National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा (साभार: National Herald/TheDailyStar)
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद पूरे देश में हिंसा फैली, जो आज भी जारी है खासकर हिंदुओं के खिलाफ। फिर शेख हसीना की सरकार गिरने के लगभग 1.5 साल बाद बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में भी हिंसा की कई खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कांग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का मानना है कि ‘भारत को बांग्लादेश से सीखने की जरूरत है।’दरअसल, खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताने वाले सौरभ सेन ने नेशनल हेराल्ड के लिए एक आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल को सौरभ सेन ने स्वीडन के मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज’ के ऑडिट के हवाले से लिखा है, जो दावा कर रहा है कि बांग्लादेश में आम चुनाव 2026 में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और उन दावों को खारिज किया जो बांग्लादेश के विपक्षी दल कहते आ रहे हैं कि चुनाव में धाँधली हुई है।
अगर भारत में हुए प्रथम चुनाव से लेकर चर्चा की जाए कांग्रेस के कार्यकाल में ही सबसे ज्यादा धांधलियां सामने आएँगी। जहाँ हारे हुए कांग्रेस उम्मीदवार को कांग्रेस सुप्रीमो के आदेश पर जीता हुआ घोषित कर दिया जाता था।
कांग्रेस की आवाज बनकर नैरेटिव गढ़ने वाले ‘नेशनल हेराल्ड’ ने राहुल गाँधी के ही स्वर में अपनी बात रखी है। आर्टिकल में भारत के चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए, सरकार पर तंज कसा गया और यहाँ तक कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास न होने का ठीकरा भी सरकार पर ही फोड़ डाला।
नेशनल हेराल्ड के आर्टिकल की हेडलाइन- बांग्लादेश में हुए ‘ऑडिट’ से भारत के लिए सबक, से ही भारत-विरोधी स्वर गूँज रहे हैं। यहाँ लेखक सौरभ सेन दावा करते हैं कि बांग्लादेश तो भारत से कहीं आगे और बेहतर देश है और भारत को उससे कुछ सीखना चाहिए, जबकि हकीकत से इससे कहीं परे है। यहाँ खासतौर से हाल ही में बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 को ‘पारदर्शी’ बताने का दावा कर भारत को सबक लेनी की बात कही जा रही है।
यहाँ नेशनल हेराल्ड उस देश के चुनावों में ‘पारदर्शी’ की बात कर रहा है, जहाँ कई सालों तक सत्ता में रही शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ को ही चुनाव लड़ने से रोका गया। पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनाव पर कई सवाल खड़े हुए, जब चुनावों में हिंसा और हेराफेरी की खबरे सामने आईं।
सच: बांग्लादेश में चुनावी हिंसा और भारत में सख्त नियम
नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में लिखा- भारत का चुनाव आयोग चाहे तो चुनाव और नतीजों की जाँच को और ज्यादा पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद बना सकता है।
जबकि सच क्या है, यह सबके सामने आ चुका है। कैसे बांग्लादेश में चुनावों में हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। कहीं मतदान केंद्र पर बम धमाका हुआ, तो कहीं गोलीबारी हुई, कई मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों की आपसी झड़प में माहौल गरमाया। मानवाधिकार संगठन ओधिकार के अनुसार, 13 फरवरी से 28 फरवरी के बीच 104 हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई और 476 से ज्यादा लोग घायल हुए।
अभी बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में कितने बम पकडे गए, अगर नहीं पकडे जाते मतदान के दौरान क्या होता जनता देखती रही है।
रही पारदर्शी की बात, तो बांग्लादेश चुनावों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी BNP के नेताओं ने ही वोटिंग प्रक्रिया में ‘हेराफेरी‘ के आरोप लगाए। ऐसे ही चुनावों से पहले हवा बनाने वाली जमात-ए-इस्लामी ने भी यही आरोप लगाए।
तो यहाँ भारत को क्या सीखने की जरूरत है? वोटिंग प्रक्रिया में हेराफेरी या मतदाताओं पर हिंसा? क्योंकि हाल ही में बंगाल चुनाव देख लीजिए। पिछले बंगाल चुनाव 2021 में मिली सभी शिकायतों का चुनाव आयोग ने हल ढूँढा। भारत के चुनाव आयोग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। जिस बंगाल में साल 2021 के चुनाव परिणामों के बाद हिंसा फैली, उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने मतदान के दौरान देशभर से आए भारी सुरक्षाबल को तैनात किया।
यानी अगर कोई प्रदेश हिंसा के लिए जाना भी जा रहा है, तो चुनाव आयोग अपनी तरफ से कायदे-कानून बनाने में कमी नहीं कर रहा है। जहाँ नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में बैलट पेपर पर हुए चुनावों की वाहवाही करते नहीं थक रहा है, वहीं भारत में EVM से ‘पारदर्शिता’ के साथ चुनाव संपन्न हो रहे हैं। और अब तो चुनाव आयोग EVM से छेड़छाड़ की घटना पर भी सख्त हो गया है।
तो इससे पता लगता है कि भारत का चुनाव आयोग चाहता नहीं, करके दिखाता है कि कैसे भारत में चुनाव पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद होते हैं।
सच: बांग्लादेश में ‘नाम’ का महिला आरक्षण और भारत में महिला आरक्षण पर सरकार ‘गंभीर’
आर्टिकल में यह भी लिखा गया, “भारत में बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में तेजी से पेश किया। पार्टी को पता था कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, फिर भी उसने ऐसा किया। इसका मकसद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले महिलाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करना था।”
यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।
यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।
ये जो नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में महिलाओं के आरक्षण पर बात करता है, क्या इन्होंने कभी बांग्लादेश में महिालओं के हालात पर मुद्दा उठाया है। बांग्लादेश में महिलाओं की हालत क्या है? यह सबको पता है। आए दिन गैंगरेप की घटनाएँ और मारपीट की घटनाओं से साफ पता लगता है कि बांग्लादेश में महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता है।
खासकर हिंदू महिलाएँ, जो घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें घर में भी सुरक्षित नहीं छोड़ते हैं। महिलाओं को आरक्षण देने वाला बांग्लादेश ही है, जिसे महिला का शक्ति रूप ‘माँ दुर्गा’ की पूजा से दिक्कत है। हर साल दुर्गा पूजा में हिंसा की खबरें सामने आती हैं, कहीं देवी की मूर्ति तोड़ी जाती है, कहीं पत्थरबाजी होती है।
और बांग्लादेश में महिला आरक्षण पर बात करने वाला नेशनल हेराल्ड कांग्रेस की ही आवाज है, जिसने भारत की संसद में महिला आरक्षण कानून का विरोध किया। तो कहना बिल्कुल शोा नहीं देता कि भारत को यह सीखने की जरूरत है कि महिलाओं का कैसे सम्मान करना है?
‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने वाली कांग्रेस को बांग्लादेश से ‘प्रेम’, पर भारत का ‘विरोध’
नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में भारत को बांग्लादेश से जो भी सीख लेने की बात कही, वह सीख अगर भारत ने ले ली तो उसकी भी हालत बांग्लादेश जैसी ही होगी। वही बांग्लादेश, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, विरोध प्रदर्शनों को बल से दबाया जाता है, विपक्षी दलों को प्रतिबंध कर दिया जाता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं।
एक ओर कांग्रेस है, जो संसद में रोजाना लोकतंत्र और संविधान की बात कर लगातार सरकार पर हमलावर रहती है, और दूसरी ओर उसी का मुखपत्र जो लोकतंत्र के नाम पर डूबे हुए बांग्लादेश से भारत को सबक लेने की सीख दे रहा है। असल में कांग्रेस सिर्फ भारत-विरोधी बात करना जानती है, चाहे उसे भारत से कमतर देश से ही क्यों न भारत की तुलना करनी पड़े।
कांग्रेस पार्टी बुद्धीजीवी बनकर अपने समाचार पत्र में महिलाओं के आरक्षम की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो पीछे हट जाती है। इसका ताजा उदाहरण लोकसभा में देखने को मिला, जब सरकार महिला आरक्षण कानून लेकर आई और कांग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया।
कांग्रेस को नहीं बोलना चाहिए कि भारत को क्या और किससे सीखने की जरूरत है। ये वही लोग हैं जो वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन बैलेट पेपर की निष्पक्षता उन्हें अच्छी लगती है। ये वही लोग हैं, जो भारत के हित में एक बात कहने में हिचकते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की वाहवाही करते नहीं थकते।