साभार: ऑपइंडिया अंग्रेजी
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के ढाँचे की घोषणा के बाद से आम लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि अंतिम समझौता कैसा होगा। राजनेता या तो इसका पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं या फिर इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं, जबकि व्यापारी वर्ग इसे सतर्क होकर आशावाद के साथ देख-समझ रहा है।
भारत-अमेरिका समझौते के तहत भारत ने सेब समेत कुछ खास कृषि उत्पादों पर अमेरिका को कोटा आधारित रियायतें देने पर सहमति जताई है। हालाँकि भारतीय बाजार में अमेरिकी सेब की एंट्री की संभावना ने खासकर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिकी सेब के लिए कोटा, भारतीय उत्पादकों की चिंताएँ और केंद्र सरकार का आश्वासन
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय सरकार ने अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50% से घटाकर 25% कर दिया है। इसके साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 75 से 80 रुपए प्रति किलो तय किया गया है। इसका मतलब यह है कि बहुत सस्ते सेब भारतीय बाजार में नहीं आ सकेंगे और स्थानीय किसानों के कारोबार को नुकसान नहीं पहुँचेगा।
मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंगइसका कारण यह है कि टैक्स जोड़ने के बाद इन सेबों की कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक होगी। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर, खासकर कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों ने चिंता जताई है।
उनका मानना है कि सीमित मात्रा में भी अमेरिकी सेब का आयात, जो आकार में एकसमान, उच्च गुणवत्ता वाले और प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध होते हैं, घरेलू सेब की कीमतों पर दबाव डाल सकता है, खासकर उन सेबों पर जो कोल्ड स्टोरेज से निकालकर ऑफ-सीजन में बेचे जाते हैं।
गौरतलब है कि कश्मीर भारत के कुल सेब उत्पादन का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा देता है। ऐसे में सेब वहाँ की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक स्थिरता के लिए बेहद अहम हैं। जम्मू-कश्मीर में सेब उद्योग की कीमत लगभग 12,000 करोड़ रुपए आँकी जाती है और इससे करीब 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।
वर्ष 2024-25 के सीजन में करीब 21 लाख टन कश्मीरी सेब दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, अहमदाबाद, कोलकाता, मुंबई जैसे बड़े शहरों में बेचे गए। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के भी कई किसान अमेरिकी सेब के आयात को अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं।
उनका कहना है कि पहले से ही बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान, सीमित कोल्ड स्टोरेज सुविधाएँ और परिवहन की दिक्कतों ने उनके मुनाफे को कम कर दिया है। ऐसे में अगर पीक सीजन में अमेरिकी सेब आ गए तो कीमतें गिरेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।
मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंगकश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स कम डीलर्स यूनियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अमेरिका और यूरोप से आने वाले सेब पर 100% से अधिक आयात शुल्क लगाने की माँग की है। यूनियन ने चेतावनी दी कि विदेशी सेब का उदार आयात भारत के बागवानी क्षेत्र को ‘बीमार उद्योग’ में बदल सकता है।
हिमाचल प्रदेश में भी यह चिंता जताई गई है कि वहाँ के प्रीमियम सेब 100 से 150 रुपए प्रति किलो बिकते हैं और अगर अमेरिकी सेब भी इसी कीमत पर उपलब्ध होंगे तो उपभोक्ता आयातित सेब को प्राथमिकता देंगे। कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिकी सेब के लिए MIP 100 रुपए प्रति किलो होना चाहिए था।
वहीं कई किसान यह भी कहते हैं कि इस समझौते का घरेलू सेब उद्योग पर खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि स्थानीय सेब गुणवत्ता में किसी से कम नहीं हैं। उनके अनुसार, MIP बढ़ाने की माँग करने की बजाय किसानों को सब्सिडी, बेहतर पौध और आधुनिक तकनीक पर जोर देना चाहिए।मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग
| मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग |
इन तमाम चिंताओं के बीच केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बार-बार भरोसा दिलाया है कि घरेलू किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब या भविष्य में ऐसा कोई भी व्यापार समझौता नहीं करेगा, जिससे कृषि और डेयरी क्षेत्र में उसकी ‘रेड लाइन’ पार हो।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय किसानों और MSMEs सेक्टर के हित पूरी तरह संरक्षित हैं। सेब आयात के मुद्दे पर उन्होंने बताया कि देश में सेब की माँग 25-26 लाख टन से अधिक है, जबकि उत्पादन करीब 20-21 लाख टन है।
भारत पहले से ही हर साल करीब 5.5 लाख टन सेब आयात करता है, जिसमें अमेरिका बड़ा आपूर्तिकर्ता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेब की अंतिम कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो होगी, इसलिए स्थानीय किसानों को नुकसान की आशंका नहीं होनी चाहिए।
पीयूष गोयल ने कहा, “हम सेब के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हैं। हमारी माँग 25-26 लाख टन है, जबकि उत्पादन 20-21 लाख टन है। हम हर साल 5.5 लाख टन सेब आयात करते हैं, जिसमें बड़ी मात्रा अमेरिका से आती है। हमने सेब के बाजार को पूरी तरह नहीं खोला है, बल्कि कोटा दिया है, जो वर्तमान आयात से भी कम है।”
उन्होंने आगे कहा, “सेब पर न्यूनतम आयात मूल्य 50 रुपए है और 50 प्रतिशत शुल्क के बाद यह 75 रुपए हो जाता है। यानी इससे कम कीमत पर सेब देश में नहीं आ सकते। अमेरिकी सेब के लिए MIP 80 रुपए है और 25 प्रतिशत शुल्क के बाद कीमत करीब 100 रुपए हो जाती है। इससे किसानों को सुरक्षा मिलती है।”
मंत्री ने जोर देकर कहा कि सीमित मात्रा में आने वाले अमेरिकी सेब स्थानीय किसानों के लिए खतरा नहीं हैं और यह मौजूदा आयात से भी कम मात्रा में होंगे।
पीड़ित मानसिकता का चश्मा: हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश छोड़ना होगा
मोदी सरकार द्वारा सीमित और संतुलित रियायत देने के बावजूद कुछ स्थानीय हितधारक डर फैलाने और पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। यह मुद्दा केवल सेब तक सीमित नहीं है। भारत में नीतिगत और सार्वजनिक विमर्श में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को अक्सर ‘पीड़ित होने’ के रूप में देखा जाता है, जबकि इसे आत्म-सुधार का अवसर माना जाना चाहिए।
भारत एक मजबूत अर्थव्यवस्था और विशाल बाजार वाला देश है। वह विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में व्यापार और उद्योग को संरक्षणवाद की ढाल के पीछे छिपे रहने की आदत छोड़नी होगी। ऊँचे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं ने लंबे समय तक स्थानीय उत्पादकों को कठिन सुधारों से बचाए रखा।
2020 के किसान आंदोलन ने दिखाया कि अच्छे सुधार भी आसानी से स्वीकार नहीं होते। भारतीय सेब स्वाद में अच्छे हैं, लेकिन गुणवत्ता में एकरूपता की कमी, कमजोर ग्रेडिंग-पैकेजिंग, ठंडी भंडारण व्यवस्था की कमी और आधुनिक तकनीक को अपनाने में सुस्ती जैसी समस्याएँ हैं।
अमेरिकी सेब बेहतर तकनीक, कीट नियंत्रण, नियंत्रित वातावरण भंडारण और गुणवत्ता मानकों के कारण आगे हैं। यदि चिली, तुर्की और अन्य देशों से आने वाले सेब हिमाचल और कश्मीर के किसानों को खत्म नहीं कर पाए, तो केवल अमेरिकी सेब से अचानक इतना डर समझ से परे है।
भारतीय सेबों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है, कीमत अपेक्षाकृत कम है और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत है। असल मुकाबला उपभोक्ता की पसंद से तय होगा। यदि अमेरिकी सेब ज्यादा पसंद किए जाते हैं, तो इसका मतलब गुणवत्ता और मूल्य में अंतर है, जिसे घरेलू उत्पादकों को पाटना होगा। प्रतिस्पर्धा सुधार के लिए दबाव बनाती है।
1991 के बाद भारत के ऑटो, टेलीकॉम और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों में यही देखने को मिला। संरक्षणवाद से उपभोक्ताओं को नुकसान और महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं। इसलिए आत्मसंतोष की संस्कृति छोड़नी होगी।
मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीरी सेब उत्पादकों की चिंता को बढ़ा-चढ़ाकर कर रहा पेश
हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश देश के लिए ठीक नहीं है। हर व्यापार समझौते में कुछ को फायदा और कुछ को नुकसान होता है। भारत जैसी परिपक्व अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक झटकों को सहने और खुद को बेहतर बनाने की क्षमता दिखानी चाहिए और यहाँ के लोगों को संरक्षित लाभ के नुकसान पर शोक मनाने के बजाय अनुकूलन, कौशल उन्नयन और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक मानकों को पूरा करने की क्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए।
मेनस्ट्रीम मीडिया को भी कश्मीरी सेब उत्पादकों के सवालों के साथ संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। अमेरिकी सेब का सीमित और सुरक्षित आयात कोई अस्तित्व का संकट नहीं है। मीडिया को इस पर प्रकाश डालना चाहिए था कि भारत पहले से कई देशों से सेब आयात करता है और इससे घरेलू उत्पादन खत्म नहीं हुआ है।
डर और आक्रोश के शोर में यह तथ्य दब रहा है कि अमेरिकी सेब मुख्य रूप से प्रीमियम शहरी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करेंगे, न कि स्थानीय सेबों को पूरी तरह खत्म करेंगे। समय की माँग है कि उत्पादक गुणवत्ता, ब्रांडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, सरकार से तकनीक और निवेश में सहयोग माँगें और वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालें।




