इस्लामिक नाटो का शुरू होने से पहले ही क्या The End हो गया; बेहतर है सऊदी अरब इज़रायल के साथ खड़ा हो जाए

सुभाष चन्द्र

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर 7 अगस्त, 2026 को मक्का में एक कथित Islamic NATO बनाया जिसमें प्रावधान था कि किसी भी एक देश पर हमला अन्य सदस्य देशों पर भी माना जाएगा और ऐसे में सब एक दूसरे के साथ मिलकर युद्ध करेंगे 

लेकिन एक समझौता एक दिखावा बनकर रह गया क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की इसे अमलीजामा नहीं पहना रहे अभी इसी महीने ईरान समर्थित हूती ने सऊदी अरब के कंट्रोल वाले मोखा शहर और Bab el-Mandeb strait पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन तुर्की और पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ diplomatic बातचीत कर रहे हैं जबकि जवाब हमले का देना चाहिए था। 

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पाकिस्तान पर बिना कोई हमला हुए तुर्की उसे हथियार सप्लाई कर रहा है, जाहिर है भारत के खिलाफ युद्ध करने के लिए लेकिन जिस सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती ने हमला कर दिया उस पर कोई कार्रवाई नहीं चाहता 

दूसरी तरफ पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने को आतुर रहा लेकिन फेल हो गया और BRICS की बैठक में ईरान के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी से युद्ध ख़त्म कराने के लिए मदद मांगी ऐसे पाकिस्तान की इंटरनेशनल लेवल पर इज़्ज़त उतर गई वैसे पाकिस्तान की इज़्ज़त तो हमारी हॉकी टीम की बेटियां भी उतार आई जो उनके मंत्री मोहसिन नक़वी से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया

इज़रायल के संबंध UAE के साथ मधुर हैं और इज़रायल उसे हथियार भी मुहैया करता है दोनों अब्राहम समझौते में शामिल हैं सऊदी अरब के लिए बेहतर होगा अगर वह इज़रायल से रक्षा समझौता करे इज़रायल सऊदी की मदद कर सकता है लेकिन पाकिस्तान और तुर्की हरगिज़ नहीं करेंगे 

सऊदी अरब के इज़रायल से मतभेद केवल फिलिस्तीन को लेकर हैं 

आज की भू राजनीति में एक देश दो अलग अलग देशों से संबंध रख सकता है बेशक उनके आपस में संबंध ठीक न हो जैसे भारत के संबंध फिलिस्तीन से भी हैं और इज़रायल से भी हैं, भारत रूस के साथ भी दोस्ती रखता है और अमेरिका के साथ भी

इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए सऊदी अरब को इज़रायल से हाथ मिलाना चाहिए लेकिन सऊदी अरब ने तो इज़रायल के साथ Diplomatic Relations भी नहीं बना कर रखे वो पाकिस्तान पर भरोसा करता है जिसका सऊदी अरब पेट भरता रहता है 

सऊदी अरब को देखना चाहिए कि UAE और ईरान Brics की बैठक में मिले जबकि ईरान UAE में अमेरिकी अड्डों पर हमले करता है फिर भी न जाने क्यों दोनों की मुलाकात हुई सऊदी अरब चाहता तो उसके भी विदेश मंत्री Prince Faisal bin Farhan Al Saud ईरान के राष्ट्रपति से मिल सकते थे

लगता है सऊदी अरब भी इज़रायल को बर्बाद देखना चाहता है और इसलिए ही उसने तुर्की और पाकिस्तान से समझौता किया है वो दोनों देश सऊदी अरब का इस्तेमाल इज़रायल पर हमले के लिए करेंगे लेकिन उससे भी नुक्सान सऊदी अरब का होगा क्योंकि सऊदी अरब इज़रायल की जद में है और वो वहां बैठे तुर्की और पाकिस्तान को भी निपट लेगा

कर्नाटक : डी.के. शिवकुमार का ‘जमीन सिंडिकेट’: लालबाग-कब्बन पार्क पर गिद्ध दृष्टि

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटालों के खिलाफ उठे प्रचंड जनआक्रोश के आगे आखिरकार सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में बेंगलुरु के सार्वजनिक पार्कों और खेल के मैदानों की 5 प्रतिशत जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों, लीज और बिक्री के लिए खोलने वाले विवादास्पद ‘पार्क्स अमेंडमेंट बिल 2026’ ने राज्य में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया। गैर-जिम्मेदाराना नीतियों से खाली हुए सरकारी खजाने को भरने और रियल एस्टेट सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने की इस नीति को शहर की हरी-भरी सांसों पर सीधा डाका माना गया। सड़क से लेकर राजभवन तक चले चौतरफा दबाव के कारण कैबिनेट को यह जनविरोधी संशोधन बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।

65.4 एकड़ हरित क्षेत्र पर डाका: लालबाग और कब्बन पार्क पर गहराया संकट
बेंगलुरु में वर्तमान में लगभग 1,308 एकड़ क्षेत्र में फैले 1,353 सार्वजनिक पार्क हैं। इस संशोधन के लागू होते ही शहर के 65.4 एकड़ से अधिक हरे-भरे क्षेत्र पर कंक्रीट के ढांचे खड़े होने का खतरा मंडराने लगा था। सबसे बड़ा आघात 240 एकड़ वाले ऐतिहासिक लालबाग की 12 एकड़ और करीब 197 एकड़ में फैले कब्बन पार्क की 9.85 एकड़ जमीन पर था। करीब 22 एकड़ की यह धरोहर सीधे तौर पर व्यावसायिक सिंडिकेट के हवाले करने की तैयारी थी, जिसे जनता ने अपनी पहचान पर हमला माना।

‘ब्रांड बेंगलुरु’ की आड़ में ऐतिहासिक धरोहरों पर गिद्ध दृष्टि
‘ब्रांड बेंगलुरु’ के आकर्षक नारों की आड़ में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कार्यालय के संरक्षण में शहर की बेशकीमती जमीनों के सौदे तैयार किए जा रहे थे। अरबों वर्ष पुरानी भूगर्भीय धरोहर वाली लालबाग की चट्टानों और ऐतिहासिक कब्बन पार्क की शांति को नष्ट कर वहां व्यावसायिक केंद्र बनाने की साजिश रची गई। विकास के नाम पर शहर की सदियों पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने का यह खुला प्रयास था।

टनल रोड प्रोजेक्ट: ठेकेदारों को उपकृत करने के लिए लालबाग की बलि
हजारों करोड़ रुपये के विवादास्पद टनल रोड प्रोजेक्ट के जरिए अपने चहेते निजी ठेकेदारों को भारी भरकम कमीशन बांटने की बिसात बिछाई गई थी। टनल रोड के नाम पर लालबाग की एकड़ भर बेशकीमती जमीन अधिग्रहित करने और वहां निजी व्यावसायिक निर्माण को स्वीकृति देने की तैयारी थी। बुनियादी ढांचा सुधारने के नाम पर कमीशनखोरी के इस मॉडल ने शहर के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया था।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

अनुच्छेद 21 का हनन: स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार पर कुठाराघात
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार रेखांकित किया है कि शहरी हरित क्षेत्र और खुले पार्क नागरिकों के जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। सार्वजनिक पार्कों की जमीन को निजी लाभ के लिए बाजार में उतारना सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन था, जिसके खिलाफ कानूनी घेराबंदी तेज हो गई।

सदन में बिना बहस चोरी-छिपे बिल पास कराने का कृत्य
सदन में जब महर्षि वाल्मीकि निगम के 89 करोड़ रुपये के घोटाले पर जवाब मांगा जा रहा था, तब हंगामे और अव्यवस्था के बीच बिना किसी लोकतांत्रिक चर्चा या सार्वजनिक परामर्श के इस विवादित कानून को पारित करा लिया गया। शहर के नागरिकों, पर्यावरणविदों और नगर नियोजकों से इस मसौदे को छिपाकर रखना यह साबित करता था कि सरकार के इरादे पूरी तरह संदिग्ध थे।

वाल्मीकि निगम घोटाले के बाद जमीन से नया कमीशन तंत्र
महर्षि वाल्मीकि विकास निगम के करोड़ों रुपये के गबन की जांच के बीच शहरी जमीनों के सौदों से नया तंत्र खड़ा करने की कोशिशें तेज थीं। सरकारी खजाने में सेंध लगने के बाद सत्ता से जुड़े सिंडिकेट की नजर बेंगलुरु की करोड़ों रुपये प्रति वर्गफुट वाली प्राइम लोकेशन की सार्वजनिक जमीनों पर टिक गई थी, ताकि चुनावी फंड और राजनीतिक खर्चों की भरपाई की जा सके।

मुफ्त की रेवड़ियों से खाली हुआ खजाना, अब पार्कों से भरपाई की जुगत
बिना किसी बजटीय योजना के लागू की गई मुफ्त योजनाओं ने राज्य के वित्त को पंगु बना दिया है। नए बुनियादी ढांचे, सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण के लिए बजट का अभाव साफ दिखने लगा। इस वित्तीय विफलता पर पर्दा डालने और राजस्व जुटाने के लिए सरकार ने बेंगलुरु के पार्कों और खेल के मैदानों का बाजारीकरण करने का सबसे आसान और विनाशकारी रास्ता चुना।

बुजुर्गों की खुली हवा और बच्चों के खेल के मैदानों पर वार
पार्क और खुले मैदान शहर के बच्चों के शारीरिक विकास और वरिष्ठ नागरिकों के टहलने के लिए अंतिम सुरक्षित स्थान बचे हैं। 5 प्रतिशत जमीन के व्यावसायिक उपयोग की छूट वास्तव में पूरे पार्क परिसर में निजी दुकानों और कंक्रीट निर्माण के अनियंत्रित प्रसार का आधार थी। वित्तीय लालच के लिए बच्चों से उनके खेल के मैदान और बुजुर्गों से उनकी खुली हवा छीनने की कोशिश ने आम परिवारों में भारी असंतोष भर दिया।

फूफा फुके हुए रहे 3 दिन, शौचालय में बैठे थे; मोदी का BRICS में जलवा देख कर दस्त लगे थे; आज कुछ नहीं मिला तो भोजन में विष घोल रहे हैं

सुभाष चन्द्र

राहुल गाँधी को LoP बनाने वालों की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। नॉनवेज पर हंगामा करना गिरी हुई मानसिकता को दिखाता है। INDI गठबंधन को इस गिरी हुई मानसिकता पर विचार कर कांग्रेस से किनारा करना उनके हित में होगा।   

नाराज फूफा 3 दिन से फुके बैठे थे मोदी का जलवा BRICS में देख कर आग लगी हुई थी और दस्त लगे हुए थे शौचालय में आना जाना लगा हुआ था कोई कमी नहीं निकाल सके BRICS के आयोजन में जिसमें मोदी छाए रहे और असली दर्द की वजह यही थी

लेकिन आज बाप बेटे राहुल गांधी और पवन खेड़ा शौचालय से निकल कर बोले कि सरकार ने जो मेहमानों को भोजन परोसा उसमें विविधता में एकता का उल्लंघन किया हर राज्य का भोजन नहीं दिया गया और नॉन वेज भी परोसा गया जबकि यह सत्य से परे है राहुल गांधी ने तो अलग सर्टिफिकेट दे दिया कि 80% भारतीय व्यंजन नॉन वेज होते हैं इतना गोबर कहां से आता है इसके दिमाग में?

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मेहमानों को कोई तकलीफ नहीं थी, उन्होंने स्वाद से भोजन किया लेकिन राहुल/खेड़ा को क्यों दस्त लग गए समझ नहीं आया?

फूफा परेशान थे मोदी पुतिन को गले मिलते देख कर, वो परेशान थे क्योंकि पुतिन उत्तर प्रदेश में बने नए हवाई अड्डे पर उतरे वो परेशान थे कि जिनपिंग क्यों आ गए जबकि उनके बारे में ख़बरें चलाई गई थी कि वो नहीं आएंगे

कांग्रेस और विपक्ष को दर्द यह था कि मोदी के आगे India नहीं “भारत” लिखा था और यह दर्द असहनीय था

फ़ुफ़ाओं को परेशानी हुई क्योंकि ईरान के राष्ट्रपति पेजेशिकयान ने भारत के आध्यात्मिक गुरु सतिशाचार्य के पैर छू कर आशीर्वाद लिया ये तो पेजेशिकयान ने घोर पाप किया क्योंकि ईरान की मदद के लिए तो 600 रुपए और आभूषण इकठ्ठे किये गए थे और वो चरण छू गए हिंदू गुरु के और उनके प्रवचन भी सुने

सबसे बड़ा झटका तो फ़ुफ़ाओं को मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने दिया जब उन्होंने कैमरे पर कहा कि मोदी इतने लोकप्रिय नेता हैं कि उनका फ़ोन ऐसे लोगो के मैसेज से भर गया है जो मोदी को अपना अभिवादन देने के लिए कह रहे थे मजे की बात है कि इब्राहिम ने किशोर कुमार के गाने की लाइनें भी गाई -”ख्वाब तो तुम या कोई हकीकत ..”

उधर ईरान अमेरिका से युद्ध के चलते इस्लामिक देशों में अमेरिकी अड्डों पर हमले कर रहा है और UAE में हमले किए हैं लेकिन BRICS में मोदी ने पेजेशिकयान और UAE के प्रिंस को एक ही टेबल पर बिठा दिया। इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं

कांग्रेस के फूफा खासकर जिनपिंग से नाराज़ हैं कि MOU हमारे साथ किया और अब शांति और व्यापार की बातें कर रहे हैं मोदी से 

कांग्रेस की एक परेशानी दूर नहीं होती दूसरी खड़ी हो जाती है BRICS शुरू होने से एक दो दिन पहले उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस को वंदे मातरम पर खरी खरी सुना दी थी कि कांग्रेस हमें न बताए कि राष्ट्रगीत गाना है या नहीं और कितना गाना है फिर उसके बाद दिल जलाने वाला BRICS आ गया, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता कांग्रेस को अब कॉकरोच जनता पार्टी में विलय कर लेना चाहिए

महिला विरोधी कांग्रेस : जेएनयू में कांग्रेसी सांसद की खुली ‘एपस्टीन फाइल्स’, एक्स्ट्रा मार्क्स के बदले सेक्स की डिमांड

कांग्रेस पार्टी और उसके नेता राहुल गांधी द्वारा महिलाओं के अधिकारों और पितृसत्तात्मक सोच के विरोध में ‘मनुस्मृति’ को लेकर दिए गए बयानों और देश भर में इसे जलाने के पार्टी के आह्वान पर राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है। राहुल गांधी ने ‘स्मैश द पैट्रियार्की’ यानी पितृसत्तात्मक सोच और व्यवस्था को खत्म करने की अपील की। इसी बीच दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में खुली एक ‘एपस्टीन फाइल्स’ ने कांग्रेस के महिला विरोधी चेहरे को उजागर कर दिया है। महिलाओं की आजादी की बात करने वाले राहुल गांधी और उनके सांसद किस तरह महिलाओं को उपभोग की वस्तु मानते हैं, इसका प्रमाण जेएनयू जैसी प्रगतिशील, सेकुलर, लिबरल और वामपंथियों के गढ़ कही जाने वाली यूनिवर्सिटी की 11 छात्राओं ने दिया है।

 

प्रोफेसर डॉ. बिमोल अंगोमचा पर यौन शोषण का आरोप
दरअसल, जेएनयू में 11 छात्राओं ने प्रोफेसर डॉ. बिमोल अकोइजम अंगोमचा पर मौखिक परीक्षा के दौरान ‘एक्स्ट्रा मार्क्स’ के बदले सेक्सुअल फेवर (यौन संबंध) की मांग करने का गंभीर आरोप लगाया है। सितंबर 2026 में सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले की जांच यूनिवर्सिटी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) कर रही है। छात्र संगठन एबीवीपी (ABVP) का दावा है कि आरोपी प्रोफेसर वर्तमान में कांग्रेस के सांसद हैं, जिसके चलते उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। साथ ही राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर मामले को दबाने के आरोप लग रहे हैं।

कौन हैं प्रोफेसर डॉ. बिमोल अकोइजम अंगोमचा ?
प्रोफेसर डॉ. बिमोल अकोइजम अंगोमचा मणिपुर से 18वीं लोकसभा के कांग्रेस सांसद हैं। उन्होंने 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर मणिपुर के इनर मणिपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में सामाजिक विज्ञान संकाय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। वह एक बुद्धिजीवी, स्तंभकार और फिल्म निर्माता भी हैं, जिन्होंने कुछ वृत्तचित्र (documentary) और फिल्में भी बनाई हैं।

कैसे हुआ कांग्रेस सांसद की ‘एपस्टीन फाइल्स’ का खुलासा
यह मामला तब उजागर हुआ जब एक छात्रा ने छात्रों के एक निजी व्हाट्सएप ग्रुप पर अपने साथ हुई घटना साझा की, जिसके बाद अन्य पीड़ित छात्राएं भी सामने आईं। छात्राओं ने जो आरोप लगाए, उनमें गंदे कमेंट्स करना और यौन संबंध बनाने के बदले एक्स्ट्रा मार्क्स देने की पेशकश करना शामिल है। मई 2026 में हुई मौखिक (वाइवा) परीक्षाओं के दौरान प्रोफेसर ने अश्लील टिप्पणियां कीं और कहा कि यदि वे उनकी मांगें मानती हैं तो उन्हें अतिरिक्त अंक दिए जाएंगे। शिकायतों के अनुसार, प्रोफेसर ने छात्राओं को कैंपस में स्थित अपने निवास स्थान पर भी बुलाया, जहां उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया।

ABVP कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस सांसद का जलाया पुतला
छात्राओं के यौन शोषण का यह मामला इस साल मई में इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) को सौंपी गई थी, जब कई स्टूडेंट्स ने प्रोफेसर के खिलाफ आरोप लगाए थे। इसके बाद कमेटी ने अपनी कार्यवाही शुरू की और छात्राओं से बयान दर्ज कराने के लिए पेश होने को कहा। आईसीसी की समिति छात्राओं के बयान दर्ज कर रही है और मामले की जांच जारी है। लेकिन मामले को दबाने की आशंका के बाद छात्रों और विभिन्न संगठनों द्वारा प्रोफेसर को तुरंत निलंबित करने और दिल्ली पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज कराने की मांग की जा रही है। जेएनयू के ABVP कार्यकर्ताओं ने आरोपी प्रोफेसर, इंटरनल कमिटी और JNUSU के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया और उनके पुतले जलाए। ABVP कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि जांच में देरी कर मामले को दबाने की कोशिश हो रही है।

ICC के लेफ्ट सदस्य विचारधारा के आधार पर देते हैं फैसले
एबीवीपी के संयुक्त सचिव विकास पटेल ने कहा कि कोई छात्र डर के मारे सामने नहीं आ रहा है। ऐसे कुल 11 छात्राओं ने आईसीसी में शिकायत दर्ज कराई थी। आईसीसी को 90 दिनों के भीतर जांच कर रिपोर्ट देनी होती है। चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है। मई का मामला है, प्रशासन भी चुप्पी साधे बैठा है। आईसीसी के जो मेंबर है, वो लेफ्ट संगठन से जुड़े हैं। वो भी चुप्पी साधे हुए हैं। यह पहली घटना नहीं हुई है। जेएनयू में इस तरह की घटनाएं होती रही हैं। और इस तरह की घटनाएं होती हैं तो आईसीसी के लेफ्ट सदस्य विचारधारा के आधार पर फैसला देते हैं, और अपने कैडर को बचाने की कोशिश करते हैं।

”होते रहना चाहिए महिलाओं का खतना’’

10 जुलाई, 2018 को कांग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में खतना के पक्ष में दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि ‘खतना’ शरिया का हिस्सा है, और इसे रोका जाना मजहब में दखल होगा। दरअसल कांग्रेस इसे धर्म से जोड़कर चंद वोटों के लिए करोड़ों महिलाओं के आत्मसम्मान से खिलवाड़ कर रही है। यह केवल विडंबना नहीं है कि सिंघवी ने इस बर्बर कुप्रथा का बचाव किया। बल्कि कांग्रेस ने फिर साबित किया कि वह मुसलमानों का वोट पाने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है। उसे इस बात की कतई चिंता नहीं कि मुस्लिम महिलाएं किस दंश से गुजरती हैं। हालांकि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कर दिया कि ‘खतना’ प्रथा पर बैन लगाने वाली याचिका का वह समर्थन करती है।

शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा

कांग्रेस ने 1986 में शाहबानों प्रकरण में जो रुख अपनाया था वो मुस्लिम महिलाओं की तकलीफें बढ़ाने वाला था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में अपना फैसला देते हुए पति को गुजारा भत्ता देने की बात कही थी, लेकिन शाहबानो के पति ने कोर्ट के फैसले को मुस्लिम पर्सलन लॉ में दखल करार देते हुए भत्ता देने से मना कर दिया। जिसके बाद इस विवाद में मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड भी कूद गया। यह विवाद इतना बढ़ा कि मामले ने राजनैतिक रंग ले लिया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कांग्रेस के अपने परंपरागत अल्पसंख्यक वोट बैंक को बचाने के लिए पर्सलन लॉ में कोर्ट के दखल को न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि अपनी बहुमत वाली सरकार से इस बारे में संसद से एक कानून भी पास करा लिया।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर अशोभनीय और भद्दा तंज

13 अगस्त को दिल्ली के एक कार्यक्रम में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर निशाना साधते हुए विदेश दौरों में राष्ट्राध्यक्षों से गले मिलने की परंपरा पर टिप्पणी कर रहे थे। इसी दौरान वह अपनी ही पार्टी के नेता संदीप दीक्षित के पास जाकर हाथ फैलाते हुए उनके गले लग जाते हैं। राहुल गांधी आगे कुछ कहते, उससे पहले ही संदीप दीक्षित ने मर्यादा की सभी सीमाओं के लांघते हुए इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर बेहद अशोभनीय और भद्दा तंज कसते हुए कहा, “मेलोनी समझ कर तो नहीं पकड़ा था?” इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह रही कि एक मित्र देश की महिला राष्ट्राध्यक्ष को लेकर किए गए इस द्विअर्थी मजाक पर आपत्ति जताने के बजाय राहुल गांधी समेत मंच पर मौजूद तमाम कांग्रेस नेता ठहाके लगाते दिखे।

पार्टी मंच पर ही महिला के साथ छेड़छाड़

कांग्रेस नेता महिला हितैषी होने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन ये सब एक तरह से ढोंग ही है। महिलाएं पार्टी के बाहर तो छोड़िए, अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं। 04 अक्टूबर, 2024 को हरियाणा के नारनौंद में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के बेटे सांसद दीपेन्द्र सिंह हुड्डा की रैली में मंच पर ही एक महिला नेता के साथ छेड़छाड़ की गई। इस रैली में दीपेन्द्र हुड्डा के साथ कांग्रेस के दो और सांसद के मौजूद रहने के बाद भी मंच पर महिला नेता सोनिया दुहन के साथ छेड़छाड़ की गई। इसकी पुष्टि खुद कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा ने की है। कुमारी शैलजा ने सोनिया दुहन के साथ स्टेज पर हुई बदसलूकी पर कहा कि ‘मैंने उनसे बात की, वो मुझे बता रही हैं कि उनके साथ वहां छेड़छाड़ की गई। मैंने उनसे इस बात की पुष्टि की है, अगर आज किसी महिला के साथ ऐसा होता है, तो इससे बुरा और निंदनीय क्या हो सकता है।’

सवाल यह है कि जिस पार्टी में खुद महिला नेता सुरक्षित नहीं हैं, सोनिया नाम की महिला सुरक्षित नहीं है, वो पार्टी देश की बहन-बेटियों को कैसे सुरक्षा देगी? इसको लेकर लोग सोशल मीडिया पर कांग्रेस की थू-थू कर रहे हैं। स्टेज पर एक महिला नेता के साथ हुई इस घटना को लेकर कांग्रेस की किरकिरी हो रही है।

 

चिदंबरम जी, ब्रिक्स और SCO को छोड़िए, बस इतना बता दो कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के MOU से देश को क्या फायदा हुआ?

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस और इसका गुलाम INDI गठबंधन नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी की कार्यशैली पर ऊँगली तो उठा सकते हैं लेकिन कांग्रेस का चीन के साथ MoU के बारे में पूछने के लिए किसी ने अपनी माँ का दूध ही नहीं पिया। दूसरे, सोनिया गाँधी का कश्मीर विरोधी संस्था का सदस्य होने पर भी पूछने के लिए किसी ने माँ ने इन्हे दूध ही नहीं पिलाया।    

ये चिदंबरम 2004 से 2008 के अंत तक वित्त मंत्री रहा था और 2006 में BRICS का गठन हुआ जबकि इसकी पहली मीटिंग 2009 में हुई आज चिदंबरम को ये ब्रह्म ज्ञान कैसे और कहां से हो गया कि BRICS और SCO से हमें कोई फायदा नहीं हुआ

SCO 2001 में बना और 2005 में भारत को Observer का स्टेटस मिला फिर कांग्रेस की सरकार को BRICS और SCO में घुसने की क्या जरूरत थी? यानी कांग्रेस में कोई दूरदर्शिता नहीं थी जो समझ सकती कि इन संगठनों से कोई फायदा नहीं होगा? 

डॉ मनमोहन सिंह BRICS की पहली 5 मीटिंग में फिर क्यों गए जो 2009, 2010, 2011, 2012 और 2013 में हुई थी? आज फिर दर्द क्यों हो रहा है जब मोदी की सरकार ने BRICS की बैठक का सफल आयोजन किया है?

कांग्रेस की समस्या यह है कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती लोकप्रियता उसे रास नहीं आती और इसलिए हर बात में आलोचना करने से मतलब है शायद इसलिए ही कांग्रेस ने विदेशों से मिले किसी सर्वोच्च सम्मान के लिए मोदी को बधाई नहीं दी  

चिदंबरम को BRICS और SCO से देश को कुछ फायदा नज़र नहीं आता तो इस बात का जवाब दे कि कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बीच हुए 2008 के MOU से देश को क्या फायदा हुआ? देश को तो नहीं कांग्रेस को अवश्य फायदा हुआ जो आज कांग्रेस और राहुल गांधी पूरी तरह चीन की गोद में बैठे हैं

कांग्रेस के बारे में एक मजेदार बात और बताता हूँ कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए जितिन प्रसाद आज मोदी के मंत्री की हैसियत से जिनपिंग का स्वागत करने गए थे कांग्रेस में अभी रहे होते तो सत्ता के लिए अंधेरे में भटक रहे होते और राहुल गांधी के पीछे पीछे चल कर चापलूसी कर रहे होते

आज के BRICS के घोषणा पत्र में पहलगाम में आतंकी हमले की निंदा की गई है जो भारत की कूटनीतिक जीत है घोषणा पत्र में आतंकवाद के प्रति और आतंकवाद को समर्थन देने वालों के प्रति zero tolerance की बात कही गई है

मजे की बात है इस घोषणा पत्र पर ईरान ने भी हस्ताक्षर किए हैं जो खुद अनेक आतंकी संगठनों को मदद कर इज़रायल पर हमले करता है हमास, हिज्बुल्ला और हूती उसके ही पाले हुए संगठन हैं और ईरान इज़रायल और यहूदियों को जीने का अधिकार भी नहीं देना चाहता खामनेई ने इज़रायल पर हमले के लिए हमास की निंदा नहीं की और हमले की तारीफ करते हुए कहा था ये फिलिस्तीनियों की जीत है

शायद इसलिए ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा है कि “हर देश की आवाज़ सुननी चाहिए” मोदी ने समुद्री मार्गों पर सुरक्षा पर भी बल दिया और एक Comprehensive Policy बनाने के लिए कहा यह संदेश ईरान और अन्य देशों के लिए था जो आयल टैंकरों पर हमले करते हैं और समुद्री मार्ग बाधित करते हैं

आज का साझा घोषणा पत्र सर्वसम्मति से जारी हुआ ऐसा ही साझा घोषणा पत्र सर्वसम्मति से 9 सितंबर, 2023 के दिल्ली में आयोजित G20 में जारी हुआ था अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में सर्वसम्मति से घोषणापत्र जारी होना बड़ी बात होती है यह साबित करता है कि वैश्विक स्तर पर मोदी की आवाज़ और विचार कितने प्रभावी हैं बाकी जिसका काम ही आलोचना करना है, वो रोता रहे या भौंकता रहे

चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी, देश का सर्वनाश करने पर क्यों उतारू हैं? 14 साल की लड़की ने जो पीएम मोदी के लिए कहा, वो आपके लिए कहे तो कैसा लगेगा?

सुभाष चन्द्र

कल(सितम्बर 10) चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 14 साल की निशु आज़ाद के कथित उत्पीड़न और उसे डराने धमकाने के मामले में सख्त संज्ञान लिया चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे के खिलाफ हिंसा या गवाह/पीड़ित परिवार को धमकाने के मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। 

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यह बातें कहने से पहले सूर्यकांत जी एक बार विचार तो कर लेते कि 14 साल की लड़की का NEET के प्रदर्शन में जाने का क्या मतलब था? निशु आज़ाद ने प्रदर्शन में क्या किया, उसका वीडियो भी देख लेते वो वहां लोगों को बुला बुला कर “मोदी की तेरहवीं का खाना और समोसे खाने को कह रही थी” उसके चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी और आवाज़ में ख़ुशी थी जैसे बड़ा महान काम कार रही हो उसने यह भी कहा था कि मोदी कितना पढ़ा लिखा है, अनपढ़ है और उसे इकॉनमी का E भी नहीं पता”

ऐसी 14 साल की लड़की को आप बचा रहे हैं उसका अपराध अक्षम्य है ऐसी गंदी गलियां देने वाली और भी बहुत लड़कियां और लड़के थे वहां

अब सोचिए आपके फैसलों से नाराज होकर कोई अगर आपकी तेरहवीं का खाना और समोसे बांटे तो आपको कैसा लगेगा? यह बात अगर निशु आज़ाद आपकी लिए कहती तो क्या ठीक था और यह भी कहती कि आप एक अनपढ़ हैं जो चीफ जस्टिस बन गए, जिसे लॉ का L भी पता नहीं

आज आपने एक और फरमान जारी कर दिया कि कॉकरोचों के खिलाफ FIR की अनुमति केवल सुप्रीम कोर्ट देगा और यह आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति नहीं दे सकती यह तब है जब कॉकरोच आपके फैसलों को मानने से इंकार कर चुके हैं

आपने अनुच्छेद 142 का दुरुपयोग कर सभी कथित छात्रों की FIR पर कार्रवाई पर रोक लगा दी जबकि अनुच्छेद 142 कहता है Constitution of India grants the Supreme Court the unique power to pass any decree or order necessary for delivering "complete justice" in any pending case.

Key Powers and ScopeComplete Justice: Allows the apex court to go beyond rigid statutory limits or procedural technicalities when existing laws fail to provide a specific remedy.

अभी तो कथित छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज ही हुई थी, अभी तो  complete justice देने की नौबत आई ही नहीं थी और इसलिए 142 का इस्तेमाल सर्वथा अनुचित था

जिस प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के 35 देश अपना सर्वोच्च सम्मान दे चुके हैं उसके लिए कॉकरोचों द्वारा गाली देना शायद आपको अच्छा लगा है?

क्या आपको प्रधानमंत्री मोदी को CJP के आंदोलन में शामिल लड़के लड़कियों का गालियां देना सही लगा? वो प्रधानमंत्री हैं, उन्होंने अगर ऐसे उद्दंड लोगों को माफ़ भी कर दिया तो क्या कानूनी तौर पर भी आप उन्हें छोड़ देंगे? संसद भवन उखाड़ने की धमकी देना क्या उचित था और क्या मोदी जी की माँ के लिए गालियां देना उचित था? अगर किसी विदेश में किसी ने प्रधानमंत्री को ऐसे गालियां दी होती उसको जेल हो गयी होती, लेकिन भारत में सुप्रीम कोर्ट ऐसे लोगों को बचाने के लिए बैठी है।   

लेकिन आपने सभी को एक झटके में अभय दान देकर गलत परंपरा शुरू कर दी आप अपने आदेशों पर पुनर्विचार कीजिए और जो लोग NEET से नहीं जुड़े थे, उनके खिलाफ कार्रवाई  आदेश दीजिए ऐसे तो देश का सर्वनाश कर देंगे आप अराजकता फ़ैलाने वालों को अगर छोड़ दिया जाएगा तो देश कहां जाएगा? 

आपने साबित कर दिया कि जज भगवान होते हैं जो कभी गलती नहीं करते  

हाई कोर्ट के जजों की भाषा ऐसी है जैसे भगवान से भी ऊपर हों; कुछ उच्च न्यायालयों की टिप्पणियां

सुभाष चन्द्र

सितम्बर 9 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिनेश चंद्र सामंत ने एक महिला समेत 4 लोगों को देवरिया पुलिस द्वारा अवैध हिरासत में रखने के आरोप में कहा कि “उत्तर प्रदेश पुलिस ‘झूठों का झुंड’ है’

चारों को थानाध्यक्ष के वेतन से 65 हजार रुपए मुआवजा देने का भी आदेश दिया

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मैं मामले के गुण-दोष (merits of case) पर नहीं जाऊंगा लेकिन पूरे उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ अतिश्योक्तिपूर्ण बयान पर मुझे आपत्ति है। उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में करीब 3.73 लाख से 4.6 लाख लोग सक्रिय रूप से कार्यरत हैं जिनमें हवलदार से लेकर पुलिस कमिश्नर तक शामिल हैं और उत्तर प्रदेश पुलिस ने राज्य को दंगा मुक्त, माफिया मुक्त करने में सराहनीय योगदान दिया है जिस पर मुख्यमंत्री योगी जी गर्व करते हैं

कहीं कोई गलती भी हो सकती है लेकिन एक मामले को लेकर हाई कोर्ट के जजों द्वारा इतनी बड़े पुलिस बल पर कलंक लगाना सर्वथा अनुचित है। इससे तो पुलिस बल को आप हतोत्साहित (demoralise) करने का काम कर रहे हैं क्या कभी जजों से गलती नहीं होती? यह भी मत भूलिए कि जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण से सभी जजों को भी भ्रष्टाचारी कहा जा सकता है

दूसरे मामले में झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि “रात में किसी महिला के घर में घुसना, उसे पकड़ना और उसके कपड़े उतारना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता (not an attempt to rape) 28 साल पुराने केस में अभियुक्त 8 महीने जेल में बिता चुका था और जज साहब ने Trespass का केस मान कर सजा को 8 महीने कर दिया अब जज साहब ये बताएं कि क्या वो आरोपी महिला के घर रात में घुस कर उसके कपड़े उतार कर भजन करने गया था

रेप के मामलों में जज “रेप विशेषज्ञ” बनते जा रहे हैं कोई कह देता है, रेप का अभियुक्त तो 5 वक्त की नमाज पढता है और सजा कम कर देता है

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला त्रिवेदी (अब रिटायर्ड) ने कह दिया कि “Every Sinner has a future” और 4 वर्ष की बच्ची के बलात्कारी/हत्यारे की फांसी की सजा रद्द कर आजीवन कारावास में बदल दी

छत्तीसगढ़ के एक जज ने आदेश में कहा “योनि के ऊपर लिंग रख कर वीर्यपात करना बलात्कार नहीं है” कोई कह देता है महिला के स्तन दबाना और उसका नाड़ा खोलना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता ऐसे बहुत केस हैं जिनमें जज रेप के मामलों में अपनी expetise झाड़ते हैं, बिना लाज शर्म के

GST के एक केस की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल खेत्रपाल और जस्टिस शील जैन  ने कहा कि “GST ने समस्याओं को सुलझाने की बजाय और अधिक समस्याएं पैदा कर दी और ऐसे ही लापरवाही चलती रही तो GST पंजीकरण पर रोक लगाने पर भी विचार किया जा सकता है” 

हाई कोर्ट के जजों को आभास नहीं है कि GST से हर महीने 2 लाख करोड़ की वसूली होती है इस पर आप रोक लगाना चाहते हैं इतने बड़े नेटवर्क में कहीं कोई चूक भी हो सकती है और अधिकारियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार भी हो सकता है लेकिन पूरे system खिलाफ ऐसे Sweeping Comments देना उचित नहीं है आप अपने हाई कोर्ट में झांक कर देखिए कितने केस पेंडिंग पड़े है क्या कभी ध्यान दिया है उन पर? क्या कहना उचित होगा कि हाई कोर्ट ने समस्याओं के निदान की जगह समस्याएं ज्यादा पैदा कर दी हैं? 

पंजाब-बिहार से लेकर तेलंगाना-कर्नाटक तक अंतर्कलह के चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस

                                                                                    साभार :सोशल मीडिया 
राहुल-प्रियंका और सोनिया गाँधी के तानाशाही रवैये से बीजेपी से कहीं ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हो रहा है। जिस तरह मनमोहन सिंह रिमोट कण्ट्रोल प्रधानमंत्री थे वही हालत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के की है। कोई खड़के से पूछे कि पार्टी में अध्यक्ष से बड़ा कौन होता है? कोई समस्या होती है तो कह देते हैं कि फैसला हाई कमांड को करना है। जब फैसला हाई कमांड को ही करना है फिर तुम अध्यक्ष बने क्यों घूम रहे हो? जितने अंतर्कलह इस समय है उतनी कांग्रेस में कभी नहीं हुई, जिसे खड़के की हाई कमांड नहीं देख पा रही और पार्टी को धरातल में घसीट रहे हैं।     
कांग्रेस आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब दूसरे दल नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर का आत्मघाती असंतोष बन चुका है। बिहार से लेकर पंजाब और राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक, हर राज्य से उठती बगावत की चिंगारी यह साफ बयां करती है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का केंद्रीय नेतृत्व राज्यों के क्षत्रपों को साधने और अनुशासन का डंडा चलाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। एक के बाद एक राज्यों में गुटबाजी, नेताओं के बीच बढ़ते मतभेद और संगठन के भीतर फैसलों को लेकर असंतोष तेज हो रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान अपने ही कुनबे को एकजुट रखने की क्षमता खोता जा रहा है? चुनावी मुहाने पर खड़े पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे बेहद महत्वपूर्ण राज्यों में कांग्रेस की यह आंतरिक खींचतान न केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ रही है, बल्कि जनता के बीच भी बेहद नकारात्मक संदेश दे रही है। दरअसल, राहुल गांधी यह समझना ही नहीं चाहते कि चुनावी राजनीति केवल नैगेटिव नरेटिव और बहसों से नहीं, बल्कि एक अनुशासित, एकजुट और मजबूत सांगठनिक मशीनरी से जीती जाती है।

कांग्रेस की गुटबाजी डूबा देगी आगामी चुनावों की नैया?

अगले साल कुल सात राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव मुख्यतः फरवरी–मार्च 2027 के आसपास होने की संभावना है, जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव वर्ष के अंत में, लगभग नवंबर–दिसंबर में अपेक्षित हैं। इनमें से सिर्फ हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, जो अभी से एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर से जूझ रही है। बाकि राज्यों में भी कांग्रेस संगठन की हालत खस्ता है। दरअसल, जिस पार्टी को चुनावी मैदान में सत्ता पक्ष को चुनौती देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकनी चाहिए, वहां नेताओं की ऊर्जा संगठन को संभालने के बजाय आपसी खींचतान और नेतृत्व पर उठते सवालों में खर्च हो रही है। सबसे बड़ा प्रश्न राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पर है। केंद्रीय नेतृत्व न तो राज्यों के क्षत्रपों के बीच संतुलन बना पा रहा है, न असंतोष को समय रहते थाम पा रहा है। कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट चुनावी दिशा नहीं मिलेगी तो तो आगामी चुनावों में कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ना तय है।

पंजाब में ‘एक अनार, सौ बीमार’: सीएम कुर्सी के लिए मची जंग

पंजाब में कांग्रेस अगले साल विधानसभा चुनाव की तैयारी करने के बजाय आपसी गुटबाजी से लहूलुहान हो रही है। यहां पर ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली स्थिति बनी हुई है। दरअसल, हर कद्दावर नेता खुद को भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहा है। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा का गुट है, तो दूसरी तरफ वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग अपनी जमीन मजबूत करने में लगे हैं। इन दोनों धड़ों के बीच नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा भी अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए लगातार दिल्ली दरबार के चक्कर काट रहे हैं। पार्टी के भीतर मचे इस जबरदस्त घमासान को शांत करने और सभी नेताओं के अहंकार (इगो) को साधने के लिए आलाकमान ने आखिरकार राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को पंजाब का नया प्रभारी नियुक्त किया है। पायलट तो खुद ही राजस्थान में नेताओं के अहंकार की लड़ाई में खुद को बचा नहीं पाए थे। वे कैसे पंजाब में नेताओं के बीच की गहरी खाई को पाटेंगे, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

हिमाचल: गुटबाजी और वित्तीय संकट के बीच वेंटिलेटर पर सरकार

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गुटबाजी के गंभीर भंवर में फंसी हुई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और दिवंगत नेता वीरभद्र सिंह के परिवार (विशेषकर उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह) के बीच की तल्खी किसी से छिपी नहीं है। राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के भीतर हुआ विद्रोह और विधायकों की क्रॉस-वोटिंग इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण थी कि मुख्यमंत्री और आलाकमान का अपनी ही पार्टी के विधायकों पर नियंत्रण बेहद कमजोर हो चुका है। सरकार को बचाने के लिए आलाकमान को बार-बार शिमला में पर्यवेक्षक भेजने पड़े, लेकिन अस्थिरता का यह साया आज भी बरकरार है। राजनीतिक कमजोरी के साथ-साथ सुक्खू सरकार इस समय अभूतपूर्व वित्तीय संकट से भी जूझ रही है, जिसने सरकार की छवि को जनता के बीच बेहद कमजोर बना दिया है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों और मुख्य सचिवों को अपनी सैलरी और भत्ते दो महीने के लिए स्थगित करने पड़े हैं। विकास कार्य पूरी तरह ठप हैं और कर्मचारियों के वेतन व पेंशन समय पर देना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस न तो अपने नेताओं को संभाल पा रही है और ना ही राज्य की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर पा रही है।

उत्तराखंड : पहाड़ी राजनीति में समन्वय कांग्रेस के लिए पहाड़-सी चुनौती

उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने अगले विधानसभा चुनाव की चुनौती केवल भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपने ही घर को संभालने की भी है। हिमाचल और पंजाब की तरह यहां भी पार्टी के भीतर गुटबाजी, नेताओं के बीच मतभेद और नेतृत्व को लेकर असंतोष समय-समय पर सतह पर आता रहा है। जनता सबसे गंभीर सवाल राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की भूमिका पर उठा रही है। उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में यदि कांग्रेस नेतृत्व प्रदेश के नेताओं के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित नहीं कर पाता और असंतोष को नहीं थाम पाता तो इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। भाजपा वैसे भी केंद्र से लेकर राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं के चलते प्रो-इंकम्बेंसी से बढ़त बनाए हुए है। सीएम धामी ने हाल ही में मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला लिया है।  उत्तराखंड की पहाड़ी राजनीति में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, उसकी अपनी अंदरूनी दरारें बन सकती हैं।

बिहार कांग्रेस का दिल्ली में दंगल: अपने ही दफ्तर पर धरना

कांग्रेस के भीतर पनप रहे असंतोष की ताजा और हैरान करने वाली बानगी देश की राजधानी दिल्ली में देखने को मिली। आम तौर पर राजनीतिक दल विपक्षी पार्टियों के दफ्तरों के बाहर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन दिल्ली में कांग्रेस के नए मुख्यालय के बाहर बिहार कांग्रेस के करीब 40 दिग्गज नेताओं ने डेरा डाल दिया। यह धरना किसी बाहरी मुद्दे पर नहीं, बल्कि अपने ही राज्य के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी को हटाने की मांग को लेकर था। असंतोष की जड़ें पिछले विधानसभा चुनाव के खराब प्रदर्शन से जुड़ी हैं, जहां महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वह बेहद कम सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पटना में उनकी जायज शिकायतों को लगातार अनसुना किया गया, जिसके कारण उन्हें दिल्ली का रुख करना पड़ा। अनुशासनहीनता के नाम पर जारी कारण बताओ नोटिसों ने इस आग में घी का काम किया है। आलाकमान का संकट यह है कि वह इस विद्रोह को दबाने के लिए कड़े कदम नहीं उठा पा रहा है, जिससे प्रांतीय नेताओं के हौसले बुलंद हैं।

राजस्थान में शांत ज्वालामुखी: सियासी जंग की आहट

पंजाब के पड़ोसी राज्य राजस्थान की कहानी किसी से छिपी नहीं है। यहां अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट की ऐतिहासिक खींचतान ने पिछले चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। हालांकि अगले विधानसभा चुनावों में अभी लंबा वक्त है, लेकिन भविष्य के नेतृत्व की जंग अभी से शुरू हो चुकी है। कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को पंजाब जैसे हाई-प्रोफाइल राज्य का प्रभारी बनाकर यह साफ संकेत दे दिया है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद बढ़ने वाला है। लेकिन इस फैसले ने राजस्थान के भीतर एक शांत पड़े ज्वालामुखी को दोबारा भड़का दिया है। गहलोत गुट इस बदलाव को शांत बैठने वाला नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा अपनी अलग ही ढपली बजा रहे हैं। राजस्थान में नए संगठन की कमान किसके हाथ सौंपी जाती है, यह आलाकमान के लिए सबसे बड़ी सरदर्दी है। अगर राजस्थान में समय रहते शक्ति संतुलन नहीं बनाया गया, तो गुटबाजी का यह मर्ज और गहरा जाएगा।

तेलंगाना: सत्ता मिलने के बाद भी कांग्रेस अंतर्कलह से मुक्त नहीं

दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना में भी स्थिति पूरी तरह कांग्रेस आलाकमान के नियंत्रण में नहीं है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अपनी ही कैबिनेट के भीतर से ही मिल रही चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। हाल ही में एक बड़े विवाद के बाद मंत्री कोंडा सुरेखा को अपनी कैबिनेट कुर्सी गंवानी पड़ी। विवाद तब बढ़ा जब कोंडा सुरेखा के परिवार की तरफ से सीधे मुख्यमंत्री के अधिकारों और उनकी कार्यशैली पर तीखी टिप्पणियां की गईं, जिसे पार्टी विरोधी और नेतृत्व को खुली चुनौती माना गया। इस पूरे घटनाक्रम ने तेलंगाना कांग्रेस के भीतर ‘पुराने बनाम नए’ नेताओं के विवाद को हवा दे दी है। मुख्यमंत्री पर पिछड़ी जातियों की उपेक्षा करने के आरोप भी लगे, जिसके बाद डैमेज कंट्रोल के लिए उन्हें आनन-फानन में पिछड़ी जाति की दो महिलाओं को सरकारी पदों पर नियुक्त करना पड़ा। दक्षिण के इस अहम गढ़ में पनप रहा यह असंतोष साबित करता है कि सत्ता मिलने के बाद भी कांग्रेस अंतर्कलह से मुक्त नहीं हो पा रही है।

कर्नाटक में मलाईदार विभागों की होड़ और भ्रष्टाचार का कलंक

कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की सरकार लगातार किसी न किसी आंतरिक संकट से जूझ रही है। मंत्रिमंडल गठन से लेकर मलाईदार विभागों के बंटवारे तक मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को कई बार दिल्ली के चक्कर लगाने पड़े हैं। असंतोष का आलम यह है कि मनचाहा विभाग (बेंगलुरु विकास मंत्रालय) न मिलने पर वरिष्ठ मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने इस्तीफे की धमकी तक दे डाली थी, जिसके बाद केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप कर उन्हें मनाना पड़ा। इसके अलावा, कैबिनेट मंत्री बी नागेंद्र पर लगे भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों और उनके इस्तीफे ने सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है। सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच की राजनीतिक तनातनी और समय-समय पर आने वाले विरोधाभासी बयान सरकार की स्थिरता और पार्टी की एकजुटता पर लगातार सवालिया निशान खड़े करते रहते हैं।

भारत और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी ताकतें तरह-तरह के नैरेटिव बनाती हैं। इनको आगे बढ़ाने का काम बिना किसी तथ्य के कांग्रेस के युवराज और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करते हैं। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति तथ्यों, तर्कों और जिम्मेदारी से ज्यादा सनसनी, भ्रम और झूठे नैरेटिव पर चलती है। इसलिए वे राजनीति में बार-बार फेल साबित हो रहे हैं। संसद से सड़क तक वे लगातार ऐसे झूठे आरोप उछालते रहते हैं, जिनका या तो बाद में खुद उनके ही दावों से खंडन हो गया, या फिर अदालत, सेना, चुनाव आयोग और सरकारी रिकॉर्ड ने उनकी बातों की धज्जियां उड़ा दीं। कभी सेना के “हाथ बांध देने” का आरोप लगाकर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, तो कभी चुनाव आयोग को “वोट चोरी” का औजार बताकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। संसद में बोलने नहीं देने का रोना रोने वाले राहुल गांधी की पोल खुद लोकसभा के रिकॉर्ड ने खोल दी। दरअसल, राहुल हर हार, हर विवाद और हर असफलता का दोष किसी न किसी संस्था पर डालते हैं, लेकिन आत्ममंथन से लगातार बचते रहते हैं।  

अखिलेश के नेतृत्व में टूटा मुस्लिम वोटबैंक का भरोसा


मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक मुस्लिम-यादव समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मुलायम ने मुसलमानों को सपा का मजबूत राजनीतिक आधार बनाया और पार्टी की पहचान मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर स्थापित की। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले जारी घोषणापत्र में भी मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने जैसे कई वादे किए गए थे।

लेकिन अखिलेश यादव के दौर में इन वादों, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। समय के साथ सपा के भीतर और बाहर से मुस्लिम नेताओं की नाराजगी के स्वर भी सामने आए। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से लेकर आजम खान प्रकरण, शफीकुर्रहमान बर्क और सलीम शेरवानी की नाराजगी और अब इमरान मसूद व मौलाना शहाबुद्दीन रजवी के बयानों तक, कई घटनाओं ने मुस्लिम समाज में सपा के प्रति भरोसे और अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए।

इन घटनाओं ने उस राजनीतिक धारणा को भी चुनौती दी है कि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता एकतरफा तौर पर समाजवादी पार्टी के साथ है। सवाल यह है कि जिस मुस्लिम समर्थन को अखिलेश की  पार्टी अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती है, उसी समुदाय के भीतर से पार्टी और अखिलेश के नेतृत्व के खिलाफ असंतोष के स्वर बार-बार क्यों उठ रहे हैं?

इमरान मसूद ने दी अखिलेश को सीधी चुनौती 

हाल ही में कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर अखिलेश यादव की पार्टी के ‘बीजेपी बनाम सपा’ वाले नैरेटिव को सीधे चुनौती दी। मसूद ने कहा कि गठबंधन के लिए शोर समाजवादी पार्टी ही मचा रही है, लेकिन समाजवादी पार्टी किसी मुस्लिम नेता को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जो अपनी बात रखता हो, और ऐसा नेता अब कांग्रेस में है।

मसूद ने यह भी दावा किया कि उत्तर प्रदेश में लड़ाई का नेतृत्व राहुल गांधी के हाथ में है। यह अखिलेश के नेतृत्व के दावे पर सीधा हमला है। 

इमरान मसूद के ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से आते हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। उनका रुख सपा के उस दावे पर सवाल खड़ा करता है कि मुस्लिम वोटों का सबसे मजबूत और स्वाभाविक विकल्प वही है। यह चुनौती सिर्फ गठबंधन की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम नेतृत्व और प्रतिनिधित्व के सवाल से भी जुड़ती है।

शहाबुद्दीन रजवी ने भी साधा अखिलेश पर निशाना 

बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी भी अखिलेश यादव पर लगातार निशाना साधते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश मुस्लिम मुद्दों पर बात करने से बचते हैं और मुस्लिमों से सपा का विकल्प तलाशने की अपील की। शहाबुद्दीन रजवी ने सपा से मुस्लिम मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने की मांग भी की।

इन बयानों से यह संकेत मिलता है कि मुस्लिम नेतृत्व के भीतर अखिलेश की पार्टी को लेकर एकरूपता नहीं है। कहीं पार्टी से नाराजगी है तो कहीं मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग। यानी जिस समुदाय को सपा अपना मजबूत राजनीतिक आधार मानती है, उसके भीतर नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। 

रजवी ने बाद में अखिलेश पर और तीखे बयान दिए, अखिलेश यादव को बीजेपी का एजेंट तक बताया। ऐसे बयानों से यह बहस और तेज हुई कि मुस्लिम समाज के प्रभावशाली चेहरों के बीच अखिलेश यादव की स्वीकार्यता पहले जैसी है या नहीं। 

अखिलेश को उल्टा पड़ा मुस्लिमों को साधने का दावा?

समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है। पार्टी ने मुस्लिम छात्रों और युवाओं से जुड़े कई वादे किए। इनमें मुस्लिम युवाओं के खिलाफ आतंकवाद से जुड़े कथित झूठे मामलों की समीक्षा, मुस्लिम छात्राओं के लिए आर्थिक सहायता और अन्य योजनाओं के वादे शामिल थे। लेकिन इन वादों के पूरा न होने से मुस्लिम समुदाय के बीच अखिलेश को लेकर गुस्सा बढ़ता रहा है। 
‘रिहाई मंच’ जैसे संगठनों ने अखिलेश पर आरोप लगाया कि उन्होंने ‘झूठे वादे’ कर मुसलमानों को गुमराह किया।  

18 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण पर अखिलेश का झूठ 

2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का वादा किया था। उस समय उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 18-19 प्रतिशत बताई जाती थी, इसलिए इस वादे को राजनीतिक तौर पर 18 प्रतिशत आरक्षण के वादे के रूप में प्रचारित किया गया।
सरकार बनने के बाद यह वादा लागू नहीं हो सका। दिसंबर 2016 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों ने अखिलेश यादव सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर 18 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग उठाई। प्रदर्शन के दौरान वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़ने की अपील वाले पोस्टर भी लगाए गए।
अखिलेश सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में मुस्लिम छात्रों के बीच से ही सपा सरकार के वादों पर सवाल उठ रहे थे। इससे मुसलमानों से अखिलेश की पार्टी के झूठे वादे और उनके अमल के बीच की दूरी सामने आई।

अखिलेश राज में मुजफ्फरनगर दंगे

2012 के घोषणापत्र में समाजवादी पार्टी ने सांप्रदायिक दंगे रोकने का वादा किया था। लेकिन अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते 2013 में मुजफ्फरनगर में बड़ा सांप्रदायिक दंगा हुआ। इसमें 62 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हुए।
मुजफ्फरनगर दंगों ने अखिलेश सरकार के सामने सबसे कठिन राजनीतिक सवाल खड़े किए। खासकर मुस्लिम समुदाय के बीच यह सवाल उठा कि जिस सरकार से सुरक्षा की उम्मीद की गई थी, उसके कार्यकाल में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा कैसे हुई।
दंगों के बाद सपा के उन दावों पर भी सवाल उठे, जिनमें सांप्रदायिक हिंसा रोकने की गारंटी दी गई थी। मुस्लिमों की सुरक्षा को लेकर बनाया गया राजनीतिक भरोसा इस घटना से गहरे सवालों के घेरे में आया।

अखिलेश सरकार पर फूटा शाही इमाम का गुस्सा

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने मुलायम सिंह यादव को पत्र लिखकर मुस्लिमों में बढ़ती नाराजगी की बात कही थी। उन्होंने अखिलेश सरकार के दौरान सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं बदली तो मुस्लिमों को सपा के बारे में अपना रुख बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है। बुखारी ने सपा के घोषणापत्र में किए गए कई वादों के पूरी तरह लागू न होने का भी सवाल उठाया। यानी अखिलेश सरकार के कार्यकाल में मुस्लिम असंतोष की आवाज केवल विपक्षी दलों से नहीं, बल्कि मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व के कुछ हिस्सों से भी उठ रही थी।

2017 में मुलायम ने अखिलेश पर उठाया सवाल

अखिलेश यादव के खिलाफ मुस्लिम असंतोष की चर्चा उस समय और गंभीर हो गई, जब खुद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन पर सवाल उठाए। 16 जनवरी 2017 को मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश पर मुस्लिमों के प्रति ‘negative approach’ रखने की बात कही। 

मुलायम ने कहा कि उन्होंने एक मुस्लिम अधिकारी को प्रदेश का DGP बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अखिलेश इससे नाराज थे। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर मुस्लिमों के हित की बात आई तो वह अपने बेटे अखिलेश के खिलाफ भी लड़ेंगे। यह बयान इसलिए अहम था क्योंकि आरोप किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव ने लगाए थे। इससे यह सवाल और गहरा हुआ कि क्या अखिलेश की राजनीतिक प्राथमिकताएं मुलायम के दौर की मुस्लिम-केंद्रित राजनीति से बदल चुकी थीं?