कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटालों के खिलाफ उठे प्रचंड जनआक्रोश के आगे आखिरकार सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में बेंगलुरु के सार्वजनिक पार्कों और खेल के मैदानों की 5 प्रतिशत जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों, लीज और बिक्री के लिए खोलने वाले विवादास्पद ‘पार्क्स अमेंडमेंट बिल 2026’ ने राज्य में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया। गैर-जिम्मेदाराना नीतियों से खाली हुए सरकारी खजाने को भरने और रियल एस्टेट सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने की इस नीति को शहर की हरी-भरी सांसों पर सीधा डाका माना गया। सड़क से लेकर राजभवन तक चले चौतरफा दबाव के कारण कैबिनेट को यह जनविरोधी संशोधन बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।65.4 एकड़ हरित क्षेत्र पर डाका: लालबाग और कब्बन पार्क पर गहराया संकट
बेंगलुरु में वर्तमान में लगभग 1,308 एकड़ क्षेत्र में फैले 1,353 सार्वजनिक पार्क हैं। इस संशोधन के लागू होते ही शहर के 65.4 एकड़ से अधिक हरे-भरे क्षेत्र पर कंक्रीट के ढांचे खड़े होने का खतरा मंडराने लगा था। सबसे बड़ा आघात 240 एकड़ वाले ऐतिहासिक लालबाग की 12 एकड़ और करीब 197 एकड़ में फैले कब्बन पार्क की 9.85 एकड़ जमीन पर था। करीब 22 एकड़ की यह धरोहर सीधे तौर पर व्यावसायिक सिंडिकेट के हवाले करने की तैयारी थी, जिसे जनता ने अपनी पहचान पर हमला माना।
‘ब्रांड बेंगलुरु’ की आड़ में ऐतिहासिक धरोहरों पर गिद्ध दृष्टि
‘ब्रांड बेंगलुरु’ के आकर्षक नारों की आड़ में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कार्यालय के संरक्षण में शहर की बेशकीमती जमीनों के सौदे तैयार किए जा रहे थे। अरबों वर्ष पुरानी भूगर्भीय धरोहर वाली लालबाग की चट्टानों और ऐतिहासिक कब्बन पार्क की शांति को नष्ट कर वहां व्यावसायिक केंद्र बनाने की साजिश रची गई। विकास के नाम पर शहर की सदियों पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने का यह खुला प्रयास था।
टनल रोड प्रोजेक्ट: ठेकेदारों को उपकृत करने के लिए लालबाग की बलि
हजारों करोड़ रुपये के विवादास्पद टनल रोड प्रोजेक्ट के जरिए अपने चहेते निजी ठेकेदारों को भारी भरकम कमीशन बांटने की बिसात बिछाई गई थी। टनल रोड के नाम पर लालबाग की एकड़ भर बेशकीमती जमीन अधिग्रहित करने और वहां निजी व्यावसायिक निर्माण को स्वीकृति देने की तैयारी थी। बुनियादी ढांचा सुधारने के नाम पर कमीशनखोरी के इस मॉडल ने शहर के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया था।
बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।
1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।
बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।
1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।
अनुच्छेद 21 का हनन: स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार पर कुठाराघात
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार रेखांकित किया है कि शहरी हरित क्षेत्र और खुले पार्क नागरिकों के जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। सार्वजनिक पार्कों की जमीन को निजी लाभ के लिए बाजार में उतारना सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन था, जिसके खिलाफ कानूनी घेराबंदी तेज हो गई।
सदन में बिना बहस चोरी-छिपे बिल पास कराने का कृत्य
सदन में जब महर्षि वाल्मीकि निगम के 89 करोड़ रुपये के घोटाले पर जवाब मांगा जा रहा था, तब हंगामे और अव्यवस्था के बीच बिना किसी लोकतांत्रिक चर्चा या सार्वजनिक परामर्श के इस विवादित कानून को पारित करा लिया गया। शहर के नागरिकों, पर्यावरणविदों और नगर नियोजकों से इस मसौदे को छिपाकर रखना यह साबित करता था कि सरकार के इरादे पूरी तरह संदिग्ध थे।
वाल्मीकि निगम घोटाले के बाद जमीन से नया कमीशन तंत्र
महर्षि वाल्मीकि विकास निगम के करोड़ों रुपये के गबन की जांच के बीच शहरी जमीनों के सौदों से नया तंत्र खड़ा करने की कोशिशें तेज थीं। सरकारी खजाने में सेंध लगने के बाद सत्ता से जुड़े सिंडिकेट की नजर बेंगलुरु की करोड़ों रुपये प्रति वर्गफुट वाली प्राइम लोकेशन की सार्वजनिक जमीनों पर टिक गई थी, ताकि चुनावी फंड और राजनीतिक खर्चों की भरपाई की जा सके।
मुफ्त की रेवड़ियों से खाली हुआ खजाना, अब पार्कों से भरपाई की जुगत
बिना किसी बजटीय योजना के लागू की गई मुफ्त योजनाओं ने राज्य के वित्त को पंगु बना दिया है। नए बुनियादी ढांचे, सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण के लिए बजट का अभाव साफ दिखने लगा। इस वित्तीय विफलता पर पर्दा डालने और राजस्व जुटाने के लिए सरकार ने बेंगलुरु के पार्कों और खेल के मैदानों का बाजारीकरण करने का सबसे आसान और विनाशकारी रास्ता चुना।
बुजुर्गों की खुली हवा और बच्चों के खेल के मैदानों पर वार
पार्क और खुले मैदान शहर के बच्चों के शारीरिक विकास और वरिष्ठ नागरिकों के टहलने के लिए अंतिम सुरक्षित स्थान बचे हैं। 5 प्रतिशत जमीन के व्यावसायिक उपयोग की छूट वास्तव में पूरे पार्क परिसर में निजी दुकानों और कंक्रीट निर्माण के अनियंत्रित प्रसार का आधार थी। वित्तीय लालच के लिए बच्चों से उनके खेल के मैदान और बुजुर्गों से उनकी खुली हवा छीनने की कोशिश ने आम परिवारों में भारी असंतोष भर दिया।