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प्राइवेट पार्ट का रोना; जब महिला ब्रिगेड किसी सम्मानित व्यक्ति के गिरेबान पकड़ना चाहती है तो क्या उसका प्राइवेट पार्ट अनछुआ रह जायेगा?
नेहरू के अहंकार से राहुल के अविश्वास तक: कांग्रेस के ‘सेना अपमान’ और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़
भारतीय सैन्य इतिहास में 1 सितंबर 1959 का दिन एक बड़ा मोड़ था, जब राजनीतिक अहंकार और विचारहीनता के चलते देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर संकट में डाला गया। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल के.एस. थिमैया ने जब चीन के बढ़ते खतरे और सेना की कमजोर तैयारियों को लेकर रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन की मनमानी का विरोध करते हुए इस्तीफा दिया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सैन्य सलाह सुनने के बजाय अपने करीबी मंत्री का पक्ष लिया। नेहरू के इस रवैये और संसद में आर्मी चीफ के अपमान ने न केवल भारतीय सेना के मनोबल को गहरी चोट पहुंचाई, बल्कि 1962 के युद्ध में देश की पराजय की नींव भी रख दी। सैन्य नेतृत्व की अनदेखी करने, जीती हुई बाजी कूटनीति की मेज पर गंवाने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल खड़े करने की यह कांग्रेसी सोच 1947 के नेहरू से शुरू होकर आज राहुल गांधी के दौर तक लगातार देखने को मिलती है।
कांग्रेस के कारनामे – उपेक्षा, अहंकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का इतिहास
‘सेना की जरूरत ही क्या है’ – जब नेहरू ने पहले सेना प्रमुख करियप्पा की सलाह का उड़ाया मजाक
1947 में आजादी के तुरंत बाद भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा ने जब देश की उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा और सेना के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा, तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी दूरदर्शिता को खारिज करते हुए कहा था कि भारत को सेना की आवश्यकता ही नहीं है, पुलिस ही देश चलाने के लिए काफी है। देश की सुरक्षा के प्रति इस बुनियादी उपेक्षा ने शुरुआती दौर में ही सेना के विकास और रक्षा ढांचे को कमजोर कर दिया।
एकतरफा सीजफायर और यूएन की भूल – PoK का नासूर पैदा करने वाली नीति1948 में कबायली हमले के दौरान जब भारतीय सेना शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीछे धकेल रही थी, तब नेहरू ने सेना को आगे बढ़ने से रोककर एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया। सेना को अपनी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित करने का अवसर दिए बिना इस आंतरिक मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर ले जाने की ऐतिहासिक भूल की गई। इसी अदूरदर्शी फैसले के कारण पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) का विवाद पैदा हुआ, जिसका नुकसान देश आज तक उठा रहा है।
‘जीप घोटाला’ – रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की शुरुआत1948 में वी.के. कृष्ण मेनन ब्रिटेन में उच्चायुक्त रहते हुए सेना के लिए जीप खरीद के चर्चित मामले के केंद्र में थे। निष्पक्ष जांच कराने के बजाय नेहरू ने उनका बचाव किया और बाद में उन्हें देश का रक्षा मंत्री तक बना दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सौदों में बिचौलियों और राजनीतिक संरक्षण का यह पहला बड़ा उदाहरण बना, जिसने रक्षा खरीद तंत्र को प्रभावित किया।
अनुच्छेद 370 और 35A का थोपाव – कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की नींव1949 में सरदार पटेल और डॉ. आंबेडकर की असहमतियों के बावजूद नेहरू सरकार ने संविधान में अनुच्छेद 370 और बाद में 1954 के राष्ट्रपति आदेश से 35A को जोड़कर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया। अलग संविधान, अलग झंडे और दोहरी व्यवस्था ने देश की एकता को चोट पहुंचाई और दशकों तक कश्मीर में अलगाववाद व सीमा पार आतंकवाद का आधार तैयार किया, जिसकी कीमत भारतीय सैनिकों और नागरिकों ने अपने बलिदान से चुकाई।
कोको द्वीप की अनदेखी – चीन को सामरिक जासूसी अड्डा सौंपने वाली ऐतिहासिक चूक1950 के दशक के आरंभ में बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीप समूह के ठीक उत्तर में स्थित रणनीतिक कोको द्वीप समूह पर भारत का मजबूत ऐतिहासिक दावा था। लेकिन नेहरू सरकार की उदासीनता और कूटनीतिक ढिलाई के कारण यह क्षेत्र म्यांमार के नियंत्रण में चला गया। आज इसी कोको द्वीप पर चीन ने अपना इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सैन्य निगरानी बेस बना रखा है, जहां से वह भारत के मिसाइल परीक्षणों, अंतरिक्ष अभियानों और नौसैनिक गतिविधियों पर सीधी नजर रखता है।
सरदार पटेल की चिट्ठी की उपेक्षा – जब पहले गृह मंत्री की चेतावनी को रद्दी समझा गया7 नवंबर 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को एक विस्तृत पत्र लिखकर तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत की सीमाओं पर मंडराते खतरे से आगाह किया था। पटेल ने स्पष्ट कहा था कि चीन शांति का मुखौटा पहनकर आक्रामकता की तैयारी कर रहा है। लेकिन नेहरू ने अपने उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की इस दूरदर्शी चेतावनी को भी यह कहकर खारिज कर दिया कि चीन कभी भारत पर हमला नहीं करेगा।
यूएन सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट पर चीन को तरजीह देने की भूल1950 के दशक में जब वैश्विक मंच पर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के अनौपचारिक अवसर मिले, तब नेहरू ने चीन के पहले हक और एशियाई एकजुटता के नाम पर इसे ठुकरा दिया। भारत के हितों की अनदेखी कर चीन की स्थायी सदस्यता की पैरवी करने की इस भूल का नुकसान आज तक भारत उठा रहा है, जहां वही चीन वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत की राह में बाधाएं खड़ी करता है और आतंकवादियों का बचाव करता है।
पंचशील समझौता और तिब्बत सरेंडर – बफर स्टेट गंवाने की ऐतिहासिक भूल1954 में नेहरू सरकार ने चीन के साथ पंचशील समझौता करते हुए बिना किसी सीमा निर्धारण के तिब्बत पर चीन के कब्जे को आधिकारिक मान्यता दे दी। भारत ने सदियों पुराने अपने सामरिक, व्यापारिक और सैन्य अधिकार बिना किसी ठोस गारंटी के छोड़ दिए। भारत और चीन के बीच की ऐतिहासिक बफर सीमा समाप्त हो गई और चीन की सेना सीधे भारत की हिमालयी सीमाओं पर आकर तैनात हो गई।
जनरल थिमैया की अनसुनी चेतावनी और ‘नेहरू-मेनन’ की मनमानी1959 में जब सीमा पर चीनी गतिविधियां बढ़ रही थीं, तब जनरल थिमैया ने सरकार को सेना की स्थिति, हथियारों की कमी और चीन के आक्रामक इरादों को लेकर आगाह किया था। लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने पेशेवर सैन्य सलाह को दरकिनार करते हुए रक्षा नीतियों में दखलंदाजी शुरू कर दी। सेना की जरूरतों को पूरा करने के बजाय आयुध कारखानों की प्राथमिकताओं को भटकाया गया और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर पसंदीदा अफसरों को पदोन्नत किया गया। जब थिमैया ने इसके विरोध में इस्तीफा दिया, तो नेहरू सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय मानने के बजाय अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया।
अक्साई चिन पर चीनी कब्जा – ‘घास का तिनका नहीं उगता’ कहकर 38,000 वर्ग किमी जमीन गंवाना𝐖𝐡𝐞𝐧 𝐉𝐚𝐰𝐚𝐡𝐚𝐫𝐥𝐚𝐥 𝐍𝐞𝐡𝐫𝐮 𝐬𝐢𝐝𝐞𝐥𝐢𝐧𝐞𝐝 𝐭𝐡𝐞 𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚𝐧 𝐀𝐫𝐦𝐲 𝐂𝐡𝐢𝐞𝐟
— BJP (@BJP4India) September 1, 2026
𝐓𝐡𝐢𝐬 𝐃𝐚𝐲, 𝐓𝐡𝐚𝐭 𝐘𝐞𝐚𝐫 | September 1, 1959
On September 1, 1959, Army Chief General K.S. Thimayya resigned amid serious differences with Defence Minister V.K. Krishna… pic.twitter.com/yWkK9kAzOI
1950 के दशक के मध्य में जब चीन ने भारत के लद्दाख स्थित अक्साई चिन क्षेत्र में गुपचुप तरीके से शिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग (Highway 179) बना लिया, तब नेहरू सरकार वर्षों तक देश और संसद से इस घुसपैठ को छिपाए रही। जब 1959 में यह सच सामने आया, तो संसद में भारतीय सीमा की रक्षा का संकल्प लेने के बजाय प्रधानमंत्री नेहरू ने यह कहकर अपनी लाचारी पर पर्दा डाला कि ‘अक्साई चिन में तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता, वह बंजर इलाका है।’ इस गैर-जिम्मेदाराना रुख के कारण भारत ने अपनी 38,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक संप्रभु भूमि हमेशा के लिए गंवा दी।
संसद में सेना प्रमुख का सार्वजनिक अपमान – सैन्य मनोबल पर गहरी चोट
1959 में नेहरू ने जनरल थिमैया को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना तो लिया, लेकिन इसके तुरंत बाद संसद के पटल पर दिए अपने बयान में आर्मी चीफ के रुख को मामूली और तुच्छ कहकर खारिज कर दिया। देश की संसद में सेना प्रमुख के स्वाभिमान को आहत करने की इस घटना ने पूरी सैन्य कमान का मनोबल तोड़ दिया। यह संदेश गया कि तत्कालीन सरकार के लिए राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक हठ था।1963 में 1962 की पराजय के कारणों की जांच के लिए सेना ने लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर पी.एस. भगत की समिति बनाई थी। इस रिपोर्ट में साफ दर्ज था कि विफलता के लिए सेना नहीं, बल्कि अपरिपक्व फॉरवर्ड पॉलिसी, सैन्य सलाह की अनदेखी और राजनीतिक दखलंदाजी जिम्मेदार थी। कांग्रेस सरकारों ने दशकों तक इस रिपोर्ट को गोपनीय बनाकर दबाए रखा, ताकि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की कमियां सामने न आ सकें।
1963 में 1962 के युद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने भारत के PoK क्षेत्र की 5,180 वर्ग किलोमीटर की सामरिक शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी। 1948 में PoK का मुद्दा अधूरा छोड़ने और 1962 की पराजय के कारण उपजी दुर्बलता के चलते नेहरू सरकार चीन और पाकिस्तान के इस गठजोड़ और भारतीय भूमि के बंटवारे को रोकने में पूरी तरह विफल रही।
आयरन लेडी इंदिरा गांधी जी
— Dr Nishikant Dubey (@nishikant_dubey) May 27, 2025
अमेरिकी दबाव में 1971 का युद्ध तत्कालीन रक्षामंत्री जगजीवन राम जी व सेनाध्यक्ष सैम मॉनेकशॉ के विरोध के बावजूद भारत ने खुद ही रोक दिया ।बाबू जगजीवन राम चाहते थे कि कश्मीर का हमारा हिस्सा जो पाकिस्तान ने ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा कर रखा है उसको लेकर ही युद्ध बंद… pic.twitter.com/8Z4guqatvx
CBI जांच का मतलब यह नहीं है कि दिशा सालियान की मौत का राज खुल जाएगा और दोषी पकड़े जाएंगे
बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस रंजितसिंहा राजा भोसले की पीठ ने दिशा सालियान केस में FIR दर्ज नहीं होने पर पुलिस को फटकार लगाई और कहा कि 6 साल तक मामले की जांच ही चलती रही। इसमें कई विसंगतियां हैं और नए सवाल खड़े होते है। कोर्ट ने CBI को जांच के आदेश देते हुए कहा कि वह दिशा के पिता के बयान दर्ज करे और मालवणी पुलिस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज़ CBI को सौंपे।
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दिशा की मौत की जांच CBI को सौंपने से कुछ उम्मीद जगी है कि शायद न्याय हो सकेगा? न्याय मिल जाए तो अच्छा होगा लेकिन CBI से भी यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि सब कुछ Black & White में बाहर आ जाएगा।
याद कीजिए आरुषि तलवार 15 मई 2008 को घर में Mysterious Circumstances में मृत मिली थी। उसका मामला 14 दिन बाद 29 मई को CBI को सौंपा गया था और इतने दिन में सभी सबूत गायब/नष्ट कर दिए गए थे। CBI ने Circumstantial Evidences के आधार पर तलवार दंपति को दोषी ठहराने की कोशिश की और ट्रायल कोर्ट ने तलवार दंपति को सजा भी सुना दी लेकिन हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। वह प्रश्न आज तक नहीं सुलझा कि आरुषि की मौत आखिर कैसे हुई?
सुशांत सिंह मामले में CBI ने लगभग 5 साल बाद 22 मार्च, 2025 को अपनी closure report कोर्ट में जमा की।
CBI ने अपनी जांच में पाया कि सुशांत सिंह की हत्या के या शारीरिक प्रताड़ना के कोई सबूत नहीं मिले।
Actress Rhea Chakraborty and her family were cleared of charges claiming they drove him to suicide or stole his money.
जब 14 दिन बाद आरुषि की मौत की बारे में सबूत नहीं मिले और 3 महीने बाद सुशांत सिंह की मौत के सबूत नहीं मिले तो 6 साल बाद दिशा सालियान की मौत के सबूत मिलने की कल्पना कैसे की जा सकती है वह भी तब, जब पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह हर मामले में मुख्य खिलाड़ी रहा हो? दिशा के पिता ने कोर्ट से आदित्य ठाकरे के खिलाफ भी FIR दर्ज कराने की मांग की थी क्योंकि उनके अनुसार वह मुख्य दोषी है लेकिन कोर्ट ने कहा ये काम अब CBI ही करेगी।
दिशा और सुशांत के केस में ठाकरे सरकार, बॉलीवुड के कुछ शातिर खिलाड़ी और केस दबाने में परमबीर सिंह शामिल रहे। उम्मीद जरूर करनी चाहिए लेकिन CBI बहुत कुछ सामने ला पाएगी, इसमें मुझे संदेह है बशर्ते कुछ लोग तोते की तरह सत्य उगलना शुरू कर दें।
परमबीर सिंह पर तो हाल ही में तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख और उनके पुत्र सलिल देशमुख ने आरोप लगाया था कि वो Antilia Bomb Scare Case का मास्टरमाइंड था। उसके लिए दिशा और सुशांत के मामलों को दबाना कोई बड़ी बात नहीं थी।
मुस्लिम कट्टरपंथी गोधरा याद रखते है लेकिन 13 अगस्त भूल जाते हैं, क्यों?
मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर बीजेपी विरोधी पार्टियों ने अपने पाप छुपाने के लिए गोधरा को लेकर बीजेपी और नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर फैला रखा है। आम मुसलमान को अपनी अक्ल का इस्तेमाल करते इन फिरकापरस्त लोगों से पूछना चाहिए कि मोदी से पहले गुजरात में कितने दंगे हुए, कितने दिन चले और कितने मुसलमान मरे? दूसरे, मुरादाबाद में ईदुलफित्र पर दंगे किसने करवाया? दिल्ली में भी मुसलमानों ने सुबह-सुबह ईद की नमाज पढ़ घर में बैठ गए थे। सुबह 8 बजे जामा मस्जिद क्षेत्र में सन्नाटा था। जब मुसलमान कहता है कि वह अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरता फिर इन फिरकापरस्तों से सच्चाई जानने से क्यों डर रहा है?
इसी दौरान अचानक पीछे से आवाज आने लगती है "भागो, सुअर आ गया है" सुअर किसी ने देखा नहीं था, MJ अकबर जो नेता है उन्होंने इसे देखने का दावा किया था, कितना सही कितना गलत, किसी को नहीं पता
पीछे की खबर सुनकर आगे भी हड़कंप मच गया, 50,000 की भीड़ अराजक हो जाती है, निकलने के लिए एक ही रास्ता था, पुलिस उन्हें लगातार समझा रही थी, पर तभी अचानक से एक पत्थरबाजी भीड़ में से होती है, SSP के सर में चोट लगती है और वे वहीं पर गिर कर बेहोश हो जाते है
तब पुलिस फायरिंग कर देती है, सरकारी आंकड़ों में करीब ढाई सौ लोग मारे जाते है, बाद में लापता और मृतकों को मिलाकर मुआवजा चार सौ लोगों का जारी किया जाता है,
खैर इतनी बड़ी भीड़ पूरी आक्रोशित हो चुकी थी, उसने पुलिस थानों पर हमला कर दिया और उनके पुलिस अधिकारियों को दौड़ा दौड़ा कर मार डाला गया
लेकिन मामला अगर यहीं खत्म हो जाता तो सब अच्छा होता
उस समय इनके एरिया से सटा वाल्मीकि समाज और कई दलित बस्तियां थी, जिससे विवाद पहले से चल रहा था, दरअसल एक दलित लड़की का अपहरण कर के जबरन मुसलमानों में निकाह करवा दिया गया था और छेड़छाड़ की घटनाएं आम थी
जब भीड़ पुलिस थानों को जलाते हुए निकली तो उन्हें एक बात जो पता थी वो थी सुअर कौन पालते है
उन्होंने पूरे दलित बस्तियों को जला दिया, अस्सी से सौ लोग मारे गए, हिन्दू एकजुट हुए लेकिन उनमें संगठनात्मक शक्ति नहीं थी, पुलिस मूकदर्शक बनकर बस देखती रही, पुलिस पर भी पक्षपात के आरोप लग रहे थे
ये दंगे तीन चरण में हुए थे पहले फेज में ये मुरादाबाद में हुआ, फिर इससे निकलकर दूसरे इलाकों में ये फैल गया
उस समय केंद्र से लेकर राज्य तक में कांग्रेस की सरकार थी, और केंद्र में इंदिरा गांधी थी
इन्हीं दंगों ने यूपी में कांग्रेस के अंत की नींव लिखी, क्योंकि एक तो वे अफवाहों को रोक नहीं पाए, दूसरा अराजकता फैलने पर भारी बल भेजने के बजाय फायरिंग करवाई
जब ये भीड़ वहां से निकल पूरे मुरादाबाद में फैल गई तो फिर ये पूरी तरह से मूकदर्शक बन गए और दलित बस्तियों को तबाह होने दिया, उनके लोगो को मरने दिया
लेकिन इस केस में जो सबसे बड़ा नाम आया वो था मुस्लिम लीग के डॉक्टर शमीम अहमद खान, इस घटना के बाद जस्टिस एम. पी. सक्सेना आयोग ने रिपोर्ट तैयार की जिसमें पाया गया कि वहां कोई सुअर नहीं था, शमीम अहमद ने जानबूझ कर सुअर की भ्रांतियां फैलाई
दरअसल वे मुस्लिम लीग को दोबारा से राज्य में पुनर्जीवित करना चाहते थे, और मुसलमानों का बड़ा चेहरा बनना चाहते थे, लेकिन खास सफलता न मिल पाने के कारण उन्होंने ऐसा किया
पूर्व एयर मार्शल जितेन्द्र मिश्र जी के राम मंदिर ट्रस्ट के CEO बनने पर भी विपक्ष को दर्द क्यों है?
तथाकथित गोदी मीडिया और विपक्ष में से किसी ने माँ का दूध नहीं पिया जो मस्जिद, दरगाह और मदरसों में हुए घोटालों पर चर्चा तक सकें। राममन्दिर चंदा चोरी पर कई दिनों तक टीवी पर चर्चा हो सकती है लेकिन चर्च, मस्जिद, दरगाहों और मदरसों के घोटालों पर मुंह खोलने तक की हिम्मत नहीं, क्यों? विपक्ष को तो अपने वोटबैंक का लालच है लेकिन मीडिया को किसका लालच है?
ऑपरेशन सिंदूर के हीरो रहे एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा जी को राम मंदिर ट्रस्ट का पहला CEO बनाया गया है। उन्होंने कहा कि उनकी भगवान भोले नाथ के प्रति अटूट आस्था रही है और प्रभु राम की सेवा मिलना ईश्वरीय आदेश है।
श्री मदन मोहन पांडेय और डॉ निर्मला यादव को ट्रस्टी बनाया गया है और डॉ महेश भागचंदका को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। इन सभी को नियुक्ति पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। प्रभु श्री राम से उन्हें कार्य निष्पादन की शक्ति मिले।
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आज उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय कह रहा है कि CEO मिश्र की नियुक्ति मंदिर में हुई चोरी को वैध ठहराने के लिए की गई है। बाहर से CEO को नियुक्त न करके साधु संतों और शंकराचार्यों को यह काम देना चाहिए था।
कांग्रेस का एक नेता इमरान मसूद कह रहा है मंदिर चलाना साधु संतों, पुजारियों और ब्राह्मणों का काम है। RSS की नज़र मंदिर के पैसे पर है और जितेंद्र मिश्र RSS के जाल में फंस गए हैं।
आरएसएस कोई कांग्रेस की तरह राजनीतिक पार्टी नहीं है जो किसी भी राज्य में सरकार बनते ही कमाई शुरू कर देती है। कांग्रेस ने 10 साल के केंद्र में राज में करोड़ों की लूट मचाई। तुम कहते हो मंदिर चलाना ब्राह्मणों का काम है लेकिन समाजवादी पार्टी कहती है कि ब्राह्मण वेश्याओं से भी ज्यादा गिरे हुए होते हैं।
इमरान मसूद के अलावा राशिद अल्वी भी भड़क रहा है। तुम लोग मुस्लिम हो, तुम अपनी कौम पर ध्यान दो, तुम्हें मंदिरों पर बोलने का क्या मतलब है और इमरान मसूद तो मोदी की बोटी बोटी करने वाला शातिर खिलाड़ी है।
अखिलेश यादव अलग तड़प रहा है कि नियुक्तियों का दिखावा हुआ है जबकि ये सब भाजपा ने किया है। जो कुछ मंदिर में हुआ वो भगवान राम से छुपा हुआ नहीं है लेकिन राम के नाम पर मंदिर में चोरी हुई।
ठीक बात है जो चोरी हुई वो भगवान राम से छुपी नहीं है जैसे तुम्हारी पार्टी का राम भक्तों पर गोली चलाना राम जी से छुपा नहीं था और सही समय आने पर तुम्हें दंड मिला। जो भी चोरी में शामिल रहे और या जो उनके पीछे थे उन सबका हिसाब राम जी ही करेंगे।
तुम अखिलेश जी अपना समय कैसे भूल गए जब 2006 और 2007 में लखनऊ, फैज़ाबाद और वाराणसी में सीरियल धमाके करने वाले आतंकियों के केस आपने वापस ले लिए थे। वो तो राम मंदिर में चोरी से भी बड़ा महापाप था और आज आप राम मंदिर की बात कर रहे हो।
विपक्ष क्या समझता है कोई सेना का अधिकारी राम भक्त नहीं हो सकता और क्या उसे ईश्वर में आस्था रखने का कोई अधिकार नहीं है। विपक्ष जितेंद्र मिश्र जी पर क्यों उंगली नहीं उठाए जब वो पाकिस्तान से हर टकराव पर सेना के शौर्य पर सवाल उठाते हुए सबूत मांग रहा था।
अखिलेश जी मस्जिद में अपनी पत्नी का मौलाना द्वारा किया अपमान भी सहन कर गए क्योंकि वो अपमान करने वाले मौलाना थे और डर था मुस्लिम वोट बैंक न छिन जाए। वोट बैंक के लिए पत्नी का अपमान भी कबूल है लेकिन हिंदुओं के मंदिर के खिलाफ कुछ भी बोल सकते हैं और मुस्लिम वोट बैंक के लिए आज तक रामलला के दर्शन को नहीं गए।
क्या राहुल ने लोकसभा कैंटीन से जाति बताकर चाय मंगवाई?
लोकसभा की सीढ़ियों पर बैठ डिस्पोजल कप में चाय पीते हुए। क्या कैंटीन वाले ने दलित समझ ऐसे कप में चाय दी?
राहुल गांधी ने कहा - चाय की दुकान पर दो तरह से कप रखे जाते हैं डिस्पोजल वाले जो फेक दिए जाते हैं वे दलितों के लिए और काँच वाले सवर्णो के लिए! कैसी हास्यास्पद बात है! इससे यह साबित होता है कि आज तक ये कभी चाय की दुकान पर गए ही नहीं।
बेगम स्वरा भास्कर ने उगला सनातन के विरुद्ध जहर
प्रधानमंत्री मोदी के आतंकवाद के प्रति रुख को SCO घोषणा पत्र में शामिल किया गया
आखिर मोदी-योगी-अमित के खिलाफ INDI गठबंधन द्वारा दुष्प्रचार करने का मुख्य कारण है कि योगी उत्तर प्रदेश से माफिया राज ख़त्म कर रहे हैं तो मोदी और अमित देश से आतंकवाद। 2014 में मोदी सरकार बनने से पहले कभी विश्व ने भारत में आतंकवाद को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही आतंकवाद को विश्व पटल पर उठाया विश्व के कान खड़े हो गए जबकि मोदी से पहले विपक्ष मुस्लिम वोटबैंक के लालच में इस्लामिक आतंकवाद को हिन्दू और भगवा आतंकवाद नाम देकर संरक्षण देने की वजह से दुनिया ने आतंकवाद को गंभीरता से नहीं लिया।
बिश्केक (किर्गिस्तान) में हुए SCO सम्मेलन में जहां ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशिकीयान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर युद्ध को रोकने की कोशिश करने को कहा, तो मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से भारतीय नाविकों की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से कहा कि यूक्रेन के साथ अंतहीन युद्ध समाप्त करने के मार्ग तलाशे जाएं, भारत शांति का पक्षधर है।
SCO के घोषणा पत्र में नरेंद्र मोदी के आतंकवाद के प्रति सख्त रुख को शामिल किया गया। सदस्य देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में “दोहरे मापदंड” को अस्वीकार्य बताया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस खतरे से निपटने का आह्वाहन किया, जिसमें आतंकियों की सीमा-पार से आवाजाही भी शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि आतंकवाद और उसे धन मुहैया कराने वालों पर लगाम लगानी होगी।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
उधर यूक्रेन-रूस युद्ध, है तो दोनों के बीच लेकिन आग में घी डाल रहे हैं ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य EU देश जो लगातार यूक्रेन को हथियार सप्लाई कर रहे हैं। रूस का युद्ध अकेले यूक्रेन से नहीं हो रहा बल्कि परोक्ष रूप से ब्रिटेन, फ्रांस और EU देश भी यूक्रेन के साथ युद्ध कर रहे हैं।
जहां तक आतंकवाद को धन मुहैया कराने वालों का सवाल है, तुर्की और चीन आतंकी पाकिस्तान को हथियार सप्लाई कर रहे हैं जिसका मतलब साफ़ है वो पाकिस्तान को भारत के खिलाफ युद्ध के लिए तैयार कर रहे हैं।
ईरान तो खुलेआम अमेरिका और इज़रायल को खत्म करने की बात करता है। उसका साफ़ कहना है कि यहूदियों को जीने का अधिकार नहीं है। इससे बड़ा आतंकवाद और क्या हो सकता है?
ईरान खुद तो अमेरिका और इज़रायल के खिलाफ लड़ ही रहा है, साथ में अनेक आंतकी संगठनों के जरिए प्रॉक्सी वॉर भी लड़ रहा है। ईरान द्वारा पोषित ये आतंकवादी संगठन इराक, सीरिया, फिलिस्तीन, यमन और लेबनान में फैले हुए हैं।
In Iraq
Kata'ib Hezbollah: A radical Iraqi Shia paramilitary group
Asa'ib Ahl al-Haq: An Iran-aligned Iraqi Shia militia group part
Badr Organization: One of the oldest Iran-backed Iraqi Shia political and paramilitary groups.
Kata'ib Sayyid al-Shuhada & Kata'ib al-Imam Ali: Additional Shia militias operating within Iraq tied to the broader Iran-led network.
In Syria
Harakat Hezbollah al-Nujaba: An Iraqi-origin Shia militia operating actively in Syria to support the Bashar al-Assad regime, closely tied to Iran.
Zaynabiyoun Brigade: A militia comprised of recruited Pakistani Shia fighters organized and deployed by Iran to fight in Syria
Fatemiyoun Division: A paramilitary unit made up of Afghan refugees recruited and trained by the IRGC to fight for Assad in Syria
Lebanese Hezbollah: The powerful Lebanese group operates extensively inside Syria alongside the Syrian military and Iranian forces to prop up the Assad government.
यही हिज़्बुल्लाह इज़रायल के साथ लड़ रहा है और इज़रायल ने पहले हमास को ठिकाने लगाया और वह हिज़्बुल्लाह को ख़त्म कर रहा है।
आतंकवाद की मार जैसे भारत झेल रहा है, वैसे ही ईरान समर्थित आतंकी संगठनों को इज़रायल झेल रहा है और शायद इसलिए ही भारत इज़रायल के साथ खड़ा है।
राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ बन रही ‘झूठे दावों की गूंज’
कहावत है कि झूठ के पांव नहीं होते, लेकिन राजनीति में झूठ की उम्र तब और छोटी हो जाती है, जब सामने आंकड़े, दस्तावेज और तथ्यों की पड़ताल पर कई पैनी निगाहें लगी हों। राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम इसी कसौटी पर अब कई असहज सवालों के घेरे में है। छात्रों और युवाओं के बीच जाकर उनसे जुड़े मुद्दे उठाना और बात है, लेकिन सवाल तब उठता है जब इन मुद्दों को धार देने के लिए इस्तेमाल किए गए आंकड़े ही कठघरे में खड़े हो जाएं। कोटा से शुरू हुई यह श्रृंखला देहरादून, प्रयागराज और पुणे तक पहुंची है। इन चार कार्यक्रमों में ही किए गए 40 दावों में तो झूठ की पोल खुल गई है। राहुल के इन दावों को सही और अकाट्य तथ्यों की रोशनी में परखा गया। गहन पड़ताल में 29 दावे बिल्कुल गलत और 11 दावे Gen Z को भ्रम में डालने वाले निकले। यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी के कमजोर भाषण और गलत फेक्ट्स के बीच झूठ बेबस खड़ा नजर आता है। मोदी सरकार के खिलाफ नैगेटिव नैरेटिव सेट करने निकले राहुल गांधी ने झूठे दावों से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।
GenZ को राहुल ने कोटा, देहरादून, प्रयागराज,पुणे में झूठ परोसा
झूठ पर झूठ बोल रहे राहुल गांधी को शायद समझ नहीं आ रहा है कि आज युवा कितने बदल गए हैं। आज का युवा केवल भाषण सुनकर संतुष्ट होने वाला नहीं है। वह गूगल करता है। सरकारी वेबसाइट खोलता है। रिपोर्ट तलाशता है और सोशल मीडिया पर दावों की सच्चाई जांचकर तुलना करता है। राहलु के चार कार्यक्रमों के 40 दावों की पड़ताल को लेकर ‘झूठ की गूंज’ नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म सामने आया। मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि राहुल गांधी ने इन कार्यक्रमों में रोजगार, सरकारी भर्ती, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था पर दावे किए थे। देहरादून में उन्होंने NTA और विश्वविद्यालयों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही, जबकि प्रयागराज में बेरोजगारी, भर्ती में देरी और पेपर लीक को प्रमुख मुद्दा बनाया। हालांकि चारों जगहों पर कई दावों को रिपीट भी किया। लेकिन किसी नेता के भाषण में उठाए गए गंभीर सवालों और उन्हें साबित करने के लिए पेश किए गए आंकड़ों में फर्क होता है। यही फर्क अब राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ पर सवालिया निशान लगा रहा है।
छात्रों की गूंज कार्यक्रमों में क्या दावे किए गए और पड़ताल में राहुल गांधी के दावों की धज्जियां कैसे उड़ीं
नंबर 1:
कोटा में 17 जून 2026 को हुए कार्यक्रम में कहा कि करीब 3000 बेहतरीन छात्रों की भीड़ में सिर्फ 1 IAS, 30 IIT और 180 डॉक्टर बन पाएंगे।
हकीकत – आंकड़ों के मुताबिक सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। असली तर्क यह है कि IAS, IIT और NEET के उम्मीदवारों के अलग-अलग applicant pools हैं। तीनों को एक ही 3,000 की भीड़ से जोड़ना ना तो सांख्यिकीय रूप से उचित नहीं और न ही इसे तार्किक रूप से ठीक ठहराया जा सकता है। फैक्ट्स यह हैं कि 2025 में ही IIT में 18,188 सीटें allotted हुईं हैं। इसके अलावा MBBS सीटें 2014 से 51,348 से बढ़कर 1,39,864 हुईं हैं।
नंबर 2:
राहुल के मुताबिक 1,000 बच्चे सिस्टम में आए तो केवल 36 को परमानेंट जॉब मिलेगी, 300 बेरोजगार रहेंगे और 700 गिग वर्कर्स बनेंगे।
हकीकत – 36+300+700 = 1,036, यानी राहुल गांधी का गणित ही 1,000 से बाहर चला जाता है। पीरिओडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) पर आधारित विश्लेषण बताता है कि 15 से 29 वर्ष के ग्रेजुएट्स में 26 प्रतिशत से अधिक रेगुलर सेलरी जॉब्स में हैं। मात्र 4.2 प्रतिशत ही बेरोजगार हैं।
नंबर 3:
करीब 22 लाख NEET विद्यार्थी हर साल परिवारों से 1.32 लाख करोड़ रुपए दिलवाते हैं और यह रकम केंद्र के पूरे एजुकेशन बजट के बराबर है।
हकीकत – वास्तविकता यह है कि 1.32 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पूरे कोचिंग इंडस्ट्री के भविष्य के अनुमान से लिया गया है। सिर्फ NEET विद्यार्थियों से वसूली नहीं है और इसमें इंजीनियरिंग के साथ-साथ विभिन्न जॉब्स की परीक्षाओं की कोचिंग भी शामिल है। इसके साथ ही केंद्र के शिक्षा बजट को राज्यों के शिक्षा खर्च से अलग करके तुलना की गई है।
नंबर 4:
भारत के करीब 80 प्रतिशत इंजीनियर बेरोजगार हैं।
हकीकत – यह पूरी तरह गलत आंकड़ा है। असल में 80 प्रतिशत का फिगर उस study का हिस्सा है, जिसमें कहा गया है कि वह “unemployable for certain knowledge-economy roles” है, unemployed नहीं। यानी skill-gap को बेरोजगारी में बदलकर युवाओं को भ्रमित करने की कोशिश की गई।
नंबर 5:
भारत में paper leaks में conviction rate बिल्कुल zero है। किसी बड़े आरोपी को जेल ही नहीं हुई है।
हकीकत – देहरादून में 17 जुलाई 2026 को किया गया दावा बिल्कुल गलत है। जनवरी 2024 के CBI court मामले का उदाहरण सामने है, जिसमें दस आरोपियों को पांच वर्ष की rigorous imprisonment हुई, उनमें Railway Recruitment Board के पूर्व chairman भी शामिल थे। इसके अलावा कांग्रेस की गहलोत सरकार में हुए पेपर लीक्स के कई आरोपी इस समय जेल की हवा खा रहे हैं।
नंबर 6:
Manufacturing, entrepreneurship, corporate employment और public sector बंद हैं। केवल सरकारी नौकरियां ही बची हैं।
हकीकत – देश में manufacturing में 7.45 करोड़, self-employment में 34.62 करोड़ और regular salaried work में 14.54 करोड़ लोग कार्यरत हैं। राहुल गांधी ने पूरी तरह से मनगढ़ंत दावे किए हैं और असली फेक्ट्स से जान बूझकर आंखें मूंद ली हैं।
नंबर 7:
छात्रों के हाथों में फोन और उनके शरीर पर पहनी शर्ट्स सभी चीन से आते हैं।
हकीकत – सभी जानते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ही भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा mobile-phone manufacturer और net exporter बना है। 2025 में smartphones भारत का सबसे बड़ा export commodity बने हैं। गारमेंट्स यानी Ready-Made Garments (RMG) की बात करें तो भारत का वित्त वर्ष 2025-26 में निर्यात लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपए, यानी करीब US$16.0 billion रहा है। यह 2024-25 के लगभग 1.35 लाख करोड़ रुपए निर्यात से करीब 2.9 प्रतिशत अधिक ही है।
नंबर 8:
भारत में 3, 4, 5 बड़े कारोबारियों ने ही banking money कब्जे में कर लिया है और आम entrepreneurs को loan नहीं मिलता है।
हकीकत – मोदी सरकार के राज में महिलाओं से लेकर युवाओं और गरीबों से लेकर रेहड़ी-पटरी वालों तक के लिए लोन की कई योजनाओं चल रही हैं। मार्च 2026 में scheduled commercial banks का कुल credit 212.9 लाख करोड़ रुपए था और micro/small industry credit में 33.1 प्रतिशत की ग्रोथ हुई है।
नंबर 9:
AI ने IT jobs को इतना नुकसान पहुंचाया है कि corporate employment का दरवाजा बंद हो गया है।
हकीकत – Nomura analysis बताता है कि AI से प्रभावित क्षेत्र में नए-नए jobs बन भी रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी के इस दौर में नए जॉब रोल्स की बात करें तो AI services, cloud engineering, cybersecurity आदि नए क्षेत्र उभर रहे हैं। एआई जाब्स लेने से ज्यादा कॉरपोरेट कल्चर में युवाओं को टेक्नोलॉजी में और दक्ष बना रहा है।
नंबर 10:
Privatizations ने युवाओं के लिए public-sector employment का रास्ता बंद कर दिया है।
हकीकत – यह दावा भी पूरी तरह से मिथ्या है। FY25 में CPSEs में करीब 15.42 लाख कर्मचारी थे और Rozgar Melas के जरिए लगभग 12 लाख नए एपोइंटमेंट लेटर जारी किए गए हैं। रोजगार मेलों के अलावा पीएम इंटर्न योजना , प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना ने भी युवाओं को पब्लिक सेक्टर में जॉब के नए दरवाजे खोले हैं।
नंबर 11:
Coaching centres, translators, printers, transporters, vendors, NTA और ministry officials मिलकर एक ही paper-leak structure चलाते हैं।
हकीकत – 1956 से लेकर 2014 तक का इतिहास इस बात का साक्षी है कि केंद्र में कांग्रेस राज के दौरान विभिन्न स्तरों की बोर्ड परीक्षाओं, विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रशासनिक सेवाओं और प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं तक के प्रश्नपत्र लीक हुए हैं। अलग-अलग स्तरों पर कुछ गड़बड़ियां हुई हैं, लेकिन इससे सभी संस्थाओं के एक coordinated criminal network होने के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं।
नंबर 12:
भारत 19वीं सदी की examination system इस्तेमाल करता है।
हकीकत – वास्तव में 2019 से मार्च 2026 तक NTA ने 275 से ज्यादा examination cycles कराए, जिनमें computer-based testing, biometric verification और encrypted transmission जैसी व्यवस्थाएं थीं। हमारी नई शिक्षा नीति ने एक्जाम पैटर्न को भी बदला है।
नंबर 13:
भारत में हर परीक्षा एक ही दिन होती है। randomization से कई दिनों में परीक्षा हो सकती है।
हकीकत – राहुल के दावे की पोल खोलने के लिए SSC CGL 2025 का उदाहरण ही काफी है। इसमें 45 shifts और 15 examination days हैं। इसके अलावा Railway NTPC की 19 दिनों में हुई परीक्षा भी राहुल के दावे की पोल खोलती है।
नंबर 14:
Competitive examinations की तैयारी में aspirants पांच साल में 9 लाख रुपए खर्च करते हैं।
हकीकत – प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को लेकर ऐसा कोई official national average उपलब्ध नहीं है। खर्च परीक्षा, शहर, coaching mode और तैयारी की अवधि के अनुसार बहुत बदलता रहता है। इससे साफ पता चलता है कि राहुल गांधी का यह फेक्ट भी मनगढ़ंत ही है।
नंबर 15:
Competitive exams की तैयारी करने वाले 99 प्रतिशत उम्मीदवार गरीब या middle-class परिवारों से आते हैं।
हकीकत – Competitive exams हर वर्ग, जाति, अमीर-गरीब के लिए ओपन हैं। सभी प्रतियोगी परीक्षाएं देते हैं। वरिष्ठ अफसरों के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाएं देकर अधिकारी बने हैं, इसके हजारों उदाहरण हैं। ऐसा कोई official dataset नहीं है जो aspirants को poor/middle class में बांटकर 99 प्रतिशत का आंकड़ा देता हो।
नंबर 16:
देश में 9 करोड़ लोग government exams की तैयारी करते हैं और 6 लाख सफल होते हैं- यानी 150 में एक को नौकरी मिलती है।
हकीकत – वास्तविकता यह है कि 9 करोड़ का आंकड़ा unique individuals नहीं, बल्कि अलग-अलग परीक्षाओं के applications हो सकते हैं। राहुल गांधी और उनके सलाहकारों को शायद यह नहीं पता कि एक व्यक्ति कई-कई परीक्षाओं में आवेदन करता है। ऐसे में उनका मैथमैटिक्स फेल हो जाता है।
नंबर 17:
पिछले दस वर्षों में paper leaks ने 7.5 करोड़ छात्रों को प्रभावित किया है।
हकीकत – पेपर लीक की बात करते समय राहुल गांधी राज्यों में कांग्रेस सरकार के दौर में हुए पेपर लीक को भूल जाते हैं। पिछले एक दशक में यदि किसी एक राज्य में सर्वाधिक पेपर लीक हुए हैं, तो वह राजस्थान की गहलोत सरकार में हुए हैं। राहुल गांधी 7.5 करोड़ का आंकड़ा किस सोर्स या methodology से लाए हैं, यह उन्होंने खुद ही स्पष्ट नहीं किया। यह तक स्पष्ट नहीं कि affected में उन्होंने किन उम्मीदवारों को शामिल किया है।
नंबर 18:
Demonetization और GST ने manufacturing को खत्म कर दिया। China, Vietnam का Made-in-country दिखता है, Made-in-India नहीं।
हकीकत – प्रयागराज में 8 अगस्त 2026 को किए गए फर्जी दावे की पोल मोदी सरकार द्वारा शुरू किया गया अभियान Make in India पूरी तरह से खोलता है। फेक्ट्स में बात करें तो electronics production 2014-15 के करीब 1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपए हुआ। इसी तरह mobile-phone exports, Defense Export समेत कई सेक्टर में भारी वृद्धि हुई है।
नंबर 19:
करीब 90 प्रतिशत small और medium businesses को bank loans नहीं मिलते।
हकीकत – यह बिल्कुल निराधार दावा है। MSME bank lending 8.5 लाख करोड़ से बढ़कर 27.3 लाख करोड़ रुपए हुई है और MUDRA के जरिए 57.79 करोड़ रुपए के loans sanctioned हुए हैं।
नंबर 20:
देशभर में Entrepreneurship खत्म हो चुकी है।
हकीकत – पिछले 10 वर्षों में भारत में उद्यमिता (Entrepreneurship) में अभूतपूर्व उछाल आया है, जिससे देश दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन गया है। साल 2014 में देश में केवल 350 मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स और 4 यूनिकॉर्न थे, वहीं अगस्त 2026 तक DPIIT मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या बढ़कर 2.23 लाख से अधिक और यूनिकॉर्न की संख्या 125 के पार पहुंच चुकी है। इस क्रांति ने देश में 23 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार के अवसरों का सृजन किया है, जिसमें सबसे खास बात यह है कि लगभग 50 प्रतिशत स्टार्टअप्स Tier-2 और Tier-3 शहरों से उभर रहे हैं और कुल स्टार्टअप्स में से करीब 48 प्रतिशत में महिला निदेशक शामिल हैं।
नंबर 21:
देशभर में 150 aspirants में केवल 1 को government job मिलती है।
हकीकत – यह युवाओं के लिए Misleading करने वाला दावा है। वेबसाइट के मुताबिक कि applications-per-post के आधार पर competition का ratio निकालना भ्रामक है। इसे 150 अलग-अलग लोगों में केवल एक को नौकरी कहना इसलिए भी गलत है, क्योंकि एक व्यक्ति कई exams में बैठ सकता है। एक व्यक्ति कई एक्जाम पास कर सकता है।
नंबर 22:
Paper leaks ने government recruitment को बुरी तरह जकड़ रखा है।
हकीकत – 2014 से पहले सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और संगठित परीक्षा धोखाधड़ी से निपटने के लिए कोई विशेष केंद्रीय कानून नहीं था। मोदी सरकार ने पहली बार पेपर लीक के खिलाफ कानून बनाया। 2019 में NTA के तहत JEE मेन परीक्षा को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित कर दिया गया और 2027 तक NEET-UG को भी पूरी तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा में बदलने की योजना है। मोदी सरकार परीक्षा व्यवस्था को अधिक कड़ा और जवाबदेह बना रही है। 2026 के एंटी-पेपर-लीक कानून में पेपर लीक या अनुचित साधनों में शामिल लोगों के लिए 10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है, जबकि संगठित परीक्षा धोखाधड़ी पर 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
नंबर 23:
PSU jobs लगभग 14 लाख से घटकर 7 लाख रह गए हैं।
हकीकत – इस दावे की वास्तविकता यह है कि मोदी सरकार आने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और बैंकों की स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है। 2014 से PSUs को मजबूत किया गया है। इनमें regular employees और contractual/casual workers अलग हो सकते हैं। SBI का मार्केट कैप FY16 के 1.51 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर अब 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। मुनाफा कमाने वाली केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (CPSEs) की संख्या FY15 के 157 से बढ़कर FY25 में 227 हो गई, जबकि घाटे में चलने वाली कंपनियां 77 से घटकर 63 रह गईं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का मुनाफा भी 2014 के 36,270 करोड़ रुपये से बढ़कर FY2025-26 में रिकॉर्ड 1.98 लाख करोड़ रुपये हो गया है और वे लगातार चौथे वर्ष मुनाफे में रहे हैं।
नंबर 24:
देश में Public schools, hospitals, BSNL, ports और airports का privatisation हो चुका है।
हकीकत – देश में निजीकरण की शुरुआत प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में हुआ। उन्हीं के राज में पहली बार सरकारी कंपनियों में मुख्यतः अल्पांश हिस्सेदारी बेची गई थी। स्कूल और हॉस्पीटल का प्राइवेटाइजेशन भी पहले से ही है। राहुल गांधी ने भ्रामक जानकारी दी है। उदाहरण के तौर पर Parliamentary Committee ने साफ तौर पर कहा कि BSNL अभी भी 100 प्रतिशत Government of India-owned PSU है।
नंबर 25:
AI traditional corporate और back-office jobs खत्म कर रहा है।
हकीकत – दरअसल, routine/back-office work का automation हो रहा है, लेकिन jobs खत्म कहना transition और नए roles को नजरअंदाज करना है। Nomura analysis का हवाला देते हुए कहा कि AI से प्रभावित क्षेत्र में नए-नए jobs बन भी रहे हैं। एआई जाब्स लेने से ज्यादा कॉरपोरेट कल्चर में युवाओं को टेक्नोलॉजी में और दक्ष बना रहा है।
नंबर 26:
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस 60 प्रतिशत जॉब्स खत्म कर देगा।
हकीकत – यह दावा निराधार और फेक्ट्स से परे है। वेबसाइट के अनुसार IMF का 60 प्रतिशत आंकड़ा AI exposure का है, यानी jobs जिनके tasks AI से प्रभावित हो सकते हैं; इसका अर्थ 60 प्रतिशत jobs का समाप्त होना नहीं है, बल्कि इनमें एआई स्किल वाले युवाओं के लिए नई-नई संभावनाएं बनेंगी।
नंबर 27:
भारतीय युवा रोज 8 घंटे Reels देखते हैं।
हकीकत – राहुल गांधी के इस दावे का कोई स्पष्ट source नहीं दिया गया है। screen time, internet use, smartphone use, social-media use तथा Reels viewing को एक ही चीज मान लिया गया है।कंपनियां युवाओं का data लेकर उसी data की मदद से उनकी jobs AI से replace करती हैं।
हकीकत – वेबसाइट के अनुसार दो अलग-अलग बातों- companies data collect करती हैं और AI कुछ jobs automate करता है। इसको जोड़कर एक causal conclusion बनाया गया है, जिसका प्रमाण नहीं दिया गया है।
हर institution में एक RSS Pracharak है।
हकीकत –राहुल गांधी के सबसे ज्यादा मनगढ़ंत दावों में से यह एक है। वे खिसयानी बिल्ली की तरह जब-तब आरएसएस पर निशाना साधते रहते हैं, लेकिन आधारहीन आरोपों के कारण कभी इनका असर नहीं हुआ है। राहुल ने आरएसएस विरोध के इस अभियान में “हर संस्था” एक universal claim की तरह है। इसकी कोई सूची, नाम, संख्या, नियुक्ति संबंधी रिकॉर्ड या इसे साबित करने की कोई कार्यप्रणाली नहीं दी गई है। बिना प्रमाण के किसी आरोप को पुख्ता तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
हर साल करीब 4 लाख बच्चियां जन्म से पहले मार दी जाती हैं।
हकीकत – पुणे में 22 अगस्त 2026 को किया यह दावा फिर से युवाओं को भ्रमित करने वाला है। लगभग 4.6 लाख का estimate वास्तविक UNFPA estimate से आता है, लेकिन वह 2013–17 के पुराने आंकड़ों पर आधारित है और आज की स्थिति बताने के लिए उसे वर्तमान आंकड़े की तरह पेश करना भ्रामक है।
देश में 80 प्रतिशत महिलाएं harassment का सामना करती हैं।
हकीकत – राजस्थान में जब कांग्रेस की सरकार थी तो यह राज्य देशभर में महिलाओं के रेप के मामले में नंबर वन था। इस पर भाजपा द्वारा सवाल करने पर तब के संसदीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शांति धारीवाल ने बेशर्मी से कहा था- क्या करें राजस्थान तो मर्दों का प्रदेश है। एक बात और 79 प्रतिशत वाला आंकड़ा 2016 के एक छोटे से survey में 502 महिलाओं से आया था। इसे अब एक दशक के बाद पूरे भारत की महिलाओं का वर्तमान national figure बताना कैसे जायज ठहराया जा सकता है।
करीब 29-30 प्रतिशत महिलाएं physical violence का सामना करती हैं।
हकीकत – पुराने फेक्ट्स पर झूठ की इमारत बनाना विपक्ष और राहुल गांधी का पसंदीदा शौक रहा है। बता दें कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) का आयोजन वर्ष 2019 से 2021 के बीच दो चरणों में किया गया था। 29.3% का आंकड़ा NFHS-5 का ही है। नवीन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 में comparable figure घटकर 22.3 प्रतिशत रह गया है, लेकिन राहुल गांधी और उनके सलाहकारों को यह नजर नहीं आता।
भारत में हर 100 में 6 महिलाओं के साथ rape होता है।
हकीकत – सबसे पहले, राहुल गांधी के बताए गए 100 में से 6 आंकड़े का कोई स्रोत ही स्पष्ट नहीं है। उन्हें बताना चाहिए कि यह आंकड़ा कहां से आया, क्योंकि नवीनतम NCRB आंकड़े इस दावे का समर्थन नहीं करते। मई 2026 में जारी NCRB की Crime in India 2024 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देशभर में बलात्कार के 29,536 मामले दर्ज हुए। इनमें 28,950 पीड़ित वयस्क (18 वर्ष या उससे अधिक) थे, जबकि 784 पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र के थे। NCRB के 2024 के आंकड़ों के अनुसार बलात्कार की दर प्रति एक लाख महिलाओं पर लगभग 4.3 मामले है, न कि 100 महिलाओं में 6 है। राहुल गांधी का रेप से संबंधित फेक्ट वास्तविकता से एकदम परे है।
देश में 50 प्रतिशत महिलाएं safety concerns के कारण work/education छोड़ती हैं। महिलाएं सेफ्टी पर 17,000 अतिरिक्त खर्च करती है।
हकीकत – राहुल गांधी के यह दोनों ही आंकड़े भ्रामक हैं। दरअसल, इसके पीछे जिस ORF–Youth Ki Awaaz के 2021 के सर्वेक्षण Women on the Move: The Impact of Safety Concerns on Women’s Mobility का इस्तेमाल किया गया है, उसमें दिसंबर 2019 से सितंबर 2020 के बीच भारत के 140 शहरों की मात्र 4,262 महिलाओं को शामिल किया गया था। यह सर्वेक्षण पूरे देश की महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सर्वे नहीं था। इसमें ग्रामीण महिलाओं का समान प्रतिनिधित्व नहीं था। इसलिए इसके निष्कर्षों को भारत की सभी महिलाओं की स्थिति बताना एकदम गलत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राहुल गांधी इस दावे को UPA के दौर के संदर्भ में नहीं देखते हैं। PHD Chamber of Commerce and Industry की 2014 की रिपोर्ट Women Safety in Delhi: A Study में पाया गया था कि कामकाजी महिलाओं में 64 प्रतिशत ने कहा था कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों का उनकी उत्पादकता पर असर पड़ा, क्योंकि वे देर तक अपने कार्यस्थल पर रुकने में हिचकिचाती थीं।
देश की 60 प्रतिशत लड़कियां अकेले घर से बाहर नहीं जा सकतीं।
हकीकत – राहुल गांधी देर रात तक शहरों में सड़कों पर घूमने वाली जैन जी को उसके ही झूठ से भरमा रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का मूल सवाल तीन खास जगहों, market, health facility और village/community से बाहर अकेले जाने की अनुमति पर है। इसे सामान्य “घर से बाहर नहीं जा सकतीं” में बदलना इसके अर्थ पूरी तरह से बदल देता है।
भारत में 45 प्रतिशत लड़कियां marriage या housework के कारण पढ़ाई छोड़ देती हैं।
हकीकत – आज नारी शक्ति स्टार्टअप से लेकर स्पेस तक, खेत से लेकर चिप बनाने तक और घर से लेकर कंपनियों को संभालने में नित-नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। UDISE के मुताबिक 2025-26 में girls’ secondary dropout rate केवल 8 प्रतिशत था। ऐसे में 45 प्रतिशत कोई current official measure नहीं है।
केवल 8 प्रतिशत महिलाओं के पास independently owned property है।
हकीकत – दरअसल, 8.3 प्रतिशत वाला आंकड़ा 15-49 वर्ष की उन महिलाओं का है, जो अकेले land own करती हैं। Joint property या broader household property ownership को जोड़ने पर आंकड़ा अलग है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 में 18.8 प्रतिशत का broader measure बताती है।
अभी 15-29 साल की औसत महिला रोज 5.5 घंटे घर का काम करती है, जबकि लड़का केवल 30 मिनट काम करता है।
हकीकत – पुणे में राहुल गांधी ने मिसलीड करने वाले दावे ही ज्यादा किए हैं। unpaid domestic work में कुछ gender gap है, लेकिन राहुल गांधी ने 5.5 घंटे बनाम 30 मिनट आंकड़ों का कोई स्पष्ट named time-use source नहीं दिया है।
Sexual violence, rape और molestation के 99 प्रतिशत मामले report ही नहीं होते।
हकीकत – वास्तविकता यह है कि 99 प्रतिशत वाला आंकड़ा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के पुराने data की एक media analysis से आया था। अब कोई official government estimate नहीं है और उसमें rape, molestation और अन्य sexual offences को अलग-अलग नहीं किया गया है।
लड़के age limit के बाद भी कई बार exam दे सकते हैं, लेकिन महिलाओं की marriage age 23 है।
हकीकत – राहुल गांधी का एक और स्पष्ट रूप से भ्रामक दावा। महिलाओं के लिए 23 वर्ष की कोई कानूनी विवाह आयु नहीं है। मोदी सरकार से पहले लागू कानून के अनुसार महिलाओं की न्यूनतम विवाह आयु 18 वर्ष और पुरुषों की 21 वर्ष थी। UPA सरकार के दौरान बनाए गए बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में भी यही अंतर बरकरार रखा गया था। दूसरे शब्दों में, कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के समय के कानून में भी पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु अलग-अलग थी। पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष। मोदी सरकार ने इस अंतर को खत्म करने की पहल की। बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 में महिलाओं की न्यूनतम विवाह आयु 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया था, ताकि यह पुरुषों के बराबर हो जाए। इसलिए राहुल गांधी का बयान दो स्तरों पर भ्रामक है। पहला, महिलाओं की विवाह आयु 23 वर्ष नहीं है। दूसरा, जिस UPA सरकार का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके समय कानून में महिलाओं और पुरुषों की विवाह आयु 18 और 21 वर्ष अलग-अलग थी, जबकि मोदी सरकार ने दोनों के लिए कानूनी आयु 21 वर्ष करने का प्रस्ताव किया।


