अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में लगे खालिस्तानी नारे, आतंकी भिंडरावाले को सेना ने इसी दिन 42 साल पहले किया था ढेर

                                                                                                              साभार - न्यूज 18
पंजाब की ऐतिहासिक और धार्मिक धरती अमृतसर से एक बार फिर तनाव और संवेदनशीलता की तस्वीरें सामने आई हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के मौके पर शुक्रवार को अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में एक बार फिर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूँज उठे। श्री अकाल तख्त साहिब के नजदीक बड़ी संख्या में कट्टरपंथी और उनके समर्थक इकट्ठा हुए, जिन्होंने हाथों में प्रतिबंधित संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए

हर साल 6 जून की यह तारीख भारतीय राजनीति, सिख समुदाय और देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसी दिन साल 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी हथियारों से लैस आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इस कार्रवाई के दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सेना ने ढेर कर दिया था। यही वजह है कि हर साल इस दिन भिंडरावाले और ऑपरेशन में मारे गए लोगों की याद में विशेष अरदास की जाती है, जिसकी आड़ में कट्टरपंथी तत्व हंगामा और नारेबाजी करते हैं।

इस बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मौके को देखते हुए पंजाब पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और अर्धसैनिक बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रहे। स्वर्ण मंदिर के आसपास के पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। हालाँकि परिसर के भीतर नारेबाजी और पोस्टरबाजी के कारण माहौल में भारी तनाव देखा गया, लेकिन प्रशासन और सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में बनी रही।

इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खड़ा किया था भिंडरावाले नाम का भस्मासुर

इतिहास के पन्नों को पलटें तो जरनैल सिंह भिंडरावाले एक ऐसा नाम है जिसने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया था। शुरुआत में भिंडरावाले को खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और अकाली दल के प्रभाव को कम करने के लिए बढ़ावा दिया था। लेकिन बाद में वही भिंडरावाले भस्मासुर बन गया और उसने पंजाब में सिखों के लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ की हिंसक मांग शुरू कर दी।

भिंडरावाले का प्रभाव 1978 के बाद तेजी से बढ़ा और उसने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उग्रवाद का रास्ता चुन लिया। उसके इशारे पर पंजाब में हिंदुओं और निरंकारियों की सरेआम हत्याएँ होने लगीं। जब कानून का शिकंजा कसने लगा, तो भिंडरावाले ने अपने सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा कर लिया और उसे एक अभेद्य किले तथा आतंकी मुख्यालय में तब्दील कर दिया।

आतंकियों से सिखों के पवित्र स्थान को मुक्त कराने के लिए सेना ने चलाया था ऑपरेशन ब्लू स्टार

जब पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और आतंकवाद चरम पर पहुँच गया, तब इंदिरा गाँधी सरकार के आदेश पर भारतीय सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार‘ चलाना पड़ा। 1 जून से 8 जून 1984 के बीच चले इस भीषण सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके घातक हथियारों से लैस समर्थकों से मुक्त कराना था। भारी गोलीबारी के बीच 6 जून 1984 को सेना ने भिंडरावाले को मार गिराया।

 इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल ‘श्री अकाल तख्त साहिब’ को भारी नुकसान पहुँचा था, जिसे सिख समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी धार्मिक भावनाओं पर गहरी चोट और बेअदबी के रूप में देखता है। यही कारण है कि 42 साल बीत जाने के बाद भी यह मुद्दा भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है और इसके जख्म आज भी ताज़ा हैं। इस ऑपरेशन के बाद देश का माहौल बिगड़ गया था और इसके प्रतिशोध में ही इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे।

इस बरसी के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भारतीय राज्य के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ने वहाँ मौजूद भीड़ के सामने बयान देते हुए कहा, “1984 की सैन्य कार्रवाई ने पूरे सिख समुदाय को एक ऐसी गहरी पीड़ा दी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। हमारे पवित्र अकाल तख्त पर हमला करके हमारी धार्मिक पहचान को कुचलने की कोशिश की गई थी। हम अपनी स्वायत्तता और हक की लड़ाई को हमेशा जिंदा रखेंगे और शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।”

‘न्याय का मजाक बना दिया’: सुप्रीम कोर्ट पर भड़का मद्रास हाई कोर्ट, कहा- ‘याचिकाएँ इतने समय तक लंबित रहेंगी तो तानाशाही की ओर बढ़ेगा देश’


मद्रास हाई कोर्ट ने 2016 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से हुई लंबी देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि अगर चुनाव याचिकाओं का निपटारा 6 वर्षों तक लंबित रखा जाएगा तो इससे लोकतंत्र कमजोर होगा और देश तानाशाही की ओर बढ़ सकता है।

यह टिप्पणी मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. जयचंद्रन ने DMK नेता और तमिलनाडु विधानसभा के पूर्व स्पीकर एम. अप्पावु द्वारा दायर चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते समय की। अदालत ने AIADMK उम्मीदवार आई.एस. इनबादुरई के चुनाव को रद्द करते हुए एम. अप्पावु को 2016-2021 कार्यकाल के लिए राधापुरम विधानसभा सीट का वैध निर्वाचित प्रतिनिधि घोषित कर दिया।

यह मामला तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले की राधापुरम विधानसभा सीट से जुड़ा हुआ है। 2016 विधानसभा चुनाव में AIADMK उम्मीदवार आई.एस. इनबादुरई ने DMK के एम. अप्पावु को केवल 49 वोटों के बेहद कम अंतर से हराया था। चुनाव नतीजों के बाद अप्पावु ने अदालत का रुख किया और आरोप लगाया कि कई वैध पोस्टल बैलेट वोटों को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया था, जिससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ।

मामले का सबसे अहम सवाल यह था कि क्या सरकारी मिडिल स्कूलों के हेडमास्टर ‘गजेटेड अधिकारी’ माने जा सकते हैं और क्या उन्हें पोस्टल बैलेट के सत्यापन (अटेस्टेशन) का अधिकार है। चुनाव के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने 203 पोस्टल बैलेट को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उन पर गजेटेड अधिकारी का प्रमाणन नहीं था। अप्पावु का कहना था कि इन पोस्टल बैलेट को गलत तरीके से रद्द किया गया और इनमें से अधिकतर वोट उनके पक्ष में थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में दर्ज वोटों की गिनती में भी कुछ अनियमितताएँ हुई थीं।

2019 में मद्रास हाई कोर्ट ने अप्पावु के पक्ष में फैसला दिया था। हाई कोर्ट ने माना था कि सरकारी मिडिल स्कूलों के हेडमास्टर पोस्टल बैलेट के लिए ‘गजेटेड अधिकारी’ माने जाएँगे। अदालत ने कहा था कि 203 पोस्टल बैलेट को खारिज करना गलत था और वोटों की दोबारा गिनती कराने का आदेश दिया था।

इसके बाद आई.एस. इनबादुरई ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा मतगणना की अनुमति तो दे दी लेकिन नतीजे घोषित करने पर रोक लगा दी। यह मामला अक्टूबर 2019 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा और आखिरकार 21 मई 2026 को इसका निपटारा हुआ। तब तक 2016-2021 विधानसभा का पूरा कार्यकाल समाप्त हो चुका था और तमिलनाडु में दो विधानसभा चुनाव भी हो चुके थे।

3 जून 2026 को दिए गए अपने विस्तृत आदेश में जस्टिस जी. जयचंद्रन ने इस देरी को ‘न्याय का गंभीर मजाक’ बताया। उन्होंने कहा कि चुनाव याचिकाओं का उद्देश्य समय रहते विवाद का समाधान करना होता है लेकिन जब फैसला कई साल बाद आता है और संबंधित विधानसभा का कार्यकाल ही समाप्त हो जाता है, तब न्याय का महत्व कम हो जाता है।

जस्टिस जयचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के मोहम्मद अकबर बनाम अशोक साहू फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव विवादों का जल्द निपटारा बेहद जरूरी है क्योंकि ऐसे मामले लोकतंत्र से सीधे जुड़े होते हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर अदालतें अपने ही पुराने फैसलों में कही गई बातों का पालन नहीं करेंगी, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।

अपने आदेश में जस्टिस जयचंद्रन ने कहा, “अगर अदालतें मोहम्मद अकबर मामले में की गई अपनी ही टिप्पणियों को लगातार नजरअंदाज करती रहें, तो मुझे डर है कि हमारा देश भी उन दूसरे देशों की राह पर जा सकता है, जो हमारे साथ करीब 75 साल पहले आजाद हुए थे लेकिन बाद में तानाशाही व्यवस्था की ओर बढ़ गए।”

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मुख्य कानूनी सवाल को अनुत्तरित छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में मामले का निपटारा करते हुए कहा था कि अब विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इसलिए यह तय करने का कोई मतलब नहीं कि मिडिल स्कूल हेडमास्टर ‘गजेटेड अधिकारी’ हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न को खुला छोड़ दिया था।

इस पर जस्टिस जयचंद्रन ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि केवल समय बीत जाने के कारण अदालत अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। उन्होंने कहा कि जब हाई कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट भी थी पहले ही इस मुद्दे पर फैसला दे चुकी थी तो सुप्रीम कोर्ट को भी इस सवाल का स्पष्ट जवाब देना चाहिए था। जस्टिस जयचंद्रन ने अपने आदेश में कहा, “पूरे सम्मान के साथ, सर्वोच्च न्यायालय को इस सवाल का जवाब देना चाहिए था क्योंकि इस अदालत ने पहले ही इस पर निष्कर्ष दिया था।”

दोबारा मतगणना के दौरान 203 पोस्टल बैलेट की जाँच हुई। इसमें पाया गया कि 153 वोट एम. अप्पावु के पक्ष में थे। इसके बाद नतीजे पूरी तरह बदल गए और अप्पावु 103 वोटों के अंतर से विजेता बन गए।

किसी व्यक्ति पर बच्चे का जैविक पिता न होने पर भी उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी है तो फिर संपत्ति के अधिकार के लिए DNA की क्या जरूरत?

सुभाष चन्द्र 

सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर दिए गए निर्णय बड़े विचित्र हैं जो वास्तविक जीवन में अमल होने संभव नहीं है।  कई जगह कहा गया है कि अगर व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं भी है (जन्मदाता नहीं है)  तब भी वह बच्चे के भरण पोषण के लिए जिम्मेदार होगा क्योंकि उसका जन्म माता पिता के वैवाहिक जीवन के दौरान हुआ है (section 112 Indian Evidence Act), भले ही उस बच्चे का पिता कोई और हो यानी माँ के किसी के साथ संबंधों से जन्म हुआ हो

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ऐसा फैसला जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस भुइया की पीठ ने 28 जनवरी, 2025 को दिया था जिसका उद्देश्य बताया गया कि यह बच्चे की वैधता (legitimacy), सामाजिक सुरक्षा और निजता  बरक़रार रखना था कोर्ट ने यह भी कहा कि पति की जिम्मेदारी है कि वो साबित करे कि उसकी पत्नी के साथ शादीशुदा होते हुए भी संबंध नहीं थे 

इस केस में पत्नी को किसी गैर मर्द से औलाद थी लेकिन कोर्ट ने उसके भरण पोषण के लिए पिता को जिम्मेदार ठहरा दिया और असली जनम देने वाले की मौज करा दी चंद्रचूड़ ने तो पत्नियों को वैसे भी Sexual Autonomy का अधिकार दे दिया था जिसका मतलब था कि पति से अगर संतुष्टि नहीं मिलती तो वह किसी और से भी संबंध बना सकती है कैसा फैसला था सूर्यकांत जी का? यह क्या किसी के वास्तविक जीवन में अमल हो सकता है?

एक दूसरे केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया क्योंकि DNA रिपोर्ट में साबित हुआ कि पति बच्चे का पिता नहीं है मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहां 29 मई, 2026 को जस्टिस संजय करोल एंड जस्टिस कोटेश्वर सिंह की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को उचित ठहरा दिया क्योंकि पत्नी ने DNA टेस्ट के लिए सहमति दी थी और क्योंकि पति बच्चे का पिता साबित नहीं हुआ, गुजारा भत्ता मान्य नहीं है 

ये मामला बड़ा अजीब था पत्नी आदमी के घर में नौकरानी थी और उसका आरोप था कि उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए दोनों ने फिर 2 मार्च 2016 को शादी कर ली और 1 अप्रैल, 2016 को यानी ठीक एक महीने बाद बच्चे का जन्म हो गया शायद इसलिए ही वो DNA टेस्ट के लिए राजी हुई लेकिन मामला कुछ और ही निकला लेकिन कोर्ट ने एक तुर्रा फिर भी लगा दिया कि बच्चे को सामाजिक कलंक से बचाने के लिए पिता उसी को माना जाएगा क्योंकि उसका जन्म शादी के बाद हुआ फिर तो गुजारा भत्ता भी देना चाहिए जैसे जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के फैसले का मतलब था

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने 4 दिन पहले एक अलग व्यवस्था दी है इस केस में किसी ने बच्चे को कथित पिता की संपत्ति में हिस्सा दिलाने के लिए ट्रायल कोर्ट में दीवानी मुकदमा दायर किया ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने DNA के आदेश दिए लेकिन वह व्यक्ति (जिसे पिता कहा गया) सुप्रीम कोर्ट चला गया कि DNA टेस्ट से मेरी निजता भंग होगी

बच्चे  के कथित माता पिता के जनवरी, 1999 में संबंध थे और सितंबर, 1999 में बच्चे का जन्म हुआ लेकिन व्यक्ति ने उसका पिता होने से इंकार कर दिया

जस्टिस करोल की पीठ ने उसकी अपील ख़ारिज करते हुए कहा कि “बच्चे का अपने पिता के बारे में जानने का अधिकार, किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है और DNA टेस्ट के आदेश दे दिए इस केस में बस यह लगता है कि महिला और उस व्यक्ति की शादी नहीं हुई थी क्योंकि पूरी रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कोर्ट ने कहा निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है (कहीं अधिकार को पूर्ण कह दिया जाता है) बिना DNA बच्चा उस अधिकारों से हमेशा वंचित रह जाएगा जिसका वह हक़दार हो सकता है और इसलिए हित संतुलन माँ के पक्ष में है

एक ही विषय पर अलग अलग फैसले देना क्या उचित है?

विवादों में ‘कॉकरोचों’ का 6 जून का प्रदर्शन, दिपके ने माना- ‘नहीं ली प्रोटेस्ट की परमिशन’

                                                           प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार - AI)
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अमेरिका से भारत लौटकर यहाँ प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

लेकिन विवाद इस बात को लेकर खड़ा हो गया है कि प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद पार्टी ने दिल्ली पुलिस को पहले से लिखित सूचना नहीं दी और न ही अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी की। CJP का कहना है कि जंतर-मंतर एक निश्चित विरोध स्थल है, इसलिए वहाँ प्रदर्शन के लिए अलग से अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो में समर्थकों से अपील की थी कि वे उनके भारत पहुँचने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर जुटें और वहाँ से संसद मार्ग थाने तक मार्च करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करें।

दिपके ने इसे ‘शांतिपूर्ण’ और ‘संवैधानिक’ विरोध बताया था। हालाँकि इसी घोषणा के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है और क्या दिल्ली पुलिस को इसकी पूर्व सूचना दी गई है।

 यहीं से सवाल उठता है कि आखिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का वास्तविक नियम क्या है? क्या कोई भी संगठन सीधे पहुँचकर धरना या प्रदर्शन शुरू कर सकता है या फिर इसके लिए पहले से पुलिस की मंजूरी जरूरी होती है? इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले और दिल्ली पुलिस के नियमों को समझना जरूरी हो जाता है।

जंतर-मंतर क्यों बना देश का प्रमुख प्रदर्शन स्थल?

दिल्ली का जंतर-मंतर कई दशकों से देशभर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक होने के कारण विभिन्न संगठन अपनी माँगों को सरकार तक पहुँचाने के लिए यहाँ जुटते रहे हैं।

हालाँकि समय के साथ स्थानीय निवासियों ने शोर, यातायात बाधा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं की शिकायतें उठाईं। इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2017 में यहाँ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

                मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, जुलाई 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यह मामला तब शुरू हुआ था जब 2017 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 144 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों और NGT के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें जंतर-मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर लगभग पूर्ण रोक लगा दी गई थी। स्थानीय निवासियों ने शोर, ट्रैफिक जाम और अन्य असुविधाओं की शिकायतें की थीं, जिसके बाद यह विवाद अदालत तक पहुँचा था।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और स्थानीय लोगों के जीवन एवं शांति के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शनों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया और यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें प्रदर्शन से पहले पुलिस को लिखित रूप से सूचित किया जाए।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए क्या प्रक्रिया है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने 2018 में जंतर-मंतर और अन्य निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन के लिए दिशा निर्देश लागू किए।

इन दिशा निर्देशों के अनुसार:

  • प्रदर्शन या सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए पहले से लिखित आवेदन देना होता है।
  • आवेदन नई दिल्ली जिला पुलिस के संबंधित अधिकारी को दिया जाता है।
  • प्रस्तावित कार्यक्रम से कम से कम 7 दिन पहले आवेदन देना आवश्यक होता है।
  • पुलिस, ट्रैफिक विभाग, विशेष शाखा और अन्य एजेंसियाँ सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था के पहलुओं की समीक्षा करती हैं।
  • स्थान की उपलब्धता और सुरक्षा मूल्यांकन के बाद ही अनुमति दी जाती है।
  • एक से अधिक आवेदन होने पर प्राथमिकता पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर तय की जा सकती है।
  • सुरक्षा कारणों, VIP मूवमेंट या अन्य आपात परिस्थितियों में अनुमति बाद में भी रद्द की जा सकती है।
दिल्ली पुलिस लंबे समय से यह कहती रही है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पूर्व अनुमति और पूर्व सूचना आवश्यक है। इसलिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था कोई नया नियम नहीं बल्कि कई वर्षों से लागू कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अभिजीत दिपके और आम आदमी पार्टी से जुड़ाव

अभिजीत दिपके का नाम पहले भी राजनीतिक अभियानों से जुड़ता रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वह 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार तंत्र से जुड़े रहे थे।
उन्हें उन लोगों में गिना जाता था जो सोशल मीडिया कंटेंट, मीम्स, वीडियो और डिजिटल कैंपेन तैयार करने में भूमिका निभाते थे। दिपके का नाम AAP की चुनावी वॉर-रूम और सोशल मीडिया समन्वय गतिविधियों से भी जोड़ा जाता रहा है।
इंटरव्यू में उन्होंने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक पहुँचने की रणनीतियों पर भी चर्चा की थी। सोशल मीडिया पर उनके राजनीतिक विचार भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि आलोचकों का कहना है कि दिल्ली में प्रदर्शनों से जुड़े नियमों और अनुमति प्रक्रिया से दिपके पूरी तरह अनजान नहीं हो सकते।
दिलचस्प बात यह भी है कि वर्ष 2020 में AAP की नेता आतिशी समेत अन्य नेताओं ने प्रदर्शन संबंधी अनुमति के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। उस दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत में दाखिल हलफनामे में 2018 के उन्हीं दिशानिर्देशों का हवाला दिया था, जिनके तहत जंतर-मंतर समेत संवेदनशील स्थानों पर प्रदर्शन के लिए पूर्व लिखित आवेदन आवश्यक बताया गया था।

क्या कॉकरोच जनता पार्टी ने इन नियमों का पालन किया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 के प्रदर्शन की घोषणा तो कर दी लेकिन प्रदर्शन से पहले आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।
विवाद तब और बढ़ गया जब बुधवार (3 जून 2026) को पत्रकार अजीत अंजुम को दिए एक इंटरव्यू में अभिजीत दिपके ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति नहीं ली है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ली गई है, तो उन्होंने सीधे ‘नहीं’ में जवाब दिया।
बातचीत के दौरान जब उन्हें बताया गया कि आयोजकों को आमतौर पर पहले से आवेदन देकर प्रतिभागियों की संख्या, समय और अन्य विवरण उपलब्ध कराने होते हैं, तब दिपके ने कहा कि वह प्रदर्शन वाले दिन ही पुलिस स्टेशन जाकर अनुमति माँगेंगे।
जब उनसे पूछा गया कि पहले से आवेदन क्यों नहीं किया गया, तो उनका जवाब था, “हम अपने तरीके से काम करना चाहते हैं और उसी पर कायम रहेंगे।” एक अन्य सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अनुमति मिलने तक पुलिस स्टेशन में इंतजार करेंगे।
इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई कि यदि प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और संवैधानिक बताया जा रहा है, तो स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया जा रहा।

उत्तर प्रदेश : कॉकरोच जनता पार्टी के पदाधिकारी ने की डॉक्टर से मारपीट, सदस्यता लेने से मना करने पर पीटा: मऊ में दर्ज हुई FIR

                                                                                                            सभार - एक्स/@AnkurSingh
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में सोशल मीडिया पर चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की सदस्यता को लेकर विवाद सामने आया है। घोसी कोतवाली क्षेत्र के मझवारा मोड़ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में एक युवक ने खुद को पार्टी का पदाधिकारी बताते हुए सरकारी चिकित्सक पर पार्टी का समर्थन करने और सदस्यता लेने का दबाव बनाया।

डॉक्टर के इनकार करने पर मारपीट की, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और जान से मारने की धमकी भी दी।

डॉक्टर का आरोप- सदस्यता लेने से मना किया तो की मारपीट

गाजीपुर जिले के बरेसर थाना क्षेत्र स्थित अलावलपुर अफगा गाँव के निवासी और मझवारा मोड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में तैनात सरकारी डॉक्टर हरिश्चन्द्र जायसवाल ने बताया कि गुरुवार (4 जून 2026) की सुबह करीब 10 बजे वह अपने चैंबर में मरीजों को देख रहे थे।

इसी दौरान केरमा महरूपुर निवासी रविशंकर यादव उनके पास ECG जाँच कराने पहुँचा। जाँच पूरी होने के बाद उसने खुद को कॉकरोच जनता पार्टी का पदाधिकारी बताया और डॉक्टर से पार्टी में शामिल होने को कहा। डॉक्टर के अनुसार जब उन्होंने इससे इनकार किया तो युवक नाराज हो गया और बहस करने लगा फिर बात आगे बढ़ी तो उनके साथ मारपीट शुरू कर दी।

पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा, आरोपित की तलाश जारी

घटना की सूचना मिलने पर अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी कोतवाली पहुँचे तथा पुलिस को शिकायत देकर कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने बताया कि डॉक्टर की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और मामले की जाँच की जा रही है।

वहीं डॉ जितेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि आरोपित के खिलाफ डॉ से मारपीट, सरकारी कार्य में बाधा डालने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम गठित कर दी गई है।

कर्नाटक : कांग्रेस सरकार में बगावत, मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने पसंद का मंत्रालय न मिलने पर दिया इस्तीफा: मुख्यमंत्री शिवकुमार पर लगाए गंभीर आरोप

             कर्नाटक कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा (फोटो साभार: DH/Telangana Today)
जिस बात की आशंका थी उसकी शुरुआत हो गयी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि सिद्धारमैया अगर मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं तो नए मुख्यमंत्री को भी चैन से नहीं बैठने देंगे। खेल खिलेगा और खिलना शुरू हो गया। मनपसंद मंत्रालय नहीं मिलने पर कैबिनेट से इस्तीफा। मामूली बात नहीं। मुख्यमंत्री शिवकुमार गर्म खीर को फूंक मार-मार कर खाना होगा। इशारा आ चुका है।  

कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विभागों के बंटवारे के तुरंत बाद कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नवनियुक्त कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। रेड्डी ने खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते वे यह बड़ा कदम उठा रहे हैं। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे कैबिनेट छोड़ रहे हैं, लेकिन विधायक (MLA) और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहेंगे।

शुक्रवार (5 जून 2026) को बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधा। रेड्डी ने दावा किया, “डीके शिवकुमार खुद मेरे घर आए थे और कहा था कि जब मैं सीएम बनूँगा, तो मैं इस मंत्रालय (बेंगलुरु विकास) को छोड़ दूँगा और आप इसे संभाल लेना।” रेड्डी के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी जब वे शिवकुमार से मिले, तो उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु से जुड़ा पोर्टफोलियो उन्हीं को मिलेगा।

रेड्डी ने भावुक होते हुए कहा, “मैंने कभी इस विभाग की माँग खुद से नहीं की थी, लेकिन मुझे बार-बार इसका भरोसा दिया गया था। दो बार वादा करने के बाद अब मुझे जल संसाधन विभाग दे दिया गया। मैं इस फैसले से बेहद निराश हूँ और इसीलिए इस्तीफा दे रहा हूँ।”

रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने एक समर्थक के जरिए मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, “मैं कैबिनेट में मंत्री पद देने के लिए आपका और कॉन्ग्रेस पार्टी का आभार व्यक्त करता हूँ। चूँकि मैं अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम करने में असमर्थ हूँ, इसलिए मैं मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।”

हालाँकि रेड्डी ने मीडिया से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से न तो शिवकुमार से नाराज हैं और ना ही सिद्धारमैया से।

ब्रिटिश संसद में फिर गूंजा मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल : प्राइवेट पार्ट में बोतल घुसाते, चेहरे को सिगरेट से दागते और क्रॉस देखकर करते दरिंदगी: ब्रिटिश सांसद ने ‘मुस्लिम गैंग’ की करतूतें दिलाई याद, बताया- ईद पर कैसे बढ़ते थे अत्याचार

        ब्रिटेन के सांसद रुपर्ट लोव ने ग्रूमिंग गैंग की पीड़िताओं की गवाही पेश की (साभार: X- @RupertLowe10)
ब्रिटेन की संसद में हाल ही में ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई। ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाएँ सामने आई हैं।

संसद में बोलते हुए लोव ने कहा कि कई पीड़िताओं ने वर्षों तक अत्याचार झेला, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि यह केवल कुछ अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा संगठित अपराध था जिसे रोकने में कई संस्थाएँ नाकाम रहीं। सांसद लोव ने इन ग्रूमिंग गैंग के मामलों में स्वतंत्र रूप से जाँच की। जाँच में पता लगा कि इन बाल यौन शोषण के मामलों में स्थानीय क्षेत्रों से ज्यादा सबूत मिले हैं।

ग्रूमिंग गैंग में ‘मुस्लिम’ एंगल

लोव ने एक महिला की गवाही का जिक्र किया, जिसके अब्बा इमाम थे। उस महिला ने बताया कि कई वर्षों तक उसके साथ 600 से 700 अलग-अलग पुरुषों ने रेप किया। एक बच्ची ने बताया कि उसके चेहरे को सिगरेट से दागा गया।

तो एक अन्य पीड़िता ने बताया कि जब वह 12 से 13 साल की थी तब उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डाल कर फोड़ दी गई। एक ने गवाही दी कि ग्रूमिंग गैंग करने वाले नस्लीय टिप्पणियाँ भी करते थें और कहते थे- “गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं।”

एक पीड़िता ने बताया कि इस्लाम में त्यौहारों के समय उनके साथ अत्याचार बढ़ जाता था। खासकर, ईद के आसपास ज्यादा पार्टियाँ होती थीं तो उन्हें निशाना बनाया जाता था, जिनमें पार्टी में शामिल होने वाले अन्य लोग भी उनके साथ दुष्कर्म करते थे।

धर्म और नस्लीय भेदभाव के आधार पर बनाया निशाना

कई पीड़िताओं ने शारीरिक हिंसा के साथ-साथ मानसिक शोषण का भी जिक्र किया। एक पीड़िता ने बताया कि उसे ईसाई होने के नाते निशाना बनाया गया। पीड़िता ने बताया कि शोषण करते समय वे लोग क्रॉस देखते और कहते थे, “अब तुम्हारा ईश्वर कहाँ है? क्या तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हे त्याग दिया है?”

ग्रूमिंग गैंग ने अधिकतर ब्रिटिश मूल की गोरी लड़कियों को निशाना बनाया। पीड़िताओं ने बताया कि नस्लीय भेदभाव किया गया। उसने कहा, “मेरे साथ जितनी भी लड़िकयाँ थीं वे लगभग सभी श्वेत (ब्रिटिश मूल) थीं।” ऐसे ही एक अन्य पीड़िता ने कहा कि उसने 15 से 20 लड़कियों को कुत्तों के पिंजरों में बंद देखा था, जो सभी ब्रिटिश मूल की थीं।

इतना ही नहीं इन मामलों में पुलिस ऑफिसर की भी संलिप्तता सामने आई। एक पीड़िता ने बताया कि देश की अलग-अलग जगहों पर उसके साथ कई पुलिस ऑफिसर ने रेप किया।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में फिर से चर्चा में आए ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल दशकों पुराना है। पिछले 20 सालों से बाल यौन शोषण के मामले सामने आते रहे हैं। इन मामलों में देश के रॉदरहैम के अलावा रोचडेल, ओल्डहम और टेलफोर्ड जैसे कई शहरों और कस्बों में संगठित समूह नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर रेप और शारीरिक शोषण जैसी घिनौनी घटनाओं का खुलासा हुआ। पुलिस की जाँच में कई मामलों में मानव तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप भी सामने आए।

2002 के आसपास पहली बार ऐसे मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अधिकतर आरोपित ब्रिटिश या पाकिस्तानी थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।

बाद में ब्रिटेन सरकार की जाँच और रिपोर्ट्स में सामने आया कि स्थानीय प्रशासन, पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियाँ समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं। कहीं न कहीं अधिकारियों की लापरवाही, पीड़ितों को ही जिम्मेदार ठहराने की सोच और कमजोर जाँच के कारण ये अपराध लंबे समय तक चलते रहे। इसी वजह से बड़ी संख्या में लड़कियाँ इसका शिकार बनीं।

तृण यानी तिनका मूल से उखड़ गया; ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस खंड खंड हुई

सुभाष चन्द्र 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त, 2023 को कहा था और उसके बाद भी कई बार कहा है कि वंशवादी/परिवारवादी पार्टियां लोकतंत्र के लिए खतरा हैं और कुछ समय बाद ये अपने आप या तो ख़त्म हो जाएंगी या अप्रासंगिक हो कर रह जाएंगी और यही हो रहा है।  

हकीकत में ममता की हार उस दिन दीवारों पर लिख दी गयी थी जब स्थानीय पुलिस को मतदान केन्द्रों से दूर रहने का आदेश हुआ था। क्योकि ममता के शासन में ममता और इसके मुस्लिम कट्टरपंथियों के अत्याचारों से त्रस्त हिन्दू ममता की पार्टी को उखाड़ फेंकने का मौका देख रहे थे। भगवान ने उनकी आवाज़ सुन ली और अत्याचारी ममता को चारों खाने चित कर दिया। वही स्थिति हिन्दू विरोधी पार्टियों की भी होने वाली है।   

लेखक 
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अकाली दल लगभग ख़त्म हो गया; लालू यादव की पार्टी को देख लो अस्तित्त्व ही जैसे समाप्त हो गया; महमूबा मुफ़्ती की पीडीपी खात्मे की ओर चली गई; बीजू जनता दल को जनता ने नकार दिया; सुब्रमनियन स्वामी की one man जनता पार्टी ख़त्म हो गई; DMK को चुनौती मिल गई और सत्ता हाथ से गई; AIDMK जयाललिता के बाद अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है; समाजवादी जैसे तैसे अपने को बचाए हुए है

KCR की BRS भी खत्म हो रही है उसकी बेटी कविता ने ही अलग पार्टी तेलंगाना राष्ट्र सेना बना ली देवे गौडा की जनता दल(सेकुलर) भी नाममात्र के लिए बची है शरद पवार की एनसीपी खंड खंड हो गई और बालासाहेब ठाकरे की शिव सेना उद्धव की हाथों से एकनाथ शिंदे ने छीन ली मजे की बात है कि आज संजय राउत शिंदे को कह रहा है कि अगर आप माफ़ी मांग लो तो उद्धव की शिव सेना में वापस आ सकते हो अब बताओ, शिंदे को, जो उपमुख्यमंत्री है, क्या किसी पागल कुत्ते ने काटा है जो उद्धव की पार्टी में विलय करेगा वह भी माफ़ी मांग कर? संजय राउत पगला गया लगता है

इन परिवारवादी पार्टियों के अलावा वामपंथी दलों, CPM और CPI का भी देश भर में लगभग सफाया हो गया है और उनकी माओवादियों की आतंकी सेना को अमित शाह ने ख़त्म कर दिया

कांग्रेस की हालत एक राष्ट्रीय पार्टी की बजाय क्षेत्रीय दल जैसी हो गई जो 3-4 राज्यों को छोड़ कर बाकी सभी राज्यों में अपने दम पर चुनाव भी नहीं लड़ सकती ये ऐसी पार्टी बन गई जो केरल में 15 दिन तक मुख्यमंत्री नियुक्त नहीं कर सकी और कर्नाटक में सिद्दरमैया को हटा तो दिया सिस्टम उसी के हाथ में है बेशक शिवकुमार CM बन गया पता नहीं सिद्धारमैया कब क्या खेल कर दे और शिवकुमार को उखाड़ दे? 

अब तृणमूल कांग्रेस वैसे तो अखिल भारतीय पार्टी होने का दावा करती थी लेकिन केवल बंगाल तक सीमित थी और कल मूल से (जमीन से) उसका तृण (घास/तिनका) उखड़ गया जो ममता सत्ता के नशे में चूर बंगाल में हिंदुओं का दमन करती रही, जो बांग्लादेशी और रोहिंग्या को पनाह देती रही, उसके 80 में से 58 विधायक अलग हो गए और विपक्ष के नेता की कुर्सी भी तृणमूल कांग्रेस के हाथ से छीन ली। सांसद भी कब अलग हो जाएं कहा नहीं जा सकता। 

जो ममता की पार्टी के नेता और अभिषेक बनर्जी अमित शाह जैसे भाजपा नेताओं को गाली बकते थे और धमकी देते थे, वो अकेले रह गए या बिल में छुप गए चुनाव में ममता का जहाज डूबता दिखाई दे रहा था और कहते हैं कि जहाज को डूबता देख कर चूहे कूदकर पहले बाहर निकल जाते हैं मगर ममता के जहाज से चूहे पहले बाहर नहीं निकले बल्कि अब खुद ही आधे डूबे हुए जहाज को पूरी तरह डुबाने में लगे हैं

कल तक ममता बनर्जी इंडी गठबंधन को घास नहीं डालती थी लेकिन अब दौड़ कर गठबंधन की मीटिंग में शामिल होने को तैयार है मोदी को हटाए बिना चैन से नहीं बैठूंगी, ऐसी घोषणा कर रही है बहुत अच्छी बात है तुम सब मिलकर उसे हटाते रहो और वो 10 जून को देश का नेहरू के बाद सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करने वाला प्रधानमंत्री बन जाएगा

ये तो मैंने बताया कि कैसे वंशवादी/परिवारवादी पार्टियां ख़त्म हुई या हो रही हैं, लेकिन ये बात अब राहुल गांधी भी कह रहा है कि भाजपा से लड़ने के लिए केवल कांग्रेस रहेगी और बाकी सभी पार्टियां ख़त्म हो जाएंगी कांग्रेस कैसे रहेगी और कितनी रहेगी भाजपा से लड़ने के लिए, ये उसे भी नहीं पता और  भाजपा से कैसे लड़ेगी, बस केवल मोदी को गालियां देकर 

क्या 6 जून को दिल्ली में दंगे की साज़िश? : ‘एयरपोर्ट से शुरू करेंगे हंगामा, हाथ में लाठी-पेपर स्प्रे लेकर आना’ : कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक सरेआम कर रहे हिंसा भड़काने का प्रयास, बोल रहे- इस बार नेपाल बना देंगे

   दिल्ली का माहौल बिगाड़ने के लिए CJP समर्थक लोगों को उकसा रहा (फोटो साभार : X_@AnkurSingh Video SS
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक 6 जून को प्रदर्शन के नाम पर हिंसा भड़काने की तैयारी में हैं। इसके लिए उन्होंने अभी से कोशिशें शुरू कर दी हैं। सोशल मीडिया पर एक Video वायरल हुई, जिसमें एक CJP समर्थक हर्षित उकसाऊ बातें करता सुनाई पड़ता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनका मकसद जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नहीं बल्कि माहौल बिगाड़ने का है।

Video में ये समर्थक साफ तौर पर धमकी देता दिख रहा है कि अगर अभिजीत डीपके को इमिग्रेशन पर रोका गया, तो एयरपोर्ट से ही भारी हंगामा खड़ा किया जाएगा… इस बार ‘आर-पार’ की लड़ाई होगी। Video में खुलेआम कहा गया कि ‘अब बहुत सह लिया, इस बार दिल्ली को नेपाल बना देंगे… अपने साथ लाठियाँ और पेपर स्प्रे लेकर आना।

गौरतलब है कि 6 जून को जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन के लिए कॉकरोच जनता पार्टी ने कहीं किसी से कोई परमिशन नहीं ली है। उलटा उसके प्रवक्ता इस बात पर गर्व कर रहे हैं कि वो इसी सिस्टम से लड़ने के लिए तो प्रदर्शन कर रहे हैं, तो परमिशन क्यों लेंगे?

कहने को तो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) इसे एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन बता रहा है, लेकिन अंदरूनी हकीकत कुछ और ही है। Video में साफ सुना जा सकता है कि लोगों से सुरक्षा के बहाने लाठियाँ, डंडे और पेपर स्प्रे खरीदकर लाने को कहा जा रहा है ताकि पुलिस का सामना किया जा सके।

दावा किया जा रहा है कि इस बड़ी साजिश में वामपंथी छात्र संगठन AISA और JNU गैंग भी शामिल हो रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि एक बार फिर दिल्ली को हिंसा की आग में झोंकने के लिए पूरी प्लानिंग कर ली गई है। प्रशासन को इस भड़काऊ Video पर तुरंत सख्त एक्शन लेना चाहिए।

जंतर-मंतर प्रदर्शन के पीछे दंगे वाली पुरानी साजिश

सीजेपी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने माना है कि 6 जून के प्रदर्शन के लिए कोई परमिशन नहीं ली गई है। अभिजीत फिलहाल अमेरिका में पढ़ाई कर रहा है। वह दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित उमर खालिद का पुराना समर्थक है। CJP के प्रवक्ता सौरभ दास भी उमर खालिद का खुलकर साथ देते रहे हैं।

साल 2020 में दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगे अचानक नहीं हुए थे। वह उमर खालिद और उसके वामपंथी-इस्लामी ग्रुप की एक सोची-समझी साजिश थी। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका भी खारिज कर दी है। तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के समय जानबूझकर हिंसा भड़काई गई थी।

अब यह संगठन एक बार फिर दिल्ली में वैसा ही माहौल बनाना चाहता है। Video में ‘नेपाल’ का जिक्र होना इसका बड़ा सबूत है। नेपाल में पिछले साल बेहद हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे। ये लोग अब भारत की राजधानी में भी उसी हिंसा और अराजकता को दोहराना चाहते हैं।

गुजरात : ‘ऑपरेशन डेल्टा’ के तहत 1 ही दिन में दबोचे गए 500+ बांग्लादेशी घुसपैठिए: गृह राज्य मंत्री बोले- पनाह और नौकरी देने वालों पर होगा कड़ा एक्शन

           एक ही दिन में गुजरात से 500+ अवैध बांग्लादेशी हिरासत में (फोटो साभार : X_@ANI Video SS)
बंगाल विधानसभा चुनाव केवल चुनाव नहीं था बल्कि देश की आंख, नाक और कान खोलने वाला चुनाव था। किस कदर घुसपैठियों ने बंगाल में बबाल मचाया हुआ था किसी तथाकथित सेक्युलरिस्ट और INDI गठबंधन में से किसी की आवाज़ नहीं निकली। बीजेपी शासित राज्य में छोटी से घटना होने पर चील-कौओं की तरह चिल्लाते हैं। सिर्फ अपने मुस्लिम वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए। लेकिन ये गैंग भूल रहा है कि जिस दिन मुसलमान सच्चाई जान जाएगा कोई मुस्लिम कट्टरपंथी गैंग भी तुम्हारे साथ खड़ा नहीं मिलेगा। क्या कोई अपने बच्चों का नाम मीर ज़फर या जय चंद रखता है? इतिहास से कुछ सीखो वरना इतिहास ही तुम्हारी हस्ती मिटा देगा। बंगाल में सत्ता बदलते ही घुसपैठियों ने भागना शुरू कर दिया। आखिर ये तथाकथित सेक्युलरिस्ट्स और INDI गठबंधन इन्हे दामादों की तरह क्यों संरक्षण दे रहा है?

जितने भी घुसपैठियों के हिमायती है बताएं क्या वह घुसपैठी बन दुनिया के किसी भी देश में रह सकते हैं? यदि नहीं, फिर क्यों अपनी कुर्सी और तिजोरियों की खातिर भारत में इनको संरक्षण देते हो?   

गुजरात में घुसपैठियों के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई हुई है। पुलिस ने ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’ के तहत एक ही दिन में 501 अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। राज्य के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने कहा कि हर घुसपैठिए को ढूँढकर वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा।

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने 6200 से अधिक संदिग्ध लोगों का डेटाबेस तैयार किया है। इसी जानकारी के आधार पर यह राज्यव्यापी अभियान चलाया गया। पकड़े गए लोगों में से कई ने फर्जी तरीके से भारतीय पहचान पत्र भी बनवा लिए थे। अहमदाबाद क्राइम ब्रांच और पुलिस की 30 टीमें इस मामले की गहराई से जाँच कर रही हैं।

शुरुआती जाँच में पता चला है कि ये लोग कोलकाता के बिचौलियों और मोबाइल ऐप के जरिए बांग्लादेश पैसा भेज रहे थे। सरकार ने साफ किया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। अब घुसपैठियों के साथ-साथ उन्हें पनाह और नौकरी देने वालों पर भी सख्त मुकदमा दर्ज किया जाएगा।

फर्जी IB कॉल केस के आरोपित AAP नेता अशोक ओझा और उसकी फैमिली के खिलाफ एक और FIR, AAP की महिला पदाधिकारी ने लगाए रेप-ब्लैकमेलिंग के आरोप

  AAP नेता अशोक ओझा पर पार्टी की महिला पदाधिकारी ने बलात्कार की दर्ज कराई शिकायत (साभार: Deshgujrat)
अरविन्द केजरीवाल ने जब से अपनी आम आदमी पार्टी बनाई है तभी से किसी न किसी विवाद का शिकार होती आयी है। चर्चा में बने रहने और सहानुभूति वोट लेने कभी स्याही कभी थप्पड़ और न जाने कितने प्रपंच किये और जनता इन झांसों में आकर केजरीवाल को वोट देती रही।   

आम आदमी पार्टी (AAP) के वडोदरा शहर अध्यक्ष अशोक ओझा एक बार फिर गंभीर आरोपों को लेकर विवादों में घिर गए हैं। पार्टी की ही एक महिला पदाधिकारी ने अशोक ओझा, उनके बेटे आनंद ओझा और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ दुष्कर्म, ब्लैकमेल और शारीरिक शोषण के आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है।

शिकायत के अनुसार, महिला को शराब पिलाकर उसका अश्लील वीडियो बनाया गया और बाद में उसे वायरल करने की धमकी देकर लंबे समय तक उसका शोषण किया गया।

नौकरी का लालच देकर बढ़ाया संपर्क, वीडियो बनाकर किया ब्लैकमेल

महिला की शिकायत के अनुसार, अशोक ओझा ने उसके पति को अच्छी नौकरी दिलाने का भरोसा देकर परिवार से संपर्क बढ़ाया था। आरोप है कि बाद में महिला को अपने घर बुलाकर शराब पिलाई गई और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए। इस दौरान उसका वीडियो भी रिकॉर्ड कर लिया गया।

महिला का कहना है कि इसी वीडियो को आधार बनाकर उसे अलग-अलग होटलों और अन्य स्थानों पर ले जाकर बार-बार शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ समय बाद अशोक ओझा के बेटे आनंद ओझा ने भी वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसके साथ दुष्कर्म किया।

आरोपों से इनकार, पहले भी विवादों में रहा है नाम

महिला ने शिकायत में यह भी कहा है कि जब उसने पूरे मामले की जानकारी अशोक ओझा की पत्नी को दी तो उसे घर से निकालने की धमकी दी गई। वहीं शिकायत में परिवार के अन्य सदस्यों पर भी दबाव बनाने के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर अशोक ओझा ने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है।

इससे पहले अशोक ओझा को फर्जी आईबी कॉल मामले में आनंद साइबर क्राइम पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) अधिकारी बनकर AAP नेताओं को धमकी भरे फोन किए गए थे। इसके अलावा एक अन्य महिला ने भी मकान दिलाने के नाम पर करीब 20 लाख रुपए की ठगी और अभद्र माँग करने के आरोप लगाए थे।

TCS के बाद अब पुणे के Wipro में इस्लामीकरण कांड, हिंदू महिला बोली- विरोध करने पर मुझे कंपनी से निकाला; ‘इस्लाम अपनाओ, मुस्लिम लड़के से संबंध बनाओ’

           पुणे की Wipro कंपनी में हिंदू महिला कर्मचारी पर जबरन धर्मांतरण का आरोप ( साभार : Bhaskar)
TCS नासिक कांड के बाद अब पुणे की दिग्गज IT कंपनी ‘विप्रो’ (Wipro) से भी ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया। 
Wipro की एक पूर्व हिंदू महिला कर्मचारी ने कंपनी के ही एक सहकर्मी पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बनाने और मानसिक उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया है।

देश में मुस्लिम कट्टरपंथी हर क्षेत्र में घुसकर माहौल ख़राब करने की कोशिश कर रहे हैं। हिन्दू महिलाओं को नौकरी पर रखो और लव जिहाद की आड़ में इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाओ। क्या सरकार ऐसे कर्मचारियों, अधिकारियों और कंपनी के विरुद्ध सख्त कार्रवाही करेगी? क्या हिन्दू महिलाओं को अपने जाल में फंसा इस्लाम कबूल करवाकर फिदायीन बनाने का घिनौना खेल चल रहा है? पकडे जाने पर बदनाम होंगे हिन्दू।    

इस मामले में पुणे के हिंजवड़ी थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। साथ ही हिंदू पीड़ित के वकील ने Wipro कंपनी को एक लीगल नोटिस भी भेजा है। हिंदू जनजागृति समिति की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिंदू पीड़िता ने अपनी आपबीती बताई।

पीड़िता का आरोप है कि उसका एक साथी कर्मचारी उसे बार-बार इस्लाम अपनाने और एक मुस्लिम युवक से संबंध बनाने के लिए मजबूर करता था। विरोध करने पर कंपनी के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने महिला की मदद करने के बजाय उल्टा उसी पर दबाव बनाया।

पीड़िता का आरोप है कि अगस्त 2025 में एक ऑनलाइन मीटिंग के दौरान उससे जबरन इस्तीफा ले लिया गया। पीड़िता के वकील विवेक भोसले ने बताया कि Wipro कंपनी को नोटिस भेजकर महिला को वापस नौकरी पर रखने और मानसिक प्रताड़ना के लिए 50 लाख रुपए का मुआवजा देने की माँग की गई है।

नोटिस में कहा गया है कि अगर 15 दिनों में कार्रवाई नहीं हुई, तो वे कोर्ट जाएँगे। फिलहाल Wipro कंपनी की तरफ से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है और पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

विधायिका के लिए चुनाव लड़ने वाले जब अपनी संपत्ति का ब्यौरा चुनाव आयोग को दे सकते हैं तो सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होने वाले जज नियुक्ति से पहले क्यों नहीं घोषित करते

सुभाष चन्द्र

भारत एक ऐसा अनूठा देश है जहां दो कानून चलते हैं। विधायिका के अलग और जजों के अलग। नेताओं के लिए अलग और आम नागरिक के लिए अलग। नमूना देखिए और खुद फैसला करिए: 

मई 2 को सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों को नियुक्त किया गया है चीफ जस्टिस द्वारा शपथ दिला कर उनके नाम है।  

नियुक्त हुए जजों के नाम हैं -

-पंजाब & हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू;

-बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर;

-मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और 

-J & K एवं लद्दाख हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण पल्ली -

इनके अलावा सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील वी मोहना को भी नियुक्त किया गया है कल तक सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली आज उसी कोर्ट में मीलॉर्ड हो गई

बड़ी अच्छी बात है लेकिन एक विडम्बना ये है कि कोई भी चीफ जस्टिस आ जाए वो नियुक्त होने वाले जजों को नियुक्ति से पहले अपनी Assets & Liability Return जमा करने को नहीं कहता

लेखक 
चर्चित YouTuber 
विधानसभा, लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए हर पार्टी के उम्मीदवार को अपनी और परिवार की  संपत्ति का ब्यौरा चुनाव आयोग के समक्ष शपथपत्र के साथ प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है और बिना ऐसा किए उसे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलती उम्मीदवार को अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों के बारे में भी सूचित करना होता है

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने, कहते हैं कुछ नए कदम उठाए हैं, लेकिन एक यह कदम भी उठा लिए होते तो अच्छा होता कहीं तो, कभी तो ये प्रथा भी शुरू कीजिए

आज सुप्रीम कोर्ट में 37 जज हो गए हैं, इन नए नियुक्त हुए 5 जजों के अलावा भी जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह ने अभी तक अपनी Assets & Liability Return जमा नहीं की है (website पर upload नहीं की है) जबकि 30 जजों ने ऐसा किया है - शुरू में जब जजों द्वारा Assets & Liability Return जमा करने का निर्णय लिया गया था, तब भी केवल 21 जजों ने ऐसा किया था, बाकी ने बाद में किया है

Assets & Liability Return सरकार के हर अधिकारी को जमा करना अनिवार्य होता है जिसमें से 20% की या कुछ विशेष की scrutiny भी की जाती है जिससे उसकी आय और संपत्ति का संतुलन समझा जा सके इससे भ्रष्टाचार भी उजागर होता है जब विसंगतियां बड़े पैमाने पर पाई जाती हैं तो उनकी गहन जांच भी होती है

जस्टिस नागरत्ना ने कुछ दिन पहले नोटबंदी की और जजों के आय से अधिक खर्चों को भ्रष्टाचार से जोड़ कर यह कहते हुए निंदा की थी की ऐसे लोग (जज) भ्रष्ट तरीके अपनाते है उन्होंने कहा था नोटबंदी कालेधन को बाहर लाने का दिखावा था और कोई काला धन नहीं निकला

ऐसे “प्रवचन” देना बहुत आसान होता है लेकिन अपने ऊपर अमल भी करना चाहिए जैसे जस्टिस नागरत्ना पब्लिक में प्रवचन देती हैं, वो Publicly ही बताएं कि उन्होंने Assets & Liability Return क्यों नहीं की उनका ये विवरणी जमा न करना ही बताता है कि नोटबंदी उन्हें क्यों पसंद नहीं थी ऐसा ही जस्टिस कोटेश्वर सिंह को भी बताना चाहिए

चीफ जस्टिस से अनुरोध है कि कल शपथ ग्रहण किए सभी जजों से Assets & Liability Return जमा करने को कहें और भविष्य के लिए यह नियम बना दें कि शपथ लेने से पहले Assets & Liability Return जमा करना अनिवार्य होगा अन्यथा नियुक्ति नहीं की जाएगी सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो अपने आप में ही कानून बन जाता है तो फिर एक कानून ऐसा भी बनाने की कोशिश कीजिए 

नवनियुक्त जस्टिस वी मोहना को देख कर याद आया कि जस्टिस के वी विश्वनाथन भी वकील थे और उनकी संपत्ति 120 करोड़ उन्होंने घोषित की थी बस मोहना जी की संपत्ति का भी खुलासे से अंदाजा लग जायेगा सिबल जैसे वकीलों के पास कितना माल है? वैसे तो विश्वनाथन जी की संपत्ति से अंदाजा लग चुका है क्योंकि सिंघवी ने हाल ही में 2800 करोड़ की संपत्ति घोषित की थी 

जब ‘दरबारी’ कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने गाँधी परिवार को आईना दिखाया तो कांग्रेस के ‘चारण-भाट’ ने फटाफट कैंसिल किया रामचंद गुहा का ‘इतिहासकार’ वाला लाइसेंस

   रामचंद्र गुहा ने कांग्रेस को 'पारिवारिक फर्म' बताकर गाँधी परिवार की क्षमताओं पर उठाया सवाल तो छीना     'इतिहासकार' का लाइसेंस
"खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से, सच्चाई छुप नहीं सकती कभी बनावट के असूलों से" बात कांग्रेस पर सटीक बैठती है। इतिहास साक्षी है कि कांग्रेस ने सच बोल पार्टी को आईना दिखाने वालों को दरकिनार किया है, चाहे वो कोई भी हो। राहुल गाँधी और प्रियंका के दादा फ़िरोज़ जहांगीर जब संसद में कुछ बोलने के खड़े होते थे ससुर जवाहर लाल नेहरू के पसीने छूटने लगते थे। अंजाम देख सबके सामने है। परिवार नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक की समाधियों पर माथा टेकने चले जाते हैं लेकिन कभी अपने दादा की कब्र पर नहीं जाते। बहुत हैं नाम जिन्हे कांग्रेस का धुरंधर कहा जाता था, अपनी चौधराहट बनाए रखने के लिए सबको भुलवा दिया। लेकिन शर्म आती है दरबारियों पर जो सच्चाई जानना ही नहीं चाहते। अरे परिवार के गुलामों रामचंद्र गुहा से ही सीख लो। जिसे पार्टी बहुत बड़ा इतिहासकार बनाए घूमती थी आज उसी गुहा ने जैसे ही आईना दिखाया इतिहासकार वाला लाइसेंस छीन लिया। अरे दरबारियों तुम्हारी क्या औकात?      
कांग्रेस के ‘दरबारी’ और कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने हाल ही में लेख लिखा है। मूलरूप से ‘द टेलीग्राफ’ के लिए लिखे गए इस लेख को ‘स्क्रॉल’ ने भी छापा है। लेख में उन्होंने एक बड़ी बात कही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता को मजबूत करने में गाँधी परिवार का भी हाथ है। गुहा का कहना है कि ‘परिवारवाद’ के कारण राहुल गाँधी ने कभी कोई असली काम नहीं किया, इसके चलते लगातार कांग्रेस के विधायक घटते गए। गुहा ने कहा कि इसके बावजूद राहुल गाँधी जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने या शासन की विफलताओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत रूप से हमला करते रहे।

स्क्रॉल ने इस लेख को “गाँधी परिवार ने मोदी को सत्ता मजबूत करने में कैसे मदद की” शीर्षक से छापा है। वहीं ‘द टेलीग्राफ’ ने इसे “मोदी के समर्थक” नाम दिया है। इस लेख में प्रियंका गाँधी के वायनाड से चुनाव लड़ने को गुहा ने गलत फैसला बताया गया। संविधान की 75वीं वर्षगाँठ पर प्रियंका को मुख्य वक्ता बनाने को भी गुहा ने अजीब बताया क्योंकि उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने ही आपातकाल लगा कर संविधान को नुकसान पहुँचाया था।

गुहा का मानना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि मई 2014 से ‘गणतंत्र के पतन’ के मुख्य सूत्रधार नरेंद्र मोदी, अमित शाह और उनकी पार्टी भाजपा है। गुहा ने साथ में यह भी कहा कि इसमें गाँधी परिवार ने जाने-अनजाने उनकी मदद ही की है। वे 2029 की भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं कि पीएम मोदी की अजेय छवि टूट सकती है लेकिन साथ में यह भी कहा कि उस वक्त जो नेता इस नाराजगी को राजनीतिक चुनौती में बदलेंगे, वो राहुल या प्रियंका गाँधी नहीं होंगे।

गुहा जो कह रहे हैं वो न तो भाजपा की तारीफ है न ही कोई एकतरफा बात। वो मानते हैं कि भाजपा की सत्ता को आगे बढ़ाने मोदी फैक्टर है और शाह की रणनीति है। साथ में तथ्यों के साथ में इसका श्रेय कांग्रेस को देने के पीछे भी वजह सामने रखी। यानी गुहा ने जो कहा वो तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं है, बस कांग्रेसी इसे पचा नहीं पा रहे हैं। और जैसे ही उन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की, कांग्रेस समर्थक उनके इतिहासकार होने पर ही सवाल उठाने लगे। अब इनसे पूछो गुहा ने वही कहा जो सच है। जब पार्टी परिवार भक्ति करती रहेगी सत्ता से दूर ही रहेगी। किसी राज्य में सरकार बन जाये तो बन जाये पार्टी का यही हाल रहा तो क्षेत्रीय दलों से बुरी हालत होने वाली है। 

रामचंद्र गुहा के लेख से कांग्रेसियों को लगी मिर्ची

कांग्रेस इकोसिस्टम ने रामचंद्र गुहा के इस लेख की खूब आलोचना की। कांग्रेसी रामचंद्र गुहा के ‘इतिहासकार’ वाला लाइसेंस रद्द करने में जुट गए। किसी ने लेख को ‘बौद्धिक बेईमानी’ बताया और कहा कि यह विश्लेषण भाजपा के लिए ही काम करता है। किसी ने सीधा सवाल पूछा कि दूसरों को दोष देने से पहले बताइए कि आपने खुद मोदी को कमजोर करने के लिए क्या किया? एक ने तो गुहा को सीधे ‘फ्रॉड’ तक बुला दिया।

पेशे से पत्रकार और कांग्रेस के चाटूकार औनिंद्यो चक्रवर्ती ने कहा कि गुहा हमेशा से मोदी सरकार के आलोचक रहे हैं, इसलिए गाँधी परिवार की आलोचना करने से वो भाजपा समर्थक नहीं हो जाते। साथ में गुहा पर सवाल उठाया कि सिर्फ आर्काइव किताबें लिखने से कोई इतिहासकार नहीं बन जाता।

राजेश ग्रीगलानी, जो खुद कांग्रेस कार्यकर्ता हैं, उन्होंने गुहा के लेख को ‘बौद्धिक बेईमानी’ बताया। उन्होंने राहुल गाँधी की तरफ लेते हुए कहा कि संसद में अडानी, NEET और संस्थाओं पर कब्जे जैसे मुद्दे लगातार उठा रहे हैं और 2024 में भाजपा का बहुमत तोड़ना उनकी रणनीति का नतीजा है। वो कहते हैं कि गुहा का ‘दोनों तरफ गलती है’ वाला रुख खतरनाक है और यह विपक्षी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ता है।

शिवानी वर्मा ने तंज कसा कि गुहा सालों से राहुल गाँधी पर कॉलम पर कॉलम लिखते आ रहे हैं, अगर राहुल इतने ही अप्रासंगिक हैं तो वो उनके बारे में लिखना बंद क्यों नहीं कर पाते। वो नाम चॉमस्की का हवाला देते हुए कहती हैं कि सबसे खतरनाक बुद्धिजीवी वो होता है जो बिना पैसे लिए भी बारीक विश्लेषण के जरिए सत्ता के लिए सुविधाजनक निष्कर्ष पर पहुँचता है।

कांग्रेसी इकोसिस्टम से जुड़ा ‘एक्स’ हैंडल Rofl Democrazy का कहना है कि गुहा ने जानबूझकर यह नजरअंदाज किया कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत में अँधे हो चुके बहुसंख्यक वोटरों ने मोदी को मजबूत किया है। वो राहुल को अकेला लड़ने वाला बताते हैं और कहते हैं कि उदारवादियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

सौरभ ने गुहा से सीधा सवाल पूछा कि चलो मान लिया गाँधी परिवार ने मोदी को मजबूत किया, लेकिन आपने मोदी को कमजोर करने के लिए क्या किया? भाजपा जब नेहरू-गाँधी पर झूठ फैला रही थी तब इतिहासकार के तौर पर आप कहाँ थे?

जवाहरलाल नेहरू के करीबी वीके कृष्ण मेनन के पैरॉडी ‘एक्स’ अकाउंट ने गुहा को ‘फ्रॉड’ करार दिया और कहा कि एक सच्चे इतिहासकार को राजनीतिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। आगे कहा कि गाँधी परिवार को नीचा दिखाने के लिए गुहा ने नेहरू के बारे में भाजपा के झूठ को भी आगे बढ़ाया है।

कैसे रामचंद्र गुहा ने कांग्रेस को बताया ‘पारिवारिक फर्म’?

गुहा लिखते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद लगा था कि कांग्रेस बदल रही है, लेकिन 2024 के चुनाव खत्म होते ही पार्टी फिर ‘पारिवारिक फर्म’ बन गई। राहुल के वायनाड छोड़ते ही वहाँ प्रियंका गाँधी को बिठा दिया गया और दावा किया गया कि राहुल उत्तर भारत और प्रियंका दक्षिण का प्रतिनिधित्व करती हैं। गुहा यह भी आपत्ति जताते हैं कि संविधान की 75वीं वर्षगाँठ पर कॉन्ग्रेस ने प्रियंका को मुख्य वक्ता बनाया, जबकि उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने ही आपातकाल लगाकार उसी संविधान को सबसे बड़ा नुकसान पहुँचाया था।

                                           (स्क्रीनशॉट साभार: The Telegraph)

गुहा आँकड़े देते हुए बताते हैं कि 2008 से जब से राहुल ने कमान संभाली है तब से देशभर में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1,204 से घटकर 676 रह गई है। प्रियंका के बारे में भी गुहा लिखते हैं कि 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी अगुवाई में कांग्रेस को महज 2.27% वोट मिले। फिर भी 99 सीटें आते ही चापलूसों और दिल्ली के कुछ हिंदू-विरोधी पत्रकारों ने राहुल को ‘भविष्य का प्रधानमंत्री’ घोषित कर दिया, नतीजा यह हुआ कि आज कांग्रेस ज्यादातर हिस्सों में धीरे-धीरे जमीन खो रही है जबकि गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में भाजपा ‘शासन की स्वाभाविक पार्टी’ बन चुकी है।

                                       (स्क्रीनशॉट साभार: The Telegraph)

राहुल में क्या कमी देखते हैं गुहा?

गुहा लिखते हैं कि राहुल गाँधी व्यक्तिगत रूप से अच्छे इंसान हैं लेकिन 55 साल की उम्र में भी वो अपनी माँ सोनिया गाँधी की इच्छा के साधन हैं। उन्होंने UPA के 10 साल में मंत्री बनने से मना कर दिया, कभी कोई असली काम नहीं किया तो फिर इतने बड़े और विविध देश के प्रधानमंत्री के तौर पर भरोसा कैसे बनेगा।

गुहा यह भी लिखते हैं कि राहुल किसी मुद्दे पर टिककर काम नहीं करते, कभी चुनाव आयोग के पक्षपात पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तो अगले ही दिन यूरोप या लैटिन अमेरिका की यात्रा पर निकल जाएँगे। सिर्फ भारत जोड़ो यात्रा के कुछ महीनों में ही उन्होंने भाजपा नेताओं जैसा फोकस्ड काम दिखाया, बाकी उनकी राजनीति ज्यादातर ट्विटर (एक्स) तक सिमटी रहती है जो 24 घंटे में भुला दी जाती है।

गुहा आगे लिखते हैं कि 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला अभियान बुरी तरह फेल हुआ, लेकिन राहुल ने उससे कोई सबक नहीं लिया और आज भी मोदी पर निजी हमले जारी हैं। गुहा यह भी लिखते हैं कि मोदी, शाह और भाजपा गणतंत्र के मुख्य दुश्मन हैं, लेकिन गांधी परिवार जाने-अनजाने उनका साथ देने वाला बन गया है।

अंत में गुहा हंगरी का उदाहरण देते हैं जहाँ एक बिल्कुल नए और साफ चेहरे ने गाँव-गाँव घूमकर वहाँ के ताकतवर नेता को चुनौती दी और साफ तौर पर कहते हैं कि 2029 में जब मोदी के खिलाफ नाराजगी राजनीतिक चुनौती बनेगी, तो उसे आगे ले जाने वाला नेता राहुल या प्रियंका गाँधी नहीं होंगे।

कौन है रामचंद्र गुहा और उनसे जुड़े विवाद?

रामचंद्र गुहा का जन्म 1958 में देहरादून में हुआ। दून स्कूल से प्रारंभिक पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में डिग्री ली। फिर समाजशास्त्र में डॉक्टरेट किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुहा येल, स्टैनफोर्ड और कैलिफोर्निया के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहे हैं। महात्मा गाँधी की जीवनी और भारत के इतिहास पर कई किताबें भी लिखी हैं। खुद को इतिहासकार कहते हैं, हालाँकि इतिहास में उनका कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं है। वामपंथी मीडिया द टेलीग्राफ, द वायर जैसे पोर्टल में नियमित कॉलम लिखते हैं।

लेकिन इनका एक और चेहरा भी है। साल 2018 की बात करें जब गुहा गोवा गए और वहाँ से एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘चूँकि यह भाजपा शासित राज्य है, इसीलिए मैंने बीफ खाकर जश्न मनाया’ यानी खाने को भी राजनीति बना दिया। जब बवाल मचा तो माफी माँग ली और कहा कि ट्वीट गैरजरूरी था। लेकिन मकसद साफ था, किसी भी बहाने भाजपा को घेरना।

फिर 2019 में देश में CAA के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे। गुहा बेंगलुरु की सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन में शामिल हुए और हिरासत में लिए गए। यानी सिर्फ लिखना नहीं, सड़क पर भी उतरते हैं, जब मुद्दा मोदी सरकार के खिलाफ हो।

फिर एक विवाद और। इन्होंने ट्वीट किया, “गुजरात के पास सिर्फ पैसा है, संस्कृति नहीं। बंगाल के पास संस्कृति है।” तब बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार थी। यानी प्रधानमंत्री के गृह राज्य की संस्कृति पर सीधा हमला किया गया। इस पर भी लताड़े गए और जवाब मिला कि गरबा, सोमनाथ, नरसिंह मेहता, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, ये सब गुजरात की संस्कृति नहीं है तो क्या है?

2022 में गुजरात दंगों की 20वीं बरसी पर स्क्रॉल के लिए एक लेख लिखा। इसमें 2002 के दंगों को ‘Pogrom’ यानी एक समुदाय के खिलाफ सुनियोजित हमला बताया। लेकिन उसी लेख में गोधरा में जिंदा जलाए गए 59 कारसेवकों का जिक्र तक नहीं था। और इसके साथ ही कांग्रेस की तारीफ करते हुए लिखा कि मोदी ने गुजरात दंगों पर माफी नहीं माँगी, यह जानते हुए भी कि नानावती आयोग मोदी को क्लीन चिट दे चुका था।

और केदारनाथ में जब पीएम मोदी ने आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण किया तो उस पर भी आपत्ति जताने वालों में गुहा शामिल थे।

यानि हिंदू आस्था हो, भाजपा शासित राज्य हो, मोदी सरकार का कोई भी फैसला हो, गुहा निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ते। और बीच-बीच में कांग्रेस पर भी कुछ लिख देते हैं ताकि निष्पक्ष दिखें। अब जब इन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की है तो वही कांग्रेस इनके इतिहासकार होने पर सवाल उठा रही है। यानी जब तक काम का था, बुद्धिजीवी थे। जैसे ही गाँधी परिवार पर लिखा, फ्रॉड हो गए।