जंतर-मंतर पर मोदी-मेलोनी के लिए गंदी गालियाँ बकने वाली रुचिका पर FIR, परिवार के साथ हुई फरार, नोएडा में वकील की शिकायत पर दर्ज हुआ केस

          जंतर मंतर पर पीएम पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली युवती पर एफआईआर दर्ज (फोटो साभार-abp)
उत्तर प्रदेश के नोएडा एक्सप्रेसवे पुलिस स्टेशन में एक युवती के खिलाफ जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोपित के खिलाफ जीरो FIR भी ग्रेटर नोएडा में ही दर्ज कराई गई है।
क्रांतिकारी कॉकरोच सपरिवार फरार चल रही है खुद के साथ साथ अपने परिवार को भी रोड पर ले आई है। क्या कोई CJP या जिसके कहने पर आंदोलन में आकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, खड़ा दिख रहा है? सभी अपनी चादर बचाने में लगे हुए हैं।   
जिन माता पिता को हम वो सम्मान नहीं दे पा रहे है जिसकी वो हकदार है तो हम उनके लिए ऐसा भी असम्मान पैदा नहीं होने देंगे जिससे वो हमारे प्रति निराश हो जाए

इस लड़की की वजह से इसका परिवार ही परेशान नहीं है इसके समाज में इसके रिश्ते नातेदार भी इसे कोस रहे होंगे, जिसने एक झटके में मान सम्मान सब छीन लिया समाज में प्रतिष्ठा भी धूमिल कर दी

जिस हिसाब से इसने अपने गटर जैसे मुखारबिंद से मोदी जी के लिए अपमानजनक शब्द कहे वो माफी के काबिल तो बिल्कुल भी नहीं है ऊपर से इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को घसीटा उनके लिए अनर्गल वकबास की वो तो और भी शर्मिंदा करने वाला था

अगर मोदी जी इसे माफ भी कर दें तो भी इसे कोई भी शरीफ इंसान तो नौकरी नहीं देगा जो भी नौकरी देगा लोग उसे भी टारगेट करेंगे नौकरी देने वाले तक का दिवाला निकल जाएगा

ये कॉकरोच पार्टी की कैसी क्रांति थी जिसमें ये अपनी लड़ाई तो जीत गए मगर इस आंदोलन में गए लोग माफी मांग रहे है खुद तो शर्मिदा है ही अपने परिवार को भी शर्मिंदा कर दिया है ऐसी परवरिश के लिए लोग इनके माता पिता को दोषी मान रहे है

गाजियाबाद के इंदिरापुरम में रहने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील स्मृति सिंह की शिकायत के आधार पर नोएडा सेक्टर 168 की रहने वाली रुचिका सिंह के खिलाफ BNS 2023 के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। बताया जाता है कि रुचिका सिंह ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। उसका आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल होने का दावा किया जा रहा है।

शिकायत में जानबूझकर विद्वेष फैलाना, सामाजिक तनाव पैदा करने और शांति भंग करने का आरोप है। अभी तक आरोपित रुचिका सिंह को पुलिस ने हिरासत में नहीं लिया है। पुलिस फिलहाल वीडियो फुटेज और दूसरे सबूतों की जाँच कर रही है और इसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस रुचिका सिंह की सोशल मीडिया एकाउंट भी खँगाल रही है। मैलोनी का भी इसने वीडियो में जिक्र किया और पीएम मोदी को भद्दी भद्दी गालियाँ दी थी। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था।

ये मामला सार्वजनिक जगह पर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है इसके लिए कानून में आईपीसी की धाराओं के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएँ भी लगाई जा सकती है।

वकील स्मृति सिंह का कहना है कि पीएम का पद राष्ट्र की गरिमा से जुड़ा हुआ है। वे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और आपत्तिजनक बयान देकर गरिमा को ठेस पहुँचाया गया है। इससे जनभावनाएँ आहत हुई हैं।

जंतर मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान कई लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। इतना ही नहीं बैनर और पोस्टर पर भी आपत्तियाँ जताई गई।

एफआईआर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास ने आपत्ति जताई है। उन्होने इसे वादाखिलाफी माना है और केन्द्र से पूछा है कि जब एफआईआर दर्ज नहीं करने की बात हुई थी तो क्यों किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई अपमाजनक भाषा का इस्तेमाल करता है तो उसपर सिविल मानहानि का केस हो सकता है लेकिन प्रदर्शनकारियों पर आपराधिक मामला दर्ज करना बेहद गलत है।

राहुल गाँधी & पार्टी ने संसद में उड़ाया हिंदू धर्म का मजाक, राम मंदिर की आड़ में की नौटंकी: पुजारी बने पप्पू यादव दानपात्र ‘चुराकर’ दौड़े, देखें Video

   राम मंदिर चंदा चोरी की आड़ में पप्पू यादव और राहुल गाँधी ने संसद के बाहर की नौटंकी (फोटो साभार : Video SS)
संसद के मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार (31 जुलाई) एक बेहद हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला। विपक्षी सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार के बाहर एक घटिया नाटक और नौटंकी की। इस नाटक के जरिए विपक्ष ने राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर जमकर हंगामा किया। इस पूरी नौटंकी में पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने मुख्य भूमिका निभाई। पप्पू यादव साधु और पुजारी का वेश बदलकर संसद परिसर में बैठ गए थे। उनके सामने एक दानपात्र रखा गया था ताकि सभी विपक्षी नेता आकर उसमें पैसे डाल सकें।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी इस ड्रामे में पीछे नहीं रहे। राहुल गाँधी खुद आगे बढ़कर उस दानपात्र में पैसे डालने पहुँचे। जैसे ही राहुल गाँधी ने पैसे डाले, पुजारी बने पप्पू यादव ने वे सारे पैसे अपनी जेब में रख लिए। समाजवादी पार्टी के सांसदों ने भी इस नौटंकी में हिस्सा लिया। इस घटिया नाटक के जरिए विपक्षी नेताओं ने यह दर्शाने की कोशिश की कि राम मंदिर में कथित तौर पर चढ़ावा चोरी हो रहा है।

इस दौरान विपक्षी सांसदों ने ‘चोर-चोर’ और ‘चढ़ावा चोर’ के नारे भी लगाए। संसद जैसे पवित्र स्थान पर इस तरह का नाटक करके विपक्ष ने राम मंदिर, वहाँ के पुजारियों और देश के करोड़ों राम भक्तों का खुला मजाक उड़ाया है।

राम मंदिर के विरोध का इतिहास और विपक्ष की दोरंगी नीति

 हकीकत यह है कि जब देश में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा था, तब इस विपक्ष ने कभी कोई मेहनत या सहयोग नहीं किया। इसके विपरीत, पिछली सरकारों और इन विपक्षी दलों ने हमेशा राम सेवकों पर अत्याचार और हिंसा को बढ़ावा दिया था। उस समय इन लोगों ने राम मंदिर के निर्माण को रोकने के लिए हर संभव कानूनी और राजनीतिक बाधाएँ पैदा की थीं।

आज जब अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिला है, तो यही लोग एकजूट होकर संसद में नौटंकी करने पर आतारू हो गए हैं। अयोध्या की पावन भूमि और भगवान श्रीराम के नाम पर ये लोग केवल अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं। राम मंदिर के पुजारियों और संतों का इस तरह सरेआम मजाक उड़ाना इनकी ओछी मानसिकता को साफ दिखाता है।

मोदी की ‘एडिटेड वीडियो’ मामले में फँसे META इंडिया के हेड, हैदराबाद में हुई FIR


जंतर मंतर पर CJP का आंदोलन ख़त्म जूं-जूं दिन बीत रहे हैं, इसे हवा देने वाले बेनकाब होने लगे हैं। Meta जिसे बहुत ही विश्वसनीय माना है जब वह किसी प्रधानमंत्री के वीडियो को एडिटेड करने की हिम्मत कर सकता, इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि "वह क्या नहीं कर सकता?" क्या Meta की ये भयंकर गलती Meta पर भारी सकती है? क्या अब 'खतरों के खिलाडी' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने वैज्ञानिकों को Meta का विकल्प तैयार करने को कह सकते हैं? क्योकि मामला बहुत गंभीर है।       

हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के AI तकनीक की मदद से तैयार किए गए फर्जी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए जाने के मामले में मेटा (Meta) इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास और कुछ सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई उन वीडियो के सामने आने के बाद की गई है, जो हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘छात्र प्रदर्शन’ के दौरान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए थे।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, इन वीडियो को इस तरह तैयार किया गया था कि वे असली लगें, जबकि उनमें AI तकनीक का इस्तेमाल कर प्रधानमंत्री की छवि से छेड़छाड़ की गई थी। शुरुआती जाँच में सामने आया है कि ये वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे मेटा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में साझा किए गए। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन वीडियो को सबसे पहले किसने तैयार किया, उन्हें किसने अपलोड किया और बाद में किन लोगों ने उन्हें बड़े स्तर पर फैलाया।

इस मामले में 29 जुलाई 2026 को बीजेपी समर्थकों की शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT एक्ट) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। जाँच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था ऐसे AI आधारित भ्रामक कंटेंट को समय रहते रोकने में विफल रही। इसी वजह से मेटा इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास का नाम भी FIR में शामिल किया गया है।

इससे पहले भी हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने मेटा के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया था। उस दौरान कंपनी के प्रतिनिधियों से यह जानकारी माँगी गई थी कि AI से बनाए गए फर्जी वीडियो, ऑनलाइन धोखाधड़ी, नकली विज्ञापनों और अन्य भ्रामक सामग्री की पहचान कर उन्हें हटाने के लिए कंपनी किस तरह की व्यवस्था अपनाती है। मेटा की ओर से एक प्रतिनिधि पुलिस के सामने पेश हुआ था और उसने कंपनी की कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली व नियमों के पालन से जुड़ी प्रक्रिया की जानकारी दी थी।

इससे ही जुड़े एक अन्य मामले में दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में एक महिला के खिलाफ भी ग्रेटर नोएडा में जीरो FIR दर्ज की गई है।

मोदी और सनातन के खिलाफ आग उगलने वाली अमेरिकी पत्रकार शिखा डालमिया को ईनाम, स्पॉन्सर की गई चीन ट्रिप: रहा है भारत विरोधी इतिहास

                                           शिखा डालमिया (फोटो साभार: Illiberalism.org)
हाल ही में सबस्टैक (Substack) पर प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कुछ प्रमुख अमेरिकी पत्रकारों को चीन-यूनाइटेड स्टेट्स एक्सचेंज फाउंडेशन (CUSEF) की ओर से चीन की प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन यात्राओं का मकसद अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में माहौल बनाना था।

यह रिपोर्ट नताली विंटर्स ने लिखी है। इसमें उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम भी बताए गए हैं, जिन्होंने ये प्रायोजित यात्राएँ की थीं। इस सूची में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखक और नीति विश्लेषक शिखा डालमिया का नाम भी शामिल है।

यह रिपोर्ट अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत दाखिल दस्तावेजों पर आधारित हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक, CUSEF ने वॉशिंगटन की कुछ लॉबिंग फर्मों को इस उद्देश्य से नियुक्त किया था कि अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में सकारात्मक खबरें और संदेश बढ़ाए जा सकें।

नताली विंटर्स के मुताबिक, FARA के दस्तावेजों में उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम सीधे नहीं लिखे गए थे, जिन्हें चीन की ओर से प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया था। इन पत्रकारों की पहचान करने के लिए उन्होंने FARA के रिकॉर्ड का मिलान पुरानी यात्रा सूची, कार्यक्रमों के ब्रोशर और लॉबिंग से जुड़े दस्तावेजों से किया।

उन्होंने चीन एक्सचेंज कार्यक्रमों में शामिल लोगों की पुरानी सूची देखी, मीडिया से जुड़े आंतरिक दस्तावेजों की जाँच की और उन पत्रकारों के आर्टिकल भी पढ़े, जो उन्होंने चीन यात्रा के बाद लिखे थे। विंटर्स के मुताबिक, इन आर्टिकल में चीन को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाई देता है।

इन आर्टिकल्स में शिखा डालमिया का एक आर्टिकल भी शामिल था, जिसकी हेडलाइन है- “China Bashing is for Losers“,यह लेख फोर्ब्स (Forbes) में प्रकाशित हुआ था। शिखा डालमिया ने यह लेख उसी साल लिखा था, जिस साल उन्होंने चीन की यात्रा की थी। इस आर्टिकल में उन्होंने कहा था कि उस समय चुनावी माहौल में चीन की आलोचना करना अमेरिका की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक तरह का ‘राजनीतिक चलन’ बन गया था।

                                                                   Forbes का स्क्रीनशॉट

उन्होंने लिखा, “रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही चीन विरोधी रुख अपनाकर अपने ही नुकसान की नींव रख रहे हैं। चीन को लगातार निशाना बनाने के बजाय उन्हें उसके साथ व्यापार के फायदों पर बात करनी चाहिए। चीन को लेकर ज्यादा समझदारी वाला नजरिया अपनाने के पक्ष में सिर्फ मजबूत आर्थिक वजह ही नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक वजह भी हैं।”

इससे पहले आर्टिकल में शिखा डालमिया ने विस्तार से यह तर्क दिया था कि चीन की लगातार आलोचना करना अमेरिकी नेताओं और देश, दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

कौन है शिखा डालमिया?

शिखा डालमिया भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखर और नीति विश्लेषक हैं। उनके लेख Reason, The Week, The New York Times, The Wall Street Journal, USA Today और Bloomberg Opinion जैसे प्रकाशनों में छप चुके हैं।

शिखा डालमिया अपने उन आर्टिकल्स के लिए भी जानी जाती हैं, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की है। उन्होंने कई आर्टिकल्स में यह भी दावा किया कि मोदी सरकार ने भारत के उदार लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया, धार्मिक बहुलता को नुकसान पहुँचाया और बहुसंख्यक राजनीति को बढ़ावा दिया।

फरवरी 2020 में, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर आए थे, तब शिखा डाल्मिया ने “While Trump Was Praising Modi for Religious Freedom, Modi-Supporting Hindus Slaughtered Muslims in the Streets” हेडलाइन के साथ एक आर्टिकल लिखा था।

उस आर्टिकल में उन्होंने दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के बारे में लिखा और दंगों का अपना ही तोड़-मरोड़कर और लीपा-पोती किया हुआ वर्जन पेश किया। उन्होंने दावा किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों और ‘हिंदू उग्रवादियों’ के बीच झड़प हुई थी।

उस आर्टिकल में शिखा डालमिया ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐसी योजना बताया, जिसका उद्देश्य “भारत के 14 करोड़ मुस्लिमों में से बड़ी संख्या को नागरिकता के अधिकार से वंचित करना औऱ संभवत: उन्हें डिटेंशन कैंपों में भेजना” था।

                                                         Reason का स्क्रीनशॉट

डालमिया ने लिखा, “हिंदू उग्रवादियों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मुस्लिमों के घरों पर पेट्रोल बम फेंके, एक मस्जिद में आग लगा दी और उस पर हिंदू झंडा फहरा दिया। साथ ही मुस्लिमों की दुकानों में लूटपाट की।”

इसके अलावा डालमिया ने लिखा कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद “भारत में मुस्लिम विरोधी हिंसा एक दुखद लेकिन आम बात बन गई है।” उन्होंने यह भी आलोचना की कि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत यात्रा के दौरान देश में कथित रूप से बिगड़ते मानवाधिकारों के मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना नहीं की।

इससे एक महीने पहले, जनवरी 2020 में, उन्होंने “Indian Prime Minister Modi’s Lawless Reign of Terror” हेडलाइन से एक और आर्टिकल लिखा था। इसमें उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘गुजरात मॉडल’ को पूरे देश में लागू किया है।

आर्टिकल में डालमिया ने आरोप लगाया कि 2002 के गुजरात दंगों के दौरान इसी मॉडल के कारण “कुछ ही दिनों में 1,000 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, की हत्या हुई।” गुजरात दंगों के लिए पीएम मोदी को दोषी ठहराना डालमिया की उस तथाकथित वामपंथी-उदारवादी लॉबी की एक अजीब विशेषता है, जिसका वह खुद हिस्सा हैं।

                                                Reason का स्क्रीनशॉट

इसके बाद शिखा डालमिया ने जेएनयू (JNU) में हुई छात्र हिंसा को प्रधानमंत्री मोदी के ‘निजी उग्रवादियों’ की कार्रवाई बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के सदस्य कैंपस में हिंसा पर उतर आए और उन्होंने मुस्लिम छात्रों व अपने कमरों में डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर रखने वाले छात्रों को निशाना बनाया।

प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ही नहीं, बल्कि शिखा डालमिया ने अपने कई आर्टिकल्स में हिंदुत्व विचारधारा की भी आलोचना की है। “Hinduism sheds its gentle image in the name of nationalism” हेडलाइन वाले एक आर्टिकल में डालमिया ने दावा किया कि ‘हिंदुत्व-हिंदू राष्ट्रवाद’ की वजह से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ रहा है।

                                                    The Times का स्क्रीनशॉट

इसके बाद शिखा डालमिया ने एक और दावा किया कि भारत के विभाजन के बाद से “हिंदू उग्रवादी” लगातार मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा करते रहे हैं। उन्होंने इस दावे को अपने आर्टिकल में तथ्य के तौर पर पेश किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति डालमिया की आलोचना 2014 में और तेज हो गई, जब मोदी भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री चुने गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की अमेरिका यात्रा पर भी डालमिया ने निराशा जताई। डालमिया ने दावा किया कि यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने के लिए नहीं थी, बल्कि उनके मुताबिक यह प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता हासिल करने, खुद की छवि को बढ़ाने और अपने अहंकार को संतुष्ट करने की कोशिश थी।

                                                    The Week का स्क्रीनशॉट

एक इंटरव्यू में, जिसमें उनके साथ वाम-उदारवादी विचारों वाले सिद्धार्थ वरदराजन भी शामिल थे, शिखा डालमिया ने सबसे पहले यह कहते हुए हैरानी जताई कि ‘ मोदी जैसे व्यक्ति’ भारत के प्रधानमंत्री कैसे बन गए।

इसके बाद उन्होंने अपनी राय रखते हुए दावा किया कि भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसी हो गई है, जहाँ अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार कम हो रहे हैं। डालमिया और सिद्धार्थ वरदराजन ने मिलकर प्रधानमंत्री मोदी के शासन में भारत में आए बदलावों की आलोचना की और कहा कि उनके अनुसार देश की स्थिति पहले से खराब हुई है।

अपराधी और नाबालिग “गटर Z”(CJP) के आंदोलन में कैसे पहुंचे; अपराधी अगर बेल पर थे, तो उनकी हिंसा के लिए अदालतें भी जिम्मेदार हैं


सुभाष चंद्र 

जुलाई 28 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के पकड़े गए बच्चों को साधारण बांड पर तुरंत रिहा किया जाए अगर उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।  कोर्ट ने निष्पक्ष की जांच की बात करते हुए पुलिस पर हुए हमलों को भी शामिल करने की बात कही और पुलिस ने जो FIR दर्ज की हुई हैं, वह उन पर जांच जारी रख सकती है लेकिन छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी ( मतलब गिरफ्तार नहीं किया जाएगा) कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से कोई संरक्षण नहीं मिलेगा लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं आदेश दिया कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए घटिया अपशब्द बोलने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए जिसे बेशर्म सौरव दास “हल्का फुल्का” मजाक बता रहा है

लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र करा कर हवा में उड़ रहे “गटर Z” के सर्वेसर्वा अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका कह रहे हैं कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं मानेंगे इतनी बड़ी हठधर्मी कि सर्वोच्च न्यायलय को भी ठोकर में रखना चाहते हैं और इनके पीछे खड़ा है कपिल सिब्बल

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नाबालिगों को रिहा करने के निर्णय पर मैं कहना चाहता हूँ कि पहले सुप्रीम कोर्ट को इस विषय पर गहन विचार करना चाहिए था कि आखिर नाबालिग बच्चे आंदोलन में कैसे पहुंचे? 18 वर्ष से कम आयु का बच्चा अगर 10+2 ही कर ले तो बड़ी बात है उन्होंने कौन सी NEET की परीक्षा दे दी और Neet से उनका क्या मतलब था?

वैसे भी आजकल तो नाबालिग हर जुर्म कर रहे हैं चाहे वह हत्या हो, लूट हो या बलात्कार अक्सर बहुत से नाबालिग लड़के ट्रेन की पटरी उखाड़ते मिल सकते हैं, पटरियों पर पत्थर रखते दिखाई दे सकते हैं, वंदे भारत ट्रेनों पर और हिंदुओं की शोभा यात्राओं पर पत्थर मारते दिख सकते हैं। इसलिए उन्हें नाबालिग मान कर छोड़ देना उचित नहीं है जब तक वो आंदोलन में जाने का मकसद ने साबित कर दें 

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए यह था कि आंदोलन में शामिल समस्त नाबालिकों को उसी तरह दण्डित किया जाए जिस तरह किसी व्यस्क को। क्योकि अगर किसी तरह इनमें से किसी एक भी मौत हो गयी होती आन्दोलनजीवी और इनके आकाओं ने आसमान सिर पर उठा लिया होता और सुप्रीम कोर्ट भी सरकार और पुलिस को जिम्मेदार ठहराती। कहती देखो कितनी अत्याचारी है सरकार। महिलाएं और बच्चे ही आन्दोलनजीविओं के nuclear है। केंद्र सरकार, पुलिस और निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। अदालतों को इनकी पैरवी करने वाले वकीलों को अड़े हाथों लेना चाहिए।  

कोर्ट ने कहा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से छूट नहीं मिलेगी दिल्ली पुलिस ने बताया है कि 2873 अपराधी आंदोलन के दंगों में शामिल थे जिनमें 101 पर हत्या करने के केस हैं; 294 पर Dacoity/ Robbery के केस दर्ज हैं; 229 पर Arms Act के और 1894 पर Other IPC/BNSS & Spl Laws में केस दर्ज हैं इसके अलावा: 

हत्या की कोशिश, बलात्कार, पॉक्सो, Molestation of Women, Chain Snatching अपहरण, ड्रग तस्करी के केस भी दर्ज हैं

सवाल यह उठता है कि 2873 अपराधी आंदोलन में कैसे पहुंचे? क्या वो कभी गिरफ्तार ही नहीं हुए और हुए तो क्या उन्हें मंदिर के प्रसाद की तरह जमानत वितरित कर दी गई मेरे अनुमान से गंभीर अपराधों के लिए तो उन्हें जमानत मिली हुई होगी ऐसे में उनकी जमानत तुरंत रद्द कर जेल में डाल देना चाहिए और इस दंगे का केस अगल से शुरू होना चाहिए लेकिन अब उन्हें या किसी भी अपराधी को सोच समझ कर जनमत दी जाए और Bail is a rule/Jail is an exception की थ्योरी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है  

जंतर-मंतर के आंदोलन का ‘मास्टरप्लान’ का काला सच


CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब छात्रों के नाम पर हुए जंतर मंतर पर हुए हर हंगामे का पर्दाफाश होते ही INDI गठबंधन चारों खाने चित हो रहा है। क्योकि जब किसी महल की नींव मजबूत नहीं होने पर महल ताश के पत्तों की मिट्टी में मिल जाता है, ठीक वही हालत मोदी सरकार के खिलाफ होने वाले आंदोलनों का है।   
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन का शोर तो अब थम चुका है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे छिपा राजनीतिक सच अब परत-दर-परत बेनकाब हो रहा है। निष्पक्ष और छात्र-हितैषी आंदोलन का दावा करने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और इसके प्रमुख चेहरों की असली मंशा पर अब गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। जिस तरह से देश के मासूम युवाओं के आक्रोश और ‘पेपर लीक’ जैसे संवेदनशील मुद्दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकी गईं, उसने इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की गहरी साजिश को जगजाहिर कर दिया है।

अमर्यादित भाषा और दागियों का साथ  
प्रदर्शन के दौरान सौरभ दास जैसे प्रमुख चेहरों का असली चरित्र उस समय सामने आया, जब प्रधानमंत्री के खिलाफ भद्दी और अमर्यादित भाषा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों का उन्होंने खुलेआम बचाव किया। हद तो तब हो गई जब जंतर-मंतर पर दागियों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले असामाजिक तत्वों को न्यौता देने पर सवाल उठे, तो आयोजकों ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के स्पष्ट आदेशों और गाइडलाइंस को मानने से साफ इनकार कर दिया।

‘सिलेक्टिव नरेटिव’ और दोहरे रवैये की खुली पोल
लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के इस तंत्र का दोहरा रवैया भी देश के सामने आ चुका है। यह स्वयंभू टोली केवल भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर (FIR) वापस लेने की मांग तो जोर-शोर से उठाती रही, लेकिन जब वैसी ही प्रशासनिक कार्रवाई वामपंथी सरकार वाले राज्य केरल या अन्य विपक्षी शासित प्रदेशों में हुई, तब इनकी जुबान पर ताला लग गया। यह ‘सुविधाजनक विरोध’ उनके निष्पक्ष होने के खोखले दावों की धज्जियां उड़ाता है।

आंदोलनकारियों की नीयत का पर्दाफाश !
आंदोलनकारियों की नीयत का सबसे बड़ा पर्दाफाश तब हुआ, जब उन्होंने कैमरे पर खुद स्वीकार किया कि ‘पेपर लीक’ और धांधली की समस्याएं हर दौर और हर सरकार के कार्यकाल में होती रही हैं, लेकिन उनका सीधा निशाना केवल और केवल भाजपा और केंद्र सरकार है। इस कबूलनामे ने साफ कर दिया कि इस पूरे तमाशे की मूल प्रेरणा छात्रों का भविष्य सुधारना नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और मोदी विरोध था।

युवाओं के सामने खड़ा बड़ा ‘यक्ष प्रश्न’
जंतर-मंतर से भले ही तंबू-कनात उखड़ चुके हों और सड़कों का शोर शांत हो गया हो, लेकिन इस आंदोलन ने देश के लाखों छात्रों के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है। प्रश्न यह है कि क्या युवा वाकई अपने हक और परीक्षा सुधारों की लड़ाई लड़ रहे थे, या फिर वे किसी के गुप्त राजनीतिक ‘मास्टरप्लान’ में केवल ढाल और मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर लिए गए? कानून, संविधान और न्यायपालिका के सम्मान को ताक पर रखकर अपनी सहूलियत से विरोध का रास्ता चुनने वाले इन चेहरों का लक्ष्य कभी भी छात्रों का भला करना नहीं था।

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट की ‘इनसाइड स्टोरी’

‘विपक्ष का पिछलग्गू’: रणनीतिकार अभिजीत दिपके पर उठते सवाल
आंदोलन के मुख्य सूत्रधार अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke) की भूमिका पूरी तरह कटघरे में है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे दिपके ने खुद को ‘गैर-राजनीतिक’ बताकर आंदोलन शुरू किया था। लेकिन जिस तरह उन्होंने बीजेपी के खिलाफ ऑनलाइन पोल चलाए, पंजाब-कर्नाटक के पेपर लीक पर चुप्पी साधी और कांग्रेस के दिग्गज कानूनी सलाहकारों का सहारा लिया, उससे उनकी तटस्थता का ढोंग बेनकाब हो गया।

दलित राजनीति का ढोंग और ‘क्रीमी लेयर’ पर रहस्यमयी चुप्पी
एक शिक्षित दलित पृष्ठभूमि से आने के कारण अभिजीत दिपके के पास ‘राष्ट्र-प्रथम’ की सोच के साथ देश का बड़ा जननेता बनने का स्वर्णिम अवसर था। यदि वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने के ऐतिहासिक स्टैंड का समर्थन करते—ताकि अंतिम पायदान के वंचित दलितों को अधिकार मिले—तो वे एक सच्चे समाज सुधारक बनते। लेकिन उन्होंने दूरगामी सामाजिक सुधार के बजाय तात्कालिक राजनीतिक विरोध का आसान रास्ता चुना।

अन्ना आंदोलन जैसा नैतिक बल नहीं, केवल राजनीतिक अवसरवाद
यदि इस आंदोलन का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि दिपके और CJP की यह लहर किसी नैतिक विचार या सामाजिक बदलाव की उपज नहीं थी। वर्ष 2011 के ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन के विपरीत, जहाँ एक नैतिक आधार था, यह पहल केवल सरकार की कमियों पर रोटियां सेकने का राजनीतिक अवसरवाद भर थी। नतीजतन, देश के युवाओं के हाथ केवल निराशा और छलावा ही आया।

न्यायपालिका पर अविश्वास और अराजकता को बढ़ावा
जंतर-मंतर पर जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताया गया, तो इससे आयोजकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था की पोल खुल गई। देश की सर्वोच्च अदालत को चुनौती देकर अपनी शर्तों पर भीड़ तंत्र चलाने की कोशिश करना सीधे तौर पर अराजकता को न्यौता देना है। छात्रों के अधिकारों की आड़ में देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना इस ‘मास्टरप्लान’ का सबसे खतरनाक हिस्सा था।

‘टूलकिट इकोसिस्टम’ और अंतरराष्ट्रीय साजिश का संदेह
जिस तेज़ी से आंदोलन का रुख परीक्षा सुधारों से हटकर केंद्र सरकार के तख्तापलट और प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत घृणा की ओर मोड़ा गया, उसने ‘टूलकिट इकोसिस्टम’ की सक्रियता को उजागर किया। सोशल मीडिया बॉट्स, प्रायोजित हैशटैग्स और विदेशी मीडिया आउटलेट्स द्वारा इस विरोध को अचानक हवा देना यह साबित करता है कि युवाओं के भोलेपन का इस्तेमाल भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करने के लिए किया गया।

लाखों निर्दोष छात्रों के करियर और भविष्य के साथ खिलवाड़
इस पूरे ड्रामे का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि देश के लाखों मेहनती और ईमानदार छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आंदोलन खत्म होते ही मुख्य रणनीतिकार अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे और महत्वाकांक्षाओं को साधकर सुरक्षित निकल गए, जबकि कई निर्दोष युवाओं पर कानूनी मुकदमे (FIR) दर्ज हो गए और उनका बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ। CJP के लिए छात्र केवल ‘पॉलीटिकल माइलेज’ का जरिया बनकर रह गए।

सकारात्मक समाधानों को नकारने की हठधर्मिता
जब केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों ने परीक्षा सुधारों के लिए उच्चस्तरीय समितियों का गठन किया और पारदर्शी व्यवस्था का रोडमैप पेश किया, तब भी आंदोलनकारियों ने बातचीत का दरवाजा बंद रखा। किसी भी सुधार या समाधान को स्वीकार न करना और केवल ‘इस्तीफे’ व ‘अस्थिरता’ की जिद पर अड़े रहना यह साबित करता है कि उनका मकसद समस्या हल करना था ही नहीं, बल्कि माहौल खराब रखना था।

‘अर्बन नक्सल थ्योरी’ और वामपंथी ताकतों की वापसी
जंतर-मंतर के मंच का इस्तेमाल जिस तरह से देशविरोधी और अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया गया, उसने ‘अर्बन नक्सल’ नरेटिव को फिर से हवा दे दी। परीक्षा सुधार के नाम पर जुटाए गए मंच पर जब वामपंथी विचारधारा से प्रभावित विवादित चेहरों और संगठनों को संरक्षण दिया जाने लगा, तो यह साफ हो गया कि यह मंच छात्रों का नहीं, बल्कि वामपंथी इकोसिस्टम को दोबारा जिंदा करने का अखाड़ा बन चुका था।

‘विक्टिम कार्ड’ और मीडिया में भ्रामक नरेटिव गढ़ने की साजिश
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सोशल मीडिया पर एक प्रायोजित ‘नरेटिव वॉर’ चलाया गया। जमीनी सच्चाइयों को दरकिनार कर कटी-छांटी क्लिप्स और फर्जी खबरों के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश हुई। जब भी निष्पक्ष पत्रकारों ने आंदोलन के नेताओं से कड़े सवाल पूछे, वे जवाब देने से भागते नजर आए और तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर विक्टिम बनने का नाटक करने लगे।

संसदीय लोकतंत्र और जनमत का खुला अनादर
आंदोलन के नाम पर जिस तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और 140 करोड़ जनता द्वारा चुनी गई सरकार की वैधता को खारिज करने की धमकियां दी गईं, वह चिंताजनक है। बिना किसी व्यापक जनाधार के, मुट्ठी भर लोगों द्वारा संसद का घेराव करने और मनमाने ढंग से सरकार गिराने की बातें करना भारतीय संसदीय लोकतंत्र का अपमान है। सुधार के नाम पर अराजकता का यह मॉडल पूरी तरह विफल साबित हुआ, जिसे देश की समझदार जनता ने खारिज कर दिया।

किसी का फोकस ‘अंबेडकरवाद’ पर, किसी का ‘फ्री फिलिस्तीन’ पर: CJP प्रदर्शन से पनपे ‘इंफ्लुएंसर्स’ का अपना-अपना एजेंडा, जानिए कंटेंट की माइनिंग कर कैसे कमाए लाखों फॉलोअर्स

                                     CJP प्रदर्शन से जन्में इंफ्लुएंसर्स (फोटो साभार: Instagram)
जब से कॉकरोच पार्टी बनी तभी से सोशल मीडिया पर इनकी मंशा पर सवाल उठ रहे थे, राष्ट्रीय मीडिया ने भी उस समय गंभीरता से नहीं लिया। और न ही सरकार ने। असली वजह अमेरिकी लेखिका रेनी लिन ने भी बताया। क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी स्कूल की किताबों में मुगलों की इतनी तारीफ क्यों होती थी? अमेरिकी लेखिका रेनी लिन का एक बयान आजकल सोशल मीडिया पर तहलका मचा रहा है! उन्होंने पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का खुलकर सपोर्ट किया है और एक बहुत बड़ा दावा किया है। 
रेनी का कहना है कि हमारी NCERT की पुरानी किताबें विदेशी आक्रमणकारियों के महिमामंडन से भरी पड़ी थीं।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर टिका कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन आखिरकार अपनी माँग पूरी होने के बाद खत्म हो गया। करीब डेढ़ महीने तक चले इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ ने सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी कई नए चेहरे खड़े कर दिए। इस दौरान कई पुराने इंफ्लुएंसर्स ने अपने लिए भरपूर कंटेन्ट तैयार किया, वहीं कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें पहचान ही इस प्रदर्शन ने दिलाई।

किसी ने पीएम नरेंद्र मोदी को गाली देकर वायरल हुआ, किसी ने मीडिया को निशाना बनाकर फॉलोवर्स जुटाए, किसी ने प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने के वीडियो बनाए तो किसी ने पुलिस से बहस और टकराव को अपना कंटेन्ट बना लिया।

इनमें मोहम्मद जुनैद, हर्षित, उज्जवल, रिया अहिर और नीशू जैसे तथाकथित इंफ्लुएंसर्स शामिल हैं। जिनकी पोस्ट पर पहले दो-चार लाइन भी मुश्किल से आते थे, आज वही लाखों फॉलोअर्स के साथ मिलियन में रीच हासिल कर रहे हैं। पिछले डेढ़ महीने में इंस्टाग्राम के बदले हुए एल्गोरिदम ने भी इनकी लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।

चिंता की बात यह है कि इन सभी का कंटेन्ट किसी न किसी एजेंडे के इर्द-गिर्द घूमता है। ऐसे में इन्हें फॉलो करने वाले लाखों युवा भी धीरे-धीरे उसी सोच और उसी नैरेटिव से प्रभावित हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से मिली लोकप्रियता ने इन लोगों को बड़ा मंच तो दे दिया है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है किस उस मंच का इस्तेमाल किस मकसद और किस दिशा में किया जा रहा है।

नीशु आजाद

इस प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे तो जमकर लगे। प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले दलित समाज से आने वाले अभिजीत दिपके ने भी खुद को ‘अंबेडकरवादी’ विचारधारा का प्रतिनिधि बताते हुए इसी सोच को आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनाया। लेकिन इसी प्रदर्शन से 15 साल की नीशू आजाद भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

नीशू का पहला वायरल वीडियो वही था, जिसमें वह एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिक्षा पर सवाल कर रही हैं, वहीं दूसरी वीडियो में वह CBSE और NEET की फुलफॉर्म तक नहीं बता पा रही थी। हैरानी की बात यह थी कि वह खुद 10वीं कक्षा की छात्रा है और उसी CJP प्रदर्शन का हिस्सा बनी हुई थी, जो NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर चलाया जा रहा था।

ऐसे में सोशल मीडिया पर कई लोगों ने नीशू को ट्रोल करना शुरू कर दिया। इसके बाद नीशू ने CJP प्रदर्शन के मंच पर जगह पाने के लिए अपने पिता पर हमले की खबर फैलाई। नीशू ने रोते हुए वीडियो बनाया कि उनके पिता को मारने वाले लोग ‘बीजेपी के अंधभक्त’ हैं, बिना उनकी नाम-पहचान जाने नीशू ने यह नैरेटिव गढ़ा और प्रदर्शन में शामिल लोगों को बीजेपी के खिलाफ भड़काया। यह देखा भी गया कि धीरे-धीरे यह प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था के नाम पर नहीं, बल्कि बीजेपी बनाम CJP हो गया, जिसमें विपक्षी दलों के अमूमन हर चेहरे ने भाग लिया।   

नीशू आजाद यहीं नहीं रुकी। और ज्यादा वायरल होने के लिए नीशू ने मीडियाकर्मियों को बयान देते हुए खुद को हिंदुओं के खिलाफ जहर तक उगला और एक दलित समाज से आते हुए भी नीशू खुद को ‘हिंदू’ मानने से इनकार कर दिया। और इतना ही नहीं, प्रदर्शन के अंत दिनों में नीशू का एक और वीडियो सामने आता है, जिसमें वह हाथ में समोसा दिखाते हुए लोगों को ‘मोदी की तेरहवीं’ का खाना खाने को कहती है।

वैसे तो इस लोकप्रियता के बाद अब नीशू के 383K फॉलोअर्स हैं, लेकिन यह जान लेते हैं कि प्रदर्शन से वायरल इंफ्लुएंसर बनी नीशू इस प्रदर्शन से पहले क्या कर रही थी? उसकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर नजर डालें तो प्रदर्शन से पहले भी नीशू का अधिकतर कंटेन्ट उन लोगों को रोस्ट करने पर केंद्रित था, जो हिंदू हितों की बात करते हैं। इस कंटेन्ट पर भी नीशू को ठीक-ठाक व्यूज आ जाते थे।

लेकिन इस तरह के कंटेन्ट पर शिफ्ट होने की वजह यह थी कि नीशू जब केवल ‘अंबेडकरवाद’ का बखान कर रही थी, तब उन्हें कोई नहीं पूछता था और तब वही किसी तरह की भी ‘इंफ्लुएंसर’ की कैटेगरी में उन्हें नहीं गिना जाता था।

मोहम्मद जुनैद

अभी अगर गूगल पर टाइप करें कि ‘कौन है जुनैद?’ तो गूगल का SEO आपको सबसे पहले जंतर-मंतर के CJP प्रदर्शन से वायरल हुए ‘जुनैद भाई’ के बारे में कंटेन्ट दिखेगा। ये जुनैद भाई वैसे तो एक मामूली वकील है, लेकिन प्रदर्शन में लोगों को मुफ्त खाना-पानी, मुफ्त दवाइयाँ देते जब इनकी वीडियो वायरल हुईं, तो कब ये सोशल मीडिया पर 1 मिलियन फॉलोअर के साथ इंफ्लुएंसर बन गए पता ही नहीं लगा।

मोहम्मद जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें, तो आज उनका हर वीडियो मिलियंस व्यूज पार कर रहा है। जुनैद के इंस्टाग्राम पर केवल CJP प्रदर्शन का ही कंटेन्ट दिखाई देता है, इससे पता लगता है कि वह भी CJP प्रदर्शन का एक मुख्य चेहरा रहे हैं। प्रदर्शन में CJP ने जुनैद को अपनी ‘सेकुलर’ विचारधारा पेश करने के लिए इस्तेमाल किया, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन में जय श्री राम के नारों पर बवाल के वीडियो भी खूब सामने आए।

प्रदर्शन के बाद इंफ्लुएंसर के रूप में उभरे मोहम्मद जुनैद का अब रोना सामने आ रहा है, जब पुलिस ने उनसे पूछताछ शुरू की है। पूछताछ भी इसीलिए जिस पर लोगों ने शक जताया है, शक यह है कि एक मामूली वकील के तौर पर जुनैद ने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के लिए खाने की सुविधा कैसे जुटाई? पुलिस जब जुनैद को पूछताछ के लिए ले गई तो उन्होंने अपनी सोशल मीडिया रीच का इस्तेमाल कर इसे बवाल बनाकर पेश किया। मीडिया में रोते हुए खूब इंटरव्यू भी दिए। 

अब बात करें कि जुनैद प्रदर्शन से पहले क्या कर रहे थे, तो इनका पास्ट रिकॉर्ड ‘आंदोलनजीवी’ का ही रहा है। जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें तो वह पहले भी ‘फ्री फिलिस्तीन’ के प्रदशनों, बाबरी मस्जिद को दोबारा खड़ा करने, माँस की दुकानों को बंद करने का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे हैं। दूसरी तरफ जुनैद अपने सोशल मीडिया पर पंडित धीरेंद्र शास्त्री जैसे हिंदू संतों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन का चेहरा बनने से पहले उनका ये कंटेन्ट उतना वायरल नहीं था।

LGBTQ के उज्जवल और हर्षित

16 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के पहले ही दिन LGBTQ समाज के दो चेहरे वायरल होते हैं। इनमें एक का नाम उज्जवल और दूसरे का नाम है हर्षित। छात्रों के इस प्रदर्शन में दोनों का एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें उनकी पहचान को लेकर रिपोर्टर सवाल पूछता है तो दोनों बिफर जाते हैं। इस वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कहीं न कहीं उन्हें एक वायरल कंटेन्ट के रूप में पहचान मिल जाती है और इसके जरिए दोनों ने खूब फॉलोवर्स भी इकट्ठा कर लिए।

CJP प्रदर्शन में भी यूट्यूब चैनलों और कई मीडिया संस्थानों ने उज्जवल और हर्षित के जमकर इंटरव्यू किए, जो उनकी लोकप्रियता बढ़ाने का जरिया बना। एक वीडियो में उज्जवल यह भी कहते नजर आए, “आपने मुझे मीठा बोल दिया… लेकिन एप्पल का फोन बनाने वाला टिम कुक भी गे है, ChatGPT का फाउंडर भी गे ही है, AI का फाउंडर भी गे ही है, इसीलिए हम लोग आपसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं।” 

सोशल मीडिया फॉलोइंस की बात करें तो उज्जवल के अब इंस्टाग्राम पर 17.6K फॉलोअर्स और हर्षित के 134K फॉलोअर्स हैं। पहचान की बात करें तो हर्षित खुद को एक कलाकार और उज्जवल 19 वर्षीय एक छात्र बताता है। सोशल मीडिया गतिविधियों से पता लगता है कि दोनों ही ‘ट्रांसजेंडर बिल’ का विरोध भी कर चुके हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन से मिली सोशल मीडिया पर लोकप्रियता अब उनकी एकमात्र पहचान बन चुकी है।

रिया अहिर

जंतर-मंतर की तर्ज पर ही मुंबई में हुए प्रदर्शनों से भी एक चेहरा सामने आया, जो अब खूब वायरल है। रिया अहीर, ये वो लड़की है जिनकी पुलिस वैन को एक हाथ से रोकते तस्वीर सामने आई थी। जो रोकने का प्रयास कम और फोटोशूट ज्यादा लग रहा था। दिलचस्प बात यह है कि रिया पेशे से मॉडल ही हैं। शायद यह बात उनको भी नहीं मालूम थी कि उनकी यह तस्वीर इतनी वायरल हो जाएगी कि मीडिया में इंटरव्यू देने पड़ेंगे। लोगों ने उनकी ये तस्वीर ‘महिला शक्ति’ के रूप में प्रस्तुत की। 

अब वे इस तस्वीर के पीछे संघर्ष की ‘मनगढ़ंत’ कहानी पूरे मीडिया में सुना रही हैं। रिया का कहना है कि जब उन्होंने देखा कि प्रदर्शनकारियों को पुलिस वैन में भरकर ले जाया जा रहा है, तो वह पुलिस वैन के आगे आकर उसे रोकने लग गईं। और हैरानी की बात तो यह है कि तभी उनके कैमरामैन ने वो तस्वीर खींच ली, जिसे शेयर कर अब ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण पेश कर रहे हैं।  

खैर रिया अहीर को प्रदर्शनों में मिली लोकप्रियता से उनके फॉलोअर्स की काउंटिंग अब 275K पहुँच गई है। उनका हालिया कंटेन्ट बेशक CJP प्रदर्शन की आवाज बनने और वायरल तस्वीर के फेम में दिए गए इंटरव्यू को लेकर हो, लेकिन बात करें उनके सोशल मीडिया के पास्ट रिकॉर्ड की तो उनका कंटेन्ट अधनग्न तस्वीरें अपलोड करना है। यहाँ तक कि ऐसी और तस्वीरें देखनी हैं तो उन्होंने ₹149 का इंस्टाग्राम सब्सक्रिप्शन प्लान भी चालू किया है, जिसमें उनके 9250 सब्सक्राइबर्स भी हैं। कुल बात यह है कि ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण बनने वाली रिया अहीर सोशल मीडिया पर ‘सॉफ्ट पॉर्न’ बेचती हैं।

कुल मिलाकर, CJP का यह प्रदर्शन सिर्फ सड़कों पर हुआ एक आंदलन नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया के लिए एक ऐसा मंच बन गया, जहाँ कई नए इंफ्लुएंसर्स पैदा हो गए। इन लोगों ने आंदोलन के हर पल को कंटेन्ट बनाया और देखते ही देखते लाखों लोगों तक अपनी पहुँच बना ली। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ये लोग वायरल कैसे हुए, बल्कि इससे भी बड़ी सवाल यह है कि वायरल होने के बाद ये अपने उस प्रभाव का इस्तेमाल किस मकसद के लिए कर रहे हैं।

इनमें से कोई ‘अंबेडकरवाद’ के नाम पर अपनी बात रख रहा है, कोई ‘फ्री फिलिस्तीन’ जैसे मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है, कोई हिंदुओं के खिलाफ बयान देकर लोकप्रियता कमा रहा है, तो कई LGBTQ की राजनीति को अपनी पहचान बना रहा है। हर किसी का अपना-अपना एजेंडा है, लेकिन सोशल मीडिया पर इन सबकी पहुँच अब लाखों युवाओं तक हो चुकी है। ऐसे में इनके हर वीडियो और हर बयान का असर भी उतनी ही तेजी से फैल रहा है।

यही वजह है कि इस पूरे प्रदर्शन का सबसे बड़ा असर शायद सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर देखने को मिलेगा। इस आंदोलन ने कुछ ऐसे इंफ्लुएंसर्स को जन्म दिया है, जिनकी सबसे बड़ी पहचान किसी उपलब्धि से नहीं, बल्कि विवाद, टकराव और एजेंडा आधारित कंटेन्ट से बनी है। आने वाले समय में ये चेहरे सिर्फ वायरल वीडियो नहीं बनाएँगे, बल्कि लाखों युवाओं की सोच और नैरेटिव को भी प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी चिंता है।

“अंधभक्त” क्या होते हैं राहुल गांधी रामायण में भगवान राम के वचनों से समझने की कोशिश करो; राम ने जो कहा उससे तुम भी रावण ही लगते हो

सुभाष चन्द्र

नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी को पप्पू ऐसे ही नहीं कहा जाता, लेकिन जुलाई 29 को राहुल ने साबित कर दिया कि वह पप्पू ही नहीं पप्पू का भी पप्पू है। प्रदर्शन में गोली चलने पर जो लोक सभा में सीधे-सीधे गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेकर विवाद खड़ा कर दिया। इस महा-पप्पू को इतना भी नहीं मालूम की लाठी चार्ज, tear gas और water canon आदि की इजाजत किसी मंत्री नहीं बल्कि मौके पर मौजूद DM या SDM द्वारा दी जाती है। अगर LoP को इतना भी नहीं मालूम तो राहुल को इस पद को तुरन्त छोड़ देना चाहिए। 

दूसरे, शाह पर आरोप लगाने पर जो संसद बाधित होने पर संसद के बाहर मीडिया के सामने जो कहा अगर वही बात शाह का नाम लेने की बजाए यही बात बोल दी होती संसद बाधित नहीं होती। फिर यह कहना कि बीजेपी और आरएसएस से कभी माफ़ी नहीं मांगूगा स्वीकार कर लिया की गलत बोला है। वैसे माफ़ी मांगने में केजरीवाल को भी पीछे छोड़ दिया है। इतना ही नहीं माइक चालू होते बोल दिया कि 'माइक बंद कर दिया' पूरी संसद तो क्या लाइव देखने वालों ने झूठ पकड़ लिया। आखिर पप्पू तो पप्पू ही होता है।       

फिर राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि “मूर्ख को भगवान मानते हैं अंधभक्त” - ऐसे “अंधभक्त” शब्द का प्रयोग कांग्रेस और विपक्ष वाले अक्सर मोदी के समर्थकों के लिए करते आए हैं। जुलाई 28 को प्रियंका वाड्रा ने प्रोफेसर V Kamakoti का अपमान करते हुए उन्हें “गौमूत्र विशेषज्ञ” कहा था जबकि प्रियंका तो क्या वर्तमान पूरी कांग्रेस उनके मुकाबले में कुछ भी नहीं है
“अंधभक्त” क्या होते हैं राहुल गांधी, उसके लिए रामायण का एक प्रसंग सुनो -

लेखक 
चर्चित YouTuber 
राम - रावण युद्ध में रावण ने श्री राम का उपहास करते हुए कहा कि वे अपनी वाणी से केवल भोले-भाले, अनपढ़ वानरों और भालुओं को ही प्रभावित या भ्रमित कर सकते हैं, लेकिन उसके जैसे विद्वान, ज्ञानी और पराक्रमी राजा को नहीं

भगवान राम ने रावण को उत्तर देते हुए कहा कि सच्ची भक्ति (भक्ति) का आधार निर्मल, निष्कपट और विनम्र हृदय होता है ऐसा पवित्र हृदय किसी अनपढ़ भक्त का भी हो सकता है, जबकि अपार सांसारिक ज्ञान, विद्वता और चतुराई के साथ भी किसी व्यक्ति का मन भ्रष्ट, दुष्ट और अहंकार से परिपूर्ण हो सकता है

भगवान राम ने अपने वचनों में रावण को विद्वान भी कह दिया लेकिन मन से भ्रष्ट, दुष्ट प्रवृत्ति का और अहंकार से परिपूर्ण भी कह दिया तुम्हें हम रावण भी नहीं कह सकते क्योंकि वो ज्ञानी और विद्वान था लेकिन तुम्हारे अंदर उसकी अन्य प्रवृत्ति हैं

आज के समय में जिनको तुम “अंधभक्त” कहते हो वो किसी मूर्ख को भगवान नहीं मान रहे बल्कि उस मोदी के प्रति श्रद्धा रखते है जिसने समस्त भारत को अपना परिवार समझा है जबकि तुम, तुम्हारे चाटुकार 

और कल पैदा हुए “कॉकरोच” उस मोदी को गाली देना ही अपना धर्म  समझते हैं

तुमसे कुछ न हो पाएगा तुम बस देश को तोड़ने की साजिश कर सकते हो विदेशियों के दम पर क्योंकि कांग्रेस की अब कोई औकात नहीं बची है