राहुल का झूठ देश को पंहुचा रहा नुकसान: बार-बार पोल खुलने के बावजूद झूठ बोलने से बाज नहीं आ रहे राहुल गांधी

यह भारत का दुर्भाग्य है कि ऐसा Leader of Opposition मिला है जो देश को लाभ पहुँचाने की बजाए नुकसान ज्यादा कर रहा है। गौतम अडानी के विरुद्ध बोलने से जो लाभ भारत को मिला था केन्या ने वह अनुबंध Leader of Opposition के आका चीन को दे दिया। वैसे भी राहुल गाँधी जब भी कोई बात बोलते हैं उसकी पोल खुलने से पहले देश को नुकसान हो चूका होता है। समझ में नहीं आता जनता ऐसे नेता को वोट देती ही क्यों है? राहुल और उनकी पार्टी बताए कि Leader of Opposition द्वारा बोली गयी किसी भी बात में दम हो? झूठ का पिटारा से ज्यादा कुछ नहीं। Leader of Opposition और INDI गठबंधन को देशभक्ति ईरान और इजराइल से सीखनी चाहिए जहाँ युद्ध के दौरान विपक्ष भी सरकार के साथ खड़ा है, लेकिन यहाँ दुश्मन देश की बोली बोल जनता को गुमराह किया जाता है। 

क्या कोई युद्ध के दौरान अपने सरकार से नुकसान होने की बात पूछता है लेकिन हमारा Leader of Opposition और INDI गठबंधन पूछता है जो दुश्मन देश की सुर्खियां बन जाती है। कसूर राहुल का नहीं राहुल के इशारे पर नाचने वाली पार्टियों का भी है।    

भारत और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी ताकतें तरह-तरह के नैरेटिव बनाती हैं। इनको आगे बढ़ाने का काम बिना किसी तथ्य के कांग्रेस के युवराज और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करते हैं। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति अब तथ्यों, तर्कों और जिम्मेदारी से ज्यादा सनसनी, भ्रम और झूठे नैरेटिव पर टिकती दिख रही है। संसद से सड़क तक वे लगातार ऐसे झूठे आरोप उछालते रहते हैं, जिनका या तो बाद में खुद उनके ही दावों से खंडन हो गया, या फिर अदालत, सेना, चुनाव आयोग और सरकारी रिकॉर्ड ने उनकी बातों की धज्जियां उड़ा दीं। कभी सेना के “हाथ बांध देने” का आरोप लगाकर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, तो कभी चुनाव आयोग को “वोट चोरी” का औजार बताकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। संसद में बोलने नहीं देने का रोना रोने वाले राहुल गांधी की पोल खुद लोकसभा के रिकॉर्ड ने खोल दी।

कई महत्वपूर्ण बहसों में राहुल ने स्वयं हिस्सा तक नहीं लिया। यह सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि झूठ को हथियार बनाकर देश में अविश्वास फैलाने की राजनीति है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राहुल गांधी के आरोप अक्सर अधूरी जानकारी, गलत तथ्यों और भावनात्मक उकसावे पर आधारित होते हैं। राफेल से लेकर अग्निवीर, EVM से लेकर विदेशी नेताओं की मुलाकातों तक, बार-बार उनके दावों की हवा निकलती रही, लेकिन झूठ का सिलसिला नहीं रुका। कभी सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी, तो कभी सेना और चुनाव आयोग को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। यदि नेता प्रतिपक्ष ही बिना प्रमाण के आरोपों की राजनीति करेगा, तो इससे सिर्फ उसकी विश्वसनीयता नहीं गिरेगी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी कमजोर होगा। हिट और रन की पॉलिटिक्स कभी भी मेहनत और परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती।दरअसल, राहुल हर हार, हर विवाद और हर असफलता का दोष किसी न किसी संस्था पर डालते हैं, लेकिन आत्ममंथन से लगातार बचते रहते हैं। 

अवलोकन करें:-

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EVM को बताया ब्लैक बॉक्स और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
राहुल गांधी ने 16 जून 2024 को एक्स पर लिखा, “भारत में ईवीएम एक ‘ब्लैक बॉक्स’ है. किसी को भी इनकी स्क्रूटनी करने की अनुमति नहीं है. हमारी चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं. जब संस्थाओं में जवाबदेही की कमी होती है, तो लोकतंत्र एक दिखावा बन जाता है और धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाती है.” हकीकत में हमारी चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और EVM प्रणाली का लोहा दुनिया मान चुकी है। भारत का चुनाव आयोग लगातार कहता रहा है कि EVM मशीनें सुरक्षित हैं और VVPAT प्रणाली के कारण मतदान का सत्यापन संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने भी EVM को पूरी तरह हटाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। चुनाव आयोग ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में ईवीएम से चुनाव हिंसा रहित कराए हैं।

संसद में बोलने नहीं दिया जाता
राहुल गांधी ने 26 मार्च 2025 को आरोप लगाते हुए कहा कि संसद में विपक्ष की और उनकी आवाज दबाई जाती है और उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने का अवसर नहीं मिलता। उनके इस झूठ की पोल खोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने उनके सदन से अनुपस्थित रहने के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए पलटवार किया है कि विपक्ष केवल हंगामा करना चाहता है, सार्थक चर्चा नहीं। सरकार और भाजपा नेताओं का आरोप है कि राहुल गांधी खुद सदन में नियमों के तहत नहीं बोलते या चर्चा से भागते हैं।

रक्षा बजट घटाने का आरोप, जबकि 15 प्रतिशत बढ़ा
राहुल गांधी ने कई मौकों पर कहा कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीर नहीं है और रक्षा तैयारियों में कमियां हैं। 12 नवंबर 2021 को राहुल ने फिर कहा कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा से आपराधिक खिलवाड़ किया जा रहा है, क्योंकि मोदी सरकार के पास कोई स्ट्रैटेजी नहीं है । दूसरी ओर हकीकत यह है कि भारत का रक्षा बजट पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है और यह विश्व के सबसे बड़े रक्षा व्ययों में शामिल है। मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय के केंद्रीय बजट 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये का सर्वकालिक उच्च आवंटन किया, जो वित्त वर्ष 2025-26 के बजटीय अनुमानों से 15 प्रतिशत अधिक है।

लद्दाख में चरागाह और जमीन खोने का आरोप
राहुल गांधी ने 20 अगस्त 2023 को झूठा आरोप लगाते हुए कहा कि लद्दाख के लोगों के चरागाह क्षेत्र चीन के नियंत्रण में चले गए हैं। हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। चीनी कब्जे की तरह यह आरोप भी बेदम ही निकला। राहुल ने आरोप लगाया था कि लद्दाख के कुछ स्थानीय प्रतिनिधियों और चरवाहों ने उनसे चराई क्षेत्रों तक पहुंच कम होने की शिकायत की है। वहीं सरकार ने स्पष्ट किया कि सीमा पर भारत की स्थिति बेहद मजबूत है और संप्रभुता से समझौता नहीं किया गया। ना ही लद्दाख में चरवारों को जमीन का नुकसान हुआ है।

हिंडनबर्ग रिपोर्ट को लेकर सरकार पर सवाल
राहुल गांधी ने 11 अगस्त 2024 को आरोप लगाते हुए कहा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद सरकार को अडानी मामले पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आम जनता के धन की रक्षा करने वाली नियामक संस्था SEBI की सत्यनिष्ठा गंभीर रूप से प्रभावित और समझौता-युक्त हो चुकी है। हकीकत में उनका झूठ पकड़ा गया। हिंडनबर्ग एक शॉर्ट-सेलिंग रिसर्च फर्म है, जिसकी रिपोर्ट ने अडानी समूह पर गंभीर आरोप लगाए थे। अडानी समूह ने इन आरोपों को खारिज किया। मामला SEBI और न्यायिक निगरानी में जांच का विषय रहा। बाद में कोर्ट से भी अडानी की हिंडनबर्ग के आरोपों में क्लीन चिट मिल गई।

LIC और बैंकों का पैसा खतरे में, रिपोर्ट में पैसा सुरक्षित
राहुल गांधी ने 9 सितंबर 2020 को एक बार फिर से अपने आरोप में कहा कि अडानी समूह में निवेश के कारण LIC और सरकारी बैंकों का पैसा खतरे में है। लेकिन उनके इस झूठ की भी कलई जल्द ही खुल गई। लाइफ इन्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि उसका निवेश कुल निवेश पोर्टफोलियो का छोटा हिस्सा है और वह वित्तीय रूप से बेहद सुरक्षित है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भी अपने एक्सपोजर को सुरक्षित सीमा में बताया।

पंजाब सरकार ने फोरेंसिक एक्सपर्ट को 10 लाख रूपए देकर भगवंत मान के बेअदबी वाले असली वीडियो को फर्जी बताया, पुलिस ने खुद बनवाई नकली रिपोर्ट: हरियाणा पुलिस ने 2 को किया गिरफ्तार

        भगवंत मान की विवादित वीडियो को फर्जी बताने के लिए पंजाब सरकार ने फोरेंसिक एक्सपर्ट को दी गई घूस
विवादों से जन्मी अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी लगता है विवादों से ही ख़त्म हो जाएगी। दिल्ली में सत्ता में रहते नितरोज कोई नया विवाद चलता रहता था लेकिन जनता मुफ्त की रेवड़ियों में केजरीवाल पार्टी को वोट देती रही। अब जिस तरह पंजाब में बेअदबी के असली वीडियो को राज्य सरकार फर्जी बताने में शामिल बताई जा रही है, बंगाल में ममता की सरकार और पंजाब में केजरीवाल सरकार की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं। 

अगर अकाल तख़्त इस मुद्दे को गंभीरता से लेती है भगवंत सिंह मान ऐसी मुसीबत में फंस जायेंगे जहाँ से इनका निकलना बहुत मुश्किल हो सकता है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इन दिनों सिख गुरुओं की बेअदबी वाले वीडियो को लेकर विवादों में घिरे हुए हैं। वीडियो में सिख गुरुओं और भिंडरावाले की तस्वीरों के साथ आपत्तिजनक हरकतें करते दिख रहे हैं। इस वीडियो को फर्जी साबित करने के लिए अब पूरी पंजाब पुलिस विवादों में है। हरियाणा के एक फोरेंसिक एक्सपर्ट ने दावा किया है कि पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने ₹10 लाख का लालच देकर वीडियो को फर्जी साबित करने को कहा था।

 मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के एक साइबर-फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट जसप्रीत ने दावा कि 15 जून 2026 को पंजाब पुलिस के अधिकारी बनकर कुछ लोग उनके पास आए और उनसे ऐसी रिपोर्ट बनवाने को कहा जो साबित करे कि सीएम भगवंत मान का यह वीडियो AI से बना हुआ फर्जी वीडियो है। जसप्रीत ने आरोप लगाया कि उन्हें फाइव स्टार क्राउन प्लाजा होटल में बुलाया गया और उनकी गाड़ी में जबरदस्ती ₹10 लाख नकद रखे गए। होटल का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है।

जसप्रीत ने विरोध किया तो उन्हें सिरसा के अरुण महेंद्रा और जींद के अंकित से मिलवाया गया, जिन्हें अधिकारियों ने पेन ड्राइव सौंपी थी।

हरियाणा पुलिस ने जसप्रीत की शिकायत के आधार पर इन दोनों को 23 जून 2026 को गुड़गाँव के सेक्टर 29 से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने बताया कि अरुण हरियाणा सरकार का ही एक कर्मचारी है और अंकित दिल्ली सरकार में कॉन्ट्रैक्ट बेस्ड कर्मचारी है।

वहीं शिरोमणि अकाली दल के महासचिव विक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा कि पंजाब पुलिस के कर्मचारी सीएम भगवंत मान की फर्जी वीडियो तैयार करने में शामिल थे। उन्होंने एक व्हाट्सऐप चैट भी शेयर की है, जिसमें फर्जी रिपोर्ट तैयार करने का दावा किया गया है। उन्होंने फॉरेंसिक एक्सपर्ट जसप्रीत की वीडियो शेयर करते हुए बताया कि पंजाब पुलिस लगातार उसे धमकियाँ दे रही है।

इसके अलावा दिल्ली के मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने भी इस विवाद को लेकर आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “…भगवंत मान चुप रहे, अरविंद केजरीवाल भी चुप रहे, और आज उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया और उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया जिन्होंने यह फ़ोरेंसिक रिपोर्ट दी थी… जिस तरह से इतना बड़ा गुनाह किया गया है और पैसे व पुलिस की मदद से इसे दबाने की कोशिश की गई है, उसे चुनौती दी गई है।” उन्होंने पंजाब के सीएम भगवंत मान के खिलाफ केस दर्ज करने की भी माँग की है।

कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो को लेकर दावा किया गया कि इसमें दिख रहा शख्स सिख गुरुओं और भिंडारवाले की तस्वीरों के साथ कुछ आपत्तिजनक हरकतें करता दिखाई दे रहा है। इस पर सिख संगठनों और अकाल तख्त ने सीएम मान को खालसा पंथ विरोधी करार दिया था।

एक ‘पत्रकार’ ने कहा- रं#@, दूसरे ने कहा- गला काट देंगे: महाराष्ट्र की एक्टिविस्ट नाजिया इलाही खान को इस्लामी कट्टरपंथियों ने दी जान से मारने की धमकी, शेयर किए वीडियो


महाराष्ट्र की एक्टिविस्ट नाजिया इलाही खान को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। नाजिया इलाही खान ने कहा कि दो मुस्लिम युवक ने अलग-अलग वीडियो बनाकर उन्हें धमकियाँ और गालियाँ दीं। अपने एक्स अकाउंट पर क्लिप शेयर करते हुए नाजिया खान ने लिखा कि उनमें से एक व्यक्ति मुस्लिम पत्रकार था और दूसरे ने खुलेआम गला काटने की धमकी दी।

सुप्रीम कोर्ट की वकील नाज़िया वो दबंग महिला है जो मुस्लिम कुरीतियों पर बड़ी बेबाकी से बोलती हैं, जिस वजह से कट्टरपंथी इनसे बहुत दुखी रहते हैं। वैसे मुस्लिम कुरीतियों पर पाकिस्तान की आरजू काज़मी आदि और भी अनेक मुस्लिम महिलाएं है जो कट्टरपंथियों पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। 72 हूरों, सर तन से जुदा, बुर्का/हिजाब हो या नकाब या फिर औरतों का मर्दों के साथ खड़े होकर नमाज नहीं पढ़ने पर कट्टरपंथियों पर जब जोरदार हमला करती हैं देखते ही बनता है।  

इन बेबाक महिलाओं और जितने भी exMuslim हैं सभी का मानना है कि मुल्लाओं ने मुसलमानों को इतना ज्यादा डरा कर रखा हुआ है कि सच सुनने की आदत नहीं। जो सच बोलता है सर तन से जुदा गैंग को सड़क पर उतर माहौल ख़राब कर देते हैं। और आम मुसलमान समझता है कि इस्लाम की तौहीन हुई है।       

नाजिया ने गाली-गलौज करने वाले मुस्लिम ‘पत्रकार’ का वीडियो किया शेयर

पहली वीडियो शेयर करते हुए नाजिया ने लिखा, “ये सलमान हैं, एक मुस्लिम पत्रकार! ये शायद महाराष्ट्र से हैं! ये पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी इस रिपोर्ट में ये मुझे वेश्या कह रहे हैं! क्या किसी मुस्लिम पत्रकार के लिए किसी महिला पर गंदी और अपमानजनक बातें कहना जायज है? इसीलिए ये खुलेआम मुझे वेश्या कह रहे हैं!”

नाजिया द्वारा शेयर किए गए वीडियो में सलमान नाम का व्यक्ति को अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते सुना जा सकता है। वह कहता है कि नाजिया की हरकतों ने उसे इतना गुस्सा दिलाया कि उसका मन उसे मारने का हुआ, लेकिन वह मजबूर था इसीलिए ऐसा नहीं कर सका। इसके बाद उसने नाजिया के परिवार और परवरिश पर सवाल उठाते हुए कहा, “अगर यह ऐसी है तो इसकी माँ कैसी होगी।”

नाजिया का नाम लेते हुए सलमान ने कहा, “पीछे जो महिला दिखाई दे रही है, वह नाजिया इलाही खान है। वह न तो खान है, न नाजिया है और न ही उसका इलाही नाम से कोई नाता है।” इसके बाद उसने नाजिया के लिए एक अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ‘रं**’ कहा। उसने यह भी कहा कि वह यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था, लेकिन उसे ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

एक मुस्लिम युवक ने गला काटने की दी धमकी

ऐसी ही धमकी भरी एक और वाडियो नाजिया इलाही खान ने शेयर की, जिसकी पहचान उन्होंने महाराष्ट्र के औरंगाबाद के अब्दुल के रूप में बताई। अब्दुल ने नाजिया को सीधे जान से मारने की धमकी दी।

वीडियो शेयर करते हुए नाजिया ने लिखा, “यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद का अब्दुल है, जो मेरा गला काटने की धमकी देते हुए वीडियो बना रहा है! और वह जेल जाने को भी तैयार है!”

वीडियो में अब्दुल कहता है, “तू कौन होती है हमरा नबी के खिलाफ बोलने वाली। तेरा ऐसा हाल करूँगा कि कभी नहीं भूलेगी। चाहे जेल क्यों न जाना पड़े।”

एक्टिविस्ट नाजिया इलाही खान ने इन दोनों वीडियो को उन धमकियों और गालियों के उदाहरण के रूप में साझा किया, जो उनके अनुसार उन्हें सोशल मीडिया पर कुछ मुस्लिम यूजर्स की ओर से मिल रही हैं। ये घटनाएँ नाजिया इलाही खान से जुड़े विवादों की लंबी श्रृंखला में एक नया अध्याय हैं। वह अक्सर सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर होने वाली तीखी बहसों के केंद्र में रही हैं। फिलहाल, उनके द्वारा साझा किए गए इन दोनों वीडियो पर कानून-व्यवस्था से जुड़ी किसी भी एजेंसी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

‘धार्मिक गतिविधि’ के नाम पर धर्मांतरण कराने वालों की विदेशी फंडिंग पर मोदी सरकार ने किया प्रहार, बदल डाले FCRA के नियम

     धर्मांतरण को ‘धार्मिक गतिविधि’ बताकर अब नहीं मिलेगी विदेशी फंडिंग (प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: AI-Dall-e)
केंद्र की मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग को लेकर लागू विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए संशोधनों के तहत धर्मांतरण (proselytisation) को अब आस्था-आधारित गतिविधियों का हिस्सा नहीं माना जाएगा। सरकार के इस कदम का सीधा असर उन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक संस्थाओं और चैरिटेबल संगठनों पर पड़ेगा जो विदेशी फंडिंग के जरिए धर्म परिवर्तन की साजिश रचते हैं।

सोमवार (22 जून 202) को गृह मंत्रालय द्वारा जारिए किए अधिसूचना में बताया गया कि नए नियमों में धार्मिक शिक्षा, पूजा-पाठ, प्रार्थना सभा, आध्यात्मिक कार्यक्रम, धार्मिक साहित्य का ज्ञान देना या समुदाय आधारित धार्मिक सेवाएँ तो आस्था-आधारित गतिविधियों की श्रेणी में रहेंगी, लेकिन किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाना, प्रभावित करना या धर्म बदलने के लिए अभियान चलाना अब इस श्रेणी से बाहर माना जाएगा।

नए नियमों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने या सालाना रिटर्न दाखिल करने वाले संगठनों को अब अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देनी होगी। इन नियमों का मकसद ज़्यादा पारदर्शिता लाना भी है, खासकर तब जब पैसा ‘डोनर एड्वाइज़्ड फंड’ या पैसे भेजने के किसी दूसरे जरिए से आता है। ऐसे मामलों में, संगठन को असली दान देने वाले की पहचान, पता और ईमेल की जानकारी के साथ-साथ मिली हुई रकम की भी जानकारी देनी होगी।

नियमों में हुए इस बदलाव का मतलब यह है कि यदि कोई संस्था विदेशी फंड का उपयोग धर्म प्रचार या धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ FCRA के तहत कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे मामलों में फंड के उपयोग की जाँच, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई या अन्य कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

सरकार ने कहा था कि विदेशी फंड का इस्तेमाल सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और वास्तविक धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, लेकिन धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए नहीं। इसी वजह से धर्मांतरण को आस्था-आधारित गतिविधियों की परिभाषा से अलग कर दिया गया है।

गृह मंत्रालय लंबे समय से यह कहता रहा है कि विदेशी धन का उपयोग जबरन, प्रलोभन या अन्य माध्यमों से धार्मिक परिवर्तन के लिए नहीं होना चाहिए। इसी संदर्भ में पहले भी FCRA नियमों को सख्त किया गया था। 2019 में भी सरकार ने नियमों में संशोधन करते हुए NGOs के प्रमुख पदाधिकारियों से यह घोषणा लेना अनिवार्य किया था कि वे धर्म परिवर्तन या सांप्रदायिक तनाव फैलाने जैसी गतिविधियों में शामिल नहीं रहे हैं।

हाल के FCRA संशोधन और संसद में हुई चर्चा के दौरान भी सरकार ने साफ संकेत दिए कि विदेशी फंड के कथित दुरुपयोग और धार्मिक परिवर्तन से जुड़े मामलों पर सख्त नजर रखी जाएगी। संसद में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि सरकार विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग और जबरन धार्मिक परिवर्तन जैसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेगी।

वहीं नए नियमों में बदलावों के लागू होने से ठीक 10 दिन पहले अमेरिकी सांसदों ने हाल ही में भारत सरकार द्वारा FCRA नियमों में किए गए बदलावों पर चिंता जताई थी। सीनेट की विदेश संबंध समिति के प्रमुख जेम्स रिष ने एक बयान में कहा था कि FCRA में प्रस्तावित बदलावों का ‘सिविल सोसाइटी समूहों’ पर बुरा असर पड़ सकता है, जिनमें ईसाई संगठन भी शामिल हैं। उन्होंने इन बदलावों को ‘बेहद चिंताजनक’ बताया था।

भारत भूषण तिवारी : केस को पहले हाई कोर्ट में ले जाना चाहिए था; लेकिन वकील विशाल तिवारी उतावला रहता है जो सुप्रीम कोर्ट चला गया

सुभाष चन्द्र

भारत भूषण तिवारी की कथित मुठभेड़ में जान चली गई यह घटना 17 जून की है। भारत तिवारी सोशल मीडिया पर activist था और बिहार के भोजपुर जिले के गांव बिलौती का रहने वाला था जो सोशल मीडिया पर विभिन्न मुद्दों को उठाने की वजह से प्रसिद्ध था बाढ़, नदियों के कटाव और उसकी वजह से लोगों के विस्थापन आदि को उठाना उसका कार्यक्षेत्र था। 

लेकिन मेरी नज़र में ये कोई ऐसे विषय नहीं हैं जिसकी वजह से उसे कोई जान से मारने की कोशिश करेगा जैसा आरोप लगाया जा रहा है पुलिस मुठभेड़ में मौत सवालों के घेरे में है पुलिस का कहना है कि जब उसे सूचना मिली कि उसके पास अवैध हथियार हैं और और वो पब्लिक में Firing करता है तो वह उसे गिरफ्तार करने गई थी लेकिन उसने पुलिस वालों पर गोली चला दी और पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई जिसमें उसकी मौत हो गई

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जो रिपोर्ट्स में बताया गया है कि परिजनों और गांव वालों के अनुसार उसका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और जो वीडियो सोशल मीडिया में हैं उससे पता चलता है कि “हथियार” छोड़ कर समर्पण करना चाहता था अब इस बात से यह तो साबित होता है कि उसके पास “हथियार” थे जैसा पुलिस का कहना है

राज्य सरकार ने थानाध्यक्ष समेत 4 लोगों को सस्पेंड कर दिया और जून 23 की खबर के अनुसार उनके खिलाफ FIR भी दर्ज कर दी गई है और सरकार ने रिटायर्ड हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में न्यायिक जांच भी बैठा दी है 

ऐसे मामले में राजनीति न हो ऐसा तो हो नहीं सकता प्रशांत किशोर ने तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को एक नंबर का गुंडा तक कह दिया भाई अपने को देख बिहार में कैसे फेल हुआ और IPAC में कैसे फंसा था

इस बीच जून 22 को ही वकील विशाल तिवारी केस की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया लेकिन कोर्ट ने तत्काल सुनवाई करने से मना कर दिया और विशाल तिवारी को कहा कि नियम कायदों के अनुसार चलिए पहले कोर्ट की रजिस्ट्री के सामने तत्काल सुनवाई के लिए अर्जी लगाओ, तब देखेंगे

ये राज्य का मामला था और विशाल तिवारी को पहले पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर करनी चाहिए थी विशाल तिवारी ने याचिका में सीबीआई जांच और पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की विशाल तिवारी याचिका में और आगे बढ़ गया उसने “देश में कानून के शासन की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाए जाने की मांग की जिसका अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट का कोई रिटायर्ड जज हो”

जहां तक सीबीआई जांच का सवाल है, वह आदेश तो हाई कोर्ट भी दे सकता था और FIR की मांग तो राज्य सरकार ने स्वयं ही पूरी कर दी लेकिन भारत तिवारी को लेकर विशाल तिवारी का पूरे देश में कानून का शासन नहीं है, यह कहना कहाँ तक उचित है? 

पहले भी देखा है विशाल तिवारी उतावलेपन में अनेक विषय सीधे सुप्रीम कोर्ट में ले जाते रहे हैं, उत्तर प्रदेश की मुठभेड़ों का मामला भी ये सुप्रीम कोर्ट ले गए थे लेकिन कुछ नहीं मिला भारत तिवारी के विषय को तो पहले हाई कोर्ट ले जाना ही उचित था

अगर मुठभेड़ गलत तरीके से हुई है तो यह गंभीर विषय है लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि किसी का सोशल मीडिया पर मुद्दे उठाना किसी को मारने का कारण नहीं बनता राज्य सरकार के विरुद्ध तो बहुत लोग बहुत कुछ लिखते हैं जनता की आवाज़ उठाना हर किसी की आज़ादी का विषय है अभी खान सर की बिल्डिंग में गोलीबारी का मामला चल ही रहा था और ये एक और विषय खड़ा हो गया। देखते हैं जांच में क्या निकलता है और सुप्रीम कोर्ट क्या आदेश देता है? मेरे विचार में कोर्ट विशाल तिवारी को हाई कोर्ट जाने के लिए कहेगा

‘पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग’ के खिलाफ सिर्फ शेरदिल ऋषि सुनक ने उठाई थी आवाज; कीर स्टार्मर समेत ब्रिटेन के तमाम प्रधानमंत्री टेकते रहे इनके आगे घुटने

                       कीर स्टारमर और ऋषि सुनक (फोटो साभार-x@Keir Starmer, @Rishi Sunak)
ब्रिटेन में आठवाँ प्रधानमंत्री अपना पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को 22 जून 2026 को अपने इस्तीफे की घोषणा करनी पड़ी। यह घोषणा लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते दबाव की वजह से की गई। दरअसल उनके प्रतिद्वंद्वी एंडी बर्नहैम ने 18 जून को हुए मेकरफील्ड उपचुनाव में निर्णायक जीत हासिल की थी।

इस जीत के साथ ही बर्नहैम ने पार्टी नेतृत्वकर्ता के तौर पर खुद को स्थापित कर लिया और स्टार्मर के लिए चुनौती बन गए। ​​स्टार्मर की घटती लोकप्रियता के कई कारण हैं, लेकिन पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोहों के मुद्दे को जानबूझकर कर नजरअंदाज करना, उनकी लोकप्रियता में कमी की अहम वजह है।

कीर स्टार्मर जनता और लेबर पार्टी के समर्थकों में लगातार अलोकप्रिय होने जा रहे थे। उनकी एक के बाद एक ली गई नीतिगत फैसलों की आलोचना हो रही है। उन्होंने पीटर मैंडेलसन को अमेरिका में ब्रिटेन का राजदूत नियुक्त किया, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने क्लीन चिट नहीं दी गई थी। स्टार्मर को पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ रहा था, क्योंकि लेबर पार्टी को अंदेशा था कि अगले आम चुनाव में स्टार्मर के फैसलों की वजह से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पार्टी ने ही कीर स्टार्मर को पद छोड़ने और एंडी बर्नहैम के लिए रास्ता बनाने का आदेश दिया। दरअसल बर्नहैम की हालिया चुनावी जीत ने इस उम्मीद को जगाया है कि उनका नेतृत्व अगले चुनाव में लेबर पार्टी को करारी हार से बचा सकता है।

देखिए किस तरह ब्रिटिश भारत में हिन्दू-मुसलमानों को लड़वाने के चिंगारियां छोड़ कर गए थे, दिल्ली में कई जगह बीच सड़क पर मस्जिदें और कब्रें बनवा गए, अब उसी आग में खुद जल रहा:-   

22 जून को अपने भाषण में कीर स्टार्मर ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी आगामी चुनाव के लिए उन्हें विश्वस्त चेहरा नहीं मानती, जिसके दम पर चुनाव जीता जा सकता है।

दरअसल कीर स्टार्मर लगातार राजनीतिक लाभ के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपना रहे हैं। इससे ब्रिटिश जनता में भारी गुस्सा है। यह याद रखना आवश्यक है कि प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने जून 2025 में अपनी नीति में अचानक बदलाव किया और ऑडिट और सिफारिशों के बाद पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कारी ग्रुमिंग गैंग की जाँच कराने का वादा किया था।

हालाँकि जनवरी 2025 में स्टार्मर ने यौन शोषण करने वाले गिरोहों की जाँच की माँग करने वालों को धुर दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थन करने वाला बताया था। दरअसल उस वक्त अमेरिकी अरबपति एलोन मस्क ने ब्रिटेन सरकार पर जोरदार हमला किया था। उन्होंने मुस्लिम बलात्कार गिरोहों के मुद्दे पर स्टार्मर सरकार द्वारा कदम नहीं उठाने की बात कही थी और वर्षों से पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रुमिंग गैंग द्वारा गैर-मुस्लिम लड़कियों के शोषण करने की बात कही थी।

पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोहों की जाँच शुरू करने में भी कीर स्टार्मर ने तत्परता नहीं दिखाई। जब उनपर दबाव बढ़ा तो उन्होंने जाँच शुरू की। इससे दोनों पक्षों के बीच वे अलोकप्रिय हुए।

लेबर पार्टी की मुस्लिम-समर्थक नीतियों के खिलाफ कंजर्वेटिव पार्टी के कड़े विरोध के बावजूद, लेबर सरकार ने ब्रिटेन के रुख में बदलाव करते हुए फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन किया है और इजरायल को कुछ हथियारों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह बदलाव गाजा में मानवीय संकट को लेकर पार्टी नेतृत्व और कई क्षेत्रों में लेबर पार्टी के समर्थक मुसलमानों के दबाव के बीच हुआ है। इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर 2024 में मुस्लिम बहुल सीटों पर लेबर पार्टी का समर्थन कम होने के बाद यह नीतिगत बदलाव आया है।

स्टार्मर को दोहरी नीति अपनाने के आरोपों का भी सामना करना पड़ा है। इफ्तार कार्यक्रमों की मेजबानी करने से लेकर मुसलमानों को ‘आधुनिक ब्रिटेन का चेहरा’ कहने और ‘इस्लामोफोबिया’ से निपटने के लिए आत्मघाती रूप से सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने तक, स्टार्मर ने अपनी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखने के लिए हद से ज्यादा प्रयास किए।

दरअसल दिसंबर 2025 में कीर स्टार्मर के नेतृत्व वाली लेबर सरकार की प्रस्तावित ‘इस्लामोफोबिया’ (या ‘मुस्लिम विरोधी घृणा’) की परिभाषा पर ब्रिटिश हिंदू, सिख और मानवाधिकार समूहों ने गहरी आपत्ति जताई है | आलोचकों का मानना है कि इसमें मौजूद अस्पष्ट शब्दावली, जैसे- ‘नस्लीयकरण’ और ‘पूर्वाग्रही रूढ़िवादिता’, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबा सकती है और एक तरह से पिछले दरवाजे से ‘ईशनिंदा कानून’ (ब्लास्पहमी लॉ) की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। हिंदू और सिख समूहों ने चेतावनी दी है कि केवल मुस्लिम के लिए ऐसी अलग और अस्पष्ट परिभाषा बनाने से अन्य धर्मों के प्रति भेदभाव की भावना पैदा होगी।

क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस (सीपीएस) के प्रमुख, लोक अभियोजन निदेशक (डीपीपी) के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कीर स्टार्मर को कुप्रबंधन के आरोपों का भी सामना करना पड़ा।

पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रुमिंग गैंग और कीर स्टार्मर की चुप्पी

1980 के दशक में टेलफोर्ड शहर में एक घटना ने पाकिस्तानी मुस्लिम रेपिस्ट गैंग की ओर लोगों का ध्यान खींचा। उस वक्त 11 साल की छोटी बच्ची को बहला-फुसलाकर अगवा किया गया, झूठी देखभाल का दिखावा किया गया और फिर नशीली दवाइयाँ देकर बलात्कार किया गया। उसे पीटा गया, बेचा गया और यहाँ तक ​​कि ग्रुमिंग गिरोहों ने उसकी हत्या भी कर दी। इस दौरान देखा गया कि गोरी बच्चियों का रेप कर उसे बलात्कारी दूसरे बलात्कारी के हवाले कर देता था।

ऐसे रेपिस्ट ज्यादातर ब्रिटिश पाकिस्तानी मूल के थे। तीन लड़कियों की हत्या कर दी गई थी और दो त्रासदियों की वजह से मारी गईं। 1,70,000 आबादी वाले शहर में लगभग 1000 लड़कियाँ पीड़ित हुईं। टेलफोर्ड में, ये पाकिस्तानी गिरोह ऐसा अड्डे चला रहे थे, जहाँ लड़कियों को प्रेमजाल में फँसा कर उन्हें गिफ्ट देकर अपने साथ लाते थे।

रोदरहम में भी इसी तरह का एक रैकेट चल रहा था। 2,26000 की आबादी वाले शहर में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों ने करीब 1500 लड़कियों का रेप किया गया और उन्हें खरीदा-बेचा गया। कई पीड़ितों के साथ गैंगरेप किया गया और यह दुर्व्यवहार 1997 से 2013 तक बेरोकटोक जारी रहा। रोशडेल में यह सिलसिला 2002 में शुरू हुआ। कम से कम 47 युवतियों को दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया। प्रशासनिक और कानूनी अधिकारियों की प्रतिक्रिया इतनी निष्क्रिय रही है कि ये गिरोह “ग्रेट ब्रिटेन” की सड़कों पर आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।

ब्रिटेन में हडर्सफ़ील्ड, रोदरहम, रोशडेल, ऑक्सफोर्ड, ब्रिस्टल, पीटरबरो और न्यूकैसल सहित कई स्थानों पर यौन शोषण के कारनामों का खुलासा हुआ। कई रिपोर्टों और जांचों के बावजूद, स्टोववुड और टूरवे जैसी जांच कार्रवाइयों के बावजूद, यौन शोषण करने वाले गिरोहों द्वारा किए गए यौन शोषण के वास्तविक पैमाने का पता नहीं लगाया जा सका।

ये ‘ग्रूमिंग’ अपराध यूनाइटेड किंगडम को लगातार परेशान कर रहे हैं, क्योंकि नेशनल सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू चिल्ड्रन (एनएसपीसीसी) ने 2023 में बताया कि पिछले पांच वर्षों में युवाओं के खिलाफ ऑनलाइन ग्रूमिंग अपराधों में 82% की वृद्धि हुई है।

पाकिस्तानी ग्रुमिंग गैंग ने गरीब श्वेत और गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ बलात्कार किया। यह मुद्दा सबसे पहले रोदरहम, रोशडेल और टेलफोर्ड जैसे शहरों में सामने आया। रोदरहम पर 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 1400 बच्चों का 16 वर्षों में यौन शोषण किया गया। इसके ज्यादातर अपराधी पाकिस्तानी मूल के पुरुष थे। हालाँकि कंजर्वेटिव पार्टी भी पूरी तरह निर्दोष नहीं है, लेकिन लेबर सरकार और कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने जानबूझकर इस मामले को नजरअंदाज किया।

हाल ही में सांसद रूपक लो की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रेप गैंग इंक्वायरी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ब्रिटिश सरकार और सीपीएस ने जातीयता और धर्म से संबंधित डेटा को किस प्रकार दबाया। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि लेबर पार्टी ने मुस्लिम वोट बैंक की नाराजगी से बचने के लिए जाँच में देरी की या फिर उसे रोक दिया। इसमें आगे कहा गया है कि बलात्कार के जिहादियों को हल्की सजा दी गईं और उन्हें देश से बाहर नहीं निकाला गया। स्टार्मर के कार्यकाल में तो हद ही हो गया, सीपीएस ने हजारों बलात्कारी जिहादियों को केवल ‘चेतावनी’ देकर छोड़ दिया।

ओपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि कैसे ब्रिटेन के राजनेता, विशेषकर लेबर पार्टी, जिहाद के मामलों को कम करके आँकते हैं। लेबर पार्टी की सांसद सारा चैंपियन को 2017 में द सन में प्रकाशित एक लेख के लिए माफी माँगनी पड़ी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि ब्रिटेन की अहम समस्या ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों का बलात्कार और शोषण है”। चैंपियन को न केवल माफी माँगनी पड़ी, बल्कि अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा।

2012 में, लेबर पार्टी के नेता और गृह मामलों की चयन समिति के अध्यक्ष कीथ वाज ने ग्रूमिंग जिहाद अपराधों को कम करके आँका। उन्होंने कहा कि पूरे समुदाय को ‘कलंकित’ नहीं किया जाना चाहिए।

दो दशकों से अधिक समय तक हजारों गैर-मुस्लिम नाबालिग और वयस्क लड़कियों को निशाना बनाने वाले मुस्लिम बलात्कार गिरोहों को पकड़ने में ब्रिटिश सरकारों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों की सामूहिक विफलता का कारण ‘इस्लामोफोबिया’ से बचने की सोच है। लेबर पार्टी के नेताओं के साथ-साथ ब्रिटिश मीडिया भी इस मामले में पाकिस्तानी ग्रुमिंग गैंग या पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश मुस्लिम ग्रुमिंग गैंग कहने से बचता रहा। इसके बजाय ‘दक्षिण एशियाई ग्रूमिंग गैंग’ का इस्तेमाल किया।

रूढ़िवादी राजनेताओं, ब्रिटिश देशभक्तों और एलोन मस्क ने स्टार्मर पर पाकिस्तानी बलात्कार गिरोह के अपराधों में मिलीभगत का आरोप लगाया। कई लोगों ने माँग की थी कि सीपीएस प्रमुख के रूप में अपने कार्यकाल और प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान इन अपराधों के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए स्टार्मर पर मुकदमा चलाया जाए।

कुल मिलाकर कीर स्टार्मर ने पाकिस्तानी ग्रुमिंग गैंग पर एक्शन लेने से परहेज किया, वहीं ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और कंजर्वेटिव नेता ऋषि सुनक ने जोखिम उठाकर पाकिस्तानी मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों के खिलाफ आवाज उठाया और उन्हें जिहादी करार दिया।

ऋषि सुनक ने उठाए थे कदम

ऋषि सुनक ब्रिटेन के एकमात्र ऐसे राष्ट्राध्यक्ष रहे, जिन्होंने न केवल मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों की निंदा की, बल्कि इस बात पर भी जोर दिया कि कैसे राजनीतिक शुद्धता ने राजनेताओं को बलात्कार जिहाद के खिलाफ बोलने से रोका। साथ ही यह भी बताया कि वह ब्रिटेन में यौन शोषण गिरोहों की समस्या से कैसे निपटेंगे।

अक्टूबर 2025 में पदभार संभालने से कुछ महीने पहले दिए गए एक साक्षात्कार में, तत्कालीन प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने ग्रूमिंग या रेप जिहाद को ‘भयानक अपराध’ बताया था और प्रधानमंत्री बनने पर इस समस्या से प्राथमिकता के आधार पर निपटने का वादा किया था।

सुनक ने घोषणा की थी कि वे राष्ट्रीय अपराध एजेंसी में एक नया टास्क फोर्स बनाएँगे, जो यौन शोषण करने वाले गिरोहों की निगरानी करेगा। उन्होंने कहा था, “हम हर जगह पुलिस बलों के लिए इसे प्राथमिकता देना अनिवार्य करेंगे। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि सभी पुलिस बल इसमें शामिल लोगों की पहचान दर्ज करें, जो वर्तमान में नहीं किया जाता क्योंकि लोग ऐसा नहीं करना चाहते। मैं यौन शोषण में शामिल लोगों के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करना चाहता हूँ, जिसमें पैरोल के बहुत सीमित विकल्प होंगे। एक कंजर्वेटिव सरकार को लोगों की सुरक्षा के आड़े राजनीतिक स्वार्थ को नहीं आने देना चाहिए ।”

सुनक ने अपना वादा निभाया और अप्रैल 2023 में देश में मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों की जाँच में पुलिस की सहायता के लिए एक नए ‘ग्रूमिंग गैंग्स टास्क फोर्स’ बनाया । इस टास्क फोर्स में सुनक ने जाँच में सहायता के लिए विशेषज्ञ अधिकारियों की नियुक्ति की घोषणा की, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यौन शोषण गिरोहों के पीछे के अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए। उन्होंने यह भी वादा किया कि यौन शोषण गिरोह के सदस्यों और सरगनाओं को उनके अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।

सुनक ने यह भी घोषणा की थी कि उनकी सरकार ऐसा कानून लाएगी जिससे यौन शोषण करने वाले गिरोह के सरगना को सजा सुनाते समय एक वैधानिक कारक के रूप में शामिल किया जा सके, जो इन अपराधों के लिए सबसे कड़ी सजा सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाएगा।

ऋषि सुनक के पास पाकिस्तानी मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों को जड़ से खत्म करने का एक दूरदर्शी दृष्टिकोण और बड़ी योजनाएँ थीं। हालाँकि, आम चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी की करारी हार ने ब्रिटेन की उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि देश में यौन शोषण गिरोहों का अंत होगा और हजारों पीड़ितों को न्याय मिलेगा।

कंजर्वेटिव पार्टी का 14 साल का शासन अर्थव्यवस्था, महँगाई, आव्रजन और ब्रेक्जिट के बाद की चुनौतियों से निपटने के तरीके को लेकर जनता के असंतोष और पार्टी के आंतरिक मतभेदों के कारण चुनावी हार के साथ समाप्त हुआ। हालाँकि ऋषि सुनक जानते थे कि वे एक डूबते जहाज का नेतृत्व कर रहे हैं, फिर भी उन्होंने राजनीतिक लाभ हासिल करने की होड़ और राजनीतिक शुद्धता को पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोहों से ब्रिटिश लड़कियों के लिए न्याय और सुरक्षा के अपने प्रयासों में बाधक न बनने देने का भरसक प्रयास किया।

कीर स्टार्मर को ऋषि सुनक की तुलना में कहीं अधिक समय तक सत्ता में रहने और राजनीतिक स्थिरता मिली, फिर भी स्टार्मर कई मोर्चों पर विफल रहे। पाकिस्तानी मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के मामले में स्टार्मर के बार-बार बदलते रुख को प्रधानमंत्री के रूप में उनकी सबसे बड़ी असफलताओं में से एक माना जाएगा।

करोड़ों का इनाम, जेल से शुरुआत… ट्रंप ने जिस आतंकी संगठन ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को बताया ‘खून का प्यासा’ के सरगना नीनो गुएरेरो को US ने किया ढेर

        आतंकी संगठन 'ट्रेन डी अरागुआ' का मुख्य सरगना नीनो गुरेरो को US ने मार गिराया (फोटो साभार : BBC)
जुर्म का अंत हमेशा बुरा होता है। अपराधी चाहे कितना भी ताकतवर हो, वह बच नहीं सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सीधे आदेश ने इस बात को सच साबित कर दिया है। उनके आदेश पर अमेरिकी सेना ने एक बड़ा हवाई हमला किया। इस हमले में वेनेजुएला का सबसे खूंखार गैंगस्टर नीनो गुएरेरो मारा गया है। नीनो गुएरेरो ‘ट्रेन डी अरागुआ’ नाम के खतरनाक आतंकी संगठन का मुख्य सरगना था। ट्रंप ने इस गैंग को ‘खून का प्यासा’ बताया। उसका खूनी साम्राज्य लातिन अमेरिका से लेकर अमेरिका तक फैला हुआ था। ट्रंप ने इस सफलता का खुद एलान किया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अब दुनिया में कहीं भी इन अपराधियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है।

ट्रंप का सीधा आदेश और पेंटागन का बड़ा एक्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़े सैन्य ऑपरेशन की जानकारी दी। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना के ‘साउदर्न कमांड’ ने यह हमला किया था। यह हमला बेहद तेज और जानलेवा था। इस हमले का मुख्य मकसद ‘ट्रेन डी अरागुआ’ के कुख्यात लीडर नीनो गुएरेरो को खत्म करना था। ट्रंप ने इस संगठन को धरती का सबसे क्रूर और हिंसक आतंकी गिरोह बताया है।
पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ ने भी इस हमले की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसके बारे में बताया। यह हवाई हमला इसी सप्ताह की शुरुआत में किया गया था। पूरी जाँच के बाद अब साफ हो चुका है कि गुएरेरो इस हमले में मारा गया है। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई का एक Video भी जारी किया है। इस Video में तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है।

वेनेजुएला सरकार की पुष्टि और संयुक्त खुफिया ऑपरेशन

इस खूंखार आतंकी को ढेर करने में वेनेजुएला सरकार ने भी अमेरिका का साथ दिया है। वेनेजुएला के सूचना और संचार मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया कि यह एक साझा ऑपरेशन था। सुरक्षाबलों और इस आपराधिक संगठन के बीच काफी देर तक भीषण मुठभेड़ चली। इस मुठभेड़ के दौरान ही आतंकी नीनो गुएरेरो को ‘न्यूट्रलाइज’ यानी हमेशा के लिए शांत कर दिया गया।
यह पूरा ऑपरेशन दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों की गहरी सूझबूझ का नतीजा था। इसमें आधुनिक तकनीक और हाई-टेक सपोर्ट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। वेनेजुएला की सरकार ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के साथ मिलकर इस खूंखार अपराधी की हर हरकत पर नजर रखी थी। इसके बाद सही मौका मिलते ही इस पर अंतिम प्रहार किया गया।

न्यूयॉर्क कोर्ट में काला चिट्ठा और 41 करोड़ का इनाम

नीनो गुएरेरो लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के निशाने पर था। पिछले साल दिसंबर में न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट में उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई थी। उस पर नार्को-आतंकवाद, जबरन वसूली, हत्या की साजिश और आतंकियों को हथियार और पैसा सप्लाई करने जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज थे। वह एक दशक से ज्यादा समय से इन वारदातों को अंजाम दे रहा था।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने गुएरेरो की गिरफ्तारी या उसके बारे में सही जानकारी देने वाले को 50 लाख डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया था। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब 41 करोड़ रुपए बैठती है। अमेरिकी वकीलों के मुताबिक, नीनो गुएरेरो का यह गैंग (खून का प्यासा) पूरे उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के कई देशों में अनगिनत हत्याओं और ड्रग्स की तस्करी के लिए जिम्मेदार था।

जेल से चला साम्राज्य और ‘डॉन’ का जन्म (2013)

इस खूंखार गैंग ‘ट्रेन डी अरागुआ’ की शुरुआत साल 2005 में एक मजदूर संगठन के रूप में हुई थी। वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के राज में एक रेलवे लाइन का निर्माण हो रहा था। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों ने मिलकर एक यूनियन बनाई। लेकिन जल्द ही इन मजदूरों के मन में लालच आ गया। उन्होंने ठेकेदारों को डराना और उनसे पैसे ऐंठना शुरू कर दिया। साल 2011 में जब सरकार ने यह रेलवे प्रोजेक्ट बंद किया, तो वो मजदूर पूरी तरह एक क्रिमिनल गैंग बन चुके थे। नाम पड़ा- ‘ट्रेन डी अरागुआ’ (अरागुआ की ट्रेन)।

साल 2013 में इस गैंग की कमान मिली हेक्टर रस्टेनफोर्ड गुएरेरो उर्फ नीनो गुएरेरो को। नीनो वेनेजुएला की सबसे बदनाम ‘तोकोरॉन जेल’ (Tocorón Prison) में बंद था। लेकिन वह मामूली कैदी नहीं था, वह वहाँ का ‘प्रान’ (जेल का डॉन) बन गया। उसने जेल के अंदर ही ऐश-ओ-आराम का महल बनाया। वहीं बैठे-बैठे उसने पूरे देश में ड्रग्स, जबरन वसूली और इंसानों की तस्करी का धंधा फैला दिया।

मजबूरी का फायदा और सरहदें पार

साल 2015 में वेनेजुएला में भयंकर गरीबी और भुखमरी फैल गई। लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे। नीनो गुएरेरो ने इस मजबूरी को धंधा बना लिया। उसके गैंग ने बॉर्डर पर कब्जा किया और भागने वाले गरीबों से टैक्स वसूलने लगे। इतना ही नहीं, इस गैंग के शातिर अपराधी आम शरणार्थियों के भेष में कोलंबिया, पेरू, चिली और अमेरिका जैसे देशों में घुस गए।

इन देशों में जाकर उन्होंने वेनेजुएला के ही प्रवासियों को अपना शिकार बनाना शुरू किया। उन्होंने वहाँ महिलाओं की तस्करी की और छोटे स्तर पर ड्रग्स बेचने का धंधा शुरू कर दिया। लातिन अमेरिका की पुलिस के मुताबिक, इस गैंग ने कई देशों में अपनी परमानेंट सेल (गुप्त ठिकाने) बना ली थीं।

चिली में पूर्व सैन्य अधिकारी की हत्या से मचा था हड़कंप

‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अपनी बेरहमी और खौफनाक हत्याओं के लिए जाना जाता है। मार्च 2023 में इस गैंग ने चिली में एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिससे दो देशों के बीच तनाव बढ़ गया। गैंग के शूटरों ने वेनेजुएला की सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट और सरकार के विरोधी रोनाल्ड ओजेडा का अपहरण कर लिया। इसके बाद उनकी बेहद क्रूरता से हत्या कर दी गई।

यह गैंग पनामा से लेकर ब्राजील तक फैल चुका था। अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, सुपारी लेकर हत्या करना और बड़े-बड़े मॉल में डकैती डालना इनका रोज का काम था। साल 2023 में जब वेनेजुएला की सेना ने इनकी तोकोरॉन जेल पर धावा बोला, तो गुएरेरो जेल के नीचे बनी एक गुप्त सुरंग से अपने साथियों के साथ भाग निकला था। तब से वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था।

अमेरिका के ऑरोरा में घुसपैठ और ट्रंप का चुनावी मुद्दा

पिछले साल अगस्त में अमेरिका के कोलोराडो राज्य के ऑरोरा शहर से एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ हथियारबंद वेनेजुएला के प्रवासी एक अपार्टमेंट की बिल्डिंग में जबरन घुसते दिखे थे। इस घटना के बाद वहाँ के मकान मालिक और नेताओं ने दावा किया कि ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने अमेरिका की सोसायटियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को बहुत जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने ऑरोरा शहर में एक बड़ी रैली की थी और मंच पर इन अपराधियों के पोस्टर लगाए थे। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वह राष्ट्रपति बनते ही देश में अवैध रूप से रह रहे इन अपराधियों को तुरंत बाहर निकालेंगे। ट्रंप की इस आक्रामक नीति को जनता का भारी समर्थन मिला था।

राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से कनेक्शन और अमेरिकी सेना का एक्शन

राष्ट्रपति ट्रंप का हमेशा से आरोप रहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने जानबूझकर अपने देश के कैदियों को अमेरिका भेजा ताकि वहाँ अपराध बढ़ सके। हालाँकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में इस बात के सीधे सबूत नहीं मिले थे। इसके बावजूद, अमेरिकी सेना ने इसी साल जनवरी में एक बेहद गुप्त ऑपरेशन चलाकर निकोलस मादुरो को वेनेजुएला से उठा लिया था। मादुरो पर फिलहाल अमेरिका में नार्को-आतंकवाद का केस चल रहा है।

अदालत में पेश की गई नई चार्जशीट में खुलासा हुआ है कि मादुरो सरकार और नीनो गुएरेरो का गैंग आपस में मिलकर काम कर रहे थे। वे मिलकर ड्रग्स के धंधे से मोटा मुनाफा कमा रहे थे। ट्रंप ने गुएरेरो की मौत पर कहा कि जो बाइडेन की कमजोर नीतियों के कारण अमेरिका की सीमाएं असुरक्षित हो गई थीं। लेकिन अब उनकी सरकार इन राक्षसों को चुन-चुनकर खत्म कर रही है।

जोसलीन और लेकन रीली की मौत का लिया बदला

अमेरिका में अवैध प्रवासियों द्वारा की गई कुछ हत्याओं ने पूरे देश को नाराज कर दिया था। 12 साल की मासूम बच्ची जोसलीन नुंगारे और 22 साल की छात्रा लेकन रीली की बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों ने हत्या कर दी थी। ट्रंप ने नीनो गुएरेरो की मौत का ऐलान करते हुए इन दोनों बच्चियों का विशेष रूप से नाम लिया।

ट्रंप ने अपने बयान में लिखा कि अमेरिकी सेना ने इन मासूम बच्चियों और उनके परिवारों के साथ पूरा न्याय किया है। इस खूंखार गैंग के सरगना को मारकर सेना ने उनकी मौतों का बदला ले लिया है। ट्रंप ने साफ किया कि उनके राज में अपराधियों को कोई माफी नहीं मिलेगी और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

‘एलियन एनिमीज एक्ट’ और मास डिपोर्टेशन की तैयारी

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। उन्होंने देश के 200 साल पुराने ‘एलियन एनिमीज एक्ट’ का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। यह कानून सरकार को यह ताकत देता है कि वह किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को बिना किसी अदालती सुनवाई के तुरंत गिरफ्तार करके देश से बाहर निकाल सकती है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह गैंग कोई मामूली चोर-उचक्कों का ग्रुप नहीं है, बल्कि यह एक हमलावर विदेशी सेना की तरह है। ट्रंप सरकार ने इस गैंग के कई संदिग्ध सदस्यों को बिना कोर्ट की मंजूरी के अल साल्वाडोर की सबसे खतरनाक ‘सेकोट जेल’ में भेजना शुरू कर दिया था। हालांकि अदालतों ने इस पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं, लेकिन सरकार अपनी कार्रवाई पर टिकी हुई है।

मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने कमजोर था यह गैंग

भले ही अमेरिका में इस गैंग को लेकर काफी डर का माहौल बनाया गया हो, लेकिन खोजी संस्था ‘इनसाइट क्राइम’ की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अमेरिका के अंदर उतना मजबूत नहीं है। अमेरिका के ड्रग मार्केट पर पहले से ही मैक्सिको के बेहद खतरनाक ‘सिनालोआ कार्टेल’ और ‘जालिस्को न्यू जनरेशन कार्टेल’ का पूरी तरह कब्जा है।

वेनेजुएला का यह गैंग मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने बहुत छोटा और कमजोर है। अमेरिकी सीमा पर इस गैंग के गुर्गे खुद को बचाने के लिए मैक्सिकन माफियाओं के लिए छोटे-मोटे काम करते हैं। अमेरिकी गृह मंत्रालय के अनुसार, पूरे अमेरिका में इस गैंग के केवल 600 के करीब एक्टिव मेंबर्स हैं। यह संख्या अमेरिका में रहने वाले 7 लाख अच्छे और शांतिप्रिय वेनेजुएला के प्रवासियों का बहुत छोटा हिस्सा है।

इस बड़े सैन्य एक्शन का आगे क्या असर होगा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बड़े और आक्रामक कदम ने दुनिया भर के अपराधियों को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि वे इन क्रूर हत्यारों और ड्रग तस्करों को दुनिया के किसी भी कोने से ढूँढ निकालेंगे। अमेरिकी साउदर्न कमांड का यह एक्शन दिखाता है कि अमेरिका अब अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने वेनेजुएला की जेल से निकलकर कई देशों में मौत और खौफ का जो खेल शुरू किया था, उसका अंत अब नजदीक है। इसके मुख्य सरगना नीनो गुएरेरो की मौत ने इस पूरे गैंग की कमर तोड़ दी है।

राहुल गाँधी जवाब दो : ‘मैं एक महान दिवंगत आत्मा की माँ हूँ’: अब्दुल्ला के मित्र नेहरू ने बलिदानी मुखर्जी की माँ की क्यों माँग ठुकराई

आज जिसे देखो बेशर्मों और बेगैरतों की तरह कहता फिरता है कि नेहरू का नाम लिए बिना सत्ता पक्ष रह नहीं सकता। कांग्रेस की वकालत करने वाले बेशर्म हिन्दुओं आंखें खोलो और अपने आका कांग्रेसी नेताओं से पूछो क्यों हिन्दू ही नहीं देशहित में काम करने वालों की रहस्यमयी मौतें हुई? आज जब मन किया चल दिए कश्मीर मौज करने और माता वैष्णों माता मन्दिर। यह संभव हो पाया डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान से। नेहरू अब्दुल्लाह ने जम्मू कश्मीर जाने के परमिट सिस्टम लागु किया हुआ था। जिसे ख़त्म करवाने की खातिर कांग्रेस कैबिनेट मंत्री डॉ मुखर्जी को अपना बलिदान देना पड़ा था। हकीकत यह है कि इस कांग्रेस ने देश को ऐसे नासूर दिए हैं जिनका पता नहीं कितने सालों तक इलाज करना पड़ेगा। देश ने कई ऐसी पुण्य आत्माएं जैसे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आदि और भी हैं, जिनकी मौत की गुथ्थी आज तक रहस्यमयी बनी हुई हैं।  

एक बात और, महात्मा गाँधी की हत्या के लिए नाथूराम गोडसे को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पूछो इन कांग्रेसियों से (डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के अनुसार) गाँधी 40 मिनट तक जीवित थे क्यों नहीं उन्हें निकटतम हॉस्पिटल कलावती या विलिंग्डन(वर्तमान डॉ राम मनोहर लोहिया) ले जाकर बचाया गया? यह भी एक रहस्यमयी मौत है। मजे की बात पोस्टमॉर्टेम डॉ मुखर्जी से लेकर गाँधी तक किसी का नहीं हुआ, क्यों? दूसरे, अगर गोडसे कसूरवार था तो फिर क्यों उनके बयानों को सार्वजानिक होने पर प्रतिबन्ध लगाया था? अगर गोडसे ने गाँधी को नहीं मारा होता अब तक भारत का एक और विभाजन यानि पाकिस्तान बन चूका होता। सच्चाई जानने के लिए नई सड़क दिल्ली में साहित्य सदन जाकर 150 बयानों की किताब खरीद कर पढ़ सकते हैं। 

 

जब किसी की मौत होती है तो पुलिस जाँच करती है। किसी की मौत के साथ जब जनभावनाएँ जुड़ी हों या जाँच से कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला हो तो स्वतंत्र एजेंसियों से जाँच की भी व्यवस्था है। लेकिन, जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की जाँच नहीं हो सकी।

जून 23, 2026 को जब उनकी मौत को 67 साल होने आए हैं, देश सवाल तो पूछेगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की स्वंतंत्र जाँच क्यों नहीं कराई?

जून 2019 में भाजपा अध्यक्ष (तब कार्यकारी) जेपी नड्डा ने कहा था कि वो जवाहरलाल नेहरू ही थे, जिन्होंने डॉ मुखर्जी की मृत्यु की जाँच कराने से इनकार कर दिया था। बकौल नड्डा, इतिहास साक्षी है कि नेहरू ने पूरे देश की माँग को ठुकरा दिया था। बता दें कि हिन्दू राष्ट्रवाद के पुरोधाओं में से एक डॉ मुखर्जी ने ही 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जो बाद में भाजपा रूप में परिवर्तित हुआ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माता श्रीमती जोगमाया ने भी पंडित नेहरू को एक भावपूर्ण पत्र लिखकर अपने पुत्र की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच की माँग की थी। लेकिन, एक माँ की माँग को भी नहीं माना गया। उनकी माँ जोगमाया ने नेहरू को भेजे पत्र में लिखा था कि वो एक महान दिवंगत आत्मा की माता हैं और ये माँग करती हैं कि स्वतंत्र व सक्षम व्यक्तियों द्वारा अविलम्ब एक पूर्णरूपेण निष्पक्ष और खुली जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने आगे नेहरू को चेताते हुए कहा था कि यह एक महान दुःखान्त घटना है, जो स्वतंत्र भारत में घटी है और भारत की जनता ज़रूर निर्णय करेगी कि इसका कारण क्या था और इस बारे में आपकी सरकार ने क्या भूमिका निभाई? उन्होंने लिखा था कि किसी भी बड़े से बड़े व्यक्ति ने ही ये कृत्य क्यों न किया हो, क़ानून उसे सज़ा दे। साथ ही जनता सावधान हो जाए ताकि किसी और माँ को स्वतंत्र भारत में इस तरह से आँसू न बहाना पड़े।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 50 के दशक की शुरुआत में ‘एक विधान, एक प्रधान, एक निशान’ आंदोलन शुरू किया था। जम्मू कश्मीर में तब ‘प्रधानमंत्री’ का पद होता था। संविधान, झंडा और दूसरे राज्यों के लोगों के वहाँ न बसने का नियम तो हालिया अनुच्छेद 370 के प्रावधान निरस्त होने तक मौजूद थे। डॉ मुखर्जी इसी भेदभाव को ख़त्म करने के पक्ष्धर थे, जो तब असंभव सा लगता था। मई 11, 1953 को जम्मू कश्मीर में घुसने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया था।

श्रीनगर के जेल में ही उनकी मृत्यु हुई, जिसकी वजह हार्ट अटैक को बताया गया। तब शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री थे, जो उनके शव पर माल्यार्पण करने भी आए थे। अब जब पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूत बन कर उभर रही है और वहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों के प्रभाव के बावजूद पहली बार कड़ी टक्कर होने जा रही है, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज एक बार फिर से भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो उठे हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस और वामपंथी कैडरों में इसकी छटपटाहट देखी जा सकती है क्योंकि मार्च 2018 में जिस तरह से कोलकाता में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के माओवादी समर्थक छात्रों ने डॉ मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ डाला, उससे वामपंथी दलों की बेचैनी प्रदर्शित होती है। उससे कुछ दिनों पहले ही त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद जनता द्वारा लेनिन की प्रतिमा गिराई गई थी। लेकिन, बंगाल में बंगाल के ही सपूत की प्रतिमा को भी वामपंथियों ने नहीं बख़्शा।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जवाहरलाल नेहरू ने पहले अंतरिम केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया था क्योंकि कॉन्ग्रेस और हिन्दू महासभा के अधिवेशन साथ-साथ होते थे और महात्मा गाँधी की भी यही सलाह थी। उनके बारे में एक बार दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी अच्छी बात कही थी। उनकी पार्टी छोटी थी लेकिन वो बिना बनाए ही विरोधी दल के नेता बन गए थे। किसी ने डॉक्टर मुखर्जी से कहा कि आपको तो नेता बनाया नहीं गया है, चुना नहीं गया है फिर भी आप विरोधी दल के मान्य नेता कैसे?

उस समय युवा अटल बिहारी वाजपेयी ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहा- “जंगल में शेर को आज तक किसी ने राजमुकुट पहनाया है? वह तो स्वयं राजा है। डॉक्टर मुखर्जी जहाँ होंगे, वो वहीं अपनी आभा बिखेरेंगे। वो जहाँ होंगे, वहाँ विद्वता की बात करते हुए राष्ट्रप्रेम पर बल देंगे।” जब डॉ मुखर्जी गिरफ़्तार हुए थे तब वाजपेयी उनके साथ ही थे। उन्होंने वाजपेयी को वापस भेज दिया था।

उन्होंने कहा था कि अटल जाओ और दुनिया को बताओ कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने परमिट सिस्टम को तोड़ दिया है। तभी तो उनके बलिदान के कुछ ही दिनों बाद नेहरू को कश्मीर में परमिट सिस्टम हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा। तब क्षुब्ध अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिख कर अपना दर्द प्रकट किया था। ‘जम्मू की पुकार‘ शीर्षक की इस कविता की कुछ पंक्तियाँ आज भी झकझोड़ती है:

अत्याचारी ने आज पुन: ललकारा, अन्यायी का चलता है दमन दुधारा।
आँखों के आगे सत्य मिटा जाता है, भारत माता का शीश कटा जाता है।
क्या पुन: देश टुकड़ों में बँट जाएगा? क्या सबका शोणित पानी बन जाएगा?
कब तक जम्मू को यों ही जलने देंगे? कब तक जुल्मों की मदिरा ढलने देंगे?
चुपचाप सहेंगे कब तक लाठी गोली? कब तक खेलेंगे दुश्मन खून से होली?
प्रह्लाद-परीक्षा की बेला अब आई, होलिका बनी देखो अब्दुल्लाशाही।
माँ-बहनों का अपमान सहेंगे कब तक? भोले पाण्डव चुपचाप रहेंगे कब तक?
आओ खण्डित भारत के वासी आओ, कश्मीर बुलाता, त्याग उदासी आओ?

जब डॉक्टर मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया, तब अटल बिहारी वाजपेयी उनके राजनीतिक सचिव थे। वो तब तक सांसद भी नहीं बने थे और पत्रकारिता में अनवरत व्यस्त रहा करते थे। डॉक्टर मुखर्जी के बलिदान के बाद वीर सावरकर ने कहा था कि एक महान देशभक्त और महान सांसद शिष्ट नष्ट हो गया है। कहते हैं, उनके बलिदान के 8-9 महीनों बाद शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी से देश चकित हो गया था।

नेहरू और अब्दुल्ला अनन्य मित्र थे, ऐसे में लोग ये सवाल ज़रूर पूछ रहे थे कि क्या अगर डॉक्टर मुखर्जी का बलिदान नहीं हुआ होता तो शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी संभव होती? डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पाँच सूत्री माँगों में एक ये भी था कि पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं और सिखों के रहन-सहन की व्यवस्था की जाए। आज दशकों बाद सीएए के रूप में उनका ये स्वप्न पूरा हुआ।

सरदार पटेल ने भी इस बात की भविष्यवाणी की थी कि जवाहरलाल नेहरू अब शेख अब्दुल्ला की मैत्री के मोहजाल में फँसे हुए हैं लेकिन समय आते ही उन्हें अब्दुल्ला का असली रंग दिख जाएगा। महाराजा हरि सिंह भी अब्दुल्ला के इस चाल-चरित्र से वाकिफ थे, तभी उन्होंने उसे जेल में बंद किया था। लेकिन, नेहरू भारत में सत्ता हस्तांतरण के दौर के बीच भी महाराजा का विरोध करने कश्मीर दौड़ पड़े – अपने मित्र अब्दुल्ला के लिए!

आज समय ने सिद्ध कर दिया है कि नेहरू गलत थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी व सरदार पटेल जैसे लोग दूरद्रष्टा थे। जब ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ सरदार सरोवर बाँध के पास भारत का गर्व बन कर खड़ा है, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने और सीएए के अस्तित्व में आने से पता चलता है कि डॉक्टर मुखर्जी की नीतियाँ भविष्य के भले के लिए थीं। अफ़सोस ये कि उनकी मृत्यु की निष्पक्ष जाँच नहीं हो सकी।