टीएमसी के बाद अब INDI गठबंधन में भी टूट, उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ और समाजवादी पार्टी में भी टूट


जो काम मोदी सरकार-3 को 400 सांसद होने पर करना था वही काम होने जा रहा है 240 सांसदों के होते। As you sow you will reap यानि हिन्दी में जो बोया वही काटो यानि कांग्रेस ने जो बोया वही आज INDI गठबंधन को काटना पड़ रहा है। इतिहास में झाँकने पर मालूम होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर बीजेपी तत्कालीन भारतीय जनसंघ तक जितनी भी पार्टियां है सभी कांग्रेस से निकली है। जनसंघ वर्तमान बीजेपी जैसी पार्टियां तो अपना अस्तित्व बनाने में सफल रही और कुछ सिर्फ क्षेत्रीय पार्टी। 
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सत्ताधारी महागठबंधन में शामिल दलों की एकजुटता की चूलें हिलाकर रख दी हैं संसद के उच्च सदन की दूसरी सीट पर प्रियंका गांधी के करीबी कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की करारी शिकस्त के बाद सत्ताधारी महागठबंधन यानी INDI ब्लॉक की दीवारें पूरी तरह दरकती दिख रहीं हैं इस चुनावी मुकाबले ने गठबंधन के भीतर चल रहे अविश्वास का एक ऐसा ‘एनकाउंटर’ किया है, जिसके जख्म के निशान अब मुख्यमंत्री आवास की दीवारों पर नजर आ रहे हैं चुनाव के इस लिटमस टेस्ट में बुरी तरह जख्मी नजर आ रही कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल(RJD) और वामपंथी दल माले(CPI-ML) पर खुलेआम क्रॉस वोटिंग और भितरघात का आरोप मढ़ा है वहीं राजद ने भी अब पलटवार करते हुए कांग्रेस को ही असली ‘गद्दार’ बता दिया है और उसे गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की मांग तेज कर दी है
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार बैजनाथ मिश्रा का मानना है कि यह चुनाव परिणाम महज एक सीट की हार नहीं, बल्कि महागठबंधन के भीतर आपसी भरोसे का पूरी तरह अंत है ऐसे में चुनाव के बाद घायल अवस्था में पड़ी कांग्रेस के नेता जहां तल्ख तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं राजद भी पूरी तरह आक्रामक है राजद के राष्ट्रीय महासचिव भोला प्रसाद यादव ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी खुद की अंदरूनी कलह और कमजोरी को छिपाने के लिए सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ रही है उन्होंने कहा कि जो दल अपने विधायकों को संभाल नहीं सकता, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है
खैर, जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक कांग्रेस ने जितनी पार्टियों में टूट और विधान सभाओं को भंग किया ऐसा कभी नहीं हुआ। आज अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी वही काम कर रही है क्योकि बीजेपी को पास कराना है महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को पारित करवाना जिसके लिए जरुरत है संसद में दो-तिहाई बहुमत। 
पार्टी छोड़कर आने वाले किसी भी विधायक से लेकर सांसद तक किसी को बीजेपी अपनी पार्टी में शामिल करने की बजाए अपनी सहयोगी पार्टियों की तरफ हस्तांतरण किया जा रहा है।    
देश में विपक्ष की सियासत इस समय दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन के एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर राज्यों के सियासी गलियारों तक, क्षेत्रीय दलों के भीतर मची भगदड़ ने भारतीय दलबदल विरोधी कानून की गलियों और राजनीतिक शुचिता के दावों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के दूसरी छोटी पार्टी में विलय के बाद अब महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 सांसदों की बगावत सुर्खियों में है। इसको लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत तो गालीगलौज तक पर उतर आए हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुनबे में टूट की सुगबुगाहट आ रही है। ये महज छिटपुट सियासी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे एक गहरे ढांचागत बदलाव का संकेत हैं। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि मजबूत दिखाई देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले भी अब अंदरूनी अंतर्विरोधों और एनडीए की राष्ट्रवादी राजनीति के आकर्षण के कारण ढह रहे हैं।

ममता के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी सांसदों का विलय
इस पूरे राजनीतिक भूचाल की शुरुआत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से हुई, जहां भाजपा ने टीएमसी को रोंदकर सरकार बनाई। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।

उद्धव गुट को एक और झटका: शिवसेना की बगावत
दूसरी ओर महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा और अब लोकसभा स्तर पर पार्टी को एक और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। पार्टी के छह प्रमुख सांसदों, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना के बागी रुख ने उद्धव ठाकरे खेमे की रीढ़ तोड़ दी है। इस टूट ने पार्टी नेतृत्व की उस संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके लिए कभी बाल ठाकरे की शिवसेना जानी जाती थी।

हताशा से भरे सांसद संजय राउत गाली गलौज पर उतरे
शिवसेना उद्धव गुट के इन सांसदों के गुट ने अभी किस पार्टी में विलय किया है, यह तो साफ नहीं हुआ है, लेकिन इस बिखराव की तल्खी तब खुलकर सामने आ गई जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना आपा खो बैठे। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज पर उतर आए। राउत का यह गुस्सा और तीखे आरोप दरअसल उस लाचारी और हताशा को दर्शाते हैं, जो एक समय महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र रहे दल के भीतर अपनी जमीन खिसकने के कारण पैदा हुई है। गाली-गलौज की यह राजनीति बताती है कि संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

समाजवादी पार्टी पर भी मंडरा रहे हैं बड़ी टूट के बादल
संसद के इस दलबदल चक्र की तपिश अब देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के इस सनसनीखेज दावे ने यूपी की सियासत में खलबली मचा दी है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 26 सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं और उनके भीतर गहरी फूट पड़ चुकी है। राजनीति में इस तरह के दावों को अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति माना जाता है। समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में चार सांसद हैं। ऐसे में 25 सांसदों के टूटने की खबरों से पार्टी में हड़कंप की स्थिति बन गई है और सांसदों को रोकने के रणनीति बनाई जा रही है।

‘सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस चर्चा को हवा दे दी है। मौर्य का यह कहना कि’सपा के सांसद टूटने को तैयार हैं, हम तोड़ नहीं रहे हैं’, दरअसल सपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है। यह बयान दिखाता है कि सत्ता पक्ष विपक्ष के किलों में लगी दरारों को भांप चुका है और केवल सही वक्त का इंतजार कर रहा है। अखिलेश यादव के लिए अपने इस बड़े कुनबे को एकजुट रखना आने वाले दिनों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कमजोर पड़ता क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व और केंद्रीय सत्ता का आकर्षण
इन तीनों राज्यों के घटनाक्रमों को अगर एक सूत्र में पिरोकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के क्षेत्रीय दल इस समय एक बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं। जब तक ये दल सत्ता में रहते हैं या मजबूत दिखते हैं, तब तक इनका अंतर्विरोध दबा रहता है। लेकिन जैसे ही चुनावी हार या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, वैसे ही सांसदों और विधायकों का मोहभंग होने लगता है। टीएमसी, शिवसेना और सपा जैसी पार्टियों का ढांचा अक्सर एक ही परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। ऐसे में जब जमीनी स्तर पर नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो महत्वाकांक्षी नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित लगने लगता है। केंद्रीय सत्ता का संरक्षण और उसके साथ मिलने वाले लाभ इन सांसदों को अपनी मूल पार्टी की विचारधारा को छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल आत्ममंथन करें कि ऐसी नौबत क्यों आई
संजय राउत के बयानों और विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह भी साफ है कि विपक्ष की राजनीति में अब गरिमापूर्ण संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है। जब कोई नेता या सांसदों का समूह पार्टी छोड़ता है, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई। इसके विपरीत, बागी नेताओं को गद्दार घोषित करना, उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना और व्यक्तिगत कीचड़ उछालना अब एक आम चलन बन गया है। यह रवैया राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को दिखाता है। लोकतंत्र में असहमति और दलबदल की एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उसे निजी दुश्मनी और गाली-गलौज के स्तर पर ले जाना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।

दलों ने आंतरिक लोकतंत्र नहीं सुधारा तो भविष्य और चुनौतीपूर्ण
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का यह खेल उस आम मतदाता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो किसी पार्टी की विचारधारा, उसके घोषणापत्र और उसके नेता का चेहरा देखकर अपना वोट देता है। जब चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ या दबाव में आकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाता है, तो जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था कम होने लगती है। टीएमसी, शिवसेना और संभावित रूप से सपा के भीतर चल रहा यह घटनाक्रम यह चेतावनी है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी अंदरूनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं सुधारा और जनमत का सम्मान नहीं किया, तो उनके लिए आने वाला भविष्य और चुनौतीपूर्ण होगा। सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कीमत पर पाई गई सत्ता लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती।

क्या है दलबदल विरोधी कानून का लक्ष्मण रेखा
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लागू दलबदल विरोधी कानून मूल रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वार्थी पाला-बदल को रोकने के लिए बनाया गया था, जिसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में व्हिप (पार्टी निर्देश) के उल्लंघन में मतदान करता है, तो उसकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त की जा सकती है; हालांकि, इस कानून की सबसे बड़ी कानूनी खिड़की इसके ‘विभाजन और विलय’ संबंधी प्रावधानों में छिपी है, जिसके मुताबिक यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ मिलकर एक अलग गुट बनाते हैं और किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में अपने गुट का आधिकारिक रूप से विलय कर लेते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई लागू नहीं होती और उनकी सांसदी या विधायकी पूरी तरह सुरक्षित रहती है। जैसा कि हाल ही में टीएमसी के 20 सांसदों ने किया।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने दिया इस्तीफा: उत्तराधिकारी चुने जाने तक अंतरिम रूप से संभालते रहेंगे पद

                कीर स्टार्मर का इस्तीफा, लेबर पार्टी में कलह के बाद छोड़ा पद (फोटो साभार: X_Keir_Starmer)
ब्रिटेन की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार (22 जून 2026) को अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी है। लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और आंतरिक कलह के बीच स्टार्मर को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा। डाउनिंग स्ट्रीट से जारी एक भावुक बयान में उन्होंने कहा कि उन्होंने किंग चार्ल्स को अपने फैसले की जानकारी दे दी है, लेकिन नया उत्तराधिकारी चुने जाने तक वह प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियाँ संभालते रहेंगे।

स्टार्मर का यह इस्तीफा पिछले कई हफ्तों से चल रही राजनीतिक अटकलों के बाद आया है। हाल के दिनों में सरकार को कई राजनीतिक झटके लगे, जिससे जनता के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से घटी। इसके साथ ही लेबर पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व परिवर्तन की माँग लगातार तेज हो रही थी, जिसने स्टार्मर को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया।

डाउनिंग स्ट्रीट से दिए अपने इस्तीफे के बयान में कीर स्टार्मर ने पूरी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “मैंने किंग (राजा) को अपने इस फैसले की जानकारी दे दी है। पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम को देखते हुए मेरा पद छोड़ना ही उचित है। हालाँकि देश में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने के लिए मैं तब तक अपने पद पर बना रहूँगा, जब तक कि मेरे उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर लिया जाता।”

जुलाई 2024 में कीर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, जिसने ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के 14 साल के शासन को खत्म किया था। शुरुआती दिनों में स्टार्मर सरकार को जनता का भारी समर्थन मिला, लेकिन जल्द ही देश की अर्थव्यवस्था, चरमराती सार्वजनिक सेवाओं और पार्टी के अंदरूनी मतभेदों ने उनके सामने बड़ी चुनौतियाँ खड़ी कर दीं।

ब्रिटेन के 58वें प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते हुए 61 वर्षीय स्टार्मर ने देश में बड़े बदलाव और नतीजों को धरातल पर लाने का वादा किया था। अपने पहले ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती ऋषि सुनक की जमकर तारीफ की थी और सुनक के समर्पण व कड़ी मेहनत को सराहा था। हालाँकि उनका यह कार्यकाल भी हाल के वर्षों में ब्रिटेन के अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह बेहद छोटा और उथल-पुथल भरा साबित हुआ।

भारत में घुसपैठ पर 900 करोड़ रूपए साल खर्च करते हैं बांग्लादेशी, 1000 घाटों पर चलता अवैध कारोबार: शुभेंदु सरकार आई तो बंद हुआ बिचौलियों का धंधा

घुसपैठ को नासूर बनाने वाली हमारी भारत सरकार ही है। सियासतखोर नेता और उनकी पार्टियां कुछ काम करने की बजाए हिन्दू-मुसलमान कर जनता को गुमराह कर कुर्सी पर बैठते रहे। घुसपैठियों को घर में घुसाकर दामादों की तरह पाल अपने ही देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने का काम होता रहा है। जबकि दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जहां घुसपैठियों को चोर रास्ते से घर में घुसा दामादों की तरह लालन-पालन करे। रोहिंग्या जिन्हे कोई मुस्लिम देश तक रखने को तैयार नहीं लेकिन भारत में सियासतखोर नेता और उनकी पार्टियां दामादों की तरह उनका बचाव करती हैं। क्या ऐसी पार्टियां देशहित में कोई काम कर सकती हैं? अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाली बीजेपी भी इस गंभीर मसले पर ज्यादा सख्त नहीं। हाँ, कुछ मुख्यमंत्री जरूर सख्ती से काम कर रहे हैं।       
घुसपैठियों को निकालने पर कट्टरपंथी और उनको समर्थन देने वाली पार्टियां दुष्प्रचार कर रही हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं और मुसलमान भी इसे सच मान मोदी सरकार की कार्य क्षमता पर शक कर रहा है। 

कहने को पाकिस्तान कंगाली के दौर से गुजर रहा है। हाथ में कटोरा लिए घूम रहा है लेकिन आतंकवाद और भारत में दंगे/जेहाद पर खूब पैसा खर्च कर रहा है। बांग्लादेश जिसे भारत सरकार हर साल करोडो रुपया मानवीय सहायता देती है, क्यों? भारत में घुसपैठी भेजने पर जो पैसा खर्च हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इस पर भी मोदी सरकार को गंभीरता से चिंतन करना होगा।     

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ को लेकर सामने आई एक विस्तृत पड़ताल में एक पूर्व बिचौलिए ने कई बड़े दावे किए हैं। उसके मुताबिक, वर्षों तक सीमा पार लोगों की आवाजाही कराने वाला एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था, जिसका सालाना कारोबार करीब 800 से 900 करोड़ रुपए तक था।

उत्तर 24 परगना के सीमा क्षेत्र से जुड़े इस बिचौलिए ने दावा किया कि इस नेटवर्क में सीमा के दोनों ओर मौजूद एजेंट, स्थानीय संपर्क, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और फर्जी दस्तावेज तैयार कराने वाले लोग शामिल थे।

सत्ता के गलियारों में यह चर्चा भी गर्म है कि जिस तरह मुख्यमंत्री शुभेन्दु हरकत में हैं कभी भी उन सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर गाज गिर सकती जिन्होंने घुसपैठियों को राशन कार्ड, पहचान पत्र और दूसरी सरकारी सुविधाएं दिलवाई। दस्तावेज ऐसे ही नहीं बन गए। सबने अपनी-अपनी कमीशन जरूर ली होगी। जो इनके बैंक खातों की जाँच होने पर ही सामने आ पाएगा।  

TMC में बिखराव ऐसे ही नहीं हुआ है, इसके पीछे भी बहुत गहरा षड़यंत्र है। शक है कि इन घुसपैठियों को दामाद मान आबाद करवाने में इन लोगों का भी हाथ है। आज अपने आपको दूध का धुला साबित करने और मुख्यमंत्री के प्रकोप से बचने के लिए सब ममता का साथ छोड़ रहे हैं। और शायद यही कारण है कि बीजेपी ने इन बागियों को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करने की बजाए त्रिपुरा की पार्टी में शामिल होने को कहा है।    

हालाँकि नवंबर 2025 में राज्य में मतदाता सूची के SIR अभियान शुरू होने और पिछले महीने भाजपा सरकार के आने से परिस्थितियाँ बदल गईं, जिसके चलते यह कारोबार लगभग बंद होने की स्थिति में पहुँच गया।

‘घाट’ और ‘लाइनमैन’ के जरिए होती थी घुसपैठ

आनंदबाजार पत्रिका में पूर्व बिचौलिए के हवाले से दावा किया गया कि भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े कई इलाकों में ऐसे ‘घाट’ (1000 घाट) मौजूद थे, जहाँ से लोगों को सीमा पार कराया जाता था। उसके अनुसार, यह तय किया जाता था कि किस स्थान पर कब निगरानी कम है और उसी के आधार पर गतिविधियाँ संचालित होती थीं।

दावे के मुताबिक, भारतीय सीमा क्षेत्र में खेतों और झाड़ियों के बीच छिपकर बैठे कुछ लोग निगरानी करते थे और सीमा सुरक्षा बल की गश्त की जानकारी दूसरी ओर पहुँचाते थे। जब रास्ता सुरक्षित माना जाता, तब सीमापार आवाजाही कराई जाती थी। रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रक्रिया केवल रात तक सीमित नहीं थी, बल्कि अवसर मिलने पर दिन में भी की जाती थी।

फोन, Sim और भुगतान के जरिए चलता था संपर्क

बिचौलिए ने दावा किया कि सीमा के दोनों ओर मौजूद लोगों के बीच लगातार संपर्क बना रहता था। इसके लिए भारतीय और बांग्लादेशी सिम कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था। कई बार डिजिटल माध्यमों से पैसों का लेनदेन भी होने का दावा किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, सीमा पार पहुँचने के बाद लोगों को नजदीकी बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन तक पहुँचाने की जिम्मेदारी स्थानीय नेटवर्क संभालता था। इसके बाद उन्हें बड़े शहरों तक भेजने के लिए अलग व्यवस्था की जाती थी। इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर भुगतान तय रहता था।

कमाई का मॉडल और सुरक्षा एजेंसियों को लेकर दावे

दावों के अनुसार, सीमा पार कराने के बदले प्रति व्यक्ति तय रकम ली जाती थी और उसका बंटवारा नेटवर्क से जुड़े अलग-अलग लोगों के बीच होता था। बिचौलिए का दावा है कि कुछ सीमावर्ती हिस्सों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग लाए जाते थे और इसी आधार पर पूरे कारोबार का आकार काफी बड़ा हो गया था।

रिपोर्ट में कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी दावा किया गया कि सीमा पार के कुछ तत्वों को आर्थिक लाभ देकर गतिविधियों को आसान बनाया जाता था। वहीं यह भी कहा गया कि पिछले कुछ वर्षों में निगरानी बढ़ने और हालिया सत्यापन प्रक्रियाओं के बाद इस तरह की गतिविधियों में गिरावट आई है।

फर्जी दस्तावेजों का नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के आरोप

पड़ताल में यह भी दावा किया गया कि सीमा पार आने के बाद पहचान स्थापित करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार कराने का समानांतर तंत्र मौजूद था। आरोप लगाए गए कि कुछ मामलों में जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, आधार, वोटर ID और PAN कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल कराने के लिए स्थानीय स्तर पर संपर्कों का इस्तेमाल किया जाता था। रिपोर्ट में कुछ पूर्व स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक तंत्र से जुड़े लोगों पर भी आरोप लगाए गए हैं कि वे ऐसे दस्तावेज तैयार कराने में मदद करते थे।

जब कांग्रेस राज में हाथ की HMT घडी के लिए , LPG, दो पहिया स्कूटर के लिए महीनों पहले बुकिंग और घर में मरम्मत करवाने के लिए राशनिंग ऑफिस से सीमेंट परमिट लेना पड़ता था

साभार : सोशल मीडिया

भारत भी कितना विचित्र देश है जहाँ सरकारी स्तर पर झूठ परोसा जाता है और जनता है कि उसे ही सच मान लेती है। शिक्षित भी अनपढ़ों की तरह ज्ञान पेलते नज़र आते हैं। वैसे जनता भी कितनी महामूर्ख है जो आँखों देखी मक्खी तक खा रही है। बच्चों की जाति हमेशा ददिहाल पर होती है ननिहाल पर नहीं। लेकिन भारत में कितना बड़ा छलावा चल रहा है कि फ़िरोज़ जहांगीर की औलादें अपने दादा की बजाए नाना का भी नहीं किसी और की जात अपनाये हुए है। जब इन्दिरा गाँधी का निकाह फिरोज से हुआ तो sarname फिरोज का होना चाहिए लेकिन नाम चल रहा है गाँधी।
दरअसल, वोट चोरी, evm से छेड़छाड़ आदि से जनता को गुमराह करने वाले राहुल गाँधी या कांग्रेस देश को बताए कि कांग्रेस राज में पनडुब्बी पर कौन ऐश करता था? पनडुब्बी देश की रक्षा के होती है या ऐश करने के लिए? जब युद्ध के दौरान हर एयरलाइन के पायलट को 24 घंटे ड्यूटी पर रहने का नियम है फिर 1971 इंडो-पाक युद्ध के दौरान पायलट राजीव गाँधी इटली क्यों चले गए, क्यों नहीं उन पर कानूनी कार्यवाही की गयी? वो इसलिए पायलट राजीव प्रधानमंत्री का बेटा था। हाँ, अगर राजीव की बजाए कोई अन्य होता उसे नौकरी से निकाल दिया जाता। क्या वजह थी कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सिर्फ मोहरा बनाकर प्रधानमंत्री पद की गरिमा को चोट पहुंचाई? किस हैसियत से पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को किसी भी सरकारी कार्यक्रम में पहली पंक्ति में जगह दी जाती थी? क्यों हर विदेशी मेहमान को सोनिया से मिलवाया जाता था? लोकतंत्र और संविधान का मजाक ही नहीं जितनी धज्जियाँ कांग्रेस ने उड़ाई हैं शायद किसी अन्य पार्टी ने नहीं। क्या वह लोकतंत्र और संविधान का मजाक नहीं था?
पूंजीपतियों को सीधा जितना फायदा कांग्रेस ने पहुंचाया है किसी ने नहीं। सेर को किलो/लीटर में बदल दिया मतलब ग्राहक से पैसे पूरे लो कम वजन में सामान दो क्योकि सेर किलो/लीटर से ज्यादा होता है। इतना ही नहीं सोना और चांदी भी तोला से ग्राम में बिकवानी शुरू कर दी। 1 तोला होता है लगभग 11.120 ग्राम। फिर कहते हो वर्तमान सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है।
देखिए सोशल मीडिया पर पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ का वीडियो। यह कोई पहला या आखिरी नहीं, सोशल प्लेटफार्म पर राष्ट्रीय और हिन्दुत्व मुद्दों को बहुत बेबाकी से उठाते रहते हैं।
कोई पत्रकार राहुल गांधी से यह नहीं पूछ रहा कि राहुल जी जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बने थे तब तक आप की नानी आपकी दोनों मौसी दोनों मौसी के पति बच्चे यानी आप का इटली का पूरा खानदान दिल्ली में रहता था।
उनको 3 सरकारी बंगले किस हैसियत से अलॉट किए गए थे और वह किस हैसियत से तमाम सरकारी कार्यक्रम में शामिल होते थे?
और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के 15 दिन के बाद यह पूरा माइनों खानदान किसी चोर की तरह इटली क्यों चला गया?
आज राहुल गांधी नानी से मिलने के बहाने बार-बार इटली आते हैं लेकिन कभी 10 साल कांग्रेस के सत्ता के दौरान और उसके पहले जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब यह धूर्त इटली नहीं जाते थे क्योंकि सोनिया गांधी के मायके का पूरा खानदान दिल्ली में रहता था और लुटियंस जोन में पांच बंगले उन्हें रहने को दिए गए थे।
यहां तक कि सोनिया गांधी के बचपन का दोस्त क्वात्रोची भी हर सरकारी सुविधा ले रहा था।
सोनिया गांधी की मां पाउलो माइनो सरकारी कार्यक्रम में भाग लेती थी राष्ट्रपति भवन में कई सरकारी कार्यक्रम में शामिल होती थी पूरी सरकारी मशीनरी उनके आगे पीछे घूमती थी।
सोनिया गांधी की तीन बहने हैं जिसमें से दो बहने तो भारत में ही रहती थी और एक बहन का रोम और मिलान में बहुत बड़ा एंटीक स्टोर है।
और कई पुरातत्वविद ने इस बात का खुलासा किया था कि भारत से कई म्यूजियम में दुर्लभ चीजों को प्रदर्शनी के बहाने विदेश ले जाया जाता था और फिर वहां बड़े नाटकीय ढंग से उन्हें चोरी हुआ दिखा दिया जाता था और बाद में पता चलता था कि वह सोनिया गांधी के बहन के स्टोर में बिकने के लिए गया है।
इस तरह से भारत की तमाम बेशकीमती दुर्लभ मूर्तियां तमाम आर्टीफैक्ट्स विदेशों में प्रदर्शनी के बहाने ले जाए गए और वहां चोरी की नौटंकी बता कर सोनिया गांधी के बहन के स्टोर में पहुंचा दिया गया था।
नेहरू चाचा ने इतना सशक्त भारत बनाया कि 𝟏𝟗𝟖𝟒 में जब इंदिरा जी की मृत्यु हुई और राजीव गाँधी जी प्रधान मंत्री बने, तो देश मे आम नागरिक को दो बोरी सीमेन्ट लेने के लिये भी तहसीलदार से परमिट लेना पड़ता था। ऐसा लम्बे समय तक चला रहा!
01 एक किलो चीनी खरीदने तक के लिये भी परमिट लगता था। शादी विवाह में एक क्विंटल चीनी लेने के लिये,तो लोग महीनों पहले से सोर्स सिफारिश खोजते फिरते थे। मुंडन, सालगिरह, शादी तक में लोगों की संख्या सीमित कर दी गयी थी। शादियों में लोग चाय और पकोड़े आदि खाकर नेग देकर जाना पड़ता था। ऐसा वृद्ध लोगों ने देखा है!
तब भारत में एलपीजी के कनेक्शन के लिये 0𝟐 दो से 0𝟑 तीन साल से लेकर 05/10 साल तक का समय लगता था। यकीन मानिए, घर में एलपीजी होते हुए, भी गृहणियां स्टोव जलाती थीं, क्योंकि उन्हें डर रहता था कि, अगर गैस खत्म हो गयी, तो ब्लैक और लम्बी लम्बी लाइनों में रात भर लगने के बाद अगला पूरा दिन खड़े रह, गैस सिलेंडर भरवाना बहुत बड़ा काम था। एजेंसी के सामने बहुत लम्बी लाइन होती थी!
ये वो ज़माना था, जब देश मे बजाज स्कूटर प्रीमियम पर बिकते थे, मतलब 𝟓𝟎𝟎𝟎 का स्कूटर और 𝟔𝟎𝟎𝟎 ब्लैक! तब 𝟏𝟏,𝟎𝟎𝟎 में स्कूटर मिलेगा। तब टेलीफोन के कनेक्शन मिलने में 0𝟕 से 𝟏𝟎 साल लग जाते थे और बहुत जबरदस्त ब्लैक होती थी।
इसी तरह सन 1970 के आसपास ट्रैक्टर खरीदना के लिए नंबर लगाना पडता था और उस समय में मैसी फर्ग्यूसन ट्रैक्टर की कीमत लगभग 18 हजार रुपए थी और उसका नंबर आने में 10 से 15 साल लगते थे, तथा तत्काल लेने पर करीब 15 हजार के अधिक देना पडता था! यह राशि उस वक्त बहुत अधिक थी!
उस नेहरु खानदान के शासनकाल के जमाने में हर किसी वस्तु का ब्लैक मार्केटिंग होता था। साथ ही हर तरह के खाद्य पदार्थ और सीमेंट जैसी अनेक प्रकार की वस्तुओं में बहुत मिलावट होती थीं।
आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू चाचा कितने बड़े युगद्रष्टा थे, इसका एक और क़िस्सा सुनिये। नेहरू चचा ने 𝟏𝟗𝟓𝟕 में राजधानी दिल्ली के विकास के लिए 𝐃𝐃𝐀 की स्थापना की।
ऐसी एजेंसी जो मास्टर प्लान बनाती थी,उसमें अगले 𝟓𝟎 वर्षों की ही प्लानिंग करती थी कि, 𝟓𝟎 साल बाद ये शहर कैसा होगा। इसकी प्लानिंग करके ही शहर बसाया जाता है। उसकी सड़कें, पुल, सार्वजनिक परिवहन, रेलवे स्टेशन, बिजली पानी की व्यवस्था सब 𝟓𝟎 साल का सोच कर की जाती है।
नेहरू चाचा कहते थे, "मेरे सपनों का भारत" चाचा ने सपने में भी कभी नही सोचा था कि, दिल्ली वाले जिंदगी में कभी कार तो क्या, स्कूटर भी खरीद पाएंगे इसलिये 𝟔𝟎 और 𝟕𝟎 के दशक में बनाये गए, दिल्ली के 𝐃𝐃𝐀 फ्लैट्स देख लीजिये। किसी फ्लैट में कार, तो छोड़ो स्कूटर खड़ा करने तक की जगह नहीं है।
नेहरू चाचा कितने बड़े युगद्रष्टा थे, इसकी एक और मिसाल '𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚 𝐔𝐧𝐛𝐨𝐮𝐧𝐝𝐬' नामक किताब के लेखक गुरुचरण दास ने दी है। आप 𝟔𝟎 और 𝟕𝟎 के दशक में 𝐏&𝐆 के 𝐂𝐄𝐎 रहे हैं। नेहरू जी एवं इंदिरा जी के भारत में किसी कंपनी को टूथपेस्ट की ज़्यादा ट्यूब बनाने के लिए भी भारत सरकार से आज्ञा लेनी पड़ती थी और वो आज्ञा बहुत देरी में मिलती थी!
𝟕𝟎 के दशक में एक बार तमिलनाडु में फ्लू फैल गया 𝐏&𝐆 का मशहूर विक्स इन्हेलर और विक्स वेपोरब तब भी बनता था। फ्लू फैला, तो विक्स बाजार से गायब हो गई। कंपनी ने भारत सरकार से 0𝟓 लाख अतिरिक्त विक्स इन्हेलर बनाने की इजाजत मांगी। वो इजाजत डेढ़ महीने में आयी, तब तक फ्लू ठीक हो चुका था। हमेशा ऐसा ही होता था!
बजाज के पास तब भी यह क्षमता थी कि, वे लाखों स्कूटर बना देते, पर नेहरू जी और इंदिरा जी ने उनको कभी भी बड़ी संख्या में स्कूटर बनाने नहीं दिए, जिससे ब्लैक मार्केटिंग बंद हो सके।

गुरुचरण दास लिखते हैं कि, बिड़ला जी के एक बेटे आदित्य बिड़ला ने भारत मे जब हिंडाल्को खड़ी की, तो नेहरू इंदिरा ने उनको इतना परेशान किया कि, उन्होंने फिर कभी देश में लम्बे समय तक कोई फैक्ट्री नहीं लगाई। जबकि उन्होंने अपने जीवन मे देश के बाहर 𝟑𝟐 बहुत बड़ी बड़ी फैक्टरी लगाई।  

आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

               आरफा खानम की इस्लामी पत्रकारिता (फोटो साभार: आरम खानुम शेरवानी का यूट्यूब चैनल)
कुंठा और पूर्वाग्रह ऐसी चीजें हैं जो इंसान के दिमाग को खोखला कर देती हैं। जब यह बीमारी किसी के जेहन में घर कर जाए, तो उसे हर सकारात्मक चीज में भी सिर्फ नकारात्मकता ही नजर आती है। इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम शेरवानी इसी बीमारी से पीड़ित हैं।

आज जब पूरी दुनिया देख रही है कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कद और लोकप्रियता किस स्तर पर बढ़ी है- उस समय आरफा खानम शेरवानी खोज-खोजकर सिर्फ अपने देश के प्रधानमंत्री की बुराई करने में जुटी हैं।

उनकी कुंठा देख साफ पता चलता है कि चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरेआम मीडिया के सामने मोदी की सराहना करें, फ्रांस के राष्ट्रपति खुद वीडियो संदेशों के जरिए अपना प्रेम जाहिर करें, या फिर इजरायल के प्रधानमंत्री गर्मजोशी से गले मिलकर भारत के साथ दोस्ती की गहराई को दिखाएँ, लेकिन आरफा को इन दृश्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो अपने स्तर पर प्रधानमंत्री की छवि धूमिल करने के प्रयास जी-जान से करेंगी।

इस बार भी आरफा ने यही किया है। जी-7 समिट के दौरान सामने आई तस्वीरों को देख पूरा देश प्रधानमंत्री की तारीफ में जुटा था, लेकिन आरफा खानम ने एक पर्ची को देखकर पूरी वीडियो बना दी और ये समझाया कि अब तक कहा जाता था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता हैं, मगर अब मान लिया जाना चाहिए कि वो पर्ची वाले PM हैं, उन्होंने देश के लोगों को बेवकूफ बनाया है।

अपने इंट्रो में आरफा ने कहा, “15 साल पहले जिस व्यक्ति ने भारत के लोगों को ये कहकर बेवकूफ बनाया कि वो देश के मान-सम्मान-सरहदों की रक्षा करेगा। भारत की जनता ने जिसे तीन बार प्रधानमंत्री बनाया… अब वो सबूत मिल रहे हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं।”

अपनी वीडियो में वो जर्नलिज्म के छात्रों को पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर रिसर्च करने को कहती हैं कि वो पीएम मोदी के बैठने से लेकर हँसने तक को नोट करने को कहती हैं। इतना ही नहीं आरफा ये भी समझाने का प्रयास करती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश को विदेशी नेता के आगे झुका दिया है।

आरफा की समस्या ये है कि आखिर राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री की तारीफ क्यों की, क्यों उन्हें सुंदर, अच्छा डील करने वाला बताया और क्यों ये बोला कि जब तक पीएम मोदी प्रधानमंत्री हैं अमेरिका हमेशा भारत का साथ देगा। ऑपरेशन सिंदूर के समय पर पाकिस्तान के साथ बैठकर सब सुलह करने की पैरवी करने वाली आरफा खानम यहाँ अपनी दोगलई दिखाते हुए ये भी कहती हैं कि क्या हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि दूसरे देश हमारे मामलों में हस्तक्षेप करेंगे!

आगे वीडियो में आरफा खानम को समस्या इस बात से होती है कि प्रधानमंत्री के हाथ में पर्ची कैसे दिख गई। वो इस चीज को अपनी वीडियो में ऐसे हाईलाइट कर रही हैं जैसे दुनिया के पत्रकार की नजर नहीं पड़ी थी और उन्होंने ही प्रधानमंत्री को एक्सपोज किया हो।

अब जरा खुद सोचिए क्या प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप के सामने बैठते हुए ये नहीं पता था कि कैमरे में वो दिख रहे हैं और उनके हाथ में रखा कागज भी… उन्हें भी मालूम है कि उनकी हरकतों पर विदेशी कैमरों से ज्यादा देश में बैठे गिद्धों की नजर है जो मौका मिलते ही झपट्टा मारेंगे। लेकिन फिर भी अगर उन्होंने अपने हाथ में कोई कागज रखा तो ये ऐसा मुद्दा नहीं है कि उनकी वाकशैली पर सवाल खड़े किए जाएँ। ये सिर्फ कुतर्क है।

अब इस कुतर्क की हकीकत को समझिए कि दुनिया का बड़े से बड़ा नेता, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हो या कोई महान विचारक, जब किसी औपचारिक मंच पर देश या विदेश नीति, आँकड़ों और गंभीर विषयों पर बात करता है, तो वह पॉइंटर्स को अपने साथ रखता है।

यह एक जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान है ताकि देश को लेकर कोई भी बिंदु गलती से भी गलत न पेश हो। इसे देश को मूर्ख बनाना कहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझना भी कहा जाता है। आरफा भी जब टीवी के सामने कैमरे के लिए कभी बोलती होंगी तो टेलीप्राम्पटर उनके सामने रहता होगा ताकि खबर का कोई पहलू न छूटे… है न?

जब बड़े-बड़े पत्रकार किसी मुद्दे पर अपने पाठकों को बिना टेलीप्रॉम्पटर पर देखे खबर पढ़कर नहीं सुना सकते, तो प्रधानमंत्री के हाथ में दिखी एक पर्ची से उनके वाककौशल पर सवाल नहीं उठाना चाहिए उठाइए… क्योंकि इससे मजाक उन्हीं पत्रकारों का बनेगा।

क्या है आरफा खानम की प्रासंगिकता?

 हास्यास्पद बात ये है कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर सवाल करने का प्रयास आरफा जैसे वो लोग कर रहे हैं जिनकी खुद की प्रासंगिकता सिर्फ इस्लामी रिपोर्टिंग तक सीमित रह गई है। आज सरकार विवरण दे सकती है कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता के लिए क्या किया। उनके पास अपने कामों को सिद्ध करने के लिए जमीन पर दिख रहा विकास और डेटा होगा। मगर, आरफा खानम के पास खुद को ‘निष्पक्ष’ साबित करने के लिए न लेख होगा, न निजी विचार होंगे, न सोशल मीडिया पोस्ट होगा और न ही कोई वीडियो होगी।

वो भले चिल्ला-चिल्लाकर खुद को न्यूट्रल कहें, हाशिए समाज पर बैठे लोगों की आवाज बनने का दावा करें किंतु उनके किए काम और उनकी टाइमलाइन साफ बताती है कि उनकी चिंताओं में देश के हिंदू के मुद्दे हैं ही नहीं। उनकी स्थिति यहाँ पहुँच चुकी है कि अगर आज वह अपने में परिवर्तन करके हिंदुओं की बात करना और मोदी सरकार के कार्यों की सराहना करना शुरू भी कर दें तो उनके अपने दर्शक ही उनको स्क्रीन से दफा कर देंगे।

असल में बेवकूफ बनाने की की जाए तो असली बेवकूफ तो आपने सेकुलर हिंदुओं का बनाया है, जिन्होंने विश्वास किया कि आप निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर उन्हें सूचनाएँ देंगी, हिंदुओं के पीड़ित होने पर उनके मुद्दे को भी प्राथमकिता देंगी, लेकिन आपने मंच पाकर कभी अपनी कट्टरपंथी खाल को नहीं बदला। देश के पक्ष में उस समय तक बोला आपको लगा कि आपका फायदा है, मोदी सरकार आते ही आपके सुर बदले और आपकी इस्लामी खाल खाल से आपके सेकुलर हिंदू फॉलोवर्स भी परिचित हुए कि आप सिर्फ उन्हें ठगने के लिए बैठी हैं।

हम केवल बीते दिनों की ही बात करें तो देश-दुनिया में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन आपने सूचनाओं को किस तरह प्रसारित किया इसका उदाहरण आपकी वीडियोज के थंबनेल देखकर ही पता चलता है। आइए आरफा खानम के कुछ थंबनेल में लिखे टेक्स्ट पर नजर डालें…

  • ट्रंप के सामने मोदी की बेबसी, दुनिया चौंकी
  • ईरान वसूलेगा अमेरिका से 400 बिलियन? PM Modi को Iran से क्या सीखना चाहिए?
  • आयुष की तरह जब आदित्य ने अपनाया इस्लाम, हिंदुत्ववादियों ने जीना कैसे हराम कर दिया?
  • सकते में Israel, Iran सबसे बड़ा Winner, Pakistan को ज़बरदस्त Diplomatic Success
  • PM Modi के गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती, क्या यही है सबूत?
  • अन्ना आंदोलन का समर्थन बड़ी भूल थी? मोदी सरकार में देश बदतर?
  • “तानाशाह को खटकते हैं मेरे जैसे पत्रकार” पंजाब की मिट्टी से Arfa Khanum Sherwani
  • Deal क़रीब, Shehbaz Sharif ने चौंकाया, गोदी मीडिया की Iran पर डबल बेशर्मी
                                फोटो साभार: आरफा खानम शेरवानी का यूट्यूब
आप इन थंबनेल और शीर्षक को देखिए। क्या आपको कहीं से भी लगता है कि एक पत्रकार द्वारा दी गई ये रिपोर्ट हो सकती हैं। शीर्षक ही अपने आप में ये बताने के लिए काफी हैं कि आरफा को पीएम मोदी बेबस दिखें तो उनके लिए अच्छा कंटेंट हैं, लेकिन अगर वो गले मिलें तो ये बताया जाएगा कि गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती।
इसके अलावा ईरान से जुड़ी अगर कोई खबर आए तो उसपर आरफा का कैसा रुख होगा और पाकिस्तान की छवि का निर्माण करना हो तो कैसे हेडलाइन में उसकी दलाली को डिप्लोमैटिक सक्सेस बताएँगे।
वहीं देश भर के हिंदुओं को आहत करने वाला आयुष मलिक का मुद्दा अगर चर्चा में आ जाए तो ये देख सकते हैं कि उनकी रिपोर्टिंग उस पर कैसे होगी। वो ऐसी घटना में इस्लामी कट्टरपंथ को उजागर करने की बजाय हिंदूवादियों को बर्बर दिखाने का प्रयास करेंगी।
                                                   आरफा खानम के सोशल मीडिया पोस्ट
इसी प्रकार से उनका सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट भी हैं। मोदी सरकार को देश से उखाड़ने का सपना देखने वाली आरफा एक तरफ राहुल गाँधी की कोटा स्पीच को जरूरी बताती हैं और दूसरी ओर ट्रंप के साथ बैठे प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने से पीछे नहीं हटतीं। उन्हें ईरान की जीत का जश्न इसलिए मनाना है क्योंकि वहाँ एक मजहब के लोगों की बहुलता है, लेकिन भारत के आयुष मलिक को इसलिए दोषी दिखाना है क्योंकि उसके केस पर देश के हिंदुओं में नाराजगी है।
क्या आपको कहीं कोई पोस्ट या वीडियो थंबनेल देखकर ये लगा कि आरफा ने कभी हिंदुओं का मुद्दा उठाया है, लव जिहाद के लिए मारी गई किसी हिंदू लड़की के लिए अपना शोक व्यक्त किया है? वैश्विक संकट के बीच देश की प्रशंसा की है? नहीं, क्योंकि वास्तविकता यही है कि खुद को निष्पक्ष पत्रकार बताने वाली, सत्ता का कॉलर पकड़कर सवाल पूछने का सपना देखने वाली आरफा के लिए हिंदुओं के मुद्दे जरूरी हैं ही नहीं। उन्होंने अपने पत्रकार होने का अस्तित्व सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों के मुद्दे उठाकर ही बचा रखा है। मोदी सरकार के रहने से उन्हें यही डर कि एक दिन ये अस्तित्व मिट जाएगा। उन्हें लोग पत्रकार की जगह इस्लामी प्रवक्ता कहने लगेंगे।(साभार) 

जो कहते हैं ईरान बड़ी बहादुरी से लड़ा, वो देखें कैसी बहादुरी से ईरान ने एक गायिका को 74 कोड़े मारने की सजा दी है; भारत के मुस्लिमों को ऐसा शरिया चाहिए क्या?

सुभाष चन्द्र

ईरान अमेरिका युद्ध में ईरान के लिए गीत गाने वालों की कमी नहीं है कि ईरान बड़ी बहादुरी से लड़ा और अमेरिका को घुटनों पर ला दिया  एक पत्रकार को मैं अभी सुन रहा था वो कह रहे थे अमेरिका ईरान की सत्ता बदलने के लिए 100 लोग भी नहीं जुटा सका और पूरा ईरान एकजुट खड़ा है। अरे भाई तानाशाही के सामने तो डर के मारे सब एकजुट ही रहेंगे वरना क़त्ल कर दिए जाते हैं और यही हाल चीन में है 

ईरान जब बंदूक की गोली से जब 45,000 विरोधियों को मौत के घाट उतार देगा, तो विद्रोह कैसे होगा? कश्मीर से मुस्लिम 600 करोड़ रुपए और गहने लेकर खड़े हो गए थे ईरान को नज़राना देने के लिए अनेक मुस्लिम भारत में कहते हैं कि उन्हें संविधान नहीं शरिया चाहिए राजनीतिक दल तो मुस्लिम प्रेम में अंधे हो चुके हैं और उनके लिए वो हिंदुओं का कत्लेआम भी करने में पीछे नहीं हटेंगे जबकि बांग्लादेश में हुई हिंदुओं पर बर्बरता और कल भगवान राम की प्रतिमा के अपमान पर सब खामोश हैं इतना ही नहीं फिलिस्तीन के नारे लगाते हैं और फिलिस्तीन का “पर्स” लेकर चलते हैं, “All Eyes on Rafah” और “All Eyes on Gaza” के पोस्टर लिए घूमते हैं ये रुदाली गैंग

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन ऐसे लोग आज ईरान से ही आई एक खबर पर खामोश हैं अब अरफ़ा खानुम ईरान की घटना पर खामोश रहेंगी क्योंकि उसे बस भारत के मुसलमानों पर कथित “खौफ” दिखाई देता है मोदी का बुरका हिज़ाब वो भी नहीं पहनती तो अब वो खुद ही बताए कि इसके लिए क्या उसे शरिया के अनुसार सजा क्यों न दी जाये?

ईरान की गायिका Parastoo Ahmadi को और उसकी प्रोडक्शन टीम के 8 सदस्यों को  ईरान की एक अदालत ने 74 कोड़े मारने की सजा दी है और दो वर्षों तक देश छोड़ने पर प्रतिबंध तथा दो वर्षों तक किसी भी कलात्मक गतिविधि में भाग लेने पर प्रतिबंध की सजा सुनाई है यह कठोर दंड वर्ष 2024 में यूट्यूब पर वायरल हुए एक वीडियो के कारण दिया गया, जिसमें उन्होंने अनिवार्य हिजाब के बिना एक देशभक्ति गीत गाया था

क्या कसूर था इन लोगों का? दिसंबर 2024 में परस्तू अहमदी ने एक ऑनलाइन संगीत कार्यक्रम में प्रसिद्ध देशभक्ति गीत Az Khoone Javanane Vatan प्रस्तुत किया इस दौरान उन्होंने हिजाब नहीं पहना था और बिना आस्तीन(स्लीवलेस) पोशाक धारण की हुई थी

ईरान के Qom Province की एक आपराधिक अदालत ने उन्हें और उनकी टीम को "सार्वजनिक शालीनता का उल्लंघन करने" तथा इंटरनेट पर "अश्लील और अनैतिक सामग्री" प्रसारित करने का दोषी ठहराया और उन्हें 74 कोड़ों की सजा के अतिरिक्त, कलाकारों पर दो वर्षों तक विदेश यात्रा करने पर प्रतिबंध तथा दो वर्षों तक सभी प्रकार की कलात्मक गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया गया है

सुना है कुछ मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है उनका मानना है कि यह निर्णय कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है 

इतना बहादुर है ईरान जो अपनी महिलाओं को हिज़ाब न पहनने के लिए कोड़े मारता है लेकिन उसे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि इस्लामिक मुल्क अपने हिसाब से इस्लाम की व्याख्या करने में माहिर हैं 

और हमारे देश का सेक्युलर गिरोह ऐसे मामलों में खामोश रहना पसंद करता है वो यहाँ मकबूल फ़िदा हुसैन की हिन्दू देवी देवताओं की बनाई गई नग्न पेंटिंग्स को अभिव्यक्ति की आज़ादी मानता है जो ईरान जैसे मुल्क में नहीं होनी चाहिए यहाँ उसके वोट बैंक को सब कुछ मिल रहा है लेकिन NEET परीक्षा में उनकी लड़कियां बुरका पहन कर जाएंगी जबकि पेपर लीक के मामले के बाद आज पूरी स्वच्छता से परीक्षा हुई 

बंगाल : आज़ादी के बाद पहली बार मना ‘पश्चिम बंग दिवस’; मोदी बोले- अब बेड़ियों से मिली मुक्ति, राज्य को दी 820 करोड़ की सौगात

   मोदी ने ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ पर बाबा तारकेश्वर की धरती से  दी 820 करोड़ की सौगात (साभार: नवभारत टाइम्स, एक्स @narendramodi)
जनसभाओं से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक देश को आज़ादी दिलवाने के कसीदे पढ़ने वाली कांग्रेस और इसकी समर्थक वामपंथी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी की TMC ने इतने साल बंगाल में राज किया, लेकिन कभी बंगाल
 का ‘पश्चिम बंग दिवस’ नहीं मनाया। फिर देशभक्ति की दुहाई देते फिरते हैं। धीरे-धीरे भारत विरोधियों की कठपुतली बनी पार्टियों की कलई खुलनी शुरू से बिलबिला रहे हैं। जो पार्टी राज्य का पावन  ‘पश्चिम बंग दिवस’ नहीं मनाए वह देशभक्त पार्टी नहीं हो सकती।   

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार 2 दिवसीय दौरे पर राज्य पहुँचे। उनके दौरे की शुरुआत हुगली जिले के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले तारकेश्वर से हुई। यहाँ पहली बार आधिकारिक तौर पर आयोजित ‘पश्चिम बंग दिवस’ कार्यक्रम में PM मोदी ने हिस्सा लिया।

इस दौरान राज्यपाल आरएन रवि और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मंच पर मौजूद रहे। PM मोदी ने राज्य के लिए विकास परियोजनाओं का शुभारंभ किया, किसानों के खातों में PM-किसान योजना की राशि जारी की और राजनीतिक व ऐतिहासिक संदर्भों पर भी अपनी बात रखी।

पहली बार आधिकारिक तौर पर मनाया गया ‘पश्चिम बंग दिवस’, इतिहास से जोड़ा गया आयोजन

नई राज्य सरकार ने 20 जून को आधिकारिक ‘पश्चिम बंग दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया। यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि 20 जून 1947 को बंगाल विधानसभा में विभाजन संबंधी प्रस्ताव पारित हुआ था। कार्यक्रम के लिए तारकेश्वर को चुना गया, जिसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया।

 अपने संबोधन में PM मोदी ने कहा, “इस बार पश्चिम बंग दिवस की यह तारीख और भी खास है। आजादी के बाद बंगाल के उज्जवल भविष्य के लिए जो सपना देखा गया था, बंगाल की महान आत्माओं ने जो परिकल्पना की थी। आज पहली बार हम पश्चिम बंग दिवस पर उन सपनों को सच्चाई में बदलते देख रहे हैं।”

मोदी ने आगे कहा, “यह ऐतिहासिक तारीख पश्चिम बंगाल के विकास की प्रेरणा बने, हम एक नया और गौरवशाली इतिहास रचे। आज भाजपा-NDA सरकार में विकास के महाअभियान की शुरुआत हो रही है। मैं कामना करता हूँ कि ऐतिहासिक ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ राज्य के विकास के लिए प्रेरणा बने।”

तारकेश्वर मंदिर में पूजा, 820 करोड़ की परियोजनाएँ और रेलवे को बड़ा पैकेज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारकेश्वर स्थित बाबा तारकनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसके बाद राज्य के लिए लगभग 820 करोड़ रुपए की विभिन्न विकास परियोजनाओं की शुरुआत की। इनमें रेलवे अवसंरचना पर विशेष जोर दिया गया और करीब 590 करोड़ रुपए रेलवे परियोजनाओं के लिए निर्धारित किए गए।

इसी क्रम में हावड़ा में 99 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले 300 बेड के नए डिवीजनल रेलवे अस्पताल का शिलान्यास भी किया गया। सरकार के अनुसार, यह अस्पताल रेलवे कर्मचारियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराएगा।

पीएम ने कहा, “बंगाल में दशकों तक पहले लेफ्ट और फिर TMC ने जो गड्ढे बनाए, उन्हें भरने के लिए डबल इंजन सरकार ने सुपरफास्ट गति से काम करना शुरू कर दिया है। बिजली की रफ्तार से फैसले हो रहे हैं। रुकी हुई योजनाओं पर काम आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में आज यहाँ सैकड़ों करोड़ की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ है।”

किसानों को पीएम-किसान की किस्त और नवद्वीप-पुरी रेल सेवा का शुभारंभ

कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने पीएम-किसान सम्मान निधि योजना की 23वीं किस्त भी जारी की। इसके तहत देश के 9.44 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में कुल 18,880 करोड़ रुपए सीधे डीबीटी के माध्यम से ट्रांसफर किए गए। इनमें पश्चिम बंगाल के 45 लाख से अधिक किसानों को 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि मिली।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल के नवद्वीप और ओडिशा के पुरी के बीच नई सीधी रेल सेवा का भी उद्घाटन किया। माना जा रहा है कि इससे धार्मिक पर्यटन और दोनों राज्यों के बीच संपर्क को मजबूती मिलेगी।

कॉन्ग्रेस, लेफ्ट और TMC पर हमला

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “उस कठिन समय में कॉन्ग्रेस ने मजबूती से खड़े होने के बजाय घुटने टेक दिए थे। “उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के समय बंगाल को भारत से अलग करने की कोशिश हुई थी और उस दौर की घटनाओं को देश नहीं भूल सकता।
उन्होंने कहा, “बीजेपी की जीत के बाद राज्य में बदलाव साफ दिखाई देने लगा है, अब बंगाल विकास, निवेश और भविष्य के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।” सभा में उन्होंने कहा, “बंटवारे के समय कॉन्ग्रेस ने बंगाल को अनाथ छोड़ दिया था और स्वतंत्रता के बाद तुष्टीकरण की राजनीति की।”
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “गुलामी के दौर में हमारे बंगाल ने क्या कुछ नहीं सहा, कितने बलिदान दिए, कितने त्याग सहे, 1946 में, कोलकाता में हुई हिंसा, कितने निर्दोष बंगाली लोग उसकी भेंट चढ़ गए। बंगाल ने रक्तपात सहा, अपनों को खोया, अपनी मातृभूमि के टुकड़े होते देखे लेकिन बंगाल ने अपनी अस्मिता, पहचान को नष्ट नहीं होने दिया।”
उन्होंने कहा, “इसी का परिणाम था कि जब पूरे बंगाल को भारत से अलग करने की साजिश हो रही थी, तब अलग पश्चिम बंगाल बनाकर उन मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया गया। पश्चिमबंग दिवस के रूप में हम केवल एक तारीख को याद नहीं कर रहे, बल्कि पूरे इतिहास को याद कर रहे हैं।”
अंत में उन्होंने योग दिवस का भी उल्लेख करते हुए कहा, “कल देश, दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाना है। इस बार मैं बंगाल में ही योग दिवस का हिस्सा बनूँगा। स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद जैसे योगियों की भूमि से जो संदेश जाएगा उससे पूरे विश्व का मार्गदर्शन होगा। मैं चाहूँगा कि इस बार बंगाल के कोने-कोने में योग दिवस के आयोजन हो।”

8वीं पास रूबीना, ‘उपाध्याय मैडम’ नाम रख फर्जी वकील बनीं, हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण और मुस्लिम लड़कों से निकाह कराने की रची साजिश

                                हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण की बड़ी साजिश (फोटो साभार: ChatGPT)
जब कांवड़ यात्रा के दौरान हिन्दू नाम रख ढाबे चलाने वाले मुस्लिमों पर कार्यवाही की जाने पर कितने सेक्युलर का चोला ओढे सनातन विरोधी चील-कौओं की तरह चीख रहे थे और हमारी अदालतें भी उनका पक्ष ले रही थी। अब अदालतों को आंखे खोलनी होंगी क्योकि 8वीं पास कानून की मोटी-मोटी किताबों को धता दे अब जेहादी नाम बदलकर अदालतों में पहुँच अपना खेल खेल रहे हैं। अदालतों को चाहिए कि पुलिस को निर्देश दे कि जिस संस्था ने इसे वकालत की डिग्री दी उसे चेतावनी ही नहीं सील करे। रुबीना के बैंक खाते फ्रीज़ किये जाएं। 
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ 8वीं पास एक मुस्लिम महिला ने खुद को हिंदू वकील बताकर हिंदू लड़कियों को इस्लाम अपनाने और मुस्लिम युवकों से शादी करने के लिए फँसाया। सत्य की आवाज की रिपोर्ट के अनुसार, रूबीना नाम की महिला ने खुद को वकील बताकर नर्मदापुरम जिला व सत्र न्यायालय में एक वरिष्ठ वकील के चैंबर से जुड़ गई।

वह वरिष्ठ वकील की सहायक के रूप में काम करती थी और वकील की ड्रेस पहनकर अदालत में आती थी। रूबीना ने न केवल वकील होने की झूठी पहचान बनाई बल्कि अपनी मजहबी पहचान भी छिपाई। वह खुद को हिंदू बताती थी और लोग वहाँ उसे ‘उपाध्याय मैडम’ के नाम से जानते थे। अपनी इस फर्जी पहचान का इस्तेमाल कर उसने हिंदू लड़कियों को धर्मांतरण के लिए निशाना बनाया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वह हिंदू महिलाओं का ब्रेनवॉश करती थी, उन्हें मुस्लिम बनाने के लिए प्रेरित करती थी और उनका निकाह मुस्लिम पुरुषों से करवाती थी। रूबीना द्वारा निशाना बनाई गई ऐसी ही एक लड़की सामने आई है और उसने बताया है कि रूबीना ने उसके साथ क्या किया।

रूबीना के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई गई है जिसमें जबरन वसूली, ब्लैकमेलिंग और धर्मांतरण के आरोप शामिल हैं। स्थानीय हिंदू संगठनों द्वारा मामला उठाए जाने के बाद उसका भंडाफोड़ हुआ। हिंदू संगठनों को संदेह है कि उसकी गतिविधियों के पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है और वे पुलिस से त्वरित और कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

इस मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर यह महिला पूरे कानूनी तंत्र को कैसे धोखा देती रही। गौरतलब है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ऐसे ही फर्जी वकीलों के मामलों का जिक्र कर रहे थे, जब उन्होंने कहा था कि कुछ लोग व्यवस्था पर कॉकरोच की तरह हमला कर रहे हैं। जिसके बाद उनके इस बयान को गलत तरीके से पेश किया गया था।

‘मुझे लोकप्रियता के लिए तुम्हारी जरूरत नहीं’: ट्रंप पर फिर फायर हुईं इटली की PM मेलोनी, पहले भी पाकिस्तान से लेकर मैंक्रों तक को दिखी चुकी हैं आँखें

डोनाल्ड ट्रम्प यह समझते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति जब चाहे जो चाहे किसी को भी बोल सकता है और दुनिया चुप रहेगी। हर देश को पाकिस्तान समझने की गलती नहीं करें। पाकिस्तान को पैसों की खातिर बेइज्जती बर्दाश्त कर सकता है हर देश नहीं। आज लगभग हर देश अपने आप में स्वतंत्र है। सबका अपना आत्मसम्मान है। 

अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप से भिड़ने से पहले भी इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी कई आलोचकों को करारा जवाब दे चुकी हैं। उन्होंने अपने अंदाज में फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों को सुना दिया था। यहाँ तक कि अपने देश में कोर्ट के फैसले की आलोचना करने से लेकर पॉर्न साइट को अपना बोरिया बिस्तर समेटने को मजबूर कर दिया था। वह यूरोप के इस्लामीकरण से काफी परेशान दिखीं। उनका पुराना वीडिया 2018 में आया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन-अलबेनिया के साथ मिलकर काम करने की बात कही है। 

राष्ट्रपति ट्रंप और मेलोनी विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और मेलोनी के बीच विवाद के बाद मेलोनी के बेबाक अंदाज की दुनियाभर में चर्चे हो रहे हैं। यह विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि लोकप्रियता गिरने के कारण मेलोनी ने जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए ‘मिन्नतें’ की थीं। ट्रंप ने यह भी कहा था कि उन्होंने मेलोनी के साथ फोटो सिर्फ इसलिए खिंचवाई क्योंकि उन्हें उन पर तरस आ गया था। दरअसल ट्रंप की असली नाराजगी ईरान युद्ध के समय इटली ने अमेरिकी फाइटर्स प्लेन को लैंडिंग की इजाजत नही दी थी।

ट्रंप के बयान पर मेलोनी ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि ट्रंप की दोस्ती से उनकी लोकप्रियता में इजाफा नहीं हुआ है। उनके दावे मनगढ़ंत है, जिसे सुनकर उन्हें हैरानी हुई। मेलोनी ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि इटली एक संप्रभु देश है और अमेरिकी एयरबेस का इस्तेमाल उनकी शर्तों पर ही होगा। मेलोनी ने यहाँ तक कह दिया कि मेरी चिंता ना करें, अपना देखें।

मेलोनी ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की बातें पूरी तरह झूठी हैं। मैं सचमुच हैरान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं।”

यह पहली बार नहीं है जब मेलोनी के जवाब पूरी दुनिया में सुर्खियाँ पाई हो। उन्होंने पहले भी कई बार अपनी बेबाकी का परिचय दिया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति को दिया जवाब

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के आप्रवासन की नीतियों और यूरोप के फैसलों को लेकर मेलोनी की फ्रांस के नेतृत्व के साथ कई बार तीखी नोक-झोंक हो चुकी है। फ्रांस के ल्योन शहर में दक्षिणपंथी कार्यकर्ता क्विंटिन डेरांक की वामपंथी चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी। इसको लेकर जॉर्जिया मेलोनी ने फ्रांस को सुनाया था और यूरोप के लिए एक गहरा घाव बताया था। इस पर भड़के फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने मेलोनी पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्रवादियों को अपने देश तक सीमित रहना चाहिए और दूसरों के मामलों में टांग नहीं अड़ाना चाहिए। मेलोनी ने भी तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि वह यूरोप में वैचारिक हिंसा के खिलाफ बोलने से पीछे नहीं हटेंगी, चाहे सामने फ्रांस जैसी बड़ी ताकत ही क्यों न हो।

यूरोप के इस्लामीकरण से चिंतित मेलोनी

जॉर्जिया मेलोनी का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने यूरोप में हो रहे इस्लामीकरण और सऊदी अरब की मदद से चल रहे कई सांस्कृतिक केंद्रों पर खुलकर चिंता जताई थी। साथ ही साफ किया था कि इस्लामी संस्कृति की कुछ व्याख्या और यूरोपीय सभ्यता के मूल्यों और अधिकारों के बीच सामंजस्य बैठना काफी मुश्किल है। इस पर मेलोनी को पाकिस्‍तान में काफी ट्रोल किया गया था। हालाँकि ये बयान 2018 है, जब वह इटली की प्रधानमंत्री नहीं थीं। उस वक्त उन्होंने साफ कहा था कि अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के लिए वह ब्रिटेन और अल्बानिया जैसे देशों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

फिलिस्तीन को नहीं दिया अलग देश का दर्जा

मेलोनी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ब्रिटेन और फ्रांस के रुख का समर्थन करते हुए फिलिस्तीन को तुरंत मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया। इटली ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस अल्टीमेटम का भी समर्थन किया, जिसमें हमास को पूरी तरह हथियार छोड़ने और इजरायली बंधकों को तुरंत रिहा करने को कहा गया था। हालाँकि उनके इस रुख का इटली में ही विरोध हुआ। इजरायल पर प्रतिबंध लगाने की माँग को लेकर 20 लाख से अधिक लोगों और ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी हड़ताल किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई।

पोर्न वेबसाइट पर कसी लगाम

फिका नाम की एक पोर्न वेबसाइट ने मेलोनी, उनकी बहन आरियाना और विपक्षी महिला नेता एली श्लेन की तस्वीरों से छेड़छाड़ कर उसे आपत्तिजनक बनाते हुए अपने साइट पर अपलोड कर दिया। इस पर एक्शन लेते हुए मेलोनी ने कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए। इसको देखते हुए वेबसाइट ही बंद कर दी गई।

अदालत से भी भिड़ चुकी हैं मेलोनी

हमास के इजरायल पर हमले और निर्दोष लोगों को बंधक बनाने को मिस्र के निवासी इमाम मोहम्मद शाहिन को इटली की अदालत ने रिहा कर दिया तो मेलोनी कोर्ट पर बरस गईं। दरअसल इटली सरकार ने उसे देश से निकालने का आदेश दिया था, जिसे कोर्ट ने पलट दिया। इस पर मेलोनी ने सीधे कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर कोर्ट आतंकवाद का समर्थन करने वालों को ऐसे ही छोड़ देगी तो वह इटली के नागरिकों की सुरक्षा कैसे करेंगी?

अय्याज ताज-अमीन शेख-हजरत मौलाना ने हिंदू महिला से किया रेप-धर्मांतरण का भी प्रयास, पीड़िता के चीखने-चिल्लाने का वीडियो वायरल


महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के सोनेगाँव क्षेत्र से एक हिंदू विवाहित महिला के साथ दुष्कर्म, ब्लैकमेलिंग और धर्मांतरण के दबाव का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में कलमेश्वर निवासी अय्याज ताज मदारे और आमीन शेख को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि मध्य प्रदेश के तामिया निवासी हजरत मौलाना फरार है और उसकी तलाश की जा रही है।

शिकायत के आधार पर पुलिस ने दुष्कर्म, जबरन वसूली, धर्मांतरण के प्रयास और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा एवं काला जादू प्रतिबंध कानून के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

नशीला पदार्थ देकर बनाया वीडियो

पीड़िता 24 वर्षीय विवाहित महिला है और प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करती है। उसका पति भारतीय वायुसेना में कार्यरत है और घटना के समय दूसरे शहर में तैनात था। शिकायत के मुताबिक, फरवरी 2025 में महिला के सहपाठी रहे अय्याज ने प्लॉट खरीदने के बहाने उससे संपर्क किया।

आरोप है कि वह महिला को वर्धा रोड स्थित एक होटल में ले गया, जहाँ उसे जूस में नशीला पदार्थ मिलाकर पिलाया गया। महिला का कहना है कि बेहोशी की हालत में उसके साथ दुष्कर्म किया गया और इस दौरान उसके वीडियो व फोटो रिकॉर्ड किए गए।

शिकायत में कहा गया है कि बाद में इन्हीं वीडियो और तस्वीरों को वायरल करने की धमकी देकर आरोपित ने लगातार उसका यौन शोषण किया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि इस दौरान उससे 3 लाख 9 हजार रुपए भी वसूले गए।

मौलाना ने कहा- अब तुम्हारा धर्मांतरण हो चुका है

शिकायत के अनुसार, मामला केवल यौन शोषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिला पर धर्म बदलने का भी दबाव बनाया गया। महिला का आरोप है कि उससे विभिन्न मजहबी क्रियाएँ कराई गईं। इसी बीच एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें आरोपित महिला के साथ कलमा पढ़ता और उस पर फूँक मारता दिखाई दिया।
शिकायत के मुताबिक, 31 मई को आरोपित उसे नागपुर के कलमेश्वर इलाके में ले गया, जहाँ उसकी मुलाकात आमीन शेख और हजरत मौलाना से कराई। तीनों उसे एक सुनसान स्थान पर ले गए और कुछ मजहबी क्रियाएँ कर यह दावा किया कि उसका धर्मांतरण हो चुका है। इसके बाद उसके साथ दोबारा दुष्कर्म करने की कोशिश भी की गई।

पति के लौटने पर सामने आया मामला, वीडियो और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जाँच

 महिला का कहना है कि वह लंबे समय तक डर और दबाव में रही और किसी को पूरी घटना नहीं बता सकी। मामला तब सामने आया जब उसका पति तीन दिन पहले नौकरी से घर लौटा। इसके बाद महिला ने पूरी घटना पति को बताई और दोनों सोनेगाँव पुलिस थाने पहुँचे।

पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट ने दोनों को पाँच दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है। पुलिस अब पीड़िता के मोबाइल चैट, बैंक लेनदेन, घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, वायरल वीडियो और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जाँच कर रही है।