फाइल फोटो (साभार-rferl.org) अमेरिका–ईरान युद्ध की ओर पूरी दुनिया की नजरें है। इस बीच ईरानी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक विरोधियों, प्रदर्शनकारियों और कथित जासूसों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। ईरान के कई मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों से ये पता चलता है कि सिर्फ जून महीने में ही 100 से ज्यादा लोगों को फाँसी दी गई है।
हालाँकि ईरानी सरकार का कहना है कि ये कदम ‘विदेशी साजिश’, ‘आतंकवाद’ और ‘इजराइल – अमेरिका के लिए जासूसी करने वालों’ से निपटने के लिए उठाए गए हैं। सरकार न सिर्फ खामोशी से फाँसी दे रही है, बल्कि लोगों की धर- पकड़ भी तेज कर दी है।
राजनीतिक विरोधियों को दी जा रही फाँसी
ईरान दुनिया के उन अग्रणी देशों में शामिल हो गया है, जहाँ राजनीतिक विरोधियों को भी फाँसी की सजा दी जा रही है। यह कदम लोगों में भय पैदा करने के लिए उठाया गया है, ताकि दिसंबर 2025 में ईरानी शासन के खिलाफ हुआ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन फिर कभी न हो सके। दरअसल ईरान ये सब कुछ अमेरिकी हमले की आड़ में कर रहा है। ईरान हाउस की संस्थापक अजादेह अफसाही ने ईरान इंटरनेशनल के आई फॉर ईरान पॉडकास्ट में भी यह बात मानी है।
उनका कहना है कि ईरान में युद्ध के बहाने तेजी से जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों और उसकी अगुवाई करने वालों को फाँसी की सजा दी जा रही है। कई मामलों में परिवारों से भी इसे छिपाया जा रहा है। दरअसल दुनिया उन धमाकों को सुन रही है, जो अमेरिकी मिसाइल-ड्रोन से हो रहे हैं, लेकिन उन खामोश मौतों को नहीं देख पा रही, जो चुपचाप ईरानी सरकार अपने राजनीतिक कैदियों को दे रही है।
ईरान मानवाधिकार संगठन ने भी इसकी पुष्टि की है। संगठनों का मानना है कि अब तक करीब 100 राजनीतिक कैदियों और प्रदर्शनकारियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है और 100 से ज्यादा इस कतार में खड़े हैं। संगठन के मुताबिक, इस्फहान की दस्तगेर्द जेल में ही 70 से अधिक राजनीतिक कैदियों को फाँसी दिया जाने वाला है।
संगठन का मानना है कि जनवरी 2026 में हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों में से 24 लोगों को फाँसी दी जा चुकी है। इनमें 22 जुलाई को कानून स्नातक मेहदी खानेकी शामिल है। जिन लोगों को फाँसी दिया गया है, उनमें से अधिकांश 8 जनवरी को इस्फहान विरोध प्रदर्शन में शामिल थे।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आरोपितों को निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया से भी वंचित रखा गया। न तो ट्रायल तरीके से हुआ और न ही सुनवाई और फाँसी की सजा मुकर्र कर दी गई।
संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन ने ईरानी अधिकारियों से कहा है कि वे इस्फहान के विरोध प्रदर्शन को लेकर फाँसी की सजा पाए 10 नौजवानों की फाँसी को तुरंत रोके। मिशन ने 19 जुलाई को 2 युवकों को दी गई फाँसी की भी कड़ी निंदा की है। ये लड़के थे 18 वर्षीय एस्फंदियारी और 23 वर्षीय अफगान नागरिक गोल मोहम्मद मोहम्मदी।
मिशन की जानकारी के मुताबिक, 10 लोगों में से 2 के परिजनों को मुलाकात के लिए बुलाया गया है। इसका मतलब है कि जल्द ही उन्हें भी फाँसी दिया जाएगा।
विरोध प्रदर्शन के सारे मामले निपटा दिए गए- प्रॉसिक्यूटर जनरल
28 दिसंबर 2025 को ईरानी इस्लामिक सत्ता के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों को अब फाँसी दिया जा रहा है। मार्च 2026 में सबसे पहले तीन युवकों को फाँसी दी गई। इनपर सुरक्षाकर्मियों की हत्या का आरोप था। इसके बाद अप्रैल 2026 में तेहरान के बासिज अड्डे पर कथित हमले के आरोप में 4 युवकों को फाँसी दी गई।
संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन को आशंका है कि फाँसी की सजा में और बढ़ोतरी होगी, क्योंकि 15 जुलाई 2026 को ईरान के ज्यूडिशरी के प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने मामले की जल्दी सुनवाई का निर्देश दिया। इसके बाद तेहरान के प्रॉसिक्यूटर जनरल अली सालेही ने 2025-26 में हुए विरोध प्रदर्शनों के सारे मामले निपटा दिए जाने का ऐलान किया। ईरान के आधिकारिक ऐलान के बाद दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन एक्टिव हो गए हैं और ईरान के क्रूरता का विरोध कर रहे हैं।
जून में 100 से ज्यादा लोगों को दी गई फाँसी
आर्टिकल 19 के मुताबिक, ईरान में जून में ही 109 लोगों को फाँसी दी गई, जिनमें 3 महिलाएँ शामिल थी। यह आंकड़ा पिछले साल जून से 10 फीसदी ज्यादा है। संगठन के मुताबिक इनमें से केवल 7 फाँसी दिए जाने की आधिकारिक जानकारी दी गई, बाकी का खुलासा भी नहीं किया गया। यहाँ तक कि कम से कम 12 परिवारों को अपने सदस्यों को फाँसी दिए जाने की खबर बाद में दी गई। कई लोगों को तो स्थानीय मीडिया से ये चला कि उनके परिवार के सदस्य को फाँसी दी जा चुकी है।
एएफपी के मुताबिक, साइंटिस्ट वाहिद बनियामेरियन के परिवार को फाँसी की जानकारी बाद में मिली, उस वक्त परिवार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार अर्जी पर सुनवाई का इंतजार कर रहा था।
युद्ध की आड़ में गिरफ्तारी भी जोरों पर
हाल के महीनों में ईरान में जिस तरह से फाँसी की सजा तेजी से अमल की जा रही है। उसी तरह छात्र नेताओं, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, सोशल मीडिया एक्टिविस्टों, विपक्षी दलों के समर्थकों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत गिरफ्तार किए जाने के मामले में काफी वृद्धि हुई है।
सरकार का कहना है कि ये लोग विदेशी एजेंसियों के साथ मिलकर देश में अस्थिरता पैदा कर रहे थे। ईरान इन लोगों को इजरायल और अमेरिका के जासूस, प्रतिबंधित पीएमओआई और एमईके जैसे संगठनों के सदस्य, ‘मोहारेबेह’ यानी ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर धड़ाधड़ कार्रवाई कर रही है। वहीं मानवाधिकार संगठन इसे असहमति दबाने की कार्रवाई बताते हैं।
मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि आरोपों के पर्याप्त सार्वजनिक सबूत नहीं दिए गए, मुकदमे बहुत जल्दी पूरे किए गए, आरोपियों को स्वतंत्र वकील नहीं मिला, यहाँ तक कि जुल्म के दम पर गुनाह कबूल कराए गए।
सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के दौरान ईरानी सत्ता ने इंटरनेट और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा। कई वेबसाइटें ब्लॉक की गईं, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध बढ़े, इंटरनेट की गति कम की गई या कुछ क्षेत्रों में बंद कर दिया गया, लोगों को मीडिया खास कर विदेशी मीडिया के साथ संपर्क नहीं रखने को कहा गया और ऐसे लोगों पर पैनी नजर रखी गई जो मीडिया से बात कर सकते हैं। सरकार का तर्क है कि इससे ‘फर्जी खबरों’ और ‘दुश्मन के साइबर अभियान’ को रोका जा सकता है।
ईरान ने दर्जनों लोगों पर आरोप लगाया कि वे इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे और सैन्य ठिकानों की जानकारी दे रहे थे। यहाँ तक कहा गया कि ईरानी सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी इजरायल के ड्रोन हमलों में इनलोगों ने मदद की है। ऐसे कुछ मामलों में लोगों को फाँसी की सजा हुई है। ईरानी सरकार इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताती है।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठन लगातार कह रहे हैं कि ईरान में न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है। आरोपितों की बंद कमरे में सुनवाई हुई, परिवारों को समय पर जानकारी नहीं दी गई, अपील का पर्याप्त अवसर नहीं मिला, कुछ मामलों में जबरदस्ती और यातना देकर दबाव बनाया गया और सजा दी गई। हालाँकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि उसकी न्यायिक प्रक्रिया देश के कानूनों के अनुसार चलती है।
ईरान लगातार देश में भय का माहौल बना रहा है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ईरानी विश्वविद्यालयों में निगरानी बढ़ी है, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर दबाव काफी है। यही वजह है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता देश छोड़कर चले गए हैं।
ईरान ऐसा क्यों कर रहा है
ईरान को जानने वाले विश्लेषकों के अनुसार, ईरानी सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचल कर देश में ऐसा माहौल बनाना चाहती है कि उसके खिलाफ कोई भी आवाज ऊँची करेगा तो उसकी आवाज को हमेशा हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाएगा। इजरायल- अमेरिका युद्ध ऐसा मौका है, जब देश में खामेनेई की सत्ता के साथ विरोधी भी आ गए हैं। राष्ट्रवाद उफान पर है और प्रतिद्वदियों को खामोशी से निपटाने का इससे अच्छा सुनहरा मौका नहीं मिल सकता।
अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान जनता को आवश्यक चीजों की कमी हो गई है। लगातार बमबारी को देखते हुए आंतरिक विद्रोह की आशंका है। वैसे भी कुछ महीनों पहले ही सत्ता विरोधी प्रदर्शन हुए थे। ऐसे में भय पैदा कर सत्ता विरोधी लहर को रोकना, साथ ही देश की सुरक्षा व्यवस्था और सत्ता प्रतिष्ठान पर अपना नियंत्रण मजबूत करना ईरानी सरकार का मकसद है। खामेनेई की सत्ता को विदेशी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ का डर है।
गोवा की राजधानी पणजी स्थित आजाद मैदान में शनिवार (25 जुलाई 2026) की शाम को माहौल उस समय अचानक गरमा गया, जब पुलिस ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रदर्शन के दौरान एक युवक को हिरासत में ले लिया। पुलिस द्वारा पकड़े गए इस युवक की पहचान मोहम्मद दानिश के रूप में हुई है, जो प्रदर्शन के दौरान हाथ में विवादित पोस्टर लेकर जेल में बंद उमर खालिद के समर्थन में नारेबाजी कर रहा था।
दरअसल, आजाद मैदान में लोग दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे सीजेपी आंदोलन के समर्थन में और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जश्न मनाने के लिए एकत्र हुए थे। इसी दौरान छात्र आंदोलन की आड़ में देश विरोधी मामलों के आरोपितों का महिमामंडन (Glorification) होते देख पुलिस तुरंत हरकत में आई और युवक को अपनी कस्टडी (Custody) में ले लिया।
यह पूरी घटना शाम लगभग 7 बजे की है, जब आजाद मैदान में प्रदर्शनकारी जमा होकर नारेबाजी कर रहे थे। इसी बीच भीड़ में मौजूद मोहम्मद दानिश नाम का युवक एक पोस्टर हाथ में लहराते हुए दिखाई दिया। इस पोस्टर पर स्पष्ट शब्दों में ‘फ्री उमर खालिद, शरजील इमाम, भीमा कोरेगाँव 16’ लिखा हुआ था। इस तरह के पोस्टर दिखने से वहाँ मौजूद लोगों और सुरक्षाकर्मियों के बीच हड़कंप मच गया।
मैदान पर तैनात पुलिसकर्मियों ने जब इस पोस्टर को देखा, तो वे तुरंत युवक के पास पहुँचे और उससे उसके संबंध में पूछताछ शुरू कर दी। अधिकारियों ने उससे उसकी पहचान साबित करने के लिए कोई वैध दस्तावेज (identity document) दिखाने को कहा, लेकिन वह नाकाम रहा।
घटनास्थल पर मौजूद पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, जब युवक से पहचान पत्र माँगा गया तो उसने साफ मना कर दिया कि उसके पास कोई आईडी (ID) नहीं है।
Youth Detained at Azad Maidan for Displaying 'Free Umar Khalid' Placard
A youth who had gathered at Azad Maidan on Saturday to celebrate the resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan was detained by police after displaying a placard reading "Free Umar Khalid."… pic.twitter.com/GiuybVQQrI
मामले की जानकारी देते हुए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “प्रदर्शन के दौरान सबसे पहले वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय पत्रकारों ने उस युवक को घेरा और पोस्टर के बारे में सवाल-जवाब किए। इसके तुरंत बाद आजाद मैदान में तैनात पुलिस बल के जवानों ने हस्तक्षेप किया और उससे उसका पहचान पत्र दिखाने को कहा। हालाँकि उस व्यक्ति ने अधिकारियों से कहा कि वह उस समय कोई भी पहचान पत्र साथ लेकर नहीं चल रहा है।”
पुलिस अधिकारी ने आगे बताया, “मैदान में किसी भी तरह की अप्रिय घटना या कानून-व्यवस्था (Law & Order) की स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए हम उस व्यक्ति को तुरंत पणाजी पुलिस स्टेशन ले आए, जहाँ उससे विस्तार से पूछताछ की जा रही है।” इस पूरी कार्रवाई का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया है, जिसमें पुलिस अधिकारी युवक से उसका पहचान पत्र माँगते हुए दिख रहे हैं।
उधर जैसे ही इस घटना की जानकारी फैली, भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ता पणजी पुलिस स्टेशन के बाहर एकत्र हो गए। बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर धरना दिया और माँग की कि ‘फ्री उमर खालिद’ के पोस्टर लहराने वालों और उनके समर्थकों के खिलाफ सख्त धाराओं में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए।
पणजी में हिंसक प्रदर्शनों को लेकर कई FIR दर्ज
पणजी में इस तरह के अनाधिकृत प्रदर्शन को लेकर पहले भी पुलिस कार्रवाई कर चुकी है। जिसमें गोवा पुलिस ने बिना अनुमति के निकाली गई सीजेपी की एकजुटता रैली को लेकर अज्ञात समर्थकों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, बीते सोमवार की शाम सैकड़ों की संख्या में लोग मिरामार सर्कल पर जमा हुए थे और वहां से मार्च निकालते हुए आजाद मैदान पहुँचे थे। बाद में जाँच में खुलासा हुआ कि आयोजकों ने इस प्रदर्शन के लिए स्थानीय प्रशासन से कोई पूर्व अनुमति (Prior Permission) नहीं ली थी।
दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों 2020 में खालिद का अहम रोल
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व छात्र और पूर्व सिमी (SIMI) सदस्य के बेटे उमर खालिद को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 14 सितंबर 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार किया था। उस पर गैर-कानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) और भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज है। फरवरी 2020 में भड़के इन दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी।
पुलिस जाँच के अनुसार, खालिद इस हिंसा की बड़ी साजिश (Conspiracies) के मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक था, जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान सड़कों को जाम करने और हिंसा भड़काने की योजना बनाई थी। पुलिस ने यह भी खुलासा किया है कि उसने जरूरी इंतजामों पर चर्चा करने के लिए आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और सह-आरोपी खालिद सैफी से मुलाकात की थी और जाँच के दायरे में शामिल संगठनों से भी उसके संबंध थे।
Umar Khalid Was Saying 'India Occupied Kashmir ' And Some Bitxch From Telugu State is Supporting This MF pic.twitter.com/F5CRm3Rhhv
— Mahesh Goud 🚩 #9999# (@indian66669296) July 25, 2026
खालिद ने यह कहकर मुसलमानों को दंगे करने, सड़कें रोकने और लोगों को परेशान करने के लिए इकट्ठा किया था कि नया कानून ‘मुसलमानों के खिलाफ’ है। उसने ‘चक्का जाम’ में महिलाओं और बच्चों को भी शामिल करने की योजना बनाई थी।
पिछले दो-तीन महीनों से सोशल मीडिया में अचानक उन खबरों की बाढ़ आ गई थी, कि अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का खराब समय आने वाला है। वो 2026 में सत्ता से बाहर हो जाएंगे। इस तरह की तमाम बातें हो रही थीं। दरअसल ये बातें उस टूल किट से निकल रही थीं, जो विदेशों में रची जा रही थी। नागपुर के फैजल खान का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, जिसमें कहा गया है कि 2022 श्रीलंका, 2024 बंग्लादेश, 2025 नेपाल, अगर जल्दी कुछ नहीं किया तो 2026 कहीं इंडिया…। दिल्ली में जो प्रदर्शन हो रहा है, उसी टूल किट का अगला कदम है।
इतना सामान बिना फंडिंग के नहीं आ सकता विदेशी टूल किट की पुष्टि कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके का अमेरिका से भारत आना, सोनम वांगचुक का भूख हड़ताल पर बैठना, 20 जुलाई का प्रदर्शन, हिंसा और उसके बाद की घटनाओं ने कर दी हैं। यह प्रदर्शन पूरी तरह विदेशी टूल किट से संचालित हो रहा है। भारत को श्रीलंका, बंग्लादेश और नेपाल की तरह जलाने के लिए की पूरी तैयारी है।
Is Fazil Khan from Nagpur trying to incite civil war and bring regime change in India?
अब प्रदर्शन को आगे जारी रखने के लिए बांग्लादेश, कतर, जर्मनी और अन्य देशों से खाने, पीने और अन्य आर्थिक मदद दी जा रही है।
इतना सामान बिना फंडिंग के नहीं आ सकता, कई बेरोजगार नेता और कई संस्थाएँ लगी हैं इनके पीछे, अब यह कोई छात्रों का आंदोलन नहीं रहा अब यह प्रायोजित अराजकता है जिसमें मुख्य हाथ बौने की दुकान का है 🙄😐😑 pic.twitter.com/7eGCvGguJU
SHOCKING - ANONYMOUS people are sending costly food through Swiggy and Zomato to Jantar Mantar. Who is behind this protest? 🤯 pic.twitter.com/OaqcLeP7qs
मोदी की मौत का कामना, खाना बांटते प्रदर्शनकारी अब आप देख सकते हैं कि 140 करोड़ जनता के निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौत की कामना करने वाले लोग उनकी तेरहवीं का खाना खिला रहे हैं। एक लड़की बड़ी खुशी के साथ बता रही है कि ये मोदी की तरहवीं का खाना है। अगर किसी को एन्जॉय करना है तो यहां आ सकता है।
SHOCKING & SHAMEFUL 🚨 CJP workers use highly objectionable language against Indian PM Modi. pic.twitter.com/vcBmZeuUyn
बांग्लादेश से प्रदर्शनकारियों के लिए आ रहा खाना अब सवाल है कि ये खाना कहां से आ रहा है और कौन दे रहा है? दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन विदेशों से संचालित हो रहा है। बांग्लादेश में बैठे लोग रात ग्यारह बजे जंतर-मंतर पर खाना भेज रहे है। जंतर मंतर पर देखा जा सकता है कि ऑन लाइन खाना ऑर्डर करने वाले एप्प स्विगी और ज़ोमैटो से खाना आ रहा है। ये खाना बांग्लादेश से आ रहा है।
🇧🇩 बांग्लादेश से जंतर मंतर पर प्रोटेस्टर्स के लिए खाना भेजा जा रहा है!
प्रोटेस्ट अब NEET से आगे निकल चुका है। विदेशी सपोर्ट और फंडिंग के साथ ये तमाशा चल रहा है।
कतर से आ रहा प्रदर्शनकारियों के लिए खाना एक डिलीवरी बॉय ने जो खुलासा किया, वो हैरान करने वाला है। उसने कहा कि डिलीवरी धरना स्थल पर किसी को देने के लिए बोला गया है। ये तो कतर से किसी ने बोला है कि वहां पर ले जाकर दे दो। कई बार कतर से फोन आया था। धरना स्थल पर जो स्टूडेंट है, उनको देने के लिए बोला गया है। बहुत सारे ऑर्डर आते हैं। दिनभर यहां का चक्कर लगता है। कभी मुंबई से आता है, कभी कोलकाता से आता है। कहीं से भी आता रहता है।
Food being ordered and paid from Qatar, delivered through apps to Jantar Mantar protesters. Connect the dots. pic.twitter.com/Pteavbso6V
जर्मनी, दुबई और सऊदी अरबसे आ रहा खाना एक डिलीवरी बॉय ने बताया, “अब तक दस ऑर्डर दे चुका हूं। सारे बाहर के, दूसरे कॉन्ट्री के ऑर्डर को दे रहा हूं। बात करता हूं तो कई कहता है, जर्मनी से हूं। कोई कहता है मैं दुबई (UAE) से हूं। कोई कहता मैं सऊदी अरब से हूं। कोई कहता है मैं गोवा से बात कर रहा हूं। आप वहां बच्चों को खाना दे देना। प्रोटेस्ट पर बैठे हुए सीजेपी वाले। उनको दे देना खाना जाकर। आलिया नाम के एक विदेशी मैडम ने खाना देने कहा।”
A delivery boy shares shocking details of the crowd present at the CJP protest, at Jantar Mantar.
He states that he delivered at least 10 food orders in a single day, to cockroaches supporting the CJP. Each and everyone was ordered and funded from a foreign country like Germany,… pic.twitter.com/hwS5eNn7At
दुबई से एक ही व्यक्ति ने भेजा 2000 प्लेट खाना एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “ऑर्डर से खाना आ रहा है। ऑर्डर वाला खाना पकड़ाता है और चला जाता है। कितने लोग खाना भेज रहे हैं। विदेश से खाना आ रहा है। दुबई से 2000 प्लेट खाना एक ही बंदे ने भेजा आठ बार…लगातार खाना आ रहा है।”
जंतर मंतर में जारी CJP प्रोटेस्ट में हजारों लोगों के लिए कौन पहुंचा रहा खाना?
विदेशों से आ रहा हद से ज्यादा खाना विदेशों से हद से ज्यादा खाना आ रहा है कि प्रदर्शनकारी अब डिलीवरी बॉय को भी खिला रहे हैं। केएफसी का चिकन, बर्गर, पिज्जा, खाना दिया रहा है।
Met a delivery executive outside the protest site who spoke about #CJP, #SonamWangchuk, state of economy, #ethanol, & KFC.
Told me he had been to the site at least six times today with bulk food orders for random strangers.
एक हजार से अधिक पिज्जा का ऑर्डर एक हजार से अधिक पिज्जा का ऑर्डर दिया गया था। एक डिलेवरी बॉय ने कहा कि ऑर्डर मिलने के बाद ये एक हजार पिज्जा जंतर मंतर पर लेकर जा रहे हैं। लगातार लंच और डीनर के लिए पिज्जा की सप्लाई की जा रही है।
Paper leak protests happening in Punjab? No worries.
Mai to delhi wale protest me ja ke waha pizza batunga.
नेपाल से आया भारत को जलाने नेपाल के पोखरा से आए एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि नेपाल में जला डाला, प्रधानमंत्री को भगा-भगाकर मारा, वहीं माहौल यहां पर होना चाहिए दिल्ली में भी। वहां पर देखा होगा कि प्रधानमंत्री को युवकों ने भगा भगा कर मारा है। और अपने हक उनसे मांगा है।
.@DelhiPolice ये आदमी खुद को नेपाल, पोखरा का बता रहा है। यह जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहा है और कह रहा है कि जैसे नेपाल में प्रधानमंत्री और मंत्रियों को मार मार कर भगा दिया, वैसा ही भारत में भी होना चाहिए। pic.twitter.com/WOHJ9FspUR
नेपाल से आकर भारत में सरकार बदलने की तैयारी नेपाल को जलाने वाले कुछ नेपाली भारत को जलाने के लिए जंतर-मंतर पर आना चाहते हैं। उनका कहना है कि जंतर-मंतर को देखकर खून खौल रहा है। नेपाल की तरह इंडिया में भी सरकार चेंज होना चाहिए। हम लोगों को सपोर्ट करेंगे तो जंतर-मंतर पर आएंगे।
नेपाल को जलाने वाले यह नेपाली आतंकवादी अब भारत को जलाने के लिए जंतर मंतर आ रहे हैं pic.twitter.com/JYsZpH86zq
लंदन में पाकिस्तान समर्थित संगठन HFHR का प्रदर्शन CJP के विरोध-प्रदर्शनों को लंदन के ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ (Hindus for Human Rights) का समर्थन मिल रहा है। इस संगठन को पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा समर्थन दिया जाता है। लंदन में आयोजित इस प्रदर्शन में एचएफएचआर (HFHR) के राजीव सिन्हा ने भाग लिया और पूरे नैरेटिव को बदल दिया। उन्हें सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों में ‘मुसलमानों और ईसाइयों पर अत्याचार हो रहा है’ वाले अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए देखा गया।
🚨‼️This is very dangerous.
CJP protests in London are supported by “Hindus for Human rights” - an organisation backed by Pakistan’s ISI.
खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का दावा -CJP नेताओं के साथ की थी जूम बैठक बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने अपने पोस्ट में लिखा, “पैसे कहां से आ रहे हैं? साजिश क्या है? पिछले 20 दिनों में राहुल गांधी जी विदेश यात्रा में किन-किन लोगों से मिले? असली खिलाड़ी कौन?” उनका यह पोस्ट उस वायरल वीडियो के बाद आया है, जिसमें खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू CJP नेताओं के साथ कथित जूम बैठक और आर्थिक मदद का दावा करता दिखाई दे रहा है। हालांकि, इस वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन दावों पर कोई आधिकारिक पुष्टि भी सामने नहीं आई है।
पैसे कहॉं से आ रहे हैं? साज़िश क्या है? पिछले 20 दिनों में राहुल गांधी जी विदेश यात्रा में किन किन लोगों से मिले? असली खिलाड़ी कौन? https://t.co/csNggsAtXg
— Dr Nishikant Dubey (@nishikant_dubey) July 22, 2026
भारत को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने के लिए 10 करोड़ रुपये की मदद वायरल वीडियो में पन्नू कथित तौर पर दावा करता है कि उसकी CJP नेताओं के साथ जूम बैठक हुई थी। वह यह भी कहता है कि ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) CJP को भारत को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने के मकसद से करीब 10 करोड़ रुपये (10 लाख डॉलर) की मदद देगा। वीडियो में पन्नू कथित तौर पर कहता है कि “दिल्ली और मोदी का पतन तय है।” इसके साथ ही वह यह भी दावा करता है कि सिर्फ सरकार बदलना समाधान नहीं है, बल्कि भारत का बंटवारा ही उसका मकसद है।
धर्मेंद्र प्रधान की बलि लेकर ये मत समझना अभिजीत दिपके खेल ख़त्म हो गया। खेल तुमने शुरू किया है लेकिन ख़त्म मोदी ही करेगा। प्रधान का resignation भी मोदी का मास्टर स्ट्रोक साबित होगा लेकिन ये समझ लो तुम अब ख़त्म हो गए।
हिम्मत है तो पंजाब में पेपर लीक करने पर आंदोलन करके दिखाओं जहाँ तुम्हारे आका केजरीवाल की सरकार है। नहीं करोगे पिटाई होने पर कोई बचाओ में नहीं आएगा क्योकि वहां बीजेपी सरकार नहीं।
दूसरे, दिपके और इसके आका केजरीवाल, राहुल, अखिलेश और विदेशों में बैठे धर्मेंद्र के इस्तीफे को अपनी जीत समझने की भूल मत करना। धर्मेंद्र का इस्तीफा पूरे गैंग पर ब्रह्मोस का काम करेगा। राँका का प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कबूलना कि हमारे agitation में गुंडों ने घुस माहौल ख़राब किया। इतना ही बोलना इस सच्चाई को साबित करता है कि उपद्रवी पार्टियां छात्रों के नाम और दिपके जैसे बिकाऊ गुंडों के कंधे पर बन्दूक रख चला रहे थे, वही तिलचट्टों का सबसे बड़ा नुकसान है। खेल तो अब शुरू होगा।
लेखक चर्चित YouTuber
मोदी ने Farmers’ laws को वापस लेते हुए कहा था किसानों के हित में कानून लाया, देश हित में वापस ले रहा हूँ।
अब मोदी ने छात्रों के हितों की बात की है और दोषियों को सजा देने का वादा किया है। तो समझ लो तुम्हारे गुंडे भी नपेंगे।
तुम कह रहे हो सरकार ने छात्रों के खिलाफ FIR रद्द करने का फैसला लिया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ वापस लेने की बात कही है, गुंडों के खिलाफ नहीं जिन्होंने पुलिस पर हमला किया, पथराव किया। FIR अगर कथित छात्रों पर वापस भी हो गई तब भी पुलिस रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज हो ही गया और जब पासपोर्ट के लिए पुलिस इन्क्वायरी आएगी, तब काम हो जायेगा।
जिस भीड़ को तुमने इकठ्ठा किया किया था उसमे किसी को क्या मिला प्रधान के इस्तीफे से, और तुम्हे भी क्या मिला? धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा नीति में मुगलों को साफ़ किया और यही वामपंथियों और कांग्रेस की आँख की किरकिरी थी लेकिन बहाना बना दिया NEET का। मूर्खों NEET परीक्षा हो गयी रिजल्ट आ गया, छात्र दाखिले में व्यस्त है, फिर ये जमावड़ा क्यों? मोदी के लिए अभ्रद शब्द और जो लड़कियों ने जिस अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया दिखा दिया कि कैसे गिरे हुए परिवार से ये लड़कियां हैं।
अब ये बताओ तुम्हारा बाप कौन है?
दिपके, तुम कहते हो, ये आंदोलन सोनम वांगचुक का नहीं था;
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि कह रही है राहुल गांधी का PM House पर धरना दिखावा था;
समाजवादी पार्टी कांग्रेस को कोस रही है;
केजरीवाल की फिर क्या वैल्यू रही;
मतलब किसी को नहीं पता दिपके का बाप कौन है?
या इनका बाप योगेंद्र यादव है जो कहता है सरकार लोकतंत्र से नहीं, सड़क से चलेगी। कुछ पता नहीं कब वो अंदर हो जाये?
अब दिपके कहता है आंदोलन में anti-social elements घुस गए थे।
ये कह कर पिंड नहीं छुड़ा सकता। जो भी आए तुम्हारे आंदोलन में आए और उनकी जिम्मेदारी तुम्हारी ही है।
2500 बदमाश भीड़ में पुलिस ने पहचाने हैं और 250 लोग क्रिमिनल बैकग्राउंड के थे।
दंगा किया इन सबने और पुलिस पर हमला किया। उसकी जिम्मेदारी से तुम बच नहीं सकते।
तुम्हारे लोगों ने मोदी के लिए गंदी गंदी भाषा बोली। अर्धनग्न लड़कियों ने बाज़ारू लड़कियों की तरह मोदी के लिए अपशब्द बोले। उसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी है। तुम्हारे गैंग ने उन्हें ऐसी भाषा बोलने के लिए ट्रेनिंग दी। तुम्हारे गुंडों ने जो पुलिस पर हमला किया, अब कौन बचाएगा उन्हें, अब तुम उनकी FIR वापस करने के लिए भी आंदोलन नहीं कर सकते। कोई नहीं आएगा और पब्लिक sympathy नहीं मिलेगी।
NEET exam के लिए इन नारों का क्या मतलब था -
-सीता का पति नीता के पति का काम कर रहा है;
-RSS मुर्दाबाद, ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद;
भगवान भी मोदी की तरह कमीना है जब चाहे मौसम बदल देता है;
-नाम रहेगा अल्लाह का;
- संत प्रेमानंद जी महाराज नहीं हैं;
-हम हिंदू नहीं हैं हमें हिंदू मत कहो;
-भारत तेरे टुकड़े होंगे।
दुबई, कतर, बांग्लादेश से जो खाना भेज रहे थे वो भी लपेटे में आएंगे और सप्लाई करने वाले भी। पूर्व क्रिकेटर अजय जडेजा ने पेपर लीक और परीक्षा विवादों में जवाबदेही को लेकर बड़ा सवाल उठाया है।
उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जिक्र करते हुए पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस और कर्नाटक के शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा पर सवाल उठाते हुए कहा कि परीक्षा विवादों में जवाबदेही का पैमाना सबके लिए एक जैसा होना चाहिए।
“सवाल सिर्फ एक से क्यों, जवाबदेही सबकी होनी चाहिए।”
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आज NEET पेपर लीक विवाद और लंबे विरोध प्रदर्शनों के बीच हुआ है।
केंद्र में इस्तीफा तो राज्यों में क्यों नहीं? अजय जडेजा ने उठाया जवाबदेही में ‘एक देश, एक पैमाना’ वाला सवाल!
हूतियों ने सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामकों पर हमला किया (फोटो साभार : People's Update) सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच एक बार फिर से खूनी संघर्ष शुरू हो गया है। यमन की तरफ से दागी गई मिसाइलों और ड्रोनों ने दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘अरामको’ और सऊदी के कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया है। इस हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है और लाल सागर के रास्ते होने वाले वैश्विक व्यापार पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
यमन की तरफ से सऊदी अरब पर अचानक कई मिसाइल और ड्रोन दागे गए। इन हमलों की वजह से सऊदी अरब के जिजान औद्योगिक शहर में जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं। जिजान की एक बेहद अहम सुविधा को इस हमले में सीधे तौर पर निशाना बनाया गया है।
इस हमले की चपेट में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको से जुड़ी तेल सुविधा भी आ गई। हमलों के बाद सऊदी अरब के कई इलाकों में अचानक बिजली गुल हो गई। इसके अलावा यमनी हमलों ने सऊदी के यानबू और दमाद इलाकों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।
यानबू में इमरजेंसी अलर्ट और हूतियों की चेतावनी
सऊदी अरब के सिविल डिफेंस विभाग ने खतरनाक हालात को देखते हुए यानबू प्रांत के लिए नेशनल अर्ली वार्निंग प्लेटफॉर्म पर आपातकालीन अलर्ट जारी किया है। यह पूरा विवाद तब और भड़क गया जब शुक्रवार (24 जुलाई) देर रात सऊदी अरब ने यमन के हूती-नियंत्रित शहर होदेइदा पर हवाई हमले किए थे।
हूती के विदेश मंत्रालय ने इन हमलों के बाद कड़ी चेतावनी जारी की थी कि सऊदी अरब को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। हूती समूह से जुड़े अल मसीरा टीवी के अनुसार, सऊदी हमलों में होदेइदा में दूरसंचार प्राधिकरण की सुविधाओं को भारी नुकसान पहुँचाया गया था। साथ ही कमरान द्वीप पर भी बमबारी की गई, जिसमें एक महिला के घायल होने की खबर सामने आई थी।
इससे पहले बुधवार (22 जुलाई) को हूती विद्रोहियों ने बड़ा दावा किया था कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों को अपना निशाना बनाया है। हूती हमलों की वजह से कम से कम एक जहाज को गंभीर नुकसान भी पहुँचा है।
हूतियों ने यह आक्रामक कार्रवाई 20 जुलाई को घोषित की गई अपनी नाकेबंदी के तहत की है। उनका कहना था कि यह हमला सना हवाई अड्डे पर हुए हमले का एक करारा जवाब है। हालाँकि, सऊदी समर्थित सरकार ने पहले सना हवाई अड्डे पर हुए हमले की जिम्मेदारी ली थी।
सऊदी की जवाबी कार्रवाई
सऊदी अरब के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने इन सभी हमलों का जवाब दिया। गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल मल्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी दी कि सेना ने यमन के होदेइदाह प्रांत में हूती मिलिशिया के सभी वैध सैन्य ठिकानों पर उचित सैन्य जवाबी कार्रवाई की है।
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यमन के होदेइदाह, रास इस्सा और सालिफ बंदरगाह समुद्री आवाजाही के लिए पूरी तरह खुले हुए हैं। वहाँ लगातार कमर्शियल जहाज आ-जा रहे हैं। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि हवाई यातायात को खुला रखने के लिए किसी भी एयरपोर्ट को निशाना नहीं बनाया गया है, लेकिन हूती विद्रोहियों ने खुद सना इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर फ्लाइट ऑपरेशंस रोक रखे हैं।
Fires erupt in Jizan, Saudi Arabia, due to Yemeni missile and drone strikes
साल 2022 में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच एक अनौपचारिक शांति समझौता हुआ था, जिसके बाद से दोनों पक्षों के बीच बड़ी लड़ाइयाँ रुक गई थीं। मौजूदा में जो हुए हमले है, वो पिछले कुछ सालों में सऊदी गठबंधन सेना और हूतियों के बीच हुई पहली ऐसी बड़ी और खौफनाक घटना हैं।
इस नए संघर्ष के शुरू होने से दोनों देशों के बीच शांति की सारी उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं। सऊदी अरब ने चेतावनी दी है कि वह अपने जहाजों, नागरिकों और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाना जारी रखेगा। इस जंग के कारण यमन के लाल सागर के समुद्री मार्ग से होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर दुनियाभर के देशों में गहरी चिंता बढ़ गई है।
पिछले डेढ़ महीने से जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन जारी है। प्रदर्शन की मुख्य माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। इस माँग को पूरी करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखित में अपना इस्तीफा सौंपा है।
इसकी जानकारी देते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने अपने एक्स अकाउंट पर पोस्ट किया, “जंतर-मंतर पर और देश में जो स्थिति बनी है, इस स्थिति का राष्ट्र विरोधी ताकतें लाभ न उठाएँ, देश की एकता बनी रहे, भारत के एक भी विद्यार्थी का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में न उलझे, हमारे बच्चे अपना समय पढ़ाई में लगाएँ, करियर बनाने पर फोकस करें, इसी बात पर विचार करते हुए मैंने अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री को भेज दिया है।”
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सुनते ही जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने जश्न मनाया। कॉकरोच जनता पार्टी के एक्स हैंडल से जश्न मनाते प्रदर्शनकारियों का वीडियो सामने आया है। इस वीडियो के कैप्शन में लिखा है, “शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। ये छात्रों की जीत है।”
— Cockroach Janta Party (@CJP_for_India) July 25, 2026
पिछले डेढ़ महीने से CJP के नेतृत्व में NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की माँग को लेकर प्रदर्शन किया जा रहा था। इस प्रदर्शन की प्रमुख माँगों में से एक धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा था। बाकी माँगों को लेकर सरकार पहले ही आश्वासन दे चुकी थी।
लेकिन CJP को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से नीचे कुछ कबूल नहीं था, वे उसी माँग पर अड़े थे। इसे लेकर पिछले दिन शुक्रवार (24 जुलाई 2026) को केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और CJP के नेतृत्व की बैठक भी हुई थी, जिसमें सरकार ने इस माँग पर विचार करने के लिए 24 घंटे का समय माँगा था। इसी अंतराल के बीच अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सामने आ गई है।
(फोटो साभार: इंडिया टूडे, बिजनेस स्टैंडर्ड) कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।
यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।
NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।
उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।
(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)
इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।
लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।
BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।
लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।
पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।
इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।
फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।
सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।
हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।
“Democracy will run from the streets, not Parliament”
Yogendra Yadav is blatantly advocating for anarchy!
यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।
और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।
NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।
‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना
अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।
यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।
‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।
योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।
इसका राजनीतिक संदेश साफ है।
अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।
यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।
भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।
असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।
बंगाल और हताशा की राजनीति
पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।
कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।
लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।
बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।
इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।
ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।
इसका यह मतलब नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।
योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।
जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है
विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।
विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।
कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।
इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।
संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।
भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।
अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।
यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।
हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।
मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।
इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।
हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।
हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।
अंबेडकरवादी विरोधाभास
योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।
इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।
नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।
लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।
संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।
लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता
भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।
पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।
संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।
योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।
ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।
यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।
असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।
भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।
लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।
सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।