दोगले पाकिस्तान ने ट्रंप की पीठ में घोंपा छुरा, ईरान के लिए खोले 6 रास्ते: हॉर्मुज की नाकाबंदी फेल


अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान ने एक बड़ा कदम उठाया है। पाकिस्तान ने ईरान के लिए व्यापार के छह नए रास्ते खोल दिए हैं। इससे ईरान को काफी राहत मिलेगी। खास बात यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर नाकाबंदी लागू की हुई है।

दरअसल, ईरान के लिए भेजे जाने वाले हजारों कंटेनर पाकिस्तान के बंदरगाहों पर फँसे हुए थे। इससे व्यापार पर भारी असर पड़ रहा था और कारोबारी परेशान था। इसीलिए अपना फायदा देखते हुए पाकिस्तान ने यह कदम उठाया। अब इन नए व्यापार के रास्तों के जरिए सामान आसानी से ईरान पहुँचाया जा सकेगा।

पाकिस्तान ने जिन व्यापार के रास्तों को दोबारा चालू किया है, वो हैं:

  • ग्वादर से गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से लियारी, ओरमारा, पसनी होकर गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से खुजदार, दलबंदिन होकर ताफ्तान
  • ग्वादरे से तुर्बत, होशाब, पंजगुर, नाग, बेसिमा, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • ग्वादर से लियारी, खुजदार, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • कराची/पोर्ट कासिम से ग्वादर होकर गब्द
इन नए रास्तों से पाकिस्तान के प्रमुख बंदरगाह, जैसे ग्वादर और पोर्ट कासिम, सीधे ईरान सीमा से जुड़ गए हैं। ये रास्ते ताफ्तान और गब्द जैसे अहम सीमा चौकियों तक पहुँचते हैं। पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जिसका अब दोनों देशों को बड़ा फायदा मिलेगा।
खास तौर पर ग्वादर से गब्द वाला रास्ता सबसे अहम माना जा रहा है। इस रास्ते से पहले जहाँ यात्रा में लगभग 18 घंटे लगते थे, वहीं अब यह दूरी केवल 3 घंटे में पूरी की जा सकेगी। इससे व्यापार तेज होगा, समय बचेगा और दोनों देशों के आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

पाकिस्तान ने कैसे अमेरिका को दिया धोखा?

पाकिस्तान के इस कदम की आलोचना इसीलिए की जा रही है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। खासकर सुरक्षा और क्षेत्रीय मामलों में दोनों देशों के रिश्ते मजबूत माने जाते हैं। लेकिन अब पाकिस्तान ने ऐसा रास्ता तैयार कर दिया है, जिससे ईरान पर अमेरिका की नाकाबंदी का असर काफी हद तक कम हो सकता है।
पाकिस्तान ने तीसरे देशों के सामान को कानूनी तौर पर अपने रास्ते ईरान भेजने की अनुमति दे दी है। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका जो ईरान पर दबाव बनाना चाहता था, वह अब कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ हिमांशु जैन और ऋचा द्विवेदी जैसे जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के इस फैसले ने अमेरिकी नाकाबंदी में एक ‘कानूनी छेद’ कर दिया है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पाकिस्तान इस क्षेत्र में अमेरिका की रणनीति के साथ कितनी मजबूती से खड़ा है।

गुजरात : बीजेपी की आंधी में उड़ गयी राहुल की कांग्रेस ; केजरीवाल पार्टी धस गयी जमीन में ;10 नगर निगमों में कांग्रेस के पास 10% से कम सीट


लोकसभा बाधित और संवैधानिक संस्थाओं को आरोपित कर सुरमाभोपाली बन रहे राहुल गाँधी को नहीं मालूम की वह कांग्रेस के लिए बहादुरशाह ज़फर बन चुके हैं। अभी पांच राज्यों में हुए चुनावों के परिणाम भी आने शेष हैं। लेकिन exit poll भी कांग्रेस का डिब्बा गुल ही दिखा रहा है। असलियत तो मई 4 को सामने आएगी। बरहाल गुजरात ने राहुल की कांग्रेस और केजरीवाल की पार्टी को जो उनकी जगह होनी चाहिए पहुंचा दिया है।   

गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एकतरफा जीत हासिल की है। खास बात यह है कि कुल 15 महानगरपालिकाओं में हुए चुनाव में भाजपा ने सिर्फ जीत ही नहीं बल्कि भारी बहुमत से विजय दर्ज की है। अब स्थिति ऐसी बन गई है कि इन 15 में से 10 महानगरपालिकाओं में आधिकारिक विपक्ष भी नहीं रहेगा।

आमतौर पर महानगरपालिकाओं की सामान्य सभा के संचालन के लिए अपने नियम होते हैं लेकिन सामान्य नियमों के अनुसार विपक्ष में बैठने के लिए कुल सीटों का कम से कम 10 प्रतिशत होना जरूरी होता है। फिलहाल स्थिति यह है कि केवल 5 महानगरपालिकाओं में ही कांग्रेस के पास 10% से अधिक सीटें हैं। इनमें अहमदाबाद, आनंद, भावनगर, गांधीधाम और वापी शामिल हैं।

अहमदाबाद में कांग्रेस ने 192 में से 32 सीटें जीती हैं। आनंद में 52 में से 8, भावनगर में 52 में से 8, गांधीधाम में 52 में से 11 और वापी में 52 में से 11 सीटें कांग्रेस को मिली हैं। वहीं, BJP को अहमदाबाद में 160, आनंद में 43, भावनगर में 44, गांधीधाम में 41 और वापी में 37 सीटें मिली हैं।

10 नगर निगमों में कांग्रेस के पास 10% से कम सीट

इसके अलावा सूरत, वडोदरा, राजकोट, नडियाद, सुरेंद्रनगर, पोरबंदर, मोरबी, नवसारी, मेहसाणा और जामनगर महानगरपालिकाओं में कांग्रेस 10% सीटें भी हासिल नहीं कर पाई है। मोरबी और पोरबंदर में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली और BJP ने सभी सीटों पर जीत दर्ज की है। सूरत, सुरेंद्रनगर और नडियाद में कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1-1 सीट मिली है। नवसारी और जामनगर में कांग्रेस को 2-2 सीटें मिली हैं।

राजकोट में विपक्ष का दर्जा पाने के लिए जरूरी 8 सीटों के मुकाबले कांग्रेस के पास 7 सीटें हैं, जबकि मेहसाणा में 6 की जरूरत के मुकाबले कांग्रेस को 5 सीटें मिली हैं। इन सभी जगहों पर आम आदमी पार्टी (AAP) का प्रदर्शन भी खास नहीं रहा और इसलिए संयुक्त विपक्ष बनने की भी कोई संभावना नहीं दिखती। AAP को सूरत में 4 और जामनगर में 2 यानी कुल 6 सीटें ही मिली हैं। सूरत में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की सीटें मिलाकर भी विपक्ष के लिए जरूरी 10% आँकड़ा पूरा नहीं होता, जहाँ 120 में से भाजपा के पास 115 सीटें हैं।

हालाँकि यह नियमों की बात है। कई बार नियमों से अलग जाकर सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को विपक्ष का पद दे देता है। पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब सिर्फ एक सीट होने के बावजूद कांग्रेस को विपक्ष के नेता का पद दिया गया है।

राहुल और केजरीवाल में मची "उपद्रवी नंबर 1" बनने की होड़; ‘अंतरात्मा की आवाज’ के नाम केजरीवाल ने कोर्ट को दिखाई ‘पीठ’, बताया ‘गाँधी’ का रास्ता: कैसे न्यायपालिका को चोट पहुँचाने का है प्रयास

              अरविंद केजरीवाल, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा (साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यूज ऑन एआईआर)
इस समय कांग्रेस के राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल दोनों में "उपद्रवी नंबर 1" बनने की जबरदस्त होड़ मची हुई है। दोनों ही की पार्टियां चुनाव हार रही है। गुजरात निकाय चुनावों में तो केजरीवाल पार्टी हवा हो गयी। पांच राज्यों में हुए चुनावों में कहीं नहीं। अब जनता में बने रहने के लिए कोई उपद्रव तो करना है। राहुल का लोकसभा में हंगामा और लोकसभा बाधित करने का ड्रामा देखते ही रहते हैं। संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। ऐसे में केजरीवाल क्यों पीछे रहे। केजरीवाल ने तो जस्टिस स्वर्ण कान्ता शर्मा पर ही सवाल खड़ा कर तीसमारखाँ बन सुर्खियां बटोरने में लगे हैं। वैसे इन दोनों के उछलने में न्यायपालिका का भी बहुत बड़ा योगदान है, जिसे न्यायपालिका झुठला नहीं सकती। प्राथमिकता पर इनके मुकदमों की सुनवाई और जमानत दे देना। वकील का नाम और शक्ल देख केस को तावोच्य देना।  

खैर, केजरीवाल ने जो जस्टिस स्वर्ण कान्ता शर्मा पर आरोप लगाए है सुप्रीम कोर्ट ने क्या कार्रवाही की? क्या कोई जज को किसी आयोजन में जाने के लिए नेताओं से इजाजत लेनी पड़ेगी? नेता चाहे किसी भी फंक्शन में चला जाए लेकिन जज नहीं, क्यों? इस गंभीर मसले पर सुप्रीम कोर्ट को मंथन करना चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब इन नेताओं का अनुसरण करते अन्य आरोपी कोर्ट का बहिष्कार करे तो उस पर भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो। क्योकि आरोपी का वकील भी इन्ही केसों का reference देगा। नेताओं और सामान्य के लिए अलग कानून नहीं होना चाहिए।         

दिल्ली के शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अब उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से पेश नहीं होंगे। 

पत्र में केजरीवाल ने क्या कहा?

केजरीवाल के अनुसार, यह फैसला उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया। उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘सत्याग्रह’ का हवाला देते हुए लिखा कि जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, न्याय की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कदम उठाना चाहिए, चाहे उसके परिणाम उसके खिलाफ ही क्यों न जाएँ।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अब इस केस में न तो खुद कोर्ट में पेश होंगे और न ही उनके वकील उनकी ओर से कोई दलील देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस निर्णय के संभावित कानूनी परिणामों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगे चलकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जाने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

जानिए क्या कहता है कानून?

अब यहाँ सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि कानून इस पूरे घटनाक्रम को किस नजरिए से देखता है। आज तक ने इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत की है और बताया है कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तामता ने विस्तार से कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।

उनके अनुसार, जब किसी आरोपित को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलती है, तब भी उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत एक बॉन्ड भरना होता है। यह बॉन्ड आमतौर पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत होता है, जिसमें आरोपित यह वादा करता है कि यदि हाई कोर्ट में अपील होती है, तो वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होगा।

इस मामले में भी केजरीवाल ने ऐसा बॉन्ड भरा है। मतलब वह कानूनी रूप से बाध्य हैं कि हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान उपस्थित रहें। यदि वह कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो यह बॉन्ड का उल्लंघन माना जाएगा और कोर्ट उनके खिलाफ पहले जमानती वारंट जारी कर सकती है।

यदि इसके बावजूद भी वे पेश नहीं होते हैं, तो गैर-जमानती वारंट भी जारी किया जा सकता है। कानून का एक और महत्वपूर्ण पहलू इस मामले में सामने आता है, जिसे ‘एकतरफा सुनवाई’ या Ex-Parte कहा जाता है। यदि कोई आरोपित कोर्ट में उपस्थित नहीं होता है, तो कोर्ट उसके बिना ही सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।

इसका मतलब यह होता है कि केवल जाँच एजेंसी या विरोधी पक्ष की दलीलें सुनी जाएँगी और आरोपित को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलेगा। यदि इस तरह की सुनवाई में फैसला जाँच एजेंसी के पक्ष में जाता है, तो ट्रायल कोर्ट का राहत देने वाला फैसला पलट सकता है और मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है।

ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल को फिर से आरोपित के रूप में पेश होना पड़ सकता है और पूरी कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हो सकती है।

 जानिए क्या है पूरा मामला?

मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की शराब नीति से जुड़ा है, जिस पर आरोप लगे कि इसमें नियमों को बदलकर कुछ निजी पक्षों को फायदा पहुँचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। जाँच एजेंसियों ने इस केस में केजरीवाल समेत कई लोगों को आरोपित बनाया और लंबी जाँच के बाद मामला कोर्ट तक पहुँचा।

इस केस में 27 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए केजरीवाल और अन्य आरोपितों को राहत दे दी। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने जाँच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए और जाँच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश तक कर दी।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जाँच एजेंसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। यह अपील जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने आई। हाई कोर्ट ने सुनवाई के शुरुआती चरण में ट्रायल कोर्ट के कुछ निर्देशों पर रोक लगाई और मामले को आगे सुनने का निर्णय लिया।

यहीं से इस केस ने एक नया मोड़ लिया, क्योंकि अब यह सिर्फ ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा नहीं रह गया था, बल्कि हाईकोर्ट में पूरी प्रक्रिया फिर से खुलने की स्थिति बन गई थी।

अरविंद केजरीवाल के बेतुके माँग ने मोड़ा केस का रुख

इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने माँग की कि इस केस की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से हटाकर किसी दूसरी बेंच को दे दी जाए। इस माँग के पीछे उन्होंने ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं।

चूँकि इस केस में जाँच एजेंसी केंद्र सरकार के अधीन है और उसकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश होते हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि किसी जज के रिश्तेदार वकालत करते हैं या किसी पैनल में हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वह पक्षपाती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह के आधार पर जज खुद को अलग करने लगें, तो न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा और हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की कोशिश करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी आरोपित या पक्षकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह तय करे कि उसका केस कौन सा जज सुनेगा।

जब उनकी यह माँग खारिज हो गई, तो इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को एक विस्तृत पत्र लिखा। यह पत्र इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। इस पत्र में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अब इस कोर्ट से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट की कार्यवाही सख्त नियमों और प्रक्रियाओं के तहत चलती है। इसमें व्यक्तिगत असहमति के आधार पर कोर्ट में पेश न होना न केवल खुद के केस को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।

यदि केजरीवाल कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो हाई कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है, जिसमें वारंट जारी करना और एकतरफा सुनवाई शामिल है। वहीं यदि हाई कोर्ट जाँच एजेंसी की अपील को स्वीकार कर लेता है, तो मामला फिर से निचली अदालत में जा सकता है और कानूनी लड़ाई एक बार फिर नए सिरे से शुरू हो सकती है।

क्या हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों की पराकाष्ठा ममता को ले डूबेगी? असम में BJP लगाएगी जीत की हैट्रिक: तमिलनाडु में DMK तो केरल में UDF सरकार के आसार


पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों की वोटिंग खत्म होने के बाद अब एग्जिट पोल के नतीजे सामने आ गए हैं। इन रुझानों ने कहीं सत्ता परिवर्तन तो कहीं पुरानी सरकार की वापसी के संकेत दिए हैं। सबसे बड़ी खबर पश्चिम बंगाल से है, जहाँ कई सर्वे में BJP को बहुमत मिलने का अनुमान जताया गया है।

बंगाल में बीजेपी आने का सनातन विरोधी और कालनेमि हिन्दुओं को साफ संकेत होगा कि युगों-युगों अतिप्राचीन सनातन का विरोध अब बर्दाश्त नहीं होगा। यह पहला ऐसा चुनाव है जिसमे ममता ने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की और ना ही चोटिल होने का कोई स्वांग रचा। चर्चा यह भी सुनने को आ रही है कि मतदान ख़त्म होने से पहले TMC में भगदड़ होने लगी है। परदे के पीछे बाबरी मस्जिद का समर्थन भी ममता को ले डूबेगा। बंगाल में पासे पलटने के लिए हर हिन्दू को चुनाव आयोग द्वारा सख्ती करने के लिए धन्यवाद् देना होगा। अगर चुनाव आयोग ने स्थानीय पुलिस को पोलिंग बूथ से दूर नहीं रखा होता जैसा एग्जिट पोल दिखा रहे हैं संभव नहीं हो पता। यही वजह है कि बंगाल में इतना भारी मतदान हुआ। कई वृद्ध लोगों को यह तक कहते सुना कि "जिन्दगी में पहली बार वोट दिया पहले तो घर से निकले बिना ही वोट डाल दिया जाता था।    

दूसरे, असम में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आये हिमंत सरमा का लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर राहुल गाँधी और इसकी गुलामी करने वालों को राजनीति छोड़ देनी चाहिए। हिमंत वही स्वाभिमानी व्यक्ति है जिसे राहुल से मिलने जाने पर राहुल द्वारा अपने कुत्ते द्वारा जो बिस्कुट नहीं खाया उसे हिमंत को देना बहुत भारी पड़ा। इतनी बेइज्जती देख कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए।  

बाबरी मस्जिद की आड़ में बंगाल में पैर ज़माने की कोशिश करने वाले असदुद्दीन ओवैसी कहीं दिखाई नहीं दे रहे। ओवैसी को दलित हिन्दुओं का रोना रोने से पहले मुस्लिम समाज में उस जातिगत सियासत के लिए सड़क पर आना चाहिए, जहाँ शिया, सुन्नी, अहमदी, पठान, वहाबी और पासमांदा आदि फिरके एक दूसरे की मस्जिद में नमाज और दूसरे के कब्रिस्तान में अपने मुर्दे को दफना नहीं सकते, क्यों नहीं इस भेदभाव को ख़त्म करने की आवाज़ उठाते? ओवैसी जानते है कि जिस दिन उस खतरनाक मुद्दे पर मुंह खोला कोई मुसलमान भी इसकी पार्टी को वोट नहीं देगा। 

वहीं, असम में BJP तीसरी अपनी सत्ता बचाती दिख रही है। केरल और तमिलनाडु में क्षेत्रीय और विपक्षी गठबंधन मजबूत नजर आ रहे हैं। असली नतीजे 4 मई को आएँगे, लेकिन Exit Poll ने हार-जीत की चर्चा तेज कर दी है।

पश्चिम बंगाल: क्या दीदी का किला ढहेगा?

 पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर आए Exit Poll ने सबको चौंका दिया है। पोल ऑफ पोल्स के अनुसार BJP 149 सीटों के साथ बहुमत के पार जा सकती है, जबकि TMC को 140 सीटें मिलने का अनुमान है।

पी-मार्क ने BJP को 150 से 175 और टीएमसी को 118 से 138 सीटें दी हैं।

वहीं जेवीसी के मुताबिक BJP 138-159 और टीएमसी 131-152 के बीच रह सकती है।

मैट्रीज ने BJP को 146-161 और टीएमसी को 125-140 सीटें दी हैं।

चाणक्य स्ट्रैटेजीज ने भी BJP को 150-160 सीटों के साथ आगे रखा है।

हालाँकि, पीपुल्स पल्स ने टीएमसी की वापसी का दावा करते हुए उन्हें 178-187 सीटें दी हैं।

असम: फिर से बीजेपी सरकार के संकेत

असम में बहुमत का आँकड़ा 64 है। पोल ऑफ पोल्स ने NDA को 92 और कॉन्ग्रेस प्लस को 30 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने NDA को 88-100 और कॉन्ग्रेस प्लस को 24-36 सीटें दी हैं।

पोल डायरी ने एनडीए को 86-101 और पी-मार्क ने 82-94 सीटें मिलने की बात कही है।

मैट्रीज ने एनडीए को 85-95 और कॉन्ग्रेस प्लस को 25-32 सीटें दी हैं।

जेवीसी एग्जिट पोल ने एनडीए को 88-101 सीटें दी हैं।

जनमत पोल्स ने भी एनडीए को 87-98 सीटों के साथ बड़ी जीत दी है। हालाँकि पीपुल्स पल्स ने यहाँ कड़ा मुकाबला बताते हुए एनडीए को 68-72 और कॉन्ग्रेस प्लस को 22-26 सीटें दी हैं।

तमिलनाडु: DMK और ADMK के बीच काँटे की टक्कर

तमिलनाडु की 234 सीटों पर बहुमत का आँकड़ा 118 है। पोल ऑफ पोल्स के मुताबिक DMK गठबंधन (SPA) को 122 और NDA को 95 सीटें मिल सकती हैं।

पीपुल्स पल्स और पी-मार्क दोनों ने ही SPA को 125-145 सीटें देकर स्पष्ट बहुमत का इशारा किया है, जबकि NDA को इन दोनों सर्वे में क्रमशः 65-80 और 65-85 सीटें दी गई हैं।

मैट्रीज ने SPA को 122-132 और एनडीए को 87-100 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया का सर्वे थोड़ा अलग है, जिसने एसपीए को 92-100 और एनडीए को 22-32 सीटें दी हैं, लेकिन अन्य (OTH) को 98-120 सीटें देकर मुकाबला फँसा दिया है।

हालाँकि, जन की बात (JAN KI BAAT) ने यहाँ NDA की जीत का दावा करते हुए उन्हें 128-147 सीटें दी हैं।

केरल: सत्ता बदलने का रिवाज रह सकता है कायम

केरल में इस बार यूडीएफ (UDF) बाजी मारता दिख रहा है। पोल ऑफ पोल्स के अनुसार यूडीएफ को 72 और एलडीएफ को 63 सीटें मिल सकती हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने यूडीएफ को 78-90 और एलडीएफ को 49-62 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।

मैट्रीज ने यूडीएफ को 70-75 और पी-मार्क ने 72-79 सीटें दी हैं।

पीपुल्स पल्स के मुताबिक भी यूडीएफ 75-85 सीटों के साथ सरकार बना सकता है, जबकि एलडीएफ 55-65 सीटों पर सिमट सकता है।

पुडुचेरी: NRC गठबंधन की बढ़त

30 सीटों वाले पुडुचेरी में बहुमत के लिए 16 सीटें चाहिए। पोल ऑफ पोल्स ने यहाँ NDA को 19 और SPA को 8 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने NDA को 16-20 और एसपीए को 6-8 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।

पीपुल्स पल्स के मुताबिक एनडीए 16-19 और एसपीए 10-12 सीटें ला सकता है।

जेवीसी एग्जिट पोल ने एनडीए को 15-17 और एसपीए को 11-13 सीटें दी हैं।

प्रजा पोल ने एनडीए को 19-25 और कामाख्या एनालिटिक्स ने 17-24 सीटें देकर एनडीए की एकतरफा जीत का दावा किया है।

पौराणिक गाथा : भगवान नरसिम्हा जयंती पर लक्ष्मी नरसिम्हा कथा


हमारे भगवान इतने दयालु है कि तपस्या करने वाले को उसका मनचाह वरदान भी दे देते हैं, लेकिन वरदान देने उपरांत उस वरदान का तोड़ भी अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं। लंकाधिपति रावण को ही लीजिए। जिसे एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि रावण जैसा महाज्ञानी, महातपस्वी और महान पंडित न हुआ है और न ही होगा। रावण को बोध था कि उसकी मृत्यु किस कारण होगी और किसके हाथों होगी। माता सीता का हरण किया लेकिन अपने महल में नहीं महल से अलग उपवन में रखा। रावण को मालूम कि जगतजननी जगदम्बा को लेने मेरा काल यानि जगत के पालनहार विष्णु राम रूप में आकर मुझे मोक्ष दिलवाने आएंगे। इस बात का उल्लेख रामानंद सागर की कृति "रामायण" में कुम्भकर्ण के श्रीमुख से सुनने को मिलता है।   
कहते हैं कि रावण को तीन जन्मों में मुक्ति मिली थी और तीनों ही बार जगत के पालनहार विष्णु को अलग-अलग रूप में धरती पर आना पड़ा था। तीन जन्म थे रावण, कंस और हिरणकश्यपु। रावण के राम, कंस के लिए कृष्ण और हिरणकश्यपु के लिए नरसिम्हा अवतार।      
इसी तरह प्राचीन काल की बात है। सत्ययुग में, ब्रह्मा जी के वरदान से दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। वह इतना शक्तिशाली हो गया था कि देवता भी उससे भयभीत रहते थे। उसने घोषणा कर दी थी कि न वह आकाश में मरेगा, न धरती पर, न दिन में, न रात में, न अस्त्र से, न शस्त्र से। उसकी अहंकार की कोई सीमा न थी।

हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। बालक प्रह्लाद दिन-रात “नारायण, नारायण” का जाप करता। पिता के क्रोध को वह जानता था, फिर भी वह अपने आराध्य से विमुख नहीं हुआ। हिरण्यकशिपु ने पुत्र को मारने के अनेक प्रयास किए — विष दिया, हाथी से कुचलवाया, आग में फेंका, पहाड़ से गिरवाया — पर हर बार भगवान विष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा की।
अंततः हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को चुनौती दी, “अगर तेरा नारायण सर्वव्यापी है तो वह इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने निडर होकर कहा, “हाँ पिता, वह हर जगह हैं।”
जैसे ही हिरण्यकशिपु ने क्रोध में खंभा तोड़ा, उसमें से भगवान विष्णु का नरसिम्हा अवतार प्रकट हुआ — आधा नर, आधा सिंह। उनके शरीर से दिव्य ज्योति फूट रही थी। सिंह का मुख, नख, और दांत अत्यंत भयंकर थे, जबकि शरीर मनुष्य का था। नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को उठाया, द्वार के चौखट पर रखा (जो न धरती थी न आकाश), संध्या काल में (जो न दिन था न रात), और अपने नखों से उसका उदर फाड़ दिया। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान की शर्तें पूरी हुईं और दैत्यराज का अंत हुआ।
लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती।
नरसिम्हा अवतार इतने उग्र और क्रोधित थे कि सारा ब्रह्मांड काँप उठा। देवता, ऋषि-मुनि सभी भयभीत हो गए। कोई भी उनके सामने जाने का साहस नहीं कर पा रहा था। नरसिम्हा का क्रोध शांत न हो रहा था। उन्होंने हिरण्यकशिपु के रक्त से अपने नख धोए और सिंहनाद किया। पृथ्वी हिलने लगी।
तब लक्ष्मी जी, जो सदा विष्णु के साथ रहती हैं, प्रकट हुईं। वे अपने पति के इस भयंकर रूप को देखकर भी निर्भय थीं। लक्ष्मी जी ने सुंदर वस्त्र पहने, दिव्य आभूषण धारण किए और हाथ में कमल व धनुष-बाण लिए नरसिम्हा के समीप पहुँची।
वन की शांत जगह में, जहाँ प्रह्लाद खड़ा था, लक्ष्मी जी ने नरसिम्हा के सामने घुटनों के बल बैठे सिंह-पुरुष को देखा। उनका क्रोध अभी भी उफान पर था। लक्ष्मी जी ने धीरे से आगे बढ़कर नरसिम्हा का हाथ अपने हाथों में लिया। उनकी कोमल उँगलियाँ उस भयंकर नखों को छू रही थीं।
“प्रभु,” लक्ष्मी जी ने मधुर स्वर में कहा, “आपका क्रोध अब शांत हो। आपने धर्म की रक्षा की, भक्त की रक्षा की। अब संसार को आपके करुणामय रूप की भी आवश्यकता है।”
नरसिम्हा ने गर्जना की। उनकी आँखें अभी भी लाल थीं। लक्ष्मी जी ने डरते हुए भी उनका सिर अपने कंधे पर टिका दिया। उन्होंने अपने आँचल से नरसिम्हा के मुख का रक्त पोंछा। धीरे-धीरे नरसिम्हा का क्रोध कम होने लगा। लक्ष्मी जी की प्रेमपूर्ण दृष्टि और स्पर्श ने उनके हृदय को शांत किया।
तब लक्ष्मी जी ने कहा, “हे नरसिम्हा, आप मेरे पति हैं। मैं आपकी शक्ति हूँ, आपकी शांति हूँ। जब आप क्रोधित होते हैं तो मैं आपके पास आती हूँ। लक्ष्मी नरसिम्हा के रूप में आपकी पूजा हो।”
नरसिम्हा का क्रोध धीरे-धीरे शांत हुआ। उनकी आँखों में करुणा झलकने लगी। उन्होंने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया और लक्ष्मी जी को अपने वक्ष से लगा लिया। उस क्षण से वे लक्ष्मी नरसिम्हा कहलाए।
इस घटना के बाद लक्ष्मी नरसिम्हा की पूजा विशेष रूप से प्रचलित हुई। जो भक्त इनकी उपासना करता है, उसे धन, समृद्धि और शत्रु-नाश दोनों प्राप्त होते हैं। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम मंदिर में नरसिम्हा के नौ रूपों की पूजा होती है, जहाँ लक्ष्मी जी भी विराजमान हैं।
कथा कहती है — जब अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, तब भगवान नरसिम्हा रूप में प्रकट होते हैं। लेकिन उनके क्रोध को शांत करने वाली केवल उनकी प्रियतमा लक्ष्मी ही होती हैं।
आज भी लाखों भक्त “लक्ष्मी नरसिम्हा” का जाप करते हैं। कहते हैं कि जो इस कथा को श्रद्धा से सुनता है, उसके घर में लक्ष्मी का वास और नरसिम्हा की सुरक्षा सदैव बनी रहती है।

पांच राज्यों के एग्जिट पोल आने शुरू हो गए; प्रधानमंत्री पद के सपने देखने वाले केजरीवाल की पार्टी ने कहीं चुनाव नहीं लड़ा? गुजरात में भी भाजपा को नहीं उखाड़ सका करवा लिया सुपरा साफ

सुभाष चन्द्र

यह मैंने कटाक्ष किया है कि प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने वाले शराब घोटाले के आरोपों में घिरे गांधी जी के नाम का सहारा लेने वाले केजरीवाल की पार्टी ने क्या पांचो राज्यों में कहीं चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं की?

सूरत निगम के लिए मनीष सिसोदिया ने कहा था “मैं गारंटी से कह सकता हूँ कि इस बार निगम में “आप” का राज होगा क्या हुआ गारंटी का? गई घुइया के खेत में जो पिछली बार की 27 सीट की जगह केवल 4 सीट ही जीत पाई “आप” और कांग्रेस को केवल एक सीट मिली

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भाजपा का प्रदर्शन गुजरात निकायों के चुनावों में जबरदस्त रहा है। 15 महानगर पालिका और 34 जिला पंचायतों में भाजपा का कब्ज़ा बना रहा नगरपालिका, जिला पंचायत और तहसील पंचायत में 90% सीट भाजपा ने जीती हैं 

पिछले चुनाव में कांग्रेस को 15 निगमों में 55 सीट मिली थी जो अबकी जबरदस्त प्रदर्शन करके 95 कर ली हैं मतलब शतक नहीं लग पाया अहमदाबाद में 32 सीट मिली है जबकि अन्य सभी निगमों में आंकड़ा एक अंक में सिमट कर रह गया

केजरीवाल सबसे ज्यादा खुश है कि पिछली बार से 10 गुना सीट जीत ली ऐसे ही ख्यालों से सोच रहा है अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को उखाड़ फेंकेगा जबकि उस समय तक तो जेल जाने की नौबत आ जाएगी 10 गुना सीट जीतने वाले यह भी तो देख सूरत में 575% सीट कम हुई हैं

एक आश्चर्यजनक परिणाम सामने आया है गोधरा में 100% मुस्लिम वोटर होने के बाद भी वहां से हिंदू महिला चुनाव जीत गई है

वैसे सूरत से एक और मजेदार परिणाम आया है ओवैसी की पार्टी ने पिछली बार 7 सीट जीती थी और अबकी बार पार्टी जीरो पर आउट हो गई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात की जनता का भाजपा को निगमों और पंचायत चुनावों में जोरदार समर्थन देने के लिए आभार व्यक्त किया है

महानगर पालिका, नगर पालिका, जिला पंचायत, और तहसील पंचायत में प्रचंड जीत इशारा करती है कि कि भाजपा की जनता पर जमीनी स्तर पर पकड़ बहुत मजबूत हैं क्योंकि इनका प्रभाव शहरो से लेकर गांवो तक होता है 2021 में विधानसभा चुनाव में इतिहास की सबसे अधिक 156 सीट भाजपा को मिली थी शायद इसलिए ही ममता के सांसद युसूफ पठान ने कहा है कि 40-50 साल तक गुजरात में भाजपा को कोई नहीं हरा सकता, बस केजरीवाल सपने देख सकता है और जनता से झूठ बोल सकता है कि मोदी और भाजपा ने गुजरता को बर्बाद कर दिया

चुनाव आयोग की इतनी सख्ती के बावजूद कहीं लाठी-रॉड चले तो कहीं EVM पर चिपकाया टेप… बंगाल में दूसरे फेज की वोटिंग के दौरान TMC के गुंडे जगह-जगह कर रहे हिंसा

                                 बंगाल में TMC के गुंडों की हिंसा (फोटो साभार : X_@ians_india)
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे फेज के लिए बुधवार (29 अप्रैल 2026) को 142 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं। आँकड़ों के अनुसार, सुबह 11 बजे तक करीब 39.97% मतदान हो चुका है। हालाँकि, वोटिंग के बीच राज्य के अलग-अलग जिलों से हिंसा और हंगामे की डराने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं।

ऐसे उपद्रवियों की कम से कम 6 साल पहले जमानत पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए। 

दक्षिण 24 परगना से लेकर हुगली तक, BJP और TMC कार्यकर्ताओं के बीच जमकर झड़पें हुई हैं। बता दें कि 2021 में इन सीटों पर TMC ने एकतरफा जीत हासिल की थी, जबकि इस बार पहले फेज में 23 अप्रैल को 93% बंपर वोटिंग हुई थी। चुनाव के नतीजे 4 मई को आएँगे।

बीजेपी कैंडिडेट की गाड़ी के तोड़े शीशे

 दक्षिण 24 परगना जिले में सबसे ज्यादा तनाव देखा जा रहा है। यहाँ BJP उम्मीदवार विकास सरदार ने आरोप लगाया कि TMC के गुंडों ने उनकी कार पर हमला बोल दिया और पत्थरों से गाड़ी के शीशे चकनाचूर कर दिए। इतना ही नहीं, TMC के गुंडों ने विकास सरदार की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी से उसकी बंदूक छीनने तक की कोशिश की। इस हमले के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

महिला उम्मीदवार पर हमला और लाठी-रॉड की जंग

पानीहाटी से BJP उम्मीदवार रत्ना देबनाथ ने आपबीती बताते हुए कहा कि वह बूथ के अंदर सब ठीक देखकर बाहर निकल रही थीं। बाहर उन्होंने एक बीमार बुजुर्ग महिला की मदद के लिए किसी को कहा, तभी TMC के गुंडों ने उन्हें घेर लिया।

BJP उम्मीदवार रत्ना का आरोप है कि TMC के गुंडों ने उन पर हमला किया और उन्हें वहाँ से बाहर निकलने से रोकने की कोशिश की। वहीं, नादिया के छपरा में BJP कार्यकर्ता मोशर्रफ मीर ने आरोप लगाया कि उन पर TMC कार्यकर्ताओं ने लाठी और रॉड से हमला किया है।

हुगली में ‘नकली पोलिंग एजेंट’ पर भिड़े समर्थक

हुगली जिले के खानकुल में मतदान के दौरान तब अफरा-तफरी मच गई जब TMC और लेफ्ट समर्थित ISF के कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। आरोप है कि बूथ नंबर 147 पर ‘नकली पोलिंग एजेंट’ बैठाए गए थे, जिसे लेकर दोनों गुटों में मारपीट हो गई। हालाँकि, मौके पर मौजूद सीआरपीएफ (CRPF) की महिला बटालियन की सब-इंस्पेक्टर उषा ने इसे छोटी घटना बताते हुए कहा कि अब वहाँ शांति है और वोटिंग जारी है।

EVM के बटन पर चिपकाया टेप, हावड़ा में पुलिस ने 2 को दबोचा

चुनाव में धांधली के भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। डायमंड हार्बर की फलता विधानसभा सीट से BJP उम्मीदवार देवांगशु पांडा ने दावा किया कि कई बूथों पर EVM मशीन में बीजेपी के चुनाव चिन्ह वाले बटन पर टेप चिपका दिया गया था ताकि लोग कमल का बटन न दबा सकें।
उधर, हावड़ा के बाली में भी ईवीएम को लेकर हुए भारी हंगामे के बाद CRPF ने दो लोगों को हिरासत में ले लिया है।

बीजपुर में निर्दलीय प्रत्याशी से मारपीट

हिंसा की लपटें बीजपुर तक भी पहुँचीं, जहाँ एक निर्दलीय प्रत्याशी और कांचरापाड़ा म्युनिसिपैलिटी के काउंसलर के बीच मारपीट की घटना सामने आई है। मतदान के शुरुआती घंटों में ही इस तरह की हिंसा ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी समर्थक कई जगहों पर दोबारा चुनाव कराने की भी माँग कर रहे हैं।

बंगाल चुनाव में EVM से गायब हुई BJP: कमल छाप वाले बटन पर टेप चिपकाया, Video सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने कहा- दोबारा कराएँगे मतदान

              बंगाल के फाल्टा विधानसभा के बूथ में EVM पर टेप लगाने का वीडियो आया सामने (फोटो साभार: X)
पश्चिम बंगाल में बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण की 142 सीटों पर मतदान जारी है। इसी बीच TMC गुंडों की हिंसा और EVM से छेड़छाड़ की घटनाएँ सामने आ रही हैं। ऐसी ही एक वीडियो दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर शहर की फाल्टा/फलटा (Falta) विधानसभा से सामने आई, जहाँ बूथ 144 के EVM पर BJP के बटन पर टेप चिपकाया गया। इसी विधानसभा क्षेत्र से जहाँगीर खान TMC के उम्मीदवार हैं।
चुनाव आयोग को मतदान केंद्र पर नियुक्त सभी कर्मचारी और अधिकारियों को बर्खास्त कर देना चाहिए। और अदालतों को भी ऐसे कर्मचारी और अधिकारियों पर नरमाई बरतने की बजाए कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। 

बीजेपी नेता अमित मालवीय ने इस घटना का वीडियो शेयर करते हुए कहा, “ममता बनर्जी इसी बात का बचाव कर रही थीं जब उन्होंने डायमंड हार्बर के फाल्टा से TMC के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अपराधी जहाँगीर खान के लिए आवाज उठाई।” अमित मालवीय ने ऐसे कई बूथों पर BJP के बटन पर टेप लगाए जाने का दावा किया।

उन्होंने इस घटना को तथाकथित ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ बताते हुए कहा, “वही मॉडल जिसने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लोकसभा सीट हासिल करने में मदद की थी।”

यह तथाकथित “डायमंड हार्बर मॉडल” है, वही मॉडल जिसने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लोकसभा सीट हासिल करने में मदद की थी। अमित मालवीय ने फाल्टा के ऐसे सभी बूथों पर दोबारा मतदान कराने की माँग की है, जहाँ EVM पर BJP के बटन पर टेप लगा दिया गया।

चुनाव आयोग की कार्ऱवाई

घटना का वीडियो सामने आने के बाद बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार ने संबंधित बूथ में दोबारा मतदान का निर्देश दिया है।

उल्लेखनीय है कि बंगाल चुनाव में मतदान शुरू होने से पहले चुनाव आयोग ने सख्ती से निर्देश दिए थे कि अगर किसी भी मतदान केंद्र में EVM से छेड़छाड़ की घटना सामने आती है तो कार्रवाई की जाएगी। इस निर्देश में खास तौर से EVM पर टेप, गोंद या परफ्यूम लगाने का भी जिक्र किया गया था।

विधानसभा से TMC उम्मीदवार है जहाँगीर खान

EVM पर टेप लगाने की घटना उसी फाल्टा विधानसभा क्षेत्र से सामने आई है, जहाँ से TMC के टिकट पर जहाँगीर खान चुनाव लड़ रहे हैं। जहाँगीर खान वही व्यक्ति हैं, जिनके समर्थकों को यूपी के IPS अफसर अजय पाल शर्मा ने एक वीडियो में मतदाताओं को डराने-धमकाने को लेकर हड़काया था। इस विवाद पर TMC लगातार जहाँगीर खान का पक्ष लेते हुए IPS अफसर को बंगाल चुनाव से हटाने की माँग कर रही है।

जम्मू-कश्मीर : आतंकवादी बनाने वाली फैक्ट्री(मदरसा) पर लग गया ताला : इस मदरसे से तालीम लेकर निकल रहे थे बड़े-बड़े आतंकी

  शोपियां में जिस सिराज-उल-उलूम से निकले कई आतंकी, उस मदरसे को किया गया सील (साभार: DainikJagran)

जम्मू-कश्मीर के इमाम साहिब शोपियां स्थित राज्य के सबसे बड़ा मदरसा ‘दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम’ पर आतंकी गतिविधियों के चलते ताला लग गया है। मदरसे को प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी ने खड़ा किया था, जिससे कई आतंकी निकले थे। पुलवामा हमले का आतंकी सज्जाद अहमद भट ने भी इसी मदरसे से तालीम ली थी।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गहन छानबीन करने पर आतंकवादियों को पनाह देने वाले बहुत ठिकाने सामने आएंगे। यह तो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर भी नहीं। बस इतना कह सकते हैं शुरुआत है। इस पहल को जारी रख देश को आतंकवाद मुक्त करना होगा। इतना ही नहीं आतंकवादियों को संरक्षण और समर्थन देने वालों पर कार्रवाई करनी होगी। 

मदरसे पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गैर कानूनी गतिविधियों के चलते UAPA एक्ट, 1967 के तहत कारवाई की है। प्रशासन का कहना है कि मदरसे से आतंकी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए फंडिंग की जा रही थी। प्रशासन को मदरसे की फंडिंग और खर्च में बड़ा अंतर मिला, जिसके कारण मदरसे को सील कर दिया गया।

वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की चीफ महबूबा मुफ्ती ने मदरसे पर सील लगाने को लेकर विरोध किया है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर महबूबा मुफ्ती ने लिखा, “दारुल उलूम जामिया सिराज उल उलूम को UAPA के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित करना बेहद अन्यायपूर्ण फैसला है। इस संस्थान ने ऐसे कई डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर तैयार किए हैं, जिन्होंने देश की ईमानदारी और समर्पण के साथ सेवा की है।”

15 एकड़ की जमीन पर फैला मदरसा 25 साल पुराना

 मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम नाम से यह मदरसा लगभग 25 साल पुराना है, जिसे जमात-ए-इस्लामी ने विदेशी फंडिंग जुटाकर खड़ा किया था। यह मदरसा 15 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है और इसके साथ 5 एकड़ का एक बाग भी है। मदरसे को सील करने से पहले इसमें लगभग 500 छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे।

मदरसे पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप लगे। विभिन्न राष्ट्रीय जाँच एजेंसियों ने इन आरोपों की जाँच की तो सही पाया। मदरसे के कई मौलवियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब मदरसे में ताला लगा हुआ है। मदरसे के दरवाजे पर सील के पोस्टर लगे हैं और बाहर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है।

मदरसे से तालीम लेकर निकला पुलवामा का आतंकी सज्जाद भट्ट

मदरसे को सील करने की वजह इसके आतंकी गतिविधियों से जुड़ा होना है। ये वही मदरसा है जहाँ से 2019 के पुलवामा आतंकी हमले का आरोपित सज्जाद भट ने भी तालीम ली थी, इस हमले में CRPF के 40 जवानों ने बलिदान दिया था।

फिर जब इस हमले की जाँच हुई, तो मदरसे ने खुद कबूला कि इस मदरसे से 11 छात्र आतंकी बने हैं। इनमें PhD आतंकी के नाम से कुख्यात मोहम्मद शफी बट और कुख्यात आदिल अहमद भी शामिल थे। हालाँकि, ये सभी एनकाउंटर में मारे गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस मदरसे के अधिकतर छात्र पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े थे।

मदरसे के मौलवी भी निकले आतंकी और OGW

इतना ही नहीं इस मदरसे से आतंकी की मदद करने वाले ओवर ग्राउंड वर्कर यानी OGW भी निकले हैं। साल 2020 में ही जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शोपियां से 3 ओवर ग्राउंड वर्कर गिरफ्तार किए थे। तब पूछताछ में सामने आया था कि ये तीनों जमात-ए-इस्लामी के लिए काम करते थे और शोपियां के इसी मदरसे से पढ़कर निकले थे।

इस मदरसे के न सिर्फ छात्र बल्कि पढ़ाने वाले मौलवी भी आतंकी गतिविधियों में शामिल रह चुके हैं। इसी मदरसे में पढ़ाने वाला शौकत अहमद शेख LeT से जुड़ा था और लश्कर के लिए आतंकियों की भर्ती करता था। शौकत को NIA ने गिरफ्तार किया था। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, शौकत ने 20 छात्रों का ब्रेनवॉश कर उन्हें आतंकी बनाया था।

मदरसे पर कार्रवाई

आतंकी गतिविधियों में लिप्त मदरसे पर कश्मीर के मंडलायुक्त अंशुल गर्ग ने UAPA अधिनियम की धारा 8(1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसे प्रतिबंधित संस्थान घोषित किया है। उन्होंने यह कार्रवाई शोपियां के SSP द्वारा जारी किए गए डोजियर और मदरसे पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साक्ष्यों के आधार पर की है।

SSP के डोजियर में साफ कहा गया कि मदरसा बाहर से मजहबी तालीम की जगह लगता है। लेकिन इसके कामकाज और पैसों के हिसाब में बड़ी गड़बड़ियाँ हैं। यह कई गैरकानूनी कामों में भी शामिल है। इसका रजिस्ट्रेशन नहीं है। इसने सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया है। और कानून से बचने के लिए यह तरह-तरह के तरीके अपनाता है।

बंगाल : बांग्लादेश बॉर्डर पर तारबंदी के लिए BSF को चाहिए 127Km जमीन, कलकत्ता हाई कोर्ट की फटकार के बाद TMC सरकार ने केवल 8Km दी

             कलकत्ता हाई कोर्ट की ममता सरकार को फटकार (साभार : The Hindu & Indianexpress)
 70 के दशक में निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर की बहुचर्चित फिल्म आयी थी "आंखें" इस फिल्म की शुरुआत "उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की निग़ाहेंबान है आँखें" देशभक्ति संवाद से होती है। जो बांग्लादेश घुसपैठियों को संरक्षण देने में बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारत-बांग्लादेश सीमा को खुला रखकर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही हैं और ममता को समर्थन दे रहा समूचा विपक्ष। घुसपैठियों को भारत में घुसने का खुला रास्ता दिया हुआ है। आखिर इतने सालों बाद 127 किलोमीटर में से सिर्फ 8 किलोमीटर ही जगह देना ममता के डोलते राज की ओर इशारा भी करता है। यही वह खुला इलाका है जहाँ से बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में घुस शेष भारत में फ़ैल रहे हैं। ममता जैसी नेताओं और इन जैसे देश विरोधी नेताओं ने देश की सुरक्षा को खतरे में डाला हुआ है।        

भारत-बांग्लादेश सीमा पर कटीले तार(फेंसिंग) लगाने के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट इस बात से बेहद नाराज है कि उसके आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने 127 किलोमीटर जमीन में से अब तक सिर्फ 8 किलोमीटर हिस्सा ही सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपा है।

कलकत्ता HC ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए राज्य सरकार के एक अधिकारी पर 25,000 रुपए का जुर्माना भी ठोक दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि केंद्र से मुआवजा मिलने के बावजूद जमीन न सौंपना चौंकाने वाला है।

कलकत्ता HC की नाराजगी की वजह

कलकत्ता HC ने पाया कि 27 जनवरी को दिए गए आदेश के बाद से अब तक राज्य सरकार ने जमीन सौंपने की प्रक्रिया में कोई खास प्रगति नहीं की है। कोर्ट के मुताबिक, 127.327 किलोमीटर की जमीन ऐसी थी जिसके लिए अधिग्रहण पूरा हो चुका था और केंद्र सरकार ने राज्य को मुआवजा भी दे दिया था।

इसके बावजूद, बंगाल सरकार ने केवल 8 किलोमीटर जमीन ही BSF को दी। कोर्ट ने सरकार की रिपोर्ट को ‘अधूरी और गोलमोल‘ बताते हुए खारिज कर दिया क्योंकि वह शपथ पत्र (Affidavit) पर नहीं दी गई थी।

राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा

पूर्व डिप्टी आर्मी चीफ सुब्रत साहा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए HC ने कहा कि सीमा पर कटीले तार लगाना देश की रक्षा, घुसपैठ रोकने और सीमा पार आतंकवाद को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने भी अदालत से गुहार लगाई थी कि जमीन जल्द दिलाई जाए ताकि फेंसिंग का काम पूरा हो सके।

राज्य सरकार ने भी माना था कि यह राष्ट्रीय हित का काम है, लेकिन इसके बावजूद 9 जिलों (उत्तर व दक्षिण 24 परगना, नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार) में जमीन सौंपने का काम लटका हुआ है।

सरकार के बहाने और HC का जुर्माना

राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण में देरी के लिए राजस्व अधिकारियों के चुनावी रोल के काम में व्यस्त होने का बहाना बनाया था, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह नकार दिया। HC ने कहा कि जब मामला राष्ट्रीय महत्व का हो, तो ऐसे बहाने नहीं चलेंगे। स्पेशल सेक्रेटरी के निर्देश के बावजूद जॉइंट डायरेक्टर ने शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जिसकी वजह से कोर्ट ने उन पर 25 हजार का जुर्माना लगाया है।

अगली सुनवाई और सख्त निर्देश

कलकत्ता HC ने अब बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह 13 मई तक एक विस्तृत शपथ पत्र जमा करे। इसमें जिलेवार जानकारी देनी होगी कि 27 जनवरी के आदेश के बाद से हर दिन जमीन सौंपने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि समय सीमा बीतने के बाद अब और ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

ईरान के सपोर्ट में शिया आबादी पाकिस्तान में कल्तेआम न मचा दे, इसलिए डरे असीम मुनीर ने NYT की रिपोर्ट ही उड़ा दी


पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।

रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।

NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।

पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।

NYT की रिपोर्ट में क्या लिखा था?

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।

दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।

रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।

पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।

जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया

जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।

उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।

इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।

पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल

अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?

इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।

पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।

इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।

पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!

यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।      (साभार) 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और बार कौंसिल स्वतः संज्ञान लें; केजरीवाल के पत्र के बाद कपिल सिब्बल का बयान न्यायपालिका पर सीधा हमला है; सिब्बल ने राकेश किशोर से भी बड़ा जूता मारा है अदालतों को

सुभाष चन्द्र

आज कपिल सिब्बल जैसे वकील अदालतों को उनकी औकात दिखा रहे हैं यह तो होना ही था। ये वही अदालतें जिन्होंने इन वकीलों को अपना सिरमौर बना रखा था। अभी भी समय है अदालतें, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, इन वकीलों द्वारा फाइल होने वाले मुकदमों को तर्जी देना बंद कर दें जिस अदालतों ने ऐसे किया ये जो अपने आपको को नामी वकील कहते फिरते हैं सब जमीन पर आ जाएंगे। जहाँ तक अरविन्द केजरीवाल की बात है उसने तो सियासत के मैदान में आने पर ही साफ शब्दों में कहा था "हाँ मैं anarchy हूँ", तो anarchi से किसी ढंग की बात सुनने को नहीं मिलेगी, और जो उम्मीद करते हैं उनसे बड़ा महा-महामूर्ख दुनियां में कहीं नहीं मिल सकता।     

कल केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को 24 पॉइंट का पत्र लिख कर उन पर पक्षपाती होने का फिर से आरोप लगाते हुए CBI की ट्रायल कोर्ट के खिलाफ अपील में खुद पेश होने से मना कर दिया और अपना कोई वकील भी अपनी तरफ से पेश करने से मना कर दिया। आज जस्टिस शर्मा की अदालत का बहिष्कार करने का ऐलान मनीष सिसोदिया ने भी कर दिया। क्या यह contempt of court नहीं? 

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केजरीवाल ने जो बातें पत्र में कही वो कोई नई बातें नहीं है सब पहले जैसे ही घिसे पिटे आरोप लगाए है और न केवल जस्टिस शर्मा के Legal Professional होने का चरित्र हनन किया बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था पर कलंक लगा दिया कहता है कि वो गांधी जी के बताए हुए “सत्याग्रह” के मार्ग पर चलेगा क्योंकि उसे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है वो “सत्याग्रह” करना चाहता, इसे “सत्ताग्रह” कहते हैं। 

पत्र की भाषा देख कर साफ़ लग रहा था कि केजरीवाल जैसा मूढ़मति ऐसा नहीं लिख सकता क्योंकि उसमे ऐसा लिखने की क्षमता ही नहीं है वह पत्र किसी वरिष्ठ वकील ने लिखा है, ऐसा प्रतीत हो रहा था

उसके पत्र भेजने के अगले दिन आज कपिल सिब्बल का बयान आया कि “अब भारत में सभी अदालतें सरकार जो कहती हैं, उसे ही सच मान लेती हैं मैं रोजाना अदालतों में देख रहा हूं”

सिब्बल के बयान से साफ़ झलकता है कि केजरीवाल का पत्र उसी ने लिखा है और अब वही उसका मार्गदर्शक है सिब्बल ने ही उसे जस्टिस शर्मा पर आरोप लगा कर अपमानित करने के लिए कहा होगा? सिब्बल के बयान जस्टिस शर्मा की तरफ भी इशारा है

 

सिब्बल का बयान और केजरीवाल का आचरण Judicial Institution का घोर अपमान है सिब्बल ने कभी कहा था कि “अब सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची जो अब देखना पड़ रहा वह अपने 50 साल के करियर में नहीं सोचा था कि ऐसा भी होगा”

सिब्बल ने आज पूरी न्यायिक व्यवस्था पर हमला करते हुए साफ़ कहा है कि “सभी अदालतें” सरकार के पक्ष में रहती हैं ऐसा है तो फिर शराब घोटाले में ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल & कंपनी को Discharge कैसे कर दिया?

सिब्बल का बयान एडवोकेट राकेश किशोर द्वारा फेंके गए जूते से भी न्यायपालिका के मुंह पर मारा हुआ बड़ा जूता है राकेश किशोर को बार कौंसिल ने तुरंत निलंबित कर दिया था और फिर उसकी प्रैक्टिस पर बैन लगा दिया था

सिब्बल और केजरीवाल के आचरण पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत और बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया को तुरंत स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और इन पर अदालतों की अवमानना का केस दर्ज करना चाहिए बार कौंसिल और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को सिब्बल की सदस्यता निलंबित करनी चाहिए उसे कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछना चाहिए कि तुम्हारे बयान को सत्य साबित करने के लिए तुम्हारे पास क्या सबूत हैं

सिब्बल या किसी भी वकील ने केजरीवाल को पढ़ा तो दिया लेकिन उन्हें पता नहीं जस्टिस शर्मा उसके खिलाफ पहले जमानती और फिर गैर जमानती वारंट भी जारी कर सकती हैं वे चाहें तो किसी को उसके लिए न्यायमित्र भी नियुक्त कर सकती हैं लेकिन जब केजरीवाल को जस्टिस शर्मा पर ही भरोसा नहीं है तो न्यायमित्र पर भी कैसे होगा? 

न्यायपालिका पर सिब्बल और केजरीवाल ने सीधा हमला बोला है इसे नहीं रोका गया तो निकट भविष्य में और भयानक मंजर दिखाई देगा न्यायपालिका की सकारात्मक आलोचना की जा सकती है लेकिन सिब्बल और केजरीवाल ने तो मर्यादा की सभी सीमाएं पार कर दी 

BBC ने कहा- ‘मेट्रो खाली’, हकीकत में रिकॉर्ड सवारी और बढ़ता नेटवर्क: अधूरे डेटा से गढ़े गए प्रोपेगेंडा का असली विश्लेषण

                                                                                                                   साभार : Aajtak & BBC
बीबीसी (BBC) ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था, “भारत ने मेट्रो पर अरबों खर्च कर दिए, लेकिन यात्री कहाँ हैं?” इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे भारत की मेट्रो परियोजनाएँ सही तरीके से काम नहीं कर रहीं और लोग उनका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग है। हकीकत यह है कि BBC ने दिल्ली मेट्रो जैसे बड़े और सफल मॉडल को ‘अपवाद’ कहकर किनारे कर दिया और नई मेट्रो लाइनों के शुरुआती कम उपयोग वाले डेटा को ही पूरी कहानी मान लिया। यह तरीका पूरा सच नहीं दिखाता।

सच्चाई यह है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट- जैसे मेट्रो, हाईवे या एयरपोर्ट को पूरी तरह चलने और लोगों की आदत में आने में समय लगता है। शुरुआत में लोग धीरे-धीरे जुड़ते हैं, नेटवर्क बढ़ता है और फिर उपयोग तेजी से बढ़ जाता है। 2025–26 के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मेट्रो का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली मेट्रो करोड़ों यात्रियों को रोज सफर करा रही है और मुंबई मेट्रो की नई लाइनों पर भी यात्रियों की संख्या हर महीने बढ़ रही है।

दिल्ली मेट्रो से सीख: सिस्टम धीरे-धीरे मजबूत होता है

BBC का मुख्य तर्क है कि कई शहरों में मेट्रो में उम्मीद से कम यात्री सफर कर रहे हैं। लेकिन इस विश्लेषण में वह दिल्ली मेट्रो के पूरे सफर को नजरअंदाज कर देता है। जब दिल्ली मेट्रो शुरू हुई थी, तब भी इसे लेकर सवाल उठे थे। कई लोगों ने कहा था कि यह महँगा है और ज्यादा काम नहीं आएगा। शुरुआती समय में लोगों को मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने में दिक्कत होती थी, क्योंकि फीडर बसें और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ पूरी तरह विकसित नहीं थीं।

धीरे-धीरे हालात बदले। जैसे-जैसे नेटवर्क बढ़ा, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी मजबूत हुई और लोगों की निर्भरता बढ़ती गई। आज दिल्ली मेट्रो देश ही नहीं, दुनिया के सबसे सफल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स में गिनी जाती है। साल 2025 में इसमें औसतन 64.6 लाख लोग रोज यात्रा कर रहे हैं और साल भर में यह 235 करोड़ से ज्यादा यात्राएँ पूरी करती है। यह आँकड़ा एक बड़े देश जैसे न्यूजीलैंड की पूरी आबादी से भी ज्यादा है।

अब दिल्ली मेट्रो कमाई के मामले में भी मजबूत स्थिति में है। 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, यह ₹412 करोड़ से ज्यादा का ऑपरेटिंग सरप्लस कमा रही है। इसका मतलब है कि मेट्रो सिर्फ चल ही नहीं रही, बल्कि अपने खर्च निकालकर मुनाफा भी दे रही है। यह साफ दिखाता है कि कोई भी मेट्रो सिस्टम शुरुआत में धीमा हो सकता है, लेकिन समय के साथ वह मजबूत, उपयोगी और आत्मनिर्भर बन जाता है।

मुंबई एक्वा लाइन की सच्चाई: ‘सुनसान’ नहीं, तेजी से बढ़ता इस्तेमाल

BBC ने मुंबई की नई एक्वा लाइन (मेट्रो-3) को ‘सुनसान’ बताने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। यह लाइन पूरी तरह अक्टूबर 2025 में शुरू हुई और अप्रैल 2026 तक इस पर 4 करोड़ से ज्यादा यात्री सफर कर चुके हैं। किसी भी नई मेट्रो लाइन के लिए इतने कम समय में यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

मुंबई की सभी मेट्रो लाइनों को मिलाकर अब रोज करीब 7.5 लाख लोग सफर कर रहे हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे लोग नई लाइन के बारे में जान रहे हैं और कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है, यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

जहाँ तक किराए की बात है, 10 से 70 रुपए का खर्च मुंबई जैसे शहर में ज्यादा नहीं माना जाता। यहाँ लोग रोज ट्रैफिक में घंटों फँसते हैं। ऐसे में मेट्रो समय बचाती है और सफर आसान बनाती है। सरकार का काम सिर्फ आज की भीड़ संभालना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत ट्रांसपोर्ट तैयार करना भी है, ताकि सड़कों पर दबाव कम हो सके।

मेट्रो का बड़ा फायदा: सफर ही नहीं, जेब भी बचा रही है

मेट्रो का असर सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं है, यह लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधार रही है। जनवरी 2026 की ‘EAC-PM’ रिपोर्ट बताती है कि मेट्रो आने से लोगों का रोज का ट्रांसपोर्ट खर्च कम हुआ है। पेट्रोल, डीजल और टैक्सी पर होने वाला खर्च बच रहा है, जिससे लोगों के पास हर महीने कुछ अतिरिक्त पैसे बच रहे हैं।

इस बचत का सीधा फायदा घर के लोन (होम लोन) चुकाने में दिख रहा है। दिल्ली में मेट्रो वाले इलाकों में लोन न चुका पाने वाले लोगों की संख्या 4.42% कम हुई है। बेंगलुरु में EMI लेट करने वालों की संख्या 2.4% घटी है, जबकि हैदराबाद में समय से पहले लोन चुकाने वालों की संख्या 1.8% बढ़ी है।

सीधी भाषा में समझें तो मेट्रो लोगों की जेब में बचत डाल रही है। इससे उनका आर्थिक बोझ कम हो रहा है और जीवन आसान बन रहा है। लेकिन ऐसे बड़े फायदे अक्सर BBC जैसी कुछ रिपोर्ट्स में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

क्या मेट्रो घाटे में है?

अक्सर कहा जाता है कि मेट्रो प्रोजेक्ट घाटे का सौदा हैं। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। शुरुआत में हर मेट्रो सिस्टम ‘नेट लॉस’ दिखाता है, क्योंकि उस पर बड़े लोन और निर्माण का खर्च होता है। इसे ही डेप्रिसिएशन कहा जाता है। इसलिए सिर्फ कुल घाटा देखकर फैसला करना सही नहीं होता।

असल पैमाना होता है ‘ऑपरेटिंग सरप्लस’। यानी रोजमर्रा का खर्च निकालने के बाद क्या मेट्रो के पास पैसा बच रहा है या नहीं। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो ने 2024-25 में 1,191 करोड़ रुपए कमाए और 229 करोड़ रुपए का ऑपरेटिंग सरप्लस हासिल किया। इसका मतलब है कि मेट्रो अपना खर्च निकालकर बचत भी कर रही है।

अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में भी यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साफ है कि यह पैसा बर्बाद नहीं हुआ, बल्कि शहरों के लिए लंबी अवधि का मजबूत ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार हुआ है। इससे प्रदूषण कम हो रहा है और पर्यावरण को भी फायदा मिल रहा है।

BBC की रिपोर्ट पर सवाल: क्या पूरी तस्वीर दिखाई गई?

बीबीसी की रिपोर्ट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें पूरी तस्वीर नहीं दिखाई गई। कुछ चुनिंदा आँकड़ों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष दिया गया, जैसे मेट्रो प्रोजेक्ट सही दिशा में नहीं हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे अलग है।

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है, जो 1,000 किलोमीटर से ज्यादा फैल चुका है। यह अपने आप में दिखाता है कि यह सिस्टम लगातार बढ़ रहा है और शहरों की जरूरत बनता जा रहा है। मेट्रो ने लोगों को लंबे ट्रैफिक जाम से राहत दी है और सफर को ज्यादा आसान और आरामदायक बनाया है।

लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और फीडर बसों की दिक्कतें अभी भी कई शहरों में हैं, लेकिन इन पर तेजी से काम हो रहा है। दिल्ली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहाँ समय के साथ मेट्रो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।

साफ है कि भारत में मेट्रो सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि शहरी बदलाव का बड़ा जरिया बन रही है। यह धीरे-धीरे हर शहर की जरूरत और आदत बनती जा रही है, और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।