नेपाल : जिस अवैध मस्जिद का पाकिस्तानी राजदूत ने किया उद्घाटन सरकार ने गिरा दी

जापान के अवैध मस्जिद के उदघाटन में पहुँचा पाकिस्तान (फोटो साभार-NDTV)
पाकिस्तान ने जापान में मस्जिद का उद्घाटन किया। इसे जापान ने गैर-कानूनी कहा और ध्वस्त करने का आदेश दिया। जापान में बढ़ रही मुस्लिम आबादी, डेमोग्राफी में बदलाव, सार्वजनिक नमाज और कब्रिस्तान की बढ़ती माँग, जन्मदर में कमी और मस्जिदों की बढ़ती संख्या के बीच इस मुद्दे ने इसलिए ध्यान खींचा है, क्योंकि जापान में पाकिस्तान के राजदूत अब्दुल हमीद इस साल की शुरुआत में मस्जिद के उद्घाटन में शामिल हुए थे।

क्या है कोवागो विवाद

कावागो में गैरकानूनी तरीके से मस्जिद बनाई गई थी, जिसके खिलाफ स्थानीय लोगों ने आवाज भी बुलंद की थी। ‘जापान जामे मस्जिद रमजान’ नाम की यह मस्जिद 4500 स्क्वेयर मीटर के प्लॉट पर बनी है, जिसे पहाड़ पर मौजूद ‘वनभूमि’ माना जाता है। यह साइट अर्बनाइजेशन कंट्रोल एरिया में आती है, जहाँ लोकल अधिकारियों से इजाजत लिए बिना कंस्ट्रक्शन पर आम तौर पर रोक होती है।

द असाही शिंबुन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रॉपर्टी रिकॉर्ड से पता चलता है कि मार्च 2025 में जमीन का मालिकाना हक बदला गया। पहले यह फुजीमी की एक रियल एस्टेट कंपनी की थी, जिसे कावागो पर रजिस्टर्ड एक फर्म को दे दी गई। कावागो शहर के अधिकारियों ने कहा कि मस्जिद जरूरी मंजूरी के बिना बनाई गई थी। यहाँ 2000 में एक फैक्ट्री बनी थी, 2007 में इसका मालिकाना हक बदल गया था और रियल एस्ट्रेट कॉर्पोरेशन बन गया। इसके बाद 2025 में स्थिति में बदलाव आया, लेकिन मस्जिद बनाने की अनुमति यहाँ नहीं थी।

जापान में सिटी प्लानिंग एक्ट के तहत बिल्डिंग बनाने पर सख्त पाबंदियाँ हैं। हालाँकि, जैसा कि दुनिया भर के इस्लामिस्टों के साथ होता है, इस्लामी विस्तार और कब्जे के मामलों में उनके लिए स्थानीय कानूनों का कोई मतलब नहीं होता है। मस्जिद को एक पाकिस्तानी कंपनी की जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया था। जापानी मीडिया की रिपोर्ट है कि रियल एस्टेट रजिस्ट्री ने उस जमीन को ‘वन भूमि’ बताया है।

अक्टूबर 2024 में स्थानीय निवासियों ने लगभग पूरी हो चुकी मस्जिद के ढाँचे का विरोध किया। शहर के प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार काम रोकने के आदेश जारी किए। लेकिन, मुस्लिम समुदाय ने बात नहीं मानी और कंस्ट्रक्शन का काम जारी रखा। शुरुआत में कहा जाता है कि मजदूरों ने कहा कि वे जापानी भाषा नहीं समझ सकते, इसलिए काम नहीं रोका। चाहे जो भी हो मस्जिद बनकर तैयार भी हो गई और इस मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तान के राजदूत भी शामिल हुए, जिसके बाद मामला और अधिक चर्चित हो गया। बाद में पाकिस्तान दूतावास को सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।

पाकिस्तान दूतावास ने जापानी कानून मानने की सलाह दी

जापान स्थित पाकिस्तान दूतावास ने बयान जारी कर कहा कि जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों को जापानी कानूनों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। मस्जिद या मदरसे का निर्माण स्थानीय प्रशासन से आवश्यक अनुमति लेने के बाद ही किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी दूतावास का उन परियोजनाओं से कोई संबंध नहीं है, जो स्थानीय कानूनों का पालन नहीं करती।

इसमें कहा गया है कि कावागो की मस्जिद के उद्घाटन में राजदूत इसलिए गए थे, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि कानून के मुताबिक जरूरी अनुमति ले ली गई है। इसमें कहा गया कि पाकिस्तानी समुदाय को स्थानीय निवासियों और प्रशासन के साथ पारदर्शिता रखनी चाहिए और अधिकारियों के साथ सहयोग करना चाहिए।

                                                        (साभार-एक्स)

पाकिस्तानी एम्बेसी ने कहा, “ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए कानूनी नियमों के पालन से जुड़ी जानकारी जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों और आस-पास के लोगों के साथ ट्रांसपेरेंट तरीके से शेयर की जानी चाहिए। इसके अलावा, प्लानिंग के दौरान और उसके बाद भी, हर हाल में जापानी कानूनों और नियमों का पालन किया जाना चाहिए।”

                                                                                      (साभार-एक्स)

कावागो जापान का पहला मामला नहीं है। इससे पहले मई 2026 में फुजिसावा शहर में एक मस्जिद बनाने को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। 440000 लोगों वाले इस शहर में मुस्लिम आबादी में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। जिस मस्जिद की बात हो रही है, उसे एक श्रीलंकाई बिजनेसमैन मोहम्मद खलील ने बनाया था। उसका कहना था कि वह एक मस्जिद बनाना चाहते हैं, क्योंकि 20 किलोमीटर दूर एबिना मस्जिद फुजिसावा में बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए काफी नहीं है।

खास बात यह है कि खलील भी 2021 में फुजिसावा के उत्तरी बाहरी इलाके में एक बंद पड़ी फैक्ट्री की 980-स्क्वायर मीटर की जगह पर ही बस गए थे। उन्होंने फटाफट फुजिसावा मस्जिद NPO बनाया। पैसे जमा किए और जमीन खरीदी और मस्जिद बनाने के लिए मंजूरी ले ली।

ये इतनी तेजी से हुआ कि 4 साल के अंदर ही एक मस्जिद बना दी। जापानी भी इससे परेशान हैं कि कैसे मुस्लिम इमिग्रेंट्स पूरे जापान में अपनी धार्मिक पहचान बढ़ा रहे हैं। ये बता रहे हैं कि जानबूझकर साजिश के तहत ये किया जा रहा है। एक तरफ तो बड़ी संख्या में प्रवासी मुस्लिम यहाँ आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का ब्रेनवॉश करके उन्हें इस्लाम कबूल करवाया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी जापानियों ने अपनी बात रखी है। इनका कहना है कि तब्लीगी जमात से संबंध रखने वाले इस अवैध मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद का शामिल होना ये बताता है कि इसे पाकिस्तानी शासन का समर्थन है।

सोशल मीडिया पर जापानियों का विरोध

सोशल मीडिया पर कई जापानी लोगों ने इस्लामी संगठन तब्लीगी जमात से कथित संबंध वाले मस्जिद के उद्घाटन समारोह में शामिल होने वाले पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद पर गुस्सा हुए।

एक्स पर उन्होंने लिखा, “जापानी भाषा के बयान के 12 घंटे बाद उर्दू में एक बयान पोस्ट किया गया। भले ही राजदूत इस बात से अनजान थे कि यह अवैध है। बात यह है कि उन्होंने इस मस्जिद के उद्घाटन समारोह में भाग लिया, जहाँ सऊदी अरब जैसे देशों द्वारा प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तबलीगी जमात’ से जुड़े लोग भी आते-जाते हैं। राजदूत को तो सतर्क रहना ही चाहिए था, इतना बिजी रहने के बावजूद भी वो इसमें क्यों शामिल हुए? क्या वह केवल इस बात से खुश थे कि जापान में मस्जिदें बढ़ रही हैं? क्या वह जापान के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला इसे मान रहे थे?”

एक और जापानी यूजर ने लिखा कि हो सकता है इस मस्जिद को पाकिस्तानी मदद मिल रही हो। इसे जापान के बारे में जानकारी इक्ट्ठा कर चीन को देने के मिशन पर लगाया गया हो। मीडिया में इस एंगल से रिपोर्टिंग क्यों नहीं हो रही है।

जापानी X यूजर ने लिखा, “साइतामा प्रीफेक्चर, कावागो सिटी, ओजा शिमोशिमोआकासाका, जहाँ कावागो सिटी में एक गैर-कानूनी तरीके से बनी मस्जिद है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि यह मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के इन्फॉर्मेशन हेडक्वार्टर ओई रेडियो स्टेशन के पास है। स्पेशल ऑब्जर्वेशन जोन को ‘इम्पॉर्टेंट लैंड सर्वे एक्ट’ के तहत बनाया गया है, ताकि जरूरी सिक्योरिटी सुविधाओं के काम में रुकावट डालने वालों को रोका सके।”

पाकिस्तानी फर्जी फुटबॉल टीम भी पहुँच गई थी जापान

पाकिस्तानी अवैध तरीके से जापान जाने के लिए भी जाने जाते हैं। हाल ही में पाकिस्तान की फर्जी फुटबॉल टीम जापान पहुँच गई थी। इसके लिए बाकायदा फर्जी फुटबॉल क्लब बनाया गया, जिसे पाकिस्तानी फुटबॉल एसोसिएशन से संबद्ध दिखाया गया। जापान पहुँचे पाकिस्तानियों से 40-40 लाख लिए गए थे।

जापान पहुँचने पर एयरपोर्ट पर इनका फर्जीवाड़ा सामने आ गया और पाकिस्तानी दूतावास से बात कर इन लोगों को वापस भेजा गया। इसी तरह 2024 में 17 पाकिस्तानियों को जापानी क्लब बोविस्टा एफसी के फर्जी आमंत्रण पत्र के जरिए जापान भेजा गया था। 15 दिनों का वीजा था, लेकिन ये लोग जापान जाकर आज तक वापस नहीं लौटे।

15 सालों में 4 गुणा बढ़ी मुस्लिम आबादी, 149 बने मस्जिद

ये सिर्फ एक शहर की बात नहीं है जापान में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

मुस्लिमों की बढ़ी आबादी मजदूरी करती है। इसके अलावा बिजनेस, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ लोग योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे में सामने आया कि देश में इनकी जनसंख्या 200000 से ज्यादा है।

मार्च 2021 तक यहाँ 113 मस्जिद बन चुके थे, जो 1999 में मात्र 15 थे। 2024 की बात करें तो यहाँ मस्जिदों की संख्या 149 हो गई थी, जो एक साल बाद यानी 2025 में 164 हो गई। इनमें से कई मस्जिदें बहुमंजिला हैं।

2024 के आखिर तक, जापानी मीडिया और रिसर्चर्स ने अंदाजा लगाया कि देश में विदेशी मुसलमानों की संख्या 360000 थी, जबकि मुसलमानों की कुल संख्या लगभग 420000 थी। इनमें करीब 55000 जापानी लोगों ने इस्लाम कबूला था। 2010-2020 के बीच ऐसे इस्लामी जापानियों की संख्या 110000 से बढ़कर 230000 हो गई। आसान शब्दों में कहें तो, जापान में मुस्लिम आबादी सिर्फ 15 से 20 सालों में चार गुना बढ़ गई है।

जापान में घटती आबादी और बढ़ता ‘इस्लाम’

जापान इन दिनों आबादी में कमी की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ दुनिया में सबसे कम फर्टिलिटी रेट है और जन्म दर में रिकॉर्ड-कमी आई है। जापान का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 2024 में घटकर 1:15 हो गया, जो लगातार नौवें साल गिरावट का संकेत है। 2023 में यह 1.0 से नीचे चला गया था।
जापानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी डेटा का हवाला देते हुए, जापान में 2025 में 705,809 जन्म दर्ज किए गए, जो 2024 में लगभग 721000 से कम है। कुल मिलाकर जापान दशकों से कम जन्मदर की वजह से ‘बूढा’ होता जा रहा है।
इस संकट की वजह से मजदूरों की हर क्षेत्र में कमी हो गई है, जिसका असर इकोनॉमिक ग्रोथ और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पड़ रहा है।
गाँवों से आबादी कम होने, स्कूल बंद होने और यहाँ तक ​​कि ‘घोस्ट टाउन’ या ‘मरते हुए गाँव’ बनने की भी खबरें आई हैं। इन इलाकों में बूढ़ी होती आबादी की वजह से वीरान होते जा रहे हैं। कई इंडस्ट्रियल हब पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं।
जापानी सरकार कई फाइनेंशियल इंसेंटिव स्कीम देकर नौजवानों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। वर्क-लाइफ रिफॉर्म किया जा रहा है, लेकिन देर से शादियाँ, बच्चों को पालने का बढ़ता खर्च और आर्थिक अनिश्चितताओं की वजह से उत्साहजनकर परिणाम नहीं आए हैं।
साफ है, जापान की घटती आबादी इस्लामिक माइग्रेंट्स के लिए काफी फायदेमंद है। मजदूरों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों से लाया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम हैं। बहुत सारे मुस्लिम जापान की इमिग्रेशन पॉलिसी का फायदा उठाकर वहीं बसते जा रहे हैं।
ऐसी खबरें आई हैं कि मुस्लिम माइग्रेंट वर्कर इस्लाम का प्रचार कर रहे हैं, जापानी लोकल लोगों का धर्म बदल रहे हैं, स्थानीय लोगों से निकाह कर रहे हैं, ताकि इस्लाम को फैला सके और अपनी आबादी बढ़ा सकें।

दुनिया के कई देश जूझ रहे हैं इस्लामी संकट से

मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि इस्लाम का फैलाव और काफिरों या गैर-इस्लामिक लोगों का धर्मांतरण करना उनका ‘इस्लामी फर्ज’ है। पहले युद्ध के जरिए जीत कर इस्लाम को बढ़ाया करते थे, अब बहलाकर, फुसलाकर, लालच देकर या धमकी देकर ये काम करते हैं। इसके लिए दूसरे देशों में बसना भी पड़े तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इनका ‘मिशन’ चलता रहता है।
एक धर्मनिरपेक्ष देश जापान में शिंटो-बौद्ध परंपराएँ मानने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। यहाँ दाह संस्कार की परंपरा है। शवों को दफनाने और कब्रिस्तान को लेकर यहाँ हंगामा भी हुआ है, क्योंकि इस्लामिक परंपरा लोकल जापानियों की परंपरा से मेल नहीं खाती है। लेकिन, मुस्लिम कट्टरपंथियों को लोकल कल्चर को अपनाना और उसका सम्मान तो कभी आया ही नहीं।
इस्लामी कट्टरपंथियों का एक पैटर्न है, पहले कुछ मुस्लिम आबादी को बसाओ, आसपास वैध-अवैध तरीके से मस्जिद बनाओ और फिर आबादी बढ़ा बढ़ा कर सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने लगो और स्थानीय लोगों पर अपना दबदबा बनाने लगो और धर्मांतरण के लिए सारे साम-दाम- दंड-भेद अपनाओ।
इन लोगों को लोकल कानूनों को तोड़ने और इस्लामी दबदबा बनाने के लिए नियम कानून तोड़ने में कोई हिचक नहीं होती। यही काम इन लोगों ने यूरोप में भी किया है। यूरोप के विकसित सहिष्णु देशों के कानून का फायदा उठाकर वहाँ पहुँचे और धीरे-धीरे अपना दावा करने लगे।
यूरोप में अपराध काफी बढ़ गए हैं। अपने रीति-रिवाज और परंपरा को ये लोग उन पर थोप रहे हैं और लगातार खूनखराब, आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। यही वजह है कि अनुमान लगाया गया है कि अगले 200 सालों में 6 यूरोपीय देशों- फ्रांस, बेल्जियम, बुल्गारिया,साइप्रस,स्वीडन और ब्रिटेन इस्लाम बहुल देश हो जाएगा।

बरेली हिंसा में मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- आरोप बेहद संगीन: लगवाए थे ‘सर तन से जुदा’ के नारे, पुलिसकर्मी भी हुए थे घायल

                                                              मौलाना तौकीर रजा खान 
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य आरोपित और साजिशकर्ता मौलाना तौकीर रजा खान को बड़ा झटका देते हुए उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता और आरोपित के आपराधिक इतिहास को देखते हुए उसे राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने शुक्रवार (5 जून 2026) को यह कड़ा आदेश पारित किया। जो इस मौलाना के लिए बहुत जरुरी भी था। 

हाईकोर्ट ने जमानत याचिका नामंजूर करते हुए सख्त टिप्पणी की कि आरोपित को जेल से बाहर भेजने पर समाज की शांति को खतरा पैदा हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आवेदक(तौकीर रजा) ने एक सार्वजनिक सभा में मुस्लिम समुदाय के कई युवाओं को इस्लामिया इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने के लिए उकसाया था। गवाहों के बयान और वीडियो क्लिप से ये संकेत मिलता है कि तौकीर रजा खान ने भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को इकट्ठा होने के लिए प्रेरित किया। भीड़ द्वारा किए गए अपराध के लिए मुख्य साजिशकर्ता होने के नाते खान पूरी तरह जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनके द्वारा भड़काने के बाद ही भीड़ ने कानून-व्यवस्था हाथ में ली।

सुनवाई के दौरान अदालत ने उस समय लगी पाबंदियों और उपद्रवियों के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 163(पूर्व में धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद आरोपित के उकसावे में आकर भारी भीड़ सड़कों पर उतरी।

अदालत ने भीड़ द्वारा लगाए गए विवादित नारों को देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। जज ने आदेश में लिखा, “भीड़ द्वारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ जैसे विवादित नारे लगाना देश के कानून की सत्ता के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को एक सीधी चुनौती है। ये कृत्य सीधे तौर पर एक सशस्त्र विद्रोह की अपील करता है। इस तरह की हिंसक और भड़काऊ नारेबाजी करना न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है, बल्कि ये कृत्य इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों और शिक्षाओं के भी पूरी तरह खिलाफ है।”

जमानत याचिका खारिज करने का मुख्य आधार तौकीर रजा के पुराने रिकॉर्ड को बनाया गया। कोर्ट ने कहा, “तौकीर रजा खान का इसी तरह के मामलों में एक लंबा और विस्तृत आपराधिक इतिहास रहा है। ऐसे में इस बात का बड़ा जोखिम है कि यदि उन्हें जमानत पर रिहा किया गया, तो वो फिर से एक विशेष समुदाय को भड़का सकते हैं और समाज की शांति व सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं।”

यह पूरा मामला पिछले साल 26 सितंबर 2025 को दर्ज पुलिस एफआईआर से जुड़ा है। आरोप है कि तौकीर रजा ने प्रशासन के कड़े प्रतिबंधों को दरकिनार कर मुस्लिमों को बरेली के इस्लामिया इंटर कॉलेज में एकत्र होने का आह्वान किया था। इसके बाद करीब 200 से 250 लोगों की उग्र इस्लामी भीड़ हाथों में भड़काऊ बोर्ड लेकर मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की तरफ बढ़ने लगी।

जब मौके पर तैनात पुलिस टीम ने उग्र हो रही भीड़ को समझाने और आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया, तो उपद्रवी हिंसक हो गए। भीड़ ने पुलिस टीम को निशाना बनाते हुए उन पर ईंट-पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब (एसिड) की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं।

सरकार को उपद्रवियों के सरगनाओं पर कार्यवाही करने के साथ-साथ एसिड, पेट्रोल और पत्थर सप्लाई करने वालों पर भी कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं इन दंगाइयों को समर्थन में victim card खेल बचाने वालों पर नकेल जरुरी है।    

इस भयानक हिंसा और पथराव के दौरान उपद्रवियों ने कई राउंड फायरिंग भी की और पुलिसकर्मियों के कपड़े तक फाड़ दिए। इस हिंसक टकराव में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया था। अदालत ने इन सभी तथ्यों को बेहद संगीन माना।

भगवान राम का अपमान, आजादी के नारे और तिरंगे से बदसलूकी: कॉकरोचों को ये तक नहीं पता कि वे क्यों आए हैं

                                                             साभार : ऑपइंडिया
कल(6 जून) को कॉकरोच जनता पार्टी ने दिखा दिया कि रात के अँधेरे में वह कहाँ जा रहा है, तो तेज सूरज की तपिश में उससे कोई उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी। नेपाल जैसा उपद्रव करने के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर इसके आका भी सिर पकड़ कर बैठ गए होंगे। कई उपद्रवियों को तो शिक्षा मंत्री तक नाम नहीं पता जिसका इस्तीफा मांग रहे थे। सोशल मीडिया पर कई वीडियो देखने को मिले जहाँ मोदी और योगी तक का पद नहीं बता पाए।
कई लोगों तो यह तक नहीं मालूम कि 'यहाँ आये किस लिए हैं?' यानि अगर किसी वजह से उपद्रव हो गया होता तो अरविन्द केजरीवाल और INDI गठबंधन की बल्ले-बल्ले हो गयी होती। लेकिन विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके तो तेज गर्मी की पहले ही भाग खड़ा हुआ था या विरोधियों की तैयारी से ये तो वही जानता है। लेकिन कोई उपद्रव नहीं होने पर इनके आकाओं के अरमानों पर पानी जरूर फिर गया।    

    

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी इस कथित पार्टी के सदस्यों यानी ‘कॉकरोचों’ को प्रदर्शन के लिए बुलाया था। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उनका साथ देने वाले कॉकरोचों की संख्या उनकी उम्मीदों को तोड़ने वाली रही।

अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों से बड़ी से बड़ी संख्या में जुटने का आह्वान किया था लेकिन आह्वान का असर केवल कुछ कॉकरोचों पर ही पड़ा। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाली इस CJP के प्रदर्शन में बमुश्किल कुछ सौ लोग ही पहुँचे। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है इसमें शामिल होने वाले कॉकरोचों को देखकर भी साफ समझा जा सकता था कि इनकी मंशा केवल हिंसा फैलाना, सुर्खियाँ बटोरना, सरकार और भारतीय संस्कृति को बदनाम करना था।

कोई कॉकरोच यहाँ हिंदू देवी-देवता का अपमान कर रहा तो कोई अपनी पर्सनल डायरी को संविधान बता रहा। किसी को तिरंगे के सम्मान से कोई लेना-देना नहीं तो कोई डफली बजाते हुए आजादी-आजादी चिल्ला रहा और इनका कहना था कि ये छात्रों के भविष्य के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे, ये कॉकरोच जिनके पास ना तो ज्ञान है और ना ही तमीज।

यह आरोप कोई हमारा मनगढ़ंत नहीं है बल्कि ऑपइंडिया को इसके प्रमाण भी मिले हैं। पहली बात तो ये सामने आई कि प्रोटेस्ट के नाम पर शोर मचाने वाले ये कॉकरोच असल में ना तो कोई छात्र हैं और ना ही पढ़ाई या किसी तरह की परीक्षा से इनका कोई लेना-देना है और इसका प्रमाण इन्होंने खुद ही दे दिया ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगाकर।

वायरल वीडियो अब तक आपने भी देख लिए होंगे और अगर नहीं देखें तो ऑपइंडिया के इन वीडियोज को देंखे, जिसमें ये अबर्न नक्सली डफली बजाते हुए ‘आजादी-आजादी’ चिल्ला रहे।

वीडियो में दिख रहे ये लोग चिल्ला रहे, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी।” अब आप सोचिए कि इसका पेपर लीक से क्या लेना देना है भला?

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को हिंसक बना दिया था।

इसके अलावा साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई।

मकसद भी नहीं बता पा रहे अभिजीत के कॉकरोच, तिरंगे के अपमान का वीडियो आया सामने

CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएँ। उनके कॉकरोचों यानी समर्थकों ने ये बात मानी भी लेकिन शायज आशुतोष उन्हें ये बताना भूल गए कि तिरंगे को हर भारतीय, हर देशभक्त सम्मान की दृष्टि से देखता है।

ऑपइंडिया ने इसकी पुष्टि कर रही ऐसी ही एक घटना को कैप्चर भी किया है, जिसमें प्रदर्शन करने पहुँचे कॉकरोच तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसको अपने देश से प्रेम हो वो ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। साफ समझ आ रहा कि ये हरकते भारत को बदनाम करने की वामपंथियों की केवल एक साजिश है।

दूसरी तरफ ऑपइंडिया के रिपोर्टर्स को ग्राउंड पर ऐसा कोई कॉकरोच नहीं मिला, जो यह बता सके कि उनका जुटान यहाँ हुआ किसलिए है। किसी के पास कोई मुद्दा नहीं जो वो बता सकें कि इसलिए वो प्रदर्शन करने आए हैं। कोई पेपर लीक पेपर लीक चिल्ला रहे तो वो उनके साथ मिल जा रहे।

कोई आजादी-आजाजी चिल्ला रहा तो उधर भी उपस्थिति दर्ज कर रहे। इस बैनर से उस बैनर, यहाँ से वहाँ, वहीं जो असल में कॉकरोच करते हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उगला जहर उगलने पहुँच रहे कॉकरोचों के दादा-परदादा

जंतर-मंतर पर पहुँचे एक बुजुर्ग ने ऑपइंडिया के रिपोर्टर से कहा कि ‘पांडव-वांडव’ तो कभी थे ही नहीं, ये सब बेकार बाते हैं। उन्होंने आगे कहा, “राम-वाम सब छोड़ दे, तु वहाँ मत जा, राम मोदी को नहीं मारता, सारे देश को लूट कर खा गया, वो मोदी को नहीं मारता, राम मंदिर के नाम पर कितने रुपए डकार गया, अडानी-अंबानी को नहीं मारता है।”

जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने पूछा कि इसमें भगवान राम बीच में कहाँ से आ गए तो वो कहते हैं, “तेरे मेरे को डराने के लिए हैं राम तो, उसको नहीं मानते।” जिनको ना तो भारत के इतिहास, संस्कृति और धर्मग्रंथो से कोई लेना-देना नहीं, ना तो इन्हें हिंदू देवी-देवताओं का सम्मान करना आता है, ये लोग पहुँचे हैं कॉकरोचों को समर्थन करने।

कोई डायरी को बता रहा संविधान तो किसी का जवाब- अब्बा-डब्बा-जब्बा

प्रशांत राणा नाम के एक कॉकरोच से ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने बात की तो उसने हाथ में ली हुई डायरी को भारत का संविधान बताया। जब रिपोर्टर ने दिखाने को कहा तो प्रशांत ने थोड़ा भाव खाया, लेकिन फिर डायरी खोली और कहा, ‘ये मेरे कुछ आर्टिकल्स हैं।’ जी हाँ यानी कॉकरोचों का अपना एक संविधान भी लिखा जा रहा है। उसने कहा कि ये मेरे लिए संविधान है।

रिपोर्टर ने जब उससे कहा कि भाई दिखाओ तो इस संविधान में क्या है तो कॉकरोच ने कहा- “इतनी पर्सनल चीज नहीं दिखा सकते।” इसके बाद वो लगातार अपने मन का बेतुकी बातें करता रहा जो संभवतः उसके अपने पर्सनल संविधान में लिखी होंगी।

ऑपइंडिया को प्रशांत की तरह ही एक और कॉकरोच मिला। उसने कहा कि वो सिस्टम का विरोध करने वालों का समर्थन कर रहा है। उसने कहा कि एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह करप्ट हो चुका है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि तो इसका हल क्या है और CJP के पास इसका क्या समाधान है तो उसने ना में सिर हिला दिया कि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है।

मास्क पहने एक कॉकरोच ने बताया कि नीट पेपर लीक हुआ है, इसलिए वो यहाँ आया है, लेकिन और कौन से पेपर कब लीक हुए हैं, इसके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। वह लगातार कहता रहा, “नीट का पेपर लीक हुआ है, होते रहते हैं, अब जैसे नीट का पेपर लीक हुआ है, नीट का पेपर लीक हुआ था, नीट का पेपर लीक हो जाएगा फिर।”

अंत में कॉकरोच ने रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि वो बताए कौन-कौन से पेपर लीक हुए हैं। रिपोर्टर के हर सवाल में फँसते हुए कॉकरोच में अंत में चेहरा दिखाकर और बेईज्जती कराना सही नहीं समझा और चुप हो गया। जिन्हें किसी विषय की कोई जानकारी नहीं है, यहाँ तक की अपने भविष्य का भी कुछ नहीं पता ये औरों के भविष्य की क्या चिंता करेंगे।

कहने को “कॉकरोच” हैं लेकिन आवारा कुत्तों से कम नहीं हैं जो केवल भोंकना जानते हैं; 350-375 लोग करोड़ों Gen Z को भड़काने चले थे

साभार: सोशल मीडिया  
सुभाष चन्द्र

अभिजीत दिपके को पता नहीं था कि सामने अमित शाह है जिसने उसकी हवा निकाल दी। दिपके की “कॉकरोच जनता पार्टी” का लक्ष्य संसद मार्ग थाने जाकर उत्पात करना था लेकिन दिल्ली पुलिस उसे Permission letter पकड़ा दिया जिसमें कहा गया कि जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकते हो। इसी से सारे मंसूबों पर पानी फिर गया। 

Gen Z को विद्रोह के लिए उकसाने चले थे लेकिन मुश्किल से 350-375 लोग ही जुड़ पाए दिपके के साथ और लोग भी ऐसे जिन्हे पता नहीं क्या बोलना है। सारी भीड़ में इन थोड़े से कॉकरोचों के अलावा 200 पत्रकार थे, 500 कैमरामैन, 1000 यूटूबर और 5000 पुलिस वाले। कॉकरोचों को ये भी नहीं पता था कि अभिजीत का सहयोगी सौरभ दास कौन है जिसे पहले ही पुलिस ने रगड़ा दे रखा था

एक लड़की चीख रही थी 5वीं-6ठी फेल मंत्री बने हुए है जो अपने बच्चो को विदेश में पढ़ाते हैं। जब उसे पूछा कि अभिजीत दिपके कौन है तो कहती है वो अमेरिका में रहते हैं पढ़ते हैं लेकिन इससे उनके नागरिक होने के अधिकार ख़त्म नहीं होते। और तो और यह भी कह दिया सुभाष चंद्र बोस ने भी विदेश में रह कर देश की सेवा की थी। यानी एक टुच्चे अभिजीत दिपके की तुलना सुभाष चंद्र बोस से कर दी। और फिर मंत्री के बच्चे अगर सरकारी स्कूल में भेजना चाहते हो तो दिपके अमेरिका में क्यों पढ़ रहा है? 

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इससे भी बड़ी बात NEET का मतलब भी नहीं बता सकी - एक अर्धनग्न सी लड़की कह रही थी “हम अपनी डिमांड मांगने आए हैं कि धर्मेंद्र प्रधान को हटाओ”। अब बताओ डिमांड मांगी जाती है या की जाती है। उनका नेता दिपके गर्मी के मारे प्रदर्शन छोड़ कर भाग खड़ा हुआ।

इसलिए मैंने कहा कि कहने को तो ये कॉकरोच हैं लेकिन भौंकने वाले आवारा कुत्तों से कम नहीं हैं जो भारत को नेपाल और बांग्लादेश समझ कर Gen Z को भड़काना चाहते हैं। इनके बाप केजरीवाल की पार्टी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। ये तो अभी आए हैं और पहला ही प्रदर्शन फेल हो गया जबकि किसान आंदोलन तो डेढ़ साल चला लेकिन उसके नेता पंजाब चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। 

विपक्ष खुद कुछ नहीं कर सका मोदी को हटाने के लिए तो इन कॉकरोचों से उम्मीद लगाए बैठा है जबकि विपक्ष का इंडी गठबंधन छिन्न भिन्न हो रहा है। राहुल गांधी आस लगाए बैठा है एक साल में मोदी सरकार गिर जाएगी। मैंने एक लेख में लिखा था कि वो ज्योतिषियों की बात पर भरोसा कर रहा है और कल उसकी मुंहफट सुप्रिया श्रीनेत से जब पूछा गया कि सरकार कैसे गिरेगी तो कहती है मोदी जी खुद ही पद छोड़ देंगे। 

अब भारत का Gen Z क्यों खड़ा होगा जब भारत की जीडीपी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सबसे तेज गति से बढ़कर 2025-26 में 7.7% रही है जिसमें सबसे बड़ा योगदान मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर का रहा है। और ये योगदान Gen Z और उद्योगों की वजह से होता है लेकिन राहुल गांधी को जनता का सारा पैसा अडानी की जेब में जाता दिखाई देता है।

 

इतना ही नहीं जिस मोदी को हटाने की मुहिम चला रहा राहुल गांधी, विपक्ष और अब ये कॉकरोच पार्टी, उसके लिए कल पुतिन ने कहा है कि मोदी मजबूत नेता हैं, उन्हें कोई दबा नहीं सकता और भारत हमारा सबसे भरोसे वाला मित्र है। इतना ही नहीं 5th Generation fighter jets SU 57 भी भारत को देने का वादा करते हुए यह भी कहा कि Jets का प्रोडक्शन रूस भारत के साथ भारत में ही करेगा

उधर डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा कि मोदी मेरे सबसे अच्छे मित्र हैं और अमेरिका-भारत की ट्रेड डील जल्दी ही साइन हो जाएगी

ऐसे में जब भारत आर्थिक रूप से सशक्त है, तो Gen Z क्या पागल है जो उन बेवकूफों के बहकावे में आकर भारत में विद्रोह करेगा

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में लगे खालिस्तानी नारे, आतंकी भिंडरावाले को सेना ने इसी दिन 42 साल पहले किया था ढेर

                                                                                                              साभार - न्यूज 18
पंजाब की ऐतिहासिक और धार्मिक धरती अमृतसर से एक बार फिर तनाव और संवेदनशीलता की तस्वीरें सामने आई हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के मौके पर शुक्रवार को अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में एक बार फिर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूँज उठे। श्री अकाल तख्त साहिब के नजदीक बड़ी संख्या में कट्टरपंथी और उनके समर्थक इकट्ठा हुए, जिन्होंने हाथों में प्रतिबंधित संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए

हर साल 6 जून की यह तारीख भारतीय राजनीति, सिख समुदाय और देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसी दिन साल 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी हथियारों से लैस आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इस कार्रवाई के दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सेना ने ढेर कर दिया था। यही वजह है कि हर साल इस दिन भिंडरावाले और ऑपरेशन में मारे गए लोगों की याद में विशेष अरदास की जाती है, जिसकी आड़ में कट्टरपंथी तत्व हंगामा और नारेबाजी करते हैं।

इस बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मौके को देखते हुए पंजाब पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और अर्धसैनिक बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रहे। स्वर्ण मंदिर के आसपास के पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। हालाँकि परिसर के भीतर नारेबाजी और पोस्टरबाजी के कारण माहौल में भारी तनाव देखा गया, लेकिन प्रशासन और सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में बनी रही।

इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खड़ा किया था भिंडरावाले नाम का भस्मासुर

इतिहास के पन्नों को पलटें तो जरनैल सिंह भिंडरावाले एक ऐसा नाम है जिसने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया था। शुरुआत में भिंडरावाले को खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और अकाली दल के प्रभाव को कम करने के लिए बढ़ावा दिया था। लेकिन बाद में वही भिंडरावाले भस्मासुर बन गया और उसने पंजाब में सिखों के लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ की हिंसक मांग शुरू कर दी।

भिंडरावाले का प्रभाव 1978 के बाद तेजी से बढ़ा और उसने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उग्रवाद का रास्ता चुन लिया। उसके इशारे पर पंजाब में हिंदुओं और निरंकारियों की सरेआम हत्याएँ होने लगीं। जब कानून का शिकंजा कसने लगा, तो भिंडरावाले ने अपने सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा कर लिया और उसे एक अभेद्य किले तथा आतंकी मुख्यालय में तब्दील कर दिया।

आतंकियों से सिखों के पवित्र स्थान को मुक्त कराने के लिए सेना ने चलाया था ऑपरेशन ब्लू स्टार

जब पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और आतंकवाद चरम पर पहुँच गया, तब इंदिरा गाँधी सरकार के आदेश पर भारतीय सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार‘ चलाना पड़ा। 1 जून से 8 जून 1984 के बीच चले इस भीषण सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके घातक हथियारों से लैस समर्थकों से मुक्त कराना था। भारी गोलीबारी के बीच 6 जून 1984 को सेना ने भिंडरावाले को मार गिराया।

 इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल ‘श्री अकाल तख्त साहिब’ को भारी नुकसान पहुँचा था, जिसे सिख समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी धार्मिक भावनाओं पर गहरी चोट और बेअदबी के रूप में देखता है। यही कारण है कि 42 साल बीत जाने के बाद भी यह मुद्दा भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है और इसके जख्म आज भी ताज़ा हैं। इस ऑपरेशन के बाद देश का माहौल बिगड़ गया था और इसके प्रतिशोध में ही इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे।

इस बरसी के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भारतीय राज्य के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ने वहाँ मौजूद भीड़ के सामने बयान देते हुए कहा, “1984 की सैन्य कार्रवाई ने पूरे सिख समुदाय को एक ऐसी गहरी पीड़ा दी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। हमारे पवित्र अकाल तख्त पर हमला करके हमारी धार्मिक पहचान को कुचलने की कोशिश की गई थी। हम अपनी स्वायत्तता और हक की लड़ाई को हमेशा जिंदा रखेंगे और शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।”

‘न्याय का मजाक बना दिया’: सुप्रीम कोर्ट पर भड़का मद्रास हाई कोर्ट, कहा- ‘याचिकाएँ इतने समय तक लंबित रहेंगी तो तानाशाही की ओर बढ़ेगा देश’


मद्रास हाई कोर्ट ने 2016 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से हुई लंबी देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि अगर चुनाव याचिकाओं का निपटारा 6 वर्षों तक लंबित रखा जाएगा तो इससे लोकतंत्र कमजोर होगा और देश तानाशाही की ओर बढ़ सकता है।

यह टिप्पणी मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. जयचंद्रन ने DMK नेता और तमिलनाडु विधानसभा के पूर्व स्पीकर एम. अप्पावु द्वारा दायर चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते समय की। अदालत ने AIADMK उम्मीदवार आई.एस. इनबादुरई के चुनाव को रद्द करते हुए एम. अप्पावु को 2016-2021 कार्यकाल के लिए राधापुरम विधानसभा सीट का वैध निर्वाचित प्रतिनिधि घोषित कर दिया।

यह मामला तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले की राधापुरम विधानसभा सीट से जुड़ा हुआ है। 2016 विधानसभा चुनाव में AIADMK उम्मीदवार आई.एस. इनबादुरई ने DMK के एम. अप्पावु को केवल 49 वोटों के बेहद कम अंतर से हराया था। चुनाव नतीजों के बाद अप्पावु ने अदालत का रुख किया और आरोप लगाया कि कई वैध पोस्टल बैलेट वोटों को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया था, जिससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ।

मामले का सबसे अहम सवाल यह था कि क्या सरकारी मिडिल स्कूलों के हेडमास्टर ‘गजेटेड अधिकारी’ माने जा सकते हैं और क्या उन्हें पोस्टल बैलेट के सत्यापन (अटेस्टेशन) का अधिकार है। चुनाव के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने 203 पोस्टल बैलेट को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उन पर गजेटेड अधिकारी का प्रमाणन नहीं था। अप्पावु का कहना था कि इन पोस्टल बैलेट को गलत तरीके से रद्द किया गया और इनमें से अधिकतर वोट उनके पक्ष में थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में दर्ज वोटों की गिनती में भी कुछ अनियमितताएँ हुई थीं।

2019 में मद्रास हाई कोर्ट ने अप्पावु के पक्ष में फैसला दिया था। हाई कोर्ट ने माना था कि सरकारी मिडिल स्कूलों के हेडमास्टर पोस्टल बैलेट के लिए ‘गजेटेड अधिकारी’ माने जाएँगे। अदालत ने कहा था कि 203 पोस्टल बैलेट को खारिज करना गलत था और वोटों की दोबारा गिनती कराने का आदेश दिया था।

इसके बाद आई.एस. इनबादुरई ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा मतगणना की अनुमति तो दे दी लेकिन नतीजे घोषित करने पर रोक लगा दी। यह मामला अक्टूबर 2019 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा और आखिरकार 21 मई 2026 को इसका निपटारा हुआ। तब तक 2016-2021 विधानसभा का पूरा कार्यकाल समाप्त हो चुका था और तमिलनाडु में दो विधानसभा चुनाव भी हो चुके थे।

3 जून 2026 को दिए गए अपने विस्तृत आदेश में जस्टिस जी. जयचंद्रन ने इस देरी को ‘न्याय का गंभीर मजाक’ बताया। उन्होंने कहा कि चुनाव याचिकाओं का उद्देश्य समय रहते विवाद का समाधान करना होता है लेकिन जब फैसला कई साल बाद आता है और संबंधित विधानसभा का कार्यकाल ही समाप्त हो जाता है, तब न्याय का महत्व कम हो जाता है।

जस्टिस जयचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के मोहम्मद अकबर बनाम अशोक साहू फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव विवादों का जल्द निपटारा बेहद जरूरी है क्योंकि ऐसे मामले लोकतंत्र से सीधे जुड़े होते हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर अदालतें अपने ही पुराने फैसलों में कही गई बातों का पालन नहीं करेंगी, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।

अपने आदेश में जस्टिस जयचंद्रन ने कहा, “अगर अदालतें मोहम्मद अकबर मामले में की गई अपनी ही टिप्पणियों को लगातार नजरअंदाज करती रहें, तो मुझे डर है कि हमारा देश भी उन दूसरे देशों की राह पर जा सकता है, जो हमारे साथ करीब 75 साल पहले आजाद हुए थे लेकिन बाद में तानाशाही व्यवस्था की ओर बढ़ गए।”

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मुख्य कानूनी सवाल को अनुत्तरित छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में मामले का निपटारा करते हुए कहा था कि अब विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इसलिए यह तय करने का कोई मतलब नहीं कि मिडिल स्कूल हेडमास्टर ‘गजेटेड अधिकारी’ हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न को खुला छोड़ दिया था।

इस पर जस्टिस जयचंद्रन ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि केवल समय बीत जाने के कारण अदालत अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। उन्होंने कहा कि जब हाई कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट भी थी पहले ही इस मुद्दे पर फैसला दे चुकी थी तो सुप्रीम कोर्ट को भी इस सवाल का स्पष्ट जवाब देना चाहिए था। जस्टिस जयचंद्रन ने अपने आदेश में कहा, “पूरे सम्मान के साथ, सर्वोच्च न्यायालय को इस सवाल का जवाब देना चाहिए था क्योंकि इस अदालत ने पहले ही इस पर निष्कर्ष दिया था।”

दोबारा मतगणना के दौरान 203 पोस्टल बैलेट की जाँच हुई। इसमें पाया गया कि 153 वोट एम. अप्पावु के पक्ष में थे। इसके बाद नतीजे पूरी तरह बदल गए और अप्पावु 103 वोटों के अंतर से विजेता बन गए।

किसी व्यक्ति पर बच्चे का जैविक पिता न होने पर भी उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी है तो फिर संपत्ति के अधिकार के लिए DNA की क्या जरूरत?

सुभाष चन्द्र 

सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर दिए गए निर्णय बड़े विचित्र हैं जो वास्तविक जीवन में अमल होने संभव नहीं है।  कई जगह कहा गया है कि अगर व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं भी है (जन्मदाता नहीं है)  तब भी वह बच्चे के भरण पोषण के लिए जिम्मेदार होगा क्योंकि उसका जन्म माता पिता के वैवाहिक जीवन के दौरान हुआ है (section 112 Indian Evidence Act), भले ही उस बच्चे का पिता कोई और हो यानी माँ के किसी के साथ संबंधों से जन्म हुआ हो

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ऐसा फैसला जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस भुइया की पीठ ने 28 जनवरी, 2025 को दिया था जिसका उद्देश्य बताया गया कि यह बच्चे की वैधता (legitimacy), सामाजिक सुरक्षा और निजता  बरक़रार रखना था कोर्ट ने यह भी कहा कि पति की जिम्मेदारी है कि वो साबित करे कि उसकी पत्नी के साथ शादीशुदा होते हुए भी संबंध नहीं थे 

इस केस में पत्नी को किसी गैर मर्द से औलाद थी लेकिन कोर्ट ने उसके भरण पोषण के लिए पिता को जिम्मेदार ठहरा दिया और असली जनम देने वाले की मौज करा दी चंद्रचूड़ ने तो पत्नियों को वैसे भी Sexual Autonomy का अधिकार दे दिया था जिसका मतलब था कि पति से अगर संतुष्टि नहीं मिलती तो वह किसी और से भी संबंध बना सकती है कैसा फैसला था सूर्यकांत जी का? यह क्या किसी के वास्तविक जीवन में अमल हो सकता है?

एक दूसरे केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया क्योंकि DNA रिपोर्ट में साबित हुआ कि पति बच्चे का पिता नहीं है मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहां 29 मई, 2026 को जस्टिस संजय करोल एंड जस्टिस कोटेश्वर सिंह की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को उचित ठहरा दिया क्योंकि पत्नी ने DNA टेस्ट के लिए सहमति दी थी और क्योंकि पति बच्चे का पिता साबित नहीं हुआ, गुजारा भत्ता मान्य नहीं है 

ये मामला बड़ा अजीब था पत्नी आदमी के घर में नौकरानी थी और उसका आरोप था कि उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए दोनों ने फिर 2 मार्च 2016 को शादी कर ली और 1 अप्रैल, 2016 को यानी ठीक एक महीने बाद बच्चे का जन्म हो गया शायद इसलिए ही वो DNA टेस्ट के लिए राजी हुई लेकिन मामला कुछ और ही निकला लेकिन कोर्ट ने एक तुर्रा फिर भी लगा दिया कि बच्चे को सामाजिक कलंक से बचाने के लिए पिता उसी को माना जाएगा क्योंकि उसका जन्म शादी के बाद हुआ फिर तो गुजारा भत्ता भी देना चाहिए जैसे जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के फैसले का मतलब था

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने 4 दिन पहले एक अलग व्यवस्था दी है इस केस में किसी ने बच्चे को कथित पिता की संपत्ति में हिस्सा दिलाने के लिए ट्रायल कोर्ट में दीवानी मुकदमा दायर किया ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने DNA के आदेश दिए लेकिन वह व्यक्ति (जिसे पिता कहा गया) सुप्रीम कोर्ट चला गया कि DNA टेस्ट से मेरी निजता भंग होगी

बच्चे  के कथित माता पिता के जनवरी, 1999 में संबंध थे और सितंबर, 1999 में बच्चे का जन्म हुआ लेकिन व्यक्ति ने उसका पिता होने से इंकार कर दिया

जस्टिस करोल की पीठ ने उसकी अपील ख़ारिज करते हुए कहा कि “बच्चे का अपने पिता के बारे में जानने का अधिकार, किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है और DNA टेस्ट के आदेश दे दिए इस केस में बस यह लगता है कि महिला और उस व्यक्ति की शादी नहीं हुई थी क्योंकि पूरी रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कोर्ट ने कहा निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है (कहीं अधिकार को पूर्ण कह दिया जाता है) बिना DNA बच्चा उस अधिकारों से हमेशा वंचित रह जाएगा जिसका वह हक़दार हो सकता है और इसलिए हित संतुलन माँ के पक्ष में है

एक ही विषय पर अलग अलग फैसले देना क्या उचित है?

विवादों में ‘कॉकरोचों’ का 6 जून का प्रदर्शन, दिपके ने माना- ‘नहीं ली प्रोटेस्ट की परमिशन’

                                                           प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार - AI)
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अमेरिका से भारत लौटकर यहाँ प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

लेकिन विवाद इस बात को लेकर खड़ा हो गया है कि प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद पार्टी ने दिल्ली पुलिस को पहले से लिखित सूचना नहीं दी और न ही अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी की। CJP का कहना है कि जंतर-मंतर एक निश्चित विरोध स्थल है, इसलिए वहाँ प्रदर्शन के लिए अलग से अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो में समर्थकों से अपील की थी कि वे उनके भारत पहुँचने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर जुटें और वहाँ से संसद मार्ग थाने तक मार्च करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करें।

दिपके ने इसे ‘शांतिपूर्ण’ और ‘संवैधानिक’ विरोध बताया था। हालाँकि इसी घोषणा के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है और क्या दिल्ली पुलिस को इसकी पूर्व सूचना दी गई है।

 यहीं से सवाल उठता है कि आखिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का वास्तविक नियम क्या है? क्या कोई भी संगठन सीधे पहुँचकर धरना या प्रदर्शन शुरू कर सकता है या फिर इसके लिए पहले से पुलिस की मंजूरी जरूरी होती है? इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले और दिल्ली पुलिस के नियमों को समझना जरूरी हो जाता है।

जंतर-मंतर क्यों बना देश का प्रमुख प्रदर्शन स्थल?

दिल्ली का जंतर-मंतर कई दशकों से देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक होने के कारण विभिन्न संगठन अपनी माँगों को सरकार तक पहुँचाने के लिए यहाँ जुटते रहे हैं।

हालाँकि समय के साथ स्थानीय निवासियों ने शोर, यातायात बाधा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं की शिकायतें उठाईं। इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2017 में यहाँ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

                मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, जुलाई 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यह मामला तब शुरू हुआ था जब 2017 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 144 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों और NGT के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें जंतर-मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर लगभग पूर्ण रोक लगा दी गई थी। स्थानीय निवासियों ने शोर, ट्रैफिक जाम और अन्य असुविधाओं की शिकायतें की थीं, जिसके बाद यह विवाद अदालत तक पहुँचा था।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और स्थानीय लोगों के जीवन एवं शांति के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शनों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें प्रदर्शन से पहले पुलिस को लिखित रूप से सूचित किया जाए।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए क्या प्रक्रिया है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने 2018 में जंतर-मंतर और अन्य निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन के लिए दिशा निर्देश लागू किए।

इन दिशा निर्देशों के अनुसार:

  • प्रदर्शन या सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए पहले से लिखित आवेदन देना होता है।
  • आवेदन नई दिल्ली जिला पुलिस के संबंधित अधिकारी को दिया जाता है।
  • प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 7 दिन पहले आवेदन देना आवश्यक होता है।
  • पुलिस, ट्रैफिक विभाग, विशेष शाखा और अन्य एजेंसियाँ सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था के पहलुओं की समीक्षा करती हैं।
  • स्थान की उपलब्धता और सुरक्षा मूल्यांकन के बाद ही अनुमति दी जाती है।
  • एक से अधिक आवेदन होने पर प्राथमिकता पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर तय की जा सकती है।
  • सुरक्षा कारणों, VIP मूवमेंट या अन्य आपात परिस्थितियों में अनुमति बाद में भी रद्द की जा सकती है।
दिल्ली पुलिस लंबे समय से यह कहती रही है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पूर्व अनुमति और पूर्व सूचना आवश्यक है। इसलिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था कोई नया नियम नहीं बल्कि कई वर्षों से लागू कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अभिजीत दिपके और आम आदमी पार्टी से जुड़ाव

अभिजीत दिपके का नाम पहले भी राजनीतिक अभियानों से जुड़ता रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वह 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार तंत्र से जुड़े रहे थे।
उन्हें उन लोगों में गिना जाता था जो सोशल मीडिया कंटेंट, मीम्स, वीडियो और डिजिटल कैंपेन तैयार करने में भूमिका निभाते थे। दिपके का नाम AAP की चुनावी वॉर-रूम और सोशल मीडिया समन्वय गतिविधियों से भी जोड़ा जाता रहा है।
इंटरव्यू में उन्होंने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक पहुँचने की रणनीतियों पर भी चर्चा की थी। सोशल मीडिया पर उनके राजनीतिक विचार भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि आलोचकों का कहना है कि दिल्ली में प्रदर्शनों से जुड़े नियमों और अनुमति प्रक्रिया से दिपके पूरी तरह अनजान नहीं हो सकते।
दिलचस्प बात यह भी है कि वर्ष 2020 में AAP की नेता आतिशी समेत अन्य नेताओं ने प्रदर्शन संबंधी अनुमति के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। उस दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल हलफनामे में 2018 के उन्हीं दिशानिर्देशों का हवाला दिया था, जिनके तहत जंतर-मंतर समेत संवेदनशील स्थानों पर प्रदर्शन के लिए पूर्व लिखित आवेदन आवश्यक बताया गया था।

क्या कॉकरोच जनता पार्टी ने इन नियमों का पालन किया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 के प्रदर्शन की घोषणा तो कर दी लेकिन प्रदर्शन से पहले आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।
विवाद तब और बढ़ गया जब बुधवार (3 जून 2026) को पत्रकार अजीत अंजुम को दिए एक इंटरव्यू में अभिजीत दिपके ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति नहीं ली है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ली गई है, तो उन्होंने सीधे ‘नहीं’ में जवाब दिया।
बातचीत के दौरान जब उन्हें बताया गया कि आयोजकों को आमतौर पर पहले से आवेदन देकर प्रतिभागियों की संख्या, समय और अन्य विवरण उपलब्ध कराने होते हैं, तब दिपके ने कहा कि वह प्रदर्शन वाले दिन ही पुलिस स्टेशन जाकर अनुमति माँगेंगे।
जब उनसे पूछा गया कि पहले से आवेदन क्यों नहीं किया गया, तो उनका जवाब था, “हम अपने तरीके से काम करना चाहते हैं और उसी पर कायम रहेंगे।” एक अन्य सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अनुमति मिलने तक पुलिस स्टेशन में इंतजार करेंगे।
इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई कि यदि प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक बताया जा रहा है, तो स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया जा रहा।

उत्तर प्रदेश : कॉकरोच जनता पार्टी के पदाधिकारी ने की डॉक्टर से मारपीट, सदस्यता लेने से मना करने पर पीटा: मऊ में दर्ज हुई FIR

                                                                                                            सभार - एक्स/@AnkurSingh
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में सोशल मीडिया पर चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की सदस्यता को लेकर विवाद सामने आया है। घोसी कोतवाली क्षेत्र के मझवारा मोड़ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में एक युवक ने खुद को पार्टी का पदाधिकारी बताते हुए सरकारी चिकित्सक पर पार्टी का समर्थन करने और सदस्यता लेने का दबाव बनाया।

डॉक्टर के इनकार करने पर मारपीट की, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और जान से मारने की धमकी भी दी।

डॉक्टर का आरोप- सदस्यता लेने से मना किया तो की मारपीट

गाजीपुर जिले के बरेसर थाना क्षेत्र स्थित अलावलपुर अफगा गाँव के निवासी और मझवारा मोड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में तैनात सरकारी डॉक्टर हरिश्चन्द्र जायसवाल ने बताया कि गुरुवार (4 जून 2026) की सुबह करीब 10 बजे वह अपने चैंबर में मरीजों को देख रहे थे।

इसी दौरान केरमा महरूपुर निवासी रविशंकर यादव उनके पास ECG जाँच कराने पहुँचा। जाँच पूरी होने के बाद उसने खुद को कॉकरोच जनता पार्टी का पदाधिकारी बताया और डॉक्टर से पार्टी में शामिल होने को कहा। डॉक्टर के अनुसार जब उन्होंने इससे इनकार किया तो युवक नाराज हो गया और बहस करने लगा फिर बात आगे बढ़ी तो उनके साथ मारपीट शुरू कर दी।

पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा, आरोपित की तलाश जारी

घटना की सूचना मिलने पर अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी कोतवाली पहुँचे तथा पुलिस को शिकायत देकर कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने बताया कि डॉक्टर की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और मामले की जाँच की जा रही है।

वहीं डॉ जितेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि आरोपित के खिलाफ डॉ से मारपीट, सरकारी कार्य में बाधा डालने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम गठित कर दी गई है।

कर्नाटक : कांग्रेस सरकार में बगावत, मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने पसंद का मंत्रालय न मिलने पर दिया इस्तीफा: मुख्यमंत्री शिवकुमार पर लगाए गंभीर आरोप

             कर्नाटक कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा (फोटो साभार: DH/Telangana Today)
जिस बात की आशंका थी उसकी शुरुआत हो गयी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि सिद्धारमैया अगर मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं तो नए मुख्यमंत्री को भी चैन से नहीं बैठने देंगे। खेल खिलेगा और खिलना शुरू हो गया। मनपसंद मंत्रालय नहीं मिलने पर कैबिनेट से इस्तीफा। मामूली बात नहीं। मुख्यमंत्री शिवकुमार गर्म खीर को फूंक मार-मार कर खाना होगा। इशारा आ चुका है।  

कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विभागों के बंटवारे के तुरंत बाद कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नवनियुक्त कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। रेड्डी ने खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते वे यह बड़ा कदम उठा रहे हैं। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे कैबिनेट छोड़ रहे हैं, लेकिन विधायक (MLA) और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहेंगे।

शुक्रवार (5 जून 2026) को बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधा। रेड्डी ने दावा किया, “डीके शिवकुमार खुद मेरे घर आए थे और कहा था कि जब मैं सीएम बनूँगा, तो मैं इस मंत्रालय (बेंगलुरु विकास) को छोड़ दूँगा और आप इसे संभाल लेना।” रेड्डी के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी जब वे शिवकुमार से मिले, तो उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु से जुड़ा पोर्टफोलियो उन्हीं को मिलेगा।

रेड्डी ने भावुक होते हुए कहा, “मैंने कभी इस विभाग की माँग खुद से नहीं की थी, लेकिन मुझे बार-बार इसका भरोसा दिया गया था। दो बार वादा करने के बाद अब मुझे जल संसाधन विभाग दे दिया गया। मैं इस फैसले से बेहद निराश हूँ और इसीलिए इस्तीफा दे रहा हूँ।”

रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने एक समर्थक के जरिए मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, “मैं कैबिनेट में मंत्री पद देने के लिए आपका और कॉन्ग्रेस पार्टी का आभार व्यक्त करता हूँ। चूँकि मैं अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम करने में असमर्थ हूँ, इसलिए मैं मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।”

हालाँकि रेड्डी ने मीडिया से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से न तो शिवकुमार से नाराज हैं और ना ही सिद्धारमैया से।

ब्रिटिश संसद में फिर गूंजा मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल : प्राइवेट पार्ट में बोतल घुसाते, चेहरे को सिगरेट से दागते और क्रॉस देखकर करते दरिंदगी: ब्रिटिश सांसद ने ‘मुस्लिम गैंग’ की करतूतें दिलाई याद, बताया- ईद पर कैसे बढ़ते थे अत्याचार

        ब्रिटेन के सांसद रुपर्ट लोव ने ग्रूमिंग गैंग की पीड़िताओं की गवाही पेश की (साभार: X- @RupertLowe10)
ब्रिटेन की संसद में हाल ही में ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई। ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाएँ सामने आई हैं।

संसद में बोलते हुए लोव ने कहा कि कई पीड़िताओं ने वर्षों तक अत्याचार झेला, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि यह केवल कुछ अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा संगठित अपराध था जिसे रोकने में कई संस्थाएँ नाकाम रहीं। सांसद लोव ने इन ग्रूमिंग गैंग के मामलों में स्वतंत्र रूप से जाँच की। जाँच में पता लगा कि इन बाल यौन शोषण के मामलों में स्थानीय क्षेत्रों से ज्यादा सबूत मिले हैं।

ग्रूमिंग गैंग में ‘मुस्लिम’ एंगल

लोव ने एक महिला की गवाही का जिक्र किया, जिसके अब्बा इमाम थे। उस महिला ने बताया कि कई वर्षों तक उसके साथ 600 से 700 अलग-अलग पुरुषों ने रेप किया। एक बच्ची ने बताया कि उसके चेहरे को सिगरेट से दागा गया।

तो एक अन्य पीड़िता ने बताया कि जब वह 12 से 13 साल की थी तब उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डाल कर फोड़ दी गई। एक ने गवाही दी कि ग्रूमिंग गैंग करने वाले नस्लीय टिप्पणियाँ भी करते थें और कहते थे- “गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं।”

एक पीड़िता ने बताया कि इस्लाम में त्यौहारों के समय उनके साथ अत्याचार बढ़ जाता था। खासकर, ईद के आसपास ज्यादा पार्टियाँ होती थीं तो उन्हें निशाना बनाया जाता था, जिनमें पार्टी में शामिल होने वाले अन्य लोग भी उनके साथ दुष्कर्म करते थे।

धर्म और नस्लीय भेदभाव के आधार पर बनाया निशाना

कई पीड़िताओं ने शारीरिक हिंसा के साथ-साथ मानसिक शोषण का भी जिक्र किया। एक पीड़िता ने बताया कि उसे ईसाई होने के नाते निशाना बनाया गया। पीड़िता ने बताया कि शोषण करते समय वे लोग क्रॉस देखते और कहते थे, “अब तुम्हारा ईश्वर कहाँ है? क्या तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हे त्याग दिया है?”

ग्रूमिंग गैंग ने अधिकतर ब्रिटिश मूल की गोरी लड़कियों को निशाना बनाया। पीड़िताओं ने बताया कि नस्लीय भेदभाव किया गया। उसने कहा, “मेरे साथ जितनी भी लड़िकयाँ थीं वे लगभग सभी श्वेत (ब्रिटिश मूल) थीं।” ऐसे ही एक अन्य पीड़िता ने कहा कि उसने 15 से 20 लड़कियों को कुत्तों के पिंजरों में बंद देखा था, जो सभी ब्रिटिश मूल की थीं।

इतना ही नहीं इन मामलों में पुलिस ऑफिसर की भी संलिप्तता सामने आई। एक पीड़िता ने बताया कि देश की अलग-अलग जगहों पर उसके साथ कई पुलिस ऑफिसर ने रेप किया।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में फिर से चर्चा में आए ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल दशकों पुराना है। पिछले 20 सालों से बाल यौन शोषण के मामले सामने आते रहे हैं। इन मामलों में देश के रॉदरहैम के अलावा रोचडेल, ओल्डहम और टेलफोर्ड जैसे कई शहरों और कस्बों में संगठित समूह नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर रेप और शारीरिक शोषण जैसी घिनौनी घटनाओं का खुलासा हुआ। पुलिस की जाँच में कई मामलों में मानव तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप भी सामने आए।

2002 के आसपास पहली बार ऐसे मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अधिकतर आरोपित ब्रिटिश या पाकिस्तानी थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।

बाद में ब्रिटेन सरकार की जाँच और रिपोर्ट्स में सामने आया कि स्थानीय प्रशासन, पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियाँ समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं। कहीं न कहीं अधिकारियों की लापरवाही, पीड़ितों को ही जिम्मेदार ठहराने की सोच और कमजोर जाँच के कारण ये अपराध लंबे समय तक चलते रहे। इसी वजह से बड़ी संख्या में लड़कियाँ इसका शिकार बनीं।