फिर पनौती साबित हुए अखिलेश यादव और तेजस्वी; जिन-जिन दलों के लिए प्रचार, दिया समर्थन, सबका बैठ गया भट्ठा

      अखिलेश और तेजस्वी ने जिसका किया प्रचार, अंत में हारी वहीं पार्टी, BJP ने किया बेहतरीन प्रदर्शन (साभार: AI)
"जहां जहां पांव पड़े कम्बख्त के, वहीं बंटाधार", कहावत चरितार्थ हो रही है अखिलेश और तेजस्वी यादव पर। युगों-युगों प्राचीन जिस सनातन का विरोध अन्य मजहब तो क्या कालनेमि हिन्दू भी कर रहे हैं। इन कालनेमि हिन्दुओं को नहीं मालूम कि हिन्दुओं ग्रंथ राजनीति ही नहीं जीवनशैली भी सिखाते हैं। 
देखिए महाभारत का सन्देश जिसे सिर्फ हिन्दुओं को नहीं हर उस सनातन विरोधी को भी गंभीरता से लेना होगा : महाभारत का सार सिर्फ़ नौ लाइनों में समझें, जिसमें पाँच लाख श्लोक हैं....
आप किसी भी धर्म के हों, चाहे आप औरत हों या मर्द, चाहे आप गरीब हों या अमीर, चाहे आप अपने देश में हों या विदेश में,
संक्षेप में...
अगर आप इंसान हैं, तो महाभारत के ये 9 अनमोल मोती ज़रूर पढ़ें और समझें....
1. अगर आप समय रहते अपने बच्चों की बेवजह की मांगों और इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं करेंगे, तो आप ज़िंदगी में लाचार हो जाएँगे... 'कौरव'
2. आप कितने भी ताकतवर क्यों न हों, अगर आप अधर्म का साथ देंगे, तो आपकी ताकत, हथियार, हुनर और आशीर्वाद सब बेकार हो जाएँगे... 'कर्ण'
3. अपने बच्चों को इतना बड़ा न बनाएँ कि वे अपने ज्ञान का गलत इस्तेमाल करके पूरी तबाही मचा दें...   'अश्वत्थामा'
4. कभी ऐसे वादे न करें कि आपको अधर्मियों के आगे झुकना पड़े...  'भीष्म पितामह'
5. अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल *धन, शक्ति, अधिकार और गलत लोगों का साथ आखिर में पूरी बर्बादी की ओर ले जाता है... 'दुर्योधन'
6. कभी भी सत्ता की बागडोर किसी अंधे व्यक्ति को मत दो, यानी जो स्वार्थ, धन, घमंड, ज्ञान, मोह या वासना में अंधा हो, क्योंकि वह बर्बादी की ओर ले जाएगा... 'धृतराष्ट्र'
7. अगर ज्ञान के साथ समझदारी है, तो आप ज़रूर जीतेंगे... 'अर्जुन'
8. धोखा आपको हर मामले में सफलता नहीं दिलाएगा... 'शकुनि'
9. अगर आप नैतिकता, नेकी और कर्तव्य को सफलतापूर्वक बनाए रखते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकती।   'युधिष्ठिर'
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सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः    
चुनावी राजनीति में बयान देना, माहौल बनाना और जीत का दावा करना आम बात है, लेकिन जब यही दावे लगातार अलग-अलग राज्यों में दोहराए जाएँ और हर बार नतीजे उसके उलट आएँ, तो मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। वह यह दिखाता है कि आपका बोलना सही नहीं है क्योंकि आप कर कुछ पा नहीं रहे और ‘पनौती’ साबित हो रहे सो अलग। पिछले कुछ चुनावों में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ यही होता नजर आ रहा है।

दोनों नेताओं ने खुद को विपक्षी राजनीति के अहम चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने बंगाल से लेकर तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार तक अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दलों के समर्थन में न सिर्फ प्रचार किया, बल्कि बार-बार दावा कर विपक्षी पार्टियों के लिए जीत लगभग तय बताई।

हालाँकि जब वास्तविक नतीजे सामने आए तो लगभग हर जगह पर तस्वीर इतनी उलट थी कि इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे। इस पूरे सिलसिले को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह सिर्फ हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गैप की कहानी है जो राजनीतिक दावों और जमीनी नतीजों के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है।

बंगाल: ममता को लेकर किया ‘एक अकेली लड़ जाएगी’ का दावा, जीती BJP

इस पैटर्न की सबसे ताजा कड़ी पश्चिम बंगाल में देखने को मिली। यहाँ अखिलेश यादव ने खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में सोशल मीडिया पर लिखा, “एक अकेली लड़ जाएगी, जीतेगी और बढ़ जाएगी।” यह बयान महज औपचारिक समर्थन नहीं था, बल्कि भविष्यवाणी जैसा था। इसमें संदेश साफ था कि ममता बनर्जी के लिए कोई चुनौती नहीं है और उनकी जीत तय है।

हालाँकि जैसे ही मतगणना के रुझान सामने आने लगे, यह दावा जमीनी हकीकत से टकराता नजर आया। पश्चिम बंगाल में BJP ने इतिहास रच दिया। बीजेपी ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार को 15 साल के बाद उखाड़ फेंका है। यहाँ बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली है।

तमिलनाडु: ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ का नारा लगातीं तेजस्वी की रैलियाँ पर वोट पर नहीं पड़ा असर

तमिलनाडु में तेजस्वी यादव की सक्रियता इस पूरे पैटर्न का अगला बड़ा उदाहरण है। तेजस्वी ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ के लिए खूब पसीना बहाया था। उन्होंने एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए उन इलाकों में प्रचार किया जहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी और मजदूरों की संख्या अधिक है।

उनके भाषणों में ‘सामाजिक न्याय’ और ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ की बात प्रमुखता से उठाई गई। यह स्थानीय राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश के साथ एक सोची-समझी रणनीति थी।

रैलियों में थोड़ी-बहुत भीड़ भी दिखी, मीडिया कवरेज भी मिला, लेकिन जब नतीजों के रुझान आए तो यह साफ हो गया कि यह रणनीति अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाई। जिन सीटों पर तेजस्वी ने विशेष ध्यान दिया था, वहाँ भी DMK गठबंधन पिछड़ता नजर आया।

कई जगह मुकाबला AIADMK और TVK के बीच सिमट गया, जिससे यह संकेत मिला कि स्थानीय मुद्दे और एंटी-इंकम्बेंसी की लहर, बाहरी प्रचार से कहीं ज्यादा प्रभावी रही। यानी मंच पर जो भीड़ दिखाने की कोशिश हो रही थी, वह वोट में तब्दील नहीं हो सकी। आँकड़ों की बात करें तो TVK ने अब तक 36 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए मजबूत बढ़त बना ली है और 72 सीटों पर आगे चल रही है।

दूसरी ओर सत्तारूढ़ DMK ने 17 सीटों पर जीत हासिल की है और 45 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ने अब तक 1 सीट पर जीत दर्ज की है और 4 सीटों पर आगे है, जबकि AIADMK ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की और वह 30 सीटों पर आगे चल रही है।

दिल्ली: अखिलेश यादव का ’70 में 70 हार जाएगी भाजपा’ वाला दावा, लेकिन हकीकत उलट

दिल्ली में अखिलेश यादव ने अरविंद केजरीवाल के साथ रोड शो करते हुए कहा था कि भाजपा सभी 70 सीटें हार सकती है और आम आदमी पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी। यह बयान चुनावी भाषण से आगे बढ़कर एक तरह की पूरी चुनावी तस्वीर पेश करता था, जहाँ इनकी ओर से तो मुकाबला लगभग खत्म माना जा रहा था।

हालाँकि दिल्ली की राजनीति इतनी सीधी नहीं होती। हर सीट पर अलग समीकरण, स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव और संगठन की ताकत चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। दिल्ली में BJP ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के किले को ढहाते हुए अपनी सरकार बनाई। यहाँ BJP ने लगभग 40 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया।

हरियाणा: इतिहास रचने का दावा और नतीजों में अचानक बदलाव

हरियाणा में भी अखिलेश यादव ने INDI गठबंधन को लेकर बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि विपक्ष की एकजुटता भाजपा को हराकर नया इतिहास लिख सकती है।

शुरुआती रुझानों में कॉन्ग्रेस की बढ़त ने इस दावे को कुछ समय के लिए सही साबित किया, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदल गई। भाजपा ने बढ़त बनाई और निर्णायक जीत दर्ज की।

यह बदलाव यह दिखाने के लिए काफी था कि चुनावी रणनीति सिर्फ शुरुआती माहौल पर नहीं टिकी होती, बल्कि अंत तक संगठन ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यहाँ विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

महाराष्ट्र: विपक्षी उम्मीदों के बीच सत्ता पक्ष की मजबूत वापसी

महाराष्ट्र में भी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीतिक लाइन विपक्षी एकजुटता के जरिए सत्ता परिवर्तन का दावा करने वाली रही। अलग-अलग मंचों और बयानों में यह लगातार कहा गया कि राज्य में सत्ता के खिलाफ माहौल है और गठबंधन मिलकर चुनावी तस्वीर बदल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में भी वही पैटर्न दिखा जो दूसरे राज्यों में नजर आया।

लेकिन जब मतदान और उसके बाद के रुझान सामने आए, तो तस्वीर दावों से अलग नजर आई। बीजेपी और उसके सहयोगियों के गठबंधन ने 288 में से करीब 235 सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत हासिल किया। अकेले बीजेपी ने 130 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। अंततः यह साफ हुआ कि सिर्फ राजनीतिक संदेश और मंचीय भाषण चुनाव नहीं जिताते।

बिहार: सबसे मजबूत गढ़ में सबसे बड़ी हार

इस पूरे पैटर्न का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक उदाहरण बिहार है। यहाँ तेजस्वी यादव खुद चुनावी लड़ाई के केंद्र में थे और अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में सक्रिय थे। ‘वोटर अधिकार यात्रा’, एमवाई समीकरण और PDA फॉर्मूले के जरिए यह दावा किया गया कि इस बार सत्ता परिवर्तन तय है, लेकिन जब नतीजे सामने आए, तो यह पूरा नैरेटिव बिखर गया।

NDA ने प्रचंड जीत हासिल की जबकि महागठबंधन लगभग 40 सीटों पर सिमट गया। यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक झटका था जिसने यह दिखा दिया कि जमीन पर वोटर का मूड उस नैरेटिव से पूरी तरह अलग था जो बनाया जा रहा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह हार उसी राज्य में हुई जहाँ तेजस्वी यादव की सबसे मजबूत पकड़ मानी जाती है।

दावों और नतीजों के बीच बढ़ती दूरी

अगर इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ होता है कि एक ही तरह का पैटर्न बार-बार दोहराया जा रहा है। जहाँ अखिलेश और तेजस्वी जाते हैं, वहाँ माहौल बनता है, दावे किए जाते हैं, जीत की तस्वीर पेश की जाती है। लेकिन जब नतीजे आते हैं, तो वही तस्वीर बदल जाती है।

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति आज भी चर्चा में रहती है, लेकिन हालिया चुनावी नतीजे यह दिखाते हैं कि उनके दावों और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

जब एक ही कहानी बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार जैसे अलग-अलग राज्यों में दोहराई जाए, तो इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता। अब अखिलेश और तेजस्वी यादव को अपनी ‘जीत की भविष्यवाणी’ करने वाली रणनीति में बदलाव लाने पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जरूर है।

ईसाई TVK नेता विजय जोसफ के चुनावी वादे भारत विरोधियों और महंगाई को खुला निमंत्रण

सुभाष चन्द्र

अरविन्द केजरीवाल ने जो फ्री की रेवड़ियों की शुरुआत की उसे हर बीजेपी विरोधी अपना रहा है। जिसका विरोध सभी ने किया था लेकिन सत्ता पाने के लिए सभी ने इस कुरीति को अपनाने में गुरेज नहीं किया। अगर इसका नकारात्मक रूप देखें तो ये फ्री की रेवड़ियां उन भारत विरोधी ताकतों को खुला निमंत्रण है भारत पर कब्ज़ा करना है तो किसी फ़ौज की जरुरत नहीं बल्कि यहाँ की लालची, कामचोर और हराम का खाने वाली पब्लिक को मुफ्त में हर परिवार को मुफ्त में राशन-पानी और अन्य सुविधाएं देना शुरू कर दो भारत की लालची जनता दुम हिलाते तुमको समर्थन देने में पीछे नहीं रहेगी और हम भारत पर कब्ज़ा कर लेंगे। यह जनता पर आरोप नहीं कटु सच्चाई है। सच स्वीकार करना होगा।  
तमिलनाडु के 2026 - 27 के बजट में राज्य का Outstanding Debt Rs.10.71 लाख करोड़ होने का अनुमान है जो 2025 -26 में 9.52 करोड़ था तमिलनाडु आज की तारीख में सबसे बड़ा कर्जदार राज्य है

इसके बावजूद TVK नेता Joseph Vijay Chandrasekhar के अभी हुए चुनाव में किए हुए वादे देखिए -

लेखक 
चर्चित YouTuber 
महिलाओं के लिए 2,500 रूपए प्रतिमाह;

दुल्हनों के लिए 8 ग्राम सोना और एक रेशमी साड़ी;

प्रति वर्ष 6 मुफ्त एलपीजी सिलेंडर;

200 यूनिट मुफ्त बिजली;

महिलाओं के लिए 5 लाख रूपए तक ब्याज-मुक्त ऋण;

बेरोजगारी सहायता: स्नातकों के लिए 4,000 रूपए/माह और डिप्लोमा धारकों के लिए 2,500 रूपए/माह;

5 लाख नई नौकरियां;

कामराजर विशेष आवासीय स्कूल और 20 लाख रूपए तक बिना गारंटी के शिक्षा ऋण;

5 एकड़ से कम भूमि रखने वाले किसानों के लिए ऋण;

एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य):

धान के लिए 3,500 रूपए प्रति क्विंटल और गन्ने के लिए 4,500 रूपए प्रति टन, जो अभी 2369/- और 2389/ है;

अर्थव्यवस्था/स्वास्थ्य:

परिवार के लिए 25 लाख रूपए तक स्वास्थ्य बीमा कवर, जो अभी प्रधानमंत्री योजना में 5 लाख है;

हर वर्ष लगभग 7 लाख विवाह होने पर, केवल सोने पर ही वार्षिक बजट लगभग 8 लाख रूपए करोड़ होगा- 

इसे कहते हैं कर्ज लेकर घी पीना

तमिलनाडु वित्तीय संकट की ओर बढ़ रहा है

MK Stalin सरकार की तरह इनकी भी नज़र मंदिरों के धन पर रहेगी जिससे मुफ्त की रेवड़ियां बाटने में आसानी हो स्टालिन की तरह यह भी कहीं सनातन धर्म को ख़त्म करने न निकल पड़े क्योंकि है तो ये भी स्टालिन की तरह ईसाई ही है, अलबत्ता शायद द्रविड़ संस्कृति से कोई खास लगाव नहीं लगता इसका

वैसे केंद्र के साथ संबंध कैसे रखता है, यह देखना होगा क्योंकि कांग्रेस के चुने गए 5 विधायकों का साथ इसे मिल गया है विजय ने बयान दिया था कि जब वह मुख्यमंत्री बनेगा तो केंद्र का कोई राज्यपाल तमिलनाडु में नहीं होगा मतलब अपने आप ही शपथ ग्रहण कर कुर्सी पर बैठ जाएगा आगे आगे देखिए क्या होता है 

मैं इस्तीफा नहीं दूंगी!!!

सुभाष चन्द्र

में हार गई तो क्या हुआ, पर में इस्तीफा नहीं दूँगी!

में भले ही ख़ुद की सीट भी हार गई पर में इस्तीफा नहीं दूँगी!

में साजिश से हार गई पर नैतिक रूप से जीत गई हूँ!

में तो हार ही नहीं सकती ना तो में इस्तीफा नहीं दूँगी!

में तो आजाद चिड़िया हूँ, जहाँ चाहूँ जा सकतीं हूँ!

में चाहे ये करूँ, में चाहे वो करूँ, मेरी मर्ज़ी!

में तो किंम जोंग की तरह मुख्तार बनी रहूँगी!

तुम मानो या ना मानो पर में तो मुख्यमंत्री हूँ तो में इस्तीफा नहीं दूँगी!

जनता जनार्दन ने भले ही मुझे ठुकरा दिया पर में जय श्री राम नहीं बोलूंगी!

जबरदस्त हार के बाद भी जबरदस्ती मुख्यमंत्री बनी रहूँगी!

हकीकत में भले ही मुख्यमंत्री ना रहूँ पर सपने में भी कोई मुझे पदभ्रष्ट कर नहीं सकता!

"रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे,

रहा तृणमूल तो फ़िर मिलेंगे!"

तुम चाहे कुछ भी कहो पर में सपने में भी इस्तीफा नहीं दूँगी!

में इस्तीफा नहीं दूँगी! में इस्तीफा नहीं दूँगी!

इंशाअल्लाह!!!

प्रीति जागीरदार

05/05/2026

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बंगाल : TMC नेता सलाउद्दीन सरदार के दफ्तर में मिले धारदार हथियार, गोला-बारूद भी बरामद


पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। घुटियारी शरीफ के नारायणपुर में TMC कार्यालय पर छापा मारा गया। इस दौरान पुलिस ने वहाँ से भारी मात्रा में धारदार हथियार बरामद किए हैं।

यह दफ्तर स्थानीय TMC नेता सलाउद्दीन सरदार का बताया जा रहा है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि पार्टी कार्यालय में हथियार छिपाकर रखे गए हैं।

छापेमारी के दौरान पुलिस ने वहाँ से 18 धारदार हथियार जब्त किए। इसके साथ ही भारी मात्रा में गोला-बारूद भी बरामद होने की खबर है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि चुनाव के बीच इतनी बड़ी संख्या में हथियार वहाँ क्यों जमा किए गए थे। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

यूँ ही नहीं खुद को ‘मुस्लिमों की पार्टी’ कहती है कांग्रेस : असम में जीते 19 विधायकों में केवल 1 हिंदू, बंगाल में दोनों मुस्लिम


2018 में उर्दू अखबार ‘इंकलाब’ ने एक खबर छापी जिसमें राहुल गाँधी का एक बयान था जिसमें कहा गया था कि ‘कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है’। तब कांग्रेस पार्टी ने इस बयान को झुठलाने की कोशिश की लेकिन पार्टी के ही तब के अल्पसंख्यक मोर्चा के चेयरमैन ने इस बयान की पुष्टि की थी। इस बात को 8 साल बीत गए हैं।
कांग्रेस पार्टी वास्तव में मुस्लिमों की पार्टी है इस सच्चाई को जानने के लिए राहुल गाँधी से लेकर मोतीलाल नेहरू तक की असलियत जानना जरुरी है। हो सकता है सच्चाई सामने आने पर परिवार भक्त/गुलाम उपद्रव मचाएं। मचेगा उसे कोई रोक नहीं पाएगा। आखिर परिवारभक्ति की कीमत जो चुकानी है। शायद यही वजह है कि सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का हथोड़ा हिन्दू समाज पर चला लेकिन उस समाज के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं हुई जिसमे हिन्दू समाज से कहीं अधिक कुरीतियां हैं।  

दूसरे, इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने हिन्दू धर्म को बदनाम करने "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" का जहर फैलाया गया। और बेशर्म हिन्दू भी इस जहर को पीकर आनंदित होता रहा। सच्चाई को जानने की कोशिश नहीं की। मुस्लिम समाज को एकजुट रखने के लिए हिन्दुओं को जातिगत सियासत में बाँटने का घिनौना खेल आज तक खेला जा रहा है। है किसी में हिम्मत जो ईसाई और मुसलमानों की जातियों में खतरनाक भेदभाव को दूर करने के लिए मुंह सके। सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को गुमराह किया जाता रहा है एक बात याद रखनी चाहिए कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। लेकिन यहाँ एक हाथ से ही ताली बजाई जा रही है।    

अब सोमवार(4 मई 2026) को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। कांग्रेस के उस दावे में कितना सच था या नहीं थे इस थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और नतीजों से कांग्रेस के मौजूदा स्वरूप को समझने की कोशिश करते हैं। बात करते हैं, असम और पश्चिम बंगाल की, इन दोनों राज्यों में बीजेपी सत्ता में आई है।

बंगाल में टक्कर TMC-BJP के बीच थी तो कांग्रेस की गर्त में जाना लगभग तय था, हुआ भी वही। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी के आक्रामक प्रचार ने राज्य में पार्टी की जीत की हैट-ट्रिक लगा दी।

कांग्रेस को असम और पश्चिम बंगाल में कुल जमा 21 विधानसभा सीटें मिलीं। असम में पार्टी ने 19 सीटें जीतीं जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के खाते में 2 सीटें आईं। इसमें एक दिलचस्प बात जो सामने आई वो उस 2018 के अखबार की उस रिपोर्ट की ही याद दिला रही थी जो राहुल गाँधी ने तब कथित तौर पर कहा था।

असम में जीते कांग्रेस के 19 विधायकों में केवल 1 विधायक हिंदू है। असम की नोबोइचा सीट से जीते जोय प्रकाश दास राज्य में कांग्रेस के इकलौते हिंदू विधायक हैं बाकी विधायकों के नाम आप इस लिस्ट में देख सकते हैं।

                              असम में जीते कांग्रेस के विधायक (साभार: ECI Result)

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस का हुआ। पश्चिम बंगाल के फरक्का में कांग्रेस के मोताब शेख और रानीनगर में जुल्फीकार अली ने जीत दर्ज की है।

                                             पश्चिम बंगाल में जीते कांग्रेस के विधायक (साभार: ECI Result)

वहीं, केरल में कांग्रेस उस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ गठबंधन में सरकार बनाने जा रही है जिसकी कट्टरपंथी विचार किसी ने छिपे नहीं है। इस कट्टरपंथी और हिंदू विरोधी पार्टी को राहुल गाँधी सेकुलर तक बता चुके हैं।

भले ही IUML यह दावा करती है कि उसका गठन 1948 के बाद हुआ लेकिन असल में यह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की ही एक शाखा है। AIML वही पार्टी थी जिसे पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बनाया था। देश के बँटवारे के बाद AIML की जगह पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने ले ली।

IUML का गठन AIML की सोच और विचारधारा को जिंदा रखने के लिए किया गया था। इसका एक बड़ा उदाहरण यह है कि IUML के पहले अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल खुद देश के बँटवारे के आंदोलन में शामिल थे और पाकिस्तान बनने के समर्थक थे।

कांग्रेस का मुस्लिम घुसपैठियों से भी प्रेम बताता है कि उसकी आज की दशा क्या हो गई है। असम और बंगाल दोनों ऐसे राज्य हैं जो घुसपैठ और डेमोग्राफी परिवर्तन से जूझ रहे हैं लेकिन कांग्रेस को ना ये अवैध घुसपैठिए नजर आते हैं, ना ही डेमोग्राफी में बदलाव नजर आता है। वो जमीनी हकीकत को भी जानते समझते हुए भी केवल वोट के लिए या कहें तो मुस्लिम वोट के लिए इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखती है।

अब भले ही 2018 में राहुल गाँधी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताया हो या ना बताया हो लेकिन पार्टी के कृत्य तो इस बात को स्थापित करते ही हैं। बाकी अभी इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के करीब 95% चुने गए विधायक मुस्लिम हैं, आगे ये आँकड़ा और कांग्रेस की राजनीति कहाँ जाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।

बंगाल भी पहुंच गया योगी बुलडोज़र; कोलकाता में BJP कार्यकर्ता की पीट-पीटकर हत्या, भीड़ ने TMC दफ्तर पर चलाया बुलडोजर: संदेशखाली में केंद्रीय बलों पर फायरिंग

                              कोलकाता में अवैध टीएमसी दफ्तर पर बुलडोजर एक्शन (साभार : Aajtak)
कोलकाता के न्यू मार्केट में मंगलवार (5 मई 2026) रात लोगों की भीड़ ने बुलडोजर चलाकर TMC का यूनियन ऑफिस ढहा दिया। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह दफ्तर अवैध कब्जे की जमीन पर बना था। घटना के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात है। न्यू मार्केट इलाके में TMC का ऑफिस जमींदोज कर दिया गया। 

स्थानीय लोगों के अनुसार यह दफ्तर एक दुकानदार से जबरन छीनी गई जमीन पर बना था। लंबे समय से लोग इस अवैध कब्जे से नाराज थे। चुनावी नतीजों के बाद उत्साहित लोगों की भीड़ ने बुलडोजर बुलाकर इसे हटा दिया। मौके पर मौजूद लोग इसे जनता का इंसाफ बता रहे हैं।

बंगाल में हो रहे उपद्रव को मुख्य चुनाव आयोग ने बंगाल गृह सचिव को उपद्रवियों से सख्ती से निपटने के आदेश दिए हैं। 

TMC का हंगामा और बीजेपी कार्यकर्ता की मौत

अचानक हुए इस एक्शन से न्यू मार्केट में भगदड़ मच गई। डर के मारे दुकानदारों ने अपने शटर गिरा दिए। ऐतिहासिक हॉग मार्केट के पास व्यापारियों में काफी खौफ देखा गया। हालात बिगड़ते देख पुलिस की कई टीमें मौके पर पहुँचीं। फिलहाल पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और गश्त जारी है।

राज्य के अन्य हिस्सों में TMC समर्थकों पर हिंसा के आरोप लगे हैं। न्यू टाउन में BJP कार्यकर्ता मधु मंडल की कथित तौर पर TMC समर्थकों ने पिटाई कर दी, जिससे उनकी मौत हो गई। कई जगहों पर BJP कार्यकर्ताओं के घरों पर भी हमले हुए हैं। हावड़ा में भी एक कार्यकर्ता की मौत की खबर है, जिसकी पत्नी ने TMC समर्थकों पर आरोप लगाए हैं।

प्रशासन ने माँगी रिपोर्ट

TMC नेताओं ने इस बुलडोजर एक्शन को गलत बताया है। वहीं, राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हुई तोड़फोड़ और आगजनी पर चुनाव आयोग सख्त है। आयोग ने पुलिस से पूरी रिपोर्ट तलब की है। पुलिस ने साफ किया है कि कानून हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस का एक और शर्मनाक रिकॉर्ड, बंगाल-असम-तमिलनाडु में भी मिली करारी हार


कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने चुनावी हार का एक ऐसा ‘कीर्तिमान’ स्थापित कर लिया है, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में विरला है। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी के ताजा नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस अब देश की राजनीति में एक अप्रासंगिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। आंकड़े गवाह हैं कि 2004 में राजनीति में प्रवेश करने के बाद से, राहुल गांधी के साये में कांग्रेस लोकसभा और विधानसभाओं के 99 चुनाव हार चुकी है। हार की इस ‘नर्वस नाइंटी’ पर खड़ी कांग्रेस आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। विडंबना यह है कि जैसे-जैसे पार्टी में राहुल गांधी की जिम्मेदारी और कद बढ़ा, वैसे-वैसे कांग्रेस का ग्राफ रसातल की ओर गिरता गया। महासचिव से लेकर अध्यक्ष पद तक, उनके दौर में पार्टी ने न केवल सत्ता गंवाई, बल्कि अपनी वैचारिक जमीन भी खो दी। राज्यों से लगातार होते सूपड़ा साफ के बीच अब ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की वह कल्पना धरातल पर उतरती दिख रही है, जिसकी कभी उनके विरोधियों ने बात की थी। ये ताजा परिणाम केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि कांग्रेस के धीरे-धीरे मिटते जाने का संकेत हैं।
                                                                                                          साभार सोशल मीडिया 

बंगाल में मिली शर्मनाक हार
पश्चिम बंगाल के नतीजों ने कांग्रेस की राष्ट्रीय स्थिति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया है। जहां भाजपा ने ममता बनर्जी की अजेय मानी जाने वाली सत्ता को उखाड़ फेंका और बहुमत का आंकड़ा पार किया, वहीं राहुल गांधी की कांग्रेस एक अदद सीट के लिए तरसती नजर आई। टीएमसी और बीजेपी की सीधी जंग में कांग्रेस का अस्तित्व पूरी तरह मिट गया। हार नंबर 99 के साथ राहुल गांधी अब ‘हार की सेंचुरी’ के मुहाने पर खड़े हैं।
असम में हिमंत का क्लीन स्वीप
असम में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने न केवल सत्ता में वापसी की, बल्कि कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में भी सेंध लगा दी। राहुल गांधी के प्रचार और ‘गारंटी’ के दावों के बावजूद कांग्रेस यहां एक सशक्त विपक्ष बनने में भी विफल रही।
तमिलनाडु में कांग्रेस गठबंधन पस्त
तमिलनाडु में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। थलापति विजय की पार्टी टीवीके (TVK) ने सीटों का शतक लगाकर इतिहास रच दिया और स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके-कांग्रेस गठबंधन की विदाई कर दी। राहुल गांधी के लिए यह हार इसलिए भी बड़ी है क्योंकि तमिलनाडु को कांग्रेस का सुरक्षित किला माना जा रहा था, लेकिन टीवीके के उदय और भाजपा-एआईडीएमके गठबंधन की मजबूती ने कांग्रेस को चुनावी मैदान से बाहर कर दिया।
पुडुचेरी में बीजेपी का परचम
पुडुचेरी में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। यहां राहुल गांधी का कोई भी दांव सफल नहीं रहा। स्थानीय मुद्दों पर पकड़ की कमी और संगठन के भीतर अंतर्कलह ने कांग्रेस को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया। मतदाताओं ने राहुल की नीतियों को पूरी तरह नकारते हुए भाजपा के ‘विकास मॉडल’ पर अपनी मुहर लगा दी है।

सत्य से मुंह मोड़ती ममता और पूरा विपक्ष; लड़ ले राहुल गांधी RSS और भाजपा से कुछ सीख मोदी से

सुभाष चन्द्र

भारत में अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी और ममता बनर्जी जैसे अराजक नेताओं ने राजनीति को गन्दी सियासत बना दिया है। हैरानी होती है इन जैसे नेताओं और इनकी पार्टी को वोट देने वाले फूहड़ वोटरों पर। इन नेताओं की अराजकता के लिए जनता भी जिम्मेदार है। इस कटु सच्चाई इनको वोट देने वाले नकार नहीं सकते। जो राहुल को नेता मानते है दिमाग खाली होने का सबूत देते हैं। जो चुनाव होते ही विदेश में बैठे अपने आकाओं की गोदी में चला जाता है। राहुल भक्त बताएं इस समय जिस नेता को देश में होना चाहिए था विदेश क्यों भाग जाता है? 

बंगाल में करारी हार के बाद भी ममता बनर्जी सत्य का सामना नहीं करना चाहती वो कह रही है कि “मैं इस्तीफ़ा नहीं दूंगी, हमने चुनाव नहीं हारा …मैं राजभवन नहीं जाउंगी सवाल ही नहीं उठता, नैतिक रूप से हम जीत हैं” वो आरोप लगा रही है उसके पेट पर लात मारी गई लेकिन किसी कैमरे में आया हो हो सबूत दे। 

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
ममता जब अपने ही दांत जिव्हा(जुबान) काट दे तब किसी को दोष नहीं देना चाहिए। ममता को हराने में इसका सनातन विरोधी और बंगाल में धूमधाम से मनाए जाने वाली "काली पूजा" के मनाने पर पाबंदियां। सिर्फ अपने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने के लिए। मुसलमानों ने वोट देकर खुश तो कर दिया लेकिन सनातनी वोट ने जमीन पर दे मारा। दूसरे, ममता की हार के पीछे BJP या RSS नहीं INDI गठबंधन है।अखिलेश यादव को प्रचार के लिए जाने से रोका था लेकिन नंबर बढ़ाने चला गया अंजाम ममता हार गयी। अखिलेश जिस-जिस राज्य में गया चुनाव हरवा कर ही शांति मिली। दूसरे, INDI गठबंधन की कांग्रेस और कम्युनिस्ट भी तृणमूल के खिलाफ लड़े।       

अगर इस्तीफा नहीं देना चाहती मत दे किसे पागल बना रही ममता। मई 8 को विधान सभा का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है और उसके साथ ही बन जाएगी "भूतपूर्व"। पाप का घड़ा भर गया बस फूटने का इंतज़ार है। अगला चुनाव आने तक शायद तृणमूल कांग्रेस का कोई नामलेवा भी होगा या नहीं भविष्य के गर्भ में छिपा है।

नैतिक रूप से जीतने से क्या सरकार बना सकती हैं ममता बनर्जी वैसे तो नैतिकता का तो नामोनिशान भी नहीं है इस महिला में राजभवन नहीं जाएगी तो जेल जाना पड़ेगा क्योंकि हारने के बाद भी इस्तीफ़ा न देना राजद्रोह कहलायेगा सरकारी भवन भी जबरन खाली करा लिया जाएगा क्योंकि अभी 60 दिन सुरक्षा बल वहां मौजूद रहेंगे

राहुल गांधी ने कहा था कि हम RSS, भाजपा और भारत देश से लड़ रहे हैं अब लड़ लिए RSS और भाजपा से RSS ने पिछले 20 साल में बंगाल की सामाजिक मुख्यधारा जो बदलाव किया, उसका परिणाम कल सामने आया है RSS ने एक Silent Killer की तरह काम किया

2006 में बंगाल में RSS की 500 से भी कम शाखाएं थी, 2011 में 830 हो गई और 2024 में बढ़ कर ये 4540 हो गई जो 2026 में हर ग्राम पंचायत में 8000 हो जाएंगी RSS ने पिछले 5 साल में घर घर जाकर जनमानस को जाग्रत किया जिसका परिणाम अब सामने आया है

राहुल गांधी RSS, भाजपा और मोदी से कुछ नहीं सीख सकता पिछले 12 साल में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राहुल गांधी पूरा देशद्रोही बन गया जिसका काम केवल मोदी को बदनाम करना और देश के खिलाफ साजिश करना रह गया। जबकि बंगाल में भाजपा ने पिछले 15 साल में कड़ी मेहनत की, सैकड़ों कारकर्ताओं का बलिदान दिया 2011 में भाजपा की जीरो सीट थी, 2016 में 3 हुई, 2021 में 73 हुई और अबकी बार 206 जबकि कांग्रेस की 2016 में 44 सीट थी और CPM की 26 लेकिन 2021 में शुन्य पर आ गई दोनों पार्टी इस बार केवल 2-2 सीट मिली हैं दोनों को

इतनी बड़ी हार के बाद भी ममता और राहुल चुनाव चोरी का राग अलाप रहे हैं राहुल गांधी ने कहा है “चुनाव चोरी, संस्था चोरी अब और चारा ही क्या है” भाई चारा क्या होता है लालू यादव से पूछ लो  और ये चुनाव चोरी हुआ होता तो केरल में कांग्रेस गठबंधन सत्ता में कैसे आ गया, ये सोचने का दिमाग राहुल गांधी में नहीं है

उधर अखिलेश यादव तड़प रहा है और कह रहा है कि ये राजनीति के इतिहास का सबसे काला दिन है संजय राउत बक रहा है कि ये पाकिस्तान जैसा चुनाव है बहुत याद आ रही है पाकिस्तान की तो क्या  इमरान खान के तरह विपक्ष के सभी नेताओ को जेल में डाल दें फिर सही में पाकिस्तान का चुनाव कह सकते हो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल केरल कांग्रेस को जीत के लिए बधाई दी, केरल और तमिलनाडु, पुडुचेरी बंगाल और असम सभी राज्यों के मतदाताओं को धन्यवाद किया जबकि ममता, राहुल, अखिलेश या किसी भी विपक्ष के नेता ने भाजपा को असम, बंगाल और पुडुचेरी जीत के लिए बधाई नहीं दी ममता ने तो सुवेंदु अधिकारी को भी बधाई नहीं दी

राहुल गांधी, अखिलेश और संजय राउत जैसे लोग ममता के लिए टसुए बहा रहे हैं लेकिन वो 8 दिसंबर, 2019 को TMC के गुंडों द्वारा बंधू प्रकाश पाल, उसकी 8 महीने की गर्भवती पत्नी और 5 साल के बच्चे की मुर्शिदाबाद में की गई निर्मम हत्या को याद नहीं कर रहे वो याद नहीं करते 8 वर्ष पहले कैसे 22 साल के त्रिलोचन महतो को TMC के गुंडों ने फांसी पर लटका दिया था क्योंकि उसने भाजपा का समर्थन कर दिया था

राजनीति के इतिहास का यह काला दिन नहीं है बल्कि कल राजनीति पर छाए हुए तानाशाही के बादल छट गए एक बात साफ़ है जो सनातन धर्म और भगवान राम से नफरत करेगा, उसका पतन निश्चित है यह बात अगर आज भी समझ नहीं आती इन लोगों को तो इनका आगे भी सर्वनाश होना तय है

‘इस्तीफा नहीं दूँगी, अब मैं आजाद परिंदा हूँ’, मेरे पेट पर लात मारी : ममता बनर्जी ; लेकिन आरोपों का एक भी सबूत पेश नहीं किया

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने 15 साल से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी को कुर्सी से उतार दिया है। हार के बाद पहली बार मीडिया के सामने आईं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बेहद आक्रामक नजर आईं। उन्होंने न केवल चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर धांधली के आरोप लगाए, बल्कि खुद के साथ मारपीट होने का भी सनसनीखेज दावा किया। हालाँकि, इन गंभीर आरोपों के समर्थन में उन्होंने कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं किया।

‘मेरे पेट और पीठ पर मारी लात’

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि जब वे मतगणना केंद्र के अंदर गईं, तो उनके साथ बदसलूकी की गई। उन्होंने दावा किया, “उन्होंने मेरे पेट में लात मारी, मुझे पीछे से पीटा और मेरे साथ हाथापाई की। उस समय वहाँ के CCTV कैमरे बंद कर दिए गए थे।” ममता का आरोप है कि करीब 200 बाहरी गुंडों और CRPF के जवानों ने मिलकर उनके काउंटिंग एजेंट्स को डराकर बाहर निकाल दिया। उनके मुताबिक, जब वे 30 हजार वोटों से आगे चल रही थीं, तब ‘खेल’ करके उन्हें हराया गया।

चुनाव आयोग को बताया ‘विलेन’

ममता ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें लोकतंत्र का ‘विलेन’ करार दिया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच ‘सेटिंग’ थी। ममता ने ईवीएम (EVM) पर भी सवाल उठाए और कहा कि मतदान के कई दिनों बाद भी मशीनों में 80-90% चार्ज कैसे रह सकता है? उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले लाखों वोटरों के नाम जानबूझकर वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे।

‘इस्तीफा नहीं दूँगी, अब मैं आजाद परिंदा हूँ’

हार के बावजूद ममता बनर्जी के तेवर नरम नहीं पड़े हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि वे राजनीति से पीछे नहीं हटेंगी और इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा, “अब मेरे पास कोई कुर्सी नहीं है, मैं एक आम नागरिक और एक आजाद परिंदा हूँ। अब मैं पूरे देश में घूमकर ‘इंडिया गठबंधन’ (INDI Alliance) को मजबूत करूँगी।”
ममता बनर्जी ने बताया कि राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं ने उन्हें फोन कर अपना समर्थन दिया है।


बंगाल : 15 साल से बंद आसनसोल का Durga Mandir के बीजेपी के जीतते ही खुले कपाट: हिंदू भगवा लहराकर बोले- जय श्रीराम; हिन्दुओं योगी की बात याद रखो कि "बंटे तो कटे।"

            बंगाल में BJP की जीत के बाद आसनसोल में दशकों बाद खुला दुर्गा माता मंदिर (साभार : Video SS)
पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है। 15 साल बाद ममता बनर्जी की सत्ता चली गई है और BJP ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। इस बड़ी जीत के साथ ही आसनसोल में बरसों से बंद पड़ा एक Durga Mandir सोमवार (4 मई 2026) को भक्तों के लिए खोल दिया गया है। जो दिखाता है कालनेमि हिन्दू महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राज में हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया था। हिन्दुओं को अपने धार्मिक उत्सवों को मनाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते थे। यह तो एक झांकी है पूरी फिल्म तो अब सामने आनी शुरू होनी है। 
बीजेपी को भी महिला आरक्षण मुद्दे पर फोकस करने की बजाए बंगाल में हिन्दुओं के खोए स्वाभिमान को जीवित करना होगा। आरक्षण देना है तो वर्तमान संख्या में दो। ये नई दुकाने खोलकर अर्थव्यवस्था पर बोझा मत डालो। 

बंगाल चुनाव सारे हिन्दू समाज के लिए eye opener है। इसे सिर्फ ममता की हार मत समझो। जिस तरह बंगाल में हिन्दू ने एकजुट होकर वोट दिया है बंगाल की तर्ज पर शेष भारत में भी करनी होगी। अगर हिन्दू ऐसा करता है सारे कट्टरपंथी और सनातन विरोधी बिलों में घुस जाएंगे। हिन्दुओं को जातियों में बाँटने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों को सत्ता से दूर रखना होगा। योगी की बात याद रखो कि "बंटे तो कटे।"   

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मुसलमानों में हिन्दुओं से कही अधिक फिरके हैं, एक फिरका दूसरे फिरके की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकता, दूसरे फिरके के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकता। इतना ही नहीं शादी उर्फ़ निकाह तक नहीं कर सकता। लेकिन चाहे किसी भी जाति से हो एक भी मंदिर में जाकर पूजा करता है और एक ही शमशान में अंतिम संस्कार करता है। ये सब जातियों का बवंडर इन्ही हिन्दू विरोधी नेताओं का है। जो अपनी कुर्सी की खातिर हिन्दुओं को विभाजित करने का घिनौना काम करता है और हिन्दू इनके मकड़जाल में फंस जाता है। कालनेमि हिन्दुओं से लेकर मुस्लिम नेताओं से दलित उत्पीड़न की बात सुनी जाती है लेकिन इनमे से किसी माँ का दूध नहीं पिया जो मुसलमानों की जातियों में भेदभाव को दूर करने के लिए मुंह खोल सके। इसे बोलते हैं इस्लामिक एकजुटता।  

चुनावी वादे के साथ खुले ताले

आसनसोल उत्तर से BJP के नए विधायक कृष्णेंदु मुखर्जी ने चुनाव से पहले एक बड़ा वादा किया था। उन्होंने कहा था कि जीत मिलते ही वह बंद Mandir को खुलवाएँगे। सोमवार (4 मई 2026) को जैसे ही BJP की जीत पक्की हुई, विधायक जी खुद मंदिर पहुँचे। उन्होंने Mandir के ताले खुलवाए और पूजा-अर्चना की।

श्री श्री Durga Mata चैरिटेबल ट्रस्ट इस मंदिर की देखरेख करता है। स्थानीय विवादों और प्रशासनिक पाबंदियों की वजह से यह Mandir सालों से आम लोगों के लिए बंद था। यहाँ साल में सिर्फ दुर्गा पूजा और लक्ष्मी पूजा के वक्त ही थोड़ी-बहुत चहल-पहल होती थी। अब यह मंदिर पूरे साल भक्तों के लिए खुला रहेगा।

भक्तों और कार्यकर्ताओं का जश्न

जैसे ही Durga Mandir के गेट खुले, वहाँ भारी भीड़ जमा हो गई। BJP कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने मिलकर जयकारे लगाए। लोग इसे सिर्फ एक मंदिर का खुलना नहीं, बल्कि इलाके में आए राजनीतिक बदलाव का प्रतीक मान रहे हैं। पश्चिम बर्धमान जिले की सभी 9 सीटों पर BJP ने कब्जा किया है, जिससे समर्थकों में जबरदस्त उत्साह है।

इस चुनाव में BJP ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है। 294 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी ने 206 सीटें जीतकर TMC(80 सीट) को काफी पीछे छोड़ दिया है। पूरे बंगाल में औसतन 92 फीसदी वोटिंग हुई थी। हालाँकि, फालता सीट पर गड़बड़ी की शिकायतों के बाद 21 मई को दोबारा वोट डाले जाएँगे और वहाँ का रिजल्ट 24 मई को आएगा।

शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को दी पटखनी, भबानीपुर में 15000+ वोटों से CM को हराया: बोले- यह हिंदुत्व की जीत; हिन्दुओं सेकुलरिज्म के नशे से निकलो


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े उलटफेर के तहत तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके गढ़ भबानीपुर में करारी हार का सामना करना पड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,105 वोटों से हरा दिया है।

मतगणना के अंतिम राउंड के बाद सामने आए नतीजों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी को कुल 73,917 वोट मिले जबकि ममता बनर्जी 58,812 वोटों के साथ पीछे रह गईं। यह हार न सिर्फ चुनावी दृष्टि से बड़ी मानी जा रही है बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका खास महत्व है।

शुभेंदु ने कहा, “ममता बनर्जी को हराना बेहद जरूरी था। यह ममता बनर्जी की राजनीति से रिटायरमेंट की शुरुआत है। इस बार भी वह 15,000 से ज्यादा वोटों से हार गईं। मुसलमानों ने खुलकर उन्हें वोट दिया। वार्ड नंबर 77 में जितने भी मुसलमान वोट डालने आए, उन्होंने ममता को ही वोट दिया। वहीं हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समाज ने मुझे आशीर्वाद दिया और जिताया। यह जीत हिंदुत्व की जीत है।”

इस जीत को हिन्दुत्व की जीत कहने का कारण भी है, क्योकि हिन्दू और हिन्दू महिलाओं पैट हुए दर्दनाक अत्याचारों ने ममता को हारा है। जबसे ममता मुख्यमंत्री बनी तभी से घुसपैठिए और मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं पर अत्याचार होने शुरू हो गए। इतने अत्याचारों के बावजूद 15 सालों तक ममता का सत्ता बने रहने की वजह थी बोगस वोटिंग। जैसाकि वोटिंग के दौरान कई मतदाताओं ने साफ कहा कि पहली बार वोट डालने का मौका मिला है पहले तो घर से निकले बगैर ही हमारा वोट पड़ जाता था। और जैसे ही मौका मिला अत्याचारों का बदला ले लिया। 

लेकिन बंगाल से बाहर हिन्दुओं को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। मुसलमानों ने बीजेपी को हराने एकजुट होकर ममता और इसकी पार्टी को वोट दिया। लेकिन बेशर्म हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में रहता है। जब मुसलमान एकजुट होकर बीजेपी को हराने के लिए वोट कर सकता है तो हिन्दू क्यों नहीं एकजुट होकर बीजेपी को वोट देता? चुनावों में मुसलमान अपनी जातिगत लड़ाई को छोड़ एकजुट होकर वोट कर सकता है हिन्दुओं तुम क्यों जातिगत सियासत में बंटते हो?  

इस जीत के साथ शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। वह पहले ऐसे भाजपा नेता बन गए हैं जिन्होंने ममता बनर्जी को दो बार चुनाव में हराया है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से भी ममता बनर्जी को हराया था।

नाम महुआ मोइत्रा और सयानी घोष, दोनों TMC की फायरब्रांड नेता हैं।
लेकिन इस चुनाव में फायरब्रांड राजनीति ने TMC को ताकत देने के बजाय नुकसान पहुंचाया।
बेवजह का aggression, तीखी भाषा, personal attacks और फालतू की टिप्पणी इन सबने मिलकर TMC की नैया डुबोने का काम किया।
योगी आदित्यनाथ जैसे नेता , जिनसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है , उन पर हल्की भाषा में टिप्पणी करना TMC के लिए उल्टा पड़ गया।
राजनीति में विरोध जरूरी है , लेकिन विरोध के नाम पर अपमान जनता हमेशा याद रखती है।
चुनाव सिर्फ भाषणों से नहीं जीते जाते। चुनाव जनता की भावना , भाषा की मर्यादा, संगठन की ताकत और जमीन पर काम से जीते जाते हैं।
TMC के कई नेताओं ने इस चुनाव में मुद्दों से ज्यादा अहंकार दिखाया। जनता से संवाद कम हुआ , विरोधियों पर व्यक्तिगत हमला ज्यादा हुआ। और जब भाषा का संतुलन बिगड़ता है, तो जनता बैलेट से जवाब देती है।
नतीजा सामने है ....
TMC बुरी तरह चुनाव हार गई। BJP प्रचंड बहुमत के साथ बंगाल में इतिहास रच गई। और ममता बनर्जी अपनी खुद की सीट तक नहीं बचा पाईं।
इस चुनाव ने साफ संदेश दिया है:

राजनीति में आग उगलना आसान है, लेकिन जनता के गुस्से की आग में पूरी पार्टी जल सकती है।

बंगाल : प्राइवेट पार्ट फाड़ा, टांग पकड़कर चीरा, फिर रेता गला: बंगाल नतीजों के बाद चर्चा में कामदूनी गैंगरेप, पीड़िता की दोस्त बोली- आवाज उठाने पर मुझे टॉर्चर किया, जेल भेजा

                               2013 में कामदूनी में छात्रा के गैंगरेप से दहला था कोलकाता (साभार: X)
किसी मुस्लिम की हत्या होने पर उसके घर को पिकनिक स्पॉट बना बीजेपी सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाला बेशर्म और निर्लज विपक्ष ममता के राज में बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथी और TMC के गुंडों द्वारा हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर ऐसे चुप रहे जैसे इनके घर की महिलाएं अपने प्रेमियों के साथ भाग गयी हों। महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जनता ने नहीं बल्कि हिन्दू महिलाओं के साथ हुए घिनौने अत्याचारों की हाय ने हराया है। हिन्दू और हिन्दू महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर बेशर्म प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक चुप्पी साधे रहा, क्यों? जबकि प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता था, लेकिन आज विज्ञापन के लालच में उतनी मुस्तैदी से असली मुद्दों को नहीं उठाता। क्या मीडिया विपक्ष से डरता है?     
मणिपुर कांड की सच्चाई खोजी पत्रकार क्यों नहीं सामने लाए? टीवी पर चौपालें बैठाकर खूब TRP बटोरने वाली मीडिया से सच्चाई को जनता के सामने लाने की हिम्मत जुटा पाया।    

पश्चिम बंगाल में इतिहास बदला गया है। आजादी के बाद यहाँ पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बहुमत से सरकार बनने जा रही है। इस जीत के कई फैक्टर हैं, इनमें से एक हैं महिलाओं के खिलाफ हिंसा। पिछली सरकार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आए, जिन्हें सुन अब तक रूह काँप जाती है। ऐसा ही एक मामला है कामदूनी गैंगरेप, जो चुनावों में भी चर्चा में रहा।

अब चुनावी नतीजों के दिन इस गैंगरेप की पीड़िता की सहेली की एक वीडियो सामने आई, जिसे देख हर कोई उस भयावह घटना के बारे में फिर एक बार बात करने लगा। वीडियो में पीड़िता की सहेली रोते हुए कहती हैं, “कामदूनी में मेरी सहेली के साथ बलात्कार हुआ था। मैंने आंदोलन किया था। मेरे परिवार को टॉर्चर किया गया। मुझे जेल भी काटनी पड़ी। घर पर बमबारी भी हुई। जान से मारने की धमकियाँ मिली।”

क्या है कामदूनी रेप केस?

साल 2013 में बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कामदूनी गाँव में कॉलेज में पढ़ने वाली 20 साल की छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। यह घटना तब हुई, जब वह कॉलेज से एग्जाम देकर स्टेशन से अकेले घर लौट रही थी। तब सैफुल, अंसार अली, इमानुल इस्लाम, अमीनुल समेत 9 लोग छात्रा को पकड़कर खेत में ले गए और गैंगरेप किया।

और सिर्फ गैंगरेप ही नहीं, बल्कि तड़पा-तड़पाकर कर जान से भी मार डाला। उन लोगों ने छात्रा के साथ हैवानियत इतनी दिखाई कि उसके प्राइवेट पार्ट को रेप के दौरान फाड़ दिया गया। इसके अलावा उसकी टांग खींचकर नाभि तक चीर दी गई और उसे फेंकने से पहले वो जिंदा न बचे इसके लिए उसके गले को रेता गया।

लड़की के भाई ने इस मामले में बताया था कि जब वो खुद कामदूनी से लौट रहा था तो उसने आरोपितों को रास्ते में देखा था। अंसार अली और सैफुल बात कर रहे थे- “आज मजा बड़ा आया, अब घर चलना चाहिए।” इनके बाद उसने बाकी 6 लोगों को भी देखा था। लेकिन तब उसे कुछ पता नहीं था।

खबरों के अनुसार, जब लड़की का शव अगले दिन बरामद हुआ तो लड़की अधनंगी थी। उसके साथ हुई वीभत्सता को देख इस मामले का खूब विरोध हुआ था। उसकी सहेलियाँ दिल्ली तक आईं। लोगों का रोष देख फिर ये मामला सीआईडी को सौंपा गया। जाँच में आरोपितों के अपराध का खुलासा हुआ।

कानून कार्रवाई में लापरवाही और कोई न्याय नहीं

बाद में आरोपित गिरफ्तार भी हुए। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे सबको राहत दी जाती रही। 9 में से 2 रफीकुल इस्लाम और नूर अली को सबूतों की कमी के कारण बरी किया गया। गोपाल नस्कर ट्रायल के दौरान ही मर गया। शेख इमानुल इस्लाम, अमीनुर इस्लाम और भोला नस्कर जिनको पहले 10 साल की सजा मिली थी, उन्हें भी 2023 मे 10000 का जमानत बॉन्ड लगाकर छोड़ दिया गया। अमीन अली को बाद में बरी किया गया और जो दो मुख्य दोषी बचे सैफुल अली और अंसार अली। जिन्हें फाँसी की सजा मुकर्रर हुई थी उनकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।

बंगाल में तीन C का नाश हुआ; भाजपा को प्रचंड जीत के लिए बधाई लेकिन सरकार की राह आसान नहीं होगी; योगी और हिमंत मॉडल को अपनाना होगा

सुभाष चन्द्र

इन 5 विधानसभा चुनावों में बंगाल, तमिलनाडु और केरलम में खोने के लिए कुछ नहीं था। फिर भी देशहित में असम और बंगाल में बीजेपी की जीत 2014, 2019 और 2024 लोक सभा चुनावों से कहीं ज्यादा बड़ी है। इन दोनों राज्यों में बीजेपी की जीत नहीं राष्ट्रवाद की जीत है। बंगाल को कांग्रेस से लेकर ममता बनर्जी ने अपनी कुर्सी की खातिर देश की सुरक्षा को घुसपैठियों, कट्टरपंथियों और बारूद के ढेर पर बैठा रखा था। यही हाल कांग्रेस ने north-east का कर रखा था जिसे राहुल गाँधी की बदसलूकी से कुंठित होकर कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थामने वाले हिमंत सरमा ने असम को देश से जोड़ने में जो मेहनत की है उसे झुठलाना सरमा के साथ बेइंसाफी होगी।      

बंगाल में एक C कांग्रेस का, दूसरा CPM का और तीसरा TMC का तीनों का सर्वनाश हो गया। 

यानी triple C डूब गया पिछले 2021 के चुनाव में कांग्रेस और CPM को कोई सीट नहीं मिली थी लेकिन इस बार 2-2 सीट पर आगे हैं मगर TMC तीसरे C वाली 215 से घट कर 82 पर आ गई यानी 133 सीट कम और दूसरी तरफ भाजपा 73 से 205 पर पहुंच गई यानी 132 सीट अधिक मतलब जो ममता ने खोया वो भाजपा ने ले लिया

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अभी सही जानकारी तो नहीं है लेकिन कहीं पढ़ा है भाजपा को 44.8% वोट मिला है जबकि पिछले 2021 के चुनाव में 38.15% वोट था यानी 6.65% ज्यादा जबकि ममता का वोट  पिछले 48.02% के मुकाबले इस बार 41.9% रह गया जो 6.12% कम है

मैंने पहले चरण की वोटिंग के बाद अपने 24 अप्रैल के लेख में लिखा था “अगर दूसरे चरण में भी यही स्थिति रहती है और भाजपा के वोट 38% से 6-7% भी बढ़ गए तो सत्ता की चाबी उसके हाथ में होगी” और आज यही हुआ कि सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई

कांग्रेस एक बार फिर से मुस्लिमों की पार्टी साबित हुई है एक चैनल पर बता रहे थे कि कांग्रेस के असम में आगे चल रहे 23 उम्मीदवारों में से 19 मुस्लिम हैं और केरल में कांग्रेस को UDF में 60-62 सीट मिल रही हैं तो गठबंधन के साथी दल “मुस्लिम लीग” को 22; क्या यह साबित नहीं करता कि कांग्रेस केवल मुस्लिमों के भरोसे चल रही है?

असम में भाजपा की सरकार तीसरी बार बनी है और पुडुचेरी में भी हिमंता बिस्वा सरमा ने कमाल किया है जो भाजपा 101 सीट पर आगे हैं और कांग्रेस कुल 22 पर पवन खेड़ा के खुद कांग्रेस का “पेड़ा” बना दिया। तरुण गोगाई की हार के जिम्मेदार राहुल गाँधी और पवन खेड़ा हैं।  

उधर सनातन धर्म को डेंगू, मलेरिया और कोढ़ कहने वाली DMK खुद ख़त्म हो गई और चीफ मिनिस्टर MK Stalin स्वयं भी हार गया और कर लो सनातन को ख़त्म

बंगाल चुनाव में एक बात मजेदार हुई जिससे एक पुरानी बात याद आ गई मोदी जी एक कुर्सी लेकर लक्षद्वीप की बीच पर बैठ गए और मालदीव निपट गया बंगाल में मोदी जी “झालमुड़ी” क्या खाई, वो ममता बनर्जी को ही खा गई

लेकिन बंगाल में जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, उसे सरकार चलाना अंगारों पर चलने से कम नहीं होगा क्योंकि 15 साल के ममता राज के चलते उसके लोग प्रशासन पर कब्ज़ा किए बैठे हैं पूरी पुलिस फाॅर्स उसकी मर्जी से चलती थी ऐसे लोगों पर विश्वास करना अत्यंत कठिन होगा और इसलिए सरकार चलाना आसान नहीं होगा। बंगाल में सनातन, राष्ट्रवाद को स्थापित करने के लिए योगी आदित्यनाथ मॉडल अपनाना होगा। योगी ने जिन-जिन क्षेत्रों में प्रचार किया अधिकतर सीटें बीजेपी के खाते आने से बहुमत के आंकड़े को पार करने में सहायक सिद्ध हुई। पिछले चुनावों में भी योगी ने बीजेपी को सीटें दिलवाने में अहम् भूमिका निभाई थी। असम मुख्यमंत्री हिमंत की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता।    

फिर बंगाल में घुसपैठियों की समस्या कम नहीं है उनके लिए तो कोलकाता से ढाका के लिए ट्रेन चला देनी चाहिए, चुपचाप बैठो और निकल जाओ वरना ठोक पीट कर निकाला जायेगा

एक प्रमुख काम जरूरी है कि बांग्लादेश सीमा से लगते हुए बंगाल के 14 और असम के 3-4 जिलों को काट कर केंद्र शासित प्रदेश बना देना चाहिए जहां से उन्हें बाहर करना आसान हो और घुसना कठिन हो जाए पूरे केंद्र शासित प्रदेश को BSF के हवाले कर देना चाहिए

बंगाल की जनता को भाजपा सरकार से रातों रात सब कुछ ठीक होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए जो बर्बादी 35 साल के CPM और 15 साल के ममता राज में हुई है, उसे पटरी पर लाने में समय लगेगा  एक घोषणा तो आज मोदी जी ने कर दी कि 5 लाख मुफ्त इलाज की सुविधा का ऐलान पहली ही कैबिनेट मीटिंग में कर दिया जायेगा  

‘TMC को यदि BJP ने हरा दिया तो मैं नंगा होकर गाँव में घूमूँगा’: बंगाल के मुस्लिम युवक "सुफियान" की हो रही खोज, Video

 'BJP जीती तो नँगा घूमूँगा': 192+ सीटों के साथ खिलते ही 'सूफियान' को ढूँढने निकले नेटीजन्स (साभार : Video SS)

बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। BJP के 192+ सीटों पर आगे निकलने और TMC के 96 पर सिमटने के बाद अब नेटीजन्स सूफियान नामक मुस्लिम युवक को पागलों की तरह खोज रहे हैं।

मजे की बात है कि पहले तो कट्टरपंथी और उपद्रवी पैसे के लालच में उल्टा-पुल्टा बयान दे देते हैं बाद में पता नहीं किस कब्र में छिप जाते हैं?   

दरअसल, चुनाव से पहले सूफियान ने बड़े जोश में दावा किया था कि अगर बीजेपी जीत गई, तो वह पूरे कोलकाता में नंगा होकर घूमेगा। अब जब कमल पूरी तरह खिल चुका है, तो लोग मजेदार मीम्स शेयर कर रहे हैं।

कोई पूछ रहा है कि ‘सूफियान भाई कहाँ हो?’ तो कोई तंज कस रहा है कि ‘भाई, कपड़े उतारने की तैयारी शुरू हुई क्या?’ कुछ लोग मजे लेते हुए उन्हें घर के अंदर ही रहने की सलाह दे रहे हैं ताकि ‘पब्लिक’ की नजरों से बच सकें। इस अटूट विश्वास ने अब सूफियान के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। 

मतगणना में पिछड़ने के बाद बंगाल के कई जगहों पर TMC का उपद्रव: पार्टी ऑफिस में बम भी मिला

                     नतीजों के बीच बंगाल में TMC की हिंसा, ऑफिस में बम मिला (साभार : X_@ANI)
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में पिछड़ने के बाद राज्य में तनाव चरम पर है। कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर के बाहर भारी भीड़ ने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए, जिससे माहौल गरमा गया है।

वहीं, राज्य के कई हिस्सों से TMC कार्यकर्ताओं द्वारा उपद्रव और हिंसा की खबरें आ रही हैं। आसनसोल में TMC पार्टी ऑफिस के पास एक बम मिला है, जिसे पुलिस ने तुरंत निष्क्रिय किया।

मतगणना केंद्रों के बाहर टीएमसी और बीजेपी समर्थकों के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं। आसनसोल और बांकुरा में उपद्रवियों ने वाहनों में तोड़फोड़ की और आगजनी की कोशिश की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षाबलों ने कड़ा लाठीचार्ज किया है।

पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि रुझान स्पष्ट हैं, इसलिए बौखलाहट में हिंसा फैलाई जा रही है। फिलहाल संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात है।


लगातार पोल खुलने पर भी बाज नहीं आ रहे राहुल गांधी

आखिर INDI गठबंधन राहुल गाँधी का क्यों पिछलग्गू बना हुआ है जो खुद तो डूब ही रहा है गठबंधन को भी डुबो रहा है। आखिर गठबंधन की ऐसे कौन-सी दुखती नब्ज राहुल ने पकड़ी हुई है। या यूँ भी कहा जा सकता है कि INDI गठबंधन महामूर्खों का जमघट है। इनको नहीं मालूम कि तुम्ही लोगों के कंधे पर बैठ ये और कांग्रेस सुरमाभोपाली बने हुए हैं। अभी जो 5 राज्यों में हुए चुनाव के चुनावी रुझानों में कांग्रेस और INDI गठबंधन की जो पतली हालत हुई है उसके लिए जिम्मेदार सिर्फ राहुल की गलत और गुमराह करने वाली सोंच है।    
नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति अब तथ्यों, तर्कों और जिम्मेदारी से ज्यादा सनसनी, भ्रम और झूठे नैरेटिव पर टिकती दिख रही है। संसद से सड़क तक वे लगातार ऐसे झूठे आरोप उछालते रहते हैं, जिनका या तो बाद में खुद उनके ही दावों से खंडन हो गया, या फिर अदालत, सेना, चुनाव आयोग और सरकारी रिकॉर्ड ने उनकी बातों की धज्जियां उड़ा दीं। कभी सेना के “हाथ बांध देने” का आरोप लगाकर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, तो कभी चुनाव आयोग को “वोट चोरी” का औजार बताकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। संसद में बोलने नहीं देने का रोना रोने वाले राहुल गांधी की पोल खुद लोकसभा के रिकॉर्ड ने खोल दी। कई महत्वपूर्ण बहसों में राहुल ने स्वयं हिस्सा तक नहीं लिया। यह सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि झूठ को हथियार बनाकर देश में अविश्वास फैलाने की राजनीति है। 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि राहुल गांधी के आरोप अक्सर अधूरी जानकारी, गलत तथ्यों और भावनात्मक उकसावे पर आधारित होते हैं। राफेल से लेकर अग्निवीर, EVM से लेकर विदेशी नेताओं की मुलाकातों तक, बार-बार उनके दावों की हवा निकलती रही, लेकिन झूठ का सिलसिला नहीं रुका। कभी सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी, तो कभी सेना और चुनाव आयोग को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। यदि नेता प्रतिपक्ष ही बिना प्रमाण के आरोपों की राजनीति करेगा, तो इससे सिर्फ उसकी विश्वसनीयता नहीं गिरेगी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी कमजोर होगा। हिट और रन की पॉलिटिक्स कभी भी मेहनत और परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती।दरअसल, राहुल हर हार, हर विवाद और हर असफलता का दोष किसी न किसी संस्था पर डालते हैं, लेकिन आत्ममंथन से लगातार बचते रहते हैं। 

गृहमंत्री ने संसद में राहुल के मौन से खोली झूठ की पोल

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अक्सर संसद के बाहर मोदी सरकार पर आरोप लगाते हैं कि उन्हें संसद में बोलने ही नहीं दिया जाता। लेकिन लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी के इस दावे की जोरदार तरीके से पोल खोल दी। अमित शाह ने सदन में रिकॉर्ड रखते हुए बताया कि 16वीं लोकसभा में राहुल गांधी ने 2014, 2015, 2017 और 2018 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा में हिस्सा तक नहीं लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने किसी बजट चर्चा और किसी सरकारी विधेयक पर भी भागीदारी नहीं की। शाह ने 17वीं लोकसभा के आंकड़े गिनाते हुए कहा कि 2019, 2020 और 2021 में भी राहुल राष्ट्रपति अभिभाषण की चर्चा से दूर रहे, जबकि कई बजट चर्चाओं में भी शामिल नहीं हुए। राहुल गांधी के राजनीतिक झूठ पर यह तथ्यात्मक जवाब करारा प्रहार बनकर सामने आया।

सेना के ‘हाथ बांध देने’ के आरोप की पूर्व आर्मी चीफ ने धज्जियां उड़ाईं

लोकसभा में राहुल गांधी ने पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक Four Stars of Destiny का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि चीन के साथ तनाव के दौरान मोदी सरकार ने सेना के “हाथ बांध दिए” थे। लेकिन बाद में खुद जनरल नरवणे की ओर से स्पष्ट किया गया कि भारतीय सेना को जमीनी हालात के अनुसार कार्रवाई के लिए पूरा “फ्री हैंड” दिया गया था और सेना ने मजबूती से चीन का सामना किया। राहुल गांधी ने जिस किताब के अंशों के सहारे सरकार और सेना के नेतृत्व पर सवाल खड़े करने की कोशिश की, वह किताब अब तक अप्रकाशित है और उसी किताब के लेखक की सफाई ने उनके आरोपों की हवा निकाल दी। राजनीतिक लाभ के लिए सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर बयान देना आखिरकार राहुल गांधी पर ही भारी पड़ गया।

‘वोट चोरी’ के झूठ पोल खुली, शाह ने बताया ऐसे रचा भ्रम

राहुल गांधी ने जो आरोप महीनों से देशभर में घूम-घूमकर उछाले, वही आरोप शाह ने चुन–चुनकर, तथ्य पर तथ्य रखकर, और सार्वजनिक दस्तावेज़ों के हवाले से इस तरह ध्वस्त किए कि पूरी कांग्रेस उस झटके से उबरने की स्थिति में भी नहीं दिखी। राहुल का सबसे बड़ा आरोप यही था कि देश में “वोट चोरी” हुई है। लेकिन अमित शाह ने खुलकर कहा कि यह अदालत में, चुनाव आयोग में, संसद में और जनता की अदालत में कहीं भी टिकने लायक आरोप नहीं है। शाह ने बताया कि चुनाव प्रक्रिया में वोटर लिस्ट से लेकर बूथ डेटा तक हर कदम का डिजिटल और फिजिकल ट्रैक रिकॉर्ड होता है। यह कोई कांग्रेस के आंतरिक चुनाव जितना आसान नहीं कि मनमर्जी के आंकड़े लिखकर अध्यक्ष चुन लिया जाए। शाह ने कठोर शब्दों में स्पष्ट किया कि कांग्रेस जानती है कि यह आरोप झूठा है, पर “हार का ठीकरा” किसी पर फोड़ना ही उनकी राजनीतिक रणनीति है। यही राहुल गांधी की चुनावी आदत है। नतीजे आते ही EVM, आयोग, मोदी, शाह सबको दोष दो और देश को भ्रमित करो।

राहुल के आयोग के झूठ का संविधान की किताब से जवाब

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पक्षपाती है। लेकिन अमित शाह ने राहुल को उसी संविधान की दूसरी अनुसूची की याद दिलाई, जिसमें आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया लिखी है। अमित शाह ने साफ कहा कि कांग्रेस जिस चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगा रही है, उसकी नियुक्ति प्रक्रिया वही है जिस पर स्वयं कांग्रेस ने संसद में सहमति दी थी। सच यही है कि कांग्रेस ने नियुक्ति प्रक्रिया पर ना आपत्ति जताई, ना बदलाव सुझाया। फिर जैसे ही जनता ने अपना स्पष्ट जनादेश तीसरी बार नरेंद्र मोदी को दिया, कांग्रेस को आयोग पक्षपाती दिखने लगा। शाह ने बताया कि जिसे आयोग को “पक्षपाती” बताकर राहुल जनता को गुमराह करते हैं, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पर कांग्रेस खुद सहमत थी।