आज गैस की 2 दिन की किल्लत में बिलबिलाने वाले कांग्रेसी अपना जमाना भी याद करें

सुभाष चन्द्र

यूगोस्लाविया के कम्युनिस्ट तानाशाह मार्शल टीटो नेहरू के सबसे अच्छे जिगरी दोस्त थे।  

 उन्होंने ही नेहरू को सलाह दिया था की अपनी जनता को इतना तरसा कर रखो और किसी भी प्राइवेट इंडस्ट्रीज को पनपने मत दो किसी को भी बिजनेस करने की इजाजत मत दो हर चीज में लाइसेंस परमिट कोटा सिस्टम कर दो ताकि जनता पूरी जिंदगी इन सब चीजों के पीछे भागती रहे!

और दूसरी किसी भी चीज पर जनता का ध्यान न जाए!

और नेहरू ने अपने कम्युनिस्ट तानाशाह मित्र मार्शल टीटो के सलाह पर अमल किया!

लेखक 
चर्चित YouTuber 
हालांकि कुछ दशको बाद यूगोस्लाविया के लोगों ने बगावत किया और युगोस्लाविया देश टूट गया आज यूगोस्लाविया नाम का कोई देश इस धरती पर नहीं है बल्कि 6 नए देश बन गए!

 नेहरू ने सबसे पहले रतन टाटा से उनका एयर इंडिया छीनकर उसको सरकारी बना दिया कई सीमेंट की फैक्ट्री और स्टील की फैक्ट्री छीन ली उनको सरकारी बना दी और तो और जो कांग्रेसी कुत्ते कहते हैं कि हमारे नेहरू ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड बनाया तो उन कांग्रेसी  को पता होना चाहिए उसे भी यह गुजराती जैन व्यापारी बालचंद भाई ने बनाया था नेहरू ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड भी बालचंद भाई से छीन लिया!

मतलब की बिजनेस करना इंडस्ट्री खड़ी करना एक अपराध बना दिया गया!

नेहरू के समय में बॉलीवुड को भी कह दिया गया कि आप ऐसी फिल्में बनाए जिसमें उद्योगपति को खून चूसने वाला बताया गया हो जिसमें समाजवाद को शानदार बताया गया हो जिसमें मजदूर नेताओं को मजदूरों के अधिकार के लिए लड़ने वाला बताया गया और फिर ऐसी उसे दौर में सैकड़ो फिल्में बनी!

अब अगर आपको अपना घर बनाना है सीमेंट खरीदना है तो आप तहसीलदार का सैकड़ो चक्कर लगाइए फिर तहसीलदार आपके घर का नक्शा देखेगा उसके बाद वह 10 बोरा प्रति महीना सीमेंट का आपको परमिट बना कर देगा!

परमिट आपको मुफ्त में नहीं मिलेगा बल्कि सीमेंट के साथ-साथ परमिट का भी फीस आपको देना पड़ेगा!

यानी हर महीने आप 10 बोरा से ज्यादा सीमेंट नहीं खरीद सकते फिर आप साल 2 साल अपना घर बनाने के पीछे कुत्ते की तरह भागते रहिए यही काम स्टील में कर दिया!

 कांग्रेस के जमाने में बजाज के अलावा किसी को स्कूटर बनाने की इजाजत नहीं दी क्योंकि जमनालाल बजाज नेहरू के दोस्त थे!

कुछ विदेशी कंपनी आई तो उनके ऊपर इतना लाल फीताशाही लगा दिया कि वह कंपनियां बंद हो गई!

 एक स्कूटर लेना होता था तो 10 साल 20 साल की वेटिंग चलती थी आपको बिजली का कनेक्शन लेना है तो 5 साल की वेटिंग टेलीफोन के कनेक्शन में तो 20 साल की वेटिंग चलती थी!

हर चीज को कांग्रेस ने एक सपना बना दिया

 अगर आपको रेडियो पर गाना सुनना है तो उसके लिए आपको लाइसेंस लेना पड़ेगा और उसे लाइसेंस को हर साल रिन्यू भी करना पड़ेगा!

फिर इंदिरा गांधी आई वह अपने पिताजी से भी 10 कदम आगे चलकर भारत में तमाम निजी बैंक को अपने कब्जे में ले लिया उद्योगपतियों को लात मारा कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बैंक चलाने की बैंक हम चलाएंगे!

किसानों को ट्रैक्टर खरीदने के लिए भी 10 साल की वेटिंग थी!

आप अपने दादाजी से पूछिएगा आप अपने परदादा जी से पूछिएगा कि भारत में क्या माहौल होता था!

 आज जो कांग्रेसी  कहते हैं कि इंडियन ऑयल  नेहरू ने बनाया उन कुत्तों को पता होना चाहिए कि यह भी पहले निजी कंपनी थी इसका नाम बर्मा शैल ऑयल हुआ करता था और उसे जमाने में ऐसा होता था कि अगर कोई आदमी 20 बोरा सीमेंट लाने में सफल हो जाता था तो वह कांग्रेस को धन्यवाद देता था कि आज मुझे कांग्रेस की कृपा से 10 बोरा सीमेंट मिला!

या किसी आदमी को बिजली का कनेक्शन मिल जाता था तो वह इंदिरा गांधी का शुक्रिया अदा करता था कि आज मुझे इंदिरा गांधी की वजह से बिजली का कनेक्शन मिल गया!

नरेंद्र मोदी ने सबसे बड़ी गलती यह कर दी कि जो गैस कनेक्शन लग्जरी मानी जाती थी उसे मोदी जी ने सबको दे दिया सब्सिडी पर दिया और उसे उज्जवला योजना के तहत 12 करोड़ गैस कनेक्शन दे दिया गैस पर लाइन खत्म हो गई सब कुछ ईजी मिलने लगा था किसी भी चीज में ना लाइसेंस सिस्टम रहना परमिट सिस्टम रहा!

आज अगर आपको कार चाहिए तो आप तुरन्त कार ले सकते हैं स्कूटर ले सकते हैं बिजली मोबाइल टेलीफोन सब कुछ है आपको जितना सीमेंट चाहिए उतना सीमेंट ले सकते हैं कोई भी सरकारी सुविधा का आपको  फॉर्म भरना है या कुछ भी करना है सब कुछ ऑनलाइन है!

कांग्रेस के जमाने में रेलवे रिजर्वेशन के लिए लंबी-लंबी लाइन लगती थी मोदी के जमाने में सबके मोबाइल में एप आ गया वह लाइन भी खत्म हो गई!

अब ऐसे में अगर गैस की सप्लाई में कोई समस्या होगी तो आम आदमी मोदी को ही गाली देगा क्योंकि उसे मोदी जी ने कांग्रेस के जमाने में  जैसी जिंदगी थी उससे मुक्त कराकर उसे एक सभ्य  इंसान जैसी जिंदगी दे दी तो आप अगर उसकी कोई भी समस्या होगी तो उसे कांग्रेस का जमाना याद नहीं आएगा!

वह तो मोदी को ही गाली देगा?

मुझे याद है कुछ साल पूर्व मेरा एक दोस्त ट्रैफिक जाम में 10 मिनट लेट होने पर गुजरात की भाजपा सरकार को गाली दे रहा था!

तब उसके पिताजी ने बोला बेटा 10 मिनट लेट ही सही पर तुम घर आ तो गए हमने वह जमाना देखा है की 30 दिन में से 20 दिन अहमदाबाद में कर्फ्यू लगा रहता था!

 हर तरफ आगजनी और कत्लोगारद  मची रहती थी कोई अगर बाहर निकलता था तो जब तक वह घर पर नहीं आ जाता था तब तक घर वाले उसकी राह देखते थे दूसरे शहर या गांव से अगर कोई अहमदाबाद आना चाहता था तब वह रेडियो पर समाचार देखता था की अहमदाबाद में माहौल कैसा है!

भाई कांग्रेस कोई मूर्ख नहीं थी जो 70 सालों तक लोगों को गैस का कनेक्शन नहीं दिया उसे पता था कि भारत की जनता को जितना तरसा कर रखो जितना तड़पा कर रखो उतना ही अच्छा है!👍

साभार

एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप का जॉर्ज सोरोस पर बहुत बड़ा खुलासा


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध के लिए कुख्यात अरबपति व्यापारी जॉर्ज सोरोस की बड़ी साजिश का खुलासा किया है। ट्रंप ने कहा कि अरबपति जॉर्ज सोरोस के संगठनों ने भारत और बांग्लादेश समेत कई देशों में उथल-पुथल मचाने के लिए यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) से 26,00,00,000 डॉलर हासिल हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि सोरोस ने इस पैसे का इस्तेमाल दुनिया भर के देशों में अराजकता फैलाने और सरकारें बदलने के लिए काम किया।

ट्रंप ने आरोप लगाया कि 'जॉर्ज सोरोस ने USAID से 26 करोड़ डॉलर हासिल किए और इस पैसे का इस्तेमाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, यूक्रेन, सीरिया, ईरान, पाकिस्तान, भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में अराजकता फैलाने, सरकारें बदलने और निजी लाभ के लिए किया।' ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब उनके प्रशासन ने USAID के बजट को फ्रीज कर दिया है और अमेरिकी विदेशी सहायता पर जांच बढ़ा दी है।
मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि पिछले 15 सालों में, USAID ने सोरोस से जुड़े संगठनों को 27 करोड़ डॉलर से ज्यादा दिए ऐसा ही एक संगठन ईस्ट-वेस्ट मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट है, जिसने सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन के साथ साझेदारी की और USAID से फंड हासिल किया है इस खुलासे ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलनों में अमेरिकी सरकार की भूमिका पर चिंताएं बढ़ा दी हैं
यूएसएड और जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी द्वारा ट्रेनिंग आयोजित कर मोदी सरकार के खिलाफ न्यूज़ फैलाने, फेक नैरेटिव बनाने, उसे सनसनीखेज हेडिंग देने के लिये भारत के 75000 मीडियाकर्मियों को बाकायदा ट्रेंड किया गया।
इन संस्थाओं द्वारा 6000 से ज्यादा मीडिया पर्सनालिटियों को लाखों डॉलर बाँटे गये। प्रशांत भूषण, पुण्य प्रसून वाजपेयी, रवीश कुमार, अजीत अंजुम और साक्षी जोशी जैसे जितने भी मोदी विरोधी पत्रकार हैं - इन सबको यूएसएड से मोटा पैसा दिया गया है।
पिछले कुछ वर्षों से मोदी के खिलाफ जो कई पत्रकार जहर उगल रहे थे, वह दरअसल यूएसएड का पैसा बोल रहा था।

इस्लामी उम्माह के नाम पर भारत की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे इस्लामी कट्टरपंथी, हैदराबाद के अडानी-एलबिट प्लांट की जानकारियाँ की सार्वजनिक: दुश्मन मुल्कों तक पहुँचा रहे डिफेंस सीक्रेट

    भारतीय इस्लामिस्ट हैदराबाद में अडानी-एलबिट JV की गलत तस्वीर पेश कर रहे (साभार- TNM, एलबिट सिस्टम्स )
इस्लामिस्टों की वफादारी दूसरे देशों और नेताओं के लिए एक्सपोर्ट की जाती है। यह वफादारी अक्सर धर्म के आधार पर देशों और नेताओं के लिए बिना किसी शर्म के सपोर्ट और एकजुटता दिखाने के लिए दिखती है। इसके बदले भले ही भारत की विदेश नीति और नेशनल सिक्योरिटी को नुकसान उठाना पड़े।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की इजरायली हमलों में हत्या पर आँसू बहाने वाले ये लोग अब अपनी इजरायल विरोधी भडास को भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर आक्रमण कर निकाल रहे हैं। हैदराबाद में भारत-इजरायल जॉइंट अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया ड्रोन समेत डिफेंस से जुड़े कई हथियार बनाती है। इस पर ये लोग अब हमलावर हैं।

भारत के खिलाफ नफरत फैलाने के दौरान ये भूल जाते हैं कि वे भारत में रहते हैं और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग उनके अपने देश को बाहरी खतरों से सुरक्षा मुहैया कराती है।

भारतीय इस्लामिस्ट हैदराबाद में अडानी-एलबिट जॉइंट वेंचर की खतरनाक रूप से तोड़-मरोड़कर तस्वीर पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और पोस्ट पटे पड़े हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि भारत किस तरह ईरान के खिलाफ इजरायल को हथियार, खासकर हर्मीस 900 UAV ड्रोन एक्सपोर्ट कर रहा है।

वे इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते झगड़े के बीच भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। बताया जा रहा है कि अडानी-एलबिट जॉइंट वेंचर की हैदराबाद फैक्ट्री में बनने वाली ड्रोन का इस्तेमाल इजरायल हमले में कर रहा है। पहले इसका इस्तेमाल गाजा में हुआ और अब ईरान में हो रहा है।

इस्लामिस्ट पोस्ट लिख रहे हैं और इमोशनल वीडियो बना रहे हैं, जिनमें अक्सर अडानी-एलबिट ज्वाइंट वेंचर की हैदराबाद फैक्ट्री की सही लोकेशन की डिटेल्स होती हैं। ऐसी ही एक पोस्ट में, मुशीर खान नाम के एक व्यक्ति ने दावा किया कि इजरायल पिछले 11 सालों से भारत में ड्रोन और मिसाइल बना रहा है और इन ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल पहले इजराइल के फिलिस्तीन के खिलाफ युद्ध में किया गया था और अब ईरान के खिलाफ किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “किसी को यह पसंद नहीं आता, जब आपके पड़ोस में किसी दूसरे देश के लिए हथियार बनाने वाली फैक्ट्री हो।”  

अनीस अहमद नाम के एक यूजर ने X पर यही वीडियो शेयर किया। उन्होंने लिखा, “अगर पिछले 11 सालों से गौतम अडानी और इजरायल हैदराबाद में ड्रोन-मिसाइल बनाने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं… और उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल गाजा पट्टी में नरसंहार और ईरान के खिलाफ किया जा रहा है… तो सवाल यह है कि एक नाजायज देश के साथ पार्टनरशिप करके दुनिया को क्या मैसेज दिया जा रहा है? असदुद्दीन ओवैसी साहब और राहुल गाँधी जी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? क्या यह सिर्फ एक अफवाह है… या एक बड़ा सच है जिसे दबाया जा रहा है?”

एक आदिल सिद्दीकी ने भी मुशीर खान का वीडियो शेयर करते हुए इस गलत दावे को आगे बढ़ाया कि इजरायल भारत में मिसाइल और ड्रोन बना रहा है, ताकि गाजा और ईरान को निशाना बनाया जा सके।

कविश अजीज, जो खुद को पत्रकार कहता है और एक घोर कट्टरपंथी है। उसने दावा किया कि इजरायल भारत में हथियार बना रहा है, जिनका इस्तेमाल फिलिस्तीन के बाद ईरान में किया जा रहा है।

अजीज ने 9 मार्च 2026 के पोस्ट में लिखा, “क्या आप जानते हैं??? इज़राइल पिछले 11 सालों से हैदराबाद में मिसाइल और ड्रोन बना रहा है। अडानी डिफेंस ने 2016 में इजरायल के एल्बिट सिस्टम्स के साथ मिलकर हर्मीस 900 ड्रोन बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर बनाया था। ये वो ड्रोन हैं जिनका इस्तेमाल फिलिस्तीन युद्ध में किया गया था और अब ईरान युद्ध में किया जा रहा है। अडानी डिफेंस इजरायली हथियार इंडस्ट्री के साथ मिलकर Tavor TAR-21, X-95 Tavor, नेगेव लाइट मशीन गन, गैलिल ACE असॉल्ट राइफ़ल, गैलिल DMR, और मसाडा पिस्टल जैसे छोटे हथियार भी बनाती है। 2020 में भारतीय सेना के लिए 16,479 Negev NG-7 LMGs के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था।”

क्या भारत ने फिलिस्तीन और ईरान के खिलाफ इजरायल को अडानी-एलबिट के बनाए ड्रोन और मिसाइल सप्लाई किए? इन इस्लामिस्टों की सोच को समझने से पहले, जो डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग जैसे मामलों को भी इस्लामिक उम्माह के नजरिए से देखते हैं, उनके बारे में कुछ बातें साफ करना जरूरी है।हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी जरूरी नहीं कि मिसाइल ही बनाती हो।

2016 में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और इजरायली डिफेंस मैन्युफैक्चरर एलबिट सिस्टम्स ने भारत में हर्मीस 900 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस अनमैन्ड एरियल व्हीकल बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर, अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड बनाया था। 2018 में अडानी एलबिट JV ने तेलंगाना के हैदराबाद में अपनी पहली मानवरहित UAV मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी खोली। JV द्वारा भारत में बनाए गए हर्मीस 900 के वर्शन को दृष्टि 10 कहा जाता है। हालाँकि भारतीय सेना कंपनी की मुख्य कस्टमर है, लेकिन यह ड्रोन एक्सपोर्ट करने के लिए भी आजाद है।

यह याद रखना चाहिए कि 2024 में, भारतीय इस्लामो-लेफ्टिस्ट ग्रुप इस बात से नाराज था कि भारत ने हैदराबाद अडानी-एलबिट फैसिलिटी में बने 20 हर्मीस 900 ड्रोन इजरायल को सप्लाई किए थे। हालाँकि, ये भारत के पूरे डिफेंस इकोसिस्टम का बहुत छोटा हिस्सा था। अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री मुख्य रूप से भारतीय डिफेंस जरूरतों को पूरा करती है, इजरायल की नहीं।

ये ड्रोन खास तौर पर भारत की सुरक्षा कर रहे हैं, जहाँ ये इस्लामिस्ट रहते हैं। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए संयंत्र बनाया गया है।

भारत को इजरायल के लिए एक बड़े हथियार एक्सपोर्टर के तौर पर दिखाना असलियत से बिल्कुल अलग है। भारत पहले फिलिस्तीन और अब ईरान के खिलाफ इजरायल को हथियार दे रहा है, ये कहना बिलकुल गलत है। भारत इजरायल से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है, जो इजरायल के कुल डिफेंस एक्सपोर्ट का 34% है। इजरायल ने हाल के सालों में भारत को बराक-8 मिसाइलें और हेरॉन ड्रोन सप्लाई किए हैं।

गाजा युद्ध के वक्त भारत ने साफ तौर पर कहा था कि वह गाजा में इस्तेमाल के लिए इजराइल को हथियार या गोला-बारूद सप्लाई नहीं करेगा। सभी एक्सपोर्ट एक एंड-यूजर एग्रीमेंट के तहत होंगे। अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने पहले ही तय कर दिया था कि हर्मीस 900 ड्रोन निगरानी और टोही मिशन के लिए बनाए गए थे और इन्हें हमले के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

ईरान-इजरायल युद्ध पर वापस आते हैं, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भारत ने ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए इजरायल को हर्मीस 900 ड्रोन या कोई भी ‘मिसाइल’ एक्सपोर्ट की है। यह पूरा दावा कि हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ईरान के खिलाफ इजरायल के युद्ध के लिए ड्रोन बना रही है, पूरी तरह से एक प्रोपेगैंडा है और देश को जनता को गुमराह करने वाला है।

हर्मीस 900 एक इजरायली ड्रोन है, और इजरायली डिफेंस फोर्स पहले से ही बड़ी संख्या में हर्मीस 900 ड्रोन और उनके पुराने वर्जन हर्मीस 450 ड्रोन का इस्तेमाल करती हैं। हर्मीस असल में दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले मिलिट्री ड्रोन में से एक है। कई देशों ने इसे अपनी फोर्स के लिए खरीदा है। सिर्फ इसलिए कि हैदराबाद अडानी-एलबिट फैसिलिटी हर्मीस 900 ड्रोन बनाती है, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ईरान में लड़ाई में इस्तेमाल के लिए इन ड्रोन को इजरायल को एक्सपोर्ट कर रहा है।

कट्टरपंथी सोच वाले मुशीर खान ने ईरान के खिलाफ अपने हमले में इजरायल द्वारा हर्मीस 900 सर्विलांस ड्रोन का इस्तेमाल करने के बारे में अपने सवाल पर ChatGPT के जवाब पर भरोसा किया। लेकिन, चैटबॉट में कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि ईरान विरोधी ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन भारत में बने हैं। यह साफ है कि इजरायल लोकल बने हर्मीस 900 UAVs का इस्तेमाल कर रहा है। फिर भी मुशीर खान और दूसरे इस्लामी कट्टरपंथी झूठी और डरावनी स्टोरी बनाकर सोशल मीडिया पर फैला रहे हैं, ये पूरी तरह गैरजिम्मेदाराना रवैया है। इसमें साजिश की बू आती है क्योंकि इस दौरान बड़ी चालाकी से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।

भारत की सोच संतुलित रहा है, चाहे वह इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध हो या ईरान और इजरायल-US के बीच चल रहा युद्ध। मोदी सरकार ने इजरायल के साथ डिफेंस टेक पार्टनरशिप के जरिए, ईरान के साथ एनर्जी और लॉजिस्टिक्स संबंधों के जरिए, और अरब देशों के साथ बड़े आर्थिक संबंधों के जरिए संबंधों को संतुलित बना कर रखा है। भारत अकेला ऐसा देश है, जिसके उन देशों के साथ अच्छे संबंध हैं जिनके साथ पुरानी दुश्मनी है या जो युद्ध में हैं, चाहे वह रूस-यूक्रेन हो, इजरायल-फिलिस्तीन हो, थाईलैंड-कंबोडिया हो, और इजरायल-ईरान हो या ईरान-गल्फ देश हों।

हालाँकि हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफ़ेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी की लोकेशन सीक्रेट नहीं है, लेकिन मैप इमेज को हाईलाइट करना, हमला करने के लिए उकसाने जैसा है।

भारत और इजरायल के बीच अडानी-एलबिट डिफ़ेंस मैन्युफ़ैक्चरिंग जॉइंट वेंचर को ईरान के साथ किसी तरह का ‘धोखा’ बताना बेबुनियाद, बेईमानी भरा और असल में भारतीय इस्लामिस्टों द्वारा भारत के साथ धोखा है। भारतीय इस्लामिस्ट जो प्रोपेगैंडा चला रहे हैं, वह एक कुत्ते के भोंकने जैसा है, जिसे कम IQ वाली सांप्रदायिक नफरत भड़काने, हैदराबाद में अडानी-एलबिट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी को टारगेट बनाने, भारत के अपने डिफेंस सेक्टर को नुकसान पहुँचाने और भारत के खिलाफ देश और दुनिया भर में गुस्सा भड़काने के लिए बनाया गया है।

इस्लामिस्ट भूल जाते हैं कि वे एक सुरक्षित और मजबूत भारत में रह रहे हैं, न कि युद्ध से जूझ रहे गाजा या ईरान में। किसी देश में बने हथियार न सिर्फ उस देश को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि वे जरूरी मिलिट्री लेवरेज और स्ट्रेटेजिक रिलेशन भी खरीदते हैं, जिससे वह देश लड़ाई और डिप्लोमेसी में मजबूत बनता है। भारत में कोई भी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट, जो भारतीय मिलिट्री को सप्लाई करता है और दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करता है, वह एक जरूरी पिलर है, जो भारत को दुनिया में सुरक्षित और मजबूत बनाए रखता है।

ये इस्लामिस्ट युद्ध में झुलस रहे गाजा और ईरान से दूर भारत में सुरक्षित हैं। ये एक मजबूत और स्थिर भारत में रह रहे है, जिसके अच्छे डिप्लोमैटिक और स्ट्रेटेजिक रिलेशन हैं। इसके बदौलत यहाँ शांति है।

भारत की विदेश और रक्षा नीति उन लोगों की भावनाओं या ‘धार्मिक’ भावनाओं से तय नहीं होती और न ही होनी चाहिए, जो विदेशी नेताओं और देशों को अपने देश और उसके हितों से ज्यादा अहमियत देते हैं।

हैदराबाद में चल रहे भारत-इजरायल जॉइंट वेंचर के खिलाफ भारतीय इस्लामी कैंपेन उस प्रोपेगैंडा कैंपेन जैसा है जो पाकिस्तानी जिहादी फरवरी 2026 के आखिर में ईरान और इजरायल+अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से कर रहे हैं। पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा सोशल मीडिया अकाउंट्स ने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस जयशंकर और भारतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी के वीडियो बनाए और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए, जिसमें वे ‘मान रहे’ थे कि भारत ने ईरान के खिलाफ इजराइल की मदद की।

इन झूठे बयानों को ईरान के खिलाफ भारत का ‘खुला धोखा’ बताया, ताकि भारत के खिलाफ दुनिया भर में नफरत फैलाई जा सके। ये लोग यह साबित करने में लगे हैं कि भारत ने ईरान को धोखा दिया। इसके लिए झूठ प्रपंच और प्रोपेगेंडा सबकुछ फैला रहे हैं। यह तब भी फैलाई जा रही है, जब भारत ने कम से कम तीन ईरानी नौसैनिक जहाजों को पनाह देने की पेशकश की, और ईरान ने नई दिल्ली को धन्यवाद भी दिया।

भारतीय इस्लामिस्ट भारत से नफरत करने वाले पाकिस्तानी जिहादियों से अलग नहीं हैं। उनका बर्ताव असल में ईरान और फिलिस्तीन के साथ ‘इस्लामिक उम्मा सॉलिडैरिटी’, मोदी-विरोधी झुकाव, दंगा भड़काने की मंशा रखने वाले हैं, वे अपने देश के हितों को भूल जाते हैं। इस्लामिस्टों को पक्का पता है कि मोदी सरकार को ‘प्रो-इजरायल’ दिखाने से वे अपने आप ‘एंटी-मुस्लिम’ लगेंगे। चल रहे प्रोपेगैंडा का असली मकसद सिर्फ भारत की डिफस मैन्युफैक्चरिंग के खिलाफ नफरत पैदा करने तक ही सीमित नहीं लगता, बल्कि देश में अशांति फैलाना भी इसका मकसद है।

यह देखा गया कि कैसे, इजरायली हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के मारे जाने की खबरें आने के बाद, लखनऊ, जम्मू और कश्मीर, कारगिल और दूसरे इलाकों में शिया मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई लोगों ने तो युद्ध से जूझ रहे ईरान जाकर खामेनेई के लिए इजरायल और अमेरिका से लड़ने की इच्छा भी जताई। इनमें से ज्यादातर ने बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की कभी निंदा नहीं की। भारत की आधिकारिक विदेश नीति के खिलाफ जाकर भी विदेशी नेताओं और देशों को इस तरह का धर्म के आधार पर सपोर्ट करना खतरनाक और देशद्रोह जैसा है।

हालाँकि बातें अलग-अलग है। लेकिन, 2022 में नूपुर शर्मा के ‘ईशनिंदा’ वाले मामले में भी ऐसी ही कोहराम मचाया गया था। इन्हीं इस्लामिस्ट लोगों ने कुरान की एक बात कोट करने पर BJP की पूर्व प्रवक्ता के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग की थी। कुछ ही समय में देश भर में दंगाई कट्टरपंथी भीड़ ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। ये गुस्सा खाड़ी देशों तक फैल गया। ऐसा लगता है कि नूपुर शर्मा वाले मामले की तरह ही कट्टरपंथी अब अडानी-एलबिट जॉइंट डिफेंस वेंचर के पीछे पड़ गए हैं और हैदराबाद फैक्ट्री के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग कर रहे हैं।

US का दावा कुछ भी हो, भारत लगातार खरीदता रहा है रूसी तेल: ‘जहाँ सस्ता मिले’ की नीति पर चलता रहा है हिंदुस्तान

  अमेरिकी बातों को नजरअंदाज कर हमेशा ही रूस से तेल खरीदता रहा है भारत, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI Grok)
भारतीय समय के मुताबिक अमेरिका ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को नई दिल्ली को 30 दिन का समय दिया कि वो समुद्र में पहले से मौजूद रूसी टैंकरों से कच्चा तेल खरीद सकता है, क्योंकि ईरान-इजराइल संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन बाधित हो गई है। यह आधिकारिक आदेश सिर्फ उन शिपमेंट्स के लिए है जो अभी समुद्र में हैं। बयान में यह भी साफ कहा गया कि ईरान से ऐसे कोई खरीदारी की इजाजत नहीं दी जा रही, क्योंकि ईरान पर भारी प्रतिबंध हैं।

ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ की कि उन्होंने ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को आने वाले खतरे से निपटने के लिए बड़ा फैसला लिया है, बिना रूस को कोई फायदा दिए। उन्होंने लिखा, “उनकी एनर्जी एजेंडा की वजह से तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। ग्लोबल मार्केट में तेल का बहाव जारी रखने के लिए ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन का अस्थायी छूट दे रहा है।”

उस संदेश में सबसे अहम शब्द था ‘अलाउ’ यानी इजाजत देना। ट्रंप प्रशासन ने जोर देकर कहा कि वो भारत को जरूरी कच्चा तेल खरीदने के लिए रूसी टैंकरों से छूट ‘दे रहा है’। अपनी तारीफ बढ़ाने के लिए बेसेंट ने इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समझदारी और मेहरबानी बता दिया।

साभार सोशल मीडिया 

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

भारत के करीब 40 प्रतिशत तेल आयात खाड़ी क्षेत्र से आता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है जो अभी ईरान के नियंत्रण में है। मोदी सरकार ने पहले ही घोषणा की थी कि देश एनर्जी सुरक्षा के मामले में बहुत आरामदायक स्थिति में है और हर दिन दो बार अपनी एनर्जी स्थिति का जायजा ले रहा है। स्टॉक की स्थिति भी अच्छी है और रोजाना भराई हो रही है। इसके अलावा भारत दूसरे स्रोतों से भी बात कर रहा है ताकि तेल का बहाव बिना रुके जारी रहे।

भारत सिर्फ अपने हितों को देखता है, अमेरिका को ‘अलाउ’ करने का कोई अधिकार नहीं

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका का यह नया कदम कई असफल दबाव वाली रणनीतियों के बाद आया है, जिसमें अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाकर कुल 50 प्रतिशत करना और भारत को ‘यूक्रेन युद्ध को फंडिंग’ के नाम पर रूसी तेल छोड़ने के लिए मजबूर करना शामिल है। दूसरी ओर नई दिल्ली ने बार-बार जोर दिया कि उसके फैसले अपनी संप्रभुता और हितों पर आधारित हैं, इसलिए वो किसी चुनौती के सामने नहीं झुकने वाला।

मॉस्को से तेल की खरीद हर महीने विभिन्न कारणों से ऊपर-नीचे होती रही, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, भले ही वाशिंगटन कुछ भी कहे। असल में भारत रूसी विक्रेताओं से लगातार संपर्क में रहा ताकि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद अपनी एनर्जी जरूरतें पूरी की जा सकें।

रीटर्स ने हाल ही में एक इन्फोग्राफिक शेयर किया जो बात साफ कर देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की रूसी तेल खरीद निश्चित रूप से बढ़ गई। लेकिन यह इसलिए नहीं क्योंकि भारत ‘युद्ध को फंडिंग’ देना चाहता था। भारत का उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। भारत ने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि रूसी तेल सस्ता मिल रहा था। और देश की जरूरतें पूरी करने के लिए तेल खरीदना भारत सरकार के लिए NATO नेताओं और यूरोपीय मीडिया को खुश करने से ज्यादा अहम था।

रीटर्स के ऊपर वाले इन्फोग्राफिक में साफ दिखता है कि अक्टूबर 2025 के बाद भारत की रूसी तेल खरीद थोड़ी कम हुई, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, जैसा अमेरिका दावा करना चाहता है।

इसलिए अमेरिका का यह खुद को बड़ा बताना सिर्फ खोखली श्रेष्ठता का एक और प्रयास है जबकि वो खुद को मेहरबान महाशक्ति दिखाने की कोशिश कर रहा है, जो हकीकत से बिल्कुल उलट है।

अमेरिकी छूट से पहले ही रूसी तेल के कार्गो भारत लौट आए

भारत ने ट्रंप प्रशासन की तथाकथित ‘इजाजत’ आने से पहले ही समुद्र में मौजूद रूसी टैंकरों से तेल लेना शुरू कर दिया था ताकि मिडिल ईस्ट से आने वाले कच्चे तेल की कमी पूरी हो सके, क्योंकि उस इलाके में तनाव बढ़ रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले से सुरक्षित किए गए 1 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल का बड़ा हिस्सा शायद अमेरिका के इस नए बयान से पहले ही लिया जा चुका था।

भारत सरकार के सूत्रों ने पहले ही कहा था कि फरवरी में रूस भारत का टॉप एनर्जी सप्लायर में से एक था। फरवरी में भारत ने 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया।

ब्लूमबर्ग के शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में रूसी कच्चे तेल के लगभग 1.5 करोड़ बैरल टैंकरों पर हैं जबकि सिंगापुर के पास और 70 लाख बैरल हैं। एक हफ्ते के अंदर ये सब भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कुछ और सूज सागर और भूमध्य सागर से होते हुए उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं।

रूसी तेल वाले टैंकरों ने अपने रूट बदलकर भारतीय बंदरगाहों की ओर इशारा करना शुरू कर दिया था, इससे पहले कि व्हाइट हाउस से ‘हम इजाजत दे रहे हैं’ वाला नोटिस आया। केप्लर के मुताबिक कम से कम 18 जहाज जो उराल्स तेल ले जा रहे हैं, वे भारत की ओर बढ़ रहे हैं। कंपनी के एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा कि यह विकास “जल्द ही मात्रा को 20 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर ले जा सकता है।”

एक सूत्र ने बताया कि सूजमैक्स टैंकर ओड्यून जो लगभग 10 लाख बैरल ले जा रहा था। रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि 4 मार्च को पूर्वी पारादीप बंदरगाह पर राज्य रिफाइनर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को तेल देने के लिए दिखा।

इसके अलावा आईओसी को 7 मार्च को पश्चिम भारत के वडिनार बंदरगाह पर स्प्रिंग फॉर्च्यून से लगभग 7 लाख बैरल रूसी तेल मिलने की उम्मीद है। आईओसी के सूत्र ने बताया कि कंपनी रूस से खरीदारी तेज कर रही है जिसमें भारत के आसपास घूम रहे जहाजों पर रखे कंटेनर शामिल हैं।

मीडिया हाउस के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि भारतीय जल क्षेत्र के पास लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल तैर रहा है और कुछ हफ्तों में पहुंच सकता है। एक और भारतीय रिफाइनर ने भी इस तेल का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी दिखाई है। रितोलिया ने कहा, “अगर मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल कम हो जाता है तो भारतीय रिफाइनर जल्दी ही रूसी ग्रेड की ओर मुड़ सकते हैं।”

उन्होंने देखा कि सिंगापुर स्ट्रेट, अरब सागर क्षेत्र और हिंद महासागर में लगभग 3 करोड़ बैरल रूसी तेल जहाजों पर उपलब्ध है, जिसमें फ्लोटिंग स्टोरेज में रखा तेल भी शामिल है।

ब्लूमबर्ग की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, केप्लर और वोर्टेक्सा के ट्रैकिंग विश्लेषण से पता चला कि दो टैंकर जो कुल 14 लाख बैरल उराल्स कच्चा तेल ले जा रहे हैं, वे इस हफ्ते भारतीय बंदरगाहों पर उतारने जा रहे हैं, पहले वे पूर्व की ओर जाने का संकेत दे रहे थे।

5 मार्च को मटारी नाम का आफ्रामैक्स टैंकर जो लगभग 7 लाख बैरल ले जा रहा था, वडिनार पहुँचने वाला था। अरब सागर में एक और सूजमैक्स इंड्री जो 730 हजार बैरल से ज्यादा उराल्स लेकर सिंगापुर जा रहा था, इस हफ्ते अचानक उत्तर की ओर भारत की तरफ मुड़ गया। पिछले साल ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इन तीनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

भारत अपनी नीति खुद बनाता है, व्हाइट हाउस की ‘इजाजत’ से नहीं

ऊपर दिया डेटा साफ कर देता है कि भारत को समय देने का अमेरिका का दावा सिर्फ एक हताश कोशिश है जहाँ उसे क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए। नई दिल्ली ने कभी इजाजत माँगी नहीं और न ही ऐसी किसी मेहरबानी की उम्मीद की थी क्योंकि वो चल रहे तनाव के बीच अपनी संप्रभु एनर्जी हितों का पीछा कर रही थी।

इसके अलावा इन आरोपों, जवाबों या रणनीतियों की बेकारता बार-बार साबित हो चुकी है क्योंकि ये मोदी सरकार के किसी फैसले को कभी प्रभावित नहीं करते। पिछले महीने केंद्र ने फिर दोहराया कि वो कच्चा तेल जहां सस्ता और अच्छी क्वालिटी का मिले वहां से आयात करता रहेगा।

भारतीय तेल कंपनियाँ गैर-प्रतिबंधित स्रोतों और भू-राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखकर काम करेंगी। यह वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने कॉन्ग्रेस नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति को बताया।

एक ऐसा ही किस्सा तब हुआ जब भारत ने अमेरिका के इस दावे का जवाब दिया कि वो रूस से तेल लेना ‘बंद’ करने पर सहमत हो गया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 9 फरवरी को कहा, “हमारे लिए एनर्जी खरीद के फैसलों में राष्ट्रीय हित मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।” उन्होंने बताया कि पर्याप्त उपलब्धता, उचित कीमत और सप्लाई की विश्वसनीयता ही देश की खरीद नीति के पीछे मुख्य कारण हैं।

विदेश सचिव के अनुसार भारत की ‘सबसे बड़ी प्राथमिकता’ है अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना और सुनिश्चित करना कि उन्हें सही कीमत पर पर्याप्त ऊर्जा मिले, भरोसेमंद और सुरक्षित स्रोतों से।

उन्होंने कहा, “इसलिए हमारी आयात नीति एनर्जी के मामले में पूरी तरह इन्हीं उद्देश्यों से चलती है। हम किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं हैं और न ही रहना चाहते हैं। और स्रोतों का मिश्रण समय-समय पर बाजार की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बदलता रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा तरीका है कई स्रोतों को बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें विविधता देना ताकि स्थिरता बनी रहे। इसलिए मैं कहूंगा कि इस क्षेत्र में जितना ज्यादा विविधता होगी, हम उतने ज्यादा सुरक्षित होंगे।” यह मजबूत जवाब तब आया जब ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और दोनों देशों के बीच व्यापार व्यवस्था के फ्रेमवर्क की घोषणा के दौरान 25 प्रतिशत टैरिफ घटा दिया।

जैसे ही संकेत मिला, भारत सरकार के सूत्रों ने फिर दोहराया कि रूसी कच्चा तेल भारत में आता रहेगा। भारत सरकार ने कहा, “आज हमारे पास होर्मुज स्ट्रेट में फंसे तेल से ज्यादा एनर्जी स्रोत हैं। हम कच्चे तेल, तेल उत्पादों और एलपीजी के मामले में आरामदायक स्थिति में हैं। हमारी मौजूदा स्टॉक स्थिति अच्छी है। हम दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों से अपनी सप्लाई बढ़ाएंगे और होर्मुज स्ट्रेट से आने वाली कमी पूरी करेंगे।”

भारत सरकार ने कहा, “हम 2022 से रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। 2022 में हम रूस से कुल आयात का सिर्फ 0.2 प्रतिशत ले रहे थे। फरवरी में हमने कुल कच्चे तेल आयात का 20 प्रतिशत रूस से लिया। फरवरी में भारत ने रूस से 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन आयात किया।”

ट्रंप को अपने MAGA समर्थकों को खुश करना है, भारत को नहीं

ट्रंप प्रशासन में बिना वजह खुद को बधाई देने या सराहने की अजीब आदत है, जिसकी वजह से भारत के लगातार जवाबों के बाद खुद को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

दूसरी ओर नई दिल्ली लगातार अपने हितों की रक्षा कर रही है और मोदी सरकार इन हरकतों से बिल्कुल प्रभावित नहीं होती। दोनों के बीच यह अब रूटीन बन गया है जहाँ वाशिंगटन कोई बेतुका आदेश या शिकायत लाता है और नई दिल्ली उसे अनदेखा कर देती है या विनम्रता से खारिज कर देती है।

इसी तरह मौजूदा व्हाइट हाउस प्रशासन ने ‘घमंडी दिखावा’ को अपनी आदत बना लिया है। चाहे ‘8 वैश्विक युद्ध रोकना’ हो या पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंधों से नियंत्रण, ट्रंप के दावे और जमीन पर उनका असल असर अक्सर मेल नहीं खाता। बहुध्रुवीय दुनिया प्रतिबंधों और टैरिफ से रिमोट कंट्रोल नहीं होती।

एक संप्रभु देश की नीति संप्रभु हितों पर चलती है। प्रतिबंध या टैरिफ सिर्फ भू-राजनीतिक हिचकी हैं जिन्हें कभी-कभी ठीक करना और पार करना पड़ता है। चाहे कच्चा तेल हो, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी), दुर्लभ पृथ्वी तत्व या कोई भी वस्तु, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स का जटिल जाल है।

कोई एक देश इसे धमकाकर या नखरे करके नहीं नियंत्रित कर सकता। भारत दशकों से इस जटिल जाल में नेविगेट कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के दावे सिर्फ अपने घरेलू MAGA समर्थकों को खुश करने के लिए हैं।

भारतीय सरकार ऐसा नहीं करती। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा-इजराइल संघर्ष और पिछले कई सालों के कई परिदृश्यों में भारत का विदेश मंत्रालय ने अपनी बातचीत पूरी तरह आधिकारिक रखी है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान किया है।

खतरनाक हैं ‘फॉस्फोरस बम’ जो इजरायल ने लेबनान पर दागे; गला देता है हड्डियाँ, हर तरफ फैलती है आग: UN ने किया है बैन

                                            इजरायल का फॉस्फोरस बम धमाका ( फोटो साभार-abp)
इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।

ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”

गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा

मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।

3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।

इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।

क्या है सफेद फॉस्फोरस

सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।

इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना

इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।

‘भारत हमारा अच्छा दोस्त’: प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात करने के बाद ईरानी राष्ट्रपति का बयान

                                  मोदी ने की ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बातचीत (साभार : NDTV)
पश्चिम एशिया में मचे भारी घमासान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से फोन पर बातचीत की है। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों और सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली बातचीत है।

मोदी ने इस तनाव पर गहरी चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से माल और ऊर्जा की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के होनी चाहिए, क्योंकि यह भारत की बड़ी प्राथमिकता है।

तनाव कम करने और भारतीयों की सुरक्षा पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बातचीत की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि भारत शांति और स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। पीएम ने जोर देकर कहा कि किसी भी विवाद का हल युद्ध नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से ही निकल सकता है। भारत ने ईरान और इजरायल दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है ताकि एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को टाला जा सके।

भारतीयों की सुरक्षा और व्यापारिक चिंताएँ

हाल ही में फारस की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों में कम से कम तीन भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है। पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पेजेश्कियान से बातचीत में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता जताई। इसके अलावा, भारत के लिए यह क्षेत्र व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए पीएम ने सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने की बात दोहराई।

ईरान ने की भारत की जमकर तारीफ

ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने बातचीत के दौरान भारत के स्टैंड को सराहा। उन्होंने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक ‘संतुलित और रचनात्मक’ भूमिका निभाई है। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह भारत को अपना एक सच्चा दोस्त मानता है। पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को बताया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता था और कूटनीति से मसले हल कर रहा था, लेकिन अमेरिका और इजरायल के हमलों ने स्थिति बिगाड़ दी। ईरान ने माना कि भारत की कोशिशें जंग खत्म करने की दिशा में बहुत प्रभावी रही हैं।

सबकी बात सुनने वाला इकलौता नेता

आज के दौर में पीएम मोदी दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो संघर्ष के दोनों पक्षों से सीधे बात कर सकते हैं। उन्होंने हाल के दिनों में इजरायली पीएम नेतन्याहू के साथ-साथ कतर, सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे देशों के नेताओं से भी संपर्क साधा है। भारत किसी एक गुट या गठबंधन का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और जिम्मेदार शक्ति के रूप में अपनी बात रख रहा है।

मध्यस्थ के रूप में भारत की साख

पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक और रणनीतिक ताकत लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र के देश भारत को एक ‘स्थिरता लाने वाली शक्ति’ के रूप में देखते हैं। चूंकि भारत का रिश्ता ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों, तीनों के साथ गहरा है, इसलिए शांति और संयम बरतने की भारत की अपील को पूरी दुनिया में गंभीरता से सुना जा रहा है। भारत का एकमात्र उद्देश्य एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोकना और मानवीय हितों की रक्षा करना है।

खामेनेई की हत्या हो या हिंद महासागर में IRIS डेना का डूबना: क्या भारत को ईरान-US-इजरायल युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहा कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम

   भारत को घसीटने की कोशिश में इस्लामी-कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT)
भारत में विपक्षी नेता, कांग्रेसी इकोसिस्टम, वामपंथी इकोसिस्टम और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम से जुड़े लोग चाहते हैं कि भारत ईरान के साथ युद्ध में कूद जाए और अमेरिका के साथ जंग कर पूरा देश बर्बाद कर ले। दरअसल, ऐसा सिर्फ उनकी हरकतों से लग रहा है। क्योंकि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से वो भारत सरकार को इस युद्ध में घसीटने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे।

पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को निशाने पर लिया और इजरायल के साथ ईरान के युद्ध में भारत की साजिश कहकर घसीटने की कोशिश की। फिर ईरान के कट्टरपंथी तानाशाह खामेनेई की मौत के बाद पीएम मोदी ने दुख क्यों नहीं जताया (हालाँकि डिप्लोमेटिक चैनल्स के माध्यम से तय प्रक्रिया होती है और भारत के विदेश सचिव में ईरान के दूतावास में जाकर रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए हैं।) और अमेरिका-इजरायल का विरोध क्यों नहीं किया.. ये कहकर भारत को उकसाने की कोशिश की।

इस बीच, अब जब हिंद महासागर में ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena को जब अमेरिकी पनडुब्बी ने मार गिराया, तो उसे भी भारत पर हमले से जोड़कर बयानबाजी करने लगे। राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि ईरानी भारत के मेहमान थे, जब उनकी फ्रिगेट को मार गिराया गया।

हैरानी की बात है कि ईरान समेत 75 देशों की नेवी और उनके जहाज, एयरक्राफ्ट इस International Fleet Review 2026 में शामिल थे, जिसमें ईरान का जहाज भी शामिल था। ये इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 15 से 25 फरवरी तक विशाखापटनम में हुआ, जो भारतीय नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड का हिस्सा है। ये कार्यक्रम 25 फरवरी 2026 को खत्म हो गया और सभी देशों की नेवी अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गई।

इसके करीब 1 सप्ताह बाद 4 मार्च 2026 को अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी जहाज IRIS Dena को इंटरनेशनल वॉटर में टारपीडो से मारा। वो भारतीय सीमा से दूर हिंद महासागर में था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की तरफ बढ़ रहा था। ऐसे में उसका भारत से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन राहुल गाँधी समेत विपक्षी नेता और वामपंथी-इस्लामी इकोसिस्टम ये अफवाह फैलाने लगा कि अमेरिकी नेवी ने भारत के गेस्ट को मार गिराया।

यहाँ समझने वाली बात ये भी है कि भारत के पानी में जब तक ये जहाज रहा, उसे अमेरिकियों ने हाथ नहीं लगाया। वो हमले से पहले ही इंटरनेशनल वॉटर जोन में था। जहाँ किसी संपर्क कॉल पर जवाब देना भी श्रीलंकाई नेवी का काम था, वो उसने किया भी। लेकिन उसे भारत के पानी में मार गिराया गया, ऐसा दावा करके कांग्रेसी इकोसिस्टम सिर्फ भारतवासियों को गुमराह ही कर रहा है।

वैसे, यहाँ ये बात भी समझनी होगी कि जब युद्ध होता है, तो पनडुब्बियों का काम दुश्मन को पानी में खोज कर खत्म करना है। अमेरिकी नेवी ने ईरानी जहाज को इंटरनेशनल पानी में मारा। डिस्ट्रेस कॉल श्रीलंका में गई, लेकिन छाती यहाँ कांग्रेसियों-वामपंथियों की छाती फटने लगी? क्यों? क्योंकि वो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह से भारत सरकार के नेतृत्व को नीचा दिखाया जाए।

इस मामले से कुछ समय पहले ही अमेरिकी मीडिया ने फेक खबरें चलाई कि अमेरिका भारतीय नौसैनिक अड्डों का इस्तेमाल कर रहा है, जोकि पूरी तरह से झूठ था। और अब ऐसी ही फर्जी खबरें बनाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश ये इकोसिस्टम कर रहा है।

इसे इस उदाहरण से समझें कि कोई मेरा गेस्ट कई दिन पहले ही मेरे घर से रवाना हो चुका है। उसका देश जंग में फंसा है और वो रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो इसमें पूर्व मेजबान का क्या लेना देना? लेकिन नहीं… इसे भारत सरकार को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटना है, क्योंकि ये भारत की तरक्की देख नहीं पा रहे हैं। सरकार का जनता के साथ मजबूत कनेक्शन नहीं देख पा रहे हैं।

ऐसे में झूठा माहौल खड़ा किया जा रहा है कि भारत अमेरिका-इजरायल जैसे देशों के दबाव में है, जबकि उनकी सरकारों के समय ये दबाव स्पष्ट दिखता था, जिसमें भारत के वीर सैनिकों ने अपना खून बहाकर जंगें जीती और बातचीत की मेजों पर इनकी सरकारों ने वो बढ़त गवाँ दिए।

चलिए, ये पूरा मामला समझाने के लिए आपको विस्तार से हरेक कड़ी के बारे में बताते हैं। इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 की पृष्ठभूमि, युद्धपोत के डूबने की घटना, ईरानी दावे, अमेरिकी पुष्टि, भारतीय सरकार की प्रतिक्रिया और विपक्ष की बयानबाजी शामिल है। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे यह कॉन्ग्रेसी-वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का इकोसिस्टम झूठी खबरें फैलाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 को समझें

यह सब शुरू होता है फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 से, जो भारतीय नौसेना द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से आयोजित एक प्रमुख समुद्री कार्यक्रम था। यह आयोजन 15 से 25 फरवरी तक चला और इसका उद्देश्य वैश्विक नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और भारत की नौसैनिक क्षमताओं का प्रदर्शन करना था।

आईएफआर 2026 में 74 देशों की भागीदारी हुई, जिसमें 66 भारतीय जहाज, भारतीय तटर रक्षक, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी के जहाज शामिल थे। विदेशी नौसेनाओं से 19 जहाज और 45 मार्चिंग कंटिंजेंट आए, साथ ही तीन देशों के 60 से अधिक विमान भी भाग लिए।

यह आयोजन पूर्वी नौसेना कमान (ईएनसी) के तहत विशाखापत्तनम में हुआ, जहाँ राष्ट्रपति मुर्मू ने आईएनएस सुमेधा से फ्लीट की समीक्षा की। प्रमुख जहाजों में आईएनएस विक्रांत (भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत), आईएनएस विशाखापत्तनम (विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर) और अन्य आधुनिक जहाज शामिल थे। ईरान का युद्धपोत आईआरआईएस डेना भी इस आयोजन में शामिल था, जो एक माउज क्लास फ्रिगेट था।

यह जहाज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस (हालाँकि ये साफ है कि किसी एक्सरसाइज में नेवी अपने हथियारों को साथ नहीं रखती, ऐसे में डेना के पास भी हथियार नहीं थे) हो सकता था और इसमें एक हेलीकॉप्टर भी रखने की क्षमता थी। आयोजन 25 फरवरी को समाप्त हुआ, और सभी भाग लेने वाले देशों की नौसेनाएँ अपने गंतव्यों की ओर रवाना हो गईं।

इस समय तक कोई युद्ध की स्थिति नहीं थी, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर आश्चर्यजनक हमला किया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस हमले ने मध्य पूर्व में संघर्ष को तेज कर दिया और ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले शुरू कर दिए।

आईएफआर 2026 न केवल एक सैन्य प्रदर्शन था, बल्कि यह भारत की नौसैनिक कूटनीति का प्रतीक था। आयोजन में भाग लेने वाले जहाजों ने बंगाल की खाड़ी में अभ्यास किया, और यह भारत की ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) नीति को मजबूत करने का माध्यम था। लेकिन विपक्ष ने इस आयोजन को भी विवादास्पद बनाने की कोशिश की, खासकर जब आईआरआईएस डेना की घटना हुई।

आईआरआईएस डेना के डूबने से जुड़ी घटनाएँ

आईआरआईएस डेना को बुधवार (4 मार्च 2026) को अमेरिकी वर्जीनिया क्लास परमाणु पनडुब्बी ने हिंद महासागर में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टॉरपीडो से मार गिराया। यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 40 किलोमीटर दूर हुई, जो भारतीय क्षेत्र से काफी दूर थी।

जहाज पर सवार कम से कम 87 नाविकों की मौत हो गई, जबकि 32 को बचाया गया और गाले अस्पताल में भर्ती किया गया। दर्जनों अभी भी लापता हैं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इसकी पुष्टि की और कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा टॉरपीडो से किसी जहाज को डुबाने की पहली घटना है। उन्होंने इसे ‘साइलेंट डेथ’ करार दिया।

ईरान ने इस हमले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कहा कि आईआरआईएस डेना ‘भारतीय नौसेना का मेहमान’ था और अमेरिका इसे बिना चेतावनी के मार गिराया। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी कि ‘अमेरिका इस कायराना हरकत (बिना चेतावनी हमला, वैसे युद्धकाल में कैसी चेतावनी?) का कड़वा अफसोस करेगा।’

ईरान का दावा था कि जहाज आईएफआर 2026 से लौट रहा था, इसलिए यह भारत से जुड़ा था। लेकिन तथ्य बताते हैं कि जहाज 25 फरवरी को विशाखापत्तनम से रवाना हो चुका था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की ओर जा रहा था। डिस्ट्रेस सिग्नल श्रीलंका की नौसेना को 5:08 बजे सुबह मिला, और बचाव अभियान श्रीलंका ने चलाया।

इस घटना ने मध्य पूर्व में संघर्ष को और तेज कर दिया। ईरान ने इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर नए हमले किए, जबकि इजरायल ने तेहरान पर ‘बड़े पैमाने’ के हमले शुरू किए। वैश्विक स्तर पर यह घटना हिंद महासागर में युद्ध के विस्तार का संकेत थी, जो 2500 नॉटिकल मील दूर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से काफी दूर था।

भारत सरकार की तटस्थता सही, प्रतिक्रिया भी संतुलित, फेक न्यूज की भी खोली पोल

भारतीय सरकार ने इस घटना पर सतर्क रुख अपनाया। सरकारी सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि आईआरआईएस डेना और उसके क्रू केवल 16 से 25 फरवरी 2026 तक भारत के मेहमान थे। 28 फरवरी 2026 को युद्ध घोषित होने के बाद जहाज ने भारत से कोई मदद नहीं माँगी। घटना भारतीय क्षेत्र से बाहर अंतरराष्ट्रीय जल में हुई, इसलिए भारत का इससे कोई सीधा लेना-देना नहीं था।

विदेश मंत्रालय की फैक्ट-चेकिंग यूनिट ने अमेरिकी मीडिया की उन खबरों का खंडन किया, जिसमें दावा किया गया कि अमेरिकी नौसेना भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए कर रही है। मंत्रालय ने कहा, “अमेरिकी चैनल ओएएन पर किए जा रहे दावे फेक और झूठे हैं।” यह स्पष्टीकरण सेवानिवृत्त अमेरिकी आर्मी कर्नल डगलस मैकग्रेगर के दावे के जवाब में आया, जिन्होंने कहा था कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपने बेस नष्ट होने के बाद भारतीय बंदरगाहों पर निर्भर है।

भारत ने संघर्ष पर तटस्थ रुख अपनाते हुए संवाद और कूटनीति की अपील की। सरकार ने पश्चिम एशिया में रहने वाले करीब 10 मिलियन भारतीयों के हितों की रक्षा पर जोर दिया। यह रुख भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, जहाँ वह किसी गुट में शामिल नहीं होता।

विपक्ष कर रहा भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश

विपक्ष ने इस घटना को भारत सरकार पर हमला करने का मौका बना लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने एक्स पर पोस्ट किया, “दुनिया एक अस्थिर चरण में प्रवेश कर चुकी है। आगे तूफानी समुद्र हैं। भारत की तेल आपूर्ति खतरे में है, क्योंकि 40% से अधिक आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। एलपीजी और एलएनजी की स्थिति और भी खराब है। संघर्ष हमारे पिछवाड़े तक पहुँच गया है, जहाँ हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत डुबो दिया गया। फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। ऐसे समय में हमें पहिये पर मजबूत हाथ की जरूरत है। इसके बजाय भारत के पास एक समझौता करने वाला पीएम है जिसने हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को आत्मसमर्पण कर दिया है।”
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी एक्स पर लिखा: “वाशिंगटन की कार्रवाई का भारत के लिए अपार प्रभाव है और यह चौंकाने वाला है कि अब तक डूबने पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। मोदी सरकार का इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान न देना आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए, क्योंकि सरकार ने अभी तक ईरान में टारगेटेड हत्याओं पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है, जो ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का संदर्भ है। भारतीय सरकार कभी इतनी डरपोक और भयभीत नहीं लगी।”
ये बयान विपक्ष की रणनीति को दर्शाते हैं, जहाँ वे भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहे हैं। पहले उन्होंने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को निशाना बनाया और इसे ईरान-इजरायल युद्ध में भारत की साजिश बताया। फिर, खामेनेई की मौत पर दुख न जताने और अमेरिका-इजरायल का विरोध न करने पर आलोचना की। अब, आईआरआईएस डेना को ‘भारत का मेहमान’ बताकर अमेरिका के हमले को भारत से जोड़ा जा रहा है।
राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कहा कि ईरानी भारत के मेहमान थे जब उनकी फ्रिगेट मार गिराई गई। लेकिन तथ्य है कि जहाज 25 फरवरी को रवाना हो चुका था, और घटना 4 मार्च को हुई।

फर्जी नरेटिव को आगे बढ़ाने में जुटा वामपंथी इकोसिस्टम

वामपंथी और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम भी इस नरेटिव को बढ़ावा दे रहा है। वे अफवाह फैला रहे हैं कि अमेरिकी नौसेना ने भारत के गेस्ट को मार गिराया, जबकि पनडुब्बियों का काम युद्ध में दुश्मन को खोजकर खत्म करना है। यह सब भारत सरकार को नीचा दिखाने का प्रयास है। उदाहरण के लिए, अगर कोई मेहमान कई दिन पहले घर से रवाना हो चुका है और रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो पूर्व मेजबान का क्या दोष? लेकिन विपक्ष इसे भारत को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटने का बहाना बना रहा है।

मेजों पर जीते युद्ध गँवाने वाले दे रहे कूटनीति का ज्ञान

यह इकोसिस्टम भारत की तरक्की नहीं देख पा रहा। मोदी सरकार का जनता से मजबूत कनेक्शन उन्हें खटक रहा है। वे दावा कर रहे हैं कि भारत अमेरिका-इजरायल के दबाव में है, जबकि पिछली कॉन्ग्रेस सरकारों में दबाव स्पष्ट था, जहाँ भारतीय सैनिकों ने खून बहाकर जंगें जीतीं, लेकिन बातचीत की मेज पर बढ़त गँवा दी।
चाहे वो लाहौर जीतकर भी ताशकंद में उसे लौटा देना हो, या ढाका से लेकर सियालकोट शहर तक पहुँचकर भी उसे शिमला समझौते में छोड़ देना, जबकि उस समय का नेतृत्व चाहता तो पाकिस्तान को अपनी शर्तों पर घुटने को मजबूत करता और पूरा कश्मीर विवाद खत्म करा सकता था। जबकि इसकी जगह हमने 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों को ‘पालने’ की सेवा की।

आम जन को विपक्ष के नरेटिव को समझने की जरूरत

सभी घटनाक्रमों को जोड़ देखने पर ये साफ हो जाता है कि जिन चीजों से भारत का कोई लेना-देना नहीं, उन बातों को लेकर मोदी सरकार को बेवजह घसीटकर भारत के अंदर का माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में ये साफ है कि राहुल गाँधी और उनके पूरे गैंग बयानबाजी सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भर है, जो राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान पहुँचा सकती है।
यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे विपक्ष भारत को युद्ध में घसीटकर देश को बर्बाद करने की कोशिश कर रहा है। बहलहाल, भारत देश के लोग इतने समझदार हैं कि वो वैश्विक मुद्दों पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष की बातों में नहीं ही जाएगी।

कट्टरपंथियों और वामपंथियों, लो मिल गया रिजवान! तरुण हत्याकांड से लोगों का ध्यान भटकाने का अब कम करो प्रयास; Victim card खेलना बंद करो

   हिंदू की हत्या में पीड़ित मुस्लिम को दिखाया जा रहा, पूछा जा रहा कहाँ है रिजवान? (साभार : Grok & Social Media Tweets)
दिल्ली के उत्तम नगर में हुए तरुण हत्याकांड को लेकर सोशल मीडिया पर अब एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तेज हो गई है। पहले जहाँ हिंदू लड़के की हत्या मामले में असली पीड़ित मुस्लिम परिवार को दिखाने की गई। वहीं अब ध्यान ज्यादा भटकाने के लिए यह दावा फैलाया जा रहा है कि 4 मार्च को हुए विवाद के बाद मुस्लिम परिवार का 14 साल का लड़का रिजवान भी ‘गायब’ है। उसका कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा है।

इस नैरेटिव को हवा देने में कई तथाकथित सेकुलर और इस्लाम के नाम पर राजनीति और पत्रकारिता करने वाले कई चेहरे खुलकर सामने आ गए हैं। RJ सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी हीरोइन सोनाक्षी सिन्हा तक ने एक जैसा अभियान चलाते हुए सोशल मीडिया पर सवाल उठाया- “हेलो दिल्ली पुलिस, रिजवान कहाँ है?”

सवाल को उठाने का मकसद साफ है। पढ़ने वाले के मन में यह बैठाना कि उत्तम नगर की घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ने ही अपना बेटा नहीं खोया, बल्कि आरोपित मुस्लिम परिवार का भी एक बच्चा लापता है। पुलिस को टैग करने की रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि आरोपों को गंभीरता का रंग दिया जा सके। आम पाठक को लगे कि जब सीधे पुलिस से सवाल किया जा रहा है तो शायद बात में दम होगा।

इस अभियान में AIMIM से जुड़े नेता वारिस पठान से लेकर कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और इस्लामी कट्टरपंथी शामिल हैं। देख सकते हैं कैसे सबने लगभग एक जैसे शब्दों में ट्वीट कर इस कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

हालाँकि, यह नैरेटिव ज्यादा देर टिक नहीं पाया क्योंकि द्वारका जिले के डीसीपी ने खुद पोस्ट करके इस सवाल का जवाब दिया। उन्होंने बताया कि जिस रिजवान को ‘लापता’ बताया जा रहा है, वह दरअसल इस मामले के मुख्य आरोपितों में से एक है। उसे गिरफ्तार किया जा चुका है और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेश पर ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया गया है। यानी उसके गायब होने की कहानी पूरी तरह झूठी और भ्रामक है।

सोशल मीडिया पर सक्रिय जाकिर अली त्यागी ने भी इसी सुर में लिखा कि परिवार के अनुसार वह ‘मासूम’ अभी 13–14 साल का है और उसे भी नहीं छोड़ा गया। उनके मुताबिक एक अकेले तरुण नाम के युवक की हत्या के आरोप में इतने लोगों- खासकर महिलाओं और बच्चों को घसीटना गलत है।

यह तर्क अपने आप में अजीब है। क्या किसी अपराध में शामिल व्यक्ति को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि उसकी उम्र कम है या वह किसी खास परिवार से आता है? अगर पुलिस के पास सबूत हैं कि रिजवान इस हत्या में शामिल था, तो कानून के मुताबिक उसे हिरासत में लिया जाना स्वाभाविक है।

दरअसल समस्या यह है कि कुछ लोग भीड़ हिंसा के उस पैटर्न को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं, जिसे देश कई बार देख चुका है। दिल्ली दंगों में बुर्का पहने महिलाओं की भीड़ द्वारा पुलिस पर हमला करने की घटनाएँ सामने आई थीं। कश्मीर में पत्थरबाजी के दौरान बच्चों को भीड़ का हिस्सा बनाकर आगे किया गया। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि कट्टरपंथी तत्व भीड़ तैयार करते समय उम्र और लिंग की परवाह नहीं करते।

उत्तम नगर की घटना में भी 4 मार्च को होली के दिन हुई हिंसा को लेकर कई चश्मदीद अपने बयान दे चुके हैं। पुलिस की जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की भूमिका खंगाली जा रही है। लेकिन इन सबके बीच ये वर्ग लगातार कोशिश कर रहा है कि असली मुद्दे से ध्यान भटक जाए। इनकी चिंता तरुण की हत्या पर नहीं, उसके परिवार के लिए नहीं, बल्कि आरोपितों के बचाव में है।

आज तरुण की हत्या पर संदेह करना साफ बताता है कि इस सेकुलर जमात के लिए सामने दिख रहा सच कोई महत्व नहीं रखता, इन्हें सिर्फ मजहब देखकर आवाज पीड़ित के लिए आवाज उठानी है। लेकिन ऐसे लोग ध्यान रखें, नैरेटिव कितना भी गढ़ा जाए, लेकिन तथ्य नहीं बदलते।

हापुड़ में सपा नेता अब्दुल रेहान के घर पुलिस का छापा, 55 भरे गैस सिलेंडर बरामद: 2000 रुपए में कालाबाजारी का आरोप

                                  सपा नेता अब्दुल रेहान के घर मिले 55 गैस सिलेंडर (फोटो साभार : NBT)
उत्तर प्रदेश में गैस सिलेंडरों की किल्लत के बीच कालाबाजारी करने वालों पर पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। हापुड़ के गाँव असौड़ा में समाजवादी पार्टी के नेता अब्दुल रेहान के घर पर पुलिस और जिला पूर्ति विभाग ने छापेमारी की। इस कार्रवाई में रेहान के घर से 55 भरे हुए और कई खाली गैस सिलेंडर बरामद हुए हैं। छापेमारी की भनक लगते ही आरोपित नेता मौके से फरार हो गया, जिसकी तलाश में पुलिस जुटी है।

सरकार और पुलिस को सिलेंडर सप्लाई करने वाली एजेंसी पर सख्त कार्यवाही कर उसका लाइसेंस तुरंत कैंसिल कर उसके बैंक अकाउंट और दुकान को भी सील कर देना चाहिए। 

महँगे दामों पर बेच रहे थे सिलेंडर

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि अब्दुल रेहान मजबूरी का फायदा उठाकर जरूरतमंदों को एक सिलेंडर 2000 रुपए तक में बेच रहा था। पुलिस को सूचना मिली थी कि पंचायती घर के पास रहने वाला रेहान अपने घर में अवैध रूप से सिलेंडरों का बड़ा स्टॉक जमा किए हुए है। सूचना मिलते ही टीम ने दबिश दी और सभी सिलेंडरों को जब्त कर लिया।

प्रदेश में सिलेंडरों की कमी के बीच इस तरह की कालाबाजारी को योगी सरकार को बदनाम करने की साजिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि अवैध भंडारण के खिलाफ यह अभियान जारी रहेगा। साथ ही जनता से अपील की गई है कि यदि कहीं भी ऐसी कालाबाजारी दिखे, तो तुरंत पुलिस को सूचित करें।

क्या सुप्रीम कोर्ट में मामलों की लिस्टिंग हमेशा सही तरीके से होती रही है? कोई वकील बोलेगा तो उसे “फटकारना” अधिकार है CJI का, लेकिन उसका दर्द भी समझना चाहिए

सुभाष चन्द्र

पिछले महीने 23 फरवरी को चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी ने वरिष्ठ वकील Mathews J Nedumpara को उनके द्वारा कॉलेजियम को ख़त्म करके NJAC बहाल करने की याचिका की लिस्टिंग को लेकर जबरदस्त फटकार लगाई उनकी याचिका पहले 17 नवंबर, 2022 को दायर हुई थी और CJI चंद्रचूड़ ने उस पर सुनवाई का आश्वासन भी दिया था। इसका मतलब था याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार हो गई थी, लेकिन  याचिका लिस्ट नहीं हुई 

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चर्चित YouTuber
 
चंद्रचूड़ जी द्वारा सुनवाई छोड़िए, 26 अप्रैल, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार पुनीत सहगल ने एडवोकेट मैथूस नेदमपरा की कॉलेजियम को ख़त्म करने और NJAC को बहाल करने की याचिका को accept करने से मना करते हुए कहा कि -

“कॉलेजियम को पहले ही Upheld किया जा चुका है और NJAC को, जिसमे जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार को बराबर के अधिकार दिए गए थे, संविधान पीठ ने October, 2015 में ख़ारिज कर दिया था review petition भी 2018 में ख़ारिज हो गई थी इसलिए Repeat litigation न्यायपालिका के समय और energy की बर्बादी करना है”

पुनीत सहगल ने 2013 के सुप्रीम कोर्ट के Rules का सहारा लेते हुए कहा कि -

“I hold that the registration of the present case was not proper and by virtue of order XV Rule 5 of the Supreme Court Rules, 2013 I hereby decline to receive the same”.

2013 के rule के अनुसार रजिस्ट्रार याचिका को Receive करने से मना कर सकता है अगर याचिकाकर्ता ने कोई reasonable cause नहीं बताया या यह याचिका तुच्छ है या इसमें scandalous matter है

CJI सूर्यकांत ने भी आश्वासन दिया था कि वो कॉलेजियम को ख़त्म करने पर विचार करेंगे और उनकी याचिका सुनेंगे वकील Nedumpara 23 फरवरी को अपनी याचिका की लिस्टिंग की मांग करने की जिद की और लगता है वे Out of Desperation कह गए कि अंबानी/अडानी के मामलों के लिए संविधान पीठ बन जाती हैं लेकिन आम आदमी के विषयों की सुनवाई नहीं होती

इस बात पर सूर्यकांत जी को घोर आपत्ति हुई और उन्होंने Nedumpara को कहा “Mr Nedumpara, be careful with what you submit in my court, you have seen me in Chandigarh, in Delhi ... I am warning you, be careful. Don’t think you will be able to continue misbehaving as you have been doing with other benches, I am warning you”. Nedumpara को यह भी कहा गया कि उनकी याचिका रजिस्ट्री के पास नहीं है उनकी 3 लंबित याचिकाओं में एक तो 27 जनवरी, 2026 को दायर हुई थी 

आप चीफ जस्टिस हैं और किसी भी वकील के बर्ताव पर आपको नाराज़ होने का पूरा अधिकार हैं लेकिन एक बार Nedumpara का दर्द भी समझाना जरूरी था क्या यह सत्य नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की चांडाल चौकड़ी अपने मामलों की लिस्टिंग अपनी मर्जी से करवाते रहे हैं और इसलिए ही उन्हें 30-35 लाख रूपए फीस एक दिन की मिलती है 

ठीक है आपको Nedumpara के शब्द बुरे लगे लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट में CJI रंजन गोगोई की पीठ के सामने वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने 16 अक्टूबर, 2019 को Official Documents फाड़ कर बेंच की तरफ फ़ेंक दिए थे लेकिन उन्हें ऐसे नहीं धमकाया गया जैसे Nedumpara की बात को Misbehaviour समझ कर फटकार मारी गई 

इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने राष्ट्रपति को आदेश दे दिए जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था दो जज राष्ट्रपति को आदेश दे सकते थे लेकिन दो जज केजरीवाल की गिरफ़्तारी की वैधता पर फैसला नहीं कर सकते थे जो उन्होंने संविधान पीठ को फैसला करने को छोड़ दिया लेकिन वह पीठ आज 2 साल में भी नहीं बनी

कॉलेजियम पर फैसला तो करना होगा जो फैसला 2015 में दिया वह गलत था क्योंकि उसने 125 करोड़ जनता की भावनाओं की अनदेखी की थी क्योंकि वह क़ानून संसद ने सर्वसम्मति से पास किया था और 16 राज्यों ने अनुमोदन किया था उसे 4 जज कैसे ख़ारिज कर सकते थे जिनकी जवाबदेही जनता के प्रति नहीं थी सुप्रीम कोर्ट इस कॉलेजियम के मामले में stakeholder और interested party है, इसलिए वह सही निर्णय नहीं ले सकता। इसके निर्णय के लिए कोई और मार्ग ढूंढना होगा