CJP प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर हैरान रह जाएंगे, लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ और TFF से कनेक्शन

                                                                                               साभार 
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनके न सिर्फ लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ से कनेक्शन हैं, बल्कि उससे मिली फंडिंग से सरकार विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास का विदेशी फंडिंग से जुड़ा कनेक्शन सामने आते ही सवालों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि किसी पत्रकार या शोधकर्ता को विदेशी संस्था से अनुदान क्यों मिला; असली सवाल यह है कि पैसा किससे आया, किस काम के लिए आया, किन लोगों और संस्थाओं तक पहुंचा और उस फंडिंग से तैयार होने वाले कंटेंट का प्रभाव किस दिशा में जाता है? जब एक ही विदेशी फाउंडेशन पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों के अलग-अलग प्रोजेक्ट को लगातार वित्तीय सहायता देता दिखाई दे, और उन नामों के काम में वैचारिक समानताएं भी नजर आएं, तो इसे महज संयोग कहकर आगे बढ़ जाना आसान जरूर है, लेकिन सवालों से बच निकलना इतना आसान नहीं। क्योंकि सौरव दास और अमेरिका स्थित ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का संबंध इसी बड़े सवाल का एक सिरा है। उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि TFF ने सौरव दास को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया है।

सौरव दास और लेफ्ट लिबरल गैंग का विदेशी फंडिंग का कनेक्शन

सौरव दास और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का रिश्ता इसी बड़े नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। जब उसी फाउंडेशन की विस्तृत ग्रांट सूची में न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक अधिकारों से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के नाम भी दिखाई देते हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि इस फंडिंग का व्यापक उद्देश्य और उसका प्रभाव क्या है। सौरभ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी उस नेटवर्क को समझने में है, जिसमें पैसा अलग-अलग नामों और परियोजनाओं तक पहुंचता है। यदि कोई संस्था भारत में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में पैसा लगा रही है, तो यह जानने का अधिकार जनता को है कि उसके संसाधनों का स्रोत क्या है, प्राथमिकताएं क्या हैं और जवाबदेही किसकी है।

 CJP के सौरव दास और TFF का कनेक्शन क्या है?

सौरव दास का नाम TFF की अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित ग्रांट पाने वाले लोगों में मिलता है। फाउंडेशन के अनुसार उन्हें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया गया। TFF की वेबसाइट पर इस ग्रांट के साथ सौरव दास की कुछ रिपोर्टों के लिंक भी दिए गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषणों में उनके अनुदान की राशि और वर्ष को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। यहीं से असली खेल शुरू होता है। यदि किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर रिपोर्टिंग के लिए विदेशी फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि कौन-सा काम उस अनुदान के तहत हुआ, उसका दायरा क्या था और फंडर तथा प्राप्तकर्ता के बीच जवाबदेही की व्यवस्था क्या थी।
TFF से लेफ्ट लिबरल गैंग को फंडिंग की सूची छोटी नहीं
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार यह अप्रैल 2019 से भारत में सूचना तक पहुंच को बढ़ावा देने और खोजी अनुदानों के माध्यम से एक अधिक जागरूक और जवाबदेह समाज बनाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। फाउंडेशन का दावा है कि उसका लक्ष्य समस्याओं के मूल कारणों पर काम करना और रणनीति के माध्यम से जवाबदेही की संस्कृति को और मजबूत बनाना है। TFF की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और विस्तृत हो जाती है। फाउंडेशन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूज़लॉन्ड्री को रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया। मनीलाइफ फाउंडेशन के RTI सेंटर को भी समर्थन दिया गया। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को evidence-based medicine की fact-checking के लिए अनुदान दिया गया है। न्यूज लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकारों और द कारवां से जुड़े रिपोर्टरों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए फेलोशिप या अनुदान दिए गए हैं। बाद के वर्षों में फाउंडेशन की सूची और फैलती दिखाई देती है। इसमें preventive detention, custodial या extrajudicial deaths, Indian Pharmacopoeia, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पतालों में संक्रमण, HIV संक्रमण, communal harmony और policy-making में think tanks की भूमिका जैसे विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ता और संस्थाएं शामिल हैं।
द वायर, न्यूजलॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज तक पहुंच
TFF की वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उसने ऐसे मीडिया और शोध नेटवर्क को समर्थन दिया है, जिनकी पहचान सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर विवादित रिपोर्टिंग की रही है। द वायर से जुड़े पत्रकारों ने TFF फेलोशिप के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम किया। Report for the World की एक प्रोफाइल भी बताती है कि द वायर की पत्रकार बंजोत कौर ने 2020 में Thakur Foundation Fellowship के तहत public health पर investigative reporting project किया था। TFF के अपने रिकॉर्ड में न्यूजलॉन्ड्री को कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए अनुदान का उल्लेख है। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को भी evidence-based medicine पर fact-checking के लिए आर्थिक सहायता दी गई थी।
सौरव दास का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है
सौरव दास का मामला इस पूरे नेटवर्क को समझने के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो TFF की अपनी वेबसाइट पर public-health reporting के फंड लेने वाले के रूप में दर्ज हैं। दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े कुछ प्रकाशित काम public health के बजाए सरकार की नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों से संबंधित हैं। कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों ने इसी अंतर पर सवाल उठाए हैं। यहां किसी के विचारों पर रोक लगाने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिस काम के लिए आर्थिक सहायता मिली, उसका घोषित उद्देश्य और प्रकाशित काम आपस में मेल क्यों नहीं खा रहा है।
विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर बहस अक्सर राजनीतिक हो जाती है। सरकार जब विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी NGO पर सवाल उठाती है तो उसे कई बार नागरिक स्वतंत्रता पर हमला कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता की मांग कोई दमन नहीं है। NGO और मीडिया संस्थानों को यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनके किस काम को, कौन पैसा दे रहा है। यही पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए। हर grant की राशि, उद्देश्य, deliverables, final output और funding disclosure सार्वजनिक होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों के सामने यह बताना चाहिए कि किसी रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में बाहरी फंडिंग लगी है या नहीं।
TFF के बॉस की एक्टिविस्ट सेना में शामिल हुआ सौरभ
कोविड कई लोगों के लिए एक दुखद याद थी, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जैकपॉट साबित हुई। जब भारत अपनी सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहा था, तब अमेरिका में बैठा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन का फाउंडर दिनेश ठाकुर चुपचाप भारत में अपनी सेना तैयार कर रहा था। यह उसके हितों के काम करने वाले एक्टिविस्ट्स की एक सेना थी। यही समय दिल्ली के RTI एक्टिविस्ट सौरव दास के मुताबिक उसके लिए सबसे खुशी लेकर आया। क्योंकि उसको आखिरकार उस सेना में जगह मिल गई, जिसमें शामिल होने की वे लंबे समय से कोशिश कर रहा था।
फाइजर बनाम रैनबैक्सी की एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यह कहानी 2021 से शुरू नहीं होती, यह 2003 से शुरू होती है। तब फाइजर बनाम रैनबैक्सी का वार चरम पर था। अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर और भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के बीच एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई चल रही थी। फाइजर अपनी सबसे अधिक बिकने वाली दवा ‘लिपिटर’ का पेटेंट गंवा चुकी थी और रैनबैक्सी लॉन्च करने के लिए तैयार थी।
ठाकुर रैनबैक्सी कंपनी छोड़कर उसके ही खिलाफ हुए 
दरअसल, अपनी जेनेरिक दवा, जो लिपिटर से कहीं सस्ती थी। लिपिटर फाइजर की सबसे अधिक बिकने वाली दवा थी, जिसकी बिक्री अरबों डॉलर में थी और जिसे फाइजर गंवाने की कगार पर थी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तीन भारतीय दिनेश ठाकुर, स्वामीनाथन और दिनेश कस्तूरी इस सारे खेल में शामिल हुऐ। तब दिनेश ठाकुर अमेरिका की फार्मा कंपनी ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) में काम कर रहा था। उसने BMS छोड़ दी और रैनबैक्सी USA से जुड़े। वहां 2 साल (2003-05) तक काम किया। फिर रैनबैक्सी छोड़ने के बाद उसने डेटा में हेरफेर (data manipulation) को लेकर US FDA में रैनबैक्सी के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई। चूंकि वह कंपनी का अंदरूनी व्यक्ति था, इसलिए उनके पास सारी गोपनीय जानकारी थी। रैनबैक्सी केस हार गई और उस पर $500 मिलियन का जुर्माना लगा।
US फार्मा माफिया के इशारे पर भारतीय कंपनियों पर निशाना
व्हिसलब्लोअर इनाम के तौर पर दिनेश ठाकुर को US सरकार से $48 मिलियन मिले। इस केस ने रैनबैक्सी को बर्बाद कर दिया और आखिरकार 2015 में इसे सन फार्मा को बेच दिया गया। यह केस फाइजर (Pfizer) के लिए जैकपॉट साबित हुआ और उसका कॉम्पिटिशन खत्म हो गया। कई कामों में हाथ आजमाने के बाद, दिनेश ठाकुर ने खराब फार्मा कंपनियों को टारगेट करने के मकसद से फार्मा एक्टिविज्म शुरू किया, लेकिन क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है कि उनके टारगेट हमेशा भारतीय फार्मा कंपनियां होती हैं और फायदा US फार्मा कंपनियों को होता है? या फिर वह US फार्मा माफिया के इशारे पर काम करता है?
यूएस सरकार से मिले पैसे से दिनेश ने 2018 में बनाया TFF
यूएस सरकार से मिले $48 मिलियन के साथ, दिनेश ठाकुर ने 2018 में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (TFF) नाम का NGO शुरू किया। इसे टैक्स छूट का दर्जा मिला और उसने अप्रैल 2019 से ग्रांट देना शुरू किया। यानि कोविड से कुछ महीने पहले। अब ‘ठाकुर की आर्मी’ बनाने का समय आ गया था। बिकने के लिए तैयार भारतीय इसकी आर्मी में शामिल होने लगे। 2019 से 2026 के बीच, उसने कई भारतीय पत्रकारों, इन्फ्लुएंसर्स, वकीलों और एक्टिविस्ट को फंड दिया। इन्हीं में सीजेपी का प्रवक्ता सौरभ भी शामिल था। वह उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्हें TFF से फंडिंग मिली। सुचेता दलाल ने ‘मनीलाइफ फाउंडेशन’ (MLF) की सह-स्थापना की, जिसे TFF से $100K मिले और उसी समय उन्होंने सन फार्मा को टारगेट करना शुरू कर दिया। सन फार्मा का स्टॉक 40% गिर गया। यह TFF के कहने पर किया था?
मोदी सरकार ने शोषण से बचाकर आत्मनिर्भरता पर दिया जोर
कोविड का समय अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पैसे कमाने का मौका था, लेकिन भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों को भारतीयों का शोषण नहीं करने दिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। और इसी के साथ ठाकुर की सेना ने भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन और दिनेश ठाकुर दोस्त हैं। सिर्फ वायर को ही TFF से फंडिंग नहीं मिली, बल्कि उसके चार पत्रकारों प्रियंका पुल्ला, श्रेया दासगुप्ता, बनजोत कौर और अदिति प्रधान को भी TFF से फंडिंग मिली। लेकिन यह पैसा मुफ्त नहीं था। उनका काम भारत को निशाना बनाना था। यह काम प्रियंका पुल्ला ने बेहतर किया। दिनेश ठाकुर उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ब्लूमबर्ग में प्रमोट किया। 2022 उसने अफ्रीका में भारतीय फार्मा कंपनियों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत बायोटेक ने ‘द वायर’ पर किया 100 करोड़ रुपये केस
असल में, ‘द वायर’ ने इतनी गंदगी फैलाई कि भारत बायोटेक ने उस पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया और उन्हें 14 खबरें हटानी पड़ीं। इनमें से लगभग सभी खबरें भारतीय वैक्सीन की कवरेज से जुड़ी थीं, जिनमें ठाकुर की फंडिंग वाली और पुल्ला की लिखी खबरें भी शामिल थीं। 2013 में “भारतीय जेनेरिक दवाओं के खिलाफ ठाकुर के एजेंडे वाली कहानियों” का पर्दाफ़ाश हुआ था, लेकिन 2021 तक आते-आते लेफ्ट लिबरल गैंग के दो पत्रकारों को TFF से फंडिंग मिली; और ठाकुर भारतीय फार्मा के मसीहा बन गए! स्क्रॉल मीडिया ने दिनेश ठाकुर के लिए भारत को निशाना बनाते हुए बहुत सारे लेख लिखे।
कोविड में फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था गिद्ध सौरभ
जब हर कोई पैसे कमा रहा था, तो सौरव दास को भी पैसे कमाने का हक है, लेकिन उस समय तक वे कोई बड़ा नाम नहीं थे। 2021 में फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन के लिए मंज़ूरी पाने की कोशिश कर रही थी, जबकि भारत सरकार ने भारतीय वैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट को मंजूरी दे दी थी। इसलिए सौरव दास ने RTI दाखिल की। सौरभ दास ने आरटीआई दाखिल कर सरकार से पूछा कि उन्होंने भारत बायोटेक एंड सीरम इंस्टीट्यूट को किस आधार पर मंजूरी दी? सरकार ने आंकड़े देने से इनकार कर दिया। सौरभ ने यह सब दिनेश ठाकुर के इशारे पर सीरम इंस्टीट्यूट को प्रभावित करने के लिए किया था। सौरभ को उसी इकोसिस्टम के अन्य लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। इसलिए सरकार से मनाही मिलने के बावजूद, वह आरटीआई दाखिल करता रहता है। जब पूरा देश कोविड से लड़ रहा था, तब ये गिद्ध फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था।

JPC से क्या होगा? बस FCRA बिल 3-4 महीने के लिए लटक जाएगा; भारत में JPC एक स्वांग है, सब दलगत राजनीति से ही बोलते हैं वहां; इस बार तो हाथापाई भी हो सकती है

सुभाष चन्द्र

यही सत्य है कि भारत में JPC is Farce (स्वांग है)। सभी सदस्य अपनी अपनी पार्टी के रुख के अनुसार रिपोर्ट बनाते है - JPC में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य होंगे और यह JPC अगले शीतकालीन सत्र के प्रथम सप्ताह के अंतिम दिन अपनी रिपोर्ट सदन को देगी बशर्ते उसका कार्यकाल न बढ़ाया जाए।

स्वतंत्रता के बाद अभी तक 20 JPC बनी हैं लेकिन किसी ने भी अपनी Recommendations सर्वसम्मति से नहीं दी है। संसद के दोनों सदनों में  JPC की सिफारिशों को रखा जाता है और सरकार अपना विधायी दायित्व पूरा करती है। जैसे JPC की सिफारिशों को ध्यान में रख कर FCRA में अगर कुछ फेरबदल की जरूरत हुई तो सरकार करेगी वरना जो बिल संसद में पहले ही पेश हो चुका है, उस पर बहस के बाद वोटिंग होगी।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जाहिर है JPC के 31 सदस्यों में बहुमत के लोग सत्ता पक्ष के होंगे और विपक्ष के लोग जो आज की सोच है उसके अनुसार अपनी रिपोर्ट देंगे। मतलब साफ़ है कि FCRA को लेकर जो हालात आज हैं, वो ही JPC की सिफारिशें आने के बाद होंगे क्योंकि विपक्ष का हल्ला बोल तब भी जारी  रहेगा कि जो हमने कहा, वह माना जाए।

JPC बनाने का मकसद है - “Detailed examination and wider stakeholder consultation on transparency and provisions within the FCRA Amendment Bill”.

अब इसके लिए हो सकता मुस्लिम और ईसाई संगठन भी अपना पक्ष JPC के सामने रखना चाहेंगे और शायद उन्हें मौका दिया भी जाए जाए जैसे कुछ मुस्लिम संगठन वक्फ की JPC के सामने भी गए थे।

लेकिन क्योंकि विपक्ष का आरोप है कि FCRA बिल अल्पसंख्यक विरोधी है, इसलिए JPC की Meetings शांति से तो नहीं होंगी जैसे वक्फ संशोधन JPC में हुआ था, इस बार भी हो सकता है।

वक्फ संशोधन JPC में भाजपा के अभिजीत गंगोपाध्याय और TMC के कल्याण बनर्जी के बीच तीखी तकरार हुई और बनर्जी ने अपना पानी का ग्लास ही शीशे की टेबल पर दे मारा जिससे वे खुद चोटिल हो गए।

विपक्ष ने पूरा सत्र केवल FCRA बिल पास न होने देने के लिए बर्बाद कर दिया जो कभी किसी देश में नहीं होता। किसी देश में विपक्ष अपने प्रधानमंत्री के लिए असभ्य भाषा नहीं बोलता।

किसी देश का LoP सड़कों पर लेटा हुआ नहीं मिलेगा लेकिन ये सब भारत में होता है। LoP विदेशों से भारत के लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाता है और अबकी बार विदेशी शक्तियों ने CJP और संसद में विपक्ष के जरिए देश में लोकतंत्र को तोड़ने की कोशिश की।

हर कार्य पूर्ण होने का समय निश्चित होता है। शायद FCRA बिल के पास होने में अभी 3- 4 महीने का समय और है। 

राहुल LoP हैं या Leader of Propaganda या Leader of Dictator? अमित शाह की संसद में बहस की चुनौती, राहुल गाँधी ने ठुकराया प्रस्ताव बोले- हमें नहीं सुनना, इस्तीफा दो

                                                     साभार : NDTV & Indiatoday
एक समय था जब रिकी पोंटिंग की अजेय ऑस्ट्रेलियाई टीम को हराने के लिए ICC ने दुनिया भर के धुरंधरों को मिलाकर एक 'ICC टीम' बनाई, लेकिन आश्चर्य देखिए...
वहाँ भी ऑस्ट्रेलिया ही जीती! तब विरोधी टीमें गिलक्रिस्ट या हेडन का विकेट लेने में ही अपनी जीत मान लेती थीं या "बैट में स्प्रिंग" होने की अफ़वाहें उड़ाकर दिल बहलाती थीं।
भारतीय राजनीति में आज ठीक यही हो रहा है!
अपना पैमाना इतना ऊँचा कर लो कि लोग आपकी एक खरोंच को भी अपनी महाविजय मान लें। आज सत्ता पक्ष को 240 सीटें मिलीं, लेकिन विपक्ष ने ऐसे जश्न मनाया मानो 40 पर रोक दिया हो। संसद में थोड़े से हंगामे या एक मंत्री के इस्तीफे को वो ऐसे सेलिब्रेट कर रहे हैं जैसे कोई 'गृहयुद्ध' जीत लिया हो।
यह मानवीय प्रवृत्ति है जैसे डिस्कवरी चैनल पर जब कोई खरगोश शेर से बच निकलता है, तो दर्शक खुश होते हैं। यह खरगोश से हमदर्दी नहीं, बल्कि शेर से ईर्ष्या और खौफ है। विपक्ष की हालत भी आज उसी खरगोश जैसी है।
याद रहे, 240 सांसदों के साथ मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव ने भी सरकार चलाई है, और अटल जी ने तो 200 से कम में!
एक दौर था जब 2013 में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जी की सदन में गर्जना मात्र से सरकार बिल वापस लेने पर मजबूर हो जाती थी। आज विपक्ष संसद न चलने देने को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठा है। पहले जो नॉर्मल था, आज वह उपलब्धि है।
सच कहूँ तो सत्ता पक्ष का इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा, जिसे शत्रु मिला भी... तो शस्त्र और बुद्धि दोनों से शून्य!
दिल्ली के जंतर-मंतर में सीजेपी प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और उत्पात को लेकर अभी भी चर्चा जारी है। कुछ समय से संसद में अमित शाह के ना आने से विपक्ष बार-बार उनसे इस्तीफे और जवाब की माँग कर रहा था। लेकिन अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में इस मुद्दे पर चर्चा करने की खुली चुनौती दे डाली है।

राहुल के नितरोज मांगों में बदलाव से साबित करता है कि राहुल राहुल LoP हैं या Leader of Propaganda या Leader of Dictator? यह कटु सत्य है कि राहुल की तानाशाही को INDI गठबंधन को समझना होगा कि राहुल कांग्रेस को तो डुबो ही रहे हैं साथ में समस्त विपक्ष को भी डुबो रहे हैं। कभी तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र का इस्तीफा और अब गृह मंत्री का। क्या है ये सब तमाशा? राहुल और विपक्ष को समझना होगा कि देश संविधान से चलेगा तानाशाही से नहीं। अब UPA की सरकार नहीं, और यही रवैया रहा तो दूर भविष्य तक नहीं आने वाली।   

अमित शाह ने कहा है कि संसद में आज ही इस पर बहस शुरू की जाए और वह हर सवाल का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हालाँकि, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने गृह मंत्री के इस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया है। राहुल गाँधी का कहना है कि देश का युवा गृह मंत्री को सुनना नहीं चाहता है और उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

संसद में चर्चा के लिए अमित शाह का प्रस्ताव

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस पूरे विवाद पर पहली बार खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने विपक्ष पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि विपक्ष संसद की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित कर रहा है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर होने वाली बहस से भाग रहा है।

अमित शाह ने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है और वह सदन के भीतर हर एक सवाल का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने विपक्ष को चुनौती दी कि वे अपनी राजनीति छोड़कर संसद को शांति से चलने दें।

अमित शाह ने समय और तारीख तय करते हुए विपक्ष को खुली चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि संसद में इस मुद्दे पर आज दोपहर 3 बजे से ही बहस की शुरुआत कर दी जानी चाहिए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह खुद सदन के अंदर मौजूद रहेंगे और पूरी बात सुनेंगे।

इसके बाद, अगले दिन यानी गुरुवार (13 अगस्त) को दोपहर तीन बजे वह इस पूरी चर्चा का एक विस्तृत और स्पष्ट जवाब सदन के पटल पर रखेंगे। उन्होंने विपक्ष से कहा कि अब यह फैसला उन्हें ही करना है कि वे सदन में चर्चा करना चाहते हैं या फिर सिर्फ हंगामा करके भागना चाहते हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की उस माँग को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें सिर्फ उनके एकतरफा बयान की माँग की जा रही थी। अमित शाह का तर्क था कि संसद में किसी भी बड़े और महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिए पहले से ही नियम और कायदे तय होते हैं।

इतने गंभीर मामलों पर केवल एक बयान देकर खानापूर्ति नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि नियम के अनुसार ही सदन में पूरी चर्चा होनी चाहिए और उसके बाद ही वह हर सवाल का विस्तार से जवाब देंगे। जरूरत पड़ने पर सरकार स्पीकर की अनुमति से प्रश्नकाल को भी स्थगित करने के लिए तैयार है।

‘लापता’ होने पर अमित शाह का जवाब

विपक्ष के नेताओं द्वारा खुद पर ‘लापता’ होने और भागने जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह संसद सत्र के दौरान रोज संसद आते हैं और अपने कार्यालय में मौजूद रहते हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया कि वे सदन के अंदर इसलिए नहीं जा पा रहे हैं क्योंकि विपक्षी दल लगातार सदन में हंगामा कर रहे हैं और कार्यवाही को चलने नहीं दे रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के हर जरूरी मुद्दे पर जनता और सदन के प्रति जवाबदेह है।

छात्रों पर लाठीचार्ज और राहुल गाँधी के तीखे सवाल

यह पूरा विवाद पिछले दिनों दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज, गोलीबारी और पैलेट गन के इस्तेमाल के बाद शुरू हुआ है। विपक्ष लगातार केंद्र सरकार और गृह मंत्री को इस बात के लिए घेर रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इस पूरे विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं।

राहुल गाँधी ने सरकार से सीधा और कड़ा सवाल पूछा है कि आखिर प्रदर्शन कर रहे मासूम छात्रों पर गोलियां चलाने और लाठियाँ बरसाने का आदेश किसने दिया था। गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से बहस की चुनौती मिलने के कुछ ही मिनटों के बाद राहुल गाँधी ने मीडिया के सामने आकर उसे सिरे से खारिज कर दिया।

राहुल गाँधी ने कहा कि देश की युवा पीढ़ी और छात्र अब गृह मंत्री की कोई भी सफाई, कल्पना या भाषण सुनने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखते हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स सीधे तौर पर देश के गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं।

उन्होंने तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि क्या छात्रों पर गोली चलाने का आदेश खुद अमित शाह ने दिया था। राहुल गाँधी ने कहा कि अगर यह आदेश अमित शाह ने दिया है, तो वह इसके लिए पूरी तरह से दोषी हैं। अगर यह आदेश उन्होंने नहीं दिया है, तो वह अपने पद के काबिल नहीं हैं और पूरी तरह से अक्षम हैं।

दोनों ही स्थितियों में गृह मंत्री को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। राहुल गाँधी ने अंत में यह भी आरोप लगाया कि सरकार के पास उनके किसी भी सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं बचा है और अब सरकार पूरी तरह से डर चुकी है।

साथ सोने को कहता था, गलत इरादे से छूता था: जंतर-मंतर पर बिरयानी वाला जुनैद निकला ‘मोलेस्टर’, जानें ऑपइंडिया से बातचीत में क्या बोलीं CJP वॉलंटियर?

छात्रों को बिरयानी खिलाने वाला मोहम्मद जुनैद असल में ठरकी निकला! ये मैं नहीं कह रही, खुद जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट में शामिल हुईं लड़कियाँ ये कह रही हैं। उन्हीं में एक महिला माहिरा कश्यप ने जुनैद के खिलाफ कानून शिकायत दर्ज कराई है, इन्हें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने वॉलंटियर बनाया था, और ये प्रदर्शन स्थल पर झाड़ूँ और बाकी साफ-सफाई का जिम्मा संभालती थीं।

माहिरा कश्यप की 4 अगस्त 2026 को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में की गई लिखित शिकायत ने जुनैद का असली चेहरा सबके सामने ला दिया है। ये वही जुनैद है, जिसके चेहरे पर प्रोटेस्ट को सेकुलर बताया जा रहा था, लिबरल-वामपंथी गैंग जुनैद के खाने बाँटने की वीडियोज को खूब सराह रहे थे। लेकिन असल में वह प्रोटेस्ट में किस एजेंडा के साथ गया था, वो माहिरा कश्यप की शिकायत से पता लग गया है।

                                        साभार सोशल मीडिया 
लिखित शिकायत से खुले प्रोटेस्ट में जुनैद के कारनामे
 

इंस्टाग्राम पर ठीक-ठाक फॉलोवर्स वालीं माहिरा कश्यप ने 04 अगस्त 2026 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस थाने में मोहम्मद जुनैद के खिलाफ लिखित शिकायत की। शिकायत में माहिरा कश्यप बताती हैं कि जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन में वह वॉलंटियर के तौर पर मदद कर रही थीं। इसी दौरान उनकी बातचीत मोहम्मद जुनैद से हुई। शुरुआत में माहिरा ने जुनैद से दोस्ताना तरीके से ही बात की और उस पर भरोसा किया।

माहिरा का कहना है कि कुछ समय बाद उन्होंने नोटिस किया कि जुनैद कई लड़कियों के साथ ठीक तरीके से पेश नहीं आ रहा था। उसके व्यवहार से लड़कियाँ असहज हो रही थीं। माहिरा ने शिकायत में कहा कि उनके साथ भी जुनैद ने इसी तरह का व्यवहार किया, जो उन्हें पसंद नहीं आया। उनका कहना है कि इस तरह के व्यवहार की वजह से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल महिलाओं के बीच असहज और असुरक्षित माहौल बन रहा था।

 माहिरा के मुताबिक, कुछ लड़कियों ने भी जुनैद के व्यवहार को लेकर अपनी परेशानी बताई थी। उन्होंने खुद भी ऐसी चीजें देखी थीं। इसके बाद उन्होंने अभिजीत दिपके से इस बारे में बात की। माहिरा का कहना है कि 11 जुलाई को उन्होंने जुनैद से प्रदर्शन वाली जगह छोड़ने को कहा और उसे वहाँ से हटा दिया, ताकि वहाँ मौजूद महिलाओं के लिए माहौल सुरक्षित रहे।

माहिरा ने पुलिस से यह भी कहा है कि 11 जुलाई की इस घटना की जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल पर लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्डिंग हो सकती है। इसलिए उन्होंने जाँच अधिकारी से संबंधित सीसीटीवी फुटेज निकलवाने और उसे सुरक्षित रखने की माँग की है।

अभिजीत दिपके के बयान दर्ज करने की माँग

शिकायत में माहिरा ने आगे बताया कि सोनम वांगचुक की हिरासत के अगले दिन जुनैद दोबारा प्रदर्शन स्थल पर आया। उसने माहिरा से अपने व्यवहार के लिए माफी माँगी। माहिरा के मुताबिक, बातचीत के दौरान जुनैद ने माना कि उसका व्यवहार गलत था और उसने इसके लिए माफी माँगी। माहिरा का कहना है कि इस बातचीत की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग उनके पास है, जिसे वह पुलिस को सबूत के तौर पर देने के लिए तैयार हैं।

इसके बाद माहिरा ने इंस्टाग्राम पर लाइव आकर लोगों को इस पूरे मामले के बारे में बताया। इसी लाइव के दौरान जुनैद का साथी राशिद भी जुड़ा और उसने कहा कि जुनैद अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी माँगेगा। हालाँकि, माहिरा का कहना है कि इसके बाद भी जुनैद की तरफ से अभी तक कोई सार्वजनिक माफी नहीं माँगी गई है।

माहिरा ने शिकायत में यह भी बताया कि उन्होंने अभिजीत दिपके को जुनैद के महिलाओं के साथ गंदे व्यवहार के बारे में जानकारी दी थी। उनका कहना है कि वह अकेली महिला नहीं थीं जिसने इस बारे में शिकायत की थी। दूसरी महिलाओं ने भी अभिजीत दिपके और उनकी टीम से संपर्क करके जुनैद के व्यवहार को लेकर अपनी परेशानी बताई थी। इसलिए माहिरा ने पुलिस से अभिजीत दिपके का बयान दर्ज करने की माँग की है, क्योंकि उन्हें इस मामले में हुई दूसरी शिकायतों के बारे में भी जानकारी हो सकती है।

आखिर में माहिरा ने कहा है कि उनकी शिकायत उनके खुद के अनुभव, उनके सामने हुई घटनाओं और उनके पास मौजूद सबूतों पर आधारित है। उन्होंने पुलिस से मामले की निष्पक्ष जाँच करने और मोहम्मद जुनैद के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करने की माँग की है।

ऑपइंडिया से बातचीत में क्या बोलीं माहिरा कश्यप?

ऑपइंडिया ने इस शिकायत को लेकर माहिरा कश्यप से संपर्क किया। माहिरा ने बताया कि उनकी शिकायत पर पुलिस ने अब तक कोई FIR दर्ज नहीं की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जुनैद इस शिकायत के डर से ही झारखंड के प्रोटेस्ट में पहुँचा है। जुनैद के गंदे व्यवहार के बारे में बताते हुए माहिरा ने कहा कि वह इकलौती लड़की नहीं हैं, जिसके साथ उसने ऐसा व्यवहार किया।

उनके मुताबिक, जुनैद कई लड़कियों से बात करते हुए उन्हें गलत इरादे से छूता था। माहिरा ने कहा, “जुनैद कभी कंधे पर, कभी सिर पर, कभी बालों पर और कभी हाथ पर छूकर लड़कियों से पूछता था कि उनका स्वास्थ्य कैसा है।” माहिरा का कहना है कि उनके साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया गया।

माहिरा ने आगे बताया कि जुनैद कुछ लड़कियों को देर रात तक कॉल भी करता था। जुनैद के बारे में एक और गंभीर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि उसने प्रोटेस्ट में शामिल एक लड़की को अपने साथ सोने का प्रस्ताव तक दिया था। माहिरा का कहना है कि ऐसी घटनाओं की वजह से उन्होंने यह मामला पुलिस के सामने उठाने का फैसला किया, ताकि प्रोटेस्ट में शामिल दूसरी लड़कियों को भी इस तरह के व्यवहार का सामना न करना पड़े।

माहिरा कहती हैं कि वह अब सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन दूसरी लड़कियों के लिए भी सामने आई हैं, जिनके साथ जुनैद ने ऐसा गंदा व्यवहार किया। उन्हें उम्मीद है कि अगर वह आज जुनैद के खिलाफ आवाज उठा रही हैं, तो कल दूसरी लड़कियाँ भी हिम्मत जुटाकर सामने आ पाएँगी। माहिरा ने बताया कि वह ऐसी लड़कियों से संपर्क भी कर रही हैं। उनका कहना है कि जुनैद का ‘असली चेहरा’ सामने आना जरूरी है, ताकि दूसरी लड़कियाँ भी उसके खिलाफ अपनी बात रख सकें।

उद्धव सेना से शिंदे की टूट का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट सुलझा नहीं सका और अब सांसदों की टूट लेकर फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए

सुभाष चन्द्र 

उद्धव ठाकरे ने अपने 6 सांसदों के शिंदे शिवसेना में विलय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उसके वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि केवल विधायक दल में टूट होना कभी भी राजनीतिक दल में टूट के बराबर नहीं हो सकता

जबकि दल बदल कानून विधायकों पर लागू होता है चाहे वो MLA हों या MP, फिर न जाने कैसी व्याख्या कर रहा है कपिल सिब्बल? 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अभी सुप्रीम कोर्ट ने शिंदे सेना के अलग होने पर फैसला नहीं दिया है महाराष्ट्र के राज्यपाल के ने 30 जून 2022 को उद्धव को अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा था लेकिन 29 जून को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और 30 जून, 2022 को एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बन गए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था “ the then-Governor Bhagat Singh Koshyari was wrong to call for a floor test without objective material indicating a loss of confidence”.

और क्योंकि उद्धव ठाकरे त्यागपत्र दे चुके हैं, हम उनकी सरकार को बहाल नहीं कर सकते कोर्ट ने यह भी कहा था कि दल बदल कानून में याचिकाओं पर निर्णय करना स्पीकर का काम है

राज्यपाल को जब सामने दीवारों पर लिखा दे रहा था कि एकनाथ शिंदे के पास बहुमत है तो उनके पास Floor Test का आदेश देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि राज्यपाल का कर्तव्य है कि वह राज्य में स्थिर सरकार बनने की संभावनाओं को टटोलें इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की राज्यपाल के विरुद्ध की गई टिप्पणी उचित नहीं थी

उद्धव में अगर दम था तो बहुमत परीक्षण का सामना करते लेकिन उन्होंने  शिंदे गुट में शामिल समेत सभी सदस्यों को व्हिप जारी कर दिया कि वे शिंदे सरकार के खिलाफ वोट करें स्पीकर ने शिंदे गुट में शामिल सदस्यों को अयोग्य घोषित करने से मना कर दिया और उस पर अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने फैसला नहीं दिया है

किसी भी विधायक दल में अगर दो तिहाई से ज्यादा सदय पार्टी से अलग होते हैं तो वे दल बदल कानून में अयोग्य नहीं होते किसी दल में औपचारिक टूट नहीं होती वह टूट विधायकों और सांसदों में ही होती है उद्धव सेना के 9 में 6 सांसद शिंदे शिवसेना में शामिल हो गए जो कानूनी दृष्टि ने गलत नहीं है

अभी कुछ दिन पहले TMC के 80 में से 60 विधायकों ने अलग होकर अपनी पार्टी बना ली और 28 में से 20 लोकसभा सांसद Nationalist Citizens Party of India (NCPI) में शामिल हो गए ECI ने भी ऋतब्रत बनर्जी की पार्टी को मान्यता दे दी

अगर किसी दल के दो तिहाई सदस्य अपनी पार्टी से अलग होते है वह राजनीतिक दल में विभाजन (Split in a Political Party) माना जाता है और अगर उससे कम सदस्य अलग होते हैं तो दल बदल कानून में वे अयोग्य घोषित हो जाते हैं फिर कौन सा कानून पढ़ रहा है कपिल सिब्बल?

यह सीधा सा कानून है फिर न जाने क्यों सुप्रीम कोर्ट 2 साल से लिए बैठा है?

FCRA Bill को ‘ईसाई संस्थानों की लूट’ बताने वाले बिशप जोसेफ डिसूजा के दावों की खुली पोल, द वायर ने फिर फैलाया वही नैरेटिव

                                   इंटरव्यू का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार - YouTube/The Wire)
वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026)  को एक क्लिप शेयर की, जिसमें ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल (AICC) का अध्यक्ष और गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया के प्राइमेट आर्कबिशप जोसेफ डिसूजा फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Bill 2026) को ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी और संघ परिवार का एजेंडा बताते हुए नजर आया।

जिस पॉडकास्ट में करण थापर ने जोसेफ डिसूजा का इंटरव्यू लिया था, वह 4 महीने पहले 2 अप्रैल 2026 को प्रसारित हुआ था। डिसूजा जो घोटाले का आरोपित और विदेशी फंडिंग प्राप्त ईसाई पादरी हैं, उसको द वायर बार-बार FCRA संशोधनों को लेकर मोदी सरकार को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये संशोधन संदिग्ध और अवैध फंडिंग, अवैध धर्मांतरण और अन्य गतिविधियों पर शिकंजा कसेंगे।

क्लिप शेयर करके द वायर उन आरोपों और झूठ की मुहिम में शामिल हो गया, जिन्हें कई निहित स्वार्थ वाले समूह FCRA बिल के खिलाफ लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। यह क्लिप डिसूजा द्वारा पत्रकार करण थापर को दिए गए एक इंटरव्यू से ली गई थी।

इंटरव्यू की शुरुआत थापर इस घोषणा के साथ करता हैं कि FCRA बिल में कठोर और देखने में असंवैधानिक उपाय शामिल हैं, जिस पर डिसूजा बिल को लेकर अपने खुद के निराधार दावे जोड़ता हैं।

द वायर पर घोटाले के आरोपित जोसेफ डिसूजा ने FCRA को कहा ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी

थापर की बात से सहमति जताते हुए डिसूजा ने दावा किया कि अगर यह बिल पास हो जाता है, तो इससे वह संभव हो सकेगा जिसे भारतीय ईसाई समुदाय और वैश्विक ईसाई समुदाय की कानूनी लूट को बढ़ावा मिलेगा।
अपने गंभीर आरोप को समझाते हुए डिसूजा ने दावा किया कि यह बिल ईसाई संस्थानों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर कब्जा करने की एक चाल है। उसने आगे दावा किया कि बिल के तहत प्रस्तावित डेजिग्नेटिड अथॉरिटी को उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों पर स्थायी नियंत्रण लेने की व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं, जिनका विदेशी योगदान पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है।
जोसेफ डिसूजा ने आगे दावा किया कि यह बिल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, क्योंकि डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के फैसले न्यायिक समीक्षा या न्यायिक जाँच के अधीन नहीं हैं।

ईसाई चर्च के प्रति RSS की ऐतिहासिक दुश्मनी

डिसूजा ने आरोप लगाया कि सरकार इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल कर सकती है। वह किसी संगठन के नवीनीकरण आवेदन को समय पर मंजूर नहीं करके या उस पर कार्रवाई नहीं करके ऐसा कर सकती है, जिससे संगठन की संपत्तियाँ जब्त हो जाएँगी।
उसने FCRA बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए इसे देश के ईसाई संस्थानों को हड़पने के RSS के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला बताया।
उसने बिल लाने के पीछे सरकार की वैचारिक मंशा होने का आरोप लगाया। उसने दावा किया कि RSS की मदर टेरेसा और ईसाई चर्च के प्रति ऐतिहासिक दुश्मनी ही FCRA बिल के पीछे की वजह है।
बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए खतरा बताते हुए आर्कबिशप ने इसकी तुलना नाजी जर्मनी में बनाए गए यहूदी मामलों के कार्यालय, जिसे रेफरेट IV B4 कहा जाता था, से की। यह कार्यालय यहूदी लोगों की संपत्तियों, संस्थानों, सिनेगॉग और उनकी हर चीज को हड़पने के लिए बनाया गया था।

ईसाई समुदाय को कमजोर करना

आर्कबिशप ने आरोप लगाया कि सरकार की आर्थिक लूट करने और ईसाई समुदाय को कमजोर करने की साजिश को FCRA बिल का रूप दिया गया है। उसने विदेशी फंडिंग से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को खारिज कर दिया और RSS पर आतंकवाद का आरोप लगाया।
उसने दावा किया कि ईसाई संगठनों की विदेशी फंडिंग की जाँच जरूरी नहीं है, क्योंकि ईसाई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। डिसूजा ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि बिल का उद्देश्य चर्चों में आने वाले उस विदेशी धन और उससे होने वाली आय को नियंत्रित करना है, जिसका इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया जाता है।
उसने आगे दावा किया कि भारत में ईसाई संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल होते हैं और सरकार को आधुनिक ईसाई धर्म की कोई समझ नहीं है। उसने धमकी दी कि बिल लाकर सरकार वैश्विक स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर देगी।
उसने कहा कि इस कार्रवाई के वैश्विक स्तर पर असर होंगे और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से प्रतिक्रिया और विरोध का सामना करना पड़ेगा। आर्कबिशप ने धमकी दी कि अगर बिल संसद में पास हो गया, तो ईसाई संगठन देश और दुनिया की अदालतों का रुख करेंगे, अपने वैश्विक साझेदारों को उनकी अदालतों में जाने देंगे।

जोसेफ डिसूजा – हिंदुओं के खिलाफ नफरत का अभियान चलाने वाला व्यक्ति, 296.6 करोड़ रुपए निजी बैंक खातों में डायवर्ट करने का आरोप

डिसूजा खुद को दलितों और हाशिए पर मौजूद समुदायों की आवाज के रूप में पेश करता हैं, लेकिन FCRA बिल पर चर्चा में वह कोई निष्पक्ष आवाज नहीं है। अतीत में उन्हें विदेशी फंडिंग और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जाँच का सामना करना पड़ा है।
वह और उसके पश्चिमी सहयोगी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह नैरेटिव आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात है कि वो भारत के उन उत्पीड़ित, पिछड़े या अछूत समुदायों से आता है, जिन्होंने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया।
गुड शेफर्ड चर्च और उससे जुड़े संगठनों के तहत स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संगठनों समेत उसके संस्थानों के नेटवर्क को विदेशी फंडिंग मिलती है और हजारों अन्य NGO की तरह पिछले वर्षों में FCRA अनुपालन जाँच का सामना कर चुका है।
जोसेफ डिसूजा ने दलित फ्रीडम नेटवर्क की सह-स्थापना की थी, जिसका बाद में नाम बदलकर डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (DFN) कर दिया गया। यह नेटवर्क अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम में प्रमुख शाखाएँ संचालित करता है।
इन संगठनों से जुड़ी उसकी वेबसाइट और प्रचार सामग्री भारत की बेहद नकारात्मक तस्वीर पेश करती हैं और भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़ों की तरह मारा जा रहा है जैसे झूठ फैलाती हैं।
तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय गबन से जुड़े गंभीर आरोपों के संबंध में आरोप लगाए जाने के बाद जोसेफ डिसूजा जाँच के घेरे में आया।
उस पर और उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा पर गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और कल्याण के लिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए के विदेशी फंड को फर्जी बिलों और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और महंगी रियल एस्टेट में निवेश करने के लिए डायवर्ट करने का आरोप लगाया गया।
डिसूजा उन प्रमुख लोगों में से एक हैं, जिन्होंने भारत को बदनाम करने के लिए ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती नफरत का झूठ फैलाया। ऑपइंडिया ने डिसूजा, उसके घोटाले और उसके विदेशी फंडिंग पर विस्तृत रिपोर्ट की है।

आर्कबिशप के झूठ का पर्दाफाश

FCRA बिल को लेकर डर फैलाने वाली बातें उन वर्गों की ओर से आ रही हैं, जिन्हें नए कानून के तहत वैध जाँच का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि वास्तविकता उन बातों से काफी अलग है, जिस तरह कुछ निहित स्वार्थ वाले समूह इसे पेश कर रहे हैं।
प्रस्तावित बिल स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों को सरकारी कब्जे, धर्मनिरपेक्षीकरण या किसी दूसरे उद्देश्य में बदले जाने से सुरक्षा देता है।
सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थानों पर कब्जा करने की व्यापक शक्तियाँ दिए जाने के दावों की सच्चाई का पता प्रस्तावित बिल को सीधे पढ़कर लगाया जा सकता है। प्रस्तावित बिल में एक प्रावधान इस प्रकार है:
उप-धारा (6) में निहित किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण (डेजिग्नेटिड अथॉरिटी), जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है, वहाँ ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से का प्रबंधन या संचालन ऐसे व्यक्ति को, ऐसे तरीके से और ऐसी शर्तों पर सौंपेगा, जो निर्धारित की जा सकती हैं और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।
डिसूजा के दावे के विपरीत, डेजिग्नेटिड अथॉरिटी  द्वारा पारित कोई भी आदेश प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील के अधीन रहेगा। इसके अलावा, केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना राज्य स्तर की एजेंसियों को स्थानीय मुकदमे शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमानी स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ एक स्पष्ट सुरक्षा उपाय है।
FCRA बिल ईसाई धर्म समेत किसी भी धर्म के लिए विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाता। चर्च, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे समेत पूजा स्थल वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी दान प्राप्त करते रहेंगे।

जोसेफ डिसूजा पर खुद अधिकारियों ने FCRA नियमों के उल्लंघन का लगाया है आरोप

जाँचकर्ताओं के अनुसार, गृह मंत्रालय (MHA) ने नेटवर्क से जुड़े प्रमुख संगठनों के FCRA लाइसेंस नियामकीय उल्लंघनों के कारण पहले निलंबित और बाद में रद्द कर दिए थे।
इसके बावजूद विदेशी फंड अप्रत्यक्ष माध्यमों से भारत में आते रहे। FCRA लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि संगठन सीधे विदेशी दान प्राप्त नहीं कर सकते थे। जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक इकाई OMBF (ओम बुक्स फाउंडेशन) का इस्तेमाल एक वैकल्पिक रास्ते के रूप में किया।
आरोपों के अनुसार, प्रिंटिंग और पब्लिशिंग सेवाओं के लिए बढ़े-चढ़े और फर्जी बिल तैयार किए गए और उन्हें विदेशों में मौजूद संबंधित या कथित रूप से संबद्ध संगठनों को भेजा गया।
इन लेनदेन को वैध व्यावसायिक गतिविधियों के रूप में पेश किया गया, जिससे यह दिखाया जा सके कि विदेशी संगठनों ने किताबों और प्रकाशनों का ऑर्डर दिया था। जाँचकर्ताओं का दावा है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल सीधे विदेशी योगदान पर लगी पाबंदियों के बावजूद विदेशी फंड को भारत में भेजते रहने के लिए किया गया।
जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि ऊपर बताई गई गतिविधियों के जरिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए को रियल एस्टेट और अन्य परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत जाँच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि जोसेफ डिसूजा, उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा और करीबी सहयोगियों ने इन गतिविधियों से जुड़े फंड का इस्तेमाल करके महंगे जमीन के टुकड़े, कमर्शियल संपत्तियाँ और लग्जरी विला खरीदे थे।
जिसे ED ने अपराध से अर्जित आय (proceeds of crime) के रूप में वर्गीकृत किया, उस पर कार्रवाई के तहत ED ने 12 प्रमुख अचल संपत्तियों को अटैच और फ्रीज किया। इनकी संयुक्त बाजार कीमत 15 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई थी।
इसके बाद इन फंड को कागजी लेनदेन और फर्जी बिलों के जरिए निजी संपत्तियों और ऐशो-आराम वाली जीवनशैली में डायवर्ट किया गया, बजाय इसके कि इनका इस्तेमाल उन लाभार्थियों के लिए किया जाता, जिनके लिए ये फंड जुटाए गए थे।

राजनीतिक संबंध, भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल

जोसेफ डिसूजा के आलोचकों का कहना है कि उसका प्रभाव मजहबी गतिविधियों से आगे तक फैला हुआ है और उसने भारत के राजनीतिक तथा मीडिया इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं।
उसका दावा है कि जब भी वित्तीय आरोपों से जुड़ी कानूनी कार्रवाई तेज होती है, तो राजनीतिक समर्थन तंत्र ऐसी कार्रवाइयों को राजनीतिक या वैचारिक रूप से प्रेरित बताने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। जोसेफ डिसूजा का वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ संबंध कई वर्षों पुराना है।
2004 के आम चुनाव के बाद, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार चुनाव हार गई और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सत्ता में आया, तब डिसूजा ने अमेरिका में चर्च नेटवर्क को पत्र लिखकर इस नतीजे को दैवीय न्याय (Divine Justice) और एक बड़ा चमत्कार बताया था।
उस समय डिसूजा ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहा था। ब्रेकिंग इंडिया  के अनुसार, इन दावों और संबंधित दस्तावेजों पर किताब के अध्याय 8 में चर्चा की गई है।
इस तरह के राजनीतिक बयान जोसेफ डिसूजा जैसे लोगों से जुड़ी ED और CID की चल रही जाँच को मजहबी उत्पीड़न के मुद्दे के रूप में पेश करने का काम करते हैं, जिससे एक राजनीतिक सुरक्षात्मक नैरेटिव तैयार होता है। हालाँकि यह स्थापित कानूनी निष्कर्ष के बजाय राजनीतिक व्याख्या और अलग-अलग दृष्टिकोणों का मामला है।
मूल रूप से, द वायर ने न केवल एक ऐसे बिशप को मंच दिया, बल्कि बार-बार उनके निराधार आरोपों और खुले झूठ को भी आगे बढ़ाया, जिन्होंने ईसाई उत्पीड़न को लेकर झूठ फैलाते हुए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी अभियान चलाया, जिन पर करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप है और जिन्होंने खुद FCRA नियमों का उल्लंघन किया है। यह सब प्रस्तावित FCRA संशोधनों के बारे में झूठ फैलाने के लिए किया गया, जो उसके जैसे घोटालेबाजों पर शिकंजा कसेंगे।

केरल में घास-मिट्टी खाने को मजबूर हुए युवा, जवाब देने के डर से लोकसभा से भागे राहुल गांधी, वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी ने साधी चुप्पी


LoP राहुल गाँधी का असली मकसद संसद में देश की समस्याओं पर सरकार का ध्यान दिलाने की बजाए संसद में हंगामा कर जनहित कार्यों में बाधा पहुँचाना है। दूसरे, बीजेपी शासित राज्यों की गलतियों पर हंगामा कर गैर-बीजेपी शासित राज्यों की कमियों पर आंख, नाक और कान सब बंध कर लेना समूचे विपक्ष का दोगलापन है।    
राहुल गांधी ने प्रयागराज में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में युवाओं को देश की आत्मा बताया और उन्हें बेरोजगारी व पेपर लीक जैसे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ एकजुट होने की सलाह दी। लेकिन केरल के वायनाड से पूर्व सांसद राहुल गांधी को वहां के युवाओं की गूंज सुनाई नहीं दे रही है। यहां तक कि वायनाड की वर्तमान सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की आंखों पर पट्टी बंधी हुई है। इसलिए दोनों भाई-बहन को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में युवाओं का अनोखा प्रदर्शन दिखाई नहीं दे रहा है। केरल की डी. सतीशन की कांग्रेस सरकार युवाओं के साथ भद्दा मजाक कर रही है। 

घास और मिट्टी खाकर अनोखा और आक्रोशित विरोध प्रदर्शन
दरअसल, केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में केरल लोक सेवा आयोग (KPSC) की लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर (LPST) परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थी 37 दोनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। अभ्यर्थियों ने नियुक्ति पत्र न मिलने पर सचिवालय के बाहर प्रतीकात्मक रूप से घास और मिट्टी खाकर एक अनोखा और आक्रोशित विरोध प्रदर्शन किया। परीक्षा पास कर रैंक सूची में नाम आने के बाद भी हफ्तों और महीनों से नियुक्ति पत्र नहीं मिले हैं। अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर सचिवालय के सामने लगातार धरना दे रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार इस मामले में सिर्फ समय गुजार रही है और उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही है।

अभ्यर्थियों का सवाल- सरकार को आखिर दो महीने का समय चाहिए क्यों?
इससे पहले ऑल केरल लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर (LPST) रैंक होल्डर्स एसोसिएशन की सचिव वलरमथी एस की 13 दिनों से जारी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के बाद 11 अगस्त को राज्य के शिक्षा मंत्री ने प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की। सरकार द्वारा मांगों की व्यापक समीक्षा के लिए 45 दिनों का समय मांगे जाने के बाद भूख हड़ताल को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया, हालांकि सचिवालय के बाहर शांतिपूर्ण धरना जारी है। इस दौरान उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि वे लगातार सरकार से नियुक्ति आदेश जारी करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जा रही। उन्होंने सवाल उठाया है कि सरकार ने दो महीने का समय मांगा है लेकिन उन्हें ये नहीं समझ आ रहा है कि आखिर इतना समय चाहिए क्यों?

अभ्यर्थियों की मुख्य मांगें:-

  • मई 2025 की रैंक लिस्ट से तत्काल नियुक्ति पत्र जारी किए जाएं, कई जिलों में टॉप रैंकर्स को भी नियुक्ति नहीं मिली है।
  • स्कूलों और क्षेत्रीय शिक्षा विभागों की ओर से शिक्षकों के खाली पदों की जानकारी 24 घंटे के भीतर PSC को रिपोर्ट करना अनिवार्य किया जाए।
  • मौजूदा मई 2025 की रैंक लिस्ट की समय सीमा बढ़ाई जाए ताकि अधिक से अधिक योग्य उम्मीदवारों को समायोजित किया जा सके।
  • छात्र-शिक्षक अनुपात को 1:25 (25 छात्रों पर 1 शिक्षक) किया जाए, जिससे कानूनन हजारों नए पद पैदा होंगे।
  • प्राथमिक विद्यालयों के हेडमास्टरों को नियमित कक्षाओं से मुक्त किया जाए, जिससे नए फुल टाइम टीचर के पद खाली हों।
  • निजी एडेड (सरकारी सहायता प्राप्त) स्कूलों की सीधी शिक्षक भर्तियों को बंद कर सभी पद पारदर्शी Kerala PSC के माध्यम से भरे जाएं।
छात्र आंदोलन पर डिटेल डिस्कशन के लिए सरकार तैयार- किरेन रिजिजू
केंद्र की मोदी सरकार झारखंड और केरल के युवाओं को लेकर संसद में चर्चा करने के लिए तैयार है। लेकिन राहुल गांधी लोकसभा से भाग खड़े हुए हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कल हमने पेशकश किया था कि छात्र आंदोलन को लेकर के जो भी घटना हुई है। पूर्ण रूप से डिटेल डिस्कशन के लिए सरकार तैयार है और जवाब भी तैयार करके रखा। गृह मंत्री अमित शाह जी भी कल से पूरा तैयार थे। चर्चा होने नहीं दे रहे हैं। आज भी हम लोग सुबह से तैयार थे। एनडीए पार्टी का पूरा सांसद भी उम्मीद के साथ बैठे थे कि चर्चा शुरू होंगे और गृह मंत्री जी भी चर्चा में जवाब के लिए पूरा तैयारी के साथ बैठे थे। लेकिन कांग्रेस पार्टी फिर भाग गए।
सदन में छात्रों और युवाओं पर चर्चा करने से भागे राहुल गांधी-किरेन रिजिजू 
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि देश के लोगों के सामने में साफ हो गया कि हम लोग चर्चा के लिए तैयार हैं और कांग्रेस चर्चा से भाग रही है। दो चीज क्लियर समझना होगा। राहुल गांधी ने शुरू से क्या कहा था? गृह मंत्री स्टेटमेंट देना चाहिए। हम कह रहे हैं कि सिर्फ स्टेटमेंट ही क्यों? हम फुल डिस्कशन कर देंगे। स्टेटमेंट पर सिर्फ औपचारिक एक बयान होता है लिखित खत्म है। हम पूरा स्टेटमेंट से आगे बढ़ के फुल फ्लेज दिन भर चर्चा, चाहे दो दिन चर्चा करके और पूरा एक-एक पॉइंट पर जवाब देंगे। डिस्कशन करना है तो पूरा करना पड़ेगा। आंदोलन का कई पहलू है। तो अब डिटेल में अगर बात करेंगे तो सामने में आ जाएगा। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अफसोस की बात है कि कांग्रेस पार्टी फिर चर्चा से भाग गई है। आज हमारे एनडीए के साथियों ने भी मांग किया कि राहुल गांधी भागो मत। तो राहुल गांधी जी आज भी भाग गए हैं। किरेन रिजिजू ने कहा कि राहुल गांधी को भागना नहीं है, डरना नहीं है।
केरल में शिक्षक अभ्यर्थियों को घास-मिट्टी खाते देखकर प्रियंका गांधी मौन 
प्रियंका गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं। राहुल गांधी द्वारा यह सीट छोड़ने के बाद नवंबर 2024 में हुए उपचुनाव में उन्होंने इस सीट पर जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक और संसदीय यात्रा की शुरुआत की थी। वायनाड की सांसद बनने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर युवा और छात्र आंदोलनों से जुड़े मुद्दों पर लगातार बयान दिए हैं। लेकिन तिरुवनंतपुरम में युवाओं को घास-मिट्टी खाते देखकर उन्होंने चुप्पी साध रखी है। प्रियंका गांधी को केरल के युवाओं की परवाह नहीं है। वह महिला शिक्षक अभ्यर्थियों की आवाज भी नहीं उठा रही हैं।

हिंदू देवी देवताओं का अपमान करना बंद करें मुस्लिम और ईसाई

सुभाष चन्द्र

टेरेसा कौन थी जिसे मदर टेरेसा के नाम से पुकारा जाने लगा। प्रधानमंत्री आवास में पूरे सम्मान के साथ बुलाया जाता था। इसकी करनी को सामने लाना होगा। 

एक चलन सा बन गया है जो मर्जी जब मर्जी हिंदू भगवानों का अपमान कर देता है मुस्लिम और ईसाई समेत कई पाखंडी हिंदू नेता भी “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के नाम पर भगवान राम का अपमान करते हैं जैसे कांग्रेस ने राम को काल्पनिक कहा और स्वामी प्रसाद मौर्य ने तो हदें ही पार कर दी थी लेकिन उसके विचारों को सुप्रीम कोर्ट ने “Line of thought” कह दिया और इस Line of thought से क्रोधित होकर हिंदू समाज प्रतिक्रिया कर देता तो क्या होता। ऐसी प्रतिक्रिया अब होनी चाहिए

सबसे पहले हिन्दुओं को सेकुलरिज्म के मीठे जहर को त्यागना होगा। दूसरे, सनातन को अपमानित करने वालों को कानून के साथ साथ सामाजिक बहिष्कार करना होगा। जब तक हिन्दू इस नीति को नहीं अपनाएगा सनातन विरोधी जहर फैलाते रहेंगे। पुलिस और जजों का भी अपना परिवार है।   

लेखक 
चर्चित YouTuber 
राहुल विंची की कथित भारत जोड़ो यात्रा में ईसाई पादरी George Ponnaiah ने कहा था जीसस ही मानव अवतार में असली भगवान हैं न कि “शक्ति” के तरह उसके पहले वह यह भी कह चुका था कि मैं भारत को माता नहीं मानता और अपने जूते पहन कर उस पर चलूंगा वरना मेरे पैरों में गंदगी लग जाएगी

अभी कुछ दिन पहले मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान कृष्ण को मुस्लिम कह दिया और कहा कि कृष्ण 5 बार नमाज पढ़ते थे उसने यह भी कहा कि Hindu scriptures divide the role of divinity by designating Brahma as creature, Vishnu as Preserver, and Shiva as as the Destroyer and he made provocative and remarks questioning traditional rituals and the worship of Shivling relative to these distinct roles”. 
साभार सोशल मीडिया 

अपने मज़हब के लिए तो मुस्लिम समुदाय नारा लगाता है "गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा", तो क्या हिंदुओं को भी ऐसा करना चाहिए? 

अभी कांवड़ यात्रा के दौरान मौलाना साजिद रशीदी ने कांवड़ यात्रियों को “आतंकवादी” कह दिया लेकिन असली आतंकियों के लिए कुछ नहीं कहता 

एक मौलाना तौकीर रजा है जो अब जेल में है, वो कहता था कि हमारे लड़के अगर सड़कों पर निकल आए तो हिंदुओं को निकलने का रास्ता भी नहीं मिलेगा दूसरा मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हिंदू अगर मुस्लिमों के साथ नहीं रह सकते तो हिंदुस्तान से चले जाएं भाई फिर पाकिस्तान मांग कर क्यों चले गए अब हिंदुओं को जाने को क्यों कहते हो, खुद अपने पाकिस्तान चले जाओ

छत्तीसगढ़ में अभी 75 साल के अरुण पन्नालाल (President of the Chattisgarh Christian Forum) ने हिंदू देवी देवताओं पर अपमानजनक टिप्पणियां की हैं। उसके खिलाफ केस दर्ज हुआ है और 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है 

Vellore Diocese ने कल Dalit Christians के SC Rights की मांग करते हुए “काला दिन” मनाया उनका कहना है कि जो दलित ईसाई हो गए, उन्हें दलितों के सभी अधिकार मिलने चाहिए इस संस्था ने दलित ईसाइयों के लिए justice, equality and human dignity की मांग की है खासकर दलित ईसाइयों के लिए

सुप्रीम कोर्ट निर्णय दे चुका है कि धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति के व्यक्ति को वे अधिकार नहीं मिल सकते जो अनुसूचित जातियों को मिलते हैं 

ईसाई धर्म तो जात पात में विश्वास ही नहीं रखता और आपने उन्हें justice, equality and human dignity के नाम पर  ईसाई बना कर, ये सब चीज़े तो खुद दे दी अब वो कैसे दलित रह गए जिनके लिए SC Status मांग रहे हो और अगर यह मांग जायज है तो मान लो कि ईसाइयों में जाति भेदभाव और छुआछूत चलता है

मेरा कहना है भारत में सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाए रखने के लिए हिंदू देवी देवताओं का दूसरे मज़हब के लोग अपमान करना बंद करें