जम्मू-कश्मीर : आतंकवादी बनाने वाली फैक्ट्री(मदरसा) पर लग गया ताला : इस मदरसे से तालीम लेकर निकल रहे थे बड़े-बड़े आतंकी

  शोपियां में जिस सिराज-उल-उलूम से निकले कई आतंकी, उस मदरसे को किया गया सील (साभार: DainikJagran)

जम्मू-कश्मीर के इमाम साहिब शोपियां स्थित राज्य के सबसे बड़ा मदरसा ‘दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम’ पर आतंकी गतिविधियों के चलते ताला लग गया है। मदरसे को प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी ने खड़ा किया था, जिससे कई आतंकी निकले थे। पुलवामा हमले का आतंकी सज्जाद अहमद भट ने भी इसी मदरसे से तालीम ली थी।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गहन छानबीन करने पर आतंकवादियों को पनाह देने वाले बहुत ठिकाने सामने आएंगे। यह तो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर भी नहीं। बस इतना कह सकते हैं शुरुआत है। इस पहल को जारी रख देश को आतंकवाद मुक्त करना होगा। इतना ही नहीं आतंकवादियों को संरक्षण और समर्थन देने वालों पर कार्रवाई करनी होगी। 

मदरसे पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गैर कानूनी गतिविधियों के चलते UAPA एक्ट, 1967 के तहत कारवाई की है। प्रशासन का कहना है कि मदरसे से आतंकी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए फंडिंग की जा रही थी। प्रशासन को मदरसे की फंडिंग और खर्च में बड़ा अंतर मिला, जिसके कारण मदरसे को सील कर दिया गया।

वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की चीफ महबूबा मुफ्ती ने मदरसे पर सील लगाने को लेकर विरोध किया है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर महबूबा मुफ्ती ने लिखा, “दारुल उलूम जामिया सिराज उल उलूम को UAPA के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित करना बेहद अन्यायपूर्ण फैसला है। इस संस्थान ने ऐसे कई डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर तैयार किए हैं, जिन्होंने देश की ईमानदारी और समर्पण के साथ सेवा की है।”

15 एकड़ की जमीन पर फैला मदरसा 25 साल पुराना

 मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम नाम से यह मदरसा लगभग 25 साल पुराना है, जिसे जमात-ए-इस्लामी ने विदेशी फंडिंग जुटाकर खड़ा किया था। यह मदरसा 15 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है और इसके साथ 5 एकड़ का एक बाग भी है। मदरसे को सील करने से पहले इसमें लगभग 500 छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे।

मदरसे पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप लगे। विभिन्न राष्ट्रीय जाँच एजेंसियों ने इन आरोपों की जाँच की तो सही पाया। मदरसे के कई मौलवियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब मदरसे में ताला लगा हुआ है। मदरसे के दरवाजे पर सील के पोस्टर लगे हैं और बाहर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है।

मदरसे से तालीम लेकर निकला पुलवामा का आतंकी सज्जाद भट्ट

मदरसे को सील करने की वजह इसके आतंकी गतिविधियों से जुड़ा होना है। ये वही मदरसा है जहाँ से 2019 के पुलवामा आतंकी हमले का आरोपित सज्जाद भट ने भी तालीम ली थी, इस हमले में CRPF के 40 जवानों ने बलिदान दिया था।

फिर जब इस हमले की जाँच हुई, तो मदरसे ने खुद कबूला कि इस मदरसे से 11 छात्र आतंकी बने हैं। इनमें PhD आतंकी के नाम से कुख्यात मोहम्मद शफी बट और कुख्यात आदिल अहमद भी शामिल थे। हालाँकि, ये सभी एनकाउंटर में मारे गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस मदरसे के अधिकतर छात्र पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े थे।

मदरसे के मौलवी भी निकले आतंकी और OGW

इतना ही नहीं इस मदरसे से आतंकी की मदद करने वाले ओवर ग्राउंड वर्कर यानी OGW भी निकले हैं। साल 2020 में ही जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शोपियां से 3 ओवर ग्राउंड वर्कर गिरफ्तार किए थे। तब पूछताछ में सामने आया था कि ये तीनों जमात-ए-इस्लामी के लिए काम करते थे और शोपियां के इसी मदरसे से पढ़कर निकले थे।

इस मदरसे के न सिर्फ छात्र बल्कि पढ़ाने वाले मौलवी भी आतंकी गतिविधियों में शामिल रह चुके हैं। इसी मदरसे में पढ़ाने वाला शौकत अहमद शेख LeT से जुड़ा था और लश्कर के लिए आतंकियों की भर्ती करता था। शौकत को NIA ने गिरफ्तार किया था। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, शौकत ने 20 छात्रों का ब्रेनवॉश कर उन्हें आतंकी बनाया था।

मदरसे पर कार्रवाई

आतंकी गतिविधियों में लिप्त मदरसे पर कश्मीर के मंडलायुक्त अंशुल गर्ग ने UAPA अधिनियम की धारा 8(1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसे प्रतिबंधित संस्थान घोषित किया है। उन्होंने यह कार्रवाई शोपियां के SSP द्वारा जारी किए गए डोजियर और मदरसे पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साक्ष्यों के आधार पर की है।

SSP के डोजियर में साफ कहा गया कि मदरसा बाहर से मजहबी तालीम की जगह लगता है। लेकिन इसके कामकाज और पैसों के हिसाब में बड़ी गड़बड़ियाँ हैं। यह कई गैरकानूनी कामों में भी शामिल है। इसका रजिस्ट्रेशन नहीं है। इसने सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया है। और कानून से बचने के लिए यह तरह-तरह के तरीके अपनाता है।

बंगाल : बांग्लादेश बॉर्डर पर तारबंदी के लिए BSF को चाहिए 127Km जमीन, कलकत्ता हाई कोर्ट की फटकार के बाद TMC सरकार ने केवल 8Km दी

             कलकत्ता हाई कोर्ट की ममता सरकार को फटकार (साभार : The Hindu & Indianexpress)
 70 के दशक में निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर की बहुचर्चित फिल्म आयी थी "आंखें" इस फिल्म की शुरुआत "उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की निग़ाहेंबान है आँखें" देशभक्ति संवाद से होती है। जो बांग्लादेश घुसपैठियों को संरक्षण देने में बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारत-बांग्लादेश सीमा को खुला रखकर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही हैं और ममता को समर्थन दे रहा समूचा विपक्ष। घुसपैठियों को भारत में घुसने का खुला रास्ता दिया हुआ है। आखिर इतने सालों बाद 127 किलोमीटर में से सिर्फ 8 किलोमीटर ही जगह देना ममता के डोलते राज की ओर इशारा भी करता है। यही वह खुला इलाका है जहाँ से बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में घुस शेष भारत में फ़ैल रहे हैं। ममता जैसी नेताओं और इन जैसे देश विरोधी नेताओं ने देश की सुरक्षा को खतरे में डाला हुआ है।        

भारत-बांग्लादेश सीमा पर कटीले तार(फेंसिंग) लगाने के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट इस बात से बेहद नाराज है कि उसके आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने 127 किलोमीटर जमीन में से अब तक सिर्फ 8 किलोमीटर हिस्सा ही सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपा है।

कलकत्ता HC ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए राज्य सरकार के एक अधिकारी पर 25,000 रुपए का जुर्माना भी ठोक दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि केंद्र से मुआवजा मिलने के बावजूद जमीन न सौंपना चौंकाने वाला है।

कलकत्ता HC की नाराजगी की वजह

कलकत्ता HC ने पाया कि 27 जनवरी को दिए गए आदेश के बाद से अब तक राज्य सरकार ने जमीन सौंपने की प्रक्रिया में कोई खास प्रगति नहीं की है। कोर्ट के मुताबिक, 127.327 किलोमीटर की जमीन ऐसी थी जिसके लिए अधिग्रहण पूरा हो चुका था और केंद्र सरकार ने राज्य को मुआवजा भी दे दिया था।

इसके बावजूद, बंगाल सरकार ने केवल 8 किलोमीटर जमीन ही BSF को दी। कोर्ट ने सरकार की रिपोर्ट को ‘अधूरी और गोलमोल‘ बताते हुए खारिज कर दिया क्योंकि वह शपथ पत्र (Affidavit) पर नहीं दी गई थी।

राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा

पूर्व डिप्टी आर्मी चीफ सुब्रत साहा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए HC ने कहा कि सीमा पर कटीले तार लगाना देश की रक्षा, घुसपैठ रोकने और सीमा पार आतंकवाद को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने भी अदालत से गुहार लगाई थी कि जमीन जल्द दिलाई जाए ताकि फेंसिंग का काम पूरा हो सके।

राज्य सरकार ने भी माना था कि यह राष्ट्रीय हित का काम है, लेकिन इसके बावजूद 9 जिलों (उत्तर व दक्षिण 24 परगना, नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार) में जमीन सौंपने का काम लटका हुआ है।

सरकार के बहाने और HC का जुर्माना

राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण में देरी के लिए राजस्व अधिकारियों के चुनावी रोल के काम में व्यस्त होने का बहाना बनाया था, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह नकार दिया। HC ने कहा कि जब मामला राष्ट्रीय महत्व का हो, तो ऐसे बहाने नहीं चलेंगे। स्पेशल सेक्रेटरी के निर्देश के बावजूद जॉइंट डायरेक्टर ने शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जिसकी वजह से कोर्ट ने उन पर 25 हजार का जुर्माना लगाया है।

अगली सुनवाई और सख्त निर्देश

कलकत्ता HC ने अब बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह 13 मई तक एक विस्तृत शपथ पत्र जमा करे। इसमें जिलेवार जानकारी देनी होगी कि 27 जनवरी के आदेश के बाद से हर दिन जमीन सौंपने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि समय सीमा बीतने के बाद अब और ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

ईरान के सपोर्ट में शिया आबादी पाकिस्तान में कल्तेआम न मचा दे, इसलिए डरे असीम मुनीर ने NYT की रिपोर्ट ही उड़ा दी


पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।

रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।

NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।

पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।

NYT की रिपोर्ट में क्या लिखा था?

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।

दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।

रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।

पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।

जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया

जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।

उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।

इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।

पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल

अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?

इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।

पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।

इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।

पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!

यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।      (साभार) 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और बार कौंसिल स्वतः संज्ञान लें; केजरीवाल के पत्र के बाद कपिल सिब्बल का बयान न्यायपालिका पर सीधा हमला है; सिब्बल ने राकेश किशोर से भी बड़ा जूता मारा है अदालतों को

सुभाष चन्द्र

आज कपिल सिब्बल जैसे वकील अदालतों को उनकी औकात दिखा रहे हैं यह तो होना ही था। ये वही अदालतें जिन्होंने इन वकीलों को अपना सिरमौर बना रखा था। अभी भी समय है अदालतें, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, इन वकीलों द्वारा फाइल होने वाले मुकदमों को तर्जी देना बंद कर दें जिस अदालतों ने ऐसे किया ये जो अपने आपको को नामी वकील कहते फिरते हैं सब जमीन पर आ जाएंगे। जहाँ तक अरविन्द केजरीवाल की बात है उसने तो सियासत के मैदान में आने पर ही साफ शब्दों में कहा था "हाँ मैं anarchy हूँ", तो anarchi से किसी ढंग की बात सुनने को नहीं मिलेगी, और जो उम्मीद करते हैं उनसे बड़ा महा-महामूर्ख दुनियां में कहीं नहीं मिल सकता।     

कल केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को 24 पॉइंट का पत्र लिख कर उन पर पक्षपाती होने का फिर से आरोप लगाते हुए CBI की ट्रायल कोर्ट के खिलाफ अपील में खुद पेश होने से मना कर दिया और अपना कोई वकील भी अपनी तरफ से पेश करने से मना कर दिया। आज जस्टिस शर्मा की अदालत का बहिष्कार करने का ऐलान मनीष सिसोदिया ने भी कर दिया। क्या यह contempt of court नहीं? 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
केजरीवाल ने जो बातें पत्र में कही वो कोई नई बातें नहीं है सब पहले जैसे ही घिसे पिटे आरोप लगाए है और न केवल जस्टिस शर्मा के Legal Professional होने का चरित्र हनन किया बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था पर कलंक लगा दिया कहता है कि वो गांधी जी के बताए हुए “सत्याग्रह” के मार्ग पर चलेगा क्योंकि उसे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है वो “सत्याग्रह” करना चाहता, इसे “सत्ताग्रह” कहते हैं। 

पत्र की भाषा देख कर साफ़ लग रहा था कि केजरीवाल जैसा मूढ़मति ऐसा नहीं लिख सकता क्योंकि उसमे ऐसा लिखने की क्षमता ही नहीं है वह पत्र किसी वरिष्ठ वकील ने लिखा है, ऐसा प्रतीत हो रहा था

उसके पत्र भेजने के अगले दिन आज कपिल सिब्बल का बयान आया कि “अब भारत में सभी अदालतें सरकार जो कहती हैं, उसे ही सच मान लेती हैं मैं रोजाना अदालतों में देख रहा हूं”

सिब्बल के बयान से साफ़ झलकता है कि केजरीवाल का पत्र उसी ने लिखा है और अब वही उसका मार्गदर्शक है सिब्बल ने ही उसे जस्टिस शर्मा पर आरोप लगा कर अपमानित करने के लिए कहा होगा? सिब्बल के बयान जस्टिस शर्मा की तरफ भी इशारा है

 

सिब्बल का बयान और केजरीवाल का आचरण Judicial Institution का घोर अपमान है सिब्बल ने कभी कहा था कि “अब सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची जो अब देखना पड़ रहा वह अपने 50 साल के करियर में नहीं सोचा था कि ऐसा भी होगा”

सिब्बल ने आज पूरी न्यायिक व्यवस्था पर हमला करते हुए साफ़ कहा है कि “सभी अदालतें” सरकार के पक्ष में रहती हैं ऐसा है तो फिर शराब घोटाले में ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल & कंपनी को Discharge कैसे कर दिया?

सिब्बल का बयान एडवोकेट राकेश किशोर द्वारा फेंके गए जूते से भी न्यायपालिका के मुंह पर मारा हुआ बड़ा जूता है राकेश किशोर को बार कौंसिल ने तुरंत निलंबित कर दिया था और फिर उसकी प्रैक्टिस पर बैन लगा दिया था

सिब्बल और केजरीवाल के आचरण पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत और बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया को तुरंत स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और इन पर अदालतों की अवमानना का केस दर्ज करना चाहिए बार कौंसिल और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को सिब्बल की सदस्यता निलंबित करनी चाहिए उसे कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछना चाहिए कि तुम्हारे बयान को सत्य साबित करने के लिए तुम्हारे पास क्या सबूत हैं

सिब्बल या किसी भी वकील ने केजरीवाल को पढ़ा तो दिया लेकिन उन्हें पता नहीं जस्टिस शर्मा उसके खिलाफ पहले जमानती और फिर गैर जमानती वारंट भी जारी कर सकती हैं वे चाहें तो किसी को उसके लिए न्यायमित्र भी नियुक्त कर सकती हैं लेकिन जब केजरीवाल को जस्टिस शर्मा पर ही भरोसा नहीं है तो न्यायमित्र पर भी कैसे होगा? 

न्यायपालिका पर सिब्बल और केजरीवाल ने सीधा हमला बोला है इसे नहीं रोका गया तो निकट भविष्य में और भयानक मंजर दिखाई देगा न्यायपालिका की सकारात्मक आलोचना की जा सकती है लेकिन सिब्बल और केजरीवाल ने तो मर्यादा की सभी सीमाएं पार कर दी 

BBC ने कहा- ‘मेट्रो खाली’, हकीकत में रिकॉर्ड सवारी और बढ़ता नेटवर्क: अधूरे डेटा से गढ़े गए प्रोपेगेंडा का असली विश्लेषण

                                                                                                                   साभार : Aajtak & BBC
बीबीसी (BBC) ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था, “भारत ने मेट्रो पर अरबों खर्च कर दिए, लेकिन यात्री कहाँ हैं?” इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे भारत की मेट्रो परियोजनाएँ सही तरीके से काम नहीं कर रहीं और लोग उनका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग है। हकीकत यह है कि BBC ने दिल्ली मेट्रो जैसे बड़े और सफल मॉडल को ‘अपवाद’ कहकर किनारे कर दिया और नई मेट्रो लाइनों के शुरुआती कम उपयोग वाले डेटा को ही पूरी कहानी मान लिया। यह तरीका पूरा सच नहीं दिखाता।

सच्चाई यह है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट- जैसे मेट्रो, हाईवे या एयरपोर्ट को पूरी तरह चलने और लोगों की आदत में आने में समय लगता है। शुरुआत में लोग धीरे-धीरे जुड़ते हैं, नेटवर्क बढ़ता है और फिर उपयोग तेजी से बढ़ जाता है। 2025–26 के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मेट्रो का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली मेट्रो करोड़ों यात्रियों को रोज सफर करा रही है और मुंबई मेट्रो की नई लाइनों पर भी यात्रियों की संख्या हर महीने बढ़ रही है।

दिल्ली मेट्रो से सीख: सिस्टम धीरे-धीरे मजबूत होता है

BBC का मुख्य तर्क है कि कई शहरों में मेट्रो में उम्मीद से कम यात्री सफर कर रहे हैं। लेकिन इस विश्लेषण में वह दिल्ली मेट्रो के पूरे सफर को नजरअंदाज कर देता है। जब दिल्ली मेट्रो शुरू हुई थी, तब भी इसे लेकर सवाल उठे थे। कई लोगों ने कहा था कि यह महँगा है और ज्यादा काम नहीं आएगा। शुरुआती समय में लोगों को मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने में दिक्कत होती थी, क्योंकि फीडर बसें और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ पूरी तरह विकसित नहीं थीं।

धीरे-धीरे हालात बदले। जैसे-जैसे नेटवर्क बढ़ा, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी मजबूत हुई और लोगों की निर्भरता बढ़ती गई। आज दिल्ली मेट्रो देश ही नहीं, दुनिया के सबसे सफल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स में गिनी जाती है। साल 2025 में इसमें औसतन 64.6 लाख लोग रोज यात्रा कर रहे हैं और साल भर में यह 235 करोड़ से ज्यादा यात्राएँ पूरी करती है। यह आँकड़ा एक बड़े देश जैसे न्यूजीलैंड की पूरी आबादी से भी ज्यादा है।

अब दिल्ली मेट्रो कमाई के मामले में भी मजबूत स्थिति में है। 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, यह ₹412 करोड़ से ज्यादा का ऑपरेटिंग सरप्लस कमा रही है। इसका मतलब है कि मेट्रो सिर्फ चल ही नहीं रही, बल्कि अपने खर्च निकालकर मुनाफा भी दे रही है। यह साफ दिखाता है कि कोई भी मेट्रो सिस्टम शुरुआत में धीमा हो सकता है, लेकिन समय के साथ वह मजबूत, उपयोगी और आत्मनिर्भर बन जाता है।

मुंबई एक्वा लाइन की सच्चाई: ‘सुनसान’ नहीं, तेजी से बढ़ता इस्तेमाल

BBC ने मुंबई की नई एक्वा लाइन (मेट्रो-3) को ‘सुनसान’ बताने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। यह लाइन पूरी तरह अक्टूबर 2025 में शुरू हुई और अप्रैल 2026 तक इस पर 4 करोड़ से ज्यादा यात्री सफर कर चुके हैं। किसी भी नई मेट्रो लाइन के लिए इतने कम समय में यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

मुंबई की सभी मेट्रो लाइनों को मिलाकर अब रोज करीब 7.5 लाख लोग सफर कर रहे हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे लोग नई लाइन के बारे में जान रहे हैं और कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है, यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

जहाँ तक किराए की बात है, 10 से 70 रुपए का खर्च मुंबई जैसे शहर में ज्यादा नहीं माना जाता। यहाँ लोग रोज ट्रैफिक में घंटों फँसते हैं। ऐसे में मेट्रो समय बचाती है और सफर आसान बनाती है। सरकार का काम सिर्फ आज की भीड़ संभालना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत ट्रांसपोर्ट तैयार करना भी है, ताकि सड़कों पर दबाव कम हो सके।

मेट्रो का बड़ा फायदा: सफर ही नहीं, जेब भी बचा रही है

मेट्रो का असर सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं है, यह लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधार रही है। जनवरी 2026 की ‘EAC-PM’ रिपोर्ट बताती है कि मेट्रो आने से लोगों का रोज का ट्रांसपोर्ट खर्च कम हुआ है। पेट्रोल, डीजल और टैक्सी पर होने वाला खर्च बच रहा है, जिससे लोगों के पास हर महीने कुछ अतिरिक्त पैसे बच रहे हैं।

इस बचत का सीधा फायदा घर के लोन (होम लोन) चुकाने में दिख रहा है। दिल्ली में मेट्रो वाले इलाकों में लोन न चुका पाने वाले लोगों की संख्या 4.42% कम हुई है। बेंगलुरु में EMI लेट करने वालों की संख्या 2.4% घटी है, जबकि हैदराबाद में समय से पहले लोन चुकाने वालों की संख्या 1.8% बढ़ी है।

सीधी भाषा में समझें तो मेट्रो लोगों की जेब में बचत डाल रही है। इससे उनका आर्थिक बोझ कम हो रहा है और जीवन आसान बन रहा है। लेकिन ऐसे बड़े फायदे अक्सर BBC जैसी कुछ रिपोर्ट्स में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

क्या मेट्रो घाटे में है?

अक्सर कहा जाता है कि मेट्रो प्रोजेक्ट घाटे का सौदा हैं। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। शुरुआत में हर मेट्रो सिस्टम ‘नेट लॉस’ दिखाता है, क्योंकि उस पर बड़े लोन और निर्माण का खर्च होता है। इसे ही डेप्रिसिएशन कहा जाता है। इसलिए सिर्फ कुल घाटा देखकर फैसला करना सही नहीं होता।

असल पैमाना होता है ‘ऑपरेटिंग सरप्लस’। यानी रोजमर्रा का खर्च निकालने के बाद क्या मेट्रो के पास पैसा बच रहा है या नहीं। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो ने 2024-25 में 1,191 करोड़ रुपए कमाए और 229 करोड़ रुपए का ऑपरेटिंग सरप्लस हासिल किया। इसका मतलब है कि मेट्रो अपना खर्च निकालकर बचत भी कर रही है।

अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में भी यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साफ है कि यह पैसा बर्बाद नहीं हुआ, बल्कि शहरों के लिए लंबी अवधि का मजबूत ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार हुआ है। इससे प्रदूषण कम हो रहा है और पर्यावरण को भी फायदा मिल रहा है।

BBC की रिपोर्ट पर सवाल: क्या पूरी तस्वीर दिखाई गई?

बीबीसी की रिपोर्ट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें पूरी तस्वीर नहीं दिखाई गई। कुछ चुनिंदा आँकड़ों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष दिया गया, जैसे मेट्रो प्रोजेक्ट सही दिशा में नहीं हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे अलग है।

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है, जो 1,000 किलोमीटर से ज्यादा फैल चुका है। यह अपने आप में दिखाता है कि यह सिस्टम लगातार बढ़ रहा है और शहरों की जरूरत बनता जा रहा है। मेट्रो ने लोगों को लंबे ट्रैफिक जाम से राहत दी है और सफर को ज्यादा आसान और आरामदायक बनाया है।

लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और फीडर बसों की दिक्कतें अभी भी कई शहरों में हैं, लेकिन इन पर तेजी से काम हो रहा है। दिल्ली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहाँ समय के साथ मेट्रो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।

साफ है कि भारत में मेट्रो सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि शहरी बदलाव का बड़ा जरिया बन रही है। यह धीरे-धीरे हर शहर की जरूरत और आदत बनती जा रही है, और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

तेलंगाना : कांग्रेस की हिटलरशाही, आलोचना करने वालों पर आतंकवाद वाला कानून क्यों? संविधान और लोकतंत्र का रोना-रोने वाले राहुल गाँधी चुप क्यों?


इमरजेंसी में जिस तरह प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने गला घोंटा था उसका तेलंगाना कांग्रेस सरकार द्वारा जीवंत उदाहरण पेश कर रही है। फिर शोर मचाते हैं मोदी सरकार में लोकतंत्र और संविधान खतरे में हैं। जनता को गुमराह करती है कांग्रेस। हकीकत में  लोकतंत्र और संविधान कांग्रेस राज में ही खतरे में रहे हैं। अपने राज में कांग्रेस ने संविधान में इतने ज्यादा संशोधन कर संविधान की मूलभावना को ही चकनाचूर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट तक चुपचाप बैठे देखती रही।  

कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी राष्ट्रीय स्तर पर खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा चैंपियन बताते हैं। वे अक्सर भाजपा सरकार पर ‘आवाज दबाने’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन तेलंगाना में उनकी अपनी सरकार का रवैया कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहा है। तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार अब सोशल मीडिया पर आलोचना करने वालों के खिलाफ देश के सबसे कड़े कानून ‘यूएपीए’ (UAPA) का इस्तेमाल कर रही है।

X हैंडल पर UAPA लगाने का क्या है पूरा मामला?

दरअसल, तेलंगाना पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग के डीआईजी (CI Cell) आर. भास्करन का एक आधिकारिक पत्र सामने आया है। 18 अप्रैल 2026 को जारी इस पत्र में एक्स कॉर्प (X Corp) को संबोधित करते हुए एक ट्विटर हैंडल @TeluguScribe के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई है। इस पत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43F का हवाला दिया गया है।

पुलिस ने अपने आधिकारिक पत्र में लिखा, “हम आपसे इस विशिष्ट एक्स (X) खाते से संबंधित निम्नलिखित विवरण प्रदान करने का अनुरोध करते हैं: खाता पंजीकरण की जानकारी, उपयोग लॉग और गतिविधि विवरण, तथा कोई भी अन्य प्रासंगिक डेटा जो हमारी जाँच में सहायता कर सके। यह जानकारी मामले की गहन जाँच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

आलोचना पर आतंकवाद वाला कानून क्यों?

हैरानी की बात यह है कि UAPA जैसा सख्त कानून, जो आमतौर पर आतंकवाद और देश विरोधी गंभीर गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया है, उसे महज कुछ ट्वीट्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। पत्र के अनुसार, उक्त हैंडल पर आपत्तिजनक भाषा और कथित तौर पर ‘पब्लिक फिगर’ की छवि खराब करने वाले ट्वीट किए गए थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी सरकार या नेता की आलोचना करना अब आतंकवाद की श्रेणी में आता है?

कांग्रेस और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर उठते सवाल

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा इस कार्रवाई से कांग्रेस के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। एक तरफ राहुल गाँधी ‘संविधान बचाने’ और ‘बोलने की आजादी’ का नारा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी सरकार असहमति की आवाज को कुचलने के लिए UAPA जैसे दमनकारी प्रावधानों का सहारा ले रही है।

इस मामले को देखें तो साफ है कि तेलंगाना में सत्ता मिलते ही कांग्रेस की ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ वाली परिभाषा बदल गई है। क्या रेवंत रेड्डी सरकार इतनी डर गई है कि उसे साधारण ट्वीट्स से राज्य की सुरक्षा को खतरा महसूस होने लगा है? यह सीधे तौर पर लोकतंत्र में विपक्ष और जनता की आवाज को खामोश करने की एक तानाशाही कोशिश नजर आती है।

आंध्र प्रदेश : अनंतपुर में 60 वर्षीय मौलाना ने की 6 साल की बच्ची से रेप की कोशिश, भीड़ ने जमकर पीटा और मुँडवा दिया सिर और दाढ़ी


आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में 60 वर्षीय मौलाना खाजा हुसैन को 6 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। आरोपित मौलाना YSRCP का नेता बताया जा रहा है। पुलिस ने आरोपित को हिरासत में लेकर मामले की जाँच शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रुद्रंपेट इलाके में आरोपित खाजा हुसैन ने बच्ची के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास कर रहा था लेकिन स्थानीय लोगों ने उसे मौके पर ही पकड़ लिया। गुस्साए लोगों ने पहले उसकी जमकर पिटाई की, फिर उसका सिर और दाढ़ी मुँडवा दी।

इतना ही नहीं उसके कपड़े उतरवाकर सड़क पर घुमाया गया और चेहरे पर कालिख भी पोती गई। घटना की सूचना मिलते ही परिवार के सदस्य और स्थानीय लोग आरोपित को लेकर चौथे टाउन पुलिस स्टेशन पहुँचे और पुलिस के हवाले कर दिया गया।

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस आरोपित को बचाने की कोशिश कर रही है, जिससे इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच में जुटी है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। 

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तारी से बच कर भागने वाले “अपराधियों” की मौज कर दी; नया कानून बना दिया

सुभाष चन्द्र

कल सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस उज्जवल भुइया की खंडपीठ ने एक नया कानून बना दिया कि अदालत के पास किसी अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने का तो अधिकार है, लेकिन वे उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि ऐसा करना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। 

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अभियुक्त की ने केवल जमानत याचिका नामंजूर की बल्कि उसे ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने और नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का आदेश दिया था हाई कोर्ट के इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने का अर्थ स्वत यह नहीं है कि अदालत अभियुक्त की “व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करते हुए” उसे सरेंडर के लिए मजबूर करे

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सरेंडर न करने के लिए कहने का प्रावधान कौन से कानून में है बल्कि सच्चाई यह है कि “अग्रिम जमानत” अदालतों द्वारा दे दी जाती है लेकिन अग्रिम जमानत” नाम से उसका भी कोई प्रावधान CRPC या BNSS में नहीं है

CRPC का सेक्शन 438 - “Anticipatory bail in India is applied for and adjudicated (accepted or rejected) under Section 438 of the CRPC, 1973. This section empowers the high court or the court of sessions to grant pre-arrest bail to any person apprehending arrest for a non-bailable offences”. 

ऐसे ही प्रावधान BNSS के section 482 में हैं लेकिन anticipatory bail शब्द उपयोग नहीं किया गया है

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने यह कानून स्वयं ही बना दिया कि कोर्ट अभियुक्त को सरेंडर करने के लिए नहीं कह सकता जबकि ऐसा प्रावधान कहीं नहीं है इसकी जगह आप यह क़ानून भी तो बना सकते थे कि जिस पर non-bailable offence के आरोप लगे हैं उसे हर हाल में ट्रायल कोर्ट में पेश होना चाहिए यानी सरेंडर करना चाहिए

आरोपी छुपा बैठा है लेकिन वकील के जरिए “अग्रिम जमानत” की अर्जी लगा रहा है और अब जब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि कोर्ट उसे सरेंडर करने के लिए नहीं कह सकता, तो आरोपी की तो मौज हो गई क्योंकि उसे पकड़ना तो बस पुलिस की जिम्मेदारी रह गई जिससे वो कहीं भी छुपता फिरेगा इसलिए ही पवन खेड़ा पकड़ में नहीं आ रहा

ऐसे निर्णयों से कानून से भागने वालों की मदद ही होगी कानून की नई परिभाषा ही बनानी थी तो वह अभियुक्त की पेशी के लिए बनानी थी न कि उसे छुट्टा घूमने की आज़ादी देने के लिए फिर जिस व्यक्ति पर non-bailable offence के आरोप हैं, उसकी “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का क्या मतलब है वह कोई भी हो सकता है और उसने कोई भी संगीन अपराध किया हुआ हो सकता है 

आप कानून बनाते हुए अभियुक्त को छूट तो दे सकते हैं लेकिन उसे कानून के सामने पेश होने के लिए कहने का कानून नहीं बना सकते पेश होने के लिए कहना या न कहना, दोनों ही प्रावधान CRPC और BNSS में नहीं है 

राष्ट्रपति को जस्टिस परदीवाला आदेश तो दे सकते हैं जबकि वह गैर कानूनी था, जो सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के reference में माना था, लेकिन एक अभियुक्त को कोर्ट में पेश होने के लिए नहीं कह सकते इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार के एक निर्णय के खिलाफ जस्टिस परदीवाला और जस्टिस महादेवन की पीठ ने कभी कोई Criminal case उनके पास भेजने की रोक लगा दी थी और वह भी कानूनी रूप से उचित नहीं थी जिसे फिर चीफ जस्टिस ने हाई कोर्ट के 13 जजों के protest letter के बाद पीठ द्वारा वापस लिया गया

कानून बनाएं लोकहित में और वैसे भी कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है। आप संसद को कानून में बदलाव के लिए सिफारिश कर सकते हैं

मैंने खुद नहीं देखी किताब, राहुल गाँधी के पास कहां से आयी? : जनरल नरवणे ने राहुल गाँधी के ‘झूठ’ की खोली पोल

                                                                                                                              साभार - न्यूज 18
पूर्व थल सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी अप्रकाशित आत्मकथा को लेकर अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने कहा कि उन्हें हैरानी हुई कि जिस किताब को उन्होंने खुद नहीं देखा, उस पर इतना बड़ा विवाद खड़ा हो गया। उन्होंने साफ किया कि रक्षा मंत्रालय (MoD) की मंजूरी के बिना किताब प्रकाशित नहीं हो सकती थी और प्रकाशक ने नियमों का पालन किया है।

जनरल नरवणे ने यह भी कहा कि अगर किसी ने गैर-कानूनी तरीके से PDF या सामग्री हासिल की है, तो उस पर वह टिप्पणी नहीं कर सकते। उन्होंने आज के दौर में साइबर क्राइम और AI के खतरे का जिक्र करते हुए कहा कि बिना पुष्टि किसी भी चीज पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने राहुल गाँधी के उन आरोपों को खारिज किया, जिसमें राहुल गाँधी ने कहा गया था कि सरकार ने सेना को अकेला छोड़ा। नरवणे के मुताबिक, उस समय सरकार ने उन्हें पूरी आजादी दी थी और यह सेना पर पूरा भरोसा था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस विवाद को राजनीतिक मुद्दा मानते हैं और सेना को राजनीति से दूर रखने के पक्षधर हैं।

क्या था मामला

पूर्व थल सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित आत्मकथा को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने संसद में इस किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि 2020 के भारत-चीन गतिरोध के दौरान सरकार ने सेना को अकेला छोड़ दिया। इस दावे के बाद संसद में हंगामा हुआ और मामला और गर्मा गया।

हालाँकि किताब के प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया  ने साफ कहा कि यह किताब न तो छपी है और न ही किसी भी रूप में प्रकाशित या वितरित की गई है। इसके बावजूद किताब की कॉपी सामने आने के दावे ने कई सवाल खड़े कर दिए, यहाँ तक कि पुलिस जाँच भी शुरू हुई।

इस बीच जनरल नरवणे ने एक नई किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज’ भी लिखी है। इसमें उन्होंने सेना से जुड़े कई दिलचस्प और कम चर्चित किस्सों को साझा किया है, जो आम लोगों के लिए नई जानकारी लेकर आते हैं। 

क्या शरिया लागू होने पर मॉडर्न फलक को इंस्टाग्राम पर आने की आज़ादी होगी? ‘योगी बंदर, चायवाला मोदी, तड़ीपार शाह’: ‘गलीचपने’ में सईदा फलक निकली ओवैसी की उस्ताद

AIMIM नेता सैयदा फलक(जो पब्लिक मीटिंग में हिजाब और इंस्टाग्राम पर मॉडर्न) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी की (Instagram: syedafalakk)
असदुद्दीन ओवैसी की मजहबी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता आए दिन विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कभी मुंब्रा की पार्षद सहर शेख खुलेमंच से पूरे इलाके को ‘हरा रंग‘ में रंगने का ख्वाब बुनती हैं, तो कभी असदु्द्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ‘15 मिनट के लिए पुलिस हटाने‘ की धमकी देती हैं। तो अब ताजा उदाहरण हैं सईदा फलक। ये देश के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के लिए ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल करती हैं।

सईदा फलक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी की है। मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए सईदा फलक अपमानजनक टिप्पणी करते यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। लोग सईदा फलक की इन अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

सईदा फलक ने पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी पर की अपमानजनक टिप्पणी

सामने आए वीडियो में AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘बंदर’ कहती है। सईदा ने कहा, “ये ‘बंदर’ योगी बंगाल में कहता है कि बंगाल को काबा नहीं बनने देंगे। ये क्या आपके बाप की जागीर है।” वे चेतावनी देते हुए कहती है, “इंशाल्लाह, कयामत तक हम दाढ़ी करेंगे, हिजाब पहनेंगे, टोपी पहनेंगे, अजान पढ़ेंगे, नमाज पढ़ेंगे, शरियत पर चलेंगे।”

असदुद्दीन ओवैसी की हिजाब पहनने वाली महिला को भारत का प्रधानमंत्री बनने वाले बयान का जिक्र करते हुए सईदा फलक ने आगे कहा, “जब ओवैसी ऐसा कहते हैं, तो सब कहते हैं कि ये गजवा-ए-हिंद की बात कर रहे हैं… क्यों नहीं बन सकते? जब कल का तड़ीपार आज होम मिनिस्टर बनकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, जो कल का चायवाला था वो प्राइम मिनिस्टर बनकर देश को बेच रहा है।” सईदा की इस अपमानजनक टिप्पणी पर मुस्लिम भीड़ जोर-जोर से हँस रही है और नारेबाजी कर रही है।

सईदा फलक के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की

AIMIM नेता सईदा फलक की पीएम मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर लोग यूपी पुलिस, गृह मंत्रालय और योगी कार्यालय को टैग करते हुए कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

अमिताभ चौधरी नाम के ‘एक्स’ यूजर लिखते हैं, “AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर रही है।
@Uppolice @myogioffice @AmitShahOffice मामले में दखल दें।”

‘फाइटर 3.0’ नाम से यूजर कहते हैं, “आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मर्यादा की सीमा लांघकर की गई टिप्पणी बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हो सकती। सईदा फलक द्वारा योगी आदित्यनाथ और अमित शाह पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियाँ सीधे-सीधे राजनीतिक शालीनता पर सवाल उठाती हैं। सीधा संदेश: असहमति हो सकती है, लेकिन अभद्रता नहीं।”

वे आगे कहते हैं, “राजनीति में स्तर गिराकर नहीं, तर्क और काम के दम पर जवाब दिया जाता है। जरूरत है कि ऐसी भाषा पर कड़ा संज्ञान लिया जाए, ताकि सार्वजनिक विमर्श की गरिमा बनी रहे और कोई भी नेता सीमाएँ पार करने की हिम्मत न करे। @Uppolice @myogioffice @AmitShahOffice“

दीपक शर्मा नाम के यूजर लिखते हैं, “हैलो @Uppolice सईदा फलक हमारे CM योगीजी के लिए बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रही है। इस खुदीली खातून के खिलाफ कार्यवाही करें।”

कौन हैं सईदा फलक?

हैदराबाद की रहने वाली 31 साल की सईदा फलक कराटे की खिलाड़ी रह चुकी हैं। सईदा ने 20 राष्ट्रीय और 22 अंतरराष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप जीते हैं। वे तेलंगाना की पहली खिलाड़ी हैं जिन्होंने वर्ल्ड कराटे चैंपियनशिप और एशियाई कराटे चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया। खिलाड़ी के तौर पर सईदा की सबसे बड़ी उपलब्धि 2016 में यूएस ओपन कराटे चैंपियनिशिप और 2022 में दुबई के शोरिन काई कराटे कप में स्वर्ण पदक जीतकर हासिल की। इसके अलावा सईदा फलक पेशेवर तौर पर एक एडवोकेट भी हैं।

खेल में करियर बनाने के बाद सईदा ने राजनीति ज्वाइन की। साल 2020 में सईदा ने ओवैसी की पार्टी AIMIM का दामन थाम लिया। तभी से वह AIMIM की विचारधारा का प्रचार करते नजर आती हैं। AIMIM ज्वाइन करने के बाद सईदा फलक की एक अलग पहचान बनी। सईदा को बुर्के में भड़काऊ भाषण देते देखा गया, जो सीधे नेताओं को टारगेट कर बोलती हैं, इसीलिए उन्हें ‘लेडी ओवैसी’ भी कहा जाने लगा।

सईदा फलक का हिजाब पर समर्थन और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान को लेकर

सईदा फलक एक तरफ हिजाब पहनने का समर्थन करती हैं और दूसरी तरफ महिलाओं की आवाज बुलंद करने के लंबे-लंबे भाषण देती हैं। यही वजह है कि सईदा को उनके ही भाषणों के लिए कई बार घेरा जा चुका है। 4 साल पहले न्यूज 18 की डिबेट में सईदा फलक ने कहा कि ‘मदरसों में लड़कियों को हिजाब की अहमियत समझाई जाएगी’, तब होस्ट अमन चोपड़ा ने उनसे सवाल किया, “आप भी हिजाब नहीं पहनती थी।” तो सईदा ने इसे विकल्प बताया, लेकिन अगली ही लाइन में इसे इस्लाम में जरूरी बताया, जिसके बाद वे टीवी डिबेट में घिरती नजर आईं।

और जब अकबरुद्दीन ओवैसी ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हुए कहा था, “कई इन लोगों के खुदा हैं। वो क्या-क्यो जो पूजा करते हैं। कितने राम-लक्ष्मण-दुर्गा क्या क्या है? हर 8 दिन में एक नया पैदा हो जाता है। अब हनुमान जयंती आ गई, लक्ष्मू मालूम थी और अब भाग्य लक्ष्मी आ गई।” तब सईदा फलक ने न्यूज 18 के साथ डिबेट में अकबरुद्दीन ओवैसी का बचाव किया था।

पहले भी सीएम योगी पर की अभद्र टिप्पणी, जानिए पुराने विवादित बयान

सईदा फलक को यूँ ही AIMIM में ‘लेडी ओवैसी’ नहीं कहा जाता है बल्कि उनके बयान भी ओवैसी से मिलते जुलते हैं। सईदा फलक कभी-भी मंच से किसी भी नेता को धमकी दे देती हैं, कभी किसी के लिए अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करती हैं।

वे पहले भी सीएम योगी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुकी हैं, “उनका (सीएम योगी) खुद का नाम पहले अजय बिष्ट था, नाम बदलकर योगी आदित्यनाथ रख लिया। तो बेहतर यह होगा कि एक बार फिर से वो अपना नाम बदलकर नाम बदलने वाला बंदर रख लें।”

हाल ही में बिहार चुनाव और मुंबई के BMC चुनावों में भी सईदा फलक के कई विवादित बयान सामने आए थे। किशनगंज में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए सईदा शेख ने पीएम मोदी और सीएम योगी को ‘छोटा शैतान‘ कहा था। वहीं BMC चुनावों में महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस को चुनौती देते हुए सईदा ने कहा था, “सुन लो फडणवीस, अगर अल्लाह ने चाहा तो एक दिन इसी नकाब और हिजाब को पहनकर एक मुस्लिम औरत हिंदुस्तान की प्राइम मिनिस्टर बनेगी।”

AIMIM नेताओं की ‘गलीचपने’ की रही पृष्ठभूमि

अब सईदा शेख की इन अपमानजनक टिप्पणियों को सुनने के बाद ज्यादा हैरानी भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये उसी पार्टी की नेता हैं, जिसमें सहर शेख और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शामिल हैं। और यही AIMIM की पहचान है, कि देश के प्रधानमंत्री और प्रशासन को सीधी ‘गाली’ या ‘धमकी’ देकर चर्चा में आओ और फिर खुद को बड़ा नेता बनाओ। इन सभी नेताओं से ऐसे बयान करने की उम्मीद भी है, क्योंकि इनके मुखिया असदु्द्दीन ओवैसी ही आए दिन हिंदू-विरोधी और कट्टर बयान देते नजर आते हैं और मंच के सामने बैठी कौम इसपर ठहाके मारकर हँसती है।

अब ईरान भी पाकिस्तान को मान रहा ‘ट्रंप का टट्टू’, अमेरिका के दलाल से ना हो पाएगी मध्यस्थता

           पाकिस्तान ट्रंप के आगे झुकता है, भरोसे लायक नहीं: ईरान ने मध्यस्थता पर उठाए सवाल (साभार: CNBC)
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव में पाकिस्तान लगातार खुद को शांतिदूत दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है। वहीं, अब तेहरान ने साफ संकेत दे दिया है कि वह पाकिस्तान को एक भरोसेमंद मध्यस्थ नहीं मानता। ईरान के सांसद और संसद की नेशनल सिक्योरिटी कमीशन के प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई ने खुलकर पाकिस्तान की भूमिका पर आपत्ति जताई है और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

हकीकत यह है कि पाकिस्तान शुरू से ही दलालियाँ कर मुल्क को चलाता रहा है। इसने कभी आत्मनिर्भर बनने की कोशिश तक नहीं की। ईरान और अमेरिका में बातचीत का ड्रामा कर अमेरिका को पागल बनाकर नोट खींच रहा है। हैरानी इस बात पर होती है कि अमेरिका जैसा देश इस दोगले पाकिस्तान के इशारे पर नाच रहा है। सोवियत यूनियन को तोड़ने में अमेरिका ने पाकिस्तान और इराक का इस्तेमाल किया और इराक की जो हालत है सबके सामने है और पाकिस्तान एक भिखारी देश। दूसरे, समझ में नहीं आता अमेरिका पाकिस्तान पर भरोसा क्यों कर रहा है? इसी पाकिस्तान ने कहा था कि ओसामा पाकिस्तान में नहीं लेकिन अमेरिका ने ओसामा को मारा पाकिस्तान में। अगर ओसामा पाकिस्तान में नहीं था फिर किस ओसामा को अमेरिका ने मारा था? 

फिर सऊदी अरब ने किस घटिया देश के साथ रक्षा समझौता किया है जिसकी सेना 1971 की लड़ाई में भारत के आगे समर्पण किया और अफगानिस्तान और बलूचिस्तान की सेनाओं से पिट रही है।   

मध्यस्थ को निष्पक्ष होना चाहिए, पाकिस्तान में भरोसे की कमी

इब्राहिम रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “पाकिस्तान के पास मध्यस्थता के लिए आवश्यक विश्वसनीयता नहीं है।” उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अच्छा मित्र और पड़ोसी जरूर है लेकिन बातचीत के लिए उपयुक्त मध्यस्थ नहीं है।

रेजाई ने कहा कि पाकिस्तान अपनी नीतियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हितों को ध्यान में रखता है और अक्सर उसी दिशा में झुकाव दिखाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस्लामाबाद कभी भी वॉशिंगटन के खिलाफ खुलकर बोलने से बचता है। रेजाई ने कहा, “एक मध्यस्थ को निष्पक्ष होना चाहिए, न कि हमेशा एक पक्ष की ओर झुकाव रखना चाहिए।”

कूटनीतिक हलचल तेज, बातचीत में अनिश्चितता कायम

इन बयानों के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची कूटनीतिक प्रयासों को तेज करने में जुटे हैं। हाल ही में उन्होंने तीन दिनों के भीतर दूसरी बार पाकिस्तान का दौरा किया और वहाँ आर्मी चीफ असीम मुनीर सहित कई शीर्ष अधिकारियों से बातचीत की। इससे पहले वे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी मुलाकात कर चुके थे।

अराघची इससे पहले ओमान भी गए थे, जहाँ सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सईद के साथ उनकी बातचीत हुई। इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा, नए कानूनी ढाँचे, मुआवजे की माँग, भविष्य में सैन्य कार्रवाई रोकने की गारंटी और अमेरिकी समुद्री प्रतिबंधों को हटाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।

वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान बातचीत चाहता है, तो वह सीधे संपर्क कर सकता है। उन्होंने कहा, “अगर वे बातचीत करना चाहते हैं, तो वे हमारे पास आ सकते हैं या हमें कॉल कर सकते हैं… आप जानते हैं, फोन मौजूद है और हमारे पास सुरक्षित लाइनें हैं।”

पौराणिक गाथा : जब जगन्नाथ जी महाराज ने एकादशी माता को बांधकर उल्टा लटकाया; एकादशी को चावल छूना भी पाप करने से कम नहीं


इस धरती पर आज भी श्रीकृष्ण, वीर हनुमान और भगवान विश्वकर्मा आदि प्रकट होते हैं। ओडिसा के पुरी में तो भगवान जगन्नाथ के रूप में श्रीकृष्ण विराजमान हैं। शनि धाम में शनि देव स्वयं। शनि धाम क्षेत्र में किसी मकान में दरवाजे बंद नहीं होते और ताला नहीं पड़ता। 
अगर त्रेता युग में पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं और धर्म दार्शनिकता से भरा है तो द्वापर युग भी श्रीकृष्ण की असंख्य लीलाओं से भरा हुआ है। परन्तु इस कलयुग में भी प्रभु की लीलाओं की कोई कमी नहीं। यह वह युग है जहां प्रभु ने अपने परमभक्त हनुमान की महिमा को प्रकाशमय कर रहे हैं। 
ओडिसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ जी(जगत पालनकर्ता श्रीविष्णु) महाराज की महिमा देखते ही बनती है।  
एकादशी के दिन जगन्नाथ जी के दर्शन करने का अवसर मिला। सुना था कि जगन्नाथ धाम के दर्शन करने बाद चावल खा सकते हैं। लेकिन जब भंडारे में रूपए देने उपरान्त पंडित जी ने भंडारे की रसीद लेकर परिवार के सभी सदस्यों के लिए भोजन लाए। भोजन में नाना प्रकार के चावल, दाल और सब्जी आदि होने पर पंडितजी महाराज को एकादशी व्रत होने से चावल खाने से मना करने पर बोले कि एकादशी को सिर्फ जगन्नाथ धाम के प्रांगण में खा सकते हो बाहर नहीं। खोल लो व्रत। प्रभु का प्रसाद है। जीवन का शायद का पहला और आखिरी व्रत होगा जब प्रभूधाम में व्रत चावल से खोला। व्रत खोलने के बाद फिर उन्होंने एकादशी माता के उल्टा लटके मूर्ति के भी दर्शन करवाने के बाद कथा बताई।   

आइए देखते हैं इस कथा में।

श्री जगन्नाथ मंदिर में आज एकादशी के दिन भात बन रहा है। हां, भात बन रहा है। दाल बन रही है। अनेकों प्रकार के व्यंजन और सब्जियां बन रही हैं।
अरे इस कलयुग में जहां एकादशी के दिन भात खाना तो दूर की बात उसका विचार करना भी महापाप माना जाता है, वहां श्री क्षेत्र पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आज उत्सव का माहौल है। भक्तगण आनंद बाजार में बैठकर तृप्त होकर महाप्रसाद से आनंदित हो रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों? क्यों यहां एकादशी माता का चाबुक नहीं चलता?
बात उस समय की है जब सतयुग का सवेरा था। भगवान विष्णु के श्री अंग से एक परम तेजस्वी शक्ति उत्पन्न हुई जिनका नाम था एकादशी देवी। उनका जन्म ही इसलिए हुआ था कि वे संसार से पाप का नाश कर सकें।
ठाकुर जी ने उन्हें निहारते हुए एक विशेष वरदान दिया। बोले देवी, महीने में दो दिन तुम्हारा राज चलेगा। जो भी मनुष्य उस तिथि पर अन्न, विशेषकर चावल पाएगा, उसके सारे संचित पाप उस अन्न में समा जाएंगे और जो तुम्हारी शरण में रहकर व्रत करेगा उसे साक्षात मेरा धाम प्राप्त होगा।
एकादशी माता को अपनी इस शक्ति पर बड़ा गर्व हो गया। हो भी क्यों ना, तीनों लोकों में उनका भय था। स्वर्ग हो या पाताल, उस दिन कहीं चूल्हा नहीं जलता था। पापी से पापी मनुष्य भी एकादशी के दिन चावल को छूने से कांपता था।
अपनी विजय पताका फहराती हुई अहंकार में डूबी एकादशी माता एक दिन नीलांचल धाम यानी हमारे जगन्नाथ पुरी पहुंची। जैसे ही उन्होंने मंदिर के सिंह द्वार में अपना पहला कदम रखा, उनको लगा कि शायद वे रास्ता भटक गई हैं।
आज एकादशी की पावन तिथि थी, पर यहां का नजारा तो बिल्कुल उलट था। आनंद बाजार में हजारों भक्त बैठे थे। कोई भूखा नहीं था, कोई प्यासा नहीं था। सबके सामने मिट्टी के कुल्हड़ों में गरमागरम अन्न परोसा जा रहा था। भक्त बड़े चाव से “जय जगन्नाथ” का उद्घोष करते हुए उस भात का आनंद ले रहे थे।
एकादशी माता का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे व्याकुल हो उठीं। सोचने लगीं, यह मेरा अपमान है। मेरे ही दिन यहां चावल! क्या जगन्नाथ जी मेरा नियम भूल गए?
क्रोध में जलती हुई वे सीधे मंदिर के गर्भगृह में घुस गईं। सामने रत्न सिंहासन पर ठाकुर जी अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
एकादशी माता ललकार कर बोलीं, “प्रभु, यह क्या अनर्थ हो रहा है? आपने ही तो मुझे वरदान दिया था कि एकादशी को चावल में पाप का वास होगा। तो आज आपके इस धाम में यह पाप क्यों बह रहा है? रोकिए इन भक्तों को, वरना मेरा श्राप सबको भस्म कर देगा।”
ठाकुर जी ने बड़े प्रेम से देखा और शांत स्वर में बोले, “देवी, शांत हो जाओ। तुम जो देख रही हो वह साधारण चावल नहीं है। वह कैवल्य है, वह मेरा महाप्रसाद है। यह साक्षात मेरी जूठन है और मेरी जूठन में कभी कोई पाप निवास नहीं कर सकता। इसके सामने कोई तिथि, कोई नियम बड़ा नहीं है।”
परंतु एकादशी माता का अहंकार बहुत बढ़ चुका था। वे बोलीं, “नहीं प्रभु, नियम तो नियम होता है। अगर सारी दुनिया चावल नहीं खा रही तो पुरी में भी कोई नहीं खाएगा।”
जैसे ही उन्होंने महाप्रसाद को रोकने के लिए हाथ उठाया, अचानक मंदिर का वातावरण बदल गया। ठाकुर जी की मुस्कान गायब हो गई और उनकी आंखों में प्रचंड तेज आ गया।
वे कड़क स्वर में बोले, “रुको देवी! तुमने मेरे महाप्रसाद को पाप कहने का दुस्साहस कैसे किया? यह महाप्रसाद साक्षात ब्रह्म है। इसके सामने वेद-पुराण भी छोटे पड़ जाते हैं।”
पर एकादशी माता नहीं मानीं। उन्होंने कहा, “मैं यह अन्याय नहीं होने दूंगी।”
अब ठाकुर जी का धैर्य समाप्त हो चुका था। उन्होंने अपनी योगमाया का आह्वान किया। अगले ही पल दिव्य जंजीरों ने एकादशी माता को जकड़ लिया। उन्हें मंदिर के ईशान कोण में ले जाकर उल्टा लटका दिया गया।
ठाकुर जी बोले, “अब तुम यहीं बंदी बनकर रहोगी। तुम्हारी आंखों के सामने मेरे भक्त महाप्रसाद पाएंगे, लेकिन तुम किसी को रोक नहीं पाओगी।”
एकादशी माता रोने लगीं। बोलीं, “प्रभु, यह अन्याय है। अगर मैं यहां बंदी रहूंगी तो संसार मेरा सम्मान करना छोड़ देगा।”
उनका अहंकार टूट चुका था।
ठाकुर जी का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा, “देवी, घबराओ मत। मैं तुम्हारा सम्मान बनाए रखूंगा। पुरी में एकादशी के दिन भक्त महाप्रसाद खाएंगे, पर उससे पहले उसे अपने मस्तक से लगाकर तुम्हें प्रणाम करेंगे।”
यह सुनकर एकादशी माता प्रसन्न हो गईं और बोलीं, “जो भक्त इस भाव से महाप्रसाद ग्रहण करेगा, मैं उसके पाप नहीं गिनूंगी, बल्कि उसे दुगुना पुण्य दूंगी।”
यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ पुरी में एकादशी के दिन हजारों भक्त आनंद से महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।
और मान्यता है कि यदि उस दिन महाप्रसाद को व्रत के कारण ठुकरा दिया जाए, तो वह भगवान का अपमान माना जाता है।
आज भी मंदिर के पास एकादशी माता की मूर्ति स्थापित है, जहां वे मौन रहकर सब देखती हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म में नियम बहुत हैं, पर प्रेम और भगवान का प्रसाद उन सभी नियमों से ऊपर है।
जय जगन्नाथ जी की
जय एकादशी माता

पाकिस्तान की तहरीक-ए-तालिबान की बांग्लादेश एयरफोर्स में घुसपैठ, बड़े अधिकारियों समेत 13 जवान गिरफ्तार


बांग्लादेश एयरफोर्स इन दिनों हाई अलर्ट पर है। हाल ही में कई एयरबेस पर खुफिया जानकारी के आधार पर छापेमारी की गई। इन छापों में कुछ अधिकारियों और जवानों पर प्रतिबंधित पाकिस्तानी आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े होने का आरोप है।

यह कार्रवाई 20 अप्रैल 2026 की सुबह शुरू हुई थी। अब तक कम से कम दो स्क्वाड्रन लीडर, करीब 10 जूनियर कमीशंड अधिकारी (JCO) और एयरफोर्स के जवानों को गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा लगभग एक दर्जन अन्य लोगों से पूछताछ की जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ अन्य संदिग्ध देश छोड़कर भाग गए हैं।

इस मामले का खुलासा सबसे पहले भारतीय पत्रकार चंदन नंदी ने 23 अप्रैल 2026 को नॉर्थईस्ट न्यूज की एक रिपोर्ट में किया था। इसके बाद 24 और 25 अप्रैल को आई रिपोर्ट्स में इस कथित घुसपैठ की पूरी जानकारी सामने आई। बांग्लादेश के अधिकांश मीडिया संस्थानों ने इस संवेदनशील सैन्य मामले पर सीधे रिपोर्टिंग करने से परहेज किया। हालाँकि, बाद में कुछ समाचार पोर्टलों ने नॉर्थईस्ट न्यूज की रिपोर्ट के आधार पर खबर प्रकाशित की। इसके बाद एयरबेस और आसपास के इलाकों में पुलिस की सतर्कता भी बढ़ा दी गई।

रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश एयरफोर्स की खुफिया शाखा ने लंबे समय तक निगरानी करने के बाद 20 अप्रैल की तड़के ढाका स्थित कम से कम दो एयरफोर्स ठिकानों पर छापेमारी की। इस दौरान दो अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 10 अन्य सैन्यकर्मियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया।

साथ ही उसने यह भी बताया कि पिछले कई महीनों से बांग्लादेश एयरफोर्स के भीतर TTP नए लोगों की भर्ती करने की कोशिश कर रही थी। इसके बाद पाकिस्तान ने यह पूरी जानकारी बांग्लादेशी अधिकारियों के साथ साझा की।

जानकारी मिलते ही बांग्लादेश एयरफोर्स की खुफिया शाखा तुरंत सक्रिय हो गई। अगले 8 से 9 दिनों तक देश के तीन प्रमुख एयरबेस पर लगातार छापेमारी की गई। इनमें चटगाँव का जुहरुल हक एयरबेस, ढाका के कुर्मिटोला स्थित एके खंदाकर बेस और जेसोर का मतीउर रहमान बेस शामिल थे। इन छापों के दौरान कई वायुसेना कर्मियों को हिरासत में लिया गया। गिरफ्तार किए गए लोगों में 4 से 5 एयरमैन कॉक्स बाजार यूनिट से थे। बाकी जवान चटगाँव की 25वीं स्क्वाड्रन और जेसोर की 18वीं स्क्वाड्रन से थे। जेसोर की यह स्क्वाड्रन रडार संचालन का काम संभालती है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फरार हुए दो एयरमैन ढाका एयरबेस में तैनात थे, जबकि एक अन्य जाहुरुल हक एयरबेस से जुड़े एयरमेन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में काम करता था। मामले की जाँच अभी जारी है और सुरक्षा एजेंसियाँ हर पहलू पर नजर बनाए हुए हैं।

जाँच एजेंसियों ने जाहुरुल हक एयर बेस की मुख्य मस्जिद के इमाम अब्दुस शुकुर को इस पूरे नेटवर्क का मुख्य भर्ती करने वाला व्यक्ति बताया है। माना जा रहा है कि करीब 6 महीने पहले TTP के लोगों ने उससे संपर्क किया था। छापेमारी के दौरान उसे गिरफ्तार कर लिया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, TTP से जुड़े बांग्लादेश एयरफोर्स के 10 से 12 अन्य कर्मी, जिनमें कुछ वारंट अधिकारी भी शामिल हैं, ये मामले का खुलासा होने के बाद तुर्की, पाकिस्तान, न्यूजीलैंड और पुर्तगाल भाग गए हैं।

नॉर्थईस्ट न्यूज की रिपोर्ट में बताया गया कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने इस्तियाक अहमद नाम के एक व्यक्ति की पहचान की है। वह सामी, अबू बक्कर और अबू मोहम्मद जैसे कई नामों से जाना जाता था। जाँच में सामने आया कि वह सेना से निकाले जा चुके दो पूर्व सैनिकों के लगातार संपर्क में था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर पूछताछ की, जिसमें उसने इस नेटवर्क से जुड़े कई अन्य लोगों के नाम बताए।

बांग्लादेशी मीडिया संस्थान ‘द सन 24’ के मुताबिक, यह पूरी कार्रवाई उस खुफिया जानकारी के बाद शुरू हुई, जिसमें कॉक्स बाजार जिले के उखिया इलाके में TTP का एक ट्रेनिंग सेंटर बनाने की साजिश का पता चला था। इसके बाद बांग्लादेश पुलिस ने देशभर के वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत अलर्ट जारी किया।

इसमें रेंज DIG, मेट्रोपॉलिटन पुलिस कमिश्नर और पुलिस अधीक्षकों को संवेदनशील जगहों की सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए। संसद भवन, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के दफ्तर, धार्मिक स्थल, मनोरंजन केंद्र, शाहबाग और हथियार भंडार जैसी जगहों पर विशेष निगरानी रखने को कहा गया है। यह चेतावनी तब जारी की गई, जब प्रतिबंधित संगठन और मौजूदा व हाल ही में बर्खास्त किए गए सैन्यकर्मियों के बीच संबंधों के संकेत मिले।

नॉर्थईस्ट न्यूज की आगे की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अब बांग्लादेश पुलिस TTP और सेना के कम से कम दो पूर्व जवानों के बीच संबंधों की भी जाँच कर रही है। इससे साफ है कि जाँच का दायरा अब केवल एयरफोर्स तक सीमित नहीं रहा है। हालाँकि, बांग्लादेश सरकार ने अब तक गिरफ्तारियों या इस ऑपरेशन के पूरे पैमाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। वहीं, पाकिस्तान में प्रतिबंधित और अफगान तालिबान से जुड़े TTP ने भी इन आरोपों पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

बंगाल : दूसरे चरण के मतदान से पहले तृणमूल कांग्रेस(TMC) के कार्यकर्ता रफीकुल इस्लाम के घर मिला क्रूड बमों का जगीरा

                   NIA ने शुरू की TMC कार्यकर्ता के घर मिले बम मामले की जाँच (साभार: न्यूज18/एनडीटीवी)

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से दूसरे चरण से पहले पश्चिम बंगाल में 79 क्रूड बम बरामद होने के मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने केस दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। यह कदम केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर उठाया गया है।

कोलकाता पुलिस ने दक्षिण 24 परगना जिले के भांगड़ इलाके में रफीकुल इस्लाम के घर से ये बम और दूसरी आपत्तिजनक सामग्री बरामद की थी। बीजेपी ने आरोपित को तृणमूल कांग्रेस(TMC) का कार्यकर्ता बताया है। इन विस्फोटकों को इस तरह रखा गया था जिससे आम लोगों की जान और संपत्ति को सीधा खतरा था।

इससे पहले चुनाव आयोग ने रविवार (26 अप्रैल 2026) को पश्चिम बंगाल पुलिस को निर्देश दिया कि राज्य में बम बनाने की गतिविधियों में शामिल लोगों को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार किया जाए और ऐसी सभी सामग्री जब्त की जाए।

आयोग ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर, सभी डीसीपी, एसपी और थाना स्तर तक के अधिकारियों को कड़ा संदेश दिया है कि अगर उनके क्षेत्र में विस्फोटक बरामद हुए या धमकी की कोई घटना सामने आई तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। आयोग ने साफ कहा है कि संबंधित अधिकारियों को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उन्हें ‘बख्शा नहीं जाएगा।’

सभी जिलों में विशेष अभियान पहले से शुरू हो चुका है। आयोग ने यह भी तय किया है कि बम बनाने से जुड़े सभी मामलों की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) करेगी ताकि चुनावी माहौल शांतिपूर्ण बना रहे। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के लिए चुनाव प्रचार सोमवार (27 अप्रैल 2026) को खत्म हो जाएगा। दूसरे चरण में 29 अप्रैल को 142 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होगा।