पुलिस ने मुहर्रम में हज़ारों जहरीले कैप्सूल जब्त किए; तिरंगे का अपमान, कहीं लहराई तलवारें, कहीं चाकू गोदकर ले ली जान तो कहीं AK-47 दिखा फैलाई दहशत; ये मुहर्रम था या शक्ति प्रदर्शन?

त्योहार किसी भी समुदाय का हो, रमजान हो, होली हो, रामनवमी हो या मुहर्रम इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा फैलाने की घटनाएँ सामने जरुर आती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से मुहर्रम के दौरान विवाद, झड़प और हिंसा की कई घटनाएँ सामने आई हैं। मजे की बात यह है कि झड़प/हिंसा आपस में ही हुई। कहीं जुलूस के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी आपस में ही लड़ पड़े और जान लेने तक पर उतर आए तो कहीं उपद्रव शांत करने पहुँचे सुरक्षाकर्मियों को भी इनकी हिंसा का सामना करना पड़ा। हैरानी तो तब हुई जब मुंबई पुलिस ने दर्द की दवा के नाम पर चूहों को मारने वाली दवा को कैप्सूलों में भरकर बाँटने वाले फ़ैयाज़ को गिरफ्तार किया। अगर पुलिस ने नहीं पकड़ा हो, कितना भयानक होता मंजर?  

इस्लामी कट्टरपंथी कहीं तलवार लहराते दिखे तो कहीं से एके47 लहराने का वीडियो सामने आया। हिंदू त्योहार तो इनके निशाने पर रहते ही है, अपने कथित पाक त्योहारों पर भी इनकी हिंसात्मक प्रवृत्ति सामने आ ही जाती है। ऑपइंडिया ऐसी ही सारी घटनाओं को एक साथ संकलित कर रहा है।

बिहार के समस्तीपुर में मुहर्रम पर हिंसा, युवक की चाकू गोदकर हत्या, पुलिस पर भी लाठियों से हमला

बिहार के समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर थाना क्षेत्र में मुहर्रम जुलूस के दौरान एक युवक की चाकू मारकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया। घटना कल्याणपुर थाना क्षेत्र के गोपालपुर भुट्टा चौक की बताई जा रही है, जहाँ मोहर्रम के अवसर पर ताजिया जुलूस निकाला जा रहा था।

मृतक की पहचान 22 वर्षीय जावेद के रूप में हुई है। जुलूस के दौरान जावेद करतब देख रहा था या उसमें शामिल था, तभी गाँव के ही हैदर नामक युवक ने उस पर चाकू से हमला कर दिया। आरोप है कि हैदर ने सीधे जावेद के सीने पर वार किया और मौके से फरार हो गया।

घटना के बाद जावेद गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। स्थानीय लोगों और पुलिस की मदद से उसे इलाज के लिए सदर अस्पताल पहुँचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उपचार के दौरान उसे मृत घोषित कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि आरोपित पहले से आपराधिक प्रवृत्ति का है और उसकी जल्द गिरफ्तारी होनी चाहिए।

मामले में सदर DSP-2 संजय कुमार ने बताया कि आरोपित की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी जारी है।

दूसरी घटना मथुरापुर थाना क्षेत्र के रामनगर सारी गाँव में हुई, जहाँ मोहर्रम जुलूस के दौरान दो पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ। कहासुनी जल्द ही हिंसक मारपीट में बदल गई, जिससे इलाके में तनाव फैल गया। झड़प की सूचना पर मौके पर पहुँची पुलिस और प्रशासन की टीम पर उग्र भीड़ ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया।

हमले में तीन पुलिस जवान घायल हो गए, जिन्हें समस्तीपुर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घायल जवानों का इलाज चल रहा है।

मुंबई में मुहर्रम जुलूस में जहर से भरे चूहे मारने वाले 14900 कैप्सूल जब्त

मुंबई में मुहर्रम जुलूस के दौरान जहर मिली चूहे मारने वाली गोलियाँ बाँटने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने पुणे निवासी फैयाज प्रेमजी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उसके पास से 14 हजार से ज्यादा कैप्सूल जब्त किए हैं। घटना जेजे और भायखला इलाके से गुजर रहे मुहर्रम जुलूस के दौरान सामने आई।

पुलिस पेट्रोलिंग टीम ने एक व्यक्ति को संदिग्ध तरीके से कैप्सूल वितरित करते देखा, जिसके बाद उससे पूछताछ की गई और उसके पास मौजूद सामग्री जब्त कर ली गई। जाँच में बरामद कैप्सूलों को लेकर पुलिस ने दावा किया कि उनमें जिंक फॉस्फाइड मिलाया गया था, जो अत्यधिक जहरीला रसायन माना जाता है।

DCP जयंत मीणा के अनुसार, आरोपित के पास से 14,900 भरे हुए कैप्सूल मिले हैं। पूछताछ में उसने बताया कि उसने 30 हजार खाली कैप्सूल और लगभग 50 किलो जिंक फॉस्फाइड मंगवाया था और कई दिनों तक उन्हें भरने का काम किया। मामले में एक व्यक्ति के बीमार पड़ने की भी जानकारी सामने आई है, जिसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

जाँच में यह भी पता चला है कि फैयाज वर्ष 2019 से 2025 के बीच कई बार ईरान और इराक गया था, जबकि पिछले एक साल में ही वह 19 बार ईरान और इराक गया था। पुलिस अब इन यात्राओं के उद्देश्य, डिजिटल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, वित्तीय लेनदेन और संपर्कों की जाँच कर रही है।

बिहार के मुजफ्फरपुर में मुहर्रम जुलूस के दौरान हिंसक झड़प

बिहार के मुजफ्फरपुर में भी मुहर्रम जुलूस के दौरान कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति बन गई। मुजफ्फरपुर जिले के हथौड़ी थाना क्षेत्र में निकाली जा रही मातमी जुलूस के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी आपस में भिड़ गए। विवाद की शुरुआत दो महिलाओं के बीच हुई कहासुनी से हुई, जो धीरे-धीरे बढ़कर दो समूहों के बीच मारपीट में बदल गई।

देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चलने लगे। इस झड़प में कई लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई है। घटना की जानकारी मिलते ही पहले से तैनात पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुँची और किसी तरह स्थिति पर काबू पा लिया गया।

मामले को लेकर मुजफ्फरपुर के SSP कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि जुलूस के दौरान दो महिलाओं के बीच शुरू हुआ विवाद बाद में दो गुटों के बीच संघर्ष में बदल गया। उन्होंने बताया कि इस घटना में तीन लोग घायल हुए हैं और पूरे मामले की जाँच की जा रही है।

मुजफ्फरपुर के कई इलाकों में भड़की हिंसा, ड्यूटी पर तैनात ASI मुस्तकिम खान ने भी उठाई तलवार

मुजफ्फरपुर जिले के हथौड़ी, औराई, पीयर और कांटी थाना क्षेत्रों में अलग-अलग जगहों पर तनाव की स्थिति बनी। पीयर थाना क्षेत्र के बरियारपुर चौक पर ताजिया मिलन के दौरान शुरू हुआ विवाद बाद में हिंसक झड़प में बदल गया और दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चले।
इसके अलावा कांटी थाना क्षेत्र के दामोदरपुर स्थित सेंट्रल बैंक के पास ताजिया जुलूस के दौरान करतब दिखाने और रास्ता देने को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हो गया, जो बाद में मारपीट तक पहुँच गया। इसी बीच मुजफ्फरपुर से एक और वीडियो सामने आया, जिसमें वर्दी पहने एक पुलिसकर्मी तलवार से करतब दिखाते नजर आए।
बताया गया कि वीडियो कांटी थाने में तैनात ASI मुस्तकिम खान का है। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उनकी ड्यूटी मुहर्रम जुलूस में लगी थी और उसी दौरान किसी ने वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

बिहार के भागलपुर में रेलवे स्टेशन पर तलवारें लेकर घुसे कट्टरपंथी, नारेबाजी कर पैदा की दहशत

बिहार के भागलपुर में मुहर्रम के दौरान रेलवे स्टेशन परिसर में बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों के घुसने का मामला सामने आया है। यहाँ 100 से अधिक कट्टरपंथी हाथों में तलवारें लेकर स्टेशन परिसर में पहुँच गए और सीढ़ियों और प्लेटफॉर्म पर नारेबाजी करते रहे। इस दौरान स्टेशन पर मौजूद यात्रियों में असहजता और डर का माहौल देखने को मिला।
घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कई यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों पर शस्त्र प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाए हैं तथा कार्रवाई की माँग की है। मामले पर पहले स्टेशन मास्टर अजय ने कहा था कि वीडियो की जाँच की जाएगी।
इसके बाद रेल प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए मामला दर्ज कर लिया। मालदा रेल मंडल की जनसंपर्क पदाधिकारी रूपा मंडल ने बताया कि वायरल वीडियो सामने आने के बाद रेलवे सुरक्षा बल (RPF) से विस्तृत रिपोर्ट माँगी गई थी। जाँच के आधार पर रेलवे अधिनियम की धारा 147 और 145 के तहत FIR दर्ज की गई है।
वीडियो में दिख रहे लोगों की पहचान की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

‘ले फिर आ गए’ लिखी वैन को क्रेन पर लटकाकर उड़ाया, मोहर्रम के जुलूस में कट्टरपंथियों ने मचाया हुड़दंग

मध्य प्रदेश के उज्जैन में मंगलवार (23 जून 2026) की रात मोहर्रम के जुलूस के दौरान किए गए एक प्रदर्शन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हंगामा मच गया। वायरल वीडियो में एक टाटा मैजिक वैन को क्रेन की मदद से करीब 40 फीट की ऊँचाई पर लटकाया गया था।
वैन के ऊपर दो युवक लाल झंडे लहराते दिखाई दिए और कुछ देर बाद वाहन में जोरदार विस्फोट जैसा दृश्य नजर आया। वैन पर ‘ले फिर आ गए’ लिखा हुआ था।
घटना का वीडियो इंस्टाग्राम अकाउंट ‘परवेज एडिट्स 2.0’ पर भी शेयर किया गया था। वीडियो सामने आने के बाद हरिद्वार के संत स्वामी शिवानंद गिरि और हिंदू संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई। हिंदू जागरण मंच ने जिला प्रशासन से पूछा कि क्या इस तरह के प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी।
मामले में पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। उज्जैन पुलिस के अनुसार जुलूस की अनुमति थी, लेकिन किसी भी तरह के विस्फोटक इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस ने आयोजक शोएब खान, झंडे लहराने वाले जाहिद खान और तस्लीम खान तथा क्रेन मालिक गोपाल माली के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

यूपी के देवरिया में मुहर्रम जुलूस के दौरान करतब दिखाते आग की चपेट में आया युवक

उत्तर प्रदेश के देवरिया में मुहर्रम जुलूस के दौरान करतब दिखाते समय एक युवक आग की चपेट में आकर घायल हो गया। घटना जिला मुख्यालय स्थित मालवीय रोड पर हुई। युवक को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ इलाज के बाद उसकी हालत स्थिर और खतरे से बाहर बताई जा रही है।
सदर कोतवाली क्षेत्र के बांस देवरिया निवासी सद्दाम खान फाइव स्टार क्लब की ओर से ताजिया जुलूस में शामिल हुआ था। जुलूस के दौरान वह लोहे के एक ड्रम के भीतर बैठकर करतब प्रस्तुत कर रहा था। इसी बीच ड्रम में जल रही आग अचानक भड़क गई और उसके कपड़ों तक पहुँच गई, जिससे वह झुलस गया।
घटना के बाद मौके पर कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। हालाँकि अखाड़े के सदस्यों और आसपास मौजूद लोगों ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए आग बुझाई और युवक को सुरक्षित बाहर निकाला। समय पर आग पर काबू पा लेने के कारण बड़ा हादसा टल गया।
इसके बाद सद्दाम खान को तत्काल एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसका इलाज जारी है। क्षेत्राधिकारी नगर संजय रेड्डी ने बताया कि मालवीय रोड पर मुहर्रम जुलूस निकाला जा रहा था। इसी दौरान यह घटना हुई। पुलिस के अनुसार स्थिति नियंत्रण में रही और कोई अन्य अप्रिय घटना नहीं हुई।

 बरेली में मुहर्रम जुलूस में नोट उड़ाने पर बवाल, चले लाठी-डंडे, 20 घायल

उत्तर प्रदेश के बरेली में मुहर्रम के जुलूस के दौरान बिथरी क्षेत्र के पदारथपुर गाँव में रुपए उड़ाने को लेकर मुस्लिमों में आपस में ही विवाद हो गया, जो कुछ ही देर में हिंसक झड़प में बदल गया। दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट और लाठी-डंडे चले, जिसमें करीब 15 से 20 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।
हालात बिगड़ते देख पुलिस को हल्का बल प्रयोग कर स्थिति को नियंत्रित करना पड़ा। गाँव में शाम के समय मुहर्रम का जुलूस निकाला जा रहा था और बड़ी संख्या में लोग उसमें शामिल थे। इसी दौरान जुलूस में कुछ लोगों ने रुपए उड़ाने शुरू कर दिए। रुपए उठाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी और धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई।
इसी बात को लेकर दो पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो बाद में झगड़े में बदल गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने पहले दोनों पक्षों को समझाकर शांत कराने की कोशिश की, लेकिन जब स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती दिखाई दी तो पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया और लाठियाँ फटकारकर भीड़ को हटाया।
बाद में थाने से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाकर स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित किया गया। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, झगड़े और माहौल खराब करने में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। इसके लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और चिह्नित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी की जाएगी।

वाराणसी में मुहर्रम जुलूस के दौरान बढ़ा विवाद

मुहर्रम के मौके पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में नई सड़क–औरंगाबाद मार्ग पर निकाले जा रहे ताजिया जुलूस के दौरान दो गुटों के बीच विवाद की स्थिति बन गई। देखते ही देखते बड़ी संख्या में मुस्लिम मौके पर जमा हो गए, जिससे कुछ समय के लिए क्षेत्र में अफरातफरी और तनाव जैसा माहौल बन गया।
घटना चेतगंज और लक्सा थाना क्षेत्रों की सीमा पर होने के कारण दोनों थानों की पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और स्थिति को संभालने में जुट गई। पुलिस अधिकारियों ने लोगों से संयम बरतने और जुलूस को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने की अपील की। हालांकि कुछ लोगों के हंगामे के कारण हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।
इसके बाद पुलिस ने विवाद कर रहे लोगों को मौके से हटाया और भीड़ को नियंत्रित कर स्थिति सामान्य कर दी। हालात शांत होने के बाद ताजिया जुलूस अपने तय मार्ग पर आगे बढ़ गया। घटना में किसी के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं मिली है।

प्रयागराज में मुहर्रम के जुलूस में DJ की टक्कर से टूटा मंदिर का चबूतरा

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में मुहर्रम जुलूस के दौरान एक विवाद सामने आया। बहरिया थाना क्षेत्र के नेवादा गाँव में जुलूस के दौरान डीजे वाहन की टक्कर से मंदिर का चबूतरा क्षतिग्रस्त हो गया। घटना के बाद गाँव में कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति बन गई।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ और एहतियात के तौर पर इलाके में पीएसी तैनात कर दी गई ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में स्थिति को नियंत्रित किया गया। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त हुए मंदिर के चबूतरे की मरम्मत भी कराई गई।
सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियोज मौजूद हैं, जिनमें कट्टरपंथी तलवारें लहराते, उत्पात मचाते, नारेबाजी करते और यहाँ तक की राइफल लहराते भी दिख रहे हैं।

‘ईरान का अस्तित्व खत्म होगा’: ट्रंप की धमकी के बीच फिर शुरू युद्ध, अमेरिका ने कई सैन्य ठिकानों पर किए हमले; शिया मुल्क ने भी कुवैत-बहरीन के US अड्डों को बनाया निशाना

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध एक बार फिर शुरू हो गया है और दोनों देशों ने एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले किए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर रविवार (28 जून 2026) को अमेरिकी सेना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए।

अमेरिका का दावा है कि ईरान ने सीजफायर समझौते का उल्लंघन करते हुए एक तेल टैंकर पर ड्रोन हमला किया था, जिसके जवाब में यह कार्रवाई की गई। वहीं, अब ईरान ने भी पलटवार करते हुए कुवैत और बहरीन में मौजूद सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए है।

 डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अमेरिकी विमानों ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज ठिकानों के साथ-साथ तटीय रडार साइटों को निशाना बनाया है।

उन्होंने कहा कि ईरान ने एक बार फिर सीजफायर तोड़ा है। ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान नहीं माना तो अमेरिका उस अभियान को पूरा करेगा जिसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ऐसी नौबत आई तो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का अस्तित्व भी खत्म हो सकता है।

अमेरिकी सेना ने क्या बताया?

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, यह कार्रवाई ईरान की ओर से एक कमर्शियल ऑयल टैंकर ‘किकू’ पर कथित ड्रोन हमले के जवाब में की गई। अमेरिका का दावा है कि जहाज करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर होरमुज से गुजर रहा था।

इसके बाद अमेरिकी सेना ने होरमुज के आसपास ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर हमला किया। इन हमलों में मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज, एयर डिफेंस सिस्टम, निगरानी प्रणाली, संचार नेटवर्क और समुद्र में बारूदी सुरंग बिछाने से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया।

ईरान का पलटवार, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर हमला

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने बताया कि उसकी नौसेना और एयरोस्पेस फोर्स ने संयुक्त अभियान चलाते हुए कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं।

IRGC के अनुसार यह कार्रवाई हालिया अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई। संगठन ने यह भी कहा कि सीजफायर का उल्लंघन इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन की पहली शर्त के खिलाफ है और इससे सभी कूटनीतिक प्रक्रियाएँ पूरी तरह रुक सकती हैं।

क्या अमेरिका इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा है? हमास का समर्थन, अल-कायदा का ‘बचाव’… कौन हैं DSA के चुनाव में ममदानी के समर्थन से जीतने वालीं ‘हिजाबन’ अबर कवास और दारियालिजा?

                          अबर कवास, जोहरान ममदानी और डारियालिजा अवीला शेवेलियर (बाएँ से दाएँ)

दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ मुस्लिम आतंकवाद का विरोध करने की बजाए victim card खेलने से पीछे नहीं। जबकि आतंकवाद कितने बेगुनाहों की जान ले रहा है वो नही दिखता। अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले से जो मीडिया यह बता रहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का उनके ही देश में विरोध हो रहा। जबकि हकीकत यह है कि जिस तरह Surgical Air Strike, Operation Sindoor आदि के समय भारतीय विपक्ष  पाकिस्तान की बोली बोल रहा था और मीडिया विपक्ष को प्रमुखता दे रहा था, ठीक उसी तरह अमेरिका में मुस्लिम कट्टरपंथी ट्रम्प के विरुद्ध बोल रहे थे। जिसे मीडिया ने नहीं बताया,  इस मसले पर ट्रम्प का "मीडिया को बिकाऊ" कहना बिलकुल सही है। वैसे भारतीय मीडिया की भी लगभग यही हालत है। "जहां दिखे तवा परात वहीं बिसाई सारी रात।" मीडिया को बस चिंता है अपनी TRP की। 

अमेरिका में इस साल नवंबर में होने वाले जनरल इलेक्शन में अपना उम्मीदवार खड़ा करने के लिए हर पार्टी अपने आंतरिक चुनाव कराती है, जिसे देश में प्राइमरी चुनाव (Primary Election) कहा जाता है। डेमोक्रेटिक पार्टी (DSA) के भीतर भी प्राइमरी चुनाव हुआ और 23 जून 2026 को नतीजे सामने आए। इन नतीजों में चर्चा न्यूयॉर्क से चुने मुस्लिम प्रतिनिधि अबर कवास (Aber Kawas) और दारियालिजा एविला शेवेलियर (Darializa Avila Chevalier) की हो रही है। इन ‘हिजाबन’ को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी का समर्थन मिला है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी जोहरान ममदानी के समर्थन से जीते नेताओं पर प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने इस पर मीडिया को घेरते हुए कहा, “मेयर ममदानी ने 3 पक्के वामपंथियों को चुनाव जितवा दिया और इसके लिए बिकाऊ मीडिया (Fake News Media) उनकी जमकर तारीफ कर रहा है। मेयर साहब को बधाई! कल रात मैंने 16-0 का रिकॉर्ड बनाया (यानी जिन 16 लोगों का मैंने समर्थन किया, वे सब जीत गए) और शानदार अमेरिकी देशभक्तों को चुनाव जिताने में मदद की, लेकिन मीडिया ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला।”

उन्होंने अपनी तारीफ में आगे लिखा, “पिछले दो सालों में, मेरे समर्थन से लोगों को प्राइमरी चुनाव में 259 जीत मिली हैं, और लगभग कोई हार नहीं हुई, फिर भी मीडिया इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता!!! बिकाऊ मीडिया।”

डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं, वह सच है। चर्चा तो हो रही है जोहरान ममदानी का समर्थन मिलने वाले जीते हुए नेताओं की। खासकर अबर कवास और दारियालिजा एविला शेवेलियर की। जहाँ पश्चिमी मीडिया इन नेताओं की जीत पर बड़े-बड़े लेख लिख रही है, वहीं सोशल मीडिया पर इनके पुराने बयान और इनकी पहचान काफी चर्चा में चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर अमेरिकी इन दोनों मुस्लिम नेताओं के मुस्लिम-प्रोपेगेंडा, हमास का समर्थन और अमेरिकियों के लिए घृणा वाली सोच को सामने ला रहे हैं।

कौन हैं अबर कवास?

अबर कवास खुद को फिलिस्तीन का निवासी बताती हैं। उनका दावा है कि उनके अम्मी-अब्बा फिलिस्तीन से माइग्रेट होकर अमेरिका आए थे। कवास के अनुसार, उनका जन्म भी न्यूयॉर्क के ब्रूकलिन में ही हुआ है। कवास ने सिटी कॉलेज ऑफ न्यूयॉर्क से ‘इंटरनेशनल स्टडीज’ की पढ़ाई की है। इससे अलग कवास ने अपनी पहचान अमेरिका में सख्त प्रवासन नीतियों और देश में मुस्लिम-विरोधी रवैये के पीड़ित के रूप में बनाई है।

वो दावा करती है कि जब वह किशोरावस्था में थीं, तब उनके पिता को अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) ने हिरासत में ले लिया और देश से डिपोर्ट कर दिया था। अपनी चुनावी अभियान की वेबसाइट में भी उन्होंने यह जानकारी लिखी है।

इसी पहचान के साथ कवास न्यूयॉर्क के डिस्ट्रिक्ट 12 क्विन्य सीट से डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में 58.3 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत दर्ज की। कवास ने असेंबली मेंबर स्टीवन रागा को 20 प्रतिशत वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ अब वे नवंबर में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बन सकती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस जीत के साथ अबर कवास ने इतिहास रचा है क्योंकि वे न्यूयॉर्क सीनेट के लिए चुनी जाने वाली पहली फिलिस्तीनी मुस्लिम महिला बन गई हैं।

फिलिस्तीन और मुस्लिम-पीड़ित का रोना रोने वाली अबर कवास का बैकग्राउंड निकला ‘आपराधिक’

कवास ने बेशक फिलिस्तीन और अमेरिका में मुस्लिम पीड़ित की रोना रोकर चुनाव लड़ा हो, लेकिन असलियत कुछ और है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर चल रही खबरों में सामने आया कि उनके द्वारा गढ़ी गई इमिग्रेशन के कारण परिवार को डिपोर्ट करने वाली कहानी झूठी है। कवास के परिवार को इसीलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उनके अब्बा ‘अब्दुलकरीम कवास’ एक दोषी अपराधी थे।
अमेरिकी की एक कोर्ट में इसके सबूत भी हैं, जिसे न्यूयॉर्क पोस्ट ने कवर भी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अबर कवास के अब्बा अब्दुलकरीम कवास जॉर्डन के नागरिक थे, जो 1989 में टूरिस्ट वीजा पर अमेरिका आए थे और कभी वापस नहीं गए। यहाँ अब्दुलकरीम का जघन्य अपराधों में नाम सामने आया। 1995 में उन्हें वर्जीनिया की रिचमंड सिटी सर्किट कोर्ट में झूठी गवाही का दोषी पाया गया और इसके 10 साल बाद न्यू जर्सी में प्रॉपर्टी चोरी के आरोप में दोषी पाने के बाद अगस्त 2006 में तीन साल की जेल तक हुई थी।
इसी बीच उनका इमिग्रेशन का मामला भी अदालतों में चलता रहा। एक फेडरल इमिग्रेशन जज ने शुरू में उन्हें 2004 की सुनवाई में उपस्थित न होने पर देश से निकालने का आदेश दिया था। इसके बाद देश में जॉर्ज बुश (George W. Bush) की सरकार के दौरान उन्हें जॉर्डन डिपोर्ट कर दिया गया था। लेकिन अबर कवास अपने चुनावी अभियान के दौरान लगातार ट्रंप प्रशासन की सख्त इमेग्रेशन नीतियों पर इसका ठीकरा फोड़ती रही हैं।

9/11 आतंकी हमलों पर अबर कवास का अमेरिकी-विरोधी बयान

यही नहीं, अबर कवास की सोच भी अमेरिकी-विरोधी है। यह तब और ज्यादा मुखर होकर सामने आया जब अबर कवास ने अमेरिकी के काले पन्नों में दर्ज 9/11 आतंकी हमले पर अपना पक्ष रखा। कवास ने इस आतंकी हमले का जिम्मेदार अमेरिकियों को ही ठहरा दिया और अलकायदा का बचाव किया। कवास के बयान की वीडियो क्लिप भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।
इस क्लिप में अबर कवास कहती हैं, “पूँजीवाद, नस्लवाद, गोरों को दूसरों से श्रेष्ठ समझना और इस्लामोफोबिया- इन सब चीजों का इस्तेमाल हमेशा से दूसरों की जमीनों पर कब्जा करने और उनके संसाधनों को छीनने के लिए किया गया है। यह बहुत लंबे समय से चला आ रहा है और 9/11 का हमला भी इसी पुरानी सोच और सिलसिले का ही एक हिस्सा था।
कवास आगे कहती हैं, “यह सोचना कि हमें (मुस्लिमों को) एक ऐसे आतंकवादी हमले के लिए माफी माँगनी चाहिए जो सिर्फ चंद लोगों ने किया था जबकि इतिहास में हुए बड़े-बड़े नरसंहारों और गुलामी की प्रथा के लिए कभी किसी ने माफी नहीं माँगी और न ही कोई मुआवजा दिया, यह बात मुझे बहुत गलत और घिनौनी लगती है।”
जिस 9/11 आतंकी हमले की अबर कवास यहाँ बात कर रही हैं, वह आतंकी संगठन अलकायदा ने अंजाम दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन था। उसके नेतृत्व में 11 सितंबर 2001 को अलकायदा के 19 आतंकियों ने अमेरिका के 4 विमानों को हाइजैक किया और उन्हें आत्मघाती बम की तरह इस्तेमाल किया था। इस पूरे हमले में 2,977 मासूम लोगों ने जानें गवाई थीं, जिनमें 90 प्रतिशत अमेरिकन थे।

कौन हैं डारियालिजा अवीला शेवेलियर?

डारियालिजा अवीला शेवेलियर ने भी अपनी पहचान प्रवासी नागरिक के तौर पर मजबूत की है। उनकी चुनावी अभियान की वेबसाइट के अनुसार, वह खुद को अप्रवासन की सख्त नीतियों का पीड़ित होने का दावा करती हैं। उनका डोमिनिकन परिवार है जो फ्लोरिडा से अमेरिका माइग्रेट हुआ था। शेवेलियर बताती हैं कि वह गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहाँ उनके अब्बा ट्रक ड्राइवर और अम्मी एक केस वर्कर हैं, जिसने अपने बचपन का ज्यादा समय वेनेजुएला में अपनी दादा के साथ बिताया है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन और अफ्रीकन स्टडीज में ग्रेजुएशन पूरी की है और फिलहाल सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क (CUNY Graduate Center) से सोशियोलॉजी में पीएचडी की डिग्री पूरी कर रही हैं। कॉलेज के समय से ही शेवेलियर कट्टर वामपंथी आंदोलनों का हिस्सा रही हैं, इस दौरान वह हिजाब भी पहना करती थीं लेकिन प्राइमरी चुनाव में अभियान के दौरान उनका हिजाब गायब दिखा।
शेवेलियर ने फिलिस्तीन समर्थित, ब्लैक लाइव्स मैटर और खासकर अप्रवासन नीतियों के खिलाफ अभियानों का हिस्सा रहकर अपनी पहचान बनाई। इसी पहचान के साथ शेवेलियर ने प्राइमरी चुनाव में 13वें डिस्ट्रिक्ट सीट से जीत हासिल की है। उन्होंने 5 बार के मौजूदा और बेहद शक्तिशाली सांसद एड्रियानो एस्पेलियाट (Adriano Espaillat) को 2,326 वोटो के अंतर से चुनाव में मात दी है।

शेवेलियर के अमेरिकी-विरोधी और प्रो-हमास होने पर सोशल मीडिया पर आलोचना

शेवेलियर को चुनाव में जोहरान ममदानी का समर्थन मिला। इसके बावजूद भी सोशल मीडिया पर अमेरिकन शेवेलियर के खिलाफ बोल रहे हैं, लोग उनके इस्लामी हित और अमेरिकी-विरोधी बयानों और विवादित बैकग्राउंड पर बात कर रहे हैं। यह भी सामने आया है कि शेवेलियर ने अपना इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर लिया है। इसके अलावा लोग उनके डोमिनिकन मूल से होने पर भी सवाल उठा रहे हैं, लोगों का कहना हैं कि वह हैतीयन (Haitian) मूल की हैं।
शेवेलियर की सोशल मीडिया हिस्ट्री खंगालकर अमेरिकी बता रहे हैं कि वह अमेरिकन झंडे का इस्तेमाल नैपकिन की तरह करती हैं। इसके अलावा 07 अक्टूबर 2025 को ठीक एक दिन बाद, उन्होंने इजरायली नागरिकों की हत्या का जश्न मनाने वाली एक रैली में भी हिस्सा लिया था। उनके अमेरिकी-विरोधी होने का भी राज खोलते हुए कहा कि वह गोरी महिलाओं को ‘बदसूरत उपनिवेशवादी’ बताती हैं।
इतना ही नहीं अमेरिकन ने बताया कि शेवेलियर कह चुकी हैं कि अपराधियों सहित किसी भी व्यक्ति का निर्वासन (देश से निकालना) उचित नहीं है। वह पुलिस से नफरत करती हैं और उन्हें ‘सूअर’ कहती हैं, अमेरिकी सैनिकों को युद्ध अपराधी बताती हैं और कहती हैं कि अमेरिका एक शर्मनाक देश है। वह सिर्फ़ न्यूयॉर्क से चुनाव लड़ रही हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फ्लोरिडा में उनके जीतने की कोई संभावना नहीं है।”
ऐसा ही उनका एक पुराना वीडियो भी सामने आया, जिसमें शेवेलियर कहती दिख रही हैं कि अगर वह कॉन्ग्रेस में पहुँचती हैं तो ‘इंशाल्लाह’ यह पक्का करना चाहेंगी कि ‘सत्ता के गलियारों’ में उनके मुस्लिम मजहब की झलक दिखे।

निष्कर्ष: न्यूयॉर्क में जोहरान ममदानी ने अपने जैसे दो को बनाया अगला प्रतिनिधि

शेवेलियर और कवास के बैकग्राउंड को देखते हुए लगता है कि यह भी जोहरान ममदानी की राह पर ही हैं। इन्होंने भी न्यूयॉर्क में मुस्लिम-पीड़ित पहचान, हमास को समर्थन और अमेरिकी नीतियों की आलोचना करके ही चुनाव जीता है। लगता है कि न्यूयॉर्क को कई जोहरान मिल गए हैं और इनका प्राइमरी चुनाव जीतने यही अंदेशा है कि ऐसे अमेरिकी विरोधी नेता आम चुनाव भी आसानी से जीत जाएँगे, क्योंकि न्यूयॉर्क पहले से ही सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ रहा है।
हालाँकि इससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या न्यूयॉर्क में सचमुच लोग ट्रंप प्रशासन की नीतियों से परेशान हैं या फिर शहर में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है। वैसे भी आए दिन सोशल मीडिया पर वीडियोज सामने आते रहते हैं कि जिसमें न्यूयॉर्क की सड़कों पर मुहर्रम के शोक हो रहे हैं, टाइम्स स्क्वायर से अजान की आवाजें आती हैं और इसी न्यूयॉर्क में बैठकर जोहरान ममदानी और उसके जैसे नेता अमेरिका के विरोध में बयान देते हैं और आतंकियों के मरने पर शोक मनाते हैं। क्या ऐसे नेताओं को सत्ता में लाकर अमेरिका इस्लामीकरण की ओर है?

चीफ जस्टिस साहब, सोशल मीडिया खुद भी पढ़ें और अपने जजों को भी पढ़ने को कहें, न्यायपालिका की गलतियां पता चलेगी; जिस मामले पर 2 हाई कोर्ट ने फैसला दे दिया; उसे सुप्रीम कोर्ट 16 साल से लिए बैठा है

सुभाष चन्द्र 

मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पीबी बालाजी की खंडपीठ ने 25 जून को एक फैसले में तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च, 2024 के आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया और कहा कि मतांतरण करने वालों को बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के रूप में आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता एक हिंदू ने इस्लाम अपना कर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और उसके बाद उसने स्वयं को मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का बता कर पिछड़े वर्ग का सदस्य बताते हुए प्रमाण पत्र की मांग की जो तहसीलदार ने स्वीकार नहीं की। इसी के सन्दर्भ में दोनों जजों ने यह फैसला सुनाया 

अब चलते हैं आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के 2007 के फैसले की तरफ आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 5:2 के बहुमत के फैसले में आंध्र प्रदेश सरकार के ANDHRAPRADESH RESERVATION FOR SOCIALLY BACKWARD AND EDUCATIONALLY BACKWARD CLAUSES OF MUSLIM ACT 2007 को ख़ारिज करते हुए कहा कि IT IS UNSUSTAINABLE AND VILOLATIVE OF ARTICLE 14 OF (EQUALITY BEFORE LAW), 15(4) AND 16(4) AND OTHER PROVISIONS PERTAINING TO PROHIBITION OF DISCRIMATION BY STATE ON THE GROUNDS OF RELIGION, RACE, CAST, SEX OR PLACE OF BIRTH”.

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस KG Balakrishnan, Justice JM Pancholi और Justice BS Chauhan की पीठ ने आंध्र प्रदेश के मुस्लिमों को दिए गए 4% आरक्षण को अनुमति दे दी साथ में मामले को संविधान पीठ को भेज दिया जो राज्य के आदेश की संवैधानिकता को परखेगी क्योंकि इसमें संविधान के संबंधित मामला उठाया गया है फिर आपको आरक्षण की अनुमति देनी ही नहीं चाहिए थी

अब आप देखिए 16 साल से वह संविधान पीठ गठित नहीं हुई है कल को अगर संविधान पीठ भी आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रख देती है और राज्य सरकार के 4% आरक्षण को अवैध कह देती है तो जो लोग 16 साल से आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, उन्हें क्या सुप्रीम कोर्ट नौकरी से निकालने के भी आदेश देगा और जो सैलरी उन्होंने 16 साल में ली है, वो क्या वापस करने के भी आदेश सुप्रीम कोर्ट देगा  

देश के अलग अलग राज्यों में “सेक्युलर दलों” से मुस्लिम आरक्षण मांगते हैं और उनका वोट लेने के लिए ये दल उन्हें आरक्षण देने का भरोसा भी दे देते हैं जो संविधान के अनुसार वैध नहीं है लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट 16 साल तक ऐसे मामले को लटकाए बैठा रहेगा तो देश में अराजकता बढ़ना स्वाभाविक है सेक्युलर दलों को मरोड़ उठती है मुस्लिमों को आरक्षण देने की जैसे तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश सरकार को उठी थी 

इस लेख में मैंने सुप्रीम कोर्ट के लिए कुछ अशोभनीय नहीं लिखा है मेरा मकसद सुप्रीम कोर्ट तक यह बात पहुंचाना है कि इस तरह की न्याय व्यवस्था देश के लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकती है यह कहना बड़ा आसान है कि सोशल मीडिया पर हम ध्यान नहीं देते और whatsapp university की बात हमारे सामने मत कीजिए लेकिन ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया और whatsapp पर सब कुछ बकवास लिखा जाता है हो सकता है कुछ बातें गलत भी होती होंगी लेकिन मैंने जो विषय उठाया है, उसे तो चीफ जस्टिस को पढ़ना चाहिए

डेनमार्क :‘अजान’ पर बैन लगाने के साथ सडकों पर नमाज़ भी होगी प्रतिबंधित; मंत्री बोले- इस्लामाबाद जैसे लग सकते हैं कई इलाके

                         डेनमार्क में सड़कों पर नमाज अदा करते मुस्लिम (फोटो साभार: Getty Images)
चीन ने तो पहले से ही इस्लाम पर नकेल कसने के साथ-साथ कई त्योहारों तक पर भी पाबन्दी लगाई हुई है। भारत पल रहे मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर किसी भी मुस्लिम देश और UNO तक की चीन के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं। मानवाधिकार भी किसी कालकोठरी में छिपा बैठा है। लेकिन अब कुछ समय से आतंकवादी गतिविधियों और कट्टरपंथियों द्वारा उत्पात मचाने को देख यूरोप ने भी कमर कसनी शुरू कर दी है। कई देशों ने तो बुर्का/हिजाब और नकाब और सड़क पर नमाज़ तक पर पाबन्दी लगा दी है।     

अब यूरोपियन देश डेनमार्क जल्द ही सड़कों पर नमाज पर रोक लगाने जा रहा है। डेनमार्क के आप्रवासन मंत्री मोर्टेन बोडस्कोव ने चेतावनी दी है कि देश के कुछ हिस्से इस्लामाबाद जैसे लग सकते हैं। उन्होंने घोषणा की कि सोशल डेमोक्रेट सरकार पूरे देश में नमाज पर रोक लगाने के मामले की फिर से जाँच शुरू करेगी।

डेनमार्क की न्यूज एजेंसी ‘रिटजाऊ’ (Ritzau) को मंत्री मोर्टेन बोडस्कोव ने बताया कि अधिकारी इस बात की कानूनी जाँच फिर से शुरू करेंगे कि क्या ऐसी पाबंदी लागू की जा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि हालाँकि कोपेनहेगन समेत कुछ इलाकों में शोर-शराबे से जुड़े कड़े नियमों की वजह से बाहर नमाज पर पहले से ही पाबंदी है। लेकिन अब डेनमार्क की सरकार और भी सख्त पाबंदी पर विचार कर रही है।

मंत्री बोडस्कोव ने कहा कि डेनमार्क में मस्जिदों से दिन में पाँच बार दी जाने वाली नमाज की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा, “डेनमार्क की छतों से अजान की आवाज नहीं सुनाई देनी चाहिए। डेनमार्क में इसकी कोई जगह नहीं है और जब आप डेनमार्क में घूमें तो आपको यह शक नहीं होना चाहिए कि आप इस्लामाबाद के किसी इलाके में आ गए हैं।”

यह पहली बार नहीं है जब डेनमार्क अपने देश में नमाज पर रोक लगाने पर विचार कर रहा है। इससे पहले 2020 और 2025 में भी इस पर चर्चा हुई थी लेकिन उससे देशभर में प्रतिबंध नहीं लग पाया।

श्रद्धालुओं का दान और सिस्टम के भीतर सेंध पर शोर मचाने को क्या मस्जिदों और दरगाहों में घोटाला नहीं दिखता?

 
मीडिया को अपनी TRP की चिंता तो नेताओं को अपने वोटबैंक की। पुरुषोत्तम श्रीराम मन्दिर में चढ़ावे में हुई चोरी पर मीडिया और विपक्ष ने फर्श से लेकर अर्श तक को सर पर उठा रखा है। इनमें से कोई ईमानदारी से बताए क्या किसी मजहबी जगह पर घोटाले नहीं। दिल्ली के ही एक स्थानीय मुस्लिम ने कई बार मस्जिदों और दरगाहों में हो रहे घोटाले को सरकार और वक़्फ़ बोर्ड के सामने लाने की कोशिश की जबकि वक़्फ़ बोर्ड तो क्या सभी जानते हैं लेकिन किसी की हिम्मत नहीं। राममन्दिर की तरह जिस दिन दूसरे मजहबों पर हाथ डाला सबकी आंखें फटी रह जाएँगी। चोरी चोरी ही है चाहे वह मंदिर में हो या मस्जिद में।

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और हैंडलिंग में कथित गड़बड़ी का मामला अब जाँच के सबसे अहम दौर में पहुँच गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर इस मामले में FIR दर्ज हुई है। इसके बाद पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 आरोपितों को गिरफ्तार किया। आरोप है कि मंदिर में आने वाले दान की गिनती, रखरखाव और उससे जुड़ी व्यवस्था में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुईं।

यह मामला पहली बार 7 जून को सामने आया था। इसके बाद यूपी सरकार ने 13 जून को SIT का गठन किया। SIT ने 23 जून को एडिशनल चीफ सेक्रेटरी गृह संजय प्रसाद को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। इसी रिपोर्ट के दो दिन बाद कार्रवाई तेज हुई और मंदिर से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपितों में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जानेंगे कि ये 8 लोग कौन हैं इन पर क्या आरोप हैं।

                                                            FIR की कॉपी का एक हिस्सा

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित चेहरा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का पूर्व ड्राइवर बताया जाता है और VHP के कारसेवकपुरम से भी जुड़ा रहा है। बताया गया है कि मंदिर की व्यवस्थाओं में उसका हस्तक्षेप रहता था और दानपात्रों की निगरानी से लेकर उन्हें बेसमेंट तक पहुँचाने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका थी।

आरोप है कि दानपात्रों की चाबियाँ भी उसी के पास रहती थीं और ट्रस्ट के लोगों से करीबी होने के कारण वह मनमाने तरीके से काम करता था। FIR और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी शुरुआती चरण में चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी हुई और उससे अयोध्या व आसपास के जिलों में संपत्तियाँ बनाने के आरोप लगे। हालाँकि, टिन्नू यादव ने कैश काउंटिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया है और आरोपों के पीछे कुछ ‘जलने वाले लोगों‘ को जिम्मेदार बताया है।

रामशंकर मिश्रा

रामशंकर मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप है। यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने बेटे अनुकल्प मिश्रा और दामाद लवकुश मिश्रा को भी चढ़ावा गिनने के काम में लगवाया।

पुलिस के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रामशंकर मिश्रा अन्य आरोपितों के साथ मिलकर दान की रकम में कथित हेराफेरी करते थे और कैश सॉर्टिंग प्रक्रिया के दौरान CCTV फुटेज में भी दिखे। जाँच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने तय वित्तीय प्रक्रिया को दरकिनार करने में भूमिका निभाई और लंबे समय तक कथित गड़बड़ी को आसान बनाया।

अनुकल्प मिश्रा

अनुकल्प मिश्रा, रामशंकर मिश्र का बेटा है और वह भी दान की रकम गिनने और संभालने की प्रक्रिया में शामिल था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अयोध्या के मिल्कीपुर क्षेत्र के बसावन गाँव का निवासी है। उसका संबंध ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा से भी बताया गया है।

अनुकल्प की ड्यूटी चढ़ावा गिनने के काम में लगती थी। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि कैश काउंटिंग के दौरान रकम में कथित हेराफेरी की गई और अनुकल्प के घर से चोरी की रकम बरामद होने का दावा भी किया गया है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि CCTV फुटेज और बरामदगी के आधार पर उसकी भूमिका की जाँच की जा रही है।

लवकुश मिश्रा

लवकुश मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम का हिस्सा था। आरोप है कि चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी के बाद उसके निपटान यानी ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी लवकुश पर थी। कहा गया है कि उसने मंदिर से चोरी कर करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है।

शुरुआती जाँच में उसके घर से रकम बरामद होने के दावे सामने आए थे। कुछ रिपोर्ट्स में उसके घर से करीब 12 लाख रुपए कैश मिलने की बात कही गई है। जाँच एजेंसियाँ इस रकम के स्रोत की जाँच कर रही हैं और आरोप है कि वह अनुकल्प मिश्रा के साथ मिलकर दान की रकम की हेराफेरी में सक्रिय रूप से शामिल था।

अविनाश शुक्ला

अविनाश शुक्ला को मंदिर की व्यवस्था और दान की रकम से जुड़ी प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति बताया गया है। रिपोर्ट्स में उसे मंदिर का अटेंडेंट या काउंटिंग टीम से जुड़ा सदस्य बताया गया है। आरोप है कि वह दान की रकम को सुरक्षित तरीके से काउंटिंग रूम तक पहुँचाने और गिनती की प्रक्रिया में शामिल था।

पुलिस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि वह उस कथित सिंडिकेट का अहम सदस्य था, जिस पर चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी का आरोप है। उसके बैंक खाते से करीब 5 लाख रुपए बरामद होने की चर्चा भी रिपोर्ट्स में सामने आई है। उस पर दान की रकम के कथित दुरुपयोग और उससे संपत्ति बनाने के आरोप लगाए गए हैं।

मनीष कुमार यादव

मनीष कुमार यादव, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का भतीजा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह टिन्नू यादव के छोटे भाई बलराम यादव का बेटा है। पुलिस के हवाले से कहा गया है कि मनीष मंदिर में दान की रकम गिनने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल था।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसके घर से भी चोरी की रकम बरामद हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान उसके घर से करीब 36 लाख रुपए नकद मिलने का दावा किया गया है। जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह रकम कहाँ से आई और इसका संबंध कथित गबन से किस तरह जुड़ता है।

सुभाष चंद्र श्रीवास्तव

सुभाष चंद्र श्रीवास्तव पूर्व बैंक कर्मचारी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें राम मंदिर में कैश काउंटिंग स्टाफ का प्रभारी बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी दान की रकम की गिनती करने वाले कर्मचारियों की निगरानी और पूरी काउंटिंग प्रक्रिया को देखना था। बैंकिंग पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इस काम की निगरानी के लिए रखा गया था।

FIR और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन पर निगरानी में कथित लापरवाही और अनियमितताओं में संलिप्तता के आरोप हैं। जाँच एजेंसियाँ यह देख रही हैं कि उनके प्रभारी रहते हुए दान की रकम की गिनती में कथित गड़बड़ी कैसे हुई।

करुणेश पांडेय

करुणेश पांडेय पर दान की रकम से जुड़ी रसीदों और वित्तीय रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी का आरोप है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा के साथ पूरी साजिश में शामिल था। जाँच एजेंसियों का दावा है कि वह श्रद्धालुओं के चढ़ावे को संभालने वाली कोर टीम का हिस्सा थे।

एक रिपोर्ट के अनुसार, उनकी जिम्मेदारी दान की रकम को गिनती वाले कमरे तक पहुँचाने से भी जुड़ी थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने रकम और रिकॉर्ड की हेराफेरी में भूमिका निभाई और कथित गड़बड़ी से संपत्ति अर्जित की।

7 पीढ़ियाँ भुगतेंगी अंजाम… अब बंगाल में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों की खैर नहीं, दंगाइयों और गुंडों के लिए शुभेंदु सरकार का नया कानून

योगी आदित्यनाथ या हिमंता सरमा से नहीं तो शुभेंदु अधिकारी से दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखना चाहिए। दिल्ली में आए दिन हो रहे क़त्ल और अधिक्रमण पर श्रीमती रेखा गुप्ता को इन मुख्यमंत्रियों की तरह काम करना चाहिए। क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स, शराब घोटाला, मनी लॉन्डरिंग आदि का? क्या इन सबको चुनाव आने तक ठंठे बस्ते में डाल दिया गया है? मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ काम करना होगा। अब तक जो अधिक्रमण हटाए जा रहे हैं सभी हिन्दू क्षेत्रों में लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों पर आंखें मूंदे हुए हैं। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु ने मुख्यमंत्री बनते ही विरोधियों के साथ-साथ दंगाइयों में और बांग्लादेश तक में खलबली मची हुई है। 

ममता की पार्टी TMC  ऐसे ही नहीं बिखरी, अधिकारी की कार्यशैली से बिखरी है। अगर अधिकारी ने बिना भेदभाव के काम किया ममता से अलग हुए कई विधायक और सांसद भी लपेटे में आएंगे। क्योकि ममता राज में जितना भी उपद्रव हुआ इन लोगों का भी प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष समर्थन था। यदि नहीं, फिर क्यों नहीं ममता का विरोध कर पार्टी छोड़ी? तब ये ही सब बड़े आनंद के साथ मलाई खा रहे था।       

पश्चिम बंगाल में अपराधियों और दंगाइयों पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक बेहद सख्त नया कानून ला रहे हैं। सोमवार(29 जून) को विधानसभा में पेश होने जा रहा यह बिल यूपी के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी ज्यादा घातक माना जा रहा है।

इस नए कानून के तहत सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों से भारी वसूली की जाएगी। इसके कड़े प्रावधानों को देखकर अभी से विपक्ष और अपराधियों के बीच खलबली मच गई है।

54 साल पुराना ढर्रा होगा खत्म

बंगाल सरकार साल 1972 के पुराने कानून ‘द वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट’ में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसकी जगह अब विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ पेश किया जाएगा।

सरकार का मानना है कि पुराना कानून आज के आधुनिक और संगठित अपराधों से निपटने के लिए काफी नहीं था। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब बंगाल में सिंडिकेट का नहीं बल्कि सिर्फ कानून का राज चलेगा।

दंगाइयों का होगा आर्थिक खात्मा

इस नए कानून का सबसे बड़ा डर इसका रिकवरी मैकेनिज्म यानी नुकसान की वसूली का नियम है। अगर किसी दंगे या बवाल में सरकारी या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, तो उसकी पूरी भरपाई अपराधी की संपत्ति बेचकर की जाएगी।

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह कानून इतना कड़ा है कि नुकसान की भरपाई करते-करते दंगाइयों की आने वाली 7 पीढ़ियाँ तक कंगाल हो जाएँगी। यह अपराधियों को पूरी तरह आर्थिक रूप से खत्म करने वाला कदम है।

UP के मॉडल से भी दो कदम आगे

यह नया बिल उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल से भी ज्यादा सख्त बताया जा रहा है। इसमें पुलिस को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने और अपराधियों को जिले से बाहर निकालने की असीमित शक्तियाँ दी गई हैं। इतना ही नहीं, दंगाइयों और गुंडों को शरण देने वालों के खिलाफ भी इसमें सख्त नियम हैं। अब किसी भी अपराधी को छिपाने या पनाह देने पर सीधे दो साल की जेल की सजा काटनी होगी।

जेब में कंडोम और ‘लव लेटर’: पूर्व आतंकी मुश्ताक ने खोली पाकिस्तान की पोल, बताया- जन्नत-हूर का ख्वाब दिखा फँसाते हैं

          पूर्व आतंकी मुश्ताक ने बताया कैसे कश्मीरी लड़कियों को फँसाते थे पाकिस्तानी आतंकी (फोटो साभार: AI)
पूर्व कश्मीरी आतंकी और बाद में भारतीय सेना के लिए अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर चुके मुश्ताक अहमद भट ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के लोकप्रिय पॉडकास्ट (‘PGX: Raw & Real’) पर एक इंटरव्यू में 90 के दशक से लेकर 2016 तक के आतंक की उस काली सच्चाई को खोलकर रख दिया, जिसे पाकिस्तान हमेशा दुनिया से छिपाना चाहता है।

उन्होंने बताया कि सरहद पार से आने वाले आतंकी ‘मुजाहिद’ होने का दावा कर घाटी में केवल अपनी हवस मिटाने और कश्मीरी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने आते थे।

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान जिस ‘जिहाद’, ‘मजहब की लड़ाई’ और ‘आजादी की लड़ाई’ का नैरेटिव दुनिया के सामने पेश करता रहा है, उसकी हकीकत क्या है? क्या सचमुच हजारों कश्मीरी युवा किसी मकसद के लिए हथियार उठाकर सीमा पार गए थे या फिर वे एक ऐसे खेल का हिस्सा बन गए थे जिसमें मजहब, राजनीति, प्रोपेगेंडा और विदेशी एजेंसियों के हित सबसे ऊपर थे और युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नहीं था?

इन सवालों का जवाब उस व्यक्ति ने दिया है, जिसने इस काली दुनिया को भीतर से देखा। उसने कश्मीर में बंदूक संस्कृति का उदय देखा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के कैंपों में समय बिताया, अफगानिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण लिया, ‘जिहाद’ की विचारधारा के नाम पर होने वाली ब्रेनवॉशिंग को करीब से देखा और बाद में उस रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। यह व्यक्ति है मुश्ताक अहमद भट, जिन्हें कभी ‘अशफाक’ और ‘रोमियो’ जैसे कोड नेम से जाना जाता था।

प्रखर के पॉडकास्ट में मुश्ताक अहमद भट ने ऐसे कई खुलासे किए, जो पाकिस्तान के दशकों पुराने दावों को चुनौती देते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार मुठभेड़ों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तलाशी के दौरान उनकी जेबों से जिहाद और शहादत के संदेश नहीं, बल्कि कश्मीरी लड़कियों को लिखे गए प्रेम पत्र निकलते थे। कई मामलों में कंडोम भी बरामद हुए।

मुश्ताक के अनुसार, जब पकड़े गए आतंकियों से पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम और जिहाद के नाम पर लड़ने आए हैं तो उनके पास ऐसी चीजें क्यों हैं?, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता था। वे बहस से बचते थे या गुस्से में जवाब देते थे। यह वह पहला सच था जो उस छवि से बिल्कुल अलग था, जो पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठनों द्वारा ‘मुजाहिदीन’ के बारे में बनाई जाती रही है।

मुश्ताक बताते हैं कि कई विदेशी और पाकिस्तानी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में ऐसे मामले सामने आए जहाँ आतंकियों ने स्थानीय परिवारों में शरण ली, परिवार की लड़कियों के साथ रात बिताई और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। वैसी लड़कियाँ और उनके होने वाले बच्चों की जिंदगी बदल गई। यह कहानी केवल आतंकियों की निजी हरकतों की नहीं है, बल्कि यह कहानी उस पूरे तंत्र की है, जिसने हजारों युवाओं को ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नाम पर इस्तेमाल किया।

एक संपन्न और राजनीतिक परिवार से आने वाला युवक

मुश्ताक अहमद भट किसी आर्थिक मजबूरी या सामाजिक उपेक्षा के कारण उस रास्ते पर नहीं गए थे। वे कश्मीर के एक प्रभावशाली और राजनीतिक परिवार से आते थे। उनके दादा गाँव के मुखिया थे और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जमीन-जायदाद की कमी नहीं थी। पढ़ाई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हुई। सामान्य जीवन चल रहा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर तेजी से बदल रहा था। 1987 के चुनावों के बाद राजनीतिक असंतोष बढ़ा। चुनावी धांधली के आरोप लगे। अलगाववादी भावनाओं को हवा मिली। पाकिस्तान ने इस असंतोष को अवसर के रूप में देखा। घाटी में धीरे-धीरे एक नया माहौल बनने लगा।

मुश्ताक बताते हैं कि उस दौर में बंदूक केवल हथियार नहीं थी, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। कॉलेजों और युवाओं के बीच पिस्तौल और AK-47 आकर्षण का केंद्र बन गए थे। जिसके पास हथियार होता था, उसे अलग नजर से देखा जाता था।

मुश्ताक ने स्वीकार किया कि वे भी इसी माहौल से प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि बंदूक शक्ति का प्रतीक है। युवाओं के मन में यह धारणा बैठाई जा रही थी कि हथियार उठाना ही सम्मान पाने का रास्ता है। यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा था।

‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नारों से शुरू हुई यात्रा

मुश्ताक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी यही बताया गया कि वे एक बड़े और पवित्र मिशन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। ‘आजादी’ जुल्म के खिलाफ संघर्ष’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्द लगातार सुनाई देते थे। रैलियाँ निकलती थीं। भाषण होते थे। युवाओं को बताया जाता था कि वे इतिहास बदलने जा रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसे युवाओं की पहचान की जाती थी, जो भावनात्मक रूप से प्रभावित हो चुके हों। मुश्ताक भी उन्हीं युवाओं में शामिल हो गए। कुछ समय बाद उन्हें बताया गया कि वे सीमा पार जाने के लिए तैयार रहें। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीमा पार जाकर वे किसी महान उद्देश्य के लिए काम करेंगे।

कुपवाड़ा से सीमा पार और मुजफ्फराबाद तक

1990 के आसपास मुश्ताक और उनके साथियों को कुपवाड़ा के रास्ते सीमा पार कराया गया। यह यात्रा आसान नहीं थी। जंगलों, पहाड़ों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुँचे। रात में चलना, दिन में छिपना और लगातार सतर्क रहना इस यात्रा का हिस्सा था।

आखिरकार वे मुजफ्फराबाद पहुँचे, जहाँ उनका स्वागत किया गया। उन्हें बताया गया कि अब वे जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। यहीं से शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसे मुश्ताक बाद में ‘ब्रेनवॉशिंग’ के रूप में याद करते हैं। मुजफ्फराबाद के कैंपों में हर तरफ एक ही बात सुनाई देती थी- जिहाद, शहादत और जन्नत।

युवाओं को बताया जाता था कि यह दुनिया अस्थायी है और असली सफलता शहादत में है। मजहबी भाषणों, भावनात्मक कहानियों और प्रचार सामग्री के जरिए उनके भीतर एक विशेष मानसिकता विकसित की जाती थी, लेकिन कुछ ही समय बाद मुश्ताक को कई बातें खटकने लगीं।

उन्होंने देखा कि जिन युवाओं के नाम पर पैसा आता था, वह उन तक नहीं पहुँचता था। कैंपों के वरिष्ठ लोग बेहतर सुविधाओं में रहते थे, जबकि युवा साधारण और कठिन परिस्थितियों में रहते थे। यहीं से उनके मन में पहला बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर यह सचमुच मजहब और सिद्धांतों की लड़ाई है, तो फिर भ्रष्टाचार क्यों?

विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तैयार किया गया नैरेटिव

मुश्ताक के अनुसार, एक समय उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल किया गया जहाँ विदेशी प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के सामने कश्मीर की एक विशेष तस्वीर पेश की जाती थी। उन्हें बताया जाता था कि क्या कहना है और कैसे कहना है। भारतीय सेना के खिलाफ कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।

लोगों को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति हासिल की जा सके। मुश्ताक के अनुसार, यहीं से उन्हें एहसास होने लगा कि केवल हथियारों का ही नहीं, बल्कि नैरेटिव और प्रोपेगेंडा का भी एक बड़ा खेल चल रहा है।

मुजफ्फराबाद में कुछ समय बिताने के बाद मुश्ताक अहमद भट और उनके साथ मौजूद कई अन्य युवाओं को अफगानिस्तान भेजे जाने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें बताया गया कि अब वे असली ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं। वहाँ से लौटकर वे ‘बड़े मिशन’ का हिस्सा बनेंगे।

उस समय तक मुश्ताक के मन में कई सवाल पैदा हो चुके थे, लेकिन वे उस मशीनरी के भीतर थे जहाँ सवाल पूछना आसान नहीं था। जो व्यक्ति सवाल पूछता था, उस पर शक किया जाता था। जो संगठन की लाइन से अलग सोचता था, उसे पसंद नहीं किया जाता था। ऐसे माहौल में अधिकांश युवा चुप रहना ही बेहतर समझते थे।

पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक का सफर, हिज्ब-ए-इस्लामी के कैंप में मिली ट्रेनिंग

मुश्ताक बताते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को पहले पेशावर की ओर ले जाया गया। वहाँ से उन्हें अफगानिस्तान पहुँचाया गया। उस समय अफगानिस्तान युद्ध और अस्थिरता का केंद्र था। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई के बाद भी वहाँ हथियारबंद गुट सक्रिय थे और अलग-अलग संगठनों के कैंप चल रहे थे।

यहीं पर मुश्ताक को पहली बार एहसास हुआ कि कश्मीर का मुद्दा केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जहाँ अलग-अलग देशों, संगठनों और विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। अफगानिस्तान में मुश्ताक को हिज्ब-ए-इस्लामी से जुड़े कैंपों में प्रशिक्षण दिया गया।

यहाँ उन्हें हथियार चलाने, विस्फोटक इस्तेमाल करने, घात लगाकर हमला करने और कठिन इलाकों में लड़ने की ट्रेनिंग दी गई। AK-47 से लेकर दूसरे हथियारों तक, हर चीज सिखाई जाती थी। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी पाक युद्ध का हिस्सा हैं।

लेकिन मुश्ताक कहते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान भी उन्हें बार-बार यह महसूस होता था कि जो बातें मंचों पर कही जाती हैं और जो जमीन पर दिखाई देता है, दोनों में बहुत अंतर है। मुश्ताक बताते हैं कि अफगानिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने पहली बार युद्ध को वास्तविक रूप में देखा।

फिल्मों और भाषणों में युद्ध को रोमांचक दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर वह केवल मौत, तबाही और दर्द छोड़ता है। उन्होंने टूटे हुए घर देखे, घायल लोगों को देखा, ऐसे परिवार देखे जिनके कई सदस्य मारे जा चुके थे। ऐसे बच्चे देखे जिन्होंने अपने माता-पिता खो दिए थे। यही वह समय था जब उनके भीतर ‘जिहाद’ की चमक फीकी पड़ने लगी।

जन्नत के सपने और मौत की सच्चाई

मुश्ताक बताते हैं कि कैंपों में युवाओं को बार-बार बताया जाता था कि शहादत सबसे बड़ी सफलता है। उन्हें जन्नत और हूरों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं, लेकिन अफगानिस्तान में उन्होंने देखा कि मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे। वे युवा थे जिन्हें भावनाओं में बहाकर यहाँ तक लाया गया था। जो लोग फैसले लेते थे, वे सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते थे।

यहीं से उनके मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे हो रहा है? मुश्ताक बताते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि ‘जिहाद’ केवल विचारधारा नहीं, बल्कि एक कारोबार भी बन चुका है।

फंड जुटाए जाते थे, दान लिया जाता था, विदेशों में अभियान चलाए जाते थे, युवाओं के नाम पर पैसा आता था, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा ऊपर बैठे लोगों तक ही सीमित रहता था। जिन युवाओं को मैदान में भेजा जाता था, उनके हिस्से में केवल खतरा और मौत आती थी।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बिताए समय के दौरान मुश्ताक को यह समझ आने लगा कि कश्मीर का मुद्दा कई लोगों के लिए राजनीतिक साधन बन चुका है। कश्मीर में जितना तनाव रहेगा, उतना ही यह मुद्दा जिंदा रहेगा। जितने ज्यादा युवा हथियार उठाएँगे, उतना ही यह नेटवर्क मजबूत रहेगा। इसलिए युवाओं को लगातार भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जाता था।

उन्हें बताया जाता था कि वे किसी महान मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में वे एक ऐसे खेल का हिस्सा थे जिसमें उनका इस्तेमाल हो रहा था।

मुश्ताक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, वे बार-बार कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी युवाओं का हुआ। कई युवा पढ़ाई छोड़कर चले गए, कई कभी वापस नहीं लौटे, कई मारे गए, कई जेलों में पहुँचे और कई ऐसे थे जिन्हें यह तक समझ नहीं आया कि वे आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं।

मुश्ताक मानते हैं कि वे खुद भी उसी दौर में बहक गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस रास्ते पर वे चल पड़े थे, उसका अंत केवल विनाश था। अफगानिस्तान के अनुभवों, कैंपों में देखे गए भ्रष्टाचार और लगातार दिखाई दे रहे विरोधाभासों ने मुश्ताक की सोच पूरी तरह बदल दी।

प्रेम पत्र, कंडोम, हूरों के नाम पर कश्मीरी लड़कियों का शोषण

मुश्ताक के खुलासों में सबसे ज्यादा चर्चा उन घटनाओं की हुई जिनमें मारे गए आतंकियों की जेबों से प्रेम पत्र और कंडोम मिले। उनके अनुसार, यह उस नैरेटिव को चुनौती देता है जिसमें आतंकियों को केवल मजहबी योद्धा के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे।

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने ‘लव लेटर्स’ के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में लिखे गए इन खतों में कहीं भी जिहाद या किसी मजहबी मकसद की बात नहीं दिखी, बल्कि उनमें कश्मीरी लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और शादी के सपने दिखा कर प्रभाव में लेने वाली बातें होती थी।

कई खतों में लिखा था, “पापी से नहीं, पाप से नफरत करो…”, “मैं तुम्हारे अच्छे कैरेक्टर से प्यार करता हूँ…”। मुश्ताक का दावा था कि विदेशी आतंकी इसी तरह के झूठे प्रेम और भरोसे का माहौल बनाकर मासूम लड़कियों को अपने करीब लाने की कोशिश करते थे। मामला सिर्फ इन खतों तक सीमित नहीं था।

पूर्व कमांडर ने दावा किया कि कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं। जब उनसे पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने आए हैं तो ऐसी चीजों की जरूरत क्यों पड़ी, तब वे जवाब देने के बजाय भड़क जाते थे। वे हूरों का ख्वाब लेकर आते थे और कश्मीरी लड़कियों का शोषण करते थे।

मुश्ताक के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के कुछ गाँवों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनकी जिंदगी पाकिस्तानी आतंकियों के आने-जाने के बाद बदल गई। उनका कहना था कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय घरों में शरण लेते थे और अस्थायी या छद्म शादियों के जरिए लड़कियों से रिश्ते बनाते थे।

यमरश और उरपोरा नागबल गाँवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि साजिद और आदिल पठान जैसे पाकिस्तानी आतंकियों ने स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। पीछे रह गए बच्चे और वे महिलाएँ, जिन्हें समाज की नजरों और मुश्किलों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

सालों तक ‘शहादत’ और ‘जिहाद’ के नाम पर कश्मीर में हिंसा फैलाने वाले आतंकियों की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कोई मजहबी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा खेल था जिसमें युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें देकर बड़े कमांडरों और पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने स्वार्थ पूरे किए। यह सच घाटी के उन युवाओं के लिए एक आईना है, जो आज भी पाकिस्तान के प्रभाव में आकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

राहुल गांधी की माफ़ी स्वीकार करना भाजपा की एक और बड़ी गलती

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी ने 2018 की चुनाव रैली में शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय सिंह का नाम लेते हुए आरोप लगाया था कि उनका नाम पनामा पेपर लीक्स में है। बयान में किसी और के नाम का जिक्र नहीं था जैसा अब राहुल ने कहा है कि वो छत्तीसगढ़ के रमन सिंह के पुत्र के बारे में कह रहे थे। उनके पुत्र का नाम अभिषेक सिंह है और दोनों के नाम में कोई समानता नहीं है। 

कार्तिकेय सिंह चौहान ने जब MP/MLA कोर्ट में  मानहानि का केस दर्ज किया तब कोर्ट ने राहुल गांधी को समन जारी किया तो उसके खिलाफ वो हाई कोर्ट चले गए और यह भी अर्जी लगाई कि केस को खारिज कर दिया जाए। 

राहुल जो habitual offender है की माफ़ी स्वीकार करना बीजेपी ने फिर भयंकर गलती की है। अगर स्थिति विपरीत होती कांग्रेस कभी माफ़ी स्वीकार करती। झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना राहुल की आदत बन चुकी है। अगर माफ़ी स्वीकार करनी ही थी तो कोर्ट से अनुरोध करना था कि माफ़ी हर अख़बार और टीवी चैनल पर जाकर सार्वजानिक रूप से मांगनी चाहिए ताकि जनता को इस झूठे LoP की असलियत सामने आती।  

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परसों 24 जून को राहुल गांधी ने हाई कोर्ट में लिखत माफीनामा दाखिल कर दिया जिसे कार्तिकेय ने अपनी लीगल टीम की सलाह पर स्वीकार कर लिया और हाई कोर्ट ने mutual agreement के आधार पर MP/MLA कोर्ट में चल रहा केस बंद कर दिया

कार्तिकेय चौहान ने राहुल गांधी के खिलाफ IPC के section 500 के अंतर्गत मानहानि का आपराधिक केस दर्ज किया था जिसमें 2 वर्ष की साधारण कैद और 5000 रुपए का जुर्माना या दोनों हो सकते थे

राहुल गांधी चीख चीख कर कहता फिरता था कि मै  सच्चाई के लिए कभी माफ़ी नहीं मागूंगा

पहले राफेल मामले से जुड़े चौकीदार चोर है के बयान पर भी सुप्रीम कोर्ट में माफ़ी मांगी थी जब दावा कर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि “चौकीदार चोर है” जबकि ऐसा कुछ नहीं कहा था सुप्रीम कोर्ट ने 

सवाल यह पैदा होता है कि जब हर बयान पर बाद में सफाई देनी पड़ती है और कोर्ट में अपना बचाव करना पड़ता है तो ऐसे उल्टे पुल्टे बयान देते ही क्यों हो और देते हो उन पर कायम रहो

 

“सारे मोदी चोर हैं” वाले बयान पर तो ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने 2 साल की सजा दे ही दी थी लेकिन कांग्रेस परिवार से आने वाले जस्टिस बीआर गवई ने राहुल गांधी को बचा लिया। तब राहुल गांधी ने माफ़ी नहीं मांगी थी क्योंकि उसे भरोसा था सुप्रीम कोर्ट में वो बच जाएगा

राहुल गांधी के खिलाफ अनेक केस चल रहे हैं लेकिन किसी को ट्रायल कोर्ट लटका कर रखते हैं, किसी को हाई कोर्ट और किसी को सुप्रीम कोर्ट लटका देता है

भाजपा की फिर माफ़ी स्वीकार करके गलती है और पहले भी की है। अरुण जेटली और गडकरी ने केजरीवाल का माफीनामा स्वीकार कर लिया था लेकिन अगर ऐसा न किया होता तो उसकी  राजनीति के गर्त में चली जाती। अब कार्तिकेय ने भी वही गलती की है। माफ़ी स्वीकार करने की बजाय कोर्ट से आग्रह करना चाहिए था राहुल के मानहानिकारक बयान के लिए उपयुक्त सजा मिले क्योंकि ऐसी बयानबाजी करना उसका “धंधा” बन चुका है। अगर केस में सजा होती तो एक बार फिर संसद से बाहर हो जाता। 

कांग्रेस माफीनामा स्वीकार करने का कोई एहसान नहीं मानेगी बल्कि मौका मिलने पर शिवराज चौहान और भाजपा पर वार करेगी जैसे वर्तमान मुख्यमंत्री पर हमला करके कर रही है

राहुल गांधी की किसी भी केस में किसी को माफ़ी स्वीकार नहीं करनी चाहिए और हर केस सजा दिलाने के लिए लड़ना चाहिए। जो व्यक्ति देश का अपमान करता है उसे जितनी जल्दी हो सके कानूनी तरीके से संसद से बाहर करना चाहिए

माफीवीर राहुल गाँधी : 8 साल पहले पनामा पेपर्स लीक से शिवराज चौहान के बेटे का कनेक्शन ढूँढने वाले ने कहा- हो गई थी ‘गलतफहमी’

भारत को दो ऐसे माफीवीर नेता अरविन्द केजरीवाल और राहुल गाँधी मिले हैं जो hit and run पॉलिसी अपनाकर अपनी ही पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगता है दोनों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है। अगर राहुल केजरीवाल पार्टी की हालत देख देश और पार्टी हित में काम नहीं करते Leader of Opposition पद छोड़ देना चाहिए। बार-बार माफ़ी मांगना LoP के लिए बहुत ही शर्म की बात है। शायद इसीलिए पब्लिक भी राहुल की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से उसी समय निकाल रही।   

लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कोर्ट में मानहानि के मामले में माफी माँगी है। उन्होने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह का पनामा पेपर्स लीक मामले में नाम लिया था। इसके खिलाफ कार्तिकेय सिंह ने राहुल गाँधी के खिलाफ भोपाल की एमपी-एमएलए कोर्ट में मानहानि का केस दर्ज कराया था। इसमें उन्होंने कहा था कि उनकी प्रतिष्ठा धुमिल हुई है।

इस मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में हुई। इस दौरान राहुल गाँधी के वकील ने बुधवार (24 जून 2026) को कोर्ट में एक आवेदन दाखिल किया। इसमें उन्होंने अपने मानहानि वाले बयान पर खेद जताया है और कहा कि उनका बयान कार्तिकेय सिंह से जुड़ा नहीं था। अर्जी में हाईकोर्ट से राहुल गाँधी के खिलाफ चल रही मानहानि की कार्यवाही से राहत देने की माँग की गई है।

राहुल गाँधी के वकील ने कोर्ट में साफ किया कि यह बयान केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिवार के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह एक गलतफहमी थी। राहुल गाँधी के इस लिखित सफाई पर कोर्ट ने कार्तिकेय सिंह से लिखित में प्रतिक्रिया देने के लिए कहा है।

क्या है मामला

करीब 8 साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के प्रचार के दौरान राहुल गाँधी ने झाबुआ में चुनावी रैली के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा था कि चौहान के शासनकाल में राज्य में ‘बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार’ हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान का नाम पनामा पेपर्स में आया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस पर कार्तिकेय शर्मा ने भोपाल के एमपी एमएलए कोर्ट में आपराधिक मानहानि की शिकायत की, जो सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई करती है।

राहुल गाँधी ने कहा था, “पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का नाम पनामा पेपर्स में आया था। पाकिस्तान जैसे देश में उन्हें जेल हुई। यहाँ, एक मुख्यमंत्री के बेटे का नाम पनामा पेपर्स में आता है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।”

अब राहुल गाँधी अपने आरोपों पर सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्हें ‘गलतफहमी’ हुई थी और उन्होंने पनामा पेपर्स लीक मामले में गलती से कार्तिकेय का नाम ले लिया था, जबकि असल में शिवराज सिंह चौहान ‘व्यापम और ई-टेंडर घोटालों में शामिल’ हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गाँधी ने कार्तिकेय को पनामा पेपर्स मामले से गलत तरीके से जोड़कर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया। शिकायत के बाद, ट्रायल कोर्ट ने राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का समन जारी किया था।

इसके जवाब में, राहुल गाँधी ने समन और मानहानि के मामले को रद्द कराने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच का रुख किया। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल इस याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। बुधवार को जब मामला सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ता पक्ष ने पहले के निर्देशानुसार निचली अदालत के रिकॉर्ड पेश किए। शिकायतकर्ता कार्तिकेय सिंह की ओर से वकील संकल्प कोचर पेश हुए।

हाई कोर्ट में दायर नई अर्जी में राहुल गाँधी ने उस बयान पर खेद व्यक्त किया है और स्पष्ट किया है कि उनका इरादा कार्तिकेय सिंह का जिक्र करने का नहीं था।