क्या गांधी परिवार ने दशकों तक किया भारत के रणनीतिक हितों का सौदा? टॉप ट्रेंड हो रहा है #CompromisedCongress


एक कहावत है आसमान पर थूका अपने ऊपर ही आता है जो कांग्रेस पर सटीक बैठता है। जब से सोनिया गाँधी से लेकर राहुल-प्रियंका द्वारा तक मोदी-योगी-अमित और बीजेपी आदि पर भारत विरोधी ताकतों की कठपुतली बन आरोपित कर रहे हैं उलटे कांग्रेस के ही गढ़े मुद्दे(भ्रष्टाचार और दबाव में आकर compromise) बाहर लाने में जनता को मजबूर कर दिया है। 2014 से पहले कमजोर विपक्ष होने के कारण कोई ज्यादा बोलने की हिम्मत नहीं कर पाता था लेकिन स्थिति एकदम विपरीत है। अब INDI गठबंधन में शामिल पार्टियों को आत्ममंथन करने की जरुरत है। ऐसे में उनका कांग्रेस को समर्थन करना आत्मघाती साबित हो रहा है।      

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आज सुबह से ही #CompromisedCongress टॉप ट्रेंड कर रहा है। यूजर्स पुराने दस्तावेजों, ऐतिहासिक भूलों और रक्षा सौदों का हवाला देकर कांग्रेस पार्टी, खासकर गांधी परिवार पर तीखा हमला बोल रहे हैं। लोगों का आरोप है कि आजादी के बाद से ही कांग्रेस की नीतियों में देश प्रथम के बजाय परिवार और निजी हित सर्वोपरि रखा है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ट्वीट्स में लोग आरोप लगा रहे हैं कि नेहरू काल में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट को ठुकरा कर चीन का समर्थन किया, जो आज भारत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है। यूजर्स का कहना है कि तिब्बत को बफर स्टेट के रूप में खोना और अक्साई चिन कॉरिडोर पर चुप्पी साधना देश की अखंडता के साथ बड़ा समझौता था। इतना ही नहीं लोग 1971 की ऐतिहासिक जीत के बाद हजारों पाकिस्तानी युद्धबंदियों को बिना कोई रणनीतिक लाभ के छोड़ देने को कांग्रेस का सरेंडर बता रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोग यह भी कह रहे हैं कि शीत युद्ध के दौरान भारत की खुफिया एजेंसियों और सरकारी मशीनरी में विदेशी ताकतों की पैठ बढ़ी। लोगों का आरोप है कि गांधी परिवार के शासनकाल में विदेशी फंडिंग और पारिवारिक नेटवर्किंग ने देश की सुरक्षा लाइनों को ‘सौदेबाजी की मेज’ पर लाकर खड़ा कर दिया।

लोगों का कहना है कि गांधी परिवार के नेतृत्व में जीप घोटाले से लेकर बोफोर्स और फिर वीवीआईपी चॉपर घोटाले तक, रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार की एक लंबी श्रृंखला रही है। राहुल गांधी द्वारा हाल के वर्षों में विदेशी धरती पर जाकर भारत की आलोचना करने और चीन के साथ गुप्त समझौते के आरोपों को भी लोग पुरानी फाइलों से खंगाल- खंगाल कर निकाल शेयर कर रहे हैं। आप भी देखिए लोग किस तरह से कांग्रेस और गांधी परिवार को लताड़ लगा रहे हैं…

उत्तर प्रदेश : PDA को लेकर अखिलेश की सपा में घमासान, हर बार यादव ही क्यों दे कुर्बानी?: क्यों वायरल हो रहा अफजाल अंसारी का बयान

                           पीडीए को लेकर समाजवादी पार्टी में घमासान, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: ChatGPT)
कभी-कभी एक पुराना बयान भी आग की तरह फैल जाता है। ठीक यही उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों हो रहा है। दरअसल, गाजीपुर के सपा सांसद अफजाल अंसारी का करीब एक साल पुराना भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उसमें उन्होंने साफ कहा था कि “सबसे बड़ी कुर्बानी यादव भाइयों को देनी होगी।” अब इस बयान पर पूर्व एमएलसी काशीनाथ यादव ने 9 फरवरी 2026 को 
जोरदार पलटवार किया है। उन्होंने कहा, “हर बार यादव ही क्यों कुर्बानी दें?” और अफजाल अंसारी को चुनौती दी कि पहले वे अपनी सीट छोड़कर देखें।

यह विवाद सिर्फ दो नेताओं के बीच नहीं है। यह पूरे पीडीए फॉर्मूले की असली परीक्षा है। क्या यादव समाज, जो लंबे समय से समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है, अब अपनी हिस्सेदारी कम करके अन्य वर्गों को आगे आने देगा? या फिर अंदरूनी खींचतान से पीडीए का सपना चूर-चूर हो जाएगा?

पीडीए फॉर्मूला है क्या और क्यों लाया गया?

समाजवादी पार्टी की जड़ें कथित तौर पर यादव-मुस्लिम वोटबैंट के समीकरण में हैं। मुलायम सिंह यादव ने 1992 में सपा बनाई तो मुख्य आधार यादव और मुस्लिम थे। इसे एमवाई कहा जाता था। यह फॉर्मूला कई बार सरकार भी बना चुका है। लेकिन 2014 से 2022 तक सपा को लगातार झटके लगे। भाजपा ने अपना हिंदुत्व और विकास का नारा देकर यादव-मुस्लिम के अलावा अन्य पिछड़ों और दलितों को अपनी तरफ खींच लिया।

अखिलेश यादव ने 2023 में नया प्लान बनाया- पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक। इसमें यादव के अलावा लोध, गुर्जर, राजभर, कुर्मी जैसी पिछड़ी जातियाँ, जाटव-पासी जैसे दलित और मुस्लिम-अल्पसंख्यक सब शामिल हैं। अखिलेश का कहना था कि यह 90 प्रतिशत लोगों का गठजोड़ है जो भाजपा के खिलाफ है।

साल 2024 लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले ने कमाल दिखाया। सपा ने 33 सीटें जीतीं। उनमें से 86 प्रतिशत सांसद पिछड़े, दलित या मुस्लिम वर्ग से थे। टिकट बंटवारे में गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को ज्यादा मौका मिला। कई यादव नेताओं ने इस फैसले का स्वागत किया क्योंकि पार्टी की सीटें बढ़ीं। लेकिन कुछ यादव कार्यकर्ता और नेता महसूस करने लगे कि उनकी पुरानी ताकत अब बंट रही है। यहीं से असंतोष की शुरुआत हुई।

अफजाल अंसारी के बयान से खींचतान आई सामने

अफजाल अंसारी गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। वे मुस्लिम समुदाय से हैं और सपा में अल्पसंख्यक चेहरा माने जाते हैं। करीब एक साल पहले (2025 में) उन्होंने गाजीपुर में एक बैठक में पीडीए को मजबूत करने की बात करते हुए कहा, “अगर पीडीए को सशक्त बनाना है तो सबसे बड़ी कुर्बानी यादव भाइयों को देनी होगी।”

उनका मतलब साफ था- यादव समाज को पद, टिकट और सत्ता की हिस्सेदारी में पीछे हटना होगा। ताकि अन्य पिछड़े, दलित और मुस्लिम नेताओं को बराबर मौका मिले। उन्होंने कहा कि सिर्फ बैठकें करने से काम नहीं चलेगा, त्याग करना पड़ेगा। यह बयान उस समय भी चर्चा में रहा लेकिन सोशल मीडिया पर अब इतना फैला कि हर कोई इसे देख रहा है।

कई लोग इसे सकारात्मक मानते हैं। वे कहते हैं कि अफजाल अंसारी सही कह रहे हैं। अगर पीडीए को असली मायने में समावेशी बनाना है तो पुराने वर्चस्व वाले वर्ग को त्याग दिखाना होगा। लेकिन यादव समाज के बड़े हिस्से को यह बात नागवार गुजरी। वे पूछते हैं- हमने पार्टी बनाई, संघर्ष किया, जेल गए, तो अब हम ही क्यों पीछे हटें?

काशीनाथ यादव का पलटवार बनी असंतोष की असली आवाज

9 फरवरी 2026 को स्वर्गीय कैलाश यादव की पुण्यतिथि पर गाजीपुर-मऊ क्षेत्र में एक कार्यक्रम था। वहाँ पूर्व एमएलसी काशीनाथ यादव ने मंच से सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “हर बार यादव ही क्यों कुर्बानी दें? अफजाल अंसारी पहले अपनी गाजीपुर सीट छोड़कर देखें कि कोई अन्य जाति का व्यक्ति वहाँ जीत पाता है या नहीं।”

काशीनाथ यादव खुद यादव समाज के बड़े नेता हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ नेता समय-समय पर दल बदलते रहते हैं। ऐसे में यादव समाज बार-बार अपना हक क्यों छोड़े? उनका बयान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं था। कई यादव कार्यकर्ता उनके साथ खड़े दिखे। यह बयान बताता है कि सपा के अंदर यादव वर्ग में गुस्सा पनप रहा है। वे महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत का फल दूसरे ले जा रहे हैं।

यादव समाज की भूमिका और कुर्बानी की असली माँग

यादव समाज उत्तर प्रदेश में करीब 9 प्रतिशत आबादी का है। वे ओबीसी में सबसे संगठित और प्रभावशाली हैं। सपा के जन्म से लेकर आज तक हर स्तर पर यादव नेता रहे हैं- जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, मंत्री, सांसद। मुलायम सिंह यादव यादव थे, अखिलेश यादव यादव हैं। इसलिए यादवों का भावनात्मक लगाव पार्टी से बहुत गहरा है।

अब पीडीए में जब अन्य पिछड़ों को टिकट दिए जा रहे हैं तो यादवों की संख्या कम हो रही है। साल 2024 में कई यादव उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला। यही ‘कुर्बानी’ की बात है जिसका जिक्र अफजाल अंसारी ने किया। लेकिन यादव नेता पूछ रहे हैं- हम त्याग करें तो क्या बदले में हमें सम्मान और सुरक्षा मिलेगी? या फिर हमारी उपेक्षा होगी?

पीडीए के अंदर तीन बड़े टकराव

यादव बनाम अन्य पिछड़े: यादवों को लगता है कि वे सबसे ज्यादा संगठित हैं इसलिए उनकी हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन अन्य पिछड़े जैसे राजभर, निषाद कहते हैं कि हम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यादव-मुस्लिम रिश्ता: मुस्लिम 19 प्रतिशत आबादी के हैं। वे 90 प्रतिशत वोट सपा को देते हैं। अफजाल अंसारी मुस्लिम प्रतिनिधि हैं। यादव कहते हैं कि मुस्लिम तो वोट देते हैं लेकिन पद कम लेते हैं। अब जब मुस्लिम नेताओं को ज्यादा जगह दी जा रही है तो टकराव बढ़ रहा है।

दलितों का शामिल होना: दलित 21 प्रतिशत हैं। सपा ने कई दलित नेताओं को जोड़ा है। लेकिन दलितों में अभी भी असंतोष है। वे पूछते हैं कि सपा के शासन में उनके साथ क्या हुआ था? क्या अब वाकई बराबरी मिलेगी?

ये तीनों टकराव पीडीए को कमजोर कर सकते हैं अगर सपा ने इन्हें नहीं संभाला तो। हालाँकि दलितों का बड़ा वोटबैंक अब भी सपा से दूर है। वो परंपरागत तौर पर बीएसपी के लिए वोट करता रहा है और अब गैर-जाटव दलितों का बड़ा वोट बीजेपी को मिलने लगा है।

साल 2027 के चुनावों में क्या असर पड़ेगा?

साल 2027 का विधानसभा चुनाव करीब हैं। सपा पीडीए को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही है। लेकिन अगर यादव कार्यकर्ता नाराज रहे तो वोट ट्रांसफर नहीं होगा। यादव बूथ स्तर पर सबसे ज्यादा काम करते हैं। अगर वे उत्साह नहीं दिखाएँगे तो पूरा समीकरण बिगड़ सकता है।

दूसरी तरफ अगर यादव समाज कुर्बानी दे देता है तो पीडीए और मजबूत हो सकता है। भाजपा इस विवाद को अपना फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेता कह रहे हैं कि सपा में यादव-मुस्लिम की लड़ाई शुरू हो गई है।

अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती

अखिलेश यादव को तीन काम करने होंगे:

  1. यादव समाज को समझाना कि त्याग से पार्टी मजबूत होगी और सबका भला होगा।
  2. अन्य वर्गों को विश्वास दिलाना कि उनकी भागीदारी सिर्फ कागज पर नहीं, हकीकत में है।
  3. पार्टी के अंदर अनुशासन बनाए रखना ताकि बयानबाजी न बढ़े।
अगर वे यह संतुलन साध लेते हैं तो पीडीए 2027 में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकता है। वरना यह नारा सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।

फिलहाल तो लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या यादव समाज वाकई कुर्बानी देने को तैयार है? क्या अफजाल अंसारी जैसे नेता खुद अपनी सीटों पर त्याग दिखाएँगे? क्या अखिलेश यादव इस असंतोष को संभाल पाएंगे?

यह विवाद सिर्फ सपा की अंदरूनी बात नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति की असली तस्वीर है। जहाँ एक तरफ सामाजिक न्याय का सपना है, दूसरी तरफ वास्तविकता में हिस्सेदारी की लड़ाई है। अभी तो समय बताएगा कि पीडीए एकजुट रहता है या आंतरिक खींचतान में बिखर जाता है। लेकिन एक बात तय है कि अखिलेश यादव का चुनावी पीडीए अब बिखरता दिख रहा है।


    जाति व्यवस्था को लेकर हिन्दुओं को घेरने वाले बता रहे पूला एंथनी को पहला ‘दलित’ बिशप: ईसाइयत अपनाने के बाद कैथोलिक को लीड करने वाला SC कैसे?

                                                             कार्डिनल बिशप पूला एंथनी (साभार-HT)
    हैदराबाद के आर्कबिशप कार्डिनल पूला एंथनी को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। CBCI भारत में कैथोलिक क्रिश्चियंस का ऐसा संगठन है, जो धार्मिक नियम कानून तय करता है।
     

    पूला एंथनी को अध्यक्ष चुने जाने को मीडिया में ऐसे दिखाया गया कि एंथनी देश के पहले ऐसे दलित क्रिश्चियन हैं, जो देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिक को लीड करेंगे!

    दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे?

    अब सवाल ये उठता है कि आखिर कोई दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे हो सकता है? ईसाई तो कैथोलिक होते हैं, प्रोटेस्टेंट होते हैं और जाति व्यवस्था तो हिंदुओं में होती है।

    ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र…अगड़ा-पिछड़ा, दलित-OBC ये सब तो हिंदुओं के वर्गीकरण हैं? फिर भला कार्डिनल एंथनी दलित कैसे हुए और ‘दलित’ रहते हुए वो ईसाइयत के प्रति कितने समर्पित हो सकते हैं। इसके बावजूद मीडिया में ये कहा जा रहा है कि वो दलित हैं! ईसाइयों में जब सब बराबर होते हैं, तो फिर कोई दलित कैसे हो गया।

    ईसाइयत की किताब बाइबिल तक कहती है कि सब बराबर हैं, सबको गॉड ने बनाया है। सब गॉड के लिए बराबर हैं। भारत में गाँव-गाँव धर्मांतरण करवाती मिशनरियाँ यही बताती घूमती हैं कि सनातन छोड़ोगे, तो जाति व्यवस्था में ऊपर बढ़ोगे? ईसाई बनोगे तो बराबर हो जाओगे। जाति व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी।

    बराबरी की बात कह बरगलाते हैं मिशनरी

    जो एसटी- एससी समाज के लोग ईसाइयत को अपनाते हैं, उनके लिए यह दलील दी जाती हैं कि वे जाति व्यवस्था से तंग आकर ईसाइयत की तरफ आकर्षित हुए।

    लेफ्ट लिबरल लॉबी भी इसी बात को लेकर सनातन को गालियाँ देती है कि यहाँ जाति-व्यवस्था हावी है। यहाँ कथित नीची जातियों को बराबर नहीं माना जाता, यहाँ कथित तौर पर लोगों को मंदिरों में घुसने की आजादी नहीं है, यहाँ उन्हें दलित और अगड़ा-पिछड़ा में बांटा जाता है, इसीलिए लोग सनातन छोड़ कर ईसाइयत अपना लेते हैं।

    तो ये जाति सूचक शब्द आखिर ईसाई बनने के बाद भी पूला एंथनी के साथ कैसे चिपका रह गया? और अगर ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रह जाता है, तब तो ईसाइयत अपनाने और धर्मांतरण को लेकर जो भी प्रचार-प्रसार किया जाता है, वह सब गलत है। इसका कोई जवाब ना लेफ्ट लिबरल लॉबी के पास होगा और ना सनातन को डेंगू मलेरिया बताने वाले नेताओं के पास!

    मीडिया ने भी दलित कार्डिनल एंथनी की बात कही

    कार्डिनल एंथनी कैसे इतने दूर तक पहुँचे और कैसे ये ऐतिहासिक है! मीडिया यही बताने में लगा है। चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो या टाइम्स ऑफ़ इंडिया। हर कोई इस बात को हाईलाइट कर रहा है कि देखिए दलित व्यक्ति अब 2 करोड़ लोगों के धार्मिक तौर तरीके मैनेज करेगा!

    उनकी कहानी बताने वाली ईसाईयत से जुड़ी वेबसाइट्स भी कार्डिनल एंथनी में ‘दलित’ को ढूँढ रही है। बताती हैं कि दलित माता-पिता के घर पैदा हुए एंथनी युवावस्था में मिशनरी की हेल्प से गरीबी से बाहर आए। अब मिशनरी की सहायता से कैसे कोई गरीब आदमी ‘गरीबी’ से बाहर निकलता है, ये सबको पता है। पैसे का लालच, पढ़ाई और इलाज का लालच धर्मांतरण के लिए आम बात है। इसको लेकर आए दिन घटनाएँ देशभर में घटती रहती हैं।

    देश का संविधान भी नहीं मानता कि ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाला दलित रह सकता है। उन्हें माइनॉरिटी कह सकते हैं, लेकिन SC/ST नहीं कहा जाता है।

    ऐसे धर्मांतरण के मामलों को लेकर साल 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाई गई। इस आयोग ने सिफारिश दी थी कि अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से धर्म से अलग होना चाहिए और ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

    लेकिन UPA सरकार भी इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर पाई, क्योंकि ये आधार ही गलत है। ये सीधे तौर पर दशकों से हाशिये पर पड़े लोगों के साथ धोखा होगा। ईसाई-मुस्लिम बने लोग एससी-एसटी के अधिकारों पर डाका डालने लगेंगे।

    कमेटी ने तो ये भी कहा था कि दलित क्रिश्चियन भी गैर बराबरी का शिकार है, लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर ईसाईयत में सभी बराबर हैं तो गैर बराबरी कैसे और कोई पिछड़ा-दलित कैसे हो सकता है? सब तो चर्च जाने वाले और जीसस को मानने वाले हुए।

    केरल में अगड़ा-पिछड़ा-दलित क्रिश्चियन

    दरअसल ये ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल दिखाता है कि ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को खुद मिशनरियाँ ही बराबर नहीं मानती। जो बराबरी की बात कर पिछड़ों-दलितों और जनजातीय समाज के लोगों को बरगलाते हैं और धर्मांतरण करवाते हैं, वो पहचान तब भी नहीं छूटती जब कोई ईसाइयत के ऊँचे स्थान पर पहुँच जाता है।

    केरल जैसे राज्यों में तो आज भी ईसाइयों के भीतर भयानक जातिवाद है। यहाँ कुछ ईसाई अपने को ऊँची जाति का बताते हैं और दलित से ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को हीन भावना से देखते हैं। मिशनरी यहाँ कुछ नहीं कर पातीं।

    असल में बराबरी का फर्जीवाड़ा सिर्फ और सिर्फ उस सनातन को कमजोर करने के लिए है, जिसने ना सिर्फ समय आने पर अपने में बदलाव किए हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएँ बनाई हैं कि पिछड़ों की भरपाई हो। आज राम मंदिर में पुजारी दलित समाज से हैं! किसी मंदिर में कोई नहीं पूछता कि आप किस जात से हो।

    सुप्रीम कोर्ट के जजों की मर्यादा; जस्टिस उज्जवल भुईया किस अधिकार से कॉलेजियम पर सरकार की शक्तियों को ललकार रहे हैं जबकि CJI कॉलेजियम को ख़त्म करने की बात की थी

    सुभाष चन्द्र

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 76 वें संविधान दिवस 26 नवंबर, 2025 को 4 महीने पहले वरिष्ठ अधिवक्ता Mathews J Nedumpara की NJAC को पुनर्जीवित करने की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी। वैसे चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने भी नेदुमपरा को उनकी याचिका पर सुनवाई करने की गोली पिलाई थी लेकिन बाद में 24 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से ही उनकी याचिका खारिज करा दी जबकि उसे सुनवाई के लिए चंद्रचूड़ जी ने स्वीकार किया था 

    लेकिन कल जब Nedumpara ने अडानी/अंबानी के मामलों पर तुरंत सुनवाई होने की बात कही लेकिन उनकी याचिका नहीं सुनी जा रही, तब सूर्यकांत जी नाराज़ हो गए और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि मेरी अदालत में सोच समझ कर बोलें और यह भी कहा कि आपकी याचिका सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में मौजूद ही नहीं है मौजूद कैसे होगी जब चंद्रचूड़ जी उसे बट्टे खाते लगवा दिया था

    लेखक 
    चर्चित YouTuber 
    एक तरफ चीफ जस्टिस NJAC शुरू करने की उम्मीद जगा रहे थे तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइया ने कॉलेजियम पर अपना ज्ञान बघार रहे हैं उन्होंने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि “केंद्र के अनुशंसा पर जजों का ट्रांसफर करके न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता एक जज का केवल इसलिए ट्रांसफर नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कोई फैसला दिया है क्योंकि उससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता compromise होती है केंद्र सरकार का हाई कोर्ट के जजों के ट्रांसफर/पोस्टिंग में कोई रोल नहीं है और केंद्र नहीं कह सकता किस जज का ट्रांसफर करना है और किसका नहीं यह केवल न्यायपालिका का अधिकार क्षेत्र है और जब कॉलेजियम किसी ट्रांसफर पर कारण रिकॉर्ड करता है तो उसे केंद्र सरकार नहीं रोक सकती”

    1981 के 1st Judge Case में SP GUPTA ने किसी कॉलेजियम की मांग नहीं की थी लेकिन यह मामला बढते बढ़ते कॉलेजियम के स्थापना पर ख़त्म हुआ जबकि इस कॉलेजियम का प्रावधान संविधान में नहीं था और इसकी स्थापना को संसद से भी मंजूरी नहीं मिली लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तानाशाह के रूप में कॉलेजियम को देश पर थोप दिया कॉलेजियम बना कर संसद के अधिकार को भी खाक में मिला दिया

    इतना ही नहीं कॉलेजियम ने संवैधानिक प्रावधान को भी बदल दिया जिसमें चीफ जस्टिस से राष्ट्रपति द्वारा जजों की नियुक्ति के लिए Consultation की बात कही हुई थी लेकिन कॉलेजियम ने उसे Concurrence में बदल दिया। मतलब सुप्रीम कोर्ट/न्यायपालिका ने स्वयं ही ऐसा कानून बना कर संसद, कार्यपालिका और संविधान प्रमुख राष्ट्रपति सभी के अधिकारों पर हथौड़ा चला दिया

    जस्टिस भुईया सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य भी नहीं हैं वे कभी चीफ जस्टिस भी नहीं बनेंगे और सुप्रीम कोर्ट के जजों की Seniority List में उनका नंबर 18 है ऐसे में क्या उनका सरकार को चुनौती देना क्या शोभा देता है?  

    स्वतंत्रता किसी संस्था को ऐसी भी नहीं होनी चाहिए जो दूसरी हर किसी संस्था के अधिकार क्षेत्र में कानून के नाम पर हस्तक्षेप करे लेकिन खुद उनके कार्यों की समीक्षा कोई न करे एक बार प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान दिवस पर ही कहा था कि जब किसी संस्था पर कोई कंट्रोल नहीं होता तो उसे लक्ष्य से भटकने से कोई नहीं रोक सकता और 2 महीने बाद ही सुप्रीम कोर्ट के 5  जज सड़क पर आ गए थे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने

    कोई मेरी बात का बुरा न माने लेकिन लुटेरों और डकैतों के भी अपने इलाके होते है जहां वो किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करते लेकिन वे खुद हर किसी के इलाके में मुंह मारते हैं

    योगी के विदेश जाते ही अखिलेश का शेर बनने का ड्रामा


    खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है उसी तरह राहुल गाँधी की सौबत में रहकर अखिलेश यादव का भी दिमाग गुड़-गोबर हो गया है। कोई अखिलेश से पूछे मुश्किल से एक साल के बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव होना है और इतने कम समय के लिए कौन महामूर्ख मुख्यमंत्री बनने में लालच में पार्टी को छोड़ेगा? वैसे यह गन्दा खेल अखिलेश कई बार खेल चुके हैं लेकिन हर बार परिणाम जीरो ही रहा। अखिलेश ने समझा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व्यापार के लिए भारत से बाहर क्या गए मानो अखिलेश के हाथों कोई बटेर लग गयी। 
    मुख्यमंत्री रहते अखिलेश प्रदेश हित के लिए कितनी बार विदेश गए?   
    समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा डिप्टी सीएम को सौ विधायक लाने पर मुख्यमंत्री बनाने के कथित ऑफर को लेकर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने बिना नाम लिए सपा नेतृत्व पर जमकर निशाना साधा और कहा कि यह बयान ही साबित करता है कि उनके पास खुद सरकार बनाने की ताकत नहीं है...!!

    राजनीति अखाड़े की तरह होती है जहां अपने दम पर लड़ना पड़ता है उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव खुद अखाड़े के पहलवान तैयार करते थे संगठन को खड़ा करते थे और जमीन पर संघर्ष करते थे लेकिन आज हालात यह हैं कि भाड़े के पहलवान के सहारे अखाड़ा जीतने की सोच रखी जा रही है, भाड़े के पहलवान से कभी जीत हासिल नहीं की जा सकती....!!

    136 करोड़ रूपए के इनामी एल मैंचो की मौत के बाद मेक्सिको में भड़की हिंसा: भारत ने अपने नागरिकों से कहा- अगले आदेश तक घर से न निकलें

                      खूंखार ड्रग तस्कर एल मेंचो की मौत के बाद भड़की हिंसा (साभार: इंडिया टीवी, नवभारत टाइम्स)
    मेक्सिको इस समय अपने हालिया इतिहास के सबसे गंभीर सुरक्षा संकटों में से एक से गुजर रहा है। देश के कई राज्यों में अचानक भड़की हिंसा, आगजनी, गोलीबारी, सड़क जाम और व्यापक दहशत ने आम जनजीवन को लगभग ठप कर दिया है। सार्वजनिक परिवहन से लेकर हवाई सेवाएँ तक प्रभावित हुई हैं। बाजार बंद हैं, स्कूलों में छुट्टियाँ घोषित कर दी गई हैं और लोगों को घरों के अंदर रहने की सलाह दी गई है।

    इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में है मेक्सिको के सबसे कुख्यात ड्रग माफिया एल मेंचो की मौत। एक बड़े सैन्य ऑपरेशन में उसकी मौत के बाद उसके संगठन जालिस्को न्यू जेनरेशन कार्टेल (CJNG) ने पूरे देश में जवाबी हिंसा छेड़ दी। हालात इतने बिगड़ गए कि भारत, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों को भी अपने नागरिकों के लिए सुरक्षा एडवाइजरी जारी करनी पड़ी।

    मेक्सिको में अचानक क्यों भड़क उठी हिंसा?

    रविवार (22 फरवरी 2026) की देर रात मेक्सिको के पश्चिमी राज्य जालिस्को के छोटे से कस्बे Tapalpa में सेना और सुरक्षा बलों ने एक अत्यंत गोपनीय और बड़े स्तर का ऑपरेशन चलाया। इस ऑपरेशन का मकसद था CJNG के सरगना एल मेंचो को पकड़ना या मार गिराना।
    मुठभेड़ के दौरान एल मेंचो गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे तुरंत हेलीकॉप्टर से इलाज के लिए मेक्सिको सिटी ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। जैसे ही यह खबर फैली, CJNG के लड़ाकों ने बड़े पैमाने पर हिंसक जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।
    कार्टेल के हथियारबंद गुर्गों ने सड़कों पर गाड़ियाँ जला दीं, हाईवे जाम कर दिए, दुकानों और पेट्रोल पंपों को आग के हवाले कर दिया और सुरक्षा बलों पर हमले किए। देखते ही देखते हालात जालिस्को से निकलकर कई अन्य राज्यों तक फैल गए।

    कौन था एल मेंचो और दुनिया के सबसे खतरनाक ड्रग लॉर्ड्स में क्यों गिना जाता था?

    एल मेंचो का असली नाम नेमेसियो रूबेन ओसेगुएरा सर्वेंटेस था। उसका जन्म 1966 में मेक्सिको के मिचोआकान राज्य के एक गरीब गाँव में हुआ था। बेहतर जिंदगी की तलाश में वह 1980 के दशक में अमेरिका चला गया, लेकिन वहाँ अपराध की दुनिया में फँस गया।
    अमेरिका में वह हेरोइन तस्करी के मामलों में पकड़ा गया, जेल गया और बाद में मेक्सिको डिपोर्ट कर दिया गया। स्वदेश लौटने के बाद उसने कुछ समय तक स्थानीय पुलिस में नौकरी की, लेकिन जल्दी ही संगठित अपराध की ओर मुड़ गया।
    उसने मिलेनियो कार्टेल के जरिए अपनी पहचान बनाई और फिर 2009 में जालिस्को न्यू जेनरेशन कार्टेल (CJNG) की स्थापना की। कुछ ही वर्षों में CJNG मेक्सिको का सबसे ताकतवर और हिंसक ड्रग कार्टेल बन गया। यह संगठन अमेरिका और अन्य देशों में फेंटानिल, मेथामफेटामीन, कोकीन और हेरोइन की बड़े पैमाने पर तस्करी करता था।
    एल मेंचो अपने अत्यंत क्रूर तरीकों, खुलेआम सैन्य टकराव और भारी हथियारों के इस्तेमाल के लिए कुख्यात था। अमेरिका ने उसकी गिरफ्तारी पर 1.5 करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा था। उस पर अमेरिका में कई गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे और वह दुनिया के सबसे वांछित अपराधियों में शुमार था।

    कैसे ढेर हुआ एल मेंचो?

    मेक्सिको की सेना, नेशनल गार्ड और अन्य केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने मिलकर Tapalpa में यह विशेष ऑपरेशन अंजाम दिया। खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर लिया और एल मेंचो के ठिकाने पर छापा मारा। भीषण मुठभेड़ के दौरान एल मेंचो घायल हो गया।
    इस कार्रवाई में छह संदिग्ध कार्टेल सदस्य मारे गए, तीन सैनिक घायल हुए और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया। सुरक्षा बलों ने बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए, जिनमें रॉकेट लॉन्चर जैसे अत्याधुनिक हथियार शामिल थे, जो हेलीकॉप्टर गिराने और बख्तरबंद गाड़ियों को तबाह करने में सक्षम हैं।
    अधिकारियों ने इस ऑपरेशन को जोआक्विन ‘एल चापो’ गुजमान और इस्माइल जाम्बादा जैसे बड़े ड्रग लॉर्ड्स की गिरफ्तारी के बाद संगठित अपराध पर सबसे बड़ी कार्रवाई बताया।

    मौत के बाद बेकाबू हुई हिंसा: कई राज्यों में आगजनी और अराजकता

    एल मेंचो की मौत के कुछ ही घंटों के भीतर पूरे क्षेत्र में अराजकता फैल गई। जालिस्को, मिचोआकान, गुआनाहुआतो, तमाउलीपास, गुएरेरो और न्यूवो लियोन जैसे राज्यों में हिंसा की खबरें सामने आईं। 20 से ज्यादा सड़कों पर जलती हुई गाड़ियाँ खड़ी कर हाईवे जाम कर दिए गए।
    ग्वाडलहारा और पुएर्तो वायार्ता जैसे बड़े शहरों में दुकानें, फार्मेसियाँ और पेट्रोल पंप बंद कर दिए गए। कई जगहों पर आगजनी की घटनाएँ हुईं और आम लोग जान बचाकर घरों में दुबक गए। पर्यटन केंद्र पुएर्तो वायार्ता में हालात इतने खराब हो गए कि पर्यटकों ने इसे ‘युद्ध जैसे दृश्य’ बताया। हवाई अड्डों पर भगदड़ के माहौल में कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द करनी पड़ीं।

    स्कूल, खेल और उड़ानों पर असर: जनजीवन पूरी तरह ठप

    हालात बिगड़ने के चलते कई राज्यों में स्कूल बंद कर दिए गए और सार्वजनिक कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। 2026 फुटबॉल वर्ल्ड कप के तहत होने वाले कुछ आयोजनों को भी स्थगित करना पड़ा। मैक्सिको की घरेलू फुटबॉल लीग के कई मैच टाल दिए गए, महिला लीग और अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडली मुकाबले भी रद्द हुए।
    अमेरिका और कनाडा की प्रमुख एयरलाइनों ने पुएर्तो वायार्ता और आसपास के इलाकों के लिए उड़ानें निलंबित कर दीं, जिससे हजारों यात्री फँस गए।

    भारत की एडवाइजरी: भारतीय नागरिकों के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी

    हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत के दूतावास ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की। इसमें कहा गया कि जालिस्को (पुएर्तो वायार्ता, चापाला, ग्वाडलहारा), तमाउलीपास, मिचोआकान, गुएरेरो और न्यूवो लियोन में रह रहे भारतीय नागरिक अगले आदेश तक घर के अंदर ही रहें।
    दूतावास ने आपात स्थिति के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी करते हुए बतायै है कि मेक्सिको में रह रहे भारतीय नागरिक +52 55 4847 7539 इस नंबर कॉल करके संपर्क कर सकते हैं। लोगों से अपील की गई है कि वे स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के निर्देशों का पूरी तरह पालन करें।

    अमेरिका और कनाडा की चेतावनी: ‘शेल्टर इन प्लेस’ का आदेश

    भारत के अलावा अमेरिका ने भी अपने नागरिकों के लिए सख्त एडवाइजरी जारी की। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि प्रभावित राज्यों में रह रहे अमेरिकी नागरिक जहाँ हैं वहीं सुरक्षित स्थान पर रुकें, गैर-जरूरी यात्रा से बचें, कानून व्यवस्था से जुड़ी गतिविधियों से दूरी बनाए रखें और स्थानीय मीडिया पर नजर रखें।
    कनाडा सरकार ने भी अपने नागरिकों को खासतौर पर पुएर्तो वायार्ता और ग्वाडलहारा में घरों के अंदर रहने और भीड़भाड़ से दूर रहने की सलाह दी।

    अमेरिका की भूमिका और ट्रंप का बयान

    एल मेंचो की मौत के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  के एक सोशल मीडिया पोस्ट, जिसमें उन्होंने लिखा है, वी आर वीनिंग टू मच” “ने वॉशिंगटन की भूमिका पर अटकलें तेज कर दीं। कई लोगों ने इसे इस ऑपरेशन में अमेरिका की सीधी भूमिका से जोड़कर देखा।

    हालाँकि मेक्सिको स्थित अमेरिकी दूतावास ने सफाई दी कि यह ऑपरेशन पूरी तरह मेक्सिको के विशेष बलों द्वारा किया गया था और अमेरिका ने केवल खुफिया सहयोग दिया। व्हाइट हाउस ने भी यही कहा कि यह संयुक्त खुफिया समन्वय का परिणाम था, न कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई।

    मेक्सिको सरकार की प्रतिक्रिया: राष्ट्रपति ने की शांति की अपील

    मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम (Claudia Sheinbaum) ने देशवासियों से शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि केंद्र सरकार सभी राज्यों के साथ मिलकर हालात को काबू में करने की कोशिश कर रही है।
    उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है और जल्द ही हालात सामान्य किए जाएँगे। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि एल मेंचो की मौत संगठित अपराध के खिलाफ एक बड़ी सफलता है, लेकिन इसके बाद भड़की हिंसा गंभीर चिंता का विषय है।

    CJNG का खौफ और आगे की चुनौती

    जालिस्को न्यू जेनरेशन कार्टेल पिछले एक दशक में मेक्सिको का सबसे ताकतवर आपराधिक संगठन बन चुका है। भारी हथियार, सैन्य शैली के काफिले और खुलेआम हिंसा इसके प्रमुख हथकंडे रहे हैं। एल मेंचो की मौत से संगठन को बड़ा झटका लगा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हिंसा और अंदरूनी सत्ता संघर्ष बढ़ सकता है।
    एल मेंचो की मौत मेक्सिको के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह संगठित अपराध के खिलाफ बड़ी सफलता जरूर है, लेकिन इसके बाद भड़की हिंसा ने यह साफ कर दिया है कि ड्रग कार्टेल की जड़ें कितनी गहरी हैं। सड़कों पर जलती गाड़ियाँ, बंद बाजार, रद्द उड़ानें और दहशत का माहौल इस बात का संकेत हैं कि मेक्सिको को शांति बहाल करने के लिए अभी लंबा और कठिन संघर्ष करना होगा।

    कांग्रेस का चुनाव चिन्ह “पंजा” कहां से और कैसे आया? जो हिंदुओं के लिए “खूनी पंजा” है; हिन्दुओं ऑंखें खोलो

    सुभाष चन्द्र

    क्या आप जानते हैं कि कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा कहां से और कैसे आया?

    कर्बला के मैदान में शहीद होने वाले हज़रत इमाम हुसैन (अली) को इस्लामिक शौर्य संघर्ष बलिदान का प्रतीक माना जाता है। 

    इस्लाम में मूर्ति या फोटो पूजा हराम है इसलिए किसी मूर्ति या फोटो की पूजा ना करके पंजे के निशान को पूजा जाता है और इस प्रतीक को कांग्रेस ने अपना चुनाव चिन्ह बनाया हुआ है 

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    चर्चित YouTuber 
    99% हिंदुओं को इस बात की जानकारी ही नहीं है, जबकि शांतिप्रिय इस बात को जानते हैं इसलिए इस पर कभी कोई बात नहीं करता या चर्चा इसलिए नहीं करता कि कहीं हिन्दू इसे समझ कर जाग्रत न हो जाएं और कांग्रेस को वोट देना बंद ना कर दें

    शान्तिप्रियों का धार्मिक निशान होने के कारण शांतिप्रिय लोग बड़ी शिद्दत से कोर वोटर बनकर कांग्रेस से जुड़ा हुआ है और हिंदुओं को इसकी जानकारी नहीं होने के कारण और स्वतंत्रता आंदोलन का तथाकथित सर्वेसर्वा होने के कारण हिन्दू मूर्ख बनकर कांग्रेस से जुड़ा हुआ है

    कांग्रेस का चुनाव चिन्ह इंदिरा गांधी से पहले “गाय बछड़ा” हुआ करता था लेकिन कांग्रेस ने अंदर ही अंदर खुद का इस्लामीकरण कर लिया ताकि शांतिप्रिय समुदाय उनसे संतुष्ट रहे

    जनप्रतिनिधि अधिनियम की धारा 130 और चुनाव आचार संहिता के नियमानुसार मानव शरीर का कोई भी अंग चुनाव चिन्ह नहीं हो सकता लेकिन इसके बावजूद 1977 से अब तक “हाथ” यानी  “पंजा” कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बना हुआ है

    कांग्रेस के विघटन के बाद जब इंदिरा गांधी ने “कांग्रेस आई” बनाई तो एक नारा बहुत प्रचलित था 

    “अली का पंजा आलीशान, इंदिरा जी का यही निशान”

    हिंदुओं की विडंबना देखिए कि वो कभी इन षड्यंत्रों को समझ ही नहीं पाए और मूर्खों की तरह अंधभक्ति करता रहे यदि आप बड़े बुजुर्गों से इसकी चर्चा करेंगे तो वो आपको बताएंगे इस प्रकार के नारे उस समय कांग्रेस की पहचान थे 

    कांग्रेस ने भारत का इस्लामीकरण करने का आज तक कोई मौका नहीं छोड़ा, तुष्टिकरण के लिए तमाम कानून बनाए हिंदुओं के धर्म प्रचार एवं अध्ययन पर प्रतिबंध लगाया, इतिहास को तोड़- मरोड़कर पेश किया यहां तक भगवान राम को भी काल्पनिक कह दिया जिससे राममंदिर को बनाने से रोक जा सके

    कांग्रेस ने मुगलों और विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन किया, हिन्दू धर्म स्थलों की दान-दक्षिणा से दूसरे धर्मों (इस्लाम और क्रिश्चियन) की सहायता की और बाकी पर सरकार का नियंत्रण रख लिया और वह नियंत्रण अभी भी चल आ रहा है अभी तक भी हिंदुओं के मंदिरों और उनके दान- दक्षिणा और उनकी आय पर कई राज्यों में सरकारी नियंत्रण है और वहां की सरकारें  उसे मनमाने ढंग से खर्च करती आ रही है

    कांग्रेस को उसके “खूनी पंजे” से पहचानने की जरूरत है जिसकी वजह से अब वह “नग्न” हो चुकी है इसलिए भारत माता की जय बोलना पड़ेगा जो कांग्रेस को पसंद नहीं है 

    जनरल नरवणे राहुल के बयान पर आपकी टिप्पणी काफी नहीं है; उसे कोर्ट ले जाएं

    सुभाष चन्द्र

    राहुल गाँधी LoP नहीं Leader of Propaganda जिसे राहुल की हरकतें खुद ही साबित कर रही हैं, फिर भी जनता इसके मकरजाल में फंस कांग्रेस को वोट देती है उससे महामूर्ख दुनिया में कहीं मिलने वाला नहीं। ये भारत विरोधी विदेशियों के हाथ की कठपुतली है। जब भी विदेश से आता है कोई न कोई प्रोपेगंडा कर संसद को बाधित करता है।  

    राहुल गांधी ने जनरल नरवणे का नाम लेकर मुद्दा उछाला था जिस पर एक सप्ताह बाद वे और पेंगुइन बाहर निकले थे और कहा था कि किताब अभी नहीं छपी है वह भी तब, जब दिल्ली पुलिस ने FIR पर कार्रवाई शुरू कर दी थी लेकिन किताब छपी या नहीं छपी, इसमें भी झोल था सबसे बड़ी बात तो यह थी कि वह पुस्तक राहुल गांधी के पास कैसे पहुंची अगर छपी ही नहीं

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    चर्चित YouTuber 
    अब 15 दिन के बाद जनरल नरवणे ने जो बयान दिया है उसे बताया जा रहा है जैसे उन्होंने बहुत बड़ा तीर मार दिया है
     उन्होंने कहा है कि -

    “चीन को एक इंच भी जमीन नहीं दी गई है; हम अज्ञात स्रोतों के हवाले से छपे लेखों पर भरोसा नहीं कर सकते; जब स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, तब हम इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा कर सकते हैं”

    जनरल नरवणे के सम्मान के विरुद्ध कुछ नहीं कहना चाहिए लेकिन वे केवल इतना बयान देकर पतली गली से नहीं निकल सकते राहुल गांधी ने उनके नाम का सहारा लेकर ना केवल मोदी सरकार पर आरोप लगाया बल्कि खुद नरवणे पर भी कीचड़ उछाली और उन पर सवाल उठाते हुए चीन को भूमि सौपने का आरोप लगाया जैसे उसके लिए जनरल नरवणे ही जिम्मेदार थे

    आपने कहा कि अज्ञात स्रोतों के हवाले से छपे लेखों पर भरोसा नहीं कर सकते और राहुल गांधी के लिए कहा कि कोई भी कुछ भी बोल सकता है लेकिन आपको यह बताना चाहिए कि जो उस लेख में छपा वो गलत है क्या और जो राहुल गांधी किताब से पढ़ कर बोल रहा था, वह क्या गलत था आपका इस बारे में स्पष्टीकरण ना आना आप पर संदेह पैदा करता है

    अगर गलत था तो जनरल नरवणे को राहुल गांधी के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में मानहानि का केस दायर करना चाहिए जैसे कि लक्ष्मी पुरी ने साकेत गोखले के खिलाफ किया था और उसे घुटनों पर ला दिया था जनरल नरवणे साहेब, राहुल गांधी “कोई भी नहीं है” वो लोकसभा में LoP है और वह आपके खिलाफ मर्यादा तोड़ कर बात नहीं कर सकता वह पहले ही सेना के अपमान और चीन द्वारा 2000 किलोमीटर भूमि हड़पने के आरोप के लिए सुप्रीम कोर्ट से फटकार खाए हुए है और अभी केस सुप्रीम कोर्ट में है ट्रायल की अनुमति के लिए जनरल नरवणे अगर उसे कोर्ट में घसीटते हैं तो कोर्ट उनकी बात की अनदेखी नहीं करेगा राहुल से पूछिए कि 38 हजार वर्गकिलोमीटर भूमि चीन के कब्जे में कैसे है?

    दिल्ली पुलिस जैसे जांच कर रही है वैसे तो उसे पूरा करने में कई वर्ष लग जाएंगे वह जांच कर रही है अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में लीक के digital और financial footprints तलाशने में वहां लीक बाद में तलाश हो सकते हैं पहले पेंगुइन और राहुल के पास पुस्तक कैसे पहुंची उसकी जांच होनी चाहिए सौ बात की एक बात है कि पुस्तक की manuscript केवल नरवणे के पास हो सकती थी या रक्षा मंत्रालय में जब तक रक्षा मंत्रालय से अनुमति नहीं मिलती, वह manuscript पेंगुइन के पास कैसे पहुंच सकती थी और उसके लिए शक की सुई नरवणे साहेब की तरफ मुड़ती है

    पेंगुइन ने कहा कि किताब Officially प्रकाशित नहीं हुई है जिसका मतलब यह भी निकलता है कि किताब छपी तो है लेकिन कंपनी ने आधिकारिक तौर पर प्रकाशित नहीं की है और इसका मतलब यह भी निकलता है कि किताब की प्रतियां चोरी छुपे प्रकाशन कार्यालय से बाहर गई है क्योंकि कंपनी ने खुद कहा है कि “They are pursuing legal remedies against the unauthorized distribution”. इससे साफ है कंपनी मान रही है कि किताब उसकी अनुमति के बिना बाहर निकली है

    दरअसल पुलिस की तीन टीमों को पेंगुइन, राहुल गांधी और नरवणे साहेब से अलग अलग एक साथ पूछताछ करनी चाहिए और सभी के जवाबों को फिर से स्पष्टीकरण लेने चाहिए जब तक ठोस परिणाम न सामने आ जाए

    देश जानता है आप(कांग्रेस) पहले से ही नंगे हो, फिर कपड़े उतारने की क्या जरूरत थी?


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 फरवरी को मेरठ से कांग्रेस पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला। मौका था मेरठ में ‘नमो भारत’ रैपिड रेल और मेट्रो सेवा के ऐतिहासिक उद्घाटन का, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के निशाने पर रही दिल्ली की वो घटना, जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। दिल्ली के ‘AI इम्पैक्ट समिट’ में कांग्रेस नेताओं द्वारा किए गए अर्धनग्न प्रदर्शन पर बरसते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब वैचारिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुकी है और देश के लिए बोझ बन गई है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 फरवरी को मेरठ से कांग्रेस पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला। मौका था मेरठ में ‘नमो भारत’ रैपिड रेल और मेट्रो सेवा के ऐतिहासिक उद्घाटन का, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के निशाने पर रही दिल्ली की वो घटना, जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। दिल्ली के ‘AI इम्पैक्ट समिट’ में कांग्रेस नेताओं द्वारा किए गए अर्धनग्न प्रदर्शन पर बरसते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब वैचारिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुकी है और देश के लिए बोझ बन गई है।

    उन्होंने कहा कि हम उस संस्कृति से आते हैं जहां गांव की शादी में भी पूरा गांव मेहमानों की खातिरदारी में जुट जाता है, लेकिन कांग्रेस अपने ही देश को बदनाम करने पर तुली है। उन्होंने कहा कि जहां पूरा देश मेहमानों के स्वागत में जुटा था, वहीं कांग्रेस देश को बदनाम करने की साजिश रच रही थी।

    भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने विपक्ष के अन्य दलों और मीडिया को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की इस हरकत से उनके साथी दल भी हैरान हैं और उन्होंने इससे किनारा कर लिया है। पीएम ने मीडिया से आग्रह किया कि ‘मोदी ने विपक्ष को धो डाला’ जैसी हेडलाइन न बनाएं, बल्कि सीधे कांग्रेस का नाम लें। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस ऐसी हरकतें करती है, तो हेडलाइन ‘विपक्ष’ के नाम से नहीं बल्कि ‘कांग्रेस’ के नाम से बननी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘विपक्ष’ शब्द का इस्तेमाल कर मीडिया अनजाने में कांग्रेस के पापों पर पर्दा डाल देता है।

    संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस द्वारा संसद में महिला सांसदों को आगे कर विरोध प्रदर्शन करवाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि क्या आप इतने खोखले हो गए हैं कि माताओं-बहनों को इस तरह आगे करना पड़ रहा है? उन्होंने कटाक्ष किया कि अगर प्रधानमंत्री बनना है, तो जनता का दिल जीतना पड़ता है, इस तरह की ओछी हरकतों से कोई नेता नहीं बनता। उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस अब देश के लिए एक ‘बोझ’ बन चुकी है।

    सियासी हमले के बाद तकनीकी उपलब्धि का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने बताया कि भारत में पहली बार एक ही प्लेटफॉर्म और एक ही ट्रैक पर ‘नमो भारत’ और ‘मेट्रो’ दोनों चलेंगी। इससे दिल्ली और मेरठ के बीच की दूरी कम हो जाएगी। इससे दिल्ली-मेरठ के बीच रोजाना सफर करने वाले नौकरीपेशा लोगों और छात्रों को बड़ी राहत मिलेगी। अब लोगों को दिल्ली में महंगे किराए के कमरे लेकर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
    उन्होंने बताया कि 2014 से पहले देश के सिर्फ 5 शहरों में मेट्रो थी, जबकि आज 25 से ज्यादा शहरों में मेट्रो का जाल बिछ चुका है, जिससे भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क बन गया है।
    मेरठ के स्पोर्ट्स गुड्स, कैंची उद्योग और मुरादाबाद के पीतल उद्योग का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने MSMEs के लिए 10 हजार करोड़ रुपये के विशेष फंड की व्यवस्था की है। अब छोटे कारीगर बिना किसी सीमा के अपना सामान विदेशों में कूरियर कर सकेंगे। उन्होंने चौधरी चरण सिंह जी को याद करते हुए कहा कि उनकी सरकार किसानों और छोटे उद्यमियों के विजन को धरातल पर उतार रही है।
    उन्होंने कहा कि 10 साल पहले पश्चिमी यूपी की पहचान दंगों, गुंडों और खराब सड़कों से होती थी। सपा राज में अपराधी बेखौफ थे, लेकिन आज योगी जी के राज में वही अपराधी जेलों में दिन काट रहे हैं। आज मेरठ की पहचान ‘ब्रह्मोस’ मिसाइल और अत्याधुनिक मेट्रो से हो रही है। पीएम मोदी ने दोहराया कि जब तक उत्तर प्रदेश विकसित नहीं होगा, भारत विकसित नहीं हो सकता। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जेवर एयरपोर्ट और सेमीकंडक्टर फैक्ट्री जैसे प्रोजेक्ट्स यहां के युवाओं के लिए लाखों रोजगार के अवसर पैदा करेंगे।




    AI समिट में नंगों ने देश को किया बदनाम : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (22 फरवरी 2025) को मेरठ में विकास की नई मिसाल पेश की। उन्होंने दिल्ली-मेरठ नमो भारत रैपिड रेल के पूरे 82 किलोमीटर लंबे फुल स्ट्रेच का भव्य उद्घाटन किया और मेरठ मेट्रो को भी हरी झंडी दिखाई। प्रधानमंत्री खुद ट्रेन में सवार होकर शताब्दी नगर से मेरठ साउथ स्टेशन तक सफर किया और वहाँ स्कूली बच्चों तथा दिव्यांग बच्चों से गर्मजोशी से बातचीत की। इस पूरे कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके साथ पूरी तरह मौजूद रहे।

    उद्घाटन के बाद मेरठ साउथ स्टेशन पर विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्य फोकस कांग्रेस पर रखते हुए तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की कनेक्टिविटी कैसे होगी इसका शानदार उदाहरण मेरठ मेट्रो और नमो भारत का एक साथ संचालन है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि कांग्रेस की कार्यशैली और भाजपा की कार्यशैली में जमीन-आसमान का अंतर है।

    प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा, “नमो भारत और मेरठ मेट्रो के एक साथ लोकार्पण में भाजपा की कार्यशैली की झलक है। हमारी कार्यसंस्कृति है कि जिस काम को शुरू किया जाए उसे पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिया जाए। इसीलिए अब की परियोजनाएँ पहले की तरह लटकती-भटकती नहीं हैं।” उन्होंने स्पष्ट रूप से कांग्रेस पर आरोप लगाया कि कांग्रेस के राज में परियोजनाएँ फाइलों में गुम हो जाती थीं।

    मोदी ने कांग्रेस पर हमला जारी रखते हुए कहा कि आज भारत मेट्रो नेटवर्क के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है। यूपी में मेरठ समेत कई शहरों में मेट्रो का काम तेजी से चल रहा है। लेकिन कांग्रेस-सपा के राज में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट फाइलों में ही गुम जाते थे। मशीनें विदेश से लाई जाती थीं और घोटालों का सिलसिला चलता रहता था। हमने न सिर्फ घोटाले बंद किए बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया।

    इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को सबसे ज्यादा घेरा। उन्होंने हाल के दिल्ली एआई समिट का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया भर के नेता और तकनीकी कंपनियाँ दिल्ली के एआई सम्मेलन में जुटीं। यह भारत का गौरव का पल था लेकिन कॉन्ग्रेस ने इस राष्ट्रीय कार्यक्रम को अपनी गंदी और नंगी राजनीति का अखाड़ा बना दिया। समारोह स्थल पर विदेशी अतिथियों के सामने कॉन्ग्रेस के नेता कपड़े उतार कर पहुंच गए।

    मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा, “मैं कांग्रेस वालों से पूछता हूँ कि सारा देश जानता है कि आप नंगे हो फिर कपड़े उतारने की जरूरत क्या पड़ी? यह दर्शाता है कि कांग्रेस पूरी तरह वैचारिक रूप से दिवालिया हो चुकी है।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस को भारत की सफलता पच नहीं रही है। कांग्रेस ने देश के एक वैश्विक आयोजन को अपनी राजनीति का मैदान बना दिया जिससे पूरी दुनिया में भारत की छवि खराब हुई।

    प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि कांग्रेस के नेताओं को मोदी से नफरत है। ये लोग मेरी कब्र खोदना चाहते हैं। मेरी माँ को गाली देने से उन्हें परहेज नहीं। उन्हें भाजपा से विरोध है एनडीए से विरोध है। अगर आपकी राजनीति यही है तो हम इसको भी सहन कर लेंगे लेकिन कांग्रेस को याद रखना चाहिए था कि एआई सम्मेलन भाजपा का कार्यक्रम नहीं था। यह देश का कार्यक्रम था फिर भी कांग्रेस ने सारी मर्यादाएँ तोड़ दीं। अब पूरे देश में लोग कांग्रेस पर थू-थू कर रहे हैं।

    मोदी ने कांग्रेस पर हमले को और तेज करते हुए कहा कि कांग्रेस के लोग देश की बेईज्जती करने वालों का जयकारा कर रहे हैं। राहुल गाँधी पर सीधा निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अगर आपको प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना है तो पहले जनता के दिल जीतने पड़ेंगे। महिला सांसदों को आगे करके सीट पर कब्जा करने से प्रधानमंत्री नहीं बन जाते। कांग्रेस अब देश के लिए बोझ बन गई है।

    उन्होंने कांग्रेस के सहयोगी दलों का भी जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली की घटना में कांग्रेस के सभी सहयोगी दलों ने भी कांग्रेस की आलोचना करने की हिम्मत की। मैं उन सभी दलों का सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त करता हूँ। यह साफ दिखाता है कि कांग्रेस की राजनीति अब उसके अपने सहयोगियों को भी पसंद नहीं आ रही। कांग्रेस पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुकी है।

    इस पूरे भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कांग्रेस की विफलताओं और नकारात्मक राजनीति को उजागर किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश की प्रगति नहीं देखना चाहती। जहाँ भाजपा विकास के काम कर रही है वहीं कांग्रेस नंगी राजनीति और बेईज्जती कर रही है।

    उत्तर प्रदेश के विकास का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पहले मेरठ और यूपी अपराध के लिए जाना जाता था। आज यूपी विकास और ब्रह्मोस मिसाइल के लिए जाना जाता है। सपा राज में अपराधी बेखौफ घूमते थे आज योगी सरकार में वे जेल में हैं। कानून व्यवस्था सुधरने से व्यापार बढ़ा है। कल ही सेमीकंडक्टर फैक्ट्री का उद्घाटन हुआ। डबल इंजन सरकार यूपी को मैन्युफैक्चरिंग हब बना रही है।

    उद्घाटन के बाद अब सराय काले खाँ से मोदीपुरम तक की यात्रा सिर्फ 55 मिनट में पूरी हो सकेगी। यह भारत की सबसे तेज सेमी हाई-स्पीड रीजनल रैपिड ट्रेन है जो 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है। इस परियोजना में महिला सशक्तिकरण को विशेष जगह दी गई है। करीब 80 प्रतिशत ड्राइवर महिलाएँ होंगी।

    अभी कुछ ही दिन पहले IndiaTV पर पूर्व कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णन ने भी राहुल गाँधी की जमकर धुलाई करते हुए कहा कि "राहुल एक समस्या नहीं बल्कि पूरे देश के लिए समस्या बन चुके हैं . .."

    बंगाल और तमिलनाडु की राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव का क्या मतलब है?

    सुभाष चन्द्र

    चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 37 सीटों के 16 मार्च चुनाव की तारीख तय की है। 

    इन 37 सीटों में 5-5 सीट तमिलनाडु और बंगाल की हैं 

    इन दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव मार्च/अप्रैल 2026 में होने हैं और जिन राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होना है वो 2 अप्रैल को रिक्त होंगी 

    इसलिए विधानसभा चुनावों से पहले राज्यसभा की इन राज्यों से सीट भरना उचित नहीं है क्योंकि जो आज विधानसभा के सदस्य हैं, वे हो सकता है अगली विधानसभा में ना हों और इस तरह उन्हें  16 मार्च के चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए

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    इसलिए राज्यसभा की दोनों  राज्यों से 10 सीट विधानसभा चुनाव होने तक रिक्त रखी जानी चाहिए

    राज्यसभा की सीट कुछ समय तक रिक्त रह सकती हैं जैसे बंगाल से एक सीट 5 जनवरी, 2026 से खाली है शायद इसलिए कि आने वाले चुनाव के साथ उसे भी भर लिया जायेगा यानी ये सीट अप्रैल, 2026 तक खाली रहेगी इस तरह वे 10 भी एक महीने के लिए खाली रखी जा सकती हैं जब तक अगली विधानसभा मई में गठित ना हो जाए

    2021 विधानसभा के लिए दोनों राज्यों में चुनाव की घोषणा 26 फरवरी, 2021 को हुई थी और जाहिर है इस वर्ष भी इसी के आसपास घोषणा की जाएगी उसके बाद तमिलनाडु में चुनाव 6 अप्रैल को हुए और बंगाल में 27 मार्च से 29 अप्रैल तक हुए दोनों राज्यों में चुनाव नतीजे 2 मई, 2021 को घोषित हुए थे

    विधानसभा चुनावों की तारीख की घोषणा के बाद राज्यसभा का चुनाव इन दोनों राज्यों से 16 मार्च को कराना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा लेकिन चुनाव आयोग ऐसा करता रहा है जबकि इस तरह के चुनाव से राज्य का उच्च सदन में सही प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद तो विधायकों को तकनीकी रूप से राज्यसभा के चुनाव में वोट देने के लिए अयोग्य माना जाना चाहिए

    मुझे समझ नहीं आया अभी तक किसी राजनीतिक दल या संविधान विशेषज्ञ ने इस पर विचार क्यों नहीं किया ऐसे चुनाव को रोकने के लिए तो सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर होनी चाहिए

    भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर रोकी बात, SC के फैसले के बाद माहौल को देखते हुए लिया फैसला


    भारत ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित अंतरिम ट्रेड डील पर होने वाली प्रमुख वार्ता स्थगित कर दी है। यह फैसला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया टैरिफ संबंधी आदेश के बाद बदले माहौल को देखते हुए लिया गया है। सूत्रों के मुताबिक अगले सप्ताह वाशिंगटन में होने वाली यह बैठक अब टाल दी गई है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल अमेरिका जाने वाला था। वहाँ अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर के साथ अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते के कानूनी पाठ को अंतिम रूप देना था। दोनों पक्ष अब लेटेस्ट डेवलपमेंट्स का मूल्यांकन करने के बाद आपसी सुविधानुसार नई तारीख तय करेंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (20 फरवरी 2026) को कहा कि भारत के साथ ट्रेड डील ट्रैक पर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अंतरिम फ्रेमवर्क के तहत तय 18 प्रतिशत टैरिफ चुकाता रहेगा। प्रस्तावित समझौते के तहत भारत ज्यादातर सामानों पर टैरिफ घटाने को तैयार है जबकि अमेरिका अपने जवाबी टैरिफ को 18 प्रतिशत तक लाएगा। हालांकि लोहा, स्टील, तांबा, एल्युमिनियम और ऑटो पार्ट्स पर 50 प्रतिशत टैरिफ बरकरार रहेंगे।

    भारतीय अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर रखे हुए हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “भारत ने अभी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए बातचीत की गुंजाइश है। हम देखेंगे कि अमेरिकी सरकार इस रूलिंग पर क्या रुख अपनाती है। अभी इसके पूरे असर का आकलन करना जल्दबाजी होगी।”
    यह स्थगन दोनों देशों द्वारा अंतरिम समझौते के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार करने का संकेत दे रहा है। फिर भी वाशिंगटन से आ रहे बयान बताते हैं कि बातचीत सही दिशा में चल रही है।
    विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने रेसिप्रोकल टैरिफ नीति की कानूनी बुनियाद को प्रभावित किया है। भारत सावधानी के साथ आगे बढ़ना चाहता है ताकि अंतिम डील दोनों के हित में हो।

    यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका के व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने और टैरिफ बाधाएँ कम करने पर जोर दे रहे हैं।