ईरान को पैसे भेजने के चक्कर में फँसे 2 मुस्लिम भाई, सऊदी अरब पुलिस ने पकड़ा (फोटो साभार : NDTV) उत्तर प्रदेश के अमरोहा के रहने वाले दो सगे मुस्लिम भाइयों, मोहम्मद जफर और मोहम्मद राहिब को सऊदी अरब की पुलिस ने दम्माम से गिरफ्तार कर लिया है। दोनों भाइयों पर सऊदी अरब से ईरान फंड ट्रांसफर करने का आरोप है।
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च महीने में हुई इस गिरफ्तारी के बाद से दोनों का कुछ पता नहीं चल रहा है। इस बीच रियाद में भारतीय दूतावास ने परिवार को ईमेल कर बताया है कि दोनों को सुरक्षा से जुड़े एक मामले में हिरासत में लिया गया है। अब मुस्लिम पीड़ित परिवार ने विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से दोनों बेटों को सुरक्षित वापस लाने की गुहार लगाई है।
वैसे तो मुसलमान दुनिया भर की खबर रखता है लेकिन षड़यंत्र करने से बाज नहीं आता। जब मालूम है कि सऊदी अरब और ईरान के जंग का माहौल है फिर क्यों सऊदी अरब से ईरान मदद भेजी? अब जब पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया तो अब्बू अपनी बीमारी का victim card खेल कर मासूमियत दिखा रहे हैं। आखिर ये victim card खेल कर कब तक दुनिया को पागल बनाओगे? भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा सकते हो लेकिन सऊदी अरब में रहकर उसके दुश्मन मुल्क ईरान की मदद करने पर गिरफ़्तारी ही होगी। सऊदी अरब में कोई विपक्ष इनकी हिमायत में नहीं बोल रहा। वो भारत नहीं सऊदी अरब है।
अम्मी के कहने पर भेजे थे पैसे
अमरोहा के नौगावां के रहने वाले जफर पिछले 5 साल से दम्माम के एक स्टोर में काम कर रहे थे। बाद में उन्होंने अपने छोटे भाई राहिब को भी वहीं नौकरी पर लगवा दिया था। फरवरी में इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हुआ।
इसके बाद दोनों भाइयों की अम्मी ने ईरान के पीड़ित लोगों की मदद करने की इच्छा जताई। अम्मी के कहने पर जफर ने छोटे भाई राहिब के मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया और भारत में मौजूद ईरानी दूतावास के बैंक खाते में 200 रियाल ट्रांसफर कर दिए।
फोन के चक्कर में छोटा भाई भी फँसा
सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। जैसे ही राहिब के फोन से ईरान से जुड़े खाते में ट्रांजैक्शन हुआ, सऊदी की सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गईं। 27 मार्च को सऊदी पुलिस ने राहिब को उसके घर से हिरासत में ले लिया, क्योंकि फोन उसी का था। इसके तीन दिन बाद यानी 30 मार्च को पुलिस ने बड़े भाई जफर को भी गिरफ्तार कर लिया। तब से परिवार का अपने दोनों बेटों से कोई संपर्क नहीं हो पाया है।
भारतीय दूतावास ने क्या कहा?
रियाद में भारतीय दूतावास के कम्युनिटी वेलफेयर विंग के अधिकारी सुमित कुमार ने पीड़ित परिवार को एक ईमेल भेजा है। इस ईमेल में लिखा है, “उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोहम्मद राहिब हसन और मोहम्मद जफर हसन को सुरक्षा से जुड़े एक मामले में हिरासत में लिया गया है। भारतीय दूतावास ने इस संबंध में और अधिक जानकारी जुटाने के लिए सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय से संपर्क किया है। अभी और विवरण मिलना बाकी है।”
अब्बू ने जयशंकर से माँगी मदद
दोनों भाइयों के अब्बू हसन अब्बास पूरी तरह से पैरालिसिस (लकवा) के शिकार हैं। उनका पूरा खर्च उनके ये दोनों बेटे ही उठा रहे थे। हसन अब्बास ने एक Video जारी कर विदेश मंत्री एस जयशंकर से अपील की है। उन्होंने कहा, “मेरे दोनों बच्चे सऊदी अरब में लापता हैं। मेरे घर का पूरा खर्च बच्चे ही उठाते थे। मैं आपसे अपील करता हूँ कि कृपया मेरे बच्चों का पता लगाएँ और उन्हें वापस लाएँ।”
राजनाथ सिंह तक पहुँचा मामला
इस बीच ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। उन्होंने रक्षा मंत्री के सामने इस गंभीर मुद्दे को उठाया है। उन्होंने बताया कि मोहम्मद शबी नाम के एक अन्य भारतीय नागरिक को भी दुबई एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया है। मौलाना यासूब अब्बास ने भी विदेश मंत्रालय से अपील की है कि मिडिल ईस्ट में फँसे शिया भारतीयों की तुरंत मदद की जाए।
दिल्ली की पूर्व केजरीवाल सरकार की शराब नीति के बाद अब पश्चिम बंगाल की 2017 में लागू नई आबकारी नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है। राज्य की तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) का गठन किया गया।
बंगाल में सरकार बने जुम्मा-जुम्मा आठ दिन नहीं हुए नितरोज ममता बनर्जी के कार्यकाल में हुए घोटाले सामने ही नहीं आ रहे कार्यवाही भी हो रही है और एक तरफ दिल्ली सरकार है जो अरविन्द केजरीवाल के कार्यकाल में हुए घोटालों पर सोई हुई है। CAG रिपोर्ट पर कितना शोर मचाया चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात वाली बात हो गयी।
एजेंसी ने राज्य के सभी 55 प्राइवेट शराब होलसेलर्स की जगह लेकर शराब वितरण पर सीधा राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इसने वितरण और थोक विक्रेता दोनों के रूप में काम करने की कोशिश की, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुआ। खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वसूले गए।
दरअसल टीएमसी सरकार के कार्यकाल में हुए राज्य में शराब व्यापार से जुड़ी एक रिपोर्टें सामने आई है। इसमें उत्पाद शुल्क विभाग के एक गोपनीय दस्तावेज से पता चलता है कि शराब वितरण नेटवर्क का इस तरह से पुनर्गठन किया गया था, जिससे कुछ खास प्राइवेट शराब विक्रेताओं को लाभ हुआ और इस तरह सिस्टम काम कर रहा था, जिससे उनका एकाधिकार स्थापित हुआ।
रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 में शराब वितरण नीति में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारे पर ये बदलाव किए गए।
ऑपइंडिया को एक रिपोर्ट की कॉपी मिली है, जिसमें दावा किया गया है कि नए सिस्टम में धीरे-धीरे थोक वितरण के पुराने मॉडल को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह ऐसी व्यवस्था की गई जिससे चुनिंदा बिचौलियों की शराब वितरण के सिस्टम में एकाधिकार हो गया।
After the Delhi Liquor Excise scam, it is now Bengal’s turn. The Excise Department altered policy and bottlers were extorted on every crate of liquor and beer. The proceeds, amounting to thousands of crores, found their way to the TMC and Abhishek Banerjee.https://t.co/xmxYRk7VVK
इससे पता चलता है कि जिसे आधिकारिक तौर पर शराब वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह वास्तव में निजी बोतलबंद शराब विक्रेताओं और शराब निर्माताओं से पैसा वसूलने का एक सिस्टम बन गया।
आबकारी विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें इन बदलावों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लागू हुए राज्य की नई आबकारी नीति के बाद शराब निर्माताओं से उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीका बदल गया। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मुक्त प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत वितरण के पारंपरिक सिद्धांतों को एक कड़े नियंत्रण वाले नेटवर्क से बदल दिया गया, जिसने कुछ चुनिंदा वितरकों के हाथों में पूरा सिस्टम आ गया।
टीएमसी ने शराब वितरण की पूरी प्रक्रिया को सेंट्रलाइज कर दिया
रिपोर्ट में एक चार्ट दिखाया गया है, जो बताता है कि शराब उत्पाद पारंपरिक रूप से बाजार में कैसे पहुँचते थे और पिछली ममता सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में यह प्रणाली कैसे विकसित हुई।
(रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट)
यह चार्ट निर्माता के गोदाम यानी ‘मदर गोदाम’ से शुरू होता है, जहाँ से उत्पाद कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी (C&FA) को भेजे जाते हैं। C&FA माल को सिस्टम में आगे बढ़ने से पहले भंडारण और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में कार्य करती है।
वहाँ से उत्पाद आमतौर पर वितरकों या सुपर स्टॉकिस्टों को आपूर्ति किए जाते हैं। ये वितरक कंपनी के अधिकृत व्यावसायिक भागीदार होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं तक कैसे पहुँचे।
यह चार्ट दर्शाता है कि वितरक, निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे बिक्री टीमों का प्रबंधन करते हैं, बाजार से ऑर्डर प्राप्त करते हैं, स्टॉक की आवाजाही को संभालते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद सभी खुदरा दुकानों पर उपलब्ध हों। कई उद्योगों में, वितरक खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं को लोन भी मुहैया कराते हैं, जिससे बाजार में नकदी की कमी नहीं होती है।
थोक विक्रेता इस सिस्टम में एक और अहम कड़ी हैं। वे वितरकों से थोक में उत्पाद खरीदते हैं और फिर उनको खुदरा विक्रेताओं तक छोटी-छोटी खेप में पहुँचाते हैं। छोटे विक्रेताओं का लाभ खरीद मूल्य और उपभोक्ताओं को बेचने के मूल्य में अंतर से मिलता है।
एक बाजार के निर्माण में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। कई बार वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा भी बाजार को मिलता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में किए गए बदलावों ने वितरण व्यवस्था पर एक छोटे- से ग्रुप का कब्जा हो गया। प्रतिस्पर्धा कम हो गया और उनका एकाधिकार होने से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का उन्हें अवसर मिला। इसकी वजह से पारंपरिक बाजार सिद्धांतों को काफी नुकसान हुआ।
वितरक और थोक विक्रेता क्यों महत्वपूर्ण हैं?
रिपोर्ट में वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच अंतर को विस्तार से बताया गया है। वितरक आम तौर पर निर्माताओं के साथ समझौते करते हैं और आधिकारिक चैनल पार्टनर के रूप में कार्य करते हैं। वितरक न केवल उत्पादों की बिक्री के लिए बल्कि उनकी मार्केटिंग, आपूर्ति नेटवर्क के रखरखाव और बाजार तक पहुँच के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। वे आमतौर पर बड़े क्षेत्रों में काम करते हैं और खुदरा विक्रेताओं, थोक विक्रेताओं और कभी-कभी सीधे उपभोक्ताओं से भी संपर्क करते हैं।
दूसरी ओर, थोक विक्रेता मुख्य रूप से बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदते हैं और उन्हें खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं। वे मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं ,जिनका उद्देश्य भंडारण, प्रबंधन और थोक खरीद के माध्यम से लाभ कमाना होता है। वितरक आमतौर पर वितरण से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को वहन करते हैं, जबकि थोक विक्रेता माल की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लागू किए गए शराब वितरण सुधारों ने इन भेदों को धुंधला कर दिया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जो स्थापित व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
2017 में सरकार द्वारा नियंत्रित वितरण संरचना में बदलाव
2017 को पश्चिम बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीएसबीसीएल) का गठन हुआ, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी थी और जिसने राज्य में पैकेटबंद शराब के थोक वितरण का कार्यभार संभाला। डब्ल्यूबीएसबीसीएल के माध्यम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने शराब के कारोबार में कदम रखा।
(रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉर्ट)
डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अस्तित्व में आने से पहले, थोक वितरण का काम बड़े पैमाने पर 1909 के बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत संचालित निजी लाइसेंस धारकों द्वारा किया जाता था। ये निजी थोक विक्रेता निर्माताओं से उत्पाद खरीदते थे और उन्हें पूरे राज्य में खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति करते थे।
डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन के बाद निगम शराब खरीदने वाला और वितरण करने वाला दोनों बन गया। इसने पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से शराब खरीदना शुरू किया और इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 5200 खुदरा दुकानों को बेचना शुरू किया।
बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 20 के तहत शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन विदेशी शराब क्षेत्र के कई आपूर्तिकर्ता कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं के बजाय केवल पंजीकृत ब्रांड मालिक या आयातक के रूप में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें निगम को उत्पाद बेचने और बिल जारी करने की अनुमति दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जो अधिनियम की भावना के विपरीत थी।
खुदरा विक्रेताओं और निर्माताओं ने शिकायत क्यों की?
रिपोर्ट में नए मॉडल से उत्पन्न होने वाले कई परिचालन और वित्तीय गड़बड़ियों के बारे में बताया गया है।
एक अहम शिकायत ऋण सुविधाओं के अभाव से संबंधित थी। पूर्व की निजी थोक प्रणाली के तहत खुदरा विक्रेताओं को अक्सर उधार पर उत्पाद प्राप्त होते थे। इससे उन्हें बड़ी अग्रिम राशि का भुगतान किए बिना स्टॉक बनाए रखने की सुविधा मिलती थी।
डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अधिग्रहण के बाद खुदरा विक्रेताओं को कथित तौर पर खरीद की पूरी लागत अग्रिम रूप से चुकानी पड़ी। चूँकि शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का लगभग 70-80% हिस्सा करों और शुल्कों का होता है, इसलिए इससे खुदरा विक्रेताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया।
रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इस बदलाव के कारण सप्लाई चेन में पूँजी की कमी हुई। छोटे खुदरा विक्रेता विशेष रूप से प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें अब लोन से मदद नहीं मिल रही थी, बल्कि ज्यादा निवेश करना पड़ रहा था। इसकी वजह से बाजार में कथित तौर पर गिरावट आई और राजस्व प्रभावित हुआ।
मोनोपॉली की शुरुआत
रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूबीएसबीसीएल के आने से हालात बदल गए। नई नीति के माध्यम से टीएमसी सरकार ने शराब निर्माताओं और बॉटलर्स को बाध्य किया कि वे केवल WBSBCL के नियुक्त वितरकों के माध्यम से ही व्यापार करें। व्होलसेलर्स की जगह आए नए वितरकों पर आरोप लगे कि वे बॉटलर्स से अनुचित दरें वसूलते थे। प्रत्येक क्रेट पर गोडाउन रेंटल (4 रूपए) और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट (3 रूपए) के नाम पर भारी रकम वसूली गई।
रिपोर्ट्स के अनुसार, वितरकों को मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा राज्य के राजस्व खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर टीएमसी नेताओं को जाता था। रिपोर्ट के हवाले से आरोप लगाए गए कि यह पूरी अवैध वसूली सिंडिकेट के जरिए सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के करीबी परिसरों, जैसे- 9, कैमक स्ट्रीट, कोलकाता तक पहुँचाई जाती थी।
रिपोर्ट के अनुसार, “विकेंद्रीकृत व्यवसाय, निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और बहु-आपूर्ति बिंदुओं की अवधारणा ने एकाधिकारवादी व्यवसाय मॉडल को जन्म दिया।”
बोतल बनाने वाली कंपनियों पर सिस्टम में शामिल होने का दबाव
रिपोर्ट और संबंधित विवरणों में यह भी दावा किया गया है कि नई व्यवस्था का विरोध करने वाले बोतल निर्माताओं को काफी दबाव का सामना करना पड़ा। इसका उदाहरण अक्सर आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के रूप में दिया जाता है। कंपनी ने उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को कई पत्र लिखकर गैरकानूनी हस्तक्षेप और दबाव को लेकर चिंता व्यक्त की।
एक पत्र में, कंपनी ने कहा कि उसने ‘कुछ उत्पाद शुल्क अधिकारियों द्वारा अवैध हस्तक्षेप’ के संबंध में बार-बार चिंता व्यक्त की थी, जो उनसे गैरकानूनी माँग पूरा नहीं करने पर परेशान कर रहे थे।
कंपनी ने आगे अनुरोध किया कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाए और कार्रवाई की जाए।
रिपोर्ट में उन 5 अधिकारियों के नाम बताए गए हैं जो डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन की दिशा में नीतिगत ढाँचे को तैयार करने में शामिल थे। इनमें पूर्व विशेष आयुक्त (राजस्व) और महाप्रबंधक (संचालन) गौतम घोष, वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त शांतनु आचार्य, उपायुक्त संचयन गांगुली, अतिरिक्त आयुक्त राजर्षि चक्रवर्ती और विशेष आयुक्त कुनास बिस्वास शामिल थे।
पहले, शुल्क का संग्रह मुख्य रूप से विनिर्माण चरण में होता था, जिसे आम तौर पर राजस्व संग्रह का सबसे सुरक्षित और सबसे कुशल तरीका माना जाता है। नए मॉडल में शुल्क संग्रह को विनिर्माण चरण और वितरक चरण के बीच विभाजित किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप राजस्व प्राप्ति में देरी हुई और वितरण नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हुआ, क्योंकि वितरक अक्सर अतिरिक्त शुल्क वक्त पर जमा करने में विफल रहते थे। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे न केवल प्रणाली जटिल हो गई बल्कि राजस्व दक्षता भी कमजोर हो गई।
करोड़ों की वसूली में TMC नेता सब्यसाची दत्ता गिरफ्तार (फोटो साभार : ETVbharat) पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने TMC को एक और बड़ा झटका दिया है। पुलिस ने बिधाननगर नगर निगम के पूर्व चेयरमैन और दिग्गज TMC नेता सब्यसाची दत्ता को गिरफ्तार कर लिया है। सब्यसाची दत्ता पर करोड़ों रुपए की रंगदारी और उगाही करने का गंभीर आरोप है।
बिधाननगर नॉर्थ पुलिस ने सोमवार (8 जून) को उन्हें राजारहाट स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया। राज्य में सरकार बदलने के बाद से TMC नेताओं पर कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। सब्यसाची दत्ता बिधाननगर-राजारहाट इलाके के बेहद प्रभावशाली नेता माने जाते हैं।
जानकारी के अनुसार, सब्यसाची दत्ता पर दंगा करने का आरोप है। एक व्यापारी ने सब्यसाची के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई थी। इसी एफआईआर के आधार पर पुलिस ने तृणमूल के पूर्व विधायक को गिरफ्तार किया। सब्यसाची ने 26वें चुनाव में तृणमूल के टिकट पर बारासात से चुनाव लड़ा था। इससे पहले वे राजारहाट-न्यूटाउन निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल के विधायक रह चुके हैं। सब्यसाची बिधाननगर नगरपालिका के महापौर भी रह चुके हैं।
पुलिस काफी समय से इन आरोपों की जाँच कर रही थी। यह गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई है जब TMC में बड़ी बगावत के संकेत मिल रहे हैं। पार्टी के करीब 20 विधायक दिल्ली में एनडीए (NDA) के बड़े नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। ये सभी विधायक जल्द ही एनडीए में शामिल होना चाहते हैं।
देर रात हुए गिरफ्तार
उस शिकायत के आधार पर, सब्यसाची को सोमवार रात को उनके न्यूटाउन स्थित फ्लैट से गिरफ्तार कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया। लंबी पूछताछ के बाद, जब उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो पुलिस ने उन्हें देर रात गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मंगलवार(9 जून) को बिधाननगर अदालत में पेश किया जाएगा। हालांकि, बिधाननगर उत्तर पुलिस स्टेशन ने इस संबंध में अब तक कोई घोषणा नहीं की है। सब्यसाची के खिलाफ जबरन वसूली या मानसिक उत्पीड़न के आरोप नए नहीं हैं। न सिर्फ व्यापारी और आम लोग, बल्कि पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ कई आरोप लग चुके हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं।
पहले भी होती रही है शिकायत
मधुसूदन चक्रवर्ती ने पहले भी कई बार पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, तृणमूल सरकार के दौरान पुलिस की निष्क्रियता के आरोप लगे थे। आरोप है कि पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन सरकार बदलने के बाद वही पुलिस अब सक्रिय हो गई है। राज्य में सत्ता में आने के बाद से भाजपा सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को किसी भी तरह से बख्शा नहीं जाएगा। तब से पुलिस लगातार सक्रिय है। तृणमूल नेताओं और पार्षदों को एक के बाद एक गिरफ्तार किया जा रहा है। इस बार सब्यसाची का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है।
बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने पर जिस रफ़्तार से TMC नेताओं पर कानूनी डंडा चल रहा है यह हकीकत है या कोई सपना? उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ द्वारा गुंडों और माफिया गैंग पर होती कार्यवाही पर तो सारा INDI गठबंधन चिल्ला रहा है लेकिन बंगाल में सब खामोश। जबकि दोनों जगह बीजेपी। इतना ही नहीं मुसलमान तक वर्तमान सरकार की कार्यवाहियों से खुश हैं। वही पुलिस वही मुस्लिम! अब कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं हो रहा। इतना ही नहीं जनता TMC नेताओं को जूतों का हार पहना रही है, अंडे और टमाटर फेंक रही है। क्या वाकई वामपंथियों से लेकर ममता राज तक जनता इतनी दुखी थी? सारा विपक्ष खामोश? जिसको देखो अपनी पार्टी को बचाए रखने की कोशिश में लगा है।अपने-अपने नेताओं तक की फ़िक्र नहीं। अजीब तमाशा चल रहा है बंगाल में।
पश्चिम बंगाल पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने TMC नेता जहाँगीर खान को नेपाल बॉर्डर से गिरफ्तार कर लिया है। जहाँगीर खान फाल्टा विधानसभा सीट से TMC के उम्मीदवार थे लेकिन चुनाव के दौरान हुईं गड़बड़ियों के बाद फिर से मतदान हुआ था। इसके बाद यहाँ दोबारा मतदान हुआ और जहाँगीर खान ने मैदान छोड़ दिया था।
जहाँगीर खान को ममता बनर्जी के भतीजी और TMC के सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। जहाँगीर खान का यूपी के चर्चित IPS ऑफिसर अजयपाल शर्मा की चुनाव के दौरान तनातनी खूब चर्चा में रही थी। जहाँगीर खाने ने अजयपाल शर्मा को चुनौती देते हुए कहा था कि वो सिंघम हैं तो मैं पुष्पा हूँ झुकूँगा नहीं।
जहाँगीर के खिलाफ हत्या के प्रयास, जबरन वसूली और दंगा भड़काने समेत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज हैं। जहाँगीर के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी दर्ज है और ED उस मामले की जाँच कर रही है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने पुलिस के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए राज्य के सभी प्रशासनिक अधिकारियों को नकारा कह दिया। पहले उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस अफसरों की वफ़ादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी पक्ष के प्रति है। वो ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग इकॉनमी’ ध्यान में रखकर आचरण करते है।
जस्टिस दिवाकर को यह नहीं भूलना चाहिए कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले उत्तर प्रदेश की कितनी दुर्गति थी। अगर जस्टिस दिवाकर योगी से पहले और बाद के प्रदेश की तुलना नहीं कर सकते उनकी मंशा पर प्रश्न खड़ा हो सकता है।
लेखक चर्चित YouTuber
उसके बाद जस्टिस दिवाकर ने कहा कि “यह कड़वा सच है कि कई सरकारों में राज्य की प्रशासनिक मशीनरी राजनीतिक घुसपैठ का शिकार रही है। ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मेरिट के आधार पर न होकर राजनीतिक सरपरस्ती के औजार बन गए हैं। वफादार अफसरों को मलाईदार जिले इनाम में मिलते हैं, जबकि स्वतंत्रता से काम करने वाले अफसरों को महत्वहीन जगहों पर भेज दिया जाता है”। यह टिप्पणी करने से पहले जस्टिस दिवाकर को न्यायपालिका की कार्यशैली को भी देखना चाहिए था।
मामला गाजियाबाद के 3 व्यक्तियों पर लगे गैंगस्टर एक्ट का था जिसे जस्टिस दिवाकर ने निरस्त कर दिया। मुझे उन लोगों पर लगे गैंगस्टर एक्ट निरस्त करने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यह मान लेना कि वे प्रतिशोध की भावना से लगाए गए, यह भी उचित नहीं है।
आपने बिकरू कांड का जिक्र किया और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए जबकि उस कांड में मरने वाला विकास दुबे भी कोई शरीफजादा नहीं था और 8 पुलिसकर्मी भी बलिदान हो गए थे।
जस्टिस दिवाकर को एक कड़वा सच और भी स्वीकार करना चाहिए कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के 10 जजों ने मुख़्तार अंसारी की जमानत अर्जी सुनने से मना कर दिया था। उनकी वफ़ादारी किसके लिए थी, संविधान के प्रति या मुख़्तार अंसारी जैसे खूंखार अपराधी के प्रति? शायद जस्टिस दिवाकर के पास इसका जवाब नहीं होगा?
जिस जज दिनेश कुमार सिंह ने मुख़्तार अंसारी को 7 साल की सजा सुनाई, उसका कुछ दिन बाद कर्नाटक हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी एक दिन राहुल गांधी पर एफ आई आर के आदेश देते हैं और अगले दिन वापस ले लेते हैं और केस ही छोड़ देते हैं।
जस्टिस गोविन्द माथुर ने दंगाइयों के फोटो हज़रतगंज चौक पर लगाने से मना कर दिया और जस्टिस चंद्रचूड़ ने दंगाइयों से 275 करोड़ के नुकसान की भरपाई करने के लिए मना कर दिया।
उत्तर प्रदेश के पुलिस और कार्यपालिका के अधिकारियों का उत्तर प्रदेश की पिछले 9 साल में हुई प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान है जिसे जस्टिस दिवाकर ने प्रदेश के सभी अधिकारियों को एक लाठी से हांक कर भुला दिया। नेतृत्व योगी जी का है लेकिन उनकी योजनाओं का क्रियान्वयन तो अधिकारी ही करते है। आज प्रदेश माफिया और बाहुबलियों से मुक्त है। 9 साल में 293 अपराधी एनकाउंटर में मारे गए और अगर न मारे जाते तो उनके मुक़दमे 20-20 साल आपकी अदालतों में धक्के खाते।
प्रदेश ने चहुंओर प्रगति की है। 2016-17 में राज्य का जीडीपी 13.30 लाख करोड़ था जो अब 30.25 लाख करोड़ है। राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान 8.6% से बढ़ कर 9.5% हो गया है और राज्य देश में दूसरे नंबर की इकॉनमी है। निर्यात वैल्यू 88,000 करोड़ से बढ़कर 1.86 लाख करोड़ रुपए हो गई। टूरिज्म का रेवेनुए 11,000 करोड़ से बढ़ कर 70,000 करोड़ रूपए हो गया। इतना ही नहीं इंफ्रास्टचर में निवेश जो एक्सप्रेस वेज़, एयरपोर्ट्स, और आने वाले प्रोजेक्ट्स में होगा वह राज्य की इकॉनमी को एक ट्रिलियन डॉलर की तरफ ले जा रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल भी प्रदेश में बन रही है।
दौड़ते घोड़े को चाबुक मारना ठीक नहीं है। एक साधु योगी ने प्रदेश का कायापलट कर दिया। एक दो मामलों की वजह से पूरी कार्यपालिका के अधिकारियों पर कलंक लगाना उचित नहीं है।
TMC के 20 लोकसभा सांसदों ने NDA में शामिल होने के लिए स्पीकर को पत्र लिखा (साभार : X_@Sachingupta) तृणमूल कांग्रेस(TMC) को बहुत बड़ा झटका लगा है। पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत कर दी है। इन बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक पत्र लिखा है। पत्र में सांसदों ने NDA में शामिल होने की इच्छा जताई है।
सांसदों ने संसद में अपने लिए अलग बैठने की जगह माँगी है। इस नए बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार होंगी। इससे पहले TMC के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय भी अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।
यह बड़ी टूट तब हुई जब ममता बनर्जी दिल्ली में ‘INDI’ गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुँची थीं। तभी उनके सांसद केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर जुट गए। पश्चिम बंगाल चुनाव में TMC की हार के बाद से ही पार्टी में कलह मची थी। अब सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजकर नई मान्यता माँगी है।
पारसी महिला का सनातनियों ने किया अंतिम संस्कार (साभार-इंडियन एक्सप्रेस) मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।
हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।
मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।
द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।
दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।
पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।
लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।
कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।
शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।
महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।
मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”
दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।
भारत में कैसे आए पारसी
लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।
कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी
पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।
पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।
बंगाल में TMC नेता साड़ियों के ढेर में छिपा(बाएँ), TMC नेता के घर में मिला तिरपाल का ढेर(दाएँ) 60 के दशक में गायक मौहम्मद रफ़ी का बहुचर्चित गीत "रात भर का है मेहमां अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा....." है, सनातन विरोधियों को इस गीत को जरूर सुनना ही सबको सुनाना भी चाहिए। पीछे एक ब्लॉग में लिखा था कि बंगाल विधानसभा चुनाव सिर्फ चुनाव ही बल्कि भारतीय राजनीति का नया सवेरा है, जिसे सियासतखोरों ने सियासत नाम दे दिया। अपनी आने वाली भावी पीढ़ियों के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण कर जो तिजोरियों भर रहे हो, देख लो बंगाल में क्या हो रहा है? अत्याचार की भी एक सीमा होती है और जब टूटती है कोई नहीं बचता।
बहुत जल्दी ममता बनर्जी और इसकी पार्टी अत्याचारों के ढेर में दब जाएगी। बंगाल में सनातन पर हमलों की पराकाष्ठा हो चुकी थी। घुसपैठियों को दामाद बनाकर पाला जा रहा था। वो भी भाग रहे हैं। हैरानी तो उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं पर होती है जो समाजवादी पार्टी को वोट देते हैं। समाजवादी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का ही दूसरा नाम है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 11 बजे के बाद खासकर अगर होली वाले दिन शुक्रवार है होली खेलने पर पाबन्दी थी। 84 कोसी परिक्रमा पर अड़चने डाली जाती थी। जबसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आयी है ये सब अड़चनें समाप्त हो गयी। फिर भी पता नहीं क्यों हिन्दू समाजवादी पार्टी को वोट देता है?
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) का ‘जंगलराज’ सामने आ रहा है। TMC के काले कारनामे सामने आने के बाद जनता का गुस्सा भी फूट रहा है। ऐसा गुस्सा कि कहीं TMC नेता पर अंडे फेंके जा रहे हैं, तो कहीं जनता के गुस्से से बचने के लिए नेता साड़ियों के ढेर में छिपे हुए हैं।
एक मामले में उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी में TMC विधायक मदन मित्रा की कार को घेरकर लोगों ने अंडे और ईंटे फेंकी गई। ऐसे ही कोलकाता नगर निगम में पार्षद बप्पादित्य दासगुप्ता पर कोर्ट में पेशी के दौरान अंडे फेंके गए। दासगुप्ता को जबरन वसूली के आरोप में शनिवार (06 जून 2026) को गिरफ्तार किया गया था।
एक अन्य मामले में हावड़ा जिले के TMC नेता ब्रह्मानंद चक्रवर्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह साड़ियों के ढेर के भीतर छिपे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, चक्रवर्ती पर सरकारी योजना के नाम पर लोगों से कटमनी लेने के आरोप हैं। पुलिस के डर से वह साड़ियों के ढेर में छिप गए। हालाँकि, इसके बावजूद पुलिस चक्रवर्ती को ढूँढकर अपने साथ गिरफ्तार करके ले गई।
हावड़ा में TMC नेता कपड़ों के ढेर के नीचे छिपा पाया गया। वायरल वीडियो में दिख रहे व्यक्ति की पहचान ब्रह्मानंद चक्रवर्ती के तौर पर हुई है, जो स्थानीय तृणमूल नेता है। इसपर हाउसिंग स्कीम के लिए आवंटित फंड से 'कट मनी' लेने का आरोप है।#TMC#WestBengal#CutMoney#ZeeNewspic.twitter.com/rBd55ltlfu
उधर, TMC नेता के बंद घर का ताला तोड़कर स्थानीय लोगों ने जमा करके रखे गए लगभग 50 हजार तिरपाल बरामद किए। यह सरकारी राहत सामग्री जनता को पहुँचानी थी, लेकिन TMC नेताओं ने अपनी संपत्ति समझकर रखी हुई थी। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक घर में फर्श से छत तक केवल तिरपाल के ढेर नजर आ रहे हैं। बताया गया कि यह बंद घर TMC नेता राजू बाग और उनके भाई बीजू बाग का है। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से ही दोनों भाई फरार चल रहे हैं।
यह कोई गिनी-चुनी घटनाएँ नहीं हैं। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं। जहाँ कटमनी का पैसा खाकर बैठे TMC नेता कहीं बिस्तर के नीचे छिपे पाए गए, तो कहीं लोगों ने गुस्से में आकर TMC नेता के करीबी को ही कूट दिया। इसके अलावा TMC नेता पर रिश्वत और जमाखोरी के मामलों में भी लगातार शिकंजा कसा जा रहा है।
FBI ने ISIS के 3 अमेरिकी आतंकियों को गिरफ्तार किया (फोटो साभार : cbs8 & nbcnews) अमेरिका में FBI ने बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए 3 अमेरिकी आतंकियों को गिरफ्तार किया है। ये तीनों आतंकी संगठन ISIS की मदद करने और अमेरिका में बड़े हमलों की साजिश रच रहे थे। इनमें से एक आरोपित का इरादा 30 करोड़ अमेरिकियों को जान से मारने और एक महिला सैनिक का सिर काटने का था।
FBI ने कंसास और कैलिफोर्निया में एक साथ मिलकर काम किया। उन्होंने शुक्रवार (5 जून) की सुबह तीन जगहों पर छापे मारे। इसके बाद बिसाम गफूर, इलियास शमसाल्दीन और बेरीन जाये नाम के तीन आतंकियों को धर दबोचा। इनकी उम्र 21 से 25 साल के बीच है।
क्या थी इनकी खतरनाक प्लानिंग?
ये तीनों आपस में बातचीत करने के लिए ‘डिस्कॉर्ड’ और दूसरे मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल करते थे। यह बातचीत फरवरी 2025 से जून 2026 तक चली। इन्होंने ISIS के लिए वफादारी की कसम खाई थी। ये आतंकी अमेरिका के सैनिकों पर हमला करना चाहते थे।
इन आतंकियों ने ISIS के एक सदस्य को 2000 डॉलर (1,90,571 रूपए) से ज्यादा भेजे थे। वे क्रिप्टोकरेंसी के जरिए पैसा जुटा रहे थे। इस पैसे से वे रॉकेट और ड्रोन खरीदना चाहते थे। आरोपित बिसाम चाहता था कि अमेरिकी लोगों पर हमला करने वाले ड्रोन पर उसका नाम लिखा जाए। वहीं बेरीन अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज को निशाना बनाना चाहता था।
महिला सैनिक का सिर काटने की थी चाहत
आरोपित बिसाम गफूर ने चैट में कहा था कि वह हमेशा से एक महिला सैनिक का सिट काटना चाहता था। बिसाम गफूर ने यह भी लिखा कि वह 30 करोड़ अमेरिकियों को मारना चाहता है। वहीं इलियास शमसाल्दीन नाम का आरोपित अमेरिकी सैनिकों को चाकू घोंपना चाहता था। ये तीनों विदेश जाकर ISIS के लिए मरने को भी तैयार थे।
इस कामयाबी पर अमेरिकी अधिकारियों ने बड़ी बात कही है। कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने कहा कि सरकार ने आतंकवादियों और गैंगस्टरों को साफ चेतावनी दे दी है। वहीं FBI डायरेक्टर काश पटेल ने कहा कि इन लोगों ने हमले की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन FBI ने समय रहते इन्हें दबोच लिया।
मुख्यमंत्री रहते जो ममता बनर्जी प्रधानमंत्री हो, महामहिम हो या फिर राज्यपाल किसी को कुछ नहीं समझती थी। बंगाल में ममता की हिटलरशाही चलती थी, लेकिन कालचक्र ऐसा घुमा चुनाव में चारों खाने चित होते ही तृणमूल कांग्रेस ही टूटने के कगार पर पहुँच गयी। खूब सनातन को अपमानित करने के साथ-साथ हिन्दुओं पर जानलेवा हमले और महिलाओं के बलात्कार पर चुप्पी साध लेने वाली ममता को बेचारी भी नहीं बोल रहा। संसद जाने के लिए युसूफ खान को सीट छोड़ने के लिए बोला उसने मना कर दिया यानि अब पार्टी में ही ममता की कोई नहीं सुन रहा। जिस तरह कांग्रेस में परिवार के चापलूस बचे हैं वही हालत तृणमूल कांग्रेस की है। इतना ही नहीं INDI गठबंधन को कमजोर करने में ममता ही का हाथ है। अगर नीतीश कुमार को गठबंधन का convener बनने देती शायद गठबंधन बीजेपी को टक्कर देने लायक होता लेकिन तानाशाह बनी ममता ने ऐसा नहीं होने दिया। लेकिन आज INDI गठबंधन के आगे माथा टेकने को मजबूर है। अब शायद वामपंथी अकेली और असहाय ममता को किसी उच्च पद पर आने से रोक सकता है।
लेखक चर्चित YouTuber
जून 5 को ममता बनर्जी की सांसदों और विधायकों की बुलाई गई बैठक में मात्र 6 सांसद और 8 विधायक पहुंचे जबकि 58 विधायकों ने अलग पार्टी बना ली और उनका नेता ऋतब्रत बनर्जी विपक्ष का नेता बन गया।
ममता बनर्जी की TMC के 13 सांसद राज्यसभा में हैं और 28 लोकसभा में हैं।
जो 6 सांसद पहुंचे बैठक उनमें से 4 लोकसभा के 2 राज्यसभा के थे जिनके नाम है -
-अभिषेक बनर्जी (लोकसभा)
-सुदीप बंदोपाध्याय (लोकसभा)
-कल्याण बनर्जी (लोकसभा) और
-माला रॉय (लोकसभा)
-डेरेक ओ ब्रायन (राज्यसभा) और
-डोला सेन (राज्यसभा)
मजे की बात है सबसे बड़े बड़बोले और मोदी विरोध में अंधे हो रखे शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, महुआ मोइत्रा, सायानी घोष और सौगात रॉय भी नहीं गए ममता की बैठक में। महुआ मोइत्रा तो मोदी विरोधी होने साथ साथ घोर हिंदू विरोधी भी है जो अक्सर हिंदू देवी देवताओं का अपमान करती रहती है। इसके अलावा सायानी घोष की तो करतूत शिवलिंग का अपमान करने के लिए घोर निंदनीय थी।
यानी लोकसभा के 28 में 24 और राज्यसभा के 13 में 11 सांसद गायब होने का मतलब है TMC की टूट दीवारों पर लिखी नज़र आ रही है। दोनों सदनों में गायब होने वालों सांसदों की संख्या दो तिहाई से ज्यादा है और वो अगर TMC से अलग होते हैं तो दल बदल विरोधी क़ानून लागू नहीं होगा, जैसे “आप पार्टी” के 10 में से 7 सदस्यों के अलग होने से उन पर वह कानून लागू नहीं हुआ।
विधानसभा में 58 विधायकों के अलग होने का मतलब है कि TMC के सारे 32 मुस्लिम विधायक भी ममता के साथ नहीं रहे। 17 मुस्लिम विधायक तो ऋतब्रत बनर्जी के साथ चले गए जिसका मतलब है बाकी 20 विधायकों में ममता के साथ 15 मुस्लिम विधायक हैं और 5 ही हिंदू हैं।
कभी ममता के विश्वसनीय रहे सौमित्र खान (जो अब भाजपा सांसद हैं) का कहना है कि TMC के लोकसभा के 20 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि अगर TMC के सांसद लोकसभा और राज्यसभा में TMC से अलग होते हैं तो उन्हें भाजपा में शामिल नहीं करना चाहिए। मेरा मानना है कि उन्हें भाजपा में शामिल कर लेना चाहिए क्योंकि वो फिर भाजपा से टूट कर अलग नहीं हो सकेंगे क्योंकि वो किसी हाल में दो तिहाई सांसद नहीं हो सकेंगे जैसे “आप पार्टी” के 7 सदस्य अब भाजपा से इसलिए ही अलग नहीं हो सकते। राज्यसभा वाले अगर भाजपा छोड़ते भी हैं तो वो कहीं से भी राज्यसभा में नहीं आ सकते।
एक बात जरूर है कि सौगात रॉय को छोड़ कर शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, महुआ मोइत्रा और सायानी घोष को किसी हाल में भाजपा में नहीं लेना चाहिए क्योंकि इन लोगों ने जो मोदी के लिए जो आग ऊगली है, उसे नहीं भुलाया नहीं जा सकता।
जापान के अवैध मस्जिद के उदघाटन में पहुँचा पाकिस्तान (फोटो साभार-NDTV)
पाकिस्तान ने जापान में मस्जिद का उद्घाटन किया। इसे जापान ने गैर-कानूनी कहा और ध्वस्त करने का आदेश दिया। जापान में बढ़ रही मुस्लिम आबादी, डेमोग्राफी में बदलाव, सार्वजनिक नमाज और कब्रिस्तान की बढ़ती माँग, जन्मदर में कमी और मस्जिदों की बढ़ती संख्या के बीच इस मुद्दे ने इसलिए ध्यान खींचा है, क्योंकि जापान में पाकिस्तान के राजदूत अब्दुल हमीद इस साल की शुरुआत में मस्जिद के उद्घाटन में शामिल हुए थे।
क्या है कोवागो विवाद
कावागो में गैरकानूनी तरीके से मस्जिद बनाई गई थी, जिसके खिलाफ स्थानीय लोगों ने आवाज भी बुलंद की थी। ‘जापान जामे मस्जिद रमजान’ नाम की यह मस्जिद 4500 स्क्वेयर मीटर के प्लॉट पर बनी है, जिसे पहाड़ पर मौजूद ‘वनभूमि’ माना जाता है। यह साइट अर्बनाइजेशन कंट्रोल एरिया में आती है, जहाँ लोकल अधिकारियों से इजाजत लिए बिना कंस्ट्रक्शन पर आम तौर पर रोक होती है।
द असाही शिंबुन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रॉपर्टी रिकॉर्ड से पता चलता है कि मार्च 2025 में जमीन का मालिकाना हक बदला गया। पहले यह फुजीमी की एक रियल एस्टेट कंपनी की थी, जिसे कावागो पर रजिस्टर्ड एक फर्म को दे दी गई। कावागो शहर के अधिकारियों ने कहा कि मस्जिद जरूरी मंजूरी के बिना बनाई गई थी। यहाँ 2000 में एक फैक्ट्री बनी थी, 2007 में इसका मालिकाना हक बदल गया था और रियल एस्ट्रेट कॉर्पोरेशन बन गया। इसके बाद 2025 में स्थिति में बदलाव आया, लेकिन मस्जिद बनाने की अनुमति यहाँ नहीं थी।
जापान में सिटी प्लानिंग एक्ट के तहत बिल्डिंग बनाने पर सख्त पाबंदियाँ हैं। हालाँकि, जैसा कि दुनिया भर के इस्लामिस्टों के साथ होता है, इस्लामी विस्तार और कब्जे के मामलों में उनके लिए स्थानीय कानूनों का कोई मतलब नहीं होता है। मस्जिद को एक पाकिस्तानी कंपनी की जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया था। जापानी मीडिया की रिपोर्ट है कि रियल एस्टेट रजिस्ट्री ने उस जमीन को ‘वन भूमि’ बताया है।
अक्टूबर 2024 में स्थानीय निवासियों ने लगभग पूरी हो चुकी मस्जिद के ढाँचे का विरोध किया। शहर के प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार काम रोकने के आदेश जारी किए। लेकिन, मुस्लिम समुदाय ने बात नहीं मानी और कंस्ट्रक्शन का काम जारी रखा। शुरुआत में कहा जाता है कि मजदूरों ने कहा कि वे जापानी भाषा नहीं समझ सकते, इसलिए काम नहीं रोका। चाहे जो भी हो मस्जिद बनकर तैयार भी हो गई और इस मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तान के राजदूत भी शामिल हुए, जिसके बाद मामला और अधिक चर्चित हो गया। बाद में पाकिस्तान दूतावास को सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।
पाकिस्तान दूतावास ने जापानी कानून मानने की सलाह दी
जापान स्थित पाकिस्तान दूतावास ने बयान जारी कर कहा कि जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों को जापानी कानूनों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। मस्जिद या मदरसे का निर्माण स्थानीय प्रशासन से आवश्यक अनुमति लेने के बाद ही किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी दूतावास का उन परियोजनाओं से कोई संबंध नहीं है, जो स्थानीय कानूनों का पालन नहीं करती।
इसमें कहा गया है कि कावागो की मस्जिद के उद्घाटन में राजदूत इसलिए गए थे, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि कानून के मुताबिक जरूरी अनुमति ले ली गई है। इसमें कहा गया कि पाकिस्तानी समुदाय को स्थानीय निवासियों और प्रशासन के साथ पारदर्शिता रखनी चाहिए और अधिकारियों के साथ सहयोग करना चाहिए।
(साभार-एक्स)
पाकिस्तानी एम्बेसी ने कहा, “ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए कानूनी नियमों के पालन से जुड़ी जानकारी जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों और आस-पास के लोगों के साथ ट्रांसपेरेंट तरीके से शेयर की जानी चाहिए। इसके अलावा, प्लानिंग के दौरान और उसके बाद भी, हर हाल में जापानी कानूनों और नियमों का पालन किया जाना चाहिए।”
(साभार-एक्स)
कावागो जापान का पहला मामला नहीं है। इससे पहले मई 2026 में फुजिसावा शहर में एक मस्जिद बनाने को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। 440000 लोगों वाले इस शहर में मुस्लिम आबादी में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। जिस मस्जिद की बात हो रही है, उसे एक श्रीलंकाई बिजनेसमैन मोहम्मद खलील ने बनाया था। उसका कहना था कि वह एक मस्जिद बनाना चाहते हैं, क्योंकि 20 किलोमीटर दूर एबिना मस्जिद फुजिसावा में बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए काफी नहीं है।
खास बात यह है कि खलील भी 2021 में फुजिसावा के उत्तरी बाहरी इलाके में एक बंद पड़ी फैक्ट्री की 980-स्क्वायर मीटर की जगह पर ही बस गए थे। उन्होंने फटाफट फुजिसावा मस्जिद NPO बनाया। पैसे जमा किए और जमीन खरीदी और मस्जिद बनाने के लिए मंजूरी ले ली।
ये इतनी तेजी से हुआ कि 4 साल के अंदर ही एक मस्जिद बना दी। जापानी भी इससे परेशान हैं कि कैसे मुस्लिम इमिग्रेंट्स पूरे जापान में अपनी धार्मिक पहचान बढ़ा रहे हैं। ये बता रहे हैं कि जानबूझकर साजिश के तहत ये किया जा रहा है। एक तरफ तो बड़ी संख्या में प्रवासी मुस्लिम यहाँ आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का ब्रेनवॉश करके उन्हें इस्लाम कबूल करवाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर भी जापानियों ने अपनी बात रखी है। इनका कहना है कि तब्लीगी जमात से संबंध रखने वाले इस अवैध मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद का शामिल होना ये बताता है कि इसे पाकिस्तानी शासन का समर्थन है।
सोशल मीडिया पर जापानियों का विरोध
सोशल मीडिया पर कई जापानी लोगों ने इस्लामी संगठन तब्लीगी जमात से कथित संबंध वाले मस्जिद के उद्घाटन समारोह में शामिल होने वाले पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद पर गुस्सा हुए।
एक्स पर उन्होंने लिखा, “जापानी भाषा के बयान के 12 घंटे बाद उर्दू में एक बयान पोस्ट किया गया। भले ही राजदूत इस बात से अनजान थे कि यह अवैध है। बात यह है कि उन्होंने इस मस्जिद के उद्घाटन समारोह में भाग लिया, जहाँ सऊदी अरब जैसे देशों द्वारा प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तबलीगी जमात’ से जुड़े लोग भी आते-जाते हैं। राजदूत को तो सतर्क रहना ही चाहिए था, इतना बिजी रहने के बावजूद भी वो इसमें क्यों शामिल हुए? क्या वह केवल इस बात से खुश थे कि जापान में मस्जिदें बढ़ रही हैं? क्या वह जापान के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला इसे मान रहे थे?”
एक और जापानी यूजर ने लिखा कि हो सकता है इस मस्जिद को पाकिस्तानी मदद मिल रही हो। इसे जापान के बारे में जानकारी इक्ट्ठा कर चीन को देने के मिशन पर लगाया गया हो। मीडिया में इस एंगल से रिपोर्टिंग क्यों नहीं हो रही है।
जापानी X यूजर ने लिखा, “साइतामा प्रीफेक्चर, कावागो सिटी, ओजा शिमोशिमोआकासाका, जहाँ कावागो सिटी में एक गैर-कानूनी तरीके से बनी मस्जिद है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि यह मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के इन्फॉर्मेशन हेडक्वार्टर ओई रेडियो स्टेशन के पास है। स्पेशल ऑब्जर्वेशन जोन को ‘इम्पॉर्टेंट लैंड सर्वे एक्ट’ के तहत बनाया गया है, ताकि जरूरी सिक्योरिटी सुविधाओं के काम में रुकावट डालने वालों को रोका सके।”
पाकिस्तानी फर्जी फुटबॉल टीम भी पहुँच गई थी जापान
पाकिस्तानी अवैध तरीके से जापान जाने के लिए भी जाने जाते हैं। हाल ही में पाकिस्तान की फर्जी फुटबॉल टीम जापान पहुँच गई थी। इसके लिए बाकायदा फर्जी फुटबॉल क्लब बनाया गया, जिसे पाकिस्तानी फुटबॉल एसोसिएशन से संबद्ध दिखाया गया। जापान पहुँचे पाकिस्तानियों से 40-40 लाख लिए गए थे।
जापान पहुँचने पर एयरपोर्ट पर इनका फर्जीवाड़ा सामने आ गया और पाकिस्तानी दूतावास से बात कर इन लोगों को वापस भेजा गया। इसी तरह 2024 में 17 पाकिस्तानियों को जापानी क्लब बोविस्टा एफसी के फर्जी आमंत्रण पत्र के जरिए जापान भेजा गया था। 15 दिनों का वीजा था, लेकिन ये लोग जापान जाकर आज तक वापस नहीं लौटे।
15 सालों में 4 गुणा बढ़ी मुस्लिम आबादी, 149 बने मस्जिद
ये सिर्फ एक शहर की बात नहीं है जापान में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।
मुस्लिमों की बढ़ी आबादी मजदूरी करती है। इसके अलावा बिजनेस, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ लोग योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे में सामने आया कि देश में इनकी जनसंख्या 200000 से ज्यादा है।
मार्च 2021 तक यहाँ 113 मस्जिद बन चुके थे, जो 1999 में मात्र 15 थे। 2024 की बात करें तो यहाँ मस्जिदों की संख्या 149 हो गई थी, जो एक साल बाद यानी 2025 में 164 हो गई। इनमें से कई मस्जिदें बहुमंजिला हैं।
2024 के आखिर तक, जापानी मीडिया और रिसर्चर्स ने अंदाजा लगाया कि देश में विदेशी मुसलमानों की संख्या 360000 थी, जबकि मुसलमानों की कुल संख्या लगभग 420000 थी। इनमें करीब 55000 जापानी लोगों ने इस्लाम कबूला था। 2010-2020 के बीच ऐसे इस्लामी जापानियों की संख्या 110000 से बढ़कर 230000 हो गई। आसान शब्दों में कहें तो, जापान में मुस्लिम आबादी सिर्फ 15 से 20 सालों में चार गुना बढ़ गई है।
जापान में घटती आबादी और बढ़ता ‘इस्लाम’
जापान इन दिनों आबादी में कमी की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ दुनिया में सबसे कम फर्टिलिटी रेट है और जन्म दर में रिकॉर्ड-कमी आई है। जापान का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 2024 में घटकर 1:15 हो गया, जो लगातार नौवें साल गिरावट का संकेत है। 2023 में यह 1.0 से नीचे चला गया था।
जापानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी डेटा का हवाला देते हुए, जापान में 2025 में 705,809 जन्म दर्ज किए गए, जो 2024 में लगभग 721000 से कम है। कुल मिलाकर जापान दशकों से कम जन्मदर की वजह से ‘बूढा’ होता जा रहा है।
इस संकट की वजह से मजदूरों की हर क्षेत्र में कमी हो गई है, जिसका असर इकोनॉमिक ग्रोथ और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पड़ रहा है।
गाँवों से आबादी कम होने, स्कूल बंद होने और यहाँ तक कि ‘घोस्ट टाउन’ या ‘मरते हुए गाँव’ बनने की भी खबरें आई हैं। इन इलाकों में बूढ़ी होती आबादी की वजह से वीरान होते जा रहे हैं। कई इंडस्ट्रियल हब पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं।
जापानी सरकार कई फाइनेंशियल इंसेंटिव स्कीम देकर नौजवानों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। वर्क-लाइफ रिफॉर्म किया जा रहा है, लेकिन देर से शादियाँ, बच्चों को पालने का बढ़ता खर्च और आर्थिक अनिश्चितताओं की वजह से उत्साहजनकर परिणाम नहीं आए हैं।
साफ है, जापान की घटती आबादी इस्लामिक माइग्रेंट्स के लिए काफी फायदेमंद है। मजदूरों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों से लाया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम हैं। बहुत सारे मुस्लिम जापान की इमिग्रेशन पॉलिसी का फायदा उठाकर वहीं बसते जा रहे हैं।
ऐसी खबरें आई हैं कि मुस्लिम माइग्रेंट वर्कर इस्लाम का प्रचार कर रहे हैं, जापानी लोकल लोगों का धर्म बदल रहे हैं, स्थानीय लोगों से निकाह कर रहे हैं, ताकि इस्लाम को फैला सके और अपनी आबादी बढ़ा सकें।
दुनिया के कई देश जूझ रहे हैं इस्लामी संकट से
मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि इस्लाम का फैलाव और काफिरों या गैर-इस्लामिक लोगों का धर्मांतरण करना उनका ‘इस्लामी फर्ज’ है। पहले युद्ध के जरिए जीत कर इस्लाम को बढ़ाया करते थे, अब बहलाकर, फुसलाकर, लालच देकर या धमकी देकर ये काम करते हैं। इसके लिए दूसरे देशों में बसना भी पड़े तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इनका ‘मिशन’ चलता रहता है।
एक धर्मनिरपेक्ष देश जापान में शिंटो-बौद्ध परंपराएँ मानने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। यहाँ दाह संस्कार की परंपरा है। शवों को दफनाने और कब्रिस्तान को लेकर यहाँ हंगामा भी हुआ है, क्योंकि इस्लामिक परंपरा लोकल जापानियों की परंपरा से मेल नहीं खाती है। लेकिन, मुस्लिम कट्टरपंथियों को लोकल कल्चर को अपनाना और उसका सम्मान तो कभी आया ही नहीं।
इस्लामी कट्टरपंथियों का एक पैटर्न है, पहले कुछ मुस्लिम आबादी को बसाओ, आसपास वैध-अवैध तरीके से मस्जिद बनाओ और फिर आबादी बढ़ा बढ़ा कर सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने लगो और स्थानीय लोगों पर अपना दबदबा बनाने लगो और धर्मांतरण के लिए सारे साम-दाम- दंड-भेद अपनाओ।
इन लोगों को लोकल कानूनों को तोड़ने और इस्लामी दबदबा बनाने के लिए नियम कानून तोड़ने में कोई हिचक नहीं होती। यही काम इन लोगों ने यूरोप में भी किया है। यूरोप के विकसित सहिष्णु देशों के कानून का फायदा उठाकर वहाँ पहुँचे और धीरे-धीरे अपना दावा करने लगे।
यूरोप में अपराध काफी बढ़ गए हैं। अपने रीति-रिवाज और परंपरा को ये लोग उन पर थोप रहे हैं और लगातार खूनखराब, आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। यही वजह है कि अनुमान लगाया गया है कि अगले 200 सालों में 6 यूरोपीय देशों- फ्रांस, बेल्जियम, बुल्गारिया,साइप्रस,स्वीडन और ब्रिटेन इस्लाम बहुल देश हो जाएगा।
मौलाना तौकीर रजा खान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य आरोपित और साजिशकर्ता मौलाना तौकीर रजा खान को बड़ा झटका देते हुए उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता और आरोपित के आपराधिक इतिहास को देखते हुए उसे राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने शुक्रवार (5 जून 2026) को यह कड़ा आदेश पारित किया। जो इस मौलाना के लिए बहुत जरुरी भी था।
हाईकोर्ट ने जमानत याचिका नामंजूर करते हुए सख्त टिप्पणी की कि आरोपित को जेल से बाहर भेजने पर समाज की शांति को खतरा पैदा हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आवेदक(तौकीर रजा) ने एक सार्वजनिक सभा में मुस्लिम समुदाय के कई युवाओं को इस्लामिया इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने के लिए उकसाया था। गवाहों के बयान और वीडियो क्लिप से ये संकेत मिलता है कि तौकीर रजा खान ने भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को इकट्ठा होने के लिए प्रेरित किया। भीड़ द्वारा किए गए अपराध के लिए मुख्य साजिशकर्ता होने के नाते खान पूरी तरह जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनके द्वारा भड़काने के बाद ही भीड़ ने कानून-व्यवस्था हाथ में ली।
सुनवाई के दौरान अदालत ने उस समय लगी पाबंदियों और उपद्रवियों के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 163(पूर्व में धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद आरोपित के उकसावे में आकर भारी भीड़ सड़कों पर उतरी।
अदालत ने भीड़ द्वारा लगाए गए विवादित नारों को देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। जज ने आदेश में लिखा, “भीड़ द्वारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ जैसे विवादित नारे लगाना देश के कानून की सत्ता के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को एक सीधी चुनौती है। ये कृत्य सीधे तौर पर एक सशस्त्र विद्रोह की अपील करता है। इस तरह की हिंसक और भड़काऊ नारेबाजी करना न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है, बल्कि ये कृत्य इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों और शिक्षाओं के भी पूरी तरह खिलाफ है।”
जमानत याचिका खारिज करने का मुख्य आधार तौकीर रजा के पुराने रिकॉर्ड को बनाया गया। कोर्ट ने कहा, “तौकीर रजा खान का इसी तरह के मामलों में एक लंबा और विस्तृत आपराधिक इतिहास रहा है। ऐसे में इस बात का बड़ा जोखिम है कि यदि उन्हें जमानत पर रिहा किया गया, तो वो फिर से एक विशेष समुदाय को भड़का सकते हैं और समाज की शांति व सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं।”
यह पूरा मामला पिछले साल 26 सितंबर 2025 को दर्ज पुलिस एफआईआर से जुड़ा है। आरोप है कि तौकीर रजा ने प्रशासन के कड़े प्रतिबंधों को दरकिनार कर मुस्लिमों को बरेली के इस्लामिया इंटर कॉलेज में एकत्र होने का आह्वान किया था। इसके बाद करीब 200 से 250 लोगों की उग्र इस्लामी भीड़ हाथों में भड़काऊ बोर्ड लेकर मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की तरफ बढ़ने लगी।
जब मौके पर तैनात पुलिस टीम ने उग्र हो रही भीड़ को समझाने और आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया, तो उपद्रवी हिंसक हो गए। भीड़ ने पुलिस टीम को निशाना बनाते हुए उन पर ईंट-पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब (एसिड) की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं।
सरकार को उपद्रवियों के सरगनाओं पर कार्यवाही करने के साथ-साथ एसिड, पेट्रोल और पत्थर सप्लाई करने वालों पर भी कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं इन दंगाइयों को समर्थन में victim card खेल बचाने वालों पर नकेल जरुरी है।
इस भयानक हिंसा और पथराव के दौरान उपद्रवियों ने कई राउंड फायरिंग भी की और पुलिसकर्मियों के कपड़े तक फाड़ दिए। इस हिंसक टकराव में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया था। अदालत ने इन सभी तथ्यों को बेहद संगीन माना।
साभार : ऑपइंडिया कल(6 जून) को कॉकरोच जनता पार्टी ने दिखा दिया कि रात के अँधेरे में वह कहाँ जा रहा है, तो तेज सूरज की तपिश में उससे कोई उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी। नेपाल जैसा उपद्रव करने के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर इसके आका भी सिर पकड़ कर बैठ गए होंगे। कई उपद्रवियों को तो शिक्षा मंत्री तक नाम नहीं पता जिसका इस्तीफा मांग रहे थे। सोशल मीडिया पर कई वीडियो देखने को मिले जहाँ मोदी और योगी तक का पद नहीं बता पाए।
कई लोगों तो यह तक नहीं मालूम कि 'यहाँ आये किस लिए हैं?' यानि अगर किसी वजह से उपद्रव हो गया होता तो अरविन्द केजरीवाल और INDI गठबंधन की बल्ले-बल्ले हो गयी होती। लेकिन विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके तो तेज गर्मी की पहले ही भाग खड़ा हुआ था या विरोधियों की तैयारी से ये तो वही जानता है। लेकिन कोई उपद्रव नहीं होने पर इनके आकाओं के अरमानों पर पानी जरूर फिर गया।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी इस कथित पार्टी के सदस्यों यानी ‘कॉकरोचों’ को प्रदर्शन के लिए बुलाया था। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उनका साथ देने वाले कॉकरोचों की संख्या उनकी उम्मीदों को तोड़ने वाली रही।
अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों से बड़ी से बड़ी संख्या में जुटने का आह्वान किया था लेकिन आह्वान का असर केवल कुछ कॉकरोचों पर ही पड़ा। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाली इस CJP के प्रदर्शन में बमुश्किल कुछ सौ लोग ही पहुँचे। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है इसमें शामिल होने वाले कॉकरोचों को देखकर भी साफ समझा जा सकता था कि इनकी मंशा केवल हिंसा फैलाना, सुर्खियाँ बटोरना, सरकार और भारतीय संस्कृति को बदनाम करना था।
🚨 SHOCKING VIDEO FROM JANTAR MANTAR
FEMALE REPORTER : "Why you are raising slogans in supoort of Umar Khalid? This protest was meant to focus on students and examinations?" 😳
कोई कॉकरोच यहाँ हिंदू देवी-देवता का अपमान कर रहा तो कोई अपनी पर्सनल डायरी को संविधान बता रहा। किसी को तिरंगे के सम्मान से कोई लेना-देना नहीं तो कोई डफली बजाते हुए आजादी-आजादी चिल्ला रहा और इनका कहना था कि ये छात्रों के भविष्य के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे, ये कॉकरोच जिनके पास ना तो ज्ञान है और ना ही तमीज।
This is an extremely serious matter.
This is a Marxist leader, Neha.
She works for the French government-funded France 24. It means the French government is funding professional protesters.
— Office Of Vijay Patel (@VijayGajeraO) June 6, 2026
यह आरोप कोई हमारा मनगढ़ंत नहीं है बल्कि ऑपइंडिया को इसके प्रमाण भी मिले हैं। पहली बात तो ये सामने आई कि प्रोटेस्ट के नाम पर शोर मचाने वाले ये कॉकरोच असल में ना तो कोई छात्र हैं और ना ही पढ़ाई या किसी तरह की परीक्षा से इनका कोई लेना-देना है और इसका प्रमाण इन्होंने खुद ही दे दिया ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगाकर।
वायरल वीडियो अब तक आपने भी देख लिए होंगे और अगर नहीं देखें तो ऑपइंडिया के इन वीडियोज को देंखे, जिसमें ये अबर्न नक्सली डफली बजाते हुए ‘आजादी-आजादी’ चिल्ला रहे।
कॉकरोच बन गए वामपंथी डफली गैंग, लगा रहे आजादी के नारे
जंतर मंतर पहुँचे कम्युनिस्ट छात्र संगठन, शुरू किया उमर ख़ालिद टाइप प्रदर्शन
वीडियो में दिख रहे ये लोग चिल्ला रहे, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी।” अब आप सोचिए कि इसका पेपर लीक से क्या लेना देना है भला?
यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को हिंसक बना दिया था।
इसके अलावा साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई।
मकसद भी नहीं बता पा रहे अभिजीत के कॉकरोच, तिरंगे के अपमान का वीडियो आया सामने
CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएँ। उनके कॉकरोचों यानी समर्थकों ने ये बात मानी भी लेकिन शायज आशुतोष उन्हें ये बताना भूल गए कि तिरंगे को हर भारतीय, हर देशभक्त सम्मान की दृष्टि से देखता है।
ऑपइंडिया ने इसकी पुष्टि कर रही ऐसी ही एक घटना को कैप्चर भी किया है, जिसमें प्रदर्शन करने पहुँचे कॉकरोच तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसको अपने देश से प्रेम हो वो ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। साफ समझ आ रहा कि ये हरकते भारत को बदनाम करने की वामपंथियों की केवल एक साजिश है।
जंतर-मंतर पर CJP के मंच से कॉकरोचों ने किया तिरंगे का अपमान
भगवान राम को अपशब्द, आजादी, आजादी के नारे... और अब राष्ट्रध्वज का अपमान
देश और धर्म विरोधी हरकतों का केंद्र बन चुका है कॉकरोच जनता पार्टी का धरना प्रदर्शन pic.twitter.com/9Mlp7sdC6S
दूसरी तरफ ऑपइंडिया के रिपोर्टर्स को ग्राउंड पर ऐसा कोई कॉकरोच नहीं मिला, जो यह बता सके कि उनका जुटान यहाँ हुआ किसलिए है। किसी के पास कोई मुद्दा नहीं जो वो बता सकें कि इसलिए वो प्रदर्शन करने आए हैं। कोई पेपर लीक पेपर लीक चिल्ला रहे तो वो उनके साथ मिल जा रहे।
कोई आजादी-आजाजी चिल्ला रहा तो उधर भी उपस्थिति दर्ज कर रहे। इस बैनर से उस बैनर, यहाँ से वहाँ, वहीं जो असल में कॉकरोच करते हैं।
Cockroach प्रोटेस्ट बना पिकनिक साइट, किसी को मालूम नहीं पूरा एजेंडा
छोटे बैनर से बड़े बैनर, एक जगह से दूसरी जगह उछल-कूद की हो रही कोशिश
हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उगला जहर उगलने पहुँच रहे कॉकरोचों के दादा-परदादा
जंतर-मंतर पर पहुँचे एक बुजुर्ग ने ऑपइंडिया के रिपोर्टर से कहा कि ‘पांडव-वांडव’ तो कभी थे ही नहीं, ये सब बेकार बाते हैं। उन्होंने आगे कहा, “राम-वाम सब छोड़ दे, तु वहाँ मत जा, राम मोदी को नहीं मारता, सारे देश को लूट कर खा गया, वो मोदी को नहीं मारता, राम मंदिर के नाम पर कितने रुपए डकार गया, अडानी-अंबानी को नहीं मारता है।”
Cockroach Janta Party के प्रदर्शन में Gen-Z के साथ आए बुजुर्ग ने हिंदू देवी-देवताओं के ख़िलाफ़ उगला ज़हर
जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने पूछा कि इसमें भगवान राम बीच में कहाँ से आ गए तो वो कहते हैं, “तेरे मेरे को डराने के लिए हैं राम तो, उसको नहीं मानते।” जिनको ना तो भारत के इतिहास, संस्कृति और धर्मग्रंथो से कोई लेना-देना नहीं, ना तो इन्हें हिंदू देवी-देवताओं का सम्मान करना आता है, ये लोग पहुँचे हैं कॉकरोचों को समर्थन करने।
कोई डायरी को बता रहा संविधान तो किसी का जवाब- अब्बा-डब्बा-जब्बा
प्रशांत राणा नाम के एक कॉकरोच से ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने बात की तो उसने हाथ में ली हुई डायरी को भारत का संविधान बताया। जब रिपोर्टर ने दिखाने को कहा तो प्रशांत ने थोड़ा भाव खाया, लेकिन फिर डायरी खोली और कहा, ‘ये मेरे कुछ आर्टिकल्स हैं।’ जी हाँ यानी कॉकरोचों का अपना एक संविधान भी लिखा जा रहा है। उसने कहा कि ये मेरे लिए संविधान है।
रिपोर्टर ने जब उससे कहा कि भाई दिखाओ तो इस संविधान में क्या है तो कॉकरोच ने कहा- “इतनी पर्सनल चीज नहीं दिखा सकते।” इसके बाद वो लगातार अपने मन का बेतुकी बातें करता रहा जो संभवतः उसके अपने पर्सनल संविधान में लिखी होंगी।
जंतर मंतर पर निजी डायरी लेकर पहुँचा 'कॉकरोच', बोला- यही है संविधान
डायरी के पन्नो पर लिखे हैं 'अंतरात्मा के विचार', उन्हें दिया है आर्टिकल का नाम @Anurragmishra की Cockroach Janta Party Protest पर ग्राउंड रिपोर्ट pic.twitter.com/qWHvHElPca
ऑपइंडिया को प्रशांत की तरह ही एक और कॉकरोच मिला। उसने कहा कि वो सिस्टम का विरोध करने वालों का समर्थन कर रहा है। उसने कहा कि एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह करप्ट हो चुका है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि तो इसका हल क्या है और CJP के पास इसका क्या समाधान है तो उसने ना में सिर हिला दिया कि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है।
एजुकेशन सिस्टम में क्रांति करने आया कॉकरोच, हल पूछने पर हो गया चुप
मास्क पहने एक कॉकरोच ने बताया कि नीट पेपर लीक हुआ है, इसलिए वो यहाँ आया है, लेकिन और कौन से पेपर कब लीक हुए हैं, इसके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। वह लगातार कहता रहा, “नीट का पेपर लीक हुआ है, होते रहते हैं, अब जैसे नीट का पेपर लीक हुआ है, नीट का पेपर लीक हुआ था, नीट का पेपर लीक हो जाएगा फिर।”
अंत में कॉकरोच ने रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि वो बताए कौन-कौन से पेपर लीक हुए हैं। रिपोर्टर के हर सवाल में फँसते हुए कॉकरोच में अंत में चेहरा दिखाकर और बेईज्जती कराना सही नहीं समझा और चुप हो गया। जिन्हें किसी विषय की कोई जानकारी नहीं है, यहाँ तक की अपने भविष्य का भी कुछ नहीं पता ये औरों के भविष्य की क्या चिंता करेंगे।