क्या 1 नवम्बर रैली कांग्रेस को तेजी से डुबो देगी?

1 नवंबर को रैली कराने पर राहुल गांधी जो अड़े हुए हैं ना, यह कांग्रेस को बहुत भारी पड़ सकता है। अब राहुल गांधी यह समझना ही नहीं चाह रहे हैं या फिर उन्हें इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता, यह अलग बात है। लेकिन मैं आपको तीन पॉइंट समझने होंगे। 

पहली बात है व्यापारियों की परेशानी। पिछले चार दिनों में व्यापारी दो बार राहुल गांधी को लेटर लिख चुके हैं कि भाई, प्लीज अभी यह रैली मत कराइए। 1 नवंबर को रैली करने के बजाय दिवाली के बाद 10 नवंबर को करा लीजिए। दिवाली का समय है। इस समय अगर आप रैली कराएंगे और उसमें 10 लाख लोग आएंगे, तो दिल्ली में कितनी बसें आएंगी, कितना ट्रैफिक जाम होगा, कितनी भीड़ होगी और कितना बवाल मचेगा! व्यापारियों का कहना है कि इससे उनका 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। इससे पहले 10 अक्टूबर को जो रैली हुई थी, उसमें भी 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही गई थी।
अब आप खुद सोचिए, व्यापारियों के मन में गुस्सा नहीं होगा क्या? आखिर वोट भी तो यही लोग देते हैं ना, या फिर वोट देने के लिए कहीं बाहर से लोग आते हैं? जब व्यापारियों का काम-धंधा प्रभावित होगा, उन्हें नुकसान होगा, तो उनके मन में कांग्रेस के लिए गुस्सा ही आएगा ना! और यही गुस्सा कांग्रेस को भारी पड़ सकता है।
दूसरी बात है राहुल गांधी का 10 लाख लोगों को लाने का दावा। राहुल गांधी ने तो कह दिया कि हम 10 लाख लोग लाएंगे और रैली करके अपनी ताकत दिखाएंगे। यानी एक तरह से यह शक्ति प्रदर्शन है। आप खुद सोचिए, क्या रामलीला मैदान में 10 लाख लोग आ सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा 50 हज़ार लोग वहां आ पाएंगे, तो बाकी के लोग कहां जाएंगे? पूरी दिल्ली में क्या स्थिति बनेगी? क्या इतनी बड़ी भीड़ को संभालना आसान होगा?

एक बात और 10 लाख लोगों को जुटाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। 10 लाख लोग बहुत ज्यादा होते हैं। अब कांग्रेस कह रही है कि अलग-अलग राज्यों को लोगों को लाने की जिम्मेदारी दी गई है। मान लीजिए पांच या सात राज्यों को जिम्मेदारी दे भी दी गई, तो क्या हर राज्य से डेढ़-डेढ़ लाख या दो-दो लाख लोग आसानी से आ जाएंगे? ऐसा करना इतना आसान नहीं है।
ऊपर से दिल्ली के व्यापारी पहले से ही नाराज हैं। उनके भी परिवार हैं, रिश्तेदार हैं। हो सकता है कि कुछ व्यापारी इस रैली में शामिल होने के बारे में सोच रहे हों, लेकिन अब वे अपने परिवार वालों को भी मना कर सकते हैं कि भाई, रहने दो, जब हमारी दुकान और काम-धंधे पर ही असर पड़ रहा है, तो हम रैली में क्यों जाएं?
यानी जो रैली कांग्रेस के लिए शक्ति प्रदर्शन होनी चाहिए थी, वही उसके लिए उलटी पड़ सकती है। राहुल गांधी ने तो पहले ही दावा कर दिया कि हम 10 लाख लोग लाएंगे। अब अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग आए ही नहीं, तो सवाल उठेंगे कि भाई, आपके समर्थन में लोग कहां हैं? आप शक्ति प्रदर्शन करने निकले थे, लेकिन लोग ही नहीं जुटा पाए। ऊपर से व्यापारियों को परेशान अलग कर दिया।

तीसरी बात है चुनाव की तैयारी। अभी कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में ही उलझे रहना है या फिर आने वाले चुनावों पर भी ध्यान देना है? उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। इन चुनावों की तैयारी भी जरूरी है, लेकिन कांग्रेस का ध्यान अभी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति और इन मुद्दों पर ज्यादा दिखाई दे रहा है।
फिर जब चुनाव के नतीजे आएंगे और कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिलेगी, तो वही बात कही जाएगी कि वोट चोरी हो गई। लेकिन सवाल यह है कि चुनाव की तैयारी कौन करेगा? अभी तो समाजवादी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे पर ही बात अटकी हुई है। पहले उस बातचीत को तो सही से आगे बढ़ाइए, सीटों की डील तो तय कर लीजिए।
अगर चुनाव में गठबंधन के बीच ही परेशानी रहेगी या नतीजे खराब आएंगे, तो फिर वही पुराना आरोप लगाया जाएगा कि वोट चोरी हो गई, वोट चोरी हो गई। लेकिन जमीनी स्तर पर क्या काम हो रहा है, पार्टी का कैडर कितना मजबूत है, कार्यकर्ता कितने सक्रिय हैं, इन सब चीजों पर भी तो ध्यान देना पड़ेगा।


सिर्फ चुनाव के ऐन मौके पर प्रदेश अध्यक्ष बदल देने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा? क्या ऐसा करने से पार्टी का पूरा संगठन मजबूत हो जाएगा और चुनाव जीतना आसान हो जाएगा? मुझे तो यह बहुत मुश्किल लगता है।
आखिर में बात इतनी सी है कि अगर कांग्रेस को चुनाव जीतना है, तो उसे सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बयानबाजी और रैलियों पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए। व्यापारियों की परेशानी, लोगों की नाराजगी, रैली में भीड़ जुटाने की चुनौती, गठबंधन की बातचीत और राज्यों में संगठन की तैयारी, इन सब चीजों पर भी ध्यान देना पड़ेगा। वरना जिस रैली को राहुल गांधी अपनी ताकत दिखाने का मौका समझ रहे हैं, वही रैली कांग्रेस के लिए नुकसान का कारण बन सकती है।

कर्नाटक में एक करोड़ वोट कटने के बाद राहुल गांधी वहां क्यों नहीं जा रहे?


कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत लगभग एक करोड़ बोगस, मृत और विस्थापित नामों की छंटाई के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह मौन साध चुका है। दिल्ली में बैठकर चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं पर ‘वोट चोरी’ का झूठा विलाप करने वाले राहुल गांधी अपनी ही पार्टी की सरकार वाले राज्य कर्नाटक जाने से कतरा रहे हैं। वास्तव में, 1 नवंबर को दिल्ली में प्रस्तावित महारैली कर्नाटक के इसी प्रशासनिक सच से देश का ध्यान भटकाने का सुनियोजित राजनीतिक स्टंट है। इस तथ्यहीन नैरेटिव को गढ़ने और हवा देने में सबसे बड़ा हाथ ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और उसकी पक्षपाती रिपोर्टिंग का रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की अपनी प्रशासनिक मशीनरी ने ही इस शुद्धिकरण को पूरा किया है, जिसे अब अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

1 नवंबर की दिल्ली महारैली का कर्नाटक कनेक्शन: बेंगलुरु छोड़कर दिल्ली में जमावड़ा क्यों?
अगर कांग्रेस सच में मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए 10 लाख लोगों का मार्च कर रही है, तो यह आयोजन बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में या कर्नाटक विधानसभा के घेराव के लिए क्यों नहीं हो रहा, जहां देश में दूसरे नंबर पर सर्वाधिक 1 करोड़ नाम हटाए गए? दिल्ली में भीड़ जुटाकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन बेंगलुरु में ऐसा करने पर जनता सीधे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से जवाब मांगने लगेगी। कांग्रेस अपनी ही सरकार द्वारा चिन्हित किए गए बोगस मतदाताओं के सच का सामना करने से घबरा रही है। यही कारण है कि स्थानीय जवाबदेही से बचने के लिए बेंगलुरु में चुप्पी साधकर दिल्ली की सड़कों पर विरोध का प्रहसन रचा जा रहा है।

राहुल गांधी के कर्नाटक न जाने के पीछे का असहज सच: अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस
राहुल गांधी देश भर में घूमकर मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, लेकिन कर्नाटक का नाम लेने से लगातार बचते हैं। इसका कारण स्पष्ट है। यदि राहुल गांधी बेंगलुरु जाकर इस प्रक्रिया का विरोध करते हैं, तो उन्हें सबसे पहले अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से पूछना पड़ेगा कि उनकी सरकार ने 1 करोड़ नाम सूची से बाहर क्यों किए। कर्नाटक जाकर बोलना सीधे अपनी ही राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करना होगा। इस असहज स्थिति से बचने के लिए कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक के इन आंकड़ों पर पर्दा डालकर भ्रामक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का गृह राज्य: अपने ही आंगन में 1 करोड़ नाम छंटने पर चुप्पी क्यों?
यह विरोधाभास तब और गहरा हो जाता है जब ध्यान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर जाता है। कर्नाटक स्वयं खड़गे का गृह राज्य है, जहां से वे दशकों तक विधायक, मंत्री और सांसद रहे हैं। जब पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष उसी राज्य से आता हो और शासन भी उन्हीं की पार्टी का हो, तब 1 करोड़ नामों की छंटाई पर खड़गे का अपने गृह राज्य में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना कई सवाल खड़े करता है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि जमीन पर किसी वैध नागरिक का अधिकार नहीं छीना गया, बल्कि मृत और फर्जी प्रविष्टियों की छंटाई हुई है। इसी वजह से वे अपने गृह क्षेत्र में इस मुद्दे को उठाने से बच रहे हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल करने का डर: कानूनी चुनौती से क्यों भाग रही है कांग्रेस?
कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के लिए दिल्ली में मीडिया ब्रीफिंग करती है और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं के जरिए सुर्खियां बटोरने का प्रयास करती है, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने से बचती है। इसका बड़ा कारण यह है कि यदि कांग्रेस 1 करोड़ नामों की छंटाई को लेकर राज्य के उच्च न्यायालय जाती है, तो अदालत राज्य सरकार के मुख्य सचिव और संबंधित जिलाधिकारियों से आधिकारिक हलफनामा मांगेगी। उस कानूनी हलफनामे में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के प्रशासन को औपचारिक रूप से स्वीकार करना पड़ेगा कि ये 1 करोड़ नाम राज्य कर्मचारियों द्वारा घर-घर सत्यापन के बाद ही मृत, विस्थापित और अपात्र पाए गए थे। इस कानूनी बेनकाबी से बचने के लिए कांग्रेस अदालत जाने के बजाय सड़क पर प्रदर्शन का रास्ता चुन रही है।

राहुल गांधी की ‘पिक एंड चूज’ प्रेस कॉन्फ्रेंस: चुनिंदा सीटों का हौवा, पूरे राज्य के आंकड़े पर चुप्पी
राहुल गांधी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कर्नाटक की किसी एक-दो विधानसभा सीटों, जैसे आलंद या बेलगावी के कुछ हजार कथित नामों का उल्लेख कर सनसनी फैलाने का प्रयास करते हैं। सवाल उठता है कि जो नेता चंद हजार प्रविष्टियों पर राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा करते हैं, वे पूरे कर्नाटक में हटाए गए 1 करोड़ (18 प्रतिशत) नामों के आधिकारिक आंकड़े पर बात क्यों नहीं करते? कुछ हजार नामों को चुनकर भ्रम फैलाना और 1 करोड़ के समग्र सत्यापन पर खामोश रहना चयनात्मक राजनीति का उदाहरण है। राहुल गांधी जानते हैं कि यदि वे पूरे 1 करोड़ के आंकड़े की बात करेंगे, तो उस पर कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य प्रशासन के ही आधिकारिक हस्ताक्षर सामने आएंगे।

फॉर्म-7 के थोक आवेदन का शिगूफा: क्या डीके शिवकुमार का प्रशासन गड़बड़ी में शामिल था?
कांग्रेस के रणनीतिकार अक्सर यह नैरेटिव गढ़ते हैं कि असामाजिक तत्वों ने फॉर्म-7 (नाम हटाने का आवेदन) थोक में भरकर वैध नागरिकों के नाम कटवा दिए। चुनाव आयोग के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी फॉर्म-7 पर बिना बूथ लेवल अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन किए और संबंधित नागरिक को औपचारिक सुनवाई का नोटिस दिए बिना नाम नहीं काटा जा सकता। कर्नाटक में यह सारा सत्यापन और सुनवाई कार्य डीके शिवकुमार सरकार के अधीन काम करने वाले राजस्व अधिकारियों और राज्य कर्मचारियों ने किया। यदि कांग्रेस का यह आरोप सही है कि फर्जी फॉर्म-7 से नाम काटे गए, तो क्या वे सीधे यह कह रहे हैं कि उनकी अपनी सरकार के कर्मचारी नियमों की अनदेखी कर रहे थे?

कर्नाटक में राज्य प्रशासन की देखरेख में पूरा हुआ SIR: तब मुख्यमंत्री ने आपत्ति क्यों नहीं की?
कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के अधीन काम करने वाले राज्य प्रशासन, जिलाधिकारियों और स्थानीय बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा ही संपन्न कराई गई। घर-घर जाकर किए गए भौतिक सत्यापन के दौरान राज्य सरकार या कांग्रेस संगठन ने कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई। इसके विपरीत, कई सार्वजनिक अवसरों पर स्वयं मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए इस अभियान को आवश्यक बताया था। जब पूरी प्रक्रिया राज्य सरकार के आधिकारिक तंत्र के तहत पूरी हुई, तो बाद में वही प्रक्रिया दिल्ली में बैठकर लोकतंत्र पर हमला कैसे बन गई?

देश में दूसरे स्थान पर कर्नाटक: 18 प्रतिशत यानी एक करोड़ नाम हटने पर दोहरा मापदंड
विशेष गहन पुनरीक्षण के आधिकारिक परिणाम कांग्रेस की राजनीतिक दोहरी नीति को उजागर करते हैं। इस राष्ट्रव्यापी अभियान में पश्चिम बंगाल से भी आगे निकलते हुए कर्नाटक देश का दूसरा ऐसा राज्य बना, जहां सबसे अधिक बोगस प्रविष्टियां हटाई गईं। राज्य की कुल मतदाता सूची में से लगभग 18 प्रतिशत यानी करीब 1 करोड़ ऐसे नाम हटाए गए जो दिवंगत हो चुके थे, स्थायी रूप से पलायन कर चुके थे या एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थे। यदि कांग्रेस के दावों को सच मान लिया जाए कि इस प्रक्रिया से दुर्भावनापूर्ण तरीके से नाम काटे गए, तो क्या राहुल गांधी यह स्वीकार करेंगे कि उनकी अपनी पार्टी की सरकार ने राज्य के 1 करोड़ नागरिकों के नाम हटा दिए?

पीड़ित मतदाता नहीं, केवल बयानों पर राजनीति
चुनाव आयोग के नियमों के तहत एसआईआर में चिन्हित नाम ड्राफ्ट सूची का हिस्सा होते हैं। अंतिम प्रकाशन से पूर्व हर नागरिक और राजनीतिक दल के पास संबंधित फॉर्म भरकर विधिक आपत्ति दर्ज कराने और पात्र नाम बहाल कराने का पूर्ण अवसर होता है। यदि कर्नाटक में पात्र नागरिकों के नाम काटे गए, तो सत्ता में बैठी राज्य सरकार और उनका संगठन आयोग के समक्ष विधिक दावे पेश क्यों नहीं कर रहा? वैधानिक प्रक्रिया का उपयोग न करते हुए केवल मीडिया में बयान देना यह दर्शाता है कि कांग्रेस के पास कोई वास्तविक पीड़ित मतदाता नहीं है, बल्कि केवल वे नाम थे जिनकी अपात्रता प्रमाणित हो चुकी है।

2022 के ‘चिलुमे’ विवाद का दोहरा चरित्र: तब बोगस वोटरों पर सवाल, आज सफाई पर आपत्ति क्यों?
कर्नाटक का राजनीतिक रिकॉर्ड बताता है कि वर्ष 2022-23 में विधानसभा चुनावों से पूर्व कांग्रेस ने ही बेंगलुरु में ‘चिलुमे ट्रस्ट’ के जरिए निजी एजेंसियों द्वारा अवैध मतदाता जोड़ने का आरोप लगाया था। उस समय पार्टी ने चुनाव आयोग से तुरंत फर्जी और अवैध प्रविष्टियां छांटने की मांग की थी। अब जब चुनाव आयोग ने आधिकारिक सरकारी तंत्र और भौतिक सत्यापन के जरिए उसी डेटाबेस की सफाई कर दी, तो कांग्रेस विरोध दर्ज करा रही है। यह रुख साफ करता है कि निष्पक्ष जांच होने पर केवल राजनीतिक लाभ-हानि देखकर रुख बदला जा रहा है।

बेंगलुरु की महानगरीय गतिशीलता का सच: आईटी हब के विस्थापन को गलत रूप देना
कर्नाटक, विशेष रूप से बेंगलुरु, देश का प्रमुख आईटी और स्टार्ट-अप केंद्र है, जहां देश भर से बड़ी संख्या में पेशेवर आते हैं, कुछ समय रहते हैं और फिर अन्य शहरों या विदेश चले जाते हैं। राज्य में 18 प्रतिशत नाम हटने का एक बड़ा प्रशासनिक कारण यही महानगरीय विस्थापन (Urban Mobility) है, जहां लोग पते बदल चुके थे लेकिन उनके नाम पुरानी कागजी सूचियों में दर्ज थे। चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर इसी अनुपस्थित डेटा को हटाया है। सामान्य प्रशासनिक शुद्धिकरण और शहरी जनसांख्यिकी के इस यथार्थ को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना प्रशासनिक वास्तविकताओं की अनदेखी है।

गैर-बीजेपी शासित राज्यों के आंकड़ों पर चुप्पी
यह आरोप आधारहीन है कि केंद्र सरकार दुर्भावना से अपने राजनीतिक विरोधियों के नाम हटवा रही है। यदि इस आरोप में सच्चाई होती, तो देश में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा 18 प्रतिशत नाम कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्य में क्यों हटते? यह तथ्य प्रमाणित करता है कि एसआईआर किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर नहीं, बल्कि देश भर में समान प्रशासनिक मानकों पर आधारित है। विपक्ष केवल चुनिंदा राज्यों पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि अपने शासित राज्यों के आंकड़ों पर चर्चा करने से बचता है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट: कमजोर तथ्यों के आधार पर दबाव बनाने का प्रयास
‘वोट चोरी’ का नैरेटिव ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा कमजोर शोध और अपुष्ट दावों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट से शुरू हुआ। इस रिपोर्ट को ठीक उसी दिन प्रकाशित किया गया जब सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले पर सुनवाई होनी थी। इसका स्पष्ट उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना और संवैधानिक संस्था की साख पर प्रश्न खड़ा करना था। बुनियादी प्रमाणों के अभाव के बावजूद इस रिपोर्ट को केवल एक विशेष नैरेटिव बनाने के उद्देश्य से आगे बढ़ाया गया।


रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज खाल से बाहर निकल विपक्ष के कुत्ते बन रहे हैं ; जज रहते उन्होंने क्या गुल खिलाए होंगे

सुभाष चन्द्र

चुनाव आयुक्तों के लिए सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाए जा रहे हैं विपक्ष की तरफ से कि ज्ञानेश कुमार CEC अकेले फैसले लेते हैं जबकि बाकी दो आयुक्त विरोध में होते हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में साबित कर दिया कि सभी फैसले सर्वसम्मति से होते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में ऐसी याचिकाओं पर विचार होने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या खुद सुप्रीम कोर्ट में एकमत रहता है। आज जिस तरह रिटायर्ड जज विपक्ष के कुत्ते बनकर भौंक रहे हैं, उसे देख कर लगता है सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह Divided House है और ऐसे जजों के कुर्सी पर रहते हुए आतंकी और अराजक तत्व मौज में रहे होंगे।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
हिज़ाब केस में कर्नाटक हाई कोर्ट के 3 जजों के सर्वसम्मत फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के दो जज एकमत फैसला नहीं दे सके। इसी तरह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के कानून पर दो जज एकमत फैसला नहीं दे सके। 

एक हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त जज हुआ करता था RF Nariman, वो UAPA को Draconian Law कहता है और उसे ख़त्म करने की वकालत करता है जबकि ये कानून 1967 में बना। लेकिन उसमे हिम्मत नहीं हुई कुरान की 26 आयतों को चुनौती देने वाली सईद वसीम रिजवी की याचिका पर सुनवाई कर सके जबकि वो आयतें रिजवी ने बहुत खतरनाक बताई थी यानी UAPA से भी खतरनाक। नरीमन ने रिजवी की याचिका Frivolous कह कर खारिज कर दी और 50 हजार का जुर्माना लगा दिया।

इसी नरीमन का मुस्लिम प्रेम देखो जिसने बंगाल के 90 वोटर SIR में हटाने पर प्रश्न खड़े किये हैं। ये चाहता है घुसपैठियों को भारत का नागरिक बना दिया जाये।

एक और है संजय किशन कौल जो रिटायर होने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने के लिए तड़प रहा है। कहता है strong speech देना कैसे आतंकवाद माना जा सकता है और उसे जमानत क्यों नहीं दी जा रही? ये ऐसा बेशर्म जज है जिसे पता नहीं इमाम देश को काटना चाहता था और दोनों ने दिल्ली दंगों में क्या किया? तुम अपने सुप्रीम कोर्ट को ही रगड़ने में लगे हो जिसने इन दोनों को जमानत नहीं दी। खन्ना की  फोटो तो सौरव दास के साथ आ चुकी है मतलब कॉकरोच पार्टी का मार्गदर्शक यह भी है। 

रिटायर होने के बाद जुबान बेलगाम हो जाती है। ये कौल साहब कहते हैं कि जजों की नियुक्ति से पहले चंद्रचूड़ मोदी से सलाह लेते थे। तो इसलिए ही तुम कॉलेजियम के लिए 2 वर्ष तक मोदी सरकार को रगड़ते रहे क्या? 

एक सुधांशु धूलिया हैं, वो कह रहे हैं “मेरे विचार से उमर खालिद और शरजील इमाम को बहुत पहले जमानत दे देनी चाहिए थी”।

मदन बी लोकुर कह रहा है दोनों पर भाषण देने और मीटिंग में जाने की वजह से UAPA नहीं लगा सकते (Terrorist Activity का लेबल नहीं लगा सकते)। 

एक रिटायर्ड जज है कुरियन जोसेफ। वो खुलेआम दंगे भड़काने को उकसा रहा है। वो कहता है “जब संसद और अदालतें विफल हों, तब जनता को सड़कों पर उतरना ही चाहिए”। अबे नालायक, तूने सुप्रीम कोर्ट में रह कर क्या तीर मारे थे और क्या चाहता है कि अगर कोई निर्णय लोगों को पसंद न आए तो वो सुप्रीम कोर्ट पर चढ़ाई कर दे?

एक और नमूना है जस्टिस मार्कंडेय काटजू जो खुद सोनिया गांधी के तलुए चाट कर प्रेस कौंसिल का चेयरमैन बना था, वो आज कह रहा है कि चंद्रचूड़ करियर में आगे बढ़ने के लिए कोई भी समझौता करने को तैयार रहते थे और उन्होंने CJI के तौर पर गणेश पूजा के लिए मोदी को अपने घर बुला कर कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाई। गौमांस खाने वाले इस हरामखोर को दिक्कत गणेश पूजा से है।

वो तो भला हो 42 रिटायर्ड जजों का जिन्होंने CEC ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ अभियान की निंदा की एक खुले पत्र में। शायद वो ही ऊपर लिखे जजों को तकलीफ दे रहा है।

राहुल की रामलीला मैदान रैली या हिन्दुओं को ब्लैकमेल करने की कोशिश या हिन्दू त्यौहार चौपट कर अर्थव्यवस्था को चोटिल करना?

राहुल गांधी का फरमान आया है कि मैं 30 सेकंड में रामलीला मैदान का प्रोटेस्ट वापस बुला लूंगा। बस एक छोटी-सी शर्त है, मोदी जी को बोलिए कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हमारे हाथ में पकड़ा दें।

थोड़ा धमकी देने जैसा नहीं लग रहा? और टाइमिंग भी देखिए, दिवाली से ठीक पहले। इन्हें सब कुछ पता है। इनका ट्वीट किसके लिए है? व्यापारियों और दुकानदारों के लिए।
लेकिन राहुल, सिर्फ व्यापारी ही होली-दिवाली जैसे त्योहारों से नहीं जुड़े होते। त्योहारों से एक पूरी इकोनॉमी चलती है। लाखों-करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी इन त्योहारों से जुड़ी होती है।
जगह भी देखिए, रामलीला मैदान, जिसके पास चांदनी चौक और दिल्ली के वो सारे बाजार हैं, जहां दिवाली पर सबसे ज्यादा खरीदारी होती है। ग्राहक को बाजार तक ले जाने वाला रिक्शेवाला कमाता है, टैक्सी चलाने वाला कमाता है। सिर्फ लाखों रुपये के लहंगे नहीं बिकते, छोटे-छोटे मिट्टी के दीये भी बिकते हैं। कोई मजदूर सामान उठाकर लाता है, कोई उसे पैकेट में बंद करता है और कोई उसे चमकाने का काम करता है। हर छोटे-बड़े काम से किसी न किसी इंसान की रोजी-रोटी और उम्मीद जुड़ी हुई है।
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और इलेक्शन कमीशन अपने फैसलों और पूरी प्रक्रिया से जुड़े सबूत दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये लोग आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। अब आप ही बताइए, क्या इन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई फर्क पड़ता है? अगर पड़ता, तो ये लोग पहले कोर्ट के फैसले का इंतजार करते।

मोहब्बत की दुकान के नाम पर हमारी दुकान खराब मत करो!


 सदर बाजार के व्यापारियों ने राहुल गांधी की प्रस्तावित रैली का किया विरोध, रैली स्थगित करने की उठाई मांग!
दिल्ली के सदर बाजार में व्यापारियों ने पोस्टर लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। व्यापारियों का कहना है कि त्योहारों के समय बाजारों में राजनीतिक रैलियों के आयोजन से कारोबार प्रभावित होता है और आम जनता को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
व्यापारियों की मांग है कि त्योहारों के दौरान बाजारों में रैलियों और बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर पुनर्विचार किया जाए, ताकि दुकानदारों की रोजी-रोटी और ग्राहकों की सुविधाएं प्रभावित न हों।
व्यापारियों का कहना है कि त्योहार उनके लिए पूरे साल की कमाई का महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। ऐसे में बाजारों में भीड़, यातायात बाधित होने और ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होने से कारोबार को नुकसान पहुंच सकता है।
 अब सवाल यह है कि राजनीति जरूरी है या व्यापारियों की रोजी-रोटी?

लोकतंत्र में राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करना सभी का अधिकार है, लेकिन व्यापारियों की समस्याओं और आम जनता की सुविधाओं का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
 जन जागरण प्रेस का सवाल:
क्या राजनीतिक दलों को त्योहारों के दौरान व्यापारियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए रैलियों के समय और स्थान पर विचार नहीं करना चाहिए?
मुझे एक बात का जवाब दीजिए, वह महिला कहां है, जिसकी वजह से यह पूरा मामला शुरू हुआ था? अब उसका कहीं कोई नामोनिशान दिखाई नहीं दे रहा है। जिस महिला के मामले को लेकर इन लोगों ने पूरे भारत में आग लगाने की योजना बना ली थी, वह महिला अब कहां है? इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह महिला नहीं होती, तो ये किसी और को मुद्दा बना लेते। कोई दूसरा नहीं मिलता, तो किसी और मुद्दे को लेकर खड़े हो जाते।

असल में, इन लोगों ने बहुत पहले से ही यह योजना बना रखी थी कि सही समय पर भारत पर दबाव बनाना है और देश में अशांति फैलानी है। जिस दिन से भारत ने दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतों की आंखों में आंखें डालकर बात करनी शुरू की, उसी दिन से भारत कई लोगों को खटकने लगा था।
अब आप देखिए कि धीरे-धीरे कितने लोग और कितने मुद्दे सामने आ रहे हैं। पहले आईटीबीपी पर सवाल उठाए गए, उसके बाद कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री का भाषण सामने आया। नेहा को देख लीजिए, सीजेआई को देख लीजिए, विपक्ष के नेताओं को देख लीजिए और उस आदमी को भी देख लीजिए, जो चिकन नेक को काटने की बात करता है। दिल्ली की यूनिवर्सिटीज में भी इस तरह की बातें दीवारों पर लिखी जा रही हैं।
और आप उन्हीं लोगों की उम्मीदों को हथियार बनाकर सरकार पर दबाव डालना चाहती हैं?
लेकिन हिंदुओं के साथ ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास में पहले भी हुआ जब हिंदुओं पर जजिया टैक्स लगाया गया था। क्यों? ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके, उन्हें मजबूर किया जा सके। और अब ये दिवाली से ठीक पहले प्रोटेस्ट की धमकी देकर एक बार फिर हिंदुओं को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं।
वैसे, जैसे ही दिवाली आने लगती है ना, इन लोगों को परेशानी होने लगती है। पिछली बार राम मंदिर पर जब दीये जलाए गए थे, तो यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी नाराज हो गई थी। उन्हें परेशानी थी कि हम दिवाली क्रिश्चियनों की तरह क्यों नहीं मनाते, छोटे-छोटे दीये क्यों जलाते हैं, इतना पैसा क्यों खर्च करते हैं और इतना तेल क्यों जलाते हैं।
उस एक दीये को बनाने के लिए कुम्हार महीनों तक मेहनत करता है। उस दीये में डालने के लिए सरसों का तेल पैदा करने वाला किसान अपने खेतों में दिन-रात मेहनत करता है। और आपलोग, जो मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए राजकुमार हैं, उन मेहनत करने वाले लोगों की छोटी-छोटी खुशियों पर भी राजनीति करके उन्हें ब्लैकमेल करना चाहते हैं?
वैसे, एक छोटी-सी बात पूछूं?
ईद से पहले जामा मस्जिद के सामने या क्रिसमस से पहले कनॉट प्लेस में ऐसा ही कोई प्रोटेस्ट करके दिखा दोगे?
नहीं ना?

वाराणसी की शिक्षक विधान परिषद सीट पर भाजपा के हारने से ऐसा कोहराम मचा रहे हैं कुछ लोग कि UGC की वजह से अब मोदी योगी दोनों के लिए खतरे की घंटी बज गई

सुभाष चन्द्र

कमाल है यार लोगों की सोच पर। स्नातक विधान परिषद की 5 सीट थी जिनमें 2 सीट मेरठ और आगरा की सीट भाजपा ने जीती। शिक्षक विधान परिषद की 6 सीट थी जिनमें से 4 सीट (मेरठ, बरेली-मुरादाबाद, लखनऊ और गोरखपुर) भाजपा ने जीती। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी और आगरा की शिक्षक विधान परिषद की सीट जीत ली।

स्नातक/शिक्षक विधान परिषद की कुल 28 सीट में भाजपा ने अकेले 13 और भाजपा गठबंधन यानी NDA ने 16 सीट जीती हैं।

लेकिन कुछ लोगों के दिमाग का फितूर देखिए जो केवल एक वाराणसी की सीट पर फोकस कर हल्ला बोल रहे हैं कि UGC rules की वजह से वो सीट भाजपा हार गई और अब मोदी/ योगी के लिए खतरे की घंटी बज गई।

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मतलब एक वाराणसी की सीट पर UGC का प्रभाव रहा जो अन्य 4 शिक्षकों की सीट पर नहीं दिखाई दिया और बस एक सीट ने मोदी/योगी को खत्म कर दिया। इससे बड़ी बेवकूफी भरी अवधारणा हो नहीं सकती। UGC Rules का असर होता तो फिर स्नातक/शिक्षक सभी सीटों पर होता लेकिन वह नहीं हुआ।

एक सज्जन आज मुझसे Whatsapp पर इसी बात को लेकर भिड़ गए और यहां तक कह गए कि मोदी जी योगी को गिराना चाहते हैं। ऐसे बकबक  वालों को मैं आजकल बिना कुछ कहे अपनी मित्रता सूची से बाहर कर देता हूं और उन सज्जन को अपनी Whatsapp की Broadcast लिस्ट से बाहर कर दिया। लेकिन उन्हें इतना जरूर बता दिया कि आप ज्यादा खुश होने से पहले सोच लो कि आप एक ब्राह्मण हो और समाजवादी ब्राह्मणों को वेश्याओं से भी गिरा हुआ कहते हैं। कल को योगी को हटा दोगे तो तुम्हारी क्या गति होगी, कल्पना भी नहीं कर सकते।

कुछ दिन पहले मैंने एक प्रश्न पाठकों से पूछा था कि मोदी का हर बात पर विरोध करने वाले राहुल गांधी और विपक्ष ने, ऐसी कौन से नीति है जिसका विरोध नहीं किया। कई लोगों ने उत्तर में UGC Rules बताया।

अब सोचिए अगर तमाम विपक्ष UGC Rules का विरोध नहीं कर रहा तो उसका कारण क्या है? कारण स्पष्ट है कि ऐसा विरोध करने से SC/ST वोट बैंक का नुक़सान हो सकता है। फिर अकेले मोदी को क्यों टारगेट किया जाए? UGC Roll Back का शोर मचाने वालों में अधिकांश ऐसे लोग होंगे जो चुनाव के दिन छुट्टी पर निकल जाते होंगे। उनमे ऐसे भी बहुत होंगे जो राम मंदिर में चंदा चोरी पर तड़प रहे होंगे लेकिन उन्होंने राम मंदिर बनने पर ख़ुशी नहीं जताई क्योंकि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होने के 3 महीने बाद भाजपा की सीट 303 से 240 कर दी।

इस संदर्भ में एक बात और याद कीजिए कि 2015 में मोहन भागवत जी ने केवल इतना कहा था कि Non-Political लोगों की एक समिति को आरक्षण पर पुनर्विचार करना चाहिए। वो समय बिहार विधानसभा चुनाव का था और क्योंकि भाजपा संघ से जुड़ा दल है, विपक्ष ने कोहराम मचा दिया कि भाजपा आरक्षण को ख़त्म करना चाहती है और इससे बिहार चुनाव में भाजपा को भारी नुकसान हुआ। 

UGC पर हायतौबा करने वाले क्या यही चाहते हैं कि मोदी SC/ST/OBC वोट बैंक की क़ुरबानी दे दे और आप वोट डालने भी न जाएं? ऐसे लोगों को यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि राहुल गांधी का कहना है कि अगर उसकी सरकार बनती है तो प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण लागू कर दिया जाएगा। फिर सर पीटते रहना।

एक बात साफ़ समझ लेनी चाहिए कि आरक्षण अब “unavoidbale evil” बन चुका है जिसे कोई दल ख़त्म नहीं करना चाहता। आरक्षण का विरोध करने वाले चाहें तो चुनाव लड़ें, सरकार बनाएं और आरक्षण ख़त्म कर लें।

मोदी से आरक्षण ख़त्म करने की मांग करने से पहले राहुल गांधी और  विपक्षी दलों से भी बात करें कि क्या वो आरक्षण ख़त्म करने में मदद करेंगे। 

फ्रांस में भी दंगाइयों से निपटने के लिए गूंजा योगी मॉडल


फ्रांस में यूपी के योगी मॉडल की चर्चा हो रही है। वहां के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच इस मॉडल को अपनाने की बात चल रही है। जानते हैं क्यों? फ्रांस के अलग-अलग हिस्सों में दंगाइयों ने जो तोड़फोड़ की और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, अब वहां की सरकार उसी नुकसान की भरपाई दंगाइयों के पैसों और उनकी प्रॉपर्टी से कराने की तैयारी कर रही है।

इसके लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मॉडल को अपनाने की चर्चा हो रही है। यूपी में साल 2020 में ऐसा कानून लाया गया था, जिसके तहत दंगों या विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से उस नुकसान की भरपाई कराई जा सकती है।
आखिर कानून-व्यवस्था को लेकर योगी मॉडल की चर्चा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्यों हो रही है? इसे थोड़ा विस्तार से समझना होगा।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने साल 2020 में उत्तर प्रदेश सार्वजनिक और निजी संपत्ति क्षति वसूली अधिनियम बनाया था। इसका मकसद दंगाइयों और हिंसा करने वालों पर कार्रवाई करना था, खासकर उन लोगों पर जो आगजनी करते हैं, सरकारी संपत्ति तोड़ते हैं या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं।
इस कानून के तहत बंद, हड़ताल, दंगे, सार्वजनिक जगहों पर हंगामा और विरोध प्रदर्शन के दौरान अगर कोई सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो उससे उस नुकसान की भरपाई कराई जा सकती है।
इसके लिए एक दावा अधिकरण यानी क्लेम्स ट्रिब्यूनल बनाया गया है। यह अधिकरण देखता है कि कितना नुकसान हुआ है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। जिम्मेदारी तय होने के बाद यह नुकसान की भरपाई करने का आदेश भी दे सकता है।
अब फ्रांस की बात करते हैं। वहां हुई हिंसा के दौरान कई दुकानों, सरकारी इमारतों और दूसरी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया था। इसके बाद फ्रांस की सरकार ने साफ कर दिया कि दंगाइयों को सिर्फ आपराधिक सजा देना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्होंने जो नुकसान किया है, उसकी भरपाई भी उन्हीं के पैसों से कराई जानी चाहिए।
इसके बाद 16 सितंबर 2026 को फ्रांस की सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर हिंसा और तोड़फोड़ से हुए नुकसान की भरपाई कराने और मुआवजे की वसूली से जुड़ा एक विधेयक पेश किया।
इस प्रस्ताव में यह व्यवस्था करने की बात है कि सामूहिक हिंसा में शामिल लोगों की आर्थिक जिम्मेदारी तय की जाए। कुछ परिस्थितियों में इसमें शामिल लोगों को नुकसान की भरपाई के लिए संयुक्त रूप से भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
यानी बात सिर्फ दंगाइयों को सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने जो नुकसान किया है, उसकी कीमत भी उनसे वसूलने की है।
और अब इसी वजह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मॉडल की चर्चा फ्रांस में हो रही है। जिस तरीके से यूपी में दंगों और तोड़फोड़ के दौरान संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से मुआवजा वसूलने के लिए कानून बनाया गया था, उसी तरह की व्यवस्था फ्रांस में भी लागू करने की तैयारी की बात सामने आ रही है।

जॉर्जिया मेलोनी ने दंगाइयों के खिलाफ बनाया सख्त प्लान, नाबालिग दंगाइयों के लिए माता-पिता जिम्मेदार


जॉर्जिया मेलोनी ने 24 घंटे के अंदर वो कर दिखाया, जो यूरोपियन यूनियन (EU) के बड़े-बड़े नेता 30 साल में भी नहीं कर पाए। मेलोनी ने इटली में दंगों को रोकने के लिए ऐसी पॉलिसी बनाई है, जिसकी वजह से पूरे यूरोप में चर्चा शुरू हो गई है। स्टूडेंट प्रोटेस्ट और हिंसक प्रदर्शनों को रोकने के लिए उन्होंने एक सख्त प्लान तैयार किया है, जिसे 'एंटी-रायट डॉक्ट्रिन' कहा जा रहा है।

मेलोनी ने साफ कह दिया है कि अगर कोई सड़क पर दंगा करेगा, तो उसके परिवार को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर कोई हिंसक प्रदर्शन में शामिल होता है, तो उसे 5 साल तक की जेल और 20,000 का जुर्माना देना पड़ सकता है। मेलोनी समझ गई हैं कि नकाब पहनकर हिंसा करने वाली भीड़ को सिर्फ आंसू गैस चलाकर नहीं रोका जा सकता। इसके लिए उनके पैसे और हिंसा की तैयारी में मदद करने वाले पूरे नेटवर्क पर चोट करनी होगी।
और जैसे ही इटली में दंगाइयों के माता-पिता पर जुर्माना लगाने और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात सामने आई, मिलान में 500 सैनिकों को तैनात करने की भी बात हुई। इसके बाद अचानक वहां के युवा प्रदर्शनकारी सड़कों से गायब हो गए। पता नहीं कहां छिप गए, जैसे जमीन में समा गए हों!
मेरे हिसाब से यह उस पूरे सिस्टम के खिलाफ एक सीधा जवाब है, जिसमें बड़े-बड़े अमीर लोग एनजीओ (NGOs) को पैसा देते हैं और फिर उन्हीं के जरिए युवाओं को आगे करके किसी देश में अशांति फैलाने की कोशिश करते हैं। इन युवाओं को आगे करके उन्हें एक तरह से ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, ताकि देश की सरकार को कमजोर किया जा सके और देश में अस्थिरता पैदा हो।
जब आप हिंसक प्रदर्शन करने वालों के पैसे के इंतजाम और कानून से बचने के रास्ते बंद कर देते हैं, तो इस तरह की गतिविधियों के पीछे काम करने वाले लोगों की असलियत सामने आने लगती है।
मेरे हिसाब से भारत को भी इसी तरह के मॉडल पर विचार करना चाहिए। अगर कोई अधिकारों के नाम पर हाईवे जाम करता है, सरकारी या आम लोगों की संपत्ति तोड़ता है या उसे आग लगाता है, तो नुकसान की भरपाई भी उसी से कराई जानी चाहिए। देश की जनता को परेशान करके और पूरे देश को बंधक बनाकर रखना लोकतंत्र नहीं है।
हां, विरोध करना हर किसी का अधिकार है, लेकिन विरोध करने का भी एक तरीका होता है। अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का मतलब यह नहीं है कि आप दूसरों के अधिकार छीन लें, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाएं या आम लोगों की जिंदगी मुश्किल बना दें।

राहुल गांधी भी सोचता होगा, मोदी को हटा दो यार, मैं हर जगह हार हार कर हार चुका हूं; EVM को छोड़ो, बैलट पेपर भी नहीं जिता रहे

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी से न होगा। खरगे बकता है “मोदी का बाप भी जाएगा” और राहुल गांधी सोचता है कभी कॉकरोचों की पीठ पर चढ़ कर, कभी खुद रैलियां निकाल कर मोदी को उखाड़ फेंकेगा लेकिन चुनाव दर चुनाव जनता ही राहुल की कांग्रेस को उखाड़ फ़ेंक रही है, फिर चाहे बैलट पेपर से ही वोटिंग क्यों न हो?

अभी हाल ही में हुए विधान परिषदों के चुनाव में उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 8, कांग्रेस शासित कर्नाटक की 4 और महाराष्ट्र की 5 सीटों में कांग्रेस को जीरो सीट मिली और राहुल को शुन्यवीर बना दिया।

इन चुनावों में EVM का नहीं बैलट बॉक्स का उपयोग हुआ। अगर वोट चोरी होती है तो DK Shivkumar कर्नाटक में करा लेता।

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ऐसा कहना सही होगा “ज़ीरो से मोहब्बत कर बैठा, नादान बेचारा राहुल ही तो है”।

लेकिन फिर भी 1 नवंबर को रामलीला मैदान में हुड़दंग करने को आतुर है।

-इसके पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनाव में भी कांग्रेस की NSUI को शून्य मिला। ABVP 4 में से 3 सीट जीत गई;

-केरल की सेंट्रल यूनिवर्सिटी भी ABVP ले गई जहां सी.पी.एम. का डिब्बा गोल हो गया और Government Sanskrit College in Tripunithura में ABVP ने चुनाव जीत कर सी.पी.एम. का 35-40 साल पुराना किला ढहा दिया;

-इसी महीने हुए गुजरात के कारपोरेशन चुनाव में गांधीनगर में भाजपा को 44 में 38 सीट मिली और कांग्रेस को केवल 5; थरा नगरपालिका की 24  में से भाजपा को 19 सीट मिली और कांग्रेस को 5 और ओखा नगरपालिका की 36 सीट में से भाजपा को 33 सीट मिली और कांग्रेस को 3;

-असम की सिल्चर कारपोरेशन में 42 सीट में से 32 सीट भाजपा को मिली और कांग्रेस को मात्र 2 जबकि उसने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था। 

ये सब निगमों के चुनाव बैलट पेपर से हुए थे। हर जगह कांग्रेस नाकाम लेकिन फिर भी राहुल गांधी चाहता है कि प्रदर्शन और हुड़दंग कर व्यापार जगत को नुकसान पहुंचा कर किसी तरह मोदी को हटा दिया जाए।

उसे अब तक समझ आ जाना चाहिए कि उसका नेतृत्व विफल हो चुका है और उसमे न कोई दम है और न काबिलियत है। पता नहीं कांग्रेस क्यों इस गांधी परिवार को ढो रही है? इस परिवार से मुक्ति पाए बिना कांग्रेस का उद्धार नहीं हो सकता।

अरे राहुल भैया खड़के ने करवा दिया वोट चोरी, निकालो पार्टी से

मोदी, तू क्या, तेरा बाप भी जाएगा! तेरा बाप भी जाएगा!

ये कांग्रेस अध्यक्ष खरगे जी पटना में एक सभा के दौरान ऐसा कहा।
और फिर एक बार कांग्रेस के साथ वही हुआ, जिसे देखकर लगता है कि वोट चोरी हो गई। कांग्रेस के खाते से लाखों वोट कट गए और बीजेपी के खाते में जुड़ गए।
हुआ यूँ कि पटना में खरगे जी एक सभा में भाषण दे रहे थे। वही पुराना राग अलाप रहे थे, वोट चोरी हो रही है, न जाने क्या-क्या। तभी कांग्रेस का एक कार्यकर्ता खड़ा हुआ और खरगे जी को आईना दिखाते हुए कह दिया कि मोदी कहीं नहीं जा रहे हैं।
फिर क्या था! खरगे जी गुस्से से लाल हो गए और चिल्लाकर बोले, "मोदी... मोदी का बाप भी जाएगा, बाप भी जाएगा! मोदी का बाप भी जाएगा, चल!"
वैसे मोदी जी की किस्मत भी कमाल की है। जब-जब कांग्रेस उन्हें गालियाँ देती है, तब-तब उनका वोट शेयर बढ़ता हुआ दिखाई देता है। सोनिया गांधी ने मोदी जी को 'मौत का सौदागर' कहा था, उसके बाद मोदी जी बार-बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने। राहुल गांधी पूरे देश में 'चौकीदार चोर है' का नारा लेकर घूमे और नतीजा ये हुआ कि मोदी जी दोबारा प्रधानमंत्री बन गए।
इसी तरह, जब जंतर-मंतर पर इन लोगों ने मोदी जी की माँ को जमकर गालियाँ दीं, तो उसके बाद हुए उपचुनावों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। इतना ही नहीं, जिन यूनिवर्सिटी के चुनावों में जेन-ज़ी यानी नई पीढ़ी के युवा वोट कर रहे थे, वहाँ भी बीजेपी की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के उम्मीदवारों को बड़ी जीत मिली।
अब इन लोगों को कौन समझाए कि अगर मोदी जी को सत्ता से हटाना है, तो जनता के सामने उनसे बेहतर गवर्नेंस मॉडल और काम करने का तरीका पेश करना पड़ेगा। लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस इस झंझट में पड़ना ही नहीं चाहते। उन्हें तो बस किसी तरह सरकार बदलवानी है, यानी रिजीम चेंज करवाना है।

इसीलिए कांग्रेस ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में 10 लाख लोगों को इकट्ठा करके विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।
अब वहाँ भी मोदी जी को गालियाँ दी जाएँगी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का फिर से इस्तीफा माँगा जाएगा। लेकिन चिंता की बात ये है कि कांग्रेस ने कहा है कि इसके बाद वो मार्च भी निकालेगी। अब सवाल ये है कि 10 लाख लोगों की ये मार्च कहाँ निकाली जाएगी, इसकी जानकारी अभी तक नहीं दी गई है।
देखिए, आजकल फ्रांस और यूरोप के दूसरे देशों में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें एक नया तरीका देखने को मिल रहा है। वहाँ कुछ प्रदर्शनकारी खतरनाक पटाखे जलाकर सरकारी इमारतों पर फेंकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस भी दिल्ली में इसी तरह का रास्ता अपनाने वाली है? इसलिए अमित शाह और दिल्ली पुलिस को पूरी तरह सतर्क रहना पड़ेगा।

वैसे, इन लोगों और राहुल गांधी ने अक्टूबर में दिल्ली में जो आंदोलन किया था, उससे दिल्ली के व्यापारियों को 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने की बात कही जा रही है। और अगर कांग्रेस ने फिर से दिल्ली में हंगामा और अराजकता फैलाने की कोशिश की, तो दिवाली तक व्यापारियों का नुकसान बढ़कर 10,000 करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है।

अब आप ही बताइए, ऐसे हालात में कोई भी समझदार इंसान इन दिमागी नक्सलियों और हर बात पर नाराज रहने वाले फ़ुफ़ाओं को वोट क्यों देगा? अगर जनता का वोट चाहिए, तो जनता के लिए काम करना पड़ेगा, बेहतर विकल्प देना पड़ेगा। सिर्फ गालियाँ देने, वोट चोरी का आरोप लगाने और विरोध प्रदर्शन करने से सरकार नहीं बदलती।

गालीबाज विपक्षी नेताओं की कुंडली: मोदी को अब तक 134 गालियां

गुजरात मुख्यमंत्री बनने से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक जितनी गालियां नरेंद्र मोदी को पड़ रही हैं शायद ही भारत के इतिहास में किसी भी नेता को मिली हों। विपक्ष मोदी की कार्यशैली और योजनाओं की आलोचना करने की बजाए ऐसे गाली-गलोच कर रहे जैसे गली का कोई गुंडा देता है। क्या विपक्ष विपक्ष के नाम पर इतनी नीचता पर उतरेगा? मोदी के जो माँ-बाप राजनीति में नहीं रहे उन्हें गालियां किस आधार पर दी जा रही हैं?    
नरेन्द्र मोदी को गाली देने का सिलसिला जारी है। विपक्ष के छोटे से लेकर बड़े नेता तक नफरत से भरे हुए हैं और वे एक के बाद एक प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ जहरीले बयान दे रहे हैं। अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बिहार की राजधानी पटना में विवादित बयान दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिता पर अशोभनीय टिप्पणी की। खरगे पीएम मोदी के खिलाफ बोल रहे थे। इस दौरान वहां मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि पीएम मोदी कहीं नहीं जाएंगे। जिस पर खरगे ने कहा कि मोदी का बाप भी जाएगा।

कब-कब विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया –

मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा- मोदी का बाप
25/10/2026
देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली देने का सिलसिला जारी है। विपक्ष के छोटे से लेकर बड़े नेता तक नफरत से भरे हुए हैं और वे एक के बाद एक प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ जहरीले बयान दे रहे हैं। अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विवादित बयान दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिता पर अशोभनीय टिप्पणी की। बिहार के पटना में डॉ. श्री कृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पीएम मोदी के विरोध में बोल रहे थे। इस दौरान वहां मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि पीएम मोदी कहीं नहीं जाएंगे। जिस पर खरगे ने कहा कि मोदी का बाप भी जाएगा।

संजय राउत ने कहा अघोरी
13/06/2026
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए अघोरी और औरंगजेब जैसे अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया है। संजय राउत ने कहा कि ‘भारतीय राजनीति में इतना अघोरी व्यक्ति कभी पैदा नहीं हुआ। इतना क्रूर व्यक्ति कभी पैदा नहीं हुआ। इसी देश की मिट्टी में पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, पीवी नरसिम्हा राव, राजीव गांधी, बाबासाहेब अंबेडकर और बालासाहेब ठाकरे जैसे महान नेता जन्मे हैं। लेकिन जब हम मोदी जी का पूरा चरित्र देखते हैं, तो डर लगता है कि ये कहां से पैदा हो गए? जिस मिट्टी से औरंगजेब पैदा हुआ था, उसी मिट्टी से ये लोग आए हैं। औरंगजेब गुजरात में ही पैदा हुआ था, है ना?’

अजय राय ने कहा गां#$ फाड़ दी
22/05/2026
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए बेहद अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया है। वाराणसी के कांग्रेस नेता ने आपत्तिजनक बयान देते हुए कहा कि कह देना अजय राय ने प्रधानमंत्री मोदी की गां#$ फाड़ दी है। इतना ही नहीं अजय राय उस एक वाक्य को दोहराते भी हैं। महोबा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं से बातचीत के दौरान अभद्र और अपशब्दों के इस्तेमाल का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। लोग सोशल मीडिया पर लताड़ लगाते हुए कह रहे हैं कि कांग्रेस नेताओं का यही स्तर है।

राहुल गांधी ने कहा गद्दार
20/05/2026
कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को गद्दार कहा। रायबरेली में एक सभा को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी ने कहा कि जब भी बीजेपी- आरएसएस के लोग आपके सामने आएं और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की बात करें तो आप उनसे खुलकर कहिए नरेंद्र मोदी-अमित शाह गद्दार हैं। बीजेपी- आरएसएस गद्दार हैं, क्योंकि आप लोगों ने मिलकर देश को बेचने का काम किया है। बीजेपी और आरएसएस ने संविधान पर, वीरा पासी जी, गांधी जी और अंबेडकर जी पर हमला किया है।

सपा सांसद अजेंद्र कुमार ने कहा हरामी
11/05/2026
महोबा से समाजवादी सांसद अजेंद्र कुमार ने मर्यादा की सारी हदें पार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को हरामी कहकर संबोधित किया। इतना ही नहीं अजेंद्र कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी को देशद्रोही भी कहा। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इतना हरामी, इतना देशद्रोही प्रधानमंत्री आजतक नहीं हुआ।

कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने बताया आतंकवादी
21/04/2026
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने काफी आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को आतंकवादी बताया है। तमिलनाडु के चेन्नई में मीडिया से बात करते हुए खरगे के कहा कि ‘वे (AIADMK) मोदी के साथ कैसे जुड़ सकते हैं? वह एक आतंकवादी हैं और वह समानता में विश्वास नहीं रखते। उनकी पार्टी भी समानता और न्याय में विश्वास नहीं रखती। और ये लोग उनके साथ जुड़ रहे हैं, इसका मतलब है कि वे लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं।’

कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल ने बताया दुर्योधन
29/08/2025
महाराष्ट्र कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विवादित बयान दिया है। कांग्रेस नेता ने पत्रकार नीरज झा के साथ एक पॉडकास्ट के दौरान कहा है कि ‘ये धृतराष्ट्र की औलाद हैं, ये दुर्योधन हैं। और चुनाव आयोग को मैं इनका छोटा भाई कहूंगा, जिसे दुशासन कहेंगे, जिसने द्रौपदी की इज्जत पर हाथ डाला था। तो चुनाव आयोग दुशासन है और नरेंद्र मोदी दुर्योधन हैं।’

सुप्रिया श्रीनेत ने दादा-नाना को लेकर कहे अपशब्द
04/11/2024
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की करीबी कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रति विवादित बयान दिया है। झारखंड के रांची में मीडिया कर्मियों को संबोधित करते हुए गालीबाज आंटी के नाम से मशहूर सुप्रिया ने पत्रकारों के एक सवाल पर कहा कि अपने नाना के घर से लाए थे पैसे…मोदी जी के दादा के घर से आया था पैसा।’ सुप्रिया श्रीनेत अपने बयानों के लेकर काफी विवादों में रही हैं, लेकिन बीजेपी नेताओं के खिलाफ अपने अपशब्दों को लेकर कांग्रेस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की चहेती बनी हुई हैं।

संजय राउत- मोदी का दिमाग सड़ा हुआ है
16/09/2024
शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत ने प्रधानमंत्री को लेकर विवादित बयान दिया है। संजय राउत ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पता नहीं होता है कि वो अब क्या बोलेंगे। उनके मानसिक संतुलन के बारे में पता नहीं चलता है। उनका दिमाग सड़ा हुआ है।’

सपा नेता हाजी रजा- छुल-छुल करके…
20/06/2024
अखिलेश यादव के करीबी समाजवादी पार्टी नेता हाजी रजा ने उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। सपा नेता हाजी रजा ने पार्टी सांसद नरेश उत्तम पटेल के स्वागत कार्यक्रम के दौरान कहा, “हम आपको इस मंच के माध्यम से बताना चाहते हैं और सांसद जी तरफ से भी आश्वस्त करना चाहते हैं कि अब ये फतेहपुर जनपद में नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश में नहीं चलने वाले। जिस समय हमारा सांसद लोकसभा में शेर की तरह दहाड़ेगा ना मोदी छुल-छुल करके मूतेगा। बोलने वाला चाहिए। अपनी बात रखने वाला चाहिए।”

औरंगजेब से तुलना कर दी जमीन में गाड़ने की धमकी
09/05/2024
शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत ने महाराष्ट्र के अहमदनगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को जमीन में गाड़ने की धमकी दी। प्रधाममंत्री पद और भाषा की मर्यादा भूल राउत तू-तड़ाक भी करने लगे। उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना औरंगजेब से करने के साथ मराठी में दिए गए भाषण में कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म महाराष्ट्र में हुआ और औरंगजेब का जन्म गुजरात में हुआ। आप इतिहास देखिए, औरंगजेब का जन्म नरेन्द्र मोदी के गांव में हुआ है। अहमदाबाद के बगल में दाहोद नाम का गांव है, जहां औरंगजेब का जन्म हुआ था। गुजरात में औरंगजेब का जन्म हुआ, यही कारण है कि वह हमारे साथ औरंगजेब की तरह बर्ताव कर रहे हैं। लेकिन याद रहे कि एक औरंगजेब को हमने इस महाराष्ट्र की धरती में गाड़ा है। हमने उस औरंगजेब को महाराष्ट्र की धरती में गाड़ दी। मोदी तू क्या चीज है? मोदी तू कौन है?