नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य होता है देशहित की बात करे नाकि अहित की। समय आ गया है जब राहुल गाँधी को वोट देने वालों को अपनी खतरनाक गलती पर पछताना होगा। राहुल द्वारा अडानी का विरोध करने का अंजाम यह हुआ कि गौतम अडानी को केन्या में मिला प्रोजेक्ट चीन को मिल गया यानि भारत को नुकसान। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं राहुल गाँधी है।
नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद जो भी कानून पास किए, उनमें कोई ऐसा नहीं है जिसका कांग्रेस और विपक्ष ने विरोध न किया हो चाहे उस विरोध के कारण देश को कितना भी नुकसान उठाना पड़ा हो।
अब सबसे ज्यादा तड़प कांग्रेस को 92000 करोड़ के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से हो रही है क्योंकि इस प्रोजेक्ट से चीन के हितों को नुकसान हो सकता है जो कांग्रेस को कतई बर्दाश्त नहीं है। कभी पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने प्रोजेक्ट के खिलाफ पर्यावरण के नाम मोर्चा खोला हुआ है और कहते है अभी तक वो 39 पोस्ट X पर डाल चुके हैं। एक वाहियात दलील दे रहे हैं कांग्रेसी कि इस प्रोजेक्ट के लिए 1.5 करोड़ पेड़ काट दिए जाएंगे। सोनिया गांधी लेख लिखती हैं और जो राहुल गांधी विदेशों में घूमता फिरता है, वह भी अंडमान निकोबार हो आया।
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कांग्रेस को पता होना चाहिए यदि किसी प्रोजेक्ट से पर्यावरण को कोई नुकसान हो सकता है तो इसका आकलन NGT करता है लेकिन उसने तो प्रोजेक्ट को स्वीकृति देते हुए कहा “NO GOOD GROUND TO INTERFERE WITH THE PROJECT DUE TO ITS NATIONAL AND STRATEGIC IMPORTANCE’.
कांग्रेस का आरोप है यह प्रोजेक्ट वहां रहने वाले शोम्पेन और निकोबारी आदिवासियों के हितों के खिलाफ है जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार शोम्पेन जनजाति की अनुमानित जनसंख्या 229 है और सरकार पागल नहीं है जो उनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं करेगी।
कांग्रेस को बस देश की विकास यात्रा में बाधा पहुंचानी है और ऐसा नहीं है भारत के विकास प्रोजेक्ट का विदेशी शक्तियां अब ही विरोध कर रही है। कांग्रेस द्वारा अपने समय में 2012 में तमिलनाडु के कुडनकुलम नुक्लेअर प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट में घसीटा गया था। नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध को भी लटकाया गया जो आज कई राज्यों की प्यास बुझा रहा है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का Infrastructure के लिए क्या महत्व है और इसमें क्या क्या बनाया जाना है -
-इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गलाथिया बे (Galathea Bay) में एक गहरा बंदरगाह, जहां बड़े मालवाहक जहाज अपना सामान उतार सकेंगे;
-ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: एक नया हवाई अड्डा, जिसे नागरिक और रक्षा (नौसेना) दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाएगा; और
-टाउनशिप और पावर प्लांट: 450 मेगावाट का बिजली संयंत्र और कर्मचारियों व निवासियों के लिए एक नया शहर बसाया जाना है।
यह प्रोजेक्ट चीन के लिए उसकी सबसे बड़ी कमजोरी 'मलक्का दुविधा' (Malacca Dilemma) को बढ़ा देता है।
मलक्का जलडमरूमध्य पर निगरानी: ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य [Strait of Malacca] के बेहद करीब स्थित है। चीन का लगभग 70-80% कच्चा तेल और भारी मात्रा में व्यापार इसी रूट से गुजरता है।
रणनीतिक बढ़त: इस प्रोजेक्ट के बन जाने से भारतीय नौसेना की इस रूट पर सीधी और मजबूत नजर रहेगी। जरूरत पड़ने पर भारत इस महत्वपूर्ण चोकपॉइंट (Chokepoint) के जरिए चीनी जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित या बाधित कर सकता है।
व्यापारिक प्रभुत्व में कमी: भारत अभी ट्रांसशिपमेंट के लिए श्रीलंका (कोलंबो) और सिंगापुर के बंदरगाहों पर निर्भर है, जिससे चीन को फायदा मिलता है। इस हब के बनने से भारत का अपना कार्गो हैंडल हो सकेगा और चीन के क्षेत्रीय व्यापारिक एकाधिकार को चुनौती मिलेगी।
कांग्रेस से बस “पापा” चीन को होने वाला यह नुकसान बर्दाश्त नहीं हो रहा। कांग्रेस तो रामसेतु के आस पास का 10 लाख टन का थोरियम भंडार बेचने की कोशिश कर रही थी।
कांग्रेस चीन के नमक का हक़ अदा नहीं कर पाएगी क्योंकि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट तो पूरा होकर रहेगा।
भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद मानने वालों की कमी नहीं। विपक्ष तो यह काम कर ही रहा है, लेकिन कुछ मीडिया वाले भी पीछे नहीं। जो समाचार-पत्र घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए विलाप करता हो उसके राष्ट्रहित समाचार प्रकाशित करने पर भी शंका होती है। क्या घुसपैठियों पर विलाप करने के लिए उनके दामादों के आकाओं ने किसी रूप में इनाम दिया है? क्या दामाद घुसपैठियों का विलाप करने वाले समाचारपत्र को नहीं मालूम कि ये दामाद किस तरह भारत की अर्थव्यवस्था में दीमक का काम कर रहे हैं?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।
नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।
दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।
घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट
1 जुलाई 2026 को Financial Times ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।
कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”
इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।
लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”
आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।
इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”
बेशक Financial Times ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।
धार्मिक रंग देने की कोशिश
लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।
असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।
आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।
संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।
Financial Times ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।
अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।
बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।
न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले
शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।
गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”
असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।
दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन
अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।
स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।
लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।
दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।
एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।
Financial Times के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।
कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।
यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।
भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
पाकिस्तान की गोरा करने वाली क्रीम से महिलाओं की किडनी हुई खराब (फोटो साभार : ChatGPT) हर कोई खूबसूरत और गोरा दिखना चाहता है। इसी चाहत में लोग अक्सर बिना सोचे-समझे बाजार में मिलने वाली कोई भी ब्यूटी क्रीम चेहरे पर लगाने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी गोरा होने का यही शौक जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। हाल ही में भारत में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया। पाकिस्तान में बनी एक मशहूर ब्यूटी क्रीम को लगाने से भारत की कई महिलाओं की सेहत पूरी तरह बिगड़ गई। इस क्रीम ने न सिर्फ महिलाओं के चेहरे को खराब किया, बल्कि सीधे उनकी किडनी पर इतना बुरा असर डाला कि वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं।
इस पूरे हंगामे की वजह पाकिस्तान की ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (Goree Beauty Cream) है। इस क्रीम को लेकर दावा किया जाता था कि इसे लगाने से चेहरा तुरंत गोरा हो जाता है, लेकिन अब इसके पीछे का जहरीला सच सबके सामने आ चुका है। महाराष्ट्र के नागपुर में जब कई महिलाओं ने इस क्रीम को लगाया, तो उन्हें सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएँ होने लगीं। जब इसकी शिकायतें डॉक्टरों और सरकार तक पहुँचीं, तो जाँच टीमें तुरंत अलर्ट हो गईं। लैब में इस क्रीम की बारीकी से जाँच की गई, जिसमें खतरनाक केमिकल मिले। इसके बाद भारत सरकार और महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने सच का पता लगाकर इस क्रीम को भारत में पूरी तरह बैन कर दिया है।
नागपुर से हुई जहरीले सच की शुरुआत
यह मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र के नागपुर में कई महिलाओं की तबीयत अचानक खराब होने लगी। जब वे डॉक्टरों के पास पहुँचे, तो पता चला कि ये सभी महिलाएँ पिछले दो साल से गोरा होने के लिए एक ही ब्रांड की क्रीम लगा रही थीं। जाँच में सामने आया कि इस क्रीम की वजह से उनकी किडनी खराब हो चुकी थी और उनके शरीर में खतरनाक जहर फैल गया था।
डॉक्टरों ने जब गहराई से जाँच की, तो मालूम पड़ा कि ये सभी 18 महिलाएँ इंटरनेट और सोशल मीडिया से खरीदकर ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (जो पाकिस्तान की है) इस्तेमाल कर रही थीं। यह बात पता चलते ही डॉक्टरों ने तुरंत इसकी जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों और प्रशासन को दी। इसके बाद सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए बाजार से इस क्रीम को जब्त कर लिया और जांच के लिए लैब में भेज दिया ताकि पता चल सके कि इसमें कौन से खतरनाक केमिकल मिलाए गए हैं।
प्रयोगशाला की जाँच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
जब महाराष्ट्र के सरकारी विभाग (FDA) ने इस ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ की लैब में जाँच की, तो नतीजे बहुत डराने वाले थे। जाँच में पता चला कि इस क्रीम में पारा (Mercury) और शीशा (Lead) जैसे बेहद खतरनाक और जहरीले केमिकल मिले हुए थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसमें पारे (Mercury) की मात्रा तय कानूनी सीमा से 752 गुना ज्यादा थी।
डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के मुताबिक, कंपनियाँ इस पारे का इस्तेमाल इसलिए करती हैं ताकि त्वचा का रंग बहुत जल्दी गोरा और साफ दिखने लगे। लेकिन यह गोरापन कोई असली निखार नहीं होता, बल्कि केमिकल्स के कारण त्वचा को पहुँचने वाला नुकसान होता है। यह खतरनाक पारा स्किन के छोटे-छोटे छेदों (रोमछिद्रों) के रास्ते बहुत आसानी से शरीर के अंदर चला जाता है और धीरे-धीरे अंदरूनी अंगों को खराब करने लगता है।
किडनी पर सीधा हमला और ‘मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी’ का खतरा
रोज इस प्रतिबंधित (बैन) क्रीम को लगाने की वजह से महिलाओं के शरीर में यह खतरनाक पारा जमा होता गया, जिसने सीधे उनकी किडनी को नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि त्वचा के रास्ते शरीर में पहुँचा यह जहर अंदरूनी अंगों को खराब करता है और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यून सिस्टम) को बिगाड़ देता है। इससे किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर सकती है, जिसका इलाज बहुत मुश्किल और महँगा होता है।
मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, ऐसे ज्यादा पारे वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से किडनी की एक गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी में किडनी का फिल्टर करने वाला हिस्सा खराब हो जाता है, जिससे शरीर का जरूरी प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर बहने लगता है। नागपुर की पीड़ित महिलाओं में भी ठीक यही बीमारी और लक्षण पाए गए, जो लंबे समय तक इस जहरीली क्रीम को लगाने की वजह से हुए थे।
भारतीय प्रशासनिक तंत्र और सरकार का कड़ा एक्शन
इस बड़े खतरे को देखते हुए भारत सरकार और महाराष्ट्र के विभाग (FDA) ने तुरंत कड़ा एक्शन लिया है। प्रशासन ने ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ के साथ दो और खराब ब्यूटी प्रोडक्ट्स- ‘फेस फ्रेश गोल्ड’ (क्रीम और सीरम) और ‘कॉस्मेटिक गोल्डन स्टार ब्यूटी क्रीम’ को पूरी तरह असुरक्षित घोषित कर दिया है। अब इन पर पूरी तरह बैन लगा दी गई है और लोगों से अपील की गई है कि वे इन्हें भूलकर भी न खरीदें।
इसके साथ ही, पूरे महाराष्ट्र में नकली और खराब कॉस्मेटिक्स बेचने वालों के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया गया है। FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की देखरेख में सिर्फ जून के महीने में ही 34 जगहों पर छापे मारे गए। इस कार्रवाई में 4 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकली दवाएँ और खतरनाक ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब्त किए गए हैं। साथ ही, नियम तोड़ने वाले दुकानदारों के खिलाफ 9 FIR दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।
नियमों का सरेआम उल्लंघन और मुंबई में क्रिमिनल केस
जाँच करने वाले अधिकारियों को पता चला कि इन पाकिस्तानी क्रीमों के पैकेट पर कानून के मुताबिक कोई भी जरूरी जानकारी नहीं लिखी थी। पैकेट पर न तो बनाने वाली कंपनी का नाम-पता था, और न ही यह लिखा था कि क्रीम कब बनी है और कब खराब (Expire) होगी। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन था, जिससे ग्राहकों को धोखे में रखकर उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा था।
इसी बीच, मुंबई पुलिस ने चेंबूर इलाके के एक दुकानदार पर केस दर्ज किया है। इस दुकानदार पर आरोप है कि पाकिस्तान से सामान मँगाने पर रोक होने के बावजूद, वह छिपकर यह खतरनाक ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ बेच रहा था। अब पुलिस और एजेंसियाँ इस बात की गहराई से जाँच कर रही हैं कि रोक होने के बाद भी यह प्रतिबंधित क्रीम भारतीय बाजारों और दुकानों तक किस रास्ते से पहुँच रही थी।
ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत में एंट्री
इस मामले में एक और बड़ी चिंता की बात यह है कि रोक होने के बाद भी यह पाकिस्तानी क्रीम लोगों के घरों तक कैसे पहुँची। जाँच में पता चला कि इसे बेचने के लिए इंस्टाग्राम पेजों, रील्स और इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा था। यहाँ तक कि मीशो (Meesho) जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी कुछ बाहरी दुकानदारों (थर्ड-पार्टी सेलर्स) द्वारा यह खतरनाक क्रीम धड़ल्ले से बेची जा रही थी, जहाँ से आम महिलाओं ने इसे आसानी से ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया।
सोशल मीडिया पर इसके विज्ञापनों और झूठे दावों को देखकर सीधी-सादी महिलाएँ इसके जाल में फँस गईं और इसे चेहरे के लिए बहुत अच्छा मान बैठीं। इंटरनेट पर इस क्रीम से बहुत जल्दी गोरा होने का झूठा प्रचार किया गया था, जिसे देखकर लोगों ने इसे खरीदा। अब सरकार ने सभी ऑनलाइन वेबसाइटों और छोटे-बड़े दुकानदारों को सख्त चेतावनी दी है कि वे इस क्रीम को तुरंत बेचना बंद कर दें, वरना उनके खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लग चुके हैं इस क्रीम पर प्रतिबंध
इस पाकिस्तानी क्रीम का यह सच सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सामने आ चुका है। यह ब्रांड विदेशों में भी अपनी बदनामी के लिए जाना जाता है। साल 2021 में न्यूजीलैंड की सरकारी दवा संस्था ने अपने लोगों को चेतावनी देते हुए इस क्रीम को लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, क्योंकि वहाँ की लैब जाँच में भी इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में जहरीला पारा और शीशा पाया गया था।
इसके बाद, साल 2025 में फिलीपींस सरकार ने भी इस क्रीम के सभी प्रोडक्ट्स को सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए चेतावनी जारी की थी। फिलीपींस सरकार का कहना था कि इस क्रीम को देश में बेचने की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी। दुनिया भर में बार-बार बैन होने के बाद भी, यह पाकिस्तानी ब्रांड तस्करी और इंटरनेट के गलत रास्तों के जरिए दुनिया के बाजारों में छिपकर बिकने की कोशिश कर रहा है।
सोशल मीडिया पर दिखा भारी आक्रोश और जनता का रिएक्शन
इस खुलासे के बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग बहुत गुस्से में हैं और इस पर बड़ी बहस छिड़ गई है। इस मामले को सबसे पहले ‘X’ (ट्विटर) पर चिराग बरजात्या नाम के एक व्यक्ति ने पोस्ट शेयर करके सामने लाया था, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई। इस पोस्ट को देखकर हजारों लोगों ने गुस्सा जताया और इसे भारतीयों के खिलाफ एक तरह का ‘केमिकल हमला’ (केमिकल टेररिज्म) कहा।
18 women in Nagpur, Maharashtra complained about kidney problems to their doctors in the span of two years. Doctors saw a pattern and checked that all of them were using this pakistani cream sold by many Instagram pages and meesho.
लोग न सिर्फ इस पाकिस्तानी क्रीम को कोस रहे हैं, बल्कि भारत की ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने बिना जाँच-पड़ताल के इसे अपनी साइट पर कैसे बिकने दिया। लोगों का कहना है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स को कोई भी विदेशी सामान बेचने से पहले उसकी सरकारी मंजूरी और लैब रिपोर्ट जरूर चेक करनी चाहिए। इसके साथ ही, लोग इंटरनेट पर अभियान चलाकर अपील कर रहे हैं कि अपने रिश्तेदारों और घर के काम करने वाले सहायकों को इसके बारे में सावधान करें, और अगर किसी के पास भी यह क्रीम दिखे, तो उसे तुरंत कचरे के डिब्बे में फेंक दें।
गोरेपन का जानलेवा भ्रम और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
पाकिस्तानी क्रीम का यह मामला दिखाता है कि गोरा होने की चाहत, टीवी-इंटरनेट के झूठे विज्ञापन और हमारी आज की आदतें कितनी खतरनाक हो सकती हैं। कुछ ही दिनों में गोरा करने का दावा करने वाली ये क्रीम असल में खूबसूरती बढ़ाने की चीज नहीं, बल्कि बोतलों में बंद धीमा जहर हैं, जो धीरे-धीरे हमारे शरीर के अंगों को खराब कर रही हैं। इस घटना से साफ है कि बिना डॉक्टर की सलाह या बिना सरकारी मंजूरी के इंटरनेट से कोई भी क्रीम या कॉस्मेटिक खरीदना जानलेवा हो सकता है।
अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठें, बल्कि खुद भी सोचें। हमें यह समझना होगा कि जैसा हमारा प्राकृतिक रंग है, वही सबसे अच्छा और सेहतमंद है। गोरा होने की अंधी दौड़ में पड़कर अपनी जान जोखिम में डालना बहुत बड़ी बेवकूफी है। सरकार का इस क्रीम को बैन करना और छापे मारना बहुत अच्छा कदम है, लेकिन यह समस्या तभी पूरी तरह खत्म होगी जब हम खुद समझदार बनेंगे, झूठे विज्ञापनों के बहकावे में नहीं आएँगे और चोरी-छिपे आने वाले ऐसे जहरीले विदेशी सामानों को पूरी तरह ना कह देंगे।
अयातुल्लाह खामेनेई को कई महीनों बाद किया जा रहा है सुपुर्द-ए-खाक (फोटो साभार: X/Government of Islamic Republic of Iran) लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।
नजफ और करबला की मजहबी अहमियत
शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।
इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।
खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।
अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश
खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।
इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी
इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।
इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।
यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।
इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।
सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई
मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।
खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।
वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर (सवाई माधोपुर) में एक 13 साल की बच्ची के साथ 32 लोगों द्वारा किए गए बलात्कार का किस्सा किसी का भी दिल दहला सकता है। यह केस सुप्रीम कोर्ट की आत्मा को झकझोरने के लिए उपयुक्त था लेकिन कोर्ट ने इस पर स्वत संज्ञान लेने की जरूरत नहीं समझी।
जहां judicial activism दिखाने के जरूरत है वहां सुप्रीम कोर्ट खामोश रहता है लेकिन कभी कभी बच्चियों के बलात्कारी को यह कह कर सजा कम कर देता है कि Every Sinner Has A Future. मेरे विचार से सुप्रीम कोर्ट को स्वत संज्ञान लेकर इस पर ट्रायल कोर्ट को ज्यादा से ज्यादा 2 महीने में निर्णय करने के आदेश देने चाहिए। विशाल तिवारी जैसा वकील भारत तिवारी के मामले को सीधा सुप्रीम कोर्ट ले गया लेकिन इस मामले को ले जाने की जरूरत नहीं समझता।
लेखक चर्चित YouTuber
बच्ची 2 सप्ताह पहले एक रिक्शा चालक बच्ची के संपर्क में आई और उसने उसे तीन होटलों के संचालकों को बेच दिया। बेचते समय तय हुआ कि बारी बारी से बच्ची को होटलों में रख कर दुष्कर्म करवाएंगे। पुलिस जांच में सामने आया कि तीनों होटलों में कुल 32 लोगों ने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। 23 जून को पुलिस ने एक मुखबिर की सूचना के आधार पर खुंगर होटल से बच्ची को मुक्त कराया जहां उसे बंधक बना कर रखा गया था। होटलों के संचालक और मैनेजर दुष्कर्म करने के लिए पैसे लेते थे।
होटल खुंगर, जाप इन और सफायर को पुलिस बल की तैनाती के बीच 30 जून को बुलडोज़र चला कर ध्वस्त कर दिया गया।
अभी तक केवल 14 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा सका है। ये दरिंदे इतने गिरे हुए कमीने थे कि बच्ची के साथ एक बार में 3 से 4 या उससे भी ज्यादा लोग अपनी हवस मिटाते थे और उसे शराब पीने के लिए मजबूर करते थे।
En la India, una niña de solo 13 años fue secuestrada, vendida y violada en grupo por 32 hombres durante 5 días en Sri Ganganagar, Rajasthan.
Alrededor del 18 de junio la menor desapareció de su hogar (yendo a clases particulares); un conductor la raptó y la vendió por dinero a… pic.twitter.com/4jKoUtL9kY
सच में यह मामला अत्यंत गंभीर है जिसमें रिक्शा चालक, होटल के मैनेजर और स्टाफ गिरफ्तार हो चुके हैं। इस केस का फैसले शीघ्र होना चाहिए लेकिन अपील में हाई कोर्ट और जरूरत पड़े तो सुप्रीम कोर्ट को भी फुर्ती दिखानी चाहिए। ऐसा न हो कि ट्रायल कोर्ट सजा दे दे और अपील में मामला 15-20 साल लटका रहे। अभी कुछ दिन पहले पुणे में एक ट्रायल कोर्ट ने 3 साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोप में 65 वर्ष के आरोपी भीमराव कांबले को 60 दिन में फांसी की सजा सुनाई है। इस सजा की अपील लटकी नहीं रहनी चाहिए।
मैं फिर आग्रह करता हूं कि श्रीगंगानगर मामले का सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान ले और शीघ्र न्याय दिलाने के लिए कदम उठाए। है कोई वकील जो विषय के लिए सुप्रीम कोर्ट में PIL लगाए?
अमेरिका के 04 जुलाई को 250वें स्वतंत्रता दिवस के बाद वॉशिंगटन दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। IQAir ने इसके पीछे ट्रंप सरकार के ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम को बताया, जिसके तहत शहर में 8.50 लाख से ज्यादा पटाखे फोड़े गए।
ट्रंप सरकार ने जिस ‘पायरोटेक्निको’ कंपनी को ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम का जिम्मा दिया था, उस कंपनी ने 40 मिनट में 8.5 लाख आतिशबाजी के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का टारगेट रखा था। लेकिन इस आतिशबाजी के बाद कुछ घंटों के लिए वॉशिन्गटन दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उस वक्त वॉशिन्गटन में बारीक कणों से होने वाला प्रदूषण 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। आसपास के वर्जीनिया और मैरीलैंड जैसे क्षेत्रों को कोड पर्पल अलर्ट ने चपेट में ले लिया, ये हवा की ऐसी गुणवत्ता का संकेत देते हैं जिसे सिर्फ जोखिम वाले समूहों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए हानिकारक माना जाता है।
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के बाद ट्रस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाया सबूत (फोटो साभार : Aajtak) राममन्दिर चढ़ावे की चोरी का जब से मुद्दा उठा है मीडिया विपक्ष द्वारा प्रायोजित खबरे प्रसारित कर सनातन विरोधी एजेंडा चलाकर अपनी TRP बढ़ाने में लगी रही। लेकिन कल(जुलाई 6) को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सबको बेनकाब कर दिया है। अभी जितनी परतें खुलेंगी सारे राम विरोधी चारों खाने चित होंगे। लेकिन इतनी मुस्तैदी से अजमेर शरीफ में हुए घोटाले पर चर्चा करने किसी ने माँ का दूध नहीं पिया। सिर्फ अजमेर शरीफ ही नहीं जितनी भी दरगाहें और मस्जिदें कोई ऐसी नहीं जहाँ घोटाला नहीं हो।
अयोध्या के राम मंदिर में दान का सामान गायब होने के आरोपों पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने करारा जवाब दिया है। ट्रस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में 5 करोड़ रुपए की सोने की रामचरितमानस, चाँदी की ईंटें और भगवान के चरण चिन्ह सबके सामने रख दिए।
कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने साफ कहा कि दान का एक-एक सामान पूरी तरह सुरक्षित है और चोरी की बातें झूठी हैं। दान में मिली सभी 2800 वस्तुओं का रजिस्टर गोविंद देव जी ने दिखाया। पूर्व IAS अधिकारी एस लक्ष्मीनारायणन ने आरोप लगाया था कि उनकी दी हुई सोने की रामचरितमानस गायब है।
इसकी कीमत करीब 5 करोड़ रुपए है। ट्रस्ट ने इस विवाद को खत्म करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस कीमती रामचरितमानस को सबके सामने रख दिया। साथ ही भगवान के सोने के चरण चिन्ह, हार और काकभुशुंडि को भी मीडिया को दिखाया गया।
दान में मिली सभी 2800 वस्तुओं का रजिस्टर गोविंद देव जी ने दिखाया।
साथ में सभी का प्रदर्शन भी किया ये पीड़ादायक लेकिन फिर भी
लेकिन आप देखते रहिए नए नए सनातनी बनने का नाटक करने वाला विपक्ष अभी भी लगातार मंदिर और न्यास को अपमानित करता रहेगा
— Shivam Tyagi (Modi Ka Parivar) (@ShivamSanghi12) July 6, 2026
SIT जाँच में सच आया सामने
सोशल मीडिया पर अफवाहें उड़ने के बाद स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने इस मामले की जाँच की। जाँच की शुरुआती रिपोर्ट में सामने आया कि श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई करीब 38 किलो और 22.5 किलो चाँदी की ईंटें ट्रस्ट के रिकॉर्ड में बिल्कुल सही सलामत दर्ज हैं।
जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, दान में मिली चाँदी की ईंटों को बाद में गला दिया गया था। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए ‘सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिन्टिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ भेजा गया था। इसका पूरा कानूनी रिकॉर्ड मौजूद है। इसी तरह मुंबई के कारोबारी और सिंधी समाज द्वारा दी गई 200 किलो चाँदी भी ट्रस्ट के पास पूरी तरह सुरक्षित पाई गई है।
चंपत राय का इस्तीफा मंजूर, नए चेहरे शामिल
राम मंदिर परिसर में करीब 3 घंटे तक ट्रस्ट की अहम बैठक चली। इस बैठक में महामंत्री चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। अब कृष्ण मोहन को अंतरिम महामंत्री बनाया गया है। बैठक में कुल 9 में से 7 स्थाई सदस्य मौजूद थे, लेकिन इसमें चंपत राय और अनिल मिश्रा शामिल नहीं हुए।
ट्रस्ट की अगली बैठक 22 जुलाई को बुलाई गई है। तब तक SIT की फाइनल रिपोर्ट भी आ जाएगी। इस अगली बैठक में मंदिर के लिए नए प्रशासनिक अधिकारियों, नए पदाधिकारियों और कुछ नए न्यासियों की नियुक्ति पर आखिरी फैसला लिया जाएगा।
टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट के अनुसार टिन्नू यादव की पत्नी पूनम यादव मंदिर ट्रस्ट पर आरोप लगाते हुए कह रही है कि असली गुनहगारों को बचाने के लिए उनके पति को जानबूझकर बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
पूनम यादव ने उनके परिवार के पास 50 करोड़ की अवैध संपत्ति और लग्ज़री कारण होने के आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया और चुनौती दी कि अगर जांच में हमारे पास से 50 करोड़ की संपत्ति मिलती है, तो उसमें से 45 करोड़ रुपए तुरंत मंदिर ट्रस्ट को दान कर दूंगी और केवल 5 करोड़ अपने पास रखूंगी। तुम 45 करोड़ दान कर 5 करोड़ रख लोगी और मामला बंद हो जाएगा?
लेखक चर्चित YouTuber
क्या सपना है? फिर जेल कौन जाएगा मंदिर में चोरी करने के लिए टिन्नू का बाप या उसका ससुर और पैसा क्या तुम्हारे दहेज़ में आया था जो दान कर दोगी और अपने पास भी रख लोगी?
ये होती है चोरी और सीनाजोरी। चलो 50 करोड़ की संपत्ति और लग्ज़री कारण नहीं है तो बता दो कितने की संपत्ति और पैसा है? या टिन्नू यादव पाक साफ है और एक पैसे का भी गबन नहीं किया।
चोरी का एक पैसा भी मिलेगा तो उस पर तुम्हारा क्या अधिकार है और तुम धन्ना सेठानी बनकर 50 करोड़ में 45 करोड़ दान करने की बात कर रही हो। और 5 करोड़ खुद रखने की बात कह कर बात तो ऐसे कर रही है टिन्नू यादव की पत्नी जैसे खुद ही जज बन गई हो और फैसला सुना दिया।
ये भी खुल कर बताओ कि असली गुनहगार कौन है? क्या उनके लिए टिन्नू यादव ने चोरी की अगर ऐसा है तो कलंक लिए क्यों बैठा है जेल में? असली गुनहगारों के नाम बता कर जेल से बाहर आ जाए। लेकिन अब तो ये भी बताना पड़ेगा कि अखिलेश यादव से 998 बार फ़ोन पर क्या बात की। टिन्नू नहीं बताएगा तो पुलिस कॉल डिटेल्स निकाल कर खुद पता कर लेगी और तब उसकी पत्नी भी मुंह छुपाती फिरेगी।
टिन्नू यादव की पत्नी को तो खामोश रहना चाहिए क्योंकि कल को उस पर भी गिरफ़्तारी की तलवार लटक सकती है क्योंकि तुम लोगों के घर से नकदी, प्रॉपर्टी के दस्तावेज़, सोने और चांदी के जेवर बरामद हुए हैं। टिन्नू यादव ने पैसा अपनी पत्नी के नाम प्रॉपर्टी खरीदने में लगाया ऐसे आरोप है और इसलिए पूनम यादव से भी पूछताछ हो सकती है और फिर गिरफ़्तारी भी।
जो लोग भी पकड़े गए हैं और चोरी के अपराधी हैं, उन्हें अपने पाप को कम करने के लिए ईमानदारी से पुलिस को साफ़ सच बता दें कि कितना चुराया, कहां छुपाया और कहां बट्टे खाते लगाया? उन्हें ये भी बताना चाहिए कि उनके पीछे कौन है लेकिन सब कुछ सबूतों के साथ बताएं, हवाबाजी में नहीं। शायद उनके पाप कुछ कम हो जाएं वरना कानून से तो दंड मिलेगा, साथ में प्रभु श्रीराम से भी दंड मिलेगा।
दिल्ली के एक अदालत ने कहा है देर रात किसी पुरुष से बात करने पर पत्नी के चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। पति ने घरेलू हिंसा के मामले में उसकी पत्नी के और एक अन्य व्यक्ति की सीडीआर को सुरक्षित रखने की मांग की थी लेकिन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शुनाली गुप्ता ने उसकी मांग ठुकरा दी।
जज ने कहा कि भारतीय समाज अब ऐसा पिछड़ा समाज नहीं है जहां किसी पुरुष से बात करने वाली महिला को गलत माना जाता है। इसके बारे में कोई पुख्ता सबूत भी नहीं है। महिला की काल डिटेल रिकॉर्ड को सुरक्षित करने की मांग करके उसकी निजता में दखल को सही नहीं ठहराया जा सकता। जब तक महिला पर अवैध या विवाहेतर संबंध होने का आरोप नहीं लगाया गया हो, तब तक उसके चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
ऐसे अवैध संबंध का आरोप लगाने के लिए कॉल डिटेल्स का होना जरूरी है लेकिन उसे निजता के अधिकार के तहत रोक दिया कोर्ट ने। कौन जानता है वह किससे बात करती थी और क्या बात करती थी। यह नहीं भूलना चाहिए कि चंद्रचूड़ ने महिलाओं को sexual autonomy दी थी व्यभिचार के कानून को रद्द करते हुए जिसका मतलब था महिला की इच्छा है वो किसी से भी संबंध बनाए।
लेखक चर्चित YouTuber
कल सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “व्यभिचार आरोपित पति को “राइट टू प्राइवेसी” की ओट नहीं है और महिला को सबूत जुटाने का अधिकार है। कोर्ट ने फैसला दिया कि तलाक़ के मामले में शादी के बाहर अवैध संबंध (व्यभिचार) रखने वाले पति को अपनी बेवफाई छिपाने के लिए निजता के अधिकार का सहारा नहीं मिलेगा। पत्नी ने पति की बेवफाई साबित करने के लिए उसके होटल बुकिंग और कॉल डिटेल्स जैसे सुबूत जुटाने की दिल्ली हाई कोर्ट ने अनुमति दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन और जस्टिस विनोद चंद्रन ने बरक़रार रखा।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा था कि यद्यपि संविधान निजता के अधिकार की रक्षा करता है, लेकिन यह अधिकार असीमित या पूर्ण नहीं है और इस पर उचित सख्ती आवश्यक है, विशेषकर तब जब यह जनहित में हो।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि निजता का अधिकार फिर बराबर रूप से महिला और पुरुष पर लागू क्यों न होने दिया जाए। पत्नी को अगर पति के खिलाफ सबूत जुटाने का अधिकार दे रहे हैं आप तो ये अधिकार पति को क्यों दिए जा सकते। संविधान ऐसा भेदभाव करने की तो अनुमति नहीं देता लेकिन न्यायाधीश अपने विवेक से इसे तोड़ मरोड़ देते हैं।
इटली में रहने वाले NRI Joseph Shine की PIL पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में फैसला दिया था कि अगर किसी पुरुष के एक शादी शुदा महिला से उसके पति की मर्जी के बिना भी Sexual relation होते हैं तो वह अपराध नहीं है। साथ में कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी पति की निजी संपत्ति नहीं है और उसे शादी के बाहर अपनी मर्जी से संबंध बनाने की Sexual Autonomy है। अलबत्ता विवाहेतर संबंध तलाक़ का कारण बन सकते है।
यह निर्णय देकर सुप्रीम कोर्ट ने समाज के Institution of marriage के तानेबाने को तोड़ कर रख दिया और आज अनेक मामले हैं जो ऐसे ही विवादों में उलझे हुए हैं। भला कौन से परिवार में यह स्वीकार किया जा सकता है कि घर की बहु पति को छोड़ कर किसी गैर-मर्द के साथ संबंध बनाए और कोई पत्नी भी यह कभी नहीं चाहेगी कि उसके पति के संबंध किसी और महिला के साथ हों लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी।
अब समय आ गया है कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार करे और तब तक पुरुष और महिला दोनों को बराबर अधिकार दिए जाएं। कानून का पलड़ा केवल महिलाओं के पक्ष में अदालत को जानबूझकर नहीं झुकाना चाहिए।
जब से राममन्दिर चढ़ावे का मुद्दा उठा है लगता है मीडिया विपक्ष द्वारा परोसी बातों पर चील-कौओं की तरह चीख-चिल्ला रहा है। मीडिया पर वही बात परोसी जा रही है जो विपक्ष बक रहा है लेकिन मीडिया द्वारा अपनी छानबीन बिलकुल नहीं। जो फिर साबित कर रहा है यह गोदी मीडिया नहीं बल्कि विपक्ष गोदी मीडिया है। अगर मीडिया चंपत आदि के साथ-साथ विपक्ष की भी भूमिका की छानबीन कर समाचार दिखाए समूचा विपक्ष किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा। मगर मीडिया को अपनी TRP और तिजोरी की चिंता है सच्चाई की नहीं। मोदी और योगी को चाहिए कि पुलिस को निर्देश दे कि तथाकथित आरोपियों पर थर्ड-डिग्री कानूनी कार्यवाही कर सच्चाई को सामने लाये वरना जनता का राममन्दिर ही नहीं हिन्दू आस्था से विश्वास उठ जाएगा। और मीडिया को सच्चाई सामने लाने के कहे विपक्ष द्वारा प्रायोजित समाचारों से लुभाने छोड़े।
यह खबर सोशल मीडिया पर आग की तरह फ़ैल चुकी है कि टिन्नू यादव लगातार अखिलेश यादव के संपर्क में था और फ़ोन पर बात करता था। गिरफ्तार होने के एक दिन पहले भी टिन्नू की बात अखिलेश के साथ हुई, ऐसा कहा गया है और कुल मिला कर 998 बार उन दोनों की बात हुई।
यह अपने आप में बहुत गंभीर मामला है जो इशारा करता है कि टिन्नू के किए गए घोटाले में अखिलेश यादव का भी हाथ रहा होगा या वो खुद ही टिन्नू यादव का मास्टरमाइंड था।
लेखक चर्चित YouTuber
लेकिन प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों इस पर खामोश है। क्या वो अखिलेश को बचाना चाहते है? कहीं किसी ने यह खबर देखी या सुनी हो तो कृपया मुझे भी बताएं। मीडिया से कुछ भी अपेक्षा की जा सकती है। ये घोटाले की बात करते करते कब खुद क्या घोटाला कर जाएं किसी को पता भी नहीं चलता।
मीडिया के टारगेट पर बस चंपत राय समेत 3-4 लोग हैं जबकि मीडिया ने एक बार भी मंदिर ट्रस्ट में बैठे 4 IAS अधिकारियों के बारे प्रश्न नहीं उठाया कि आखिर वो ट्रस्ट में क्या कर रहे थे और लगता है SIT ने भी उनसे कुछ पूछताछ करने की जरूरत नहीं समझी। उनका प्रशासनिक अनुभव क्या कर रहा था?
मैंने SIT को Email किया था कि रामगोपाल यादव को समन कर पूछें कि उसे कहां से पता चला कि 20,000 करोड़ रुपए का गबन हुआ है और उसके पास इसके क्या सबूत है लेकिन SIT को email डिलीवर ही नहीं हुआ।
मीडिया की हर बात पर विश्वास करना ठीक नहीं है। हर बात को “सूत्रों” की खबर बता देते हैं लेकिन टिन्नू यादव और अखिलेश यादव की बातचीत को “सूत्रों” की खबर भी कह कर नहीं बता रहे।
चर्चा में यह है कि जब पुलिस ने टिन्नू यादव के कॉल डिटेल्स निकाले तो उसमें टिन्नू-अखिलेश की बातचीत उजागर हुई। सोशल मीडिया की खबरों का पुलिस ने भी खंडन नहीं किया है। इसका क्या मतलब हो सकता है?
भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पाकिस्तान अपना बताने में जुटा (फोटो साभार : ChatGPT) भारत से नफरत करने के अलावा पाकिस्तान को अब एक नया चस्का लग गया है। वह प्राचीन भारत के इतिहास को अपना बताने में जुट गया है। यह वही इतिहास है जो पूरी तरह से हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान का जन्म ही इस्लाम से पहले के इतिहास (यानी हिंदू अतीत) को पूरी तरह नकारने के आधार पर हुआ था।
लेकिन अब वही पाकिस्तानी सरकार अपने फायदे के लिए उसी अतीत को जबरन अपनाने की कोशिश कर रही है। ऐसा करके वह दुनिया में खुद को जायज साबित करना चाहती है। वह एक ऐसा इतिहास दिखाना चाहती है, जिसका असलियत में कोई वजूद ही नहीं है।
‘तुर्की खून’ से लेकर ‘चाणक्य हमारे पूर्वज’ तक: पहचान के संकट में फँसा पाकिस्तान; अब भारतीय इतिहास पर जता रहा झूठा हक
पाकिस्तान इन दिनों अपनी पहचान के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। दशकों तक पाकिस्तानी खुद को अरब, तुर्क, फारसी या मध्य एशियाई देशों के वंशज बताते रहे। वे खुद को विदेशी और ‘शुद्ध’ मुस्लिम दिखाने की कोशिश करते थे।
साल 1977 से जनरल जिया-उल-हक का दौर शुरू हुआ। उनके शासनकाल में पाकिस्तान के इतिहास और संस्कृति को पूरी तरह बदलने का काम किया गया। जिया सरकार ने स्कूली किताबों (इस्लामियात और पाकिस्तान स्टडीज) के सिलेबस में बदलाव किए। इसका मकसद बच्चों के दिमाग में जबरन एक अरबी-इस्लामिक पहचान को बिठाना था।
असलियत यह है कि वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमानों के पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन कट्टरपंथ के कारण वे अपने इसी हिंदू अतीत से नफरत करने लगे। उन्होंने उस इतिहास से अपना हर रिश्ता तोड़ने की पूरी कोशिश की। अब वही पाकिस्तान बिल्कुल अलग राग अलाप रहा है।
वह सिंधु घाटी सभ्यता, पाणिनी, चाणक्य और राजा पोरस पर अपना हक जता रहा है। वह इस पूरे इतिहास से ‘हिंदू’ शब्द को गायब कर देना चाहता है। ऐसा करके पाकिस्तान एक झूठी और बनावटी ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ पहचान गढ़ने की हताश कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तानी लोग सोशल मीडिया पर भी अजीबोगरीब और मजाकिया दावे कर रहे हैं। हाल ही में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने BBC हिंदी का एक वीडियो शेयर किया। इसमें एक पाकिस्तानी मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ाते नजर आ रहे हैं। इस Video को शेयर करते हुए यूजर ने दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा ही नहीं है। उसने लिखा कि पाणिनी ने संस्कृत को पाकिस्तान के गांधार में तैयार किया था। उसने यह बेतुका दावा भी किया कि भारतीय लोग संस्कृत और अंग्रेजी दोनों का गलत उच्चारण करते हैं।
गायत्री मंत्र न जानने वाले भी अब संस्कृत पर जता रहे हक: ‘साउथ एशिया’ के नाम पर भारत की हिंदू विरासत चुराने का नया खेल
पाकिस्तानी मुस्लिम बिना गलती किए गायत्री मंत्र का पाठ तक नहीं कर सकते। गूगल किए बिना तो उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि यह मंत्र क्या है। इसके अलावा, इस्लाम से थोड़ा भी भटकने पर उन्हें ‘सर तन से जुदा’ होने का खौफ रहता है। लेकिन इसके बावजूद, एक पाकिस्तानी यूजर ने बड़े दुस्साहस के साथ दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा नहीं है। उसका तर्क है कि पाणिनी ने संस्कृत को गांधार में तैयार किया था, जो अब उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में है।
इस तरह के दावों को देखकर किसी भी हिंदू या भारतीयों को एक साथ हँसी और गुस्सा दोनों आ सकते हैं। BBC के Video में दिख रहे प्रोफेसर डॉ राशिद शाहिद ने संस्कृत को ‘साउथ एशिया (दक्षिण एशिया) की साझी विरासत’ बताया है। भारतीय लोग अब बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि जब भी पाकिस्तानी- चाहे वे अच्छे इरादे वाले ही क्यों न दिखें, ‘साउथ एशिया’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका असली मतलब क्या होता है।
साजिश बहुत सीधी है। इतिहास, संस्कृति या धर्म के लिहाज से जो कुछ भी हिंदू और भारतीय है, उस पर ‘साउथ एशिया’ का लेबल लगा दो। ऐसा करने के बाद, भारत और हिंदुओं से नफरत करने वाले पाकिस्तानी और कभी-कभी बांग्लादेशी मुस्लिम भी उस विरासत को आसानी से अपना बताकर हड़प लेते हैं।
‘पाणिनी को पाकिस्तानी’ बताने की बचकानी जिद: अष्टाध्यायी में लिखा था ‘भारत’ का नाम
पाकिस्तानी लोग आजकल प्राचीन भारत के इतिहास पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हैं। लेकिन वे एक छोटी सी बात भूल जाते हैं। पाणिनी ने जब अपनी किताब ‘अष्टाध्यायी’ लिखी, उससे हजारों साल पहले ही संस्कृत में वेद लिखे जा चुके थे। शुरू में संस्कृत सिर्फ पूजा-पाठ और मंत्र बोलने की भाषा थी।
बाद में यह हिंदू धर्म और साहित्य की एक मजबूत भाषा बन गई। पाणिनी ने संस्कृत को नियम और सही ढांचा दिया, यह सच है। लेकिन सिर्फ इसलिए संस्कृत को पराया बता देना कि पाणिनी गांधार (जो अब पाकिस्तान में है) के रहने वाले थे, बिल्कुल बेवकूफी है। इंटरनेट पर एक पाकिस्तानी यूजर ने तो पाणिनी को ही पाकिस्तानी बता दिया।
पाकिस्तानी यूजर ने लिखा, “संस्कृत के सबसे महान ज्ञानी पाणिनी एक पाकिस्तानी थे। आज आप जिस संस्कृत पर इतराते हैं, उसे एक पाकिस्तानी ने ही ठीक किया था।” यह देखना वाकई मजेदार है कि जो पाकिस्तान अपने कानून के तहत किसी हिंदू को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने नहीं देता, वही आज एक हिंदू ब्राह्मण पाणिनी को अपना बताने के लिए मरा जा रहा है।
वह पाणिनी के नाम से ‘हिंदू’ और ‘भारतीय’ पहचान को गायब करना चाहता है। असल में पाकिस्तान की उम्र सिर्फ 78 साल है, इसलिए वह खुद को पुराना दिखाने के लिए ऐसी अजीब हरकतें कर रहा है। पाणिनी ने अपनी किताबों में भारत के कोने-कोने का जिक्र किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की फूटी किस्मत देखिए, पाणिनी ने अपनी किसी भी किताब में ‘पाकिस्तान’ शब्द का नाम तक नहीं लिया।
पाणिनी ने उस समय के पूरे देश को ‘भारत’ कहा था। आज भी हमारा देश इसी नाम का इस्तेमाल करता है। सच तो यह है कि ‘भारत’ शब्द का पहला लिखित सबूत ही पाणिनी की किताब ‘अष्टाध्यायी’ के एक श्लोक ‘नद्व्यचःप्राच्यभरतेषु’ (4.2.113) में मिलता है। पाणिनी ने ‘पूर्वी भारत’ और ‘उत्तरी भारत’ की बात की थी, किसी ‘पूर्वी या उत्तरी पाकिस्तान’ की नहीं।
आपके मन में भी यह सवाल जरूर आया होगा कि क्या पाकिस्तानियों को खुद यह बात नहीं पता? वे अच्छी तरह जानते हैं कि ‘पाकिस्तान’ शब्द का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। यह नाम नया है। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी वे इंटरनेट पर झूठ फैला रहे हैं।
जब पाकिस्तानी मुस्लिम सोशल मीडिया पर ‘पाणिनी एक पाकिस्तानी थे’ जैसा सफेद झूठ बेचते हैं, तो उनकी असलियत सामने लाना बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसे में इतिहास के सही तथ्यों के साथ उनका थोड़ा मजाक उड़ाना और उन्हें आईना दिखाना बिल्कुल लाजिमी है।
त्रिपुंडधारी ब्राह्मण पाणिनी और चाणक्य को ‘पाकिस्तानी’ बताने की अजीब जिद
पाकिस्तानी यूजर ने पाणिनी का जो उदाहरण शेयर किया है, वह उनकी एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखाता है। पाकिस्तानी मुसलमानों की सोच में यही सबसे बड़ा खोट है। वे सोचते हैं कि आज के भूगोल के हिसाब से प्राचीन भारत के सभी ऐतिहासिक लोग, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ बन जाते हैं।
माथे पर त्रिपुंड लगाने वाले एक हिंदू ब्राह्मण और संस्कृत के महाज्ञानी पाणिनी की मेज पर पाकिस्तान का ‘चांद-तारा’ वाला झंडा दिखाना बेहद अजीब और मजाकिया है। पाणिनी खुशनसीब थे कि वे उस दौर में पैदा हुए जब इस्लाम या पाकिस्तान जैसा कुछ था ही नहीं। पाकिस्तान खुद को ‘रियासत-ए-मदीना’ कहता है और काफिरों, खासकर मूर्तिपूजक हिंदुओं से नफरत करता है।
लेकिन चूंकि उनके पास जिहादी आतंकियों के अलावा अपना कोई ऐतिहासिक हीरो नहीं है, इसलिए वे प्राचीन भारत के हिंदुओं को जबरन ‘पाकिस्तानी’ बनाने में जुटे हैं। पाणिनी की लिखी ‘अष्टाध्यायी’ वेदों के छह अंगों (वेदांग) में से एक है। वेद हिंदू सनातन धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ हैं। इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकारियों ने इन्हें पूरी तरह मिटाने और नष्ट करने की बहुत कोशिश की।
हालाँकि, समय से परे मौजूद इन वेदों को खत्म करना नामुमकिन है। भारतीय हिंदू हस्तियों को जबरन पाकिस्तानी बताने का यह मजाक यहीं नहीं रुका। अब वे महान राजनीतिक रणनीतिकार और चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु, आचार्य चाणक्य के पीछे भी पड़ गए हैं। इसी सिलसिले में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने लिखा, “महान चाणक्य ने पाकिस्तान की तक्षशिला यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। वहाँ मिले ज्ञान ने ही उन्हें इतिहास का सबसे बड़ा रणनीतिकार बनाया, जिससे उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य खड़ा करने में मदद की। आज भी उनके विचार राजनीति और शासन को प्रभावित करते हैं।”
अब कुछ पाकिस्तानी यूजर इस हद तक नासमझी दिखा रहे हैं कि वे ईसा पूर्व चौथी सदी की ‘तक्षशिला’ को ‘पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी’ बता रहे हैं, जबकि उस दौर में न तो इस्लाम मजहब था और न ही पाकिस्तान नाम का कोई मुल्क।
हद तो तब हो गई जब इंटरनेट पर एक यूजर ने बिना किसी ऐतिहासिक सबूत के पंजाब के महान राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) को जबरन एक बौद्ध राजा घोषित कर दिया और सोशल मीडिया पर इस सफेद झूठ को सच साबित करने की बचकानी जिद पर अड़ गया।
राजा पुरुषोत्तम (राजा पोरस) एक महान प्राचीन भारतीय राजा थे। उन्होंने झेलम (वितस्ता) और चिनाब (असीकनी) नदियों के बीच के इलाके पर राज किया था। उन्होंने ईसा पूर्व 326 में झेलम नदी के किनारे सिकंदर के बढ़ते कदमों को रोक दिया था। हालाँकि राजा पोरस के धर्म को लेकर बहुत ज्यादा विवरण नहीं मिलते। लेकिन सभी इतिहासकार मानते हैं कि वे वैदिक धर्म यानि हिंदू धर्म के अनुयायी थे।
गंगा घाटी से नफरत और पाकिस्तान का अधूरा ज्ञान
भारत के गंगा मैदानी इलाके से नफरत करने वाले पाकिस्तानियों ने तुरंत राजा पोरस को ‘बौद्ध’ घोषित कर दिया। वे यह भूल गए कि बौद्ध धर्म की शुरुआत भी भारत के इसी पूर्वी गंगा मैदान (बिहार-यूपी) से हुई थी। वे इस बात को नहीं जानते या जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं कि बौद्ध धर्म सम्राट अशोक के काल के बाद ही उत्तर-पश्चिम (आज के पाकिस्तान वाले इलाके) में ठीक से फैला था। लेकिन पाकिस्तानी तो मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा चलाने में माहिर हैं। उनके लिए इतिहास के तथ्य मायने नहीं रखते, बल्कि उनका झूठा नैरेटिव सबसे ऊपर रहता है।
सोशल मीडिया पर ऐसे झूठे दावों की बाढ़ आई हुई है। पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा विंग (ISPR) के बॉट्स मिलकर एक सोची-समझी साजिश चला रहे हैं। इनका मकसद प्राचीन भारत के हिंदू इतिहास को चुराकर एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ की विरासत तैयार करना है। खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए पाकिस्तानी अब एक नया पैंतरा अपना रहे हैं। वे ‘सिंधु घाटी बनाम गंगा घाटी’ का एक फर्जी विवाद पैदा कर रहे हैं।
वे गंगा घाटी के इतिहास और संस्कृति को सिंधु घाटी से कमतर या घटिया दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। वे जानबूझकर ‘हम बेहतर और तुम खराब’ की सोच फैला रहे हैं। ऐसा करके वे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपना झूठा हक जताना चाहते हैं। इस साजिश के जरिए वे ‘अखंड प्राचीन भारत’ के ऐतिहासिक और भौगोलिक वजूद को ही मिटाना चाहते हैं। इस दिशा में उनका पहला कदम भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जगह जबरन ‘साउथ एशिया’ शब्द को बढ़ावा देना था।
इतिहास को अपनाने से लेकर चुराने तक का खेल: पाकिस्तान ने सिंधु घाटी सभ्यता पर क्यों बढ़ा लालच?
यह बेहद अजीब और चौंकाने वाला है। साल 1947 में पाकिस्तान ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (टू-नेशन थ्योरी) के आधार पर बना था। तब कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग देश हैं और वे कभी साथ नहीं रह सकते। लेकिन आज वही पाकिस्तानी लोग प्राचीन भारत के हिंदुओं और उनके महान कामों पर अपना हक जताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उनका तर्क है कि ये हस्तियाँ जिस जगह पैदा हुईं या जहाँ उन्होंने काम किया, वह इलाका अब आधुनिक पाकिस्तान में आता है, इसलिए वे ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ थे।
आइए कुछ सच बिल्कुल साफ-साफ समझ लेते हैं। यह सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता (सिंधु-सरस्वती सभ्यता) के कुछ बड़े मुख्य हिस्से जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो आज के पाकिस्तान में हैं। तक्षशिला और पाणिनी का जन्मस्थान (अटक का शालातुला) भी वहीं है। लेकिन कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान इन ऐतिहासिक जगहों की ठीक से देखभाल नहीं करता है। इसके उलट, भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की 2,000 से ज्यादा जगहें हैं और भारत सरकार उन्हें बहुत अच्छे से संभालकर रखती है। एक मजेदार तथ्य यह भी है कि इस प्राचीन सभ्यता की लगभग 60% जगहें आज के भारत में ही मौजूद हैं।
भारतीय लोगों या भारत सरकार ने इस भौगोलिक सच से कभी इनकार नहीं किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की चालाकी यह है कि वे इन जगहों को जबरन एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी लोग अक्सर ऐसे इतिहासकारों का सहारा लेते हैं जो कट्टरपंथी सोच के हैं। वे इन लोगों की मदद से सिंधु घाटी सभ्यता से हिंदू धर्म के गहरे जुड़ाव को पूरी तरह मिटाना चाहते हैं।
पाकिस्तान का अकेला मकसद यही है कि किसी भी तरह भारत को उसकी पुरानी जड़ों से अलग कर दिया जाए। वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारत की सभ्यता कहीं और से उधार ली गई है, ताकि भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति को लेकर हीनभावना पैदा हो सके। इसी साल (2026) मई में भारत के संस्कृति मंत्रालय ने हमारी अटूट सभ्यता का एक बड़ा सबूत दुनिया के सामने रखा।
मंत्रालय ने ‘पशुपति सील’ (मोहर) का जिक्र किया। यह मोहर अखंड भारत के समय मोहनजोदड़ो में मिली थी। पत्थर से बनी यह मोहर करीब 4,300 साल पुरानी है। इसमें एक योगी की मूर्ति है जो योग मुद्रा (मूलबंधासन) में बैठी है। इसे भगवान शिव का ‘पशुपति’ रूप माना जाता है, जिनके चारों तरफ जानवर मौजूद हैं।
संस्कृति मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा, “भले ही ये प्राचीन जगहें आज की नई सीमाओं के पार चली गई हों, लेकिन भारत आज भी इस विरासत का असली और जिंदा रखवाला है। पशुपति सील में दिखने वाली योग मुद्रा, भगवान शिव का प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, रोज की पूजा-पाठ और योग परंपराओं में पूरी तरह जिंदा है। वैदिक काल से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, हमारी सभ्यता की यह कड़ी कभी नहीं टूटी। यह हमारे विचारों, रीति-रिवाजों और हमारी आत्मा में गहराई से बसी हुई है।”
भारत के संस्कृति मंत्रालय के बयान के तुरंत बाद, देश-विदेश का एक खास वामपंथी और कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों का गुट (कैबाल) मैदान में कूद पड़ा। इस पूरे गैंग का एक ही मकसद था, किसी भी तरह सिंधु घाटी सभ्यता से वैदिक हिंदू धर्म के जुड़ाव को पूरी तरह नकार दिया जाए।
भारत से नफरत करने वाली और क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की प्रशंसक ऑड्रे ट्रुशके ने इस मामले पर सोशल मीडिया पर जहर उगला। उसने लिखा, “यह भगवान शिव की मूर्ति नहीं है। इसकी जगह यह एक यूरेशियन देवता (पशुओं के भगवान) को दिखाने वाले प्रोटो-एलामाइट प्रतीकों से प्रभावित कोई आकृति हो सकती है।”
इस वामपंथी गुट ने इतिहास के स्थापित सच को झुठलाने के लिए तुरंत अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वे यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि मोहनजोदड़ो में मिली पशुपति सील का संबंध सीधे तौर पर सनातन धर्म और भगवान शिव से है।
इतिहासकार जॉन मार्शल को भी नकारने लगा पाकिस्तान: वामपंथियों के सहारे भारत विरोधी प्रोपेगेंडा
ऑड्रे ट्रुशके के इसी बेतुके दावे का सहारा लेकर कई पाकिस्तानी यूजर्स भारत के संस्कृति मंत्रालय के पोस्ट पर आकर रोना रोने लगे। वे ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन मार्शल को भी गलत बताने लगे। जॉन मार्शल ने साल 1931 में अपनी किताब ‘मोहनजो-दड़ो एंड द इंडस सिविलाइजेशन’ में साफ लिखा था कि पशुपति सील असल में ऐतिहासिक भगवान शिव का ही शुरुआती रूप है।
सिंधु घाटी सभ्यता के कई बड़े और मुख्य हिस्से जैसे कालीबंगा (राजस्थान), बनावली और राखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) आज के भारत में मौजूद हैं। ये सभी जगहें घग्गर-हकरा नदी तंत्र, यानी पौराणिक सरस्वती नदी के किनारे बसी हुई थीं। इससे साफ पता चलता है कि इस पूरी सभ्यता के विकास में एक बहुत बड़ी नदी का सहारा था। यही वजह है कि इतिहासकार इसे ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ भी कहते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक और मशहूर पुरातत्वविद् ब्रज बासी लाल (BB लाल) ने भी एक अहम बात बताई थी। उन्होंने सबूतों के साथ कहा था कि हड़प्पा संस्कृति की ज्यादातर जगहें सिंधु नदी के पास नहीं, बल्कि सरस्वती नदी के रास्ते पर बसी थीं। इससे साबित होता है कि सरस्वती नदी ही इस सभ्यता का मुख्य केंद्र थी। इसके अलावा, राजस्थान के कालीबंगा में हुई खुदाई के दौरान प्राचीन वैदिक यज्ञ वेदियाँ, हवन कुंड और यूप (यज्ञ स्तंभ) मिले हैं। ये चीजें साफ इशारा करती हैं कि वैदिक संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच एक अटूट धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ता था।
भारत और विदेशों के कुछ पक्षपाती इतिहासकारों ने जानबूझकर सरस्वती नदी को ‘काल्पनिक’ (एक मिथक) बताकर खारिज कर दिया। पुख्ता रिसर्च और नई खोजों के बावजूद उन्होंने ऐसा किया। उनका एकमात्र मकसद हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों को ऐतिहासिक रूप से सच्चा और भरोसेमंद मानने से रोकना था।
इतिहासकारों के इस पक्षपात का पूरा फायदा पाकिस्तान उठा रहा है। कुछ पाकिस्तानी हर कीमत पर तथ्यों को झुठलाने में लगे हैं। वे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों में साफ दिखने वाली हिंदू और वैदिक संस्कृति की कड़ियों को तोड़ना चाहते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिक खोजों ने उनका झूठ पकड़ लिया है। हाल ही में राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन से 23 मीटर नीचे एक प्राचीन नदी का रास्ता (पैलियोचैनल) दबा हुआ मिला है, जो इस सभ्यता के सच को साबित करता है।
बात सिर्फ ‘पाकिस्तान’ नाम की नहीं है। साल 1947 से पहले दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम का कोई राजनीतिक वजूद था ही नहीं। इसलिए, ‘प्राचीन पाकिस्तान’ जैसी किसी भी चीज के होने का तो सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए सही शब्द सिर्फ ‘प्राचीन भारत’ या प्राचीन अखंड भारत का इतिहास ही है। भारतीय इतिहासकार आज के पाकिस्तान में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के हिस्सों को प्राचीन भारतीय इतिहास का ही भाग मानते हैं। पाकिस्तान चाहे कितना भी मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा कर ले, या एक ही झूठ को बार-बार सच बताने की हिटलर के मंत्री गोएबल्स जैसी चालें चल ले, इतिहास का सच कभी नहीं बदलेगा।
सिर्फ 93 साल पुराना है ‘पाकिस्तान’ शब्द का इतिहास
भले ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) की जड़ें 19वीं सदी में सर सैयद अहमद खान के विचारों में मिलती हैं, जिन्होंने मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की वकालत की थी। लेकिन ‘पाकिस्तान’ शब्द पहली बार साल 1933 में चौधरी रहमत अली खान ने गढ़ा था। उन्होंने इस नाम को पाँच इलाकों को मिलाकर एक शॉर्ट फॉर्म (अक्रोनिम) के रूप में बनाया था। इसमें ‘P’ का मतलब पंजाब, ‘A’ का अफगानिया (खैबर पख्तूनख्वा), ‘K’ का कश्मीर, ‘S’ का सिंध और ‘tan’ का मतलब बलूचिस्तान था।
आज के पाकिस्तानी तर्क देते हैं कि चूंकि पाकिस्तान के नाम में इन पाँचों क्षेत्रों के नाम शामिल थे, इसलिए इन इलाकों का ‘प्राचीन’ इतिहास स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का ही है। ऐसा कहते हुए वे बड़ी चालाकी से इस सच को छुपा जाते हैं कि चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान किसी धर्मनिरपेक्ष देश की सोच नहीं था। वे तो केवल और केवल मुसलमानों के लिए एक अलग, स्वतंत्र और संप्रभु मुल्क बनाना चाहते थे।
पिछले 70 से ज्यादा सालों से पाकिस्तान के स्कूलों के सिलेबस, वहाँ के नेताओं के भाषणों, मीडिया और यहाँ तक कि मनोरंजन उद्योग में भी हमेशा इस्लामिक आक्रमणों का गुणगान किया गया। वहाँ की आम मुस्लिम जनता को झूठा दिलासा दिया गया कि वे तुर्क, अरब या अन्य ‘लड़ाकू नस्लों’ के वंशज हैं और उनका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि असलियत यह है कि एक अदद DNA टेस्ट ही उन्हें उनके इस ‘असहज’ कर देने वाले सच से रूबरू करा सकता है कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। वे आज भी 8वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर किए गए हमले को पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए एक महान और जश्न मनाने वाला ऐतिहासिक पल बताते हैं।
असल में, पाकिस्तान के स्कूलों की इतिहास की किताबों और वहाँ के देशभक्ति के गानों में हिंदू राजाओं को हमेशा विलेन की तरह दिखाया जाता है। ‘आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की’ जैसे मशहूर गानों में सिंध के हिंदू राजा दाहिर की छवि को बेहद खराब करके पेश किया गया है। इसके उलट, वे मोहम्मद बिन कासिम के क्रूर हमले को पाकिस्तान के इतिहास की एक शानदार शुरुआत बताते हैं। वे ऐसा दिखाते हैं जैसे बिन कासिम के आने से ही वहाँ सभ्यता की शुरुआत हुई थी।
पाकिस्तानी सरकार और वहाँ की आम जनता हिंदुओं से नफरत के चलते मोहम्मद घोरी और सोमनाथ मंदिर को तोड़ने वाले ‘बुतशिकन’ (मूर्तियाँ तोड़ने वाले) महमूद गजनवी जैसे जिहादी हमलावरों का खूब गुणगान करती है। हिंदुओं के प्रति यह नफरत उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच में बहुत गहराई तक धँसी हुई है। यही वजह है कि मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क (पाकिस्तान) लेने, वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और अनगिनत मंदिरों को तोड़ने के बाद भी उनकी नफरत शांत नहीं हुई है। वे आज भी उस हिंदू धर्म से नफरत करते हैं, जिसे कभी उनके खुद के पूर्वज मानते थे।
पाकिस्तान का दोहरापन देखिए, एक तरफ तो वे पाणिनी, आचार्य चाणक्य और राजा पोरस जैसी प्राचीन हिंदू सनातन हस्तियों पर अपना हक जताते हैं। दूसरी तरफ, वे अपनी मिसाइलों के नाम गजनवी, घोरी और अब्दाली जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रमणकारियों के नाम पर रखते हैं। ये वही हमलावर थे जिन्होंने भारतीय जमीनों को बेरहमी से लूटा और उजाड़ा। उन्होंने उस इलाके की धन-दौलत भी लूटी जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। इन लुटेरों ने आज के भारतीयों और पाकिस्तानियों के सांझे हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन पूर्वजों पर भयंकर जुल्म ढाए थे, उनका कत्लेआम किया था।
आखिर पाकिस्तानी मुसलमान बिना उसकी ‘हिंदू पहचान’ को स्वीकार किए अपने पुराने हिंदू इतिहास को अपना कैसे कह सकते हैं? विदेशी हमलावरों के खिलाफ भारत की रक्षा करने वाले राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) उनके हीरो कैसे हो सकते हैं? खासकर तब, जब उनके असली हीरो घोरी और गजनवी जैसे विदेशी इस्लामिक हमलावर हैं, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म ढाए थे।
लंबे समय तक पाकिस्तानियों ने अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास को छोटा दिखाया और उसे नकारा। वे खुद को समाज में ऊँचा दिखाने के लिए झूठा दावा करते रहे कि वे अरब, तुर्क या फारसी नस्ल के हैं। वे यह मानने से भागते रहे कि उनके पूर्वज हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख थे। आज भी कई पाकिस्तानी खुद को ‘मुस्लिम राजपूत’ कहते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू क्षत्रिय राजपूत थे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बिना कुलदेवी की पूजा के कोई राजपूत कैसे हो सकता है?
जैसे ‘मुस्लिम राजपूत’ शब्द अपने आप में ही उल्टा और बेतुका है, ठीक वैसे ही ‘प्राचीन पाकिस्तान’ कहना भी पूरी तरह से बेतुका और मजाक है।
पाकिस्तान के इस्लामिक जनरलों ने वहाँ की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी को कट्टर बनाने के लिए हर मुमकिन पैंतरा चला। उन्होंने देश का पूरी तरह इस्लामीकरण कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू और बाकी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।
सालों से पाकिस्तानी मुसलमान उस संस्कृति से दूरी बनाते आए हैं जिसे वे हिकारत से ‘हिंदूआना संस्कृति’ कहते हैं। स्कूल की किताबों से लेकर, नेताओं के भाषणों और टीवी सीरियलों तक, पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हर उस चीज को ‘हिंदूआना’ कहकर खारिज कर देता है जो इस्लामिक नहीं है। उनकी नजर में जो इस्लामिक नहीं, वो खराब है।
साड़ी पर पाबंदी से लेकर ‘ताजमहल’ पर दावे तक: अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान
मजेदार बात यह है कि हाल के सालों में पाकिस्तानियों ने ‘साड़ी’ को फिर से अपनाना शुरू कर दिया है। साड़ी एक ऐसा हिंदू पहनावा है जिसे भारत के धार्मिक बँटवारे से बहुत पहले से महिलाएँ पहनती आ रही हैं। लेकिन जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के दौरान पाकिस्तान में साड़ियों पर एक अघोषित पाबंदी लगा दी गई थी। उस समय मुस्लिम महिलाओं को साड़ी पहनने से रोका जाता था, क्योंकि इसे विशुद्ध रूप से भारतीय और हिंदू संस्कृति से जुड़ा पहनावा माना जाता था।
ये वही पाकिस्तानी हैं जो भारत के ‘ताजमहल’ पर भी अपना हक जताता है। उनका तर्क है कि मुसलमान होने के नाते वे मुगलों की ‘विरासत’ के असली वारिस या रखवाले हैं। उनमें से बहुत से लोग तो आज भी इसी मुगालते में जीते हैं कि उनके पूर्वज मुगल थे। इसी वजह से वे सोशल मीडिया पर ‘हमने हिंदुओं पर 800 साल राज किया है’ जैसा बेहद झूठा और हास्यास्पद दावा करते फिरते हैं।
पाकिस्तानी लोग आज दोहरी चाल चल रहे हैं। वे भौगोलिक आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर प्राचीन भारत के महान हिंदुओं पर अपना हक जताना चाहते हैं। साथ ही, वे मध्यकालीन भारत के क्रूर इस्लामिक लुटेरों का भी गुणगान करते हैं ताकि वे अपनी जबरन थोपी गई मुस्लिम पहचान को सही ठहरा सकें। यह सब कुछ वे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि दुनिया के सामने पाकिस्तान को एक ‘ऐतिहासिक सभ्यता वाला देश’ (सिविलाइजेशनल स्टेट) साबित कर सकें।
पाकिस्तान ने यह पैंतरा असल में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की किताब से सीखा है। ईरान के मुल्ला शासन ने शुरुआती तीन दशकों तक अपने प्राचीन राजा सायरस (Cyrus) को कभी याद नहीं किया। लेकिन जब उनके देश पर वजूद का संकट मंडराने लगा, तो उन्हें अचानक अपनी इस्लाम से पहले की प्राचीन विरासत याद आ गई और वे उसका गुणगान करने लगे। आज पाकिस्तान भी ठीक उसी तरह अपने वजूद के संकट से बचने के लिए भारत के प्राचीन इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहा है।
यह बात और भी ज्यादा मजेदार हो जाती है जब भारतीय हिंदू पूरी दुनिया के सामने प्राचीन भारतीय सभ्यता के असली रखवाले होने का दावा करते हैं। इस पर पाकिस्तानी मुसलमान अचानक भड़क जाते हैं और गुस्सा दिखाने लगते हैं। भारत का यह दावा पूरी तरह सही है, चाहे उस प्राचीन सभ्यता के अवशेष आज की किसी भी भौगोलिक सीमा के अंदर क्यों न आते हों।
अचानक पाकिस्तान को संस्कृत, पाणिनी, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सनातन सभ्यता से जुड़ी हर चीज से प्यार हो गया है। वे इसे गले लगाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह भारत के हिंदू ही हैं और कुछ हद तक पाकिस्तान और बांग्लादेश के बचे हुए हिंदू, जिन्होंने इस भाषा, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और ग्रंथों की परंपरा को हजारों साल से जिंदा रखा है। हिंदुओं के लिए संस्कृत एक ‘देवभाषा’ यानी देवताओं की भाषा है। हिंदू शुरू से भारत को अपनी मातृभूमि मानकर पूजते आए हैं, जबकि इस्लाम में ऐसी कोई सोच मौजूद ही नहीं है।
अगर सिर्फ आज के भूगोल या जमीन के टुकड़े के आधार पर ही इतिहास के हर हीरो या जगह पर हक जताया जा सकता है, तो पाकिस्तानियों को सबसे पहले अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार करना चाहिए। उन्हें गजनवी और घोरी जैसे क्रूर लुटेरों की तारीफ करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म किए और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया। इस सोच का आखिरी और स्वाभाविक नतीजा तो यही होगा कि वे अपनी ऐतिहासिक गलती को सुधारें और वापस अपने मूल हिंदू धर्म में लौट आएँ।
प्राचीन भारतीय इतिहास पर हिंदुओं का यह दावा भाषा, पवित्र ग्रंथों, दर्शन और पुरातत्व के मजबूत सबूतों पर टिका है। यह एक ऐसी अटूट सभ्यता है जो हजारों सालों से लगातार चली आ रही है। यह इतिहास सिर्फ आज के भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार दूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ है।
आतंक की छवि सुधारने और वजूद बचाने के लिए पाकिस्तान की नई चाल
पाकिस्तान इस समय जो कुछ भी कर रहा है, वह इतिहास का एक चुनिंदा इस्तेमाल है। वह सिर्फ राष्ट्रीय गर्व के लिए इस्लाम से पहले के इतिहास को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन वह अपनी उस बुनियादी सोच को नहीं छोड़ रहा जो नफरत भरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) पर टिकी है। इसी सोच के तहत बँटवारे को सही ठहराने के लिए कभी हिंदू इतिहास को पूरी तरह नकार दिया गया था।
पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान ने दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के गढ़ के रूप में बदनामी कमाई है। आप किसी भी जिहादी आतंकी संगठन का नाम लीजिए, उसका पाकिस्तान से कनेक्शन अपने आप सामने आ जाएगा। पाकिस्तान के सरकारी संरक्षण में चलने वाले इस आतंकवाद ने देश की छवि को पूरी दुनिया में बर्बाद कर दिया है। अब अपनी इस साख को सुधारने के लिए यह इस्लामिक देश मोहनजोदड़ो, तक्षशिला और सिंधु घाटी सभ्यता का सहारा ले रहा है। वह इनके जरिए दुनिया में अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ बढ़ाना चाहता है, राष्ट्रीय गर्व दिखाना चाहता है और विदेशी पर्यटकों को लुभाना चाहता है।
‘प्राचीन पाकिस्तान’ का यह पूरा मनगढ़ंत नाटक सिर्फ इसलिए रचा जा रहा है ताकि एक कड़वे सच का मुकाबला किया जा सके। दुनिया भर में यह माना जाता है कि ‘पाकिस्तान एक अप्राकृतिक और बनावटी देश है।’ इसी हकीकत को झुठलाने के लिए वे भारत के प्राचीन इतिहास को अपना बता रहे हैं।
आज पाकिस्तान के भीतर ही बलूच, पश्तून, सिंधी और कई अन्य जातीय समूह पंजाब के दबदबे वाले पाकिस्तान से आजादी माँग रहे हैं। देश अंदर से पूरी तरह टूट रहा है। ऐसे में कट्टर इस्लामिक नैरेटिव या खुद को ‘शुद्ध अरबी खून’ बताने वाले झूठे दावे भी देश को एक रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि अब वे अपनी एकता बनाए रखने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
वसंत पंचमी से माँ सरस्वती का नाम हटाने वाला मुल्क कैसे बनेगा सेक्युलर?
जिस मुल्क की सत्ता आसिम मुनीर जैसे मदरसा-छाप जनरल के हाथों में हो, जो हर भाषण में पाकिस्तानियों को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) न भूलने की नसीहत देता है, वहाँ बदलाव की उम्मीद करना ही बेकार है। वहाँ इतिहास या संस्कृति को इस्लाम से अलग दिखाने की कोई भी कोशिश सिर्फ दिखावा, भ्रष्ट और स्वार्थ से भरी हुई है।
इसी साल (2026) फरवरी में जब पूरी दुनिया के हिंदुओं ने पतंगबाजी का त्योहार ‘वसंत पंचमी’ मनाया, तो पाकिस्तान ने भी इस त्योहार को ‘बसंत’ के नाम से दोबारा शुरू किया। वहाँ के नेताओं ने इसे दुनिया के सामने आजादी और सहनशीलता के सबूत के रूप में पेश किया। लेकिन कट्टरपंथियों के डर या अपनी खुद की खराब सोच की वजह से उन्होंने इस त्योहार से हिंदू धर्म और माँ सरस्वती की पूजा को पूरी तरह अलग कर दिया। उन्होंने वसंत पंचमी को सिर्फ एक ‘सांस्कृतिक’ या ‘क्षेत्रीय’ त्योहार बताकर पेश किया।
इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने लाहौर के कुछ इलाकों के पुराने हिंदू और सिख नाम वापस रखने का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत ‘इस्लामपुरा’ का नाम बदलकर फिर से ‘कृष्ण नगर’ और ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम ‘जैन मंदिर चौक‘ किया जाना था। इस फैसले पर वहाँ की सरकार और सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी ढिंढोरा पीटने लगे। वे कहने लगे कि ‘एक तरफ भारत सांप्रदायिकता में डूब रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान धर्मनिरपेक्षता और सहनशीलता की मिसाल बन रहा है।’ लेकिन जैसे ही इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने इसका थोड़ा सा भी विरोध किया, सरकार तुरंत डरकर पीछे हट गई।
जो मुल्क अपने शहरों के हिंदू इतिहास से जुड़े पुराने नाम तक वापस रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वह आज प्राचीन भारत के पूरे हिंदू इतिहास पर अपना हक जताना चाहता है। यह पाकिस्तान के खोखले दावों और उनकी लाचारी को पूरी तरह बेनकाब करता है।
ऑपरेशन सिंदूर में पिटने के बाद अब प्रोपेगेंडा के सहारे भारत को घेरने की फिराक में पाकिस्तान
ये सारे सोची-समझी कोशिशें, खासकर सिंधु घाटी सभ्यता पर हक जताना और ‘प्राचीन पाकिस्तान’ का हौव्वा खड़ा करना, असल में सिंधु जल समझौते (IWT) से जुड़े हुए हैं। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकी हमले के जवाब में भारत सरकार ने इस सिंधु जल समझौते को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
इस समझौते को बचाने के लिए पाकिस्तान दुनिया के हर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा खटखटा चुका है। उसने भारत को ‘युद्ध’ की धमकियाँ तक दीं और फिर भारत से इस समझौते को दोबारा शुरू करने की भीख भी माँगी। लेकिन मोदी सरकार ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देना और जिहादियों को पालना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक यह समझौता रद्दी के डिब्बे में ही रहेगा।
पाकिस्तानी नेतृत्व अच्छे से जानता है कि वे सैन्य ताकत के दम पर भारत को कभी नहीं हरा सकते। खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद वे सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं खो चुके हैं। इसलिए अब पाकिस्तान अपने सबसे पुराने और पसंदीदा हथियार यानी ‘प्रोपेगेंडा और नैरेटिव’ के खेल पर उतर आया है।
यह असल में दुनिया के सामने रोना रोने और भारत के खिलाफ दूसरे देशों का समर्थन जुटाने की एक लंबी प्लानिंग है। पाकिस्तान भविष्य में वैश्विक मंचों पर यह तर्क देना चाहता है कि सिंधु नदी का सीधा संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से है। चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की ऐतिहासिक विरासत है, इसलिए भारत का उसे इस नदी के पानी से महरुम करना कानूनी और नैतिक रूप से बिल्कुल गलत है। इसी झूठे नैरेटिव को सेट करने के लिए वे आज इतिहास चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
‘अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ेंगे तो वे भारतीय बन जाएँगे’: पहचान के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा पड़ोसी मुल्क
अगर पाकिस्तान पूरी तरह से अपनी इस्लामिक कट्टरपंथी सोच और घमंड को छोड़ दे, तो वह ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ नहीं रह जाएगा। तब उसे भारत के हिंदू इतिहास को चुराने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वह सीधे अपनी पुरानी हिंदू जड़ों में वापस लौट आएगा। आज प्राचीन सभ्यता की इस अटूट कड़ी और पाकिस्तान के बीच केवल एक ही दीवार खड़ी है और वह है उनकी जबरन थोपी गई इस्लामिक पहचान।
लेकिन पाकिस्तान का जिहादी सैन्य नेतृत्व वहाँ की आम जनता को कभी भी अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास और असली पहचान को अपनाने नहीं देगा। इसके पीछे एक मशहूर कहावत है, “अगर तुर्क लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे तुर्क ही रहेंगे; अगर अरब लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे अरब ही रहेंगे; लेकिन अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ देंगे, तो वे वापस भारतीय बन जाएँगे।”
यही वजह है कि पाकिस्तानी लोग आज भी उसी जिहादी इस्लामिक सोच से चिपके हुए हैं, जिसने कभी उनके इस इलाके के हिंदू इतिहास को मिटाने और उसे विलेन दिखाने का काम किया था। लेकिन अब वे अपनी ही बात से पलटकर उसी इतिहास का चुनिंदा हिस्सा चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तानी समाज का दोहरापन यहीं नहीं रुकता। वे अपनी शादियों में हिंदू रीति-रिवाजों की नकल करते हैं और भारत के क्लासिकल डांस फॉर्म्स को भी अपनाते हैं। इसके बाद वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के हिंदू इतिहास को ‘साउथ एशिया’ का नाम देकर नया रूप देना चाहते हैं। हकीकत यह है कि केवल 78 साल पुराने इस मुल्क (पाकिस्तान) का अपना खुद का इतिहास और संस्कृति सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद, कज़िन-मैरिज (भाई-बहनों में शादी) पर बने टीवी सीरियलों और जिहादी मानसिकता के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है।(साभार)