बैलेट चुनाव में भी राहुल कांग्रेस का डिब्बा गूल

राहुल गांधी को किस तरह झटका लगा है, वह भी रामलीला मैदान की रैली के बाद, इसका एक ताजा उदाहरण देखिए। राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी लगातार कह रहे थे कि वोट चोरी हो रही है, ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने चाहिए। अब देखिए, आंध्र प्रदेश में बैलेट पेपर से चुनाव हुए हैं और नतीजे क्या आए हैं।

आंध्र प्रदेश में शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव कराए गए। इसमें 13 नगर निगम, 77 नगरपालिका और 10 नगर पंचायत, यानी कुल 100 शहरी निकायों के 3,942 वार्डों में चुनाव हुए। अब नतीजे जान लीजिए। कांग्रेस पार्टी का हर जगह सफाया हो गया। कांग्रेस को कहीं भी कुछ नहीं मिला। पार्टी का खाता तक नहीं खुला। आप सोच सकते हैं कि यह किस राज्य की बात हो रही है? आंध्र प्रदेश की, जो दक्षिण भारत का एक राज्य है।
अब नगर निगम के चुनाव का नतीजा देखिए। 13 नगर निगमों में से 10 पर टीडीपी, 2 पर जनसेना और 1 पर वाईएसआरसीपी ने जीत हासिल की। कांग्रेस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। यानी पूरी तरह सफाया हो गया।
अब चेयरपर्सन की लिस्ट देखिए। भारतीय जनता पार्टी के पास कम से कम चार चेयरपर्सन की सीटें हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी का नाम तक नहीं है। वजह साफ है, कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। वार्डों में भी कांग्रेस पार्टी का पूरी तरह सफाया हो गया और यहां भी एनडीए की जबरदस्त जीत हुई।
अब यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि ये चुनाव किस तरह हुए थे? ये चुनाव ईवीएम से नहीं, बल्कि बैलेट पेपर से कराए गए थे। यानी जिस बैलेट पेपर की मांग राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी कर रहे थे, उसी से चुनाव हुए और नतीजों में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला।
अब जरा सोचिए, दक्षिण भारत के राज्यों को लेकर अक्सर कहा जाता है कि वहां बीजेपी कभी नहीं जीत सकती और कांग्रेस की स्थिति बहुत मजबूत है। लेकिन यहां तो कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला। जब अभी यह हाल है, तो आगे क्या होगा, आप खुद समझ सकते हैं।
अब देखना यह था कि कांग्रेस पार्टी इन नतीजों पर क्या प्रतिक्रिया देती है। कांग्रेस की अध्यक्ष वाई. एस. शर्मिला का कहना है कि स्थानीय निकायों के चुनाव के ये नतीजे जनता की असली राय को नहीं दिखाते हैं। यानी चुनाव के नतीजे आए तो उन्हें ही मानने से इनकार किया जा रहा है। आप खुद समझ सकते हैं कि स्थिति क्या है।
एक बात पवन कल्याण के बारे में भी बताना चाहती हूँ। उनका स्ट्राइक रेट 100 प्रतिशत रहा। उन्होंने जहां-जहां चुनाव लड़ा, वहां-वहां जीत हासिल की।
कुल मिलाकर यह एनडीए की बड़ी जीत है। आंध्र प्रदेश में भले ही स्थानीय पार्टियां चुनाव जीत रही हैं, लेकिन एक बात साफ दिखाई देती है कि जो भी पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है, उसका प्रदर्शन काफी बेहतर हो जाता है।

पौराणिक गाथा : शनिवार को पीपल पूजने और घर के बाहर नींबू-मिर्च टांगने का रहस्य


घर के बाहर नींबू-मिर्च क्यों टांगते हैं? जानिए पद्म पुराण का वह गुप्त प्रसंग, जहाँ माँ लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी के भोजन और वास का रहस्य छुपा है!

अधिकांश लोग केवल माँ लक्ष्मी के प्राकट्य की कथा जानते हैं, परंतु बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी के निकलने से ठीक पहले उनकी ज्येष्ठ (बड़ी) बहन 'अलक्ष्मी' (जिन्हें 'ज्येष्ठा' या 'दरिद्रता' भी कहा जाता है) प्रकट हुई थीं।
जब देवों और असुरों ने अमृत पाने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तो हलाहल विष के पश्चात समुद्र के भीतर से काले वर्ण, लाल नेत्रों और रूखे केशों वाली एक स्त्री प्रकट हुई। वह थी अलक्ष्मी।
उसके प्रकट होते ही चारों ओर उदासी, दुर्गंध और कलह का वातावरण छा गया। कोई भी देव या दानव उसे अपनाने को तैयार नहीं हुआ।इसके ठीक बाद, उसी सागर से स्वर्णिम कांति वाली, कमल पर आसीन माँ महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्होंने भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाली।
जब माँ लक्ष्मी का विवाह भगवान विष्णु से हो गया, तो बड़ी बहन अलक्ष्मी रोने लगी: हे नारायण! मेरी छोटी बहन का विवाह तो आपसे हो गया, परंतु मेरा क्या? मैं बड़ी हूँ, मेरे बिना विवाह के संसार का संतुलन कैसे रहेगा? मेरा स्वामी कौन बनेगा?भगवान विष्णु ने जगत के कल्याण के लिए एक कठोर तपस्वी ऋषि महर्षि उद्दालक(दुःसह मुनि) को समझाया और उनका विवाह अलक्ष्मी से करवा दिया।
विवाह के बाद महर्षि उद्दालक अलक्ष्मी को लेकर अपने पावन आश्रम पहुँचे। परंतु आश्रम के द्वार पर कदम रखते ही अलक्ष्मी चीखने लगी: जहाँ वेदों की ऋचाएं गूँजती हैं, मैं वहाँ नहीं रह सकती!
जहाँ हवन का धुआँ और शंख की ध्वनि होती है, वहाँ मेरे कान फटने लगते हैं! जहाँ अतिथि-सत्कार और स्वच्छता होती है, वहाँ मेरा दम घुटता है!
महर्षि उद्दालक समझ गए कि यह स्त्री धर्म और शांति के सर्वथा विपरीत है। तंग आकर महर्षि ने अलक्ष्मी को एक पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़ दिया और स्वयं समाधि में चले गए।
पीपल के नीचे अकेली बैठकर अलक्ष्मी जोर-जोर से विलाप करने लगी। उसकी करुण पुकार सुनकर वैकुंठ से माँ लक्ष्मी अपने स्वामी श्रीहरि के साथ वहाँ पहुँचीं।
अलक्ष्मी ने रोते हुए कहा:
हे बहन! न मेरे पास रहने का कोई घर है, न कोई मुझे आदर देता है, और न मेरे भोजन की कोई व्यवस्था है। मैं इस संसार में कैसे जिऊँ?
माँ लक्ष्मी ने अपनी बड़ी बहन के प्रति करुणा दिखाते हुए उसे तीन वरदान दिए, जो आज भी हमारे दैनिक जीवन के नियम हैं:
पीपल पर वास:
भगवान विष्णु ने कहा—"हे अलक्ष्मी! प्रत्येक शनिवार को मैं और लक्ष्मी स्वयं तुम्हारे इस पीपल के वृक्ष पर वास करेंगे। इसलिए शनिवार को पीपल की पूजा करने वाले को धन-धान्य मिलेगा, परंतु अन्य दिनों में तुम्हारा ही प्रभाव रहेगा।
अलक्ष्मी का भोजन (तीखा और खट्टा):
माँ लक्ष्मी ने कहा—मेरा प्रिय भोजन मिष्ठान्न (खीर, बताशे, फल) है। तुम्हारा प्रिय भोजन 'तीखा और खट्टा' (कड़वा रस) होगा।(यही कारण है कि लोग अपने घर और व्यापार के मुख्य द्वार पर नींबू और हरी मिर्च टांगते हैं। अलक्ष्मी द्वार पर आकर अपना प्रिय तीखा-खट्टा भोजन ग्रहण करके तृप्त हो जाती हैं और वहीं से बाहर लौट जाती हैं, घर के भीतर प्रवेश नहीं करतीं।)
अलक्ष्मी के रहने का स्थान:
माँ लक्ष्मी ने स्पष्ट आदेश दिया—जहाँ आलस्य, जुआ, मदिरा, पति-पत्नी में कलेश, गंदे बर्तन, और अपशब्द बोले जाएंगे, वहाँ तुम पूरे अधिकार के साथ वास करना। जहाँ स्वच्छता, प्रेम, संध्या-दीप और ईश्वर-स्मरण होगा, वहाँ मेरी कृपा रहेगी और तुम्हारा प्रवेश वर्जित होगा।

राहुल का संसद में सवालों से कन्नी काटना, संसद बाधित करना और सोशल मीडिया पर बहस का शोर!


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुली बहस की चुनौती देने वाले राहुल गांधी के सामने अब एक बुनियादी सवाल है- जब संसद में सरकार को घेरने, सवाल पूछने और अपनी बात रखने का पूरा अवसर मौजूद था, तब उन्होंने उसका कितना इस्तेमाल किया? क्यों बार-बार संसद बाधित की जाती है? चार लोकसभाओं का संसदीय रिकॉर्ड उनकी चुनौती को एक अलग ही संदर्भ में खड़ा करता है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दे रहे हैं। किसी भी मंच पर आमने-सामने बहस की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री अपनी पसंद का मंच चुन लें और देश के सामने हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा करें।

प्रधानमंत्री से बहस की मांग पर सरकार का पलटवार 

गृह मंत्री अमित शाह ने 2 नवंबर को SIR, EVM और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर विशेष संसदीय सत्र बुलाकर चर्चा कराने की पेशकश की और राहुल गांधी को बहस की चुनौती दी।
राहुल गांधी की चुनौती पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और उन्हें संसद में ही सरकार से सवाल करने तथा जवाब मांगने का अवसर उपलब्ध है।
सवाल ये है कि क्या कांग्रेस संसद में इन मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है? क्या वह अपने आरोपों के समर्थन में दस्तावेज और प्रमाण सदन में रखेगी? और क्या वह सरकार का जवाब भी उसी गंभीरता से सुनेगी, जिस गंभीरता से जवाब मांगती है?

बहस के मंच से पहले बहस की जिम्मेदारी भी समझनी होगी

राहुल गांधी की खुली बहस की चुनौती के बहाने अब एक बड़ा सवाल भारतीय संसदीय राजनीति के सामने है। क्या बहस सिर्फ कैमरों के सामने होने वाली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनकर रह जाएगी, या संसद के भीतर तथ्य और तर्क के आधार पर भी गंभीर चर्चा होगी?
प्रधानमंत्री से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन प्रधानमंत्री के जवाब सुनना और उसका तथ्यों के साथ जवाब देना भी संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा है।
इसलिए राहुल गांधी से सवाल पूछना जरूरी है कि जब संसद में उन्हें सरकार से सवाल करने और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात रखने का अवसर मिलता रहा, तब उनकी संसदीय भागीदारी इन आंकड़ों तक क्यों सीमित रही और अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में क्या वे संसद को सरकार से जवाब मांगने का सबसे प्रभावी मंच बनाने की दिशा में ठोस पहल करेंगे?
प्रधानमंत्री को बहस की चुनौती देने से पहले राहुल गांधी को यह भी दिखाना होगा कि वे बहस की पूरी प्रक्रिया के लिए तैयार हैं। सवाल पूछने के लिए भी, जवाब सुनने के लिए भी और अपने आरोपों के प्रमाण देने के लिए भी।
आखिरकार, देश को सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि जवाबदेह सरकार और जिम्मेदार विपक्ष चाहिए। संसद में सवाल हों, सरकार के जवाब हों, विपक्ष के प्रमाण हों। लोगों को दोनों पक्षों को परखने का अवसर मिले। यही संसदीय लोकतंत्र की असली कसौटी है।

लेकिन लोकतंत्र में बहस का मतलब सिर्फ चुनौती देना नहीं होता। बहस का मतलब है सवाल पूछना, जवाब सुनना, तथ्यों का सामना करना और अपने आरोपों को प्रमाणित करना। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जो नेता प्रधानमंत्री से सार्वजनिक मंच पर बहस की मांग कर रहा है, उसका अपना संसदीय रिकॉर्ड क्या कहता है?

क्या राहुल गांधी ने संसद में उपलब्ध बहस के अवसरों का भरपूर इस्तेमाल किया? क्या उन्होंने सरकार से नियमित रूप से सवाल पूछे? क्या उनकी उपस्थिति और संसदीय भागीदारी राष्ट्रीय औसत के अनुरूप रही?

PRS Legislative Research के आंकड़े इन सवालों के जवाब देते हैं। और ये आंकड़े बताते हैं कि राहुल गांधी की पिछली तीन लोकसभाओं में उपस्थिति, बहस में भागीदारी और सवाल पूछने का रिकॉर्ड राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे रहा है।

इसलिए प्रधानमंत्री को खुली बहस की चुनौती देने से पहले राहुल गांधी के अपने संसदीय प्रदर्शन पर चर्चा होना भी उतना ही जरूरी है।

चार लोकसभाओं का रिकॉर्ड: आंकड़े क्या बताते हैं?

PRS Legislative Research के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राहुल गांधी ने 2004 से लोकसभा में पांच कार्यकाल पूरे किए हैं। यहां उनके 15वें से 18वें लोकसभा के आंकड़ों पर नजर डालें तो उनके झूठे नैरेटिव की पूरी तस्वीर सामने आ जाती है। 

15वीं लोकसभा (2009–2014): 43 प्रतिशत उपस्थिति, सिर्फ दो बहसें

  • राहुल गांधी की सदन में उपस्थिति: 43 प्रतिशत
  • राष्ट्रीय औसत उपस्थिति: 76 प्रतिशत
  • बहसों में भागीदारी: 2
  • राष्ट्रीय औसत: लगभग 38 बहसें
  • पूछे गए सवाल: 0
  • राष्ट्रीय औसत: 300 सवाल
पांच साल के कार्यकाल में महज दो बहसों में भागीदारी और एक भी संसदीय सवाल नहीं। यह रिकॉर्ड उस समय का है जब राहुल गांधी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और पार्टी केंद्र की सत्ता में थी।

16वीं लोकसभा (2014–2019): प्रदर्शन में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं

  • राहुल गांधी की उपस्थिति: 52 प्रतिशत
  • राष्ट्रीय औसत: 80 प्रतिशत
  • बहसों में भागीदारी: 14
  • राष्ट्रीय औसत: लगभग 67 बहसें
  • पूछे गए सवाल: 0
  • राष्ट्रीय औसत: 293 सवाल
इस कार्यकाल में भी उपस्थिति राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत अंक कम रही। बहसों में भागीदारी राष्ट्रीय औसत के मुकाबले काफी कम थी और संसदीय प्रश्नों का आंकड़ा शून्य रहा।

17वीं लोकसभा (2019–2024): आठ बहसें, 99 सवाल

  • राहुल गांधी की उपस्थिति: 51 प्रतिशत
  • राष्ट्रीय औसत: 79 प्रतिशत
  • बहसों में भागीदारी: 8
  • राष्ट्रीय औसत: लगभग 47 बहसें
  • पूछे गए सवाल: 99
  • राष्ट्रीय औसत: 210 सवाल
इस कार्यकाल में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं रही। उपस्थिति और बहस में भागीदारी दोनों राष्ट्रीय औसत से नीचे रहीं। सवाल पूछने के मामले में भी राहुल गांधी का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत के आधे से कम रहा।
इन तीनों लोकसभाओं के आंकड़ों को एक साथ देखें तो सवाल उठता है कि संसद में सरकार को जवाबदेह बनाने की जिम्मेदारी निभाने के लिए राहुल गांधी ने उपलब्ध अवसरों का कितना उपयोग किया?
संसद में सवाल पूछना और बहस में भाग लेना किसी सांसद पर एहसान नहीं, बल्कि जनता के प्रति उसकी जवाबदेही का हिस्सा है।

नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद कितना बदला रिकॉर्ड?

18वीं लोकसभा में राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं। स्वाभाविक रूप से उनसे संसदीय सक्रियता और भी अधिक अपेक्षित है।
PRS के 13 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक:
  • बहसों में भागीदारी: 17
  • पूछे गए सवाल: 64
  • राष्ट्रीय औसत बहसें: 21.5
  • राष्ट्रीय औसत सवाल: 120
यहां भी बहस और सवालों के उपलब्ध आंकड़ों में उनका रिकॉर्ड राष्ट्रीय औसत से कम है।
अब राहुल गांधी को यह बताना चाहिए कि प्रधानमंत्री से बहस की मांग करने के साथ-साथ संसद में सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए उनकी अपनी प्राथमिकताएं क्या हैं?
सार्वजनिक मंच पर बहस की मांग करना आसान है, लेकिन संसद में लगातार सवाल पूछना, जवाब सुनना और तर्कों का सामना करना भी उतना ही जरूरी है।

संसद में बहस या वॉकआउट? कांग्रेस के आचरण पर भी सवाल

विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना है। सरकार की गलतियों को उजागर करना, नीतियों पर सवाल उठाना और जनता के मुद्दे उठाना लोकतंत्र में विपक्ष की अनिवार्य भूमिका है। लेकिन विरोध और चर्चा के बीच संतुलन भी जरूरी है।
संसद के रिकॉर्ड में ऐसे कई अवसर दर्ज हैं जब राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों ने विरोध जताते हुए सदन से वॉकआउट किया।
22 जुलाई 2024: NEET विवाद पर वॉकआउट
लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, राहुल गांधी और कुछ विपक्षी सांसदों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के जवाब से असंतुष्ट होकर सदन से वॉकआउट किया। यह NEET विवाद पर राहुल गांधी के पूरक सवाल के जवाब के बाद हुआ।
सरकार के जवाब से असहमति जताना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि जवाब से असंतुष्ट होने पर क्या चर्चा को आगे बढ़ाने और सरकार को अतिरिक्त सवालों के जरिए घेरने का प्रयास अधिक प्रभावी नहीं होता?
10 फरवरी 2021: प्रधानमंत्री के जवाब के दौरान कांग्रेस का वॉकआउट
कृषि कानूनों के विरोध के बीच राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान कांग्रेस सांसदों ने विरोध किया और वॉकआउट किया।
इस घटना ने विपक्ष के विरोध के तरीके और प्रधानमंत्री के जवाब को सदन में सुनने की संसदीय परंपरा पर सवाल खड़े किए।
मार्च 2020: दिल्ली दंगों पर हंगामा और सांसदों का निलंबन
दिल्ली दंगों पर चर्चा की मांग को लेकर लोकसभा में कांग्रेस सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद सात कांग्रेस सांसदों को आसन के पास हंगामा करने और कागज छीनने जैसी घटनाओं के आरोप में बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित किया गया।
जुलाई 2017: मॉब लिंचिंग के मुद्दे पर हंगामा
लोकसभा में मॉब लिंचिंग के मुद्दे पर कांग्रेस सांसदों के विरोध के दौरान कागज फाड़ने और आसन की ओर फेंकने की घटनाएं हुईं। इसके बाद छह कांग्रेस सांसदों को निलंबित किया गया।
इन घटनाओं का उल्लेख इसलिए जरूरी है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में विरोध का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण सदन की मर्यादा और चर्चा की निरंतरता भी है।
विपक्ष को सरकार से जवाब मांगने का पूरा अधिकार है, लेकिन जवाब सुनने और उस पर आगे सवाल करने की जिम्मेदारी से भी वह बच नहीं सकता।

खुली बहस की चुनौती, लेकिन संसद में फीका प्रदर्शन

राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारी है। संसद में प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधेयकों पर चर्चा, बजट बहस और विभिन्न प्रस्तावों के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं।

पटाखों पर बैन लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज पहले बताएं कि आज दिल्ली में प्रदूषण क्यों है?

सुभाष चन्द्र

एक सामान्य नागरिक के मन में यही विचार आता है कि हिंदुओं के एक दिन के दीपावली के त्योहार को बर्बाद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज बिना सोचे समझे फैसले देते है जैसे predetermined हों। 

अपने 2 नवंबर के आदेश में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने कहा कि “पटाखे जलाने से प्रदूषण हो सकता है। NCR में इस समस्या से निपटने के लिए किए गए उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके क्योंकि निर्देशों का पालन सही ढंग से नहीं हुआ। पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना आदर्श समाधान दिखाई देता है”। 

ये इतने काबिल जज है कि पटाखों पर बैन लगाने के लिए हिंदू धर्म ग्रंथो जैसे स्कंद पुराण और पद्म पुराण भी पढ़ लिए और कोट कर दिए कि उनमे भी पटाखों का उल्लेख नहीं है। ये यह भी नहीं देखते कि दुनिया के अनेक देशों में युद्ध में पटाखे नहीं चल रहे बम और मिसाइल चल रही हैं और आप यहां पटाखों पर बैन लगाने से खुश हो रहे हैं।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
यह कह कर मीलॉर्ड्स ने 7 और 8 नवंबर को पटाखे जलाने की अनुमति देकर हिंदुओं पर बहुत बड़ा अहसान किया लेकिन वो पटाखे ग्रीन पटाखे होने चाहिए और 9 नवंबर से प्रतिबंध पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। अगर ग्रीन पटाखों से प्रदूषण नहीं होता तो उनकी अनुमति केवल 2 दिन के लिए ही क्यों दी? 

सुप्रीम कोर्ट वर्षों से ऐसे आदेश दे रहा है जिसका बहुत खास असर होता भी नहीं है। आप क्या हजारों लोगों को जेल में डालना चाहते हैं जो पटाखे जलाते हैं और पुलिस का काम बढ़ाना चाहते हैं जो पहले ही कानून व्यवस्था की समस्याओं में उलझी रहती है?

दीपावली से पहले से ही प्रदूषण बढ़ना शुरू हो जाता है और दीपावली के बाद भी कई महीने तक जारी रहता है जबकि दीपावली से पहले और बाद भी पटाखे नहीं जलाये जाते। फिर क्यों दो दिन के लिए हिंदुओं पर कुठाराघात करते हो? कभी ईसाईयों पर क्रिसमस पर पेड़ काटने और बकरीद पर जानवरों के वध पर भी प्रतिबन्ध लगाने की हिम्मत कीजिए जनाब। नहीं करते क्योंकि Hindu is a Holy Cow जिस पर आप हुकुम चलाते हो।

बुधवार यानी 4 नवंबर का दिन दिल्ली NCR में पिछले 288 दिनों में सबसे अधिक प्रदूषित रहा। और आगे भी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के जज बस इतना बता दें कि ये 288 दिन से कौन से पटाखे जल रहे थे जो बुधवार को प्रदूषण रिकॉर्ड तोड़ गया और क्या दीपावली के दो दिन पटाखे जलाने में आसमान गिर जाएगा? 

कुछ ही साल पहले तक करवाचौथ के दिन से ही आतिशबाज़ी का हिन्दू आनन्द लेते थे। लेकिन जब से मुस्लिम तुष्टिकरण ने जोर पकड़ा है कोई भी हिन्दू त्यौहार हो जैसे होली, दीपावली या फिर करवाचौथ सनातन विरोधियों को ऐसे तड़पन होने लगती है मानो उनकी बात नहीं मानी गयी तो मर जाएंगे। जबकि मुस्लिम क्षेत्रों में जाइये शब्बे रात और 14/15 अगस्त को कितनी आतिशबाज़ी छोड़ी जाती है तब प्रदुषण नहीं होता क्या? लेकिन चीखना-चिल्लाने हिन्दू त्योहारों पर ही है।     

उसके बाद भी अगर प्रदूषण रहा जो रहेगा तो क्या उसके लिए आप जिम्मेदारी लेंगे? मैं तो कहता हूँ और सुप्रीम कोर्ट को ही हिमाचल ले जाया करो कम से कम दो महीने के लिए और ऑनलाइन कार्रवाई किया करो जिससे आप प्रदूषण से बचे रहें। दूसरा रास्ता और भी है। आप अपनी ग्रीष्म कालीन डेढ़ महीने की छुट्टियां अक्टूबर नवंबर में किया करो और बाहर घूमने का भी आनंद मिले।

आदेश ऐसे होने चाहिए जो आम जनमानस को ठेस न पहुंचाएं। लोग फिर आदेशों की अवहेलना करेंगे और वो आपको अच्छा नहीं लगेगा। यह केवल आर्डर आर्डर करने से काम नहीं चलेगा, कुछ Practical भी सोचना चाहिए।  

आखिर विपक्ष ज्ञानेश कुमार के पीछे क्यों? जानिए ज्ञानेश का देशप्रेम

विपक्ष पहले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के पीछे पड़ा, क्यों? क्योकि धर्मेंद्र ने किताबों से आक्रांताओं की महिमामंडन को हटा मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले देशभक्ति का चोला ओढे पाखंडी नेताओं को चोट पहुंचाई थी और अब ये लोग ज्ञानेश कुमार के पीछे क्यों पड़े हुए हैं। SIR तो बस बहाना है। हकीकत में, ज्ञानेश ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले राष्ट्रहित में ऐसे काम किये हैं जिसने भारत विरोधियों के हाथों में खेलने वालों की नींद, रोटी और पानी तक हराम कर दिया। दरअसल, ज्ञानेश कुमार ने इनकी जड़ें काट दी हैं। उन्होंने राष्ट्र के लिए ऐसे काम किए हैं, जिनकी वजह से आज कश्मीर में शांति और सुकून का माहौल है। हाथों में संविधान लिए घूमने वाले और मुस्लिम कट्टरपंथी नहीं चाहते थे कश्मीर में शांति स्थापित हो। 

आज ज्ञानेश कुमार की भूमिका की वजह से ही देश में CAA लागू हुआ और पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में परेशान किए गए हिंदुओं को भारत की नागरिकता मिली। आज मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति मिली, उसमें भी ज्ञानेश कुमार की भूमिका रही है।
इन लोगों की परेशानी ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयुक्त बनने से नहीं है। इनकी असली परेशानी यह है कि सरकार की इतनी बड़ी उपलब्धियों में ज्ञानेश कुमार की भी भूमिका रही है। और अब ज्ञानेश कुमार 2029 तक इनके सामने रहेंगे। अगर सरकार चाहे तो उनका कार्यकाल 2031 तक भी आसानी से बढ़ाया जा सकता है। उनकी उम्र और उनकी काबिलियत पूरी दुनिया देख रही है। वह अजीत डोभाल और नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद और परखे हुए अधिकारी हैं।

पूरा देश देख रहा है कि उन्होंने किस तरह एक-एक घुसपैठिए की पहचान की। सुप्रीम कोर्ट में आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं लाया जा सका, जिसके बारे में यह साबित किया जा सके कि ज्ञानेश कुमार और उनकी टीम ने गलत तरीके से उसका नाम वोटर लिस्ट से कटवाया है।
दरअसल, ज्ञानेश कुमार को बार-बार ज्ञानेश गुप्ता कहकर अपमानित करने के पीछे भी एक सोच है। इन्हें लगता है कि बनिया समाज बीजेपी का वोटर है, इसलिए ये बार-बार उनके गुप्ता होने पर जोर देते हैं। ज्ञानेश कुमार से नफरत करते-करते इन्होंने दिल्ली के व्यापारियों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। क्योंकि ज्ञानेश कुमार एक कारोबारी परिवार से आते हैं और दिल्ली के व्यापारियों ने भी उनका विरोध किया था, इसलिए इन लोगों ने ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ व्यापारियों के खिलाफ भी नफरत दिखाई।

 
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राहुल गाँधी अगर वोट चोरी हुई है तो शपथ पत्र दाखिल करने से क्यों भाग रहे हो?
हमारे युवराज की बौद्धिक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए कि अंबानी-अडानी से नफरत करते-करते इन्होंने दिल्ली के करीब 20 बड़े व्यापारियों को भी अपने निशाने पर ले लिया और इसी चक्कर में दिल्ली में अपनी राजनीतिक जमीन खो दी।
साभार सोशल मीडिया 
ये वही व्यापारी हैं, जो दिल्ली में चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी और उनकी पूरी सरकार के लिए राहुल गांधी जैसे नेता किसी ताकत से कम नहीं हैं। अब आप खुद सोचिए कि विपक्ष के बाकी नेता राहुल गांधी को देखकर क्या सोच रहे होंगे।

बांग्लादेश में फिर आगजनी

बांग्लादेश के मामले में राहुल गांधी और नेहा बोरा, दोनों फंसते हुए नजर आ रहे हैं। बल्कि अब तो दोनों के बीच कनेक्शन भी दिखाई देने लगा है।

पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश ने जिस तरह प्रगति और विकास कर पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया था आज वही बांग्लादेश पाकिस्तान की तरह बर्बाद होने की कगार पर पहुँच रहा है। देश विरोधी अराजक तत्वों ने जिस तरह बांग्लादेश को आगजनी के हवाले किया था उस नासूर से शायद ही कभी बांग्लादेश बाहर आ सके।  
इस समय बांग्लादेश एक बार फिर जल रहा है। करीब 28 महीने बाद लोग फिर से सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन इस बार किसी क्रांति के लिए नहीं, बल्कि वहां के लोगों को जैसे क्रांति करने की आदत ही पड़ गई है। अब छोटी-छोटी बातों पर भी लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने लगते हैं।
इस बार पूरा मामला गारमेंट इंडस्ट्री यानी कपड़े बनाने वाली फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों की सैलरी बढ़ाने का है। लेकिन सैलरी बढ़ाने की मांग को लेकर पूरे बांग्लादेश में आगजनी हो रही है, गाड़ियों में तोड़फोड़ की जा रही है, हिंसा हो रही है और पुलिस वालों तक पर हमले किए जा रहे हैं।
                                                                                            साभार सोशल मीडिया 
अब जरा इस खबर को समझिए। अभी नेहा बोरा का बयान आया था ना कि बांग्लादेश ने दुनिया को क्रांति करने का रास्ता दिखाया है। तो मैं उनसे पूछना चाहती हूं कि मैडम, बांग्लादेश में तो क्रांति हो चुकी है, फिर वहां दोबारा क्रांति क्यों हो रही है? जरा इसका जवाब भी दीजिए।
और, आजकल नेहा बोरा राहुल गांधी की सबसे बड़ी पोस्टर गर्ल बनी हुई हैं। राहुल गांधी की बात करें तो उनकी राजनीति में भी आपको यही चीज दिखाई देगी। जैसे नेहा बोरा बांग्लादेश से प्रेरणा लेने की बात करती हैं, वैसे ही राहुल गांधी भी मोदी जी को नीचा दिखाने के लिए बार-बार बांग्लादेश का उदाहरण देते हैं।

आपको साल 2020 की खबर याद होगी। उस समय प्रति व्यक्ति जीडीपी के आंकड़ों की तुलना करके यह दिखाने की कोशिश की गई थी कि बांग्लादेश भारत से आगे निकल गया है और भारत उससे पीछे रह गया है।
लेकिन इन आंकड़ों पर हमें भरोसा नहीं है। क्योंकि अगर इन्हीं आंकड़ों को सही मान लिया जाए, तो बांग्लादेश दुनिया का सबसे खुशहाल देश भी दिखाई देने लगेगा और भारत उससे पीछे नजर आएगा। जबकि हकीकत यह है कि बांग्लादेश को कई मौकों पर भारत से मदद मांगनी पड़ती है।
उस समय भी लोगों ने इन आंकड़ों के जवाब में कांग्रेस की सरकार के दोनों कार्यकाल और मोदी सरकार के कार्यकाल की जीडीपी और ग्रोथ रेट की तुलना करके दिखाया था कि मोदी सरकार में विकास की रफ्तार पहले के मुकाबले दोगुनी हो गई थी।
इतना ही नहीं, इसके बाद राहुल गांधी को भारत को घेरने के लिए एक और मुद्दा मिल गया, टेक्सटाइल इंडस्ट्री यानी कपड़ा उद्योग।
उन्हें पता चला कि बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग काफी आगे बढ़ चुका है। लेकिन यहां एक बात समझने वाली है कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में कपड़ा उद्योग की बहुत बड़ी भूमिका है। वहां मुख्य रूप से इसी इंडस्ट्री पर सबसे ज्यादा निर्भरता है, जबकि भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था कई अलग-अलग उद्योगों पर टिकी हुई है।

लेकिन राहुल गांधी बार-बार बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग का उदाहरण देकर भारत को कमजोर दिखाने की कोशिश करते रहे हैं।
अब जरा आज की स्थिति देखिए। भारत अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, लेकिन बांग्लादेश की हालत देखिए। वहां जिस कपड़ा उद्योग के दम पर बांग्लादेश अपनी अर्थव्यवस्था और एक्सपोर्ट में इतनी बड़ी हिस्सेदारी रखता है, वही आज संकट में है।
बांग्लादेश के कुल एक्सपोर्ट में कपड़ा उद्योग की हिस्सेदारी करीब 81 प्रतिशत है। यानी देश की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा इसी एक इंडस्ट्री से आता है।
और इसकी सबसे बड़ी वजहों में से एक है वहां मजदूरों को मिलने वाली बहुत कम मजदूरी। बांग्लादेश में लेबर कॉस्ट यानी मजदूरों पर होने वाला खर्च दुनिया के सबसे कम खर्चों में गिना जाता है।
लेकिन अब जब यही मजदूर अपनी सैलरी बढ़ाने के लिए हड़ताल पर उतर आए हैं और फैक्ट्रियों में काम बंद हो रहा है, तो बांग्लादेश का पूरा कपड़ा उद्योग संकट में पड़ता दिखाई दे रहा है। जिस इंडस्ट्री के दम पर बांग्लादेश अपनी तरक्की का दावा करता था, आज वही इंडस्ट्री ठप होने की कगार पर पहुंच गई है। 

राहुल गाँधी अगर वोट चोरी हुई है तो शपथ पत्र दाखिल करने से क्यों भाग रहे हो?

राहुल गाँधी का पिछलग्गू बना INDI गठबंधन संविधान की आड़ में देश की हर संवैधानिक संस्था को बदनाम कर जनता को गुमराह में लगा हुआ है। मानो रोटी तो ये ही लोग खाते बाकी जनता तो हवा पानी पीते हैं। मोदी चाय बेचता था कलाम अखबार बेचता था लेकिन कोई इन पाखंडियों से यह नहीं पूछता कि सोनिया गाँधी क्या करती थी? चीन के साथ क्या MoU साइन किया था और किस हैसियत से? किसके खर्चे पर इतने विदेशी दौरे होते हैं? और किन-किन लोगों से मिलते हो और उनसे क्या बातचीत होती है? संसद में बहस करने की बजाए क्यों संसद को बाधित कर करोड़ों रुपया बर्बाद करते हो? कौन भरेगा इस नुकसान को? फिर कहते हैं जनसेवक? किसी खोजी पत्रकार तो क्या किसी गोदी मीडिया में भी यह पूछने की हिम्मत नहीं। अगर यही काम मोदी या किसी अन्य बीजेपी नेता होता सारा गोदी मीडिया इन विपक्षियों के साथ सुरताल मिला आसमान सिर पर उठा रहा होता। दूसरे,  विपक्षियों द्वारा सड़कछाप भाषा बोल कौन सी  संस्कृति और कौन से संविधान का परिचय दिया जा रहा है?             
लोकतंत्र में जनता का विश्वास निष्पक्ष संवैधानिक संस्थाओं और पारदर्शी निर्वाचन प्रणाली पर टिका होता है। भारतीय जनता पार्टी सदैव एक त्रुटिरहित, पारदर्शी और शुद्ध मतदाता सूची की पक्षधर रही है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित स्पेशल समरी रिवीजन और मतदाता सूची शुद्धिकरण की प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य ही मृतक, स्थानांतरित और दोहरे नामों को हटाकर सूची को पारदर्शी बनाना है। इसके विपरीत, कांग्रेस और उनके शीर्ष नेता राहुल गांधी बिना किसी कानूनी प्रमाण के ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव गढ़ने में जुटे हैं। जब देश का चुनाव कानून और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम किसी भी गड़बड़ी पर शपथपत्र (Affidavit) के साथ आयोग या अदालत में आपत्ति दर्ज कराने का स्पष्ट अधिकार देता है, तब कांग्रेस केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक भाषणबाजी तक ही सीमित क्यों रहती है? लोकतांत्रिक संस्थाओं को लांछित करने की इस राजनीति पर देश की जनता राहुल गांधी और कांग्रेस से तीखे सवाल पूछ रही है।

नकारात्मकता नहीं, जवाबदेही से मजबूत होगा लोकतंत्र
भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, जिसकी सुदृढ़ नींव मतदाताओं के अटूट विश्वास और पारदर्शी संस्थागत प्रक्रियाओं पर टिकी है। निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची को त्रुटिरहित और अद्यतन बनाना एक सतत चलने वाली वैधानिक प्रक्रिया है। निराधार आरोपों और राजनीतिक हताशा के दम पर देश की संवैधानिक व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश को जागरूक जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी। यदि कांग्रेस सचमुच लोकतंत्र और मतदाता के अधिकारों के प्रति गंभीर है, तो उसे सनसनीखेज राजनीति छोड़कर सक्षम कानूनी मंचों पर प्रमाणिक तथ्य रखने चाहिए। अन्यथा, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यह सारा प्रलाप केवल अपनी चुनावी पराजय और सांगठनिक कमजोरियों से ध्यान भटकाने का एक विफल प्रयास मात्र है।

राहुल गांधी और कांग्रेस से 12 तीखे सवाल

1. कानूनी मंच से दूरी और केवल मीडिया में बयानबाजी क्यों?

राहुल गांधी जनसभाओं और सोशल मीडिया पर निर्वाचन आयोग और लोकतांत्रिक प्रणाली पर वोट चोरी के संगीन आरोप लगाते हैं। चुनाव कानूनों के तहत किसी भी गड़बड़ी पर तय प्रपत्र और शपथपत्र (Affidavit) के माध्यम से वैधानिक आपत्ति दर्ज कराने का स्पष्ट प्रावधान है। यदि उनके दावों में लेशमात्र भी सच्चाई है, तो वे शपथपत्र पर हस्ताक्षर कर सक्षम मंचों के समक्ष ठोस दस्तावेज क्यों नहीं रखते? शपथपत्र दाखिल न करने का सीधा अर्थ है कि वे झूठे दावों पर होने वाले कानूनी परिणामों और जवाबदेही से बचना चाहते हैं। अदालत के समक्ष गलत हलफनामा देना कानूनन दंडनीय है, यही वजह है कि कांग्रेस केवल प्रेस वार्ता तक सीमित रहती है। जब साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर आता है, तब मौन साधकर जनता में भ्रम फैलाया जाता है। क्या देश का कानून सिर्फ सामान्य नागरिकों पर लागू होता है या कांग्रेस नेतृत्व खुद को कानून से ऊपर मानता है?

2. राज्यों के हिसाब से बदलता रुख: आखिर यह दोहरा रवैया क्यों?

मतदाता सूची संशोधन की वैधानिक प्रक्रिया पर कांग्रेस का रुख राज्य और चुनावी समीकरण देखकर बदल जाता है। जिन राज्यों में राजनीतिक जमीन खिसकती दिखती है, वहां इस प्रशासनिक प्रक्रिया को लोकतंत्र विरोधी बताकर हो-हल्ला मचाया जाता है। इसके विपरीत, अन्य राज्यों में जहां उनका गठबंधन मजबूत स्थिति में होता है, वहां इसी प्रक्रिया पर रणनीतिक चुप्पी साध ली जाती है। देश की जनता यह जानना चाहती है कि निर्वाचन आयोग की एक ही राष्ट्रीय प्रक्रिया एक राज्य में अनुचित और दूसरे राज्य में स्वीकार्य कैसे हो सकती है? यह अवसरवादी राजनीति का स्पष्ट उदाहरण है, जहां राष्ट्रीय हितों को ताक पर रखकर केवल चुनावी गणित साधा जाता है। जब सुविधा के अनुसार रुख बदलता है, तो यह साफ हो जाता है कि कांग्रेस को चुनावी शुचिता से नहीं, बल्कि केवल वोट बैंक से सरोकार है। एक जिम्मेदार राष्ट्रीय दल को एक ही देश में दो अलग-अलग पैमाने अपनाने की छूट कैसे दी जा सकती है?

3. खुद उठाई थी फर्जी वोटरों की बात, अब सूची की सफाई से ऐतराज क्यों?

अतीत में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता स्वयं मतदाता सूची में डुप्लीकेट और बोगस प्रविष्टियों का मुद्दा उठाते रहे हैं। अब जब निर्वाचन आयोग तकनीक और फील्ड वेरिफिकेशन के जरिए घर-घर जाकर मृतक, अनुपस्थित और दोहरे मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को शुद्ध कर रहा है, तो कांग्रेस को परेशानी क्यों हो रही है? क्या कांग्रेस चाहती है कि फर्जी प्रविष्टियां मतदाता सूची में यथावत बनी रहें ताकि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सके? एक निष्पक्ष चुनाव की पहली और बुनियादी शर्त ही यह है कि एक पात्र भारतीय नागरिक का केवल एक ही वैध वोट दर्ज हो। जब आयोग पूरी पारदर्शिता के साथ त्रुटियों का निवारण कर रहा है, तब उस पर आक्षेप लगाना अत्यंत संदेहास्पद है। अगर कांग्रेस सचमुच निष्पक्ष व्यवस्था की पक्षधर है, तो मतदाता सूची के इस व्यापक शुद्धिकरण अभियान का समर्थन करने के बजाय वह इसमें रोड़े क्यों अटका रही है?

4. सुविधा के हिसाब से सिद्धांत बदलना बंद कब होगा?

प्रशासनिक सुधारों और मतदाता पुनरीक्षण की जिन प्रक्रियाओं की कभी कांग्रेस के दौर में सराहना की जाती थी, आज राजनीतिक लाभ के लिए उन्हीं पर प्रहार किया जा रहा है। अपनी राजनीतिक सुविधा देखकर अपने ही पुराने निर्णयों और बयानों से मुकर जाना कांग्रेस की पुरानी परिपाटी रही है। सिद्धांतों की यह अस्थिरता दर्शाती है कि पार्टी के पास अब कोई ठोस नीतिगत और वैचारिक आधार नहीं बचा है। कभी जिस निर्वाचन व्यवस्था को विश्व का सबसे मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा बताया जाता था, आज उसी पर अनर्गल संदेह खड़े किए जा रहे हैं। जब सत्ता हाथ में होती है तो प्रशासनिक तंत्र निष्पक्ष नजर आता है, लेकिन विपक्ष में आते ही वही व्यवस्था पक्षपाती दिखने लगती है। यह वैचारिक दिवालियापन लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक और निराशाजनक साबित हो रहा है। जनता देख रही है कि कैसे सत्ता से दूर होते ही राष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रहार किए जाने लगते हैं।

 5. यदि प्रक्रिया असंवैधानिक है, तो नैतिक साहस क्यों नहीं दिखाते?

कांग्रेस यह लगातार दावा करती है कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पूरी तरह असंवैधानिक और जनता के अधिकारों पर कुठाराघात है। अगर कांग्रेस वास्तव में इसे इतना बड़ा संवैधानिक संकट मानती है, तो उसके शासित राज्यों के मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि अपने पदों से त्यागपत्र देकर कोई ठोस राजनीतिक संदेश क्यों नहीं देते? केवल भाषणों में आक्रोश जताना और उसी प्रशासनिक ढांचे के तहत मिली सत्ता का पूरा उपभोग करना कथनी और करनी के भारी अंतर को उजागर करता है। जब पूरी व्यवस्था को ही दूषित बताया जा रहा है, तो उसी व्यवस्था के बल पर मिले विशेषाधिकारों को क्यों नहीं छोड़ा जाता? नैतिक साहस की यह कमी प्रमाणित करती है कि यह विरोध केवल जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए रचा गया एक राजनीतिक प्रपंच है। गंभीर प्रश्नों पर केवल खोखली बयानबाजी करने के बजाय क्या कांग्रेस में कोई निर्णायक और नैतिक कदम उठाने का साहस है?
6. जीत पर व्यवस्था दुरुस्त, पराजय पर वोट चोरी का प्रलाप क्यों?
जब विभिन्न राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनती है, तब निर्वाचन प्रणाली और ईवीएम पर कोई उंगली नहीं उठाई जाती। परंतु जब देश की जनता भारतीय जनता पार्टी की विकासोन्मुख नीतियों और सुशासन पर मुहर लगाती है, तो तत्काल ‘वोट चोरी’ का बहाना खोज लिया जाता है। अपनी जीत का सेहरा खुद बांधना और हर पराजय का ठीकरा संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ना किसी भी जिम्मेदार दल को शोभा नहीं देता। यह दोहरा रवैया दर्शाता है कि कांग्रेस जनता के स्पष्ट जनादेश को विनम्रता से स्वीकार करने का लोकतांत्रिक साहस खो चुकी है। अपनी सांगठनिक विफलताओं और नेतृत्व की दिशाहीनता पर आत्ममंथन करने के बजाय पूरी चुनावी प्रक्रिया पर कीचड़ उछाला जाता है। चुनाव परिणाम आते ही अपनी सुविधा के हिसाब से तर्क बदलना जनता के विवेक का खुला अनादर है। देश का मतदाता अब पराजय छिपाने के लिए गढ़े जाने वाले इन बहानों की सच्चाई को भली-भांति पहचानता है।
7. महिला पत्रकार से कथित दुर्व्यवहार पर अभिव्यक्ति की आजादी की बातें कहां गईं?
विरोध प्रदर्शनों के दौरान जब काम पर तैनात एक गर्भवती महिला पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की और अशोभनीय व्यवहार की घटना सामने आती है, तब महिला सशक्तिकरण के दावे कहां चले जाते हैं? प्रेस की स्वतंत्रता और नारी सम्मान पर लंबे-चौड़े व्याख्यान देने वाले कांग्रेस नेता इस गंभीर विषय पर पूरी तरह चुप्पी साध लेते हैं। जब मीडिया उनकी पसंद के अनुसार सवाल नहीं पूछता या उनके बयानों की विसंगतियों को उजागर करता है, तब इस तरह की असहिष्णुता खुलकर सामने आ जाती है। अभिव्यक्ति की आजादी का झंडा उठाने का दावा करने वाले नेता अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के ऐसे अमर्यादित आचरण पर सार्वजनिक खेद प्रकट क्यों नहीं करते? प्रेस की सुरक्षा और महिलाओं का सम्मान केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रह सकता। जनता यह जानना चाहती है कि राजनीतिक स्वार्थ के आगे बुनियादी मानवीय संवेदना और सामाजिक शिष्टाचार को क्यों भुला दिया गया?
8. बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) की निष्क्रियता पर पर्दा डालने का प्रयास क्यों?
चुनाव नियमों के तहत प्रत्येक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को हर पोलिंग स्टेशन पर अपना बूथ लेवल एजेंट (BLA) नियुक्त करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। मतदाता सूची के प्रारूप प्रकाशन के बाद उस पर दावे और आपत्तियां आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की प्राथमिक जिम्मेदारी इन्हीं प्रतिनिधियों की होती है। कांग्रेस कभी यह स्पष्ट नहीं करती कि उसके बीएलए ने ग्राउंड पर तय प्रक्रिया के तहत लिखित आपत्तियां क्यों नहीं दर्ज कराईं? जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की गैर-मौजूदगी और कमजोर संगठन की नाकामी को छिपाने के लिए पूरी चुनाव प्रणाली पर आक्षेप लगाना अनुचित है। जब निर्धारित नियमों और कानूनी रास्तों का उपयोग धरातल पर नहीं किया जाता, तो फिर टीवी चैनलों पर व्यवस्था को कोसने का क्या औचित्य है? अपनी सांगठनिक शिथिलता का दोष तंत्र पर मढ़ने के बजाय कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि उसके प्रतिनिधि बूथ स्तर पर सक्रिय क्यों नहीं रहे?
9. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के लोकतांत्रिक सम्मान को दांव पर लगाना क्यों?
जब विपक्ष के शीर्ष नेता बिना किसी आधार के भारतीय चुनावी प्रक्रिया पर खुलेआम सवाल उठाते हैं, तो इसका सीधा असर वैश्विक पटल पर देश की छवि पर पड़ता है। भारत को पूरी दुनिया में ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में सम्मान प्राप्त है, किंतु ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयानों से विदेशी मंचों को देश की साख पर प्रश्नचिह्न लगाने का अवसर मिलता है। घरेलू राजनीति की खींचतान को इस सीमा तक घसीटना कि भारत की संवैधानिक गरिमा को आघात पहुंचे, अत्यंत चिंताजनक है। अपनी चुनावी कुंठा को निकालने के लिए देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदिग्ध साबित करने का प्रयास किसी भी दृष्टि से राष्ट्रहित में नहीं हो सकता। राजनीतिक लाभ क्षणिक हो सकते हैं, परंतु वैश्विक स्तर पर राष्ट्र की प्रतिष्ठा सबसे ऊपर होनी चाहिए। क्या सत्ता पाने की होड़ में देश के लोकतांत्रिक गौरव को इस प्रकार नुकसान पहुंचाना उचित है?
10. जवाबदेही से भागना और आत्ममंथन से परहेज कब तक?
लगातार मिल रही असफलताओं के बाद भी कांग्रेस अपनी नीतियों, दिशाहीन एजेंडे और नेतृत्व के संकट का निष्पक्ष मूल्यांकन करने से कतराती रही है। जनसरोकारों और विकास के वास्तविक मुद्दों पर बात करने के स्थान पर केवल काल्पनिक षड्यंत्रों का नैरेटिव तैयार किया जाता है। देश का मतदाता आज आधारभूत ढांचे, डिजिटल प्रगति, आर्थिक विकास और पारदर्शी शासन के आधार पर मतदान कर रहा है। इसके विपरीत, कांग्रेस का पूरा विमर्श दशकों पुराने नकारात्मक बयानों और संकीर्ण राजनीति में ही सिमट कर रह गया है। पार्टी के भीतर से उठने वाली सुधारात्मक आवाजों को दरकिनार कर दिया जाता है और हर नाकामी का दोष बाहरी तत्वों पर थोप दिया जाता है। बहानेबाजी की यह कार्यशैली कांग्रेस को जनभावनाओं से निरंतर दूर कर रही है। जब तक नेतृत्व अपनी कमजोरियों को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करना असंभव है।
11. संविधान की दुहाई और सड़क पर अशांति फैलाने का प्रयास क्यों?
हाथ में संविधान की प्रति लेकर सार्वजनिक सभाओं में जाने वाले नेताओं का आचरण संविधान प्रदत्त मर्यादाओं और लोकतांत्रिक नियमों के अनुकूल होना चाहिए। यदि किसी प्रशासनिक या चुनावी निर्णय से असहमति है, तो उसके निराकरण के लिए संसद, वैधानिक संस्थाएं और न्यायपालिका जैसे सशक्त मंच उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, विरोध के नाम पर सड़कों पर अव्यवस्था पैदा करना और संवैधानिक संस्थाओं की साख गिराना बाबासाहेब आंबेडकर के आदर्शों के सर्वथा प्रतिकूल है। संविधान के प्रति वास्तविक निष्ठा उसकी प्रक्रियाओं और संस्थाओं का आदर करने से सिद्ध होती है, न कि केवल प्रतीकात्मक प्रदर्शनों से। संस्थागत मंचों की अवहेलना कर अराजकता का वातावरण बनाना स्वस्थ जनतंत्र की पहचान नहीं है। देश की जनता अब यह समझ चुकी है कि संविधान की रक्षा का नारा केवल एक राजनीतिक ढाल के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जबकि व्यवहार में संवैधानिक नियमों की ही अनदेखी की जाती है।
12. साक्ष्य हैं तो देश की स्वतंत्र अदालतों में जाने से संकोच क्यों?
अगर राहुल गांधी और कांग्रेस के पास वोट चोरी के पक्के और पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं, तो वे उन्हें देश की शीर्ष न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत कर कानूनी लड़ाई क्यों नहीं लड़ते? प्रेस कॉन्फ्रेंस करने या चुनावी रैलियों में बिना दस्तावेज के आरोप मढ़ने से कोई बात कानूनी रूप से सच साबित नहीं हो जाती। भारतीय न्याय व्यवस्था पूरी तरह स्वतंत्र, सक्षम और निष्पक्ष है, फिर वहां औपचारिक याचिका और साक्ष्य प्रस्तुत करने से हिचकिचाहट क्यों है? जब भी न्यायालय के समक्ष जाने की बात आती है, तब केवल धारणाएं बनाने और मीडिया ट्रायल चलाने का प्रयास किया जाता है। अदालत के भीतर हर दावे की जांच वैज्ञानिक और कानूनी कसौटियों पर होती है, जहां तथ्यहीन दावों की सच्चाई तुरंत सामने आ जाती है। यही कारण है कि वैधानिक प्रक्रिया से दूरी बनाई जाती है और केवल राजनीतिक लाभ के लिए जनता को भ्रमित किया जाता है।

अमेरिका में “हाथी” हार गया और “गधा” जीत गया; ट्रंप की हार पर खुश होने वालों को याद रखना चाहिए Democrats अमेरिका को भी फ्रांस की तरह जला देंगे

सुभाष चन्द्र

अभी तक विदेशी कहते थे कि महामूर्ख भारत में हो रहते हैं जो घुसपैठियों को बचाने घुसपैठियों को बचाने वाली पार्टियों और नेताओं की वकालत करते हैं लेकिन अमेरिका में हुए चुनावों से मालूम हुआ कि महामूर्ख भारत ही नहीं अमेरिका में भी रहते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अमेरिका भी बहुत जल्द फ्रांस, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसा ज्वलंत माहौल देखेगा,जिसे डोनाल्ड ट्रम्प बचाए हुए थे। लेकिन एक बात जरूर सामने आयी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधियों को परमपिता परमेश्वर मात दे रहे हैं। चाहे वह भारत में हो या दुनियां के किसी भी कोने में।   

लेखक 
चर्चित YouTuber 
डोनाल्ड ट्रंप की Republican Party का चुनाव चिन्ह “हाथी” है और Democrats का “गधा” है। यानी अमेरिकियों ने “गधा” जिता दिया और “हाथी” को हरा दिया। ठीक है ट्रंप अपनी नीतियों की वजह से हारे हैं या कहें तो ये Anti-incumbency वोट था। ईरान युद्ध और अमेरिका को टैरिफ देश बना देना उसकी सबसे बड़ी गलती मानी गई है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना ट्रंप की कोई गलती नहीं थी।

ट्रंप की हार पर अमेरिका के लोग भी खुश है और भारत में भी लोग खुश हैं लेकिन एक खतरे से अमेरिकी अनजान हैं कि Democrats मुस्लिमों को सिर चढाने वाली वैसी ही पार्टी है जैसे भारत की कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियां। Democrats के पास वैसे तो अभी हुकूमत नहीं है अलबत्ता दोनों सदनों में बहुमत है लेकिन यदि वो सत्ता में आते है तो मुस्लिमों की एंट्री अमेरिका में बेतहाशा बढ़ेगी। अमेरिकी मौलाना बहुत हैं जो अमेरिका को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की बात करते हैं। और Democrats के सत्ता में आने के बाद अमेरिका भी फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की तरह जल उठेगा। Democrats की सत्ता में अमेरिका का इस्लामीकरण तेजी से बढ़ेगा।

साभार सोशल मीडिया 

अमेरिका में मुस्लिम जनसंख्या का खेल देखिए। 1970 में अमेरिका में मुस्लिम 1 से 2 लाख की बीच थे जो 1990 में बढ़ कर 25 लाख हो गए और आज 2026 में उनकी संख्या 55 लाख है। अमेरिकी अभी इस्लामिक खतरे से अनभिज्ञ हैं, तभी मिशिगन से कोई मुस्लिम पहली बार सीनेट के लिए चुना गया है। मिशिगन से ही कट्टरपंथी मुस्लिम राशिदा तैलब और मिनिसोटा से इल्हान ओमर जीती है। ऐसे ही एक मिस्र-अमेरिकी सर्जन एडम हमावी(जिसने गाज़ा में एक डॉक्टर के रूप में स्वेच्छा से काम किया) न्यू जेरसी से पहला मुस्लिम कांग्रेस का सदस्य बना है। न्यूयॉर्क का मेयर पहले ही मुस्लिम ममदानी बन चुका है।

इज़रायल में भी अरब पार्टीज के लिए मुस्लिमों ने एकजुट वोट किया और 19 सांसद चुने गए और अब सत्ता की चाबी उनके हाथ में। नेतन्याहू को डर है कि इज़रायल को इस्लामिक देश बनाने की साजिश चल रही है। मुख्य विपक्षी नेता भी इज़रायल को यहूदी राष्ट बनाए रखने की बात कर रहे हैं लेकिन नेतन्याहू को किसी कीमत पर हटाना चाहते हैं जिसके लिए उन्हें अरब दलों का समर्थन लेना पड़ेगा जो बहुत घातक साबित होगा।

कुछ लोग बहुत खुश हैं कि 6 भारतीय अमेरिकी भी कांग्रेस के लिए चुने गए हैं जबकि उन 6 में 3 तो भारत के कट्टर दुश्मन हैं। वो हैं Ami Bora, RO Khanna, Pramila Jayapal. लेकिन सीनेट के लिए एक भी भारतीय अमेरिकी नहीं चुना गया है।

2025 में ट्रंप ने मोदी के लिए कहा था “I don't want to destroy his political career”.  इसका मतलब यह भी निकलता है कि वो चाहे तो ऐसा कर सकता है। लेकिन फिर मोदी की भूरी भूरी प्रशंसा भी की थी।

अब दो साल बेशक ट्रंप राष्ट्रपति रहेंगे लेकिन उन्हें हर काम सदनों से पारित कराने के लिए Democrats के आगे झुकना पड़ेगा। कुछ लोगों का कहना है वो Lame Duck President हो गए। मुझे नहीं पता अब वो भारत के साथ ट्रेड डील कर भी सकेंगे या नहीं लेकिन ट्रेड डील के लिए अमेरिकी संसद की अनुमति की जरूरत नहीं है।

जो होता है अच्छा होता है। हो सकता है अगले 2 वर्ष के कार्यकाल में ट्रंप Republican Party के लिए कुछ करिश्मा कर दें या स्वयं जनता को समझ आ जाए कि Democrats को सत्ता देना अमेरिका के हित में नहीं है।