शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को दी पटखनी, भबानीपुर में 15000+ वोटों से CM को हराया: बोले- यह हिंदुत्व की जीत; हिन्दुओं सेकुलरिज्म के नशे से निकलो


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े उलटफेर के तहत तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके गढ़ भबानीपुर में करारी हार का सामना करना पड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,105 वोटों से हरा दिया है।

मतगणना के अंतिम राउंड के बाद सामने आए नतीजों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी को कुल 73,917 वोट मिले जबकि ममता बनर्जी 58,812 वोटों के साथ पीछे रह गईं। यह हार न सिर्फ चुनावी दृष्टि से बड़ी मानी जा रही है बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका खास महत्व है।

शुभेंदु ने कहा, “ममता बनर्जी को हराना बेहद जरूरी था। यह ममता बनर्जी की राजनीति से रिटायरमेंट की शुरुआत है। इस बार भी वह 15,000 से ज्यादा वोटों से हार गईं। मुसलमानों ने खुलकर उन्हें वोट दिया। वार्ड नंबर 77 में जितने भी मुसलमान वोट डालने आए, उन्होंने ममता को ही वोट दिया। वहीं हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समाज ने मुझे आशीर्वाद दिया और जिताया। यह जीत हिंदुत्व की जीत है।”

इस जीत को हिन्दुत्व की जीत कहने का कारण भी है, क्योकि हिन्दू और हिन्दू महिलाओं पैट हुए दर्दनाक अत्याचारों ने ममता को हारा है। जबसे ममता मुख्यमंत्री बनी तभी से घुसपैठिए और मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं पर अत्याचार होने शुरू हो गए। इतने अत्याचारों के बावजूद 15 सालों तक ममता का सत्ता बने रहने की वजह थी बोगस वोटिंग। जैसाकि वोटिंग के दौरान कई मतदाताओं ने साफ कहा कि पहली बार वोट डालने का मौका मिला है पहले तो घर से निकले बगैर ही हमारा वोट पड़ जाता था। और जैसे ही मौका मिला अत्याचारों का बदला ले लिया। 

लेकिन बंगाल से बाहर हिन्दुओं को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। मुसलमानों ने बीजेपी को हराने एकजुट होकर ममता और इसकी पार्टी को वोट दिया। लेकिन बेशर्म हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में रहता है। जब मुसलमान एकजुट होकर बीजेपी को हराने के लिए वोट कर सकता है तो हिन्दू क्यों नहीं एकजुट होकर बीजेपी को वोट देता? चुनावों में मुसलमान अपनी जातिगत लड़ाई को छोड़ एकजुट होकर वोट कर सकता है हिन्दुओं तुम क्यों जातिगत सियासत में बंटते हो?  

इस जीत के साथ शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। वह पहले ऐसे भाजपा नेता बन गए हैं जिन्होंने ममता बनर्जी को दो बार चुनाव में हराया है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से भी ममता बनर्जी को हराया था।

नाम महुआ मोइत्रा और सयानी घोष, दोनों TMC की फायरब्रांड नेता हैं।
लेकिन इस चुनाव में फायरब्रांड राजनीति ने TMC को ताकत देने के बजाय नुकसान पहुंचाया।
बेवजह का aggression, तीखी भाषा, personal attacks और फालतू की टिप्पणी इन सबने मिलकर TMC की नैया डुबोने का काम किया।
योगी आदित्यनाथ जैसे नेता , जिनसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है , उन पर हल्की भाषा में टिप्पणी करना TMC के लिए उल्टा पड़ गया।
राजनीति में विरोध जरूरी है , लेकिन विरोध के नाम पर अपमान जनता हमेशा याद रखती है।
चुनाव सिर्फ भाषणों से नहीं जीते जाते। चुनाव जनता की भावना , भाषा की मर्यादा, संगठन की ताकत और जमीन पर काम से जीते जाते हैं।
TMC के कई नेताओं ने इस चुनाव में मुद्दों से ज्यादा अहंकार दिखाया। जनता से संवाद कम हुआ , विरोधियों पर व्यक्तिगत हमला ज्यादा हुआ। और जब भाषा का संतुलन बिगड़ता है, तो जनता बैलेट से जवाब देती है।
नतीजा सामने है ....
TMC बुरी तरह चुनाव हार गई। BJP प्रचंड बहुमत के साथ बंगाल में इतिहास रच गई। और ममता बनर्जी अपनी खुद की सीट तक नहीं बचा पाईं।
इस चुनाव ने साफ संदेश दिया है:

राजनीति में आग उगलना आसान है, लेकिन जनता के गुस्से की आग में पूरी पार्टी जल सकती है।

बंगाल : प्राइवेट पार्ट फाड़ा, टांग पकड़कर चीरा, फिर रेता गला: बंगाल नतीजों के बाद चर्चा में कामदूनी गैंगरेप, पीड़िता की दोस्त बोली- आवाज उठाने पर मुझे टॉर्चर किया, जेल भेजा

                               2013 में कामदूनी में छात्रा के गैंगरेप से दहला था कोलकाता (साभार: X)
किसी मुस्लिम की हत्या होने पर उसके घर को पिकनिक स्पॉट बना बीजेपी सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाला बेशर्म और निर्लज विपक्ष ममता के राज में बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथी और TMC के गुंडों द्वारा हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर ऐसे चुप रहे जैसे इनके घर की महिलाएं अपने प्रेमियों के साथ भाग गयी हों। महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जनता ने नहीं बल्कि हिन्दू महिलाओं के साथ हुए घिनौने अत्याचारों की हाय ने हराया है। हिन्दू और हिन्दू महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर बेशर्म प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक चुप्पी साधे रहा, क्यों? जबकि प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता था, लेकिन आज विज्ञापन के लालच में उतनी मुस्तैदी से असली मुद्दों को नहीं उठाता। क्या मीडिया विपक्ष से डरता है?     
मणिपुर कांड की सच्चाई खोजी पत्रकार क्यों नहीं सामने लाए? टीवी पर चौपालें बैठाकर खूब TRP बटोरने वाली मीडिया से सच्चाई को जनता के सामने लाने की हिम्मत जुटा पाया।    

पश्चिम बंगाल में इतिहास बदला गया है। आजादी के बाद यहाँ पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बहुमत से सरकार बनने जा रही है। इस जीत के कई फैक्टर हैं, इनमें से एक हैं महिलाओं के खिलाफ हिंसा। पिछली सरकार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आए, जिन्हें सुन अब तक रूह काँप जाती है। ऐसा ही एक मामला है कामदूनी गैंगरेप, जो चुनावों में भी चर्चा में रहा।

अब चुनावी नतीजों के दिन इस गैंगरेप की पीड़िता की सहेली की एक वीडियो सामने आई, जिसे देख हर कोई उस भयावह घटना के बारे में फिर एक बार बात करने लगा। वीडियो में पीड़िता की सहेली रोते हुए कहती हैं, “कामदूनी में मेरी सहेली के साथ बलात्कार हुआ था। मैंने आंदोलन किया था। मेरे परिवार को टॉर्चर किया गया। मुझे जेल भी काटनी पड़ी। घर पर बमबारी भी हुई। जान से मारने की धमकियाँ मिली।”

क्या है कामदूनी रेप केस?

साल 2013 में बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कामदूनी गाँव में कॉलेज में पढ़ने वाली 20 साल की छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। यह घटना तब हुई, जब वह कॉलेज से एग्जाम देकर स्टेशन से अकेले घर लौट रही थी। तब सैफुल, अंसार अली, इमानुल इस्लाम, अमीनुल समेत 9 लोग छात्रा को पकड़कर खेत में ले गए और गैंगरेप किया।

और सिर्फ गैंगरेप ही नहीं, बल्कि तड़पा-तड़पाकर कर जान से भी मार डाला। उन लोगों ने छात्रा के साथ हैवानियत इतनी दिखाई कि उसके प्राइवेट पार्ट को रेप के दौरान फाड़ दिया गया। इसके अलावा उसकी टांग खींचकर नाभि तक चीर दी गई और उसे फेंकने से पहले वो जिंदा न बचे इसके लिए उसके गले को रेता गया।

लड़की के भाई ने इस मामले में बताया था कि जब वो खुद कामदूनी से लौट रहा था तो उसने आरोपितों को रास्ते में देखा था। अंसार अली और सैफुल बात कर रहे थे- “आज मजा बड़ा आया, अब घर चलना चाहिए।” इनके बाद उसने बाकी 6 लोगों को भी देखा था। लेकिन तब उसे कुछ पता नहीं था।

खबरों के अनुसार, जब लड़की का शव अगले दिन बरामद हुआ तो लड़की अधनंगी थी। उसके साथ हुई वीभत्सता को देख इस मामले का खूब विरोध हुआ था। उसकी सहेलियाँ दिल्ली तक आईं। लोगों का रोष देख फिर ये मामला सीआईडी को सौंपा गया। जाँच में आरोपितों के अपराध का खुलासा हुआ।

कानून कार्रवाई में लापरवाही और कोई न्याय नहीं

बाद में आरोपित गिरफ्तार भी हुए। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे सबको राहत दी जाती रही। 9 में से 2 रफीकुल इस्लाम और नूर अली को सबूतों की कमी के कारण बरी किया गया। गोपाल नस्कर ट्रायल के दौरान ही मर गया। शेख इमानुल इस्लाम, अमीनुर इस्लाम और भोला नस्कर जिनको पहले 10 साल की सजा मिली थी, उन्हें भी 2023 मे 10000 का जमानत बॉन्ड लगाकर छोड़ दिया गया। अमीन अली को बाद में बरी किया गया और जो दो मुख्य दोषी बचे सैफुल अली और अंसार अली। जिन्हें फाँसी की सजा मुकर्रर हुई थी उनकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।

बंगाल में तीन C का नाश हुआ; भाजपा को प्रचंड जीत के लिए बधाई लेकिन सरकार की राह आसान नहीं होगी; योगी और हिमंत मॉडल को अपनाना होगा

सुभाष चन्द्र

इन 5 विधानसभा चुनावों में बंगाल, तमिलनाडु और केरलम में खोने के लिए कुछ नहीं था। फिर भी देशहित में असम और बंगाल में बीजेपी की जीत 2014, 2019 और 2024 लोक सभा चुनावों से कहीं ज्यादा बड़ी है। इन दोनों राज्यों में बीजेपी की जीत नहीं राष्ट्रवाद की जीत है। बंगाल को कांग्रेस से लेकर ममता बनर्जी ने अपनी कुर्सी की खातिर देश की सुरक्षा को घुसपैठियों, कट्टरपंथियों और बारूद के ढेर पर बैठा रखा था। यही हाल कांग्रेस ने north-east का कर रखा था जिसे राहुल गाँधी की बदसलूकी से कुंठित होकर कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थामने वाले हिमंत सरमा ने असम को देश से जोड़ने में जो मेहनत की है उसे झुठलाना सरमा के साथ बेइंसाफी होगी।      

बंगाल में एक C कांग्रेस का, दूसरा CPM का और तीसरा TMC का तीनों का सर्वनाश हो गया। 

यानी triple C डूब गया पिछले 2021 के चुनाव में कांग्रेस और CPM को कोई सीट नहीं मिली थी लेकिन इस बार 2-2 सीट पर आगे हैं मगर TMC तीसरे C वाली 215 से घट कर 82 पर आ गई यानी 133 सीट कम और दूसरी तरफ भाजपा 73 से 205 पर पहुंच गई यानी 132 सीट अधिक मतलब जो ममता ने खोया वो भाजपा ने ले लिया

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अभी सही जानकारी तो नहीं है लेकिन कहीं पढ़ा है भाजपा को 44.8% वोट मिला है जबकि पिछले 2021 के चुनाव में 38.15% वोट था यानी 6.65% ज्यादा जबकि ममता का वोट  पिछले 48.02% के मुकाबले इस बार 41.9% रह गया जो 6.12% कम है

मैंने पहले चरण की वोटिंग के बाद अपने 24 अप्रैल के लेख में लिखा था “अगर दूसरे चरण में भी यही स्थिति रहती है और भाजपा के वोट 38% से 6-7% भी बढ़ गए तो सत्ता की चाबी उसके हाथ में होगी” और आज यही हुआ कि सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई

कांग्रेस एक बार फिर से मुस्लिमों की पार्टी साबित हुई है एक चैनल पर बता रहे थे कि कांग्रेस के असम में आगे चल रहे 23 उम्मीदवारों में से 19 मुस्लिम हैं और केरल में कांग्रेस को UDF में 60-62 सीट मिल रही हैं तो गठबंधन के साथी दल “मुस्लिम लीग” को 22; क्या यह साबित नहीं करता कि कांग्रेस केवल मुस्लिमों के भरोसे चल रही है?

असम में भाजपा की सरकार तीसरी बार बनी है और पुडुचेरी में भी हिमंता बिस्वा सरमा ने कमाल किया है जो भाजपा 101 सीट पर आगे हैं और कांग्रेस कुल 22 पर पवन खेड़ा के खुद कांग्रेस का “पेड़ा” बना दिया। तरुण गोगाई की हार के जिम्मेदार राहुल गाँधी और पवन खेड़ा हैं।  

उधर सनातन धर्म को डेंगू, मलेरिया और कोढ़ कहने वाली DMK खुद ख़त्म हो गई और चीफ मिनिस्टर MK Stalin स्वयं भी हार गया और कर लो सनातन को ख़त्म

बंगाल चुनाव में एक बात मजेदार हुई जिससे एक पुरानी बात याद आ गई मोदी जी एक कुर्सी लेकर लक्षद्वीप की बीच पर बैठ गए और मालदीव निपट गया बंगाल में मोदी जी “झालमुड़ी” क्या खाई, वो ममता बनर्जी को ही खा गई

लेकिन बंगाल में जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, उसे सरकार चलाना अंगारों पर चलने से कम नहीं होगा क्योंकि 15 साल के ममता राज के चलते उसके लोग प्रशासन पर कब्ज़ा किए बैठे हैं पूरी पुलिस फाॅर्स उसकी मर्जी से चलती थी ऐसे लोगों पर विश्वास करना अत्यंत कठिन होगा और इसलिए सरकार चलाना आसान नहीं होगा। बंगाल में सनातन, राष्ट्रवाद को स्थापित करने के लिए योगी आदित्यनाथ मॉडल अपनाना होगा। योगी ने जिन-जिन क्षेत्रों में प्रचार किया अधिकतर सीटें बीजेपी के खाते आने से बहुमत के आंकड़े को पार करने में सहायक सिद्ध हुई। पिछले चुनावों में भी योगी ने बीजेपी को सीटें दिलवाने में अहम् भूमिका निभाई थी। असम मुख्यमंत्री हिमंत की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता।    

फिर बंगाल में घुसपैठियों की समस्या कम नहीं है उनके लिए तो कोलकाता से ढाका के लिए ट्रेन चला देनी चाहिए, चुपचाप बैठो और निकल जाओ वरना ठोक पीट कर निकाला जायेगा

एक प्रमुख काम जरूरी है कि बांग्लादेश सीमा से लगते हुए बंगाल के 14 और असम के 3-4 जिलों को काट कर केंद्र शासित प्रदेश बना देना चाहिए जहां से उन्हें बाहर करना आसान हो और घुसना कठिन हो जाए पूरे केंद्र शासित प्रदेश को BSF के हवाले कर देना चाहिए

बंगाल की जनता को भाजपा सरकार से रातों रात सब कुछ ठीक होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए जो बर्बादी 35 साल के CPM और 15 साल के ममता राज में हुई है, उसे पटरी पर लाने में समय लगेगा  एक घोषणा तो आज मोदी जी ने कर दी कि 5 लाख मुफ्त इलाज की सुविधा का ऐलान पहली ही कैबिनेट मीटिंग में कर दिया जायेगा  

‘TMC को यदि BJP ने हरा दिया तो मैं नंगा होकर गाँव में घूमूँगा’: बंगाल के मुस्लिम युवक "सुफियान" की हो रही खोज, Video

 'BJP जीती तो नँगा घूमूँगा': 192+ सीटों के साथ खिलते ही 'सूफियान' को ढूँढने निकले नेटीजन्स (साभार : Video SS)

बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। BJP के 192+ सीटों पर आगे निकलने और TMC के 96 पर सिमटने के बाद अब नेटीजन्स सूफियान नामक मुस्लिम युवक को पागलों की तरह खोज रहे हैं।

मजे की बात है कि पहले तो कट्टरपंथी और उपद्रवी पैसे के लालच में उल्टा-पुल्टा बयान दे देते हैं बाद में पता नहीं किस कब्र में छिप जाते हैं?   

दरअसल, चुनाव से पहले सूफियान ने बड़े जोश में दावा किया था कि अगर बीजेपी जीत गई, तो वह पूरे कोलकाता में नंगा होकर घूमेगा। अब जब कमल पूरी तरह खिल चुका है, तो लोग मजेदार मीम्स शेयर कर रहे हैं।

कोई पूछ रहा है कि ‘सूफियान भाई कहाँ हो?’ तो कोई तंज कस रहा है कि ‘भाई, कपड़े उतारने की तैयारी शुरू हुई क्या?’ कुछ लोग मजे लेते हुए उन्हें घर के अंदर ही रहने की सलाह दे रहे हैं ताकि ‘पब्लिक’ की नजरों से बच सकें। इस अटूट विश्वास ने अब सूफियान के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। 

मतगणना में पिछड़ने के बाद बंगाल के कई जगहों पर TMC का उपद्रव: पार्टी ऑफिस में बम भी मिला

                     नतीजों के बीच बंगाल में TMC की हिंसा, ऑफिस में बम मिला (साभार : X_@ANI)
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में पिछड़ने के बाद राज्य में तनाव चरम पर है। कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर के बाहर भारी भीड़ ने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए, जिससे माहौल गरमा गया है।

वहीं, राज्य के कई हिस्सों से TMC कार्यकर्ताओं द्वारा उपद्रव और हिंसा की खबरें आ रही हैं। आसनसोल में TMC पार्टी ऑफिस के पास एक बम मिला है, जिसे पुलिस ने तुरंत निष्क्रिय किया।

मतगणना केंद्रों के बाहर टीएमसी और बीजेपी समर्थकों के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं। आसनसोल और बांकुरा में उपद्रवियों ने वाहनों में तोड़फोड़ की और आगजनी की कोशिश की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षाबलों ने कड़ा लाठीचार्ज किया है।

पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि रुझान स्पष्ट हैं, इसलिए बौखलाहट में हिंसा फैलाई जा रही है। फिलहाल संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात है।


लगातार पोल खुलने पर भी बाज नहीं आ रहे राहुल गांधी

आखिर INDI गठबंधन राहुल गाँधी का क्यों पिछलग्गू बना हुआ है जो खुद तो डूब ही रहा है गठबंधन को भी डुबो रहा है। आखिर गठबंधन की ऐसे कौन-सी दुखती नब्ज राहुल ने पकड़ी हुई है। या यूँ भी कहा जा सकता है कि INDI गठबंधन महामूर्खों का जमघट है। इनको नहीं मालूम कि तुम्ही लोगों के कंधे पर बैठ ये और कांग्रेस सुरमाभोपाली बने हुए हैं। अभी जो 5 राज्यों में हुए चुनाव के चुनावी रुझानों में कांग्रेस और INDI गठबंधन की जो पतली हालत हुई है उसके लिए जिम्मेदार सिर्फ राहुल की गलत और गुमराह करने वाली सोंच है।    
नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति अब तथ्यों, तर्कों और जिम्मेदारी से ज्यादा सनसनी, भ्रम और झूठे नैरेटिव पर टिकती दिख रही है। संसद से सड़क तक वे लगातार ऐसे झूठे आरोप उछालते रहते हैं, जिनका या तो बाद में खुद उनके ही दावों से खंडन हो गया, या फिर अदालत, सेना, चुनाव आयोग और सरकारी रिकॉर्ड ने उनकी बातों की धज्जियां उड़ा दीं। कभी सेना के “हाथ बांध देने” का आरोप लगाकर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, तो कभी चुनाव आयोग को “वोट चोरी” का औजार बताकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। संसद में बोलने नहीं देने का रोना रोने वाले राहुल गांधी की पोल खुद लोकसभा के रिकॉर्ड ने खोल दी। कई महत्वपूर्ण बहसों में राहुल ने स्वयं हिस्सा तक नहीं लिया। यह सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि झूठ को हथियार बनाकर देश में अविश्वास फैलाने की राजनीति है। 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि राहुल गांधी के आरोप अक्सर अधूरी जानकारी, गलत तथ्यों और भावनात्मक उकसावे पर आधारित होते हैं। राफेल से लेकर अग्निवीर, EVM से लेकर विदेशी नेताओं की मुलाकातों तक, बार-बार उनके दावों की हवा निकलती रही, लेकिन झूठ का सिलसिला नहीं रुका। कभी सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी, तो कभी सेना और चुनाव आयोग को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। यदि नेता प्रतिपक्ष ही बिना प्रमाण के आरोपों की राजनीति करेगा, तो इससे सिर्फ उसकी विश्वसनीयता नहीं गिरेगी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी कमजोर होगा। हिट और रन की पॉलिटिक्स कभी भी मेहनत और परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती।दरअसल, राहुल हर हार, हर विवाद और हर असफलता का दोष किसी न किसी संस्था पर डालते हैं, लेकिन आत्ममंथन से लगातार बचते रहते हैं। 

गृहमंत्री ने संसद में राहुल के मौन से खोली झूठ की पोल

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अक्सर संसद के बाहर मोदी सरकार पर आरोप लगाते हैं कि उन्हें संसद में बोलने ही नहीं दिया जाता। लेकिन लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी के इस दावे की जोरदार तरीके से पोल खोल दी। अमित शाह ने सदन में रिकॉर्ड रखते हुए बताया कि 16वीं लोकसभा में राहुल गांधी ने 2014, 2015, 2017 और 2018 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा में हिस्सा तक नहीं लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने किसी बजट चर्चा और किसी सरकारी विधेयक पर भी भागीदारी नहीं की। शाह ने 17वीं लोकसभा के आंकड़े गिनाते हुए कहा कि 2019, 2020 और 2021 में भी राहुल राष्ट्रपति अभिभाषण की चर्चा से दूर रहे, जबकि कई बजट चर्चाओं में भी शामिल नहीं हुए। राहुल गांधी के राजनीतिक झूठ पर यह तथ्यात्मक जवाब करारा प्रहार बनकर सामने आया।

सेना के ‘हाथ बांध देने’ के आरोप की पूर्व आर्मी चीफ ने धज्जियां उड़ाईं

लोकसभा में राहुल गांधी ने पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक Four Stars of Destiny का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि चीन के साथ तनाव के दौरान मोदी सरकार ने सेना के “हाथ बांध दिए” थे। लेकिन बाद में खुद जनरल नरवणे की ओर से स्पष्ट किया गया कि भारतीय सेना को जमीनी हालात के अनुसार कार्रवाई के लिए पूरा “फ्री हैंड” दिया गया था और सेना ने मजबूती से चीन का सामना किया। राहुल गांधी ने जिस किताब के अंशों के सहारे सरकार और सेना के नेतृत्व पर सवाल खड़े करने की कोशिश की, वह किताब अब तक अप्रकाशित है और उसी किताब के लेखक की सफाई ने उनके आरोपों की हवा निकाल दी। राजनीतिक लाभ के लिए सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर बयान देना आखिरकार राहुल गांधी पर ही भारी पड़ गया।

‘वोट चोरी’ के झूठ पोल खुली, शाह ने बताया ऐसे रचा भ्रम

राहुल गांधी ने जो आरोप महीनों से देशभर में घूम-घूमकर उछाले, वही आरोप शाह ने चुन–चुनकर, तथ्य पर तथ्य रखकर, और सार्वजनिक दस्तावेज़ों के हवाले से इस तरह ध्वस्त किए कि पूरी कांग्रेस उस झटके से उबरने की स्थिति में भी नहीं दिखी। राहुल का सबसे बड़ा आरोप यही था कि देश में “वोट चोरी” हुई है। लेकिन अमित शाह ने खुलकर कहा कि यह अदालत में, चुनाव आयोग में, संसद में और जनता की अदालत में कहीं भी टिकने लायक आरोप नहीं है। शाह ने बताया कि चुनाव प्रक्रिया में वोटर लिस्ट से लेकर बूथ डेटा तक हर कदम का डिजिटल और फिजिकल ट्रैक रिकॉर्ड होता है। यह कोई कांग्रेस के आंतरिक चुनाव जितना आसान नहीं कि मनमर्जी के आंकड़े लिखकर अध्यक्ष चुन लिया जाए। शाह ने कठोर शब्दों में स्पष्ट किया कि कांग्रेस जानती है कि यह आरोप झूठा है, पर “हार का ठीकरा” किसी पर फोड़ना ही उनकी राजनीतिक रणनीति है। यही राहुल गांधी की चुनावी आदत है। नतीजे आते ही EVM, आयोग, मोदी, शाह सबको दोष दो और देश को भ्रमित करो।

राहुल के आयोग के झूठ का संविधान की किताब से जवाब

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पक्षपाती है। लेकिन अमित शाह ने राहुल को उसी संविधान की दूसरी अनुसूची की याद दिलाई, जिसमें आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया लिखी है। अमित शाह ने साफ कहा कि कांग्रेस जिस चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगा रही है, उसकी नियुक्ति प्रक्रिया वही है जिस पर स्वयं कांग्रेस ने संसद में सहमति दी थी। सच यही है कि कांग्रेस ने नियुक्ति प्रक्रिया पर ना आपत्ति जताई, ना बदलाव सुझाया। फिर जैसे ही जनता ने अपना स्पष्ट जनादेश तीसरी बार नरेंद्र मोदी को दिया, कांग्रेस को आयोग पक्षपाती दिखने लगा। शाह ने बताया कि जिसे आयोग को “पक्षपाती” बताकर राहुल जनता को गुमराह करते हैं, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पर कांग्रेस खुद सहमत थी।

जिस तरह केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोला है, उसे देख कर जस्टिस संजीव खन्ना से उसको मिली जमानत के फैसले की जांच होनी चाहिए

सुभाष चन्द्र

केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर अनेक आरोप लगाकर उन्हें CBI की अपील मामले से हटने की जिद की है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आपसे मुझे न्याय की उम्मीद नहीं है। उसे देख कर साफ़ लगता है कि 12 जुलाई, 2024 को जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जो उसे जमानत दी थी, उसमे बहुत बड़ा झोल था  

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केजरीवाल ने जस्टिस खन्ना की बेंच के सामने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के ही फैसले के खिलाफ अपील की थी जिसमें उन्होंने ED द्वारा केजरीवाल की गिरफ़्तारी को वैध कहा था और जमानत देने से मना कर दिया था जस्टिस शर्मा ने अनेक कारण दिए थे उसकी गिरफ़्तारी को वैध बताने के लिए लेकिन तब केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा के ऊपर कोई ऊँगली नहीं उठाई थी

जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस SVN Bhatti की पीठ ने ही ED के केस में कभी कहा था कि “money trail of ₹338 crore was tentatively established in the Delhi liquor policy case”. फिर भी उन्होंने जस्टिस दीपांकर दत्ता के साथ अन्य बेंच में केजरीवाल को जमानत दे दी यह निश्चित रूप से इशारा करता है कि केजरीवाल के वकील कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने जस्टिस खन्ना के साथ कुछ सांठगांठ की होगी जस्टिस खन्ना की तरह केजरीवाल को अब जस्टिस शर्मा से उसके पक्ष में फैसले की उम्मीद नहीं है जैसे पहले उसे अपने पक्ष में फैसला नहीं मिला

केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा को कलंकित करने के साथ ही यह साबित कर दिया कि जस्टिस खन्ना से उसे मनपसंद निर्णय मिला था क्योंकि वो उसके पसंद के जज थे सबसे बड़ी बात जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता ने ED द्वारा गिरफ़्तारी की वैधता को संवैधानिक मामला बता कर 5 जजों की बेंच के पास भेज दिया

हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को गिरफ़्तारी वैध करार देने में कोई समस्या नहीं हुई लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दो जज जस्टिस शर्मा के फैसले को नहीं काट (counter कर) सके, बस यही दोनों के फैसले पर संशय पैदा करता है जिसकी जांच होनी चाहिए, कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के जज होते हुए वे गिरफ़्तारी की वैधता पर फैसला क्यों नहीं कर सके कर नहीं सके या सिंघवी से Setting और Moneypower खेल कर गई? ये काम जस्टिस शर्मा के साथ नहीं कर पा रहा केजरीवाल

इतना ही नहीं सिंघवी ने ही ऐसी Setting की जो 5 जजों की बेंच आज करीब दो साल बाद भी नहीं बन सकी - अगर 5 जजों की बेंच ने गिरफ़्तारी को वैध ठहरा दिया तो केजरीवाल की जमानत स्वतः ही ख़त्म हो जाएगी - वैसे कोई भी legal expert  यह कभी नहीं कहेगा कि गिरफ़्तारी की वैधता में  किसी तरह का  गैर संवैधानिक प्रश्न हो सकता है - लेकिन मीलॉर्ड्स तो मीलॉर्ड्स हैं, कानून को जैसे मर्जी “interpret” कर सकते हैं और कर दिया -

जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता केजरीवाल की गिरफ़्तारी की वैधता में संवैधानिक प्रावधान तलाशने लगे और जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस महादेवन ने राष्ट्रपति को गैर संवैधानिक आदेश दे दिए - वो गैर संवैधानिक थे क्योंकि राष्ट्रपति से प्रश्नों के जवाब में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्वयं स्वीकार किया था कि सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति को आदेश देने का अधिकार नहीं है लेकिन फिर भी वे आदेश वापस नहीं लिए गए 

केजरीवाल का जस्टिस शर्मा के प्रति मर्यादाहीन आचरण देखते हुए, जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता के 12 जुलाई, 2024 के निर्णय की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए -

ED को चाहिए वह सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने 5 जजों की बेंच गठित करने के विषय को उठाए - यह आदमी छुट्टा नहीं घूमना चाहिए क्योंकि ये समाज के कोढ़ है -

तस्लीमा और शेख हसीना को सुरक्षा प्रदान कर भारत सरकार का भारत से लेकर विदेशों में बसे मुस्लिम कट्टरपंथियों पर झन्नाटेदार थप्पड़

बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जाएगी लेकिन शांतिदूतों और उनके समर्थकों पर भारत सरकार ने ऐसा झन्नाटेदार थप्पड़ मारा है सभी को चिंतन करने की जरुरत है। 122 आतंकी संगठनों की मदद करने वाला ईरान जब बुर्का/हिजाब और नकाब का विरोध करने वाली महिलाओं पर अत्याचार करता है, पाकिस्तान का तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक़ जब हज़ारों फिलिस्तीनों द्वारा पाकिस्तान नहीं छोड़ने पर गोली से भून देता है, शायद जकार्ता कुछ ही साल पहले पाकिस्तान सेना को खरीद अपने मुल्क से लाखों फिलिस्तीनों को 72 हूरों के पास पहुँचाने का काम करता है आदि आदि सभी मुस्लिम कट्टरपंथी और उनके समर्थकों के घरों में ऐसा मातम पसर जाता है शायद उनके घर की महिलाएं अपने मित्रों साथ भाग गयी हैं। किसी भी कट्टरपंथी में सच्चाई सुनने और बर्दाश्त करने का माद्दा नहीं। इन लोगों की दुकान ही धमकियों और उपद्रव करने पर ही चलती है।

तस्लीमा नसरीन द्वारा पुस्तक "लज्जा" लिखने पर इतना ज़ुल्म किया कि अपने जन्मस्थान को छोड़ना पड़ा। इतना ही सलमान रुश्दी पर फतवा दे दिया जाता है, लेकिन किसी में अनवर शेख के खिलाफ एक लब्ज बोलने की हिम्मत नहीं, जिसने इस्लाम को बेनकाब कर दिया। उसकी किताबें पढ़ लोग इस्लाम छोड़ रहे हैं। और अब अली सीना की किताब भी वही काम कर रही है।

जब प्रख्यात बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की जान खतरे में थी, तब दुनिया के किसी भी देश ने उन्हें शरण नहीं दी।

इस्लामिक देश तो दूर, यूरोप तक ने हाथ खड़े कर दिए।
यही नहीं, जब शेख हसीना अपदस्थ हुईं, तब भी अधिकांश इस्लामिक देशों ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। दोनों ही स्त्रियाँ तस्लीमा और हसीना अकेली, असहाय और चौराहे पर खड़ी थीं।
उस समय यदि किसी ने साथ दिया, तो वह भारत था।
भारत ने जिसे भी मित्र बनाया, उससे कभी विश्वासघात नहीं किया। यदि भारत का सहारा न मिला होता, तो शायद आज न तस्लीमा जीवित होतीं और न हसीना।
यह कटु सत्य है कि जिस पूर्वी पाकिस्तान को संवार-संभाल कर भारत ने बांग्लादेश के रूप में खड़ा किया, वही आज वहाँ के हिंदुओं की पीठ में छुरा घोंप रहा है।
यह कोई नई कहानी नहीं है। बांग्लादेश के कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार का इतिहास पुराना है। तस्लीमा नसरीन का विश्वप्रसिद्ध उपन्यास “लज्जा” आज भले आसानी से न मिले, लेकिन जिन्होंने पढ़ा है, वे उसकी पीड़ा नहीं भूल सकते।
वह उपन्यास सच्ची घटनाओं पर आधारित था, मानवता को झकझोर देने वाला, रूह कंपा देने वाला।
उसकी सबसे दर्दनाक पंक्ति थी-
“अब्दुल, एक-एक कर करो, वह मर जाएगी…”
यह वह बेबस चीख थी एक हिंदू माँ की, जिसकी 16 वर्षीय बेटी को अब्दुल और उसके साथियों ने उठा लिया था।
दर्द से टूटी माँ गिड़गिड़ाकर कहती है-
“आधे लोग मेरे साथ कर लो, उसे छोड़ दो।”
लेकिन दरिंदों का दिल नहीं पसीजा। मासूम बेटी की जान चली गई, और माँ ने उन्हीं में से एक का खंजर अपने सीने में उतार लिया। यही थी लज्जा की भयावह सच्चाई।
कट्टरपंथी मौलानाओं ने तस्लीमा के खिलाफ “सर तन से जुदा” के फरमान जारी किए। किसी तरह वह भारत पहुँचीं और आज निर्वासन का जीवन जी रही हैं, जैसे शेख हसीना।
अच्छा हुआ कि तस्लीमा और हसीना भारत आ सकीं। वरना दीपूचंद्र दास की तरह उन्हें भी पेड़ से बाँधकर जला दिया जाता।
फिर भी, इस अमानवीय यथार्थ पर कोई “लज्जा-2” लिखेगा, और वही लिख पाएगा, जिसके हाथ न काँपें, होंठ न थरथराएँ और आत्मा न चीख उठे।
इतिहास ने स्वयं को एक बार फिर दोहरा दिया है। जिगर पर पत्थर रखकर समय ने अपने माथे पर यह रक्तरंजित कथा लिख दी है।
क्षमा करें अटल जी, आज के दौर का यही कड़वा गीत है, इसलिए आपकी पंक्तियों का सहारा लेना पड़ा।
आज बांग्लादेश में जो हो रहा है, उसे देखकर देश के जनरल_अरोड़ा और फील्ड मार्शल मानेकशॉ की आत्माएँ भी विचलित हो उठी होंगी।
हर कोई तस्लीमा या हसीना नहीं होता, जिसे संकट में भारत का आँचल नसीब हो,,,,,

गधे के मांस के लिए चीन ने पाकिस्तान में जिस प्रोसेसिंग प्लांटको खोला था उस पर लग गया ताला: कंगाल मुल्क का पैसा कमाने का सपना टूटा

                                                                                                                  साभार - ऑपइंडिया इंग्लिश
पाकिस्तान के ग्वादर में चीन की एक बड़ी कंपनी ने अचानक अपना गधा स्लॉटरहाउस और प्रोसेसिंग प्लांट बंद करने का ऐलान कर दिया है। कंपनी ने सभी कर्मचारियों को निकाल दिया है और इसके पीछे सरकारी अड़चनें, एक्सपोर्ट रुकना और भारी आर्थिक नुकसान को वजह बताया है। यह प्रोजेक्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत शुरू किया गया था और इसे एक बड़े निवेश के तौर पर देखा जा रहा था।

सरकारी अड़चनें और रुका एक्सपोर्ट बना कारण

हैंगेंग ट्रेड कंपनी ने शनिवार (2 मई 2026) को जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह अब पाकिस्तान में अपना काम जारी नहीं रख सकती। कंपनी के मुताबिक, उसने चीन के कस्टम और अंतरराष्ट्रीय HACCP फूड सेफ्टी के सभी नियमों का पालन किया था, इसके बावजूद उसे एक्सपोर्ट की मंजूरी नहीं मिली।

कंपनी ने साफ कहा कि समस्या तकनीकी नहीं, बल्कि सिस्टम से जुड़ी है। लगातार ब्यूरोक्रेटिक रुकावटें और नीतियों के लागू होने में अनिश्चितता के कारण काम प्रभावित हुआ। पिछले तीन महीनों में कंपनी को भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसमें कर्मचारियों की सैलरी, बिजली बिल, कॉन्ट्रैक्ट पेनल्टी और कंटेनर चार्ज शामिल हैं।

7 मिलियन डॉलर का निवेश, अब निवेशकों को चेतावनी

इस प्रोजेक्ट में कंपनी ने करीब 7 मिलियन डॉलर (लगभग 50 मिलियन युआन) का निवेश किया था। प्लांट की क्षमता सालाना 3 लाख गधों को प्रोसेस करने की थी, जिनका मांस और खाल चीन भेजी जानी थी। चीन में इनका इस्तेमाल खासतौर पर पारंपरिक दवा एजियाओ बनाने में होता है।

हालाँकि कंपनी ने पाकिस्तान के कुछ अधिकारियों की सराहना भी की लेकिन साथ ही दूसरे चीनी निवेशकों को चेतावनी दी कि निवेश से पहले नीतिगत खामियों और संस्थागत अनिश्चितताओं का आकलन जरूर करें।

कंपनी ने अपने कर्मचारियों से माफी माँगते हुए कहा कि मौजूदा हालात में वह उन्हें रोजगार देने में असमर्थ है। यह प्रोजेक्ट 2023 में शुरू हुआ था और इससे पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा और रोजगार मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अब इसका बंद होना CPEC प्रोजेक्ट्स पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

उत्तर प्रदेश : अब्बू और चाचा करते रहे 14 साल की अपनी ही बच्ची का बलात्कार; POCSO एक्ट में दोनों को पुलिस ने किया गिरफ्तार


उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक 14 साल की नाबालिग लड़की के साथ उसके अब्बू और चाचा द्वारा कई महीनों तक रेप किए जाने का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार, लड़की के चाचा ने करीब चार महीने तक उसे धमकाकर और जान से मारने की धमकी देकर कई बार शारीरिक शोषण किया।

जब पीड़िता ने हिम्मत करके यह बात अपने अब्बू को बताई, तो उसने मदद करने के बजाय खुद भी उसके साथ दुष्कर्म किया। इस तरह नाबालिग अपने ही परिवार में लगातार शोषण का शिकार होती रही।

अब्बू से न्याय मांगने पर भी मिली दरिंदगी

जब किशोरी ने हिम्मत जुटाकर अपने अब्बू फरमान को चाचा की करतूतों के बारे में बताया, तो रिश्तों की मर्यादा को तार-तार करते हुए कलयुगी अब्बू ने भी अपनी बेटी का बलात्कार किया। कई महीनों तक यह सिलसिला चलता रहा, जिससे तंग आकर किशोरी ने शामली में रहने वाली अपनी खाला से संपर्क साधकर आपबीती सुनाई।

पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया कि उसकी अम्मी काफी समय पहले अब्बू की हरकतों से तंग आकर घर छोड़कर जा चुकी थी।  माँ की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए सबसे पहले चाचा आसिफ ने पिछले 4 महीनों से उसे जान से मारने की धमकी देकर लगातार दुष्कर्म करता रहा। लेकिन अब्बू से मदद मिलने की बजाए अब्बू ने भी बलात्कार करना शुरू कर दिया। 

लड़की की अम्मी पहले ही घर छोड़ चुकी थी, जिसके कारण वह अकेली रह गई थी। बाद में पीड़िता ने अपनी खाला को पूरी घटना बताई, जिसके बाद गुरुवार (30 अप्रैल 2026) को वह पुलिस के पास शिकायत लेकर पहुँची। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज किया और दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस की त्वरित कार्रवाई

पुलिस ने बीएनएस की धारा 65(1), 115(2), 351(3) और 5/6 पॉक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर आरोपी अब्बू फरमान और चाचा आसिफ को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने बताया कि पीड़िता का बयान दर्ज किया जा रहा है और मामले की गहराई से जाँच की जा रही है। पुलिस ने POCSO एक्ट सहित गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया है। 

इस जघन्य मामले पर विभिन्न राजनीतिक दलों और महिला संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विपक्षी दलों ने कहा कि प्रदेश में बेटियाँ घर में भी सुरक्षित नहीं हैं, जो सरकार की विफलता को उजागर करता है। अब कोई इन से पूछे कि जब घर वाले ही अपनी बच्ची का बलात्कार कर रहे हैं तो सरकार कहाँ से बीच में आ गयी?

सत्तापक्ष ने पुलिस की त्वरित कार्रवाई की सराहना की और कहा कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने पीड़िता के पुनर्वास और मनोवैज्ञानिक सहायता की तत्काल व्यवस्था की माँग की है।

बंगाल : TMC उम्मीदवार जहांगीर खान द्वारा हिन्दू वोटरों को धमकाने के कारण फाल्टा विधानसभा सीट के सभी 285 बूथों पर 21 मई को दोबारा वोटिंग और रिजल्ट 24 को

बंगाल में मतदान केंद्रों पर भारी भीड़ की वजह थी अधिकांश लोगों द्वारा पहली बार वोट डालने का मौका मिलना। इस चुनाव से पहले लोगों के घर से निकलने की जरुरत ही नहीं पड़ती थी। क्योकि सत्तारूढ़ पार्टी के गुंडे पहले ही उनके वोट डाल दिया करते थे। 
पश्चिम बंगाल की 144-फाल्टा विधानसभा सीट पर मतदान के दौरान सामने आई गंभीर गड़बड़ियों के बाद चुनाव आयोग ने पूरे विधानसभा क्षेत्र में दोबारा मतदान कराने का आदेश दिया है। आयोग ने साफ किया है कि 21 मई 2026 को सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक सभी 285 मतदान केंद्रों और सहायक बूथों पर पुनर्मतदान कराया जाएगा।

कितनी सीटों पर होगी दोबारा वोटिंग?

चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार, फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के सभी 285 मतदान केंद्रों पर नए सिरे से मतदान कराया जाएगा। सभी सहायक मतदान केंद्रों पर भी नए सिरे से वोट डाले जाएंगे। नतीजतन, जहां बंगाल की 293 सीटों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे, वहीं फाल्टा को इस घोषणा से अलग रखा जाएगा।

दोबारा हो रही थी मतदान की मांग

दरअसल फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के लिए मतदान चुनाव के दूसरे चरण के दौरान विशेष रूप से 29 अप्रैल को हुआ था। उस दिन इस सीट के अलग-अलग बूथों पर मतदान प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोप सामने आए थे। साथ ही यह शिकायत भी मिली थी कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) पर स्टिकर चिपकाए गए थे। इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया था कि स्थानीय निवासियों के एक बड़े वर्ग को अपना वोट डालने से रोका गया था। तब से फाल्टा में दोबारा चुनाव कराने की मांग लगातार बढ़ रही थी। मतदान के अगले दिन फाल्टा के कई हिस्सों में सड़क जाम करने की घटनाएं सामने आईं, जो निवासियों को मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने के विरोध में की गई थीं।

पूरे फाल्टा क्षेत्र में फिर से मतदान कराने का आदेश

शुक्रवार रात को राज्य के विशेष रोल पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता ने पुष्टि की कि आयोग को फाल्टा की स्थिति के संबंध में कई शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों की सावधानीपूर्वक जांच की जा रही थी और CCTV कैमरे की फुटेज की भी गहनता से पड़ताल की जा रही थी। इसके बाद शनिवार रात को, आयोग ने एक निर्देश जारी किया जिसमें पूरे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में फिर से मतदान कराने का आदेश दिया गया। गौरतलब है कि शनिवार को मगराहाट पश्चिम और डायमंड हार्बर विधानसभा क्षेत्रों के कई बूथों पर भी दोबारा चुनाव कराए गए थे।

फाल्टा में वोटरों को धमकाने का आरोप

इससे पहले चुनाव आयोग ने शनिवार को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले की डायमंड हार्बर जिला पुलिस को निर्देश दिया कि वे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान के करीबी सहयोगियों के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करें। ग्रामीणों ने इन सहयोगियों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने बीजेपी को वोट देने पर उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है।

सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी

पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर के सूत्रों ने बताया कि आयोग ने डायमंड हार्बर जिला पुलिस को चेतावनी दी है कि अगर वे उसके निर्देशों का पालन करने में नाकाम रहते हैं और एफआईआर दर्ज करके गांव वालों को धमकाने के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं करते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
वोटों की गिनती 4 मई को
दरअसल 29 अप्रैल को मतदान से पहले ही फाल्टा ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा था। इसकी वजह जहांगीर खान और ईसीआई द्वारा नियुक्त विशेष पुलिस पर्यवेक्षक, अजय पाल शर्मा (उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी) के बीच हुई बातचीत थी। मतदान के दिन भी दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर उप-मंडल के तहत आने वाले फाल्टा और आस-पास के विधानसभा क्षेत्रों से मतदान से जुड़ी छिटपुट हिंसा की खबरें मिली थीं। बता दें कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को हुए थे। वोटों की गिनती 4 मई को होगी और उसी दिन नतीजे घोषित किए जाएंगे।

मिसाइलों और यूरेनियम से ईरान लोगों का पेट नहीं भर सकता, पाकिस्तान भी दलाली को विदेशों में जमाकर लोगों को भूखा मार कटोरा हाथ में उठाए फिर रहा है; ईरान भी उसी हाल में है

सुभाष चन्द्र

पाकिस्तान शुरू से आतंक के रास्ते चल कर परमाणु बम बना कर अपनी जनता का पेट नहीं भर सका और आज कटोरा हाथ में लिए घूमता फिर रहा है। इस हाल में ईरान भी पहुँच चुका है। वह भी परमाणु हथियारों, 440 किलो यूरेनियम और आतंक से 9 करोड़ आबादी का पेट नहीं भर सकता कोई नहीं जानता अमेरिका और इज़रायल के हमलों में ईरान कितना बर्बाद हुआ है क्योंकि किसी पत्रकार को वहां घुसने की इज़ाज़त नहीं है हमारे पत्रकार तो क्या दुनिया भर के पत्रकार अमेरिका में ट्रंप का विरोध दिखा देंगे, इज़रायल में हुआ नुकसान दिखा देंगे और मिडिल ईस्ट के देशों में ईरान के हमलों से नुकसान दिखा देंगे लेकिन कोई ईरान में नहीं घुस सकता

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भारत का देश विरोधियों के हाथ बिका विपक्ष Operation Sindoor, सर्जिकल/एयर स्ट्राइक पर सरकार से सबूत मांगता है जबकि ईरान का विपक्ष बुर्का/नकाब और हिजाब के खिलाफ छिड़ी लड़ाई को भूल अपनी सरकार के साथ खड़ा है। भारत के विपक्ष को ईरान की जनता की पैरों की धूल को नमन करना चाहिए। वैसे हमारा मीडिया भी कम नहीं। हिम्मत है तो दिखाए ईरान में हुई तबाही। अगर नहीं तो इजराइल, सऊदी अरब और UAE की तबाही को दिखाना बंद करे। हमारा विपक्ष और मीडिया एक हाथ से ताली बजाकर भारतीय जनमानस को पागल बना अपनी TRP में मरा जा रहा है।    

आज भी ईरान अमेरिका और इज़रायल को धमकी देने से बाज नहीं आ रहा क्या मिलेगा ईरान को आगे और युद्ध करके? अमेरिका के वह केवल मिडिल ईस्ट देशों में उसके बेस पर नुकसान कर सकता है या अपने ही मुस्लिम साथी देशों का नुकसान कर सकता है इतना ही नहीं वह उन देशों के आयल संयंत्रों पर भी हमले करने से पीछे नहीं हटा लेकिन ईरान भूल रहा है कि उसकी आमदनी का स्रोत केवल तेल है और अगर अमेरिका/इज़रायल ने उसके तेल भंडार ख़त्म कर दिए तो वह कहीं का नहीं रहेगा

युद्ध कितना भी चले, अमेरिका/इज़रायल अपनी जनता का पेट पाल लेंगे क्योंकि वो किसी भी हाल में आर्थिक रूप से संपन्न है लेकिन ईरान भूखा बर्बाद हो जाएगा और हो रहा है आज एक डॉलर 14 लाख ईरानी रियाल के बराबर है होर्मुज को गुंडागर्दी से बंद किया लेकिन आज उसके ही आयल टैंकर नहीं निकल पा रहे क्योंकि अमेरिका ने नाकेबंदी कर दी है

यही कारण है कि ईरान इस समय अमेरिका से समझौते के लिए बेताब है उसको समझ आया है कि पाकिस्तान अमेरिका का साथ दे रहा है लेकिन पाकिस्तान ईरान के लिए भी रास्ते खोल रहा है और ये पाकिस्तान की बर्बादी का भी कारण बनेगा क्योंकि इज़रायल के निशाने पर अब पाकिस्तान आ जायेगा अगर वह ईरान के साथ खड़ा हो गया

ईरान का विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) दूसरे दौर की बातचीत के लिए पहले पाकिस्तान गया, फिर ओमान गया (ओमान जिसके तेल के ठिकाने ईरान ने बर्बाद किये) और उसके बाद रूस गया केवल इसलिए कि कोई अमेरिका से समझौते का रास्ता निकाल दे शायद इसलिए ही ट्रंप और पुतिन के बीच डेढ़ घंटे बात हुई है एक दिन पहले लेकिन शायद कोई हल नहीं निकला रूस क्या हल निकलेगा जब वह अपने यूक्रेन युद्ध का हल नहीं निकाल पाया?

Iran has targeted oil fields, refineries, and storage facilities in the UAE, Qatar, Saudi Arabia, Bahrain, Iraq, and Oman as part of a significant escalation in regional conflict. Key strikes, often using drones and missiles, severely impacted the UAE’s Fujairah port and Qatar’s Ras Laffan LNG. 

इसलिए अब ईरान को अपने तेल के अड्डों पर हमलों के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि अब अगर युद्ध शुरू हुआ तो वे टारगेट बनेंगे

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और संसद के स्पीकर  मोहम्मद बागेर गालीबाफ विदेश मंत्री को हटाना चाहते है क्योंकि उनका मानना है कि अब्बास अराघची उनकी सरकार के साथ नहीं बल्कि IRGC के इशारों पर चल रहे हैं यह ईरान में साफतौर पर पड़ी फूट को दर्शाता है आज सच्चाई यही लगती है कि ईरान को IRGC ने कब्जे में ले लिया है जैसे पाकिस्तान को असिम मुनीर ने ले रखा है और इसलिए अमेरिका को जो भी धमकी दी जा रही हैं वो IRGC की तरफ से दी जा रही हैं

बेहतर होगा ईरान हिज़्बुल्ला, हमास और हूतियों को छोड़ शांति का मार्ग तलाश करे वरना उसे बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता। ईरान पर हमलों का असली कारण दुनिया के लगभग 122 आतंकी संगठनों को मदद करता है।   

तो क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहुल गांधी को राजद्रोह कर “गृहयुद्ध” छेड़ने की अनुमति दे दी है?

सुभाष चन्द्र

कल इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम डी चौहान ने राहुल गांधी के देश विरोधी बयान के लिए उसके खिलाफ FIR दर्ज करने वाली याचिका को खारिज कर दिया। 

याचिकाकर्ता सिमरन गुप्ता ने संभल की अदालत में राहुल गांधी के आपत्तिजनक बयानों के लिए (जिन्हें उसने राजद्रोह बताया था) केस दर्ज कर राहुल के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी लेकिन संभल कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी सिमरन गुप्ता ने कहा था कि उसके बयान जनता की भावनाओं को भड़काने वाले है और राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं और इसके लिए उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
राहुल गांधी ने 15 जनवरी, 2025 को कांग्रेस समिति की सभा में कहा था कि “We are fighting against the BJP, RSS and the government of India” (सही शब्द उसने कहा था fighting against the Indian State)  लेकिन इसे न्यूज़ पोर्टल्स पर बदल दिया गया है Govt of India”

संभल कोर्ट ने सिमरन की अर्जी ख़ारिज कर दी थी और कल उसके खिलाफ अपील इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी खारिज कर दी

अगर मान भी लिया जाए कि राहुल गांधी ने Fight against govt of india कहा तब भी वह पुराने IPC के सेक्शन 124(a) और वर्तमान BNSS की धाराओं में यह “राजद्रोह” की श्रेणी में आता है

“fighting against the Government of India or attempting to overthrow it is covered under the Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023, which replaced the Indian Penal Code (IPC) on July 1, 2024. While the BNS officially repealed Section 124A (Sedition) of the IPC, it has introduced a new, arguably broader, provision under Section 152 that deals with "acts endangering sovereignty, unity, and integrity of India".

(Section 152 BNS): Criminalizes acts threatening the nation's sovereignty, unity, and integrity through violence, subversion, or secessionist.

इसका मतलब यही है कि संभल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट की नज़र में Government of India के खिलाफ युद्ध छेड़ना कुछ गलत नहीं है यानी हाई कोर्ट ने राहुल गांधी के राजद्रोह के जरिये “गृहयुद्ध” छेड़ने की अनुमति दे दी वो पहले ही नेपाल की तरह Gen-Z के जरिये मोदी को उखाड़ फेंकने की योजना बनाता रहता है और अब उसे हाई कोर्ट का साथ मिल गया 

पता नहीं सिमरन गुप्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने की हिम्मत रखती हैं या नहीं लेकिन मुझे नहीं लगता इस निर्णय में कोई बदलाव करेगा सुप्रीम कोर्ट तो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा देगा क्योंकि वहां से तो कांग्रेस नेताओं को राहत मिल ही जाती है सबसे बड़ी राहत तो कांग्रेस परिवार से आने वाले जस्टिस बीआर गवई ने दी थी उसकी सजा पर रोक लगा कर जिसकी वजह से राहुल गांधी आज देश विदेश में भारत के खिलाफ विषवमन करता फिरता है

इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ को कल के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, चाहे फिर सुप्रीम कोर्ट जो मर्जी फैसला करे लेकिन कल के फैसले ने राहुल गांधी को “गृहयुद्ध” छेड़ने की अनुमति दे दी है 

‘IB की रिपोर्ट में दावा- बंगाल में TMC जीतेगी 220 तक सीटें’: क्या है सच?

                                                                                                                   साभार: @PIBFactCheck
पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले सोशल मीडिया पर मचे तूफान को केंद्र सरकार ने शांत कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक कथित ‘IB रिपोर्ट’ वायरल हो रही थी, जिसमें दावा किया गया कि TMC 220 सीटें जीतकर सत्ता में लौट रही है। शुक्रवार (1 मई 2026) को PIB ने साफ कर दिया कि यह रिपोर्ट पूरी तरह फर्जी है।

PIB ने खोली पोल

सोशल मीडिया पर ‘पैरामिलिट्री असेसमेंट’ के नाम से एक लेटर वायरल हुआ। इसमें दिखाया गया कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने TMC की बड़ी जीत का अनुमान लगाया है। PIB ने X पर पोस्ट कर बताया कि IB ने ऐसी कोई रिपोर्ट कभी जारी नहीं की। यह किसी की शरारत है। सरकार ने अपील की है कि लोग ऐसी अफवाहों पर यकीन न करें। किसी भी खबर को केवल सरकारी वेबसाइट से ही चेक करें।

फर्जी IB रिपोर्ट पर PIB का बड़ा खुलासा

चुनावी माहौल में माहौल बिगाड़ने के लिए अक्सर ऐसी झूठी खबरें फैलाई जाती हैं। PIB ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध मैसेज या फोटो को आगे शेयर न करें। किसी भी जानकारी को केवल सरकारी वेबसाइट या आधिकारिक सूत्रों से ही चेक करें। गलत सूचना फैलाना कानूनन जुर्म भी हो सकता है।

फैक्ट चेक यूनिट का कहना है कि चुनाव जैसे संवेदनशील समय में ऐसी फर्जी रिपोर्ट वोटरों को गुमराह कर सकती हैं। नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि वे बिना जाँचे किसी भी खबर को सच न मानें। सोशल मीडिया पर चल रहे दावों की पुष्टि करना बहुत जरूरी है ताकि शांति बनी रहे।

कांग्रेस के मुखपत्र National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा, उस बांग्लादेश के ‘निष्पक्ष चुनाव’ की दे रहा दुहाई जहाँ विपक्ष को बोलने की आजादी तक नहीं

     National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा (साभार: National Herald/TheDailyStar)
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद पूरे देश में हिंसा फैली, जो आज भी जारी है खासकर हिंदुओं के खिलाफ। फिर शेख हसीना की सरकार गिरने के लगभग 1.5 साल बाद बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में भी हिंसा की कई खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कांग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का मानना है कि ‘भारत को बांग्लादेश से सीखने की जरूरत है।’

दरअसल, खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताने वाले सौरभ सेन ने नेशनल हेराल्ड के लिए एक आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल को सौरभ सेन ने स्वीडन के मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज’ के ऑडिट के हवाले से लिखा है, जो दावा कर रहा है कि बांग्लादेश में आम चुनाव 2026 में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और उन दावों को खारिज किया जो बांग्लादेश के विपक्षी दल कहते आ रहे हैं कि चुनाव में धाँधली हुई है।

अगर भारत में हुए प्रथम चुनाव से लेकर चर्चा की जाए कांग्रेस के कार्यकाल में ही सबसे ज्यादा धांधलियां सामने आएँगी। जहाँ हारे हुए कांग्रेस उम्मीदवार को कांग्रेस सुप्रीमो के आदेश पर जीता हुआ घोषित कर दिया जाता था। 

कांग्रेस  की आवाज बनकर नैरेटिव गढ़ने वाले ‘नेशनल हेराल्ड’ ने राहुल गाँधी के ही स्वर में अपनी बात रखी है। आर्टिकल में भारत के चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए, सरकार पर तंज कसा गया और यहाँ तक कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास न होने का ठीकरा भी सरकार पर ही फोड़ डाला।

नेशनल हेराल्ड के आर्टिकल की हेडलाइन- बांग्लादेश में हुए ‘ऑडिट’ से भारत के लिए सबक, से ही भारत-विरोधी स्वर गूँज रहे हैं। यहाँ लेखक सौरभ सेन दावा करते हैं कि बांग्लादेश तो भारत से कहीं आगे और बेहतर देश है और भारत को उससे कुछ सीखना चाहिए, जबकि हकीकत से इससे कहीं परे है। यहाँ खासतौर से हाल ही में बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 को ‘पारदर्शी’ बताने का दावा कर भारत को सबक लेनी की बात कही जा रही है।

यहाँ नेशनल हेराल्ड उस देश के चुनावों में ‘पारदर्शी’ की बात कर रहा है, जहाँ कई सालों तक सत्ता में रही शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ को ही चुनाव लड़ने से रोका गया। पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनाव पर कई सवाल खड़े हुए, जब चुनावों में हिंसा और हेराफेरी की खबरे सामने आईं।

सच: बांग्लादेश में चुनावी हिंसा और भारत में सख्त नियम

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में लिखा- भारत का चुनाव आयोग चाहे तो चुनाव और नतीजों की जाँच को और ज्यादा पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद बना सकता है।

जबकि सच क्या है, यह सबके सामने आ चुका है। कैसे बांग्लादेश में चुनावों में हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। कहीं मतदान केंद्र पर बम धमाका हुआ, तो कहीं गोलीबारी हुई, कई मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों की आपसी झड़प में माहौल गरमाया। मानवाधिकार संगठन ओधिकार के अनुसार, 13 फरवरी से 28 फरवरी के बीच 104 हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई और 476 से ज्यादा लोग घायल हुए।

अभी बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में कितने बम पकडे गए, अगर नहीं पकडे जाते मतदान के दौरान क्या होता जनता देखती रही है।  

रही पारदर्शी की बात, तो बांग्लादेश चुनावों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी BNP के नेताओं ने ही वोटिंग प्रक्रिया में ‘हेराफेरी‘ के आरोप लगाए। ऐसे ही चुनावों से पहले हवा बनाने वाली जमात-ए-इस्लामी ने भी यही आरोप लगाए।

तो यहाँ भारत को क्या सीखने की जरूरत है? वोटिंग प्रक्रिया में हेराफेरी या मतदाताओं पर हिंसा? क्योंकि हाल ही में बंगाल चुनाव देख लीजिए। पिछले बंगाल चुनाव 2021 में मिली सभी शिकायतों का चुनाव आयोग ने हल ढूँढा। भारत के चुनाव आयोग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। जिस बंगाल में साल 2021 के चुनाव परिणामों के बाद हिंसा फैली, उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने मतदान के दौरान देशभर से आए भारी सुरक्षाबल को तैनात किया।

यानी अगर कोई प्रदेश हिंसा के लिए जाना भी जा रहा है, तो चुनाव आयोग अपनी तरफ से कायदे-कानून बनाने में कमी नहीं कर रहा है। जहाँ नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में बैलट पेपर पर हुए चुनावों की वाहवाही करते नहीं थक रहा है, वहीं भारत में EVM से ‘पारदर्शिता’ के साथ चुनाव संपन्न हो रहे हैं। और अब तो चुनाव आयोग EVM से छेड़छाड़ की घटना पर भी सख्त हो गया है।

तो इससे पता लगता है कि भारत का चुनाव आयोग चाहता नहीं, करके दिखाता है कि कैसे भारत में चुनाव पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद होते हैं।

सच: बांग्लादेश में ‘नाम’ का महिला आरक्षण और भारत में महिला आरक्षण पर सरकार ‘गंभीर’

आर्टिकल में यह भी लिखा गया, “भारत में बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में तेजी से पेश किया। पार्टी को पता था कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, फिर भी उसने ऐसा किया। इसका मकसद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले महिलाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करना था।”

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

ये जो नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में महिलाओं के आरक्षण पर बात करता है, क्या इन्होंने कभी बांग्लादेश में महिालओं के हालात पर मुद्दा उठाया है। बांग्लादेश में महिलाओं की हालत क्या है? यह सबको पता है। आए दिन गैंगरेप की घटनाएँ और मारपीट की घटनाओं से साफ पता लगता है कि बांग्लादेश में महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता है।

खासकर हिंदू महिलाएँ, जो घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें घर में भी सुरक्षित नहीं छोड़ते हैं। महिलाओं को आरक्षण देने वाला बांग्लादेश ही है, जिसे महिला का शक्ति रूप ‘माँ दुर्गा’ की पूजा से दिक्कत है। हर साल दुर्गा पूजा में हिंसा की खबरें सामने आती हैं, कहीं देवी की मूर्ति तोड़ी जाती है, कहीं पत्थरबाजी होती है।

और बांग्लादेश में महिला आरक्षण पर बात करने वाला नेशनल हेराल्ड कांग्रेस की ही आवाज है, जिसने भारत की संसद में महिला आरक्षण कानून का विरोध किया। तो कहना बिल्कुल शोा नहीं देता कि भारत को यह सीखने की जरूरत है कि महिलाओं का कैसे सम्मान करना है?

‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने वाली कांग्रेस को बांग्लादेश से ‘प्रेम’, पर भारत का ‘विरोध’

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में भारत को बांग्लादेश से जो भी सीख लेने की बात कही, वह सीख अगर भारत ने ले ली तो उसकी भी हालत बांग्लादेश जैसी ही होगी। वही बांग्लादेश, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, विरोध प्रदर्शनों को बल से दबाया जाता है, विपक्षी दलों को प्रतिबंध कर दिया जाता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं।
एक ओर कांग्रेस है, जो संसद में रोजाना लोकतंत्र और संविधान की बात कर लगातार सरकार पर हमलावर रहती है, और दूसरी ओर उसी का मुखपत्र जो लोकतंत्र के नाम पर डूबे हुए बांग्लादेश से भारत को सबक लेने की सीख दे रहा है। असल में कांग्रेस सिर्फ भारत-विरोधी बात करना जानती है, चाहे उसे भारत से कमतर देश से ही क्यों न भारत की तुलना करनी पड़े।
कांग्रेस पार्टी बुद्धीजीवी बनकर अपने समाचार पत्र में महिलाओं के आरक्षम की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो पीछे हट जाती है। इसका ताजा उदाहरण लोकसभा में देखने को मिला, जब सरकार महिला आरक्षण कानून लेकर आई और कांग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया।
कांग्रेस को नहीं बोलना चाहिए कि भारत को क्या और किससे सीखने की जरूरत है। ये वही लोग हैं जो वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन बैलेट पेपर की निष्पक्षता उन्हें अच्छी लगती है। ये वही लोग हैं, जो भारत के हित में एक बात कहने में हिचकते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की वाहवाही करते नहीं थकते।