पौराणिक गाथा : जब भगवान विष्णु शालिग्राम(काला पत्थर) बन गए


तुलसी का पूर्व जन्म में नाम वृंदा था। वे एक अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त स्त्री थीं। उनका विवाह असुर राज शंखचूड़ (कुछ कथाओं में इसे जालंधर भी कहा गया है) से हुआ। शंखचूड़ बहुत शक्तिशाली था, लेकिन उसकी शक्ति का असली स्रोत स्वयं उसकी पत्नी वृंदा थी।

वृंदा इतनी पतिव्रता और पवित्र थी कि उसके 'सतीत्व' के तेज के कारण शंखचूड़ को युद्ध में कोई भी देवता, यहाँ तक कि स्वयं भगवान शिव भी नहीं हरा पा रहे थे।

शंखचूड़ ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को भगा दिया। हारकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुँचे। विष्णु जी जानते थे कि जब तक वृंदा का सतीत्व भंग नहीं होता, तब तक शंखचूड़ को मारना असंभव है।

भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और वृंदा के पास पहुँचे। वृंदा अपने पति को युद्ध से लौटा हुआ समझकर उनके चरणों में गिर पड़ीं और उनका सत्कार किया।

जैसे ही वृंदा ने नकली शंखचूड़ (विष्णु जी) का स्पर्श किया, उनका पतिव्रता धर्म खंडित हो गया। उसी क्षण भगवान शिव ने असली शंखचूड़ का वध कर दिया।

जब वृंदा को सच्चाई का पता चला कि उनके आराध्य देव विष्णु ने ही उनके साथ छल किया है, तो वे क्रोध और शोक से भर गईं। उन्होंने विष्णु जी से कहा:
"हे प्रभु! आपने एक स्त्री का धर्म नष्ट किया है। आपका हृदय पत्थर का है, इसलिए आप अभी 'पत्थर' बन जाएँ।"
भगवान विष्णु ने चुपचाप उस श्राप को स्वीकार किया और शालिग्राम (काले पत्थर) बन गए।

वृंदा ने स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया। उनकी राख से एक सुंदर पौधा उत्पन्न हुआ, जिसे 'तुलसी' कहा गया। विष्णु जी अपनी भूल का प्रायश्चित करना चाहते थे और वृंदा की भक्ति से प्रसन्न भी थे। उन्होंने वरदान दिया:
"हे वृंदा! तुम अब 'तुलसी' के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। मेरा शालिग्राम रूप तुम्हारे बिना अधूरा होगा। हर साल कार्तिक मास में मेरा और तुम्हारा विवाह (तुलसी विवाह) उत्सव के रूप में मनाया जाएगा।"
"संसार मुझे जो भी भोग लगाएगा, वह तब तक मैं स्वीकार नहीं करूँगा जब तक उसमें तुम्हारा एक पत्ता (तुलसी दल) न हो।"
हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है।

तुलसी को 'हरिप्रिया' (विष्णु की प्रिय) कहा जाता है।
वृंदा (तुलसी) ने एक असुर से विवाह करके भी अपनी पवित्रता से देवताओं को हिला दिया था। यह कहानी हमें सिखाती है कि चरित्र की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति होती है।

संसद न चलने के लिए लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति भी जिम्मेदार हैं; सदन कैसे चलाया जाता विपक्ष से सीखो; हुड़दंग मचाने वालों को मार्शलों से सदन से बाहर निकालो

सुभाष चन्द्र

अपने 24 जुलाई, 2026 के लेख में मैंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला जी और राज्यसभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन जी से करबद्ध अनुरोध किया था कि विपक्षी सांसदों की नंगई/गुंडई देखते हुए उन्हें सत्र के लिए सस्पेंड कर दीजिए क्योंकि ये लोग प्यार की भाषा नहीं समझ सकते 

जब तक इन हुड़दंगियों को इन्हीं की भाषा में जवाब नहीं दिया जाएगा ये हुड़दंगी सही रास्ते पर नहीं आएंगे। अगर सदन स्थगित होता है इसका मतलब है आप अपनी शक्तियों का दुरूपयोग कर रहे हैं और ये हुड़दंगी उसका फायदा उठा कर सदन को मछली बाजार बनाकर आपका और सरकार का उपहास कर रहे हैं। ये हुड़दंगी आप दोनों का खुलेआम अपमान कर रहे हैं और उसे दोनों क्यों बर्दाश्त कर रहे हैं?  

मैंने यहां तक कहा था कि “Your inaction and leniency is being treated as your Weakness by the opposition as if you are not capable of performing your duty”.

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
दोनों के पास अपार शक्तियां हैं और अब दंड ही एक विधान रह गया है। 

जैसे दिसंबर 2023 में हुड़दंग मचाने वाले लोकसभा के 95 और राज्यसभा के 51 सदस्यों को ससपेंड किया गया था, वैसा ही अब करना आवश्यक हो गया है

संसद का लगभग पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया है यह सिलसिला पिछले 12 साल से चल रहा है और मुझे याद नहीं पड़ता कभी प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में भी व्यवधान न डाला गया हो अब सुना है 12 अगस्त को FCRA विधेयक पेश किया जाएगा मुझे नहीं लगता आज जैसे हालात देखते हुए उस पर भी कोई चर्चा होगी और पास हो सकेगा

याद कीजिए केजरीवाल के मुख्यमंत्री रहते हुए जून, 2015, नवंबर, 2015, नवंबर, 2016, मई, 2017 और नवंबर, 2024 को भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता को मार्शलों से जबरन उठाकर विधानसभा से बाहर निकलवा दिया गया था महाराष्ट्र विधानसभा में 5 जुलाई, 2021 को भाजपा के 12 विधायकों को एक वर्ष के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने सदन में दुर्व्यवहार किया और पीठासीन अधिकारी के लिए अपशब्द कहे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निलंबन केवल चालू सत्र के लिए हो सकता है

इसी तरह कर्नाटक में 21 मार्च, 2025 को भाजपा के 18 विधायक 6 महीने के लिए निलंबित किए गए इसके पहले 19 जुलाई, 2023 को भी भाजपा के 10 विधायक सस्पेंड किए गए थे आरोप था - 

"indiscipline and unruly behavior" after papers were thrown toward the Chair during a protest”. उससे ज्यादा "indiscipline and unruly behavior" तो संसद में आज विपक्ष कर रहा है

मुझे समझ नहीं आता लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति विपक्ष की हुड़दंगबाजी देखकर भी क्यों मूक दर्शक बने हुए हैं? संसद में क्या मार्शल नहीं हैं? निलंबित करना चाहिए या मार्शलों से उन्हें बाहर निकलवा देना चाहिए लोकसभा और राज्यसभा में पहले भी मार्शल सांसदों को उठा कर सदन से बाहर ले जा चुके हैं

दोनों सदनों का इस तरह समय बर्बाद करने के लिए फिर स्पीकर और सभापति ही जिम्मेदार माने जाने चाहिए संसद के बाहर तो भीड़तंत्र चलाया गया और अगर संसद में भी भीड़तंत्र चलेगा तो फिर संसद में तो लोकतंत्र चलेगा ही नहीं 

एक समाचार के अनुसार 16 से 18 अगस्त को संसद का विशेष सत्र बुलाया जाएगा जिसमें महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पास कराया जाएगा क्या ऐसे हालात में यह संभव हो पाएगा?

आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री की हिंदू बहू का आरोप- ईसाई पहचान छिपा कराई शादी, अगरबत्ती की खुशबू को बोलते बदबू: YSRCP नेता जोगी रमेश और परिवार के खिलाफ FIR

                                    आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री जोगी रमेश और उनकी बहु मेघना
आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री और YSRCP के वरिष्ठ नेता जोगी रमेश और उनके परिवार के लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। उनकी बहू मेघना ने अपने ससुर, पति जोगी राजीव और परिवार के करीब 10 अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, मारपीट और घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई है।

यह शिकायत शुक्रवार (24 जुलाई 2026) को NTR जिले के इब्राहिमपटनम पुलिस थाने में दर्ज कराई गई। पुलिस ने मेघना की करीब 24 पन्नों की विस्तृत शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया है और अब इसकी गहराई से जाँच शुरू कर दी गई है।

पुलिस ने इस मामले में जोगी रमेश, उनकी पत्नी शकुंतला और बेटे राजीव समेत कुल 11 लोगों के नाम दर्ज किए हैं। इनमें जोगी रमेश के भाई रामू और उनके बेटे पांडु व राकेश भी शामिल हैं। यह केस भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85, 318 और 109 के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत दर्ज किया गया है। ये धाराएँ घरेलू क्रूरता, दहेज उत्पीड़न और धोखाधड़ी से जुड़ी हैं।

मेघना ने शिकायत में क्या आरोप लगाए?

मेघना की शादी जोगी रमेश के बेटे राजीव से हुई थी। पुलिस को दी अपनी शिकायत में मेघना ने कहा है कि उनकी शादी बाहर से देखने में जितनी सामान्य लगती थी, असल में हकीकत उतनी सुखद नहीं थी। शादी के कुछ समय बाद से ही ससुराल में उनके साथ बुरा बर्ताव शुरू हो गया।

मेघना का आरोप है कि उन्हें बार-बार अतिरिक्त दहेज की माँग को लेकर मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनका कहना है कि छोटी-छोटी बातों पर उन्हें गालियाँ दी जाती थीं और कई बार मारपीट भी हुई। मेघना के अनुसार, घर के बाकी सदस्यों को भी इस प्रताड़ना की जानकारी थी और वे इसमें किसी न किसी रूप में साथ देते थे।

बुजुर्गों की मौजूदगी में सुलह की कई कोशिशों के बावजूद, मेघना के मुताबिक, प्रताड़ना कम होने की बजाय और बढ़ती गई। आखिरकार अपनी जान को खतरा महसूस होने पर उन्होंने पुलिस का दरवाजा खटखटाया।

ईसाई पहचान छिपाने का गंभीर आरोप

शिकायत में मेघना ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनके मुताबिक, शादी तय होते समय जोगी रमेश के परिवार ने खुद को हिंदू परिवार बताया था और शादी भी हिंदू रीति-रिवाजों से ही हुई थी। लेकिन ससुराल पहुँचने के बाद धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि असल में परिवार ईसाई है। मेघना का कहना है कि यह जानकारी जानबूझकर उनसे छिपाई गई, जो उनके साथ एक बड़ा धोखा था।

शिकायत में मेघना ने एक घटना का भी जिक्र किया है। उनका कहना है कि एक बार जब वह घर में पूजा कर रही थीं और भगवान के सामने अगरबत्ती जलाई तो ससुराल वाले नाराज हो गए और अगरबत्ती की खुशबू का मजाक उड़ाया और उसकी तुलना लाश से आने वाली दुर्गंध से की। मेघना के मुताबिक, इसका विरोध करने पर उन्हें डराया-धमकाया गया औऱ सख्त हिदायत दी गई कि घर की बातें या धर्म से जुड़ा सच वह अपने मायके वालों को न बताएँ। उनका आरोप है कि चुप न रहने पर गंभीर अंजाम भुगतने की धमकी भी दी गई।

पुलिस की कार्रवाई

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला संवेदनशील है क्योंकि इसमें एक प्रमुख राजनीतिक परिवार शामिल है। जाँच अधिकारियों ने मेघना का बयान दर्ज कर लिया है औऱ अब आरोपित परिवार के सदस्यों को पूछताछ के लिए औपचारिक नोटिस भेजे जाने की उम्मीद है। पुलिस ने भरोसा दिलाया कि मामले की निष्पक्ष जाँच होगी और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

‘विकसित भारत की यात्रा में आपकी भूमिका बहुत बड़ी’: IIT दिल्ली में युवाओं को PM मोदी का संदेश, दीक्षांत समारोह में छात्रों को दी डिग्री; ‘परम प्रज्ञा’ का किया उद्घाटन

                   मोदी ने IIT दिल्ली में परम प्रज्ञा लॉन्च किया। (फोटो साभार - एक्स/ @narendramodi)
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली का 57वाँ दीक्षांत समारोह शनिवार (8 अगस्त 2026) को आयोजित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने 3036 छात्रों को डिग्री प्रदान की और मेधावी छात्रों को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक, निदेशक स्वर्ण पदक समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया।

मोदी ने IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में मौजूद AI आधारित हाई-परफॉर्मेंस सुपरकंप्यूटिंग सुविधा ‘परम प्रज्ञा’ का उद्घाटन भी किया। इस मौके पर संस्थान ने अपनी पढ़ाई, रिसर्च, पेटेंट और स्टार्टअप से जुड़ी उपलब्धियों की भी जानकारी दी।

मोदी ने कहा आज से शुरू हो रही जीवन की नई यात्रा

दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज देश के प्रतिभाशाली युवाओं के जीवन की नई यात्रा शुरू हो रही है। उन्होंने कहा कि यह छात्रों के जीवन का यादगार पल है और इस उत्साह, उमंग, सपनों और भावनाओं से भरे अवसर का हिस्सा बनना उनके लिए भी खास अनुभव है।

मोदी ने छात्रों से कहा, “आज दुनिया का सामरिक समीकरण बहुत तेजी से बदल रहा है, वैश्विक शक्ति संतुलन भी बहुत तेजी से बदल रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी ताकत है टेक्नोलॉजी की स्पीड। आज कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि अगले 20-30 वर्षों की दुनिया कैसी होगी।”

उन्होंने कहा, “जीवन में चेतना बनाए रखिए, जो बातें बिना सोचे-समझिए स्वीकार कर ली जाती हैं, उन्हें परखिए, उन पर सवाल उठाइए। लेकिन सिर्फ सवाल पूछकर मत रुकिए, उनका समाधान खोजना का साहस भी रखिए। यही सोच आपकी अलग पहचान बनाएगी।”

उन्होंने कहा, “जब-जब बदलावों का दौर आता है, तब-तब चुनौतियाँ भी आती हैं और नए अवसर भी पैदा होते हैं। दुनिया भी बदलेगी, टेक्नोलॉजी भी बदलेगी, उद्योग भी बदलेगी, पेशे भी बदलेंगे। लेकिन इन सबके बीच जो सीखेगा, वो जीतेगा।”

उन्होंने कहा कि हर पीढ़ी के सामने अलग चुनौतियाँ और दायित्व होते हैं। देश ने गुलामी का दौर देखा और उस समय की पीढ़ी के सामने आजादी हासिल करना सबसे बड़ा लक्ष्य था। इसके लिए लोगों ने लंबा संघर्ष किया और त्याग व बलिदान दिए।

PM ने कहा, “आज की पीढ़ी की चुनौतियाँ और जिम्मेदारियाँ अलग हैं। अगले 30-35 साल में आप जो करेंगे, वह विकसित भारत की यात्रा को प्रभावित करेगा। आपके निर्णय का आधार ये भी होना चाहिए कि इससे देश को क्या फायदा होगा, कौन-सी जरूरत पूरी होगी।”

उन्होंने छात्रों से कहा, “विकसित भारत की यात्रा में आपकी भूमिका बहुत बड़ी है।” प्रधानमंत्री ने छात्रों को बदलती तकनीक के दौर के लिए तैयार रहने का संदेश दिया। उन्होंने AI और आधुनिक तकनीक के बढ़ते महत्व का जिक्र करते हुए कहा कि परम प्रज्ञा जैसी सुविधाएँ देश के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को नई ताकत देंगी। उन्होंने युवाओं से केवल नौकरी तलाशने तक सीमित न रहने और नए अवसर पैदा करने पर जोर दिया।

3036 छात्रों को डिग्री, 587 छात्रों को PhD

IIT दिल्ली के निदेशक रंगन बनर्जी के मुताबिक, इस साल कुल 3036 छात्रों को डिग्री प्रदान की गई। इनमें 587 PhD, 567 MTech और 1049 BTech छात्र शामिल हैं। यह संस्थान के लिए PhD डिग्री की रिकॉर्ड संख्या बताई गई है।

समारोह में मेधावी छात्रों को कई प्रतिष्ठित गोल्ड मेडल भी दिए गए। इनमें प्रेसिडेंट्स गोल्ड मेडल, डायरेक्टर्स गोल्ड मेडल, डॉ शंकर दयाल शर्मा गोल्ड मेडल और परफेक्ट टेन गोल्ड मेडल शामिल हैं।

संस्थान के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 600 करोड़ रुपए की प्रायोजित रिसर्च परियोजनाओं पर काम हुआ। पिछले एक साल में 196 नए पेटेंट दाखिल किए गए और 26 नए स्टार्टअप शुरू हुए। IIT दिल्ली ने देश के 18 NITs के साथ अकादमिक और रिसर्च सहयोग के लिए MoU भी किया है। इसके अलावा 30 देशों के साथ 88 सक्रिय अंतरराष्ट्रीय समझौते हैं।

AI सुपरकंप्यूटर परम प्रज्ञा क्यों खास?

दीक्षांत समारोह में IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में स्थापित AI आधारित हाई-परफॉर्मेंस सुपरकंप्यूटिंग सिस्टम परम प्रज्ञा का उद्घाटन किया गया। यह सुविधा नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन के सहयोग से तैयार की गई है।

संस्थान के मुताबिक इसकी क्षमता 250 पेटाफ्लॉप्स बताई गई है। इसका इस्तेमाल AI, डेटा साइंस, एडवांस्ड कंप्यूटिंग, विज्ञान, इंजीनियरिंग और दूसरे क्षेत्रों में रिसर्च के लिए किया जाएगा। सुपरकंप्यूटर की करीब 60 प्रतिशत क्षमता IIT दिल्ली के शोधकर्ता इस्तेमाल करेंगे, जबकि करीब 40 प्रतिशत क्षमता दूसरे संस्थानों के शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध होगी।

इसका मतलब है कि बड़ी और जटिल गणनाओं के लिए वैज्ञानिकों को ज्यादा कंप्यूटिंग ताकत मिलेगी। AI मॉडल की ट्रेनिंग, बड़े डेटा का विश्लेषण और वैज्ञानिक सिमुलेशन जैसे काम तेजी से किए जा सकेंगे।

IIT दिल्ली ने इस दिशा में 18 NITs के साथ ALIGN (एकेडेमिक लिंकेज फॉर इनोवैशन एण्ड नैशनल ग्रोथ) पहल भी शुरू की है। इसके तहत छात्र और शिक्षक संयुक्त शोध, प्रोजेक्ट, थीसिस, अकादमिक आदान-प्रदान और साझा रिसर्च सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे। संस्थान का कहना है कि यह पहल IIT दिल्ली को IIT Delhi 2.0 की दिशा में आगे बढ़ाने का हिस्सा है।

E20 पर मोदी सरकार को घेरने निकले राहुल गाँधी, वीडियो में इस्तेमाल कार ने ही खोल दी खुद की पोल


लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को केंद्र सरकार की E20 पेट्रोल नीति पर अपना हमला और तेज कर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर 53 सेकंड का एक वीडियो पोस्ट किया। 20% एथेनॉल मिले पेट्रोल को लागू करने के खिलाफ बड़े आंदोलन का ऐलान करते हुए गाँधी ने आरोप लगाया कि यह नीति भ्रष्टाचार का जरिया है और सीधे उपभोक्ताओं पर हमला है। हालाँकि, इस वीडियो में एक ऐसा विडंबनापूर्ण मोड़ था, जिसने जल्द ही इंटरनेट का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

जब कोई आदमी अपनी अक्ल की बजाए दूसरों के इशारे पर नाचता हो, उसमे सच्चाई जानने की हिम्मत नहीं होती। राहुल को E20 पर कुछ बोलने से पहले अपने पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर का संसद में दिया बयान देख लेना चाहिए था, जब वह पेट्रोल में एथनॉल मिलाने के लिए शराब कम पीने के लिए कहा है। 

वीडियो में गाँधी एक आधुनिक SUV के पास खड़े दिखाई दे रहे हैं। अपनी बात पर जोर देने के लिए वह गाड़ी का फ्यूल टैंक ढक्कन खोलते हैं, अंदर देखते हैं और फिर कैमरे की ओर मुड़ते हैं। इस दौरान वह अपने दावों को रखने के लिए हिंदी की एक लोकप्रिय कहावत को नए अंदाज में पेश करते हैं।

गाँधी ने कहा, “E20 का मुद्दा बहुत बड़ा मुद्दा है।” उन्होंने कहा, “आमतौर पर हम कहते हैं कि दाल में कुछ काला है, लेकिन यहाँ पूरी दाल ही काली है।” इसके बाद उन्होंने कहा कि E20 ईंधन को बड़े स्तर पर लागू करने से लोगों की संपत्ति को नुकसान हो रहा है।

गाँधी ने दावा किया, “यह लोगों की कारों को बर्बाद कर रहा है, लोगों के स्कूटरों को बर्बाद कर रहा है, लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है और सीधे तौर पर उनसे चोरी कर रहा है।” उन्होंने वादा किया कि कॉन्ग्रेस पार्टी इस मुद्दे को ‘बड़े स्तर’ पर उठाएगी।

विपक्ष ने इस मुद्दे को पहले क्यों नहीं उठाया, इस सवाल पर उन्होंने सरकार की कथित गलतियों की बड़ी संख्या का हवाला दिया। उन्होंने समझाया, “यह मुद्दों को क्रम में रखने का मामला है। किसी भी अभियान में हमें मुद्दों को उठाने का क्रम तय करना होता है। इस समय हमारी समस्या यह है कि इतना भ्रष्टाचार है कि हमारे सामने मुद्दों की एक बहुत बड़ी सूची है, जिन्हें हमें क्रम में रखना है।”

E20 वाली गाड़ी का पेंच

E20 ईंधन के खिलाफ तीखी बयानबाजी के बावजूद वीडियो में एक साफ विरोधाभास दिखाई दिया। जब गाँधी अपनी बात रखने के लिए गाड़ी का फ्यूल टैंक ढक्कन खोलते हैं, तो फ्यूल टैंक के कैप पर साफ लिखा दिखाई देता है कि वह गाड़ी वास्तव में ‘E20’ के लिए अनुकूल है। इस बात ने वीडियो के पूरे दावे को कमजोर कर दिया क्योंकि गाँधी जिस गाड़ी का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए कर रहे थे कि यही ईंधन कथित तौर पर ‘कारों को बर्बाद’ कर रहा है, वह गाड़ी खुद 20% एथेनॉल मिले ईंधन पर चलने के लिए बनाई गई थी।

यह राहुल गाँधी से जुड़े उन मामलों की सूची में एक और चूक बन गई, जिनको लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर उनकी आलोचना होती रही है।

E20 का संदर्भ

केंद्र सरकार E20 ईंधन को बढ़ावा दे रही है। इसमें पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाया जाता है। सरकार का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम करना और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण को घटाना है। हालाँकि, E20 को तेजी से लागू किए जाने का कई लोगों और संगठनों ने विरोध भी किया है।

E20 को लेकर आलोचकों का कहना है कि इससे गाड़ियों का माइलेज कम हो सकता है। पुराने वाहनों के इंजन के साथ इसकी अनुकूलता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके अलावा, पेट्रोल पंपों पर उपभोक्ताओं के पास विकल्प कम होने की बात भी कही जा रही है। राहुल गाँधी का नया वीडियो इसी मुद्दे पर हाल में हुए विपक्षी विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। इसी सप्ताह AAP के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी E20 के मुद्दे पर विरोध मार्च निकाला था। कॉन्ग्रेस अब इस मुद्दे को बड़े अभियान के रूप में उठाने की तैयारी कर रही है। ऐसे में यह देखना बाकी है कि अभियान की शुरुआत में सामने आई इस चूक पर कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी क्या जवाब देते हैं।

JNU की जिस वामपंथन निवेदिता मेनन को ‘मुस्लिम मर्द’ लगते हैं अट्रैक्टिव, वो भारत को कह रही ‘मनहूस देश’

                                                                                       साभार 
हाल ही में पत्रकार मंदीप पुनिया के यूट्यूब चैनल पर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन का एक इंटरव्यू आया है। इस इंटरव्यू में निवेदिता ने छात्र आंदोलनों और शिक्षा के मुद्दों की आड़ लेकर भारत राष्ट्र, देश की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधे हमले करते हुए भारत को ‘मनहूस’ देश बताया है।

JNU जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में बैठकर लंबे समय तक पठन-पाठन से जुड़ी रहीं एक प्रोफेसर द्वारा सार्वजनिक मंचों से इस तरह के वक्तव्य देना केवल असहमति व्यक्त करना नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने पर किया गया एक सोची-समझी रणनीति का प्रहार है।

पूरे साक्षात्कार के दौरान बोले गए उनके शब्द यह साफ उजागर करते हैं कि वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम किस हद तक भारत के प्रति द्वेष और घृणा से भरा हुआ है।

भारत को ‘मनहूस’ बताकर किया देश का अनादर, हिंदुओं पर भी की घटिया टिप्पणी

निवेदिता मेनन ने अपने इस इंरव्यू में देश में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन, विभिन्न छात्र आंदोलनों और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए भारत राष्ट्र के प्रति अपनी अंतर्निहित घृणा को जगजाहिर कर दिया। उन्होंने भारत जैसे महान, सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश के लिए ‘मनहूस’ जैसे अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया।

देश के भीतर चल रहे CJP के अभियानों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब जुनैद जैसे बच्चे को ट्रेन में मार के फेंक दिया जाता है और पूरा देश सन्नाटे में रहता है, मुझे लगता है कि पिछले 12 साल में ऐसे उनको मतलब बार-बार एहसास दिलाया जा रहा है कि तुम यहाँ के नहीं हो। तुम्हें बुलडोज करेंगे हम, तुम्हें हम कुछ भी करेंगे और तुम चू तक नहीं कर सकते। CJP का प्रोटेस्ट जो है वह थोड़ा साँस लेने की जगह दी और मुसलमानों को शायद लगने लगा कि शायद इस मनहूस देश में हमारे लिए भी कोई जगह है।”

भारत जैसे महान राष्ट्र, जहाँ करोड़ों नागरिक अपनी सांस्कृतिक धरोहर और संप्रभुता पर गर्व करते हैं, उसी राष्ट्र को एक ‘मनहूस’ ढाँचा बताकर पेश करना यह साबित करता है कि तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के पास रचनात्मक आलोचना के नाम पर केवल राष्ट्र-विरोधी जहर उगलने का काम बचा है।

इस प्रकार की भ्रामक भाषा का प्रयोग करके वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को एक अत्याचारी राष्ट्र के रूप में चित्रित करने का प्रयास करती हैं।

CJP और अराजक आंदोलनों का महिमामंडन: संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की साजिश

निवेदिता का पूरा जोर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों को सही ठहराने और उनका महिमामंडन करने पर रहा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के भेष में तमाम उपद्रवियों के संसद में घुसने की साजिशों और उपद्रव में शामिल वामंपथी और कट्टरपंथी संगठनों व पुलिस पर हमले करने वाले गुंडो को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।

मेनन ने इन आंदोलनों को ‘लोकतांत्रिक जीत’ का नाम दिया। उन्होंने कह, “यह अकाउंटेबिलिटी शब्द जो CJP के प्रोटेस्ट ने इतना आम बनाया कि हर कोई अकाउंटेबिलिटी और जवाबदेही की बात कर रहे हैं। एक स्टूडेंट ने आपको याद होगा एनसीआरटी की टेक्स्ट बुक से डेमोक्रेसी का वर्णन पढ़ते हुए बताया कि अकाउंटेबिलिटी है डेमोक्रेसी का फीचर। तो यह इस मूवमेंट का सबसे बड़ा की सबसे बड़ी बड़ी जीत यह है कि अकाउंटेबिलिटी शब्द हमारे शब्दकोश में हमारे आम बोलचाल में यह शब्द आ गया है।”

आंदोलन के नेतृत्व और उसके स्वरूप पर बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, “CJP के कॉल पे जिस तरह के लोग निकल के आए तो एक तरह से मैं सुन रही हूँ यह शब्द ऑर्गेनिक बहुत ज्यादा कि यह ऑर्गेनिक हो गया। अब ऑर्गेनिक तो हो गया लेकिन ऑर्गेनिक अपने आप में उभर के नहीं आता है। कहीं न कहीं एक कॉल देने वाला एक केंद्र होना चाहिए और इसमें अभिजीत दीपके का नाम और अभिजीत दीपके की भूमिका जो है हम कभी नहीं भूल सकते। उनको रिड्यूस नहीं कर सकते।”

उन्होंने यह दावा भी किया कि इस तरह के आंदोलनों ने पिछले 12 वर्षों के सन्नाटे को तोड़ा है और विभिन्न वामपंथी समूहों को एक मंच पर लाया है। उन्होंने कहा, “लेकिन वह जो बिल्कुल एक 12 साल से घना सन्नाटा छाया हुआ था, इन 12 सालों में जो कुछ भी हुआ है, एक तरह से अभिजीत ने इसीलिए लेफ्ट ग्रुप्स उनके साथ जुड़ सके। इसीलिए इतने सारे लोग दुनिया देश भर में, दुनिया भर में एक्चुअली दुनिया भर में भी सपोर्ट हुआ है।”

RSS, केंद्र सरकार और शैक्षणिक व्यवस्था पर जहरीले प्रहार

इंटरव्यू के दौरान केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति निवेदिता मेनन का राजनीतिक विद्वेष स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन्होंने देश के नए शिक्षा मंत्री, नवगठित टास्क फोर्स और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर तीखी और अमर्यादित टिप्पणियाँ कीं। साथ ही आरोप लगाया कि इनकी मानसिकता महिलाओं को लेकर भी बहुत घटिया है।

उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, “धर्मेंद्र प्रधान निकल गए लेकिन जो एजुकेशन मिनिस्टर बन के आए वह उनसे भी कट्टर संघी हैं और भी कट्टर RSS के मतलब प्रचारक हैं। उन्होंने बिलकिस बानो के बलात्कारियों के बारे में बहुत ही सपोर्टिवली बात की। तो ऐसे शख्स को एजुकेशन मिनिस्टर बनाया है जो हमने सोचा होगा कि धर्मेंद्र प्रधान से खराब कोई नहीं होगा, लो उन्होंने एक और अपने बट से निकाला।” मेनन ने नए शिक्षा मंत्री पर कई तरह के अन्य घटिया आरोप लगाए और हिंदू समाज पर अभद्र टिप्पणी की।

सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए बनाई गई टास्क फोर्स के गठन और उसमें शामिल सदस्यों का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा, “उन्होंने जो सो कॉल्ड हाई पावर टास्क फोर्स बनाया है उसमें देख लीजिए किस तरह के लोग हैं। उसमें IAS के ब्यूरोक्रेट्स हैं, उसमें इंफोसिस के चीफ हैं और इंफोसिस एजुकेशन के बारे में क्या बताएगा हमको? फिर एक और हैं जिन्होंने गोमूत्र के बारे में बहुत प्रशंसा की है कि गोमूत्र के जरिए बहुत सारी बीमारियाँ ठीक होती हैं। तो इस तरह का एक टास्क फोर्स बनाया है जिससे हमें मतलब कोई उम्मीद ही नहीं।”

देश के राजनीतिक ढाँचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह से नकारते हुए उन्होंने आरोप लगाया, “12 साल से हिंदू राष्ट्र ही रहा है हमारे यहाँ, हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश की गई है और एक तरह से हिंदू राष्ट्र बन भी गया है। हम सब हिंदू राष्ट्र की छाया में रह रहे हैं।”

CAA विरोधी प्रदर्शनों, उमर खालिद और अलगाववादी निरंतरता का समर्थन

इंटरव्यू में निवेदिता मेनन ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों के संदिग्धों का खुलकर बचाव किया। उन्होंने उमर खालिद जैसे जेल में बंद आरोपितों द्वारा फैलाए गए आख्यानों का महिमामंडन किया और इसे एक बड़े क्रांतिकारी सफर के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा, “जो बीज बोए गए एंटी-सीएए और फार्मर्स प्रोटेस्ट में जो बीज बोए गए और उनको दबाया गया एक तरह से, लेकिन उसमें से जो वो सीड्स उमर खालिद जैसे नौजवानों ने जो बीज बोए थे, वो पौधे बनकर उभरे। और अब तो वो एक कंटिन्यूटी है, एक कंटिन्यूटी है एंटी-सीएए से लेके यहाँ तक।”

इसके अलावा उन्होंने देश की चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर पूर्ण अविश्वास व्यक्त करते हुए कहा, “इस तरह का जो व्यवहार है किसी सरकार का दिखाता है हमें कि उनका कोई इरादा नहीं है एक चुनाव जीतने का, इसका मतलब यह है ना कि उनको चुनाव से डर नहीं है क्योंकि हर लेवल पर उन्होंने EVM, ECI, SIR, डीलिमिटेशन ये सारी चीजों को लेके अब उनको लगता है कि चुनाव हमें जीतने की जरूरत ही नहीं है।”

PM मोदी को दी गई गालियों को बताया ‘प्रतिरोध’, ‘एंटी-पेट्रियारकल’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’

छात्र आंदोलनों के दौरान प्रधानमंत्री और देश की संवैधानिक हस्तियों को दी जाने वाली अभद्र और अमर्यादित गालियों को सही ठहराने के लिए निवेदिता मेनन और मंदीप पुनिया ने फेमिनिस्ट और ‘क्वीर’ थ्योरी का सहारा लिया। उन्होंने इसे युवाओं का ‘क्रांतिकारी प्रतिरोध’ करार देते हुए कहा, “जब कोई भी ग्रुप पे एक गाली बार-बार मारी जाती है, उस गाली को उठा के एक फूलों का गुलदस्ता बनाना और बैज ऑफ ऑनर बनाना, यह भी ऐतिहासिक प्रोसेस है।”

उन्होंने आगे गालियों का बचाव करते हुए कहा, “ज्यादातर जो गालियाँ हैं वो एक्चुअली एंटी-पेट्रियारकल हैं, मुझे गालियाँ सुनके लगा कि यह भी वो जो रेजिस्टेंस का एक पोक, दिस इज अ काइंड ऑफ रेजिस्टेंस जो व्हिच आवर जनरेशन, तो मुझे लगता है गालियाँ सुनके लगा कि यह भी रेजिस्टेंस का हिस्सा है।”

एक पूर्व विश्वविद्यालय प्रोफेसर द्वारा युवाओं की अशिष्टता, अमर्यादित भाषा और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के प्रति गालियों को ‘बैज ऑफ ऑनर’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’ बताकर बढ़ावा देना वामपंथी बौद्धिक वर्ग के नैतिक पतन की चरम सीमा को दर्शाता है।

JNU के मंच का दुरुपयोग और युवाओं के मन में जहर घोलने का प्रयास

इंटरव्यू के अंत में निवेदिता मेनन ने यह खुलकर स्वीकार किया कि वे किस प्रकार युवाओं की इन अराजक कार्यशैली से सीख रही हैं और इसे बढ़ावा देना चाहती हैं।

उन्होंने कहा, “यह RSS और BJP वाले जब प्रोपेगेंडा करते हैं, उनसे सीखूँगी मैं, उनसे सीखूँगी कैसे जब कीचड़ उछाला जाता है आप कीचड़ को उठा के उनके ऊपर नहीं, उसको एक तरह से गुब्बारा या गुलदस्ता बना के वापस उछाल रहे हैं।”

एक प्रोफेसर का यह दायित्व होता है कि वह छात्रों को अध्ययन, अनुशासित बहस, राष्ट्रनिर्माण और संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति जागरूक करे। लेकिन इसके विपरीत, निवेदिता मेनन जैसे वामपंथी विचारक युवाओं के मन में देश की राज्य व्यवस्था, न्यायपालिका और सीमाओं के प्रति आक्रोश और अलगाववाद की भावना को भड़काने में लगे रहते हैं।

निवेदिता मेनन का पुराना ‘कच्चा-चिट्ठा’: विवादित बयानों की पूरी लिस्ट

भारत को ‘मनहूस देश’ बताना या भारतीय सेना व संवैधानिक व्यवस्था पर हमले करना निवेदिता मेनन की किसी नई सोच का नतीजा नहीं है। अगर उनके पिछले करियर और रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका पूरा इतिहास ही भारत विरोधी बयानों, सेना के अपमान, अलगाववादियों के समर्थन और हिंदू विरोधी एजेंडे से भरा पड़ा है।

भारत ने कश्मीर पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है: निवेदिता का विवादित बयान

मार्च 2016 में, JNU परिसर में ‘आजादी’ के नारों को लेकर जारी विवाद के दौरान निवेदिता मेनन ने ‘व्हाट नेशनहुड मीन्स टू मी’ (मेरे लिए राष्ट्रवाद का क्या अर्थ है) विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान दिया था। इस भाषण में उन्होंने खुले तौर पर कहा था, “हम सभी जानते हैं कि कश्मीर पर भारत का कब्जा अवैध है। दुनिया भर में यह माना जाता है कि भारत ने कश्मीर पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है (India is illegally occupying Kashmir)।”

उन्होंने टाइम और न्यूजवीक जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के विवादित नक्शों का संदर्भ देकर यह तर्क दिया था कि यदि पूरा विश्व भारत को कश्मीर में एक आक्रामक शक्ति मानता है, तो घाटी में ‘आजादी’ के नारे लगना पूरी तरह से जायज और प्राकृतिक है। उनके इस वक्तव्य से देश भर में भारी आक्रोश पैदा हुआ था।

भारतीय सैनिकों का अपमान और ‘रोजी-रोटी के लिए काम करने’ का आरोप

फरवरी 2017 में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU), जोधपुर में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में निवेदिता मेनन मुख्य वक्ता थीं। वहाँ उन्होंने न केवल भारत का विवादित नक्शा प्रदर्शित किया, बल्कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले भारतीय सेना के जवानों का घोर अपमान किया।

उन्होंने कहा था, “सैनिक देश की रक्षा या देशभक्ति के लिए सीमाओं पर नहीं खड़े हैं, बल्कि वे केवल अपनी आजीविका (रोजगार) चलाने और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए सेना में काम करते हैं।” उन्होंने आगे यह भी कहा था कि भारत को सियाचिन जैसे क्षेत्रों से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए और उस पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।

इस राष्ट्र-विरोधी बयान के बाद जोधपुर में विश्वविद्यालय परिसर से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन हुए थे, मेनन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी और संगोष्ठी की आयोजक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया था।

भारत के आधिकारिक मानचित्र और अखंडता पर सवाल उठाना

निवेदिता मेनन ने अपने कई व्याख्यानों और लेखों में भारत के भौगोलिक मानचित्र की वैधता को खारिज किया है। ‘हिमालयन मैगजीन’ और विदेशी प्रकाशनों के विवादित नक्शों का हवाला देकर उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया है कि भारत एक ‘कृत्रिम राष्ट्र-राज्य’ है।

वे उत्तर-पूर्व भारत और कश्मीर के भारत में विलय को एक ‘सैनिक जबर्दस्ती’ के रूप में पेश करती हैं, जो सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाला रुख है।

‘लव जिहाद’ पर वामपंथी-इस्लामी साँठगाँठ: आरफा खानम और निवेदिता मेनन द्वारा पीड़ित हिंदुओं का मजाक

निवेदिता मेनन और ‘द वायर’ की प्रोपेगैंडिस्ट आरफा खानम शेरवानी की एक पुरानी बातचीत का विश्लेषण यह साफ उजागर करता है कि किस तरह वामपंथी और इस्लामी मिलकर हिंदू समाज की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों का मजाक उड़ाते हैं।

आरफा खानम ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाते हुए सवाल पूछा कि ‘हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’, तो निवेदिता मेनन ने ठहाके लगाते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा, “मुस्लिम मर्द होंगे इतने अट्रैक्टिव और उनको अपने ही धर्म में वो नहीं मिलता होगा।”

आरफा और निवेदिता की इस जोड़ी ने लव जिहाद के पीछे की उस गहरी कड़वी सच्चाई को छिपाने की कोशिश की, जहाँ मुस्लिम युवक अपनी मजहबी पहचान छिपाकर हाथ में कलावा बाँधते हैं, फर्जी हिंदू नाम रखकर हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं और बाद में यौन शोषण व धर्मांतरण का दबाव बनाते हैं।

भारतीय संविधान, हिंदू धर्म और हिंदुत्व पर अनर्गल टिप्पणियाँ

प्रोफेसर मेनन अपने भाषणों में लगातार हिंदू समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और हिंदुत्व की अवधारणा पर तीखे हमले करती रही हैं। वे हिंदुत्व को एक उग्र, हिंसक और महिला-विरोधी विचारधारा के रूप में चित्रित करती हैं, जबकि अन्य धर्मों में मौजूद कड़े कट्टरपंथ और कुरीतियों पर वे पूरी तरह मौन धारण कर लेती हैं।

हिंदू धर्म की मान्यताओं को निशाना बनाकर बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ असंतोष फैलाना उनकी रणनीतिक बयानबाजी का मुख्य हिस्सा रहा है।

देश की न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की साख पर प्रहार

मेनन का यह रिकॉर्ड रहा है कि वे भारत की किसी भी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं करतीं। कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए अलगाववादियों या आतंकवादियों के समर्थकों के मामले में वे हमेशा न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल उठाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए जाँच के आदेशों को वे ‘राज्य का दमन’ बताती हैं और पुलिस द्वारा की जाने वाली कानूनी कार्रवाइयों को ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ का नाम देती हैं। इस प्रकार वे युवाओं के मन में भारतीय राज्य व्यवस्था के प्रति पूर्ण अविश्वास पैदा करने का काम करती हैं।

वैचारिक अराजकता और राष्ट्र-विरोधी आख्यान का वास्तविक आईना

निवेदिता मेनन के इस हालिया इंटरव्यू और उनका पुराना विवादित इतिहास यह साफ उजागर करता है कि उनका पूरा आख्यान केवल किसी राजनीतिक दल या सरकार का विरोध नहीं है, बल्कि भारत के राष्ट्र-राज्य, उसकी संप्रभुता और संवैधानिक ढाँचे पर किया गया एक गहरा प्रहार है।

भारत जैसे विविध और सहिष्णु देश को ‘मनहूस’ बताना, देश की रक्षा करने वाली भारतीय सेना के शौर्य को मात्र ‘रोजी-रोटी का जरिया’ करार देना, कश्मीर पर भारत के संप्रभु अधिकारों को अवैध बताना और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपितों को ‘क्रांति का बीज’ कहना- यह सब एक सुनियोजित वामपंथी-अलगाववादी सोच का हिस्सा है।

लोकतंत्र में असहमति और वैचारिक आलोचना का हमेशा स्वागत है, लेकिन जब असहमति के नाम पर राष्ट्र के अस्तित्व को नकारा जाने लगे, गालियों को ‘सम्मान का पदक’ (Badge of Honor) बनाकर पेश किया जाने लगे और अराजकता को बढ़ावा दिया जाए, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं बल्कि ‘वैचारिक आतंकवाद’ कहा जाएगा।

एम जे अकबर का करियर कैसे बर्बाद किया गया?

पत्रकार सुपर्णा शर्मा 
सुभाष चन्द्र

वर्ष 2017 में बॉलीवुड की तनुश्री दत्ता ने मी-टू अभियान चलाया नाना पाटेकर पर आरोप लगा कर। उसके बाद प्रिया रमानी ने अक्टूबर, 2018, में 25 साल पुराने कथित यौन शोषण का आरोप विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर पर लगा दिया, मंत्रीपद चला गया और आज 8 साल बाद भी वो रमानी के खिलाफ केस लड़ रहा है केस में किस किस तारीख को क्या हुआ, पहले ये देखिए ➖

लेखक 
चर्चित YouTuber 
-अक्टूबर 2018 को प्रिया रमानी ने अकबर के खिलाफ sexual misconduct का आरोप लगाया जो कथित तौर पर दिसंबर,1993 में हुआ

-15 अक्टूबर, 2018 को अकबर ने रमानी पर आपराधिक मानहानि का केस दर्ज किया;

-29 जनवरी, 2019 को कोर्ट ने एक अभियुक्त के तौर प्रिया को समन किया;

-25 फरवरी, 2019 रमानी कोर्ट में पेश हुई और जमानत मिल गई;

-1 फरवरी, 2020 को कोर्ट ने अंतिम सुनवाई की; और 

-17 फरवरी, 2021 को (यानी एक साल बाद) कोर्ट ने अकबर का केस ख़ारिज करते हुए कहा कि WOMAN’S RIGHT TO DIGNITY OUTWEIGHS A MAN’S RIGHT TO REPUTATION. महिला उस अधिकार के लिए दशकों बाद भी आवाज़ उठा सकती है

-मार्च-सितंबर 2025 में अकबर ने हाई कोर्ट में अपील दायर की जो MP/MLA कोर्ट को भेज दी गई;

-हाई कोर्ट ने 16 मार्च, 2026 अंतिम सुनवाई के लिए तय की;

-लेकिन अब उसे बढ़ा कर 24 सितंबर, 2026 कर दिया गया है

- इस बीच MP/MLA कोर्ट के मुक़दमे अभी तक देख रही जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की जगह अब जस्टिस मनोज जैन देखेंगे

1 फरवरी, 2020 को सब तरह से सुनवाई पूरी करने के बाद चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट रविंद्र कुमार पांडेय ने दोनों पक्षों की बहस सुनकर फैसले के लिए 10 फरवरी की तिथि तय की। उस दिन ये नहीं कहा गया कि दोनों पक्ष अपने लिखित बयान भी देंगे

लेकिन 10 फरवरी को यानी फैसले के दिन CMM पांडेय ने ये कह कर फैसले की तारीख 17 फरवरी कर दी कि लिखित बयान देर से भेजे गए दोनों पक्षों द्वारा। ये बात कुछ हजम नहीं हुई थी और उस दिन होने वाले फैसले पर शंका थी मुझे

जब आपने 10 फरवरी को फैसला देना था तो दोनों पक्षों को लिखित बयान 3 फरवरी तक देने को कहना था और तब ही तय तारीख पर फैसला हो सकता था मगर ऐसा नहीं किया गया

जैसा मैंने कल तरुण तेजपाल के केस में कहा था कि फैसले की तारीख बदलना कुछ गोलमाल की तरफ इशारा करता है और अकबर के केस में भी ऐसा ही हुआ

इस केस में सबसे रहस्यमय बात यह है कि एक तरफ प्रिया रमानी ने दिसंबर 1993 में अकबर पर Sexual Misconduct (रेप का नहीं) का आरोप लगाया दूसरी तरफ वह MJ Akbar की फरवरी,1994 में शुरू होने वाली पत्रिका Asian Age में जनवरी,1994 में ही नौकरी ज्वाइन कर गई

गूगल के अनुसार प्रिया ने लॉन्च से पहले की तैयारियों के लिए नौकरी ज्वाइन की यानी अकबर की कहानी फर्जी थी फिर 25 साल तक खामोश क्यों रही? 

इसका मतलब साफ है या तो प्रिया रमानी ने झूठे आरोप लगाए और या उसे MJ Akbar के व्यवहार से कोई समस्या नहीं थी क्योंकि Asian Age के मालिक तो वही थे जब MJ Akbar ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया तो उसे उनकी संस्था में जाना ही नहीं चाहिए था और यह साबित करता है कि इसकी शिकायत मनघडंत और किसी राजनीति से प्रेरित थी

MJ Akbar एक समय में भाजपा/RSS/Modi के कट्टर आलोचक थे लेकिन मार्च 2014 में भाजपा में शामिल हो गए और राज्यसभा के सदस्य बने उन्होंने विदेश राज्य मंत्री रहते इस्लामिक देशों से भारत के संबंधों को आगे बढ़ाया बस इसी कारण शायद उनके खिलाफ यह षड्यंत्र रचा गया और मोहरा बनी प्रिया रमानी

महबूबा मुफ्ती की हिंदू विरोधी बेटी इल्तिजा पर FIR, पुलिस अधिकारी को दाँत से काटा: बहने लगा खून, 370 हटाने के विरोध में जमकर किया हंगामा


हिंदुत्व को ‘बीमारी’ बताने वाली जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बेटी और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) नेता इल्तिजा मुफ्ती के खिलाफ श्रीनगर पुलिस ने FIR दर्ज की है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान इल्तिजा मुफ्ती ने ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी के साथ हाथापाई की और उनकी बाँह पर काट लिया। इल्तिजा के काटने से अधिकारी की बांह पर चोट आई और खून निकलने लगा।

इस मामले में इल्तिजा मुफ्ती के साथ महबूबा मुफ्ती का नाम भी दर्ज किया गया है। महबूबा मुफ्ती पर लगाए गए प्रतिबंधों और प्रशासनिक निर्देशों के उल्लंघन का आरोप है। पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 121, 132 और 191 के तहत कार्रवाई की है। ये धाराएँ सरकारी कर्मचारियों पर हमले, उनके सरकारी काम में बाधा डालने और उपद्रव/दंगा जैसी गतिविधियों से संबंधित हैं। FIR कोठीबाग थाने में दर्ज की गई है और पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है।

SK पार्क में प्रदर्शन, लाल चौक की ओर बढ़ने की कोशिश और मारपीट

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 अगस्त की शाम श्रीनगर के एसके पार्क में महबूबा मुफ्ती और इल्तिजा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी का प्रदर्शन आयोजित किया गया था। प्रदर्शन का मकसद अनुच्छेद 370 हटाए जाने के विरोध में अपनी बात रखना था। इस दौरान प्रशासन की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने रेजीडेंसी रोड को अवरुद्ध करने और लाल चौक की तरफ बढ़ने की कोशिश की।

पुलिस के मुताबिक, इसके बाद प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेड हटाने और कानून-व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मियों को रोकने की कोशिश की। इसी दौरान धक्का-मुक्की की स्थिति पैदा हुई और इल्तिजा मुफ्ती पर एक पुलिस अधिकारी के साथ हाथापाई की।

पुलिस का कहना है कि इल्तिजा ने अधिकारी को पकड़कर उनकी बांह पर काट लिया। इससे अधिकारी के हाथ में गहरी चोट आई और खून बहने लगा। घायल पुलिस अधिकारी को तत्काल अस्पताल ले जाया गया। वहाँ चिकित्सकों ने घाव का उपचार किया।

पुलिस ने जारी किया समन

पुलिस ने इस घटना को ड्यूटी के दौरान सरकारी कर्मचारी पर कथित हमले और सरकारी काम में बाधा डालने का मामला माना है। कोठीबाग थाने में एफआईआर संख्या 63/2026 दर्ज की गई है।

जांँच के तहत इल्तिजा मुफ्ती को शुक्रवार को कोठीबाग थाने में पेश होने और जांँच में शामिल होने के लिए समन जारी किया गया है। पुलिस ने कहा है कि जांँच के दौरान यदि कोई अन्य व्यक्ति सरकारी कर्मचारियों पर कथित हमले या सरकारी काम में बाधा डालने में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

वहीं, पीडीपी ने पुलिस के आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा पुलिस पर इल्तिजा मुफ्ती के साथ बदसलूकी और उन्हें चोट पहुँचाने का आरोप लगाया है।

हिंदू विरोध के लिए कुख्यात इल्तिजा

इल्तिजा मुफ्ती अपनी हिंदू विरोध सोच के लिए भी कुख्यात हैं। यहाँ तक कि वो हिंदुत्व को बीमारी तक बता चुकी हैं। इल्तिजा ने दिसंबर 2024 में कहा था कि हिंदुत्व एक ‘बीमारी’ है, जिसने लाखों भारतीयों को अपनी चपेट में ले लिया है और भगवान के नाम को बदनाम किया है। मुफ्ती ने कहा था कि ‘हिंदुत्व नफरत की एक विचारधारा है जिसे वीर सावरकर ने 1940 के दशक में भारत में हिंदुओं का वर्चस्व स्थापित करने के मकसद से फैलाया था’।

सिर्फ हिंदुत्व ही नहीं बल्कि इल्तिजा का भारत विरोध भी पुराना है। नवंबर 2019 में CNN के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था, “भारत पाकिस्तान का इस्तेमाल ‘कश्मीरियों को दबाने के लिए एक हथियार’ के तौर पर करता है। सच यह है कि कश्मीर एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत का हिस्सा बना था और अब भारत एक ‘तानाशाह हिंदू पाकिस्तान’ में बदल रहा है।” इल्तिजा आगे कहती हैं कि भारत कट्टरता, चुनिंदा उत्पीड़न और अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) के प्रति नफरत का अड्डा बनता जा रहा है।

‘FCRA बिल वापस लें या JPC को भेजें’: अमित शाह से मिले ईसाई प्रतिनिधियों ने की माँग, गृह मंत्री से मिलकर मिजोरम के CM बोले- 12 अगस्त से संसद में इस पर होगी चर्चा


विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA Bill) को लेकर फैलाए जा रहे प्रोपेगेंडा के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार (6 अगस्त 2026) को ईसाई समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों से मुलाकात की। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतिनिधियों ने गृह मंत्री के साथ बैठक के दौरान विधेयक से जुड़े अपने मुद्दों और आशंकाओं पर चर्चा की।

सूत्रों के अनुसार, अमित शाह ने प्रतिनिधियों की बात ध्यान से सुनी और उनकी चिंताओं को नोट किया। गृह मंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उठाए गए मुद्दों को देखेंगे और इस मामले पर सरकार के अन्य सदस्यों के साथ भी चर्चा करेंगे।

वहीं, CNN News18 की एक पत्रकार ने X पर इस मुलाकात को लेकर लिखा कि शाह से मुलाकात करने वाले ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों ने FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अपनी आपत्ति जताई। उन्होंने लिखा, “प्रतिनिधियों ने माँग की कि विधेयक को या तो वापस लिया जाए या फिर आगे की संसदीय जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए।”

FCRA बिल को लेकर मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह से मुलाकात की। बैठक के बाद उन्होंने बताया कि उन्होंने गृह मंत्री के सामने विधेयक से जुड़े 6 मुद्दे उठाए थे।

लालदुहोमा के मुताबिक, इन छह मुद्दों में से एक पर अमित शाह ने उन्हें स्पष्ट आश्वासन दिया कि FCRA संशोधन विधेयक पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाएगा। यानी कानून बनने से पहले की अवधि पर इसके प्रावधान लागू नहीं होंगे।

मिजोरम के मुख्यमंत्री ने बताया कि बाकी मुद्दों पर गृह मंत्री ने लिखित जवाब देने की बात कही है। अमित शाह की ओर से इन बिंदुओं पर लिखित प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही विधेयक को लेकर पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। लालदुहोमा ने यह भी बताया कि अमित शाह 12 अगस्त से संसद में FCRA संशोधन विधेयक पर चर्चा शुरू करने वाले हैं।

क्या है बिल के संशोधन और क्यों परेशान हैं मिशनरी

मार्च 2026 में पेश किया गया FCRA संशोधन विधेयक मुख्य रूप से उन संस्थाओं से जुड़ा है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, जिन्होंने अपना लाइसेंस खुद सरेंडर कर दिया है या जिनका लाइसेंस रीन्यू नहीं हुआ है। इस विधेयक के तहत केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उस पैसे से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार दिया गया है। इसका उद्देश्य विदेशी फंड के दुरुपयोग और उसके अवैध तरीके से किसी दूसरे को हस्तांतरित किए जाने पर रोक लगाना है।

इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को एक अधिसूचना जारी कर विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 में भी बदलाव किया। इसके तहत धार्मिक समुदायों के कई वर्गों के लिए धर्मांतरण यानी Proselytisation को इन नियमों के दायरे से बाहर रखा गया है।

सरकार की शक्तियाँ केवल उन्हीं संपत्तियों तक सीमित रहेंगी, जो विदेशी फंड से बनाई गई हैं और जिन पर FCRA लाइसेंस खत्म होने जैसी निर्धारित परिस्थितियाँ लागू होती हैं। साथ ही, ऐसे मामलों में सरकार के आदेश की समीक्षा और उसके खिलाफ अपील करने का अधिकार भी मौजूद रहेगा।

पिछले कई दशकों से अमेरिका स्थित कई ईसाई प्रचारक और मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, खासकर जनजातीय और दलित समुदायों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India और Joshua Project जैसे कई विदेशी ईसाई संगठन भारत में सक्रिय रहे हैं। इन संगठनों की गतिविधियों को धार्मिक कामों के साथ-साथ उनके मूल देशों के रणनीतिक हितों से भी जोड़ा जाता रहा है।

अब यही विदेशी और भारतीय मिशनरी संगठन FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इस कानून से उन संस्थाओं तक विदेशी फंड पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा, जिन पर भारत की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलने और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले एजेंडे पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं।

क्या देश में आग लगाना चाहते हैं राहुल गांधी? आलाकमान के मिशन को आगे बढ़ा रहे खड़गे, मनुस्मृति को बनाया हथियार


कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देश में आग लगाना चाहते हैं। मई 2022 में राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस ने सैकड़ों नेताओं के साथ चिंतन शिविर का आयोजन किया था। इस चिंतन शिवर के मंच से राहुल गांधी ने देश में ‘आग’ लगाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था,
आपको दिखेगा अब यह लड़ाई शुरू हुई है। आने वाले समय में आपको दिखेगा हिंदुस्तान में आग लगेगी।” राहुल गांधी के इस बयान के बाद सशस्त्र बलों में भर्ती प्रक्रिया को लेकर लाई गई नई अग्निपथ योजना के विरोध में बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पंजाब समेत कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए।

राहुल गांधी की गृहयुद्ध की धमकी-पूरे देश में आग लगने जा रही है, याद रखो
दिल्ली के रामलीला मैदान में 31 मार्च, 2024 को अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी के विरोध में रैली हुई थी। इस रैली में कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने गृहयुद्ध की धमकी दी थी। राहुल गांधी ने कहा था, “इस पूरे देश में आग लगने जा रही है जो मैंने कहा याद रखो यह देश नहीं बचेगा।” उन्होंने देश के मौजूदा राजनीतिक हालात को IPL से जोड़ते हुए ‘मैच फिक्सिंग’ का आरोप जड़ा। इसके बाद राहुल गांधी ने अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए कई बार प्रयास किए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की सूझबूझ और धर्य ने उनकी चाहत पर पानी फेर दिया और देश जलने से बच गया।

भारत को नेपाल की तरह जलाने और सत्ता परिवर्तन की बड़ी साजिश नाकाम
राहुल गांधी की इच्छा पूरी करने के लिए साजिशों का दौर जारी है। हाल ही में नीट परीक्षा में पेपर लीक को लेकर छात्रों को भड़काया गया। 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले प्रदर्शन के दौरान कांग्रेसी कार्यकर्ताओं, सेकुलर गुंडों और टुकड़े-टुकड़े गैंग की उग्र भीड़ ने बैरिकेड्स तोड़कर संसद भवन परिसर में जबरन घुसने का प्रयास किया। लेकिन सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने सांसदों को बंधक बनाने, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका की तरह देश को जलाने के उनके खतरनाक मंसूबों और साजिशों को नाकाम कर दिया।

खड़गे की अमित शाह को धमकी, खींच कर लाएंगे, जनता के सामने दिखाएंगे
जब छात्रों की आड़ में देश में सत्ता परिवर्तन नहीं कर पाए तो राहुल गांधी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को देश में आग लगाने के खतरनाक मिशन पर लगा दिया। क्योकि जो अध्यक्ष होते हुए भी परिवार की इजाजत के बिना कोई निर्णय नहीं ले सकता वह इतनी बड़ी बात बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता। 30 जुलाई को राज्यसभा में चर्चा के दौरान खड़गे ने संसद भवन के सामने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया। जिस तरह उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ विवादित बयान दिया, वो देश को आग में झोंकने जैसा है। खड़गे ने कहा “आप बंद कमरे में रह कर बहुत दिन तक छुप नहीं सकते। एक दिन हम बाहर खींच कर लाएंगे और जनता के सामने हम दिखाएंगे, फिर बताएंगे”

खड़गे ने देश में आग लगाने के लिए मनुस्मृति को बनाया हथियार
अपने आलाकमान राहुल गांधी के निर्देश को पालन करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने सदन में आरोप लगाया कि नए और बदले जा रहे शैक्षणिक पाठ्यक्रम में मनुस्मृति की चीजें डाली जा रही हैं। खड़गे ने मनुस्मृति का जिक्र करते हुए कहा कि वेद का उच्चारण करने पर जीभ काटने तक की बात कही गई है। वेद मंत्र धारण करने पर शरीर काटने तक की बात कही गई है। ये सब मनुस्मृति में लिखा हुआ है। खड़गे के इतना बोलते ही सदन में हंगामा मच गया। बीजेपी के सांसदों ने इसका जमकर विरोध किया। इस दौरान सभापति ने खड़गे को टोका और कहा कि मनुस्मृति का पेपर लीक बिल से क्या लेना-देना है।

खड़गे के बयान से समाज में अशांति फैल सकती है- जेपी नड्डा
सदन के नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने बीजेपी की ओर से जवाब देते हुए मनुस्मृति से जुड़ी टिप्पणी को रिकॉर्ड से हटाने का आग्रह किया। साथ ही कहा कि इससे समाज में अशांति फैल सकती है। उन्होंने कहा, ‘अभी जो वक्तव्य लीडर ऑफ अपोजिशन मल्लिकार्जुन खड़गे जी ने दिया है। उस वक्तव्य से समाज में विद्वेश की भावना पैदा होती है। अशांति का वातावरण पैदा होता है। जहां तक मेरी जानकारी है, यह तथ्यों से परे हैं। मनुस्मृति के ओरिजनल टैक्स्ट को ऑथेंटिकेट करें। ये ओरिजनल नहीं है।”

सुधांशु त्रिवेदी ने अंबेडकर के किताब का हवाला देकर ऑथेंटिकेशन की दी चुनौती
बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “कलकत्ता हाईकोर्ट के एक पूर्व जज विलियम जोंस ने 1790 में मनुस्मृति का ट्रांसलेशन किया। उन्होंने तीन किताबों का ट्रांसलेशन किया था।” इसके साथ ही सुधांशु त्रिवेदी ने बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की किताब को कोट किया और कई किताबों का संदर्भ दिया । उन्होंने कहा, “बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की किताब “हू वर द शूद्राज़” (Who Were the Shudras?) चैप्टर नंबर वन, पेज नंबर वन, पैराग्राफ नंबर तीन में उन्होंने लिखा है कि देयर इज नो कनेक्शन ऑफ़ मॉडर्न डेज शेड्यूल कास्ट विद द वैदिक एंड शूद्रा। बाबा साहेब अंबेडकर की किताब ‘द अनटचेबल’ उसमें उन्होंने लिखा है कि देयर वाज़ नो अनटचेबिलिटी। मैंने बाबा साहेब को कोट किया है। विलियम जोंस से पहले की किताब अवेलेबल नहीं है। इसीलिए मैंने कहा आई वांट ऑथेंटिकेशन…।” इस पर सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने मनुस्मृति पर दिए गए खड़गे के बयान को सदन की कार्यवाही से बाहर निकालने का ऐलान कर दिया।

खड़गे की सफाई- इस तरह का दंड मनुस्मृति में नहीं पाया जाता
बीजेपी सांसदों के जबरदस्त विरोध के बाद मल्लिकार्जु खड़गे को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्हें तथ्यात्मक रूप से पता चला कि यह प्रावधान मूल मनुस्मृति में नहीं, बल्कि गौतम धर्मसूत्र में हैं। उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया है, तो फिर आधारहीन तथ्यों को लेकर सफाई देने चले आए। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सफाई देते हुए खुद लिखा कि इस तरह के कठोर प्रावधान गौतम धर्मसूत्र के हैं। इस तरह का दंड मनुस्मृति में नहीं पाया जाता। इनका उल्लेख गौतम धर्मसूत्र (अध्याय 12, छंद 4-6) में किया गया है। खड़गे की इस सफाई के बाद स्पष्ट हो गया है कि राहुल गांधी सामाजिक विद्वेश पैदाकर दलितों और सवर्णों के बीच गृहयुद्ध कराना चाहते हैं। हिन्दुओं को विभाजित कर सत्ता में आना चाहते हैं।

हिन्दू विरोधी कांग्रेस- दलित वोट बैक के लिए प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रंथों का अपमान
दलित वोट बैंक पर कब्जा करने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जाने को तैयार है। दलितों को गुमराह करने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपना रही है। इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ कर अपने सियासी एजेंडे के अनुसार पेश कर रही है। दरअसल, मनुस्मृति में शूद्रों के बारे में जो भी लिखा है उसे लेकर विद्वानों, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के बीच अलग-अलग विचार हैं। एक पक्ष इसे पूरी तरह भेदभाव करने वाला मानता है तो दूसरा पक्ष इसे गुण-कर्म आधारित काम के बंटवारे की तरफ देखता है। साथ ही उनका यह भी तर्क है कि पाठ में सदियों से कई संशोधन हुए हैं और बाद में इसकी मूल सामग्री को बदल दिया गया होगा। कई शोधकर्ताओं ने इस बात का तर्क दिया है कि बाद के समय में बड़ी संख्या में छंद जोड़े गए। इस तरह अलग-अलग कालखंडों में रचे गए हिन्दू धर्मग्रंथों से समाज, संस्कृति और विचारों में समय-समय पर हुए बदलाव की पूरी जानकारी मिलती है।

राहुल पर एक साल में अराजकता के द्वारा सत्ता परिवर्तन करने का आरोप
सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी राहुल गांधी पर निशाना साधते नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, “निरंतर चुनावों में अपनी पराजय के कारण कांग्रेस पार्टी ना सिर्फ मानसिक हताशा के दौर से गुजर रही है…परंतु उसी के साथ एक बहुत खतरनाक षड्यंत्र का हिस्सा होती जा रही है। राहुल गांधी का बयान समाचार पत्रों में आया है। उन्होंने कहा है कि एक साल के अंदर अराजकता के द्वारा यह सत्ता का परिवर्तन होगा। इससे एक बात स्पष्ट हो गई है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पार्टी के लिए कहा था कि अब ये कांग्रेस पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि मुश्लिम लीगी, माओवादी कांग्रेस में तब्दील हो गई है। केरल में मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में आने वाली कांग्रेस और ये हम नहीं कह रहे हैं। बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि कांग्रेस मुस्लिम लीग बन गई है।”

राहुल गांधी की थी भविष्यवाणी- अगले एक साल में पीएम मोदी की विदाई तय
दरअसल,  मई 2026 में दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में कांग्रेस पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग की एक बैठक हुई थी। इस बैठक में राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं से कहा कि यह सरकार सालभर से ज्यादा नहीं टिकने वाली है। हालांकि उन्होंने इसका कारण भी बताया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक हालात बदल रहे हैं। इसी वजह से देश में महंगाई और आर्थिक असंतोष बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में मोदी सरकार की विदाई का कारण बनेगा। इस बीच बैठक में कुछ नेताओं ने मुस्लिम शब्द के बजाय अल्पसंख्यक शब्द इस्तेमाल की अपील की, जिस पर राहुल गांधी ने असहमति जताते हुए कहा कि डरना क्यों, जिस वर्ग के साथ अन्याय हो उसके साथ खुलकर खड़े होना है।

राहुल गांधी की भविष्यवाणी कितनी सच होगी, यह तो भविष्य के गर्त में हैं। हालांकि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता से हटाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को हटा नहीं पाए। अब वह देश को जलाकर और अराजकता पैदा कर सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं। आइए एक नजर डालते हैं राहुल गांधी ने कब कब देश को जलाने का प्रयास किया है…