‘IB की रिपोर्ट में दावा- बंगाल में TMC जीतेगी 220 तक सीटें’: क्या है सच?

                                                                                                                   साभार: @PIBFactCheck
पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले सोशल मीडिया पर मचे तूफान को केंद्र सरकार ने शांत कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक कथित ‘IB रिपोर्ट’ वायरल हो रही थी, जिसमें दावा किया गया कि TMC 220 सीटें जीतकर सत्ता में लौट रही है। शुक्रवार (1 मई 2026) को PIB ने साफ कर दिया कि यह रिपोर्ट पूरी तरह फर्जी है।

PIB ने खोली पोल

सोशल मीडिया पर ‘पैरामिलिट्री असेसमेंट’ के नाम से एक लेटर वायरल हुआ। इसमें दिखाया गया कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने TMC की बड़ी जीत का अनुमान लगाया है। PIB ने X पर पोस्ट कर बताया कि IB ने ऐसी कोई रिपोर्ट कभी जारी नहीं की। यह किसी की शरारत है। सरकार ने अपील की है कि लोग ऐसी अफवाहों पर यकीन न करें। किसी भी खबर को केवल सरकारी वेबसाइट से ही चेक करें।

फर्जी IB रिपोर्ट पर PIB का बड़ा खुलासा

चुनावी माहौल में माहौल बिगाड़ने के लिए अक्सर ऐसी झूठी खबरें फैलाई जाती हैं। PIB ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध मैसेज या फोटो को आगे शेयर न करें। किसी भी जानकारी को केवल सरकारी वेबसाइट या आधिकारिक सूत्रों से ही चेक करें। गलत सूचना फैलाना कानूनन जुर्म भी हो सकता है।

फैक्ट चेक यूनिट का कहना है कि चुनाव जैसे संवेदनशील समय में ऐसी फर्जी रिपोर्ट वोटरों को गुमराह कर सकती हैं। नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि वे बिना जाँचे किसी भी खबर को सच न मानें। सोशल मीडिया पर चल रहे दावों की पुष्टि करना बहुत जरूरी है ताकि शांति बनी रहे।

कांग्रेस के मुखपत्र National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा, उस बांग्लादेश के ‘निष्पक्ष चुनाव’ की दे रहा दुहाई जहाँ विपक्ष को बोलने की आजादी तक नहीं

     National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा (साभार: National Herald/TheDailyStar)
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद पूरे देश में हिंसा फैली, जो आज भी जारी है खासकर हिंदुओं के खिलाफ। फिर शेख हसीना की सरकार गिरने के लगभग 1.5 साल बाद बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में भी हिंसा की कई खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कांग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का मानना है कि ‘भारत को बांग्लादेश से सीखने की जरूरत है।’

दरअसल, खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताने वाले सौरभ सेन ने नेशनल हेराल्ड के लिए एक आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल को सौरभ सेन ने स्वीडन के मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज’ के ऑडिट के हवाले से लिखा है, जो दावा कर रहा है कि बांग्लादेश में आम चुनाव 2026 में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और उन दावों को खारिज किया जो बांग्लादेश के विपक्षी दल कहते आ रहे हैं कि चुनाव में धाँधली हुई है।

अगर भारत में हुए प्रथम चुनाव से लेकर चर्चा की जाए कांग्रेस के कार्यकाल में ही सबसे ज्यादा धांधलियां सामने आएँगी। जहाँ हारे हुए कांग्रेस उम्मीदवार को कांग्रेस सुप्रीमो के आदेश पर जीता हुआ घोषित कर दिया जाता था। 

कांग्रेस  की आवाज बनकर नैरेटिव गढ़ने वाले ‘नेशनल हेराल्ड’ ने राहुल गाँधी के ही स्वर में अपनी बात रखी है। आर्टिकल में भारत के चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए, सरकार पर तंज कसा गया और यहाँ तक कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास न होने का ठीकरा भी सरकार पर ही फोड़ डाला।

नेशनल हेराल्ड के आर्टिकल की हेडलाइन- बांग्लादेश में हुए ‘ऑडिट’ से भारत के लिए सबक, से ही भारत-विरोधी स्वर गूँज रहे हैं। यहाँ लेखक सौरभ सेन दावा करते हैं कि बांग्लादेश तो भारत से कहीं आगे और बेहतर देश है और भारत को उससे कुछ सीखना चाहिए, जबकि हकीकत से इससे कहीं परे है। यहाँ खासतौर से हाल ही में बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 को ‘पारदर्शी’ बताने का दावा कर भारत को सबक लेनी की बात कही जा रही है।

यहाँ नेशनल हेराल्ड उस देश के चुनावों में ‘पारदर्शी’ की बात कर रहा है, जहाँ कई सालों तक सत्ता में रही शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ को ही चुनाव लड़ने से रोका गया। पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनाव पर कई सवाल खड़े हुए, जब चुनावों में हिंसा और हेराफेरी की खबरे सामने आईं।

सच: बांग्लादेश में चुनावी हिंसा और भारत में सख्त नियम

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में लिखा- भारत का चुनाव आयोग चाहे तो चुनाव और नतीजों की जाँच को और ज्यादा पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद बना सकता है।

जबकि सच क्या है, यह सबके सामने आ चुका है। कैसे बांग्लादेश में चुनावों में हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। कहीं मतदान केंद्र पर बम धमाका हुआ, तो कहीं गोलीबारी हुई, कई मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों की आपसी झड़प में माहौल गरमाया। मानवाधिकार संगठन ओधिकार के अनुसार, 13 फरवरी से 28 फरवरी के बीच 104 हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई और 476 से ज्यादा लोग घायल हुए।

अभी बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में कितने बम पकडे गए, अगर नहीं पकडे जाते मतदान के दौरान क्या होता जनता देखती रही है।  

रही पारदर्शी की बात, तो बांग्लादेश चुनावों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी BNP के नेताओं ने ही वोटिंग प्रक्रिया में ‘हेराफेरी‘ के आरोप लगाए। ऐसे ही चुनावों से पहले हवा बनाने वाली जमात-ए-इस्लामी ने भी यही आरोप लगाए।

तो यहाँ भारत को क्या सीखने की जरूरत है? वोटिंग प्रक्रिया में हेराफेरी या मतदाताओं पर हिंसा? क्योंकि हाल ही में बंगाल चुनाव देख लीजिए। पिछले बंगाल चुनाव 2021 में मिली सभी शिकायतों का चुनाव आयोग ने हल ढूँढा। भारत के चुनाव आयोग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। जिस बंगाल में साल 2021 के चुनाव परिणामों के बाद हिंसा फैली, उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने मतदान के दौरान देशभर से आए भारी सुरक्षाबल को तैनात किया।

यानी अगर कोई प्रदेश हिंसा के लिए जाना भी जा रहा है, तो चुनाव आयोग अपनी तरफ से कायदे-कानून बनाने में कमी नहीं कर रहा है। जहाँ नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में बैलट पेपर पर हुए चुनावों की वाहवाही करते नहीं थक रहा है, वहीं भारत में EVM से ‘पारदर्शिता’ के साथ चुनाव संपन्न हो रहे हैं। और अब तो चुनाव आयोग EVM से छेड़छाड़ की घटना पर भी सख्त हो गया है।

तो इससे पता लगता है कि भारत का चुनाव आयोग चाहता नहीं, करके दिखाता है कि कैसे भारत में चुनाव पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद होते हैं।

सच: बांग्लादेश में ‘नाम’ का महिला आरक्षण और भारत में महिला आरक्षण पर सरकार ‘गंभीर’

आर्टिकल में यह भी लिखा गया, “भारत में बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में तेजी से पेश किया। पार्टी को पता था कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, फिर भी उसने ऐसा किया। इसका मकसद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले महिलाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करना था।”

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

ये जो नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में महिलाओं के आरक्षण पर बात करता है, क्या इन्होंने कभी बांग्लादेश में महिालओं के हालात पर मुद्दा उठाया है। बांग्लादेश में महिलाओं की हालत क्या है? यह सबको पता है। आए दिन गैंगरेप की घटनाएँ और मारपीट की घटनाओं से साफ पता लगता है कि बांग्लादेश में महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता है।

खासकर हिंदू महिलाएँ, जो घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें घर में भी सुरक्षित नहीं छोड़ते हैं। महिलाओं को आरक्षण देने वाला बांग्लादेश ही है, जिसे महिला का शक्ति रूप ‘माँ दुर्गा’ की पूजा से दिक्कत है। हर साल दुर्गा पूजा में हिंसा की खबरें सामने आती हैं, कहीं देवी की मूर्ति तोड़ी जाती है, कहीं पत्थरबाजी होती है।

और बांग्लादेश में महिला आरक्षण पर बात करने वाला नेशनल हेराल्ड कांग्रेस की ही आवाज है, जिसने भारत की संसद में महिला आरक्षण कानून का विरोध किया। तो कहना बिल्कुल शोा नहीं देता कि भारत को यह सीखने की जरूरत है कि महिलाओं का कैसे सम्मान करना है?

‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने वाली कांग्रेस को बांग्लादेश से ‘प्रेम’, पर भारत का ‘विरोध’

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में भारत को बांग्लादेश से जो भी सीख लेने की बात कही, वह सीख अगर भारत ने ले ली तो उसकी भी हालत बांग्लादेश जैसी ही होगी। वही बांग्लादेश, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, विरोध प्रदर्शनों को बल से दबाया जाता है, विपक्षी दलों को प्रतिबंध कर दिया जाता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं।
एक ओर कांग्रेस है, जो संसद में रोजाना लोकतंत्र और संविधान की बात कर लगातार सरकार पर हमलावर रहती है, और दूसरी ओर उसी का मुखपत्र जो लोकतंत्र के नाम पर डूबे हुए बांग्लादेश से भारत को सबक लेने की सीख दे रहा है। असल में कांग्रेस सिर्फ भारत-विरोधी बात करना जानती है, चाहे उसे भारत से कमतर देश से ही क्यों न भारत की तुलना करनी पड़े।
कांग्रेस पार्टी बुद्धीजीवी बनकर अपने समाचार पत्र में महिलाओं के आरक्षम की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो पीछे हट जाती है। इसका ताजा उदाहरण लोकसभा में देखने को मिला, जब सरकार महिला आरक्षण कानून लेकर आई और कांग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया।
कांग्रेस को नहीं बोलना चाहिए कि भारत को क्या और किससे सीखने की जरूरत है। ये वही लोग हैं जो वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन बैलेट पेपर की निष्पक्षता उन्हें अच्छी लगती है। ये वही लोग हैं, जो भारत के हित में एक बात कहने में हिचकते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की वाहवाही करते नहीं थकते।

अगर राहुल Leader of Propaganda नहीं Leader of Opposition है तो देश को बताएं चीन के साथ क्या MoU किया है? संसद और मीडिया खामोश क्यों?


आज जिस नेता/पार्टी --सत्ता और विपक्ष -- को देखो जनता को संविधान के रक्षक और देशप्रेमी होने की बात से गुमराह करने की बात करते फिरते हैं। लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि राहुल गाँधी से पूछे कि चीन के साथ क्या MoU साइन किया है? क्या सभी की अंतरआत्मा मर गयी है? अगर सभी की अंतरआत्मा मर गयी है फिर क्यों देशभक्ति और संविधान की दुहाई देकर जनता को पागल बनाते हो? अगर यही गुप्त MoU किसी बीजेपी नेता ने किया होता क्या तब भी चुप रहते, यदि नहीं तो अब क्यों नहीं? इसको क्या कहा जाए : बुजदिली, कायरता, गुलामी मानसिकता या फिर जयचन्द और मीर ज़फर के वंशज? मीडिया भी इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है, क्यों? आज देश को जरुरत है लालबहादुर शास्त्री जैसे एक सख्त राज शासक की।     

कांग्रेस के युवराज और सांसद राहुल गांधी जिस संविधान की प्रति हाथ में लेकर लोकतंत्र बचाने की बातें करते हैं, वही राहुल गांधी पिछले कई वर्षों से देश की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। कभी चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” का आरोप, कभी ईवीएम की खराबी, कभी संसद को “अहंकार की ईंटों” से बनी संस्था बताना, कभी अदालतों और जांच एजेंसियों को RSS के कब्जे में बताना, तो कभी पूरे “Indian State” से लड़ने की बात कहना, यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार प्रहार है। विडंबना यह है कि जब कांग्रेस को किसी चुनाव में जीत मिलती है तो वही संस्थाएं राहुल गांधी को निष्पक्ष नजर आने लगती हैं, लेकिन हार या राजनीतिक संकट आते ही लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगता है। यह राजनीति नहीं, बल्कि संस्थाओं पर अविश्वास फैलाने का खतरनाक नैरेटिव है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार जरूर है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर देश में अविश्वास का वातावरण बनाना बेहद गंभीर विषय है। राहुल गांधी बार-बार चुनाव आयोग, संसद, न्यायपालिका और प्रशासनिक संस्थाओं को पक्षपाती बताकर आखिर किस मंसूबे को साधना चाहते हैं? यदि हर संस्था पर सवाल खड़े किए जाएंगे, तो आम जनता का भरोसा किस पर बचेगा? राजनीतिक लड़ाई विचारों और जनसमर्थन से लड़ी जाती है, संस्थाओं को बदनाम करके नहीं।

राहुल ने चुनाव आयोग तक को पक्षपाती बता दिया
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग तक को पक्षपाती बता दिया। दिसंबर 2025 में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गांधी ने SIR और चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए उन्हें सवालों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिशि की। लेकिन अमित शाह ने राहुल को उसी संविधान की दूसरी अनुसूची की याद दिलाई, जिसमें आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया लिखी है। अमित शाह ने साफ कहा कि कांग्रेस जिस चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगा रही है, उसकी नियुक्ति प्रक्रिया वही है जिस पर स्वयं कांग्रेस ने संसद में सहमति दी थी। सच यही है कि जैसे ही जनता ने अपना स्पष्ट जनादेश तीसरी बार नरेंद्र मोदी को दिया, कांग्रेस को आयोग पक्षपाती दिखने लगा। बड़ा सवाल यह है कि अगर नियुक्ति प्रक्रिया सही थी, तो अचानक आयोग गलत कैसे हो गया?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संविधान नहीं, मनुस्मृति चाहिए
27 जून 2025 को राहुल गांधी ने RSS पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि संघ संविधान की जगह “मनुस्मृति” लागू करना चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर वैचारिक दबाव बनाया जा रहा है और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर किया जा रहा है। राहुल ने कहा कि संविधान समानता, न्याय और अधिकारों की गारंटी देता है, जबकि संघ की सोच देश को विभाजित करने वाली है। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और संविधान बनाम विचारधारा की बहस छिड़ गई।

वक्फ कानून को संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया
अहमदाबाद में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान राहुल गांधी ने 9 अप्रैल 2025 को वक्फ कानून को “संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार संवैधानिक मूल्यों को कमजोर कर अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर प्रहार कर रही है। राहुल ने कहा कि संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है, लेकिन सरकार संस्थाओं का इस्तेमाल कर एक विशेष विचारधारा थोपने की कोशिश कर रही है। उनके इस बयान ने संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया।

हम अब Indian State से लड़ रहे हैं- राहुल गांधी
राहुल गांधी विरोध की राजनीति करते-करते इतने गिर गए कि राष्ट्रविरोधी भाषा तक बोलने लग गए। उन्होंने सवाल खड़ा करते हुए कहा कि BJP और RSS ने “लगभग हर संस्था पर कब्जा कर लिया है” और विपक्ष अब केवल राजनीतिक दलों से नहीं, बल्कि “Indian State” से लड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियां, प्रशासनिक संस्थाएं और लोकतांत्रिक ढांचा निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर रहे। राहुल के इस बयान पर भारी विवाद हुआ और इसे संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सीधा हमला बताया गया। इस टिप्पणी को लेकर उनके खिलाफ FIR तक दर्ज की गई।

EVM पर सवाल दागने राहुल गांधी और राठी साथ आए
राहुल गांधी ने ध्रुव राठी के साथ मिलकर एक नैरेटिव बनाया गया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है। उन्होंने 11 जुलाई 2024 ईवीएम को लेकर यह झूठ फैलाया। यहां तक कि बिजनेसमैन एलन मस्क ने 15 जून को लिखा- EVM को खत्म कर देना चाहिए। इसके एक दिन बाद 16 जून, 2024 को मिड डे ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है, जिसने राजनीतिक हलकों और आम जनता में विवाद खड़ा कर दिया। चुनाव अधिकारी ने मिड-डे की रिपोर्ट को ‘झूठी खबर’ कहकर खारिज कर दिया। अधिकारी ने पब्लिकेशन को मानहानि का नोटिस जारी किया। नोटिस मिलते ही मिड डे ने माफीनामा प्रकाशित कर दिया, लेकिन इंडी अलायंस के नेता राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे समेत विपक्षी नेता इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश करते रहे। उधर ध्रुव राठी और अन्य लेफ्ट लिबरल एजेंडा चलाने वालों ने इसे जोर-शोर से उठाकर मोदी सरकार को बदनाम करने की कोशिश की।

संवैधानिक संस्थाओं को प्रधानमंत्री की निजी संपत्ति की संज्ञा दी
वायनाड में चुनाव प्रचार के दौरान 15 अप्रैल 2024 को राहुल गांधी ने अपरोक्ष रूप से कहा कि “ऐसा लग रहा है कि संवैधानिक संस्थाएं प्रधानमंत्री मोदी की निजी संपत्ति हैं, जबकि वास्तविकता में यह राष्ट्र की हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों और अन्य संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए कर रही है। राहुल ने कहा कि लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण होती है, लेकिन मौजूदा दौर में उन पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा है। उनके इस बयान ने चुनावी माहौल में संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर नई बहस छेड़ दी।

नए संसद भवन पर हमला, उद्घाटन समारोह का बहिष्कार
नए संसद भवन के उद्घाटन को लेकर 24 मई 2023 को राहुल गांधी ने कहा कि “संसद अहंकार की ईंटों से नहीं, संवैधानिक मूल्यों से बनती है।” उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संसद जैसी सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बना रही है। राहुल ने कहा कि संसद केवल भवन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है और उसका सम्मान सभी संवैधानिक परंपराओं के अनुरूप होना चाहिए। विपक्ष ने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार भी किया, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।

चीन मुद्दे पर सेना, सरकार और संस्थाओं पर ही किए सवाल
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने 16 दिसंबर को इस मामले पर दावा किया कि भारत चीन से युद्ध के खतरे की अनदेखी कर रहा है। राहुल ने कहा कि चीन भारत की सीमा पर युद्ध की तैयारी कर रहा है और भारत सरकार सोई हुई है। कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि चीन ने 2,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है, 20 भारतीय सैनिकों को मार डाला है और ‘अरुणाचल प्रदेश में हमारे जवानों की पिटाई कर रहा है।’ राहुल ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर संसद और देश को पूरी सच्चाई नहीं बताई जा रही। उनके इस बयान पर भारी विवाद हुआ और सरकार ने इसे सेना के मनोबल को कमजोर करने वाला बताया। बीजेपी ने पलटवार करते हुए उन पर सेना का मनोबल गिराने का आरोप लगाया और कटाक्ष करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वाला भारत नहीं है।

चीनी हमले और कब्जे के झूठ पर एससी से मिली फटकार
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी चीनी हमले पर लगातार झूठ बोल रहे हैं कि चीन ने भारतीय जमीन पर कब्जा किया, जबकि सरकार के साथ सेना भी इनकार कर चुकी है। झूठ को सच साबित करने के लिए राहुल ने कई एडिटेड वीडियो भी शेयर किए लेकिन लोगों ने उसमें कई खामियां निकाल दी। फिर राहुल ने ट्वीट कर कहा कि अब चीन के कब्जे के सच मान लेना चाहिए। सच्चाई यह है कि मोदी सरकार की सख्त नीति के कारण चीन को एलएसी से काफी पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी राहुल गांधी को फटकार लगाते हुए पूछा है कि आपको कैसे पता चला कि चीन ने जमीन पर कब्जा किया है तो राहुल गांधी के झूठ की बोलती बंद हो गई।

J&K को दिखाया पाकिस्तान का हिस्सा, नॉर्थ ईस्ट को चीन में घुसाया: गलत मैप शेयर करने पर नेपाल एयरलाइंस को गाली पड़ी तो बोले- SORRY, गलती हो गई

    नेपाल एयरलाइंंस ने भारत के J&K को पाकिस्तान और नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाते मैप किया शेयर (साभार: X-Nepal Airlines)
नेपाल में बालेन शाह की सरकार बनने के बाद एक और भारत-विरोधी कारनामे सामने आ रहे हैं। अब नेपाल एयरलाइंस ने नक्शा (मैप) जारी किया, जिसमें पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का और पूरे नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाया गया है। भारत के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एयरलाइन से जवाबदेही माँगी, तब जाकर एयरलाइन ने ऐसा भ्रामक नक्शा दिखाने के लिए माफी माँगी है।

दरअसल, नेपाल की ‘नेपाल एयरलाइंस’ ने 29 अप्रैल 2026 ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट पर अपने फ्लाइट नेटवर्क को दिखाते हुए पूरी दुनिया का एक नक्शा पोस्ट किया। इस नक्शे में सबसे आपत्तिजनक बात थी कि इसमें भारत के अधिकतर हिस्सों को चीन और पाकिस्तान के नक्शे में दिखाया गया।

नक्शे में खासकर पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया, जिस पर भारत के नेटिजन्स भड़क गए। इतना ही नहीं भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे सिक्किम, दार्जीलिंग समेत पूरे नॉर्थ ईस्ट को भी चीन के हिस्से में दिखाया गया। यह देखकर भारत के नेटिजंस और ज्यादा गुस्सा गए।

नेपाल एयरलाइंस पर भारत के नेटिजन्स का फूटा गुस्सा

इस हरकत के बाद नेपाल एयरलाइंस भारत के नेटिजन्स के निशाने पर आ गया। लोगों ने नेपाल एयरलाइंस से जवाबदेही माँगी। ‘एक्स’ पर #NepalAirlines और #JammuKashmir से जुड़े हैशटैग के साथ पोस्ट वायरल होने लगे, जिसमें यूजर्स ने इसे भारत-विरोधी और जानबूझकर किया गया गलत काम बताया।

दिव्या गंडोत्रा ​​टंडन नाम की यूजर ने लिखा, “भारत ने दशकों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। खुली सीमा से लेकर लाखों नेपाली नागरिकों को रोजगार देने तक, व्यापार के लिए भारत के बंदरगाह उपलब्ध कराने से लेकर ईंधन पाइपलाइन, बिजली परियोजनाएँ, आपदा के समय मदद, बुनियादी ढाँचे का निर्माण, स्कॉलरशिप और सैन्य सहयोग तक, भारत हमेशा नेपाल के साथ खड़ा रहा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “लेकिन ऐसे में नेपाल एयरलाइंस की ओर से जारी एक फ्लाइट नेटवर्क मैप ने हैरान कर दिया। इस मैप में जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के साथ दिखाया गया। यह कोई साधारण डिजाइन की गलती नहीं लगती, बल्कि एक गंभीर और संवेदनशील मामला है। जब भारत आज भी नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साझेदार है, तब एक राष्ट्रीय एयरलाइन से ऐसी लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती। यह केवल एक नक्शा नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है, जो कई सवाल खड़े करता है।”

असम के वोकेशनल टीचर्स एसोसिएशन के आधिकारिक हैंडल ने भी आपत्ति जताते हुए लिखा, “भारत कई दशकों से नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साथी रहा है। ऐसे में नेपाल एयरलाइंस द्वारा अपने फ्लाइट मैप में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। यह एक गंभीर गलती है, जिसे सुधारा जाना चाहिए।”

ऐसे ही भोजपुरी स्टार और RJD नेता खेसारी लाल यादव ने भी लिखा, “कोई बता पाएगा की क्या सोच के नेपाल एयरलाइंस भारत के नक्शे में ऐसा छेड़ छाढ़ किया है और वो भी जम्मू कश्मीर को लेकर? ये मामूली बात नहीं है, जानबूझकर किया हुआ काम लगता हैं। इसको चिढ़ाना बोलते हैं।”

‘द दार्जीलिंग क्रोनिकल’ नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “नेपाल एयरलाइंस की नजर में दुनिया कुछ अलग ही है। उनके नक्शे को देखें तो ऐसा लगता है कि भारत का पूरा उत्तर-पश्चिम, पूरा उत्तर-पूर्व, दार्जिलिंग, सिक्किम और यहाँ तक कि म्यांमार का हिस्सा भी चीन में शामिल कर दिया गया है। काठमांडू में आजकल लोग क्या फूँक रहे हैं?”

नेपाल एयरलाइंस ने माँगी माफी

भारत के यूजर्स की कड़ी आलोचना के बाद नेपाल एयरलाइंस ने आखिरकार सार्वजनिक तौर पर माफी माँगी। एयरलाइन ने कहा कि वे अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर हाल ही में साझा किए गए फ्लाइट नेटवर्क मैप में हुई गलती के लिए दिल से माफी माँगते हैं।

यह भी कहा कि इस नक्शे में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लेकर गंभीर त्रुटियाँ थीं, जो नेपाल सरकार या नेपाल एयरलाइंस की आधिकारिक स्थिति को बिल्कुल भी नहीं दर्शाती है।

नेपाल का भारत-विरोधी रुख और बालेन शाह सरकार में उथल-पुथल

नेपाल में नई बालेन शाह सरकार बनने के बाद से ही नेपाल का भारत-विरोधी रुख सामने आता जा रहा है। हाल ही में बालेन शाह सरकार नई भंसार नीति लाई थी, जिसके तहत भारत से लाए जाने वाले 100 से अधिक नेपाली रुपये (लगभग ₹63) के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाई थी, जिसके बाद भी बालेन शाह सरकार का विरोध हुआ था।

यह भी किसी से नहीं छिपा कि बालेन शाह सरकार अपने ही फैसलों से गतिरोध का सामना कर रही है, उनके बड़े-बड़े मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिसके बाद उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ा। कुल मिलाकर नई बालेन शाह सरकार देश को चलाने में असमर्थ साबित हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट का नंगा नाच; पवन खेड़ा को जमानत, सुप्रीम कोर्ट के जजों का एक निर्लज्ज फैसला; Personal Liberty का मतलब बता दिया, जालसाजी करो, किसी का भी चरित्र हनन करो पर गिरफ़्तारी नहीं होगी

सुभाष चन्द्र

किसी का चरित्र हनन करों और कोई अन्य अपराध अगर निचली अदालत सख्ती दिखा रही है तो दलाल वकीलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाओ कोई गिरफ़्तारी नहीं। क्या इसीका नाम कानून है? कानून अँधा नहीं दलाल वकीलों और उनके इशारे पर नाचने वाले जजों ने बनाया हुआ है। जब तक देश में दलाल वकीलों और उनकी  कठपुतली बने जज रहेंगे इंसाफ को भूल जाना चाहिए। अगर इसी तरह सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाही होनी है क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट को बंद कर देना चाहिए। नहीं चाहिए ऐसे अदालतें जो आदमी और दलाल वकीलों के इशारे पर डांस करती हो। सुप्रीम ने साबित कर दिया कि देश में दो कानून है एक आम नागरिक को निचोड़ने के लिए और दूसरा नेताओं को ऐश करवाने के लिए। जब सुप्रीम कोर्ट ही कानून में भेदभाव करे तो निचली अदालतों को दोष नहीं देना चाहिए।  

जब पवन खेड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में गुवाहाटी हाई कोर्ट के खिलाफ अपील की, तो मैंने कई जगह टिप्पणी की थी कि अब उसे जमानत मिल जाएगी और आज वही हुआ।  सवाल इस बात है कि फिर सुप्रीम कोर्ट को उसे हाई कोर्ट भेजने की जरूरत ही क्या थी, उसी दिन ही खुद बेल दे देते सुप्रीम कोर्ट के जजों से बेहतर और उचित तो हाई कोर्ट के जस्टिस पार्थिव ज्योति सैकिया थे जिन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पर आरोप लगाते तो political overtones हो सकता था लेकिन खेड़ा ने एक निर्दोष महिला पर दोषारोपण किया

लेखक 
चर्चित YouTuber 
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेके माहेश्वरी और AS Chandurkar ने घिनौना तर्क देकर कहा कि यह मामला Political Rivalry का लगता है जिस वजह से उसकी गिरफ़्तारी पर रोक लगनी चाहिए उन्होंने कहा -

“The allegations and counter - allegations, as apparent in the present case, prima facie, appear to be politically motivated and seemingly influenced by such rivalry, rather than disclosing a situation warranting custodial interrogation”.

“The right of personal liberty is a cherished fundamental right, and any deprivation thereof must be justified on a higher threshold, particularly where the surrounding circumstances may indicate the presence of political overtones”.

मतलब खेड़ा अपराध करेगा और फिर आप उसे Personal Liberty के लिए जमानत दे देंगे, यह काम फिर जस्टिस सैकिया ने क्यों नहीं किया? आप political overtones की बात कर रहे हैं लेकिन पवन खेड़ा की रिंकी भुईया के साथ क्या राजनीतिक दुश्मनी थी जो खेड़ा ने उसका चरित्र हनन करने के लिए फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर आरोप लगाए जो कुछ जवाब दिया खेड़ा को वह हिमंता ने दिया लेकिन रिंकी भुईया ने तो कुछ नहीं कहा, बस केस दर्ज किया है Therefore, allegations were malicious but the reactions from Himanta were justified and quite warranted.

आपने खेड़ा को जांच में सहयोग करने और सबूतों से छेड़छाड़ न करने के लिए कहा है। क्या इतना शरीफ आदमी है खेड़ा जो आपकी बातें मानेगा उसे पता है अभिषेक मनु सिंघवी की सुप्रीम कोर्ट में “चलती” है वो तो जांच में बहाने बना बना कर जाएगा ही नहीं और जब फर्जी दस्तावेज़ बनाए तो उन्हें नष्ट करने की भी कोशिश करेगा

आज के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने एक बार न्यायपालिका पर भरोसा फिर से ख़त्म कर दिया और कोई भी कह सकता है Setting और Paisa खेल कर गया 

सुप्रीम कोर्ट के ऐसे ही निर्णयों ने कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं की हिम्मत बढ़ा रखी है

इस वजह से वे लोग जो मुंह में आता है बोलते हैं क्योंकि उन्हें पता है अंत में सुप्रीम कोर्ट से बचाव हो जाएगा। Political Rivalry का मतलब यह नहीं है कि आप विरोधियों को अपशब्द कहने की अनुमति दे देंगे जो आज आपने दे दी 

कुछ दिन पहले खड़गे ने प्रधानमंत्री को Terrorist कहा इसलिए ही बहुत से केस दर्ज नहीं होते कि सुप्रीम कोर्ट हाथ बांध कर बैठ जाएगा राहुल गांधी हो या केजरीवाल हो, उन्हें अभय दिया हुआ है राहुल गांधी देश के खिलाफ, सेना के खिलाफ और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बोलता है और केजरीवाल ने तो आपकी न्यायपालिका पर कलंक लगा दिया लेकिन आप चुप बैठे है

आज सुप्रीम कोर्ट ने खेड़ा को बेल देकर साफ़ कर दिया कि कोई भी किसी पर फर्जी दस्तावेजों के साथ आरोप लगा सकता लेकिन गिरफ्तार नहीं किया जाएगा यानी जालसाजी एक आधिकारिक धंधा घोषित कर दिया

पौराणिक गाथा : माँ चण्डिका जयंती


माँ चण्डिका जयंती देवी दुर्गा के उग्र और शक्ति-स्वरूप माँ चण्डिका के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। इन्हें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का एकीकृत रूप माना जाता है

2026 में तिथि
इस साल माँ चण्डिका जयंती शुक्रवार, 1 मई 2026 को वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि पर पड़ रही है
माँ चण्डिका कौन हैं?
स्वरूप: दुर्गा सप्तशती के अनुसार माँ चण्डिका दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी हैं
महिमा: शास्त्र कहते हैं कि माँ की उग्रता भक्तों के लिए सुरक्षा कवच है। वे भय, बाधा और शत्रुओं का नाश करती हैं
अन्य नाम: प्रचंड चण्डिका, माँ छिन्नमस्ता, येल्लम्मा, रेणुका माता
महत्व और लाभ
भय-बाधा नाश: इस दिन पूजा से डर, तनाव, नकारात्मक ऊर्जा और तंत्र-बाधा दूर होती है
शक्ति-साहस: साधक को आत्मबल, साहस और विजय का आशीर्वाद मिलता है
आरोग्य-सौभाग्य: स्तुति में “रूपं देहि जयं देहि, यशो देहि” की कामना की जाती है
पूजन विधि
स्नान-शुद्धि: सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, संकल्प लें
स्थापना: माँ चण्डिका/दुर्गा की मूर्ति या चित्र चौकी पर रखें
दीप-पुष्प: घी का दीपक जलाएं, लाल गुड़हल या गुलाब अर्पित करें
भोग: नारियल, लाल मिठाई या सात्विक नैवेद्य चढ़ाएं
मंत्र जाप: बीज मंत्र “ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” का जाप करें
पाठ: दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र का पाठ या चण्डिका स्तुति करें
समय: सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पाठ विशेष शुभ
प्रमुख स्तुति
“ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥”
कहाँ-कैसे मनाते हैं
महाराष्ट्र: सतारा के जावळी तालुका में 22 अगस्त को श्री चंडिका माता जन्मोत्सव भव्य पालकी यात्रा, भजन-जागरण के साथ मनाते हैं
उत्तराखंड: रुद्रप्रयाग, हिमालयी गाँवों में माँ चण्डिका की बड़ी प्रतिमा के साथ जुलूस, लोक नृत्य और “जय माँ चण्डिका” के जयकारे लगते हैं
रीवा, मध्य प्रदेश: पंचमूर्ति चण्डिका सिद्धपीठ में माँ का विशेष पूजन होता है
सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है
इस साल 1 मई को शक्ति पाने का “सबसे खास दिन” बताया जा रहा है। लोग डर खत्म करने और बाधा दूर करने के उपाय शेयर कर रहे हैं। इंस्टाग्राम पर माँ चण्डिका के जुलूस और भक्ति रील्स खूब वायरल हैं
संक्षेप में: 1 मई 2026 को माँ चण्डिका जयंती है। लाल फूल, घी का दीपक, चण्डिका मंत्र और दुर्गा सप्तशती पाठ से माँ की पूजा करें। ये दिन साहस, विजय और नकारात्मकता से मुक्ति के लिए माना जाता है।
जय माँ चण्डिका 🙏

‘शराब पीकर सदन में आए पंजाब के मुख्यमंत्री’: विपक्षी दलों ने की ‘डोप टेस्ट’ कराने की माँग

                           शराब पीकर पहुँचें पंजाब के सीएम, विपक्ष का आरोप (साभार : Aajtak)
पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र में उस समय भारी तनाव पैदा हो गया, जब विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री भगवंत मान पर शराब पीकर सदन में आने का गंभीर आरोप लगाया। कांग्रेस और अकाली दल के नेताओं ने माँग की कि मुख्यमंत्री समेत सभी विधायकों का तुरंत ‘एल्को-मीटर’ और ‘डोप टेस्ट‘ कराया जाए।

BJP ने मुख्यमंत्री भगवंत मान का नशे में धुत होने वाला वीडियो भी शेयर किया है। विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने इसके लिए स्पीकर को पत्र भी लिखा। हालाँकि, विधानसभा स्पीकर ने विपक्ष की इस माँग को सिरे से खारिज कर दिया।

हंगामे के बीच आम आदमी पार्टी ने सरकार का बहुमत साबित करने के लिए विश्वास प्रस्ताव पेश करने की तैयारी की। सत्र के दौरान ‘आप’ के 89 विधायक मौजूद रहे, जबकि भाजपा ने इस सत्र का पूरी तरह बहिष्कार किया। 

प्राइवेट स्कूलों को मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की चेतावनी, बोलीं- खास दुकान से यूनिफॉर्म-किताबें खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते


एक समय था जब स्कूलों के परिणाम आते ही नई सड़क पर किताबों और नोटबुक(कापियों) की दुकानों पर भीड़ लग जाती थी। लेकिन जबसे स्कूलों में किताबों और कापियों को बेच व्यापार शुरू है उसी नई सड़क पर आज सन्नाटा रहता है। नई ड्रैस के लिए कपडे वालों की दुकानों और दर्जियों की दुकानों पर भीड़ देखने को मिलती थी। अब सब इतिहास बन चुका है। ये सब काम कुछ लोगों के हाथ में सिमट रह गया है। और सरकारें खामोश। लगभग सभी पुस्तक विक्रेताओं और प्रकाशकों की दुकानें दूसरे व्यवसाय में बदल चुकी हैं। जबकि स्कूल मनमाने दामों पर किताबें, कॉपी और अब तो स्कूल ड्रेस तक बेच लाभ कमा रहे हैं। यानि स्कूल आज Business Centre बन चुके हैं।   

इतना ही नहीं, जब सरकारी स्कूलों में किताबें फ्री में मिलती है फिर भी कुछ NGOs फ्री में किताबें वितरित कर रहे हैं, क्यों? इसकी भी जाँच बहुत जरुरी है कि जो बच्चे इनसे किताबें ले रहे हैं उन्हें स्कूल से किताबें मिल रही है या नहीं और अगर नहीं मिल रही हैं तो क्यों? क्या दिल्ली प्रशासन उन स्कूलों तक किताबें नहीं पहुंचा रहा?         

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर लगाम कस दी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि वह कभी भी किसी स्कूल का औचक निरीक्षण कर सकती हैं। उन्होंने साफ निर्देश दिया कि स्कूल अब अभिभावकों को किसी खास दुकान से यूनिफॉर्म या किताबें खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकेंगे।

अगर कोई स्कूल नियमों के खिलाफ जाकर दबाव बनाएगा, तो सरकार उस स्कूल का अधिग्रहण (कब्जा) कर लेगी। मुख्यमंत्री ने सभी स्कूलों को आदेश दिया है कि वे अपनी वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर साफ लिखें कि पैरेंट्स कहीं से भी सामान खरीद सकते हैं।

देखना यह है कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का यह बयान सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा या जमीनी स्तर पर लागु होगा? 

यह फैसला अभिभावकों से मिल रही लगातार शिकायतों के बाद लिया गया है। मुख्यमंत्री ने साफ चेतावनी दी है कि नियमों की अनदेखी करने वाले स्कूलों के खिलाफ अब सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। ताकि परिवारों पर आर्थिक बोझ न बढ़े।

कौन था मोसाद का एजेंट ‘M’ जिनकी झील में डूबने से हुई मौत, ईरान के जुटाए थे सारे सीक्रेट


दुनिया की और इजरायल की सबसे बड़ी जासूसी एजेंसी ‘मोसाद’ के काम करने का तरीका हमेशा एक राज रहा है। कुछ समय पहले ही इजरायल ने अपने एक ऐसे ही जाबांज एजेंट की कहानी से पर्दा उठाया है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी देश की सुरक्षा के लिए अंधेरे में रहकर काम किया। मई 2023 में इटली में एक नाव हादसे के दौरान इस एजेंट की जान चली गई थी।

यह एजेंट कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बल्कि ईरान के खतरनाक मंसूबों को रोकने में इजरायल का सबसे बड़ा हथियार था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस एजेंट की वजह से ही इजरायल को ईरान के खिलाफ चल रही गुप्त जंग में बड़ी कामयाबी मिली थी।

कौन था एजेंट ‘M’ और क्या थी उनकी पहचान?

एजेंट ‘M’ का असली नाम आज भी एक गहरा राज बना हुआ है। इजरायल की सरकार और मोसाद ने कभी भी उनकी पहचान को पूरी तरह नहीं खोला। इटली की मीडिया ने उन्हें ‘एरेज शिमोनी’ नाम दिया था, लेकिन माना जाता है कि यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए एक नकली नाम था। उन्होंने मोसाद में लगभग 30 साल तक अपनी सेवा दी और इजरायल की सबसे मजबूत दीवार बने रहे।

वह स्वभाव से बहुत ही शांत और नेक इंसान था। उनके दोस्तों और साथियों का कहना है कि वह हर किसी से बहुत प्यार से मिलते थे और बड़ों से लेकर बच्चों तक, सबकी भाषा समझते थे। वह दुनिया की नजरों में एक साधारण इंसान थे, लेकिन असल में वह इजरायल के सबसे बड़े रक्षक थे। उनकी मृत्यु के बाद जब उन्हें विदा किया गया, तो मोसाद के बड़े अधिकारियों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए टोपी और मास्क लगाकर उन्हें अंतिम सलाम दिया।

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ईरान के खिलाफ भूमिका और ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’

एजेंट ‘M’ ने ईरान के खिलाफ चल रही लड़ाई में बहुत ही खास भूमिका निभाई थी। मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने बताया कि ‘M’ ने उन गुप्त मिशनों को संभाला था जिनकी वजह से इजरायल को ईरान पर बड़ी जीत मिली। उन्होंने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ नाम के एक बड़े अभियान में अपनी बुद्धि और नई तकनीक का ऐसा इस्तेमाल किया कि दुश्मन के पास कोई जवाब नहीं था।

मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने आगे बताया कि उन्हें ‘M’ की बहादुरी पर बहुत गर्व है। ‘M’ ने इजरायल की सरहद से दूर रहकर उन खतरों को खत्म किया जो देश की सुरक्षा को नुकसान पहुँचा सकते थे। उनके काम करने का तरीका इतना शानदार था कि दुश्मन को पता भी नहीं चलता था और मिशन पूरा हो जाता था। वह उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने ईरान के खतरनाक हथियारों और परमाणु मंसूबों को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

इटली की झील में वो दर्दनाक नाव हादसा

मई 2023 की एक शाम इटली की ‘लेक मैगीगोर’ झील में एक बहुत ही दुखद हादसा हुआ। एजेंट ‘M’ वहाँ किसी छुट्टी पर नहीं, बल्कि एक बहुत ही जरूरी मीटिंग के लिए गए थे। उस नाव पर उनके साथ इजरायल और इटली के कई और जासूस भी सवार थे। अचानक मौसम बिगड़ा और नाव पलट गई। इस हादसे में ‘M’ के साथ इटली के दो एजेंट और नाव के कप्तान की पत्नी की डूबने से मौत हो गई।

उस नाव पर क्षमता से ज्यादा लोग सवार थे, जिस कारण यह हादसा हुआ। नाव जब डूबी तो वह किनारे से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर थी, लेकिन ‘M’ को बचाया नहीं जा सका। हादसे के तुरंत बाद इजरायल ने अपने बाकी बचे जासूसों को एक प्राइवेट जेट से तुरंत वापस बुला लिया। यह पूरी घटना इतनी रहस्यमयी थी कि इसने पूरी दुनिया की मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया।

देश की श्रद्धांजलि और आखिरी सलाम

एजेंट ‘M’ को इजरायल के अश्कलोन शहर में पूरे सम्मान के साथ विदाई दी गई। मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया उनके जनाजे पर भावुक हो गए और उन्हें एक सच्चा दोस्त और महान इंसान बताया। उन्होंने कहा कि ‘M’ ने अपनी पूरी जवानी देश की सेवा में लगा दी। उनकी बहादुरी की कई ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें शायद देश की सुरक्षा की वजह से कभी भी जनता को नहीं बताया जा सकेगा।

इजरायल के प्रधानमंत्री और बड़े नेताओं ने भी उनकी शहादत को याद किया। उन्होंने कहा कि ‘M’ जैसे गुमनाम हीरोज की वजह से ही देश आज सुरक्षित है। आज इजरायल की आधिकारिक यादगारों पर उनका नाम बड़े सम्मान के साथ दर्ज है। भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए महान काम इजरायल के इतिहास में हमेशा चमकते रहेंगे।

पौराणिक गाथा : जगत पालनहार विष्णु को धरती को बचाने लेना पड़ा वराह अवतार


जब भी धरती और भक्तों पर कोई घोर विपत्ति आई जगत पालनहार विष्णु को किसी न किसी रूप में धरती पर आना पड़ा। 
भगवान वराह अवतार की यह कथा अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक है, जिसका विस्तार से वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कंध में मिलता है।

आइए इसे पूरी भावना और विस्तार के साथ समझते हैं—
1. सृष्टि पर संकट की शुरुआत
सतयुग में हिरण्याक्ष नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था। वह दिति और कश्यप ऋषि का पुत्र था, और उसका भाई हिरण्यकशिपु था।
हिरण्याक्ष ने कठोर तपस्या करके अपार शक्ति प्राप्त की। शक्ति मिलते ही उसमें घोर अहंकार आ गया। वह स्वयं को अजेय समझने लगा और देवताओं को युद्ध के लिए ललकारने लगा।
एक दिन अपने अहंकार में उसने सोचा— "अगर मैं पूरी सृष्टि को ही अस्त-व्यस्त कर दूँ, तो कौन मेरा सामना करेगा?"
इसी विचार से उसने पृथ्वी (भूदेवी) का अपहरण कर लिया और उसे ब्रह्मांडीय महासागर (रसातल) की गहराइयों में ले जाकर छिपा दिया।
परिणाम ...
सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया जीवन समाप्त होने लगा चारों ओर अंधकार और भय फैल गया देवता अत्यंत चिंतित होकर ब्रह्मा जी के पास पहुँचे।
2. वराह अवतार का अद्भुत प्रकट होना ब्रह्मा जी सृष्टि की रक्षा के लिए ध्यान में लीन हो गए। तभी एक चमत्कार हुआ—
उनकी नासिका से एक छोटा सा वराह (सूअर का शिशु) प्रकट हुआ।
शुरुआत में वह बहुत छोटा था, लेकिन देखते ही देखते—
वह आकाश को छूने लगा उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया उसकी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं
देवता आश्चर्यचकित हो गए और समझ गए— यह कोई साधारण जीव नहीं, स्वयं भगवान विष्णु का अवतार है।
3. महासागर में प्रवेश और पृथ्वी की खोज......
भगवान विष्णु के रूप में वराह देव ने विशाल गर्जना की और सीधे ब्रह्मांडीय महासागर में कूद पड़े। समुद्र की लहरें उफान मारने लगीं जलचर भयभीत हो उठे वराह देव गहराइयों में पृथ्वी को खोजने लगे अंततः उन्होंने रसातल में जाकर माता भूदेवी को ढूँढ लिया।
4. हिरण्याक्ष और वराह देव का भयंकर युद्ध.. ।।
जैसे ही वराह देव पृथ्वी को उठाने लगे, हिरण्याक्ष वहाँ आ पहुँचा।
वह क्रोधित होकर बोला— "कौन है जो मेरी शक्ति को चुनौती दे रहा है?"
इसके बाद शुरू हुआ एक महाभयंकर युद्ध—
गदा, त्रिशूल और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग हुआ समुद्र की गहराइयों में भीषण टकराव हुआ देवता ऊपर से इस युद्ध को देख रहे थे हिरण्याक्ष अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन भगवान के सामने उसकी शक्ति टिक न सकी।
अंत में—
वराह देव ने उसे परास्त कर दिया
उसके अहंकार का अंत हो गया
5. पृथ्वी का उद्धार (भूदेवी की रक्षा)
युद्ध समाप्त होने के बाद—
वराह देव ने पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाया धीरे-धीरे उसे महासागर से बाहर लाए फिर उसे उसके सही स्थान (कक्षा) में स्थापित कर दिया
उस समय का दृश्य अत्यंत दिव्य था।
पृथ्वी देवी ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया देवताओं ने पुष्प वर्षा की पूरे ब्रह्मांड में शांति और संतुलन लौट आया
6. इस कथा का गहरा संदेश
यह कथा केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें गहरे आध्यात्मिक अर्थ छिपे हैं—
1. अहंकार का विनाश
हिरण्याक्ष का अंत यह सिखाता है कि
.. अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, सत्य के सामने टिक नहीं सकता।
2. भगवान का संरक्षण
जब भी सृष्टि पर संकट आता है—
.. भगवान किसी न किसी रूप में रक्षा के लिए अवतरित होते हैं।
3. पृथ्वी का महत्व
भूदेवी का उद्धार हमें सिखाता है—
.. पृथ्वी केवल भूमि नहीं, बल्कि माता है।
4. धर्म की विजय
अंततः हमेशा—
.. धर्म की जीत और अधर्म का नाश होता है।
वराह अवतार की यह कथा हमें यह विश्वास दिलाती है कि— जब भी जीवन में अंधकार और संकट आए, ईश्वर किसी न किसी रूप में मार्ग दिखाने अवश्य आते हैं।

NSA अजित डोभाल से मीटिंग के 2 दिन बाद UAE ने छोड़ा OPEC


मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 65 साल से अधिक पुराने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC)(Organization of the Petroleum Exporting Countries) और ओपेक+ से बाहर निकलने का फैसला किया है। UAE 1 मई 2026 से आधिकारिक तौर पर इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक तेल सप्लाई पहले से दबाव में है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हैं।

इस फैसले से जुड़ी एक और अहम बात जिसे लेकर चर्चा है वो है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की विदेश यात्रा। अपनी 25-26 अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने अबू धाबी में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जाएद से मुलाकात की थी। इस यात्रा के दौरान उनकी कुछ अन्य अहम मीटिंग भी हुईं। इसके 2 दिन बाद ही 28 अप्रैल को UAE ने OPEC छोड़ने का ऐलान कर दिया।

ऐसे में UAE का यह कदम सिर्फ एक संगठन से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे तेल की कीमतों, सप्लाई और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। वहीं, भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए इसमें मौके भी छिपे हुए हैं।

OPEC क्या है और क्यों बना था?

ओपेक (OPEC) यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (Organization of the Petroleum Exporting Countries) एक ऐसा इंटर गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन है जिसे 1960 में पाँच देशों ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर बनाया था।

उस समय तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था और तेल उत्पादक देशों को उचित कीमत नहीं मिल रही थी। ऐसे में इन देशों ने मिलकर एक ऐसा समूह बनाया जिसका उद्देश्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करना, कीमतों को स्थिर रखना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना था।

समय के साथ यह संगठन काफी शक्तिशाली हो गया और वैश्विक तेल बाजार में इसका बड़ा प्रभाव हो गया। बाद में ओपेक+ बना, जिसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक देश भी शामिल हुए, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।

कब जुड़ा UAE और क्या रही उसकी भूमिका?

UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है और इसकी उत्पादन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। UAE 1971 में ओपेक का सदस्य बना, हालाँकि अबू धाबी 1967 से ही इस समूह से जुड़ा हुआ था।

ओपेक के भीतर UAE को एक भरोसेमंद और अनुशासित सदस्य के रूप में देखा जाता था, जो संगठन के फैसलों का पालन करता था। इसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी थी, यानी जरूरत पड़ने पर यह उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बना सकता था। इसी वजह से इसे स्विंग प्रोड्यूसर के रूप में भी देखा जाता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।

UAE ने ओपेक क्यों छोड़ा?

UAE ने अपने बयान में कहा है कि यह फैसला उसके राष्ट्रीय हित और लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल पिछले कुछ समय से UAE और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे।

सऊदी अरब चाहता था कि उत्पादन सीमित रखा जाए ताकि कीमतें ऊँची बनी रहें जबकि UAE ज्यादा उत्पादन करना चाहता था ताकि वह अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सके।

UAE ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह इन निवेशों का लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा UAE की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रही है। उसने पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विकास किया है, जिससे वह ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक फैसले लेने की स्थिति में है।

ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को लेकर असंतोष भी एक कारण माना जा रहा है, जिससे UAE ने अपने रास्ते अलग करने का फैसला लिया। UAE के बाहर निकलने के बाद ओपेक में अब कुल 11 सदस्य देश रह जाएँगे।

इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और कांगो गणराज्य शामिल हैं। इससे पहले कतर 2019 में और अंगोला 2024 में इस संगठन को छोड़ चुके हैं। लगातार देशों के बाहर निकालने से यह साफ पता चलता है कि ओपेक की एकजुटता कमजोर हो रही है और भविष्य में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता हैं।

UAE क्या हासिल करना चाहता है?

UAE का मुख्य उद्देश्य अधिक स्वतंत्रता के साथ अपने तेल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है। वह अब ओपेक के उत्पादन कोटा से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन बढ़ाना चाहता है।
इसके जरिए वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहता है। साथ ही, UAE खुद को एक स्वतंत्र ऊर्जा शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से फैसले ले सके। यह कदम उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकता है।

OPEC पर इसका क्या असर पड़ेगा?

UAE के बाहर निकलने से ओपेक को कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। सबसे पहले संगठन की कुल उत्पादन क्षमता में कमी आएगी, जिससे उसकी बाजार पर पकड़ कमजोर होगी।
दूसरा, तेल की कीमतों को नियंत्रित करना ओपेक के लिए और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अब कम स्पेयर कैपेसिटी होगी। तीसरा, इससे संगठन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद और बढ़ सकते हैं और अन्य देश भी बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं।
इसके अलावा वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि एक कमजोर ओपेक सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखने में पहले जितना सक्षम नहीं रहेगा। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर होगा?

इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा, खासकर तब तक जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुल नहीं जाता। लेकिन लंबे समय में इसका असर जरूर पड़ेगा। UAE के ज्यादा उत्पादन करने से वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
हालाँकि इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता भी बढ़ सकती है, क्योंकि ओपेक की पकड़ कमजोर होगी और तालमेल कम हो जाएगा जिसका असर आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।

भारत को फायदा होगा या नुकसान?

भारत के लिए यह स्थिति ज्यादातर मामलों में फायदेमंद मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करता है और उसमें से एक बड़ा हिस्सा ओपेक देशों से आता है।
UAE भारत का एक अहम सप्लायर है, इसलिए उसके ज्यादा उत्पादन करने से भारत को सस्ता तेल मिल सकता है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और महंगाई पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। अब भारत सीधे UAE के साथ लंबी अवधि के समझौते कर सकता है, जो पहले ओपेक के नियमों के कारण सीमित थे।
कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगर ब्लॉक रहता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।
UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि अब देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए पारंपरिक संगठनों से अलग होने में हिचक नहीं रहे हैं।
इससे जहाँ एक ओर ओपेक की ताकत कमजोर हो सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है, जहाँ वे सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत हासिल कर सकते हैं।

UAE के OPEC से निकलने के लिए सऊदी अरब पाकिस्तान गठजोड़ जिम्मेदार है; UAE का यह कदम भारत के लिए बेहतर हो सकता है

सुभाष चन्द्र

OPEC की स्थापना 1960 में Iran, Iraq, Kuwait, Saudi Arabia, and Venezuela ने मिल कर की थी जिसमें UAE 1967 में शामिल हुआ था। UAE ने एक मई से OPEC और OPEC Plus से बाहर होने की घोषणा कर दी यानी करीब 60 साल बाद UAE ने इन संगठनों को छोड़ा है जिसका मुख्य कारण मुझे लगता है सऊदी अरब और पाकिस्तान का सैन्य गठजोड़ है 

UAE के छोड़ने के समय OPEC के सदस्य हैं अल्जीरिया, कांगो, Equatorial Guinea, Gabon, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब और वेनेजुएला

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
2016 में 10 देश जोड़ कर OPEC Plus बनाया गया रूस, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाकिस्तान, मलेशिया, मेक्सिको, ओमान, साउथ सूडान और सूडान ने OPEC से जुड़ कर OPEC Plus बनाया वेनेजुएला तो एक तरह अब अमेरिका के कब्जे में हो गया, वह पता नहीं इसका सदस्य रह भी पायेगा या नहीं

ईरान युद्ध के पहले ही सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक रक्षा समझौता हुआ था जिसके अनुसार एक देश पर हुआ कोई हमला दूसरे पर भी माना जाएगा लेकिन ईरान सऊदी अरब पर हमले करता रहा पर पाकिस्तान ने साथ नहीं दिया उसके बाद पाकिस्तान ने अपनी सैनिक और लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजे हैं क्योंकि सऊदी ने भी अपना पैसा मांग लिया था लगता है बस यही UAE के OPEC छोड़ने की वजह है उसने पाकिस्तान से अपने 3.5 बिलियन डॉलर भी वापस ले लिए और हो सकता है, वह भी देने के लिए सऊदी ने मदद की होगी

OPEC का तेल उत्पादन 35 मिलियन बैरल per Day (mbd) है जिसका 25% यानी 9 mbd सऊदी अरब का उत्पादन है UAE का उत्पादन 3.1 mbd है जिसे वह 2027 तक 5 mbd कर सकता है OPEC अपने सदस्यों के उत्पादन और कीमतों को भी कंट्रोल करता है लेकिन अब UAE इन बंधनों से मुक्त हो जाएगा अब वह भारत के साथ भी नए सिरे से तेल सप्लाई पर डील कर सकता है - वह सप्लाई होर्मुज से नहीं ओमान के रास्ते से होगी

भारत की अपनी रोजाना की कुल खपत 55 लाख बैरल तेल का लगभग 10% यानी 4.5 लाख बैरल कच्चा तेल UAE से आयात करता है जाहिर है UAE के OPEC से अलग होने पर उसकी सप्लाई भारत को बढ़ सकती है अभी भारत UAE का व्यापार रुपए और दिरहम में होता है, न कि डॉलर में

यह संयोग है कि 22 अप्रैल को अजित डोभाल UAE गए थे और एक सप्ताह बाद UAE की घोषणा होती है अभी 4 यूरोपीय देशों की यात्रा से पहले मई के मध्य में प्रधानमंत्री 4 घंटे के लिए UAE में रुक कर UAE President Sheikh Mohamed bin Zayed Al Nahyan से मुलाकात करेंगे और हो सकता है इसी मीटिंग में आयल के बारे में डील हो जाए शेख और मोदी के आपसी संबंध वैसे भी बहुत मधुर हैं बल्कि निजी तौर पर बहुत प्रघाड़ हैं -कुल मिलाकर भारत के लिए अब बेहतर होगा 

UAE पर ईरान ने ड्रोन से 2200 हमले किये  सऊदी अरब को भी ईरान ने बहुत ठोका है और अगर युद्ध फिर भड़का और कल को सऊदी ने पाकिस्तान को ईरान पर परमाणु बम चलाने के लिए कहा तो वह कभी नहीं करेगा क्योंकि उसका वह बम तो भारत के लिए बना था या उसे वो इज़रायल पर चलाएगा लेकिन अपने किसी मुस्लिम देश पर नहीं

भारत में कांग्रेस UAE से भारत को आयल सप्लाई बढ़ने पर बिल्कुल भी खुश नहीं होगी वह तो अभी चीन के साथ मिलकर भारत के अंडमान निकोबार प्रोजेक्ट को बंद कराने के लिए जोर लगा रही है बस देश की प्रगति नहीं होनी चाहिए, यह एकमात्र लक्ष्य है कांग्रेस का