ममता बनर्जी: संवैधानिक संस्थाओं के अपमान के बाद अब राष्ट्रपति का अपमान, चुनाव में मजा चखाएंगे आदिवासी


पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी अपनी मनमानी कार्यशैली और अकर्मण्यता से बाज नहीं आ रही हैं। उन्होंने पहले चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं की पुरजोर खिलाफत की है। इस बार तो राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद का खुलेआम अपमान किया है। ममता सरकार ने जानते-बूझते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर दिया है। इसके पीछे आदिवासी वोट बैंक को राष्ट्रपति से दूर रखने की सियासी रणनीति सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे राष्ट्रपति का ही नहीं, बल्कि संविधान का अपमान बताया है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना के आरोप लगे हों। इससे पहले भी उन्होंने कई बार केंद्रीय संस्थाओं और संवैधानिक पदों को लेकर तीखे बयान देकर अपमानित किया है। अब जब राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक सीमा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। पश्चिम बंगाल से उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक मतभेद चाहे कितने भी तीखे क्यों न हों, संवैधानिक मर्यादाओं से समझौता किसी भी सूरत में देश बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगकर उसकी हालत इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे तो खाई वाली कर दी है।

संवैधानिक मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसकी संवैधानिक मर्यादाओं में बसती है। इन मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद होता है, जिसे संविधान ने राष्ट्र के प्रथम नागरिक का स्थान दिया है। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार या उसका मुखिया राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल की अनदेखी करता है, तो यह केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं के अपमान से जुड़ा विषय बन जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से जुड़ा विवाद इसी गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। सीएम ममता बनर्जी को यह समझना होगा कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के साथ टकराव का संदेश केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत है। जब संस्थाओं का सम्मान दांव पर लग जाता है, तो नुकसान केवल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मर्यादा और जिम्मेदारी भी दी है। यदि इन मर्यादाओं का सम्मान नहीं होगा, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होगी। इस पूरे विवाद की यही सबसे बड़ी चेतावनी है।

राष्ट्रपति के कार्यक्रम में ममता सरकार की उदासीनता और कुप्रबंधन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हालिया विवाद संवैधानिक प्रोटोकॉल के उल्लंघन से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रपति के सिलीगुड़ी दौरे पर थीं। ममता बनर्जी या उनके किसी भी मंत्री ने उनकी अगवानी नहीं की, जिसे राष्ट्रपति ने अपने पद और आदिवासी समुदाय के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने सार्वजनिक मंच से राज्य सरकार की उदासीनता और कार्यक्रम के कुप्रबंधन पर सवाल उठाए। तृणमूल सरकार की ओर से वह सम्मानजनक व्यवहार और औपचारिक व्यवस्था नहीं दिखाई गई, जो सामान्यतः राष्ट्रपति के दौरे के समय अनिवार्य मानी जाती है। ममता बनर्जी ने इस अक्षम्य गलती को मानने के बजाए, उल्टा राष्ट्रपति पर ही सवाल उठाकर आग में घी का काम किया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कार्यक्रमों के समन्वय और आयोजन को लेकर राज्य सरकार में आपसी मतभेद थे। ममता बनर्जी से गलती को स्वीकारने के बजाए उल्टे आरोप लगा दिए, जिससे यह मतभेद से बढ़कर एक संवैधानिक गतिरोध में बदल गया।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति पद का सम्मान करना अनिवार्य
अब गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में रिपोर्ट मांगे जाने से इस विवाद को और भी गहरा दिया है, जिससे केंद्र और पश्चिम बंगाल के बीच पहले से जारी तनाव एक नए स्तर पर पहुँच गया है। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख माना गया है। राष्ट्रपति केवल औपचारिक पद नहीं हैं, बल्कि वह राष्ट्र की एकता, गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक हैं। संसद का संचालन हो, सरकार का गठन हो या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कई संवैधानिक औपचारिकताएं, इन सभी में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण राष्ट्रपति के कार्यक्रमों और दौरों के दौरान राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करें। यह केवल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का हिस्सा है। यदि किसी स्तर पर इस मर्यादा की अनदेखी होती है तो उसे केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जाता, बल्कि उसे संविधान के प्रति असम्मान के रूप में देखा जाता है।

ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता
राष्ट्रपति पद की गरिमा के कारण सार्वजनिक प्रतिक्रिया अक्सर संयमित होती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ममता सरकार की उदासीनता और लापरवाह कार्यशैली ने राष्ट्रपति की नाराजगी और असंतोष बढ़ा दिया है। यह असंतोष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति का पद किसी दल या सरकार से नहीं, बल्कि पूरे संविधान से जुड़ा होता है। जब इस पद से जुड़े प्रोटोकॉल की अनदेखी होती है, तो यह संकेत देता है कि राजनीतिक टकराव अब संवैधानिक मर्यादाओं तक पहुंच गया है। यही कारण है कि ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता व्यक्त की जा रही है।

राष्ट्रपति का नहीं, संविधान और लोकतंत्र का अपमान- पीएम मोदी
इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यह केवल राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र का अपमान है। पीएम मोदी ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि आज देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है और कल बंगाल की टीएमसी सरकार ने महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू घोर अपमान किया है। राष्ट्रपति मुर्मू संथाल समुदाय के एक बड़े उत्सव में भाग लेने गई थीं, लेकिन टीएमसी सरकार ने इस आयोजन का बहिष्कार किया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति देश की एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च प्रतीक होते हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार उनके प्रोटोकॉल की अनदेखी करती है, तो यह पूरे राष्ट्र की संवैधानिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है।

आदिवासी समुदायों में ममता सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष
इस विवाद को केवल प्रोटोकॉल की चूक मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे आदिवासी राजनीति का पहलू भी जुड़ा हुआ है। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी समाज में एक नई राजनीतिक चेतना और सम्मान की भावना पैदा हुई है। ऐसे में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां आदिवासी आबादी महत्वपूर्ण है, वहां पर आदिवासी समुदाय के कार्यक्रम का बहिष्कार करना अपने आप में राजनीतिक भेदभाव का प्रतीक है। इसलिए भी देशभर के आदिवासी समुदायों में ममता बनर्जी सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष व्याप्त है।

संघीय व्यवस्था का अपमान, प्रशासनिक भूल या राजनीतिक रणनीति
भारत एक संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों और संस्थाओं के सम्मान को लेकर एक साझा मर्यादा कायम रहती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में आए दिन इसकी धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। वह कभी राज्यपाल से टकरा जाती हैं तो कभी अदालतों के निर्णयों पर सवाल उठाती फिरती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी हो जाए कि वह संवैधानिक शिष्टाचार को ही चुनौती देने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि लगातार संवैधानिक संस्थाओं के साथ टकराव की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यह केवल भूल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है। लोकतंत्र की असली ताकत उसके संस्थानों में विश्वास से आती है। यदि राजनीतिक दल और सरकारें इन संस्थानों का सम्मान नहीं करेंगी, तो जनता के बीच भी उनका विश्वास कमजोर होगा। राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका जैसे पद और संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई भी कुत्सित प्रयास अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की नापाक कोशिश है।

चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों पर ममता के लगातार हमले
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वभाव में आक्रामकता दिखाई है। लेकिन सवाल तब उठता है जब यह आक्रामकता संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच जाती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन संस्थाओं के सम्मान की एक सीमा भी होती है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान किया हो। इससे पहले चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उनका टकराव चुनाव आयोग से भी हो चुका है। उन्होंने कई मौकों पर चुनाव आयोग के निर्णयों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खुलकर आलोचना की थी। इसी प्रकार ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कई बार केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ भी मुखर रही है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से ईडी और सीबीआई की कार्रवाइयों पर सवाल उठाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के छापों के दौरान भी मुख्यमंत्री ने अनाश्यक दखलंदाजी की और महत्वपूर्ण फाइलों को उठाकर ले गईं। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह संवैधानिक संस्था की सार्वजनिक अवमानना करनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी को सत्ता–संरक्षण देने के भंवर में फंस गई है। इस साल की शुरुआत में 8 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।

चीफ जस्टिस ने NCERT की किताब पर केंद्र से कहा था : नाम बताओ, हम एक्शन लेंगे; क्या आपको नाम पता नहीं हैं?

सुभाष चन्द्र 

एक किताब को हटवा कर न्यायपालिका क्या बेदाग़ हो गई।  क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के दाग साफ़ हो गए पिछली सुनवाई में किताब हटाने के आदेश देते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, आप नाम बताओ, हम एक्शन लेंगे यह बात सुनकर मुझे ताज्जुब भी हुआ और हंसी भी आई क्या जनाब सूर्यकांत जी को नाम नहीं पता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं लेकिन आपके एक्शन भी इतने गोपनीय होते हैं जो किसी को कानों कान खबर नहीं लगती

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चर्चित YouTuber 
अभी कुछ दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा था 2016 से 2026 के बीच हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की 8630 शिकायतें आई क्या चीफ जस्टिस को उनके नाम नहीं पता चले? क्या एक्शन हुआ? यशवंत वर्मा का नाम तो एक साल पहले सामने आया था जब उनके घर से 15 करोड़ के अधजले नोट मिले थे क्या वह भ्रष्टाचार नहीं था? 

सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का जनक न्यायपालिका में कॉलेजियम हैं जिसका जिक्र संविधान में नहीं है लेकिन देश पर थोपा हुआ है ऐसी गोपनीयता रहती है कि किसी को पता नहीं चलता कैसे जज बनाये जाते हैं - सरकार अपने विवेक से कॉलेजियम की अनुशंसा पर जजों की नियुक्ति करती है और जहां गलत लगता उन मामलो पर ही रोक लगाई जाती है फिर 5 रिटायर्ड हाई कोर्ट के जजों को हाई कोर्ट के जज Contractual basis पर नियुक्त करने की क्या जरूरत पड़ गई। इसमें भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध आती है

अभिषेक मनु सिंघवी का नाम तो सुना ही होगा 2009 में सिंघवी की संपत्ति 43 करोड़ थी और आज वह 2869 करोड़ कैसे हो गई? ये सीधा सीधा भ्रष्टाचार का मामला है 2012 में सिंघवी का वीडियो सामने आया था जिसमें वह एक महिला वकील को जज बना रहा था लेकिन उस केस को दबा दिया गया उसने अपने ड्राइवर पर आरोप लगाया कि उसने फर्जी वीडियो बनाया लेकिन वैसे तो हर वीडियो की फॉरेंसिक जांच होती है लेकिन उसके वीडियो की कोई जांच नहीं हुई और दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस रेवा खेत्रपाल ने वीडियो पर पाबंदी लगा दी खेत्रपाल रिटायर होने के बाद नवंबर, 2015 में दिल्ली की लोकायुक्त बन गई जब केजरीवाल सत्ता में आ गया और सिंघवी केजरीवाल का वकील रहा है इसमें भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध आती है

लालू यादव 12 साल से 5 मामलों में 32 साल की सजा पा कर भी जमानत पर मौज में घूम रहा है और झारखंड हाई कोर्ट उसकी किसी अपील पर सुनवाई नहीं कर रहा ये है भ्रष्टाचार दिल्ली हाई कोर्ट 2G मामलों में CBI और ED की अपील लिए बैठा है ये है भ्रष्टाचार CBI जज ओ पी सैनी 18 महीने तक चिदंबरम की गिरफ़्तारी पर रोक लगाए रहे यह था भ्रष्टाचार सैनी ने ही फिल्म की स्टोरी बता कर 2G में सभी को बरी कर दिया था सलमान खान का hit n run कस में महाराष्ट्र सरकार की अपील स्वयं सुप्रीम कोर्ट 10 साल से लिए बैठा है क्या कहेंगे इसे?

दो दो अदालतों ने राहुल गांधी को दोषी करार दिया और 2 वर्ष की सजा सुनाई लेकिन जस्टिस गवई ने खुद को कांग्रेसी परिवार का जज स्वीकार करते हुए राहुल गांधी को छोड़ दिया और सुनिए, एक दिन में दो बेंच गठित करके तीस्ता सीतलवाड़ को जमानत दे दी हर भ्रष्टाचार के सबूत नहीं होते लेकिन शंका तो पैदा होती ही हैं

चीफ जस्टिस साहेब, आपको NCERT की एक किताब ने हिला दिया लेकिन कभी सुप्रीम कोर्ट का कलेजा नहीं फटा जब वही NCERT भारत की आत्मा को लहूलुहान करता रहा वामपंथियों की किताबो में हिंदू संस्कृति की हत्या करते हुए

आत्मनिरीक्षण की जरूरत है न्यायपालिका को अपने चैम्बर के झरोखों से बाहर झांकिए और देखिए कि क्या जनता सच में न्यायपालिका को भ्रष्ट नहीं समझती

‘अम्मा का गोश्त मिला तो…’: योगी की माँ पर अभद्र टिप्पणी करने वाले मौलाना अब्दुल्लाह पर UP के 84 थानों में FIR

                                         योगी जी की माँ पर मौलाना अब्दुल्ला सलीम ने किया था कमेंट
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की माँ पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में मौलाना अब्दुल्ला सलीम के खिलाफ प्रदेश के अलग-अलग जिलों के कुल 84 थानों में एफआईआर दर्ज की गई है।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, मौलाना के खिलाफ आईपीसी की धारा 196 (1), 299 और 353 (1) (सी) के तहत केस को दर्ज किया है।

कुछ दिन पहले मौलाना की एक वीडियो सामने आई थी इसमें वो साफ कहता सुनाई पड़ रहा था कि अगर 250 ग्राम तक किसी पर योगी जी की अम्मा का गोश्त/माँस पाया जाता है तो उसके घुटनों से नीचे गोली मारकर छेद करने का आदेश है।

इसी बयान के बाद पूरा विवाद भड़का लोग लगातार उनके बयान के खिलाफ कई जगह प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जल्द कार्रवाई कर मौलाना की गिरफ्तारी नहीं की गई तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।

राजनीतिक तौर पर मौलाना अब्दुल्ला सलीम के तार पहले ओवैसी की पार्टी AIMIM से जुड़े थे। वर्ष 2025 में जोकीहाट विधानसभा सीट से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया था। इसके बाद वह प्रशांत किशोर की जन सुराज में शामिल हो गए, लेकिन चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग ने उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया। 

सलीम वास्तिक पर हमला करने वाले 20 बरस बाद बरी हो जाते जैसे राम रहीम बरी हो गया

सुभाष चन्द्र

देश में Ex-Muslim की बढ़ती जनसँख्या का श्रेय जाता है अनवर शेख को। जो खोमैनी सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा देने की हिम्मत तो कर सकता था लेकिन अनवर के खिलाफ एक भी लब्ज बोलने की बोलने की हिम्मत नहीं। अब आजकल अली सीना की Understanding Mohammad and muslim बहुत चर्चा में है जिसका विरोध करने की किसी भी सुरमा भोपाली बने फिर रहे कट्टरपंथी की हिम्मत नहीं। वास्तव में Ex-muslim सामने आने शुरू हुए नूपुर शर्मा विवाद से।        

Ex-muslim यूटूबर सलीम वास्तिक पर दो भाइयों ज़ीशान और गुलफाम ने घर में घुसकर बार बार चाकुओं से हमला कर हत्या की कोशिश की और वो अभी तक जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं लेकिन दोनों हमलावरों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया। उनके पिता का कहना है और कुछ और लोग भी कह रहे थे कि उन्हें पकड़ कर अदालत में मुकदमा चला कर सजा दिलानी चाहिए थी। होली का रंग पसंद नहीं आया तो 26 साल के तरुण की हत्या कर दी गई। ये क्या तमाशा हो गया। कितने साल में उसके परिवार को न्याय मिलेगा। किसी मामले में तो चीफ जस्टिस आगे बढ़ कर देखें क्या हो रहा है या जब 20 बरस बाद उनकी अदालत में केस आएगा तब ही देखेंगे

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अदालत से अगर समय पर सजा मिल जाती तो फिर अपराध होते ही क्यों? उनके पिता ने कभी उन्हें यह समझाने की कोशिश क्यों नहीं की कि जिसे तुम जिंदगी दे नहीं सकते उसकी जिंदगी क्यों लेने जा रहे हो। अदालत उन्हें जमानत पर छोड़ देती जिससे वे किसी और की जान लेते और सलीम पर हमले के लिए 20 बरस बाद सबूतों और गवाहों के अभाव में बरी कर देते। जमीयत उलेमा हिन्द उनकी वकालत करता और कपिल सिब्बल उन्हें बेकसूर कहता। हो सकता था मुख़्तार अंसारी की तरह कई  जज भी कुर्सी छोड़ कर भाग लेते। इसलिए उनका न्याय तो प्रशासन ने कर दिया

अदालत के कामकाज की कहानी ही अलग है। कल डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की 2002 में हत्या के 24 साल पुराने केस में हाई कोर्ट ने यह कह कर बरी कर दिया कि राम रहीम के खिलाफ रामचंद्र की हत्या के पीछे किसी Conspiracy के सबूत नहीं मिले जबकि बाकी 3 अभियुक्तों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। 3 की सजा ठीक और एक की गलत अपने आप में एक बड़ा झोल साबित करता है। 2019 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। रामचंद्र के भाई ने कहा है वो सुप्रीम कोर्ट जायेंगे। वहां पहले से टाइम तय करके चलो 5 साल तो लग ही जाएंगे, यानी निर्णय होने में 30 साल 

राम रहीम के मैनेजर की भी 2002 में ही हत्या हुई थी और 2021 में उसे भी उम्रकैद हुई थी लेकिन मई 2024 में हाई कोर्ट ने उसके लिए भी राम रहीम को बरी कर दिया था। दो साध्वियों के साथ यौन अपराध के मामले में रंजीत सिंह की हत्या हुई थी और रामचंद्र छत्रपति की भी हत्या उसी प्रकरण में हुई थी क्योंकि वह उस केस की रिपोर्टिंग कर रहे थे। दोनों साध्वियों से यौन अपराध के लिए  2017 में सीबीआई कोर्ट ने राम रहीम को 20 वर्ष की सजा सुनाई थी

हत्या के दोनों मामलों में बरी होने का इशारा यह भी है कि साध्वियों पर किये यौन अपराध के लिए भी शायद वह भविष्य में बरी हो जायेगा। अभी शायद वह 8 साल जेल में रह चुका है क्योंकि उसे बार बार परोल पर छोड़ दिया जाता है

ऐसे अनेक मामले हैं जहां न्याय होता ही नहीं है। आरुषि हत्याकांड भी किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंचा था। आज लोग तुरंत न्याय की चाहत रहने लगे हैं जो न्यायपालिका पर से विश्वास ख़त्म होना साबित कर रहा है। ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कोई भी त्वतरित न्याय देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहते। यही अदालतों में भ्रष्टाचार साबित करता है

कांग्रेस इकोसिस्टम फैला रही भ्रम : ‘ईरान ने हॉर्मूज की खाड़ी को भारत के लिए किया ब्लॉक’

                                         होर्मुज स्ट्रेट और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा (साभार-x@congress)
होर्मुज स्ट्रेट भारत के लिए बंद नहीं है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने साफ कर दिया है कि ये समुद्री रास्ता इजरायल अमेरिका, यूरोप के उसके सहयोगी देशों के जहाजों के लिए बंद किया गया है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर कांग्रेस का प्रोपेगेंडा जारी है।

कांग्रेस फैला रही झूठ

कांग्रेस का कहना है कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद कर दिया है। वहाँ से सिर्फ रूस और चीन के जहाज ही जा सकते हैं। इस लिस्ट में भारत का नाम नहीं है। कांग्रेस का ये भी कहना है कि इस समुद्री रास्ते के बंद होने से 10 हजार करोड़ का भारतीय सामान, 38 जहाज और 1100 नाविक फँसे हुए हैं।

कांग्रेस का कहना है कि इंडियन नेशनल शिप ओनर्स एसोसिएशन ने भारत सरकार से मदद की गुजारिश की है, लेकिन सरकार मदद करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि भारत सरकार ने ईरान के साथ बातचीत के सारे रास्ते बंद कर लिए हैं।

अब कांग्रेस को कौन समझाए कि ईरान ने जिसके जहाज को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने पर हमला करने की बात कही है, उसमें भारत का नाम नहीं है। ईरान सिर्फ उन देशों के जहाजों को पार नहीं होने देगा जिसने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध में इजरायल और अमेरिका का साथ दे रहा है।

भारत ने विश्व शांति की अपील की है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा है कि वैश्विक स्थिरता को अभी सबसे ज्यादा खतरा है और शांति ही एकमात्र हर विवाद को सुलझाने का तरीका है। भारत ने ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर शोक भी जताया है। ऐसे में भारत के जहाज पर ईरानी आक्रमण का खतरा नहीं है।

बीमा कंपनियों की मनाही का असर

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यूएस-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से इस रास्ते पर कई दिनों से अनिश्चितता बनी हुई है और कमर्शियल ट्रैफिक रुक गए हैं। अब रहा सवाल वहाँ भारतीय सामानों के फँसे होने का, तो इसकी वजह बीमा कंपनियों का होर्मुज स्ट्रेट से होकर जाने वाले जहाजों पर से हाथ खींच लेना है। ब्रिटिश बीमा कंपनियों ने बीमा करना बंद कर दिया है, इसलिए आवाजाही रुकी है।

इंश्योरेंस कंपनियों ने शिपिंग कंपनियों को नोटिस दिया था कि वे ईरान पर इजराइल-US हमलों को देखते हुए इंश्योरेंस रोक देंगी और प्रीमियम बढ़ा देंगी। नॉर्थस्टैंडर्ड, अमेरिकन क्लब, स्वीडिश क्लब, स्कल्ड, गार्ड और लंदन पी एंड आई क्लब सहित प्रमुख बीमा कंपनियों ने पोत सुरक्षा के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए युद्ध जोखिम बीमा वापस ले लिया था।

ये खतरा इजरायल और अमेरिका की ईरान पर किए गए हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने के बाद बढ़ा। ईरान ने इसके बाद स्ट्रेट होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर हमला करने की चेतावनी दी थी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने जहाजों को सुरक्षा देने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) को खाड़ी में काम करने वाली शिपिंग लाइनों को तुरंत ‘बहुत सही कीमत’ पर पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस देने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो US नेवी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। ऐसी परिस्थिति में जब भारत अपने लिए रास्ता तलाश रहा है, कॉन्ग्रेस लोगों को डरा रही है।

देश को भयभीत करने की कोशिश कर रही कांग्रेस 

कांग्रेस का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण देश के लोगों को खामियाजा उठाना पड़ेगा, क्योंकि एलजीपी, एलएनजी उसी रास्ते से आता है। मिडिल ईस्ट में होने वाले युद्ध का असर देश के फर्टिलाइजर, ट्रांसपोर्ट, माइनिंग, रेलवे, पॉवर, एग्रीकल्चर समेत कई सेक्टर्स पर पड़ेगा। आने वाले समय में जिस तरह से महँगाई बढ़ेगी और मंदी आएगी, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

कांग्रेस ऐसा कह कर सरकार को आगाह करना चाहती है या देश को डराना चाहती है। मिडिल ईस्ट के देशों के साथ भारत के मधुर संबंध हैं और व्यापारिक रिश्ते भी काफी मजबूत हैं। भारत के लिए जब होर्मुज स्ट्रेट बंद नहीं है, तो फिर ऐसा संकट क्यों आएगा। भारत को रूस ने तेल देने की पेशकश भी कर चुका है। बाकी रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का बयान

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कहा है कि होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके पश्चिमी सहयोगियों के जहाजों के लिए बंद है। यह घोषणा गुरुवार 5 मार्च 2026 को ईरान के सरकारी ब्रॉडकास्टर IRIB के जरिए की गई है।

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा कि इंटरनेशनल कानून और संबंधित प्रस्तावों के मुताबिक, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान युद्ध के समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने को रेगुलेट करने का अधिकार रखता है। इसलिए इस रास्ते से अगर अमेरिका, इजराइल, यूरोप और उनके ‘समर्थकों’ का कोई भी जहाज इस रास्ते पर दिखेगा तो उसपर निश्चित रूप से हमला किया जाएगा।

इससे पहले ईरान ने साफ किया था कि वह चीनी झंडे लगे जहाजों को स्ट्रेट इस्तेमाल करने देगा। अब उसने दुनिया के बाकी देशों को भी ग्रीन सिग्नल दे दिया है, जो इस युद्ध में शामिल नहीं है या उसके खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं। ये पूरी दुनिया के लिए राहत भरी खबर है।

ममता का आचरण कोई नई बात नहीं है लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पर राजनीति करने के आरोप से घटिया बात नहीं हो सकती

सुभाष चन्द्र

पिछले 12 साल से विपक्षी दलों के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री मोदी का उनके राज्यों के दौरों पर  बहिष्कार करके उनका अपमान करते रहे हैं लेकिन इस बार ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बहिष्कार करके मर्यादा की सभी सीमाएं तोड़ दी राष्ट्रपति मुर्म सिलीगुड़ी में विश्व आदिवासी सम्मेलन में शामिल होने गई थी लेकिन न तो उनके स्वागत के लिए ममता बनर्जी गई और न उनका  कोई मंत्री गया इससे बड़ा घोर अपमान राष्ट्रपति का हो नहीं सकता जो स्वयं के आदिवासी महिला है। 

विश्व आदिवासी सम्मेलन के आयोजन में भी क्या राजनीति हो सकती है जिससे ममता बनर्जी घबरा गई उन्होंने कहा कि “माननीय राष्ट्रपति महोदया हम आपका आदर करते हैं, लेकिन चुनाव के दौरान भाजपा के इशारे पर राजनीति न करें” ममता संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को भी भाजपा का एजेंट बताती है और अब देश के सर्वोच्च पद पर बैठी राष्ट्रपति को भी भाजपा का एजेंट बता दिया प्रधानमंत्री ने सही कहा है कि ममता के अहंकार ने आदिवासी महिला राष्ट्रपति का अपमान किया है ममता का राष्ट्रपति के प्रति आदर किसी ढकोसले से कम नहीं है

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अपने स्वभाव से शालीन और शांत रहने वाली द्रौपदी मुर्मू जी को भी कल कहना पड़ गया कि ममता मुझे बंगाल में आना ही नहीं देना चाहती और सम्मेलन में आदिवासियों को आने से रोका गया 

ममता हो या विपक्ष के अन्य मुख्यमंत्री हों, वे अक्सर प्रधानमंत्री के राज्य के दौरों में उनका बहिष्कार करते हैं 8 से 10 मुख्यमंत्री तो ऐसे हैं जो नियमित रूप से नीति आयोग की बैठकों  बहिष्कार करते हैं जबकि आयोग ही उनके राज्यों की वित्तीय समस्याओं को हल करने के लिए धन उपलब्ध करता है कुछ और किस्से हैं प्रधानमंत्री के बहिष्कार के

-तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने 5-6 बार मोदी की state visit पर प्रोटोकॉल के अनुसार उनका स्वागत नहीं किया; आज क्या हुआ, मिट्टी में मिल गया;

-ममता बनर्जी ने खुद प्रधानमंत्री के बंगाल दौरों पर उनके अगुवाई करने की जरूरत नहीं समझी;

-6 अप्रैल, 2025 को तमिलनाडु के CM स्टालिन ने प्रधानमंत्री मोदी के रामेश्वरम में पमबम ब्रिज के उद्घाटन में गायब रहे और ऊटी जाने का बहाना बना दिया;

-27 अप्रैल, 2020 को प्रधानमंत्री मोदी की मुख्यमंत्रियों के साथ कोरोना जैसे गंभीर विषय पर मीटिंग में भी केरल के मुख्यमंत्री विजयन गायब रहे याद रहे सबसे ज्यादा मौतें केरल में हुई थी और मुख्यमंत्री ने मुस्लिमों के समारोहों पर कोई नहीं लगाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट के मोदी विरोधी जजों ने स्वीकृति दी थी

-मई 2023 में बंगाल, दिल्ली, पंजाब, तेलंगाना, केरल और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग की Governing Council का बहिष्कार किया;

-जुलाई, 2024 में 7 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग का बहिष्कार किया

इस आचरण का कारण एकमात्र है और वह है नरेंद्र मोदी से “नफरत” लेकिन जब इनके राज्यों को पैसे की जरूरत पड़ती है तो नाक रगड़ने आते दिल्ली में मोदी के दरबार में  फिर भी वह उनके साथ भेदभाव नहीं करता 

बंगाल में 2011 की जनगणना के अनुसार 53 लाख से ज्यादा आदिवासियों की आबादी है क्या इसके लिए कोई सम्मेलन भी नहीं हो सकता? ममता की दुश्मनी मोदी से है लेकिन राष्ट्रपति को तो उसे नहीं घसीटना चाहिए था अब TMC और ममता का दिया बंगाल में बुझना ही चाहिए लेकिन एक फैक्टर है जो ममता को सत्ता में रख सकता है और वह है “cut money” लोग जिसके आदि हो चुके हैं और उन्हें यह डर रहता कि भाजपा सरकार आने पर उनका यह धंधा बंद हो जाएगा और पिछले चुनाव में उसे 48% वोट मिले

5000 साल पुराना इतिहास : दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर: हर साल दाने के बराबर जमीन में धंसती जा रही प्रतिमा; वक्फ संपत्ति बता हड़पने की हुई कोशिश

                               कोटा के कैथून में है विभीषण का एकमात्र मंदिर (फोटो साभार: पंजाब केसरी )
राजस्थान के कोटा जिले के कैथून कस्बे में हर साल होली के अवसर पर एक बेहद अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। देशभर में होलिका दहन के साथ होली का त्योहार मनाया जाता है लेकिन कैथून में इसके अगले दिन यानी धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

इसी खास परंपरा के साथ यहाँ पाँच दिवसीय विभीषण मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु आस्था और परंपरा का संगम देखने के लिए पहुँचते हैं। इस वर्ष भी मेले की शुरुआत धूमधाम से हुई। राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर मेले के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

उन्होंने पहले विभीषण मंदिर में पूजा-अर्चना की और फिर मेला स्थल पर परंपरा के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन कर अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया।

              प्रदेश के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने किया मेले का शुभारंभ (साभार:ETV भारत)

होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की अनोखी परंपरा और देव विमानों की शोभायात्रा

कैथून का विभीषण मेला देश में अपनी तरह का अनूठा आयोजन माना जाता है। यहाँ परंपरा के अनुसार, पहले होलिका दहन होता है और उसके अगले दिन धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले को जलाया जाता है। इस परंपरा का संबंध भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु की कथा से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि जब होलिका आग में जलकर नष्ट हो गई, तब असुर राजा हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। उसी समय भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। इसी घटना की स्मृति में कैथून में धुलेंडी के दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

यह परंपरा लगभग 45 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है और हर साल इसके साथ भव्य मेले का आयोजन होता है। विभीषण मेले की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होती है। आसपास के कई मंदिरों से देवताओं की प्रतिमाओं को सजाए गए देव विमानों में बैठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।

ये देव विमान श्रद्धालुओं की भीड़ के साथ विभीषण मंदिर तक पहुँचते हैं, जहाँ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद सभी देव विमानों को मेला स्थल लाया जाता है। मेला स्थल पर आतिशबाजी, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और धार्मिक आयोजन होते हैं। कार्यक्रम के अंतिम चरण में मुख्य अतिथि द्वारा हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है, जो धर्म की जीत और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है।

दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर: हर साल दाने के बराबर जमीन में धंसती जा रही प्रतिमा

कैथून की पहचान केवल मेले तक सीमित नहीं है। यहाँ स्थित विभीषण मंदिर को दुनिया का इकलौता मंदिर माना जाता है जहाँ रावण के भाई विभीषण की पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर परिसर में एक विशाल चबूतरे के ऊपर छतरी के नीचे विभीषण की बड़ी प्रतिमा स्थापित है।

                                                                     (साभार: News 18)

इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसका केवल धड़ से ऊपर का हिस्सा ही दिखाई देता है, जबकि बाकी भाग जमीन के अंदर धँसा हुआ माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा हर साल थोड़ा-थोड़ा जमीन में और धँसती जाती है। मंदिर के पास एक प्राचीन कुंड भी है, जिसके निकट विक्रम संवत 1815 का शिलालेख मौजूद है।

विभीषण मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

मंदिर की स्थापना को लेकर एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के समय सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि और राजा अयोध्या पहुँचे थे। इसी दौरान भगवान शिव ने पृथ्वी लोक की यात्रा करने की इच्छा जताई। यह सुनकर विभीषण ने निवेदन किया कि वह शिव और हनुमान को कांवड़ में बैठाकर भारत भ्रमण कराना चाहते हैं।

भगवान शिव ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया लेकिन एक शर्त रखी कि यात्रा के दौरान काँवड़ जहाँ भी जमीन से टिक जाएगी, वहीं यात्रा समाप्त मानी जाएगी। विभीषण ने एक विशाल लकड़ी की काँवड़ तैयार की जिसकी लंबाई लगभग 8 कोस (करीब 32 किलोमीटर) बताई जाती है। काँवड़ के एक हिस्से में भगवान शिव और दूसरे हिस्से में हनुमान जी विराजमान थे।

जब यह यात्रा प्राचीन नगर कौथुनपुर (आज का कैथून) से गुजर रही थी, तब काँवड़ का एक सिरा जमीन से लग गया। जिस स्थान पर शिवजी का भाग जमीन से टिका, वह स्थान आज चौरचौमा के नाम से जाना जाता है और वहाँ चोमेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है।

दूसरा हिस्सा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र में आकर टिका, जहाँ आज हनुमान जी का मंदिर स्थित है। वहीं कैथून में जहाँ विभीषण रुके, वहाँ विभीषण मंदिर की स्थापना मानी जाती है।

मंदिर के वर्तमान स्वरूप का इतिहास और वक्फ विवाद

मंदिर को पौराणिक रूप से हजारों साल पुराना माना जाता है लेकिन इसके वर्तमान ढाँचे का निर्माण बाद में हुआ। माना जाता है कि कोटा के शासक महाराव उम्मेद सिंह प्रथम ने 1770 से 1821 के बीच मंदिर की छतरी और संरचना का निर्माण करवाया था। मंदिर के आसपास के कई हिस्सों का समय-समय पर जीर्णोद्धार भी किया गया।

स्थानीय गौतम परिवार ने प्राचीन कुंड और अन्य संरचनाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी इस परिवार के सदस्य विशेष अवसरों पर यहाँ पूजा करने आते हैं। मेला उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने मंदिर की जमीन से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस भूमि को वक्फ संपत्ति बताकर कब्जाने की कोशिश की गई थी।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए वक्फ संशोधन कानून के बाद यह स्पष्ट कर दिया गया है कि केवल वही संपत्ति वक्फ के नाम दर्ज होगी जो वास्तव में मुस्लिम समाज द्वारा दान की गई हो। इस कानूनी बदलाव और लंबे समय से चल रहे संघर्ष के बाद कोर्ट ने विभीषण मंदिर की जमीन हिंदू समाज को वापस सौंपने के आदेश दिए।

दिलावर ने यह भी कहा कि राजस्थान सरकार ने निर्णय लिया है कि आबादी क्षेत्र में स्थित मंदिरों की जमीन के पट्टे मंदिर की मूर्ति के नाम जारी किए जाएँगे, ताकि भविष्य में कोई अवैध कब्जा न कर सके। मेला समारोह में मंत्री दिलावर ने कहा कि विभीषण ने अधर्म के मार्ग पर चल रहे अपने भाई रावण का साथ छोड़कर भगवान राम का साथ दिया था।

रामायण की कथा में विभीषण का यह निर्णय धर्म के पक्ष में खड़े होने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि कैथून में उन्हें विशेष सम्मान के साथ पूजा जाता है। होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की परंपरा, दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर और उससे जुड़ी कथाएँ इस स्थान को भारत के धार्मिक मानचित्र पर एक अलग पहचान देती हैं।

शिया सुन्नी को और सुन्नी सुन्नी को मार रहा तो "असली मुस्लिम" कौन है?


साभार सोशल मीडिया 

ना मुझे अमेरिका इजरायल से मतलब है और नहीं खाड़ी के किसी दुबई, कतर, बहरीन, अबू धाबी या सऊदी जैसे देश से और ना ईरान से, मतलब
अपना भारत सुरक्षित चाहिए।
कश्मीर में नरसंहार हुआ तो तुमने कोई विरोध नहीं किया;
साभार सोशल मीडिया 

कारगिल में सैकड़ों भारतीय सैनिक शहीद हुए तुमने कोई विरोध प्रदर्शन नहीं किया, मजहब की चादर ओढ़ के मौन थे;
26/11 मुम्बई मैं आतंकवादी हमला हुआ तुमने कोई विरोध प्रदर्शन नहीं किया;
अयोध्या से लौट रहे कारसेवको को गोधरा में साबरमती ट्रेन में जिंदा जलाया गया तुमने कोई विरोध प्रदर्शन नहीं किया;
पहलगाम पुलवामा और उरी में हमला हुआ, धर्म पूछ कर मारा गया तुमने कोई विरुद्ध प्रदर्शन नहीं किया;
साभार सोशल मीडिया 

आज तुम्हारे मजहब के विदेशी धरती में आग लगी हुई है तो अब भारत में सीना पीट रहे हो
और कहते हो कि तुम्हारा भी खून शामिल है यहां की मिट्टी में।
परायों के लिए तुम्हारी आंखों में आंसू आ जाते हैं और अपने देश में आतंकवादी हमले में मारे जाने वाले आम भारतीयों के लिए क्यों नहीं?
शिया सुन्नी, को मार रहा, ( ईरान vs सऊदी) 
सुन्नी-सुन्नी, को पेल रहा, (अफ़ग़ानिस्तान vs पाकिस्तान) 
 
अब सवाल है, कि "ओरिजनल मुस्लिम" कौन है? 

पाकिस्तान के कटोरा शरीफ ने सऊदी अरब के साथ "डिफेंस पैक्स" साइन किया था!

सऊदी अरब पर हमला पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और पाकिस्तान पर हमला सऊदी अरब पर हमला माना जाएगा!

सन 1971 मे लिखी गई भविष्य वाणी शायद करवट लेने वाली है।अखिल विश्व गायत्री परिवार के पण्डित श्रीराम शर्मा के 1971 के एक लेख द्वारा की गई भविष्यवाणी
लेकिन अफगानिस्तान पाकिस्तान की बजा रहा है, और सऊदी चुप है !
ईरान सऊदी की बजा रहा है, और पाकिस्तान चुप है 
तुम्हारे दस साल के राज में जो देश के चीथड़े चीथड़े उड़ते रहे, दिल्ली से लेकर मुंबई तक... बाजार बाजार, ट्रेन ट्रेन और शहर दर शहर... उसमें आरडीएक्स कहां से आया था?

दिल्ली के सरोजनी नगर में 2005 में धनतेरस वाले दिन जब 85 लोगो के चीथड़े उड़े थे तो देश में वो आज तक का सबसे ज्यादा आरडीएक्स वाला धमाका था। 

300 किलो से भी ज्यादा! कहां से आता था इतना आरडीएक्स, कौन लाया था भाई?

एक अनुमान के अनुसार तुम्हारी सोनिया के दस साल के राज में लगभग 4000 किलो आरडीएक्स से देश की निर्दोष जनता को लहूलुहान किया गया! जवाब दो कहां से आया इतना आरडीएक्स? कौन लाया? 

आओ बेशर्मों तुम्हें सिलसिलेवार एक एक आतंकवादी घटना की याद दिलाऊ...

1. 15 अगस्त, 2004: असम के धिमजी स्कूल में RDX बम ब्लास्ट- (18 मरे, 40 घायल)

2. 5 जुलाई 2005: अयोध्या में रामजन्मभूमि पर आतंकवादी हमला (6 मरे, दर्जनों घायल)

3. 28 जुलाई 2005: जौनपुर में श्रमजीवी एक्सप्रेस ट्रेन में RDX द्वारा बम विस्फोट (13 मरे, 50 घायल)

4. 29 अक्टूबर 2005: धनतेरस वाले दिन दिल्ली के गोविंदपुरी, पहाड़गंज और सरोजनी नगर के भीड़भाड़ वाले इलाके में RDX ब्लास्ट करके 85 लोगो के चिथड़े उड़ा दिए गए और 250 से ज्यादा घायल हुए।

5. 28 दिसम्बर 2005: बैंगलोर के इंस्टीट्यूट आफ साइंस पर आतंकवादी हमला 1 मरे 4 घायल!

6. 7 मार्च 2006: हिंदुओं की श्रद्धा के केंद्र वाराणसी के प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर और भीडभाड वाले कैंट रेलवे स्टेशन पर 3 RDX बम ब्लास्ट करके 28 श्रद्धालुओं, नागरिको को बम से उड़ा दिया, 101 लोग घायल हुए। 

7. 11 जुलाई 2006: मुम्बई में एक साथ माटुंगा रोड, माहिम, बांद्रा, खार रॉड, जोगेश्वरी, भाइंदर, बोरिवली स्टेशनों के लोकल ट्रेन में RDX के बमो से सीरियल ब्लास्ट करके 209 लोगो को बम से उड़ाया गया 700 से ज्यादा लोग घायल हुए!

8. 8 सितंबर 2006: मालेगांव की मस्जिद में सीरियल RDX बम ब्लास्ट 37 मरे 125 घायल।

9. 18 फरवरी 2007: समझौता एक्सप्रेस में वही RDX बम ब्लास्ट, 68 मरे 50 घायल!

10. हैदराबाद की मक्का मस्जिद में RDX बम ब्लास्ट 16 मरे 100 घायल। 

11. 14 अक्टूबर 2007: लुधियाना के थियेटर में RDX बम ब्लास्ट 6 लोग मरे।

12.. 24 नवम्बर 2007: उत्तर प्रदेश में लखनऊ, अयोध्या और बनारस के न्यायालयों में सीरियल RDX बम बलास्ट 16 मरे 79 घायल।

13. 1 जनवरी 2008: रामपुर उत्तर प्रदेश में CRPF कैम्प पर हमला 8 मरे 7 घायल।

14. 13 मई 2008: जयपुर के छोटी चौपड़, बड़ी चौपड़, मानकपुर पुलिस स्टेशन एरिया, जौहरी बाजार, त्रिपोलिया बाजार, कोतवाली क्षेत्र में RDX द्वारा 9 जगहों पर सीरियल ब्लास्ट 63 मरे 200 घायल!

15. 25 जुलाई 2008: बैंगलुरु में में 8 सीरियल RDX बमब्लास्ट 2 मरे 20 घायल!

16. 26 जुलाई 2008: गुजरात के अहमदाबाद में 17 जगहों पर सीरियल RDX बम ब्लास्ट 35 मरे 110 घायल।

17. 13 सितंबर 2008: दिल्ली के गफ्फार मार्केट, बारहखम्भा रोड, GK1, सेंट्रल पार्क में 31 मिनट के अंदर 5 RDX बम ब्लास्ट हुए। 33 लोगो कि बम विस्फोट में मृत्यु और 150 से ज्यादा घायल।

18. 27 सितंबर 2008: दिल्ली महरौली के इलेक्ट्रानिक मार्केट में 2 बम ब्लास्ट 3 लोग मरे और 33 घायल।

19. 1 अक्टूबर 2008: अगरतला में बम विस्फोट, 4 मरे 100 घायल।

20.  21 अक्टूबर 2008: इम्फाल में RDX बम विस्फोट, 17 मरे 50 घायल।

21. 30 अक्टूबर 2008: असम में RDX बम विस्फोट, 81 मरे और 500 से ज्यादा घायल।

22. 28 नवम्बर 2008: मुम्बई हमला, ताज होटल, ओबेराय होटल, कामा हॉस्पिटल, नरीमन हाउस, लियोपोल्ड कैफे, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर आतंकवादी हमला 166 लोग मारे गए 600 से ज्यादा घायल।

23. 1 जनवरी 2009: गुवाहाटी में RDX बम ब्लास्ट 6 मरे 67 घायल!

24. 6 अप्रैल 2009: गुवाहाटी में RDX बम ब्लास्ट 7 मरे 62 घायल!

25. 13 फरवरी 2010: पुणे की जर्मन बेकरी में RDX बम ब्लास्ट, 17 मरे 70 घायल!

26. 7 दिसम्बर 2010: दशास्वमेध घाट पर गंगा आरती के समय बम ब्लास्ट। 3 मरे 36 घायल!

27. 13 जुलाई 2011: मुबई के ओपेरा हाउस, जावेरी बाज़ार और दादर एरिया में भीषण RDX बम ब्लास्ट! 26 मरे 130 लोग घायल।

28. 7 सितंबर 2011: दिल्ली हाईकोर्ट में RDX बम ब्लास्ट, 17 मरे और 180 लोग घायल। 

29. 13 फरवरी 2011: इजराइली डिप्लोमेट की कार को बम से उड़ाने का प्रयास, बम सही से फटा नही। 4 घायल। 

30. 1 अगस्त 2012: पुणे ब्लास्ट।

31. 21 फरवरी 2013: हैदराबाद की हैदाराबाद में 2 RDX बम ब्लास्ट। 18 लोग मारे गए और 131 घायल!

32. 17 अप्रैल 2013: बैंगलोर में RDX बम ब्लास्ट, 14 लोग गंभीर रुप से घायल!

33. 7 जुलाई 2013: बोधगया मे ब्लास्ट 5 लोग गंभीर रूप से घायल। 

34. 27 अक्टूबर 2013: पटना में, नरेंद्र मोदी की रैली में इंडियन मुजाहिद्दीन द्वारा 8 बम ब्लास्ट, 6 मरे 85 घायल। लाखो की भीड़ में भगदड़ मचा कर हजारो को मारने की साजिश।

35. 1 मई 2014: चेन्नई में गुवाहाटी बैंगलोर एक्सप्रेस में बम बलास्ट 2 मरे 14 गंभीर रूप से घायल।

सोनिया राज के दस वर्षो की जो भी बम ब्लास्ट की घटनाएं मैंने लिखीं हैं उनमें कश्मीर की घटनाएं नहीं हैं।

कश्मीर में भी इस दरम्यान सैकड़ो घटनाएं हुई जिनमें हजारों किलो आरडीएक्स प्रयोग हुआ और हजारों बेकसूर मारे गए।

कांग्रेस को जवाब देना चाहिए कि किस रास्ते से आरडीएक्स देश में निर्बाध आता रहा और मासूमों के चीथड़े उड़ाता रहा।

पुलवामा में हुए हमले से हर देशवासी दुखी है। लेकिन सेना और मासूम जनता को सोनिया राज में क्यों भूना जाता रहा, इसका जवाब दो सुजेवाला! इसका जवाब दो राहुल गांधी!

और जवाब तो उस दाउद के काले कारनामे का भी दो....जब 1993 में तुम्हारी सरपरस्ती में 400 बेकसूर लोगों को RDX बमों से मौत के घाट उतार दिया गया था।

पर धूर्त कांग्रेसी कभी आतंकियों पर अंगुली नहीं उठाये, बल्कि इस्लामिक आतंकवाद न कह सके पर भगवा आतंकवाद का झूठ का प्रचार कर इस पावन भारत भूमि और हिंदुओं को कलंकित, अपमानित करने का काम तुम गद्दारों ने अवश्य किया।

कांग्रेस के अपने घर में हाहाकार मचा है; कुछ चापलूसी करते थक गए पर मिला “बाबा जी का ठुल्लू” विपक्ष क्या होता है इज़रायल से नहीं सीख सकते तो पाकिस्तान में हाल देख कर समझ लो कि भारत में कितने खुश हो

सुभाष चन्द्र

पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत जैसे चमचे राहुल गांधी की चापलूसी में नरेंद्र मोदी के लिए ऐसे ऐसे अपशब्द कहते रहे जो कहने के लिए शायद उनका दिल भी नहीं मानता होगा।  पिछली बार भी राहुल गांधी ने पवन खेड़ा को राज्यसभा नहीं भेजा और इस बार भी पिछली बार भी पवन खेड़ा ने कहा था कि शायद मेरी तपस्या में कमी रह गई और इस बार भी वही शब्द दोहराए हैं अगर दिमाग राहुल गांधी के पास गिरवी रख कर काम करोगे तो ऐसा ही होगा सुरजेवाला ने क्या तुमसे बढ़िया गाली दी थी मोदी को जो उसे इनाम दे दिया गया

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अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस का जड़खरीद गुलाम पाकिस्तान से मोदी को हटाने की भीख मांगने वाला मणिशंकर अय्यर भी राहुल गांधी से उखड़ गया उसे कांग्रेस को समझने में देर कर दी या पहले से समझा हुआ था जो रोज मोदी के लिए बकवास करता था अब उसने कहा है

“मुझे गंदे कपड़े की तरह फेंक दिया मैं बूढ़ा हो चुका हूं, मेरे दांत गिर चुके हैं; कांग्रेस ने मुझे गंदे कपड़े की तरह किनारे फ़ेंक दिया; 85 साल के बुजुर्ग का कुछ तो लिहाज होना चाहिए; मुझे धक्के मारकर भगाया गया; सवाल उठता है कि क्या पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बचा पा रही है? या नई राजनीति में पुराने चेहरे बेकार हो जाते है? कांग्रेस के अंदर असंतोष की आवाज़ें तेज हो रही हैं”

अपने पर पड़ी तो सम्मान याद आ गया लेकिन जब सीताराम केसरी को टॉयलेट में बंद कर उसे धक्के मार कर निकाला गया और उसकी धोती फाड़ दी गई थी, तब मणिशंकर कुछ बोले थे क्या - 85 साल के बुजुर्ग का सम्मान होना चाहिए लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे आदमी को आप “नीच” कहना ठीक समझते हैं ये आपका ही कर्मफल है जो लौट कर आ रहा है आज आप कांग्रेस के लिए तो क्या किसी पार्टी के लिए भी किसी काम के नहीं हैं 

गाली बकने की संस्कृति तो कांग्रेस की पुरानी है सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को “मौत का सौदागर” का कहा और राहुल गांधी ने “खून की दलाली करने वाला” एक थे कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी जिसने 12 अगस्त, 2020 को  टीवी डिबेट में अमीश देवगन को “भड़वा” और कई अपशब्द कहे थे अभी 4 दिन पहले कांग्रेस के प्रवक्ता अलोक शर्मा ने रिटायर्ड कर्नल दनवीर सिंह जी को “भड़वा और भोसड़ीवाले” कह कर गाली दी

दिग्विजय सिंह लादेन को “ओसामा जी” कहते थे और सुशील शिंदे ने हाफिज सईद को “हाफिज साहब” कहा असम का कांग्रेस नेता भूपेन बोराह ने कहा राहुल गांधी ने 15 मिनट में सब बातें साफ़ कर दी मुझे कांग्रेस छोड़ने के लिए क्या खास समझा दिया महान राहुल गांधी ने? अभी कर्नाटक में सिद्धारमैया और शिवकुमार में लठ्ठमलट्ठा हो रही है

इतना ही नहीं आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ममता उन्हें बंगाल में नहीं आने देती लेकिन कांग्रेस ने ममता के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया क्योंकि वैसे भी कांग्रेस राष्ट्रपति मुर्मू से नफरत करती है

इज़रायल के विपक्ष से नहीं सीख सकते तो पाकिस्तान के विपक्ष की हालत देख ले कांग्रेस और राहुल गांधी यहां विपक्ष में रह कर लोकतंत्र की पूरी मौज ले रहे हो, मोदी को स्पीकर को, चुनाव आयोग को सबको गाली देते हो और दूसरी तरफ पाकिस्तान में इमरान खान की हालत देख लो क्या तुम्हारी भी वैसी हालत कर देनी चाहिए जिससे पता चले कि “बदले की कार्रवाई” क्या होती है

बिहार में बड़े बदलाव की बयार, नितीश कुमार की राज्यसभा की राह के साथ नए समीकरण और BJP का बड़ा उभार


बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। दरअसल, सियासत में कई बार ऐसे क्षण आते हैं, जब एक निर्णय पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल देता है। इन दिनों बिहार की राजनीति में भी कुछ वैसी ही हलचल दिखाई दे रही है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता की धुरी बने रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की सुर्खियों ने सियासी गलियारों में नए समीकरणों की अटकलें तेज कर दी हैं। यह केवल एक नेता के पद परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत भी है। इस बदलाव से पूरे राज्य की राजनीति की दिशा और दशा दोनों प्रभावित होंगी। नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने से बिहार में भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक अवसर होगा। लंबे समय तक सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद पहली बार भाजपा को बिहार में मुख्यमंत्री पद हासिल करने का मौका मिल सकता है। राज्य की राजनीति में भाजपा का सफर आसान नहीं रहा है। एक समय ऐसा था जब पार्टी का जनाधार सीमित था और वह मुख्यतः गठबंधन की राजनीति पर निर्भर थी। भाजपा ने लगातार कठिन परिश्रम, समर्पित सेवा भावना और विकास की राह से जीरो से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया है।

JDU से ज्यादा सीटें होने के बावजूद बीजेपी द्वारा अपना मुख्यमंत्री नहीं बनाने की असली वजह थी राज्य में अपना जनाधार बनाना। मौका मिलते ही बीजेपी ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया। पहली बार गृह मंत्रालय अपने पास रख स्पष्ट दे दिया कि खेला होने वाला है।  

दो दशक की राजनीति के बाद नए सत्ता समीकरण की शुरुआत
नीतीश कुमार ने राज्यसभा में जाने के लिए नामांकन भर दिया है। उनके साथ जद (यू) के रामनाथ ठाकुर, भाजपा के नितिन नवीन व शिवेश कुमार तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने भी नामांकन किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मौके गवाह बनने पटना पहुंचे हैं। नामांकन के बाद एनडीए नेताओं के साथ बैठक कर वो नई सरकार के गठन पर चर्चा भी कर सकते हैं। यह सिर्फ एक नेता के राज्यसभा पहुंचने की नहीं, बल्कि बिहार की 20 साल पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के अंत और नए सत्ता समीकरण की शुरुआत है। नीतीश कुमार 75 वर्ष के हो चुके हैं। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने भारी जीत हासिल की। भाजपा अकेले 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जद (यू) ने 85 सीटें जीतीं। चुनाव परिणामों को पीएम मोदी की बेहद लोकप्रियता का परिणाम माना गया। चुनाव के बाद नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन मात्र चार महीने बाद यह निर्णय ले लिया है। जेडीयू के लोग इसे नीतीश की अपनी मर्जी बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे राज्य की राजनीति से सम्मानित विदाई के रूप में देखा जा रहा है।

बेटे के लिए बिहार की राजनीति, अपने लिए केंद्र की सियासत
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना बिहार राजनीति में बड़ा बदलाव है। पर एक सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है कि नीतीश कुमार के इस फैसले से उन्हें हासिल क्या होगा। आम तौर पर मुख्यनेता अपनी कुर्सी नहीं छोड़ते। ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि नेता मृत्युशैया पर होने के बाद भी रिजाइइन देने से बचते रहे हैं। जेल में महीनों बिताने के बाद भी एक नेता ने सीएम का पद नहीं छोड़ा। विधानसभा में बहुमत न होने के बाद भी मुख्यमंत्रियों को ये भरोसा रहा है कि वे अंतिम समय में कोई न कोई विकल्प निकाल ही लेंगे। पर नीतीश कुमार के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। जाहिर है कि सवाल कौंधेगा कि नीतीश कुमार क्यों करने जा रहे हैं? फिलहाल इसके पीछे दो कारण नजर आ रहे हैं। एक तो इससे नीतीश कुमार अपने बेटे के लिए बिहार में राजनीति का नया रास्ता बना पाएंगे। दूसरे, वे राज्य की राजनीति से निकलकर देश की राजनीति में पैर रख सकेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नीतीश कुमार को केंद्रीय मंत्री का पद मिल सकता है।

नीतीश के बाद निशांत संभाल सकते हैं पार्टी की कमान
जद (यू) का नेतृत्व नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से थोड़ा हिल-डुल सकता है। नीतीश कुमार ने अपने अलावा पार्टी में किसी को उभरने नहीं दिया। जाहिर है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी में और कोई ऐसा है भी नहीं जिससे पार्टी के बंटने का भी खतरा हो। अब जेडीयू के लोगों के सामने ऑप्शन यही होगा कि वे या तो बीजेपी की छत्रछाया में रहें या बीजेपी जॉइन कर लें। अगर निशांत उप-मुख्यमंत्री बनते हैं, तो पार्टी उनके नाम पर एकजुट रह सकती है। संजय झा जैसे नेता अंतरिम कमान संभाल सकते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म की लीडरशिप के लायक पार्टी में कोई बड़ा नेता नहीं दिख रहा है। ऐसे में नीतीश के बाद निशांत ही पार्टी की कमान संभाल सकते हैं। या फिर भविष्य में पार्टी का विलय बीजेपी में हो जाए तो कोई अचंभित करने वाली बात नहीं होगी।

जद-यू में नीतीश के बाद बड़ा नेता नहीं जो सर्वसम्मति से उभर सके
हालांकि जद (यू) में श्रवण कुमार, अशोक चौधरी और विजय कुमार चौधरी जैसे दूसरे दर्जे के नेता हैं, लेकिन कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो सर्वसम्मति से उभर सके। ऐसे में नीतीश के बेटे निशांत जेडीयू के लिए सबसे अच्छा विकल्प प्रतीत होते हैं। नीतीश देश के इकलौते क्षेत्रीय राजनेता हैं जिन्होंने लंबे समय तक अपने बेटे को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन अब जब निशांत को आगे बढ़ाया जा रहा है और नई सरकार में उन्हें जगह मिलने की उम्मीद है, तो कई लोग सोच रहे हैं कि क्या बहुत देर हो चुकी है। जेडीयू के एक नेता ने कहा कि निशांत की ताकत और कमजोरी दोनों यही है कि वह नीतीश कुमार के बेटे हैं। उन्हें एक नेता के रूप में तेजी से विकसित होना होगा। उन्होंने अपने पिता की राजनीति को करीब से देखा है। उन्हें बस बिहार में घूमना-फिरना है। अपने पिता की समृद्ध राजनीतिक विरासत के कारण उन्हें जनता का समर्थन और आशीर्वाद दोनों मिलेगा।

बिहार के सीएम का नाम चौंकाने वाला भी हो सकता है!
बीजेपी के लिए यह किसी बड़े अवसर से कम नहीं है। 89 सीटों के साथ, वह अगले कुछ वर्षों में जेडीयू और अन्य छोटे सहयोगी दलों के साथ निर्बाध रूप से सत्ता में बने रहने की उम्मीद कर सकती है। उसकी असली चुनौती 2030 के बाद आएगी और उसे एक मजबूत नेता नियुक्त करने की आवश्यकता है। सुशील मोदी के निधन के बाद से, भाजपा के पास राज्य में और भी चेहरे हैं। 2024 के बाद ही उसे सम्राट चौधरी के रूप में एक मजबूत नेता मिला, जो ओबीसी कुशवाहा निर्वाचन क्षेत्र से आते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उनका नाम भी है। लेकिन बीजेपी पिछले एक दशक से मुख्यमंत्री के रूप में कई बार चौंकाने वाले नाम भी सामने लाई है। इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि बिहार के नए मुख्यमंत्री का नाम सबको चौंकाने वाला भी हो सकता है। हाल ही में बीजेपी ने बिहार से ही नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सबको चौंकाया है।

बिहार में जीरो से शिखर तक का भाजपा का शानदार सफर
बिहार में भाजपा का सफर वास्तव में “जीरो से शिखर” तक पहुंचने की कहानी है। शुरुआती दौर में पार्टी की मौजूदगी बहुत सीमित थी। लेकिन संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं की मेहनत और राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति ने धीरे-धीरे पार्टी को मजबूत किया। अटल-अडवाणी के दौर से शुरू हुआ यह विस्तार अब पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा है। बिहार की राजनीति लंबे समय तक गठबंधन की राजनीति से संचालित होती रही है। भाजपा ने भी इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए रणनीति बनाई। जदयू के साथ गठबंधन ने भाजपा को राज्य में स्थायित्व और विस्तार दोनों दिया। लेकिन जनता-जनार्दन के अटूट विश्वास और कार्यकर्ताओं की असीम मेहनत से भाजपा का संगठन इतना मजबूत हो गया कि अब वह अपने दम पर सत्ता का दावेदार बन चुका है। यही कारण है कि सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भाजपा पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाल सकती है।

मंदिर निर्माण पर हो रही थी बात, आरफा खानम ने रखी ‘मस्जिद’ की डिमांड: हिंदू महिलाओं ने लताड़ा तो RSS को देने लगीं गाली

             मंदिर निर्माण की माँग को आरफा ने दिया सामप्रदायिक रंग (फोटो साभार : YT_@TheWireNews)
प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फँस गई हैं। नोएडा की एक पॉश सोसाइटी में मंदिर निर्माण के सीधे-साधे मुद्दे को ‘सांप्रदायिक’ रंग देने और अपना पुराना ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ चमकाने पहुँची आरफा को वहाँ की जागरूक हिंदू महिलाओं ने ऐसा करारा जवाब दिया कि उन्हें वहाँ से उल्टे पाँव भागना पड़ा।

आरफा, जो हिंदू महिलाओं को ‘गैसलाइट’ करने और उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराने गई थीं, खुद ट्रोल होकर लौटी हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आरफा खानम की पत्रकारिता का मकसद जमीन की हकीकत दिखाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे में बीजेपी, RSS और मुस्लिम एंगल घुसाकर समाज में दरार पैदा करना है।

वीडियो की हकीकत: आरफा के ‘मस्जिद कार्ड’ पर महिलाओं का जवाब

सोशल मीडिया पर आरफा खानम का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे नोएडा के सेक्टर 15ए की महिलाओं से बातचीत कर रही हैं। इस वीडियो में महिलाओं अपनी माँग को बताती है कि उन्हें मंदिर सोसाइटी में चाहिए, जिससे काफी दूर आना-जाना, ट्रैफिक में फँसना बंद हो जाएगा और बुजुर्गों के लिए सुविधा हो जाएगी। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कोई भी महिला आरफा से ना तो बदतमीजी से बातचीत कर रही है, ना ही तेज आवाज में चिल्ला रही है और ना ही धक्का-मुक्की कर रही हैं।

आरफा ने जितने भी सवाल वहाँ खड़ी हिंदू महिलाओं से पूछे है उनके जवाब उन्हें बेहद शांतिपूर्ण तरीके से मिला है। अपना मुस्लिम और मस्जिद विक्टिम कार्ड घुसाने पर भी महिलाओं ने उन्हें ये ही कहाँ है कि आप अपना एजेंडा यहाँ मत लाओ। मंदिर की बात है, मंदिर तक रहने दो। वीडियो में आप सुन सकते हैं कि जब मंदिर की माँग ज्यादा कर रही लोगों की तादाद ज्यादा थी, तो प्रोपेगेंडाई पत्रकार आरफा ने मस्जिद बनवाने पर भी सवाल कर डाला। आरफा महिलाओं से कहने लगी कि फिर तो मस्जिद भी बनना चाहिए।

इस सवाल का जवाब महिलाओं ने बेहत लहजे से दिया कि जब सोसाइटी में 99.99 प्रतिशत हिंदू लोग है तो मस्जिद बनवाना या ना बनवाना कहाँ से आ जाता है। फिर आरफा ने महिलाओं की तादात को ‘मेजोरिटिज्म’ शब्द से नवाजा, जिसका जवाब भी हिंदू महिलाओं ने बेहद तरीके और करारा दिया। वहाँ खड़ी एक हिंदू महिला ने आरफा को कहा- “हमें ऐसा लग रहा है कि अपने ईश्वर का नाम लेने में क्रिमिनल करार दिया जा रहा है।”

महिला ने आरफा को सीधा मुँह यह भी जवाब दिया कि यह महीने आज से 40 साल पहले नोएडा के मास्टर प्लान में मंदिर के लिए डेजिग्नेटिड यानि नामित थी। 40 साल पहले इतना ट्रैफिक नहीं हुआ करता था और लोग आसानी से दूर मंदिर जा सकते हैं। लेकिन आज ट्रैफिक बढ़ रहा है, समय नहीं है, लोग बुजुर्ग है, कुछ दिव्याँग है, तो कुछ लोगों के पास गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है कि वह उन्हें मंदिर तक ले जाए।

वहाँ खड़ी एक महिला ने तो साफ कहा कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, ये हम लोगों की माँग है। इसके अलावा भी आरफा को हिंदू महिलाओं ने उनके कट्टरपंथी एजेंडे पर काफी बढ़िया जवाब दिया है, जिसे आप वीडियो में सुन सकते हैं। महिलाओं ने आरफा को ये ही कहा कि आप अपने एजेंडा यहाँ मत थोपिए… महिलाओं ने साफ कहा कि हमें पता है आपका एजेंडा क्या होता है, आप एक Biased साइड के लिए रिपोर्टिंग करती है। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स ने आरफा के इस वीडियो पर काफी हँसी उड़ाई। कुछ लोगों ने लिखा कि जनता अब नफरत भरे एजेंडे पर यकीन नहीं कर रही है। अब जनता झगड़े के बजाय फैक्ट्स पर यकीन कर रही है।

The Wire का खेल: एडिटिंग का मायाजाल और फर्जी हेडलाइन

जब ग्राउंड पर आरफा का एजेंडा बुरी तरह फेल हो गया, तो उनके संस्थान ‘The Wire’ ने डैमेज कंट्रोल के लिए अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला। इस वीडियो का टाइटल दिया गया- ‘मंदिर का समर्थन पर ‘लोकतंत्र’ से समस्या, उग्र महिलाओं ने आरफ़ा के साथ की धक्का-मुक्की’।

इस टाइटल और वीडियो की एडिटिंग को गौर से देखें तो ‘The Wire’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो जाता है। वीडियो की शुरुआत में ही आरफा इसे ‘अमीर लोगों की सोसाइटी’ और ‘BJP वोटर्स’ का गढ़ बताकर नफरत फैलाना शुरू कर देती हैं। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव पास हैं और RSS पूरी हरकत में आ गई है, हमारे समाज का हिंदूकरण कम पड़ गया था जो अब घर तक मंदिर की बात आ गई है।”

आरफा ने जानबूझकर इसे ‘RSS का प्रोजेक्ट’ करार दिया और अपने दर्शकों से कहा कि ‘आप 100 साल के RSS को देख रहे हैं कि वे कैसे घुसपैठ कर रहे हैं।’ ‘The Wire’ ने वीडियो को इस तरह से काट-छाँट कर पेश किया है ताकि हिंदू महिलाएँ ‘उग्र’ दिखें, जबकि असल में आरफा खुद महिलाओं को उकसा रही थीं और उन्हें अपराधी साबित करने पर तुली हुई थीं। वीडियो में कहीं भी वह धक्का-मुक्की नहीं है जिसका दावा हेडलाइन में किया गया है। लेकिन आरफा अपनी आदत के मुताबिक ‘डोंट टच मी’ कहकर खुद को पीड़ित दिखाने का नाटक करती रहीं।

क्या है पूरा मामला? क्यों हो रही है मंदिर की माँग?

नोएडा के सेक्टर 15A का यह पूरा मामला कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों की बुनियादी सुविधा और उनके अधिकारों का मामला है। इस सोसाइटी में रहने वाले लगभग 99 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू लोग चाहते हैं कि उनकी सोसाइटी के भीतर एक मंदिर बन जाए। इसके पीछे बहुत ही साधारण वजहें हैं।

पहली वजह यह है कि सोसाइटी के पास कोई मंदिर नहीं है, जिसके कारण बुजुर्गों को पूजा-पाठ के लिए काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी समस्या ट्रैफिक और जाम की है, मुख्य मंदिर दूर होने की वजह से लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, वहाँ की महिलाओं का कहना है कि 40 साल पहले जब इस इलाके का नक्शा बना था, तभी यह जमीन मंदिर के लिए ही तय की गई थी।

लेकिन इस सीधी-सादी माँग को पत्रकार आरफा खानम ने एक अलग ही रंग दे दिया। उन्हें इसमें ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश और जमीन हड़पने जैसा गंभीर मामला नजर आने लगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे एक खतरे की घंटी (वेक-अप कॉल) बताया। जबकि हकीकत यह है कि वहां के निवासी सिर्फ अपनी ही जमीन पर अपनी आस्था और सुविधा के लिए मंदिर बनवाना चाहते हैं, जो उनका अधिकार है।

एजेंडा पत्रकारिता की हार

आरफा खानम की पूरी रिपोर्टिंग का मकसद यह था कि सेक्टर 15A को ‘RSS की प्रयोगशाला’ साबित किया जाए। उन्होंने जानबूझकर बातचीत में नरेंद्र मोदी और BJP को घुसाया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मैजोरिटी टेररिज्म’ का नैरेटिव सेट कर सकें। वे वहाँ रिपोर्टिंग करने नहीं, बल्कि महिलाओं को डराने और उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने गई थीं।

आरफा खानम वही चेहरा हैं जिन्होंने शाहीन बाग के समय मुस्लिमों को सलाह दी थी कि ‘विचारधारा न बदलें, बस रणनीति बदलें।’ नोएडा में भी वे इसी ‘रणनीति’ के साथ आई थीं, पहले निष्पक्ष पत्रकार होने का ढोंग करना और फिर धीरे से ‘मस्जिद’ और ‘मुस्लिम अधिकार’ का रोना रोकर हिंदुओं को दबाना।

लेकिन नोएडा की इन महिलाओं ने उनकी इस चाल को भांप लिया और उन्हें साफ कह दिया ‘अपना एजेंडा यहाँ मत चलाइए।’ जब आरफा का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ नहीं चला, तो वे आक्रामक हो गईं और बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने लगीं।