अरविंद केजरीवाल, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा (साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यूज ऑन एआईआर)
इस समय कांग्रेस के राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल दोनों में "उपद्रवी नंबर 1" बनने की जबरदस्त होड़ मची हुई है। दोनों ही की पार्टियां चुनाव हार रही है। गुजरात निकाय चुनावों में तो केजरीवाल पार्टी हवा हो गयी। पांच राज्यों में हुए चुनावों में कहीं नहीं। अब जनता में बने रहने के लिए कोई उपद्रव तो करना है। राहुल का लोकसभा में हंगामा और लोकसभा बाधित करने का ड्रामा देखते ही रहते हैं। संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। ऐसे में केजरीवाल क्यों पीछे रहे। केजरीवाल ने तो जस्टिस स्वर्ण कान्ता शर्मा पर ही सवाल खड़ा कर तीसमारखाँ बन सुर्खियां बटोरने में लगे हैं। वैसे इन दोनों के उछलने में न्यायपालिका का भी बहुत बड़ा योगदान है, जिसे न्यायपालिका झुठला नहीं सकती। प्राथमिकता पर इनके मुकदमों की सुनवाई और जमानत दे देना। वकील का नाम और शक्ल देख केस को तावोच्य देना। खैर, केजरीवाल ने जो जस्टिस स्वर्ण कान्ता शर्मा पर आरोप लगाए है सुप्रीम कोर्ट ने क्या कार्रवाही की? क्या कोई जज को किसी आयोजन में जाने के लिए नेताओं से इजाजत लेनी पड़ेगी? नेता चाहे किसी भी फंक्शन में चला जाए लेकिन जज नहीं, क्यों? इस गंभीर मसले पर सुप्रीम कोर्ट को मंथन करना चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब इन नेताओं का अनुसरण करते अन्य आरोपी कोर्ट का बहिष्कार करे तो उस पर भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो। क्योकि आरोपी का वकील भी इन्ही केसों का reference देगा। नेताओं और सामान्य के लिए अलग कानून नहीं होना चाहिए।
दिल्ली के शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अब उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से पेश नहीं होंगे।
पत्र में केजरीवाल ने क्या कहा?
केजरीवाल के अनुसार, यह फैसला उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया। उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘सत्याग्रह’ का हवाला देते हुए लिखा कि जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, न्याय की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कदम उठाना चाहिए, चाहे उसके परिणाम उसके खिलाफ ही क्यों न जाएँ।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अब इस केस में न तो खुद कोर्ट में पेश होंगे और न ही उनके वकील उनकी ओर से कोई दलील देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस निर्णय के संभावित कानूनी परिणामों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगे चलकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जाने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।
जानिए क्या कहता है कानून?
अब यहाँ सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि कानून इस पूरे घटनाक्रम को किस नजरिए से देखता है। आज तक ने इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत की है और बताया है कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तामता ने विस्तार से कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
उनके अनुसार, जब किसी आरोपित को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलती है, तब भी उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत एक बॉन्ड भरना होता है। यह बॉन्ड आमतौर पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत होता है, जिसमें आरोपित यह वादा करता है कि यदि हाई कोर्ट में अपील होती है, तो वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होगा।
इस मामले में भी केजरीवाल ने ऐसा बॉन्ड भरा है। मतलब वह कानूनी रूप से बाध्य हैं कि हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान उपस्थित रहें। यदि वह कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो यह बॉन्ड का उल्लंघन माना जाएगा और कोर्ट उनके खिलाफ पहले जमानती वारंट जारी कर सकती है।
यदि इसके बावजूद भी वे पेश नहीं होते हैं, तो गैर-जमानती वारंट भी जारी किया जा सकता है। कानून का एक और महत्वपूर्ण पहलू इस मामले में सामने आता है, जिसे ‘एकतरफा सुनवाई’ या Ex-Parte कहा जाता है। यदि कोई आरोपित कोर्ट में उपस्थित नहीं होता है, तो कोर्ट उसके बिना ही सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।
इसका मतलब यह होता है कि केवल जाँच एजेंसी या विरोधी पक्ष की दलीलें सुनी जाएँगी और आरोपित को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलेगा। यदि इस तरह की सुनवाई में फैसला जाँच एजेंसी के पक्ष में जाता है, तो ट्रायल कोर्ट का राहत देने वाला फैसला पलट सकता है और मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल को फिर से आरोपित के रूप में पेश होना पड़ सकता है और पूरी कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हो सकती है।
जानिए क्या है पूरा मामला?
मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की शराब नीति से जुड़ा है, जिस पर आरोप लगे कि इसमें नियमों को बदलकर कुछ निजी पक्षों को फायदा पहुँचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। जाँच एजेंसियों ने इस केस में केजरीवाल समेत कई लोगों को आरोपित बनाया और लंबी जाँच के बाद मामला कोर्ट तक पहुँचा।
इस केस में 27 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए केजरीवाल और अन्य आरोपितों को राहत दे दी। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने जाँच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए और जाँच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश तक कर दी।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जाँच एजेंसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। यह अपील जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने आई। हाई कोर्ट ने सुनवाई के शुरुआती चरण में ट्रायल कोर्ट के कुछ निर्देशों पर रोक लगाई और मामले को आगे सुनने का निर्णय लिया।
यहीं से इस केस ने एक नया मोड़ लिया, क्योंकि अब यह सिर्फ ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा नहीं रह गया था, बल्कि हाईकोर्ट में पूरी प्रक्रिया फिर से खुलने की स्थिति बन गई थी।
अरविंद केजरीवाल के बेतुके माँग ने मोड़ा केस का रुख
इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने माँग की कि इस केस की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से हटाकर किसी दूसरी बेंच को दे दी जाए। इस माँग के पीछे उन्होंने ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं।
चूँकि इस केस में जाँच एजेंसी केंद्र सरकार के अधीन है और उसकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश होते हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि किसी जज के रिश्तेदार वकालत करते हैं या किसी पैनल में हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वह पक्षपाती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह के आधार पर जज खुद को अलग करने लगें, तो न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा और हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की कोशिश करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी आरोपित या पक्षकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह तय करे कि उसका केस कौन सा जज सुनेगा।
जब उनकी यह माँग खारिज हो गई, तो इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को एक विस्तृत पत्र लिखा। यह पत्र इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। इस पत्र में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अब इस कोर्ट से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट की कार्यवाही सख्त नियमों और प्रक्रियाओं के तहत चलती है। इसमें व्यक्तिगत असहमति के आधार पर कोर्ट में पेश न होना न केवल खुद के केस को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।
यदि केजरीवाल कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो हाई कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है, जिसमें वारंट जारी करना और एकतरफा सुनवाई शामिल है। वहीं यदि हाई कोर्ट जाँच एजेंसी की अपील को स्वीकार कर लेता है, तो मामला फिर से निचली अदालत में जा सकता है और कानूनी लड़ाई एक बार फिर नए सिरे से शुरू हो सकती है।