इंडी गठबंधन की रैली का कड़वा सच: हिंदुओं से नफरत, घुसपैठियों से हमदर्दी

दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी इंडी गठबंधन की “वोट बचाओ, देश बचाओ” महारैली का आयोजन किया गया। 1 नवंबर को आयोजित इस महारैली में कांग्रेस, सपा, टीएमसी, राजद और आप सहित लगभग 20 से अधिक विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं, कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने हिस्सा लिया। हालांकि विपक्ष की तरफ से इस महारैली में 10 लाख लोगों के शामिल होने के दावे किए गए थे, लेकिन सारे दावे खोखले साबित हुए। दरअसल, इंडी गठबंधन का यह शक्ति प्रदर्शन चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा था। वोट चोरी और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में विपक्ष ने जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा और धमकी का इस्तेमाल किया, उससे स्पष्ट हो गया कि इस रैली का मुख्य एजेंडा ‘हिन्दू विरोध और घुसपैठिया बचाओ’ था।

राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को दी धमकी  
इंडी गठबंधन की “वोट बचाओ, देश बचाओ” महारैली में विपक्षी नेताओं खासकर राहुल गांधी के निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार थे। राहुल गांधी ने जिस तरह एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख पर तीखा हमला बोला, वो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से आपेक्षा नहीं की जा सकती। उन्होंने मंच से दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाया जाएगा और उन्हें जेल जाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य चोरी नहीं है, बल्कि देश के हर नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों और आवाज की चोरी है जिसे कानून की भाषा में ‘देशद्रोह’ माना जाना चाहिए।

पीएम मोदी और गृहमंत्री शाह को लीगल कारवाई की धमकी
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “नरेन्द्र मोदी कहीं नहीं जा सकते। अगर जाना भी चाहेंगे हम उन्हें नहीं जाने देंगे। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह जी आप बात समझिए। ज्ञानेश कुमार के बाद हम आपके सामने खड़े होने जा रहे हैं और आप भूलिए मत जो आपने वोट चोरी की है। कहीं नहीं जाएंगे। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ, अमित शाह के खिलाफ लीगल कारवाई होगी। देश को न्याय मिलेगा। यह जो आपने वोट चोरी की है। अडानी को जो आपने देश बेचा है। उसके लिए देश आपसे न्याय मांगेगा। देख लेना आप भागने की मत सोचो। आप भाग नहीं सकते। आप यहीं के यहीं रहोंगे और आपके खिलाफ ये जो आवाज है। आपके खिला, अमित शाह के खिलाफ, ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई होगी… होगी…होगी।”

जो काफ़िर हैं हर रोज़ डरते हैं-ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल में सत्ता जाने के बाद ममता बनर्जी मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए उनकी भाषा बोल रही है। रामलीला मैदान के मंच से उन्होंने हिन्दुओं को काफिर (अल्लाह के अस्तित्व को नहीं मानता) कहने से बाज नहीं आईं। उन्होंने कहा, “हम कहते हैं रोशनी चांद से होती है, सितारों से नहीं। मोहब्बत लोकतंत्र से होती है, पुलिस की बर्बरता से नहीं। इसी के लिए जो लड़ते हैं वो ज़िंदगी बनाते हैं, क़ीमत कामयाबी कराती है। और जो डरते हैं वो मरते हैं, जो काफ़िर हैं हर रोज़ डरते हैं और जो लड़ते हैं वो जीतते हैं। और आने वाले दिनों का स्लोगन एक ही है- Save India, Save Democracy… और युवा, छात्र और CJP तथा अन्य सभी… हम आपसे कह रहे हैं कि यहां कोई रंग नहीं है, कोई भेद नहीं है। सभी जातियां, सभी पंथ, सभी समुदाय… आइए मिलकर उस लड़ाई को लड़ें।”

SIR में अधिकतर मुस्लिमों के नाम काटे गए-नेहा बोरा
भारत में रेड और ग्रीन नेटवर्क की ब्रांड एंबेसडर नेहा बोरा ने रामलीला मैदान के मंच से मुस्लिम तुष्टिकरण का खुलकर प्रदर्शन किया। उन्होंने घुसपैठियों को बचाने के लिए देश की संवैधानिक संस्था को चुनौती दी। उन्होंने सवाल किया कि आप होते कौन हैं हिंदुस्तान की आवाम को यह पूछने वाले कि तुम अपनी सिटीजनशिप प्रूफ करो? उन्होंने कहा, “वो अपनी तरफ से नफ़रत की, इस्लामोफ़ोबिया की, जातिवाद की, पितृसत्ता की, नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ पीलीभीत में आप देखिए, 10,470 वोटर्स के नाम पर फॉर्म-8 की एप्लीकेशंस मूव की गई हैं, जिसमें अधिकतर मुसलमान हैं। बंगाल का आंकड़ा देखिए, जहां पे 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटर्स जिनके वोट डिलीट किए गए वो महिलाएं हैं, 70 प्रतिशत से ज्यादा वोटर्स जिनके वोट डिलीट किए गए वो मुसलमान हैं। उत्तराखंड का एग्जांपल ले लीजिए… किच्छा में 5,000 से ज्यादा लोगों के वोट्स फॉर्म-7 के नाम पर डिलीट किए गए।”

योगेंद्र यादव ने घुसपैठियों का किया बचाव
आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव का मुस्लिम प्रेम जगजाहिर है। रामलीला मैदान की रैली से पहले आयोजित प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ कार्यक्रम में उन्होंने खुद को मुस्लिमों का प्रतिनिधि बताया। उन्होंने कहा,”मैडम मैं इस देश के अल्पसंख्यकों की तरफ से जिनके पुरखों ने पार्टीशन का दंश झेलने के बावजूद इस देश को चुना था। जिनके पुरखों की हड्डियां इस देश की मिट्टी में गड़ी हैं। जिनके खिलाफ घुसपैठ या घुसपैठिया करके तोहमत लगाई गई है। इलेक्शन कमीशन ने इस देश को तोड़ने के षड्यंत्र में योगदान दिया है… बार-बार एसआईआर में इलीगल फॉरेनर का नाम लेके। जबकि हकीकत उन्हें पता थी, मैडम। हकीकत यह है कि छह राज्यों से हमें केवल 1600 नाम मिले हैं। इसका मतलब है 0.01% फॉरेनर भी नहीं है। और जो है मैडम वो नेपाल के निकले हैं।”

SIR की वजह से 71 प्रतिशत मुस्लिमों के नाम कटे- महुआ
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने नई दिल्ली में ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा आयोजित एक प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ कार्यक्रम के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत हटाए गए मतदाताओं में से 71 प्रतिशत मुस्लिम और 51 प्रतिशत महिलाएं हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम करने वाली “कठपुतली” बताया और उन पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बंगाल में SIR के तहत आपराधिक खेल रचा गया। जब SIR प्रक्रिया शुरू हुई, तो 7.86 करोड़ मतदाता थे। गणना के बाद 58 लाख नाम हटा दिए गए, और फिर शुरू हुई एक खामोश और अदृश्य धांधली।

कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए; मनमोहन सिंह प्रेम से कुर्सी दे रहे थे तो बैठ जाते और आज तक दादी की तरह तानाशाह बनकर रहते

सुभाष चन्द्र

विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता, इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता। भारत से लेकर पूरी दुनिया में राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनने के मुंगेरी लाल के सपने देख रहे हैं उनसे बड़ा महामूर्ख और बेवकूफ पूरी दुनियां में नहीं मिलेगा। 1555 में फ्रैंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस ने साफ लिख दिया था कि राजीव के बाद परिवार से कोई प्रधानमंत्री नहीं बनेगा।  

एक कहावत जो कांग्रेस पर शत प्रतिशत सच होती नज़र आ रही है "दिल के फफोले जल उठे सीने की आग से इस घर को आग लगाई घर से चिराग से" यानि प्रियंका को पार्टी में शामिल कर सोनिया और राहुल ने भयंकर गलती कर दी है। आज हालत ये है कि प्रियंका गुट कहने को तो राहुल के साथ खड़े नज़र आते हैं लेकिन सूत्रों के अनुसार प्रियंका गुट राहुल को पछाड़ देने में काम कर रहा है। कहना मुश्किल है कि कब पार्टी ही प्रियंका को अपना नेता मान पार्टी तोड़ दे। 

खैर, क्या हाल कर दिया नरेंद्र मोदी ने इस फर्जी गांधी परिवार का जो कभी प्रधानमंत्रियों का खानदान हुआ करता था लेकिन आज सड़कों पर बैठा है सत्ता पाने के लिए। 

मुझे अच्छी तरह याद है एक कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में मनमोहन सिंह से स्पष्ट कहा था, “मैं जिस कुर्सी पर बैठा हूं, वो आपकी ही है, आप जब मर्जी ले सकते हैं, मैं खाली कर दूंगा”।

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ये राहुल गांधी को कहा था और वो बड़े आराम से तब प्रधानमंत्री बन सकता था। कोई रोक नहीं सकता था और फिर तानाशाह बनकर आज तक राज कर रहा होता। 

परसों खड़गे के घर में फर्जी संसद में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रताव पारित करने और कल रामलीला मैदान में फ्लॉप रैली करके क्या हासिल हो गया? व्यापारी वर्ग को हज़ारों करोड़ का नुकसान जरूर हो गया। लेकिन न ज्ञानेश कुमार हटा और न मोदी, अलबत्ता सिखों के कत्लेआम के दिन रैली करके एक और दाग कांग्रेस के माथे पर लगा लिया।

कितनी जनता आई, वो मैदान कितना खाली था, बता रहा था फिर बेशक AI की कैसी भी तस्वीरें पोस्ट कर दो। 50 हज़ार की क्षमता वाले मैदान में 10 लाख लोग आने का दावा करना ही हास्यास्पद था। बहुत लोग कहते दिखाई दिए, उन्हें पता नहीं क्यों लाए गए हैं, पैसे मिले और दिल्ली घूमने आ गए।

रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली के लिए सात लाख इडली और नारियल की चटनी का इंतज़ाम था।
हर पैकेट में दो-दो इडली और चटनी पैक होकर तैयार थीं। मगर मैदान में पहुँचे महज़ 25 हजार लोग!
अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल विपक्ष की एकजुटता नहीं, बल्कि बाकी इडली के निपटारे का है!
सात लाख इडली बन गईं, पैकेट तैयार हो गए, चटनी भी बँटने को तैयार थी…बस भीड़ ही रास्ता भूल गई!
लगता है इंडिया गठबंधन की रैली में जनता कम और नाश्ते का जनादेश भारी पड़ गया!
राजनीति में भीड़ जुटाना मुश्किल है, लेकिन इतनी इडली खपाना उससे भी बड़ी चुनौती है! ......रैली का तो जो होना था वो हो गया....सबने देख लिया कि 13 पार्टियां मिलकर भी 50 हजार की कपैसिटी वाले मैदान को आधा भी नहीं भर पाईं.........लेकिन बात वो नहीं है....इस रैली ने INDI गठबंधन की पोल खोल दी.....
* प्रियंका वाड्रा ने ना तो mock parliament मे कोई भाषण दिया...ना कल रैली मे....जबकि नेहा वोरा ने दिया....ध्यान रहे कि...राहुल गांधी जब वियतनाम मे थे...तो प्रियंका ने अपने बेटे को चमचों के नए मालिक के रूप मे प्रोजेक्ट करने की कोशिश की थी.
* सुप्रिया सुले ने भी दोनों मे से किसी जगह भाषण नहीं दिया...जबकि वो दोनों जगह मौजूद थीं.
* उद्धव आए ही नहीं...ना mock parliament मे ना रैली में.
* DMK भी नहीं आई....ना कोई बयान दिया.
* तमिलनाडु के विजयन भी नहीं आए...ना कोई बयान आया.
* झारखंड के हेमंत सोरेन भी नहीं आए.
* केजरीवाल भी नहीं आए.
* CJP का कोई तिलचट्टा कहीं नहीं दिखा

........ये पूरा जमावड़ा सिर्फ हारे हुए नेताओं का था जिसमें....राहुल...अखिलेश...तेजस्वी और ममता प्रमुख थे.......जिसे INDI गठबंधन का नाम दिया गया है....बाकि गठबंधन जैसी कोई चीज़ अब बची नहीं है...

आखिर ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा क्यों देंगे? तुम्हारे पास वोट चोरी के सबूत हैं तो सुप्रीम कोर्ट में दो जहां तुम लोगों ने मुक़दमे दायर किए हुए हैं। राहुल गांधी के शब्दों अहंकार देखो। उसने कहा कि

“ज्ञानेश कुमार का कृत्य सामान्य चोरी नहीं है, कानून की भाषा में इस Rarest of Rare कहते हैं और यह देश द्रोह है” फिर तो सुप्रीम कोर्ट उसे जरूर फांसी की सजा सुना देगा । लेकिन राहुल गांधी की क्या औकात है इस तरह कानून की व्याख्या करने का।

राहुल ने आगे कहा कि “अमित शाह कहते हैं कि नरेंद्र मोदी कहीं नहीं जा रहे। मैं बता दूं कि अगर वो जाना भी चाहें तो हम जाने नहीं देंगे। ज्ञानेश कुमार के बाद हम आपने सामने खड़े होने जा रहे हैं। जो वोट चोरी की है, उसके लिए मोदी और शाह पर कार्रवाई होगी”। कैसे कार्रवाई करेगा, जैसे फर्जी संसद में ज्ञानेश कुमार को हटा दिया।

राहुल ने और कहा कि मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक और 2024 के लोकसभा चुनाव सब में वोट चोरी हुई बिना ज्ञानेश कुमार के। 2024 चुनाव के बाद 13.3 करोड़ वोटर सूची से हटा दिए यानी 15% वोट बाहर कर दिए। 2024 में NDA और विपक्ष के बीच केवल 3% का अंतर था।

राहुल गांधी को फिर तो सभी विपक्षी दलों के साथ सरकार बनाने का दावा करना चाहिए था लेकिन वो सभी दल तो भानुमति का कुनबा भी नहीं था फिर सरकार कैसे बनती। राहुल को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 1952 से 2024 तक 1984 के अलावा कांग्रेस को कभी 50% से ज्यादा वोट नहीं मिले। फिर तो हमेशा विपक्ष की ही सरकार बननी चाहिए थी।

फारूक अब्दुल्ला आए लेकिन बेटा नहीं आया क्योंकि बाप को तकलीफ है SIR से मगर बेटे को नहीं है। फारूक ने कहा मुसलमानों को पाकिस्तानी कहना बंद करो। कोई हो न हो लेकिन तुम पाकिस्तान के जन्म से ही पाकिस्तानी थे और आज भी हो। 

राहुल गांधी चुनावों की जब हार होती है तो वोट चोरी का राग अलापता है। दूसरी तरफ बीजेपी एक चुनाव होते ही दूसरे चुनाव की तैयारी में लग जाती है। मोदी ने गुजरात से अभियान शुरू कर दिया और अमित शाह ने उप्र और पंजाब से। अमित शाह के कथन पर कि उत्तर प्रदेश में भाजपा “अंगद का पैर” है, अखिलेश यादव ने कहा है कि भाजपा को पैर रखने की भी जगह नहीं मिलेगी। जो ऐसा अहंकार पालते है, उनकी हार सुनिश्चित होती है। 

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पूरी तरह एक्शन में

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पूरी तरह एक्शन में आ गए हैं। राहुल गांधी को शायद लग रहा था कि अब चुनाव आयोग दबाव में होगा और कोई बड़ा कदम नहीं उठा पाएगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। चुनाव आयोग ने अपना काम शुरू कर दिया है।

दरअसल, इस साल के खत्म होते ही अगले साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पांच राज्य तो ऐसे हैं, जहां चुनाव बिल्कुल सामने हैं। ये राज्य हैं गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड। इन राज्यों को लेकर चुनाव आयोग ने एक बड़ा आदेश जारी किया है। यह आदेश चुनाव से जुड़े अधिकारियों की ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर है।
आदेश में साफ कहा गया है कि अगर कोई अधिकारी एक ही जिले में तीन साल से ज्यादा समय से तैनात है, तो उसका ट्रांसफर किया जाए। इसके अलावा, जो अधिकारी अपने ही गृह जिले में तैनात हैं, उनका भी तबादला किया जाए। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि चुनाव की पूरी व्यवस्था निष्पक्ष तरीके से हो सके और किसी तरह का पक्षपात न हो।
अगले साल कुल सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें गोवा, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात शामिल हैं। लेकिन इन पांच राज्यों की चुनावी टाइमलाइन पर खास ध्यान दीजिए। उत्तर प्रदेश और गोवा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में भी चुनाव होने हैं।
अब सवाल यह है कि बाकी नेता आखिर कर क्या रहे हैं?
राहुल गांधी की बात करें तो वो अभी भी रणनीति बनाने, रैलियों की तैयारी करने और धरना-प्रदर्शन में ही लगे हुए हैं। पिछले एक महीने से उनका ज्यादातर समय धरने और प्रदर्शनों में ही बीत रहा है। क्या आपको लगता है कि वो चुनाव वाले राज्यों में जाकर वहां की जनता से जुड़ने, उनकी समस्याएं समझने या पार्टी को मजबूत करने के लिए कोई काम कर रहे हैं? बिल्कुल नहीं।
लेकिन बाकी नेता क्या कर रहे हैं, जरा वो भी देखिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही देख लीजिए। अगले साल गुजरात में भी चुनाव होने हैं और पीएम मोदी ने अभी से वहां पूरी ताकत लगानी शुरू कर दी है। वो बनासकांठा जाकर लोगों से मिल रहे हैं, उनकी समस्याएं समझ रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि लोगों से बेहतर तरीके से कैसे जुड़ा जाए। अगर कहीं कोई समस्या है या कोई काम बाकी रह गया है, तो उसे कैसे ठीक किया जाए।
इसी तरह गृह मंत्री अमित शाह को देखिए। उन्होंने भी उत्तर प्रदेश की कमान अभी से संभाल ली है। वो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अगर कहीं कोई उलझन या परेशानी है, तो उसे भी दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।
अब मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं। राहुल गांधी लगातार सवाल उठा रहे हैं कि हम चुनाव क्यों हार जाते हैं, हमारी पार्टी क्यों नहीं जीतती? लेकिन भाई, चुनाव जीतने के लिए कुछ मेहनत भी तो करनी पड़ेगी। जनता के बीच जाना पड़ेगा, उनकी समस्याएं समझनी पड़ेंगी और जो कमियां हैं, उन्हें दूर करना पड़ेगा।
अगले साल इतने सारे राज्यों में चुनाव होने हैं। कुछ राज्यों में तो चुनाव होने में सिर्फ दो-तीन महीने ही बचे हैं। ऐसे में राहुल गांधी आखिर कर क्या रहे हैं? कम से कम अभी से चुनावी राज्यों में जाकर मेहनत तो कीजिए, जनता से जुड़ने की कोशिश तो कीजिए।
लेकिन राहुल गांधी की तरफ से ऐसा कुछ होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है।
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों अभी से चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं और खुद मैदान में उतरकर काम कर रहे हैं।
अब आप ही सोचिए और फैसला कीजिए कि जब चुनाव के नतीजे आएंगे, तो जीत किसकी होगी और हार किसकी?

आजम खान को छोड़ने की जरूरत क्या थी ? 10 साल की सजा थी, फिर क्यों छोड़ दिया

सुभाष चन्द्र

आज़म खान को 17 नवंबर, 2025 को रामपुर के MP/MLA कोर्ट के स्पेशल जज ने Dual Pan Card forgery and Conspiracy केस में दोषी करार देते हुए 7 साल की कठोर कारावास की सजा दी थी। इसे Additional District and Sessions Judge Vijay Kumar ने 23/5/26 को बढ़ा कर 10 साल कर दिया था। आज़म खान और उसके बेटे दोनों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जून 2026 में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट के जस्टिस समित गोपाल ने 30 अक्टूबर को उसकी दोष सिद्धि पर रोक नहीं लगाई लेकिन उसकी सजा को निलंबित कर दिया और जमानत दे दी।

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माननीय जज साहब ने कहा कि वह काफी समय जेल में रह चुका है। 4 साल, 1 महीना और 9 दिन (including remissions)। ये सजा होने के बाद इतना समय कैसे जेल में रहा मान लिया जबकि सजा 17 नवंबर, 2025 को हुई। सजा होने के बाद तो वह जेल में अभी एक साल भी नहीं रहा।

सवाल यह उठता है कि आखिर उसे छोड़ने का औचित्य क्या था जबकि मामले की अंतिम सुनवाई जनवरी, 2027 में होनी तय थी।

आज़म खान इसके पहले 8 मामलों में दोषी करार दिया जा चुका है। 2 मामलों में सेशन कोर्ट से और 6 मामलों में मजिस्ट्रेट कोर्ट से दोषी करार दिया जा चुका है। उसकी दो अपील मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट खारिज कर चुका है।

आज़म खान के खिलाफ 92 आपराधिक मुक़दमे चला रहे हैं जिनमें 81 अलग अलग अदालतों में लंबित हैं। जिन 8 मामलों आज़म खान को दोषी करार दिया गया उनमें कुल 27 साल की सजा हो चुकी है।

ऐसे आरोपी को छोड़ना कतई उचित नहीं था क्योंकि उत्तर प्रदेश के चुनाव आने को हैं। अखिलेश यादव कुछ दिन पहले उसे जेल में मिलकर आए थे।

क्या उस मुलाकात के बाद ही तो कोई सेटिंग हाई कोर्ट में नहीं हुई जो उसे छोड़ा गया?

लेकिन ED के कल(31 अक्टूबर) ही आज़म खान को जौहर यूनिवर्सिटी के 426.46 करोड़ के घपले में गिरफ्तार कर लिया और आज कोर्ट ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। आज़म खान का एक ही घिसा पिटा रोना है कि उसे मुसलमान होने की वजह से परेशान किया जा रहा है। मतलब तुम मुसलमान होकर कुछ भी घपला करो लेकिन कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। 

अखिलेश यादव ने भी कहा है फर्जी मुकदमों में आज़म खान को बहुत देर तक जेल में नहीं रख सकते। उसे भरोसा है उसकी सरकार बनेगी और वो सब केस वापस ले लेगा। इतना भी आसान नहीं होगा ऐसा करना।  

अदृश्य शक्ति नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ी


अब तक नरेंद्र मोदी के साथ कौन सा चमत्कार जुड़ा हुआ है यह बात सारी दुनिया में किसी को समझ में नहीं आ रही है। नरेंद्र मोदी के खिलाफ दुनिया भर का मीडिया लगा हुआ है सोशल मीडिया भी प्रयत्नशील है लेकिन हर मामले में नरेंद्र मोदी पूरी तरह सफल होते जा रहे हैं चाहे वह विदेश नीति हो अर्थ नीति हो अथवा कोई चुनाव हो सब जगह अप्रत्याशित हो रहा है। जैसे कोई अदृश्य शक्ति नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ी हो। आप सोचिए सारी दुनिया में डीजल पेट्रोल का हाहाकार मचा हुआ है अमेरिका और रूस पूरी तरह परेशान हो गए हैं भारत के सभी पड़ोसी देश यह बात समझ नहीं पा रहे हैं कि वह इस मामले में क्या करें लेकिन दुनिया में भारत अकेला देश है जो डीजल पेट्रोल के मामले में पूरी तरह निश्चित है। अर्थ नीति के मामले में जहां ट्रंप घोषणा कर रहे थे कि भारत की अर्थव्यवस्था और असफल में चली जाएगी जहां राहुल गांधी दिन-रात प्रयत्न कर रहे थे कि भारत की अर्थव्यवस्था रसातल में चली जाए जहां सोरोंस हिडन वर्ग दिन-रात इसमें लगे हुए थे कि 
भारत के उद्योगपति अदानी को भीख मंगा बना दिया जाए लेकिन ऐसा क्या चमत्कार हुआ की अदानी सबसे बड़े पूंजीपति बन गए भारत की अर्थव्यवस्था भी आगे निकल गई अकल काम नहीं कर रही है कि क्या हुआ। भारत की विदेश नीति को भी चीन और अमेरिका लगातार झटके पर झटका दे रहे थे विदेश नीति के मामले में।

भारत का सारा विपक्ष एकजुट होकर नरेंद्र मोदी को युद्ध करने की सलाह दे रहा था लेकिन आखिर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ कि भारत की विदेश नीति की यूक्रेन भी तारीफ कर रहा है और रूस भी तारीफ कर रहा है ईरान भी तारीफ कर रहा है और अमेरिका भी तारीफ कर रहा है। जहां दुनिया भर के आतंकवादी भारत में आतंक फैलाते थे वही अब भारत के आतंकवादी दुनिया में चुपचाप मारे जा रहे हैं। है ना कोई चमत्कार।
मैं यह नहीं कह सकता कि चमत्कार नरेंद्र मोदी के भाग्य का है अथवा राहुल गांधी के दुर्भाग्य का है अथवा कोई भारत में ऐसी गुप्त योजना चल रही है जो योजना हम लोगों को समझ में नहीं
आ रही है कारण चाहे जो भी हो लेकिन कोई ना कोई अदृश्य योजना अवश्य सफल हो रही है।

देखिए भारतीय जनता पार्टी वोट चोरी कैसे करती है

साभार सोशल मीडिया 
आपको पता है कि पंजाब में चुनाव नजदीक हैं। देश के गृह मंत्री अमित शाह पिछले तीन महीने से लगातार दिल्ली से पंजाब आ-जा रहे हैं। हर गली, हर मोहल्ले में बैठकें हो रही हैं, कार्यकर्ताओं से बातचीत की जा रही है और नशे के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है।

लेकिन देश के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कहाँ हैं? वियतनाम में! वो किन मुद्दों पर आवाज उठा रहे हैं? वोट चोरी और सीआर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग जैसे मुद्दों पर। महामहिम ने जब सबूत मांगे राहुल आज बगले झांक अराजकता फ़ैलाने में लगे हैं। लेकिन जमीन पर, लोगों के बीच नजर नहीं आएंगे।
यही पैटर्न बीजेपी उत्तर प्रदेश में भी अपना रही है। बीजेपी की पूरी टीम पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारी में लगी हुई है। यही आपने पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी देखा होगा, जहाँ बीजेपी के अलग-अलग राज्यों के लगभग सभी मुख्यमंत्री प्रचार करने पहुँच रहे थे।


बिहार में भी यही हुआ। राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव को अकेला छोड़ दिया था। तेजस्वी यादव अकेले चुनाव प्रचार कर रहे थे। बिहार चुनाव से एक-दो महीने पहले ही राहुल गांधी ने बिहार जाना बंद कर दिया और विदेश दौरे पर निकल गए।                                                                       
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जी, आपसे मेरा बस एक ही अनुरोध है। अगर देश में चुनाव जीतना है, तो जमीन पर उतरकर मेहनत कीजिए। लोगों के बीच जाइए, उनकी समस्याएँ सुनिए और उनके लिए काम कीजिए।
सिर्फ वोट चोरी, ईवीएम हैकिंग और चुनाव आयोग पर आरोप लगाने से हकीकत नहीं बदलने वाली।
जब देश के गृह मंत्री अमित शाह चाहें, तो अपने राजनीतिक जीवन के बाकी दिन आराम से एसी कमरे में बैठकर बिता सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं कर रहे हैं। वो पिछले तीन महीने से लगातार दौरे कर रहे हैं, जमीन पर उतरकर काम कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं।
लेकिन, आप राहुल गांधी कहाँ हैं?

कोर्ट से किसी को छूट मिलती है तो किसी पर लट्ठ बजाया जाता है

सुभाष चन्द्र

30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के बाहुबली नेता अनंत सिंह की जमानत रद्द कर दी और उसे 1 दिसंबर तक पुलिस के सामने सरेंडर करने का समय दे दिया। यानी पूरे एक महीने का समय वह भी हत्या के मामले में आरोपी को। अनंत सिंह का वकील था अभिषेक मनु सिंघवी जिसने अनंत सिंह के घर में शादी का हवाला देते हुए लंबी तारीख ले ली।

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अनंत सिंह पर जनसुराज्य पार्टी के नेता दुलार चंद की हत्या में शामिल होने का आरोप है। पहले वह खुद एक इंटरव्यू में कह चुका है कि नीतीश कुमार का समर्थन करते हुए उसने 9 हत्याएं की/करवाई। कुछ तो इलेक्शन कमीशन के हलफनामे में भी कही हैं।

दूसरी तरफ दिल्ली की SEM कोर्ट ने नेहा बोरा को Peace Bond भरने के लिए कहा था लेकिन वो हाई कोर्ट चली गई। वहां उसकी अर्जी ख़ारिज हो गई लेकिन हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसे पुलिस सभी संबंधित दस्तावेज सौंपे। उसके बाद भी वो ललकारती रही कि वो कोई बांड नहीं भरेगी। 

पुलिस से उसे 6 FIRs के सभी दस्तावेज दे दिए लेकिन SEM कोर्ट में पेश नहीं हुई। पुलिस ने कोर्ट को बताया कि दस्तावेज़ देने के बाद भी उसने बांड नहीं भरा है। अब 28 अक्टूबर को SEM कोर्ट ने उसे 20 नवंबर को पेश होने का अंतिम मौका दिया है।

सवाल यह उठता है कि जब वो पब्लिक में चीख चीख कर कह रही है कि वो बांड नहीं भरेगी तो उसे तो 31 अक्टूबर को पेश होने के आदेश देने चाहिए थे। 20 नवंबर तक का समय देने का क्या औचित्य है? ऐसी ही कोर्ट की लचरता नेहा बोरा जैसे लोगों को उद्दंड बना रही है और कानून का उल्लंघन करने की छूट दे रही है। वह भी तब वो जोर शोर से कह रही थी कि हमें बांग्लादेश ने रास्ता दिखाया है सरकार का तख्तापलट करने का।

मार्कण्डेय काटजू नेहा बोरा के बांड न भरने को उसकी बहादुरी बता रहा है।

जो छूट अनंत सिंह को सुप्रीम कोर्ट से दी गई, क्या वह किसी साधारण आरोपी को मिल सकती है। शायद नहीं। इसका उदाहरण भी देख सकते है।

आसाराम बापू को राजस्थान हाई कोर्ट से regular/medical उपचार के लिए 20 दिन की पैरोल दी गई थी जो 27 अक्टूबर को ख़त्म होनी थी। आसाराम बापू ने सुप्रीम कोर्ट से पैरोल 27 अक्टूबर के बाद भी जारी रखने की अपील की थी। 

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर को ही आसाराम बापू की अर्जी ख़ारिज कर दी और आदेश दिया कि वे 27 अक्टूबर की शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में अपने आप को सरेंडर कर दें।

ये अदालत का भेदभाव नहीं तो और क्या कहलाया जाएगा? क्या आसाराम बापू अनंत सिंह से भी बड़े अपराधी हो गए कि उन्हें सरेंडर उसी दिन करने को कहा गया और अनंत सिंह को एक महीने का समय दे दिया गया? ये माना कोर्ट को अधिकार है कि किसी को समय दे और किसी को समय न दे लेकिन कुछ तो औचित्य होना चाहिए और दिखाई भी देना चाहिए।

इलाज न मिलने से अगर आसाराम बापू की मौत हो जाती है और अनंत सिंह एक महीने में कोई और हत्या करा देता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

क्या 1 नवम्बर रैली कांग्रेस को तेजी से डुबो देगी?

1 नवंबर को रैली कराने पर राहुल गांधी जो अड़े हुए हैं ना, यह कांग्रेस को बहुत भारी पड़ सकता है। अब राहुल गांधी यह समझना ही नहीं चाह रहे हैं या फिर उन्हें इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता, यह अलग बात है। लेकिन मैं आपको तीन पॉइंट समझने होंगे। 

पहली बात है व्यापारियों की परेशानी। पिछले चार दिनों में व्यापारी दो बार राहुल गांधी को लेटर लिख चुके हैं कि भाई, प्लीज अभी यह रैली मत कराइए। 1 नवंबर को रैली करने के बजाय दिवाली के बाद 10 नवंबर को करा लीजिए। दिवाली का समय है। इस समय अगर आप रैली कराएंगे और उसमें 10 लाख लोग आएंगे, तो दिल्ली में कितनी बसें आएंगी, कितना ट्रैफिक जाम होगा, कितनी भीड़ होगी और कितना बवाल मचेगा! व्यापारियों का कहना है कि इससे उनका 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। इससे पहले 10 अक्टूबर को जो रैली हुई थी, उसमें भी 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही गई थी।
अब आप खुद सोचिए, व्यापारियों के मन में गुस्सा नहीं होगा क्या? आखिर वोट भी तो यही लोग देते हैं ना, या फिर वोट देने के लिए कहीं बाहर से लोग आते हैं? जब व्यापारियों का काम-धंधा प्रभावित होगा, उन्हें नुकसान होगा, तो उनके मन में कांग्रेस के लिए गुस्सा ही आएगा ना! और यही गुस्सा कांग्रेस को भारी पड़ सकता है।
दूसरी बात है राहुल गांधी का 10 लाख लोगों को लाने का दावा। राहुल गांधी ने तो कह दिया कि हम 10 लाख लोग लाएंगे और रैली करके अपनी ताकत दिखाएंगे। यानी एक तरह से यह शक्ति प्रदर्शन है। आप खुद सोचिए, क्या रामलीला मैदान में 10 लाख लोग आ सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा 50 हज़ार लोग वहां आ पाएंगे, तो बाकी के लोग कहां जाएंगे? पूरी दिल्ली में क्या स्थिति बनेगी? क्या इतनी बड़ी भीड़ को संभालना आसान होगा?

एक बात और 10 लाख लोगों को जुटाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। 10 लाख लोग बहुत ज्यादा होते हैं। अब कांग्रेस कह रही है कि अलग-अलग राज्यों को लोगों को लाने की जिम्मेदारी दी गई है। मान लीजिए पांच या सात राज्यों को जिम्मेदारी दे भी दी गई, तो क्या हर राज्य से डेढ़-डेढ़ लाख या दो-दो लाख लोग आसानी से आ जाएंगे? ऐसा करना इतना आसान नहीं है।
ऊपर से दिल्ली के व्यापारी पहले से ही नाराज हैं। उनके भी परिवार हैं, रिश्तेदार हैं। हो सकता है कि कुछ व्यापारी इस रैली में शामिल होने के बारे में सोच रहे हों, लेकिन अब वे अपने परिवार वालों को भी मना कर सकते हैं कि भाई, रहने दो, जब हमारी दुकान और काम-धंधे पर ही असर पड़ रहा है, तो हम रैली में क्यों जाएं?
यानी जो रैली कांग्रेस के लिए शक्ति प्रदर्शन होनी चाहिए थी, वही उसके लिए उलटी पड़ सकती है। राहुल गांधी ने तो पहले ही दावा कर दिया कि हम 10 लाख लोग लाएंगे। अब अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग आए ही नहीं, तो सवाल उठेंगे कि भाई, आपके समर्थन में लोग कहां हैं? आप शक्ति प्रदर्शन करने निकले थे, लेकिन लोग ही नहीं जुटा पाए। ऊपर से व्यापारियों को परेशान अलग कर दिया।

तीसरी बात है चुनाव की तैयारी। अभी कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में ही उलझे रहना है या फिर आने वाले चुनावों पर भी ध्यान देना है? उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। इन चुनावों की तैयारी भी जरूरी है, लेकिन कांग्रेस का ध्यान अभी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति और इन मुद्दों पर ज्यादा दिखाई दे रहा है।
फिर जब चुनाव के नतीजे आएंगे और कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिलेगी, तो वही बात कही जाएगी कि वोट चोरी हो गई। लेकिन सवाल यह है कि चुनाव की तैयारी कौन करेगा? अभी तो समाजवादी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे पर ही बात अटकी हुई है। पहले उस बातचीत को तो सही से आगे बढ़ाइए, सीटों की डील तो तय कर लीजिए।
अगर चुनाव में गठबंधन के बीच ही परेशानी रहेगी या नतीजे खराब आएंगे, तो फिर वही पुराना आरोप लगाया जाएगा कि वोट चोरी हो गई, वोट चोरी हो गई। लेकिन जमीनी स्तर पर क्या काम हो रहा है, पार्टी का कैडर कितना मजबूत है, कार्यकर्ता कितने सक्रिय हैं, इन सब चीजों पर भी तो ध्यान देना पड़ेगा।


सिर्फ चुनाव के ऐन मौके पर प्रदेश अध्यक्ष बदल देने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा? क्या ऐसा करने से पार्टी का पूरा संगठन मजबूत हो जाएगा और चुनाव जीतना आसान हो जाएगा? मुझे तो यह बहुत मुश्किल लगता है।
आखिर में बात इतनी सी है कि अगर कांग्रेस को चुनाव जीतना है, तो उसे सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बयानबाजी और रैलियों पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए। व्यापारियों की परेशानी, लोगों की नाराजगी, रैली में भीड़ जुटाने की चुनौती, गठबंधन की बातचीत और राज्यों में संगठन की तैयारी, इन सब चीजों पर भी ध्यान देना पड़ेगा। वरना जिस रैली को राहुल गांधी अपनी ताकत दिखाने का मौका समझ रहे हैं, वही रैली कांग्रेस के लिए नुकसान का कारण बन सकती है।

कर्नाटक में एक करोड़ वोट कटने के बाद राहुल गांधी वहां क्यों नहीं जा रहे?


कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत लगभग एक करोड़ बोगस, मृत और विस्थापित नामों की छंटाई के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह मौन साध चुका है। दिल्ली में बैठकर चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं पर ‘वोट चोरी’ का झूठा विलाप करने वाले राहुल गांधी अपनी ही पार्टी की सरकार वाले राज्य कर्नाटक जाने से कतरा रहे हैं। वास्तव में, 1 नवंबर को दिल्ली में प्रस्तावित महारैली कर्नाटक के इसी प्रशासनिक सच से देश का ध्यान भटकाने का सुनियोजित राजनीतिक स्टंट है। इस तथ्यहीन नैरेटिव को गढ़ने और हवा देने में सबसे बड़ा हाथ ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और उसकी पक्षपाती रिपोर्टिंग का रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की अपनी प्रशासनिक मशीनरी ने ही इस शुद्धिकरण को पूरा किया है, जिसे अब अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

1 नवंबर की दिल्ली महारैली का कर्नाटक कनेक्शन: बेंगलुरु छोड़कर दिल्ली में जमावड़ा क्यों?
अगर कांग्रेस सच में मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए 10 लाख लोगों का मार्च कर रही है, तो यह आयोजन बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में या कर्नाटक विधानसभा के घेराव के लिए क्यों नहीं हो रहा, जहां देश में दूसरे नंबर पर सर्वाधिक 1 करोड़ नाम हटाए गए? दिल्ली में भीड़ जुटाकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन बेंगलुरु में ऐसा करने पर जनता सीधे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से जवाब मांगने लगेगी। कांग्रेस अपनी ही सरकार द्वारा चिन्हित किए गए बोगस मतदाताओं के सच का सामना करने से घबरा रही है। यही कारण है कि स्थानीय जवाबदेही से बचने के लिए बेंगलुरु में चुप्पी साधकर दिल्ली की सड़कों पर विरोध का प्रहसन रचा जा रहा है।

राहुल गांधी के कर्नाटक न जाने के पीछे का असहज सच: अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस
राहुल गांधी देश भर में घूमकर मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, लेकिन कर्नाटक का नाम लेने से लगातार बचते हैं। इसका कारण स्पष्ट है। यदि राहुल गांधी बेंगलुरु जाकर इस प्रक्रिया का विरोध करते हैं, तो उन्हें सबसे पहले अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से पूछना पड़ेगा कि उनकी सरकार ने 1 करोड़ नाम सूची से बाहर क्यों किए। कर्नाटक जाकर बोलना सीधे अपनी ही राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करना होगा। इस असहज स्थिति से बचने के लिए कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक के इन आंकड़ों पर पर्दा डालकर भ्रामक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का गृह राज्य: अपने ही आंगन में 1 करोड़ नाम छंटने पर चुप्पी क्यों?
यह विरोधाभास तब और गहरा हो जाता है जब ध्यान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर जाता है। कर्नाटक स्वयं खड़गे का गृह राज्य है, जहां से वे दशकों तक विधायक, मंत्री और सांसद रहे हैं। जब पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष उसी राज्य से आता हो और शासन भी उन्हीं की पार्टी का हो, तब 1 करोड़ नामों की छंटाई पर खड़गे का अपने गृह राज्य में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना कई सवाल खड़े करता है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि जमीन पर किसी वैध नागरिक का अधिकार नहीं छीना गया, बल्कि मृत और फर्जी प्रविष्टियों की छंटाई हुई है। इसी वजह से वे अपने गृह क्षेत्र में इस मुद्दे को उठाने से बच रहे हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल करने का डर: कानूनी चुनौती से क्यों भाग रही है कांग्रेस?
कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के लिए दिल्ली में मीडिया ब्रीफिंग करती है और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं के जरिए सुर्खियां बटोरने का प्रयास करती है, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने से बचती है। इसका बड़ा कारण यह है कि यदि कांग्रेस 1 करोड़ नामों की छंटाई को लेकर राज्य के उच्च न्यायालय जाती है, तो अदालत राज्य सरकार के मुख्य सचिव और संबंधित जिलाधिकारियों से आधिकारिक हलफनामा मांगेगी। उस कानूनी हलफनामे में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के प्रशासन को औपचारिक रूप से स्वीकार करना पड़ेगा कि ये 1 करोड़ नाम राज्य कर्मचारियों द्वारा घर-घर सत्यापन के बाद ही मृत, विस्थापित और अपात्र पाए गए थे। इस कानूनी बेनकाबी से बचने के लिए कांग्रेस अदालत जाने के बजाय सड़क पर प्रदर्शन का रास्ता चुन रही है।

राहुल गांधी की ‘पिक एंड चूज’ प्रेस कॉन्फ्रेंस: चुनिंदा सीटों का हौवा, पूरे राज्य के आंकड़े पर चुप्पी
राहुल गांधी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कर्नाटक की किसी एक-दो विधानसभा सीटों, जैसे आलंद या बेलगावी के कुछ हजार कथित नामों का उल्लेख कर सनसनी फैलाने का प्रयास करते हैं। सवाल उठता है कि जो नेता चंद हजार प्रविष्टियों पर राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा करते हैं, वे पूरे कर्नाटक में हटाए गए 1 करोड़ (18 प्रतिशत) नामों के आधिकारिक आंकड़े पर बात क्यों नहीं करते? कुछ हजार नामों को चुनकर भ्रम फैलाना और 1 करोड़ के समग्र सत्यापन पर खामोश रहना चयनात्मक राजनीति का उदाहरण है। राहुल गांधी जानते हैं कि यदि वे पूरे 1 करोड़ के आंकड़े की बात करेंगे, तो उस पर कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य प्रशासन के ही आधिकारिक हस्ताक्षर सामने आएंगे।

फॉर्म-7 के थोक आवेदन का शिगूफा: क्या डीके शिवकुमार का प्रशासन गड़बड़ी में शामिल था?
कांग्रेस के रणनीतिकार अक्सर यह नैरेटिव गढ़ते हैं कि असामाजिक तत्वों ने फॉर्म-7 (नाम हटाने का आवेदन) थोक में भरकर वैध नागरिकों के नाम कटवा दिए। चुनाव आयोग के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी फॉर्म-7 पर बिना बूथ लेवल अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन किए और संबंधित नागरिक को औपचारिक सुनवाई का नोटिस दिए बिना नाम नहीं काटा जा सकता। कर्नाटक में यह सारा सत्यापन और सुनवाई कार्य डीके शिवकुमार सरकार के अधीन काम करने वाले राजस्व अधिकारियों और राज्य कर्मचारियों ने किया। यदि कांग्रेस का यह आरोप सही है कि फर्जी फॉर्म-7 से नाम काटे गए, तो क्या वे सीधे यह कह रहे हैं कि उनकी अपनी सरकार के कर्मचारी नियमों की अनदेखी कर रहे थे?

कर्नाटक में राज्य प्रशासन की देखरेख में पूरा हुआ SIR: तब मुख्यमंत्री ने आपत्ति क्यों नहीं की?
कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के अधीन काम करने वाले राज्य प्रशासन, जिलाधिकारियों और स्थानीय बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा ही संपन्न कराई गई। घर-घर जाकर किए गए भौतिक सत्यापन के दौरान राज्य सरकार या कांग्रेस संगठन ने कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई। इसके विपरीत, कई सार्वजनिक अवसरों पर स्वयं मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए इस अभियान को आवश्यक बताया था। जब पूरी प्रक्रिया राज्य सरकार के आधिकारिक तंत्र के तहत पूरी हुई, तो बाद में वही प्रक्रिया दिल्ली में बैठकर लोकतंत्र पर हमला कैसे बन गई?

देश में दूसरे स्थान पर कर्नाटक: 18 प्रतिशत यानी एक करोड़ नाम हटने पर दोहरा मापदंड
विशेष गहन पुनरीक्षण के आधिकारिक परिणाम कांग्रेस की राजनीतिक दोहरी नीति को उजागर करते हैं। इस राष्ट्रव्यापी अभियान में पश्चिम बंगाल से भी आगे निकलते हुए कर्नाटक देश का दूसरा ऐसा राज्य बना, जहां सबसे अधिक बोगस प्रविष्टियां हटाई गईं। राज्य की कुल मतदाता सूची में से लगभग 18 प्रतिशत यानी करीब 1 करोड़ ऐसे नाम हटाए गए जो दिवंगत हो चुके थे, स्थायी रूप से पलायन कर चुके थे या एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थे। यदि कांग्रेस के दावों को सच मान लिया जाए कि इस प्रक्रिया से दुर्भावनापूर्ण तरीके से नाम काटे गए, तो क्या राहुल गांधी यह स्वीकार करेंगे कि उनकी अपनी पार्टी की सरकार ने राज्य के 1 करोड़ नागरिकों के नाम हटा दिए?

पीड़ित मतदाता नहीं, केवल बयानों पर राजनीति
चुनाव आयोग के नियमों के तहत एसआईआर में चिन्हित नाम ड्राफ्ट सूची का हिस्सा होते हैं। अंतिम प्रकाशन से पूर्व हर नागरिक और राजनीतिक दल के पास संबंधित फॉर्म भरकर विधिक आपत्ति दर्ज कराने और पात्र नाम बहाल कराने का पूर्ण अवसर होता है। यदि कर्नाटक में पात्र नागरिकों के नाम काटे गए, तो सत्ता में बैठी राज्य सरकार और उनका संगठन आयोग के समक्ष विधिक दावे पेश क्यों नहीं कर रहा? वैधानिक प्रक्रिया का उपयोग न करते हुए केवल मीडिया में बयान देना यह दर्शाता है कि कांग्रेस के पास कोई वास्तविक पीड़ित मतदाता नहीं है, बल्कि केवल वे नाम थे जिनकी अपात्रता प्रमाणित हो चुकी है।

2022 के ‘चिलुमे’ विवाद का दोहरा चरित्र: तब बोगस वोटरों पर सवाल, आज सफाई पर आपत्ति क्यों?
कर्नाटक का राजनीतिक रिकॉर्ड बताता है कि वर्ष 2022-23 में विधानसभा चुनावों से पूर्व कांग्रेस ने ही बेंगलुरु में ‘चिलुमे ट्रस्ट’ के जरिए निजी एजेंसियों द्वारा अवैध मतदाता जोड़ने का आरोप लगाया था। उस समय पार्टी ने चुनाव आयोग से तुरंत फर्जी और अवैध प्रविष्टियां छांटने की मांग की थी। अब जब चुनाव आयोग ने आधिकारिक सरकारी तंत्र और भौतिक सत्यापन के जरिए उसी डेटाबेस की सफाई कर दी, तो कांग्रेस विरोध दर्ज करा रही है। यह रुख साफ करता है कि निष्पक्ष जांच होने पर केवल राजनीतिक लाभ-हानि देखकर रुख बदला जा रहा है।

बेंगलुरु की महानगरीय गतिशीलता का सच: आईटी हब के विस्थापन को गलत रूप देना
कर्नाटक, विशेष रूप से बेंगलुरु, देश का प्रमुख आईटी और स्टार्ट-अप केंद्र है, जहां देश भर से बड़ी संख्या में पेशेवर आते हैं, कुछ समय रहते हैं और फिर अन्य शहरों या विदेश चले जाते हैं। राज्य में 18 प्रतिशत नाम हटने का एक बड़ा प्रशासनिक कारण यही महानगरीय विस्थापन (Urban Mobility) है, जहां लोग पते बदल चुके थे लेकिन उनके नाम पुरानी कागजी सूचियों में दर्ज थे। चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर इसी अनुपस्थित डेटा को हटाया है। सामान्य प्रशासनिक शुद्धिकरण और शहरी जनसांख्यिकी के इस यथार्थ को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना प्रशासनिक वास्तविकताओं की अनदेखी है।

गैर-बीजेपी शासित राज्यों के आंकड़ों पर चुप्पी
यह आरोप आधारहीन है कि केंद्र सरकार दुर्भावना से अपने राजनीतिक विरोधियों के नाम हटवा रही है। यदि इस आरोप में सच्चाई होती, तो देश में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा 18 प्रतिशत नाम कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्य में क्यों हटते? यह तथ्य प्रमाणित करता है कि एसआईआर किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर नहीं, बल्कि देश भर में समान प्रशासनिक मानकों पर आधारित है। विपक्ष केवल चुनिंदा राज्यों पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि अपने शासित राज्यों के आंकड़ों पर चर्चा करने से बचता है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट: कमजोर तथ्यों के आधार पर दबाव बनाने का प्रयास
‘वोट चोरी’ का नैरेटिव ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा कमजोर शोध और अपुष्ट दावों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट से शुरू हुआ। इस रिपोर्ट को ठीक उसी दिन प्रकाशित किया गया जब सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले पर सुनवाई होनी थी। इसका स्पष्ट उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना और संवैधानिक संस्था की साख पर प्रश्न खड़ा करना था। बुनियादी प्रमाणों के अभाव के बावजूद इस रिपोर्ट को केवल एक विशेष नैरेटिव बनाने के उद्देश्य से आगे बढ़ाया गया।


रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज खाल से बाहर निकल विपक्ष के कुत्ते बन रहे हैं ; जज रहते उन्होंने क्या गुल खिलाए होंगे

सुभाष चन्द्र

चुनाव आयुक्तों के लिए सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाए जा रहे हैं विपक्ष की तरफ से कि ज्ञानेश कुमार CEC अकेले फैसले लेते हैं जबकि बाकी दो आयुक्त विरोध में होते हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में साबित कर दिया कि सभी फैसले सर्वसम्मति से होते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में ऐसी याचिकाओं पर विचार होने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या खुद सुप्रीम कोर्ट में एकमत रहता है। आज जिस तरह रिटायर्ड जज विपक्ष के कुत्ते बनकर भौंक रहे हैं, उसे देख कर लगता है सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह Divided House है और ऐसे जजों के कुर्सी पर रहते हुए आतंकी और अराजक तत्व मौज में रहे होंगे।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
हिज़ाब केस में कर्नाटक हाई कोर्ट के 3 जजों के सर्वसम्मत फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के दो जज एकमत फैसला नहीं दे सके। इसी तरह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के कानून पर दो जज एकमत फैसला नहीं दे सके। 

एक हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त जज हुआ करता था RF Nariman, वो UAPA को Draconian Law कहता है और उसे ख़त्म करने की वकालत करता है जबकि ये कानून 1967 में बना। लेकिन उसमे हिम्मत नहीं हुई कुरान की 26 आयतों को चुनौती देने वाली सईद वसीम रिजवी की याचिका पर सुनवाई कर सके जबकि वो आयतें रिजवी ने बहुत खतरनाक बताई थी यानी UAPA से भी खतरनाक। नरीमन ने रिजवी की याचिका Frivolous कह कर खारिज कर दी और 50 हजार का जुर्माना लगा दिया।

इसी नरीमन का मुस्लिम प्रेम देखो जिसने बंगाल के 90 वोटर SIR में हटाने पर प्रश्न खड़े किये हैं। ये चाहता है घुसपैठियों को भारत का नागरिक बना दिया जाये।

एक और है संजय किशन कौल जो रिटायर होने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने के लिए तड़प रहा है। कहता है strong speech देना कैसे आतंकवाद माना जा सकता है और उसे जमानत क्यों नहीं दी जा रही? ये ऐसा बेशर्म जज है जिसे पता नहीं इमाम देश को काटना चाहता था और दोनों ने दिल्ली दंगों में क्या किया? तुम अपने सुप्रीम कोर्ट को ही रगड़ने में लगे हो जिसने इन दोनों को जमानत नहीं दी। खन्ना की  फोटो तो सौरव दास के साथ आ चुकी है मतलब कॉकरोच पार्टी का मार्गदर्शक यह भी है। 

रिटायर होने के बाद जुबान बेलगाम हो जाती है। ये कौल साहब कहते हैं कि जजों की नियुक्ति से पहले चंद्रचूड़ मोदी से सलाह लेते थे। तो इसलिए ही तुम कॉलेजियम के लिए 2 वर्ष तक मोदी सरकार को रगड़ते रहे क्या? 

एक सुधांशु धूलिया हैं, वो कह रहे हैं “मेरे विचार से उमर खालिद और शरजील इमाम को बहुत पहले जमानत दे देनी चाहिए थी”।

मदन बी लोकुर कह रहा है दोनों पर भाषण देने और मीटिंग में जाने की वजह से UAPA नहीं लगा सकते (Terrorist Activity का लेबल नहीं लगा सकते)। 

एक रिटायर्ड जज है कुरियन जोसेफ। वो खुलेआम दंगे भड़काने को उकसा रहा है। वो कहता है “जब संसद और अदालतें विफल हों, तब जनता को सड़कों पर उतरना ही चाहिए”। अबे नालायक, तूने सुप्रीम कोर्ट में रह कर क्या तीर मारे थे और क्या चाहता है कि अगर कोई निर्णय लोगों को पसंद न आए तो वो सुप्रीम कोर्ट पर चढ़ाई कर दे?

एक और नमूना है जस्टिस मार्कंडेय काटजू जो खुद सोनिया गांधी के तलुए चाट कर प्रेस कौंसिल का चेयरमैन बना था, वो आज कह रहा है कि चंद्रचूड़ करियर में आगे बढ़ने के लिए कोई भी समझौता करने को तैयार रहते थे और उन्होंने CJI के तौर पर गणेश पूजा के लिए मोदी को अपने घर बुला कर कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाई। गौमांस खाने वाले इस हरामखोर को दिक्कत गणेश पूजा से है।

वो तो भला हो 42 रिटायर्ड जजों का जिन्होंने CEC ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ अभियान की निंदा की एक खुले पत्र में। शायद वो ही ऊपर लिखे जजों को तकलीफ दे रहा है।

राहुल की रामलीला मैदान रैली या हिन्दुओं को ब्लैकमेल करने की कोशिश या हिन्दू त्यौहार चौपट कर अर्थव्यवस्था को चोटिल करना?

राहुल गांधी का फरमान आया है कि मैं 30 सेकंड में रामलीला मैदान का प्रोटेस्ट वापस बुला लूंगा। बस एक छोटी-सी शर्त है, मोदी जी को बोलिए कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हमारे हाथ में पकड़ा दें।

थोड़ा धमकी देने जैसा नहीं लग रहा? और टाइमिंग भी देखिए, दिवाली से ठीक पहले। इन्हें सब कुछ पता है। इनका ट्वीट किसके लिए है? व्यापारियों और दुकानदारों के लिए।
लेकिन राहुल, सिर्फ व्यापारी ही होली-दिवाली जैसे त्योहारों से नहीं जुड़े होते। त्योहारों से एक पूरी इकोनॉमी चलती है। लाखों-करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी इन त्योहारों से जुड़ी होती है।
जगह भी देखिए, रामलीला मैदान, जिसके पास चांदनी चौक और दिल्ली के वो सारे बाजार हैं, जहां दिवाली पर सबसे ज्यादा खरीदारी होती है। ग्राहक को बाजार तक ले जाने वाला रिक्शेवाला कमाता है, टैक्सी चलाने वाला कमाता है। सिर्फ लाखों रुपये के लहंगे नहीं बिकते, छोटे-छोटे मिट्टी के दीये भी बिकते हैं। कोई मजदूर सामान उठाकर लाता है, कोई उसे पैकेट में बंद करता है और कोई उसे चमकाने का काम करता है। हर छोटे-बड़े काम से किसी न किसी इंसान की रोजी-रोटी और उम्मीद जुड़ी हुई है।
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और इलेक्शन कमीशन अपने फैसलों और पूरी प्रक्रिया से जुड़े सबूत दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये लोग आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। अब आप ही बताइए, क्या इन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई फर्क पड़ता है? अगर पड़ता, तो ये लोग पहले कोर्ट के फैसले का इंतजार करते।

मोहब्बत की दुकान के नाम पर हमारी दुकान खराब मत करो!


 सदर बाजार के व्यापारियों ने राहुल गांधी की प्रस्तावित रैली का किया विरोध, रैली स्थगित करने की उठाई मांग!
दिल्ली के सदर बाजार में व्यापारियों ने पोस्टर लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। व्यापारियों का कहना है कि त्योहारों के समय बाजारों में राजनीतिक रैलियों के आयोजन से कारोबार प्रभावित होता है और आम जनता को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
व्यापारियों की मांग है कि त्योहारों के दौरान बाजारों में रैलियों और बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर पुनर्विचार किया जाए, ताकि दुकानदारों की रोजी-रोटी और ग्राहकों की सुविधाएं प्रभावित न हों।
व्यापारियों का कहना है कि त्योहार उनके लिए पूरे साल की कमाई का महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। ऐसे में बाजारों में भीड़, यातायात बाधित होने और ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होने से कारोबार को नुकसान पहुंच सकता है।
 अब सवाल यह है कि राजनीति जरूरी है या व्यापारियों की रोजी-रोटी?

लोकतंत्र में राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करना सभी का अधिकार है, लेकिन व्यापारियों की समस्याओं और आम जनता की सुविधाओं का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
 जन जागरण प्रेस का सवाल:
क्या राजनीतिक दलों को त्योहारों के दौरान व्यापारियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए रैलियों के समय और स्थान पर विचार नहीं करना चाहिए?
मुझे एक बात का जवाब दीजिए, वह महिला कहां है, जिसकी वजह से यह पूरा मामला शुरू हुआ था? अब उसका कहीं कोई नामोनिशान दिखाई नहीं दे रहा है। जिस महिला के मामले को लेकर इन लोगों ने पूरे भारत में आग लगाने की योजना बना ली थी, वह महिला अब कहां है? इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह महिला नहीं होती, तो ये किसी और को मुद्दा बना लेते। कोई दूसरा नहीं मिलता, तो किसी और मुद्दे को लेकर खड़े हो जाते।

असल में, इन लोगों ने बहुत पहले से ही यह योजना बना रखी थी कि सही समय पर भारत पर दबाव बनाना है और देश में अशांति फैलानी है। जिस दिन से भारत ने दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतों की आंखों में आंखें डालकर बात करनी शुरू की, उसी दिन से भारत कई लोगों को खटकने लगा था।
अब आप देखिए कि धीरे-धीरे कितने लोग और कितने मुद्दे सामने आ रहे हैं। पहले आईटीबीपी पर सवाल उठाए गए, उसके बाद कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री का भाषण सामने आया। नेहा को देख लीजिए, सीजेआई को देख लीजिए, विपक्ष के नेताओं को देख लीजिए और उस आदमी को भी देख लीजिए, जो चिकन नेक को काटने की बात करता है। दिल्ली की यूनिवर्सिटीज में भी इस तरह की बातें दीवारों पर लिखी जा रही हैं।
और आप उन्हीं लोगों की उम्मीदों को हथियार बनाकर सरकार पर दबाव डालना चाहती हैं?
लेकिन हिंदुओं के साथ ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास में पहले भी हुआ जब हिंदुओं पर जजिया टैक्स लगाया गया था। क्यों? ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके, उन्हें मजबूर किया जा सके। और अब ये दिवाली से ठीक पहले प्रोटेस्ट की धमकी देकर एक बार फिर हिंदुओं को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं।
वैसे, जैसे ही दिवाली आने लगती है ना, इन लोगों को परेशानी होने लगती है। पिछली बार राम मंदिर पर जब दीये जलाए गए थे, तो यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी नाराज हो गई थी। उन्हें परेशानी थी कि हम दिवाली क्रिश्चियनों की तरह क्यों नहीं मनाते, छोटे-छोटे दीये क्यों जलाते हैं, इतना पैसा क्यों खर्च करते हैं और इतना तेल क्यों जलाते हैं।
उस एक दीये को बनाने के लिए कुम्हार महीनों तक मेहनत करता है। उस दीये में डालने के लिए सरसों का तेल पैदा करने वाला किसान अपने खेतों में दिन-रात मेहनत करता है। और आपलोग, जो मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए राजकुमार हैं, उन मेहनत करने वाले लोगों की छोटी-छोटी खुशियों पर भी राजनीति करके उन्हें ब्लैकमेल करना चाहते हैं?
वैसे, एक छोटी-सी बात पूछूं?
ईद से पहले जामा मस्जिद के सामने या क्रिसमस से पहले कनॉट प्लेस में ऐसा ही कोई प्रोटेस्ट करके दिखा दोगे?
नहीं ना?