मोदी फिर बने संकटमोचक, पश्चिम एशिया में युद्ध के वैश्विक तनाव के बीच भी 4.50 लाख भारतीयों की सकुशल वापसी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के बीच संकटमोचक बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीयों की सुरक्षित स्वदेश वापसी का सिलसिला बना हुआ है। विदेश मंत्रालय के अनुसार एक माह में ही साढ़े चार लाख से अधिक भारत नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है। मंत्रालय ने कहा है कि 28 फरवरी से अब तक लगभग 4.50 लाख यात्री और भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया से भारत लौट चुके हैं। इनमें खाड़ी देशों, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब, ओमान, बहरीन और कुवैत के अलावा ईरान, इज़राइल और संघर्ष प्रभावित अन्य क्षेत्रों से लौटे भारतीय यात्री कामगार, छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं। भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर रख रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। युद्ध के कारण हवाई सेवाओं, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ा है, इसलिए भारतीय दूतावास लगातार हेल्पलाइन, विशेष उड़ानें और सुरक्षित निकासी योजनाएं चला रहे हैं।

भारतीय दुनिया के किसी कोने में फंसा हो, तिरंगा सुरक्षा की गारंटी
दुनिया एक बार फिर अशांत दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-इजराइल टकराव, या फिर अमेरिका की भूमिका हो। इन सबने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और भय का माहौल बना दिया है। ऐसे समय में, जब बमों की आवाज और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच आम इंसान सबसे अधिक असुरक्षित होता है, तब राष्ट्रों की असली परीक्षा होती है। भारत ने इस कसौटी पर बार-बार खुद को साबित किया है। पीएम मोदी के प्रयासों से केंद्र सरकार युद्ध के बीच फंसे भारतीयों की वापसी करा रही है। मोदी सरकार ने यह स्थापित कर दिया है कि दुनिया के किसी भी कोने में अगर भारतीय फंसा है, तो तिरंगा उसकी सुरक्षा की गारंटी है। पिछले माह 23 मार्च तक अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में फंसे 3.75 लाख भारतीयों की सुरक्षित वापसी हुई है। यह स्वदेश वापसी केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि एक मानवीय प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय संकल्प का परिचायक है। हाल के घटनाक्रमों में यह स्पष्ट हुआ है कि भारत सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और इसके लिए हर संभव संसाधन जुटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है।

संकट के बीच सुरक्षित वापसी का बड़ा अभियान
इजरायल-यूएस-ईरान 2026 में युद्ध के तेज होने पर प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशन में भारत ने अपने देशवासियों को सकुशल निकालने के अभियान को और अधिक गति दी। हजारों भारतीयों को ईरान से सुरक्षित निकाला गया, जिनमें से अधिकांश को आर्मेनिया और अज़रबैजान के रास्ते बाहर लाकर दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों के जरिए भारत पहुंचाया गया। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से जुड़े 70–80 छात्रों को सुरक्षित दिल्ली लाया गया। इस प्रकार 2025 और 2026 को मिलाकर अब तक करीब लाखों  भारतीयों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा चुकी है। तमिलनाडु के मछुआरे अभी भी ईरान क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनकी निकासी के प्रयास तेज गति से जारी हैं। इन अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का इवैक्युएशन तंत्र केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, बहुस्तरीय और प्रभावी प्रक्रिया है, जिसमें कूटनीति, ट्रांजिट देशों का सहयोग और आधुनिक लॉजिस्टिक्स का बेहतरीन समन्वय देखने को मिलता है।

पिछले साल भी ईरान और इजराइल से भारतीयों को लाए वापस
इससे पहले 2025 में इजरायल-ईरान संघर्ष की शुरुआत में भारत ने चरणबद्ध तरीके से अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने का व्यापक अभियान चलाया। इस दौरान सबसे बड़ा प्रयास “ऑपरेशन सिंधु” के रूप में सामने आया, जिसके तहत कुल 4415 भारतीयों को सकुशल निकाला गया। इनमें 3597 ईरान से और 818 इजरायल से थे। इन नागरिकों को 19 विशेष उड़ानों (निजी एयरलाइंस और भारतीय वायुसेना) के जरिए मुख्य रूप से नई दिल्ली लाया गया। शुरुआती चरण में ही करीब 100 से अधिक छात्रों को ईरान से आर्मेनिया के रास्ते सुरक्षित निकालकर भारत पहुंचाया गया, जिसके बाद यह प्रक्रिया लगातार कई चरणों में आगे बढ़ती रही। इस पूरे अभियान में जम्मू-कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और केरल के हजारों छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल थे। इस प्रकार 2025 के इस बड़े अभियान ने भारत की त्वरित रणनीति, समन्वय और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित किया।

भारतीय तिरंगा: सुरक्षा और विश्वास का सबसे भरोसेमंद का प्रतीक

जब कोई भारतीय विदेश में संकट में होता है, तो सबसे पहले उसे अपने देश के झंडे तिरंगे से उम्मीद बंधती है। यह केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सुरक्षा और विश्वास का आश्वासन बन चुका है। इजरायल-ईरान संघर्ष के बीच जब हजारों भारतीय, विशेषकर छात्र, अनिश्चितता में फंसे थे, तब भारत सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें सुरक्षित निकालने का अभियान शुरू किया। दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों से विशेष उड़ानों के जरिए इन नागरिकों को वापस लाया गया। यह दिखाता है कि भारत केवल कागजी आश्वासन नहीं देता, बल्कि जमीनी स्तर पर परिणाम भी सुनिश्चित करता है। भारतीय दूतावासों ने इस पूरे अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हेल्पलाइन नंबर जारी करना, नागरिकों से लगातार संपर्क बनाए रखना, सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना और स्थानीय प्रशासन से तालमेल बैठाना। ये सभी कदम इस बात को दर्शाते हैं कि भारत की कूटनीतिक मशीनरी संकट के समय कितनी प्रभावी और सजग हो जाती है।

एयरलिफ्ट से लेकर ग्राउंड सपोर्ट तक का व्यापक नेटवर्क
भारत का इवैक्युएशन प्रोटोकॉल बहुआयामी है। इसमें केवल एयरलिफ्ट ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी व्यापक सहायता शामिल होती है। संघर्ष क्षेत्र से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, वहां से उन्हें ट्रांजिट देशों तक ले जाना और फिर विशेष उड़ानों के जरिए भारत लाना। यह पूरी प्रक्रिया एक सुव्यवस्थित तंत्र के तहत संचालित होती है। भारतीय वायुसेना और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की साझेदारी इस दिशा में एक मजबूत उदाहरण प्रस्तुत करती है। इन अभियानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को और मजबूत किया है। आज भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता है, जो न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अन्य देशों के नागरिकों की भी मदद करता है। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का आधुनिक रूप है, जहां मानवता को प्राथमिकता दी जाती है।

मोदी की निर्णायक भूमिका ने संकट को अवसर में बदला
किसी भी संकट में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह दिखाया है कि निर्णायक फैसले, त्वरित कार्रवाई और स्पष्ट प्राथमिकताएं किस तरह संकट को अवसर में बदल सकती हैं। यह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दृष्टिकोण भी है, जो हर भारतीय को यह विश्वास दिलाता है कि वह कहीं भी हो, उसका देश उसके साथ खड़ा है। यह केवल राजनीति या कूटनीति का विषय नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न है। युद्ध के बीच फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना एक राष्ट्र के नैतिक दायित्व का हिस्सा है। भारत ने इस दायित्व को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि उसे पूरी निष्ठा और क्षमता के साथ निभाया भी है। आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से घिरी हुई है, भारत ने अपने कार्यों से यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील राष्ट्र भी है।

इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने जारी किए हेल्पलाइन नंबर
भारत ने बुधवार को ईरान से अपने नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु शुरू करने की घोषणा की, क्योंकि इजराइल-ईरान के बीच संघर्ष कम होने का कोई संकेत नहीं दिखा। इजराइल- ईरान में हुए घटनाक्रमों को देखते हुए, भारत सरकार ने इजराइल से उन भारतीय नागरिकों को निकालने का फैसला किया है जो वहां से निकलना चाहते हैं। इजराइल से भारत की उनकी यात्रा लैंड बॉर्डर के माध्यम से और उसके बाद हवाई मार्ग से कराई जाएगी। तेल अवीव स्थित भारतीय दूतावास इजराइल में मौजूद भारतीय नागरिकों की मदद करेगा, जो अपने देश लौटना चाहते हैं। इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। मोदी सरकार ने नागरिकों से तेल अवीव में भारतीय दूतावास संपर्क की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश दिया है।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से मेडिकल छात्रों की स्वदेश वापसी कराई
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संवेदनशीलता और लोकप्रियता ही है कि जब भी उन्हें पता चलता है कि दुनिया के किसी भी कौने में भारतीय संकट में हैं, तो वे उनकी सकुशल वापसी के लिए संकटमोचक की भूमिका में आ जाते हैं। ऐसा एक नहीं कई बार, कई देशों में फंसे भारतीयों के साथ हो चुका है। संकट से जूझ रहे भारतीयों की उम्मीदों का आखिरी सहारा पीएम मोदी ही बने हैं। वह चाहे कोरोना काल हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, या फिर किसी देश में कोई और संकट हो, हर बार हजारों भारतीयों की सकुशल स्वदेश वापसी हुई है। अब ताजा उदाहरण इजराइल-ईरान युद्ध का है। पीएम मोदी ने इस भीषण युद्ध के बीच ‘ऑपरेशन सिंधु’ चलाकर भारतीयों की सकुशल वापसी कराई है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान की मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे लगभग 110 भारतीय छात्र सुरक्षित भारत पहुंच गए हैं। इनमें से 90 छात्र कश्मीर के हैं। ईरान-इजराइल जंग से ऑपरेशन सिंधु के माध्यम से भारत पहुंचे छात्रों के मुताबिक वहां के हालात हर दिन खराब होते जा रहे हैं। खासकर तेहरान में स्थिति बहुत भयावह बनी हुई है। युद्ध इसलिए बहुत खराब है, क्योंकि इसमें इंसानियत ही खत्म हो जाती है।

अकेले ईरान में स्टूडेंट्स समेत दस हजार से ज्यादा भारतीय फंसे
ईरान और इजरायल के बीच में जारी जंग लगातार भीषण होती जा रही है। इजरायल जहां ईरान में राजधानी तेहरान, न्यूक्लियर साइट और सैन्य ठिकानों को टारगेट कर रहा है। वहीं ईरान भी इजरायल में सैन्य ठिकानों को तबाह करने में लगा है। जंग के बीच हजारों भारतीय ईरान और इजरायल में फंसे हुए हैं। अकेले ईरान में ही 10000 से ज्यादा भारतीय फंसे हैं जिनमें आधे से ज्यादा स्टूडेंट्स हैं। इनमें भी मेडिकल स्टूडेंट्स सबसे ज्यादा हैं। भारत सरकार ने युद्ध के बीच से भारतीयों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु लॉन्च किया है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान से निकाले गए ये छात्र मंगलवार को आर्मेनिया पहुंचे थे, जहां उन्हें राजधानी येरेवन के होटलों में ठहराया गया। इसके बाद इन्हें कतर के रास्ते भारत लाया गया। इंडिगो की एक फ्लाइट आर्मेनिया के येरेवन एयरपोर्ट से इन छात्रों को लेकर कतर की राजधानी दोहा के लिए रवाना हुई थी। इसके बाद एक दूसरी फ्लाइट से इन्हें दोहा से नई दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट लाया गया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने छात्रों को ईरान से बाहर निकालने की पुष्टि की है।

ईरान से लौटने वाले भारतीय छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल
इन छात्रों को आर्मेनिया बॉर्डर पर नॉरदुज चौकी से बसों में निकाला गया। ईरान में 1,500 स्टूडेंट्स सहित लगभग दक हजार भारतीय फंसे हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक मौजूदा हालात में देश के एयरपोर्ट भले ही बंद हैं, लेकिन लैंड बॉर्डर्स खुले हुए हैं। मंत्रालय ने विदेशी नागरिकों से ईरान छोड़ने से पहले अपना नाम, पासपोर्ट नंबर, गाड़ी डिटेल्स, देश से निकलने का समय और जिस बॉर्डर से जाना चाहते हैं, उसकी जानकारी मांगी थी।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से 110 छात्रों का ग्रुप दिल्ली पहुंच चुका है। इन छात्रों को आर्मेनिया के रास्ते भारत लाया गया है। इंडिगो एयरलाइंस की फ्लाइट देर रात 3 बजकर 43 मिनट पर दिल्ली लैंड हुई। इन 110 छात्रों में 94 जम्मू-कश्मीर से हैं जबकि 16 लोग अन्य 6 राज्यों से है। ईरान से लौटने वाले छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल हैं। सकुशल देश वापस आने के बाद इन छात्रों के चेहरे पर खुशी का साफ झलक रही थी।

ईरान-इजरायल के बीच जंग में राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी
वहीं, आपको बता दें कि इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, दोनों देशों के बीच जंग भीषण होती जा रही है। बुधवार को इजरायल ने तेहरान पर जबरदस्त अटैक किया। इजरायल के 50 से ज्यादा लड़ाकू विमानों ने ईरान की राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी की। इजरायल की एयरफोर्स ने तेहरान और उसके पास कराज में ईरान की न्यूकिलयर साइट को निशाना बनाया। इन दोनों ही न्यूक्लियर फैसेलिटीज में ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट में इस्तेमाल होने वाले सेंट्रीफ्यूज बनाता है। इजरायली सेना ने दावा किया कि 25 फाइटर जेट ने ईरान के वेस्टर्न सिटी करमनशाह में ईरान के 5 अटैक हेलीकॉप्टर्स को बर्बाद कर दिया। इजरायल के फाइटर जेट्स ने ईरान की उन साइट पर भी जोरदार अटैक किया जहां से इजरायल पर मिसाइल्स फायर की जा रही थी। इजरायल के हमलों में अब तक ईरान के करीब छह सौ लोग मारे जा चुके हैं और 1300 से ज्यादा लोग घायल हैं।

भारत ने फंसे लोगों को निकालने के लिए आर्मेनिया को क्यूं चुना?
दरअसल, ईरान का बॉर्डर 7 देशों से लगता है। ये देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान, आर्मेनिया, तुर्किये और इराक हैं। इसके अलावा समुद्री सीमा ओमान के साथ है। आर्मेनिया को ही चुनने की बड़ी वजह यह है कि आर्मेनिया का बॉर्डर ईरान के प्रमुख शहरों से कम दूरी पर है। आर्मेनिया के साथ भारत के संबंध काफी अच्छे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते भी हुए हैं। इसके अलावा आर्मेनियां को चुनने की कुछ प्रमुख वजहें हैं…
• आर्मेनिया राजनीतिक रूप से स्थिर है और भारत से उसके दोस्ताना संबंध हैं। वहां से फ्लाइट ऑपरेशन तेजी से संभव है, क्योंकि येरेवन एयरपोर्ट पूरी तरह चालू है।
• ईरान और आर्मेनिया के बीच फिलहाल कोई सीमा विवाद या सैन्य तनाव नहीं है।
• दूसरी तरफ ईरान का पूर्वी पड़ोसी पाकिस्तान है। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते ऑपरेशन सिंदूर के बाद और उसके पहले से ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में भारत के पास पाकिस्तान के रास्ते छात्रों को लाने का विकल्प नहीं है।
• इराक पहले से ही ईरान के साथ चल रहे तनाव में शामिल है। कई बार इजराइल ने इराक में भी ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वहां से गुजरना खतरे से भरा हो सकता था।
• हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में आया था। उसने भारत की कार्रवाई की निंदा भी की थी। ऐसे में भारत उसकी मदद नहीं लेगा।
• तुर्किये भले ही स्थिर देश है, लेकिन ईरान से सड़क के जरिए वहां तक पहुंचना काफी लंबा है। हाल ही में भारत और तुर्किये के बीच तनातनी देखने को मिली है। दरअसल तुर्किये ने भी ऑपरेशन सिंदूर की निंदा करते हुए खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था।

ईरान से इसलिए भारतीय छात्रों को सीधे नहीं लाया जा रहा
भीषण जंग के चलते इस वक्त ईरान और इजराइल के बीच हालात काफी तनावपूर्ण हैं। कई शहरों में हमले हो चुके हैं और सुरक्षा का खतरा बना हुआ है। ऐसे में भारतीय छात्रों को सीधे ईरान से एयरलिफ्ट करना फिलहाल संभव नहीं है। ईरान के ज्यादातर इंटरनेशनल एयरपोर्ट इस समय नागरिक उड़ानों के लिए बंद हैं। युद्ध जैसे हालात की वजह से वहां से फ्लाइट उड़ाना सुरक्षित नहीं है। ईरान के कई इलाकों में इजराइली हमले हो चुके हैं। ऐसे में फ्लाइट्स पर भी हमले का खतरा बना रहता है। सीधे ईरान से भारतीय एयरलाइंस को भेजना काफी जोखिम भरा है। इसके लिए ईरान की इजाजत के साथ-साथ मजबूत सुरक्षा इंतजाम भी चाहिए होंगे, जो युद्ध की स्थिति में संभव नहीं हैं। नॉरदुज बॉर्डर सुरक्षित माना जा रहा है। आर्मेनिया में हालात स्थिर हैं और वहां से फ्लाइट्स भी आसानी से उड़ाई जा सकती हैं।

कतर से भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कराया

इससे पहले कतर की अदालत ने 12 फरवरी को भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कर दिया। इसमें से सात नौसैनिक भारत लौट आए हैं। आठों पूर्व नौसैनिकों पर जासूसी करने के आरोप लगाए गए थे और वे कतर की जेल में कैद थे। इन्हें कतर की अदालत ने मौत की सजा भी सुना दी थी, जिसके बाद इनकी रिहाई मुश्किल हो गई थी। 26 अक्टूबर 2023 को कतर की अदालत ने जब इन पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा सुनाई तब समूचा देश मोदी सरकार के साथ खड़ा था और प्रार्थना कर रहा था कि इनकी जल्द रिहाई हो। लेकिन नफरत की राजनीति करने वाली कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को मुद्दा मिल गया। जब मौत की सजा सुनाई गई थी तब इसे सरकार की कूटनीतिक विफलता करार दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक प्रयासों से आज (12 फरवरी 2024) जब इनकी रिहाई हुई है तब उनके मुंह एक जोरदार तमाचा पड़ा है। चाहे पाकिस्तान से विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाना हो, यूक्रेन, लीबिया, सूडान, इजराइल, अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों को वापस लाना हो या फिर उत्तराखंड सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को सुरक्षित सकुशल लाना हो, आज नए भारत की ताकत पूरा विश्व देख रहा है।

भारत की कूटनीतिक चतुराई से रुकी मौत की सजा
कतर की अदालत की तरफ से जब पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का ऐलान किया गया था, तो भारत ने अपने कूटनीतिक चतुराई पेश करते हुए, इसके खिलाफ अपील की थी। इसका फायदा भी देखने को मिला था, क्योंकि 28 दिसंबर, 2023 को भारत की अपील को ध्यान में रखते हुए आठों नागरिकों को सुनाई गई मौत की सजा पर रोक लगा दी गई थी। पूर्व नौसैनिकों की रिहाई उस समय हुई है, जब पिछले सप्ताह ही दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) खरीदेगा। ये डील अगले 20 सालों के लिए हुई है और इसकी लागत 78 अरब डॉलर है। भारत की पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) कंपनी ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये करार किया है। इस समझौते के तहत कतर हर साल भारत को 7.5 मिलियन टन गैस निर्यात करेगा। इस गैस से भारत में बिजली, उर्वरक और सीएनजी बनाई जाएगी।

नक्सलियों के बाद अब धर्मांतरण करने वालों NGOs की नकेल कसेगी; अमेरिका ने NGOs को सीधी फंडिंग पर रोक लगाई

सुभाष चन्द्र 

अमेरिका के Secretary of State मार्को रुबियो ने साफ़ घोषणा कर दी कि अब से अमेरिका अंतरराष्ट्रीय और अमेरिका के NGOs पर करोड़ों डॉलर खर्च नहीं करेगी अब यह राशि सीधी विभिन देशों की सरकारों को दी जाएगी जिससे पैसे का लाभ सीधा जरूरतमंदो को मिले, NGOs जैसे बिचौलियों के हाथ न पड़े 

अमेरिका की यह घोषणा भारत में फलफूल रहे NGO उद्योग और धर्मांतरण में लिप्त संगठनों पर किसी वज्रपात से कम नहीं है मोदी सरकार इसलिए FCRA कानून में संशोधन की तैयारी में लगी है जिससे कांग्रेस और अन्य सेकुलर दलों के पेट में मरोड़ें पैदा हो गई है। यह फंडिंग 16000 NGOs को करीब 22 हजार करोड़ मिलती है जिस पर किसी की कोई जवाबदेही नहीं है

लेखक 
चर्चित YouTuber 
कांग्रेस के के सी वेणुगोपाल ने संशोधन को गैर संवैधानिक कहा है, जो NGOs और Community Organisations को ख़त्म कर देगा खासकर उन संस्थाओं को जो अल्पसंख्यक चलाते है वेणुगोपाल ने बड़ी हास्यास्पद बात कही है कि “we will not allow this to be passed under any circumstances”. कैसे रोक दोगे जनाब? क्या संसद में अराजकता फैला दोगे क्योंकि संशोधन प्रस्ताव तो पारित हो ही जायेगा तुम चाहे लाख सिर पटक लो - दोनों सदनों में NDA का पूर्ण बहुमत है अपना जमाना याद करो जब हर बिल आप भी बहुमत की वजह से पारित करा लिया करते थे

Cardinal Baselios has claimed “FCRA amendment bill has caused anxiety and pressure among Christian Communities”. ऐसी चिंता(anxiety) कभी उन्हें तब नहीं हुई जब ईसाइयों के गांव के गांव वक्फ बोर्ड ने हड़पने की कोशिश की इनकी चिंता अब इसलिए बढ़ रही है क्योंकि इस बिल से विदेशी धन पर रोक लगेगी खासकर conversion related activities पर

सबसे बड़ी बात है कांग्रेस और वामपंथी इन NGOs को मिलने वाले धन से धर्मांतरण को बढ़ाने के अलावा सरकार के खिलाफ नेरेटिव सेट कर लोगों को सरकार के खिलाफ प्रभावित करने का खेल भी खेलती हैं

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में साफ़ किया था कि ईसाई या मुस्लिम मजहब में जाने के बाद व्यक्ति को SC/ST के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता वैसे तो यह निर्णय भी धर्मांतरण के उद्योग पर देश भर में प्रभाव डाल सकता है लेकिन पंजाब जैसे राज्य के लोगों को ज्यादा सतर्क हो जाना चाहिए क्योंकि इस समय ईसाई मिशनिरिओं का सिखों को ईसाई बनाने का खेल वहां बड़े पैमाने पर चल रहा है 

यदि किसी हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन का धर्मांतरण ईसाई या इस्लाम में कराया जाता है तो उसका नए मज़हब के अनुसार नाम भी परवर्तित करना अनिवार्य होना चाहिए क्योंकि बिना नाम बदले आरक्षण का लाभ लेने की संभावना बनी रह सकती है क्योंकि नाम से तो वह हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन ही प्रतीत होगा

कांग्रेस का हाल ख़राब है चुनाव प्रचार में लगे सभी सांसदों को उसने दिल्ली बुला लिया है क्योंकि “किसी भी हाल” में बिल को रोकना है अभी वक्फ कानून ने ही कांग्रेस और मुस्लिम अल्पसंख्यक नेताओं की नींद उड़ाई हुई थी, अब ये कानून और उनके मंसूबों पर पानी फेर देगा

देश के अर्बन नक्सलों की अब शामत आएगी! 

मातृशक्ति BJP का मास्टरस्ट्रोक: महिला आरक्षण से लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, 273 महिला सांसद बनेंगी


क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को विकसित हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है? नारी शक्ति को जितना सम्मान सनातन धर्म में दिया गया है किसी अन्य धर्म में नहीं। पौराणिक कथाओं का अवलोकन करने पर एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि जीवन में जब पुरुष  किसी असुर शक्ति से मानव को राहत देने में असमर्थ होने पर महिला शक्ति जिसे आज देवी माता के रूप में पूजा जाता है, का सहारा लिया। देवी माता को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने वाले सभी देवता हैं। यही कारण है कि वर्ष में 2 बार नवरात्रे मनाने की प्रथा चली आ रही है।    

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और सरकार ने मातृशक्ति और युवाशक्ति पर खास फोकस किया है। देश की राजनीति में मातृशक्ति भागीदारी बढ़ाने को लेकर सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी की जा सकती है, ताकि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रभावी तरीके से दिया जा सके। इस योजना का मकसद यह है कि महिला आरक्षण लागू करने के साथ-साथ किसी राज्य की मौजूदा सीटों में कटौती न हो और सभी को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। साथ ही, आरक्षित सीटों के भीतर एससी और एसटी वर्ग के लिए भी अलग से आरक्षण जारी रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए संसद के मौजूदा सत्र या अगले सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। इससे लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है। इनमें महिला सांसदों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी।

गृहमंत्री अमित शाह की सभी राजनीतिक दलों में सहमति की कवायद
पीएम मोदी के दिशा निर्देशन में गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठकें भी की हैं। इस दौरान सीट बढ़ाने के “स्ट्रेट जैकेट फॉर्मूला” पर चर्चा हुई, जिसमें मौजूदा सीटों को बढ़ाकर नए ढांचे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जाएंगी। इससे लोकसभा की कुल सीटें बढ़कर करीब 800 से ज्यादा हो सकती हैं। इस बीच दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन पर ऐतराज किया है। इसलिए सरकार अब ऐसा फॉर्मूला लाने की कोशिश कर रही है, जिससे सभी राज्यों के हितों का संतुलन बना रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर सहमति बनाने के लिए एनडीए और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक की। सहमति बनने पर बिल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं।

महिला सांसदों ने सरकार के कदम को स्वागत योग्य बताया
महिला सांसदों ने बजट सत्र या अगले सत्र के दौरान महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए विधेयक लाने की केंद्र सरकार की योजना का स्वागत किया और कहा कि इस कदम से शासन में महिलाओं की भागीदारी और मजबूत होगी। जेडीयू सांसद लवली आनंद ने इसे “स्वागत योग्य कदम” बताया और कहा कि राजनीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी देश की प्रगति को गति देगी। भाजपा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा कि महिला आरक्षण कानून के पारित होने से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की “आधी आबादी” से किया गया एक लंबे समय से चला आ रहा वादा पूरा हुआ है। सहरावत ने कहा कि इस देश में कई लोगों ने महिलाओं के बारे में बात की है, लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लाने का प्रयास और उसमें मिली सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है। आरक्षण विधेयक लाना प्रधानमंत्री द्वारा देश की आधी आबादी से किया गया वादा है, और वह आधी आबादी उन पर भरोसा करती है।

2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन करने की रणनीति
दरअसल, 2023 में महिला आरक्षण कानून संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। इसके तहत महिला आरक्षण नई जनगणना के बाद लागू होना है। अब सरकार का प्रस्ताव है कि नई जनगणना का इंतजार करने की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन किया जाए। इससे प्रोसेस तय समय पर पूरी हो सकेगी और आरक्षण लागू किया जा सकेगा। इसके लिए दो बिल लाए जा सकते हैं। एक बिल के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन होगा, जबकि दूसरा परिसीमन कानून में बदलाव से जुड़ा होगा। इसे पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है।

महिला आरक्षण के लिए पूरे देश में एकरूपता लाने की कवायद
महिला आरक्षण प्रस्ताव के मुताबिक 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का ढांचा ऐसा होगा, जिसमें एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा मिलेगा। ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है। इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों इसके लिए कई नेताओं से बैठकें की हैं। इनमें वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (एसपी), आरजेडी और एआईएमआईएम के नेता शामिल रहे। बीजेडी और शिवसेना (यूबीटी) से भी बातचीत हुई है, जबकि कांग्रेस से चर्चा बाकी है।

महिला आरक्षण बिल दोनों सदनों से पास, पर अभी लागू नहीं
महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में यह बिल सर्वसम्मति से पास हुआ था। हालांकि, यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इसकी लागू होने की तारीख केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए तय करेगी और जरूरत पड़ने पर संसद इसमें संशोधन कर सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है।

1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था
• 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया।
• 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया।
• 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी।
• 1988: महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perpective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी।
• 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023
1998: 13 जुलाई को अटल की एनडीए सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन RJD सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998: 14 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में दोबारा पेश करने की कोशिश की, लेकिन हंगामे और विरोध की वजह से पेश नहीं हो सका।
1998: 11 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर पोडियम तक पहुंच गए।
1998: 23 दिसंबर को अटल सरकार बिल पेश करने में कामयाब रही। हालांकि JDU ने विरोध कर दिया और पारित नहीं हो सका।
2000: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2002: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2003: जुलाई में बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
2008: मनमोहन सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में विधेयक पेश किया। खूब हंगामा हुआ। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
2010: 9 मार्च को राज्यसभा में विधेयक पेश किया गया और दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया। बिल लैप्स हो गया।
2023: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में विधेयक संसद में पेश किया। कुशल प्रबंधन के चलते यह लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही पारित हो गया। 106वा संविधान संशोधन और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बना।

नक्सलियों का अंत करने के लिए मोदी, अमित शाह की इच्छा शक्ति को नमन और सभी सुरक्षाबलों को धन्यवाद और साधुवाद

सुभाष चन्द्र

अमित शाह ने लगातार यह प्रण किया था कि 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा और कल उन्होंने संसद में घोषणा कर दी कि देश माओवाद से मुक्त हो गया। एक आतंक पिछले 60 साल से चला आ रहा था लेकिन अधिकतम समय सत्ता में रही कांग्रेस वो नहीं कर सकी जिसकी आवश्यकता थी जो अब मोदी सरकार ने की यह केवल मोदी सरकार की इच्छाशक्ति का ही परिणाम है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
याद कीजिए 6 अप्रैल, 2010 को जब दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने 76 CRPF के जवानों की निर्मम हत्या की थी और JNU के छात्रों ने जिनमें प्रमुख था कन्हैया कुमार जश्न मनाया था आज वो कन्हैया कुमार कांग्रेस की NSUI का अध्यक्ष है याद कीजिए 25 मई, 2013 को जब छत्तीसगढ़ के बस्तर में कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ला के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया और 11 जून को उनकी मौत हो गई कांग्रेस कुछ नहीं कर सकी

अमित शाह ने याद दिलाया कि 172 जवानों को मारने वाले खूंखार माओवादी हिडमा के मारे जाने पर उसके समर्थन में इंडिया गेट पर प्रदर्शन हुआ जिसमें नारे लगे कि “तुम कितने हिड़मा मारोगे, हर घर से हिड़मा निकलेंगे राहुल गांधी ने वह वीडियो पोस्ट किया और ओडिशा में लाडो सिकोका के साथ मंच साझा किया कभी हर घर से अफजल निकाला जाता था कभी हिड़मा और हाल ही में खामनेई भी हर घर से निकालने की बात कही गई है कांग्रेस, CPI और CPM हमेशा माओवादियों के साथ खड़ी हुई कांग्रेस का हर नेता ही हिड़मा ही लगता है

बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए इस नक्सली आतंक ने 20 हजार से ज्यादा लोगों की जान ली और पिछले 12 वर्ष में 10 हजार नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया अमित शाह ने याद दिलाया कि मनमोहन सिंह ने भी माना था कि कश्मीर और पूर्वोत्तर से भी बड़ी चुनौती माओवाद है लेकिन कांग्रेस ने उसके खात्मे के लिए कुछ नहीं किया

जब जब भी माओवादी हिंसा होती थी टीवी चैनल्स पंचायत लगाते थे और कथित बुद्धिजीवी माओवादियों की गरीबी का रोना रोते थे गरीब थे लेकिन आधुनिक हथियारों से लोगों की हत्या करते थे CPI और CPM से अलग चीन ने नक्सली खड़े किये और आज एक यूट्यूब चैनल पर डॉ मनीष कुमार ने सही कहा कि माओवाद का खत्म होना असल में चीन की हार है लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभी जड़ ख़त्म नहीं हुई है 

माओवाद की जड़ ख़त्म करने के लिए अर्बन नक्सलों पर प्रहार करना होगा जिन्हे कभी चंद्रचूड़ ने बचा लिया था और कहा था “"Dissent is the safety valve of democracy. If you don't allow safety valve, pressure cooker will burst," मतलब अर्बन नक्सल की आवाज़ को उन्होंने Dissent कहा जिसे बढ़ने देना चाहिए

आज कई न्यूज़ पोर्टल हैं जो कथित तौर पर अर्बन नक्सलों के समर्थन में खड़े रहते हैं The Wire, Caravan, The Print, Scroll.In और The Quint जैसो पर साम दाम दंड भेद की नीति से प्रहार करना जरूरी है

अमित शाह का सुरक्षा बलों की प्रशंसा करना सराहनीय है सुरक्षाबलों ने अदम्य साहस का परिचय दिया देश से माओवाद के कलंक को मिटाने में वे सभी सुरक्षाबल साधुवाद के पात्र हैं 

जय हिंद! भारत माता की जय!

जैश के सरगना मसूद अजहर के भाई की मौत से पाकिस्तान में हड़कंप, संदिग्ध हालात में मिला ताहिर अनवर का शव


पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के भाई मोहम्मद ताहिर अनवर की संदिग्ध हालात में मौत हो गई है। अब तक इस मौत की वजह साफ नहीं हो पाई है। मोहम्मद ताहिर अनवर की मौत पाकिस्तान के बहावलपुर में हुई। उसकी उम्र करीब 62 साल बताई जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताहिर अनवर की मौत की पुष्टि खुद जैश-ए-मोहम्मद के आधिकारिक चैनल के जरिए की गई लेकिन आंतकी संगठन ने मौत के कारण को लेकर कोई जानकारी नहीं दी। न तो बीमारी का जिक्र किया गया है और न ही किसी हमले या घटना की बात कही गई है। इस चुप्पी ने पूरे मामले को और ज्यादा संदिग्ध बना दिया है।

ताहिर अनवर को सोमवार (30 मार्च 2026) देर रात बहावलपुर में स्थित मस्जिद में दफन किया गया। आंतकी संगठन के नए मुख्यालय ‘मरकज उस्मान-ओ-अली’ परिसर में आधी रात के करीब नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गई। इस दौरान संगठन के कई बड़े चेहरे मौजूद रहे जिनमें मसूद अजहर खुद भी शामिल था। इसके अलावा इब्राहिम अजहर, तल्हा अल सैफ, अब्दुर रऊफ और मोहम्मद अम्मार अलवी जैसे आतंकी भी वहाँ मौजूद थे।

जैश-ए-मोहम्मद में था बड़ा रोल

ताहिर अनवर कोई मामूली सदस्य नहीं था बल्कि वह संगठन के सैन्य मामलों का प्रमुख माना जाता था। वह पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से आतंकी गतिविधियों को संचालित कर रहा था। 2001 के बाद से उसने कई ट्रेनिंग कैंपों की स्थापना और संचालन में अहम भूमिका निभाई। हथियारों की सप्लाई और लॉजिस्टिक्स का जिम्मा भी उसी के पास था जिससे वह संगठन की रीढ़ माना जाता था। बताया जाता है कि जैश में शामिल होने से पहले वह पोल्ट्री फार्मिंग करता था और 12 भाई-बहनों में सबसे बड़ा था।

ऑपरेशन सिंदूर में हुआ था घायल

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताहिर अनवर पहले भी भारतीय कार्रवाई में घायल हो चुका था। भारत की ओर से बहावलपुर में किए गए हवाई हमलों के दौरान उसे गंभीर चोटें आई थीं। यह हमला ऑपरेशन सिंदूर के तहत किया गया था जो जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने किया था। पहलगाम में हुए हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। उसी हमले में उसका बेटा हम्माद भी घायल हुआ था। हालाँकि दोनों उस समय बच गए थे।

गुजरात : AAP का उपाध्यक्ष हसमुख पटेल गिरफ्तार, बेनामी संपत्तियों को छिपाने से इनकार करने पर अपनी ही महिला अकाउंटेंट का किया अपहरण

                                                   बेनामी लेनदेन में पकड़े गए AAP प्रदेश उपाध्यक्ष
गुजरात के गाँधीनगर में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रदेश उपाध्यक्ष हसमुख पटेल को एक महिला अकाउंटेंट के अपहरण, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला बेनामी लेनदेन और संदिग्ध वित्तीय गड़बड़ियों के खुलासे से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। पुलिस ने केस दर्ज कर आगे की जाँच शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अहमदाबाद के गोटा इलाके में रहने वाली महिला गाँधीनगर के सेक्टर-25 GIDC स्थित HBC लाइफ साइंस कंपनी में अकाउंटेंट के रूप में काम करती थी। कंपनी के मालिक हसमुख पटेल हैं, जबकि उनके भाई हिमांशु पटेल ने महिला को अपनी दूसरी कंपनी मैक्सिएमएस हॉलीडे प्राइवेट लिमिटेड के ऑडिट का काम भी सौंपा था।

ऑडिट के दौरान महिला ने करीब 80 से 85 लाख रुपए के संदिग्ध लेनदेन और बिना बिल के भुगतान का खुलासा किया। इस खुलासे के बाद कंपनी प्रबंधन में हड़कंप मच गया और यहीं से पूरे विवाद की शुरुआत हुई।

अपहरण, मारपीट और धमकी देने का आरोप

शिकायत के मुताबिक, 26 मार्च 2026 को दोपहर के समय कंपनी के पार्किंग एरिया से महिला को जबरन एक हरे रंग की कार में बैठाकर अगवा कर लिया गया। चलती गाड़ी में आरोपितों ने महिला के साथ मारपीट की, उसके बाल खींचे और धमकी दी कि अगर उसने इस मामले की जानकारी किसी को दी तो उसे जान से मारकर कहीं दफना दिया जाएगा।

घटना के बाद डरी हुई महिला ने हसमुख पटेल को फोन कर पूरी जानकारी दी, लेकिन मदद करने के बजाय उस पर शिकायत न करने का दबाव बनाया गया। आरोप है कि यह पूरी साजिश उन्हीं के इशारे पर रची गई थी।

बाद में महिला ने गाँधीनगर के सेक्टर-21 पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए हसमुख पटेल को गिरफ्तार कर लिया। मामले में अन्य आरोपितों के खिलाफ भी जाँच जारी है।

‘द वायर’ में सूरज येंगडे का ‘दलित पोर्न’ वाला लेख, संस्थापक-संपादक ने बताया ‘फर्जी’: वायरल स्क्रीनशॉट से छिड़ा विवाद

                      वायरल स्क्रीनशॉट में सूरज येंगड़े के जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।

वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।

इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।

वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।

ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।

द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।

फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को क्यों लगा असली?

भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।

येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।

सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”

 एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।

येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।

इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।

भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।

साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।

                                                    वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।

                       पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट

इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।

इज़रायल के यहूदियों को मेरा संदेश : यह युद्ध यहूदी कौम के अस्तित्व को बचाने के लिए है

सुभाष चन्द्र

इस लेख में इज़रायल के यहूदियों को मैं कुछ कहना चाहता हूं क्योंकि कल के समाचारों से पता चला कि इज़रायल में युद्ध के खिलाफ लोगों ने भारी प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री नेतन्याहू को हटाने तक की मांग के लिए नारे लगाए गए। यह आक्रोश देख कर मुझे दुख हुआ

इज़रायल की जनता के नेतन्याहू से मतभेद हो सकते हैं लेकिन यहूदी कौन एक बात याद रखनी चाहिए कि ईरान यहूदियों के लिए दूसरा हिटलर है जिसने 60 लाख यहूदियों को गैस चैंबरों में हत्या कर दी थी लेकिन 2000 हजार साल पुरानी यहूदी कौम ने 1948 से लगातार अपने चारों तरफ बैठे इस्लामिक दुश्मनों का मुकाबला किया है फिलिस्तीन और अन्य इस्लामिक देश इज़रायल को देश ही नहीं मानते और ईरान बार बार धमकी दे रहा है कि वह इज़रायल को दुनिया के नक़्शे से मिटा देगा क्या इज़रायल के यहूदी अपना अस्तित्व मिटा हुआ देखना चाहते हैं? 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
यहूदी कौम ने हर युद्ध में कुर्बानी दी है और दुनिया के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया है जो इस्लामिक शत्रु इज़रायल को देखना नहीं चाहते, वे इज़रायल में भी मौजूद हैं भारत की तरह इज़रायल को भी बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से लड़ने की जरूरत है इस्लामिक शक्तियां इज़रायल को ख़त्म करना चाहती हैं जबकि इज़रायल ने उनके साथ मिलकर रहने की कोशिश भी की है

ईरान ने इज़रायल को ख़त्म करने के लिए हमास, हिज़्बुल्ला और हूती जैसे खूंखार आतंकी पैदा किये सीरिया के आतंकियों को भी धन और हथियार देता रहा लेकिन यह यहूदियों की इच्छाशक्ति है जिसकी वजह से ईरान सफल नहीं हो सका

इज़रायल के यहूदियों को क्या लगता है कि अगर नेतन्याहू को हटा दिया गया और Yair Lapid या Naftali Bennett प्रधानमंत्री बन गए तो वे क्या युद्ध बंद कर देंगे? ये सोचना अपने आपको धोखा देना होगा क्योंकि जो संकट नेतन्याहू के सामने है, वह उन दोनों के सामने भी होगा क्योंकि यहूदी कौम इस्लाम की स्थायी शत्रु है जिसका खात्मा ही इस्लाम का लक्ष्य है ईरान परमाणु हथियार इज़रायल को ख़त्म करने के लिए बनाना चाहता है पाकिस्तान के पास तो पहले से वो हथियार हैं और वह तो इज़रायल को मान्यता भी नहीं देता जैसा युद्ध नेतन्याहू लड़ रहे हैं वैसा ही Naftali और Lapid भी लड़ेंगे या यहूदियों के अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ने को विवश होंगे

इसलिए मेरा इज़रायल के यहूदियों से अनुरोध है कि वे अपनी कौम के अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुट रहें और नेतन्याहू के साथ खड़े रहें

मोदी को गोली मारने वाले, इजरायल को उड़ाने वाले ‘Time Bomb’ नहीं लेकिन योगी को खिलौना देने वाली बच्ची ‘हिंदू आतंकी’: क्यों वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना बनी यशस्विनी

                       योगी बच्ची संग (बाएँ), प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा (दाएँ), (साभार : PTI & crickettimes)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।

बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”

मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।

आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’

लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”

आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”

वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”

एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”

इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।

जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं

ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।

यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।

आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।

आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।

बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’

आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।
यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?

आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए

आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।

आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।