कांग्रेस ने जिन कर्नल पुरोहित को बनाया ‘भगवा आतंकवाद’ का शिकार, अब बनेंगे ब्रिगेडियर: सेना ने दी मंजूरी, सहना पड़ा था अत्याचार


करीब 17 साल तक चले मालेगाँव ब्लास्ट केस में बरी होने के बाद भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को अब बड़ी राहत मिली है। उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए मंजूरी दे दी गई है।

यह फैसला उस लंबे दौर के बाद आया है। जब वह आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए जेल में रहे, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और अपने करियर को लगभग ठहरता हुआ देखा।

जुलाई 2025 में NIA की विशेष अदालत ने उन्हें और अन्य आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। इस केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कुल सात लोग आरोपित थे, जिन्हें अदालत ने दोषमुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित ने अपने करियर को हुए नुकसान को लेकर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक चले मुकदमे और हिरासत के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन के अवसर नहीं मिल पाए।

ट्रिब्यूनल ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी थी। अब जब उन्हें प्रमोशन की मंजूरी मिल गई है।

क्या था मालेगाँव ब्लास्ट मामला

मालेगाँव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुआ था। रमजान के दौरान एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और लगभग 95 लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद देशभर में हड़कंप मच गया था और जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव था कि जल्द से जल्द आरोपित को पकड़ा जाए।

शुरुआत में इस मामले की जाँच महाराष्ट्र ATS ने की और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में साल 2011 में जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई। इस केस में श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी समेत कई लोगों को आरोपित बनाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि यह एक संगठित साजिश थी, लेकिन अदालत में यह आरोप टिक नहीं पाए।

कैसे अदालत में कमजोर पड़ा पूरा केस

जब यह मामला अदालत में पहुँचा और गवाहों व सबूतों की जाँच शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर होता चला गया। NIA कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि वे कश्मीर से RDX लेकर आए थे और उसका इस्तेमाल इस धमाके में किया गया, लेकिन कोर्ट में यह तक साबित नहीं हो पाया कि वे उस समय कश्मीर में तैनात थे। उनके घर से भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी आरडीएक्स के कोई निशान नहीं पाए गए।

इसी तरह साजिश से जुड़ी कथित बैठकों, कॉल रिकॉर्ड या किसी भी ठोस प्लानिंग का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सबूतों के अभाव में सभी आरोपितों को बरी करना जरूरी है।

कोर्ट ने क्या कहा

NIA की विशेष अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो इस पूरे मामले की दिशा और निष्कर्ष को समझने के लिए बेहद अहम हैं। अदालत ने साफ कहा कि “आतंकवाद एक गंभीर अपराध है और इसे किसी भी धर्म या विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य संदेह से परे दोष सिद्ध करने के मानक पर खरे नहीं उतरते। कोर्ट ने कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। उदाहरण के तौर पर, विस्फोटक सामग्री की जब्ती और उसके परीक्षण की प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव था।

कथित कबूलनामों को लेकर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपित से दबाव या प्रताड़ना के तहत बयान लिया गया है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में असंगतियाँ और विरोधाभास भी अदालत के सामने स्पष्ट रूप से सामने आए।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केवल एक नैरेटिव या थ्योरी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर सभी आरोपितों को बरी किया गया।

कर्नल पुरोहित को क्या-क्या झेलना पड़ा

लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए यह मामला सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तर पर एक लंबा संघर्ष था। उनकी गिरफ्तारी नवंबर 2008 में हुई थी और उन्हें करीब 9 साल तक जेल में रहना पड़ा।

इस दौरान उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल भी चला, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। उनके परिवार को भी सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

कर्नल पुरोहित ने बाद में आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक ऑपरेशन के तहत कुछ संगठनों के संपर्क में थे, लेकिन उनकी इस भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

उनकी सेवा के दौरान मिलने वाले प्रमोशन और अन्य लाभ भी इस केस के चलते रुक गए। यही कारण था कि बरी होने के बाद उन्होंने AFT का रुख किया और अपने करियर की बहाली की माँग की।

भगवा आतंकवाद नैरेटिव और कॉन्ग्रेस की साजिश

इस केस के दौरान ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द काफी चर्चा में आया। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार किया गया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के बयानों को लेकर भी काफी विवाद हुआ। बाद में खुद शिंदे ने माना कि आतंकवाद को किसी धर्म या रंग से जोड़ना सही नहीं था।

अदालत ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी थ्योरी को केवल नैतिक आधार पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर ही साबित किया जाना चाहिए।

कांग्रेस (UPA) की नेतृत्व वाली केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जानबूझकर फँसाया था, जबकि सरकार को जानकारी थी कि वह ड्यूटी पर थे और खुफिया जानकारी जुटा रहे थे। हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है।

मालेगाँव विस्फोट मामले में 2008 में गिरफ्तार किए गए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को उस समय की सरकार और मीडिया ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ की विचार को स्थापित करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को देशद्रोही बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस द्वारा ‘नो इनपुट अवेलेबल’ शब्द का इस्तेमाल सत्य के रूप में किया गया था। बाद में डीजीएमआई ने अधिक इनपुट के लिए परिणामी कार्यालयों को लिखा, लेकिन सरकार ने कोई फॉलोअप कार्रवाई नहीं की।

पेज 2 पर 4 लाइनें बताती हैं कि पूरा कांग्रेस नेतृत्व कर्नल पुरोहित के बारे में झूठ बोल रहा था। सेना के पत्र की लाइन 1 में कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक सोर्स नेटवर्क का संचालन कर रहे थे, जिसके माध्यम से उन्होंने खुफिया जानकारी प्राप्त की थी’। यह उस बात के विपरीत है, जिसे हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि ‘कोई इनपुट नहीं’ था।

इस्लामाबाद में ईरानी-अमेरिकियों के बीच आई हाथापाई की नौबत, होर्मुज पर भिड़े विदेश मंत्री अराघची और US के दूत विटकॉफ: रिपोर्ट


इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई अहम वार्ता के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण होने की भी बात सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बीच तीखी बहस छिड़ने का दावा किया गया है। तुर्की के एक पत्रकार ने दोनों के बीच हाथापाई की नौबत आने का जिक्र किया है।

बताया जा रहा है कि बातचीत के दौरान दोनों नेताओं के बीच बातचीत नोंकझोंक में बदल गई और माहौल अचानक गर्मा गया। यह विवाद इतना बढ़ गया कि स्थिति लगभग हाथापाई तक पहुँच गई थी।

दोनों पक्षों के बीच मुख्य मतभेद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नियंत्रण और प्रबंधन को लेकर था। गौरतलब है कि इस्लामाबाद में चली लंबी बातचीत बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो चुकी है। 

‘जाओ अपने बॉयफ्रेंड केसी वेणुगोपाल को अपना ego दिखाओ’..बता भागी एम हजीना सैयद, तमिलनाडु महिला कांग्रेस की अध्यक्ष; आरोप-प्रत्यारोप के बीच चल रही नूराकुश्ती

                                                                                                                                                                                                                                  साभार - ऑपइंडिया इंग्लिश
तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के मतदान होने के अगले ही दिन प्रदेश की महिला कांग्रेस अध्यक्ष हजीना सैयद को उनके पद से हटा दिया गया है। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष अलका लांबा ने पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए हजीना सैयद को अध्यक्ष पद से हटाने का आदेश दिया है। वहीं अब हजीना ने अलका लांबा को जवाब देते हुए करारा पलटवार किया है। हजीना सैयद ने कहा कि क्या तुम्हें कोई कॉमन सेंस है? मैंने तो एक ऑफिशियल प्रेस मीट में पहले ही इस्तीफा दे दिया है। जाओ अपने बॉयफ्रेंड केसी वेणुगोपाल को अपना ego दिखाओ।

कांग्रेस पार्टी के अंदर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जहाँ तमिलनाडु महिला कांग्रेस की अध्यक्ष एम हजीना सैयद ने पार्टी से इस्तीफा देने के बाद शीर्ष नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी की ओर से उन्हें ‘एंटी-पार्टी गतिविधियों’ के आरोप में निष्कासित भी कर दिया गया, लेकिन सैयद का कहना है कि वह पहले ही इस्तीफा दे चुकी थीं। उन्होंने कथित तौर पर अल्का लाँबा को केसी वेणुगोपाल की गर्लफ्रेंड करार दिया।

हजीना ने अपने मेल में लिखा है कि नमस्ते सुश्री अलका लांबा, क्या आपमें ज़रा भी अक्ल है? मैंने तो कल ही इस्तीफ़ा दे दिया था। 10 अप्रैल 2026 को दोपहर 1:00 बजे हुई आधिकारिक प्रेस मीट में मैंने इस बात की घोषणा भी कर दी थी। जाइए, अपना अहंकार अपने बॉयफ्रेंड के. सी. वेणुगोपाल को दिखाइए, मुझे नहीं। हजीना ने आगे लिखा है कि ध्यान रहे, आपको मुझे अपमानित करने का कोई अधिकार नहीं है। आप हमारी सदस्यता फ़ीस के पैसों पर ऐश कर रही हैं। क्या इस पार्टी में इतनी हिम्मत है कि वह AIMC के खातों का ऑडिट करवा सके? हजीना सैयद ने यह भी लिखा कि आप आम आदमी पार्टी से कूदकर यहां कांग्रेस को बर्बाद करने आई हैं। इसलिए, अपनी हद में रहिए और चुपचाप बैठी रहिए। वरना मैं आपको ठीक कर दूंगी। हजीना ने सोशल मीडिया एक्स पर अलका लांबा को टैग करके अपना जवाब भी लिखा है।

निष्कासन से पहले इस्तीफे का दावा, आदेश पर उठाए सवाल

ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की अध्यक्ष अल्का लांबा ने शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को एक आधिकारिक पत्र जारी कर हजीना सैयद को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निकालने की घोषणा की। पत्र में कहा गया कि यह निर्णय संगठन की अनुशासन और अखंडता बनाए रखने के लिए लिया गया है।
हालाँकि सैयद ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने उसी दिन दोपहर 1 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में निष्कासन का कोई औचित्य नहीं बनता। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर सीधे अल्का लांबा को टैग करते हुए इस कदम को गलत बताया।

अल्का लांबा पर लगाए गंभीर आरोप, सोशल मीडिया पर निकाली भड़ास

हजीना सैयद ने अपने पोस्ट और ईमेल में आल्का लांबा पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि लांबा महिला कांग्रेस के पदाधिकारियों को सदस्यता के नाम पर परेशान करती हैं और पैसे का दुरुपयोग करती हैं। सैयद ने यहाँ तक कहा कि संगठन के फंड्स का सही ऑडिट नहीं होता और इसका इस्तेमाल निजी विलासिता के लिए किया जा रहा है। यही नहीं, अपने पोस्ट में और अल्का को लिखे मेल में उन्होंने अल्का लाँबा को कथित तौर पर केसी वेणुगोपाल की गर्लफ्रेंड करार दिया है।
उन्होंने अपने ईमेल में यह भी लिखा कि अगर उत्पीड़न बंद नहीं हुआ तो वह लांबा और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज कराएँगी। सैयद का दावा है कि उनके पास गैरकानूनी लेन-देन और सदस्यता घोटाले के सबूत मौजूद हैं। उन्होंने लांबा के पिछले राजनीतिक संबंधों पर भी सवाल उठाए।

इस्तीफा पत्र में भी लगाए आरोप, पार्टी नेतृत्व पर उठाए सवाल

हजीना सैयद ने गुरुवार (9 अप्रैल 2026) को लिखे अपने इस्तीफा पत्र में भी पार्टी नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि उनके साथ अन्याय हुआ है और उनकी गरिमा तथा आत्मसम्मान को ठेस पहुँची है। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का भी जिक्र करते हुए कहा कि उनकी अपील पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सैयद ने तमिलनाडु कांग्रेस अध्यक्ष पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने निजी हितों के चलते उनका विधानसभा टिकट काट दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी में भ्रष्ट व्यवस्था को समर्थन मिल रहा है, जिससे सच्चे कार्यकर्ताओं को नुकसान हो रहा है।

कब हुई थी उनकी नियुक्ति

हजीना सैयद को 21 अप्रैल, 2024 को इस पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने सुधा रामकृष्णन का स्थान लिया, जिन्होंने मयिलादुथुराई निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में आम चुनाव लड़ने के लिए पद छोड़ दिया था। उस समय हजीना को एक सशक्त संगठनात्मक नेता के रूप में जाना जाता था, क्योंकि वे पहले अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव रह चुकी थीं। इन वर्षों में, उन्होंने कांग्रेस के एक प्रमुख चेहरे के रूप में अपनी पहचान बनाई और टेलीविजन बहसों और सार्वजनिक मंचों पर अक्सर पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। पार्टी के विचारों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने और राजनीतिक चर्चाओं में सक्रिय भागीदारी ने उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता दोनों के बीच पहचान दिलाई।

ईरान-अमेरिका की ‘इस्लामाबाद शांति वार्ता’ फेल, शिया मुल्क को धमका US लौटे जेडी वेंस


जैसी अटकलें लगाई जा रही थी ठीक वही हुआ। दरअसल आतंकी पाकिस्तान को पैसा चाहिए था और डोनाल्ड ट्रम्प ने आतंकिस्तान ने नस पकड़ कर बलि का बकरा बना दिया और इस खेल में परदे के पीछे चीन सफल रहा। शांति वार्ता के फेल होने के असार उस समय नज़र आ गयी थी जब पाकिस्तान ने अपनी फौज और टैंक सऊदी अरब भेजने शुरू कर दिए थे। भारत में मोदी विरोधी विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में लगा रहा। आतंकिस्तान मुल्क ने एक डाकिए का काम कर कटोरे में डॉलर ले रहा था। मालूम हो, पाकिस्तान के दोगले रवैये की वजह से कई मुस्लिम देशों ने अपने यहां रह रहे पाकिस्तानियों को मुल्क छोड़ने के बोल दिया है। उनके हर तरह के-गोल्डन वीसा आदि- वीसा रद्द कर दिए हैं।

      

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति को लेकर चली लंबी बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। यह बातचीत 21 घंटे से ज्यादा समय तक चली लेकिन दोनों देशों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका।

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत खत्म होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि इस दौरान कई अहम मुद्दों पर गंभीर चर्चा जरूर हुई। उन्होंने इसे ‘अच्छी बात’ बताया लेकिन साफ किया कि कोई समझौता नहीं हो पाना ‘बुरी खबर’ है।

वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपनी शर्तें और सीमाएँ पहले ही स्पष्ट कर दी थीं और कुछ मुद्दों पर लचीलापन भी दिखाने को तैयार था। इसके बावजूद ईरान ने प्रस्तावित शर्तों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी समझौते के लिए यह जरूरी है कि ईरान यह वादा करे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

बातचीत के बाद वह अपनी टीम के साथ अमेरिका लौट गए। वेंस ने बताया कि ईरान के साथ 21 घंटे तक चली लंबी बातचीत के दौरान वे लगातार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हर पल की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा कि ‘हॉटलाइन’ के जरिए दोनों के बीच दर्जनों बार बातचीत हुई। यानी पूरी बैठक के दौरान अमेरिकी नेतृत्व लगातार संपर्क में था और हर फैसले पर नजर रखी जा रही थी।

वेंस ने कहा, “बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुँच पाए हैं। मेरा मानना है कि यह अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है। हम बिना किसी समझौते के ही अमेरिका लौट रहे हैं क्योंकि उन्होंने हमारी शर्तें मानने से इनकार कर दिया।”

वहीं, ईरान की तरफ से भी इस बातचीत के खत्म होने की पुष्टि की गई है। ईरानी न्यूज एजेंसी ‘तस्नीम’ के अनुसार, अमेरिका की शर्तें जरूरत से ज्यादा सख्त थीं जिस कारण समझौते का रास्ता नहीं निकल सका।

ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया कि हवाले हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर जरूरत से ज्यादा सख्त माँगें कर रहा है। फार्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका बातचीत के जरिए वह हासिल करना चाहता है जो वह 40 दिन चले युद्ध में नहीं कर सका। इसके लिए जहाजों का बीमा, तेल टैंकरों की सुरक्षा और अन्य सैन्य व आर्थिक तरीकों का सहारा लिया जा रहा है। ईरान का कहना है कि हॉर्मुज स्ट्रेट के अलावा भी कई मुद्दों पर अमेरिका की माँगे ईरान के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।

ईरान ने Strait of Hormuz को अपना “आतंकी हथियार” बना लिया, मीडिया इसकी पुरजोर निंदा न करके ईरान को हीरो बना रहा है और ट्रंप की हार बता रहा है

सुभाष चन्द्र

मीडिया का अजीब रवैया है जो “ट्रंप सरेंडर” के गीत गा रहा है लेकिन ईरान द्वारा होर्मुज को अपना “आतंकी हथियार” बना कर हर जहाज से 20 लाख डॉलर की उगाही बनाने पर भी उसकी निंदा न करके ईरान को “हीरो” बना रहा है। इस विषय पर मीडिया में कोई चर्चा हो ही नहीं रही

आज की मीडिया ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाली बात को ही झुठला दिया है। विज्ञापन का लालच दो जो चाहे प्रसारित करवा लो। ईरान हो, लेबनान हो या गाज़ा यहां आतंकियों के ठिकानों पर हमले हो रहे हैं आम नागरिकों पर नहीं। इन हमलों में बेकसूरों के मरने का कारण है आतंकियों द्वारा स्कूलों, कॉलेज, हॉस्पिटल और मॉल्स में अपने ठिकाने बनाना। जब इन जगहों पर आतंकवादी ठिकानों पर हमला होने पर बेकसूरों का भी मरना स्वाभाविक है। कोई मीडिया यह नहीं कहता कि यहाँ की सरकारों ने इन भीड़भाड़ वाले स्थानों पर आतंकवादियों को अपने ठिकानों क्यों बनाने दिए?

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अभी एक आतंकी मुल्क पाकिस्तान में आतंकवाद समर्थक मुल्कों द्वारा शांति वार्ता शांति के नाम पर कलंक है। खैर बातचीत फेल हो गयी है जैसी उम्मीद की जा रही थी। आतंकी मुल्क पाकिस्तान ने यह खेल डॉलर लेने के लालच में लिया था और किसी शांति के लिए नहीं।    

Strait of Hormuz के बारे वास्तविक स्थिति क्या है, यह समझने की आवश्यकता है 

ईरान Strait of Hormuz (जलडमरूमध्य) का मालिक नहीं है, लेकिन वह इस जलडमरूमध्य पर ओमान के साथ साझा नियंत्रण रखता है लगभग 21 मील चौड़ा यह संकरा मार्ग एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग है, जहाँ ईरान उत्तरी तट रेखा को नियंत्रित करता है और भू-राजनीतिक तनाव के समय अक्सर वास्तविक (de facto) संचालनात्मक नियंत्रण का प्रयोग करता है, जो अपने आप में एक आतंकवाद बन चुका है

साझा अधिकार (Shared Ownership):

यह जलडमरूमध्य ईरान और Oman दोनों के क्षेत्रीय जलक्षेत्र में आता है

भौगोलिक नियंत्रण (Geographical Control):

ईरान उत्तरी तट और जलडमरूमध्य के कुछ द्वीपों को नियंत्रित करता है, हालांकि सभी द्वीप उसके नियंत्रण में नहीं हैं

रणनीतिक महत्व (Strategic Importance):

यह विश्व का एक प्रमुख ऊर्जा मार्ग (चोकपॉइंट) है, जहाँ से लगभग 20% वैश्विक तेल और एलएनजी (LNG) का परिवहन होता है, लेकिन यह तकनीकी रूप से केवल ईरान का जलक्षेत्र नहीं है लेकिन ईरान ने उस पर जबरन कब्ज़ा किया हुआ है 

वर्तमान स्थिति (2026):

ईरान ने एक प्रकार की “टोल बूथ” व्यवस्था स्थापित की है, जिसमें जहाजों को गुजरने के लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती है, विशेषकर 2026 के ईरान युद्ध के बाद

ईरान अपनी भौगोलिक स्थिति और सैन्य उपस्थिति के कारण इस जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर मजबूत प्रभाव रखता है, लेकिन इसका उस पर पूर्ण स्वामित्व नहीं है

Strait of Hormuz किसी एक देश की संपत्ति नहीं है, यह एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है।

ईरान को इसे पूरी तरह बंद करने का कानूनी अधिकार नहीं है, फिर भी वह अपनी ताकत के बल पर जहाजों को रोकने और नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है

इस जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है और कई जहाज फंसे हुए हैं लेकिन EU, ब्रिटेन और NATO देश इस पर ट्रंप का साथ नहीं देना चाहते फिर भुगतेंगे हर जहाज पर 20 लाख डॉलर का टोल

दूसरी ओर, Donald Trump ईरान को बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि वह इस मार्ग को खोले- उल्टा ईरान युद्ध जारी रखने के बहाने बना रहा है, जैसे आज पाकिस्तान में होने वाली कथित वार्ता से पहले उसने शर्त रख दी कि लेबनान पर हमले बंद किए जाएं और लेबनान को भी ceasefire में शामिल किया जाये जबकि ये दोनों शर्तें बेबुनियाद हैं क्योंकि ईरान ने तो स्वयं इज़रायल को ceasefire से अलग कर दिया था 

मेरा फिर यही  सवाल यह है:

मीडिया बार-बार “Trump Surrenders” का ढोल क्यों पीट रहा है,

जबकि ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग पर दबाव और “टोल” जैसी आतंकित करने वाली कार्रवाई पर उतनी चर्चा क्यों नहीं हो रही?

Oman भी इस जलमार्ग का हिस्सा नियंत्रित करता है, लेकिन वह टकराव से बचते हुए तटस्थ भूमिका निभा रहा है।

👉 सच्चाई यही है:

 कानून के अनुसार Hormuz खुला रहना चाहिए,

 लेकिन जमीनी हकीकत में ताकत का खेल खेल कर ईरान दुनिया भर के लिए ऊर्जा संकट पैदा कर रहा है इसकी गंभीर निंदा होनी चाहिए और ईरान पर दबाव बढ़ाना चाहिए

तरुण हत्याकांड में नहीं मिली 2 मुस्लिम नाबालिगों को बेल, कोर्ट ने खारिज की याचिका


दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हुई तरुण भुटोलिया की हत्या के मामले में कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने इस मामले में शामिल दो नाबालिग आरोपितों की जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इनकी रिहाई से इलाके की शांति भंग हो सकती है और न्याय की प्रक्रिया में बाधा आ सकती है।

कश्मीर से लेकर अब तक हुई पत्थरबाज़ी में एक बात खासतौर पर देखने को मिलती है कि बच्चे और महिलाएं आगे होती है ताकि उनको नासमझ मासूम आदि कहकर अपनी करतूत पर पर्दा डाल दिया जाए। अभी रामलीला ग्राउंड दिल्ली में अवैध निर्माण हटाने गए सरकारी कर्मचारियों पर की गयी पत्थरबाज़ी को बाहरी लोगों द्वारा क्षेत्र का माहौल बिगड़ने की बातों से गुमराह किया गया लेकिन गिरफ्तार हुए सभी स्थानीय कोई बाहरी नहीं। 

द्वारका स्थित बोर्ड ने 8 अप्रैल 2026 को अपने आदेश में कहा कि उत्तम नगर में अभी भी सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है। ऐसे ‘संवेदनशील’ माहौल में आरोपितों को रिहा करना खतरनाक हो सकता है।

कोर्ट ने साफ किया कि मामले की जाँच अभी शुरुआती दौर में है, कई आरोपित फरार हैं और कुछ अहम सबूत मिलने बाकी हैं। ऐसे में बाहर आने पर आरोपित जाँच को प्रभावित कर सकते हैं।

यह दुखद घटना 4 मार्च 2026 यानी होली के दिन हुई थी। विवाद तब शुरू हुआ जब तरुण के परिवार की एक बच्ची ने छत से गुब्बारा फेंका, जिसका पानी नीचे खड़ी एक पड़ोसी महिला पर गिर गया।

हिंदू परिवार ने तुरंत माफी भी माँगी, लेकिन मुस्लिम महिला के पक्ष ने करीब 15-20 लोगों को बुला लिया। जब हिंदू युवक तरुण बाइक से घर लौट रहा था, तब इस्लामी भीड़ ने उसे घेर लिया।

हमलावरों ने लोहे की रॉड, ईंट और पत्थरों से तरुण को बेरहमी से पीटा। परिजनों के मुताबिक, जब तरुण सड़क पर गिर गया, तब उसके सीने पर भारी पत्थर से वार किया गया। अस्पताल में इलाज के दौरान तरुण की मौत हो गई।

बच्चों की तस्वीरें, गुलाब और मृतकों के जूते…. मिनाब में मारे गए स्कूली छात्रों की यादें लेकर पाकिस्तान पहुँचा ईरानी दल

                  मृतक बच्चों की तस्वीरें लेकर पाकिस्तान पहुँचे ईरानी दल (साभार : X_ @mb_ghalibaf)
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए शनिवार (11 अप्रैल 2026) को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता होगी। इस बैठक के लिए ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) देर रात पाकिस्तान पहुँचे। जेडी वेंस भी अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद पहुँच चुके हैं।

ईरानी स्पीकर गालिबाफ ने इस्लामाबाद पहुँचते ही सोशल मीडिया पर एक भावुक तस्वीर शेयर की। गालिबाफ ने ‘मिनाब-168’ लिखकर दुनिया को उस जख्म की याद दिलाई, जब 28 फरवरी को एक स्कूल पर हुए हमले में 168 बच्चों और स्टाफ की मौत हो गई थी।

पाकिस्तानी आतंकियों की तरह हमास, हिजबुल और अन्य आतंकवादी संगठन अलग से अपना कोई ठिकाना बनाने की बजाए स्कूलों, कॉलेज, हॉस्पिटल और मॉल आदि में ही अपना ठिकाना बनाते हैं ताकि उन पर होने वाले हमलों में छात्र, मरीज और आम नागरिकों के मरने पर उनको मोहरा बनाकर victim card खेल सहानुभूति बटोरी जा जाके। और यही सीख ईरान की दी हुई है। इसका नमूना भारत में भी देखने को मिलता है। कश्मीर में होती पत्थरबाज़ी में बच्चों और महिलाओं को आगे रखना और वैसे भी जहां-जहां दंगे होते हैं वहां बच्चे और महिलाओं को ही आगे रखा जाता है। शंका है मृतक बच्चों की तस्वीरों और जूतों का बातचीत पर कोई असर पड़ने वाला है। 

सरकारों को आतंकी संगठनों द्वारा स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और मॉल में बने आतंकी ठिकानों को बंद करना होगा अन्यथा बेकसूर अकाल मौत मरते रहेंगे।       

ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जान-बूझकर स्कूल को निशाना बनाया, जबकि अमेरिका इसे मिलिट्री बेस पर किया गया हमला बताता है। ईरान ने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में भी उठाया है और हमले के जिम्मेदार अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

‘ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं’

इस्लामाबाद पहुँचने के बाद गालिबाफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे शांति के लिए ‘अच्छी नीयत’ के साथ आए हैं, लेकिन उन्हें अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। उन्होंने पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका ने हमेशा समझौतों का उल्लंघन किया है। गालिबाफ के साथ इस डेलिगेशन में विदेश मंत्री और रक्षा परिषद के सचिव जैसे कई बड़े अधिकारी शामिल हैं, जो आज अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टीम के साथ आमने-सामने बैठेंगे।

शांति वार्ता से पहले ट्रंप की युद्ध वाली चेतावनी: ‘बात बनी तो ठीक, नहीं तो अंजाम बुरा होगा’: ईरान बोला- शर्तें मानने पर ही होगी बातचीत शुरू

                           ट्रंप-ईरान के बीच शांति वार्ता होगी पाकिस्तान में (साभार : Aajtak, Jagran)
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार (11 अप्रैल 2026) को अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता होने जा रही है। इस महा-बैठक से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी दी है कि वह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (समुद्री रास्ता) को तुरंत खोल दे, वरना अंजाम बुरा होगा।

ट्रंप ने साफ कहा कि ईरान जंग हार चुका है और अब यह बातचीत ही उसका आखिरी मौका है। दूसरी तरफ, ईरान का प्रतिनिधिमंडल भी अपनी कड़ी शर्तों के साथ इस्लामाबाद पहुँच चुका है।

ईरान की अपनी शर्तें और अमेरिका का कड़ा रुख

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गलिबाफ एक भारी-भरकम डेलीगेशन के साथ शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को ही इस्लामाबाद पहुँच गए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि बातचीत तभी शुरू होगी जब अमेरिका उनकी शर्तें मानेगा।

ईरान की मुख्य माँगों में लेबनान में तुरंत युद्धविराम और अमेरिका द्वारा फ्रीज किए गए अरबों डॉलर के फंड को जारी करना शामिल है। गलिबाफ ने कहा कि ईरान बातचीत तो चाहता है लेकिन उसे अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है।

ट्रंप की युद्ध वाली चेतावनी

उधर, अमेरिका के तेवर और भी तीखे हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरानी केवल समुद्री रास्तों को रोककर दुनिया को डराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में यहाँ तक कह दिया कि अमेरिकी युद्धपोतों को नए और घातक हथियारों से लैस कर दिया गया है।

अगर शनिवार (11 अप्रैल 2026) की बातचीत फेल होती है, तो अमेरिका ईरान पर हमला करने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने साफ कर दिया कि वह समुद्री रास्ते (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में ईरान को कोई ‘टोल टैक्स’ वसूलने नहीं देंगे।

पाकिस्तान के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति

इस बातचीत की मेजबानी कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे ‘मेक-ऑर-ब्रेक’ (बनी तो बनी, नहीं तो बिगड़ी) वाली स्थिति बताया है। उन्होंने कहा कि पूरे मिडिल ईस्ट की शांति इसी बैठक पर टिकी है। पाकिस्तान चाहता है कि दोनों देश मिलकर किसी ठोस नतीजे पर पहुँचें ताकि लंबे समय से चल रहा तनाव खत्म हो सके।
इस चर्चा के लिए दोनों तरफ से दिग्गज नेता मैदान में उतर चुके हैं। ईरान की ओर से इस वार्ता का मोर्चा विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गलिबाफ संभाल रहे हैं, जिनके साथ ईरान के सेंट्रल बैंक के गवर्नर और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी शामिल हैं।
वहीं, अमेरिका की तरफ से टीम की अगुवाई खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, और उनके साथ डोनाल्ड ट्रंप के भरोसेमंद जारेड कुशनर और अनुभवी सैन्य रणनीतिकार वाइस एडमिरल ब्रैड कूपर मौजूद हैं।
चूँकि पाकिस्तान इस पूरी बातचीत की मेजबानी कर रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार भी इस महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा बने रहेंगे।

क्या होगा आगे?

जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या शनिवार (11 अप्रैल 2026) के बाद भी बातचीत का दौर चलेगा, तो उन्होंने सस्पेंस बनाए रखा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारें 47 साल से सिर्फ बातें कर रही थीं, अब फैसला जल्द होगा।

अमेरिका का मुख्य मकसद यह है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बना पाए और अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर कब्जा न करे। अब सबकी निगाहें शनिवार की टेबल टॉक पर हैं कि क्या दुनिया को युद्ध से राहत मिलेगी या तनाव और बढ़ेगा।

‘उन्हें सिर्फ बातचीत के लिए जिंदा छोड़ा है’: शांति वार्ता से पहले ट्रंप की ईरान को धमकी, कहा- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टोल वसूलना बंद करे


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर अपनी मनमानी बंद करे। ट्रंप ने साफ कर दिया कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से गुजरने वाले जहाजों पर कोई टैक्स या टोल (पारगमन शुल्क) वसूलने की इजाजत नहीं देगा।

ट्रंप ने तेहरान की इस कोशिश को ‘दुनिया से जबरदस्ती वसूली‘ करार दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ट्रंप ने तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा कि ईरान के पास अब कोई मजबूत दाँव नहीं बचा है।

ट्रंप ने यहाँ तक कह दिया कि आज ईरान अगर सुरक्षित है, तो उसकी एकमात्र वजह यह है कि अमेरिका ने बातचीत के लिए दरवाजे खुले रखे हैं। ट्रंप के मुताबिक, ईरान अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल दुनिया को डराने और अपनी सौदेबाजी करने के लिए कर रहा है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

पाकिस्तान को गाज़ा बना देगा इज़रायल; ख्वाजा आसिफ ने अपने हाथ से पाकिस्तान की बर्बादी लिख दी

सुभाष चन्द्र

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इज़रायल को कैंसर बताते हुए लिखा -

““Israel is evil and a curse for humanity, while peace talks are underway in Islamabad, genocide is being committeed in Lebanon. Innocent citizens are being killed by Israel, first Gaza, then Iran and now Lebanon, bloodshedding continues unabated. I hope and pray people who created this cancerous state on Palestinian land to get rid of European jews burn in hell”.

ख्वाजा भूल गए कि वो इज़रायल है तुम्हारी बकवास और धमकी सहन नहीं करेगा ख्वाजा ने पाकिस्तान की बर्बादी अपने हाथों से लिख दी “कैंसर है इज़रायल, इंसानियत के लिए अभिशाप है, जहन्नुम में जले” लिखने की सलाह किसने दी? आज फिलिस्तीन की चिंता करने वाला ख्वाजा भूल गया कि 1970 में जिया उल हक़ ने 25 हजार फिलिस्तीनी मरवा दिए थे। इतना ही नहीं अभी 2/3 साल पहले ही पाकिस्तान की फौज को किराये पर लेकर जकार्ता में 1 लाख फिलिस्तीनियों को पाकिस्तान ने ही 72 हूरों के पास पहुंचाया था।   

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इतना डरपोक है ख्वाजा कि जब इज़रायल ने प्रतिक्रिया दी तो तुरंत X से अपनी पोस्ट डिलीट कर दी। इज़रायल ने साफतौर पर पाकिस्तान को आतंकी देश कह दिया और नेतन्याहू ने यहां तक कहा कि अमेरिका करता होगा तुम पर विश्वास, हमें भरोसा नहीं है किसी देश की सरकार से इस तरह की भाषा बर्दाश्त नहीं की जा सकती, खासकर उस देश से जो शांति के लिए बिचौलिया बनने का दावा करता हो 

भारत में इज़रायल के राजदूत रुबेन अज़ार ने कहा - “हम पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करते, क्योंकि वह आतंकियों को पालता-पोषता है आतंकवाद को बढ़ावा देता है हम किसी भी विपरीत स्तिथि से निपटने के लिए अपने अमेरिकी मित्रों पर भरोसा करते हैं” लेकिन पाकिस्तान गिड़गिड़ाएगा फिर भी अमेरिका के सामने ही जो शायद इज़रायल को सामने देख कर कोई मदद न करे

कुछ दिन पहले नेतन्याहू का बयान था कि हमारा अगला टारगेट पाकिस्तान होगा शायद ऐसा इसलिए कहा होगा कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम हैं और ईरान बनाने की फ़िराक़ में है और दोनों के परमाणु बम इज़रायल के लिए पहले होंगे वैसे पाकिस्तान भारत के मुंबई और दिल्ली पर एटम बम मारने की धमकी दे रहा है जबकि उसे पता नहीं कि पहले तो वो ऐसा कर नहीं पाएगा और अगर हिम्मत की भी तो अगले पल दुनिया से गायब नज़र आएगा

पाकिस्तान को इस्लामिक मुल्कों से जो मदद मिलती रही है, वह अब ईरान युद्ध के चलते खतरे में आ जाएगी UAE ने 3.5 बिलियन डॉलर मांग लिए हैं, सऊदी अरब ने 6 बिलियन डॉलर की मांग की है और पाकिस्तान को पालने वाले चीन ने भी 2000 करोड़ रुपए की मांग कर दी है

ईरान की चापलूसी में इज़रायल से तो दुश्मनी मोल ले ही ली है (जो पहले से थी) लेकिन अब वो सारे इस्लामिक मुल्क भी पाकिस्तान को घास डालना बंद कर देंगे जिन पर ईरान ने हमले किये हैं

पाकिस्तानियों में डर देखने लायक है, उसके एक सांसद मुशाहिद हुसैन सईद ने UAE के पैसा वापस मांगने पर उसे सलाह दी है भारत से संबंध इतने मत बढ़ाओ कि अखंड भारत का हिस्सा बन जाओ उसने कहा UAE के एक करोड़ लोगों में 43 लाख भारतीय हैं 

पहले ही पाकिस्तान बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बना जा रहा था और अब पूरे इस्लामिक वर्ल्ड में और अकेला पड़ जाएगा ख्वाजा ने इज़रायल के लिए जहन्नुम में जलने की मन्नत की है, लेकिन पाकिस्तान का अल्लाह पाकिस्तान को इज़रायल के हाथों जहन्नुम बनने से बचाए

आम दिनों में करो महिलाओं का अपमान, चुनावों के वक्त चिल्लाओ ‘नारीवाद’: कांग्रेसी नेताओं की दोगलई फिर उजागर, फेक वीडियो देख उड़ाया पत्रकार का मजाक

                                                                                        साभार: एक्स @NayakRagini, @chitraaum
कांग्रेस पार्टी जिसका नारा रहा है-‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’, लेकिन उसने कभी लड़कियों, महिलाओं की इज्जत को समाज में उछालने में कोई शर्म नहीं की है। पार्टी के नेता कभी सोशल मीडिया पर तो कभी किसी इंटरव्यू में नारी को मजाक का केंद्र बनाते रहे हैं। अब कांग्रेस नेत्री डॉक्टर रागिनी नायक ने भी इसी नीचता में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की है।

रागिनी नायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आज तक की एंकर और पत्रकार चित्रा त्रिपाठी का एक वीडियो शेयर करते हुए ना सिर्फ उनका अपमान किया है, बल्कि सच्चाई सामने आने के बावजूद अपने पोस्ट को डिलीट नहीं किया है। आईए जानते हैं कि वीडियो में क्या है और कैसे कांग्रेस पार्टी का इतिहास ही हमेशा महिलाओं के अपमान का रहा है।

इस फेक वीडियो में कथित तौर पर चित्रा कहती दिखती हैं, “बलूचिस्तान को देखिए, खैबर पख्तूनख्वा को देखिए।” इस पर पाकिस्तानी कहता है, “चित्रा जी बलूचिस्तान को देखने के लिए जनरल आसिफ मुनीर काफी हैं, मैं तो सिर्फ आपको ही देखूँगा आज, अगर मेरी नजरें आपसे हटी तो 50 किलो मेकअप, जो आप अपने चेहरे पर थोप के आई हैं उसका क्या फायदा?”

इस पर चित्रा कहती हैं, “मेकअप पर टिप्पणी मत करिए, आपके पाकिस्तान में भी खातूने करती हैं मेकअप।” तो वह कहता है, “बिल्कुल पाकिस्तानी औरतें मेकअप करती हैं, मगर अपने खर्चे से, आपके मेकअप का खर्चा तो मोदी जी का है ना।”

वीडियो के साथ रागिनी नायक ने लिखा, “चित्रा – मेरे Makeup पर टिप्पणी मत करिए..पाकिस्तानी खातूनें भी Makeup करती हैं। Pak पैनलिस्ट- बिल्कुल, पाकिस्तानी औरतें Makeup करती हैं, पर अपने खर्चे से..आपके Makeup का खर्चा मोदी जी का है ना। पाकिस्तानियों को शो पर बुला कर, उनके हाथों यूँ जलील होने की क्या मजबूरी है भला???”

अगले ही ट्वीट में रागिनी नायक ने लिखा, “अब चित्रा कह रही हैं कि ये Video Fake है! चलिए अच्छा है! ऐसी बेइज्जती तो भगवान दुश्मन की भी ना कराए!” सोचने वाली बात है कि अगर चित्रा ने ये पुष्टि कर दी है कि वीडियो फेक है और रागिनी यह मान भी रहीं है तो भी अपना पोस्ट हटाया क्यों नहीं।

दरअसल उनका असल मुद्दा तो केवल एक महिला का मजाक उड़ाना था, बेइज्जती करना था। वो भी तब, जब बेइज्जती कर रहा व्यक्ति पाकिस्तान जैसे आतंकी देश का हो। साफ समझा जा सकता है कि नारीवाद के नाम पर चिल्लाने वाली इस पार्टी की नेताओं की मानसिकता क्या है।

इन्होंने ये बातें एक फर्जी वीडियो पर बोली हैं। यानी इन्हें प्रमाणिकता से लेना-देना नहीं होता, पाकिस्तान ही अगर इनके मतलब की बात कर देगा तो ये उसे कोट करके भारतीयों का मजाक उड़ा लेंगे।

रागिनी के साथ अलका लांबा को भी चित्रा त्रिपाठी ने दी नसीहत

कांग्रेस नेत्री लका लांबा ने भी X पर वहीं वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “चित्रा की क्या मजबूरी होगी जो पाकिस्तान के लोगों को अपने चैनल/शो में बुला कर चर्चा करवाने की? और यूँ उनके हाथों जलील होने की ??” अलका लांबा की पोस्ट पर जवाब देते हुए चित्रा ने लिखा, “अलका लांबा जी पाकिस्तान का यूट्यूबर अपने व्यूज बढ़ाने के लिये मेरे वीडियो में काँट छाँट करके फेक न्यूज तैयार करता है। आजतक कभी भी ये व्यक्ति मेरे शो का हिस्सा नहीं रहा।”

चित्रा ने आगे लिखा, “हैरानी होती हूँ जब कांग्रेस के बड़े पद पर बैठी महिला एक न्यूज एंकर के पीछे पड़ जाये, आप लगातार मेरे उपर टिप्पणी करती हैं और मैं इग्नोर करती हूँ। मगर मैडम पाकिस्तानी फेक न्यूज के एजेंडे में मत पड़ें। पाकिस्तान से आपकी मोहब्बत आपका ही नुकसान करेगी।”

मंडी में रं&… रेट सही मिलता है’: कॉन्ग्रेसियों ने कंगना रनौत पर की थी अभद्र टिप्पणी

भाजपा की ओर से हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से अभिनेत्री कंगना रनौत को टिकट मिलने के बाद उनके खिलाफ भी अभद्र टिप्पणियों की बाढ़ आ गई थी। टिप्पणी करने वालों में कांग्रेस के पदाधिकारी और इस्लामी नामों वाले अकाउंट थे।

खुद को नारीवादी और पत्रकार बताने वाली मृणाल पांडे ने एक्स पर लिखा, “शायद यूँ कि मंडी में सही रेट मिलता है?” हालाँकि चौतरफा छीछालेदर के बाद कांग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की संपादक मृणाल पांडे ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

कांग्रेस की ही राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के अकाउंट से लिखा गया, “क्या भाव चल रहा है मंडी में कोई बताएगा?” यह पोस्ट भी श्रीनेत के अकाउंट से हटा दिया गया है। इस पर सुप्रिया श्रीनेत ने सफाई दी है कि उनके फेसबुक और इन्स्टाग्राम अकाउंट को किसी और का भी एक्सेस था और उसने यह पोस्ट की। उन्होंने कहा है कि वह ऐसा पोस्ट कभी नहीं करती।

सबसे घटिया बात कि कंगना का विरोध करने वालों ने भाषाई स्तर की बिलकुल भी परवाह नहीं की। एक और ट्विटर यूजर ने कंगना की एक फोटो के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

‘भगवा रंग की ब्रा पहन भक्तों को जवाब दें’: पठान के बचाव में कॉन्ग्रेसी उदित राज का बयान

बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान की फिल्म पठान (Pathaan) में ‘भगवा रंग’ के गाने को लेकर काफी विवाद हुआ था। इस बीच कांग्रेस के नेता उदित राज (Udit Raj) ने नारीवादियों से भगवा रंग की बिकनी और ब्रा पहनने की सलाह दी थी। इसको लेकर वो सोशल मीडिया यूजर के निशाने पर भी आ गए थे।

अक्सर विवादों में रहने वाले भाजपा के पूर्व नेता और वर्तमान में कांग्रेस पार्टी में शामिल उदित राज ने अपने ट्वीट में लिखा था, “स्त्रीवादियों से मेरी सलाह है बिकनी और ब्रा आदि भगवा रंग का ही पहनकर इन भक्तों को जवाब दें।” सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा कि इसकी शुरुआत उन्हें अपने घर से करनी चाहिए।

वहीं कुछ यूजर ने उन्हें मानसिक रूप से बीमार बताया है। एक अन्य यूजर ने लिखा, “जरा अपनी पार्टी के सबसे बड़े लीडर तक यह जवाब पहुँचा तो दो। यह जानबूझकर खाली सुनवाने के लिए यह ट्वीट किया गया लगता है। कसम खा लिए हो जबतक राहुल गांँधी को कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष नहीं बना देते ऐसे ही passive mode में गाली सुनवाते रहेंगे।”

अपनी असली मानसिकता स्वीकारो: नारीवाद को लेकर ढोंग क्यों?

देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी को किसी भी महिला की इज्जत से कोई खास फर्क पड़ता नहीं है, तो फिर सवाल ये है कि नारीवाद-नारीवाद चिल्लाने की जरुरत क्या है? ये वहीं पार्टी है, जिसने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवगंत माँ को भी नहीं छोड़ा था। पार्टी अपने फायदे के लिए किसी को भी निशाना बना सकती है, चाहे आधार ही झूठा क्यों ना निकल जाए।

जिस पार्टी में देश की आधी आबादी की भी इज्जत ना हो, वह पार्टी, ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ जैसे नारे देकर ऐसे झूठे दिखावे करती है। सब छोड़िए पार्टी की महिला नेत्री भी खुद महिला होकर जब एक महिला की सरेआम बेइज्जती कर सकती हैं, तो फिर पार्टी के अन्य नेताओं से तो महिलाओं की इज्जत की क्या ही उम्मीद करना।

'22 दिन में मार दूँगा PM मोदी को’: प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वाला अमन बक्सर से गिरफ्तार, पूछताछ में बताया- विदेश से मिला था काम


आरएसएस प्रचारक से लेकर गुजरात मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री से भारत के प्रधानमंत्री बनने बाद भी नरेंद्र मोदी के जानी दुश्मनों में कोई कमी नहीं आयी। लेकिन देवी-देवताओं का सुरक्षा कवच सभी के होंसले पस्त कर रहा है। काम को अंजाम देने से पहले ही कानून के हत्ते चढ़ जाता है।  

बिहार के बक्सर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक खतरनाक साजिश का खुलासा हुआ। खुफिया एजेंसियों की सूचना पर पुलिस ने छापेमारी कर एक युवक अमन तिवारी को गिरफ्तार किया है।

आरोपित अमन तिवारी कथित तौर पर PM मोदी को नुकसान पहुँचाने की योजना बना रहा था। पुलिस इस मामले में विदेशी कनेक्शन की भी जाँच कर रही है। उसने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को ईमेल भेजकर भारी रकम की माँग की थी।

आरोपित अमन तिवारी ने दावा किया था कि वह 22 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी साजिश को अंजाम दे सकता है। कार्रवाई में युवक के पास से मोबाइल, लैपटॉप और कई डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वह किन-किन लोगों के संपर्क में था। बरामद किए गए सभी उपकरणों को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया गया है। मुख्य आरोपित अमन तिवारी से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने दो और लोगों को हिरासत में लिया है।

इन सभी के बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन को खंगाला जा रहा है। पुलिस यह सुनिश्चित करना चाहती है कि इस नेटवर्क के पीछे कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन तो नहीं है। फिलहाल मामले की गहराई से जांच जारी है।

‘कैंसर है इजरायल, जहन्नुम में जले’: पाकिस्तान रक्षा मंत्री की भाषा सुन भड़के नेतन्याहू, बोले- अमेरिका करता होगा तुम पर विश्वास, हमें भरोसा नहीं

                 ख्वाजा आसिफ के बिगड़े बोल पर इजरायली PM नेतन्याहू ने लताड़ा (फोटो साभार : NDTV)
इजरायल और पाकिस्तान के बीच कड़वाहट काफी बढ़ गई है। विवाद तब शुरू हुआ जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल को इंसानियत के लिए ‘अभिशाप’ और ‘कैंसर’ कह दिया। इस पर पलटवार करते हुए इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दफ्तर ने कड़ा बयान जारी किया है। नेतन्याहू ने कहा कि किसी देश की सरकार से इस तरह की भाषा बर्दाश्त नहीं की जा सकती, खासकर उस देश से जो शांति के लिए बिचौलिया बनने का दावा करता हो। बता दें कि पहली बार इजरायल ने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान को एक ‘आतंकवादी देश’ करार दिया है।
इजराइल से फटकार पड़ते ही डरपोक आसिफ ने पोस्ट डिलीट कर दिया। आखिर पाकिस्तान कितना नीचे गिरेगा? इजराइल द्वारा पाकिस्तान को 'आतंकी देश' घोषित करना बहुत बड़ी बात है। जो पाकिस्तान को बर्बादी की ओर धकेल देगा। इसमें कोई शक भी नहीं आतंकियों की पनाहगार बने पाकिस्तान को मुस्लिम मुल्कों से इसी बात की ही ज़कात मिलती है। और उस ज़कात पर पाकिस्तान हुक्मरान आवाम को पागल बनाकर ऐश करते हैं। विदेशों में बैंक खातों में धन जमा कर पाकिस्तान को भुखमरी में डाल रखा है। 
   

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने क्या कहा था?

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सोशल मीडिया पर एक विवादित पोस्ट डाला था। ख्वाजा आसिफ ने इजरायल को ‘बुराई’ और ‘इंसानियत के लिए श्राप’ बताया। ख्वाजा आसिफ ने लिखा कि जब इस्लामाबाद में शांति की बातें हो रही हैं, तब इजरायल लेबनान में नरसंहार कर रहा है।

ख्वाजा आसिफ ने आगे कहा कि पहले गाजा, फिर ईरान और अब लेबनान में मासूमों का खून बहाया जा रहा है। उन्होंने इजरायल को एक ‘कैंसर वाला देश’ बताते हुए ‘वे नरक में जलें’ जैसे विवादित शब्दों का इस्तेमाल किया।

नेतन्याहू का जवाब, पाकिस्तान पर भरोसा नहीं

पाक रक्षा मंत्री के इस बयान के बाद इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को मोर्चा संभाला। इजरायल की ओर से कहा गया कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा इजरायल को मिटाने की बात करना बेहद अपमानजनक है। इजरायल ने पाकिस्तान की साख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो देश खुद को शांति का दूत बताता हो, उसके मुँह से ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं।

इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह शांति वार्ता में पाकिस्तान को एक भरोसेमंद खिलाड़ी नहीं मानता। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा कि अमेरिका भले ही अपने कारणों से पाकिस्तान की मदद ले रहा हो, लेकिन इजरायल पाकिस्तान को क्रेडिबल (भरोसेमंद) नहीं मानता। उन्होंने इसकी तुलना कतर और तुर्की जैसे देशों से की, जिन्हें इजरायल समस्या पैदा करने वाला मानता है। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि वह केवल अमेरिका के साथ तालमेल बिठाकर ही आगे बढ़ना चाहता है।

मीडिया का “सुपर पावर” ईरान अब कर रहा त्राहिमाम त्राहिमाम, लेबनान में उसका प्रॉक्सी हिज़्बुल्लाह इज़रायल पर हमले करेगा और इज़रायल चुप रहे कैसे हो सकता है; इज़रायल को ईरान ने ही Ceasefire से अलग रखा था

सुभाष चन्द्र

पिछले कई सप्ताह से हमारे मीडिया ने ईरान को ऐसा हीरो बनाया हुआ था कि जैसे अमेरिका की “सुपर पावर” की गद्दी ईरान ने छीन ली हो और कल से नारा लगा रहा है मीडिया “ट्रंप सरेंडर” जिस ईरान की करेंसी एक करोड़ रियाल हमारे 713 रुपए के बराबर है वो सुपर पावर हो गया। 

वैसे देखा जाए तो हमारे मीडिया में और मुस्लिम कट्टरपंथियों कर इन कट्टरपंथियों के आकाओं में कोई फर्क नहीं। दोनों ही सिक्के के एक पहलु हैं। जब भी कहीं कोई दंगा होता है तो दंगाइयों को पीड़ित बताते हुए victim card खेल दंगाइयों का बचाव करने खड़े हो जाते हैं ठीक वही स्थिति अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध में देखने को मिली। गाज़ा पर इजराइल द्वारा हमला करने पर सभी ने इजराइल को दोषी बताते रहे, लेकिन किसी मीडिया ने यह नहीं बताया कि इजराइल पर पहला हमला आतंकी संगठन हमास ने किया था। दूसरे, खोमैनी ने क्यों कहा कि यहूदियों और इजराइल को नक़्शे से मिटा दूंगा। तीसरे, मीडिया ईरान को बब्बर शेर दिखाने इजराइल, गल्फ देशों और अमेरिका में भेजने की हिम्मत कर सकता है लेकिन ईरान में नहीं, क्यों? कोई भारतीय या विदेशी मीडिया इसका जवाब देगा।        

कैसी कैसी कहानी गढ़ी हमारे मीडिया ने, कुछ मत पूछो हल्ला मचाया कि ईरान ने डिएगो गार्सिया पर मिसाइल दाग दी लेकिन ये नहीं बताया वो मिसाइल गई कहां डिएगो गार्सिया से ईरान की दूरी लगभग 4000 किमी है जबकि तेहरान सार्वजनिक रूप से दावा करता है कि उसकी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता 2000 किमी तक सीमित है लेकिन फिर भी शोर मचा दिया कि जैसे डिएगो गार्सिया को खत्म कर दिया हो

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अप्रैल 9 की सुबह से ईरान दर्द से कराह रहा है कि लेबनान पर इज़रायल हमले का युद्ध विराम का उल्लंघन कर रहा है विदेश मंत्री अराघची ने कहा है कि -

ईरान -US युद्ध विराम की शर्तें स्पष्ट हैं -

अमेरिका को चुनना है युद्ध या ceasefire

सीजफायर और युद्ध एक साथ संभव नहीं 

दुनिया लेबनान में नरसंहार को देख रही है

आज ईरान Ceasefire याद करा रहा है जबकि ईरान ने Ceasefire होते ही कहा था इज़रायल के लिए यह Ceasefire नहीं होगा। ईरान ने Ceasefire होते ही कुवैत, सऊदी और बहरीन पर हमले किये थे जैसे उसे युद्ध विराम चाहिए ही नहीं था

जब ईरान ने इज़रायल को खुद ही उससे अलग कर दिया तो अब लेबनान को उसमे शामिल करने के लिए कैसे कह सकता है ईरान चाहता है लेबनान से उसका प्रॉक्सी हिजबुल्लाह इज़रायल पर हमले करता रहे लेकिन इज़रायल चुप रहे बड़ी अजीब बात है ईरान लेबनान को Ceasefire में शामिल करना चाहता है लेकिन इज़रायल को नहीं

अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने साफ़ किया है लेबनान Ceasefire में शामिल नहीं था। ईरान को समझने में गलती हुई, ईरान समझौते से पीछे हटा तो गंभीर परिणाम

हमारे मीडिया ने पूरे युद्ध में एकतरफा ट्रंप के खिलाफ रिपोर्टिंग की है बड़े बड़े मिलिट्री ऑफिसर्स भी खुलकर ट्रंप को पेलने में लगे थे ऐसा प्रोजेक्ट किया गया जैसे सारा नुकसान  अमेरिका और इज़रायल का ही हुआ हो और ईरान का कुछ नहीं बिगड़ा अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ प्रदर्शन पर हल्ला मचा दिया लेकिन यह नहीं समझा कि अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है ईरान के खामनेई तो अपने ही देश के 40 हजार प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भून दिया जबकि ट्रंप ने किसी पर गोली नहीं चलाई

आज मेरे मित्र संजय भाई ने लिखा है कि ईरान का क्या क्या नुकसान हुआ लेकिन मीडिया में कभी कोई रिपोर्ट नहीं दी गई -

115 एक्सट्रीम हाई-वैल्यू लीडर्स हूर धाम पहुंच चुके हैं

145 नेवल वेसल्स मतलब पुरी नेवी लगभग खत्म है

54 एयरक्राफ्ट का रायता हो चुका है एयरफोर्स का बुरा है

200+ मिसाइल लॉन्च साइट्स तबाह हो चुकी हैं

इस्फ़हान, नतांज, फोर्डो जैसे न्यूक्लियर और मिसाइल सेंटर पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए हैं

8000+ मौतें हो चुकी हैं

16,000 से ज्यादा प्रिसीजन स्ट्राइक,

25,000 घायल 

आधा ईरान खंडहर में बदल चुका है जिसे रिकंस्ट्रक्ट में दशकों लगेंगे

ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।