कनिमोझी की सीक्रेट मीटिंग से हड़कंप, तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट, कांग्रेस को झटका देने की तैयारी


राहुल गाँधी ने बेसिर पैर बकवास कर कांग्रेस का स्तर इतना गिरा दिया है कि क्षेत्रीय पार्टियां तक दूरी बना रही हैं। यानि क्षेत्रीय पार्टियों के आगे कांग्रेस की कोई कीमत नहीं। 
तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और डीएमके सांसद कनिमोझी के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और क्षेत्र-वार बैठकों ने इस चर्चा को हवा दी है कि क्या क्षेत्रीय दल कांग्रेस के बिना एक नए समीकरण की पटकथा लिख रहे हैं। इसके संकेत हाल ही में हुईं कुछ बैठकों से मिल रहे हैं। DMK यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम सांसद कनिमोझी ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की है। खबरें हैं कि बगैर कांग्रेस के और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक क्षेत्रीय दलों का गठबंधन तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों की योजना है कि जिस राज्य में जो क्षेत्रीय दल मजबूत है, उसे वहां की राजनीतिक कमान सौंपी जानी चाहिए।

कनिमोझी और ममता बनर्जी की मुलाकात
तमिलनाडु में टीवीके की करिश्माई जीत के बाद कांग्रेस की धोखेबाजी से आहत डीएमके तीसरा मोर्चा (थर्ड फ्रंट) की संभावना पर काम कर रही है।  गुरुवार यानी 17 सितंबर को डीएमके के लोकसभा सदस्य कनिमोझी करुणानिधि ने पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी से कोलकाता में मुलाकात की। हालांकि, कालीघाट स्थित पूर्व सीएम के आवास पर हुई बैठक में किन मुद्दों पर बात की गई, इसे लेकर स्थिति साफ नहीं हो पाई है। लेकिन राजनीतिक हलकों में इस मुलाकात को थर्ड फ्रंट को अस्तित्व में लाने की कवायद से जोड़ कर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि कनिमोझी करुणानिधि डीएमके संसदीय दल की नेता हैं।

तीसरा मोर्चा बनाने के लिए मुलाकातों का दौर जारी
यह सारी कवायद 2029 के आम चुनावों से पहले बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत क्षेत्रीय मोर्चा बनाने के लिए की जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, डीएमके के एक नेता ने कहा, ‘हम बगैर कांग्रेस के एक तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाश रहे हैं।’ इधर, मीडिया से बातचीत में एक टीएमसी सांसद ने कहा, ‘ममता बनर्जी के DMK प्रमुख एमके स्टालिन के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। वह गैर NDA पार्टियों के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाए रखती हैं और INDIA ब्लॉक के उन सदस्यों के करीब हैं जो कांग्रेस समर्थक नहीं हैं। आज की बातचीत सिर्फ उनके और कनिमोझी के बीच हुई। इसके अलावा कुछ भी कहना सिर्फ अटकलें लगाना होगा।’

उद्धव ठाकरे से ‘मातोश्री’ में मिली कनिमोझी
इससे पहले डीएमके नेता कनिमोझी ने शिवसेना यूबीटी चीफ उद्धव ठाकरे से ‘मातोश्री’ आवास पर मुलाकात की। ठाकरे ने खुद डीएमके सांसद का स्वागत किया और उन्हें सम्मान के तौर पर सुनहरी शॉल भेंट की। करीब एक घंटे तक चली इस बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अनिल देसाई और मिलिंद नार्वेकर भी मौजूद थे। खबरों के मुताबिक, बीजेपी के प्रति कांग्रेस के मौजूदा रुख और इंडिया ब्लॉक की भविष्य की रणनीति पर चर्चा की। इस चर्चा में विपक्षी गठबंधन में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों के महत्व और उभरती राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में उनकी भूमिका पर भी बात हुई।

कनिमोझी की शरद पवार और सुप्रिया सुले से बातचीत
उद्धव ठाकरे के साथ बैठक के बाद कनिमोझी दिल्ली गईं, जहां उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एसपी) के नेता शरद पवार और उनकी बेटी व लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले के साथ अलग-अलग बातचीत की। इन मुलाकातों से यह अटकलें शुरू हो गई हैं कि डीएमके उन क्षेत्रीय पार्टियों को एक साथ लाने की संभावना तलाश रही है, जिनके कांग्रेस पार्टी के साथ मतभेद हैं।

केजरीवाल और अखिलेश यादव से मुलाकात की संभावना
कहा जा रहा है कि कनिमोझी जल्द ही आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल से मिल सकती हैं। केजरीवाल के ममता बनर्जी और एम स्टालिन से रिश्ते अच्छे हैं। यह स्थिति कांग्रेस को बेचैन कर सकती है। कनिमोझी पंजाब के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान तथा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से मिलकर अपना संपर्क अभियान जारी रखेंगी। इन प्रस्तावित बैठकों को एक समन्वित क्षेत्रीय राजनीतिक मंच के लिए समर्थन का आकलन करने की डीएमके की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

डीएमके तमिलनाडु में पड़ रही अकेली
डीएमके की तरफ थर्ड फ्रंट बनाने की कोशिशों की चर्चा ऐसे वक्त पर सामने आई है जब तमिलनाडु में विजय अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ समय पहले उन्होंने सेक्युलर सोशल जस्टिस विक्ट्री अलायंस बनाया है। इसका हिंदी में मतलब ‘धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय विजय गठबंधन’ है। डीएमके की मुश्किल यह है कि वह बीजेपी के साथ नहीं जा सकती है, दूसरी तरफ कांग्रेस ने पोस्ट पोल अलायंस के तहत विजय से हाथ मिला लिया है।

DMK की कांग्रेस से नाराजगी, INDIA गठबंधन से भी दूरी
तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक कांग्रेस और डीएमके एक साथ रहे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ लड़े, लेकिन 2026 चुनाव के बाद स्थिति बदल गई। कांग्रेस राज्य के सबसे बड़े दल तमिलागा वेत्री कझगम से जा मिली और पुराने साथी डीएमके के छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि डीएमके ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा और INDIA गठबंधन से भी दूरी बना ली।

डीएमके के पास हैं 32 सांसद
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) पार्टी के पास संसद के दोनों सदनों में कुल 32 सांसद (लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 10) हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर थर्ड फ्रंट की बात आगे बढ़ती है तो इसमें बीआरएस और जगन मोहन की अगुवाई वाली वाईएसआरसीपी जैसे दल भी एंट्री ले सकते हैं। अभी राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए और इंडिया ब्लॉक हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है।

कांग्रेस ने मदद से किया इनकार तो नाराज हुई ममता बनर्जी
ममता बनर्जी की नाराजगी की एक वजह सीट शेयरिंग हो सकती है। खबरें थीं कि पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर ममता ने कांग्रेस से मदद मांगी थी, जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। हालांकि, टीएमसी नेता इससे इनकार कर रहे हैं। जबकि, कांग्रेस खुलकर इसे स्वीकार कर रही है। खबरें थीं कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस से रेजिनगर सीट पर समर्थन मांगा था और नंदीग्राम सीट छोड़ने की पेशकश की थी।

पहले भी हो चुकी हैं तीसरे मोर्चे की कोशिशें
कांग्रेस और भाजपा से अलग क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं। 2013 में ममता बनर्जी ने ऐसा राजनीतिक मंच बनाने की पहल की थी। इसके बाद 2018 में तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने विभिन्न राज्यों के नेताओं से संपर्क किया था। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल की ओर से भी विपक्षी दलों के बीच व्यापक राजनीतिक समन्वय की कोशिशें हुई थीं।

कांग्रेस की सोच किसी भी सीमा तक गिर सकती है; राहुल गांधी का तो कोई मुकाबला कर ही नहीं सकता

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस को जितना नुकसान गाँधी परिवार ने किया है किसी और नहीं। यही वजह है कि कांग्रेस से अच्छी स्थिति क्षेत्रीय दलों की है। सोनिया से लेकर प्रियंका तक जितना अपना मुंह खोलेंगे बीजेपी को उतना ही फायदा होगा। 

हर दिन कांग्रेस के लोग हिंदू और सनातन विरोध में सभी सीमाएं लांघते जा रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि देश का GenZ उसके साथ मिलकर मोदी को उखाड़ फेंकेगा लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत कई अन्य विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद ने चुनाव जीत कर बता दिया कि युवा वर्ग न कांग्रेस के साथ है और न कॉकरोचों के साथ 

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-कांग्रेस ने कुछ दिन पहले सिख नरसंहार के दोषी सज्जन कुमार को अपना “रोल मॉडल” बताया था;

-फिर दिल्ली दंगों के मास्टर माइंड उमर खालिद को “राष्ट्रवादी” कहा;

-खड़गे का पुत्र प्रियांक खड़गे RSS को बैन करने के चक्कर में है;

-कांग्रेस के नेता अजय राय के स्वागत के लिए सावन के पवित्र माह में राम की नगरी अयोध्या में “Fish Party” की जाती है;

-राहुल गांधी बुर्के में एक मुस्लिम लड़की, गाउन से बदन ढके एक ईसाई लड़की के साथ साड़ी पहने एक हिंदू लड़की को स्टेज पर खड़ा करके कहता है मनुस्मृति ने महिलाओं को दबाया हुआ है;

-पुलकित मणि के साथ खड़ा होकर राहुल गांधी मोदी जी की स्वर्गीय माता जी का अपमान करता है उसके पहले बिहार में भी राहुल की रैली में मोदी जी की माँ को लेकर गाली दी गई

-कांग्रेस का नेता सलमान खुर्शीद अपनी जीवनी में 1984 के सिख विरोधी दंगों के बारे में लिखता है कि हिंदू और सिख 1947 के अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मुसलमानों में भयानक संतुष्टि थी; 

-यासीन मलिक का कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विशेष अतिथि के रूप में स्वागत करते थे; 

-जो दस साल उपराष्ट्रपति रहा उस हामिद अंसारी ने जाते हुए कहा था कि यह देश अब रहने लायक नहीं रहा जहां मुसलमान डरे हुए हैं;

-आज उस हामिद अंसारी ने फिर नेहरू के शब्दों को Quote करते हुए कहा है कि “भारत को खतरा कम्युनिज्म से नहीं, हिंदू राइट विंग से है” 

-आज राहुल गांधी ने नया शिगूफा छेड़ा है और हमले का रुख अजीत डोभाल के तरफ मोड़ते हुए कहा कि “ये अपनी INFORMAL बातचीत में कहते हैं कि हिंदुस्तान को कंट्रोल करना है तो सिर्फ 500 लोगों को कंट्रोल करना पड़ेगा, इन्होने हिंदुस्तान के TELEPHONE, WHATSAPP और FACEBOOK कम्युनिकेशन को अपने कंट्रोल में ले रखा है, फ़ोन टैपिंग करवाते हैं और उसकी जानकारी अमित शाह और नरेंद्र मोदी को देते हैं”

यह INFORMAL बातचीत राहुल के पास कैसे पहुंची और अगर डोभाल जी 500 लोगों को कंट्रोल कर देश चला रहे हैं तो उनसे बड़ा administrator कोई हो नहीं सकता

-कल कांग्रेस राम मंदिर नहीं बनना देना चाहती थी और आज उनके एक नेता प्रदीप माथुर ने कहा है कि हम मथुरा में कॉरिडोर नहीं बनने देंगे’ 

अगर कांग्रेस इसी हाल में रहना चाहती है तो सत्ता में आना तो भूल जाए क्योंकि राहुल गांधी से न हो पायेगा कांग्रेस के नेता इमरान मसूद ने कहा है कि मुसलमानों को यह ग़लतफ़हमी थी कि उनके बिना कोई सरकार नहीं बन सकती लेकिन मोदी जी ने वह दूर कर दी यह ग़लतफ़हमी मुस्लिमों को ही नहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को भी थी तो फिर भी हिंदुओं का विरोध करके क्या मिलेगा

कॉकरोचों का बुलबुला फट गया, केजरीवाल के बच्चे बर्बाद हो गए और राहुल गांधी की “गूंज” दब गई; राजस्थान में भी और दिल्ली में भी

सुभाष चन्द्र

केजरीवाल की नाजायज औलादों ने पहले दिल्ली में गुंडागर्दी मचाई और फिर राजस्थान गए भाजपा सरकार को अस्थिर करने के लिए उधर राहुल गांधी “छात्रों को अपनी गूंज” सुना रहा था।  

लेकिन पहले राजस्थान में पिटे और आज दिल्ली के छात्रसंघ के चुनाव में सबकी लुटिया डूब गई DUSU के 4 पदों में से 3 विद्यार्थी परिषद जीत गई और एक निर्दलीय उपाध्यक्ष बना जो कहते हैं कांग्रेस का बागी है यानी कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया और राहुल गांधी अपने गुरु योगेंद्र यादव के कहने पर सड़क से सरकार चलाने के सपने देख रहा था

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दिल्ली छात्रसंघ चुनाव में वामपंथियों के वोट देखने वाले हैं जिन्होंने दिल्ली में दंगा किया अध्यक्ष पद के लिए वामपंथी को मात्र 5377 वोट मिले, उपाध्यक्ष के लिए एक को 2383 वोट मिले और दूसरे को केवल 2274, सचिव पद के लिए भी एक वामपंथी उम्मीदवार को 8734 और दूसरे को 7639 वोट मिले संयुक्त सचिव पद के लिए NSUI तीसरे नंबर पर रही और वामपंथी को 5837 वोट मिले ये सब देश में Gen-G के नाम पर बांग्लादेश और नेपाल जैसा तख्तापलट करना चाहते थे लेकिन इनकी जमीनी हकीकत क्या है, वो आज नज़र आ गई

राजस्थान में 10 निगमों में से 4 में सीधे भाजपा के मेयर बने और भरतपुर में निर्दलीयों के साथ आपने मेयर बना लिया कांग्रेस का केवल एक निगम में मेयर बना बाकी 4 में भाजपा मेयर बना लेगी

राजस्थान में 2021 के मुकाबले भाजपा का वोट 4% बढ़ा और कांग्रेस का 4% गिरा निर्दलीयों का डेढ़ प्रतिशत बढ़ा भाजपा को कुल 4139 सीट मिली जबकि कांग्रेस को 3613 और निर्दलीयों को 2273 सीट मिली बस निर्दलीयों की सीट देख कर कुछ सिरफिरे कहते फिर रहे थे कि भाजपा हार गई और अब उत्तर प्रदेश को संभाल के रखे भाजपा

कॉकरोच जनता पार्टी जो केजरीवाल की छत्रछाया में पल रही है और राहुल गांधी की “गूंज” पानी के बुलबुले की तरह हैं जो कब फट जाए पता नहीं चलता 

JNU में वामपंथी छात्रसंघ पर कब्ज़ा बनाए हुए हैं लेकिन एक दिन वहां भी अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा  

हिन्दू ही हिन्दू का दुश्मन! जानिए क्यों?

आज देश में सबसे बड़ा हिंदू विरोधी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताया जा रहा है ओर बोला जा रहा है कि मोदी ने हिंदू का वोट लेकर हिंदू के लिए कुछ नहीं कर रहे है सवर्णों के लिए कुछ नहीं कर रहे है...!
लेकिन असलियत इसके उलट है क्योंकि गद्दारी नरेंद्र मोदी ने नहीं बल्कि खुद हिंदुओं ने करी है उसी का परिणाम रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव मैं मोदी को 400 सीट देने के बजाए मात्र 240 पर लाकर रोक दिया,
इसका बात का सीधा सा उदाहरण इस बात से ही पता चल जाएगा क्योंकि आपके सामने जो चेहरे नजर आ रहे है ये उत्तरप्रदेश से आने वाले कांग्रेस ओर समाजवादी पार्टी के सांसद है जो 2024 मैं जीत कर लोकसभा पहुंचे,


इकरा हसन —उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी की सांसद हैं। कैराना लोकसभा क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 58% से 60% (करीब 11 से 12 लाख) है
इमरान मसूद —उत्तर प्रदेश की सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं (वोटर्स) की संख्या लगभग 18.5 लाख है। अगर धार्मिक और जातिगत समीकरणों (Demography) की बात करें, तो इस सीट पर हिंदू वोटर्स की संख्या लगभग 56% से 58% (करीब 10.5 लाख से 11 लाख) है। वहीं, मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 41% से 42% (लगभग 6.5 से 7 लाख) है।
जिया उल रहमान बर्क —यह यूपी के सबसे संवेदन शील इलाके सम्भल से सांसद है जहां पर हिंदू मतदाता संभल लोकसभा क्षेत्र में लगभग 48% से 50% हिंदू मतदाता हैं। संख्या के लिहाज से इस लोकसभा सीट पर करीब 8.5 लाख से 9 लाख के करीब हिंदू वोटर हैं

 अफजाल अंसारी—अफजाल अंसारी यूपी के सबसे बड़े माफिया बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई है जो कि गाजीपुर संसदीय क्षेत्र से आते है जहां हिंदू आबादी/वोट गाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू समुदाय की आबादी और मतदाता भारी बहुमत में हैं। यहाँ लगभग 89% से 90% (करीब 89.3%) आबादी हिंदू धर्म से संबंधित है। कुल मतदाताओं में से लगभग 16 लाख से अधिक मतदाता हिंदू हैं।

अब इस बात को बताने का उद्देश्य यह है कि पिछला चुनाव हिंदू को एकजुट होने के लिए था क्यों कि 500 वर्ष बाद प्रभु श्री राम का भव्य मंदिर मोदी योगी के प्रयासों से बनकर तैयार हुआ था लेकिन जहां हिंदू को एकमुश्त वोट देकर मोदी की ताकत मजबूत करना थी वहां हिन्दू ने आबादी के 50% से ज्यादा होने के बाद भी हिंदू के नाम पर वोट नहीं किया,

अब आप खुद इतने समझदार है कि समझ सकते है कि गद्दार मोदी है या खुद हिन्दू क्योंकि मोदी हिंदू के लिए अब कर रहा है फिर भी उन्हें गाली दी जा रही है,

हिंदू का कोई ओर दुशमन नहीं रहा क्योंकि खुद हिन्दू ही हिन्दू का हमेशा से दुश्मन होता आया है.

डोनाल्ड ट्रंप क्या मुंह लेकर भारत आएंगे अगर 100% टैरिफ लगाते हैं

सुभाष चन्द्र

पिछले कुछ दिनों पहले डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहा था कि वो 2026 के अंत में भारत जाने का विचार कर रहे हैं। 

लेकिन सितम्बर 17 को अमेरिकी संसद ने “Lindsey O Graham Sanctioning Russia and Iran act of 2026 पास कर दिया इस बिल के पक्ष में 262 वोट पड़े और विपक्ष में 159 सीनेट ये बिल अगस्त में पहले ही पारित कर चुकी है Lindsey ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का सदस्य है

इस बिल के पारित होने से ट्रंप को उन 5 बड़े देशों के आयात पर 100 टैरिफ लगाने की शक्तियां मिल गई जो रूस से तेल या गैस खरीदेंगे - चीन और भारत उसमे सबसे ऊपर हैं

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यह बिल भारत में BRICS सम्मेलन समाप्त होने के 4 दिन बाद पारित हुआ है जैसे बहुत जल्दी थी क्योंकि ट्रंप से BRICS की सफलता बर्दाश्त नहीं हुई

भारत ने साफ़ कर दिया है कि इस तरह के कदम से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ने की सम्भावना है भारत अपने 1.40 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है वह विभिन स्रोतों से और बाजार की बदलती परिस्तिथियों के आधार पर यह काम जारी रखेगा 

लगता है यह बिल BRICS के सफल आयोजन के प्रतिशोध के लिए पारित कराया गया है अगर भारत पर ट्रंप 100% टैरिफ लगाते हैं तो किस मुंह से वो भारत आएंगे और ट्रेड डील तो ख़त्म ही समझो

डोनाल्ड ट्रंप भूल रहे हैं कि अगर पुतिन से यूरोप के देशों और ब्रिटेन को गैस (LNG)  सप्लाई बंद कर दी तो उनके लोग ठंड से मर जाएंगे रूस पर पहले ही 30,000 से ज्यादा प्रतिबंध लगे हुए हैं जो अमेरिका EU देशों और ब्रिटेन ने लगाए हुए हैं पुतिन पलटवार करेगा तो मुश्किल होगी

यूक्रेन अकेला लड़ने की हिम्मत नहीं रखता रूस से उसके साथ कौन लड़ रहे हैं उसे खाद पानी देकर यह भी देखिए -

-अमेरिका ने 31 मार्च 2026 तक 195 बिलियन डॉलर दिए;

-NATO देशों ने 27 बिलियन डॉलर की मदद दी अमेरिका के जरिए;

-EU और उसने 27 सदस्य देशों ने 240 बिलियन डॉलर की मदद दी इसके अलावा 125 बिलियन यूरो लोन और रेफुजियों को सपोर्ट के लिए दिए; 78 बिलियन यूरो मिलिट्री सपोर्ट और यूक्रेन के लोगों को EU सदस्य देशों में रिफ्यूजी के रूप में रखने के लिए दिए और 17 बिलियन यूरो पूरी तरह से रिफ्यूजियों पर खर्च किये;

-ब्रिटेन ने 33 बिलियन डॉलर की multi-year commitments की; इसके अलावा 16 बिलियन पाउंड्स के हथियार मुहैया कराए; 5.6 बिलियन पाउंड्स की आर्थिक मदद अलग से की जिसमें वर्ल्ड बैंक के लोन की गारंटी भी शामिल हैं

तो इस तरह देखा जाए तो रूस अकेले यूक्रेन से युद्ध नहीं लड़ रहा उसके खिलाफ परोक्ष रूप से लड़ रहे हैं अमेरिका, ब्रिटेन, NATO देश, EU और EU के 27 देश अगर इनका साथ न हो तो यूक्रेन की कोई औकात नहीं है रूस से लड़ने की

एक तरफ ट्रंप ने 100% टैरिफ लगाने का बिल पास कराया और दूसरी तरफ रूस यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए अपना दूत भी पुतिन के पास भेजा। फिर तो sanctions ही चलने दो, युद्ध रोकने की क्या जरूरत है लेकिन शायद ट्रंप युद्ध रुकवा कर Nobel Prize के चक्कर में हैं 

अमेरिकी प्रतिनिधि की मुलाकात पुतिन से तब हुई जब पुतिन और मोदी मिल चुके थे और डॉ जयशंकर जेलेंस्की से मिल चुके थे यानी बातचीत का आधार तैयार हो गया था लेकिन पुतिन ने अमेरिका के सामने बस दो शर्ते रखी पहली डॉन बॉस्को पर कब्ज़ा नहीं छोड़ेंगे और दूसरी यूक्रेन को NATO एंट्री नहीं मिलेगी

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को विश्व में अकेला करके मानेंगे क्योंकि विश्व की आधी आबादी तो BRICS देशों में हैं इस्लामिक देश वैसे ही ट्रंप को पसंद नहीं करते मुझे नहीं लगता अब डोनाल्ड ट्रंप भारत आ सकेंगे

राहुल गांधी का एक और कछुए की चाल से चलने वाला केस देखो; 7 साल लगा दिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन रद्द करने की याचिका ख़ारिज करने में

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी के खिलाफ 2018 में गिरगांव मजिस्ट्रेट कोर्ट में भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल ने एक आपराधिक  मुकदमा दर्ज किया था राहुल गांधी पर आरोप था कि उसने राफेल मामले में राजस्थान की रैली में।    

प्रधानमंत्री मोदी को “चोरों का सरदार” (“Commander-in-Thief) कहा था

गिरगांव मजिस्ट्रेट ने 28 अगस्त, 2019 को राहुल गांधी को समन जारी किए थे जिन्हें राहुल गांधी ने 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी (writ petition No 4391 of 2021) 

अब 8 सितंबर, 2026 को हाई कोर्ट के जस्टिस NR Borkar ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “the court did not find any ‘perversity and illegality’ in the magistrate’s order and hence no reason to interfere”.

अब आप हिसाब लगा लीजिए कैसे कछुए की चाल से चलते हैं राहुल गांधी के खिलाफ केस 28 अगस्त, 2019 के समन पर फैसला होने में 7 साल लग गए स्वयं हाई कोर्ट ने राहुल की याचिका पर निर्णय देने में 5 साल लगा दिए

जस्टिस बोरकर ने यह भी कहा कि वो अपने 2021 के आदेश को बरकरार रखते हैं जिसमें मजिस्ट्रेट को सुनवाई 6 हफ्ते के लिए टालने के लिए कहा गया था जिससे राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें 2021 का कोई और आदेश मुझे नहीं मिला जिसको राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देता लेकिन अब देगा और जैसे अन्य मामलों में होता आया है, सुप्रीम कोर्ट इस केस में गिरगांव कोर्ट के समन पर रोक लगा देगा जिससे मामला फिर बर्फ में लग जाएगा 

में पहले भी कहा है राहुल गांधी VVIP/दामाद है अदालतों का 5 साल हाई कोर्ट का उसकी याचिका पर बैठे रहना भी इसका एक सबूत है 

मजे के बात है राहुल गांधी के वकील सुदीप पसबोला और कुशल मोर ने कोर्ट में कहा कि शिकायत करता पीड़ित पक्ष नहीं है, उसे शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है उनका मतलब था कि शिकायतकर्ता की कोई मानहानि नहीं हुई और इसलिए aggrieved party तो मोदी हैं, उन्हें शिकायत दर्ज करनी चाहिए 

मतलब कांग्रेस का तर्क है कि हमारे लोग दिन रात प्रधानमंत्री को गाली देंगे और अगर मोदी जी आहत होते हैं तो खुद कोर्ट में जाए नया संविधान लिखना चाहता है राहुल गांधी लेकिन जब गांधी परिवार के किसी सदस्य खिलाफ कुछ कहा जाता है तो कांग्रेस के लोग क्यों FIR दर्ज करते हैं, खुद गांधी परिवार के लोग क्यों नहीं करते ऐसी दलीले देकर कांग्रेस अपने ही जाल में फंस जाएगी और जो भी मुक़दमे उसने किसी के खिलाफ भी फायर किये हुए हैं वो सब पिट जाएंगे

UPI पर शुल्क के लिए ऐसा बवाल काट रहे हैं जैसे आसमान गिर गया हो; सुविधाएं सब चाहिए लेकिन शुल्क नहीं देना

सुभाष चन्द्र

टैक्सों की मार का सबसे ज्यादा असर वेतनभोगी पर होता है। और जिन गरीबों(भिखारियों से लेकर सब्जी बेचने वाले आदि) के कन्धों पर बैठ सियासतखोर सियासत खेलते हैं वही गरीब वेतनभोगी से ज्यादा अमीर होता है। अभी कुछ दिन पहले एक भिखारिन के घर से लाखों रूपये और बोरों में सिक्के मिलने के अलावा कुछ महीने पहले शायद महाराष्ट्र में एक करोड़पति भिखारी के पास दो बंगले और भिखारी कर्मचारियों का भांडा सामने आया। अगर यही किसी वेतनभोगी के घर से बरामदगी होती सारा मीडिया दहाड़ें मार रहा होता। आज भीख एक सफेदपोशी व्यापार है। 

इस विषय पर राहुल गांधी ने फिजूल का बवाल काटा है जबकि UPI जैसे सिस्टम पर ब्राज़ील और राहुल गांधी के अब्बा जैसे मुल्क चीन में भी 0.40% शुल्क लगता, ब्राजील में 0.33%

NPCI ने व्यवस्था दे दी है कि Person to Person लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं होगा और 2000 तक की खरीदारी पर भी कोई शुल्क नहीं होगा

ग्राहक जब दुकानदार को डिजिटल भुगतान करता है तो दुकानदार को पेमेंट प्रोवाइडर को छोटी सी प्रोसेसिंग फीस देनी होती है। NPCI ने व्यवस्था दी है कि 75000 या उससे ज्यादा भुगतान पर अधिकतम शुल्क 300 रुपए होगा जो 75000 का 0.4% है।  

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महीने में एक लाख तक का भुगतान लेने वाले दुकानदारों पर कोई शुल्क नहीं होगा। बिजली बिल, स्कूल फीस, पाइप लाइन गैस बिल भुगतान पर मात्र 5 रुपए टैक्स होगा

डिजिटल भुगतान कितनी बड़ी सुविधा है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 75000 या उससे ज्यादा भुगतान करना है तो फिर कॅश लिए चलना पड़ेगा और कहीं भी रास्ते में लुट सकते हैं जबकि डिजिटल भुगतान एक क्लिक में क्रेडिट/डेबिट कार्ड से हो जाता है

मुझे समझ नहीं आता कि इसमें अमेरिका कहां से बीच में आ गया जो राहुल गांधी कह रहा है कि यह अमेरिका के दबाव में किया गया है। 

सच्चाई यह है कि लोग सुविधाएं सब चाहते हैं लेकिन कोई शुल्क नहीं देना चाहते। बड़े व्यापारी अगर कॅश में भुगतान लेंगे तो पैसा जमा करने के लिए अलग से कर्मचारी रखने पड़ेंगे बैंक भेजने के लिए जबकि डिजिटल भुगतान से पैसा तुरंत खाते में जमा हो जाता है 

राहुल गांधी को रायता फ़ैलाने से मतलब है। उससे BRICS की सफलता बर्दाश्त नहीं हो रही। 

जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए मजबूत है तंत्र: कह रहे हैं चीफ जस्टिस; लेकिन पारदर्शिता कहां है? न्यायपालिका में सुधार होने चाहिए लेकिन बिना न्यायपालिका को शामिल किए

सुभाष चन्द्र 

सितम्बर 14 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने राम जेठमलानी स्मारक व्याख्यान में बोलते हुए कहा कि “जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा बनाया गया तंत्र मजबूत, बहुत प्रतिक्रिया देने वाला और समय से काम करने वाला है। हम बिना हिचकिचाते हुए मानते हैं कि सुधार ही नियम होना चाहिए कोई भी संस्था एक ही स्थिति में न तो टिक सकती है और न ही गर्व महसूस कर सकती है लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर सार्वजनिक मंच से प्रतिक्रिया देना सही नहीं हो सकता” उन्होंने न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना की भी बात की

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चीफ जस्टिस की बातें तालियां बटोरने के लिए बहुत अच्छी हैं लेकिन सत्य से परे हैं। आलोचना कौन कर सकता है न्यायपालिका की, वकील लोग तो कर नहीं सकते क्योंकि उन्हें ब्लैकलिस्ट होने का डर होता है जनमानस सोशल मीडिया पर आलोचना कर सकता है लेकिन सोशल मीडिया को तो न्यायपालिका ठेंगे पर रखती है और वहां कही गई आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं देती बेशक आलोचना कितनी भी रचनात्मक क्यों न हो 

महेश जेठमलानी ने सितम्बर 14 को उसी समारोह में कहा कि “ न्यायपालिका और न्यायाधिकरणों में भ्रष्टाचार नहीं हो सकता जब तक कि फ़िक्सर वकील न हों, जो पूरी कानूनी प्रणाली को रिश्वत देकर खेलते हैं, उनके नाम शायद ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास हैं जो कॉलेजियम को सूचित किए जाने चाहिए 

जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए तंत्र मजबूत होगा लेकिन केवल आपकी दृष्टि से क्योंकि उन शिकायतों का निपटारा कैसे होता है, किसी को पता नहीं चलता जिसका मतलब है आपका तंत्र पारदर्शी नहीं है, फिर कोई कैसे विश्वास कर सकता है?

क़ानून मंत्री ने पिछले दिनों कहा था कि “2016 से 2025 के बीच 8630 शिकायतें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ चीफ जस्टिस कार्यालय को भेजी गई थी जिनमें corruption, sexual misconduct, and other serious improprieties के आरोप थे सबसे ज्यादा 1,170 शिकायतें 2024 में थी और 1,102 शिकायतें 2025 में थी इनका निपटारा न्यायपालिका के आंतरिक “in-house mechanism’ से होता है न कि सरकार के किसी दाखल से

किसी को पता नहीं इन गंभीर शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, क्या किसी को दोषी पाया गया और पाया गया तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? 

यह कैसा आंतरिक प्रबंधन है शिकायतों के निपटारे के लिए? फिर कैसे माना जा सकता है कि शिकायतों से निपटने के लिए आपका तंत्र मजबूत है? आपने तो जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR नहीं होनी दी जिसके खिलाफ संसदीय समिति आरोप सही पाए फिर कैसा मजबूत तंत्र है आपका?

दरअसल न्यायपालिका ने अपना ताना बाना ऐसा बना रखा है कि जैसे हर जज रेनकोट पहन कर नहाता है जिस पर कोई दाग नहीं लग सकता 

न्यायपालिका में सुधार अवश्यम्भावी हैं लेकिन उन सुधारों की प्रक्रिया से न्यायपालिका को दूर रखना होगा अन्यथा फिर चौधराहट अपने ही हाथ में रखने की व्यवस्था बना दी जाएगी जैसे आज है 

सबसे बड़ा हथकंडा न्यायपालिका ने अपना रखा है कि किसी भी जज के खिलाफ केस दायर करने से पहले चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी चाहिए ये कैसा न्याय है? मतलब दरोगा पर आरोप होगा तो उसी से अनुमति लेनी होगी कि उसके खिलाफ जांच की जाए या नहीं

आप खुद भी न्यायिक सुधार कर सकते हैं बस हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति UPSC से परीक्षा के माध्यम से शुरू कर दीजिए लिखित परीक्षा के 60%, जितने केस जीते, उनके 20% और इंटरव्यू के 20% नंबर होने चाहिए ऐसा कीजिए, न्यायपालिका का आधा भ्रष्टाचार स्वतः ख़त्म हो जाएगा

इस्लामिक नाटो का शुरू होने से पहले ही क्या The End हो गया; बेहतर है सऊदी अरब इज़रायल के साथ खड़ा हो जाए

सुभाष चन्द्र

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर 7 अगस्त, 2026 को मक्का में एक कथित Islamic NATO बनाया जिसमें प्रावधान था कि किसी भी एक देश पर हमला अन्य सदस्य देशों पर भी माना जाएगा और ऐसे में सब एक दूसरे के साथ मिलकर युद्ध करेंगे 

लेकिन एक समझौता एक दिखावा बनकर रह गया क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की इसे अमलीजामा नहीं पहना रहे अभी इसी महीने ईरान समर्थित हूती ने सऊदी अरब के कंट्रोल वाले मोखा शहर और Bab el-Mandeb strait पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन तुर्की और पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ diplomatic बातचीत कर रहे हैं जबकि जवाब हमले का देना चाहिए था। 

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पाकिस्तान पर बिना कोई हमला हुए तुर्की उसे हथियार सप्लाई कर रहा है, जाहिर है भारत के खिलाफ युद्ध करने के लिए लेकिन जिस सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती ने हमला कर दिया उस पर कोई कार्रवाई नहीं चाहता 

दूसरी तरफ पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने को आतुर रहा लेकिन फेल हो गया और BRICS की बैठक में ईरान के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी से युद्ध ख़त्म कराने के लिए मदद मांगी ऐसे पाकिस्तान की इंटरनेशनल लेवल पर इज़्ज़त उतर गई वैसे पाकिस्तान की इज़्ज़त तो हमारी हॉकी टीम की बेटियां भी उतार आई जो उनके मंत्री मोहसिन नक़वी से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया

इज़रायल के संबंध UAE के साथ मधुर हैं और इज़रायल उसे हथियार भी मुहैया करता है दोनों अब्राहम समझौते में शामिल हैं सऊदी अरब के लिए बेहतर होगा अगर वह इज़रायल से रक्षा समझौता करे इज़रायल सऊदी की मदद कर सकता है लेकिन पाकिस्तान और तुर्की हरगिज़ नहीं करेंगे 

सऊदी अरब के इज़रायल से मतभेद केवल फिलिस्तीन को लेकर हैं 

आज की भू राजनीति में एक देश दो अलग अलग देशों से संबंध रख सकता है बेशक उनके आपस में संबंध ठीक न हो जैसे भारत के संबंध फिलिस्तीन से भी हैं और इज़रायल से भी हैं, भारत रूस के साथ भी दोस्ती रखता है और अमेरिका के साथ भी

इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए सऊदी अरब को इज़रायल से हाथ मिलाना चाहिए लेकिन सऊदी अरब ने तो इज़रायल के साथ Diplomatic Relations भी नहीं बना कर रखे वो पाकिस्तान पर भरोसा करता है जिसका सऊदी अरब पेट भरता रहता है 

सऊदी अरब को देखना चाहिए कि UAE और ईरान Brics की बैठक में मिले जबकि ईरान UAE में अमेरिकी अड्डों पर हमले करता है फिर भी न जाने क्यों दोनों की मुलाकात हुई सऊदी अरब चाहता तो उसके भी विदेश मंत्री Prince Faisal bin Farhan Al Saud ईरान के राष्ट्रपति से मिल सकते थे

लगता है सऊदी अरब भी इज़रायल को बर्बाद देखना चाहता है और इसलिए ही उसने तुर्की और पाकिस्तान से समझौता किया है वो दोनों देश सऊदी अरब का इस्तेमाल इज़रायल पर हमले के लिए करेंगे लेकिन उससे भी नुक्सान सऊदी अरब का होगा क्योंकि सऊदी अरब इज़रायल की जद में है और वो वहां बैठे तुर्की और पाकिस्तान को भी निपट लेगा

कर्नाटक : डी.के. शिवकुमार का ‘जमीन सिंडिकेट’: लालबाग-कब्बन पार्क पर गिद्ध दृष्टि

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटालों के खिलाफ उठे प्रचंड जनआक्रोश के आगे आखिरकार सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में बेंगलुरु के सार्वजनिक पार्कों और खेल के मैदानों की 5 प्रतिशत जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों, लीज और बिक्री के लिए खोलने वाले विवादास्पद ‘पार्क्स अमेंडमेंट बिल 2026’ ने राज्य में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया। गैर-जिम्मेदाराना नीतियों से खाली हुए सरकारी खजाने को भरने और रियल एस्टेट सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने की इस नीति को शहर की हरी-भरी सांसों पर सीधा डाका माना गया। सड़क से लेकर राजभवन तक चले चौतरफा दबाव के कारण कैबिनेट को यह जनविरोधी संशोधन बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।

65.4 एकड़ हरित क्षेत्र पर डाका: लालबाग और कब्बन पार्क पर गहराया संकट
बेंगलुरु में वर्तमान में लगभग 1,308 एकड़ क्षेत्र में फैले 1,353 सार्वजनिक पार्क हैं। इस संशोधन के लागू होते ही शहर के 65.4 एकड़ से अधिक हरे-भरे क्षेत्र पर कंक्रीट के ढांचे खड़े होने का खतरा मंडराने लगा था। सबसे बड़ा आघात 240 एकड़ वाले ऐतिहासिक लालबाग की 12 एकड़ और करीब 197 एकड़ में फैले कब्बन पार्क की 9.85 एकड़ जमीन पर था। करीब 22 एकड़ की यह धरोहर सीधे तौर पर व्यावसायिक सिंडिकेट के हवाले करने की तैयारी थी, जिसे जनता ने अपनी पहचान पर हमला माना।

‘ब्रांड बेंगलुरु’ की आड़ में ऐतिहासिक धरोहरों पर गिद्ध दृष्टि
‘ब्रांड बेंगलुरु’ के आकर्षक नारों की आड़ में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कार्यालय के संरक्षण में शहर की बेशकीमती जमीनों के सौदे तैयार किए जा रहे थे। अरबों वर्ष पुरानी भूगर्भीय धरोहर वाली लालबाग की चट्टानों और ऐतिहासिक कब्बन पार्क की शांति को नष्ट कर वहां व्यावसायिक केंद्र बनाने की साजिश रची गई। विकास के नाम पर शहर की सदियों पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने का यह खुला प्रयास था।

टनल रोड प्रोजेक्ट: ठेकेदारों को उपकृत करने के लिए लालबाग की बलि
हजारों करोड़ रुपये के विवादास्पद टनल रोड प्रोजेक्ट के जरिए अपने चहेते निजी ठेकेदारों को भारी भरकम कमीशन बांटने की बिसात बिछाई गई थी। टनल रोड के नाम पर लालबाग की एकड़ भर बेशकीमती जमीन अधिग्रहित करने और वहां निजी व्यावसायिक निर्माण को स्वीकृति देने की तैयारी थी। बुनियादी ढांचा सुधारने के नाम पर कमीशनखोरी के इस मॉडल ने शहर के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया था।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

अनुच्छेद 21 का हनन: स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार पर कुठाराघात
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार रेखांकित किया है कि शहरी हरित क्षेत्र और खुले पार्क नागरिकों के जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। सार्वजनिक पार्कों की जमीन को निजी लाभ के लिए बाजार में उतारना सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन था, जिसके खिलाफ कानूनी घेराबंदी तेज हो गई।

सदन में बिना बहस चोरी-छिपे बिल पास कराने का कृत्य
सदन में जब महर्षि वाल्मीकि निगम के 89 करोड़ रुपये के घोटाले पर जवाब मांगा जा रहा था, तब हंगामे और अव्यवस्था के बीच बिना किसी लोकतांत्रिक चर्चा या सार्वजनिक परामर्श के इस विवादित कानून को पारित करा लिया गया। शहर के नागरिकों, पर्यावरणविदों और नगर नियोजकों से इस मसौदे को छिपाकर रखना यह साबित करता था कि सरकार के इरादे पूरी तरह संदिग्ध थे।

वाल्मीकि निगम घोटाले के बाद जमीन से नया कमीशन तंत्र
महर्षि वाल्मीकि विकास निगम के करोड़ों रुपये के गबन की जांच के बीच शहरी जमीनों के सौदों से नया तंत्र खड़ा करने की कोशिशें तेज थीं। सरकारी खजाने में सेंध लगने के बाद सत्ता से जुड़े सिंडिकेट की नजर बेंगलुरु की करोड़ों रुपये प्रति वर्गफुट वाली प्राइम लोकेशन की सार्वजनिक जमीनों पर टिक गई थी, ताकि चुनावी फंड और राजनीतिक खर्चों की भरपाई की जा सके।

मुफ्त की रेवड़ियों से खाली हुआ खजाना, अब पार्कों से भरपाई की जुगत
बिना किसी बजटीय योजना के लागू की गई मुफ्त योजनाओं ने राज्य के वित्त को पंगु बना दिया है। नए बुनियादी ढांचे, सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण के लिए बजट का अभाव साफ दिखने लगा। इस वित्तीय विफलता पर पर्दा डालने और राजस्व जुटाने के लिए सरकार ने बेंगलुरु के पार्कों और खेल के मैदानों का बाजारीकरण करने का सबसे आसान और विनाशकारी रास्ता चुना।

बुजुर्गों की खुली हवा और बच्चों के खेल के मैदानों पर वार
पार्क और खुले मैदान शहर के बच्चों के शारीरिक विकास और वरिष्ठ नागरिकों के टहलने के लिए अंतिम सुरक्षित स्थान बचे हैं। 5 प्रतिशत जमीन के व्यावसायिक उपयोग की छूट वास्तव में पूरे पार्क परिसर में निजी दुकानों और कंक्रीट निर्माण के अनियंत्रित प्रसार का आधार थी। वित्तीय लालच के लिए बच्चों से उनके खेल के मैदान और बुजुर्गों से उनकी खुली हवा छीनने की कोशिश ने आम परिवारों में भारी असंतोष भर दिया।