समाजवादी पार्टी के PDA मतलब Parivar Development Authority यानि अखिलेश यादव की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी!


कहते हैं "आसमान पर तारे बहुत हैं लेकिन तोड़ने के लिए अक्ल चाहिए" समाजवादी पार्टी वही कर रही है। PDA का नाम देकर खूब जनता को पागल बनाया जा रहा है और जनता बन रही है। PDA का मतलब बताया जाता है "पिछड़ा", "दलित" और "अल्पसंख्यक", जबकि इन लोगों का उद्धार यानि भला करने की बजाए अपने ही परिवार का भला किया। उनकी भावी पीढ़ियों तक के ऐश से रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम कर दिया गया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, जनता देख ले खुली आंख से। फिर भी जनता अंधी बन समाजवादी पार्टी को वोट देती है तो उससे बड़ा अँधा कोई नहीं। 
हिन्दुओं को जातियों में बांट जातिगत आधारित कई पार्टियां बन गयी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह भला इन पार्टियों के मुखियाओं के परिवारों का हुआ है और हो भी रहा है। हिन्दू है कि इनके मकड़जाल में फंस वोट दे देता है जबकि मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट होकर बीजेपी को हराने वाली पार्टी को वोट देता है। समझदार कौन हिन्दू या मुसलमान?   

           

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर यह बहस सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में लंबे समय से सैफई परिवार की निर्णायक भूमिका रही है। समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में समाजवादी विचारधारा और आम कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे लाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ पार्टी की कमान एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। आलोचकों का आरोप रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसदों और महत्वपूर्ण चुनावी सीटों तक पर सैफई परिवार का प्रभाव दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह यादव परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रही है।

परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे
मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह राजनीतिक वर्चस्व आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी जारी है। यादव परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे, कई मंत्री बने और पार्टी के संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस कदर हावी रहा है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश, डिंपल, धर्मेंद्र, अक्षय, आदित्य और तेज प्रताप यादव तक पार्टी की हर सुरक्षित और वीआईपी सीट परिवार के भीतर ही घूमती रहती है। समाजवादी सोच के आधार पर बनी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का यह हाल है कि साढ़े तीन दशक के बाद भी पार्टी अध्यक्ष मुलायम परिवार के अलावा कोई नहीं बन पाया है।

पांच भाईयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह थे सबसे तेज
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के बाबा का नाम मेवाराम था। मेवाराम के दो बेटे थे। सुगहर सिंह और बच्चीलाल सिंह। सुघर सिंह के पांच बेटे थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, रतन सिंह, राजपाल सिंह यादव, अभय राम सिंह और शिवपाल सिंह यादव। भाइयों में मुलायम सिंह तीसरे नंबर और शिवपाल सिंह सबसे छोटे हैं। मुलायम सिंह यादव ने दो शादी की है। मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे अखिलेश यादव हैं। अखिलेश यादव ने डिंपल यादव से शादी की है। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता है। प्रतीक यादव मुलायम की दूसरी पत्नी साधना सिंह के बेटे हैं। प्रतीक का पिछले महीने निधन हो गया। अपर्णा यादव की शादी प्रतीक यादव से हुई थी। इस तरह अपर्णा मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू हैं। मुलायम के भाई, बेटे, भतीजे के अलावा अब इस कुनबे की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में है।

शिक्षक से सपा के संस्थापक और मुख्यमंत्री तक का सफर
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समाजवादी आंदोलन से की। वर्ष 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए जसवंतनगर सीट से विधायक चुने गए। आपातकाल के दौरान जेल गए और बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1989-91, 1993-95 और 2003-07) रहे। इसके अलावा वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव कई बार लोकसभा सांसद रहे और लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे। सपा की राजनीतिक पहचान और संगठन का निर्माण मुख्य रूप से उनके नेतृत्व में हुआ। मुलायम यादव ने ही अयोध्या में कार सेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाईं थीं। मुलायम सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव भी पूरी तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं।

मुलायम के पांच भाइयों में सबसे बड़े, बेटा बना सांसद
मुलायम के पांच भाइयों में अभयराम सबसे बड़े हैं। धर्मेंद्र यादव उनके बेटे हैं। धर्मेंद्र तीन बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले 2004 में मैनपुरी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके बाद 2009 और फिर 2014 में बदायूं से जीत हासिल की। 2019 लोकसभा चुनाव में वह हार गए।

मुलायम सिंह के भाई, पौत्र को मैनपुरी से बनाया सांसद
मुलायम सिंह के पांच भाइयों में रतन सिंह दूसरे नंबर पर हैं। मैनपुरी के पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव रतन सिंह के पौत्र हैं। तेज प्रताप के पिता रणवीर सिंह हैं। तेज प्रताप ने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी की है। तेज प्रताप की शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी से हुई है। मतलब तेज प्रताप लालू के दामाद भी हैं।

सपा के रणनीतिकार और संगठन के प्रमुख चेहरे
रामगोपाल यादव मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से सपा की राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा सांसद चुने गए और पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर रहे। नीतिगत फैसलों और संसदीय रणनीति तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संगठन निर्माता और परिवार की राजनीतिक धुरी
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सपा संगठन की रीढ़ माने गए। वे कई बार जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे। 2016 में अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण परिवार में बड़ा संघर्ष सामने आया। बाद में उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई, हालांकि बाद में फिर सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

विरासत के उत्तराधिकारी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की दूसरी पीढ़ी के सबसे प्रमुख नेता हैं। उन्होंने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 और 2009 में भी वे कन्नौज से सांसद चुने गए। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया और अखिलेश यादव 38 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2017 में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष के बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। 2022 में वे करहल विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

मुलायम परिवार की बहू से संसद तक का सफर
डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। उन्होंने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं। 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जहां वह सांसद चुनी गईं। 2014 और 2019 में भी कन्नौज से चुनाव लड़ा, लेकिन 2019 में भाजपा उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचीं और वर्तमान में सांसद हैं।

अखिलेश के चचेरे भाई ने मैनपुरी से जीता पहला चुनाव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे और रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। उन्होंने 2004 में पहली बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीता। वे 2009 और 2014 में बदायूं लोकसभा सीट से सांसद बने। 2019 में भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए। 2022 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। इसके बावजूद वे पार्टी के प्रमुख प्रचारकों और रणनीतिक नेताओं में शामिल रहे हैं।

मुलायम के भतीजे का फिरोजाबाद से संसद तक का सफर
अक्षय यादव रामगोपाल यादव के पुत्र और मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। वे पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं और समय-समय पर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

मुलायम के भाई के पौत्र और लालू यादव के दामाद
तेज प्रताप यादव मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं। वे मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीता। 2019 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों में उनकी भूमिका फिर चर्चा में रही।

यादव परिवार की नई पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री
आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की नई राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी की युवा राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माना जाता है। वे लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। सपा में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि सैफई परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही है।

अखिलेश के चचेरे भाई को सपा की युवा ईकाई से जोड़ा
समाजवादी युवजन सभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव अनुराग यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दो पुत्र धर्मेंद्र यादव और अनुराग यादव हैं। अनुराग यादव उर्फ दीपू यादव समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में राष्ट्रीय सचिव रहे हैं। वर्ष 2013 में उन्हें यह संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई थी। वे चुनावी राजनीति में अपने भाई धर्मेंद्र यादव की तरह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे, लेकिन पार्टी संगठन और सैफई परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भूमिका रही है।

राम गोपाल यादव के अपने भांजे को एमएलसी बनाया
एमएलसी अरविंद सिंह यादव भी सैफई परिवार की राजनीतिक शाखा से जुड़े हुए हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। उनका संबंध मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के परिवार से है। रामगोपाल यादव की बहन गीता देवी हैं। अरविंद सिंह यादव गीता देवी के ही पुत्र हैं। इस प्रकार अरविंद यादव रामगोपाल यादव के भांजे हैं। अरविंद यादव का राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ। वे मैनपुरी जिले की करहल ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य बने। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद के दौरान उनका नाम चर्चा में आया था।

मुलायम के भतीजे को इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया
इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं। वे मुलायम सिंह यादव के सगे छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र हैं। अंशुल यादव लंबे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध जीता। वर्ष 2021 में वे फिर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने और निर्विरोध निर्वाचित हुए।

अखिलेश की भाभी को सैफई ब्लॉक प्रमुख बनाया
सैफई ब्लॉक प्रमुख मृदुला यादव का संबंध भी मुलायम सिंह यादव के परिवार से है। वह अखिलेश यादव की चचेरी भाभी लगती हैं। वह मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पुत्र रणवीर सिंह यादव की पत्नी हैं। रणवीर सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे थे। मृदुला यादव लंबे समय तक सैफई की स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं। वह सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर कई बार निर्वाचित हो चुकी हैं। सैफई ब्लॉक पर पिछले लगभग ढाई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार या उससे जुड़े सदस्यों का प्रभाव रहा है। पहले रणवीर सिंह यादव, फिर धर्मेंद्र यादव, उसके बाद तेज प्रताप यादव और बाद में मृदुला यादव इस पद तक पहुंचे।

अखिलेश की चचेरे भाई सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने
इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष आदित्य यादव का संबंध मुलायम परिवार से है। वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई तथा अखिलेश यादव के चाचा हैं। आदित्य यादव सैफई परिवार की नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में जसवंतनगर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़कर राजनीतिक शुरुआत की, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2016 में उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक की ओर से उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक और प्रदेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन में प्रतिनिधि चुना गया था। वर्ष 2021 में वे निर्विरोध रूप से इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर उनके पिता शिवपाल सिंह यादव लगभग 33 वर्षों तक काबिज रहे थे।

अखिलेश की चचेरी बहन इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक
इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक डॉ. अनुभा यादव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की चचेरी बहन लगती हैं। वह शिवपाल सिंह यादव की पुत्री हैं। शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। डॉ. अनुभा यादव की शादी आईएएस अधिकारी अजय यादव से हुई। डॉ. अनुभा यादव सैफई परिवार की उन महिला सदस्यों में शामिल हैं, जिन्हें सहकारी संस्थाओं में जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2021 में इटावा जिला सहकारी बैंक के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव के परिवार के कई सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में डॉ. अनुभा यादव भी बैंक की निदेशक चुनी गई थीं।

मुलायम सिंह यादव के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय
मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन 2003 में हुआ। इसके बाद साधना गुप्ता के साथ उनके संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने चुनावी हलफनामों में साधना गुप्ता को अपनी पत्नी के रूप में दर्ज किया। हालांकि साधना गुप्ता ने कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार की चर्चाओं में उनका नाम कई बार सामने आया। 2022 में उनका निधन हो गया।

राजनीति से दूरी लेकिन परिवार की चर्चित शाखा
प्रतीक यादव साधना गुप्ता के पुत्र हैं और मुलायम सिंह यादव के सौतेले पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी है और मुख्य रूप से व्यवसाय और फिटनेस के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। प्रतीक कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए और न ही समाजवादी पार्टी में कोई संगठनात्मक पद संभाला।

सपा परिवार की बहू लखनऊ से चुनाव लड़कर हारीं
अपर्णा यादव, प्रतीक यादव की पत्नी हैं। उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं। बाद में 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्तमान में वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।

अगर दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू…नोमानी बताओ कि शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पठान और पासमांदा मुस्लिम हैं? अगर मुस्लिम है तो एक ही मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को भेजता है सलाम

                                                   सज्जाद नोमानी (फोटो साभार - यूट्यूब/)
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का एक विवादित बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है। वायरल हो रही एक वीडियो क्लिप में वह दावा करते हैं कि भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। किसी भी परिस्थिति में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता।

नोमानी जिस तरह हिन्दुओं को विभाजित करने की कोशिश कर रहा है उसके जवाब में हिन्दुओं को भी इन कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि जब शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पासमांदा आदि दूसरे फिरके मुस्लिम हैं तो एक मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? क्यों नहीं एक ही कब्रिस्तान में मुर्दे को दफ़न किया जा सकता? इस कट्टरपंथी को मालूम है कि हिन्दू को जाति बांटकर विभाजित किया जा सकता है, लेकिन इन कट्टरपंथियों अपनी मुस्लिम कौम से सभी फिरकों को एक ही मस्जिद में नमाज पढ़ने और सभी के मुर्दे एक ही कब्रिस्तान में दफ़न होने चाहिए।

 

इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ कालनेमि हिन्दू भी प्रोग्राम में शामिल थे,  क्योकि उनकी पार्टियों को इनके वोट चाहिए। वीडियो में देखिए कितनी मुस्लिम महिलाएं हिजाब, नकाब या बुर्के हैं। दूसरे, क्या शिया, सुन्नी और वहाबी आदि पचासों फिरकों के लिए अलग मस्जिद और कब्रिस्तान के लिए जगह क्या land jihad नहीं?               

मौलाना नोमानी ने अपने इस दावे के पीछे तर्क देते हुए देश के कई बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर आते हैं। उन्होंने कहा, सिख, ईसाई और बौद्ध ये तो हिंदू हैं ही नहीं। इनके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जाट और जनजातीय लोग भी हिंदू नहीं हैं। न ही तमिलनाडु के लोग और लिंगायत खुद को हिंदू मानते हैं। 

भाषण में नोमानी की दिखी हिंदू घृणा

अपने भाषण में नोमानी ने केवल सामाजिक वर्गीकरण ही नहीं किया, बल्कि देश की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के रुख पर भी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की। उन्होंने कहा “हमने हिंदुओं को ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘फासिस्ट’ (फासीवादी) श्रेणियों में बाँट दिया। हम राजनीतिक समर्थन के लिए सेकुलर हिंदुओं पर निर्भर रहे, लेकिन इन समूहों ने आखिरकार देश की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दी जिन्हें हम फासिस्ट हिंदू कहते हैं। दोनों ने ही मिलकर हमारे मकसद को नुकसान पहुँचाया।”

 सज्जान नोमानी का यह भाषण 2 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ के समापन सत्र के दौरान दिया गया था।

यह कार्यक्रम इस मीडिया हाउस की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रखा गया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार शामिल थे।

मौलाना नोमानी ने जोर देकर कहा कि उनका यह बयान हवा-हवाई नहीं है, बल्कि देश भर में धार्मिक, जातिगत और आदिवासी पहचानों पर किए गए उनके तीन दशकों के सफर और शोध पर आधारित है।

पहले भी उगल चुका है हिंदुओं के लिए जहर

 हिंदुओं को तोड़ने और हिंदुओं को बाँटने की बात करने वाला सज्जाद नोमानी का ये पहला विवादित बयान नहीं है। ये वही सज्जाद नोमानी है जिसे तालिबान के आने पर खुशी हुई थी और जो बच्चियों की शिक्षा का विरोधी रहा है।

साल 2023 में नोमानी की वीडियो सामने आई थी। अपनी वीडियो में वह कहता सुनाई पड़ रहे थे, “पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।”

इतना ही नहीं साल 2021 में तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब सज्जाद नोमानी ने भारत में इसका स्वागत किया था। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की तारीफों के पुल बाँधते हुए तालिबानियों को सलाम भेजा था।

सज्जाद नोमानी की हिंदू घृणा  और भारत को तोड़ने का प्रयास

अजीब बात है कि एक तरफ सज्जाद नोमानी खुलकर भारत के हिंदुओं के विरुद्ध अपनी घृणा जाहिर करता है, उन्हें बाँटने की बात करता है, उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। दूसरी तरफ खुलकर तालिबान के लिए अपना समर्थन देता है, इस्लामी कट्टरपंथ की पैरवी करता है, बच्चियों की पढ़ाई को हराम बताता है, बड़े-बड़े नेता, लेखक, विचारक उसके भाषणों को सुनते हैं और स्वरा भास्कर जैसे लोग तो मुस्लिमों के बीच राजनीति करने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे सरेंडर कर देते हैं। लेकिन फिर भी भारत के लिबरल उसे बुद्धिजीवी मानकर इतना बड़ा मंच देते हैं। उसे सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं।

कहना गलत नहीं है कि जिन ‘सेकुलर हिंदुओं’ ने कभी अपनी उदारता दिखाने के लिए नोमानी को ‘महान स्कॉलर’ के रूप में स्थापित किया, आज वही स्कॉलर मंचों से खुलेआम हिंदुओं के अस्तित्व और उनकी जनसांख्यिकीको चुनौती दे रहे हैं। आज मंच से खुलेआम इवकी नफरत जगजाहिर हो रही है।

नोमानी का यह दावा कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक नहीं हैं और जो खुद को हिंदू मानते हैं वो असल में अलग-अलग पहचानों में बंटे हैं… कोई साधारण बयान नहीं है।

ये हिंदुओं के लिए ही सीखने का समय है कि जब हम खुद को राजनीति जाति और क्षेत्रो में खुद को बाँटते हैं, तभी नोमानी जैसे लोग इसी कमजोरी को पकड़कर हम पर चोट करते हैं। खुलकर हम भारतीयों को तोड़ने का प्रयास करते हैं और ये संदेश देते हैं कि देश में हिंदू आबादी बहुसंख्यक नहीं है और जो लोग खुद को हिंदू मानते हैं वो अलग हैं। इसका सीधा उद्देश्य बहुसंख्यक समाज के भीतर एक ऐसा हीनभावना और भ्रम पैदा करना है जिससे वे अपनी सामूहिक ताकत को भूल जाएँ और कट्टरपंथी ताकतों का गजवा-ए-हिंद का रास्ता आसान हो सके।

‘जो मुल्क आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति मानता है, उससे नहीं करेंगे समझौता’ : UN में भारत ने PAK को धोया, कहा- अब नहीं काम आएँगे पुराने हथकंडे

                                          भारतीय राजनयिक अनुपमा सिंह (फोटो साभार - एक्स/@Ani)
एक समय था जब भारत पाकिस्तान से गलबहियां करता था, लेकिन बदलते परिवेश में आज उसी पाकिस्तान को उसी भारत के हाथों नीचा देखना पड़ता है। अब भारत की नीति है कि जब तक पाकिस्तान आतंकियों को अपना दामाद बनाकर पालता रहेगा कोई समझौता नहीं होगा।  

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में एक बार फिर भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया। सिंधु जल संधि मुद्दे को लेकर बढ़ी बहस में भारत ने पाकिस्तान के आरोपों का जवाब देते हुए साफ कहा कि जो देश आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति की तरह इस्तेमाल करता है, वह सहयोग और सद्भावना पर आधारित समझौतों का फायदा लेने की उम्मीद नहीं कर सकता।

संयुक्त राष्ट्र में भारत की सचिव अनुपमा सिंह ने कहा कि 1960 में हुई सिंधु जल संधि आज के समय में पुरानी पड़ चुकी है। उन्होंने कहा कि दुनिया बदल रही है और छह दशक पुराने समझौते को मौजूदा परिस्थितियों से अलग नहीं देखा जा सकता। भारत ने यह भी कहा कि एक तरफ पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देता है और दूसरी तरफ भारत से सहयोग की उम्मीद करता है, जो तर्कसंगत नहीं है।

पूरा कश्मीर है भारत का हिस्सा

भारतीय राजनयिक अनुपमा सिंह ने जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के बयानों को भी सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।

भारत ने दोहराया कि अब केवल एक ही मुद्दा बचा है, वह है पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को मुक्त कराना। भारत ने कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुष्प्रचार फैलाकर अपनी घरेलू नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी पुरानी रणनीतियाँ अब काम नहीं आएँगी।

भारत ने पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि 26 लोगों की मौत के बाद सिंधु जल संधि को तब तक के लिए स्थगित कर दिया गया है, जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाता। भारत ने पाकिस्तान को अपने आंतरिक मामलों पर ध्यान देने की सलाह देते हुए उसे ‘फ्रेंकेंस्टीन स्टेट’ तक करार दिया।

ट्रम्प द्वारा मोदी से मुलाकात में Operation Sindoor के दौरान Cease fire का जिक्र नहीं करने को राष्ट्रीय मीडिया ने क्यों नहीं प्रमुखता दी? G7 में ट्रंप ने की प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ, बोले- जब तक मोदी PM हैं, दुनिया में भारत की बड़ी भूमिका तय


राहुल गाँधी और INDI गठबंधन में शामिल सारी पार्टियां Operation Sindoor के दौरान पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने पर पाकिस्तान की ओर से सफ़ेद झंडा(फ़ोन या हॉटलाइन पर) दिखाए जाने पर बहुत शोर मचा ट्रम्प ने कहा 'मोदी सरेंडर' और मोदी ने सरेंडर कर दिया। 'मोदी ट्रम्प से डरता है' आदि आदि। लेकिन फ्रांस में प्रधानमंत्री नरेंद्र के सामने अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान पर हमले का जिक्र तक नहीं किया जिसे मीडिया तक ने प्रमुखता नहीं दी, क्यों? आखिर राष्ट्रीय मीडिया ने किसके दबाब में इस मुख्य समाचार को प्रमुखता क्यों नहीं दी? क्या इस समाचार को प्रमुखता नहीं देने के लिए कांग्रेस या INDI गठबंधन ने मीडिया को कोई लालच दिया था?         

फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियन में जी7 शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात दुनिया भर में चर्चा का बड़ा विषय बन गई। दोनों नेताओं के बीच वैश्विक सुरक्षा, व्यापार, रणनीतिक सहयोग और पश्चिम एशिया की स्थिति समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई। हालांकि इस मुलाकात की सबसे ज्यादा चर्चा राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर की गई प्रशंसा को लेकर रही।

बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत छवि और नेतृत्व शैली की जमकर तारीफ की। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी के साथ हमारी बहुत अच्छी बातचीत हुई है। मोदी देखने में बहुत सुंदर और अच्छे लगते हैं, बिल्कुल फरिश्ते जैसे। लेकिन असल में वह अपने देश के हितों को लेकर बेहद कठोर हैं। वह एक असली ‘किलर’ हैं, जितने सख्त इंसान कोई हो सकता है, मोदी उनमें से एक हैं।”

राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान दिखाता है कि प्रधानमंत्री मोदी भले ही वैश्विक मंचों पर बेहद शालीन और मिलनसार दिखाई देते हों, लेकिन जब बात भारत के हितों की आती है तो वह अपने रुख पर मजबूती से कायम रहते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान के पीछे पीएम मोदी की दृढ़ नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

प्रेसिडेंट ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी शर्तें मनवाने में बेहद सख्त और एक टफ नेगोशिएटर हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम मोदी भारत के हितों की रक्षा करने में किसी से पीछे नहीं हटते। राष्ट्रपति ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक मामलों में अपनी भूमिका लगातार मजबूत कर रहा है।

इस मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “अगर भारत पर कभी भी कोई हमला हुआ या कोई संकट आया, तो हम पूरी ताकत से भारत की मदद करेंगे।” राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान को भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की मजबूती और दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के बढ़ते वैश्विक कद का जिक्र करते हुए कहा, “आज दुनिया के हर कोने में भारत की बहुत बड़ी भूमिका है। और मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री रहेंगे, तब तक वैश्विक मंच पर भारत की यह बड़ी भूमिका रहना पूरी तरह तय है।”

अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की अंतरराष्ट्रीय पहचान को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रिय भागीदारी और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है, जिसका जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप के बयान में भी देखने को मिला।

एक तरफ जहां राष्ट्रपति ट्रंप भारत की तारीफ कर रहे थे, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप के सामने रखा और कहा कि दुनिया भर के समुद्री मार्गों पर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक कार्यरत हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला और सुरक्षित रहना आवश्यक है। उन्होंने नौवहन की स्वतंत्रता तथा निर्बाध वाणिज्यिक गतिविधियों को बनाए रखने के महत्व पर बल दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी महत्वपूर्ण विषय है।

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप के उन प्रयासों की भी सराहना की, जिनके परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त करने और व्यापक क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बहाल करने को लेकर सहमति बनी है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता वैश्विक विकास के लिए आवश्यक है।

दोनों नेताओं ने फरवरी 2025 में वॉशिंगटन डीसी में हुई अपनी पिछली बैठक के बाद से भारत-अमेरिका कॉम्पैक्ट के तहत हुई प्रगति की समीक्षा भी की। दोनों देशों ने रक्षा, रणनीतिक तकनीकों, ऊर्जा और द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्रों में हुई महत्वपूर्ण प्रगति का स्वागत किया।

व्यापार संबंधों को लेकर भी दोनों नेताओं ने सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने एक अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में चल रही वार्ता में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और अधिकारियों को जल्द से जल्द एक संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी और व्यावसायिक रूप से सार्थक समझौते को अंतिम रूप देने के निर्देश दिए। इसी सिलसिले में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर अगले सप्ताह भारत का दौरा करेंगे।

मुलाकात के अंत में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों नेताओं ने रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।

जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई यह मुलाकात कई मायनों में महत्वपूर्ण रही। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की खुलकर सराहना की, वहीं दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक शांति, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी जिम्मेदार भूमिका को मजबूती से रखा।

डोनाल्ड ट्रंप के मोदी के लिए कहे गए शब्दों ने कांग्रेस का नरेटिव ध्वस्त कर दिया

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी और उसकी ब्रिगेड ने बहुत दिनों से एक fake Narrative चलाया हुआ था। मोदी ट्रंप से डरता है, मोदी ट्रंप के आगे Compromise हो गया है और मोदी ने डर कर रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया ऑपरेशन सिंदूर युद्ध रुकने के बाद राहुल गांधी ने तुर्रा छेड़ा था “नरेंदर सरेंडर” और हर कोई ऐरा गैरा नत्थू गैरा यही राग अलाप रहा था

नरेंद्र मोदी 5 देशों की यात्रा से 40 बिलियन डॉलर का व्यापार लेकर आए लेकिन राहुल गांधी को केवल मेलोडी दिखाई दी उसने कहा कि देश में पेट्रोल और गैस की समस्या हैं और मोदी इटली में मेलोडी खा रहे हैं

जून 17 को ट्रंप से साथ मोदी की मुलाकात के बाद कांग्रेस ब्रिगेड ने नरेटिव चलाया कि ट्रंप ने मोदी को नज़रअंदाज किया और फिर शोर मचाया कि मोदी ने भारतीय नाविकों का मुद्दा G7 में क्यों नहीं उठाया दिमाग से पैदल हो गए हैं राहुल के चमचे मोदी ने नाविकों का मुद्दा ट्रम्प के सामने दृढ़ता से उठाया क्योंकि अमेरिकी सेना की कार्रवाई में ही भारतीय नाविक मारे गए थे G7 प्लेटफार्म नहीं था उस मुद्दे को उठाने के लिए 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जिस मोदी ने ट्रंप के चार फ़ोन नहीं उठाए उसके लिए राहुल और उसकी ब्रिगेड कहती है मोदी compromise हो गए, मोदी ट्रंप से डरते हैं क्या मज़ाक है?

लेकिन जून 17 को डोनाल्ड ट्रंप के मोदी और भारत के लिए गए शब्दों ने कांग्रेस के नरेटिव को ध्वस्त कर दिया ट्रंप का एक एक शब्द राहुल गांधी के मुंह पर पड़ने वाला थप्पड़ था ट्रंप ने कहा- "Narendra Modi is a very tough negotiator, a total killer at the negotiating table. He's calm, he's cool, and he thinks a lot about India. He always puts India's interests first."

ट्रंप ने कहा कि “मोदी देखने में बहुत सुंदर और अच्छे लगते हैं, बिलकुल फ़रिश्ते जैसे लेकिन असल में वे बेहद कठोर हैं, एक किलर हैं, जितने सख्त हो सकते हैं उनमें से एक लेकिन उनकी शक्ल इतनी भली है कि वह अचानक चौंका (surprise) देते हैं

ट्रंप की मोदी के बारे में  कही गई कुछ और बातें -

पीएम मोदी शांत और संयमित हैं (Cool);

मोदी शांत और जबरदस्त हैं; 

मैं मोदी की तरह शांत नहीं हूँ;

भारतीय नाविकों के लिए संवेदनाएं; 

मोदी सख्त वार्ताकार हैं;

मेरे कार्यकाल में भारत से अच्छे संबंध रहे हैं; 

ट्रेड डील पर हमारी अच्छी बात हो रही है; 

पीएम मोदी से हमारे रिश्ते अच्छे हैं; 

जल्द भारत का दौरा करूंगा; 

जब तक मोदी हैं भारत का रोल बड़ा; 

मैं पीएम मोदी का सम्मान करता हूँ; और  

भारत पर हमला हुआ तो हम मदद करेंगे 

ट्रंप ने नाविकों की मौत पर खेद जता कर अपने ही विदेश मंत्री मार्को रुबियो को भी लताड़ दिया क्योंकि उन्होंने नाविकों पर हुए हमले का बचाव किया था और कोई संवेदना प्रकट नहीं की थी

हालांकि ट्रंप के भारत पर हमला होने पर मदद के लिए आने की बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता यह वो तब ही करेंगे जब उनका कोई हित होगा अभी तक ताइवान को समर्थन देने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी चीन यात्रा के अंत में ताइवान को सलाह दी कि वह स्वतंत्रता घोषित न करे। he took a transactional approach to the region's security, warning Taiwan not to declare formal independence and stating he didn't want the US to travel 9,500 miles (15,289 km) to fight a wa.

भारत पर हमला या तो चीन कर सकता है और या पाकिस्तान भारत दोनों से निपटने में सक्षम है लेकिन जब ताइवान को गच्चा दे दिया तो हमें भी दे सकते हैं जापान को भी अमेरिका की मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहिए

कांग्रेस के दिल में मोदी के लिए नफरत कूट कूट कर भरी है तभी तो मोदी को 33 देशों से सर्वोच्च सम्मान मिलने के बाद भी कांग्रेस ने मोदी को बधाई नहीं दी जबकि मोदी हर सम्मान को 140 करोड़ लोगों का सम्मान कहते रहे हैं

कांग्रेस द्वारा अडानी पर वार ने अपने आका चीन को पहुँचाया सीधा फायदा: भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट; केन्या सरकार ने नैरोबी एयरपोर्ट का टेंडर बदला, चीनी कंपनी को 50% महंगे दाम पर दी प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी

                                                                                   साभार : Hu Long  @HuLong240

आज कांग्रेस से लेकर INDI गठबंधन तक जितनी भी पार्टियां है सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना में इतने अंधे होकर देश की अर्थव्यवस्था तक से खिलवाड़ कर रहे हैं। जिसका जीता-जागता उदाहरण भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी को मिला टेंडर इनके आका चीन को मिल गया। जो पार्टी देश को आज़ादी दिलवाने के कसीदे पढ़ती हो वही पार्टी देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगी?    

केन्या की राजधानी नैरोबी का ‘जोमो केन्याटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ इन दिनों एक बड़े विवाद की वजह से चर्चा में है। केन्या सरकार लंबे समय से इस एयरपोर्ट का विस्तार और आधुनिकीकरण करना चाहती थी।

शुरुआत में यह प्रोजेक्ट भारत के अडानी समूह को मिलने की चर्चा थी, लेकिन बाद में सरकार ने इसे एक चीनी सरकारी कंपनी को सौंप दिया। अब इस फैसले को लेकर आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं।

अडानी समूह ने दिया था सस्ता प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी समूह इस एयरपोर्ट को विकसित करने के लिए करीब 2 अरब डॉलर (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) का निवेश करने को तैयार था। यह परियोजना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत प्रस्तावित थी।

इसका मतलब था कि परियोजना में बड़ा निवेश प्राइवेट कंपनी करती और केन्या सरकार पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ नहीं पड़ता। इस मॉडल का फायदा यह भी था कि सरकार को टैक्सपेयर्स के पैसे से परियोजना की लागत नहीं उठानी पड़ती और देश पर नया कर्ज लेने का दबाव कम रहता।

फिर चीन को कैसे मिला प्रोजेक्ट?

बाद में केन्या सरकार ने यह परियोजना चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंप दी। बताया जा रहा है कि चीनी कंपनी इस काम के लिए करीब 2.9 अरब डॉलर (करीब 24–25.5 हजार करोड़ रुपए) ले रही है। जबकि यह राशि अडानी समूह के प्रस्ताव से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है।

यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कम लागत वाला विकल्प मौजूद था तो ज्यादा महंगे प्रस्ताव को क्यों चुना गया। कहा जा रहा है कि इस फैसले के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक वजहें भी हो सकती हैं।

भारत की राजनीति और विवाद का असर?

इस मामले का संबंध भारत की राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। सितंबर 2024 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केन्या में अडानी परियोजना के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार और अडानी समूह पर सवाल उठाए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानी समूह को लेकर बने विवादों और राजनीतिक माहौल ने केन्या में इस परियोजना को संवेदनशील बना दिया। उनका कहना है कि इसी वजह से चीनी कंपनी को मौका मिला और उसने यह बड़ा ठेका हासिल कर लिया।

फर्जी प्रेस रिलीज और सूचना युद्ध की भी चर्चा

इस विवाद के दौरान सितंबर 2024 में अडानी समूह के नाम से एक कथित प्रेस रिलीज सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उसमें केन्याई अधिकारियों को धमकी देने जैसी बातें लिखी गई थीं। बाद में अडानी समूह ने इसे पूरी तरह फर्जी बताया।

इसके अलावा मई 2026 में फ्रांस की सरकारी एजेंसी विजिनम ने दावा किया कि चीन के सरकारी प्रसारक CGTN से जुड़े कुछ नेटवर्क AI की मदद से चीन सपोर्ट मटीरियल और नैरेटिव फैलाने का काम कर रहे थे। इसके बाद डिजिटल दुष्प्रचार और सूचना युद्ध को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई।

केन्या, भारत और चीन के लिए क्या मायने हैं?

माना जा रहा है कि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा जोखिम केन्या के सामने है। अगर परियोजना की लागत ज्यादा रहती है तो सरकार को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है, जिसका बोझ देश के नागरिकों और टैक्स पेयर्स पर पड़ेगा।

भारत के लिए यह झटका माना जा रहा है क्योंकि अफ्रीका में बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ रही थी। वहीं चीन के लिए यह सौदा अफ्रीका में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक और अवसर माना जा रहा है।

पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस में 4 नेताओं में मुख्यमंत्री पद के लिए बड़ी गुटबाजी: अध्यक्ष खड़के फिर राहुल कौन?

                                                                                                                       साभार: सोशल मीडिया  
पंजाब की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां दूसरे दलों से अधिक चुनौती कांग्रेस को अपने ही घर के भीतर से मिल रही है। विधानसभा चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता में अभी से घमासान छिड़ा हुआ है। हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान को भितरघात को सुलझाने के लिए कमेटी तक बनानी पड़ी है। 

दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कांग्रेस के प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा खुद को अभी से ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके चलते कांग्रेस चार धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। यही स्थिति कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी है। पार्टी हाईकमान ने गुटबाजी को नियंत्रित करने और नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल समितियां बनाकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित किया जा सकता है? पंजाब कांग्रेस का हाल देखकर यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है।

इतना ही नहीं, अब मुख्यमंत्री पद की लड़ाई में यह बात चर्चा का विषय बनी हुई है कि पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के फैसले ले राहुल गाँधी, क्यों? अगर खड़के कोई फैसला नहीं ले सकते फिर अध्यक्ष क्यों बने बैठे हैं? क्यों परिवार का मुंह ताकते हैं? ऊपर से प्रियंका को ले आए जैसे पार्टी में गाँधी परिवार के अलावा पार्टी को संभालने वाला कोई नहीं? जबकि परिवार की वजह से पार्टी गर्त में जा रही है। हर चुनाव में विधायकों की संख्या कम हो रही है। जब तक पार्टी में परिवार भक्ति रहेगी कांग्रेस बीजेपी को हरा नहीं सकती। मोदी को गालियां देने के अलावा परिवार के पास कोई मुद्दा नहीं। मोदी 'मौत का सौदागर', 'चौकीदार चोर' से लेकर 'मोदी सरेंडर' तक जितनी गालियां दी बीजेपी उतनी ही मजबूत हुई है और होती रहेगी। और कुछ नहीं मिला तो सनातन पर कीजड़ फेंकना। परिवार जनता की नब्ज पकड़ने में पूरी तरह से नाकाम है। मुस्लिम तुष्टिकरण पॉलिसी भी पूरी तरह से फेल। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का यह कहना 'congress is muslim, muslim is congress' ये तो वही बात हो गयी जिस तरह इंदिरा गाँधी की चमचागिरी करते देवकांत बरुआ ने कहा था 'India is Indira, Indira is India' क्या मिला बरुआ को?

सत्ता की लड़ाई शुरु होने से पहले ही कांग्रेसियों में परस्पर लड़ाई 
पंजाब कांग्रेस आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसे तय करना है कि वह 2022 की गलतियों से सीखना चाहती है या उन्हें दोहराना चाहती है। चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग सभी अनुभवी और प्रभावशाली नेता हैं। उनकी महत्वाकांक्षा स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी हित व्यक्तिगत दावेदारी से ऊपर होना चाहिए। तीन सदस्यीय समिति तभी सफल मानी जाएगी जब वह नेताओं को एक मंच पर लाकर सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित करे। अन्यथा 77 सीटों से 18 सीटों तक का सफर केवल अतीत की कहानी नहीं रहेगा, बल्कि कांग्रेस के भविष्य की भी चेतावनी बन सकता है। पंजाब की जनता एक मजबूत और एकजुट विपक्ष चाहती है, लेकिन यदि कांग्रेस अपने ही अंतर्विरोधों में उलझी रही तो सत्ता की लड़ाई शुरू होने से पहले ही वह राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकती है।

चन्नी खुद को मानते हैं पंजाब का सबसे बड़ा दलित चेहरा

पंजाब कांग्रेस पर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि घर बसा नहीं और मंगते पहले आ गए…यानि ना तो अभी चुनाव एकदम पास हैं, ना ही कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत मिलना तय है, लेकिन सीएम बनने के लिए कांग्रेस के नेता अभी से ताल ठोंक रहे हैं। सबसे पहले बात पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की। चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं और राज्य की लगभग एक-तिहाई दलित आबादी के बीच उनकी पहचान मानी जाती है। कांग्रेस नेतृत्व ने 2021 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया था। हालांकि इसका परिणाम कांग्रेस के खिलाफ ही आया। आज भी चन्नी अपने कथित सामाजिक आधार और जनसंपर्क शैली के कारण स्वयं को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते हैं। उनकी कोशिश है कि कांग्रेस दलित मतदाताओं को फिर से अपने साथ जोड़ सके।

रंधावा को परंपरागत सिख वोट बैंक पर पकड़ का भरोसा

दूसरी ओर सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा कांग्रेस के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे पंजाब सरकार में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं। संगठन और प्रशासन दोनों पर उनकी पकड़ मानी जाती है। वे राजस्थान के भी प्रभारी रह चुके हैं। रंधावा लंबे समय से कांग्रेस के परंपरागत सिख वोट बैंक और ग्रामीण क्षेत्रों में असर रखते हैं। यही कारण है कि वे स्वयं को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा खुद को संकटमोचक बता रहे

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा भी कम मजबूती से अपना दावा नहीं ठोंक रहे हैं। बाजवा वर्तमान में पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और लंबे समय से कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल रहे हैं। उनके पास संसदीय राजनीति और संगठनात्मक अनुभव दोनों हैं। पार्टी के भीतर उनका अपना समर्थक वर्ग है और वे स्वयं को कांग्रेस के संकटमोचक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष के नेता होने के नाते उन्हें लगातार मीडिया में स्थान भी मिलता है, जिससे उनकी दावेदारी और मजबूत दिखाई देती है।

प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर को अपनी आक्रामक शैली पर विश्वास

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग वर्तमान में पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाते की कमान संभाल रहे हैं। पार्टी संगठन की कमान उनके हाथ में है और वे लगातार पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। युवा नेतृत्व की छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और संगठन पर पकड़ उन्हें मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में बनाए हुए है। प्रदेश अध्यक्ष होने के कारण स्वाभाविक रूप से उनका राजनीतिक कद भी बढ़ा है।

 जिम्मेदारियां बड़ी, लेकिन महत्वाकांक्षाएं उससे भी बड़ी

इन चारों नेताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सभी के पास संगठनात्मक या प्रशासनिक अनुभव है। चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री हैं, रंधावा पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, बाजवा विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं और राजा वड़िंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। यानी पार्टी के लगभग सभी प्रमुख पद इन नेताओं के पास हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संगठन को मजबूत करने के बजाय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा अधिक दिखाई देने लगती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता को एकजुट विकल्प नहीं दिख रहा है। यदि हर नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताने लगे तो कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम पैदा होता है। परिणामस्वरूप संगठनात्मक ऊर्जा चुनावी तैयारी में लगने के बजाय आंतरिक खींचतान में खर्च होने लगती है।
क्या पंजाब कांग्रेस पिछले चुनाव का सबक भूल रही है?
पंजाब कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा चेतावनी संकेत 2022 का विधानसभा चुनाव है। 2017 में कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। लेकिन अगले ही चुनाव में पार्टी मात्र 18 सीटों पर सिमट गई। यह गिरावट केवल सत्ता विरोधी लहर का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कांग्रेस की भीषण गुटबाजी भी जिम्मेदार थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चला लंबा संघर्ष पूरे कार्यकाल में सुर्खियों में रहा। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच टकराव ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। नेतृत्व परिवर्तन, सार्वजनिक बयानबाजी और आपसी आरोप-प्रत्यारोप ने कांग्रेस को जनता की नजर में अस्थिर पार्टी बना दिया। परिणामस्वरूप आम आदमी पार्टी ने इस असंतोष का लाभ उठाया और कांग्रेस का जनाधार तेजी से खिसक गया।
गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए समिति बनानी पड़ी
पंजाब कांग्रेस के लिए हालात पिछले चुनाव से पहले जैसे ही नजर आ रहे हैं। पिछले चुनाव में दो-तीन नेताओं में टक्कर थी, तो इस बार चार-चार नेता आमने-सामने हैं। ये सभी नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिखाई दे रहे हैं, तब स्वाभाविक रूप से 2022 की यादें ताजा हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में स्थिति नहीं संभाली तो पिछला इतिहास दोहराया जा सकता है। गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने तीन सदस्यीय समिति बनानी पड़ी है। इसके साथ ही 66 नेताओं को दिल्ली बुलाकर बातचीत शुरू की है। इससे नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा और संगठनात्मक शिकायतों का समाधान खोजा जा सकेगा।
समिति संगठनात्मक अनुशासन लागू करने का साहस दिखाएगी?
राजनीति की जानकार मानते हैं कि केवल समिति, बैठकें और रिपोर्ट तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या समिति निष्पक्ष ढंग से सभी पक्षों को सुनेगी? क्या वह संगठनात्मक अनुशासन लागू करने का साहस दिखाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या समिति मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले नेताओं को सामूहिक नेतृत्व के लिए तैयार कर पाएगी? यदि समिति केवल औपचारिक कवायद बनकर रह गई तो इसका कोई विशेष लाभ नहीं होगा। पंजाब कांग्रेस की समस्या व्यक्तियों के बीच मतभेद से अधिक नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा है। इसका समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है।
राहुल गांधी और हाईकमान की एक बार फिर कड़ी परीक्षा
पंजाब कांग्रेस की स्थिति कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी के लिए भी बड़ी परीक्षा है। पार्टी लंबे समय से राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रही है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में गुटबाजी ने कांग्रेस को कई बार नुकसान पहुंचाया है। पंजाब में स्पष्ट रणनीति न होने से विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने के लगातार अवसर मिल रहे हैं। जनता यह जानना चाहती है कि कांग्रेस चुनाव किस नेतृत्व में लड़ेगी और उसके पास शासन का स्पष्ट रोडमैप क्या है। यदि पार्टी केवल आंतरिक संघर्षों में उलझी रही तो मतदाता किसी अन्य विकल्प की ओर रुख कर सकते हैं।
हर गुट समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाएगा
आने वाले विधानसभा चुनाव में गुटबाजी का असर केवल सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होगा, संसाधनों का बंटवारा असंतुलित होगा और स्थानीय स्तर पर बगावत की संभावनाएं बढ़ेंगी। टिकट वितरण के समय यह संकट और गहरा सकता है। यदि प्रत्येक गुट अपने समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाएगा तो असंतोष बढ़ना तय है। राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनाव केवल लोकप्रिय नेताओं से नहीं, बल्कि मजबूत संगठन से जीते जाते हैं। कांग्रेस के पास पंजाब में अभी भी अनुभवी नेता है, लेकिन यदि यह शक्ति आपसी संघर्ष में खर्च होती रही तो उसका लाभ विरोधी दलों को मिलेगा।
ऑब्जर्वर ने पार्टी विधायकों व पूर्व विधायकों से फीडबैक लिया
पार्टी के अंदर चल रही गुटबाजी को खत्म करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने कमेटी बनाई है। पार्टी के तीन ऑब्जर्वर आज (17 जून) को लगातार दूसरे दिन भी पार्टी के विधायकों व पूर्व विधायकों से फीडबैक ले रहे हैं। यह प्रक्रिया कल तक चलेगी। इसके बाद ऑब्जर्वर्स की तरफ से अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंप दी जाएगी। माना जा रहा है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस 2027 में होने वाले चुनाव से पहले नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। इस दौरान ऑब्जर्वर्स कोशिश कर रहे हैं कि हर नेता को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। कांग्रेस के ऑब्जर्वर्स ने इंदिरा भवन में सांसदों, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्षों और पूर्व मंत्रियों समेत वरिष्ठ नेताओं से वन-टू-वन बातचीत कर उनकी राय जानी जा रही । मौजूदा विधायकों, पूर्व विधायकों और जिला कांग्रेस अध्यक्षों से कल और परसों मुलाकात की जाएगी। ऑब्जर्वर्स से मिलने वाले नेताओं में कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा, डॉ. अमर सिंह, गुरजीत सिंह औजला, डॉ. धर्मवीर गांधी और पूर्व पीपीसीसी प्रमुख शमशेर सिंह दूलो शामिल रहे।

मोदी-योगी-अमित द्वारा कांग्रेस को उसी भाषा में जवाब देने पर कांग्रेस में बंट रही जूतों में दाल

आसमान पर थूका अक्सर अपने ऊपर आता है मतलब जब तक किसी नग्न के सामने नग्न ना हो तो नग्न अपने आपको सुरमा भोपाली समझ अपनी मनमानी करता रहता है। कांग्रेस इतने वर्ष सत्ता में रहकर अपने आपको सुरमा भोपाली समझ अपनी मनमानी करती रही। संविधान का मूल स्वरुप ही बिगाड़ दिया और बात करती है संविधान बचाओ का शोर मचाकर जनता को गुमराह करती फिर रही है। 2014 से अब तक संविधान में जितने सुधार हुए हैं उन सबसे परेशान हो गयी है। देशप्रेमी पार्टी को छोड़ रहे हैं। कांग्रेस चुनाव-दर-चुनाव हार रही है। जिस कारण कांग्रेस में जूते में दाल बंट रही है और कांग्रेस खा रही है, मजे में ना सही, मजबूरी में ही सही। मोदी-योगी-अमित कांग्रेस को उसी भाषा में जवाब दे रहे हैं जिसकी कांग्रेस हक़दार है।
आज कांग्रेस मोदी-योगी और अमित को क्या कुछ नहीं बोल रही, लेकिन भूल रहे हैं कि आज बीजेपी में मोदी, योगी और अमित शाह जैसों की कमी नहीं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत सरमा और अब बंगाल के शुभेंदु अधिकारी के काम को देख ले। मुस्लिम कट्टरपंथी कहते हैं कि 'जितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा' लेकिन बीजेपी हर राज्य से मोदी, योगी और अमित शाह निकाल रही है।
दूसरे, आतंकवादियों को दामाद की तरह पालने की बजाए उन्हीं की भाषा में जवाब देने पर कांग्रेस और इसकी पिछलग्गू पार्टियां बिलबिलाती दिखती हैं। इतना ही नहीं पाकिस्तान को कंगाल हालत में पहुँचाने में कांग्रेस का ही हाथ है क्योकि कांग्रेस जितनी कमजोर होगी पाकिस्तान भी उतना ही कमजोर होगा।
आज भाजपा कांग्रेस को उसके स्टाइल में ही जवाब दे रही है!
भाजपा उसी जूते का भरपूर उपयोग कर रही हैं जिस जूते से कभी कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार को मारा था, आज नरेंद्र मोदी, योगी और अमित शाह उसी जूते से कांग्रेस को दाल परोस रहे हैं।
इसे ही कहते हैं 'मियां की जूती, मियां के सर।'

आज कांग्रेसी नेता यह कहते हुए कहीं भी मिल जाएंगे!
बीजेपी में नैतिकता नहीं है।
बीजेपी विधायक खरीद रही है।
बीजेपी सांसद खरीद रही है। बीजेपी सरकार गिरा रही है, विपक्ष को ख़त्म कर रही है, लोकतंत्र खतरे में, यह आखिरी चुनाव आदि आदि।
अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ सोनिया गांधी और उसके सलाहकार अहमद पटेल ने जो कुछ किया था पत्रकार स्वप्नदास गुप्ता के अनुसारः-
''अटल जी के आंखों में आंसू आ गए थे और वहां मौजूद कई लोगों ने अटल जी को रोते देखा था।''
16 अप्रैल 1999 को अटल जी के सरकार का बहुमत परीक्षण होने वाला था अटल जी आश्वस्त थे कि वह बहुमत साबित कर देंगे।
कांग्रेस ने इतना गंदा खेल खेला की एनडीए में शामिल अकाली दल के सांसद इंद्रकुमार गुजराल को तोड़ा और गुजराल ने ह्विप का उल्लंघन करके अटल बिहारी वाजपेयी जी के खिलाफ वोट डाला।
इसके अलावा उस वक्त फारुख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस जो NDA में शामिल थी।
उस नेशनल कांफ्रेंस के सैफुद्दीन सोज को अहमद पटेल ने कुरान की कसम देकर अटल बिहारी वाजपेयी जी के सरकार के खिलाफ वोट देने को कहा था।
यह सब तो ठीक था। क्यों कांग्रेस सत्ता पाने के लिए कुरान को ले आयी? आज जब मन्दिरों के मुद्दों को बीजेपी लेकर आती है तो कांग्रेस और इसकी पिछलग्गू पार्टियां किस आधार पर धर्म को चुनावों में लाने के लिए बीजेपी को गलत बताती है? मुस्लिम वोटबैंक की खातिर मन्दिरों को विवादित बना दिया। कोर्ट में पुरुषोत्तम श्रीराम और रामसेतु को काल्पनिक किसने बताया?
उससे भी बढ़कर नीचता देखकर उस वक्त सब चौंक गए कि जब 15 फरवरी को ही उड़ीसा के मुख्यमंत्री का शपथ ले चुके गिरधर गोमांग सदन में आ गये थे।
नैतिकता के अनुसार जब वह मुख्यमंत्री पद का शपथ ले लिए तब उन्हें संसद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। लेकिन फरवरी में वह मुख्यमंत्री बने और अप्रैल तक उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया।
यह तो अटल बिहारी बाजपेयी जी की महानता थी कि उन्होंने सदन में खड़े होकर कहा थाः
''मैं सोनिया गांधी और गिरधर गोमांग के विवेक पर छोड़ता हूं कि क्या वह जो कर रहे हैं वह नैतिक रूप से ठीक है और मुझे विश्वास है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज मानते हुए गिरधर गोमांग सदन की वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे क्योंकि वह एक मुख्यमंत्री बन चुके हैं।''
लेकिन उसके बावजूद भी भारत के लोकतंत्र की हत्या करते हुए सोनिया गांधी ने गिरधर गोमांग से वोट दिलवाया था और मात्र एक वोट से अटल जी की सरकार गिर गयी थी। बाद में लॉबी में सारे पत्रकार थे और अटल बिहारी वाजपेयी जी की आंखें आंसुओं से भरी हुई थी
क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी जी को विश्वास था की सोनिया गांधी और गिरधर गोमांग देश के लोकतंत्र का सम्मान करेंगे।
एक जमाना था जब बीजेपी में नैतिकता उदारवादी बहुत चलती थी और जिसका फायदा इन कांग्रेसियों ने उठाया।
अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह कांग्रेस को एक-एक वोट के लिए एक-एक सरकार के लिए तरसा दे रहे हैं।

जब भी कोई कांग्रेस की सरकार गिरती है तो कसम से हर देशप्रेमी और लोकतंत्र प्रेमी को बड़ा सुकून मिलता है।