दिल्ली पुलिस कमिश्नर को NSA के तहत मिली हिरासत में लेने की शक्ति, छात्रों के नाम पर हिंसा के बीच केंद्र का बड़ा फैसला : पुलिस ने बताया- रूटीन प्रक्रिया

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत लोगों को हिरासत में लेने की शक्तियाँ दे दी हैं। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब छात्रों के नाम पर शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ (CJP) का प्रदर्शन हिंसक और उग्र हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संबंध में बुधवार (22 जुलाई 2026) को दिल्ली गजट (असाधारण) में आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। हालाँकि, इस अधिसूचना पर 15 जुलाई की तारीख दर्ज है। अनुराग कुमार की हाल ही में दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्ति हुई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना औपचारिक आरोप तय किए 12 दिन से लेकर 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। नई अधिसूचना के अनुसार, 19 जुलाई से 18 अक्टूबर तक तीन महीने की अवधि के लिए यह निवारक हिरासत (Preventive Detention) की शक्ति लागू रहेगी। अधिसूचना में कहा गया है कि दिल्ली के उपराज्यपाल को यह यकीन है कि सार्वजनिक सुरक्षा के हित में हिरासत की यह शक्ति सौंपना आवश्यक है।

अधिसूचना में कहा गया है, “राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 2(ई) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 3(3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, दिल्ली के उपराज्यपाल ने निर्देश दिया है कि निर्धारित अवधि के दौरान दिल्ली पुलिस आयुक्त भी कानून की धारा 3(2) के तहत निरोधक प्राधिकारी (Detaining Authority) की शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे।”

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अनुसार, इस अधिकार के तहत दिल्ली पुलिस आयुक्त उन लोगों के खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी कर सकते हैं जिनकी गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा या आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति एवं रखरखाव के लिए हानिकारक मानी जाएँ। इस कानून के तहत सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित प्राधिकरण जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस प्रमुखों को भी निरोधक प्राधिकारी नियुक्त कर सकता है।

पिछले वर्ष 26 सितंबर को लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने एक आदेश जारी किया था जिसके बाद सोनम वांगचुक को NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। उनके आंदोलन के दौरान क्षेत्र में हुई घातक हिंसा के बाद यह कार्रवाई की गई थी। उन्हें 170 दिनों तक हिरासत में रखा गया था।

जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब हिंसक हो गया है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ मारपीट की गई है और पत्थर-बोतलें भी फेंकी गईं। इससे पहले मानसून सत्र के पहले दिन CJP के सदस्य संसद तक मार्च करने के लिए बैरिकेड तोड़ने की कोशिश कर चुके थे जिसके बाद दिल्ली में झड़पें और तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी।

सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधि पहले ही कह चुके हैं कि केंद्र सरकार ने न तो हुई गलती को कम करके दिखाया है और न ही जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार उनकी ‘राजनीतिक’ माँग मानने का कोई इरादा नहीं रखती। एक अधिकारी ने कहा, “समस्या हुई थी। हमने इसे रिकॉर्ड पर स्वीकार किया है और रिकॉर्ड पर ही इसकी जिम्मेदारी भी ली है। सरकार इससे भाग नहीं रही है।”

एक अन्य अधिकारी ने कहा, “हम यह नहीं कह रहे कि लोगों को विरोध नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को विरोध करने का पूरा अधिकार है। लेकिन मुद्दा कौन उठा रहा है, किस तरीके से उठा रहा है और उसके पीछे कौन लोग हैं, ये अलग सवाल हैं। क्या हमें राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाना चाहिए?”

उन्होंने आगे कहा, “जिस व्यवस्था पर हमने भरोसा किया था, उसी के लोगों ने उसे कमजोर कर दिया। हम पेपर माफिया नहीं हैं। व्यवस्था के भीतर के लोगों ने हमें निराश किया, हमने उन पर भरोसा किया था। हमने पेपर लीक की घटना नहीं छिपाई। हमने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की और इसे ठीक करने की कोशिश की।”

दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (23 जुलाई 2026) को आधिकारिक बयान जारी कर उन खबरों का खंडन किया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि राष्ट्रीय राजधानी में चल रहे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रदर्शनों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस आयुक्त को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत विशेष रूप से निवारक हिरासत (Preventive Detention) की शक्तियाँ दी गई हैं।

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि यह एक नियमित आदेश है जिसे हर तीन महीने में रीन्यू किया जाता है। पुलिस ने कहा कि इस आदेश का मौजूदा CJP प्रदर्शनों से कोई संबंध नहीं है। मौजूदा आदेश 7 जुलाई 2026 को जारी किया गया था, जो 19 जुलाई 2026 से 18 अक्टूबर 2026 तक की अवधि के लिए प्रभावी है।

(नोट इस खबर को दिल्ली पुलिस के बयान के बाद अपडेट किया गया है)

चेहरे चमक गए, पर मुद्दे धुंधले पड़े: CJP की अंदरूनी लड़ाई ने आंदोलन की साख पर उठाए सवाल


NEET पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।

लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।

साभार : सोशल मीडिया 

CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।

अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।

दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है। 

दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”

असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।

जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।

इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।

वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।

उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।

जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।

किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।

ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।

CJP के गुंडों ने महिला रिपोर्टरों से की बदसलूकी, कपड़े फाड़े, मारा-पीटा : ‘संसद चलो’ प्रदर्शन में हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को चुन-चुनकर बनाया निशाना, हमले की 10+ घटनाएँ

                                              सीजेपी प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों पर हमले
जंतर-मंतर पर पिछले डेढ़ महीने से ‘छात्र हितों’ के नाम पर धरना देकर बैठे ‘कॉकरोचों’ का असली चेहरा 20 जुलाई 2026 के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के वक्त सामने आ गया। इस दौरान उपद्रवियों ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि ग्राउंड जीरों पर सच दिखाने पहुँचे पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना भी बनाया।

कॉकरोचों के इस हिंसक प्रदर्शन में छात्र काम और गुंडों का जमावड़ा है जिसने इनके असली मुद्दे को बिलकुल ख़त्म कर दिया है। दूसरे, भारत विरोधी ताकतों की नचनिया बना विपक्ष अगर देश को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका बनाने के रास्ते पर जा रहे हैं वह इनके अंजामों से बेखबर होना इनके दिवालिया मानसिकता का सबूत है। जितना ज्यादा प्रदर्शन हिंसक होगा उतना ही विपक्ष को नुकसान होने वाला है। जनता भी चुपचाप इनकी जहरीली सोंच को देख रही है।   

कथित ‘प्रदर्शनकारियों’ में शायद इस बात का डर था कि जमीन पर मौजूद मीडियाकर्मी उनकी हकीकत देश के सामने ले आएँगे, इसलिए अपनी विचारधारा से अलग सवाल पूछने या तथ्यों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना बना लिया गया।

20 और 21 जुलाई से सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो CJP के प्रदर्शन में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए पत्रकारों के साथ हुई बर्बरता को उजागर करते हैं। कहीं रिपोर्टरों को उग्र भीड़ बीच सड़क पर घेरकर धक्के दे रही है, तो कहीं उनके साथ मारपीट की जा रही है।

महिला पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी और खींचतान की तस्वीरें सामने आई हैं। जो भी पत्रकार अपनी ड्यूटी निभाने वहाँ पहुँचा, उसे ‘गोदी मीडिया’ का टैग देकर डराने, रोकने और हाथापाई करने की कोशिश की गई- यहाँ तक कि उनके कपड़े फाड़े गए और चश्मे-कैमरे तक तोड़ दिए गए।

आपको कम से कम ऐसी 10 घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिनसे पता चले कि CJP प्रदर्शन के दौरान कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ कैसे बर्बरता हुई।

ऑपइंडिया के अनुराग मिश्रा पर बार-बार हमले

ऑपइंडिया के निर्भीक पत्रकार अनुराग मिश्रा को इस प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान बार-बार निशाना बनाया गया। 18 जुलाई को जब अनुराग जंतर-मंतर पर सामान्य सवाल पूछ रहे थे, तब भीड़ ने उन्हें घेरकर हाथापाई की। इसके बाद जब 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने उन्हें दोबारा निशाना बनाया और ‘गोदी मीडिया’ का कहकर, उन पर दोबारा हिंसक हमला किया।   

Times Now के देव कोटक की शर्ट फाड़ी, चश्मा तोड़कर चेहरे पर मारा

टाइम्स नाऊ के रिपोर्टर देव कोटक पर हुआ हमला इस हिंसक भीड़ की क्रूरता को बयाँ करता है। अभिजीत दीपके का इंटरव्यू लेने जंतर-मंतर पहुँचे देव पर ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारों के बीच अचानक चारों तरफ से लात-घूँसे, मुक्के और बोतलें बरसाई गईं। धक्का देकर उन्हें जमीन पर गिरा दिया गया, उनकी शर्ट फाड़ दी गई और घड़ी व मोबाइल छीन लिया गया। जब देव ने चिल्लाकर कहा कि चश्मे को न छुआ जाए, उन्हें उसके बिना धुंधला दिखता है, तो उपद्रवियों ने उनका चश्मा छीनकर तोड़ दिया और उसी टूटे चश्मे से उनके मुँह पर वार किया।

एबीपी न्यूज के वरुण भसीन और मीडिया गाड़ियों पर पथराव

अनुराग और देव की तरह ही एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन के साथ भी बदसलूकी हुई। रिपोर्टिंग के दौरान प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेरकर नारेबाजी की। वरुण ने अपनी आपबीती में बताया कि आंदोलन में शामिल युवा पूरी तरह हिंसक हो चुके थे। वे न केवल पत्रकारों को डरा रहे थे, बल्कि मीडिया की गाड़ियों पर पथराव कर रहे थे और कैमरे तोड़ने की फिराक में थे। सामने आई वीडियो में भीड़ को उनका पीछा करते हुए, उनपर स्प्रे मारते हुए देखा जा सकता है।

ऑपइंडिया की रितिका चंडोला को निशाना बनाया

महिला पत्रकारों के साथ इस भीड़ का रवैया बेहद शर्मनाक रहा। ऑपइंडिया की महिला पत्रकार रितिका चंडोला ने जब ग्राउंड पर जाकर शिक्षा के नाम पर शुरू हुए इस प्रदर्शन में छिपी गंदी राजनीति और ‘ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ लग रहे नारों पर सहजता से सवाल पूछे, तो जय भीम का नारेबाजी करने वाले आंदोलनकारी बौखला गए। तर्क का जवाब तर्क से देने के बजाय रितिका पर ‘गोदी मीडिया’ का टैग लगाकर उन्हें चुप कराने और डराने का प्रयास किया गया।

बैंक में छिपकर ज्योति मिश्रा ने बचाई जान, शेफाली निगम से भी बदसलूकी

टाइम्स नाऊ की ज्योति मिश्रा जब जनता की बात दिखाने पहुँचीं, तो उग्र भीड़ उनके पीछे पड़ गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने भांप लिया कि अगर ज्योति का सिर दिखा तो भीड़ पत्थर मारकर उनकी जान ले सकती है।

ज्योति को अपनी जान बचाने के लिए एक पास के बैंक में शरण लेनी पड़ी। बैंक कर्मी के अनुसार, हमलावरों की संख्या एक हजार से अधिक थी, जिन्होंने बैंक के अंदर घुसकर हमला करने की कोशिश की।

इसी तरह शेफाली निगम को भी प्रदर्शनकारियों द्वारा बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि भीड़ पीछे से आकर शेफाली को घेरती है और फिर पीछे से मारा जाता है।

2 महिला पत्रकारों के साथ खींचतान और छेड़छाड़

सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक और वीडियो में दो महिला पत्रकारों को भीड़ द्वारा घेरकर उनके साथ बदसलूकी हो रही है। दोनों पत्रकार भड़की हुई हैं। वह भीड़ से सवाल करती हैं, लेकिन उग्र भीड़ उन पर शारीरिक रूप से हावी होने लगती है और लोग उन्हें ज़बरदस्ती घसीटने लगते हैं। घटना की वीडियो हर जगह वायरल है।

NDTV पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोका

प्रदर्शन के दौरान भीड़ इस कदर पत्रकारों पर हावी थी कि उन्होंने एनडीटीवी की महिला पत्रकार को भी बख्शा नहीं। लाइव कवरेज के दौरान भीड़ उनके पीछे खड़े होकर ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाती रही और उन्हें बोलने तक नहीं दिया। सोशल मीडिया पर इस हरकत को यह कहकर जायज ठहराया गया कि ‘एनडीटीवी को अडानी ने खरीद लिया है’।

NDTV के रवीश रंजन शुक्ला के साथ भी बदसलूकी

वरिष्ठ पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला को भी इस उग्र भीड़ ने बख्शा नहीं। सोशल मीडिया पर आए वीडियो में दिखा कि रवीश सड़क पर बैठे हुए थे और चारों तरफ से भीड़ उन पर चीखते हुए ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही थी तथा उनसे तेज आवाज में ये पूछा जा रहा था कि इतने दिन से वो लोग प्रोटेस्ट कवर करने क्यों नहीं आ रहे थे।
सोशल मीडिया पर रवीश रंजन की वीडियो देख लोगों ने कहा कि ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उनके हाथ में एनडीटीवी का माइक था, जिसे अडाणी ग्रुप खरीद चुका है।

न्यूज 24 के राजीव रंजन की रिपोर्टिंग में अड़ंगा

न्यूज 24 के जाने-माने रिपोर्टर राजीव रंजन को छात्रों ने घेरकर ‘गोदी मीडिया वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनका मज़ाक उड़ाया। हालाँकि, राजीव पीछे नहीं हटे, उन्होंने अपने कैमरामैन के साथ डटकर खड़े रहकर पूरी घटना और भीड़ की गुंडागर्दी को कैमरे में कैद किया।

गौरतलब हो कि 10+ घटनाएँ केवल चंद मामले हैं जिनकी वीडियोज वायरल हुईं, वरना जैसा पैटर्न इन पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के वक्त दिख रहा है, उससे साफ है कि वहाँ सवाल पूछने वाले हर पत्रकार से भीड़ ने ऐसा ही बर्ताव किया होगा।

खबर है कि बिहार के पटना में भी छात्रों के नाम पर प्रदर्शन करने उतरी हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाया है।

पत्रकारों पर हमले की घटना पर एडिटर्स गिल्ड की चुप्पी

दुखद और शर्मनाक बात यह है कि इन घटनाओं को लेकर वो ‘एडिटर्स गिल्ड’ और वामपंथी धड़ा दिन-रात एकदम मौन है, जो समय-समय पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर ढोल पीटता है, लेकिन इन घटनाओं पर उससे कुछ नहीं बोला जा रहा- शायद इनके लिए पत्रकारों का अर्थ सिर्फ वामपंथी ईकोसिस्टम है। 

आरफा खानुम शेरवानी जैसी तथाकथित पत्रकार इन हमलों की निंदा करने के बजाय पत्रकारों की ही निंदा पर उतर आई हैं और पत्रकारों के साथ हुई मारपीट को जायज ठहरा रही हैं। वहीं, द हिंदू की विजेता सिंह जैसे लोग नफरत का बचाव करते हुए उलटे पत्रकारों पर ही ‘घृणा फैलाने’ का आरोप मढ़ रहे हैं।

वामपंथियों की ये समस्या पुरानी है कि जब उनके अनुकूल बात नहीं होती तो वो ऐसा ही रवैया अपनाते हैं। इस बार सीजेपी प्रदर्शन में यही देखने को मिला। उन पत्रकारों को जमकर एंट्री दी गई जो सीजेपी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले लग रहे थे। वहीं राष्ट्रवादी मुद्दों की बात करने वाले पत्रकार, इन्फ्लुएंसर को भगाने का, धमकाने का खूब काम हुआ। 20-21 जुलाई के बाद सामने आई आंदोलन की तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि यह विरोध प्रदर्शन किसी हक की लड़ाई नहीं, बल्कि वामपंथी नफरत और अराजकता का प्रायोजित खेल है।

तमिलनाडु में गोहत्या पर मद्रास हाई कोर्ट ने बैन लगाया; सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगाई

सुभाष चन्द्र

ईसाई स्टालिन सरकार पहले ही हिंदुओं के खिलाफ थी और कार्तिकेय दीपम पर अदालतों के आदेशों की अवहेलना कर रही थी। उस सरकार के जाने के बाद विजय जोसेफ, दूसरा ईसाई 10 मई, 2026 को मुख्यमंत्री बना 

27 मई, 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के Justice GR Swaminathan और Justice वी Lakshminarayanan की खंडपीठ ने राज्य में गायों और बछड़ों की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि गौ हत्या इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और राज्य को दूध उत्पादन व ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए 1976 के सरकारी आदेश को सख्ती से लागू करना चाहिए

लेखक 
चर्चित YouTuber 
मद्रास हाई कोर्ट के इस आदेश से जुड़ी मुख्य बातें और घटनाक्रम निम्नलिखित हैं:

कब और क्या कहा: हाई कोर्ट ने 27 मई 2026 को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बकरीद या किसी भी अन्य दिन राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े का वध नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 का हवाला देते हुए राज्य को 30 अगस्त 1976 के राज्य के सरकारी आदेश का पालन करने का निर्देश दिया

दो महीने बाद विजय जोसेफ सरकार हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और 13 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के Justice Vikram Nath और Justice Sandeep Mehta की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी

राज्य सरकार की दलील:

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी थी सरकार ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट का यह निर्देश राज्य के मौजूदा 'तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958' के खिलाफ है, जो कुछ शर्तों के साथ पशु वध की अनुमति देता है

आर्टिकल 48 और राज्य सरकार के 30 अगस्त, 1976 के आदेश में दुधारू और भार ढोने वाले पशुओं विशेषकर गायों बछड़ों के वध पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है

देश में अनेक राज्यों में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध है जिसमें शामिल हैं -

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना और कर्नाटक

कुछ राज्यों में इन पशुओं के वध के लिए “Fit for Slaughter Certificate” होना आवश्यक है ये राज्य हैं -अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम - दक्षिण भारत के राज्य हैं केरल और लक्षद्वीप

जब इतने राज्यों में गोवध निषेध हो सकता है तो तमिलनाडु में क्यों नहीं जहां 87% हिन्दू आबादी है लगता है विजय जोसेफ स्टालिन से भी एक कदम आगे है

आशा की जाती है सुप्रीम कोर्ट विजय सरकार की अपील पर जल्द सुनवाई कर हाई कोर्ट के निर्णय को बरक़रार रखेगा

CJP आम आदमी पार्टी की B-टीम है : कॉकरोच जनता पार्टी के पूर्व समर्थक ने खोली सारी पोल

        कॉकरोच जनता पार्टी के पूर्व प्रदर्शनकारी वीरू भाई ने खोली AAP नेताओं की पोल (फोटो साभार : News18
वो कहावत है ना… देर आए, दुरुस्त आए। ये ही कहावत अब कॉकरोच जनता पार्टी में देखने को मिल रही है। जी हाँ, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग का मुद्दा अब कहीं भटकता दिखाई दे रहा है। तिलचट्टों के ग्रुप में अब कलह पैदा होती दिख रही है। सीजेपी में अब उनके ही प्रदर्शनकारी पार्टी पर आरोप लगाते दिखाई नजर आ रहे हैं। आंदोलन में लंबे समय से सक्रिय रहे पूर्व प्रदर्शनकारी वीरू भाई ने संगठन और उसके AAP नेताओं की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स से बातचीत में वीरू भाई ने खुलासा किया कि वह करीब एक महीने तक इस आंदोलन से जुड़े रहे, लेकिन अब उन्होंने खुद को कॉकरोच जनता पार्टी के इस प्रदर्शन से अलग कर लिया है। उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। 

इस पार्टी के बनने पर सोशल मीडिया पर चर्चा थी कि इसमें छात्र कम असामाजिक तत्वों का जमावड़ा है। राहुल गाँधी पहले ही देश में माजिस दिखाने की देर की बात कर रहा था, इस आदमी ने मिले LoP पद की गरिमा को ही तार-तार कर दिया है।   

टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत करते हुए उन्होंने खुलासा किया कि वे एक महीने पहले बिहार में अपना घर छोड़कर इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने आए थे। उनके परिवार ने बार-बार उन्हें इसमें शामिल न होने की सलाह दी थी और कहा था कि सीजेपी ‘केवल नाटक कर रही है’, लेकिन वे इस उम्मीद में अड़े रहे कि सीजेपी शिक्षा व्यवस्था को बदलने के लिए संघर्ष कर रही है।

आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं की अनुपस्थिति पर उठे सवाल

मीडिया रिपोर्ट्स से बातचीत के दौरान वीरू भाई ने बताया कि आंदोलन से जुड़े सभी प्रदर्शनकारियों को काफी उम्मीदें थीं। उन्हें लगता था कि आम आदमी पार्टी के बड़े नेता इस प्रदर्शन में उनका साथ देंगे। लोगों को उम्मीद थी कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जैसे दिग्गज नेता मार्च में समर्थन करने जरूर आएँगे।

लेकिन ऐन मौके पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कोई भी बड़ा नेता वहाँ नहीं पहुँचा। पूर्व प्रदर्शनकारी वीरू भाई ने गद्दार पार्टी AAP से सवाल किया कि अगर आम आदमी पार्टी सच में इस आंदोलन का समर्थन कर रही थी, तो फिर उसका कोई भी सांसद प्रदर्शन में शामिल होने क्यों नहीं आया।

छात्रों और महिलाओं को आगे कर खुद पीछे छुपे सीजेपी वाले

पूर्व प्रदर्शनकारी वीरू भाई ने सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके और अन्य मुख्य नेताओं पर आंदोलनकारियों को गुमराह करने के आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया।

इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा। सही नेतृत्व न मिलने के कारण छात्रों को पुलिस की कड़ी कार्रवाई झेलनी पड़ी। नेताओं की इस रणनीति से कई युवा छात्र जख्मी हो गए।

संसद मार्च की अनुमति न होने के बावजूद जोखिम लेने पर सवाल

पूर्व प्रदर्शनकारी ने पुलिस कार्रवाई के दौरान नेताओं की भूमिका पर भी उंगली उठाई है। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस ने पहले ही साफ कर दिया था कि ‘संसद चलो’ मार्च की कोई अनुमति नहीं है। पुलिस ने रास्तों पर मजबूत बैरिकेडिंग भी कर रखी थी।

इसके बावजूद आयोजकों ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने के लिए उकसाया। जब सब जानते थे कि आगे खतरा है, तब भी आम लोगों को बैरिकेड्स तोड़ने के लिए आगे क्यों भेजा गया। नेताओं की इस लापरवाही के कारण ही स्थिति इतनी खराब हुई।

20 जुलाई के संसद मार्च में हुई हिंसा का पूरा लेखा-जोखा

यह पूरा विवाद 20 जुलाई 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा निकाले गए ‘संसद चलो’ मार्च के बाद शुरू हुआ है। सीजेपी के कार्यकर्ता शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर सड़क पर उतरे थे। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हो गई थी।

दिल्ली पुलिस के अनुसार इस हिंसा में कुल 178 लोग घायल हुए हैं। घायलों में 118 पुलिसकर्मी और करीब 60 प्रदर्शनकारी शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना पड़ा था।

मोदी के आवास के बाहर हंगामा कराने के लिए राहुल-प्रियंका गाँधी ने अपने ही सांसदों से बोला झूठ? रिपोर्ट में सामने आया कैसे बरगलाए गए MP

                               राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास 7 लोक कल्याण मार्ग के बाहर 21 जुलाई 2026 (मंगलवार) को उस समय बड़ा राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला, जब कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और पार्टी के कई सांसदों ने अचानक धरना शुरू कर दिया। राहुल गाँधी ने कहा कि उनका विरोध NEET पेपर लीक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ है।

इससे पहले CJP के प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च निकालने निकले थे। इस दौरान भीड़ ने हिंसक रूप ले लिया, पुलिसकर्मियों पर हमला किया और संसद परिसर की ओर बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले छोड़े। बाद में PM आवास के बाहर धरना देने वाले राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और कई कांग्रेस नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

प्रधानमंत्री मोदी के आवास के बाहर राहुल गाँधी और कांग्रेस नेताओं का धरना सुरक्षा में बड़ी चूक माना गया। इसी वजह से पुलिस ने कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया। हालाँकि, अब सामने आई रिपोर्ट में राहुल गाँधी की साजिश को लेकर गंभीर दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राहुल गाँधी ने अपने ही नेताओं से झूठ बोलकर उन्हें इस सुरक्षा उल्लंघन में शामिल होने के लिए तैयार किया।

राहुल गाँधी ने अपने ही नेताओं से कैसे धरने के लिए बोला झूठ?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गाँधी के इस धरने की योजना आखिरी समय तक पूरी तरह गुप्त रखी गई थी। कांग्रेस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार और एसपीजी (SPG) को इसकी भनक न लगे, इसलिए राहुल गाँधी ने अपने लगभग 25 सांसदों को यह तक नहीं बताया था कि वे प्रधानमंत्री के आवास के बाहर धरना देने जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा झूठ राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल ने मिलकर गढ़ा था।

रिपोर्ट के अनुसार, सांसदों से कहा गया था कि उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के जन्मदिन की शुभकामनाएँ देने उनके आवास पर जाना है। मल्लिकार्जुन खरगे का आवास 10 राजाजी मार्ग पर है, जो पीएम मोदी के 7 लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एक कांग्रेस सांसद ने बताया, “जन्मदिन का कार्यक्रम खत्म होने के बाद हमें कहा गया कि बिना कोई सवाल पूछे राहुल गांधी के काफिले के पीछे चलो। हमने ऐसा ही किया। जब हम 7 लोक कल्याण मार्ग पहुँचे, तब हमें बताया गया कि अब हमें यहीं बैठना है।”

सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई तो राहुल गाँधी ने बदल दीं अपनी माँगें

धरने के दौरान सरकार ने राहुल गाँधी से बातचीत करने का फैसला किया। यह बातचीत इसलिए शुरू की गई क्योंकि प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने से आम लोगों को भारी असुविधा हो रही थी और यह सुरक्षा के लिहाज से भी खतरा बन गया था। हालाँकि, सरकार के बातचीत के लिए आगे आने के बाद भी राहुल गाँधी ने अपना रुख बदल लिया।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस के धरने के दौरान राहुल गांधी ने अपनी पहली माँग मान लिए जाने के बाद एक नई माँग जोड़ दी।
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह करीब एक घंटे बाद प्रदर्शन स्थल पर पहुँचे और राहुल गाँधी से बातचीत की। इसके बावजूद कांग्रेस सांसदों ने बाद में कहा कि बातचीत से कोई समाधान नहीं निकला और सरकार उनकी माँगों को पूरा करने में विफल रही।
जितेंद्र सिंह ने X पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्हें और केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन को सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए भेजा गया था क्योंकि प्रदर्शन का नेतृत्व कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा जैसे वरिष्ठ नेता कर रहे थे।
जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि बातचीत के दौरान राहुल गाँधी ने उनसे कहा था कि यदि सरकार संसद में NEET विवाद, कथित पेपर लीक और देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर चर्चा कराने के लिए तैयार हो जाए तो धरना समाप्त कर दिया जाएगा।
जितेंद्र सिंह के अनुसार, उन्होंने तुरंत सरकार के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत की और वापस आकर राहुल गाँधी को बताया कि सरकार संसद में NEET और परीक्षा विवाद से जुड़े सभी मुद्दों पर चर्चा कराने के लिए तैयार है।
जितेंद्र सिंह ने कहा कि इसके बाद धरना समाप्त करने के बजाय राहुल गाँधी ने एक नई शर्त रख दी। उनके अनुसार, राहुल गाँधी ने कहा कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देंगे तब तक धरना खत्म नहीं होगा।
जितेंद्र सिंह ने कहा, “सरकार द्वारा संसद में चर्चा कराने पर सहमति देने की जानकारी मिलने के बाद राहुल गाँधी ने कहा कि केवल इतना काफी नहीं है और केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी चाहिए।”
मंत्री ने आगे दावा किया कि उन्होंने राहुल गाँधी को याद दिलाया कि कुछ मिनट पहले तक उनकी केवल एक ही माँग थी कि संसद में चर्चा हो। इस पर राहुल गाँधी ने जवाब दिया कि अब उनकी माँगें बदल गई हैं। बाद में राहुल गाँधी ने कहा कि अपनी माँगें बदलना उनका अधिकार है।

अब क्या हैं राहुल गाँधी की माँगें

इसके बाद जब राहुल गाँधी को हिरासत में लिया गया तो उन्होंने अपनी माँगों की सूची और बढ़ा दी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनकी नई माँगों में शामिल हैं-
  • गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
  • सोमवार को छात्रों पर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेना।
  • सोमवार की पुलिस कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री से माफी।
  • संसद में इस पूरे मुद्दे पर चर्चा।
  • जल्द से जल्द शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार।
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी पर हिंसक तत्वों का समर्थन करने के आरोप लगे हैं। वर्ष 2020 के दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान भी राहुल गाँधी ने लगातार दंगाइयों का समर्थन किया था और सोनिया गाँधी के साथ मिलकर हिंसा भड़काने के आरोप लगे थे। इतना ही नहीं ऑपइंडिया की रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि राहुल गाँधी के करीबी सहयोगी सचिन राव उस व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा थे जहाँ इन दंगों की योजना बनाई गई थी।

‘हमारा समय बर्बाद मत करो’: CJP के समर्थन में आई याचिका पर सुनवाई से SC का इनकार, CJI सूर्यकांत ने कहा- ‘वीडियो देखने का वक्त नहीं’


दिल्ली में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन पर कथित पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से साफ इनकार कर दिया। बुधवार (22 जुलाई 2026) को जब एक वकील ने मामले की अर्जेंट लिस्टिंग की माँग की तो मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “हमारा समय बर्बाद मत करिए, अपना समय भी बर्बाद मत करिए।”

मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच के सामने हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं और दिल्ली पुलिस उनके खिलाफ बर्बर कार्रवाई कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्र NEET परीक्षा सही तरीके से कराने, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) में सुधार और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे उठा रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की पैरवी करने वाले वकीलों से Bar Association को पूछना चाहिए कि भारत को नेपाल या बांग्लादेश बनाना चाहते हो? प्रदर्शन में कितने छात्र थे और कितने बिकाऊ गुंडे? क्योकि जिस तरह का उपद्रव हुआ है वह गुंडे ही कर सकते हैं छात्र नहीं।

हालाँकि, CJI ने वकील की बात बीच में ही रोकते हुए कहा, “थैंक यू वेरी मच।” जब वकील ने पुलिस की कथित ज्यादती के वीडियो दिखाने की बात कही तो CJI ने दो टूक जवाब दिया, “हमें वीडियो में कोई रुचि नहीं है। हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है।” इसके बाद बेंच ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया।

इससे एक दिन पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इसी मुद्दे पर तत्काल सुनवाई की माँग ठुकरा दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था, “कोर्ट को इसमें मत घसीटिए।”

CJP और देशभर से आए छात्र जंतर-मंतर समेत दिल्ली के कई इलाकों में लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने जुलाई 20 को संसद तक मार्च निकालने की योजना बनाई थी लेकिन दिल्ली पुलिस ने उन्हें रास्ते में रोक दिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथरावा किया और उनकी गाड़ियों में तोड़फोड़ की। वहीं, प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल किया जिसमें कई प्रदर्शनकारी घायल हुए।

बंगाल के मुख्यमंत्री सुभेंदू अधिकारी ने पटल पर रख दी 33 साल पुरानी हत्याकांड की रिपोर्ट, जिस पर ममता तक सब खामोश रहे

अगर सच सहन करने की क्षमता हो तो ही आगे पढ़े वरना यहीं से छोड़ दे.

क्योंकि मेरे पास वो सत्य होता है, जिसे पढ़ कर आपकी।आत्मा कांप सकती है अगर बची हो तो और वो सत्य जो हवा में उड़ते बिना अधार वाले उन लोगों को जमीन पर ला सकता है, जो बात बात में मोदी चोर है, मोदी चोर है के नारे लगाते फिरते हैं.
कल जब संसद में घुसते हुए प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस ने हल्का बल पप्रयोग किया, और उन चार डंडों पर पूरे विपक्ष को घड़ियाली आंसू बहाते देखा, और छाती पीटते देखा, तब आप सबको लगा होगा कि विपक्ष कितना इमोशनल है बच्चों के लिए.
पर कल के पूरे हंगामे में एक और घटना घट रही थी, दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर. किसी का ध्यान नहीं गया. वो घटना घट रही थी बंगाल में, कलकत्ता विधान सभा में. जहां बंगाल के मुख्य मंत्री सुभेंदू अधिकारी एक 33 साल पुरानी हत्याकांड की रिपोर्ट, जो कहीं दबा दी गई थी, उसे विधान सभा के पटल पर रख रहे थे.
मैंने भी नहीं सुना था, शायद हमारी पीढि में से किसी ने भी ये चीज़ नहीं सुनी, कि आज से 33 साल पहले बंगाल में क्या हुआ था,
किसकी रिपोर्ट थी ये. और 33 साल बाद क्यों बाहर आई?
अब जरा धैर्य से पढ़िये.
जैसे कल जंतर-मंतर से चलकर संसद में घुसने के लिए वामपंथ, आम आदमी पार्टी, कॉंग्रेस, का कोकटेल, छात्रों के नाम पर संसद की तरफ बढ़ा, उसी तरह 21 जुलाई 1993 को बंगाल के कलकत्ता के धरमतला क्षेत्र में, युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता और नेता लोग राइटर्स बिल्डिंग की तरफ बढ़ रहे थे. उस वक्त सत्ता में थे वामपंथी, ज्योति बसु की सरकार थी. और जब वो युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दल राइटर्स बिल्डिंग की तरफ बढ़ रहा था,
अभी वो राइटर्स बिल्डिंग से बहुत काफी दूर थे, तभी अचानक उन कार्यकर्ताओं पर पुलिस की गोलिया चलती हैं, और उनमें 13 कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं की मौत हो जाती है.
सन्नाटा पसर जाता है पूरे बंगाल में. जब हल्ला मचता है, तो सरकार की तरफ से एक आयोग गठित किया जाता है, जिसको चटर्जी आयोग कहा गया था.
चटर्जी आयोग की रिपोर्ट आती है, और अलमारी में धूल फांकती है. उसी धरमतला हत्याकांड को राजनीती का मुद्धा बनाकर ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग होती है, और बंगाल की सत्ता में आती है.
और जिस दिन ये हत्याकांड हुआ था, उसी 21 जुलाई को शहीद दिवस घोषित करती है, और हर साल tmc शहीद दिवस मनाती है. लेकिन 15 साल सत्ता में रहने के बाद भी ममताबनर्जी ने उस रिपोर्ट को कभी संसद के पटल पर नहीं रखा, कभी उसको सार्वजनिक नहीं किया. क्यों?
क्योंकि आज जो तृणमूल कॉंग्रेस के बड़े बड़े नेता हैं, वो उस वक्त वामपंथ सरकार के हिस्से थे. और उन सब नेताओं का नाम उस रिपोर्ट में है.
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ये लिखा है कि उस वक्त स्वागत राय, ममताबनर्जी ये सब बड़े गवाहों की लिस्ट में थे, लेकिन पुलिस ने इनसे कभी पूछताछ ही नहीं करी.
ओर गोली चलाने के आदेश किसने दिए इसके दस्तावेज ज्योति बसु सरकार ने कभी आयोग को दिए ही नही
अब बताईए ऐसी रिपोर्ट ममताबनर्जी कैसे पटल कर सकती थी? जबकि उसी रिपोर्ट की कमाई खाकर ममताबनर्जी मजैसे लोग सत्ता में आये थे.
और कॉंग्रेस जो आज घडियाली आँसु बहा रही है, इन उग्र प्रदर्शन कारियों के और वामपंथी कोकटेल के लिए, उस कॉंग्रेस ने 33 साल में अपने युवा कार्यकर्ताओं की हत्या पर एक सवाल नहीं उठाया, ना बंगाल विधानसभा में, ना संसद में, और ना ही कहीं सड़क पर.
क्या वो किसी के बच्चे नहीं थे?
अरे प्रियंका गांधी जी वो आपकी सत्ता के पाए मजबूत करने के लिए मरे थे वहाँ.
आज संसद में घुसने से रोकने के लिए चार डंडे मारने वाले, मोदी को आप राक्षस और तानाशाह और पता नहीं क्या-क्या कह रहे हो. तो आप क्या हो?
उन 13 कार्यकर्ताओं, मरने वाले 13 कार्यकर्ताओं के घरों वालों को ना तो मुआवजा मिला, ना उनको न्याय मिला. लेकिन एक बात जो सुबेंदु अधिकारी ने बंगाल की विधानसभा में कल कही, उसने पूरे बंगाल में और पूरी बंगाल की राजनीती में खलबली मचा दी.
उन्होंने कहा कि उन 13 कार्यकर्ताओं, भले वो कॉंग्रेसी थे, लेकिन वो बंगाली थे. और अन्याय के शिकार हुवे थे. अगर उन 13 कार्यकर्ताओं के परिवार के लोग अगर आज चाहेंगे, तो हम दुबारा FIR लिख सकते हैं, और दुबारा उस केस की जाच कर सकते हैं. और उस रिपोर्ट में जो मुआवजा, 25-25 लाख रुपे देने के लिए चटरजी आयोग ने सिफारिश करी थी, अगर परिवार चाहेंगे, तो आज वो मुआवजा हम मुख्यमंत्री राहत कोस से देने की वादा कर सकते हैं.
ये है उस वामपंथ, कॉंग्रेस और तृणमूल कॉंग्रेस का असली खूनी सच जो आज तक देश की जनता से छुपाया गया था. लेकिन राजनीती इतनी घृणित होती है कि आज उन्ही कॉंग्रेस और तृणमूल कॉंग्रेस और वामपंथियों को जरा भी शर्म नहीं आती है. आज फिर वो वही खेल खेल रहे हैं. कॉलेज, स्टुडेंट और अपने कार्यकर्ताओं को अपनी राजनीती के पाए मजबूत करने के लिए उसी पुलिस के सामने खड़ा कर दे रहे हैं. और अराजकता के माहौल में उनको झोंक रहे हैं. और उपर से बात करते हैं कि मोदी सरकार संवेदनशील नही है.
आप की संवेदनशीलता तो चटरजी आयोग की फाइलों में दबी पड़ी है. जो सुभेंदू अधिकारी ने कल देश के सामने रख दी. इस विपक्ष को तो छात्रों, किसानों या किसी अन्याय के मुद्दे पर एक शब्द बोलने का अधिकार नहीं है. लेकिन सब चाटुकारिता में लगे हैं. किसे फुरसत है, एक कठोर सवालें नेताओं से पूछने की. और किसकी हिम्मत है?
आज पॉलिटिक्स का इकोसिस्टम इतना पावरफुल है कि आप चाहकर भी अपनी आवाज अपने हलक से निकाल नहीं सकते.
और हमारे जैसे जो लोग फेसबुक या यूट्यूब पर जो अपनी आवाज निकाल रहे हैं, वो आवाज इतनी धीमी और इतनी छोटी है कि उन कानों तक पहुँच ही नहीं पाती. 
साभार : संजय पाण्डेय शास्त्री एडवोकेट जिला एवं सत्र न्यायालय प्रयागराज 9506157554 

कांग्रेस राज में कैट से लेकर रीट तक पेपर लीक की लंबी सूची, मोदी सरकार में ‘जीरो टॉलरेंस’


देश में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता से खिलवाड़ करने का यह खेल कोई नया नहीं है। अगर इतिहास उठाकर देखें तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के शासनकाल में पेपर लीक एक संस्थागत बीमारी की तरह फैल चुका था। कैट (CAT) और एआईपीएमटी (AIPMT) जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय परीक्षाओं से लेकर राज्यों की लोक सेवा आयोग (PCS) और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, फर्जीवाड़ा और सॉल्वर गिरोहों का बोलबाला रहा।

जहां अतीत में कांग्रेस सरकारों के दौरान पेपर लीक के मामलों में केवल निचले स्तर की लीपापोती करके बड़े मगरमच्छों और सिंडिकेट को बचा लिया जाता था, वहीं मोदी सरकार ने युवाओं के सपनों की रक्षा के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है। सरकार ने न केवल आरोपियों को जेल भेजा, बल्कि ऐतिहासिक कानून बनाकर फर्जीवाड़े में शामिल संगठित गिरोहों की जड़ें काटने का काम किया है। 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए (NDA) संसदीय दल की बैठक में नीट (NEET) और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर बड़ा बयान देते हुए पेपर लीक को ‘घोर पाप’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम मोदी ने भरोसा दिलाया कि सरकार ने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा है, छात्रों के हित में पारदर्शी तरीके से री-एग्जाम कराकर परिणाम जारी किए हैं और पूरे परीक्षा तंत्र को फुलप्रूफ बनाने के लिए कड़े प्रशासनिक व कानूनी कदम उठाए हैं।

कांग्रेस कार्यकाल के दौरान पेपर लीक के प्रमुख मामले

CAT (Common Admission Test) — 2003-04: देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों (IIMs) में दाखिले के लिए आयोजित होने वाली कैट परीक्षा का पर्चा नवंबर 2003 में लीक हो गया। सीबीआई जांच में कुख्यात रंजीत डॉन का नाम सामने आया, जिसने प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों से साठगांठ कर पेपर लीक कराया था। इस घोटाले के कारण 1.25 लाख से अधिक छात्रों की परीक्षा निरस्त करनी पड़ी और फरवरी 2004 में दोबारा परीक्षा आयोजित हुई।

CBSE All India Pre-Medical Test (AIPMT) — 2004: अप्रैल 2004 में परीक्षा से ठीक पहले सीबीएसई की AIPMT परीक्षा का पर्चा लीक हो गया। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की जांच में इसके पीछे भी रंजीत डॉन गिरोह की भूमिका पाई गई, जिसके बाद परीक्षा को रद्द करके दोबारा आयोजित करना पड़ा।

AIEEE Paper Leak — 2011: 1 मई 2011 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ और कानपुर में ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जामिनेशन (AIEEE) का पेपर लीक हुआ, जिससे देशभर के लाखों अभ्यर्थियों को मानसिक तनाव और परेशानी झेलनी पड़ी।

AIIMS Entrance Exam — 2012: 2012 में एम्स (AIIMS) पीजी प्रवेश परीक्षा में बड़े पैमाने पर तकनीकी धांधली और लीक का मामला सामने आया। सीबीआई जांच में एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश हुआ जो मोटी रकम लेकर उम्मीदवारों को उत्तर-कुंजी (Answer Keys) मुहैया कराता था।

राज्य स्तर पर कांग्रेस व सहयोगी सरकारों के दौर में धांधली

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) महाघोटाला — 2003: अजीत जोगी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद आयोजित हुई पहली ही पीसीएस (PCS) परीक्षा में भारी भाई-भतीजावाद हुआ और ओएमआर शीट्स तक बदली गईं। सीबीआई के अनुसार, एक कोचिंग संचालक के पास प्रश्नपत्रों की अग्रिम पहुंच थी और उसने महासमुंद के एक होटल में पसंदीदा उम्मीदवारों के लिए टारगेटेड सेशंस चलाए, जिससे अफसरों के रिश्तेदारों और प्रभावशाली लोगों को टॉप रैंक दिलाई गई।

महाराष्ट्र ‘टीईटी’ (TET) व शिक्षक भर्ती घोटाला — 2011-13: कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार (मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण) के शासन में महाराष्ट्र राज्य परीक्षा परिषद द्वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) और डी.एड (D.Ed) भर्ती में ओएमआर शीट में हेरफेर और बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ।

हरियाणा JBT शिक्षक भर्ती घोटाला — 2000 (सजा 2013): साल 2000 में 3,206 जूनियर बेसिक ट्रेंड (JBT) शिक्षकों की भर्ती में फर्जी इंटरव्यू लिस्ट और कॉपियों में हेरफेर की गई। इस मामले में साल 2013 में अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला सहित कई अधिकारियों को 10-10 साल की सजा सुनाई।

राजस्थान RPSC व शिक्षक भर्ती — 2012-13: अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की ग्रेड-II और ग्रेड-III शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। प्रिंटिंग प्रेस और कोचिंग संचालकों का जो सिंडिकेट उस समय पनपा, उसने आगे चलकर प्रदेश के परीक्षा तंत्र को पूरी तरह से खोखला कर दिया।

उत्तर प्रदेश CPMT पेपर लीक — 2014: 22 जून 2014 को सपा सरकार के दौरान सीपीएमटी का पर्चा लीक होने से परीक्षा रद्द करनी पड़ी।

महाराष्ट्र HSC परीक्षा — 2013: मार्च 2013 में मुंबई और आसपास के इलाकों में कक्षा 12वीं (HSC) का इंग्लिश और अन्य विषयों का पर्चा परीक्षा से पहले मोबाइल पर लीक हो गया था।

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार (2018–2023) में पेपर लीक की झड़ी
राजस्थान में कांग्रेस शासन के दौरान लगभग हर प्रमुख भर्ती परीक्षा पेपर लीक की भेंट चढ़ी:

कांस्टेबल भर्ती परीक्षा 2018: 11 मार्च को आयोजित परीक्षा का पेपर लीक होने पर 17 मार्च को इसे रद्द किया गया।

लाइब्रेरियन भर्ती परीक्षा 2018: राजस्थान चयन बोर्ड द्वारा 29 दिसंबर 2019 को आयोजित परीक्षा पेपर लीक के कारण रद्द हुई।

JEN सिविल डिग्रीधारी भर्ती 2018: 6 दिसंबर 2020 को आयोजित परीक्षा को एसओजी (SOG) की रिपोर्ट पर रद्द किया गया।

REET लेवल-2 परीक्षा 2021: 26 सितंबर को आयोजित इस परीक्षा का पेपर लीक हुआ और चौतरफा दबाव के बाद सरकार को करीब 4 महीने बाद इसे रद्द करना पड़ा।

बिजली विभाग टेक्निकल हेल्पर भर्ती 2022: ऑनलाइन परीक्षा के दौरान पेपर लीक पर भारी बवाल हुआ और 6 केंद्रों की परीक्षा रद्द करनी पड़ी।

कांस्टेबल भर्ती परीक्षा 2022: 14 मई 2022 को दूसरी पारी का पेपर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद परीक्षा रद्द करके दोबारा कराई गई।

वनरक्षक भर्ती परीक्षा 2020: 12 नवंबर 2022 को परीक्षा के उत्तर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद एक पारी की परीक्षा रद्द हुई।

हाईकोर्ट LDC, सेकंड ग्रेड 2022 व मेडिकल ऑफिसर भर्ती: ये सभी महत्वपूर्ण परीक्षाएं पेपर लीक और धांधली के चलते रद्द करनी पड़ीं।

पेपर लीक रोकने और परीक्षा तंत्र को पारदर्शी बनाने के लिए मोदी सरकार के ऐतिहासिक कदम
मोदी सरकार ने छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले माफियाओं के खिलाफ केवल बातें नहीं कीं, बल्कि ठोस प्रशासनिक, कानूनी और तकनीकी सुधार किए हैं:

लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 (Public Examinations Act, 2024): सरकार ने देश का पहला सख्त केंद्रीय कानून संसद से पास कराकर लागू किया। इसके तहत पेपर लीक करने, सॉल्वर गैंग चलाने या मिलीभगत करने वाले अपराधियों के लिए 3 से 10 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

संगठित अपराध सिंडिकेट्स की संपत्ति कुर्क करने का नियम: नए कानून में प्रावधान किया गया है कि यदि कोई संस्थान, परीक्षा केंद्र या संगठित माफिया पेपर लीक में शामिल पाया जाता है, तो उसकी संपत्ति जब्त/कुर्क (Property Attachment) की जाएगी और उस सेवा प्रदाता (Service Provider) को 4 साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।

सीबीआई जांच और त्वरित गिरफ्तारियां: नीट (NEET-UG) और यूजीसी-नेट मामलों में तत्परता दिखाते हुए जांच तुरंत सीबीआई को सौंपी गई। किसी भी रसूखदार को बचाने के बजाय मुख्य मास्टरमाइंड्स, कोचिंग संचालकों और सॉल्वर गैंग के 13 से अधिक आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा गया।

NTA के पुनर्गठन के लिए इसरो (ISRO) के पूर्व अध्यक्ष की अगुवाई में उच्च स्तरीय समिति: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली, परीक्षा प्रोटोकॉल, डेटा सुरक्षा और संरचनात्मक सुधारों के लिए पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (High-Level Committee of Experts) का गठन किया गया, ताकि भविष्य में ऑनलाइन या ऑफलाइन किसी भी स्तर पर चूक न हो।

तकनीकी व डिजिटल सुरक्षा कवच (Cyber & AI Audit): प्रश्नपत्रों के निर्माण, छपाई से लेकर परीक्षा केंद्रों तक डिलीवरी के लिए ‘एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन’, डिजिटल लॉक वाले बक्से और बायोमेट्रिक अटेंडेंस अनिवार्य की गई है। इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके परीक्षा केंद्रों पर असामान्य गतिविधि और सॉल्वर पैटर्न की रीयल-टाइम निगरानी शुरू की गई है।

री-एग्जाम और छात्रों के हितों का त्वरित संरक्षण: पीएम मोदी के स्पष्ट निर्देशों के तहत, जहां भी परीक्षा प्रणाली की शुचिता प्रभावित हुई, वहां छात्रों का समय खराब किए बिना तुरंत री-एग्जाम आयोजित कराए गए और उनके परिणाम समय पर घोषित किए गए, ताकि ईमानदार अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित न हों।

कांग्रेस पेपर लीक पर विलाप करते हुए अपने समय में हुए पेपर लीक याद करें

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी, अखिलेश यादव, केजरीवाल CJP की गुंडागर्दी के साथ खड़े होकर NEET पेपर लीक पर विलाप कर रहे हैं। कांग्रेस और समाजवादी शासन में कितने पेपर लीक हुए, उन्हें भी ये लोग याद रखें पिछले 20 वर्ष में व्यवस्थित अनियमितताओं और संगठित गिरोहों के कारण केंद्रीय एवं राज्य स्तर की 150 से अधिक परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक या समझौता (Compromise) होने के मामले सामने आए हैं

कांग्रेस की सरकार केंद्र में लीक हुए पेपर ये थे 

2006: सीबीएसई (CBSE) कक्षा 12 का अकाउंटेंसी प्रश्नपत्र लीक हुआ;

2007: अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (AIEEE) का प्रश्नपत्र लीक हुआ;

2008: अखिल भारतीय प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) का प्रश्नपत्र लीक हुआ;

2014: सीबीएसई कक्षा 10 गणित तथा कक्षा 12 अर्थशास्त्र के प्रश्न पत्र लीक हुए-

लेखक 
चर्चित YouTuber 
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री के समय में पेपर तो लीक हुए ही लेकिन समाजवादी पार्टी की सरकार तो खुलेआम नक़ल करने की भी अनुमति देती थी। इससे बड़ा पेपर लीक और क्या होगा?

2015: UPPSC Prelims के प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर लीक हो गए;

2016 : UPPSC RO/ARO : The Review Officer / Assistant Review Officer (RO/ARO) preliminary examination के पेपर लीक हुए जो परीक्षा बाद में 2020 में हुई

कांग्रेस की राजस्थान सरकार ने 2018 से 2023 तक पेपर लीक का रिकॉर्ड बनाया जो पेपर लीक हुए वो भी पढ़िए -

-REET-2021 (लेवल-2)

राजस्थान अध्यापक पात्रता परीक्षा (REET) का प्रश्नपत्र लीक होने के कारण लेवल-2 परीक्षा रद्द करनी पड़ी;

इससे 16 लाख से अधिक अभ्यर्थी प्रभावित हुए;

-राजस्थान पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा-2022

प्रश्नपत्र लीक होने के कारण द्वितीय पाली की परीक्षा रद्द करनी पड़ी तथा हजारों अभ्यर्थियों के लिए पुनः परीक्षा आयोजित की गई;

-वरिष्ठ अध्यापक (ग्रेड-II) परीक्षा-2022

राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) द्वारा आयोजित परीक्षा का सामान्य ज्ञान प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले लीक हो गया।

परिणामस्वरूप परीक्षा रद्द करनी पड़ी तथा अनेक गिरफ्तारियां हुईं;

-वनरक्षक (Forest Guard) परीक्षा-2022

प्रश्न पत्र सोशल मीडिया पर लीक हुआ;

इसके बाद गिरफ्तारियां हुईं तथा परीक्षा पुनर्निर्धारित करनी पड़ी;

-सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO) परीक्षा-2022

इस भर्ती परीक्षा में भी प्रश्नपत्र लीक होने की पुष्टि संबंधित रिपोर्टें सामने आईं तथा कई गिरफ्तारियां हुईं

तमिलनाडु - कांग्रेस की साथी दल DMK के साथ सरकार में

2022: शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) गंभीर तकनीकी गड़बड़ियों के कारण रद्द कर दी गई-

कर्नाटक (सिद्धारमैया मुख्यमंत्री)

2016:

द्वितीय वर्ष प्री-यूनिवर्सिटी (PUC-II) की रसायन विज्ञान परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हुआ, परिणामस्वरूप परीक्षा रद्द कर पुनः आयोजित करनी पड़ी;

केरल (पिनराई विजयन, मुख्यमंत्री)

2016:

केरल लोक सेवा आयोग (Kerala PSC) की 10वीं स्तर की प्रारम्भिक परीक्षा में अनेक त्रुटियों की शिकायतों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई

ऐसा नहीं है भाजपा के केंद्र में रहते हुए और अन्य राज्यों में पेपर लीक नहीं हुए लेकिन विशेष तौर पर अबकी बार NEET को लेकर हाय तौबा मचाना देश में अराजकता फ़ैलाने की साजिश है, जबकि NEET परीक्षा में जिस धर्मेंद्र प्रधान के मंत्री होते हुए गड़बड़ी हुई, उसी धर्मेंद्र प्रधान के मंत्री रहते हुए परीक्षा फिर से आयोजित हुई और परिणाम भी आ गए लेकिन किसी को कोई समस्या नहीं है 

राहुल गांधी और अखिलेश यादव जुलाई 21 को प्रधानमंत्री आवास पर धरने पर बैठे है ये देश के लिए अच्छे संकेत नहीं है। उन्हें कल प्रदर्शन में शामिल होना चाहिए था जंतर मंतर पर अधिकांश कथित छात्र ऐसे थे जिनको न NEET का फुल फॉर्म पता था और न CBSE का ये छात्र आंदोलन है ही नहीं बल्कि विदेशी शक्तियों द्वारा प्रायोजित हुड़दंग है