बंगाल : अब ‘नो कोर्ट, सीधा डिपोर्ट’: मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अवैध बांग्लादेशियों को BSF को सौंपने का दिया आदेश, बोले- अदालत ना ले जाएँ

       शुभेंदु अधिकारी और अवैध बांग्लादेशी प्रवासी, BSF को सौंपने का आदेश (फोटो साभार : NDTV & Jagran)
बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने पर बीजेपी सरकार ने घुसपैठ पर अब तक का सबसे बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एलान किया है कि राज्य में पकड़े गए अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को अब कोर्ट में पेश नहीं किया जाएगा, बल्कि सीधे बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपकर वापस भेजा जाएगा। ‘पता लगाओ, हटाओ और देश-निकाला दो’ अभियान के तहत यह नया नियम 20 मई से लागू हो चुका है।

जिन बांग्लादेशियों को अपनी कुर्सी की खातिर ममता बनर्जी दामाद बनाकर पाल रही थी, अब दामादों को जिस तरह देश-निकाला किया जा रहा है, हर बीजेपी राज्य को शुभेंदु के रास्ते पर चलना होगा। ये अवैध घुसपैठियों की वजह से भारतीयों को मिलने वाली सुविधाएं बाधित हो रही है। जब तक देश से घुसपैठियों- पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्या- को बाहर नहीं किया जाएगा देश में असुरक्षा का डर हमेशा बना रहेगा। इन घुसपैठियों का समर्थन करने वाली पार्टियों से पूछना चाहिए कि जिन रोहिंग्यों को जब कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं फिर क्यों भारत में रखने के लिए हिन्दू-मुसलमान कर माहौल ख़राब कर रहे हो? क्या ये घुसपैठिये तुम्हारे दामाद हैं?         

अब कोर्ट के चक्कर नहीं, सीधे बॉर्डर पर ‘नो एंट्री’

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हावड़ा में साफ कहा कि पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को कड़े निर्देश दे दिए गए हैं। हावड़ा स्टेशन या राज्य में कहीं भी कोई अवैध बांग्लादेशी पकड़ा जाता है, तो उसे अदालत ले जाने की जरूरत नहीं है। पुलिस पहले उसे अच्छे से खाना खिलाएगी और फिर सीधे उत्तर 24 परगना के पेट्रापोल या बशीरहाट बॉर्डर पर BSF के हवाले कर देगी, जहाँ से उन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा।

किसे मिलेगी राहत और कौन होगा बाहर?

इस नए नियम से उन लोगों को अलग रखा गया है जो नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के दायरे में आते हैं। बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थी अगर प्रताड़ना की वजह से भारत आए हैं, तो वे CAA के तहत नागरिकता का दावा कर सकते हैं। लेकिन जो इस दायरे में नहीं आते और अवैध रूप से रह रहे हैं, उन्हें तुरंत डिपोर्ट किया जाएगा। हर हफ्ते ऐसे लोगों की रिपोर्ट पुलिस महानिदेशक (DGP) के जरिए मुख्यमंत्री दफ्तर भेजी जाएगी।

2025 के नए कानून से मिला सरकार को पावर

अब तक का नियम था कि बिना कागजात मिलने वाले विदेशी नागरिक को ‘विदेशी अधिनियम 1946’ के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जाता था। यह अदालती प्रक्रिया सालों चलती थी। लेकिन अब सरकार संसद से अप्रैल 2025 में पास हुए ‘प्रवासन और विदेशियों अधिनियम, 2025’ के तहत कार्रवाई कर रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने 14 मई को ही इस संबंध में आदेश जारी किया था, जिसका बंगाल सरकार पालन कर रही है।

कांग्रेस शासन में हिंदुओं के खिलाफ लाए 7 काले कानून!

                                                                                                                     साभार: सोशल मीडिया  
आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता को केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि वैचारिक वर्चस्व स्थापित करने का औजार भी बना लिया। देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को उसकी अपनी आस्था, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के प्रति अपराधबोध से भरने की एक सुनियोजित राजनीति दशकों तक चलती रही। सेक्युलरिज्म के नाम पर ऐसा वातावरण और कानून बनाए गए, जिनमें हिन्दू यदि अपने अधिकारों, मंदिरों या सांस्कृतिक अस्मिता की बात करे तो उसे संकीर्ण और साम्प्रदायिक ठहराया जाए, जबकि तुष्टिकरण की राजनीति को प्रगतिशीलता का प्रमाणपत्र दिया जाता रहा। हिन्दू कोड बिल से लेकर वक्फ कानून, शाहबानो प्रकरण से लेकर वोट बैंक आधारित नीतियों तक, कांग्रेस ने बार-बार ऐसा संदेश देने की कोशिश की कि इस देश में बहुसंख्यक होना ही मानो अपराध है। यही कारण है कि दशकों तक हिन्दू समाज को ‘सहन करो, झुको और चुप रहो’ की मानसिकता में ढालने का प्रयास किया गया।

मोदी सरकार ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए एक नई पहचान दी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने 80 और 90 के दशक में इस वैचारिक खेल की परतें खोलनी शुरू कीं। हिन्दू समाज को यह एहसास कराया गया कि सहिष्णुता और आत्मसमर्पण एक ही नहीं होते। सनातन परंपरा क्षमा सिखाती है, लेकिन आत्महीनता नहीं। कांग्रेस ने जहां जाति, क्षेत्र और तुष्टिकरण के जरिए हिंदुओं को खांचों में बांटने की राजनीति की, वहीं मोदी सरकार ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के माध्यम से उन्हें एक साझा पहचान देने की पुरजोर कोशिशें की हैं। आज एक ओर ओबीसी, जातीय जनगणना और विभाजनकारी विमर्श के जरिए हिन्दू समाज को बांटने की कांग्रेस और विपक्ष की राजनीति है, तो दूसरी ओर सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय एकता, सबका विकास और सभ्यतागत गौरव को पुनर्स्थापित करने का सफल प्रयास है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE)

लागू हुआ : 1 अप्रैल 2010
आरटीई में मदरसों और मुस्लिम शिक्षण संस्थानों को छूट
इस कानून के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया। निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी जोड़ा गया। लेकिन कांग्रेस सरकार की पक्षपातपूर्ण मंशा की पोल तब खुल गई, जब पता चला कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों, मदरसों को कई प्रावधानों से छूट दी गई, जबकि 
हिन्दू प्रबंधित निजी स्कूलों पर अधिक नियामकीय बोझ डाला गया। इस कानून को लेकर आज भी “समान नियम बनाम विशेष छूट” की बहस जारी है।
                                                                                     साभार : सोशल मीडिया 
फॉरेन कॉन्ट्रीबूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए)
लागू हुआ :2010
गैर हिंदू धार्मिक एवं गैर-सरकारी संगठनों को अप्रत्यक्ष लाभ
एफसीआरए का उद्देश्य विदेशी चंदे के नियमन को मजबूत करना था। लेकिन वास्तविकात में इस कानून का इस्तेमाल चयनात्मक तरीके से किया गया और कुछ गैर 
हिन्दू धार्मिक एवं गैर-सरकारी संगठनों को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। दरअसल, यह कानून विदेशी फंडिंग की निगरानी और गैरकानूनी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए होना चाहिए था। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। बाद में मोदी सरकार ने इसमें कई संशोधन कर नियमों को और कड़ा किया और इसे सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता से जोड़ा।
वक्फ अधिनियम संशोधन
लागू हुआ : 1995
वक्फ बोर्डों को आंख मूंदकर अत्यधिक अधिकार दिए गए
कांग्रेस सरकार ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए नया वक्फ कानून लागू किया। इससे वक्फ संपत्तियों पर कब्जे को भी बढ़ावा मिला। आलोचकों ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्डों को अत्यधिक अधिकार दिए गए, जिससे संपत्ति विवादों में सामान्य नागरिकों के लिए कानूनी जटिलताएं बढ़ीं। बाद के वर्षों में कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने मांग उठाई कि वक्फ कानूनों में अधिक पारदर्शिता और न्यायिक संतुलन होना चाहिए।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम
लागू हुआ : 1992
मुसलमानों के धार्मिक और भाषाई अधिकारों की रक्षा करना
आजादी के बाद वक्फ की संपत्ति और उसके रखरखाव के लिए वक्फ एक्ट-1954 बनाया गया था। कोई भी ऐसी चल या अचल संपत्ति वक्फ की हो सकती है, जिसे इस्लाम को मानने वाला कोई भी व्यक्ति धार्मिक कार्यों के लिए दान कर दे। 1995 में वक्फ कानून में संशोधन करते हुए वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां दे दी गईं। आज इसी शक्ति की वजह वक्फ और मुसलमान समुदाय देशभर में लैंड जिहाद चला रहा है। कानून कहता है कि यदि वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति पर अपना दावा कर दे, तो उसे उसकी संपत्ति माना जाएगा। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कई उदाहरणों में से यह एक बड़ा कानून था। कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वैधानिक दर्जा देने के लिए यह कानून बनाया। इसका उद्देश्य केवल मुसलमानों के धार्मिक और भाषाई अधिकारों की रक्षा करना था। स्वाभाविक रूप से आलोचकों का कहना था कि संविधान पहले से सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, इसलिए अलग आयोग बनाना पहचान-आधारित राजनीति को बढ़ावा देता है। विरोधियों ने यह भी कहा कि बहुसंख्यक समुदाय की शिकायतों के लिए समान स्तर की संस्थागत व्यवस्था नहीं बनाई गई।

पूजा स्थल अधिनियम
लागू हुआ : 1991
हिंदू धार्मिक स्थलों पर ऐतिहासिक दावों के कानूनी रास्ते सीमित किए

राम मंदिर आंदोलन की तरह अन्य आंदोलन न हों, इसी मंशा से पूजा स्थल कानून लाया गया था। पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार द्वारा लाए गए इस कानून में यह प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बदला नहीं जाएगा। अयोध्या विवाद को इससे बाहर रखा गया था। दरअसल, हकीकत यह थी कि इससे अयोध्या को तो भारी दबाव के चलते अलग रख दिया गया। लेकिन इस कानून की आड़ में काशी और मथुरा जैसे अन्य हज़ारों विवादित हिन्दू धार्मिक स्थलों पर ऐतिहासिक दावों के कानूनी रास्ते सीमित कर दिए गए। दरअसल इस कानून के माध्यम से हिंदू पक्ष की मांगों को स्थायी रूप से रोकने का कुत्सित प्रयास किया गया।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट धारा- 2
यह धारा कहती है कि 15 अगस्त 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव के विषय में यदि कोई याचिका कोर्ट में पेंडिंग है तो उसे बंद कर दिया जाएगा।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 3
इस धारा के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से किसी दूसरे धर्म में बदलने की अनुमति नहीं है। इसके साथ ही यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि एक धर्म के पूजा स्थल को दूसरे धर्म के रूप में ना बदला जाए या फिर एक ही धर्म के अलग खंड में भी ना बदला जाए।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 4 (1)
इस कानून की धारा 4(1) कहती है कि 15 अगस्त 1947 को एक पूजा स्थल का चरित्र जैसा था उसे वैसा ही बरकरार रखा जाएगा।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 4 (2)
धारा- 4 (2) के अनुसार यह उन मुकदमों और कानूनी कार्यवाहियों को रोकने की बात करता है जो प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट के लागू होने की तारीख पर पेंडिंग थे।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 5
धारा- 5 में प्रावधान है कि यह एक्ट रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले और इससे संबंधित किसी भी मुकदमे, अपील या कार्यवाही पर लागू नहीं करेगा।

आर्टिकल 25- धर्म परिवर्तन को मान्यता
वर्ष 1950 में संविधान में आर्टिकल 25 शामिल किया गया। इसमें धर्म परिवर्तन को मान्यता दी गई। इससे सबसे ज्यादा नुकसान हिंदुओं को हुआ क्योंकि हिन्दू धर्म के लोगों का ही सबसे अधिक धर्म परिवर्तन कराया गया। भारत के संविधान में धर्मांतरण को लेकर कोई स्पष्ट अनुच्छेद नहीं है। अनुच्छेद 25 से लेकर 28 के बीच धार्मिक स्वतंत्रता का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि अपनी स्वेच्छा से भारत के हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार-प्रसार करने की आजादी है।

आर्टिकल 28 – हिंदुओं से धार्मिक शिक्षा का हक छीना
जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजों की ही तरह आजादी के बाद भी दबाना जारी रखा। आर्टिकल 28 के जरिये हिंदुओं की धार्मिक शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया गया। एक तरफ हिंदूओं से धार्मिक शिक्षा का अधिकार छीना गया वहीं दूसरी तरफ आर्टिकल 30 के तहत मुसलमान और अल्पसंख्यक धार्मिक शिक्षा ले सकते हैं।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम
लागू हुआ : 1986
चुनाव हारने के डर से कानूनी व्यवस्था में गहरा विरोधाभास पैदा किया
यह कानून भारतीय राजनीति और कानूनी इतिहास में एक अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद मोड़ था, जिसने धर्मनिरपेक्षता और समानता की बहस को पूरी तरह बदल दिया। 1985 के शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि एक बुजुर्ग तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से जीवनभर भरण-पोषण पाने की हकदार है, जो कि देश का एक धर्मनिरपेक्ष और सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होने वाला कानून था। हालांकि, इस फैसले का कट्टरपंथी मुस्लिम मौलवियों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कड़ा विरोध किया और इसे शरिया कानून व मुस्लिम पर्सनल लॉ में सीधा हस्तक्षेप माना। चुनाव हारने के डर और मुस्लिम रूढ़िवादी नेतृत्व के भारी दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में पूर्ण बहुमत का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को उलटने के लिए यह विशेष कानून पारित कर दिया। यह कानून मुस्लिमों (विशेषकर मुस्लिम पुरुषों और रूढ़िवादी वर्ग) के फेवर (पक्ष) में इस प्रकार था क्योंकि इसने शरीयत के इस सिद्धांत को कानूनी मान्यता दे दी कि एक मुस्लिम पति की जिम्मेदारी तलाक के बाद केवल 90 दिनों की ‘इद्दत अवधि’ तक ही सीमित है, और उसके बाद वह अपनी बेसहारा पत्नी को वित्तीय सहायता देने के कानूनी दायित्व से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। इसने मुस्लिम समाज के पारंपरिक ढांचे और उनके व्यक्तिगत कानूनों की स्वायत्तता को धर्मनिरपेक्ष अदालतों के हस्तक्षेप से बचा लिया, जिसे मुस्लिम नेतृत्व ने अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की जीत के रूप में देखा। इसके विपरीत, यह कदम हिंदुओं और अन्य समुदायों के लिए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण इसलिए प्रतीत हुआ क्योंकि इसने देश की कानूनी व्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास पैदा कर दिया। जहां एक तरफ हिंदू, ईसाई या सिख पुरुषों पर देश का धर्मनिरपेक्ष कानून (CrPC 125) लागू होता था, जिसके तहत यदि वे अपनी पत्नी को तलाक देते हैं तो उन्हें पत्नी के पुनर्विवाह न करने तक जीवनभर आर्थिक भरण-पोषण (Alimony) देना अनिवार्य है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम पुरुषों को इस नए कानून के माध्यम से उस सामान्य नागरिक दायित्व से विशेष छूट दे दी गई। आलोचकों, हिंदू संगठनों और कई कानूनी विचारकों ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति का चरम उदाहरण माना, जहां एक ही अपराध या नागरिक परिस्थिति (तलाक के बाद महिला की लाचारी) के लिए दो अलग-अलग धर्मों के नागरिकों के साथ कानूनन अलग व्यवहार किया गया।

हिंदू कोड बिल
लागू हुआ : 1955
केवल हिंदुओं पर कानून लागू, मुस्लिमों को बख्श दिया
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार ने हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार के नाम पर हिंदू कोड बिल 1955-56 लागू किया। यह कानून विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति अधिकारों के बारे में थे। इसके तहत हिंदू मैरिज एक्ट 1955, हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956, हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956, हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट 1956 को शामिल किया गया। इन कानूनों में यह पूरी तरह साफ था कि सरकार ने केवल हिंदू समाज में हस्तक्षेप किया, जबकि समान नागरिक संहिता की दिशा में अन्य धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को नहीं छुआ गया। इसी कारण कई राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर “असमान सुधार” कहा।

हिंदू कोड बिल पर राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था नेहरू का विरोध
आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने पहली लोकसभा में 1955-56 में हिंदू कोड बिल्स पास किए। इस बिल को लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच राजनीतिक मतभेद उत्पन्न हो गया था। अक्टूबर 1947 में संविधान सभा में अंबेडकर ने इसका मसौदा पेश किया। नेहरू ने उसका समर्थन किया। इसके तहत सभी हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी। तब गृह मंत्री सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो हिंदू महासभा से संबंधित थे, कांग्रेसी नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिंदू कोड बिल का पुरज़ोर तरीके से विरोध किया था। कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया कि आनेवाले चुनावों में इस बिल का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया था कि यह बिल हिंदू संस्कृति को टुकड़ों में बांट देगा। ऑल इंडिया हिंदू वीमेन कांफ्रेंस की अध्यक्ष जानकी बाई जोशी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखते हुए कहा था कि प्रस्तावित विधेयक संस्कार विवाह को संविदात्मक बनाकर हिंदुओं की परिवार व्यवस्था को ही नष्ट कर रहा है। 

हिंदू दर्शन, कला और संस्कृति को सीखने का केंद्र थे मंदिर
मंदिर हमेशा से ही हिंदू सभ्यता और संस्कृति के केंद्र रहे थे। हमारी सभ्यता इन्हीं मंदिरों की वजह से फलती-फूलती रही। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे। बल्कि, हिंदू दर्शन, कला और संस्कृति को सीखने का केंद्र थे। सभी राजाओं ने अपने समय में मंदिरों का निर्माण किया। और, ये मंदिर ही मुगल और अंग्रेजों के समय विरोध का भी केंद्र बने। मुगलों ने मंदिरों को तोड़ने की कोशिशें की, लेकिन उस पर नियंत्रण नहीं कर सके। समय-समय पर ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों ने भी ऐसा ही करना चाहा। लेकिन, वो नाकाम रहे। 1863 में अंग्रेजों ने एक एक्ट लाकर हिंदू मंदिरों को स्वतंत्र कर दिया। जिसके चलते मंदिर स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकों की जगह बन गए।

मिडिल ईस्ट टेंशन के बीच ट्रंप की खुफिया निदेशक ने दिया इस्तीफा, ईरान ने की तारीफ

                                                      तुलसी गबार्ड (फोटो साभार: US आर्मी)
अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (DNI) तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। तुलसी गबार्ड ने शुक्रवार (22 मई 2026) को ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बैठक के दौरान उन्हें अपने फैसले की जानकारी दी। राष्ट्रीय खुफिया निदेशक कार्यालय (ODNI) में उनका अंतिम दिन 30 जून 2026 होगा। भारत से जुड़ी पृष्ठभूमि रखने वाली तुलसी गबार्ड के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने उनकी जमकर सराहना की है।

पति की बीमारी बनी इस्तीफे की वजह

तुलसी ने X पोस्ट पर अपने इस्तीफे से जुड़ा पत्र शेयर कर राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद दिया है। तुलसी ने लिखा, “आपने मुझ पर जो भरोसा जताया और राष्ट्रीय खुफिया निदेशक कार्यालय का नेतृत्व करने का अवसर दिया, उसके लिए मैं हार्दिक आभारी हूँ।”
उन्होंने आगे लिखा, “दुर्भाग्यवश, मुझे 30 जून 2026 से प्रभावी अपना इस्तीफा देना होगा। मेरे पति अब्राहम को हाल ही में हड्डियों के कैंसर के एक अत्यंत दुर्लभ प्रकार का पता चला है। हमारे परिवार के लिए इस बेहद निजी और कठिन समय में आपके सहयोग के लिए धन्यवाद।”
उन्होंने आगे कहा कि डीएनआई के रूप में देश की सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात रही और इसके लिए वह अमेरिकी जनता तथा राष्ट्रपति ट्रंप की हमेशा आभारी रहेंगी।

भारत से क्या है तुलसी गबार्ड का नाता

तुलसी गबार्ड का जन्म अमेरिका के समोआ में हुआ था। उनके पिता यूरोपीय मूल के हैं जबकि उनकी माँ भारतीय हैं। सेना में रहते हुए तुलसी ने इराक में भी सेवाएँ दी थीं।
तुलसी गबार्ड अमेरिका की पहली हिंदू सांसद मानी जाती हैं। वह पहले डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ी थीं और पार्टी की प्रमुख नेताओं में शामिल रहीं। हालाँकि, साल 2022 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी और बाद में रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हो गईं।
तुलसी कमला हैरिस की मुखर आलोचक रही हैं। साल 2019 में राष्ट्रपति पद की पहली डिबेट में उन्होंने कमला हैरिस को कड़ी चुनौती दी थी। साथ ही, तुलसी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रशंसक भी माना जाता है।

इस्तीफे पर ईरान ने भी की तारीफ

तुलसी गबार्ड के इस्तीफे के बाद ईरान की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट करते हुए तुलसी गबार्ड की तारीफ की और कहा कि उन्होंने ईरान के बारे में कई बार ऐसी ‘सच्चाई’ कही जिससे राष्ट्रपति ट्रंप असहज थे।
ईरानी दूतावास ने अपने पोस्ट में लिखा, “हम अब्राहम के शीघ्र और पूर्ण स्वस्थ होने की कामना करते हैं। आपने पहले भी कई बार यह दिखाया है कि आप अमेरिका के लिए काम करती हैं, इजरायल के लिए नहीं। आपने कई बार ईरान के बारे में ऐसी सच्चाइयां बताईं, जिनसे ट्रंप नफरत करते थे।”

गद्दार कौन? राहुल गांधी को पता होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

भारतीय जनता युवा मोर्चे के कार्यकर्त्ता अभिषेक दुबे ने राहुल गांधी के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज की है जिस पर जांच शुरू हो गई है। राहुल गांधी ने मोदी, अमित शाह और RSS को “गद्दार” कहा था अब बोल तो गए मियां जी, लेकिन भागना मत और ये मत कहना कि ये तो मेरा राजनीतिक बयान था जैसा अभिषेक मनु सिंघवी ने राफेल के बयान पर कहा था

लेकिन राहुल गांधी को पता होना चाहिए गद्दार कौन होता है और किसने देश के साथ गद्दारी की है, अनुराग ठाकुर ने नारे “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को” कोर्ट ने भी गलत नहीं पाया 

बस कुछ गद्दार दुनिया छोड़ चुके हैं और कुछ अभी भी हैं

-सबसे पहले तो गद्दारी कांग्रेस के साथ नेहरू ने ही की गांधी जी के साथ मिलकर जब पूरी कांग्रेस सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी लेकिन बन गए नेहरू; 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
-हिंदू, मुस्लिम अलग देश बता कर देश के टुकड़े किये और गांधी नेहरू ने उन पाकिस्तान मांगने वाले 95% मुसलमानों को भारत में रहने दिया, ये देश के साथ गद्दारी थी;

-नेहरू ने एक तिहाई जम्मू कश्मीर पाकिस्तान को दे दिया, अक्साई चिन चीन को दे दिया और भारत के न जाने कितने टुकड़े करके दूसरे देशो को दे दिए - 1962 में 38,000 वर्ग किलोमीटर भूमि चीन को दे दी और तिब्बत उसके पहले ही दे चुके थे - सब ऐसे दे दिया जैसे दहेज़ का माल था;

-भारत को UNSC की स्थायी सीट और वीटो पावर मिल रही थी लेकिन नेहरू ने देश के खिलाफ गद्दारी कर वो चीन को दे दी;

-नेहरू देश के संकट के समय इश्क़ लड़ा रहे थे एडविना के साथ और जब कैनेडी भी नेहरू को UN की सीट और वीटो पावर देने की चर्चा करना चाह रहे तो नेहरू उनके बातो को छोड़ कैनेडी की बीवी से बात करने में व्यस्त थे;

साभार सोशल मीडिया 
-नेहरू ने 370 और 35A लगा कर जम्मू कश्मीर को एक तरह से भारत से अलग ही कर दिया;

-इंदिरा गांधी ने 1971 युद्ध के बाद बांग्लादेश के मुसलमानों को भारत में घुसा कर अपना वोट बैंक बना लिया; 

-फील्ड मार्शल मानेकशॉ की पेंशन नहीं दी; 

-कच्चातीवू द्वीप इंदिरा गांधी ने 1974 में श्रीलंका को दे दिया -

-राजीव गांधी ने शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट को ठोकर मार कर संविधान ही बदल दिया और आज राहुल गांधी संविधान को खतरे में बताता है;

-राजीव गांधी ने राष्ट्रीय जलपोत को परिवार के सैर सपाटे के लिए इस्तेमाल किया-

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में अमेरिकन पुलिस ने राहुल को किसी संगीन अपराध में गिरफ्तार किया था कि सोनिया गाँधी को नटवर सिंह को लेकर आधी रात सोते हुए वाजपेयी को जगाया था? और वाजपेयी ने हॉटलाइन पर जॉर्ज बुश से बात कर भारत आ रहे जहाज से एयरपोर्ट से ही वापस भारत भेजने के लिए अनुरोध कर पुलिस से छुड़वाया था? 

साभार सोशल मीडिया 
दूसरे, गद्दार कौन है असलियत जानने के लिए कांग्रेस और नेहरू-गाँधी के इतिहास को सामने लाना होगा। ढोल पीटा जाता है "मोदी चाय वाला" और भूतपूर्व महामहिम महान वैज्ञानिक अबुल आज़ाद "अखबार बेचते थे" लेकिन कोई यह नहीं बताता कि सोनिया राजीव गाँधी से शादी करने से पहले क्या करती थी? क्या जनता से सच्चाई छुपाना गद्दारी नहीं? इतना ही नहीं, 1971 युद्ध के दौरान पायलट राजीव गाँधी अपनी पत्नी के साथ इटली क्यों चले गए थे? जबकि युद्ध के दौरान किसी भी एयरलाइन्स के पायलट को 24 घंटे ड्यूटी पर रहने का नियम है। राजीव पर नियम तोड़ने के आरोप में कार्यवाही क्यों नहीं हुई?          

अब राहुल गांधी अपनी और सुन लो भारत विरोधी कौन ऐसा व्यक्ति है जिससे तुम विदेश में जाकर नहीं मिले अमेरिका में CAIR में बैठे पाकिस्तानियों से तुम मिलते थे; इल्हान ओमर जो कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा कहती है, उसको तुम मिले; सोरोस गैंग की सुनीता विश्वनाथन से तुम मिले और उज्बेकिस्तान में जाकर सामंथा पावर से तुम मिले तुमने 54 विदेश यात्राओं में जाकर हर जगह भारत का अपमान किया, इसे कहते हैं गद्दारी तुमने हमेशा भारत की सेना के शौर्य कौशल पर सवाल उठाए अमेरिका में किसी ने सवाल नहीं किया कि ईरान युद्ध में 42 विमानों को क्या नुकसान हुआ लेकिन तुमने भारत का बिना कोई विमान गिरे सवाल उठाए कि कितने विमान गिरे?

तुमने नहीं देखा कि मोदी 5 देशों से 40 बिलियन डॉलर का निवेश लेकर आए हैं तुमने बस मेलोडी का मजाक उड़ाया जैसे उसके स्वाद से तुम्हारा मुंह कड़वा हो गया गद्दारी इसे कहते हैं!

‘अजय राय ने मोदी की #$% फाड़ दी’: उत्तर प्रदेश कांग्रेस चीफ राय ने मोदी पर की घटिया टिप्पणी

                                         उत्तर प्रदेश कांग्रेस चीफ ने मोदी पर की अभद्र टिप्पणी
लगता मोदी विरोध में राहुल गाँधी ही नहीं शायद पूरी कांग्रेस अपना दिमागी संतुलन खो चुकी है। जिसे देख यह कहने में संकोच नहीं कि कांग्रेस को वोट देना मतदाता द्वारा भी अपने दिमागी दिवालियेपन का सबूत देगा।  

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस इकाई के मुखिया अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बेहद घटिया टिप्पणी की है। इसके बाद सोशल मीडिया पर जमकर बवाल मचा हुआ है। बीजेपी की IT सेल के मुखिया अमित मालवीय ने X पर राय का यह वीडियो शेयर किया है। यह वीडियो उत्तर प्रदेश के महोबा का है, जहाँ शुक्रवार (22 मई 2026) को राय एक दुष्कर्म पीड़िता से मिलने पहुँचे थे।

राय इस वीडियो में कह रहे हैं, “कह देना कि अजय राय ने मोदी की #$% फाड़ दी है।” मालवीय ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “कुछ दिन पहले जब यूपीपीसीसी चीफ अजय राय अस्वस्थ थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सार्वजनिक रूप से उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की थी।”

उन्होंने आगे लिखा, “आज वही अजय राय प्रधानमंत्री के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते कैमरे में कैद हुए। यही कांग्रेस की राजनीति का स्तर है- शिष्टाचार का जवाब अभद्रता से।”

वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस पर गंभीर नाराजगी जताई है। सीएम योगी ने X पर लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के विषय में उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा की गई अभद्र, असंसदीय और अक्षम्य टिप्पणी कांग्रेस के राजनीतिक कुसंस्कारों को प्रकट करती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “पूर्व में कांग्रेस के ‘युवराज’ भी अपने कुसंस्कार का परिचय दे चुके हैं। कॉन्ग्रेस अब हताशा, निराशा, कुंठा और मानसिक दिवालियेपन के शीर्ष स्तर पर पहुँच चुकी है। अब देश वासियों से क्षमा माँगने लायक भी स्थिति उनकी नहीं रही है।”

नार्वे की पत्रकार हेले लिंग और राहुल की राजनीति

डॉ राकेश कुमार आर्य

प्रधानमंत्री मोदी जैसा कोई व्यक्तित्व जब किसी क्षेत्र में पैर रखता है तो उसे भली प्रकार यह ज्ञान होता है कि किस मोड़ पर कितने बड़े-बड़े विरोधियों से सामना करना पड़ सकता है ? जो लोग यह अनुमान नहीं लगा पाते कि जिस रास्ते को चुना गया है, उसमें कई प्रकार के अंधे मोड़ आएंगे और उन पर दुर्घटना संभावित है, वह जीवन की भूलभुलैया में यूं ही खो जाते हैं। राजनीति में जिन्हें अचानक प्रसिद्धि मिल जाती है वह उसे इसीलिए नहीं संभाल पाते कि उन्हें मिला हुआ पद सुनियोजित नहीं था बल्कि तात्कालिक आधार पर बनी हुई परिस्थितियों का परिणाम था। भारत के कई प्रधानमंत्रियों को प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य तो मिल गया परंतु क्योंकि उनके लिए यह तात्कालिक संयोग था, इसलिए उन्हें आने वाले तूफानों की या मोड़ों की कोई जानकारी नहीं थी। परिणाम यह निकला कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाए। परंतु मोदी जी पर यह बात लागू नहीं होती । उन्होंने बहुत दूर की कौड़ियां बहुत समय पहले से सजानी आरंभ कर दी थीं। उनके लक्ष्य की प्राप्ति में जितनी भी बाधाएं थीं उन सबको कैसे दूर करना है? - इस पर उन्होंने बहुत गंभीरता से चिंतन मंथन करके आगे बढ़ना आरंभ किया था।
यही कारण है कि पीएम मोदी अपने सामना खड़े किसी संकट से घबराते नहीं हैं। वह संकट का सामना इस प्रकार करते हैं कि जैसे वह पहले से ही उसकी प्रतीक्षा में खड़े थे? नॉर्वे में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के समय पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से अचानक प्रश्न पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से प्रश्न क्यों नहीं लेते?”
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं
हमें समझना चाहिए कि जब कहीं कोई इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की जाती है तो उसमें सब कुछ बहुत व्यवस्थित होता है। प्रश्नों को भी बहुत सीमित किया जाता है। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या विदेशी अतिथि के लिए किसी भी परिस्थिति में कोई असहज स्थिति उत्पन्न न होने पाए? इस बात को भारत में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी भी भली प्रकार जानते हैं, परंतु इसके उपरांत भी वह नॉर्वे की पत्रकार के द्वारा पूछे गए प्रश्न के संबंध में कई प्रकार की भ्रांतियां फैलाने का काम कर रहे हैं। वास्तव में उनका इस प्रकार का यह आचरण उनके पद की गरिमा को गिराता है।
इससे उनके विरोधियों को यह कहने का अवसर मिल रहा है कि राहुल गांधी यदि इस प्रकार का आचरण कर रहे हैं तो वह भी नॉर्वे की पत्रकार के द्वारा पूछे गए प्रश्न से उद्भूत विमर्श का एक अंग बन चुके हैं? ऐसी बात को भी 'भारत में लोकतंत्र खतरे में है', 'संविधान के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न हो गया है ', 'संवैधानिक प्रतिष्ठानों पर हमला हो रहे हैं', 'देश को बेच दिया गया है' - जैसे नेता प्रतिपक्ष के परंपरागत झूठ भरे विमर्श के साथ जोड़ने का प्रयास किया जाता है। प्रधानमंत्री श्री मोदी को सारा विपक्ष जुमलेबाज कहता है। यह अलग बात है कि सारा विपक्ष ही राहुल गांधी की जुमलेबाजी का शिकार हो रहा है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय नॉर्वे की पत्रकार ने हमारे प्रधानमंत्री से उपरोक्त प्रश्न पूछा था, उस समय वह कोई राजनीतिक मंच नहीं था बल्कि वह कूट नीतिक मंच था। जिस पर प्रश्न पूछने की भी सीमित छूट होती है। नॉर्वे की पत्रकार ने इसके बाद उपजी स्थिति को अपने अनुकूल बनाने का हरसंभव प्रयास किया। उसने इसे अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ले जाकर भुनाना आरंभ कर दिया। नॉर्वे की यह पत्रकार मोदी विरोधी मीडिया लॉबी के साथ जोड़कर काम करती रही है।
वह जिस अखबार Dagsavisen के लिए काम करती है उसके फॉलोअर्स 50,000 से भी कम हैं । इससे स्पष्ट है कि अपना सवाल दाग कर उसने अपने आप को लॉन्च करने का प्रयास किया है। भारत के नेता प्रतिपक्ष ने एक ऐसी हल्की पत्रकार को हवा देकर उसे लांच होने में सहायता प्रदान की है। राहुल गांधी के इस प्रकार के आचरण से स्पष्ट होता है कि वह सत्ता के लिए कुछ भी करने की तैयार हैं। बल्कि कहा जाए कि 'मुंगेरी लाल के सपनों' से कम नहीं। राहुल गांधी जिस प्रकार की बयानबाजी करके और ' विदेशी हस्तक्षेप' के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने के लिए उतावले दिखाई देते हैं उससे वह कभी भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे। क्योंकि पीएम मोदी सत्ता में बहुत भारी भरकम होकर बैठे हैं। उन्हें उखाड़ना कदापि संभव नहीं है। विशेष रूप से तब जब भारत की वफादार और शौर्य संपन्न देशभक्त सेना अपने प्रधानमंत्री के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ी है। इसके साथ ही भारत का युवा वर्ग भी पीएम मोदी के साथ है। यही कारण रहा कि राहुल गांधी के बार-बार उकसाने के उपरांत भी भारत का युवा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ सड़कों पर नहीं आया।
अभी हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिस प्रकार राहुल गांधी की पार्टी को धोया गया है, उससे राहुल गांधी को शिक्षा लेनी चाहिए कि उनके लिए देश अभी दूर-दूर तक भी तैयार दिखाई नहीं देता। इसके उपरांत भी यदि वह नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के दुराचरण को देश में सत्ता परिवर्तन का आधार बनाने के रूप में देख रहे हैं तो इसे उनका बचकानापन भी कहा जाएगा। आज का भारत सशक्त भारत है। जागरूक और सजग भारत है। इसे झूठे विमर्श या नेरेटिव से भटकाया नहीं जा सकता। देश का परिपक्व मतदाता अब सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहता है। वह चाहता है कि जिस प्रकार देश आगे बढ़ रहा है वह बढ़ता रहना चाहिए। देश के मतदाता की बनी हुई इस सोच को राहुल गांधी बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वह जितना ही अपनी भटकी हुई इस भूमिका को निभाते हैं, उतना ही देश का मतदाता उनसे दूर चला जाता है। भटकाव के लिए अब उसके पास सोचने तक का समय नहीं है। भारत की वर्तमान सशक्त स्थिति को देखकर नॉर्वे की पत्रकार को यह कहना पड़ा है कि 'वह कोई जासूस नहीं है।' परंतु यह कहना ही उसके 'कुछ होने' की ओर संकेत करता है। माना कि सारी दाल काली नहीं है परंतु दाल में काला अवश्य है।
अब हम सबके लिए बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि हमारे देश का मतदाता 'दाल में काला' और 'सारी दाल के काली होने' में अंतर समझने लगा है। वह यह भी समझने लगा है कि इस प्रकार दाल को काली करने का प्रयास कौन कर रहा है? और यदि दाल में काला है तो उसके लिए दोषी कौन है? राहुल गांधी को इस तथ्य को समझना होगा।

दिल्ली : ‘जन्नत जाने के लिए हिंदू महिला को बनाना होगा मुसलमान’: फहीम ने ‘साहिल’ बन किया दलित युवती का बलात्कार

                             दलित हिन्दू महिला का बलात्कार (फोटो साभार: न्यूज 18 और भारत समाचार)
दिल्ली के बटला हाउस इलाके में एक 23 वर्षीय दलित युवती के साथ अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और धर्मांतरण कराने का मामला सामने आया है। पीड़िता की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने एफआईआर (FIR) दर्ज कर चार आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। हालाँकि लड़की का कहना है कि आरोपित जेल से भी उसे धमकियाँ भेज रहे हैं।

दलित-दलित चिल्लाकर हिन्दुओं को गुमराह करने वाले नेता और उनकी पार्टियां कहाँ हैं? उनके "शांतिदूत" ने हिन्दू दलित का बलात्कार ही नहीं इस्लाम कबूल करवा दिया। सबकी बोलती बंद है। सबको फ़िक्र खा रही है अपने वोट बैंक की। हाँ, अगर स्थिति विपरीत होती, दिल्ली बीजेपी सरकार के खिलाफ सडकों पर हल्ला हो रहा होता।      

पीड़िता के अनुसार साल 2021 में सोशल मीडिया पर उसकी मुलाकात ‘साहिल’ नाम के एक युवक से हुई थी। युवक ने खुद को एक अमीर हिंदू परिवार से बताया और शादी का झाँसा देकर उसे 2022 में बाटला हाउस बुलवा लिया। यहाँ लड़की को पता चला कि युवक का असली नाम साहिल नहीं, बल्कि फहीम है।

बाटला हाउस में लड़की के साथ फहीम ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर गैंगरेप किया, उसकी वीडियो बनाई और बाद में उसी का इस्तेमाल करके वो उसे ब्लैकमेल करने लगे। लड़की को मेरठ ले जाया गया।

फहीम ने उसे कहा- “मैं अपने आपराधिक रिकॉर्ड की वजह से वह हज के लिए भारत से बाहर नहीं जा सकता, इसलिए मुझे जन्नत में जाने के लिए एक हिंदू महिला से निकाह करनी होगी और उसका धर्म परिवर्तन कराकर उसे इस्लाम कबूल करवाना होगा।”

इसके बाद उसका निकाह हुआ, उसका नाम आयशा रखा गया। धीरे-धीरे सामने आया कि फहीम का परिवार तो अवैध हथियारों की तस्करी धंधे से जुड़ा है।

रिपोर्ट्स बताती है कि लड़की ने ये भी बताया है कि आरोपित का परिवार उसे डराने के लिए उसे खून से सराबोर मीट लाकर देते थे, उस पर जानवरों का मांस फेंका जाता था और उसे पकाने का दबाव दिया जाता था। इसके अलावा उसकी बेटी को छत से लटकाकर फेंकने की धमकी भी दी जाती थी। पीड़िता ने तस्लीम मौलवी नाम के एक अन्य आरोपित पर भी प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं।

पीड़िता ने बताया कि वो इन सबसे तंग आकर आत्महत्या करने जा रही थी, लेकिन फिर किसी ने उसे रोककर उसका संपर्क एक एनजीओ से कराया। इसके बाद ही उसने मामले में शिकायत दी। जानकारी के मुताबिक, साल 2025 में मुख्य आरोपित फहीम को गुरुग्राम पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिसके पास से पीड़िता के अश्लील वीडियो वाला मोबाइल जब्त हुआ।

हालाँकि, युवती का अब भी आरोप है कि फहीम ने उसे जेल के अंदर से भी उससे संपर्क किया और उसे दुबई के नंबर से जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। पुलिस ने शिकायत पर सुनवाई करते हुए अपनी जाँच को शुरू कर दिया है।

सड़कों पर की कुर्बानी तो सीधे FIR, उत्तर प्रदेश-बंगाल के बाद अब दिल्ली में बकरीद के लिए जारी सख्त गाइडलाइंस: गाय-बछड़ा-ऊँट काटने पर बैन


उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में बकरीद पर कुर्बानी के नियमों के बाद अब दिल्ली में भी कुर्बानी के नियमों को लेकर गाइडलाइंस जारी कर दी गई हैं। दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा ने शुक्रवार (22 मई 2026) को X पर एक पोस्ट में लिखा, “बकरीद पर गौवंश, गाय, बछड़ा, ऊँट व अन्य प्रतिबंधित जानवरों की कुर्बानी पूरी तरह गैरकानूनी है और ऐसा करने वालों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाएगा।”

सरकार को प्रतिबंधित जानवरों की बिक्री पर ही रोक लगा देनी चाहिए ताकि जब प्रतिबंधित जानवर बिका ही नहीं फिर कोई इनकी कुर्बानी नहीं दे पायेगा और कानूनी कार्यवाही से बच जाएगा। वरना वही बात होगी सिगरेट और शराब पर लिखा होता है "सेहत के लिए नुकसानदायक" लेकिन धरल्ले से बिक रही है। क्योकि जितनी आय सरकार को इन उत्पादनों से होती है किसी और से नहीं।   

उन्होंने आगे लिखा, “सार्वजनिक स्थलों गली, सड़कों पर कुर्बानी की अनुमति नहीं है, ऐसा करने वालों पर भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कुर्बानी के बाद सीवर व नाली या सार्वजनिक स्थलों पर वेस्ट को डालना पूरी तरह प्रतिबंधित है , कुर्बानी सिर्फ वैध स्थलों पर ही की जा सकती है।”

साथ ही, कपिल मिश्रा ने साफ कर दिया है कि अगर कहीं पर इन गाइडलाइंस का उल्लंघन होता है तो लोग पुलिस व दिल्ली सरकार के विकास मंत्रालय को सूचित कर सकते हैं।

दिल्ली : 13 साल बाद फिर बनेंगे राशन कार्ड, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने किया ऐलान: आय सीमा बढ़ाने की भी तैयारी, जानें- आवेदन प्रक्रिया की डिटेल्स


दिल्ली के लाखों गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए राहत की खबर सामने आई है। राजधानी में पिछले 13 वर्षों से रुकी हुई राशन कार्ड बनाने की प्रक्रिया अब फिर शुरू होने जा रही है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने गुरुवार (21 मई 2026) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि 15 जून से नए राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सरकार का कहना है कि लंबे समय से राशन कार्ड का इंतजार कर रहे लोगों को अब राहत मिलेगी और पूरी प्रक्रिया डिजिटल तरीके से पूरी की जाएगी।

13 साल से रुके थे नए राशन कार्ड

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि पिछले 13 वर्षों में दिल्ली के लाखों गरीब नागरिक राशन कार्ड बनवाने के लिए अधिकारियों और नेताओं के चक्कर काटते रहे लेकिन पुराने शासन में उनके आवेदन लंबित पड़े रहे। उन्होंने बताया कि बीते 13 साल में करीब 3 लाख 72 हजार लोगों ने राशन कार्ड के लिए आवेदन किया था लेकिन उनके कार्ड नहीं बनाए गए। अब इन सभी लोगों को नई डिजिटल व्यवस्था के तहत फिर से आवेदन करना होगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य प्रधानमंत्री की अंत्योदय योजना के तहत सभी पात्र लोगों तक राशन पहुँचाना है। इसके लिए पात्र लोगों की पहचान कर उन्हें योजना का लाभ दिया जाएगा।

राशन कार्ड के लिए आय सीमा बढ़ाने की तैयारी

दिल्ली सरकार ने राशन कार्ड के लिए आय सीमा बढ़ाने का भी फैसला किया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि पहले परिवार की वार्षिक आय सीमा एक लाख रुपए थी जिसे बाद में बढ़ाकर 1.20 लाख रुपए किया गया था। अब सरकार इसे बढ़ाकर 2.5 लाख रुपए सालाना करने की तैयारी कर रही है।

रेखा गुप्ता ने कहा कि इस प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल में चर्चा हो चुकी है और जल्द ही इसे मंजूरी मिलने की उम्मीद है। अगर प्रस्ताव पारित हो जाता है तो सालाना 2.5 लाख रुपए तक की आय वाले परिवार भी राशन कार्ड बनवाने के पात्र हो जाएँगे।

ऑडिट में सामने आईं बड़ी गड़बड़ियाँ

मुख्यमंत्री ने बताया कि सरकार ने पिछले एक साल में राशन कार्ड धारकों का ऑडिट कराया जिसमें बड़ी संख्या में अनियमितताएँ सामने आईं। जाँच में पाया गया कि 1.44 लाख लोग तय आय सीमा से ऊपर होने के बावजूद राशन कार्ड का लाभ ले रहे थे। इसके अलावा करीब 35 हजार लोगों ने पिछले एक साल में राशन ही नहीं लिया था। सरकार के अनुसार, लगभग 29 हजार राशन कार्ड ऐसे लोगों के नाम पर मिले जिनकी मृत्यु हो चुकी थी। वहीं, 23 हजार से अधिक राशन कार्ड डुप्लीकेट पाए गए।

ऑडिट के दौरान कुल 7 लाख 72 हजार से अधिक अपात्र राशन कार्ड धारकों की पहचान की गई जिनके नाम योजना से हटा दिए गए हैं।

15 जून से आवेदन शुरू: पूरी प्रक्रिया होगी डिजिटल

दिल्ली सरकार के मुताबिक 15 जून से नए राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। दिल्ली सरकार ने राशन कार्ड की नई व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल बनाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि नए राशन कार्ड के लिए आवेदन केवल ऑनलाइन किए जा सकेंगे। आवेदन से लेकर राशन वितरण तक की पूरी प्रक्रिया डिजिटल होगी ताकि पारदर्शिता बनी रहे और लाभार्थियों को पूरा राशन मिल सके।

सरकार का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अपने घर के नजदीक से ऑनलाइन आवेदन कर सकेगा। पहले आय प्रमाण पत्र को स्वयं घोषित करने की व्यवस्था थी जिससे गड़बड़ी की आशंका रहती थी। अब डिजिटल सत्यापन के जरिए प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा।

बिना बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन नहीं मिलेगा राशन

रेखा गुप्ता ने बताया कि दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) 2013 के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए दिल्ली खाद्य सुरक्षा नियम 2026 लागू किया है। इसके तहत राशन वितरण व्यवस्था में बड़े बदलाव किए गए हैं।

राशन दुकानों पर पारंपरिक वजन मशीनों की जगह ई-वेइंग मशीनें लगाई जा रही हैं और राशन लेने के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण अनिवार्य किया गया है। अब बिना बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के राशन नहीं मिलेगा। सरकार का कहना है कि इससे कम राशन मिलने, फर्जीवाड़े और वितरण में गड़बड़ियों जैसी शिकायतों पर रोक लगेगी।

मेलोडी एक दिन में लोकल से ग्लोबल कर दी मोदी ने, लेकिन राहुल गांधी जल भुन कर राख हो गया; मनमोहन सिंह गद्दी छोड़ रहे थे, मुफ्त में PM बन जाता तो आज पापड़ न बेलने पड़ते

सुभाष चन्द्र

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी देश के उत्पादों को ग्लोबल करने पर काफी समय से जोर दे रहे हैं और  Giorgia Meloni को मेलोडी उपहार में देने के पीछे मकसद ही यही था कि भारतीय उत्पाद मेलोडी एक दिन में ग्लोबल हो गई। मोदी और Meloni  की तस्वीरें देखकर राहुल गांधी की छाती पर सांप लोट गया और हताशा में मोदी शाह को “गद्दार” कह गया

एक बहुत पुरानी कहावत है बन्दर के हाथ उस्तरा लगना यानि कांग्रेस और विपक्ष को एक ऐसा बड़बोला भटके दिमाग का नेता मिला हुआ है जो खुद तो डूब ही रहा है अपनी पार्टी और विपक्ष में अपनी सहयोगी पार्टियों को भी निपटाने में लगा हुआ है। समझ में नहीं आता कि उसकी पार्टी और सहयोगी पार्टी आखिर क्यों उसकी बेतुकी भड़काऊ बातों का क्यों बचाव करते हैं? मुंह में चाँदी का चम्मच लेकर कोई नेता या साहूकार नहीं बन जाता बुद्धि की जरुरत होती है जो लगता है भगवान ने वह उसे दी ही नहीं। क्योकि जिसकी सौबत ही छल और कपटियों की होगी और देश विरोधी ताकतों के हाथ कठपुतली हो उसके शरीर में अक्ल का खाना खाली ही रहेगा।  

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए रायबरेली में राहुल गांधी ने कहा - “जब आप घर जाओगे और आरएसएस के लोग आपके सामने आकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बात करें, तो उनसे साफ़ कहो कि आपका प्रधामंत्री गद्दार है, आपका गृह मंत्री गद्दार है और आपका संगठन गद्दार है अपने देश को बेचने और संविधान को नष्ट करने का काम किया है”

उसने नहीं बताया कि देश को किसने खरीदा लेकिन कुछ मीडिया चैनल्स अपने आप से लगा रहे थे कि राहुल ने कहा मोदी ने देश को अंबानी, अडानी और अमेरिका को बेच दिया जबकि यह बात उसने कही ही नहीं 

इनका इंडी गठबंधन भी राहुल के बयान पर तार तार हो गया 

सपा ने इस भाषा से खुद को स्पष्ट रूप से अलग कर लिया है सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने मीडिया को स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि यह राहुल गांधी की निजी विचारधारा हो सकती है और समाजवादी पार्टी इस तरह की असंसदीय या अमर्यादित भाषा का बिल्कुल समर्थन नहीं करती है

साभार सोशल मीडिया 
आज ही शरद पवार का बयान आया जिसमें उन्होंने कहा कि “भले ही हम मोदी से राजनीतिक रूप से सहमत न हों लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रधानमंत्री के रूप में वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए काम कर रहे हैं

इंडी गठबंधन में कांग्रेस अकेली पार्टी है जो राहुल के बयान का समर्थन कर रही है और उसके लिए भी कौन बोला है पवन खेड़ा जो अभी असम केस में उलझे होने के कारण राहुल की “तेल मालिश” कर रहा है खेड़ा ने न जाने असम पुलिस को क्या बता दिया जो रणदीप सुरजेवाला को तलब कर लिया और कुछ पता नहीं जब सुरजेवाला जाएगा तो वो किसका नाम ले ले यह भी हो सकता है उसकी बातों से शक की सुई राहुल गांधी की तरफ मुड़ जाए

राहुल गांधी को एक ये असम केस से डर लगा हुआ है दूसरा उसके खिलाफ जो ब्रिटिश नागरिकता का मामला चल रहा है, वो उससे भी परेशान है कि मामला कब किस मोड़ पर पहुंच जाए उसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सबसे बड़ा हंटर चला दिया राहुल गांधी की विदेश यात्राओं को लेकर ED/CBI को उसके Disproportionate Assets की जांच करने को कह दिया और अंतरिम रिपोर्ट 2 सप्ताह में मांगी है हेराल्ड केस तो पहले से चला रहा है और जीजा ने तो पता नहीं क्या क्या खरीदा है देश में और विदेश में जिसमे वो अलग फंसा हुआ है 

राहुल गांधी के पास सुनहरा अवसर था 2013 में जब वो बिना किसी मेहनत के प्रधानमंत्री बन सकता था लेकिन उसने अवसर को लपका नहीं और आज तक प्रधानमंत्री बनने के लिए पापड़ बेल रहा है

मनमोहन सिंह ने 7 सितंबर 2013 को ट्वीट में लिखा था “I would be happy to work for the Congress party under the leadership of Mr Rahul Gandhi” एक अन्य जगह उन्होंने यह भी कहा था “आप जब मर्जी आए, मैं आपके लिए कुर्सी खाली कर दूंगा, वो आपकी ही है”

उस समय अगर प्रधानमंत्री बन जाता राहुल गांधी तो 2014 के चुनाव में मोदी को आने से रोक लेता मोदी के नाम की घोषणा तो भाजपा ने 13 सितंबर, 2013 को की थी शायद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री देखकर नरेंद्र मोदी जी डर जाते और आज राहुल गांधी को दिन रात मोदी को गाली देने की आवश्यकता नहीं पड़ती

गद्दार कौन है और किसने देश बेचा यह लोग खुद समझते हैं मोदी ने देश बेचा नहीं, बनाया है 

तमिलनाडु : शपथ में उडी संविधान की धज्जियाँ ; कांग्रेस मंत्री शपथ लेने के बीच चिल्लाकर लगाने लगे राहुल-राजीव गाँधी का नाम: राज्यपाल ने फटकारा, कहा- ये सब नहीं चलेगा

     कांग्रेस नेता ने शपथ के दौरान राहुल-राजीव गाँधी के नारे लगाए, राज्यपाल ने टोका (साभार : PTI Video SS)
तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली कैबिनेट का गुरुवार (21 मई 2026) को विस्तार हुआ। इस दौरान कुल 23 मंत्रियों ने शपथ ली। शपथ ग्रहण में तब विवाद हो गया जब कांग्रेस  मंत्री एस राजेश कुमार ने राहुल गाँधी और राजीव गाँधी के नाम के नारे लगाए।

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें तुरंत बीच में ही रोक दिया। राज्यपाल ने कड़े शब्दों में कहा कि यह शपथ का हिस्सा नहीं है। इस घटना का Video सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

कांग्रेस पार्टी पूरे 59 साल बाद राज्य सरकार का हिस्सा बनी है। इससे पहले कॉन्ग्रेस 1967 में सत्ता में थी। 2026 के विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी (TVK) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बहुमत के लिए उन्होंने कॉन्ग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया।

‘गाय की कुर्बानी तो होगी, 1400 साल से होती आ रही है’: हुमायूँ कबीर ने शुभेंदु अधिकारी को दिया चैलेंज, कहा- आग से मत खेलो, मुश्किलें खड़ी होंगी


पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखने वाले आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के चीफ और विधायक हुमायूँ कबीर ने बकरीद से पहले विवादित बयान देने शुरू कर दिए हैं। हुमायूँ कबीर ने गाय की कुर्बानी को लेकर विवादित बयान दिया है। हुमायूँ कबीर ने कहा कि 1400 साल पहले से कुर्बानी हो रही है और जब तक दुनिया रहेगी, तब तक कुर्बानी होती रहेगी।

हुमायूँ कबीर ने सीधे-सीधे सरकारी आदेश को ताक पर रखते हुए कहा, “कुर्बानी कोई मना करेगा भी तो उसे नहीं सुना जाएगा। सत्ता में शुभेंदु अधिकारी आ गए हैं, ये ठीक है कि लोगों ने उनको वोट दिए हैं, वो सरकार चलाएँगे लेकिन मेरा कहना है कि 1400 साल पहले से ये कुर्बानी होती आ रही है। जितने दिन तक दुनिया रहेगी, ये कुर्बानी होगी।”

उन्होंने कहा, “संविधान का सम्मान करना चाहिए लेकिन कुर्बानी होगी। गाय की भी होगी, बकरे की भी होगी और ऊंट की भी होगी। कुर्बानी के लिए जो पशु जायज हैं, उनकी कुर्बानी होंगी। बीजेपी सरकार को मैं चेतावनी देता हूँ, शुभेंदु अधिकारी से सीधे तौर पर कह रहा हूँ कि आग से मत खेलो। अगर वे कुर्बानी पर रोक लगाने की कोशिश करते हैं, तो इससे उनके लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी। मुस्लिम समुदाय किसी भी हाल में कुर्बानी के मामले में कोई समझौता नहीं करेगा।”

कबीर ने कहा कि वे मुसलमानों को गाय खाने से मना कर रहे हैं, उनकी सरकार है, वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन कुर्बानी तो होगी ही। उन्होंने कहा, “37% से अधिक मुसलमान गाय का गोश्त खाते हैं। सबसे पहले स्लॉटर हाउस बंद करना चाहिए। ईद की नमाज पढ़ने के लिए सरकार को हमें बड़ा मैदान देना चाहिए। अगर मैदान की व्यवस्था नहीं होगी, तो सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।”

बंगाल : पाकिस्तानी औरत से निकाह कर कोलकाता का जफर रियाज बना ISI का जासूस, 20 साल तक भारत के इनपुट आतंकी मुल्क को बेचे: सरकार बदलने के बाद NIA ने दबोचा


जिस तरह बंगाल में सत्ता बदलने के बाद मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी काम कर रहे हैं उनसे दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखने की जरुरत है। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री "मामाजी" शिवराज सिंह के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत सरमा अपने काम के बलबूते पर मोदी के हाथ मजबूत कर मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। जिस तरह बंगाल में वामपंथी सरकारों से लेकर ममता बनर्जी के राज में हुए अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा हुआ, उसी तरह दिल्ली में भी शीला दीक्षित से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक जो अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीनों पर कब्जे हुए हैं लेकिन रेखा गुप्ता द्वारा मुख्यमंत्री बनने के इतने दिनों राज करने पर भी कोई कार्रवाही नज़र नहीं आ रही। यमुना नदी वही गन्दी।  

क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स का? कहाँ गए बांग्लादेशी, रोहिंग्या और पाकिस्तानी घुसपैठिये? चुनावों में बहुत शोर मचाया था। कुर्सी मिल गयी जाए जनता भाड़ में। लगभग हर मेट्रो और लाल बत्ती(चौक)पर रिक्शाओं और थ्री-व्हीलर का जमावड़ा। चावड़ी बाजार, लाल कुआँ, नई सड़क, जामा मस्जिद और अन्य क्षेत्रों में पटरियों पर कब्जे। जनता पटरी पर चलने की बजाए सड़क पर चलने को मजबूर। पुराने समय में निकले छज्जों के नीचे सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर दुकानों, ढाबे और होटलों में शामिल आदि आदि।   

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले जफर रियाज उर्फ रिजवी को गिरफ्तार किया है। वह कोलकाता का रहने वाला है और उसने पाकिस्तानी से निकाह किया है। फिलहाल जफर की बीवी और बच्चे पाकिस्तान में ही रहते हैं।

मंगलवार (20 मई 2026) देर रात NIA ने जानकारी दी कि जफर रियाज के खिलाफ पहले से ही लुक आउट सर्कुलर जारी था। साथ ही उसे अपराधी घोषित करने की प्रक्रिया भी चल रही थी। इसी दौरान एजेंसी ने उसे गिरफ्तार कर लिया। आरोपित पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) , आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत केस दर्ज किया गया है।

पाकिस्तानी एजेंसियों से कैसे बिठाए संपर्क?

जाँच एजेंसी के अनुसार जफर रियाज का निकाह एक पाकिस्तानी औरत से हुआ था और उसके बच्चे भी पाकिस्तान के नागरिक हैं। NIA की जाँच में सामने आया कि वह साल 2005 से लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच यात्रा करता रहा। इसी दौरान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के अधिकारियों ने उसे अपने संपर्क में लिया और जासूसी की ट्रेनिंग दी।

पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों ने जफर को पैसों का लालच दिया था। इसके अलावा उसे पाकिस्तान की नागरिकता दिलाने का भी वादा किया गया था। इसके बदले आरोपित भारत से जुड़ी संवेदनशील और गोपनीय सुरक्षा जानकारियाँ पाकिस्तान तक पहुँचाने का काम कर रहा था।

जासूसी के आरोप में पहले भी गिरफ्तार हो चुका जफर

NIA ने बताया कि जफर रियाज पहले भी जासूसी के एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। उस समय उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई हुई थी। इसके बावजूद वह लगातार पाकिस्तान के संपर्क में बना रहा।

NIA अब इस पूरे जासूसी नेटवर्क की गहराई से जाँच कर रही है। एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और भारत-विरोधी साजिश कितनी बड़ी थी। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

अधूरा सच बेहद घातक होता है। सोरोस और कांग्रेस की propagandist हेले लिंग ने दिखा दिया मोदी और देश विरोध का अन्तर

एक बार एक बड़े धर्मगुरु अमेरिका पहुंचे। वहां पहुंचते ही एक पत्रकार ने उन्हें परेशान करने की नीयत से पूछा - Do you want to see any nude club? (क्या आप नंगो का क्लब देखना पसंद करेंगे? )
धर्मगुरु ने चौंकते हुए पूछा - what, is there a nude club here too? (क्या, यहां नंगो का क्लब भी है?)
दूसरे दिन अख़बार की सुर्खियां थीं।
धर्मगुरु ने अमेरिका की धरती पर कदम रखते ही पहला सवाल पूछा - "is there a nude club here too?"
जिसने भी अख़बार पढ़ा वही चौंक गया - अरे बाप रे!
तथ्यात्मक रूप से ये बिल्कुल सत्य बात है। अमेरिका की धरती पर धर्मगुरु के मुंह से निकले पहले शब्द यही थे पर क्या ये सच, सच था? अख़बार की सुर्खियां जो कह रही थी बात बिल्कुल उसके विपरीत थी। एक अधूरे सच ने भावार्थ बदल दिए थे।
जब भी किसी देश के प्रधानमंत्री दूसरे देश की यात्रा पर होते हैं तो उनकी कूटनीतिक वार्ता के बाद औपचारिक तौर पर एक साझा प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की जाती है। जिसमें दोनों देशों के प्रधानमंत्री मंच साझा करते हैं। पहले मेहमान और फिर मेज़बान देश के प्रधानमंत्री ओपचारिक तौर पर एक दूसरे का धन्यवाद करते हैं, दोनों पूर्व से तैयार अपना वक्तब्य पढ़ते हैं जिसमें वार्ता में शामिल कूटनीतिक मुद्दों पर बने आपसी सहयोग की बात करते हैं, यदि कोई समझौता (MOU) हुआ हो तो उसकी चर्चा करते हैं। फिर हाथ मिलाते हैं और मंच से चले जाते हैं। हां यदि पहले से तय हो तो दोनों प्रधानमंत्री दूसरे देश के पत्रकार के एक या दो सवाल का जवाब देते हैं पर यहां ये बात पहले ही तय कर ली जाती है कि कौन सा पत्रकार सवाल पूछेगा, जैसा हर देश में होता है और अमूमन ये भी तय कर लिया जाता है कि क्या सवाल पूछा जाएगा। कोई पत्रकार ऐसा सवाल नहीं कर सकता जिससे दो देशों के संबंधों को प्रभावित करने वाली कूटनीतिक असहजता पैदा न हो इसलिए संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग का यही प्रोटोकॉल है। पूरी प्रेस ब्रीफिंग का एक-एक मिनट पूर्णतः स्क्रिप्टेड होता है।
इस समय देश में सबसे ज्यादा चर्चा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नार्वेजियन पत्रकार हेले लिंग के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। ये सच भी है पर ये अधूरा सच है। तो सच क्या है? भारत - नार्वे के प्रधानमंत्रियों की साझा प्रेस ब्रीफिंग में पत्रकारों के सवाल लेने का समय प्रोटोकॉल में शामिल ही नहीं था। ना तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस से कोई सवाल लिया ना ही नार्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने प्रेस से कोई सवाल लिया। दोनों ने प्रेस ब्रीफिंग की हाथ मिलाया और मंच से चल दिए। लेकिन उसी समय नार्वे की propagandist पत्रकार हेले लिंग ने अपना कैमरा भारत के प्रधानमंत्री पर फोकस किया और चीख कर कुछ सवाल दाग दिए। स्वाभाविक है कोई भी प्रधानमंत्री ऐसी स्थिति में जवाब नहीं देगा। यहां अधूरा सच ये है कि भारत के प्रधानमंत्री ने हेले के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया पर पूरा सच ये है कि वो प्रश्न समुचित तरीके से पूछे ही नहीं गए थे बल्कि उनका अनुत्तरित रहना बिल्कुल तय था बस इस काम के मिले धन को वसूलने के लिए एक वीडियो रिकॉर्डिंग होनी थी वो हो गई।
ये नार्वे सरकार की व्यवस्था की विफलता थी। किसी मेहमान प्रधानमंत्री के साथ ये व्यवहार सर्वथा अनुचित था और कूटनीतिक संबंधों के लिए प्रतिकूल भी। शायद नार्वे की सरकार ने हेले द्वारा प्रोटोकॉल के इस उल्लंघन को समझा और हेले के ट्विटर-इंस्टा एकाउंट को सस्पेंड कर दिया।
भारत के प्रधानमंत्री की अस्मिता में गुस्ताख़ी की इस घटना को भारत के नामचीन पत्रकार जिस तरह उद्धृत कर रहे हैं वो अचंभित करता है। होना तो ये चाहिए था कि हमें प्रोटोकॉल की असफलता पर, हेले के गरिमाहीन व्यवहार पर प्रश्न उठाना चाहिए था।
देश के प्रधानमंत्री जब विदेशी दौरे पर जाते हैं तो वो व्यक्ति विशेष नहीं होते बल्कि अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं ऐसे में जब कोई आउट ऑफ बॉक्स जाकर हमारे प्रधानमंत्री के समक्ष घटिया व्यवहार करता है तो ये बात निसंदेह निंदनीय है। आप प्रधानमंत्री से सवाल पूछिए, उनकी नीतियों की आलोचना कीजिए किन्तु किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो मुद्दा है ही नहीं, साफ़-साफ fabricated झूठ दिखता है उस पर आपका ये रवैया?
मुझे दो बातें याद आती हैं -
1. जब भारत ने अमेरिका से बैर मोल लिया था तब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था - मुझे व्यक्तिगत हानि उठानी पड़ेगी।
2. फ़िल्म धुरंधर देख कर ये धारणा पुष्ट हुई कि हर देश में दुसरे देशों के एजेंट(sleeper cells) होते हैं जो घटनाओं को अपने आका देशों के मुताबिक़ मोड़ने की कोशिश कर देश में अराजकता पैदा कर अपने आका को गुप्त समर्थन देते है ताकि जनता उनकी गद्दारी को न भांप सके। लेकिन दुर्भाग्य से हमारा समूचा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथ की कठपुतली बन जनता को गुमराह करने का कोई मौका नहीं चूक रहा। हिन्दुओं को जातिगत सियासत में विभाजित कर मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथ मजबूत कर रहा है।
हिन्दुओं को Secularism के नशे को छोड़ सनातन पर कीजड़ फेंकने वालों से पूछना चाहिए क्या तुममें से किसी में ईसाई और इस्लाम की कुरीतियों पर बोलने की हिम्मत है?
मोदी विरोध और भारत विरोध के फ़र्क को समझना तो होगा!