बंगाल में TMC नेता के घर मिले 626 कारतूस-पिस्टल, ममता के गुंडों को पुलिस ने दबोचा: 1.07 रूपए करोड़ कैश भी बरामद

       TMC नेता ने खेत में दबा रखे थे ₹500 के नोटों से भरे बोरे, तृणमूल जिला परिषद सदस्य के घर से कैश बरामद
पश्चिम बंगाल में ममता के गुंडों और भ्रष्ट नेताओं का आतंक इस कदर बढ़ चुका है कि अब उनके घर शरीफों के रहने लायक नहीं, बल्कि बारूद के ढेर और अवैध संपत्तियों के गोदाम बन चुके हैं। TMC नेताओं के काले कारनामों का एक और खौफनाक सच सामने आया है। पुलिस ने भारी छापेमारी कर जिला परिषद के रसूखदार TMC नेता अजीत साहा और बडुरिया नगर पालिका के चेयरमैन दीपांकर भट्टाचार्य को दबोच लिया है।

शुभेंदु सरकार लगातार अपराधियों पर नकेल कसने का काम कर रही है। इसी कड़ी में तृणमूल कांग्रेस(TMC) के नेताओं के ठिकानों पर अकूत संपत्ति और नकदी मिलने का सिलसिला जारी है। किसी नेता के घर में मोटी रकम पकड़ी गई है तो किसी के फार्म हाउस से बोरों में भरा कैश बरामद किया गया है।

इनके पास से जो मिला, उसे देखकर पूरा बंगाल दहल गया है। TMC नेता अजीत साहा के घर जब पुलिस ने धावा बोला, तो वहाँ का नजारा किसी खूंखार अपराधी के ठिकाने जैसा था। घर के कोने-कोने से 27 लाख रुपए की गद्दी, 1 पिस्टल, 1 एयरगन और भारी मात्रा में 626 जिंदा कारतूस बरामद हुए हैं।

इतना ही नहीं, गुंडागर्दी और अय्याशी के सबूत के तौर पर 52 बोतल विदेशी शराब भी जब्त की गई है। यह वही साहा बंधु हैं जिन पर पहले भी हिंसा और जबरन वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं। दूसरी तरफ, ममता के एक और खास नेता दीपांकर भट्टाचार्य के पास से 80 लाख रुपए कैश मिले।

और तो और, TMC दफ्तर के पास जूट के खेत को खोदकर नोटों से भरे बैग और बोरे निकाले गए। इन नेताओं ने बंगाल को पूरी तरह लूट और आतंक का केंद्र बना दिया है। 

खेत में दबा रखे थे 500 रूपए के नोटों से भरे बोरे, खोला तो निकले 2.2 करोड़ रुपए… छापेमारी के बाद गिरफ्तार

TMC नेता और बदुरिया नगर निगम के चेयरमैन दीपांकर भट्टाचार्य की अकूत संपत्ति का खुलासा हुआ है। बुधवार (28 मई 2026) को पुलिस ने उनके खेत की खुदाई में 500 रूपए के नोटों से भरे बोरे और ट्रॉली बैग बरामद किए। तस्वीर सामने आई जिसमें पुलिस कंधों पर इन बोरों को ढोकर अपने वाहन में रख रही है। पुलिस ने बताया कि इसकी कीमत लगभग 2 करोड़ 24 लाख रूपए है। इसके अलावा बोरों में कुछ जरूरी दस्तावेज भी मिले हैं।

पुलिस को यह कामयाबी उनकी गिरफ्तारी के बाद हासिल हुई। पुलिस ने मंगलवार (26 मई 2026) को भट्टाचार्य को 80 लाख रूपए नकदी और 4000 तिरपाल के साथ उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने बताया कि इस रकम और सामान सरकारी था जो राहत के लिए लोगों में बाँटा जाना था। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने TMC नेता को कोर्ट में पेश कर 6 दिन की रिमांड पर लिया।

TMC नेता भट्टाचार्य से पूछताछ में पुलिस को इस खेत की जानकारी मिली। तभी पुलिस अपने साथ भट्टाचार्य को खेत में ले आई, जहाँ जमीन के नीचे कैश से बरे बोरे बरामद किए गए। इसके अलावा पुलिस ने आसपास के खेतों में भी ड्रोन से तलाशी ली। इसके बाद पुलिस ने भट्टाचार्य के पीए शमीम गाजी को भी गिरफ्तार कर लिया।

उत्तर 24 परगना से TMC नेता और उसके भाई के घर से मोटी रकम मिली

इससे पहले उत्तर 24 परगना के मछलंदपुर में पुलिस ने राशन घोटाले के आरोप में जेल में बंद TMC सरकार में खाद्य मंत्री रहे ज्योतिप्रिय मल्लिक के करीबी TMC जिला परिषद सदस्य अजीत साहा के घर मंगलवार (26 मई 2026) को छापेमारी की। यहाँ पुलिस को 27,80,200 रूपए नकदी, 666 जिंदा कारतूस, 61 खाली कारतूस, एक एयर गन, छर्रों का डिब्बा, एक स्पोर्ट्स शूटिंग राइफल और विदेशी शराब की 52 बोतलें भी पुलिस ने जब्त की। पुलिस ने अजीत साहा और उनके भाई सुजीत उर्फ सुबीर साहा को भी गिरफ्तार किया।

दुरंतो एक्सप्रेस में टॉयलेट सीट पर रखे दिखे बर्तन, Video हुआ वायरल

                                                    दुरंतो एक्सप्रेस ट्रेन की टॉयलेट सीट पर दिखे बर्तन

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (IRCTC) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के बाद भेजा गया है जिसमें ट्रेन नंबर 12223, मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस-एर्नाकुलम दुरंतो एक्सप्रेस के अंदर कैटरिंग स्टाफ को ट्रेन के टॉयलेट में बर्तन धोते हुए नजर आए थे।

सोशल मीडिया पर सामने आए इस वीडियो ने लोगों में काफी नाराजगी पैदा कर दी। बताया जा रहा है कि यह वीडियो मुंबई-एर्नाकुलम दुरंतो एक्सप्रेस की फर्स्ट एसी कोच H1 में रिकॉर्ड किया गया था। वीडियो में कैटरिंग/कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी टॉयलेट के अंदर प्लेट, कटोरी और कटलरी (खाने के बर्तन) कथित तौर पर धोते हुए दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में प्लास्टिक की एक क्रेट (टोकरा) में रखी चीनी मिट्टी की प्लेटें और कटोरियाँ टॉयलेट सीट पर रखी नजर आती हैं।

फर्स्ट एसी कोच में यात्रा कर रहे एक यात्री ने यह देखने के बाद स्टाफ से बहस की और उसका वीडियो बना लिया। वीडियो क्लिप में यात्री कर्मचारी से टॉयलेट में बर्तन धोने और उन्हीं बर्तनों में खाना परोसने को लेकर सवाल करता दिखाई देता है। हालाँकि, कर्मचारी ने कहा कि वह अभी-अभी वहाँ आया है और उसने कैटरिंग स्टाफ को टॉयलेट में बर्तनों के साथ नहीं देखा।

IRCTC के ठेकेदार के तहत काम करने वाला कैटरिंग कर्मचारी यह नहीं बता पाया कि वह वहाँ क्या कर रहा था। उसने केवल अपना नाम सुरेश बताया। वीडियो से ऐसा लग रहा था कि कैटरिंग स्टाफ ने टॉयलेट के अंदर बर्तन धोए और फिर उन्हें टॉयलेट सीट पर रखी क्रेट में रख दिया।

यह वीडियो X जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद खासकर प्रीमियम और महँगे किराए वाली ट्रेन में सफाई और खानपान के मानकों को लेकर लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिली। यात्री ने इस मामले में IRCTC, रेल मदद (Rail Madad) और रेलवे मंत्रालय में औपचारिक शिकायत भी दर्ज कराई।

FSSAI के नोटिस के अनुसार, यह तरीका खाद्य सुरक्षा और मानक (फूड बिजनेस लाइसेंसिंग और रजिस्ट्रेशन) नियम, 2011 के शेड्यूल-4 का उल्लंघन है। इन नियमों के तहत खाद्य कारोबार से जुड़े संस्थानों को भोजन बनाने, संभालने, धोने और सफाई के दौरान पूरी स्वच्छता बनाए रखना जरूरी होता है ताकि खाने और खाने के संपर्क में आने वाली चीजों में किसी तरह की गंदगी या संक्रमण न फैले।

FSSAI ने कहा कि यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के जरिए उसके ध्यान में आया। इसके बाद IRCTC को निर्देश दिया गया है कि वह इस घटना को लेकर तथ्यात्मक जानकारी और विस्तृत जवाब पेश करे जिसमें ऑनबोर्ड कैटरिंग स्टाफ की भूमिका के बारे में भी जानकारी दी जाए।

अब तक IRCTC ने इस मामले पर कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है। हालाँकि, X पर घटना साझा करने वाली एक पोस्ट पर जवाब देते हुए IRCTC ने सामान्य प्रक्रिया के तहत यात्री से PNR नंबर और फोन नंबर माँगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ट्रेन का कैटरिंग ठेका वृंदावन फूड प्रोडक्ट्स कंपनी के पास है जो RK ग्रुप का हिस्सा है। यह कंपनी रेलवे की कई प्रीमियम ट्रेनों में खानपान सेवा देने वाली सबसे बड़ी ठेकेदार कंपनियों में गिनी जाती है। रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले में कैटरिंग ठेकेदार पर 50,000 रूपए का जुर्माना लगाया गया है। साथ ही, जिस कर्मचारी ने यह हरकत की उसे ड्यूटी से हटाने का आदेश दिया गया है। ट्रेन के पैंट्री कार मैनेजर को भी कड़ी चेतावनी दी गई है।

उत्तर प्रदेश : प्रयागराज में पादरी ने बेटे संग मिलकर हिंदू प्रिंसिपल का किया बलात्कार

        कॉन्वेंट स्कूल की प्रिंसिपल ने बिशप और उनके बेटे पर गैंगरेप का लगाया आरोप (साभार: Dainik Bhaskar)
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में ‘डायसिस ऑफ लखनऊ’ के अंतर्गत संचालित कॉन्वेंट स्कूल बिशप जॉनसन गर्ल्स स्कूल एंड कॉलेज की हिंदू महिला प्रिंसिपल से गैंगरेप का मामला सामने आया है। प्रिंसिपल ने आरोप लगाया कि नौकरी से निकालने की धमकी देते हुए संस्था के चेयरमैन बिशप मॉरिस एडगर दान, उनके बेटे एलन दान और सेक्रेटरी राकेश चत्री ने बलात्कार किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़ित प्रिंसिपल ने कर्नलगंज थाने में 23 मई 2026 को 4 लोगों के खिलाफ शिकायत दी है। शिकायत में प्रिंसिपल ने बताया कि बिशप और उनके साथियों ने उनसे यह भी कहा कि तुम्हें ऊपर के अधिकारियों को संतुष्ट करना है तभी तुम्हारी नौकरी बची रहेगी। प्रिंसिपल ने इस मामले में अपने पूर्व पति विशान नोवेल सिंह को भी शामिल बताया है।

पुलिस के मुताबिक, प्रिंसिपल मूलरूप से बिहार की रहने वाली है, जो करीब 15 साल पहले प्रयागराज आई थी। यहाँ कटरा के एक स्कूल में वह हेडमिस्ट्रेस रहीं, तभी से वह यहाँ काम कर रही हैं। महिला ने बताया कि उसका दो साल पहले पति से तलाक हो चुका है। आरोपित उनके तलाकशुदा होने का फायदा उठाते हैं और एक साल से शारीरिक उत्पीड़न कर रहे हैं।

पीड़िता ने नौकरी जाने के डर से इस बारे में किसी को खुलकर नहीं बताया। उन्होंने बताया कि 07 मई 2026 को बिशप मॉरिस एडगर दान ने उन्हें फोन करके सेक्रेटरी राकेश चत्री के घर जाने को कहा, लेकिन उन्होंने मना किया तो गंदी-गंदी गालियाँ देने लगा और नौकरी से भी निकालने की धमकी दी। उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपितों ने पूर्व प्रिंसिपल को भी इसी तरह टॉर्चर कर स्कूल से निकाल दिया था।

मामले में एसीपी कर्नलगंज विमल किशोर मिश्र ने बताया कि पीड़ित प्रिंसिपल की शिकायत पर FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस अब मामले की जाँच में जुट गई है। महिला की भी मेडिकल जाँच और बयान दर्ज करने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

क्या शिक्षा मंत्री भाजपा के 'राहुल गाँधी' बन रहे हैं? ‘दोबारा जाँची जाएँगी 12वीं की कॉपियाँ’: CBSE की 40 करोड़ पन्नों की चेकिंग में ‘गड़बड़ी’ की शिक्षा मंत्री ने ली जिम्मेदारी

                                            केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (फोटो साभार : X_@ANI)

कभी paper leak तो अब CBSE में गड़बड़ी, आखिर ऊर्जावान केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान छात्र/छात्राओं के जीवन से खिलवाड़ करने वालों पर कब नकेल कसेंगे? Paper Leak घोटाले में पेपर लीक करने वालों को तो दबोजा लेकिन पेपर खरीदने वालों को नहीं, क्यों? अप्रत्यक्ष रूप से देखा जाये तो ये भी बराबर के दोषी हैं।        

CBSE 12वीं क्लास की कॉपियों की चेकिंग में इस बार बड़ी लापरवाही और तकनीकी गड़बड़ी सामने आई। OSM सिस्टम को लेकर देशभर में मचे बवाल के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने खुद सामने आकर कॉपियों के मूल्यांकन में हुई चूक को स्वीकार किया है।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि इस डिजिटल सिस्टम में जो भी कमियाँ रही हैं, उसकी जिम्मेदारी वे खुद लेते हैं। उन्होंने साफ किया कि सरकार देश के एक भी छात्र के साथ अन्याय नहीं होने देगी और प्रभावित छात्रों के लिए री-इवैल्युएशन यानी कॉपियों की दोबारा जाँच की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जा रही है।

पहली बार हुआ 40 करोड़ डिजिटल पन्नों का मूल्यांकन

इस साल CBSE 12वीं की परीक्षा में करीब 17 लाख छात्र शामिल हुए थे। इन सभी छात्रों की कुल मिलाकर 98 लाख उत्तर पुस्तिकाएँ थीं। हर कॉपी में औसतन 40 पेज होते हैं। इस लिहाज से CBSE ने इतिहास में पहली बार कुल 40 करोड़ स्कैन किए गए पेजों का कंप्यूटर के जरिए डिजिटल मूल्यांकन कराया था। शिक्षा मंत्री ने छात्रों और अभिभावकों को भरोसा दिया है कि सभी 98 लाख कॉपियाँ बोर्ड के पास पूरी तरह सुरक्षित हैं।

कॉपियों की अदला-बदली और पन्ने गायब होने के आरोप

दरअसल, इस नए डिजिटल सिस्टम के लागू होने के बाद छात्रों में भारी गुस्सा था। सोशल मीडिया पर कॉपियों की अदला-बदली और पन्ने गायब होने के गंभीर आरोप लग रहे थे। इसके चलते कई मेधावी छात्र डिप्रेशन में आ गए थे। इस विवाद पर शिक्षा मंत्री ने कहा कि यह पहला मौका था जब CBSE ने देश में इस तरह का बड़ा सिस्टम लागू किया। इसके कारण कुछ विसंगतियाँ और गड़बड़ियाँ सामने आईं, जिन्हें अब पूरी तरह सुधारा जाएगा।

OSM सिस्टम को बताया छात्रों के लिए फायदेमंद

धर्मेंद्र प्रधान ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम का बचाव भी किया। उन्होंने इसे एक प्रगतिशील और छात्र-केंद्रित तकनीक बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय इस सिस्टम को अपना रहे हैं। इस तकनीक से कॉपियों की जाँच में पारदर्शिता आती है। छात्र घर बैठे अपनी स्कैन की हुई कॉपी देख सकते हैं। इससे उन्हें पता चल जाता है कि किस सवाल पर कितने नंबर मिले हैं और कोई पन्ना जाँचने से छूटा तो नहीं है।

हर छात्र को मिलेगा इंसाफ, दूर होगी हर शंका

शिक्षा मंत्री ने देश के छात्रों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि बोर्ड के तमाम अधिकारी और पूरी सरकार इस वक्त इसी समस्या को ठीक करने में जुटी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हम किसी भी एक छात्र की शंका, चिंता या शिकायत को अनसुना नहीं छोड़ेंगे। हर बच्चे के सवाल का समाधान निकाला जाएगा और जल्द ही उचित री-इवैल्युएशन प्रक्रिया के जरिए सबको इंसाफ दिया जाएगा।

मनन मिश्रा जी, वकीलों की डिग्रियां फर्जी हैं, केवल कहने से क्या होगा? दीपक गुप्ता समिति ने 3 साल में क्या किया, इसका खुलासा कीजिए?

सुभाष चन्द्र

लगता है जितना फर्जीवाड़ा भारत में है शायद ही किसी और देश में हो। कांवड़ यात्रा के दौरान ढाबों के मालिकों को असली नाम लिखने पर मुस्लिम वोट के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों ने बहुत बवाल काटा और उसको समर्थन मिला वकीलों और अदालतों का, क्यों? बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया(BCI)  ने क्यों नहीं फर्जीवाड़ों की वकालत करने वाले वकीलों और जजों को कटघरे में खड़ा किया? असली नाम छुपाकर व्यापार करना क्या अपराध नहीं?    

बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन मिश्रा जी बार बार कह रहे हैं कि लगभग 35 से 40 प्रतिशत वकीलों के पास फर्जी डिग्रियां हैं, वे मनगढंत डिग्री सर्टिफिकेट के आधार पर अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे है।  जब डिग्रियों की सत्यापन प्रक्रिया शुरू की गई, तो लगभग 40 प्रतिशत वकीलों ने फार्म ही नहीं भरे, जिससे उनके फर्जी होने का संदेह है” करीब ऐसी ही बात चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कही थी जिस पर वकील बवाल कर रहे हैं कि वे अपना बयान वापस लें

अब ये बयानबाजी से क्या लाभ हो सकता है? आपकी BCI को चाहिए कि जो वकील अपनी डिग्री का सत्यापन नहीं कराते, उन्हें तत्काल प्रभाव से प्रैक्टिस करने से रोक दिया जाए फर्जी डिग्री धारक वकील लोगों को लूट रहे हैं 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जैसे National Medical Council (NMC) के नियमों के अनुसार हर डॉक्टर को क्लिनिक, उसके बाहर बोर्ड, प्रिस्क्रिप्शन, मेडिकल सर्टिफिकेट, फीस की रसीद आदि पर अपना रजिस्ट्रेशन नंबर लिखना अनिवार्य है, वैसे ही वकीलों के लिए भी बार काउंसिल का रजिस्ट्रेशन नंबर  वकालतनामा, याचिका दायर करते हुए, चैंबर के बाहर और Letterhead पर  लिखना अनिवार्य होना चाहिए जब तक डिग्रियों का सत्यापन चलता है, तब तक के लिए ये आदेश तो दिए ही जा  सकते हैं

मनन मिश्रा जी को पता होगा कि 10 अप्रैल, 2023 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस जे बी परदीवाला की पीठ ने रिटायर्ड जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता में एक 8 सदस्यों की समिति गठित की थी जो 25 लाख वकीलों की डिग्रियों का सत्यापन करके 31 अगस्त, 2023 तक अपनी रिपोर्ट देगी उस कमिटी में सदस्य थे

-Justice Deepak Gupta: Former Judge of the Supreme Court (Chairperson)

Justice Arun Tandon: Former Judge of the Allahabad High Court

Justice Rajendra Menon: Former Chief Justice of the Delhi High Court

Mr. Rakesh Dwivedi: Senior Advocate

Mr. Maninder Singh: Senior Advocate

Three Members: Nominated by the Bar Council of India (BCI) 

यानी 3 सदस्य तो BCI ने भी समिति में नामित किये थे

कुछ विश्वविद्यालयों ने डिग्री सत्यापन के लिए फीस की मांग की थी लेकिन फिर सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि वे विशवविद्यालय बिना किसी फीस के डिग्रियों के सत्यापन में मदद करेंगी

लेकिन 3 साल बाद भी अभी तक समिति ने कोई रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को जमा नहीं की लगती है मुझे नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक RTI के जवाब में कहा था कि जिस केस में सुप्रीम कोर्ट ने समिति का गठन किया था, उसमें आप पार्टी ही नहीं थे और इसलिए आपको सूचना मांगने का अधिकार नहीं है, लेकिन साथ में यह भी कहा कि अभी तक समिति ने कोई रिपोर्ट नहीं दी है

ऐसे में सवाल यह है कि मनन मिश्रा जी समिति का कार्य संपन्न कराने के लिए क्या कर रहे हैं। 3 साल से समिति 8 सदस्य तो मुफ्त का मलीदा पेल रहे होंगे मनन मिश्रा की BCI को ऐसे सभी वकीलों के प्रैक्टिस करने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए जिन्होंने डिग्री सत्यापन के लिए फॉर्म नहीं भरा और इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में समिति के गठन के आदेश पर पुनः याचिका दायर कर बैन की मांग करनी चाहिए और समिति से अब तक हुए डिग्रियों के सत्यापन  की रिपोर्ट देने को कहने के आदेश सुप्रीम कोर्ट से मांग करनी चाहिए अब तक किए गए सत्यापन में कितनी डिग्रियां फर्जी पाई गई और उन वकीलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, इसका भी खुलासा करना चाहिए

मुख्यमंत्री हिमंता के राज में असम में 480 से 84 पर आई मातृ मृत्यु दर(MMR)

                                हिमंता बिस्वा की सरकार में घटा मातृ मृत्यु दर (फोटो साभार : ChatGPT)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर राज्य की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी की जानकारी दी है। असम में मातृ मृत्यु दर (MMR) अब तेजी से घटकर महज 84 पर आ गई है। राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब असम का यह आँकड़ा देश के राष्ट्रीय औसत यानी 88 से भी नीचे चला गया है।

मुख्यमंत्री ने इस पल को अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे भावुक करने वाला क्षण बताया है। उन्होंने इस सफलता का पूरा श्रेय असम के हजारों डॉक्टरों, नर्सों, आशा बहुओं और स्वास्थ्य कर्मियों को दिया है। CM हिमंता ने बताया कि साल 2006 में जब उन्होंने स्वास्थ्य विभाग संभाला था, तब राज्य में मातृ मृत्यु दर 480 थी। उस समय इस स्थिति को सुधारना बिल्कुल नामुमकिन लगता था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों के लगातार काम और त्याग से आज यह सच हो चुका है।

क्या है मातृ मृत्यु दर?

अगर हम आम लोगों की बिल्कुल सरल भाषा में समझें तो जब कोई महिला गर्भवती होती है या बच्चे को जन्म देती है, तब सही इलाज न मिलने या स्वास्थ्य की अन्य जटिलताओं के कारण यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे मातृ मृत्यु माना जाता है। इस पूरी व्यवस्था में बच्चे के जन्म के बाद के 42 दिनों का नाजुक समय भी शामिल किया जाता है।

स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया में इसे ठीक से मापने के लिए एक पैमाना बनाया गया है जिसे मातृ मृत्यु अनुपात कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि समाज में हर एक लाख जीवित बच्चों के जन्म लेने पर कितनी माताओं को अपनी जान गँवानी पड़ी है। यह विशेष आँकड़ा किसी भी राज्य या देश की अस्पताल व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता और इलाज की असली मजबूती को दुनिया के सामने साफ-साफ दिखाता है।

असम में पहले और अब के आँकड़ों में अंतर

असम राज्य ने पिछले दो दशकों के भीतर गर्भवती माताओं की देखभाल को लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अगर हम साल 2006 के पुराने आँकड़ों को देखें तो असम की स्थिति पूरे देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक और डरावनी मानी जाती थी। उस समय असम में हर एक लाख बच्चों के जन्म पर 480 माताओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती थी।

इसके बाद सरकार, अस्पतालों और जमीनी स्वास्थ्य कर्मियों ने मिलकर एक लंबा और कठिन सफर तय किया। इसी लगातार की गई मेहनत का नतीजा है कि साल 2026 में यह आँकड़ा बहुत तेजी से नीचे गिरकर केवल 84 पर टिक गया है। भारत सरकार के ताजा आँकड़ों के अनुसार इस समय पूरे देश की मातृ मृत्यु दर का औसत आँकड़ा 88 बना हुआ है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि असम अब देश के सबसे पिछड़े राज्यों की सूची से बाहर निकलकर राष्ट्रीय औसत से भी कहीं ज्यादा बेहतर और शानदार काम कर रहा है।

आखिर किन वजहों से होती है गर्भवती माताओं की मौत

गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय महिलाओं की अचानक जान जाने के पीछे मुख्य रूप से कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ जिम्मेदार होती हैं। डॉक्टरों के अनुसार इनमें सबसे बड़ी और जानलेवा समस्या डिलीवरी के तुरंत बाद महिला के शरीर से बहुत ज्यादा खून बह जाना है। अगर इस खून के बहाव को समय पर नहीं रोका जाए तो महिला की कुछ ही घंटों में मौत हो सकती है। इसके अलावा प्रसव के समय या उसके बाद अस्पतालों या घरों में पूरी तरह साफ-सफाई न होने से महिला के शरीर में बहुत तेजी से इंफेक्शन यानी संक्रमण फैल जाता है।

गर्भावस्था के दिनों में अचानक ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप का बहुत ज्यादा बढ़ जाना भी दिमाग और दिल पर गहरा असर डालता है जिसे चिकित्सा की भाषा में एक्लेम्पसिया कहा जाता है। कई बार समाज में बिना डॉक्टरी सलाह के या दाइयों के जरिए गलत तरीके से कराया गया असुरक्षित गर्भपात भी सीधे मौत का कारण बन जाता है। इन सभी समस्याओं के साथ ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के शरीर में पहले से पोषण की कमी और खून की भारी कमी यानी एनीमिया का होना स्थिति को प्रसव के समय और ज्यादा नाजुक बना देता है।

माताओं की जान बचाने के सबसे सरल उपाय

चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ कहना है कि गर्भवती माताओं की होने वाली इन अधिकांश मौतों को बहुत ही आसान उपायों से पूरी तरह रोका जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी और प्राथमिक उपाय यह है कि बच्चे का जन्म हमेशा किसी अच्छे और मान्यता प्राप्त अस्पताल में डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सों की देखरेख में ही होना चाहिए। पुराने तौर-तरीकों से घरों पर प्रसव कराने से अचानक पैदा होने वाले खतरों को संभालना नामुमकिन हो जाता है।

इसके अलावा गर्भावस्था के शुरुआती दिनों से ही महिला की कम से कम चार बार नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त जाँच होनी चाहिए और समय पर सभी जरूरी टीके लगने चाहिए। गर्भवती महिला के रोज के खान-पीने का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल, दूध और सरकार द्वारा दी जाने वाली आयरन की गोलियाँ नियमित रूप से शामिल हों। इसके साथ ही किसी भी अचानक पैदा होने वाली आपातकालीन स्थिति के लिए एम्बुलेंस या गाड़ी की व्यवस्था पहले से तैयार रखनी चाहिए ताकि बिना समय गँवाए मरीज को बड़े अस्पताल पहुँचाया जा सके।

सुरक्षा के लिए देश और राज्य में चलाई जा रही योजनाएँ

गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार और असम सरकार मिलकर कई बेहतरीन और बेहद मजबूत योजनाएँ चला रही हैं। इन योजनाओं का मुख्य लक्ष्य गरीब से गरीब परिवार की महिला को भी बिना किसी खर्च के बड़े अस्पतालों में इलाज की सुविधा देना है।

जननी सुरक्षा योजना– इस दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम साबित हुई है। इस योजना के तहत सरकार ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की गर्भवती महिलाओं को सीधे नकद पैसे की मदद देती है ताकि वे पैसों की तंगी छोड़कर अस्पताल में आकर ही सुरक्षित डिलीवरी करवाएँ। इसी तरह जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को शुरू किया गया है, जिसका पूरा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं के इलाज में जेब से होने वाले हर एक पैसे के खर्च को पूरी तरह खत्म करना है।

इस योजना के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में महिला का सीजेरियन ऑपरेशन, प्रसव, सभी जरूरी दवाइयाँ, जाँच, खून की जरूरत और डॉक्टर द्वारा बताया गया भोजन पूरी तरह मुफ्त मिलता है। इतना ही नहीं, महिला को घर से अस्पताल लाने और डिलीवरी के बाद वापस घर सुरक्षित छोड़ने के लिए एम्बुलेंस की गाड़ी भी पूरी तरह बिना किसी पैसे के सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई जाती है।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत पूरे देश में हर महीने की 9 तारीख को एक विशेष दिन तय किया गया है। इस दिन सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा हर एक गर्भवती महिला की व्यापक और बिल्कुल मुफ्त जाँच की जाती है। इस अभियान के तहत जिन महिलाओं की गर्भावस्था में ज्यादा खतरा दिखाई देता है, उनकी पहचान करके सुरक्षित प्रसव होने तक आशा वर्कर्स के जरिए लगातार उनकी व्यक्तिगत ट्रैकिंग की जाती है।

माताओं के स्वास्थ्य को और ज्यादा सम्मानजनक बनाने के लिए सरकार ने सुरक्षित मातृत्व आश्वासन यानी ‘सुमन’ योजना भी शुरू की है, जिसमें अस्पताल आने वाली हर महिला को बिना किसी कोताही के गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित इलाज की गारंटी दी जाती है। लेबर रूम की कमियों को दूर करने के लिए ‘लक्ष्य’ नाम का एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिससे अस्पतालों के प्रसव कक्षों को आधुनिक और पूरी तरह साफ-सुथरा बनाया जा सके।

पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं के अच्छे खान-पान के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सीधे बैंक खाते में 5,000 रुपए भेजे जाते हैं, और मिशन शक्ति के तहत दूसरा बच्चा लड़की होने पर परिवार को 6,000 रुपए की मातृत्व सहायता दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में खून की कमी को खत्म करने के लिए एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत स्कूलों और गाँवों में आयरन की दवाइयाँ मुफ्त बाँटी जा रही हैं और RCH पोर्टल के जरिए हर गर्भवती महिला का नाम लिखकर ऑनलाइन कंप्यूटर पर उसकी हर जाँच का हिसाब रखा जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का वैश्विक नजरिया और 2030 का बड़ा संकल्प

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO पूरी दुनिया के स्तर पर मातृ मृत्यु दर को एक बेहद गंभीर और संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या मानता है। इस वैश्विक संगठन के अनुसार साल 2023 के आँकड़ों को देखें तो दुनिया भर में हर दिन गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी रोकी जा सकने वाली कमियों के कारण 700 से अधिक महिलाओं को अपनी जान गँवानी पड़ती थी, जिसका मतलब है कि हर दो मिनट में एक माँ दुनिया छोड़ देती थी।

WHO ने दुनिया के सभी देशों के साथ मिलकर सतत विकास लक्ष्य के तहत एक बड़ा संकल्प लिया है कि साल 2030 तक पूरी दुनिया में मातृ मृत्यु दर को घटाकर प्रति एक लाख जन्म पर 70 से भी नीचे लेकर आना है। WHO की रिपोर्ट साफ बताती है कि दुनिया भर में होने वाली कुल मातृ मौतों में से लगभग 92% मौतें सिर्फ कम आय वाले और पिछड़े देशों में होती हैं, जहाँ अमीर और गरीब के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का बहुत बड़ा अंतर है।

संगठन का मानना है कि इन मौतों के पीछे अस्पताल प्रणालियों की खराब जवाबदेही, आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी, दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता और महिलाओं के अधिकारों को कम प्राथमिकता देना जैसे बड़े सामाजिक कारण शामिल हैं। WHO लगातार अनुसंधान और तकनीकी दिशा-निर्देशों के जरिए भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत कर रहा है।

संगठन का स्पष्ट संदेश है कि यदि गर्भावस्था और प्रसव के समय हर एक महिला को प्रशिक्षित डॉक्टर या दाई की सही देखरेख मिल जाए, तो दुनिया की अधिकांश माताओं को एक नया और सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है।

बीवी को ‘कैसे करें प्यार’ पर किताब लिखने वाले पादरी के खुद की कई बीवी: अमेरिका के फ्लोरिडा में गिरफ्तार

                                           एक से अधिक पत्नी होने के आरोप में पादरी गिरफ्तार
अमेरिका के फ्लोरिडा से एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। वहाँ लोगों को शादी पर और अपनी पत्नी को कैसे प्यार करें- इसका ज्ञान देने वाले एक 62 साल के पादरी को एक से ज्यादा  शादी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पादरी का नाम 62 वर्षीय लेस्ली विलियम्स है। पिछले हफ्ते उनके घर के पास स्थित द विलेजेस रिटायरमेंट कम्युनिटी में पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया।

स्थानीय पुलिस के अनुसार, विलियम्स के खिलाफ जॉर्जिया राज्य में एक साथ एक से अधिक विवाह करने के आरोप में केस दर्ज है। वहाँ की पुलिस ने 3 अप्रैल को उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। फिलहाल उन्हें डिटेंशन सेंटर में बिना जमानत के रखा गया है और जॉर्जिया को प्रत्यर्पित करने की प्रक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

मामले को लेकर दिलचस्प बात यह है कि विलियम्स ने 2017 में एक किताब लिखी थी, जिसमें पति-पत्नी के बीच प्रेम और वैवाहिक संबंधों को मजबूत बनाने के तरीके बताए थे। लोग विलियम्स की लिखी किताब और उनकी एक से ज्यादा हुई शादियों की बात सुनकर खूब मजे ले रहे हैं।

विलियम्स के सोशल मीडिया पोस्ट जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘सिंडी’ उनकी नई पत्नी है-इस पर लोगों ने उन्हें बधाइयाँ भी दी और तंज भी कसा। लोगों ने कहा कि उन्हें तो लगता था कि पादरी पहले से शादीशुदा है।

अभी विलियम्स की पहली शादी के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। विलियम्स खुद को एक ईसाई धर्म के प्रचारक बताते हैं। क्षेत्र में उनके कई अनुयायी भी हैं। इस घटना के बाद ने उनके अनुयायियों और स्थानीय समुदाय में हैरानी पैदा कर दी है। पुलिस मामले की जाँच में जुटी है और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

PETA और मेनका गांधी ईद पर होने वाली बकरों और अन्य जानवरों की हत्या पर खामोश क्यों हैं? जीवित भी हैं या मर गए?

सुभाष चन्द्र

जब भी हिन्दू त्यौहार आते हैं, सड़क पर गऊओं पर PETA और मेनका गाँधी के साथ-साथ तथाकथित सेक्युलरिस्ट्स ज्ञान देने लगते हैं लेकिन मुस्लिम त्यौहारों पर सबको सांप सूंघ जाता है क्या? मुस्लिम हलकों में घूमते बकरे नहीं दिखाई पड़ते। शहरों से गौशालाएं बंद करवा दीं इन सनातन विरोधियों ने। जबकि सनातन में पहली रोटी गौ माता की और परिवार में मृत्यु पर तेरवीं तक सुबह शाम एक रोटी/पूरी गाय की निकलती है अब उस ग्रास को इनके मुंह में ढुँसे?   

People for the Ethical Treatment of Animals(PETA) और People for Animals(PFA) चलाने वाली मेनका गांधी सुप्रीम कोर्ट के आवारा कुत्तों के लिए दिए गए आदेश पर बिफर रहे थे 

PFA मेनका गांधी ने 1994 में शुरू किया था और PETA वर्ष 2000 में शुरू हुआ था और इन दोनों संगठनों का पशु प्रेम ऐसा है कि ये ईद पर बकरों और अन्य जानवरों की होने वाली हत्याओं पर कभी उफ़ नहीं करते

मेनका गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की निंदा करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी हाई कोर्टों की तरफ सरका रहा है और कुत्तों को इस तरह पकड़ कर shelter homes में भेजना व्यावहारिक नहीं है मेनका ने कहा था कि Gandhi “mass implementation of the Animal Birth Control (ABC) rules and sterilization drives are the only effective, permanent solutions to manage the stray dog population. 

दूसरी तरफ PETA ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को "impractical, illogical, and illegal” कह दिया था। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर कुत्तों को पकड़ कर हटाना Animal Birth Control के नियमों के खिलाफ है और कोर्ट/सरकार से मांग की थी कि बड़े पैमाने पर Sterlisation (Spay/Neuter) और vaccination किया जाए नाकि कुत्तों को पकड़ा जाए

लेखक 
चर्चित YouTuber 
इन दोनों संगठनों का पशु प्रेम selective होता है जबकि कथित उद्देश्य सभी पशुओं के लिए प्रेम से है ईद पर पशु हत्या इन संगठनों के अनुसार पशुओं के प्रति नैतिकता का प्रमाण है (Ethical) है

लेकिन ईद उल जुहा पर जब बकरों, गायों, ऊंटों और अन्य पशुओं की हत्या की जाती है, तब ये संगठन secularism का लबादा ओढ़ कर खामोश हो जाते हैं मेनका गांधी की तो राजनीति में अब कोई औकात नहीं रह गई है फिर किस कारण चुप रहती है जबकि PETA को तो विदेशों से भी धन मिलता है और शायद विदेशी एजेंडा के कारण वह भी ईद पर खामोश रहता है ईद पर कटने वाले पशुओं से उनको कोई सहानुभूति नहीं है 

आप गूगल सर्च कीजिए आपको पता चलेगा कुर्बानी इस्लाम में हर किसी के लिए आवश्यक भी नहीं है आज कुछ मौलाना कह रहे हैं कि ईद पर गायों की कुर्बानी न दी जाए लेकिन कुछ के बोलने का कोई महत्व नहीं है गाय और उसके बछड़े का भक्षण किया ही इसलिए जाता है क्योंकि गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय है कुछ मौलाना यह भी कह रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाए अब ऐसी मांग करने का क्या उद्देश्य है, पता नहीं लेकिन अगर ऐसा कर दिया जाता तो सबसे पहले विरोध करने वाले भी मुस्लिम ही होंगे 

जिन राज्यों में गोवध पर प्रतिबंध है, शायद उन्हें देख कर ही राहुल गांधी कहता है कि भाजपा लोगों के खाने पीने पर भी रोक लगा रही है

सरकार अगर कहती है कि कुर्बानी नियत स्थानों पर की जानी चाहिए, तो उसमे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए लेकिन मुंबई की मीरा रोड, घाटकोपर और गोरेगांव की Housing Societies में पशुओं को पकड़ा गया है जो बलि के लिए लाए गए थे अनुमान लगाइए 40-50 बकरे एक सोसाइटी में कटेंगे तो कितना खून बहेगा और आस पास के लोगों का जीना कैसे हराम न होगा? लेकिन पशु प्रेमी PETA और PFA आंखे बंद किये बैठे हैं

पौराणिक गाथा : जगन्नाथ मन्दिर की तीसरी सीढ़ी का रहस्य


जगन्नाथ मंदिर पुरी के मुख्य द्वार पर बनी 22 सीढ़ियों में से एक सीढ़ी ऐसी भी है, जिस पर पैर रखते ही आपके सारे पुण्य समाप्त हो सकते हैं?

जी हां… यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राचीन मान्यता है जिसे सुनकर बड़े-बड़े ज्ञानी भी चौंक जाते हैं।
कहते हैं, जगन्नाथ धाम की हर सीढ़ी का अपना एक रहस्य है, लेकिन तीसरी सीढ़ी… सबसे रहस्यमयी मानी जाती है। इस सीढ़ी को “यमशीला” कहा जाता है।
लेकिन आखिर क्यों?
इस रहस्य को समझने के लिए हमें समय के उस काल में जाना होगा… जब धरती पर भक्ति अपने चरम पर थी।
उस समय, जो भी भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता… वह तुरंत पापों से मुक्त हो जाता था। केवल एक झलक… और वर्षों के पाप धुल जाते।
लोग दूर-दूर से आते, केवल एक बार भगवान के दर्शन करने के लिए।
भक्ति इतनी सरल हो गई थी कि हर कोई बिना कठिन तपस्या के ही मोक्ष की ओर बढ़ने लगा।
लेकिन यह बात एक देवता को चिंतित करने लगी।
वो थे मृत्यु के देवता — यमराज।
एक दिन यमराज चिंतित मन से सीधे भगवान के धाम पहुँचे।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
“हे प्रभु… आप तो करुणा के सागर हैं। आपके दर्शन मात्र से मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। लेकिन अगर हर कोई यूं ही मुक्त हो जाएगा… तो फिर न्याय का क्या होगा? कर्मों का हिसाब कौन देगा? यमलोक का क्या उद्देश्य रह जाएगा?”
भगवान मुस्कुराए…
उनकी मुस्कान में करुणा भी थी और गहरा रहस्य भी।
भगवान जगन्नाथ ने शांत स्वर में कहा—
“हे यमराज… तुमने जो कहा, वह सत्य है। संसार में संतुलन आवश्यक है। केवल कृपा ही नहीं, कर्मों का फल भी जरूरी है।”
कुछ क्षण के मौन के बाद उन्होंने एक अद्भुत निर्णय लिया।
“हे यमराज, तुम मेरे धाम के मुख्य द्वार पर बनी तीसरी सीढ़ी पर निवास करो। वही तुम्हारा स्थान होगा।”
यमराज आश्चर्यचकित रह गए…
“तीसरी सीढ़ी?”
भगवान बोले—
“हाँ… जो भक्त मेरे दर्शन के लिए आएगा, वह तो मेरे दर्शन से पापमुक्त हो जाएगा। लेकिन जब वह लौटेगा… और अनजाने में उस तीसरी सीढ़ी पर पैर रखेगा… तब उसके पुण्य क्षीण हो जाएंगे।”
“और तब… उसे अपने कर्मों का फल भोगने के लिए यमलोक आना ही पड़ेगा।”
मित्रों… उसी दिन से उस तीसरी सीढ़ी को “यमशीला” कहा जाने लगा।
कहा जाता है कि आज भी… उस सीढ़ी पर अदृश्य रूप में यमराज का निवास है।
भक्त जब मंदिर में प्रवेश करते हैं… तो श्रद्धा से सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। लेकिन जब वे लौटते हैं… तो कई लोग अनजाने में उस तीसरी सीढ़ी पर पैर रख देते हैं।
और यही वह क्षण होता है… जब उनके संचित पुण्य क्षीण हो जाते हैं।
इसी कारण से, कई जानकार और साधु-संत आज भी इस सीढ़ी को पार करते समय विशेष सावधानी बरतते हैं।
कुछ लोग उस सीढ़ी को छूकर प्रणाम करते हैं… लेकिन उस पर पैर रखने से बचते हैं।
क्योंकि वे जानते हैं… यह सिर्फ एक पत्थर की सीढ़ी नहीं… बल्कि कर्म और न्याय का प्रतीक है।
मित्रों… यह कथा हमें एक गहरा संदेश देती है।
भगवान की कृपा असीम है… लेकिन कर्मों का हिसाब भी उतना ही सच्चा है।
केवल दर्शन से मुक्ति नहीं मिलती… बल्कि सही कर्मों से ही जीवन सफल होता है।
तो अगली बार अगर आप पुरी के इस पवित्र धाम में जाएं…
तो इन 22 सीढ़ियों को केवल रास्ता मत समझिए…
इनमें छिपे रहस्यों को महसूस कीजिए…
क्योंकि कभी-कभी… एक छोटी सी सीढ़ी भी… आपकी पूरी किस्मत बदल सकती है। 

‘मैं नहीं मानती ये गंदा धर्म’: सनातन विरोधी टिप्पणी के लिए ममता बनर्जी पर 1 साल बाद हुई FIR, TMC नेता बोले- हम भी बयान के खिलाफ थे

    
क्या ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस इतिहास बनने के कगार पर पहुँच गयी है? जिस कुर्सी की खातिर "श्रीराम" नाम से, सनातन से चिढ़ती थी, वही इनको और इनकी पार्टी को इतिहास बना रहा है। कल जिस मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने सनातन और हिन्दुओं पर हमले करवाए आज वही मुस्लिम समाज भी इन्हे नहीं पूछ रहा। अगर वर्तमान मुख्यमंत्री सुभेंदु इसी तरह काम करते रहे बंगाल में कोई ममता या INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाला । कई साल हिन्दुओं ने हिन्दू विरोधी सरकारों के अत्याचार सहे हैं। चुनावों में उन्हें वोट तक नहीं डालने दिया जाता था जिस वजह से हिन्दू विरोधी सरकारें सत्ता में आती रहती थीं। फिलिस्तीन में इजराइल के हमलों पर तो INDI गठबंधन के हर नेता की जुबान खुलती थी लेकिन बंगाल में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों पर बोलने पर सबको सांप सूंघ जाता था। 




इफ्तार पार्टी हो या फिर नमाज के दौरान मुस्लिम महिलाओं की तरह ममता हिजाब धारण करने पर इनके हिन्दू ब्राह्मण होने पर सन्देह होता है, जिसका खुलासा कोई खोजी पत्रकार या ममता की ही पार्टी कर सकती है। 

श्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सिलीगुड़ी साइबर थाने में एक FIR दर्ज की गई है। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2025 में कोलकाता में आयोजित ईद कार्यक्रम के दौरान सनातन धर्म को ‘गंदा धर्म’ बताया था।

एफआईआर दर्ज होने के बाद से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वीडियो में उन्हें विवादित टिप्पणी करते सुन सकते हैं। वो कहती सुनाई पड़ रही हैं- “हम जानबूझकर एक गंदा धर्म, जिसे जुमला पार्टी ने बनाया, हम उसे नहीं मानते हैं।”

यह शिकायत वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इस बयान से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कुछ नेता पहले भी हिंदू धर्म को लेकर विवादित बयान देते रहे हैं।

रिंकी चटर्जी सिंह ने दावा किया कि उन्होंने 2025 में भी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई और उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।

वहीं, तृणमूल कॉन्ग्रेस के दार्जिलिंग यूनिट के महासचिव और वकील अत्री शर्मा ने भी बयान को अनुचित बताया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। 

बंगाल : पुलिस निकाल रही गुंडों की परेड; किसी को उठाया कच्छे में, किसी को अय्याशी करते हुए दबोचा: 1 हफ्ते में 70+ TMC नेता-कार्यकर्ता गिरफ्तार

                                   TMC नेताओं पर एक्शन जारी ( फोटो साभार-chatgpt)
पश्चिम बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कसी जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बांग्लादेशियों को बाहर निकाल रही है, वहीं ‘तोलाबाजी’ यानी सिंडिकेट, चुनाव बाद हिंसा और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान चला रही है। बीते एक हफ्ते में 70 से ज्यादा टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।

कोई बनियान-कच्छे में तो कोई लुंगी पहने हुआ गिरफ्तार

अपराधियों को हर हाल में गिरफ्तार करने के आदेश हैं। यही वजह है कि कई ऐसी तस्वीरें सामने आई जब इन लोगों को अचानक घरों, अड्डों और शराब के ठेकों से उठाया गया और सड़कों पर घुमाया गया। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बंगाल में अराजकता फैला दी थी और जनता दहशत में जीने के लिए मजबूर थी।

बंगाल पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया था। वह हावड़ा के डॉन कहलाता था। आकाश सिंह पर 2021 में पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने और 20 से ज्यादा बम फेंकने का आरोप है। एक कड़ा संदेश देने के लिए उसे हावड़ा की सड़कों पर सिर्फ अंडरवियर में घुमाया गया।

इसके बाद 25 मई 2026 को टीएमसी के गुंडे और कुख्यात सनी मोल्ला को पुलिस ने गिरफ्तार कर सड़कों पर बनियान-पैजामा में घुमाया। स्थानीय लोगों के अनुसार, सनी मोल्ला TMC से जुड़ा एक संविदा आधारित होम गार्ड था और लंबे समय से संकराइल और आसपास के इलाकों में रंगदारी और दबंगई का नेटवर्क चला रहा था। वह व्यापारियों, छोटे दुकानदारों से रंगदारी वसूलता था। विरोध करने पर धमकी देता, मारपीट करता और कारोबार बंद कराने की चेतावनी देता था। इलाके में लोग उसे ‘छोटा डॉन’ कहकर बुलाते हैं।

टीएमसी से जुड़ा और ‘बड़े भाई’ कहलाने वाले शमीम अहमद को भी पश्चिम बंगाल पुलिस ने बनियान- ऑफ पेंट में सड़कों पर घुमाया। दरअसल ये वह व्यक्ति है, जिस पर शिबपुर में इस्लामी हिंसा भड़काने, सड़कों पर बमबारी करने और BJP समर्थकों पर गोली चलाने के आरोप है।

जलपाईगुड़ी जिले में टीएमसी नेता पंचानन रॉय को एक कार में शराब पीते हुए पकड़ा गया था। वह स्थानीय पंचायत समिति के अध्यक्ष हैं और शराब पार्टी करते हुए गिरफ्तार किया गया। टीएमसी पार्षद मोनी गाजी को भी पुलिस रेड के दौरान शराब की बोतलों और आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। उस पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है।

 ऐसे अपराधी शुभेंदु शासन के आते ही छिपने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि इनलोगों को बनियान कच्छा शॉर्ट पैंट में ही पुलिस उठा कर ले गई। इनलोगों को सड़कों पर घुमा भी रही है, ताकि लोगों के मन में उनका भय खत्म हो सके, जो पिछले 15 सालों से व्याप्त है। सरकार ‘नो नोटिस एक्शन’ वाली छवि बना रही है। अपराधियों को देर रात छापेमारी कर भी गिरफ्तार किया जा रहा है। कई जिलों में लगातार तलाशी के बाद कई लोगों को दबोचा गया, ताकि लोगों को संदेश मिले कि ‘भागने पर भी बचना मुश्किल’ है।

बीते 18 मई से करीब एक हफ्ते में राज्य में भ्रष्टाचार वसूली और चुनाव बाद हिंसा को लेकर टीएमसी के 70 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पूर्व मंत्री सुजीत बसु भी शामिल हैं। वहीं पूर्व मंत्री के करीबी बंगाल के बिधाननगर नगर निगम के 34 नंबर वार्ड के टीएमसी पार्षद और बोरो चेयरमैन रंजन पोद्दार को बिधाननगर उत्तर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ तोलाबाजी यानी जबरन वसूली करने और लोगों को डराने-धमकाने का आरोप है।

बीते 23 मई 2026 को एक दिन में राज्यभर में 17 टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें कोलकाता और बिधाननगर के कई पार्षद शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बड़ंचा में दबंग तृणमूल नेता अबु बक्कर को हत्या के प्रयास और हथियार से हमला करने के आरोप में पकड़ा गया।

कोलकाता नगर निगम के पार्षद सुदीप पोल्ले और बिधाननगर के पार्षद बरुआ को तोलाबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हावड़ा से 2021 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोपित उपग्राम प्रधान गुरुपद माझी और उसके भाई राजू माझी को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा हुगली, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर कूचबिहार तक के टीएमसी गुंडों को पुलिस ने पकड़ा।

उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक पार्षद को घर के अंदर सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बनगांव नगर पालिका के वार्ड नंबर 22 से TMC पार्षद सुकुमार राय को पुलिस कॉलर पकड़कर थाने ले गई।

पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में शेख कमरुद्दीन को चुनावी आतंक, भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं कूच बिहार से भवरंजन बर्मन को बीजेपी कार्यकर्ता को पीटने और पैसे माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बीजेपी नेता पप्पू साना पर हमले और शुभेंदु अधिकारी के पीएम रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पुलिस ने कई इलाकों में लगातार छापेमारी की है और कई लोगों को हिरासत में लिया।

टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुल्मों से त्रस्त जनता की प्रतिक्रिया भी इस दौरान सामने आई। जब कोलकाता के युवा टीएमसी अध्यक्ष तपन बिस्वास और उसके साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उसे लोगों ने थप्पड़ मारे। कुछ ऐसा ही हाल हावड़ा से गिरफ्तार श्यामला मित्रा का हुआ। उसे भी लोगों ने पीटा।

दक्षिण 24 परगना से जब TMC नेता अरित्रा बोस को गिरफ्तार किए जाने के बाद महिलाएँ उसे पीटने के लिए चप्पल- झाड़ू लेकर दौड़ी। जब पुलिस उसे वैन में बैठाकर ले जा रही थी, तब झाड़ू, चप्पल और पानी की बोतलें पुलिस वैन पर फेंकने लगी। संदेशखाली में ईडी टीम पर हमले को लेकर गिरफ्तार टीएमसी नेता शाहजहाँ की मदद करने वाली दो महिला नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। इन पर शाहजहाँ को बचाने के लिए भीड़ जमा कर हिंसा भड़काने का आरोप है।

घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान

अवैध घुसपैठ और बॉर्डर नेटवर्क पर भी कार्रवाई तेज हुई है। बंगाल सरकार ने ‘होल्डिंग सेंटर’ शुरू किए हैं और पुलिस-आरपीएफ-बीएसएफ के समन्वय से संदिग्ध घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है।

हाल ही में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मंगलवार सुबह (26 मई 2026) को बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तरी 24 परगना के हाकिमपुर चेक पोस्ट पर जमा किया गया।

हाल ही में सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि बगैर दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों की पहचान कर उसे पुलिस के हवाले करें, ताकि जनता से इनलोगों को अलग किया जा सके और देश से निकाला जा सके।

बीजेपी सरकार का पूरा अभियान ये दिखाता है कि अपराधियों और घुसपैठियों को अब ‘पहले जैसा संरक्षण’ नहीं दिया जाएगा। अपराधियों का जेल भेजा जाएगा और घुसपैठियों को ‘देश निकाला’ मिलेगा। चाहे ये लोग कहीं भी छिप जाएँ, पुलिस उन्हें ढूंढ निकालेगी और हर हाल में सलाखों के पीछे भेजेगी। इसलिए अपराधी कहीं जंगल में छिपे मिल रहे हैं तो कहीं घरों में छिप कर शराब पीते।

देश को खतरे में ना डालें, मंदिर के प्रसाद की तरह जमानत दीजिए लेकिन वो जमानत पर रह कर अपराध करें तो उसकी जिम्मेदारी भी सुप्रीम कोर्ट ले

सुभाष चन्द्र

देश में सबसे बड़ी समस्या यह खड़ी हो गई है कि संसद कानून बनाती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट उसमें नुक्ताचीनी करके अपने नियम बनाकर कानून को कुंद करने का काम करता है।  PML Act, पोक्सो एक्ट में इतनी व्याख्या कर दी कि उन कानूनों की प्रासंगिकता को हाशिए पर ला दिया अब UAPA के लिए जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइया की पीठ ने व्याख्या कर दी कि Bail is a rule, jail is an exception का नियम उसमें भी लागू होता है 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
UAPA के सेक्शन 45D(5) में जमानत देने के लिए पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले स्वतंत्रता के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकती ये कहते हुए उन्होंने जम्मू कश्मीर के हाई प्रोफाइल नार्को टेरर (नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकी फंडिंग) के अपराध में 5 साल से ज्यादा समय से सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दे दी मतलब स्वतंत्र कर दिया आर्टिकल 21 में जिससे वह किसी और तरीके से वही अपराध कर सके

जम्मू कश्मीर में 2019 से 2023 के बीच 3,662 लोग UAPA में गिरफ्तार हुए और इसमें 23 को दोषी करार दिया गया बाकी केस चल रहे होंगे दोषसिद्धि न होने का सबसे बड़ा कारण है कि ट्रायल कोर्ट अपराध के ऐसे सबूत चाहते है कि अपराध की जैसे कोई वीडियो रिकॉर्डिंग चल रही हो यही कारण है कि लोग छूट जाते हैं इसी अंतराल में UAPA  में कुल 10,440 गिरफ़्तारी हुई लेकिन सजा 335 को हुई

सुप्रीम कोर्ट अपना अलग दर्शनशास्त्र बना देता है एक केस में कहा कि “mere association or Passive support” for a terrorist organisation is insufficient to attract UAPA charges. There must be clear, discernible evidence of an intent to further the activities of a terrorist organisation or overt acts of violence”. 

अब सोचिए terrorist organisation आतंक या हिंसा का इरादा साबित करना क्या आसान काम है, वो तो जब वह कांड कर देगा तब ही पता चलेगा लेकिन उसमें भी गिरफ्तार लोगों को article 21 का सहारा मिलेगा सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसी व्यक्ति का mere association or Passive support आतंकी संगठन की हिंसक/आतंकी गतिविधि में बहुत बड़ा योगदान दे सकता है

पहलगाम हमला करने वालों को एक गाइड ने अपने घर में शरण दी थी और उन्होंने 26 हिंदुओं की निर्मम हत्या कर दी गाइड को क्या आतंकियों के साथ mere association or Passive support मान कर छोड़ दिया जाए?

ये माना बहुत undertrial वर्षों तक जेल में रहते हैं और उन पर मुकदमे पूरे नहीं होते उन्हें छोड़ने की आदेश दीजिये लेकिन आपने तो खालिद ओमर और शरजील इमाम के दिल में एक आशा की किरण जगा दी अगर इनको जमानत दी जाए तो क्या देशभक्ति की काम में लग जाएंगे? जी नहीं, ये अन्य उत्पात मचाने की तैयारी करेंगे

सुप्रीम कोर्ट का Bail is a rule, jail is an exception का दर्शन शास्त्र State of Rajasthan vs Balchand alias Baliya(1977) से शुरू हुआ था 1978 के Motiram vs State of MP में फिर दोहराया गया उसके बाद कितने मामलों में इसे क्रियान्वित किया गया यह मालूम नहीं लेकिन 2022 में फिर सुनाई दिया Satender Kumar Antil vs CBI के केस में

वैसे तो आर्टिकल 21 में अपराधी मौज ले रहे हैं और पिछले 12 साल में article 19 ने कहर ही ढहा दिया है, हर किसी को कुछ भी बोलने की आज़ादी है और कांग्रेस के नेताओं में तो इस आर्टिकल के तहत प्रधानमंत्री मोदी को नई नई गाली देने की होड़ लगी रहती है

अब ये Bail is a rule, jail is an exception का मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया है आशा तो नहीं है कुछ तार्किक निर्णय होगा लेकिन पीठ को देश की सुरक्षा को ध्यान में रख कर निर्णय देना चाहिए देश सुरक्षित नहीं होगा तो जो आतंकी आग लगा सकते हैं उसमें सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के न्यायाधीशों समेत किसी के भी परिवार झुलस सकते हैं 

एक फितूर को सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए कि “हम सुप्रीम हैं और हम जो कहेंगे वो ही सही होगा” राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर चलें 

असम विधानसभा में UCC विधेयक, बहुविवाह पर रोक, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य


असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर दिया है।

सोमवार (25 मई 2026) को विधानसभा में पेश किए गए ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026’ बिल के जरिए सरकार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढाँचे में लाना चाहती है।

हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को इस कानून से बाहर रखा गया है। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा।

सरकार का दावा है कि यह कानून महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करेगा। खास बात यह है कि बिल में पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से परिभाषित करते हुए उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

साथ ही बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाने और सभी विवाह तथा तलाक का पंजीकरण जरूरी करने की बात कही गई है।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड और क्यों है इसकी चर्चा?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब ऐसा कानून है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। अभी भारत में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। उदाहरण के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट आदि।

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करने की बात कही गई है। हालाँकि स्वतंत्रता के बाद से अब तक केंद्र स्तर पर पूरे देश में UCC लागू नहीं हो सका। असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले BJP ने अपने घोषणा पत्र में UCC लागू करने का वादा किया था।

असम UCC बिल में क्या-क्या बड़े प्रावधान हैं?

असम सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयक में कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रावधान बहुविवाह पर प्रतिबंध है। यानी अब किसी भी समुदाय में एक से अधिक शादी की अनुमति नहीं होगी। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।

विधेयक में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। यह प्रावधान मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप है, लेकिन अब इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू करने की कोशिश की जा रही है। बिल के अनुसार, सभी विवाहों और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा।

यानी केवल धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी करने के अलावा उसका कानूनी रजिस्ट्रेशन भी जरूरी होगा। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और विवादों की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहेगा। विधेयक उत्तराधिकार यानी संपत्ति के बंटवारे के लिए भी समान नियम लागू करने की बात करता है।

सरकार का दावा है कि इससे संपत्ति के हस्तांतरण में पारदर्शिता आएगी और महिलाओं को परिवार की संपत्ति में अधिक सुरक्षा मिलेगी। सबसे चर्चित प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। पहली बार किसी कानून में लिव-इन संबंधों के लिए अलग कानूनी ढाँचा तैयार किया गया है।

इसके तहत शादी किए बिना साथ रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनी पहचान और सुरक्षा मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप पर कानून क्यों बना रही है सरकार?

असम UCC बिल का सबसे नया और बहस वाला हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी नियमन है। सरकार का तर्क है कि समाज में ऐसे संबंधों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने के कारण कई बार महिलाएँ और बच्चे असुरक्षित रह जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी साथी के साथ रहकर बाद में उसे छोड़ देता है, तो मौजूदा व्यवस्था में पीड़ित पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई जटिल हो जाती है। सरकार का कहना है कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से ऐसे संबंधों का रिकॉर्ड रहेगा और जरूरत पड़ने पर महिला अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेगी।

बिल में यह भी कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान माना जाएगा। इससे उत्तराधिकार और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने की कोशिश होगी। हालाँकि अभी तक विधेयक के विस्तृत नियम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि रजिस्ट्रेशन कितने दिनों के भीतर कराना होगा, रजिस्ट्रेशन न कराने पर क्या सजा होगी, किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी और सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी। इन बिंदुओं पर विधानसभा में चर्चा और अंतिम अधिसूचना के बाद स्थिति साफ हो सकती है।

विधेयक यह भी स्पष्ट करता है कि यदि किसी लिव-इन रिलेशनशिप में कोई साथी पहले से विवाहित है या नाबालिग है, तो ऐसे संबंध का पंजीकरण नहीं किया जाएगा।

किन लोगों को UCC से रखा गया है बाहर?

असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सरकार ने इस बिल में कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी है। विधेयक के अनुसार राज्य की अनुसूचित जनजातियों यानी शेड्युल्ड ट्राइब्स (Scheduled Tribes) पर यह कानून लागू नहीं होगा। इसमें पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों की जनजातियाँ शामिल हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की लगभग 12.45 प्रतिशत आबादी जनजातीय समुदायों से आती है। सरकार का कहना है कि इन समुदायों की पारंपरिक सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए उन्हें UCC से बाहर रखा गया है।

इसके अलावा बिल में कहा गया है कि धार्मिक और पारंपरिक रस्मों के अनुसार विवाह करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी। यानी लोग अपने धर्म और समुदाय की परंपराओं के अनुसार शादी कर सकेंगे, लेकिन उसका कानूनी पंजीकरण जरूरी होगा।

BJP ने अपने चुनावी वादे में भी स्पष्ट किया था कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों को UCC से छूट दी जाएगी। इससे सरकार जनजातीय संगठनों की आशंकाओं को कम करना चाहती है।

उत्तराखंड और गुजरात के UCC से कितना अलग है असम मॉडल?

उत्तराखंड देश का पहला राज्य था जिसने 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 से उसे लागू भी कर दिया। उत्तराखंड UCC में भी लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया गया था। वहाँ किसी जोड़े को साथ रहने के एक महीने के भीतर अपना संबंध पंजीकृत कराना होता है।

यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो तीन महीने तक की जेल, 10 हजार रुपए तक जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान रखा गया है। उत्तराखंड कानून में रजिस्ट्रार को यह अधिकार भी दिया गया कि यदि कोई साथी 21 वर्ष से कम उम्र का है, तो उसके माता-पिता को जानकारी दी जाए। इसके अलावा संबंध समाप्त होने की सूचना पुलिस को देने का प्रावधान भी था।

इनमें से कुछ प्रावधानों को लेकर निजता के अधिकार पर सवाल उठे थे। बाद में उत्तराखंड सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कुछ नियमों में बदलाव की जानकारी दी। उदाहरण के लिए आधार कार्ड और सामुदायिक प्रमाणपत्र की अनिवार्यता हटाई गई तथा गर्भावस्था की सूचना देने वाला नियम भी समाप्त किया गया।

गुजरात ने मार्च 2026 में अपना UCC बिल पारित किया। वहाँ भी लिव-इन रिलेशनशिप को ‘विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध’ बताया गया और लगभग उत्तराखंड जैसे प्रावधान रखे गए।

असम का मॉडल कई मामलों में उत्तराखंड और गुजरात से प्रेरित माना जा रहा है, लेकिन इसमें जनजातीय समुदायों को स्पष्ट छूट देकर स्थानीय सामाजिक संरचना को ध्यान में रखने की कोशिश की गई है।

असम में UCC लागू होने से क्या बदल सकता है?

यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो असम में पारिवारिक और व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा बनने से प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट हो सकती हैं।
सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को संपत्ति और वैवाहिक अधिकारों के मामलों में अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक लगने से एकल विवाह व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।
लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों, को कानूनी पहचान मिल सकती है। इससे भविष्य में उत्तराधिकार, भरण-पोषण और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा विवाह और तलाक के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से सरकारी रिकॉर्ड अधिक व्यवस्थित होंगे और कानूनी मामलों में प्रमाण जुटाना आसान हो सकता है। असम सरकार इसे सामाजिक सुधार और कानूनी समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।
अब विधानसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा और मतदान होना है। यदि बिल पारित होता है, तो असम देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहाँ समान नागरिक संहिता को जमीन पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।