आखिर राहुल गाँधी के गुलाम बन INDI गठबंधन देश को कहां ले जाना चाहता है? वैसे लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला जो अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने जा रहे हैं उसके जिम्मेदार वे स्वयं हैं। लोक सभा में हंगामा कर रोज के करोड़ों रूपए बर्बाद करने वालों को सदन से बाहर नहीं करना। आखिर मार्शल किस लिए हैं? लोक सभा अध्यक्ष की अपेक्षा विधान सभा के अध्यक्ष हंगामा करने वालों के विरुद्ध मार्शल को बुलाकर उन सदस्यों को सदन से बाहर करते हैं। बिरला को हंगामा करने वाले सदस्यों को बाहर निकलवाकर सदन की कार्यवाही को चालू रखना चाहिए। जब तक ईंट का जवाब पत्थर नहीं दिया जाएगा उपद्रवी बाज़ नहीं आने वाले। लोकसभा में विपक्ष लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी को संसद में बोलने नहीं देने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गाँधी पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे थे। उस वक्त स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देते हुए राहुल गाँधी को रोका। इस मुद्दे पर कई दिनों तक विपक्ष ने सदन को नहीं चलने दिया।
कांग्रेस इस बात से भी नाराज है कि जब महिला सांसदों ने पीएम की सीट को सदन में घेरा, तो स्पीकर ओम बिरला ने कहा था कि कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, इसलिए प्रधानमंत्री को सदन आने से उन्होंने रोका। लेकिन ऐसी घटनाएँ सदन में पहली बार हुई कि महिला सांसद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा को संबोधित नहीं कर पाए। इसकी वजह महिला सांसदों का इस तरह से पीएम की सीट को घेरना था। चर्चा यह है कि नरेंद्र मोदी पर हमले की सूचना ओम बिरला को कांग्रेस में इस घिनौनी हरकत के विरोधी सदस्यों ने दी थी।
विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और दूसरे प्रधानमंत्रियों पर आरोप लगाया। संसद में हंगामे के दौरान 8 विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। सासंदों के निलंबन और महिला सांसदों द्वारा पीएम की सीट घेरने को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगे थे। इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलने की अनुमति नहीं मिली।
स्पीकर के खिलाफ ‘हटाने का प्रस्ताव’ लाया जाता है
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, उससे थोड़ा अलग होता है। इसमें लोकसभा स्पीकर को ‘हटाने का प्रस्ताव’ यानी मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है। यह संविधान की अनुच्छेद 94 सी के तहत लाया जाता है। इस अनुच्छेद में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है।
लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश करने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना होता है। ये नोटिस लिखित होना चाहिए। इस प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर होना जरूरी है यानी कोई भी सांसद लोकसभा में खड़े होकर अपने दम पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता। स्पीकर पर स्पष्ट और ठोस आरोप लगे हों। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद इस पर सदन में चर्चा होती है और फिर सांसद वोटिंग करते हैं। इस दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करते हैं, बल्कि डिप्टी स्पीकर या सदन का वरिष्ठ सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।
हटाने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत
लोकसभा में प्रस्ताव सदन में उपस्थित सांसदों द्वारा बहुमत से पास होना जरूरी है, कोई दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती। स्पीकर को हटाने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत होती है। जितने सांसद वोट दे रहे हों, उनका 50 फीसदी से एक ज्यादा जरूरी है।
अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो तुरंत ही स्पीकर पद से हट जाता है। वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं और फिर सदन को दूसरा स्पीकर चुनना होता है।
स्पीकर को हटाने के लिए आज तक कभी वोटिंग नहीं हुई
सदन में स्पीकर को हटाने के लिए कई बार नोटिस दिया गया है। सदन में प्रस्ताव पर बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग नहीं हुई है।
पहली बार 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इस पर सदन में बहस हुई। विपक्ष ने उनपर कांग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाया था। सदन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और वोटिंग हुई नहीं।
दूसरी बार लोकसभा स्पीकर डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ 1967 में हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन पर कांग्रेस का पक्ष लेने का विपक्ष ने आरोप लगाया। विपक्ष का कहना था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। इस वक्त भी मतदान नहीं हुआ।
तीसरी बार 8वीं लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड के खिलाफ विपक्ष ने 1987 में अविश्वास प्रस्ताव रखा। उस वक्त बोफोर्स को लेकर कांग्रेस सरकार पर विपक्ष हमलावर था। विपक्ष का आरोप था कि जाखड नियमों का हवाला देकर विपक्ष को बोलने से रोकते हैं और सरकार को बचाते हैं। इस प्रस्ताव पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई।
13वीं लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उस वक्त एनडीए की सरकार थी। 2001 में नोटिस दिया गया, लेकिन प्रस्ताव खारिज हो गई। उन पर आरोप था कि सरकार के पक्ष में स्थगन प्रस्ताव को वह खारिज कर देते हैं।
2011 में 15वीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें 2जी, सीडब्लूजी घोटालों को लेकर बहस में बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। स्पीकर सरकार का बचाव कर रही हैं। इस नोटिस को भी खारिज कर दिया गया और वोटिंग तक बात नहीं पहुँची।
17वीं लोकसभा में 2020 में वर्तमान स्पीकर ओम बिरला ने कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष के जबरदस्त हंगामे पर विपक्षी सांसदों को निलंबित किया था। इसके विरोध में विपक्ष ने स्पीकर को हटाने का नोटिस देने की बात सार्वजनिक रूप से कीकांग्रेस लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर प्रस्ताव सदन में लाया ही नहीं जा सका।
गौरव गोगोई और पत्नी एलिजाबेथ ( साभार-ABP) कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई के पाकिस्तानी लिंक की जाँच असम स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी एसआईटी ने पूरी कर ली है। रिपोर्ट को 8 फरवरी 2026 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक कर दी। इसमें लोकसभा में विपक्ष के डिप्टी लीडर और उनकी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए गए।
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि राज्य सरकार ने पूरा केस केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दिए हैं, क्योंकि असम पुलिस के पास सीमित अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि ये लिंक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है और इनकी विस्तृत जाँच की जरूरत है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि एसआईटी जाँच में जो खुलासे हुए हैं वे बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक मौजूदा सांसद का शामिल होना, मामले को ज्यादा ‘गंभीर’ बनाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि गोगोई ने 2015 में नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में एक युवक के साथ जाकर हाई कमिश्नर अब्दुल बासित से मुलाकात की थी।
सीएम के मुताबिक, मैं सिंगापुर में था जब मुझे यह तस्वीर मिली कि हमारे असम के सांसद एक युवक के साथ पाकिस्तानी दूतावास गए थे। उन्होंने कहा कि आज तक कॉन्ग्रेस का भी कोई नेता गोगोई की तरह किसी प्रतिनिधिमंडल के साथ पाकिस्तानी दूतावास नहीं गया।
सरमा के मुताबिक, एलिजाबेथ पहले US के पूर्व सीनेटर टॉम उडाल की सहयोगी थीं, जो भारत विरोधी अरबपति जॉर्ज सोरोस से जुड़े हैं। ये लोग मोदी सरकार समेत दुनिया भर में राष्ट्रवादी सरकारों को गिराना चाहते हैं।
सरमा ने इस मीटिंग की एक वायरल तस्वीर भी दिखाई। उन्होंने कहा कि शुरुआत में लगा कि तस्वीर फोटोशॉप की हुई हैं, लेकिन बाद में पता चला कि यह तस्वीर असली थी। बताया जाता है कि इसके बाद अब्दुल बासित ने असम का दौरा किया, जो कोई इत्तेफाक नहीं था।
उन्होंने कहा कि एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई और पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख के ‘संबंधों’ का भी उन्हें पता चला। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, एलिजाबेथ ने 18 मार्च, 2011 से 17 मार्च, 2012 तक पाकिस्तान में LEAD पाकिस्तान नाम के एक पाकिस्तानी संगठन के लिए काम किया। इस दौरान, कथित तौर पर उनके अली तौकीर शेख के साथ करीबी रिश्ते बन गए, जिन्हें CM सरमा ने पाकिस्तानी आर्मी, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और देश के प्लानिंग कमीशन से कनेक्शन रखने वाला ‘पाकिस्तानी एजेंट’ बताया।
सरमा के मुताबिक, शेख सिर्फ पर्यावरणविद नहीं था, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर ‘भारत विरोध’ को बढ़ावा दिया। खासकर सिंधु जल संधि और दूसरे भारत-पाकिस्तान के झगड़ों को लेकर भारत की छवि धुमिल करने की कोशिश की। शेख ने 2010 और 2013 के बीच कम से कम 13 बार भारत का दौरा किया, जिससे भारत विरोधी गतिविधियों में उनकी भूमिका का शक जताया गया। सीएम सरमा ने कहा कि UPA सरकार ने उन्हें भारत आने से नहीं रोका, जबकि उनके भारत विरोधी कमेंट्स के बारे में सबको पता था।
सरमा ने SIT रिपोर्ट से कई चौंकाने वाली बातें बताईं, जिसमें दावा किया गया कि एलिज़ाबेथ का भारत ट्रांसफर हो गया था, लेकिन उनके ट्रांसफर के बाद भी उन्हें पाकिस्तानी फर्म से सैलरी मिलती रही। इतना ही नहीं, ट्रांसफर से एक साल पहले उन्हें भारत आने का अपॉइंटमेंट लेटर जारी किया गया था।
SIT जाँच के मुताबिक, LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान के तहत लाया गया, ताकि एलिजाबेथ की सैलरी पाकिस्तान से भारत ट्रांसफर की जा सके।
सरमा ने कहा कि LEAD पाकिस्तान सीधे एलिजाबेथ को सैलरी नहीं भेज सकता था, क्योंकि FCRA के तहत फंड ट्रांसफर सिर्फ भारतीयों को की जा सकती है और वह भारतीय नागरिक नहीं हैं। इसलिए उनकी सैलरी देने के लिए एक भारतीय संस्था LEAD इंडिया को फंड भेजा जाता था।
एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई, लीड इंडिया में भावना लूथरा के अंडर काम करती थीं, जिनसे SIT ने इस केस के सिलसिले में पूछताछ की थी। लीड इंडिया के फाइनेंशियल रिकॉर्ड की जाँच से पता चला कि LEAD इंडिया को ऑर्गनाइज़ेशनल काम के नाम पर LEAD पाकिस्तान से फंड मिला था। असल में यह पैसा गोगोई की सैलरी के लिए था।
सरमा ने कहा कि एलिजाबेथ के पाकिस्तान में एक्टिव बैंक अकाउंट थे, लेकिन उसने SIT को अकाउंट की डिटेल्स बताने से मना कर दिया। एक और चौंकाने वाली बात यह थी कि उसकी सैलरी भारत में उसके सीनियर से बहुत ज़्यादा थी। जहाँ उसे ₹2,50,000 मिलते थे, वहीं भावना लूथरा की सैलरी ₹50,000 थी।
जाँच के अनुसार, गोगोई को FCRA के ज़रिए पाकिस्तान से कुल ₹82.41 लाख मिले। LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान से ₹63.48 लाख मिले, जबकि सितंबर 2012 से नवंबर 2014 तक कुल ₹91.27 लाख मिले। इसमें से 90% रकम अकेले गौरव गोगोई की पत्नी को मिली।
इससे यह साफ हो जाता है कि LEAD इंडिया पूरी तरह से LEAD पाकिस्तान के अंडर था, यह एक अजीब अरेंजमेंट है क्योंकि आम तौर पर, इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन की कंट्री यूनिट्स का रैंक और स्टेटस बराबर होता है, और उन्हें रीजनल/ग्लोबल हेड्स चलाते हैं। लेकिन इस मामले में, एक लोकसभा MP की पत्नी पाकिस्तान के सीधे कंट्रोल वाले ऑर्गनाइज़ेशन के अंडर काम करती थी। सीएम ने इसे गंभीर मामला बताया।
जाँच के दौरान SIT ने यह एग्रीमेंट हाथ लगी। CM सरमा के मुताबिक, जब एलिजाबेथ पाकिस्तान से इंडिया ट्रांसफर हुई, तो वह इंडिया में काम करने वाली LEAD पाकिस्तान की ‘शैडो एम्प्लॉई’ बनी रही। उन्होंने कहा कि SIT ने LEAD इंडिया ऑफिस से पाकिस्तान से इंडिया में पैसे के फ्लो को दिखाने वाले डॉक्यूमेंट्स ज़ब्त किए हैं, और भावना लूथरा ने भी इसकी पुष्टि की है।
सरमा ने एक और सनसनीखेज आरोप लगाया कि एलिजाबेथ ने भारत से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पाकिस्तान को दी। इसमें शेख को भेजा गया 50 पेज का एक कॉन्फिडेंशियल डॉक्यूमेंट भी शामिल है। इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के सोर्स का जिक्र था। रिपोर्ट को कॉन्फिडेंशियल मार्क किया गया था। यह ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के सेक्शन 2 का सीधा उल्लंघन है।
पूछताछ के दौरान एलिजाबेथ ने माना कि उसने रिपोर्ट लिखी थी। CM के मुताबिक रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जिसमें एलिजाबेथ पर लो रिस्क, लो विजिबिलिटी रणनीति को बढ़ावा देने का आरोप है। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी एजेंटों को सलाह दी गई थी कि वे केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकारों और क्षेत्रीय राजनीतिक तनावों का फायदा उठाएँ। उन्होंने लिखा था कि PM मोदी के राज में केंद्र और राज्यों के बीच तनाव बढ़ेगा।
जब वह LEAD इंडिया में काम कर रही थीं, तो 6 बार इस्लामाबाद गईं। LEAD इंडिया छोड़ने और ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट में जुड़ने के बाद तीन बार फिर पाकिस्तान गईं। CM सरमा के मुताबिक, हर बार उन्होंने फ्लाइट के बजाय अटारी बॉर्डर के रास्ते का इस्तेमाल किया। SIT के मुताबिक, LEAD इंडिया की हेड भावना लूथरा ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि एलिजाबेथ पाकिस्तान क्यों गईं।
SIT का एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई का खुलासा
सीनेटर टॉम उडाल के जरिए जॉर्ज सोरोस से लिंक
अली तौकीर शेख के अंडर LEAD पाकिस्तान में नौकरी
पाकिस्तानी बैंक अकाउंट की जानकारी देने से मना कर दिया
LEAD इंडिया के साथ पहले से तय नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट (जॉइन करने से 18 महीने पहले जारी किया गया)
भारत में एंट्री आसान बनाने के लिए ‘शैडो नौकरी’ का इंतजाम
रिपोर्टिंग मैनेजर से 500% ज्यादा सैलरी और FCRA का उल्लंघन
पाकिस्तान से फंडिंग का सोर्स छिपाया
LEAD इंडिया मैनेजमेंट की तरफ से कोई निगरानी नहीं, सीधे पाकिस्तान को रिपोर्ट की गई
पाकिस्तान को कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट भेजना (5 अगस्त, 2014)
रिपोर्ट में सीक्रेट IB कम्युनिकेशन का जिक्र था
पाकिस्तानी एक्टर्स के लिए ‘लो रिस्क लो विज़िबिलिटी’ स्ट्रैटेजी की वकालत की गई
राज्य-लेवल पर बातचीत करने और केंद्र सरकार को बायपास करने की सलाह दी गई
खुफिया रिपोर्ट में केंद्र-राज्य के राजनीतिक तनाव का फायदा उठाया गया
अली तौकीर शेख के साथ नौकरी से पहले एक साथ 3 बार यात्रा
LEAD इंडिया में रहते हुए पाकिस्तान की 6 बार बिना इजाजत दौरा
ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट जॉइन करने के बाद पाकिस्तान के 3 और दौरे
मुख्यमंत्री ने गौरव गोगोई के बारे में भी बात की और कहा कि 2013 में अपने पहले लोकसभा चुनाव जीतने से 5 महीने पहले, गोगोई इजरायल की यात्रा के दौरान अपना पासपोर्ट खो जाने के बाद ज़मीनी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान गए थे। CM सरमा ने पाकिस्तान पहुँचने पर गोगोई के सिंगल एंट्री वीजा को मल्टीपल-एंट्री में अपग्रेड करने और बॉर्डर पर झड़पों के बीच पाकिस्तानी शहरों में ISI के आकाओं से मुलाकात का आरोप लगाया।
CM के मुताबिक, गोगोई का वीजा सिर्फ लाहौर के लिए था, लेकिन पाकिस्तान पहुँचने के बाद, उनके वीजा को इस्लामाबाद और कराची तक के लिए बढ़ा दिया गया। यह एक्सटेंशन पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा लिखे गए एक लेटर के आधार पर किया गया था। CM सरमा ने कहा कि SIT ने वीजा लोकेशन बढ़ाने के लिए मंजूरी दिखाने वाला पासपोर्ट हासिल कर लिया है।
CM के मुताबिक, पाकिस्तान जाने के बाद गोगोई की पर्सनैलिटी पूरी तरह बदल गई और उन्होंने दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में न्यूक्लियर पावर प्लांट, यूरेनियम रिज़र्व, बॉर्डर सिक्योरिटी, डिफेंस हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर, एयर पावर, घरेलू हथियार बनाने, जासूसी जैसे कॉन्फिडेंशियल मामलों से जुड़े पार्लियामेंट्री सवाल उठाए। उन्होंने नेशनल वॉटर मिशन स्ट्रेटेजी पर भी सवाल पूछे, जो एलिजाबेथ के काम के एरिया से जुड़ा मामला था।
CM ने एक इंटरव्यू का वीडियो क्लिप भी दिखाया, जिसमें गौरव गोगोई ने कहा था कि वह पाकिस्तान इसलिए गए थे क्योंकि उनकी पत्नी वहाँ काम कर रही थीं, लेकिन CM सरमा ने बताया कि उनकी पत्नी का उनके दौरे से एक साल पहले LEAD इंडिया में ट्रांसफर हो गया था।
हालाँकि गौरव गोगोई की बेटी ब्रिटिश नागरिक है, क्योंकि उसका जन्म लंदन में हुआ था। CM सरमा के मुताबिक उन्होंने अपने भारत में जन्मे बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया। उन्होंने दिल्ली में रीजनल पासपोर्ट द्वारा जारी किया गया सरेंडर सर्टिफिकेट दिखाया, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट 12 मई 2022 को सरेंडर किया गया था। CM सरमा ने इसे बहुत अफसोस की बात बताया कि असम के पूर्व CM तरुण गोगोई के बेटे ने अपने बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया।
CM ने एक और गंभीर आरोप लगाया कि जब बेटे कबीर गोगोई के पास इंडियन पासपोर्ट था, तो उसका धर्म हिंदू लिखा था, लेकिन उसके ब्रिटिश पासपोर्ट में किसी धर्म का जिक्र नहीं है। दूसरी तरफ बेटी माया गोगोई के ब्रिटिश पासपोर्ट में उसका धर्म क्रिश्चियन लिखा है।
CM सरमा ने कहा कि उनके बेटे का ईसाई में धर्मांतरण हो रहा है और गौरव गोगोई अब अपने ही परिवार में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।
हिमंता सरमा ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा, “SIT ने सबूत दिया है कि तीन लोगों का पाकिस्तान से सीधा लिंक है— अली तौकीर शेख, एलिजाबेथ गोगोई और गौरव गोगोई। SIT रिपोर्ट देखने के बाद हमारे कैबिनेट मंत्री भी हैरान रह गए।”
उन्होंने आगे कहा कि शुरू में असम पुलिस की CID जाँच कर रही थी। उसमें जब गंभीरता का अंदाजा लगा तो इंटरपोल की मदद की जरूरत पड़ी और असम पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्लासिफाइड डेटा तक पहुँच की जरूरत थी। कैबिनेट ने 7 फरवरी को रिपोर्ट पर चर्चा की। कैबिनेट ने कॉन्फिडेंशियल बातों को छोड़कर इसके कुछ हिस्से को बताने की मंजूरी दी। कैबिनेट ने आगे की जाँच के लिए रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजने का फैसला किया है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी सवाल उठाया है कि गौरव गोगोई से शादी के इतने साल बाद भी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई ने अपना UK वीजा क्यों रखा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि उनके बच्चे भी ब्रिटिश नागरिक क्यों हैं और भारतीय नागरिकता के लिए कोई आवेदन क्यों नहीं किया गया है।
भूपेन बोरा अश्लील इशारा करते (साभार - एक्स/@Namami_Bharatam) असम में राजनीतिक माहौल गरमाने के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा पर रैली के दौरान महिला नेता के सामने अश्लील हाथ का इशारा करने का आरोप लगा है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
भूपेन बोरा पार्टी की ‘परिवर्तन यात्रा’ के दौरान अनुचित हाथ का इशारा करते दिखे। उस समय कांग्रेस नेता गौरव गोगोई बस पर खड़े होकर जनसभा को संबोधित कर रहे थे। वीडियो में दिखता है कि भूपेन बोरा, असम विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया और कांग्रेस नेता मीरा बोरठाकुर से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान बोरा ने अपने दाहिने हाथ से बेहद आपत्तिजनक इशारा किया।
मीरा बोरठाकुर ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन बोरा ने इशारा जारी रखा। वहीं, देबब्रत सैकिया को इस दौरान मुस्कुराते हुए भी देखा गया।
See the gesture of Bhupen Borah, while talking to Mira Borthakur during Parivartan Rally in Guwahati.
मीडिया को संबोधित करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को इस घटना की कड़ी आलोचना की और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “एक महिला के प्रति किया गया यह अश्लील इशारा पूरी तरह अस्वीकार्य है और यह सम्मान की गंभीर कमी को दर्शाता है।”
मुख्यमंत्री ने आगे कहा, “अगर कांग्रेस सच में महिलाओं की गरिमा के लिए खड़ी है, तो उसे भूपेन बोरा को तुरंत पार्टी से निष्कासित करना चाहिए। इस तरह का व्यवहार राजनीति में स्वीकार्य नहीं है, खासकर उनके जैसे वरिष्ठ नेता से।”
हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी कहा कि वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि राज्य कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने वरिष्ठ पार्टी नेताओं, जिनमें एक महिला नेता भी शामिल थीं, उनकी मौजूदगी में ऐसा इशारा किया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “ऐसे लोग महिला मामलों के मंत्री, सामाजिक मामलों के मंत्री बनने की सोच रखते हैं, यहाँ तक कि मुख्यमंत्री बनने के सपने देखते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंच पर इस तरह का अशोभनीय इशारा कर रहे हैं।”
Assam: “How can a Senior Congress leader show such obscene gesture to a woman? If Congress does not expel them, these leaders won’t be accepted in the society. In the cabinet today, we will take an action.”
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि वह कैबिनेट बैठक के बाद होने वाली अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर विस्तार से बात करेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि इस मामले को महिला आयोग के पास भेज दिया गया है और आयोग से इसे गंभीरता से संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है।
इसके अलावा, हिमंत बिस्वा सरमा ने मीडिया की भी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि टीवी चैनलों और डिजिटल पोर्टलों ने इस वीडियो को प्रसारित नहीं किया और कार्यक्रम के फुटेज से क्लिप को हटा दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह संभव है कि मीडिया की नजर इस घटना पर नहीं पड़ी हो।
जस्टिस सूर्यकांत ने चीफ जस्टिस बनने के बाद कई आदेश/बयान दिए जिसकी सराहना की जा रही है और और करनी भी चाहिए। ट्रेड यूनियन आंदोलन को इंडसट्रीज़ को बंद होने का कारण बताना, रोहिंग्या को रेड कारपेट न देना का बयान, व्हाट्सप्प को निर्देश कि या भारत के कानून को मानों या देश छोड़ जाओ, UGC पर कहना कि यदि हम दखल नहीं देंगे तो समाज पर गंभीर खतरा पैदा होगा और प्रशांत किशोर को बैरंग लौटाना कुछ ऐसे विषय हैं जिन्हें लोगों ने पसंद किया है।
लेखक चर्चित YouTuber
कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उससे अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं और वह आदमी कभी कुछ गलती कर दे तो समाज उसे बख्शता भी नहीं है। मैं आजकल में चर्चित एक नेता का नाम नहीं लूंगा जिसने समाज और देश की सेवा में अपना जीवन लगा दिया लेकिन एक गलती (जो उसकी थी भी नहीं) के लिए लोग उसे फांसी लगाने के लिए आमादा हो गए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत से भी अपेक्षाएं बहुत हैं लेकिन उनका कार्यकाल असीमित नहीं है। एक वर्ष बाद 9 फरवरी को रिटायर हो जाएंगे। इसलिए मैं केवल एक आवेदन करना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट में जो वर्षों से मुक़दमे जंग खा रहे हैं, उन्हें निपटाने के लिए कोई रणनीति बनाएं।
ऐसे मुकदमों में एक है आंध्र प्रदेश में 2004 में लाया गया मुसलमानों के लिए 5% आरक्षण। मुख्यमंत्री Y. S. Rajasekhara Reddy ने मुसलमानों को BC-E मानकर आरक्षण दिया जिसे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। उसके बाद अध्यादेश लाया गया जिसे विधानसभा से पारित करा कर कानून बनाया गया लेकिन उसे भी हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। यह 5% आरक्षण क्योंकि राज्य में 50% को पार करता था इसलिए रेड्डी ने उसे 4% कर दिया।
2005 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि Prima Facie यह आरक्षण धार्मिक आधार पर लगता है और रोक लगा दी थी।
यह मामला हाई कोर्ट में कई लोग व्यक्तिगत तौर पर ले गए जिसमें प्रमुख थे वकील K. Kondala Rao and others जिन्होंने 2007 के मुस्लिम रिजर्वेशन एक्ट को हाई कोर्ट में चुनौती दी। चुनौती का आधार था कि आरक्षण धार्मिक आधार पर होने के कारण संवैधानिक नहीं है।
फरवरी 2010 में हाई कोर्ट ने मुस्लिमों को आरक्षण देने वाले कानून को खारिज कर दिया। लेकिन राज्य सरकार हाई कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। सरकार का शुरू से मत रहा कि मुसलमानों की 15 जातियों को उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन की वजह से आरक्षण दिया गया है। (15 specific Muslim sub-groups (communities) categorized as socially and economically backward)। ये आरक्षण फर्जी था क्योंकि मुस्लिमों में कोई जातिप्रथा नहीं होती और आर्थिक पिछड़ापन तो हर समुदाय में होता है और इसलिए यह पूरी तरह धार्मिक आधार पर ही था जिसका कोई प्रावधान संविधान में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले।
वह संविधान पीठ 2026 तक 16 वर्ष बाद भी नहीं बनी है और मुसलमानों के लिए आरक्षण जारी है। सोचिए अगर संविधान पीठ ने आरक्षण को अवैध कह दिया तो जो 2004 से अब तक मुस्लिम आरक्षण का लाभ उठा कर जो नौकरी पाए होंगे, उन्हें कैसे निकाला जाएगा।
इसलिए इस मुकदमे को और ऐसे अन्य 15-20 वर्षो से लंबित मुकदमों को समयबद्ध तरीके से निपटाना आवश्यक है और यही अपेक्षा है चीफ जस्टिस सूर्यकांत से कि वे इस पर ध्यान देंगे और कॉलेजियम को भी समाप्त करने के लिए कदम उठाएंगे जो उन्होंने आश्वासन दिया था।
अखबार ने 300 से ज्यादा स्टाफ को नौकरी से निकाल दिया है (साभार - सीबीएस न्यूज/द वाशिंगटन पोस्ट) अमेरिका के प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने अपने कर्मचारियों की लगभग एक-तिहाई संख्या में कटौती करने का फैसला किया है। यह बड़े पैमाने पर छंटनी बुधवार (4 जनवरी 2026) को घोषित की गई, जो कंपनी के सभी विभागों को प्रभावित करेगी। इस फैसले से अखबार की अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों की कवरेज में भारी कमी आने की आशंका है।
छंटनी के तहत स्पोर्ट्स सेक्शन को पूरी तरह बंद किया जा रहा है, जबकि कुछ खेल संवाददाताओं को फीचर्स सेक्शन में स्पोर्ट्स कल्चर कवर करने के लिए शिफ्ट किया जाएगा। इसके अलावा बुक्स, मेट्रो सेक्शन और प्रमुख न्यूज पॉडकास्ट ‘Post Reports’ को भी बंद करने की योजना है।
एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने इस कदम को कंपनी के लिए स्थिरता लाने वाला बताया, लेकिन कर्मचारियों और पत्रकारों ने इसे अखबार के इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से एक और खून-खराबे जैसा फैसला करार दिया है। गौरतलब है कि वाशिंगटन पोस्ट के मालिक अमेजन के संस्थापक और अरबपति जेफ बेजोस हैं।
मैट मरे ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पाठकों तक पहुँचने में आ रही मुश्किलों के कारण यह फैसला लेना जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ओवरसीज कवरेज भी कम की जाएगी, हालाँकि करीब 12 विदेशी ब्यूरो बनाए रखे जाएँगे, जिनका फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर होगा।
कर्मचारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने माना कि यह फैसला परेशान करने और चौंकाने वाला है। इससे पहले स्थानीय और विदेशी पत्रकारों ने जेफ बेज़ोस से अपनी नौकरियाँ बचाने की अपील भी की थी, लेकिन उनकी अपील सफल नहीं हो सकी।
वाशिंगटन पोस्ट की इस बड़ी छंटनी का असर भारत में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी पड़ा है। 300 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिनमें कई जाने-माने नाम शामिल हैं। इनमें शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर भी शामिल हैं।
इसके अलावा, नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा और यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह (Gerry Shih) को भी हटाया गया है। दोनों पहले से ही अखबार की भारत-विरोधी रिपोर्टिंग और पश्चिमी मीडिया के पक्षपाती रवैये से जुड़े चर्चित चेहरे माने जाते रहे हैं।
छंटनी के बाद कई प्रभावित पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। प्रांशु वर्मा ने लिखा कि उन्हें यह बताते हुए दिल टूट गया है कि उन्हें वाशिंगटन पोस्ट से निकाल दिया गया। उन्होंने अपने चार साल के अनुभव को सम्मान की बात बताया और कहा कि वे अपने कई प्रतिभाशाली साथियों के लिए भी दुखी हैं, जिन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।
वाशिंगटन पोस्ट से निकाले जाने के बाद यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह ने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि अखबार के साथ उनका समय उनके लिए एक सम्मान और सौभाग्य जैसा रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने सात साल से अधिक समय तक दुनिया भर की यात्रा की, एक ऐसे अखबार के लिए, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था।
गैरी शिह ने कहा कि उन्हें मिडिल ईस्ट टीम के बाकी सदस्यों के साथ हटा दिया गया है और दिल्ली से लेकर बीजिंग, कीव और लैटिन अमेरिका तक के अधिकांश सहयोगियों की भी नौकरी चली गई है। उन्होंने इस दिन को दुखद बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह सफर मजेदार, यादगार और चुनौतीपूर्ण रहा और उनकी टीम ने अपने काम के दौरान खूब असरदार काम किया।
प्रांशु वर्मा से जिन्होंने अपनी नौकरी बचाने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की
वाशिंगटन पोस्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, प्रांशु वर्मा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान से जुड़ी खबरों की कवरेज के जिम्मेदार थे। वे 2022 में द पोस्ट से जुड़े थे और इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समेत कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग की। इससे पहले वे बोस्टन ग्लोब में टेक्नोलॉजी पर लिख चुके थे और न्यूयॉर्क टाइम्स में कूटनीति और परिवहन से जुड़ी रिपोर्टिंग कर चुके हैं।
उनका पत्रकारिता करियर फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर से शुरू हुआ था, जहाँ उन्होंने न्यू जर्सी की राजनीति और जेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया। वे डेलावेयर विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से डिग्री हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद अब छंटनी की मार उनकी नौकरी पर भी पड़ी।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्मा ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से अपनी नौकरी बचाने की अपील भी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनका मीडिया संस्थान भारत में उन गिने-चुने प्लेटफॉर्म्स में से है, जो सरकार के डर के बिना अकाउंटेबिलिटी रिपोर्टिंग कर सकता है। हालाँकि, उनकी यह कोशिश काम नहीं आई।
बताया गया है कि वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग में मोदी सरकार के खिलाफ बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया और कई लेखों में सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले आरोप लगाए। उन्होंने गर्व के साथ उन रिपोर्ट्स का जिक्र किया, जिनमें भारतीय अरबपतियों को विशेष लाभ मिलने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में क्रोनी कैपिटलिज़्म, भारत की कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका निभाने के आरोप और अवैध घुसपैठ रोकने की भारत की मुहिम को मुसलमानों के खिलाफ कठोर निर्वासन अभियान के रूप में दिखाया गया था।
इन उदाहरणों को वर्मा ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया, जो वाशिंगटन पोस्ट की भारत को लेकर आलोचनात्मक और पक्षपाती अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग की छवि से मेल खाती रही है। फिर भी, इन सबके बावजूद छंटनी से उनकी नौकरी नहीं बच पाई।
वाशिंगटन पोस्ट में जर्नलिस्ट बनने के लिए ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की अहम भूमिका
जानकारी के मुताबिक, प्रांशु वर्मा ने यह साफ कर दिया था कि वाशिंगटन पोस्ट में भारतीय संवाददाता बनने के लिए क्या अपेक्षित है। उनके मुताबिक, भारत जो वर्तमान में राइट-विंग सरकार के तहत है और जिसे उदार (लिबरल) नजरियों में आलोचना का सामना करना पड़ता है, उसे संदिग्ध और आलोचनात्मक रूप में पेश करना चाहिए। देश की कार्रवाइयों को संवैधानिक लोकतंत्र की चुनौती के बजाय तानाशाही, बहुसंख्यकवाद और नैतिक गिरावट के नजरिए से दिखाना जरूरी था।
उदाहरण के तौर पर, वर्मा ने अवैध रोहिंग्या प्रवास से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों को, जिसमें जाली दस्तावेज, सीमा में घुसपैठ और आपराधिक आरोप शामिल हैं, साम्प्रदायिक उत्पीड़न की कहानी के रूप में पेश किया। इसी तरह, अरबपतियों को सरकारी भ्रष्टाचार के साधन के रूप में दिखाया गया, जबकि वे फ्री मार्केट के व्यावसायिक खिलाड़ी हैं।
उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के तनाव का स्रोत भौगोलिक या रणनीतिक कारण नहीं, बल्कि भारत की कथित नैतिक असफलताओं में हैं। नई दिल्ली की संसदीय संप्रभुता और नागरिक कल्याण की रक्षा की कोशिशों को बार-बार नकारात्मक रूप में दिखाया गया।
वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए फैलाई गई नैरेटिव पर गर्व किया और इस पक्षपाती और गलतियों से भरी रिपोर्टिंग के भारत पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को अपने नौकरी बचाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। विडंबना यह है कि उन्होंने भारतीय अरबपतियों पर लगातार हमला किया और भारत में सेंसरशिप की चिंता जताई, लेकिन खुद एक अमेरिकी अरबपति के कंधों पर काम के लिए निर्भर रहे।
उनकी बातों में शक्ति से स्वतंत्रता की चर्चा थी, लेकिन यह अमीर मालिक की कृपा पर आश्रित अपीलों से विरोधाभासी दिखती है। वर्मा के मामले ने यह साबित किया कि लिबरलवाद कभी-कभी स्पष्ट पाखंड और डबल स्टैंडर्ड से जुड़ा हो सकता है।
गैरी शिह का प्रोफाइल और विवादास्पद रिपोर्टिंग
वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, गैरी शिह ने 2018 में अखबार में शामिल होकर यरुशलम ब्यूरो चीफ के रूप में इजराइल, फिलिस्तीनी इलाके और मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों की कवरेज की। इससे पहले वे 2021-2025 तक नई दिल्ली ब्यूरो चीफ रहे और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में राजनीति, विदेश नीति, खुफिया और टेक्नोलॉजी पर रिपोर्टिंग की।
शिह ने इससे पहले एसोसिएटेड प्रेस, रॉयटर्स और द न्यूयॉर्क टाइम्स में भी काम किया। उनकी भारत पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग के लिए 2024 में पुलित्जर पुरस्कार के फाइनलिस्ट होने का गौरव हासिल हुआ और उन्हें 2020 ओसबोर्न इलियट पुरस्कार भी मिला। वह चीनी मूल के हैं।
मीडिया रंबल के अनुसार, शिह ने बीजिंग से AP के लिए रिपोर्टिंग की, जहाँ उन्होंने चीन में सरकार की कार्रवाई, घरेलू राजनीति और विदेश नीति को कवर किया। उन्होंने रॉयटर्स के लिए सिलिकॉन वैली की सोशल मीडिया कंपनियों और न्यू यौर्क टाइम्स के लिए नॉर्दर्न कैलिफ़ोर्निया की रिपोर्टिंग भी की।
विशेष रूप से यह कहा जा सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट में भारत-विरोधी रुख रखना कोई अनोखी बात नहीं, बल्कि यह कर्मचारी बनने की प्रवृत्ति मानी जाती है। इसी परंपरा के अनुरूप, गैरी शिह ने अपने लेखन का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की सरकार के साथ मिलकर भारत पर बिना ठोस प्रमाण आरोप लगाने के लिए भी किया।
इस मिलीभगत ने पत्रकारिता की ईमानदारी की काँच की दीवारों को तोड़ दिया
रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) और कनाडाई सरकार ने 14 अक्टूबर 2024 को भारत के खिलाफ गंभीर, लेकिन बिना आधार के आरोप लगाए। आरोप यह थे कि भारतीय एजेंट, अधिकारी और वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ, जिनमें उस समय भारत के उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा भी शामिल थे, उन्होंने कनाडाई धरती पर अपराधिक गतिविधियों में भाग लिया।
कनाडा के इन दावों पर वाशिंगटन पोस्ट ने घंटों के भीतर एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसे गैरी शिह और ग्रेग मिलर ने लिखा। इस रिपोर्ट में अमित शाह को भी कथित अवैध आपराधिक ऑपरेशंस में शामिल बताया गया। लेख में सूत्र के रूप में कनाडा की नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर नतालि ड्रूइन और विदेश मंत्रालय के डिप्टी मिनिस्टर डेविड मॉरिसन को उद्धृत किया गया।
हालाँकि बाद में यह खुलासा हुआ कि अखबार को RCMP और कनाडाई अधिकारियों के आरोपों से पहले ही तैयार ब्रीफिंग मिल चुकी थी। रिपोर्ट वास्तव में प्रेस कॉन्फ़्रेंस का इंतजार कर रही थी। इसमें आतंकवादी हरेदीप सिंह निज्जर की हत्या और अन्य लक्षित हमलों को भारत पर आरोपित किया गया। कनाडा के NSA ने सभी आरोपों को मीडिया हाउस तक पहुँचाने का आदेश पहले ही दे दिया था, जबकि कोई औपचारिक निष्कर्ष या सबूत सार्वजनिक नहीं हुए थे।
इस खुलासे ने वाशिंगटन पोस्ट की स्वतंत्र पत्रकारिता और अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। यह साबित हो गया कि इसके लेखक ओटावा के प्रभाव में आकर न्यू दिल्ली की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले औजार के रूप में काम कर रहे थे।
अगर आप चाहें, मैं अब तक के सभी घटनाक्रम और पत्रकारों के प्रोफाइल को मिलाकर एक संयुक्त हिंदी न्यूज आर्टिकल तैयार कर सकता हूँ, जो वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी, विवादास्पद रिपोर्टिंग और भारत-विरोधी गतिविधियों को पूरी तरह कवर करे।
भारत पर लगातार हमले, कॉन्सपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा
वाशिंगटन पोस्ट के माध्यम से गैरी शिह ने भारत पर कई तरह के आरोप लगाए है। उनके अनुसार भारत ने नेटफ्लिक्स और अमेजन से दर्दनाक कंटेंट हटवाया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक पर घृणा भाषण फैलाया और पाकिस्तान में आतंकवादियों की हत्या करवाई।
उनके लिए सुनहरा मौका तब आया जब अमेरिका ने कहा कि भारत ने 2023 में प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नून को मारने का प्रयास किया।
इस पर गैरी शिह ने प्रचार चैनल द वायर पर करण थापर से बातचीत में दावा किया कि पूर्व R&AW प्रमुख समंत कुमार गोयल पूरी साजिश में शामिल थे। उन्होंने अपने लेख में लिखा, “अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया है कि पन्नून को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन को उस समय के रॉ प्रमुख सामंत गोयल ने मंजूरी दी थी।” बाद में 2024 में अपने इंटरव्यू में उन्होंने इसे “अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ की समझ के अनुसार” के रूप में बचाव करने की कोशिश की। यह मामला भी दिखाता है कि शिह ने लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे चुनौतीपूर्ण रूप में पेश करने का प्रयास किया।
गैरी शिह ने अपने बयान में कहा “यह कोई अकेली या अलग घटना नहीं थी, बल्कि इस पर एजेंसी के उच्च अधिकारियों, जिनमें सचिव समंत कुमार गोयल भी शामिल हैं की मंजूरी थी। यदि हम अपने स्रोतों से मिली जानकारी पर ध्यान दें, तो यह साफ है कि उन्हें इन खतरों को खत्म करने के लिए दबाव डाला गया था और यही हमारी समझ का आधार है कि यह एक ऑपरेशन था।”
हालाँकि, उनकी यह रिपोर्टिंग कई सवालों के घेरे में आई, खासकर कनाडाई सरकार के साथ उनकी साझेदारी और भारत पर बार-बार झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को देखते हुए। शिह ने 2022 में भारत की तुलना चीन से करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई, जो उनके बौद्धिक धोखे और पक्षपात को उजागर करता है।
मोदी सरकार ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और रूस-यूक्रेन युद्ध में पश्चिमी दबाव के सामने झुकी नहीं, लेकिन शिह ने इसे भी आलोचना का विषय बनाया क्योंकि सरकार ने उनके पसंदीदा पश्चिमी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया।
उन्होंने कहा “मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक अल्पसंख्यकों का व्यवहार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर मोदी चीन के समान पृष्ठ पर हैं। पश्चिमी पाखंड की यह धारणा भारतीय कूटनीतिज्ञों की ओर से आ सकती है, लेकिन यह वास्तव में चीनी कूटनीतिज्ञों से आती हो सकती है।”
यह टिप्पणी उन्होंने कारवाँ के एक लेख पर प्रतिक्रिया में दी थी, जो लिबरल लेखक सुषांत सिंह द्वारा लिखा गया था। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कन्वल सिब्बल ने शिह की इस तुलना को सटीक रूप से खारिज करते हुए कहा।
“कोई भी व्यक्ति जो बौद्धिक ईमानदारी रखता है, भारत और चीन को इन मुद्दों पर बराबर नहीं मान सकता। शिह को चीन से निकाला गया और अब वह भारत की स्वतंत्रता का लाभ उठा रहा है।” यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि गैरी शिह लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में लगे रहे।
वाशिंगटन पोस्ट की हालिया छंटनी और कर्मचारियों की बर्खास्तगी मीडिया हाउस में पिछले कुछ वर्षों में जारी बायआउट और स्टाफ कटौती का हिस्सा है। ये बदलाव उस समय की आलोचना और संपादकीय निर्णयों के कारण हुए, जब अखबार ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले किसी राष्ट्रपति उम्मीदवार का समर्थन न करने का निर्णय लिया। यह निर्णय अमेज़न के संस्थापक जेफ बेज़ोस ने लिया था। इसके बाद अखबार ने कई हजार सब्सक्राइबर खो दिए।
दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक से अधिकांश राष्ट्रपति चुनावों में अखबार ने उम्मीदवार का समर्थन किया और सभी उम्मीदवार डेमोक्रेट्स रहे। इसके अलावा, बेज़ोस द्वारा पिछले साल अखबार के ओपिनियन सेक्शन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार के दृष्टिकोण पर केंद्रित करने का निर्णय लेने के बाद, उस विभाग के संपादक ने इस्तीफा दे दिया था।
कंपनी को पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है और इसमें भारत और मोदी सरकार के प्रति गहरी पूर्वाग्रह और नफरत रही है। प्रांशु वर्मा और गैरी शिह ने इस पक्षपाती नैरेटिव को आगे बढ़ाने में पूरी मेहनत की और इस अनैतिक परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालाँकि, इस नए घटनाक्रम ने कंपनी की आंतरिक समस्याओं पर फिर से ध्यान आकर्षित किया। यह साबित हुआ कि विशेष रूप से भारत को निशाना बनाकर रिपोर्टिंग करने वाले आधुनिक पत्रकार (ब्राउन सेपियंस) भी लिबरल मीडिया में नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं रखते। चाहे उनका देश विरोधी दृष्टिकोण कितना भी स्पष्ट क्यों न हो, वे आखिरकार हटा दिए जाते हैं या आसानी से बदल दिए जाते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में जिस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Agreement के ढाँचे पर सहमति बनी है, उसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है।
भारत और अमेरिका, दोनों ही देश इस बात को समझते हैं कि आने वाले समय में व्यापार केवल मुनाफे का साधन नहीं रहेगा, बल्कि भरोसेमंद साझेदारी, तकनीकी सहयोग और रोजगार सृजन का मजबूत आधार बनेगा।
यही वजह है कि इस अंतरिम ट्रेड डील को जल्दबाजी में किया गया फैसला नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक संतुलित ढाँचा कहा जा रहा है।
इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुलने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।
मोदी ने बताया दोनों देशों के लिए अच्छी खबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को X पर एक पोस्ट में इसे भारत-अमेरिका के लिए बहुत अच्छी खबर बताया है। PM मोदी ने कहा, “दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) के लिए एक ढाँचा तय हुआ है। मैं राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाने में व्यक्तिगत रुचि दिखाई।”
Great news for India and USA!
We have agreed on a framework for an Interim Trade Agreement between our two great nations. I thank President Trump for his personal commitment to robust ties between our countries.
उन्होंने लिखा, “यह ढाँचा हमारे साझेदारी संबंधों में बढ़ती गहराई, भरोसे और ऊर्जा को दिखाता है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी और भारत के मेहनती किसानों, उद्यमियों, MSMEs, स्टार्टअप इनोवेटर्स, मछुआरों और अन्य लोगों के लिए नए अवसर खुलेंगे। इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। भारत और अमेरिका दोनों नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह ढाँचा निवेश और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करेगा।”
वहीं केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बताया है कि इससे भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार के दरवाजे खुलेंगे। उन्होंने कहा, “इसका सबसे ज्यादा फायदा छोटे उद्योगों (MSMEs), किसानों और मछुआरों को होगा। निर्यात बढ़ने से महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।”
अंतरिम ट्रेड डील का मतलब क्या है और यह क्यों जरूरी थी?
अंतरिम ट्रेड डील का सीधा मतलब है कि यह कोई अंतिम या पूर्ण व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाले बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement- BTA) की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।
फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BTA की औपचारिक शुरुआत की थी, लेकिन ऐसे व्यापक समझौतों को अंतिम रूप देने में आमतौर पर कई साल लग जाते हैं। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने तय किया कि पहले एक ऐसा ढाँचा बनाया जाए, जिससे व्यापारिक रिश्तों को तुरंत गति मिल सके।
इस अंतरिम ढाँचे के जरिए दोनों देशों ने बाजार तक पहुँच बढ़ाने, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत व भरोसेमंद बनाने पर सहमति जताई है।
यह समझौता इस बात का भी संकेत देता है कि भारत और अमेरिका लंबे समय तक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वे वैश्विक व्यापार में एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।
अमेरिका का बाजार खुला: भारत को व्यापार और निर्यात में क्या मिला?
इस समझौते से भारत को जो सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है, वह है अमेरिका के 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार तक बेहतर और आसान पहुँच। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, इससे भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा होंगे।
खास बात यह है कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% करने पर सहमति जताई है, जिससे भारतीय सामान वहाँ पहले के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। कपड़ा और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प और कुछ चुनिंदा मशीनरी जैसे सेक्टरों को इस फैसले से सीधा फायदा मिलेगा।
The India-US Trade Deal will not only provide greater access to the US market for Indian products but also support our labour intensive sectors. Additionally, it will give a big boost to our digital infrastructure.#IndiaUSJointStatementpic.twitter.com/AAUB8x9MGM
ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत में बड़ी संख्या में छोटे उद्योग, कारीगर और श्रमिक काम करते हैं। इसके अलावा जेनेरिक दवाओं, रत्न और आभूषण, हीरे और विमान के पुर्जों जैसे उत्पादों पर अमेरिका ने टैरिफ पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई मजबूती मिलेगी।
इसके अलावा दोनों दोनों देश टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स, जिसमें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले दूसरे इक्विपमेंट शामिल हैं, इनमें ट्रेड बढ़ाने और उभरते टेक्नोलॉजी सेक्टर में जॉइंट कोऑपरेशन को बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं।
किन सेक्टरों में रोजगार और MSMEs को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
यह अंतरिम ट्रेड डील केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए नहीं, बल्कि छोटे उद्योगों के लिए भी अहम मानी जा रही है। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प और होम डेकोर जैसे क्षेत्रों में MSMEs की बड़ी भागीदारी है। अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की माँग पहले से मौजूद है और अब टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद वहां और तेजी से पहुंच सकेंगे।
सरकार का दावा है कि निर्यात बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। महिलाओं और युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ श्रम की जरूरत ज्यादा होती है। मछुआरों और फिशरी सेक्टर को भी अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है, जिससे तटीय इलाकों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।
अनाज, मसाले और सब्जियाँ: किसानों को कैसे मिला पूरा संरक्षण?
इस समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख अनाजों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
इसका मतलब यह है कि अमेरिकी अनाज भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर नहीं आ सकेंगे और घरेलू किसानों को कीमतों में गिरावट का डर नहीं रहेगा।
गौरतलब है कि इस ट्रेड डील को लेकर विपक्ष ने भी अफवाहें फैला कर किसानों और छोटे उद्यमियों के भड़काने की कम कोशिश नहीं की थी। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे केंद्र सरकार को भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की भी चेतावनी दी थी।
उस दौरान भी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान का हवाला देते हुए खरगे के तमाम आरोपों का खंडन करते हुए बताया था कि यह समझौता समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाएगा। भाषण में खरगे ने कहा था कि व्यापार समझौता किसानों को बर्बाद कर देगा।
इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था, “मोदी सरकार ने अमेरिका के सभी कृषि उत्पादों पर जीरो शुल्क लगाने का जो निर्णय किया है उससे एक बात साफ है कि अमेरिका से आने वाला कपास, गेहूँ, सब्जियाँ और दूसरे कृषि उत्पाद भारतीय किसानों की फसलों पर संकट होगा।”
जबकि आँकड़े साफ कहते हैं कि यह समझौता सिर्फ किसानों के हितों को ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र के तमाम कारीगरों को भी पूरी तरह से ध्यान में रखकर लिया गया है। मसालों के मामले में भी भारत ने पूरी सख्ती दिखाई है। काली मिर्च, लौंग, सूखी हरी मिर्च, दालचीनी, धनिया, जीरा, हींग, अदरक, हल्दी, अजवाइन, मेथी, चक्रफूल, कसिया, सरसों, राई और अन्य पाउडर मसालों को पूरा संरक्षण दिया गया है।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
भारत की पहचान ही मसालों से जुड़ी हुई है और इनसे लाखों किसानों की रोजी-रोटी चलती है। इस समझौते में यह सुनिश्चित किया गया है कि अमेरिकी मसाले या उनके विकल्प भारतीय बाजार में आकर घरेलू उत्पादन को नुकसान न पहुँचा सकें।
सब्जियों के मामले में भी आलू, मटर, बीन्स और अन्य दलहनी सब्जियों के साथ-साथ फ्रोजन, डिब्बाबंद और अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियों पर कड़ा नियंत्रण रखा गया है, ताकि सब्जियों के मामले में भी भारतीय किसानों की आमदनी सुरक्षित रहे।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
डेयरी सेक्टर क्यों रहा सरकार की ‘रेड लाइन’?
डेयरी सेक्टर को लेकर भारत ने इस समझौते में सबसे कड़ा रुख अपनाया है। दूध, क्रीम, बटर, घी, चीज, योगर्ट, बटर मिल्क, व्हे प्रोडक्ट्स और अन्य डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका जैसे देश की बड़ी डेयरी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधी एंट्री नहीं दी गई है।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
इसका सीधा फायदा भारत के करोड़ों छोटे पशुपालकों को मिलेगा, जिनकी आजीविका दूध उत्पादन पर निर्भर है। भारत का डेयरी सेक्टर सहकारी मॉडल पर आधारित है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस समझौते ने यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के नाम पर इस सेक्टर को कमजोर न किया जाए।
मेक इन इंडिया, तकनीक और भविष्य की साझेदारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत और अमेरिका दोनों के लिए अच्छी खबर बताते हुए कहा है कि यह ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती देगा और निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ाएगा। दोनों देश इनोवेशन, डेटा सेंटर्स, जीपीयू, ऊर्जा और उन्नत तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में मिलकर काम करने पर सहमत हुए हैं।
भारत ने अगले पाँच साल में अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पाद, विमान और तकनीक खरीदने का इरादा भी जताया है, जिससे व्यापार संतुलन बना रहेगा और सप्लाई चेन मजबूत होगी। भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील का यह ढाँचा केवल व्यापार बढ़ाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक संतुलित समझौता है, जिसमें भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।
एक तरफ जहाँ भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील कृषि और खाद्य उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। यही संतुलन इस समझौते को खास बनाता है और यही कारण है कि इसे भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों के लिए एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
शेख हसीना और मोहम्मद युनूस बांग्लादेश में हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों का अत्याचार बढ़ रहा है और उसे सरकारी संरक्षण प्राप्त है यह बात किसी से अब छिपी नहीं है। हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बांग्लादेश की सरकार में नफरत किस कदर हावी हो गई है उसका अंदाजा यूनुस के चीफ एडवाइजर और प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम के बयान से लगाया जा सकता है। शफीकुल आलम ने एक इंटरव्यू में हिंदू संगठनों की तुलना पालतू कुत्तों से की है।
शफीकुल आलम ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ‘भारत-बांग्लादेश’ के रिश्तों को लेकर कहा है कि भारत को बांग्लादेश को भूटान नहीं समझना चाहिए। आलम ने कहा, “हसीना के दौर में खुलेआम चुनाव में धांधली हुई। इसके बावजूद किसने हसीना का समर्थन किया, लोग ये सब समझते हैं। मुझे लगता है कि यूनुस, शेख हसीना की वापसी चाहते हैं। वे वहाँ रहकर बांग्लादेश में लोगों को भड़का रही हैं।”
कट्टरंपथी उस्मान हादी की हत्या को लेकर आलम ने कहा कि उस्मान को अवामी लीग (शेख हसीना की पार्टी) के समर्थकों ने मारा है। आलम ने कहा, “हमारी रिपोर्ट्स बताती हैं कि अवामी लीग के सीनियर लीडर ने हादी को मरवाने के लिए फंडिंग की है।” बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर भी आलम ने खुलेआम झूठ बोला है। आलम का दावा है कि कम्युनल और हेट क्राइम के मामले में पिछले एक साल में सिर्फ एक ही हत्या हुई है, जिसमें दीपू चंद्र दास का मामला है। उसके मुताबिक, अवामी लीग हर हिंदू की हत्या को धार्मिक हिंसा में हुई मौत बता रही है।
वहीं, जब आलम से सवाल किया गया कि ‘हिंदू अल्पसंख्यक कम्युनिटी’ अपराध बढ़ने का डेटा जारी किया है। इस पर आलम ने कहा कि ऐसे संगठनों के नेता अवामी लीग से मिले हुए हैं। आलम ने कहा, “डेटा में से कोई भी घटना कम्युनल किलिंग की नहीं है। ज्यादातर मामले लूटपाट, आपसी रंजिश के हैं। बांग्लादेश हिंदू, बुद्ध, क्रिश्चियन परिषद नाम के संगठन और लोग हसीना के पालतू कुत्तों की तरह के हैं।”
डॉ सैयद अली हामिद और पुष्कर सिंह धामी (साभार - एबीपी/इंडियन एक्स्प्रेस) उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।
अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।
मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?
अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।
राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।
अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव
मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।
इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।
क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?
नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।
सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।
अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।
पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?
नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।
मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।
कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?
सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।
डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।
मान्यता के लिए सख्त नियम लागू
नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।
यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।
पप्पू यादव गिरफ्तार (साभार: ABP न्यूज) बिहार के पूर्णिया से लोकसभा सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को पटना पुलिस ने शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को देर रात करीब 12 बजे गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई 31 साल पुराने एक मामले में पटना की विशेष अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी आदेश के बाद की गई, जिसमें पप्पू यादव समेत तीन आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस की टीम शुक्रवार रात करीब 12 बजे मंदिरी स्थित पप्पू यादव के आवास पर पहुँची थी। गिरफ्तारी की प्रक्रिया के दौरान लगभग तीन घंटे तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही। इस दौरान पप्पू यादव की तबीयत अचानक बिगड़ गई और वे बेहोश हो गए जिसके बाद उनके समर्थकों में नाराजगी फैल गई और माहौल कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गया।
स्थिति सामान्य होने के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और अपने साथ ले गई। गिरफ्तारी के समय पप्पू यादव ने कहा कि उन्हें मामले को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा, “यह ठीक नहीं है, मेरे साथ क्या होगा यह कहना मुश्किल है।”
गिरफ्तारी के बाद देर रात उन्हें हेल्थ चेक-अप के लिए इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) ले जाया गया, जहाँ उनका मेडिकल चेकअप कराया गया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, आज (शनिवार, 7 फरवरी) उन्हें संबंधित अदालत में पेश किया जाएगा।
पप्पू यादव की गिरफ्तारी के लिए उनके आवास पर बड़े पैमाने पर पुलिस बल तैनात किया गया। कार्रवाई के दौरान सिटी एसपी के नेतृत्व में 5 डीएसपी, 6 थानेदार और करीब 100 पुलिसकर्मी मौके पर पहुँचे।
पटना के एसपी सिटी भानु प्रताप सिंह ने बताया कि यह मामला वर्ष 1995 से जुड़ा हुआ है, जिसमें न्यायिक प्रक्रिया के तहत ट्रायल चल रहा है। उन्होंने कहा कि संबंधित मामले में सांसद को अदालत में उपस्थित होना था, लेकिन तय तिथि पर उनकी उपस्थिति नहीं हुई। इसी वजह से अदालत के आदेश पर उनकी गिरफ्तारी की गई।
क्या है 31 साल पुराना केस?
विवाद की जड़ वर्ष 1995 का एक मामला है, जिसमें आरोप है कि पप्पू यादव ने पटना के गर्दनीबाग इलाके में स्थित एक मकान को किराए पर लिया था लेकिन उन्होंने इस घर पर कब्जा कर लिया। शिकायतकर्ता विनोद बिहारी लाल के अनुसार, पप्पू यादव ने मकान को व्यक्तिगत उपयोग के लिए लेने की बात कही थी बकि बाद में उसी मकान को राजनीतिक कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया गया। जब मकान मालिक को इसकी जानकारी हुई तो दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके बाद उन्होंने गर्दनीबाग थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।
यह मामला गर्दनीबाग थाना कांड संख्या 552/1995 के तहत दर्ज हुआ था, जिसमें पप्पू यादव पर धोखाधड़ी, जालसाजी, घर में अवैध प्रवेश, आपराधिक धमकी और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। लंबे समय से यह मामला सांसद-विधायक (MP-MLA) विशेष अदालत में विचाराधीन था और वहाँ इसकी नियमित सुनवाई चल रही थी।
कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, पप्पू यादव को कई बार समन जारी कर अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया, लेकिन वे निर्धारित तिथियों पर पेश नहीं हुए। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना मानते हुए पहले उनकी संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया और उसके बाद उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। कोर्ट के आदेश के अनुपालन में पटना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए शुक्रवार आधी रात उन्हें गिरफ्तार किया।
यही सत्य है कि “मोदी तेरी कब्र खुदेगी” नारे में केवल मोदी का विरोध नहीं छुपा है बल्कि इस जिसने भी यह नारा लगाया है उसने मोदी की आत्मा को जैसे किसी शूल से छलनी किया है। इस नारे को लगाने के पीछे के कारण बताते हुए राज्यसभा में मोदी वाणी ऐसी थी जैसे उसके मुंह से श्राप निकल रहे हों।
जब किसी व्यक्ति की आत्मा घायल होती है तो उसके शब्दों से सावधान रहना चाहिए।
कांग्रेस ही नहीं INDI गठबंधन को महाराज कृत्यानी द्वारा 7 नवम्बर 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दिए श्राप को याद करना होगा, जब इंदिरा गो हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेलते हुए पार्लियामेंट स्ट्रीट को लाल कर रही थी, तब उन्होंने श्राप दिया था कि "इंदिरा जिस तरह गोपाष्टमी के दिन हम निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेली जा रही है तेरी भी मौत गोपाष्टमी के दिन होगी। तेरी पार्टी को बर्बाद करने हिमालय से आधुनिक ड्रेस में एक तपस्वी आएगा..." याद करिए 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्टमी ही थी। यानि जिस तरह मोदी पर कांग्रेस और INDI गठबंधन द्वारा गालियां देने के साथ अब सफेदपोशी नक्सलियों का रूप धारण कर शारीरिक हमले की साज़िश रची जा रही है, मोदी के दिल से निकलने वाली हाय इन सबको बर्बादी की ओर धकेल रही है। हाय कभी खाली नहीं जाती।
मोदी के जीवन में बहुत आए धोखा देने वाले जो अधिकांश राजनीतिक मिट्टी में मिल गए और अब तो बिना सोचे समझे यह नारा लगाना फैशन बन गया है। यह नारा लगाने वालों में UGC प्रकरण में मोदी को फांसी लगाने वाले भी शामिल हो गए।
यह बात याद रखनी चाहिए कि कांग्रेस ने मोदी के 12 साल गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए कैसे कैसे षड़यंत्र किए वो भी सुप्रीम कोर्ट के जजों से मिलकर और मौत का सौदागर तक कहा लेकिन वह कांग्रेस 2014 में आज़ादी के बाद लोकसभा में सबसे कम 44 सीट लेकर शहीद हो गई जिसकी कुछ सांसे चल रही थी। कांग्रेस की खुद की कब्र खुद गई।
लेखक चर्चित YouTuber
कांग्रेस को मोदी ने उसकी कब्र खोदने के कारण गिनाए। मोदी ने कहा कांग्रेस मोदी की कब्र खोदना चाहती है क्योंकि -
-उसे मोदी से नफरत है, उसे इस बात से नफरत है कि एक गरीब परिवार का आदमी प्रधानमंत्री कैसे बन गया और अब तक टिका हुआ है, क्योंकि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर तो कांग्रेस अपना अधिकार समझती है;
-क्योंकि हमने 370 हटा दी और J&K का स्पेशल स्टेटस ख़त्म कर दिया, इसलिए मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं;
-हमने माओवादियों को जड़ से ख़त्म करने का काम किया, इसलिए कब्र खोदना चाहते हैं;
- हमने आतंकियों पर प्रहार किया और पाकिस्तान को घर में घुस कर मारा, इसलिए कब्र खोदनी है;
-हमने Northeast में बम, बंदूक और आतंकवाद से मुक्ति दिलाई, इसलिए कब्र खोदना चाहते हैं;
-सिंधु जल समझौता जो देश हित में नहीं था, हमने उसे ख़त्म किया, इसलिए मोदी की कब्र खोदना चाहती है कांग्रेस;
-हमने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को ठोका, इसलिए कांग्रेस को कब्र खोदनी है;
- ये “मोहब्बत की दुकान” चलाने वाले देश के एक नागरिक के हत्या कर उसकी कब्र खोदना चाहते है और फिर संविधान की किताब उठाए घूमते हैं। आखिर कौन सा कानून है संविधान में जो किसी की भी हत्या करने की अनुमति देता है।
मोदी ने कांग्रेस को चुनौती दी कि वो मेरी कब्र खोदने के नारे लगाते रहें लेकिन मुझे देश के 140 करोड़ लोगों के आशीर्वाद मिलते हैं, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
लोकसभा में एक दिन पहले कांग्रेस ने मोदी को बोलने से रोकने के लिए षड़यंत्र खेला लेकिन कुछ कथित मोदी समर्थक ही ओम बिरला को निकम्मा कह रहे है कि वो मोदी की रक्षा नहीं कर पाए जबकि ये लोग नहीं समझते कि कांग्रेस की महिला सांसदों को तैयार किया गया था मोदी से सामने जाकर हल्ला कर अपने कपडे फाड़ने का ड्रामा कर मोदी को बदनाम करने के लिए।
जो लोग ओम बिरला का विरोध कर रहे हैं, वो क्या ऐसी हालत में वहां खड़े होते। कुछ जरूरत से ज्यादा श्याणे UGC रेगुलेशन के विरोध में इतने पागल हो गए हैं कि वो मोदी को दोष दे रहे है कि उसका लोकसभा में न बोलना एक अपराधबोध है। शर्म आनी चाहिए।
मोदी का विरोध करने वाले लगता है बंगाल में चौथी बार ममता की सरकार बना कर मानेंगे क्योंकि ये UGC विरोध की छूत की बीमारी बंगाल में भी फैलाई जाएगी और बंगाल के हिंदू बिना किसी जातीय भेदभाव के ममता के गुंडों और बांग्लादेशी मुस्लिमों का 5 साल और शिकार बनेंगे।