कॉकरोचों का बुलबुला फट गया, केजरीवाल के बच्चे बर्बाद हो गए और राहुल गांधी की “गूंज” दब गई; राजस्थान में भी और दिल्ली में भी

सुभाष चन्द्र

केजरीवाल की नाजायज औलादों ने पहले दिल्ली में गुंडागर्दी मचाई और फिर राजस्थान गए भाजपा सरकार को अस्थिर करने के लिए उधर राहुल गांधी “छात्रों को अपनी गूंज” सुना रहा था।  

लेकिन पहले राजस्थान में पिटे और आज दिल्ली के छात्रसंघ के चुनाव में सबकी लुटिया डूब गई DUSU के 4 पदों में से 3 विद्यार्थी परिषद जीत गई और एक निर्दलीय उपाध्यक्ष बना जो कहते हैं कांग्रेस का बागी है यानी कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया और राहुल गांधी अपने गुरु योगेंद्र यादव के कहने पर सड़क से सरकार चलाने के सपने देख रहा था

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दिल्ली छात्रसंघ चुनाव में वामपंथियों के वोट देखने वाले हैं जिन्होंने दिल्ली में दंगा किया अध्यक्ष पद के लिए वामपंथी को मात्र 5377 वोट मिले, उपाध्यक्ष के लिए एक को 2383 वोट मिले और दूसरे को केवल 2274, सचिव पद के लिए भी एक वामपंथी उम्मीदवार को 8734 और दूसरे को 7639 वोट मिले संयुक्त सचिव पद के लिए NSUI तीसरे नंबर पर रही और वामपंथी को 5837 वोट मिले ये सब देश में Gen-G के नाम पर बांग्लादेश और नेपाल जैसा तख्तापलट करना चाहते थे लेकिन इनकी जमीनी हकीकत क्या है, वो आज नज़र आ गई

राजस्थान में 10 निगमों में से 4 में सीधे भाजपा के मेयर बने और भरतपुर में निर्दलीयों के साथ आपने मेयर बना लिया कांग्रेस का केवल एक निगम में मेयर बना बाकी 4 में भाजपा मेयर बना लेगी

राजस्थान में 2021 के मुकाबले भाजपा का वोट 4% बढ़ा और कांग्रेस का 4% गिरा निर्दलीयों का डेढ़ प्रतिशत बढ़ा भाजपा को कुल 4139 सीट मिली जबकि कांग्रेस को 3613 और निर्दलीयों को 2273 सीट मिली बस निर्दलीयों की सीट देख कर कुछ सिरफिरे कहते फिर रहे थे कि भाजपा हार गई और अब उत्तर प्रदेश को संभाल के रखे भाजपा

कॉकरोच जनता पार्टी जो केजरीवाल की छत्रछाया में पल रही है और राहुल गांधी की “गूंज” पानी के बुलबुले की तरह हैं जो कब फट जाए पता नहीं चलता 

JNU में वामपंथी छात्रसंघ पर कब्ज़ा बनाए हुए हैं लेकिन एक दिन वहां भी अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा  

हिन्दू ही हिन्दू का दुश्मन! जानिए क्यों?

आज देश में सबसे बड़ा हिंदू विरोधी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताया जा रहा है ओर बोला जा रहा है कि मोदी ने हिंदू का वोट लेकर हिंदू के लिए कुछ नहीं कर रहे है सवर्णों के लिए कुछ नहीं कर रहे है...!
लेकिन असलियत इसके उलट है क्योंकि गद्दारी नरेंद्र मोदी ने नहीं बल्कि खुद हिंदुओं ने करी है उसी का परिणाम रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव मैं मोदी को 400 सीट देने के बजाए मात्र 240 पर लाकर रोक दिया,
इसका बात का सीधा सा उदाहरण इस बात से ही पता चल जाएगा क्योंकि आपके सामने जो चेहरे नजर आ रहे है ये उत्तरप्रदेश से आने वाले कांग्रेस ओर समाजवादी पार्टी के सांसद है जो 2024 मैं जीत कर लोकसभा पहुंचे,


इकरा हसन —उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी की सांसद हैं। कैराना लोकसभा क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 58% से 60% (करीब 11 से 12 लाख) है
इमरान मसूद —उत्तर प्रदेश की सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं (वोटर्स) की संख्या लगभग 18.5 लाख है। अगर धार्मिक और जातिगत समीकरणों (Demography) की बात करें, तो इस सीट पर हिंदू वोटर्स की संख्या लगभग 56% से 58% (करीब 10.5 लाख से 11 लाख) है। वहीं, मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 41% से 42% (लगभग 6.5 से 7 लाख) है।
जिया उल रहमान बर्क —यह यूपी के सबसे संवेदन शील इलाके सम्भल से सांसद है जहां पर हिंदू मतदाता संभल लोकसभा क्षेत्र में लगभग 48% से 50% हिंदू मतदाता हैं। संख्या के लिहाज से इस लोकसभा सीट पर करीब 8.5 लाख से 9 लाख के करीब हिंदू वोटर हैं

 अफजाल अंसारी—अफजाल अंसारी यूपी के सबसे बड़े माफिया बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई है जो कि गाजीपुर संसदीय क्षेत्र से आते है जहां हिंदू आबादी/वोट गाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू समुदाय की आबादी और मतदाता भारी बहुमत में हैं। यहाँ लगभग 89% से 90% (करीब 89.3%) आबादी हिंदू धर्म से संबंधित है। कुल मतदाताओं में से लगभग 16 लाख से अधिक मतदाता हिंदू हैं।

अब इस बात को बताने का उद्देश्य यह है कि पिछला चुनाव हिंदू को एकजुट होने के लिए था क्यों कि 500 वर्ष बाद प्रभु श्री राम का भव्य मंदिर मोदी योगी के प्रयासों से बनकर तैयार हुआ था लेकिन जहां हिंदू को एकमुश्त वोट देकर मोदी की ताकत मजबूत करना थी वहां हिन्दू ने आबादी के 50% से ज्यादा होने के बाद भी हिंदू के नाम पर वोट नहीं किया,

अब आप खुद इतने समझदार है कि समझ सकते है कि गद्दार मोदी है या खुद हिन्दू क्योंकि मोदी हिंदू के लिए अब कर रहा है फिर भी उन्हें गाली दी जा रही है,

हिंदू का कोई ओर दुशमन नहीं रहा क्योंकि खुद हिन्दू ही हिन्दू का हमेशा से दुश्मन होता आया है.

डोनाल्ड ट्रंप क्या मुंह लेकर भारत आएंगे अगर 100% टैरिफ लगाते हैं

सुभाष चन्द्र

पिछले कुछ दिनों पहले डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहा था कि वो 2026 के अंत में भारत जाने का विचार कर रहे हैं। 

लेकिन सितम्बर 17 को अमेरिकी संसद ने “Lindsey O Graham Sanctioning Russia and Iran act of 2026 पास कर दिया इस बिल के पक्ष में 262 वोट पड़े और विपक्ष में 159 सीनेट ये बिल अगस्त में पहले ही पारित कर चुकी है Lindsey ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का सदस्य है

इस बिल के पारित होने से ट्रंप को उन 5 बड़े देशों के आयात पर 100 टैरिफ लगाने की शक्तियां मिल गई जो रूस से तेल या गैस खरीदेंगे - चीन और भारत उसमे सबसे ऊपर हैं

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यह बिल भारत में BRICS सम्मेलन समाप्त होने के 4 दिन बाद पारित हुआ है जैसे बहुत जल्दी थी क्योंकि ट्रंप से BRICS की सफलता बर्दाश्त नहीं हुई

भारत ने साफ़ कर दिया है कि इस तरह के कदम से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ने की सम्भावना है भारत अपने 1.40 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है वह विभिन स्रोतों से और बाजार की बदलती परिस्तिथियों के आधार पर यह काम जारी रखेगा 

लगता है यह बिल BRICS के सफल आयोजन के प्रतिशोध के लिए पारित कराया गया है अगर भारत पर ट्रंप 100% टैरिफ लगाते हैं तो किस मुंह से वो भारत आएंगे और ट्रेड डील तो ख़त्म ही समझो

डोनाल्ड ट्रंप भूल रहे हैं कि अगर पुतिन से यूरोप के देशों और ब्रिटेन को गैस (LNG)  सप्लाई बंद कर दी तो उनके लोग ठंड से मर जाएंगे रूस पर पहले ही 30,000 से ज्यादा प्रतिबंध लगे हुए हैं जो अमेरिका EU देशों और ब्रिटेन ने लगाए हुए हैं पुतिन पलटवार करेगा तो मुश्किल होगी

यूक्रेन अकेला लड़ने की हिम्मत नहीं रखता रूस से उसके साथ कौन लड़ रहे हैं उसे खाद पानी देकर यह भी देखिए -

-अमेरिका ने 31 मार्च 2026 तक 195 बिलियन डॉलर दिए;

-NATO देशों ने 27 बिलियन डॉलर की मदद दी अमेरिका के जरिए;

-EU और उसने 27 सदस्य देशों ने 240 बिलियन डॉलर की मदद दी इसके अलावा 125 बिलियन यूरो लोन और रेफुजियों को सपोर्ट के लिए दिए; 78 बिलियन यूरो मिलिट्री सपोर्ट और यूक्रेन के लोगों को EU सदस्य देशों में रिफ्यूजी के रूप में रखने के लिए दिए और 17 बिलियन यूरो पूरी तरह से रिफ्यूजियों पर खर्च किये;

-ब्रिटेन ने 33 बिलियन डॉलर की multi-year commitments की; इसके अलावा 16 बिलियन पाउंड्स के हथियार मुहैया कराए; 5.6 बिलियन पाउंड्स की आर्थिक मदद अलग से की जिसमें वर्ल्ड बैंक के लोन की गारंटी भी शामिल हैं

तो इस तरह देखा जाए तो रूस अकेले यूक्रेन से युद्ध नहीं लड़ रहा उसके खिलाफ परोक्ष रूप से लड़ रहे हैं अमेरिका, ब्रिटेन, NATO देश, EU और EU के 27 देश अगर इनका साथ न हो तो यूक्रेन की कोई औकात नहीं है रूस से लड़ने की

एक तरफ ट्रंप ने 100% टैरिफ लगाने का बिल पास कराया और दूसरी तरफ रूस यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए अपना दूत भी पुतिन के पास भेजा। फिर तो sanctions ही चलने दो, युद्ध रोकने की क्या जरूरत है लेकिन शायद ट्रंप युद्ध रुकवा कर Nobel Prize के चक्कर में हैं 

अमेरिकी प्रतिनिधि की मुलाकात पुतिन से तब हुई जब पुतिन और मोदी मिल चुके थे और डॉ जयशंकर जेलेंस्की से मिल चुके थे यानी बातचीत का आधार तैयार हो गया था लेकिन पुतिन ने अमेरिका के सामने बस दो शर्ते रखी पहली डॉन बॉस्को पर कब्ज़ा नहीं छोड़ेंगे और दूसरी यूक्रेन को NATO एंट्री नहीं मिलेगी

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को विश्व में अकेला करके मानेंगे क्योंकि विश्व की आधी आबादी तो BRICS देशों में हैं इस्लामिक देश वैसे ही ट्रंप को पसंद नहीं करते मुझे नहीं लगता अब डोनाल्ड ट्रंप भारत आ सकेंगे

राहुल गांधी का एक और कछुए की चाल से चलने वाला केस देखो; 7 साल लगा दिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन रद्द करने की याचिका ख़ारिज करने में

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी के खिलाफ 2018 में गिरगांव मजिस्ट्रेट कोर्ट में भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल ने एक आपराधिक  मुकदमा दर्ज किया था राहुल गांधी पर आरोप था कि उसने राफेल मामले में राजस्थान की रैली में।    

प्रधानमंत्री मोदी को “चोरों का सरदार” (“Commander-in-Thief) कहा था

गिरगांव मजिस्ट्रेट ने 28 अगस्त, 2019 को राहुल गांधी को समन जारी किए थे जिन्हें राहुल गांधी ने 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी (writ petition No 4391 of 2021) 

अब 8 सितंबर, 2026 को हाई कोर्ट के जस्टिस NR Borkar ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “the court did not find any ‘perversity and illegality’ in the magistrate’s order and hence no reason to interfere”.

अब आप हिसाब लगा लीजिए कैसे कछुए की चाल से चलते हैं राहुल गांधी के खिलाफ केस 28 अगस्त, 2019 के समन पर फैसला होने में 7 साल लग गए स्वयं हाई कोर्ट ने राहुल की याचिका पर निर्णय देने में 5 साल लगा दिए

जस्टिस बोरकर ने यह भी कहा कि वो अपने 2021 के आदेश को बरकरार रखते हैं जिसमें मजिस्ट्रेट को सुनवाई 6 हफ्ते के लिए टालने के लिए कहा गया था जिससे राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें 2021 का कोई और आदेश मुझे नहीं मिला जिसको राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देता लेकिन अब देगा और जैसे अन्य मामलों में होता आया है, सुप्रीम कोर्ट इस केस में गिरगांव कोर्ट के समन पर रोक लगा देगा जिससे मामला फिर बर्फ में लग जाएगा 

में पहले भी कहा है राहुल गांधी VVIP/दामाद है अदालतों का 5 साल हाई कोर्ट का उसकी याचिका पर बैठे रहना भी इसका एक सबूत है 

मजे के बात है राहुल गांधी के वकील सुदीप पसबोला और कुशल मोर ने कोर्ट में कहा कि शिकायत करता पीड़ित पक्ष नहीं है, उसे शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है उनका मतलब था कि शिकायतकर्ता की कोई मानहानि नहीं हुई और इसलिए aggrieved party तो मोदी हैं, उन्हें शिकायत दर्ज करनी चाहिए 

मतलब कांग्रेस का तर्क है कि हमारे लोग दिन रात प्रधानमंत्री को गाली देंगे और अगर मोदी जी आहत होते हैं तो खुद कोर्ट में जाए नया संविधान लिखना चाहता है राहुल गांधी लेकिन जब गांधी परिवार के किसी सदस्य खिलाफ कुछ कहा जाता है तो कांग्रेस के लोग क्यों FIR दर्ज करते हैं, खुद गांधी परिवार के लोग क्यों नहीं करते ऐसी दलीले देकर कांग्रेस अपने ही जाल में फंस जाएगी और जो भी मुक़दमे उसने किसी के खिलाफ भी फायर किये हुए हैं वो सब पिट जाएंगे

UPI पर शुल्क के लिए ऐसा बवाल काट रहे हैं जैसे आसमान गिर गया हो; सुविधाएं सब चाहिए लेकिन शुल्क नहीं देना

सुभाष चन्द्र

टैक्सों की मार का सबसे ज्यादा असर वेतनभोगी पर होता है। और जिन गरीबों(भिखारियों से लेकर सब्जी बेचने वाले आदि) के कन्धों पर बैठ सियासतखोर सियासत खेलते हैं वही गरीब वेतनभोगी से ज्यादा अमीर होता है। अभी कुछ दिन पहले एक भिखारिन के घर से लाखों रूपये और बोरों में सिक्के मिलने के अलावा कुछ महीने पहले शायद महाराष्ट्र में एक करोड़पति भिखारी के पास दो बंगले और भिखारी कर्मचारियों का भांडा सामने आया। अगर यही किसी वेतनभोगी के घर से बरामदगी होती सारा मीडिया दहाड़ें मार रहा होता। आज भीख एक सफेदपोशी व्यापार है। 

इस विषय पर राहुल गांधी ने फिजूल का बवाल काटा है जबकि UPI जैसे सिस्टम पर ब्राज़ील और राहुल गांधी के अब्बा जैसे मुल्क चीन में भी 0.40% शुल्क लगता, ब्राजील में 0.33%

NPCI ने व्यवस्था दे दी है कि Person to Person लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं होगा और 2000 तक की खरीदारी पर भी कोई शुल्क नहीं होगा

ग्राहक जब दुकानदार को डिजिटल भुगतान करता है तो दुकानदार को पेमेंट प्रोवाइडर को छोटी सी प्रोसेसिंग फीस देनी होती है। NPCI ने व्यवस्था दी है कि 75000 या उससे ज्यादा भुगतान पर अधिकतम शुल्क 300 रुपए होगा जो 75000 का 0.4% है।  

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महीने में एक लाख तक का भुगतान लेने वाले दुकानदारों पर कोई शुल्क नहीं होगा। बिजली बिल, स्कूल फीस, पाइप लाइन गैस बिल भुगतान पर मात्र 5 रुपए टैक्स होगा

डिजिटल भुगतान कितनी बड़ी सुविधा है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 75000 या उससे ज्यादा भुगतान करना है तो फिर कॅश लिए चलना पड़ेगा और कहीं भी रास्ते में लुट सकते हैं जबकि डिजिटल भुगतान एक क्लिक में क्रेडिट/डेबिट कार्ड से हो जाता है

मुझे समझ नहीं आता कि इसमें अमेरिका कहां से बीच में आ गया जो राहुल गांधी कह रहा है कि यह अमेरिका के दबाव में किया गया है। 

सच्चाई यह है कि लोग सुविधाएं सब चाहते हैं लेकिन कोई शुल्क नहीं देना चाहते। बड़े व्यापारी अगर कॅश में भुगतान लेंगे तो पैसा जमा करने के लिए अलग से कर्मचारी रखने पड़ेंगे बैंक भेजने के लिए जबकि डिजिटल भुगतान से पैसा तुरंत खाते में जमा हो जाता है 

राहुल गांधी को रायता फ़ैलाने से मतलब है। उससे BRICS की सफलता बर्दाश्त नहीं हो रही। 

जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए मजबूत है तंत्र: कह रहे हैं चीफ जस्टिस; लेकिन पारदर्शिता कहां है? न्यायपालिका में सुधार होने चाहिए लेकिन बिना न्यायपालिका को शामिल किए

सुभाष चन्द्र 

सितम्बर 14 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने राम जेठमलानी स्मारक व्याख्यान में बोलते हुए कहा कि “जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा बनाया गया तंत्र मजबूत, बहुत प्रतिक्रिया देने वाला और समय से काम करने वाला है। हम बिना हिचकिचाते हुए मानते हैं कि सुधार ही नियम होना चाहिए कोई भी संस्था एक ही स्थिति में न तो टिक सकती है और न ही गर्व महसूस कर सकती है लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर सार्वजनिक मंच से प्रतिक्रिया देना सही नहीं हो सकता” उन्होंने न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना की भी बात की

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चीफ जस्टिस की बातें तालियां बटोरने के लिए बहुत अच्छी हैं लेकिन सत्य से परे हैं। आलोचना कौन कर सकता है न्यायपालिका की, वकील लोग तो कर नहीं सकते क्योंकि उन्हें ब्लैकलिस्ट होने का डर होता है जनमानस सोशल मीडिया पर आलोचना कर सकता है लेकिन सोशल मीडिया को तो न्यायपालिका ठेंगे पर रखती है और वहां कही गई आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं देती बेशक आलोचना कितनी भी रचनात्मक क्यों न हो 

महेश जेठमलानी ने सितम्बर 14 को उसी समारोह में कहा कि “ न्यायपालिका और न्यायाधिकरणों में भ्रष्टाचार नहीं हो सकता जब तक कि फ़िक्सर वकील न हों, जो पूरी कानूनी प्रणाली को रिश्वत देकर खेलते हैं, उनके नाम शायद ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास हैं जो कॉलेजियम को सूचित किए जाने चाहिए 

जजों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए तंत्र मजबूत होगा लेकिन केवल आपकी दृष्टि से क्योंकि उन शिकायतों का निपटारा कैसे होता है, किसी को पता नहीं चलता जिसका मतलब है आपका तंत्र पारदर्शी नहीं है, फिर कोई कैसे विश्वास कर सकता है?

क़ानून मंत्री ने पिछले दिनों कहा था कि “2016 से 2025 के बीच 8630 शिकायतें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ चीफ जस्टिस कार्यालय को भेजी गई थी जिनमें corruption, sexual misconduct, and other serious improprieties के आरोप थे सबसे ज्यादा 1,170 शिकायतें 2024 में थी और 1,102 शिकायतें 2025 में थी इनका निपटारा न्यायपालिका के आंतरिक “in-house mechanism’ से होता है न कि सरकार के किसी दाखल से

किसी को पता नहीं इन गंभीर शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, क्या किसी को दोषी पाया गया और पाया गया तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? 

यह कैसा आंतरिक प्रबंधन है शिकायतों के निपटारे के लिए? फिर कैसे माना जा सकता है कि शिकायतों से निपटने के लिए आपका तंत्र मजबूत है? आपने तो जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR नहीं होनी दी जिसके खिलाफ संसदीय समिति आरोप सही पाए फिर कैसा मजबूत तंत्र है आपका?

दरअसल न्यायपालिका ने अपना ताना बाना ऐसा बना रखा है कि जैसे हर जज रेनकोट पहन कर नहाता है जिस पर कोई दाग नहीं लग सकता 

न्यायपालिका में सुधार अवश्यम्भावी हैं लेकिन उन सुधारों की प्रक्रिया से न्यायपालिका को दूर रखना होगा अन्यथा फिर चौधराहट अपने ही हाथ में रखने की व्यवस्था बना दी जाएगी जैसे आज है 

सबसे बड़ा हथकंडा न्यायपालिका ने अपना रखा है कि किसी भी जज के खिलाफ केस दायर करने से पहले चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी चाहिए ये कैसा न्याय है? मतलब दरोगा पर आरोप होगा तो उसी से अनुमति लेनी होगी कि उसके खिलाफ जांच की जाए या नहीं

आप खुद भी न्यायिक सुधार कर सकते हैं बस हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति UPSC से परीक्षा के माध्यम से शुरू कर दीजिए लिखित परीक्षा के 60%, जितने केस जीते, उनके 20% और इंटरव्यू के 20% नंबर होने चाहिए ऐसा कीजिए, न्यायपालिका का आधा भ्रष्टाचार स्वतः ख़त्म हो जाएगा

इस्लामिक नाटो का शुरू होने से पहले ही क्या The End हो गया; बेहतर है सऊदी अरब इज़रायल के साथ खड़ा हो जाए

सुभाष चन्द्र

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर 7 अगस्त, 2026 को मक्का में एक कथित Islamic NATO बनाया जिसमें प्रावधान था कि किसी भी एक देश पर हमला अन्य सदस्य देशों पर भी माना जाएगा और ऐसे में सब एक दूसरे के साथ मिलकर युद्ध करेंगे 

लेकिन एक समझौता एक दिखावा बनकर रह गया क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की इसे अमलीजामा नहीं पहना रहे अभी इसी महीने ईरान समर्थित हूती ने सऊदी अरब के कंट्रोल वाले मोखा शहर और Bab el-Mandeb strait पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन तुर्की और पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ diplomatic बातचीत कर रहे हैं जबकि जवाब हमले का देना चाहिए था। 

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पाकिस्तान पर बिना कोई हमला हुए तुर्की उसे हथियार सप्लाई कर रहा है, जाहिर है भारत के खिलाफ युद्ध करने के लिए लेकिन जिस सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती ने हमला कर दिया उस पर कोई कार्रवाई नहीं चाहता 

दूसरी तरफ पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने को आतुर रहा लेकिन फेल हो गया और BRICS की बैठक में ईरान के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी से युद्ध ख़त्म कराने के लिए मदद मांगी ऐसे पाकिस्तान की इंटरनेशनल लेवल पर इज़्ज़त उतर गई वैसे पाकिस्तान की इज़्ज़त तो हमारी हॉकी टीम की बेटियां भी उतार आई जो उनके मंत्री मोहसिन नक़वी से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया

इज़रायल के संबंध UAE के साथ मधुर हैं और इज़रायल उसे हथियार भी मुहैया करता है दोनों अब्राहम समझौते में शामिल हैं सऊदी अरब के लिए बेहतर होगा अगर वह इज़रायल से रक्षा समझौता करे इज़रायल सऊदी की मदद कर सकता है लेकिन पाकिस्तान और तुर्की हरगिज़ नहीं करेंगे 

सऊदी अरब के इज़रायल से मतभेद केवल फिलिस्तीन को लेकर हैं 

आज की भू राजनीति में एक देश दो अलग अलग देशों से संबंध रख सकता है बेशक उनके आपस में संबंध ठीक न हो जैसे भारत के संबंध फिलिस्तीन से भी हैं और इज़रायल से भी हैं, भारत रूस के साथ भी दोस्ती रखता है और अमेरिका के साथ भी

इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए सऊदी अरब को इज़रायल से हाथ मिलाना चाहिए लेकिन सऊदी अरब ने तो इज़रायल के साथ Diplomatic Relations भी नहीं बना कर रखे वो पाकिस्तान पर भरोसा करता है जिसका सऊदी अरब पेट भरता रहता है 

सऊदी अरब को देखना चाहिए कि UAE और ईरान Brics की बैठक में मिले जबकि ईरान UAE में अमेरिकी अड्डों पर हमले करता है फिर भी न जाने क्यों दोनों की मुलाकात हुई सऊदी अरब चाहता तो उसके भी विदेश मंत्री Prince Faisal bin Farhan Al Saud ईरान के राष्ट्रपति से मिल सकते थे

लगता है सऊदी अरब भी इज़रायल को बर्बाद देखना चाहता है और इसलिए ही उसने तुर्की और पाकिस्तान से समझौता किया है वो दोनों देश सऊदी अरब का इस्तेमाल इज़रायल पर हमले के लिए करेंगे लेकिन उससे भी नुक्सान सऊदी अरब का होगा क्योंकि सऊदी अरब इज़रायल की जद में है और वो वहां बैठे तुर्की और पाकिस्तान को भी निपट लेगा

कर्नाटक : डी.के. शिवकुमार का ‘जमीन सिंडिकेट’: लालबाग-कब्बन पार्क पर गिद्ध दृष्टि

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटालों के खिलाफ उठे प्रचंड जनआक्रोश के आगे आखिरकार सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में बेंगलुरु के सार्वजनिक पार्कों और खेल के मैदानों की 5 प्रतिशत जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों, लीज और बिक्री के लिए खोलने वाले विवादास्पद ‘पार्क्स अमेंडमेंट बिल 2026’ ने राज्य में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया। गैर-जिम्मेदाराना नीतियों से खाली हुए सरकारी खजाने को भरने और रियल एस्टेट सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने की इस नीति को शहर की हरी-भरी सांसों पर सीधा डाका माना गया। सड़क से लेकर राजभवन तक चले चौतरफा दबाव के कारण कैबिनेट को यह जनविरोधी संशोधन बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।

65.4 एकड़ हरित क्षेत्र पर डाका: लालबाग और कब्बन पार्क पर गहराया संकट
बेंगलुरु में वर्तमान में लगभग 1,308 एकड़ क्षेत्र में फैले 1,353 सार्वजनिक पार्क हैं। इस संशोधन के लागू होते ही शहर के 65.4 एकड़ से अधिक हरे-भरे क्षेत्र पर कंक्रीट के ढांचे खड़े होने का खतरा मंडराने लगा था। सबसे बड़ा आघात 240 एकड़ वाले ऐतिहासिक लालबाग की 12 एकड़ और करीब 197 एकड़ में फैले कब्बन पार्क की 9.85 एकड़ जमीन पर था। करीब 22 एकड़ की यह धरोहर सीधे तौर पर व्यावसायिक सिंडिकेट के हवाले करने की तैयारी थी, जिसे जनता ने अपनी पहचान पर हमला माना।

‘ब्रांड बेंगलुरु’ की आड़ में ऐतिहासिक धरोहरों पर गिद्ध दृष्टि
‘ब्रांड बेंगलुरु’ के आकर्षक नारों की आड़ में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कार्यालय के संरक्षण में शहर की बेशकीमती जमीनों के सौदे तैयार किए जा रहे थे। अरबों वर्ष पुरानी भूगर्भीय धरोहर वाली लालबाग की चट्टानों और ऐतिहासिक कब्बन पार्क की शांति को नष्ट कर वहां व्यावसायिक केंद्र बनाने की साजिश रची गई। विकास के नाम पर शहर की सदियों पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने का यह खुला प्रयास था।

टनल रोड प्रोजेक्ट: ठेकेदारों को उपकृत करने के लिए लालबाग की बलि
हजारों करोड़ रुपये के विवादास्पद टनल रोड प्रोजेक्ट के जरिए अपने चहेते निजी ठेकेदारों को भारी भरकम कमीशन बांटने की बिसात बिछाई गई थी। टनल रोड के नाम पर लालबाग की एकड़ भर बेशकीमती जमीन अधिग्रहित करने और वहां निजी व्यावसायिक निर्माण को स्वीकृति देने की तैयारी थी। बुनियादी ढांचा सुधारने के नाम पर कमीशनखोरी के इस मॉडल ने शहर के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया था।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके।

1975 के ऐतिहासिक संरक्षण कानून को कमजोर करने की साजिश
वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

अनुच्छेद 21 का हनन: स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार पर कुठाराघात
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और स्वच्छ पर्यावरण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार रेखांकित किया है कि शहरी हरित क्षेत्र और खुले पार्क नागरिकों के जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। सार्वजनिक पार्कों की जमीन को निजी लाभ के लिए बाजार में उतारना सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन था, जिसके खिलाफ कानूनी घेराबंदी तेज हो गई।

सदन में बिना बहस चोरी-छिपे बिल पास कराने का कृत्य
सदन में जब महर्षि वाल्मीकि निगम के 89 करोड़ रुपये के घोटाले पर जवाब मांगा जा रहा था, तब हंगामे और अव्यवस्था के बीच बिना किसी लोकतांत्रिक चर्चा या सार्वजनिक परामर्श के इस विवादित कानून को पारित करा लिया गया। शहर के नागरिकों, पर्यावरणविदों और नगर नियोजकों से इस मसौदे को छिपाकर रखना यह साबित करता था कि सरकार के इरादे पूरी तरह संदिग्ध थे।

वाल्मीकि निगम घोटाले के बाद जमीन से नया कमीशन तंत्र
महर्षि वाल्मीकि विकास निगम के करोड़ों रुपये के गबन की जांच के बीच शहरी जमीनों के सौदों से नया तंत्र खड़ा करने की कोशिशें तेज थीं। सरकारी खजाने में सेंध लगने के बाद सत्ता से जुड़े सिंडिकेट की नजर बेंगलुरु की करोड़ों रुपये प्रति वर्गफुट वाली प्राइम लोकेशन की सार्वजनिक जमीनों पर टिक गई थी, ताकि चुनावी फंड और राजनीतिक खर्चों की भरपाई की जा सके।

मुफ्त की रेवड़ियों से खाली हुआ खजाना, अब पार्कों से भरपाई की जुगत
बिना किसी बजटीय योजना के लागू की गई मुफ्त योजनाओं ने राज्य के वित्त को पंगु बना दिया है। नए बुनियादी ढांचे, सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण के लिए बजट का अभाव साफ दिखने लगा। इस वित्तीय विफलता पर पर्दा डालने और राजस्व जुटाने के लिए सरकार ने बेंगलुरु के पार्कों और खेल के मैदानों का बाजारीकरण करने का सबसे आसान और विनाशकारी रास्ता चुना।

बुजुर्गों की खुली हवा और बच्चों के खेल के मैदानों पर वार
पार्क और खुले मैदान शहर के बच्चों के शारीरिक विकास और वरिष्ठ नागरिकों के टहलने के लिए अंतिम सुरक्षित स्थान बचे हैं। 5 प्रतिशत जमीन के व्यावसायिक उपयोग की छूट वास्तव में पूरे पार्क परिसर में निजी दुकानों और कंक्रीट निर्माण के अनियंत्रित प्रसार का आधार थी। वित्तीय लालच के लिए बच्चों से उनके खेल के मैदान और बुजुर्गों से उनकी खुली हवा छीनने की कोशिश ने आम परिवारों में भारी असंतोष भर दिया।

फूफा फुके हुए रहे 3 दिन, शौचालय में बैठे थे; मोदी का BRICS में जलवा देख कर दस्त लगे थे; आज कुछ नहीं मिला तो भोजन में विष घोल रहे हैं

सुभाष चन्द्र

राहुल गाँधी को LoP बनाने वालों की मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। नॉनवेज पर हंगामा करना गिरी हुई मानसिकता को दिखाता है। INDI गठबंधन को इस गिरी हुई मानसिकता पर विचार कर कांग्रेस से किनारा करना उनके हित में होगा।   

नाराज फूफा 3 दिन से फुके बैठे थे मोदी का जलवा BRICS में देख कर आग लगी हुई थी और दस्त लगे हुए थे शौचालय में आना जाना लगा हुआ था कोई कमी नहीं निकाल सके BRICS के आयोजन में जिसमें मोदी छाए रहे और असली दर्द की वजह यही थी

लेकिन आज बाप बेटे राहुल गांधी और पवन खेड़ा शौचालय से निकल कर बोले कि सरकार ने जो मेहमानों को भोजन परोसा उसमें विविधता में एकता का उल्लंघन किया हर राज्य का भोजन नहीं दिया गया और नॉन वेज भी परोसा गया जबकि यह सत्य से परे है राहुल गांधी ने तो अलग सर्टिफिकेट दे दिया कि 80% भारतीय व्यंजन नॉन वेज होते हैं इतना गोबर कहां से आता है इसके दिमाग में?

लेखक 
चर्चित YouTuber 
मेहमानों को कोई तकलीफ नहीं थी, उन्होंने स्वाद से भोजन किया लेकिन राहुल/खेड़ा को क्यों दस्त लग गए समझ नहीं आया?

फूफा परेशान थे मोदी पुतिन को गले मिलते देख कर, वो परेशान थे क्योंकि पुतिन उत्तर प्रदेश में बने नए हवाई अड्डे पर उतरे वो परेशान थे कि जिनपिंग क्यों आ गए जबकि उनके बारे में ख़बरें चलाई गई थी कि वो नहीं आएंगे

कांग्रेस और विपक्ष को दर्द यह था कि मोदी के आगे India नहीं “भारत” लिखा था और यह दर्द असहनीय था

फ़ुफ़ाओं को परेशानी हुई क्योंकि ईरान के राष्ट्रपति पेजेशिकयान ने भारत के आध्यात्मिक गुरु सतिशाचार्य के पैर छू कर आशीर्वाद लिया ये तो पेजेशिकयान ने घोर पाप किया क्योंकि ईरान की मदद के लिए तो 600 रुपए और आभूषण इकठ्ठे किये गए थे और वो चरण छू गए हिंदू गुरु के और उनके प्रवचन भी सुने

सबसे बड़ा झटका तो फ़ुफ़ाओं को मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने दिया जब उन्होंने कैमरे पर कहा कि मोदी इतने लोकप्रिय नेता हैं कि उनका फ़ोन ऐसे लोगो के मैसेज से भर गया है जो मोदी को अपना अभिवादन देने के लिए कह रहे थे मजे की बात है कि इब्राहिम ने किशोर कुमार के गाने की लाइनें भी गाई -”ख्वाब तो तुम या कोई हकीकत ..”

उधर ईरान अमेरिका से युद्ध के चलते इस्लामिक देशों में अमेरिकी अड्डों पर हमले कर रहा है और UAE में हमले किए हैं लेकिन BRICS में मोदी ने पेजेशिकयान और UAE के प्रिंस को एक ही टेबल पर बिठा दिया। इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं

कांग्रेस के फूफा खासकर जिनपिंग से नाराज़ हैं कि MOU हमारे साथ किया और अब शांति और व्यापार की बातें कर रहे हैं मोदी से 

कांग्रेस की एक परेशानी दूर नहीं होती दूसरी खड़ी हो जाती है BRICS शुरू होने से एक दो दिन पहले उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस को वंदे मातरम पर खरी खरी सुना दी थी कि कांग्रेस हमें न बताए कि राष्ट्रगीत गाना है या नहीं और कितना गाना है फिर उसके बाद दिल जलाने वाला BRICS आ गया, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता कांग्रेस को अब कॉकरोच जनता पार्टी में विलय कर लेना चाहिए