सुप्रीम कोर्ट कैसे केंद्र को अपमानित करता है?

सुभाष चन्द्र

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की एक सभा में  Justice B.V. Nagarathna ने कहा कि केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें देश में मुकदमेबाजी की सबसे बड़ी जनक हैं और वे लगातार सामान्य मामलों तथा अपीलों को अंत तक लड़कर अदालतों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ाती है। 

* सबसे बड़ी वादी (Primary Litigant):

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सरकार केवल न्याय व्यवस्था की सहभागी नहीं है, बल्कि मुकदमेबाजी की सबसे बड़ी वजह भी है। केंद्र और राज्य सरकारें देश में सबसे अधिक मुकदमों के लिए जिम्मेदार हैं;

* लगातार अपीलें (Relentless Appeals):

हालाँकि सरकार सार्वजनिक रूप से अदालतों में लंबित मामलों पर चिंता व्यक्त करती है, लेकिन वही सरकार नियमित मामलों और अपीलों को अंतिम स्तर तक लड़कर इस लंबित बोझ को और बढ़ाती है;

* “मॉडल लिटिगेंट” का विरोधाभास:

 राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह संयमित तरीके से मुकदमे लड़े और एक “आदर्शवादी” की तरह व्यवहार करे, लेकिन न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि व्यवहार में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है;

* संस्थागत कारण (Institutional Drivers):

 उन्होंने कहा कि अक्सर नौकरशाही में जवाबदेही और जांच के भय के कारण ये अपीलें की जाती हैं। अधिकारी विवादों को सुलझाने के बजाय अदालतों में मामला जारी रखना अधिक सुरक्षित समझते हैं, ताकि उन पर लापरवाही का आरोप न लगे;

कुछ दिन पहले जस्टिस नागरत्ना ने कहा है कि “Judges who are unable to live within their known source of income and fall prey to greed and temptation must be weeded out of the system” - मतलब साफ है जज भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं

उसके भी पहले कहा था -“नोटबंदी से काला धन सफ़ेद में बदला; हम सब जानते हैं कि 8 नवंबर 2016 को क्या हुआ था, कालेधन का खत्म कहां हुआ? यह कालेधन को सफ़ेद बनाने का एक अच्छा तरीका था” यानी सीधे मोदी जी को चुनौती दी थी

यह कोई नया राग नहीं है जो जस्टिस नागरत्ना ने अलापा है

इसके पहले भी 11th August, 2023 को Justices BR Gavai, PS Narasimha, and Prashant Kumar Mishra की पीठ ने कहा था करीब 70% सरकार के केस Frivolous होते हैं सरकार litigation policy को क्रियान्वित करने की बात करती है लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है

मई, 2023 में भी जस्टिस गवई की बेंच ने कहा था करीब 40% केंद्र और राज्य सरकारों के केस आधारहीन होते हैं

मैंने एक RTI में सुप्रीम कोर्ट से जस्टिस गवई की बेंच की टिप्पणी पर पूछा था कि केंद्र सरकार कितने cases में पार्टी है मुझे 10 नवंबर, 2023 के जवाब में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हैरान करने वाली जानकारी दी गई जिसमें बताया गया कि केंद्र सरकार 11349 मामलों में Petitioner है और 35601 मामलों में Respondent है यानी 46950 मामलों में मात्र 24% केस में सरकार वादी है मतलब केवल 24% केस सरकार ने फाइल किये हुए थे

जाहिर है 11349 मामलों में सरकार की अपील भी शामिल होंगी जो हाई कोर्ट के उसके खिलाफ फैसलों के विरुद्ध फाइल की गई होंगी और इसलिए गवई बेंच का सरकार के cases को frivolous कहना उचित नहीं था

इसका मतलब साफ़ है केंद्र सरकार मुख्य Litigant है वो भी frivolous cases में कहना सही नहीं है 

ऐसा ही  सर्टिफिकेट जस्टिस नागरत्ना ने भी दे दिया क्या सरकार को किसी मामले में अपील करने का भी अधिकार नहीं है? उदाहरण के लिए क्या ट्रायल कोर्ट के शराब घोटाले में केजरीवाल गैंग को डिस्चार्ज करने के खिलाफ भी अपील नहीं करनी चाहिए? और अगर हाई कोर्ट सरकार की अपील खारिज करती है तो क्या उसे सुप्रीम कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं है?

बंगाल : TMC विधायक दिलीप मंडल फरार: पुलिस ने उनके बेटे और अन्य लोगों को अवैध हथियार रखने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया

TMC विधायक दिलीप मंडल ने बिष्णुपुर सीट से चुनाव जीतने के बाद BJP कार्यकर्ताओं को धमकी दी थी।

उन्होंने कहा था, "जाओ और शुभेंदु से पूछो कि दिलीप मंडल कौन है। जाओ अर्जुन सिंह से पूछो कि दिलीप मंडल कौन है।"
बाद में पुलिस ने FIR दर्ज की और उनके घर पर छापा मारा। मंडल पिछले दरवाज़े से भाग निकले और भागते समय एक नाले के ऊपर से कूद गए गिरते पड़ते भागे।
पिछले चार दिनों से वह फ़रार हैं।
पुलिस ने उनके बेटे और चार अन्य लोगों को अवैध हथियार रखने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया है।
यह वही विधायक हैं जिनके आलीशान घर के वीडियो, जिसमें एक स्विमिंग पूल भी था, पहले वायरल हुए थे।
आपको बताते चलूँ की मण्डल ममता बनर्जी के करीबी हैं बात इनके शान ओ शौकत की करें तो माशा अल्ला वो तो इनके पेट से बड़ी है 3 तो अलीशान महलनुमा घर नही रिज़ॉर्ट हैं अत्याधुनिक सुविधाओ से लैस। तीनो की वैल्यू कम से कम 400 करोड़ तो होगी ही।
बाकी इनके पास क्या क्या होगा अंदाज़ लगा लीजिये।
उसके बावजूद आजतक दलित शोषित वंचित हैं बेचारे दलितों का माल हक और अधिकार खाकर मोटे हो गए हैं उसके बावजूद उनका खून चूसने मे ये भी पीछे नहीं हैं
क्या भारतीय संविधान इसकी इजाजत देता है?
आप लखपति नही करोड़पति नही अरबपति नही खरबपती हो अथवा CM,PM, PRESIDENT,
IAS, PCS या जज मतलब कोई भी पद पा जाओसैकड़ों करोड़ बना जाओ फ़िर भी आप आरक्षण का आनंद लीजिये बस आप SC ST OBC हो।
यही लोग ज्यादा चिल्लाते हैं की देखो देखो पण्डित जी राजपूत साहेब तुम्हारा आरक्षण हक अधिकार खा रहे हैं संविधान बचाओ लोकतंत्र बचाओ ये बचाओ वो बचाओ
ये तो नहीं न कहेंगे हमसे खुद को बचाओ? असली दलित पिछड़े बेचारे इनको मसीहा समझते हैं।
अगर ऐसे लोग मसीहा हैं तो फ़िर लुटेरा कौन है?

बंगाल : TMC के जहाँगीर खान ने फाल्टा सीट पर मतदान से 2 दिन पहले ही नाम वापस लिया, कहा था- पुष्पा झुकेगा नहीं: चुनाव के दौरान यहीं पर EVM पर चिपकाए थे टेप

                       अभिषेक बनर्जी और TMC उम्मीदवार जहाँगीर खान (फोटो साभार : News18)
ममता के सत्ता में रहते बहुत बड़े खलीफा बन रहे जहांगीर खान चुनाव से पहले ही खुद ही हो गया चारों खाने चित। 21 तारीख को वोटिंग होनी है। यानि प्रशासक अगर सख्त हो अच्छे से अच्छा खलीफा पानी पीता नज़र आता है। ममता के राज में गुंडागर्दी मचाने वाले आज पनाह मांग रहे हैं। पश्चिम बंगाल की फालता विधानसभा सीट से एक बड़ी खबर सामने आई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवार जहाँगीर खान ने चुनावी मैदान छोड़ दिया है। जहाँगीर खान ने मतदान से महज दो दिन पहले अपना नाम वापस ले लिया है।

प्रचार खत्म होने के कुछ ही घंटे पहले हुए इस हैरान करने वाले फैसले से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जहाँगीर खान ने साफ किया है कि अब वह इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रहेंगे।

बीजेपी नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि TMC को अपनी करारी हार का अंदाजा हो चुका है। नेताओं का कहना है कि इसी डर से उम्मीदवार ने मैदान छोड़ दिया है। फाल्टा विधानसभा सीट पिछले 15 सालों से TMC का मजबूत गढ़ रही है।

बता दें कि बंगाल चुनाव के दौरान EVM पर बीजेपी के बटन पर टेप चिपकाए गए थे, जिससे कोई बीजेपी को वोट ना दे सके। बाद में चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान कराने का फैसला किया था। 

वर्जिन बच्चियों से निकाह के लिए तालिबान ने सुनाया फरमान, कहा- इनकी चुप्पी को ‘हाँ’ समझो: चुप्पी साधे बैठा रहा भारत का लिबरल गैंग

तालिबान सरकार ने वर्जिन लड़कियों की चुप्पी को माना मंजूरी, निकाह के लिए नया फरमान (फाइल फोटो साभार: The Conversation)
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया फैमिली लॉ लागू किया है और इस कानून की एक लाइन को लेकर पूरी दुनिया में बहस शुरू हो गई है। इस नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई ‘कुँवारी लड़की’ (वर्जिन लड़की) निकाह के प्रस्ताव पर कुछ नहीं बोलती, तो उसकी चुप्पी को ही उसकी मंजूरी यानी कंसेंट माना जाएगा। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठन, महिला अधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे औरतों और बच्चियों की आजादी पर एक और बड़ा हमला बता रही हैं।

क्या है तालिबान का नया फैमिली लॉ?

तालिबान ने 31 आर्टिकल वाला एक नया फैमिली रेगुलेशन जारी किया है, जिसका नाम ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस’ रखा गया है। इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। यह कानून निकाह, तलाक, नाबालिगों का निकाह, मियां-बीवी के अलगाव और पारिवारिक विवादों से जुड़े नियम तय करता है। लेकिन सबसे विवादित हिस्सा वही है, जिसमें ‘कुँवारी लड़की’ की चुप्पी को उसकी मंजूरी माना गया है।

क्या है ‘खियार अल बुलूघ’ का नियम?

इस कानून में ‘खियार अल बुलूघ‘ नाम का एक इस्लामी कानूनी सिद्धांत भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है ‘बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार।’ इसके तहत अगर किसी बच्चे का निकाह कम उम्र में तय कर दिया गया है, तो वह बालिग होने के बाद उस निकाह को खत्म करने की माँग कर सकता है।
लेकिन यहाँ एक बड़ी शर्त भी रखी गई है। निकाह खत्म करने के लिए मजहबी अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। यानी सिर्फ लड़की की इच्छा से निकाह खत्म नहीं होगा, बल्कि तालिबान की अदालत फैसला करेगी कि निकाह रद्द किया जाए या नहीं।
कानून में यह भी कहा गया है कि अगर शौहर निकाह के लिए सही नहीं माना जाता या दहेज को लेकर बहुत ज्यादा फर्क होता है, तो उस निकाह को मान्यता नहीं दी जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कौन ‘सही लड़का है’, इसका फैसला भी तालिबान की मजहबी अदालतें ही करेंगी।

नाबालिग बच्चों के निकाह को लेकर क्या कहता है कानून?

इस नए कानून में ‘बाल विवाह’ को लेकर कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में नाबालिग लड़के और लड़कियों के निकाह को मान्यता दी जा सकती है। कानून में अब्बा और दादा को बच्चों का निकाह तय करने का अधिकार दिया गया है। यानी परिवार के बड़े पुरुष यह फैसला कर सकते हैं कि लड़की का निकाह किससे और कब होगा।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर रिश्तेदारों द्वारा तय किए गए निकाह में लड़का ‘सामाजिक रूप से उपयुक्त’ माना जाता है और दहेज भी मजहबी मानकों के मुताबिक है, तो उस निकाह को वैध माना जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो अगर परिवार और मजहबी अदालत को रिश्ता सही लगता है, तो कम उम्र में हुए निकाह भी स्वीकार किए जा सकते हैं।

निजी जिंदगी में भी बढ़ेगा तालिबान सरकार का दखल

इस कानून में सिर्फ निकाह ही नहीं बल्कि कई निजी मामलों में भी तालिबान की अदालतों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। अगर किसी औरत पर व्यभिचार यानी अवैध संबंध का आरोप लगाता है, अगर कोई धर्म परिवर्तन करता है, अगर शौहर लंबे समय तक गायब रहता है या ‘जिहार’ जैसी स्थिति बनती है, तो तालिबानी जज फैसला ले सकेंगे।

‘जिहार’ इस्लामी कानून का एक पुराना सिद्धांत है जिसमें शौहर अपनी बीवी की तुलना ऐसी औरत रिश्तेदार से करता है जिससे निकाह करना मजहबी रूप से मना होता है। ऐसे मामलों में अदालत मियां-बीवी को अलग करने, जेल भेजने या दूसरी सजा देने का आदेश भी दे सकती है।

क्यों खतरनाक माना जा रहा कानून?

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी निकाह में लड़की की साफ और खुली सहमति जरूरी होती है। लेकिन अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई छठी क्लास के बाद बंद कर दी गई। औरतों को यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया। कई नौकरियों में औरतों के काम करने पर पाबंदी है और उनके अकेले यात्रा करने पर भी सख्त नियम लागू हैं।

ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की डर, दबाव या परिवार की वजह से चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ मान लेना जबरन निकाह का रास्ता खोल सकता है। जिस समाज में औरतों को खुलकर बोलने की आजादी ही नहीं हो, वहाँ ‘चुप्पी ही सहमति है’ जैसा नियम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

दुनिया भर में हो रही कानून की आलोचना

एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि निकाह में सहमति हमेशा साफ, खुली और बिना दबाव के होनी चाहिए। किसी लड़की का डर या मजबूरी में चुप रहना सहमति नहीं माना जा सकता।

कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तालिबान जिस तरह इन नियमों को मजहबी आधार पर सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वह इस्लाम की आधुनिक और व्यापक व्याख्याओं से मेल नहीं खाता। उनके मुताबिक मजहब के नाम पर औरतों की आवाज दबाना और उन्हें फैसले लेने के अधिकार से दूर रखना मानवाधिकारों के खिलाफ है।

यही कारण है कि तालिबान का यह नया कानून सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब इसे दुनिया भर में औरतों की आजादी और अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के तौर पर देखा जा रहा है।

लड़कियों की ‘चुप्पी’ पर तालिबान का कानून, लेकिन लिबरल चेहरे खामोश क्यों?

यह कानून साफ तौर पर महिला विरोधी है। यह लड़कियों से उनका सबसे बुनियादी अधिकारी यानी उनकी शादी पर फैसला लेने का हक तक छीन लेता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में खुद को लिबरल, प्रोग्रेसिव और महिला अधिकारों का समर्थक बताने वाले कई नामी इस्लामी अकाउंट्स और एक्टिविस्ट इस मुद्दे पर चुप हैं।

ये वही लोग हैं जो भारत में किसी भी मुद्द पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं और नारीवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। विदेशी मजहबी मुल्कों में मुस्लिमों से जुड़ा कोई भी मामला हो, तो सबसे पहले यही लोग आवाज उठाते नजर आते हैं। लेकिन अफगानिस्तान में लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी जाए, महिलाओं को घरों तक सीमित कर दिया जाए और अब लड़की की चुप्पी को ही शादी की मंजूरी मान लिया जाए, तब इनकी टाइमलाइन लगभग खाली नजर आती है।

न कोई बड़ा कैंपेन दिखता है, न लगातार ट्वीट्स, न रीट्वीट और न ही वैसी नाराजगी, जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। कहीं ‘सेव वूमेन’ की बात नहीं होती, कहीं ‘फेमिनिज्म’ की बहस नहीं होती और न ही महिलाओं की आजादी पर लंबे थ्रेड लिखे जाते हैं।

यही दोहरापन सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। अगर महिलाओं के अधिकार सच में सबसे ऊपर हैं, तो फिर अफगानिस्तान की लड़कियाँ भी उतनी ही अहम होनी चाहिए जितनी भारत की महिलाएँ। लेकिन अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की एक्टिविज्म और नारीवाद की आवाज सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाती है।

‘छूट मिले या न मिले, रूस से खरीदते रहेंगे तेल’: मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव को दिखाया ठेंगा


मोदी सरकार ने सोमवार (18 मई 2026) को साफ कहा कि भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा, चाहे अमेरिका की तरफ से कोई छूट मिले या नहीं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव (मार्केटिंग और ऑयल रिफाइनरी) सुजाता शर्मा ने कहा, “अमेरिका की तरफ से रूस पर छूट को लेकर मैं यह साफ करना चाहती हूँ कि भारत पहले भी रूस से तेल खरीदता था। छूट के दौरान भी खरीदता रहा और अब भी खरीद जारी रहेगी।”

उन्होंने कहा कि भारत के लिए तेल खरीदने में सबसे अहम बात आर्थिक मजबूती और व्यापारिक फायदा है। सुजाता शर्मा ने यह भी बताया कि देश में कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है और भारत से ही पर्याप्त मात्रा में तेल की व्यवस्था कर रखी है।

उन्होंने कहा, “तेल खरीदने का फैसला पूरी तरह व्यापारिक समझ और फायदे को देखकर लिया जाता है। कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है। पर्याप्त मात्रा में तेल की व्यवस्था बार-बार की गई है, इसीलिए छूट मिले या नहीं मिले इससे हमारी सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

ट्रंप प्रशासन ने इससे पहले मार्च में रूस से समुद्री रास्ते से आने वाले तेल की खरीद से जुड़ा 30 दिनों का लाइसेंस जारी किया था। बाद में इस छूट की अवधि 16 मई तक बढ़ा दी थी। खास बात यह है कि भारत ने कभी भी रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया। साल 2022 में रूस से सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने के बाद भारत ने बड़ी मात्रा में खरीद शुरू की थी और तब से खरीद में बढ़ोतरी या कमी सप्लाई और आर्थिक स्थिति के हिसाब से होती रही है।

अमेरिका के इस दावे के बावजूद कि उसने भारत को रूसी तेल खरीदने से रोक दिया है। फरवरी 2026 में भारत ने अपने कुल कच्चे तेल का 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रूस से आयात किया। भारत सरकार कई बार, यहाँ तक कि संसद में भी साफ कर चुकी है कि किसी भी देश से कच्चा तेल खरीदना भारत का संप्रभु फैसला है, जो देशहित को ध्यान में रखकर लिया जाता है। भारत अपने जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, इसीलिए जहाँ तेल सस्ता मिलता है भारत वहीं से खरीदता है।

इतना ही नहीं, ट्रंप प्रशासन ने खुद माना था कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने से दुनिया में तेल की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं। पिछले साल भारत के विदेश मंत्रालय ने भी बताया था कि अमेरिकी सरकार ने भारत से कहा था कि वह रूस से तेल खरीदना जारी रखे, ताकि वैश्विक तेल बाजार स्थिर बना रहे। हालाँकि, बाद में अमेरिका ने अपना ही रुख बदलते हुए रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया।

भारत ने साफ संकेत दिए हैं कि मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के बीच भी देश की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हित उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता बने रहेंगे।

5 साल मुसलमानों का काम नहीं करूँगा : रितेश तिवारी, बीजेपी विधायक

                                                                                                      साभार : सोशल मीडिया 
आज कल सोशल मीडिया पर एक बीजेपी विधायक रितेश तिवारी का बयान बहुत वायरल हो रहा है। हालाँकि ना ही पुष्टि हो पायी है और ना ही तिवारी द्वारा इसका खंडन किया गया है। अगर तिवारी के इस बयान में सच्चाई है तो इसके जिम्मेदार मुसलमानों का दोगलापन है जो सरकार की हर सुविधा का लाभ तो उठाना जानते हैं लेकिन बीजेपी को हराने के लिए एकजुट होकर विरोध में वोट देना। चर्चा यह भी है कि BPL और अन्य सुविधाओं का लाभ उठाने वालों की जाँच करने की मुहिम भी चलाए जाने का अंदेशा दर्शाया जा रहा है। 
मुसलमान गोधरा के लिए नरेंद्र मोदी को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ता लेकिन सच्चाई जानने की कोशिश नहीं करता। ये मोदी ही है जिसने गुजरात में होते दंगों पर लगाम लगाई है। 2002 दंगों से पहले हुए दंगों में कितने मुसलमानों की जानें गयी भूल जाता है। कांग्रेस के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश के मलियाना में अलविदा नमाज के दौरान हुए दंगे में कितने मुसलमानों की जाने गयीं। इतना ही नहीं जितने दंगे कांग्रेस कार्यकाल में हुए किसी पार्टी के राज में नहीं हुए। मुसलमान कट्टरपंथियों और छद्दम सेक्युलरिस्ट्स के कहने पर हर दंगे के लिए तत्कालीन जनसंघ वर्तमान बीजेपी को ही दोषी मानती है।  
ये सेकुलरिज्म का जहर पिलाकर हिन्दुओं को गुमराह करते है, कहते बीजेपी मुसलमानों को न टिकट देती है और न ही मंत्री बनाती है क्यों बनाये या टिकट दे। मुसलमान बीजेपी उम्मीदवार हिन्दू क्षेत्रों से जीतता आता है लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों की EVM खुलने से अपने जमानत जब्त करवा लेता है। 
जहाँ तक तिवारी के बयान की बात है, तिवारी की बात में दम ही नहीं बल्कि तत्कालीन चावड़ी बाजार वर्तमान मटिया महल विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनसंघ के महानगर पार्षद(उन दिनों आज की विधानसभा को महानगर परिषद् और जीतने वाले को महानगर पार्षद कहते थे) अनवर अली देहलवी की बात याद आती है जो मुसलमानों को साफ कहते थे कि "पहले हिन्दुओं का काम करूँगा मुझे जिताने वाला चरखे वालन का हिन्दू है लाल दरवाज़े के मुसलमानों ने मुझे हरा दिया था।" अनवर और दलजीत टंडन को दूसरा वाजपेयी कहा जाता था। जिस पब्लिक मीटिंग में अटल बिहारी नहीं पहुँच पाते थे वहां अनवर या दलजीत का नाम पोस्टरों पर होता था और भीड़ में कोई कोई कमी नहीं होती थी। देश में आपातकाल लगने से पहले तक जामा मस्जिद, गेट नंबर 1 के सामने निवास एवं कार्यालय होने के कारण जनसंघ का झंडा लहराता था। उस समय दिल्ली से 5 महानगर पार्षद जनसंघ से जीतकर महानगर परिषद् पहुंचे थे। इतना ही नहीं दो/तीन चुनाव पहले लिखा था कि बीजेपी मंडल अध्यक्ष के पोलिंग बूथ से बीजेपी को जीरो(00000000)वोट मिली थी। यानि मंडल अध्यक्ष ने भी अपनी पार्टी को वोट नहीं दिया।         
रितेश तिवारी जी का बयान बहुत लोगों को बुरा लग रहा है लेकिन किस एंगल से बुरा है, यह कोई नहीं बता सकता? अगर लड़ाई में हमारा जो साथ दिया है, मैं उसके साथ खड़ा रहूंगा या जो मुझे मारने के लिए आया है, मैं उसके साथ खड़ा रहूंगा यह कोई बता सकता है?

याद करिए वह कांग्रेस का जमाना, जब कोई अवार्ड बाटना होगा, कोई पेट्रोल पंप देना होगा, कोई गैस एजेंसी क्या लाइसेंस इश्यू करना होगा, तो कांग्रेस पहले अपने आदमियों को ढूंढती थी, और आज भी ढूंढती है, लेकिन यही काम अगर कांग्रेस के जगह पर बीजेपी करती है तो आपको बुरा क्यों लगता है? आप करें तो प्यार हम करें तो बलात्कार नहीं चलेगा । जमाना बदल गया है दूसरे एंगल से सोची ये।
कोई मर्द है तो बता दे भारत में कहीं भी गैस एजेंसी अगर 20 साल 30 साल पहले खुली है तो किसी गैर कांग्रेसी को मिला हो? और यही बात अगर तिवारी जी कहते हैं कि भाई जो मेरा साथ दिया है मैं उसका साथ दूंगा तो इसमें बुरा क्या है।
मोदी जी की आईडियोलॉजी अब बदलेगी उनका कहना है सबका साथ सबका विश्वास सबका प्रयास सबका साथ क्यों भाई जो आपका दुश्मन है उसका साथ क्यों दोगे क्यों जो चिल्ला चिल्ला के बोल रहा है कि बीजेपी को वोट मत दीजिए मत दीजिए मत दीजिए और फिर उसी के साथ आप क्यों जाएंगे वह तो हत्या कर देगा आपकी ।

रोहिणी कोर्ट के जज का वीडियो वायरल करने पर DJSA ने जताई कड़ी आपत्ति, वकीलों की ओर से जजों को धमकाने को न्यायपालिका पर बताया सीधा हमला

                                          रोहिणी कोर्ट के वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट
दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन (DJSA) ने रोहिणी कोर्ट के डिस्ट्रिक्ट जज राकेश कुमार-V का अदालती कार्यवाही के दौरान बिना अनुमति वीडियो रिकॉर्ड करने और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने की घटना की कड़ी निंदा की है। एसोसिएशन ने रविवार (18 मई 2026) को जारी एक आधिकारिक बयान में इस कृत्य पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा के लिए एक गंभीर खतरा बताया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस विवादित वीडियो के सामने आने के बाद जज राकेश कुमार-V को न्यायिक कार्य से मुक्त कर दिल्ली न्यायिक अकादमी से संबद्ध कर दिया है।

एसोसिएशन ने अपने पत्र में सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “न्यायिक कार्यवाही की गुप्त रूप से रिकॉर्डिंग करना और उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल करना न केवल घोर अनुचित है, बल्कि यह न्यायिक संस्थान की गरिमा, स्वतंत्रता और महिमा पर सीधा हमला है। ऐसे गैर-कानूनी और लापरवाही भरे कृत्य अदालतों को बदनाम करने, न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को कमजोर करने और न्यायिक अधिकारियों को उनके संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान डराने, बदनाम करने और सार्वजनिक दबाव में लाने के उद्देश्य से किए जाते हैं।”

इसके साथ ही वकीलों के एक वर्ग द्वारा न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने और काम का बहिष्कार करने पर भी एसोसिएशन ने तीखी आपत्ति जताई। पत्र में आगे कहा गया, “बार के कुछ सदस्यों द्वारा न्यायिक अधिकारियों को खुलेआम धमकी देना, डराना और उनके कानूनी कर्तव्यों में बाधा डालने का प्रयास करना कानून के शासन वाले संवैधानिक लोकतंत्र में पूरी तरह से अस्वीकार्य है। अगर ऐसे दबाव और सार्वजनिक बदनामी को बर्दाश्त किया गया, तो कोई भी न्यायिक अधिकारी निडर होकर काम नहीं कर पाएगा। हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी वकीलों द्वारा न्यायिक कार्य से दूर रहना जनता को बंधक बनाने और न्याय व्यवस्था को पंगु बनाने जैसा है।”

डीजेएसए ने जज राकेश कुमार और पूरे न्यायिक बिरादरी के साथ एकजुटता दोहराते हुए कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। एसोसिएशन ने दिल्ली हाई कोर्ट से सोशल मीडिया से इन वायरल वीडियो क्लिपों को तुरंत हटाने का निर्देश देने की मांग की है। यह पूरा विवाद को-ऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ ऑल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशंस द्वारा जज के तबादले और जांच की मांग को लेकर काम बंद करने के आह्वान के बाद और गरमा गया है।

चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल में कौन होगा? क्या सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था; नहीं, तो अब क्यों सवाल उठा रहा है सुप्रीम कोर्ट?

सुभाष चन्द्र

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बने कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश सी शर्मा की खंडपीठ ने सवाल उठाया है कि चयन पैनल में कैबिनेट मंत्री क्यों होना चाहिए? तीसरा व्यक्ति निष्पक्ष होना चाहिए

यह प्रश्न करने से पहले 2 मार्च, 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गौर करना चाहिए जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम बनाने के आदेश दिए गए थे। इस कॉलेजियम में प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और चीफ जस्टिस को रखा गया था और यदि आधिकारिक नेता विपक्ष न हो, तो सबसे बड़े दल के नेता को विपक्षी नेता की जगह रखा जाएगा

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कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि “यह व्यवस्था संसद द्वारा इस बारे में कानून बनाए जाने तक लागू रहेगी” - यानी जब तक संसद कानून बना कर वैकल्पिक समिति/चयन प्रक्रिया निर्धारित नहीं कर देती तब तक कॉलेजियम जारी रहेगा 

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश 5 जजों की संविधान पीठ ने दिया था जिसमें न्यायाधीश शामिल थे

जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस हृषिकेश रॉय, जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस अजय रस्तोगी यह निर्णय आयोग को स्वतंत्र बनाने के उद्देश्य से दिया गया था और जस्टिस जोसेफ ने बहुत प्रफुल्लित थे और उन्होंने कहा कि “अदालतें कानून नहीं बना सकती, यह मिथक बहुत पहले ही टूट चुका है” इसका मतलब था सुप्रीम कोर्ट संसद की तरह कानून बना सकता है उन्होंने इसके लिए टिप्पणी की थी कि जब संसद अपने किसी विशेषाधिकार उल्लंघन के लिए समन या दंडित करती है तो वह न्यायपालिका की भूमिका निभाते है मतलब हमने भी संसद के अधिकार का उपयोग किया है 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपनी टिप्पणियों में एक तरह यह कहा कि चुनाव आयोग निष्पक्ष काम नहीं कर रहा है और इसलिए चयन प्रक्रिया के लिए कॉलेजियम बनाया गया है यह भाषा किसी भी विपक्ष दल की थी

लेकिन पीठ ने यह नहीं कहा था कि संसद अगर कानून बना कर कॉलेजियम से इतर कोई चयन समिति का गठन करती है तो उसमें कौन कौन सदस्य होने चाहिए? उसमें ये नहीं कहा गया था कि चयन समिति में चीफ जस्टिस को भी रखना जरूरी होगा तो फिर आप आज क्यों पूछ रहे है कि चयन समिति में कोई मंत्री कैसे हो सकता है? यानी आप अपने ही फैसले की समीक्षा कर रहे हैं?

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को साफ़ बताया है कि चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है

CBI और Vigilance Chief की नियुक्ति में चीफ जस्टिस शामिल होता है लेकिन NJAC में कॉलेजियम में कानून मंत्री का होना आपको गंवारा नहीं था क्योंकि उसे आपने न्यायिक स्वतंत्रता में खलल माना था फिर आप कैसे कार्यपालिका के क्षेत्र में कैसे दखल दे रहे हैं? यह दोहरा मापदंड किस तरह उचित है?

पौराणिक गाथा : जिस कुंवारी जमीन पर हुआ था दानवीर कर्ण का अंतिम संस्कार वहां वट वृक्ष पर उगते हैं 3 पत्ते


जब महाभारत का युद्ध चल रहा था और अर्जुन-कर्ण के बीच युद्ध चल रहा था, तब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया। तब कर्ण ने भीष्म पितामह के बनाएं नियमों की बात करते हुए अर्जुन से कहा, "हे अर्जुन, जब तक मैं रथ का पहिया नहीं निकाल लेता, तब तक तुम मुझ पर आक्रमण नहीं करोगे।" यह सुनकर अर्जुन रुक गया। तब भगवान कृष्ण ने कहा, ‘हे अर्जुन, तुम क्यों रुके? तीर मारो।’ जब अर्जुन ने कहा कि वह युद्ध के खिलाफ है। तब भगवान कृष्ण ने याद दिलाया कि अभिमन्यु एक अकेले योद्धा से लड़ रहा था, तब युद्ध के नियम ज्ञात नहीं थे। भरी सभा में जब द्रोपदी से अपशब्द कहे गये तो नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ?

इन शब्दों को सुनकर अर्जुन क्रोधित हो गए और उन्होंने कर्ण पर भगवान शिवजी का दिया हुआ अस्त्र चला दिया। अर्जुन के इस बाण से कर्ण मृत्यु के समीप पहुँच गया। जब कर्ण अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था तब भगवान कृष्ण ने कर्ण की परीक्षा लेने का विचार किया। भगवान कृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और कहा, ‘हे कर्ण, मेरी बेटी की शादी हो रही है और मेरे पास उसे देने के लिए सोना नहीं है, इसलिए मुझे सोना दो।’ तब कर्ण ने कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है। मैं तुम्हें क्या दान कर सकता हूं। तब ब्राह्मण ने कहा कि तुम्हारे पास सोने का दांत है। वह दान कर दो। कर्ण ने कहा कि मुझे एक पत्थर से मारो और मेरा दांत निकाल दो। ब्राह्मण ने ऐसा करने से मनाकर दिया और कहा कि दान तो खुद ही करना पड़ता है।
इसके बाद कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर ब्राह्मण को दे दिया। इस पर ब्राह्मण ने कहा कि यह दांत तो खून में गंदा हो गया उसे साफ करो। इस पर कर्ण ने अपने धनुष से धरती पर बाण चलाया तो वहां से गंगा की तेज जलधारा निकल पड़ी। उससे दांत धोकर कर्ण ने कहा अब तो ये शुद्ध हो गया। इसके बाद भगवान कृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। श्रीकृष्ण ने तब कर्ण से कहा था कि ‘‘तुम्हारी यह बाण गंगा युग युगों तक तुम्हारा गुणगान करती रहेगी।‘‘ घायल कर्ण को श्रीकृष्ण ने आशीर्वाद दिया था कि ”जब तक सूर्य, चन्द्र, तारे और पृथ्वी रहेंगे, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में किया जाएगा। संसार में तुम्हारे समान महान दानवीर न तो हुआ है और न कभी होगा।"
श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं। कर्ण ने कृष्णजी से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने के कारण उसके साथ बहुत छल हुए हैं। अगली बार जब कृष्णजी धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें। इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे। दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्णजी उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार एक कुंवारी भूमि पर करना।
मान्यता है कि भगवान को पूरी पृथ्वी पर भूमि का कोई ऐसा टुकड़ा नहीं मिला, जहां पहले किसी व्यक्ति का दाह संस्कार न हुआ हो। काफी तलाशने के बाद उन्हें केवल सूरत शहर में ताप्ती नदी के किनारे एक इंच जमीन ही ऐसी मिली, जहां पहले कभी किसी का शवदाह नहीं हुआ था। यहां एक इंच भूमि पर शव रखना असंभव था. ऐसे में भगवान कृष्ण ने उस भूमि के टुकड़े पर पहले एक बाण रखा। इसके बाद उस पर कर्ण के शरीर को रखकर दाह संस्कार किया। इस जगह को अब लोग 'तुल्सीबड़ी मंदिर' के रूप में पहचानते हैं
तापी नदी के किनारे कर्ण का शवदाह किए जाने के पश्चात् पांडवों ने जब कुंवारी भूमि होने पर शंका जताई तो श्रीकृष्णजी ने कर्ण को प्रकट करके उससे आकाशवाणी द्वारा कहलाया था कि वो सूर्य के पुत्र हैं और अश्विनी और कुमार उनके भाई हैं। तापी उनकी बहन हैं। उनका अग्निदाह कुंवारी भूमि पर ही किया गया है। पांडवों ने कहा हमें तो पता चल गया परंतु आने वाले युगों को कैसे पता चलेगा? तब भगवान कृष्ण ने कहा कि यहां पर तीन पत्रों का वट वृ़क्ष होगा जो ब्रह्मा, विष्णु, और महेश का प्रतीक रूप होगा।
यहां तीन पत्ता बड़ का एक मंदिर है। यहां बरगद का एक पेड़ है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह हजारों साल पुराना है, लेकिन इस पर आज तक सिर्फ 3 पत्ते ही आए हैं जो आज भी हरे-भरे हैं। शायद यही कारण है कि वट(बरगद) वृक्ष की दीर्घ आयु होती है। 
  
ऐसी मान्यता है कि यहां कोई भी सच्चे विश्वास के साथ प्रार्थना करेगा तो उसका मनोरथ कार्य अवश्य पूर्ण होगा।

ईरान की मस्जिदों में महिलाओं समेत सबको दी जा रही एके-47 चलाने की ट्रेनिंग, मीडिया के जरिए किया जा रहा प्रचार: स्टूडियो में एंकर भी राइफल लिए नजर आए

                                 ईरान में हथियारों की ट्रेनिंग (फोटो साभार-iran news)
ईरान के सरकारी टेलीविजन ने कई शहरों की मस्जिदों में पुरुषों और महिलाओं को हथियारों का प्रशिक्षण देते हुए दिखाया गया। इसे देश की रक्षा के लिए जनता की तैयारी का हिस्सा बताया गया।

शनिवार (16 मई 2026) को प्रसारित रिपोर्ट के मुताबिक, अहवाज, केरमान, बीजार, शिराज और जहेदान की मस्जिदों में लोगों की भीड़ दिखाई दी। इस दौरान कुछ लोगों को हथियार चलाते और एक साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया। न्यूज रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और टीन एज को आत्मरक्षा के लिए इस तरह का प्रशिक्षण दिया गया।

सरकारी टेलीविजन के अनुसार, प्रशिक्षण के दौरान लोगों को अलग अलग हल्के हथियारों से परिचित कराया गया, उन्हें यह सिखाया गया कि वे कैसे काम करते हैं, और उन्हें कैसे जोड़ा और अलग किया जाता है।

इससे पहले ईरान के सरकारी टेलीविजन ने शुक्रवार रात कई कार्यक्रम दिखाए, जिनमें एंकर स्टूडियो में राइफलें लिए नजर आ रहे थे। उन्होंने कहा कि वे हथियारों को इस्तेमाल करने की बुनियादी ट्रेनिंग ले रहे हैं और जरूरत पड़ने पर जंग में शामिल होंगे।

शुक्रवार को ऐसे तीन कार्यक्रम प्रसारित किए गए। इन्हें ईरानी मीडिया आउटलेट्स ने भी दिखाया, जिसके बाद ऑनलाइन इस पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इन हिस्सों को जंग की तैयारी के तौर पर देखा।

ईरान के जबरदस्त समर्थक और इजरायल विरोधी माने जाते वाले अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार और इन्फ़्लुएंसर जैकसन हिंकल ने X पर लिखा कि ईरानी सरकारी टीवी यह दिखा रहा है कि AK-47 का इस्तेमाल और उसे कैसे चलाया जाए। उन्होंने इसे ‘अमेरिका के जमीनी हमले की तैयारी’ का जवाब बताया।

हथियारों और जंग से जुड़े वीडियो पर फ़ोकस करने वाले एक अन्य अकाउंट ने कहा कि ईरानी टीवी चैनल हथियारों को इस्तेमाल करने के बुनियादी निर्देश दे रहे हैं। उसने यह भी बताया कि जो राइफ़ल दिखाई गई थी, वह शुरुआती दौर की ईस्ट जर्मन MPi-KMS असॉल्ट राइफल लग रही थी।

ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जंग फिर से शुरू होने की आशंका के बीच ऐसे वीडियो ईरान की तैयारी को बताता है।

बंगाल : ‘मुसलमानो, गायों की कुर्बानी मत देना’ : भाजपा आने के बाद नखोदा मस्जिद के इमाम ने बकरीद से पहले की अपील, कहा- पहले अलग थी बात, अब बदल गई है सरकार

                          बकरीद से पहले मौलाना की अपील (फोटो साभार- डेली हिंदी, नवभारत टाइम्स और किसान तक)
बंगाल में पशु वध अधिनियम को लेकर हुई सख्ती के बाद नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने मुसलमानों से अपील की है कि बकरीद पर गायों की कुर्बानी न दी जाए।

इमाम की इस अपील साफ शब्दों में बता रही है कि बंगाल में ममता के राज में किस तरह गौ हत्या करना आम बात थी। लेकिन सरकार बदलते ही अब तेवर बदलने शुरू हो गए हैं। इस अपील से यह भी जाहिर होता है कि किस तरह ममता के राज में सनातन का खुलेआम क़त्ल हो रहा है। अब देखना यह है कि खुले में किसी भैसे, बैल या ऊंट की कुर्बानी दे जाएगी या नहीं।   

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने जो पशु वध को लेकर नए नियम जारी किए हैं उसके बाद गाय की कुर्बानी देना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो गया है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय के लोग गाय की नहीं बल्कि बकरियों की कुर्बानी को प्राथमिकता दें।

मौलाना कासमी ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को समझाया कि पहले की सरकार की बात अलग थी इस सरकार की बात अलग है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 से लागू है, लेकिन मौजूदा सरकार इसे पहले की तुलना में अधिक सख्ती से लागू कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने मुसलमानों को छूट तो दी, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला।

कासमी ने सरकार के लिए भी अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि सरकार यदि पशु वध के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं करा सकती, तो उसे गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देशभर में गोवध और गोमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने माँग की कि हर इलाके में आधुनिक बूचड़खाने बनाए जाएँ और बाजारों में पशु चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में पशु वध को लेकर नई अधिसूचना जारी की है। इसके तहत बिना सरकारी स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के किसी भी पशु के वध पर रोक लगा दी गई है। अधिकारियों को प्रमाण पत्र जारी करने से पहले पशुओं की उम्र और उनकी शारीरिक स्थिति की जांच करनी होगी।

7 अक्टूबर के हमले के मास्टरमाइंड को इजरायल ने किया ढेर, गाजा में हमास कमांडर इज-अल-दीन अल-हदाद पर बरसाए बम

                             हमास के सैन्य प्रमुख अल-हद्दाद का शव (फोटो साभार - टाइम्स नाउ)
इजरायल और हमास के बीच जारी संघर्ष के बीच इजरायल की सेना (IDF) ने गाजा सिटी में सटीक हवाई हमले किए। इन हमलों में हमास की सैन्य शाखा का कमांडर इज-अल-दीन अल-हदाद ढेर हो गया है।

यह कार्रवाई शुक्रवार (15 मई 2026) को की गई, जबकि इसकी पुष्टि IDF ने शनिवार (16 मई 2026) को की। अल-हदाद को 7 अक्टूबर 2023 के इजरायल पर हुए बड़े हमले का मास्टरमाइंड और हमास के सबसे वरिष्ठ सैन्य नेताओं में से एक माना जाता था।

इजरायल के अनुसार, वह हाल के समय में गाजा में हमास की सैन्य क्षमता को फिर से मजबूत करने और नए हमलों की योजना बनाने में लगा हुआ था।

इजरायली सेना प्रमुख ने इस कार्रवाई को एक महत्वपूर्ण ऑपरेशनल सफलता बताया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रक्षा मंत्री ने भी बयान जारी कर कहा कि यह हमला खुफिया जानकारी के आधार पर किया गया था और इसे योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।

जानकारी के मुताबिक, हमले से पहले इजरायली वायुसेना ने एक डिसेप्शन ऑपरेशन भी चलाया ताकि हमास को किसी तरह की भनक न लगे। इजरायली सेना का दावा है कि अल-हदाद लंबे समय से बंधकों के नेटवर्क और हमास की सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित कर रहा था और खुद को बचाने के लिए बंधकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करता था।

बंधकों, युद्ध और गाजा में जारी संघर्ष की स्थिति

इजरायल का कहना है कि अल-हदाद 1980 के दशक से हमास से जुड़ा था और 7 अक्तूबर 2023 के हमलों में उसकी अहम भूमिका थी, जिसमें लगभग 1200 लोग मारे गए थे और 250 से अधिक को बंधक बनाया गया था। वह मोहम्मद सिनवार की मौत के बाद हमास की सैन्य कमान संभाल रहा था। इस हमले में उसके परिवार के कुछ सदस्य भी मारे गए होने की खबर है।

नेताओं की तरह सूर्यकांत जी ने सफाई दी

सुभाष चन्द्र

यह तो राजनेताओं का चलन है कि जहां उनके बयान की छीछलेदार होती, तो वे तुरंत सफाई देते हैं कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है भले ही वह बयान मीडिया के वीडियो में साफ़ सुनाई दे रहा हो एक बात और कह देते हैं राजनेता कि उनके बयान से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची है तो उसके लिए मुझे खेद है। 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी राजनेताओं की तरह पलटी खाई और सफाई दी कि “मीडिया के एक वर्ग द्वारा उनकी मौखिक टिप्पणी को गलत तरीके से पेश किया गया है” उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना देश के युवाओं के खिलाफ नहीं थी, बल्कि फर्जी डिग्री के सहारे विभिन्न पेशों में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ थी लेकिन नेताओं की तरह बस “खेद” व्यक्त नहीं किया

Live Law ने सूर्यकांत जी के बयान को इस भाषा में प्रकाशित किया था 

“There are youngsters like Cockroaches, who don’t get any employment and don’t  have any place in the profession. Some of them become media, some of them become social media, some of them become RTI activist, some of them become other activists and they start attacking everyone”.

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इस बयान में कहीं यह स्पष्ट नहीं है कि आप केवल वकालत जैसे नोबल प्रोफेशन में फर्जी डिग्री धारकों की बात कर रहे हैं जैसा अब आप स्पष्टीकरण दे रहे हैं आपने तो सारे बेरोजगार युवाओं को एक लाठी हाँक दिया था विभिन्न पेशों में फर्जी डिग्रियों के सहारे घुसे लोगों की बात होती तो आप सभी की डिग्रियों की जांच की बात करते जबकि आपने केवल दिल्ली के सभी वकीलों की डिग्रियों की CBI से जांच की बात की

अब सूर्यकांत जी स्पष्टीकरण दे रहे हैं कि “मुझे न केवल हमारे वर्तमान युवा और भविष्य के मानव संसाधन पर गर्व है, बल्कि भारत का हर युवा मुझे प्रेरित करता है और यह भी कहा कि हमारे युवा विकसित भारत के स्तम्भ हैं और वे देश के युवाओं का बहुत सम्मान और आदर करते हैं”

मैंने कल लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल 2023 को रिटायर्ड जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय समिति बनाई थी 25 लाख वकीलों और जजों की डिग्रियों के सत्यापन के लिए और समिति को 31 अगस्त, 2023 तक रिपोर्ट देने को कहा था मैंने यह भी बताया था कि कैसे मुझे सुप्रीम कोर्ट के CPIO ने रिपोर्ट के स्टेटस की जानकारी देने से मना करते हुए यहां तक कहा कि आपको तो सूचना मांगने का अधिकार ही नहीं है क्योंकि आप केस में पार्टी नहीं हो 

क्या किसी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट के बारे में सूचना मांगने का भी अधिकार नहीं है यदि वह केस में पार्टी नहीं है? इस तरह का उत्तर कोई “परजीवी” अधिकारी ही दे सकता है 

करीब तीन साल से डी के गुप्ता समिति ने कोई अंतरिम रिपोर्ट भी नहीं दी है जबकि honorarium बराबर मिल रहा होगा किसकी जेब से पैसा खर्च हो रहा है पहले उस समिति से अभी तक सत्यापित की डिग्रियों की रिपोर्ट तो तलब कीजिए शायद उसमे ही दिल्ली के वकीलों की जानकारी निकल आए और CBI जांच की जरूरत ही न पड़े और हां, डी के गुप्ता समिति को यथाशीघ्र काम पूरा करने के लिए कहा जाए 

हो सकता है आपकी मंशा वह न रही हो जैसा मीडिया में बताया लेकिन नूपुर शर्मा को तो आपने जस्टिस परदीवाला के साथ पूरी तरह सोच समझ कर अपमानित किया था जबकि विदेशी शक्तियां तक उसके कथित बयान पर सरकार को घेर रही थी और आपने आग में घी डालने का काम किया नूपुर को सारे फसाद की जड़ बता कर आप दोनों जज छोटे नहीं हो जाते अगर आप उससे अपने शब्दों के लिए अफ़सोस ही प्रकट कर देते

चलिए आपने तो स्पष्टीकरण दे दिया लेकिन यह भी सत्य है कि कई बार जजों द्वारा अवांछनीय टिप्पणियां की जाती है को judicial decorum को शोभा नहीं देती

बंगाल में योगी मॉडल लागू करेगी BJP सरकार, उपद्रवियों से वसूला जाएगा नुकसान: डायमंड हार्बर से बोले मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी


पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शनिवार (16 मई 2026) को डायमंड हार्बर क्षेत्र में एक अहम प्रशासनिक बैठक कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की।

यह इलाका लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिए कि अब राज्य में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और हिंसा या तोड़फोड़ की कीमत सीधे आरोपियों को चुकानी पड़ेगी।

आसनसोल में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए सुवेंदु ने कहा, “आसनसोल में जो अप्रिय घटना हुई थी, उस पर हमारी सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है। पुलिस ने अब तक इस मामले में संलिप्त 15 उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया है। तोड़-फोड़ और हिंसा के लिए जिम्मेदार इन सभी आरोपियों को पुलिस हिरासत, रिमांड और कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ेगा।”

उन्होंने कहा कि राज्य में किसी भी स्थिति में अराजकता फैलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और पुलिस को पूरी सख्ती के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

‘योगी मॉडल’ की तर्ज पर भरपाई की नीति, सीएम ने कहा- एजेंसियों को दी जाएगी खुली छूट

मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की तर्ज पर नई नीति लागू करने का संकेत देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों से पूरी क्षतिपूर्ति वसूली जाएगी। उन्होंने कहा, “किसी को भी बंगाल में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “आसनसोल घटना या भविष्य में होने वाली किसी भी ऐसी तोड़फोड़ के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई सीधे आरोपियों के निजी फंड और संपत्तियों से कराई जाएगी। यह कदम राज्य में कानून का राज स्थापित करने के लिए बेहद जरूरी है।”

अंत में सुवेंदु कहा, “पूर्ववर्ती व्यवस्था के दौरान CID और अन्य राज्य स्तरीय जाँच एजेंसियों का कानून-व्यवस्था सुधारने में पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया था। हमारी सरकार अब इन पेशेवर एजेंसियों को खुली छूट देगी ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई कर सकें।”

वाह शुभेंदु अधिकारी वाह ! दिल जीत लिया

कांग्रेस के हटते ही धीरे धीरे नर्क में बदले जा रहे बंगाल में 50 बरस बाद लागू कर दिया योगी मॉडल! सोमवार से सभी स्कूलों में वन्देमातरम अनिवार्य। धर्मस्थलों से हटेंगे लाउडस्पीकर। गौ हत्या और गौ कटान पर पूरी तरह प्रतिबंध। गरीबों और मजदूरों के लिए 5 रूपए में माछ भात । सीमावर्ती तमाम जिलों में बॉर्डर पर फैंसिंग के लिए 6 महीनों के भीतर लैंड ट्रान्सफर। मदरसों की गतिविधियों की पड़ताल, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर सख्त एक्शन। गुंडा माफियाओं के खिलाफ ऑपरेशन लंगड़ा। घुसपैठियों को चुनचुनकर निकालने की तैयारी।

80 साल बाद बंगाल में खुशियों की बहार। छह दिनों में ही शुभेंदु के ताबड़तोड़ फैसलों से ममता बनर्जी इतनी बौखलाई कि वकीलों की ड्रेस और काला कोट पहनकर हाईकोर्ट पहुंच गई। छह ही दिनों में सरकार पर आरोपों की बौछार कर दी। अरी दीदी सब्र करो थोड़ा धीरज धरो। अभी शुभेंदु के पास 5 साल ही नहीं हैं, लंबा भविष्य भी है। बंगाल की जनता ममता से इसकदर ऊब चुकी है कि उनकी सूरत नहीं देखनी चाहते। तभी तो ममता जैसे ही कोर्ट से बाहर निकलीं, लोगों ने चोर चोर के नारे लगाने शुरू कर दिए। याद कीजिए ऐसे ही नारे अभी हाल ही में महुआ मोइत्रा के विरुद्ध भी लगे जब वे प्लेन में कोलकाता से दिल्ली पहुंची। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बंगाल बार से ममता के लाइसेंस की बाबत रिकॉर्ड तलब किया है।
तृणमूल को अभी यह झेलना होगा, ममता समझ लें। थोड़ा रुकिए ममता दीदी, आपके भतीजे अभिषेक को अभी काफी भुगतना है। अपने भ्रष्टाचार, कटमनी, तोलाबाजी और धमकियों के लिए अभिषेक को अभी जेलें भी काटनी हैं। यही नहीं घुसपैठियों की बदौलत बंगाल की डेमोग्राफी बदलने वाली ममता को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय जांच एजेंसियों को बंधक बनाने लेने के लिए काफी कुछ झेलना है। अभिषेक को मुख्यमंत्री पद देकर दिल्ली की राजनीति करते हुए प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न तो चकनाचूर हुआ। हां सब ठीक चला तो वे राज्यसभा के रास्ते दिल्ली पहुंचकर दिल्ली में इंडी का नेतृत्व संभाल सकती हैं। बशर्ते कि ममता से मुंह फेर चुके राहुल गांधी अपना सपना वापस ले लें।
तो ममता बनर्जी, आपका खेल खत्म हो चुका है। वामपंथियों ने 35 साल और अपने 15 साल बड़े जुल्म ढहाए। इस बॉर्डर स्टेट को भारत से अलग करने का षड्यंत्र किया, राज्यपाल को कुछ नहीं समझा। आपकी तमन्ना थी कि केन्द्र सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा दे ताकि आप सहानुभूति का वोट हासिल कर लें। लेकिन दीदी आप शाह मोदी को अब तक गलत पहचानती रही। आ जाएगा, जल्द समझ आ जाएगा कि देश के सिस्टम के ख़िलाफ़ जाना भी देशद्रोह के समान है। बंगाल के साथ साथ पूरे देश की जनता समझ गई है कि आपके समर्थन में बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? समझ जाओ दीदी वक्त बदल गया है।

ममता बनर्जी 75 मुस्लिम जातियों को बनाना चाहती थी OBC, सरकार ने बदला फैसला: SC से वापस लेगी याचिका, 1.69 करोड़ जाति प्रमाण पत्रों की होगी जाँच


पश्चिम बंगाल में नई BJP सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बड़ा फैसला लिया गया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस याचिका को वापस लेने का निर्णय किया है, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने 75 मुस्लिम और 2 हिंदू समुदायों समेत कुल 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द कर दिया था।

22 मई 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इन समुदायों को बिना उचित सामाजिक और शैक्षणिक सर्वे के केवल धार्मिक आधार पर OBC सूची में शामिल किया गया था, जो संविधान के खिलाफ है। ये समुदाय 2010 से 2012 के बीच पहले वाम मोर्चा सरकार और बाद में TMC सरकार के दौरान OBC सूची में जोड़े गए थे।

जबकि मुसलमानों में शिया, सुन्नी, पठान, अहमदी, वहाबी और पासमांदा आदि अनेकों फिरकों में इतना ज्यादा भेदभाव है कि कोई एक दूसरे की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकता दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकने के अलावा जातियों को मानते ही नहीं फिर सिर्फ वोट की सियासत में यह काम एकदम गलत है।      

कोर्ट ने 2010 के बाद जारी सभी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य कर दिया था और नौकरी व एडमिशन में उनके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके तुरंत बाद ममता बनर्जी की सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेने की तैयारी

आनंदबाजार पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार के वकील कुनाल मिमानी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर इस मामले को वापस लेने की अनुमति माँगी है। सरकार ने मामले की जल्द सुनवाई की भी माँग की है। इस फैसले से 2010 के बाद जारी हुए करीब 5 लाख OBC प्रमाणपत्र प्रभावित हो सकते हैं।

इससे पहले वाम मोर्चा सरकार ने 42 मुस्लिम समुदायों और TMC सरकार ने 35 अन्य समुदायों को OBC सूची में शामिल किया था। बाद में 2023 में OBC रिजर्वेशन एक्ट भी लाया गया था।

1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों की होगी दोबारा जाँच

नई सरकार ने इसके साथ ही 2011 के बाद जारी सभी SC, ST और OBC प्रमाणपत्रों की दोबारा जाँच का आदेश भी दिया है। इसमें करीब 1.69 करोड़ दस्तावेज शामिल हैं। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अधिकारी सभी प्रमाणपत्रों की जाँच करें और फर्जी या अनियमित पाए जाने पर कार्रवाई करें।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष तपस राय ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा, “TMC सरकार ने मनमाने ढंग से काम किया। उसने किसी कानून, संविधान या नियम का पालन नहीं किया। ओबीसी आरक्षण के मामले में भी यही हुआ है। नई सरकार ने सही कदम उठाया है।”

वहीं TMC प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा है, “पिछली सरकार ने जनता के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाए थे। पार्टी नेतृत्व द्वारा नई सरकार के इस फैसले की कानूनी स्तर पर जाँच की जाएगी।”

भाजपा ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘वोट बैंक की राजनीति’ और पिछली सरकार के दौरान हुई अनियमितताओं का अंत बताया है। सरकार ने संकेत दिया है कि OBC सूची को संशोधित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचे, एक नया, संवैधानिक रूप से अनुपालन करने वाला पिछड़ापन सर्वेक्षण कराया जाएगा।

बंगाल : TMC के गुंडों से राधा गोविंद मंदिर मुक्त, कब्जा कर बना लिया था पार्टी कार्यालय, BJP आई तो फिर शुरू हुई पूजा-अर्चना


पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आते ही बीरभूम जिले के रामपुरहाट स्थित श्री श्री राधा गोविंद मंदिर के भोगघर से तृणमूल कांग्रेस (TMC)  का कब्जा हटा दिया गया है। BJP कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की मदद से वहाँ चल रहा पार्टी कार्यालय बंद कराया गया और जगह को दोबारा मंदिर समिति को सौंप दिया गया है।

कब्जा हटने के बाद परिसर में फिर से पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो गए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1990 में इलाके के लोगों ने चंदा जुटाकर की थी। मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। बाद में मंदिर के पास भोगघर का निर्माण शुरू किया गया था।

आरोप है कि TMC के कुछ कार्यकर्ताओं ने निर्माण कार्य रुकवाकर उस जगह पर कब्जा कर लिया और वहाँ पार्टी कार्यालय खोल दिया। इस घटना को लेकर इलाके में लंबे समय से नाराजगी बनी हुई थी। श्रद्धालुओं और मंदिर समिति का कहना था कि धार्मिक स्थल का उपयोग राजनीतिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। अब कब्जा हटने और मंदिर को उसकी पुरानी पहचान वापस मिलने के बाद स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है।

WHO की ‘इंटरनेशनल वॉर्निंग’: इबोला वायरस का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन बरपा रहा कहर, कांगो-युगांडा से लेकर केन्या तक अलर्ट

                                                                                                                             साभार - आज तक
कांगो में इबोला वायरस तेजी से कहर बरपा रहा है। यहाँ इस वायरस के चलते करीब 80 लोगों की मौत हुई है और इसे देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी सतर्क हो गया है। WHO ने इसे इंटरनेशनल पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया है। हालाँकि, WHO का कहना है कि अभी यह महामारी की श्रेणी में नहीं है।

यह बीमारी बंडिबुग्यो स्ट्रेन से फैल रही है, जो बेहद खतरनाक मानी जाती है और शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है।

कांगो में सबसे ज्यादा असर, सैकड़ों केस सामने आए

कांगो के इतुरी प्रांत के बुनिया, रवामपारा और मोंगब्वालू जैसे इलाकों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। यहाँ करीब 80 संदिग्ध मौतें और 246 से ज्यादा संदिग्ध केस दर्ज किए गए हैं, जबकि 8 मामलों की लैब में पुष्टि हुई है। अफ्रीका CDC के अनुसार, कुल मौतों की संख्या 87 तक पहुँच गई है और संक्रमण अब समुदाय के भीतर फैल रहा है, जिससे रोकथाम मुश्किल हो रही है।

बुनीया में लोगों के बीच डर और चिंता का माहौल बना हुआ है। स्थानीय निवासी जीन मार्क असिम्वे ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से लगातार लोगों की मौत हो रही है। कई बार एक ही दिन में दो-तीन या उससे अधिक लोगों का अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रकोप एक नर्स के मामले से शुरू हुआ और धीरे-धीरे कई इलाकों में फैल गया। मोंगब्वालू में सक्रिय केस ज्यादा होने से ट्रैकिंग और इलाज की प्रक्रिया और कठिन हो गई है।

हालात तब और चुनौतीपूर्ण हो गए जब पड़ोसी देश युगांडा में भी एक मामला सामने आया, जहाँ संक्रमित व्यक्ति की मौत हो चुकी है। हालाँकि सरकारें और स्वास्थ्य एजेंसियाँ स्क्रीनिंग, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और निगरानी बढ़ाकर इसे रोकने की कोशिश कर रही हैं।

अफ्रीका की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ने चेतावनी दी है कि यह बीमारी युगांडा और दक्षिण सूडान तक फैल सकती है। वहीं, क्षेत्र में लोगों की लगातार आवाजाही को देखते हुए केन्या ने भी सतर्कता बढ़ा दी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत भड़के; बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह होते हैं

सुभाष चन्द्र 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एक वकील की वरिष्ठ वकील  का दर्जा की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जिसमें चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की - “कुछ युवा कॉकरोच की तरह होते हैं, जिन्हे न तो कुछ रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई जगह, उनमें से कुछ इंटरनेट मीडिया पर चले जाते हैं, कुछ RTI कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं; काले वस्त्र पहने हजारों लोग घूम रहे हैं जिनकी डिग्रियों पर गंभीर संदेह है, हम इसकी जांच CBI से कराने पर विचार कर रहे हैं”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
हम आपका सम्मान करते हैं लेकिन यह कहना आप भूल गए कि ऐसे ही कुछ वकील हाई कोर्ट के जज भी बन जाते हैं इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने राष्ट्रपति को लिखे एक पत्र में ऐसा ही कुछ इशारा किया है एसोसिएशन ने “हाईकोर्ट में दिल्ली सहित अन्य जगहों से प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की जज के रूप में नियुक्ति पर आपत्ति जताई है 

एसोसिएशन का कहना है कि हाल के वर्षों में कई ऐसे वकीलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज नियुक्त किया गया है, जिनका यहां नियमित प्रैक्टिस या फाइलिंग का अनुभव नहीं रहा” क्या इसका मतलब यह नहीं निकलता कि “कॉकरोच जैसे वकील हाई कोर्ट के जज बनाए जा रहे हैं” जिस वकील को फाइलिंग का भी अनुभव नहीं है वह कैसे हाई कोर्ट का जज बनने लायक है बार एसोसिएशन ने कहा है तो उसमें कुछ तो सच्चाई होगी

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि “मैं किसी मामले का इंतज़ार कर रहा हूँ, मैं चाहता हूँ CBI दिल्ली के सभी वकीलों की डिग्रियों की जांच करे तीस हजारी में फलां-फलां वकील जिस तरह फेसबुक पर पोस्ट और चीज़ें डाल रहे हैं क्या उन्हें लगता है कि हम देख नहीं रहे हैं?”

लेकिन आपने तो कभी कहा था कि हम सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होते इसका मतलब आप सोशल मीडिया को देखते हैं

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा “SHOW ME EVEN A SINGLE PROJECT WHERE THESE SO CALLED ENVIRONMENTAL ACTIVISTS HAVE SAID THAT WE WELCOME THIS PROJECT”. लेकिन जनाब, पर्यावरण के नाम पर प्रोजेक्ट्स को चुनौती देने वाले कोई आम वकील नहीं होते, रिकॉर्ड उठा कर देख लीजिए, विगत में उन प्रोजेक्ट्स को चुनौती सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों ने ही दी है

आप CBI से जांच कराने की बात कर रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल 2023 को रिटायर्ड जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय समिति बनाई थी 25 लाख वकीलों और जजों की डिग्रियों के सत्यापन के लिए और समिति को 31 अगस्त, 2023 तक रिपोर्ट देने को कहा था लेकिन समिति की रिपोर्ट आज तक नहीं सुप्रीम कोर्ट को जमा नहीं हुई है

मैं कोई RTI activist नहीं हूँ लेकिन मैंने सुप्रीम कोर्ट से RTI में पूछा था कि दीपक गुप्ता समिति की रिपोर्ट का क्या स्टेटस है मुझे कोर्ट के रजिस्ट्रार ने 10 नवंबर 2023 को अपने जवाब में कहा कि -

“As ascertained from concerned branch of the registry, you are not a party in the below mentioned case ➖

Writ Petition (Civil) No 82 of 2023 

Ajay Shankar Srivastava verses Bar Council of India & Anr.

“No report has been received in the concerned judicial file”

तीन साल में क्या अंतरिम रिपोर्ट भी नहीं सकती ?

हाई कोर्ट एक जज ने एक बच्ची के बलात्कारी की सजा केवल इसलिए कम कर दी थी कि वो 5 वक्त की नमाज पढता है मतलब नमाज पढ़ते हुए बलात्कार करना जायज था लेकिन नमाज पढ़ने से सजा कम हो सकती है सुप्रीम कोर्ट में भी एक जज ने एक बच्ची के बलात्कारी और हत्यारे की फांसी की सजा यह कह कर उम्र कैद में बदल दी कि EVERY SINNER HAS A FUTURE”.  एक हाई कोर्ट के जज ने कहा Skin to Skin contact नहीं हुआ तो बलात्कार नहीं माना जा सकता एक हाई कोर्ट के जज ने कहा -” योनि के ऊपर लिंग रख कर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं है” ऐसे फैसले क्या किसी “परजीवी” जज के नहीं माने जा सकते?