आम दिनों में करो महिलाओं का अपमान, चुनावों के वक्त चिल्लाओ ‘नारीवाद’: कांग्रेसी नेताओं की दोगलई फिर उजागर, फेक वीडियो देख उड़ाया पत्रकार का मजाक

                                                                                        साभार: एक्स @NayakRagini, @chitraaum
कांग्रेस पार्टी जिसका नारा रहा है-‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’, लेकिन उसने कभी लड़कियों, महिलाओं की इज्जत को समाज में उछालने में कोई शर्म नहीं की है। पार्टी के नेता कभी सोशल मीडिया पर तो कभी किसी इंटरव्यू में नारी को मजाक का केंद्र बनाते रहे हैं। अब कांग्रेस नेत्री डॉक्टर रागिनी नायक ने भी इसी नीचता में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की है।

रागिनी नायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आज तक की एंकर और पत्रकार चित्रा त्रिपाठी का एक वीडियो शेयर करते हुए ना सिर्फ उनका अपमान किया है, बल्कि सच्चाई सामने आने के बावजूद अपने पोस्ट को डिलीट नहीं किया है। आईए जानते हैं कि वीडियो में क्या है और कैसे कांग्रेस पार्टी का इतिहास ही हमेशा महिलाओं के अपमान का रहा है।

इस फेक वीडियो में कथित तौर पर चित्रा कहती दिखती हैं, “बलूचिस्तान को देखिए, खैबर पख्तूनख्वा को देखिए।” इस पर पाकिस्तानी कहता है, “चित्रा जी बलूचिस्तान को देखने के लिए जनरल आसिफ मुनीर काफी हैं, मैं तो सिर्फ आपको ही देखूँगा आज, अगर मेरी नजरें आपसे हटी तो 50 किलो मेकअप, जो आप अपने चेहरे पर थोप के आई हैं उसका क्या फायदा?”

इस पर चित्रा कहती हैं, “मेकअप पर टिप्पणी मत करिए, आपके पाकिस्तान में भी खातूने करती हैं मेकअप।” तो वह कहता है, “बिल्कुल पाकिस्तानी औरतें मेकअप करती हैं, मगर अपने खर्चे से, आपके मेकअप का खर्चा तो मोदी जी का है ना।”

वीडियो के साथ रागिनी नायक ने लिखा, “चित्रा – मेरे Makeup पर टिप्पणी मत करिए..पाकिस्तानी खातूनें भी Makeup करती हैं। Pak पैनलिस्ट- बिल्कुल, पाकिस्तानी औरतें Makeup करती हैं, पर अपने खर्चे से..आपके Makeup का खर्चा मोदी जी का है ना। पाकिस्तानियों को शो पर बुला कर, उनके हाथों यूँ जलील होने की क्या मजबूरी है भला???”

अगले ही ट्वीट में रागिनी नायक ने लिखा, “अब चित्रा कह रही हैं कि ये Video Fake है! चलिए अच्छा है! ऐसी बेइज्जती तो भगवान दुश्मन की भी ना कराए!” सोचने वाली बात है कि अगर चित्रा ने ये पुष्टि कर दी है कि वीडियो फेक है और रागिनी यह मान भी रहीं है तो भी अपना पोस्ट हटाया क्यों नहीं।

दरअसल उनका असल मुद्दा तो केवल एक महिला का मजाक उड़ाना था, बेइज्जती करना था। वो भी तब, जब बेइज्जती कर रहा व्यक्ति पाकिस्तान जैसे आतंकी देश का हो। साफ समझा जा सकता है कि नारीवाद के नाम पर चिल्लाने वाली इस पार्टी की नेताओं की मानसिकता क्या है।

इन्होंने ये बातें एक फर्जी वीडियो पर बोली हैं। यानी इन्हें प्रमाणिकता से लेना-देना नहीं होता, पाकिस्तान ही अगर इनके मतलब की बात कर देगा तो ये उसे कोट करके भारतीयों का मजाक उड़ा लेंगे।

रागिनी के साथ अलका लांबा को भी चित्रा त्रिपाठी ने दी नसीहत

कांग्रेस नेत्री लका लांबा ने भी X पर वहीं वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “चित्रा की क्या मजबूरी होगी जो पाकिस्तान के लोगों को अपने चैनल/शो में बुला कर चर्चा करवाने की? और यूँ उनके हाथों जलील होने की ??” अलका लांबा की पोस्ट पर जवाब देते हुए चित्रा ने लिखा, “अलका लांबा जी पाकिस्तान का यूट्यूबर अपने व्यूज बढ़ाने के लिये मेरे वीडियो में काँट छाँट करके फेक न्यूज तैयार करता है। आजतक कभी भी ये व्यक्ति मेरे शो का हिस्सा नहीं रहा।”

चित्रा ने आगे लिखा, “हैरानी होती हूँ जब कांग्रेस के बड़े पद पर बैठी महिला एक न्यूज एंकर के पीछे पड़ जाये, आप लगातार मेरे उपर टिप्पणी करती हैं और मैं इग्नोर करती हूँ। मगर मैडम पाकिस्तानी फेक न्यूज के एजेंडे में मत पड़ें। पाकिस्तान से आपकी मोहब्बत आपका ही नुकसान करेगी।”

मंडी में रं&… रेट सही मिलता है’: कॉन्ग्रेसियों ने कंगना रनौत पर की थी अभद्र टिप्पणी

भाजपा की ओर से हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से अभिनेत्री कंगना रनौत को टिकट मिलने के बाद उनके खिलाफ भी अभद्र टिप्पणियों की बाढ़ आ गई थी। टिप्पणी करने वालों में कांग्रेस के पदाधिकारी और इस्लामी नामों वाले अकाउंट थे।

खुद को नारीवादी और पत्रकार बताने वाली मृणाल पांडे ने एक्स पर लिखा, “शायद यूँ कि मंडी में सही रेट मिलता है?” हालाँकि चौतरफा छीछालेदर के बाद कांग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की संपादक मृणाल पांडे ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

कांग्रेस की ही राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के अकाउंट से लिखा गया, “क्या भाव चल रहा है मंडी में कोई बताएगा?” यह पोस्ट भी श्रीनेत के अकाउंट से हटा दिया गया है। इस पर सुप्रिया श्रीनेत ने सफाई दी है कि उनके फेसबुक और इन्स्टाग्राम अकाउंट को किसी और का भी एक्सेस था और उसने यह पोस्ट की। उन्होंने कहा है कि वह ऐसा पोस्ट कभी नहीं करती।

सबसे घटिया बात कि कंगना का विरोध करने वालों ने भाषाई स्तर की बिलकुल भी परवाह नहीं की। एक और ट्विटर यूजर ने कंगना की एक फोटो के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

‘भगवा रंग की ब्रा पहन भक्तों को जवाब दें’: पठान के बचाव में कॉन्ग्रेसी उदित राज का बयान

बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान की फिल्म पठान (Pathaan) में ‘भगवा रंग’ के गाने को लेकर काफी विवाद हुआ था। इस बीच कांग्रेस के नेता उदित राज (Udit Raj) ने नारीवादियों से भगवा रंग की बिकनी और ब्रा पहनने की सलाह दी थी। इसको लेकर वो सोशल मीडिया यूजर के निशाने पर भी आ गए थे।

अक्सर विवादों में रहने वाले भाजपा के पूर्व नेता और वर्तमान में कांग्रेस पार्टी में शामिल उदित राज ने अपने ट्वीट में लिखा था, “स्त्रीवादियों से मेरी सलाह है बिकनी और ब्रा आदि भगवा रंग का ही पहनकर इन भक्तों को जवाब दें।” सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा कि इसकी शुरुआत उन्हें अपने घर से करनी चाहिए।

वहीं कुछ यूजर ने उन्हें मानसिक रूप से बीमार बताया है। एक अन्य यूजर ने लिखा, “जरा अपनी पार्टी के सबसे बड़े लीडर तक यह जवाब पहुँचा तो दो। यह जानबूझकर खाली सुनवाने के लिए यह ट्वीट किया गया लगता है। कसम खा लिए हो जबतक राहुल गांँधी को कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष नहीं बना देते ऐसे ही passive mode में गाली सुनवाते रहेंगे।”

अपनी असली मानसिकता स्वीकारो: नारीवाद को लेकर ढोंग क्यों?

देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी को किसी भी महिला की इज्जत से कोई खास फर्क पड़ता नहीं है, तो फिर सवाल ये है कि नारीवाद-नारीवाद चिल्लाने की जरुरत क्या है? ये वहीं पार्टी है, जिसने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवगंत माँ को भी नहीं छोड़ा था। पार्टी अपने फायदे के लिए किसी को भी निशाना बना सकती है, चाहे आधार ही झूठा क्यों ना निकल जाए।

जिस पार्टी में देश की आधी आबादी की भी इज्जत ना हो, वह पार्टी, ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ जैसे नारे देकर ऐसे झूठे दिखावे करती है। सब छोड़िए पार्टी की महिला नेत्री भी खुद महिला होकर जब एक महिला की सरेआम बेइज्जती कर सकती हैं, तो फिर पार्टी के अन्य नेताओं से तो महिलाओं की इज्जत की क्या ही उम्मीद करना।

'22 दिन में मार दूँगा PM मोदी को’: प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वाला अमन बक्सर से गिरफ्तार, पूछताछ में बताया- विदेश से मिला था काम


आरएसएस प्रचारक से लेकर गुजरात मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री से भारत के प्रधानमंत्री बनने बाद भी नरेंद्र मोदी के जानी दुश्मनों में कोई कमी नहीं आयी। लेकिन देवी-देवताओं का सुरक्षा कवच सभी के होंसले पस्त कर रहा है। काम को अंजाम देने से पहले ही कानून के हत्ते चढ़ जाता है।  

बिहार के बक्सर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक खतरनाक साजिश का खुलासा हुआ। खुफिया एजेंसियों की सूचना पर पुलिस ने छापेमारी कर एक युवक अमन तिवारी को गिरफ्तार किया है।

आरोपित अमन तिवारी कथित तौर पर PM मोदी को नुकसान पहुँचाने की योजना बना रहा था। पुलिस इस मामले में विदेशी कनेक्शन की भी जाँच कर रही है। उसने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को ईमेल भेजकर भारी रकम की माँग की थी।

आरोपित अमन तिवारी ने दावा किया था कि वह 22 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी साजिश को अंजाम दे सकता है। कार्रवाई में युवक के पास से मोबाइल, लैपटॉप और कई डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वह किन-किन लोगों के संपर्क में था। बरामद किए गए सभी उपकरणों को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया गया है। मुख्य आरोपित अमन तिवारी से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने दो और लोगों को हिरासत में लिया है।

इन सभी के बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन को खंगाला जा रहा है। पुलिस यह सुनिश्चित करना चाहती है कि इस नेटवर्क के पीछे कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन तो नहीं है। फिलहाल मामले की गहराई से जांच जारी है।

‘कैंसर है इजरायल, जहन्नुम में जले’: पाकिस्तान रक्षा मंत्री की भाषा सुन भड़के नेतन्याहू, बोले- अमेरिका करता होगा तुम पर विश्वास, हमें भरोसा नहीं

                 ख्वाजा आसिफ के बिगड़े बोल पर इजरायली PM नेतन्याहू ने लताड़ा (फोटो साभार : NDTV)
इजरायल और पाकिस्तान के बीच कड़वाहट काफी बढ़ गई है। विवाद तब शुरू हुआ जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल को इंसानियत के लिए ‘अभिशाप’ और ‘कैंसर’ कह दिया। इस पर पलटवार करते हुए इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दफ्तर ने कड़ा बयान जारी किया है। नेतन्याहू ने कहा कि किसी देश की सरकार से इस तरह की भाषा बर्दाश्त नहीं की जा सकती, खासकर उस देश से जो शांति के लिए बिचौलिया बनने का दावा करता हो। बता दें कि पहली बार इजरायल ने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान को एक ‘आतंकवादी देश’ करार दिया है।
इजराइल से फटकार पड़ते ही डरपोक आसिफ ने पोस्ट डिलीट कर दिया। आखिर पाकिस्तान कितना नीचे गिरेगा? इजराइल द्वारा पाकिस्तान को 'आतंकी देश' घोषित करना बहुत बड़ी बात है। जो पाकिस्तान को बर्बादी की ओर धकेल देगा। इसमें कोई शक भी नहीं आतंकियों की पनाहगार बने पाकिस्तान को मुस्लिम मुल्कों से इसी बात की ही ज़कात मिलती है। और उस ज़कात पर पाकिस्तान हुक्मरान आवाम को पागल बनाकर ऐश करते हैं। विदेशों में बैंक खातों में धन जमा कर पाकिस्तान को भुखमरी में डाल रखा है। 
   

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने क्या कहा था?

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सोशल मीडिया पर एक विवादित पोस्ट डाला था। ख्वाजा आसिफ ने इजरायल को ‘बुराई’ और ‘इंसानियत के लिए श्राप’ बताया। ख्वाजा आसिफ ने लिखा कि जब इस्लामाबाद में शांति की बातें हो रही हैं, तब इजरायल लेबनान में नरसंहार कर रहा है।

ख्वाजा आसिफ ने आगे कहा कि पहले गाजा, फिर ईरान और अब लेबनान में मासूमों का खून बहाया जा रहा है। उन्होंने इजरायल को एक ‘कैंसर वाला देश’ बताते हुए ‘वे नरक में जलें’ जैसे विवादित शब्दों का इस्तेमाल किया।

नेतन्याहू का जवाब, पाकिस्तान पर भरोसा नहीं

पाक रक्षा मंत्री के इस बयान के बाद इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को मोर्चा संभाला। इजरायल की ओर से कहा गया कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा इजरायल को मिटाने की बात करना बेहद अपमानजनक है। इजरायल ने पाकिस्तान की साख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो देश खुद को शांति का दूत बताता हो, उसके मुँह से ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं।

इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह शांति वार्ता में पाकिस्तान को एक भरोसेमंद खिलाड़ी नहीं मानता। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा कि अमेरिका भले ही अपने कारणों से पाकिस्तान की मदद ले रहा हो, लेकिन इजरायल पाकिस्तान को क्रेडिबल (भरोसेमंद) नहीं मानता। उन्होंने इसकी तुलना कतर और तुर्की जैसे देशों से की, जिन्हें इजरायल समस्या पैदा करने वाला मानता है। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि वह केवल अमेरिका के साथ तालमेल बिठाकर ही आगे बढ़ना चाहता है।

मीडिया का “सुपर पावर” ईरान अब कर रहा त्राहिमाम त्राहिमाम, लेबनान में उसका प्रॉक्सी हिज़्बुल्लाह इज़रायल पर हमले करेगा और इज़रायल चुप रहे कैसे हो सकता है; इज़रायल को ईरान ने ही Ceasefire से अलग रखा था

सुभाष चन्द्र

पिछले कई सप्ताह से हमारे मीडिया ने ईरान को ऐसा हीरो बनाया हुआ था कि जैसे अमेरिका की “सुपर पावर” की गद्दी ईरान ने छीन ली हो और कल से नारा लगा रहा है मीडिया “ट्रंप सरेंडर” जिस ईरान की करेंसी एक करोड़ रियाल हमारे 713 रुपए के बराबर है वो सुपर पावर हो गया। 

वैसे देखा जाए तो हमारे मीडिया में और मुस्लिम कट्टरपंथियों कर इन कट्टरपंथियों के आकाओं में कोई फर्क नहीं। दोनों ही सिक्के के एक पहलु हैं। जब भी कहीं कोई दंगा होता है तो दंगाइयों को पीड़ित बताते हुए victim card खेल दंगाइयों का बचाव करने खड़े हो जाते हैं ठीक वही स्थिति अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध में देखने को मिली। गाज़ा पर इजराइल द्वारा हमला करने पर सभी ने इजराइल को दोषी बताते रहे, लेकिन किसी मीडिया ने यह नहीं बताया कि इजराइल पर पहला हमला आतंकी संगठन हमास ने किया था। दूसरे, खोमैनी ने क्यों कहा कि यहूदियों और इजराइल को नक़्शे से मिटा दूंगा। तीसरे, मीडिया ईरान को बब्बर शेर दिखाने इजराइल, गल्फ देशों और अमेरिका में भेजने की हिम्मत कर सकता है लेकिन ईरान में नहीं, क्यों? कोई भारतीय या विदेशी मीडिया इसका जवाब देगा।        

कैसी कैसी कहानी गढ़ी हमारे मीडिया ने, कुछ मत पूछो हल्ला मचाया कि ईरान ने डिएगो गार्सिया पर मिसाइल दाग दी लेकिन ये नहीं बताया वो मिसाइल गई कहां डिएगो गार्सिया से ईरान की दूरी लगभग 4000 किमी है जबकि तेहरान सार्वजनिक रूप से दावा करता है कि उसकी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता 2000 किमी तक सीमित है लेकिन फिर भी शोर मचा दिया कि जैसे डिएगो गार्सिया को खत्म कर दिया हो

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अप्रैल 9 की सुबह से ईरान दर्द से कराह रहा है कि लेबनान पर इज़रायल हमले का युद्ध विराम का उल्लंघन कर रहा है विदेश मंत्री अराघची ने कहा है कि -

ईरान -US युद्ध विराम की शर्तें स्पष्ट हैं -

अमेरिका को चुनना है युद्ध या ceasefire

सीजफायर और युद्ध एक साथ संभव नहीं 

दुनिया लेबनान में नरसंहार को देख रही है

आज ईरान Ceasefire याद करा रहा है जबकि ईरान ने Ceasefire होते ही कहा था इज़रायल के लिए यह Ceasefire नहीं होगा। ईरान ने Ceasefire होते ही कुवैत, सऊदी और बहरीन पर हमले किये थे जैसे उसे युद्ध विराम चाहिए ही नहीं था

जब ईरान ने इज़रायल को खुद ही उससे अलग कर दिया तो अब लेबनान को उसमे शामिल करने के लिए कैसे कह सकता है ईरान चाहता है लेबनान से उसका प्रॉक्सी हिजबुल्लाह इज़रायल पर हमले करता रहे लेकिन इज़रायल चुप रहे बड़ी अजीब बात है ईरान लेबनान को Ceasefire में शामिल करना चाहता है लेकिन इज़रायल को नहीं

अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने साफ़ किया है लेबनान Ceasefire में शामिल नहीं था। ईरान को समझने में गलती हुई, ईरान समझौते से पीछे हटा तो गंभीर परिणाम

हमारे मीडिया ने पूरे युद्ध में एकतरफा ट्रंप के खिलाफ रिपोर्टिंग की है बड़े बड़े मिलिट्री ऑफिसर्स भी खुलकर ट्रंप को पेलने में लगे थे ऐसा प्रोजेक्ट किया गया जैसे सारा नुकसान  अमेरिका और इज़रायल का ही हुआ हो और ईरान का कुछ नहीं बिगड़ा अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ प्रदर्शन पर हल्ला मचा दिया लेकिन यह नहीं समझा कि अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है ईरान के खामनेई तो अपने ही देश के 40 हजार प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भून दिया जबकि ट्रंप ने किसी पर गोली नहीं चलाई

आज मेरे मित्र संजय भाई ने लिखा है कि ईरान का क्या क्या नुकसान हुआ लेकिन मीडिया में कभी कोई रिपोर्ट नहीं दी गई -

115 एक्सट्रीम हाई-वैल्यू लीडर्स हूर धाम पहुंच चुके हैं

145 नेवल वेसल्स मतलब पुरी नेवी लगभग खत्म है

54 एयरक्राफ्ट का रायता हो चुका है एयरफोर्स का बुरा है

200+ मिसाइल लॉन्च साइट्स तबाह हो चुकी हैं

इस्फ़हान, नतांज, फोर्डो जैसे न्यूक्लियर और मिसाइल सेंटर पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए हैं

8000+ मौतें हो चुकी हैं

16,000 से ज्यादा प्रिसीजन स्ट्राइक,

25,000 घायल 

आधा ईरान खंडहर में बदल चुका है जिसे रिकंस्ट्रक्ट में दशकों लगेंगे

ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

मालदा के लिए कितने और कौन गिरफ्तार हुए? 2-3 को छोड़ कर किसी के नाम नहीं आ रहे TMC के कौन है? गिरफ़्तारी उच्च अधिकारियों की होनी चाहिए

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 6 को बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव, DGP, मालदा के DM और SP को Virtually हाजिर को कर बताने के लिए कहा है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए। इनके लिए सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला करे, लेकिन उनकी तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए क्योंकि इन सभी को 7 जुडिशल ऑफिसर्स के साथ हुई घटना की जानकारी न रही हो, ऐसा हो नहीं सकता लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ नहीं किया That is the case of dereliction of duty और इसे गंभीर अपराध माना जाना चाहिए दंगाइयों को ही गिरफ्तार करना काफी नहीं है ये अधिकारी अगर चाहते तो वह न होता जो न्यायिक अधिकारियों के साथ हुआ

NIA की टीम भी पहुंची हुई है लेकिन यह सामने नहीं आ रहा कितने और कौन लोग गिरफ्तार हुए है? कहीं कहा जा रहा है 18 गिरफ्तार हुए हैं और कहीं कहा गया है 35 हुए हैं बस दो प्रमुख नाम सामने आए हैं - पहला है मोथाबाड़ी के उम्मीदवार Indian Secular Front मौलाना शाहजहां अली का और दूसरे के लिए कहा गया है कि बंगाल CID ने कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील और पूर्व AIMIM नेता Mofakkerul Islam को बागडोगरा एयरपोर्ट से बंगलुरु की फ्लाइट पर चढ़ते हुए गिरफ्तार किया 

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एक अन्य व्यक्ति गिरफ्तार हुआ बताया गया है Ekrmul Bagni लेकिन वो कौन है क्या है किस पार्टी का है, कुछ पता नहीं क्या कमाल की है मीडिया की रिपोर्टिंग जो एक भी TMC का कार्यकर्ता गिरफ्तार हुआ नहीं बता रहे क्या गिरफ्तार लोगों में कोई बांग्लादेशी या रोहिंग्या भी है जिसका नाम वोटर लिस्ट से कटा हो?

Mofakkerul Islam के लिए कहा जा रहा है कि वह पूर्व AIMIM नेता है जिसके टिकट पर 2021 का चुनाव लड़ा था आज AIMIM की बंगाल में कुछ ज्यादा वैल्यू नहीं है तो यह क्यों नहीं बता रहे कि अब वह TMC से जुड़ा है

SIR का काम करते हुए जजों को रोका गया, बंधक बनाया गया, गाड़ियों पर पत्थर मारे गए और फिर भी TMC का कोई कार्यकर्त्ता गिरफ्तार न हो, ऐसा संभव हो सकता है क्या? 

सुप्रीम कोर्ट को इन सभी विषयों पर संज्ञान लेना चाहिए उच्च अधिकारियों पर किसी तरह की नरमी नहीं होनी चाहिए और हर गिरफ्तार हुए व्यक्ति की पृष्ठभूमि अदालत में खुल कर बताई जानी चाहिए अपने लोगों को लगता है ममता फिर भी बचा लेगी

असम : कांग्रेस उम्मीदवार ने कांग्रेस को बताया ‘गद्दार’, मतदान से पहले छोड़ी पार्टी: कहा- मियाँ लोगों का करती है तुष्टिकरण


आज परिवार के कारण कांग्रेस में ही फूट पड़ती जा रही है। लगता है कुछ समय बाद पार्टी में सिर्फ परिवार गुलामों का ही बोलबाला रहने वाला है। 2024 के बाद से जिस तेजी से लोग कांग्रेस की देश विरोधी नीतियों की वजह से पार्टी छोड़ रहे हैं कांग्रेस को जड़ से ख़त्म करने में लगे हैं। हकीकत यह है कि ब्रिटिश नागरिक द्वारा कांग्रेस का गठन आज़ादी के लिए नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम से भारतीयों का ध्यान भटकाने के लिए किया था, जिसे आज राहुल गाँधी द्वारा भारत विरोधियों से मेलजोल जाहिर कर रहा है।     

असम में विधानसभा चुनाव के लिए गुरुवार (9 अप्रैल 2026) को मतदान से ठीक एक दिन पहले उदलगुरी सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार सुरेन दैमरी ने पार्टी से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया है। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए और पार्टी को ‘गद्दार’ बताया है। मीडिया से बातचीत में दैमरी ने कहा कि कांग्रेस ने उनके साथ धोखा किया और उनकी बातों को नजरअंदाज किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुरेन ने कहा, “कांग्रेस एक गद्दार पार्टी है। उन्होंने मुझे ठगा है। टिकट देने के बाद भी उन्होंने मुझसे कोई संपर्क नहीं किया। मैंने कई बार फोन किया लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया।” दैमरी ने दावा किया कि उन्हें पार्टी नेताओं से कोई समर्थन या सहयोग नहीं मिला है।

इसके अलावा, उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा, “कांग्रेस मियाँ समुदाय का तुष्टिकरण करती है।” गौरतलब है कि असम में विधानसभा चुनाव एक ही चरण में होने हैं और मतदान सुबह 7 बजे से शुरू होगा।

क्या चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं है? तो फिर CJI की बेंच ममता बनर्जी के आयोग द्वारा पक्षपात करने के आरोपों को क्यों ठुकरा रही है?

सुभाष चन्द्र

मुझे समझ नहीं आता कि सुप्रीम कोर्ट के जज उन विषयों पर क्यों बयानबाजी करते हैं जिससे उनका कोई सरोकार नहीं है? कुछ दिन पहले जस्टिस उज्जवल भुइयां ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी थी कि वह कॉलेजियम के फैसलों को दरकिनार नहीं कर सकता फिर उन्होंने UAPA की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए, वह कानून जो संसद से पारित हुआ जबकि कॉलेजियम कभी संसद से पारित नहीं हुआ और उसका जिक्र संविधान में भी कहीं नहीं है

अब जस्टिस बी वी नागरत्ना ने नया शिगूफा छेड़ दिया उन्होंने पटना में डॉ राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए कहा कि “चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना चाहिए यदि चुनाव कराने वाली संस्थाएं चुनाव लड़ने वालों पर ही निर्भर होंगी, तो मतदान की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती चुनाव आयोग को उच्च महत्व वाला संवैधानिक प्राधिकरण बताते हुए कहा कि चुनाव केवल एक सामयिक घटना नहीं है बल्कि राजनीतिक सत्ता के गठन का आधार है और चुनावी प्रक्रिया पर नियंत्रण का अर्थ वास्तव में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की स्तिथियों पर नियंत्रण करना है”

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जस्टिस नागरत्ना के बयान का अर्थ समझने के लिए we have to read between the lines और उनका मतलब साफ़ है कि वर्तमान चुनाव आयोग “स्वतंत्र” नहीं है और न निष्पक्षता से चुनाव करा रहा है उन्हें शायद मालूम नहीं चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 45 से ज्यादा याचिकाएं दायर हो चुकी है और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ख़ारिज किया था आखिर चुनावी प्रक्रिया पर चुनाव आयोग का नियंत्रण नहीं होगा तो किसका होगा?

उन्हें शायद यह भी आभास नहीं है कि SIR को लेकर समूचा विपक्ष और खासकर ममता बनर्जी आए दिन चुनाव आयोग पर आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव आयोग भाजपा की B Team के रूप में काम कर रहा है लेकिन चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच हर सुनवाई पर ममता को फटकार मार रही है और पीठ ने चुनाव आयोग के SIR कराने की शक्तियों और प्रक्रिया पर कोई कमी नहीं निकाली यानी चीफ जस्टिस और उनकी बेंच चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे लेकिन जस्टिस नागरत्ना को चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं दिखाई दे रहा 

क्या जस्टिस नागरत्ना के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और उनकी पीठ से सदस्यों से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी कार्यशैली को लेकर मतभेद हैं? उनके बयान से लगता है कि अगर SIR का मामला उनके हाथ में होता तो वे तो ममता बनर्जी और विपक्ष की बल्ले बल्ले करा देती और चुनाव आयोग की बखिया उधेड़ देती

जस्टिस नागरत्ना को पता है चुनावों की घोषणा के बाद राज्य का प्रशासन चुनाव आयोग के पास होता है और सुप्रीम कोर्ट भी उसके कार्य में दखल नहीं देता ऐसे में क्या जस्टिस नागरत्ना को लगता है कि 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना कर उन पर हमला करना जायज था?

क्या चुनाव आयोग ने निष्पक्षता से काम नहीं किया? उन्हें यह याद रहे कि आयोग अगर निष्पक्ष न होता तो कई राज्यों में विपक्षी दलों की कभी कोई सरकार नहीं बनती वे कृपया कांग्रेस के समय में चुनाव आयोगों और आज के चुनाव आयोग की कार्य शैलियों का अवलोकन करें जिससे वे अपने विचारों की समीक्षा कर सकें लेकिन आज जब मामला चीफ जस्टिस देख रहे हैं, तब उन्हें चुनाव आयोग पर बयान नहीं देना चाहिए था

मल्लिकार्जुन खड़गे की Hate Speech के लिए 50 शहरों में FIR दर्ज होनी चाहिए; मुस्लिमों को हिंदुओं को क़त्ल करने को कहा है

सुभाष चन्द्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कुरान को लेकर जो कुछ भी कहा, लेकिन समाजवादी पार्टी में मुस्लिम नेताओं को भी बेनकाब कर दिया। दलितों और दीन की बातें कर जनता को पागल बनाने वाले ये पाखंडी मुस्लिम नेता खड़के का बचाव करते लाइव टीवी शो में कहते हैं कि "ठीक से कुरान पढ़ना पड़ेगा" यानि इसका यही मतलब निकाला जा सकता है कि इन मुस्लिम नेताओं ने कुरान सिर्फ दिखावे के लिए रखा है। 

दूसरे, जो अध्यक्ष पार्टी में किसी भी विवाद पर परिवार से पूछे बिना स्वयं कोई फैसला नहीं ले सकता वो इतनी बड़ी और गंभीर बात कैसे बोल सकता है। यानि सोंची-समझी सियासत और षड़यंत्र के मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़काने के यह जहर उगलवाया गया है।     

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने भाषण में मुस्लिमों से कहा कि “अगर आपके सामने से कोई जहरीला सांप गुजर रहा है और आप नमाज़ भी पढ़ रहे हैं तो नमाज़ छोड़ कर आपको सांप को मारना चाहिए, ऐसा कुरान में कहा है। और मैं यही कहूंगा कि आपका नमाज तोडना परवाह नहीं, यह जहरीला सांप है RSS और BJP, इसको अगर आप नहीं मारेंगे, आप कभी बचेंगे नहीं”

अब कुरान कब पढ़ी खड़गे ने और उसमे क्या पढ़ा उन्होंने, यह तो पता नहीं लेकिन इस बयान पर उन्हें रगड़ा लगाया जा सकता है

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खड़गे का यह बयान मुस्लिमों में हिंदुओं के प्रति नफरत पैदा करने वाला है (जो पहले से ही है) और मुस्लिमों को खुलेआम कहना है खड़गे का कि RSS/BJP को ख़त्म कर दो यानी दोनों के हिंदुओं को मार दो वरना आप बचेंगे नहीं इससे बड़ा नफरती बयान (Hate speech) हो नहीं सकता

सुप्रीम कोर्ट कहता है कि राज्य सरकारों को चाहिए कि Hate Speech के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करें यह बयान शायद खड़गे ने वामपंथी सरकार चला रहे केरलम में दिया है लेकिन वह सरकार तो खुद ऐसे विचार रखती है और इसलिए वह कोई कार्रवाई नहीं करेगी 

इसलिए आवश्यकता है खड़गे के खिलाफ तुरंत कम से कम 50 शहरों में FIR दर्ज कराई जाए। खड़गे ने पहले प्रधानमंत्री मोदी को “जहरीला नाग” कहा था और फिर कह दिया कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया और अब भी यही कहेंगे कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है

अवलोकन करें:-

खड़के द्वारा कुरान पर अपमानजनक बात बोलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों, "सिर तन से जुदा गैंग" और उनके आ
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खड़के द्वारा कुरान पर अपमानजनक बात बोलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों, "सिर तन से जुदा गैंग" और उनके आ
नूपुर शर्मा द्वारा इस्लामिक किताबों में लिखी बात को बोलने पर हंगामा करने वाले उपद्रवी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार....

लगता है खड़गे को साँपों और नागों से बहुत लगाव है अभी पवन खेड़ा भागता फिर रहा है, एक बार खड़गे को भी भागने पर मजबूर करना चाहिए उधर राहुल गांधी बार बार कह रहा है कि मोदी का करियर एक दिन में ख़त्म कर सकता हूं एप्सटीन फाइल्स में मोदी का नाम लोगो के सामने ला कर एक केस उस पर भी दर्ज होना चाहिए कि बता क्या लिखा है एप्सटीन फाइल्स में मोदी के लिए फिर वकीलों की लाइन पर लगाएगा कि मुझे बचाओ

थमा Iran-US का ‘महायुद्ध’, ट्रंप बोले- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलेगा तो तेहरान ने भी रखीं 10 शर्तें

  ईरान-अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद सीजफायर का किया ऐलान, हॉर्मुज पर बनी बात (साभार: NYT/Chosun)
ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन से जारी युद्ध के बाद अब दोनों देशों ने सीजफायर की घोषणा कर दी है। ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए राजी हो गया है। इससे सहमत होते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों तक हमला रोकने का ऐलान किया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहाँ के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने अनुरोध किया कि आज रात ईरान पर होने वाले हमले को रोक दिया जाए। इस शर्त कि ईऱान तुरंत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए तैयार हो गया है, इसीलिए मैं दो हफ्तों के लिए हमले और बमबारी को रोकने के लिए सहमत हूँ। यह दोनों तरफ से युद्धविराम (सीजफायर) होगा।”

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खुलवाने की डेडलाइन मंगलवार (07 अप्रैल 2026) को ख्तम हो गई, जिसके बाद उम्मीद थी कि अमेरिका कोई बड़ा हमला करेगा। लेकिन डेडलाइन खत्म होने से कुछ घंटों पहले ही दोनों देशों के बीच सीजफायर पर बात बन गई। लेकिन इस सीजफायर की भी कुछ शर्ते हैं। ईरान ने 10 प्रस्ताव दिए, जिसे अमेरिका मानने को तैयार हुआ। तब जाकर यह युद्ध खत्म हुआ।

क्या है ईरान की वो 10 प्रस्ताव

ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, अमेरिका ने इन 10 प्रस्तावों को स्वीकार किया है:

  • अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता होगा कि दोनों एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे
  • स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान का नियंत्रण बना रहेगा
  • ईरान को परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को मान्यता
  • अमेरिका द्वारा लगाए गए सभी मुख्य प्रतिबंध हटा दिए जाएँगे
  • दूसरे देशों पर असर डालने वाले सभी प्रतिबंध भी खत्म किए जाएँगे
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
  • ईरान को हुए नुकसान के लिए उसे मुआवजा दिया जाएगा
  • अमेरिका अपने सैनिकों को इस क्षेत्र से वापस बुलाएगा
  • हर जगह चल रही लड़ाई बंद होगी, जिसमें ईरान से जुड़े समूह जैसे लेबनान का हिज्बुल्लाह भी शामिल है
  • सीजफायर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खेलने से जुड़ा होगा
इन प्रस्तावों को मानते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते तक अस्थायी तनाव कम करने के लिए समझौता किया है। इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, क्योंकि दुनिया के 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। इसीलिए इस रास्ते को खोलना दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद जरूरी रहा। ईरान ने माना कि वह दो हफ्ते तक जहाजों को सीमित और नियंत्रित तरीके से गुजरने देगा।

जंग अभी खत्म नहीं हुई

अमेरिका के साथ सीजफायर बनी सहमति के ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने अपनी मिलिट्री को गोलीबारी रोकने का आदेश दिया है। मोजतबा खामेनेई का यह निर्देश ईरान के सरकारी चैनल IRIB पर सीजफायर के ऐलान के दो घंटे बाद पढ़ा गया।
मोजतबा खामेनेई के बयान में कहा गया, “यह युद्ध का अंत नहीं है, लेकिन सभी सेना के हिस्सों को सुप्रीम लीडर के आदेश का पालन करते हुए गोलीबारी रोकनी चाहिए।” बयान में यह भी कहा गया कि लड़ाई रोकना पूरी तरह स्थायी नहीं है, बल्कि यह शर्तों पर आधारित है और आगे चल रही बातचीत से जुड़ा हुआ है।

जंग में जीत का ईरान और अमेरिका का दावा

बेशक युद्ध सिर्फ दो हफ्तों के लिए ही टाला गया हो, लेकिन ईरान और अमेरिका दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ईरान ने कहा कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। वहीं अमेरिका ने कहा कि यह उनकी जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी सेना ने संभव बनाया है।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के बयान के अनुसार, तेहरान इस मौजूदा संघर्ष को एक बड़ी रणनीतिक सफलता मान रहा है और उनका कहना है कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि यह संघर्ष करीब 40 दिनों तक चला, जिसका मकसद जरूरी राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को पूरा करना था, जिनमें उनके बड़े क्षेत्रीय माँगों को मनवाना भी शामिल था।
इतना ही नहीं ईरान ने युद्ध आगे जारी रखने के भी संकेत दिए। काउंसिल ने यह भी कहा कि ईरान ने पहले अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा तय की गई समय-सीमा को मानने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वह दुश्मनों द्वारा तय किए गए समय के अनुसार चलने को तैयार नहीं था। उनका कहना था कि जब तक सभी लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते, तब तक सैन्य कार्रवाई जारी रखी जाएगी।
वहीं दूसरी तरफ व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह अमेरिका की जीता है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और हमारी अविश्वसनीय सेना ने संभव बनाया है।” उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति ने हॉर्मुज को फइर से खुलवा दिया है। लीविट ने बताया कि राष्ट्रपति ने शुरू से ही कहा था कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 4 से 6 हफ्ते का अभियान होगा और अमेरिका ने 38 दिनों में अपने प्रमुख सैन्य उद्देश्यों को हासिल कर लिया और उनसे कहीं आगे निकल गया।

सीजफायर के बाद तेल की कीमतों में राहत, शेयर बाजार में उछाल

ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर की घोषणा का सीधा असर तेल और शेयर बाजार दोनों पर देखने को मिला है। युद्ध के दौरान स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज बंद होने से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई प्रभावित हुई थी, जिससे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं और वैश्विक बाजारों में डर और अस्थिरता फैल गई थी। लेकिन जैसे ही सीजफायर की घोषणा हुई और हॉर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमित बनी, कच्चे तेल की कीमतों में अचानक गिरावट आई। रिपोर्ट्स के अनुसार, कीमतें 13 प्रतिशथ से 16 प्रतिशत तक नीचे आ गईं।
तेल सस्ता होने और तनाव कम होने की वजह से शेयर बाजार में तेजी देखने को मिली। भारत में सेंसेक्स 2600 प्वाइंट के ऊपर रहा और 23,800 के साथ निफ्टी में भी जोरदार उछाल आया, जबकि अमेरिका और अन्य देशों के बाजार भी सकारात्मक संकेत दिखाने लगे। खासकर तेल पर निर्भर कंपनियों और रिफाइनरी सेक्टर को इससे फायदा होने की उम्मीद है, क्योंकि उनका खर्च कम होगा।
हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अभी अस्थायी है, क्योंकि जमीन पर तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और जहाजों की आवाजाही अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही। इसलिए आने वाले समय में बाजार का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि यह सीजफायर स्थायी शांति में बदलता है या नहीं।

ईरान-अमेरिका युद्ध में अब तक क्या-क्या हुआ?

ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन का संघर्ष चला। यह संघर्ष अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान रहा। इसकी शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका के हमले से हुई, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने का दावा किया गया, हालाँकि ईरान ने भी इसकी पुष्टि की, तभी ईरान का नया सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह के बड़े बेटे मोजतबा खामेनेई को चुना गया।
अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान युद्ध के रड़ में उतरा और सबसे पहले खाड़ी देशों को निशाना बनाना शुरू किया। ईरान ने कुवैत, लेबनान, बहराइन से लेकर UAE को निशाना बनाया। इन खाड़ी देशों को अमेरिका का साथ देने की सजा दी गई। इस बीच ईरान के क्षेत्र में तेल का सबसे बड़ा मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने की कगार पर आ गया, जिसके चलते दुनिया में तेल का संकट आ गया। इस दौरान भारत की रणनीतिक साझेदारी दुनियाभर में तारीफ के काबिल रही, हॉर्मुज बंद होने के बावजूद भारत के कई जहाजों की आवाजाही चालू रही।
इसके बाद अमेरिका और इजरायल ने एक के बाद एक ईरान के टॉप सैन्य कमांडर को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 38 दिन के युद्ध में ईरान के सभी टॉप कमांडर को ढेर कर दिया गया। इसके बावजूद ईरान सीजफायर समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ, जिससे दुनियाभर के देशों का तेल संकट बढ़ता गया। तब जाकर ट्रंप ने ईरान को 07 अप्रैल 2026 तक की डेडलाइन दी कि अगर ईरान हॉर्मुज नहीं खोलता, तो इसका बहुत बुरा अंजाम खोलना होगा।
हालाँकि, डेडलाइन से दो घंटे पहले दोनों देशों के बीच सीजफायर समझौते पर सहमित बनी और युद्ध विराम की घोषण की गई। लेकिन यह सीजफायर केवल 2 हफ्तों के लिए ही है। ईरान का दावा है कि इन दो हफ्तों में दोनों देशों के बीच बातचीत होगी और युद्ध को स्थायी तौर पर रोकने पर भी सहमित बनेगी।

शहबाज शरीफ की इंटरनेशनल बेज्जती, ‘मध्यस्थ’ नहीं अमेरिका के ‘दलाल’ ही थे शहबाज शरीफ: ट्रंप से मिला मैसेज किया ‘कॉपी-पेस्ट’ तो जमकर हुए ट्रोल

                                 शहबाज शरीफ ने ट्रंप का मैसेज किया 'कॉपी-पेस्ट' (साभार : Grok)
मिडिल ईस्ट में पिछले 38 दिनों से चल रही विनाशकारी जंग पर बुधवार (8 अप्रैल 2026) सुबह आखिरकार ब्रेक लग गया। खास बात यह रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी डेडलाइन खत्म होने से ठीक 2 घंटे पहले सीजफायर(संघर्ष विराम) का ऐलान कर दिया।

इस शांति के पीछे पाकिस्तान का हाथ बताया जा रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के एक ‘कॉपी-पेस्ट’ ट्वीट ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। चर्चा है कि ट्रंप खुद झुकते हुए नहीं दिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शहबाज शरीफ से एक खास रिक्वेस्ट वाला ट्वीट करवाया ताकि उन्हें पीछे हटने का बहाना मिल सके। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ठीक ही कहा था कि भारत इस युद्ध में पाकिस्तान की तरह दलाली नहीं कर सकता है और अब शायद वही बात सामने भी आ रही है।

डेडलाइन से ठीक पहले ट्रंप का यू-टर्न

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार(7 अप्रैल) देर रात घोषणा की कि वह पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर से बातचीत के बाद युद्ध रोकने को तैयार हुए हैं। ट्रंप ने पहले ईरान को चेतावनी दी थी कि या तो वह झुक जाए या बड़े हमले के लिए तैयार रहे। लेकिन जैसा कि पिछले कई मौकों पर देखा गया है, ट्रंप डेडलाइन खत्म होने से ऐन पहले पीछे हट जाते हैं। माना जा रहा है कि अपनी साख बचाने के लिए उन्होंने इस बार पाकिस्तान के कंधे का इस्तेमाल किया।

‘Draft’ ट्वीट से खुली पोल, क्या ट्रंप ने लिखा था संदेश?

विवाद तब शुरू हुआ जब पीएम शहबाज शरीफ ने ‘X’ (ट्विटर) पर रात 12:46 बजे एक पोस्ट किया। इस पोस्ट की पहली लाइन में ही ‘Draft–Pakistan’s PM Message on ‘X’’ लिखा था। हालाँकि, शरीफ की टीम ने एक मिनट के अंदर ‘कॉपी-पेस्ट’ को एडिट किया, लेकिन तब तक यह मैसेज वायरल हो चुका था।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह मैसेज ट्रंप की टीम ने लिखकर पाकिस्तान भेजा था? जानकारों का कहना है कि किसी देश के PM की टीम अपने ड्राफ्ट में ‘पाकिस्तान के पीएम का मैसेज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करती। ऐसा लग रहा है जैसे ट्रंप प्रशासन ने खुद यह ड्राफ्ट तैयार किया और शहबाज शरीफ से इसे पोस्ट करने को कहा, ताकि ट्रंप को दुनिया के सामने यह कहने का मौका मिले कि वह पाकिस्तान के अनुरोध पर जंग रोक रहे हैं।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पोस्ट में क्या लिखा था?

शहबाज शरीफ ने अपने पोस्ट में बड़ी चतुराई से ट्रंप से अनुरोध किया था कि कूटनीति को एक मौका देने के लिए हमले की डेडलाइन 2 हफ्ते आगे बढ़ा दी जाए। साथ ही, उन्होंने ईरान से भी अपील की कि वे सद्भावना दिखाते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खोल दें। इसी ट्वीट को आधार बनाकर ट्रंप ने जंग रोकने का फैसला सुना दिया।

शहबाज शरीफ के लेबनान पर सीजफायर के दावे की इजरायल ने निकाली हवा (साभार : Thetribune & Indianews)
लेबनान में सीजफायर का झूठा दावा पड़ा भारी: इजरायल ने बम बरसाकर निकाली हवा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। शहबाज ने ट्वीट कर दावा किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ सीजफायर लेबनान समेत हर जगह तुरंत प्रभावी होगा।

हालाँकि, इजरायल ने इस दावे की धज्जियाँ उड़ाते हुए साफ कर दिया कि लेबनान में कोई युद्धविराम नहीं है। इजरायल ने बयान जारी करने के साथ ही लेबनान में बमबारी जारी रखकर पाकिस्तान के झूठ की हवा निकाल दी।

पाकिस्तानी PM का बड़बोलापन

शहबाज शरीफ ने खुद को ‘शांति दूत’ बताते हुए घोषणा की थी कि लेबनान में भी जंग रुक गई है। लेकिन इजरायली PM बेंजामिन नेतन्याहू ने सख्त लहजे में कहा कि यह समझौता लेबनान पर लागू नहीं होता। इजरायल का तर्क है कि हिजबुल्लाह का मोर्चा अलग है। जब तक उत्तरी सीमा सुरक्षित नहीं होती, हमले जारी रहेंगे।

इजरायल के रुख से साफ है कि पाकिस्तान को या तो समझौते की समझ नहीं है या उसने श्रेय लेने के लिए सफेद झूठ बोला। इस घटना ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के उस बयान को सच साबित कर दिया, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को ‘फीस लेकर संकट सुलझाने का दावा करने वाला दलाल’ कहा था। पाकिस्तान अब कूटनीतिक रूप से अलग-थलग और बेनकाब हो गया है।

खड़के द्वारा कुरान पर अपमानजनक बात बोलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों, "सिर तन से जुदा गैंग" और उनके आकाओं को क्या सांप सूंघ गया है?


नूपुर शर्मा द्वारा इस्लामिक किताबों में लिखी बात को बोलने पर हंगामा करने वाले उपद्रवी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के द्वारा कुरान में नहीं लिखी बात को बोलने पर क्यों खामोश हैं? क्या मुस्लिम कट्टरपंथी और उनके आका पार्टी देख उपद्रव करते हैं? जो कुरान की बात खड़के ने कही क्या सच है अगर नहीं फिर कट्टरपंथियों और उनके आकाओं की चुप्पी क्या साबित करती है? क्या अब इस्लाम का सम्मान किया जा रहा?

टीवी पर परिचर्चाओं में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता खड़के पर हो रहे प्रहारों पर कुरान टिप्पणी पर पर्दा डाल दलित कार्ड खेल बचाते नज़र आया। लेकिन अगर यही बात खड़के की बजाए किसी बीजेपी नेता ने कह दी होती उपद्रवी मुस्लिम कट्टरपंथी और उनके आका चील-कौआ की तरह चीख-चिल्लाकर "सिर तन से जुदा गैंग" सडकों पर आ गए होते, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा अपमानजनक बात बोलने पर सबको सांप सूंघ गया।

            

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के नाम से केजरीवाल की पैंट हर समय गीली रहती है; न्यायपालिका और न्यायाधीश पर पक्षपाती होने का आरोप लगा कर फंस गया केजरीवाल

सुभाष चन्द्र

केजरीवाल की मंशा है कि जस्टिस शर्मा पर हर फोरम पर आरोप लगा कर इतना दबाव बना दिया जाए कि वो स्वयं ही केस से अलग हो जाएं लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि आज जस्टिस शर्मा हैं तो कल को कोई और जज हो सकता है जिसकी इज़्ज़त उतारने में ये मक्कार पीछे नहीं रहेगा। प्रश्न न्यायपालिका और न्यायाधीश के सम्मान का है और दोनों पर आरोप लगा कर केजरीवाल ने खुलेआम Contempt of Court कर दिया

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जस्टिस शर्मा के खिलाफ केजरीवाल का विलाप साबित कर रहा है कि उनके निर्णय को काट सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता भी नहीं कर सके लेकिन केजरीवाल ने उन्हें ऐसा “manage” कर लिया कि 12,जुलाई 2024 को ED की गिरफ़्तारी मामले में जमानत तो दे दी लेकिन गिरफ्तारी वैध थी या नहीं, यह निर्णय नहीं कर सके और बड़ी बेंच को भेज दिया केजरीवाल ने सब कुछ ऐसा manage किया कि आज लगभग 2 साल बाद भी बेंच नहीं बनी है

आप एक बहुत गहरी बात समझिए कि दो जज गिरफ़्तारी के मामले पर (जिस पर जस्टिस शर्मा ने निर्णय दे दिया) फैसला नहीं कर सके लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ही दो जज राष्ट्रपति को आदेश दे देते हैं क्या चारों जज अपने ऊपर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़ा किए अपनी क़ाबलियत को लेकर? क्यों दो जज हाई कोर्ट के एक जज के फैसले को नहीं पलट सके और बड़ी बेंच को भेजा तो आदेश भी देते यह बेंच 3 महीने गठित कर दी जाए यह साबित करता है कि सारा मामला “Managed” और मैनेजर तो कई रहे होंगे अभिषेक सिंघवी मुख्य था

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा में केजरीवाल को “महिषासुरमर्दिनि” दिखाई दे रही है कि अगर उसने  सुनवाई की तो केस फिर खुलेगा जिसमें “manage” कर के “सभी Discharge” हो गए वह भी बिना ट्रायल के 

केजरीवाल ED के 9 समन पर हाजिर न हो कर जब हाई कोर्ट गया तब वहां से ही ED के सबूत देख कर आदेश मिल गया था गिरफ़्तारी का और 21 मार्च, 2024 को गिरफ्तार हुआ सिंघवी ने स्वर्ण कांता शर्मा के सामने विलाप किया कि चुनाव के समय क्यों गिरफ्तार किया गया ये अपने केजरीवाल से पूछ नवंबर,23 से 9 समन पर क्यों नहीं आया था 

अपने 8 अप्रैल, 2024 के फैसले में जस्टिस शर्मा ने साफ़ कहा था कि -

-”जांच एजेंसी के कानून के आदेश का पालन किया और रिमांड पर भेजने का मजिस्ट्रेट का आदेश भी सही था;

-ED की सामग्री से पता चलता है कि केजरीवाल ने षड़यंत्र रचा, वह पैसे के उपयोग और छिपाने में भी शामिल था;

-यह भी पता चलता है डीलरों के साथ गोवा चुनाव में आप उम्मीदवार के भी बयान हैं और पैसा गोवा भेजा गया; 

-न्यायाधीश कानून से बंधे हैं और अदालत के निर्णय राजनीतिक विचारों के बजाय कानूनी सिद्धांतों पर दिए जाते हैं और यह मामला केंद्र सरकार और केजरीवाल के बीच न होकर ED और केजरीवाल के बीच है;

-यह तय करना आरोपी का काम नहीं है कि जांच कैसे की जानी है, CM सहित किसी के लिए भी कोई विशेषाधिकार नहीं हो सकता”

अब जस्टिस शर्मा के स्पष्ट आदेशों की काट अगर सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं निकाल सके तो यह साबित करता है वे मान रहे है कि केजरीवाल की गिरफ़्तारी वैध थी जो जस्टिस शर्मा ने कही लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने जबरन लटका दिया और वह आज भी मौज कर रहा है

जनता का 55 करोड़ रुपया वकीलों पर उड़ा कर आज हाई कोर्ट में खड़ा हो गया कि जज को हटाने का केस वो खुद लड़ेगा तुषार मेहता ने कहा अपने वकील को पहले डिस्चार्ज करो फिर केस की बहस करो बड़ा बेईमान है, कहता है आज के लिए कोई वकील नहीं होगा बस मैं रहूँगा

ममता को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था आपके पास वकीलों की फ़ौज है, उन्हें ही उनका काम करने दीजिए 

पाकिस्तान में 80% Gay, 20% Bisexual: ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट हिना बलोच का दावा, कहा- इस मुल्क में कोई नहीं Straight, मजहबी दबाव में छिपाते हैं यौन पहचान


पाकिस्तान में ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट हिना बलूच ने एक हैरान करने वाला दावा किया है। हिना बलूच ने कहा कि पाकिस्तान की 80% आबादी ‘गे’ (Gay) है जबकि बाकी 20% ‘बाइसेक्शुअल’ (Bisexual) है। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और समाज में बहस तेज हो गई है।

हिना बलोच ने क्वीर ग्लोबल को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पाकिस्तान का ओपन सीक्रेट है। हिना के मुताबिक, लोग अपनी असली यौन पहचान छिपाते हैं और मजहब, संस्कृति व परिवार के दबाव की वजह से इसे खुलकर स्वीकार नहीं करते। उन्होंने यहाँ तक कहा कि पाकिस्तान में कोई भी पूरी तरह ‘स्ट्रेट’ (Straight) नहीं है।

हिना ने अपने निजी संघर्ष की बात करते हुए बताया कि बचपन में लिपस्टिक लगाने और लड़कियों जैसे कपड़े पहनने पर परिवार से मारपीट झेलनी पड़ी। उन्होंने पाकिस्तान में ‘ख्वाजा सिरा’ समुदाय की खराब हालत का भी जिक्र किया और कहा कि इस समुदाय को अक्सर भीख, नाच या सेक्स वर्क जैसे सीमित विकल्पों में धकेल दिया जाता है।

हिना बलोच सिंध मूरत मार्च की को-फाउंडर रही हैं और औरत मार्च में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि ‘प्राइड झंडा’ उठाने के कारण उन्हें अगवा किया गया और प्रताड़ित किया गया, जिसके बाद उन्हें देश छोड़कर यूके में शरण लेनी पड़ी।