जंतर-मंतर के आंदोलन का ‘मास्टरप्लान’ का काला सच


CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब छात्रों के नाम पर हुए जंतर मंतर पर हुए हर हंगामे का पर्दाफाश होते ही INDI गठबंधन चारों खाने चित हो रहा है। क्योकि जब किसी महल की नींव मजबूत नहीं होने पर महल ताश के पत्तों की मिट्टी में मिल जाता है, ठीक वही हालत मोदी सरकार के खिलाफ होने वाले आंदोलनों का है।   
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन का शोर तो अब थम चुका है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे छिपा राजनीतिक सच अब परत-दर-परत बेनकाब हो रहा है। निष्पक्ष और छात्र-हितैषी आंदोलन का दावा करने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और इसके प्रमुख चेहरों की असली मंशा पर अब गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। जिस तरह से देश के मासूम युवाओं के आक्रोश और ‘पेपर लीक’ जैसे संवेदनशील मुद्दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकी गईं, उसने इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की गहरी साजिश को जगजाहिर कर दिया है।

अमर्यादित भाषा और दागियों का साथ  
प्रदर्शन के दौरान सौरभ दास जैसे प्रमुख चेहरों का असली चरित्र उस समय सामने आया, जब प्रधानमंत्री के खिलाफ भद्दी और अमर्यादित भाषा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों का उन्होंने खुलेआम बचाव किया। हद तो तब हो गई जब जंतर-मंतर पर दागियों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले असामाजिक तत्वों को न्यौता देने पर सवाल उठे, तो आयोजकों ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के स्पष्ट आदेशों और गाइडलाइंस को मानने से साफ इनकार कर दिया।

‘सिलेक्टिव नरेटिव’ और दोहरे रवैये की खुली पोल
लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के इस तंत्र का दोहरा रवैया भी देश के सामने आ चुका है। यह स्वयंभू टोली केवल भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर (FIR) वापस लेने की मांग तो जोर-शोर से उठाती रही, लेकिन जब वैसी ही प्रशासनिक कार्रवाई वामपंथी सरकार वाले राज्य केरल या अन्य विपक्षी शासित प्रदेशों में हुई, तब इनकी जुबान पर ताला लग गया। यह ‘सुविधाजनक विरोध’ उनके निष्पक्ष होने के खोखले दावों की धज्जियां उड़ाता है।

आंदोलनकारियों की नीयत का पर्दाफाश !
आंदोलनकारियों की नीयत का सबसे बड़ा पर्दाफाश तब हुआ, जब उन्होंने कैमरे पर खुद स्वीकार किया कि ‘पेपर लीक’ और धांधली की समस्याएं हर दौर और हर सरकार के कार्यकाल में होती रही हैं, लेकिन उनका सीधा निशाना केवल और केवल भाजपा और केंद्र सरकार है। इस कबूलनामे ने साफ कर दिया कि इस पूरे तमाशे की मूल प्रेरणा छात्रों का भविष्य सुधारना नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और मोदी विरोध था।

युवाओं के सामने खड़ा बड़ा ‘यक्ष प्रश्न’
जंतर-मंतर से भले ही तंबू-कनात उखड़ चुके हों और सड़कों का शोर शांत हो गया हो, लेकिन इस आंदोलन ने देश के लाखों छात्रों के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है। प्रश्न यह है कि क्या युवा वाकई अपने हक और परीक्षा सुधारों की लड़ाई लड़ रहे थे, या फिर वे किसी के गुप्त राजनीतिक ‘मास्टरप्लान’ में केवल ढाल और मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर लिए गए? कानून, संविधान और न्यायपालिका के सम्मान को ताक पर रखकर अपनी सहूलियत से विरोध का रास्ता चुनने वाले इन चेहरों का लक्ष्य कभी भी छात्रों का भला करना नहीं था।

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट की ‘इनसाइड स्टोरी’

‘विपक्ष का पिछलग्गू’: रणनीतिकार अभिजीत दिपके पर उठते सवाल
आंदोलन के मुख्य सूत्रधार अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke) की भूमिका पूरी तरह कटघरे में है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे दिपके ने खुद को ‘गैर-राजनीतिक’ बताकर आंदोलन शुरू किया था। लेकिन जिस तरह उन्होंने बीजेपी के खिलाफ ऑनलाइन पोल चलाए, पंजाब-कर्नाटक के पेपर लीक पर चुप्पी साधी और कांग्रेस के दिग्गज कानूनी सलाहकारों का सहारा लिया, उससे उनकी तटस्थता का ढोंग बेनकाब हो गया।

दलित राजनीति का ढोंग और ‘क्रीमी लेयर’ पर रहस्यमयी चुप्पी
एक शिक्षित दलित पृष्ठभूमि से आने के कारण अभिजीत दिपके के पास ‘राष्ट्र-प्रथम’ की सोच के साथ देश का बड़ा जननेता बनने का स्वर्णिम अवसर था। यदि वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने के ऐतिहासिक स्टैंड का समर्थन करते—ताकि अंतिम पायदान के वंचित दलितों को अधिकार मिले—तो वे एक सच्चे समाज सुधारक बनते। लेकिन उन्होंने दूरगामी सामाजिक सुधार के बजाय तात्कालिक राजनीतिक विरोध का आसान रास्ता चुना।

अन्ना आंदोलन जैसा नैतिक बल नहीं, केवल राजनीतिक अवसरवाद
यदि इस आंदोलन का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि दिपके और CJP की यह लहर किसी नैतिक विचार या सामाजिक बदलाव की उपज नहीं थी। वर्ष 2011 के ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन के विपरीत, जहाँ एक नैतिक आधार था, यह पहल केवल सरकार की कमियों पर रोटियां सेकने का राजनीतिक अवसरवाद भर थी। नतीजतन, देश के युवाओं के हाथ केवल निराशा और छलावा ही आया।

न्यायपालिका पर अविश्वास और अराजकता को बढ़ावा
जंतर-मंतर पर जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताया गया, तो इससे आयोजकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था की पोल खुल गई। देश की सर्वोच्च अदालत को चुनौती देकर अपनी शर्तों पर भीड़ तंत्र चलाने की कोशिश करना सीधे तौर पर अराजकता को न्यौता देना है। छात्रों के अधिकारों की आड़ में देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना इस ‘मास्टरप्लान’ का सबसे खतरनाक हिस्सा था।

‘टूलकिट इकोसिस्टम’ और अंतरराष्ट्रीय साजिश का संदेह
जिस तेज़ी से आंदोलन का रुख परीक्षा सुधारों से हटकर केंद्र सरकार के तख्तापलट और प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत घृणा की ओर मोड़ा गया, उसने ‘टूलकिट इकोसिस्टम’ की सक्रियता को उजागर किया। सोशल मीडिया बॉट्स, प्रायोजित हैशटैग्स और विदेशी मीडिया आउटलेट्स द्वारा इस विरोध को अचानक हवा देना यह साबित करता है कि युवाओं के भोलेपन का इस्तेमाल भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करने के लिए किया गया।

लाखों निर्दोष छात्रों के करियर और भविष्य के साथ खिलवाड़
इस पूरे ड्रामे का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि देश के लाखों मेहनती और ईमानदार छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आंदोलन खत्म होते ही मुख्य रणनीतिकार अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे और महत्वाकांक्षाओं को साधकर सुरक्षित निकल गए, जबकि कई निर्दोष युवाओं पर कानूनी मुकदमे (FIR) दर्ज हो गए और उनका बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ। CJP के लिए छात्र केवल ‘पॉलीटिकल माइलेज’ का जरिया बनकर रह गए।

सकारात्मक समाधानों को नकारने की हठधर्मिता
जब केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों ने परीक्षा सुधारों के लिए उच्चस्तरीय समितियों का गठन किया और पारदर्शी व्यवस्था का रोडमैप पेश किया, तब भी आंदोलनकारियों ने बातचीत का दरवाजा बंद रखा। किसी भी सुधार या समाधान को स्वीकार न करना और केवल ‘इस्तीफे’ व ‘अस्थिरता’ की जिद पर अड़े रहना यह साबित करता है कि उनका मकसद समस्या हल करना था ही नहीं, बल्कि माहौल खराब रखना था।

‘अर्बन नक्सल थ्योरी’ और वामपंथी ताकतों की वापसी
जंतर-मंतर के मंच का इस्तेमाल जिस तरह से देशविरोधी और अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया गया, उसने ‘अर्बन नक्सल’ नरेटिव को फिर से हवा दे दी। परीक्षा सुधार के नाम पर जुटाए गए मंच पर जब वामपंथी विचारधारा से प्रभावित विवादित चेहरों और संगठनों को संरक्षण दिया जाने लगा, तो यह साफ हो गया कि यह मंच छात्रों का नहीं, बल्कि वामपंथी इकोसिस्टम को दोबारा जिंदा करने का अखाड़ा बन चुका था।

‘विक्टिम कार्ड’ और मीडिया में भ्रामक नरेटिव गढ़ने की साजिश
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सोशल मीडिया पर एक प्रायोजित ‘नरेटिव वॉर’ चलाया गया। जमीनी सच्चाइयों को दरकिनार कर कटी-छांटी क्लिप्स और फर्जी खबरों के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश हुई। जब भी निष्पक्ष पत्रकारों ने आंदोलन के नेताओं से कड़े सवाल पूछे, वे जवाब देने से भागते नजर आए और तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर विक्टिम बनने का नाटक करने लगे।

संसदीय लोकतंत्र और जनमत का खुला अनादर
आंदोलन के नाम पर जिस तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और 140 करोड़ जनता द्वारा चुनी गई सरकार की वैधता को खारिज करने की धमकियां दी गईं, वह चिंताजनक है। बिना किसी व्यापक जनाधार के, मुट्ठी भर लोगों द्वारा संसद का घेराव करने और मनमाने ढंग से सरकार गिराने की बातें करना भारतीय संसदीय लोकतंत्र का अपमान है। सुधार के नाम पर अराजकता का यह मॉडल पूरी तरह विफल साबित हुआ, जिसे देश की समझदार जनता ने खारिज कर दिया।

किसी का फोकस ‘अंबेडकरवाद’ पर, किसी का ‘फ्री फिलिस्तीन’ पर: CJP प्रदर्शन से पनपे ‘इंफ्लुएंसर्स’ का अपना-अपना एजेंडा, जानिए कंटेंट की माइनिंग कर कैसे कमाए लाखों फॉलोअर्स

                                     CJP प्रदर्शन से जन्में इंफ्लुएंसर्स (फोटो साभार: Instagram)
जब से कॉकरोच पार्टी बनी तभी से सोशल मीडिया पर इनकी मंशा पर सवाल उठ रहे थे, राष्ट्रीय मीडिया ने भी उस समय गंभीरता से नहीं लिया। और न ही सरकार ने। असली वजह अमेरिकी लेखिका रेनी लिन ने भी बताया। क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी स्कूल की किताबों में मुगलों की इतनी तारीफ क्यों होती थी? अमेरिकी लेखिका रेनी लिन का एक बयान आजकल सोशल मीडिया पर तहलका मचा रहा है! उन्होंने पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का खुलकर सपोर्ट किया है और एक बहुत बड़ा दावा किया है। 
रेनी का कहना है कि हमारी NCERT की पुरानी किताबें विदेशी आक्रमणकारियों के महिमामंडन से भरी पड़ी थीं।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर टिका कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन आखिरकार अपनी माँग पूरी होने के बाद खत्म हो गया। करीब डेढ़ महीने तक चले इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ ने सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी कई नए चेहरे खड़े कर दिए। इस दौरान कई पुराने इंफ्लुएंसर्स ने अपने लिए भरपूर कंटेन्ट तैयार किया, वहीं कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें पहचान ही इस प्रदर्शन ने दिलाई।

किसी ने पीएम नरेंद्र मोदी को गाली देकर वायरल हुआ, किसी ने मीडिया को निशाना बनाकर फॉलोवर्स जुटाए, किसी ने प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने के वीडियो बनाए तो किसी ने पुलिस से बहस और टकराव को अपना कंटेन्ट बना लिया।

इनमें मोहम्मद जुनैद, हर्षित, उज्जवल, रिया अहिर और नीशू जैसे तथाकथित इंफ्लुएंसर्स शामिल हैं। जिनकी पोस्ट पर पहले दो-चार लाइन भी मुश्किल से आते थे, आज वही लाखों फॉलोअर्स के साथ मिलियन में रीच हासिल कर रहे हैं। पिछले डेढ़ महीने में इंस्टाग्राम के बदले हुए एल्गोरिदम ने भी इनकी लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।

चिंता की बात यह है कि इन सभी का कंटेन्ट किसी न किसी एजेंडे के इर्द-गिर्द घूमता है। ऐसे में इन्हें फॉलो करने वाले लाखों युवा भी धीरे-धीरे उसी सोच और उसी नैरेटिव से प्रभावित हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से मिली लोकप्रियता ने इन लोगों को बड़ा मंच तो दे दिया है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है किस उस मंच का इस्तेमाल किस मकसद और किस दिशा में किया जा रहा है।

नीशु आजाद

इस प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे तो जमकर लगे। प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले दलित समाज से आने वाले अभिजीत दिपके ने भी खुद को ‘अंबेडकरवादी’ विचारधारा का प्रतिनिधि बताते हुए इसी सोच को आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनाया। लेकिन इसी प्रदर्शन से 15 साल की नीशू आजाद भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

नीशू का पहला वायरल वीडियो वही था, जिसमें वह एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिक्षा पर सवाल कर रही हैं, वहीं दूसरी वीडियो में वह CBSE और NEET की फुलफॉर्म तक नहीं बता पा रही थी। हैरानी की बात यह थी कि वह खुद 10वीं कक्षा की छात्रा है और उसी CJP प्रदर्शन का हिस्सा बनी हुई थी, जो NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर चलाया जा रहा था।

ऐसे में सोशल मीडिया पर कई लोगों ने नीशू को ट्रोल करना शुरू कर दिया। इसके बाद नीशू ने CJP प्रदर्शन के मंच पर जगह पाने के लिए अपने पिता पर हमले की खबर फैलाई। नीशू ने रोते हुए वीडियो बनाया कि उनके पिता को मारने वाले लोग ‘बीजेपी के अंधभक्त’ हैं, बिना उनकी नाम-पहचान जाने नीशू ने यह नैरेटिव गढ़ा और प्रदर्शन में शामिल लोगों को बीजेपी के खिलाफ भड़काया। यह देखा भी गया कि धीरे-धीरे यह प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था के नाम पर नहीं, बल्कि बीजेपी बनाम CJP हो गया, जिसमें विपक्षी दलों के अमूमन हर चेहरे ने भाग लिया।   

नीशू आजाद यहीं नहीं रुकी। और ज्यादा वायरल होने के लिए नीशू ने मीडियाकर्मियों को बयान देते हुए खुद को हिंदुओं के खिलाफ जहर तक उगला और एक दलित समाज से आते हुए भी नीशू खुद को ‘हिंदू’ मानने से इनकार कर दिया। और इतना ही नहीं, प्रदर्शन के अंत दिनों में नीशू का एक और वीडियो सामने आता है, जिसमें वह हाथ में समोसा दिखाते हुए लोगों को ‘मोदी की तेरहवीं’ का खाना खाने को कहती है।

वैसे तो इस लोकप्रियता के बाद अब नीशू के 383K फॉलोअर्स हैं, लेकिन यह जान लेते हैं कि प्रदर्शन से वायरल इंफ्लुएंसर बनी नीशू इस प्रदर्शन से पहले क्या कर रही थी? उसकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर नजर डालें तो प्रदर्शन से पहले भी नीशू का अधिकतर कंटेन्ट उन लोगों को रोस्ट करने पर केंद्रित था, जो हिंदू हितों की बात करते हैं। इस कंटेन्ट पर भी नीशू को ठीक-ठाक व्यूज आ जाते थे।

लेकिन इस तरह के कंटेन्ट पर शिफ्ट होने की वजह यह थी कि नीशू जब केवल ‘अंबेडकरवाद’ का बखान कर रही थी, तब उन्हें कोई नहीं पूछता था और तब वही किसी तरह की भी ‘इंफ्लुएंसर’ की कैटेगरी में उन्हें नहीं गिना जाता था।

मोहम्मद जुनैद

अभी अगर गूगल पर टाइप करें कि ‘कौन है जुनैद?’ तो गूगल का SEO आपको सबसे पहले जंतर-मंतर के CJP प्रदर्शन से वायरल हुए ‘जुनैद भाई’ के बारे में कंटेन्ट दिखेगा। ये जुनैद भाई वैसे तो एक मामूली वकील है, लेकिन प्रदर्शन में लोगों को मुफ्त खाना-पानी, मुफ्त दवाइयाँ देते जब इनकी वीडियो वायरल हुईं, तो कब ये सोशल मीडिया पर 1 मिलियन फॉलोअर के साथ इंफ्लुएंसर बन गए पता ही नहीं लगा।

मोहम्मद जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें, तो आज उनका हर वीडियो मिलियंस व्यूज पार कर रहा है। जुनैद के इंस्टाग्राम पर केवल CJP प्रदर्शन का ही कंटेन्ट दिखाई देता है, इससे पता लगता है कि वह भी CJP प्रदर्शन का एक मुख्य चेहरा रहे हैं। प्रदर्शन में CJP ने जुनैद को अपनी ‘सेकुलर’ विचारधारा पेश करने के लिए इस्तेमाल किया, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन में जय श्री राम के नारों पर बवाल के वीडियो भी खूब सामने आए।

प्रदर्शन के बाद इंफ्लुएंसर के रूप में उभरे मोहम्मद जुनैद का अब रोना सामने आ रहा है, जब पुलिस ने उनसे पूछताछ शुरू की है। पूछताछ भी इसीलिए जिस पर लोगों ने शक जताया है, शक यह है कि एक मामूली वकील के तौर पर जुनैद ने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के लिए खाने की सुविधा कैसे जुटाई? पुलिस जब जुनैद को पूछताछ के लिए ले गई तो उन्होंने अपनी सोशल मीडिया रीच का इस्तेमाल कर इसे बवाल बनाकर पेश किया। मीडिया में रोते हुए खूब इंटरव्यू भी दिए। 

अब बात करें कि जुनैद प्रदर्शन से पहले क्या कर रहे थे, तो इनका पास्ट रिकॉर्ड ‘आंदोलनजीवी’ का ही रहा है। जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें तो वह पहले भी ‘फ्री फिलिस्तीन’ के प्रदशनों, बाबरी मस्जिद को दोबारा खड़ा करने, माँस की दुकानों को बंद करने का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे हैं। दूसरी तरफ जुनैद अपने सोशल मीडिया पर पंडित धीरेंद्र शास्त्री जैसे हिंदू संतों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन का चेहरा बनने से पहले उनका ये कंटेन्ट उतना वायरल नहीं था।

LGBTQ के उज्जवल और हर्षित

16 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के पहले ही दिन LGBTQ समाज के दो चेहरे वायरल होते हैं। इनमें एक का नाम उज्जवल और दूसरे का नाम है हर्षित। छात्रों के इस प्रदर्शन में दोनों का एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें उनकी पहचान को लेकर रिपोर्टर सवाल पूछता है तो दोनों बिफर जाते हैं। इस वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कहीं न कहीं उन्हें एक वायरल कंटेन्ट के रूप में पहचान मिल जाती है और इसके जरिए दोनों ने खूब फॉलोवर्स भी इकट्ठा कर लिए।

CJP प्रदर्शन में भी यूट्यूब चैनलों और कई मीडिया संस्थानों ने उज्जवल और हर्षित के जमकर इंटरव्यू किए, जो उनकी लोकप्रियता बढ़ाने का जरिया बना। एक वीडियो में उज्जवल यह भी कहते नजर आए, “आपने मुझे मीठा बोल दिया… लेकिन एप्पल का फोन बनाने वाला टिम कुक भी गे है, ChatGPT का फाउंडर भी गे ही है, AI का फाउंडर भी गे ही है, इसीलिए हम लोग आपसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं।” 

सोशल मीडिया फॉलोइंस की बात करें तो उज्जवल के अब इंस्टाग्राम पर 17.6K फॉलोअर्स और हर्षित के 134K फॉलोअर्स हैं। पहचान की बात करें तो हर्षित खुद को एक कलाकार और उज्जवल 19 वर्षीय एक छात्र बताता है। सोशल मीडिया गतिविधियों से पता लगता है कि दोनों ही ‘ट्रांसजेंडर बिल’ का विरोध भी कर चुके हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन से मिली सोशल मीडिया पर लोकप्रियता अब उनकी एकमात्र पहचान बन चुकी है।

रिया अहिर

जंतर-मंतर की तर्ज पर ही मुंबई में हुए प्रदर्शनों से भी एक चेहरा सामने आया, जो अब खूब वायरल है। रिया अहीर, ये वो लड़की है जिनकी पुलिस वैन को एक हाथ से रोकते तस्वीर सामने आई थी। जो रोकने का प्रयास कम और फोटोशूट ज्यादा लग रहा था। दिलचस्प बात यह है कि रिया पेशे से मॉडल ही हैं। शायद यह बात उनको भी नहीं मालूम थी कि उनकी यह तस्वीर इतनी वायरल हो जाएगी कि मीडिया में इंटरव्यू देने पड़ेंगे। लोगों ने उनकी ये तस्वीर ‘महिला शक्ति’ के रूप में प्रस्तुत की। 

अब वे इस तस्वीर के पीछे संघर्ष की ‘मनगढ़ंत’ कहानी पूरे मीडिया में सुना रही हैं। रिया का कहना है कि जब उन्होंने देखा कि प्रदर्शनकारियों को पुलिस वैन में भरकर ले जाया जा रहा है, तो वह पुलिस वैन के आगे आकर उसे रोकने लग गईं। और हैरानी की बात तो यह है कि तभी उनके कैमरामैन ने वो तस्वीर खींच ली, जिसे शेयर कर अब ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण पेश कर रहे हैं।  

खैर रिया अहीर को प्रदर्शनों में मिली लोकप्रियता से उनके फॉलोअर्स की काउंटिंग अब 275K पहुँच गई है। उनका हालिया कंटेन्ट बेशक CJP प्रदर्शन की आवाज बनने और वायरल तस्वीर के फेम में दिए गए इंटरव्यू को लेकर हो, लेकिन बात करें उनके सोशल मीडिया के पास्ट रिकॉर्ड की तो उनका कंटेन्ट अधनग्न तस्वीरें अपलोड करना है। यहाँ तक कि ऐसी और तस्वीरें देखनी हैं तो उन्होंने ₹149 का इंस्टाग्राम सब्सक्रिप्शन प्लान भी चालू किया है, जिसमें उनके 9250 सब्सक्राइबर्स भी हैं। कुल बात यह है कि ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण बनने वाली रिया अहीर सोशल मीडिया पर ‘सॉफ्ट पॉर्न’ बेचती हैं।

कुल मिलाकर, CJP का यह प्रदर्शन सिर्फ सड़कों पर हुआ एक आंदलन नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया के लिए एक ऐसा मंच बन गया, जहाँ कई नए इंफ्लुएंसर्स पैदा हो गए। इन लोगों ने आंदोलन के हर पल को कंटेन्ट बनाया और देखते ही देखते लाखों लोगों तक अपनी पहुँच बना ली। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ये लोग वायरल कैसे हुए, बल्कि इससे भी बड़ी सवाल यह है कि वायरल होने के बाद ये अपने उस प्रभाव का इस्तेमाल किस मकसद के लिए कर रहे हैं।

इनमें से कोई ‘अंबेडकरवाद’ के नाम पर अपनी बात रख रहा है, कोई ‘फ्री फिलिस्तीन’ जैसे मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है, कोई हिंदुओं के खिलाफ बयान देकर लोकप्रियता कमा रहा है, तो कई LGBTQ की राजनीति को अपनी पहचान बना रहा है। हर किसी का अपना-अपना एजेंडा है, लेकिन सोशल मीडिया पर इन सबकी पहुँच अब लाखों युवाओं तक हो चुकी है। ऐसे में इनके हर वीडियो और हर बयान का असर भी उतनी ही तेजी से फैल रहा है।

यही वजह है कि इस पूरे प्रदर्शन का सबसे बड़ा असर शायद सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर देखने को मिलेगा। इस आंदोलन ने कुछ ऐसे इंफ्लुएंसर्स को जन्म दिया है, जिनकी सबसे बड़ी पहचान किसी उपलब्धि से नहीं, बल्कि विवाद, टकराव और एजेंडा आधारित कंटेन्ट से बनी है। आने वाले समय में ये चेहरे सिर्फ वायरल वीडियो नहीं बनाएँगे, बल्कि लाखों युवाओं की सोच और नैरेटिव को भी प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी चिंता है।

“अंधभक्त” क्या होते हैं राहुल गांधी रामायण में भगवान राम के वचनों से समझने की कोशिश करो; राम ने जो कहा उससे तुम भी रावण ही लगते हो

सुभाष चन्द्र

नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी को पप्पू ऐसे ही नहीं कहा जाता, लेकिन जुलाई 29 को राहुल ने साबित कर दिया कि वह पप्पू ही नहीं पप्पू का भी पप्पू है। प्रदर्शन में गोली चलने पर जो लोक सभा में सीधे-सीधे गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेकर विवाद खड़ा कर दिया। इस महा-पप्पू को इतना भी नहीं मालूम की लाठी चार्ज, tear gas और water canon आदि की इजाजत किसी मंत्री नहीं बल्कि मौके पर मौजूद DM या SDM द्वारा दी जाती है। अगर LoP को इतना भी नहीं मालूम तो राहुल को इस पद को तुरन्त छोड़ देना चाहिए। 

दूसरे, शाह पर आरोप लगाने पर जो संसद बाधित होने पर संसद के बाहर मीडिया के सामने जो कहा अगर वही बात शाह का नाम लेने की बजाए यही बात बोल दी होती संसद बाधित नहीं होती। फिर यह कहना कि बीजेपी और आरएसएस से कभी माफ़ी नहीं मांगूगा स्वीकार कर लिया की गलत बोला है। वैसे माफ़ी मांगने में केजरीवाल को भी पीछे छोड़ दिया है। इतना ही नहीं माइक चालू होते बोल दिया कि 'माइक बंद कर दिया' पूरी संसद तो क्या लाइव देखने वालों ने झूठ पकड़ लिया। आखिर पप्पू तो पप्पू ही होता है।       

फिर राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि “मूर्ख को भगवान मानते हैं अंधभक्त” - ऐसे “अंधभक्त” शब्द का प्रयोग कांग्रेस और विपक्ष वाले अक्सर मोदी के समर्थकों के लिए करते आए हैं। जुलाई 28 को प्रियंका वाड्रा ने प्रोफेसर V Kamakoti का अपमान करते हुए उन्हें “गौमूत्र विशेषज्ञ” कहा था जबकि प्रियंका तो क्या वर्तमान पूरी कांग्रेस उनके मुकाबले में कुछ भी नहीं है
“अंधभक्त” क्या होते हैं राहुल गांधी, उसके लिए रामायण का एक प्रसंग सुनो -

लेखक 
चर्चित YouTuber 
राम - रावण युद्ध में रावण ने श्री राम का उपहास करते हुए कहा कि वे अपनी वाणी से केवल भोले-भाले, अनपढ़ वानरों और भालुओं को ही प्रभावित या भ्रमित कर सकते हैं, लेकिन उसके जैसे विद्वान, ज्ञानी और पराक्रमी राजा को नहीं

भगवान राम ने रावण को उत्तर देते हुए कहा कि सच्ची भक्ति (भक्ति) का आधार निर्मल, निष्कपट और विनम्र हृदय होता है ऐसा पवित्र हृदय किसी अनपढ़ भक्त का भी हो सकता है, जबकि अपार सांसारिक ज्ञान, विद्वता और चतुराई के साथ भी किसी व्यक्ति का मन भ्रष्ट, दुष्ट और अहंकार से परिपूर्ण हो सकता है

भगवान राम ने अपने वचनों में रावण को विद्वान भी कह दिया लेकिन मन से भ्रष्ट, दुष्ट प्रवृत्ति का और अहंकार से परिपूर्ण भी कह दिया तुम्हें हम रावण भी नहीं कह सकते क्योंकि वो ज्ञानी और विद्वान था लेकिन तुम्हारे अंदर उसकी अन्य प्रवृत्ति हैं

आज के समय में जिनको तुम “अंधभक्त” कहते हो वो किसी मूर्ख को भगवान नहीं मान रहे बल्कि उस मोदी के प्रति श्रद्धा रखते है जिसने समस्त भारत को अपना परिवार समझा है जबकि तुम, तुम्हारे चाटुकार 

और कल पैदा हुए “कॉकरोच” उस मोदी को गाली देना ही अपना धर्म  समझते हैं

तुमसे कुछ न हो पाएगा तुम बस देश को तोड़ने की साजिश कर सकते हो विदेशियों के दम पर क्योंकि कांग्रेस की अब कोई औकात नहीं बची है 

‘घुसपैठियों को खुश करना बंद करो’: कर्नाटक हाई कोर्ट की दो टूक, अवैध बांग्लादेशियों की पोल खोलने वाले डॉक्टर पर FIR करने पर पुलिस को फटकार

कर्नाटक हाई कोर्ट (फोटो साभार : Bar & Bench
कर्नाटक हाई कोर्ट ने अवैध बांग्लादेशी की पहचान कराने वाले डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नागेंद्र के खिलाफ दर्ज 2 आपराधिक मामलों पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने दोनों मामलों की आगे की जाँच पर अंतरिम रोक लगा दी है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य पुलिस और गृह विभाग के कामकाज पर सवाल उठाए।

कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि घुसपैठियों को रोकने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, न कि ऐसे लोगों को संरक्षण देने पर। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को पहली नजर में आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला माना है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त 2026 को होगी।

डॉक्टर ने दी थी घुसपैठियों की जानकारी

 याचिकाकर्ता डॉ नागेंद्र की ओर से अदालत में बताया गया कि वह पेशे से डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह लंबे समय से बेंगलुरु में रह रहे कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान करने में पुलिस की मदद कर रहे थे।

वकील ने बताया कि 22 जुलाई 2026 को डॉ नागेंद्र ने जाँच अधिकारी को बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी की जानकारी दी थी। यह सूचना विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) को भी भेजी गई। लेकिन इसके कुछ ही मिनट बाद घटनाक्रम पूरी तरह बदल गया।

15 मिनट बाद डॉक्टर के खिलाफ दर्ज हो गई FIR

कोर्ट में बताया गया कि FRRO को सूचना भेजे जाने के करीब 15 मिनट बाद ही एक कथित अवैध प्रवासी ने डॉ नागेंद्र के खिलाफ मारपीट की शिकायत दर्ज करा दी। इतना ही नहीं, उसी दिन बाद में डॉ नागेंद्र की ओर से की गई दूसरी शिकायत के बाद भी दूसरे थाने में उनके खिलाफ एक और आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया। उन्हें गिरफ्तार किया गया, न्यायिक हिरासत में भेजा गया और अगले ही दिन जमानत मिल गई।

सुनवाई के दौरान जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने पूछा कि यदि कोई व्यक्ति घुसपैठियों की जानकारी देता है तो उसी घुसपैठी की शिकायत के आधार पर उसके खिलाफ मामला कैसे दर्ज किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में खुद बांग्लादेश का पता दर्ज है। ऐसे में पुलिस ने बिना प्रारंभिक जाँच के एफआईआर कैसे दर्ज कर ली। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।

‘घुसपैठ रोकिए, दूसरी बातों में समय मत गँवाइए’

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले अवैध घुसपैठ को नियंत्रित किया जाए। कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस इस तरह अवैध प्रवासियों के पक्ष में काम करेगी तो यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्था को किसी भी हालत में बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

विशेष लोक अभियोजक बीएन जगदीश ने अदालत को बताया कि जिन लोगों को अवैध प्रवासी बताया गया है, उन्हें पहले ही FRRO के सामने पेश किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि फिलहाल उन लोगों को डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। अभियोजन पक्ष का कहना था कि शिकायतकर्ता ने डॉ नागेंद्र पर मारपीट का आरोप लगाया है। वहीं कोर्ट ने FRRO को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया और उसकी ओर से पूरी स्थिति रिपोर्ट माँगी है।

‘घरों में जगह देने वालों पर भी हो कार्रवाई’

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उन लोगों पर भी चिंता जताई जो बिना वैध दस्तावेज वाले विदेशी नागरिकों को किराए पर मकान देते हैं। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग थोड़े ज्यादा पैसे के लालच में ऐसे लोगों को रहने की जगह दे देते हैं। अगर लालच देश की सुरक्षा पर भारी पड़ने लगे तो यह गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि ऐसे मकान मालिकों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

उमर खालिद से शरजील इमाम तक, जंतर-मंतर पर Gen Z की रील्स में ही देशविरोधी इरादों का खुलासा


कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर मंतर पर चल रहे धरने में प्रदर्शनकारियों में छात्र भी हैं, लेकिन केवल छात्र भर ही नहीं है। सिमी के फाउण्डर से लेकर उमर खालिद, शरजील समर्थक तक सब हैं। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाली पूरी ढपली गैंग, लेफ्ट लिबरल गैंग और पूरी तरह एक्सपोज्ड केजरीवाल टीम भी। देशविरोधी तत्व भी हैं और मोदी सरकार के सियासी विरोधी भी। जंतर-मंतर पर Gen Z के बयानों की रील्स से ही देशविरोधी इरादों का खुलासा हो गया है। पेपरलीक पर प्रदर्शन करने वालों का शर्मनाक और एक संगठित गिरोह है। इसे नेस्तनाबूद करना जरूरी है। दरअसल, नीट पेपरलीक से शुरू हुए आंदोलन का स्वरूप और स्वर धीरे-धीरे बदल गए हैं। परीक्षा सुधार, दोषियों पर कार्रवाई और युवाओं के भविष्य जैसे मूल मुद्दे पीछे छूटने लगे हैं, जबकि भारत विरोधी, सरकार विरोधी, भाजपा विरोधी, संघ विरोधी, वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक नारे केंद्र में आ गए हैं। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं छात्रों का हुआ है, जिनके लिए आंदोलन शुरू हुआ था।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन किसी भी जनआंदोलन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह अपने मूल उद्देश्य पर कितना केंद्रित रहता है। अब ये आंदोलनकारी नहीं, बल्कि उपद्रवकारी बनकर कह रहे हैं कि उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे देशद्रोहियों को रिहा करना होगा।

छात्र हितों के नाम पर आंदोलन करने वालों का एजेंडा सामने आने लगा है कि बीजेपी के फोलोअर्स कम करो। ये यहां पर छात्र हितों की बातें कम और बीजेपी-संघ का विरोध करने वाली बातें ज्यादा करते हैं।

छात्र हितों की बात करने के नाम पर जंतर मंतर पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे लग रहे हैं। इससे युवाओं को खासा आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि यहां पर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद या बीजेपी-आरएसएस हो बर्बाद के नारे लगे तो वे इनका यहीं पर इलाज कर देंगे।

जंतर मंतर पर कॉकरोचों की भीड़ में कई ऐसे कॉकरोच भी शामिल हैं, जो न छात्र हैं, न उनका नीट से कोई लेना देना है। न उनको मुद्दे का पता है। बस जंतर-मंतर पर पहुंच गए और बंट रहे मास्क को पहनकर खुद भी कॉकरोच बन गए। 

जंतर मंतर पर जमा जेन जी को छोड़िए कॉकरोज जनता पार्टी के मुखिया अभिजीत दीपके तक गलत नैरेटिव सैट करने में पीछे नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं और लड़कियों के पुलिस ने फोटो खींचे और खुद लड़कियों के साथ सेल्फी खिंचवाकर हीरोगिरी करते नजर आए।

जंतर मंतर के मंच पर अब हिंदू-मुस्लिम भी होने लगा है। आंदोलनरत होने के बजाए जेन जी वहां मस्ती में गा रही है- बस नाम रहेगा अल्लाह का! ये दिखावे भर के लिए छात्र हितैषी होने का दम भरते हैं। असल में तो यह लेफ्ट लिबरल गैंग से ही हैं।

जंतर-मंतर में कॉकरोचों की पैरवी में दिन रात एक कर रहे जेन जी कॉकरोचों को उस NEET का फुल फॉर्म तक नहीं मालूम है, जिसके लिए उन्होंने एक महीने बवाल मचाया हुआ है। 

मैडम जी, मैं तो बस यूं ही सपोर्ट करने आ गया। मैं कोई पढ़ाई-वढ़ाई नहीं करता हूं। मैं तो जॉब करता हूं। मुझे तो कॉकरोच पार्टी के प्रवक्ता का नाम तक नहीं मालूम है।

जंतर-मंतर पर इस बंदे ने तो सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक का भी एजेंडा खोलकर रख दिया। जम्मू-कश्मीर का रहने वाला सोनम क्या यह कभी कश्मीरी पंडितों पर हमले के खिलाफ धरने पर बैठा। क्या यह कभी आतंकियों के खिलाफ धरने पर बैठा। क्यों नहीं बैठा, क्योंकि उस समय कोई एजेंडा नहीं था।

ये कॉकरोच जनता पार्टी नहीं है, बल्कि असल में टुकड़े-टुकड़े गैंग है। इसमें भारत से ही नहीं, बल्कि अमेरिका और विदेशों से भी लोग आए हैं। ये बांग्लादेशी हैं, ये नारे लगा रहे हैं कश्मीर की आजादी-भारत की बर्बादी। इनका भारत से कोई लेना-देना नहीं है।

जंतर मंतर पर जमा जेन जी को कुछ भी पता नहीं कि मुद्दा कहां से शुरू हुआ। पार्टी कैसे अस्तित्व में आई। जेन जी ने कहा कि मंत्री ने हमें कॉकरोच बोला है। जब इनसे पूछा कि किस मंत्री ने तो चुप्पी साध ली।

विपक्ष इनको निर्दोष बच्चे बता रहा है, जबकि जंतर-मंतर पर एक आंदोलनकारी महिलाओं को अश्लील इशारे करता नजर आया। महिला पत्रकार से बदसलूकी का मामला भी सामने आया है।

अभिजीत दीपके को पांच बजे तक परमीशन मिली थी, लेकिन दो बजे ही भाग छूटा। मतलब पसीने छूट गए, एसी में बैठाया। ये वहां का वाशरूम इस्तेमाल नहीं करता। वहां खाना नहीं खाऊंगा, फाइव स्टार का खाना खाऊंगा। मैं अनशन पर नहीं बैठूंगा, सोनम अनशन करें। असल में यह जार्ज सोरोस फंडेड हैं। जो लोग नीट के पेपर लीक पर राजनीति कर रहे हैं, उन्हे चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए।

कॉकरोच जनता पार्टी के कर्ताधर्ता अभिजीत दीपके को अब निहंगों ने भी चेतावनी दे दी है। उन्होंने साफ-साफ कहा के कि दीपके या तो तत्काल माफी मांग ले, अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।

 

जनता कॉकरोचों का मजाक बना रही है और कॉकरोचों का मुखिया अपने ही समर्थकों का मजाक उड़ाने में मशगूल है। अभीजीत दीपके एक वीडियो में तंज कसते नजर आता है और कहता है- सबसे फनी चीज क्या है कि मैं सुबह उठता हूं तो ये लोग चिल्लाना शुरू कर देते हैं। धर्मेंद्र प्रधान आउट। मैं कहता हूं अरे अभी उठने तो दो। इनका बस चले तो ये प्रधान को भी न उठने दें।

बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी कहते हैं कि अगर मुद्दा शिक्षा व्यवस्था है तो इसका मोदी को पीटेंगे…मोदी को उखा फेंकेगे इससे क्या लेना-देना है। मोदी का लास्ट डे होगा- इसका शिक्षा व्यवस्था से क्या लेना-देना है। और  प्रेमानंद महाराज पाखंडी हैं इसका शिक्षा से क्या लेना-देना है। वहां गाना गाया जाता है कि नाम रहेगा अल्लाह का….इसका धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से क्या लेना-देना है।

कॉकरोचों के बर्बर आंदोलन की पोल कांस्टेबल अंकित कसाना ने खोली। वे आंदोलनकारियों की पत्थरबाजी में जख्मी हो गए थे। उन्होंने बताया कि इन लोगों को शांत रखने के लिए कहा गया था। लेकिन अचानक हम पर पथराव शुरू हो गया। यह पथराव सुलभ शौचालय की छत से पत्थरबाजी हो रही थी। टाइलों को घिस-घिसकर वैपन के रूप में फेंक रहे थे। वे किसी भी तरह छात्र नहीं लग रहे थे। से वे लोग तो मुझे जान से मारने वाले थे।

सनातन का अपमान, स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘SHAKTI’ विकसित करने वाले वैज्ञानिक का उड़ाया मजाक


कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की सनातन धर्म में कोई आस्था नहीं है। सनातन संस्कृति, गौ माता और भारतीय वैज्ञानिकों का अपमान करना इनकी आदत बन चुकी है। 7 नवंबर 1966 (गोपाष्टमी) को गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर स्वामी करपात्री जी महाराज और कई हिंदू संगठनों ने संसद भवन के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया था। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साधु-संतों पर गोली चलाने का निर्देश दिया था, जिसमें सैकड़ों साधु-संत मारे गए थे। पार्लियामेंट स्ट्रीट साधुओं के खून से लाल हो गयी थी। आज फिर इंदिरा गांधी की पोती प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस घटना की याद ताजा कर दी है। उन्होंने संसद में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन, पुलिस लाठीचार्ज और परीक्षा सुधार को लेकर गठित समितियों पर बोलते हुए गौ माता और वैज्ञानिक का अपमान किया।
चुनावों में हिन्दुओं को गुमराह करने रुद्राक्ष की माला पहन मन्दिरों में जाती है लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों में हाथ में कलावा तक नहीं होता। आखिर मुस्लिमपरस्त पार्टी से सनातन का गुणगान कैसे कर सकती है? कुछ लोग कहते थे कि प्रियंका गाँधी कांग्रेस के लिए राहुल गाँधी से बेहतर विकल्प हो सकता है, मुझे भी लगता था!
लेकिन शायद कांग्रेस को हकीकत पता थी, शायद इसीलिए राहुल के लगातार फेलियर के बावजूद प्रियंका को कभी कांग्रेस अध्यक्ष या PM मेटेरियल के रूप में प्रोजेक्ट करने का साहस नही किया!
जुलाई 28 को संसद में छात्रों के भविष्य और पेपर लीक विरोधी कानून जैसे गम्भीर मुद्दे पर प्रियंका गाँधी ने सिर्फ एक लाइन बोली कि ये पूरा कानून ही बेकार है, इससे पेपर लीक नही रुक सकता है!
आपको याद होगा इसी मानसिकता से इसने राजस्थान में लगभग हर पेपर लीक पर गहलोत का बचाव करते हुए कहा था कि गहलोत जी प्रयास कर रहे है! फिर भी पेपर लीक हो रहे है तो क्या करे?
क्योकि मंशा छात्रहित न होकर सिर्फ छात्रों के नाम पर राजनीति करना हो तो फिर सुझाव कहाँ से आएंगे?
अपनी योग्यता से IIT मद्रास जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के निदेशक पद पर बैठे प्रोफेसर कामाकोटी वीझिनाथन को गोमूत्र विशेषज्ञ बताकर हंसने लगी जैसे तो सनातन आस्था का मजाक बना रही हो? और गुलाम हिन्दू कांग्रेसी हंस रहे थे।
प्रियंका का कहना कि IIT मद्रास के निदेशक को शिक्षा बारे में क्या पता, अब कोई इनसे पूछे कि वो इस पद पर किसी खानदान में पैदा होने से नही पँहुचे बल्कि शिक्षा के दम पर ही पँहुचे है!
तुम दोनो बहन भाइयों को शिक्षा के बारे में क्या पता? एक खानदान में पैदा होने के अलावा तुम्हारी क्या योग्यता है जो तुम लोगो की लांचिंग ही सीधे राष्ट्रीय पदों पर होती है?
तुम दोनो भाई बहिन कांग्रेस का लीक नही रोक पा रहे तुम से पेपर लीक पर सुझाव की वैसे भी कोई उम्मीद नही है!
कभी नए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी पर अनर्गल आरोप लगाने लगी!
न किसी क्लोज की बात की, न कोई और सुझाव दिया सीधे बोल दिया, नई कमेटियां बनाने से काम नहीं चलेगा। राधाकृष्णन कमेटी भी बनी थी लेकिन उसकी एक भी सिफारिश लागू नहीं की गई।
यहाँ भी साफ झूठ बोला, राधाकृष्ण कमेटी की 60% सिफारिश लागू हो चुकी है!
अभी तक इस मुद्दे पर विपक्ष के किसी वक्ता की तरफ से इस मुद्दे पर कोई सुझाव नही आया, आएगा भी कैसे, इनके पास सुझाव ही होते तो पहले इनकी सरकारों में ही कोई ठोस कानून बन गए होते, पेपर लीक तो पहले भी होते थे लेकिन इन्होंने तो कोई कानून लाने का प्रयास ही नही किया था!
आज सरकार प्रयास कर रही है तो ये लोग इसे सिर्फ सरकार को गरियाने का मुद्दा समझकर चुनावी भाषण दे रहे है, गम्भीर मुद्दे को सदन में मजाक बनाकर रखा है!
प्रियंका वाड्रा ऐसे बोल रही थी जैसे वो देश के मालिक है और दुनिया मे सब लोग उनके आगे तुच्छ है!
उसका मकसद मुद्दे पर गम्भीर चर्चा के बजाय, इस विषय से जुड़े लोगों की मजाक बनाकर तालिया बजवाने और ठहाके लगवाने के अलावा कुछ नही लगा !  

प्रियंका गांधी ने लोकसभा में गौ माता का किया अपमान
दरअसल नीट (NEET) और अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं में गड़बड़ियों को रोकने और परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए केंद्र सरकार ने नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक हाई-पावर्ड रिफॉर्म टास्क फोर्स का गठन किया है। लोकसभा में इस कार्यबल पर तंज कसते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि इस नई समिति में तो पूर्व आईबी चीफ, एक आईटी कंपनी के मालिक, और एक गौ-मूत्र के विशेषज्ञ भी है। इन्हें शिक्षा के बारे में क्या पता जी। इस दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा के चेहरे पर कुटिल मुस्कान और लोकसभा में बैठे कांग्रेस सांसदों द्वारा मेज थप-थपाकर हंसना साबित करता हैं कि इन्हें सनातन संस्कृति और गौ-माता का अपमान करने में मजा आता है।

प्रियंका गांधी ने वैज्ञानिक वी.कामकोटि का उड़ाया मजाक
प्रियंका गांधी वाड्रा ने जिस गौ मूत्र विशेषज्ञ पर तंज कसा, उनका नाम प्रो.वी.कामकोटि हैं। इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में गठित हाई-पावर्ड टास्क फोर्स में देश के चुनिंदा शिक्षा और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। इसमें आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो.वी.कामकोटि का नाम भी शामिल है। प्रो. कामकोटि सिर्फ एक शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि भारत के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘SHAKTI’के विकास का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिक भी हैं।

विकसित किया भारत का पहला स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘SHAKTI’
प्रो. कामकोटि को सबसे ज्यादा पहचान भारत के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर SHAKTI माइक्रोप्रोसेसर परियोजना से मिली। उन्होंने उस रिसर्च टीम का नेतृत्व किया जिसने भारत का पहला स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर विकसित किया। इस परियोजना का उद्देश्य भारत को चिप डिजाइन और सेमीकंडक्टर तकनीक में आत्मनिर्भर बनाना था। आज SHAKTI को देश की महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धियों में गिना जाता है। प्रो.वी.कामकोटि का कंप्यूटर साइंस, साइबर सुरक्षा और टेक्‍नोलॉजी इनोवेशन के क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है। ऐसे में अब उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे NTA की परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

पेपर लीक बिल पास तो हो जाएगा लेकिन क्या ट्रायल कोर्ट 3 महीने में फैसले कर सकेंगे

सुभाष चन्द्र 

पेपर लीक बिल यानी Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 संसद से बहुमत से पास हो जाएगा क्योंकि उसे पारित करने के लिए साधारण बहुमत की आवश्यकता है और वह भाजपा के NDA गठबंधन के पास दोनों सदनों में है। 

इस बिल में सजा और जुर्माने के प्रावधानों के अलावा यह भी प्रावधान किया गया कि सभी जांच प्रक्रिया 2 महीने यानी 60 दिन में पूरी की जाएगी इसके अलावा Fast Track Courts स्थापित कर चार्जशीट दायर होने के बाद रोज सुनवाई करके 3 महीने में ट्रायल पूरा कर दिया जाएगा जिसका मतलब है, 3 महीने में सजा का ऐलान कर दिया जाएगा 

क्या भारत की अदालतों में 3 महीने में सुनवाई पूरी होना संभव है? ट्रायल कोर्ट चार्जशीट दायर होने के बाद अभियुक्तों को कम से कम एक महीना का समय देकर “समन” जारी करता है जिसे अभियुक्त तुरंत सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में चुनौती देता है जहां जितनी मर्जी जल्दी हो, 3-4 महीने लग ही  जाते हैं मतलब सेशन और हाई कोर्ट में फिर भी बात न बने तो सुप्रीम कोर्ट जाता है जहां कोई समय सीमा नहीं रहती 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
मैं इस लेटलतीफी के बारे में 3 किस्से बता रहा हूँ जबकि ऐसे मामलों की भरमार है

अमित शाह को 2018 में “हत्यारा” कहने के लिए लिए राहुल गांधी पर सुल्तानपुर MP/MLA कोर्ट में 4 अगस्त, 2018 को केस दर्ज किया गया था जिस पर कोर्ट ने 5 साल बाद 27 नवंबर, 2023 को राहुल गांधी के खिलाफ “समन” जारी किए मुकदमा अभी भी लंबित है;

बीआरओ के पूर्व डायरेक्टर उदय शंकर श्रीवास्तव की शिकायत पर (जिसमें उन्होंने राहुल गांधी पर सेना का अपमान करने का आरोप लगाया था) लखनऊ के MP/MLA कोर्ट ने 11 फरवरी, 2025 को राहुल गांधी को “समन” जारी किए राहुल गांधी “समन” रद्द कराने इलाहाबाद हाई कोर्ट चला गया लेकिन हाई कोर्ट ने उसकी अपील ख़ारिज कर दी राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट चला गया और सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त, 2025 को राहुल गांधी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई पर रोक लगा दी अगली तारीख 5 महीने बाद 22 अप्रैल, 2026 तय की सुप्रीम कोर्ट के जज थे जस्टिस SR Sharma और जस्टिस MM Sundresh. सुंदरेश जी सबरीमाला मंदिर की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई की बेंच में शामिल थे अब भगवान ही जाने सुप्रीम कोर्ट क्या कर रहा है इस केस का?

केजरीवाल के 2014 के आपत्तिजनक भाषण पर सुल्तानपुर कोर्ट ने 6 सितंबर, 2014 को “समन” जारी किए केजरीवाल ने कहा था “जो कांग्रेस को वोट देगा, वो देश के साथ गद्दारी करेगा और जो भाजपा को वोट देगा, उसे भगवान भी माफ़ नहीं करेगा” Section 125 of the Representaion of People Act, 1951 में FIR दर्ज हुई थी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने के लिए मना कर दिया एक अन्य केस में सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर, 2016 को केजरीवाल पर सड़क जाम कर ट्रैफिक में अवरोध करने के आरोप में “समन” पर रोक लगा दी लेकिन आगे कुछ नहीं किया जिसका मतलब है मामला ठंडे बस्ते में भेज दिया 6 सितंबर, 2014 के ‘समन” के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी, 2023 को को स्टे कर दिया और उसके खिलाफ चल रही Criminal Proceedings को भी अगले आदेश तक स्टे कर दिया उसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ पता नहीं मतलब मामला 12 साल से चल रहा है 

सुप्रीम कोर्ट तो वैसे भी स्टे कोर्ट और बेल कोर्ट बन चुका है  

इसलिए मेरा मानना है कि पेपर लीक पर सही मंशा से कानून बनाया जा रहा है लेकिन उसके प्रभावी होने पर मुझे संदेह है