न सरकार ने ‘CJP’ से साधा कोई संपर्क, न तय हुई कोई मुलाकात: साख बचाने के लिए झूठ बोल रहा सौरव दास; संसद तक पहुँची ‘कॉकरोचों’ की भीड़, पुलिस पर भी CJP समर्थकों ने किया हमला: देखें Videos

20 जुलाई को जंतर मंतर से लेकर पार्लियामेंट स्ट्रीट तक INDI गठबंधन के सहयोग से जो उपद्रव मचा उसे विपक्ष खासतौर से आम आदमी पार्टी अपनी जीत मान रहा है। जबकि उसने इस उपद्रव से बांग्लादेश और नेपाल में मची खुलेआम हुई गुंडागर्दी को अंजाम देने के मंसूबों को जाहिर कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी है। अंग्रेजी दैनिक 'द हिन्दू' भी आग में घी डालने से पीछे नहीं रहा। विपक्ष और 'द हिन्दू' ने यह भी साबित कर दिया कि भारत विरोधी ताकतों को हवा देकर भारत में उपद्रवियों की हर संभव मदद करने में पीछे नहीं रहेंगे। अभी तक यह सच्चाई भी सामने नहीं कि आखिर इस 'कॉकरोच जनता पार्टी' का संरक्षण कौन है?  

जिस तरह कांग्रेस की स्थापना उस विदेशी अंग्रेज़ ने की थी उसी तरह इस उपद्रवी पार्टी की स्थापना भी एक विदेशी ने ही की है। गौरतलब बात यह है कि जब विदेशी अंग्रेज़ द्वारा कांग्रेस की स्थापना की गयी थी ब्रिटिश सरकार ने उसे देश विरोधी नहीं कहा क्योकि कांग्रेस का गठन नेताजी सुभाष चंद्र बोस, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आज़ाद और भगतसिंह पार्टी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी जा रही थी उससे लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया गया था। ठीक उसी तरह विकासशील भारत में अड़चने डालने के लिए इस उपद्रवी पार्टी का गठन किया गया है। देखना यह है कि क्या यह पार्टी अपने साथ विपक्ष को भी लेकर डूबेगी? यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।

          

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जुटे 'कॉकरोच जनता पार्टी' के समर्थक मार्च करते हुए सोमवार (20 जुलाई) को संसद तक पहुँच गए। इस दौरान कॉकरोचों ने न केवल पार्लिएमेंट में घुसने की कोशिश की, बल्कि बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास किया और पुलिस से भिड़ने की भी कोशिश की।

स्थिति बिगड़ते देख संसद भवन की सुरक्षा अत्यंत कड़ी कर दी गई है और सभी मुख्य प्रवेश द्वारों को बंद कर दिया गया। उपद्रवी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों की पूर्व नियोजित रणनीति संसद परिसर के भीतर प्रवेश करने की थी। प्रदर्शन में शामिल सीजेपी समर्थक बयान दे रहे थे कि एकजुट होकर केंद्र की मोदी सरकार को गिरा दी जानी चाहिए। प्रदर्शन के दौरान समर्थकों के हाथों में भीम आर्मी के झंडे देखे गए। लोगों को ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए देखा गया

घटना के सामने आए वीडियो फुटेज में प्रदर्शनकारी पुलिस बल पर पथराव करते साफ नजर आ रहे हैं। इस दौरान उपद्रवियों को खुलेआम यह कहते सुना गया, “पत्थरबाजी तो होगी ही।”

कॉकरोच जनता पार्टी ने इस प्रदर्शन से पहले दावा किया था कि वह एक पीसफुल प्रोटेस्ट करेंगे। हालाँकि 20 जुलाई को दिखी तस्वीरों ने यह साफ कर दिया कि मंशा कुछ अलग है। इस प्रदर्शन में पत्रकारों से लेकर पुलिस पर हमला हुआ। तस्वीरें और वीडियोज सोशल मीडिया पर आ चुकी हैं। इस दौरान सुनियोजित ढंग से भीम आर्मी के एजेंडे को बढ़ाया गया।

न सरकार ने ‘CJP’ से साधा कोई संपर्क, न तय हुई कोई मुलाकात: साख बचाने के लिए झूठ बोल रहा सौरव दास, सरकारी सूत्रों ने मीडिया दावों को नकारा

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने 20 जुलाई को केंद्र सरकार के साथ बातचीत का जो दावा कर सुर्खियाँ बटोरीं थी वो असल में फर्जी निकली हैं। सौरव दास ने X पर पोस्ट करके कहा था कि मोदी सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए संपर्क किया है और वह और आशुतोष रंका CJP की ओर से केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा से मिलने जा रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने सुबह ही उनसे बातचीत के लिए संपर्क किया था, युवाओं का बड़ा जमावड़ा उनके साथ है और पार्टी की माँगें पूरी तरह स्पष्ट हैं।

इस खबर को ‘द हिंदू’ की पत्रकार विजइता सिंह ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर प्रमुखता से आगे बढ़ाया।

उन्होंने अपने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया कि नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा केंद्र सरकार की ओर से CJP टीम से बातचीत कर रहे थे। साथ ही ये भी कहा कि CJP सदस्यों को पहले जिला मजिस्ट्रेट, फिर केंद्र सरकार के एक सचिव और उसके बाद राज्य मंत्री स्तर के अधिकारियों के साथ बातचीत का प्रस्ताव दिया गया था। मगर, CJP सदस्यों ने इन सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया क्योंकि उनकी माँग थी कि उनकी सीधी बातचीत केवल प्रधानमंत्री या किसी कैबिनेट मंत्री के साथ ही हो, और उन्होंने इसके लिए डीसीपी को मंत्रियों के नामों की एक सूची भी सौंपी थी।

हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम में तब नया मोड़ आया जब यह स्पष्ट हुआ कि सौरव दास और उनका समर्थन करने वाले पत्रकारों के ये दावे कथित रूप से असत्य थे। ऑपइंडिया को सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सौरव दास द्वारा किए गए सभी दावे पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठे हैं।

सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार की ओर से CJP या प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए ऐसा कोई संपर्क नहीं साधा गया था और न ही केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और सौरव दास के बीच किसी भी प्रकार की कोई बैठक या मुलाकात तय थी।

गौरतलब हो कि पूरा सच सामने आने के बाद अब ये दावा हो रहा है कि प्रदर्शन की विफलता को देखते हुए जीत का झूठा दावा किया गया और अपनी साख बचाने के मकसद से यह अफवाह फैलाई गई थी।

नहीं चाहिए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, अनशन भी खत्म कर देंगे सोनम वांगचुक: CJP के संसद मार्च से पहले सुरक्षा सख्त-कई मेट्रो स्टेशन बंद

                   भूख हड़ताल खत्म करने के लिए क्या है सोनम वांगचुक की माँगे (फोटो साभार: आजतक)
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक अब किसी तरह अपनी गर्दन बचाने में लग गए हैं। पहले जहाँ वह कह रहे थे कि वह तभी अनशन खत्म करेंगे जब इस्तीफा मिलेगा वहीं अब 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च से एक दिन पहले पहले खबर आई कि उन्होंने सफदरजंग अस्पताल से हस्तलिखित संदेश जारी कर अपनी नई माँगों के बारे में बताया है।

अपने संदेश में उन्होंने बताया कि वह 20 जुलाई को अपना अनशन खत्म कर देंगे लेकिन इसके लिए उनकी तीन शर्तें हैं।

सोनम वांगचुक की तीन शर्तें

अपने पत्र में उन्होंने लिखा कि उनके समर्थक लगातार यह जानना चाह रहे हैं कि वह अपना अनशन कब समाप्त करेंगे। उन्होंने पहले बिंदु में लिखा कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था में हाल के समय में सामने आई खामियों, विशेष रूप से पेपर लीक जैसी घटनाओं की जिम्मेदारी स्वीकार करती है, तो वह 20 जुलाई को अपना अनशन समाप्त कर देंगे।

उन्होंने दूसरी शर्त में कहा कि यदि वह और उनके आंदोलन का नेतृत्व संसद तक पहुँचता है और वहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और नेता यह भरोसा देते हैं कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को संसद में उठाया जाएगा, तो भी वह अपना अनशन समाप्त कर देंगे।

वांगचुक ने तीसरी शर्त में कहा कि यदि उनकी स्वास्थ्य स्थिति या अन्य परिस्थितियाँ उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं देतीं, तो विभिन्न दलों के सांसद और नेता सफदरजंग अस्पताल पहुँचकर उन्हें यह आश्वासन दें कि उनकी मांगों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को संसद में उठाया जाएगा। ऐसी स्थिति में भी वह अपना अनशन समाप्त कर देंगे।

अपने संदेश के अंत में वांगचुक ने लिखा कि यह पत्र उन्होंने 19 जुलाई को सफदरजंग अस्पताल से लिखा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें ‘अवैध हिरासत’ में रखा गया है और उनकी आवाजाही, बोलने तथा संवाद करने की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई है।

दिल्ली पुलिस ने नहीं दी संसद चलो मार्च की अनुमति

20 जुलाई को सीजेपी और उनके समर्थकों का 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च करने का प्लान है। लेकिन, नई दिल्ली पुलिस ने यह साफ किया है कि उनकी ओर से ऐसे किसी प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई है। ऐसे में डीएमआरसी ने भी सुरक्षा लिहाज से जनपत, राजीव चौक, पटेक चौक, केंद्रीय सचिवालय और सेवा तीर्थ जैसे मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया है।

पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए नई दिल्ली में BNS की धारा 163 लागू की है जिसके तहत बिना अनुमति के किसी भी प्रकार के प्रदर्शन की अनुमति नहीं होगी और न ही 5 लोगों के एक साथ इकट्ठा होने को कहा जाएगा।

20 जुलाई से संसद सत्र शुरू होना है, इसलिए जन सुरक्षा, संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा और महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। पुलिस ने कहा है कि इन निषेधाज्ञाओं का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति पर धारा 223 बीएनएसएस और कानून के अन्य लागू प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाया जाएगा।

जब सोनम वांगचुक को उठाकर ले गई दिल्ली पुलिस, तब ‘समलैंगिक’ प्रवक्ता के घर थे अभिजीत दिपके: अनीश गावंडे, शरद पवार की पार्टी से क्या है कनेक्शन?

  अभिजीत दिपके और NCP (SP) नेता सुप्रिया सुले के साथ गवांडे (फोटो साभार: Instagram/@anishgawande)
एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रवक्ता अनीश गावंडे ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को हटाने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के धरना स्थल से हटाया था। वह करीब 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे थे। गावंडे ने लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने की अपील भी की।

गावंडे ने दावा किया कि प्रदर्शन स्थल से सोनम वांगचुक को हटाना दरअसल उनकी ‘गिरफ्तारी’ थी। उनका आरोप था कि पुलिस ने बिना कोई कारण बताए और बिना किसी लिखित आदेश के यह कार्रवाई की। हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाकर उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था।

इसके बाद गावंडे ने यह भी दावा किया कि पुलिस की यह कार्रवाई वांगचुक की सेहत की चिंता की वजह से नहीं की गई बल्कि इसका मकसद चल रहे प्रदर्शन को बाधित करना था।

अनीश गावंडे को किसी राजनीतिक दल का पहला खुले तौर पर समलैंगिक (ओपनली गे) प्रवक्ता बनाए जाने के कारण भी पहचान मिली थी। उन्होंने खुलकर CJP के प्रदर्शन का समर्थन किया है और उससे जुड़े रहे हैं। जब पुलिस सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटा रही थी, उसी दौरान CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके कपड़े बदलने के लिए गावंडे के घर गए हुए थे। इसी दौरान पुलिस ने दिपके को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया था।   

गावंडे ने आरोप लगाया कि जब अभिजीत दिपके उनके घर की सीढ़ियों पर थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस की पिटाई के चलते दिपके जोर-जोर से चिल्ला रहे थे।

कौन है अनीश गावंडे?

मीडिया रिपोर्ट्स में मौजूद जानकारी के अनुसार, अनीश गावंडे स्वतंत्रता सेनानी, वकील और प्रसिद्ध शिक्षाविद टी. के. टोपे के परिवार से आते हैं। उनका पालन-पोषण मुंबई में हुआ। उन्होंने वर्ली के ग्रीनलॉन्स स्कूल और फोर्ट स्थित कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से तुलनात्मक साहित्य (Comparative Literature) की पढ़ाई की। बाद में रोड्स स्कॉलर (Rhodes Scholar) के रूप में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बौद्धिक इतिहास (Intellectual History) और लोक नीति (Public Policy) में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की।

राजनीति में आने से पहले अनीश गावंडे LGBTQ+ अधिकारों के कार्यकर्ता और लेखक रहे हैं। उन्होंने पिंक लिस्ट इंडिया की भी स्थापना की जो LGBTQ+ अधिकारों का समर्थन करने वाले नेताओं का एक डेटाबेस है।

अपनी समलैंगिक (गे) पहचान सार्वजनिक करने के बाद गावंडे ने फ्रैंकोफोन पश्चिम अफ्रीका और सेनेगल की भाषाई राजनीति पर अध्ययन किया। उनका इरादा अकादमिक क्षेत्र में प्रोफेसर बनने का था। हालाँकि, 2018 में उन्हें भारत में एक चुनावी अभियान से जुड़ने का अवसर मिला, जिसके बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया। अगस्त 2024 में उन्हें एनसीपी (शरदचंद्र पवार) का राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किया गया।

गावंडे क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) के समर्थक हैं। उनका मानना है कि जाति आधारित आरक्षण के साथ-साथ खेल कोटा, महिलाओं और दिव्यांगों जैसी श्रेणियों के लिए भी क्षैतिज आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि देश में भेदभाव की समस्या को दूर करने के लिए एक व्यापक भेदभाव-विरोधी कानून बनाया जाना चाहिए।

हाल ही में अनीश गावंडे ने खालिस्तानी प्रोपेगेंडा फिल्म ‘सतलुज’ का समर्थन किया था। यह फिल्म रिलीज के तुरंत बाद Zee5 ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी। 

फिल्म के समर्थन में इंस्टाग्राम पर लिखी एक पोस्ट में गावंडे ने कहा था, “दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ जिसमें उन्होंने मानवाधिकार जांचकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है, भारतीय स्क्रीन पर केवल 48 घंटे ही रह सकी और फिर उसे ‘अगली सूचना तक’ चुपचाप हटा दिया गया। जिन लोगों को गायब कर दिया गया, उन पर बनी एक फिल्म भी गायब कर दी गई।”

जो कहता है “मेक इन इंडिया” हो ही नहीं सकता, वो राहुल विन्ची भी विक्रम-1 के लिए Skyroot Aerospace को बधाई दे रहा है; स्पेस और डिफेंस में प्राइवेट सेक्टर क्या कर रहा है, बहुत लोगों को पता ही नहीं

सुभाष चन्द्र

Skyroot Aerospace के पवन कुमार चांदना और नागा भारत डाका को उनके सफल विक्रम -1 के लिए हार्दिक बधाई ये दोनों ISRO में 2012 से 2018 तक कार्यरत थे जब उन्होंने VRS ले लिया और अपने मिशन पर लग गए अभी सुनने में आया है कि ISRO और DRDO के करीब 100 इंजीनियर/बैज्ञानिक संस्थानों को छोड़ना चाहते हैं और प्राइवेट सेक्टर में में जाने को इच्छुक हैं क्योंकि वहां जयादा पैसा मिलता है। 

प्राइवेट सेक्टर आज तो ISRO और DRDO के वैज्ञानिकों को ज्यादा सैलरी देकर खींच रहा है लेकिन कल वह भी इस प्रवृत्ति से परेशान होगा जब उसके लोग भी ज्यादा सैलरी के लालच में दूसरी कंपनियों में जाएंगे 

विक्रम-1 पूरी तरह मेक इन इंडिया है और जिस दिन यह सफल हुआ, उस दिन भी खरदिमाग राहुल विंची ने कहा कि “मेक इन इंडिया” हो ही नहीं सकता जबकि आज सब कुछ भारत में ही बन रहा है भारत ने कई युद्धपोत तैयार कर लिए, ISRO ने चंद्रयान मिशन सफल कर दिया, दुनिया भर के satellite ISRO भेजता है, DRDO ने अनेक मिसाइलें बना दी, एयर डिफेंस सिस्टम बना दिए जो विदेशों में निर्यात हो रहे हैं लेकिन राहुल विंची एक गाना गाता है कि “मेक इन इंडिया” हो ही नहीं सकता ऐसा कहते हुए उसे शर्म भी नहीं आती उधर कॉकरोच बैठे हुए नारा लगा रहे हैं, मोदी सरकार निकम्मी है, ये सरकार बदलनी है इन लोगों में एक भी नहीं है जो पवन कुमार चांदना और नागा भारत डाका का मुकाबला कर सके

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भारत में स्पेस और डिफेंस में आज क्या हो रहा है जब से मोदी सरकार ने इन दोनों सेक्टरों को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोला है

अंतरिक्ष एवं रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी

भारत में वर्तमान में लगभग 400 निजी अंतरिक्ष (स्पेस) उद्यम तथा 430 से अधिक लाइसेंस प्राप्त निजी रक्षा कंपनियां कार्यरत हैं इनके अतिरिक्त हजारों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भी इन क्षेत्रों को सहयोग प्रदान कर रहे हैं चूँकि अनेक एयरोस्पेस कंपनियां रक्षा तथा अंतरिक्ष—दोनों क्षेत्रों के लिए उत्पाद एवं सेवाएं उपलब्ध कराती हैं, इसलिए इन दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय समानता और परस्पर जुड़ी है

अंतरिक्ष क्षेत्र (Space Sector)

कुल स्टार्टअप/उद्यम:

IN-SPACe के अंतर्गत पंजीकृत लगभग 400 निजी स्पेस-टेक स्टार्टअप एवं कंपनियां-

प्रमुख कंपनियां:

स्काई रूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace)

पिक्सेल (Pixel)

अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos)

बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace)

बाज़ार मूल्य:

भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र का अनुमानित बाज़ार मूल्य 8.4 अरब अमेरिकी डॉलर है-

रक्षा क्षेत्र (Defence Sector)

लाइसेंस प्राप्त निर्माता:

लगभग 430 सक्रिय निजी कंपनियां, जिनके पास रक्षा उत्पादन हेतु औद्योगिक लाइसेंस हैं-

एमएसएमई एवं उप-आपूर्तिकर्ता:

लगभग 10,000 से 16,000 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) तथा पुर्ज़े एवं घटक आपूर्तिकर्ता रक्षा उद्योग को सहयोग प्रदान करते हैं

प्रमुख औद्योगिक समूह एवं कंपनियां:

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स (Tata Advanced Systems)

लार्सन एंड टुब्रो (L&T)

अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस (Adani Defence & Aerospace)

भारत फोर्ज (Bharat Forge)

डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज (Dynamatic Technologies)

Direct employment: 4–6.5 lakh persons

Indirect employment: 8–12 lakh persons

Overall Employment Impact

A reasonable estimate is that the private space and defence ecosystem in India presently supports around 12 to 18 lakh jobs (direct and indirect combined)

अब सोचिए विपक्ष के नेता और कॉकरोच जो भारत में Gen Z को आंदोलन भड़काना चाहते है और बांग्लादेश/नेपाल जैसे तख्तापलट करना चाहते है, वो कैसे सोच सकते है कि 18 लाख लोग जो  प्राइवेट स्पेस/डिफेंस में कार्यरत हैं, वो Gen Z आंदोलन में शामिल होंगे

कार्यकर्ताओं को राम मंदिर-पौधरोपण का मुद्दा देकर खुद विदेश घूमने निकले अखिलेश : क्या UP चुनाव के लिए यही है आपकी राजनीति?

                                                            (AI तस्वीर साभार: Dall-e)
कहते हैं, “नेतृत्व की असली पहचान चुनावी मंच पर नहीं, मुश्किल समय में होती है।” जब जनता सवाल पूछ रही हो, सरकार फैसले ले रही हो और राजनीति अपने सबसे गर्म दौर में हो, तब यह भी देखा जाता है कि नेता मैदान में खड़ा है या हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सोशल मीडिया से राजनीति कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस समय राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जाँच कर रही है, पौधरोपण अभियान को लेकर बडे़ स्तर पर सक्रिय है। ऐसे वक्त में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव विदेश दौरे पर हैं। ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव निजी दौरे पर अमेरिका गए हैं, और वहाँ से लंदन की यात्रा कर वापस भारत लौटेंगे।

सांसद प्रियंका चतुर्वेदी का अखिलेश पर हमला 

राज्य सभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि, राम मन्दिर दान चोरी का मास्टर माइंड टिन्नू यादव तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी का पुराना कार्यकर्ता निकला जो अपने आका के कहने पर हिन्दूओं की आस्था पर चोट कर रहा था।
और ये सब पता चला टिन्नू यादव और अखिलेश यादव की 980 बार हुई फोन कॉल से.. वाह रे सपाई भड़वो बाप ने राम भक्तों पर गो**ली चलवाई और बेटे ने रामभक्तों का चन्दा ही चुरा लिया यानी दोनों ही बाप बेटे ने हिन्दूओं के साथ खेला किया है। ध्यान रहे..
जो अखिलेश राम मन्दिर से चोरी करवा सकता है वो 2027 में CM बनने के बाद राम मन्दिर को तुड़वा भी सकता हैं।

ये वही अखिलेश यादव हैं, जो अपनी विदेश यात्रा के ठीक एक दिन पहले अपनी राजनीति चमकाने के लिए मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम से मिलते हैं। उससे पहले योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को ‘भ्रष्टाचार’ बता देते हैं और अपने हिस्से का जनता को बरगलाकर खुद गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने विदेश चले जाते हैं।

हजारों किलोमीटर दूर से सोशल मीडिया पर राजनीति कर रहे अखिलेश यादव

दिलचस्प बात यह है कि विदेश जाने से पहले अखिलेश यादव अपनी सोशल मीडिया टीम को ठीक ढंग से समझाकर गए हैं। तभी तो उत्तर प्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर पहुँचने के बाद भी अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट बंद नहीं हो रहे हैं। उनकी टीम योगी सरकार को घेरते हुए हर घंटे पोस्ट शेयर कर रही है।

अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट भी योगी सरकार के बड़े पौधरोपण अभियान को निशाना बनाने वाली है। इस पोस्ट में उन्होंने अपना पुराना आरोप दोहराते हुए पूरे अभियान को ‘भ्रष्टारोपण’ अभियान बताया। इसके साथ उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंच पर पौधरोपण करते हुए एक वीडियो भी साझा किया।

इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने जैसे अभियान पर राजनीतिक हमला करते हुए उन्होंने इसे ‘एनकाउंटर’ तक कह दिया।

पहले भी राजनीति छोड़ विदेश घूमने गए समाजवादी पार्टी के मुखिया

यह पहली बार नहीं है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़ अचानक अखिलेश यादव विदेश घूमने निकल गए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश यात्रा पर रहे। पार्टी ने हर बार इन दौरों को निजी बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इनकी टाइमिंग पर चर्चा जरूर हुई।

जून 2018 में अखिलेश यादव परिवार के साथ एक विदेशी छुट्टी पर रवाना हुए थे। उस समय समाजवादी पार्टी उपचुनावों में मिली सफलता के बाद विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी। वहीं, लखनऊ के सरकारी बंगले को खाली करने और उसमें नुकसान के आरोपों को लेकर भी उनकी राजनीति के केंद्र में चर्चा हो रही थी। ऐसे समय में उनके विदेश जाने को लेकर सवाल भी उठे थे।

और 2020 में जब हाथरस कांड पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ था। कॉन्ग्रेस से लेकर विपक्षी दलों के नेता लगातार हाथरस पहुँच रहे थे। लेकिन उस समय अखिलेश यादव विदेश में थे।

2025 में संसद के बजट सत्र के आसपास भी अखिलेश यादव परिवार के साथ लंदन टूर पर गए थे। तब तक 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी कर चुकी थी और अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके थे। इस समय जब देश में राजनीति करनी चाहिए थी, तब वह जश्न मनाने विदेश में थे।

यानी न तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया, न प्रदेश में किसी मुद्दे पर सक्रियता से भाग लिया और न ही खुद पर आए आरोपों का जवाब देने की उन्हें फुरसत मिली क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश घूमने में व्यस्त थे।

आज राम मंदिर पर सिर्फ तीन लोग बोल रहे हैं।
1:-पहले कांग्रेसी जिन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी कि अयोध्या में किसी भी कीमत पर राम मंदिर ना बने अपने बड़े-बड़े वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर रोकने के लिए लगा दिया और राम को काल्पनिक पात्र बताया था.. कोर्ट में एफिडेविट दिए कांग्रेस ने.*
2:- दूसरा समाजवादी पार्टी जिन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा राम भक्तों की अयोध्या में.. हत्या करवा दी पूरा सरयू खून से लाल करवा दिया..सरयू मै घायलों को बोरी में डालकर फेंका था मुलायम सरकार ने। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक आजम खान को पार्टी और सरकार में नंबर दो बना दिया ।और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के अध्यक्ष जफरयाब जिलानी को कैबिनेट मंत्री का प्रोटोकॉल दिया*
3:- तीसरा आम आदमी पार्टी जिसका सबसे बड़ा नेता केजरीवाल कहता था कि मेरी नानी ने कहा है कि राम मंदिर भूलकर भी मत जाना क्योंकि राम कभी ऐसे मंदिर में नहीं रह सकते जो मस्जिद तोड़कर बनी है । और इसी AAP का मनीष सिसोदिया जो कहता था कि राम मंदिर नहीं बनना चाहिए वहां यूनिवर्सिटी बननी चाहिए।*
इनकी राजनीतिक लालसा तो देखिए आज यह तीनों कैटेगरी के हिंदूद्रोही इस तरह से हिंदुओं को भरमा रहे हैं जैसे यही सबसे बड़े राम भक्त हो..।*
इसका कारण कोई राम भक्त और सनातनी विचारधारा, हिंदुत्व की विचारधारा नहीं है सिर्फ एक ही मकसद है कि हिंदुओं को और ज्यादा कैसे बांटे?कैसे इनको एक से दो फिर दो से चार से चार से आठ करें... इनका यही मकसद है कि हिंदू समाज को कैसे तोड़ा जाए... सिर्फ अपने वोट के हित के लिए सिर्फ अपनी राजनीति एजेंडा के लिए... जिन लोगों ने कभी भी राम मंदिर के समर्थन भी नहीं किया.. चंदा देना तो बहुत दूर की बात... आज वह लोग बात करते हैं राम मंदिर की!!*

अखिलेश, तेजस्वी, राहुल… सब विदेश में बैठकर चमका रहे राजनीति

एक तरफ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में सत्ता हथियाने का ख्वाब बुन रहे हैं, दूसरी तरफ हर जरूरी मौकों पर विदेश यात्राएँ पर घूमने निकल पड़ते हैं। उन्होंने राम मंदिर चंदा चोरी के नाम पर हिंदुओं को जगाने का ढोंग कर, दलित छात्रा की हत्या पर अपने मतलब की राजनीति कर और पौधरोपण जैसे पॉजिटिव काम को भ्रष्टाचार बताकर, अपने समर्थकों को झुनझुना थमा दिया है और अब उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि इसे बजाना कैसे हैं?

अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी विदेश यात्रा पर सवाल उठे हों। अलग-अलग समय पर अन्य विपक्षी नेता भी यही करते आए हैं। उदाहऱण के लिए, तेजस्वी यादव, जो फिलहाल यूरोप में है, वहीं बैठकर पटना के बंटी यादव हत्याकांड के पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर लेते हैं। राहुल गाँधी भी तीन हफ्ते से यूरोप घूम रहे हैं, जिसके चलते कॉन्ग्रेस के खुद के ‘छात्रों की गूँज’ जैसे कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं।

तो इसीलिए यह सोच-विचार करना जरूरी है कि किस नेता को असल में जनता के मुद्दों की फिक्र है और किसे नहीं है। जहाँ एक ओर योगी सरकार राम मंदिर चढ़ावे की निष्पक्ष जाँच कर रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग को खत्म करने के लिए पौधरोपण कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश का विपक्ष विदेश घूमने में व्यस्त है।

संविधान के दो ही बड़े रक्षक है, पहला नंबर राहुल गांधी है जो अपनी अधिकांश सभाओं एवं पद यात्राओं में एक लाल रंग की पुस्तक होती है उसी को हाथ में लहराते हुए ,चाहे उन्होंने उस पुस्तक को खोल कर पढ़ा हो या नहीं, बह लाल किताब को बह भारत का संविधान कहते है, उसकी रक्षा का बह प्रण लेते दिखते है जब उनके नेहरू गांधी परिवार ने उस संविधान को अपने हिसाब से दसियों बार तोड़ा एवं बदला है।
दूसरे संविधान के रक्षक समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव है, जो 10 साल से सत्ता से बाहर रहकर ऊब चुके है। उन्हें भी राहुल गांधी की तरह संविधान से बहुत प्यार है। उनके एवं उनके पिताश्री के शासन काल में जिस तरह से दूसरे समुदाय के तुष्टिकरण के लिए अपनी सरकार आते ही
उन अपराधियों को छोड़ दिया गया जिन पर बहुत ही गंभीर आरोप थे । अतीक अहमद, मुख्तयार अंसारी एवं उनके गुर्गो के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। फिरौती, जवारदस्त हफ्ता वसूली करने बालों पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं। महिलाओं के अंदर घर से बाहर निकलने पर उनके परिजनों को भय, बच्चियां स्कूल जाने से भी डरती थी, बही लोग अब संविधान की रक्षा की बात कर रहे है।

दुनिया मोदी को अपना सिरमौर बना रही है लेकिन राहुल विन्ची और विपक्ष मोदी से घृणा पाल रहे हैं; अब पोलैंड के विदेश मंत्री ने मोदी का हुनर जगजाहिर कर दिया

सुभाष चन्द्र 

राहुल विन्ची और उसकी ब्रिगेड ने बहुत दिनों से एक fake Narrative चलाया हुआ था। मोदी ट्रंप से डरता है, मोदी ट्रंप के आगे Compromise हो गया है और मोदी ने डर कर रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया। ऑपरेशन -सिंदूर युद्ध रुकने के बाद राहुल गांधी ने तुर्रा छेड़ा था “नरेंदर सरेंडर” और हर कोई ऐरा गैरा नत्थू गैरा यही राग अलाप रहा था

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चर्चित YouTuber 
लेकिन राहुल और तमाम विपक्षी नेताओं को पोलैंड के विदेश मंत्री व्लादिस्लाव टेओफिल बार्टोशेव्स्की (Władysław Teofil Bartoszewski) की बात सुनकर सांप सूंघ गया। उन्होंने कहा कि कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को परमाणु हमले करने से रोकने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, और पुतिन से बात कर इस विनाशकारी कदम उठाने से रोकने के लिए राजी किया

विश्व के अनेक नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवर्तनकारी शासन, गरीबी उन्मूलन के प्रयासों तथा बढ़ते वैश्विक प्रभाव की समय-समय पर प्रशंसा की है। 

क्रिस्टोफर लक्सन, न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री:

 उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को "हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में से एक" तथा "न्यूज़ीलैंड के सच्चे मित्र" बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत में आया परिवर्तन, विशेषकर करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य, उन्हें अत्यंत प्रभावित करता है;

बराक ओबामा, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ने  मोदी के परिवर्तनकारी एजेंडे की सराहना करते हुए TIME पत्रिका में उन्हें भारत का "मुख्य सुधारक (Reformer-in-Chief)" कहा था;

व्लादिमीर पुतिन, रूस के राष्ट्रपति ने  मोदी को "एक अत्यंत बुद्धिमान नेता, जो सबसे पहले अपने देश के बारे में सोचते हैं" कहा था। उन्होंने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की प्रशंसा करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री मोदी सदैव राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं;

प्रबोवो सुबियांतो, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने मोदी के राजनीतिक जीवन और शासन की सराहना करते हुए कहा, "मैं आपके राजनीतिक जीवन का अनुसरण करता हूँ और आपके अनेक कार्यक्रमों को अपनाता हूँ";

अलेक्ज़ेंडर स्टब, फ़िनलैंड के राष्ट्रपति ने भारत के बढ़ते कूटनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक कद ऐसा है कि वे यूक्रेन संघर्ष में युद्ध विराम और वार्ता का आह्वान करने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं;

अबी अहमद अली, इथियोपिया के प्रधानमंत्री ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, आर्थिक परिवर्तन तथा गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की सराहना की और उन्हें "ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की एक सशक्त आवाज़" बताया;

 संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान "चैम्पियंस ऑफ द अर्थ (Champions of the Earth Award)" तथा "ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड (Global Goalkeeper Award)" मिले

अभी हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने मोदी के लिए कहा "Narendra Modi is a very tough negotiator, a total killer at the negotiating table. He is calm, he's cool, and he thinks a lot about India. He always puts India's interests first." ये कह कर राहुल विन्ची और विपक्ष की “नरेंदर सरेंडर” की थ्योरी को उखाड़ फेंका

अभी तक 35 देश उन्हें अपना सर्वोच्च सम्मान दे चुके हैं - मोदी ने कोरोना में 100 से ज्यादा देशों की मदद की और हाल ही में वेनेजुएला में आए भूकंप में मोदी की मदद के लिए वेनेजुएला सरकार ने कहा Thank You Prime Minister Modi. मोदी से चिढ़ने वालों को याद होगा कि  Prime Minister of Papua New Guinea, James Marape ने मोदी के चरण स्पर्श किये थे

जंतर-मंतर पर ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा पर हमला, CJP के लोगों ने की सरेआम गुंडागर्दी


दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन के दौरान एक बेहद चिंताजनक और निंदनीय घटना सामने आई है। प्रदर्शन कवर करने पहुंचे ‘ऑपइंडिया’ (OpIndia) के पत्रकार अनुराग मिश्रा के साथ वहाँ मौजूद कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े गुंडों द्वारा न सिर्फ बदसलूकी की गई, बल्कि उन पर शारीरिक हमला भी किया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रदर्शन के ‘शांतिपूर्ण’ होने के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों और वायरल वीडियो के अनुसार, अनुराग मिश्रा जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों से सामान्य सवाल पूछ रहे थे। इसी दौरान वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनके काम में बाधा डालनी शुरू कर दी। देखते ही देखते बहस हाथापाई में बदल गई और पत्रकार पर हमला कर दिया गया।

 पत्रकार अनुराग मिश्रा ने घटना के बावजूद अपना काम नहीं रोका और बेखौफ होकर अपना काम करते रहे। उन्होंने कहा, “हम वहाँ सिर्फ अपना काम कर रहे थे और निष्पक्षता से सवाल पूछ रहे थे। लेकिन कुछ लोगों को सवाल पसंद नहीं आए। उन्होंने मुझे घेरा, धक्का-मुक्की की और मुझ पर हमला कर दिया। अगर देश की राजधानी में पत्रकार ही सुरक्षित नहीं हैं और सवाल पूछने पर उन पर हमले होंगे, तो लोकतंत्र और प्रेस की आजादी का क्या मतलब रह जाता है?”

इस घटना के बाद प्रदर्शन के मुख्य चेहरों और आयोजकों पर उंगलियाँ उठने लगी हैं। सोशल मीडिया पर लोग सोनम वांगचुक, विजेता दहिया, अभिजीत दिपके और सौरव दास जैसे नेताओं को टैग करके सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यही उनके तथाकथित शांतिपूर्ण आंदोलन की सच्चाई है? क्या वे अपने प्रदर्शन में शामिल इन अराजक तत्वों की गुंडागर्दी की जिम्मेदारी लेंगे? आलोचकों का कहना है कि असहमति की आवाज को हिंसा के दम पर दबाना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है।

इस हमले ने एक बार फिर फील्ड पर काम करने वाले ग्राउंड पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। लोगों ने दिल्ली पुलिस से माँग की है कि वीडियो के आधार पर हमलावरों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी पत्रकार के साथ ऐसी हरकत न हो सके।

राम मंदिर में बुलडोजर क्यों नहीं चला? अब डिंपल यादव ने उगला जहर; मुलायम परिवार की आँखों में खटक रहा राम मंदिर, ससुर ने कारसेवकों का कराया नरसंहार-पति ने चंदाचोरी पर फैलाई नफरत


अपने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने अयोध्या में राममन्दिर का समाजवादी पार्टी शुरू से विरोध करती रही है। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू 11 बजे के बाद होली तक नहीं खेल सकते थे। 84 कोसी परिक्रमा पर पाबन्दी आदि आदि इतना सबकुछ होने के बाद भी समझ में नहीं आता हिन्दू क्यों समाजवादी पार्टी को वोट देता है? समाजवादी पार्टी में जितने भी हिन्दू हैं क्या वह कालनेमि हिन्दू हैं? यदि नहीं तो खुलकर डिम्पल ने जो राममन्दिर के विरुद्ध जहर उगला है उसका विरोध करो। अगर दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बन गयी PDA यानि Phir Darayega Ali हरकत में आ जाएगा।   

समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार और नीट (NEET) पेपर लीक के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के समर्थन में उतरी हुई हैं। जंतर-मंतर पहुँचकर डिंपल यादव ने वांगचुक का समर्थन तो किया, लेकिन इस दौरान मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले को लेकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोला। डिंपल यादव ने राम मंदिर और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर एक ऐसा विवादित बयान दे दिया है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है।

राम मंदिर पर डिंपल का ‘बुलडोजर’ राग और पुराना इतिहास

डिंपल यादव ने भाजपा सरकार को घेरते हुए कहा कि देश में इस समय ‘बुलडोजर सरकार’ चल रही है, जो छात्रों के भविष्य पर बुलडोजर चला रही है। उन्होंने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले का जिक्र करते हुए सवाल उठाया। डिंपल ने कहा, “जब राम मंदिर में इतनी बड़ी चोरी हो गई तो वहाँ पर बुलडोजर थक गया है। तो आखिर बुलडोजर क्यों थम गया, सवाल इस बात का है।”

इस बयान के बाद अब डिंपल यादव खुद चौतरफा घिर गई हैं। आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या एक कर्मचारी पर लगे कथित चोरी के आरोप के आधार पर पवित्र राम मंदिर की तुलना किसी अवैध निर्माण से करना जरा भी उचित है? इतिहास गवाह है कि मुलायम सिंह यादव के समय में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई गई थीं, जिसे लोग नरसंहार तक कहते हैं।

इसके बाद अखिलेश यादव ने राम मंदिर के चंदे को लेकर बयानबाजी की थी। अब डिंपल यादव के इस बयान के बाद लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिंपल भी राम मंदिर पर बुलडोजर चलवाकर वहाँ पुराना बाबरी ढांचा वापस देखना चाहती हैं? पूरा यादव परिवार ही राम विद्रोही बनकर सामने आ रहा है।

अखिलेश का पुराना बयान और पूरा परिवार घेरे में

अखिलेश यादव ने भी पहले राम मंदिर के संदर्भ में एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हमें सांचा नहीं, बल्कि ‘ढांचा बदलना’ होगा। उनके इस पुराने बयान को डिंपल यादव के ताजा बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। देश जानता है कि पूरा मुलायम परिवार शुरू से ही राम विरोधी रहा है और डिंपल का यह बयान उसी सोच को आगे बढ़ाता है। अब जंतर-मंतर के बहाने इनके अंदर की कड़वाहट भी बाहर आ रही है। मुद्दा पेपर लीक मामले का है, लेकिन निशाना राम मंदिर पर आकर रूक जाता है।

अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण होने के बाद से ही यह मंदिर मुलायम परिवार की आँखों में और ज्यादा खटकने लगा है। राम मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी पर चोरी का आरोप क्या लगा, डिंपल यादव ने सीधे पूरे मंदिर परिसर पर बुलडोजर चलाने की माँग जैसी भाषा का इस्तेमाल कर दिया। जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से गूँज रहा है कि क्या एक कथित चोरी के बहाने पूरे राम मंदिर को निशाना बनाना और वहाँ बुलडोजर की बात करना तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा नहीं है?

सपा सांसदों का जमावड़ा

इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत सोनम वांगचुक के धरने से जुड़ी हुई है। सोनम वांगचुक शिक्षा में बड़े सुधार, नीट पेपर लीक मामले में सख्त एक्शन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर पिछले 21 दिनों से जंतर-मंतर पर कड़े धरने पर बैठे हैं। वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले यह बड़ा आंदोलन चला रहे हैं। इतने दिनों से लगातार अनशन पर रहने के कारण वांगचुक की तबीयत काफी बिगड़ चुकी है और शनिवार (18 जुलाई) सुबह ही अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच समाजवादी पार्टी के सांसदों का एक बड़ा दल लगातार जंतर-मंतर पहुँच रहा है। इससे पहले सपा सांसद प्रिया सरोज भी वांगचुक के अनशन स्थल पर पहुँची थीं और उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक उनके मुद्दों को उठाने का वादा किया था। खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सोनम वांगचुक से अपना अनशन समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन अब इस आंदोलन के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक बयानों के लिए होने लगा है।

अखिलेश यादव ने फैलाया ‘नोटों के निजीकरण’ का झूठ, पॉलिमर शीट खरीदने के टेंडर पर गढ़ी कहानी: भूल गए UPA के दौर में विदेश से आता था करेंसी पेपर

                                            नोटों के निजीकरण पर अखिलेश का फर्जी दावा
विपक्ष का धरातल में जाने का मुख्य कारण झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना है। अब तक जितने भी मुद्दों को विपक्ष ने उछाला सबके सब धराशाही हो गए। एक बात जो ध्यान देने वाली है कि राममन्दिर चढ़ावे में चोरी का मामला है यह चुनाव तक खींचेगा क्योकि उम्मीद की जा रही है कि अखिलेश और कुछ विपक्षी भी लपेटे में आएंगे। जो उत्तर प्रदेश में थाली में सजाकर योगी आदित्यनाथ को सत्ता सौंपने का काम करेगी।  

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाया है कि क्या भाजपा सरकार में अब भारतीय बैंक नोटों का भी निजीकरण किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी एक टेंडर का हवाला दिया है।

इस टेंडर में नोटों की छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाली ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए कंपनियों से आवेदन माँगे गए हैं। इसे आधार बनाकर अखिलेश यादव ने X पर लिखा, “कमीशनखोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था।”

उन्होंने लिखा, “भ्रष्ट BJP राज में अब नोटों का भी प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा क्या? कमीशनख़ोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था। जब देश की मुद्रा ही आत्मनिर्भर नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था और देश आत्मनिर्भर कैसे होगा? अब क्या सरकार भी आउटसोर्सिंग पर दे दी जाएगी?”

अखिलेश ने लिखा, “इतने बड़े और संवेदनशील कार्य के लिए इतना छोटा कंजूसीभरा टेंडर निकालने के पीछे, कहीं चुपके से औपचारिकता पूरा करने का कोई गलत मंसूबा तो नहीं है। लगता है सेटिंग पहले ही हो चुकी है, दिखाने को ख़ानापूर्ति की जा रही है। भाजपा सरकार नहीं, मुनाफाखोरों की भागीदार है।”

जिस टेंडर का अखिलेश यादव जिक्र कर रहे हैं, वह 17 जुलाई 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी किया गया एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) है। इसमें भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए उपयुक्त ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए आवेदन माँगे गए हैं। अखिलेश यादव का यह दावा कि इससे बैंक नोटों का निजीकरण हो रहा है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

यह टेंडर केवल BRBNMPL द्वारा एक विशेष प्रकार के कच्चे माल यानी बेस सब्सट्रेट की खरीद के लिए जारी किया गया है। इसका भारतीय मुद्रा की छपाई, डिजाइन, सुरक्षा फीचर्स या नोट जारी करने का अधिकार किसी निजी कंपनी को देने से कोई संबंध नहीं है। भारतीय नोटों की छपाई पहले की तरह ही केवल RBI के नियंत्रण वाली प्रेसों में होती रहेगी।

इनमें BRBNMPL की मैसूर और सालबोनी स्थित प्रेसें तथा सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) की नासिक और देवास स्थित प्रेसें शामिल हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से पॉलिमर आधारित बैंक नोट लाने की संभावना पर विचार कर रहा है। खासकर छोटे मूल्य के नोटों के लिए क्योंकि वे जल्दी गंदे हो जाते हैं और उनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं। जून 2026 में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव शुरुआती चरण में है और केंद्रीय बैंक इसके फायदे और नुकसान का अध्ययन कर रहा है। भविष्य में ऐसा निर्णय होने पर भी नोटों की छपाई इन्हीं सरकारी प्रेसों में होगी, किसी निजी कंपनी के पास नहीं जाएगी।

 भारत में अभी पॉलिमर नोट जारी नहीं किए जाते और इसलिए यहाँ पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने वाली कोई कंपनी भी नहीं है। दुनिया के केवल कुछ ही देश पॉलिमर नोट जारी करते हैं। जैसे सामान्य कागज वाले नोटों के लिए इस्तेमाल होने वाले कॉटन पेपर में सुरक्षा फीचर पहले से शामिल होते हैं, वैसे ही पॉलिमर शीट में भी निर्माण के दौरान सुरक्षा फीचर जोड़े जाते हैं। इसलिए यह एक विशेष प्रकार का उत्पाद है जिसे दुनिया की केवल कुछ कंपनियाँ ही बनाती हैं। इसी कारण BRBNMPL ने योग्य कंपनियों से वैश्विक स्तर पर एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) माँगा है।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, रोमानिया और वियतनाम जैसे कई देशों ने अपने सभी या अधिकांश मूल्य वर्ग के लिए पॉलिमर बैंक नोट अपनाए हैं। लेकिन ये देश भी इन नोटों के लिए जरूरी विशेष ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट खुद नहीं बनाते। ये शीट कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों से खरीदी जाती हैं। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी ऑस्ट्रेलिया की CCL Secure है।

इसकी बेस फिल्म इसकी सहयोगी कंपनी Innovia Films तैयार करती है। इसके बाद CCL Secure उस पर ओपैसिफिकेशन लेयर और संबंधित केंद्रीय बैंक की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा फीचर जोड़ती है। दूसरी बड़ी कंपनी ब्रिटेन की De La Rue है जो अपना Safeguard पॉलिमर सब्सट्रेट बनाती है और तैयार बैंक नोट भी छापती है। दुनिया के केंद्रीय बैंक और उनकी नोट छापने वाली प्रेसें इन विशेष कंपनियों से तैयार पॉलिमर शीट खरीदती हैं। वे इन्हें खुद नहीं बनातीं।

अखिलेश यादव जहाँ पॉलिमर शीट के आयात को बैंक नोटों का निजीकरण बता रहे हैं तो वहीं हकीकत यह है कि भारत में भी हाल तक कागज वाले नोट आयातित सुरक्षा कागज पर ही छपते थे। RBI लंबे समय तक जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से आयातित करेंसी पेपर पर निर्भर था।

हालाँकि, होशंगाबाद की सिक्योरिटी पेपर मिल से कुछ घरेलू उत्पादन होता था लेकिन आत्मनिर्भरता को बड़ी मजबूती तब मिली जब मैसूर में बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने काम शुरू किया। SPMCIL और BRBNMPL के इस संयुक्त उपक्रम ने 2016 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। इससे भारत की उत्पादन क्षमता काफी बढ़ी और मेक इन इंडिया पहल के तहत आयातित बैंक नोट पेपर पर निर्भरता काफी कम हुई।

इसका मतलब यह है कि जब केंद्र में अखिलेश यादव की पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी, तब भारत विदेशी देशों से आयात किए गए कागज पर बैंक नोट छाप रहा था।

यह टेंडर भविष्य में इस्तेमाल हो सकने वाली नई सामग्री की जाँच और तैयारी की एक सामान्य प्रक्रिया है और यह पूरी तरह RBI की निगरानी में होगी। आयातित शीट का इस्तेमाल ₹10 और ₹20 के नोटों के सीमित पायलट प्रोजेक्ट के लिए किया जाएगा। इससे बैंक नोटों के निजीकरण या मुद्रा पर सरकार के नियंत्रण में किसी तरह की कमी का कोई संकेत नहीं मिलता।

दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल भारत में डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में नकदी का इस्तेमाल होता है। इसलिए यदि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव लागू होता है तो बड़ी मात्रा में पॉलिमर शीट की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में विदेशी कंपनियाँ भारतीय निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर भारत में ही उत्पादन इकाइयाँ लगाने में रुचि लेंगी।

जहाँ तक अखिलेश यादव के इस आरोप का सवाल है कि इतने महत्वपूर्ण काम के लिए बहुत छोटा विज्ञापन जारी किया गया, तो आजकल टेंडर विज्ञापन इसी तरह प्रकाशित किए जाते हैं। विस्तृत निविदा दस्तावेज और सभी शर्तें संबंधित विभाग या एजेंसी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाती हैं जबकि अखबारों में केवल छोटा-सा विज्ञापन देकर वेबसाइट का पता बताया जाता है। इससे खर्च कम रहता है क्योंकि बड़े अखबारी विज्ञापनों पर ज्यादा पैसा खर्च होता है। इस विज्ञापन में भी इच्छुक कंपनियों से कहा गया है कि वे EOI दस्तावेज, पात्रता मानदंड और अन्य जानकारी के लिए www.brbnmpl.co.in पर जाएँ।

ईरान की जनता में रिकॉर्ड गुस्सा, 90% लोग चाहते हैं बदलाव: राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़ी लीक रिपोर्ट में बड़ा दावा, जानें- युद्ध और राष्ट्रीय पहचान पर क्या बोले लोग?

जब से ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध शुरू हुआ है मीडिया इजराइल, ओमेन, दुबई, सऊदी अरब और कुवैत आदि में ईरान की बमबारी से हुए नुकसान को दिखाता रहता है, लेकिन ईरान को कितना नुकसान हुआ है वह नहीं दिखाता, क्यों? क्योकि ईरान ने इंटरनेट बंद कर रखा है। जिस दिन इंटरनेट की पाबन्दी हटेगी दुनिया एक बर्बाद ईरान देखेगी। 

फिर भी इतनी सख्ती के बावजूद ईरान राष्ट्रपति कार्यालय से लीक हुई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरानी युद्ध नहीं शांति चाहते हैं ताकि कट्टरपंथ से बाहर निकल आधुनिक जीवन जी सकें।  

गौरतलब यह है कि युद्ध से पहले ईरान में महिलाओं द्वारा बुर्का, हिजाब और नकाब को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे, महिलाएं बुर्का, हिजाब और नकाब उतार सड़क पर बाल कटवा रही थीं।        

ईरान की राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़ी एक गोपनीय रिपोर्ट लीक होने के बाद देश की मौजूदा स्थिति को लेकर कई बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत ईरानी नागरिक किसी न किसी तरह का बदलाव चाहते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुकी है। खास बात यह है कि रिपोर्ट सरकार को समस्याओं की जड़ दूर करने के बजाय जनता के गुस्से को नियंत्रित करने की सलाह देती है।

यह दस्तावेज ‘What Iran Wants’ शीर्षक से तैयार किया गया है। इसे राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के सामाजिक मामलों के सलाहकार और पूर्व खुफिया अधिकारी अली रबीई ने तैयार किया है। यह रिपोर्ट अप्रैल और मई में कराए गए सर्वे पर आधारित बताई गई है और जून में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच साझा की गई थी।

सर्वे में सिर्फ 9% लोगों ने मौजूदा व्यवस्था का समर्थन किया

रिपोर्ट के मुताबिक, जब लोगों से ईरान के भविष्य को लेकर राय पूछी गई तो केवल 9 प्रतिशत लोगों ने मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने का समर्थन किया। बाकी लोगों ने सुधार, बड़े सुधार या पूरी व्यवस्था बदलने जैसे विकल्पों को चुना।


हालाँकि, रिपोर्ट में सर्वे की कार्यप्रणाली का पूरा विवरण नहीं दिया गया है, इसलिए इसके आँकड़ों पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। फिर भी कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये नतीजे देश के मौजूदा माहौल से मेल खाते हैं।

जनता में गुस्सा और निराशा रिकॉर्ड स्तर पर

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान में गुस्से का स्तर दुनिया में अब तक दर्ज किसी भी देश से अधिक है। सर्वे के अनुसार 63.6 प्रतिशत लोगों ने खुद को गुस्से में बताया, जबकि पहले यह आंकड़ा काफी कम था।

इसके अलावा करीब आधी आबादी ने खुद को निराश, उदास, डरी हुई या लगातार चिंता में रहने वाला बताया। रिपोर्ट के अनुसार युवाओं और पढ़े-लिखे लोगों में यह भावना सबसे ज्यादा देखने को मिली।

युद्ध नहीं, बातचीत का रास्ता चाहते हैं लोग

अमेरिका के साथ तनाव को लेकर भी रिपोर्ट में अहम जानकारी सामने आई है। करीब 44 प्रतिशत लोगों ने युद्धविराम बनाए रखने और बातचीत जारी रखने का समर्थन किया। वहीं, बहुत कम लोगों ने अमेरिका की सभी शर्तें मानने की बात कही।

अधिकांश लोगों ने यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करने का भी विरोध किया। हालाँकि, सर्वे में यह भी सामने आया कि लोगों का भरोसा न तो बातचीत करने वाली टीम पर पूरी तरह है और न ही सैन्य नेतृत्व पर।

सरकारी दावों से अलग दिखी जनता की तस्वीर

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार जिस राष्ट्रीय एकजुटता की तस्वीर पेश कर रही है, वह पूरी तरह वास्तविक नहीं दिखती। सर्वे के अनुसार 47 प्रतिशत लोग युद्ध के दौरान आयोजित सरकारी रैलियों में कभी शामिल नहीं हुए। राजधानी तेहरान में यह आँकड़ा 61 प्रतिशत रहा। रिपोर्ट में यह भी माना गया कि राष्ट्रीय रक्षा से जुड़े स्वयंसेवी अभियान को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

राष्ट्रीय पहचान मजबूत, लेकिन देश छोड़ने की इच्छा भी बढ़ी

सर्वे में 85 प्रतिशत से अधिक लोगों ने खुद को ईरानी होने पर गर्व महसूस करने की बात कही। खासकर युवाओं में मजहबी पहचान की तुलना में राष्ट्रीय पहचान अधिक मजबूत होती दिखाई दी।

दूसरी ओर  परंपराओं का पालन लगातार घटने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है। इसके साथ ही करीब एक-तिहाई लोगों ने मौका मिलने पर देश छोड़ने की इच्छा जताई। 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और विश्वविद्यालय शिक्षित लोगों में यह प्रतिशत और अधिक बताया गया।

सरकार को क्या सलाह दी गई?

रिपोर्ट में सरकार को राजनीतिक बदलाव की सलाह नहीं दी गई है। इसके बजाय सुझाव दिया गया है कि लोगों को यह समझाने की कोशिश की जाए कि उनकी आर्थिक परेशानियों की मुख्य वजह प्रतिबंध हैं।

साथ ही सरकारी मीडिया को अधिक समावेशी छवि दिखाने और ऐसी नीतियों से बचने की सलाह दी गई है जिनसे सरकार और समाज के बीच टकराव बढ़े। रिपोर्ट के अंत में चेतावनी दी गई है कि समाज गहरे असंतोष की स्थिति में है और यदि हालात नहीं बदले तो भविष्य में इसका गंभीर असर देखने को मिल सकता है।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई दिल्ली पुलिस; बड़ा खुलासा : देश, हिन्दुत्व और मोदी विरोधी ताकतों की अराजकता फैलाने की खतरनाक साजिश, हटाए गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा


दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार (18 जुलाई 2026) को दिल्ली पुलिस ने जबरन अस्पताल ले गई है। यह कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश और उनकी लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और मेडिकल निगरानी सुनिश्चित करने के लिए की गई। अरविन्द केजरीवाल गैंग के मंसूबों पर पानी फिर गया।  

पुलिस के अस्पताल ले जाने के दौरान प्रदर्शन स्थल पर कुछ समय के लिए तनाव का माहौल भी देखने को मिला। दिल्ली पुलिस का कहना है कि कोर्ट के आदेशों और मेडिकल एक्सपर्ट्स की सलाह के अनुसार, सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए उन्हें जरूरी मेडिकल देखभाल के लिए सफदरजंग अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।

सोनम वांगचुक 28 जून 2026 से नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे समेत विभिन्न माँगों को लेकर धरने और भूख हड़ताल पर बैठे थे। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में उनकी सेहत को देखते हुए नियमित चिकित्सकीय जाँच और आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी नागरिक के जीवन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह पुलिस की टीम जंतर-मंतर पहुँची और मेडिकल सहायता के लिए वांगचुक को अस्पताल ले गई। इस दौरान वहाँ मौजूद छात्रों और समर्थकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

हालाँकि पुलिस उन्हें अपने साथ लेकर रवाना हो गई। इसके बाद जंतर-मंतर पर मौजूद अन्य प्रदर्शनकारियों को भी वहाँ से हटाया जाने लगा। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आरोप लगाया गया कि पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को उनके ठहरने के स्थान पर रोककर हिरासत में लिया गया।

अभिजीत दीपके ने दावा किया कि पुलिस ने उनके साथ मारपीट की। वहीं पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ दास ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया और कई लोगों को हटाया गया। हालांकि इन आरोपों पर दिल्ली पुलिस की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

वांगचुक ने शुक्रवार (17 जुलाई 2026) की रात एक वीडियो संदेश जारी कर कहा था कि उनके शरीर का करीब 20 प्रतिशत वजन कम हो चुका है. उन्होंने बताया कि शरीर की मांसपेशियाँ भी प्रभावित हो चुकी हैं, लेकिन उनका हौसला और मानसिक स्थिति अब भी मजबूत है।

वीडियो संदेश में वांगचुक ने देशवासियों से 20 जुलाई को प्रस्तावित ‘चलो संसद’ मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे मशहूर एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को 20 दिन पूरे हो चुके हैं। 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक नीट (NEET) जैसी बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। अभिजीत दीपके द्वारा संचालित आंदोलन में वांगचुक जब भूख हड़ताल पर बैठे तो उन्हें लगा कि वो महात्मा गांधी और समाज सेवी अन्ना हजारे की तरह एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे भीड़ गायब होती चली गई। इससे ना सिर्फ वांगचुक की हताशा बढ़ने लगी, बल्कि उन्हें मोहरा बनाने वाले देश, हिन्दुत्व और मोदी विरोधी ताकतों की बेचैनी भी बढ़ने लगी। अब ये ताकतें संसद के मानसून सत्र के दौरान अराजकता पैदा कर दिल्ली सहित पूरे देश का माहौल खराब करना चाहती हैं। इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ आंदोलन का आह्वान किया है। वहीं खुफिया एजेंसियों से मिली गोपनीय रिपोर्ट के बाद केंद्र की मोदी सरकार भी सतर्क हो गई है।

क्यों हटाए गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा? 
दिल्ली में कानून व्यवस्था के स्तर पर शुक्रवार 17 जुलाई, 2026 को बड़ा बदलाव हुआ। सतीश गोलचा को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पद से हटा दिया गया। सतीश की जगह वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अनुराग कुमार को दिल्ली पुलिस का नया कमिश्नर नियुक्त किया गया है। उन्होंने चंद घंटों में पदभार संभाल लिया। हैरानी की बात यह है कि सतीश गोलचा का कार्यकाल अभी खत्म नहीं हुआ था। करीब 11 माह पहले गोलचा को पद से क्यों हटाया गया इसको लेकर तरह-तरह की चर्चा की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, यह नियुक्ति दिल्ली की सुरक्षा स्थिति और आने वाली चुनौतियों को देखते हुए की गई है। साथ ही राजधानी में खुफिया जानकारी पर आधारित पुलिसिंग को मजबूत करने की जरूरत को भी ध्यान में रखा गया है। अनुराग कुमार लंबे समय से इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम कर रहे थे और उन्होंने अपने कार्यकाल में कई अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनका खुफिया एजेंसी में काम करने का अनुभव इस काम में मदद करेगा।

संसद के मानसून सत्र को बाधित करने की बड़ी साजिश
अभिजीत दीपके द्वारा संचालित आंदोलन की शुरुआत से ही बातें कही जा रही थीं कि सोनम वांगचुक तो सिर्फ मोहरा है। असली खिलाड़ी तो डीप स्टेट से जुड़ी वो ताकतें हैं, जो देश के अंदर और बाहर से इस फर्जी आंदोलन के लिए साजिशें रच रही हैं। आंदोलन की हवा निकलती देख दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी 16 जुलाई,2026 को वांगचुक से मिलने जंतर-मंतर पहुंच गए। इस दौरान सोनम वांगचुक और अरविंद केजरीवाल के बीच जो बातचीत हुई, वो एक बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही है। केजरीवाल ने सोशल मीडिया में एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें 0.25 सेकंड से लेकर 0.46 सेकंड तक उनकी बातचीत सुनी जा सकती है। 

केजरीवाल और वांगचुक के बीच बातचीत
वांगचुक – 28 को सफल बनाएंगे।
केजरीवाल – 28 को,
वांगचुक – सफल बनाए।
केजरीवाल – हां, सफल बनाएंगे।
वांगचुक – सफल बनाकर छोड़ूंगा नहीं तो भूत बन जाऊंगा।
केजरीवाल – आपको कुछ नहीं होगा। आपको कुछ नहीं होने देंगे।
वांगचुक – 20 को सफल बनाएंगे।
केजरीवाल – आपने पूरे देश को जगा दिया है।

20 तारीख को दिल्ली में अराजकता पैदा करने की होगी कोशिश
अरविंद केजरीवाल ने कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से कहा कि हमें सोनम वांगचुक जैसा शिक्षा मंत्री भी चाहिए और उसके क्रांतिकारी कदम भी चाहिए। 20 तारीख को देश के कोने कोने में जो लोग सुन रहे हैं। जो लोग सोशल मीडिया में देखेंगे, जो लोग मीडिया के जरिए देखेंगे, सबको अपील करना चाहता हूं। ज्यादा से ज्याद संख्या में यहां पर आएंगे। 20 तारीख के आंदोलन को, इनके कॉल को, पार्लियामेंट तक की जो यात्रा है उसको सफल बनाना है। ज्यादा से ज्यादा संख्या में आना है। गौरतलब है कि 20 जुलाई, 2026 से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है, जो 13 जुलाई तक चलेगा।

वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री क्यों नहीं बना रहे केजरीवाल ? 
सोनम वांगचुक से मुलाकात के दौरान अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार अहंकार में डूबी हुई है। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि युवाओं की आवाज सुन लीजिए, नहीं तो यही युवा 2029 में आपको सत्ता से बाहर कर देंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर असल में शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते तो सोनम वांगचुक को देश का शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं प्रधानमंत्री ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें डर होगा कि सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव कर देंगे। अगर अरविंद केजरीवाल को सोनम वांगचुक पर इतना भरोसा है तो उनके पास वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री बनाने का सुनहरा मौका है। पंजाब में भगवंत मान सरकार की लोकप्रियता खत्म हो चुकी है। अगले साल 2027 की शुरुआत में वहां चुनाव होने वाला है, ऐसे में केजरीवाल वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री बनाकर अपनी सरकार की साख बचा सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे।

वांगचुक को अन्ना हजारे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं केजरीवाल 
दरअसल, अरविंद केजरीवाल का मकसद अन्ना हजारे की तरह वांगचुक को मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करना है। वांगचुक से मुलाकात के दौरान केजरीवाल के अंदर की बात सामने आ गई। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि इतिहास खुद को दोहराता है। इसी जंतर-मंतर पर 4 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे आंदोलन पर बैठे थे और तीन साल बाद उस समय की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। केजरीवाल चाहते हैं कि वांगचुक को मोहरा बनाकर वो फिर से दिल्ली में खिसकी हुई अपनी सियासी जमीन को हासिल कर सकते हैं। केजरीवाल के इस सियासी मकसद को पूरा करने के लिए इससे पहले आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना, मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज भी जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके है।

 

अभिजीत दीपके और उसके दोस्त ने खोली केजरीवाल की पोल


अभिजीत दीपके के दोस्त ने खुलासा किया कि हम दोनों एक-दूसरे को करीब सात साल से जानते हैं। हम दोनों अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया टीम से जुड़े हुए थे। 2019-20 में अभिजीत दीपके आम आदमी पार्टी का ट्वीटर हैंडल देखता था। मैं व्हाट्सएप टीम देखता था। तब से हम लोग एक-दूसरे से परिचित थे। अभिजीत दीपके के दोस्त ने आगे कहा कि हैरानी की बात है कि कॉकरोच वाले बयान के एक हफ्ते पहले मेरी और दीपके की बात हुई थी, क्योंकि दीपके जॉब ढूंढ़ रहा था।