डेनमार्क :‘अजान’ पर बैन लगाने के साथ सडकों पर नमाज़ भी होगी प्रतिबंधित; मंत्री बोले- इस्लामाबाद जैसे लग सकते हैं कई इलाके

                         डेनमार्क में सड़कों पर नमाज अदा करते मुस्लिम (फोटो साभार: Getty Images)
चीन ने तो पहले से ही इस्लाम पर नकेल कसने के साथ-साथ कई त्योहारों तक पर भी पाबन्दी लगाई हुई है। भारत पल रहे मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर किसी भी मुस्लिम देश और UNO तक की चीन के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं। मानवाधिकार भी किसी कालकोठरी में छिपा बैठा है। लेकिन अब कुछ समय से आतंकवादी गतिविधियों और कट्टरपंथियों द्वारा उत्पात मचाने को देख यूरोप ने भी कमर कसनी शुरू कर दी है। कई देशों ने तो बुर्का/हिजाब और नकाब और सड़क पर नमाज़ तक पर पाबन्दी लगा दी है।     

अब यूरोपियन देश डेनमार्क जल्द ही सड़कों पर नमाज पर रोक लगाने जा रहा है। डेनमार्क के आप्रवासन मंत्री मोर्टेन बोडस्कोव ने चेतावनी दी है कि देश के कुछ हिस्से इस्लामाबाद जैसे लग सकते हैं। उन्होंने घोषणा की कि सोशल डेमोक्रेट सरकार पूरे देश में नमाज पर रोक लगाने के मामले की फिर से जाँच शुरू करेगी।

डेनमार्क की न्यूज एजेंसी ‘रिटजाऊ’ (Ritzau) को मंत्री मोर्टेन बोडस्कोव ने बताया कि अधिकारी इस बात की कानूनी जाँच फिर से शुरू करेंगे कि क्या ऐसी पाबंदी लागू की जा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि हालाँकि कोपेनहेगन समेत कुछ इलाकों में शोर-शराबे से जुड़े कड़े नियमों की वजह से बाहर नमाज पर पहले से ही पाबंदी है। लेकिन अब डेनमार्क की सरकार और भी सख्त पाबंदी पर विचार कर रही है।

मंत्री बोडस्कोव ने कहा कि डेनमार्क में मस्जिदों से दिन में पाँच बार दी जाने वाली नमाज की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा, “डेनमार्क की छतों से अजान की आवाज नहीं सुनाई देनी चाहिए। डेनमार्क में इसकी कोई जगह नहीं है और जब आप डेनमार्क में घूमें तो आपको यह शक नहीं होना चाहिए कि आप इस्लामाबाद के किसी इलाके में आ गए हैं।”

यह पहली बार नहीं है जब डेनमार्क अपने देश में नमाज पर रोक लगाने पर विचार कर रहा है। इससे पहले 2020 और 2025 में भी इस पर चर्चा हुई थी लेकिन उससे देशभर में प्रतिबंध नहीं लग पाया।

श्रद्धालुओं का दान और सिस्टम के भीतर सेंध पर शोर मचाने को क्या मस्जिदों और दरगाहों में घोटाला नहीं दिखता?

 
मीडिया को अपनी TRP की चिंता तो नेताओं को अपने वोटबैंक की। पुरुषोत्तम श्रीराम मन्दिर में चढ़ावे में हुई चोरी पर मीडिया और विपक्ष ने फर्श से लेकर अर्श तक को सर पर उठा रखा है। इनमें से कोई ईमानदारी से बताए क्या किसी मजहबी जगह पर घोटाले नहीं। दिल्ली के ही एक स्थानीय मुस्लिम ने कई बार मस्जिदों और दरगाहों में हो रहे घोटाले को सरकार और वक़्फ़ बोर्ड के सामने लाने की कोशिश की जबकि वक़्फ़ बोर्ड तो क्या सभी जानते हैं लेकिन किसी की हिम्मत नहीं। राममन्दिर की तरह जिस दिन दूसरे मजहबों पर हाथ डाला सबकी आंखें फटी रह जाएँगी। चोरी चोरी ही है चाहे वह मंदिर में हो या मस्जिद में।

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और हैंडलिंग में कथित गड़बड़ी का मामला अब जाँच के सबसे अहम दौर में पहुँच गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर इस मामले में FIR दर्ज हुई है। इसके बाद पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 आरोपितों को गिरफ्तार किया। आरोप है कि मंदिर में आने वाले दान की गिनती, रखरखाव और उससे जुड़ी व्यवस्था में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुईं।

यह मामला पहली बार 7 जून को सामने आया था। इसके बाद यूपी सरकार ने 13 जून को SIT का गठन किया। SIT ने 23 जून को एडिशनल चीफ सेक्रेटरी गृह संजय प्रसाद को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। इसी रिपोर्ट के दो दिन बाद कार्रवाई तेज हुई और मंदिर से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपितों में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जानेंगे कि ये 8 लोग कौन हैं इन पर क्या आरोप हैं।

                                                            FIR की कॉपी का एक हिस्सा

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित चेहरा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का पूर्व ड्राइवर बताया जाता है और VHP के कारसेवकपुरम से भी जुड़ा रहा है। बताया गया है कि मंदिर की व्यवस्थाओं में उसका हस्तक्षेप रहता था और दानपात्रों की निगरानी से लेकर उन्हें बेसमेंट तक पहुँचाने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका थी।

आरोप है कि दानपात्रों की चाबियाँ भी उसी के पास रहती थीं और ट्रस्ट के लोगों से करीबी होने के कारण वह मनमाने तरीके से काम करता था। FIR और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी शुरुआती चरण में चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी हुई और उससे अयोध्या व आसपास के जिलों में संपत्तियाँ बनाने के आरोप लगे। हालाँकि, टिन्नू यादव ने कैश काउंटिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया है और आरोपों के पीछे कुछ ‘जलने वाले लोगों‘ को जिम्मेदार बताया है।

रामशंकर मिश्रा

रामशंकर मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप है। यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने बेटे अनुकल्प मिश्रा और दामाद लवकुश मिश्रा को भी चढ़ावा गिनने के काम में लगवाया।

पुलिस के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रामशंकर मिश्रा अन्य आरोपितों के साथ मिलकर दान की रकम में कथित हेराफेरी करते थे और कैश सॉर्टिंग प्रक्रिया के दौरान CCTV फुटेज में भी दिखे। जाँच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने तय वित्तीय प्रक्रिया को दरकिनार करने में भूमिका निभाई और लंबे समय तक कथित गड़बड़ी को आसान बनाया।

अनुकल्प मिश्रा

अनुकल्प मिश्रा, रामशंकर मिश्र का बेटा है और वह भी दान की रकम गिनने और संभालने की प्रक्रिया में शामिल था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अयोध्या के मिल्कीपुर क्षेत्र के बसावन गाँव का निवासी है। उसका संबंध ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा से भी बताया गया है।

अनुकल्प की ड्यूटी चढ़ावा गिनने के काम में लगती थी। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि कैश काउंटिंग के दौरान रकम में कथित हेराफेरी की गई और अनुकल्प के घर से चोरी की रकम बरामद होने का दावा भी किया गया है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि CCTV फुटेज और बरामदगी के आधार पर उसकी भूमिका की जाँच की जा रही है।

लवकुश मिश्रा

लवकुश मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम का हिस्सा था। आरोप है कि चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी के बाद उसके निपटान यानी ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी लवकुश पर थी। कहा गया है कि उसने मंदिर से चोरी कर करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है।

शुरुआती जाँच में उसके घर से रकम बरामद होने के दावे सामने आए थे। कुछ रिपोर्ट्स में उसके घर से करीब 12 लाख रुपए कैश मिलने की बात कही गई है। जाँच एजेंसियाँ इस रकम के स्रोत की जाँच कर रही हैं और आरोप है कि वह अनुकल्प मिश्रा के साथ मिलकर दान की रकम की हेराफेरी में सक्रिय रूप से शामिल था।

अविनाश शुक्ला

अविनाश शुक्ला को मंदिर की व्यवस्था और दान की रकम से जुड़ी प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति बताया गया है। रिपोर्ट्स में उसे मंदिर का अटेंडेंट या काउंटिंग टीम से जुड़ा सदस्य बताया गया है। आरोप है कि वह दान की रकम को सुरक्षित तरीके से काउंटिंग रूम तक पहुँचाने और गिनती की प्रक्रिया में शामिल था।

पुलिस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि वह उस कथित सिंडिकेट का अहम सदस्य था, जिस पर चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी का आरोप है। उसके बैंक खाते से करीब 5 लाख रुपए बरामद होने की चर्चा भी रिपोर्ट्स में सामने आई है। उस पर दान की रकम के कथित दुरुपयोग और उससे संपत्ति बनाने के आरोप लगाए गए हैं।

मनीष कुमार यादव

मनीष कुमार यादव, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का भतीजा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह टिन्नू यादव के छोटे भाई बलराम यादव का बेटा है। पुलिस के हवाले से कहा गया है कि मनीष मंदिर में दान की रकम गिनने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल था।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसके घर से भी चोरी की रकम बरामद हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान उसके घर से करीब 36 लाख रुपए नकद मिलने का दावा किया गया है। जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह रकम कहाँ से आई और इसका संबंध कथित गबन से किस तरह जुड़ता है।

सुभाष चंद्र श्रीवास्तव

सुभाष चंद्र श्रीवास्तव पूर्व बैंक कर्मचारी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें राम मंदिर में कैश काउंटिंग स्टाफ का प्रभारी बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी दान की रकम की गिनती करने वाले कर्मचारियों की निगरानी और पूरी काउंटिंग प्रक्रिया को देखना था। बैंकिंग पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इस काम की निगरानी के लिए रखा गया था।

FIR और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन पर निगरानी में कथित लापरवाही और अनियमितताओं में संलिप्तता के आरोप हैं। जाँच एजेंसियाँ यह देख रही हैं कि उनके प्रभारी रहते हुए दान की रकम की गिनती में कथित गड़बड़ी कैसे हुई।

करुणेश पांडेय

करुणेश पांडेय पर दान की रकम से जुड़ी रसीदों और वित्तीय रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी का आरोप है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा के साथ पूरी साजिश में शामिल था। जाँच एजेंसियों का दावा है कि वह श्रद्धालुओं के चढ़ावे को संभालने वाली कोर टीम का हिस्सा थे।

एक रिपोर्ट के अनुसार, उनकी जिम्मेदारी दान की रकम को गिनती वाले कमरे तक पहुँचाने से भी जुड़ी थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने रकम और रिकॉर्ड की हेराफेरी में भूमिका निभाई और कथित गड़बड़ी से संपत्ति अर्जित की।

7 पीढ़ियाँ भुगतेंगी अंजाम… अब बंगाल में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों की खैर नहीं, दंगाइयों और गुंडों के लिए शुभेंदु सरकार का नया कानून

योगी आदित्यनाथ या हिमंता सरमा से नहीं तो शुभेंदु अधिकारी से दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखना चाहिए। दिल्ली में आए दिन हो रहे क़त्ल और अधिक्रमण पर श्रीमती रेखा गुप्ता को इन मुख्यमंत्रियों की तरह काम करना चाहिए। क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स, शराब घोटाला, मनी लॉन्डरिंग आदि का? क्या इन सबको चुनाव आने तक ठंठे बस्ते में डाल दिया गया है? मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ काम करना होगा। अब तक जो अधिक्रमण हटाए जा रहे हैं सभी हिन्दू क्षेत्रों में लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों पर आंखें मूंदे हुए हैं। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु ने मुख्यमंत्री बनते ही विरोधियों के साथ-साथ दंगाइयों में और बांग्लादेश तक में खलबली मची हुई है। 

ममता की पार्टी TMC  ऐसे ही नहीं बिखरी, अधिकारी की कार्यशैली से बिखरी है। अगर अधिकारी ने बिना भेदभाव के काम किया ममता से अलग हुए कई विधायक और सांसद भी लपेटे में आएंगे। क्योकि ममता राज में जितना भी उपद्रव हुआ इन लोगों का भी प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष समर्थन था। यदि नहीं, फिर क्यों नहीं ममता का विरोध कर पार्टी छोड़ी? तब ये ही सब बड़े आनंद के साथ मलाई खा रहे था।       

पश्चिम बंगाल में अपराधियों और दंगाइयों पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक बेहद सख्त नया कानून ला रहे हैं। सोमवार(29 जून) को विधानसभा में पेश होने जा रहा यह बिल यूपी के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी ज्यादा घातक माना जा रहा है।

इस नए कानून के तहत सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों से भारी वसूली की जाएगी। इसके कड़े प्रावधानों को देखकर अभी से विपक्ष और अपराधियों के बीच खलबली मच गई है।

54 साल पुराना ढर्रा होगा खत्म

बंगाल सरकार साल 1972 के पुराने कानून ‘द वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट’ में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसकी जगह अब विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ पेश किया जाएगा।

सरकार का मानना है कि पुराना कानून आज के आधुनिक और संगठित अपराधों से निपटने के लिए काफी नहीं था। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब बंगाल में सिंडिकेट का नहीं बल्कि सिर्फ कानून का राज चलेगा।

दंगाइयों का होगा आर्थिक खात्मा

इस नए कानून का सबसे बड़ा डर इसका रिकवरी मैकेनिज्म यानी नुकसान की वसूली का नियम है। अगर किसी दंगे या बवाल में सरकारी या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, तो उसकी पूरी भरपाई अपराधी की संपत्ति बेचकर की जाएगी।

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह कानून इतना कड़ा है कि नुकसान की भरपाई करते-करते दंगाइयों की आने वाली 7 पीढ़ियाँ तक कंगाल हो जाएँगी। यह अपराधियों को पूरी तरह आर्थिक रूप से खत्म करने वाला कदम है।

UP के मॉडल से भी दो कदम आगे

यह नया बिल उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल से भी ज्यादा सख्त बताया जा रहा है। इसमें पुलिस को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने और अपराधियों को जिले से बाहर निकालने की असीमित शक्तियाँ दी गई हैं। इतना ही नहीं, दंगाइयों और गुंडों को शरण देने वालों के खिलाफ भी इसमें सख्त नियम हैं। अब किसी भी अपराधी को छिपाने या पनाह देने पर सीधे दो साल की जेल की सजा काटनी होगी।

जेब में कंडोम और ‘लव लेटर’: पूर्व आतंकी मुश्ताक ने खोली पाकिस्तान की पोल, बताया- जन्नत-हूर का ख्वाब दिखा फँसाते हैं

          पूर्व आतंकी मुश्ताक ने बताया कैसे कश्मीरी लड़कियों को फँसाते थे पाकिस्तानी आतंकी (फोटो साभार: AI)
पूर्व कश्मीरी आतंकी और बाद में भारतीय सेना के लिए अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर चुके मुश्ताक अहमद भट ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के लोकप्रिय पॉडकास्ट (‘PGX: Raw & Real’) पर एक इंटरव्यू में 90 के दशक से लेकर 2016 तक के आतंक की उस काली सच्चाई को खोलकर रख दिया, जिसे पाकिस्तान हमेशा दुनिया से छिपाना चाहता है।

उन्होंने बताया कि सरहद पार से आने वाले आतंकी ‘मुजाहिद’ होने का दावा कर घाटी में केवल अपनी हवस मिटाने और कश्मीरी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने आते थे।

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान जिस ‘जिहाद’, ‘मजहब की लड़ाई’ और ‘आजादी की लड़ाई’ का नैरेटिव दुनिया के सामने पेश करता रहा है, उसकी हकीकत क्या है? क्या सचमुच हजारों कश्मीरी युवा किसी मकसद के लिए हथियार उठाकर सीमा पार गए थे या फिर वे एक ऐसे खेल का हिस्सा बन गए थे जिसमें मजहब, राजनीति, प्रोपेगेंडा और विदेशी एजेंसियों के हित सबसे ऊपर थे और युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नहीं था?

इन सवालों का जवाब उस व्यक्ति ने दिया है, जिसने इस काली दुनिया को भीतर से देखा। उसने कश्मीर में बंदूक संस्कृति का उदय देखा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के कैंपों में समय बिताया, अफगानिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण लिया, ‘जिहाद’ की विचारधारा के नाम पर होने वाली ब्रेनवॉशिंग को करीब से देखा और बाद में उस रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। यह व्यक्ति है मुश्ताक अहमद भट, जिन्हें कभी ‘अशफाक’ और ‘रोमियो’ जैसे कोड नेम से जाना जाता था।

प्रखर के पॉडकास्ट में मुश्ताक अहमद भट ने ऐसे कई खुलासे किए, जो पाकिस्तान के दशकों पुराने दावों को चुनौती देते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार मुठभेड़ों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तलाशी के दौरान उनकी जेबों से जिहाद और शहादत के संदेश नहीं, बल्कि कश्मीरी लड़कियों को लिखे गए प्रेम पत्र निकलते थे। कई मामलों में कंडोम भी बरामद हुए।

मुश्ताक के अनुसार, जब पकड़े गए आतंकियों से पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम और जिहाद के नाम पर लड़ने आए हैं तो उनके पास ऐसी चीजें क्यों हैं?, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता था। वे बहस से बचते थे या गुस्से में जवाब देते थे। यह वह पहला सच था जो उस छवि से बिल्कुल अलग था, जो पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठनों द्वारा ‘मुजाहिदीन’ के बारे में बनाई जाती रही है।

मुश्ताक बताते हैं कि कई विदेशी और पाकिस्तानी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में ऐसे मामले सामने आए जहाँ आतंकियों ने स्थानीय परिवारों में शरण ली, परिवार की लड़कियों के साथ रात बिताई और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। वैसी लड़कियाँ और उनके होने वाले बच्चों की जिंदगी बदल गई। यह कहानी केवल आतंकियों की निजी हरकतों की नहीं है, बल्कि यह कहानी उस पूरे तंत्र की है, जिसने हजारों युवाओं को ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नाम पर इस्तेमाल किया।

एक संपन्न और राजनीतिक परिवार से आने वाला युवक

मुश्ताक अहमद भट किसी आर्थिक मजबूरी या सामाजिक उपेक्षा के कारण उस रास्ते पर नहीं गए थे। वे कश्मीर के एक प्रभावशाली और राजनीतिक परिवार से आते थे। उनके दादा गाँव के मुखिया थे और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जमीन-जायदाद की कमी नहीं थी। पढ़ाई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हुई। सामान्य जीवन चल रहा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर तेजी से बदल रहा था। 1987 के चुनावों के बाद राजनीतिक असंतोष बढ़ा। चुनावी धांधली के आरोप लगे। अलगाववादी भावनाओं को हवा मिली। पाकिस्तान ने इस असंतोष को अवसर के रूप में देखा। घाटी में धीरे-धीरे एक नया माहौल बनने लगा।

मुश्ताक बताते हैं कि उस दौर में बंदूक केवल हथियार नहीं थी, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। कॉलेजों और युवाओं के बीच पिस्तौल और AK-47 आकर्षण का केंद्र बन गए थे। जिसके पास हथियार होता था, उसे अलग नजर से देखा जाता था।

मुश्ताक ने स्वीकार किया कि वे भी इसी माहौल से प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि बंदूक शक्ति का प्रतीक है। युवाओं के मन में यह धारणा बैठाई जा रही थी कि हथियार उठाना ही सम्मान पाने का रास्ता है। यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा था।

‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नारों से शुरू हुई यात्रा

मुश्ताक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी यही बताया गया कि वे एक बड़े और पवित्र मिशन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। ‘आजादी’ जुल्म के खिलाफ संघर्ष’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्द लगातार सुनाई देते थे। रैलियाँ निकलती थीं। भाषण होते थे। युवाओं को बताया जाता था कि वे इतिहास बदलने जा रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसे युवाओं की पहचान की जाती थी, जो भावनात्मक रूप से प्रभावित हो चुके हों। मुश्ताक भी उन्हीं युवाओं में शामिल हो गए। कुछ समय बाद उन्हें बताया गया कि वे सीमा पार जाने के लिए तैयार रहें। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीमा पार जाकर वे किसी महान उद्देश्य के लिए काम करेंगे।

कुपवाड़ा से सीमा पार और मुजफ्फराबाद तक

1990 के आसपास मुश्ताक और उनके साथियों को कुपवाड़ा के रास्ते सीमा पार कराया गया। यह यात्रा आसान नहीं थी। जंगलों, पहाड़ों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुँचे। रात में चलना, दिन में छिपना और लगातार सतर्क रहना इस यात्रा का हिस्सा था।

आखिरकार वे मुजफ्फराबाद पहुँचे, जहाँ उनका स्वागत किया गया। उन्हें बताया गया कि अब वे जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। यहीं से शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसे मुश्ताक बाद में ‘ब्रेनवॉशिंग’ के रूप में याद करते हैं। मुजफ्फराबाद के कैंपों में हर तरफ एक ही बात सुनाई देती थी- जिहाद, शहादत और जन्नत।

युवाओं को बताया जाता था कि यह दुनिया अस्थायी है और असली सफलता शहादत में है। मजहबी भाषणों, भावनात्मक कहानियों और प्रचार सामग्री के जरिए उनके भीतर एक विशेष मानसिकता विकसित की जाती थी, लेकिन कुछ ही समय बाद मुश्ताक को कई बातें खटकने लगीं।

उन्होंने देखा कि जिन युवाओं के नाम पर पैसा आता था, वह उन तक नहीं पहुँचता था। कैंपों के वरिष्ठ लोग बेहतर सुविधाओं में रहते थे, जबकि युवा साधारण और कठिन परिस्थितियों में रहते थे। यहीं से उनके मन में पहला बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर यह सचमुच मजहब और सिद्धांतों की लड़ाई है, तो फिर भ्रष्टाचार क्यों?

विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तैयार किया गया नैरेटिव

मुश्ताक के अनुसार, एक समय उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल किया गया जहाँ विदेशी प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के सामने कश्मीर की एक विशेष तस्वीर पेश की जाती थी। उन्हें बताया जाता था कि क्या कहना है और कैसे कहना है। भारतीय सेना के खिलाफ कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।

लोगों को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति हासिल की जा सके। मुश्ताक के अनुसार, यहीं से उन्हें एहसास होने लगा कि केवल हथियारों का ही नहीं, बल्कि नैरेटिव और प्रोपेगेंडा का भी एक बड़ा खेल चल रहा है।

मुजफ्फराबाद में कुछ समय बिताने के बाद मुश्ताक अहमद भट और उनके साथ मौजूद कई अन्य युवाओं को अफगानिस्तान भेजे जाने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें बताया गया कि अब वे असली ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं। वहाँ से लौटकर वे ‘बड़े मिशन’ का हिस्सा बनेंगे।

उस समय तक मुश्ताक के मन में कई सवाल पैदा हो चुके थे, लेकिन वे उस मशीनरी के भीतर थे जहाँ सवाल पूछना आसान नहीं था। जो व्यक्ति सवाल पूछता था, उस पर शक किया जाता था। जो संगठन की लाइन से अलग सोचता था, उसे पसंद नहीं किया जाता था। ऐसे माहौल में अधिकांश युवा चुप रहना ही बेहतर समझते थे।

पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक का सफर, हिज्ब-ए-इस्लामी के कैंप में मिली ट्रेनिंग

मुश्ताक बताते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को पहले पेशावर की ओर ले जाया गया। वहाँ से उन्हें अफगानिस्तान पहुँचाया गया। उस समय अफगानिस्तान युद्ध और अस्थिरता का केंद्र था। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई के बाद भी वहाँ हथियारबंद गुट सक्रिय थे और अलग-अलग संगठनों के कैंप चल रहे थे।

यहीं पर मुश्ताक को पहली बार एहसास हुआ कि कश्मीर का मुद्दा केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जहाँ अलग-अलग देशों, संगठनों और विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। अफगानिस्तान में मुश्ताक को हिज्ब-ए-इस्लामी से जुड़े कैंपों में प्रशिक्षण दिया गया।

यहाँ उन्हें हथियार चलाने, विस्फोटक इस्तेमाल करने, घात लगाकर हमला करने और कठिन इलाकों में लड़ने की ट्रेनिंग दी गई। AK-47 से लेकर दूसरे हथियारों तक, हर चीज सिखाई जाती थी। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी पाक युद्ध का हिस्सा हैं।

लेकिन मुश्ताक कहते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान भी उन्हें बार-बार यह महसूस होता था कि जो बातें मंचों पर कही जाती हैं और जो जमीन पर दिखाई देता है, दोनों में बहुत अंतर है। मुश्ताक बताते हैं कि अफगानिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने पहली बार युद्ध को वास्तविक रूप में देखा।

फिल्मों और भाषणों में युद्ध को रोमांचक दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर वह केवल मौत, तबाही और दर्द छोड़ता है। उन्होंने टूटे हुए घर देखे, घायल लोगों को देखा, ऐसे परिवार देखे जिनके कई सदस्य मारे जा चुके थे। ऐसे बच्चे देखे जिन्होंने अपने माता-पिता खो दिए थे। यही वह समय था जब उनके भीतर ‘जिहाद’ की चमक फीकी पड़ने लगी।

जन्नत के सपने और मौत की सच्चाई

मुश्ताक बताते हैं कि कैंपों में युवाओं को बार-बार बताया जाता था कि शहादत सबसे बड़ी सफलता है। उन्हें जन्नत और हूरों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं, लेकिन अफगानिस्तान में उन्होंने देखा कि मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे। वे युवा थे जिन्हें भावनाओं में बहाकर यहाँ तक लाया गया था। जो लोग फैसले लेते थे, वे सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते थे।

यहीं से उनके मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे हो रहा है? मुश्ताक बताते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि ‘जिहाद’ केवल विचारधारा नहीं, बल्कि एक कारोबार भी बन चुका है।

फंड जुटाए जाते थे, दान लिया जाता था, विदेशों में अभियान चलाए जाते थे, युवाओं के नाम पर पैसा आता था, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा ऊपर बैठे लोगों तक ही सीमित रहता था। जिन युवाओं को मैदान में भेजा जाता था, उनके हिस्से में केवल खतरा और मौत आती थी।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बिताए समय के दौरान मुश्ताक को यह समझ आने लगा कि कश्मीर का मुद्दा कई लोगों के लिए राजनीतिक साधन बन चुका है। कश्मीर में जितना तनाव रहेगा, उतना ही यह मुद्दा जिंदा रहेगा। जितने ज्यादा युवा हथियार उठाएँगे, उतना ही यह नेटवर्क मजबूत रहेगा। इसलिए युवाओं को लगातार भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जाता था।

उन्हें बताया जाता था कि वे किसी महान मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में वे एक ऐसे खेल का हिस्सा थे जिसमें उनका इस्तेमाल हो रहा था।

मुश्ताक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, वे बार-बार कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी युवाओं का हुआ। कई युवा पढ़ाई छोड़कर चले गए, कई कभी वापस नहीं लौटे, कई मारे गए, कई जेलों में पहुँचे और कई ऐसे थे जिन्हें यह तक समझ नहीं आया कि वे आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं।

मुश्ताक मानते हैं कि वे खुद भी उसी दौर में बहक गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस रास्ते पर वे चल पड़े थे, उसका अंत केवल विनाश था। अफगानिस्तान के अनुभवों, कैंपों में देखे गए भ्रष्टाचार और लगातार दिखाई दे रहे विरोधाभासों ने मुश्ताक की सोच पूरी तरह बदल दी।

प्रेम पत्र, कंडोम, हूरों के नाम पर कश्मीरी लड़कियों का शोषण

मुश्ताक के खुलासों में सबसे ज्यादा चर्चा उन घटनाओं की हुई जिनमें मारे गए आतंकियों की जेबों से प्रेम पत्र और कंडोम मिले। उनके अनुसार, यह उस नैरेटिव को चुनौती देता है जिसमें आतंकियों को केवल मजहबी योद्धा के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे।

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने ‘लव लेटर्स’ के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में लिखे गए इन खतों में कहीं भी जिहाद या किसी मजहबी मकसद की बात नहीं दिखी, बल्कि उनमें कश्मीरी लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और शादी के सपने दिखा कर प्रभाव में लेने वाली बातें होती थी।

कई खतों में लिखा था, “पापी से नहीं, पाप से नफरत करो…”, “मैं तुम्हारे अच्छे कैरेक्टर से प्यार करता हूँ…”। मुश्ताक का दावा था कि विदेशी आतंकी इसी तरह के झूठे प्रेम और भरोसे का माहौल बनाकर मासूम लड़कियों को अपने करीब लाने की कोशिश करते थे। मामला सिर्फ इन खतों तक सीमित नहीं था।

पूर्व कमांडर ने दावा किया कि कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं। जब उनसे पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने आए हैं तो ऐसी चीजों की जरूरत क्यों पड़ी, तब वे जवाब देने के बजाय भड़क जाते थे। वे हूरों का ख्वाब लेकर आते थे और कश्मीरी लड़कियों का शोषण करते थे।

मुश्ताक के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के कुछ गाँवों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनकी जिंदगी पाकिस्तानी आतंकियों के आने-जाने के बाद बदल गई। उनका कहना था कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय घरों में शरण लेते थे और अस्थायी या छद्म शादियों के जरिए लड़कियों से रिश्ते बनाते थे।

यमरश और उरपोरा नागबल गाँवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि साजिद और आदिल पठान जैसे पाकिस्तानी आतंकियों ने स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। पीछे रह गए बच्चे और वे महिलाएँ, जिन्हें समाज की नजरों और मुश्किलों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

सालों तक ‘शहादत’ और ‘जिहाद’ के नाम पर कश्मीर में हिंसा फैलाने वाले आतंकियों की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कोई मजहबी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा खेल था जिसमें युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें देकर बड़े कमांडरों और पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने स्वार्थ पूरे किए। यह सच घाटी के उन युवाओं के लिए एक आईना है, जो आज भी पाकिस्तान के प्रभाव में आकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

राहुल गांधी की माफ़ी स्वीकार करना भाजपा की एक और बड़ी गलती

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी ने 2018 की चुनाव रैली में शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय सिंह का नाम लेते हुए आरोप लगाया था कि उनका नाम पनामा पेपर लीक्स में है। बयान में किसी और के नाम का जिक्र नहीं था जैसा अब राहुल ने कहा है कि वो छत्तीसगढ़ के रमन सिंह के पुत्र के बारे में कह रहे थे। उनके पुत्र का नाम अभिषेक सिंह है और दोनों के नाम में कोई समानता नहीं है। 

कार्तिकेय सिंह चौहान ने जब MP/MLA कोर्ट में  मानहानि का केस दर्ज किया तब कोर्ट ने राहुल गांधी को समन जारी किया तो उसके खिलाफ वो हाई कोर्ट चले गए और यह भी अर्जी लगाई कि केस को खारिज कर दिया जाए। 

राहुल जो habitual offender है की माफ़ी स्वीकार करना बीजेपी ने फिर भयंकर गलती की है। अगर स्थिति विपरीत होती कांग्रेस कभी माफ़ी स्वीकार करती। झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना राहुल की आदत बन चुकी है। अगर माफ़ी स्वीकार करनी ही थी तो कोर्ट से अनुरोध करना था कि माफ़ी हर अख़बार और टीवी चैनल पर जाकर सार्वजानिक रूप से मांगनी चाहिए ताकि जनता को इस झूठे LoP की असलियत सामने आती।  

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परसों 24 जून को राहुल गांधी ने हाई कोर्ट में लिखत माफीनामा दाखिल कर दिया जिसे कार्तिकेय ने अपनी लीगल टीम की सलाह पर स्वीकार कर लिया और हाई कोर्ट ने mutual agreement के आधार पर MP/MLA कोर्ट में चल रहा केस बंद कर दिया

कार्तिकेय चौहान ने राहुल गांधी के खिलाफ IPC के section 500 के अंतर्गत मानहानि का आपराधिक केस दर्ज किया था जिसमें 2 वर्ष की साधारण कैद और 5000 रुपए का जुर्माना या दोनों हो सकते थे

राहुल गांधी चीख चीख कर कहता फिरता था कि मै  सच्चाई के लिए कभी माफ़ी नहीं मागूंगा

पहले राफेल मामले से जुड़े चौकीदार चोर है के बयान पर भी सुप्रीम कोर्ट में माफ़ी मांगी थी जब दावा कर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि “चौकीदार चोर है” जबकि ऐसा कुछ नहीं कहा था सुप्रीम कोर्ट ने 

सवाल यह पैदा होता है कि जब हर बयान पर बाद में सफाई देनी पड़ती है और कोर्ट में अपना बचाव करना पड़ता है तो ऐसे उल्टे पुल्टे बयान देते ही क्यों हो और देते हो उन पर कायम रहो

 

“सारे मोदी चोर हैं” वाले बयान पर तो ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने 2 साल की सजा दे ही दी थी लेकिन कांग्रेस परिवार से आने वाले जस्टिस बीआर गवई ने राहुल गांधी को बचा लिया। तब राहुल गांधी ने माफ़ी नहीं मांगी थी क्योंकि उसे भरोसा था सुप्रीम कोर्ट में वो बच जाएगा

राहुल गांधी के खिलाफ अनेक केस चल रहे हैं लेकिन किसी को ट्रायल कोर्ट लटका कर रखते हैं, किसी को हाई कोर्ट और किसी को सुप्रीम कोर्ट लटका देता है

भाजपा की फिर माफ़ी स्वीकार करके गलती है और पहले भी की है। अरुण जेटली और गडकरी ने केजरीवाल का माफीनामा स्वीकार कर लिया था लेकिन अगर ऐसा न किया होता तो उसकी  राजनीति के गर्त में चली जाती। अब कार्तिकेय ने भी वही गलती की है। माफ़ी स्वीकार करने की बजाय कोर्ट से आग्रह करना चाहिए था राहुल के मानहानिकारक बयान के लिए उपयुक्त सजा मिले क्योंकि ऐसी बयानबाजी करना उसका “धंधा” बन चुका है। अगर केस में सजा होती तो एक बार फिर संसद से बाहर हो जाता। 

कांग्रेस माफीनामा स्वीकार करने का कोई एहसान नहीं मानेगी बल्कि मौका मिलने पर शिवराज चौहान और भाजपा पर वार करेगी जैसे वर्तमान मुख्यमंत्री पर हमला करके कर रही है

राहुल गांधी की किसी भी केस में किसी को माफ़ी स्वीकार नहीं करनी चाहिए और हर केस सजा दिलाने के लिए लड़ना चाहिए। जो व्यक्ति देश का अपमान करता है उसे जितनी जल्दी हो सके कानूनी तरीके से संसद से बाहर करना चाहिए

माफीवीर राहुल गाँधी : 8 साल पहले पनामा पेपर्स लीक से शिवराज चौहान के बेटे का कनेक्शन ढूँढने वाले ने कहा- हो गई थी ‘गलतफहमी’

भारत को दो ऐसे माफीवीर नेता अरविन्द केजरीवाल और राहुल गाँधी मिले हैं जो hit and run पॉलिसी अपनाकर अपनी ही पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगता है दोनों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है। अगर राहुल केजरीवाल पार्टी की हालत देख देश और पार्टी हित में काम नहीं करते Leader of Opposition पद छोड़ देना चाहिए। बार-बार माफ़ी मांगना LoP के लिए बहुत ही शर्म की बात है। शायद इसीलिए पब्लिक भी राहुल की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से उसी समय निकाल रही।   

लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कोर्ट में मानहानि के मामले में माफी माँगी है। उन्होने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह का पनामा पेपर्स लीक मामले में नाम लिया था। इसके खिलाफ कार्तिकेय सिंह ने राहुल गाँधी के खिलाफ भोपाल की एमपी-एमएलए कोर्ट में मानहानि का केस दर्ज कराया था। इसमें उन्होंने कहा था कि उनकी प्रतिष्ठा धुमिल हुई है।

इस मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में हुई। इस दौरान राहुल गाँधी के वकील ने बुधवार (24 जून 2026) को कोर्ट में एक आवेदन दाखिल किया। इसमें उन्होंने अपने मानहानि वाले बयान पर खेद जताया है और कहा कि उनका बयान कार्तिकेय सिंह से जुड़ा नहीं था। अर्जी में हाईकोर्ट से राहुल गाँधी के खिलाफ चल रही मानहानि की कार्यवाही से राहत देने की माँग की गई है।

राहुल गाँधी के वकील ने कोर्ट में साफ किया कि यह बयान केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिवार के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह एक गलतफहमी थी। राहुल गाँधी के इस लिखित सफाई पर कोर्ट ने कार्तिकेय सिंह से लिखित में प्रतिक्रिया देने के लिए कहा है।

क्या है मामला

करीब 8 साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के प्रचार के दौरान राहुल गाँधी ने झाबुआ में चुनावी रैली के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा था कि चौहान के शासनकाल में राज्य में ‘बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार’ हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान का नाम पनामा पेपर्स में आया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस पर कार्तिकेय शर्मा ने भोपाल के एमपी एमएलए कोर्ट में आपराधिक मानहानि की शिकायत की, जो सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई करती है।

राहुल गाँधी ने कहा था, “पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का नाम पनामा पेपर्स में आया था। पाकिस्तान जैसे देश में उन्हें जेल हुई। यहाँ, एक मुख्यमंत्री के बेटे का नाम पनामा पेपर्स में आता है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।”

अब राहुल गाँधी अपने आरोपों पर सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्हें ‘गलतफहमी’ हुई थी और उन्होंने पनामा पेपर्स लीक मामले में गलती से कार्तिकेय का नाम ले लिया था, जबकि असल में शिवराज सिंह चौहान ‘व्यापम और ई-टेंडर घोटालों में शामिल’ हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गाँधी ने कार्तिकेय को पनामा पेपर्स मामले से गलत तरीके से जोड़कर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया। शिकायत के बाद, ट्रायल कोर्ट ने राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का समन जारी किया था।

इसके जवाब में, राहुल गाँधी ने समन और मानहानि के मामले को रद्द कराने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच का रुख किया। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल इस याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। बुधवार को जब मामला सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ता पक्ष ने पहले के निर्देशानुसार निचली अदालत के रिकॉर्ड पेश किए। शिकायतकर्ता कार्तिकेय सिंह की ओर से वकील संकल्प कोचर पेश हुए।

हाई कोर्ट में दायर नई अर्जी में राहुल गाँधी ने उस बयान पर खेद व्यक्त किया है और स्पष्ट किया है कि उनका इरादा कार्तिकेय सिंह का जिक्र करने का नहीं था।

कंगाली से जूझते बांग्लादेश को ‘काले धन’ का सहारा, विदेश में जमा 21.8 लाख करोड़ रूपए पर नजर: बर्बादी की कगार पर कपड़ा उद्योग

                    कर्ज में डूबा बांग्लादेश विदेशों से अपनी 230 अरब डॉलर की संपत्ति वापस लाने में जुटा
पाकिस्तान की कंगाली के बाद बांग्लादेश भी उसी स्थिति में लगभग पहुँच चुका है। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सोंचा था कि शेख हसीना को हटाकर बांग्लादेश को ऊँचे स्तर पर ले जाएंगे। कमांड मुहम्मद यूनुस के हाथों में देकर हिन्दुओं पर जानलेवा हमले कर कट्टरपंथी बड़े सुरमा भोपाली बन रहे थे। हसीना की कमाई पर उछल-कूद हो रही थी, लेकिन चुनाव के बाद नई सरकार बनने पर मालूम हुआ कि बांग्लादेश बदहाली में पहुँच चुका है। और उस बदहाली से निकलने के लिए देश को किसी अनुभवी प्रशासक की जरुरत है। और जिस तरह यूनुस की छत्रसाया में कट्टरपंथी उपद्रव का नंगा नाच कर रहे थे और अवाम भी कट्टरपंथियों की उँगलियों पर नाच रहे थे तभी राजनीतिक पंडितो को आशंका थी कि बहुत जल्द बांग्लादेश कंगाली की ओर जा रहा है। 

कट्टरपंथियों का कुछ नहीं गया उन्होंने तो हिन्दुओं पर हमले करवाकर अपनी तिजोरियां भर ली, मुल्क को बदहाल कर दिया जिसका अंजाम अवाम को भुगतना पड़ रहा है, अभी और भुगतेगी। आखिर तख्ता पलट कर मुल्क को क्या मिला? जिस कौम ने बांग्लादेश निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान को नहीं बक्शा मुजीब की बेटी को क्यों बख्शेंगे। मुजीब के स्टेचू को तोड़ने में बड़ा फक्र महसूस कर रहे थे। पहले सरकारी सम्पत्तियों को खूब नुकसान पहुँचाया और फिर हसीना के देश छोड़ने के बाद हिन्दुओं पर जानलेवा हमले। उपद्रव में शामिल लोगों को क्या मिला? आखिर किस वजह से तख्ता पलट किया?         

बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल के दौरान कथित तौर पर देश से बाहर भेजी गई 230 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति वापस लाने की कोशिशें तेज कर रही है। इससे पहले मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने कहा था कि बांग्लादेश से 234 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम ‘चोरी‘ की गई थी। सरकार ने यह भी कहा था कि इस धन की वापसी में मदद करना ब्रिटेन की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है।

लेकिन अब मौजूदा सरकार इस 230 अरब डॉलर की राशि को वापस लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वहीं पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियाँ और बढ़ गई हैं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह भी कहा था कि शेख हसीना के शासन के अंतिम वर्षों में हर साल लगभग 16 अरब डॉलर बांग्लादेश से बाहर भेजे जा रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नई सरकार ने विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर दिए हैं। तारिक रहमान सरकार इस मामले में अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने की कोशिश कर रही है और बड़े उद्योगपतियों व शेख हसीना के शासनकाल से जुड़े लोगों के खिलाफ कानूनी मामले भी दर्ज कर रही है।

हालाँकि, सरकार इस धन को वापस लाने के लिए बेहद उत्सुक है, लेकिन उसे इस बात का भी एहसास है कि यह काम आसान नहीं है। बांग्लादेश के पास विदेशों में छिपाई गई संपत्तियों का पता लगाने और उनसे जुड़े जटिल कानूनी मामलों को संभालने का पर्याप्त अनुभव नहीं है। यह काम भूसे के ढेर में सुई ढूँढने जैसा माना जा रहा है।

बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है कि अगर कोई बड़ी रकम वापस मिलती भी है तो इसमें कई साल, बल्कि दशकों तक लग सकते हैं। वहीं, शेख हसीना के सत्ता से हटने और देश छोड़ने के बाद से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी काफी कमजोर हो गई है।

बांग्लादेश सरकार के अधिकारी खुद मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश का बैंकिंग क्षेत्र लगभग ढहने की स्थिति में पहुँच गया है। बैंकों को खराब कर्ज (NPL) कुल ऋण का करीब 30 से 35 प्रतिशत तक पहुँच गए हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक स्तरों में से एक है। कई बैंक आर्थिक रूप से इतने कमजोर (Insolvent) हो गए हैं कि वे अपने दम पर चलने की स्थिति में नहीं हैं। कुछ बैंकों को दूसरे बैंकों में मिलाना (Merge) पड़ा है।

वहीं बांग्लादेश का विदेश मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve), जो 2021 में शेख हसीना सरकार के दौरान लगभग 48 अरब डॉलर तक पहुँच गया था, 2024 तक घटकर 20 अऱब डॉलर के स्तर पर आ गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे खराब प्रबंधन और वित्तीय गड़बड़ियाँ भी एक बड़ा कारण है।

इसके अलावा वित्त वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर घटकर 3.49 प्रतिशत रह गई। हालाँकि, 2025-26 के वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 4.6 से 4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इसके अलावा वित्त वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर घटकर 3.49 प्रतिशत रह गई। हालाँकि, 2025-26 के वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 4.6 से 4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

ईरान के खिलाफ अमेरका और इजरायल के युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट का भी बांग्लादेश पर गंभीर असर पड़ा है। बांग्लादेश अपनी तेल और ईंधन की जरूरतों का लगभग 95 प्रतिशत आयात करता है, इसीलिए बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव डाला है। बांग्लादेश के वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने हाल ही में कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण पिछले तीन महीनों में देश के खजाने को लगभग 4 अरब डॉलर का ‘नुकसान’ हुआ है।

आर्थिक दबाव बढ़ने के कारण बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से 3 अरब डॉलर का कर्ज माँगना पड़ा है। इसके लिए देश के IMF, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे संस्थानों से सहायता की माँग की है। यह कदम तब उठाया गया जब चालू वित्त वर्ष में देश का राजकोषीय घाटा बढ़कर अनुमानित 3.6 प्रतिशत तक पहुँच गया।

इस बीच वित्त मंत्री महमूद चौधरी ने कहा कि BNP के नेतृत्व वाली सरकार उन संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर रही है, जिन्हें वह ‘लूटी गई संपत्ति’ बताती आई है। उन्होंने कहा, “इस समय जब देश गंभीर वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहा है, तब जितनी भी रकम वापस मिल सके, वह हमारे लिए मददगार साबित होगी।”

इस साल अप्रैल में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बांग्लादेश की संसद को बताया कि विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लेने के प्रयास और मजबूत किए जा रहे हैं। इसके लिए संबंधित देशों के साथ जानकारी साझा करने, संपत्तियों की पहचान करने और कानूनी सहयोग बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विदेशों में जमा या भेजी गई अवैध संपत्तियों को वापस लाना उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है।

बांग्लादेश उन संपत्तियों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है जो ब्रिटेन, अमेरिका, UAE और सिंगापुर सहित कई देशों में मौजूद हैं। इसके लिए नए केंद्रीय बैंक गवर्नर मोहम्मद मुस्ताकुर रहमान की अगुवाई में एक विशेष टास्क फोर्स भी बनाई गई है, जिसका काम विदेशों में मौजूद बांग्लादेसी धन का पता लगाना और उसे वापस लाना है।

वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने कहा कि वित्तीय गड़बड़ियों के कारण कई बैंकों की वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो गई है। उनके अनुसार, कुछ बैंकों की बैलेंस शीट ‘शून्य या घाटे’ में पहुँच गई, जिसके चलते सरकार को उनमें फिर से पूँजी डालनी पड़ी। चौधरी ने कहा, “शेख हसीना से जुड़े कारोबारी और राजनेता लगभग 234 अरब डॉलर देश से बाहर ले गए, जिससे बैंकिंग क्षेत्र गंभीर संकट में आ गया।”

इसी कारण जून 2026 में रहमान सरकार को बैंकिंग क्षेत्र को संभालने और उसे फिर से मजबूत बनाने के लिए 3.2 अरब डॉलर का आपातकालीन सहायता पैकेज देने का फैसला करना पड़ा।

महँगाई भी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। नए केंद्रीय बैंक गवर्नर द्वारा कई महीनों तक सख्त मौद्रित नीतियाँ अपनाने के बावजूद महँगाई दर 8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, जो दक्षिण एशिया में सबसे अधिक मानी जा रही है। मई 2026 तक बांग्लादे की महँगाई दर 9.42 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल 2026 में 9.04 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि एक महीने में महँगाई और बढ़ गई, जिससे लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च भी बढ़ता जा रहा है।

ईरान युद्ध से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भी बांग्लादेश में आम लोगों के लिए भोजन, ईंधन, किराया और अन्य जरूरी सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। देश अभी कोविड-19 महामारी के असर से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दीं।

बांग्लादेश में गरीबी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश की कुल गरीबी दर 27.9 प्रतिशत है, जबकि 9.3 प्रतिशत लोग सबसे ज्यादा गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। इसका मतलब है कि देश की एक चौथाई से भी अधिक आबादी राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

इसके अलावा कई ऐसे परिवार जो पहले गरीबी रेखा से ‘थोड़ा ऊपर’ थे, अब बढ़ती महँगाई के कारण फिर से गरीबी की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी आय कीमतों में हो रही बढ़ोतरी के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही है।

सरकारी कर्ज भी बांग्लादेश के लिए चिंता का विषय बन गया है। देश पर कुल सार्वजनिक कर्ज 22 लाख करोड़ टका से अधिक हो चुका है, जो उसकी GDP का लगभग 40 से 42 प्रतिशत है। इस महीने बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया कि अगर सरकार अगले वित्त वर्ष में कोई नया कर्ज भी नहीं लेती, जो कि संभव नहीं माना जा रहा, “तब भी उसे पहले से लिए गए कर्ज के मूलधन और ब्याज की अदायगी के लिए लगभग 4.35 ट्रिलियन टका खर्च करने पड़ेंगे।”

पिछले दो वर्षों में राजनीति में उथल-पुथल के कारण बांग्लादेश में निवेश में बड़ी गिरावट आई है। नई सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन देश में समय-समय पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा और अशांति के कारण निवेशकों का भरोसा पूरी तरह बन पा रहा है। इसलिए कई निवेशक नया पैसा लगाने या नई परियोजनाएँ शुरू करने से बच रहे हैं।

बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग की, जो कभी उसकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, आज मुश्किल दौर में गुजर रहा है। करीब 23 अरब डॉलर कीमत वाला यह उद्योग तैयार रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र को धागा और अन्य सामग्री उपलब्ध कराता है। रेडीमेड गारमेंट्स क्षेत्र बांग्लादेश की कुल निर्यात आय का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा देता है। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और भारत के साथ बढ़े तनाव ने इस उद्योग की समस्याओं को और बढ़ा दिया है।

वहीं, भारत यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे भारतीय कपड़ा और परिधान उद्योग को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। अमेरिका पहले से ही भारतीय कपड़ा उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है, जहाँ हर साल लगभग 10.5 से 11 अरब डॉलर के उत्पाद निर्यात किए जाते हैं।

फरवरी 2025 में मोदी सरकार ने कपड़ा मंत्रालय का बजट बढ़ाकर 5,272 करोड़ रुपए कर दिया, जो पिछले वित्त वर्ष के 4,417 करोड़ रुपए से अधिक था। माना गया कि यह कदम उन कंपनियों को आकर्षित करने के लिए उठाया गया, जो बांग्लादेश से अपना कारोबार दूसरी जगह ले जाना चाहती थीं। इससे बांग्लादेश की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गईं।

मई 2025 में भारत ने बांग्लादेशी सामानों पर कुछ बंदरगाह प्रतिबंध लगाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम मुहम्मद यूनुस के भारत के प्रति सख्त रुख के ‘जवाब’ में उठाया गया था। इन प्रतिबंधों से बांग्लादेश को 77 करोड़ डॉलर से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है।

हालाँकि शेख हसीना के शासनकाल में भी बांग्लादेश कोई आदर्श आर्थिक मॉडल नहीं था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 2022 से 2025 के बीच देश ने कई क्षेत्रों में पीछे की ओर कदम बढ़ाए हैं। इसका मतलब है कि गरीबी कम करने और आर्थिक सुधार के क्षेत्र में हुई कई वर्षों की प्रगति कमजोर पड़ती दिखाई दी।

साफ हो गया है कि आज बांग्लादेश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। इसी कारण सरकार विदेशों में भेजी गई 230 अरब डॉलर की संपत्तियों को वापस लाने की कोशिश कर रही है।

दिलचस्प बात यह है कि यही बांग्लादेश कभी भारत के कुछ उदारवादी टिप्पणीकारों द्वारा एक सफल आर्थिक मॉडल के रूप में पेश किया जाता था। उनका कहना था कि आकार में छोटा होने के बावजूद आर्थिक विकास के मामले में ‘बांग्लादेश भारत से आगे’ निकल रहा है। जर्मनी में रहने वाले यूट्यूबर ध्रुव राठी, मोदी विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ वामपंथी मीडिया संस्थानों ने भी समय-समय पर ऐसे दावे किए।

कुछ भारतीय उदारवादी टिप्पणीकार और राजनीतिक समूह ‘बांग्लादेश चमत्कार’ की कहानी को बढ़ावा देते रहे, ताकि मोदी सरकार की आलोचना की जा सके। लेकिन वे भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाओं, आबादी और राजनीतिक परिस्थितियों के बड़े अंतर को नजरअंदाज करते रहे। जहाँ बांग्लादेश की GDP लगभग 450 अरब डॉलर है, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है, जो उससे 8-9 गुना बड़ी है।

यह सच है कि भारत ने पहले अपने कपड़ा उद्योग की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया था और इस क्षेत्र में बांग्लादेश को बढ़त हासिल थी। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी और विविध है, इसलिए अब वह इस क्षेत्र में भी तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।

कुछ भारतीय उदारवादी यह भी कहते रहे हैं कि प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) के मामले में बांग्लादेश भारत से थोड़ा आगे है। उनके अनुसार बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,911 डॉलर है, जबकि भारत की 2,812 डॉलर। वे इसे भारत के लिए चिंता का विषय बताते हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह अंतर कई बार मुद्रा विनिमय दरों और बांग्लादेश की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था के कारण दिखाई देता है।

केवल कुछ चुनिंदा आँकड़ों को देखने के बजाए पूरी तस्वीर पर ध्यान देना चाहिए। भारत की अर्थव्यवस्था आकार, संपत्ति और विविधता के मामले में बांग्लादेश से कहीं बड़ी है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि बांग्लादेश चावल, बिजली और अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है।

लेकिन मोदी सरकार और भाजपा का विरोध करने वाले राजनीतिक और वैचारिक कारणों से भारत की उपलब्धियों को कम करके दिखाते हैं। पहले भी इन्होंने यह तर्क दिया था कि ‘तालिबान शासित अफगानिस्तान की मुद्रा भी भारतीय रुपए से मजबूत है’, जिसे उन्होंने भ्रामक तुलना बताया है।

राष्ट्रवाद का दम भरने वाली बीजेपी और शिवसेना की मौजूदगी में सना मलिक ने महाराष्ट्र विधानसभा में गूंज दिया ‘भारत में शरिया कानून और बहुविवाह…’ और ‘पाकिस्तान प्रेम’

       नवाब मलिक की बेटी सना मलिक ने भारत में शरिया कानून लागू करने की माँग की (फोटो साभार : Loksatta)
ये महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश के लिए डूब मरने की बात है जब अपने आपको राष्ट्रवादी बताने वाली बीजेपी और शिवसेना की मौजूदगी में विधायक सना मलिक ने शरिया, तीन तलाक और बहुविवाह की बात करते पाकिस्तान का उदाहरण दे दिया। सब चुप लेकिन अगर यही बात कांग्रेस या INDI गठबंधन के किसी विधायक ने बोल दी होती विधानसभा से लेकर सड़क तक हंगामा हो रहा होता। लेकिन यह मिसाल दी अजित पवार गुट की NCP की विधायक ने। क्या राष्ट्रवादी मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री में सना के विरुद्ध कार्यवाही करने की हिम्मत है? एक मुस्लिम महिला पत्रकार की बात याद आ जाती कि जब पूछा कि "गैर-मर्द के हमबिस्तर होने पर औरत पाक कैसे हो जाती है?" जवाब मिला "हलाला हमारा होता है और दर्द दूसरों को होता है।"      
महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र में NCP (अजीत पवार गुट) की विधायक सना मलिक के एक बयान पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने सदन में चर्चा के दौरान भारत में भी कुरान पर आधारित कानून लागू करने की माँग की। सना मलिक ने तीन तलाक और बहुविवाह (पॉलिगेमी) का जिक्र करते हुए पाकिस्तान का उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि जब पाकिस्तान कुरान के नियमों को अपना कानून बना सकता है, तो भारत को भी ऐसा ही करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद बीजेपी विधायकों ने सदन में जमकर हंगामा किया और सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध हो रहा है।

कौन हैं सना मलिक? अब्बू का सियासी बैकग्राउंड

सना मलिक महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया और चर्चित चेहरा हैं। वह मुंबई के अणुशक्ति नगर विधानसभा क्षेत्र से साल 2024 में पहली बार विधायक चुनी गई हैं। सना मलिक वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व मंत्री नवाब मलिक की बेटी हैं। नवाब मलिक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, जो बाद में मुंबई आकर राजनीति में सक्रिय हुए।

राजनीति में कदम रखने से पहले सना मलिक एक आर्किटेक्ट और वकील के तौर पर काम कर चुकी हैं। साल 2024 के चुनाव में नवाब मलिक ने अपनी सीट से बेटी सना को उम्मीदवार बनाया था। सना अपनी पार्टी में अल्पसंख्यक और मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों पर काफी आक्रामक रुख रखती हैं।

विधानसभा में क्यों शुरू हुई बहुविवाह और तीन तलाक पर बहस?

विधानसभा सत्र के दौरान BJP विधायक देवयानी फरांडे ने तीन तलाक कानून को सख्ती से लागू करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने सदन को बताया कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को आज भी प्रताड़ित किया जा रहा है। देवयानी ने इसके लिए पाकिस्तान का उदाहरण दिया था।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में दूसरे निकाह के लिए पहली बीवी की लिखित अनुमति और एक काउंसिल की मंजूरी जरूरी है। इसी सख्त नियम के कारण पाकिस्तान में बहुविवाह की दर सिर्फ एक प्रतिशत है। उन्होंने महाराष्ट्र में भी ऐसे ही कड़े कानून और समान नागरिक संहिता (UCC) लाने की माँग की।

सना मलिक का विवादित तर्क और ‘पाकिस्तानी प्रेम’

BJP विधायक के बयान पर पलटवार करते हुए सना मलिक ने आक्रामक रुख अपना लिया। उन्होंने दलील दी कि बहुविवाह सिर्फ मुस्लिम समाज में नहीं होता, बल्कि हर धर्म में है। सना मलिक ने कहा कि पाकिस्तान ने कुछ नया नहीं किया, उसने सिर्फ कुरान में लिखे मुस्लिम पर्सनल लॉ को ही कानून का रूप दिया है।

सना मलिक ने आगे कहा, “हम इस्लाम में कुरान की शिक्षाओं को मानते हैं। अगर पाकिस्तान इसे लागू कर सकता है, तो भारत को भी कुरान पर आधारित कानून लाना चाहिए, हम इसकी माँग करते हैं।” उनके इस बयान को लोगों ने हिंदुओं और भारतीय व्यवस्था के खिलाफ एक कट्टरपंथी सोच माना।

BJP का करारा पलटवार: ‘देश संविधान से चलेगा, शरिया से नहीं’

सना मलिक के इस बयान पर BJP विधायक अतुल भातखलकर ने सदन में तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि यह देश केवल भारत के संविधान से चलता है, किसी मजहबी ग्रंथ या कुरान से नहीं। उन्होंने साफ किया कि सदन में पाकिस्तान और शरिया की वकालत करने की कोई जरूरत नहीं है।

वहीं, महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने भी सना मलिक को सीधे जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून किसी धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं बनता। कानून समाज में हो रहे अन्याय को रोकने के लिए बनता है, किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं।

नितेश राणे की दो टूक: ‘शरिया चाहिए तो पाकिस्तान चले जाओ’

इस विवाद के बाद महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और BJP नेता नितेश राणे ने सना मलिक पर बेहद तीखा हमला बोला। नितेश राणे ने कहा कि सना मलिक शायद भूल गई हैं कि वह एक हिंदू बहुसंख्यक देश में बैठी हैं। वह भारत की विधायक हैं, पाकिस्तान की संसद में नहीं बैठी हैं।

नितेश राणे ने साफ कहा कि हमारे देश के संविधान में ही समान नागरिक संहिता (UCC) का जिक्र है। जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, वे ही आज धर्म के नाम पर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर किसी को भारत का कानून पसंद नहीं है और शरिया कानून ही चाहिए, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देकर पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

चौतरफा घिरने के बाद सना मलिक ने दी सफाई

चारों तरफ से घिरने और सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल होने के बाद सना मलिक ने अपने बयान पर सफाई जारी की है। सना मलिक ने दावा किया कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। सना ने कहा कि वह पाकिस्तान को कोई आदर्श नहीं मानती हैं।

उन्होंने सिर्फ देवयानी फरांडे के पाकिस्तान वाले संदर्भ पर जवाब दिया था। सना ने कहा कि भारतीय मुसलमान होने के नाते उनका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। भारत का संविधान उन्हें अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है और उन्होंने केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बात रखी थी।

इजराइल किसी के रहमोकरम पर नहीं अपनी आत्मक्षमता के दम पर खड़ा है


75 साल पहले हमें मरने के लिए यहां लाया गया था। हमारे पास ना कोई देश, ना कोई सेना, सात देशों ने हमारे विरुद्ध जंग छेड़ दी। हम सिर्फ 65,000 थे।

हमें बचाने वाला कोई नहीं था। हम पर हमले होते रहे।
लेबनान, सीरिया, ईराक़, जॉर्डन, मिस्र, लीबिया, सऊदी अरब जैसे कई देशों ने हमारे ऊपर कोई दया नहीं दिखाई। सभी लोग हमें मारना चाहते थे किंतु हम बच गये।
संयुक्त राष्ट्र ने हमें धरती दी, वह धरती जो 65 प्रतिशत रेगिस्तान थी। हमने उसको भी अपने खून से सींचा। हमने उसे ही अपना देश माना क्योंकि हमारे लिए वही सब कुछ था।

हम कुछ नहीं भूले, हम फिरऔन से बच गए। हम यूनान से बच गए। हम रोमन से बच गए। हम स्पेन से बच गए। हम हिटलर से बच गए। हम अरब देशों से बच गए। हम सद्दाम से बच गए। हम गद्दाफी से बच गए।
हम हमास से भी बचेंगे, हम हिजबुल्ला से भी बचेंगे और हम ईरान से भी बचेंगे।

हमारे जेरूसलम पर अब तक 52 बार आक्रमण किया गया, 23 बार घेरा गया, 39 बार तोड़ा गया, तीन बार बर्बाद किया गया, 44 बार कब्जा किया गया लेकिन हम अपने जेरूसलम को कभी नहीं भूले। वह हमारे हृदय में है, वह हमारे मस्तिष्क में है और जब तक हम रहेंगे, जेरूसलम हमारी आत्मा में रहेगा।

संसार ये याद रखें कि जिन्होंने हमें बर्बाद करना चाहा वह आज स्वयं नहीं है। मिस्र, लेबनान, बेबीलोन, यूनान, सिकंदर, रोमन सब खत्म हो गए हैं।

हम फिर भी बचे रहे।

हमें वे (इस्लामी) खत्म करना चाहते हैं। उन्होंने हमारे रस्म रिवाज को कब्जाया। उन्होंने हमारे उपदेशों को कब्जाया। उन्होंने हमारी परंपरा को कब्जाया। उन्होंने हमारे पैगंबर को कब्जाया। कुछ समय पश्चात अब्राहम इब्राहिम कर दिए गए, सोलोमन सुलेमान हो गए, डेविड दाऊद बना दिए गए, मोजेज मूसा कर दिए गए...

फिर एक दिन... उन्होंने कहा तुम्हारा पैगंबर (मुहम्मद) आ गया है। हमने इसे नहीं स्वीकार नहीं किया। करते भी कैसे, उनके आने का समय नहीं आया था। उन्होंने कहा, स्वीकारो! कबूल लो! हमने नहीं कबूला। फिर हमें मारा गया। हमारे शहरों को कब्जाया गया, हमारे शहर यसरब को मदीना बना दिया गया। हम कत्ल हुए, भगा दिए गए...

मक्का के काबा में हम 2 लाख थे, मार दिए गए। हमें दुश्मन बता कर कत्ल किया गया, फिर सीरिया में, ओमान में यही हुआ। हम तीन लाख थे, मार दिए गए। ईराक़ में हम 2 लाख थे, तुर्की में चार लाख, हमें मारा जाता रहा, मारा जाता रहा। वे हमें मार रहे हैं, मारते जा रहे हैं। हमारे शहर, धन, दौलत, घर, पशु, मान-सम्मान सब कुछ कब्जाए जाते रहे फिर भी हम बचे रहे।

1300 सालों में करोड़ों यहूदियों को मारा गया फिर भी हम बचे रहे।
75 साल पहले वे हम पर थूकते थे, जलील करते थे, मारते थे। हमारी नियति यही थी किंतु हम स्वयं पर, अपने नेतृत्व पर, अपने विश्वास पर टिके रहे रहे।
आज हमारे पास एक अपना देश है। एक स्वयं की सेना है, एक छोटी अर्थव्यवस्था है। इंटेल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, फेसबुक, जैसी कई संस्थायें हमने इस दौर में बनाईं। आज हमारे चिकित्सक दवा बन रहे हैं, लेखक किताबें लिख रहे हैं, ये सबके लिए हैं, यह मानवता के कल्याण के लिए है।
हमने रेगिस्तान को हरियाली में बदला हमारे फल, दवाएं, उपकरण, उपग्रह सभी के लिए है।
हम किसी के दुश्मन नहीं है, हमने किसी को खत्म करने की कसमें नहीं खाईं। हमें किसी को बर्बाद भी नहीं करना, हम साजिशें भी नहीं करते।
हम जीना चाहते हैं, सिर्फ सम्मान से, अपने देश में, अपनी जमीन पर, अपने घर में।

पिछले हजार सालों से हमें मिटाया गया, खदेड़ा गया, कब्जाया जाता रहा, हम मिटे नहीं, हारे नहीं और न आगे कभी हारेंगे। हम जीतेंगे, हम जीत कर रहेंगे, हम 3000 सालों से यरुशलम में ही थे। आज हम अपने पहले देश इजराइल में हैं। यह हमारा ही था, हमारा ही है और हमारा ही रहेगा, येरूसलम हमसे है और हम येरूसलम से हैं। (2025) बेंजामिन नेतन्याहू का UN में दिया गया भाषण का अंश साभार 

राहुल गांधी और कांग्रेस आज लोकतंत्र के लिए ढोल पीटने से पहले याद करें कि आज के दिन इंदिरा गांधी ने 1975 को कैसे देश को बंधक बनाया था; ”Indira Surrendered To Bhutto”

सुभाष चन्द्र 

कथित संविधान की लाल किताब हाथ में लिए हुए बेशर्म राहुल गांधी देश ही नहीं विदेशों में गीत गाता फिरता है कि मोदी ने लोकतंत्र और संविधान कुचल दिया, संवैधानिक संस्थाएं कब्जे में कर ली है। मोदी सरेंडर चिल्लाने वाले बेशर्म राहुल तेरी दादी ने तो पाकिस्तान के आगे सरेंडर कर दिया था, पाकिस्तान के बंधक बनाए 95000 फौजियों को छोड़ दिया लेकिन अपने 85 सैनिकों को नहीं छुड़वाया। उन्हें पाकिस्तान के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया। और उसी रास्ते पूरी कांग्रेस और INDI गठबंधन चल रहा है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जबकि सच्चाई यह है कि नेहरू से लेकर 2014 तक कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट और जितनी भी संवैधानिक संस्थाएं है सबको गुलाम बना रखा था। जो सुप्रीम कोर्ट सरकार के विरुद्ध बोल जाती है कांग्रेस के राज में किसी जज की हिम्मत नहीं थी। इंदिरा गाँधी का चुनाव रद्द कर 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ने का फैसला देने वाले इलाहबाद हाई कोर्ट जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा कहां गायब हो गए पता नहीं। बेशर्मों की तरह राहुल से लेकर INDI गठबंधन चील-कौओं की तरह संवैधानिक संस्थाओं को छोड़ो प्रधानमंत्री तक को गाली देने से नहीं चुकता। 

इमरजेंसी में वामपंथ कांग्रेस की गोदी में बैठा था। हाँ, महाराष्ट्र में हिन्दू सम्राट बालासाहेब ठाकरे को गिरफ्तार करने में इंदिरा ने घुटने टेक दिए थे। जानती थी कि ठाकरे को छेड़ना अपनी बचीकुची इज्जत से हाथ धोना। लेकिन माननीय बालासाहेब के बेटे ने कांग्रेस के आगे सरेंडर कर अपने बाप की इज्जत को मलियामेट कर दिया।   

लेकिन वह नहीं पढ़ना चाहता कि आज के दिन 1975 में उसकी दादी इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाकर, संविधान की किताब को बंद कर दिया था और लोकतंत्र की निर्मम हत्या कर दी थी। संविधान में मुस्लिमों को खुश करने के लिए बदलाव किए। 

कुछ दिन पहले अशोक गहलोत ने कहा था कि आज इंदिरा गांधी होती तो वह भाजपा पर बैन लगा देती राहुल गांधी तो कुछ पढ़ना नहीं चाहता लेकिन अशोक गहलोत तुम तो बुजुर्ग हो, तुम्हे तो पता होगा कैसे तुम्हारी अम्मा इंदिरा गांधी ने एक भाजपा (जनसंघ) ही नहीं सभी पार्टियों को बैन कर दिया था लोकनायक जयप्रकाश नारायण समेत विपक्ष के सभी नेता जेल में ठूंस दिए गए थे आरएसएस पर भी बैन लगा दिया था आम जनता पर अत्याचारों की कोई सीमा नहीं थी और आधी रात में पुलिस किसी को भी उठा ले जाती थी मौलिक अधिकार ख़त्म कर दिए गए थे 

अगले दिन 26 जून की सुबह सभी अख़बारों के पहले पन्ने काले थे कुछ नहीं लिखा गया था। तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में केवल दिल्ली दूरदर्शन था इंदिरा गांधी का गुणगान करने के लिए लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स में पत्रकार खुलेआम सरकार और मोदी की आलोचना करते हैं कुछ पत्रकार ऐसे हैं जो 1975 में थे और आज भी हैं, वो भी उन दिनों को भूलकर मोदी को गरिया रहे हैं जैसे स्वतंत्रता मिठाई के रूप में भी उन्हें हजम नहीं हो रही उन्हें वो ही काले दिन दिखा देता मोदी तो अच्छा रहता

राहुल गांधी संविधान की बात करता है हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून, 1975 को इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था लेकिन दादी ने क्या किया, उस फैसले को ठुकरा कर 12 दिन बाद इमरजेंसी लगा दी सारी न्यायपालिका को कब्जे में ले लिया आज जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज मोदी सरकार को हेंकड़ी दिखाते हैं, वो याद नहीं करते कि उनकी न्यायपालिका की क्या दुर्गति की थी इंदिरा गांधी ने आज कॉलेजियम से अपनी “दादागिरी” चला रही है न्यायपालिका लेकिन तब इंदिरा गांधी खुद जज बनाती थी और न्यायपालिका नतमस्तक रहती थी इनको भी स्वतंत्रता हज़म नहीं हो रही

न्यायपालिका को याद होगा कैसे बहरुल इस्लाम को एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट और राज्यसभा भेजती रही इंदिरा गांधी जबकि आज न्यायपालिका सरकार को अपनी मर्जी से तय किए जज नियुक्त करने  को मजबूर करती है अब कुछ हद तक मोदी सरकार उनकी Recommendations को स्वीकार नहीं करती

1971 का चुनाव इंदिरा गांधी “गरीबी हटाओ” के नारे पर जीती थी और राहुल गांधी आज भी गरीबी हटाओ का नारा लगाता है जबकि गांधी परिवार गरीबी हटाते हटाते खुद मालदार होता चला गया एक उपलब्धि, इंदिरा गांधी की कांग्रेस गाती फिरती है कि उसने बांग्लादेश बनाया जो आज हमारे लिए नासूर बन गया है पाकिस्तान पर जीत तो हासिल की लेकिन शिमला वार्ता में भुट्टो को इंदिरा गांधी ने सब कुछ वापस लौटा दिया -”Indira Surrendered To Bhutto”- ऐसी थी वो Iron Lady.

राहुल गांधी आज चुनाव आयोग पर सरकार के कब्जे की बात करता है जबकि कांग्रेस ने हर चुनाव आयुक्त को अपनी जेब में रखा और उससे वह सब करवाया जो कांग्रेस चाहती थी डॉ कुरैशी, डॉ गिल और नवीन चावला के नाम तो याद होंगे राहुल गांधी को

आज के दिन भी अगर राहुल गांधी और उसके चट्टे बट्टे लोकतंत्र की बात करते है तो इससे बड़ी शर्म की बात हो नहीं सकती क्योंकि लोकतंत्र की हत्या का काला दाग तो उनके चेहरे पर इंदिरा गांधी की इमरजेंसी से ही लगा हुआ है

राम मंदिर का मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट में क्यों गया? खारिज क्यों नहीं कर दिया गया? क्या हाई कोर्ट को बंद कर देना चाहिए?

सुभाष चन्द्र

यह बड़ा गंभीर प्रश्न है कि आखिर राज्यों के मामले वकील लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट कैसे ले जाते हैं और सुप्रीम कोर्ट उन्हें Admission Stage पर ही खारिज क्यों नहीं करता दो दिन पहले एक वकील विशाल तिवारी भारत भूषण तिवारी के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट चला गया था जबकि उसे पहले हाई कोर्ट जाना चाहिए था। 

सुप्रीम कोर्ट जाना साबित करता है कि जो घोटाला हुआ है इसमें 2027 में योगी को हराने के लिए विपक्ष की भूमिका होने का शक है। सुप्रीम कोर्ट जाने वाले वकील चुनाव तक तारीख पे तारीख लेते रहेंगे, ताकि हिन्दुओं में बीजेपी के खिलाफ भड़काया जा सके। 

आज राम मंदिर के चोरी के मामले को लेकर कुछ वकील सीधे सुप्रीम कोर्ट चले गए उनमें ये वकील शामिल हैं -

लेखक 
चर्चित YouTuber 
-अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव उन्होंने PIL दायर करके मांग की है कि FIR दर्ज की जाए; CCTV के रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं और समयबढ़ सीमा में सीबीआई के आधीन एक SIT जांच करे;

-एडवोकेट नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने भी Digital Payment logs, CCTV footage और मंदिर की DVR रिकॉर्डिंग को सुरक्षित करने की मांग की है;

-Advocate-on-record अनूप प्रकाश अवस्थी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मामले का संज्ञान लेने और अपनी निगरानी में CBI जांच और ट्रस्ट के खातों की Forensic Audit की मांग की है

इन तीनो की याचिकाओं में कोई विषय ऐसा नहीं है जिस पर भारत का सबसे बड़ा हाई कोर्ट, इलाहबाद हाई कोर्ट निर्णय नहीं ले सकता लेकिन ये सभी लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट भागे हैं जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने तुरंत सुनवाई से इंकार कर दिया और कहा कि कोर्ट रजिस्ट्री के द्वारा मामलों को लिस्ट किया जाएगा

सुप्रीम कोर्ट लिस्टिंग बाद भी कह सकता है कि पहले हाई कोर्ट जाओ लेकिन ये आज ही कह देनी चाहिए थी देश के High Courts को अगर नज़रअंदाज करके किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट सीधे सुनवाई करता है तो वह अपनी सीमाओं को लांघने का काम करेगा और हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करेगा

ये वकील लोग इतने उतावले क्यों थे? उत्तर प्रदेश सरकार ने SIT गठित की थी जिसने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में FIR दर्ज करने की संस्तुति की है अब कुछ समय तो दीजिए राज्य सरकार को SIT की Recommendation पर अमल करने के लिए लेकिन ये वकील तो ऐसा कर रहे हैं जैसे आसमान ही गिर गया हो क्योंकि योगी सरकार ने कुछ किया ही नहीं क्यों भूल जाते हैं ये लोग, वो योगी है, चोरों की कब्रों में से भी उगाही करवा देगा?

सुप्रीम कोर्ट को दिशा निर्देश तय करने चाहिए कि कौन सा मामला पहले हाई कोर्ट जाएगा और कौन से मामले वह सीधे सुनेगा केंद्र सरकार का आदेश अगर पूरे देश पर लागू होता है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं; दो या उससे ज्यादा राज्यों का अगर एक ही मामला है तो वह भी सुप्रीम कोर्ट जा सकता है लेकिन जो मामला राज्य सरकार से ही संबंधित है वह पहले हाई कोर्ट ही जाना चाहिए 

मनमर्जी नहीं चलनी चाहिए जैसे चंद्रचूड़ ने कोरोना के विषय में किया था जब हर हाई कोर्ट को सुनवाई करने के लिए कह दिया और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में वो 24-24 घंटे में केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांग रहे थे केंद्र और राज्यों की सरकार कोरोना से निबटे या अदालतों के चक्कर लगाती रहें, इसका ख्याल नहीं आया चंद्रचूड़ को और हर सर्कार को चकरी बना कर रख दिया था लेकिन फिर हुआ क्या, जो सबसे ज्यादा छातियां पीट रहा था ऑक्सीजन के लिए, वह केजरीवाल ही जरूरत से चार गुना ऑक्सीजन लिए बैठा था लेकिन उस पर कुछ नहीं बोले मीलॉर्ड