आत्मघाती इतिहास और वर्तमान का धैर्य क्यों बंधे हैं मोदी-शाह के हाथ? क्योकि हिन्दुओं से कही ज्यादा समझदार मुसलमान है जो बीजेपी को हराने एकजुट वोट देता है लेकिन हिन्दू आरक्षण और सेकुलरिज्म के नशे में जातिगत सियासत में डूबा रहता है

इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन विडंबना देखिए कि हम इतिहास से सीखने के बजाय बार-बार वही गलतियां दोहराने में गर्व महसूस करते हैं। आज जो लोग सोशल मीडिया पर बैठकर पूछते हैं कि "मोदी-शाह कड़ा फैसला क्यों नहीं लेते?" उन्हें एक बार 1992 और 2004 के आईने में अपनी तस्वीर देख लेनी चाहिए।
जिस दिन मोदी ने कड़े फैसले लेने शुरू कर दिए, कोई यह सोंचकर मोदी सरकार को वापस लाने की बात नहीं करेगा कि इसने देश को कहां से कहां पहुंचा दिया, आतंकवाद और इसके समर्थकों को नेस्ताबूत किया जा रहा है, किस तरह तीन तलाक और हलाला के नाम मुस्लिम महिलाओं का शोषण किया जा रहा था, किस तरह जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का दुरुपयोग हो रहा था, कल तक जो अनाज गोदामों में सड़ता था और किसी काम का नहीं रहता था उसे BPL के नाम पर उपयोग किया जा रहा है, किस तरह सनातन को धूमिल किया जा रहा था आदि आदि एक लम्बी सूची है मुस्लिम महिलाएं तो क्या हिन्दू भी भूल कर विरोधियों को वोट देने में देर नहीं करेगा।
कल्याण सिंह: शौर्य का वह उपहार, जिसे 'अपनों' ने ठुकराया
1992 में अयोध्या में कलंक का ढांचा गिरा, तो कल्याण सिंह ने एक क्षण की भी परवाह किए बिना अपनी सत्ता का बलिदान दे दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि "राम मंदिर के लिए एक नहीं, सौ सरकारें कुर्बान।" लेकिन इसके बाद क्या हुआ? जिन कारसेवकों पर मुलायम सिंह ने गोलियां चलवाई थीं, उन्हीं को हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से ने 'जाति' के नाम पर वोट देकर सत्ता की दहलीज पार करा दी। यह वही दौर था जब "मिले मुलायम-कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम" के नारों ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान की कमर तोड़ दी थी।
अटल बिहारी वाजपेयी: विकास को 'व्यक्तिगत लालच' की भेंट चढ़ाया
2004 का चुनाव भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा 'धोखा' था। अटल जी ने देश को सड़कों का जाल दिया, परमाणु शक्ति बनाया और अर्थव्यवस्था को गति दी। लेकिन जनता ने क्या दिया? छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों और विपक्षी 'गठबंधन' के भ्रमजाल में फंसकर एक तपस्वी को सत्ता से बाहर कर दिया। परिणाम? 10 साल का वह रिमोट कंट्रोल शासन, जिसने देश को भ्रष्टाचार और आतंकवाद के गहरे गर्त में धकेल दिया। बारूद के ढेर पर बैठे भारत में इस्लामिक आतंकियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु/संत और साध्वियों को जेल में डाल भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद के नाम पर हिन्दुओं को बदनाम किया जा रहा था। और हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में धुत होकर झूठ को सच मान रहा था।
लालबहादुर शास्त्री :
लालबहादुर शास्त्री की अकाल मृत्यु का असली कारण था 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान देश में छुपे गद्दारों पर कार्यवाही। आज कितने नेता शास्त्री जी का नाम लेते हैं? इस बौने प्रधानमंत्री ने अपने साहसिक कार्यों से नेहरू के 18 सालों को अपने अल्प 18 महीने के कार्यकाल से दाब दिया था। अगर शास्त्री जी के काम उजागर किये जाएं तो देश स्तब्ध रह जाएगा की ऐसा था हमारा "बौना" प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री।
आज मोदी और शाह के सामने दुश्मन केवल बाहर नहीं, बल्कि भीतर की 'जातिवादी दीवारों' के रूप में खड़ा है।
खालिस्तानी और वामपंथी संगठन: ये संगठन जानते हैं कि वे सीधे तौर पर मोदी सरकार से नहीं लड़ सकते। इसलिए वे क्या करते हैं? वे 'किसान', 'दलित' या 'पिछड़ा' कार्ड खेलते हैं।
हिंदुओं की कमजोरी: दुर्भाग्य यह है कि जब भी राष्ट्रवाद की बात आती है, विपक्ष एक ऐसी 'जातिगत ढाल' आगे कर देता है जहाँ हिंदू बिखर जाता है। जैसे ही हिंदू अपनी 'जाति' में सिमटता है, मोदी और शाह की वह ताकत आधी हो जाती है जो 'तांडव' करने की क्षमता रखती है
2026 का सच: मलाई बनाम राष्ट्रवाद
आज 2026 में भी स्थिति वही है। दशकों तक जिन्होंने सिस्टम की मलाई खाई, जिनके लिए भ्रष्टाचार ही ऑक्सीजन था, उन्हें आज सूखी हड्डी भी नसीब नहीं हो रही। इसीलिए ये 'बलवा' का रास्ता चुन रहे हैं। कभी डकैत संगठनों के नाम पर, कभी विदेशी फंडिंग के दम पर अराजकता फैलाई जा रही है। मोदी-शाह का धैर्य उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी 'मजबूरी' है, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने कड़ा कदम उठाया, तो उनका अपना ही 'हिंदू भाई' किसी अफवाह या जातिगत राजनीति के कारण फिर से 2004 न दोहरा दे।
2014 चुनाव के बाद जिस बात को मुसलमान, मुस्लिम कट्टरपंथी और इनको समर्थक देने वाली पार्टियां समझ गयी कि बीजेपी को हराना है तो एकजुट होकर वोट दो। लेकिन हिन्दू आरक्षण और जातिगत सियासत से बाहर नहीं आ पाया। अगर हिन्दू आरक्षण और जातिगत सियासत से बाहर आ गया होता जातियों पर आधारित चाहे वह सत्ता में हैं या विपक्ष में कभी इन पार्टियों को वोट नहीं देता। रामायण को फाड़ने की और सनातन को कलंकित करने की किसी की हिम्मत नहीं होती।
जब तक हिंदू 'वोटर' रहेगा, 'नागरिक' नहीं बनेगा...जब तक हिंदू खुद को 'ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, जाट या दलित' के खांचे में रखकर देखेगा, तब तक देश के दुश्मनों को ऑक्सीजन मिलती रहेगी। मोदी-शाह को 'फ्री हैंड' कानून नहीं देता, बल्कि जनता की अटूट एकजुटता देती है।
अगर हम चाहते हैं कि देशद्रोहियों के खिलाफ 'तांडव' हो, तो पहले हमें अपनी 'जातिवादी ढालों' को तोड़कर एक मजबूत सनातनी दीवार बनना होगा। वरना इतिहास फिर से वही लिखेगा—कि नायक लड़ते रहे, और हम स्वार्थ में अपनों को ही धोखा देते रहे। मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिशर्स अपने साथ फौज नहीं लेकर आए थे उनको मालूम था भारत में थोक के भाव में बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र मिल जाएंगे।

बंगाल के प्रथम चरण के चुनाव के लिए चुनाव आयोग, सुरक्षाबल, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट बधाई के पात्र हैं

सुभाष चन्द्र

बंगाल में प्रथम चरण के चुनाव में रिकॉर्ड 92.88 % छुटपुट घटनाओं को छोड़ कर शांतिपूर्ण मतदान के लिए चुनाव आयोग (खासकर ज्ञानेश कुमार जी), सुरक्षा बल और केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट बधाई के पात्र हैं। 

वास्तव में तत्कालीन चुनाव आयुक्त TN Seshan ने जो गति चुनाव आयोग को दी उसे वर्तमान आयुक्त ने कहीं आगे बढ़ा दिया। शेषन से ज्यादा विरोध ज्ञानेश का हुआ। लेकिन अपनी सीमाओं में रहते हर काम को बखूबी निभा रहे हैं।  

चुनाव आयोग ने जिस तरह SIR का काम संभाला और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आयोग को पूरा समर्थन मिला उसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है चुनाव में आयोग ने केंद्र सरकार से जितने भी सुरक्षा बल मांगे शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए वे उसे मिले 

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केंद्र सरकार ने पैरामिलिट्री संगठनों को मिला कर एक अलग संगठन बनाया Central Armed Police Forces (CAPF) और इसमें शामिल BSF, CRPF, SSB, ITBP और CISF के प्रमुखों ने कोलकाता में बैठ कर सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा की

CAPF की 2500 कंपनियां तैनात की गई और एक कंपनी में 100 से 110 सुरक्षाकर्मी होते हैं, मतलब कुल मिलाकर 2.5 लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई शायद इसलिए ही 92.88% रिकॉर्ड मतदान हुआ जो पिछले चुनाव के 82.30% से 10% ज्यादा है इसका श्रेय आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सुरक्षाबलों, मोदी सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट को भी जाता है 

सुरक्षाबलों की वजह से मतदाता भयमुक्त होकर मतदान कर सके

अभी दूसरे चरण का चुनाव होना शेष है लेकिन पिछले चुनावों से तुलना की जाए तो हम देखते हैं ममता को 2016 के मुकाबले 2021 में मात्र 3.11% वोट ज्यादा मिले थे (यानी 48.02%) और सीट बढ़ी थी केवल 4 दूसरी तरफ भाजपा को 2016 के मुकाबले 2021 में 28% वोट ज्यादा मिले थे (यानी 38.15%) लेकिन सीट बढ़ी थी 74 (3 से 77 हो गई)

2011 में 84.33% मतदान भी रिकॉर्ड था और ममता CPM को हटा कर सत्ता में आई थी अब रिकॉर्ड मतदान के बाद भाजपा भी ममता को सत्ता से हटा कर सत्ता में आ सकती है

अगर दूसरे चरण में भी यही स्थिति रहती है और भाजपा के वोट 38% से 6-7% भी बढ़ गए तो सत्ता की चाबी उसके हाथ में होगी एक फैक्टर और नज़र आया है कि हुमायूँ कबीर का जिस तरह टकराव हुआ है TMC के साथ, उसे देख कर लगता है मुस्लिम वोट निश्चित रूप से बंटा है, जबकि हिंदू वोट एकजुट हुआ है SIR में 91 लाख वोट कटने से ममता का वोट गिरना तय है लेकिन कितना गिरेगा यह समय ही बताएगा 

चुनाव आयोग के काम में कोलकाता हाई कोर्ट की तरफ से वोटिंग के एक दिन पहले अड़ंगा लगाया गया जब कोर्ट ने आयोग द्वारा चुनाव में गड़बड़ी फ़ैलाने वाले 800 संदिघ्द लोगो के लिए आदेश पर रोक लगा दी और सुनवाई की तारीख 30 जून तक के लिए उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी उससे क्या फर्क पड़ना था जब भारी सुरक्षाबल तैनात हैं 30 जून का क्या मतलब है जब चुनाव 29 अप्रैल को संपन्न हो जाना है

कुल मिलाकर अनुमान यही लगाया जा सकता है बंगाल से ममता की विदाई तय है 

पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाई कोर्ट से बड़ा झटका, अंतरिम जमानत याचिका खारिज


सुप्रीम कोर्ट के बाद अब कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाई कोर्ट से भी बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट ने खेड़ा की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है।

दरअसल, पवन खेड़ा ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रिंकी सरमा पर कई पासपोर्ट रखने और विदेश में संपत्तियाँ होने के आरोप लगाए थे। इसके बाद रिंकी सरमा ने उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कराया।

मामले की सुनवाई के दौरान खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह ज्यादा से ज्यादा मानहानि का मामला है और उनके मुवक्किल के फरार होने की कोई आशंका नहीं है, इसलिए गिरफ्तारी से राहत दी जानी चाहिए। वहीं, असम सरकार की तरफ से महाधिवक्ता देवजीत सैकिया ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मामला गंभीर है और इसमें जालसाजी जैसे आरोप शामिल हैं।

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गिरफ़्तारी से बचने हैदराबाद भागा पवन खेड़ा: असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा, कांग्रेस नेता
गिरफ़्तारी से बचने हैदराबाद भागा पवन खेड़ा: असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा, कांग्रेस नेता
 

करीब तीन घंटे चली बहस के बाद जस्टिस पार्थिव ज्योति सैकिया की एकल पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे अब सुनाते हुए कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद पवन खेड़ा की गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गई है।

‘लाहौर में कंपनी खोल ले, भारत में काहे को मर रहा है’: बाबा बागेश्वर ने लेंसकार्ट को सुनाई खरी-खरी


आईवियर कंपनी लेंसकार्ट में कर्मियों को कलावा और तिलक ना लगाने देने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने लेंसकार्ट के मालिक पर जमकर भड़ास निकाली है और कंपनी को भारत छोड़कर पाकिस्तान के लाहौर जाने की सलाह दी है। प्रयागराज में कार्यक्रम के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शात्री ने यह टिप्पणी की है।

उन्होंने कहा, “एक कंपनी है उसका नाम लेंसकार्ट है, उसने अपने वर्करों को बोला है कि हमारे यहाँ कोई तिलक लगा के नहीं आ सकता, मंगलसूत्र पहन के नहीं आ सकता, सिंदूर लगा के नहीं आ सकता। तू अपनी कंपनी लाहौर में खोल ले, भारत में काहे को मर रहा है। तेरे कक्का का भारत है क्या, हमारे तो बाप का भारत है।”

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Lenskart controversy : CEO की पत्नी निधि मित्तल बंसल ने बंद किया अपना X अकाउंट; ये कालनेमि हिन्दू मुस्लिम कट्टरप

बाबा बागेश्वर ने कहा कि जिनको तिलक-चंदन-राम-हनुमान से दिक्कत है वो पतली गली पकड़ कर लाहौर निकल ले। उन्होंने कहा, “लेंसकार्ट वालों से कहेंगे कि बेटा गड़बड़ हो गए हो तुम, अभी भी मौका है सुधर जाओ, वरना भारत का कानून सुधार भी देता है और यूपी की पुलिस तो वैसे भी फेमस है।”

जो ममता ने IPAC में किया, वो कोई आम आदमी करता तो अभी तक जेल में होता; इसलिए “कानून सबके लिए समान है” ये एक मज़ाक है

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 22 को स्पष्ट कहा है कि ED की जांच में कोई मुख्यमंत्री बाधा नहीं डाल सकता और इसका मतलब साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट के विचार में ममता बनर्जी ने ED के काम में बाधा डाली

हंसी आती है उन वरिष्ठ पत्रकारों पर जो टीवी पर बैठ ममता को बहुत मजबूत नेत्री कहते हैं। ममता नेत्री नहीं बल्कि किसी मवाली से कम नहीं। महिला होकर उन गालियों को देती है जो गली-कूचे में गुंडे देते हैं। अभी तीन/चार पहले ही प्रधानमंत्री मोदी के लिए किन आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, जो साबित करता है कि ममता कोई नेत्री नहीं मवाली है। वैसे पहले भी अभद्र(मर्द गुप्तांग) भाषा का इस्तेमाल कर चुकी है। हैरानी होती है ऐसी मवाली आदत की नेत्री को वोट देने वालों पर। क्या वह भी इसी बिरादरी से आते हैं?       

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अगर ऐसा किसी आम आदमी ने किया होता तो ED स्वयं ही उसे गिरफ्तार कर लेती और वह अभी जेल में होता इसलिए यह कहना कि “कानून सबसे के लिए समान है” एक मज़ाक ही प्रतीत होता है। 

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा कि “यह एक असाधारण मामला है; यह केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों में बाधा डालने से संबंधित है; जब कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है, तो इसे केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं कहा जा सकता; यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य है, जो संयोगवश मुख्यमंत्री भी है, जिसने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को ही खतरे में डाल दिया; कभी ऐसी कल्पना नहीं की गई थी कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री वहां पहुंच जाए”

पुलिस अधिकारियों की वकील मेनका गुरुस्वामी ने तो ED के आर्टिकल 32 में याचिका को भी गलत ठहरा दिया और कहा कि मामला केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद है तब जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा कि इसमें राज्य का कौन सा अधिकार शामिल है, किसी राज्य का मुख्यमंत्री चल रही जांच में आकर लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकता इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जा सकता 

पता नहीं कहां सही है लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि मेनका गुरु स्वामी ने कोर्ट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट “महारानी” के काम पर टिप्पणी नहीं कर सकता और इस पर एक जज ने पूछा “कौन है रानी” 

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‘मुझे झाँ* फर्क नहीं पड़ता’: ममता बनर्जी ने मोदी के लिए किया अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल; और कितनी
‘मुझे झाँ* फर्क नहीं पड़ता’: ममता बनर्जी ने मोदी के लिए किया अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल; और कितनी
 

सुप्रीम कोर्ट का कहना कि मुख्यमंत्री ने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया 

अब यह तो सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं माना है कि ममता ने ED की जांच में बाधा डाली ममता ने खुद माना था कि वह वहां पार्टी अध्यक्ष के नाते गई थी जो फाइल और अन्य दस्तावेज़ वह वहां से जबरन ले गई थी वे भी अभी तक ED को नहीं लौटाए है सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में ममता का अपराध सिद्ध हो गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट सख्त टिप्पणियां तो कर रहा है लेकिन उसके लिए सजा का ऐलान नहीं कर रहा वह सजा का मामला कहीं ट्रायल कोर्ट के पास न भेज दिया जाए 

सरकारी काम में बाधा डालने के लिए सजा के प्रावधान हैं -

-Whoever voluntarily obstructs any public servant in the discharge of their public functions can be punished with:

Imprisonment of either description (simple or rigorous) for a term that may extend to three months, OR

Fine that may extend to five hundred rupees (increased to ₹2500 under BNS 221), OR

Both

If the interference involves more than simple obstruction, heavier penalties apply: 

Assault or Criminal Force to Deter Duty (IPC 353): If a person assaults or uses criminal force to prevent an official from doing their job, the sentence can be up to 2 years imprisonment, a fine, or both.

ममता का अपराध use of criminal force की श्रेणी में आता है

हो सकता है सुप्रीम कोर्ट भी 4 मई के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहा हो अगर ममता हार गई तो मामला तुरंत निपटा दिया जाएगा

आज देश को चाहिए कर्पूरी ठाकुर और लालबहादुर शास्त्री जैसे नेता


आज चने चबाते निगम पार्षद/विधायक या फिर सांसद बनते हैं लेकिन कुछ ही महीनों बाद तिजोरियां भरने शुरू हो जाती और हम मूर्ख जनता गरीबों का मसीहा बता गलियाने लगते हैं। लेकिन इसी देश में ऐसे भी नेता हुए जो राजनीति में उच्च पद पर रहते हुए भी अपने बच्चों को देकर गए कर्जा। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंत में अकस्मात् मृत्यु पर उन्हीं की पार्टी ने भ्रष्टाचारी होने का आरोप लगाया था और जब जाँच हुई तो बैंक खाते में लगभग 365 रूपए और कार खरीदने पर पंजाब नेशनल बैंक से लिया लोन। उसी तरह जननायक कर्पूरी ठाकुर हुए।   
जब जननायक कर्पूरी ठाकुर का निधन हुआ, तो दिल्ली से लेकर पटना तक के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। लोग हैरान थे कि दो बार मुख्यमंत्री और सालों तक विधायक रहा शख्स आखिर अपने पीछे क्या छोड़ गया होगा?
अगले दिन जब उनके पैतृक गांव की सुध ली गई, तो जो दिखा उसने पूरी दुनिया की आंखों में आंसू ला दिए।
वहां कोई आलीशान कोठी नहीं थी। कोई स्विमिंग पूल या मार्बल के फर्श नहीं थे। मिट्टी की दीवारों और कच्ची खपरैल वाली एक पुरानी झोपड़ी खड़ी थी, जिसकी दीवारें गरीबी की गवाही दे रही थीं।
हैरानी की बात जानते हैं क्या है?
जब वो मुख्यमंत्री थे, तो उनका एक कुर्ता कंधे से फटा हुआ था। युगोस्लाविया के दौरे पर विदेशी नेताओं ने जब भारत के एक मुख्यमंत्री के फटे कपड़े देखे, तो दंग रह गए। वहां के मार्शल टीटो ने उन्हें सम्मान में एक नया कोट गिफ्ट किया।
लेकिन असली 'तमाशा' तो भारत लौटकर हुआ। कर्पूरी ठाकुर ने उस कीमती कोट को अलमारी में रखने के बजाय सरकारी खजाने में जमा करा दिया। बोले— "यह तोहफा मुझे नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री को मिला है, और इस पर जनता का हक है।"
जब उनकी बेटी की शादी हुई, तो लोगों को लगा कि अब तो सरकारी तामझाम दिखेगा। लेकिन उस 'फकीर' मुख्यमंत्री ने अपनी बहन की शादी के लिए बैंक से एक आम आदमी की तरह लोन मांगा। किसी की सिफारिश नहीं ली, किसी उद्योगपति का अहसान नहीं लिया।
उनकी कुल जमापूंजी क्या थी?
* फटे हुए पुराने कुर्ते।
* एक टूटी हुई खाट।
* और करोड़ों गरीबों की दुआएं।
जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी उनके गांव पहुंचे, तो उस टूटी झोपड़ी को देखकर उनके मुंह से निकला था— "क्या इतने बड़े नेता का घर ऐसा होता है?"
आज हम छोटी सी नौकरी पाकर रुतबा दिखाने लगते हैं, एक सफेद कुर्ता पहनकर खुद को भगवान समझने लगते हैं। लेकिन उस शख्स ने सत्ता के शिखर पर बैठकर भी 'फकीरी' नहीं छोड़ी।
कर्पूरी ठाकुर ने सिखाया कि "राजनीति मेवा खाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के आखिरी आदमी की सेवा के लिए होती है।"
आज के दौर में जहाँ भ्रष्टाचार और घमंड की राजनीति चलती है, वहां कर्पूरी ठाकुर का जीवन एक आईना है। हाल ही में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' देकर इस सादगी को सलाम किया है।
इस 'जननायक' की ईमानदारी के सम्मान में एक 'नमन' तो बनता है।

इसे इतना शेयर करो कि आज के नेताओं और घमंड में चूर लोगों को पता चले कि असली 'अमीरी' बैंक बैलेंस में नहीं, किरदार में होती है। 

जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध


भारत में हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बाद 500 साल मुगलों ने.. 200 साल अंग्रेजों ने और 70 साल कांग्रेस ने शासन किया फिर 770 साल दलितों का शोषण सवर्णों ने कैसे किया? हमारे देश में ऐसा नेता है जो महाज्ञानी रावण को बदनाम कर रहा है जिसके पीछे चन्द्रशेखर "रावण" लगता है। रावण एक ऐसा महाज्ञानी पंडित था जिसने माता सीता को छुआ तक नहीं और एक ये कलयुग का "रावण" है जिसने एक दलित बेटी का बार बार शोषण किया है। आज ये जिस प्रकार दलितों को बली का बकरा बना कर शांति दूतों से क*ट*वा रहा है। और एक शब्द तक नहीं बोलता क्योंकि कहीं इसके वोट बैंक को बुरा न लग जाए। 
भारत में जब मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिश आये थे अपने साथ कोई फौज नहीं लेकर आए थे क्योकि उनको मालूम था कि भारत में बिकाऊ जयचन्दों और मीर ज़ाफरों की कोई कमी नहीं। एक ठूंठोंगे हज़ार मिल जाएंगे। वही भूमिका हमारे कुछ सांसद और पार्टियां निभा रही है। जो देश को जाति और मजहब के नाम पर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। किसी में यह कहने की हिम्मत नहीं कि सभी भारतीय हैं और सबको समान अधिकार मिलने चाहिएं। 

दूसरे, आंबेडकर की माला जपने वाले देश को बताएं कि क्या आंबेडकर ने आरक्षण मांगने पर इसके दुरूपयोग होते देख ख़त्म करने के लिए नहीं बोला था? फिर उसी आरक्षण पर इतना बवाल क्यों? इसमें दोषी जनता भी है जो जाति आधारित पार्टियों को वोट देती है। इतना ही नहीं जितनी भी पार्टियां है सभी इस जहर को परोस रही हैं। देश में ऐसी कौन-सी पार्टी है जिसने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ नही बनाया हुआ। किसी भी पार्टी में इन प्रकोष्ठों को बंद करने की हिम्मत नहीं। जब हमाम में सभी नंगे है फिर एक-दूसरी पार्टी पर दोषारोपण क्यों? फिर कहते हैं कि हम भारतीय हैं। जब सभी भारतीय हैं तो इन प्रकोष्ठों की नौटंकी क्यों? आखिर इस नौटंकी की कब राम नाम सत्य होगी।        

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।

उन्होंने कहा कि आरक्षण इन लोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।  

नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एक मात्र व्यवहार्य समाधान है।”

दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।

संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”

1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधान सभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।

इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।

अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।

संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

साभार- संविधान सभा की बहसें (खंड 8) (स्रोत: constitutionofindia.net)

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।

पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए

पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।
भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।

गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद

महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना ​​था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।
उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।

पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान

24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।
दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।
अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।
हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।
भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।
हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।
समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।
बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान का हिस्सा: क्या यह स्थायी है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

              इजरायली फौज द्वारा बनाई गई येलो लाइन, बेंजामिन नेतान्याहू (साभार: X_IDF/AI ChatGPT)
पूरी दुनिया जब अप्रैल 2026 के बीच में इजरायल-लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम पर नजर टिकाए हुए थी, तभी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक नई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) या ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ बना दी। इजरायली रक्षा बल (IDF) ने खुद एक नक्शा जारी कर बताया कि दक्षिणी लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर गहरी यह सैन्य जोन अब उनके नियंत्रण में है। पाँच डिवीजनों की ताकत के साथ इजरायली सैनिक इस लाइन के दक्षिण में तैनात हैं।

आईडीएफ ने कहा है कि उसके सैनिक हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करने और उत्तरी इजरायल पर हमले रोकने के लिए मैदान में डटे हैं। हालाँकि लेबनान और हिजबुल्लाह इसे संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा बताते हुए इस कदम का विरोध किया है। एक तरफ अभी युद्धविराम की स्याही सूखी भी नहीं है कि दूसरी तरफ इजरायली बुलडोजर दक्षिणी लेबनान के भीतर बसे गाँवों में घरों को तोड़ रहे थे, तोपें चल रहे थे और हवाई हमले हो रहे थे। हालाँकि अभी युद्धविराम लागू है, लेकिन छिटपुट हमले दोनों तरफ से हो रहे हैं।

लेबनान के दक्षिणी हिस्सा में घट रही यह घटना महज एक स्थानीय तनाव नहीं है। यह मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक नक्शे में एक नया अध्याय जोड़ रही है। इजरायल ने पहले भी लेबनान पर कब्जा किया था, जिसमें 1982 से 2000 तक 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर कब्जा रखा था। तब भी उसने लिटानी नदी तक पहुँचने का सपना देखा था और आज फिर वही रणनीति इजरायल की तरफ से दोहराई जा रही है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या इजरायल का यह कब्जा स्थायी होगा? या उसका ये कदम अमेरिका-ईरान वार्ता में सौदेबाजी का हथियार बनेगा। 

येलो लाइन का जन्म और युद्धविराम का मजाक

मध्य पूर्व में एक बार फिर सीमाओं की लकीरें स्याही से नहीं, बल्कि टैंकों के टायरों और सैन्य चौकियों से खींची जा रही हैं। इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में बनाई गई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य घेराबंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जो दशकों पुराने विवादों को नया रंग दे रही है।

दरअसल, अमेरिका की मध्यस्थता में 16 अप्रैल 2026 को इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का युद्धविराम शुरू हुआ है। करीब 46 दिन के इजरायली हमलों और जमीनी ऑपरेशन के बाद यह समझौता हुआ। लेकिन कुछ घंटों में ही IDF ने दक्षिणी लेबनान में ‘येलो लाइन’ की घोषणा कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा, “हम लेबनान में 10 किलोमीटर गहरी मजबूत सुरक्षा पट्टी में रहेंगे। यह पहले से कहीं ज्यादा ठोस, निरंतर और मजबूत है। हम यहाँ से नहीं जाएँगे।”

IDF के बयान में कहा गया कि लाइन के दक्षिण में पाँच डिवीजनों के सैनिक हिजबुल्लाह के आतंकी ढाँचे को तोड़ रहे हैं। जिसकी वजह से 55 लेबनानी गाँवों और कस्बों में निवासियों को वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई।

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम शुरू होते ही इजरायली सेना ने हनीन गाँव में घर उड़ाए, बेत लिफ, अल-कांतारा और तौल पर तोपें दागीं। बुलडोजर से जमीन साफ की जा रही है। गाजा में इसी येलो लाइन मॉडल का इस्तेमाल हो रहा है, जहाँ का 60 प्रतिशत इलाका इजरायली नियंत्रण में है और सैकड़ों घर ध्वस्त किए गए। अब लेबनान में भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।

 हिजबुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने कहा, “युद्धविराम एकतरफा नहीं हो सकता। अगर इजरायल उल्लंघन करेगा तो हम जवाब देंगे। हमारे लड़ाके मैदान में हैं, ट्रिगर पर उँगली रखे हुए।” हिजबुल्लाह इसे देश का अपमान मान रहा है और पूर्ण वापसी की माँग कर रहा है।

इजरायल ने कब कब बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा?

इजरायल का विस्तारवाद नया नहीं है। साल 1918 में डेविड बेन-गुरियन और यित्जाक बेन-ज्वी ने ‘एरेट्स यिसराइल’ किताब में लिखा कि यहूदियों का देश लिटानी नदी तक फैला होना चाहिए। इसके बाद 1919 में वर्ल्ड जियोनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ने पेरिस शांति सम्मेलन में लिटानी नदी को उत्तरी सीमा बताते हुए नक्शा पेश किया गया।

इजरायल की आजादी के बाद साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के 15 गाँवों पर कब्जा कर लिया। हालाँकि बाद में साल 1949 में आर्मिस्टिस समझौते के तहत इसमें से सात गाँवों को इजरायल को सौंप दिए गए।

इसके बाद साल 1978 में ऑपरेशन लिटानी के तहत इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वो साल 1982 में ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली में बेरूत तक पहुँच गए। और फिर करीब 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा बना रहा। हालाँकि साल 2000 में यूनिफिल और हिजबुल्लाह के दबाव में इजरायल ने वहाँ से वापसी की, लेकिन शेबा फार्म्स पर कब्जा आज भी जारी है।

वहीं साल 1967 के छह दिन युद्ध में गोलान हाइट्स (सीरिया) पर कब्जा कर लिया, जिसे साल 1981 में इजरायल ने अपने आप में मिला लिया। यही नहीं, वेस्ट बैंक और गाजा पर उसका साल 1967 से ही कब्जा है। और अब 2026 में लेबनान में फिर वही पैटर्न दिख रहा है, जिसमें पहले सुरक्षा जोन, फिर स्थायी नियंत्रण।

इजरायल का तर्क हमेशा ‘सुरक्षा’ रहा है। लेकिन आलोचक इसे ‘ग्रेटर इजरायल’ का हिस्सा मानते हैं, जिसमें लिटानी नदी, गोलान और वेस्ट बैंक शामिल हैं। अभी 2026 के जमीनी ऑपरेशन में इजरायल ने पहले ही दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में बफर जोन बना लिया था। जिसे अब येलो लाइन संस्थागत रूप दे रही है।

क्या यह स्थाई कब्जा है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कब्जा अस्थायी नहीं होगा। चूँकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साफ कह चुके हैं कि इजरायली सेना ‘क्लियर और सिक्योर’ पोजीशंस को छोड़ने वाली नहीं है। इसके साथ ही गाजा मॉडल की तरह लेबनान में भी सफाई अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।

हालाँकि दक्षिणी लेबनान का यह इलाका (जिस पर अभी इजरायली सेना मौजूद) भविष्य की बातचीत (ईरान या लेबनान के साथ) में ‘लीवरेज’ (दबाव का हथियार) बन सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

दरअसल, इस इलाके का और खासकर हिज्बुल्लाह का ईरान से जुड़ाव और गहरा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका-ईरान वार्ता का पूर्व शर्त है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में ईरान ने कहा कि जब तक इजरायल लेबनान से नहीं हटेगा, कोई समझौता नहीं होगा। ईरान के इस स्टैंड के बाद ही इजरायल-लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, लेकिन अब जब ईरान बातचीत की टेबल पर आएगा तो उसके बाद सिर्फ हॉर्मूज ही नहीं दक्षिणी लेबनान का हिस्सा भी जोर-आजमाइश के लिए मौजूद रहेगा।

इस बीच, हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल नहीं हटा तो वे जवाब देंगे। लेबनानी सेना और सरकार भी संप्रभुता की बात कर रही है। यूएनएफआईएल (UNIFIL) पहले से ही रेजोल्यूशन 1701 का हवाला दे रही है, जिसमें इजरायल को ब्लू लाइन के दक्षिण में रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलेगी या मिलेगी हमेशा की तरह निंदा?

इतिहास गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के कब्जों को कभी मान्यता नहीं दी है। गोलान हाइट्स पर 1981 के एनेक्सेशन को यूएन ने अवैध घोषित किया। वेस्ट बैंक पर बस्तियों को भी वो अवैध कहता है। लेबनान भी रेजोल्यूशन 1701 (2006) के तहत इजरायल से पूर्ण वापसी की माँग करता रहा है। तो यूएन एक्सपर्ट्स ने इजरायल के बमबारी को ‘एथनिक क्लिंजिंग’ और ‘डोमिसाइड’ (घरों का विनाश) बताया है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यूएन की ताकत बहुत सीमित है। यूएन में इजरायल के लिए उठ रही किसी भी समस्या पर अमेरिका तुरंत वीटो कर देता है। ऐसे में साल 2026 में भी यूएन सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव तो आ सकते हैं, लेकिन कुछ भी लागू होना मुश्किल है। हालाँकि फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों ने ‘येलो लाइन’ की निंदा की है, लेकिन इजरायल ‘आत्मरक्षा’ का हवाला देकर कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में अगर यूएन कोई निंदा प्रस्ताव लाता भी है, तो भी इजरायल पर कोई खास फर्क पड़ेगा, ये अभी तो नहीं देखा जा रहा।

भविष्य में होगी शांति या खुलेगा वॉर का नया फ्रंट?

अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान की बातचीत सफल हुई तो लेबनान से इजरायली वापसी हो सकती है। हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल न सिर्फ लेबनान बल्कि सीरिया में भी क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति अपना रहा है। क्योंकि भविष्य की किसी भी बातचीत में यह जमीन ‘लीवरेज’ बनेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जबरन कब्जा भी ज्यादा समय तक टिकता नहीं है।

चूँकि इजरायल पहले भी 18 साल के कब्जे के बाद साल 2000 में दक्षिणी लेबनान से हटा था, ऐसे में किसी समझौते और स्थाई सुरक्षा गारंटी के नाम पर वो फिर से अपने कदम वापस खींच भी सकता है। बशर्ते उस पर अमेरिकी दबाव बना रहे।

क्या हो सकती हैं संभावनाएँ?

फिलहाल, इस मामले में अभी दो ही संभावित रास्ते दिखते हैं-

रास्ता A (बड़ा समझौता): अगर अमेरिका ईरान को कुछ बड़ी आर्थिक राहत देता है और बदले में ईरान हिजबुल्लाह को सीमा से पीछे हटने के लिए मना लेता है, तो एक ‘अस्थाई डील’ हो सकती है। इसमें ‘येलो लाइन’ को हटाकर वहाँ लेबनानी सेना या एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय फोर्स को तैनात किया जा सकता है।

रास्ता B (लंबा संघर्ष): यह ज्यादा संभव लग रहा है। इजरायल जिस तरह से 55 गाँवों को खाली कराकर वहाँ बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रहा है, उससे लगता है कि वह वहाँ ‘स्थाई सुरक्षा चौकियाँ’ बनाना चाहता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर गुरिल्ला वॉर शुरू करेगा, जिससे यह संघर्ष महीनों या सालों तक खिंच सकता है।

लेबनान में इजरायल की सैन्य उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी सीमाएँ अब सिर्फ कागज पर रह गई हैं। यह कब्जा न केवल लेबनान की भौगोलिक स्थिति को बदल रहा है, बल्कि यह ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले ‘ग्रैंड बार्गेन’ का भविष्य भी तय करेगा।

बहरहाल, दशकों से युद्ध का मैदान बन चुका मिडिल ईस्ट अब भी दहक रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर यह ‘ग्रेटर इजरायल’ vs ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (ईरान-हिजबुल्लाह-हमास) की जंग है। इन सबके बीच हकीकत यही है कि मिडिल ईस्ट का नक्शा सचमुच बदल रहा है। ऐसे में इजरायल का यह ताजा विस्तार स्थाई होता है या अस्थाई, ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि इसका फौरी जवाब किसी के पास नहीं है। चूँकि अब पूरा मामला सौदेबाजी, समय और कूटनीतिक चालों में उलझ चुका है, ऐसे में इस समस्या को लेकर आगे क्या बदलाव आते हैं, इस पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।