पब्लिशर 'पेंगुइन' ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब पर स्पष्टीकरण देते हुए बयान जारी किया (फोटो साभार: IndiaToday/X) कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की जिस ‘फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी’ किताब को संसद में दिखाया, वह अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। यह स्पष्ट तौर पर किताब की पब्लिकेशन कंपनी ‘पेंगुइन रेंडम हाउस इंडिया’ ने आधिकारिक तौर पर दी है। इस मामले में दिल्ली पुलिस भी FIR दर्ज कर चुकी है।
पब्लिशर ने यह भी कहा कि न ही सिर्फ किताब, बल्कि अब तक किताब की कोई भी कॉपी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। पब्लिशर ने कहा कि जो भी कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, वह गैर-कानूनी है। यह बयान सोशल मीडिया पर किताब के कुछ अंशों की वैधता पर सवाल उठाने जाने के बाद सामने आया है। इसी के चलते पिछले हफ्ते संसद में खूब हंगामा भी हुआ था।
ऐसे में सवाल यह भी होता है कि नरवणे की जो किताब प्रकशित ही नहीं हुई, उस पर हो रहे विवाद और राहुल द्वारा उस किताब को लोकसभा में दिखाने पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की चुप्पी क्यों? बल्कि विवाद शुरू होते ही सबसे पहले इन्ही को FIR करवानी चाहिए थी। क्या इस साज़िश में नरवणे भी शामिल हैं? रक्षा मंत्रालय को पूर्व सेनाध्यक्ष से प्रश्न करना चाहिए।
पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने किताब के स्टेटस की दी जानकारी
किताब के पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने बयान जारी कर कहा, “हाल में इस पुस्तक को लेकर सार्वजनिक चर्चा और मीडिया रिपोर्टिंग सामने आई है। इस संबंध में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया यह स्पष्ट करना चाहता है कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’, जो भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा है, उसके प्रकाशन के सभी अधिकार केवल पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के पास हैं।”
‘पेंगुइन’ द्वारा जारी किया गया बयान (फोटो साभार: X)
पब्लिशर ने बयान में आगे कहा, हम साफ तौर पर यह बताना चाहते हैं कि यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की ओर से इस किताब की कोई भी प्रति- चाहे वह प्रिंट हो या डिजिटल, न तो छापी गई है, न वितरित की गई है और न ही बिक्री या किसी अन्य रूप में सार्वजनिक की गई है।
पब्लिशर ‘पेंगुइन’ कानूनी कार्रवाई करेगा
विवाद पर पब्लिशर ने कहा, “अगर इस पुस्तर की कोई प्रति, पूरी या आंशिक रूप में, प्रिंट, डिजिटल, PDF या किसी अन्य फॉर्मेट में, ऑनलाइन या ऑफलाइन, किसी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, तो वह पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के कॉपीराइन का उल्लंघन है। ऐसे सभी फॉर्मेट को तुरंत बंद किया जाना चाहिए।”
‘पेंगुइन’ द्वारा जारी किया गया बयान (फोटो साभार: X)
पब्लिशर ने इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने की बात भी कही। उन्होंने कहा, “पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया इस पुस्तर के अवैध और अनाधिकृत प्रसार के खिलाफ कानून के तहत उपलब्ध सभी कानूनी कदम उठाएगा।” पब्लिशर ने स्पष्ट किया कि यह बयान प्रकाशक की स्थिति को बताने और रिकॉर्ड पर रखने के लिए जारी किया गया है।
शमिक अधिकारी (साभार: Instagram/yournonsane) कोलकाता पुलिस ने 25 साल के सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शमिक अधिकारी को यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया है। शमिक को ऑनलाइन ‘नॉनसेन’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें गुरुवार (5 फरवरी 2026) को दमदम से पकड़ा गया। पहले उन्हें गलत तरीके से कैद करने, हमला करने और महिला की इज्जत से खिलवाड़ करने के आरोप में पकड़ा किया गया था, लेकिन बाद में 22 साल की पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने रेप का केस भी जोड़ दिया।
शमिक को शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को कोर्ट में पेश किया गया और अब उन्हें 16 फरवरी 2026 तक पुलिस कस्टडी में रखा गया है। पुलिस के मुताबिक, महिला ने शिकायत की थी कि शमिक ने उसे 2 फरवरी 2026 की रात करीब साढ़े नौ बजे से अगले दिन शाम 5 बजे तक अपने बेहाला वाले घर में जबरन रोका रखा।
इस दौरान महिला का आरोप है कि उसे मारा-पीटा गया, धमकाया गया। उसने कहा कि शमिक ने उसे गलत तरीके से छुआ, कपड़े खींचे और फिर जबरन यौन हमला किया।
पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता का मेडिको-लीगल टेस्ट एमआर बांगुर अस्पताल में हुआ। एक महिला पुलिस अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया और इसके बाद भारतीय न्याय संहिता की रेप वाली धारा FIR में जोड़ी गई। पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिले और वह काफी आघात में थी, इसलिए शिकायत करने में देरी हुई।
पुलिस ने आगे कहा कि शमिक ने पीड़िता को अश्लील फोटो भेजकर धमकाया था। जाँचकर्ताओं के मुताबिक टावर लोकेशन से पता चला कि शिकायत में बताए समय पर दोनों आरोपित और पीड़िता अपराध वाली जगह पर मौजूद थे।
शमिक की तरफ से कहा गया कि दोनों पुराने दोस्त हैं और लंबे समय से जानते हैं। उस रात गलतफहमी हुई थी, लेकिन कोई जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जाँच में कुछ बचा ही नहीं है तो पुलिस कस्टडी की क्या जरूरत है।
वायरल रील जिसने छेड़ दी राजनीतिक बहस
शमिक कोई आम इंफ्लुएंसर नहीं हैं। इंस्टाग्राम पर उनके करीब 4.20 लाख और फेसबुक पर 4 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। लेकिन राजनीतिक सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट ‘@yournonsane’ पर 21 जनवरी को एक रील पोस्ट की। पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले की बात है।
यह रील वायरल हो गई, 30 लाख से ज्यादा व्यूज और 3.5 लाख से ज्यादा लाइक्स आए। इसमें शमिक ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला किया था। वीडियो में वे खुद को आम वोटर दिखाते हैं जो वोट डालने जा रहा है। वहाँ एक लोकल टीएमसी गुंडा वोटरों को सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को वोट देने का दबाव डालता है और नहीं मानने पर धमकी देता है।
वीडियो में आगे राज्य की स्थिति दिखाने वाले फ्लैशबैक थे। इसमें 26 हजार सरकारी टीचर्स की नौकरी जाने और उसका भावनात्मक असर दिखाया गया। रात में अकेली चलती महिला को कुछ लोग पीछे चल रहे हैं।
रील में आरजी कर रेप-मर्डर केस का भी जिक्र था। उस केस में कोलकाता कोर्ट ने दोषी संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई और राज्य सरकार को पीड़िता के माता-पिता को 17 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, हालाँकि पीड़िता के माता-पिता ने कहा कि उन्हें न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं।
वीडियो ने सीधे सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाया और चुनाव से ठीक पहले आया, इसलिए कई लोगों ने इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना। वायरल होने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।
TMC ने BJP से लिंक का किया दावा
रील वायरल होने के बाद कई टीएमसी लीडर्स और सपोर्टर्स ने दावा किया कि शमिक का बीजेपी से लिंक है। उनका कहना था कि वह सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं।
TMC प्रवक्ता रिजू दत्ता ने सोशल मीडिया पर कड़ा बयान दिया और शमिक को ‘बीजेपी यूट्यूबर’ कहा। पोस्ट में उन्होंने कहा कि वही शख्स जो पश्चिम बंगाल सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा में नाकाम होने का आरोप लगा रहा था, अब खुद महिला की इज्जत से खिलवाड़ और मारपीट के केस में फंसा है।
Breaking 🚨
BJP YouTuber named Shamik Adhikary popularly known as “Nonsane” is booked for Outraging the Modesty of a Woman & Physical Assault! - He is the same person who made a video against WB Govt. claiming women are not safe in Bengal and said not to vote for TMC !
दत्ता ने केस में दर्ज धाराओं का जिक्र किया और बताया कि पीड़िता ने करीब 12 घंटे कैद रखने, मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया है। एक विवादास्पद टिप्पणी में उन्होंने शमिक को बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय से जोड़ा और कहा कि महिलाओं का गलत इस्तेमाल करने वाले बीजेपी में शामिल हो जाते हैं।
अब टीएमसी की बात है कि यह सीधा-सादा क्रिमिनल मामला है और विपक्ष अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दे रहा है।
गिरफ्तारी पर उठे सवाल, झूठे मामले में फँसाने का शक
दूसरी तरफ बीजेपी सपोर्टर्स और कई इंफ्लुएंसर्स ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए हैं। कई लोगों ने इशारा किया कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई हो सकती है, खासकर क्योंकि शमिक की रील ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की थी।
Trinamool Congress is running the most authoritarian and dictatorial regime Bengal has seen to date.
The people of Bengal live in fear afraid that speaking against Mamata Banerjee will invite FIRs and false cases.
— Pradeep Bhandari(प्रदीप भंडारी)🇮🇳 (@pradip103) February 6, 2026
कुछ सोशल मीडिया यूजर्स तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यौन उत्पीड़न की शिकायत झूठी बनाई गई है ताकि उन्हें चुप कराया जाए। उनका तर्क है कि वायरल वीडियो के ठीक बाद और चुनाव से पहले गिरफ्तारी हुई, जिससे शक पैदा होता है।
बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय ने ममता बनर्जी की सरकार पर कड़ा हमला बोला। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘तानाशाही शासन’ बन गया है जहाँ आलोचकों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण FIR से निशाना बनाया जाता है।
मालवीय ने लिखा, “यह टीएमसी का शासन मॉडल है: अभिव्यक्ति की आजादी को दबाओ, आलोचकों को डराओ, पुलिस का इस्तेमाल करो और सत्ता में बने रहने के लिए प्रतिष्ठा बर्बाद करो। लेकिन बंगाल देख रहा है। और बंगाल चुप नहीं रहेगा। बीजेपी हर उस शख्स के साथ खड़ी है जो ममता बनर्जी के शासन का शिकार बना है।”
This is the video of ‘YourNonsanee’ that rattled the Trinamool Congress so deeply that it unleashed the entire police machinery against him.
The Trinamool Congress is running the most authoritarian and dictatorial regime Bengal has witnessed to date.
उन्होंने आगे कहा, “पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मिलकर हम डर को हराएँगे, सत्ता के दुरुपयोग को बेनकाब करेंगे और लोकतंत्र बहाल करेंगे। यह न्याय नहीं है। यह राजनीतिक उत्पीड़न है। और इसका अंत होगा।”
साथी इंफ्लुएंसर्स ने किया शमिक का समर्थन
शमिक को कुछ साथी कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया यूजर्स का भी समर्थन मिला है। एक एक्स यूजर ने सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलने वाले इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ क्यों केस हो रहे हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक आक्रोश क्यों नहीं होता।
First Sayak Chatterjee on Beef Issue & Now Samik Adhikari both are big youtubers bloggers from Kolkata both took social & political scenario of #WestBengal & #Kolkata. Police filed cases against them for raising their voices for exercising the democratic rights. Why No outrage ?? pic.twitter.com/c4eMJ5de0w
समर्थकों का कहना है कि शासन और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसके लिए कानूनी परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि दूसरे लोग कहते हैं कि क्रिमिनल आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए और राजनीतिक बहस से अलग जाँच होनी चाहिए।
फिलहाल शमिक अधिकारी ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। आने वाले दिनों में कोर्ट की कार्यवाही और जाँच के नतीजे इस मुद्दे में बड़ी भूमिका निभाएँगे।
केस एक अपराध की शिकायत से शुरू हुआ था, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस बन गया है जो आरोपी पर लगे आरोपों के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी, राजनीतिक दुश्मनी और चुनाव के समय सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठा रहा है।
पाकिस्तान ने उरी पर हमला किया, पुलवामा में आतंकी हमला किया और पहलगाम में धर्म पूछ कर लोगों की नृशंस हत्या की। तीनो बार आतंक का उत्तर भारत ने 10-15 दिन में पाकिस्तान में घुस कर दिया और हर बार उसका जबड़ा तोड़ा। उन हमलों की और भारत के जवाब की तारीख देख सकते है।
18 /9 /2016 उरी पर हमला,
September 28–29, 2016 (भारत की सर्जिकल स्ट्राइक)
14 फरवरी, 2019 पुलवामा हमला,
26 फरवरी, 2019 भारत की बालाकोट एयर स्ट्राइक
22 अप्रैल, 2025 पहलगाम में हमला,
ऑपरेशन सिंदूर 7 - 10 मई, 2025
लेखक चर्चित YouTuber
अब बलूचिस्तान में BLA ने (BLA) ने 29 जनवरी, 2026 को "Operation Herof 2.0" पाकिस्तान सेना को निशाना बनाते हुए किया और 250 पाकिस्तानी सैनिकों को 72 हूरों के पास भेज दिया। एशिया कप का ट्रॉफी चोर मोहसिन नक़वी ने तुरंत कहा बलूचिस्तान के आतंक के पीछे भारत का हाथ है। इसके अलावा भी जब कभी पाकिस्तान में आतंकी हमले उसके ही आतंकी करते हैं तब पाकिस्तानी नेता भारत को दोष देते हैं जबकि वह खुद भारत में अपने पालतू आतंकी भेजकर हमले कराता है और भारत में बैठे स्लीपर सेल्स से भी खुराफात कराता है।
अभी 6 फरवरी को इस्लामाबाद के तरलाई इलाके में शिया मुसलमानों की खदीजा तुल कुबरा मस्जिद में आत्मघाती आतंकी हमला हुआ जिसमें 30-35 लोग मारे गए और 170 से ज्यादा घायल हुए। उसका दोष भी भारत के सिर मढ़ दिया पाकिस्तान ने जिसका भारत ने खंडन किया है। ये हमला 20 सितंबर, 2008 को इस्लामाबाद के मैरियट होटल में हुए हमले जैसा बताया गया है। मैरियट होटल में विस्फोटक से भरे एक ट्रक ने घुस कर धमाके किए थे जिसकी वजह से 60 लोग मारे गए थे और 250 से ज्यादा घायल हुए थे।
पाकिस्तान से यह भी आरोप लगाया जाता रहा है कि भारत ही “अज्ञातों” (unknown gunmen) से हत्याएं करा रहा है। अरे भाई, जितने अज्ञातों ने मारे हैं वे सब आतंकी थे और वो तुम्हारे ही थे, उन “अज्ञातों” से भारत का क्या लेना देना।
भारत तो ऑपरेशन सिंदूर से आतंकियों की जड़ें ही काटना जानता है और एक एक आतंकी के परिवारों को ही एकसाथ ख़त्म करता है, उसे इक्का दुक्का आतंकियों की हत्या कराने की क्या जरूरत है।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस्लामाबाद का हमला मुल्ला मुनीर के कराया है क्योंकि वह अमेरिका के सामने अपने ऐसे हालात दिखा कर Gaza Peace Board में अपने सैनिक भेजने से बचना चाहता है क्योंकि उन सैनिकों को हमास से उसके हथियार छीनने के लिए लड़ना पड़ेगा जो न शाहबाज शरीफ चाहता है और न मुनीर। बलूचिस्तान रगड़ रहा है जो पाकिस्तान संभल नहीं पा रहा। रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने स्वीकार किया है कि हमारी सेना बलूचों को काबू करने में असमर्थ है - Asif stated that Baloch rebels possess rifles worth Rs 2 million (approx. 20 lakh) and thermal weapon sights worth $4,000-$5,000, saying "we don't have that rifle".
उधर अफ़ग़ानिस्तान भी यदा कदा पाकिस्तान की सेवा कर रहा है और जब मर्जी ठोकता रहता है और POJK तो पहले ही बगावत पर उतारू है। TTP पख्तूनिस्तान में पाकिस्तान का पिछवाड़ा लाल किए हुए है। ईरान के खिलाफ अमेरिका से हाथ मिला कर मुनीर ने ईरान को खुला हाथ दे दिया और वो जब मर्जी पाकिस्तान में घुस सकता है क्योंकि ईरान का बॉर्डर पाकिस्तान से लगता है।
अब पाकिस्तान के पास पाकिस्तानियों को मूर्ख बनाने और उनका ध्यान भटकाने के लिए एक ही उपाय है कि वो बलूचिस्तान और इस्लामाबाद हमले का भारत से बदला लेने के लिए भारत पर या तो हमला कर दे और या भारत की तरह कोई सर्जिकल या एयर स्ट्राइक कर दे और भारत को सबक सिखा दे जैसे मोदी तुरंत हिसाब चुकता कर देता है। उठो बढ़ो पाकिस्तानियों हिम्मत करो और भारत को ठोक दो। अब कश्मीर मांगना बंद कर दो क्योंकि POJK को भी तुम्हारे अब्बा अमेरिका ने भारत का हिस्सा बता दिया।
आखिर राहुल गाँधी के गुलाम बन INDI गठबंधन देश को कहां ले जाना चाहता है? वैसे लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला जो अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने जा रहे हैं उसके जिम्मेदार वे स्वयं हैं। लोक सभा में हंगामा कर रोज के करोड़ों रूपए बर्बाद करने वालों को सदन से बाहर नहीं करना। आखिर मार्शल किस लिए हैं? लोक सभा अध्यक्ष की अपेक्षा विधान सभा के अध्यक्ष हंगामा करने वालों के विरुद्ध मार्शल को बुलाकर उन सदस्यों को सदन से बाहर करते हैं। बिरला को हंगामा करने वाले सदस्यों को बाहर निकलवाकर सदन की कार्यवाही को चालू रखना चाहिए। जब तक ईंट का जवाब पत्थर नहीं दिया जाएगा उपद्रवी बाज़ नहीं आने वाले। लोकसभा में विपक्ष लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी को संसद में बोलने नहीं देने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गाँधी पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे थे। उस वक्त स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देते हुए राहुल गाँधी को रोका। इस मुद्दे पर कई दिनों तक विपक्ष ने सदन को नहीं चलने दिया।
कांग्रेस इस बात से भी नाराज है कि जब महिला सांसदों ने पीएम की सीट को सदन में घेरा, तो स्पीकर ओम बिरला ने कहा था कि कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, इसलिए प्रधानमंत्री को सदन आने से उन्होंने रोका। लेकिन ऐसी घटनाएँ सदन में पहली बार हुई कि महिला सांसद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा को संबोधित नहीं कर पाए। इसकी वजह महिला सांसदों का इस तरह से पीएम की सीट को घेरना था। चर्चा यह है कि नरेंद्र मोदी पर हमले की सूचना ओम बिरला को कांग्रेस में इस घिनौनी हरकत के विरोधी सदस्यों ने दी थी।
विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और दूसरे प्रधानमंत्रियों पर आरोप लगाया। संसद में हंगामे के दौरान 8 विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। सासंदों के निलंबन और महिला सांसदों द्वारा पीएम की सीट घेरने को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगे थे। इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलने की अनुमति नहीं मिली।
स्पीकर के खिलाफ ‘हटाने का प्रस्ताव’ लाया जाता है
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, उससे थोड़ा अलग होता है। इसमें लोकसभा स्पीकर को ‘हटाने का प्रस्ताव’ यानी मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है। यह संविधान की अनुच्छेद 94 सी के तहत लाया जाता है। इस अनुच्छेद में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है।
लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश करने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना होता है। ये नोटिस लिखित होना चाहिए। इस प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर होना जरूरी है यानी कोई भी सांसद लोकसभा में खड़े होकर अपने दम पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता। स्पीकर पर स्पष्ट और ठोस आरोप लगे हों। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद इस पर सदन में चर्चा होती है और फिर सांसद वोटिंग करते हैं। इस दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करते हैं, बल्कि डिप्टी स्पीकर या सदन का वरिष्ठ सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।
हटाने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत
लोकसभा में प्रस्ताव सदन में उपस्थित सांसदों द्वारा बहुमत से पास होना जरूरी है, कोई दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती। स्पीकर को हटाने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत होती है। जितने सांसद वोट दे रहे हों, उनका 50 फीसदी से एक ज्यादा जरूरी है।
अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो तुरंत ही स्पीकर पद से हट जाता है। वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं और फिर सदन को दूसरा स्पीकर चुनना होता है।
स्पीकर को हटाने के लिए आज तक कभी वोटिंग नहीं हुई
सदन में स्पीकर को हटाने के लिए कई बार नोटिस दिया गया है। सदन में प्रस्ताव पर बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग नहीं हुई है।
पहली बार 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इस पर सदन में बहस हुई। विपक्ष ने उनपर कांग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाया था। सदन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और वोटिंग हुई नहीं।
दूसरी बार लोकसभा स्पीकर डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ 1967 में हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन पर कांग्रेस का पक्ष लेने का विपक्ष ने आरोप लगाया। विपक्ष का कहना था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। इस वक्त भी मतदान नहीं हुआ।
तीसरी बार 8वीं लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड के खिलाफ विपक्ष ने 1987 में अविश्वास प्रस्ताव रखा। उस वक्त बोफोर्स को लेकर कांग्रेस सरकार पर विपक्ष हमलावर था। विपक्ष का आरोप था कि जाखड नियमों का हवाला देकर विपक्ष को बोलने से रोकते हैं और सरकार को बचाते हैं। इस प्रस्ताव पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई।
13वीं लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उस वक्त एनडीए की सरकार थी। 2001 में नोटिस दिया गया, लेकिन प्रस्ताव खारिज हो गई। उन पर आरोप था कि सरकार के पक्ष में स्थगन प्रस्ताव को वह खारिज कर देते हैं।
2011 में 15वीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें 2जी, सीडब्लूजी घोटालों को लेकर बहस में बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। स्पीकर सरकार का बचाव कर रही हैं। इस नोटिस को भी खारिज कर दिया गया और वोटिंग तक बात नहीं पहुँची।
17वीं लोकसभा में 2020 में वर्तमान स्पीकर ओम बिरला ने कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष के जबरदस्त हंगामे पर विपक्षी सांसदों को निलंबित किया था। इसके विरोध में विपक्ष ने स्पीकर को हटाने का नोटिस देने की बात सार्वजनिक रूप से कीकांग्रेस लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर प्रस्ताव सदन में लाया ही नहीं जा सका।
गौरव गोगोई और पत्नी एलिजाबेथ ( साभार-ABP) कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई के पाकिस्तानी लिंक की जाँच असम स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी एसआईटी ने पूरी कर ली है। रिपोर्ट को 8 फरवरी 2026 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक कर दी। इसमें लोकसभा में विपक्ष के डिप्टी लीडर और उनकी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए गए।
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि राज्य सरकार ने पूरा केस केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दिए हैं, क्योंकि असम पुलिस के पास सीमित अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि ये लिंक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है और इनकी विस्तृत जाँच की जरूरत है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि एसआईटी जाँच में जो खुलासे हुए हैं वे बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक मौजूदा सांसद का शामिल होना, मामले को ज्यादा ‘गंभीर’ बनाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि गोगोई ने 2015 में नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में एक युवक के साथ जाकर हाई कमिश्नर अब्दुल बासित से मुलाकात की थी।
सीएम के मुताबिक, मैं सिंगापुर में था जब मुझे यह तस्वीर मिली कि हमारे असम के सांसद एक युवक के साथ पाकिस्तानी दूतावास गए थे। उन्होंने कहा कि आज तक कॉन्ग्रेस का भी कोई नेता गोगोई की तरह किसी प्रतिनिधिमंडल के साथ पाकिस्तानी दूतावास नहीं गया।
सरमा के मुताबिक, एलिजाबेथ पहले US के पूर्व सीनेटर टॉम उडाल की सहयोगी थीं, जो भारत विरोधी अरबपति जॉर्ज सोरोस से जुड़े हैं। ये लोग मोदी सरकार समेत दुनिया भर में राष्ट्रवादी सरकारों को गिराना चाहते हैं।
सरमा ने इस मीटिंग की एक वायरल तस्वीर भी दिखाई। उन्होंने कहा कि शुरुआत में लगा कि तस्वीर फोटोशॉप की हुई हैं, लेकिन बाद में पता चला कि यह तस्वीर असली थी। बताया जाता है कि इसके बाद अब्दुल बासित ने असम का दौरा किया, जो कोई इत्तेफाक नहीं था।
उन्होंने कहा कि एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई और पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख के ‘संबंधों’ का भी उन्हें पता चला। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, एलिजाबेथ ने 18 मार्च, 2011 से 17 मार्च, 2012 तक पाकिस्तान में LEAD पाकिस्तान नाम के एक पाकिस्तानी संगठन के लिए काम किया। इस दौरान, कथित तौर पर उनके अली तौकीर शेख के साथ करीबी रिश्ते बन गए, जिन्हें CM सरमा ने पाकिस्तानी आर्मी, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और देश के प्लानिंग कमीशन से कनेक्शन रखने वाला ‘पाकिस्तानी एजेंट’ बताया।
सरमा के मुताबिक, शेख सिर्फ पर्यावरणविद नहीं था, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर ‘भारत विरोध’ को बढ़ावा दिया। खासकर सिंधु जल संधि और दूसरे भारत-पाकिस्तान के झगड़ों को लेकर भारत की छवि धुमिल करने की कोशिश की। शेख ने 2010 और 2013 के बीच कम से कम 13 बार भारत का दौरा किया, जिससे भारत विरोधी गतिविधियों में उनकी भूमिका का शक जताया गया। सीएम सरमा ने कहा कि UPA सरकार ने उन्हें भारत आने से नहीं रोका, जबकि उनके भारत विरोधी कमेंट्स के बारे में सबको पता था।
सरमा ने SIT रिपोर्ट से कई चौंकाने वाली बातें बताईं, जिसमें दावा किया गया कि एलिज़ाबेथ का भारत ट्रांसफर हो गया था, लेकिन उनके ट्रांसफर के बाद भी उन्हें पाकिस्तानी फर्म से सैलरी मिलती रही। इतना ही नहीं, ट्रांसफर से एक साल पहले उन्हें भारत आने का अपॉइंटमेंट लेटर जारी किया गया था।
SIT जाँच के मुताबिक, LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान के तहत लाया गया, ताकि एलिजाबेथ की सैलरी पाकिस्तान से भारत ट्रांसफर की जा सके।
सरमा ने कहा कि LEAD पाकिस्तान सीधे एलिजाबेथ को सैलरी नहीं भेज सकता था, क्योंकि FCRA के तहत फंड ट्रांसफर सिर्फ भारतीयों को की जा सकती है और वह भारतीय नागरिक नहीं हैं। इसलिए उनकी सैलरी देने के लिए एक भारतीय संस्था LEAD इंडिया को फंड भेजा जाता था।
एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई, लीड इंडिया में भावना लूथरा के अंडर काम करती थीं, जिनसे SIT ने इस केस के सिलसिले में पूछताछ की थी। लीड इंडिया के फाइनेंशियल रिकॉर्ड की जाँच से पता चला कि LEAD इंडिया को ऑर्गनाइज़ेशनल काम के नाम पर LEAD पाकिस्तान से फंड मिला था। असल में यह पैसा गोगोई की सैलरी के लिए था।
सरमा ने कहा कि एलिजाबेथ के पाकिस्तान में एक्टिव बैंक अकाउंट थे, लेकिन उसने SIT को अकाउंट की डिटेल्स बताने से मना कर दिया। एक और चौंकाने वाली बात यह थी कि उसकी सैलरी भारत में उसके सीनियर से बहुत ज़्यादा थी। जहाँ उसे ₹2,50,000 मिलते थे, वहीं भावना लूथरा की सैलरी ₹50,000 थी।
जाँच के अनुसार, गोगोई को FCRA के ज़रिए पाकिस्तान से कुल ₹82.41 लाख मिले। LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान से ₹63.48 लाख मिले, जबकि सितंबर 2012 से नवंबर 2014 तक कुल ₹91.27 लाख मिले। इसमें से 90% रकम अकेले गौरव गोगोई की पत्नी को मिली।
इससे यह साफ हो जाता है कि LEAD इंडिया पूरी तरह से LEAD पाकिस्तान के अंडर था, यह एक अजीब अरेंजमेंट है क्योंकि आम तौर पर, इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन की कंट्री यूनिट्स का रैंक और स्टेटस बराबर होता है, और उन्हें रीजनल/ग्लोबल हेड्स चलाते हैं। लेकिन इस मामले में, एक लोकसभा MP की पत्नी पाकिस्तान के सीधे कंट्रोल वाले ऑर्गनाइज़ेशन के अंडर काम करती थी। सीएम ने इसे गंभीर मामला बताया।
जाँच के दौरान SIT ने यह एग्रीमेंट हाथ लगी। CM सरमा के मुताबिक, जब एलिजाबेथ पाकिस्तान से इंडिया ट्रांसफर हुई, तो वह इंडिया में काम करने वाली LEAD पाकिस्तान की ‘शैडो एम्प्लॉई’ बनी रही। उन्होंने कहा कि SIT ने LEAD इंडिया ऑफिस से पाकिस्तान से इंडिया में पैसे के फ्लो को दिखाने वाले डॉक्यूमेंट्स ज़ब्त किए हैं, और भावना लूथरा ने भी इसकी पुष्टि की है।
सरमा ने एक और सनसनीखेज आरोप लगाया कि एलिजाबेथ ने भारत से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पाकिस्तान को दी। इसमें शेख को भेजा गया 50 पेज का एक कॉन्फिडेंशियल डॉक्यूमेंट भी शामिल है। इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के सोर्स का जिक्र था। रिपोर्ट को कॉन्फिडेंशियल मार्क किया गया था। यह ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के सेक्शन 2 का सीधा उल्लंघन है।
पूछताछ के दौरान एलिजाबेथ ने माना कि उसने रिपोर्ट लिखी थी। CM के मुताबिक रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जिसमें एलिजाबेथ पर लो रिस्क, लो विजिबिलिटी रणनीति को बढ़ावा देने का आरोप है। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी एजेंटों को सलाह दी गई थी कि वे केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकारों और क्षेत्रीय राजनीतिक तनावों का फायदा उठाएँ। उन्होंने लिखा था कि PM मोदी के राज में केंद्र और राज्यों के बीच तनाव बढ़ेगा।
जब वह LEAD इंडिया में काम कर रही थीं, तो 6 बार इस्लामाबाद गईं। LEAD इंडिया छोड़ने और ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट में जुड़ने के बाद तीन बार फिर पाकिस्तान गईं। CM सरमा के मुताबिक, हर बार उन्होंने फ्लाइट के बजाय अटारी बॉर्डर के रास्ते का इस्तेमाल किया। SIT के मुताबिक, LEAD इंडिया की हेड भावना लूथरा ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि एलिजाबेथ पाकिस्तान क्यों गईं।
SIT का एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई का खुलासा
सीनेटर टॉम उडाल के जरिए जॉर्ज सोरोस से लिंक
अली तौकीर शेख के अंडर LEAD पाकिस्तान में नौकरी
पाकिस्तानी बैंक अकाउंट की जानकारी देने से मना कर दिया
LEAD इंडिया के साथ पहले से तय नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट (जॉइन करने से 18 महीने पहले जारी किया गया)
भारत में एंट्री आसान बनाने के लिए ‘शैडो नौकरी’ का इंतजाम
रिपोर्टिंग मैनेजर से 500% ज्यादा सैलरी और FCRA का उल्लंघन
पाकिस्तान से फंडिंग का सोर्स छिपाया
LEAD इंडिया मैनेजमेंट की तरफ से कोई निगरानी नहीं, सीधे पाकिस्तान को रिपोर्ट की गई
पाकिस्तान को कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट भेजना (5 अगस्त, 2014)
रिपोर्ट में सीक्रेट IB कम्युनिकेशन का जिक्र था
पाकिस्तानी एक्टर्स के लिए ‘लो रिस्क लो विज़िबिलिटी’ स्ट्रैटेजी की वकालत की गई
राज्य-लेवल पर बातचीत करने और केंद्र सरकार को बायपास करने की सलाह दी गई
खुफिया रिपोर्ट में केंद्र-राज्य के राजनीतिक तनाव का फायदा उठाया गया
अली तौकीर शेख के साथ नौकरी से पहले एक साथ 3 बार यात्रा
LEAD इंडिया में रहते हुए पाकिस्तान की 6 बार बिना इजाजत दौरा
ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट जॉइन करने के बाद पाकिस्तान के 3 और दौरे
मुख्यमंत्री ने गौरव गोगोई के बारे में भी बात की और कहा कि 2013 में अपने पहले लोकसभा चुनाव जीतने से 5 महीने पहले, गोगोई इजरायल की यात्रा के दौरान अपना पासपोर्ट खो जाने के बाद ज़मीनी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान गए थे। CM सरमा ने पाकिस्तान पहुँचने पर गोगोई के सिंगल एंट्री वीजा को मल्टीपल-एंट्री में अपग्रेड करने और बॉर्डर पर झड़पों के बीच पाकिस्तानी शहरों में ISI के आकाओं से मुलाकात का आरोप लगाया।
CM के मुताबिक, गोगोई का वीजा सिर्फ लाहौर के लिए था, लेकिन पाकिस्तान पहुँचने के बाद, उनके वीजा को इस्लामाबाद और कराची तक के लिए बढ़ा दिया गया। यह एक्सटेंशन पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा लिखे गए एक लेटर के आधार पर किया गया था। CM सरमा ने कहा कि SIT ने वीजा लोकेशन बढ़ाने के लिए मंजूरी दिखाने वाला पासपोर्ट हासिल कर लिया है।
CM के मुताबिक, पाकिस्तान जाने के बाद गोगोई की पर्सनैलिटी पूरी तरह बदल गई और उन्होंने दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में न्यूक्लियर पावर प्लांट, यूरेनियम रिज़र्व, बॉर्डर सिक्योरिटी, डिफेंस हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर, एयर पावर, घरेलू हथियार बनाने, जासूसी जैसे कॉन्फिडेंशियल मामलों से जुड़े पार्लियामेंट्री सवाल उठाए। उन्होंने नेशनल वॉटर मिशन स्ट्रेटेजी पर भी सवाल पूछे, जो एलिजाबेथ के काम के एरिया से जुड़ा मामला था।
CM ने एक इंटरव्यू का वीडियो क्लिप भी दिखाया, जिसमें गौरव गोगोई ने कहा था कि वह पाकिस्तान इसलिए गए थे क्योंकि उनकी पत्नी वहाँ काम कर रही थीं, लेकिन CM सरमा ने बताया कि उनकी पत्नी का उनके दौरे से एक साल पहले LEAD इंडिया में ट्रांसफर हो गया था।
हालाँकि गौरव गोगोई की बेटी ब्रिटिश नागरिक है, क्योंकि उसका जन्म लंदन में हुआ था। CM सरमा के मुताबिक उन्होंने अपने भारत में जन्मे बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया। उन्होंने दिल्ली में रीजनल पासपोर्ट द्वारा जारी किया गया सरेंडर सर्टिफिकेट दिखाया, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट 12 मई 2022 को सरेंडर किया गया था। CM सरमा ने इसे बहुत अफसोस की बात बताया कि असम के पूर्व CM तरुण गोगोई के बेटे ने अपने बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया।
CM ने एक और गंभीर आरोप लगाया कि जब बेटे कबीर गोगोई के पास इंडियन पासपोर्ट था, तो उसका धर्म हिंदू लिखा था, लेकिन उसके ब्रिटिश पासपोर्ट में किसी धर्म का जिक्र नहीं है। दूसरी तरफ बेटी माया गोगोई के ब्रिटिश पासपोर्ट में उसका धर्म क्रिश्चियन लिखा है।
CM सरमा ने कहा कि उनके बेटे का ईसाई में धर्मांतरण हो रहा है और गौरव गोगोई अब अपने ही परिवार में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।
हिमंता सरमा ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा, “SIT ने सबूत दिया है कि तीन लोगों का पाकिस्तान से सीधा लिंक है— अली तौकीर शेख, एलिजाबेथ गोगोई और गौरव गोगोई। SIT रिपोर्ट देखने के बाद हमारे कैबिनेट मंत्री भी हैरान रह गए।”
उन्होंने आगे कहा कि शुरू में असम पुलिस की CID जाँच कर रही थी। उसमें जब गंभीरता का अंदाजा लगा तो इंटरपोल की मदद की जरूरत पड़ी और असम पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्लासिफाइड डेटा तक पहुँच की जरूरत थी। कैबिनेट ने 7 फरवरी को रिपोर्ट पर चर्चा की। कैबिनेट ने कॉन्फिडेंशियल बातों को छोड़कर इसके कुछ हिस्से को बताने की मंजूरी दी। कैबिनेट ने आगे की जाँच के लिए रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजने का फैसला किया है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी सवाल उठाया है कि गौरव गोगोई से शादी के इतने साल बाद भी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई ने अपना UK वीजा क्यों रखा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि उनके बच्चे भी ब्रिटिश नागरिक क्यों हैं और भारतीय नागरिकता के लिए कोई आवेदन क्यों नहीं किया गया है।
भूपेन बोरा अश्लील इशारा करते (साभार - एक्स/@Namami_Bharatam) असम में राजनीतिक माहौल गरमाने के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा पर रैली के दौरान महिला नेता के सामने अश्लील हाथ का इशारा करने का आरोप लगा है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
भूपेन बोरा पार्टी की ‘परिवर्तन यात्रा’ के दौरान अनुचित हाथ का इशारा करते दिखे। उस समय कांग्रेस नेता गौरव गोगोई बस पर खड़े होकर जनसभा को संबोधित कर रहे थे। वीडियो में दिखता है कि भूपेन बोरा, असम विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया और कांग्रेस नेता मीरा बोरठाकुर से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान बोरा ने अपने दाहिने हाथ से बेहद आपत्तिजनक इशारा किया।
मीरा बोरठाकुर ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन बोरा ने इशारा जारी रखा। वहीं, देबब्रत सैकिया को इस दौरान मुस्कुराते हुए भी देखा गया।
See the gesture of Bhupen Borah, while talking to Mira Borthakur during Parivartan Rally in Guwahati.
मीडिया को संबोधित करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को इस घटना की कड़ी आलोचना की और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “एक महिला के प्रति किया गया यह अश्लील इशारा पूरी तरह अस्वीकार्य है और यह सम्मान की गंभीर कमी को दर्शाता है।”
मुख्यमंत्री ने आगे कहा, “अगर कांग्रेस सच में महिलाओं की गरिमा के लिए खड़ी है, तो उसे भूपेन बोरा को तुरंत पार्टी से निष्कासित करना चाहिए। इस तरह का व्यवहार राजनीति में स्वीकार्य नहीं है, खासकर उनके जैसे वरिष्ठ नेता से।”
हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी कहा कि वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि राज्य कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने वरिष्ठ पार्टी नेताओं, जिनमें एक महिला नेता भी शामिल थीं, उनकी मौजूदगी में ऐसा इशारा किया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “ऐसे लोग महिला मामलों के मंत्री, सामाजिक मामलों के मंत्री बनने की सोच रखते हैं, यहाँ तक कि मुख्यमंत्री बनने के सपने देखते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंच पर इस तरह का अशोभनीय इशारा कर रहे हैं।”
Assam: “How can a Senior Congress leader show such obscene gesture to a woman? If Congress does not expel them, these leaders won’t be accepted in the society. In the cabinet today, we will take an action.”
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि वह कैबिनेट बैठक के बाद होने वाली अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर विस्तार से बात करेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि इस मामले को महिला आयोग के पास भेज दिया गया है और आयोग से इसे गंभीरता से संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है।
इसके अलावा, हिमंत बिस्वा सरमा ने मीडिया की भी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि टीवी चैनलों और डिजिटल पोर्टलों ने इस वीडियो को प्रसारित नहीं किया और कार्यक्रम के फुटेज से क्लिप को हटा दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह संभव है कि मीडिया की नजर इस घटना पर नहीं पड़ी हो।
जस्टिस सूर्यकांत ने चीफ जस्टिस बनने के बाद कई आदेश/बयान दिए जिसकी सराहना की जा रही है और और करनी भी चाहिए। ट्रेड यूनियन आंदोलन को इंडसट्रीज़ को बंद होने का कारण बताना, रोहिंग्या को रेड कारपेट न देना का बयान, व्हाट्सप्प को निर्देश कि या भारत के कानून को मानों या देश छोड़ जाओ, UGC पर कहना कि यदि हम दखल नहीं देंगे तो समाज पर गंभीर खतरा पैदा होगा और प्रशांत किशोर को बैरंग लौटाना कुछ ऐसे विषय हैं जिन्हें लोगों ने पसंद किया है।
लेखक चर्चित YouTuber
कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उससे अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं और वह आदमी कभी कुछ गलती कर दे तो समाज उसे बख्शता भी नहीं है। मैं आजकल में चर्चित एक नेता का नाम नहीं लूंगा जिसने समाज और देश की सेवा में अपना जीवन लगा दिया लेकिन एक गलती (जो उसकी थी भी नहीं) के लिए लोग उसे फांसी लगाने के लिए आमादा हो गए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत से भी अपेक्षाएं बहुत हैं लेकिन उनका कार्यकाल असीमित नहीं है। एक वर्ष बाद 9 फरवरी को रिटायर हो जाएंगे। इसलिए मैं केवल एक आवेदन करना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट में जो वर्षों से मुक़दमे जंग खा रहे हैं, उन्हें निपटाने के लिए कोई रणनीति बनाएं।
ऐसे मुकदमों में एक है आंध्र प्रदेश में 2004 में लाया गया मुसलमानों के लिए 5% आरक्षण। मुख्यमंत्री Y. S. Rajasekhara Reddy ने मुसलमानों को BC-E मानकर आरक्षण दिया जिसे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। उसके बाद अध्यादेश लाया गया जिसे विधानसभा से पारित करा कर कानून बनाया गया लेकिन उसे भी हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। यह 5% आरक्षण क्योंकि राज्य में 50% को पार करता था इसलिए रेड्डी ने उसे 4% कर दिया।
2005 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि Prima Facie यह आरक्षण धार्मिक आधार पर लगता है और रोक लगा दी थी।
यह मामला हाई कोर्ट में कई लोग व्यक्तिगत तौर पर ले गए जिसमें प्रमुख थे वकील K. Kondala Rao and others जिन्होंने 2007 के मुस्लिम रिजर्वेशन एक्ट को हाई कोर्ट में चुनौती दी। चुनौती का आधार था कि आरक्षण धार्मिक आधार पर होने के कारण संवैधानिक नहीं है।
फरवरी 2010 में हाई कोर्ट ने मुस्लिमों को आरक्षण देने वाले कानून को खारिज कर दिया। लेकिन राज्य सरकार हाई कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। सरकार का शुरू से मत रहा कि मुसलमानों की 15 जातियों को उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन की वजह से आरक्षण दिया गया है। (15 specific Muslim sub-groups (communities) categorized as socially and economically backward)। ये आरक्षण फर्जी था क्योंकि मुस्लिमों में कोई जातिप्रथा नहीं होती और आर्थिक पिछड़ापन तो हर समुदाय में होता है और इसलिए यह पूरी तरह धार्मिक आधार पर ही था जिसका कोई प्रावधान संविधान में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले।
वह संविधान पीठ 2026 तक 16 वर्ष बाद भी नहीं बनी है और मुसलमानों के लिए आरक्षण जारी है। सोचिए अगर संविधान पीठ ने आरक्षण को अवैध कह दिया तो जो 2004 से अब तक मुस्लिम आरक्षण का लाभ उठा कर जो नौकरी पाए होंगे, उन्हें कैसे निकाला जाएगा।
इसलिए इस मुकदमे को और ऐसे अन्य 15-20 वर्षो से लंबित मुकदमों को समयबद्ध तरीके से निपटाना आवश्यक है और यही अपेक्षा है चीफ जस्टिस सूर्यकांत से कि वे इस पर ध्यान देंगे और कॉलेजियम को भी समाप्त करने के लिए कदम उठाएंगे जो उन्होंने आश्वासन दिया था।
अखबार ने 300 से ज्यादा स्टाफ को नौकरी से निकाल दिया है (साभार - सीबीएस न्यूज/द वाशिंगटन पोस्ट) अमेरिका के प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने अपने कर्मचारियों की लगभग एक-तिहाई संख्या में कटौती करने का फैसला किया है। यह बड़े पैमाने पर छंटनी बुधवार (4 जनवरी 2026) को घोषित की गई, जो कंपनी के सभी विभागों को प्रभावित करेगी। इस फैसले से अखबार की अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों की कवरेज में भारी कमी आने की आशंका है।
छंटनी के तहत स्पोर्ट्स सेक्शन को पूरी तरह बंद किया जा रहा है, जबकि कुछ खेल संवाददाताओं को फीचर्स सेक्शन में स्पोर्ट्स कल्चर कवर करने के लिए शिफ्ट किया जाएगा। इसके अलावा बुक्स, मेट्रो सेक्शन और प्रमुख न्यूज पॉडकास्ट ‘Post Reports’ को भी बंद करने की योजना है।
एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने इस कदम को कंपनी के लिए स्थिरता लाने वाला बताया, लेकिन कर्मचारियों और पत्रकारों ने इसे अखबार के इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से एक और खून-खराबे जैसा फैसला करार दिया है। गौरतलब है कि वाशिंगटन पोस्ट के मालिक अमेजन के संस्थापक और अरबपति जेफ बेजोस हैं।
मैट मरे ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पाठकों तक पहुँचने में आ रही मुश्किलों के कारण यह फैसला लेना जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ओवरसीज कवरेज भी कम की जाएगी, हालाँकि करीब 12 विदेशी ब्यूरो बनाए रखे जाएँगे, जिनका फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर होगा।
कर्मचारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने माना कि यह फैसला परेशान करने और चौंकाने वाला है। इससे पहले स्थानीय और विदेशी पत्रकारों ने जेफ बेज़ोस से अपनी नौकरियाँ बचाने की अपील भी की थी, लेकिन उनकी अपील सफल नहीं हो सकी।
वाशिंगटन पोस्ट की इस बड़ी छंटनी का असर भारत में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी पड़ा है। 300 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिनमें कई जाने-माने नाम शामिल हैं। इनमें शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर भी शामिल हैं।
इसके अलावा, नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा और यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह (Gerry Shih) को भी हटाया गया है। दोनों पहले से ही अखबार की भारत-विरोधी रिपोर्टिंग और पश्चिमी मीडिया के पक्षपाती रवैये से जुड़े चर्चित चेहरे माने जाते रहे हैं।
छंटनी के बाद कई प्रभावित पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। प्रांशु वर्मा ने लिखा कि उन्हें यह बताते हुए दिल टूट गया है कि उन्हें वाशिंगटन पोस्ट से निकाल दिया गया। उन्होंने अपने चार साल के अनुभव को सम्मान की बात बताया और कहा कि वे अपने कई प्रतिभाशाली साथियों के लिए भी दुखी हैं, जिन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।
वाशिंगटन पोस्ट से निकाले जाने के बाद यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह ने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि अखबार के साथ उनका समय उनके लिए एक सम्मान और सौभाग्य जैसा रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने सात साल से अधिक समय तक दुनिया भर की यात्रा की, एक ऐसे अखबार के लिए, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था।
गैरी शिह ने कहा कि उन्हें मिडिल ईस्ट टीम के बाकी सदस्यों के साथ हटा दिया गया है और दिल्ली से लेकर बीजिंग, कीव और लैटिन अमेरिका तक के अधिकांश सहयोगियों की भी नौकरी चली गई है। उन्होंने इस दिन को दुखद बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह सफर मजेदार, यादगार और चुनौतीपूर्ण रहा और उनकी टीम ने अपने काम के दौरान खूब असरदार काम किया।
प्रांशु वर्मा से जिन्होंने अपनी नौकरी बचाने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की
वाशिंगटन पोस्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, प्रांशु वर्मा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान से जुड़ी खबरों की कवरेज के जिम्मेदार थे। वे 2022 में द पोस्ट से जुड़े थे और इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समेत कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग की। इससे पहले वे बोस्टन ग्लोब में टेक्नोलॉजी पर लिख चुके थे और न्यूयॉर्क टाइम्स में कूटनीति और परिवहन से जुड़ी रिपोर्टिंग कर चुके हैं।
उनका पत्रकारिता करियर फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर से शुरू हुआ था, जहाँ उन्होंने न्यू जर्सी की राजनीति और जेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया। वे डेलावेयर विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से डिग्री हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद अब छंटनी की मार उनकी नौकरी पर भी पड़ी।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्मा ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से अपनी नौकरी बचाने की अपील भी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनका मीडिया संस्थान भारत में उन गिने-चुने प्लेटफॉर्म्स में से है, जो सरकार के डर के बिना अकाउंटेबिलिटी रिपोर्टिंग कर सकता है। हालाँकि, उनकी यह कोशिश काम नहीं आई।
बताया गया है कि वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग में मोदी सरकार के खिलाफ बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया और कई लेखों में सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले आरोप लगाए। उन्होंने गर्व के साथ उन रिपोर्ट्स का जिक्र किया, जिनमें भारतीय अरबपतियों को विशेष लाभ मिलने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में क्रोनी कैपिटलिज़्म, भारत की कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका निभाने के आरोप और अवैध घुसपैठ रोकने की भारत की मुहिम को मुसलमानों के खिलाफ कठोर निर्वासन अभियान के रूप में दिखाया गया था।
इन उदाहरणों को वर्मा ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया, जो वाशिंगटन पोस्ट की भारत को लेकर आलोचनात्मक और पक्षपाती अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग की छवि से मेल खाती रही है। फिर भी, इन सबके बावजूद छंटनी से उनकी नौकरी नहीं बच पाई।
वाशिंगटन पोस्ट में जर्नलिस्ट बनने के लिए ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की अहम भूमिका
जानकारी के मुताबिक, प्रांशु वर्मा ने यह साफ कर दिया था कि वाशिंगटन पोस्ट में भारतीय संवाददाता बनने के लिए क्या अपेक्षित है। उनके मुताबिक, भारत जो वर्तमान में राइट-विंग सरकार के तहत है और जिसे उदार (लिबरल) नजरियों में आलोचना का सामना करना पड़ता है, उसे संदिग्ध और आलोचनात्मक रूप में पेश करना चाहिए। देश की कार्रवाइयों को संवैधानिक लोकतंत्र की चुनौती के बजाय तानाशाही, बहुसंख्यकवाद और नैतिक गिरावट के नजरिए से दिखाना जरूरी था।
उदाहरण के तौर पर, वर्मा ने अवैध रोहिंग्या प्रवास से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों को, जिसमें जाली दस्तावेज, सीमा में घुसपैठ और आपराधिक आरोप शामिल हैं, साम्प्रदायिक उत्पीड़न की कहानी के रूप में पेश किया। इसी तरह, अरबपतियों को सरकारी भ्रष्टाचार के साधन के रूप में दिखाया गया, जबकि वे फ्री मार्केट के व्यावसायिक खिलाड़ी हैं।
उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के तनाव का स्रोत भौगोलिक या रणनीतिक कारण नहीं, बल्कि भारत की कथित नैतिक असफलताओं में हैं। नई दिल्ली की संसदीय संप्रभुता और नागरिक कल्याण की रक्षा की कोशिशों को बार-बार नकारात्मक रूप में दिखाया गया।
वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए फैलाई गई नैरेटिव पर गर्व किया और इस पक्षपाती और गलतियों से भरी रिपोर्टिंग के भारत पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को अपने नौकरी बचाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। विडंबना यह है कि उन्होंने भारतीय अरबपतियों पर लगातार हमला किया और भारत में सेंसरशिप की चिंता जताई, लेकिन खुद एक अमेरिकी अरबपति के कंधों पर काम के लिए निर्भर रहे।
उनकी बातों में शक्ति से स्वतंत्रता की चर्चा थी, लेकिन यह अमीर मालिक की कृपा पर आश्रित अपीलों से विरोधाभासी दिखती है। वर्मा के मामले ने यह साबित किया कि लिबरलवाद कभी-कभी स्पष्ट पाखंड और डबल स्टैंडर्ड से जुड़ा हो सकता है।
गैरी शिह का प्रोफाइल और विवादास्पद रिपोर्टिंग
वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, गैरी शिह ने 2018 में अखबार में शामिल होकर यरुशलम ब्यूरो चीफ के रूप में इजराइल, फिलिस्तीनी इलाके और मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों की कवरेज की। इससे पहले वे 2021-2025 तक नई दिल्ली ब्यूरो चीफ रहे और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में राजनीति, विदेश नीति, खुफिया और टेक्नोलॉजी पर रिपोर्टिंग की।
शिह ने इससे पहले एसोसिएटेड प्रेस, रॉयटर्स और द न्यूयॉर्क टाइम्स में भी काम किया। उनकी भारत पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग के लिए 2024 में पुलित्जर पुरस्कार के फाइनलिस्ट होने का गौरव हासिल हुआ और उन्हें 2020 ओसबोर्न इलियट पुरस्कार भी मिला। वह चीनी मूल के हैं।
मीडिया रंबल के अनुसार, शिह ने बीजिंग से AP के लिए रिपोर्टिंग की, जहाँ उन्होंने चीन में सरकार की कार्रवाई, घरेलू राजनीति और विदेश नीति को कवर किया। उन्होंने रॉयटर्स के लिए सिलिकॉन वैली की सोशल मीडिया कंपनियों और न्यू यौर्क टाइम्स के लिए नॉर्दर्न कैलिफ़ोर्निया की रिपोर्टिंग भी की।
विशेष रूप से यह कहा जा सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट में भारत-विरोधी रुख रखना कोई अनोखी बात नहीं, बल्कि यह कर्मचारी बनने की प्रवृत्ति मानी जाती है। इसी परंपरा के अनुरूप, गैरी शिह ने अपने लेखन का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की सरकार के साथ मिलकर भारत पर बिना ठोस प्रमाण आरोप लगाने के लिए भी किया।
इस मिलीभगत ने पत्रकारिता की ईमानदारी की काँच की दीवारों को तोड़ दिया
रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) और कनाडाई सरकार ने 14 अक्टूबर 2024 को भारत के खिलाफ गंभीर, लेकिन बिना आधार के आरोप लगाए। आरोप यह थे कि भारतीय एजेंट, अधिकारी और वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ, जिनमें उस समय भारत के उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा भी शामिल थे, उन्होंने कनाडाई धरती पर अपराधिक गतिविधियों में भाग लिया।
कनाडा के इन दावों पर वाशिंगटन पोस्ट ने घंटों के भीतर एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसे गैरी शिह और ग्रेग मिलर ने लिखा। इस रिपोर्ट में अमित शाह को भी कथित अवैध आपराधिक ऑपरेशंस में शामिल बताया गया। लेख में सूत्र के रूप में कनाडा की नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर नतालि ड्रूइन और विदेश मंत्रालय के डिप्टी मिनिस्टर डेविड मॉरिसन को उद्धृत किया गया।
हालाँकि बाद में यह खुलासा हुआ कि अखबार को RCMP और कनाडाई अधिकारियों के आरोपों से पहले ही तैयार ब्रीफिंग मिल चुकी थी। रिपोर्ट वास्तव में प्रेस कॉन्फ़्रेंस का इंतजार कर रही थी। इसमें आतंकवादी हरेदीप सिंह निज्जर की हत्या और अन्य लक्षित हमलों को भारत पर आरोपित किया गया। कनाडा के NSA ने सभी आरोपों को मीडिया हाउस तक पहुँचाने का आदेश पहले ही दे दिया था, जबकि कोई औपचारिक निष्कर्ष या सबूत सार्वजनिक नहीं हुए थे।
इस खुलासे ने वाशिंगटन पोस्ट की स्वतंत्र पत्रकारिता और अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। यह साबित हो गया कि इसके लेखक ओटावा के प्रभाव में आकर न्यू दिल्ली की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले औजार के रूप में काम कर रहे थे।
अगर आप चाहें, मैं अब तक के सभी घटनाक्रम और पत्रकारों के प्रोफाइल को मिलाकर एक संयुक्त हिंदी न्यूज आर्टिकल तैयार कर सकता हूँ, जो वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी, विवादास्पद रिपोर्टिंग और भारत-विरोधी गतिविधियों को पूरी तरह कवर करे।
भारत पर लगातार हमले, कॉन्सपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा
वाशिंगटन पोस्ट के माध्यम से गैरी शिह ने भारत पर कई तरह के आरोप लगाए है। उनके अनुसार भारत ने नेटफ्लिक्स और अमेजन से दर्दनाक कंटेंट हटवाया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक पर घृणा भाषण फैलाया और पाकिस्तान में आतंकवादियों की हत्या करवाई।
उनके लिए सुनहरा मौका तब आया जब अमेरिका ने कहा कि भारत ने 2023 में प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नून को मारने का प्रयास किया।
इस पर गैरी शिह ने प्रचार चैनल द वायर पर करण थापर से बातचीत में दावा किया कि पूर्व R&AW प्रमुख समंत कुमार गोयल पूरी साजिश में शामिल थे। उन्होंने अपने लेख में लिखा, “अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया है कि पन्नून को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन को उस समय के रॉ प्रमुख सामंत गोयल ने मंजूरी दी थी।” बाद में 2024 में अपने इंटरव्यू में उन्होंने इसे “अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ की समझ के अनुसार” के रूप में बचाव करने की कोशिश की। यह मामला भी दिखाता है कि शिह ने लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे चुनौतीपूर्ण रूप में पेश करने का प्रयास किया।
गैरी शिह ने अपने बयान में कहा “यह कोई अकेली या अलग घटना नहीं थी, बल्कि इस पर एजेंसी के उच्च अधिकारियों, जिनमें सचिव समंत कुमार गोयल भी शामिल हैं की मंजूरी थी। यदि हम अपने स्रोतों से मिली जानकारी पर ध्यान दें, तो यह साफ है कि उन्हें इन खतरों को खत्म करने के लिए दबाव डाला गया था और यही हमारी समझ का आधार है कि यह एक ऑपरेशन था।”
हालाँकि, उनकी यह रिपोर्टिंग कई सवालों के घेरे में आई, खासकर कनाडाई सरकार के साथ उनकी साझेदारी और भारत पर बार-बार झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को देखते हुए। शिह ने 2022 में भारत की तुलना चीन से करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई, जो उनके बौद्धिक धोखे और पक्षपात को उजागर करता है।
मोदी सरकार ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और रूस-यूक्रेन युद्ध में पश्चिमी दबाव के सामने झुकी नहीं, लेकिन शिह ने इसे भी आलोचना का विषय बनाया क्योंकि सरकार ने उनके पसंदीदा पश्चिमी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया।
उन्होंने कहा “मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक अल्पसंख्यकों का व्यवहार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर मोदी चीन के समान पृष्ठ पर हैं। पश्चिमी पाखंड की यह धारणा भारतीय कूटनीतिज्ञों की ओर से आ सकती है, लेकिन यह वास्तव में चीनी कूटनीतिज्ञों से आती हो सकती है।”
यह टिप्पणी उन्होंने कारवाँ के एक लेख पर प्रतिक्रिया में दी थी, जो लिबरल लेखक सुषांत सिंह द्वारा लिखा गया था। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कन्वल सिब्बल ने शिह की इस तुलना को सटीक रूप से खारिज करते हुए कहा।
“कोई भी व्यक्ति जो बौद्धिक ईमानदारी रखता है, भारत और चीन को इन मुद्दों पर बराबर नहीं मान सकता। शिह को चीन से निकाला गया और अब वह भारत की स्वतंत्रता का लाभ उठा रहा है।” यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि गैरी शिह लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में लगे रहे।
वाशिंगटन पोस्ट की हालिया छंटनी और कर्मचारियों की बर्खास्तगी मीडिया हाउस में पिछले कुछ वर्षों में जारी बायआउट और स्टाफ कटौती का हिस्सा है। ये बदलाव उस समय की आलोचना और संपादकीय निर्णयों के कारण हुए, जब अखबार ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले किसी राष्ट्रपति उम्मीदवार का समर्थन न करने का निर्णय लिया। यह निर्णय अमेज़न के संस्थापक जेफ बेज़ोस ने लिया था। इसके बाद अखबार ने कई हजार सब्सक्राइबर खो दिए।
दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक से अधिकांश राष्ट्रपति चुनावों में अखबार ने उम्मीदवार का समर्थन किया और सभी उम्मीदवार डेमोक्रेट्स रहे। इसके अलावा, बेज़ोस द्वारा पिछले साल अखबार के ओपिनियन सेक्शन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार के दृष्टिकोण पर केंद्रित करने का निर्णय लेने के बाद, उस विभाग के संपादक ने इस्तीफा दे दिया था।
कंपनी को पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है और इसमें भारत और मोदी सरकार के प्रति गहरी पूर्वाग्रह और नफरत रही है। प्रांशु वर्मा और गैरी शिह ने इस पक्षपाती नैरेटिव को आगे बढ़ाने में पूरी मेहनत की और इस अनैतिक परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालाँकि, इस नए घटनाक्रम ने कंपनी की आंतरिक समस्याओं पर फिर से ध्यान आकर्षित किया। यह साबित हुआ कि विशेष रूप से भारत को निशाना बनाकर रिपोर्टिंग करने वाले आधुनिक पत्रकार (ब्राउन सेपियंस) भी लिबरल मीडिया में नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं रखते। चाहे उनका देश विरोधी दृष्टिकोण कितना भी स्पष्ट क्यों न हो, वे आखिरकार हटा दिए जाते हैं या आसानी से बदल दिए जाते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में जिस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Agreement के ढाँचे पर सहमति बनी है, उसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है।
भारत और अमेरिका, दोनों ही देश इस बात को समझते हैं कि आने वाले समय में व्यापार केवल मुनाफे का साधन नहीं रहेगा, बल्कि भरोसेमंद साझेदारी, तकनीकी सहयोग और रोजगार सृजन का मजबूत आधार बनेगा।
यही वजह है कि इस अंतरिम ट्रेड डील को जल्दबाजी में किया गया फैसला नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक संतुलित ढाँचा कहा जा रहा है।
इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुलने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।
मोदी ने बताया दोनों देशों के लिए अच्छी खबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को X पर एक पोस्ट में इसे भारत-अमेरिका के लिए बहुत अच्छी खबर बताया है। PM मोदी ने कहा, “दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) के लिए एक ढाँचा तय हुआ है। मैं राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाने में व्यक्तिगत रुचि दिखाई।”
Great news for India and USA!
We have agreed on a framework for an Interim Trade Agreement between our two great nations. I thank President Trump for his personal commitment to robust ties between our countries.
उन्होंने लिखा, “यह ढाँचा हमारे साझेदारी संबंधों में बढ़ती गहराई, भरोसे और ऊर्जा को दिखाता है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी और भारत के मेहनती किसानों, उद्यमियों, MSMEs, स्टार्टअप इनोवेटर्स, मछुआरों और अन्य लोगों के लिए नए अवसर खुलेंगे। इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। भारत और अमेरिका दोनों नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह ढाँचा निवेश और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करेगा।”
वहीं केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बताया है कि इससे भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार के दरवाजे खुलेंगे। उन्होंने कहा, “इसका सबसे ज्यादा फायदा छोटे उद्योगों (MSMEs), किसानों और मछुआरों को होगा। निर्यात बढ़ने से महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।”
अंतरिम ट्रेड डील का मतलब क्या है और यह क्यों जरूरी थी?
अंतरिम ट्रेड डील का सीधा मतलब है कि यह कोई अंतिम या पूर्ण व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाले बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement- BTA) की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।
फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BTA की औपचारिक शुरुआत की थी, लेकिन ऐसे व्यापक समझौतों को अंतिम रूप देने में आमतौर पर कई साल लग जाते हैं। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने तय किया कि पहले एक ऐसा ढाँचा बनाया जाए, जिससे व्यापारिक रिश्तों को तुरंत गति मिल सके।
इस अंतरिम ढाँचे के जरिए दोनों देशों ने बाजार तक पहुँच बढ़ाने, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत व भरोसेमंद बनाने पर सहमति जताई है।
यह समझौता इस बात का भी संकेत देता है कि भारत और अमेरिका लंबे समय तक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वे वैश्विक व्यापार में एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।
अमेरिका का बाजार खुला: भारत को व्यापार और निर्यात में क्या मिला?
इस समझौते से भारत को जो सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है, वह है अमेरिका के 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार तक बेहतर और आसान पहुँच। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, इससे भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा होंगे।
खास बात यह है कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% करने पर सहमति जताई है, जिससे भारतीय सामान वहाँ पहले के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। कपड़ा और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प और कुछ चुनिंदा मशीनरी जैसे सेक्टरों को इस फैसले से सीधा फायदा मिलेगा।
The India-US Trade Deal will not only provide greater access to the US market for Indian products but also support our labour intensive sectors. Additionally, it will give a big boost to our digital infrastructure.#IndiaUSJointStatementpic.twitter.com/AAUB8x9MGM
ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत में बड़ी संख्या में छोटे उद्योग, कारीगर और श्रमिक काम करते हैं। इसके अलावा जेनेरिक दवाओं, रत्न और आभूषण, हीरे और विमान के पुर्जों जैसे उत्पादों पर अमेरिका ने टैरिफ पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई मजबूती मिलेगी।
इसके अलावा दोनों दोनों देश टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स, जिसमें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले दूसरे इक्विपमेंट शामिल हैं, इनमें ट्रेड बढ़ाने और उभरते टेक्नोलॉजी सेक्टर में जॉइंट कोऑपरेशन को बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं।
किन सेक्टरों में रोजगार और MSMEs को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
यह अंतरिम ट्रेड डील केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए नहीं, बल्कि छोटे उद्योगों के लिए भी अहम मानी जा रही है। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प और होम डेकोर जैसे क्षेत्रों में MSMEs की बड़ी भागीदारी है। अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की माँग पहले से मौजूद है और अब टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद वहां और तेजी से पहुंच सकेंगे।
सरकार का दावा है कि निर्यात बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। महिलाओं और युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ श्रम की जरूरत ज्यादा होती है। मछुआरों और फिशरी सेक्टर को भी अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है, जिससे तटीय इलाकों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।
अनाज, मसाले और सब्जियाँ: किसानों को कैसे मिला पूरा संरक्षण?
इस समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख अनाजों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
इसका मतलब यह है कि अमेरिकी अनाज भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर नहीं आ सकेंगे और घरेलू किसानों को कीमतों में गिरावट का डर नहीं रहेगा।
गौरतलब है कि इस ट्रेड डील को लेकर विपक्ष ने भी अफवाहें फैला कर किसानों और छोटे उद्यमियों के भड़काने की कम कोशिश नहीं की थी। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे केंद्र सरकार को भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की भी चेतावनी दी थी।
उस दौरान भी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान का हवाला देते हुए खरगे के तमाम आरोपों का खंडन करते हुए बताया था कि यह समझौता समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाएगा। भाषण में खरगे ने कहा था कि व्यापार समझौता किसानों को बर्बाद कर देगा।
इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था, “मोदी सरकार ने अमेरिका के सभी कृषि उत्पादों पर जीरो शुल्क लगाने का जो निर्णय किया है उससे एक बात साफ है कि अमेरिका से आने वाला कपास, गेहूँ, सब्जियाँ और दूसरे कृषि उत्पाद भारतीय किसानों की फसलों पर संकट होगा।”
जबकि आँकड़े साफ कहते हैं कि यह समझौता सिर्फ किसानों के हितों को ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र के तमाम कारीगरों को भी पूरी तरह से ध्यान में रखकर लिया गया है। मसालों के मामले में भी भारत ने पूरी सख्ती दिखाई है। काली मिर्च, लौंग, सूखी हरी मिर्च, दालचीनी, धनिया, जीरा, हींग, अदरक, हल्दी, अजवाइन, मेथी, चक्रफूल, कसिया, सरसों, राई और अन्य पाउडर मसालों को पूरा संरक्षण दिया गया है।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
भारत की पहचान ही मसालों से जुड़ी हुई है और इनसे लाखों किसानों की रोजी-रोटी चलती है। इस समझौते में यह सुनिश्चित किया गया है कि अमेरिकी मसाले या उनके विकल्प भारतीय बाजार में आकर घरेलू उत्पादन को नुकसान न पहुँचा सकें।
सब्जियों के मामले में भी आलू, मटर, बीन्स और अन्य दलहनी सब्जियों के साथ-साथ फ्रोजन, डिब्बाबंद और अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियों पर कड़ा नियंत्रण रखा गया है, ताकि सब्जियों के मामले में भी भारतीय किसानों की आमदनी सुरक्षित रहे।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
डेयरी सेक्टर क्यों रहा सरकार की ‘रेड लाइन’?
डेयरी सेक्टर को लेकर भारत ने इस समझौते में सबसे कड़ा रुख अपनाया है। दूध, क्रीम, बटर, घी, चीज, योगर्ट, बटर मिल्क, व्हे प्रोडक्ट्स और अन्य डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका जैसे देश की बड़ी डेयरी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधी एंट्री नहीं दी गई है।
(साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
इसका सीधा फायदा भारत के करोड़ों छोटे पशुपालकों को मिलेगा, जिनकी आजीविका दूध उत्पादन पर निर्भर है। भारत का डेयरी सेक्टर सहकारी मॉडल पर आधारित है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस समझौते ने यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के नाम पर इस सेक्टर को कमजोर न किया जाए।
मेक इन इंडिया, तकनीक और भविष्य की साझेदारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत और अमेरिका दोनों के लिए अच्छी खबर बताते हुए कहा है कि यह ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती देगा और निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ाएगा। दोनों देश इनोवेशन, डेटा सेंटर्स, जीपीयू, ऊर्जा और उन्नत तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में मिलकर काम करने पर सहमत हुए हैं।
भारत ने अगले पाँच साल में अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पाद, विमान और तकनीक खरीदने का इरादा भी जताया है, जिससे व्यापार संतुलन बना रहेगा और सप्लाई चेन मजबूत होगी। भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील का यह ढाँचा केवल व्यापार बढ़ाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक संतुलित समझौता है, जिसमें भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।
एक तरफ जहाँ भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील कृषि और खाद्य उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। यही संतुलन इस समझौते को खास बनाता है और यही कारण है कि इसे भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों के लिए एक मजबूत कदम माना जा रहा है।