कौन थे ‘फादर अमीर’ जिन्होंने कतर को दुनिया की आर्थिक शक्ति बनाया: भारत में उनके निधन पर झुका तिरंगा

                                             कतर के फादर अमीर का निधन (फोटो साभार-दैनिक भास्कर)
भारत ने कतर के ‘फादर अमीर’ हिज हाइनेस शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। 13 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय झंडा आधा झुका रहेगा। तिरंगा उन सभी इमारतों पर एक दिन तक आधा झुका रहेगा, जहाँ राष्ट्रीय झंडा नियमित फहराया जाता है।

इस दिन कोई आधिकारिक मनोरंजन वाले कार्यक्रम भी नहीं आयोजित होंगे। संसदीय मामलों और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू जल्द ही कतर जाएँगे और भारत सरकार की ओर से कतर को शोक संदेश देंगे और संवेदना जताएँगे।

मोदी ने फादर अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर शोक व्यक्त किया है और कहा है कि वह भारत के सच्चे दोस्त थे। उन्होंने कहा कि वे दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने कतर को विकास और खुशहाली को नई ऊँचाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कतर के फादर अमीर को श्रद्धांजलि दी और कतर के नेतृत्व, शाही परिवार और वहाँ की जनता के प्रति अपनी संवेदना जताई।

अपने पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा, हम उन्हें एक सच्चे दोस्त के रूप में याद करते हैं। पीएम ने फरवरी 2024 की अपनी कतर यात्रा को याद किया और ‘फादर अमीर’ के प्रति संवेदना जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

2024 की प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारत-कतर के आपसी रिश्तों में और मजबूती आई। कतर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाला अहम देश है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अहम समझौते हुए । कतर की जनसंख्या में अप्रवासी भारतीयों का बड़ा भाग है, जो कतर के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं। इससे दोनों देश की नजदीकियाँ भी बढ़ी हैं।

कौन थे शेख हमद बिन खलीफा अल थानी

1995 से 2013 तक कतर के अमीर के रूप में अपनी सेवा देने वाले शेख हमद बिन खरीलाफ अल थानी को आधुनिक कतर का निर्माता कहा जाता है। कतर को आर्थिक राजनयिक और वैश्विक स्तर पर उन्होंने पहचान दिलाई। उनके शासनकाल में कतर ने अपने नेचुरल गैस के व्यापक भंडार के दम पर तेजी से प्रगति की और वैश्विक स्तर पर संपन्न देश के रूप में अपनी पहचान बना। उन्होंने इसके बाद अपनी सत्ता बेटे शेख तमीन बिन हमद अल थानी को सौंप दी। 12 जुलाई 2026 को 74 वर्ष में उनका निधन हो गया।

शेख हमद बिन खलीफा अल थानी को कतर में ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। दरअसल ये कोई पारिवारिक संबोधन नहीं, बल्कि कतर में दिया जाने वाला एक सम्मानजनक आधिकारिक खिताब है। जब कोई शासक या अमीर अपनी सत्ता स्वेच्छा से अपने उत्तराधिकारी को सौंप देता है, तब उसे ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। शेख हमद बिन खलीफा अल थानी ने 2013 में स्वेच्छा से अपने बेटे शेख तमीम बिन हमद अल-थानी को सत्ता सौंप दी थी। इसलिए उन्हें कतर में सम्मान से ‘फादर अमीर’ कहते हैं। खाड़ी देशों में इस तरह का स्वैच्छिक सत्ता हस्तांतरण बहुत कम देखने को मिलता है।

उनका जन्म 1952 में हुआ था। उनके अब्बू का नाम शेख खलीफा बिन हमद अल-थानी था जो कतर के शासक थे। उनकी अम्मी शेखा आयशा बिंत हमद अल अत्तिया था। कतर पर अली थानी राजवंश की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य से है। जब कतर को 1971 में ब्रिटेन से आजादी मिली, तो उसके कुछ ही महीनों बाद 1972 में शेख हमद के पिता शेख खलीफा कतर के अमीर बन गए थे। इसलिए फादर अमीर को बचपन से ही सत्ता का उत्तराधिकारी माना जाता था।

यूके के प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्स्ट से 1971 में ग्रेजुशन करने के बाद वह कतर आकर सेना में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वह सेना के कमांडर इन चीफ के पद तक पहुँचे। 1977 में उन्हें कतर का ‘क्राउन प्रिंस’ आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया। जून 1995 में कतर में उन्होंने रक्तहीन सत्तापलट किया। हुआ यूँ कि उनके पिता शेख खलीफा जब स्विटजरलैंड की यात्रा पर थे तो उन्होंने सेना के समर्थन से तख्तापलट किया और खुद को ‘अमीर’ घोषित कर दिया। इसकी वजह से दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। लंबे समय तक अब्बा फ्रांस में निर्वासित रहे, लेकिन आपसी सुलह के बाद 2004 में वे कतर लौटे, जहाँ 2016 में उनका निधन हुआ।

दरअसल फादर अमीर का मानना था कि उनके पिता प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे और पुराने तरीके से शासन चला रहे हैं।

आधुनिक कतर के निर्माता

उन्होंने कतर को अपने शासनकाल में पूरी तरह बदल दिया।कतर के प्राकृतिक संसाधनों खासकर गैस भंडार का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। उनके नेतृत्व में कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल हो गया। इसका असर ये हुआ कि देश में समृद्धि आई और प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अव्वल श्रेणी में पहुँच गई। उन्होंने कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिए दुनिया भर में बड़े निवेश कराए। इससे कतर की आर्थिक और रणनीतिक पहुँच कई देशों तक बढ़ी। उनके शासन में अल जजीरा न्यूज नेटवर्क की स्थापना हुई, जिसने कतर को वैश्विक मीडिया शक्ति के रूप में पहचान दिलाई।

उनके नेतृत्व में कतर ने 2022 फीफा विश्व कप की मेजबानी का अधिकार हासिल किया। इसके लिए देश में मेट्रो, स्टेडियम, सड़कें और दूसरे बुनियादी ढाँचे का व्यापक विकास हुआ। उन्होंने कतर को मध्य-पूर्व की कूटनीति में महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया। हालाँकि कुछ क्षेत्रीय नीतियों और इस्लामी संगठनों के साथ संबंधों को लेकर उनकी सरकार विवादों में भी रही।

भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, तकनीक के क्षेत्र में मजबूत रिश्ते हैं। प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या यहाँ रहती है जिससे दोनों देशों के संबंध और गहरे हो गए हैं। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और कतर के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। खासकर शेख हमद के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के संबंध बेहद मजबूत हुए थे। यही वजह है कि भारत सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है।

तिरंगा कब आधा झुकाया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को राष्ट्रीय शोक के वक्त आधा झुकाया जाता है। यह शोक के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।

आम तौर पर देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश और दूसरे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के निधन पर झंडा आधा झुकाया जाता है।

भारतीय ध्वज संहिता के अनुसार ऐसा किया जाता है। वैश्विक गणमान्य व्यक्तियों के निधन पर गृह मंत्रालय विशेष निर्देश जारी करता है, तब झंडा झुकाया जाता है।

किसी राज्य के राज्यपाल या मुख्यमंत्री के निधन पर उस राज्य में झंडा आधा झुकाया जाता है। किसी राष्ट्रीय त्रासदी पर या असाधारण घटना पर जब केन्द्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है तो झंडा आधा झुका रहता है।

इसके अलावा किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, सरकार के मुखिया या महत्वपूर्ण वैश्विक नेता के निधन पर यदि भारत सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है, तो उस दिन सभी सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका रहता है। इस दिन सरकारी कामकाज तो सामान्य रूप से होते हैं लेकिन कोई मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होता है। हालाँकि राष्ट्रीय अवकाश भी नहीं होता है।

बिहार में एक्टिव आतंकवाद का ‘स्लीपर सेल’ : मोहम्मद अहद से लेकर सद्दाम तक

                                                                                                                             प्रतीकात्मक 
बिहार में हाल के दिनों में सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से कई ऐसे चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिन्होंने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को पूरी तरह अलर्ट पर डाल दिया है। केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA), स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में कटिहार से मोहम्मद अहद नाम के एक संदिग्ध युवक की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व लगातार देश को दहलाने की साजिश रच रहे हैं।

मोहम्मद अहद को पाकिस्तानी आतंकी संगठन का एक सक्रिय ‘स्लीपर सेल’ बताया जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए सीधे पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में था, लेकिन यह कोई इकलौता मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों के भीतर बिहार के अलग-अलग जिलों जैसे मधुबनी, मुंगेर और मुजफ्फरपुर से भी इसी तरह के संदिग्धों को दबोचा गया है।

                                       पुलिस की गिरफ्त में मोहम्मद अहद (फोटो साभार: जागरण)

इन सभी मामलों की कड़ियों को आपस में जोड़ने पर एक बेहद खतरनाक और सुव्यवस्थित पैटर्न उभर कर सामने आता है। ये गिरफ्तारियाँ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि बिहार आतंकियों के निशाने पर हैं, जहाँ वे स्थानीय युवाओं का ब्रेनवॉश कर एक बड़ा नेटवर्क खड़ा करने की साजिश रच रहे हैं।

गिरफ्तारियों में ‘कॉमन फैक्टर’ और पाकिस्तानी गैंगस्टर्स का कनेक्शन

अगर हम हाल के दिनों में बिहार से हुई तमाम गिरफ्तारियों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो इन सब में कुछ बेहद खतरनाक और समान बातें देखने को मिलती हैं। सबसे बड़ी समानता यह है कि इन सभी संदिग्धों के तार सीधे तौर पर सीमा पार यानी पाकिस्तान में बैठे आकाओं से जुड़े हुए हैं।

चाहे वह कटिहार का मोहम्मद अहद हो, मुंगेर का मोहम्मद सद्दाम हो या फिर मुजफ्फरपुर से पकड़ा गया मोहम्मद अली, ये सभी लोग किसी न किसी रूप में पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में थे। कटिहार से पकड़े गए अहद के मामले में सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया कि वह पाकिस्तानी गैंगस्टर राणा हुसैन और शहजाद भट्टी के नेटवर्क से लगातार संपर्क में था।

मुंगेर से गिरफ्तार मोहम्मद सद्दाम के तार भी ‘राणा भाई’ गैंग से जुड़े पाए गए थे, जो सीमा पार के एक संदिग्ध नेटवर्क का संचालन करता था। यह इस बात का सबूत है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियाँ और आतंकी संगठन अब वहाँ के स्थानीय गैंगस्टर्स और अपराधियों के नेटवर्क का इस्तेमाल भारत में स्लीपर सेल बनाने और हथियारों की सप्लाई के लिए कर रहे हैं।

दूसरा सबसे बड़ा कॉमन फैक्टर इन सभी का डिजिटल कनेक्शन है। ये सभी संदिग्ध आम तौर पर समाज के बीच बेहद सामान्य जिंदगी जी रहे थे, लेकिन डिजिटल दुनिया में ये देश के खिलाफ एक अघोषित युद्ध लड़ रहे थे। वॉट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए इन्हें सीमा पार से निर्देश मिल रहे थे।

इनका मुख्य काम बिहार के अन्य पिछड़े इलाकों के गरीब और कम पढ़े-लिखे युवाओं को ढूँढना, मजहबी आधार पर उनका ब्रेनवॉश करना और उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों के लिए भड़काकर एक नया नेटवर्क तैयार करना था।

पिछले कुछ महीनों के प्रमुख मामले: बिहार में आतंकी नेटवर्क की सक्रियता

 बिहार में पिछले एक-दो महीनों के भीतर सुरक्षा एजेंसियों ने ताबड़तोड़ कार्रवाइयाँ करते हुए कई बड़े मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। हाल ही में बिहार ATS और स्थानीय पुलिस ने एक बड़े कट्टरपंथी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए मधुबनी जिले के पंडौल थाना क्षेत्र से 50 साल के मदरसा संचालक मौलाना इजहार-उल-हक को गिरफ्तार किया।

इजहार को एक पाकिस्तानी एजेंट बताया गया है जो बिहार में स्लीपर सेल तैयार करने और कट्टरपंथी मॉड्यूल की फंडिंग का काम संभाल रहा था। उसके पास से कई भड़काऊ वीडियो मिले, जिनमें भारत में शरीयत कानून लागू करने की बातें कही गई थीं। इस मॉड्यूल के तार पाँच राज्यों से जुड़े थे और इजहार की गिरफ्तारी इस सिलसिले में छठी बड़ी कामयाबी थी।

इसी तरह मुंगेर पुलिस ने तारापुर थाना क्षेत्र के मिलिक थानपुर गाँव में देर रात छापेमारी कर मोहम्मद सद्दाम नाम के युवक को गिरफ्तार किया। सद्दाम पिछले दो-तीन साल से मुंबई में रह रहा था और वहीं वह ‘राणा भाई’ नामक पाकिस्तानी नेटवर्क के संपर्क में आया था। मुंबई में जब सुरक्षा एजेंसियों की धर-पकड़ बढ़ी, तो वह भागकर मुंगेर आ गया।

पुलिस ने उसके पास से एक देसी पिस्तौल और मोबाइल बरामद किया है। वह अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर किसी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने की फिराक में था। इसके अलावा 2 साल पहले गुजरात की सूरत स्पेशल ब्रांच की टीम ने बिहार पुलिस के सहयोग से मुजफ्फरपुर के सकरा थाना क्षेत्र से मोहम्मद अली को गिरफ्तार किया।

मोहम्मद अली पर भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा और हिंदू नेता उमेश्वर राणा को जान से मारने की धमकी देने और साजिश रचने का आरोप था। वह नेपाल में बैठकर इंटरनेट के माध्यम से आपत्तिजनक टिप्पणियाँ और साजिशें रचता था। उसका नेटवर्क सूरत के एक मौलाना और पाकिस्तान के कट्टरपंथी सदस्यों से जुड़ा हुआ था।

इसी तरह बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया में पुलिस ने पाकिस्तान से जुड़े संदिग्ध वॉट्सऐप चैट के मामले में 25 वर्षीय खुर्शीद आलम को गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक, आरोपित के मोबाइल फोन में पाकिस्तान के फोन नंबरों के साथ बातचीत और कई क्यूआर कोड मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई थी।

बिहार के सीमावर्ती जिले मधुबनी में सुरक्षा एजेंसियों ने अंतरराष्ट्रीय जाली नोट नेटवर्क के शातिर अपराधी अबुल इनाम उर्फ लादेन को गिरफ्तार किया था। अबुल इनाम पर केवल जाली नोट चलाने का ही नहीं, बल्कि एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद मस्तान को सुरक्षित नेपाल के रास्ते भगाने का भी गंभीर आरोप था।

पुलिस के मुताबिक, लादेन इस गैंग का मुख्य लोकल ऑपरेटर था। वह सीमा पार से आने वाले संदिग्धों को पनाह और रास्ता मुहैया कराता था। आंध्र प्रदेश और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुए अंतर-राज्यीय ऑपरेशन में 12 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें बिहार के शादमान दिलकुश, अजमनुल्लाह खान भी शामिल थे।

पुलिस की छानबीन में इनके संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) और ISIS से जुड़े सामने आए। जाँच में ये भी पता चला है कि ये आतंकी एक गेमिंग ऐप के जरिए विदेशी हैंडलरों के संपर्क में थे और इनके तार ISIS से संबंध रखने वाले Benex Com नामक एक समूह से भी जुड़े थे।

PFI का ‘मिशन 2047’: बिहार से ही खुला था देश को इस्लामिक मुल्क बनाने की साजिश का राज

बिहार का आतंकी कनेक्शन आज का नहीं है, बल्कि देश को हिला देने वाली कई बड़ी साजिशों के तार इसी राज्य से खुले हैं। इसका सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत साल 2022 में तब मिला, जब पटना के फुलवारी शरीफ में पुलिस ने एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था।

इस छापेमारी के दौरान पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े दो मुख्य आरोपितों, अथर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से जो दस्तावेज बरामद हुए, उसने पूरे देश के सुरक्षा महकमे को हिलाकर रख दिया।

इस दस्तावेज का नाम ‘India Vision 2047’ था, जिसकी टैगलाइन ‘Towards Rule of Islam in India’ थी। इस गुप्त दस्तावेज में साल 2047 तक, यानी भारत की आजादी के 100 साल पूरे होने तक, भारत को एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र में बदलने की एक बहुत ही खतरनाक और चरणबद्ध योजना तैयार की गई थी।

इस योजना के पहले चरण में देश के अलग-अलग मुस्लिम संप्रदायों को PFI के झंडे तले इकट्ठा करने और एक ऐसी कट्टरपंथी पहचान बनाने पर जोर था जो राष्ट्रीय पहचान से ऊपर हो। युवाओं को लाठी, रॉड, तलवार और अन्य हथियारों को चलाने का आक्रामक प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी।

दूसरे चरण में अपने विरोधियों के मन में डर पैदा करने और अपनी ताकत दिखाने के लिए चुनिंदा हिंसा का सहारा लेने का प्रस्ताव था। जिन कार्यकर्ताओं में ज्यादा आक्रामकता दिखाई दे, उन्हें उन्नत हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण देने की योजना थी।

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस अंतिम हिंसक उद्देश्य को छुपाने के लिए कार्यकर्ताओं को भारतीय संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और डॉ बीआर आंबेडकर जैसे प्रतीकों और शब्दों का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया था ताकि वे कानून की नजरों से बच सकें।

इसके बाद तीसरे चरण में PFI अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाना चाहता था ताकि बहुसंख्यक समाज को आपस में लड़ाया जा सके। संगठन का लक्ष्य खुद को अल्पसंख्यकों और वंचितों का एकमात्र मसीहा साबित करना था।

इसी चरण में भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक जमा करने और विरोधियों पर सुनियोजित हमले करने की बात भी शामिल थी। चौथे और आखिरी चरण में PFI ने खुद को देश के मुसलमानों का निर्विवाद नेता बनाने और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हथियाने की कल्पना की थी।

सत्ता के करीब पहुँचते ही अपने वफादार लोगों को कार्यपालिका, न्यायपालिका, पुलिस और सेना में भर्ती करने की योजना थी। इसके बाद मौजूदा लोकतांत्रिक संविधान को हटाकर देश में इस्लामिक संविधान लागू करने का अंतिम लक्ष्य था।

इसके लिए हर मुस्लिम परिवार से एक सदस्य की भर्ती और एक समर्पित सशस्त्र बल तैयार करने का खाका खींचा गया था, जो जरूरत पड़ने पर तुर्की जैसे विदेशी इस्लामिक मुल्कों की मदद से भारतीय राज्य के साथ अंतिम संघर्ष कर सके।

इस दस्तावेज के सामने आने के बाद ही केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए सितंबर 2022 में गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के तहत PFI और उससे जुड़े 8 अन्य संगठनों पर 5 साल का प्रतिबंध लगा दिया था।

स्लीपर सेल के खुलासों और भंडाफोड़ के पुराने मामले

मध्य प्रदेश से गिरफ्तार इजहार उल हक ने पूछताछ में यह कबूला था कि उनके स्लीपर सेल पूरे देश में शांत बैठे हुए हैं, जो सिर्फ सही समय और ऊपर से मिलने वाले आदेश का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे बाहर निकलकर बड़ी तबाही मचा सकें। स्लीपर सेल का यह खतरा कोई नया नहीं है। भारत में पिछले दो दशकों से यह पैटर्न लगातार देखा जा रहा है।

स्लीपर सेल ऐसे प्रशिक्षित आतंकवादी या समर्थक होते हैं जो किसी भी आम नागरिक की तरह समाज में रहते हैं और कोई नौकरी, दुकान या पढ़ाई करते हैं जिससे किसी को शक न हो। वे तब तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं करते जब तक कि उन्हें आकाओं द्वारा किसी विशेष हमले को अंजाम देने का निर्देश न मिले।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के समय भी देश के भीतर इंडियन मुजाहिदीन और सिमी जैसे संगठनों के स्लीपर सेल्स का एक बड़ा नेटवर्क सामने आया था।

उस दौरान दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद और बोधगया में हुए सिलसिलेवार धमाकों की जाँच में यह बात साफ हुई थी कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर इन्हीं स्लीपर सेल्स ने लॉजिस्टिक्स, रहने की जगह और रेकी करने में मदद पहुँचाई थी।

उस समय भी बिहार के दरभंगा और समस्तीपुर जैसे जिलों से कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने दरभंगा मॉड्यूल का नाम दिया था। इसके बाद साल 2020 के दौरान देश में ISIS के कई डिजिटल मॉड्यूल्स का पता चला।

जाँच में सामने आया कि सीरिया और इराक में बैठे हैंडलर्स भारत के पढ़े-लिखे युवाओं को इंटरनेट के माध्यम से प्रभावित कर रहे थे और इस दौरान भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में छापेमारी कर ऐसे युवाओं को पकड़ा गया जो ऑनलाइन माध्यमों से कसम लेकर देश में अकेले दम पर हमला करने की फिराक में थे।

वहीं साल 2023 में भी NIA ने देश के कई राज्यों में एक साथ छापेमारी कर अल-कायदा और ISIS से प्रेरित मॉड्यूल्स का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान भारी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य, प्रतिबंधित साहित्य और हथियार बरामद किए गए थे, जिसमें बिहार से हुई कई गिरफ्तारियों ने यह साबित किया कि स्लीपर सेल्स का जाल समय के साथ और अधिक फैल चुका है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म: आतंकियों का नया और सुरक्षित ‘हथियार’

आज के समय में आतंकवादियों को अपना नेटवर्क चलाने के लिए किसी गुप्त जगह पर आमने-सामने मिलने की जरूरत नहीं रह गई है। आधुनिक तकनीक और इंटरनेट ने उनके काम को बेहद आसान और सुरक्षित बना दिया है, यही कारण है कि अब सुरक्षा एजेंसियाँ आतंकवाद के इस नए रूप को डिजिटल जिहाद का नाम दे रही हैं।

टेलीग्राम, सिग्नल, थ्रेमा और वॉट्सएप जैसे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स इन आतंकियों के सबसे बड़े मददगार बन गए हैं क्योंकि इन ऐप्स पर होने वाली बातचीत को आसानी से ट्रैक नहीं किया जा सकता, जिससे ये कानून और सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचे रहते हैं। आतंकी इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बहुत ही शातिराना तरीके से करते हैं।

जैसे टेलीग्राम और सिग्नल पर वे सीक्रेट चैट का उपयोग करते हैं, जहाँ संदेश अपने आप नष्ट हो जाते हैं और बिना नंबर दिखाए बड़े-बड़े ग्रुप्स का संचालन किया जाता है। वहीं फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भड़काऊ और प्रोपेगैंडा वीडियो शेयर करके समाज से असंतुष्ट युवाओं की पहचान की जाती है।

इन सब के साथ डार्क वेब और वीपीएन तकनीक का सहारा लेकर वे अपनी पहचान पूरी तरह छुपा लेते हैं और विदेशी आकाओं से बात करने के साथ-साथ क्रिप्टोकरेंसी के जरिए फंड ट्रांसफर का काम भी करते हैं। इन डिजिटल टूल्स की वजह से भारत के भोले-भाले युवाओं को निशाना बनाना बहुत आसान हो गया है।

पाकिस्तानी हैंडलर्स सोशल मीडिया पर लगातार नजर रखते हैं कि कौन से युवा देश की नीतियों या धार्मिक\मजहबी मुद्दों पर ज्यादा आक्रामक या असंतुष्ट हैं और फिर उन्हें निशाना बनाया जाता है। शुरुआत में उन्हें धार्मिक साहित्यों और वीडियो के जरिए जोड़ा जाता है और धीरे-धीरे उनके मन में देश के प्रति नफरत का बीज बो दिया जाता है।

उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और इसका एकमात्र उपाय व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना है। जब युवा पूरी तरह उनके मानसिक नियंत्रण में आ जाता है, तब उसे टेलीग्राम या सिग्नल के किसी गुप्त ग्रुप में शामिल कर लिया जाता है, जहाँ उसे हथियार चलाने, प्रोपेगैंडा फैलाने या स्लीपर सेल के रूप में काम करने के निर्देश दिए जाते हैं।

कटिहार के मोहम्मद अहद और मुंगेर के सद्दाम के मोबाइल से मिले पाकिस्तानी नंबर और चैट इसी डिजिटल ब्रेनवाशिंग की कहानी बयां करते हैं। बिहार में लगातार मिल रहे स्लीपर सेल्स के सुराग यह दिखाते हैं कि देश के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौती कितनी गंभीर है, हालाँकि सुरक्षा एजेंसियाँ एक-एक कर इनका सफाया कर रही हैं।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : ताहिर हुसैन की सजा पर बिलबिलाई AAP-कांग्रेस, बेनकाब हुए ‘चुनावी हिंदू’ केजरीवाल


राष्ट्रवादी ताकतों और कानून की एक बड़ी जीत के तहत वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान आईबी अफसर अंकित शर्मा की निर्मम हत्या के मामले में अदालत ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच दंगाइयों को दोषी करार दिया।
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण कुमार सिंह ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत के इस न्यायपूर्ण फैसले पर आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने खुलकर दंगाइयों के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाते हुए दुख जाहिर किया है। वहीं पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल वोटबैंक की खातिर सुंदरकांड कार्यक्रम के जरिये हिंदुओं को भ्रमित करने में जुटे हैं।

ये आम आदमी पार्टी का असली चेहरा है—दिल्ली में दंगे करवाकर हिंदुओं का कत्लेआम करने वाले को अगर कानून सजा दे रहा है, तो इन्हें दुख हो रहा है। वहीं केजरीवाल जो आजकल चुनावी लाभ के लिए हिंदू हृदय सम्राट बने घूम रहे हैं, वो असल में तुष्टीकरण की राजनीति के तहत देशविरोधी तत्वों को संरक्षण देते रहे हैं।

मर्डर केस में AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन दोषी

दिल्ली की अदालत ने आईबी कर्मी अंकित शर्मा हत्याकांड में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच कट्टरपंथियों को दोषी करार दिया है। दोषी ठहराए गए आरोपितों में ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनस शामिल हैं। इन देशद्रोहियों और दंगाइयों की सजा पर अदालत अलग से सुनवाई करेगी।

ताहिर हुसैन पर कौन से लगे आरोप

अदालत ने ताहिर हुसैन को सरकारी आदेश की अवहेलना, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, दंगा करने, घातक हथियार के साथ दंगा करने, अपहरण, हत्या तथा गैरकानूनी जमाव के साझा उद्देश्य से अपराध करने के गंभीर आरोपों में दोषी ठहराया। यह साबित करता है कि ताहिर हुसैन दिल्ली को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने का मुख्य सूत्रधार था।

अंकित शर्मा की हत्या कर शव नाले में फेंका

यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान आईबी कर्मी अंकित शर्मा की निर्दयी और बर्बर हत्या से जुड़ा है। कर्तव्यनिष्ठ अंकित शर्मा का शव 26 फरवरी 2020 को चांदबाग इलाके के एक नाले से बरामद हुआ था। अभियोजन पक्ष ने अदालत में पुख्ता सबूतों के साथ साबित किया कि हिंसक भीड़ ने उनकी हत्या कर शव को नाले में फेंक दिया था।
AAP विधायक अमानतुल्लाह खान दोषी के साथ
एक तरफ अदालत ने AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को मर्डर केस में दोषी ठहराया, वहीं AAP विधायक अमानतुल्लाह खान खुलेआम इस खूंखार दोषी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। उन्होंने ट्वीट किया: “आज अदालत के जरिए पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दिल्ली दंगों में दोषी क़रार दिए जाने पर बहुत दुखी हूँ, अल्लाह उसके घर वालों को सब्र अता करे…” अमानतुल्लाह खान का यह बयान साफ दिखाता है कि आम आदमी पार्टी के लिए देश की सुरक्षा और न्याय से बढ़कर उनका खास वोटबैंक है।
अमानतुल्लाह खान को यह भी देश को बताना होगा कि ताहिर के मुसलमान होने के नाते किसी भी अपराध को करने की छूट है? आखिर कब तक अमानतुल्लाह खान जैसे कट्टरपंथी victim card खेल लोगों को गुमराह करते रहेंगे। कोर्ट को ऐसे लोगों पर भी सख्ती से पेश आना होगा।   
राम, हनुमान के साथ केजरीवाल के लगे पोस्टर
दिल्ली में आयोजित सुंदरकांड कार्यक्रम में लगे पोस्टरों ने एक नये विवाद और आक्रोश को जन्म दे दिया है। भगवान राम और संकटमोचन हनुमान के साथ अरविंद केजरीवाल की तस्वीरों वाले ये पोस्टर सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि हिंदुओं को भ्रमित करने और आम आदमी पार्टी के दंगों में संलिप्त चेहरे पर परदा डालने के उद्देश्य से बनाए गए हैं। एक तरफ पार्टी का पूर्व पार्षद सांप्रदायिक दंगे फैलाता है, मर्डर केस में दोषी करार दिया जाता है, वहीं पार्टी का विधायक अमानतुल्लाह खान दोषी के बचाव में छाती पीटता है। दूसरी तरफ केजरीवाल दिखावे के लिए सुंदरकांड कार्यक्रम करके बहुसंख्यक समाज की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रहे हैं।
ताहिर के बचाव में उतरे इमरान मसूद
ताहिर हुसैन को दोषी करार दिए जाने पर प्रियंका वाड्रा के करीबी कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने विक्टिम कार्ड खेलते हुए बेहद शर्मनाक बयान दिया है। उनका कहना है कि ताहिर को सजा इसलिए मिली क्योंकि उसका नाम ताहिर है, उसका नाम कपिल नहीं है। न्यायालय पर सवाल उठाने वाले इस बयान से आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का चरित्र क्या है। ये लोग सांप्रदायिक दंगा और मर्डर के दोषी के बचाव में उतर गए हैं। जबकि अदालत ने छह साल चले मुकदमे में ठोस सबूतों के आधार पर ही ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया है। यह साफ है कि राष्ट्रवादी भाजपा जहां पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं पूरा विपक्ष देश के दुश्मनों और दंगाइयों की ढाल बनकर खड़ा हो गया है।
अंकित शर्मा की हत्या और ताहिर हुसैन का खूनी सच
24 फरवरी 2020 को चांदबाग इलाके में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर उग्र मुस्लिम भीड़ ने दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की निर्मम हत्या कर दी थी। हिंसा का यह तांडव यहीं नहीं रुका; इसके अगले दो दिनों तक, यानी 25 और 26 फरवरी को, ताहिर हुसैन की इमारत का इस्तेमाल एक रणनीतिक ठिकाने के रूप में किया गया। इस पांच मंजिला इमारत की छत से पूरे दिन आस-पास की हिंदू बस्तियों पर योजनाबद्ध तरीके से भारी पत्थर, ईंटें, तेजाब की बोतलें और पेट्रोल बम बरसाए गए, जिससे पूरा इलाका जल उठा।
ताहिर की इमारत बनी ‘डेथ ट्रैप’
25 फरवरी की शाम, ताहिर हुसैन की इमारत के नीचे जुटी हिंसक और उन्मादी भीड़ ने आईबी अफसर अंकित शर्मा को निशाना बनाया। कर्तव्यनिष्ठ अंकित शर्मा को भीड़ ने जबरन घसीटकर उस इमारत के अंदर खींच लिया, जहां उनके साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दी गईं। भीड़ ने उनकी बेरहमी से लिंचिंग (हत्या) कर दी और सबूत मिटाने के उद्देश्य से उनके शव को पास के एक गंदे नाले में फेंक दिया। कोर्ट में यह साबित हुआ है कि आम आदमी पार्टी के तत्कालीन पार्षद ताहिर हुसैन ने न केवल इस पूरी खूनी साजिश को अंजाम देने के लिए अपनी इमारत मुहैया कराई, बल्कि उसने अपने समुदाय के लोगों को हिंदुओं के नरसंहार के लिए खुलेआम उकसाया और भड़काया।
ताहिर को केजरीवाल का संरक्षण
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के दोहरे चरित्र पर सीधा और तीखा हमला बोला है। गौरव भाटिया ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दंगे और मर्डर के दोषी ताहिर हुसैन के तार आज भी अरविंद केजरीवाल से जुड़े हुए हैं और उसे आज भी केजरीवाल का पूरा संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के अदालती फैसले पर दिए गए बयान को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि देश के न्यायालय ने पुख्ता साक्ष्यों, प्रमाणों और गवाहों की गवाही के आधार पर जो सजा सुनाई है, उसेअमानतुल्लाह खान द्वारा ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताना बेहद शर्मनाक है। गौरव भाटिया ने तीखे सवाल दागते हुए पूछा कि क्या यह सीधे तौर पर देश विरोधी तत्वों को बढ़ावा देने वाली घटिया ‘वोटबैंक की राजनीति’ नहीं है? उन्होंने केजरीवाल को घेरते हुए पूछा कि क्या अरविंद केजरीवाल अब स्वयं को इस देश के कानून और न्यायालय से भी ऊपर मानने लगे हैं?
वामपंथी ‘लिबरल इकोसिस्टम’ का असली चेहरा बेनकाब
आईबी अफसर अंकित शर्मा के हत्यारे ताहिर हुसैन को सजा मिलने के बाद देश के तथाकथित ‘लिबरल इकोसिस्टम’ का घिनौना चरित्र पूरी तरह से बेनकाब हो गया है। वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान जब अंकित शर्मा की निर्मम हत्या कर उनके शव को नाले में फेंक दिया गया था, तब इस इकोसिस्टम ने पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने के बजाय, मुख्य आरोपी ताहिर हुसैन को ‘पीड़ित’ साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया था। राणा अय्यूब जैसे चेहरों ने खुलेआम विक्टिम कार्ड खेलते हुए दावा किया था कि ताहिर को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया “क्योंकि उसका सरनेम हुसैन है।” इस पूरे वामपंथी गैंग ने ताहिर को एक बेगुनाह मुस्लिम के रूप में पेश किया, जिसे एक तथाकथित ‘हिंदू बहुसंख्यकवादी राज्य’ द्वारा फंसाया जा रहा था। उन्होंने न्याय की हर मांग को सांप्रदायिक करार दिया और हर कड़वे सच को प्रोपेगैंडा कहकर खारिज कर दिया। 
अवलोकन करें:-
अंकित शर्मा के लिए न्याय ताहिर हुसैन सहित 5 को फांसी से पूरा होगा; साबित हो गया दिल्ली दंगे केजरी
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अंकित शर्मा के लिए न्याय ताहिर हुसैन सहित 5 को फांसी से पूरा होगा; साबित हो गया दिल्ली दंगे केजरी
सुभाष चन्द्र आईबी अफसर अंकित शर्मा को 25 फरवरी, 2020 को राक्षसों की तरह मार कर ताहिर हुसैन और उसके गिरोह ने इंसानियत की ..... 
लेकिन आज दिल्ली की एक अदालत ने ताहिर हुसैन को दोषी करार देकर इस इकोसिस्टम के चेहरे से मुखौटा नोच दिया है। इस तथाकथित लिबरल इकोसिस्टम ने न केवल गलत रिपोर्टिंग की, बल्कि पीड़ित और अपराधी की भूमिकाओं को ही पलट दिया। इन्होंने एक खूंखार हत्यारे को प्रताड़ित प्रतीक बनाने की कोशिश की। देश न तो इस खौफनाक अपराध को भूलेगा, और न ही अपराधियों की ढाल बनने वाले इन चेहरों को माफ करेगा।

अंकित शर्मा के लिए न्याय ताहिर हुसैन सहित 5 को फांसी से पूरा होगा; साबित हो गया दिल्ली दंगे केजरीवाल ने करवाए

सुभाष चन्द्र

आईबी अफसर अंकित शर्मा को 25 फरवरी, 2020 को राक्षसों की तरह मार कर ताहिर हुसैन और उसके गिरोह ने इंसानियत की सभी मर्यादाएं तार तार कर दी थी और ताहिर हुसैन के पीछे खड़ा था केजरीवाल और उसकी आम आदमी पार्टी अगर ताहिर हुसैन पकड़ में न आता तो वो अभी भी केजरीवाल का चहेता होता  वो पकड़ा गया तो केजरीवाल ने उसे पार्टी से निकाल कर अपना पल्ला झाड़ लिया लेकिन यह तो सत्य ही है कि दंगों के समय वो केजरीवाल का ही आदमी था और दिल्ली दंगे ठीक उस समय करवाए गए जब डोनाल्ड ट्रंप भारत की यात्रा आने वाले थे। 

निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट को अंकित शर्मा की निर्मम हत्या के साथ इस बात का भी संज्ञान लेना होगा कि दंगा भारत को बदनाम करने उस समय किया गया था जब विदेशी मेहमान अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत आए हुए थे। दूसरे, इन हत्यारों की पैरवी करने वाले वकीलों के साथ भी सख्ती से पेश आना होगा।  

अंकित को 51 बार चाकुओं से छलनी कर दिया ये लोग इंसान कहलाने लायक ही नहीं है ये बर्बरता ताहिर हुसैन ने अपनी कौम की सोच के अनुसार दिखाई, ऐसा कहने में कोई संशय नहीं होना चाहिए यही बर्बरता हमास ने इजरायल के लोगों के साथ दिखाई थी

लेखक 
चर्चित YouTuber 
ट्रायल कोर्ट के जस्टिस प्रवीण कुमार सिंह ने ताहिर को सरकारी आदेश का उल्लंघन करने, सांप्रदायिक वैमनस्य फ़ैलाने, घातक हथियारों संग दंगा करने, अपहरण, हत्या व गैरकानूनी जमाव के साथ साझा उद्देश्य से अपराध करने के आरोपों में दोषी करार दिया है

ताहिर हुसैन के साथ उसके गिरोह के नाज़िम, कासिम, जावेद और अनस को भी ऐसे आरोपों में दोषी पाया है जबकि 6 लोगो को बरी कर दिया इस तरह अगर देखा जाए तो कोर्ट ने ताहिर और उसके साथियों को निष्पक्ष तरीके से दोषी ठहराया है, अगर ऐसा न किया होता तो सभी 11 अभियुक्तों को दोषी करा देता 

ताहिर हुसैन जैसे दंगाइयों और आतंकियों को अपने बचाव की चिंता नहीं होती क्योंकि उसके लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद अपनी वकीलों की फ़ौज खड़ी कर दता है इस उलेमा ने कोर्ट में ताहिर के साथ उसके दंगाइयों की भी पैरवी की थी

ताहिर जैसे लोग और अन्य आतंकी अपने मुल्ला मौलवियों के बहकावे में आकर हत्या और आतंकी हमले तो कर देते हैं लेकिन यह भूल जाते है कि एक दिन तो उनकी गर्दन देर से ही सही कानून के हाथ में आ सकती है

आज ताहिर हुसैन को दोषी करार दिए जाने पर सेक्युलर दलालों के मुंह में सीमेंट भर गया है, केजरीवाल ने एक शब्द नहीं बोला क्योंकि ताहिर ने जिसकी हत्या की वो सरकार की IB का हिंदू अधिकारी था 

कल मैंने अपने लेख में लिखा था कैसे अमेरिका, नीदरलैंड और स्विट्ज़रलैंड भारत के अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) के लिए आंसू बहाते हैं और कहते हैं कि उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है, अब वो देश आंखे खोल कर देख लें कि जिस अल्पसंख्यक समुदाय के लिए वो टसुए बहाते हैं, वह अल्पसंखयक क्या करते हैं भारत में उन देशों को अभी पता नहीं है “सर तन से जुदा” क्या  होता है लेकिन उन्हें बस भारत को बदनाम करने के लिए ढोल पीटने से मतलब है

अंकित शर्मा के पिता ने ताहिर हुसैन और अन्य दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग की है और यही होना चाहिए क्योंकि उसके बिना अंकित के लिए इंसाफ अधूरा रहेगा ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे

अभी दिल्ली दंगों के लिए उमर खालिद और शरजील इमाम पर भी फैसला होना है खालिद के माता पिता तो न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी के सामने अपने बेटे की बेगुनाही बता कर आ चुके हैं उत्तराखंड के दिलबर सिंह नेगी की 24 फरवरी, 2020 को भीड़ ने बुरी तरह पिटाई कर जिंदा जला कर हत्या कर दी थी अभी उसकी हत्या के बारे में फैसला आना है लेकिन कुछ आरोपियों को कोर्ट से जमानत मिल चुकी है 

लोग ताहिर हुसैन को आम आदमी पार्टी का पूर्व पार्षद कहते हैं पूर्व क्यों कहते हो, वो दिल से तो अभी भी केजरीवाल की जमात में शामिल है ताहिर हुसैन के दोषी करार दिए जाने से केजरीवाल का मुंह काला हो गया

महरंग बलोच पर मलाला मौन… अफगान महिलाओं के लिए मंच-मंच भाषण, लेकिन पाकिस्तानी फौज के बलोचों के दमन पर नोबेल विजेता मलाला यूसुफजई खामोश क्यों?

                                      महरंग बलोच (बाएँ), मलाला यूसुफजई (दाएँ), (फोटो साभार : ChatGPT)
पाकिस्तान में अत्याचारों का कोई अंत नहीं होता है। बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन के खिलाफ संघर्ष करने वाली बलोच याकजेहती कमेटी (BYC) की मुखिया महरंग बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। जिस डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप के बदले जनता की आवाज को हथियार बनाया था, जिसे टाइम मैगजीन ने 2024 में ‘TIME100 नेक्स्ट’ में शामिल किया था और BBC ने 100 सबसे प्रेरणादायक महिलाओं में जगह दी थी उसे उम्रभर के लिए जेल में डाल दिया।

तभी से सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक गूँज रहा है… लेकिन तब दुनिया के कोने-कोने से मानवाधिकार का झंडा उठाने वाली नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला युसूफजई की टाइमलाइन पर सन्नाटा है। हाँ, उन्हें फिक्र है तो अफगानिस्ता की, तालिबान की और वहाँ की महिलाओं की.. बाकी उनके खुद के मुल्क में महिलाओं के साथ जो होता हो वो होता रहे, उस पर कोई चिंता नहीं।

महरंग बलोच: ‘बलूचिस्तान की शेरनी’

महरंग बलोच को समझना हो तो पहले बलूचिस्तान को समझना होगा। पाकिस्तान का यह सबसे बड़ा प्रांत दशकों से ‘एनफोर्स्ड डिसअपियरेंस’ यानी सरकारी तंत्र द्वारा लोगों के जबरन गायब कर दिए जाने की त्रासदी झेल रहा है। महरंग के अब्बू अब्दुल गफ्फार लंगोव खुद इस तंत्र के शिकार हुए। जब महरंग मात्र 16 साल की थी तब 2009 में उनके अब्बू को हिरासत में ले लिया गया। तभी से इस लड़की ने विरोध को अपनी जिंदगी बना लिया।
बलोच मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई करते हुए भी महरंग सड़कों पर रही। उनके अब्बू का तो शव कुछ समय बाद मिल गया और तब से उन्होंने BYC के बैनर तले लॉन्ग मार्च निकाले, धरने दिए और हजारों लापता बलोचों के परिजनों की आवाज बनीं।
जुलाई 2024 में ग्वादर में हुए ‘राजी मुची’ बलोच राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुई हिंसा में फ्रंटियर कॉर्प्स के एक सिपाही शब्बीर बलोच की मृत्यु हो गई। पाकिस्तानी सरकार ने इसका ठीकरा महरंग पर फोड़ा। मार्च 2025 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। फिर ट्रायल को खुली अदालत से जेल ट्रायल में बदला और फिर उन्हें उम्रकैद मिली। लेकिन इस पर दुनियाभर में महिला अधिकारों की झंडाबरदार मलाला युसूफजई खामोश हैं।

मलाला के मौन पर सवाल

आप में से कई लोग इस नाम से परिचित होंगे, जो नहीं जानते होंगे उन्हें बताएँ कि मलाला आतंक के खिलाफ महिलाओं की आवाज का कथित प्रतीक हैं। मलाला यूसुफजई का जन्म 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान की स्वात घाटी में हुआ था।। जब तालिबान ने स्वात पर कब्जा किया और लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगाई, तब ग्यारह साल की मलाला ने BBC उर्दू के लिए ‘गुल मकई’ नाम से डायरी लिखनी शुरू की। अक्टूबर 2012 में तालिबान के एक बंदूकधारी ने उनके स्कूली बस में उन्हें गोली मार दी। मलाला बचीं और ब्रिटेन में इलाज के बाद महिला अधिकारों की आवाज बन गईं। 2014 में महज 17 साल की उम्र में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
अब वह महिलाओं के लिए आवाज तो उठाती हैं लेकिन कहा जाता है कि तभी तक जब तक कि उनकी अपनी छवि को कोई नुकसान न हो? मार्च 2025 में जब महरंग को पहली बार गिरफ्तार किया गया था, तब मलाला ने कहा था, “मैं महरंग बलोच की हिरासत को लेकर परेशान और चिंतित हूँ, यह उनका अधिकार है कि वे आवाज उठाएँ। उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।” यह सराहनीय था।
लेकिन 22 जून 2026 को जब उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जब दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन बोल उठे, जब BYC ने इसे ‘बलोच राष्ट्र के प्रति नफरत की अभिव्यक्ति’ कहा तब मलाला की आवाज कहाँ थी? दूसरी तरफ अफगानिस्तान की महिलाओं के लिए मलाला की आवाज निरंतर और मुखर है। वे तालिबान को ‘जेंडर अपार्थेड’ का दोषी कहती हैं, UN में भाषण देती हैं, हार्वर्ड में सेमिनार करती हैं। यह काम जरूरी है और इसकी तारीफ होनी चाहिए। लेकिन एक सवाल अनुत्तरित रहता है कि अफगानिस्तान की महिलाओं पर तालिबान का जुल्म जितना बड़ा मुद्दा है, क्या बलोचिस्तान में राज्य-प्रायोजित गुमशुदगियाँ, बलोच महिलाओं की पुकार और एक डॉक्टर-एक्टिविस्ट की उम्रकैद उतना बड़ा मुद्दा नहीं?
इससे और आगे बढ़ें तो पाकिस्तान में हर साल हजारों हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म-परिवर्तन और शादी करवाई जाती है। संयुक्त राष्ट्र के 2025 के विश्लेषण के अनुसार, इन मामलों में 75% पीड़ित हिंदू महिलाएँ हैं और 80% मामले सिंध प्रांत से हैं।
मलाला ने कभी सीधे पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म-परिवर्तन को नाम लेकर नहीं कोसा। जब एक ट्विटर यूजर ने उनसे इन लड़कियों के लिए आवाज उठाने की गुजारिश की, तो मलाला ने उन्हें ब्लॉक कर दिया। यहाँ सवाल चुनाव का है। जब मलाला तालिबान को ‘जेंडर अपार्थेड’ का मुजरिम कहती हैं तो वे सही हैं। लेकिन जब उसी पाकिस्तान में हिंदू बच्चियों को उठाकर उनकी जिंदगी तबाह की जाती है और जब एक बलोच डॉक्टर को उम्रकैद की सजा मिलती है तो यही मलाला क्यों चुप हो जाती हैं?
अफगानिस्तान की महिला पर बोलना आसान है क्योंकि तालिबान उनकी दुश्मन है, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उनकी बात सुनता है और वहाँ उन्हें नहीं जाना है तो कोई बड़ा राजनीतिक जोखिम नहीं है। लेकिन पाकिस्तान की फौज के खिलाफ बलोचों के दमन पर बोलना, वहाँ की हिंदू अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए लड़ना यह राजनीतिक रूप से जोखिमभरा है। और शायद यही कारण है कि मलाला की आवाज वहाँ पहुँचते-पहुँचते दब जाती है।

 

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के सवाल से फंस गए राहुल गांधी, खुल गया कच्चा चिट्ठा

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। यह कहावत कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत पर बिल्कुल सटीक बैठती है। सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया विदेशी दौरों को लेकर सवाल उठाया है।  सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए पोस्ट में उन्होंने लिखा कि एक ओर प्रधानमंत्री भारतीयों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री लगातार विदेशी दौरों पर हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने पिछले 57 दिनों में 11 देशों का दौरा किया है। सुप्रिया श्रीनेत के इस सवाल ने जहां राहुल गांधी को बुरी तरह फंसा दिया है, वहीं प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों से मिली उपलब्धियों को नजरअंदाज कर देश की 140 करोड़ जनता को गुमराह किया है।

57 दिनों में 11 देशों के दौरे का किया जिक्र
सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों की लिस्ट भी शेयर की। उनके मुताबिक, ‘प्रधानमंत्री ने 15-16 मई को UAE, 17 मई को नीदरलैंड, 18 मई को स्वीडन, 19 मई को नॉर्वे, 20 मई को इटली, 13-16 जून को फ्रांस, 17-18 जून को स्लोवाकिया, 27-29 जून को सेशेल्स, 6-7 जुलाई को इंडोनेशिया, 8-9 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया और 10-11 जुलाई को न्यूजीलैंड का दौरा किया।’ कांग्रेस नेता ने आगे लिखा कि प्रधानमंत्री ने भारतीय नागरिकों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री स्वयं पिछले 57 दिनों में 11 देशों की यात्रा कर चुके हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों ने कांग्रेस की नाकामियों को किया उजागर 
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सवाल तो उठाया दिया, लेकिन ये नहीं बताया कि इन विदेशी दौरों से देश को क्या हासिल हुआ। उन्होंने जनता को गुमराह करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को विरोधाभासी साबित करने की पूरी कोशिश की है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों से मिली कामयाबी ही कांग्रेस के प्रोपेगैंडा और झूठ को बेनकाब करने के लिए काफी है। अब प्रधानमंत्री मोदी के उन प्रमुख विदेशी दौरों पर एक नजर डालते हैं, जिन्होंने ना सिर्फ देश को लाभान्वित और सुरक्षित किया है, बल्कि पूर्ववर्ती कांग्रेस शासन की विदेश नीति और उसकी नाकामियों को भी उजागर किया है। 

न्यूजीलैंड दौरा : मुक्त व्यापार समझौता,20 बिलियन डॉलर के भारी निवेश
रिकॉर्ड 9 महीने के समय में हुए मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच बाजार की पहुंच, निवेश, टेक्नोलॉजी और सेवाओं के नए द्वार खुलेंगे। इसके तहत न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 बिलियन डॉलर के भारी निवेश का वादा किया है।

ऑस्ट्रेलिया दौरा : यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स का समझौता
ऑस्‍ट्रेलिया में ऊर्जा सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर बड़ा समझौता किया गया। भारत को यूरेनियम की आपूर्ति के लिए ‘इंडिया-ऑस्ट्रेलिया सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट’ को अंतिम रूप दिया गया। इसे भारत की एक बड़ी जीत माना जा रहा है। गौरतलब है कि साल 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम बेचने से साफ मना कर दिया था। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के कोकोस द्वीप पर अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल स्थापित किया जाएगा, जो भारत के गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन को तकनीकी सहयोग देगा।

इंडोनेशिया दौरा : ब्रह्मोस मिसाइल, समुद्री सुरक्षा और क्रिटिकल मिनरल्स
दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग और समुद्री सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण समझौते हुए। इंडोनेशिया भारत को क्रिटिकल मिनरल्स देगा। भारत और इंडोनेशिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए सहयोग का विस्तार किया है। 

सेशेल्स दौरा : समुद्री सुरक्षा लेकर दोनों देशों के बीच समझौत
इस ऐतिहासिक दौरे में भारत और सेशेल्स के बीच अगले 50 वर्षों के लिए रोडमैप तैयार हुआ तथा डिजिटल पेमेंट (UPI) सहित 9 महत्वपूर्ण समझौते किए गए। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, समुद्री सुरक्षा और रक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग और मजबूत हुआ। इसके साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय भागीदार की भूमिका और सशक्त होगी।

क्यों जरूरी थे प्रधानमंत्री मोदी के ये विदेशी दौरे 
प्रधानमंत्री मोदी का 4 देशों का दौरा यूं ही नहीं हुआ। इसका आधार 16 जून 2026 को अमेरिका में हुई एक घटना को माना जा रहा है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जून को अपनी सबसे बड़ी सैन्य कमांड, ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड’ (USINDOPACOM) का नाम बदलकर फिर से ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ (USPACOM) कर दिया। माना जा रहा है कि अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्‍स को लेकर चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि रेयर अर्थ मिनरल्‍स सेमी-कंडक्‍टर निर्माण, बैटरी वाली गाड़ियों, स्मार्टफोन और डिफेंस सेक्‍टर के लिए काफी महत्‍वपूर्ण होते हैं। रेयर अर्थ मिनरल्‍स पर चीन का एकाधिकार है। इसके चलते हिंद और प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों ने आपसी कूटनीति को नई दिशा देने की शुरुआत कर दी है। इसी को धार देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने प्रशांत महासागर क्षेत्र के तीन देशों इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र के देश सेशेल्स की यात्रा की।

बीजेपी ने पेश किया पीएम मोदी के विदेश दौरों का ‘रिपोर्ट कार्ड’
बीजेपी ने रविवार (12 जुलाई,2026) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया विदेश दौरों का ‘रिपोर्ट कार्ड’ पेश करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला। बीजेपी मुख्यालय में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के दौरों से देश को महत्वपूर्ण रणनीतिक, रक्षा और आर्थिक लाभ हुए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के सेशेल्स, इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरों तथा जापान के शीर्ष नेतृत्व की भारत यात्रा का जिक्र करते हुए अपनी प्रस्तुति को ’10 कदम, 10 का दम’ नाम दिया। पात्रा ने कहा कि भारत हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्रों में एक ‘स्थिरता की ताकत’ के रूप में उभर रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि विदेश में मौजूद कांग्रेस नेता बंद कमरों में ‘साजिश’ रच रहे होंगे। पात्रा ने आरोप लगाया कि राहुल इस बात की ‘साजिशन’ रच रहे होंगे कि मोदी सरकार के अच्छे कामों में कैसे बाधा डाली जाए।

सुप्रिया श्रीनेत के सवाल से कैसे फंस गए राहुल गांधी ?
प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सवाल उठने के बाद अब राहुल गांधी के विदेशी दौरों को लेकर बहस तेज हो गई है। अब पूछा जा रहा है कि राहुल गांधी अभी कहा है? केरल के वायनाड में हाल में हुए भूस्खलन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हादसे के कई दिन बाद भी राहुल गांधी प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने व पीड़ितों से मिलने नहीं पहुंचे। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दावा किया कि, ‘राहुल गांधी काफी समय से भारत से बाहर हैं और किसी को उनके ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं है। उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा, ‘क्या किसी को पता है कि राहुल गांधी कहां हैं? वह किस देश में छुट्टियां मना रहे हैं? वह किसके साथ हैं? वह अक्सर किससे मिलने जाते हैं?’

वायनाड में हालिया भूस्खलन, राहुल और प्रियंका गायब
वहीं एक अन्य पोस्ट में बीजेपी नेता ने लिखा कि ‘वायनाड में हालिया भूस्खलन में लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर तबाही हुई, लेकिन इसके बावजूद न राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रभावित इलाके में जाकर पीड़ितों से मुलाकात की।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘किसी भी जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता इस बात से मापी जाती है कि वह लोगों के सबसे कठिन समय में उनके साथ खड़ा हो, न कि केवल चुनाव के समय उनके बीच पहुंचे।’ बता दें कि 7 जुलाई को केरल के वायनाड में भूस्खलन हुआ था। भारी बारिश होने के कारण मिट्टी खिसकने से दुर्घटना हुई थी जिसमें जान-माल का नुकसान हुआ था।

राहुल गांधी की विदेश यात्रा अभी भी रहस्य के घेरे में
अमित मालवीय ने सोशल मीडिया एक्स पर एक और पोस्ट करते हुए सवाल उठाया कि 22 जून से 13 जुलाई के बीच राहुल गांधी की विदेश यात्रा अभी भी रहस्य के घेरे में है। वह कहाँ गए थे? उन्होंने किससे मुलाकात की? उनकी यात्रा और वहां ठहरने का खर्च किसने उठाया? ये कुछ ऐसे जायज सवाल हैं, जिन्हें लेकर नेता प्रतिपक्ष को खुलकर सामने आना चाहिए। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि क्या उनकी इन विदेशी मुलाकातों में ऐसी बैठकें शामिल थीं, जिनका भारत के राजनीतिक या रणनीतिक हितों पर कोई असर पड़ सकता है।

देश और पार्टी की जरूरत के समय राहुल गांधी की विदेश यात्रा
राहुल गांधी की विदेश यात्रा उस वक्त होती है जब कांग्रेस पार्टी को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। अब सवाल है कि पार्टी की स्थिति को ठीक करने के बजाए राहुल गुपचुप विदेश यात्राओं पर क्यों निकल जाते हैं? कांग्रेस द्वारा जारी प्रचार कार्यक्रम के अनुसार, देहरादून में अगले बड़े जनसभा से पहले 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियां होनी थीं। हालांकि, राहुल गांधी की विदेश यात्रा बढ़ने के कारण इन्हें स्थगित करना पड़ा है और उनके 17 जुलाई के आसपास लौटने की उम्मीद है। सूत्रों का यह भी कहना है कि राहुल गांधी पिछले 20 दिन से सार्वजनिक गतिविधियों में नजर नहीं आए हैं। अब सवाल उठ रहे हैं कि राहुल गांधी आखिर हैं कहां। सूत्रों का दावा है कि राहुल गांधी विदेश दौरे पर हैं। लेकिन इसे लेकर न तो कोई यात्रा कार्यक्रम जारी किया गया और ना ही उन्होंने खुद इसे लेकर सोशल मीडिया पर ही कोई पोस्ट किया। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान उनका अधिकांश समय इंग्लैंड और फिनलैंड सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों में बीता है। 

खास मौकों पर गायब रहे राहुल गांधी
सितंबर 2025 में, राहुल गांधी ने उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के शपथ ग्रहण समारोह में भाग नहीं लिया, जिस पर भाजपा ने आरोप लगाया कि वह उस समय विदेश यात्रा पर थे।

अक्टूबर 2024 में, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान चिली की उनकी यात्रा भी एक राजनीतिक विवाद का मुद्दा बन गई।

30 दिसंबर,2024 को राहुल गांधी वियतनाम में थे। राहुल गांधी का वियतनाम दौरा ऐसे समय पर हुआ था, जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन हुआ था और देश में सात दिन का शोक घोषित था। 

दिसंबर 2020 में, राहुल गांधी ने विदेश यात्रा की क्योंकि कांग्रेस ने किसानों के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में अपना अभियान तेज कर दिया था।

2016 में, नए साल के मौके़ पर वह पाँच राज्यों के चुनाव से ठीक पहले विदेश यात्रा पर गए। इस मौके़ पर भी पंजाब कांग्रेस के नेताओं की ओर से काफ़ी नाराज़गी का भाव मीडिया में सामने आया।

2015 में, राहुल गांधी ने लगभग दो महीने की छुट्टी लेकर विदेश में अवकाश लिया, जिसके चलते वे संसद के बजट सत्र के एक महत्वपूर्ण हिस्से और विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक पर हुई बहस में शामिल नहीं हो पाए।

22 साल में 54 विदेश यात्रा, राहुल की ट्रिप पर 60 करोड़ खर्च
बीजेपी ने राहुल गांधी की विदेश यात्रा का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने रखते हुए विस्तृत जानकारी दी। राहुल गांधी ने साल 2004 से 2026 तक कुल 54 व्यक्तिगत विदेश यात्राएं की हैं, जिसमें अमेरिका, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, वियतनाम, कम्बोडिया, सिंगापुर, बहरीन, मालदीव, कतर, यूएई शामिल है। इसके अलावा वो 3 मई,2026 को बिना जानकारी के मस्कट ओमान भी गए, जिसकी फुटेज सोशल मीडिया पर मौजूद है। बीजेपी ने दावा किया कि राहुल गांधी 22 साल में 54 बार विदेश यात्रा पर गए, जिन पर 60 करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। अब सवाल उठ रहे कि राहुल की इन यात्राओं की फंडिंग किसने की।

सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़कर गोपनीय रूप से विदेश जाने का आरोप
राहुल गांधी के विदेशी दौरों को लेकर उन पर सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़कर गोपनीय रूप से यात्रा करने के आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से बचाव में कहा जाता है कि राहुल गांधी अपनी निजी जिंदगी को राजनीतिक जीवन से अलग रखते हैं। कई बार वह ध्यान (विपासना) लगाने, आराम करने या छुट्टियां बिताने के लिए एकदम गोपनीय तरीके से यात्रा करते हैं। उनके कई दौरों को लेकर सत्ता पक्ष और जानकारों का मानना है कि वे विदेशों में छिपी हुई राजनीतिक बैठकों, विचार-विमर्श या अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ संपर्क साधने के लिए जाते हैं। उनके लंबे विदेश दौरों के कारण कभी-कभी उनकी घरेलू राजनीति और संसद में उपस्थिति पर सवाल उठते हैं। बीजेपी अक्सर उन पर विदेशों में देश विरोधी ‘साजिश’ रचने का आरोप लगाती है, जबकि कांग्रेस उनके विचारों और संवादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बताती है।

25 सालों बाद हिन्दू आतंकवाद की सच्चाई सामने आई :‘कांग्रेस ने भगवा आतंकवाद बोलने को कहा’: UPA सरकार में मंत्री रहे सुशील शिंदे ने खोल दी पार्टी की असलियत, पुराना वीडियो Viral

कांग्रेस आलाकमान सोनिया गाँधी के साथ पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे (फोटो साभार: IndiaToday)
केंद्र में कांग्रेस की सरकार में 2012 से 2014 तक गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ को लेकर बड़ा बयान दे रहे हैं। उन्होंने माना कि यह शब्द इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था और इसके पीछे पार्टी का हाथ बताया। अब सच्चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग कांग्रेस को खूब लताड़ लगा रहे हैं।

वीडियो में सुशील कुमार शिंदे से जब पूछा गया कि ‘भगवा आतंकवाद' टर्म सही था या नहीं तब वह कहते हैं, “पार्टी (कांग्रेस) ने बताया था कि भगवा आतंकवाद बोलना है, मैंने वही किया। गलत तो था। मैं यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। ऐसा नहीं होना चाहिए था। ये उस पार्टी की विचारधारा होती है। ये चाहे भगवा हो या रेड हो या सफेद हो। ऐसा कोई आतंकवाद नहीं होता है।”

हालाँकि, सुशील शिंदे का यह बयान डेढ़ साल पुराना है। जब यूट्यूबर और पत्रकार शुभांकर मिश्रा ने सुशील कुमार शिंदे के साथ पॉडकास्ट किया था। अब इस वीडियो के एक अंश वायरल हो रहा है, जिसमें शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे भद्दे प्रोपेगेंडा को गलत बताकर अपना कबूलनामा सौंप रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

अब डेढ़ साल बाद सोशल मीडिया पर शिंदे के इस बयान का वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। लोग इसे कांग्रेस की ‘झूठों’ से पर्दा उठाने और कांग्रेस की हिंदू-घृणा जैसी बातें कह रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कबूलनामा बताया है। बीजेपी ने सवाल उठाया कि क्या यह सनातन संस्कृति को बदनाम करने की कांग्रेस की एक सोची-समझी साजिश थी?

बीजेपी नेता डॉ. निखिल आनंद कहते हैं कि सुशील कुमार शिंदे का बयान कांग्रेस की वैचारिक सोच को उजागर करता है। उनके मुताबिक कांग्रेस और उससे जुड़ी विचारधारा ने हमेशा भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सनातन आस्था को निशाना बनाया है तथा राजनीतिक हितों के लिए कट्टरपंथी ताकतों के साथ समझौता किया है। उन्होंने लोगों से ऐसे तत्वों के प्रति सतर्क रहने और लोकतांत्रिक तरीके से उनका जवाब देने की बात कही।

कपिल बिश्नोई कहते हैं, “कांग्रेस पार्टी की हिंदुओं और भगवा रंग से नफरत किसी से ढकी छिपी नहीं है। रह रह कर ये नफरत किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाती है।”

एक्स हैंडल ‘जनार्दन मिश्रा’ ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “अब तो पूर्व कांग्रेसी भी सच बोलने लगे लेकिन चमचे फिर भी नहीं मानेगे…!!”

‘भगवा आतंकवाद’ पर शिंदे ने क्या कहा था?

भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने साल जनवरी 2013 में कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस बयान को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी। हालाँकि, इन आलोचनाओं के बाद भी वे अपने बयान पर कायम थे।

तब गृहमंत्री शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।” दरअसल, 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान शिंदे ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाया था।

अपने बयान के पीछे शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं। समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि ऐसी कोशिशों से देश को सतर्क रहना चाहिए। शिंदे के इस बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकवाद दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रहते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने साल 2010 में सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।

भगवा आतंकवाद पर केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”