‘अरब-तुर्क’ का ढोंग खत्म, अब पाणिनी-चाणक्य पर आया लालच: पहचान के संकट में फँसे पाकिस्तान ने शुरू किया भारत का हिंदू इतिहास चुराने का नया प्रोपेगेंडा

                  भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पाकिस्तान अपना बताने में जुटा (फोटो साभार : ChatGPT)
भारत से नफरत करने के अलावा पाकिस्तान को अब एक नया चस्का लग गया है। वह प्राचीन भारत के इतिहास को अपना बताने में जुट गया है। यह वही इतिहास है जो पूरी तरह से हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान का जन्म ही इस्लाम से पहले के इतिहास (यानी हिंदू अतीत) को पूरी तरह नकारने के आधार पर हुआ था।

लेकिन अब वही पाकिस्तानी सरकार अपने फायदे के लिए उसी अतीत को जबरन अपनाने की कोशिश कर रही है। ऐसा करके वह दुनिया में खुद को जायज साबित करना चाहती है। वह एक ऐसा इतिहास दिखाना चाहती है, जिसका असलियत में कोई वजूद ही नहीं है।

‘तुर्की खून’ से लेकर ‘चाणक्य हमारे पूर्वज’ तक: पहचान के संकट में फँसा पाकिस्तान; अब भारतीय इतिहास पर जता रहा झूठा हक

पाकिस्तान इन दिनों अपनी पहचान के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। दशकों तक पाकिस्तानी खुद को अरब, तुर्क, फारसी या मध्य एशियाई देशों के वंशज बताते रहे। वे खुद को विदेशी और ‘शुद्ध’ मुस्लिम दिखाने की कोशिश करते थे।

साल 1977 से जनरल जिया-उल-हक का दौर शुरू हुआ। उनके शासनकाल में पाकिस्तान के इतिहास और संस्कृति को पूरी तरह बदलने का काम किया गया। जिया सरकार ने स्कूली किताबों (इस्लामियात और पाकिस्तान स्टडीज) के सिलेबस में बदलाव किए। इसका मकसद बच्चों के दिमाग में जबरन एक अरबी-इस्लामिक पहचान को बिठाना था।

असलियत यह है कि वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमानों के पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन कट्टरपंथ के कारण वे अपने इसी हिंदू अतीत से नफरत करने लगे। उन्होंने उस इतिहास से अपना हर रिश्ता तोड़ने की पूरी कोशिश की। अब वही पाकिस्तान बिल्कुल अलग राग अलाप रहा है।

वह सिंधु घाटी सभ्यता, पाणिनी, चाणक्य और राजा पोरस पर अपना हक जता रहा है। वह इस पूरे इतिहास से ‘हिंदू’ शब्द को गायब कर देना चाहता है। ऐसा करके पाकिस्तान एक झूठी और बनावटी ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ पहचान गढ़ने की हताश कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तानी लोग सोशल मीडिया पर भी अजीबोगरीब और मजाकिया दावे कर रहे हैं। हाल ही में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने BBC हिंदी का एक वीडियो शेयर किया। इसमें एक पाकिस्तानी मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ाते नजर आ रहे हैं। इस Video को शेयर करते हुए यूजर ने दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा ही नहीं है। उसने लिखा कि पाणिनी ने संस्कृत को पाकिस्तान के गांधार में तैयार किया था। उसने यह बेतुका दावा भी किया कि भारतीय लोग संस्कृत और अंग्रेजी दोनों का गलत उच्चारण करते हैं।

गायत्री मंत्र न जानने वाले भी अब संस्कृत पर जता रहे हक: ‘साउथ एशिया’ के नाम पर भारत की हिंदू विरासत चुराने का नया खेल

पाकिस्तानी मुस्लिम बिना गलती किए गायत्री मंत्र का पाठ तक नहीं कर सकते। गूगल किए बिना तो उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि यह मंत्र क्या है। इसके अलावा, इस्लाम से थोड़ा भी भटकने पर उन्हें ‘सर तन से जुदा’ होने का खौफ रहता है। लेकिन इसके बावजूद, एक पाकिस्तानी यूजर ने बड़े दुस्साहस के साथ दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा नहीं है। उसका तर्क है कि पाणिनी ने संस्कृत को गांधार में तैयार किया था, जो अब उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में है।
इस तरह के दावों को देखकर किसी भी हिंदू या भारतीयों को एक साथ हँसी और गुस्सा दोनों आ सकते हैं। BBC के Video में दिख रहे प्रोफेसर डॉ राशिद शाहिद ने संस्कृत को ‘साउथ एशिया (दक्षिण एशिया) की साझी विरासत’ बताया है। भारतीय लोग अब बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि जब भी पाकिस्तानी- चाहे वे अच्छे इरादे वाले ही क्यों न दिखें, ‘साउथ एशिया’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका असली मतलब क्या होता है।
साजिश बहुत सीधी है। इतिहास, संस्कृति या धर्म के लिहाज से जो कुछ भी हिंदू और भारतीय है, उस पर ‘साउथ एशिया’ का लेबल लगा दो। ऐसा करने के बाद, भारत और हिंदुओं से नफरत करने वाले पाकिस्तानी और कभी-कभी बांग्लादेशी मुस्लिम भी उस विरासत को आसानी से अपना बताकर हड़प लेते हैं।

‘पाणिनी को पाकिस्तानी’ बताने की बचकानी जिद: अष्टाध्यायी में लिखा था ‘भारत’ का नाम

पाकिस्तानी लोग आजकल प्राचीन भारत के इतिहास पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हैं। लेकिन वे एक छोटी सी बात भूल जाते हैं। पाणिनी ने जब अपनी किताब ‘अष्टाध्यायी’ लिखी, उससे हजारों साल पहले ही संस्कृत में वेद लिखे जा चुके थे। शुरू में संस्कृत सिर्फ पूजा-पाठ और मंत्र बोलने की भाषा थी।

बाद में यह हिंदू धर्म और साहित्‍य की एक मजबूत भाषा बन गई। पाणिनी ने संस्कृत को नियम और सही ढांचा दिया, यह सच है। लेकिन सिर्फ इसलिए संस्कृत को पराया बता देना कि पाणिनी गांधार (जो अब पाकिस्तान में है) के रहने वाले थे, बिल्कुल बेवकूफी है। इंटरनेट पर एक पाकिस्तानी यूजर ने तो पाणिनी को ही पाकिस्तानी बता दिया।

पाकिस्तानी यूजर ने लिखा, “संस्कृत के सबसे महान ज्ञानी पाणिनी एक पाकिस्तानी थे। आज आप जिस संस्कृत पर इतराते हैं, उसे एक पाकिस्तानी ने ही ठीक किया था।” यह देखना वाकई मजेदार है कि जो पाकिस्तान अपने कानून के तहत किसी हिंदू को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने नहीं देता, वही आज एक हिंदू ब्राह्मण पाणिनी को अपना बताने के लिए मरा जा रहा है।

वह पाणिनी के नाम से ‘हिंदू’ और ‘भारतीय’ पहचान को गायब करना चाहता है। असल में पाकिस्तान की उम्र सिर्फ 78 साल है, इसलिए वह खुद को पुराना दिखाने के लिए ऐसी अजीब हरकतें कर रहा है। पाणिनी ने अपनी किताबों में भारत के कोने-कोने का जिक्र किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की फूटी किस्मत देखिए, पाणिनी ने अपनी किसी भी किताब में ‘पाकिस्तान’ शब्द का नाम तक नहीं लिया।

पाणिनी ने उस समय के पूरे देश को ‘भारत’ कहा था। आज भी हमारा देश इसी नाम का इस्तेमाल करता है। सच तो यह है कि ‘भारत’ शब्द का पहला लिखित सबूत ही पाणिनी की किताब ‘अष्टाध्यायी’ के एक श्लोक ‘नद्व्यचःप्राच्यभरतेषु’ (4.2.113) में मिलता है। पाणिनी ने ‘पूर्वी भारत’ और ‘उत्तरी भारत’ की बात की थी, किसी ‘पूर्वी या उत्तरी पाकिस्तान’ की नहीं।

आपके मन में भी यह सवाल जरूर आया होगा कि क्या पाकिस्तानियों को खुद यह बात नहीं पता? वे अच्छी तरह जानते हैं कि ‘पाकिस्तान’ शब्द का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। यह नाम नया है। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी वे इंटरनेट पर झूठ फैला रहे हैं।

जब पाकिस्तानी मुस्लिम सोशल मीडिया पर ‘पाणिनी एक पाकिस्तानी थे’ जैसा सफेद झूठ बेचते हैं, तो उनकी असलियत सामने लाना बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसे में इतिहास के सही तथ्यों के साथ उनका थोड़ा मजाक उड़ाना और उन्हें आईना दिखाना बिल्कुल लाजिमी है।

त्रिपुंडधारी ब्राह्मण पाणिनी और चाणक्य को ‘पाकिस्तानी’ बताने की अजीब जिद

पाकिस्तानी यूजर ने पाणिनी का जो उदाहरण शेयर किया है, वह उनकी एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखाता है। पाकिस्तानी मुसलमानों की सोच में यही सबसे बड़ा खोट है। वे सोचते हैं कि आज के भूगोल के हिसाब से प्राचीन भारत के सभी ऐतिहासिक लोग, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ बन जाते हैं।

माथे पर त्रिपुंड लगाने वाले एक हिंदू ब्राह्मण और संस्कृत के महाज्ञानी पाणिनी की मेज पर पाकिस्तान का ‘चांद-तारा’ वाला झंडा दिखाना बेहद अजीब और मजाकिया है। पाणिनी खुशनसीब थे कि वे उस दौर में पैदा हुए जब इस्लाम या पाकिस्तान जैसा कुछ था ही नहीं। पाकिस्तान खुद को ‘रियासत-ए-मदीना’ कहता है और काफिरों, खासकर मूर्तिपूजक हिंदुओं से नफरत करता है।

लेकिन चूंकि उनके पास जिहादी आतंकियों के अलावा अपना कोई ऐतिहासिक हीरो नहीं है, इसलिए वे प्राचीन भारत के हिंदुओं को जबरन ‘पाकिस्तानी’ बनाने में जुटे हैं। पाणिनी की लिखी ‘अष्टाध्यायी’ वेदों के छह अंगों (वेदांग) में से एक है। वेद हिंदू सनातन धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ हैं। इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकारियों ने इन्हें पूरी तरह मिटाने और नष्ट करने की बहुत कोशिश की।

हालाँकि, समय से परे मौजूद इन वेदों को खत्म करना नामुमकिन है। भारतीय हिंदू हस्तियों को जबरन पाकिस्तानी बताने का यह मजाक यहीं नहीं रुका। अब वे महान राजनीतिक रणनीतिकार और चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु, आचार्य चाणक्य के पीछे भी पड़ गए हैं। इसी सिलसिले में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने लिखा, “महान चाणक्य ने पाकिस्तान की तक्षशिला यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। वहाँ मिले ज्ञान ने ही उन्हें इतिहास का सबसे बड़ा रणनीतिकार बनाया, जिससे उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य खड़ा करने में मदद की। आज भी उनके विचार राजनीति और शासन को प्रभावित करते हैं।”

अब कुछ पाकिस्तानी यूजर इस हद तक नासमझी दिखा रहे हैं कि वे ईसा पूर्व चौथी सदी की ‘तक्षशिला’ को ‘पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी’ बता रहे हैं, जबकि उस दौर में न तो इस्लाम मजहब था और न ही पाकिस्तान नाम का कोई मुल्क।

हद तो तब हो गई जब इंटरनेट पर एक यूजर ने बिना किसी ऐतिहासिक सबूत के पंजाब के महान राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) को जबरन एक बौद्ध राजा घोषित कर दिया और सोशल मीडिया पर इस सफेद झूठ को सच साबित करने की बचकानी जिद पर अड़ गया।

राजा पुरुषोत्तम (राजा पोरस) एक महान प्राचीन भारतीय राजा थे। उन्होंने झेलम (वितस्ता) और चिनाब (असीकनी) नदियों के बीच के इलाके पर राज किया था। उन्होंने ईसा पूर्व 326 में झेलम नदी के किनारे सिकंदर के बढ़ते कदमों को रोक दिया था। हालाँकि राजा पोरस के धर्म को लेकर बहुत ज्यादा विवरण नहीं मिलते। लेकिन सभी इतिहासकार मानते हैं कि वे वैदिक धर्म यानि हिंदू धर्म के अनुयायी थे।

गंगा घाटी से नफरत और पाकिस्तान का अधूरा ज्ञान

भारत के गंगा मैदानी इलाके से नफरत करने वाले पाकिस्तानियों ने तुरंत राजा पोरस को ‘बौद्ध’ घोषित कर दिया। वे यह भूल गए कि बौद्ध धर्म की शुरुआत भी भारत के इसी पूर्वी गंगा मैदान (बिहार-यूपी) से हुई थी। वे इस बात को नहीं जानते या जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं कि बौद्ध धर्म सम्राट अशोक के काल के बाद ही उत्तर-पश्चिम (आज के पाकिस्तान वाले इलाके) में ठीक से फैला था। लेकिन पाकिस्तानी तो मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा चलाने में माहिर हैं। उनके लिए इतिहास के तथ्य मायने नहीं रखते, बल्कि उनका झूठा नैरेटिव सबसे ऊपर रहता है।
सोशल मीडिया पर ऐसे झूठे दावों की बाढ़ आई हुई है। पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा विंग (ISPR) के बॉट्स मिलकर एक सोची-समझी साजिश चला रहे हैं। इनका मकसद प्राचीन भारत के हिंदू इतिहास को चुराकर एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ की विरासत तैयार करना है। खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए पाकिस्तानी अब एक नया पैंतरा अपना रहे हैं। वे ‘सिंधु घाटी बनाम गंगा घाटी’ का एक फर्जी विवाद पैदा कर रहे हैं।
वे गंगा घाटी के इतिहास और संस्कृति को सिंधु घाटी से कमतर या घटिया दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। वे जानबूझकर ‘हम बेहतर और तुम खराब’ की सोच फैला रहे हैं। ऐसा करके वे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपना झूठा हक जताना चाहते हैं। इस साजिश के जरिए वे ‘अखंड प्राचीन भारत’ के ऐतिहासिक और भौगोलिक वजूद को ही मिटाना चाहते हैं। इस दिशा में उनका पहला कदम भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जगह जबरन ‘साउथ एशिया’ शब्द को बढ़ावा देना था।

इतिहास को अपनाने से लेकर चुराने तक का खेल: पाकिस्तान ने सिंधु घाटी सभ्यता पर क्यों बढ़ा लालच?

यह बेहद अजीब और चौंकाने वाला है। साल 1947 में पाकिस्तान ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (टू-नेशन थ्योरी) के आधार पर बना था। तब कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग देश हैं और वे कभी साथ नहीं रह सकते। लेकिन आज वही पाकिस्तानी लोग प्राचीन भारत के हिंदुओं और उनके महान कामों पर अपना हक जताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उनका तर्क है कि ये हस्तियाँ जिस जगह पैदा हुईं या जहाँ उन्होंने काम किया, वह इलाका अब आधुनिक पाकिस्तान में आता है, इसलिए वे ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ थे।
आइए कुछ सच बिल्कुल साफ-साफ समझ लेते हैं। यह सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता (सिंधु-सरस्वती सभ्यता) के कुछ बड़े मुख्य हिस्से जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो आज के पाकिस्तान में हैं। तक्षशिला और पाणिनी का जन्मस्थान (अटक का शालातुला) भी वहीं है। लेकिन कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान इन ऐतिहासिक जगहों की ठीक से देखभाल नहीं करता है। इसके उलट, भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की 2,000 से ज्यादा जगहें हैं और भारत सरकार उन्हें बहुत अच्छे से संभालकर रखती है। एक मजेदार तथ्य यह भी है कि इस प्राचीन सभ्यता की लगभग 60% जगहें आज के भारत में ही मौजूद हैं।

भारतीय लोगों या भारत सरकार ने इस भौगोलिक सच से कभी इनकार नहीं किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की चालाकी यह है कि वे इन जगहों को जबरन एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी लोग अक्सर ऐसे इतिहासकारों का सहारा लेते हैं जो कट्टरपंथी सोच के हैं। वे इन लोगों की मदद से सिंधु घाटी सभ्यता से हिंदू धर्म के गहरे जुड़ाव को पूरी तरह मिटाना चाहते हैं।

पाकिस्तान का अकेला मकसद यही है कि किसी भी तरह भारत को उसकी पुरानी जड़ों से अलग कर दिया जाए। वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारत की सभ्यता कहीं और से उधार ली गई है, ताकि भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति को लेकर हीनभावना पैदा हो सके। इसी साल (2026) मई में भारत के संस्कृति मंत्रालय ने हमारी अटूट सभ्यता का एक बड़ा सबूत दुनिया के सामने रखा।

मंत्रालय ने ‘पशुपति सील’ (मोहर) का जिक्र किया। यह मोहर अखंड भारत के समय मोहनजोदड़ो में मिली थी। पत्थर से बनी यह मोहर करीब 4,300 साल पुरानी है। इसमें एक योगी की मूर्ति है जो योग मुद्रा (मूलबंधासन) में बैठी है। इसे भगवान शिव का ‘पशुपति’ रूप माना जाता है, जिनके चारों तरफ जानवर मौजूद हैं।

संस्कृति मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा, “भले ही ये प्राचीन जगहें आज की नई सीमाओं के पार चली गई हों, लेकिन भारत आज भी इस विरासत का असली और जिंदा रखवाला है। पशुपति सील में दिखने वाली योग मुद्रा, भगवान शिव का प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, रोज की पूजा-पाठ और योग परंपराओं में पूरी तरह जिंदा है। वैदिक काल से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, हमारी सभ्यता की यह कड़ी कभी नहीं टूटी। यह हमारे विचारों, रीति-रिवाजों और हमारी आत्मा में गहराई से बसी हुई है।”

भारत के संस्कृति मंत्रालय के बयान के तुरंत बाद, देश-विदेश का एक खास वामपंथी और कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों का गुट (कैबाल) मैदान में कूद पड़ा। इस पूरे गैंग का एक ही मकसद था, किसी भी तरह सिंधु घाटी सभ्यता से वैदिक हिंदू धर्म के जुड़ाव को पूरी तरह नकार दिया जाए।

भारत से नफरत करने वाली और क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की प्रशंसक ऑड्रे ट्रुशके ने इस मामले पर सोशल मीडिया पर जहर उगला। उसने लिखा, “यह भगवान शिव की मूर्ति नहीं है। इसकी जगह यह एक यूरेशियन देवता (पशुओं के भगवान) को दिखाने वाले प्रोटो-एलामाइट प्रतीकों से प्रभावित कोई आकृति हो सकती है।”

इस वामपंथी गुट ने इतिहास के स्थापित सच को झुठलाने के लिए तुरंत अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वे यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि मोहनजोदड़ो में मिली पशुपति सील का संबंध सीधे तौर पर सनातन धर्म और भगवान शिव से है।

इतिहासकार जॉन मार्शल को भी नकारने लगा पाकिस्तान: वामपंथियों के सहारे भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

ऑड्रे ट्रुशके के इसी बेतुके दावे का सहारा लेकर कई पाकिस्तानी यूजर्स भारत के संस्कृति मंत्रालय के पोस्ट पर आकर रोना रोने लगे। वे ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन मार्शल को भी गलत बताने लगे। जॉन मार्शल ने साल 1931 में अपनी किताब ‘मोहनजो-दड़ो एंड द इंडस सिविलाइजेशन’ में साफ लिखा था कि पशुपति सील असल में ऐतिहासिक भगवान शिव का ही शुरुआती रूप है।

सिंधु घाटी सभ्यता के कई बड़े और मुख्य हिस्से जैसे कालीबंगा (राजस्थान), बनावली और राखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) आज के भारत में मौजूद हैं। ये सभी जगहें घग्गर-हकरा नदी तंत्र, यानी पौराणिक सरस्वती नदी के किनारे बसी हुई थीं। इससे साफ पता चलता है कि इस पूरी सभ्यता के विकास में एक बहुत बड़ी नदी का सहारा था। यही वजह है कि इतिहासकार इसे ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ भी कहते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक और मशहूर पुरातत्वविद् ब्रज बासी लाल (BB लाल) ने भी एक अहम बात बताई थी। उन्होंने सबूतों के साथ कहा था कि हड़प्पा संस्कृति की ज्यादातर जगहें सिंधु नदी के पास नहीं, बल्कि सरस्वती नदी के रास्ते पर बसी थीं। इससे साबित होता है कि सरस्वती नदी ही इस सभ्यता का मुख्य केंद्र थी। इसके अलावा, राजस्थान के कालीबंगा में हुई खुदाई के दौरान प्राचीन वैदिक यज्ञ वेदियाँ, हवन कुंड और यूप (यज्ञ स्तंभ) मिले हैं। ये चीजें साफ इशारा करती हैं कि वैदिक संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच एक अटूट धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ता था।

भारत और विदेशों के कुछ पक्षपाती इतिहासकारों ने जानबूझकर सरस्वती नदी को ‘काल्पनिक’ (एक मिथक) बताकर खारिज कर दिया। पुख्ता रिसर्च और नई खोजों के बावजूद उन्होंने ऐसा किया। उनका एकमात्र मकसद हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों को ऐतिहासिक रूप से सच्चा और भरोसेमंद मानने से रोकना था।

इतिहासकारों के इस पक्षपात का पूरा फायदा पाकिस्तान उठा रहा है। कुछ पाकिस्तानी हर कीमत पर तथ्यों को झुठलाने में लगे हैं। वे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों में साफ दिखने वाली हिंदू और वैदिक संस्कृति की कड़ियों को तोड़ना चाहते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिक खोजों ने उनका झूठ पकड़ लिया है। हाल ही में राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन से 23 मीटर नीचे एक प्राचीन नदी का रास्ता (पैलियोचैनल) दबा हुआ मिला है, जो इस सभ्यता के सच को साबित करता है।

बात सिर्फ ‘पाकिस्तान’ नाम की नहीं है। साल 1947 से पहले दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम का कोई राजनीतिक वजूद था ही नहीं। इसलिए, ‘प्राचीन पाकिस्तान’ जैसी किसी भी चीज के होने का तो सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए सही शब्द सिर्फ ‘प्राचीन भारत’ या प्राचीन अखंड भारत का इतिहास ही है। भारतीय इतिहासकार आज के पाकिस्तान में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के हिस्सों को प्राचीन भारतीय इतिहास का ही भाग मानते हैं। पाकिस्तान चाहे कितना भी मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा कर ले, या एक ही झूठ को बार-बार सच बताने की हिटलर के मंत्री गोएबल्स जैसी चालें चल ले, इतिहास का सच कभी नहीं बदलेगा।

सिर्फ 93 साल पुराना है ‘पाकिस्तान’ शब्द का इतिहास

भले ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) की जड़ें 19वीं सदी में सर सैयद अहमद खान के विचारों में मिलती हैं, जिन्होंने मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की वकालत की थी। लेकिन ‘पाकिस्तान’ शब्द पहली बार साल 1933 में चौधरी रहमत अली खान ने गढ़ा था। उन्होंने इस नाम को पाँच इलाकों को मिलाकर एक शॉर्ट फॉर्म (अक्रोनिम) के रूप में बनाया था। इसमें ‘P’ का मतलब पंजाब, ‘A’ का अफगानिया (खैबर पख्तूनख्वा), ‘K’ का कश्मीर, ‘S’ का सिंध और ‘tan’ का मतलब बलूचिस्तान था।

आज के पाकिस्तानी तर्क देते हैं कि चूंकि पाकिस्तान के नाम में इन पाँचों क्षेत्रों के नाम शामिल थे, इसलिए इन इलाकों का ‘प्राचीन’ इतिहास स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का ही है। ऐसा कहते हुए वे बड़ी चालाकी से इस सच को छुपा जाते हैं कि चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान किसी धर्मनिरपेक्ष देश की सोच नहीं था। वे तो केवल और केवल मुसलमानों के लिए एक अलग, स्वतंत्र और संप्रभु मुल्क बनाना चाहते थे।

पिछले 70 से ज्यादा सालों से पाकिस्तान के स्कूलों के सिलेबस, वहाँ के नेताओं के भाषणों, मीडिया और यहाँ तक कि मनोरंजन उद्योग में भी हमेशा इस्लामिक आक्रमणों का गुणगान किया गया। वहाँ की आम मुस्लिम जनता को झूठा दिलासा दिया गया कि वे तुर्क, अरब या अन्य ‘लड़ाकू नस्लों’ के वंशज हैं और उनका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि असलियत यह है कि एक अदद DNA टेस्ट ही उन्हें उनके इस ‘असहज’ कर देने वाले सच से रूबरू करा सकता है कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। वे आज भी 8वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर किए गए हमले को पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए एक महान और जश्न मनाने वाला ऐतिहासिक पल बताते हैं।

असल में, पाकिस्तान के स्कूलों की इतिहास की किताबों और वहाँ के देशभक्ति के गानों में हिंदू राजाओं को हमेशा विलेन की तरह दिखाया जाता है। ‘आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की’ जैसे मशहूर गानों में सिंध के हिंदू राजा दाहिर की छवि को बेहद खराब करके पेश किया गया है। इसके उलट, वे मोहम्मद बिन कासिम के क्रूर हमले को पाकिस्तान के इतिहास की एक शानदार शुरुआत बताते हैं। वे ऐसा दिखाते हैं जैसे बिन कासिम के आने से ही वहाँ सभ्यता की शुरुआत हुई थी।

पाकिस्तानी सरकार और वहाँ की आम जनता हिंदुओं से नफरत के चलते मोहम्मद घोरी और सोमनाथ मंदिर को तोड़ने वाले ‘बुतशिकन’ (मूर्तियाँ तोड़ने वाले) महमूद गजनवी जैसे जिहादी हमलावरों का खूब गुणगान करती है। हिंदुओं के प्रति यह नफरत उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच में बहुत गहराई तक धँसी हुई है। यही वजह है कि मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क (पाकिस्तान) लेने, वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और अनगिनत मंदिरों को तोड़ने के बाद भी उनकी नफरत शांत नहीं हुई है। वे आज भी उस हिंदू धर्म से नफरत करते हैं, जिसे कभी उनके खुद के पूर्वज मानते थे।

पाकिस्तान का दोहरापन देखिए, एक तरफ तो वे पाणिनी, आचार्य चाणक्य और राजा पोरस जैसी प्राचीन हिंदू सनातन हस्तियों पर अपना हक जताते हैं। दूसरी तरफ, वे अपनी मिसाइलों के नाम गजनवी, घोरी और अब्दाली जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रमणकारियों के नाम पर रखते हैं। ये वही हमलावर थे जिन्होंने भारतीय जमीनों को बेरहमी से लूटा और उजाड़ा। उन्होंने उस इलाके की धन-दौलत भी लूटी जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। इन लुटेरों ने आज के भारतीयों और पाकिस्तानियों के सांझे हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन पूर्वजों पर भयंकर जुल्म ढाए थे, उनका कत्लेआम किया था।

आखिर पाकिस्तानी मुसलमान बिना उसकी ‘हिंदू पहचान’ को स्वीकार किए अपने पुराने हिंदू इतिहास को अपना कैसे कह सकते हैं? विदेशी हमलावरों के खिलाफ भारत की रक्षा करने वाले राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) उनके हीरो कैसे हो सकते हैं? खासकर तब, जब उनके असली हीरो घोरी और गजनवी जैसे विदेशी इस्लामिक हमलावर हैं, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म ढाए थे।

लंबे समय तक पाकिस्तानियों ने अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास को छोटा दिखाया और उसे नकारा। वे खुद को समाज में ऊँचा दिखाने के लिए झूठा दावा करते रहे कि वे अरब, तुर्क या फारसी नस्ल के हैं। वे यह मानने से भागते रहे कि उनके पूर्वज हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख थे। आज भी कई पाकिस्तानी खुद को ‘मुस्लिम राजपूत’ कहते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू क्षत्रिय राजपूत थे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बिना कुलदेवी की पूजा के कोई राजपूत कैसे हो सकता है?

जैसे ‘मुस्लिम राजपूत’ शब्द अपने आप में ही उल्टा और बेतुका है, ठीक वैसे ही ‘प्राचीन पाकिस्तान’ कहना भी पूरी तरह से बेतुका और मजाक है।

पाकिस्तान के इस्लामिक जनरलों ने वहाँ की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी को कट्टर बनाने के लिए हर मुमकिन पैंतरा चला। उन्होंने देश का पूरी तरह इस्लामीकरण कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू और बाकी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।

सालों से पाकिस्तानी मुसलमान उस संस्कृति से दूरी बनाते आए हैं जिसे वे हिकारत से ‘हिंदूआना संस्कृति’ कहते हैं। स्कूल की किताबों से लेकर, नेताओं के भाषणों और टीवी सीरियलों तक, पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हर उस चीज को ‘हिंदूआना’ कहकर खारिज कर देता है जो इस्लामिक नहीं है। उनकी नजर में जो इस्लामिक नहीं, वो खराब है।

साड़ी पर पाबंदी से लेकर ‘ताजमहल’ पर दावे तक: अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान

मजेदार बात यह है कि हाल के सालों में पाकिस्तानियों ने ‘साड़ी’ को फिर से अपनाना शुरू कर दिया है। साड़ी एक ऐसा हिंदू पहनावा है जिसे भारत के धार्मिक बँटवारे से बहुत पहले से महिलाएँ पहनती आ रही हैं। लेकिन जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के दौरान पाकिस्तान में साड़ियों पर एक अघोषित पाबंदी लगा दी गई थी। उस समय मुस्लिम महिलाओं को साड़ी पहनने से रोका जाता था, क्योंकि इसे विशुद्ध रूप से भारतीय और हिंदू संस्कृति से जुड़ा पहनावा माना जाता था।

ये वही पाकिस्तानी हैं जो भारत के ‘ताजमहल’ पर भी अपना हक जताता है। उनका तर्क है कि मुसलमान होने के नाते वे मुगलों की ‘विरासत’ के असली वारिस या रखवाले हैं। उनमें से बहुत से लोग तो आज भी इसी मुगालते में जीते हैं कि उनके पूर्वज मुगल थे। इसी वजह से वे सोशल मीडिया पर ‘हमने हिंदुओं पर 800 साल राज किया है’ जैसा बेहद झूठा और हास्यास्पद दावा करते फिरते हैं।

पाकिस्तानी लोग आज दोहरी चाल चल रहे हैं। वे भौगोलिक आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर प्राचीन भारत के महान हिंदुओं पर अपना हक जताना चाहते हैं। साथ ही, वे मध्यकालीन भारत के क्रूर इस्लामिक लुटेरों का भी गुणगान करते हैं ताकि वे अपनी जबरन थोपी गई मुस्लिम पहचान को सही ठहरा सकें। यह सब कुछ वे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि दुनिया के सामने पाकिस्तान को एक ‘ऐतिहासिक सभ्यता वाला देश’ (सिविलाइजेशनल स्टेट) साबित कर सकें।

पाकिस्तान ने यह पैंतरा असल में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की किताब से सीखा है। ईरान के मुल्ला शासन ने शुरुआती तीन दशकों तक अपने प्राचीन राजा सायरस (Cyrus) को कभी याद नहीं किया। लेकिन जब उनके देश पर वजूद का संकट मंडराने लगा, तो उन्हें अचानक अपनी इस्लाम से पहले की प्राचीन विरासत याद आ गई और वे उसका गुणगान करने लगे। आज पाकिस्तान भी ठीक उसी तरह अपने वजूद के संकट से बचने के लिए भारत के प्राचीन इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहा है।

यह बात और भी ज्यादा मजेदार हो जाती है जब भारतीय हिंदू पूरी दुनिया के सामने प्राचीन भारतीय सभ्यता के असली रखवाले होने का दावा करते हैं। इस पर पाकिस्तानी मुसलमान अचानक भड़क जाते हैं और गुस्सा दिखाने लगते हैं। भारत का यह दावा पूरी तरह सही है, चाहे उस प्राचीन सभ्यता के अवशेष आज की किसी भी भौगोलिक सीमा के अंदर क्यों न आते हों।

अचानक पाकिस्तान को संस्कृत, पाणिनी, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सनातन सभ्यता से जुड़ी हर चीज से प्यार हो गया है। वे इसे गले लगाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह भारत के हिंदू ही हैं और कुछ हद तक पाकिस्तान और बांग्लादेश के बचे हुए हिंदू, जिन्होंने इस भाषा, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और ग्रंथों की परंपरा को हजारों साल से जिंदा रखा है। हिंदुओं के लिए संस्कृत एक ‘देवभाषा’ यानी देवताओं की भाषा है। हिंदू शुरू से भारत को अपनी मातृभूमि मानकर पूजते आए हैं, जबकि इस्लाम में ऐसी कोई सोच मौजूद ही नहीं है।

अगर सिर्फ आज के भूगोल या जमीन के टुकड़े के आधार पर ही इतिहास के हर हीरो या जगह पर हक जताया जा सकता है, तो पाकिस्तानियों को सबसे पहले अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार करना चाहिए। उन्हें गजनवी और घोरी जैसे क्रूर लुटेरों की तारीफ करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म किए और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया। इस सोच का आखिरी और स्वाभाविक नतीजा तो यही होगा कि वे अपनी ऐतिहासिक गलती को सुधारें और वापस अपने मूल हिंदू धर्म में लौट आएँ।

प्राचीन भारतीय इतिहास पर हिंदुओं का यह दावा भाषा, पवित्र ग्रंथों, दर्शन और पुरातत्व के मजबूत सबूतों पर टिका है। यह एक ऐसी अटूट सभ्यता है जो हजारों सालों से लगातार चली आ रही है। यह इतिहास सिर्फ आज के भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार दूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ है।

आतंक की छवि सुधारने और वजूद बचाने के लिए पाकिस्तान की नई चाल

पाकिस्तान इस समय जो कुछ भी कर रहा है, वह इतिहास का एक चुनिंदा इस्तेमाल है। वह सिर्फ राष्ट्रीय गर्व के लिए इस्लाम से पहले के इतिहास को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन वह अपनी उस बुनियादी सोच को नहीं छोड़ रहा जो नफरत भरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) पर टिकी है। इसी सोच के तहत बँटवारे को सही ठहराने के लिए कभी हिंदू इतिहास को पूरी तरह नकार दिया गया था।

पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान ने दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के गढ़ के रूप में बदनामी कमाई है। आप किसी भी जिहादी आतंकी संगठन का नाम लीजिए, उसका पाकिस्तान से कनेक्शन अपने आप सामने आ जाएगा। पाकिस्तान के सरकारी संरक्षण में चलने वाले इस आतंकवाद ने देश की छवि को पूरी दुनिया में बर्बाद कर दिया है। अब अपनी इस साख को सुधारने के लिए यह इस्लामिक देश मोहनजोदड़ो, तक्षशिला और सिंधु घाटी सभ्यता का सहारा ले रहा है। वह इनके जरिए दुनिया में अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ बढ़ाना चाहता है, राष्ट्रीय गर्व दिखाना चाहता है और विदेशी पर्यटकों को लुभाना चाहता है।

‘प्राचीन पाकिस्तान’ का यह पूरा मनगढ़ंत नाटक सिर्फ इसलिए रचा जा रहा है ताकि एक कड़वे सच का मुकाबला किया जा सके। दुनिया भर में यह माना जाता है कि ‘पाकिस्तान एक अप्राकृतिक और बनावटी देश है।’ इसी हकीकत को झुठलाने के लिए वे भारत के प्राचीन इतिहास को अपना बता रहे हैं।

आज पाकिस्तान के भीतर ही बलूच, पश्तून, सिंधी और कई अन्य जातीय समूह पंजाब के दबदबे वाले पाकिस्तान से आजादी माँग रहे हैं। देश अंदर से पूरी तरह टूट रहा है। ऐसे में कट्टर इस्लामिक नैरेटिव या खुद को ‘शुद्ध अरबी खून’ बताने वाले झूठे दावे भी देश को एक रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि अब वे अपनी एकता बनाए रखने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

वसंत पंचमी से माँ सरस्वती का नाम हटाने वाला मुल्क कैसे बनेगा सेक्युलर?

जिस मुल्क की सत्ता आसिम मुनीर जैसे मदरसा-छाप जनरल के हाथों में हो, जो हर भाषण में पाकिस्तानियों को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) न भूलने की नसीहत देता है, वहाँ बदलाव की उम्मीद करना ही बेकार है। वहाँ इतिहास या संस्कृति को इस्लाम से अलग दिखाने की कोई भी कोशिश सिर्फ दिखावा, भ्रष्ट और स्वार्थ से भरी हुई है।

इसी साल (2026) फरवरी में जब पूरी दुनिया के हिंदुओं ने पतंगबाजी का त्योहार ‘वसंत पंचमी’ मनाया, तो पाकिस्तान ने भी इस त्योहार को ‘बसंत’ के नाम से दोबारा शुरू किया। वहाँ के नेताओं ने इसे दुनिया के सामने आजादी और सहनशीलता के सबूत के रूप में पेश किया। लेकिन कट्टरपंथियों के डर या अपनी खुद की खराब सोच की वजह से उन्होंने इस त्योहार से हिंदू धर्म और माँ सरस्वती की पूजा को पूरी तरह अलग कर दिया। उन्होंने वसंत पंचमी को सिर्फ एक ‘सांस्कृतिक’ या ‘क्षेत्रीय’ त्योहार बताकर पेश किया।

इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने लाहौर के कुछ इलाकों के पुराने हिंदू और सिख नाम वापस रखने का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत ‘इस्लामपुरा’ का नाम बदलकर फिर से ‘कृष्ण नगर’ और ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम ‘जैन मंदिर चौक‘ किया जाना था। इस फैसले पर वहाँ की सरकार और सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी ढिंढोरा पीटने लगे। वे कहने लगे कि ‘एक तरफ भारत सांप्रदायिकता में डूब रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान धर्मनिरपेक्षता और सहनशीलता की मिसाल बन रहा है।’ लेकिन जैसे ही इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने इसका थोड़ा सा भी विरोध किया, सरकार तुरंत डरकर पीछे हट गई।

जो मुल्क अपने शहरों के हिंदू इतिहास से जुड़े पुराने नाम तक वापस रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वह आज प्राचीन भारत के पूरे हिंदू इतिहास पर अपना हक जताना चाहता है। यह पाकिस्तान के खोखले दावों और उनकी लाचारी को पूरी तरह बेनकाब करता है।

ऑपरेशन सिंदूर में पिटने के बाद अब प्रोपेगेंडा के सहारे भारत को घेरने की फिराक में पाकिस्तान

ये सारे सोची-समझी कोशिशें, खासकर सिंधु घाटी सभ्यता पर हक जताना और ‘प्राचीन पाकिस्तान’ का हौव्वा खड़ा करना, असल में सिंधु जल समझौते (IWT) से जुड़े हुए हैं। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकी हमले के जवाब में भारत सरकार ने इस सिंधु जल समझौते को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

इस समझौते को बचाने के लिए पाकिस्तान दुनिया के हर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा खटखटा चुका है। उसने भारत को ‘युद्ध’ की धमकियाँ तक दीं और फिर भारत से इस समझौते को दोबारा शुरू करने की भीख भी माँगी। लेकिन मोदी सरकार ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देना और जिहादियों को पालना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक यह समझौता रद्दी के डिब्बे में ही रहेगा।

पाकिस्तानी नेतृत्व अच्छे से जानता है कि वे सैन्य ताकत के दम पर भारत को कभी नहीं हरा सकते। खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद वे सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं खो चुके हैं। इसलिए अब पाकिस्तान अपने सबसे पुराने और पसंदीदा हथियार यानी ‘प्रोपेगेंडा और नैरेटिव’ के खेल पर उतर आया है।

यह असल में दुनिया के सामने रोना रोने और भारत के खिलाफ दूसरे देशों का समर्थन जुटाने की एक लंबी प्लानिंग है। पाकिस्तान भविष्य में वैश्विक मंचों पर यह तर्क देना चाहता है कि सिंधु नदी का सीधा संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से है। चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की ऐतिहासिक विरासत है, इसलिए भारत का उसे इस नदी के पानी से महरुम करना कानूनी और नैतिक रूप से बिल्कुल गलत है। इसी झूठे नैरेटिव को सेट करने के लिए वे आज इतिहास चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

‘अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ेंगे तो वे भारतीय बन जाएँगे’: पहचान के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा पड़ोसी मुल्क

अगर पाकिस्तान पूरी तरह से अपनी इस्लामिक कट्टरपंथी सोच और घमंड को छोड़ दे, तो वह ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ नहीं रह जाएगा। तब उसे भारत के हिंदू इतिहास को चुराने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वह सीधे अपनी पुरानी हिंदू जड़ों में वापस लौट आएगा। आज प्राचीन सभ्यता की इस अटूट कड़ी और पाकिस्तान के बीच केवल एक ही दीवार खड़ी है और वह है उनकी जबरन थोपी गई इस्लामिक पहचान।

लेकिन पाकिस्तान का जिहादी सैन्य नेतृत्व वहाँ की आम जनता को कभी भी अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास और असली पहचान को अपनाने नहीं देगा। इसके पीछे एक मशहूर कहावत है, “अगर तुर्क लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे तुर्क ही रहेंगे; अगर अरब लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे अरब ही रहेंगे; लेकिन अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ देंगे, तो वे वापस भारतीय बन जाएँगे।”

यही वजह है कि पाकिस्तानी लोग आज भी उसी जिहादी इस्लामिक सोच से चिपके हुए हैं, जिसने कभी उनके इस इलाके के हिंदू इतिहास को मिटाने और उसे विलेन दिखाने का काम किया था। लेकिन अब वे अपनी ही बात से पलटकर उसी इतिहास का चुनिंदा हिस्सा चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तानी समाज का दोहरापन यहीं नहीं रुकता। वे अपनी शादियों में हिंदू रीति-रिवाजों की नकल करते हैं और भारत के क्लासिकल डांस फॉर्म्स को भी अपनाते हैं। इसके बाद वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के हिंदू इतिहास को ‘साउथ एशिया’ का नाम देकर नया रूप देना चाहते हैं। हकीकत यह है कि केवल 78 साल पुराने इस मुल्क (पाकिस्तान) का अपना खुद का इतिहास और संस्कृति सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद, कज़िन-मैरिज (भाई-बहनों में शादी) पर बने टीवी सीरियलों और जिहादी मानसिकता के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है।(साभार) 

पाकिस्तान में 125 साल पुराना गुरुद्वारा तोड़े जाने पर भारत भड़का, दोबारा पुर्ननिर्माण की उठाई माँग

                            125 वर्ष पुराना ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा साहिब में तोड़फोड़ 
आतंकिस्तान पाकिस्तान के साथ वार्ता की वकालत करने वाले भारत में पल रहे पाकिस्तान परस्त सिखों के ऐतिहासिक 125 वर्ष पुराने गुरूद्वारे श्री गुरु सिंह सभा साहिब को तोड़े पर क्यों क्यों चुप हैं? क्या सिखों और हिन्दुओं पर हमले करने के लिए वार्ता के बोल रहे हो? आखिर क्या वजह है जो पाकिस्तान की दामाद की तरह वकालत की जा रही है।   

भारत ने पाकिस्तान के फारूकाबाद में स्थित 125 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा साहिब गुरुद्वारा (लेहरी) के कुछ हिस्सों को तोड़े जाने की कड़ी निंदा की है और इसे ‘बेहद निंदनीय और सोची-समझी तोड़फोड़’ करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और गुरुद्वारे के पुनर्निमाण की माँग की है।

विदेश मंत्रालय ने इसे सिख समुदाय की धार्मिक विरासत पर हमला करार देते हुए पाकिस्तान से पूरी घटना की निष्पक्ष जाँच की माँग की है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि इन मामले में दोषियों को कानून के कटघरे में खड़ा किया जाए और गुरुद्वारा साहिब के जिन हिस्सों को तोड़ा गया है उसका पुनर्निमाण कराया जाए।

विदेश मंत्रालय ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए का कि हमें पाकिस्तान के फारूकाबाद में ऐतिहासिक और पवित्र गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा साहिब को गिराए जाने की दुखद खबर मिली है। यह सिखों के लिए पवित्र स्थल है। सिखों के खिलाफ की गई इस घटना की भारत कड़ी निंदा करता है।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार लगातार हो रहे हैं। इसको लेकर विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों को लगातार टारगेट किया जा रहा है। ये सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पाकिस्तान को अपने अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा और उनके पूजा स्थलों को सुरक्षा मुहैया कराना चाहिए और पाकिस्तान को अपने देश में बढ़ रहे सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक असहिष्णुता पर लगाम लगाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला

125 वर्ष पुराना ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा साहिब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फारूकाबाद (पुराना नाम मंडी चूहड़काना) में स्थित है, जो लाहौर से लगभग 60-70 किलोमीटर दूर है।

रिपोर्टों के अनुसार, 24 जून 2026 की देर रात कुछ लोगों ने गुरुद्वारे के हिस्से को तोड़ दिया। कई वीडियो सामने आए, जिनमें इमारत को भारी नुकसान दिखाई दिया। स्थानीय सिख समुदाय ने इसका विरोध किया और आरोप लगाया कि यह कार्रवाई जमीन पर कब्जे (लैंड माफिया) की कोशिश से जुड़ी हो सकती है।

पाकिस्तान के कुछ अधिकारियों ने कहा कि केवल गुंबद या एक हिस्सा गिराया गया, जबकि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में नुकसान ज्यादा दिखाई दे रहा है। इसको लेकर सिख समुदाय में गुस्सा है।

“अमन का तमाशा” करने वाले 61 लोग बेहतर होगा पाकिस्तान चले जाएं

सुभाष चन्द्र

“अमन की आशा” के नाम पर तमाशा करने वाले 61 भारतीय लोगों को शर्म भी नहीं आई प्रधानमंत्री मोदी और शाहबाज शरीफ को 56 पाकिस्तानियों के साथ मिलकर लेटर में बातचीत शुरू करने की अपील करने में। इन 61 में कुछ तो ऐसे हैं जो हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़े रहते हैं फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती, मीरवाइज़ उमर फारुकी, मणिशंकर अय्यर, मनोज झा और ए एस दुल्लत 61 में खास नाम हैं कौन इन लोगों से परिचित नहीं है

इन लोगों को दिखाई नहीं देता कि भारत का ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है आज अमरनाथ यात्रा शुरू हो चुकी है और कोई नहीं जानता पाकिस्तान यात्रा में कब कैसे आतंकी हमला कर दे इन लोगों को तकलीफ है कि भारत ने सिंधु जल समझौता रद्द कर दिया लेकिन ये लोग मोदी से बातचीत शुरू करने से पहले यह देखने के लिए अंधे हो चुके हैं कि पाकिस्तान का रक्षा मंत्री पानी के लिए युद्ध छेड़ने की धमकी दे रहा है बिलावल भुट्टो भी कहता है कि पानी नहीं दिया तो चिनाब में खून बहेगा

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इन लोगों को यह भी दिखाई नहीं देता कि पाकिस्तान कंगाल होने के बाद भी भारत में अपना आतंकी जाल फैलाए हुए है और अपने ही लोगों का बलूचिस्तान और POJK में खून बहा रहा है

इन्हे ये भी याद नहीं जुल्फिकार अली भुट्टो ने कश्मीर के लिए 1000 साल तक भारत से लड़ने की कसम खाई थी  

ये लोग भूल रहे हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी शांति के लिए बस लेकर लाहौर गए थे और पाकिस्तान ने क्या सिला दिया उसने भारत की पीठ में छुरा घोंप कर कारगिल में युद्ध छेड़ दिया और आप उस मुल्क से बात करने को कहते हो अटल जी के दल में जाने वालों में दुल्लत भी था जो उस समय रॉ का मुखिया था जिसे भनक तक नहीं लगी कि पाकिस्तान कारगिल में शरारत कर रहा है और हो सकता है दुल्लत को जानकारी रही हो लेकिन उसने अटल जी अंधेरे में रख कर उनके साथ विश्वासघात किया ये आदमी हर समय भारत को कोसने वाले राहुल गांधी की कथित “भारत जोड़ो यात्रा” में शामिल था

इन कम्बख्तों को दिखाई नहीं देता भारत ने किस हद तक जाकर पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तान ने हमें 26/11 दिया मोदी खुद नवाज़ शरीफ की बेटी की शादी में 25 दिसंबर, 2015 को गए लेकिन पाकिस्तान ने ठीक एक हफ्ते बाद पठानकोट में हमला किया और 9 महीने बाद 18 सितंबर, 2016 को उरी में हमला कर दिया

कितने नेता पाकिस्तान के भारत को परमाणु बम चलाने की धमकी दे चुके है और फारूक अब्दुल्ला बस उसके इसी परमाणु बम से डरने के लिए कहता है कश्मीर का ही सईद अली शाह गिलानी गाना गाता था - “मेरी जान मेरी जान - पाकिस्तान पाकिस्तान”

सिंधु जल समझौता नेहरू और अयूब खान के बीच भारत के हितों को नज़रअंदाज करने वाला और पाकिस्तान को जरूरत से ज्यादा पानी देने वाला गैर-कानूनी समझौता था जिसके लिए नेहरू ने खुद फैसला लिया और संसद समेत किसी से परामर्श नहीं किया

एक बार ये 61 निकम्मे पाकिस्तान से कह कर तो देखें कि खुलेआम स्वीकार करे कि उनके नेताओं ने पाकिस्तान बना कर गलती की उससे भी बड़ी गलती एक तिहाई कश्मीर हड़प कर और बाकी सारे कश्मीर को हड़पने की मंशा रखने में की क्या ये खुद मानते हैं कि मुसलमानों ने पाकिस्तान लेकर गलती की?

आज वह पाकिस्तान दाने दाने को मोहताज़ है हर किसी देश से भीख मांगता फिरता है आवाम को देने के लिए खाना नहीं है और महंगाई ने बैंड बजा रखा है लेकिन मंसूबे रखता है भारत में आतंकी हमले करने के और अब तो अफगानिस्तान से भी रोज तनातनी रहती है

कवि प्रदीप का गीत हमेशा याद रखना चाहिए 

“कहनी है इक बात हमें,

इस देश के पहरेदारों से, 

संभल के रहना अपने घर में 

छिपे हुए गद्दारों से”

पाकिस्तान के डिप्टी प्रधानमंत्री डार के पोते ने दो विदेशी महिलाओं को किडनैप कर किया बलात्कार, लाहौर पुलिस ने किया गिरफ्तार


पाकिस्तान में लाहौर पुलिस ने उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार के पोते मुहम्मद रजा डार और चार अन्य लोगों को दो विदेशी नागरिकों के अपहरण, गैंगरेप और जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, लाहौर की अदालत ने आरोपितों को 5 दिनों की हिरासत में भेज दिया है।

पीड़ितों में एक डच महिला स्टेफनी एड्रियाना और एक वेनेजुएला की महिला एस्ट्रिड रॉबिन्सन ब्राचो शामिल हैं, जो अक्टूबर 2025 में सिंगापुर में मुहम्मद रजा डार से मिली थीं। आरोप है कि डार ने उन्हें पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया और उनके वीजा भी बनवाए। जून 2026 में उसने उनके अपहरण की योजना बनाई।

2 जुलाई को दर्ज FIR के अनुसार, महिलाओं ने अपने बयान में अपहरण, बलात्कार और यातना की जानकारी दी है। आरोप है कि उन्हें लाहौर के डिफेंस इलाके में एक खाली घर में ले जाकर उनके कीमती सामान छीन लिए गए, फिर उनके साथ कई बार गैंगरेप और बेरहमी से मारपीट की गई।

साथ ही आरोपितों ने उन्हें धमकी दी कि अगर फिरौती नहीं दी गई तो उनकी हत्या कर दी जाएगी या उनके अंग निकाल लिए जाएँगे। पीड़ित महिलाएँ किसी तरह अपने-अपने दूतावासों से संपर्क करके बचाई गईं।

यह भी उल्लेखनीय है कि यह मामला राजनीतिक विवाद का कारण बन सकता है क्योंकि इशाक डार प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के करीबी माने जाते हैं। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ ने इस मामले की सख्त जाँच के आदेश दिए हैं।

उत्तर प्रदेश को बदनाम करने के लिए NewsLaundry की ट्रिक: असल बात को छुपाओ, शब्दों का हेर-फेर कर प्रोपेगेंडा फैलाओ


उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2017 के बाद निवेश प्रोत्साहन के क्षेत्र में एक सुनियोजित नीतिगत यात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य राज्य को निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य के रूप में स्थापित करना था। हालाँकि प्रपेगेंडा मीडिया न्यूजलॉन्ड्री ने 30 जून 2026 को उत्तर प्रदेश में हुए निवेश और समझौता ज्ञापनों पर आर्टिकल लिखा।

इस आर्टिकल में शब्दों का हेर फेर कर न्यूजलॉन्ड्री ने ये बताने की कोशिश की कि यूपी में निवेश को लेकर हुए MoU केवल कागजी दावे हैं और सरकार सुर्खियों के आधार पर बड़े-बड़े दावे कर रही है।

असल में फरवरी 2018 में शुरू हुए पहले यूपी इन्वेस्टर्स समिट से लेकर फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट तथा जून 2026 के उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग (बेंगलुरु) तक उत्तर प्रदेश सरकार ने निवेश के लिए मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू के मंच का बार-बार उपयोग किया है। 

साभार सोशल मीडिया 

न्यूजलॉन्ड्री ने शब्दों से खेल कर निवेश को बताया झूठ

न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तर प्रदेश में आए निवेश को लेकर एक रिपोर्ट की सीरीज ‘द एमओयू मिराज’ प्रकाशित किया है। इसमें न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के कई एमओयू पर सवाल उठाए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया था। इस दावे को लेकर न्यूजलॉन्ड्री सवाल खड़े कर रही है। उसका कहना है कि निवेश को बढ़ा चढ़कर और केवल ‘शून्य बढ़ाकर’ कागजी दावे किए जा रहे हैं।

वास्तव में ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने के दावे का सही अर्थ यह है कि इतने मूल्य के निवेश प्रस्ताव सरकार को मिले थे, न कि उतना पैसा एक साथ राज्य में आ गया था। निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में बड़ा फर्क होता है, और यह फर्क रिपोर्ट में धुंधला कर दिया गया है।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया कि किन MoU में बाद में कितनी प्रगति हुई, कौन-सी परियोजनाएँ अप्रूवल तक पहुँचीं और किन्हें रद्द किया गया। यानी रिपोर्ट में साइनिंग का प्रक्रिया को ही पूरा निवेश समझ कर पाठकों को अंतिम सत्य बता दिया बता दिया गया।

Newslaundry ने MoUs को ‘कागजी निवेश’ कहकर वास्तविक निवेश से बराबरी पर रखा। यह गलत है क्योंकि सरकार ने कभी इन्हें realised investment नहीं बताया, बल्कि ‘pipeline’ और ‘commitments’ के रूप में प्रस्तुत किया है।

रिपोर्ट में लिखा गया कि कई MoU बाद में धरातल पर नहीं उतरे। इस बात में बताते हुए लेखक ये बताना भूल गए कि उत्तर प्रदेश सरकार ने MoU के लिए मॉनिटरिंग तंत्र बनाया गया है ताकि राज्य में निवेश प्रस्तावों पर विभागीय स्तर पर फॉलो-अप, नियमित समीक्षा और प्रगति रिपोर्टिंग पर काम किया जा सके।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यदि कोई राज्य वास्तव में केवल कागजी आँकड़े बढ़ाना चाहता, तो उसे निगरानी और सत्यापन की ऐसी व्यवस्था बनाने की कोई जरूरत नहीं होती।

निगरानी तंत्र यह दिखाता है कि राज्य ने गलती की संभावना को स्वीकार किया, लेकिन उसे सुधारने के लिए संस्थागत ढाँचा भी बनाया। इसीलिए अधूरे और वित्तीय अनियमितताओं वाले MoU पर समय पर कार्यवाही होनी सुनिश्चित हुई। 

MoU से नहीं होता आर्थिक हस्तांतरण

पहली बात जो साफ तौर पर जानने के लायक है वह ये कि अगर कोई व्यक्ति या कंपनी MoU पर हस्ताक्षर करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि राज्य का पैसा तुरंत ट्रांसफर हो गया या जनता का धन सीधे खतरे में आ गया।

MoU से पहले भी सरकारी स्तर पर जाँच होती है, और बाद में भी प्रोजेक्ट की क्षमता, वित्तीय स्थिति, भूमि उपलब्धता, अनुमतियों और अनुपालन की समीक्षा होती है। इसलिए केवल किसी असंगत या कम-ज्ञात इकाई के MoU पर हस्ताक्षर कर देने से इसे ‘घोटाला’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

इसके अलावा जब भी किसी निवेशक की वित्तीय साख पर कोई सवाल खड़े होते हैं तब राज्य सरकार के पास उसकी समीक्षा, MoU रद्द करने या उस पर अन्य कार्रवाही करने का तंत्र होता है।

अब तक की 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के माध्यम से ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतर चुकी हैं और लगभग 60 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। ये अकेले एमओयू की चर्चा से कहीं आगे की वास्तविकता दर्शाता है।

सत्यापन, निगरानी एवं कार्रवाई की प्रक्रिया

न्यूजलॉन्ड्री ने आयोजनों में आए पूछ एआई, ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर जैसी कुछ कंपनियों के निवेश प्रस्ताव में हुई धोखाधड़ी और उनके संदिग्धता पर सवाल करते खड़े करते हुए योगी कार्यकाल में आए सभी तरह के निवेश को ही झूठ बताने की कोशिश की।

सच्चाई यह है कि जिन संदिग्ध कंपनियों के बारे में सरकार को पता चला उस पर जाँच की गई है और कुछ एक निवेश प्रस्ताव को छोड़कर ज्यादातर निवेश प्रस्ताव को धरातल पर उतरने का काम शुरू किया जा चुका है।

उत्तराखंड : ‘जमीन हड़पने के लिए 90 वर्षीय नसरीन को धमकी दे रहे कांग्रेसी’: बीजेपी का प्रियंका और रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप, कहा- सायरा वाड्रा कर रहीं कब्जे की कोशिश

                                                   प्रतिकात्मक तस्वीर (साभार- Dall-E)
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी जो कहते हैं 'Congress is Muslim, Muslim is Congress' लेकिन वही कांग्रेस ही वृद्ध मुस्लिम महिला की जमीन हड़पने में लगी है। यानि मुस्लिम सुरक्षा के नाम ढोंग। ऐसा इसलिए हो रहा परिवार पर लम्बित घोटाले केस। परिवार को लगता है कि केंद्र में अगर बीजेपी सरकार है तो क्या हुआ मनमानी तो हमारी ही चलेगी।   

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा पर उत्तराखंड के किच्छा में 90 वर्षीय मुस्लिम महिला की जमीन हड़पने की कोशिश का समर्थन करने का आरोप लगाया है। बीजेपी ने इस विवाद की तुलना ‘गाँधी-वाड्रा परिवार’ के कथित भ्रष्टाचार से करते हुए ‘नेशनल हेराल्ड मामले’ से की है।

एक प्रेस ब्रीफिंग में भंडारी ने बताया कि उधम सिंह नगर के किच्छा में खान फार्म एस्टेट में मौजूद प्रॉपर्टी के असली कागजात स्वर्गीय कुलसुम खान के नाम पर थे। उनकी 90 साल की बहन नसरीन खान अभी उसी जमीन पर बने मकान में रहती हैं।

भंडारी के मुताबिक, प्रियंका की भाभी और रॉबर्ट वाड्रा के परिवार की सदस्य सायरा वाड्रा उस प्रॉपर्टी पर कब्जा करने में लगी हुई हैं, जबकि प्रॉपर्टी के कागजात उनके नाम पर नहीं हैं।

कांग्रेस विधायक ने बुज़ुर्ग महिला को धमकाया- भंडारी

भंडारी ने बताया कि किच्छा से कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहर देर रात करीब 100 पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विवादित जमीन पर गए और नसरीन खान को धमकाया। विधायक तिलक राज प्रियंका गाँधी वाड्रा के करीबी माने जाते हैं।

भंडारी ने नसरीन खान का बयान दोहराते हुए कहा कि कांग्रेस के कुछ लोग यहाँ आए हैं। वे मेरे फार्म का कब्जा कर वाड्रा परिवार को सौंपने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि खान ने सिर्फ सायरा वाड्रा का नाम लेने के बजाय पूरे वाड्रा परिवार का जिक्र किया था। उन्होंने सवाल पूछा कि क्या कांग्रेस विधायक ने प्रियंका वाड्रा या रॉबर्ट वाड्रा के कहने पर महिला को धमकाया था। उन्होंने यह भी कहा कि सायरा और उनके पति सिकंदर आलम ने नसरीन की बहन पर झूठे हलफनामे पर दस्तखत करने का दबाव डाला और एक फर्जी वसीयत बनवाने की कोशिश की।

भंडारी ने कहा कि तरीका यह था कि असली संपत्ति के मालिक को तब तक डराया-धमकाया जाए जब तक वह उसे छोड़कर चली न जाए, जिसके बाद कोई दूसरी पार्टी सिविल विवाद में कब्जे का दावा कर सके।

नेशनल हेराल्ड मामले से घटना की तुलना की

बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस विधायक की हरकतें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351 के दायरे में आती हैं, जो आपराधिक धमकी से संबंधित है। उन्होंने कहा कि यह व्यवहार गैर-कानूनी था। उन्होंने कहा, “बात सिर्फ कांग्रेस विधायक तक सीमित नहीं है। जिम्मेदारी प्रियंका वाड्रा की है।

भंडारी ने रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े जमीन के मामलों का भी जिक्र किया, जिनमें गुरुग्राम का शिकोहपुर मामला और स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी से जुड़ा बीकानेर-कोलायत जमीन का मामला शामिल है।

उन्होंने नेशनल हेराल्ड मामले से भी तुलना की और गाँधी परिवार पर आजादी की लड़ाई लड़ने वालों से जुड़ी संपत्तियों को निजी संपत्ति में बदलने का आरोप लगाया। गाँधी-वाड्रा परिवार पर गंभीर आरोप लगाते हुए भंडारी ने पूछा कि क्या प्रियंका ने कांग्रेस विधायक को उस प्रॉपर्टी पर जाने के लिए कहा था और मुसलमानों, महिलाओं और गरीबों का समर्थन करने का दावा करने वाली पार्टी एक 90 साल की मुस्लिम महिला को उसकी जमीन के मामले में क्यों निशाना बना रही थी।

चंपत राय जी ने कह कर कि कलंक लेकर नहीं जाऊंगा, कुछ इशारा कर दिया; रामगोपाल यादव को भी SIT समन करे और चोरों के नाम देख कर सोचो वो “कौन जात हैं”?

सुभाष चन्द्र

जुलाई 1 को चंपत राय जी ने कहा है कि अयोध्या में उनकी सेवा पूरी हो गई लेकिन अपने पर कलंक लेकर नहीं जाऊंगा यह बात कह कर ही उन्होंने इशारा कर दिया कि वो समय आने पर कुछ ऐसे भेद खोलेंगे जिससे उन पर हो रहा मीडिया ट्रायल बेनकाब होगा उन्हें ऐसा करना ही चाहिए लेकिन उन्हें ही नहीं हर किसी को एक सीख भी लेनी चाहिए कि किसी पर अतिविश्वास कभी कभी घातक होता है। 

चोरों ने अपने आकाओं के कहने पर खेल तो खेल दिया लेकिन अंजाम नहीं सोंचा। 

तरह तरह की कहानियां सोशल मीडिया में गढ़ी जा रही है चंपत राय के बारे में आज कहीं पढ़ा जिसमें लिखने वाला कह रहा है कि SIT के सदस्यों को आते ही उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि पहले मुझसे पूछताछ करो और पूछताछ में कई बार SIT के लोगों को धमकी दी जबकि सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने अपने चैनल पर कहा कि चंपत राय ने सबसे पहले SIT को पूरी व्यवस्था से अवगत कराया

लेखक 
चर्चित YouTuber 
एक स्टोरी बाजार में है कि चंपत राय ने मंदिर में गुप्त कैमरे लगाए हुए थे जिनसे उन्हें चोरी के बारे में पता चला इस बात का चंपत राय ने कभी खंडन नहीं किया  मीडिया ने कभी इस विषय को उठाया ही नहीं मीडिया तो उन्हें शीघ्र जेल भेजने के प्रयास कर रहा है मैं फिर कहता हूँ जितनी इन पत्रकारों की उम्र है, उससे ज्यादा समय तो चंपत राय समाज, संघ, विहिप और राम मंदिर को दे चुके हैं उनकी व्यवस्था में हो सकता है कुछ कमी रह गई हो लेकिन उन पर चोरी का आरोप लगाना मूर्खता है

जिसके मुंह में जो आ रहा है, बोल रहा है जुलाई 1 को  समाजवादी रामगोपाल यादव कह रहे थे कि 20 हजार करोड़ रुपए का घपला हुआ है जिसमें दान राशि, सोना चांदी के आभूषण चोरी हुए हैं जबकि अखिलेश यादव ने 7 करोड़ की बात की थी

उचित समय आने पर चंपत जी ने धमाका कर मीडिया से लेकर विपक्ष को औंधे मुंह गिराएंगे, लेकिन SIT से लेकर मीडिया में से किसी में रामगोपाल और अखिलेश से यह पूछने की हिम्मत नहीं कि 'किन लोगों से तुम्हे कैसे मालूम हुआ कि 20 हजार करोड़ रुपए का घपला हुआ है जिसमें दान राशि, सोना चांदी के आभूषण चोरी हुए हैं', पुलिस और SIT को इसे गंभीरता से लेने की जरुरत है।  

मेरा मानना है कि कालनेमि पार्टी “समाजवादी पार्टी” के इन दोनों नेताओं को SIT को समन करके पूछना चाहिए कि जिस रकम की चोरी की बात आप कर रहे हो, वह आपको कहां से पता चली और उसके सबूत दीजिए और अगर सबूत नहीं देते तो FIR कर अंदर कर देना चाहिए आज यह मत समझना कि इनके और अन्य दलों के मन में भगवान राम के प्रति कोई श्रद्धा पैदा हो गई है, उनकी मंशा तो 2027 तक उत्तर प्रदेश के चुनाव तक इस मुद्दे को भुनाने के लिए जीवित रखना है लेकिन योगी बाबा इस घोटाले में हर किसी का पर्दाफाश कर देंगे, हर किसी का मतलब विपक्षियों समेत

जुलाई 1 को रिपब्लिक भारत पर बताया गया पकड़े गए 8 कथित चोरों के घर से कितना धन बरामद हुआ है -

-अविनाश शुक्ल - 20 लाख रुपए और डॉलर;

-करुणेश पांडेय - 18 लाख रुपए 

-लवकुश मिश्रा - 14 लाख रुपए;

-अनुकल्प मिश्रा - 16 लाख रुपए;

-रामशंकर मिश्रा - 7 लाख रुपए;

-मनीष यादव - 2 लाख रुपए;

-टिन्नू यादव - 1 लाख रुपए 

-अविनाश - 1121 US डॉलर;

गिरफ्तार हुए 8 में 6 लोग वाराणसी की सैनिक सिक्योरिटी सर्विस के कर्मचारी थे, स्टेट बैंक को एक अनुबंध के अनुसार 1 जनवरी, 2026 एजेंसी ने 65 लोग हाउसकीपिंग के लिए दिए गए थे लेकिन स्टेट बैंक ने उन्हें मंदिर में दान गणना में लगा दिया इसलिए घपले में स्टेट बैंक भी अपने को पाक साफ़ नहीं कह सकता 

समाज के एक वर्ग के लोग जो UGC पर सबसे ज्यादा भड़क रहे थे, वो देख सकते हैं कि ऊपर दिए गए 8 में पहले 5 लोग कौन हैं? 

जुलाई 1 को फेसबुक की किसी की पोस्ट में लिखा था कि राम मंदिर से चोरी का पाप किसके हिस्से आएगा मोदी, भाजपा, आरएसएस या विहिप के? वो क्या मंदिर निर्माण रोकने का पाप भी किसी के सिर मढ़ेगा और मंदिर निर्माण करने का पुण्य किसी को देगा मोदी, भाजपा, आरएसएस या विहिप को या केवल पाप बांटना चाहता है, पुण्य नहीं 

आज वो लोग भी राम नाम की गंगा में स्नान करना चाहते हैं जिनके राज में अयोध्या की सरयू कारसेवकों की रक्त से लाल कर दी गई थी

US Federal Court ने चीनी जालसाज को दी 30 साल की सजा, पश्चिमी मीडिया बताता था ‘बागी’: जानें गुओ वेनगुई की कहानी और जालसाज़ राणा अय्यूब के साथ उसकी समानताएँ

                                               गुओ वेनगुई और राणा अय्यूब (फोटो साभार: Opindia)
चीन का एक भगोड़ा अरबपति गुओ वेनगुई (जिसे हो वान क्वोक, गुओ माइल्स, माइल्स क्वोक और “ब्रदर सेवन” जैसे कई नामों से जाना जाता है) कई सालों तक पश्चिमी मीडिया के बीच एक नायक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विरोधी बागी के रूप में ऐश की जिंदगी जी रहा था। गुओ वेनगुई ने पश्चिम में इस दावे के दम पर अपने लाखों समर्थक बना लिए थे कि ‘चीनी सरकार मेरे पीछे पड़ी है’। लेकिन आखिरकार अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उसे अपने ही समर्थकों से 1 अरब डॉलर (करीब 83 अरब रुपए) से ज्यादा की धोखाधड़ी का दोषी पाया। 29 जून 2026 को फेडरल कोर्ट ने गुओ वेनगुई को 30 साल जेल की सजा सुनाई।

धोखाधड़ी के आरोप और गुओ वेनगुई का चीन से पलायन

इस अभियान में वेनगुई के साथी, जिनमें पूर्व खुफिया अधिकारी मा जियान भी शामिल थे, निशाने पर आए। गुओ वेनगुई उर्फ गुओ माइल्स ने चीनी अधिकारियों की इस कार्रवाई को एक राजनीतिक साजिश बताया। उसने दावा किया कि चीनी सरकार के बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के कारण उसे निशाना बनाया जा रहा है।

भागने के शुरुआती सालों में चीनी अधिकारियों ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया और उसके खिलाफ इंटरपोल नोटिस भी जारी कराया। चीन सरकार ने उस पर रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, अपनी पूर्व सहायक के साथ बलात्कार, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे।

हांगकांग समेत कई जगहों पर वेनगुई की संपत्तियाँ सील कर दी गईं। चीन ने अमेरिका से इस जालसाज को वापस सौंपने की माँग भी की थी।

चीन में धोखेबाज, पश्चिम में बागी: बिकाऊ मीडिया की मदद से कैसे बनाई ‘एक्टिविस्ट’ की छवि

खुद को देश से बाहर रखने के दौरान गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े आलोचक के रूप में खुद को नए सिरे से पेश किया। वेनगुई ने अमेरिका सरकार की फंडिंग से चलने वाले वॉयस ऑफ अमेरिका (VoA), बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स और फोर्ब्स सहित कई बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों को इंटरव्यू दिए। वह कई ऑडियो पॉडकास्ट में भी शामिल हुआ।
अमेरिकी मीडिया एक्जीक्यूटिव, इन्वेस्टमेंट बैंकर और व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ मिलकर गुओ वेनगुई ने ‘जीटीवी’ (GTV) नाम की एक मीडिया कंपनी बनाई।
साल 2018 में, स्टीव बैनन और गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) की स्थापना की, जिसका नाम उसने ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ (Rule of Law Society) रखा। शुरुआत में इस संस्था को गुओ वेनगुई की तरफ से 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया था।
हालाँकि जब इस संस्था के पैसों की जाँच शुरू हुई और दस्तावेज देने से इनकार किया गया, तो स्टीव बैनन ने 2021 में ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।
इस जोड़ी ने साल 2020 में एक लग्जरी नाव (याट) से ‘न्यू फेडरल स्टेट ऑफ चाइना’ की घोषणा की और गुओ ने दावा किया कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंकेगा। गुओ के मीडिया वेंचर्स पर कोविड की शुरुआत और अमेरिकी राजनीति को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप भी लगे और आलोचना हुई।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने वाले अपने इस ‘एक्टिविज्म’ और मीडिया इंटरव्यूज के जरिए गुओ वेनगुई ने विदेशों में रहने वाले चीनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधियों के बीच अपने कट्टर समर्थक तैयार कर लिए। वेनगुई ने अपने इस फर्जी एक्टिविज्म को ‘लोकतंत्र और चीनी तानाशाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध’ के रूप में पेश किया।
जनवरी 2025 में इस 1 अरब डॉलर के घोटाले में भूमिका के लिए गुओ की सहयोगी यवेट वांग को भी 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, पश्चिमी मीडिया और मशहूर हस्तियों ने गुओ वेनगुई को एक हीरो की तरह पेश किया। आखिरकार अमेरिकी प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए ‘चीनी सरकार की प्रताड़ना’ का शिकार बने एक चीनी अरबपति से बेहतर और क्या हो सकता था। अमेरिका में गुओ के आगे बढ़ने की वजह चीन विरोधी आवाजों को मिलने वाला खुला समर्थन था, शायद इसी वजह से शुरुआत में उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई।
चूँकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी विरोधियों की आवाज दबाने के लिए जानी जाती है, इसलिए पश्चिम के लोगों को वेनगुई की मनगढ़ंत कहानी बिल्कुल सच लगी।

गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने हजारों फॉलोअर्स को कैसे ठगा, अमेरिकी अधिकारियों ने किया खुलासा

गुओ वेनगुई को मार्च 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इंटरनेट पर अपने हजारों फॉलोअर्स से 1 अरब डॉलर की ठगी करने की बड़ी साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह धोखाधड़ी जीटीवी (GTV) के प्राइवेट शेयर, लोन, जी|क्लब्स (G|CLUBS) की मेंबरशिप, हिमालय फार्म और ‘हिमालय कॉइन/एक्सचेंज’ नाम की क्रिप्टोकरेंसी के जरिए की गई थी।

सरकारी वकीलों ने आरोप लगाया कि गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने अपने चीन विरोधी ‘आंदोलन’ से जुड़े निवेशों पर भारी मुनाफे का वादा किया था। इसके बाद उसने इन पैसों में से करोड़ों डॉलर अपनी निजी विलासिता पर उड़ा दिए। उसने 50,000 वर्ग फुट का एक महल जैसा बंगला, एक फेरारी, 4.4 मिलियन डॉलर की बुगाटी स्पोर्ट्स कार, 37 मिलियन डॉलर की एक लग्जरी नाव (याट) और बेहद महँगे गद्दे खरीदे।

गुओ ने लंदन में रहने वाले अपने बिजनेस पार्टनर किम मिंग जे के साथ मिलकर हेज फंड में निवेश किया, 10 लाख डॉलर के कालीन और 1,40,000 डॉलर का पियानो खरीदने जैसी फिजूलखर्ची की।

अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ‘अफ़िनिटी फ्रॉड’ (भरोसे की धोखाधड़ी) कहा, क्योंकि गुओ ने अपनी चीन विरोधी छवि का इस्तेमाल करके अपने फॉलोअर्स के भरोसे का गलत फायदा उठाया था।

गुओ की हरकतों की जाँच से पता चला कि उसने चुराए गए करोड़ों डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग की ताकि अपनी इस अवैध साजिश को छुपा सके और धोखाधड़ी का धंधा चालू रख सके।

साल 2021 में माइल्स गुओ उर्फ हान वो क्वोक ने अवैध रूप से फंड जुटाने के एक मामले में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ 539 मिलियन डॉलर का समझौता किया था।

जुलाई 2024 में गुओ को जालसाजी की साजिश, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सिक्योरिटीज धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग समेत 12 में से 9 मामलों में दोषी ठहराया गया।

आखिरकार 29 जून 2026 को गुओ वेनगुई उर्फ हान वो क्वोक को 30 साल जेल की सजा सुनाई गई और 889 मिलियन डॉलर जब्त करने का आदेश दिया गया। फैसला सुनाते समय फेडरल जज ने कहा कि गुओ वेनगुई ने उन लोगों को अपना शिकार बनाया जो चीन में लोकतंत्र चाहते थे।

मुकदमे के दौरान भी गुओ वेनगुई खुद को पीड़ित बताता रहा और उसके बचे हुए समर्थकों का दावा है कि अमेरिकी आरोप चीनी सरकार के इशारे पर लगाए गए हैं ताकि उसकी आवाज दबाई जा सके। हालाँकि वकीलों ने गुओ के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए सबूत उसके फॉलोअर्स के साथ की गई वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं, न कि किसी मनगढ़ंत राजनीतिक आरोपों से।

गुओ वेनगुई चीन में अपने कथित घोटाले की कानूनी आँच से बचकर अमेरिका भागा, पश्चिमी मीडिया की मदद से खुद को हीरो साबित करने की कहानी रची, प्रताड़ना का रोना रोया, अपनी इस ‘हीरो’ वाली कहानी को बेचकर पैसे कमाए, लोगों का ध्यान और फॉलोअर्स खींचे, और फिर उसी मंच और फॉलोअर्स के भरोसे का इस्तेमाल एक बहुत बड़े घोटाले के लिए किया।

यह याद रखना भी दिलचस्प है कि गुओ वेनगुई ने अगस्त 2019 में भविष्यवाणी की थी कि अलीबाबा के संस्थापक जैक मा या तो जेल जाएँगे या मारे जाएँगे, क्योंकि चीनी सरकार जैक मा के ‘एएनटी ग्रुप’ (ANT Group) को ‘वापस लेना यानी हड़पना’ चाहती है।

झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़ना, विदेश में नापसंद की जाने वाली सरकार या विचारधारा पर हमला करके फॉलोअर्स जुटाना, लोगों को ठगना और जब जवाबदेही की बारी आए तो किसी तानाशाह या फासीवादी शासन द्वारा ‘राजनीति से प्रेरित प्रताड़ना’ का रोना रोना—गुओ वेनगुई का यह मामला वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब की याद दिलाता है।

राणा अय्यूब: भारत की गुओ वेनगुई?

राणा अय्यूब को 2016 में खुद से प्रकाशित की गई किताब ‘गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर-अप’ से काफी चर्चा मिली थी। उनका दावा था कि यह किताब 2010 में गुजरात के अधिकारियों की की गई अंडरकवर रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों के बाद मामलों को दबाने और एनकाउंटर की बात ‘कबूल’ की थी।

अय्यूब की तत्कालीन कंपनी ‘तहलका’ ने कहानी अधूरी होने और अन्य संपादकीय कमियों का हवाला देते हुए इसे छापने से मना कर दिया था। हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहान ने खुलासा किया था कि उन्होंने तहलका के मंच पर इन टेपों को चलाने का ऑफर दिया था, लेकिन राणा अय्यूब ने मना कर दिया था।

इस पत्रकार ने दंगों के इर्द-गिर्द अपनी पक्षपातपूर्ण और बेतुकी पत्रकारिता के जरिए खुद को ‘हिंदुत्ववादियों के अत्याचार के खिलाफ एक निडर आवाज’ के रूप में स्थापित कर लिया।

नरेंद्र मोदी के खिलाफ लंबे समय से एजेंडा चला रहीं राणा अय्यूब को तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों पर लिखी उनकी इस तथाकथित ‘खोजी’ किताब को कूड़ेदान में डाल दिया।

अय्यूब की किताब में एक इशारा यह भी था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की साजिश रची थी, जिनकी 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

निचली अदालत ने हरेन पंड्या की हत्या में मुख्य आरोपी असगर अली समेत 12 मुस्लिम पुरुषों को दोषी पाया था। सीबीआई जाँच के मुताबिक, यह हत्या गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए मुफ्ती सूफियान नाम के एक मुस्लिम मौलवी के इशारे पर की गई थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने सीबीआई की ‘खराब जाँच’ का हवाला देते हुए इन लोगों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आपराधिक साजिश और हत्या के प्रयास के आरोप बरकरार रखे थे।

सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने आखिरकार निचली अदालत के मूल फैसले को सही ठहराया।

अय्यूब के ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (मुसलमानों को पीड़ित दिखाने) के एजेंडे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही में राणा अय्यूब की किताब ‘गुजरात फाइल्स’ पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस किताब को फटकारते हुए कहा कि यह सिर्फ अनुमानों, अटकलों और कयासों पर आधारित है।

असल में राणा अय्यूब की किताब के दावे इतने संदिग्ध हैं कि धुर-वामपंथी (लेफ्ट विंग) पब्लिकेशंस ने भी इसे छापने से मना कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार अय्यूब को इसे खुद ही पब्लिश करना पड़ा। यह किताब एक कथित स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इसके वीडियो जारी नहीं किए।

अपनी इस तथाकथित प्रसिद्धि के बाद से, राणा अय्यूब लगातार विदेशी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्प्रचार में लगी रही हैं। सीएए विरोधी शाहीन बाग प्रदर्शन, 2020 के दिल्ली दंगे, कोविड महामारी के दौरान सरकार विरोधी दुष्प्रचार, हर मुद्दे में मुस्लिम उत्पीड़न का एंगल घुसाना, ‘भारतीय सेना कश्मीरी लड़कों को प्रताड़ित कर रही है’ जैसे झूठ फैलाना, 2015 में रानाघाट में एक नन के साथ हुए बलात्कार के लिए आरएसएस और ‘हिंदू आतंकवादियों’ को जिम्मेदार ठहराना राणा अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ हमेशा एजेंडा और भाजपा-आरएसएस के विरोध पर टिकी रही है।

उनके इस दुष्प्रचार ने उन्हें वामपंथी और कुछ खास विचारधारा वाले हलकों में लोकप्रिय बना दिया। लेकिन जो बात राणा अय्यूब को गुओ वेनगुई के जैसा बनाती है, वह है कोविड के नाम पर चंदा जुटाने का कथित घोटाला, जिसे अंजाम देने का उन पर आरोप है।

जब भारत कोविड महामारी से जूझ रहा था, तब राणा अय्यूब ने ‘केटो’ (Ketto) प्लेटफॉर्म पर 3 क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए 2,69,50,695 रूपए की भारी-भरकम रकम जुटाई थी।

राणा को मिले हुए 2.69 करोड़ रूपए में से लगभग 80,49,856 रूपए विदेशी मुद्रा में प्राप्त हुए थे, जो फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) 2010 का सीधा उल्लंघन था।

राणा अय्यूब ने कोविड राहत कार्य के लिए मिलने वाले इस चंदे को अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख के बैंक खाते में 1.60 रूपए करोड़ और अपनी बहन इफ्फत शेख के खाते में 37.15 लाख रूपए ट्रांसफर करवाए।

इसके बाद राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से 84.40 लाख रूपए और अपनी बहन के खाते से 36.40 रूपए लाख अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए। कुल मिलाकर करीब 1,20,80,000 रूपए राणा अय्यूब के निजी खाते में भेजे गए।

हैरानी की बात यह है कि अप्रैल 2022 में उन्होंने इतनी बड़ी रकम के हेरफेर को ‘महज 20,000 डॉलर की छोटी सी रकम’ कहकर टालने की कोशिश की, जबकि असल में यह रकम 2.69 करोड़ रूपए (लगभग $3,14,500) थी।

जुलाई 2025 के अपने आदेश में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने साफ कहा कि चंदे के तौर पर जुटाए गए पैसों में से करीब 2.4 करोड़ रूपए का अभियान के एक साल बाद भी कोई इस्तेमाल नहीं किया गया था।

अदालत ने कहा, “जिस खाते से करदाता या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा पैसे निकाले गए, वह एक पर्सनल सेविंग अकाउंट (निजी बचत खाता) था। इसके अलावा, कोई राहत कार्य करने के बजाय, करदाता ने एक नया करंट अकाउंट खोला और अपने नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर लिया और उसी सेविंग अकाउंट से अपने निजी खर्चे भी किए जिसमें चंदे का पैसा आया था।”

अय्यूब ने आयकर विभाग के सामने दावा किया था कि 2.69 करोड़ रूपए में से एक ‘छोटा हिस्सा (28 लाख रूपए)’ प्रवासी मजदूरों को घर भेजने, राशन खरीदने, इलाज, परिवहन और पश्चिम बंगाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किया गया था।

उन्होंने 19 लाख रूपए अपने ‘निजी खर्चों’ को पूरा करने में उड़ा दिए। यह भी सामने आया कि इस विवादित ‘पत्रकार’ ने कोविड राहत कार्य के लिए मिले पैसों में से 50 लाख रूपए की अपने नाम पर पर्सनल फिक्स डिपॉजिट (FD) करवा ली थी।

आयकर विभाग ने सवाल उठाया कि अगर अय्यूब की कोई गलत नीयत नहीं थी, तो उन्होंने अपने निजी नाम पर 50,00,000 रूपए की एफडी रसीदें क्यों खरीदीं?

जाँच में पता चला कि केटो पर पहले अभियान के जरिए राणा अय्यूब को मिले 1.23 करोड़ रूपए में से राहत कार्य के लिए सिर्फ 18 लाख रूपए का इस्तेमाल किया गया था। अपने बचाव में अय्यूब ने दावा किया कि बचे हुए पैसे ‘अस्पताल बनाने के लिए रिजर्व’ रखे गए थे।

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि राणा अय्यूब ने एफसीआरए (FCRA) 2010 का उल्लंघन किया है, क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट की यह ‘पत्रकार’ एफसीआरए की धारा 3(1)(h) के तहत विदेशी चंदा पाने की हकदार ही नहीं है।

अय्यूब ने समर्थकों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों से कोविड राहत के नाम पर चैरिटी के लिए पैसे जुटाए, लेकिन चैरिटी के लिए इन पैसों के इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं मिला। इस विवादित ‘पत्रकार’ ने दान का पैसा अपने रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराया और कथित सामाजिक कार्यों के लिए कोई अलग खाता तक नहीं रखा।

इससे पहले, फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अय्यूब की 1.77 करोड़ रूपए की संपत्ति कुर्क की थी। वह जाहिर तौर पर अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करती हैं और इसे अपनी आवाज दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित उत्पीड़न बताती हैं।

चूंकि राणा अय्यूब की पत्रकारिता के नाम पर किए जाने वाले इस एक्टिविज्म और चंदे की धोखाधड़ी के आरोपों के कारण पश्चिमी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स ने भी उनसे दूरी बना ली, फिर भी उन्हें विदेशी वामपंथी और कुछ राजनीतिक हलकों में नियोक्ता और समर्थक मिल गए, जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के विरोधी हैं।