कांग्रेस इकोसिस्टम फैला रही भ्रम : ‘ईरान ने हॉर्मूज की खाड़ी को भारत के लिए किया ब्लॉक’

                                         होर्मुज स्ट्रेट और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा (साभार-x@congress)
होर्मुज स्ट्रेट भारत के लिए बंद नहीं है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने साफ कर दिया है कि ये समुद्री रास्ता इजरायल अमेरिका, यूरोप के उसके सहयोगी देशों के जहाजों के लिए बंद किया गया है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर कांग्रेस का प्रोपेगेंडा जारी है।

कांग्रेस फैला रही झूठ

कांग्रेस का कहना है कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद कर दिया है। वहाँ से सिर्फ रूस और चीन के जहाज ही जा सकते हैं। इस लिस्ट में भारत का नाम नहीं है। कांग्रेस का ये भी कहना है कि इस समुद्री रास्ते के बंद होने से 10 हजार करोड़ का भारतीय सामान, 38 जहाज और 1100 नाविक फँसे हुए हैं।

कांग्रेस का कहना है कि इंडियन नेशनल शिप ओनर्स एसोसिएशन ने भारत सरकार से मदद की गुजारिश की है, लेकिन सरकार मदद करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि भारत सरकार ने ईरान के साथ बातचीत के सारे रास्ते बंद कर लिए हैं।

अब कांग्रेस को कौन समझाए कि ईरान ने जिसके जहाज को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने पर हमला करने की बात कही है, उसमें भारत का नाम नहीं है। ईरान सिर्फ उन देशों के जहाजों को पार नहीं होने देगा जिसने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध में इजरायल और अमेरिका का साथ दे रहा है।

भारत ने विश्व शांति की अपील की है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा है कि वैश्विक स्थिरता को अभी सबसे ज्यादा खतरा है और शांति ही एकमात्र हर विवाद को सुलझाने का तरीका है। भारत ने ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर शोक भी जताया है। ऐसे में भारत के जहाज पर ईरानी आक्रमण का खतरा नहीं है।

बीमा कंपनियों की मनाही का असर

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यूएस-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से इस रास्ते पर कई दिनों से अनिश्चितता बनी हुई है और कमर्शियल ट्रैफिक रुक गए हैं। अब रहा सवाल वहाँ भारतीय सामानों के फँसे होने का, तो इसकी वजह बीमा कंपनियों का होर्मुज स्ट्रेट से होकर जाने वाले जहाजों पर से हाथ खींच लेना है। ब्रिटिश बीमा कंपनियों ने बीमा करना बंद कर दिया है, इसलिए आवाजाही रुकी है।

इंश्योरेंस कंपनियों ने शिपिंग कंपनियों को नोटिस दिया था कि वे ईरान पर इजराइल-US हमलों को देखते हुए इंश्योरेंस रोक देंगी और प्रीमियम बढ़ा देंगी। नॉर्थस्टैंडर्ड, अमेरिकन क्लब, स्वीडिश क्लब, स्कल्ड, गार्ड और लंदन पी एंड आई क्लब सहित प्रमुख बीमा कंपनियों ने पोत सुरक्षा के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए युद्ध जोखिम बीमा वापस ले लिया था।

ये खतरा इजरायल और अमेरिका की ईरान पर किए गए हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने के बाद बढ़ा। ईरान ने इसके बाद स्ट्रेट होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर हमला करने की चेतावनी दी थी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने जहाजों को सुरक्षा देने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) को खाड़ी में काम करने वाली शिपिंग लाइनों को तुरंत ‘बहुत सही कीमत’ पर पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस देने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो US नेवी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। ऐसी परिस्थिति में जब भारत अपने लिए रास्ता तलाश रहा है, कॉन्ग्रेस लोगों को डरा रही है।

देश को भयभीत करने की कोशिश कर रही कांग्रेस 

कांग्रेस का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण देश के लोगों को खामियाजा उठाना पड़ेगा, क्योंकि एलजीपी, एलएनजी उसी रास्ते से आता है। मिडिल ईस्ट में होने वाले युद्ध का असर देश के फर्टिलाइजर, ट्रांसपोर्ट, माइनिंग, रेलवे, पॉवर, एग्रीकल्चर समेत कई सेक्टर्स पर पड़ेगा। आने वाले समय में जिस तरह से महँगाई बढ़ेगी और मंदी आएगी, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

कांग्रेस ऐसा कह कर सरकार को आगाह करना चाहती है या देश को डराना चाहती है। मिडिल ईस्ट के देशों के साथ भारत के मधुर संबंध हैं और व्यापारिक रिश्ते भी काफी मजबूत हैं। भारत के लिए जब होर्मुज स्ट्रेट बंद नहीं है, तो फिर ऐसा संकट क्यों आएगा। भारत को रूस ने तेल देने की पेशकश भी कर चुका है। बाकी रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का बयान

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कहा है कि होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके पश्चिमी सहयोगियों के जहाजों के लिए बंद है। यह घोषणा गुरुवार 5 मार्च 2026 को ईरान के सरकारी ब्रॉडकास्टर IRIB के जरिए की गई है।

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा कि इंटरनेशनल कानून और संबंधित प्रस्तावों के मुताबिक, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान युद्ध के समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने को रेगुलेट करने का अधिकार रखता है। इसलिए इस रास्ते से अगर अमेरिका, इजराइल, यूरोप और उनके ‘समर्थकों’ का कोई भी जहाज इस रास्ते पर दिखेगा तो उसपर निश्चित रूप से हमला किया जाएगा।

इससे पहले ईरान ने साफ किया था कि वह चीनी झंडे लगे जहाजों को स्ट्रेट इस्तेमाल करने देगा। अब उसने दुनिया के बाकी देशों को भी ग्रीन सिग्नल दे दिया है, जो इस युद्ध में शामिल नहीं है या उसके खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं। ये पूरी दुनिया के लिए राहत भरी खबर है।

ममता का आचरण कोई नई बात नहीं है लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पर राजनीति करने के आरोप से घटिया बात नहीं हो सकती

सुभाष चन्द्र

पिछले 12 साल से विपक्षी दलों के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री मोदी का उनके राज्यों के दौरों पर  बहिष्कार करके उनका अपमान करते रहे हैं लेकिन इस बार ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बहिष्कार करके मर्यादा की सभी सीमाएं तोड़ दी राष्ट्रपति मुर्म सिलीगुड़ी में विश्व आदिवासी सम्मेलन में शामिल होने गई थी लेकिन न तो उनके स्वागत के लिए ममता बनर्जी गई और न उनका  कोई मंत्री गया इससे बड़ा घोर अपमान राष्ट्रपति का हो नहीं सकता जो स्वयं के आदिवासी महिला है। 

विश्व आदिवासी सम्मेलन के आयोजन में भी क्या राजनीति हो सकती है जिससे ममता बनर्जी घबरा गई उन्होंने कहा कि “माननीय राष्ट्रपति महोदया हम आपका आदर करते हैं, लेकिन चुनाव के दौरान भाजपा के इशारे पर राजनीति न करें” ममता संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को भी भाजपा का एजेंट बताती है और अब देश के सर्वोच्च पद पर बैठी राष्ट्रपति को भी भाजपा का एजेंट बता दिया प्रधानमंत्री ने सही कहा है कि ममता के अहंकार ने आदिवासी महिला राष्ट्रपति का अपमान किया है ममता का राष्ट्रपति के प्रति आदर किसी ढकोसले से कम नहीं है

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
अपने स्वभाव से शालीन और शांत रहने वाली द्रौपदी मुर्मू जी को भी कल कहना पड़ गया कि ममता मुझे बंगाल में आना ही नहीं देना चाहती और सम्मेलन में आदिवासियों को आने से रोका गया 

ममता हो या विपक्ष के अन्य मुख्यमंत्री हों, वे अक्सर प्रधानमंत्री के राज्य के दौरों में उनका बहिष्कार करते हैं 8 से 10 मुख्यमंत्री तो ऐसे हैं जो नियमित रूप से नीति आयोग की बैठकों  बहिष्कार करते हैं जबकि आयोग ही उनके राज्यों की वित्तीय समस्याओं को हल करने के लिए धन उपलब्ध करता है कुछ और किस्से हैं प्रधानमंत्री के बहिष्कार के

-तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने 5-6 बार मोदी की state visit पर प्रोटोकॉल के अनुसार उनका स्वागत नहीं किया; आज क्या हुआ, मिट्टी में मिल गया;

-ममता बनर्जी ने खुद प्रधानमंत्री के बंगाल दौरों पर उनके अगुवाई करने की जरूरत नहीं समझी;

-6 अप्रैल, 2025 को तमिलनाडु के CM स्टालिन ने प्रधानमंत्री मोदी के रामेश्वरम में पमबम ब्रिज के उद्घाटन में गायब रहे और ऊटी जाने का बहाना बना दिया;

-27 अप्रैल, 2020 को प्रधानमंत्री मोदी की मुख्यमंत्रियों के साथ कोरोना जैसे गंभीर विषय पर मीटिंग में भी केरल के मुख्यमंत्री विजयन गायब रहे याद रहे सबसे ज्यादा मौतें केरल में हुई थी और मुख्यमंत्री ने मुस्लिमों के समारोहों पर कोई नहीं लगाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट के मोदी विरोधी जजों ने स्वीकृति दी थी

-मई 2023 में बंगाल, दिल्ली, पंजाब, तेलंगाना, केरल और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग की Governing Council का बहिष्कार किया;

-जुलाई, 2024 में 7 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग का बहिष्कार किया

इस आचरण का कारण एकमात्र है और वह है नरेंद्र मोदी से “नफरत” लेकिन जब इनके राज्यों को पैसे की जरूरत पड़ती है तो नाक रगड़ने आते दिल्ली में मोदी के दरबार में  फिर भी वह उनके साथ भेदभाव नहीं करता 

बंगाल में 2011 की जनगणना के अनुसार 53 लाख से ज्यादा आदिवासियों की आबादी है क्या इसके लिए कोई सम्मेलन भी नहीं हो सकता? ममता की दुश्मनी मोदी से है लेकिन राष्ट्रपति को तो उसे नहीं घसीटना चाहिए था अब TMC और ममता का दिया बंगाल में बुझना ही चाहिए लेकिन एक फैक्टर है जो ममता को सत्ता में रख सकता है और वह है “cut money” लोग जिसके आदि हो चुके हैं और उन्हें यह डर रहता कि भाजपा सरकार आने पर उनका यह धंधा बंद हो जाएगा और पिछले चुनाव में उसे 48% वोट मिले

5000 साल पुराना इतिहास : दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर: हर साल दाने के बराबर जमीन में धंसती जा रही प्रतिमा; वक्फ संपत्ति बता हड़पने की हुई कोशिश

                               कोटा के कैथून में है विभीषण का एकमात्र मंदिर (फोटो साभार: पंजाब केसरी )
राजस्थान के कोटा जिले के कैथून कस्बे में हर साल होली के अवसर पर एक बेहद अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। देशभर में होलिका दहन के साथ होली का त्योहार मनाया जाता है लेकिन कैथून में इसके अगले दिन यानी धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

इसी खास परंपरा के साथ यहाँ पाँच दिवसीय विभीषण मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु आस्था और परंपरा का संगम देखने के लिए पहुँचते हैं। इस वर्ष भी मेले की शुरुआत धूमधाम से हुई। राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर मेले के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

उन्होंने पहले विभीषण मंदिर में पूजा-अर्चना की और फिर मेला स्थल पर परंपरा के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन कर अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया।

              प्रदेश के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने किया मेले का शुभारंभ (साभार:ETV भारत)

होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की अनोखी परंपरा और देव विमानों की शोभायात्रा

कैथून का विभीषण मेला देश में अपनी तरह का अनूठा आयोजन माना जाता है। यहाँ परंपरा के अनुसार, पहले होलिका दहन होता है और उसके अगले दिन धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले को जलाया जाता है। इस परंपरा का संबंध भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु की कथा से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि जब होलिका आग में जलकर नष्ट हो गई, तब असुर राजा हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। उसी समय भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। इसी घटना की स्मृति में कैथून में धुलेंडी के दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

यह परंपरा लगभग 45 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है और हर साल इसके साथ भव्य मेले का आयोजन होता है। विभीषण मेले की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होती है। आसपास के कई मंदिरों से देवताओं की प्रतिमाओं को सजाए गए देव विमानों में बैठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।

ये देव विमान श्रद्धालुओं की भीड़ के साथ विभीषण मंदिर तक पहुँचते हैं, जहाँ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद सभी देव विमानों को मेला स्थल लाया जाता है। मेला स्थल पर आतिशबाजी, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और धार्मिक आयोजन होते हैं। कार्यक्रम के अंतिम चरण में मुख्य अतिथि द्वारा हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है, जो धर्म की जीत और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है।

दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर: हर साल दाने के बराबर जमीन में धंसती जा रही प्रतिमा

कैथून की पहचान केवल मेले तक सीमित नहीं है। यहाँ स्थित विभीषण मंदिर को दुनिया का इकलौता मंदिर माना जाता है जहाँ रावण के भाई विभीषण की पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर परिसर में एक विशाल चबूतरे के ऊपर छतरी के नीचे विभीषण की बड़ी प्रतिमा स्थापित है।

                                                                     (साभार: News 18)

इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसका केवल धड़ से ऊपर का हिस्सा ही दिखाई देता है, जबकि बाकी भाग जमीन के अंदर धँसा हुआ माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा हर साल थोड़ा-थोड़ा जमीन में और धँसती जाती है। मंदिर के पास एक प्राचीन कुंड भी है, जिसके निकट विक्रम संवत 1815 का शिलालेख मौजूद है।

विभीषण मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

मंदिर की स्थापना को लेकर एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के समय सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि और राजा अयोध्या पहुँचे थे। इसी दौरान भगवान शिव ने पृथ्वी लोक की यात्रा करने की इच्छा जताई। यह सुनकर विभीषण ने निवेदन किया कि वह शिव और हनुमान को कांवड़ में बैठाकर भारत भ्रमण कराना चाहते हैं।

भगवान शिव ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया लेकिन एक शर्त रखी कि यात्रा के दौरान काँवड़ जहाँ भी जमीन से टिक जाएगी, वहीं यात्रा समाप्त मानी जाएगी। विभीषण ने एक विशाल लकड़ी की काँवड़ तैयार की जिसकी लंबाई लगभग 8 कोस (करीब 32 किलोमीटर) बताई जाती है। काँवड़ के एक हिस्से में भगवान शिव और दूसरे हिस्से में हनुमान जी विराजमान थे।

जब यह यात्रा प्राचीन नगर कौथुनपुर (आज का कैथून) से गुजर रही थी, तब काँवड़ का एक सिरा जमीन से लग गया। जिस स्थान पर शिवजी का भाग जमीन से टिका, वह स्थान आज चौरचौमा के नाम से जाना जाता है और वहाँ चोमेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है।

दूसरा हिस्सा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र में आकर टिका, जहाँ आज हनुमान जी का मंदिर स्थित है। वहीं कैथून में जहाँ विभीषण रुके, वहाँ विभीषण मंदिर की स्थापना मानी जाती है।

मंदिर के वर्तमान स्वरूप का इतिहास और वक्फ विवाद

मंदिर को पौराणिक रूप से हजारों साल पुराना माना जाता है लेकिन इसके वर्तमान ढाँचे का निर्माण बाद में हुआ। माना जाता है कि कोटा के शासक महाराव उम्मेद सिंह प्रथम ने 1770 से 1821 के बीच मंदिर की छतरी और संरचना का निर्माण करवाया था। मंदिर के आसपास के कई हिस्सों का समय-समय पर जीर्णोद्धार भी किया गया।

स्थानीय गौतम परिवार ने प्राचीन कुंड और अन्य संरचनाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी इस परिवार के सदस्य विशेष अवसरों पर यहाँ पूजा करने आते हैं। मेला उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने मंदिर की जमीन से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस भूमि को वक्फ संपत्ति बताकर कब्जाने की कोशिश की गई थी।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए वक्फ संशोधन कानून के बाद यह स्पष्ट कर दिया गया है कि केवल वही संपत्ति वक्फ के नाम दर्ज होगी जो वास्तव में मुस्लिम समाज द्वारा दान की गई हो। इस कानूनी बदलाव और लंबे समय से चल रहे संघर्ष के बाद कोर्ट ने विभीषण मंदिर की जमीन हिंदू समाज को वापस सौंपने के आदेश दिए।

दिलावर ने यह भी कहा कि राजस्थान सरकार ने निर्णय लिया है कि आबादी क्षेत्र में स्थित मंदिरों की जमीन के पट्टे मंदिर की मूर्ति के नाम जारी किए जाएँगे, ताकि भविष्य में कोई अवैध कब्जा न कर सके। मेला समारोह में मंत्री दिलावर ने कहा कि विभीषण ने अधर्म के मार्ग पर चल रहे अपने भाई रावण का साथ छोड़कर भगवान राम का साथ दिया था।

रामायण की कथा में विभीषण का यह निर्णय धर्म के पक्ष में खड़े होने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि कैथून में उन्हें विशेष सम्मान के साथ पूजा जाता है। होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की परंपरा, दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर और उससे जुड़ी कथाएँ इस स्थान को भारत के धार्मिक मानचित्र पर एक अलग पहचान देती हैं।

शिया सुन्नी को और सुन्नी सुन्नी को मार रहा तो "असली मुस्लिम" कौन है?


साभार सोशल मीडिया 

ना मुझे अमेरिका इजरायल से मतलब है और नहीं खाड़ी के किसी दुबई, कतर, बहरीन, अबू धाबी या सऊदी जैसे देश से और ना ईरान से, मतलब
अपना भारत सुरक्षित चाहिए।
कश्मीर में नरसंहार हुआ तो तुमने कोई विरोध नहीं किया;
साभार सोशल मीडिया 

कारगिल में सैकड़ों भारतीय सैनिक शहीद हुए तुमने कोई विरोध प्रदर्शन नहीं किया, मजहब की चादर ओढ़ के मौन थे;
26/11 मुम्बई मैं आतंकवादी हमला हुआ तुमने कोई विरोध प्रदर्शन नहीं किया;
अयोध्या से लौट रहे कारसेवको को गोधरा में साबरमती ट्रेन में जिंदा जलाया गया तुमने कोई विरोध प्रदर्शन नहीं किया;
पहलगाम पुलवामा और उरी में हमला हुआ, धर्म पूछ कर मारा गया तुमने कोई विरुद्ध प्रदर्शन नहीं किया;
साभार सोशल मीडिया 

आज तुम्हारे मजहब के विदेशी धरती में आग लगी हुई है तो अब भारत में सीना पीट रहे हो
और कहते हो कि तुम्हारा भी खून शामिल है यहां की मिट्टी में।
परायों के लिए तुम्हारी आंखों में आंसू आ जाते हैं और अपने देश में आतंकवादी हमले में मारे जाने वाले आम भारतीयों के लिए क्यों नहीं?
शिया सुन्नी, को मार रहा, ( ईरान vs सऊदी) 
सुन्नी-सुन्नी, को पेल रहा, (अफ़ग़ानिस्तान vs पाकिस्तान) 
 
अब सवाल है, कि "ओरिजनल मुस्लिम" कौन है? 

पाकिस्तान के कटोरा शरीफ ने सऊदी अरब के साथ "डिफेंस पैक्स" साइन किया था!

सऊदी अरब पर हमला पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और पाकिस्तान पर हमला सऊदी अरब पर हमला माना जाएगा!

सन 1971 मे लिखी गई भविष्य वाणी शायद करवट लेने वाली है।अखिल विश्व गायत्री परिवार के पण्डित श्रीराम शर्मा के 1971 के एक लेख द्वारा की गई भविष्यवाणी
लेकिन अफगानिस्तान पाकिस्तान की बजा रहा है, और सऊदी चुप है !
ईरान सऊदी की बजा रहा है, और पाकिस्तान चुप है 
तुम्हारे दस साल के राज में जो देश के चीथड़े चीथड़े उड़ते रहे, दिल्ली से लेकर मुंबई तक... बाजार बाजार, ट्रेन ट्रेन और शहर दर शहर... उसमें आरडीएक्स कहां से आया था?

दिल्ली के सरोजनी नगर में 2005 में धनतेरस वाले दिन जब 85 लोगो के चीथड़े उड़े थे तो देश में वो आज तक का सबसे ज्यादा आरडीएक्स वाला धमाका था। 

300 किलो से भी ज्यादा! कहां से आता था इतना आरडीएक्स, कौन लाया था भाई?

एक अनुमान के अनुसार तुम्हारी सोनिया के दस साल के राज में लगभग 4000 किलो आरडीएक्स से देश की निर्दोष जनता को लहूलुहान किया गया! जवाब दो कहां से आया इतना आरडीएक्स? कौन लाया? 

आओ बेशर्मों तुम्हें सिलसिलेवार एक एक आतंकवादी घटना की याद दिलाऊ...

1. 15 अगस्त, 2004: असम के धिमजी स्कूल में RDX बम ब्लास्ट- (18 मरे, 40 घायल)

2. 5 जुलाई 2005: अयोध्या में रामजन्मभूमि पर आतंकवादी हमला (6 मरे, दर्जनों घायल)

3. 28 जुलाई 2005: जौनपुर में श्रमजीवी एक्सप्रेस ट्रेन में RDX द्वारा बम विस्फोट (13 मरे, 50 घायल)

4. 29 अक्टूबर 2005: धनतेरस वाले दिन दिल्ली के गोविंदपुरी, पहाड़गंज और सरोजनी नगर के भीड़भाड़ वाले इलाके में RDX ब्लास्ट करके 85 लोगो के चिथड़े उड़ा दिए गए और 250 से ज्यादा घायल हुए।

5. 28 दिसम्बर 2005: बैंगलोर के इंस्टीट्यूट आफ साइंस पर आतंकवादी हमला 1 मरे 4 घायल!

6. 7 मार्च 2006: हिंदुओं की श्रद्धा के केंद्र वाराणसी के प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर और भीडभाड वाले कैंट रेलवे स्टेशन पर 3 RDX बम ब्लास्ट करके 28 श्रद्धालुओं, नागरिको को बम से उड़ा दिया, 101 लोग घायल हुए। 

7. 11 जुलाई 2006: मुम्बई में एक साथ माटुंगा रोड, माहिम, बांद्रा, खार रॉड, जोगेश्वरी, भाइंदर, बोरिवली स्टेशनों के लोकल ट्रेन में RDX के बमो से सीरियल ब्लास्ट करके 209 लोगो को बम से उड़ाया गया 700 से ज्यादा लोग घायल हुए!

8. 8 सितंबर 2006: मालेगांव की मस्जिद में सीरियल RDX बम ब्लास्ट 37 मरे 125 घायल।

9. 18 फरवरी 2007: समझौता एक्सप्रेस में वही RDX बम ब्लास्ट, 68 मरे 50 घायल!

10. हैदराबाद की मक्का मस्जिद में RDX बम ब्लास्ट 16 मरे 100 घायल। 

11. 14 अक्टूबर 2007: लुधियाना के थियेटर में RDX बम ब्लास्ट 6 लोग मरे।

12.. 24 नवम्बर 2007: उत्तर प्रदेश में लखनऊ, अयोध्या और बनारस के न्यायालयों में सीरियल RDX बम बलास्ट 16 मरे 79 घायल।

13. 1 जनवरी 2008: रामपुर उत्तर प्रदेश में CRPF कैम्प पर हमला 8 मरे 7 घायल।

14. 13 मई 2008: जयपुर के छोटी चौपड़, बड़ी चौपड़, मानकपुर पुलिस स्टेशन एरिया, जौहरी बाजार, त्रिपोलिया बाजार, कोतवाली क्षेत्र में RDX द्वारा 9 जगहों पर सीरियल ब्लास्ट 63 मरे 200 घायल!

15. 25 जुलाई 2008: बैंगलुरु में में 8 सीरियल RDX बमब्लास्ट 2 मरे 20 घायल!

16. 26 जुलाई 2008: गुजरात के अहमदाबाद में 17 जगहों पर सीरियल RDX बम ब्लास्ट 35 मरे 110 घायल।

17. 13 सितंबर 2008: दिल्ली के गफ्फार मार्केट, बारहखम्भा रोड, GK1, सेंट्रल पार्क में 31 मिनट के अंदर 5 RDX बम ब्लास्ट हुए। 33 लोगो कि बम विस्फोट में मृत्यु और 150 से ज्यादा घायल।

18. 27 सितंबर 2008: दिल्ली महरौली के इलेक्ट्रानिक मार्केट में 2 बम ब्लास्ट 3 लोग मरे और 33 घायल।

19. 1 अक्टूबर 2008: अगरतला में बम विस्फोट, 4 मरे 100 घायल।

20.  21 अक्टूबर 2008: इम्फाल में RDX बम विस्फोट, 17 मरे 50 घायल।

21. 30 अक्टूबर 2008: असम में RDX बम विस्फोट, 81 मरे और 500 से ज्यादा घायल।

22. 28 नवम्बर 2008: मुम्बई हमला, ताज होटल, ओबेराय होटल, कामा हॉस्पिटल, नरीमन हाउस, लियोपोल्ड कैफे, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर आतंकवादी हमला 166 लोग मारे गए 600 से ज्यादा घायल।

23. 1 जनवरी 2009: गुवाहाटी में RDX बम ब्लास्ट 6 मरे 67 घायल!

24. 6 अप्रैल 2009: गुवाहाटी में RDX बम ब्लास्ट 7 मरे 62 घायल!

25. 13 फरवरी 2010: पुणे की जर्मन बेकरी में RDX बम ब्लास्ट, 17 मरे 70 घायल!

26. 7 दिसम्बर 2010: दशास्वमेध घाट पर गंगा आरती के समय बम ब्लास्ट। 3 मरे 36 घायल!

27. 13 जुलाई 2011: मुबई के ओपेरा हाउस, जावेरी बाज़ार और दादर एरिया में भीषण RDX बम ब्लास्ट! 26 मरे 130 लोग घायल।

28. 7 सितंबर 2011: दिल्ली हाईकोर्ट में RDX बम ब्लास्ट, 17 मरे और 180 लोग घायल। 

29. 13 फरवरी 2011: इजराइली डिप्लोमेट की कार को बम से उड़ाने का प्रयास, बम सही से फटा नही। 4 घायल। 

30. 1 अगस्त 2012: पुणे ब्लास्ट।

31. 21 फरवरी 2013: हैदराबाद की हैदाराबाद में 2 RDX बम ब्लास्ट। 18 लोग मारे गए और 131 घायल!

32. 17 अप्रैल 2013: बैंगलोर में RDX बम ब्लास्ट, 14 लोग गंभीर रुप से घायल!

33. 7 जुलाई 2013: बोधगया मे ब्लास्ट 5 लोग गंभीर रूप से घायल। 

34. 27 अक्टूबर 2013: पटना में, नरेंद्र मोदी की रैली में इंडियन मुजाहिद्दीन द्वारा 8 बम ब्लास्ट, 6 मरे 85 घायल। लाखो की भीड़ में भगदड़ मचा कर हजारो को मारने की साजिश।

35. 1 मई 2014: चेन्नई में गुवाहाटी बैंगलोर एक्सप्रेस में बम बलास्ट 2 मरे 14 गंभीर रूप से घायल।

सोनिया राज के दस वर्षो की जो भी बम ब्लास्ट की घटनाएं मैंने लिखीं हैं उनमें कश्मीर की घटनाएं नहीं हैं।

कश्मीर में भी इस दरम्यान सैकड़ो घटनाएं हुई जिनमें हजारों किलो आरडीएक्स प्रयोग हुआ और हजारों बेकसूर मारे गए।

कांग्रेस को जवाब देना चाहिए कि किस रास्ते से आरडीएक्स देश में निर्बाध आता रहा और मासूमों के चीथड़े उड़ाता रहा।

पुलवामा में हुए हमले से हर देशवासी दुखी है। लेकिन सेना और मासूम जनता को सोनिया राज में क्यों भूना जाता रहा, इसका जवाब दो सुजेवाला! इसका जवाब दो राहुल गांधी!

और जवाब तो उस दाउद के काले कारनामे का भी दो....जब 1993 में तुम्हारी सरपरस्ती में 400 बेकसूर लोगों को RDX बमों से मौत के घाट उतार दिया गया था।

पर धूर्त कांग्रेसी कभी आतंकियों पर अंगुली नहीं उठाये, बल्कि इस्लामिक आतंकवाद न कह सके पर भगवा आतंकवाद का झूठ का प्रचार कर इस पावन भारत भूमि और हिंदुओं को कलंकित, अपमानित करने का काम तुम गद्दारों ने अवश्य किया।

कांग्रेस के अपने घर में हाहाकार मचा है; कुछ चापलूसी करते थक गए पर मिला “बाबा जी का ठुल्लू” विपक्ष क्या होता है इज़रायल से नहीं सीख सकते तो पाकिस्तान में हाल देख कर समझ लो कि भारत में कितने खुश हो

सुभाष चन्द्र

पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत जैसे चमचे राहुल गांधी की चापलूसी में नरेंद्र मोदी के लिए ऐसे ऐसे अपशब्द कहते रहे जो कहने के लिए शायद उनका दिल भी नहीं मानता होगा।  पिछली बार भी राहुल गांधी ने पवन खेड़ा को राज्यसभा नहीं भेजा और इस बार भी पिछली बार भी पवन खेड़ा ने कहा था कि शायद मेरी तपस्या में कमी रह गई और इस बार भी वही शब्द दोहराए हैं अगर दिमाग राहुल गांधी के पास गिरवी रख कर काम करोगे तो ऐसा ही होगा सुरजेवाला ने क्या तुमसे बढ़िया गाली दी थी मोदी को जो उसे इनाम दे दिया गया

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस का जड़खरीद गुलाम पाकिस्तान से मोदी को हटाने की भीख मांगने वाला मणिशंकर अय्यर भी राहुल गांधी से उखड़ गया उसे कांग्रेस को समझने में देर कर दी या पहले से समझा हुआ था जो रोज मोदी के लिए बकवास करता था अब उसने कहा है

“मुझे गंदे कपड़े की तरह फेंक दिया मैं बूढ़ा हो चुका हूं, मेरे दांत गिर चुके हैं; कांग्रेस ने मुझे गंदे कपड़े की तरह किनारे फ़ेंक दिया; 85 साल के बुजुर्ग का कुछ तो लिहाज होना चाहिए; मुझे धक्के मारकर भगाया गया; सवाल उठता है कि क्या पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बचा पा रही है? या नई राजनीति में पुराने चेहरे बेकार हो जाते है? कांग्रेस के अंदर असंतोष की आवाज़ें तेज हो रही हैं”

अपने पर पड़ी तो सम्मान याद आ गया लेकिन जब सीताराम केसरी को टॉयलेट में बंद कर उसे धक्के मार कर निकाला गया और उसकी धोती फाड़ दी गई थी, तब मणिशंकर कुछ बोले थे क्या - 85 साल के बुजुर्ग का सम्मान होना चाहिए लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे आदमी को आप “नीच” कहना ठीक समझते हैं ये आपका ही कर्मफल है जो लौट कर आ रहा है आज आप कांग्रेस के लिए तो क्या किसी पार्टी के लिए भी किसी काम के नहीं हैं 

गाली बकने की संस्कृति तो कांग्रेस की पुरानी है सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को “मौत का सौदागर” का कहा और राहुल गांधी ने “खून की दलाली करने वाला” एक थे कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी जिसने 12 अगस्त, 2020 को  टीवी डिबेट में अमीश देवगन को “भड़वा” और कई अपशब्द कहे थे अभी 4 दिन पहले कांग्रेस के प्रवक्ता अलोक शर्मा ने रिटायर्ड कर्नल दनवीर सिंह जी को “भड़वा और भोसड़ीवाले” कह कर गाली दी

दिग्विजय सिंह लादेन को “ओसामा जी” कहते थे और सुशील शिंदे ने हाफिज सईद को “हाफिज साहब” कहा असम का कांग्रेस नेता भूपेन बोराह ने कहा राहुल गांधी ने 15 मिनट में सब बातें साफ़ कर दी मुझे कांग्रेस छोड़ने के लिए क्या खास समझा दिया महान राहुल गांधी ने? अभी कर्नाटक में सिद्धारमैया और शिवकुमार में लठ्ठमलट्ठा हो रही है

इतना ही नहीं आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ममता उन्हें बंगाल में नहीं आने देती लेकिन कांग्रेस ने ममता के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया क्योंकि वैसे भी कांग्रेस राष्ट्रपति मुर्मू से नफरत करती है

इज़रायल के विपक्ष से नहीं सीख सकते तो पाकिस्तान के विपक्ष की हालत देख ले कांग्रेस और राहुल गांधी यहां विपक्ष में रह कर लोकतंत्र की पूरी मौज ले रहे हो, मोदी को स्पीकर को, चुनाव आयोग को सबको गाली देते हो और दूसरी तरफ पाकिस्तान में इमरान खान की हालत देख लो क्या तुम्हारी भी वैसी हालत कर देनी चाहिए जिससे पता चले कि “बदले की कार्रवाई” क्या होती है

बिहार में बड़े बदलाव की बयार, नितीश कुमार की राज्यसभा की राह के साथ नए समीकरण और BJP का बड़ा उभार


बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। दरअसल, सियासत में कई बार ऐसे क्षण आते हैं, जब एक निर्णय पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल देता है। इन दिनों बिहार की राजनीति में भी कुछ वैसी ही हलचल दिखाई दे रही है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता की धुरी बने रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की सुर्खियों ने सियासी गलियारों में नए समीकरणों की अटकलें तेज कर दी हैं। यह केवल एक नेता के पद परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत भी है। इस बदलाव से पूरे राज्य की राजनीति की दिशा और दशा दोनों प्रभावित होंगी। नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने से बिहार में भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक अवसर होगा। लंबे समय तक सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद पहली बार भाजपा को बिहार में मुख्यमंत्री पद हासिल करने का मौका मिल सकता है। राज्य की राजनीति में भाजपा का सफर आसान नहीं रहा है। एक समय ऐसा था जब पार्टी का जनाधार सीमित था और वह मुख्यतः गठबंधन की राजनीति पर निर्भर थी। भाजपा ने लगातार कठिन परिश्रम, समर्पित सेवा भावना और विकास की राह से जीरो से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया है।

JDU से ज्यादा सीटें होने के बावजूद बीजेपी द्वारा अपना मुख्यमंत्री नहीं बनाने की असली वजह थी राज्य में अपना जनाधार बनाना। मौका मिलते ही बीजेपी ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया। पहली बार गृह मंत्रालय अपने पास रख स्पष्ट दे दिया कि खेला होने वाला है।  

दो दशक की राजनीति के बाद नए सत्ता समीकरण की शुरुआत
नीतीश कुमार ने राज्यसभा में जाने के लिए नामांकन भर दिया है। उनके साथ जद (यू) के रामनाथ ठाकुर, भाजपा के नितिन नवीन व शिवेश कुमार तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने भी नामांकन किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मौके गवाह बनने पटना पहुंचे हैं। नामांकन के बाद एनडीए नेताओं के साथ बैठक कर वो नई सरकार के गठन पर चर्चा भी कर सकते हैं। यह सिर्फ एक नेता के राज्यसभा पहुंचने की नहीं, बल्कि बिहार की 20 साल पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के अंत और नए सत्ता समीकरण की शुरुआत है। नीतीश कुमार 75 वर्ष के हो चुके हैं। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने भारी जीत हासिल की। भाजपा अकेले 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जद (यू) ने 85 सीटें जीतीं। चुनाव परिणामों को पीएम मोदी की बेहद लोकप्रियता का परिणाम माना गया। चुनाव के बाद नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन मात्र चार महीने बाद यह निर्णय ले लिया है। जेडीयू के लोग इसे नीतीश की अपनी मर्जी बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे राज्य की राजनीति से सम्मानित विदाई के रूप में देखा जा रहा है।

बेटे के लिए बिहार की राजनीति, अपने लिए केंद्र की सियासत
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना बिहार राजनीति में बड़ा बदलाव है। पर एक सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है कि नीतीश कुमार के इस फैसले से उन्हें हासिल क्या होगा। आम तौर पर मुख्यनेता अपनी कुर्सी नहीं छोड़ते। ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि नेता मृत्युशैया पर होने के बाद भी रिजाइइन देने से बचते रहे हैं। जेल में महीनों बिताने के बाद भी एक नेता ने सीएम का पद नहीं छोड़ा। विधानसभा में बहुमत न होने के बाद भी मुख्यमंत्रियों को ये भरोसा रहा है कि वे अंतिम समय में कोई न कोई विकल्प निकाल ही लेंगे। पर नीतीश कुमार के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। जाहिर है कि सवाल कौंधेगा कि नीतीश कुमार क्यों करने जा रहे हैं? फिलहाल इसके पीछे दो कारण नजर आ रहे हैं। एक तो इससे नीतीश कुमार अपने बेटे के लिए बिहार में राजनीति का नया रास्ता बना पाएंगे। दूसरे, वे राज्य की राजनीति से निकलकर देश की राजनीति में पैर रख सकेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नीतीश कुमार को केंद्रीय मंत्री का पद मिल सकता है।

नीतीश के बाद निशांत संभाल सकते हैं पार्टी की कमान
जद (यू) का नेतृत्व नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से थोड़ा हिल-डुल सकता है। नीतीश कुमार ने अपने अलावा पार्टी में किसी को उभरने नहीं दिया। जाहिर है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी में और कोई ऐसा है भी नहीं जिससे पार्टी के बंटने का भी खतरा हो। अब जेडीयू के लोगों के सामने ऑप्शन यही होगा कि वे या तो बीजेपी की छत्रछाया में रहें या बीजेपी जॉइन कर लें। अगर निशांत उप-मुख्यमंत्री बनते हैं, तो पार्टी उनके नाम पर एकजुट रह सकती है। संजय झा जैसे नेता अंतरिम कमान संभाल सकते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म की लीडरशिप के लायक पार्टी में कोई बड़ा नेता नहीं दिख रहा है। ऐसे में नीतीश के बाद निशांत ही पार्टी की कमान संभाल सकते हैं। या फिर भविष्य में पार्टी का विलय बीजेपी में हो जाए तो कोई अचंभित करने वाली बात नहीं होगी।

जद-यू में नीतीश के बाद बड़ा नेता नहीं जो सर्वसम्मति से उभर सके
हालांकि जद (यू) में श्रवण कुमार, अशोक चौधरी और विजय कुमार चौधरी जैसे दूसरे दर्जे के नेता हैं, लेकिन कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो सर्वसम्मति से उभर सके। ऐसे में नीतीश के बेटे निशांत जेडीयू के लिए सबसे अच्छा विकल्प प्रतीत होते हैं। नीतीश देश के इकलौते क्षेत्रीय राजनेता हैं जिन्होंने लंबे समय तक अपने बेटे को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन अब जब निशांत को आगे बढ़ाया जा रहा है और नई सरकार में उन्हें जगह मिलने की उम्मीद है, तो कई लोग सोच रहे हैं कि क्या बहुत देर हो चुकी है। जेडीयू के एक नेता ने कहा कि निशांत की ताकत और कमजोरी दोनों यही है कि वह नीतीश कुमार के बेटे हैं। उन्हें एक नेता के रूप में तेजी से विकसित होना होगा। उन्होंने अपने पिता की राजनीति को करीब से देखा है। उन्हें बस बिहार में घूमना-फिरना है। अपने पिता की समृद्ध राजनीतिक विरासत के कारण उन्हें जनता का समर्थन और आशीर्वाद दोनों मिलेगा।

बिहार के सीएम का नाम चौंकाने वाला भी हो सकता है!
बीजेपी के लिए यह किसी बड़े अवसर से कम नहीं है। 89 सीटों के साथ, वह अगले कुछ वर्षों में जेडीयू और अन्य छोटे सहयोगी दलों के साथ निर्बाध रूप से सत्ता में बने रहने की उम्मीद कर सकती है। उसकी असली चुनौती 2030 के बाद आएगी और उसे एक मजबूत नेता नियुक्त करने की आवश्यकता है। सुशील मोदी के निधन के बाद से, भाजपा के पास राज्य में और भी चेहरे हैं। 2024 के बाद ही उसे सम्राट चौधरी के रूप में एक मजबूत नेता मिला, जो ओबीसी कुशवाहा निर्वाचन क्षेत्र से आते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उनका नाम भी है। लेकिन बीजेपी पिछले एक दशक से मुख्यमंत्री के रूप में कई बार चौंकाने वाले नाम भी सामने लाई है। इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि बिहार के नए मुख्यमंत्री का नाम सबको चौंकाने वाला भी हो सकता है। हाल ही में बीजेपी ने बिहार से ही नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सबको चौंकाया है।

बिहार में जीरो से शिखर तक का भाजपा का शानदार सफर
बिहार में भाजपा का सफर वास्तव में “जीरो से शिखर” तक पहुंचने की कहानी है। शुरुआती दौर में पार्टी की मौजूदगी बहुत सीमित थी। लेकिन संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं की मेहनत और राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति ने धीरे-धीरे पार्टी को मजबूत किया। अटल-अडवाणी के दौर से शुरू हुआ यह विस्तार अब पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा है। बिहार की राजनीति लंबे समय तक गठबंधन की राजनीति से संचालित होती रही है। भाजपा ने भी इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए रणनीति बनाई। जदयू के साथ गठबंधन ने भाजपा को राज्य में स्थायित्व और विस्तार दोनों दिया। लेकिन जनता-जनार्दन के अटूट विश्वास और कार्यकर्ताओं की असीम मेहनत से भाजपा का संगठन इतना मजबूत हो गया कि अब वह अपने दम पर सत्ता का दावेदार बन चुका है। यही कारण है कि सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भाजपा पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाल सकती है।

मंदिर निर्माण पर हो रही थी बात, आरफा खानम ने रखी ‘मस्जिद’ की डिमांड: हिंदू महिलाओं ने लताड़ा तो RSS को देने लगीं गाली

             मंदिर निर्माण की माँग को आरफा ने दिया सामप्रदायिक रंग (फोटो साभार : YT_@TheWireNews)
प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फँस गई हैं। नोएडा की एक पॉश सोसाइटी में मंदिर निर्माण के सीधे-साधे मुद्दे को ‘सांप्रदायिक’ रंग देने और अपना पुराना ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ चमकाने पहुँची आरफा को वहाँ की जागरूक हिंदू महिलाओं ने ऐसा करारा जवाब दिया कि उन्हें वहाँ से उल्टे पाँव भागना पड़ा।

आरफा, जो हिंदू महिलाओं को ‘गैसलाइट’ करने और उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराने गई थीं, खुद ट्रोल होकर लौटी हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आरफा खानम की पत्रकारिता का मकसद जमीन की हकीकत दिखाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे में बीजेपी, RSS और मुस्लिम एंगल घुसाकर समाज में दरार पैदा करना है।

वीडियो की हकीकत: आरफा के ‘मस्जिद कार्ड’ पर महिलाओं का जवाब

सोशल मीडिया पर आरफा खानम का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे नोएडा के सेक्टर 15ए की महिलाओं से बातचीत कर रही हैं। इस वीडियो में महिलाओं अपनी माँग को बताती है कि उन्हें मंदिर सोसाइटी में चाहिए, जिससे काफी दूर आना-जाना, ट्रैफिक में फँसना बंद हो जाएगा और बुजुर्गों के लिए सुविधा हो जाएगी। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कोई भी महिला आरफा से ना तो बदतमीजी से बातचीत कर रही है, ना ही तेज आवाज में चिल्ला रही है और ना ही धक्का-मुक्की कर रही हैं।

आरफा ने जितने भी सवाल वहाँ खड़ी हिंदू महिलाओं से पूछे है उनके जवाब उन्हें बेहद शांतिपूर्ण तरीके से मिला है। अपना मुस्लिम और मस्जिद विक्टिम कार्ड घुसाने पर भी महिलाओं ने उन्हें ये ही कहाँ है कि आप अपना एजेंडा यहाँ मत लाओ। मंदिर की बात है, मंदिर तक रहने दो। वीडियो में आप सुन सकते हैं कि जब मंदिर की माँग ज्यादा कर रही लोगों की तादाद ज्यादा थी, तो प्रोपेगेंडाई पत्रकार आरफा ने मस्जिद बनवाने पर भी सवाल कर डाला। आरफा महिलाओं से कहने लगी कि फिर तो मस्जिद भी बनना चाहिए।

इस सवाल का जवाब महिलाओं ने बेहत लहजे से दिया कि जब सोसाइटी में 99.99 प्रतिशत हिंदू लोग है तो मस्जिद बनवाना या ना बनवाना कहाँ से आ जाता है। फिर आरफा ने महिलाओं की तादात को ‘मेजोरिटिज्म’ शब्द से नवाजा, जिसका जवाब भी हिंदू महिलाओं ने बेहद तरीके और करारा दिया। वहाँ खड़ी एक हिंदू महिला ने आरफा को कहा- “हमें ऐसा लग रहा है कि अपने ईश्वर का नाम लेने में क्रिमिनल करार दिया जा रहा है।”

महिला ने आरफा को सीधा मुँह यह भी जवाब दिया कि यह महीने आज से 40 साल पहले नोएडा के मास्टर प्लान में मंदिर के लिए डेजिग्नेटिड यानि नामित थी। 40 साल पहले इतना ट्रैफिक नहीं हुआ करता था और लोग आसानी से दूर मंदिर जा सकते हैं। लेकिन आज ट्रैफिक बढ़ रहा है, समय नहीं है, लोग बुजुर्ग है, कुछ दिव्याँग है, तो कुछ लोगों के पास गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है कि वह उन्हें मंदिर तक ले जाए।

वहाँ खड़ी एक महिला ने तो साफ कहा कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, ये हम लोगों की माँग है। इसके अलावा भी आरफा को हिंदू महिलाओं ने उनके कट्टरपंथी एजेंडे पर काफी बढ़िया जवाब दिया है, जिसे आप वीडियो में सुन सकते हैं। महिलाओं ने आरफा को ये ही कहा कि आप अपने एजेंडा यहाँ मत थोपिए… महिलाओं ने साफ कहा कि हमें पता है आपका एजेंडा क्या होता है, आप एक Biased साइड के लिए रिपोर्टिंग करती है। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स ने आरफा के इस वीडियो पर काफी हँसी उड़ाई। कुछ लोगों ने लिखा कि जनता अब नफरत भरे एजेंडे पर यकीन नहीं कर रही है। अब जनता झगड़े के बजाय फैक्ट्स पर यकीन कर रही है।

The Wire का खेल: एडिटिंग का मायाजाल और फर्जी हेडलाइन

जब ग्राउंड पर आरफा का एजेंडा बुरी तरह फेल हो गया, तो उनके संस्थान ‘The Wire’ ने डैमेज कंट्रोल के लिए अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला। इस वीडियो का टाइटल दिया गया- ‘मंदिर का समर्थन पर ‘लोकतंत्र’ से समस्या, उग्र महिलाओं ने आरफ़ा के साथ की धक्का-मुक्की’।

इस टाइटल और वीडियो की एडिटिंग को गौर से देखें तो ‘The Wire’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो जाता है। वीडियो की शुरुआत में ही आरफा इसे ‘अमीर लोगों की सोसाइटी’ और ‘BJP वोटर्स’ का गढ़ बताकर नफरत फैलाना शुरू कर देती हैं। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव पास हैं और RSS पूरी हरकत में आ गई है, हमारे समाज का हिंदूकरण कम पड़ गया था जो अब घर तक मंदिर की बात आ गई है।”

आरफा ने जानबूझकर इसे ‘RSS का प्रोजेक्ट’ करार दिया और अपने दर्शकों से कहा कि ‘आप 100 साल के RSS को देख रहे हैं कि वे कैसे घुसपैठ कर रहे हैं।’ ‘The Wire’ ने वीडियो को इस तरह से काट-छाँट कर पेश किया है ताकि हिंदू महिलाएँ ‘उग्र’ दिखें, जबकि असल में आरफा खुद महिलाओं को उकसा रही थीं और उन्हें अपराधी साबित करने पर तुली हुई थीं। वीडियो में कहीं भी वह धक्का-मुक्की नहीं है जिसका दावा हेडलाइन में किया गया है। लेकिन आरफा अपनी आदत के मुताबिक ‘डोंट टच मी’ कहकर खुद को पीड़ित दिखाने का नाटक करती रहीं।

क्या है पूरा मामला? क्यों हो रही है मंदिर की माँग?

नोएडा के सेक्टर 15A का यह पूरा मामला कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों की बुनियादी सुविधा और उनके अधिकारों का मामला है। इस सोसाइटी में रहने वाले लगभग 99 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू लोग चाहते हैं कि उनकी सोसाइटी के भीतर एक मंदिर बन जाए। इसके पीछे बहुत ही साधारण वजहें हैं।

पहली वजह यह है कि सोसाइटी के पास कोई मंदिर नहीं है, जिसके कारण बुजुर्गों को पूजा-पाठ के लिए काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी समस्या ट्रैफिक और जाम की है, मुख्य मंदिर दूर होने की वजह से लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, वहाँ की महिलाओं का कहना है कि 40 साल पहले जब इस इलाके का नक्शा बना था, तभी यह जमीन मंदिर के लिए ही तय की गई थी।

लेकिन इस सीधी-सादी माँग को पत्रकार आरफा खानम ने एक अलग ही रंग दे दिया। उन्हें इसमें ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश और जमीन हड़पने जैसा गंभीर मामला नजर आने लगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे एक खतरे की घंटी (वेक-अप कॉल) बताया। जबकि हकीकत यह है कि वहां के निवासी सिर्फ अपनी ही जमीन पर अपनी आस्था और सुविधा के लिए मंदिर बनवाना चाहते हैं, जो उनका अधिकार है।

एजेंडा पत्रकारिता की हार

आरफा खानम की पूरी रिपोर्टिंग का मकसद यह था कि सेक्टर 15A को ‘RSS की प्रयोगशाला’ साबित किया जाए। उन्होंने जानबूझकर बातचीत में नरेंद्र मोदी और BJP को घुसाया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मैजोरिटी टेररिज्म’ का नैरेटिव सेट कर सकें। वे वहाँ रिपोर्टिंग करने नहीं, बल्कि महिलाओं को डराने और उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने गई थीं।

आरफा खानम वही चेहरा हैं जिन्होंने शाहीन बाग के समय मुस्लिमों को सलाह दी थी कि ‘विचारधारा न बदलें, बस रणनीति बदलें।’ नोएडा में भी वे इसी ‘रणनीति’ के साथ आई थीं, पहले निष्पक्ष पत्रकार होने का ढोंग करना और फिर धीरे से ‘मस्जिद’ और ‘मुस्लिम अधिकार’ का रोना रोकर हिंदुओं को दबाना।

लेकिन नोएडा की इन महिलाओं ने उनकी इस चाल को भांप लिया और उन्हें साफ कह दिया ‘अपना एजेंडा यहाँ मत चलाइए।’ जब आरफा का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ नहीं चला, तो वे आक्रामक हो गईं और बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने लगीं।

राहुल गांधी और विपक्ष इज़रायल के विपक्ष की चरणों की धूल भी नहीं है; कांग्रेस के एक बार मंसूबे धरे रह गए

सुभाष चन्द्र

Strait of Hormuz बंद होने से कांग्रेस की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था कि अब तो भारत को तेल आना बंद हो जाएगा और पेट्रोल के दाम आसमान छूने लगेंगे, फिर मौका मिलेगा मोदी पर हमला करने का। एक कथित राजनीतिक विश्लेषक तो कह रहा था कि पेट्रोल की कीमत 5000 रुपए लीटर हो जाएगी सुबह एक खबर भी दी गई कि ट्रंप प्रशासन ने भारत के रूस से तेल खरीद पर आपत्ति की है लेकिन कांग्रेस और विपक्ष का Bad Luck देखो, अमेरिका ने भारत और अन्य सहयोगियों के रूस से तेल खरीद पर 30 दिन के लिए रोक हटा दी है, यानी मजे से तेल खरीद सकते हैं हाय हाय अब मोदी को कैसे तोड़ेंगे!

India Today पर राजदीप सरदेसाई ने इज़रायल के विपक्ष के नेता Yair Lapid को एक इंटरव्यू में घेरने की कोशिश करते हुए सवाल किया कि क्या आप ईरान में इज़रायल की कार्रवाई का समर्थन करते हैं? राजदीप ने सोचा था शायद Lapid भी राहुल गांधी है जो नेतन्याहू पर बरस पड़ेगा लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा Lapid ने जवाब दिया अमेरिका और इज़रायल ने जो किया वह सही है और पूरा इज़रायल युद्ध में जीत चाहता है राजदीप ने फिर पूछा कि जीत का क्या मतलब है, खामनेई की मौत या ईरान में सत्ता परिवर्तन? इसका जवाब सुनकर राजदीप की हवा निकल गई Lapid ने कहा ईरान इज़रायल का अस्तित्त्व मिटाना चाहता है और हम उसके पास कोई ऐसा हथियार नहीं छोड़ सकते जो इज़रायल को खतरे में डाल दे

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इसी तरह इंडिया टुडे के ही एक अन्य पत्रकार ने पूर्व प्रधानमंत्री Naftali Bennett को उलझाने की कोशिश की उसने भी पूछा आप नेतन्याहू को ईरान के साथ युद्ध में समर्थन करते हैं? Naftali ने भी उसे टका सा जवाब दिया कि हमारे नेतन्याहू से मतभेद हैं लेकिन इज़रायल की हर पार्टी और जनता किसी भी कीमत पर ईरान पर विजय देखना चाहते हैं

ऐसा होता है विपक्ष जबकि हमारे देश में राहुल गांधी और समूचा विपक्ष हर विषय पर मोदी को गाली बकने से बाज़ नहीं आता

पिछले महीने प्रधानमंत्री मोदी के इज़रायली संसद में भाषण से पहले जब नेतन्याहू ने भाषण शुरू किया तो Yair Lapid और उनकी पार्टी के सांसद उठ कर चले गए लेकिन जैसे मोदी ने भाषण शुरू हुआ सभी सांसद वापस आ गए हमारे मीडिया चैनल्स और ANI जैसी News Agency ने भी ढोल पीट दिया कि इज़रायल के विपक्ष ने मोदी का बहिष्कार कर दिया

जबकि संसद कार्यवाही देखने जब भी विदेशी आए भारत विरोधियों के गुलाम राहुल और INDI गठबंधन चील-कौओं की तरह चीखता दिखाई दिया। दूसरे, जनता को इस ग़लतफ़हमी से भी बाहर आना चाहिए कि मीडिया गोदी-मीडिया है। हकीकत यह है बेपेंदी मीडिया आज भी कांग्रेस और INDI गठबंधन का गुलाम है, सिर्फ अपनी TRP के चक्कर में मोदी-मोदी चिल्लाता है। वरना कांग्रेस के खिलाफ इतना बारूद है कि मीडिया अगर उछाले तो कांग्रेस तो क्या सारा INDI गठबंधन जनता में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा।       

Lapid और उसकी पार्टी ने दिल से मोदी का भाषण सुना और उन्होंने कहा कि हमारा आपसे तो कोई विरोध था ही नहीं हमने अपने स्पीकर और सरकार के खिलाफ विरोध प्रकट किया था क्योंकि उन्होंने देश के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को इस सभा में नहीं बुलाया जहां आपने अपनी बात रखनी थी भारत और इज़रायल की मैत्री तो अटूट है 

भाषण समाप्त होने के बाद मोदी सभी सांसदों से मिले और सबसे पहले Lapid के साथ गर्मजोशी से गले मिले 

अमेरिकी संसद में भी जब मोदी का एक बार भाषण हुआ था, तब भी पक्ष-विपक्ष से सभी सांसद उनसे हाथ मिलाने को आतुर थे और उनमें वे भी शामिल जो मोदी के संसद में बोलने पर आपत्ति जता रहे थे

मेरा ख्याल है राहुल गांधी और विपक्ष के सभी नेता इज़रायल के विपक्ष से कभी कुछ नहीं सीख सकते इज़रायल के विपक्ष के लिए देश पहले है और भारत के विपक्ष के लिए देश की कोई कीमत नहीं है आज हर चैनल पर विपक्षी नेता ऐसे चीख रहे हैं जैसे पागल हो गए हों खामनेई के गम में और जैसे मोदी ने ही खामनेई को मारा हो

सोनिया गांधी, कांग्रेस और विपक्ष क्या सुन्नी देशों में मुसलमानों और भारतीयों का नरसंहार चाहते हैं?

सुभाष चन्द्र

युद्ध अमेरिका और इज़रायल का ईरान के खिलाफ हो रहा है जिसमें मारा गया खामनेई जो कभी भारत के पक्ष में नहीं रहा भारत तो छोड़ो, उसने अपने ईरान में भी लोगों को कल्पना से परे यातनाएं दी लेकिन उसे सोनिया गांधी और समूचा विपक्ष “पीड़ित” (victim) बना कर पेश कर रहे है। वो भूल जाते हैं कि खामनेई भी नेतन्याहू और ट्रंप के साथ वही करता जो उसके साथ हुआ

और अभी भी ईरान धमकी दे रहा है कि वह इज़रायल को दुनिया के नक़्शे से मिटा देगा और नेतन्याहू की हत्या कर देगा

कांग्रेस की यहूदी और हिंदुओं से जानी दुश्मनी है आज ईरान की पहुंच अमेरिका तक नहीं है तो वह सुन्नी देशों में अमेरिका के अड्डों पर हमले कर रहा है यानी सोनिया गांधी, कांग्रेस और विपक्ष को सुन्नी मुसलमानों के नरसंहार से कोई गुरेज नहीं है इतना ही नहीं खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों का भी ईरान नरसंहार करे तो उससे भी इन लोगों को बुरा नहीं लगेगा 

UAE में 45 लाख, सऊदी अरब में 27 लाख, ओमान में 6.5 लाख और बहरीन में 3.5 लाख, कतर में 30 लाख में से 8.5 लाख, कुवैत के 50 लाख में 10 लाख भारतीय रहते हैं 

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
दूसरी तरफ ईरान के साथ भारत का व्यापार केवल $1.68 बिलियन है जबकि सऊदी अरब के साथ $ 41.88 बिलियन; UAE के साथ $ 100 बिलियन; कुवैत के साथ $ 10.22 बिलियन;

क़तर के साथ $ 19 बिलियन; ओमान के साथ $ 10.61 बिलियन और बहरीन के साथ $ 1.64 बिलियन डॉलर  व्यापार है 

कांग्रेस, विपक्ष और फर्जी गांधी परिवार चाहता है ऐसे देशों से व्यापारिक संबंध तोड़ कर हम ईरान के साथ खड़े हो जाएं और लाखों भारतीयों का जीवन खतरे में डाल दें जबकि कोई मुस्लिम देश भी ईरान के साथ नहीं खड़ा है मनमोहन सिंह के समय सुपर प्राइम मिनिस्टर सोनिया गांधी के समय में भारत सरकार ने 2011-12 में अमेरिका के UNO में तीन प्रस्तावों पर ईरान के खिलाफ वोट दिया था आज सोनिया गांधी परेशान है कि मोदी ईरान के पक्ष में क्यों नहीं बोल रहे है और उसकी मौत पर कोई बयान भी क्यों नहीं दिया लेकिन वह भूल रही है है कि 2006 में सद्दाम हुसैन के और 2011 में गद्दाफी के मारे जाने पर सोनिया सरकार खामोश रही थी थी जबकि इराक और लीबिया से हमारे संबंध ख़राब भी नहीं थे वैसे भारत के विदेश सचिव ईरान दूतावास में जाकर शोक प्रकट कर आये हैं

अमेरिका और इज़रायल से बदला लेने के लिए ईरान खाड़ी देशों में किसी हद तक भी हमले कर सकता है और सुन्नी मुसलमानों और भारतीयों का नरसंहार कर सकता है लगता है वह सोनिया, कांग्रेस और विपक्ष के लिए ख़ुशी की बात होगी

आज भारत में शिया मुस्लिम तो बोल रहे हैं लेकिन ईरान के सुन्नी देशों पर हमले पर भारत के सुन्नी क्या सोच कर खामोश हैं? विपक्ष को तो बस One Point Programme है, मामला कुछ भी हो मोदी की गर्दन नापी जाए जब क़तर में 8 भारतीयों को फांसी की सजा हुई थी तब ये लोग उनकी फांसी की प्रतीक्षा कर रहे थे कि उधर फांसी हो और इधर मोदी को बदनाम कर दें लेकिन मोदी उन्हें सुरक्षित निकाल लाया और विपक्षी दलों के मंसूबों पर पानी फिर गया

सौ बात की एक बात है भारत का कोई भी शत्रु हो, वो कांग्रेस को प्रिय होता है लेकिन अब कांग्रेस को प्रतीक्षा करनी चाहिए जब पाकिस्तान भी इज़रायल के निशाने पर होगा जो अभी अफगानिस्तान और बलूचों की मार झेल रहा है अभी ईरान के लिए बहने वाले आंसू पाकिस्तान के लिए बचा कर रखो 

खामेनेई का ‘परमाणु फतवा’ : ईरान के उस न्यूक्लियर प्रोग्राम की कहानी जिसकी वजह से युद्ध के मुहाने पर खड़ा मिडिल ईस्ट

      ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया (साभार- perplexityAI)
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल और अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने मध्य पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। इसके बावजूद ईरान अपने परमाणु ढाँचे को फिर से खड़ा करने की पुकजोर कोशिश में है।

यूँ तो मिडिल ईस्ट में ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से तनाव का केंद्र रहा है पर अब ये अब खुलेआम युद्ध की शक्ल ले चुका है। इजरायल और अमेरिका की हालिया स्ट्राइक्स ने नतांज जैसी प्रमुख सुविधाओं को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन ईरान का कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

ताजा हालात: न्यूक्लियर फैसिलिटी का क्या हुआ?

ईरान की प्रमुख न्यूक्लियर साइट नतांज पर हाल ही में भारी क्षति हुई है। 1 और 2 मार्च 2026 को लिए गए सैटेलाइट इमेजेस से पता चलता है कि कम्प्लेक्स के अंदर कम से कम दो छोटी बिल्डिंग्स को गंभीर नुकसान पहुँचा, जो एक दिन पहले बिल्कुल सुरक्षित दिख रही थीं।

ईरान के एटॉमिक एनर्जी चीफ मोहम्मद एस्लामी ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर अमेरिका और इजरायल पर दो हमलों का आरोप लगाया। यह नुकसान जून 2025 के युद्ध के बाद आया, जब इजरायल की ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ और अमेरिका की ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ ने नतांज, इस्फहान और फोर्डो जैसी साइट्स को निशाना बनाया था।

अमेरिका ने दावा किया कि कार्यक्रम ‘ऑब्लिटरेट’ यानी खत्म हो गया, लेकिन सैटेलाइट इमेजेस दिखाते हैं कि ईरान पुनर्निर्माण कर रहा है। फरवरी 2026 में अमेरिका की ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजरायल की ‘ऑपरेशन रोअरिंग लायन’ ने फिर से न्यूक्लियर और मिसाइल साइट्स को टारगेट किया।

               ईरान में न्यूक्लियर फैसिलिटी में हो रहे काम की सैटेलाइट तस्वीर, साभार- The times of Israel

IAEA का अनुमान है कि ईरान के पास 440 किलो 60% यूटेनियम स्टॉक है, जो 10 बम बना सकता है, लेकिन इसकी लोकेशन अज्ञात है। नतांज ईरान का मुख्य संवर्धन केंद्र था, जहाँ हजारों सेंट्रीफ्यूज लगे थे, लेकिन हमलों के बावजूद IAEA को इंस्पेक्शन में बाधाएँ आ रही हैं। ईरान ने नए अंडरग्राउंड बंकर्स बना लिए हैं, जो हमलों से सुरक्षित हैं।

US-इजरायल की चिंताएँ और बयानबाजी

इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अगर हमला न होता, तो ईरान का कार्यक्रम ‘महीनों में इम्यून’ हो जाता, क्योंकि वे अंडरग्राउंड बंकर्स बना रहे थे। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि जून 2025 के हमलों के बाद ईरान ने नए साइट्स बनाए, जो मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम को सुरक्षित कर देते। नेतन्याहू ने इसे ‘क्विक एंड डिसाइसिव’ बताया और कहा कि यह रीजिम चेंज यानी ईरान की सत्ता के पतन की स्थितियाँ पैदा करेगा।

अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ट्रंप का लक्ष्य ईरान का ‘माइंडसेट’ बदलना है, ताकि वे कभी न्यूक्लियर वेपन न बनाएँ। उन्होंने जून 2025 के हमलों को सफल बताया, लेकिन कहा कि नेगोशिएशंस नाकाम रहीं क्योंकि ईरान नहीं माना।

यूएस स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने खुलासा किया कि ईरानी नेगोशिएटर्स ने दावा किया था कि उनके पास 460 किलो 60% एंरिच्ड यूटेनियम है, जो 11 बम बना सकता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए स्ट्राइक्स किए।

CFR के अनुसार, इजरायल ईरान को एक्जिस्टेंशियल थ्रेट मानता है, क्योंकि न्यूक्लियर ईरान मिडिल ईस्ट को डेस्टेबलाइज करेगा। अमेरिका ने JCPOA से 2018 में बाहर निकलने के बाद सैंक्शंस लगाए, और अब 2026 में ओमान में बातचीत जारी है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम: शुरुआत से आज तक

1950-1970: ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू किया।
1979: ईरानी क्रांति के बाद कार्यक्रम धीमा पड़ा।
2002: नतांज़ और अराक में गुप्त परमाणु स्थलों का खुलासा हुआ।
2015: JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) हुआ, जिसमें ईरान ने यूरेनियम संवर्धन सीमित करने का वादा किया।
2018: अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलकर कठोर प्रतिबंध लगाए।
2025: इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी की।

ईरान न्यूक्लियर हथियार क्यों चाहता है?

ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ के तहत अमेरिकी मदद से शुरू हुआ था। 1979 की इस्लामिक रेवोल्यूशन के बाद सस्पेंड हुआ, लेकिन 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक वॉर में केमिकल अटैक्स के बाद रिवाइव हो गया। ईरान इसे ‘पीसफुल’ बताता है, लेकिन वेस्टर्न एनालिस्ट्स कहते हैं कि यह वेपन रिसर्च है।

इसके पीछे ईरान का मकसद इजरायल के न्यूक्लियर आर्सेनल और अमेरिकी थ्रेट्स के खिलाफ खुद को मजबूत करना है। ईरान के पास मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल आर्सेनल है, जो 2000 किमी तक मार कर सकता है। न्यूक्लियर वेपन से वे रीजनल पावर बनेंगे, प्रॉक्सीज (हिजबुल्लाह, हूती) को स्ट्रॉन्ग करेंगे। IAEA रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान ने 60% एंरिचमेंट बढ़ाया, जो वेपन्स-ग्रेड (90%) के करीब है।

ईरान के अधिकारी कहते हैं कि ‘कॉर्नर्ड कैट’ होने पर डॉक्ट्रिन चेंज कर सकते हैं। ‘कॉर्नर्ड कैट’ (घिरी हुए बिल्ली) का मतलब है कि जब कोई जीव खतरे में घिर जाता है, तो वह आक्रामक हो जाता है – यानी ईरान भी अस्तित्व पर संकट दिखने पर अपनी नीति बदल सकता है।

अप्रैल 2024 में IRGC के न्यूक्लियर सिक्योरिटी कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद हग्तलाब ने कहा कि अगर इजरायल ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमला करता है या धमकी देता है तो ईरान अपना ‘न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन रिवाइज’ (परमाणु नीति संशोधित) कर सकता है।

अप्रैल 2024 के इजरायल पर ड्रोन-मिसाइल हमले के बाद उन्होंने धमकी देते हुए कहा था, “हमारे पास इजरायल की न्यूक्लियर साइट्स की जानकारी है, और जवाबी मिसाइल हमले तैयार हैं।”

इजरायल-अमेरिका क्यों रोकना चाहते हैं?

इजरायल के लिए ईरान एक्जिस्टेंशियल थ्रेट है। नेतन्याहू कहते हैं कि 95% मिडिल ईस्ट की परेशानियाँ ईरान से हैं। न्यूक्लियर ईरान सऊदी, UAE जैसे देशों को आर्म्स रेस में धकेलेगा। इजरायल ने पहले इराक (1981), सीरिया (2007) के रिएक्टर्स बम किए।

अमेरिका ईरान को US इंटरेस्ट्स के खिलाफ मानता है। ट्रंप ने 2018 में JCPOA छोड़ा क्योंकि यह अस्थायी था। 10-15 साल बाद खत्म हो जाता, एंरिचमेंट फिर शुरू हो जाता।

ट्रंप इसे कमजोर मानते थे, इसलिए अधिक से अधिक सैंक्शंस लगाए। उनका कहना था कि नई डील ‘इंडेफिनिट’ यानी हमेशा के लिए होनी चाहिए। उनका लक्ष्य ये है कि कोई न्यूक्लियर वेपन नहीं हो, मिसाइल प्रोग्राम खत्म किया जाए और प्रॉक्सी सपोर्ट मिलना बंद हो।

ट्रंप के स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने कहा कि ईरान ने ‘इनएलियनेबल राइट’ माँगी, लेकिन US ने कहा कि हम रोकेंगे। रीजिम चेंज यानी सत्ता में बदलाव से पीस डील्स होंगी। रीजिम चेंद को लेकर ईरान में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते आए हैं। इस दौरान खामेनेई ने हजारों लोगों को मरवा दिया।

ट्रंप ने जनवरी 2026 में इसे लेकर खामेनेई को चेतावनी भी दी थी कि ईरान प्रोटेस्टर्स की हत्या बंद करे, वरना मिलिट्री एक्शन लिया जाएगा।

क्या है ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन

ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन सरल शब्दों में यही कहता है कि ईरान परमाणु बम या हथियार कभी नहीं बनाएगा। यह खामेनेई के फतवे पर टिका है, जो इस्लामिक नियमों से आता है। ईरान का दावा है कि उसका प्रोग्राम बिजली और मेडिकल के लिए है। NPT संधि में शामिल होने से उन्हें यूरेनियम संवर्धन (3-5%) का अधिकार है। लेकिन वे इसमें 60% तक पहुँच गए, जो बम के करीब (90%) है।

ईरान ने न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन 2015 के JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) समझौते के बाद उसने कई उल्लंघन किए हैं। IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) का कहना है कि ईरान ने पर्छिन और लाविसान-शियन साइट्स जैसी जगहों पर गुप्त अनुसंधान किया है।

डॉक्ट्रिन के अनुसार ईरान का कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है, लेकिन 60% तक यूरेनियम संवर्धन (सिविल उपयोग के लिए सामान्यतः 3-5% पर्याप्त) ने संदेह पैदा कर दिया है।

खामेनेई के ‘परमाणु फतवा’ की सच्चाई 

खामेनेई का फतवा ईरान द्वारा दुनिया को परमाणु हथियारों को ‘हराम’ यानी इस्लामिक नियमों में निषिद्ध के तौर पर बताकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, लेकिन असल में यह एक फर्जी नैरेटिव है।

अटलांटिक काउंसिल के विश्लेषण के अनुसार, 2004 में तत्कालीन न्यूक्लियर नेगोशिएटर हसन रूहानी ने यूरोपीय देशों को बताया कि खामेनेई ने फतवा जारी किया है, जो NPT से ज्यादा मजबूत है।

2003 में इराक इनवेजन के बाद खामेनेई ने कहा, ‘हम बॉम्ब नहीं चाहते।’ 2004 में रूहानी ने EU को बताया कि फतवा है। लेकिन खामेनेई ने कभी लिखित फतवा नहीं जारी किया।

उनके भाषणों में भी ‘उपयोग’ को हराम कहा गया, प्रोडक्शन या स्टोरेज पर कोई बात नहीं की गई।उनकी वेबसाइट पर 85 बयानों में सिर्फ उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

यह नैरेटिव 2003 इराक इनवेजन के बाद शुरू हुआ, जब ईरान ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसे इस्तेमाल किया। अब अगर बात करें शिया लॉ की तो शिया कानून में फतवा स्थायी नहीं बल्कि रिवर्सिबल (बदलने योग्य) है, जैसे 1890s टोबैको फतवा। अधिकारी जैसे अली अली (2021) ने कहा: “कॉर्नर्ड कैट अलग व्यवहार करेगी।”

शिया लॉ में फतवा रिवर्सिबल है। अलवी ने कहा, ‘कॉर्नर्ड कैट अलग बिहेव करेगी।’ साइंटिस्ट्स कहते हैं कि खामेनेई कल स्टांस चेंज कर सकते हैं। यह पॉलिटिकल टूल है, जैसे 1890 के दशक में जारी हुआ तंबाकू फतवा।

तंबाकू फतवा की कहानी ऐसी है कि काजर सत्ता में नासिर अल-दीन शाह ने 1890 में ब्रिटेन को तंबाकू व्यापार का एकाधिकार दे दिया। इसके बाद धर्मगुरु मिर्जा हसन शिराजी ने दिसंबर 1891 में फतवा जारी किया, “तंबाकू का उपयोग इमाम महदी के खिलाफ युद्ध है।” इसके बाद लाखों ईरानियों ने तंबाकू पीना बंद कर दिया।

ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम की पूरी कहानी

ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1957 में अमेरिका की मदद से शुरू हुआ था, जब शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ योजना के तहत सहयोग हुआ। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह कार्यक्रम निलंबित हो गया, लेकिन 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान इसे पुनर्जनन मिला। 2000 के दशक में नतांज और फोर्डो जैसी गुप्त साइटों का खुलासा होने पर IAEA ने सवाल उठाए।

2015 में JCPOA समझौते से यूरेनियम संवर्धन सीमित (3.67%) हुआ और IAEA निरीक्षण बढ़े। 2018 में ट्रंप ने इससे बाहर निकल गए और कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में ईरान ने ब्रेकआउट टाइम (बम बनाने की अवधि) कम कर दिया।

2024 में ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला किया। जून 2025 में इजरायल-अमेरिका ने नतांज, इस्फहान पर स्ट्राइक्स किए, और IAEA ने नवंबर 2024 में 182 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम का अनुमान लगाया। फरवरी 2026 में फिर हमले हुए।

इस कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा कर दिया। इजरायल-ईरान के बीच टकराव अब बढ़ गया है और प्रॉक्सी वॉर तेज हुए हैं। सऊदी अरब ने कहा है कि ईरान को हथियार मिले तो हमें भी बनाने होंगे। सबसे चिंताजनक बात ये है कि IAEA को ईरान के स्टॉक की जगहों का पता नहीं है जो सबसे बड़ा खतरा है।

मिडिल ईस्ट का क्या है भविष्य: रीजिम चेंज या आर्म्स रेस?

ईरान के न्यूक्लियर संकट को लेकर भविष्य देखा जाए तो दो मुख्य रास्ते दिख रहे हैं। पहला, या तो रीजिम चेंज हो यानी ईरानी सरकार का पतन होगा और या फिर मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस शुरू होगी। इसमें देशों के बीच हथियारों की होड़ लगेगी और स्थिति और बदतर होती चली जाएगी।

हालिया इजरायल-अमेरिकी स्ट्राइक्स ने ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम का मटेरियल और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स अभी भी ईरान के पास बरकरार है।

इसके अलावा ओमान में चल रही डिप्लोमेटिक टॉक्स फेल हो चुकी हैं, जिससे अब पूरी तरह से क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ गई है। ईरान IAEA निरीक्षण के बिना ही अपने कार्यक्रम का पुनर्निर्माण करेगा। इसके कारण ये मिडिल ईस्ट में और अधिक असुरक्षा का माहौल पैदा करेगा।

दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप का रीजिम चेंज का आह्वान इराक (2003) और लीबिया (2011) की तरह जोखिम भरा हो सकता है, जहाँ सरकार गिरने से अराजकता फैल गई। इससे मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस का खतरा मंडरा रहा है, जहां सऊदी अरब जैसे देश भी हथियार बनाने पर उतर आएँगे।