोई और आदेश मुझे नहीं मिला जिसको राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देता लेकिन अब देगा और जैसे अन्य मामलों में होता आया है, सुप्रीम कोर्ट इस केस में गिरगांव कोर्ट के समन पर रोक लगा देगा जिससे मामला फिर बर्फ में लग जाएगा 

में पहले भी कहा है राहुल गांधी VVIP/दामाद है अदालतों का 5 साल हाई कोर्ट का उसकी याचिका पर बैठे रहना भी इसका एक सबूत है 

मजे के बात है राहुल गांधी के वकील सुदीप पसबोला और कुशल मोर ने कोर्ट में कहा कि शिकायत करता पीड़ित पक्ष नहीं है, उसे शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है उनका मतलब था कि शिकायतकर्ता की कोई मानहानि नहीं हुई और इसलिए aggrieved party तो मोदी हैं, उन्हें शिकायत दर्ज करनी चाहिए 

मतलब कांग्रेस का तर्क है कि हमारे लोग दिन रात प्रधानमंत्री को गाली देंगे और अगर मोदी जी आहत होते हैं तो खुद कोर्ट में जाए नया संविधान लिखना चाहता है राहुल गांधी लेकिन जब गांधी परिवार के किसी सदस्य खिलाफ कुछ कहा जाता है तो कांग्रेस के लोग क्यों FIR दर्ज करते हैं, खुद गांधी परिवार के लोग क्यों नहीं करते ऐसी दलीले देकर कांग्रेस अपने ही जाल में फंस जाएगी और जो भी मुक़दमे उसने किसी के खिलाफ भी फायर किये हुए हैं वो सब पिट जाएंगे

UPI पर शुल्क के लिए ऐसा बवाल काट रहे हैं जैसे आसमान गिर गया हो; सुविधाएं सब चाहिए लेकिन शुल्क नहीं देना

सुभाष चन्द्र

टैक्सों की मार का सबसे ज्यादा असर वेतनभोगी पर होता है। और जिन गरीबों(भिखारियों से लेकर सब्जी बेचने वाले आदि) के कन्धों पर बैठ सियासतखोर सियासत खेलते हैं वही गरीब वेतनभोगी से ज्यादा अमीर होता है। अभी कुछ दिन पहले एक भिखारिन के घर से लाखों रूपये और बोरों में सिक्के मिलने के अलावा कुछ महीने पहले शायद महाराष्ट्र में एक करोड़पति भिखारी के पास दो बंगले और भिखारी कर्मचारियों का भांडा सामने आया। अगर यही किसी वेतनभोगी के घर से बरामदगी होती सारा मीडिया दहाड़ें मार रहा होता। आज भीख एक सफेदपोशी व्यापार है। 

इस विषय पर राहुल गांधी ने फिजूल का बवाल काटा है जबकि UPI जैसे सिस्टम पर ब्राज़ील और राहुल गांधी के अब्बा जैसे मुल्क चीन में भी 0.40% शुल्क लगता, ब्राजील में 0.33%

NPCI ने व्यवस्था दे दी है कि Person to Person लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं होगा और 2000 तक की खरीदारी पर भी कोई शुल्क नहीं होगा

ग्राहक जब दुकानदार को डिजिटल भुगतान करता है तो दुकानदार को पेमेंट प्रोवाइडर को छोटी सी प्रोसेसिंग फीस देनी होती है। NPCI ने व्यवस्था दी है कि 75000 या उससे ज्यादा भुगतान पर अधिकतम शुल्क 300 रुपए होगा जो 75000 का 0.4% है।  

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महीने में एक लाख तक का भुगतान लेने वाले दुकानदारों पर कोई शुल्क नहीं होगा। बिजली बिल, स्कूल फीस, पाइप लाइन गैस बिल भुगतान पर मात्र 5 रुपए टैक्स होगा

डिजिटल भुगतान कितनी बड़ी सुविधा है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 75000 या उससे ज्यादा भुगतान करना है तो फिर कॅश लिए चलना पड़ेगा और कहीं भी रास्ते में लुट सकते हैं जबकि डिजिटल भुगतान एक क्लिक में क्रेडिट/डेबिट कार्ड से हो जाता है

मुझे समझ नहीं आता कि इसमें अमेरिका कहां से बीच में आ गया जो राहुल गांधी कह रहा है कि यह अमेरिका के दबाव में किया गया है। 

सच्चाई यह है कि लोग सुविधाएं सब चाहते हैं लेकिन कोई शुल्क नहीं देना चाहते। बड़े व्यापारी अगर कॅश में भुगतान लेंगे तो पैसा जमा करने के लिए अलग से कर्मचारी रखने पड़ेंगे बैंक भेजने के लिए जबकि डिजिटल भुगतान से पैसा तुरंत खाते में जमा हो जाता है 

राहुल गांधी को रायता फ़ैलाने से मतलब है। उससे BRICS की सफलता बर्दाश्त नहीं हो रही। 

जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए मजबूत है तंत्र: कह रहे हैं चीफ जस्टिस; लेकिन पारदर्शिता कहां है? न्यायपालिका में सुधार होने चाहिए लेकिन बिना न्यायपालिका को शामिल किए

सुभाष चन्द्र 

सितम्बर 14 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने राम जेठमलानी स्मारक व्याख्यान में बोलते हुए कहा कि “जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा बनाया गया तंत्र मजबूत, बहुत प्रतिक्रिया देने वाला और समय से काम करने वाला है। हम बिना हिचकिचाते हुए मानते हैं कि सुधार ही नियम होना चाहिए कोई भी संस्था एक ही स्थिति में न तो टिक सकती है और न ही गर्व महसूस कर सकती है लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर सार्वजनिक मंच से प्रतिक्रिया देना सही नहीं हो सकता” उन्होंने न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना की भी बात की

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चीफ जस्टिस की बातें तालियां बटोरने के लिए बहुत अच्छी हैं लेकिन सत्य से परे हैं। आलोचना कौन कर सकता है न्यायपालिका की, वकील लोग तो कर नहीं सकते क्योंकि उन्हें ब्लैकलिस्ट होने का डर होता है जनमानस सोशल मीडिया पर आलोचना कर सकता है लेकिन सोशल मीडिया को तो न्यायपालिका ठेंगे पर रखती है और वहां कही गई आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं देती बेशक आलोचना कितनी भी रचनात्मक क्यों न हो 

महेश जेठमलानी ने सितम्बर 14 को उसी समारोह में कहा कि “ न्यायपालिका और न्यायाधिकरणों में भ्रष्टाचार नहीं हो सकता जब तक कि फ़िक्सर वकील न हों, जो पूरी कानूनी प्रणाली को रिश्वत देकर खेलते हैं, उनके नाम शायद ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास हैं जो कॉलेजियम को सूचित किए जाने चाहिए 

जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए तंत्र मजबूत होगा लेकिन केवल आपकी दृष्टि से क्योंकि उन शिकायतों का निपटारा कैसे होता है, किसी को पता नहीं चलता जिसका मतलब है आपका तंत्र पारदर्शी नहीं है, फिर कोई कैसे विश्वास कर सकता है?

क़ानून मंत्री ने पिछले दिनों कहा था कि “2016 से 2025 के बीच 8630 शिकायतें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ चीफ जस्टिस कार्यालय को भेजी गई थी जिनमें corruption, sexual misconduct, and other serious improprieties के आरोप थे सबसे ज्यादा 1,170 शिकायतें 2024 में थी और 1,102 शिकायतें 2025 में थी इनका निपटारा न्यायपालिका के आंतरिक “in-house mechanism’ से होता है न कि सरकार के किसी दाखल से

किसी को पता नहीं इन गंभीर शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, क्या किसी को दोषी पाया गया और पाया गया तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? 

यह कैसा आंतरिक प्रबंधन है शिकायतों के निपटारे के लिए? फिर कैसे माना जा सकता है कि शिकायतों से निपटने के लिए आपका तंत्र मजबूत है? आपने तो जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR नहीं होनी दी जिसके खिलाफ संसदीय समिति आरोप सही पाए फिर कैसा मजबूत तंत्र है आपका?

दरअसल न्यायपालिका ने अपना ताना बाना ऐसा बना रखा है कि जैसे हर जज रेनकोट पहन कर नहाता है जिस पर कोई दाग नहीं लग सकता 

न्यायपालिका में सुधार अवश्यम्भावी हैं लेकिन उन सुधारों की प्रक्रिया से न्यायपालिका को दूर रखना होगा अन्यथा फिर चौधराहट अपने ही हाथ में रखने की व्यवस्था बना दी जाएगी जैसे आज है 

सबसे बड़ा हथकंडा न्यायपालिका ने अपना रखा है कि किसी भी जज के खिलाफ केस दायर करने से पहले चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी चाहिए ये कैसा न्याय है? मतलब दरोगा पर आरोप होगा तो उसी से अनुमति लेनी होगी कि उसके खिलाफ जांच की जाए या नहीं

आप खुद भी न्यायिक सुधार कर सकते हैं बस हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति UPSC से परीक्षा के माध्यम से शुरू कर दीजिए लिखित परीक्षा के 60%, जितने केस जीते, उनके 20% और इंटरव्यू के 20% नंबर होने चाहिए ऐसा कीजिए, न्यायपालिका का आधा भ्रष्टाचार स्वतः ख़त्म हो जाएगा

इस्लामिक नाटो का शुरू होने से पहले ही क्या The End हो गया; बेहतर है सऊदी अरब इज़रायल के साथ खड़ा हो जाए

सुभाष चन्द्र

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर 7 अगस्त, 2026 को मक्का में एक कथित Islamic NATO बनाया जिसमें प्रावधान था कि किसी भी एक देश पर हमला अन्य सदस्य देशों पर भी माना जाएगा और ऐसे में सब एक दूसरे के साथ मिलकर युद्ध करेंगे 

लेकिन एक समझौता एक दिखावा बनकर रह गया क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की इसे अमलीजामा नहीं पहना रहे अभी इसी महीने ईरान समर्थित हूती ने सऊदी अरब के कंट्रोल वाले मोखा शहर और Bab el-Mandeb strait पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन तुर्की और पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ diplomatic बातचीत कर रहे हैं जबकि जवाब हमले का देना चाहिए था। 

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पाकिस्तान पर बिना कोई हमला हुए तुर्की उसे हथियार सप्लाई कर रहा है, जाहिर है भारत के खिलाफ युद्ध करने के लिए लेकिन जिस सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती ने हमला कर दिया उस पर कोई कार्रवाई नहीं चाहता 

दूसरी तरफ पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने को आतुर रहा लेकिन फेल हो गया और BRICS की बैठक में ईरान के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी से युद्ध ख़त्म कराने के लिए मदद मांगी ऐसे पाकिस्तान की इंटरनेशनल लेवल पर इज़्ज़त उतर गई वैसे पाकिस्तान की इज़्ज़त तो हमारी हॉकी टीम की बेटियां भी उतार आई जो उनके मंत्री मोहसिन नक़वी से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया

इज़रायल के संबंध UAE के साथ मधुर हैं और इज़रायल उसे हथियार भी मुहैया करता है दोनों अब्राहम समझौते में शामिल हैं सऊदी अरब के लिए बेहतर होगा अगर वह इज़रायल से रक्षा समझौता करे इज़रायल सऊदी की मदद कर सकता है लेकिन पाकिस्तान और तुर्की हरगिज़ नहीं करेंगे 

सऊदी अरब के इज़रायल से मतभेद केवल फिलिस्तीन को लेकर हैं 

आज की भू राजनीति में एक देश दो अलग अलग देशों से संबंध रख सकता है बेशक उनके आपस में संबंध ठीक न हो जैसे भारत के संबंध फिलिस्तीन से भी हैं और इज़रायल से भी हैं, भारत रूस के साथ भी दोस्ती रखता है और अमेरिका के साथ भी

इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए सऊदी अरब को इज़रायल से हाथ मिलाना चाहिए लेकिन सऊदी अरब ने तो इज़रायल के साथ Diplomatic Relations भी नहीं बना कर रखे वो पाकिस्तान पर भरोसा करता है जिसका सऊदी अरब पेट भरता रहता है 

सऊदी अरब को देखना चाहिए कि UAE और ईरान Brics की बैठक में मिले जबकि ईरान UAE में अमेरिकी अड्डों पर हमले करता है फिर भी न जाने क्यों दोनों की मुलाकात हुई सऊदी अरब चाहता तो उसके भी विदेश मंत्री Prince Faisal bin Farhan Al Saud ईरान के राष्ट्रपति से मिल सकते थे

लगता है सऊदी अरब भी इज़रायल को बर्बाद देखना चाहता है और इसलिए ही उसने तुर्की और पाकिस्तान से समझौता किया है वो दोनों देश सऊदी अरब का इस्तेमाल इज़रायल पर हमले के लिए करेंगे लेकिन उससे भी नुक्सान सऊदी अरब का होगा क्योंकि सऊदी अरब इज़रायल की जद में है और वो वहां बैठे तुर्की और पाकिस्तान को भी निपट लेगा

कर्नाटक : डी.के. शिवकुमार का ‘जमीन सिंडिकेट’: लालबाग-कब्बन पार्क पर गिद्ध दृष्टि

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटालों के खिलाफ उठे प्रचंड जनआक्रोश के आगे आखिरकार सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में बेंगलुरु के सार्वजनिक पार्कों और खेल के मैदानों की 5 प्रतिशत जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों, लीज और बिक्री के लिए खोलने वाले विवादास्पद ‘पार्क्स अमेंडमेंट बिल 2026’ ने राज्य में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया। गैर-जिम्मेदाराना नीतियों से खाली हुए सरकारी खजाने को भरने और रियल एस्टेट सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने की इस नीति को शहर की हरी-भरी सांसों पर सीधा डाका माना गया। सड़क से लेकर राजभवन तक चले चौतरफा दबाव के कारण कैबिनेट को यह जनविरोधी संशोधन बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।

65.4 एकड़ हरित क्षेत्र पर डाका: लालबाग और कब्बन पार्क पर गहराया संकट
बेंगलुरु में वर्तमान में लगभग 1,308 एकड़ क्षेत्र में फैले 1,353 सार्वजनिक पार्क हैं। इस संशोधन के लागू होते ही शहर के 65.4 एकड़ से अधिक हरे-भरे क्षेत्र पर कंक्रीट के ढांचे खड़े होने का खतरा मंडराने लगा था। सबसे बड़ा आघात 240 एकड़ वाले ऐतिहासिक लालबाग की 12 एकड़ और करीब 197 एकड़ में फैले कब्बन पार्क की 9.85 एकड़ जमीन पर था। करीब 22 एकड़ की यह धरोहर सीधे तौर पर व्यावसायिक सिंडिकेट के हवाले करने की तैयारी थी, जिसे जनता ने अपनी पहचान पर हमला माना।

‘ब्रांड बेंगलुरु’ की आड़ में ऐतिहासिक धरोहरों पर गिद्ध दृष्टि
‘ब्रांड बेंगलुरु’ के आकर्षक नारों की आड़ में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कार्यालय के संरक्षण में शहर की बेशकीमती जमीनों के सौदे तैयार किए जा रहे थे। अरबों वर्ष पुरानी भूगर्भीय धरोहर वाली लालबाग की चट्टानों और ऐतिहासिक कब्बन पार्क की शांति को नष्ट कर वहां व्यावसायिक केंद्र बनाने की साजिश रची गई। विकास के नाम पर शहर की सदियों पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने का यह खुला प्रयास था।

टनल रोड प्रोजेक्ट: ठेकेदारों को उपकृत करने के लिए लालबाग की बलि
हजारों करोड़ रुपये के विवादास्पद टनल रोड प्रोजेक्ट के जरिए अपने चहेते निजी ठेकेदारों को भारी भरकम कमीशन बांटने की बिसात बिछाई गई थी। टनल रोड के नाम पर लालबाग की एकड़ भर बेशकीमती जमीन अधिग्रहित करने और वहां निजी व्यावसायिक निर्माण को स्वीकृति देने की तैयारी थी। बुनियादी ढांचा सुधारने के नाम पर कमीशनखोरी के इस मॉडल ने शहर के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया था।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

अनुच्छेद 21 का हनन: स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार पर कुठाराघात
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार रेखांकित किया है कि शहरी हरित क्षेत्र और खुले पार्क नागरिकों के जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। सार्वजनिक पार्कों की जमीन को निजी लाभ के लिए बाजार में उतारना सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन था, जिसके खिलाफ कानूनी घेराबंदी तेज हो गई।

सदन में बिना बहस चोरी-छिपे बिल पास कराने का कृत्य
सदन में जब महर्षि वाल्मीकि निगम के 89 करोड़ रुपये के घोटाले पर जवाब मांगा जा रहा था, तब हंगामे और अव्यवस्था के बीच बिना किसी लोकतांत्रिक चर्चा या सार्वजनिक परामर्श के इस विवादित कानून को पारित करा लिया गया। शहर के नागरिकों, पर्यावरणविदों और नगर नियोजकों से इस मसौदे को छिपाकर रखना यह साबित करता था कि सरकार के इरादे पूरी तरह संदिग्ध थे।

वाल्मीकि निगम घोटाले के बाद जमीन से नया कमीशन तंत्र
महर्षि वाल्मीकि विकास निगम के करोड़ों रुपये के गबन की जांच के बीच शहरी जमीनों के सौदों से नया तंत्र खड़ा करने की कोशिशें तेज थीं। सरकारी खजाने में सेंध लगने के बाद सत्ता से जुड़े सिंडिकेट की नजर बेंगलुरु की करोड़ों रुपये प्रति वर्गफुट वाली प्राइम लोकेशन की सार्वजनिक जमीनों पर टिक गई थी, ताकि चुनावी फंड और राजनीतिक खर्चों की भरपाई की जा सके।

मुफ्त की रेवड़ियों से खाली हुआ खजाना, अब पार्कों से भरपाई की जुगत
बिना किसी बजटीय योजना के लागू की गई मुफ्त योजनाओं ने राज्य के वित्त को पंगु बना दिया है। नए बुनियादी ढांचे, सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण के लिए बजट का अभाव साफ दिखने लगा। इस वित्तीय विफलता पर पर्दा डालने और राजस्व जुटाने के लिए सरकार ने बेंगलुरु के पार्कों और खेल के मैदानों का बाजारीकरण करने का सबसे आसान और विनाशकारी रास्ता चुना।

बुजुर्गों की खुली हवा और बच्चों के खेल के मैदानों पर वार
पार्क और खुले मैदान शहर के बच्चों के शारीरिक विकास और वरिष्ठ नागरिकों के टहलने के लिए अंतिम सुरक्षित स्थान बचे हैं। 5 प्रतिशत जमीन के व्यावसायिक उपयोग की छूट वास्तव में पूरे पार्क परिसर में निजी दुकानों और कंक्रीट निर्माण के अनियंत्रित प्रसार का आधार थी। वित्तीय लालच के लिए बच्चों से उनके खेल के मैदान और बुजुर्गों से उनकी खुली हवा छीनने की कोशिश ने आम परिवारों में भारी असंतोष भर दिया।

फूफा फुके हुए रहे 3 दिन, शौचालय में बैठे थे; मोदी का BRICS में जलवा देख कर दस्त लगे थे; आज कुछ नहीं मिला तो भोजन में विष घोल रहे हैं

सुभाष चन्द्र

राहुल गाँधी को LoP बनाने वालों की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। नॉनवेज पर हंगामा करना गिरी हुई मानसिकता को दिखाता है। INDI गठबंधन को इस गिरी हुई मानसिकता पर विचार कर कांग्रेस से किनारा करना उनके हित में होगा।   

नाराज फूफा 3 दिन से फुके बैठे थे मोदी का जलवा BRICS में देख कर आग लगी हुई थी और दस्त लगे हुए थे शौचालय में आना जाना लगा हुआ था कोई कमी नहीं निकाल सके BRICS के आयोजन में जिसमें मोदी छाए रहे और असली दर्द की वजह यही थी

लेकिन आज बाप बेटे राहुल गांधी और पवन खेड़ा शौचालय से निकल कर बोले कि सरकार ने जो मेहमानों को भोजन परोसा उसमें विविधता में एकता का उल्लंघन किया हर राज्य का भोजन नहीं दिया गया और नॉन वेज भी परोसा गया जबकि यह सत्य से परे है राहुल गांधी ने तो अलग सर्टिफिकेट दे दिया कि 80% भारतीय व्यंजन नॉन वेज होते हैं इतना गोबर कहां से आता है इसके दिमाग में?

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मेहमानों को कोई तकलीफ नहीं थी, उन्होंने स्वाद से भोजन किया लेकिन राहुल/खेड़ा को क्यों दस्त लग गए समझ नहीं आया?

फूफा परेशान थे मोदी पुतिन को गले मिलते देख कर, वो परेशान थे क्योंकि पुतिन उत्तर प्रदेश में बने नए हवाई अड्डे पर उतरे वो परेशान थे कि जिनपिंग क्यों आ गए जबकि उनके बारे में ख़बरें चलाई गई थी कि वो नहीं आएंगे

कांग्रेस और विपक्ष को दर्द यह था कि मोदी के आगे India नहीं “भारत” लिखा था और यह दर्द असहनीय था

फ़ुफ़ाओं को परेशानी हुई क्योंकि ईरान के राष्ट्रपति पेजेशिकयान ने भारत के आध्यात्मिक गुरु सतिशाचार्य के पैर छू कर आशीर्वाद लिया ये तो पेजेशिकयान ने घोर पाप किया क्योंकि ईरान की मदद के लिए तो 600 रुपए और आभूषण इकठ्ठे किये गए थे और वो चरण छू गए हिंदू गुरु के और उनके प्रवचन भी सुने

सबसे बड़ा झटका तो फ़ुफ़ाओं को मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने दिया जब उन्होंने कैमरे पर कहा कि मोदी इतने लोकप्रिय नेता हैं कि उनका फ़ोन ऐसे लोगो के मैसेज से भर गया है जो मोदी को अपना अभिवादन देने के लिए कह रहे थे मजे की बात है कि इब्राहिम ने किशोर कुमार के गाने की लाइनें भी गाई -”ख्वाब तो तुम या कोई हकीकत ..”

उधर ईरान अमेरिका से युद्ध के चलते इस्लामिक देशों में अमेरिकी अड्डों पर हमले कर रहा है और UAE में हमले किए हैं लेकिन BRICS में मोदी ने पेजेशिकयान और UAE के प्रिंस को एक ही टेबल पर बिठा दिया। इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं

कांग्रेस के फूफा खासकर जिनपिंग से नाराज़ हैं कि MOU हमारे साथ किया और अब शांति और व्यापार की बातें कर रहे हैं मोदी से 

कांग्रेस की एक परेशानी दूर नहीं होती दूसरी खड़ी हो जाती है BRICS शुरू होने से एक दो दिन पहले उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस को वंदे मातरम पर खरी खरी सुना दी थी कि कांग्रेस हमें न बताए कि राष्ट्रगीत गाना है या नहीं और कितना गाना है फिर उसके बाद दिल जलाने वाला BRICS आ गया, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता कांग्रेस को अब कॉकरोच जनता पार्टी में विलय कर लेना चाहिए

महिला विरोधी कांग्रेस : जेएनयू में कांग्रेसी सांसद की खुली ‘एपस्टीन फाइल्स’, एक्स्ट्रा मार्क्स के बदले सेक्स की डिमांड

कांग्रेस पार्टी और उसके नेता राहुल गांधी द्वारा महिलाओं के अधिकारों और पितृसत्तात्मक सोच के विरोध में ‘मनुस्मृति’ को लेकर दिए गए बयानों और देश भर में इसे जलाने के पार्टी के आह्वान पर राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है। राहुल गांधी ने ‘स्मैश द पैट्रियार्की’ यानी पितृसत्तात्मक सोच और व्यवस्था को खत्म करने की अपील की। इसी बीच दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में खुली एक ‘एपस्टीन फाइल्स’ ने कांग्रेस के महिला विरोधी चेहरे को उजागर कर दिया है। महिलाओं की आजादी की बात करने वाले राहुल गांधी और उनके सांसद किस तरह महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानते हैं, इसका प्रमाण जेएनयू जैसी प्रगतिशील, सेकुलर, लिबरल और वामपंथियों के गढ़ कही जाने वाली यूनिवर्सिटी की 11 छात्राओं ने दिया है।

 

प्रोफेसर डॉ. बिमोल अंगोमचा पर यौन शोषण का आरोप
दरअसल, जेएनयू में 11 छात्राओं ने प्रोफेसर डॉ. बिमोल अकोइजम अंगोमचा पर मौखिक परीक्षा के दौरान ‘एक्स्ट्रा मार्क्स’ के बदले सेक्सुअल फेवर (यौन संबंध) की मांग करने का गंभीर आरोप लगाया है। सितंबर 2026 में सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले की जांच यूनिवर्सिटी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) कर रही है। छात्र संगठन एबीवीपी (ABVP) का दावा है कि आरोपी प्रोफेसर वर्तमान में कांग्रेस के सांसद हैं, जिसके चलते उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। साथ ही राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर मामले को दबाने के आरोप लग रहे हैं।

कौन हैं प्रोफेसर डॉ. बिमोल अकोइजम अंगोमचा ?
प्रोफेसर डॉ. बिमोल अकोइजम अंगोमचा मणिपुर से 18वीं लोकसभा के कांग्रेस सांसद हैं। उन्होंने 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर मणिपुर के इनर मणिपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में सामाजिक विज्ञान संकाय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। वह एक बुद्धिजीवी, स्तंभकार और फिल्म निर्माता भी हैं, जिन्होंने कुछ वृत्तचित्र (documentary) और फिल्में भी बनाई हैं।

कैसे हुआ कांग्रेस सांसद की ‘एपस्टीन फाइल्स’ का खुलासा
यह मामला तब उजागर हुआ जब एक छात्रा ने छात्रों के एक निजी व्हाट्सएप ग्रुप पर अपने साथ हुई घटना साझा की, जिसके बाद अन्य पीड़ित छात्राएं भी सामने आईं। छात्राओं ने जो आरोप लगाए, उनमें गंदे कमेंट्स करना और यौन संबंध बनाने के बदले एक्स्ट्रा मार्क्स देने की पेशकश करना शामिल है। मई 2026 में हुई मौखिक (वाइवा) परीक्षाओं के दौरान प्रोफेसर ने अश्लील टिप्पणियां कीं और कहा कि यदि वे उनकी मांगें मानती हैं तो उन्हें अतिरिक्त अंक दिए जाएंगे। शिकायतों के अनुसार, प्रोफेसर ने छात्राओं को कैंपस में स्थित अपने निवास स्थान पर भी बुलाया, जहां उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया।

ABVP कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस सांसद का जलाया पुतला
छात्राओं के यौन शोषण का यह मामला इस साल मई में इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) को सौंपी गई थी, जब कई स्टूडेंट्स ने प्रोफेसर के खिलाफ आरोप लगाए थे। इसके बाद कमेटी ने अपनी कार्यवाही शुरू की और छात्राओं से बयान दर्ज कराने के लिए पेश होने को कहा। आईसीसी की समिति छात्राओं के बयान दर्ज कर रही है और मामले की जांच जारी है। लेकिन मामले को दबाने की आशंका के बाद छात्रों और विभिन्न संगठनों द्वारा प्रोफेसर को तुरंत निलंबित करने और दिल्ली पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज कराने की मांग की जा रही है। जेएनयू के ABVP कार्यकर्ताओं ने आरोपी प्रोफेसर, इंटरनल कमिटी और JNUSU के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया और उनके पुतले जलाए। ABVP कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि जांच में देरी कर मामले को दबाने की कोशिश हो रही है।

ICC के लेफ्ट सदस्य विचारधारा के आधार पर देते हैं फैसले
एबीवीपी के संयुक्त सचिव विकास पटेल ने कहा कि कोई छात्र डर के मारे सामने नहीं आ रहा है। ऐसे कुल 11 छात्राओं ने आईसीसी में शिकायत दर्ज कराई थी। आईसीसी को 90 दिनों के भीतर जांच कर रिपोर्ट देनी होती है। चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है। मई का मामला है, प्रशासन भी चुप्पी साधे बैठा है। आईसीसी के जो मेंबर है, वो लेफ्ट संगठन से जुड़े हैं। वो भी चुप्पी साधे हुए हैं। यह पहली घटना नहीं हुई है। जेएनयू में इस तरह की घटनाएं होती रही हैं। और इस तरह की घटनाएं होती हैं तो आईसीसी के लेफ्ट सदस्य विचारधारा के आधार पर फैसला देते हैं, और अपने कैडर को बचाने की कोशिश करते हैं।

”होते रहना चाहिए महिलाओं का खतना’’

10 जुलाई, 2018 को कांग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में खतना के पक्ष में दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि ‘खतना’ शरिया का हिस्सा है, और इसे रोका जाना मजहब में दखल होगा। दरअसल कांग्रेस इसे धर्म से जोड़कर चंद वोटों के लिए करोड़ों महिलाओं के आत्मसम्मान से खिलवाड़ कर रही है। यह केवल विडंबना नहीं है कि सिंघवी ने इस बर्बर कुप्रथा का बचाव किया। बल्कि कांग्रेस ने फिर साबित किया कि वह मुसलमानों का वोट पाने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है। उसे इस बात की कतई चिंता नहीं कि मुस्लिम महिलाएं किस दंश से गुजरती हैं। हालांकि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कर दिया कि ‘खतना’ प्रथा पर बैन लगाने वाली याचिका का वह समर्थन करती है।

शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा

कांग्रेस ने 1986 में शाहबानों प्रकरण में जो रुख अपनाया था वो मुस्लिम महिलाओं की तकलीफें बढ़ाने वाला था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में अपना फैसला देते हुए पति को गुजारा भत्ता देने की बात कही थी, लेकिन शाहबानो के पति ने कोर्ट के फैसले को मुस्लिम पर्सलन लॉ में दखल करार देते हुए भत्ता देने से मना कर दिया। जिसके बाद इस विवाद में मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड भी कूद गया। यह विवाद इतना बढ़ा कि मामले ने राजनैतिक रंग ले लिया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कांग्रेस के अपने परंपरागत अल्पसंख्यक वोट बैंक को बचाने के लिए पर्सलन लॉ में कोर्ट के दखल को न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि अपनी बहुमत वाली सरकार से इस बारे में संसद से एक कानून भी पास करा लिया।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर अशोभनीय और भद्दा तंज

13 अगस्त को दिल्ली के एक कार्यक्रम में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर निशाना साधते हुए विदेश दौरों में राष्ट्राध्यक्षों से गले मिलने की परंपरा पर टिप्पणी कर रहे थे। इसी दौरान वह अपनी ही पार्टी के नेता संदीप दीक्षित के पास जाकर हाथ फैलाते हुए उनके गले लग जाते हैं। राहुल गांधी आगे कुछ कहते, उससे पहले ही संदीप दीक्षित ने मर्यादा की सभी सीमाओं के लांघते हुए इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर बेहद अशोभनीय और भद्दा तंज कसते हुए कहा, “मेलोनी समझ कर तो नहीं पकड़ा था?” इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह रही कि एक मित्र देश की महिला राष्ट्राध्यक्ष को लेकर किए गए इस द्विअर्थी मजाक पर आपत्ति जताने के बजाय राहुल गांधी समेत मंच पर मौजूद तमाम कांग्रेस नेता ठहाके लगाते दिखे।

पार्टी मंच पर ही महिला के साथ छेड़छाड़

कांग्रेस नेता महिला हितैषी होने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन ये सब एक तरह से ढोंग ही है। महिलाएं पार्टी के बाहर तो छोड़िए, अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं। 04 अक्टूबर, 2024 को हरियाणा के नारनौंद में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के बेटे सांसद दीपेन्द्र सिंह हुड्डा की रैली में मंच पर ही एक महिला नेता के साथ छेड़छाड़ की गई। इस रैली में दीपेन्द्र हुड्डा के साथ कांग्रेस के दो और सांसद के मौजूद रहने के बाद भी मंच पर महिला नेता सोनिया दुहन के साथ छेड़छाड़ की गई। इसकी पुष्टि खुद कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा ने की है। कुमारी शैलजा ने सोनिया दुहन के साथ स्टेज पर हुई बदसलूकी पर कहा कि ‘मैंने उनसे बात की, वो मुझे बता रही हैं कि उनके साथ वहां छेड़छाड़ की गई। मैंने उनसे इस बात की पुष्टि की है, अगर आज किसी महिला के साथ ऐसा होता है, तो इससे बुरा और निंदनीय क्या हो सकता है।’

सवाल यह है कि जिस पार्टी में खुद महिला नेता सुरक्षित नहीं हैं, सोनिया नाम की महिला सुरक्षित नहीं है, वो पार्टी देश की बहन-बेटियों को कैसे सुरक्षा देगी? इसको लेकर लोग सोशल मीडिया पर कांग्रेस की थू-थू कर रहे हैं। स्टेज पर एक महिला नेता के साथ हुई इस घटना को लेकर कांग्रेस की किरकिरी हो रही है।

 

चिदंबरम जी, ब्रिक्स और SCO को छोड़िए, बस इतना बता दो कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के MOU से देश को क्या फायदा हुआ?

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस और इसका गुलाम INDI गठबंधन नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी की कार्यशैली पर ऊँगली तो उठा सकते हैं लेकिन कांग्रेस का चीन के साथ MoU के बारे में पूछने के लिए किसी ने अपनी माँ का दूध ही नहीं पिया। दूसरे, सोनिया गाँधी का कश्मीर विरोधी संस्था का सदस्य होने पर भी पूछने के लिए किसी ने माँ ने इन्हे दूध ही नहीं पिलाया।    

ये चिदंबरम 2004 से 2008 के अंत तक वित्त मंत्री रहा था और 2006 में BRICS का गठन हुआ जबकि इसकी पहली मीटिंग 2009 में हुई आज चिदंबरम को ये ब्रह्म ज्ञान कैसे और कहां से हो गया कि BRICS और SCO से हमें कोई फायदा नहीं हुआ

SCO 2001 में बना और 2005 में भारत को Observer का स्टेटस मिला फिर कांग्रेस की सरकार को BRICS और SCO में घुसने की क्या जरूरत थी? यानी कांग्रेस में कोई दूरदर्शिता नहीं थी जो समझ सकती कि इन संगठनों से कोई फायदा नहीं होगा? 

डॉ मनमोहन सिंह BRICS की पहली 5 मीटिंग में फिर क्यों गए जो 2009, 2010, 2011, 2012 और 2013 में हुई थी? आज फिर दर्द क्यों हो रहा है जब मोदी की सरकार ने BRICS की बैठक का सफल आयोजन किया है?

कांग्रेस की समस्या यह है कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती लोकप्रियता उसे रास नहीं आती और इसलिए हर बात में आलोचना करने से मतलब है शायद इसलिए ही कांग्रेस ने विदेशों से मिले किसी सर्वोच्च सम्मान के लिए मोदी को बधाई नहीं दी  

चिदंबरम को BRICS और SCO से देश को कुछ फायदा नज़र नहीं आता तो इस बात का जवाब दे कि कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बीच हुए 2008 के MOU से देश को क्या फायदा हुआ? देश को तो नहीं कांग्रेस को अवश्य फायदा हुआ जो आज कांग्रेस और राहुल गांधी पूरी तरह चीन की गोद में बैठे हैं

कांग्रेस के बारे में एक मजेदार बात और बताता हूँ कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए जितिन प्रसाद आज मोदी के मंत्री की हैसियत से जिनपिंग का स्वागत करने गए थे कांग्रेस में अभी रहे होते तो सत्ता के लिए अंधेरे में भटक रहे होते और राहुल गांधी के पीछे पीछे चल कर चापलूसी कर रहे होते

आज के BRICS के घोषणा पत्र में पहलगाम में आतंकी हमले की निंदा की गई है जो भारत की कूटनीतिक जीत है घोषणा पत्र में आतंकवाद के प्रति और आतंकवाद को समर्थन देने वालों के प्रति zero tolerance की बात कही गई है

मजे की बात है इस घोषणा पत्र पर ईरान ने भी हस्ताक्षर किए हैं जो खुद अनेक आतंकी संगठनों को मदद कर इज़रायल पर हमले करता है हमास, हिज्बुल्ला और हूती उसके ही पाले हुए संगठन हैं और ईरान इज़रायल और यहूदियों को जीने का अधिकार भी नहीं देना चाहता खामनेई ने इज़रायल पर हमले के लिए हमास की निंदा नहीं की और हमले की तारीफ करते हुए कहा था ये फिलिस्तीनियों की जीत है

शायद इसलिए ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा है कि “हर देश की आवाज़ सुननी चाहिए” मोदी ने समुद्री मार्गों पर सुरक्षा पर भी बल दिया और एक Comprehensive Policy बनाने के लिए कहा यह संदेश ईरान और अन्य देशों के लिए था जो आयल टैंकरों पर हमले करते हैं और समुद्री मार्ग बाधित करते हैं

आज का साझा घोषणा पत्र सर्वसम्मति से जारी हुआ ऐसा ही साझा घोषणा पत्र सर्वसम्मति से 9 सितंबर, 2023 के दिल्ली में आयोजित G20 में जारी हुआ था अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में सर्वसम्मति से घोषणापत्र जारी होना बड़ी बात होती है यह साबित करता है कि वैश्विक स्तर पर मोदी की आवाज़ और विचार कितने प्रभावी हैं बाकी जिसका काम ही आलोचना करना है, वो रोता रहे या भौंकता रहे

चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी, देश का सर्वनाश करने पर क्यों उतारू हैं? 14 साल की लड़की ने जो पीएम मोदी के लिए कहा, वो आपके लिए कहे तो कैसा लगेगा?

सुभाष चन्द्र

कल(सितम्बर 10) चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 14 साल की निशु आज़ाद के कथित उत्पीड़न और उसे डराने धमकाने के मामले में सख्त संज्ञान लिया चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे के खिलाफ हिंसा या गवाह/पीड़ित परिवार को धमकाने के मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
यह बातें कहने से पहले सूर्यकांत जी एक बार विचार तो कर लेते कि 14 साल की लड़की का NEET के प्रदर्शन में जाने का क्या मतलब था? निशु आज़ाद ने प्रदर्शन में क्या किया, उसका वीडियो भी देख लेते वो वहां लोगों को बुला बुला कर “मोदी की तेरहवीं का खाना और समोसे खाने को कह रही थी” उसके चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी और आवाज़ में ख़ुशी थी जैसे बड़ा महान काम कार रही हो उसने यह भी कहा था कि मोदी कितना पढ़ा लिखा है, अनपढ़ है और उसे इकॉनमी का E भी नहीं पता”

ऐसी 14 साल की लड़की को आप बचा रहे हैं उसका अपराध अक्षम्य है ऐसी गंदी गलियां देने वाली और भी बहुत लड़कियां और लड़के थे वहां

अब सोचिए आपके फैसलों से नाराज होकर कोई अगर आपकी तेरहवीं का खाना और समोसे बांटे तो आपको कैसा लगेगा? यह बात अगर निशु आज़ाद आपकी लिए कहती तो क्या ठीक था और यह भी कहती कि आप एक अनपढ़ हैं जो चीफ जस्टिस बन गए, जिसे लॉ का L भी पता नहीं

आज आपने एक और फरमान जारी कर दिया कि कॉकरोचों के खिलाफ FIR की अनुमति केवल सुप्रीम कोर्ट देगा और यह आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति नहीं दे सकती यह तब है जब कॉकरोच आपके फैसलों को मानने से इंकार कर चुके हैं

आपने अनुच्छेद 142 का दुरुपयोग कर सभी कथित छात्रों की FIR पर कार्रवाई पर रोक लगा दी जबकि अनुच्छेद 142 कहता है Constitution of India grants the Supreme Court the unique power to pass any decree or order necessary for delivering "complete justice" in any pending case.

Key Powers and ScopeComplete Justice: Allows the apex court to go beyond rigid statutory limits or procedural technicalities when existing laws fail to provide a specific remedy.

अभी तो कथित छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज ही हुई थी, अभी तो  complete justice देने की नौबत आई ही नहीं थी और इसलिए 142 का इस्तेमाल सर्वथा अनुचित था

जिस प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के 35 देश अपना सर्वोच्च सम्मान दे चुके हैं उसके लिए कॉकरोचों द्वारा गाली देना शायद आपको अच्छा लगा है?

क्या आपको प्रधानमंत्री मोदी को CJP के आंदोलन में शामिल लड़के लड़कियों का गालियां देना सही लगा? वो प्रधानमंत्री हैं, उन्होंने अगर ऐसे उद्दंड लोगों को माफ़ भी कर दिया तो क्या कानूनी तौर पर भी आप उन्हें छोड़ देंगे? संसद भवन उखाड़ने की धमकी देना क्या उचित था और क्या मोदी जी की माँ के लिए गालियां देना उचित था? अगर किसी विदेश में किसी ने प्रधानमंत्री को ऐसे गालियां दी होती उसको जेल हो गयी होती, लेकिन भारत में सुप्रीम कोर्ट ऐसे लोगों को बचाने के लिए बैठी है।   

लेकिन आपने सभी को एक झटके में अभय दान देकर गलत परंपरा शुरू कर दी आप अपने आदेशों पर पुनर्विचार कीजिए और जो लोग NEET से नहीं जुड़े थे, उनके खिलाफ कार्रवाई  आदेश दीजिए ऐसे तो देश का सर्वनाश कर देंगे आप अराजकता फ़ैलाने वालों को अगर छोड़ दिया जाएगा तो देश कहां जाएगा? 

आपने साबित कर दिया कि जज भगवान होते हैं जो कभी गलती नहीं करते