परमाणु हथियारों का फैलाव न हो, इसके लिए ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अमेरिका ने भी कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। मध्यपूर्व में परमाणु होड़ को रोकने से लेकर आतंकी संगठनों हूती, हिजबुल्ला और हमास तक पर लगाम कसने के लिए ईरान पर ‘रोक’ जरूरी है। इजरायल के अस्तित्व को नकारने वाले ईरान के हाथ परमाणु बम लगने का वैश्विक असर पड़ सकता है। इसलिए परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण विराम अमेरिका की अहम शर्त है।
परमाणु करार पर बढ़ी ‘रार’
ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध को स्थाई तौर पर रोकने के लिए इस्लामाबाद में 21 घंटे की वार्ता विफल रही। मध्यपूर्व में स्थाई शांति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकना और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए चल रही वार्ता पर दुनियाभर की नजर थी। इसके विफल रहने के पीछे अहम वजह होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण और उसका परमाणु कार्यक्रम ही है।
अमेरिका नहीं चाहता है कि किसी भी हालत में ईरान के पास परमाणु बम हो। वह हर हाल में ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म या सीमित करना चाहता है, लेकिन ईरान इसे एक देश का अधिकार मानता है।
ईरान-अमेरिका वार्ता भी इसकी वजह से सफल नहीं हो सकी। दरअसल परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी दबाव ईरान को अस्वीकार है। उसका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन वह पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, लेकिन परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।
ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से ही अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे में कमी आनी शुरू हो गई थी। अमेरिका को ईरान पर जरा भी एतबार नहीं है।
2015 में अमेरिका डील से बाहर निकल गया
2003 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ईरान चोरी छिपे परमाणु हथियार बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए। 2006 में ईरानी कंपनियों की संपत्ति, जो विदेशों में थी, उसे फ्रीज कर दिया गया और ईरान में यूरेनियम संवर्धन पर प्रतिबंध लगाया गया।
इसके अगले साल यानी 2007 में ईरान के हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगाया गया। ईरान की अर्थव्यवस्था पर सबसे गहरी चोट तब पहुँची, जब ईरानी सेंट्रल बैंक और तेल निर्यात पर रोक लगा दी गई।
2015 में ईरान के परमाणु बम नहीं बनाने को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की अगुवाई में ईरान और दुनिया के बड़े देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन के बीच JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौता हुआ था।
उस वक्त ईरान ने माना था कि वो यूरेनियम संवर्धन का स्तर निम्न रखेगा, स्टॉकपाइल सीमित करेगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने प्लांट के निरीक्षण की इजाजत देगा। समझौते के बाद उस पर लगी आर्थिक पाबंदियाँ हटा दी गईं।
अमेरिका और इजराइल का मानना था कि इससे ईरान परमाणु बम नहीं बना पाएगा और अगर चोरी-छिपे बनाता भी है, तो इसमें काफी समय लगेगा। लेकिन, 2018 में अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया। राष्ट्पति ट्रंप का मानना था कि डील एक तरफा और कमजोर है। इसमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर रोक नहीं लगी है। प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती हमास) पर कोई रोक नहीं है और 10-15 साल बाद ईरान फिर से खुलकर परमाणु कार्यक्रम चला सकता है। इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे डील तोड़ी। उसने यूरेनियम 60% तक संवर्धित करना शुरू कर दिया। हालाँकि परमाणु बम के लिए ये संवर्धन 90% जरूरी होता है। स्टॉकपाइल बढ़ा दिया और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से सहयोग करना कम कर दिया।
10 साल बाद यानी 2025-26 में जब ईरान पर संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध हटने वाला था, लेकिन JCPOA का उल्लंघन करने, 60 फीसदी से ज्यादा यूरेनियम संवर्धन करने और परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के जुर्म में उस पर ज्यादा कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। हालाँकि ईरान कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा और चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका नहीं माना।
ईरान के साथ बातचीत के बीच अमेरिका ने चेतावनी दी और अंत में इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को हमला कर दिया।
क्या सुरक्षा की गारंटी है परमाणु हथियार
अमेरिका के धूर विरोधी उत्तर कोरिया और ईरान दोनों ही देश हैं। दोनों देशों के संबंध रूस और चीन के साथ अच्छे हैं। लेकिन, अमेरिका उत्तर कोरिया पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन ईरान पर हमला करता है। इसकी एक अहम वजह ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न नहीं होना भी है।
अगर उत्तर कोरिया की तरह ईरान के पास परमाणु बम होता, तो इजरायल और अमेरिका दोनों ही देश उस पर हमला करने से पहले सौ बार सोचते। दरअसल अमेरिका को डर रहता है कि अगर उसने उत्तर कोरिया को छेड़ा, तो उस तक युद्ध की आँच पहुँच जाएगी। उत्तर कोरिया के पास ऐसे मिसाइल मौजूद हैं, जिससे अमेरिका को टारगेट किया जा सकता है।
अगर ईरान को ‘परमाणु बम’ मिल जाए तो क्या होगा?
अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है, तो मध्यपूर्व में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होने का तर्क अमेरिका देता रहा है। ईरान के पड़ोसी देशों सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन, तुर्की, इजरायल समेत सभी देश परमाणु हथियार बनाने की होड़ में शामिल हो सकते हैं। इससे पूरे मध्यपूर्व और पूरी दुनिया को खतरा पैदा होगा। फिलहाल इस्लामिक देशों में सिर्फ पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, इसकी धौंस वह भारत पर भी जमाता रहता है।
अमेरिका का करीबी देश इजरायल परमाणु संपन्न है, इसके बावजूद ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक है। 1979 में इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान के इजरायल से काफी अच्छे संबंध थे। 1950 में ईरान ने इजरायल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी। ऐसा करने वाली ईरान उन शुरुआती देशों में शामिल था, जिन्होंने इजरायल को राष्ट्र के रूप में स्वीकारा, लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने उसे ‘दुश्मन देश’ करार दिया और विश्व मानचित्र से हटाने की बात कही। जाहिर तौर पर इजरायल के लिए ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना खतरे की घंटी होगी। इसके अलावा हमास से तो इजरायल का युद्ध लंबे वक्त तक चला। हमास को कमजोर करने में वह सफल रहा है, लेकिन ईरान के परमाणु संपन्न होने से हमास एक बार फिर सामरिक और राजनीतिक रूप से ‘जीवित’ हो सकता है।
हिज्बुल्लाह, हूती, हमास जैसे आतंकियों तक परमाणु बम पहुँच सकते हैं
ईरान के परमाणु बम बना लेने से लेबनान का हिज्बुल्लाह, यमन के हूती, फिलिस्तीन के हमास जैसे संगठन काफी ताकतवर हो सकते हैं। इन संगठनों को ईरान मदद करता है और ये संगठन लगातार इजरायल और मध्यपूर्व के देशों के खिलाफ आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। ऐसे में इन आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को ईरान परमाणु बम का धौंस दिखा कर रोकने की कोशिश कर सकता है। इसके बाद ये आतंकी संगठन बेखौफ होकर आक्रामक गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। ईरान को इनकी मदद करने में कोई दिक्कत भी नहीं होगी, क्योंकि उसे किसी का डर नहीं होगा।
जो ईरान अभी होर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल कर अमेरिका को वार्ता की मेज तक आने के लिए मजबूर कर दिया। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डालने में कामयाब रहा, वह हूतियों के माध्यम से लाल सागर पर भी नियंत्रण कर लेगा। होर्मुज की तरह लाल सागर भी दुनिया के व्यस्ततम मार्गों में एक है। ऐसे में ईरान का प्रभुत्व काफी बढ़ जाएगा। इससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा।
ईरान के परमाणु संपन्न होने से न सिर्फ मध्यपूर्व के देश परमाणु बनाने की होड़ में शामिल हो जाएँगे, बल्कि दुनियाभर में परमाणु बम बनाने की एक सनक सवार हो सकती है। परमाणु अप्रसार को रोकने के लिए वैश्विक परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी कमजोर पड़ सकता है। परमाणु संपन्न देश अपने एटमी बमों और हथियारों को दुनिया में न फैलाएँ और धीरे-धीरे दुनिया परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर बढ़े, ये इसका उद्देश्य है, लेकिन ईरान जैसे ‘गैर जिम्मेदार’ देशों के पास परमाणु हथियारों का पहुँचना, पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है।

