कार्यकर्ताओं को राम मंदिर-पौधरोपण का मुद्दा देकर खुद विदेश घूमने निकले अखिलेश : क्या UP चुनाव के लिए यही है आपकी राजनीति?

                                                            (AI तस्वीर साभार: Dall-e)
कहते हैं, “नेतृत्व की असली पहचान चुनावी मंच पर नहीं, मुश्किल समय में होती है।” जब जनता सवाल पूछ रही हो, सरकार फैसले ले रही हो और राजनीति अपने सबसे गर्म दौर में हो, तब यह भी देखा जाता है कि नेता मैदान में खड़ा है या हजारों किलोमीटर दूर बैठकर सोशल मीडिया से राजनीति कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस समय राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जाँच कर रही है, पौधरोपण अभियान को लेकर बडे़ स्तर पर सक्रिय है। ऐसे वक्त में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव विदेश दौरे पर हैं। ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव निजी दौरे पर अमेरिका गए हैं, और वहाँ से लंदन की यात्रा कर वापस भारत लौटेंगे।

सांसद प्रियंका चतुर्वेदी का अखिलेश पर हमला 

राज्य सभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि, राम मन्दिर दान चोरी का मास्टर माइंड टिन्नू यादव तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी का पुराना कार्यकर्ता निकला जो अपने आका के कहने पर हिन्दूओं की आस्था पर चोट कर रहा था।
और ये सब पता चला टिन्नू यादव और अखिलेश यादव की 980 बार हुई फोन कॉल से.. वाह रे सपाई भड़वो बाप ने राम भक्तों पर गो**ली चलवाई और बेटे ने रामभक्तों का चन्दा ही चुरा लिया यानी दोनों ही बाप बेटे ने हिन्दूओं के साथ खेला किया है। ध्यान रहे..
जो अखिलेश राम मन्दिर से चोरी करवा सकता है वो 2027 में CM बनने के बाद राम मन्दिर को तुड़वा भी सकता हैं।

ये वही अखिलेश यादव हैं, जो अपनी विदेश यात्रा के ठीक एक दिन पहले अपनी राजनीति चमकाने के लिए मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम से मिलते हैं। उससे पहले योगी सरकार के पौधरोपण अभियान को ‘भ्रष्टाचार’ बता देते हैं और अपने हिस्से का जनता को बरगलाकर खुद गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने विदेश चले जाते हैं।

हजारों किलोमीटर दूर से सोशल मीडिया पर राजनीति कर रहे अखिलेश यादव

दिलचस्प बात यह है कि विदेश जाने से पहले अखिलेश यादव अपनी सोशल मीडिया टीम को ठीक ढंग से समझाकर गए हैं। तभी तो उत्तर प्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर पहुँचने के बाद भी अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट बंद नहीं हो रहे हैं। उनकी टीम योगी सरकार को घेरते हुए हर घंटे पोस्ट शेयर कर रही है।

अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट भी योगी सरकार के बड़े पौधरोपण अभियान को निशाना बनाने वाली है। इस पोस्ट में उन्होंने अपना पुराना आरोप दोहराते हुए पूरे अभियान को ‘भ्रष्टारोपण’ अभियान बताया। इसके साथ उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंच पर पौधरोपण करते हुए एक वीडियो भी साझा किया।

इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने जैसे अभियान पर राजनीतिक हमला करते हुए उन्होंने इसे ‘एनकाउंटर’ तक कह दिया।

पहले भी राजनीति छोड़ विदेश घूमने गए समाजवादी पार्टी के मुखिया

यह पहली बार नहीं है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़ अचानक अखिलेश यादव विदेश घूमने निकल गए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश यात्रा पर रहे। पार्टी ने हर बार इन दौरों को निजी बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इनकी टाइमिंग पर चर्चा जरूर हुई।

जून 2018 में अखिलेश यादव परिवार के साथ एक विदेशी छुट्टी पर रवाना हुए थे। उस समय समाजवादी पार्टी उपचुनावों में मिली सफलता के बाद विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी। वहीं, लखनऊ के सरकारी बंगले को खाली करने और उसमें नुकसान के आरोपों को लेकर भी उनकी राजनीति के केंद्र में चर्चा हो रही थी। ऐसे समय में उनके विदेश जाने को लेकर सवाल भी उठे थे।

और 2020 में जब हाथरस कांड पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ था। कॉन्ग्रेस से लेकर विपक्षी दलों के नेता लगातार हाथरस पहुँच रहे थे। लेकिन उस समय अखिलेश यादव विदेश में थे।

2025 में संसद के बजट सत्र के आसपास भी अखिलेश यादव परिवार के साथ लंदन टूर पर गए थे। तब तक 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी कर चुकी थी और अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हो चुके थे। इस समय जब देश में राजनीति करनी चाहिए थी, तब वह जश्न मनाने विदेश में थे।

यानी न तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया, न प्रदेश में किसी मुद्दे पर सक्रियता से भाग लिया और न ही खुद पर आए आरोपों का जवाब देने की उन्हें फुरसत मिली क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया विदेश घूमने में व्यस्त थे।

आज राम मंदिर पर सिर्फ तीन लोग बोल रहे हैं।
1:-पहले कांग्रेसी जिन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी कि अयोध्या में किसी भी कीमत पर राम मंदिर ना बने अपने बड़े-बड़े वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर रोकने के लिए लगा दिया और राम को काल्पनिक पात्र बताया था.. कोर्ट में एफिडेविट दिए कांग्रेस ने.*
2:- दूसरा समाजवादी पार्टी जिन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा राम भक्तों की अयोध्या में.. हत्या करवा दी पूरा सरयू खून से लाल करवा दिया..सरयू मै घायलों को बोरी में डालकर फेंका था मुलायम सरकार ने। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक आजम खान को पार्टी और सरकार में नंबर दो बना दिया ।और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के अध्यक्ष जफरयाब जिलानी को कैबिनेट मंत्री का प्रोटोकॉल दिया*
3:- तीसरा आम आदमी पार्टी जिसका सबसे बड़ा नेता केजरीवाल कहता था कि मेरी नानी ने कहा है कि राम मंदिर भूलकर भी मत जाना क्योंकि राम कभी ऐसे मंदिर में नहीं रह सकते जो मस्जिद तोड़कर बनी है । और इसी AAP का मनीष सिसोदिया जो कहता था कि राम मंदिर नहीं बनना चाहिए वहां यूनिवर्सिटी बननी चाहिए।*
इनकी राजनीतिक लालसा तो देखिए आज यह तीनों कैटेगरी के हिंदूद्रोही इस तरह से हिंदुओं को भरमा रहे हैं जैसे यही सबसे बड़े राम भक्त हो..।*
इसका कारण कोई राम भक्त और सनातनी विचारधारा, हिंदुत्व की विचारधारा नहीं है सिर्फ एक ही मकसद है कि हिंदुओं को और ज्यादा कैसे बांटे?कैसे इनको एक से दो फिर दो से चार से चार से आठ करें... इनका यही मकसद है कि हिंदू समाज को कैसे तोड़ा जाए... सिर्फ अपने वोट के हित के लिए सिर्फ अपनी राजनीति एजेंडा के लिए... जिन लोगों ने कभी भी राम मंदिर के समर्थन भी नहीं किया.. चंदा देना तो बहुत दूर की बात... आज वह लोग बात करते हैं राम मंदिर की!!*

अखिलेश, तेजस्वी, राहुल… सब विदेश में बैठकर चमका रहे राजनीति

एक तरफ अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में सत्ता हथियाने का ख्वाब बुन रहे हैं, दूसरी तरफ हर जरूरी मौकों पर विदेश यात्राएँ पर घूमने निकल पड़ते हैं। उन्होंने राम मंदिर चंदा चोरी के नाम पर हिंदुओं को जगाने का ढोंग कर, दलित छात्रा की हत्या पर अपने मतलब की राजनीति कर और पौधरोपण जैसे पॉजिटिव काम को भ्रष्टाचार बताकर, अपने समर्थकों को झुनझुना थमा दिया है और अब उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि इसे बजाना कैसे हैं?

अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी विदेश यात्रा पर सवाल उठे हों। अलग-अलग समय पर अन्य विपक्षी नेता भी यही करते आए हैं। उदाहऱण के लिए, तेजस्वी यादव, जो फिलहाल यूरोप में है, वहीं बैठकर पटना के बंटी यादव हत्याकांड के पीड़ित परिवार से फोन पर बात कर लेते हैं। राहुल गाँधी भी तीन हफ्ते से यूरोप घूम रहे हैं, जिसके चलते कॉन्ग्रेस के खुद के ‘छात्रों की गूँज’ जैसे कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं।

तो इसीलिए यह सोच-विचार करना जरूरी है कि किस नेता को असल में जनता के मुद्दों की फिक्र है और किसे नहीं है। जहाँ एक ओर योगी सरकार राम मंदिर चढ़ावे की निष्पक्ष जाँच कर रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग को खत्म करने के लिए पौधरोपण कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश का विपक्ष विदेश घूमने में व्यस्त है।

संविधान के दो ही बड़े रक्षक है, पहला नंबर राहुल गांधी है जो अपनी अधिकांश सभाओं एवं पद यात्राओं में एक लाल रंग की पुस्तक होती है उसी को हाथ में लहराते हुए ,चाहे उन्होंने उस पुस्तक को खोल कर पढ़ा हो या नहीं, बह लाल किताब को बह भारत का संविधान कहते है, उसकी रक्षा का बह प्रण लेते दिखते है जब उनके नेहरू गांधी परिवार ने उस संविधान को अपने हिसाब से दसियों बार तोड़ा एवं बदला है।
दूसरे संविधान के रक्षक समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव है, जो 10 साल से सत्ता से बाहर रहकर ऊब चुके है। उन्हें भी राहुल गांधी की तरह संविधान से बहुत प्यार है। उनके एवं उनके पिताश्री के शासन काल में जिस तरह से दूसरे समुदाय के तुष्टिकरण के लिए अपनी सरकार आते ही
उन अपराधियों को छोड़ दिया गया जिन पर बहुत ही गंभीर आरोप थे । अतीक अहमद, मुख्तयार अंसारी एवं उनके गुर्गो के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। फिरौती, जवारदस्त हफ्ता वसूली करने बालों पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं। महिलाओं के अंदर घर से बाहर निकलने पर उनके परिजनों को भय, बच्चियां स्कूल जाने से भी डरती थी, बही लोग अब संविधान की रक्षा की बात कर रहे है।

दुनिया मोदी को अपना सिरमौर बना रही है लेकिन राहुल विन्ची और विपक्ष मोदी से घृणा पाल रहे हैं; अब पोलैंड के विदेश मंत्री ने मोदी का हुनर जगजाहिर कर दिया

सुभाष चन्द्र 

राहुल विन्ची और उसकी ब्रिगेड ने बहुत दिनों से एक fake Narrative चलाया हुआ था। मोदी ट्रंप से डरता है, मोदी ट्रंप के आगे Compromise हो गया है और मोदी ने डर कर रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया। ऑपरेशन -सिंदूर युद्ध रुकने के बाद राहुल गांधी ने तुर्रा छेड़ा था “नरेंदर सरेंडर” और हर कोई ऐरा गैरा नत्थू गैरा यही राग अलाप रहा था

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन राहुल और तमाम विपक्षी नेताओं को पोलैंड के विदेश मंत्री व्लादिस्लाव टेओफिल बार्टोशेव्स्की (Władysław Teofil Bartoszewski) की बात सुनकर सांप सूंघ गया। उन्होंने कहा कि कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को परमाणु हमले करने से रोकने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, और पुतिन से बात कर इस विनाशकारी कदम उठाने से रोकने के लिए राजी किया

विश्व के अनेक नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवर्तनकारी शासन, गरीबी उन्मूलन के प्रयासों तथा बढ़ते वैश्विक प्रभाव की समय-समय पर प्रशंसा की है। 

क्रिस्टोफर लक्सन, न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री:

 उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को "हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में से एक" तथा "न्यूज़ीलैंड के सच्चे मित्र" बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत में आया परिवर्तन, विशेषकर करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य, उन्हें अत्यंत प्रभावित करता है;

बराक ओबामा, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ने  मोदी के परिवर्तनकारी एजेंडे की सराहना करते हुए TIME पत्रिका में उन्हें भारत का "मुख्य सुधारक (Reformer-in-Chief)" कहा था;

व्लादिमीर पुतिन, रूस के राष्ट्रपति ने  मोदी को "एक अत्यंत बुद्धिमान नेता, जो सबसे पहले अपने देश के बारे में सोचते हैं" कहा था। उन्होंने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की प्रशंसा करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री मोदी सदैव राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं;

प्रबोवो सुबियांतो, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने मोदी के राजनीतिक जीवन और शासन की सराहना करते हुए कहा, "मैं आपके राजनीतिक जीवन का अनुसरण करता हूँ और आपके अनेक कार्यक्रमों को अपनाता हूँ";

अलेक्ज़ेंडर स्टब, फ़िनलैंड के राष्ट्रपति ने भारत के बढ़ते कूटनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक कद ऐसा है कि वे यूक्रेन संघर्ष में युद्ध विराम और वार्ता का आह्वान करने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं;

अबी अहमद अली, इथियोपिया के प्रधानमंत्री ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, आर्थिक परिवर्तन तथा गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की सराहना की और उन्हें "ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की एक सशक्त आवाज़" बताया;

 संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान "चैम्पियंस ऑफ द अर्थ (Champions of the Earth Award)" तथा "ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड (Global Goalkeeper Award)" मिले

अभी हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने मोदी के लिए कहा "Narendra Modi is a very tough negotiator, a total killer at the negotiating table. He is calm, he's cool, and he thinks a lot about India. He always puts India's interests first." ये कह कर राहुल विन्ची और विपक्ष की “नरेंदर सरेंडर” की थ्योरी को उखाड़ फेंका

अभी तक 35 देश उन्हें अपना सर्वोच्च सम्मान दे चुके हैं - मोदी ने कोरोना में 100 से ज्यादा देशों की मदद की और हाल ही में वेनेजुएला में आए भूकंप में मोदी की मदद के लिए वेनेजुएला सरकार ने कहा Thank You Prime Minister Modi. मोदी से चिढ़ने वालों को याद होगा कि  Prime Minister of Papua New Guinea, James Marape ने मोदी के चरण स्पर्श किये थे

जंतर-मंतर पर ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा पर हमला, CJP के लोगों ने की सरेआम गुंडागर्दी


दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन के दौरान एक बेहद चिंताजनक और निंदनीय घटना सामने आई है। प्रदर्शन कवर करने पहुंचे ‘ऑपइंडिया’ (OpIndia) के पत्रकार अनुराग मिश्रा के साथ वहाँ मौजूद कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े गुंडों द्वारा न सिर्फ बदसलूकी की गई, बल्कि उन पर शारीरिक हमला भी किया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रदर्शन के ‘शांतिपूर्ण’ होने के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों और वायरल वीडियो के अनुसार, अनुराग मिश्रा जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों से सामान्य सवाल पूछ रहे थे। इसी दौरान वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनके काम में बाधा डालनी शुरू कर दी। देखते ही देखते बहस हाथापाई में बदल गई और पत्रकार पर हमला कर दिया गया।

 पत्रकार अनुराग मिश्रा ने घटना के बावजूद अपना काम नहीं रोका और बेखौफ होकर अपना काम करते रहे। उन्होंने कहा, “हम वहाँ सिर्फ अपना काम कर रहे थे और निष्पक्षता से सवाल पूछ रहे थे। लेकिन कुछ लोगों को सवाल पसंद नहीं आए। उन्होंने मुझे घेरा, धक्का-मुक्की की और मुझ पर हमला कर दिया। अगर देश की राजधानी में पत्रकार ही सुरक्षित नहीं हैं और सवाल पूछने पर उन पर हमले होंगे, तो लोकतंत्र और प्रेस की आजादी का क्या मतलब रह जाता है?”

इस घटना के बाद प्रदर्शन के मुख्य चेहरों और आयोजकों पर उंगलियाँ उठने लगी हैं। सोशल मीडिया पर लोग सोनम वांगचुक, विजेता दहिया, अभिजीत दिपके और सौरव दास जैसे नेताओं को टैग करके सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यही उनके तथाकथित शांतिपूर्ण आंदोलन की सच्चाई है? क्या वे अपने प्रदर्शन में शामिल इन अराजक तत्वों की गुंडागर्दी की जिम्मेदारी लेंगे? आलोचकों का कहना है कि असहमति की आवाज को हिंसा के दम पर दबाना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है।

इस हमले ने एक बार फिर फील्ड पर काम करने वाले ग्राउंड पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। लोगों ने दिल्ली पुलिस से माँग की है कि वीडियो के आधार पर हमलावरों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी पत्रकार के साथ ऐसी हरकत न हो सके।

राम मंदिर में बुलडोजर क्यों नहीं चला? अब डिंपल यादव ने उगला जहर; मुलायम परिवार की आँखों में खटक रहा राम मंदिर, ससुर ने कारसेवकों का कराया नरसंहार-पति ने चंदाचोरी पर फैलाई नफरत


अपने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने अयोध्या में राममन्दिर का समाजवादी पार्टी शुरू से विरोध करती रही है। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू 11 बजे के बाद होली तक नहीं खेल सकते थे। 84 कोसी परिक्रमा पर पाबन्दी आदि आदि इतना सबकुछ होने के बाद भी समझ में नहीं आता हिन्दू क्यों समाजवादी पार्टी को वोट देता है? समाजवादी पार्टी में जितने भी हिन्दू हैं क्या वह कालनेमि हिन्दू हैं? यदि नहीं तो खुलकर डिम्पल ने जो राममन्दिर के विरुद्ध जहर उगला है उसका विरोध करो। अगर दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बन गयी PDA यानि Phir Darayega Ali हरकत में आ जाएगा।   

समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार और नीट (NEET) पेपर लीक के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के समर्थन में उतरी हुई हैं। जंतर-मंतर पहुँचकर डिंपल यादव ने वांगचुक का समर्थन तो किया, लेकिन इस दौरान मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले को लेकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोला। डिंपल यादव ने राम मंदिर और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर एक ऐसा विवादित बयान दे दिया है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है।

राम मंदिर पर डिंपल का ‘बुलडोजर’ राग और पुराना इतिहास

डिंपल यादव ने भाजपा सरकार को घेरते हुए कहा कि देश में इस समय ‘बुलडोजर सरकार’ चल रही है, जो छात्रों के भविष्य पर बुलडोजर चला रही है। उन्होंने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले का जिक्र करते हुए सवाल उठाया। डिंपल ने कहा, “जब राम मंदिर में इतनी बड़ी चोरी हो गई तो वहाँ पर बुलडोजर थक गया है। तो आखिर बुलडोजर क्यों थम गया, सवाल इस बात का है।”

इस बयान के बाद अब डिंपल यादव खुद चौतरफा घिर गई हैं। आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या एक कर्मचारी पर लगे कथित चोरी के आरोप के आधार पर पवित्र राम मंदिर की तुलना किसी अवैध निर्माण से करना जरा भी उचित है? इतिहास गवाह है कि मुलायम सिंह यादव के समय में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई गई थीं, जिसे लोग नरसंहार तक कहते हैं।

इसके बाद अखिलेश यादव ने राम मंदिर के चंदे को लेकर बयानबाजी की थी। अब डिंपल यादव के इस बयान के बाद लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिंपल भी राम मंदिर पर बुलडोजर चलवाकर वहाँ पुराना बाबरी ढांचा वापस देखना चाहती हैं? पूरा यादव परिवार ही राम विद्रोही बनकर सामने आ रहा है।

अखिलेश का पुराना बयान और पूरा परिवार घेरे में

अखिलेश यादव ने भी पहले राम मंदिर के संदर्भ में एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हमें सांचा नहीं, बल्कि ‘ढांचा बदलना’ होगा। उनके इस पुराने बयान को डिंपल यादव के ताजा बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। देश जानता है कि पूरा मुलायम परिवार शुरू से ही राम विरोधी रहा है और डिंपल का यह बयान उसी सोच को आगे बढ़ाता है। अब जंतर-मंतर के बहाने इनके अंदर की कड़वाहट भी बाहर आ रही है। मुद्दा पेपर लीक मामले का है, लेकिन निशाना राम मंदिर पर आकर रूक जाता है।

अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण होने के बाद से ही यह मंदिर मुलायम परिवार की आँखों में और ज्यादा खटकने लगा है। राम मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी पर चोरी का आरोप क्या लगा, डिंपल यादव ने सीधे पूरे मंदिर परिसर पर बुलडोजर चलाने की माँग जैसी भाषा का इस्तेमाल कर दिया। जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से गूँज रहा है कि क्या एक कथित चोरी के बहाने पूरे राम मंदिर को निशाना बनाना और वहाँ बुलडोजर की बात करना तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा नहीं है?

सपा सांसदों का जमावड़ा

इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत सोनम वांगचुक के धरने से जुड़ी हुई है। सोनम वांगचुक शिक्षा में बड़े सुधार, नीट पेपर लीक मामले में सख्त एक्शन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर पिछले 21 दिनों से जंतर-मंतर पर कड़े धरने पर बैठे हैं। वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले यह बड़ा आंदोलन चला रहे हैं। इतने दिनों से लगातार अनशन पर रहने के कारण वांगचुक की तबीयत काफी बिगड़ चुकी है और शनिवार (18 जुलाई) सुबह ही अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच समाजवादी पार्टी के सांसदों का एक बड़ा दल लगातार जंतर-मंतर पहुँच रहा है। इससे पहले सपा सांसद प्रिया सरोज भी वांगचुक के अनशन स्थल पर पहुँची थीं और उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक उनके मुद्दों को उठाने का वादा किया था। खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सोनम वांगचुक से अपना अनशन समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन अब इस आंदोलन के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक बयानों के लिए होने लगा है।

अखिलेश यादव ने फैलाया ‘नोटों के निजीकरण’ का झूठ, पॉलिमर शीट खरीदने के टेंडर पर गढ़ी कहानी: भूल गए UPA के दौर में विदेश से आता था करेंसी पेपर

                                            नोटों के निजीकरण पर अखिलेश का फर्जी दावा
विपक्ष का धरातल में जाने का मुख्य कारण झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना है। अब तक जितने भी मुद्दों को विपक्ष ने उछाला सबके सब धराशाही हो गए। एक बात जो ध्यान देने वाली है कि राममन्दिर चढ़ावे में चोरी का मामला है यह चुनाव तक खींचेगा क्योकि उम्मीद की जा रही है कि अखिलेश और कुछ विपक्षी भी लपेटे में आएंगे। जो उत्तर प्रदेश में थाली में सजाकर योगी आदित्यनाथ को सत्ता सौंपने का काम करेगी।  

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाया है कि क्या भाजपा सरकार में अब भारतीय बैंक नोटों का भी निजीकरण किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी एक टेंडर का हवाला दिया है।

इस टेंडर में नोटों की छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाली ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए कंपनियों से आवेदन माँगे गए हैं। इसे आधार बनाकर अखिलेश यादव ने X पर लिखा, “कमीशनखोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था।”

उन्होंने लिखा, “भ्रष्ट BJP राज में अब नोटों का भी प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा क्या? कमीशनख़ोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था। जब देश की मुद्रा ही आत्मनिर्भर नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था और देश आत्मनिर्भर कैसे होगा? अब क्या सरकार भी आउटसोर्सिंग पर दे दी जाएगी?”

अखिलेश ने लिखा, “इतने बड़े और संवेदनशील कार्य के लिए इतना छोटा कंजूसीभरा टेंडर निकालने के पीछे, कहीं चुपके से औपचारिकता पूरा करने का कोई गलत मंसूबा तो नहीं है। लगता है सेटिंग पहले ही हो चुकी है, दिखाने को ख़ानापूर्ति की जा रही है। भाजपा सरकार नहीं, मुनाफाखोरों की भागीदार है।”

जिस टेंडर का अखिलेश यादव जिक्र कर रहे हैं, वह 17 जुलाई 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी किया गया एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) है। इसमें भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए उपयुक्त ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए आवेदन माँगे गए हैं। अखिलेश यादव का यह दावा कि इससे बैंक नोटों का निजीकरण हो रहा है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

यह टेंडर केवल BRBNMPL द्वारा एक विशेष प्रकार के कच्चे माल यानी बेस सब्सट्रेट की खरीद के लिए जारी किया गया है। इसका भारतीय मुद्रा की छपाई, डिजाइन, सुरक्षा फीचर्स या नोट जारी करने का अधिकार किसी निजी कंपनी को देने से कोई संबंध नहीं है। भारतीय नोटों की छपाई पहले की तरह ही केवल RBI के नियंत्रण वाली प्रेसों में होती रहेगी।

इनमें BRBNMPL की मैसूर और सालबोनी स्थित प्रेसें तथा सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) की नासिक और देवास स्थित प्रेसें शामिल हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से पॉलिमर आधारित बैंक नोट लाने की संभावना पर विचार कर रहा है। खासकर छोटे मूल्य के नोटों के लिए क्योंकि वे जल्दी गंदे हो जाते हैं और उनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं। जून 2026 में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव शुरुआती चरण में है और केंद्रीय बैंक इसके फायदे और नुकसान का अध्ययन कर रहा है। भविष्य में ऐसा निर्णय होने पर भी नोटों की छपाई इन्हीं सरकारी प्रेसों में होगी, किसी निजी कंपनी के पास नहीं जाएगी।

 भारत में अभी पॉलिमर नोट जारी नहीं किए जाते और इसलिए यहाँ पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने वाली कोई कंपनी भी नहीं है। दुनिया के केवल कुछ ही देश पॉलिमर नोट जारी करते हैं। जैसे सामान्य कागज वाले नोटों के लिए इस्तेमाल होने वाले कॉटन पेपर में सुरक्षा फीचर पहले से शामिल होते हैं, वैसे ही पॉलिमर शीट में भी निर्माण के दौरान सुरक्षा फीचर जोड़े जाते हैं। इसलिए यह एक विशेष प्रकार का उत्पाद है जिसे दुनिया की केवल कुछ कंपनियाँ ही बनाती हैं। इसी कारण BRBNMPL ने योग्य कंपनियों से वैश्विक स्तर पर एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) माँगा है।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, रोमानिया और वियतनाम जैसे कई देशों ने अपने सभी या अधिकांश मूल्य वर्ग के लिए पॉलिमर बैंक नोट अपनाए हैं। लेकिन ये देश भी इन नोटों के लिए जरूरी विशेष ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट खुद नहीं बनाते। ये शीट कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों से खरीदी जाती हैं। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी ऑस्ट्रेलिया की CCL Secure है।

इसकी बेस फिल्म इसकी सहयोगी कंपनी Innovia Films तैयार करती है। इसके बाद CCL Secure उस पर ओपैसिफिकेशन लेयर और संबंधित केंद्रीय बैंक की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा फीचर जोड़ती है। दूसरी बड़ी कंपनी ब्रिटेन की De La Rue है जो अपना Safeguard पॉलिमर सब्सट्रेट बनाती है और तैयार बैंक नोट भी छापती है। दुनिया के केंद्रीय बैंक और उनकी नोट छापने वाली प्रेसें इन विशेष कंपनियों से तैयार पॉलिमर शीट खरीदती हैं। वे इन्हें खुद नहीं बनातीं।

अखिलेश यादव जहाँ पॉलिमर शीट के आयात को बैंक नोटों का निजीकरण बता रहे हैं तो वहीं हकीकत यह है कि भारत में भी हाल तक कागज वाले नोट आयातित सुरक्षा कागज पर ही छपते थे। RBI लंबे समय तक जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से आयातित करेंसी पेपर पर निर्भर था।

हालाँकि, होशंगाबाद की सिक्योरिटी पेपर मिल से कुछ घरेलू उत्पादन होता था लेकिन आत्मनिर्भरता को बड़ी मजबूती तब मिली जब मैसूर में बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने काम शुरू किया। SPMCIL और BRBNMPL के इस संयुक्त उपक्रम ने 2016 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। इससे भारत की उत्पादन क्षमता काफी बढ़ी और मेक इन इंडिया पहल के तहत आयातित बैंक नोट पेपर पर निर्भरता काफी कम हुई।

इसका मतलब यह है कि जब केंद्र में अखिलेश यादव की पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी, तब भारत विदेशी देशों से आयात किए गए कागज पर बैंक नोट छाप रहा था।

यह टेंडर भविष्य में इस्तेमाल हो सकने वाली नई सामग्री की जाँच और तैयारी की एक सामान्य प्रक्रिया है और यह पूरी तरह RBI की निगरानी में होगी। आयातित शीट का इस्तेमाल ₹10 और ₹20 के नोटों के सीमित पायलट प्रोजेक्ट के लिए किया जाएगा। इससे बैंक नोटों के निजीकरण या मुद्रा पर सरकार के नियंत्रण में किसी तरह की कमी का कोई संकेत नहीं मिलता।

दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल भारत में डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में नकदी का इस्तेमाल होता है। इसलिए यदि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव लागू होता है तो बड़ी मात्रा में पॉलिमर शीट की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में विदेशी कंपनियाँ भारतीय निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर भारत में ही उत्पादन इकाइयाँ लगाने में रुचि लेंगी।

जहाँ तक अखिलेश यादव के इस आरोप का सवाल है कि इतने महत्वपूर्ण काम के लिए बहुत छोटा विज्ञापन जारी किया गया, तो आजकल टेंडर विज्ञापन इसी तरह प्रकाशित किए जाते हैं। विस्तृत निविदा दस्तावेज और सभी शर्तें संबंधित विभाग या एजेंसी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाती हैं जबकि अखबारों में केवल छोटा-सा विज्ञापन देकर वेबसाइट का पता बताया जाता है। इससे खर्च कम रहता है क्योंकि बड़े अखबारी विज्ञापनों पर ज्यादा पैसा खर्च होता है। इस विज्ञापन में भी इच्छुक कंपनियों से कहा गया है कि वे EOI दस्तावेज, पात्रता मानदंड और अन्य जानकारी के लिए www.brbnmpl.co.in पर जाएँ।

ईरान की जनता में रिकॉर्ड गुस्सा, 90% लोग चाहते हैं बदलाव: राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़ी लीक रिपोर्ट में बड़ा दावा, जानें- युद्ध और राष्ट्रीय पहचान पर क्या बोले लोग?

जब से ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध शुरू हुआ है मीडिया इजराइल, ओमेन, दुबई, सऊदी अरब और कुवैत आदि में ईरान की बमबारी से हुए नुकसान को दिखाता रहता है, लेकिन ईरान को कितना नुकसान हुआ है वह नहीं दिखाता, क्यों? क्योकि ईरान ने इंटरनेट बंद कर रखा है। जिस दिन इंटरनेट की पाबन्दी हटेगी दुनिया एक बर्बाद ईरान देखेगी। 

फिर भी इतनी सख्ती के बावजूद ईरान राष्ट्रपति कार्यालय से लीक हुई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरानी युद्ध नहीं शांति चाहते हैं ताकि कट्टरपंथ से बाहर निकल आधुनिक जीवन जी सकें।  

गौरतलब यह है कि युद्ध से पहले ईरान में महिलाओं द्वारा बुर्का, हिजाब और नकाब को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे, महिलाएं बुर्का, हिजाब और नकाब उतार सड़क पर बाल कटवा रही थीं।        

ईरान की राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़ी एक गोपनीय रिपोर्ट लीक होने के बाद देश की मौजूदा स्थिति को लेकर कई बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत ईरानी नागरिक किसी न किसी तरह का बदलाव चाहते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुकी है। खास बात यह है कि रिपोर्ट सरकार को समस्याओं की जड़ दूर करने के बजाय जनता के गुस्से को नियंत्रित करने की सलाह देती है।

यह दस्तावेज ‘What Iran Wants’ शीर्षक से तैयार किया गया है। इसे राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के सामाजिक मामलों के सलाहकार और पूर्व खुफिया अधिकारी अली रबीई ने तैयार किया है। यह रिपोर्ट अप्रैल और मई में कराए गए सर्वे पर आधारित बताई गई है और जून में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच साझा की गई थी।

सर्वे में सिर्फ 9% लोगों ने मौजूदा व्यवस्था का समर्थन किया

रिपोर्ट के मुताबिक, जब लोगों से ईरान के भविष्य को लेकर राय पूछी गई तो केवल 9 प्रतिशत लोगों ने मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने का समर्थन किया। बाकी लोगों ने सुधार, बड़े सुधार या पूरी व्यवस्था बदलने जैसे विकल्पों को चुना।


हालाँकि, रिपोर्ट में सर्वे की कार्यप्रणाली का पूरा विवरण नहीं दिया गया है, इसलिए इसके आँकड़ों पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। फिर भी कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये नतीजे देश के मौजूदा माहौल से मेल खाते हैं।

जनता में गुस्सा और निराशा रिकॉर्ड स्तर पर

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान में गुस्से का स्तर दुनिया में अब तक दर्ज किसी भी देश से अधिक है। सर्वे के अनुसार 63.6 प्रतिशत लोगों ने खुद को गुस्से में बताया, जबकि पहले यह आंकड़ा काफी कम था।

इसके अलावा करीब आधी आबादी ने खुद को निराश, उदास, डरी हुई या लगातार चिंता में रहने वाला बताया। रिपोर्ट के अनुसार युवाओं और पढ़े-लिखे लोगों में यह भावना सबसे ज्यादा देखने को मिली।

युद्ध नहीं, बातचीत का रास्ता चाहते हैं लोग

अमेरिका के साथ तनाव को लेकर भी रिपोर्ट में अहम जानकारी सामने आई है। करीब 44 प्रतिशत लोगों ने युद्धविराम बनाए रखने और बातचीत जारी रखने का समर्थन किया। वहीं, बहुत कम लोगों ने अमेरिका की सभी शर्तें मानने की बात कही।

अधिकांश लोगों ने यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करने का भी विरोध किया। हालाँकि, सर्वे में यह भी सामने आया कि लोगों का भरोसा न तो बातचीत करने वाली टीम पर पूरी तरह है और न ही सैन्य नेतृत्व पर।

सरकारी दावों से अलग दिखी जनता की तस्वीर

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार जिस राष्ट्रीय एकजुटता की तस्वीर पेश कर रही है, वह पूरी तरह वास्तविक नहीं दिखती। सर्वे के अनुसार 47 प्रतिशत लोग युद्ध के दौरान आयोजित सरकारी रैलियों में कभी शामिल नहीं हुए। राजधानी तेहरान में यह आँकड़ा 61 प्रतिशत रहा। रिपोर्ट में यह भी माना गया कि राष्ट्रीय रक्षा से जुड़े स्वयंसेवी अभियान को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

राष्ट्रीय पहचान मजबूत, लेकिन देश छोड़ने की इच्छा भी बढ़ी

सर्वे में 85 प्रतिशत से अधिक लोगों ने खुद को ईरानी होने पर गर्व महसूस करने की बात कही। खासकर युवाओं में मजहबी पहचान की तुलना में राष्ट्रीय पहचान अधिक मजबूत होती दिखाई दी।

दूसरी ओर  परंपराओं का पालन लगातार घटने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है। इसके साथ ही करीब एक-तिहाई लोगों ने मौका मिलने पर देश छोड़ने की इच्छा जताई। 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और विश्वविद्यालय शिक्षित लोगों में यह प्रतिशत और अधिक बताया गया।

सरकार को क्या सलाह दी गई?

रिपोर्ट में सरकार को राजनीतिक बदलाव की सलाह नहीं दी गई है। इसके बजाय सुझाव दिया गया है कि लोगों को यह समझाने की कोशिश की जाए कि उनकी आर्थिक परेशानियों की मुख्य वजह प्रतिबंध हैं।

साथ ही सरकारी मीडिया को अधिक समावेशी छवि दिखाने और ऐसी नीतियों से बचने की सलाह दी गई है जिनसे सरकार और समाज के बीच टकराव बढ़े। रिपोर्ट के अंत में चेतावनी दी गई है कि समाज गहरे असंतोष की स्थिति में है और यदि हालात नहीं बदले तो भविष्य में इसका गंभीर असर देखने को मिल सकता है।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई दिल्ली पुलिस; बड़ा खुलासा : देश, हिन्दुत्व और मोदी विरोधी ताकतों की अराजकता फैलाने की खतरनाक साजिश, हटाए गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा


दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार (18 जुलाई 2026) को दिल्ली पुलिस ने जबरन अस्पताल ले गई है। यह कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश और उनकी लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और मेडिकल निगरानी सुनिश्चित करने के लिए की गई। अरविन्द केजरीवाल गैंग के मंसूबों पर पानी फिर गया।  

पुलिस के अस्पताल ले जाने के दौरान प्रदर्शन स्थल पर कुछ समय के लिए तनाव का माहौल भी देखने को मिला। दिल्ली पुलिस का कहना है कि कोर्ट के आदेशों और मेडिकल एक्सपर्ट्स की सलाह के अनुसार, सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए उन्हें जरूरी मेडिकल देखभाल के लिए सफदरजंग अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।

सोनम वांगचुक 28 जून 2026 से नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे समेत विभिन्न माँगों को लेकर धरने और भूख हड़ताल पर बैठे थे। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में उनकी सेहत को देखते हुए नियमित चिकित्सकीय जाँच और आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी नागरिक के जीवन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह पुलिस की टीम जंतर-मंतर पहुँची और मेडिकल सहायता के लिए वांगचुक को अस्पताल ले गई। इस दौरान वहाँ मौजूद छात्रों और समर्थकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

हालाँकि पुलिस उन्हें अपने साथ लेकर रवाना हो गई। इसके बाद जंतर-मंतर पर मौजूद अन्य प्रदर्शनकारियों को भी वहाँ से हटाया जाने लगा। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आरोप लगाया गया कि पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को उनके ठहरने के स्थान पर रोककर हिरासत में लिया गया।

अभिजीत दीपके ने दावा किया कि पुलिस ने उनके साथ मारपीट की। वहीं पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ दास ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया और कई लोगों को हटाया गया। हालांकि इन आरोपों पर दिल्ली पुलिस की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

वांगचुक ने शुक्रवार (17 जुलाई 2026) की रात एक वीडियो संदेश जारी कर कहा था कि उनके शरीर का करीब 20 प्रतिशत वजन कम हो चुका है. उन्होंने बताया कि शरीर की मांसपेशियाँ भी प्रभावित हो चुकी हैं, लेकिन उनका हौसला और मानसिक स्थिति अब भी मजबूत है।

वीडियो संदेश में वांगचुक ने देशवासियों से 20 जुलाई को प्रस्तावित ‘चलो संसद’ मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे मशहूर एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को 20 दिन पूरे हो चुके हैं। 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक नीट (NEET) जैसी बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। अभिजीत दीपके द्वारा संचालित आंदोलन में वांगचुक जब भूख हड़ताल पर बैठे तो उन्हें लगा कि वो महात्मा गांधी और समाज सेवी अन्ना हजारे की तरह एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे भीड़ गायब होती चली गई। इससे ना सिर्फ वांगचुक की हताशा बढ़ने लगी, बल्कि उन्हें मोहरा बनाने वाले देश, हिन्दुत्व और मोदी विरोधी ताकतों की बेचैनी भी बढ़ने लगी। अब ये ताकतें संसद के मानसून सत्र के दौरान अराजकता पैदा कर दिल्ली सहित पूरे देश का माहौल खराब करना चाहती हैं। इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ आंदोलन का आह्वान किया है। वहीं खुफिया एजेंसियों से मिली गोपनीय रिपोर्ट के बाद केंद्र की मोदी सरकार भी सतर्क हो गई है।

क्यों हटाए गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा? 
दिल्ली में कानून व्यवस्था के स्तर पर शुक्रवार 17 जुलाई, 2026 को बड़ा बदलाव हुआ। सतीश गोलचा को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पद से हटा दिया गया। सतीश की जगह वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अनुराग कुमार को दिल्ली पुलिस का नया कमिश्नर नियुक्त किया गया है। उन्होंने चंद घंटों में पदभार संभाल लिया। हैरानी की बात यह है कि सतीश गोलचा का कार्यकाल अभी खत्म नहीं हुआ था। करीब 11 माह पहले गोलचा को पद से क्यों हटाया गया इसको लेकर तरह-तरह की चर्चा की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, यह नियुक्ति दिल्ली की सुरक्षा स्थिति और आने वाली चुनौतियों को देखते हुए की गई है। साथ ही राजधानी में खुफिया जानकारी पर आधारित पुलिसिंग को मजबूत करने की जरूरत को भी ध्यान में रखा गया है। अनुराग कुमार लंबे समय से इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम कर रहे थे और उन्होंने अपने कार्यकाल में कई अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनका खुफिया एजेंसी में काम करने का अनुभव इस काम में मदद करेगा।

संसद के मानसून सत्र को बाधित करने की बड़ी साजिश
अभिजीत दीपके द्वारा संचालित आंदोलन की शुरुआत से ही बातें कही जा रही थीं कि सोनम वांगचुक तो सिर्फ मोहरा है। असली खिलाड़ी तो डीप स्टेट से जुड़ी वो ताकतें हैं, जो देश के अंदर और बाहर से इस फर्जी आंदोलन के लिए साजिशें रच रही हैं। आंदोलन की हवा निकलती देख दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी 16 जुलाई,2026 को वांगचुक से मिलने जंतर-मंतर पहुंच गए। इस दौरान सोनम वांगचुक और अरविंद केजरीवाल के बीच जो बातचीत हुई, वो एक बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही है। केजरीवाल ने सोशल मीडिया में एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें 0.25 सेकंड से लेकर 0.46 सेकंड तक उनकी बातचीत सुनी जा सकती है। 

केजरीवाल और वांगचुक के बीच बातचीत
वांगचुक – 28 को सफल बनाएंगे।
केजरीवाल – 28 को,
वांगचुक – सफल बनाए।
केजरीवाल – हां, सफल बनाएंगे।
वांगचुक – सफल बनाकर छोड़ूंगा नहीं तो भूत बन जाऊंगा।
केजरीवाल – आपको कुछ नहीं होगा। आपको कुछ नहीं होने देंगे।
वांगचुक – 20 को सफल बनाएंगे।
केजरीवाल – आपने पूरे देश को जगा दिया है।

20 तारीख को दिल्ली में अराजकता पैदा करने की होगी कोशिश
अरविंद केजरीवाल ने कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से कहा कि हमें सोनम वांगचुक जैसा शिक्षा मंत्री भी चाहिए और उसके क्रांतिकारी कदम भी चाहिए। 20 तारीख को देश के कोने कोने में जो लोग सुन रहे हैं। जो लोग सोशल मीडिया में देखेंगे, जो लोग मीडिया के जरिए देखेंगे, सबको अपील करना चाहता हूं। ज्यादा से ज्याद संख्या में यहां पर आएंगे। 20 तारीख के आंदोलन को, इनके कॉल को, पार्लियामेंट तक की जो यात्रा है उसको सफल बनाना है। ज्यादा से ज्यादा संख्या में आना है। गौरतलब है कि 20 जुलाई, 2026 से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है, जो 13 जुलाई तक चलेगा।

वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री क्यों नहीं बना रहे केजरीवाल ? 
सोनम वांगचुक से मुलाकात के दौरान अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार अहंकार में डूबी हुई है। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि युवाओं की आवाज सुन लीजिए, नहीं तो यही युवा 2029 में आपको सत्ता से बाहर कर देंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर असल में शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते तो सोनम वांगचुक को देश का शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं प्रधानमंत्री ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें डर होगा कि सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव कर देंगे। अगर अरविंद केजरीवाल को सोनम वांगचुक पर इतना भरोसा है तो उनके पास वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री बनाने का सुनहरा मौका है। पंजाब में भगवंत मान सरकार की लोकप्रियता खत्म हो चुकी है। अगले साल 2027 की शुरुआत में वहां चुनाव होने वाला है, ऐसे में केजरीवाल वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री बनाकर अपनी सरकार की साख बचा सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे।

वांगचुक को अन्ना हजारे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं केजरीवाल 
दरअसल, अरविंद केजरीवाल का मकसद अन्ना हजारे की तरह वांगचुक को मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करना है। वांगचुक से मुलाकात के दौरान केजरीवाल के अंदर की बात सामने आ गई। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि इतिहास खुद को दोहराता है। इसी जंतर-मंतर पर 4 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे आंदोलन पर बैठे थे और तीन साल बाद उस समय की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। केजरीवाल चाहते हैं कि वांगचुक को मोहरा बनाकर वो फिर से दिल्ली में खिसकी हुई अपनी सियासी जमीन को हासिल कर सकते हैं। केजरीवाल के इस सियासी मकसद को पूरा करने के लिए इससे पहले आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना, मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज भी जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके है।

 

अभिजीत दीपके और उसके दोस्त ने खोली केजरीवाल की पोल


अभिजीत दीपके के दोस्त ने खुलासा किया कि हम दोनों एक-दूसरे को करीब सात साल से जानते हैं। हम दोनों अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया टीम से जुड़े हुए थे। 2019-20 में अभिजीत दीपके आम आदमी पार्टी का ट्वीटर हैंडल देखता था। मैं व्हाट्सएप टीम देखता था। तब से हम लोग एक-दूसरे से परिचित थे। अभिजीत दीपके के दोस्त ने आगे कहा कि हैरानी की बात है कि कॉकरोच वाले बयान के एक हफ्ते पहले मेरी और दीपके की बात हुई थी, क्योंकि दीपके जॉब ढूंढ़ रहा था।  

राम की माया - कौन समझ पाया? राम से बैर करने वाले आज रावण के कालनेमि बनकर रामधुन गाते दिखाई दे रहे हैं

सुभाष चन्द्र 

आज राममन्दिर के विरुद्ध राम विरोधी जो कुछ बक रहे हैं कोई नई बात नहीं। पुरुषोत्तम श्रीराम के अयोध्या लौटने पर जब सुखी जीवन जी रहे थे राक्षस प्रवित्ति के लोगों को रास नहीं आया। लगा दिया सीता माता पर आरोप, लेकिन जब सीता माता ने धरती माता से शरण मांगी और धरती माता सीता माता को लेकर जा रही थी तब तत्कालीन उपद्रवियों को अपनी गलती का अहसास हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लेकिन उन उपद्रवियों की मानसिकता सामने आ गयी। ठीक वही स्थिति आज कलयुगी कालनेमियों की होने वाली है। प्रभु राम अभी इन सबकी परीक्षा ले रहे हैं और जब प्रभु न्याय करने पर आएंगे उस पीड़ा को ये झेल नहीं पाएंगे।  

कांग्रेस के नेता राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दिन संसद में “काले वस्त्र” पहन कर गए थे क्योंकि कांग्रेस की नज़र में तो भगवान राम थे ही नहीं, वो तो काल्पनिक चरित्र थे। मगर आज मंदिर से दान चोरी को लेकर राम राम जप रहे हैं जबकि राहुल गांधी और अन्य नेता केवल चुनाव के समय मंदिरों में भटकते हैं। जयराम रमेश को टॉयलेट मंदिर से ज्यादा पवित्र लगता है और वो राम मंदिर की जगह टॉयलेट बनाने की वकालत करते थे। ये बन गए आज के कालनेमि

लेखक 
चर्चित YouTuber 
दूसरे प्रमुख कालनेमि अखिलेश यादव और उनकी पार्टी का गिरोह। कभी अखिलेश ने कहा था कि किसी कीमत पर राम मंदिर नहीं बनने देंगे। कांग्रेस और सपा कभी हनुमान गढ़ी में मुसलमानों से नमाज पढ़वाते थे। कारसेवकों को गोली से मरवाने वाले मुलायम सिंह ने कहा कि और भी हिंदू मारने की जरूरत पड़ी तो और मारते। रामगोपाल यादव ने कहा कि गुंबद पर कारसेवक चढ़ तो गए लेकिन नीचे नहीं आ सके, उन्हें गोली मार दी गई और हमें इस पर गर्व है। किसी कीमत पर राम मंदिर न बनने देने की कसम खाने वाली पार्टी की नेता डिंपल यादव कैसे 51 हजार रुपये दान दे सकती है। 

तीसरा कालनेमि केजरीवाल जिसकी नानी मस्जिद तोड़ कर बनाए गए मंदिर में जाना पाप कहती थी। केजरीवाल समेत कौन सा “आप” नेता है, जिसने मंदिर का विरोध न किया हो। लेकिन आज सुन्दर कांड की महिमा का बखान कर रहा है। राम मंदिर भी हो आया जबकि विपक्ष का कोई नेता प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण मिलने के बाद भी वहां नहीं गया। और आज भी मुस्लिम वोटों के खोने के डर से अखिलेश और राहुल विन्ची राम मंदिर जाने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं

मंदिर हिंदुओं का, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बना मंदिर, उसके आदेश पर ट्रस्ट बना। आम लोगों समेत लाखों लोगों ने योगदान दिया। ये विपक्षी तो न तीन में थे न तेरह में लेकिन आज दान चोरी को लेकर ऐसे तड़पते हुए रामधुन गा रहे हैं जैसे इनके बाप का पैसा लुट गया हो 

सबसे बड़ी बात तो समाजवादी कह रहे हैं कि आज अगर कोई सनातनी पार्टी है तो वह समाजवादी पार्टी है। अब PDA में सनातन कहां और कैसे फिट होता है? ये पहाड़ में बैठे सच्चे कालनेमि हैं जो हनुमान जी का रास्ता रोकने गया था। डिंपल और केजरीवाल जिस वांगचुक के मंच पर गए वहां नारे लगे “लेकर रहेंगे ब्रामणवाद से आज़ादी” और राजकुमार भाटी कहता है कि ब्राह्मण वैश्यों से भी गिरे हुए होते हैं और ठाकुर महिलाएं एक से ज्यादा पति रखती है। फिर ठाकुर और ब्राह्मण वोट क्यों देंगे सपा को?

अगर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस (केजरीवाल को छोड़ो, उसकी कोई औकात नहीं है उत्तर प्रदेश में) सनातन का चोला ओढ़ कर चुनाव में जाएंगे तो मुसलमान इन्हें वोट क्यों देंगे? मुसलमान केवल अपना हित देख कर वोट देता है, लेकिन मोदी से सभी लाभ लेकर भी मोदी को वोट नहीं देता। अखिलेश मुंह की खाएगा और कांग्रेस मुसलमानों को क्या देगी जब वह अकेले सरकार ही नहीं बना सकेगी।  फिर ओवैसी खड़ा होगा लेकिन अखिलेश, कांग्रेस और ओवैसी की हिंदू विरोधी राजनीति हिंदुओं को एकजुट कर देगी जैसे बंगाल में हुआ

सारे कालनेमि योगी जैसे हनुमान के हाथों राजनीति के मुक्तिधाम भेजे जाएंगे। एक अविमुक्तेश्वरानंद बहुत उछल रहा है। उसे आजम खान और तौकीर रजा को याद रखना चाहिए

उसका भी एक दिन वही हाल होगा जो उन दोनों का हुआ। और हां दान चोरी की जांच अभी लंबी चलनी है कुछ पता नहीं कौन सा छुपा हुआ चेहरा सामने आ जाए जैसे अखिलेश और टिन्नू यादव की बात 980 बार फ़ोन पर बात सामने आ गई

UNSC का सदस्य बनेगा भारत, विदेश मंत्री जयशंकर ने पेश की दावेदारी, 6 प्राथमिकताओं के साथ ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनेगा भारत


भारत ने विश्व के सबसे शक्तिशाली मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का सदस्य बनने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी है। दरअसल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 13 जुलाई, 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सदस्यता हासिल करने के अभियान की औपचारिक शुरुआत की। भारत एशिया-प्रशांत समूह की एक सीट के लिए चुनाव मैदान में है, जहां उसका मुकाबला ताजिकिस्तान से होगा। इस मौके पर जयशंकर ने कहा कि अगर भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य चुना जाता है तो उसकी छह प्राथमिकताएं होंंगी और भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनेगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया कि UNSC में भारत की रणनीति SHANTI (सिक्योरिंग होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट एंड इंटीग्रिटी) के सिद्धांतों पर होगी।

 भारत की सुरक्षा परिषद में होंगी 6 प्राथमिकताएं

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में कैम्पेन लॉन्च करते हुए कहा कि भारत की 6 प्राथमिकताएं सुरक्षा परिषद में होंगी: 1. ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मजबूत करना, 2. बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार, 3. शांति स्थापना अभियानों को आधुनिक बनाना, 4. सुरक्षित और जिम्मेदार AI को बढ़ावा देना, 5. समुद्री सुरक्षा और निर्बाध व्यापार सुनिश्चित करना, 6. आतंकवाद के वित्तपोषण पर सख्त कार्रवाई। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है। इसके फाइनेंशियल नेटवर्क को खत्म करने पर ज़्यादा इंटरनेशनल फोकस करने की अपील की। ​​जयशंकर ने कहा कि भारत टेरर फाइनेंसिंग का मुकाबला करने के लिए कमिटेड है और टेररिस्ट ग्रुप्स की लिस्टिंग के लिए ऑब्जेक्टिव और सबूत-आधारित प्रस्तावों को बढ़ावा देगा।
भारत ने UNSC रिफॉर्म पर दिया जोर
न्यूयॉर्क में यूएन मुख्यालय में उम्मीदवारी पेश करते हुए जयशंकर ने कहा, “आज दोपहर आपके साथ मिलकर 2028-29 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर भारत की उम्मीदवारी पेश करना खुशी की बात है। हम यह कदम ऐसे समय में उठा रहे हैं जब दुनिया एक गहरे विरोधाभास का सामना कर रही है।” उन्होंने आगे कहा, “साथ ही, हम टकराव, हिंसा और अस्थिरता का ऐसा स्तर देख रहे हैं जो उन लोगों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है जो शायद बहुत दूर हैं।” जयशंकर ने कहा कि भारत रिफॉर्म को आगे बढ़ाने की दिशा में काम करेगा। विदेश मंत्री ने कहा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाने की जरूरत है। भारत का दृष्टिकोण संवाद, सहयोग और मतभेदों को दूर करने पर आधारित रहेगा।
भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुख्य मुकाबला
वर्ष 2028-29 में एशिया-प्रशांत ग्रुप के खाते में सिर्फ एक सीट है, जिसके लिए भारत और ताजिकिस्तान आमने-सामने हैं। ताजिकिस्तान को 57 इस्लामिक देशों के संगठन ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) का समर्थन प्राप्त है। OIC का समर्थन मिलने के बाद ताजिकिस्तान एक बेहद मजबूत दावेदार बन गया है। इसके कारण भारत ने इस सीट के लिए अपना कूटनीतिक अभियान शुरू कर दिया है। भारत को ज्यादातर यूरोपीय देश, अपने पड़ोसी देशों, कैरिबियाई और द्वीपीय देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, खाड़ी देशों और कई अफ्रीकी देशों का समर्थन मिलने की भी उम्मीद है।
जून 2027 में होगा चुनाव, भारत का पलड़ा भारी
इस अस्थायी सीट के लिए जून 2027 में चुनाव आयोजित किए जाएंगे। इस चुनाव में जीत के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो-तिहाई यानी कम से कम 128-129 वोटों की जरूरत होगी। वोटिंग संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में होता है। यह सीक्रेट बैलेट (गुप्त मतदान) के जरिए होता है। जीत के लिए कुल मौजूद सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। UN में 193 सदस्य हैं, यानी जीतने के लिए कम से कम 128-129 वोटों की आवश्यकता होती है। भारत को पिछले सभी चुनावों में लगातार भारी समर्थन मिला है। भारत ने जब 2011–12 के कार्यकाल के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी उस वक्त 190 में से 187 वोट और 2021–22 के कार्यकाल के लिए 193 में से 184 वोट मिले थे। भारत के पास 8 बार यूएनएससी की अस्थाई सदस्यता रही है इस लिहाज से अनुभव के मामले में ताजिकिस्तान पर बढ़त हासिल है जबकि ताजिकिस्तान पहली बार अपनी किस्मत आजमा रहा है।
भारत 8 बार बन चुका है UNSC का अस्थाई सदस्य
UNSC की अस्थायी सदस्यता हासिल करने के मामले में भारत का ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है। भारत को इससे पहले आठ बार दो-दो साल के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चुना गया है। 1950–51, 1967–68, 1972–73, 1977–78, 1984–85, 1991–92, 2011–12 और 2021–22 में भारत यूएनएससी का अस्थाई सदस्य रह चुका है। इस तरह भारत ने अस्थायी सदस्य के तौर पर कुल 16 साल काम किया है।
UNSC में मौजूदगी से भारत का बढ़ेगा दबदबा
सुरक्षा परिषद में मौजूदगी से किसी भी देश की यूएन प्रणाली में दखल और दबदबे का दायरा बढ़ जाता है। ऐसे में 5 साल बाद भारत की सुरक्षा परिषद में दो साल के लिए पहुंचना खासा अहम होगा। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस के लिए भी भारत को साधना अहम होगा। यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और ईरान पर चल रहे तनाव के बीच भारत गुटबाजी से दूर रहा है। साथ ही भारत ने डायलॉग और डिप्लोमेसी का रास्ता सुझाया है। दुनिया में जब भी युद्ध होते हैं, तो गरीब देशों में तेल, खाने और फर्टिलाइजर का संकट आ जाता है। भारत ऐसे देशों की आवाज उठाता है। अब भारत को पाकिस्तान के झूठे प्रोपेगेंडा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर काउंटर करना आसान होगा। 
कैसे काम करता है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य देश हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं। ये हैं- अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन। 10 देशों को अस्थाई सदस्यता दी गई है। हर साल पांच अस्थायी सदस्य चुने जाते हैं। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो साल होता है। पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो पावर होता है। यह किसी भी प्रस्ताव को रोकने की शक्ति देता है। अगर 14 सदस्य किसी प्रस्ताव के पक्ष में हों, लेकिन 5 स्थायी देशों में से कोई एक वीटो कर दे, तो प्रस्ताव रद्द हो जाता है। दुनिया के बड़े फैसले जैसे- किसी देश पर प्रतिबंध लगाना, शांति सेना भेजना या अंतरराष्ट्रीय सैन्य कार्रवाई की मंजूरी देना UNSC के प्रस्ताव से ही पास होते हैं। फैसले के लिए 9 वोट चाहिए होते हैं (जिसमें वीटो का इस्तेमाल न हुआ हो)। अस्थायी सदस्य अध्यक्षता करते हैं और प्रस्ताव ला सकते हैं, लेकिन वो वीटो का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास विटो की शक्ति नहीं होती है। 

बिना कानून बाजार पर हलाल सर्टिफिकेट का कब्जा: केन्या में कोर्ट तक पहुँची सर्टिफिकेशन की लड़ाई, समझें- कैसे पिस रहे व्यापारी


केन्या में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 16 अप्रैल 2026 को डेनिस नथुम्बी, डेनिस ओवुओर ओचांडा और हेनरी बरासा टॉम ने नैरोबी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी निजी व्यवस्थाएँ किसी स्पष्ट कानून के बिना ही खाद्य और मांस उद्योग में बाजार तक पहुँचने, सरकारी खरीद में भाग लेने और व्यापार करने की व्यावहारिक शर्त बनती जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी संस्थाओं को किसी निजी सर्टिफिकेट को लाइसेंस, व्यापार या सार्वजनिक खरीद की अनिवार्य शर्त मानने से रोकने की माँग की है।

जून 2026 में केन्या हलाल सर्टिफिकेशन ब्यूरो (KBHC) ने इस मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की माँग की। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम उपभोक्ताओं को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि कोई खाद्य पदार्थ उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया है या नहीं।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मुसलमानों के हलाल भोजन खाने के अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका सवाल केवल इतना है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी एक निजी मजहबी व्यवस्था धीरे-धीरे खाने-पीने की चीजों के उत्पादन, बिक्री और सप्लाई की पूरी प्रक्रिया में जरूरी शर्त कैसे बन गई।

उनका कहना है कि बूचड़खानों से लेकर सुपरमार्केट और सरकारी खरीद तक, हलाल सर्टिफिकेट ही व्यवसाय की स्वीकार्यता निर्धारित करने लगा है। सर्टिफिकेट न लेने वाला कारोबारी कुछ आपूर्ति शृंखलाओं, ठेकों और बाजारों से बाहर हो जाता है। इस स्थिति में कागज पर स्वैच्छिक दिखने वाला सर्टिफिकेशन व्यवहार में अनिवार्य बन जा रहा है।

दूसरी आपत्ति प्रमाणन शुल्क को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि निजी संस्थाओं को दिया जाने वाला शुल्क अंततः वस्तु की कीमत में जोड़कर उपभोक्ता से वसूला जा सकता है जबकि अधिकांश खरीदारों को न प्रमाणन की प्रक्रिया पता होती है, न उसकी कीमत।

केन्या के कानून में टकराव कहाँ है?

याचिका में केन्या के संविधान के अनुच्छेद 43, 46 और 47 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 43 स्वास्थ्य और स्वीकार्य गुणवत्ता वाले भोजन जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 46 उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता, आवश्यक जानकारी और उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 47 सरकारी प्रशासनिक कार्रवाई को वैध, तर्कसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष बनाने की माँग करता है।

केन्या के मांस नियंत्रण नियम में पशु और मांस की जाँच का अधिकार सरकारी पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्य निरीक्षकों और अधिकृत अधिकारियों को दिया गया है। पशु को काटने से पहले और मांस को बाजार में भेजने से पहले सरकारी निरीक्षण आवश्यक है। इसलिए धार्मिक प्रमाणन सार्वजनिक स्वास्थ्य की वैधानिक जाँच का स्थान नहीं ले सकता है।

हलाल वास्तव में क्या है?

हलाल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है इस्लामी कानून के अनुसार जायज। यह केवल जानवर काटने की पद्धति नहीं है। किसी उत्पाद में सूअर, रक्त, शराब या अन्य निषिद्ध सामग्री न हो, उसके निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के दौरान वह गैर-हलाल पदार्थों के संपर्क में न आया हो ये सभी शर्तें हलाल व्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।
FAO और WHO की Codex Alimentarius Guidelines के अनुसार, हलाल पशु का वध एक मानसिक रूप से स्वस्थ और इस्लामी प्रक्रिया से परिचित मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु को काटने से ठीक पहले ‘बिस्मिल्लाह’ कहा जाना चाहिए, पशु जीवित होना चाहिए, उपकरण तेज होना चाहिए और गर्दन की श्वासनली, भोजन नली तथा मुख्य रक्त वाहिकाएँ काटी जानी चाहिए। Codex यह भी स्वीकार करता है कि विभिन्न इस्लामी मतों और देशों के बीच हलाल की व्याख्या में अंतर हो सकता है।
इसी Codex में यह चेतावनी भी दी गई है कि हलाल लेबल का प्रयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा पर संदेह पैदा हो या यह दावा किया जाए कि हलाल भोजन स्वभावतः अधिक पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक है। इससे साफ जाहिर होता है कि हलाल एक धार्मिक अनुरूपता का दावा है, सरकारी खाद्य-सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं है।
हलाल मांस को लेकर सबसे तीखा विवाद जानवर को काटने से पहले बेहोश करने पर होता है। सभी हलाल व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। कई मुस्लिम प्रमाणन संस्थाएँ reversible stunning स्वीकार करती हैं, जिसमें जानवर मरे बिना अस्थायी रूप से बेहोश होता है। कुछ संस्थाएँ बिना stunning किए वध को ही स्वीकार करती हैं।
Codex के अनुसार हलाल करने वाला व्यक्ति मुस्लिम होना चाहिए। व्यक्तिगत मजहबी उपभोग के संदर्भ में यह इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी देश का पूरा मांस बाजार हलाल व्यवस्था पर निर्भर हो जाए तो पशु काटने का एक विशेष काम गैर-मुस्लिम कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक रूप से बंद हो सकता है।

अधिकार की रक्षा हो, लेकिन छिपी अनिवार्यता नहीं: क्यों मुसीबत में व्यापारी

किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को हलाल खाना खरीदने, उसकी पहचान करने और उसका सर्टिफिकेट माँगने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश का खाद्य उद्योग हलाल व्यवस्था को ही सामान्य नियम मान ले। यह भी जरूरी नहीं कि गैर-मुस्लिम ग्राहक और व्यापारी किसी मजहबी सर्टिफिकेट का खर्च उठाएँ या उसके नियम मानने के लिए मजबूर हों।
इसका सही रास्ता न तो हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना है और न ही उसे हर जगह अनिवार्य बनाना। हलाल सर्टिफिकेशन लोगों और कारोबारियों की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। सर्टिफिकेट देने वाली संस्था और उसकी फीस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। खाने के पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए कि वह हलाल प्रमाणित है या नहीं। बाजार में गैर-हलाल विकल्प भी आसानी से उपलब्ध रहने चाहिए। सरकारी खाद्य-सुरक्षा जाँच को किसी मजहबी प्रमाणपत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
सरकारी खरीद में भी हलाल सर्टिफिकेट की शर्त केवल तभी लगनी चाहिए, जब भोजन खास तौर पर उन लोगों के लिए खरीदा जा रहा हो जिन्हें हलाल खाना चाहिए। इसके लिए भी स्पष्ट कानून या सरकारी नियम होना जरूरी है।
केन्या का यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को यह तय नहीं करना है कि हलाल सही है या गलत। अदालत को यह तय करना है कि किसी निजी मजहबी संस्था को बाजार और कारोबार पर कितनी ताकत दी जा सकती है। मजहबी स्वतंत्रता का मतलब लोगों को विकल्प देना है। लेकिन बिना किसी कानून के उसी विकल्प को व्यापार करने की जरूरी शर्त बना देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि बाजार पर निजी नियंत्रण बन सकता है।