मजहब देखकर कट्टरपंथी दिखाते हैं मानवता; मजहब देखकर मदद करने तक है जिनकी औकात, वो भारतीय सेना को ‘शराबी-बलात्कारी’ बताकर उठाते हैं सवाल

                                                          प्रतीकात्मक 
भारत में रहकर इस्लामी मुल्कों के लिए अपनी ईमानदारी दिखाना और यहाँ की सरकार व सैनिकों का अपमान करना कट्टरपंथियों के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले 12 सालों में ऐसे कई मामले देखे गए जब ये लोग कैमरे पर देश के खिलाफ स्पष्ट रूप से जहर उगलते कैद हुए। इस बार इन्होंने ये काम ईरान के नाम पर किया है। इन कट्टरपंथियों से कोई पूछे कि वहां महिलाएं बुर्का/हिजाब के विरोध में सड़क पर उतरने की हिम्मत करती है, क्या भारतीय कट्टरपंथी इस मुद्दे पर ईरानी महिलाओं का साथ देंगी? अगर नहीं तो इसे दोगलापन ही कहा जाएगा।     

हाल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इसमें बुर्काधारी महिला सैनिकों को ‘शराबी-कबाबी’ कहती नजर आ रही है। उसका कहना है कि वो लोग जो दान कर रहे हैं वह उनके अपने ‘रहबर’ शिया मुल्क ईरान के लिए है। उनके लिए अभी भारतीय सेना या कुछ और बिलकुल जरूरी नहीं है।

यह पहला मौका नहीं है जब ऐसा बयान सामने आया हों। ईरान से जुड़े तनाव या पश्चिम एशिया की घटनाओं के दौरान कई बार ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें शिया समुदाय की भीड़ सड़कों पर उतरकर खुले तौर पर विदेशी ताकतों के समर्थन में नारे लगाती और हल्ला करते हुए दिखी।

लखनऊ में जहाँ बुर्काधारी महिला ने तो यहाँ तक कहा कि खामेनेई के लिए उनकी जान भी हाजिर है वही दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए बुर्काधारी महिलाएँ बोलीं कि उनके लिए सबसे जरूरी ईरान ही है।

इस बीच कुछ मुल्ला-मौलाना के बयान भी गौर देने वाले थे। जैसे मौलाना साजिद रशीदी ने कैमरे पर ये कहा था कि अगर कभी ऐसा समय आया कि ईरान और भारत आमने-सामने हुए तो भारत के मुस्लिम ईरान का ही साथ देंगे।

वहीं कट्टरपंथ में सने बच्चे भी ये कहते नजर आए थे कि उन्हें भारत देश की सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अगर मौका मिला तो वह ईरान का बदला लेकर इजरायल में घुसकर चाकूबाजी कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति के नाम पर जहर उगलने का काम पुराना

लोकतांत्रिक भारत में यह एक बड़ी विडंबना है कि हम इन लोगों के विचारों से अवगत होते हुए भी अक्सर इनका खुलकर विरोध नहीं कर पाते। कारण वो सेकुलरिज्म का बोझ है जिसे ढोने की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं को दी गई है। देश का लेफ्ट-लिबरल इसी सहिष्णुता का फायदा उठाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कभी देश की संप्रभुता-सुरक्षा-सद्भाव को ठेस पहुँचाई जाती है, कभी इसका इस्तेमाल सेना को गाली देने के लिए किया जाता है।

व्यक्तिगत राय और लोकतंत्र की मजबूती की बात करते-करते सेकुलर हिंदुओं को ये समझ नहीं आता कि जो लोग कट्टरपंथ के कारण अपनी मातृभूमि के नहीं हो पा रहे हैं वो उनके कैसे होंगे। क्या ये सोचने वाली बात नहीं है कि आखिर क्यों ईरान को अपना रहबर और देश भर के मुस्लिमों को अपना भाई बताने वाले इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को ‘काफिर’ क्यों कहते हैं।

खैर! ईरान से पहले फिलीस्तीन के लिए भी भारत के मुस्लिम ऐसा रोना रो चुके हैं। उस वक्त भी सेकुलर हिंदुओं का काम सिर्फ इनका ‘पिछलग्गू’ बने रहने का था। उन्हें न हमास आतंकियों के बारे में कोई बात करनी थी और न ही 7 अक्तूबर 2023 को क्या हुआ इसकी जानकारी थी। ये लोग उस समय भी घूम-फिराकर ये नैरेटिव आगे बढ़ाते रहे कि इजरायल बेवजह ही फिलीस्तीनियों को निशाना बना रहा है और गाजा के लिए रोना रोने वाले मुस्लिम ही इंसानियत के साथ खड़े हैं।

आपने कभी हमास-इजरायल युद्ध के दौरान में इस्लामी कट्टरपंथी जमात को हमास आतंकियों की हरकत पर बात करते नहीं सुना गया। उन्होंने न उस घटना की निंदा की थी और न ही विरोध।

मजहब देखकर दिखाते हैं मानवता

आज फिर मानवता का हवाला देकर ईरान के लिए भी वैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है, लेकिन इन सब घटनाक्रमों के बीच विचार करने वाली बात ये है कि ईरान-फिलीस्तीन के लिए छाती पीटने वालों के मन में कभी भारत के लोगों के लिए ये दर्द नहीं उठा। तमाम मौके थे जब ये लोग मजहब से ऊपर उठकर गैर-मुस्लिमों के लिए इंसानियत दिखा सकते थे लेकिन इन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।

चाहे 2001 में गुजरात के भुज में भूकंप की घटना हो या 2015 में नेपाल में भीषण त्रासदी ऐसी घटनाओं में हमेशा देशभर से मदद पहुँचीं लेकिन क्या वो दृश्य आपको देखने को मिले जो ईरान के वक्त कश्मीर में दिखे? क्या आपने जगह-जगह से मुस्लिमों को गैर-मुस्लिमों के लिए जकात काम काम करते देखा?

नहीं, ये कट्टरपंथी जमात मजहब देखकर सबाब का काम करती है और ये भूल जाती है कि जिस सेना को ये लोग ‘शराबी-बलात्कारी’ बताते हैं वही सेना हर मुश्किल घड़ी पर सबसे आगे मदद के लिए रहती है। वो समय चाहे प्राकृतिक आपदा के कारण आया हो या फिर विश्व में अलग-अलग चल रहे युद्ध की वजह से… भारतीय सेना अपने देश के नागरिकों की रक्षा में जान की परवाह किए बिना तैनात रहती है, तभी कश्मीर में कट्टरपंथियों से लेकर केरल के वामपंथी तक सुकून से सो पाते हैं।  

‘इस्लाम की रोशनी’ पर ज्ञान देने से नहीं चला ओझा ‘सर’ का काम, अब देश में क्रांति के नाम पर कर रहे ‘मारने-काटने’ की बात: पूर्व AAP नेता का आतंकियों के बखान का रहा है इतिहास

UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर ने देश में 'मार-काट' होने की भविष्यवाणी की (साभार: Salt by Lutyens)

जो न राजनीति में टिका, न शिक्षक के रूप में उसने आज तक ढंग की कोई बात कही। वह अब चला है देश का भविष्य तय करने। तो ये हैं हमारे UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर। जिन्होंने फेमस होने के लिए, हिंदुओं के खिलाफ टिप्पणी भी की, इस्लाम की सराहना भी की, क्लासेज में सेक्सी-सेक्सी बातें भी कीं और यहाँ तक की आतंकवादी का बखान भी इन्होंने किया। लेकिन इतने विवादों के बाद भी करियर किसी क्षेत्र में सफल नहीं हुआ।
अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति में कदम रखते ही कहा था कि "हाँ मै अराजक हूँ", जिसे उन्होंने अपनी कार्यशैली से एक बार नहीं कई बार साबित किया है। लेकिन महामूर्ख जनता मुफ्त रेवड़ियों के लालच में आम आदमी पार्टी को वोट देते रहते हैं। बिना इस्तीफा दिया बिना जेल में रहना, मुख्यमंत्री रहते किसी मंत्रालय का नहीं लेना लेकिन इसके हुक्म के बिना पार्टी में पत्ता नहीं हिलता। जाँच अधिकारीयों को लैपटॉप/मोबाइल का पासवर्ड नहीं बताना, अपनी ही महिला सांसद की अपने ही घर में पिटाई करवाना आदि आदि अराजकता के मुख्य प्रमाण हैं। ठीक यही हालत केजरीवाल पार्टी की है।      

इन सारे विवादित बयानों के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में हाथ आजमाया, यह सोचकर कि विवादों में ही सही, फेमस तो हुआ हूँ, लोग वोट कर ही देंगे। लेकिन लोगों को उनकी देश-विरोधी और हिंदू विरोधी बयानों की सच्चाई पता थी, तभी वह चुनाव हार गए। और अब दोबारा निकल पड़े हैं देश की तबाही की राह खोजने।

तो हाल ही में ओझा सर ने सॉल्ट बाय लुटियंस को इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू का एक वीडियो क्लिप काफी चर्चा का विषय बना। वीडियो में ओझा सर ने US-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग का हवाला देते हुए भारत में ‘मार-काट’ होने की भविष्यवाणी कर दी। और बोला कि ऐसे में वह खुद चीन भाग जाएँगे।

ओझा सर के ‘मारकाट’ वाले बयान का संदर्भ

ओझा सर यह बात किस संदर्भ में कहते हैं उसे भी पहले जान लेना जरूरी है, क्योंकि यह बात एक शिक्षक की जुबान से सुनना काफी अटपटा लगता है। भारत में शिक्षा व्यवस्था को खराब बताते हुए ओझा कहते हैं, “यहाँ शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त है। मेरी बेटियों के टीचर्स मुझसे शिकायत करते हैं कि पढ़ती नहीं हैं। हमने कहा कि क्या करोगे इतना पढ़ाकर… इंजीनियर, डॉक्टर हमें बनाना नहीं… हमें बनाना है नेता।”

यह बात वाकई में एक शिक्षक के जुबान से सुननी अटपटी लगती हैं। एक शिक्षक, जो छात्रों को बेहतर शिक्षा देकर एक बेहतर समाज तैयार करता है। अगर वह कहे कि पढ़ाई की क्या जरूरत, नेता बन जाओ। जैसे नेता तो पढ़े-लिखे होते ही नहीं, और अगर कुछ धारणाएँ और हकीकत ऐसी हैं भी। तो क्या इसे बदलना एक शिक्षक का कर्तव्य नहीं, या बच्चों के मन में ये भरना कि पढ़ो मत, नेता बन जाना। क्या इससे देश में कोई बदलाव आएगा?

ओझा सर शायद ही ऐसा सोच पाएँ, क्योंकि वह ठान कर बैठे हैं कि भारत माता को जय करने वाला हमारा देश एक ‘जंगल’ है। वह कहते हैं कि इस जंगल में या तो ‘शिकारी’ या फिर ‘शेर’ रहते हैं। एक शिक्षक की ऐसी भाषा न सिर्फ आक्रामक है, बल्कि पूरी व्यवस्था और समाज को नकारने वाली भी है। अगर एक शिक्षक ही देश के बारे में ऐसी सोच रखता है, तो वह छात्रों को क्या दिशा देगा।

अब ओझा सर की विशेष भविष्यवाणी

और बस यहीं ओझा सर क्रांति की बात शुरू करते हैं। भविष्यवाणी करते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए एक क्रांति होगी। ओझा कहते हैं, “एक क्रांति होने जा रही है, भयंकर मार-काट होगी… इस देश में। इकोनॉमी और बैंकों का पतन होगा।”

इसके बाद खुद को दुनिया की राजनीति का ‘फर्जी’ एक्सपर्ट दिखाते हुए आगे कहते हैं, “ये ईरान और अमेरिका वाला युद्ध बढ़ जाए और गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो जाए। तो ये दिल्ली, मुंबई, कोलकाता… यहाँ भूखा आदमी मरने से पहले मारेगा।”

ओझा सर ने यह तुलना फ्रांस और रूस की क्रांतियों से की, जब पहले विश्व युद्ध के दौरान 1917 में रूस में भूखमरी और खाद्यान्न की भारी कमी के कारण जनता ने विद्रोह किया था। ये ओझा सर की भविष्यवाणी कम और बददुआ ज्यादा नजर आती है। पहली बात तो भारत की स्थिति को उसी तराजू में रखना पूरी तरह गलत है, दूसरी बात ओझा सर को अंदाजा भी नहीं है कि ऐसी बातों से लोगों में कितना डर पैदा हो सकती है, जिनका कोई ठोस आधार तक नहीं है।

लेकिन ओझा सर ने ऐसे डर पैदा करने वाले बयान जानबूझ कर दिए हैं। यहाँ भी दो पहलू हो सकते हैं। पहली बात की वो फेमस होने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उनकी बात करते हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि ये बातें आलोचना हो या तारीफ। दूसरी बात कि यहाँ ओझा सर की भारत के खिलाफ घृणा साफ झलकती है, जो कि सिर्फ झलकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस देश को ‘तबाह’ करने की सोची-समझी मंशा है।

क्योंकि खुद तो वह चीन भागने की तैयारी में हैं। वह खुद कहते हैं, “मैं तो चीन निकल जाऊँगा, मेरा तो अपना है सारा व्यापार। दोस्त हैं, शोरूम हैं… वहाँ निकल जाएँगे।” यहाँ पूरे देशवासियों में डर पैदा करके ओझा सर ने अपना इंतजाम कर लिया है। भागने की बात कर रहे हैं, वो भी एक ऐसे देश में, जिसके साथ भारत की दुश्मनी है। ये तो वही हो गया, विजय माल्या ने देशवासियों के पैसे लूटे और बस गया ‘अंग्रेजों’ के बीच, जिन्होंने भारत पर 200 साल राज किया।

ये सभी लोग देश को बर्बाद करने के ख्वाब बुनते हैं और खुद विदेशी सहयोग के सहारे बैठे रहते हैं। कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी, जब कल को ओझा सर का कोई विदेशी लिंक सामने आएगा, जिसमें कहा जाएगा कि ओझा सर को विदेशी फंडिंग मिल रही थी ये सब बेतुके और भद्दे बयान देने के लिए।

ओझा सर के इस्लाम और आतंकियों के बखान में प्रवचन

देश में ‘मार-काट’ हो जाने जैसा भारत-विरोधी और ‘आतंकी’ विचारधारा वाला बयान ओझा सर ने कोई पहली बार नहीं दिया है। ये वही ओझा सर हैं, जिनके इस्लाम और आतंकियों का बखान करते वीडियो वायरल होते हैं। और हिंदू धर्म के देवी-देवताओं को गाली देने में भी इनका नाम कुख्यात की लिस्ट में आता है।

कभी ये आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका में किए 9/11 हमले को महान उपलब्धि ठहरा देते हैं और उसके बहादुरी के किस्से छात्रों को सुनाते हैं। कभी इस्लाम की बड़ाई में चूर रहते हैं और कहते हैं कि इस्लाम ही पूरी दुनिया में रोशनी लेकर आया, इससे पहले तो अँधेरा था।

वहीं हिंदुओं की बात आती है तो अवध ओझा कड़वाहट के बोल निकालने शुरू कर देते हैं। श्रीकृष्ण पर लांछन लगाते हैं औऱ दावा करते हैं कि यादव लोग एक बार भगवान को मिलकर मारने वाले थे। इतना ही नहीं श्रीकृष्ण के चरित्र पर भी सरेआण बोलते हैं कि वे तो यादव की बीवियों के साथ नाचते थे।

और ऐसा नहीं है कि छात्र जानते नहीं है अवध ओझा की सच्चाई को। ओझा की क्लासेज अटेंड करने वाले छात्र कहते हैं कि ओझा सर कच्छा पहनकर क्लास में आते हैं और सेक्स की बातें करते हैं। कहने को ये UPSC एस्पिरेंट को पढ़ाने वाले शिक्षक हैं।

अगर ऐसी घटिया मानसिकता वाले शिक्षक से छात्र पड़ेगा, तो लाजमी है कि कल को परीक्षा में सफल होकर कोई छात्र देश के बड़े उच्च पदों पर बैठेगा, तो उसके विचार क्या होंगे? वो देश को किस नजरिए से देखेगा? और देश की तरक्की में योगदान देने के बजाए क्या वह भी ओझा सर की तरह चीन चला जाएगा?

ओझा सर खुद तो राजनीति में टिक नहीं पाए, और शिक्षक के तौर पर भी उनका करियर सफल हो नहीं सका। तो अब वे ऐसे भविष्य तैयार करने में निकल पड़े हैं, जो उनकी मानसिकता को पूरे देश में फैलाए। तो इसीलिए छात्र को समझना होगा कि ऐसे शिक्षक केवल देश को तबाह करने के बारे में सोचते हैं, न कि देश की तरक्की के बारे में।

बंगाल में Khela HoBe: ममता के गुंडों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का फूटा गुस्सा; जागे रहे रात भर; CJI बोले- हमें पता है उपद्रवी कौन? बेशर्म INDI गठबंधन खामोश क्यों?

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने राज्य सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट, कोलकाता हाईकोर्ट और चुनाव आयोग बार-बार पश्चिम बंगाल सरकार को डांट-फटकार लगा रहे हैं। राज्य सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। अदालत और संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों के नाफरमानी सरकार की आदत बनती जा रही है। न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से लेकर अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने तक हर स्तर पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया। लेकिन विधानसभा चुनावों में हार को लेकर डरी ममता सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें नौ घंटे भूखे बंधक बनाकर रखा गया। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।

बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना

दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।  

सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी


सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।

कोर्ट रूम LIVE-सीजेआई सूर्यकांत ने ममता सरकार को जमकर लगाई फटकार 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से थे।
CJI: क्या आपने देखा है कि क्या हुआ है?
कपिल सिब्बल: मुझे एक रिपोर्ट (मालदा वाली) मिली है… मैंने इसे पढ़ा है।
मेनका गुरुस्वामी: ये एक गैरराजनीतिक विरोध प्रदर्शन था।
CJI: हम इसे राजनीतिक नहीं बनाना चाहते।
तुषार मेहता: यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है!
CJI: रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था। मुझे रात में मौखिक रूप से आदेश देने पड़े। खाना और पानी तक नहीं लेने दिया गया।
जस्टिस बागची: जिन व्यक्तियों को अब कानून-व्यवस्था सौंपी गई है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना होगा। कृपया पूछताछ करें… राज्य के ऐसे नेता हैं जिन्हें एक स्वर में बोलना चाहिए… हम यहां विशेष अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हैं।
गोपाल एस: हम सुरक्षा बढ़ाएंगे।
तुषार मेहता: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अब राज्य पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी।
जस्टिस बागची: हम इसे चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं।
गोपाल एस: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने अब सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने कहा है कि वे विरोध जारी रखेंगे।
पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल: हम सभी जानते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की रक्षा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग को विरोधी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए।
CJI: मिस्टर एडवोकेट जनरल, अब आप हमें मजबूर कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, आपके राज्य में आप में से हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हमने कभी इतना ध्रुवीकृत राज्य नहीं देखा। यहां तक कि अदालती आदेशों के पालन में भी राजनीति झलकती है। क्या आपको लगता है कि हमें नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? कम से कम मैं रात 2 बजे तक सब कुछ मॉनिटर कर रहा था!
‘अगर विरोध अराजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या यह उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर पहुंचें और देखें कि क्या हो रहा है? कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया। रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था।’

मालदा घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सात आदेश

  • CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। एजेंसी सीधे कोर्ट को रिपोर्ट देगी।
  • चीफ सेक्रेटरी, DGP, DM, SSP को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
  • सभी जिम्मेदार अधिकारियों को 6 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश।
  • चुनाव आयोग (ECI) को कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें।
  • जहां-जहां जज काम कर रहे हैं, वहां सुरक्षा बढ़ाएं।
  • जिस गेस्ट हाउस में जज रुके हैं, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
  • जहां SIR का काम चल रहा है, वहां एक बार में सिर्फ 5 लोगों को ही जाने की अनुमति होगी।
7 अधिकारी, 9 घंटे रहे बंधक, 6 पॉइंट में जानिए सारा मामला
  • 1. सुबह 10 बजे; प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में जुड़ते गए, विरोध प्रदर्शन किया। एक अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में इकठ्ठा होते गए। फिर वे BDO ऑफिस के करीब गए, यहां प्रदर्शन करने लगे।
    2. दोपहर 2 बजे; न्यायिक अधिकारी मालदा के BDO ऑफिस पहुंचे। दोपहर 2 बजे के करीब 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर मालदा के माताबारी स्थित BDO ऑफिस पहुंचे। ये सभी अधिकारी SIR प्रोसेस से जुड़ा काम देख रहे थे।
    3. शाम 6 बजे; वोटर लिस्ट में नाम कटने को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी बाहर जमा। इलेक्शन ऑब्जर्वर के ऑफिस पहुंचने की सूचना मिलते ही हजारों स्थानीय लोग बाहर जमा हो गए। उन्होंने SIR में नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन किया।
    4. शाम 7 बजे; प्रदर्शनकारियों की ऑफिस के अंदर जाने की मांग। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि वे अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना चाहते हैं। जिससे इनकार कर दिया गया।
    5. रात 11 बजे; पुलिस सुरक्षा में अधिकारी निकाले गए, गाड़ी रोकने की कोशिश। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।
    6. रात 12 बजे; न्यायिक अधिकारी की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, ईंट से हमला। जिस गाड़ी से न्यायिक अधिकारियों को बाहर निकाला गया। उस गाड़ी पर प्रदर्शनकारियों ने ईंट से हमला किया। गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए।
अब 4 पॉइंट में मालदा में वोटर लिस्ट में जुड़ा पूरा विवाद
  • 1. यह मामला क्या है? दस्तावेजों में गड़बड़ियां, काफी समय से अनुपस्थिति और तकनीकी त्रुटियों के चलते SIR के बाद मालदा सहित राज्य के कई सीमावर्ती जिलों में हजारों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। तभी से स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।
    2. यह कितने गांवों से जुड़ा है? मालदा जिले में 100 से ज्यादा गांवों की मतदाता सूची इस संशोधन से प्रभावित हुई है।
    3. SIR में हर गांव से कितने लोगों के नाम काटे गए? यह आंकड़ा प्रशासन ने जारी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न सूत्रों और ग्राम पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार शिलालमपुर कालियाचक-2 से 427 लोगों के नाम हटाए गए। कुछ अन्य गांवों में 50 से 200 तक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबर है। हालांकि जिन नामों को हटाया गया है, उनकी समीक्षा जारी है।
    4. नाम क्यों काटे गए?
    • दस्तावेजों में गड़बड़ी: SIR की सुनवाई के दौरान जमा किए गए दस्तावेजों को कई मामलों में ‘अप्रमाणित’ या ‘अपर्याप्त’ माना गया।
    • लंबे समय से अनुपस्थिति: कुछ मामलों में यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति उस पते पर स्थायी रूप से नहीं रहते (विशेषकर प्रवासी मजदूर)।
    • तकनीकी व प्रक्रियागत त्रुटियां: डिजिटल डाटाबेस अपडेट के दौरान एक ही व्यक्ति का नाम दो बार होना या जन्मतिथि में गलती जैसी वजहों से भी नाम हटे।
सीजेआई भड़के और कहा कि फिजूल की आपत्तियां ना उठाएं
इससे पपहले पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने ऐसी दलील दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए। टीएमस सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फिजूल की आपत्तियां न उठाएं यह सिर्फ ओरिएंटेशन है। दरअसल, टीएमसी सांसद ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन पर सवाल उठाया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब तक करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि हर दिन लगभग 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने पत्र में CJI को बताया कि सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग (ECI) ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं।
ममता ने ‘खेला होबे’ से किया इशारा, राज्य में डर का राज – भाजपा
राज्य के अंदर की बिगड़ी स्थिति को संभाल पाने में विफल रहने पर टीएमसी मालदा की घटना की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह पर डालने की बेशर्मी भी कर रही है। टीएमसी के मुताबिक शाह लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बार-बार विफल रहे। इससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरी ओर भाजपा ने कहा कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में डर का राज कायम कर रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर लिखा-‘मालदा के कालियाचक में हिंसक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए गए। आवाजाही ठप हो गई और सत्ता की जगह डर का राज छा गया। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले कहा था- खेला होबे। क्या उनका इशारा इसी ओर था?’ बता दें कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई थी। इसमें 7.04 करोड़ वोटर के नाम थे। लगभग 60 लाख नाम न्यायिक जांच के दायरे में रखे गए। इन्हें वोटर लिस्ट में रखने या हटाने पर फैसले के लिए 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम की टाइमलाइन
• 2 अप्रैल 2026: Supreme Court of India ने मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” बताया और राज्य के मुख्य सचिव, DGP, मालदा DM और SP को नोटिस जारी किया।
• 1 अप्रैल 2026: मालदा के कालियाचक में SIR मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी थीं, को दोपहर से रात तक BDO कार्यालय में घेरकर रखा गया। पुलिस और CAPF की मदद से देर रात अधिकारियों को निकाला गया।
• 31 मार्च 2026: Supreme Court of India ने कहा कि लगभग 60 लाख दावे और आपत्तियां SIR प्रक्रिया में आई हैं, जिनमें से 47.3 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। अदालत ने बाकी मामलों को 7 अप्रैल तक पूरा करने का निर्देश देने के साथ ही कहा की फालतू की आपत्तियां ना लगाएं।
• 30 मार्च 2026: TMC ने मांग की कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कारण सार्वजनिक किए जाएं और अपील की प्रक्रिया को जिला स्तर से नीचे BDO स्तर तक ले जाया जाए।
• 28 मार्च 2026: Election Commission of India ने SIR मामलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 24 जिलों में अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। बाद में Supreme Court of India ने इन ट्रिब्यूनलों को ताजा दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति भी दी।
• मार्च 2026 के दूसरे और तीसरे सप्ताह: Murshidabad, Malda, Nadia और सीमावर्ती जिलों में कथित रूप से मतदाता सूची से नाम कटने के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, धरना और राजनीतिक टकराव बढ़े।
10 मार्च 2026: Supreme Court of India ने SIR में लगे न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को फटकार लगाई और कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों की ईमानदारी पर संदेह करना उचित नहीं है।
• मार्च 2026 की शुरुआत: टीएमसी के लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। Murshidabad, Malda और सीमावर्ती जिलों में सबसे ज्यादा दावे और आपत्तियां दर्ज हुईं।
• 27 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने TMC की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक अधिकारियों को दिए जा रहे ECI के प्रशिक्षण मॉड्यूल पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी किसी दबाव में नहीं आएंगे।
• 26 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 530 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की। इन्हें विभिन्न जिलों में दावे, आपत्तियां और मतदाता सूची की जांच की जिम्मेदारी दी गई।
• 22 फरवरी 2026: SIR में “logical discrepancy” वाले मामलों की संख्या को लेकर नया विवाद सामने आया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कितने मामलों को न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा जाएगा।
• 20 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने Calcutta High Court को सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR कार्य में लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच “trust deficit” है।
• 17 फरवरी 2026: Election Commission of India ने राज्य सरकार को SIR में हुई कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और FIR दर्ज करने के निर्देशों के पालन के लिए अंतिम समयसीमा दी।
 16 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही, कर्तव्य में चूक और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
• 10 फरवरी 2026: Election Commission of India ने घोषणा की कि SIR से जुड़े दावे और आपत्तियों की सुनवाई 21 फरवरी तक पूरी होगी और अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
• 3 फरवरी 2026: Mamata Banerjee ने Supreme Court of India और चुनाव आयोग के सामने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि इसको लेकर वह कोई ठोस तथ्य नहीं दे पाईं।
• 12 जनवरी 2026: Mamata Banerjee ने Election Commission of India को अपना पांचवां पत्र भेजा और आरोप लगाया कि AI आधारित डिजिटाइजेशन और सॉफ्टवेयर त्रुटियों की वजह से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिह्नित किए जा रहे हैं।
• जनवरी 2026 के पहले सप्ताह: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेज जांच का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। सीमावर्ती जिलों, विशेषकर Murshidabad, Malda और Nadia में शुरुआत से ही सबसे ज्यादा विवाद सामने आए।

मोदी फिर बने संकटमोचक, पश्चिम एशिया में युद्ध के वैश्विक तनाव के बीच भी 4.50 लाख भारतीयों की सकुशल वापसी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के बीच संकटमोचक बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीयों की सुरक्षित स्वदेश वापसी का सिलसिला बना हुआ है। विदेश मंत्रालय के अनुसार एक माह में ही साढ़े चार लाख से अधिक भारत नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है। मंत्रालय ने कहा है कि 28 फरवरी से अब तक लगभग 4.50 लाख यात्री और भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया से भारत लौट चुके हैं। इनमें खाड़ी देशों, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब, ओमान, बहरीन और कुवैत के अलावा ईरान, इज़राइल और संघर्ष प्रभावित अन्य क्षेत्रों से लौटे भारतीय यात्री कामगार, छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं। भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर रख रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। युद्ध के कारण हवाई सेवाओं, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ा है, इसलिए भारतीय दूतावास लगातार हेल्पलाइन, विशेष उड़ानें और सुरक्षित निकासी योजनाएं चला रहे हैं।

भारतीय दुनिया के किसी कोने में फंसा हो, तिरंगा सुरक्षा की गारंटी
दुनिया एक बार फिर अशांत दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-इजराइल टकराव, या फिर अमेरिका की भूमिका हो। इन सबने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और भय का माहौल बना दिया है। ऐसे समय में, जब बमों की आवाज और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच आम इंसान सबसे अधिक असुरक्षित होता है, तब राष्ट्रों की असली परीक्षा होती है। भारत ने इस कसौटी पर बार-बार खुद को साबित किया है। पीएम मोदी के प्रयासों से केंद्र सरकार युद्ध के बीच फंसे भारतीयों की वापसी करा रही है। मोदी सरकार ने यह स्थापित कर दिया है कि दुनिया के किसी भी कोने में अगर भारतीय फंसा है, तो तिरंगा उसकी सुरक्षा की गारंटी है। पिछले माह 23 मार्च तक अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में फंसे 3.75 लाख भारतीयों की सुरक्षित वापसी हुई है। यह स्वदेश वापसी केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि एक मानवीय प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय संकल्प का परिचायक है। हाल के घटनाक्रमों में यह स्पष्ट हुआ है कि भारत सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और इसके लिए हर संभव संसाधन जुटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है।

संकट के बीच सुरक्षित वापसी का बड़ा अभियान
इजरायल-यूएस-ईरान 2026 में युद्ध के तेज होने पर प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशन में भारत ने अपने देशवासियों को सकुशल निकालने के अभियान को और अधिक गति दी। हजारों भारतीयों को ईरान से सुरक्षित निकाला गया, जिनमें से अधिकांश को आर्मेनिया और अज़रबैजान के रास्ते बाहर लाकर दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों के जरिए भारत पहुंचाया गया। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से जुड़े 70–80 छात्रों को सुरक्षित दिल्ली लाया गया। इस प्रकार 2025 और 2026 को मिलाकर अब तक करीब लाखों  भारतीयों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा चुकी है। तमिलनाडु के मछुआरे अभी भी ईरान क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनकी निकासी के प्रयास तेज गति से जारी हैं। इन अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का इवैक्युएशन तंत्र केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, बहुस्तरीय और प्रभावी प्रक्रिया है, जिसमें कूटनीति, ट्रांजिट देशों का सहयोग और आधुनिक लॉजिस्टिक्स का बेहतरीन समन्वय देखने को मिलता है।

पिछले साल भी ईरान और इजराइल से भारतीयों को लाए वापस
इससे पहले 2025 में इजरायल-ईरान संघर्ष की शुरुआत में भारत ने चरणबद्ध तरीके से अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने का व्यापक अभियान चलाया। इस दौरान सबसे बड़ा प्रयास “ऑपरेशन सिंधु” के रूप में सामने आया, जिसके तहत कुल 4415 भारतीयों को सकुशल निकाला गया। इनमें 3597 ईरान से और 818 इजरायल से थे। इन नागरिकों को 19 विशेष उड़ानों (निजी एयरलाइंस और भारतीय वायुसेना) के जरिए मुख्य रूप से नई दिल्ली लाया गया। शुरुआती चरण में ही करीब 100 से अधिक छात्रों को ईरान से आर्मेनिया के रास्ते सुरक्षित निकालकर भारत पहुंचाया गया, जिसके बाद यह प्रक्रिया लगातार कई चरणों में आगे बढ़ती रही। इस पूरे अभियान में जम्मू-कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और केरल के हजारों छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल थे। इस प्रकार 2025 के इस बड़े अभियान ने भारत की त्वरित रणनीति, समन्वय और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित किया।

भारतीय तिरंगा: सुरक्षा और विश्वास का सबसे भरोसेमंद का प्रतीक

जब कोई भारतीय विदेश में संकट में होता है, तो सबसे पहले उसे अपने देश के झंडे तिरंगे से उम्मीद बंधती है। यह केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सुरक्षा और विश्वास का आश्वासन बन चुका है। इजरायल-ईरान संघर्ष के बीच जब हजारों भारतीय, विशेषकर छात्र, अनिश्चितता में फंसे थे, तब भारत सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें सुरक्षित निकालने का अभियान शुरू किया। दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों से विशेष उड़ानों के जरिए इन नागरिकों को वापस लाया गया। यह दिखाता है कि भारत केवल कागजी आश्वासन नहीं देता, बल्कि जमीनी स्तर पर परिणाम भी सुनिश्चित करता है। भारतीय दूतावासों ने इस पूरे अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हेल्पलाइन नंबर जारी करना, नागरिकों से लगातार संपर्क बनाए रखना, सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना और स्थानीय प्रशासन से तालमेल बैठाना। ये सभी कदम इस बात को दर्शाते हैं कि भारत की कूटनीतिक मशीनरी संकट के समय कितनी प्रभावी और सजग हो जाती है।

एयरलिफ्ट से लेकर ग्राउंड सपोर्ट तक का व्यापक नेटवर्क
भारत का इवैक्युएशन प्रोटोकॉल बहुआयामी है। इसमें केवल एयरलिफ्ट ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी व्यापक सहायता शामिल होती है। संघर्ष क्षेत्र से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, वहां से उन्हें ट्रांजिट देशों तक ले जाना और फिर विशेष उड़ानों के जरिए भारत लाना। यह पूरी प्रक्रिया एक सुव्यवस्थित तंत्र के तहत संचालित होती है। भारतीय वायुसेना और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की साझेदारी इस दिशा में एक मजबूत उदाहरण प्रस्तुत करती है। इन अभियानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को और मजबूत किया है। आज भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता है, जो न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अन्य देशों के नागरिकों की भी मदद करता है। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का आधुनिक रूप है, जहां मानवता को प्राथमिकता दी जाती है।

मोदी की निर्णायक भूमिका ने संकट को अवसर में बदला
किसी भी संकट में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह दिखाया है कि निर्णायक फैसले, त्वरित कार्रवाई और स्पष्ट प्राथमिकताएं किस तरह संकट को अवसर में बदल सकती हैं। यह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दृष्टिकोण भी है, जो हर भारतीय को यह विश्वास दिलाता है कि वह कहीं भी हो, उसका देश उसके साथ खड़ा है। यह केवल राजनीति या कूटनीति का विषय नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न है। युद्ध के बीच फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना एक राष्ट्र के नैतिक दायित्व का हिस्सा है। भारत ने इस दायित्व को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि उसे पूरी निष्ठा और क्षमता के साथ निभाया भी है। आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से घिरी हुई है, भारत ने अपने कार्यों से यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील राष्ट्र भी है।

इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने जारी किए हेल्पलाइन नंबर
भारत ने बुधवार को ईरान से अपने नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु शुरू करने की घोषणा की, क्योंकि इजराइल-ईरान के बीच संघर्ष कम होने का कोई संकेत नहीं दिखा। इजराइल- ईरान में हुए घटनाक्रमों को देखते हुए, भारत सरकार ने इजराइल से उन भारतीय नागरिकों को निकालने का फैसला किया है जो वहां से निकलना चाहते हैं। इजराइल से भारत की उनकी यात्रा लैंड बॉर्डर के माध्यम से और उसके बाद हवाई मार्ग से कराई जाएगी। तेल अवीव स्थित भारतीय दूतावास इजराइल में मौजूद भारतीय नागरिकों की मदद करेगा, जो अपने देश लौटना चाहते हैं। इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। मोदी सरकार ने नागरिकों से तेल अवीव में भारतीय दूतावास संपर्क की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश दिया है।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से मेडिकल छात्रों की स्वदेश वापसी कराई
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संवेदनशीलता और लोकप्रियता ही है कि जब भी उन्हें पता चलता है कि दुनिया के किसी भी कौने में भारतीय संकट में हैं, तो वे उनकी सकुशल वापसी के लिए संकटमोचक की भूमिका में आ जाते हैं। ऐसा एक नहीं कई बार, कई देशों में फंसे भारतीयों के साथ हो चुका है। संकट से जूझ रहे भारतीयों की उम्मीदों का आखिरी सहारा पीएम मोदी ही बने हैं। वह चाहे कोरोना काल हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, या फिर किसी देश में कोई और संकट हो, हर बार हजारों भारतीयों की सकुशल स्वदेश वापसी हुई है। अब ताजा उदाहरण इजराइल-ईरान युद्ध का है। पीएम मोदी ने इस भीषण युद्ध के बीच ‘ऑपरेशन सिंधु’ चलाकर भारतीयों की सकुशल वापसी कराई है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान की मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे लगभग 110 भारतीय छात्र सुरक्षित भारत पहुंच गए हैं। इनमें से 90 छात्र कश्मीर के हैं। ईरान-इजराइल जंग से ऑपरेशन सिंधु के माध्यम से भारत पहुंचे छात्रों के मुताबिक वहां के हालात हर दिन खराब होते जा रहे हैं। खासकर तेहरान में स्थिति बहुत भयावह बनी हुई है। युद्ध इसलिए बहुत खराब है, क्योंकि इसमें इंसानियत ही खत्म हो जाती है।

अकेले ईरान में स्टूडेंट्स समेत दस हजार से ज्यादा भारतीय फंसे
ईरान और इजरायल के बीच में जारी जंग लगातार भीषण होती जा रही है। इजरायल जहां ईरान में राजधानी तेहरान, न्यूक्लियर साइट और सैन्य ठिकानों को टारगेट कर रहा है। वहीं ईरान भी इजरायल में सैन्य ठिकानों को तबाह करने में लगा है। जंग के बीच हजारों भारतीय ईरान और इजरायल में फंसे हुए हैं। अकेले ईरान में ही 10000 से ज्यादा भारतीय फंसे हैं जिनमें आधे से ज्यादा स्टूडेंट्स हैं। इनमें भी मेडिकल स्टूडेंट्स सबसे ज्यादा हैं। भारत सरकार ने युद्ध के बीच से भारतीयों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु लॉन्च किया है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान से निकाले गए ये छात्र मंगलवार को आर्मेनिया पहुंचे थे, जहां उन्हें राजधानी येरेवन के होटलों में ठहराया गया। इसके बाद इन्हें कतर के रास्ते भारत लाया गया। इंडिगो की एक फ्लाइट आर्मेनिया के येरेवन एयरपोर्ट से इन छात्रों को लेकर कतर की राजधानी दोहा के लिए रवाना हुई थी। इसके बाद एक दूसरी फ्लाइट से इन्हें दोहा से नई दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट लाया गया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने छात्रों को ईरान से बाहर निकालने की पुष्टि की है।

ईरान से लौटने वाले भारतीय छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल
इन छात्रों को आर्मेनिया बॉर्डर पर नॉरदुज चौकी से बसों में निकाला गया। ईरान में 1,500 स्टूडेंट्स सहित लगभग दक हजार भारतीय फंसे हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक मौजूदा हालात में देश के एयरपोर्ट भले ही बंद हैं, लेकिन लैंड बॉर्डर्स खुले हुए हैं। मंत्रालय ने विदेशी नागरिकों से ईरान छोड़ने से पहले अपना नाम, पासपोर्ट नंबर, गाड़ी डिटेल्स, देश से निकलने का समय और जिस बॉर्डर से जाना चाहते हैं, उसकी जानकारी मांगी थी।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से 110 छात्रों का ग्रुप दिल्ली पहुंच चुका है। इन छात्रों को आर्मेनिया के रास्ते भारत लाया गया है। इंडिगो एयरलाइंस की फ्लाइट देर रात 3 बजकर 43 मिनट पर दिल्ली लैंड हुई। इन 110 छात्रों में 94 जम्मू-कश्मीर से हैं जबकि 16 लोग अन्य 6 राज्यों से है। ईरान से लौटने वाले छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल हैं। सकुशल देश वापस आने के बाद इन छात्रों के चेहरे पर खुशी का साफ झलक रही थी।

ईरान-इजरायल के बीच जंग में राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी
वहीं, आपको बता दें कि इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, दोनों देशों के बीच जंग भीषण होती जा रही है। बुधवार को इजरायल ने तेहरान पर जबरदस्त अटैक किया। इजरायल के 50 से ज्यादा लड़ाकू विमानों ने ईरान की राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी की। इजरायल की एयरफोर्स ने तेहरान और उसके पास कराज में ईरान की न्यूकिलयर साइट को निशाना बनाया। इन दोनों ही न्यूक्लियर फैसेलिटीज में ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट में इस्तेमाल होने वाले सेंट्रीफ्यूज बनाता है। इजरायली सेना ने दावा किया कि 25 फाइटर जेट ने ईरान के वेस्टर्न सिटी करमनशाह में ईरान के 5 अटैक हेलीकॉप्टर्स को बर्बाद कर दिया। इजरायल के फाइटर जेट्स ने ईरान की उन साइट पर भी जोरदार अटैक किया जहां से इजरायल पर मिसाइल्स फायर की जा रही थी। इजरायल के हमलों में अब तक ईरान के करीब छह सौ लोग मारे जा चुके हैं और 1300 से ज्यादा लोग घायल हैं।

भारत ने फंसे लोगों को निकालने के लिए आर्मेनिया को क्यूं चुना?
दरअसल, ईरान का बॉर्डर 7 देशों से लगता है। ये देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान, आर्मेनिया, तुर्किये और इराक हैं। इसके अलावा समुद्री सीमा ओमान के साथ है। आर्मेनिया को ही चुनने की बड़ी वजह यह है कि आर्मेनिया का बॉर्डर ईरान के प्रमुख शहरों से कम दूरी पर है। आर्मेनिया के साथ भारत के संबंध काफी अच्छे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते भी हुए हैं। इसके अलावा आर्मेनियां को चुनने की कुछ प्रमुख वजहें हैं…
• आर्मेनिया राजनीतिक रूप से स्थिर है और भारत से उसके दोस्ताना संबंध हैं। वहां से फ्लाइट ऑपरेशन तेजी से संभव है, क्योंकि येरेवन एयरपोर्ट पूरी तरह चालू है।
• ईरान और आर्मेनिया के बीच फिलहाल कोई सीमा विवाद या सैन्य तनाव नहीं है।
• दूसरी तरफ ईरान का पूर्वी पड़ोसी पाकिस्तान है। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते ऑपरेशन सिंदूर के बाद और उसके पहले से ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में भारत के पास पाकिस्तान के रास्ते छात्रों को लाने का विकल्प नहीं है।
• इराक पहले से ही ईरान के साथ चल रहे तनाव में शामिल है। कई बार इजराइल ने इराक में भी ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वहां से गुजरना खतरे से भरा हो सकता था।
• हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में आया था। उसने भारत की कार्रवाई की निंदा भी की थी। ऐसे में भारत उसकी मदद नहीं लेगा।
• तुर्किये भले ही स्थिर देश है, लेकिन ईरान से सड़क के जरिए वहां तक पहुंचना काफी लंबा है। हाल ही में भारत और तुर्किये के बीच तनातनी देखने को मिली है। दरअसल तुर्किये ने भी ऑपरेशन सिंदूर की निंदा करते हुए खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था।

ईरान से इसलिए भारतीय छात्रों को सीधे नहीं लाया जा रहा
भीषण जंग के चलते इस वक्त ईरान और इजराइल के बीच हालात काफी तनावपूर्ण हैं। कई शहरों में हमले हो चुके हैं और सुरक्षा का खतरा बना हुआ है। ऐसे में भारतीय छात्रों को सीधे ईरान से एयरलिफ्ट करना फिलहाल संभव नहीं है। ईरान के ज्यादातर इंटरनेशनल एयरपोर्ट इस समय नागरिक उड़ानों के लिए बंद हैं। युद्ध जैसे हालात की वजह से वहां से फ्लाइट उड़ाना सुरक्षित नहीं है। ईरान के कई इलाकों में इजराइली हमले हो चुके हैं। ऐसे में फ्लाइट्स पर भी हमले का खतरा बना रहता है। सीधे ईरान से भारतीय एयरलाइंस को भेजना काफी जोखिम भरा है। इसके लिए ईरान की इजाजत के साथ-साथ मजबूत सुरक्षा इंतजाम भी चाहिए होंगे, जो युद्ध की स्थिति में संभव नहीं हैं। नॉरदुज बॉर्डर सुरक्षित माना जा रहा है। आर्मेनिया में हालात स्थिर हैं और वहां से फ्लाइट्स भी आसानी से उड़ाई जा सकती हैं।

कतर से भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कराया

इससे पहले कतर की अदालत ने 12 फरवरी को भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कर दिया। इसमें से सात नौसैनिक भारत लौट आए हैं। आठों पूर्व नौसैनिकों पर जासूसी करने के आरोप लगाए गए थे और वे कतर की जेल में कैद थे। इन्हें कतर की अदालत ने मौत की सजा भी सुना दी थी, जिसके बाद इनकी रिहाई मुश्किल हो गई थी। 26 अक्टूबर 2023 को कतर की अदालत ने जब इन पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा सुनाई तब समूचा देश मोदी सरकार के साथ खड़ा था और प्रार्थना कर रहा था कि इनकी जल्द रिहाई हो। लेकिन नफरत की राजनीति करने वाली कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को मुद्दा मिल गया। जब मौत की सजा सुनाई गई थी तब इसे सरकार की कूटनीतिक विफलता करार दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक प्रयासों से आज (12 फरवरी 2024) जब इनकी रिहाई हुई है तब उनके मुंह एक जोरदार तमाचा पड़ा है। चाहे पाकिस्तान से विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाना हो, यूक्रेन, लीबिया, सूडान, इजराइल, अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों को वापस लाना हो या फिर उत्तराखंड सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को सुरक्षित सकुशल लाना हो, आज नए भारत की ताकत पूरा विश्व देख रहा है।

भारत की कूटनीतिक चतुराई से रुकी मौत की सजा
कतर की अदालत की तरफ से जब पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का ऐलान किया गया था, तो भारत ने अपने कूटनीतिक चतुराई पेश करते हुए, इसके खिलाफ अपील की थी। इसका फायदा भी देखने को मिला था, क्योंकि 28 दिसंबर, 2023 को भारत की अपील को ध्यान में रखते हुए आठों नागरिकों को सुनाई गई मौत की सजा पर रोक लगा दी गई थी। पूर्व नौसैनिकों की रिहाई उस समय हुई है, जब पिछले सप्ताह ही दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) खरीदेगा। ये डील अगले 20 सालों के लिए हुई है और इसकी लागत 78 अरब डॉलर है। भारत की पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) कंपनी ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये करार किया है। इस समझौते के तहत कतर हर साल भारत को 7.5 मिलियन टन गैस निर्यात करेगा। इस गैस से भारत में बिजली, उर्वरक और सीएनजी बनाई जाएगी।

नक्सलियों के बाद अब धर्मांतरण करने वालों NGOs की नकेल कसेगी; अमेरिका ने NGOs को सीधी फंडिंग पर रोक लगाई

सुभाष चन्द्र 

अमेरिका के Secretary of State मार्को रुबियो ने साफ़ घोषणा कर दी कि अब से अमेरिका अंतरराष्ट्रीय और अमेरिका के NGOs पर करोड़ों डॉलर खर्च नहीं करेगी अब यह राशि सीधी विभिन देशों की सरकारों को दी जाएगी जिससे पैसे का लाभ सीधा जरूरतमंदो को मिले, NGOs जैसे बिचौलियों के हाथ न पड़े 

अमेरिका की यह घोषणा भारत में फलफूल रहे NGO उद्योग और धर्मांतरण में लिप्त संगठनों पर किसी वज्रपात से कम नहीं है मोदी सरकार इसलिए FCRA कानून में संशोधन की तैयारी में लगी है जिससे कांग्रेस और अन्य सेकुलर दलों के पेट में मरोड़ें पैदा हो गई है। यह फंडिंग 16000 NGOs को करीब 22 हजार करोड़ मिलती है जिस पर किसी की कोई जवाबदेही नहीं है

लेखक 
चर्चित YouTuber 
कांग्रेस के के सी वेणुगोपाल ने संशोधन को गैर संवैधानिक कहा है, जो NGOs और Community Organisations को ख़त्म कर देगा खासकर उन संस्थाओं को जो अल्पसंख्यक चलाते है वेणुगोपाल ने बड़ी हास्यास्पद बात कही है कि “we will not allow this to be passed under any circumstances”. कैसे रोक दोगे जनाब? क्या संसद में अराजकता फैला दोगे क्योंकि संशोधन प्रस्ताव तो पारित हो ही जायेगा तुम चाहे लाख सिर पटक लो - दोनों सदनों में NDA का पूर्ण बहुमत है अपना जमाना याद करो जब हर बिल आप भी बहुमत की वजह से पारित करा लिया करते थे

Cardinal Baselios has claimed “FCRA amendment bill has caused anxiety and pressure among Christian Communities”. ऐसी चिंता(anxiety) कभी उन्हें तब नहीं हुई जब ईसाइयों के गांव के गांव वक्फ बोर्ड ने हड़पने की कोशिश की इनकी चिंता अब इसलिए बढ़ रही है क्योंकि इस बिल से विदेशी धन पर रोक लगेगी खासकर conversion related activities पर

सबसे बड़ी बात है कांग्रेस और वामपंथी इन NGOs को मिलने वाले धन से धर्मांतरण को बढ़ाने के अलावा सरकार के खिलाफ नेरेटिव सेट कर लोगों को सरकार के खिलाफ प्रभावित करने का खेल भी खेलती हैं

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में साफ़ किया था कि ईसाई या मुस्लिम मजहब में जाने के बाद व्यक्ति को SC/ST के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता वैसे तो यह निर्णय भी धर्मांतरण के उद्योग पर देश भर में प्रभाव डाल सकता है लेकिन पंजाब जैसे राज्य के लोगों को ज्यादा सतर्क हो जाना चाहिए क्योंकि इस समय ईसाई मिशनिरिओं का सिखों को ईसाई बनाने का खेल वहां बड़े पैमाने पर चल रहा है 

यदि किसी हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन का धर्मांतरण ईसाई या इस्लाम में कराया जाता है तो उसका नए मज़हब के अनुसार नाम भी परवर्तित करना अनिवार्य होना चाहिए क्योंकि बिना नाम बदले आरक्षण का लाभ लेने की संभावना बनी रह सकती है क्योंकि नाम से तो वह हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन ही प्रतीत होगा

कांग्रेस का हाल ख़राब है चुनाव प्रचार में लगे सभी सांसदों को उसने दिल्ली बुला लिया है क्योंकि “किसी भी हाल” में बिल को रोकना है अभी वक्फ कानून ने ही कांग्रेस और मुस्लिम अल्पसंख्यक नेताओं की नींद उड़ाई हुई थी, अब ये कानून और उनके मंसूबों पर पानी फेर देगा

देश के अर्बन नक्सलों की अब शामत आएगी! 

मातृशक्ति BJP का मास्टरस्ट्रोक: महिला आरक्षण से लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, 273 महिला सांसद बनेंगी


क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को विकसित हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है? नारी शक्ति को जितना सम्मान सनातन धर्म में दिया गया है किसी अन्य धर्म में नहीं। पौराणिक कथाओं का अवलोकन करने पर एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि जीवन में जब पुरुष  किसी असुर शक्ति से मानव को राहत देने में असमर्थ होने पर महिला शक्ति जिसे आज देवी माता के रूप में पूजा जाता है, का सहारा लिया। देवी माता को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने वाले सभी देवता हैं। यही कारण है कि वर्ष में 2 बार नवरात्रे मनाने की प्रथा चली आ रही है।    

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और सरकार ने मातृशक्ति और युवाशक्ति पर खास फोकस किया है। देश की राजनीति में मातृशक्ति भागीदारी बढ़ाने को लेकर सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी की जा सकती है, ताकि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रभावी तरीके से दिया जा सके। इस योजना का मकसद यह है कि महिला आरक्षण लागू करने के साथ-साथ किसी राज्य की मौजूदा सीटों में कटौती न हो और सभी को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। साथ ही, आरक्षित सीटों के भीतर एससी और एसटी वर्ग के लिए भी अलग से आरक्षण जारी रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए संसद के मौजूदा सत्र या अगले सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। इससे लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है। इनमें महिला सांसदों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी।

गृहमंत्री अमित शाह की सभी राजनीतिक दलों में सहमति की कवायद
पीएम मोदी के दिशा निर्देशन में गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठकें भी की हैं। इस दौरान सीट बढ़ाने के “स्ट्रेट जैकेट फॉर्मूला” पर चर्चा हुई, जिसमें मौजूदा सीटों को बढ़ाकर नए ढांचे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जाएंगी। इससे लोकसभा की कुल सीटें बढ़कर करीब 800 से ज्यादा हो सकती हैं। इस बीच दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन पर ऐतराज किया है। इसलिए सरकार अब ऐसा फॉर्मूला लाने की कोशिश कर रही है, जिससे सभी राज्यों के हितों का संतुलन बना रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर सहमति बनाने के लिए एनडीए और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक की। सहमति बनने पर बिल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं।

महिला सांसदों ने सरकार के कदम को स्वागत योग्य बताया
महिला सांसदों ने बजट सत्र या अगले सत्र के दौरान महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए विधेयक लाने की केंद्र सरकार की योजना का स्वागत किया और कहा कि इस कदम से शासन में महिलाओं की भागीदारी और मजबूत होगी। जेडीयू सांसद लवली आनंद ने इसे “स्वागत योग्य कदम” बताया और कहा कि राजनीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी देश की प्रगति को गति देगी। भाजपा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा कि महिला आरक्षण कानून के पारित होने से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की “आधी आबादी” से किया गया एक लंबे समय से चला आ रहा वादा पूरा हुआ है। सहरावत ने कहा कि इस देश में कई लोगों ने महिलाओं के बारे में बात की है, लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लाने का प्रयास और उसमें मिली सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है। आरक्षण विधेयक लाना प्रधानमंत्री द्वारा देश की आधी आबादी से किया गया वादा है, और वह आधी आबादी उन पर भरोसा करती है।

2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन करने की रणनीति
दरअसल, 2023 में महिला आरक्षण कानून संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। इसके तहत महिला आरक्षण नई जनगणना के बाद लागू होना है। अब सरकार का प्रस्ताव है कि नई जनगणना का इंतजार करने की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन किया जाए। इससे प्रोसेस तय समय पर पूरी हो सकेगी और आरक्षण लागू किया जा सकेगा। इसके लिए दो बिल लाए जा सकते हैं। एक बिल के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन होगा, जबकि दूसरा परिसीमन कानून में बदलाव से जुड़ा होगा। इसे पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है।

महिला आरक्षण के लिए पूरे देश में एकरूपता लाने की कवायद
महिला आरक्षण प्रस्ताव के मुताबिक 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का ढांचा ऐसा होगा, जिसमें एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा मिलेगा। ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है। इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों इसके लिए कई नेताओं से बैठकें की हैं। इनमें वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (एसपी), आरजेडी और एआईएमआईएम के नेता शामिल रहे। बीजेडी और शिवसेना (यूबीटी) से भी बातचीत हुई है, जबकि कांग्रेस से चर्चा बाकी है।

महिला आरक्षण बिल दोनों सदनों से पास, पर अभी लागू नहीं
महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में यह बिल सर्वसम्मति से पास हुआ था। हालांकि, यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इसकी लागू होने की तारीख केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए तय करेगी और जरूरत पड़ने पर संसद इसमें संशोधन कर सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है।

1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था
• 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया।
• 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया।
• 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी।
• 1988: महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perpective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी।
• 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023
1998: 13 जुलाई को अटल की एनडीए सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन RJD सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998: 14 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में दोबारा पेश करने की कोशिश की, लेकिन हंगामे और विरोध की वजह से पेश नहीं हो सका।
1998: 11 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर पोडियम तक पहुंच गए।
1998: 23 दिसंबर को अटल सरकार बिल पेश करने में कामयाब रही। हालांकि JDU ने विरोध कर दिया और पारित नहीं हो सका।
2000: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2002: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2003: जुलाई में बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
2008: मनमोहन सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में विधेयक पेश किया। खूब हंगामा हुआ। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
2010: 9 मार्च को राज्यसभा में विधेयक पेश किया गया और दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया। बिल लैप्स हो गया।
2023: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में विधेयक संसद में पेश किया। कुशल प्रबंधन के चलते यह लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही पारित हो गया। 106वा संविधान संशोधन और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बना।