ISI से लिंक, सेना मुख्यालय से लेकर सरकारी दफ्तरों में आना-जाना: मेरठ में अम्मी-बेटी निकली PAK की नागरिक, 30 सालों से फर्जी आधार कार्ड-पासपोर्ट के जरिए भारत में रह रहीं

पाकिस्तानी नागरिक अम्मी-बेटी के खिलाफ जाली भारतीय दस्तावेज और अवैध निवास के आरोप में FIR दर्ज (साभार: Dall-E/X)
उत्तर प्रदेश की मेरठ पुलिस ने 14 फरवरी 2026 को एक अम्मी और उसकी बेटी के खिलाफ केस दर्ज किया। आरोप है कि ये दोनों करीब 30 साल से भारत में रह रही थीं, जबकि वे पाकिस्तानी नागरिक हैं। इस मामले की शिकायत सामाजिक कार्यकर्ता रुखसाना ने की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अम्मी-बेटी ने धोखे से भारतीय पहचान पत्र बनवा लिए। रुखसाना ने शिकायत में बताया कि पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद दोनों ने फर्जी तरीके से आधार कार्ड, वोटर आईडी और भारतीय पासपोर्ट तक हासिल कर लिया।

मीडिया से बात करते हुए SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि उन्हें फरहत मसूद नाम के एक व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली। वह दिल्ली गेट इलाके में रहता है। बताया जा रहा है कि फरहत मसूद पाकिस्तान गया था, जहाँ उसने सबा नाम की औरत से निकाह किया। वहीं पाकिस्तान में उनकी एक बेटी पैदा हुई। सबा और उसकी बेटी दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक हैं।

SSP ने बताया कि शुरुआती जाँच में यह साफ हो गया है कि आरोपित बिना वैध भारतीय नागरिकता के यहाँ रह रहे थे। उन्होंने कहा कि इससे पहले SP सिटी द्वारा की गई जाँच में भी आरोपों में सच्चाई पाई गई थी। जाँच में तथ्य सामने आने के बाद अब इस मामले में औपचारिक रूप से FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने बताया कि आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है और पूरे मामले की गहराई से जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।

मामले में FIR की पूरी जानकारी

ऑपइंडिया ने इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी देखी है। इस FIR में सबा मसूद उर्फ नाजी उर्फ नाजिया और उशकी बेटी ऐमन फरहत को मुख्य आरोपित बताया गया है। इन दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS)2023 की कई धाराएँ लगाई गई हैं।

इनमें धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2), 351(2) और 352 शामिल हैं। ये धाराएँ धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोपों से जुड़ी हुई हैं।

                                                                       साभार: UP पुलिस

शिकायतकर्ता ने बताया कि सबा ने पाकिस्तान में फरहत मसूद से निकाह किया था और उनके बेटी ऐमन का जन्म वहीं 25 मई 1993 को हुआ था। उन्होंने आगे कहा कि जब सबा भारत आई, तो ऐमन भी उसके साथ ही आई थी। ऐमन ने भारत में एंट्री सबा के पाकिस्तानी पासपोर्ट के जरिए की थी। उस पासपोर्ट में ऐमन का नाम और उसकी जन्मतिथि साफ-साफ दर्ज थी।

शिकायतकर्ता रुखसाना ने आगे बताया कि अम्मी और बेटी, दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद मेरठ में रह रही थीं। उन्होंने कभी भी कानूनी तरीके से भारतीय नागरिकता लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की। रुखसाना ने यह भी कहा कि ऐमन ने मेरठ में ही पढ़ाई की, जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक थी।

                                                              साभार: UP पुलिस

उन्होंने आगे बताया कि ऐमन के लिए भारतीय पासपोर्ट बनवाने के लिए फर्जी और बनावटी दस्तावेज तैयार किए गए। रुखसाना के मुताबिक, सबा ने भी दो अलग-अलग नामों से वोटर कार्ड बनवा लिए थे। इनमें एक सबा मसूद के नाम से और दूसरा नाजिया मसूद के नाम से था। शिकायत में कहा गया है कि ये सब जानबूझकर अपनी असली पहचान छिपाने और भारतीय अधिकारियों को धोखा देने के लिए किया गया।

रुखसाना ने अपनी शिकायत में सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि आरोपित फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेजों के आधार पर कई बार पाकिस्तान और दूसरे देशों की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि सबा के अब्बा हनीफ अहमद कथित तौर पर पाकिस्तान नागरिक थे और उनका संबंध ISI से बताया जाता है। रुखसाना के अनुसार, इसी वजह से यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर हो जाता है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि आरोपित अपनी असली पहचान छिपाकर दिल्ली में सेना मुख्यालय और दूसरे सरकारी दफ्तरों में भी अकसर आते-जाते रहे हैं।
FIR में यह भी दर्ज है कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने पहले इस मामले पर आपत्ति जताई थी तब उन्हें धमकाया और डराया गया था। रुखसाना का कहना है कि आरोपितों ने उन्हें यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की कि उनकी राजनीतिक पहुँच है और पुलिस प्रशासन में भी उनके संबंध हैं।

ममता के तुष्टिकरण पर भारी पड़ेगा राष्ट्रवाद: इधर तारिक रहमान को मिठाई, उधर SIR में अड़ंगा बने अफसरों पर आयोग का डंडा


पश्चिम बंगाल मैं जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा खुलकर सामने आने लगा है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, इन सबने मिलकर बंगाल की जनता को भीतर तक झकझोर दिया है। बांग्लादेशी में जीते रहमान को मिठाई भेजने से लेकर SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अड़ंगा डालने तक, ममता सरकार के कदम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ता बचाने के लिए राज्य की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी गिरवी रखा जा सकता है। यही वजह है कि अब बंगाल का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लापरवाही बरतने पर ममता सरकार से सात अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रहार है, जो खुद को संविधान से ऊपर समझ बैठे हैं।

अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और सुशासन की मांग
ममता सरकार की इन्हीं कारगुजारियों से बंगाल में बदलाव का आहट सुनाई देने लगी है। यहीं से बंगाल में बदलाव की कहानी शुरू होती है। तुष्टिकरण की थकी हुई राजनीति के मुकाबले राष्ट्रवाद, विकास और सुशासन की बात करने वाली भाजपा तेजी से जनता का भरोसा जीतती दिख रही है। ममता सरकार की घुसपैठ पर चुप्पी, वोट बैंक की राजनीति और ईडी-आयोग जैसी संस्थाओं से टकराव वाली नीतियां आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा हथियार बन रही हैं। ममता बनर्जी अपनी जिद और तुष्टिकरण की राजनीति से बीजेपी के लिए रेड कार्पेट बिछा रही हैं। हर गलत फैसला, हर पक्षपाती कदम और हर संवैधानिक टकराव जनता को यह एहसास दिला रहा है कि अब बदलाव जरूरी है। यही कारण है कि बंगाल की फिजा में अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और स्थिरता की मांग गूंजने लगी है।

तुष्टिकरण के लिए तारिक रहमान को बधाई और मिठाई
राज्य में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हुई, वैसे ही ममता बनर्जी की राजनीति एक बार फिर उसी पुराने ट्रैक पर लौट आई यानी मुस्लिम तुष्टिकरण। बांग्लादेश में जीत हासिल करने वाले तारिक रहमान को जीत की बधाई के साथ मिठाई भेजना केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत में एक गहरा संदेश है। यह संदेश साफ है—वोट बैंक सर्वोपरि है, चाहे राज्य की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दांव पर क्यों न लग जाए। विडंबना देखिए कि जिस बंगाल में सबसे ज्यादा अवैध घुसपैठियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है, उसी बंगाल की मुख्यमंत्री बांग्लादेशी नेता को मिठाई भेजने में संकोच नहीं करतीं। सवाल यह है कि क्या राज्य के मूल निवासियों की चिंता से ज्यादा जरूरी विदेश के ‘भाई’ से रिश्ते निभाना है? यह दोहरा चरित्र अब किसी से छिपा नहीं रहा।

जय श्रीराम के नारों से बिदकने वाली ममता की बाबरी यात्रा पर बोलती बंद
दरअसल, पश्चिम बंगाल में ममता सरकार को इन दिनों कई भूचाल का सामना करना पड़ रहा है। ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हैं तो खुद उनकी पार्टी में उनके खिलाफ आवाज उठने लगी है। कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद रहे विधायक हुमायूं कबीर अब उन्हीं के गले की फांस बनते जा रहे हैं। मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण की घोषणा, उस पर अमल और  बाबरी यात्रा निकालकर  राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्रीराम के नारों से ही बिदक जाती थीं, उनकी बोलती बाबरी यात्रा पर बंद हो गई है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि किसी एक स्तंभ ने ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक तक सत्ता में टिकाए रखा है, तो वह है मुस्लिम वोट बैंक। यही साम्प्रदायिक संतुलन अब तेजी से दरकता नजर आ रहा है। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का सबसे स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 27-28 प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता के निर्णायक वोट बैंक बनते रहे हैं। लेकिन अब यही वोट बैंक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। बल्कि यदि यह कहें कि वोट-बैंक रूपी यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल होगा, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

चुनाव आयोग का सख्त संदेश: अब लापरवाही नहीं चलेगी
इस बीच चुनाव आयोग ने ममता सरकार को करारा झटका दिया है। SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में अड़ंगा डालने वाले मुख्यमंत्री के सात अधिकारियों को सस्पेंड कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि संवैधानिक कार्यों में बाधा किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि तृणमूल सरकार की मनमानी पर सीधा तमाचा है। सात अफसर निलंबित हो गए, लेकिन असली सवाल यह है कि उन्हें ऐसा करने का साहस कहां से मिला? क्या बिना मुख्यमंत्री के इशारे के इतने बड़े स्तर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप संभव है? अफसरों को मोहरा बनाकर खुद को पाक-साफ दिखाने की यह पुरानी राजनीति अब जनता समझ चुकी है। दरअसल, ममता सरकार की राजनीति का केंद्र बिंदु वर्षों से एक ही रहा है और वह है एक वर्ग विशेष को खुश रखना। अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार की ढिलाई किसी भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: एसआईआर में दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं
हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने भी ममता सरकार को साफ शब्दों में चेताया कि SIR प्रक्रिया में किसी तरह की अनावश्यक दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़े, यह अपने आप में बताता है कि बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव बनाया जा रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं से भिड़ती नजर आई हों। कभी राज्यपाल से टकराव, कभी केंद्रीय एजेंसियों पर आरोप, ईडी की टीम से टकराव और अब चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, यह एक ऐसे नेतृत्व की तस्वीर पेश करता है, जो कानून से ऊपर खुद को मान बैठा है।

अब इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर जोर दे रही जनता
एक ओर जहां देश के दूसरे हिस्से इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर बात कर रहे हैं, वहीं बंगाल की राजनीति आज भी पहचान और तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है। उद्योग पलायन कर रहे हैं, युवा बेरोजगार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का फोकस बांग्लादेशी नेताओं को मिठाई भेजने और वोट बैंक साधने पर है। अब बंगाल का आम नागरिक सवाल पूछ रहा है, क्या यही सुशासन है? क्या यही ‘मां-माटी-मानुष’ का मॉडल है? जिन इलाकों में स्थानीय लोग खुद को अल्पसंख्यक महसूस करने लगे हैं, वहां सरकार की चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है। जनता समझ रही है कि यह सब अचानक नहीं हो रहा, बल्कि वर्षों की राजनीतिक प्रयोगशाला का नतीजा है।

तुष्टिकरण की राजनीति अब भारी पड़ेगा विकास और सुशासन
सात अफसरों का निलंबन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले एक स्पष्ट संदेश है कि अब सिस्टम से खिलवाड़ नहीं चलेगा। यह ममता सरकार के लिए आखिरी चेतावनी भी हो सकती है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, जवाबदेही जरूर होती है। ममता बनर्जी आज उसी जाल में फंसती दिख रही हैं, जिसे उन्होंने खुद बुना है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और अफसरशाही का दुरुपयोग, ये सब मिलकर उनकी सरकार की विश्वसनीयता को तेजी से खोखला कर रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि अब मनमानी का दौर खत्म होने वाला है। बंगाल बदलाव चाहता है। वह विकास और सुशासन चाहता है। वह महिला शक्ति का आत्मसम्मान और युवाओ के लिए रोजगार चाहता है। और शायद इस बार वोट सिर्फ भावनाओं पर नहीं, बल्कि सच्चाई, सुरक्षा, सुशासन और विकास के लिए ही पड़ेगा।

बाबरी यात्रा के जरिए ममता के मुस्लिम वोट बैंक में पैठ बनाना लक्ष्य
बंगाल चुनाव से पहले टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद नादिया-मुर्शिदाबाद बॉर्डर (पलाशी) से बेलडांगा तक 22 किलोमीटर का पैदल मार्च (बाबरी यात्रा) शुरू की है। इस बाबरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुर्शिदाबाद के बेल़डांगा में अयोध्या की बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति (Replica) का निर्माण करना है। इस यात्रा के जरिए कबीर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में अपनी पैठ बनाएंगे और अपनी नई पार्टी, जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के लिए जनसंपर्क करेंगे। यह यात्रा नादिया जिले के ऐतिहासिक स्थल पलाशी से शुरू होकर मुर्शिदाबाद जिले में निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद स्थल तक जाएगी। हालांकि पहले इसे उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक ले जाने की योजना थी, जिसे फिलहाल छोटा कर दिया गया है। खबरों के मुताबिक पहले यह यात्रा लगभग 265 किलोमीटर लंबी होनी थी, लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के चलते और पुलिस की अनुमति न मिलने के कारण इसे घटाकर 22 किलोमीटर कर दिया गया है।

न्यायिक ढील कन्हैया कुमार को एक बार फिर JNU में ले आई; ब्राह्मणों को ठिकाने लगाने के नारे लगाए; रुचि तिवारी पर हमला JNU के गिरोह का ही काम था

सुभाष चन्द्र 

भारत के कानून लचीले हैं या न्यायाधीश इस गंभीर मुद्दे पर देश को जवाब मांगना होगा। कोर्ट में  freedom of speech के नाम पर जो रिहा करने का ड्रामा भारत में होता है किसी और देश में नहीं। "क्यों टुकड़े गैंग" को देशद्रोह के आरोप में जेलों में डाला जाता?     

आज से 9 साल पहले JNU में 9 फरवरी, 2016 को कन्हैया कुमार और उमर खालिद के नेतृत्व में नारेबाजी का नंगा नाच हुआ और देश तोड़ने के नारे लगाए गए। 

“हम क्या चाहते - आज़ादी, 

बंदूक से लेंगे आज़ादी, 

भारत तेरे टुकड़े होंगे - इंशाअल्ला,

इंडियन आर्मी मुर्दाबाद,

पाकिस्तान जिंदाबाद,

भारत को रगड़ा दे रगड़ा दे, और 

इंडिया गो बैक”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
दिल्ली पुलिस ने जो केस दर्ज किया तो ये दोनों हिम्मत वाले नेता कन्हैया कुमार और उमर खालिद भाग खड़े हुए कि उन्होंने कोई नारे नहीं लगाए। केजरीवाल सरकार 4 साल तक कन्हैया कुमार को बचाती रही और 28 फरवरी, 2020 को दिल्ली चुनाव से पहले उस पर मुकदमा चलाने की सैंक्शन दी। 

मजिस्ट्रेट कोर्ट जांच में कह दिया गया कि उसके नारेबाजी में शामिल होने का प्रमाण नहीं मिला और कुछ वीडियो पुलिस के पास doctored हैं। लेकिन Sedition का केस कन्हैया कुमार पर चल रहा है परंतु ठंडे बस्ते में लगे होने की वजह से वह मौज ले रहा है और 15 फरवरी को एक बार फिर JNU में निष्काशित JNU छात्र संघ के नेताओ के साथ  ढपली बजा कर नारेबाजी कर रहा था। 

अबकी कन्हैया कुमार और JNU की अदिति मिश्रा गिरोह ने नारे लगाए -

“ब्राह्मणवाद से आज़ादी,

इस्लामफोबिया से आज़ादी,

मनुवाद से आज़ादी 

जातपात से आज़ादी”

उसके पहले 5-6 जनवरी को अदिति मिश्रा के नेतृत्व में कथित JNU छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत ख़ारिज होने पर नारे लगाए थे और सुप्रीम कोर्ट को सीधी चुनौती दी थी

“मोदी शाह की कब्र खुदेगी JNU की छाती पर,

ABVP - RSS की कब्र खुदेगी, 

इसके साथ आज़ादी के भी नारे लगे और नारे लगे -

“ब्राह्मणों भारत छोड़ो,

ब्राह्मणों कैंपस छोड़ो, 

ब्राह्मणों - बनियों से बदला लेंगे”

इस नारेबाजी और तोड़फोड़ के बाद छात्रसंघ के सभी पदाधिकारियों को JNU ने निष्कासित कर दिया था।

 

14 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकार यूटूबर रुचि तिवारी पर JNU गिरोह ने जिसमें निष्कासित नेता शामिल थे हमला किया, उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश की। रूचि के अनुसार वे लोग उसकी नग्न परेड कराना चाहते थे क्योंकि वह एक ब्राह्मण है। याद रहे ये JNU के गुंडे ब्राह्मणों को भारत से निकालने की बात कर रहे हैं

UGC रेगुलेशंस में कमियां हैं लेकिन सवर्णो खासकर ब्राह्मणों को JNU की खासकर ब्राह्मण नेता अदिति मिश्रा के उनके विरुद्ध नारेबाजी से सावधान रहना चाहिए। JNU के मुट्ठीभर लोग किसी का भविष्य तय नहीं कर सकते। इसलिए अब उन्हें JNU के गुंडों के खिलाफ हल्ला बोलना चाहिए और उन्हें याद रहे कांग्रेस ऐसे लोगो के साथ खड़ी है। मोदी से नाराज़गी हो सकती है लेकिन वह फिर भी अपना है लेकिन ये कांग्रेस और JNU के अर्बन नक्सल आपके दुश्मन है और किसी तरह ये अपने नहीं हो सकते

ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेसियों पर ही भड़क उठे मणिशंकर अय्यर?


केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। उन्होंने न केवल आगामी चुनावों में कांग्रेस की हार की भविष्यवाणी की, बल्कि कई दिग्गज नेताओं पर भी तीखे प्रहार किए। उनके इन बयानों ने पार्टी के भीतर भूचाल ला दिया है और अंदरूनी कलह को सरेआम सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है।

मणिशंकर अय्यर ने केरल चुनाव से पहले अपनी ही पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए दावा किया है कि राज्य में फिर से वाम मोर्चा (LDF) की सरकार बनने जा रही है और पिनराई विजयन ही मुख्यमंत्री की गद्दी संभालेंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने वाम मोर्चा के पंचायती राज मॉडल का गुणगान करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब सोचिए, जिस वक्त कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) राज्य में 10 साल का सियासी सूखा खत्म करने की कोशिश में जुटी है, उसी वक्त पार्टी के वरिष्ठ नेता विपक्ष की जीत की भविष्यवाणी कर दें—तो फिर किरकिरी तो बनती है! इन बयानों के बाद कांग्रेस के भीतर ही मणिशंकर के खिलाफ बगावत शुरू हो गई है। पार्टी के एक शीर्ष नेता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी भड़ास निकालते हुए साफ किया कि अय्यर का पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं है और वे जो कुछ भी कह रहे हैं, वह उनकी ‘निजी हैसियत’ में है।

हालांकि, जब पार्टी ने उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश की, तो अय्यर साहब ‘फुल फॉर्म’ में आ गए और पलटवार करते हुए अपना ही मोर्चा खोल दिया। उन्होंने पवन खेड़ा को ‘कठपुतली’ करार देते हुए दावा किया कि वे पार्टी के अधिकृत प्रवक्ता नहीं हैं। अय्यर ने यहां तक कह दिया कि यदि कांग्रेस पवन खेड़ा के विकल्प के तौर पर किसी और को प्रवक्ता नहीं बना पाती, तो पार्टी की हालत ऐसी ही बदतर बनी रहेगी।

अय्यर के तरकश के तीर यहीं नहीं रुके। उन्होंने शशि थरूर पर भी तंज कसते हुए कहा कि वे ‘अगले विदेश मंत्री’ बनने के सपनों में खोए हुए हैं और उनमें इस पद के लिए भारी महत्वाकांक्षा है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश पर निशाना साधते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि उन्हें अपनी ‘नौकरी’ बचाने के लाले पड़े हुए हैं।

इतना ही नहीं अपने बयानों से अक्सर विवादों में रहने वाले अय्यर ने राहुल गांधी को भी नहीं छोड़ा। राहुल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कहा कि मैं राहुलवादी नहीं हूं।

पूरा मामला तूल पकड़ चुका है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस को लेकर मीम्स और तंज की बाढ़ आ गई है। इससे कांग्रेस की किरकिरी हो रही है…

 

शोएब अख्तर ने ऑन कैमरा मोहसिन नकवी को लताड़ा : ‘जाहिल, अयोग्य और बेकार’: T-20 में भारत से मिली हार के बाद PAK टीम को पाकिस्तानियों ने ही रगड़ा


ICC टी-20 वर्ल्ड कप में भारत ने एक बार फिर बड़े मुकाबले में अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए पाकिस्तान को 61 रन से करारी शिकस्त दी और सुपर 8 में अपनी जगह पक्की कर ली। कोलंबो में खेले गए इस हाई-वोल्टेज मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 7 विकेट के नुकसान पर 175 रन बनाए। जवाब में पाकिस्तान की पूरी टीम 18 ओवर में 114 रन पर सिमट गई।

मैन ऑफ द मैच ईशान किशन ने 40 गेंदों पर 77 रन की विस्फोटक पारी खेली। उनकी पारी में 10 चौके और 3 छक्के शामिल रहे। उन्होंने स्पिनरों के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाज़ी की और रन गति को लगातार बढ़ाया। बाद में पाकिस्तान टीम जब पिच पर बैटिंग करने उतरी तो कुछ ही ओवरों में पता चल गया कि मैच के परिणाम क्या होने वाले हैं।

पाकिस्तान टीम की दुर्दशा के लिए खिलाडी नहीं पाकिस्तान सरकार जिम्मेदार है। U-19 में भारत के हाथों मिली हार के बाद प्रधानमंत्री शाहबाज़ द्वारा टूर्नामेंट का बहिष्कार करने ने टीम का मनोबल ही तोड़ दिया था। लेकिन ICC के सख्त रवैये की वजह से हाँ-ना में भारत के विरुद्ध खेलने के फैसले से टीम मझधार में रही। 

टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत के हाथों पाकिस्तान की शर्मनाक हार के बीच कोलंबो के स्टेडियम से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने सोशल मीडिया पर विवाद और मजाक का नया दौर शुरू कर दिया है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के अध्यक्ष और एशिया कप की ट्रॉफी चुराने वाले मोहसिन नकवी मैच खत्म होने से पहले ही स्टेडियम छोड़कर भाग निकले। उनसे पाकिस्तान की हार देखी नहीं गई।

जब भारतीय गेंदबाजों ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी और 12वें ओवर में मोहम्मद नवाज का विकेट गिरा, तब पाकिस्तान का स्कोर 77/5 था। जीत की उम्मीद खत्म होते देख मोहसिन नकवी वीवीआईपी बॉक्स से उठकर सीधे अपनी गाड़ी की ओर भागते दिखे। पीटीआई द्वारा जारी वीडियो में उन्हें मैच खत्म होने से काफी पहले स्टेडियम के बाहर जाते देखा गया। सोशल मीडिया पर फैंस ने इसे हार के डर से भागना करार दिया है। 

पूर्व क्रिकेटरों ने दी बधाई, इरफान पठान ने डांस कर पूछा- पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?

भारत की जीत के बाद देशभर में जश्न का माहौल रहा। सोशल मीडिया पर भी इस जीत को लेकर उत्साह देखने को मिला। भारतीय क्रिकेट जगत के पुराने खिलाड़ियों ने भी जीत के लिए टीम के खिलाड़ियों के बेहद अलग अंदाज में बधाई दी।

पूर्व भारतीय क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने टीम इंडिया को जीत की बधाई देते हुए X पर लिखा, “ईशान किशन असली धुरंधर की तरह खेले। सभी छोटी टीमों में से पाकिस्तान को हराना भारत के लिए सबसे आसान लग रहा था क्योंकि T-20 क्रिकेट में उनका 17वीं सदी का अप्रोच था और उन्हें हमेशा की तरह अच्छी हार मिली। पूरी कंबल कुट्टई।”

इसी तरह मास्टर-ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लिखा, “पावरप्ले में भारत ने मैच अपने हाथ से छीन लिया। पहली इनिंग में ईशान किशन की बॉलिंग और दूसरी इनिंग में हमने जो जबरदस्त बॉलिंग देखी, उससे सारा फर्क पड़ा। हम हमेशा ड्राइवर सीट पर थे। आज रात भारत ने धमाल मचा दिया।”

पूर्व भारतीय ऑलराउंडर इरफान पठान का एक खास वीडियो तो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की हार पर चुटकी ली है। मैच खत्म होते ही इरफान पठान ने इंस्टाग्राम पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वह मशहूर गाने ‘अफगान जलेबी’ पर थिरकते नजर आ रहे हैं। वीडियो के कैप्शन में लिखा, “पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?”  

क्रिकेटर युवराज सिंह ने X पर लिखा, “बड़े गेम में बड़े कैरेक्टर की जरूरत होती है और लड़कों ने आज रात वही दिखाया! शांत दिमाग और मजबूती से खत्म करने की भूख एक यूनिट के तौर पर हमने जिस तरह से परफॉर्म किया, उस पर गर्व है! आगे बढ़ते रहो और ऊपर उठते रहो।”

भारत के अलावा बलूचिस्तान में भी लोगों ने डांस करते हुए भारतीय टीम की जीत का जश्न मनाया। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।

मोहसिन नकवी पर भड़के शोएब अख्तर

दूसरी ओर पाकिस्तान में निराशा स्पष्ट थी। पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन मोहसिन की आलोचना करते हुए प्रशासनिक ढाँचे पर सवाल उठाए। उनका मानना था कि क्रिकेट की समझ रखने वाले लोगों को शीर्ष पदों पर होना चाहिए, तभी टीम का प्रदर्शन सुधर सकता है।
गुस्से में शोएब अख्तर ने नकवी को जाहिल और पद के लिए अयोग्य तक बताया। उन्होंने भारतीय न्यूज चैनलों से बात करते हुए अपना रोष प्रकट किया। उन्होंने कप्तान बाबर आजम के प्रदर्शन पर भी टिप्पणी की और टीम चयन व नेतृत्व को लेकर नाराजगी जाहिर की।
एबीपी न्यूज पर बात करते हुए अख्तर ने माना है कि क्रिकेट नहीं जानते, PCB के चेयरमैन बन गए हैं, इस कारण पाकिस्तान टीम का यह हाल हो रहा है। शोएब अख्तर ने कहा, “एक आदमी जिसे कुछ नहीं पता, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन (मोहसिन नकवी) बन गया है, आप क्या कर सकते हैं? टीम कैसे चलेगी? आपने एक ऐसे खिलाड़ी (बाबर आजम) को सुपरस्टार बना दिया है जो आपको एक भी मैच नहीं जिता सकता। दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है नाकाबिल और जाहील आदमी को बड़ा काम देना।”

पाकिस्तानी फैन्स की उम्मीदें टूटीं, विराट कोहली जैसे कप्तान की रखी माँग

पाकिस्तानी समर्थकों में भी गहरी निराशा दिखी। कई प्रशंसकों ने टीम की रणनीति, तैयारी और मानसिक मजबूती पर सवाल उठाए। कुछ ने भारतीय टीम की तारीफ करते हुए स्वीकार किया कि मौजूदा समय में भारत हर विभाग में बेहतर दिख रहा है।
फैन्स का मानना है कि टीम को राजनीति और आंतरिक विवादों से दूर रहकर पेशेवर तैयारी पर ध्यान देना होगा। तेज गेंदबाजी और ऑलराउंड प्रदर्शन के सामने पाकिस्तान के बल्लेबाजों की कमजोरी उजागर हुई।
एक ने कहा, “एकतरफा मैच था, अगर पाकिस्तान की अवाम बाबर आजम को किंग समझती है, तो उन्हें किंग की तरह बनना चाहिए, उन्हें विराट कोहली जैसा बनना चाहिए। विराट कोहली अगर आजम की जगह होते तो यह मैच इंडिया को आसानी से जिता देते। बाबर आजम किंग नहीं हैं और टीम में जगह पाने के लायक नहीं हैं। यह कोई टीम नहीं है, बस इधर-उधर से आए कुछ खिलाड़ियों का जमावड़ा है।”
एक मकबूल नाम के फैन ने कहा, “मुझे थोड़ी उम्मीद थी कि हम मैच जीतेंगे और कम से कम कड़ी टक्कर देंगे। लेकिन यह तो एक आम बात हो गई है। हमारे पास बुमराह का कोई जवाब नहीं है। हम हार्दिक का सामना नहीं कर सकते। यही हाल है। हमेशा की तरह, टीम इंडिया ने शानदार प्रदर्शन किया। अगर इसी तरह का प्रदर्शन जारी रहा, तो हम भारत को नहीं हरा सकते। भारतीय टीम बहुत अच्छी है। और हम इस बात को स्वीकार करते हैं।”

बुरी तरह हारने का पाकिस्तान का रहा है इतिहास

गौरतलब है कि T20 वर्ल्ड Cup के इतिहास में भारत और पाकिस्तान के मैच हमेशा खास रहे हैं, हर बार पाकिस्तान का दावा रहता है कि वो पूरी तैयारी के साथ हैं, लेकिन हर बार उन्हें फजीहत झेलनी पड़ती है। अब तक दोनों टीमों के बीच कुल 9 मुकाबले खेले गए हैं, जिनमें से भारत ने 8 में जीत दर्ज की है।
इनमें एक मुकाबला ऐसा भी रहा, जिसमें परिणाम सुपर ओवर से तय हुआ और वहाँ भी भारत ने दबाव में बेहतर प्रदर्शन करते हुए बाज़ी अपने नाम की। यह दर्शाता है कि करीबी परिस्थितियों में भी भारतीय टीम मानसिक मजबूती और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में सफल रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तान को इस टूर्नामेंट में भारत के खिलाफ केवल एक जीत हासिल हुई है-वह भी 2021 में।

ब्राह्मण विरोधी नफरत, कश्मीरी पंडितों का मजाक और विक्टिम कार्ड: अंबेडकरवादी लक्ष्य लेकी ने की साइबर बुलिंग, वकील ट्यूलिप शर्मा ने दर्ज कराई शिकायत

                                   लक्ष्य लेकी, ट्यूलिप शर्मा (फोटो साभार: Instagram)
खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले लक्ष्य लेकी सोशल मीडिया पर विवादों में घिर गए हैं। IIM इंदौर से पढ़े और TedX स्पीकर लक्ष्य के खिलाफ क्रिमिनल लॉयर और इन्फ्लुएंसर ट्यूलिप शर्मा ने साइबर शिकायत दर्ज कराई है। उस पर ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत फैलाने, जातिगत गालियाँ देने और महिलाओं को अपमानजनक मैसेज भेजने का आरोप है।

ऑपइंडिया से बातचीत में ट्यूलिप ने शिकायत के बारे में कहा कि ऐसा करना जरूरी था, क्योंकि लक्ष्य जैसे लोग एक जगह पर नहीं रुकते, वो लगातार ऐसी हरकतें करते रहते हैं।

लक्ष्य लेकी आईआईएम इंदौर के ग्रेजुएट हैं और टीईडीएक्स स्पीकर भी रह चुके हैं। वे ‘लक्ष्य स्पीक्स’ नाम से इंस्टाग्राम पेज और यूट्यूब चैनल चलाते हैं। इंस्टाग्राम पर उनके लगभग 5 लाख 53 हजार फॉलोअर्स हैं और यूट्यूब पर 14 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर्स।

ट्यूलिप ने भारतनाट्यम और देवदासी पर उसके दावों पर उठाए सवाल, तो लक्ष्य ने ब्राह्मणों को दी गालियाँ

ट्यूलिप शर्मा ने गुरुवार (12 फरवरी 2026) को अपने इंस्टाग्राम हैंडल @_tulipsharma पर एक वीडियो डाला। इसमें उन्होंने बताया कि लक्ष्य लेकी काफी समय से जाति-विरोध के नाम पर ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी है और इंटरनेट पर नफरत कोई नई बात नहीं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कोई विरोधी राय बर्दाश्त न कर सके। वे ऐसे इन्फ्लुएंसर हैं जो अगर कोई उनके पोस्ट पर विरोधी कमेंट करे तो डीएम में आकर गंदी-गंदी बातें करते हैं।

ट्यूलिप ने बताया कि सब कुछ 11 फरवरी को शुरू हुआ जब लक्ष्य लेकी ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो डाला। उसमें उन्होंने दावा किया कि भारतनाट्यम को ब्राह्मणों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि भारतनाट्यम ब्राह्मणों की सांस्कृतिक चोरी है, असली डांस सदिर अट्टम या दासी अट्टम था जो देवदासियां करती थीं। उनका कहना था कि तमिल ब्राह्मण महिला रुक्मिणी देवी ने उस डांस के सेक्सुअल/इरोटिक हिस्से को हटा दिया, उसे साफ-सुथरा बना दिया, लेकिन ऐसा करते हुए सदिर अट्टम की असली जड़ों से इसे अलग कर दिया।

इसके जवाब में ट्यूलिप शर्मा ने कमेंट किया, “आपकी लॉजिक के मुताबिक, ‘ब्राह्मण’ महिला रुक्मिणी देवी ने देवदासियों के यौन शोषण के चक्र को खत्म कर दिया। अब इसमें समस्या क्या है? एक तरफ आप इसे दमनकारी व्यवस्था मानते हैं, फिर कोई सुधार करे तो भी समस्या है सिर्फ इसलिए कि सुधार करने वाली ‘ब्राह्मण’ है। हंसते हुए। जिंदगी में थोड़ी क्लैरिटी लाओ और व्हाट्सएप नॉलेज पर निर्भर मत रहो।”

लेकिन ट्यूलिप शर्मा के तर्क का तथ्यों से जवाब देने की बजाय लक्ष्य लेकी उनके डीएम में घुस आए और जातिगत गालियाँ देने लगे। अपने दावे के समर्थन में शर्मा ने बातचीत के स्क्रीनशॉट और स्क्रीन रिकॉर्डिंग भी शेयर किए। 

ट्यूलिप शर्मा ने बताया कि बात ब्राह्मण लड़कियों की भी नहीं थी, फिर भी लक्ष्य लेकी अपनी ब्राह्मण एक्स गर्लफ्रेंड्स के बारे में डींगें हाँकने लगे। ट्यूलिप ने कहा, “बात ब्राह्मण लड़कियों की नहीं थी लेकिन लक्ष्य लेकी अपनी सारी एक्स को ब्राह्मण बताकर बहस जीतना चाहते थे। पूरी कम्युनिटी की लड़कियों को इस्तेमाल करके बहस जीतना दिखाता है कि वे कितने बड़े जातिवादी हैं।”

लक्ष्य लेकी की ब्राह्मण लड़कियों को ऑब्जेक्ट बनाने वाली सोच को और एक्सपोज करते हुए शर्मा ने बताया कि वो जाति खत्म करने के लिए ‘अंतरजातीय बच्चे’ पैदा करने की बात कर रहा था।

                                                          सोर्स: ट्यूलिप शर्मा का वीडियो

शर्मा ने वीडियो में कहा, “उनका पूरा प्रोफेशन ही ब्राह्मणों को गालियाँ देने पर टिका है और फिर वे अपनी ब्राह्मण एक्स के बारे में डींग मारते हैं। वे और आगे बढ़कर कहते हैं कि अंतरजातीय बच्चे बनाकर जाति खत्म कर रहे हैं।” शर्मा ने बातचीत का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया।

एक वीडियो में लक्ष्य लेकी ने खुद कहा था कि वे अपनी एससी/एसटी कम्युनिटी के बाहर डेट करने की हिम्मत नहीं रखते, लेकिन ट्यूलिप शर्मा की एक फीमेल फॉलोअर के मैसेज बॉक्स में उसने लिखा, “ब्राह्मण गर्लफ्रेंड मुझे ब्लो जॉब देती है, प्रॉब्लम?”

                                                         ट्यूलिप शर्मा की इंस्टाग्राम स्टोरी से

कई पब्लिकली शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स के मुताबिक लक्ष्य लेकी ने ट्यूलिप शर्मा को डीएम में लिखा, “होली चॉप्ड, ब्राह्मण लड़की के लिए तुम बहुत बदसूरत हो।” एक और मैसेज में उन्होंने लिखा, “मेरी गर्लफ्रेंड तुमसे कहीं ज्यादा खूबसूरत है। तुम तो बॉयफ्रेंड वाली भी नहीं लगतीं।”

एक और मैसेज में लक्ष्य ने लिखा, “4 ब्राह्मण एक्स, सब तुमसे ज्यादा खूबसूरत।”

इस बीच ट्यूलिप शर्मा ने अपने फॉलोअर्स को बताया कि उन्होंने आईटी एक्ट और संबंधित बीएनएस सेक्शन के तहत लक्ष्य लेकी के खिलाफ साइबर शिकायत दर्ज करा दी है।

बैकलैश के बीच लक्ष्य लेकी ने दावा किया कि ट्यूलिप शर्मा ने उनके जातिवादी और अपमानजनक मैसेज के जो स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं, वे फेक हैं। उनका कहना है कि उन्हें फर्जी केस में फंसाने की कोशिश हो रही है।  

एक और वीडियो में लक्ष्य ने फिर दोहराया कि शर्मा के साथ उनकी चैट के सारे स्क्रीनशॉट फेक हैं। इस अंबेडकरवादी जाति एक्टिविस्ट ने विक्टिम कार्ड खेला और खुद की तुलना रोहित वेमुला से कर दी।

लक्ष्य ने कहा कि रोहित वेमुला के साथ भी इसी तरह की तरकीबें इस्तेमाल की गई थीं। लक्ष्य का रोहित वेमुला से अपनी तुलना करना बहुत बेशर्मी भरा था, क्योंकि असल में तेलंगाना पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट में कहा गया था कि वेमुला एससी जाति से नहीं थे।  

अक्सर घटिया प्रोपेगेंडा करता रहा है लक्ष्य लेकी

ज्यादातर कथित जाति-विरोधी ‘एक्टिविस्ट्स’ की तरह लक्ष्य लेकी भी जाति श्रेष्ठता के विरोध के नाम पर ब्राह्मणों को निशाना बनाता रहा है। एक वीडियो में उसने कहा कि दूसरे देशों में वेजिटेरियन होते हैं लेकिन भारत में ‘प्योर वेजिटेरियन’ होते हैं। ब्राह्मणों के शाकाहार से जुड़े धार्मिक विश्वास पर हमला करते हुए उसने कहा, “केवल भारत में ही ‘प्योर वेजिटेरियन’ का कॉन्सेप्ट है। क्योंकि यहाँ शाकाहार सिर्फ जानवरों के बारे में नहीं है। ये शुद्धता, श्रेष्ठता और जाति के बारे में है। ये कहने के बारे में है कि मैं भगवान के ज्यादा करीब हूँ और तुम मांस खाने वाले दलित कम हो। वो ब्राह्मणवादी नजरिया तो वीगन लोगों में भी दिखता है जब वे दलित एक्टिविस्ट्स को वीगन न होने पर शर्मिंदा करते हैं।”

लक्ष्य ने ये नैरेटिव फैलाया कि ‘प्योर’ शब्द का मतलब जातिगत श्रेष्ठता या भगवान से ज्यादा निकटता है, जबकि असल में ये सिर्फ शाकाहार में सख्ती को दिखाता है।

जुलाई 2025 में एक पॉडकास्ट में लक्ष्य ने दावा किया कि ब्राह्मणों ने मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भेदभाव किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों ने शिवाजी की जाति की वजह से उनका राजतिलक करने से इनकार कर दिया था और उन्हें बनारस से पुजारी बुलाने पड़े।

ये दावा कट्टर ‘जाति-विरोधी’ एक्टिविस्ट्स द्वारा गढ़ा गया ब्राह्मण-विरोधी नैरेटिव का हिस्सा है। हकीकत में स्थानीय ब्राह्मणों ने शिवाजी का ताज नहीं ठुकराया था क्योंकि उन्हें उनकी जाति से कोई समस्या थी, बल्कि इसलिए कि उन्हें ऐंद्रेय राजाभिषेक करना नहीं आता था। इसलिए बनारस से गागाभट्ट को बुलाया गया। ध्यान देने वाली बात ये है कि गागाभट्ट भी मराठी ब्राह्मण थे, उनका परिवार महाराष्ट्र के पैठण से था। छत्रपति शिवाजी महाराज के राजतिलक को लेकर विवाद वैदिक रीति बनाम तांत्रिक रीति को लेकर था।

अपने एक एक्स पोस्ट में लक्ष्य ने यादवों को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए उकसाया क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर उनके साथ शादी के रिश्ते नहीं जोड़ते। उसने लिखा, “और यादव, अपनी राजनीतिक ताकत और क्षत्रियता के दावों के बावजूद, ठाकुरों और ब्राह्मणों द्वारा बराबर नहीं माने जाते। कोई अंतरजातीय शादी नहीं। कोई सम्मान नहीं। सिर्फ ग्रेडेड इनइक्वालिटी। मेरे यादव भाइयों और बहनों इस जाति पिरामिड का हिस्सा बनने की कोशिश मत करो।”

आश्चर्य की बात नहीं कि लक्ष्य लेकी 2020 के दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित उमर खालिद का फैन है। उन्होंने मुस्लिम विक्टिमहुड का नैरेटिव फैलाया और कन्हैया कुमार के राजनीतिज्ञ बनने की तुलना उमर खालिद के जेल में रहने से की, सिर्फ इसलिए कि खालिद मुस्लिम है।

खालिद की लंबी जेल पर दुख जताते हुए लक्ष्य ने लिखा, “दो स्टूडेंट लीडर्स। एक ही कैंपस। एक जैसे आरोप। लेकिन दो बहुत अलग किस्मत। कन्हैया कुमार आजाद हैं, मुख्यधारा की राजनीति में आ गए। उमर खालिद, एक मुस्लिम, बेल के बिना 5 साल जेल में। ये संयोग नहीं है। भारत में मुस्लिम होने की कीमत है।”

दिलचस्प बात ये है कि लक्ष्य ने कहा कि उमर खालिद ‘मुस्लिम होने की कीमत’ चुका रहा है, जबकि खालिद खुद को नास्तिक बताता रहा है।

इस्लामो-लेफ्टिस्टों द्वारा उमर खालिद के लिए समर्थन और सहानुभूति जुटाने के लिए फैलाए जा रहे झूठे नैरेटिव के विपरीत ऑपइंडिया ने पहले रिपोर्ट किया था कि 2023 और 2024 में 14 स्थगनों में से 7 स्थगन खुद उमर खालिद ने माँगे थे। इसलिए जमानत वापस लेना ‘देरी’ की वजह से नहीं था। जबकि इस्लामी-लेफ्ट इकोसिस्टम ‘अन्याय’ का रोना रोता रहता है, असल में आरोपित के वकील की नाकाम कोशिशों की वजह से खालिद इतने दिनों से जेल में हैं।

दरअसल, भारत के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने भी इस साल कहा था कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक ग्रुप्स की सोच में है जो अपने केस सिर्फ कुछ खास जजों से सुनवाना चाहते हैं। ऑपइंडिया ने बार-बार रिपोर्ट किया है कि खालिद की लीगल टीम ने फरवरी 2024 में ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला देकर जमानत अर्जी वापस लेने से पहले कम से कम सात बार स्थगन माँगा था।

कई सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स के मुताबिक लक्ष्य लेकी ने 1990 के दशक में इस्लामी आतंकवादियों द्वारा कश्मीरी पंडितों के सामूहिक नरसंहार और पलायन का भी मजाक उड़ाया। एक कमेंट के जवाब में लक्ष्य ने लिखा, “कश्मीर ब्राह्मणों का यही हालत था।” एक और में लिखा, “मुझे कुछ नहीं होगा, तुम्हारे कश्मीरी पंडित भाइयों की तरह।”

राहुल गांधी को एक नहीं अनेक डर सता रहे हैं; सबसे बड़ा डर उसे बहन की तरफ से है; उस डर से बचने के लिए वह हर नीच हरकत कर रहा है

सुभाष चन्द्र

जिस तरह प्रियंका वाड्रा को राजनीति में लाने की जो कोशिश चल रही भटकाऊ राहुल गैंदी  कांग्रेस में चल रही अपने खिलाफ माहौल को समझने की बजाए उनके जाल में फंस बहन को लाकर अपने ही पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली। 

राहुल गांधी पर एक कहावत फिट बैठती है -”करमहीन खेती करै, बैल मरै या सूखा परै” हर काम जोर षोर से शुरू करता है लेकिन ख़ाक हो जाता है। हाल का नरवणे की किताब का प्रकरण यही साबित करता है जो अब लाज बचाना मुश्किल हो रहा है

कुछ दिन पहले रॉबर्ट वाड्रा ने कहा था कि “हमें बांग्लादेशी हिंदुओं से क्या लेना देना है पहले हमें अपने देश की बात करनी चाहिए, बांग्लादेश की नहीं उसने एक दूसरे बयान में कहा था “पूरे देश की यह मांग है कि प्रियंका गांधी आएं और नेतृत्व करें” अब पता नहीं उसने यह “पूरे देश की मांग” कैसे समझ लिया लगता है अपनी मांग को ही पूरे देश की मांग समझ लिया

लेखक 
चर्चित YouTuber 
आजकल राहुल गांधी के करीबी बना हुआ नेता, कांग्रेस की महिला सांसदों को प्रधानमंत्री मोदी की कुर्सी का घेराव करने के लिए आगे बढ़ाता हुआ और कभी मोदी की बोटी बोटी काटने की धमकी देने वाले इमरान मसूद ने कहा था कि “ प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बनाओ, फिर देखो वो इंदिरा की तरह कैसे जवाब देगी, वो इंदिरा गांधी की पोती है, उसमें पीएम बनने के सारे गुण हैं”

लगता है प्रियंका वाड्रा अपने मन की बात अपने पति और अन्य चाटुकारों से आगे कर रही है लेकिन वैसे सब राहुल के साथ दिखाई दे रहे हैं यह अंदर ही अंदर एक ज्वालामुखी धधकता दिखाई दे रहा है राहुल गांधी को और इस वजह से वह ऐसी वो हरकत कर रहा है जिससे वह Limelight में दिखाई देता रहे चाहे उसके काम मूर्खता भरे ही क्यों न हों वह ऐसा सब प्रियंका वाड्रा को पीछे धकेलने के लिए कर रहा है और उसे जता रहा है कि उसके होते हुए प्रियंका कांग्रेस का नेतृत्व नहीं कर सकती 

वैसे तो कांग्रेस के कई नेता राहुल गांधी की कार्यशैली को धता बता कर पार्टी से अलग होते रहे हैं लेकिन फिर भी उसे कुछ परवाह नहीं है वह अपने साथ पार्टी की 5 पनौतियां साथ लेकर चल रहा है और वो हैं के सी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सुप्रिया श्रीनेत, पवन खेड़ा और रणदीप सुरजेवाला इनके अलावा अमेरिका में बैठा है सैम पित्रोदा राहुल को लगता है ये सब मिलकर उसको बचाते रहेंगे जबकि कांग्रेस में राहुल और प्रियंका के बीच एक War of Supremacy चल रही है प्रियंका अनिश्चित समय के लिए राहुल के पीछे पीछे नहीं चलना चाहती और यही डर अंदर ही अंदर राहुल को सता रहा है

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने कांग्रेस छोड़ दी और कुछ दिन पहले उन्होंने एक बयान में  कहा था “राहुल गांधी एक डरपोक नेता हैं फिर उन्होंने डरपोक के लिए कहा एक Insecure नेता हैं उन्होंने कहा -” राहुल गांधी जैसा insecure politician मेरी नज़र में आज तक नहीं हुआ। हर मजबूत कांग्रेसी से उसे डर लगता है

उसकी सोच है कि मोदी जी से जब लोग नाराज़ होंगे, तो वो मेरी तरफ आएंगे क्योंकि देश में अन्य नेता सब एक एक राज्य के नेता हैं 

राहुल गांधी को कोई नेता उनके खिलाफ बोलता हुआ पसंद नहीं है वो खुद लोकसभा में आरोप लगाता है कि उसे बोलने नहीं दिया जाता जबकि वह हर अनाप शनाप बात बोलता है लेकिन अपनी पार्टी में किसी को बोलने की इज़ाज़त नहीं देता कांग्रेस में कोई लोकतंत्र नहीं चाहिए राहुल गांधी को और शायद इसलिए ही प्रियंका वाड्रा खुल कर सामने नहीं आ रही लेकिन राहुल गांधी यह अच्छी तरह जानता है कि मौका मिलते ही प्रियंका उसका पत्ता साफ़ कर सकती है

कोई बड़ी बात नहीं कांग्रेस के भीतर ही राहुल गांधी को संसद में उत्पात करने के लिए उकसाया जा रहा हो जिससे उससे छुटकारा मिल सके और प्रियंका को स्थापित किया जा सके अगर उसके खिलाफ निशिकांत दुबे का Sabstantive Motion पास हो गया तो उसकी लुटिया डूबी ही डूबी 

वैश्विक अर्थव्यवस्था से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक बढ़ रहा प्रभाव, US महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने की भारत की तारीफ: कहा- AI समिट के लिए आदर्श मंच

           AI समिट के लिए बिल्कुल सही जगह: UN महासचिव ने जमकर की भारत की तारीफ (साभार: टाइम्स नाउ)
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका की खुलकर सराहना की है। उन्होंने भारत को एक अत्यंत सफल उभरती अर्थव्यवस्था बताते हुए कहा कि आज भारत न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत में आयोजित होने जा रहा ‘इंडिया-AI इम्पैक्ट समिट 2026’ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसे महत्वपूर्ण विषय पर वैश्विक विमर्श के लिए एक आदर्श मंच है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में दिए इंटरव्यू में गुटेरस ने कहा कि AI का लाभ पूरी दुनिया को मिलना चाहिए। यह तकनीक सिर्फ विकसित देशों या दो महाशक्तियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

गुटेरस ने कहा, “यह बेहद जरूरी है कि AI मानव जाति के हित के लिए एक सार्वभौमिक साधन बने। भारत, जो आज एक बेहद सफल उभरती अर्थव्यवस्था है और न सिर्फ वैश्विक अर्थव्यवस्था में बल्कि वैश्विक मामलों में भी अपना प्रभाव बढ़ा रही है, इस शिखर सम्मेलन के आयोजन के लिए भारत सही जगह है।”

उन्होंने कहा, “यहाँ AI की अपार संभावनाओं और जोखिमों पर गहराई से चर्चा होनी चाहिए, लेकिन यह सुनिश्चित करना चाहिए कि AI पूरी दुनिया का हो, कुछ ही लोगों का नहीं।” 20 फरवरी 2026 तक चलने वाला यह सम्मेलन ग्लोबल साउथ में होने वाला पहला उच्च स्तरीय AI समिट होगा, जिसमें विकासशील देशों की भागीदारी और उनकी जरूरतों को केंद्र में रखा जाएगा।

नेहरू की इंटेलिजेंस की अनदेखी से लेकर इंदिरा गाँधी की CIA से जुड़ी दखलअंदाजी तक: निजी फायदे के लिए देश के हितों को बेचने का कांग्रेस का रहा है इतिहास

साभार-chatgpt
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को भारत-US ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। लेकिन उनका भाषण सिर्फ बगैर सबूत के आरोपों से भरा था। असल में ये पूरा ड्रामा था, जो हकीकत से कोसों दूर थी।

केंद्र पर ‘भारत माता को बेचने’ और ‘राष्ट्रीय हितों से समझौता करने’ के आरोप लगाते हुए उन्होंने तर्क देने के बजाय अपने गुस्से का इजहार किया। संसद में उनके भाषण में बड़े-बड़े दावों के साथ इमोशनल नारे भी थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि भारत के हितों की कैसे अनदेखी की मोदी सरकार ने?

राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार खुद मानती है कि दुनिया एक उथल-पुथल वाले दौर में जा रही है, जिसमें जियोपॉलिटिकल टकराव, एनर्जी और फाइनेंस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आगे दावा किया कि अगर अमेरिका कहता है कि भारत किसी खास देश से तेल नहीं खरीद सकता है और भारत ऐसा करता है, तो इसका मतलब है कि मोदी सरकार ने ‘भारत’ को बेच दिया है।

यह एक गंभीर आरोप है। बिना किसी डॉक्यूमेंट्री सबूत के, ट्रेड डील के दस्तावेजों में कहाँ ये बात लिखी हुई है, ये बताए बिना, कौन से खास क्लॉज से संप्रभुता खतरे में है, ये बताए बिना आरोप लगाना काफी खतरनाक है। उन्होंने सरकार पर ‘प्रेशर’ की बात की, ‘प्रधानमंत्री की आँखों में डर’ की बात की और यहाँ तक कि सीलबंद ‘एपस्टीन फाइल्स’ का भी जिक्र किया, जिसका भारत की ट्रेड डील से कोई कनेक्शन नहीं है। यह भाषण एक ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ से ज्यादा कुछ नहीं था।

उन्होंने आगे दावा किया कि टैरिफ करीब 3% से बढ़कर 18% हो गए हैं और भारत में US इंपोर्ट $46 बिलियन से बढ़कर $146 बिलियन हो सकता है। उन्होंने इसे ‘जबरदस्ती रियायत’ कहना बताया। लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन नारों में नहीं होती। टैरिफ लाइन, कोटा, मिनिमम इंपोर्ट प्राइस और सेफगार्ड क्लॉज मायने रखते हैं। पूरे डील पर बातचीत किए बगैर राहुल गाँधी की बातें आर्थिक नीति की आलोचना से ज्यादा डर पैदा करने वाले लगते हैं।

चीन में भारत के खुफिया तंत्र की मजबूती के खिलाफ थे नेहरू

इतिहासकार पॉल एम. मैकगार ने अपनी 2024 की किताब ‘स्पाइंग इन साउथ एशिया: ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स, एंड इंडियाज़ सीक्रेट कोल्ड वॉर’ में लिखा है, कांग्रेस के कई फैसलों ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया। मैकगार ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया में फैले मजबूत खुफिया ढाँचा बनाने का विरोध किया, खासकर चीन के मामले में। नेहरू का तर्क था कि चीन जैसे देश में इंटेलिजेंस क्षमताओं को बढ़ाना, भारत के बस की बात नहीं है। खुफिया तंत्र की कमजोरी का खामियाजा भारत को 1962 के युद्ध के वक्त उठानी पड़ी।

मसाजर की किताब का अंश

यह सिर्फ फैसले की नाकामी नहीं थी, बल्कि सरकार के नीति पर सवाल था।

इतिहासकार मैकगार ने इंदिरा गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कांग्रेस की नीति की बखिया उधेड़ डाली है। डैनियल पैट्रिक मोयनिहान की 1978 की किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ का ज़िक्र करते हुए, मैकगार ने लिखा है कि CIA ने कम से कम दो बार भारतीय राजनीति में दखल दिया, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी को पैसे दिए। मोयनिहान के मुताबिक, एक बार CIA के पैसे सीधे इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते दिए गए।

लाहौर और सियालकोट भारत के हो सकते थे, लेकिन कांग्रेस ने दे दिया

युद्ध के मैदान में मिली जीत को बातचीत की टेबल पर हार में बदलने में कांग्रेस माहिर रही है। जब भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पछाड़ दिया, तो कांग्रेस सरकार ने ताशकंद में समझौता के दौरान उन सभी क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस करने पर सहमत हो गई, जो भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए जीता था। इसमें लाहौर जैसे कई शहर और कश्मीर का हाजी पीर दर्रा शामिल थे। ये जमीन के सिर्फ सिंबॉलिक टुकड़े नहीं थे, बल्कि जांबाजों की खून और कुर्बानी से हासिल की गई जगहें थीं। भारतीय सैनिक लाहौर की आखिरी डिफेंसिव बैरियर, इछोगिल कैनाल तक पहुँच गए थे और कश्मीर में घुसपैठ के मुख्य रास्ते हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया था।
मिलिट्री और डिप्लोमैटिक तौर पर भारत मजबूत स्थिति में था। फिर भी इंटरनेशनल दबाव में और कॉन्ग्रेस की विदेश नीति के हिसाब से, भारत सरकार ने लाहौर और सियालकोट जैसे जगहों और कश्मीर का हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया। युद्ध में जीत के बाद भी भारत के हाथ नाकामी ही आई।
उस फैसले के नतीजे आज भी भारत को परेशान करते हैं। हाजी पीर पास वापस करके कांग्रेस सरकार ने कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों को भारत भेजने का एक रास्ता छोड़ दिया। आज भी इस रास्ते से आतंकवादी भारत में घुस कर पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलवामा हमला जैसे साजिश रचते हैं।
ताशकंद समझौते से हमेशा के लिए शांति नहीं मिली। इसने पाकिस्तान को हार के बावजूद कुछ खास नुकसान नहीं हुआ और साँस लेने की जगह दी। अयूब खान बिना कुछ खोए घर लौटे जबकि भारत जीत के बावजूद ‘खाली हाथ’ घर लौटा।
यह कोई नेतागिरी नहीं थी, यह खुद को नुकसान पहुँचाना था। जब राहुल गाँधी दूसरों पर ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाते हैं, तो वह एक ऐसी पार्टी की तरफ से बोल रहे होते हैं, जिसके अपने रिकॉर्ड शानदार रहे हों। ताशकंद में युद्ध के मैदान में मिली जीत को छोड़ देना और उससे पहले 1948 में कश्मीर का इंटरनेशनलाइजेशन करना शामिल है। ऐसे फैसलों ने पीढ़ियों तक भारत की ताकत को कमजोर किया।

बगैर मोल भाव किए 93,000 बंदी बनाए गए पाकिस्तानी फौजियों को वापस करना बड़ी गलती थी

भारत की सबसे बड़ी मिलिट्री जीत 1971 में देखने को मिली। उस वक्त भी कांग्रेस ने वही किया। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के समय भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बनाए, बल्कि 93,000 पाकिस्तानियों को युद्धबंदी भी बनाया। ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सरेंडर में से एक था। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। भारत के पास पाकिस्तानी फौज के जवान और अफसर थे, जिन्हें बगैर किसी मोलभाव के वापस भेज दिया गया।
भारत चाहता तो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अपने सभी झगड़ों का निपटारा कर सकता था। जम्मू कश्मीर के पीओके वाले हिस्से को वापस ले सकता था, जिस पर आज भी पाकिस्तान का कब्जा है, 54 भारतीय सैनिकों और एयरमेन की वापसी पक्की कर सकता था, जिन्हें पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और जिन्हें 1971 से ऑफिशियली “मिसिंग इन एक्शन” लिस्ट में रखा गया था।
लेकिन इंदिरा गाँधी सरकार ने शिमला समझौते के तहत सभी 93,000 पाकिस्तानी POWs को वापस भेजने की जल्दबाजी की, बिना उन 54 भारतीय सैनिकों की वापसी पक्की किए और न ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर कोई पक्का समझौता किया। दशकों बाद भी उन भारतीय सैनिकों की किस्मत का फैसला नहीं हुआ है।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।

कांग्रेस के वक्त हुई थी असली ‘वोट चोरी’

बाहरी पैसे का इस्तेमाल भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और चुनावी नतीजे सत्तारूढ़ कांग्रेस के पक्ष में झुकाने के लिए किया जा रहा था। लेकिन इस पर कांग्रेस ने देश से कभी माफी नहीं माँगी, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया।
राहुल गाँधी का दावा है कि भारत ‘बाहरी दबाव’ में फैसले ले रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कांग्रेस सरकारों के वक्त भारत की स्ट्रेटेजिक क्षमताएं कमजोर हुआ करती थीं। खुफिया तंत्र कमजोर था। अगर मैकगार और मोयनिहान की बात पर यकीन करें, तो सत्ताधारी पार्टी ने अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए विदेशी इंटेलिजेंस और फंडिंग का भी इस्तेमाल किया।
इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की ट्रेड बातचीत जाँच से बाहर होनी चाहिए। अमेरिका के साथ ट्रेड डील के हर शब्द, हर सेक्टर और हर क्षेत्र में फायदे की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लेकिन जाँच के लिए फैक्ट्स, दस्तावेजों और तर्कों की जरूरत होती है, न कि ‘आँखों में डर’ या इंटरनेशनल स्कैंडल्स को जबरदस्ती मुद्दा बनाने की।
राहुल गाँधी का भाषण लफ्फाजी और बगैर सबूत के आरोप लगाने के आदत को दिखाता है। देश की सुरक्षा को लेकर कांग्रेस के रिकॉर्ड खुद काफी खराब रहे हैं। ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाने से पहले, कांग्रेस को अपने अतीत में किए गए कार्यकलापों पर जवाब देना चाहिए।
राहुल गाँधी का आरोप कि मोदी सरकार ने अमेरिका से ट्रेड डील कर ‘भारत को बेच दिया।’ कॉन्ग्रेस का खुद का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का एक मजबूत इंटेलिजेंस सिस्टम बनाने से इनकार करना, 1966 में ताशकंद समझौता करना जिसमें भारत को युद्ध में मिली जीत पर पानी फेर देना। 1972 में कश्मीर या भारत के सैनिकों को रिहा करवाए बिना 93,000 पाकिस्तानी POWs को रिहा करना शामिल है। इतिहास बताता है कि युद्ध के मैदान में सेना जीतती है और बातचीत की टेबल पर कॉन्ग्रेस उसका फायदा नहीं उठा पाती और भारत का नुकसान करती रही है।