अखिलेश के नेतृत्व में टूटा मुस्लिम वोटबैंक का भरोसा


मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक मुस्लिम-यादव समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मुलायम ने मुसलमानों को सपा का मजबूत राजनीतिक आधार बनाया और पार्टी की पहचान मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर स्थापित की। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले जारी घोषणापत्र में भी मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने जैसे कई वादे किए गए थे।

लेकिन अखिलेश यादव के दौर में इन वादों, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। समय के साथ सपा के भीतर और बाहर से मुस्लिम नेताओं की नाराजगी के स्वर भी सामने आए। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से लेकर आजम खान प्रकरण, शफीकुर्रहमान बर्क और सलीम शेरवानी की नाराजगी और अब इमरान मसूद व मौलाना शहाबुद्दीन रजवी के बयानों तक, कई घटनाओं ने मुस्लिम समाज में सपा के प्रति भरोसे और अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए।

इन घटनाओं ने उस राजनीतिक धारणा को भी चुनौती दी है कि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता एकतरफा तौर पर समाजवादी पार्टी के साथ है। सवाल यह है कि जिस मुस्लिम समर्थन को अखिलेश की  पार्टी अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती है, उसी समुदाय के भीतर से पार्टी और अखिलेश के नेतृत्व के खिलाफ असंतोष के स्वर बार-बार क्यों उठ रहे हैं?

इमरान मसूद ने दी अखिलेश को सीधी चुनौती 

हाल ही में कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर अखिलेश यादव की पार्टी के ‘बीजेपी बनाम सपा’ वाले नैरेटिव को सीधे चुनौती दी। मसूद ने कहा कि गठबंधन के लिए शोर समाजवादी पार्टी ही मचा रही है, लेकिन समाजवादी पार्टी किसी मुस्लिम नेता को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जो अपनी बात रखता हो, और ऐसा नेता अब कांग्रेस में है।

मसूद ने यह भी दावा किया कि उत्तर प्रदेश में लड़ाई का नेतृत्व राहुल गांधी के हाथ में है। यह अखिलेश के नेतृत्व के दावे पर सीधा हमला है। 

इमरान मसूद के ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से आते हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। उनका रुख सपा के उस दावे पर सवाल खड़ा करता है कि मुस्लिम वोटों का सबसे मजबूत और स्वाभाविक विकल्प वही है। यह चुनौती सिर्फ गठबंधन की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम नेतृत्व और प्रतिनिधित्व के सवाल से भी जुड़ती है।

शहाबुद्दीन रजवी ने भी साधा अखिलेश पर निशाना 

बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी भी अखिलेश यादव पर लगातार निशाना साधते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश मुस्लिम मुद्दों पर बात करने से बचते हैं और मुस्लिमों से सपा का विकल्प तलाशने की अपील की। शहाबुद्दीन रजवी ने सपा से मुस्लिम मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने की मांग भी की।

इन बयानों से यह संकेत मिलता है कि मुस्लिम नेतृत्व के भीतर अखिलेश की पार्टी को लेकर एकरूपता नहीं है। कहीं पार्टी से नाराजगी है तो कहीं मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग। यानी जिस समुदाय को सपा अपना मजबूत राजनीतिक आधार मानती है, उसके भीतर नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। 

रजवी ने बाद में अखिलेश पर और तीखे बयान दिए, अखिलेश यादव को बीजेपी का एजेंट तक बताया। ऐसे बयानों से यह बहस और तेज हुई कि मुस्लिम समाज के प्रभावशाली चेहरों के बीच अखिलेश यादव की स्वीकार्यता पहले जैसी है या नहीं। 

अखिलेश को उल्टा पड़ा मुस्लिमों को साधने का दावा?

समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है। पार्टी ने मुस्लिम छात्रों और युवाओं से जुड़े कई वादे किए। इनमें मुस्लिम युवाओं के खिलाफ आतंकवाद से जुड़े कथित झूठे मामलों की समीक्षा, मुस्लिम छात्राओं के लिए आर्थिक सहायता और अन्य योजनाओं के वादे शामिल थे। लेकिन इन वादों के पूरा न होने से मुस्लिम समुदाय के बीच अखिलेश को लेकर गुस्सा बढ़ता रहा है। 
‘रिहाई मंच’ जैसे संगठनों ने अखिलेश पर आरोप लगाया कि उन्होंने ‘झूठे वादे’ कर मुसलमानों को गुमराह किया।  

18 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण पर अखिलेश का झूठ 

2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का वादा किया था। उस समय उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 18-19 प्रतिशत बताई जाती थी, इसलिए इस वादे को राजनीतिक तौर पर 18 प्रतिशत आरक्षण के वादे के रूप में प्रचारित किया गया।
सरकार बनने के बाद यह वादा लागू नहीं हो सका। दिसंबर 2016 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों ने अखिलेश यादव सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर 18 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग उठाई। प्रदर्शन के दौरान वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़ने की अपील वाले पोस्टर भी लगाए गए।
अखिलेश सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में मुस्लिम छात्रों के बीच से ही सपा सरकार के वादों पर सवाल उठ रहे थे। इससे मुसलमानों से अखिलेश की पार्टी के झूठे वादे और उनके अमल के बीच की दूरी सामने आई।

अखिलेश राज में मुजफ्फरनगर दंगे

2012 के घोषणापत्र में समाजवादी पार्टी ने सांप्रदायिक दंगे रोकने का वादा किया था। लेकिन अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते 2013 में मुजफ्फरनगर में बड़ा सांप्रदायिक दंगा हुआ। इसमें 62 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हुए।
मुजफ्फरनगर दंगों ने अखिलेश सरकार के सामने सबसे कठिन राजनीतिक सवाल खड़े किए। खासकर मुस्लिम समुदाय के बीच यह सवाल उठा कि जिस सरकार से सुरक्षा की उम्मीद की गई थी, उसके कार्यकाल में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा कैसे हुई।
दंगों के बाद सपा के उन दावों पर भी सवाल उठे, जिनमें सांप्रदायिक हिंसा रोकने की गारंटी दी गई थी। मुस्लिमों की सुरक्षा को लेकर बनाया गया राजनीतिक भरोसा इस घटना से गहरे सवालों के घेरे में आया।

अखिलेश सरकार पर फूटा शाही इमाम का गुस्सा

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने मुलायम सिंह यादव को पत्र लिखकर मुस्लिमों में बढ़ती नाराजगी की बात कही थी। उन्होंने अखिलेश सरकार के दौरान सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं बदली तो मुस्लिमों को सपा के बारे में अपना रुख बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है। बुखारी ने सपा के घोषणापत्र में किए गए कई वादों के पूरी तरह लागू न होने का भी सवाल उठाया। यानी अखिलेश सरकार के कार्यकाल में मुस्लिम असंतोष की आवाज केवल विपक्षी दलों से नहीं, बल्कि मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व के कुछ हिस्सों से भी उठ रही थी।

2017 में मुलायम ने अखिलेश पर उठाया सवाल

अखिलेश यादव के खिलाफ मुस्लिम असंतोष की चर्चा उस समय और गंभीर हो गई, जब खुद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन पर सवाल उठाए। 16 जनवरी 2017 को मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश पर मुस्लिमों के प्रति ‘negative approach’ रखने की बात कही। 

मुलायम ने कहा कि उन्होंने एक मुस्लिम अधिकारी को प्रदेश का DGP बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अखिलेश इससे नाराज थे। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर मुस्लिमों के हित की बात आई तो वह अपने बेटे अखिलेश के खिलाफ भी लड़ेंगे। यह बयान इसलिए अहम था क्योंकि आरोप किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव ने लगाए थे। इससे यह सवाल और गहरा हुआ कि क्या अखिलेश की राजनीतिक प्राथमिकताएं मुलायम के दौर की मुस्लिम-केंद्रित राजनीति से बदल चुकी थीं?

सुप्रीम कोर्ट का आचरण साबित करता है कि राहुल गांधी VVIP ही नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का “दामाद” है और कानून से ऊपर है

सुभाष चन्द्र

सेना की मानहानि के आपराधिक मामले में आज राहुल के खिलाफ शिकायत करने वाले BRO के पूर्व निदेशक उदय शंकर श्रीवास्तव की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश होते उनके वकील गौरव भाटिया ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने राहुल गांधी के खिलाफ मामला लंबे समय से लिस्ट नहीं किया क्योंकि इसमें खुद राहुल गांधी शामिल है।  भाटिया ने कहा कि राहुल गांधी कोई VVIP नहीं है जो उनका मामला लिस्ट न किया जाए

यह बात चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच के सामने कही CJI सूर्यकांत ने कहा “आप जल्द सुनवाई की मांग करते हुए आवेदन दाखिल कीजिए, हमारे सामने सब बराबर हैं”

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अगर CJI सूर्यकांत ने केस की timeline देखी होती तो उन्हें पता चलता कि राहुल गांधी VVIP भी सुप्रीम कोर्ट के दामाद लेवल का है

-उदय शंकर जी ने लखनऊ MP/MLA कोर्ट में शिकायत की थी कि राहुल गांधी ने 16 दिसंबर, 2022 को भारतीय सेना की चीनी सैनिकों से हुई 9 दिसंबर की झड़प को लेकर सेना के लिए अपमानजनक टिप्पणी की थी;

-MP/MLA कोर्ट ने राहुल गांधी को 24 मार्च, 2025 को कोर्ट में पेश होने के लिए समन जारी किए जिसके खिलाफ वो इलाहाबाद हाई कोर्ट चला गया और हाई कोर्ट ने 29 मई, 2025 को राहुल गांधी की अपील ख़ारिज  कर दी - यानी 2 महीने में फैसला हो गया;

-राहुल गांधी हाई कोर्ट आर्डर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चला गया जहां उसकी मौज हो गई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के केस को स्टे कर दिया और 13 महीने से सुनवाई नहीं हुई हाई कोर्ट 2 महीने में फैसला दे सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट 13 महीने से सो रहा है, इसलिए ही वो कोर्ट का VVIP दामाद है;

-4 अगस्त, 2025 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस अगस्त मसीह की पीठ ने समन रद्द करने ने मना करते हुए ट्रायल कोर्ट के केस पर स्टे लगा दिया जस्टिस दत्ता ने कहा था कि अगर आप सच्चे भारतीय होते तो ऐसी बात न कहते;

-चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी, इसका विरोध प्रियंका वाड्रा ने किया और कहा कि जज कौन होते हैं मेरे भाई को भारतीय प्रमाणित करने वाले और दोनों जजों की बेंच बदल दी गई, ये है VVIP राहुल गांधी;

-फिर बेंच बनी जस्टिस MM Sundresh और जस्टिस सीताराम शर्मा की जिसने 20 नवंबर, 2025 को नियमित सुनवाई को टाल दिया;

-इसके बाद 4 दिसंबर 2025 को जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस शर्मा की बेंच ने राहुल की अपील को औपचारिक तौर पर admit कर लिया लेकिन ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई पर स्टे जारी रखा अगली तारीख तय की 22 अप्रैल, 2026 की यानी 5 महीने बाद क्या तमाशा हो गया सुप्रीम कोर्ट में, 5 महीने बाद की तारीख देना फिर साबित करता है कि राहुल VVIP दामाद है सुप्रीम कोर्ट का;

-22 अप्रैल आई लेकिन सुनवाई नहीं हुई क्योंकि जस्टिस सुंदरेश सबरीमाला बेंच में सुनवाई कर रहे थे

जज की सुनवाई में आप (CJI सूर्यकांत) कहते हैं कि आप जल्द सुनवाई के लिए आवेदन कीजिए मतलब सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को कोई मतलब नहीं है देखने का कि 22 अप्रैल को सुनवाई नहीं हुई तो उसकी अगली तारीख भी देनी है

गड़बड़झाला रजिस्ट्री में होता है और अगर न होता तो हजारो केस सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग न होते ये गड़बड़ हर हाई कोर्ट में भी होता है

राहुल गांधी VVIP है इसका एक और सबूत है कि आपने आय से अधिक संपत्ति का केस बिना तारीख तय किए नोटिस जारी करके छोड़ दिया अमित शाह के मानहानि का केस सुल्तानपुर कोर्ट में 7 साल से लंबित है लेकिन आपके पास राहुल ने अपील की तो उसे स्टे कर दिया 

मोदी सरनेम पर राहुल की दोषसिद्धि पर स्टे लगाकर ऐसा आदेश पारित किया गया कि आज केस का स्टेटस क्या है 3 साल बाद भी किसी को पता नहीं है

सत्य निकेतन की बिल्डिंग गिरने के मामले में जो गिरफ्तार हुए उनकी आयु भी देख लो; जीते जी तो सजा मिल नहीं पाएगी; जो अधिकारी सस्पेंड हुए, उनके घरों और संपत्तियों की जांच हो

सुभाष चन्द्र

सत्य निकेतन की जो बिल्डिंग गिरी और 6 लोग मारे गए, इसमें भवन के मालिक हरिराम गुप्ता, उसकी पत्नी उर्मिला गुप्ता और बेटे महेश गुप्ता को गिरफ्तार किया गया है। हरिराम की आयु 81 वर्ष है, उर्मिला की 75 वर्ष और बेटे महेश की 52 वर्ष है

हरिराम और उर्मिला को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है और महेश को 2 दिन की पुलिस रिमांड पर और देर सवेर वो भी न्यायिक हिरासत में जाएगा

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यह मुकदमा साल 6 महीने में तो ख़त्म होने वाला नहीं है इसकी पूर्ति में कम से कम 10 साल मान कर चलें और तब की उम्र में पति पत्नी को क्या सजा होगी, ईश्वर ही जाने अभी तो अधिक आयु के कारण उनका बीमार पड़ना स्वाभाविक है और सरकार को उनका इलाज भी कराना पड़ेगा

इसके अलावा लापरवाही के लिए जिम्मेदार दक्षिणी जोन के उपायुक्त राकेश कुमार, अधीक्षक अभियंता (भवन) रणवीर सिंह, अधिशासी अभियंता ललित कुमार गोयल, AE सुनील चौहान और JE आशीष कुमार को सस्पेंड किया गया है

लेकिन इस पूरे प्रकरण में पुलिस क्यों अछूता छोड़ दिया? क्या सरकार को नहीं मालूम कि नगर निगम का भवन विभाग बिना रिश्वत लिए मंजूरी नहीं देता तो पुलिस भी एक लेंटर का 50 से 60,000 रूपए लेती है। पहले घरेलू मरम्मत के लिए पुलिस कुछ नहीं कहती थी लेकिन अब तो दीवार का हो, चु रही छत या टूट रहे फर्श की मरम्मत करने पर पुलिस बिना रिश्वत लिए नहीं रहती। जबकि नगर निगम ने इन कामों को करवाने की छूट दे रखी है। ये वो कटु सच्चाई है जिसे कोई नहीं नकार सकता।     

इन लोगों के कार्यकाल में जितने भी भवन अनाधिकृत रूप से बने, उन सबकी जांच होनी चाहिए जब ये लोग दूसरों के भवन अनाधिकृत बनने की मंजूरी दे सकते हैं तो अपने घरों को खड़ा करने में तो सभी नियम ताक पर लगा दिए होंगे इन सबके घरों का निरीक्षण होना चाहिए कि कितना हिस्सा अनाधिकृत बना रखा है जिसे तुरंत गिरा देना चाहिए

केजरीवाल & कंपनी को राजनीति करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसके समय में भी कई भवन गिरे थे उसने तो अपना शीश महल भी बिना नक्शा पास कराए बना लिया था अगर वो भाजपा सरकार को दोष देना चाहता है क्योंकि आज उसकी सरकार है तो 30 साल पहले जब ये भवन बना था तब तो शीला दीक्षित की सरकार थी, उसे दोष देना चाहिए

अनधिकृत निर्माण बिना निगम के अधिकारियों की मर्जी नहीं हो सकता अभी सुना है 41 जर्जर भवनों को नोटिस दिया गया है लेकिन यह काम नोटिस से नहीं होगा एक विशेष टीम तुरंत सभी भवनों का निरीक्षण करे और जो भी अवैध निर्माण पाया जाए, उसे तुरंत बुलडोज़र से गिरा देना चाहिए 

जो भी अधिकारी निलंबित किए गए हैं, उनकी संपत्ति की जांच ED को सौंप देनी चाहिए बल्कि 41भवनों के अनधिकृत निर्माण के लिए भी जो अधिकारी जिम्मेदार हैं उनकी भी संपत्ति की जांच करा लेनी चाहिए

नरेंद्र मोदी कोई नाकामी नहीं छिपा रहा बल्कि कांग्रेस के “फूफा” उसकी सफलता से जले “झूठ की गूंज” चला रहे हैं

सुभाष चन्द्र

नरेंद्र मोदी ने SRCC कॉलेज में फ़ुफ़ाओं की बात करते हुए क्या कांग्रेस का नाम लिया नहीं लिया तो फिर कांग्रेस के नेता क्यों छटपटा रहे हैं और खड़गे जी कह रहे हैं कि मोदी अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए हर साल ऐसे शब्द गढ़ते हैं। 

विपक्ष को अपने आपमें इस बात पर चर्चा करनी चाहिए कि मोदी को हमारे लिए ऐसे अलंकारों का क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है। जितना राष्ट्रीय आपदाओं में सरकार के साथ खड़े होने की बजाए दुश्मन की बोली बोल सरकार को घेरने की कोशिश की जाएगी उतना ही विपक्ष को नुकसान होगा।  

कांग्रेस अगर “फूफा” नहीं है तो पिछले 12 साल में मोदी का एक काम भी बता दे जिसे कांग्रेस ने पसंद किया हो बल्कि संसद का एक भी सत्र शांति से नहीं चलने दिया पेपर लीक की बात तो ऐसे कर रहे हैं जैसे कांग्रेस के राज में कोई पेपर लीक हुआ ही नहीं और प्रियंका वाड्रा ने कहा कि 150 पेपर लीक में 750 करोड़ छात्र प्रभावित हुए किसी ने उसे सही करने की जरूरत नहीं समझी कि देश की आबादी 140 करोड़ है और विश्व की 800 करोड़

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मुझे याद है चिदंबरम ने UPI शुरू करने पर कहा था कि गांवों की जनता और रेहड़ी पटरी वाले कैसे इसे इस्तेमाल करेंगे जब उनके पास मोबाइल भी नहीं है तकलीफ यह है कि आज देश की GDP लगातार क्यों बढ़ रही है

कांग्रेस ने हमेशा पाकिस्तान पर की गई कार्रवाई के सबूत मांगे। संसद भवन निर्माण की निंदा की चंद्रयान चंद्रमा पर पहुंचा उसे देख कर जल मरे, चंद्रयान जहां चांद पर उतरा, उसका नाम शिव-शक्ति देना भी कांग्रेस को रास नहीं आया। 1984 के बाद कांग्रेस को कभी बहुमत नहीं मिला लेकिन मोदी को 30 साल बाद पूर्ण बहुमत मिला मगर कांग्रेस और ममता ने कभी मोदी को बधाई नहीं दी

खड़गे जी आपने मोदी के लिए ऐसी नफरत पाल रखी है कि आपने मोदी को “जहरीला नाग” कहा, कांग्रेस ने तो मोदी को गलियां देने का शतक बना दिया और फिर तकलीफ हो रही है कि मोदी ने “फूफा” क्यों कह दिया 

कांग्रेस आज एक क्षेत्रीय दल बनकर रह गई है बिना किसी सहारे किसी राज्य में अकेले चुनाव कहीं कहीं ही लड़ सकती है 

आप महंगाई और बेरोजगारी का रोना रो रहे हो जबकि कांग्रेस के राज में 

2008 से 2011 क्या हालत थी ये भी देख लो -

 Year       GDP     Inflation(%)    Unemployment Rate 

2008     3.09%    8.35                 7.63%

2009     7.86%    10.88               7.64%

2010     8.50%    11.99                7.63%

2011     5.24%     8.99                 7.61%

जबकि आज GDP 7.8% है, inflation 5% और बेरोजगारी दर 4.5% है और आप कहते हो मोदी अपनी नाकामी छिपा रहा है दुनिया भर के देश भारत की आर्थिक मजबूती की प्रशंसा कर रही है परंतु कांग्रेस सुलग रही है

                                                      साभार सोशल मीडिया 
कांग्रेस को तकलीफ है कि 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर क्यों उठ गए, कांग्रेस को तकलीफ है कि 50 करोड़ से ज्यादा जनधन खाते खोल कर मोदी ने DBT से पैसा क्यों भेजना शुरू कर दिया जिससे कांग्रेस के लोगों  की दलाली बंद हो गई
 कांग्रेस का 10 साल का राज घोटालों का राज रहा और उसे छिपाने के लिए कांग्रेस के नेता लगातार मोदी पर हमला करते हैं

एक बात अब साफ़ हो गई कि मोदी के जिस काम का कांग्रेस विरोध करे, उसे सही समझना चाहिए और कांग्रेस जो कुछ भी कहे उसे झूठ मान कर ही चलना चाहिए

बांके बिहारी कॉरिडोर विरोध: 2027 चुनाव से पहले विपक्ष का तुष्टीकरण दांव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में आज पूरे देश में सनातन विरासत को सहेजने और कल्चरल टूरिज्म को नई ऊंचाई देने का ऐतिहासिक कार्य हो रहा है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की डबल इंजन सरकार ने कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाकर राज्य को भयमुक्त माहौल दिया है और विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और उज्जैन में महाकाल लोक के निर्माण से देश में सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व पंख लगे हैं। पावन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जब मथुरा-वृंदावन में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है, तो उनकी सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए आधुनिक व्यवस्था की आवश्यकता और भी प्रखर हो उठती है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अपनी खोई जमीन तलाश रहे विपक्षी दलों को यह विकास और सांस्कृतिक जागरण पच नहीं रहा है। वोट बैंक को साधने और तुष्टीकरण की पुरानी राजनीति के तहत अब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी बांके बिहारी कॉरिडोर का विरोध करने पर उतर आई हैं। संभल से लेकर वृंदावन तक, आस्था के केंद्रों के पुनरुद्धार को रोकने की यह साजिश सीधे तौर पर प्रदेश के विकास और लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधा को बाधित करने का कुत्सित प्रयास है।

मथुरा-वृंदावन बना 2027 की राजनीति का नया अखाड़ा: पश्चिमी यूपी में ध्रुवीकरण की फिराक में विपक्ष
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के मुहाने पर खड़े राज्य में मथुरा-वृंदावन अब सियासी टकराव का नया केंद्र बन चुका है। एक तरफ बीजेपी की डबल इंजन सरकार कॉरिडोर, सुगम दर्शन और सांस्कृतिक पर्यटन के जरिए ब्रज को विकास का वैश्विक मॉडल बनाने में जुटी है, वहीं मुद्दाविहीन विपक्ष स्थानीय विस्थापन और बुनियादी समस्याओं का झूठा हौव्वा खड़ा कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी खोई जमीन तलाश रहा है। आने वाले समय में बांके बिहारी कॉरिडोर का यह विषय केवल एक निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पश्चिमी यूपी में राष्ट्रवाद और विकास बनाम अवसरवादी तुष्टीकरण की राजनीति के बीच एक निर्णायक चुनावी बहस का रूप लेगा। 

विकास के नाम पर विपक्ष का प्रलाप: अजय राय और प्रदीप माथुर के बेबुनियाद आरोप
बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और सुरक्षा की आवश्यकता को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने परियोजना पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने वृंदावन पहुंचकर इसे विकास के नाम पर विध्वंस करार दिया और काशी विश्वनाथ धाम के कायाकल्प की तुलना करते हुए बेतुके आरोप लगाए कि स्थानीय पहचान खत्म की जा रही है। वहीं, कांग्रेस नेता प्रदीप माथुर ने भी भ्रम फैलाते हुए दावा किया कि कॉरिडोर के जरिए सेवायतों के अधिकार छीने जा रहे हैं और बाहरी लोगों को बसाया जा रहा है। असल में कांग्रेस का यह विरोध श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के प्रति उसकी घोर उपेक्षा को ही दर्शाता है।

राहुल के ‘ग्रंथ ज्ञान’ का ढोंग: जब सब पढ़ा तो हिंदू आस्था से बैर क्यों?
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत सार्वजनिक मंचों पर दावा करती रही हैं कि राहुल गांधी ने दुनिया भर के धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया है, जिनमें रामायण, महाभारत, गीता और वेद-पुराण शामिल हैं। बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि राहुल गांधी और उनकी पार्टी भारतीय सनातन संस्कृति और शास्त्रों के इतने बड़े ज्ञाता हैं, तो फिर हिंदू आस्था के केंद्रों के जीर्णोद्धार और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के हर प्रयास का विरोध कांग्रेस क्यों करती है? काशी विश्वनाथ से लेकर बांके बिहारी तक, हर पवित्र धाम के पुनरुत्थान में अड़ंगा लगाना कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र और ढोंग की पोल खोल देता है।

विभाजन की नींव रखने वाली कांग्रेस का सनातन के प्रति पुराना वैमनस्य
कांग्रेस का यह रुख कोई नया नहीं है। सत्ता की लालसा में पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर में धर्म के आधार पर देश का विभाजन स्वीकार करने वाली कांग्रेस आज भी उसी विभाजनकारी सोच पर चल रही है। तुष्टीकरण की नीति को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस दशकों तक भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाती रही और अब संभल के प्राचीन स्थलों से लेकर वृंदावन के बांके बिहारी धाम तक हिंदुओं के पूज्य स्थलों के सुंदरीकरण और विकास को रोकने के लिए भ्रम का जाल बुन रही है।

सपा का दोहरा रुख: विकास के हर कदम पर रोड़ा अटकाने की आदत
समाजवादी पार्टी भी इस मामले में कांग्रेस से पीछे नहीं है। जून 2025 में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के निर्देश पर राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन वृंदावन पहुंचे और कॉरिडोर का विरोध करने वालों को हवा दी। सपा हमेशा से तुष्टीकरण की सियासत के जरिए एक खास वर्ग को खुश करने के लिए बहुसंख्यक समाज की आस्था से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर सवाल खड़े करती रही है। विस्थापन और स्थानीय अधिकारों की आड़ लेकर सपा असल में श्रद्धालुओं की सुरक्षा और वृंदावन के आधुनिकीकरण के खिलाफ खड़ी दिख रही है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर 50 लाख से अधिक श्रद्धालु: क्यों अनिवार्य है भव्य सुरक्षा और कॉरिडोर?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मथुरा-वृंदावन में धार्मिक उत्साह चरम पर नजर आया और प्रशासनिक अनुमानों के मुताबिक उत्सव में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा। श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर मुख्य कार्यक्रम के अलावा बांके बिहारी मंदिर, द्वारिकाधीश, प्रेम मंदिर और इस्कॉन मंदिर में देश-विदेश से लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचे। इतने विशाल जनप्रवाह को नियंत्रित करने के लिए मंदिरों और प्रमुख मार्गों पर भारी पुलिस बल तथा पीएसी के जवानों की तैनाती करनी पड़ी। 50 लाख से अधिक भक्तों की यह ऐतिहासिक आमद स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है कि संकरी गलियों के भरोसे मथुरा-वृंदावन को नहीं छोड़ा जा सकता और बांके बिहारी कॉरिडोर जैसी आधुनिक व्यवस्था श्रद्धालुओं के जीवन की सुरक्षा के लिए कितनी अपरिहार्य बन चुकी है।

सनातन संस्कृति के केंद्रों का विकास अनवरत जारी रहेगा: सीएम योगी
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा पहुंचकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना की और श्रद्धालुओं पर पुष्प वर्षा कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना की। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार विकास और जनकल्याण के कार्यों में जनता के साथ खड़ी है तथा बांके बिहारी मंदिर, बरसाना, वृंदावन और गोवर्धन सहित पूरे ब्रज के प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास की योजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए सीएम योगी ने कहा कि जिन लोगों की आस्था कृष्ण, राम और भगवान विश्वनाथ में नहीं है, वे जनता की धार्मिक भावनाओं को कभी नहीं समझ सकते। उन्होंने साफ किया कि समाज में विभाजन और अविश्वास फैलाने वाले तत्वों के मंसूबों को सरकार कभी सफल नहीं होने देगी और सनातन संस्कृति के केंद्रों का विकास अनवरत जारी रहेगा।

मंदिर फंड पर विपक्ष का सफेद झूठ: ठाकुर जी के नाम ही होगी भूमि की रजिस्ट्री
कांग्रेस और सपा जनता के बीच यह भ्रामक प्रचार कर रहे हैं कि सरकार मंदिर का खजाना और फंड हड़पना चाहती है। जबकि वास्तविकता यह है कि सरकार ने अदालत और सार्वजनिक मंचों पर साफ किया है कि कॉरिडोर के लिए अधिग्रहित की जाने वाली 5 एकड़ भूमि सीधे तौर पर स्वयं ‘ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज’ के नाम ही दर्ज होगी। निर्माण और विकास कार्यों का मुख्य वित्तीय भार भी राज्य सरकार अपने बजट से वहन कर रही है। विपक्ष का यह अनर्गल प्रलाप केवल श्रद्धालुओं को भड़काने और मंदिर के विकास को रोकने की सोची-समझी चाल है।

सेवायतों का सम्मान सुरक्षित, बिचौलियों के सिंडिकेट पर चोट
विपक्ष यह भ्रम फैला रहा है कि प्रस्तावित मंदिर न्यास के जरिए स्थानीय गोस्वामियों और सेवायतों के अधिकार छीन लिए जाएंगे। हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। प्रस्तावित कानून में स्वामी हरिदास जी के वंशज गोस्वामी समाज के पूजा, सेवा, भोग और पारंपरिक धार्मिक अधिकारों को पूर्ण विधिक संरक्षण दिया गया है। ट्रस्ट में सेवायत प्रतिनिधियों की अनिवार्य भागीदारी तय की गई है। सरकार का उद्देश्य सेवायतों का हक छीनना नहीं, बल्कि मंदिर के नाम पर सक्रिय अवैध बिचौलियों, फर्जी गाइडों और श्रद्धालुओं से मनमानी वसूली करने वाले सिंडिकेट पर नकेल कसना है। विपक्ष असल में इसी सिंडिकेट के बचाव में ढाल बनकर खड़ा है।

गर्भगृह अछूता: कुंज गलियों के वास्तविक स्वरूप की रक्षा
अजय राय और विपक्षी नेता लगातार यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि कॉरिडोर से वृंदावन का प्राचीन स्वरूप और कुंज गलियां समाप्त हो जाएंगी। जबकि सरकार का प्लान स्पष्ट करता है कि मंदिर के प्राचीन गर्भगृह, पारंपरिक वास्तुशिल्प और आंतरिक स्वरूप को तनिक भी स्पर्श नहीं किया जाएगा। 5 एकड़ का होल्डिंग और सर्कुलेशन एरिया मंदिर के बाहरी परिधि क्षेत्र में बनाया जा रहा है। जब प्रतिदिन उमड़ने वाली लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को बाहरी गलियारे में प्रबंधित कर लिया जाएगा, तब जाकर आंतरिक कुंज गलियों को अत्यधिक दबाव और जाम से मुक्ति मिलेगी तथा संतों और स्थानीय निवासियों के लिए वृंदावन का मूल शांत स्वरूप सुरक्षित रहेगा।

मौलाना साजिद रशीदी की हिंदुओं को धमकी: हिंदुओं को छिपने की जगह नहीं मिलेगी; हिंदू सचेत रहें, एक रहें

सुभाष चन्द्र

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी अवैध मस्जिद को सितम्बर 5 को गिरा दिया गया। 

16 जुलाई, को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने उसे अवैध घोषित किया था जिसके खिलाफ मस्जिद पक्ष ने जिला जज की अदालत में अपील की थी लेकिन जिला जज ने 2 सितंबर को अपील ख़ारिज कर दी। मस्जिद पक्ष चाहता तो इलाहाबाद हाई कोर्ट जा सकता था क्योंकि वकीलों को हाई कोर्ट में अपील दायर करने में ज्यादा समय नहीं लगता लेकिन मस्जिद पक्ष ने ऐसा करना उचित नहीं समझा शायद इसलिए कि उनका पक्ष कमजोर था

मुस्लिम कट्टरपंथी और इनको तन, मन और धन से समर्थन देने वाली हिन्दू विरोधी पार्टियां हिन्दू धर्म स्थलों को विवादित बनाकर लटकाने में करोड़ों रूपए बर्बाद कर सकते हैं लेकिन सच्चाई को सामने आने से रोकने में नाकाम रहते हैं। अंजाम सामने है, बाबरी के एवज में मिली जमीन पर आज तक नींव खोदने के लिए भीख मांग रहे हैं जबकि राममंदिर बनकर तैयार भी हो गया। इसलिए हिन्दू जागो और इन कट्टरपंथियों का समर्थन कर रही पार्टियों को दोजख का रास्ता दिखाओं।    

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मस्जिद पक्ष ने 1 जनवरी 1911 का बिजली का बिल पेश करते हुए दावा किया था कि मस्जिद कलेक्ट्रेट से भी पुरानी है लेकिन यह दावा जांच में गलत पाया गया क्योंकि बिजली 1922 में आई थी और उसका वितरण 1928 में शुरू हुआ ऐसे में 1911 का बिल फर्जी साबित हुआ ऐसा भी बताया गया है कि 1898 के खसरे के रिकॉर्ड में यह जमीन “सरकार केसरी हिंद” के रूप में कचहरी और कलेक्ट्रेट के नाम ही दर्ज है

गिराई गई मस्जिद के मलबे के नीचे 100 वर्ष पुराना 20 फुट गहरा और डेढ़ मीटर चौड़ा कुंआ मिला है जिसकी जांच ASI करेगी इसका मतलब भी यही निकलता है कि यह मस्जिद भी किसी मंदिर को तोड़ कर बनाई गई होगी

ऐसी ही एक मस्जिद इलाहाबाद हाई कोर्ट के परिसर में थी जिसका मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक चला जिसके आदेश पर मस्जिद गिराई गई  

मस्जिद गिराए जाने पर बवाल काटने वालों में प्रमुख हैं इकरा हसन, इमरान मसूद, ओवैसी, मायावती, मौलाना अरशद मदनी और सपा चीफ अखिलेश यादव अखिलेश ने तो इसे राम मंदिर से जोड़ दिया और लिखा “जिस भाजपा ने मंदिर दान-मान को लूट लिया, वो किसी की आस्था के प्रतीकों का मोल क्या जाने”

इस सबसे अलग मौलाना साजिद रशीदी ने कहा है कि आज आपकी सरकार है, जो मर्जी कर सकते हो लेकिन जब सरकार बदलेगी तो हिंदुओं को छिपने की जगह नहीं मिलेगी यह मौलाना की हिंदुओं को सीधी धमकी है यह मौलाना तो राम मंदिर को तोड़ने की धमकी दे चुका है और इसने डिंपल यादव के मस्जिद में बैठने पर आपत्तिजनक शब्द कहे थे लेकिन न तो 

अखिलेश यादव कुछ बोले और न कोई समाजवादी बोला शायद इसलिए कि मुस्लिम वोट बैंक नाराज हो जाएगा

मौलाना तौकीर रजा भी ऐसे ही धमकी देता था कि हमारे लड़के अगर सड़कों पर आ गए तो हिंदुओं को निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा आज वो जेल में है ऐसा ही इलाज मौलाना साजिद रशीदी का होना चाहिए 

इस धमकी पर हिंदुओं को सचेत हो जाना चाहिए हिंदुओं के किसी वर्ग के दिमाग में अगर योगी को हटाने का ख्याल मन में है तो संभल जाना चाहिए

आज की तारीख के सबसे बड़े “फूफा"

सुभाष चन्द्र

SRCC के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार के हर काम को गलत कहने वालों को सही नाम दिया “फूफा”

आज की तारीख में कांग्रेस के चापलूस पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और पूर्व रघुराम राजन सबसे बड़े फूफा हैं

कांग्रेस की तरह गर्ग ने GDP को गलत कहते हुए कहा है कि actual GDP केवल 2.6% है लेकिन फिर बिदक गया और अब कह रहा है कि 5% है

ऐसी बातें कांग्रेस और गर्ग तब कह रहे हैं जब जापान की रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग upgrade कर दी है और दुनियाभर के देश पहली तिमाही की GDP की बढ़ोतरी 7.8% के सराहना कर रहे हैं

दूसरा बड़ा फूफा है रघुराम राजन ये ढक्कन कह रहा है कि सेमीकंडक्टर चिप बनाने की क्या जरूरत है, उसकी तो भारत “तस्करी” भी कर सकता है और भारत सुपर पावर क्यों बनना चाहता है, उसे आर्थिक शक्ति बनने की क्या जरूरत है?

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ये ऐसे हरामखोर हैं जो देश की बर्बादी ही चाहते हैं रघुराम राजन ने तो पिछले साल के लिए कहा कहा था कि GDP अगर 5% भी बढ़ जाए जो बड़ी बात होगी जो बातें राहुल गांधी बोलता है वो उसके पालतू  बोल रहे हैं जो असली फूफा है। 

सवाल यह है कि अगर रघुराम राजन नहीं चाहता कि भारत आर्थिक शक्ति बने या सुपर पावर बने तो खुद July 2026 से the U.S. Federal Reserve में  high-level task force dedicated to overhauling and reshaping America's monetary policy framework के लिए नियुक्त हो कर क्या घुईया छील रहा है क्या वो भारत को Dead Economy देखना चाहता है? याद रहे ये रघुराम राजन राहुल गांधी की “भारत तोड़ो यात्रा” में शामिल था

प्राइवेट पार्ट का रोना; जब महिला ब्रिगेड किसी सम्मानित व्यक्ति के गिरेबान पकड़ना चाहती है तो क्या उसका प्राइवेट पार्ट अनछुआ रह जायेगा?

क्रोकरोच जनता पार्टी के सदस्य सिर्फ बीजेपी सरकार वाली राज्यों के स्कूलों में निरीक्षण के नाम पर जिस अभियान पर निकल रही है उसमें शिक्षा में सुधार से ज्यादा अपनी राजनीति चमकाने की बू साफ साफ देखी जा सकती है। बीजेपी के शासन में आने से पहले सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छुपी नहीं है। आज यद्यपि सरकार के सामने शिक्षा में सुधार के क्षेत्र में काफी कुछ करना बाकी है फिर भी भवन, पोशाक, साइकिल, मिड डे मिल कुछ अपवादों को छोड़कर काफी उन्नत हुआ है
बिना प्रशासनिक अनुमति के स्कूलों के निरीक्षण का अधिकार क्या किसी भी अराजक ग्रुप या हुल्लड़बाज कार्यकर्ताओं का प्रजातांत्रिक अधिकार है यह आज का मौलिक प्रश्न है?
आज स्कूलों के शिक्षक, अभिभावक, छात्र और छात्राएं काफी सशंकित रहते हैं कि कब कोई अराजक टोली उन्हें निशाना बनाने आ धमकेगी और हुल्लड़बाजी पर उतर आएगी ऐसे में पठन पाठन का कार्य बाधित हो चला है।
आज उपद्रवियों ने मुस्लिम कट्टरपंथियों की हरकत अपना रही है कि बच्चे और महिलाओं को आगे कर पीछे कर हंगामा करो और जब पुलिस एक्शन में आएगी तो बच्चों और महिलाओं के चोटिल होने पर सरकार को घेर अपनी तिजोरियां भर सके। इस षड़यंत्र पर निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को गंभीरता से लेना चाहिए कि मर्दों की मौजूदगी में बच्चों और महिलाओं को क्यों आगे किया गया? किस जहनियत के चलते इनको बलि का बकरा बनने को मजबूर किया? पिछले कई सालों से यह देखा गया है कि उपद्रव में जमा भीड़ ही चोटिल होती है कोई इनका नेता नहीं। सब नेता पीछे रहते हैं, क्यों? नेता क्यों नहीं आगे होते?
आज ऐसे संगठनों ने अपनी अग्रिम पंक्ति में महिला सदस्यों को रखकर योजनाबद्ध तरीके से आक्रामक अभियान छेड़ रखा है। स्थानीय जागरूक लोगों, अभिभावकों, शिक्षकों के किसी प्रतिरोध या झड़प के बाद इन अराजक तत्वों का सर्वसुलभ आरोप होता है कि उनके महिला कार्यकर्ताओं के प्राइवेट पार्ट को निशाना बनाया गया अथवा उसे टच किया गया। ऐसे में उनका उद्देश्य महिलाओं के प्राइवेट पार्ट का बचाव कहीं से उनकी मंशा में नहीं देखा जाता। यदि उन्हें अपनी महिला कमांडो के प्राइवेट पार्ट की अस्मिता की चिंता होती तो उन्हें पीछे की पंक्ति में रख कर स्वयं आगे निकल कर आते! वस्तुस्थिति तो यह लगती है कि वे महिला प्राइवेट पार्ट का ढाल की तरह उपयोग करते हैं
वैसे तो मुझे महिलाओं के प्राइवेट पार्ट शब्द पर ही घोर ऐतराज है। क्या महिलाओं के कुछ ही पार्ट प्राइवेट होते हैं और शेष अंग प्राइवेट नहीं बल्कि सार्वजनिक होते हैं? यदि आपकी किसी सामाजिक लड़ाई में महिलाओं का साथ आवश्यक है तो उनके अंगों का वर्गीकरण कर अपनी कुत्सित मंशा की तुष्टि करना बंद करें!
जब आपकी महिला ब्रिगेड आगे बढ़ कर किसी सम्मानित व्यक्ति के गिरेबान पकड़ना चाहती है तो आप कैसे आशा रखते हैं कि उसका प्राइवेट पार्ट अनछुआ रह जायेगा? सामने वाला व्यक्ति क्या इसीलिए अपना बचाव करना छोड़ देगा कि कही उसका हाथ किसी फीमेल कॉकरोच के प्राइवेट पार्ट से टच न कर जाए!
कल्पना कीजिए यदि उस स्कूल की छात्राओं ने आपके वंदे मातरम राष्ट्रगीत की अवमानना के विरोध में आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया तो उन्हें झांसी की रानी की तरह अपने प्राइवेट पार्ट की कोई चिंता नहीं रह जाएगी और आपको दलबल सहित नंगे पांव वापस भागना पड़ सकता है
नारीवादी महिलाएं तो स्वयं स्वीकारती हैं कि अंगों या पार्टों में अश्लीलता नहीं होती, देखने वाले की नजरों में होती है तो फिर किसी अंग को प्राइवेट कहकर उसके बचाव में अलग दृष्टि क्यों अपनाई जाय! पूरी की पूरी महिला को इन हुल्लड़ प्रलापों से दूर रखें तो आपकी मंशा सही लगे!
किसी जागरूक संगठन के लिए आवश्यक है कि पहले शिक्षा के उत्थान के लिए अपना कोई सामाजिक योगदान देना सुनिश्चित करे ताकि उनकी बात असरकारक हो सके
यह सही है कि शिक्षा और मिड डे मिल में काफी विसंगतियां हैं पर इसका निवारण उच्च अधिकारियों और सक्षम पदाधिकारियों के द्वारा ही संभव है। किसी संगठन को उन पदाधिकारियों से बातचीत कर हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए।
कोई संगठन बैंकों में व्याप्त अनियमितता के लिए कैश रूम में या स्ट्रांग रूम में तो नहीं घुस सकता। यदि उसे चिकित्सा के क्षेत्र की अनियमितता या भ्रष्टाचार दिखाना है तो धड़ल्ले से आईसीयू में घुस सकता है क्या? फिर तो वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, शोधशालाओं और गोपनीय सुरक्षा कक्षों तक भी उनकी पहुंच बेरोकटोक कर दी जाए!

नेहरू के अहंकार से राहुल के अविश्वास तक: कांग्रेस के ‘सेना अपमान’ और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़

भारतीय सैन्य इतिहास में 1 सितंबर 1959 का दिन एक बड़ा मोड़ था, जब राजनीतिक अहंकार और विचारहीनता के चलते देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर संकट में डाला गया। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल के.एस. थिमैया ने जब चीन के बढ़ते खतरे और सेना की कमजोर तैयारियों को लेकर रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन की मनमानी का विरोध करते हुए इस्तीफा दिया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सैन्य सलाह सुनने के बजाय अपने करीबी मंत्री का पक्ष लिया। नेहरू के इस रवैये और संसद में आर्मी चीफ के अपमान ने न केवल भारतीय सेना के मनोबल को गहरी चोट पहुंचाई, बल्कि 1962 के युद्ध में देश की पराजय की नींव भी रख दी। सैन्य नेतृत्व की अनदेखी करने, जीती हुई बाजी कूटनीति की मेज पर गंवाने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल खड़े करने की यह कांग्रेसी सोच 1947 के नेहरू से शुरू होकर आज राहुल गांधी के दौर तक लगातार देखने को मिलती है।

कांग्रेस के कारनामे – उपेक्षा, अहंकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का इतिहास

‘सेना की जरूरत ही क्या है’ – जब नेहरू ने पहले सेना प्रमुख करियप्पा की सलाह का उड़ाया मजाक

1947 में आजादी के तुरंत बाद भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा ने जब देश की उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा और सेना के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा, तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी दूरदर्शिता को खारिज करते हुए कहा था कि भारत को सेना की आवश्यकता ही नहीं है, पुलिस ही देश चलाने के लिए काफी है। देश की सुरक्षा के प्रति इस बुनियादी उपेक्षा ने शुरुआती दौर में ही सेना के विकास और रक्षा ढांचे को कमजोर कर दिया।

एकतरफा सीजफायर और यूएन की भूल – PoK का नासूर पैदा करने वाली नीति

1948 में कबायली हमले के दौरान जब भारतीय सेना शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीछे धकेल रही थी, तब नेहरू ने सेना को आगे बढ़ने से रोककर एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया। सेना को अपनी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित करने का अवसर दिए बिना इस आंतरिक मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर ले जाने की ऐतिहासिक भूल की गई। इसी अदूरदर्शी फैसले के कारण पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) का विवाद पैदा हुआ, जिसका नुकसान देश आज तक उठा रहा है।

‘जीप घोटाला’ – रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की शुरुआत

1948 में वी.के. कृष्ण मेनन ब्रिटेन में उच्चायुक्त रहते हुए सेना के लिए जीप खरीद के चर्चित मामले के केंद्र में थे। निष्पक्ष जांच कराने के बजाय नेहरू ने उनका बचाव किया और बाद में उन्हें देश का रक्षा मंत्री तक बना दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सौदों में बिचौलियों और राजनीतिक संरक्षण का यह पहला बड़ा उदाहरण बना, जिसने रक्षा खरीद तंत्र को प्रभावित किया।

अनुच्छेद 370 और 35A का थोपाव – कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की नींव

1949 में सरदार पटेल और डॉ. आंबेडकर की असहमतियों के बावजूद नेहरू सरकार ने संविधान में अनुच्छेद 370 और बाद में 1954 के राष्ट्रपति आदेश से 35A को जोड़कर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया। अलग संविधान, अलग झंडे और दोहरी व्यवस्था ने देश की एकता को चोट पहुंचाई और दशकों तक कश्मीर में अलगाववाद व सीमा पार आतंकवाद का आधार तैयार किया, जिसकी कीमत भारतीय सैनिकों और नागरिकों ने अपने बलिदान से चुकाई।

कोको द्वीप की अनदेखी – चीन को सामरिक जासूसी अड्डा सौंपने वाली ऐतिहासिक चूक

1950 के दशक के आरंभ में बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीप समूह के ठीक उत्तर में स्थित रणनीतिक कोको द्वीप समूह पर भारत का मजबूत ऐतिहासिक दावा था। लेकिन नेहरू सरकार की उदासीनता और कूटनीतिक ढिलाई के कारण यह क्षेत्र म्यांमार के नियंत्रण में चला गया। आज इसी कोको द्वीप पर चीन ने अपना इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सैन्य निगरानी बेस बना रखा है, जहां से वह भारत के मिसाइल परीक्षणों, अंतरिक्ष अभियानों और नौसैनिक गतिविधियों पर सीधी नजर रखता है।

रदार पटेल की चिट्ठी की उपेक्षा – जब पहले गृह मंत्री की चेतावनी को रद्दी समझा गया

7 नवंबर 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को एक विस्तृत पत्र लिखकर तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत की सीमाओं पर मंडराते खतरे से आगाह किया था। पटेल ने स्पष्ट कहा था कि चीन शांति का मुखौटा पहनकर आक्रामकता की तैयारी कर रहा है। लेकिन नेहरू ने अपने उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की इस दूरदर्शी चेतावनी को भी यह कहकर खारिज कर दिया कि चीन कभी भारत पर हमला नहीं करेगा।

यूएन सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट पर चीन को तरजीह देने की भूल

1950 के दशक में जब वैश्विक मंच पर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के अनौपचारिक अवसर मिले, तब नेहरू ने चीन के पहले हक और एशियाई एकजुटता के नाम पर इसे ठुकरा दिया। भारत के हितों की अनदेखी कर चीन की स्थायी सदस्यता की पैरवी करने की इस भूल का नुकसान आज तक भारत उठा रहा है, जहां वही चीन वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत की राह में बाधाएं खड़ी करता है और आतंकवादियों का बचाव करता है।

पंचशील समझौता और तिब्बत सरेंडर – बफर स्टेट गंवाने की ऐतिहासिक भूल

1954 में नेहरू सरकार ने चीन के साथ पंचशील समझौता करते हुए बिना किसी सीमा निर्धारण के तिब्बत पर चीन के कब्जे को आधिकारिक मान्यता दे दी। भारत ने सदियों पुराने अपने सामरिक, व्यापारिक और सैन्य अधिकार बिना किसी ठोस गारंटी के छोड़ दिए। भारत और चीन के बीच की ऐतिहासिक बफर सीमा समाप्त हो गई और चीन की सेना सीधे भारत की हिमालयी सीमाओं पर आकर तैनात हो गई।

जनरल थिमैया की अनसुनी चेतावनी और ‘नेहरू-मेनन’ की मनमानी

1959 में जब सीमा पर चीनी गतिविधियां बढ़ रही थीं, तब जनरल थिमैया ने सरकार को सेना की स्थिति, हथियारों की कमी और चीन के आक्रामक इरादों को लेकर आगाह किया था। लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने पेशेवर सैन्य सलाह को दरकिनार करते हुए रक्षा नीतियों में दखलंदाजी शुरू कर दी। सेना की जरूरतों को पूरा करने के बजाय आयुध कारखानों की प्राथमिकताओं को भटकाया गया और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर पसंदीदा अफसरों को पदोन्नत किया गया। जब थिमैया ने इसके विरोध में इस्तीफा दिया, तो नेहरू सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय मानने के बजाय अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया।

अक्साई चिन पर चीनी कब्जा – ‘घास का तिनका नहीं उगता’ कहकर 38,000 वर्ग किमी जमीन गंवाना

1950 के दशक के मध्य में जब चीन ने भारत के लद्दाख स्थित अक्साई चिन क्षेत्र में गुपचुप तरीके से शिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग (Highway 179) बना लिया, तब नेहरू सरकार वर्षों तक देश और संसद से इस घुसपैठ को छिपाए रही। जब 1959 में यह सच सामने आया, तो संसद में भारतीय सीमा की रक्षा का संकल्प लेने के बजाय प्रधानमंत्री नेहरू ने यह कहकर अपनी लाचारी पर पर्दा डाला कि ‘अक्साई चिन में तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता, वह बंजर इलाका है।’ इस गैर-जिम्मेदाराना रुख के कारण भारत ने अपनी 38,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक संप्रभु भूमि हमेशा के लिए गंवा दी। 

संसद में सेना प्रमुख का सार्वजनिक अपमान – सैन्य मनोबल पर गहरी चोट

1959 में नेहरू ने जनरल थिमैया को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना तो लिया, लेकिन इसके तुरंत बाद संसद के पटल पर दिए अपने बयान में आर्मी चीफ के रुख को मामूली और तुच्छ कहकर खारिज कर दिया। देश की संसद में सेना प्रमुख के स्वाभिमान को आहत करने की इस घटना ने पूरी सैन्य कमान का मनोबल तोड़ दिया। यह संदेश गया कि तत्कालीन सरकार के लिए राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक हठ था।
हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट को दबाना – 1962 की नाकामी पर पर्दा डालने का काम
1963 में 1962 की पराजय के कारणों की जांच के लिए सेना ने लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर पी.एस. भगत की समिति बनाई थी। इस रिपोर्ट में साफ दर्ज था कि विफलता के लिए सेना नहीं, बल्कि अपरिपक्व फॉरवर्ड पॉलिसी, सैन्य सलाह की अनदेखी और राजनीतिक दखलंदाजी जिम्मेदार थी। कांग्रेस सरकारों ने दशकों तक इस रिपोर्ट को गोपनीय बनाकर दबाए रखा, ताकि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की कमियां सामने न आ सकें।
शक्सगाम घाटी का हस्तांतरण – चीन-पाक गठजोड़ पर कूटनीतिक लाचारी
1963 में 1962 के युद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने भारत के PoK क्षेत्र की 5,180 वर्ग किलोमीटर की सामरिक शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी। 1948 में PoK का मुद्दा अधूरा छोड़ने और 1962 की पराजय के कारण उपजी दुर्बलता के चलते नेहरू सरकार चीन और पाकिस्तान के इस गठजोड़ और भारतीय भूमि के बंटवारे को रोकने में पूरी तरह विफल रही।