नया नहीं है विदेशी सेबों का आयात, मीडिया भारत-US ट्रेड डील पर भ्रम फैलाना बंद करे

                                                                 साभार: ऑपइंडिया अंग्रेजी
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के ढाँचे की घोषणा के बाद से आम लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि अंतिम समझौता कैसा होगा। राजनेता या तो इसका पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं या फिर इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं, जबकि व्यापारी वर्ग इसे सतर्क होकर आशावाद के साथ देख-समझ रहा है।

भारत-अमेरिका समझौते के तहत भारत ने सेब समेत कुछ खास कृषि उत्पादों पर अमेरिका को कोटा आधारित रियायतें देने पर सहमति जताई है। हालाँकि भारतीय बाजार में अमेरिकी सेब की एंट्री की संभावना ने खासकर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिकी सेब के लिए कोटा, भारतीय उत्पादकों की चिंताएँ और केंद्र सरकार का आश्वासन

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय सरकार ने अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50% से घटाकर 25% कर दिया है। इसके साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 75 से 80 रुपए प्रति किलो तय किया गया है। इसका मतलब यह है कि बहुत सस्ते सेब भारतीय बाजार में नहीं आ सकेंगे और स्थानीय किसानों के कारोबार को नुकसान नहीं पहुँचेगा।

                                                    मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

इसका कारण यह है कि टैक्स जोड़ने के बाद इन सेबों की कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक होगी। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर, खासकर कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों ने चिंता जताई है।

उनका मानना है कि सीमित मात्रा में भी अमेरिकी सेब का आयात, जो आकार में एकसमान, उच्च गुणवत्ता वाले और प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध होते हैं, घरेलू सेब की कीमतों पर दबाव डाल सकता है, खासकर उन सेबों पर जो कोल्ड स्टोरेज से निकालकर ऑफ-सीजन में बेचे जाते हैं।

गौरतलब है कि कश्मीर भारत के कुल सेब उत्पादन का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा देता है। ऐसे में सेब वहाँ की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक स्थिरता के लिए बेहद अहम हैं। जम्मू-कश्मीर में सेब उद्योग की कीमत लगभग 12,000 करोड़ रुपए आँकी जाती है और इससे करीब 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।

वर्ष 2024-25 के सीजन में करीब 21 लाख टन कश्मीरी सेब दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, अहमदाबाद, कोलकाता, मुंबई जैसे बड़े शहरों में बेचे गए। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के भी कई किसान अमेरिकी सेब के आयात को अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं।

उनका कहना है कि पहले से ही बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान, सीमित कोल्ड स्टोरेज सुविधाएँ और परिवहन की दिक्कतों ने उनके मुनाफे को कम कर दिया है। ऐसे में अगर पीक सीजन में अमेरिकी सेब आ गए तो कीमतें गिरेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

                                             मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स कम डीलर्स यूनियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अमेरिका और यूरोप से आने वाले सेब पर 100% से अधिक आयात शुल्क लगाने की माँग की है। यूनियन ने चेतावनी दी कि विदेशी सेब का उदार आयात भारत के बागवानी क्षेत्र को ‘बीमार उद्योग’ में बदल सकता है।

हिमाचल प्रदेश में भी यह चिंता जताई गई है कि वहाँ के प्रीमियम सेब 100 से 150 रुपए प्रति किलो बिकते हैं और अगर अमेरिकी सेब भी इसी कीमत पर उपलब्ध होंगे तो उपभोक्ता आयातित सेब को प्राथमिकता देंगे। कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिकी सेब के लिए MIP 100 रुपए प्रति किलो होना चाहिए था।

वहीं कई किसान यह भी कहते हैं कि इस समझौते का घरेलू सेब उद्योग पर खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि स्थानीय सेब गुणवत्ता में किसी से कम नहीं हैं। उनके अनुसार, MIP बढ़ाने की माँग करने की बजाय किसानों को सब्सिडी, बेहतर पौध और आधुनिक तकनीक पर जोर देना चाहिए।मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

इन तमाम चिंताओं के बीच केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बार-बार भरोसा दिलाया है कि घरेलू किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब या भविष्य में ऐसा कोई भी व्यापार समझौता नहीं करेगा, जिससे कृषि और डेयरी क्षेत्र में उसकी ‘रेड लाइन’ पार हो।

मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय किसानों और MSMEs सेक्टर के हित पूरी तरह संरक्षित हैं। सेब आयात के मुद्दे पर उन्होंने बताया कि देश में सेब की माँग 25-26 लाख टन से अधिक है, जबकि उत्पादन करीब 20-21 लाख टन है।

भारत पहले से ही हर साल करीब 5.5 लाख टन सेब आयात करता है, जिसमें अमेरिका बड़ा आपूर्तिकर्ता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेब की अंतिम कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो होगी, इसलिए स्थानीय किसानों को नुकसान की आशंका नहीं होनी चाहिए।

पीयूष गोयल ने कहा, “हम सेब के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हैं। हमारी माँग 25-26 लाख टन है, जबकि उत्पादन 20-21 लाख टन है। हम हर साल 5.5 लाख टन सेब आयात करते हैं, जिसमें बड़ी मात्रा अमेरिका से आती है। हमने सेब के बाजार को पूरी तरह नहीं खोला है, बल्कि कोटा दिया है, जो वर्तमान आयात से भी कम है।”

उन्होंने आगे कहा, “सेब पर न्यूनतम आयात मूल्य 50 रुपए है और 50 प्रतिशत शुल्क के बाद यह 75 रुपए हो जाता है। यानी इससे कम कीमत पर सेब देश में नहीं आ सकते। अमेरिकी सेब के लिए MIP 80 रुपए है और 25 प्रतिशत शुल्क के बाद कीमत करीब 100 रुपए हो जाती है। इससे किसानों को सुरक्षा मिलती है।”

मंत्री ने जोर देकर कहा कि सीमित मात्रा में आने वाले अमेरिकी सेब स्थानीय किसानों के लिए खतरा नहीं हैं और यह मौजूदा आयात से भी कम मात्रा में होंगे।

पीड़ित मानसिकता का चश्मा: हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश छोड़ना होगा

मोदी सरकार द्वारा सीमित और संतुलित रियायत देने के बावजूद कुछ स्थानीय हितधारक डर फैलाने और पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। यह मुद्दा केवल सेब तक सीमित नहीं है। भारत में नीतिगत और सार्वजनिक विमर्श में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को अक्सर ‘पीड़ित होने’ के रूप में देखा जाता है, जबकि इसे आत्म-सुधार का अवसर माना जाना चाहिए।

भारत एक मजबूत अर्थव्यवस्था और विशाल बाजार वाला देश है। वह विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में व्यापार और उद्योग को संरक्षणवाद की ढाल के पीछे छिपे रहने की आदत छोड़नी होगी। ऊँचे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं ने लंबे समय तक स्थानीय उत्पादकों को कठिन सुधारों से बचाए रखा।

2020 के किसान आंदोलन ने दिखाया कि अच्छे सुधार भी आसानी से स्वीकार नहीं होते। भारतीय सेब स्वाद में अच्छे हैं, लेकिन गुणवत्ता में एकरूपता की कमी, कमजोर ग्रेडिंग-पैकेजिंग, ठंडी भंडारण व्यवस्था की कमी और आधुनिक तकनीक को अपनाने में सुस्ती जैसी समस्याएँ हैं।

अमेरिकी सेब बेहतर तकनीक, कीट नियंत्रण, नियंत्रित वातावरण भंडारण और गुणवत्ता मानकों के कारण आगे हैं। यदि चिली, तुर्की और अन्य देशों से आने वाले सेब हिमाचल और कश्मीर के किसानों को खत्म नहीं कर पाए, तो केवल अमेरिकी सेब से अचानक इतना डर समझ से परे है।

भारतीय सेबों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है, कीमत अपेक्षाकृत कम है और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत है। असल मुकाबला उपभोक्ता की पसंद से तय होगा। यदि अमेरिकी सेब ज्यादा पसंद किए जाते हैं, तो इसका मतलब गुणवत्ता और मूल्य में अंतर है, जिसे घरेलू उत्पादकों को पाटना होगा। प्रतिस्पर्धा सुधार के लिए दबाव बनाती है।

1991 के बाद भारत के ऑटो, टेलीकॉम और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों में यही देखने को मिला। संरक्षणवाद से उपभोक्ताओं को नुकसान और महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं। इसलिए आत्मसंतोष की संस्कृति छोड़नी होगी।

मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीरी सेब उत्पादकों की चिंता को बढ़ा-चढ़ाकर कर रहा पेश

हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश देश के लिए ठीक नहीं है। हर व्यापार समझौते में कुछ को फायदा और कुछ को नुकसान होता है। भारत जैसी परिपक्व अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक झटकों को सहने और खुद को बेहतर बनाने की क्षमता दिखानी चाहिए और यहाँ के लोगों को संरक्षित लाभ के नुकसान पर शोक मनाने के बजाय अनुकूलन, कौशल उन्नयन और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक मानकों को पूरा करने की क्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए।

मेनस्ट्रीम मीडिया को भी कश्मीरी सेब उत्पादकों के सवालों के साथ संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। अमेरिकी सेब का सीमित और सुरक्षित आयात कोई अस्तित्व का संकट नहीं है। मीडिया को इस पर प्रकाश डालना चाहिए था कि भारत पहले से कई देशों से सेब आयात करता है और इससे घरेलू उत्पादन खत्म नहीं हुआ है।

डर और आक्रोश के शोर में यह तथ्य दब रहा है कि अमेरिकी सेब मुख्य रूप से प्रीमियम शहरी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करेंगे, न कि स्थानीय सेबों को पूरी तरह खत्म करेंगे। समय की माँग है कि उत्पादक गुणवत्ता, ब्रांडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, सरकार से तकनीक और निवेश में सहयोग माँगें और वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालें।

राहुल गेंडी के खिलाफ निशिकांत दुबे का Substantive Motion भाजपा को छोड़ना नहीं चाहिए; राहुल भाजपा ही नहीं देश का दुश्मन है; स्पीकर के चैंबर में कांग्रेस नेताओं की “गालियां” सार्वजनिक की जाए

सुभाष चन्द्र

भाजपा राहुल गेंडी को साथी सांसद समझ कर शिष्टाचार के नाते अपना दुश्मन बेशक न माने लेकिन वह भाजपा, नरेंद्र मोदी/RSS और देश को अपना दुश्मन मानता है और इसलिए अब वह किसी उदारता का अधिकारी नहीं रहा। उसकी पार्टी की महिला नेताओं ने जो प्रधानमंत्री की कुर्सी घेर कर जो तांडव किया और जो बड़े बड़े Playcards वो लोकसभा में लाई उसकी जांच होनी चाहिए। यह सुरक्षा में चूक का गंभीर मामला था और जो भी उसके लिए दोषी हो उसे दंडित किया जाना चाहिए। यह नए संसद भवन में सुरक्षा में दूसरी चूक है। पहली तब हुई थी जब कुछ मसखरे smoke bomb लेकर पहुंचे थे। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए राहुल को राजनीति का pin point भी ज्ञान नहीं। वो समझता है कि नेहरू से लेकर राजीव तक जिस खानदान के इतने प्रधानमंत्री हुए है तो मै जो बोलूंगा वही सही है। राहुल और कांग्रेस को नहीं मालूम कि सफेदपोशी गुंडागर्दी उनके लिए इतनी घातक होने जा रही जहाँ से कांग्रेस का उठना बहुत मुश्किल है। अगर सांसद निशिकांत दुबे का Substantive Motion पास हो गया तो भाई-बहन(राहुल-प्रियंका) की जोड़ी पार्टी को शमशान पहुंचा देंगे। INDI गठबंधन में शामिल पार्टियों को कोई देरी किये कांग्रेस से दूरी बना लेनी चाहिए। वरना कांग्रेस तो डूबेगी गठबंधन में पार्टियां भी डूब जाएँगी। 
संसद में प्रधानमंत्री के आने से पहले विपक्ष द्वारा मोदी की सीट को घेर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है। इसको कहते हैं गुंडागर्दी। क्या जनता ने संसद में गुंडागर्दी करने के लिए तुम्हे वोट दिया था? 

 दूसरे, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध जो अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है यह विपक्ष पर बहुत भारी पड़ने वाला है। प्रस्ताव गिरने के बाद जब उनकी वापसी होगी अपने संयम को भूल संसद में आकर विपक्ष के हंगामे पर कहर भरपा सकते हैं।        

किरेन रिजिजू ने स्पीकर के चैंबर में कांग्रेस के 20 - 25 सांसदों के हुड़दंग का वीडियो जारी करते हुए कहा है कि वो लोग जो गालियां दे रहे थे, वह बताई भी नहीं जा सकती - क्यों नहीं बताई जा सकती। नंगई का जवाब नंगई से देना ही उचित है। वो लोग इतनी नीचता पर उतर आए जो नाकाबिले बर्दाश्त गालियां दी स्पीकर के चैंबर में तो वे गालियां लोगों को भी पता चलनी चाहिए जिससे जनता को पता चले कि उन्होंने कैसे नेता चुन कर संसद में भेजे हैं। इसलिए वीडियो में गालियां स्पष्ट करके जनता को सुनाएं। 

राहुल और कांग्रेस ने मोदी को हलके में ले लिया। उन्हें पता नहीं मोदी का शांत रहना कभी कभी  किसी तूफान के आने से पहले की शांति होती है। जो उसे दुख देता है, उसकी आत्मा पर चोट करता है, धोखा देता है, उसे छोड़ना उसके स्वभाव में नहीं है। मौका देख कर ऐसे मक्कार को मारता कम है और घसीटता ज्यादा है और अब राहुल के दुर्दिन शुरू हुए समझो क्योंकि अबकी बार जो राहुल ने किया वह हो सकता है शिशुपाल की 100वीं यानी आखिरी गाली साबित होगी जो मोदी के लिए ये एपिसोड Turning Point बनेगा

राहुल गेंडी के विरुद्ध भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने Substantive Motion पेश किया है।  यह एक ऐसा स्व-निहित (self-contained) प्रस्ताव है जिसे सदन (लोकसभा) में पेश किया जाता है, जिस पर बहस की जा सकती है और मतदान के माध्यम से निर्णय लिया जा सकता है। यह आम तौर पर किसी गंभीर मुद्दे या आचरण की निंदा करने के लिए और सजा देने के लिए लाया जाता है

The notice accused Gandhi of "colluding with anti-India elements" and foreign organisations, such as the Soros Foundation, Ford Foundation, and USAID, and objects to his usage of unverified claims regarding a pending book by former Army Chief Gen MM Naravane. इसमें और भी आरोप लगाए जाने चाहिए जैसे राहुल ने देश को बेचने का आरोप लगाया है प्रधानमंत्री मोदी पर

यह प्रस्ताव विशेषाधिकार प्रस्ताव से अलग है और इसमें मांग की गई है कि  राहुल गेंडी की लोकसभा सदस्यता रद्द की जाए और उस पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाए

विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव तो दुबे जी मना कर दिया है कि वह नहीं लाया जाएगा

प्रस्ताव को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसे मतदान से समय मौजूदा सांसदों की संख्या के बहुमत से पारित किया जा सकता है। बहुमत जुटाने में भाजपा को कोई कठिनाई नहीं होगी और प्रस्ताव आसानी से पारित हो सकता है। यह एक Golden Chance है राहुल गेंडी को ठिकाने लगाने का जिसमें अबकी बार चूक नहीं होनी चाहिए। 

अर्थव्यवस्था की शानदार रफ्तार, प्रत्यक्ष कर संग्रह 9.4 प्रतिशत बढ़कर 19 लाख करोड़ रुपये के पार; बढ़ती महंगाई की मार झेलता वेतनभोगी

जब से देश में आयकर लागू हुआ है वेतनभोगी सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है व्यापारी वर्ग के पास टैक्स से बचने के हज़ार रास्ते है वेतनभोगी के पास नहीं। फिर भी बढ़ती महंगाई की जितनी मार वेतनभोगी पर पड़ती है किसी दूसरे पर नहीं। सरकार वेतनभोगियों पर पड़ रही मार से कब राहत दिलाएगी?  
देश की अर्थव्यवस्था के लिए टैक्स के मोर्चे पर एक बहुत बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की आर्थिक सेहत न केवल सुधर रही है, बल्कि रिकॉर्ड भी बना रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस वित्त वर्ष में सरकार की डायरेक्ट टैक्स से होने वाली कमाई 19 लाख करोड़ रुपये के पार निकल गई है। वित्त मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, 10 फरवरी तक देश का नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 9.4 प्रतिशत बढ़कर 19.44 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। पिछले साल इसी समय के मुकाबले यह बढ़ोतरी दिखाती है कि भारतीय बाजार और व्यापार जगत में काफी हलचल और मजबूती है। टैक्स राजस्व में आई यह तेजी ऐसे समय पर आई है जब वित्त वर्ष अपने अंतिम चरण में है। इससे सरकार का राजकोषीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी और विकास कार्यों के लिए सरकार के पास पर्याप्त फंड मौजूद रहेगा। इस रिपोर्ट में एक दिलचस्प पहलू टैक्स रिफंड का भी है। इस अवधि के दौरान सरकार द्वारा दिया जाने वाला टैक्स रिफंड 18.82 प्रतिशत घटकर 3.34 लाख करोड़ रुपये रह गया है। इसका मतलब है कि टैक्स फाइलिंग और प्रोसेसिंग अब पहले से अधिक सटीक और सुव्यवस्थित हो रही है।

जनवरी में GST कलेक्‍शन 6.2 प्रतिशत बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये पर
टैक्स कलेक्शन के मामले में सरकार को बड़ा फायदा हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी कलेक्शन जनवरी, 2026 में 6.2 प्रतिशत बढ़ गया है। इस साल जनवरी में सकल जीएसटी वसूली 1,93,384 करोड़ रुपये रही है। यह पिछले साल जनवरी के 1,82,094 करोड़ रुपये के मुकाबले 6.2 प्रतिशत ज्यादा है। वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 तक कुल जीएसटी कलेक्‍शन 18.43 लाख करोड़ रुपये रहा है। यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 17.01 लाख करोड़ रुपये से 8.3 प्रतिशत ज्‍यादा है। इस महीने जीएसटी राजस्व में सीजीएसटी 35,488 करोड़ रुपये, एसजीएसटी 43,553 करोड़ रुपये, आईजीएसटी 91,678 करोड़ रुपये और उपकर 5768 करोड़ रुपये रहे हैं। इस दौरान 22,665 करोड़ रुपये के रिफंड जारी किए गए।

कर संग्रह में उछाल मजबूत आर्थिक विकास का संकेत
भारत के प्रत्यक्ष कर संग्रह में लगातार वृद्धि देश के बढ़ते आधार और बेहतर अनुपालन उपायों को दर्शाता है। इसके साथ ही प्रत्यक्ष कर संग्रह में यह उछाल कॉर्पोरेट आय में वृद्धि, रोजगार और आय के बढ़ते स्तर को रेखांकित करता है। कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत आयकर संग्रह दोनों में मजबूत वृद्धि बताता है कि भारत का आर्थिक सुधार महत्वपूर्ण गति प्राप्त कर रहा है। भारत की आर्थिक मजबूती विकास को भी गति देने में कारगर साबित होगी। आखिरकार इसका लाभ टैक्सपेयर को ही मिलेगा।

जनवरी में तेज रफ्तार के साथ 58.5 पर पहुंचा सर्विस सेक्टर PMI
अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर यह है कि सर्विस सेक्टर ने जनवरी महीने में भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है। HSBC इंडिया सर्विसेज परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) जनवरी में बढ़कर 58.5 पर पहुंच गया। यह दो महीने का उच्चतम स्तर है। पीएमआई का 50 से अधिक रहना गतिविधियों में विस्तार और इससे नीचे का आंकड़ा सुस्ती का संकेत है। PMI के इस बढ़ते आंकड़े से साफ है कि सर्विस सेक्टर में मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। नए बिजनेस में बढ़ोतरी हुई है और कंपनियों ने टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ाया है, जिससे कुल ग्रोथ को सपोर्ट मिला है। HSBC के चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा कि जनवरी में पीएमआई का 58.5 पर पहुंचना सेक्टर में जारी तेजी को दर्शाता है।नए ऑर्डरों की लगातार आमद से आउटपुट में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि इस ग्रोथ में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया से आई अंतरराष्ट्रीय मांग की अहम भूमिका रही है। विदेशी बाजारों से मिले ऑर्डर्स ने सर्विस सेक्टर को और मजबूती दी है। भंडारी के मुताबिक, एफिशिएंसी में सुधार, बेहतर मार्केटिंग रणनीतियों और नए ग्राहकों के जुड़ने से कारोबारी भरोसा भी बढ़ा है। बिजनेस कॉन्फिडेंस तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है।

रिकॉर्ड 709.413 अरब डॉलर पर विदेशी मुद्रा भंडार
देश का विदेशी मुद्रा भंडार अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों के अनुसार, 23 जनवरी को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 8.053 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 709.413 अरब डॉलर के ऑल-टाइम हाई स्तर पर पहुंच गया। यह भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और वैश्विक स्तर पर बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। विदेशी मुद्रा भंडार के सबसे बड़े घटक फॉरेन करेंसी एसेट्स (एफसीए) की वैल्यू इस अवधि में 2.367 अरब डॉलर बढ़कर 562.885 अरब डॉलर हो गई। वहीं, गोल्ड रिजर्व में भी उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई और यह 5.635 अरब डॉलर की वृद्धि के साथ 123.088 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसके अलावा, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (एसडीआर) की वैल्यू 3.3 करोड़ डॉलर बढ़कर 18.737 अरब डॉलर हो गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास भारत की रिजर्व पोजिशन 1.8 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.703 अरब डॉलर हो गई।

इसके पहले 16 जनवरी 2026 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार में 14.167 बिलियन डॉलर की जबरदस्त बढ़ोतरी के साथ 701.360 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार सरकार की आर्थिक नीतियों, बेहतर पूंजी प्रवाह, निर्यात में सुधार और आरबीआई की प्रभावी मुद्रा प्रबंधन रणनीति का परिणाम है। मजबूत रिजर्व से न केवल रुपये को स्थिरता मिलती है, बल्कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से निपटने में भी देश की क्षमता बढ़ती है। बजट से पहले विदेशी मुद्रा भंडार का रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना मोदी सरकार के आर्थिक प्रबंधन की एक और बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

इसके पहले देश का मुद्रा भंडार 27 सितंबर 2024 को समाप्त सप्ताह के दौरान 12.59 अरब डॉलर उछलकर 700 अरब डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करते हुए 704.89 अरब डॉलर के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया था। विदेशी मुद्रा भंडार ने 4 जून, 2021 को 6.842 अरब डॉलर बढ़कर 600 अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार किया था। इसके पहले विदेशी मुद्रा भंडार ने 5 जून, 2020 को खत्म हुए हफ्ते में पहली बार 500 अरब डॉलर के स्तर को पार किया था। इसके पहले यह आठ सितंबर 2017 को पहली बार 400 अरब डॉलर का आंकड़ा पार किया था। जबकि यूपीए शासन काल के दौरान 2014 में विदेशी मुद्रा भंडार 311 अरब डॉलर के करीब था। मोदी राज में विदेशी मुद्रा भंडार दो गुना से ज्यादा बढ़ चुका है। मोदी राज में देश की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है और इसी वजह से ये भंडार भी बढ़ता जा रहा है, जो हमारे देश की आर्थिक स्थिरता को मजबूत करता है। जब देश के पास इतना बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार होता है, तो हमारा पैसा भी मजबूत रहता है और व्यापार और निवेश के लिए अच्छा माहौल बनता है।

2000 साल पहले भी होता था भारत-मिस्र में व्यापार, कब्रों में खुदे मिले तमिल-संस्कृत लिपियों में व्यापारियों के नाम: विदेशी शोधकर्ता भी हैरान

                    कब्रों पर खुदे तमिल-संस्कृत लिपियों में नाम की खोज (साभार: Deccan Herald)
मिस्र के ‘वैली ऑफ किंग’ नाम की प्राचीन कब्रों से 30 शिलालेख मिले हैं, जो लगभग 2000 साल पुराने हैं। इन शिलालेखों में भारत और मिस्र के बीच व्यापार और संपर्क की जानकारियाँ हैं। इन शिलाओं पर लिखे शब्द तमिली (प्राचीन तमिल-ब्राह्मी) और प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में हैं, जो यह साबित करते हैं कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप के लोग मिस्र आते-जाते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये शिलालेख 6 अलग-अलग रॉक-कट कब्रों में मिले हैं। इनमें से 20 शिलाएँ तमिली में और बाकी 10 शिलाएँ संस्कृत और प्राकृत में हैं। इसका मतलब यह है कि केवल दक्षिण भारत के ही नहीं बल्कि भारत के उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी हिस्सों से भी लोग मिस्र जाते थे। विशेष रूप से प्राचीन राजधानी थेब्स के भीतर स्थित राजाओं की घाटी में, जहाँ पहले से तीसरी ईस्वी के बीच मसालों और अन्य वसतुओं का व्यापार होता था।

इस खोज की जानकारी स्विट्जरलैंड की लॉजेन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ स्लाविक एंड साउथ एशियन स्टडीज (SLAS) के प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच और फ्रांस के पेरिस स्थित EFEO की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने दी है। उन्होंने बुधवार (11 फरवरी 2026) को तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) द्वारा तमिल शिलालेखों पर आयोजित सम्मेलन में यह जानकारी दी। इस कार्यक्रम में दुनियाभर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता शामिल हुए थे, जहाँ इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खोज को पहली सार्वजनिक रूप से बताया गया।

तमिल व्यापारी से लेकर राजा के दूत ने की मिस्र यात्रा

शोधकर्ताओं को एक बहुत अहम जानकारी भी मिली है। सिकाई कोर्रान (Cikai Korran) नाम के एक व्यक्ति ने अपना नाम मिस्र की 6 में से लगभग 5 कब्रों में कुल 8 बार खुदवाया है। माना जा रहा है कि वह एक तमिल व्यापारी था, जो प्राचीन ‘तमिलगम’ क्षेत्र से जहाज के जरिए मिस्र पहुँचा था।

इतिहासकारों का मानना है कि ‘कोर्रान’ नाम ‘कोर्रवाई’ देवी से जुड़ा हो सकता है, जो चेरा राजवंश के समय पूजी जाती थीं। इन देवी का उल्लेख दूसरी सदी की प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य रचना ‘शिलप्पदिकारम’ में भी मिलता है।

इसी के साथ एक शिलालेख में एक अन्य व्यक्ति का जिक्र संस्कृत में किया गया है, जिसे एक क्षहरात (Ksaharata) राजा का दूत बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि उत्तर-पश्चिम भारत के लोग भी मिस्र जाते थे, जिनमें केवल व्यापारी ही नहीं बल्कि शाही प्रतिनिधि के लोग भी शामिल थे।

मिस्र में मिले तमिली शिलालेखों ने शोधकर्ताओं को चौंकाया

प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हुआ जब मिस्र में तमिली भाषा के शिलालेख मिले। इन कब्रों को हर साल लाखों लोग देखते हैं, लेकिन पहले किसी ने इन्हें नोटिस नहीं किया। कब्र नंबर 14 में ‘सिकाई कोर्रान’ नाम करीब 6 मीटर ऊँची दीवार पर अकेला लिखा मिला। स्ट्राउच ने 2024 में पहला शिलालेख खोजा और बाद में प्रो. शार्लोट श्मिड के साथ मिलकर कुल 30 शिलालेख ढूँढे, जिनमें 20 तमिली में हैं, जबकि भारत में ऐसे करीब 100 ही मिले हैं।

प्रो. श्मिड ने इसे असाधारण खोज बताया। उन्होंने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि उस समय लिपि का उपयोग कितना होता था और भारत में ऐसे शिलालेख कम क्यों हैं। संभव है कि लिखने का माध्यम अलग रहा हो या व्यापारी समुदाय की अपनी परंपराएँ रही हों। दोनों शोधकर्ताओं का मानना है कि उस दौर के व्यापारी कई भाषाएँ जानते थे और ग्रीक भी पढ़ सकते थे, क्योंकि तमिलगम के व्यापारिक समझौते ग्रीक में लिखे जाते थे।

भारत-रोम व्यापार के नए सबूत

प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने यह भी कहा कि रोमन काल में ग्रीक भाषा जानना बहुत जरूरी था। उनका मानना है कि ग्रीक जानने वाले लोग भारतीय शिलालेख नहीं पढ़ते थे, लेकिन भारतीय व्यापारी ग्रीक जरूर पढ़ और समझ सकते थे। उस दौर में बिना ग्रीक पढ़े-लिखे काम चलाना मुश्किल था।

TNSDA के अकादमिक सलाहकार प्रोफेसर के राजन ने बताया कि भारत का समुद्री व्यापार सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) से ही शुरू हो गया था और शुरुआती ऐतिहासिक काल में यह और तेज हुआ। उस समय ज्यादातर सामान भारत से पश्चिमी देशों की ओर जाता था। IVC के बाद गुजरात और तमिलगम (मुजिरि, केरल) से व्यापारी समूह उभरे, जो तमिल भाषा का इस्तेमाल करते थे।

रोमन लोग भारतीय वस्तुओं, खासकर काली मिर्च के दीवाने थे। नई खोज से भारत और रोमन साम्राज्य के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध साबित होते हैं। यह खोज तमिल ब्राह्मी लिपि और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर नई चर्चा भी शुरू करती है। थेब्स में मिले शिलालेखों को लाल सागर के बंदरगाह बेरेनाइक से जोड़ा गया है, जहाँ 30 साल से खुदाई चल रही है और भारतीय भाषाओं, यहाँ तक कि तमिल में भी शिलालेख मिले हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः जस्टिस स्वामीनाथन के निर्णय पर मुहर लगा दी; तमिलनाडु DMK सरकार का लक्ष्य सम्पूर्ण सनातन धर्म को समाप्त करना है जिसमें सभी हिंदू शामिल हैं

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने सोमवार 9 फरवरी, 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने से मना करते हुए थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित सिकंदर बादशाह बुलिया दरगाह को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने नेल्ली थोपू इलाके में मुस्लिमों को रोजाना नमाज पढ़ने पर रोक लगाते हुए सिर्फ रमजान और बकरीद के मौकों पर ही नमाज की इजाजत दी थी साथ ही दरगाह परिसर में जानवरों की कुर्बानी पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई थी।


यह निर्णय सबसे पहले जस्टिस स्वामीनाथन की एकल पीठ ने एक दिसंबर, 2025 को दिया था जिसे हाई कोर्ट में राज्य सरकार ने चुनौती दी थे अपील पर जस्टिस G. Jayachandran and K.K. Ramakrishnan की खंडपीठ ने जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले को उचित ठहराया जस्टिस स्वामीनाथन के आदेश पर स्टालिन सरकार ने अमल नहीं किया और वह अवमानना का केस झेल रही है विपक्ष के नेताओं को जस्टिस स्वामीनाथन के हिंदुओं के पक्ष में दिए गए निर्णय ने पागल कर दिया और उन्होंने जस्टिस स्वामीनाथन के विरुद्ध महाभियोग की कार्रवाई शुरू कर दी जो अभी तक सफल नहीं हुई 

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महाभियोग चलाना तो आजकल एक फैशन हो गया - कपिल सिब्बल इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ हिंदुओं के पक्ष में बोलने के लिए महाभियोग ले आए, स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग, 10 दिन पहले ममता बनर्जी CEC ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की बात कर रही थी और एक दिन पहले कांग्रेस और समाजवादी ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ले आए

अंग्रेजों के समय में उनकी अदालतों ने भी मस्जिद स्थल को छोड़ कर पहाड़ी का बाकी हिंदुओं की संपत्ति बताई थी

कुछ वर्षों से मुस्लिम पक्ष ने पहाड़ी पर रोजाना नमाज, कुर्बानी और नाम बदलने की कोशिश की, जिसका हिंदू संगठनों ने विरोध किया मुस्लिमों ने कार्तिगई दीपम प्रज्ज्वलित करने पर रोक की मांग की और DMK सरकार ने मुस्लिमों का साथ देते हुए जस्टिस स्वामीनाथन के आदेश को हाई कोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी हाई कोर्ट में स्टालिन सरकार ने एक ही रोना रोया कि कार्तिगाई दीपम से कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है

मद्रास हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में संतुलन बनाते हुए मुस्लिमों को सीमित अधिकार दिए, लेकिन रोजाना धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाई। हाईकोर्ट ने पशु बलि को भी प्रतिबंधित किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हाईकोर्ट का आदेश संतुलित है और इसमें बदलाव की जरूरत नहीं मुस्लिम सिर्फ रमजान और बकरीद पर ही दरगाह में नमाज पढ़ सकते हैं, रोजाना नहीं दरगाह परिसर में जानवरों की कुर्बानी पर रोक बरकरार रहेगी” 

अब तक DMK सरकार और मुस्लिमों को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से कुछ उम्मीद थी लेकिन वह भी खत्म हो गई और इसलिए अब अराजकता का माहौल खड़ा करना एकमात्र रास्ता है हिंदुओं को मंदिर से दूर करने का अब हो सकता है मदुरै में दंगे कराए जाएं और DMK सरकार  हिंदुओं का दमन करेगी

यह बात हिंदू समाज के प्रत्येक वर्ग को याद रखनी चाहिए कि DMK और कांग्रेस खुलेआम सनातन धर्म को समाप्त करने का अभियान छेड़े हुए हैं और सनातन समाज में दलित, आदिवासी, OBC और सवर्ण शामिल हैं जिन्हें  DMK और कांग्रेस एक साथ मुस्लिम वोट बैंक लिए समाप्त करना चाहते हैं नाकि सनातन धर्म के किसी एक वर्ग को हिंदुओं को एक बात पता होनी चाहिए कि कर्नाटक सरकार 2013-14 to 2018-19 के दौरान लोन लेने वाले मुस्लिम किसानों का 267 करोड़ का ब्याज माफ़ कर रही है,  किसी हिंदू किसान का नहीं

2 चीफ जस्टिस NV RAMNA और डी वाई चंद्रचूड़ पीछे पड़े थे राजद्रोह एवं देशद्रोह का कानून ख़त्म करने के; क्या आज राहुल गांधी / पेंगुइन और नरवणे पर राजद्रोह का मुकदमा नहीं चलना चाहिए

सुभाष चन्द्र

रमना और चंद्रचूड़ एक तरह पगला गए थे राज द्रोह और देश द्रोह के कानून को ख़त्म करने के लिए उनका कहना था कि वह अंग्रेजों का कानून था स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ और गांधी और तिलक के खिलाफ इस्तेमाल किया गया लेकिन ये दोनों महानुभाव भूल गए कि राजद्रोह तो किसी भी सरकार के खिलाफ बगावत हो सकती है और देश की संप्रभुता और एकता अखंडता को कभी भी चुनौती दी जा सकती है। गांधी को उस कानून में एक बार 6 साल की सजा हुई थी लेकिन वह 2 साल बाहर आ गए बीमारी की वजह से और नेहरू पर तो कभी वह कानून लगा ही नहीं

आज के सन्दर्भ में राहुल गांधी, जनरल नरवणे और पेंगुइन हर किसी पर BNS की धारा 152 के तहत, अब 'राजद्रोह' के बजाय भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता (Sovereignty, Unity, and Integrity) को खतरे में डालने वाले कार्य के लिए देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हो सकता है में अपने कल के लेख में इन तीनों पर The Official Secrets Act (OSA), 1923 का उल्लंघन का आरोप लग सकता है क्योंकि शक की सुई इनके इर्द गिर्द घूमती है जनरल की पुस्तक लीक करने के लिए जो अभी तक सरकार के अनुसार छपी नहीं

राहुल गांधी ने 2 फरवरी को किताब को लोकसभा में लहरा का उसके अंश पढ़ने की कोशिश की थी जबकि उसे सदन के नियमों का हवाला देते हुए स्पीकर ने पढ़ने से मना किया था पेंगुइन का बयान गूगल पर कई दिन पहले आ गया था लेकिन कंपनी X पर कल 8 दिन बाद बोली, और जनरल नरवणे भी 8 दिन तक खामोश रहे - जब FIR दर्ज होने के बाद जांच तेज हो गई, तब ये डर से बाहर आए क्योंकि यह तो जांच का विषय होगा कि किताब बिना प्रकाशित हुए किसने लीक की राहुल गांधी ने वह पुस्तक संसद के बाहर The Wire के अनुसार 4 फरवरी को जनता को दिखाई थी इसलिए वो संसद में अपने कृत्य के बचाव में बहाना नहीं कर सकता

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उसी दिन कांग्रेस की 8 महिलाओं ने घोर पाप किया जो प्रधानमंत्री मोदी को कलंकित करने के लिए बड़ा घटिया और चरित्रहीनता का परिचय दिया उन 8 महिलाओं ने और उस पर सबने और प्रियंका वाड्रा ने तोहमत लगाई कि प्रधानमंत्री महिलाओं से डर कर नहीं आए “नंग बड़े परमेश्वर से” अपनी इज़्ज़त अपने हाथ होती है कांग्रेस की महिलाएं अगर हिज़डों की तरह प्रधानमंत्री की सीट पर उन्हें घेर कर अपने कपड़े उतार लेती तो वह बेशर्मी देखने से तो बेहतर था कि ऐसी बदनाम गली में जाया ही न जाए कांग्रेस की गिरावट की कोई सीमा नहीं है उससे और फर्जी गांधी परिवार से कुछ भी उम्मीद की जा सकती है

लेकिन राहुल गांधी कानून से बचने की कला जानता है और तभी उसके मुक़दमे 12 - 14 साल से चल रहे है जो ख़त्म ही नहीं होते नरवणे और पेंगुइन को भी वकील लोग बता देंगे कैसे बचना है

पुलिस जांच में शामिल ही नहीं होगा राहुल गांधी पुलिस फिर हो सकता है कोर्ट में शिकायत दर्ज कर उसे जांच में शामिल होने की मांग करे कोर्ट आदेश दे देगा लेकिन उसे लेकर वह हाई कोर्ट चला जायेगा साल दो साल मामला हाई कोर्ट में लटक जाएगा फिर सुप्रीम कोर्ट अगर हाई कोर्ट ने उसके खिलाफ फैसला दे दिया तो सुप्रीम कोर्ट 6-6 महीने सुनवाई नहीं करेगा हेराल्ड हाउस को खाली करने का मामला सुप्रीम कोर्ट ने 5 अप्रैल, 2019 को स्टे किया था और तब से अब तक 7 साल से मामला दबा हुआ है

लेकिन अब मोदी/अमित शाह को राहुल गांधी और उसकी मंडली के लोगों पर कोई रहम नहीं बरतना चाहिए अटल जी बहुत भारी गलती की उसे बोस्टन में छुड़ा कर जिसका सिला वह ऐसे दे रहा है बेहतर होता बोस्टन की जेल में सड़ता रहता और अब अगर कोई ऐसा मौका आता है तो रगड़ देना चाहिए 

FIR होते ही सारे बंट निकल गए पप्पू के आज चुपचाप सदन में आया जो भी बकना था बका पर भूल के भी नरवणे की किताब का नाम तक नही लिया सोचिए जिस बिना छपि किताब पर तीन दिन तक इतना ग़दर काटा उस किताब का आज गलती से भी नाम तक नही लिया क्यो .....क्योंकि उसे समझ आ गया है की उसकी बकरी फाटक में फंस चुकी है
अब सत्ता पक्ष पप्पू के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की भी घोषणा कर चुका है।
ओरइधर ओम बिरला जी के खिलाफ जो अविश्वास लाया है उसमे TMC शामिल नही है व सपा और dmk कब से सदन में खुद को हंगामे से दूर रखें हुवे है कुल मिला कर पप्पू के हर मुद्दे पर पहले सब साथ देते है पर इसको फसा कर बाकी सब तुरन्त पीछे हट जाते है पप्पू कांग्रेस को इतनी एक्सपोज कर देगा कि जो इन्हें वोट देता है उसकी भी आत्मा एक बार उसे धिक्कारेगी जरूर की

‘हुमायूं हम आएंगे, बाबरी फिर गिराएंगे’ से हिंदुओं की हुंकार, बंगाल में बाबरी के जिन्न से ममता की मुश्किलें चौतरफा बढ़ीं


मुर्शिदाबाद में तृणमूल कांग्रेस के हुमायूँ कबीर(अब पार्टी से निष्काषित) द्वारा बाबर के नाम पर मस्जिद बनाए जाने से ममता बनर्जी के सत्ता में आने के रास्ते में कांटे बिछा दिए हैं। ममता के लिए आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति है यानि ममता मस्जिद का विरोध करती है मुस्लिम वोटबैंक बुरी तरह से छिटक जाएगा, इसलिए ममता ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। लेकिन चुप्पी भी ममता को भारी पड़ने जा रही है।     

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से ध्रुवीकरण की जमीन तैयार हो रही है, उसने ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ाकर रख दी है। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के पोस्टर—“हुमायूं हम आएंगे, बाबरी फिर गिराएंगे” के साथ ही हिंदुओं ने हुंकार भरी है कि पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद को नहीं बनने दिया जाएगा। दरअसल, बाबरी विवाद ने ममता बनर्जी की राजनीति की कमजोर नस पकड़ ली है। विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनने से यह सियासी आग उनकी सत्ता को झुलसा सकती है। बंगाल का चुनाव अब सिर्फ सत्ता का संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह पहचान, आस्था और राजनीतिक भविष्य की लड़ाई बन चुका है। लखनऊ में विश्व हिंदू रक्षा परिषद का बाबरी को लेकर नारा सिर्फ एक संगठन का उग्र बयान नहीं, बल्कि यह जागृत हो चुके हिंदुओं के ज्वालामुखी का संकेत है, जो मुर्शिदाबाद से निकलकर पूरे पश्चिम बंगाल राजनीति को झुलसाने की तैयारी में है। बाबरी मस्जिद विवाद का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ चुका है और इसका सबसे बड़ा नकारात्मक असर तृणमूल कांग्रेस पर पर पड़ता दिख रहा है। क्योंकि तुष्टिकरण की राजनीति के भंवर में फंसी ममता बनर्जी से अब बाबरी की जिन्न ना निगला जा रहा है और ना ही उगला जा रहा है।

लखनऊ में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने पर भारी विरोध
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से विश्व हिंदू रक्षा परिषद ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बन रही एक मस्जिद का विरोध करने के लिए ‘मुर्शिदाबाद चलो’ का नारा दिया। इस मस्जिद की आधारशिला टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर 2024 को रखी थी, जिसे उन्होंने “बाबरी मस्जिद की तर्ज पर” बनाने का दावा किया था। लखनऊ में संगठन के कार्यकर्ताओं ने हाथों में फावड़ा, कुल्हाड़ी और भगवा झंडा लेकर प्रदर्शन किया और “बंटोगे तो कटोगे” आदि नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे बाबर के नाम पर किसी भी नई संरचना का निर्माण नहीं होने देंगे। 10 फरवरी (मंगलवार) को जब संगठन के कार्यकर्ता लखनऊ से मुर्शिदाबाद के लिए रवाना होने वाले थे, तब उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें रोक दिया। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय को उनके आवास पर नजरबंद कर दिया। क्योंकि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार नहीं चाहती कि कानून-व्यवस्था में किसी तरह का खलल पड़े। यह कार्रवाई बताती है कि मामला कितना संवेदनशील हो चुका है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी-शैली मस्जिद ने आग में घी डाला
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यही मस्जिद निर्माण कार्य में 1000 से 1200 धर्मगुरुओं द्वारा कुरान की तिलावत भी की गई। इसके साथ ही इस कथित बाबरी मस्जिद का विरोध भी तेज हो गया है। यह विवाद अब केवल स्थानीय नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। जिस तरह हिंदू संगठन सड़क पर उतरने को तैयार हैं, योगी और ओवैसी आदि नेता मैदान में हैं और ममता बनर्जी असहज चुप्पी साधे बैठी हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि यह मुद्दा बंगाल चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में सस्पेंडेड टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद के नाम से मस्जिद की नींव रखने की घोषणा ने सियासत को विस्फोटक मोड़ दे दिया। कबीर ने कहा कि यह महज धार्मिक पहल नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग है। यह मामला केवल राजनीतिक नहीं रहा, समाज के विभिन्न वर्गों ने इसे अलग-अलग रुख से लिया है। हिन्दू संगठनों ने इसे ‘अवैध’ और ‘संविधान के अनुरूप नहीं’ करार दिया है और बुलंद आवाज़ों में यह मांग उठी है कि सरकार कबीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे।

हुमायूं के 100 सीटों पर लड़ने के ऐलान से ममता पर संकट
टीएमसी से निलंबित हुमायूं कबीर अब खुद को स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनाने की कोशिश में हैं। नई पार्टी बनाने और 100 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारने के ऐलान ने ममता बनर्जी के लिए अंदरूनी संकट खड़ा कर दिया है। टीएमसी चाहे औपचारिक रूप से उनसे दूरी बनाए, लेकिन यह विवाद ममता सरकार की प्रशासनिक कमजोरी और राजनीतिक असमंजस को उजागर करता है। इसके अलावा कबीर यदि किसी गठबंधन में चुनाव लड़े तो वह तृणमूल कांग्रेस के ही कोर वोट बैंक में सैंध लगाएगा। अब सवाल यह है कि क्या बंगाल का चुनाव रोज़गार, उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर होगा या फिर बाबरी मस्जिद जैसे भावनात्मक विषयों पर होगा। ममता सरकार के दौरान यह विवाद खड़ा होना, उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

बाबरी विवाद: भाजपा के लिए अवसर, टीएमसी के लिए संकट
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को ममता सरकार की विफलता के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी का दावा है कि बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति ने सामाजिक संतुलन बिगाड़ दिया है। बाबरी विवाद भाजपा को हिंदू मतों के ध्रुवीकरण का अवसर दे रहा है, जबकि टीएमसी का पारंपरिक समीकरण दरकता दिख रहा है। विधानसभा चुनाव में ओवैसी और हुमायूं कबीर जैसे चेहरे मुस्लिम मतदाताओं को अलग दिशा में मोड़ सकते हैं। इससे टीएमसी का मुस्लिम वोट बैंक भी कमजोर हो सकता है। यही वजह है कि यह विवाद ममता बनर्जी के लिए दोहरी मार साबित हो सकता है यानी हिंदू नाराज और मुस्लिम बंटे हुए। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि बंगाल धीरे-धीरे धार्मिक राजनीति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।

ममता बनर्जी के लिए क्या है खतरा?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति पर यह विवाद गंभीर प्रभाव डाल रहा है। टीएमसी की तरफ से इसकी शुरुआत को पार्टी की आधिकारिक नीति नहीं बताते हुए दूरी बनाई गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से जनता तक पहुंचाने में कठिनाई हो रही है। हुमायूं कबीर के सार्वजनिक आरोपों और टिप्पणिओं ने टीएमसी नेतृत्व को अंदरूनी विवाद में उलझाया है। इसके अलावा, ओवैसी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के बंगाल आने की खबरें राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना रही हैं। इससे यह उदाहरण स्थापित हो रहा है कि चुनावों में धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों को उघाड़ने से स्थिति अस्थिर हो सकती है। राजनीतिक समीकरणों का निचोड़ यह है कि बाबरी मस्जिद विवाद वोट बैंक राजनीति का एक नया मोड़ है। हिंदू मतदाताओं के बीच स्पष्टता की उम्मीदें पैदा होती दिख रही हैं। दरअसल, अब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से कोई स्पष्ट और मजबूत बयान नहीं आया है। यह चुप्पी बताती है कि वह दो पाटों के बीच फंसी हुई हैं—एक तरफ मुस्लिम वोट बैंक, दूसरी तरफ नाराज हिंदू मतदाता। यही असमंजस उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बनता जा रहा है।

कयामत के दिन तक भी बाबरी ढांचा नहीं बनेगा- सीएम योगी
उधर उत्तर प्रदेश से बाबरी मस्जिद विवाद का जिन्न एक बार फिर फूट पड़ा है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से बाबरी मस्जिद विवाद यहां गरमा गया है। मामले में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी मैदान में उतर गए हैं। सीएम योगी ने मुद्दे पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण कभी भी नहीं होगा, कयामत तक बाबरी ढांचा नहीं बनेगा। बाराबंकी के श्री राम जानकी मंदिर में आयोजित दशम श्री हनुमान विराट महायज्ञ में सीएम योगी ने कहा कि यह सरकार जो बोलती है, करके दिखाती है। यह जितना करती है, उतना ही बोलती है। हमने कहा था रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। सीएम योगी ने सवालिया लहजे में जनसमूह से पूछा कि क्या आज कोई संदेह है? हम आज फिर इस बात को कह रहे हैं कि कयामत के दिन तक भी बाबरी ढांचा नहीं बनेगा। उन्होंने कहा कि कयामत का दिन तो कभी आना नहीं है, इसलिए बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण भी कभी होना नहीं है। सीएम योगी कहा कि कयामत के दिन के आने का जो लोग सपना देख रहे हैं, ऐसे ही सड़ गल जाएंगे। कयामत का वह दिन कभी आने वाला नहीं है। जिन्हें सपना देखना है, देखते रहें। हम अपनी विरासत को सम्मान देते हुए, भारत की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करते रहेंगे।

मुस्लिम वोटों के लिए औवेसी और हुमायूं कबीर के मिलने की अटकलें
सीएम योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कानून तोड़ने वालों के लिए प्रदेश में कोई जगह नहीं है। अगर कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे। कयामत के दिन के लिए मत जियो। हिंदुस्तान में कायदे से रहना सीखो। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर कोई भी यहां कानून तोड़ने की कोशिश करेगा तो उसके लिए कानून के तहत ही कार्रवाई होगी। ऐसे लोगों का रास्ता जहन्नुम की तरफ ही जाता है। कानून तोड़कर अगर कोई जन्नत जाने का सपना देख रहा है तो उसका सपना कभी पूरा नहीं होने वाला है। हैदाराबाद वाले भड़काऊ भाईजान ओवैसी भी मुर्शिदाबाद जाने की सोच रहे हैं। यहां पर औवेसी और हुमायूं कबीर मिलकर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने की रुपरेखा बना सकते हैं। अयोध्या में दफ्न हो चुकी बाबरी को मुर्शिदाबाद में जिंदा कर हुमायूं कबीर ने एक ऐसे विवाद को जन्म दे दिया है जिसके नासूर बनने की पूरी आशंका है। लखनऊ के पोस्टर इसकी तस्दीक कर रहे हैं कि भविष्य में यह बड़ा मुद्दा बनने वाला है।

ममता बनर्जी ने बड़ी कृपा की जो चुनाव आयोग की तरह सुप्रीम कोर्ट को भी भाजपा का एजेंट नहीं कहा; ममता की दाल नहीं गली सुप्रीम कोर्ट में; सिब्बल/सिंघवी/दीवान फेल हो गए

सुभाष चन्द्र

4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ ममता की याचिका पर सुनवाई से 2 दिन पहले ममता बनर्जी CEC ज्ञानेश कुमार से मिलने गई थी जिसकी आवश्यकता नहीं थी जब कोर्ट में सुनवाई होनी थी। लेकिन ममता ने राजनीति करनी थी और उसके अनुसार आयोग के कार्यालय से बाहर निकल कर उसने ड्रामा करते हुए कहा

-हमें अपमानित और लज्जित किया जिस वजह से हमने मीटिंग का बहिष्कार किया;

-CEC “extremely arrogant और झूठे हैं” और दावा किया कि वो भाजपा के इशारों पर काम कर रहे हैं;

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-आयोग ने 58 लाख लोगों के नाम बिना जांच काट दिए - आयोग backdor mechanism से हमारे लोगों के नाम काट रहा है; (मतलब 24.18 लाख मरे हुए लोग भी आपको वोट देते थे);

-आयोग वोटरों के नाम काटने के लिए AI का उपयोग कर रहा है यह काम बंगाल में किया जा रहा है, भाजपा शासित राज्यों में नहीं;

-SIR बंद होना चाहिए और CEC पर महाभियोग शुरू होना चाहिए -

ये बातें सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से ठीक 2 दिन पहले कही और सुनवाई के दिन ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में खुद जिरह कर कोर्ट को राजनीति का अखाड़ा बनाते हुए कहा -

-लोकतंत्र को बचा लीजिए;

-चुनाव आयोग का SIR वोट काटने के लिए किया जा रहा है, वोट जोड़ने के लिए नहीं;

-चुनाव आयोग whatsapp commision की तरह काम कर रहा है;  

-आयोग चुनाव के समय केवल बंगाल को निशाना बना रहा है -

परसों सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस अंजारिया की पीठ ने सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि SIR के काम में कोई बाधा सहन नहीं की जाएगी जो भी आदेश या स्पष्टीकरण देने की जरूरत होगी, हम देंगे लेकिन कोई बाधा नहीं डालने दी जाएगी, CJI सूर्यकांत ने कहा

पीठ ने बंगाल की ममता सरकार को यह भी आदेश दिए कि वह आयोग को Group - B अधिकारियों को आयोग को SIR के कार्य के सौपे जिससे वह “ECI-MIcro-Observers” को हटा सके SIR से संबंधित शिकायतों के निपटान के अंतिम आदेश Electoral Registration Officer ही कर सकेंगे, micro officers और बाद में Group-B अधिकारी उन्हें सहयोग करेंगे। बेंच ने 14 फरवरी तक समय बढ़ा दिया आयोग को electoral list publish करने के लिए

ममता बनर्जी ने एक खास मांग की थी कि आयोग को निर्देश दिए जाएं कि कोई भी Instruction वो whatsapp पर न दे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई आदेश नहीं दिए यानी whatsapp जारी रहेगा

4 फरवरी को बंगाल सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल भी पेश हुए थे, कल सरकार के तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए और ममता की तरफ से श्याम दीवान थे यानी SIR को रोकने के लिए बंगाल 3 वरिष्ठ वकीलों की फीस जनता के पैसे से खर्च कर रहा है जो लाखों की फीस एक दिन में लेते हैं यह एक अलग तरह की लूट है

सुप्रीम कोर्ट के कल के आदेश पर मेरे एक मित्र ने लिखा कि - 

“जो सख्ती केंद्र सरकार को चुनाव आयोग को सुरक्षा देकर करनी थी, वह सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, लाचार केंद्र के कारण चुनाव आयोग भी असहाय दिख रहा है बंगाल में दोनों फेल हो चुके हैं”

अब यह कहना तो हद पार करना हो गया चुनाव आयोग ने लट्ठ बजा रखा है जिसकी वजह से ममता सुप्रीम कोर्ट भागती फिर रही है जहां तक सुरक्षा देने का सवाल है वह राज्य सरकार का काम है और जरूरत पड़ने पर केंद्र CRPF की सहायता दे भी रहा है अगर केंद्र और आयोग को विफल कहना है तो सुप्रीम कोर्ट को भी विफल कहना होगा क्योंकि उसके निर्देशों के बावजूद  ममता ढीला रवैया अपना रही है केंद्र वैसे भी आयोग के काम में दखल नहीं दे सकता बिना दखल ममता आयोग को भाजपा का एजेंट कह रही है और अगर दखल दिया केंद्र ने तो पता नहीं क्या कहेगी

बांग्लादेश : कट्टरपंथ फैलाते-फैलाते यूनुस ने भर ली जेब, एक साल में 1.61 करोड़ टका बढ़ी संपत्ति: बीवी भी हुईं मालामाल


मुस्लिम कट्टरपंथियों के इशारे पर नाचने वाले उपद्रवियों को आंखें खोलनी चाहिए। उन्हें मिलती गोली, जेल या फिर जिस्मानी चोट, जबकि उनके आका अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश इसकी मिसाल है। ये हाल सभी जगह है। दंगों में मरता आम नागरिक है किसी कट्टरपंथी और उनके आकाओं के घर के परिंदे तक कुछ नहीं होता। मरती जनता ही है चाहे वह उपद्रवी ही क्यों न हो।   

बांग्लादेश चुनाव से दो दिन पहले मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सलाहकारों की संपत्ति का ब्योरा जारी किया गया है कैबिनेट डिवीजन ने इसे मंगलवार को जारी किया इस ब्योरा के अनुसार 30 जून तक अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहाकार मोहम्मद यूनुस की कुल संपत्ति 15 करोड़, 62 लाख, 44 हजार और 65 टका है

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की संपत्ति में पिछले एक साल के दौरान बड़ी बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, जून 2024 में मोहम्मद यूनुस की कुल संपत्ति 14.01 करोड़ टका थी, जो जून 2025 तक बढ़कर 15.62 करोड़ टका हो गई है।

यानी महज एक साल में उनकी दौलत करीब 1.61 करोड़ टका बढ़ गई। दिलचस्प बात यह है कि देश का नेतृत्व कर रहे यूनुस पूरी तरह कर्ज मुक्त हैं। यूनुस की कमाई में यह उछाल मुख्य रूप से बैंक बचत, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), निवेश योजनाओं और विरासत में मिले शेयरों की वजह से आया है।

मोहम्मद यूनुस की वित्तीय संपत्ति अब 14.76 करोड़ टका है, जबकि विदेशों में मौजूद उनकी संपत्ति भी बढ़कर लगभग 64.73 लाख टका हो गई है। साथ ही, उनकी बीवी अफरोजी यूनुस की संपत्ति भी 2.11 करोड़ से बढ़कर 2.27 करोड़ टका हो गई है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद नेताओं की संपत्ति सार्वजनिक करने की बढ़ती माँग के बीच ये आँकड़े सामने आए हैं।

एक साल पहले यह 14 करोड़, 13 लाख, 96 हजार और 73 टका थी. यानी, एक साल में मोहम्मद यूनुस की संपत्ति में 1 करोड़, 61 लाख, 4 हजार 392 टका की बढ़ोतरी हुई

उन्होंने कहा कि सेविंग्स सर्टिफिकेट को कैश कराने, सेविंग्स या टर्म डिपॉजिट में बढ़ोतरी, विरासत में मिले शेयर वगैरह की वजह से कुल संपत्ति बढ़ी

जानें यूनुस की पत्नी के पास कितनी संपत्ति

चीफ एडवाइजर की पत्नी अफरोजी यूनुस की कुल संपत्ति एक करोड़, 27 लाख, 63 हजार और 360 टका है यह पिछले साल दो करोड़, 11 लाख, 77 हजार, 278 टका था. इस तरह से उनकी संपत्ति में 84 लाख, 13 हजार और 914 टका की कमी आई है

प्रथम आलो की रिपोर्ट के अनुसार इनकम टैक्स एक्ट के मुताबिक, संपत्ति किसी टैक्सपेयर के मालिकाना हक वाली अचल, चल, फाइनेंशियल और कैपिटल संपत्ति का जोड़ है

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का किया था वादा

उन्होंने अपने भाषण में यह भी बताया कि राज्य लेवल पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संविधान के आर्टिकल 77 में किए गए वादे के मुताबिक एक ओम्बड्समैन नियुक्त करने के लिए एक ऑर्डिनेंस बनाया जाएगा
उस साल 1 अक्टूबर को, अंतरिम सरकार के एडवाइजर और बराबर हैसियत वाले लोगों की इनकम और संपत्ति के खुलासे की पॉलिसी, 2024 जारी की गई थी
पॉलिसी में कहा गया है कि अंतरिम सरकार के एडवाइजर और बराबर हैसियत वाले लोग, जो सरकार या रिपब्लिक की सेवा में काम कर रहे हैं, हर साल इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की आखिरी तारीख के 15 वर्किंग डेज के अंदर कैबिनेट डिवीजन के जरिए चीफ एडवाइजर को अपनी इनकम और संपत्ति जमा करेंगे
अगर पत्नी या पति की अलग इनकम है, तो वह भी जमा करनी होगी चीफ एडवाइजर इस बयान को अपनी समझ के हिसाब से पब्लिश करेंगे

संपत्ति के ब्योरा नहीं देने पर आलोचना

लेकिन इसे अब तक पब्लिश न करने पर आलोचना भी हुई थी इस बारे में चीफ एडवाइजर के प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम ने सोमवार को कहा था कि अंतरिम सरकार के सलाहकारों के एसेट स्टेटमेंट एक-दो दिन में पब्लिश कर दिए जाएंगे
5 अगस्त, 2024 को हिंसक छात्र आंदोलन के बाद अवामी लीग सरकार गिरने के बाद, 8 अगस्त को प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी थी

प्रियंका गाँधी के उकसाने पर 20-25 कांग्रेसी सांसदों ने ओम बिरला के साथ चैम्बर में की गाली गलौज; कांग्रेस राजनीति नहीं सफेदपोशी गुंडागर्दी कर रही है


जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष में जाकर गाली गलोच कर कांग्रेस किस गन्दी और घिनौनी सियासत कर रही है? क्या INDI गठबंधन कांग्रेस की इस हरकत के साथ है या विरोध में? पहले तो राहुल ही हंगामे के लिए बहुत था लेकिन अब प्रियंका भी आ गयी। यदि INDI गठबंधन ने इस हरकत को गंभीरता से नहीं लिया भविष्य में लोकसभा में कुछ भी अनहोनी हो सकती है। क्योकि कांग्रेस राजनीति नहीं सफेदपोशी गुंडागर्दी कर रही है।   

केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार (11 फरवरी) को सनसनीखेज आरोप लगाते हुए दावा किया कांग्रेस के 20 से 25 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर के चैंबर में घुसकर उनके साथ गाली-गलौज की है। केंद्रीय मंत्री ने दावा किया कि प्रियंका गांधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल की मौजूदगी में कांग्रेस सांसदों ने स्पीकर के चेंबर में जाकर गाली गलौज की। इस दौरान उन्हें बहुत बुरा भला कहा। बता दें कि विपक्ष ने ओम बिरला को लोकसभा स्पीकर पद से हटाने के लिए संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है।

केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को पत्रकारों से कहा, "कम से कम 20-25 कांग्रेस MP लोकसभा स्पीकर के चैंबर में घुस गए और उन्हें गालियां दीं। मैं भी वहीं था। स्पीकर बहुत नरम इंसान हैं, नहीं तो सख्त कार्रवाई होती। प्रियंका गांधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल समेत सीनियर कांग्रेस नेता भी अंदर मौजूद थे, और वे उन्हें लड़ने के लिए उकसा रहे थे।"

ओम बिरला को हटाने के लिए विपक्ष द्वारा लाए जाने वाले प्रस्ताव पर वर्तमान बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन 9 मार्च को सदन में चर्चा कराई जा सकती है। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने कहा, "संभावना है कि बजट सत्र के दूसरे भाग के पहले दिन, यानी 9 मार्च को ही लोकसभा स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है।"

 

घटना की जानकारी दे रहे केन्द्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि ये लोग स्पीकर की बात नहीं मानते हैं। राहुल गाँधी कहते हैं कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जाता। किरन रिजिजू ने कहा कि राहुल गाँधी अपनी मर्जी से जो भी मन करे वो बोलते हैं। ये सब रिकॉर्ड में है। लेकिन स्पीकर की परमिशन के बिना वे कैसे बोल सकते हैं। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि उन्होंने खुद स्पीकर बिरला से बात की है।

स्पीकर ओम बिरला के स्वभाव को लेकर उन्होंने कहा कि वे नरम दिल आदमी हैं, इसलिए कुछ नहीं किया। कोई दूसरा होता तो कठोर कदम उठाता और सजा देता। उन्होंने जोर देकर कहा कि कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता जैसे प्रियंका गाँधी और केसी वेणुगोपाल भी वहाँ मौजूद थे। इसके बावजूद ये सब हुआ। ये कोई तरीका नहीं है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि मामले का निपटारा होने तक बिरला आसन पर नहीं बैठेंगे। बिरला ने लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह को निर्देश दिया है कि वह विपक्ष के नोटिस की जांच कर उचित कार्रवाई करें।

विपक्ष ने बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस मंगलवार को लोकसभा महासचिव को सौंपा। विपक्ष ने बिरला पर पक्षपातपूर्ण तरीके से सदन संचालित करने, कांग्रेस सदस्यों पर झूठे इल्जाम लगाने तथा अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया है।

इस बीच, खबर है कि ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी विपक्ष के नोटिस में कई कमियां पाई गई थी। इसके बाद खुद ओम बिरला ने इसमें सुधार करवा के कार्यवाही करने का निर्देश अपने सचिवालय को दिया। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि नोटिस में कुछ घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए चार जगहों पर साल 2026 के बजाय वर्ष 2025 लिखा गया था । इस आधार पर नोटिस को खारिज भी किया जा सकता था।

राहुल का ‘किताब कांड’ पड़ा उल्टा: क्या आंच शशि थरूर तक पहुंचेगी? पब्लिशर के बयान ने खोली पोल, अब FIR के फंदे में फंसी कांग्रेस, हिली राहुल की चूलें!


बर्बाद करने को एक ही उल्लू काफी है यहाँ INDI गठबंधन में उल्लुओं की कोई कमी नहीं अन्जामें इनकी मतमारी सियासत का क्या होगा? जनता को कब तक पागल बनाते रहेंगे ये महामूर्ख गैंग? CAA विरोध से लेकर अब 
पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ पर किए बबाल ने कांग्रेस समेत पूरे INDI गठबंधन को चारों खाने चित कर दिया। आखिर कौन पागल इन महामूर्खों को ऐसी सलाह दे रहा है? दरअसल भारत विरोधी विदेशी आकाओं के इशारों पर नाचने वाले INDI गठबंधन में देश में बढ़ती सोने और चांदी की कीमतें एवं महंगाई आदि समस्याओं पर सरकार को घेरने की बजाए उन मुद्दों से संसद का समय बर्बाद कर करदाताओं के धन को भी बर्बाद कर रहे हैं। आने वाले चुनावों में जनता को इन बिकाऊ पार्टियों का बहिष्कार कर इनको इनकी औकात दिखानी चाहिए।  
 

दिल्ली की सियासत में इन दिनों एक किताब ने ऐसा बवाल मचाया है कि कांग्रेस और लोकसभा मे विपक्ष के नेता राहुल गांधी खुद सवालों के घेरे में आ गए हैं। मामला है पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ का, जिसे लेकर संसद से लेकर सोशल मीडिया तक हंगामा मचा हुआ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में इस किताब के कुछ हिस्सों का हवाला देकर सरकार पर हमला करने की कोशिश की। मगर यहीं पर खेल उल्टा पड़ गया।

दूसरे, क्या इस किताब से लगी आंच शशि थरूर तक भी पहुंचेगी? किताब कांड से दो दिन पहले ही थरूर की मल्लिकार्जुन खड़के और राहुल के साथ होती है। फिर सोशल मीडिया पर चर्चा है कि किताब का प्रेफरस शशि ने लिखा है, इसमें कितनी सच्चाई है, पुष्टि नहीं, यह जाँच में ही सामने आएगा।    

राजनीति में कहावत है- आधी-अधूरी जानकारी सेहत के लिए हानिकारक होती है, लेकिन कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के लिए यह सिर्फ सेहत नहीं, बल्कि कानूनी मुसीबत का सबब बनती दिख रही है। दरअसल में संसद में जिस किताब को ‘ब्रह्मास्त्र’ बनाकर राहुल गांधी सरकार पर वार कर रहे थे, अब उसी किताब के पब्लिशर ने उनके दावों की हवा निकाल दी है। पब्लिशर ने साफ कह दिया- किताब छपी ही नहीं है। पब्लिशर पेंगुइन रैंडम हाउस ने आधिकारिक बयान जारी कर सबको चौंका दिया है। पेंगुइन ने साफ कहा कि किताब न तो अभी पब्लिश हुई है, न ही इसकी कोई कॉपी (डिजिटल या प्रिंट) जनता के लिए जारी की गई है।

कंपनी ने यह भी कहा कि अगर कोई कॉपी कहीं घूम रही है, तो वह सीधा-सीधा कॉपीराइट का उल्लंघन है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर पब्लिशर ने किताब छापी ही नहीं, तो राहुल गांधी सदन में क्या लहरा रहे थे? क्या राहुल गांधी के पास किताब की कोई गैर-कानूनी कॉपी है? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में पहले ही कहा था कि किताब अभी पब्लिश नहीं हुई है, जिसे राहुल ने ‘झूठ’ करार दिया था। लेकिन अब पब्लिशर की सफाई ने राहुल गांधी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

अब मामला सिर्फ राजनीतिक तू-तू मैं-मैं तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है। जांच इस बात की हो रही है कि जो किताब अभी रक्षा मंत्रालय के रिव्यू में है और पब्लिश नहीं हुई, उसकी ‘टाइपसेट पीडीएफ’ इंटरनेट पर कैसे पहुंची? अगर राहुल गांधी उसी लीक कॉपी का इस्तेमाल कर रहे थे, तो उन पर कॉपीराइट एक्ट और आईटी एक्ट के तहत गाज गिर सकती है।

साफ है कि कांग्रेस जिस नैरेटिव के जरिए सरकार को घेरना चाहती थी, वह अब उसके अपने ही गले की फांस बन गया है। अब सोशल मीडिया पर तो जैसे मीम्स और आलोचनाओं की बाढ़ आ गई है। लोग राहुल गांधी को ट्रोल कर रहे हैं, तो कई लोग पूछ रहे हैं कि संसद को सर्कस क्यों बनाया गया? यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या राहुल गांधी ने देश की सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी वाली किताब को गैर-कानूनी तरीके से हासिल किया? कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि उन पर ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ लगना चाहिए। कुछ लोग इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे घटिया विपक्ष का सबसे घिनौना चेहरा बता रहे हैं। आप भी देखिए लोग सोशल मीडिया पर किस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं…