मातृशक्ति BJP का मास्टरस्ट्रोक: महिला आरक्षण से लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, 273 महिला सांसद बनेंगी


क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को विकसित हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है? नारी शक्ति को जितना सम्मान सनातन धर्म में दिया गया है किसी अन्य धर्म में नहीं। पौराणिक कथाओं का अवलोकन करने पर एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि जीवन में जब पुरुष  किसी असुर शक्ति से मानव को राहत देने में असमर्थ होने पर महिला शक्ति जिसे आज देवी माता के रूप में पूजा जाता है, का सहारा लिया। देवी माता को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने वाले सभी देवता हैं। यही कारण है कि वर्ष में 2 बार नवरात्रे मनाने की प्रथा चली आ रही है।    

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और सरकार ने मातृशक्ति और युवाशक्ति पर खास फोकस किया है। देश की राजनीति में मातृशक्ति भागीदारी बढ़ाने को लेकर सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी की जा सकती है, ताकि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रभावी तरीके से दिया जा सके। इस योजना का मकसद यह है कि महिला आरक्षण लागू करने के साथ-साथ किसी राज्य की मौजूदा सीटों में कटौती न हो और सभी को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। साथ ही, आरक्षित सीटों के भीतर एससी और एसटी वर्ग के लिए भी अलग से आरक्षण जारी रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए संसद के मौजूदा सत्र या अगले सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। इससे लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है। इनमें महिला सांसदों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी।

गृहमंत्री अमित शाह की सभी राजनीतिक दलों में सहमति की कवायद
पीएम मोदी के दिशा निर्देशन में गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठकें भी की हैं। इस दौरान सीट बढ़ाने के “स्ट्रेट जैकेट फॉर्मूला” पर चर्चा हुई, जिसमें मौजूदा सीटों को बढ़ाकर नए ढांचे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जाएंगी। इससे लोकसभा की कुल सीटें बढ़कर करीब 800 से ज्यादा हो सकती हैं। इस बीच दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन पर ऐतराज किया है। इसलिए सरकार अब ऐसा फॉर्मूला लाने की कोशिश कर रही है, जिससे सभी राज्यों के हितों का संतुलन बना रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर सहमति बनाने के लिए एनडीए और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक की। सहमति बनने पर बिल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं।

महिला सांसदों ने सरकार के कदम को स्वागत योग्य बताया
महिला सांसदों ने बजट सत्र या अगले सत्र के दौरान महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए विधेयक लाने की केंद्र सरकार की योजना का स्वागत किया और कहा कि इस कदम से शासन में महिलाओं की भागीदारी और मजबूत होगी। जेडीयू सांसद लवली आनंद ने इसे “स्वागत योग्य कदम” बताया और कहा कि राजनीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी देश की प्रगति को गति देगी। भाजपा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा कि महिला आरक्षण कानून के पारित होने से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की “आधी आबादी” से किया गया एक लंबे समय से चला आ रहा वादा पूरा हुआ है। सहरावत ने कहा कि इस देश में कई लोगों ने महिलाओं के बारे में बात की है, लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लाने का प्रयास और उसमें मिली सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है। आरक्षण विधेयक लाना प्रधानमंत्री द्वारा देश की आधी आबादी से किया गया वादा है, और वह आधी आबादी उन पर भरोसा करती है।

2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन करने की रणनीति
दरअसल, 2023 में महिला आरक्षण कानून संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। इसके तहत महिला आरक्षण नई जनगणना के बाद लागू होना है। अब सरकार का प्रस्ताव है कि नई जनगणना का इंतजार करने की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन किया जाए। इससे प्रोसेस तय समय पर पूरी हो सकेगी और आरक्षण लागू किया जा सकेगा। इसके लिए दो बिल लाए जा सकते हैं। एक बिल के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन होगा, जबकि दूसरा परिसीमन कानून में बदलाव से जुड़ा होगा। इसे पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है।

महिला आरक्षण के लिए पूरे देश में एकरूपता लाने की कवायद
महिला आरक्षण प्रस्ताव के मुताबिक 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का ढांचा ऐसा होगा, जिसमें एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा मिलेगा। ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है। इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों इसके लिए कई नेताओं से बैठकें की हैं। इनमें वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (एसपी), आरजेडी और एआईएमआईएम के नेता शामिल रहे। बीजेडी और शिवसेना (यूबीटी) से भी बातचीत हुई है, जबकि कांग्रेस से चर्चा बाकी है।

महिला आरक्षण बिल दोनों सदनों से पास, पर अभी लागू नहीं
महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में यह बिल सर्वसम्मति से पास हुआ था। हालांकि, यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इसकी लागू होने की तारीख केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए तय करेगी और जरूरत पड़ने पर संसद इसमें संशोधन कर सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है।

1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था
• 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया।
• 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया।
• 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी।
• 1988: महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perpective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी।
• 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023
1998: 13 जुलाई को अटल की एनडीए सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन RJD सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998: 14 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में दोबारा पेश करने की कोशिश की, लेकिन हंगामे और विरोध की वजह से पेश नहीं हो सका।
1998: 11 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर पोडियम तक पहुंच गए।
1998: 23 दिसंबर को अटल सरकार बिल पेश करने में कामयाब रही। हालांकि JDU ने विरोध कर दिया और पारित नहीं हो सका।
2000: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2002: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2003: जुलाई में बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
2008: मनमोहन सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में विधेयक पेश किया। खूब हंगामा हुआ। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
2010: 9 मार्च को राज्यसभा में विधेयक पेश किया गया और दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया। बिल लैप्स हो गया।
2023: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में विधेयक संसद में पेश किया। कुशल प्रबंधन के चलते यह लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही पारित हो गया। 106वा संविधान संशोधन और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बना।

नक्सलियों का अंत करने के लिए मोदी, अमित शाह की इच्छा शक्ति को नमन और सभी सुरक्षाबलों को धन्यवाद और साधुवाद

सुभाष चन्द्र

अमित शाह ने लगातार यह प्रण किया था कि 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा और कल उन्होंने संसद में घोषणा कर दी कि देश माओवाद से मुक्त हो गया। एक आतंक पिछले 60 साल से चला आ रहा था लेकिन अधिकतम समय सत्ता में रही कांग्रेस वो नहीं कर सकी जिसकी आवश्यकता थी जो अब मोदी सरकार ने की यह केवल मोदी सरकार की इच्छाशक्ति का ही परिणाम है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
याद कीजिए 6 अप्रैल, 2010 को जब दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने 76 CRPF के जवानों की निर्मम हत्या की थी और JNU के छात्रों ने जिनमें प्रमुख था कन्हैया कुमार जश्न मनाया था आज वो कन्हैया कुमार कांग्रेस की NSUI का अध्यक्ष है याद कीजिए 25 मई, 2013 को जब छत्तीसगढ़ के बस्तर में कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ला के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया और 11 जून को उनकी मौत हो गई कांग्रेस कुछ नहीं कर सकी

अमित शाह ने याद दिलाया कि 172 जवानों को मारने वाले खूंखार माओवादी हिडमा के मारे जाने पर उसके समर्थन में इंडिया गेट पर प्रदर्शन हुआ जिसमें नारे लगे कि “तुम कितने हिड़मा मारोगे, हर घर से हिड़मा निकलेंगे राहुल गांधी ने वह वीडियो पोस्ट किया और ओडिशा में लाडो सिकोका के साथ मंच साझा किया कभी हर घर से अफजल निकाला जाता था कभी हिड़मा और हाल ही में खामनेई भी हर घर से निकालने की बात कही गई है कांग्रेस, CPI और CPM हमेशा माओवादियों के साथ खड़ी हुई कांग्रेस का हर नेता ही हिड़मा ही लगता है

बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए इस नक्सली आतंक ने 20 हजार से ज्यादा लोगों की जान ली और पिछले 12 वर्ष में 10 हजार नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया अमित शाह ने याद दिलाया कि मनमोहन सिंह ने भी माना था कि कश्मीर और पूर्वोत्तर से भी बड़ी चुनौती माओवाद है लेकिन कांग्रेस ने उसके खात्मे के लिए कुछ नहीं किया

जब जब भी माओवादी हिंसा होती थी टीवी चैनल्स पंचायत लगाते थे और कथित बुद्धिजीवी माओवादियों की गरीबी का रोना रोते थे गरीब थे लेकिन आधुनिक हथियारों से लोगों की हत्या करते थे CPI और CPM से अलग चीन ने नक्सली खड़े किये और आज एक यूट्यूब चैनल पर डॉ मनीष कुमार ने सही कहा कि माओवाद का खत्म होना असल में चीन की हार है लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभी जड़ ख़त्म नहीं हुई है 

माओवाद की जड़ ख़त्म करने के लिए अर्बन नक्सलों पर प्रहार करना होगा जिन्हे कभी चंद्रचूड़ ने बचा लिया था और कहा था “"Dissent is the safety valve of democracy. If you don't allow safety valve, pressure cooker will burst," मतलब अर्बन नक्सल की आवाज़ को उन्होंने Dissent कहा जिसे बढ़ने देना चाहिए

आज कई न्यूज़ पोर्टल हैं जो कथित तौर पर अर्बन नक्सलों के समर्थन में खड़े रहते हैं The Wire, Caravan, The Print, Scroll.In और The Quint जैसो पर साम दाम दंड भेद की नीति से प्रहार करना जरूरी है

अमित शाह का सुरक्षा बलों की प्रशंसा करना सराहनीय है सुरक्षाबलों ने अदम्य साहस का परिचय दिया देश से माओवाद के कलंक को मिटाने में वे सभी सुरक्षाबल साधुवाद के पात्र हैं 

जय हिंद! भारत माता की जय!

जैश के सरगना मसूद अजहर के भाई की मौत से पाकिस्तान में हड़कंप, संदिग्ध हालात में मिला ताहिर अनवर का शव


पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के भाई मोहम्मद ताहिर अनवर की संदिग्ध हालात में मौत हो गई है। अब तक इस मौत की वजह साफ नहीं हो पाई है। मोहम्मद ताहिर अनवर की मौत पाकिस्तान के बहावलपुर में हुई। उसकी उम्र करीब 62 साल बताई जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताहिर अनवर की मौत की पुष्टि खुद जैश-ए-मोहम्मद के आधिकारिक चैनल के जरिए की गई लेकिन आंतकी संगठन ने मौत के कारण को लेकर कोई जानकारी नहीं दी। न तो बीमारी का जिक्र किया गया है और न ही किसी हमले या घटना की बात कही गई है। इस चुप्पी ने पूरे मामले को और ज्यादा संदिग्ध बना दिया है।

ताहिर अनवर को सोमवार (30 मार्च 2026) देर रात बहावलपुर में स्थित मस्जिद में दफन किया गया। आंतकी संगठन के नए मुख्यालय ‘मरकज उस्मान-ओ-अली’ परिसर में आधी रात के करीब नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गई। इस दौरान संगठन के कई बड़े चेहरे मौजूद रहे जिनमें मसूद अजहर खुद भी शामिल था। इसके अलावा इब्राहिम अजहर, तल्हा अल सैफ, अब्दुर रऊफ और मोहम्मद अम्मार अलवी जैसे आतंकी भी वहाँ मौजूद थे।

जैश-ए-मोहम्मद में था बड़ा रोल

ताहिर अनवर कोई मामूली सदस्य नहीं था बल्कि वह संगठन के सैन्य मामलों का प्रमुख माना जाता था। वह पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से आतंकी गतिविधियों को संचालित कर रहा था। 2001 के बाद से उसने कई ट्रेनिंग कैंपों की स्थापना और संचालन में अहम भूमिका निभाई। हथियारों की सप्लाई और लॉजिस्टिक्स का जिम्मा भी उसी के पास था जिससे वह संगठन की रीढ़ माना जाता था। बताया जाता है कि जैश में शामिल होने से पहले वह पोल्ट्री फार्मिंग करता था और 12 भाई-बहनों में सबसे बड़ा था।

ऑपरेशन सिंदूर में हुआ था घायल

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताहिर अनवर पहले भी भारतीय कार्रवाई में घायल हो चुका था। भारत की ओर से बहावलपुर में किए गए हवाई हमलों के दौरान उसे गंभीर चोटें आई थीं। यह हमला ऑपरेशन सिंदूर के तहत किया गया था जो जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने किया था। पहलगाम में हुए हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। उसी हमले में उसका बेटा हम्माद भी घायल हुआ था। हालाँकि दोनों उस समय बच गए थे।

गुजरात : AAP का उपाध्यक्ष हसमुख पटेल गिरफ्तार, बेनामी संपत्तियों को छिपाने से इनकार करने पर अपनी ही महिला अकाउंटेंट का किया अपहरण

                                                   बेनामी लेनदेन में पकड़े गए AAP प्रदेश उपाध्यक्ष
गुजरात के गाँधीनगर में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रदेश उपाध्यक्ष हसमुख पटेल को एक महिला अकाउंटेंट के अपहरण, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला बेनामी लेनदेन और संदिग्ध वित्तीय गड़बड़ियों के खुलासे से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। पुलिस ने केस दर्ज कर आगे की जाँच शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अहमदाबाद के गोटा इलाके में रहने वाली महिला गाँधीनगर के सेक्टर-25 GIDC स्थित HBC लाइफ साइंस कंपनी में अकाउंटेंट के रूप में काम करती थी। कंपनी के मालिक हसमुख पटेल हैं, जबकि उनके भाई हिमांशु पटेल ने महिला को अपनी दूसरी कंपनी मैक्सिएमएस हॉलीडे प्राइवेट लिमिटेड के ऑडिट का काम भी सौंपा था।

ऑडिट के दौरान महिला ने करीब 80 से 85 लाख रुपए के संदिग्ध लेनदेन और बिना बिल के भुगतान का खुलासा किया। इस खुलासे के बाद कंपनी प्रबंधन में हड़कंप मच गया और यहीं से पूरे विवाद की शुरुआत हुई।

अपहरण, मारपीट और धमकी देने का आरोप

शिकायत के मुताबिक, 26 मार्च 2026 को दोपहर के समय कंपनी के पार्किंग एरिया से महिला को जबरन एक हरे रंग की कार में बैठाकर अगवा कर लिया गया। चलती गाड़ी में आरोपितों ने महिला के साथ मारपीट की, उसके बाल खींचे और धमकी दी कि अगर उसने इस मामले की जानकारी किसी को दी तो उसे जान से मारकर कहीं दफना दिया जाएगा।

घटना के बाद डरी हुई महिला ने हसमुख पटेल को फोन कर पूरी जानकारी दी, लेकिन मदद करने के बजाय उस पर शिकायत न करने का दबाव बनाया गया। आरोप है कि यह पूरी साजिश उन्हीं के इशारे पर रची गई थी।

बाद में महिला ने गाँधीनगर के सेक्टर-21 पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए हसमुख पटेल को गिरफ्तार कर लिया। मामले में अन्य आरोपितों के खिलाफ भी जाँच जारी है।

‘द वायर’ में सूरज येंगडे का ‘दलित पोर्न’ वाला लेख, संस्थापक-संपादक ने बताया ‘फर्जी’: वायरल स्क्रीनशॉट से छिड़ा विवाद

                      वायरल स्क्रीनशॉट में सूरज येंगड़े के जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।

वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।

इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।

वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।

ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।

द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।

फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को क्यों लगा असली?

भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।

येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।

सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”

 एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।

येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।

इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।

भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।

साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।

                                                    वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।

                       पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट

इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।

इज़रायल के यहूदियों को मेरा संदेश : यह युद्ध यहूदी कौम के अस्तित्व को बचाने के लिए है

सुभाष चन्द्र

इस लेख में इज़रायल के यहूदियों को मैं कुछ कहना चाहता हूं क्योंकि कल के समाचारों से पता चला कि इज़रायल में युद्ध के खिलाफ लोगों ने भारी प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री नेतन्याहू को हटाने तक की मांग के लिए नारे लगाए गए। यह आक्रोश देख कर मुझे दुख हुआ

इज़रायल की जनता के नेतन्याहू से मतभेद हो सकते हैं लेकिन यहूदी कौन एक बात याद रखनी चाहिए कि ईरान यहूदियों के लिए दूसरा हिटलर है जिसने 60 लाख यहूदियों को गैस चैंबरों में हत्या कर दी थी लेकिन 2000 हजार साल पुरानी यहूदी कौम ने 1948 से लगातार अपने चारों तरफ बैठे इस्लामिक दुश्मनों का मुकाबला किया है फिलिस्तीन और अन्य इस्लामिक देश इज़रायल को देश ही नहीं मानते और ईरान बार बार धमकी दे रहा है कि वह इज़रायल को दुनिया के नक़्शे से मिटा देगा क्या इज़रायल के यहूदी अपना अस्तित्व मिटा हुआ देखना चाहते हैं? 

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चर्चित YouTuber 
यहूदी कौम ने हर युद्ध में कुर्बानी दी है और दुनिया के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया है जो इस्लामिक शत्रु इज़रायल को देखना नहीं चाहते, वे इज़रायल में भी मौजूद हैं भारत की तरह इज़रायल को भी बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से लड़ने की जरूरत है इस्लामिक शक्तियां इज़रायल को ख़त्म करना चाहती हैं जबकि इज़रायल ने उनके साथ मिलकर रहने की कोशिश भी की है

ईरान ने इज़रायल को ख़त्म करने के लिए हमास, हिज़्बुल्ला और हूती जैसे खूंखार आतंकी पैदा किये सीरिया के आतंकियों को भी धन और हथियार देता रहा लेकिन यह यहूदियों की इच्छाशक्ति है जिसकी वजह से ईरान सफल नहीं हो सका

इज़रायल के यहूदियों को क्या लगता है कि अगर नेतन्याहू को हटा दिया गया और Yair Lapid या Naftali Bennett प्रधानमंत्री बन गए तो वे क्या युद्ध बंद कर देंगे? ये सोचना अपने आपको धोखा देना होगा क्योंकि जो संकट नेतन्याहू के सामने है, वह उन दोनों के सामने भी होगा क्योंकि यहूदी कौम इस्लाम की स्थायी शत्रु है जिसका खात्मा ही इस्लाम का लक्ष्य है ईरान परमाणु हथियार इज़रायल को ख़त्म करने के लिए बनाना चाहता है पाकिस्तान के पास तो पहले से वो हथियार हैं और वह तो इज़रायल को मान्यता भी नहीं देता जैसा युद्ध नेतन्याहू लड़ रहे हैं वैसा ही Naftali और Lapid भी लड़ेंगे या यहूदियों के अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ने को विवश होंगे

इसलिए मेरा इज़रायल के यहूदियों से अनुरोध है कि वे अपनी कौम के अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुट रहें और नेतन्याहू के साथ खड़े रहें

मोदी को गोली मारने वाले, इजरायल को उड़ाने वाले ‘Time Bomb’ नहीं लेकिन योगी को खिलौना देने वाली बच्ची ‘हिंदू आतंकी’: क्यों वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना बनी यशस्विनी

                       योगी बच्ची संग (बाएँ), प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा (दाएँ), (साभार : PTI & crickettimes)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।

बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”

मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।

आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’

लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”

आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”

वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”

एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”

इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।

जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं

ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।

यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।

आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।

आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।

बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’

आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।
यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?

आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए

आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।

आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।

कांग्रेस के नंगो का हमाम : दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज किया AICC General Secretary KC Venugopal और MP Kodikunnil Suresh के खिलाफ

सुभाष चन्द्र

हरियाणा महिला कांग्रेस नेता सुचित्रा और उनके पति गौरव कुमार ने वेणुगोपाल और सुरेश पर हरियाणा चुनाव में टिकट के लिए 7 करोड़ लेने का आरोप लगाया है। दिल्ली पुलिस ने अब दोनों के खिलाफ FIR (No.11/2026) दर्ज की है वैसे दिल्ली पुलिस किसी नतीजे पर पहुंचेगी, मुझे इसमें संदेह है नरवणे की किताब को छापने वाले पेंगुइन का मामला ठंडे बस्ते में दब गया। इस मुद्दे का ठंडे बस्ते में जाना शुभ संकेत नहीं। समझ नहीं आता कि गाँधी परिवार के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामले जरुरत से ज्यादा धीमी गति से चल रहे हैं, क्यों? 

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वेणुगोपाल ने आरोपों को गलत बताया है और कहा है कि अगले विधानसभा चुनावों से पहले ये भाजपा के कहने पर किया गया है ये “fabricated scandal” है और उन्हें किसी जांच से कोई डर नहीं लगता

ये पैसे के लेनदेन से टिकट मिलना कांग्रेस क्या कई दलों में आम बात है लेकिन कांग्रेस की तो कहानी ही कुछ और है उनके तो विधायक भी राज्यसभा चुनाव में गैर कांग्रेसी उम्मीदवार को वोट दे देते हैं और फिर पार्टी उन्हें सस्पेंड कर देती है अभी असम कांग्रेस के गौरव गोगोई पाकिस्तान से संबंधों को लेकर फंसे हुए हैं और खुद राहुल गांधी विदेशी नागरिकता के आरोप में अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट में फंसा है उसके अलावा भी न जाने कितने केस राहुल गांधी पर चल रहे है लेकिन धमकी दे रहा है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता विश्व शर्मा चुनाव के बाद जेल में होंगे पहले अपनी तो खैर मना लो भाई, कब किस केस में अंदर हो जाओ, पता नहीं  

सत्ता में आने पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लोग बड़ी बड़ी धमकिया देते हैं ऐसी ही धमकी कभी कपिल सिब्बल ने 2019 चुनाव से पहले दी थी CBI और ED के अधिकारियों को लेकिन धमकी देने वाले कभी सत्ता में नहीं पहुंचते

वेणुगोपाल ने जरूर कहा है कि उसके खिलाफ आरोप मिथ्या हैं लेकिन एक प्रश्न यह भी उठता है कि सुचित्रा और उसके पति गौरव के पास 7 करोड़ रुपए आये कहां से जबकि सुचित्रा और उसके पति गौरव कभी विधायक नहीं रहे और उनका केवल एक छोटा से फैमिली व्यवसाय है क्या 7 करोड़ इस उम्मीद से दिए थे कि चुनाव जीतने के बाद वह 15 करोड़ कमा लेगी?

चोटिल होने, मिडिल ईस्ट वॉर, फ्यूल संकट और ‘लॉकडाउन’ की राजनीति: डर फैलाकर वोट बटोरने की जुगत में ममता बनर्जी

                                                 ममता बनर्जी (फोटो साभार: AI ChatGPT)
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने की खबरों ने वैश्विक तेल और गैस सप्लाई को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, स्वाभाविक रूप से सतर्क हो गए हैं।

इसी बीच देश के भीतर एक अलग ही बहस छिड़ गई कि क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है? क्योंकि ममता बनर्जी ने लॉकडाउन लगने की अफवाहों को फैलाना का काम जोरदार तरीके से किया। हालाँकि केंद्र सरकार ने उनकी इन हरकतो के सफल होने से पहले ही जनता तक संदेश पहुँचा दिया है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें।

ममता बनर्जी का लॉकडाउन बयान: आशंका या सियासत?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि केंद्र सरकार फ्यूल संकट के बहाने देश में लॉकडाउन लगा सकती है।

ममता बनर्जी ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में चुनाव प्रचार करते हुए कहा, “वे (केंद्र सरकार) लॉकडाउन लगा सकते हैं। लोग घरों में बंद रहेंगे। 2021 में लॉकडाउन के समय मैंने लड़ाई लड़ी थी, अब भी लड़ सकती हूँ।” उन्होंने LPG सिलेंडर की बुकिंग 25-35 दिन बाद मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ गए। पेट्रोल की कीमत बढ़ गई। क्या केंद्र सरकार फिर लॉकडाउन की तैयारी कर रही है?

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने खारिज किए अफवाह

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक्स पर लिखा, “लॉकडाउन की अफवाहें पूरी तरह झूठी हैं। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। हम ऊर्जा, सप्लाई चेन और जरूरी चीजों पर नजर रख रहे हैं। लोग शांत रहें, जिम्मेदार रहें।”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा, “मैं लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूँ कि कोई लॉकडाउन नहीं होगा। कुछ नेता बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। कोविड जैसा लॉकडाउन कभी नहीं होगा।”

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने खुद पैनिक न करने को कहा है। जमाखोरी पर चेतावनी दी गई है। राज्य सरकारें होर्डिंग न करें। पूरी स्थिति केंद्र के नियंत्रण में है।

तो फिर डर क्यों फैला रही हैं ममता बनर्जी?

राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में ममता डर फैला रही हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ईंधन संकट का मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा साबित हो रहा है। वे लोगों में डर पैदा करके कह रही हैं कि केंद्र सरकार लॉकडाउन लगा रही है, LPG 25 दिन बाद मिलेगा, खाना कैसे पकाएँगे, ट्रांसपोर्ट कैसे चलेगा।

लेकिन असल में केंद्र सरकार पहले से ही एक्शन ले रही है, जिसमें एक्साइज ड्यूटी कम की, एक्सपोर्ट पर ड्यूटी लगाई, सप्लाई चेन को मजबूत किया।

दरअसल, ममता का मकसद साफ है, वो है- आम जनता को भड़काना, मोदी सरकार को बदनाम करना और टीएमसी के वोट बैंक को मजबूत करना। वे जानती हैं कि डर का माहौल बन गया तो लोग सोचेंगे ‘मोदी सरकार फेल हो गई’।

दरअसल, ममता खुद के राज्य में LPG और पेट्रोल की सप्लाई सुधारने में कुछ नहीं कर रही। सिर्फ आरोप लगा रही हैं। चुनावी फायदे के लिए लोगों को अनावश्यक चिंता में डालना गलत है। आम आदमी पहले से परेशान है, उस पर ममता का ये डर और बढ़ा रहा है।

ममता बनर्जी ने पहले भी लोगों को भड़काया, वो हैबिचुएल ऑफेंडर

ममता बनर्जी का ये तरीका नया नहीं। वे हर मुद्दे को राजनीति बना लेती हैं। वो डर की राजनीति करती रही हैं शुरुआत से। कभी वामपंथ का डर दिखाकर, कभी कॉन्ग्रेस का डर दिखाकर, कभी बीजेपी का डर दिखाकर, तो कभी हिंदुओं का डर दिखाकर। देखें- कैसे लोगों को भड़काकर वोट बटोरती रही हैं ममता बनर्जी-

CAA के नाम पर: जब नागरिकता संशोधन कानून आया तो ममता ने पूरे बंगाल में हंगामा मचा दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि मुसलमानों के अधिकार छिन जाएँगे। उन्होंने पूरे बंगाल में शाहीन बाग स्टाइल में प्रदर्शन तक करवाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनता, बल्कि पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है। इसके बावजूद ममता ने सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भ्रम फैलाया और अब तक वो इस मुद्दे पर भ्रम ही फैला रही हैं।

SIR के नाम पर: एसआईआर के दौरान जब कुछ जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं तो ममता ने इसे भी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि आम मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं। ममता ने इसे राजनीतिक हथियार बनाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया और दिल्ली तक प्रदर्शन कर डाले।

कोरोना के नाम पर: बता दें कि साल 2021 के चुनाव के समय आंशिक लॉकडाउन चल रहा था। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने दावा करते हुए कहा कि केंद्र ने कुछ नहीं किया, सिर्फ टीएमसी लड़ रही है। लेकिन असल में केंद्र ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, फंड सब दिया। ममता ने इसका इस्तेमाल सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए किया।

केंद्रीय योजनाओं के नाम पर: पीएम आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर ममता हमेशा हमला करती हैं। कहती हैं केंद्र कुछ नहीं दे रहा। लेकिन हकीकत ये है कि बंगाल में लाखों लोग इन योजनाओं से फायदा ले रहे हैं। ममता सिर्फ क्रेडिट लेने के चक्कर में विरोध करती हैं।

इस तरह ममता हर बार डर और भ्रम फैलाकर वोट बटोरती हैं।

ममता की ये राजनीति आम आदमी को पहुँचा रही है नुकसान

आज ईंधन संकट है तो हर राज्य प्रभावित है। केरल, तमिलनाडु, असम के मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। लेकिन वे मीटिंग में समाधान ढूँढ रहे हैं। ममता अकेली हैं जो लॉकडाउन का डर दिखा रही हैं। उनका बयान सुनकर लोग पैनिक खरीदारी कर रहे हैं। LPG सिलेंडर की होर्डिंग बढ़ रही है। छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट वाले, गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता का रिकॉर्ड क्या है- संदेशखाली, टीएमसी के गुंडागर्दी, भर्ती घोटाले। अब ईंधन संकट को भी वोट में बदलने की कोशिश। लेकिन इस बार लोग समझ रहे हैं।

ममता का डर लोगों को नहीं, खुद को बचाने का है

ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। लेकिन असल में बंगाल की जनता महँगाई, बेरोजगारी, अपराध से परेशान है। ईंधन संकट राष्ट्रीय समस्या है। इसमें सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ममता अगर सच में चिंतित हैं तो राज्य में होर्डिंग रोकें, सप्लाई सुधारें, केंद्र के साथ मिलकर काम करें। लेकिन नहीं, वे तो बस डर फैलाकर वोट माँग रही हैं।

आम जनता के लिए सबसे जरूरी है कि वह अफवाहों से दूर रहे और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करे। क्योंकि संकट के समय घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार होती है। वैसे भी, ममता बनर्जी की हरकतों को पूरा देश देख रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता भी देख रही है। डर की राजनीति अब पुरानी हो गई है। अब विकास और समाधान की राजनीति चाहिए। मोदी सरकार पहले की तरह इस संकट से भी देश को निकाल लेगी। ममता का डर सिर्फ चुनावी चाल है। लोग अब समझ चुके हैं।

असम : चुनाव से पहले घर में रहस्यमयी विस्फोट से दहशत: नूर मोहम्मद के शरीर के उड़े चिथड़े, नाबालिग बेटे की भी मौत


असम के जोरहाट में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक रहस्यमयी विस्फोट ने पूरे इलाके को हिला दिया। शनिवार (28 मार्च 2026) को एक किराए के घर में हुए इस धमाके में दो लोगों की मौत हो गई जबकि एक बच्ची गंभीर रूप से घायल है।

यह घटना 28 मार्च को दोपहर करीब 3:30 बजे जोरहाट शहर के राजा मैदाम न्यू कॉलोनी में हुई। मृतकों की पहचान नूर मोहम्मद और उनके 8 वर्षीय बेटे मोहम्मद इकबाल के रूप में हुई है। धमाका इतना भीषण था कि नूर मोहम्मद की मौके पर ही मौत हो गई और उनका शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया। उनके बेटे इकबाल ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।

वहीं, इकबाल की 7 साल की एक बहन इस हमले में गंभीर रूप से घायल है और जोरहाट मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (JMCH) में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रही है। इसके अलावा, पड़ोस की एक महिला भी इस विस्फोट में घायल हुई है जिसे उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। शुरुआत में स्थानीय लोगों को लगा कि यह विस्फोट LPG सिलेंडर फटने से हुआ है लेकिन बाद में जाँच में पता चला कि वहां कोई एलपीजी सिलेंडर नहीं था और न ही विस्फोट के बाद आग लगी थी।

धमाका इतना तेज था कि कमरे के अंदर नूर मोहम्मद के शरीर के अंग बिखर गए और दीवारें भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। फर्श पर एक छोटा गड्ढा भी बन गया था जिससे विस्फोट की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि यह परिवार नगाँव का रहने वाला था और जोरहाट में अंसारी मलिक के मकान में किराए पर रह रहा था।

जानकारी के मुताबिक, घटना के समय घर के अंदर कोई सामान खोला जा रहा था तभी यह विस्फोट हुआ। हालाँकि, वह क्या सामान था और विस्फोट का असली कारण क्या है इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है और जाँच जारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नूर मोहम्मद एक कबाड़खाने में काम करते थे और वे कोई चीज घर लाए थे जिसे हथौड़े से तोड़कर खोलने की कोशिश कर रहे थे।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँच गई और मामले की गहन जाँच शुरू कर दी है। गौरतलब है कि असम की 126 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में मतदान होना है, जबकि नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे।

ISIS-अलकायदा आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़, 12 गिरफ्तार : लादेन की देखते थे वीडियो, गेमिंग ऐप से करते थे आका से संपर्क, पाकिस्तान जाने का था प्लान

                                           आतंकरोधी अभियान के तहत पकड़े गए 12 आतंकी
देश के विभिन्न राज्यों में चलाए गए एक बड़े आतंकरोधी अभियान के तहत सुरक्षा एजेंसियों ने ISIS-अलकायदा से जुड़े आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। जानकारी सामने आई है कि आंध्र प्रदेश और दिल्ली पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुए अंतर-राज्यीय ऑपरेशन में 12 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया।

इन 12 आतंकियों की पहचान मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ (आंध्र प्रदेश), मिर्जा सोहेल बेग (आंध्र प्रदेश), मोहम्मद दानिश (आंध्र प्रदेश), शादमान दिलकुश (बिहार), अजमनुल्लाह खान (बिहार), लकी अहमद (दिल्ली), मीर आसिफ अली (पश्चिम बंगाल), जीशान (राजस्थान), अब्दुल सलाम (कर्नाटक), शाहरुख खान (महाराष्ट्र), शियाक पियाज उर रहमान (महाराष्ट्र) और सईदा बेगम (तेलंगाना) के रूप में हुई है।

                                        साभार : सोशल मीडिया 
पुलिस की छानबीन में इनके संबंध अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) और ISIS से जुड़े सामने आए हैं। जाँच में ये भी पता चला है कि ये आतंकी एक गेमिंग ऐप के जरिए विदेशी हैंडलरों के संपर्क में थे और इनके तार ISIS से संबंध रखने वाले Benex Com नामक एक समूह से भी जुड़े थे।

पुलिस के अनुसार, ये लोग सोशल मीडिया पर भड़काऊ गतिविधियों में शामिल थे। इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया, ISIS के झंडे का समर्थन किया और भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने की बात कही। आगे इनकी योजना पाकिस्तान जाकर आतंकी प्रशिक्षण लेने की थी और साथ ही अपने साथ अन्य युवाओं को भी जिहाद के लिए प्रेरित करने की थी।

इनमें से तीन- मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ, मोहम्मद दानिश और मोहम्मद सोहेल बेग ने तो ‘अल-मलिक इस्लामिक यूथ’ नाम से ग्रुप भी बनाया था। इसके जरिए ये युवाओं को भड़काने और जिहाद के लिए तैयर करने का काम करते थे।

वहीं अन्य लगातार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए जिहाद से जुड़े प्रचार में सक्रिय थे और ओसामा बिन लादेन के वीडियो देखकर आतंकी-कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दे रहे थे।

पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जाँच कर रही है और सभी डिजिटल साक्ष्यों व संपर्कों की पड़ताल की जा रही है, ताकि इस आतंकी साजिश के हर पहलू का खुलासा किया जा सके।

अब जस्टिस भुइयां UAPA पर भी रोक लगाना चाहते हैं क्या? अपराधियों को छोड़ दिया जाए? विकसित भारत क्या सुप्रीम कोर्ट बनाएगा?

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुइयां ने हाल ही में कहा है कि UAPA के अत्यधिक उपयोग से हासिल नहीं हो सकता विकसित भारत का लक्ष्य उन्होंने कहा कि 2019 से 2023 के बीच इस एक्ट में दोषसिद्धि मात्र 5% है हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन आरोप सिद्ध नहीं हो सके

जस्टिस भुइयां ने सीधे कानून बनाने वाली संस्था संसद को चुनौती दी है।  यह कानून मोदी सरकार ने नहीं बनाया, यह 1967 में बना था 2004, 2008, 2012 और 2019 में इसमें संशोधन किये गए यानी 3  बार संशोधन तो कांग्रेस ने ही किया था 2 अगस्त, 2019 में सरकार ने संगठनों के साथ साथ व्यक्तियों को भी आतंकी श्रेणी में शामिल किया था 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
NIA अपनी पूरी शक्ति से आरोपियों के खिलाफ सबूत जुटाती है और अगर वे कोर्ट को पसंद न आए तो इसका मतलब यह नहीं है कि कानून ही बेकार है

क्या आसिया अंद्राबी के खिलाफ UAPA लागू नहीं करना चाहिए था जिसे अभी कुछ दिन पहले उम्र कैद की और उसकी दो साथियों को 30-30 साल की सजा हुई है क्या यासीन मलिक पर UAPA नहीं लगना चाहिए था जिसे 2022 में उम्र कैद की सजा हुई थी? उस पर अभी TADA में एयरफोर्स के अधिकारियों की हत्या का मुकदमा चल रहा है यह TADA कानून 1987 में नरसिम्हा राव ने निरस्त कर दिया था जो 1995 में ख़त्म हुआ लेकिन जो मुक़दमे दर्ज थे, उन्हें जारी रखने दिया गया था 

उमर खालिद और शरजील इमाम पर भी क्या UAPA नहीं लगना चाहिए था जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से मना कर दिया? उन पर दिल्ली दंगे भड़काने का आरोप है याद रहे इमाम ने चिकन नैक काट कर भारत से अलग करने की बात की थी

आप UAPA में 5% दोषसिद्धि को लेकर कानून पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन CBI का Success Rate तो 76% होने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह CBI के कार्यों की समीक्षा करेंगे मतलब 5% भी पसंद नहीं और 76% भी पसंद नहीं

पिछले दिनों जस्टिस भुइयां ने कॉलेजियम की सिफारिशों के लिए केंद्र सरकार पर उंगली उठाते हुए कहा था कि केंद्र को कॉलेजियम की सिफारिशें खारिज करने का अधिकार नहीं है

बड़ी विडंबना है, पुलिस को सुप्रीम कोर्ट फटकार मारता है, प्रशासन को नहीं छोड़ता, सेना के कार्य में कमी निकालता है, केंद्र और राज्य सरकारों की तो बात ही छोड़ दो जब सभी में कमी निकालनी हैं तो सत्ता में आने का तरीका ढूंढिए

एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को विकसित देश बनाने में लगा है और आपने एक UAPA को लेकर कह दिया कि इससे विकसित देश नहीं बन सकता प्रधानमंत्री की मेहनत पर ऐसे तो पानी फेरना उचित नहीं है विकसित देश क्या सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के राष्ट्रपति को गैर कानूनी आदेश देने से बनेगा 

आत्मचिंतन करने की जरूरत है और Individual Judges को सरकार और उसकी एजेंसियों पर बोलने से बचना चाहिए जस्टिस भुइयां के बयान से यह तो स्पष्ट हो गया कि कोई मामला UAPA का उनकी अदालत में चला गया, तो न्याय तो नहीं होगा 

कर्नाटक : कांग्रेस की दादागिरी : ‘VIP हैं हम, जनता की लाइन में थोड़े न लगेंगे’: कांग्रेस MLA ने दिखाई IPL वालों को आँख, स्पीकर का आदेश- हर विधायक को दो 4 टिकट


कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और सरकार ने आईपीएल के सामने अपनी हनक दिखाई है। एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले आईपीएल मैचों के लिए कॉम्प्लिमेंटरी टिकट की माँग ने विवाद खड़ा कर दिया है। विधानसभा स्पीकर यू.टी. खादेर ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर विधायक को कम से कम चार प्रीमियम टिकट सुनिश्चित किए जाएँ।

यह मुद्दा तब सामने आया जब कांग्रेस विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (केएससीए) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आईपीएल 2026 सीजन के शुरूआती मैच 28 मार्च को बेंगलुरु में होने वाले हैं लेकिन केएससीए ने विधायकों और मंत्रियों को टिकट नहीं दिए।

हुंगुंड विधानसभा क्षेत्र से विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा, “28 मार्च को आईपीएल मैच है लेकिन केएससीए ने विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दिए हैं। वे सरकार से सभी सुविधाएँ लेते हैं लेकिन विधायकों का सम्मान नहीं करते। हम वीआईपी हैं, हम लाइन में लगकर थोड़े न टिकट लेंगे। पिछली बार हम लाइन में खड़े हुए थे और फिर आम जनता के साथ सामान्य गैलरी में बैठना पड़ा। यह फिर नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ऑनलाइन टिकट बिक्री से ब्लैक मार्केटिंग बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “टिकट ₹5000 में बिक रहे हैं लेकिन उन्हें ₹35000 में बेचा जा रहा है। वे विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दे रहे बल्कि ऑनलाइन बुकिंग करने को कह रहे हैं। हम जानते हैं कि ऑनलाइन बुकिंग कैसे ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा देती है।”

काशप्पनावर ने माँग की कि केएससीए हर विधायक को कम से कम पाँच कॉम्प्लिमेंटरी टिकट, अलग सीटिंग व्यवस्था और डेडिकेटेड लाउंज उपलब्ध कराए। उन्होंने बताया कि यह मुद्दा पहले विपक्षी नेता आर. अशोक ने विधानसभा में उठाया था।

इस माँग पर स्पीकर यू.टी. खादेर ने उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को निर्देश दिया कि वे केएससीए से सीधे बात करें और हर विधायक को कम से कम चार वीआईपी टिकट सुनिश्चित करें। शिवकुमार ने कहा कि वे केएससीए अध्यक्ष वेंकटेश प्रसाद से बात करेंगे और विधायकों द्वारा ऐसी सुविधाएँ माँगने में कुछ गलत नहीं है।

इस बीच भाजपा नेता और सांसद तेजस्वी सूर्या ने कांग्रेस विधायक पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “विधायक का बयान गलत है और सच कहें यह आश्चर्यजनक भी नहीं है। सबसे पहले यह उनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है। जब राज्य के असली मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है तब विधानसभा में इस तरह का मुद्दा उठाना खुद ही बहुत कुछ बताता है। अगर स्पीकर इस पर कार्रवाई करते हैं तो इससे विधान सौधा की गरिमा कम होती है।”

तेजस्वी सूर्या ने आगे कहा, “मूल सवाल यह है कि केएससीए या कोई भी खेल संगठन विधायकों को फ्री टिकट क्यों दे? उन्हें ऐसा क्या देना चाहिए? यह साफ तौर पर उत्पीड़न है, सामंती सोच है। एक विधायक जो फ्री टिकट, अलग गैलरी माँगता है और आम जनता के साथ बैठने से इनकार करता है वह यह मानता है कि वह उन लोगों से ऊपर है जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है। यही समस्या है। अगर आम नागरिकों को टिकट खरीदना पड़ता है तो विधायकों को भी खरीदना चाहिए। सरल बात है। जब तक हम इसे स्पष्ट रूप से नहीं चुनौती देंगे तब तक उत्पीड़न की संस्कृति को बढ़ावा मिलता रहेगा जो आधुनिक, समान और लोकतांत्रिक समाज के बिल्कुल विपरीत है। यह गलत है और इसका विरोध किया जाना चाहिए।”

बता दें कि चिन्नास्वामी स्टेडियम में बीते साल हुई भगदड़ में 11 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद चिन्नास्वामी स्टेडियम में क्रिकेट मैचों के आयोजन पर रोक लगा दी गई थी। हालाँकि इस सत्र के लिए चिन्नास्वामी स्टेडियम को न सिर्फ आईपीएल की मेजबानी मिली है, बल्कि 2 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों का आयोजन भी यहाँ होगा।