कांग्रेस द्वारा अडानी पर वार ने अपने आका चीन को पहुँचाया सीधा फायदा: भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट; केन्या सरकार ने नैरोबी एयरपोर्ट का टेंडर बदला, चीनी कंपनी को 50% महंगे दाम पर दी प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी

                                                                                   साभार : Hu Long  @HuLong240

आज कांग्रेस से लेकर INDI गठबंधन तक जितनी भी पार्टियां है सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना में इतने अंधे होकर देश की अर्थव्यवस्था तक से खिलवाड़ कर रहे हैं। जिसका जीता-जागता उदाहरण भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी को मिला टेंडर इनके आका चीन को मिल गया। जो पार्टी देश को आज़ादी दिलवाने के कसीदे पढ़ती हो वही पार्टी देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगी?    

केन्या की राजधानी नैरोबी का ‘जोमो केन्याटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ इन दिनों एक बड़े विवाद की वजह से चर्चा में है। केन्या सरकार लंबे समय से इस एयरपोर्ट का विस्तार और आधुनिकीकरण करना चाहती थी।

शुरुआत में यह प्रोजेक्ट भारत के अडानी समूह को मिलने की चर्चा थी, लेकिन बाद में सरकार ने इसे एक चीनी सरकारी कंपनी को सौंप दिया। अब इस फैसले को लेकर आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं।

अडानी समूह ने दिया था सस्ता प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी समूह इस एयरपोर्ट को विकसित करने के लिए करीब 2 अरब डॉलर (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) का निवेश करने को तैयार था। यह परियोजना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत प्रस्तावित थी।

इसका मतलब था कि परियोजना में बड़ा निवेश प्राइवेट कंपनी करती और केन्या सरकार पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ नहीं पड़ता। इस मॉडल का फायदा यह भी था कि सरकार को टैक्सपेयर्स के पैसे से परियोजना की लागत नहीं उठानी पड़ती और देश पर नया कर्ज लेने का दबाव कम रहता।

फिर चीन को कैसे मिला प्रोजेक्ट?

बाद में केन्या सरकार ने यह परियोजना चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंप दी। बताया जा रहा है कि चीनी कंपनी इस काम के लिए करीब 2.9 अरब डॉलर (करीब 24–25.5 हजार करोड़ रुपए) ले रही है। जबकि यह राशि अडानी समूह के प्रस्ताव से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है।

यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कम लागत वाला विकल्प मौजूद था तो ज्यादा महंगे प्रस्ताव को क्यों चुना गया। कहा जा रहा है कि इस फैसले के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक वजहें भी हो सकती हैं।

भारत की राजनीति और विवाद का असर?

इस मामले का संबंध भारत की राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। सितंबर 2024 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केन्या में अडानी परियोजना के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार और अडानी समूह पर सवाल उठाए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानी समूह को लेकर बने विवादों और राजनीतिक माहौल ने केन्या में इस परियोजना को संवेदनशील बना दिया। उनका कहना है कि इसी वजह से चीनी कंपनी को मौका मिला और उसने यह बड़ा ठेका हासिल कर लिया।

फर्जी प्रेस रिलीज और सूचना युद्ध की भी चर्चा

इस विवाद के दौरान सितंबर 2024 में अडानी समूह के नाम से एक कथित प्रेस रिलीज सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उसमें केन्याई अधिकारियों को धमकी देने जैसी बातें लिखी गई थीं। बाद में अडानी समूह ने इसे पूरी तरह फर्जी बताया।

इसके अलावा मई 2026 में फ्रांस की सरकारी एजेंसी विजिनम ने दावा किया कि चीन के सरकारी प्रसारक CGTN से जुड़े कुछ नेटवर्क AI की मदद से चीन सपोर्ट मटीरियल और नैरेटिव फैलाने का काम कर रहे थे। इसके बाद डिजिटल दुष्प्रचार और सूचना युद्ध को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई।

केन्या, भारत और चीन के लिए क्या मायने हैं?

माना जा रहा है कि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा जोखिम केन्या के सामने है। अगर परियोजना की लागत ज्यादा रहती है तो सरकार को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है, जिसका बोझ देश के नागरिकों और टैक्स पेयर्स पर पड़ेगा।

भारत के लिए यह झटका माना जा रहा है क्योंकि अफ्रीका में बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ रही थी। वहीं चीन के लिए यह सौदा अफ्रीका में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक और अवसर माना जा रहा है।

पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस में 4 नेताओं में मुख्यमंत्री पद के लिए बड़ी गुटबाजी: अध्यक्ष खड़के फिर राहुल कौन?

                                                                                                                       साभार: सोशल मीडिया  
पंजाब की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां दूसरे दलों से अधिक चुनौती कांग्रेस को अपने ही घर के भीतर से मिल रही है। विधानसभा चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता में अभी से घमासान छिड़ा हुआ है। हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान को भितरघात को सुलझाने के लिए कमेटी तक बनानी पड़ी है। 

दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कांग्रेस के प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा खुद को अभी से ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके चलते कांग्रेस चार धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। यही स्थिति कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी है। पार्टी हाईकमान ने गुटबाजी को नियंत्रित करने और नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल समितियां बनाकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित किया जा सकता है? पंजाब कांग्रेस का हाल देखकर यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है।

इतना ही नहीं, अब मुख्यमंत्री पद की लड़ाई में यह बात चर्चा का विषय बनी हुई है कि पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के फैसले ले राहुल गाँधी, क्यों? अगर खड़के कोई फैसला नहीं ले सकते फिर अध्यक्ष क्यों बने बैठे हैं? क्यों परिवार का मुंह ताकते हैं? ऊपर से प्रियंका को ले आए जैसे पार्टी में गाँधी परिवार के अलावा पार्टी को संभालने वाला कोई नहीं? जबकि परिवार की वजह से पार्टी गर्त में जा रही है। हर चुनाव में विधायकों की संख्या कम हो रही है। जब तक पार्टी में परिवार भक्ति रहेगी कांग्रेस बीजेपी को हरा नहीं सकती। मोदी को गालियां देने के अलावा परिवार के पास कोई मुद्दा नहीं। मोदी 'मौत का सौदागर', 'चौकीदार चोर' से लेकर 'मोदी सरेंडर' तक जितनी गालियां दी बीजेपी उतनी ही मजबूत हुई है और होती रहेगी। और कुछ नहीं मिला तो सनातन पर कीजड़ फेंकना। परिवार जनता की नब्ज पकड़ने में पूरी तरह से नाकाम है। मुस्लिम तुष्टिकरण पॉलिसी भी पूरी तरह से फेल। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का यह कहना 'congress is muslim, muslim is congress' ये तो वही बात हो गयी जिस तरह इंदिरा गाँधी की चमचागिरी करते देवकांत बरुआ ने कहा था 'India is Indira, Indira is India' क्या मिला बरुआ को?

सत्ता की लड़ाई शुरु होने से पहले ही कांग्रेसियों में परस्पर लड़ाई 
पंजाब कांग्रेस आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसे तय करना है कि वह 2022 की गलतियों से सीखना चाहती है या उन्हें दोहराना चाहती है। चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग सभी अनुभवी और प्रभावशाली नेता हैं। उनकी महत्वाकांक्षा स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी हित व्यक्तिगत दावेदारी से ऊपर होना चाहिए। तीन सदस्यीय समिति तभी सफल मानी जाएगी जब वह नेताओं को एक मंच पर लाकर सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित करे। अन्यथा 77 सीटों से 18 सीटों तक का सफर केवल अतीत की कहानी नहीं रहेगा, बल्कि कांग्रेस के भविष्य की भी चेतावनी बन सकता है। पंजाब की जनता एक मजबूत और एकजुट विपक्ष चाहती है, लेकिन यदि कांग्रेस अपने ही अंतर्विरोधों में उलझी रही तो सत्ता की लड़ाई शुरू होने से पहले ही वह राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकती है।

चन्नी खुद को मानते हैं पंजाब का सबसे बड़ा दलित चेहरा

पंजाब कांग्रेस पर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि घर बसा नहीं और मंगते पहले आ गए…यानि ना तो अभी चुनाव एकदम पास हैं, ना ही कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत मिलना तय है, लेकिन सीएम बनने के लिए कांग्रेस के नेता अभी से ताल ठोंक रहे हैं। सबसे पहले बात पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की। चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं और राज्य की लगभग एक-तिहाई दलित आबादी के बीच उनकी पहचान मानी जाती है। कांग्रेस नेतृत्व ने 2021 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया था। हालांकि इसका परिणाम कांग्रेस के खिलाफ ही आया। आज भी चन्नी अपने कथित सामाजिक आधार और जनसंपर्क शैली के कारण स्वयं को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते हैं। उनकी कोशिश है कि कांग्रेस दलित मतदाताओं को फिर से अपने साथ जोड़ सके।

रंधावा को परंपरागत सिख वोट बैंक पर पकड़ का भरोसा

दूसरी ओर सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा कांग्रेस के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे पंजाब सरकार में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं। संगठन और प्रशासन दोनों पर उनकी पकड़ मानी जाती है। वे राजस्थान के भी प्रभारी रह चुके हैं। रंधावा लंबे समय से कांग्रेस के परंपरागत सिख वोट बैंक और ग्रामीण क्षेत्रों में असर रखते हैं। यही कारण है कि वे स्वयं को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा खुद को संकटमोचक बता रहे

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा भी कम मजबूती से अपना दावा नहीं ठोंक रहे हैं। बाजवा वर्तमान में पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और लंबे समय से कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल रहे हैं। उनके पास संसदीय राजनीति और संगठनात्मक अनुभव दोनों हैं। पार्टी के भीतर उनका अपना समर्थक वर्ग है और वे स्वयं को कांग्रेस के संकटमोचक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष के नेता होने के नाते उन्हें लगातार मीडिया में स्थान भी मिलता है, जिससे उनकी दावेदारी और मजबूत दिखाई देती है।

प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर को अपनी आक्रामक शैली पर विश्वास

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग वर्तमान में पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाते की कमान संभाल रहे हैं। पार्टी संगठन की कमान उनके हाथ में है और वे लगातार पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। युवा नेतृत्व की छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और संगठन पर पकड़ उन्हें मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में बनाए हुए है। प्रदेश अध्यक्ष होने के कारण स्वाभाविक रूप से उनका राजनीतिक कद भी बढ़ा है।

 जिम्मेदारियां बड़ी, लेकिन महत्वाकांक्षाएं उससे भी बड़ी

इन चारों नेताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सभी के पास संगठनात्मक या प्रशासनिक अनुभव है। चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री हैं, रंधावा पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, बाजवा विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं और राजा वड़िंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। यानी पार्टी के लगभग सभी प्रमुख पद इन नेताओं के पास हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संगठन को मजबूत करने के बजाय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा अधिक दिखाई देने लगती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता को एकजुट विकल्प नहीं दिख रहा है। यदि हर नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताने लगे तो कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम पैदा होता है। परिणामस्वरूप संगठनात्मक ऊर्जा चुनावी तैयारी में लगने के बजाय आंतरिक खींचतान में खर्च होने लगती है।
क्या पंजाब कांग्रेस पिछले चुनाव का सबक भूल रही है?
पंजाब कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा चेतावनी संकेत 2022 का विधानसभा चुनाव है। 2017 में कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। लेकिन अगले ही चुनाव में पार्टी मात्र 18 सीटों पर सिमट गई। यह गिरावट केवल सत्ता विरोधी लहर का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कांग्रेस की भीषण गुटबाजी भी जिम्मेदार थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चला लंबा संघर्ष पूरे कार्यकाल में सुर्खियों में रहा। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच टकराव ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। नेतृत्व परिवर्तन, सार्वजनिक बयानबाजी और आपसी आरोप-प्रत्यारोप ने कांग्रेस को जनता की नजर में अस्थिर पार्टी बना दिया। परिणामस्वरूप आम आदमी पार्टी ने इस असंतोष का लाभ उठाया और कांग्रेस का जनाधार तेजी से खिसक गया।
गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए समिति बनानी पड़ी
पंजाब कांग्रेस के लिए हालात पिछले चुनाव से पहले जैसे ही नजर आ रहे हैं। पिछले चुनाव में दो-तीन नेताओं में टक्कर थी, तो इस बार चार-चार नेता आमने-सामने हैं। ये सभी नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिखाई दे रहे हैं, तब स्वाभाविक रूप से 2022 की यादें ताजा हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में स्थिति नहीं संभाली तो पिछला इतिहास दोहराया जा सकता है। गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने तीन सदस्यीय समिति बनानी पड़ी है। इसके साथ ही 66 नेताओं को दिल्ली बुलाकर बातचीत शुरू की है। इससे नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा और संगठनात्मक शिकायतों का समाधान खोजा जा सकेगा।
समिति संगठनात्मक अनुशासन लागू करने का साहस दिखाएगी?
राजनीति की जानकार मानते हैं कि केवल समिति, बैठकें और रिपोर्ट तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या समिति निष्पक्ष ढंग से सभी पक्षों को सुनेगी? क्या वह संगठनात्मक अनुशासन लागू करने का साहस दिखाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या समिति मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले नेताओं को सामूहिक नेतृत्व के लिए तैयार कर पाएगी? यदि समिति केवल औपचारिक कवायद बनकर रह गई तो इसका कोई विशेष लाभ नहीं होगा। पंजाब कांग्रेस की समस्या व्यक्तियों के बीच मतभेद से अधिक नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा है। इसका समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है।
राहुल गांधी और हाईकमान की एक बार फिर कड़ी परीक्षा
पंजाब कांग्रेस की स्थिति कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी के लिए भी बड़ी परीक्षा है। पार्टी लंबे समय से राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रही है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में गुटबाजी ने कांग्रेस को कई बार नुकसान पहुंचाया है। पंजाब में स्पष्ट रणनीति न होने से विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने के लगातार अवसर मिल रहे हैं। जनता यह जानना चाहती है कि कांग्रेस चुनाव किस नेतृत्व में लड़ेगी और उसके पास शासन का स्पष्ट रोडमैप क्या है। यदि पार्टी केवल आंतरिक संघर्षों में उलझी रही तो मतदाता किसी अन्य विकल्प की ओर रुख कर सकते हैं।
हर गुट समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाएगा
आने वाले विधानसभा चुनाव में गुटबाजी का असर केवल सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होगा, संसाधनों का बंटवारा असंतुलित होगा और स्थानीय स्तर पर बगावत की संभावनाएं बढ़ेंगी। टिकट वितरण के समय यह संकट और गहरा सकता है। यदि प्रत्येक गुट अपने समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाएगा तो असंतोष बढ़ना तय है। राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनाव केवल लोकप्रिय नेताओं से नहीं, बल्कि मजबूत संगठन से जीते जाते हैं। कांग्रेस के पास पंजाब में अभी भी अनुभवी नेता है, लेकिन यदि यह शक्ति आपसी संघर्ष में खर्च होती रही तो उसका लाभ विरोधी दलों को मिलेगा।
ऑब्जर्वर ने पार्टी विधायकों व पूर्व विधायकों से फीडबैक लिया
पार्टी के अंदर चल रही गुटबाजी को खत्म करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने कमेटी बनाई है। पार्टी के तीन ऑब्जर्वर आज (17 जून) को लगातार दूसरे दिन भी पार्टी के विधायकों व पूर्व विधायकों से फीडबैक ले रहे हैं। यह प्रक्रिया कल तक चलेगी। इसके बाद ऑब्जर्वर्स की तरफ से अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंप दी जाएगी। माना जा रहा है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस 2027 में होने वाले चुनाव से पहले नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। इस दौरान ऑब्जर्वर्स कोशिश कर रहे हैं कि हर नेता को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। कांग्रेस के ऑब्जर्वर्स ने इंदिरा भवन में सांसदों, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्षों और पूर्व मंत्रियों समेत वरिष्ठ नेताओं से वन-टू-वन बातचीत कर उनकी राय जानी जा रही । मौजूदा विधायकों, पूर्व विधायकों और जिला कांग्रेस अध्यक्षों से कल और परसों मुलाकात की जाएगी। ऑब्जर्वर्स से मिलने वाले नेताओं में कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा, डॉ. अमर सिंह, गुरजीत सिंह औजला, डॉ. धर्मवीर गांधी और पूर्व पीपीसीसी प्रमुख शमशेर सिंह दूलो शामिल रहे।

मोदी-योगी-अमित द्वारा कांग्रेस को उसी भाषा में जवाब देने पर कांग्रेस में बंट रही जूतों में दाल

आसमान पर थूका अक्सर अपने ऊपर आता है मतलब जब तक किसी नग्न के सामने नग्न ना हो तो नग्न अपने आपको सुरमा भोपाली समझ अपनी मनमानी करता रहता है। कांग्रेस इतने वर्ष सत्ता में रहकर अपने आपको सुरमा भोपाली समझ अपनी मनमानी करती रही। संविधान का मूल स्वरुप ही बिगाड़ दिया और बात करती है संविधान बचाओ का शोर मचाकर जनता को गुमराह करती फिर रही है। 2014 से अब तक संविधान में जितने सुधार हुए हैं उन सबसे परेशान हो गयी है। देशप्रेमी पार्टी को छोड़ रहे हैं। कांग्रेस चुनाव-दर-चुनाव हार रही है। जिस कारण कांग्रेस में जूते में दाल बंट रही है और कांग्रेस खा रही है, मजे में ना सही, मजबूरी में ही सही। मोदी-योगी-अमित कांग्रेस को उसी भाषा में जवाब दे रहे हैं जिसकी कांग्रेस हक़दार है।
आज कांग्रेस मोदी-योगी और अमित को क्या कुछ नहीं बोल रही, लेकिन भूल रहे हैं कि आज बीजेपी में मोदी, योगी और अमित शाह जैसों की कमी नहीं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत सरमा और अब बंगाल के शुभेंदु अधिकारी के काम को देख ले। मुस्लिम कट्टरपंथी कहते हैं कि 'जितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा' लेकिन बीजेपी हर राज्य से मोदी, योगी और अमित शाह निकाल रही है।
दूसरे, आतंकवादियों को दामाद की तरह पालने की बजाए उन्हीं की भाषा में जवाब देने पर कांग्रेस और इसकी पिछलग्गू पार्टियां बिलबिलाती दिखती हैं। इतना ही नहीं पाकिस्तान को कंगाल हालत में पहुँचाने में कांग्रेस का ही हाथ है क्योकि कांग्रेस जितनी कमजोर होगी पाकिस्तान भी उतना ही कमजोर होगा।
आज भाजपा कांग्रेस को उसके स्टाइल में ही जवाब दे रही है!
भाजपा उसी जूते का भरपूर उपयोग कर रही हैं जिस जूते से कभी कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार को मारा था, आज नरेंद्र मोदी, योगी और अमित शाह उसी जूते से कांग्रेस को दाल परोस रहे हैं।
इसे ही कहते हैं 'मियां की जूती, मियां के सर।'

आज कांग्रेसी नेता यह कहते हुए कहीं भी मिल जाएंगे!
बीजेपी में नैतिकता नहीं है।
बीजेपी विधायक खरीद रही है।
बीजेपी सांसद खरीद रही है। बीजेपी सरकार गिरा रही है, विपक्ष को ख़त्म कर रही है, लोकतंत्र खतरे में, यह आखिरी चुनाव आदि आदि।
अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ सोनिया गांधी और उसके सलाहकार अहमद पटेल ने जो कुछ किया था पत्रकार स्वप्नदास गुप्ता के अनुसारः-
''अटल जी के आंखों में आंसू आ गए थे और वहां मौजूद कई लोगों ने अटल जी को रोते देखा था।''
16 अप्रैल 1999 को अटल जी के सरकार का बहुमत परीक्षण होने वाला था अटल जी आश्वस्त थे कि वह बहुमत साबित कर देंगे।
कांग्रेस ने इतना गंदा खेल खेला की एनडीए में शामिल अकाली दल के सांसद इंद्रकुमार गुजराल को तोड़ा और गुजराल ने ह्विप का उल्लंघन करके अटल बिहारी वाजपेयी जी के खिलाफ वोट डाला।
इसके अलावा उस वक्त फारुख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस जो NDA में शामिल थी।
उस नेशनल कांफ्रेंस के सैफुद्दीन सोज को अहमद पटेल ने कुरान की कसम देकर अटल बिहारी वाजपेयी जी के सरकार के खिलाफ वोट देने को कहा था।
यह सब तो ठीक था। क्यों कांग्रेस सत्ता पाने के लिए कुरान को ले आयी? आज जब मन्दिरों के मुद्दों को बीजेपी लेकर आती है तो कांग्रेस और इसकी पिछलग्गू पार्टियां किस आधार पर धर्म को चुनावों में लाने के लिए बीजेपी को गलत बताती है? मुस्लिम वोटबैंक की खातिर मन्दिरों को विवादित बना दिया। कोर्ट में पुरुषोत्तम श्रीराम और रामसेतु को काल्पनिक किसने बताया?
उससे भी बढ़कर नीचता देखकर उस वक्त सब चौंक गए कि जब 15 फरवरी को ही उड़ीसा के मुख्यमंत्री का शपथ ले चुके गिरधर गोमांग सदन में आ गये थे।
नैतिकता के अनुसार जब वह मुख्यमंत्री पद का शपथ ले लिए तब उन्हें संसद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। लेकिन फरवरी में वह मुख्यमंत्री बने और अप्रैल तक उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया।
यह तो अटल बिहारी बाजपेयी जी की महानता थी कि उन्होंने सदन में खड़े होकर कहा थाः
''मैं सोनिया गांधी और गिरधर गोमांग के विवेक पर छोड़ता हूं कि क्या वह जो कर रहे हैं वह नैतिक रूप से ठीक है और मुझे विश्वास है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज मानते हुए गिरधर गोमांग सदन की वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे क्योंकि वह एक मुख्यमंत्री बन चुके हैं।''
लेकिन उसके बावजूद भी भारत के लोकतंत्र की हत्या करते हुए सोनिया गांधी ने गिरधर गोमांग से वोट दिलवाया था और मात्र एक वोट से अटल जी की सरकार गिर गयी थी। बाद में लॉबी में सारे पत्रकार थे और अटल बिहारी वाजपेयी जी की आंखें आंसुओं से भरी हुई थी
क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी जी को विश्वास था की सोनिया गांधी और गिरधर गोमांग देश के लोकतंत्र का सम्मान करेंगे।
एक जमाना था जब बीजेपी में नैतिकता उदारवादी बहुत चलती थी और जिसका फायदा इन कांग्रेसियों ने उठाया।
अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह कांग्रेस को एक-एक वोट के लिए एक-एक सरकार के लिए तरसा दे रहे हैं।

जब भी कोई कांग्रेस की सरकार गिरती है तो कसम से हर देशप्रेमी और लोकतंत्र प्रेमी को बड़ा सुकून मिलता है। 

नेतन्याहू से बिगाड़ कर अमेरिका की कोई पार्टी और ट्रंप 75 लाख यहूदियों की नाराजगी नहीं झेल सकते

सुभाष चन्द्र

ईरान और लेबनान को लेकर ट्रंप ने कई बार नेतन्याहू को खरी खोटी सुनाई है लेकिन इज़रायल का कहना है कि हम किसी के गुलाम नहीं है, हम संप्रभु राष्ट्र हैं और अपनी चुनौतियों का सामना स्वयं कर सकते है। 

अब सवाल उठता है कि क्या ट्रंप, रिपब्लिकन पार्टी और Democrats अमेरिका में रहने वाले यहूदियों की नाराजगी झेल सकते हैं? जैसे भारत में सभी सेकुलर पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक के पीछे रहती हैं, वैसे ही अमेरिका में यहूदी कौम एक बहुत बड़ा वोट बैंक है ट्रंप रोज रोज नेतन्याहू पर बरस कर क्या नवंबर में होने वाले चुनाव जीत सकते हैं?

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अमेरिका में रहने वाले करीब 54 लाख भारतीय लोगों का समर्थन लेने के लिए दोनों दल उतावले रहते  हैं जबकि 40-45 लाख मुस्लिम Democrats के साथ होते हैं और जिनमें करीब 7 लाख तो पाकिस्तानी हैं

दूसरी तरफ अमेरिका में यहूदियों की संख्या 63 से 75 लाख के बीच है यानी अमेरिका की आबादी का 2 से 2.5% यहूदियों की है जबकि इज़रायल की एक करोड़ आबादी में 75 लाख यहूदी हैं मतलब एक पूरा इज़रायल अमेरिका में बसता है

न्यूयॉर्क में यहूदी 21 लाख, Los Angeles में 6,17,000, फ्लोरिडा में 5,27,000 वाशिंगटन डी सी में 2,97,000, शिकागो में 2,94,000 और बोस्टन में 2,50,000 यहूदी रहते हैं यहूदी आबादी में करीब 44 लाख व्यस्क हैं, मतलब वोटर हैं

अमेरिका और इज़रायल के अलावा विश्व भर में यहूदियों की सख्या करीब 22 लाख है जिसमें सबसे अधिक 4,40,000 फ्रांस में हैं, कनाडा में 4,00,000 और ब्रिटैन में 3,00,000 लाख है

भारत में ब्रिटिश समय में 20000 यहूदी थे जिसमें बहुत से इज़रायल की स्थापना के बाद वहां चले गए और आज भी करीब 5000 यहूदी भारत में रहते हैं

यहूदी विश्व में कहीं भी रहें, उनकी प्रतिबद्धता इज़रायल के प्रति रहेगी और अगर अमेरिका या ट्रंप इज़रायल से संबंध बिगाड़ते हैं तो उससे उनकी छवि पर यहुदिओं के मन में दाग ही लगेगा

में कल भी लिखा था कि ईरान और हिजबुल्लाह (लेबनान) के लिए ट्रंप का नेतन्याहू से संबंध बिगाड़ना उचित नहीं है ट्रंप को ईरान के साथ हुए समझौते पर खुद ही विश्वास नहीं है तभी तो आज उन्होंने फिर कहा है कि अगर डील पसंद नहीं हुई तो फिर से बमबारी की जाएगी

कहने का तात्पर्य यह है कि अधिक समय तक इज़रायल को नाराज़ करके ट्रंप या अमेरिका यहूदियों की नाराजगी बर्दाश्त नहीं कर सकते अमेरिका के विकास में भारतीयों और यहूदियों का सबसे बड़ा योगदान है इसलिए शायद आज ट्रंप मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे और कह रहे थे कि मोदी शांत और संयमित है लेकिन मैं मोदी के जैसा शांत नहीं हूँ तो भाई शांत रहना सीखने के लिए मोदी को गुरु बना लो 

‘....राहुल गाँधी धोखेबाज’: DMK का कांग्रेस पर तीखा हमला


जब कोई नेता अपनी अक्ल की बजाए विदेशों में बैठे अपने आकाओं के कठपुतली बन बोलता हो, क्या ऐसे नेता से किसी हित की कल्पना की जा सकती है? वास्तव में नेता प्रतिपक्ष को इतना संवेदनशील, दूरगामी और परिपक़्व होना चाहिए कि जब वह बोले सत्तापक्ष ध्यान से सुने और विपक्ष नेता के मुंह बात पर चिंता करे। लेकिन देश को ऐसा विपक्षी नेता मिला है जो खुद मजाक बन रहा है। कोई गंभीरता नाम की चीज ही नहीं, उपद्रवी भाषा। अगर राहुल विदेश में बैठे अपने आकाओं के चक्कर काटने की बजाए अपने दादा फिरोज जहांगीर की कब्र पर जाकर दुआ मांगते शायद दादा फिरोज अल्लाह मियां को बोलकर कुछ अक्ल दिलवा देते। कांग्रेस पार्टी को सिर्फ show piece बना दिया।      

तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच राजनीतिक अलगाव के बाद एक-दूसरे पर तीखे वाण छोड़े जा रहे हैं।

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के मुखपत्र ‘मुरासोली’ और पार्टी की आईटी विंग ने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पर तीखा हमला बोला है और उन्हें ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला’ और ‘राजनीतिक रूप से अपरिपक्व’ के साथ-साथ ‘एक बड़ा मजाक’ करार दिया है।

डीएमके ने अपने मुखपत्र के संपादकीय में आरोप लगाया कि राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनावों में इंडी गठबंधन के सहयोगियों के खिलाफ काम किया और उन्हें कमजोर किया। पार्टी का कहना है कि राहुल गाँधी इंडी गठबंधन की बैठकों में विपक्षी एकजुटता की बात करते हैं, लेकिन उन्होंने ही अलग-अलग राज्यों में विपक्ष की एकजुटता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है।

दरअसल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे की ‘दोस्ती की मिसाल’ देने वाली ये दोनों पार्टियाँ चुनाव बाद के नतीजों के बाद एक-दूसरे की दुश्मन बन गई हैं। डीएमके का कहना है कि कांग्रेस ने राज्य में गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया और गठबंधन में होने के बावजूद, सरकार बनाने के लिए अभिनेता विजय की पार्टी यानी टीवीके को समर्थन दे दिया। डीएमके ने दावा किया है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी, तब उन्होंने कांग्रेस का साथ दिया, लेकिन नया विकल्प मिलते ही उन्होंने डीएमके को धोखा दे दिया।

समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है पूरी समाजवादी पार्टी; रामगोपाल यादव ने अमित शाह को सौंपी चिट्ठी


उत्तर प्रदेश में चुनाव होने से पहले ही लगता है चुनाव परिणाम घोषित हो गया है। राहुल गाँधी की छत्रसाया में रहने वाली एक और पार्टी अपने अंत की ओर चल पड़ी है। महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस(TMC) में टूट और दल-बदल चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर भी बड़ा दावा सामने आया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि सपा में जल्द ही बड़ी टूट हो सकती है।

उन्होंने कहा, “समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र बंगाल छोड़िए, समूची सपा, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।”

एक बयान में राम गोपाल यादव ने कहा, “अब यूपी का नंबर है, राम गोपाल जी एक चिट्ठी अमित शाह को थमा दिए हैं और उनसे कह दिए हैं उनसे कि इतने लोगों का नाम है। इन लोगों को अपने पास ले लीजिए, हम लोगों की जान बचाकर रखिएगा।”

राजभर ने अपने बयान में कई घोटालों का भी जिक्र किया है जिसके बाद सियासी हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है।

राँची के RSS के दफ्तर पर देर रात पेट्रोल बम से अटैक, बम फेंकने का CCTV फुटेज आया सामने

                                  देर रात RSS के दफ्तर पर बम फेंकते दिखे लोग (फोटो साभार: X/@ANI)
पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय पर पेट्रोल बम फेंकने वालों से पूछो 'क्या पेट्रोल 50 रूपए सस्ता हो गया है?' जो पेट्रोल बम फेंके जा रहे हैं।  
झारखंड की राजधानी राँची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यालय पर पेट्रोल बम से हमला किया गया है। निवारणपुर स्थित संघ कार्यालय पर मंगलवार (16 जून 2026) देर रात दो अज्ञात युवकों ने पेट्रोल बम फेंका। हालाँकि, दोनों बोतलें कार्यालय परिसर के अंदर नहीं पहुँच सकीं जिससे बड़ा हादसा टल गया। यह घटना रात करीब 12:36 बजे की बताई जा रही है।

घटना की जानकारी बुधवार सुबह उस समय हुई जब स्वयंसेवक कार्यालय परिसर में पहुँचे। परिसर के बाहर संदिग्ध बोतलें मिलने पर CCTV फुटेज की जाँच की गई और उसमें दो युवक पेट्रोल बम फेंकते हुए दिखाई दिए। इसके बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई।

पुलिस की प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि हमलावरों ने चिली सॉस की काँच की बोतलों में पेट्रोल भरकर उन्हें पेट्रोल बम की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की। पहला बम फेंके जाने के दौरान उसमें लगी जलती हुई सुतली जमीन पर ही गिर गई, जिससे वह प्रभावी नहीं हो सका। दूसरा बम भी कार्यालय की बाउंड्री पार नहीं कर पाया और बाहर ही गिर गया। इस कारण कार्यालय को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचा है।

घटना के समय कार्यालय परिसर में प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा, प्रांत सह व्यवस्था प्रमुख आनंद तुलस्यान, प्रांत कार्यालय प्रमुख नरसिंह सिंह समेत कई स्वयंसेवक, विद्यार्थी और कर्मचारी मौजूद थे। घटना की जानकारी मिलते ही केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी तथा भाजपा के कई नेता और कार्यकर्ता कार्यालय पहुँचे।

बाबूलाल मरांडी ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हमलावर किसी वाहन से आए थे और घटना की गहन जाँच की जानी चाहिए। वहीं रांची पुलिस ने कहा है कि मामले की जाँच के लिए एफएसएल समेत कई टीमों को लगाया गया है। CCTV फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपितों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही घटना में शामिल लोगों को पकड़ लिया जाएगा।

30 देशों की 120 सीक्रेट बायोलैब्स में अमेरिकी फंडिंग: कुर्सी छोड़ने से पहले तुलसी गबार्ड ने खोले US के राज, कहा- खतरनाक Pathogens पर हुई रिसर्च

                                                                         तुलसी गबार्ड
अमेरिका की डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) तुलसी गबार्ड ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिकी सरकार ने दुनिया के 30 से अधिक देशों में 120 से ज्यादा जैविक प्रयोगशालाओं (Biolabs) को फंडिंग दी है, जिनमें यूक्रेन की लैब्स भी शामिल हैं। गबार्ड ने कहा कि इन लैब्स में खतरनाक रोगाणुओं (Pathogens) पर रिसर्च की गई और इसकी जानकारी अमेरिकी जनता से सालों तक छिपाई गई।

गबार्ड ने शुक्रवार (12 जून 2026) को जारी एक बयान में कहा कि कई महीनों तक खुफिया दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद उन्हें पता चला कि अमेरिकी फंडिंग से दुनिया भर में बायोलैब्स का एक बड़ा नेटवर्क चल रहा है। उन्होंने विशेष रूप से यूक्रेन में मौजूद लैब्स को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इन प्रयोगशालाओं को नुकसान पहुँचने, कब्जे में जाने या हमला होने का खतरा बना हुआ है।

गबार्ड ने दावा किया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की पहले की रिपोर्टों में भी चेतावनी दी गई थी कि यूक्रेन की कुछ लैब्स में संभावित रूप से खतरनाक रोगाणु रखे गए हैं। युद्ध के दौरान अगर ये लैब्स प्रभावित होती हैं तो बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लैब्स की लोकेशन, फंडिंग और गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जानबूझकर छिपाई गई।

गबार्ड ने कहा, “अमेरिकी फंडिंग वाली इन बायोलैब्स के अस्तित्व, इतिहास, स्थान और फंडिंग को प्रभावशाली लोगों ने जानबूझकर छिपाया। जो लोग इनके बारे में सवाल उठाते थे, उन्हें विदेशी एजेंट और अमेरिका का गद्दार तक बताया गया।”

गबार्ड ने ‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’ (Gain-of-Function Research) पर भी चिंता जताई। यह ऐसी रिसर्च होती है जिसमें वायरस या रोगाणुओं को बदलकर यह समझने की कोशिश की जाती है कि वे कैसे फैलते हैं या ज्यादा खतरनाक बन सकते हैं। इस तरह की रिसर्च को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। गबार्ड ने इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 25 मई 2025 के उस एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से जोड़ा है जिसमें दुनिया भर में ऐसी रिसर्च के लिए फेडरल फंडिंग रोकने का फैसला लिया गया था।

उन्होंने पूर्व अमेरिकी सरकारों, कुछ स्वास्थ्य अधिकारियों और खासतौर पर एंथनी फाउची पर भी निशाना साधा। गबार्ड ने आरोप लगाया कि अमेरिकी जनता से इन लैब्स के बारे में सच छिपाया गया और जो लोग सवाल उठाते थे उन्हें दबाने की कोशिश की गई। गबार्ड ने कहा कि उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को विदेशों में मौजूद इन बायोलैब्स पर ज्यादा जानकारी जुटाने के निर्देश दिए हैं।

गबार्ड ने हाल ही में अपने पद से इस्तीफे का भी ऐलान किया है। उन्होंने 22 मई को बताया था कि वह 30 जून से पद छोड़ देंगी। गबार्ड ने कहा कि उनके पति अब्राहम विलियम्स को हड्डियों के कैंसर की एक दुर्लभ बीमारी हुई है और वह परिवार के साथ समय बिताना चाहती हैं। हालाँकि, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि विदेश नीति समेत कई मुद्दों पर प्रशासन के कुछ हिस्सों से उनके मतभेद थे।

आतंकी संगठन पाल रहे ईरान के लिए ट्रंप भरोसेमंद इज़रायल को धोखा दे रहे हैं; डील अमेरिका-ईरान की है तो इज़रायल और हिज़्बुल्लान कैसे पार्टी हो गए?

सुभाष चन्द्र

ट्रंप ईरान के साथ कथित समझौते में भरोसेमंद साथी इज़रायल के साथ धोखा कर रहे हैं जबकि उन्हें पता है कि ईरान खुद और उसके पाले हुए आतंकी संगठन हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती इज़रायल को दुनिया के मानचित्र से मिटा देना चाहते है। ट्रंप नेतन्याहू को कहते हैं कि लेबनान पर हमले बंद करें लेकिन हिज़्बुल्लाह को नहीं कहते कि वो इज़रायल के खिलाफ हथियार न चलाए

क्या धोखा देना अमेरिका के DNA में है? इजराइल को हिजबुल्लाह के खिलाफ हथियार न चलाए की नसीयत देने वाले ट्रम्प ने हिजबुल्लाह को आतंकी हमले नहीं करने के लिए क्यों नहीं बोला? ये वही अमेरिका है जिसने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की मदद से सोवियत यूनियन को तोड़ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को भी धोखा देने में देरी नहीं की। आज इन दोनों मुल्कों की क्या हालत है दुनिया के सामने है। क्या नागों को दूध पिलाना अमेरिका की फितरत में है? दूसरे, यह कि जब पाकिस्तान द्वारा भारत पर आतंकी हमले करने पर भारत उसका जवाब देता है तो अमेरिका परदे के पीछे से पाकिस्तान की मदद करता है। अब इसे अमेरिका का दोगलापन ही कहा जाएगा।    

लेखक 
चर्चित YouTuber 
ट्रंप की नसीहत इज़रायल के लिए तब उचित होती अगर वह समझौते में शर्त रखते कि ईरान हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती को इज़रायल पर हमले करने से रोकेगा इसलिए इज़रायल का इस समझौते को मानने से मना करना पूरी तरह उचित है 

ट्रंप पिछले कुछ दिनों में नेतन्याहू पर 5 बार बरसे हैं, नेतन्याहू को पागल तक कह दिया और यह भी कह दिया कि “अगर मैं न होता तो तुम जेल में होते” ऐसे ही अहंकार भरे शब्द ट्रंप ने आज भी कहे हैं कि इज़रायल अमेरिका की वजह से है, इज़रायल बहुत पहले तबाह हो गया होता, ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो वह उससे जंग के दौरान इज़रायल पर हमला करता” तो क्या इज़रायल के पास परमाणु हथियर सजाने के लिए रखे हैं, वह क्या उपयोग नहीं करता ईरान पर?

ट्रंप भूल रहे हैं कि इज़रायल जितने अवरोध झेल कर युद्ध कर खड़ा हुआ है, वह आज तक कोई देश नहीं कर सका अमेरिका ने एक बार पहले भी धमकी दी थी कि हम इज़रायल को हथियार देना बंद कर देंगे और तब नेतन्याहू ने कहा था कि अगर हमारे पास हथियार नहीं भी होंगे तो अपने हाथों की नाखूनों से युद्ध करेंगे यह जज्बा है इज़रायल का और आज कहते है इज़रायल का पूरा विपक्ष नेतन्याहू के साथ खड़ा है

ये समझौता देखा जाए तो एक दिखावा है और उसके टिके रहने की संभावना बहुत कम है। ट्रंप अपनी ही हाँक रहे हैं कि ईरान के साथ हुए समझौते का अहम यह है कि तेहरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और उन्होंने इस पर सहमति दी है जबकि ईरान की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया 

ट्रंप ने यह भी कहा है कि होर्मुज समुद्री मार्ग जल्द खुल जाएगा और ईरान को वहां से निकलने वाले जहाजों से टैक्स वसूलने का अधिकार नहीं होगा लेकिन ईरान ने कहा है कि वह समुद्री मार्ग उसकी व्यवस्था के तहत खुलेगा। कितना बड़ा विरोधाभास है!

उधर ईरान के विदेश मंत्री अरघाची ने कहा है कि इस MOU में दो पार्टी हैं एक तरफ अमेरिका और इज़रायल है और दूसरी तरफ ईरान और हिज़्बुल्लाह और लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध बंद होना चाहिए लेकिन लेबनान पर हमले से समझौते का उल्लंघन माना जाएगा इज़रायल कैसे पार्टी हो गया और हिजबुल्लाह क्या कोई देश है जिसे ईरान MOU में पार्टी बता रहा है? अलबत्ता लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध रोकने की बात MOU में कही गई है जबकि लेबनान का मामला इज़रायल का है और अमेरिका को उस पर दखल देने का अधिकार नहीं है

MOU में 60 दिन में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत होगी जब बात होनी है तो ट्रंप का दावा सही नहीं है कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने के लिए सहमति दी है

यह भी कहा गया है ईरान के फ्रीज़ आधे Assets 12 बिलियन डॉलर के अमेरिका समझौता होने से पहले मुक्त कर देगा और आधे बाद में

इसके अलावा ईरान ने पुनर्निर्माण के लिए 300 बिलियन डॉलर की भी मांग की है जिसके बारे में MOU में कुछ नहीं स्पष्ट नहीं है लेकिन जो ईरान को विजई कह रहे हैं उन्हें यह जानना जरूरी है कि कितना भारी नुकसान हुआ है ईरान का जिसके लिए इतनी मोटी रकम मांग रहा है

मूर्ख और चालाक ईरान के लिए अमेरिका का इज़रायल को त्यागना उसके लिए ही हानिकारक सिद्ध होगा

उत्तर प्रदेश : अब जब्त अफीम से बनेगी जीवनरक्षक दवा, योगी सरकार का अपराध से जनकल्याण तक का सफर

            जब्त अफीम से बनेगी दवा, योगी सरकार ने अपराध को बदला जनकल्याण में (फोटो साभार : ChatGPT)
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले जिस उत्तर प्रदेश में माफियाओं का डंका बजता था, पुलिस मंत्रियों की भैंस ढूंढने में लगी रहती थी, आज स्थिति एकदम बदल चुकी है।   

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस तरह अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति बनाई है, उसी तरह अब उनसे जब्त की गई सामग्री को भी प्रयोग में लाया जाएगा। दरअसल गाजियाबाद पुलिस ने अलग-अलग थानों के मालखानों में सालों से बंद पड़े 16,378 किलोग्राम से ज्यादा के नशीले पदार्थ जब्त कर उसे पूरी तरफ नष्ट किया है।

इसी के साथ, अपराधियों से पकड़ी गई 4.206 किलोग्राम शुद्ध अफीम को नष्ट करने के बजाय सरकारी अफीम कारखाने (गाजीपुर) भेजा गया है। इस अफीम का इस्तेमाल अब नशे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों की दवाएँ बनाने में किया जाएगा। योगी सरकार का यह कदम दिखाता है कि कैसे अपराध की सामग्री का इस्तेमाल अब जन-कल्याण के लिए हो रहा है।

थानों में जमा ड्रग्स को ऐसे किया गया नष्ट

गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के थानों में सालों से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ जमा थे। इन मादक पदार्थों की वजह से थानों के मालखानों में जगह कम पड़ रही थी और इनके दुरुपयोग का खतरा भी बना हुआ था। इसी समस्या को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एक उच्च स्तरीय ड्रग डिस्पोजल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी में अपर पुलिस आयुक्त अपराध और अपर पुलिस उपायुक्त यातायात जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया था।

इस विशेष कमेटी ने कोर्ट, संबंधित विभागाध्यक्षों और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से सभी जरूरी कानूनी अनुमतियाँ और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किए। इसके बाद बुधवार (10 जून) को धौलाना स्थित एक अधिकृत बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल केंद्र में कुल 63 मुकदमों से जुड़े मादक पदार्थों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। नष्ट किए गए सामान में सबसे अधिक मात्रा नंदग्राम थाने से बरामद हुई 15,735 लीटर कोडीन युक्त नशीली कफ सिरप की थी। नियमों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई।

जब्त अफीम से दवा बनने की पूरी प्रक्रिया

अफीम एक खास पौधे से मिलती है। इस पौधे का नाम ‘अफीम पोस्त‘ है। इसे वैज्ञानिक भाषा में पैपावर सोम्रिफेरस कहते हैं। इस पौधे पर हरे रंग के कच्चे फल लगते हैं। इन कच्चे फलों को ‘डोडा’ कहा जाता है। जब इन डोडों पर हल्का सा चीरा लगाया जाता है, तो उनमें से सफेद रंग का गाढ़ा दूध जैसा रस निकलता है। यही रस हवा के संपर्क में आकर सूख जाता है और गोंद जैसा काला-भूरा बन जाता है। इसी सूखे रस को हम अफीम कहते हैं।

अफीम के अंदर कई तरह के प्राकृतिक तत्व होते हैं। विज्ञान की भाषा में इन तत्वों को ‘एल्कलॉइड्स’ कहते हैं। अफीम में ऐसे 25 से ज्यादा अलग-अलग तत्व पाए जाते हैं। जब पुलिस अपराधियों से यह अफीम पकड़ती है, तो उसे गाजीपुर के सरकारी कारखाने में भेजा जाता है। इस कारखाने को ‘सरकारी अफीम और अल्कलॉइड वर्क्स’ (GOAW) कहते हैं। यहाँ वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में अफीम की पूरी जाँच करते हैं। वह देखते हैं कि अफीम कितनी असली है। इसके बाद मशीनों की मदद से अफीम को अच्छी तरह साफ किया जाता है।

अफीम से कैसे निकाली जाती है दवा?

साफ करने की इस प्रक्रिया को ‘प्रोसेसिंग’ कहते हैं। प्रोसेसिंग के दौरान वैज्ञानिक अफीम के अंदर से दो सबसे जरूरी तत्व अलग करते हैं। पहले तत्व का नाम ‘मॉर्फीन’ है। दूसरे तत्व का नाम ‘कोडीन’ है। ये दोनों तत्व बहुत काम के होते हैं। जब ये तत्व अफीम से अलग हो जाते हैं, तो सरकार इन्हें दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियों को बेच देती है। ये कंपनियाँ इन तत्वों की मदद से बहुत ही असरदार और तेज दर्द को ठीक करने वाली दवाएँ तैयार करती हैं।

इन दोनों तत्वों का काम अलग-अलग बीमारियों में होता है। उदाहरण के लिए, ‘कोडीन’ नाम के तत्व का इस्तेमाल सूखी खांसी को ठीक करने के लिए किया जाता है। इससे खांसी के कफ सिरप बनाए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, ‘मॉर्फीन’ नाम का तत्व बहुत तेज दर्द को रोकने के काम आता है। डॉक्टर इसका इस्तेमाल गंभीर मरीजों के लिए करते हैं। मॉर्फीन की मदद से दर्द को दबाने वाले इंजेक्शन और गोलियाँ (टैबलेट) बनाई जाती हैं। इस तरह यह अफीम मरीजों का जीवन बचाने के काम आती है।

क्या हर पकड़ी गई अफीम से दवा बन सकती है?

यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है। पुलिस जो भी अफीम पकड़ती है, उस हर अफीम से दवा नहीं बनाई जा सकती। असल में, नशा बेचने वाले तस्कर बहुत चालाक होते हैं। वे ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अफीम में मिलावट कर देते हैं। वे अफीम का वजन बढ़ाने के लिए उसमें स्टार्च, पाउडर या खराब केमिकल मिला देते हैं। कभी-कभी तो इसमें आर्सेनिक और लेड जैसी जहरीली चीजें भी मिला दी जाती हैं। ऐसी मिलावटी अफीम इंसानी शरीर के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक और जानलेवा हो जाती है।

जब पुलिस इस अफीम को गाजीपुर या नीमच के सरकारी कारखाने में भेजती है, तो वहाँ सबसे पहले उसकी शुद्धता जाँची जाती है। इसके लिए लैब में एक खास टेस्ट होता है। अगर टेस्ट में अफीम मिलावटी निकलती है, तो कारखाना उसे लेने से मना कर देता है। यही नहीं, अगर अफीम में सीलन (नमी) या फंगस लगी हो, तो भी वह रिजेक्ट हो जाती है। ऐसी खराब अफीम को दवा बनाने के लायक नहीं माना जाता। बाद में, इस खराब अफीम को भी बाकी नशीले पदार्थों की तरह आग में जलाकर या केमिकल डालकर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। कारखाने में सिर्फ और सिर्फ एकदम शुद्ध अफीम का ही इस्तेमाल दवा बनाने के लिए होता है।

योगी सरकार: अपराध खत्म कर लोगों की भलाई का नया सफर

उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, कामकाज का तरीका बिल्कुल बदल गया है। पहले के समय में पुलिस जो करोड़ों रुपए की अफीम पकड़ती थी, वह थानों के मालखानों में सालों तक बंद रहती थी। वह रखी-रखी सड़ जाती थी या फिर कई बार चोरी भी हो जाती थी। लेकिन अब योगी सरकार ने इस पूरे सिस्टम को साफ-सुथरा और बेहतर बना दिया है। अब पकड़ी गई चीजों का सही इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार की इस नई नीति से एक साथ दो बड़े फायदे हो रहे हैं। पहला फायदा यह है कि पुलिस नशे का काला कारोबार करने वाले अपराधियों को पकड़कर उनका पूरा नेटवर्क तोड़ रही है। दूसरा फायदा यह है कि उनसे जो अफीम मिल रही है, उसका इस्तेमाल बीमार और लाचार लोगों के इलाज के लिए किया जा रहा है। सरकार एक तरफ अपराधियों पर कड़ा एक्शन ले रही है, तो दूसरी तरफ उनकी जब्त की गई चीजों को जनता की भलाई में लगा रही है। यह सरकार की एक बहुत अच्छी और दूर की सोच को दिखाता है।

पुलिस और कानून के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?

कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई बहुत जरूरी है। थानों के मालखानों में बहुत ज्यादा नशा जमा रखना खतरे से खाली नहीं होता। हमेशा डर रहता है कि कहीं यह नशीले पदार्थ चोरी न हो जाएँ। यह भी डर रहता है कि कोई इन्हें दोबारा चोरी-छिपे बाजार में न बेच दे। इसलिए समय-समय पर अभियान चलाकर इन्हें नष्ट करना बहुत जरूरी है। इससे थानों का रिकॉर्ड एकदम साफ हो जाता है और पुलिस के कामकाज में ईमानदारी बनी रहती है।

गाजियाबाद पुलिस ने इन नशीले पदार्थों को खुले में नहीं जलाया। खुले में जलाने से हवा जहरीली हो जाती है। इसके बजाय पुलिस इन्हें धौलाना के एक विशेष वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में लेकर गई। वहाँ पूरी सावधानी और नियमों के साथ इन्हें नष्ट किया गया। इससे पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश पुलिस का यह कदम देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मिसाल है। यह दिखाता है कि कैसे कड़े नियमों का पालन करके जनता की भलाई और सुरक्षा की जा सकती है।

18000 करोड़ रूपए के प्रोजेक्ट के लिए किसानों से जबरदस्ती जमीन ले रही कर्नाटक की कांग्रेस सरकार


कर्नाटक में प्रस्तावित ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) यानी बिदादी टाउनशिप परियोजना को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। राज्य की कांग्रेस सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के खिलाफ भाजपा और जेडी(एस) ने मोर्चा खोल दिया है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी से हस्तक्षेप करने की माँग की है।

भाजपा और जेडी(एस) का आरोप है कि किसानों की सहमति के बिना हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित की जा रही है।

क्या है पूरा मामला और कितना बड़ा है प्रोजेक्ट?

कर्नाटक सरकार के अनुसार, बेंगलुरु पर बढ़ते दबाव को कम करने और शहर के विस्तार के लिए बिदादी और हरोहल्ली के बीच लगभग 18 हजार करोड़ रुपए की लागत से ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) विकसित करने की योजना पर काम कर रही है। सरकार इसे भविष्य के शहरी विकास और नई टाउनशिप मॉडल के तौर पर पेश कर रही है।

विपक्ष का दावा है कि इसके लिए हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित की जा रही है। दावों के मुताबिक, करीब 7,481 एकड़ से लेकर 9,600 एकड़ तक जमीन अधिग्रहण की योजना बताई जा रही है। सरकार ने संकेत दिया है कि जून के अंत तक भूमि अधिग्रहण से जुड़ी अधिसूचनाएँ पूरी की जाएँगी और प्रभावित किसानों को मुआवजा दिया जाएगा।

BJP ने बताया- किसान कर रहे विरोध, नहीं हो रही सुनवाई

भाजपा और जेडी(एस) ने इस परियोजना को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने राहुल गाँधी को लिखे पत्र में दावा किया कि 25 गाँवों के 3,500 से ज्यादा किसान पिछले करीब 470 दिनों से विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी आपत्तियों पर सार्वजनिक सुनवाई तक नहीं की गई।

जेडी(एस) नेता निखिल कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के पारदर्शिता और सहमति संबंधी प्रावधानों को नजरअंदाज किया। उन्होंने दावा किया कि अंतिम भूमि अधिग्रहण अधिसूचना जारी करने से पहले पर्याप्त जनसहमति नहीं ली गई।

इसी बीच जेडी(एस) ने वित्त विभाग के दस्तावेज भी सार्वजनिक किए, जिनमें परियोजना के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल, फंडिंग व्यवस्था और एक साथ बड़ी मात्रा में जमीन अधिग्रहण पर सवाल उठाए जाने का दावा किया गया। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि परियोजना के लिए HUDCO से लगभग 12 हजार करोड़ रुपए जुटाने की योजना बनाई जा रही है।

भाजपा ने कहा- यह राज्य प्रायोजित भूमि कब्जा

केंद्रीय मंत्री और जेडी(एस) नेता एचडी कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर हमला करते हुए आरोप लगाया कि यह विकास परियोजना नहीं बल्कि रियल एस्टेट हितों को फायदा पहुँचाने वाला मॉडल बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि किसानों की इच्छा के खिलाफ उपजाऊ जमीन ली जा रही है और विरोध करने वालों पर प्रशासनिक दबाव डाला जा रहा है।

वहीं भाजपा ने इसे ‘राज्य प्रायोजित भूमि कब्जा’ बताते हुए राहुल गाँधी से मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप कर जमीन अधिग्रहण रोकने का निर्देश देने की माँग की है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि परियोजना पहले से चली आ रही शहरी योजना का हिस्सा है और इसे रोका नहीं जाएगा।

NEET-UG री-एग्जाम से पहले फर्जीवाड़ा और ठगी रोकने के लिए भारत सरकार ने Telegram ऐप पर लगाई अस्थायी रोक


NEET-UG 2026 की री-एग्जाम को सुरक्षित कराने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर 22 जून 2026 तक अस्थायी रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही टेलीग्राम का मैसेज एडिट फीचर भी 30 जून तक बंद रहेगा।

यह फैसला 21 जून को होने वाली NEET पुनर्परीक्षा को निष्पक्ष तरीके से कराने के लिए लिया गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने इस संबंध में निर्देश जारी कर दिए हैं। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है।

NTA के मुताबिक, कुछ ठग गिरोह टेलीग्राम चैनलों के जरिए छात्रों को नकली प्रश्नपत्र बेच रहे थे। ये लोग ‘Paper Leaked NEET’ और ‘Private Mafia’ जैसे नामों से चैनल चला रहे थे। वे पेपर के बदले छात्रों के परिवारों से लाखों रुपए माँग रहे थे।

NTA ने साफ किया है कि नीट का असली प्रश्नपत्र पूरी तरह सुरक्षित है। परीक्षा से पहले यह किसी के पास भी मौजूद नहीं है। जाँच में सामने आया कि ठग टेलीग्राम के मैसेज एडिट फीचर का गलत इस्तेमाल कर रहे थे।

वे परीक्षा खत्म होने के बाद पुराने मैसेज को बदल देते थे। उसमें असली प्रश्नपत्र जोड़कर ऐसा दिखाते थे, मानो पेपर पहले ही लीक हो गया हो। इसी फर्जीवाड़े और अफवाहों को रोकने के लिए सरकार ने टेलीग्राम पर यह पाबंदी लगाई है। 

राहुल गाँधी ने ट्रेन में जिस युवक की वीडियो को शेयर करके सरकार को घेरने की कोशिश की है उस घटना का कोई सोर्स नहीं


आखिर कांग्रेस का इकोसिस्टम कब तक अफवाह फैलाकर जनता को गुमराह करता रहेगा? कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें ट्रेन में एक व्यक्ति की कथित तौर पर दम घुटने से मौत का दावा किया गया। बताया गया कि यह वीडियो पाटलिपुत्र स्टेशन की है और वीडियो में दिख रहा व्यक्ति एग्जाम देने जा रहा था। इस वीडियो को कांग्रेस से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी रीपोस्ट कर सरकार पर निशाना साधा। लेकिन रेलवे ने कांग्रेस ने फैलाई इस वीडियो की हकीकत पर सवाल खड़े किए हैं।

राहुल गाँधी ने वीडियो रीपोस्ट करते हुए लिखा, “इस वीडियो ने मुझे झकझोर दिया। ये उस भारत के लाचार युवा हैं, जिसकी सरकार अपने अरबपति दोस्तों पर लाखों करोड़ लुटा देती है, पर अपने ही छात्रों को एक सुरक्षित सफ़र तक नहीं दे सकती। चुनाव के वक़्त यही सरकार पूरी-पूरी ट्रेनों का इंतज़ाम कर लेती है। और परीक्षा देने जा रहे छात्रों के हिस्से में आती है – भीड़, घुटन, और बेबसी।”

उन्होंने आगे कहा, “इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि मोदी सरकार छात्रों की गूँज सुनना ही नहीं चाहती। पर मैं वादा करता हूँ – हम यह आवाज़ उन बहरे कानों तक पहुँचाएँगे। हर छात्र को उसका हक़ मिलेगा, उसका न्याय मिलेगा।”

वीडियो पर पूर्व मध्य रेलवे ने संज्ञान लिया। रेलवे ने जाँच के बाद बताया कि यह वीडियो पाटलिपुत्र स्टेशन की नहीं है। इसी के साथ रेलवे ने बताया कि इस वीडियो में व्यक्ति की मौत का कोई आधिकारिक सोर्स भी नहीं है। इसके अलावा रेलवे ने व्यक्ति की दम घुटने से मौत के दावे को भी खारिज किया।

रेलवे ने कहा, “वीडियो में दिख रहे व्यक्ति के हाव-भाव और हालत देखकर ऐसा लगता है कि शायद वो किसी बीमारी या ज्यादा थकान की वजह से जूझ रहा हो।”

अखिलेश यादव सरकार में केवल मुसलमानों का कल्याण


उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति किसी से छिपी नहीं है। सपा ने खुद को हमेशा अल्पसंख्यकों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के बीच अपना जनाधार बनाए रखने के लिए पार्टी ने अपने विभिन्न कार्यकालों में अनेक योजनाओं के केंद्र बिंदु में मुस्लिमों को ही रखा। यहां तक कि कई योजनाओं तो उन्होंने सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही शुरू कीं। मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के कार्यकाल तक अल्पसंख्यक कल्याण को राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया गया। यही कारण है कि भाजपा सहित अन्य दल अक्सर समाजवादी पार्टी पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” की राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं।

सपा ने चार कार्यकाल में मुस्लिमों में ही पहचान बनाई

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार चार प्रमुख कार्यकालों में सत्ता में रही। मुलायम सिंह यादव 1989-91, 1993-95 और 2003-07 के बीच मुख्यमंत्री रहे, जबकि अखिलेश यादव ने 2012 से 2017 तक राज्य की कमान संभाली। इन अवधियों में मुस्लिम समुदाय की शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगार, मदरसा आधुनिकीकरण, अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्थान और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई योजनाएं लागू की गईं। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने अल्पसंख्यक कल्याण को अपनी राजनीति और शासन की केंद्रीय धुरी बनाए रखा। छात्रवृत्ति, मुस्लिम लड़कियों के लिए आर्थिक सहायता, मदरसा आधुनिकीकरण, उर्दू शिक्षा और आरक्षण की मांग जैसी पहलों ने मुस्लिम समुदाय के बीच पार्टी की मजबूत पहचान बनाई। दूसरी ओर, इन्हीं नीतियों को विपक्ष ने “मुस्लिम तुष्टिकरण” करार दिया।

कब्रिस्तानों की चारदीवारी योजना: वोट बैंक के लिए कब्जे 

अखिलेश यादव सरकार के सबसे चर्चित फैसलों में से एक राज्यभर के कब्रिस्तानों की चारदीवारी का निर्माण था। वर्ष 2012-13 के बजट में इसके लिए विशेष प्रावधान किया गया। सरकार का तर्क था कि भूमि विवादों और अतिक्रमण को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों कब्रिस्तानों की चारदीवारी के लिए एक हजार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। विपक्ष ने इसे खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण बताया। यह योजना मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय रही और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक इसका राजनीतिक प्रभाव देखने को मिला। सपा सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मो. आजम खां के पास था। उन्होंने ही कब्रिस्तानों की चारदीवारी के निर्माण की योजना चलाई। इस योजना पर पांच साल में 1200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जबकि हकीकत यह है कि कई जिलों में योजना पर काम ही नहीं हुआ। जहां काम हुआ भी वहां भी घपले की शिकायतें हैं।

लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू शिक्षा और उर्दू सॉफ्टवेयर को बढ़ावा

अखिलेश यादव सरकार ने लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू सॉफ्टवेयर शामिल करने की घोषणा की। रामपुर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा था कि विद्यार्थियों को दिए जाने वाले लैपटॉप में हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध कराया जाएगा। मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे उर्दू भाषा के संरक्षण और डिजिटल युग में उसके विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना।

सच्चर समिति के तहत मुस्लिमों को सरकारी नौकरी में आरक्षण की पैरवी

दिसंबर 2012 में समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सत्ता में आने पर सपा विधि विषेशज्ञों की राय लेकर केरल तथा आंध्र प्रदेश की तर्ज पर मुसलमानों को इतना आरक्षण देगी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएंगे। हालांकि यह नीति पूरी तरह लागू नहीं हो सकी, लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच इसे सपा की राजनीतिक प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया गया।

‘हमारी बेटी उसका कल’: मुस्लिम लड़कियों के लिए सबसे चर्चित योजना

10 दिसंबर 2012 को रामपुर में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने “हमारी बेटी उसका कल” योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत हाईस्कूल उत्तीर्ण अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को 30,000 रुपये की एकमुश्त सहायता दी जाती थी। इसका उद्देश्य लड़कियों की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को विवाह संबंधी सहायता देना था। योजना का सबसे बड़ा लाभ मुस्लिम छात्राओं को मिला। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है। प्रारंभिक चरण में लगभग 14,000 लड़कियों को इसका लाभ मिला। बाद में यह संख्या और बढ़ी। सरकार ने इस योजना के लिए लगभग 250 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। “हमारी बेटी उसका कल” योजना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका तक दाखिल हुई थी।

 वोट बैंक को साधने के लिए 84 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव में लगभग 84 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। सपा के 42 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी होकर विधानसभा पहुंचे थे। उस चुनाव में कुल 63 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे थे, जिनमें सबसे अधिक सपा के थे। 15 मार्च 2012 को बनी पहली अखिलेश यादव सरकार में कुल 48 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इनमें 9 मुस्लिम मंत्री शामिल थे।
प्रदेश में हज यात्रियों के लिए सुविधाओं का विस्तार
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखिलेश सरकार ने हज यात्रियों की सुविधा के लिए लखनऊ हज हाउस और अन्य व्यवस्थाओं का विस्तार किया। हज प्रशिक्षण शिविरों, आवास और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर दिया गया। गाजियाबाद में 1886 हज यात्रियों के रुकने के लिए बनाए गए हज हाउस में शासन ने 51.16 करोड़ रुपये खर्च किए। 11 साल में बनकर तैयार हुए इस हज हाउस शिलान्यास 30 मार्च 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम ¨सिंह ने किया था और उद्घाटन उनके पुत्र व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 5 सितंबर 2016 को किया। नगर विकास मंत्री आजम खान ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के हज पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए जाने के लिए व्यवस्था की गई है।