क्या वाकई भगवान श्रीकृष्ण का हृदय आज भी धड़क रहा है?
INDIA FIRST
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में धड़कता है श्रीकृष्ण का वास्तविक हृदय
क्या वाकई भगवान श्रीकृष्ण का हृदय आज भी धड़क रहा है?
सिलेबस बदले, किताबें नहीं मिलने पर PDF से पढ़ाई: बच्चों का दुख- दर्द कब समझेगा NCERT
NCERT के किताब का झोल बच्चों पर भारी पड़ रहा है। किताबों का ठिकाना नहीं और नया सेशन शुरू हुए करीब दो महीने बीत गए हैं। इतना ही नहीं, गर्मी की छुट्टियाँ भी जारी हैं, लेकिन अब तक खासकर क्लास 9 के छात्र-छात्राओं की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।साभार
किताबें पीडीएफ फाइल के रूप में डिजिटल फॉर्म में मौजूद है। सिलेबस में बड़े बदलाव किए गए हैं, ऐसे में पढ़ाई जो अप्रैल में शुरू हो जानी चाहिए थी, वो अब तक नहीं हो पाई है। यहाँ तक की स्कूलों के बुक शॉप से ये भी नहीं पता चल पा रहा है कि किताबें अब तक मिलेंगी। केन्द्रीय विद्यालय और दूसरे सरकारी स्कूलों का तो और भी बुरा हाल है। बच्चे परेशान, टीचर परेशान और पैरेंट्स बिचारे सारी बातें जानकर पूरे सिस्टम को कोस रहे हैं।
पैरेंट्स जानना चाहते हैं कि आखिर सिलेबस बदले, तो किताबें पहले क्यों नहीं छपी। अगर किताबों की छपाई न कर पाए तो इस साल नया सिलेबस लागू करने की जरूरत क्या थी। तीन भाषा की जानकारी देने वाला फॉर्मूला क्लास 9 में क्यों इस तरह से थोपा गया। बच्चे पहले से परेशान हैं, वो पूरी चीजों को कैसे मैनेज करेंगे।
किताबों की अनिश्चितता को लेकर टीचर चिंतित
आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के एक बड़े स्कूल में साइंस टीचर मिस शिवानी ( बदला हुआ नाम) ने बदले हुए क्लास 9 सिलेबस में बदलाव के बाद टेक्स्टबुक्स की देरी से चिंता जताई। उनका कहना है कि स्कूलों को इस बारे में साफ जानकारी नहीं मिली है कि किताबें कब तक मिल पाएँगी।
टीचर के मुताबिक, “बदकिस्मती से यह बार-बार होने वाली दिक्कत बन गई है। एकेडमिक सेशन अप्रैल में शुरू होता है, फिर भी टेक्स्टबुक्स अक्सर कई महीनों तक अवेलेबल नहीं रहतीं। थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला लागू होने के साथ क्लास 9 के स्टूडेंट्स से अब तीसरी भाषा पढ़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इन कोर्स के लिए जरूरी टेक्स्टबुक्स भी मौजूद नहीं हैं।”
उन्होंने कहा कि एक टीचर और CBSE स्टूडेंट के पेरेंट्स के तौर पर पूरी परिस्थिति चिंताजनक है। इस तरह की देरी स्कूलों, टीचरों, स्टूडेंट्स और पेरेंट्स, सभी के लिए अनिश्चितता वाली है। सबसे अहम बात यह है कि इससे पूरे सिस्टम की लापरवाही, निरंतरता और तैयारी की कमी का पता चलता है। एजुकेशनल रिफॉर्म्स और करिकुलम में बदलावों को समय पर प्लानिंग, सही रिसोर्स और लागू करने के लिए सही रणनीति की जरूरत होती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर न पड़े।
दिल्ली-एनसीआर की एक केन्द्रीय विद्यालय में टीचर सीमा (बदला हुआ नाम) सोशल साइंस पढ़ाती हैं। इनका कहना है कि क्लास 9 के सोशल साइंस में काफी बदलाव आए हैं। छात्रों को पीडीएफ से पढ़ाना पड़ता है। क्लास में बच्चों के पास किताब नहीं है, इसलिए उन्हें समझाना अपने आप में बड़ा चैलेंज है। बच्चों को पीडीएफ फाइल की कॉपी निकालने के लिए कहा, ताकि उन्हें जो बताया जा रहा है, वह समझ सकें। इस बीच गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, किताबों का कोई अता-पता नहीं है। बच्चों की परीक्षा भी शुरू हो जाएगी, आखिर शिक्षक क्या करे?
एडवांस मैथ्स के बाद एडवांस साइंस की एंट्री
क्लास 9 में इस साल से एडवांस मैथ्स के साथ एडवांस साइंस भी शुरू हो गया है। 2024 में सीबीएसई के स्कूलों में एडवांस मैथ्स की शुरुआत हुई थी। आज तक इसके लिए एनसीईआरटी ने कोई किताब नहीं छापा है। अगर छापा भी होगा तो बच्चों के हाथों तक नहीं पहुँचा। ऐसे में टीचर जो किताब मौजूद है, उससे ही मैथ्स करवाते हैं। जो थोड़ा टफ होता है, उसे एडवांस मैथ्स का सवाल बता दिया जाता है और जो आसान होते हैं उसे बेसिक मैथ्स का। अब सोचा जा सकता है कि एक ही क्लासरूम में जो बच्चा एडवांस मैथ्स वाला सवाल कर रहा होगा, उस वक्त बेसिक मैथ्स लिया बच्चा क्या कर रहा होगा।
ऐसी स्थिति में अब एडवांस साइंस की पढ़ाई शुरू हो रही है। आगे जो बच्चे साइंस पढ़ना चाहते हैं, उन्हें एडवांस मैथ्स और एडवांस साइंस लेना है। ह्यूमेनिटी और कॉमर्स लेने वाले बच्चों को अभी से साइंस पर ज्यादा मेहनत नहीं करना है। आखिर क्लास 11 में ये अंतर आ ही जाता है, तो क्लास 9 में इसकी जरूरत क्या थी।
किताब जिसे मिले, वे छात्र भी परेशान
डीपीएस नोएडा में पढ़ने वाली क्लास 9 की छात्रा अक्षरा का कहना है कि उन्हें दो-तीन दिन पहले किताब मिल गई है। लेकिन अभी भी सोशल साइंस की किताब नहीं मिली है। वैसे भी मैथ्स की तो अलग किताब स्कूल पहले से ही पढ़ाता रहा है। साइंस के लिए एनसीईआरटी की किताब मिल गई है। उसका कहना है कि साइंस की किताब पूरी तरह बदल गई है। मैथ्स का पहला चैप्टर पहले नंबर सिस्टम हुआ करता था, लेकिन अब ज्योमेट्री का है। पहले बच्चे के लिए कैलकुलेशन वाले सवाल ज्यादा आते थे, लेकिन अब लैंग्वेज बेस सवाल ज्यादा हैं। गणित में भी ऐसा लगता है कि लैंग्वेज समझना पड़ेगा। काफी मुश्किल लग रहा है इसे समझना।
उसने कहा कि साइंस की किताब भी काफी मुश्किल लग रही है। बहुत ज्यादा गहराई से समझना पड़ेगा। इसे वही छात्र खुद से कर पाएगा, जिसे साइंस पढ़ना काफी पसंद हो। समरबिल स्कूल, दिल्ली में पढ़ने वाली छात्रा रियाना का कहना है कि उसे तो अभी तक किताब भी नहीं मिली है। स्कूल के अंदर जो बुक शॉप हैं, वहाँ पूछने पर बोला जाता है कि अभी तक उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि किताब कब तक मिलेगा। टीचर ने बच्चों को पीडीएफ भेज कर उसकी कॉपी करवा कर लाने के लिए कहा था। अप्रैल में जैसे-तैसे उनलोगों ने पढ़ा है। मैम भी परेशान रहती हैं। बच्चे भी किताब नहीं मिलने से परेशान हैं। उनकी तो टर्म 1 की परीक्षा भी हो गई है, लेकिन किताब का ठिकाना नहीं है।
जब स्कूल में मौजूद किताब के दुकानदार से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा कि अभी तक तो किताबें नहीं आई हैं। कब तक आएगी उन्हें भी नहीं पता। अब तो गर्मी की छुट्टियाँ चल रही है। अब बच्चों को जुलाई में स्कूल खुलने के बाद ही पता चलेगा कि किताब मिल पाएगी या नहीं। हालाँकि स्कूल से अलग कोंडली के ‘उत्तराखंड बुक शॉप’ के दुकानदार का कहना है कि उनके यहाँ सारी किताबें मिल रही हैं, सिर्फ क्लास 9 की सोशल साइंस की किताब अब तक नहीं आई है। उन्होंने जानकारी दी कि जल्द ही एडवांस मैथ्स के साथ-साथ एडवांस साइंस की किताब बाजार में आने वाली है।
तीन लैंग्वेज पढ़ने की अनिवार्यता से सभी परेशान
बच्चे जब किताब नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं इस साल तीन लैंग्वेज पढ़ना भी क्लास 9 में अनिवार्य कर दिया गया है। एक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और एक विदेशी भाषा। ज्यादातर स्कूलों में इसके लिए हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। ऐसे में जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषा अब नहीं पढ़ाई जा रही है। इससे जुड़े शिक्षकों को भी स्कूलों ने बाय-बाय कर दिया है।
डीएवी स्कूल गाजियाबाद में क्लास 10 में पढ़ने वाली छात्रा की माँ अल्पना राय, जो माँ के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाती भी हैं, उनका कहना है कि बच्चों को दो-तीन दिन पहले किताबें मिली है। उन्होंने किताबों में कई कमियाँ पाई हैं। साइंस में बहुत ज्यादा सिलेबस है, उसे इस तरह से बनाया गया है कि बच्चों के लिए खुद से समझना काफी मुश्किल है। टीचर को भी पढ़ना पड़ेगा। मैथ्स का भी वही हाल है। सोशल साइंस की किताब मिली नहीं है। अप्रैल से अब तक बच्चों के पास किताबें नहीं थी, सिलेबस बदल दिया गया और किताब भी न मिले, तो बच्चा क्या करे। क्लास 9 बच्चे का आधार होता है। इस क्लास में लापरवाही काफी गंभीर बात है। ऐसी स्थिति में तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता बच्चों पर भारी पड़ रही है।
समरविल स्कूल नोएडा में पढ़ने वाली एक छात्रा की माँ जैस्मिन तिर्की का कहना है कि उन्होंने तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता के खिलाफ स्कूल प्रबंधन से विरोध जताया है। उनका कहना है कि उन्होंने अप्रैल में स्कूल से पुरानी किताबें खरीद ली थी। तभी वही किताबें बेची जा रही थी। अब सिलेबस बदल गया है, तो फिर खरीदना पड़ रहा है। ये दोहरा खर्च भी उन्हें परेशान कर रहा है।
हालाँकि, उनका कहना है कि सिलेबस को वक्त-वक्त पर परखा जाना चाहिए, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आज के परिवेश में बदलाव होना चाहिए। लेकिन सिलेबस में बदलाव के बाद वक्त पर किताबों का मिलना भी जरूरी है। अगर किताब नहीं मिलेंगे तो पीडीएफ फाइल से बच्चे पढ़ते हैं। मोबाइल से दूर रखने की हमारी सारी कोशिश बेकार हो जाती है, इसलिए बदलाव से पहले सही रणनीति बनाना जरूरी है। बदलाव करिए, लेकिन बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता को तोड़ कर नहीं। अगर अगले साल इसे लागू किया जाता, तो किताबें भी मार्केट में आ जाती और बच्चों को सहूलियत भी होती।
ये हाल सिर्फ क्लास 9 के बच्चों का नहीं हुआ है। साल 2025 में क्लास 4 से क्लास 8 तक का सिलेबस बदल गया था। उस वक्त भी कई महीनों तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई। क्लास 5 और क्लास 8 के बच्चों ने तो जून तक इंतजार किया था। इसके बावजूद एनसीईआरटी ने कोई सबक नहीं लिया और साल 2026 में क्लास 9 का सिलेबस बदल कर किताब उपलब्ध कराने में असफल रहे। फिर वही पीडीएफ फाइल और टीचर्स के नोट्स पर बच्चों की निर्भरता। गाँवों-कस्बों के बच्चे क्या पीडीएफ फाइल खोल पाएँगे? क्या इंटरनेट की ऐसी सुविधा उन्हें मिलती है, ये भी बड़ा सवाल है। कई बार अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पहले छप जाती हैं, हिन्दी में बाद में आती है। इसको लेकर भी असमानता का आरोप एनसीईआरटी पर लगता है।
नकली किताबों से सावधान रहें
एक बात और है कि प्राइवेट स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महँगी किताबें स्कूल में पढ़ाते हैं, इसे खरीदने का दबाव अभिभावकों पर होता है। इसको लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है और पूछा है कि जब एनसीईआरटी की किताबें कम पैसों में उपलब्ध है, तो स्कूल क्यों महँगी किताबों से पढ़ाती है। लेकिन, एनसीईआरटी की किताबें उपलब्धता पर भी बड़ा सवाल है।
एनसीईआरटी की किताबों में कमी की वजह से कई जगहों पर नकली किताबें मिल रही हैं। इन किताबों की भारी माँग रहती है। उसके अनुपात में आपूर्ति नहीं हो पाती। इसके कारण बाजार में नकली और पायरेटेड किताबों का बड़ा गिरोह सक्रिय है। ये किताबें घटिया कागज, हल्की स्याही और बिना लोगो के छपती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और आँखों पर बुरा असर पड़ता है।
2020 में सिर्फ मेरठ और आसपास के इलाकों में करीब 5.64 करोड़ रुपये की नकली किताबें खपाने की बात सामने आई थी। 2025 में दिल्ली के शाहदरा में नकली किताबों का एक रैकेट पकड़ा गया था जिसके पास से 1.7 लाख से अधिक नकली किताबें जब्त की गई थी, जिसकी कीमत करीब 2.4 करोड़ बताई गई थी। कहने का मतलब यह है कि एनसीईआरटी की नकली किताबों से भी सावधान रहने की जरूरत है। किताबों की कमी की वजह से ‘नकली का धँधा’ भी जोरों से चल रहा है।
NCERT की किताबों में संशोधन और विवाद
एनसीईआरटी की किताबों में हाल ही में कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के मुद्दे पर जमकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। इसके बाद एनसीईआरटी को माफी माँगनी पड़ी और किताब को बाजार से हटाना पड़ा।
कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में राजपूत राजघरानों के मराठा साम्राज्य में दिखाए जाने पर जमकर बवाल मचा। दरअसल किताब में संस्थान ने 1759 का एक मैप प्रकाशित किया, जिसमें राजस्थान के स्वतंत्र राजघरानों जैसे- जैसलमेर, बीकानेर, बूंदी को मराठा साम्राज्य में दिखाया गया। सवाल उठने के बाद NCERT को बदलाव करना पड़ा। उसने एक कमेटी बनाई और समीक्षा के बाद संस्थान ने माना कि उससे बड़ी गलती हुई थी और इस मैप का कोई सोर्स नहीं था।
कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।
कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।
कुल मिलाकर एनसीईआरटी को किताबों में संशोधन से लेकर नई किताब बाजार में लाने के लिए सही रणनीति की जरूरत है। सालों से किताबों की कमी का सामना बच्चे कर रहे हैं। आखिर किताबें कम क्यों छापी जाती है? यह जानते हुए कि इससे कालाबाजारी होती है और नकली किताबों के ढेर में से असली को छाँटना छात्रों के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में अगर किताब बाजार में ही उपलब्ध न हो तो बच्चे क्या करें? उनकी पढ़ाई में गैप आता है। मन नहीं करता पढ़ने का। स्कूल भी हाथ खड़े कर देते हैं। जरा सोचिए ऐसे स्टूडेंट्स का क्या हाल होगा, जो गाँव में बगैर सिलेबस और किताब के पढ़ने की कोशिश करते होंगे।
बाँध में पानी घटते ही बाहर आया सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर, रहस्यमई जलमग्न शिवलिंग है खास पहचान: जानें पुणे में क्यों उमड़े श्रद्धालु और क्या है इतिहास?
सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर (फोटो साभार: Eskal)
महाराष्ट्र के पुणे जिले के भोर तालुका में इन दिनों एक ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है, जिसने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है। भाटघर बाँध का जलस्तर कम होते ही पानी के भीतर छिपा सदियों पुराना कांबरेश्वर मंदिर एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। साल के अधिकांश महीनों तक पानी में डूबा रहने वाला यह मंदिर हर वर्ष कुछ समय के लिए ही दिखाई देता है।
यही वजह है कि इसे देखने के लिए श्रद्धालुओं, पर्यटकों, फोटोग्राफरों और इतिहास प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला, इंजीनियरिंग और इतिहास का जीवंत उदाहरण भी माना जाता है।
पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका मजबूत ढाँचा आज भी लोगों को हैरान कर देता है। मंदिर की रहस्यमयी बनावट, पानी में स्थित शिवलिंग और इससे जुड़ी मान्यताएँ इसे और भी खास बना देती हैं।
कुछ महीने पहले News18 पर एंकर किशोर अजवाणी ने अपने शो आधी हकीकत आधा फ़साना में किसी राज्य में समुद्र में दो शिव मन्दिरों को दिखाया था जो 6 घंटे पानी से बाहर आते हैं और जब एक मन्दिर पानी से बाहर आता तो कुछ दूरी पर दूसरा मन्दिर समुद्र में जलमग्न हो जाता। जलमग्न होने पर मन्दिरों को किसी प्रकार की क्षति नहीं होती। सब भोलेनाथ का चमत्कार है।
भाटघर बाँध का जलस्तर घटते ही सामने आया मंदिर
पुणे के भोर तालुका में स्थित ब्रिटिशकालीन भाटघर बाँध इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। बाँध में पानी का स्तर काफी नीचे पहुँच गया है, जिसके कारण इसके कैचमेंट एरिया में मौजूद कई हिस्से दिखाई देने लगे हैं। इन्हीं में सबसे प्रमुख है कांबरे गाँव का ऐतिहासिक कांबरेश्वर मंदिर।
वेलवंडी नदी पर बने इस मंदिर का अधिकांश हिस्सा हर साल मानसून के बाद पानी में डूब जाता है। जैसे-जैसे बारिश का पानी बढ़ता है, मंदिर पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और कई महीनों तक दिखाई नहीं देता। गर्मियों के मौसम में जब बाँध का जलस्तर घटता है, तब धीरे-धीरे मंदिर का शिखर नजर आने लगता है और फिर पूरा मंदिर सामने आ जाता है।
साभार: NDTVस्थानीय लोगों के अनुसार, मई के आखिर और जून की शुरुआत में यह मंदिर सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही समय होता है जब बड़ी संख्या में लोग यहाँ पहुँचते हैं। ग्रामीण हर साल मंदिर की सफाई करते हैं और वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर को खोला जाता है।
अंग्रेजों के बाँध निर्माण के बाद पानी में समा गया मंदिर
कांबरेश्वर मंदिर की कहानी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है। बताया जाता है कि वर्ष 1928 में अंग्रेजों ने लॉयड डैम यानी आज के भाटघर बाँध का निर्माण कराया था। बाँध बनने के बाद आसपास का बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो गया। कांबरे गाँव को दूसरी जगह बसाना पड़ा, लेकिन मंदिर को वहीं छोड़ दिया गया।
तब से हर वर्ष मानसून के दौरान यह मंदिर पानी में डूब जाता है और गर्मियों में फिर बाहर दिखाई देता है। दशकों से यही क्रम जारी है। समय के साथ यह मंदिर स्थानीय लोगों के लिए केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक बन गया है।
इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर बेहद प्राचीन है। स्थानीय लोग इसे पांडव काल से जोड़ते हैं और मानते हैं कि इसका निर्माण महाभारत काल में हुआ था। हालाँकि कई इतिहास विशेषज्ञ इसे हेमाडपंती शैली का मंदिर मानते हैं।
मंदिर की बनावट, पत्थरों की संरचना और निर्माण शैली इस बात की ओर इशारा करती है कि इसे मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य शैली में तैयार किया गया होगा।
मंदिर की बनावट आज भी इंजीनियरों को करती है हैरान
कांबरेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूती है। वर्षों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है। लगातार पानी की लहरों, गाद और मौसम के प्रभाव के बाद भी इसकी मुख्य संरचना सुरक्षित दिखाई देती है।
मंदिर की दीवारों को बड़े-बड़े तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया है। पत्थरों को बिना आधुनिक तकनीक के इतनी मजबूती से जोड़ा गया कि सदियों बाद भी उनका संतुलन बना हुआ है। मंदिर के शिखर और ऊपरी हिस्से में चूना पत्थर, रेत और पकी हुई ईंटों का उपयोग किया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय की निर्माण तकनीक बेहद उन्नत थी। यही कारण है कि लगातार पानी में रहने के बावजूद मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। हालाँकि समय के साथ कुछ हिस्सों में टूट-फूट जरूर हुई है, लेकिन इसकी नींव और मुख्य ढाँचा अब भी मजबूत दिखाई देता है।
मंदिर को देखने के लिए हर साल आर्किटेक्चर के छात्र, इंजीनियर, शोधकर्ता और इतिहासकार यहाँ पहुँचते हैं। उनके लिए यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का मास्टरपीस है।
पानी से भरा गर्भगृह और रहस्यमयी शिवलिंग
कांबरेश्वर मंदिर का गर्भगृह इसे और भी रहस्यमयी बना देता है। मंदिर पूरी तरह बाहर आने के बाद भी इसके भीतर घुटनों तक पानी भरा रहता है। इसी पानी के बीच भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है।
श्रद्धालु मंदिर के अंदर जाकर पानी में हाथ डालकर शिवलिंग को स्पर्श करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद लेते हैं। भक्तों के लिए यह अनुभव बेहद भावुक और आध्यात्मिक माना जाता है। मंदिर में माता पार्वती और नंदी महाराज की प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं।
साभार: NDTVपहले मंदिर तक पहुँचने के लिए पाँच सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती थीं, लेकिन हर साल जमा होने वाली मिट्टी और गाद के कारण अब वे सीढ़ियाँ दब चुकी हैं। गाँव वाले हर वर्ष मंदिर से गाद हटाने और सफाई करने का काम करते हैं ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन में परेशानी न हो।
मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा और एक खुला आँगन है। यहाँ वीरगळ यानी शहीद योद्धाओं की स्मृति में बनाई गई पत्थर की शिलाएँ भी मौजूद हैं, जो इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाती हैं।
पर्यटन, आस्था और इतिहास का अनोखा संगम बना मंदिर
कांबरेश्वर मंदिर अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है। हर साल जब यह पानी से बाहर आता है, तब दूर-दूर से लोग इसे देखने पहुँचते हैं। सुबह और शाम के समय मंदिर और वेलवंडी नदी का दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान यहाँ का नजारा पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए खास आकर्षण बन जाता है।
स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत लोगों से मंदिर की पवित्रता बनाए रखने की अपील भी करते हैं। गाँव वालों का कहना है कि यह केवल घूमने की जगह नहीं, बल्कि उनकी आस्था और परंपरा का केंद्र है। इसलिए यहाँ आने वाले लोगों को धार्मिक मर्यादा और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए।
ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर तक पहुँचने वाले रास्ते को भी सुरक्षित बनाया है। हर साल मंदिर खुलने के बाद यहाँ पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हजारों श्रद्धालु पानी में मौजूद शिवलिंग के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं।
सदियों पुरानी विरासत की जीवित मिसाल है कांबरेश्वर मंदिर
कांबरेश्वर मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला कितनी उन्नत और टिकाऊ थी। पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका अस्तित्व बना रहना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। हर साल कुछ दिनों के लिए पानी से बाहर आने वाला यह मंदिर मानो समय के भीतर छिपी एक कहानी को फिर से जीवित कर देता है।
भोर तालुका का यह प्राचीन शिव मंदिर आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है और यह साबित करता है कि भारत की ऐतिहासिक धरोहरें केवल पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति की जीवित पहचान हैं।
बंगाल में BJP सरकार आई तो डरकर दक्षिण में भाग रहे घुसपैठिए, कर्नाटक में 20 लाख+ अवैध बांग्लादेशी होने का दावा
कर्नाटक में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से इसको लेकर लगातार रिपोर्टें सामने आ रही हैं। ऑर्गेनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, हुबली के श्री सिद्धरूढ़ रेलवे स्टेशन के बाहर कुछ दिनों पहले हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया और पश्चिम बंगाल व पूर्वी राज्यों से आने वाले लोगों की कड़ी निगरानी की माँग उठाई।
रिपोर्ट के अनुसार, श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुथालिक और संगठन के कार्यकर्ताओं ने यह विरोध प्रदर्शन उस आशंका के बीच किया कि पश्चिम बंगाल में शुभेंदु सरकार की कार्रवाई के बाद कई संदिग्ध बांग्लादेशी दक्षिण भारत के शहरों में शरण लेने पहुँच रहे हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे लोग पहचान छिपाने और काम की तलाश में कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों का रुख कर सकते हैं।
Illegal Bangladeshi In Hubballi: ಅಕ್ರಮ ಬಾಂಗ್ಲಾ ವಲಸಿಗರ ದಾಖಲೆ ಪರಿಶೀಲನೆ ನಡೆಸುತ್ತಿರುವ ಪೊಲೀಸರು
— Republic Kannada (@KannadaRepublic) May 23, 2026
WATCH #RepublicKannada LIVE: https://t.co/hNIigZLnqy#bangladeshi #policeraid #hubbli #karnataka #IllegalBangladeshiimmigrants #Bangladeshiimmigrants #republickannada pic.twitter.com/tZs5dyZ86b
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि फर्जी आधार कार्ड के सहारे लोगों को बिना पर्याप्त जाँच के यात्रा करने दी जा रही है। उनका कहना था कि रेलवे पुलिस ट्रेनों में संदिग्ध यात्रियों की केवल औपचारिक जाँच कर रही है। हाल ही में हुबली रेलवे स्टेशन पर पश्चिम बंगाल से आए करीब 10 संदिग्ध लोगों से पूछताछ की गई थी। उन्होंने खुद को बागलकोट जिले में मजदूरी के लिए जा रहा बताया और आधार कार्ड दिखाने के बाद उन्हें जाने दिया गया।
इस पर नाराजगी जताते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सिर्फ आधार कार्ड नागरिकता का पर्याप्त प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि फर्जी दस्तावेज भी आसानी से बन जाते हैं। प्रमोद मुथालिक ने कहा कि केवल आधार कार्ड देखकर लोगों को छोड़ना ठीक नहीं है बल्कि गहराई से जाँच होनी चाहिए ताकि घुसपैठिए कर्नाटक में बस न सकें। उन्होंने पुलिस, रेलवे और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की भी माँग की।
विरोध के बाद रेलवे स्टेशन पर खासकर पश्चिम बंगाल से आने वाली शालीमार एक्सप्रेस के यात्रियों की जाँच बढ़ाई गई लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसे कर्मचारियों की कमी के कारण केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई बताया।
इस बीच जनवरी में आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कर्नाटक में करीब 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हो सकते हैं। खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा गया कि इनमें से 70-80% लोगों के पास भारतीय पहचान पत्र हैं। अनुमान के मुताबिक, बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में 5 से 6 लाख, मालनाड और तटीय क्षेत्रों में 8 से 10 लाख और बाकी उत्तर कर्नाटक व पुराने मैसूर क्षेत्र में रह रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेशी घुसपैठिए खुद को पश्चिम बंगाल का निवासी बताकर कर्नाटक में अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं। बेंगलुरु, बेंगलुरु ग्रामीण और मालनाड क्षेत्रों में ये लोग निर्माण स्थलों, सुपारी और कॉफी बागानों, कबाड़ दुकानों समेत कई जगहों पर कम मजदूरी में काम करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय मजदूरों की तुलना में ये 100 से 150 रुपए कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं और इसलिए इन्हें प्राथमिकता मिलती है।
राज्य में सबसे अधिक ऐसे लोग बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों में रहने की बात कही गई है। यहाँ वे कूड़ा बीनने, निर्माण मजदूर, सैलून कर्मचारी, अस्पतालों में सफाई कर्मी, होटल-रेस्तराँ में कामगार और सड़क किनारे कपड़े व रोजमर्रा का सामान बेचने का काम करते हैं। वहीं, चिक्कमगलुरु, उडुपी, शिवमोग्गा, कोडागु, दक्षिण कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ जैसे जिलों में कॉफी-सुपारी बागानों, रिसॉर्ट, एस्टेट और फार्महाउस में भी इनके काम करने की बात सामने आई है। कुछ लोग अपने परिवारों के साथ रहते पाए गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि तटीय और मालनाड क्षेत्रों में पिछले 15 वर्षों से रह रहे कई अवैध बांग्लादेशी भारतीय पहचान पत्र हासिल कर चुके हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने लाखों रुपये की संपत्ति खरीदी और कथित तौर पर भारतीय पहचान के आधार पर पासपोर्ट बनवाकर 15-20 साल बाद दूसरे देशों तक में पहुँचे हैं।
‘भाषा-कला-खाना-पहनावा… सब मुगलों की देन’: ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने यूँ किया इस्लामी आक्रांताओं का महिमामंडन, बाबर से पहले देश में कुछ नहीं था क्या?
1992 की बॉलीवुड फिल्म ‘बेमिसाल’ के एक सीन में अमिताभ बच्चन ने कहा था, “कश्मीर को छोड़कर, भारत के सभी हिल स्टेशन अंग्रेजों ने खोजे थे, कश्मीर को मुगलों ने खोजा था।” यह बात उन्होंने राखी गुलजार यानी कविता से कही थी। उस वक्त कविता मुगल शासकों की ‘शानदार संगीत, चित्रकला और वास्तुकला’ के लिए तारीफ कर रही थीं और जोर दे रही थीं कि उनका कोई मुकाबला नहीं है। तब अमिताभ ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि उनकी सबसे बड़ी देन तो ‘मुगलाई खाना’ है।
यह क्लिप 2022 में फिर से सामने आई और वायरल हो गई। लोगों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि फिल्म इंडस्ट्री किस तरह लगातार सच को तोड़-मरोड़कर पेश करती है, ताकि हमलावरों को महिमा मंडित किया जा सके। वैसे भी यह हिंदू-विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए बदनाम रही है।
अब 2026 की बात करें, तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने उस फिल्मी सीन को अपने तरीके से लिखा है। इसमें मुगल वंश को ‘भाषा, खान-पान, वास्तुकला, संगीत, कला और मिली-जुली संस्कृति’ का श्रेय दिया गया है। साथ ही, व्यंग्य करते हुए यह भी जोड़ा गया है कि इसी वंश की वजह से 2014 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई।
The Mughals brought language, food, architecture, music, art and syncretism to India. And they brought Narendra Modi’s party to power https://t.co/XX1e6m40ve
— The Economist (@TheEconomist) April 20, 2026
“What have the Mughals ever done for us?” शीर्षक वाला लेख 19 अप्रैल 2026 (रविवार) को प्रकाशित हुआ। इसके साथ यह टैगलाइन थी कि भारत के सबसे महान मुस्लिम साम्राज्य ने अपनी सबसे शक्तिशाली हिंदू पार्टी का निर्माण कैसे किया।
यह मुस्लिम शासकों का स्तुतिगान है, जो यह बताता है कि मुगलों ने भारत को समृद्ध बनाया। लेकिन, मुगलों के प्रभाव के बिना भी भारत की हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक सभ्यता थी। यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत थी। कला और विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियाँ थीं। साहित्य में योगदान था और जिसकी एक समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत थी।
बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। वह परिवारिक झगड़ों और लड़ाइयों में बार-बार मिली हार के कारण अपने पैतृक घर फरगना (जो अब उज़्बेकिस्तान में है) से बेदखल हो गया। इसकी वजह से वह भारत की ओर रुख किया। उसे यहाँ की अपार धन-संपदा और संसाधनों ने आकर्षित किया था। वह इस्लामी आक्रमणकारी था।
इस्लामवादियों से लेकर श्वेत उपनिवेशवादियों तक— सभी भारत को लूटने आए थे। इसका शोषण करने आए थे। इसमें वे सफल भी रहे। आक्रमणकारी किसी भी तरह से यहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन करवाना चाहते थे। मुगलों का उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही था।
मुगलों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया: एक हास्यास्पद तर्क
‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक, “उन सभी में, मुगलों का शासन सबसे लंबे समय तक चला। 21 अप्रैल को पानीपत की पहली लड़ाई के ठीक 500 साल पूरे हो रहे हैं; यह वह समय था जब तैमूरलंग और चंगेज खान के मध्य एशियाई वंशज बाबर (इसीलिए ‘मुगल’, जो ‘मंगोल’ शब्द से बना है) ने दिल्ली के अंतिम सुल्तान को हराया था।
उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य, अपने चरमोत्कर्ष पर, दुनिया के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। इसके शासकों ने भारतीय राजशाही की रीतियों को अपनाया, स्थानीय लोगों से विवाह किए, और वास्तव में वे भारतीय ही बन गए (अंग्रेजों के विपरीत)। उनकी उपलब्धियाँ भारतीय ही हैं,”
मुगल साम्राज्य की धन-संपदा और सत्ता का स्रोत वह भारतीय भूभाग ही था, जिसे उन्होंने सदियों तक लूटा-खसोटा। उन्होंने देश की फलती-फूलती प्राचीन रीतियों और परंपराओं का लाभ उठाकर नई संरचनाएँ खड़ी कीं। इन संरचनाओं का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके किया गया था। बाद में इन्हें ‘समन्वय के प्रतीक’ स्मारक के रूप में महिमामंडित किया गया।
वे अपनी लूटी हुई धन-संपत्ति को अपनी मूल मातृभूमि तक नहीं ले जा सके, क्योंकि उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों द्वारा वहाँ से खदेड़ दिया गया था। बाबर ने वापस जाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
दरअसल वे भारत में किसी प्रेम या लगाव के कारण नहीं, बल्कि केवल मजबूरी के कारण रुके रहे। भारत के प्रति उनके तथाकथित प्रेम का एक और प्रमाण इस बात से मिलता है कि बाबर के पार्थिव अवशेषों को, उसकी इच्छानुसार काबुल ले जाकर दफनाया गया। वह उसी स्थान को अपना ‘घर’ मानता था।
वामपंथी-उदारवादी खेमा (लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड) आमतौर पर आक्रमणकारियों की निंदा का तो स्वागत करते हैं, लेकिन तब नहीं, जब वे अत्याचार भारत या हिंदुओं के विरुद्ध किए गए हों। ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या उन्हें सही ठहराने जाता है। जैसा कि इस लेख (कॉलम) में देखा जा सकता है, उनका गुणगान किया जाता है।
इसी क्रम में, ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी मजाक उड़ाया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने भारत के उस इतिहास का जिक्र किया था, जिसमें भारत को विदेशी शक्तियों के अधीन रहना पड़ा।
इतिहासकारों ने माना कि मुगलों ने मंदिरों तोड़ा, साथ ही दावा किया कि इसे उनका अपमान नहीं माना जा सकता। ‘जजिया’ लगाना, हिंदुओं का नरसंहार और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन, जिनका जिक्र इस्लामी शासकों ने खुद अपनी लेखनी में किया था, उन्हें उसने आसानी से नजरअंदाज कर दिया।
हालाँकि वह गुट जो छोटी-मोटी घटनाओं को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ‘उकसावा’ करार देता है, वह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों पर हुए हमलों को अपमान नहीं मानता। वह यह कहना चाहता है कि इसे आस्था पर हमला नहीं समझा जाना चाहिए। ध्यान दें तो हिंदू-विरोधी आचरण को सामान्य सी बात मानता है।
इसके बाद लेखक ने कहा, “उन्होंने भारत के पास जो कुछ भी था, सब ले लिया। साथ ही, यह विचारधारा पूछती है कि बदले में उन्होंने हमें क्या दिया?” फिर मुगलों का गुणगान करना शुरू कर देता है।
मुगलों के जरिए भारत का परिचय फारस से हुआ, जिन्होंने भारतीय भाषा में योगदान दिया- द इकोनॉमिस्ट
लेख में जोर देकर कहा गया, “उनके ऊपर दिए गए उद्धरण के मूल 28 शब्दों में से, एक-चौथाई शब्द फारसी के जरिए भारत में आए। यह बात मुस्लिम भारत के इतिहासकार रिचर्ड ईटन बताते हैं। मुगल दरबार की भाषा ने उत्तरी भारत की ज्यादातर भाषाओं को प्रभावित किया है। सच तो यह है कि हिंदी और हिंदू—दोनों ही ‘हिंद’ शब्द से आए हैं। यह उस नदी का फारसी नाम है, जिसे अंग्रेजी में ‘इंडस’ (और इस तरह ‘इंडिया’) कहा जाता है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद में ‘हिंदू’ शब्द जोड़ने के अलावा, मुगलों ने हमारे लिए और क्या किया है?”
भारत में भाषाओं का सबसे विविध संग्रह मौजूद है, जो समय के साथ लगातार विकसित होता रहा है। भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और समय के साथ आगे बढ़ती हैं। इसी तरह हिंदी का फारसी के साथ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के एक ही पूर्वज है। हालाँकि हिन्दी की जड़ें संस्कृत में हैं। भाषाओं का यह जुड़ाव मुगलों के प्रभाव से ज्यादा, इन भाषाओं के मूल से संबंधित था।
अगर इसी तर्क को माना जाए, तो अंग्रेजी भाषा का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करना गलत, भ्रामक और ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। ठीक वैसे ही, जैसा कि मौजूदा तर्क है। इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि भाषा, कला और साहित्य के प्रसार के लिए दमन की जरूरत नहीं होती। कई देश बिना किसी की गुलामी किए भी विदेशी भाषाओं को अपना चुके हैं।
मुगलों ने भारतीय खान-पान और वास्तुकला में एक खास नजाकत जोड़ी- द इकोनॉमिस्ट
‘द इकोनॉमिस्ट’ ने मुगलों की तारीफ करते हुए उनके खान-पान पर जोर दिया। इन्हें अक्सर ‘मुगलाई’ कहा जाता है, इनमें तंदूरी व्यंजन और बिरयानी शामिल हैं।
“तंदूर—मिट्टी का एक ओवन जिससे परतदार नान और भुने हुए कबाब निकलते हैं— फारसी दुनिया से आया था। ठीक वैसे ही जैसे समोसे, शरबत, अलग-अलग तरह की मिठाइयाँ और बिरयानी आई थीं। बिरयानी पिछले दस सालों से लगातार डिलीवरी ऐप्स पर भारत में सबसे ज्यादा ऑर्डर की जाने वाली डिश रही है।
BJP का वह धड़ा, जो मौज-मस्ती का विरोधी है, वह मांस और अंडों को पसंद नहीं करता, लेकिन शाकाहारी लोग भी अच्छे तंदूरी पनीर का मजा लेते हैं। लेख में कहा गया है कि पनीर शब्द फारसी के ‘पनीर’ से आया है, जो एक तरह का चीज है और शायद अफगानों के जरिए भारत पहुँचा।
तंदूर का आविष्कार सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यताओं में हुआ था। मध्य एशिया में बाबर के राज में चावल की खेती नहीं होती थी, जबकि बिरयानी का एक मुख्य हिस्सा चावल ही है। भारतीय उपमहाद्वीप मशहूर मसालों के लिए मशहूर रहा है। लेकिन यह विचार कि मसालों और मीट के साथ पकाया गया चावल एक बेहतरीन डिश बन सकता है, इसके लिए शायद मुगलों का ही शुक्रिया अदा करना होगा।
लेख के अनुसार, मुगलों के आने से पहले भारतीय लोग शायद संघर्ष कर रहे थे या बहुत ही साधारण भोजन पर निर्भर थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनके पास स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का ज्ञान और महारत नहीं थी। इसके बाद भारतीय मजदूरों और संसाधनों से तैयार की गई भव्य परियोजनाओं के लिए मुगलों की तारीफ की गई।
लेख में बताया गया, “भारत के दस सबसे मशहूर ऐतिहासिक स्थलों में से चार (जिनके लिए टिकट लगता है), जिन्हें स्थानीय पर्यटक सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं और विदेशियों की पसंद वाली सूची के छह स्थल मुगलों के ही बनवाए हुए हैं। इन दोनों सूचियों में ताजमहल सबसे ऊपर है। हर साल प्रधानमंत्री लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हैं। यह दिल्ली में स्थित एक मुगल स्मारक है और भारत की अपनी पहचान के लिए इतना अहम है कि यह हमारे सबसे आम नोट के पीछे भी छपा हुआ है।”
विडंबना यह है कि इन इमारतों का निर्माण उस समय हुआ था, जब आम भारतीय (ज्यादातर हिंदू) मुगलों की तानाशाही और बर्बरता को झेल रहे थे। ये इमारतें मुगलों की बेहद आलीशान जीवनशैली की प्रतीक हैं और इन्हें उनके समृद्ध साम्राज्य की शान दिखाने के लिए ही बनाया गया था।
इसके अलावा उनके पास इस धन-दौलत को मध्य एशिया ले जाने का कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मर्जी के मुताबिक और अपने फायदे के लिए ही इस धन का इस्तेमाल किया।
बहरहाल, ये सभी ऐतिहासिक स्थल पूरी तरह से भारत की संपत्ति हैं। चुनी हुई सरकार का पूरा अधिकार है कि वह इनका इस्तेमाल मुद्रा (नोटों) पर छापने के लिए करे या किसी अन्य काम के लिए। फिर भी, इससे इन स्थलों से जुड़ा इतिहास या मुगलों की वह धूमिल विरासत मिट नहीं जाती। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू की नींव संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में है, फिर भी इस बात को खुलकर नहीं बताया जाता, क्योंकि ऐसा करने से मुस्लिम बादशाहों की बड़ाई करने वाले एजेंडे कमजोर पड़ जाएँगे।
शेरवानी, सितार और BJP की जबरदस्त बढ़त के लिए मुगल जिम्मेदार हैं- द इकोनॉमिस्ट
‘द इकोनॉमिस्ट’ ने शेरवानी और सितार को लेकर मुगलों की खूब तारीफ़ की। ये दोनों चीज़ें 16वीं और 18वीं सदी के बीच विकसित हुई थीं। इसने इतिहासकार जदुनाथ सरकार का हवाला देते हुए कहा, “मध्यकालीन भारत के लोकप्रिय धर्म सूफीवाद, उर्दू भाषा और कला—विजेताओं और पराजितों की साझा विरासत थे। इन्होंने इन दोनों को आपस में जोड़ने का काम किया।
लेख में अकबर के कथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ के उस घिसे-पिटे और उबाऊ ढोंग का प्रचार किया, जिसने हिंदू महाकाव्यों का अनुवाद करवाया था। साथ ही, उस समुदाय के खिलाफ चलाए गए अपने हिंसक अभियानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। मानो यह महिमामंडन ही काफी न हो, इस लेख ने हिंदू मान्यताओं का उपहास उड़ाते हुए यह दावा भी कर दिया कि अगर राम जन्मभूमि पर ‘बाबरी मस्जिद’ न होती, तो ‘भगवा पार्टी’ (BJP) कभी सत्ता में नहीं आ पाती।
लेख में कहा गया, “1990 में, जब पार्टी के पास संसद में केवल 16% सीटें थीं, तब उसने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया। इसमें रामजन्मभूमि स्थल पर एक मंदिर बनाने की माँग की गई। इसे रामायण के नायक भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है। उस जगह पर एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे पहले मुगल बादशाह बाबर के शासनकाल में बनवाया गया था।”
इसमें कहा गया, “1992 में, BJP के अधिकारियों की मौजूदगी में एक भीड़ ने उस मस्जिद को ढहा दिया। इस घटना से पूरे देश में हिंसा की आग भड़क उठी, जिसने पार्टी के जनाधार को मजबूत किया और अंततः उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचा दिया। 2024 की शुरुआत में, जब मोदी ने उस बहुप्रतीक्षित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, तब तक उनकी पार्टी के पास 56% सीटें हो चुकी थीं। पिछले एक दशक में पार्टी ने मुगल-कालीन शहरों के नाम बदलने, मुगलई खान-पान को नकारने और इतिहास की किताबों से मुगलों का जिक्र मिटाने पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रखा है।”
राम मंदिर हिंदू धर्म का मूल आधार है। इसे महज एक चुनावी हथकंडा बताकर उसकी गरिमा को कम करने की कोशिश की गई। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि BJP ने इस मुद्दे का समर्थन किया था। इस मीडिया संस्थान ने बाबर को नायक के तौर पर दिखाया, जबकि वह मंदिरों को ढहाने वाला था। वहीं दूसरी ओर BJP को हिंदुओं के अधिकारों की पैरवी करने के कारण, एक खलनायक के तौर पर पेश किया गया।
लेख के आखिर में कहा गया, “ईंटों से बनी किसी इमारत को ढहा देना एक बात है, लेकिन उस संस्कृति को मिटाना कहीं ज्यादा मुश्किल है। यह पाँच सदियों से भी ज्यादा समय से भारत के खून और मिट्टी में रच-बस गई है। तो फिर उनके इस सवाल का सबसे अच्छा जवाब यही है कि मुगलों ने उनके लिए आखिर किया क्या है। उन्होंने राजनीतिक हिंदुत्व को उसका एक ऐसा ‘खलनायक’ दिया, जो हमेशा रहेगा और जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता।”
इंटरनेट यूजर्स ने जताई हैरानी
एक यूज़र ने इस पर टिप्पणी करते हुए लेक को बेतुका करार दिया। उसने लिखा “यह कहना कि मुगलों की वजह से ही नरेंद्र मोदी की पार्टी सत्ता में आई, कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर और नाजियों ने ही इजरायल देश बनाया था,”
वरुण ने मीडिया प्लेटफॉर्म से कहा कि वे अपने दायरे को केवल कला या संगीत तक ही सीमित न रखें, बल्कि सूर्य, चंद्रमा और हिमालय की रचना के लिए मुगलों का भी गुणगान करें।
Stating that "Mughals brought Narendra Modi’s party to power" is a bit like saying "Hitler and Nazis created the state of Israel."
— Openminded Fanatic (@Openatic) April 20, 2026
While the traumatic experiences of these regimes(Mughals in the case of Hindus and Nazis in the case of Jews) catalysed a defensive response that…
It seems these days in India, Marxist historians have been removed and Islamists have taken their place. Now no soft propaganda, it’s Direct Islamic narrative !! https://t.co/pIwQzPjJfl
— Monidipa Bose - Dey (মণিদীপা) (@monidipadey) April 21, 2026
While Mughals left cultural legacies, records show atrocities vs. non-Muslims, esp. Hindus:
— Grok (@grok) April 20, 2026
Baburnama (primary): Babur boasted slaughtering "infidels" at Chanderi, turning Dar-ul-Harb to Dar-ul-Islam; poem: "For Islam I battled Hindus... Thank God I became a Killer of…
‘द इकोनॉमिस्ट’ भी दूसरी मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों की तरह ही ऐसी कहानियाँ गढ़ने में माहिर है, जो भारत की उपलब्धियों का श्रेय विदेशियों को देती हैं। चाहे वे अतीत से जुड़ी हों या वर्तमान से। दरअसल ये भारतीय हिन्दू समाज की उपलब्धियों को नकारने का तरीका है।
जनसंख्या असंतुलन देश भर में है, रोहिंग्या/बांग्लादेशी कॉकरोचों की तरह देश भर में फैले हुए हैं; लेकिन कई बार उन्हें अदालतों से भी संरक्षण मिल जाता है
गृह मंत्री अमित शाह ने देश भर में घुसपैठ और उसके कारण कई भागों खासकर सीमावर्ती इलाकों की Demographic Change समस्या से निपटने के लिए High Power Committee का गठन किया है। इसके अध्यक्ष होंगे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नावलेकर और सदस्य होंगे पूर्व IAS दुर्गा शंकर मिश्र; पूर्व IPS बालाजी श्रीवास्तव और डॉ शमिका रवि जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति की सदस्य भी हैं।
![]() |
| लेखक चर्चित YouTuber |
प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी समिति के गठन की बात 15 अगस्त के अपने भाषण में भी कही थी और अमित शाह ने अब बीड़ा उठाया है। समय भले ही लगेगा लेकिन अमित शाह ने जैसे नक्सलवाद को लगभग ख़त्म कर दिया, वो इस समस्या का भी हल निकाल कर रहेंगे।
लेकिन समस्या अत्यंत गंभीर है जो केवल भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में व्याप्त है। इस्लामिक देशों से मुस्लिम यूरोप, अमेरिका और भारत में घुसे हैं कभी शरणार्थी बनकर और कभी घुसपैठ करके और भारत में तो उनकी पैरवी करने वाले तमाम सेकुलर दल हैं और अनेक नामीग्रामी वकील खड़े हो जाते हैं।
भारत को गज़वा-ए-हिंद बनाने की बात करते हैं तो अमेरिका को भी अब इस्लामिक राष्ट्र बनाने की बात करने लगे हैं और यूरोप को भी इस्लामिक यूरोप बनाने का षड़यंत्र चल रहा है लेकिन अमेरिका और यूरोप के दिलों में भारत के अल्पसंख्यकों के लिए दर्द कुछ ज्यादा ही रहता है।
भारत में एक तरफ बड़ी मुस्लिमों की आबादी बढ़ाई गई है तो दूसरी तरफ योजनाबद्ध तरीके से मस्जिदें और दरगाह बनाई गई हैं। शहर के शहर मुस्लिम आबादी ने घेर लिए हैं। मुंबई चारों तरफ से इस कदर घेरा हुआ है कि अगर दंगा हो जाए तो हिंदुओं को न मुम्बई में घुसने का मार्ग मिलेगा किसी की रक्षा के लिए और न हिंदुओं को बाहर निकलने का मार्ग मिलेगा।
आपने देखा होगा हर हिंदू त्योहारों की शोभा यात्राओं पर पथराव होता है और बहाना दिया जाता है कि शोभायात्राओं के शोर से हमें मस्जिद में परेशानी होती है। कैसे न होगी जब हर मार्ग पर मस्जिद खड़ी कर दी गई हैं। इसलिए बरेली का मौलाना तौकीर रजा कहा करता था कि अगर हमारे लड़के सड़कों पर आ गए तो हिंदुओं को निकलने का भी रास्ता नहीं मिलेगा।
अभी अमित शाह के मार्गदर्शन पर शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल में घुसपैठियों को निकालने का अभियान चलाया है और हज़ारों बांग्लादेशी बांग्लादेश की तरफ भाग भी रहे हैं। लेकिन रोहिंग्या और बांग्लादेशी केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं हैं। वहां से तो घुसते है और फिर देश भर भी फ़ैल जाते हैं। असली कॉकरोच तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी हैं जो भारत के हर प्रान्त में मिल जाएंगे।
और इसलिए बांग्लादेशी और रोहिंग्या को ढूढ़ने का यह अभियान पूरे देश में चलना चाहिए। दिल्ली में तो कॉलोनियां ही ऐसी बन गई हैं जहां 80-85% मुस्लिम मिल सकते हैं। लेकिन दिल्ली में बीजेपी सरकार सो रही है।
दरअसल आधार कार्ड देते हुए ही पूरी जांच होनी चाहिए। जो एजेंसियां ऐसे कार्ड बनाती हैं उन पर ही निगरानी की जरूरत है।
बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि जो भी बांग्लादेशी हैं, खुद ही चले जाएं वरना पकडे गए तो Detention Center में डालकर जांच होगी। ऐसा आदेश पूरे भारत के लिए दिया जाना चाहिए। रेलवे की भूमि पर जहां भी अवैध कब्ज़ा है, उन इलाकों में खासकर यह आदेश लागू करने की जरूरत है।
