UNSC का सदस्य बनेगा भारत, विदेश मंत्री जयशंकर ने पेश की दावेदारी, 6 प्राथमिकताओं के साथ ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनेगा भारत


भारत ने विश्व के सबसे शक्तिशाली मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का सदस्य बनने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी है। दरअसल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 13 जुलाई, 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सदस्यता हासिल करने के अभियान की औपचारिक शुरुआत की। भारत एशिया-प्रशांत समूह की एक सीट के लिए चुनाव मैदान में है, जहां उसका मुकाबला ताजिकिस्तान से होगा। इस मौके पर जयशंकर ने कहा कि अगर भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य चुना जाता है तो उसकी छह प्राथमिकताएं होंंगी और भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनेगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया कि UNSC में भारत की रणनीति SHANTI (सिक्योरिंग होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट एंड इंटीग्रिटी) के सिद्धांतों पर होगी।

 भारत की सुरक्षा परिषद में होंगी 6 प्राथमिकताएं

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में कैम्पेन लॉन्च करते हुए कहा कि भारत की 6 प्राथमिकताएं सुरक्षा परिषद में होंगी: 1. ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मजबूत करना, 2. बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार, 3. शांति स्थापना अभियानों को आधुनिक बनाना, 4. सुरक्षित और जिम्मेदार AI को बढ़ावा देना, 5. समुद्री सुरक्षा और निर्बाध व्यापार सुनिश्चित करना, 6. आतंकवाद के वित्तपोषण पर सख्त कार्रवाई। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है। इसके फाइनेंशियल नेटवर्क को खत्म करने पर ज़्यादा इंटरनेशनल फोकस करने की अपील की। ​​जयशंकर ने कहा कि भारत टेरर फाइनेंसिंग का मुकाबला करने के लिए कमिटेड है और टेररिस्ट ग्रुप्स की लिस्टिंग के लिए ऑब्जेक्टिव और सबूत-आधारित प्रस्तावों को बढ़ावा देगा।
भारत ने UNSC रिफॉर्म पर दिया जोर
न्यूयॉर्क में यूएन मुख्यालय में उम्मीदवारी पेश करते हुए जयशंकर ने कहा, “आज दोपहर आपके साथ मिलकर 2028-29 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर भारत की उम्मीदवारी पेश करना खुशी की बात है। हम यह कदम ऐसे समय में उठा रहे हैं जब दुनिया एक गहरे विरोधाभास का सामना कर रही है।” उन्होंने आगे कहा, “साथ ही, हम टकराव, हिंसा और अस्थिरता का ऐसा स्तर देख रहे हैं जो उन लोगों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है जो शायद बहुत दूर हैं।” जयशंकर ने कहा कि भारत रिफॉर्म को आगे बढ़ाने की दिशा में काम करेगा। विदेश मंत्री ने कहा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाने की जरूरत है। भारत का दृष्टिकोण संवाद, सहयोग और मतभेदों को दूर करने पर आधारित रहेगा।
भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुख्य मुकाबला
वर्ष 2028-29 में एशिया-प्रशांत ग्रुप के खाते में सिर्फ एक सीट है, जिसके लिए भारत और ताजिकिस्तान आमने-सामने हैं। ताजिकिस्तान को 57 इस्लामिक देशों के संगठन ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) का समर्थन प्राप्त है। OIC का समर्थन मिलने के बाद ताजिकिस्तान एक बेहद मजबूत दावेदार बन गया है। इसके कारण भारत ने इस सीट के लिए अपना कूटनीतिक अभियान शुरू कर दिया है। भारत को ज्यादातर यूरोपीय देश, अपने पड़ोसी देशों, कैरिबियाई और द्वीपीय देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, खाड़ी देशों और कई अफ्रीकी देशों का समर्थन मिलने की भी उम्मीद है।
जून 2027 में होगा चुनाव, भारत का पलड़ा भारी
इस अस्थायी सीट के लिए जून 2027 में चुनाव आयोजित किए जाएंगे। इस चुनाव में जीत के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो-तिहाई यानी कम से कम 128-129 वोटों की जरूरत होगी। वोटिंग संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में होता है। यह सीक्रेट बैलेट (गुप्त मतदान) के जरिए होता है। जीत के लिए कुल मौजूद सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। UN में 193 सदस्य हैं, यानी जीतने के लिए कम से कम 128-129 वोटों की आवश्यकता होती है। भारत को पिछले सभी चुनावों में लगातार भारी समर्थन मिला है। भारत ने जब 2011–12 के कार्यकाल के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी उस वक्त 190 में से 187 वोट और 2021–22 के कार्यकाल के लिए 193 में से 184 वोट मिले थे। भारत के पास 8 बार यूएनएससी की अस्थाई सदस्यता रही है इस लिहाज से अनुभव के मामले में ताजिकिस्तान पर बढ़त हासिल है जबकि ताजिकिस्तान पहली बार अपनी किस्मत आजमा रहा है।
भारत 8 बार बन चुका है UNSC का अस्थाई सदस्य
UNSC की अस्थायी सदस्यता हासिल करने के मामले में भारत का ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है। भारत को इससे पहले आठ बार दो-दो साल के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चुना गया है। 1950–51, 1967–68, 1972–73, 1977–78, 1984–85, 1991–92, 2011–12 और 2021–22 में भारत यूएनएससी का अस्थाई सदस्य रह चुका है। इस तरह भारत ने अस्थायी सदस्य के तौर पर कुल 16 साल काम किया है।
UNSC में मौजूदगी से भारत का बढ़ेगा दबदबा
सुरक्षा परिषद में मौजूदगी से किसी भी देश की यूएन प्रणाली में दखल और दबदबे का दायरा बढ़ जाता है। ऐसे में 5 साल बाद भारत की सुरक्षा परिषद में दो साल के लिए पहुंचना खासा अहम होगा। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस के लिए भी भारत को साधना अहम होगा। यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और ईरान पर चल रहे तनाव के बीच भारत गुटबाजी से दूर रहा है। साथ ही भारत ने डायलॉग और डिप्लोमेसी का रास्ता सुझाया है। दुनिया में जब भी युद्ध होते हैं, तो गरीब देशों में तेल, खाने और फर्टिलाइजर का संकट आ जाता है। भारत ऐसे देशों की आवाज उठाता है। अब भारत को पाकिस्तान के झूठे प्रोपेगेंडा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर काउंटर करना आसान होगा। 
कैसे काम करता है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य देश हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं। ये हैं- अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन। 10 देशों को अस्थाई सदस्यता दी गई है। हर साल पांच अस्थायी सदस्य चुने जाते हैं। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो साल होता है। पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो पावर होता है। यह किसी भी प्रस्ताव को रोकने की शक्ति देता है। अगर 14 सदस्य किसी प्रस्ताव के पक्ष में हों, लेकिन 5 स्थायी देशों में से कोई एक वीटो कर दे, तो प्रस्ताव रद्द हो जाता है। दुनिया के बड़े फैसले जैसे- किसी देश पर प्रतिबंध लगाना, शांति सेना भेजना या अंतरराष्ट्रीय सैन्य कार्रवाई की मंजूरी देना UNSC के प्रस्ताव से ही पास होते हैं। फैसले के लिए 9 वोट चाहिए होते हैं (जिसमें वीटो का इस्तेमाल न हुआ हो)। अस्थायी सदस्य अध्यक्षता करते हैं और प्रस्ताव ला सकते हैं, लेकिन वो वीटो का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास विटो की शक्ति नहीं होती है। 

बिना कानून बाजार पर हलाल सर्टिफिकेट का कब्जा: केन्या में कोर्ट तक पहुँची सर्टिफिकेशन की लड़ाई, समझें- कैसे पिस रहे व्यापारी


केन्या में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 16 अप्रैल 2026 को डेनिस नथुम्बी, डेनिस ओवुओर ओचांडा और हेनरी बरासा टॉम ने नैरोबी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी निजी व्यवस्थाएँ किसी स्पष्ट कानून के बिना ही खाद्य और मांस उद्योग में बाजार तक पहुँचने, सरकारी खरीद में भाग लेने और व्यापार करने की व्यावहारिक शर्त बनती जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी संस्थाओं को किसी निजी सर्टिफिकेट को लाइसेंस, व्यापार या सार्वजनिक खरीद की अनिवार्य शर्त मानने से रोकने की माँग की है।

जून 2026 में केन्या हलाल सर्टिफिकेशन ब्यूरो (KBHC) ने इस मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की माँग की। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम उपभोक्ताओं को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि कोई खाद्य पदार्थ उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया है या नहीं।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मुसलमानों के हलाल भोजन खाने के अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका सवाल केवल इतना है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी एक निजी मजहबी व्यवस्था धीरे-धीरे खाने-पीने की चीजों के उत्पादन, बिक्री और सप्लाई की पूरी प्रक्रिया में जरूरी शर्त कैसे बन गई।

उनका कहना है कि बूचड़खानों से लेकर सुपरमार्केट और सरकारी खरीद तक, हलाल सर्टिफिकेट ही व्यवसाय की स्वीकार्यता निर्धारित करने लगा है। सर्टिफिकेट न लेने वाला कारोबारी कुछ आपूर्ति शृंखलाओं, ठेकों और बाजारों से बाहर हो जाता है। इस स्थिति में कागज पर स्वैच्छिक दिखने वाला सर्टिफिकेशन व्यवहार में अनिवार्य बन जा रहा है।

दूसरी आपत्ति प्रमाणन शुल्क को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि निजी संस्थाओं को दिया जाने वाला शुल्क अंततः वस्तु की कीमत में जोड़कर उपभोक्ता से वसूला जा सकता है जबकि अधिकांश खरीदारों को न प्रमाणन की प्रक्रिया पता होती है, न उसकी कीमत।

केन्या के कानून में टकराव कहाँ है?

याचिका में केन्या के संविधान के अनुच्छेद 43, 46 और 47 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 43 स्वास्थ्य और स्वीकार्य गुणवत्ता वाले भोजन जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 46 उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता, आवश्यक जानकारी और उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 47 सरकारी प्रशासनिक कार्रवाई को वैध, तर्कसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष बनाने की माँग करता है।

केन्या के मांस नियंत्रण नियम में पशु और मांस की जाँच का अधिकार सरकारी पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्य निरीक्षकों और अधिकृत अधिकारियों को दिया गया है। पशु को काटने से पहले और मांस को बाजार में भेजने से पहले सरकारी निरीक्षण आवश्यक है। इसलिए धार्मिक प्रमाणन सार्वजनिक स्वास्थ्य की वैधानिक जाँच का स्थान नहीं ले सकता है।

हलाल वास्तव में क्या है?

हलाल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है इस्लामी कानून के अनुसार जायज। यह केवल जानवर काटने की पद्धति नहीं है। किसी उत्पाद में सूअर, रक्त, शराब या अन्य निषिद्ध सामग्री न हो, उसके निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के दौरान वह गैर-हलाल पदार्थों के संपर्क में न आया हो ये सभी शर्तें हलाल व्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।
FAO और WHO की Codex Alimentarius Guidelines के अनुसार, हलाल पशु का वध एक मानसिक रूप से स्वस्थ और इस्लामी प्रक्रिया से परिचित मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु को काटने से ठीक पहले ‘बिस्मिल्लाह’ कहा जाना चाहिए, पशु जीवित होना चाहिए, उपकरण तेज होना चाहिए और गर्दन की श्वासनली, भोजन नली तथा मुख्य रक्त वाहिकाएँ काटी जानी चाहिए। Codex यह भी स्वीकार करता है कि विभिन्न इस्लामी मतों और देशों के बीच हलाल की व्याख्या में अंतर हो सकता है।
इसी Codex में यह चेतावनी भी दी गई है कि हलाल लेबल का प्रयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा पर संदेह पैदा हो या यह दावा किया जाए कि हलाल भोजन स्वभावतः अधिक पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक है। इससे साफ जाहिर होता है कि हलाल एक धार्मिक अनुरूपता का दावा है, सरकारी खाद्य-सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं है।
हलाल मांस को लेकर सबसे तीखा विवाद जानवर को काटने से पहले बेहोश करने पर होता है। सभी हलाल व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। कई मुस्लिम प्रमाणन संस्थाएँ reversible stunning स्वीकार करती हैं, जिसमें जानवर मरे बिना अस्थायी रूप से बेहोश होता है। कुछ संस्थाएँ बिना stunning किए वध को ही स्वीकार करती हैं।
Codex के अनुसार हलाल करने वाला व्यक्ति मुस्लिम होना चाहिए। व्यक्तिगत मजहबी उपभोग के संदर्भ में यह इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी देश का पूरा मांस बाजार हलाल व्यवस्था पर निर्भर हो जाए तो पशु काटने का एक विशेष काम गैर-मुस्लिम कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक रूप से बंद हो सकता है।

अधिकार की रक्षा हो, लेकिन छिपी अनिवार्यता नहीं: क्यों मुसीबत में व्यापारी

किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को हलाल खाना खरीदने, उसकी पहचान करने और उसका सर्टिफिकेट माँगने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश का खाद्य उद्योग हलाल व्यवस्था को ही सामान्य नियम मान ले। यह भी जरूरी नहीं कि गैर-मुस्लिम ग्राहक और व्यापारी किसी मजहबी सर्टिफिकेट का खर्च उठाएँ या उसके नियम मानने के लिए मजबूर हों।
इसका सही रास्ता न तो हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना है और न ही उसे हर जगह अनिवार्य बनाना। हलाल सर्टिफिकेशन लोगों और कारोबारियों की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। सर्टिफिकेट देने वाली संस्था और उसकी फीस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। खाने के पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए कि वह हलाल प्रमाणित है या नहीं। बाजार में गैर-हलाल विकल्प भी आसानी से उपलब्ध रहने चाहिए। सरकारी खाद्य-सुरक्षा जाँच को किसी मजहबी प्रमाणपत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
सरकारी खरीद में भी हलाल सर्टिफिकेट की शर्त केवल तभी लगनी चाहिए, जब भोजन खास तौर पर उन लोगों के लिए खरीदा जा रहा हो जिन्हें हलाल खाना चाहिए। इसके लिए भी स्पष्ट कानून या सरकारी नियम होना जरूरी है।
केन्या का यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को यह तय नहीं करना है कि हलाल सही है या गलत। अदालत को यह तय करना है कि किसी निजी मजहबी संस्था को बाजार और कारोबार पर कितनी ताकत दी जा सकती है। मजहबी स्वतंत्रता का मतलब लोगों को विकल्प देना है। लेकिन बिना किसी कानून के उसी विकल्प को व्यापार करने की जरूरी शर्त बना देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि बाजार पर निजी नियंत्रण बन सकता है।

न सांसद हैं-न विधायक फिर भी लेटरहेड पर ‘अशोक स्तंभ’: TMC प्रवक्ता साकेत गोखले ने किया ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अधिनियम’ का उल्लंघन

                                           साकेत गोखले (फोटो साभार-india today)
मोदी सरकार पर संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाने वाले ही संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। बने फिर रहे हैं संविधान की रक्षक के चौधरी। 

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र विवादों में आ गया है। उन्होंने पत्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से सरकार को संपर्क करने का आग्रह किया है, लेकिन पत्र के लिए जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ बना हुआ है, साथ ही मोटे अक्षरों में ‘पूर्व सांसद’ लिखा हुआ है। नियम के मुताबिक, पूर्व सांसद को ऐसे लेटरहेड के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह हों।

क्या लिखा है खत में

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद ने खत में केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह सोनम वांगचुक से संपर्क कर उनका भूख हड़ताल खत्म करवाए। वांगचुक NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में 28 जून 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गोखले ने सोशल मीडिया पर अपने उस पत्र की कॉपी को साझा किया।

गोखले ने यह पत्र 15 जुलाई 2026 को लिखा है। इसमें वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि उनका वजन महज दो सप्ताह में 8 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है। उन्होंने मंत्री से अपील की है कि वे कम से कम उनसे संवाद करें और देश भर के लाखों छात्रों की चिंता का समाधान करें।

                                                           (साभार-x@sakeygokhale)

साकेत गोखले ने अपने निजी स्टेशनरी पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करके कानून का उल्लंघन किया है, क्योंकि पूर्व सांसदों और विधायकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का इस तरह से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। यह भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 (State Emblem of India – Prohibition of Improper Use Act, 2005) के तहत बनाए गए थे।

इन नियमों के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल पूर्व सांसद और विधायक, बल्कि पूर्व मंत्री, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी किसी तरह से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं कर सकते हैं। नियम 10 में कहा गया है, “इन नियमों के तहत अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति (जिनमें सरकार के पूर्व पदाधिकारी, जैसे पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व विधानसभा सदस्य, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी शामिल हैं) किसी भी प्रकार से प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा।”

इस कानून में उन अधिकारियों की सूची दी गई है जो अपने स्टेशनरी पर इस प्रतीक चिन्ह का उपयोग कर सकते हैं, और इस सूची में पूर्व सांसदों और विधायकों को शामिल नहीं किया गया है। केवल संसद और विधान सभाओं या परिषदों के वर्तमान सदस्यों को ही इसका उपयोग करने की अनुमति है और वह भी आधिकारिक कार्यों के लिए। नियम में ये बताया गया है कि किस-किस काम के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही अधिनियम की अनुसूची 1 में अधिकारियों की पूरी सूची दी गई है, जो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

किन लोगों को राज्य प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति है

2007 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग करने की अनुमति भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, लोकसभा और राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रालय और विभाग, राज्य सरकारों के विभाग, भारतीय दूतावास और उच्चायोग, केंद्र एवं राज्य सरकार के वे कार्यालय जिन्हें नियमों के अंतर्गत अनुमति दी गई हो, कुछ वैधानिक निकाय और आयोग, यदि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किया गया हो। इनके लिए भी उपयोग केवल आधिकारिक कार्य, सरकारी पत्राचार, सील, दस्तावेज, भवन, वाहन आदि तक सीमित होता है।

यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि किसी भी तरह से यह धारणा न बने कि कोई मैसेज आधिकारिक है या किसी संवैधानिक प्राधिकरण या सरकारी कार्यालय से आया है। गोखले ने अपने निजी लेटरहेड पर प्रतीक चिन्ह लगाकर यही भ्रम पैदा की है, जिसे कानून रोकना चाहता है।

नियम 10(1) के तहत साफ कहा गया है कि सरकार के सभी पूर्व पदाधिकारियों चाहे वह पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल या पूर्व जज हों, वे आधिकारिक स्टेशनरी या किसी भी दूसरे रूप में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग नहीं कर सकते। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक पद को छोड़ता है, रिटायर होता है या उसका कार्यकाल समाप्त होता है, उसका राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार भी तुरंत खत्म हो जाता है।

जाना पड़ सकता है जेल

2005 के अधिनियम में आगे यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो बिना पूर्व अनुमति के प्रतीक चिन्ह या उसके मिलते-जुलते रूप का उपयोग करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सरकार से संबंधित है या एक आधिकारिक दस्तावेज है, तो उसे दो साल तक की जेल की सजा हो सकती है या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है अथवा जुर्माना और सजा दोनों ही दिया जा सकता है।
भारत के राज्य चिह्न (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 की धारा 3 में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति राज्य चिह्न या उससे मिलते-जुलते चिन्ह का उपयोग इस तरह नहीं करेगा कि जिससे यह आभास हो कि यह सरकार से संबंधित है या यह केंद्र सरकार या राज्य सरकार का आधिकारिक दस्तावेज है, जब तक कि केंद्र सरकार या अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति न मिल जाए।”
धारा 7 (1) में दंड के बारे में बताया गया है, “धारा 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाला कोई भी व्यक्ति दो वर्ष तक के कारावास या पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा। यदि वह अपने अपराध को दोहराता है तो हर बार अपने अपराध के लिए कम से कम छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास और पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”
यह कानून किसी भी व्यापार, व्यवसाय के उद्देश्य से प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने पर दंड का प्रावधान भी करता है। इसलिए नियम में साफ कहा गया है कि सभी के निजी काम, निजी कंपनी, एनजीओ, सोसायटी, राजनीतिक दल, निजी कॉलेज, स्कूल या यूनिवर्सिटी, निजी अस्पताल, व्यापारिक प्रतिष्ठान, यूट्यूब चैनल, वेबसाइट या मीडिया संस्थान, अधिवक्ता, डॉक्टर, इंजीनियर या दूसरे पेशेवर अपनी निजी पहचान के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।
हालाँकि गोखले ने लेटरहेड पर खुद को ‘पूर्व सांसद’ के रूप में सही तरीके से लिखा है, लेकिन लेटरहेड पर अशोक स्तंभ की उपस्थिति यह बताती है कि उन्होंने लेटरहेड कानून का उल्लंघन किया है। पूर्व सांसदों को अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक पत्राचार पर राजकीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, यह प्रतिबंध सभी पूर्व सदस्यों पर समान रूप से लागू होता है।
साकेत गोखले जुलाई 2023 के उपचुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस की तरफ से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। चूँकि वे गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुइज़िन्हो फलेरो के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुने गए थे, इसलिए उन्होंने राज्यसभा नियमों के अनुसार खाली सीट का पूरा कार्यकाल नहीं बल्कि शेष कार्यकाल पूरा किया। इसलिए गोखले की राज्यसभा सदस्यता अप्रैल 2026 में खत्म हो गई। पार्टी ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा। इसलिए वे पूर्व सांसद हैं।

साम्यवाद एक कैंसर है, इसे शुरुआत में ही रोकना होगा - ट्रंप

सुभाष चन्द्र

सच्चाई कभी छुप नहीं सकती, देर सवेर से बाहर निकल आती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का वामपंथियों के लिए बोले गए एक-एक शब्द 100%सत्य है। भारत में वामपंथियों को अपने टीवी शो में बुलाने वालों को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। याद करिए, 1962 में हुए चीन-भारत युद्ध के दौरान वामपंथियों ने साफ कहा था कि 'कोई कम्युनिस्ट फौजियों के लिए खून नहीं देगा', उसके बावजूद लोग और अब टीवी पर चौपालें लगाने वाले इन्हे सिरमौर बने का कोई मौका नहीं छोड़ते।       

डोनाल्ड ट्रंप ने सही कहा है कि साम्यवाद (Communism) एक कैंसर है और इसे शुरुआत में ही रोकना होगा, ये लूज़र ही रहा है और रहेगा, ये प्रणाली कभी कारगर साबित नहीं हुई

आज दुनिया के कुछ देश हैं चीन, रूस, उत्तर कोरिया, क्यूबा, लाओस और वियतनाम जो पूरी तरह वामपंथ के कब्जे में हैं जो अपने आप में एक तानाशाही व्यवस्था है सोवियत संघ के विघटन के बाद जो देश अलग हुए उन्होंने वामपंथ को बहुत हद तक छोड़ दिया 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
साम्यवादियों को लोकतांत्रिक देशों में घुसपैठ करना बहुत आसान होता है और ट्रंप यह जानते हैं कि अमेरिका में भी यह घुस चुका है इसलिए वो इसे रोकने की बात कर रहे हैं लेकिन लोकतंत्र वामपंथियों के लिए संजीवनी का काम करता है इसका मुख उद्देश्य हर लोकतांत्रिक देश की व्यवस्थाओं को ख़त्म करना होता है जिससे अराजकता फैले

भारत में वामपंथी लगभग ख़त्म होकर अंतिम सांसे ले रहे हैं लेकिन इनकी संख्या फिर भी इतनी है कि देश में उपद्रव कर सकें भारत में पहले एक मात्र CPI होती थी जिसका झुकाव सोवियत संघ की तरफ होता था लेकिन 1967 में CPI से विभाजित होकर CPM बन गई जो चीन से जुड़ गई

देश के विरुद्ध काम करना वामपंथियों का मुख्य उद्देश्य रहा है और तभी CPI ने 1962 के युद्ध में चीन को हमलावर मानने पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया था 

CPI की 1952 में लोकसभा में 16 सीट थी, 1957 में 27 और 1962 में 29 सीट थी - पार्टी से अलग होने के बाद सी.पी.एम., CPI और अन्य वामपंथी पार्टियों के लोकसभा में संख्या 5 बार 50 से ऊपर रही और 3 बार 47, 48 और 49 रही मतलब वामपंथियों का अच्छा खासा दबदबा था 1977 में पहली बार CPM बंगाल में सत्ता में आई और 34 वर्ष के शासन में बंगाल को खोखला कर दिया 

1967 में CPM बनने के बाद वामपंथी नक्सली आतंकी संगठन बंगाल की नक्सलबाड़ी से शुरू किया गया जिसने देश भर में फ़ैल कर हजारों लोगों की हत्या की लेकिन वामपंथी उन्हें गरीब और वंचित कह कर समर्थन देते थे आज मोदी के नेतृत्व में अमित शाह ने नक्सलवाद की कब्र खोद दी 

इसके अलावा CPM और CPI भी अंतिम सांसे ले रही है 2014 में लोकसभा में दोनों के  केवल 10 सदस्य थे, 2019 में 5 और 2024 में 6 सदस्य हैं लेकिन ये देश विरोध में सबसे आगे रहते हैं

अभी सुना है CPM के वरिष्ठ नेता MA Baby चीनी राजदूत से मिले और उसके आसपास ही कॉकरोच सोनम वांगचुक से भी मिले वृंदा करात भी वांगचुक को मिलने गई और आज केजरीवाल ने भी। कॉकरोचों के जरिए देश में कोई दंगा कराने की साजिश लगती है 

CPM की ट्रेड यूनियन है AITUC (All India Trade Union Congress) और कांग्रेस पार्टी की है INTUC (Indian National Trade Union Congress) और दोनों का लक्ष्य Industrial Unrest फैलाना रहा है दोनों का एक ही नारा था खासकर AITUC का “हर जोर जुलम की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है” इन दोनों को टक्कर दी संघ समर्थित BMS (भारतीय मजदूर संघ) ने

मिल मालिकों से मजदूरों को नौकरी मिलती थी सैलरी मिलती थी लेकिन वामपंथी उन्हें भड़काते थे तुम्हारा मालिक तुम्हारा खून चूस कर पैसा कमा रहा है, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो और मजदूरों को हड़ताल पर लगा देते थे काम बंद तो सैलरी बंद और मजदूरों के बच्चे भूखे मरते थे देश भर के औद्योगिक संगठन (फैक्टरियां) बंद हो गई और मजदूर रिक्शा चलाने पर मजबूर कर दिए गए 

कांग्रेस राज में 1970 के शुरू में बंगाल से Labour Unrest के कारण आदित्य विक्रम बिरला को writers building के बाहर कार से घसीट कर पीटा गया और वे लगभग नग्न अवस्था में बंगाल छोड़ कर आ गए और कभी वापस नहीं गए 2008 में रतन टाटा को सिंगुर की छोटी कार परियोजना बंद करनी पड़ी 

उसके बाद दौर आया 2011 में ममता बनर्जी का जो CPM के हिंसक राज से भी चार कदम आगे निकली आज जनमानस ने ऐसी स्थिर सरकार बनाई है कि उद्योगपति लौटने लगे हैं 

जगन्नाथ रथ यात्रा : सोने की झाड़ू लगाकर गजपति महाराज ने निभाई 'छेरा पहरा' रस्म


ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा आज पूरे धार्मिक उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो गई। रथ यात्रा से पहले सदियों पुरानी 'छेरा पहरा' रस्म निभाई गई, जिसमें पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक के रूप में सोने की झाड़ू से रथ मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई की। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के समक्ष राजा और प्रजा सभी समान हैं तथा सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।

गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव भोई राजवंश के वर्तमान प्रमुख हैं और वर्ष 1970 में मात्र 17 वर्ष की आयु में सिंहासन पर बैठे थे। परंपरा के अनुसार वे श्री जगन्नाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष और भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक माने जाते हैं। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां वे आठ दिन तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से भगवान श्रीमंदिर लौटते हैं और 27 जुलाई को नीलाद्रि बिजे की रस्म के साथ इस वर्ष की रथ यात्रा का समापन होगा। सोने की मूठ वाली झाड़ू से मार्ग साफ करने की यह परंपरा केवल विनम्रता और सेवा का संदेश ही नहीं देती, बल्कि इसे समृद्धि, पवित्रता और नकारात्मकता के नाश का प्रतीक भी माना जाता है।

पौराणिक गाथा : प्रभु जगन्नाथ का अद्भुत अक्षय अन्न भंडार


पूर्वजों का कहना है कि द्वार/घर में आए किसी भी प्राणी का जल एवं भोजन से आदर-सत्कार करें। जिस घर में आज भी इस मूलमंत्र को अपनाया जाता है उस परिवार का संरक्षण स्वयं प्रभु करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश हम अपनी सनातनी पद्धति को त्याग पश्चिमी सभ्यता में डूब गए हैं और कोई अन्याय होने पर भाग्य को दोष देने लगते हैं। परिवार की रक्षा स्त्री के हाथ होती है क्योकि वह लक्ष्मी एवं अन्नपूर्णा माता होती है। याद रखो भाग्यवान के द्वार/घर मेहमान आता है कम्बख्त के द्वार/घर नहीं।    
पुरी धाम की वह रात आज भी इतिहास के सबसे रहस्यमय और दिव्य प्रसंगों में गिनी जाती है। समुद्र की लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकरा रही थीं। अंधेरी रात में भी श्री मंदिर के शिखर पर लहराता महाप्रभु जगन्नाथ का पवित्र पतित पावन बाना अद्भुत तेज बिखेर रहा था। लेकिन उस समय मंदिर के अंदर एक ऐसा डर जन्म ले चुका था, जिसने सालों से सेवा कर रहे पुजारियों और सेवकों के दिलों को कंपा दिया था। श्री मंदिर के विशाल अक्षय भंडार में रखा अनाज तेजी से खत्म होने लगा था। ओडिशा में भयंकर अकाल पड़ा था। खेत सूख गए थे, कुएं खाली हो गए थे और गाँव-गाँव में भूखे लोगों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। हजारों गरीब और भूखे लोग जगन्नाथ पुरी की ओर भागे चले आ रहे थे, क्योंकि उनका अटूट विश्वास था कि जहाँ स्वयं जगन्नाथ वास करते हैं, वहाँ कोई भूखा नहीं सो सकता।

मंदिर के मुख्य भंडारी पंडित दामोदर दिन-रात चिंता में डूबे रहते थे। वह हर दिन विशाल भंडार गृह के एक-एक मटके और पात्र का हिसाब करते थे। पहले जहाँ अनाज के पहाड़ आसमान छूते दिखते थे, अब वहाँ खाली पड़े बर्तन भय पैदा कर रहे थे। उस दिन शाम को जब दामोदर आखिरी बार भंडार गृह देखने पहुंचे, तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने कांपते हाथों से आखिरी मटके का ढक्कन उठाया। उसमें भी बहुत कम चावल बचा था। उनका गला सूख गया। वे तुरंत मंदिर के गर्भगृह की ओर दौड़े। सामने रत्नसिंहासन पर विराजमान महाप्रभु जगन्नाथ मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। दामोदर की आँखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “हे नाथ! यदि कल तक भंडार भरने का कोई उपाय नहीं निकला, तो हजारों भक्त भूखे रह जाएंगे। आपकी रसोई में कभी कमी नहीं हुई प्रभु... इस बार भी अपनी मर्यादा की रक्षा करें।”
पूरी रात दामोदर को नींद नहीं आई। मंदिर के विशाल प्रांगण में सन्नाटा छाया हुआ था। केवल कहीं-कहीं दीये की लौ टिमटिमा रही थी। आधी रात को अचानक उन्हें भंडार गृह की ओर से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। पहले उन्होंने सोचा कि शायद कोई चोर घुस आया है। वह तुरंत चाबियों का गुच्छा लेकर अंधेरे बरामदे से होते हुए आगे बढ़े। जैसे ही वह भंडार गृह के पास पहुंचे, अंदर से अनाज गिरने और मिट्टी के बर्तन खिसकने की आवाज और तेज हो गई। दामोदर की छाती जोरों से धड़कने लगी। उन्होंने धीरे से भारी लकड़ी का दरवाजा खोला... और अगले ही पल उनकी सांसें अटक गईं।
भंडार गृह के अंदर का दृश्य देखकर उनका शरीर कांप उठा। वहां कोई साधारण इंसान नहीं था। साक्षात महाप्रभु जगन्नाथ स्वयं अपने दिव्य बाल-युवा रूप में खड़े थे। उनका सांवला शरीर सुनहरी रोशनी से चमक रहा था। सिर पर रत्नजड़ित मुकुट था, जिसमें मोर पंख झूल रहा था। उनके बड़े-बड़े गोलाकार नेत्र करुणा और प्रेम से भरे थे। गले में फूलों की माला लटकी थी और पीतांबर की चमक पूरे भंडार गृह को रोशन कर रही थी। उनके हाथों में मिट्टी का एक विशाल मटका था। लेकिन वह कोई साधारण मटका नहीं था। महाप्रभु जैसे ही उसे नीचे की ओर झुकाते, उसमें से चमकते हुए चावल की धार नदी की तरह बहने लगती। देखते ही देखते खाली पड़ा भंडार गृह अनाज से भरने लगा।
दामोदर आश्चर्य से अवाक होकर देखते रहे। यह सपना है या सच, वह समझ नहीं पा रहे थे। उनके हाथ कांपने लगे। वह वहीं सुन्न होकर खड़े रह गए। तभी महाप्रभु ने मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा। उनके लाल होठों की मुस्कान में ऐसी दिव्य शांति थी कि दामोदर की सारी चिंता उसी पल दूर हो गई। भगवान ने कहा, “दामोदर... तुमने यह कैसे सोच लिया कि मेरे भक्त भूखे रहेंगे? तुम इंसान केवल उतना ही देख सकते हो, जितना तुम्हारी आँखें देख सकती हैं। लेकिन मेरा भंडार सीमित नहीं है। जहाँ भक्तों के लिए दया और प्रेम होता है, वहाँ माँ लक्ष्मी स्वयं वास करती हैं।”
इतना कहकर महाप्रभु ने मटके को और झुका दिया। चावल की धार पहले से भी तेज बहने लगी। कुछ ही पलों में पूरा कमरा अनाज के विशाल ढेर से भर गया। दामोदर आश्चर्यचकित होकर उस मटके को देखते रहे। लगातार अनाज निकल रहा था, लेकिन मटका खाली होने का नाम नहीं ले रहा था। तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण पात्र नहीं, स्वयं ईश्वर का अक्षय पात्र है।
अब दामोदर अपने आंसू नहीं रोक पाए। वह दौड़कर अनाज के ढेर पर घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने अपना सिर भगवान के श्रीचरणों में रख दिया। उनका शरीर कांप रहा था। वह रोते-रोते बोले, “मुझे क्षमा करें प्रभु। मैं मूर्ख था जो आपके भंडार को सीमित मान बैठा था। इस संसार का पालनहार कौन है, यह आज आपने मुझे दिखा दिया।”
महाप्रभु शांत भाव से मुस्कुराते रहे। उनके शरीर से निकलने वाली दिव्य रोशनी से पूरा भंडार गृह प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने दामोदर के सिर पर हाथ रखकर कहा, “जब तक इस मंदिर के द्वार पर आने वाले हर भूखे व्यक्ति के लिए तुम्हारे मन में करुणा रहेगी, तब तक यह भंडार कभी खाली नहीं होगा। याद रखना... मेरे लिए सबसे बड़ा भोग सोने-चांदी का नहीं, बल्कि एक भूखे को दिया गया अन्न है।”
अगले दिन सुबह जब मंदिर के सेवकों ने भंडार गृह खोला, तो वे हैरान रह गए। जो बर्तन कल तक खाली थे, आज वे छत तक अनाज से भरे हुए थे। पूरे मंदिर में यह खबर फैल गई। उसी दिन हजारों भूखे लोगों को महाप्रसाद बांटा गया। उसके अगले दिन भी... और उसके अगले दिन भी। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि, जितना अनाज निकाला जाता था, भंडार उतना ही भरा रहता था।
पंडित दामोदर उस दिन के बाद पूरी तरह बदल गए थे। उनके चेहरे पर एक अद्भुत शांति छा गई थी। वे अब हर भूखे व्यक्ति को भोजन कराते समय यही कहते थे, “यह अन्न हमारा नहीं... यह स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ का है। उनके घर में किसी चीज की कमी नहीं हो सकती।”
कहा जाता है कि, आज भी जगन्नाथ पुरी श्री मंदिर में जब लाखों भक्त महाप्रसाद ग्रहण करते हैं, तब वहाँ सेवा करने वाले बुजुर्ग पुजारी धीरे से मुस्कुरा देते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि, उस विशाल रसोईघर और अक्षय भंडार की रक्षा आज भी स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ कर रहे हैं।

‘5 वक्त की नमाज पढ़ते थे कृष्णजी’: मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान राम-कृष्ण को बताया- ‘मुसलमान’, CM योगी पर भी की विवादित टिप्पणी

                                                मौलाना जर्जिस अंसारी (फोटो साभार: आज तक)
मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान श्री कृष्ण को लेकर विवादित बयान दिया है जिसके बाद हंगामा मच गया है। दरअसल, मौलना ने एक मजहबी तकरीर के दौरान भगवान श्री कृष्ण को मुसलमान बताया है और कहा है कि भगवान कृष्ण पाँचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे। इस बयान का वीडियो सामने के बाद संतों और धार्मिक और सामाजिक संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है।

अंसारी को फिर इतना भी मालूम होगा कि भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत गीता में कहा "विनाश काले विपरीत बुद्धि", यानि अंसारी जो अपने आपको मौलाना कहता है साबित कर रहा है कि उसने अपने धर्म परिवर्तन कर रखा है।  

मौलाना जर्जिस अंसारी ने कहा, “हमारे भाई, अगर बुरा न मानें, तो कृष्ण जी भी पाँचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे। यकीन न आए तो श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का 10वाँ श्लोक देख लीजिए…जिसमें कृष्ण जी अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन, ईश्वर की पूजा करो तो पूरे शरीर का योग करो। योगी, उत्तर प्रदेश वाला नहीं। पूरे शरीर का योग करो यानी पूजा सिर्फ खड़े होकर नहीं बल्कि पूरे शरीर के साथ होनी चाहिए।”

जर्जिस ने हिंदुओं का मजाक उड़ाते हुए आगे कहा, “आज हिंदू धर्म में चले जाइए, लोग सिर्फ ऐसे हाथ उठाएँगे- ओम नमः शिवाय, बस हो गई पूजा। योगी जी बड़े भक्त बनते हैं राम के और अगर अपनी किताबें पढ़ लें, तो यकीन मानिए इस्लाम से मोहब्बत करने लगेंगे।” उन्होंने कहा, “इसी दीन और इसी धर्म को रामचंद्र जी ने भी पेश किया है, कृष्ण जी ने भी पेश किया है। ये सिर्फ मुसलमानों का नहीं है।”

मौलाना के इस बयान पर साधु-संत भड़क गए हैं। महंत विष्णु दास ने कहा, “मौलाना कहता है कि भगवान श्री कृष्ण मुसलमान हैं। ऐसे मौलाना की जो जीभ काटकर लाएगा उसे 10 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा।”

मौलाना जर्जिस अंसारी का यह वीडियो झारखंड की एक मजहबी जलसे का बताया जा रहा है। यह वीडियो 23 जून 2026 का बताया जा रहा है लेकिन यह वायरल अब हुआ है। मौलाना जार्जिस उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के रहने वाले हैं और पहले भी कई विवादित बयान दे चुके हैं।

सोनम वांगचुक का अनशन हेडलाइन, ग्रामीणों का सत्याग्रह फुटनोट क्यों?


सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी में उन बेरोजगार युवकों को ‘कॉकरोच’ बताया जो सोशल मीडिया को किसी पर भी अटैक करने का हथियार बनाते हैं। खलिहरों की एक जमात ने इसमें वायरल होने का मौका देखा। बीजेपी और नरेंद्र मोदी विरोधी एजेंडा को पुश करने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम की दुकान खोल ली। सोशल मीडिया में फॉलोअर, लाइक, शेयर, ट्रेंड का धंधा चकाचक चलने के बाद, जब इस दुकान की लॉन्चिंग जमीन पर हुई तो उसे जन समर्थन ही नहीं मिला।


फिर भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर उन्होंने एक टेंट गाड़ रखा है। सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) नाम के एक ‘आंदोलनजीवी’ को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बिठा रखा है। 17 दिन के अनशन के बाद भी जनसमर्थन नहीं मिलने के बाद, यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास हो रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार ही असंवेदनशील है, क्योंकि वांगचुक के समर्थन में सोशल मीडिया पर भारत के विपक्षी नेताओं की छाती में दूध उतर आया है। मीडिया भी इस तमाशे को हाइप देने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही।

अब दिल्ली के जंतर मंतर से सीधे मध्य प्रदेश चलते हैं। यहाँ केन-बेतवा लिंक परियोजना के कथित प्रभावितों का छतरपुर में प्रदर्शन चल रहा है। बारिश से नदी उफान पर है। फिर भी ग्रामीण अपनी माँगों के समर्थन में जल सत्याग्रह कर रहे हैं। कभी चिता पर लेटकर तो कभी सांकेतिक फाँसी के जरिए।

क्या इनके समर्थन में आपने किसी नेता, किसी अभिनेता को देखा-सुना है? क्या सोशल मीडिया पर इनके समर्थन में आपने ट्रेंड या रील की बाढ़ देखी है? क्या मेनस्ट्रीम मीडिया को इनके प्रदर्शन पर चर्चा करते आपने देखा है?

इन सभी सवालों का जवाब है- नहीं। क्या इस उपेक्षा की वजह यह है कि जंतर-मंतर देश की संसद से सटा हुआ है और मध्य प्रदेश का छतरपुर इसी संसद से सैकड़ों किलोमीटर दूर है? या फिर ये सोच कि जंतर-मंतर के तमाशे में नामचीन ​खलिहर शामिल हैं जो टीआरपी और वायरल कंटेंट देते हैं, जबकि छतरपुर के प्रदर्शन में इस देश के वे सामान्य लोग हैं जिन्हें शायद ही पता हो कि टीआरपी और वायरल कंटेंट आखिर किस चिड़िया का नाम है?

मैं यहाँ इस चर्चा में नहीं जाना चाहता कि ये दोनों प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। इन चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए हैं। इसमें भी नहीं जाना चाहता कि इनकी माँगें कितनी जायज है और जो ये माँग रहे हैं क्या वही पूरी समस्या का समाधान है। इस पर गूगल करेंगे तो आपको सारी जानकारी मिल जाएगी।

पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर आंदोलन/प्रदर्शन/सत्याग्रह/अनशन का एक ही लक्ष्य होता है- सत्ता को झुकाकर समझौते के लिए बाध्य करना। अतीत के आंदोलनों के अनुभव बताते हैं कि सरकार उन प्रदर्शनों के सामने कभी नहीं झुकती, जिसके साथ व्यापक समाज का समर्थन नहीं हो। वह उनके साथ भी समझौता नहीं करती, जिस प्रदर्शन का उद्देश्य किसी परिणाम तक पहुँचने की जगह एक समझौते के बाद दूसरे समझौते के लिए दबाव बनाना हो। साथ ही सीजेपी की शुरुआत से ही यह स्पष्ट है कि आज जिस समझौते के लिए वांगचुक को अनशन पर बिठाया गया है, उसके पीछे कुछ ‘आंदोलनजीवी’ हैं। आज के समय में ऐसा हर गिरोह बेनकाब हो चुका है। किसी के पास भी नैतिक मूल्य नहीं बचा है।

साफ है कि सोनम वांगचुक के अनशन से केवल शशि थरूर, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे ​​ही ‘भावुक’ हो पा रहे हैं और सत्ता नहीं झुक रही तो इसका मतलब उसका असंवेदनशील होना नहीं है। तानाशाह होना नहीं है। मक्कार होना नहीं है।

यदि सरकार असंवेदनशील होती तो मध्य प्रदेश की इसी बीजेपी सरकार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावितों के लिए 202.5 करोड़ रुपए के अतिरिक्त पुनर्वास पैकेज को मँजूरी नहीं दी होती। स्थानीय विधायक ने कहा है कि इस पैकेज के तहत प्रभावित परिवारों को 12.5 लाख रुपए का पुनर्वास अनुदान एक ही बार में दिया जाएगा।

ऐसे में सवाल सरकार से नहीं, CJP से है। यदि वांगचुक की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि वे मृत्यु के कगार तक पहुँच चुके हैं, फिर भी उनके समर्थन में समाज का वह व्यापक समर्थन क्यों नहीं आ रहा है? जाहिर है वांगचुक और उनके साथियों के लिए संदेश है कि ‘हठ छोड़ो, आत्ममंथन करो’। लेकिन जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट और मंच को ‘डांस इंडिया डांस’ का स्टेज समझने वाले कॉकरोचों से इसकी उम्मीद बेमानी है।

क्या अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल अपराध है?

सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह सोनम वांगचुक या किसी को भी अपनी माँगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से रोके। अनशन कोई अपराध नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी ऐसी स्थिति में तभी बनती है, जब उसे लगे कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन सार्वजनिक व्यवस्था, उसके खुद के जीवन की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था पर प्रभाव डाल सकता है।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत व्यवस्था, सुरक्षा, नैतिकता आदि के आधार पर सरकार उचित प्रतिबंध अवश्य लगा सकती है।

भूख हड़ताल से कब रोक सकती है पुलिस?

इस मामले में पुलिस की जिम्मेदारी तभी बनती है, जब उसे लगे कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। हिंसा होने की आशंका है। ट्रैफिक बाधित हो रहा है। सरकारी कामकाज प्रभावित हो रहा है। या फिर अनशनकारी की स्वयं की जान को खतरा है।

ऐसी स्थिति में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अनुसार मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकते हैं। धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। राज्यों के पुलिस अधिनियम भी प्रदर्शन की जगह बदलने या अनुमति रद्द करने जैसे अधिकार देते हैं।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबरन अस्पताल ले जा सकते हैं?

यदि डॉक्टर को लगे कि अनशन करने वाले की जान खतरे में है तो उसे जबरन भी अस्पताल ले जाया जा सकता है। अस्पताल में भर्ती कर निगरानी की जा सकती है। कई मामलों में अदालतें कह चुकी हैं कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबर्दस्ती भोजन दे सकते हैं?

अनशन करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने के प्रावधान को स्पष्ट तौर पर परिभाषित करता कोई कानून नहीं है। पर व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि मेडिकल राय, मजिस्ट्रेट के आदेश या अदालती निर्देशों पर यह भी किया जा सकता है।

क्या भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं?

ऐसे मामलों पर गिरफ्तारी पूरी तरह परिस्थिति पर निर्भर करती है। जैसे- अवैध जमावड़ा, प्रशासनिक ड्यूटी में बाधा, सार्वजनिक रास्ता रोकना, आदेशों की अवहेलना वगैरह।

आमरण अनशन की स्थिति में सरकार आमतौर पर क्या करती है?

ऐसी स्थिति में प्रशासन बातचीत से रास्ता निकालने का प्रयास करता है। मेडिकल टीम अनशन करने वाले की नियमित जाँच करती है। गंभीर स्थिति होने पर अस्पताल ले जाती है।

मणिपुर में इरोम शर्मिला को लंबे समय तक हिरासत में रखकर नाक के माध्यम से पोषण दिया जाता था। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए शासनकाल में इसी दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन शुरू करने के बाद हिरासत में ले लिया गया था। लेकिन बाद में रिहा कर निर्धारित स्थान पर अनशन की अनुमति दे दी गई थी। ठीक उसी काल खंड में स्वामी रामदेव के आंदोलन पर पुलिस ने कानून-व्यवस्था को आधार बनाकर बल प्रयोग किया था।

भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता लागू, 99% सामान पर इंपोर्ट ड्यूटी खत्म, भारतीय किसानों और उद्योगों की सुरक्षा के साथ निर्यात में होगी बढ़ोतरी


भारत और ब्रिटेन की अर्थव्यस्था के लिए 15 जुलाई, 2026 का दिन ऐतिहासिक बन गया है। दोनों देशों के बीच 11 महीने पहले हुआ कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA/FTA) आज से लागू हो गया। इस समझौते के प्रभावी होने के साथ ही आयात और निर्यात पर लगने वाले भारी-भरकम टैरिफ में बड़ी कटौती की गई है। अब भारत के 99% सामानों को ब्रिटेन में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं ब्रिटेन के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। इससे 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार दोगुना होकर 120 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। इस व्यापार समझौते के लागू होने से पहले भारत में ब्रिटेन की हाई कमिश्नर लिंडी कैमरन ने कहा कि यह दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए ग्रोथ के नए युग की शुरुआत करेगा, वहीं भारत के वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने इसे भारत के व्यापार इतिहास का एक स्वर्णिम और ऐतिहासिक क्षण बताया।

व्यापार, निवेश व रोजगार-सृजन के नए रास्ते खुलने की उम्मीद-पीएम मोदी
करीब 3 साल में 14 राउंड की बातचीत के बाद 24 जुलाई, 2025 को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और ब्रिटिश व्यापार मंत्री जोनाथन रेनॉल्ड्स ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की मौजूदगी में इस समझौते पर साइन किए थे। यह संधि एक ऐसे वक्त पर हुई थी, जब विशेषकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में काफी हलचल थी। इस दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने कहा था कि यह समझौता ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएगा और ब्रिटिश कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित होगा। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस समझौते से व्यापार, निवेश, विकास व रोजगार-सृजन के नए रास्ते खुलने की उम्मीद जताई। 

99% सामान पर इंपोर्ट ड्यूटी खत्म, निर्यात में होगी अप्रत्याशित बढ़ोतरी 
इस व्यापार समझौता के लागू होने से भारत से ब्रिटेन भेजे जाने वाले करीब 99 प्रतिशत सामान पर इंपोर्ट ड्यूटी खत्म हो जाएगी। यानी भारतीय कंपनियां अपना सामान पहले के मुकाबले कम कीमत पर बेच सकेंगी और ब्रिटेन के बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे भारतीय कंपनियों को ब्रिटेन जैसे बड़े विकसित बाजार तक आसान पहुंच सुनिश्चित होगा, निर्यात में बढ़ोतरी होगी और दोनों देशों के बीच कारोबार को नई रफ्तार मिलेगी। वाणिज्य सचिव के अनुसार, समझौता दोनों देशों के बीच तकनीकी और गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करेगा, जिससे भारतीय व्यापारियों को नए बाजार तलाशने में आसानी होगी।इसके तहत कुल 30 अध्याय शामिल किए गए हैं, जो डिजिटल व्यापार, सरकारी खरीद, नवाचार, श्रम, पर्यावरण, लैंगिक समानता और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSMEs) जैसे आधुनिक विषयों को कवर करते हैं। 

किन-किन सामानों पर लगेगा जीरो ड्यूटी 
इस समझौते के लागू होने से भारत से ब्रिटेन जाने वाले लगभग 99 प्रतिशत सामानों पर कोई टैक्स (सीमा शुल्क) नहीं लगेगा। इससे भारत के कपड़ा, चमड़ा, रत्न और आभूषण (ज्वेलरी), इंजीनियरिंग सामान, समुद्री उत्पाद, चाय एवं कॉफी, लकड़ी एवं कागज, खनिज, यांत्रिक मशीनरी, मसाले, तिलहन, प्लास्टिक, शैल्य चिकित्सा एवं अन्य उपकरण, फर्निचर एवं खेल सामग्री और रसायनों के व्यापार पर जीरो ड्यूटी लगेगा। इससे उत्पादकों को बहुत फायदा होगा। देश के छोटे उद्योगों (MSMEs), किसानों और नए निर्माताओं के लिए विदेशों में कमाई के बड़े मौके खुलेंगे।

मोदी सरकार ने किसानों और उद्योगों की सुरक्षा का रखा पूरा ख्याल  
इस समझौते में मोदी सरकार ने अपने किसानों और संवेदनशील घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा का पूरा ध्यान रखा है। दूध, डेयरी उत्पाद, अनाज, दालें, मोटा अनाज, खाद्य तेल, सेब और कुछ अन्य संवेदनशील कृषि उत्पादों को भारत ने इस समझौते से बाहर रखा है ताकि घरेलू किसानों के हित सुरक्षित रह सकें। इसके विपरीत, भारत के कपड़ा, फुटवियर और चमड़ा जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भारी लाभ होगा। यूके में इन उत्पादों पर लगने वाला 12 प्रतिशत तक का आयात शुल्क अब शून्य हो जाएगा, जिससे भारतीय निर्यात बढ़ेगा और लाखों नए रोजगार पैदा होंगे।

भारतीय किसानों की यूके के विशाल कृषि बाजार तक होगी पहुंच
भारतीय किसानों को यूके के 90 बिलियन डॉलर के विशाल कृषि बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी। इसके साथ ही, भारत के समुद्री और सीफूड निर्यात को यूके में पूरी तरह से सीमा शुल्क छूट दी गई है, जिससे तटीय क्षेत्रों के मछुआरों और निर्यातकों की आय में वृद्धि होगी। नियमों को आसान बनाने के लिए ‘सेल्फ-सर्टिफिकेशन’ प्रणाली शुरू की जा रही है, जो व्यापार में कागजी कार्रवाई और अनुपालन के बोझ को कम करेगी।

समझौते से आईटी और सेवा क्षेत्र के पेशेवरों को होगा लाभ
आईटी और सेवा क्षेत्र के लिए इसके साथ लागू होने वाला ‘डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन’ (DCC) एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। वर्तमान में, यूके में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को वहां की राष्ट्रीय बीमा प्रणाली में लगभग 25 प्रतिशत योगदान देना पड़ता था, जिसका लाभ वे नहीं उठा पाते थे। अब नए नियम के तहत, यूके में 5 साल तक काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को वहां सामाजिक सुरक्षा योगदान देने से छूट मिलेगी और वे भारत में ही अपना योगदान जारी रख सकेंगे। इससे 75,000 से अधिक भारतीय श्रमिकों और 900 से अधिक नियोक्ताओं को सीधा वित्तीय लाभ होगा। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इस डील से भारत को अगले पांच सालों में सिर्फ सर्विस सेक्टर से हर साल करीब 2.5 अरब डॉलर का एक्सट्रा रेवेन्यू मिलेगा।

ब्रिटेन से आयात होने पर क्या-क्या सस्ता होगा?
ब्रिटेन से भारत आने वाले कई विदेशी उत्पाद अब काफी सस्ते दामों पर मिलेंगे। विदेश व्यापार महानिदेशालय द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, इस मुक्त व्यापार समझौते का सबसे ज्यादा फायदा ब्रिटिश स्कॉच और व्हिस्की इंडस्ट्री को मिलने जा रहा है। वर्तमान में भारत में आयातित स्कॉच व्हिस्की पर 150 प्रतिशत का भारी भरकम टैरिफ लगता है। लेकिन FTA के तहत, इस ड्यूटी को कई चरणों में घटाकर महज 40 प्रतिशत तक लाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में भारत के अंदर स्कॉच और व्हिस्की की कीमतों में 110 फीसदी तक की बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी। इस डील के तहत देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी बड़ा बदलाव होने जा रहा है। कोटा व्यवस्था के माध्यम से लग्जरी कारों पर लगने वाले टैरिफ को 100% से घटाकर 10% कर दिया जाएगा। इससे ब्रिटेन की जगुआर, लैंड रोवर, एस्टन मार्टिन, रोल्स रॉयस और डिफेंडर जैसी प्रीमियम कारें भारतीय बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध होंगी। कारों और शराब के अलावा, ब्रिटेन से आने वाले कॉस्मेटिक्स, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और अन्य उपभोक्ता सामानों की कीमतों में भी नरमी आएगी।

FCRA के नए नियमों को लेकर अमेरिकियों में खलबली है; फर्जी NGOs के जरिए धर्मांतरण के लिए पैसा जो आना बंद हो जाएगा

सुभाष चन्द्र

FCRA amendment bill, 2026 लोकसभा में 25 मार्च, 2026 को सरकार ने पेश किया लेकिन कांग्रेस और विपक्ष के विरोध के चलते बाद में इसे चर्चा के लिए स्थगित कर दिया मगर सरकार ने 22 जून, 2026 को इस बिल के मुख्य नियमों को Notify कर दिया जो अब लागू हो गए है। 

बिल के मुख्य प्रावधान हैं -

गतिविधि-विशिष्ट पंजीकरण (Activity-Specific Registration)

गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को भारत में अपने सटीक उद्देश्यों तथा कार्यक्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख करना होगा;

प्रत्येक गतिविधि श्रेणी तथा राज्य/केंद्र शासित प्रदेश (State/UT) के लिए अलग-अलग शुल्क देय होगा;

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चर्चित YouTuber 
वर्तमान में एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संगठनों को एक वर्ष में बताना होगा कि वे किन उद्देश्यों तथा किन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में अपना पंजीकरण बनाए रखना चाहते हैं;

धार्मिक गतिविधियां (Religious Activities)

विदेशी अंशदान का उपयोग पूजा-अर्चना, धार्मिक शिक्षा, धार्मिक विरासत के संरक्षण तथा सामुदायिक रसोई (Community Kitchens) के लिए किया जा सकेगा;

"धर्मांतरण (Proselytization)" पर स्पष्ट प्रतिबंध;

गैर-सरकारी संगठनों को विदेशी अंशदान का उपयोग धर्मान्तरण के लिए सख्ती से प्रतिबंधित होगा;

यह प्रावधान रेव. स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुरूप है, जिसमें न्यायालय ने कहा था कि धर्म के प्रचार (Propagate) का अधिकार, दूसरों का धर्म परिवर्तन कराने (Convert) का अधिकार नहीं है;

प्रमुख पदाधिकारियों (Key Functionaries) पर प्रतिबंध

जिन संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारी विदेशी नागरिक हों (भारतीय मूल के व्यक्तियों – Persons of Indian Origin (PIO) – को छोड़कर), उन्हें सामान्यतः एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति (Prior Permission) के लिए पात्र नहीं माना जाएगा;

अधिक कठोर वित्तीय अनुपालन (Strict Financial Compliance)

गैर-सरकारी संगठनों को अगली किस्त प्राप्त करने से पहले पूर्व में प्राप्त विदेशी अंशदान का कम-से-कम 75% उपयोग करना अनिवार्य होगा;

एफसीआरए पंजीकरण के नवीनीकरण (Renewal) के लिए यह आवश्यक होगा कि संगठन ने पिछले दो वर्षों में अनुमोदित गतिविधियों पर कम-से-कम ₹10 लाख व्यय किए हों;

बढ़ी हुई पारदर्शिता (Enhanced Transparency)

अंतिम (वास्तविक) दाता (Ultimate Donor) का विवरण अनिवार्य रूप से सार्वजनिक करना होगा

ये नए नियम देश की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए लागू किये गए हैं लेकिन अमेरिका और मानवाधिकार संस्था जैसे  Amnesty International और  International Commission of Jurists (ICJ) इसका विरोध कर रहे हैं, उनका मानना है कि  civil society के खिलाफ इसका हथियार के रूप में उपयोग होगा

अमेरिका में एक दूसरे के धुर विरोधी Democrats और Republicans  हमारे देश के कानून (नियमों) के खिलाफ तलवार लेकर खड़े हो गए हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो कोलकाता में Missionaries of Charities में भारत के दौरे पर सबसे पहले 23 मई, 2026 को पहुंच गए। रुबियो का मकसद विचार विमर्श करना था कि कैसे नए नियमों से बचाव किया जाए

उसके बाद 22 जून, 2026 को भारत में अमेरिकी राजदूत Sergio Gor तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसफ विजय को स्वयं मिलने तमिलनाडु पहुंच गए। जीसेफ कह चुके हैं “मैं विश्वभर के मिशनरियों के संपर्क में हूँ और भारत को एक ईसाई राष्ट्र बनाने के उद्देश्य से कार्य कर रहा हूँ। मैं अपने सभी द्रविड़ भाइयों और बहनों से आग्रह करता हूँ कि वे आगे आएँ और हमें सौंपे गए इस पवित्र उद्देश्य को साकार करने में सहायता करें”

Sergio Gor का जोसफ विजय से मिलना उसके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए माना जा सकता है। लेकिन बताया है गया कि उनकी मुलाकात में भारत-अमेरिका के संबंधों को मजबूत करने और boosting economic partnerships, and expanding cultural ties के लिए थी लेकिन किसी और CM से नहीं हुई, क्यों?

कौन थे ‘फादर अमीर’ जिन्होंने कतर को दुनिया की आर्थिक शक्ति बनाया: भारत में उनके निधन पर झुका तिरंगा

                                             कतर के फादर अमीर का निधन (फोटो साभार-दैनिक भास्कर)
भारत ने कतर के ‘फादर अमीर’ हिज हाइनेस शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। 13 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय झंडा आधा झुका रहेगा। तिरंगा उन सभी इमारतों पर एक दिन तक आधा झुका रहेगा, जहाँ राष्ट्रीय झंडा नियमित फहराया जाता है।

इस दिन कोई आधिकारिक मनोरंजन वाले कार्यक्रम भी नहीं आयोजित होंगे। संसदीय मामलों और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू जल्द ही कतर जाएँगे और भारत सरकार की ओर से कतर को शोक संदेश देंगे और संवेदना जताएँगे।

मोदी ने फादर अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर शोक व्यक्त किया है और कहा है कि वह भारत के सच्चे दोस्त थे। उन्होंने कहा कि वे दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने कतर को विकास और खुशहाली को नई ऊँचाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कतर के फादर अमीर को श्रद्धांजलि दी और कतर के नेतृत्व, शाही परिवार और वहाँ की जनता के प्रति अपनी संवेदना जताई।

अपने पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा, हम उन्हें एक सच्चे दोस्त के रूप में याद करते हैं। पीएम ने फरवरी 2024 की अपनी कतर यात्रा को याद किया और ‘फादर अमीर’ के प्रति संवेदना जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

2024 की प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारत-कतर के आपसी रिश्तों में और मजबूती आई। कतर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाला अहम देश है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अहम समझौते हुए । कतर की जनसंख्या में अप्रवासी भारतीयों का बड़ा भाग है, जो कतर के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं। इससे दोनों देश की नजदीकियाँ भी बढ़ी हैं।

कौन थे शेख हमद बिन खलीफा अल थानी

1995 से 2013 तक कतर के अमीर के रूप में अपनी सेवा देने वाले शेख हमद बिन खरीलाफ अल थानी को आधुनिक कतर का निर्माता कहा जाता है। कतर को आर्थिक राजनयिक और वैश्विक स्तर पर उन्होंने पहचान दिलाई। उनके शासनकाल में कतर ने अपने नेचुरल गैस के व्यापक भंडार के दम पर तेजी से प्रगति की और वैश्विक स्तर पर संपन्न देश के रूप में अपनी पहचान बना। उन्होंने इसके बाद अपनी सत्ता बेटे शेख तमीन बिन हमद अल थानी को सौंप दी। 12 जुलाई 2026 को 74 वर्ष में उनका निधन हो गया।

शेख हमद बिन खलीफा अल थानी को कतर में ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। दरअसल ये कोई पारिवारिक संबोधन नहीं, बल्कि कतर में दिया जाने वाला एक सम्मानजनक आधिकारिक खिताब है। जब कोई शासक या अमीर अपनी सत्ता स्वेच्छा से अपने उत्तराधिकारी को सौंप देता है, तब उसे ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। शेख हमद बिन खलीफा अल थानी ने 2013 में स्वेच्छा से अपने बेटे शेख तमीम बिन हमद अल-थानी को सत्ता सौंप दी थी। इसलिए उन्हें कतर में सम्मान से ‘फादर अमीर’ कहते हैं। खाड़ी देशों में इस तरह का स्वैच्छिक सत्ता हस्तांतरण बहुत कम देखने को मिलता है।

उनका जन्म 1952 में हुआ था। उनके अब्बू का नाम शेख खलीफा बिन हमद अल-थानी था जो कतर के शासक थे। उनकी अम्मी शेखा आयशा बिंत हमद अल अत्तिया था। कतर पर अली थानी राजवंश की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य से है। जब कतर को 1971 में ब्रिटेन से आजादी मिली, तो उसके कुछ ही महीनों बाद 1972 में शेख हमद के पिता शेख खलीफा कतर के अमीर बन गए थे। इसलिए फादर अमीर को बचपन से ही सत्ता का उत्तराधिकारी माना जाता था।

यूके के प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्स्ट से 1971 में ग्रेजुशन करने के बाद वह कतर आकर सेना में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वह सेना के कमांडर इन चीफ के पद तक पहुँचे। 1977 में उन्हें कतर का ‘क्राउन प्रिंस’ आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया। जून 1995 में कतर में उन्होंने रक्तहीन सत्तापलट किया। हुआ यूँ कि उनके पिता शेख खलीफा जब स्विटजरलैंड की यात्रा पर थे तो उन्होंने सेना के समर्थन से तख्तापलट किया और खुद को ‘अमीर’ घोषित कर दिया। इसकी वजह से दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। लंबे समय तक अब्बा फ्रांस में निर्वासित रहे, लेकिन आपसी सुलह के बाद 2004 में वे कतर लौटे, जहाँ 2016 में उनका निधन हुआ।

दरअसल फादर अमीर का मानना था कि उनके पिता प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे और पुराने तरीके से शासन चला रहे हैं।

आधुनिक कतर के निर्माता

उन्होंने कतर को अपने शासनकाल में पूरी तरह बदल दिया।कतर के प्राकृतिक संसाधनों खासकर गैस भंडार का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। उनके नेतृत्व में कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल हो गया। इसका असर ये हुआ कि देश में समृद्धि आई और प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अव्वल श्रेणी में पहुँच गई। उन्होंने कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिए दुनिया भर में बड़े निवेश कराए। इससे कतर की आर्थिक और रणनीतिक पहुँच कई देशों तक बढ़ी। उनके शासन में अल जजीरा न्यूज नेटवर्क की स्थापना हुई, जिसने कतर को वैश्विक मीडिया शक्ति के रूप में पहचान दिलाई।

उनके नेतृत्व में कतर ने 2022 फीफा विश्व कप की मेजबानी का अधिकार हासिल किया। इसके लिए देश में मेट्रो, स्टेडियम, सड़कें और दूसरे बुनियादी ढाँचे का व्यापक विकास हुआ। उन्होंने कतर को मध्य-पूर्व की कूटनीति में महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया। हालाँकि कुछ क्षेत्रीय नीतियों और इस्लामी संगठनों के साथ संबंधों को लेकर उनकी सरकार विवादों में भी रही।

भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, तकनीक के क्षेत्र में मजबूत रिश्ते हैं। प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या यहाँ रहती है जिससे दोनों देशों के संबंध और गहरे हो गए हैं। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और कतर के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। खासकर शेख हमद के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के संबंध बेहद मजबूत हुए थे। यही वजह है कि भारत सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है।

तिरंगा कब आधा झुकाया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को राष्ट्रीय शोक के वक्त आधा झुकाया जाता है। यह शोक के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।

आम तौर पर देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश और दूसरे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के निधन पर झंडा आधा झुकाया जाता है।

भारतीय ध्वज संहिता के अनुसार ऐसा किया जाता है। वैश्विक गणमान्य व्यक्तियों के निधन पर गृह मंत्रालय विशेष निर्देश जारी करता है, तब झंडा झुकाया जाता है।

किसी राज्य के राज्यपाल या मुख्यमंत्री के निधन पर उस राज्य में झंडा आधा झुकाया जाता है। किसी राष्ट्रीय त्रासदी पर या असाधारण घटना पर जब केन्द्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है तो झंडा आधा झुका रहता है।

इसके अलावा किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, सरकार के मुखिया या महत्वपूर्ण वैश्विक नेता के निधन पर यदि भारत सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है, तो उस दिन सभी सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका रहता है। इस दिन सरकारी कामकाज तो सामान्य रूप से होते हैं लेकिन कोई मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होता है। हालाँकि राष्ट्रीय अवकाश भी नहीं होता है।