अमेरिका में एक शिक्षक की शक्ति: डॉ. मोक्षराज की अमेरिकी शिष्या मैरी मिलबेन ने सर संधचालक डॉ. मोहन भागवत के पक्ष में मोर्चा सँभाला

एक अमेरिकी महिला का सनातन संस्कृति के साथ खड़ा होना गौरव की बात- डॉ. मोक्षराज

दिल्ली /न्यूयॉर्क/31.08.26

भारत सरकार की ओर से भारतीय राजदूतावास वाशिंगटन डीसी अमेरिका में 2018 से 2020 तक नियुक्त रहे प्रथम सांस्कृतिक राजनयिक एवं भारतीय संस्कृति शिक्षक डॉ. मोक्षराज (Dr. Moxraj) की शिष्या अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री मैरी मिलबेन (Mary Millben) ने न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन (Madison Square Garden) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम का विरोध करने वालों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 2023 में अमेरिका की धरती पर भारत का राष्ट्रगान गाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूकर करोड़ों भारतीयों को सम्मान देने वाली हॉलीवुड अभिनेत्री मिलबेन भारतीय हितों के लिए बांग्लादेश की दुर्दशा तथा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आशातीत टैरिफ लगाने की घटनाओं के समय भी भारत के हित में बेबाक़  प्रतिक्रियाएँ देती रही हैं ।

आरएसएस (RSS) के शताब्दी वर्ष के वैश्विक संपर्क कार्यक्रम के तहत, 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' (Universal Oneness Celebration) आयोजित किया गया है । न्यूयॉर्क के मेयर और समाजवादी राजनेता जोहरान ममदानी (Zohran Mamdani) तथा कुछ अन्य संगठनों ने इस कार्यक्रम का कड़ा विरोध किया था। तब मैरी मिलबेन ने पलटवार करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर मेयर ज़ोहरान ममदानी पर तीखा हमला करते हुए उन्हें "समाजवादी सनकी" (socialist nuts) करार दिया। उन्होंने लिखा कि ममदानी और उनके जैसे लोग इस कार्यक्रम का विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के विरोधी हैं।

पूंजीवाद और निजी कार्यक्रम का तर्क: 

मिलबेन ने तंज कसते हुए साफ शब्दों में कहा कि मैडिसन स्क्वायर गार्डन एक कॉर्पोरेशन है जो समाजवाद की रट से नहीं बल्कि पूंजीवाद (Capitalism) से चलता है। उन्होंने विरोधी नेताओं को सलाह दी कि वे खुद पैसे जुटाएँ, मैडिसन स्क्वायर गार्डन को किराए पर लें और वहाँ अपनी मोदी-विरोधी रैली करें।

मिलबेन की ममदानी के विरुद्ध दी गई कठोर प्रतिक्रियाओं के बाद भारतीय समुदाय को बल मिला है तथा मोहन भागवत का यह कार्यक्रम ऐतिहासिक सफलता के रूप में देखा गया है । 

कुछ ऐतिहासिक वैश्विक घटनाओं का राजस्थान के डॉ. मोक्षराज से संबंध -

डॉ. मोक्षराज ने मिलबेन को करोड़ों भारतीयों में लोकप्रिय बनाया व उसे भारतीय संस्कारों की भी शिक्षा दी -

अफ्रीकी अमेरिकी मूल की हॉलीवुड अभिनेत्री मैरी मिलबेन, अमेरिका स्थित भारतीय राजदूतावास वाशिंगटन डीसी में प्रथम सांस्कृतिक राजनयिक एवं भारतीय संस्कृति शिक्षक रहे  डॉ. मोक्षराज की शिष्या हैं । जिन्हें 2020 में डॉ. मोक्षराज  ने भारत का राष्ट्रगान तथा ओम् जय जगदीश हरे आरती सिखाकर विश्व के समस्त भारतीय समुदाय में लोकप्रिय बना दिया था, ममदानी के विरुद्ध मिलबेन के इस कड़े रुख ने विदेशी धरती पर भारत और संघ से जुड़े इस कार्यक्रम के पक्ष में एक मजबूत माहौल तैयार किया है।

शिक्षक की शक्ति का अनूठा उदाहरण-

राजस्थान के डॉ. मोक्षराज  का वैश्विक योगदान-

अमेरिका में तीन वर्ष तक भारतीय संस्कृति शिक्षक रहे राजस्थान के डॉ. मोक्षराज ने कई बार सारी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा है । 

1. अफ्रीकी अमेरिकी मूल की हॉलीवुड अभिनेत्री मैरी मिलबेन को कोरोना महामारी के समय 2020 में ऑनलाइन हिंदी भाषा सिखाते हुए डॉ. मोक्षराज ने अमेरिका की इस प्रसिद्ध गायिका को सर्वप्रथम भारत का राष्ट्रगान सिखाया, जिसे मिलबेन ने 15 अगस्त 2020 को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था । यह प्रस्तुति इतनी आकर्षक थी कि उसे विश्वभर के करोड़ों लोगों ने देखा व सराहा , इनमें प्रमुख रूप से भारतीय, प्रवासी भारतीय तथा अनेक राजनयिक  सम्मिलित थे । 

2. ⁠ वर्ष 2020 में ही डॉ. मोक्षराज ने मिलबेन को दीपावली के अवसर पर “ओम् जय जगदीश हरे” आरती गाने के लिए तैयार किया । जिसकी प्रस्तुति के लिए अमेरिका स्थित एरिज़ोना की लाल पहाड़ियों के बीच एक चर्च को चुना गया,  इस फिल्मांकन में मिलबेन ने केसरिया रंग के राजस्थानी लहंगा चुनरी पहनकर भारत के शौर्य व अध्यात्म को प्रदर्शित किया । इस प्रस्तुति को भी अत्यंत लोकप्रियता प्राप्त हुई और मिलबेन को प्रवासी भारतीय समुदाय तथा भारत सरकार द्वारा आमंत्रित किया जाने लगा । 

3. ⁠भारत सरकार ने आजादी के अमृत महोत्सव में डॉ. मोक्षराज की इस अनौखी शिष्या को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद नई दिल्ली के माध्यम से भारत में आमंत्रित किया, जहॉं कई देशों के प्रवासी भारतीयों के बीच राष्ट्रगान की स्वरलहरी गूँज उठी थी ।

4. ⁠इन कई उपलब्धियों के बाद संस्कृति शिक्षक डॉ. मोक्षराज ने अपनी शिष्या के माध्यम से एक नया इतिहास रचा । अमेरिका की धरती पर हज़ारों प्रवासी भारतीयों के बीच भारत के इतिहास में पहली बार एक प्रसिद्ध हॉलीवुड गायिका के द्वारा भारत का राष्ट्रगान गाया गया तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूकर मिलबेन ने करोड़ों भारतीयों को अभूतपूर्व गौरव प्रदान किया । एक अमेरिकी महिला नागरिक की ओर से रचा गया यह इतिहास भी डॉ. मोक्षराज की उपलब्धियों में से एक है ।

5. ⁠इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत सरसंघचालक का न्यूयॉर्क में 29 अगस्त को विशेष कार्यक्रम था। न्यूयॉर्क के मेयर तथा अन्य भारत विरोधी ताक़तों ने इस आयोजन का दुष्प्रचार व विरोध किया, जिसे किसी प्रसिद्ध अमेरिकी नागरिक द्वारा नियंत्रित करना उचित था । इस कार्य के लिए भी डॉ. मोक्षराज की शिष्या मैरी मिलबेन ने बेबाक़ी से मोर्चा सँभाला और ममदानी के स्वर धीमे पड़ गये और संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का यह प्रवास भी ऐतिहासिक सिद्ध हुआ । 

सार रूप में  देखा जाए तो राजस्थान के एक शिक्षक के कारण विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा विश्व के सबसे बड़े संगठन आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत को अमेरिका की धरती पर अत्यधिक सम्मान व प्रतिष्ठा मिली है, इस उपलब्धि का पर्याप्त श्रेय राजस्थान के डॉ. मोक्षराज की रीति नीति को भी जाता है।

जस्टिस उज्जवल भुइया देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं क्या? अलग विचार रखने वालों को कितनी आज़ादी देना चाहते हो आप?

सुभाष चन्द्र

कुछ दिन पहले रिटायर होते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा था कि जज भगवान नहीं होते, उससे भी गलती हो सकती है। अब कल का भगवान की तरह संविधान और कानून को ताक पर रख दिया गया जस्टिस उज्जवल भुईया का बयान सुन लो

जस्टिस भुईया ने कहा अलग विचार रखने वाले या सवाल पूछने वाले छात्रों को सजा की धमकी नहीं दी जा सकती क्योंकि ऐसा रवैया संवैधानिक नहीं है और सत्ता या पद का दुरुपयोग है उन्होंने कहा विश्वविद्यालय में ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां स्थापित विचारों की जांच की जा सके, उन पर सवाल उठाए जा सके और छात्र मुश्किल सवाल पूछने से नहीं हिचकिचाएं, सवाल पूछने का अधिकार बगावत या अवज्ञा नहीं है और “असहिष्णु मानसिकता” संविधान की भावना के विपरीत है

लेखक 
चर्चित YouTuber  
जस्टिस भुईया का कथन ऐसे समय में आया है जब राहुल विंची ने मनुस्मृति पर बवाल काटने की कोशिश की जस्टिस भुईया की बात फिर केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह सकती विपक्ष तो सदन का पूरा सत्र और करोड़ों रुपया बर्बाद कर देता है और बड़े शान से कहता है हमें सवाल पूछने से नहीं रोका जा सकता

जस्टिस भुईया का बयान ऐसे समय आया जब उन्होंने देखा कि कैसे दिपके & कंपनी के कथित छात्रों ने एक महीने पहले देश के अनेक हिस्सों खासकर दिल्ली में हिंसा फैलाई 15-16 साल की लड़कियों ने प्रधानमंत्री के लिए किस तरह गालियां दी। उन्हें भला NEET से क्या लेना देना था क्या उन पर कोई कार्रवाई संविधान के विरुद्ध होगी?

जो गालियां प्रधानमंत्री मोदी को स्कूल जाने वाले लड़के लड़कियों ने दी, वो अगर आपको दी जाएं तो सारी अकल ठिकाने आ जाएगी कोई आपको कहे कि आप जिसके पक्ष में निर्णय देते हो उसकी बीवी बहन के साथ पहले सोते हो तो कैसा लगेगा? ऐसी बातें प्रधानमंत्री के लिए कही गई

आप विश्वविद्यालय में स्थापित विचारों के खिलाफ अलग विचार रखने और सवाल पूछने की बात करके छात्रों में अनुशासनहीनता का भाव जगाना चाहते हैं JNU में लगने वाले नारों का आप समर्थन कर रहे हैं क्या? देश के  टुकड़े टुकड़े करने के नारे लगते हैं, कश्मीर की आज़ादी लेने के नारे लगते हैं, ब्राह्मणवाद से आज़ादी लेने के नारे लगते है और ना जाने क्या क्या नारे लगते हैं ये कोई अलग विचार नहीं माने जा सकते जिनका आप समर्थन कर रहे हैं

उमर खालिद और शरजील इमाम भी JNU के छात्र ही है उन्हें दंगा करने की अनुमति दे देनी चाहिए क्या? चिकेन नेक को काटने की आज़ादी शरजील इमाम को दे देनी चाहिए क्या क्योंकि ये उसका अलग विचार है?

अलग विचार तो आतंकियों के भी होते हैं यासीन मलिक को भी छोड़ देना चाहिए क्या क्योंकि terror funding उसके अपने विचार से सही है और घुसपैठियों को खुला निमंत्रण दे देना चाहिए क्योंकि उनकी वकालत करने वाले भी बहुत से वकील सुप्रीम कोर्ट में खड़े होते हैं क्या सुरक्षाबलों को आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई बंद कर देनी चाहिए क्योंकि उनका अलग विचार होता है कश्मीर को भारत से अलग करना? ऐसे तो देश की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाएगी

आजकल यदाकदा जस्टिस भुईया के उलटे पुल्टे बयान आते रहते हैं आज एक और बयान सामने आया उनका कि 76 वर्षों से कोई भी  “Distinguished Jurist” सुप्रीम कोर्ट का जज क्यों नहीं बना जबकि हाई कोर्ट के जज और वकील ही सुप्रीम कोर्ट के जज बनते है पहले ही कॉलेजियम ने न्यायपालिका का सर्वनाश किया हुआ है और आप एक द्वार और खोल देना चाहते हैं जिससे भाई भतीजावाद में और वृद्धि हो एक सवाल यह भी है कि क्या “Distinguished Jurist” सुप्रीम कोर्ट के जज बनना भी चाहते है क्योंकि उनकी कमाई तो अपने profession में बहुत है, जज बनकर क्या करेंगे? 

बेचे जाने और लीज पर देने का अंतर भूल बैठे हैं अखिलेश यादव, JPNIC ‘बिक गया’ या सिर्फ लीज पर गया?

योगी सरकार द्वारा लखनऊ के JPNIC को लीज पर देने के फैसला को अखिलेश ने सरकार पर इसे बेचने का आरोप लगाया है। फोटो साभार- ChatGPT

लखनऊ के गोमतीनगर में खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, यानी JPNIC एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज तक ठीक से जनता के काम नहीं आ पाया और अब योगी सरकार ने तय किया है कि इसका बचा-खुचा निर्माण और आगे का संचालन निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार की दलील सीधी है, परिसर भी पूरा हो जाएगा, और रखरखाव का बोझ भी खजाने पर नहीं पड़ेगा।

बस यही ऐलान होते ही अखिलेश यादव मैदान में कूद पड़े। उनका कहना है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है, निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्ति ठिकाने लगाई जा रही है।

अब सवाल उठता है कि क्या वाकई JPNIC बिक गया? क्या इसकी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम हो गई? जिस प्रोजेक्ट को लेकर आज इतना हंगामा है, उसके निर्माण में खर्च को लेकर खुद CAG ने क्या पाया था? इन सबका जवाब जानने के लिए कहानी को शुरू से पकड़ना होगा।

जानिए, JPNIC है क्या चीज

गोमतीनगर की करीब 18-20 एकड़ ज़मीन पर बना यह एक बड़ा सा बहुउद्देशीय परिसर है, जिसे शुरू से ही एक आधुनिक कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर सोचा गया था। नक्शे में एक स्टेट लेवल कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों के बैठने लायक हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा एक म्यूजियम ब्लॉक, सब कुछ शामिल था। मतलब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि आयोजनों, सम्मेलनों और खेल गतिविधियों के लिए बना एक पूरा कॉम्प्लेक्स।

इसकी नींव 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी थी। तब लागत आंकी गई थी 265.59 करोड़ रूपए लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह आंकड़ा भी बढ़ता गया और नवंबर 2016 आते-आते संशोधित लागत पहुँच गई 864.99 करोड़ रूपए तक। CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी यही दो आँकड़े दर्ज हैं, शुरुआती 265.59 करोड़ रूपए और संशोधित 864.99 करोड़ रूपए

यहीं से यह कहानी सिर्फ ‘एक अधूरी इमारत’ की नहीं रह जाती, यह सार्वजनिक पैसे के हिसाब-किताब और जवाबदेही की कहानी बन जाती है।

लागत तीन गुने से भी ज्यादा कैसे बढ़ी

निर्माण की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को दी गई थी। मार्च 2013 में जब लागत 265.59 करोड़ रूपए तय हुई, उसके कुछ ही महीनों बाद मई 2013 में LDA ने काम एक ठेकेदार को सौंप दिया 149.60 करोड़ रूपए में जो अनुमानित लागत से करीब 12.35 फीसदी ज्यादा था।

फिर धीरे-धीरे प्रोजेक्ट में बदलाव जुड़ते गए। जैसे, शुरुआती डिज़ाइन में हेलिपैड का कोई ज़िक्र नहीं था। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड की शर्तों के चलते छत पर हेलिपैड जोड़ना पड़ा, और इसके लिए नींव में 600 मिमी की जगह 1,000 मिमी वाले पाइल इस्तेमाल करने पड़े। अब यह बदलाव अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं, निर्माण के दौरान ऐसे फेरबदल होते रहते हैं। असली सवाल इस काम पर चुकाई गई दर को लेकर उठा।

CAG ने उंगली उठाई

ऑडिट में सामने आया कि 1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक 2013 की लागू दर के हिसाब से यह सिर्फ 8,201.40 रूपए प्रति मीटर बनती थी। कुल 24,680 मीटर के इस काम पर यह छोटा-सा अंतर जुड़कर करीब 1.41 करोड़ रूपए का ‘अनुचित लाभ’ ठेकेदार की जेब में गया और उतनी ही रकम का घाटा सरकारी खजाने को हुआ। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में ‘undue benefit’ कहा गया है।

यह कोई विपक्ष का लगाया आरोप नहीं बल्कि खुद देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है।

योगी सरकार ने गड़बड़ियों की जाँच कराई

2017 में सरकार बदली और योगी आदित्यनाथ ने JPNIC के खर्चों पर आई रिपोर्ट के आधार पर जाँच कराई जिससे काम रुक गया। इसके बाद बरसों तक यह विशाल परिसर लगभग सुनसान पड़ा रहा। आखिरकार 2025 में सरकार ने फैसला लिया कि इसे फिर से LDA के जिम्मे किया जाए, ताकि अधूरा काम पूरा हो सके और कोई संचालन मॉडल तय हो।

अब हुआ क्या

अगस्त 2026 में योगी कैबिनेट ने JPNIC को निजी क्षेत्र के जरिए चलवाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के एक संयुक्त उपक्रम को चुना गया।

अब यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि ‘बेचना’ और ‘लीज पर देकर चलवाना’, दोनों एक चीज नहीं हैं। सरकार ने न तो JPNIC की जमीन बेची है, न ही इसकी सरकारी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम की है। जो व्यवस्था बनी है वह लीज और सहभागिता की है और कंपनी को संचालन का अधिकार मिलेगा, मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। जैसे कि म्यूजियम ब्लॉक, जो LDA के नियंत्रण में ही रहने वाला है।

अखिलेश यादव का यह कहना कि JPNIC ‘बेच दिया गया’ सरासर उनकी सरकार के विरोध और खुद असफल होने की कुंठा का प्रतीक है। यह बिक्री नहीं लंबी अवधि की लीज पर निजी संचालन की व्यवस्था है।

निजी कंपनी को बदले में करना क्या होगा

अब इस फैसले का वह हिस्सा जो अक्सर नारेबाजी में दब जाता है। JPNIC अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है, इसमें इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी हैं, जिन पर करीब 200 से 250 करोड़ रूपए और खर्च होने का अंदाजा है और यह खर्च सरकार नहीं, निजी ऑपरेटर अपनी जेब से उठाएगा।

इसके अलावा कंपनी को LDA को शुरुआत में 10.11 करोड़ रूपए का अपफ्रंट प्रीमियम और 25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी। संचालन शुरू होते ही हर साल 6 करोड़ रूपए का भुगतान होगा, जिसमें हर वर्ष 5 फीसदी की बढ़ोतरी भी जुड़ी है।

यानी सालों से अधूरा पड़ा जो परिसर सरकार खुद पूरा नहीं करवा पाई, उसे अब पूरा करने, चलाने और संभालने के लिए निजी पैसा लगाया जा रहा है।

पहले लगे 821.74 करोड़ रूपए का क्या होगा

एक और अहम पहलू है जो अक्सर बहस में छूट जाता है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक करीब 821.74 करोड़ रूपए जारी हो चुके हैं। यह रकम सरकार ने LDA को दी थी और अब इसे एक ‘ट्रांसफर्ड लोन’ माना जा रहा है, जिसे LDA को अगले 30 सालों में वापस चुकाना होगा।

मतलब सरकार का मौजूदा मॉडल सिर्फ ‘कंपनी को सौंप दो’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पहले खर्च हो चुके पैसे की वसूली, बाकी निर्माण, आगे के संचालन का खर्च और JPNIC को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, ये सारी चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं।

अखिलेश को नहीं पता बेच देने और लीज पर देने फर्क

विपक्ष का काम ही है सवाल पूछना और इस मायने में अखिलेश यादव का सरकार पर निशाना साधना कोई अटपटी बात नहीं। लेकिन जब आरोप ‘संपत्ति बेचने’ जैसा गंभीर हो, तो तथ्य और राजनीतिक भाषा में फर्क करना ज़रूरी हो जाता है।

तथ्य यह है कि JPNIC की शुरुआत खुद अखिलेश सरकार के दौर में हुई। तथ्य यह भी है कि इसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर CAG के रिकॉर्ड के मुताबिक 865 करोड़ रूपए तक पहुँच गई। तथ्य यह भी कि CAG ने पाइल के काम में दर के हेरफेर से 1.41 करोड़ के नुकसान की आपत्ति दर्ज की।

यह भी सच है कि 2017 के बाद जाँच बैठी, काम बरसों रुका रहा और आखिरकार 2025-26 में सरकार ने इसे LDA के जरिए फिर से पटरी पर लाने और निजी भागीदारी से संचालित करने का रास्ता चुना जिसके एवज में उसे प्रीमियम, गारंटी और नियमित लीज आय मिलेगी।

इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो सीधे ‘JPNIC बेच दिया गया’ कह देना पूरे मामले को बहुत ज्यादा सरल बना देना है।

’97 हजार करोड़’ वाली रिपोर्ट का JPNIC से क्या नाता है

अखिलेश सरकार के दौर के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर 2018 में एक और CAG रिपोर्ट सामने आई थी, जिसका ज़िक्र अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। 2014 से मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े 97,906.27 करोड़ रूपए के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे और CAG ने कहा था कि इससे धन के दुरुपयोग का जोखिम पैदा होता है।

असली सवाल बेचने का नहीं, इस्तेमाल में लाने का है

पिछले करीब दस साल से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अधूरे वादे की तरह खड़ा रहा है और सैकड़ों करोड़ खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अब सरकार इसका संचालन मॉडल बदलने जा रही है।

बहस सिर्फ इस एक लाइन पर टिकी है कि ‘JPNIC बेच दिया गया’, तो मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह दावा टिकता नहीं दिखता। मामला बिक्री का नहीं, लंबी लीज और निजी भागीदारी से चलाए जाने का है।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस प्रोजेक्ट की लागत 265 करोड़ से बढ़कर 865 करोड़ तक पहुँच गई, जिसके निर्माण में CAG ने ठेकेदार को दिए गए 1.41 करोड़ के अनुचित फायदे पर आपत्ति जताई और जो सालों तक अधूरा पड़ा रहा, उसी को अब पूरा कराने के लिए सरकार निजी पैसे का सहारा ले रही है।

पंजाब में भी ‘केजरी मॉडल’ के गुब्बारे की निकली हवा, वादों के भंवर में फंसे लाखों नाराज कर्मचारी


पंजाब में साल 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान ‘बदलाव’ की आंधी पर सवार होकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी और उसके बहुचर्चित ‘केजरी मॉडल’ की कलई अब पूरी तरह खुल चुकी है। मुफ्त बिजली और लोक-लुभावन गारंटी के विज्ञापनों की चमक के पीछे वित्तीय कुप्रबंधन का एक ऐसा दलदल तैयार हो गया है, जिसमें राज्य की रीढ़ कहे जाने वाले सरकारी कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस प्रदेश को देश के सामने एक आदर्श गवर्नेंस मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था, आज उसी पंजाब के 3 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी सड़कों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह अभूतपूर्व संकट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह उन झूठे चुनावी वादों, प्रशासनिक अहंकार और वित्तीय कंगाली का सीधा परिणाम है, जिसने पंजाब की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह वेंटिलेटर पर लाकर खड़ा कर दिया है।

महा-हड़ताल ने आर्थिक रूप से पंगु बने राज्य की पोल खुली
राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए हवा में उछाले गए ‘केजरी मॉडल’ की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो पार्टी कल तक कर्मचारियों के हर धरने में जाकर उनके हक की वकालत करती थी, आज सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही वह उनके प्रति क्रूर और उदासीन हो गई है। इससे साफ है कि कर्मचारियों के हक की बातें सिर्फ झूठा स्वांग भर ही थीं। मुख्यमंत्री भगवंत मान का आंदोलनकारी कर्मचारियों से बात करने से साफ इनकार कर देना और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकियां देना साफ दर्शाता है कि ‘आप’ सरकार संवादहीनता के उस दौर में पहुंच चुकी है, जहां जनता और कर्मचारियों की जायज मांगें भी उसे गुनाह नजर आती हैं। 27 अगस्त की ऐतिहासिक महा-हड़ताल ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब का कर्मचारी अब केवल कागजी आश्वासनों से बहलने वाला नहीं है। मुफ्तखोरी की राजनीति और बजटीय प्राथमिकताओं को दरकिनार करने के कारण समृद्ध राज्य आर्थिक रूप से पंगु हो चुका है और उसके कर्मचारी अपने ही हक के लिए लाठियां और पानी की बौछारें सहने को विवश हैं।

भगवंत मान सरकार ने चार सालों में केवल आश्वासन दिए
पंजाब की आप सरकार पर सवालिया निशान यह है कि आखिरकार राज्य के कर्मचारी इतने उग्र क्यों हो रहे हैं। वे सामूहिक अवकाश लेकर पूरे राज्य को ठप करने जैसा आत्मघाती कदम उठाने को क्योकर विवश हो रहे हैं? इसका सीधा-सा जवाब है कि लगातार टूटते वादे और आर्थिक शोषण। कर्मचारियों का आरोप है कि भगवंत मान सरकार ने पिछले चार सालों में केवल आश्वासन दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर एक भी वित्तीय मांग को पूरा नहीं किया। यह आंदोलन तब और भड़क उठा जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा कर्मचारियों के हक में फैसला दिए जाने के बावजूद मान सरकार ने उनके बकाया भत्तों का भुगतान नहीं किया। इसे कर्मचारी न्यायपालिका का अपमान और अपने अधिकारों पर डकैती मान रहे हैं।

कर्मचारियों को न महंगाई भत्ता न ही मिल रहा पूरा वेतन
सबसे अहम बात यह है कि राज्य के कर्मचारी संगठनों (सांझा मुलाजम मंच और पेंशनर्स फ्रंट) की मांगें कोई नई या नाजायज नहीं हैं। उनकी सबसे पहली मांग है पिछले लंबे समय से लंबित 18 प्रतिशत महंगाई भत्ता (DA) और छठे वेतन आयोग (6th Pay Commission) के बकाए का तुरंत भुगतान किया जाए। यह लगातार लेटलतीफी के चलते करीब 20,161 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू रहा है। इसके अलावा, पुरानी पेंशन योजना (OPS) की पूर्ण बहाली, कच्चे और कॉन्ट्रैक्ट (ठेके) पर काम कर रहे कर्मचारियों का नियमितीकरण, और 17 जुलाई 2020 के उस काले नोटिफिकेशन को रद्द करना जिसके तहत नए भर्ती कर्मचारियों को केवल मूल वेतन दिया जा रहा है। ये ऐसी मांगें हैं जिन पर आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए कर्मचारियों के साथ धरने पर बैठकर सहमति जताई थी।

‘केजरी मुफ्त मॉडल’ के चलते सरकार पर कर्ज का बोझ
सरकार की नीयत पर उठने वाला बड़ा सवाल यह है कि जो सरकार विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, वह अपने कर्मचारियों की मांगें पूरी क्यों नहीं कर पा रही? असल में, ‘केजरी मॉडल’ का पूरा ढांचा मुफ्त बिजली, महिलाओं को भत्ते और अन्य लोक-लुभावन गारंटियों पर टिका है। इन गारंटियों को पूरा करने के चक्कर में पंजाब का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है। राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार अधिक से अधिक होते हुए अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सरकार के पास दैनिक प्रशासनिक खर्चे और कर्मचारियों को समय पर वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं, तो वह 20 हजार करोड़ से अधिक का डीए बकाया कहां से चुकाएगी? अपनी इसी वित्तीय विफलता को छिपाने के लिए सरकार कभी अदालतों का बहाना बनाती है तो कभी केंद्र सरकार पर फंड रोकने का आरोप लगाती फिरती है।

चपेट में कई प्रमुख विभाग: सचिवालय से अस्पताल तक ठप
राज्य के कर्मचारियों की इस महा-हड़ताल का असर पंजाब के किसी एक कोने में नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है। पंजाब सिविल सचिवालय के कर्मचारी, डीसी दफ्तरों के कर्मचारी, राजस्व विभाग के तहसीलदार (जो पहले से ही सतर्कता छापों के खिलाफ हड़ताल पर थे), शिक्षा विभाग के सरकारी शिक्षक और पंजाब रोडवेज के कर्मचारी समेत कई संगठनों के कर्मचारी इसमें शामिल हैं। सबसे दुखद स्थिति स्वास्थ्य विभाग की है, जहां सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के हड़ताल पर जाने के कारण ओपीडी सेवाएं पूरी तरह बंद रहीं। गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकते रहे, लेकिन भगवंत मान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है।

आप के चुनावी वादों की फेहरिस्त अब तो ‘जुमला’ बन गई
साल 2022 के चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने पंजाब के हर वर्ग के कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्होंने कहा था कि सरकार बनते ही कैबिनेट की पहली बैठक में सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का कर दिया जाएगा। उन्होंने हिमाचल और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर पंजाब में भी पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने का ढिंढोरा पीटा था। लेकिन सत्ता में आने के बाद ओपीएस के नाम पर केवल एक कागजी अधिसूचना जारी करके छोड़ दी गई, जिसे आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने की फाइलें आज भी सचिवालय की अलमारियों में धूल फांक रही हैं।

पंजाब के इतिहास में यह पहली बार सड़कों पर इतने कर्मचारी – भाजपा
भाजपा पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने राज्य में कर्मचारियों और पेंशनरों द्वारा की गई महा-हड़ताल को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि कर्मचारी हर सरकार की रीढ़ की हड्डी होते हैं, लेकिन पंजाब के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी और पेंशनर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हुए हैं। ढिल्लों ने आरोप लगाया कि ‘आप’ सरकार ने कर्मचारियों का लगभग 15,000 करोड़ रुपये का महंगाई भत्ता नहीं देकर उनके साथ सीधे तौर पर धोखा किया है। माननीय हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सरकार डीए जारी करने से बच रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दूसरे राज्यों के चुनावों में वोट बटोरने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च कर दिए, लेकिन अपने ही राज्य के कर्मचारियों को उनका हक देने के समय खजाना खाली होने का बहाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा कर्मचारी संगठनों के साथ तय बैठकों से दो-दो बार पीछे हटना बेहद निंदनीय है। सरकार की इस टालमटोल की नीति के कारण आज आम जनता को सरकारी कार्यालयों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी भगवंत मान सरकार की है।

मोहन भागवत जी ने जीवन दर्शन विस्तार से समझाया; नहीं हिंदू राष्ट्र की बात की और न मुसलमानों के लिए कुछ कहा

सुभाष चन्द्र
मैंने मोहन भागवत जी का अगस्त 29 मेडिसन स्क्वायर में दिया हुआ पूरा भाषण सुना उन्होंने मानवता और मानव के जीवन दर्शन का व्याख्यान किया और कहीं भी न हिंदू राष्ट्र की बात की और न एक शब्द मुसलमानों के लिए कहा लेकिन फिर भी प्रिंट मीडिया ने अपने शब्द उनके मुंह में घुसेड़ दिए कि उन्होंने कहा कि मुसलमानों भारत से भगाने की इच्छा रखने वाले हिंदू नहीं है जबकि यह बात उन्होंने कही ही नहीं चाहे तो कोई उनका भाषण यूट्यूब पर सुन सकता है। 

मीडिया की इस शरारत को देख लगता है मीडिया आरएसएस विरोधियों की तरह संघ का विरोधी है। क्या कभी किसी पार्टी या मीडिया को मुस्लिम लीग, हिन्दू उत्सवों पर पत्थरबाज़ी करने वालों का विरोध करते देखा है? क्योकि इन लोगों ने माँ का दूध ही नहीं पिया।   

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भागवत जी के व्याख्यान में एक बहुत विशेष बात थी जो उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से कही कि अमेरिका आप की कर्मभूमि है, आपको इसके प्रति निष्ठावान होना चाहिए जन्मभूमि/मातृभूमि के लिए कुछ कर सकते हो तो करो लेकिन जन्मभूमि/मातृभूमि आपसे यह अपेक्षा नहीं करती यह संदेश हर देश के लोगों के लिए था

उनके भाषण में एक और वृतांत प्रमुख था उन्होंने कहा कि एक समय में कुछ लोग जीविका की तलाश में निकले सब आपस में जानते थे लेकिन उनमे दो विपरीत विचार थे एक विचार था जियो और जीने दो और दूसरा विचार था, हम जिएंगे लेकिन उनको रहने देंगे जो हमारे कहे अनुसार चलेंगे, अब इसका मतलब कोई भी समझ सकता है किसके लिए कहा होगा

भागवत जी के भाषण के प्रमुख बिंदु नीचे दिए है और कोई भी उनमें किसी प्रकार की कमी निकाल कर दिखा दे, अलबत्ता राहुल विंची जरूर उनके भाषण को नफरत भरा कह सकता है जबकि उसमें नफरत की कोई बात नहीं थी

“मानवता एक है, धर्म अलग-अलग हो सकते हैं”

उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्मों और धार्मिक परंपराओं के बावजूद मानवता मूल रूप से एक है। उनके अनुसार सत्य एक है, लेकिन उसे समझने और उस तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं।

2. विविधता में हमारी एकता की सजावट है

उन्होंने विविधता को विभाजन का कारण नहीं बल्कि अंतर्निहित एकता का सौंदर्य और विस्तार बताया। विभिन्न समुदायों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों का सम्मान, संरक्षण और स्वीकार करना आवश्यक है।

3. “मैं” और “मेरा” की बजाय “हम” और “हमारा”

भाषण का एक महत्वपूर्ण संदेश था कि केवल व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना समस्याएं पैदा करती है, जबकि “हम” और “हमारा” की भावना समाधान की दिशा देती है।

4. धर्म का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं

उन्होंने कहा कि आज धर्म को अक्सर उसके rituals और बाहरी practices से पहचाना जाता है। उनके अनुसार कर्मकांड का अपना स्थान है, लेकिन धर्म का अंतिम उद्देश्य सत्य और उच्चतर आध्यात्मिक समझ की ओर ले जाना है।

5. हर व्यक्ति की गरिमा और समानता

उन्होंने मानव गरिमा और मनुष्यों की मूलभूत समानता पर जोर दिया। उनके अनुसार बाहरी भिन्नताएँ प्रकृति की विविधता का हिस्सा हैं और उनसे मानवता की मूल एकता समाप्त नहीं होती।

6. राजनीति से अधिक समाज की शक्ति

उन्होंने यह विचार भी रखा कि स्थायी और वास्तविक परिवर्तन केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि समाज के भीतर परिवर्तन और जन-सहमति से आता है।

7. सेवा कार्यों का उल्लेख

उन्होंने RSS के सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवा कार्य लोगों के प्रति भेदभाव किए बिना किए जाते हैं।की 

मनुस्मृति पर राहुल विंची को करारा जवाब

           चित्र में पहली ईसाई है, दूसरी मुस्लिम, और तीसरी साड़ी में मनुस्मृति द्वारा गुलाम बनाई हुई महिला है।

जब से राहुल गाँधी ने मनुस्मृति को लेकर जहर उगला है, तब से सोशल मीडिया पर निम्न लेख खूब चर्चित हो रहा है। सनातन पर हमला करना आसान है क्योकि हिन्दू सहिष्णु है हिंसक नहीं। लेकिन जब सीमा पार हो जाती है, हाथ में हथियार उठाने से पीछे नहीं हटता। हिन्दू शास्त्र साक्षी है। जब-जब राक्षसों ने अति की हमारे देवी-देवताओं ने शस्त्र उठाए। जब कोई राक्षस देवताओं से पराजित नहीं हुआ देवी माता का आव्हान कर नाना प्रकार के शस्त्रों से सुशोभित कर राक्षसों का वध किया। यही शायद मुख्य कारण है वर्ष में दो बार नवरात्रों में माता रानी का गुणगान किया जाता है। इतना ही नहीं नारी कितनी बलशाली है इसका भी उदाहरण ज्येष्ठ माह में बढमवास, सावन में रक्षा बंधन और कार्तिक माह में करवाचौथ। क्या राहुल किसी अन्य मजहब में नारी का इतना सम्मान दिखा सकने की हिम्मत रखते हैं?

    " मनुस्मृति "

मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं आप?
मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?
मनुस्मृति कहती है - "विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?
" पुत्रेण दुहिता समा" - अर्थात, पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप?
क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए। स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर। मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अब तक लेकर आए आप?
बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते।
"आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः- अर्थात, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती है, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप?
धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?
पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या।
जीवेच्छिल्पैर गर्हितः- आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः- धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है, आधी आबादी। पूरे पचास प्रतिशत - उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। इससे एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की जिम्मेदारियां हैं।
मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।
मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः सौभाग्य शालिनी और सौभाग्य लाने वाली कहा।
मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः सम्मान की अधिकारी कहा।
मनुस्मृति ने स्त्री को गृह दीप्तयः घर को प्रकाश और प्रसन्न रखने वाली कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।
अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसंग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।
लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। कुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गांधी आज स्त्रीवादी बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हमने भी नहीं है, इसलिए जो कहा जाता है मान लेते हैं। सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी।
अब राहुल गांधी हिंदू लड़की और महिलाओं को सनातन धर्म के खिलाफ बरगलाने का काम कर रहा है। अभी हाल में मनुस्मृति पर जहर उगलते हुए बोला कि हिंदू महिलाएं गुलाम है मनुस्मृति ने उन्हें पिंजरे में कैद कर रखा है।
राहुल गांधी चाहते है कि हिंदू महिलाएं अपनी सनातनी परंपरा से बगावत कर मुस्लिम या ईसाई बनकर खुद को प्रगतिशील बनाए।

भारत की छवि खराब करने की बड़ी साजिश, मोहरा बनी CJP, ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हंगामा करने का टूलिकट तैयार; संयम की अग्नि परीक्षा मत लो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधी इतनी नीचता पर गिर चुके हैं कि जब भी देश में कोई विदेशी आता है विरोधी कोई न कोई हंगामा कर भारत की छवि ख़राब इस तरह कर रहे जैसे वो कोई भारतीय नहीं बल्कि किराये के टट्टू हों। जिन्हे जहाँ चाहो छोड़ दो। क्या ये उपद्रवी चाहते हैं कि देशप्रेमी पुलिस और अन्य सुरक्षाकर्मियों को पीछे कर इन्हे छटी दूध पिलाने सड़क पर उतरें? आखिर बर्दाश्त की भी एक हद होती है।  

भारत वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, कूटनीति और तकनीकी प्रगति के कारण तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यह जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। वैश्विक स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बढ़ता कद, अपनी शर्तों पर ट्रेड एग्रिमेंट और बहुपक्षीय मंचों (जैसे ब्रिक्स और जी20) पर अग्रणी भूमिका ने विश्व के शक्तिशाली देशों को हैरान कर दिया है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय ताकतें भारत की छवि खराब करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के विरोधियों को मोहरा बना रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, घरेलू असंतोष (जैसे परीक्षा पत्र लीक और छात्र मुद्दों) को हथियार बनाकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक अस्थिर राष्ट्र के रूप में पेश करने की बड़ी साज़िश रची जा रही है। इसके तहत 12 और 13 सितंबर 2026 को होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान फिर बड़े हिंसक आंदोलन का टूलकिट तैयार किया गया है।

CJP का 5 सितंबर को दिल्ली में विरोध मार्च का ऐलान
दरअसल, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 5 सितंबर 2026 को दिल्ली में बंद और राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण विरोध मार्च का ऐलान किया है। सीजेपी ने भारत सरकार पर युवाओं से किए गए वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया है। कॉकरोच जनता पार्टी की नेशनल वर्किंग कमेटी की 24 अगस्त, 2025 को 2 बजे ऑलाइन मीटिंग हुई। इसमें फैसला लिया गया कि 5 सितंबर को शांतिपूर्ण मार्च नई दिल्ली के इंडिया गेट से शुरू होगा। प्रदर्शनकारी यहां से नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय की ओर आगे बढ़ेंगे। CJP ने बताया कि मार्च का नेतृत्व NEET परीक्षा से जुड़े मामलों में जान गंवाने वाले छात्रों के परिजन और पुलिस बर्बरता के पीड़ितों के परिवार करेंगे। सीजेपी के मुताबिक, इन परिवारों के साथ छात्र और युवा संगठन भी मार्च में शामिल होंगे। इसके अलावा देशभर से युवा नागरिकों के दिल्ली पहुंचने की उम्मीद है।

CJP ने वादों को पूरा नहीं करने का लगाया आरोप
नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान सीजेपी सरकार के सामने तीन मांगें रखी थीं। सबसे बड़ी मांग थी शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। यह मांग पूरी होने के बाद सीजेपी ने आंदोलन को वापस ले लिया था। सरकार के सामने दो और मांगें रखी गईं थीं, नीट पेपर लीक की वजह से खुदकुशी करने वालों के परिवारों को एक करोड़ रुपये मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को रद्द करना। सीजेपी का कहना है कि केंद्र सरकार ने उन्हें इन दोनों वादों को पूरा करने का भरोसा दिया था, जो अब तक नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का धैर्य एक महीने में ही टूट गया है और उन्हें सरकार के वादे याद आ रहे हैं, जबकि झारखंड में छात्र अभी तक आंदोलन कर रहे हैं।

 

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की टाइमिंग पर उठे सवाल
सीजेपी के नेताओं को झारखंड में कई हफ्तों से आंदोलन कर रहे छात्र याद नहीं आ रहे हैं। झारखंड की राजधानी रांची में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच पुलिस ने आंदोलन के नेताओं और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। 21 अगस्त को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प के मामले में रांची पुलिस ने कम से कम तीन FIR दर्ज की हैं। इन मामलों में 14 लोगों को नामजद किया गया है, जबकि 200 से अधिक अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। छात्रों के आंदोलन स्थल रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और उसके आसपास प्रशासन ने धारा 163 (निषेधाज्ञा) लागू कर दी है और स्टेडियम के गेट बंद कर दिए गए हैं। झारखंड सरकार की इस सख्ती के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी को झारखंड के छात्रों के साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है,क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का मकसद कुछ और है। 5 सितंबर को होने वाले बंद और राष्ट्रव्यापी विरोध मार्च की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

12 और 13 सितंबर 2026 को दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन
राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर 2026 को 18वां ब्रिक्स सम्मेलन होने जा रहा है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में ग्यारह सदस्य देश- ब्राज़ील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात शामिल हो रहे हैं। इनके अलावा दस भागीदार देश भी शामिल होंगे। ब्रिक्स सम्मेलन से पहले देश के विभिन्न शहरों में कई sectoral और मंत्रिस्तरीय बैठकें आयोजित की जा रही हैं। ब्रिक्स युवा एवं खेल मंत्रियों की बैठक 22 और 23 अगस्त, 2026 को विशाखापत्तनम में आयोजित की गई। इससे पहले 21 अगस्त को जयपुर के रामबाग पैलेस में ब्रिक्स देशों के पर्यटन मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक हुई। दो दिवसीय मंत्रिस्तरीय बैठक में ब्रिक्स सदस्य देशों के पर्यटन मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इस तरह 12-13 सितंबर को होने वाले मुख्य सम्मेलन से पहले कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

11 सदस्य देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष, शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधिमंडल होंगे शामिल
इस उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन में लगभग 20 देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष, शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधिमंडल भाग लेंगे। सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकीयन सहित कई वैश्विक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। इसको देखते हुए व्यापक तैयारियां की जा रही हैं।समिट से जुड़े बड़े कार्यक्रमों, जैसे ब्रिक्स बाजार, ब्रिक्स रन एंड राइड, ब्रिक्स म्यूरल्स एंड पेंटिंग और ब्रिक्स फूड फेस्टिवल के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। समिट शुरू होने से पहले 30 अगस्त को एनडीएमसी द्वारा ब्रिक्स रन एंड राइड का भी आयोजन किया जाएगा। समिट से जुड़े लगभग सभी कार्यक्रम भारत मंडपम् में आयोजित होंगे। इसके अलावा ज्यादातर विदेशी मेहमान NDMC के तहत आने वाले फाइव स्टार होटल्स में ठहरेंगे। लेकिन समिट में शामिल होने वाले 20 देशों के मेहमानों की नजर में भारत की अच्छी छवि बनाने के लिए अलग से बंदोबस्त करने के लिए कहा गया है।

BRICS समिट में शामिल हो सकते हैं रूसी राष्ट्रपति पुतिन 
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी ब्रिक्स समिट में शामिल हो सकते हैं। मॉस्को में सोमवार 24 अगस्त, 2026 को भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जल्द मुलाकात की उम्मीद जताई। दोनों नेताओं ने भारत-रूस के रिश्तों और आपसी सहयोग को लेकर भी चर्चा की। जयशंकर रविवार को मॉस्को पहुंचे थे। वह रूस के अपने दो दिन के दौरे पर हैं। जयशंकर ने पुतिन से कहा कि पीएम मोदी ब्रिक्स समिट के लिए पुतिन का भारत में स्वागत करेंगे। दोनों नेताओं की सालाना बैठक भी जल्द होगी। उन्होंने बताया कि पीएम मोदी किर्गिजस्तान में होने वाली SCO समिट में उनसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

चीन के राष्ट्रपति की BRICS समिट में शामिल होने की उम्मीद
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS समिट में शामिल हो सकते हैं। यह उनका 7 साल बाद भारत का पहला दौरा होगा। भारत 12-13 सितंबर को BRICS सम्मेलन की मेजबानी करेगा। रॉयटर्स के मुताबिक, जिनपिंग के साथ करीब 400 अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल आ सकता है। जिनपिंग आखिरी बार 2019 में भारत आए थे। तब उनके साथ 200 से कम अधिकारी थे। जिनपिंग के भारत दौरे की तैयारियों में LAC पर शांति और सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दों में है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं, जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर न पड़े। भारत और चीन के बीच सिर्फ सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि व्यापार और आर्थिक रिश्ते भी बातचीत का हिस्सा हैं। भारत चीन के साथ अपने बड़े व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। इसके अलावा रेयर अर्थ मैगनेट और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जैसे जरूरी सामान की सप्लाई को लेकर भी भारत अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।

एनएसए अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की मुलाकात
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच मंगलवार 25 अगस्त,2026 को Special Representatives स्तर की महत्वपूर्ण वार्ता हुई। बातचीत में भारत-चीन सीमा विवाद के साथ-साथ दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में सुधार और आगे की राह पर चर्चा हुई। यह वार्ता ऐसे समय में हुई है जब भारत और चीन के बीच संबंधों को स्थिर करने तथा सीमा पर शांति एवं विश्वास बहाल करने के प्रयास जारी हैं। बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित BRICS Summit में शामिल होने की उम्मीद है। ऐसे में डोभाल-वांग वार्ता को दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ब्रिक्स सम्मेलन पर अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व और भू-राजनीतिक तनाव का साया
सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले BRICS सम्मेलन को लेकर अमेरिका की मुख्य चिंता ब्रिक्स देशों द्वारा अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को अपनाने की कोशिशों से जुड़ी है। ईरान और अन्य सदस्य देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता खत्म करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं और डिजिटल करेंसी लिंकेज पर जोर दे रहे हैं, जिससे अमेरिकी आर्थिक हितों को चुनौती मिल रही है। अमेरिका ने ईरान या अन्य विरोधी देशों के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भारी टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है, जिससे भारत जैसे देशों के सामने रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती पैदा हो गई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण ब्रिक्स मंच पर भी सदस्य देशों के बीच स्पष्ट मतभेद देखे जा रहे हैं, जिसे कूटनीतिक हलकों में पश्चिमी प्रभाव और ब्रिक्स की एकजुटता के बीच खिंचाव के रूप में देखा जाता है।

वैश्विक मीडिया की मौजूदगी में भारत की छवि खराब करने की साजिश 
प्रधानमंत्री मोदी और देश विरोधी ताकतें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान वैश्विक मीडिया की मौजूदगी का फायदा उठाकर भारत की छवि खराब करने की कोशिश में हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन जैसे वैश्विक मंचों के दौरान बड़े पैमाने पर डिजिटल टूलकिट अभियान और जमीनी विरोध प्रदर्शन की तैयारी के संकेत मिल रहे हैं, ताकि भारत में मानवाधिकार और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए जा सकें। अगर 5 सितंबर से शुरू होने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के मार्च के दौरान कोई हिंसा होती है, तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है। ऐसी स्थिति में वैश्विक मीडिया और मानवाधिकार निकायों द्वारा सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश की जा सकती है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया का हुआ था गलत इस्तेमाल
हाल ही में दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के ‘चलो संसद’ मार्च और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान जिस तरह सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल किया गया, वो आंतर्राष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल अभियानों और ‘टूलकिट’ के ज़रिए किसी देश की घरेलू राजनीति या अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करने की रणनीति आधुनिक हाइब्रिड वॉरफेयर (Hybrid Warfare) का एक प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। टूलकिट का इस्तेमाल मुख्य रूप से सामाजिक असंतोष को भड़काने, विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी मुद्दे को बड़ा बनाने के लिए किया जा रहा है। सीजेपी प्रदर्शन के दौरान एल्गोरिदम के कारण उपयोगकर्ताओं को ध्रुवीकृत या अतिवादी वीडियो (जैसे केवल पुलिस कार्रवाई या केवल प्रदर्शनकारियों की आक्रामकता) अधिक दिखाए गए, जिससे समाज में अलग-अलग और परस्पर विरोधी धारणाएं बनीं। एल्गोरिदम को प्रभावित कर भीड़ के आक्रोश को और बढ़ाया गया।

अतीत में कांग्रेस और मोदी विरोधी ताकतों ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और महत्वपूर्ण अवसरों पर भारत की छवि खराब करने की कोशिश की

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दौरान युवा कांग्रेस का अर्धनग्न प्रदर्शन
20 फरवरी 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का आयोजन किया गया था। इसमें देश व विदेश के भी काफी प्रमुख लोग आमंत्रित थे तथा यह इवेन्ट अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में था। इसमें 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष, 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि, कंपनियों के सीईओ और एआई एक्सपर्ट शामिल हुए थे। इस दौरान भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) के कार्यकर्ताओं ने अर्धनग्न (शर्टलेस) होकर विरोध प्रदर्शन किया था। युवा कांग्रेस के करीब 6-10 कार्यकर्ताओं ने अंदर पहुंचकर अपनी शर्ट और जैकेट उतारकर नारेबाज़ी की।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल करने की कांग्रेस की कोशिश
युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की शॉर्ट लेस प्रदेश की पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। कई राजनीतिक दलों ने प्रदर्शन करने के तरीके पर सवाल खड़े किए। भाजपा ने इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुए विरोध को देश की छवि धूमिल करने वाला और शर्मनाक बताया था। देश को बदनाम करने के लिए रची गई इस साजिश का पर्दाफाश करने के लिए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मात्र तीन दिनों में दो राज्यों में ताबड़तोड़ छापेमारी करते हुए कांग्रेस के सात नेताओं को गिरफ्तार किया था। इसमें भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव कृष्णा हरि, राष्ट्रीय समन्वयक नरसिम्हा यादव सहित कई कार्यकर्ता शामिल थे।

2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान उमर खालिद का ऐलान और दिल्ली दंगा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 24 और 25 फरवरी 2020 को भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए थे। जब ट्रंप अहमदाबाद और नई दिल्ली में आधिकारिक कार्यक्रमों में व्यस्त थे, उसी दौरान 24-25 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली (जैसे सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, खजूरी खास) में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर हिंसक झड़पें और सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। राजधानी में हुई इस हिंसक घटना से वैश्विक स्तर पर भारत की छवि पर असर पड़ा और ट्रंप के दौरे की चमक फीकी पड़ गई। दिल्ली पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट और गृह मंत्रालय के अनुसार, यह हिंसा सुनियोजित थी। पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि हिंसा का समय जानबूझकर ट्रंप के दौरे के वक्त रखा गया था, क्योंकि उस दौरान प्रशासनिक अमला और सुरक्षा एजेंसियां वीआईपी मेहमान की सुरक्षा व व्यवस्था में व्यस्त थीं। इस हिंसा में 50 से अधिक लोगों की जान गई थी और भारी नुकसान हुआ था। दिल्ली दंगे से पहले उमर खालिद ने ऐलान किया था, “हम वादा करते हैं कि 24 तारीख को जब डोनाल्ड ट्रंप हिन्दुस्तान आएंगे, तो हम ये बताएंगे कि हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री और हिन्दुस्तान की सरकार हिन्दुस्तान को बांटने का काम कर रही है। महात्मा गांधी के वसूलों की धज्जियां उड़ा रही हैं। ये बताएंगे कि हिन्दुस्तान की आवाम हिन्दुस्तान के हुक्मरानों के खिलाफ लड़ रही है। हम तमाम लोग सड़कों पर निकलकर आएंगे।”