‘चलो दिल्ली’ के बीच ‘क्रांति’ और ‘खून-खराबे’ का खुलासा: विपक्ष की देशविरोधी साजिश का पर्दाफाश


राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन के ‘चलो दिल्ली’ मार्च तथा सुप्रीम कोर्ट की ओर कूच करने के आह्वान के ठीक बीच वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की वर्चुअल बैठक का सामने आया सनसनीखेज ऑडियो रोंगटे खड़े करने वाला है। चुनाव दर चुनाव जनता द्वारा नकारे जाने के बाद अब लोकतंत्र का मुखौटा उतारकर सीधे देश को हिंसा की आग में झोंकने की तैयारी की जा रही है। सरेआम क्रांति, खून-खराबा और सेना तक के नाम पर गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियां भड़काने की यह बात महज एक संयोग नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण भारत में सुनियोजित तरीके से अशांति फैलाने की सोची-समझी क्रोनोलॉजी है। सत्ता परिवर्तन के नाम पर पड़ोसी देशों अथवा सीरिया और लीबिया जैसी अराजकता पैदा करने का यह ताना-बाना देश की सुरक्षा और संप्रभुता पर सीधा प्रहार है। देश की सुरक्षा एजेंसियों और कानून व्यवस्था को पंगु बनाकर जनमत को बंधक बनाने की इस खतरनाक साजिश पर अब कड़े कानूनी प्रहार की मांग उठ रही है। 

सड़क पर प्रदर्शन और पर्दे के पीछे ‘खून-खराबे’ की पटकथा
जिस दिन विपक्षी गठबंधन के प्रमुख नेता सर्वोच्च अदालत और संसद की सीमाओं को चुनौती देते हुए राजधानी की सड़कों पर उतरे, उसी समय उनके प्रमुख पैरोकार द्वारा खुलेआम क्रांति और खून-खराबे की बात करना कोई सामान्य संयोग नहीं है। लगातार चुनावी शिकस्त झेलने के बाद हताश हुआ यह तंत्र अब जनता का निर्णय स्वीकार करने के बजाय अशांति का रास्ता चुन रहा है। सड़कों पर भीड़ जुटाकर संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाना और पर्दे के पीछे सशस्त्र विद्रोह की पटकथा तैयार करना लोकतंत्र के साथ खुला खिलवाड़ है। यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि जनाधार खो चुका विपक्ष अब देश के अमन-चैन को खतरे में डालकर अपना राजनीतिक वजूद बचाने का प्रयास कर रहा है।

‘सुप्रीम कोर्ट मार्च’ पर मुख्य न्यायाधीश का कड़ा रुख: न्यायिक गरिमा से खिलवाड़ नामंजूर
सड़क पर भीड़ जुटाकर अदालत पर दबाव बनाने की विपक्षी रणनीति को उस समय करारा झटका लगा जब देश के मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी नेताओं के प्रतिनिधिमंडल से मिलने से साफ इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायिक प्रक्रियाएं सड़क के नारों से नहीं, बल्कि संविधान और साक्ष्यों के आधार पर संचालित होती हैं। विचाराधीन मामलों में शक्ति प्रदर्शन करने पहुंचे नेताओं को यह दो टूक सीख दी गई कि यदि उन्हें कोई आपत्ति है तो वे विधिसम्मत याचिका दाखिल करें। मुख्य न्यायाधीश के इस दृढ़ रुख ने विपक्ष के उस मंसूबे को पूरी तरह विफल कर दिया, जिसके जरिए वे न्यायपालिका को राजनीतिक अखाड़े में घसीटना चाहते थे।

‘स्ट्रीट वीटो’ की पुरानी फितरत: शाहीन बाग मॉडल का पुनरावर्तन
संसद और अदालतों में अपनी बात मनवाने में विफल रहने के बाद सड़कों को बंधक बनाकर सरकारी नीतियों को पलटने का यह तरीका कोई नया नहीं है। पूर्ववर्ती आंदोलनों से लेकर हालिया प्रदर्शनों तक, विपक्षी इकोसिस्टम ने बार-बार ‘स्ट्रीट वीटो’ का सहारा लेकर चुनी हुई व्यवस्था को झुकाने का दांव आजमाया है। जब जनता के प्रतिनिधि संसद में कानून पारित करते हैं, तो यह गुट चुनिंदा भीड़ जुटाकर राष्ट्रीय राजमार्गों और राजधानी के प्रवेश द्वारों को अवरुद्ध कर देता है। ‘चलो दिल्ली’ मार्च भी उसी सुनियोजित रणनीति की अगली कड़ी है, जिसका उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सड़क के दबाव से सत्ता और कानून-व्यवस्था को बंधक बनाना है।

पराजय का अग्रिम बहाना: भावी चुनावी हार की पूर्व-भूमिका तैयार करने का खेल
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, विपक्ष का यह समूचा उपद्रव आगामी विधानसभा और स्थानीय चुनावों में तय दिख रही हार से बचने की पूर्व-भूमिका मात्र है। जब भी चुनावी सर्वेक्षण और जमीनी रुझान विपक्ष के प्रतिकूल नजर आते हैं, यह तंत्र अपनी सांगठनिक कमजोरी और जनसमर्थन के अभाव को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर देता है। चुनाव आयोग और मतदान प्रक्रिया को पहले से ही संदिग्ध बताकर यह विमर्श इसलिए गढ़ा जाता है ताकि नतीजों के बाद अपनी विफलता पर पर्दा डाला जा सके। हार के डर से उपजी यह अग्रिम हताशा ही इन्हें लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर अराजकता और हिंसा के रास्ते पर धकेल रही है।

‘शिव तांडव’ के नाम पर उन्माद और अनियंत्रित भीड़ का आह्वान
विपक्षी आंदोलन की दिशाहीनता तब और स्पष्ट हो गई जब राहुल गांधी ने प्रदर्शन की तुलना ‘शिव के तांडव’ और ‘शिव की बारात’ से करते हुए कहा कि इसमें कोई योजना नहीं होती और इसमें कोई भी आ सकता है, वे किसी को नहीं रोकेंगे। स्वयं को शिवभक्त बताने वाले नेता द्वारा भगवान शिव के पवित्र स्वरूप का उपयोग अनियंत्रित भीड़ और उपद्रव को सही ठहराने के लिए करना आस्थावान समाज को आहत करने वाला है। राहुल गांधी का यह कहना कि ‘आज सुप्रीम कोर्ट है, कल कुछ और होगा’, सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था को खुली चुनौती देने और समर्थकों को उकसाने का प्रयास प्रतीत होता है। धार्मिक प्रतीकों की आड़ में अनियंत्रित उपद्रव को जायज ठहराने की यह भाषा उनकी मंशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

जनादेश से हारे तंत्र की हिंसक हताशा: खुली बगावत और अशांति का ताना-बाना
राहुल गांधी के साथ हर मंच पर कदम से कदम मिलाकर चलने वाले प्रशांत भूषण का यह कहना कि अब एकमात्र रास्ता क्रांति है और इसमें भारी खून-खराबा हो सकता है, पूरे विपक्षी तंत्र की हताशा की पराकाष्ठा है। यह कोई वैचारिक असहमति या सामान्य राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि जनादेश से बार-बार नकारे जाने के बाद देश में अशांति भड़काने और बेकसूर नागरिकों की जान जोखिम में डालने का सुनियोजित षड्यंत्र है। सोशल मीडिया स्पेस में हुई इस बातचीत से यह बेपर्दा हो गया है कि सत्ता की चाहत में यह तंत्र किसी भी हद तक जाने को तत्पर है। भारत का शांतिप्रिय समाज और सजग नागरिक इनके इन मंसूबों को भली-भांति पहचानते हैं और कानून के राज को किसी भी अराजकता की भेंट नहीं चढ़ने देंगे।

सुरक्षाबलों पर घृणित आक्षेप: टकराव भड़काने और उकसावे की सुनियोजित साजिश
प्रदर्शन के दौरान अराजक तत्वों की असलियत तब खुलकर सामने आ गई जब कानून-व्यवस्था बनाए रखने में जुटे कर्तव्यनिष्ठ जवानों को खुलेआम उकसाने की साजिश रची गई। जेएनयू छात्र संघ से जुड़े छात्र नेताओं और उपद्रवियों द्वारा ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाबलों के खिलाफ अत्यंत अपमानजनक और घृणित शब्दों का प्रयोग किया गया। सुरक्षाबलों पर इस तरह के झूठे और आपत्तिजनक लांछन लगाकर जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा करने का प्रयास किया गया जिससे जवानों का धैर्य टूटे, टकराव बढ़े और अप्रिय स्थिति बने। इस उकसावे का मकसद केवल एक टकराव पैदा करना था, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित कर भारत को बदनाम किया जा सके, किंतु सुरक्षाबलों के संयम ने इस चाल को निष्प्रभावी कर दिया।

त्योहारी सीजन में राजधानी को बंधक बनाने की चाल: व्यापारियों और आमजन पर आफत
अक्टूबर के इस महत्वपूर्ण समय में जब पूरा देश त्योहारों की तैयारियों में जुटा है और दिल्ली के बाजार व्यापार की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तब विपक्ष ने राजधानी के मुख्य व्यापारिक केंद्रों को जाम कर दिया। कनॉट प्लेस, बाराखंभा और मध्य दिल्ली में बिना पूर्व अनुमति निकाले गए इस मार्च के कारण सामान्य जनजीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और पटरी वालों का त्योहारी कारोबार इस उपद्रव की भेंट चढ़ गया, जिससे आम कामकाजी वर्ग में भारी रोष है। अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए त्योहारों के मौसम में जनता को परेशान करना और व्यापारियों के पेट पर लात मारना विपक्ष की असंवेदनशील सोच को उजागर करता है।

रेजीम चेंज की विदेशी साजिश: राजधानी को पंगु बनाने का असफल प्रयास
दिल्ली की सड़कों पर दिखे इस उपद्रव के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकारों को अस्थिर करने वाले ‘रेजीम चेंज’ मॉडल की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। वैश्विक एजेंसियों और बाहरी टूलकिट की कार्यशैली पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि राजधानी को चारों तरफ से घेरकर शासन को पंगु बनाना इसी रणनीति का हिस्सा रहा है। प्रदर्शनों में संदिग्ध चेहरों की सक्रियता और वैश्विक स्तर पर तख्तापलट के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रतीकों का प्रदर्शन यह संकेत देता है कि चुनावी मैदान में विफल तंत्र अब बाहरी दबाव की मदद से चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का दांव चल रहा है। जब घरेलू राजनीतिक दल विदेशी सोच के प्रभाव में आकर अपनी ही संप्रभु व्यवस्था पर हमला करने लगें, तो यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ खड़ा होना बन जाता है।

संविधान हाथ में और अराजकता दिमाग में: विपक्ष का बेनकाब होता दोहरा चरित्र
एक तरफ कांग्रेस नेतृत्व हाथों में संविधान की प्रति लहराकर ‘संविधान बचाओ’ की बात करता है, तो दूसरी तरफ उसी के थिंक टैंक खुलेआम स्वीकार करते हैं कि संवैधानिक रास्ते खत्म हो चुके हैं और अब सेना के दखल व क्रांति की दरकार है। यह खुला विरोधाभास दिखाता है कि इनके लिए बाबा साहेब का संविधान केवल एक राजनीतिक मुखौटा है, जबकि वास्तविक सोच जनादेश को दरकिनार करने की है। यदि इन्हें संविधान पर जरा भी भरोसा होता, तो संसद और जनअदालत में हारने के बाद हिंसा व रक्तपात का मार्ग तलाशने के बजाय लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन करते। इस दोहरे चरित्र ने विपक्षी गठबंधन की बची-खुची साख को भी जनता की नजरों में धूमिल कर दिया है।

पड़ोसी देशों जैसी अस्थिरता का ‘टूलकिट’: बांग्लादेश और श्रीलंका मॉडल दोहराने का षड्यंत्र?
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि विपक्ष भारत में ठीक वही हिंसक फॉर्मूला दोहराना चाहता है जो हाल के वर्षों में हमारे पड़ोसी देशों में देखने को मिला। श्रीलंका में आर्थिक असंतोष की आड़ में सुनियोजित भीड़ जुटाकर राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कराया गया और संवैधानिक व्यवस्था को पंगु बना दिया गया। इसी तरह बांग्लादेश में सुनियोजित आंदोलन के रास्ते अशांति फैलाकर तख्तापलट को अंजाम दिया गया, जबकि नेपाल में भी सड़क के उपद्रव से चुनी हुई सरकारों को अस्थिर किया जाता रहा है। प्रशांत भूषण की बातों से यह साबित होता है कि चुनावी मैदान में जनता द्वारा पूरी तरह नकारा गया विपक्ष अब भारत में भी बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी सड़कों पर हिंसा कराकर लोकतांत्रिक सरकार को अस्थिर करने का खतरनाक खेल खेल रहा है।

अंतरराष्ट्रीय साजिशों का साया: तियानमेन चौक जैसी पटकथा दोहराने की आशंका?
सोशल मीडिया और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच यह गंभीर चिंता उभर रही है कि भारत की तेज आर्थिक प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने के लिए विदेशी ताकतों के इशारे पर अशांति का माहौल तैयार किया जा रहा है। ठीक ऐसे ही जून 1989 में चीन के तियानमेन चौक पर विरोध प्रदर्शनों की आड़ में व्यापक अस्थिरता पैदा की गई थी, जिसके बाद हुए दमन में आधिकारिक रूप से 240 और स्वतंत्र अनुमानों के मुताबिक सैकड़ों-हजारों लोगों की जानें गई थीं। भारत को आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर कमजोर करने के लिए उसी तर्ज पर देश की सड़कों पर गोलियां चलते और खून बहते देखने की ख्वाहिश रखने वाले चेहरों के पीछे छिपे विदेशी गठजोड़ की गहन जांच जरूरी है, ताकि विकास की राह पर बढ़ते भारत को कोई भीतरघात न रोक सके।

सुप्रीम कोर्ट में इंडी गठबंधन की याचिका स्वीकार नहीं हो सकी


सुप्रीम कोर्ट में इंडी गठबंधन की याचिका स्वीकार नहीं हो सकी।

बस उसमे चौदह कमियां ही हैं। मतलब हद चल रहा है देश में।
अभिषेक मनु सिंघवी के साथ करीब पांच सौ वकीलों का जत्था प्रदर्शन में था। विपक्ष के पास एक से एक धुरंधर वकील हैं। फिर भी ऐसा हुआ। साफ बात है कि यह जान-बूझ कर किया गया ताकि यह कहकर हंगामा काटा जाए कि देखो सुप्रीम कोर्ट भी इनसे मिला हुआ है।
मुख्य न्यायाधीश ने आर्टिकल 32 के तहत याचिका डालने को कहा था, जिसमें किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों के हनन के किसी मामले मे किसी सरकार या संस्था को प्रतिवादी बनाया जाता है। इन्होंने तीनों चुनाव आयुक्तों को व्यक्तिगत तौर पर प्रतिवादी बनाया है।
दूसरा सबसे मजेदार मामला है कि ग्यारह याचिकाकर्ताओं में से नौं ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर ही नहीं किये हैं। वे हैं तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, सौगत राय, संजय राउत, सुप्रिया सुले, डी राजा, एम ए बेबी, महुआ माझी और ई टी मोहम्मद् बशीर।
मतलब यही कि राहुल गाँधी और खड़गे को छोड़कर किसी ने हस्ताक्षर नहीं किया। मतलब साफ है कि कांग्रेस के साथ विपक्ष हंगामे मे बेशक साथ रहे लेकिन लीगल ग्राउंड पर कोई साथ नहीं।
हद दर्जे की दोगलयी देखिये कि खड़गे के पहचान पत्र की फोटोकॉपी ही नहीं साफ है, उसमें उनका नाम तक नहीं पढ़ा जा रहा।
और उससे भी मजेदार खामी यह रही कि फीस भी 220 रूपये कम जमा की गयी थी। भीख मांग लेते भाई।
इनको करना कुछ भी नहीं है, बस देश में आग लगाना है, झूठ फैलाना है।
इतना नंंगा सच भी जिन्हें दिखाई न पड़े।

प्रदर्शन में बंगला साहब का दुरूपयोग : केजरीवाल और विधायकों पर FIR


दिल्ली के ऐतिहासिक गुरुद्वारा बंगला साहिब में हुए घटनाक्रम को लेकर सियासी विवाद गहराता नजर आ रहा है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल समेत पार्टी के अन्य नेताओं और विधायकों के खिलाफ FIR दर्ज की है। समिति ने आरोप लगाया है कि गुरुद्वारा परिसर में राजनीतिक नारेबाजी की गई और इस पूरे घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर कथित तौर पर भ्रामक वीडियो प्रसारित किए गए।

समिति के अध्यक्ष सरदार हरमीत सिंह कालका और महासचिव सरदार जगदीप सिंह कहलों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गुरुद्वारा परिसर में लाकर नारेबाजी कराई गई। उनका दावा है कि कुछ लोग बैनर और नारे लिखी तख्तियां लेकर परिसर में पहुंचे थे, जिसके बाद धार्मिक स्थल पर प्रदर्शन किया गया। समिति ने इस घटनाक्रम को गुरुद्वारे की मर्यादा के खिलाफ बताते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
समिति पदाधिकारियों के मुताबिक, घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियो भी सामने आए, जिन्हें उन्होंने भ्रामक बताते हुए आरोप लगाया कि इनके जरिए पूरे मामले को अलग रूप देने और गुरुद्वारा साहिब की छवि प्रभावित करने का प्रयास किया गया। इस मामले में पुलिस को शिकायत देकर संबंधित वीडियो फुटेज की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि गुरुद्वारा साहिब श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, जहां माथा टेकने, लंगर छकने और सेवा करने की परंपरा सर्वोपरि है। धार्मिक परिसर में राजनीतिक गतिविधियों और नारेबाजी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। पदाधिकारियों ने कहा कि यदि किसी को विरोध या प्रदर्शन करना है, तो उसे धार्मिक स्थल के बाहर किया जाना चाहिए।
फिलहाल, मामले में पुलिस जांच जारी है और शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही हो सकेगी। इस घटनाक्रम ने धार्मिक स्थलों की मर्यादा, राजनीतिक गतिविधियों और सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री की विश्वसनीयता को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

राहुल गांधी के लिए एक सुझाव: शायद कुछ असर हो जाए; सब काम कर लिए, अब महात्मा गांधी के वस्त्र पहन कर रहना शुरू करे

सुभाष चन्द्र

राहुल गांधी ने पिछले कुछ दिनों में नए नए स्वांग रच लिए और अलग अलग कामों का Experience ले लिया। जो काम उसने किए उनमें प्रमुख है। 

1. मोटर मैकेनिक (बाइक मरम्मत)

जून 2023 में वे दिल्ली के करोल बाग स्थित मोटरसाइकिल मार्केट पहुंचे, जहाँ उन्होंने मैकेनिकों के साथ बैठकर बाइक के कल-पुर्जे ठीक किए। उन्होंने खुद पेचकस और रींच लेकर गाड़ी खोली और मैकेनिकों के हुनर की बारीकियों को समझा;

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2. किसान (धान की रोपाई और ट्रैक्टर चलाना)

जुलाई 2023 में हरियाणा के सोनीपत (मदीना गांव) का दौरा करते समय वे अचानक खेतों में उतर गए, पैंट ऊपर की और किसानों के साथ मिलकर कीचड़ में धान की रोपाई की। उन्होंने खेत में हल जोतने के लिए ट्रैक्टर भी चलाया;

3. चाकलेट मेकर (फैक्ट्री वर्कर)

अगस्त 2023 में ऊटी (तमिलनाडु) की यात्रा के दौरान उन्होंने एक चॉकलेट फैक्ट्री का दौरा किया और वहाँ कामगारों के साथ मिलकर खुद चॉकलेट बनाने की पूरी प्रक्रिया में हिस्सा लिया;

4. कारपेंटर/बढ़ई (लकड़ी का काम)

सितंबर 2023 में वे दिल्ली के कीर्ति नगर फर्नीचर मार्केट पहुंचे। वहाँ उन्होंने लकड़ी के कारीगरों (बढ़ई) के साथ बैठकर आरी चलाई, लकड़ी को काटा और रंदा मारकर उसे साफ करने का काम सीखा;

5. कुली (सामान उठाना)

सितंबर 2023 में राहुल गांधी दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहाँ उन्होंने कुलियों की लाल शर्ट पहनी, बाजू पर बिल्ला बांधा और यात्रियों का सूटकेस/सामान अपने सिर पर उठाकर कुली का काम किया। उन्होंने स्टेशन पर कुलियों के साथ बैठकर उनकी कमाई और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की;

6. कुक/शेफ (खाना बनाना)

वे कई बार यूट्यूब वीडियो और कैम्पों में पारंपरिक शेफ के रूप में खाना बनाते नजर आए हैं। उन्होंने तमिलनाडु के विलेज कुकिंग चैनल के साथ मिलकर खाना पकाया और अपनी मां सोनिया गांधी के साथ घर पर भी कुकिंग के वीडियो साझा किए हैं;

7. मोची (जूते-चप्पल की सिलाई)

जुलाई 2024 में सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में एक अदालती पेशी से लौटते समय राहुल गांधी ने सड़क किनारे रामचेत मोची की दुकान पर रुककर जूते-चप्पल सिलने का काम किया। उन्होंने मोची के साथ बैठकर टांके लगाने की तकनीक सीखी, उनके रोजगार की समस्याएं सुनीं और बाद में उन्हें एक आधुनिक सिलाई मशीन भी उपहार में भेजी; (मतलब मोची को सिलाई मशीन भेजी, किस काम की थी उसके लिए);

8. नाई/हेयर ड्रेसर (सैलून का दौरा)

अक्टूबर 2024 के दौरान उन्होंने दिल्ली में एक स्थानीय नाई (मिथुन) की दुकान पर जाकर खुद दाढ़ी बनवाई और बाल कटवाए, और देश के छोटे दुकानदारों की आर्थिक स्थिति और उनके काम की चुनौतियों को करीब से समझा।

बाकी राफेल, चौकीदार चोर, EVM, वोट चोरी, संविधान खत्म हो गया, बोलने की आज़ादी छिन गई, सेना का अपमान जैसी बातो से काम नहीं चला।

अब बस राहुल गांधी को सुझाव है कि पैंट/टी शर्ट छोड़ कर महात्मा गांधी की तरह एक घुटने तक की धोती पहनना शुरू कर दे। चाहे तो गांधी जी की तरह ब्रह्मचर्य का स्वांग भी रच ले।

राहुल गांधी दूसरा केजरीवाल बन गया है। जैसे केजरीवाल सब कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ कहता था उसके पास सबूत है जो कभी सामने नहीं लाया, वैसे ही राहुल गांधी भी हर बात का सबूत लिए घूमता है लेकिन सबूत हों तो कोर्ट में दिखाए।

कोरोना के लिए राहुल गांधी केजरीवाल की तरह Pfizer की वैक्सीन चाहता था जो 4000 रुपए की थी जबकि भारत ने वैक्सीन फ्री में दी और आज वो एलन मस्क का 9000 रुपये महीने वाला स्टरलिंक चाहता है जबकि अंबानी के डेटा की कीमत उसके मुकाबले कुछ नहीं है।

कभी UPA सरकार में कानून मंत्री रहते हुए कपिल सिब्बल ने वोट कटने के कारण बताए थे; आज उन्हीं के विरोध में सिब्बल भी खड़ा है और कांग्रेस भी

सुभाष चन्द्र

कपिल सिब्बल ने संसद में UPA सरकार के कानून मंत्री होकर बयान देते हुए वोट कटने के 3 कारण बताए थे। वो कारण थे -

-पहला कारण : जब कोई व्यक्ति एक विधानसभा क्षेत्र से अपना मकान बदलकर दूसरे क्षेत्र में चला जाता है तो कानूनन उसका नाम पुराने क्षेत्र से हटा दिया जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसका वोट छीन लिया गया है बल्कि इसका मतलब ये है कि वो अब दूसरे क्षेत्र का मतदाता बन चुका है;

-दूसरा कारण : नाम का दोहराव यानी रेप्लिकेशन- अगर किसी व्यक्ति का नाम पुरानी जगह भी चल रहा है और नई जगह भी दर्ज हो गया है तो नियम के मुताबिक एक जगह से उसका नाम रद्द करना पड़ेगा क्योंकि एक नागरिक दो जगह वोट नहीं डाल सकता;

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तीसरा कारण : अगर किसी मतदाता का निधन हो जाता है तो मृत्यु के बाद उसका नाम मतदाता सूची से हटाना अनिवार्य है।

जब जब कांग्रेस के समय में SIR हुआ, इन नियमों का पालन किया गया होगा जो सिब्बल ने गिनाए। सिब्बल का भाषण संसद के रिकॉर्ड में उपलब्ध होगा।

आज कांग्रेस और कपिल सिब्बल स्वयं उन्हीं बातों का विरोध कर रहे हैं जो उन्होंने खुद कही थी। जो नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए उनमें 2.8 करोड़ लोग मर गए, 6.3 करोड़ जगह छोड़ कर चले गए और एक करोड़ डुप्लीकेट नाम के वोटर थे। अब जो जगह छोड़ कर चले गए उन्होंने अपने नाम दूसरे क्षेत्र में जुड़वा लिए होंगे बशर्ते वो विदेशी होने के कारण देश छोड़ कर न चले गए हो जैसे रोहिंग्या और बांग्लादेशी और अपनी भारतीय नागरिकता साबित न कर पाए हों। 

कांग्रेस का ड्रामा देखिए - वो पहले कुछ और विपक्षी दलों को लेकर वोट चोरी का आरोप लेकर राष्ट्रपति के पास गए और राहुल गांधी ने झूठ फैला दिया कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी की बात मानी। उन्होंने हमसे सबूत मांगे। जब सबूत मांगे तो राष्ट्रपति ने वोट चोरी की बात कैसे मान ली? 

खड़गे साहब ने भी कहा कि राष्ट्रपति ने हमसे सबूत मांगे हैं और हम सबूत जुटा रहे हैं।

अगर सबूत जुटा लिये तो राष्ट्रपति को दो, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत से बिना सबूत के मिलने का समय मांगने का क्या औचित्य है? चीफ जस्टिस जब पहले ही CEC को निलंबित करने के मांग करने वाली याचिका ख़ारिज कर चुके हैं, तब भी राहुल गांधी और खड़गे CEC को हटाने के लिए चीफ जस्टिस से मिलना चाहते थे लेकिन चीफ जस्टिस से मिलने से मना कर दिया।

कांग्रेस को अगर CEC को हटाना है तो वह उनके विरुद्ध संसद में महाभियोग प्रस्ताव लेकर आए।  सड़क पर हिंसक राजनीति करने उन्हें नहीं हटाया जा सकता - यह बात सिब्बल बेहतर जानते होंगे जो उन्हें कांग्रेस और विपक्ष को समझा देनी चाहिए। लेकिन सिब्बल का भरोसा जब सुप्रीम कोर्ट से उठ गया है तो संसद पर क्या भरोसा रहा होगा। अब उन्हें संयास ले लेना चाहिए।

आज प्रशांत भूषण ने भी हिंसा फ़ैलाने की बात कही है। उसकी हिंसा फ़ैलाने की बात का जवाब हिंसा से ही दिया जाए तो उचित ही होगा। एक बड़ी भीड़ अगर उसका काम तमाम कर दे तो कैसा रहेगा? यह इलाज योगेंद्र यादव का भी होना चाहिए। सड़क की हिंसक राजनीति का यही उपचार है।

राहुल द्वारा उड़ाई जा रही संविधान की धज्जियाँ ; कॉकरोचों के पास महंगे वकील खड़े करने के लिए किसने तिजोरियां खोली?

हाथ मे संविधान की प्रति लेकर संविधान की सबसे ज्यादा धज्जियां राहुल गांधी ने उड़ाई है।

शायद इसी लिए वह संविधान हाथ मे रखता है ताकि जब चाहे संविधान का अपमान कर सके।
सुप्रीम कोर्ट में कोई विषय रखने का माध्यम है याचिका दायर करना। उस पर कोर्ट सुनवाई करता है। लेकिन राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन सौंपना चाहता है।
ज्ञापन किसी अधिकारी को दिया जाता है, कोर्ट का जज कोई अधिकारी नही होता। बल्कि वह एक ऐसा व्यक्ति है जो किसी एक पक्ष की बात के आधार पर कोई निर्णय नही दे सकता। लेकिन राहुल गांधी को चीफ जस्टिस से पर्सनल मीटिंग करनी है। हालांकि चीफ जस्टिस ने व्यक्तिगत मिलने से मना कर दिया है।
जब जनता के मन को राहुल नही जीत सका तो अब जबरदस्ती करके संवैधानिक संस्थाओं के पीछे पड़ गया है।
ये कहते हैं कि सरकार देश मे इमरजेंसी जैसे हालात बना रही है, जबकि इन्होंने खुद पूरे देश को अराजकता में झोंक रखा है।
उत्तर प्रदेश में इनके वर्तमान और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष में जूते चल रहे हैं। पंजाब में आपसी विवाद इतना बढ़ा कि प्रदेश अध्यक्ष को इस्तीफा देना पड़ा। चुनाव में भद पिट जाएगी तो फिर ये चुनाव आयोग को दोष देगा।
ना इस आदमी का खुद के नेताओ पर कंट्रोल है, ना ही इसका स्वयं के निर्णयों और भाषा पर कंट्रोल है और इसको देश का प्रधानमंत्री बनना है।
सरकार के विरोध में पगला चुके हैं कि देश में अराजकता फ़ैलाने की कोशिश की जा रही है।
इस समय सरकार को वास्तव में ही सख्त होने की आवश्यकता है।
देश में जादू चल रहा है पहली बार सबको मजा आ रहा है जो वहां पहुंचे वह भी खुश जो नहीं पहुंचे वह भी खुश।

अदालत में करोड़ों का मजमा, सड़कों पर 'प्रायोजित' हुड़दंग और 10 तारीख का ही फिक्स जिद्
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काकरोच आपातकाल कांग्रेस और दिमागी नक्सलियों के प्रोटेस्ट को हरी झंडी दिलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में जो नजारा दिखा, उसने न्याय व्यवस्था से ज्यादा 'धनबल' के प्रदर्शन की नुमाइश कर दी
।
 अदालत के सामने एक-दो नहीं, बल्कि देश के 10 से 15 सबसे महंगे और दिग्गज वकीलों की पूरी फौज खड़ी कर दी गई। कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण जैसे ये वो नामचीन वकील हैं, जिनकी सिर्फ एक हियरिंग (एक सुनवाई) की फीस 50 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच बैठती है
।
अब सीधा और चुभता हुआ सवाल महज 20 मिनट की दलीलों के लिए वकील की फीस के रूप में 10 से 15 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा देने वाला ये 'अदृश्य कुबेर' कौन है? CJP जैसे संगठन, जो खुद को एनजीओ और जनहित का पैरोकार बताते हैं, उनके पास एकाएक इतने करोड़ों का बजट कहां से आ गया
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यह कोई सामान्य जन-आंदोलन नहीं, बल्कि भारी-भरकम विदेशी और कॉर्पोरेट फंडिंग का एक सुव्यवस्थित नेटवर्क है। जब भी देश में किसी नीति या कानून के खिलाफ विरोध खड़ा करना होता है, तो अचानक से एफसीआरए (FCRA) के संदिग्ध रास्तों, विदेशी संस्थाओं और लुटियंस क्लब के उद्योगपतियों की थैलियों के मुंह खुल जाते हैं। सवाल यह है कि लोकतंत्र की आड़ में देश का माहौल बिगाड़ने के लिए यह भारी-भरकम 'इन्वेस्टमेंट' कौन कर रहा है
सबसे दिलचस्प और संदेहास्पद खेल तो तारीखों की जिद्द का है! जब प्रशासन या सुरक्षा एजेंसियां व्यवस्था का हवाला देकर 10 तारीख के बजाय 15 तारीख को प्रदर्शन करने का सुझाव देती हैं, तो ये आयोजक 10 तारीख पर ही क्यों अड़ जाते हैं
वजह बहुत साफ है 'एडवांस पेमेंट' हो चुका है
टूलकिट तैयार हैं, 'दहाड़ने' वाले चेहरों की बुकिंग हो चुकी है, बसों का किराया बंट चुका है और विदेशी मीडिया में कवरेज का टाइम-स्लॉट फिक्स है। अगर तारीख 10 से 15 हुई, तो टूलकिट का पूरा शेड्यूलिंग नेटवर्क ध्वस्त हो जाएगा और बांटे गए करोड़ों रुपये डूब जाएंगे। जो पैसा आंदोलन के नाम पर बांटा जा चुका है, वह अब वापस तो आएगा नहीं, इसलिए प्रदर्शन तो 'डेडलाइन' पर ही होगा चाहे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में करोड़ों के वकील ही क्यों न उतारने पड़ें
यह जनता का स्वतःस्फूर्त गुस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की 'कॉरपोरेट स्टाइल' स्पॉन्सर्ड स्क्रिप्ट है, जिसका मकसद इंसाफ नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता का तमाशा खड़ा करना है

अराजक तत्वों के बचाव के लिए, मीलॉर्ड रविवार को भी सुनवाई पर बैठ गए; पुलिस फोर्स के लिए जब एक तरफा राय रखेंगे मीलॉर्ड, तो अराजकता फैलना तय है

सुभाष चन्द्र

अराजक तत्वों के लिए रविवार के दिन सुप्रीम कोर्ट खुलने से बुजुर्गों की कहावत शत-प्रतिशत ठीक साबित हो गयी कि जिसके पैरों में लोहे का जूता और सोने के हाथ हैं वो मुवक्किल हारा हुआ मुकदमा भी जीत जाएगा वरना जीतने वाला मुकदमा भी हार जाएगा। क्या मीलॉर्ड को पिछले जंतर मंतर का अनुभव नहीं था? अगर अनुभव होता तो न रविवार को कोर्ट खोलते और न ही दंगाई क्षेत्रों में इंटरनेट बंद को कहती। यानि जब तक उपद्रवियों के लपेटे में मीलॉर्ड नहीं आएंगे तब तक बेवक्त अदालत को खोलना और अराजक तत्वों मालपुए खिलाने बंद नहीं होंगे।    

गजबे है सुप्रीम कोर्ट के दो जज आज रविवार को छुट्टी के दिन पुलिस के कल किये गए इंतज़ाम के खिलाफ सुनवाई के लिए बैठ गए और निर्देश जारी कर दिए, ये मत करो, वो मत करो, ये कर दो और वो कर दो। लेकिन ये दोनों जस्टिस बागची और जस्टिस वी मोहना भूल गए कि अगर पुलिस ने कल सावधानियां न बरती होती तो जुलाई से बहुत बड़ा दंगा हो सकता था। 

BNSS के सेक्शन 163 से सुप्रीम कोर्ट का इलाका भी अछूता नहीं है। आपके वकील जो कॉकरोचों के समर्थन में नारेबाजी कर रहे थे क्या वो सुप्रीम कोर्ट में हिंसा नहीं कर सकते थे, उन्हें तो बचने के हजार तरीके मालूम होते हैं। सुप्रीम कोर्ट को यह भी पता होना चाहिए था कि कल के प्रदर्शन के लिए पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी और सुप्रीम कोर्ट के अपने निर्णय के अनुसार ऐसा प्रदर्शन गैर कानूनी है अगर पुलिस की अनुमति नहीं है।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
सुप्रीम कोर्ट को लगता है दिपके, दास, रांका को प्लेन से और ध्रुव राठी को गुरुग्राम से हिरासत में लेने से तकलीफ हुई है। वह पुलिस ने सतर्कता के लिए किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट देखो कितनी छूट देना चाहता है अराजक तत्वों को।

सुप्रीम कोर्ट के महान जजों ने कहा -

-बिना कानूनी प्रक्रिया हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए खासकर peaceful और unarmed assemblies outside active prohibitory zones - 163 के हिस्से के बाहर तो हथियार पहुंचाने में न कोई विलंब हो सकता है और न किसी की नज़र पड़ सकती है और वो लोग आसानी से 163 के इलाके में घुस कर पुलिस पर हमला कर सकते हैं; फिर कौन जिम्मेदार होगा?

-केंद्र को नोटिस जारी किया गया political leaders, lawyers, students और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने के लिए। मीलॉर्ड क्या ये सब दूध के धुले हुए हैं या कानून से ऊपर हैं? उन्हें हिरासत में लेना पुलिस के अधिकार क्षेत्र में था कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए और अगर आप चाहते हैं कि कानून व्यवस्था बिगड़े तो फिर उसकी जिम्मेदारी पुलिस के कन्धों पर मत डालिए; कौन छात्र थे, वो videos भी देखिये जिनमें अनेक लड़किया undergarments में दिखाई देंगी;

-मेट्रो और ट्रेन सर्विस सुचारू रूप से जारी रखने के भी निर्देश दिए जिससे लोगों को आवागमन में परेशानी ना हो। ऐसे निर्देश देते हुए यह भी बता देते कि करोड़ों की लागत से बनी मेट्रो ट्रेंस को नुकसान होता या उनमे दंगाई आग लगा देते तो जिम्मेदार कौन होता? क्या आप जिम्मेदारी लेते;

-इंटरनेट सर्विस जारी रहनी चाहिए subject only to necessary law and order conditions; कानून व्यवस्था को ध्यान में रख कर ही इंटरनेट बंद किया जाता है, पुलिस कोई पागलों की संस्था नहीं है जो बिना वजह इंटरनेट बंद कर दे;

-सुप्रीम कोर्ट से तुरंत BNSS की धारा 163 के बोर्ड हटाने के निर्देश दिए। कल को दंगाई अगर सुप्रीम कोर्ट में घुस जाएं तो पुलिस को दोष मत दीजिए क्योंकि वो 163 आपकी सुरक्षा के लिए लगाई गई थी; और 

-सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अवांछनीय बैरिकेड्स को भी हटाने के भी निर्देश दिए। मीलॉर्ड ने लगता है वो वीडियो नहीं देखे जिसमें राहुल गांधी और जुलाई में कॉकरोच बेरिकेड्स को तोड़ कर घुसने की और पुलिस पर हमले की कोशिश कर रहे थे।

मैंने तो पहले भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ खड़ा होना चाहिए। ऐसे कोर्ट में आर्डर आर्डर देने से क्या लाभ है? आपका नजरिया पुलिस के खिलाफ एक तरफ़ा है। अभी तो कांग्रेस ने कल प्रदर्शन करना है। आज आपके कहने से बेरिकेड्स हटा दे पुलिस और कल कांग्रेस के लोगों को दंगा करने की खुली छूट मिल जाए, क्या ऐसा ही चाहते है आप ?

राहुल और केजरीवाल में ‘अराजक नंबर-1’ बनने की होड़, देश को अस्थिर करने की बड़ी साजिश

जो सख्ती गृह मंत्रालय द्वारा अक्टूबर 10 को दिखाई अगर पहले ही ऐसी सख्ती की होती कोई राहुल, अरविन्द और इनके कॉकरोच दिल्ली में उपद्रव करने की हिम्मत नहीं करता।

  
देश में इस समय विपक्षी दलों के बीच ही सियासी जंग छिड़ी हुई है, जिसमें एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ मची है। फिलहाल इस जंग में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सबसे आगे चल रही है और दोनों के बीच कांटे का मुकाबला हो रहा है। दोनों पार्टियां पूरे देश में और खासकर दिल्ली में अराजकता और अशांति फैलाकर इस जंग को जीतना चाहती हैं, ताकि खुद को अराजक नंबर वन का खिताब हासिल कर सके। दरअसल, इस खिताब का इस्तेमाल साल 2027 में होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनावों में किया जाएगा। इसलिए दिल्ली की सड़क पर दोनों पार्टियां अपने-अपने नेता को सबसे आक्रामक और मुखर रूप में पेश करना चाहती हैं। यहीं वजह है कि हाल के घटनाक्रमों में राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अलग-अलग विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं।

राहुल गांधी ने CJP प्रदर्शन से बनाई दूरी, पहुंचे चेन्नई

सबसे पहले राहुल गांधी की बात करते हैं। 20 जुलाई 2026 को शुरू हुई अराजकता की जंग में अरविंद केजरीवाल से पिछड़ने के बाद राहुल गांधी को बड़ा पछतावा हुआ था। हालांकि उन्होंने प्रधानमंत्री निवास के सामने धरना देकर आगे निकलने की कोशिश की थी। लेकिन इसका व्यापक असर नहीं हुआ। इसलिए 6 से 9 अक्टूबर के बीच उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर जमकर बवाल काटा। इस दौरान राहुल गांधी ने अरविंद केजरीवाल को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने अपनी बहन प्रियंका गांधी और कांग्रेस सांसदों के साथ मिलकर आकाशवाणी भवन से लेकर जंतर-मंतर तक जमकर प्रदर्शन किया। दोनों भाई और बहन ने खुद को अराजक नंबर वन साबित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली की सड़कों पर चाहे महिला पुलिसकर्मियों से मारपीट और बदसलूकी करना हो या दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का अपमान करना हो, दोनों ने अपना पूरा स्टंट और रसूख दिखाया। इसके बाद शांति का पाठ पढ़ाने राजघाट पहुंच गए। जैसे ही 10 अक्टूबर को अरविंद केजरीवाल की बारी आई, राहुल गांधी ने उनसे दूरी बना ली और चेन्नई में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल होने पहुंच गए।

राहुल से दूरी, CJP प्रदर्शन में परिवार संग शामिल होने का ऐलान

कॉकरोच जनता पार्टी ने कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को 10 अक्टूबर के प्रदर्शन में शामिल होने का न्योता दिया था। वाम दलों और आप ने अपनी भागीदारी की घोषणा कर दी। ममता बनर्जी ने भी शामिल होने की बात कही थी। कांग्रेस पार्टी ने सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर कोई बयान नहीं दिया। वहीं राहुल गांधी के प्रदर्शन से दूरी बनाने वाले आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने लोगों से 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटने का आह्वान किया। अरविंद केजरीवाल ने कहा, “ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए पूरा देश मांग कर रहा है। मैं सब लोगों से और पूरे देश के लोगों से अपील करता हूं कि ज्यादा से ज्यादा जंतर-मंतर जाएं। किसी एक व्यक्ति और पार्टी की बात नहीं है। इस देश की बात है। कल से जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट चालू हो रहा है। मैं भी जाऊंगा, मेरा पूरा परिवार भी जाएगा। आप सब लोग जाइए।”

हिरासत में केजरीवाल, टांगकर ले गई दिल्ली पुलिस

कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को रोकने के लिए प्रशासन पूरी कोशिश कर रहा है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और मेट्रो स्टेशनों के एंट्री-एग्जिट पर पाबंदियां लगाई गई हैं। प्रदर्शन की अनुमति नहीं होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे। वो नहीं चाहते थे कि राहुल गांधी उनसे आगे निकले। वो भी राहुल गांधी की तरह पुलिस से भिड़ गए और धक्का-मुक्की करने लगे। उनके अड़ियल रूख को देखते हुए आखिरकार पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। पुलिस ने उन्हें साथ चलने को कहा, लेकिन कजरीवाल अड़े रहे। राहुल गांधी की तरह पुलिस उनको भी टांगकर ले गई। इस दौरान AAP समर्थकों और पुलिस के बीच खींचतान होती भी दिखी। केजरीवाल के अलावा आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक को भी हिरासत में लिया गया।

हिरासत में केजरीवाल, टांगकर ले गई दिल्ली पुलिस

कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को रोकने के लिए प्रशासन पूरी कोशिश कर रहा है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और मेट्रो स्टेशनों के एंट्री-एग्जिट पर पाबंदियां लगाई गई हैं। प्रदर्शन की अनुमति नहीं होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे। वो नहीं चाहते थे कि राहुल गांधी उनसे आगे निकले। वो भी राहुल गांधी की तरह पुलिस से भिड़ गए और धक्का-मुक्की करने लगे। उनके अड़ियल रूख को देखते हुए आखिरकार पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। पुलिस ने उन्हें साथ चलने को कहा, लेकिन कजरीवाल अड़े रहे। राहुल गांधी की तरह पुलिस उनको भी टांगकर ले गई। इस दौरान AAP समर्थकों और पुलिस के बीच खींचतान होती भी दिखी। केजरीवाल के अलावा आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक को भी हिरासत में लिया गया।

हिरासत में ममता बनर्जी, माणिक सरकार, पी. विजयन 

तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों ममता बनर्जी, माणिक सरकार, पी. विजयन को दिल्ली में हिरासत में लिया गया है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शनिवार को दिल्ली में उनके आवास के बाहर हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया है। पूर्व सांसद साकेत गोखले ने कहा कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के पांच अन्य नेताओं को दिल्ली पुलिस और CRPF ने हिरासत में लिया है। ममता बनर्जी ने विरोध जताने के लिए अपने मुंह पर बैंड-ऐड (पट्टी) चिपकाया था और वे धरने पर बैठी थीं।

चंडीगढ़ में मनीष सिसोदिया और AAP नेता पुलिस हिरासत में 

चंडीगढ़ में सीईसी ज्ञानेश कुमार के मामले को लेकर मुख्य चुनाव अधिकारी के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया और पंजाब आप के कार्यकर्ताओं और नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। प्रदर्शन के दौरान जब आप नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सुरक्षा घेरा पार करने की कोशिश की, तो पुलिस ने हस्तक्षेप किया और मनीष सिसोदिया समेत कई अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया। इस प्रदर्शन के दौरान पंजाब के पार्टी नेता और मंत्री हरपाल सिंह चीमा समेत कई कार्यकर्ता भी मौजूद थे और उन्हें भी हिरासत में लिया गया है।

 फ्लाइट से हिरासत में लिए गए दीपके,रांका और सौरव दास

इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) फाउंडर अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली एयरपोर्ट पर फ्लाइट से हिरासत में ले लिया गया। वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर आंदोलन करने के इरादे से मुंबई से दिल्ली पहुंचे थे। उन्हें फ्लाइट के अंदर से ही हिरासत में ले लिया गया। इस दौरान दीपके को यह कहते हुए सुना जा सकता है, ‘मैं अरेस्ट होने के लिए ही आया हूं। कर लो अरेस्ट।’ दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के तीनों नेताओं को विमान से गिरफ्तार करने के बाद एक वैन में बिठाकर ले गई। उन्हें कहां लेकर गई है, फिलहाल इसकी जानकारी नहीं दी गई है।
दिल्ली पुलिस के हिरासत में यूट्यूबर ध्रुव राठी
यूट्यूबर ध्रुव राठी समेत 1000 समर्थकों को भी पकड़ा जा चुका है। दिल्ली पुलिस ने ध्रुव राठी को उनके गुरुग्राम स्थित घर से हिरासत में लिया। सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने आए ध्रुव राठी को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस सुबह 7:48 बजे उनके घर में दाखिल हुई। बताया जा रहा है कि ध्रुव राठी की मां के दरवाजा खोलने के बाद पुलिस घर के अंदर गई। खबर है कि देर रात उनके घर के बाहर करीब 50 पुलिसकर्मी जमा हो गए थे। दिल्ली पुलिस ने ध्रुव राठी को गुरुग्राम के सेक्टर 56 स्थित उनके घर से हिरासत में लिया। उनका परिवार गुरुग्राम के सेक्टर 56, सेंट्रल पार्क विहार में रहता है। गौरतलब है कि ध्रुव राठी ने 9 अक्टूबर की रात में इंडिया गेट जाकर वीडियो बनाया और लोगों को जंतर मंतर पर इकट्ठा होने की अपील की थी।
बैरिकेड उखाड़ने का प्रयास, पुलिस पर पत्थराव
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस एक्शन मोड में आ गई है।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की मल्टी-लेयर बैरिकेडिंग को पार करने और बैरिकेड उखाड़ने का प्रयास किया। पुलिस अधिकारियों को धक्का दिया। शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का दावा करने वाले हिंसा पर उतारू थे। इसके बाद पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को संसद मार्ग इलाके से डिटेन किया। इसके अलावा कनॉट प्लेस से भी कई प्रदर्शनकारी पकड़े गए। इन सबको बसों में बैठाया गया। इम्तियाज अली मार्ग पर आकाशवाणी भवन के पास प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड पार कर पुलिस पर पत्थर फेंके, जिससे दो पुलिसकर्मी घायल हो गए।

ट्रंप चिचा अमेरिका पर कितना टैरिफ लगेगा?

सुभाष चन्द्र

राष्ट्रपति ट्रंप का बयान सामने आया है जिसकी विभिन्न एजेंसियों ने अपने तरीके से पुष्टि की है। 

राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रम्प

“मैंने अभी-अभी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक अत्यंत सफल बातचीत समाप्त की है। इस बातचीत में यह सहमति बनी है कि रूस तत्काल अमेरिकी और वैश्विक बाजार में 3,00,000 टन से अधिक डीजल ईंधन की आपूर्ति करेगा। इसके अतिरिक्त, नवंबर महीने के दौरान 5,00,000 टन और उसके बाद तत्काल 10,00,000 टन डीजल ईंधन की आपूर्ति की जाएगी।

इसके अलावा, रूस की डीजल रिफाइनरियों की क्षमता को ध्यान में रखते हुए, रूस कुछ ही समय में 30,00,000 टन डीजल ईंधन की आपूर्ति करेगा।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर हमारे पूर्ण नियंत्रण और रूसी ऊर्जा के संबंध में इस बड़ी घोषणा के परिणामस्वरूप, अमेरिका और वास्तव में पूरी दुनिया में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक और बहुत तेजी से नीचे आएँगी!

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अमेरिकियों, विशेषकर हमारे महान किसानों, पशुपालकों और ट्रक चालकों के लिए ईंधन की कीमतें कम करना मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

यह एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण घोषणा है।

इसके अतिरिक्त, यह समझ लिया जाना चाहिए कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होगा!

इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद।

ChatGPT के अनुसार -

Reuters: रिपोर्ट करता है कि ट्रंप ने 9 अक्टूबर को रूस से डीजल आपूर्ति के संबंध में यह घोषणा की थी। 

Reuters

Associated Press (AP): इस समझौते और रूस से डीजल आपूर्ति की घोषणा की पुष्टि करने वाली रिपोर्ट प्रकाशित की है।

AP News

The Kyiv Independent: ट्रम्प के Truth Social पोस्ट के शब्दों और घोषित आपूर्ति की मात्रा का उल्लेख करता है।

अगर अमेरिका रूस से किसी तरह का भी तेल खरीदता है तो ट्रंप बताएं अमेरिका पर कितना टैरिफ लगेगा।

लेकिन ट्रंप अभी भी नोबेल के लिए तड़प रहे हैं जो भारतीय मूल के South African jurist Navanethem “Navi” Pillay को मिल गया।

राहुल गांधी का देश विरोधी एजेंडा, एलन मस्क के ‘स्टारलिंक’ का स्वागत, भारत की आईटी कंपनियों पर चुप्पी

मुख्य चुनाव आयुक्त और विशेष गहन पुनरावलोकन (एसआईआर) के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन संयोग नहीं, बल्कि खतरनाक प्रयोग है। एक तरफ राहुल गांधी देश के भीतर रोजगार और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी ‘स्टारलिंक’ के लाइसेंस में हो रही देरी पर अमेरिकी अरबपति एलन मस्क के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस पहले एलन मस्क के ‘स्टारलिंक’ का विरोध करती थी, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार को घेरने, राजनीतिक लाभ और सरकार विरोधी नैरेटिव को धार देने के लिए राहुल गांधी इसका स्वागत कर रहे हैं, भले ही देश में किसी विदेशी हस्ती या बाहरी कंपनी का हस्तक्षेप क्यों न शामिल हो। विदेश मामलों के जानकार और कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के बयान से असहज महसूस कर रहे हैं। राहुल गांधी के स्टैंड में अचानक आया यह बदलाव किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश और गठजोड़ की ओर इशारा कर रहा है।

क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं?- एलन मस्क
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी 8 अक्टूबर को दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एलन मस्क के एक पोस्ट ने खलबली मचा दी। मस्क का पोस्ट उसी टूलकिट का हिस्सा था, जिसे विदेशी ताकतें भारत में लागू करने की कोशिश कर रही हैं। एक भारतीय यूजर डॉ. अनुरूद्ध ने X पर एक पोस्ट में लिखा था कि क्या सरकार भारतीय सिटिजन को छोड़ कर क्रोनी कैपिटिलिज्म को बचा रही है? इसी पोस्ट को कोट करते हुए एलन मस्क ने X पर जवाब दिया, ‘Starlink को 165 देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और पांच साल तक हर कंप्पलायंस पूरा करने के बावजूद भारत में उन्हें लाइसेंस क्यों नहीं मिल रहा? क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? मस्क के मुताबिक ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि भारतीयों पर अपना “monopolistic chokehold” बनाया रखा जा सके। मस्क ने इसे भारतीय जनता के साथ “crime” तक बताया। इसके जवाब में भारत सरकार ने साफ कहा कि सैटेलाइट कम्युनिकेशन सेवाओं के लिए बनाई गई उसकी रेगुलेटरी व्यवस्था किसी कंपनी के साथ भेदभाव नहीं करती।

राहुल ने कहा, ‘भारत में आपका स्वागत है, एलन’
एलन मस्क के इस बयान के तुरंत बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, ‘भारत में आपका स्वागत है, एलन। तब तक इंतजार करें जब तक आप दूसरे व्यक्ति को नहीं खोज लेते।’ राहुल के इस बयान पर एलन मस्क ने प्रतिक्रिया भी दी। उन्होंने लिखा, ‘थैंक्यू राहुल। ये वाकई परेशान करने वाला है।’ जब एक विदेशी व्यापारी द्वारा अपने प्रतिस्पर्धी भारतीय व्यापारी पर सवाल उठाया जाता है,तो एक भारतीय का कर्तव्य है कि वो अपने भारतीय व्यापारी का समर्थन करें। लेकिन समर्थन देने के बजाए एक ऐसे विदेशी व्यापारी का स्वागत करना हैरान करने वाला है। भारत की सुरक्षा और भारतीय व्यापारियों के हितों की अनदेखी कर समर्थन करने से स्पष्ट है कि राहुल गांधी का एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन सिर्फ बहाना है। उनका मकसद अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए विदेशी कंपनियों और ताकतों के लिए लॉबिंग करना है।

अमेरिका में भारतीय आईटी कंपनियों पर सख्त फैसला
जब एलन मस्क और राहुल गांधी ‘X’ पर एक-दूसरे का समर्थन कर रहे थे। इसी दौरान अमेरिका की ट्रंप सरकार के फैसले ने दोनों को बेनकाब कर दिया। अमेरिकी प्रशासन ने आठ बड़ी आईटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) से निलंबित कर दिया। इनमें भारत से जुड़ी टेक कंपनियां कॉग्निजेंट (Cognizant), इंफोसिस (Infosys), टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो (Wipro) और एचसीएल (HCL) शामिल हैं। इस कार्रवाई के बाद इन कंपनियों से जुड़े नए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम एप्लीकेशन पर रोक लगेगी। पहले से पेंडिंग एप्लीकेशन पर भी फिलहाल कार्रवाई नहीं होगी। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन विदेशी पेशेवरों को नौकरी देने वाली कंपनियों की जांच तेज कर रहा है। ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के लिए वीजा सिस्टम का गलत इस्तेमाल कर रही हैं और इससे अमेरिकी पेशेवरों के रोजगार पर असर पड़ रहा है।

राहुल गांधी की भारतीय आईटी कंपनियों पर चुप्पी
ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से सबसे बड़ा सवाल उन भारतीय कर्मचारियों को लेकर है, जो H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं और जिनकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया इन कंपनियों के जरिए आगे बढ़ रही है। अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल ने माइक्रोसॉफ्ट को PERM ग्रीन कार्ड कार्यक्रम से निलंबित किए जाने के फैसले की आलोचना की। उन्होंने इसे कानूनी तरीके से अमेरिका आने वाले प्रवासियों पर हमला बताया। डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता जयपाल ने चेतावनी दी कि इस तरह के कदम से अमेरिका की इनोवेशन कैपेसिटी कमजोर हो सकती है और प्रवासी कामगारों को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन ट्रंप प्रशासन के इस फैसले पर एलन मस्क का भारत में स्वागत करने के लिए तैयार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मौन है। उन्हें भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स की चिंता नहीं है। उन्हें तो बस किसी तरह तरह से केंद्र की सत्ता चाहिए, चाहे उसके लिए विदेशी ताकतों की मदद क्यों न लेनी पड़े।

पहले विरोध और अब समर्थन, कांग्रेस का अचानक यू-टर्न 
पहले कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनिंदा कारोबारियों को फायदा पहुंचाने का हवाला देकर स्टारलिंक का विरोध किया था, लेकिन अब राहुल गांधी मस्क के बयान का समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी पर ट्रंप के दबाव में आने का आरोप लगाया था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मार्च 2025 में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक और भारतीय टेलीकॉम कंपनियों (जियो और एयरटेल) के बीच हुई डील और केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति में इंटरनेट कनेक्टिविटी को बंद करने का अधिकार किसके पास होगा—स्टारलिंक के पास या उसकी भारतीय साझीदार कंपनियों के पास। उन्होंने यह आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने और उनका समर्थन पाने के लिए जल्दबाजी में स्टारलिंक को भारत में लाने का रास्ता साफ किया है। लेकिन अब कांग्रेस के अचानक यू-टर्न से सवाल खड़े हो रहे हैं।

जयराम रमेश ने टेस्ला पर भी उठाया था सवाल
कांग्रेस ने स्टारलिंक का विरोध करते हुए भारत के महत्वपूर्ण डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर विदेशी नियंत्रण और सख्त नियामक जांच  की जरूरत पर जोर दिया था। हालांकि इससे पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भारत में टेस्ला के मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) पर भी सवाल उठाया था। जब एलन मस्क ने 21 अप्रैल 2024 को अपनी भारत यात्रा टाली तो जयराम रमेश ने बीजेपी पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि यह अजीब है कि एलन मस्क एक निवर्तमान प्रधानमंत्री से मिलने के लिए आ रहे थे। कांग्रेस नेता ने पोस्ट किया कि उन्होंने भी अब दीवार पर लिखी इबारत पढ़ ली है और अपनी यात्रा टालने का फैसला किया है। भारत के प्रधानमंत्री जल्द ही उनका स्वागत करेंगे और भारत सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को और भी अधिक आक्रामक तरीके से बढ़ावा देगी।

राहुल गांधी के “गले की फांस” बना एलन मस्क का समर्थन
स्टारलिंक और टेस्ला के मैन्युफैक्चरिंग पर सवाल उठाने वाले कांग्रेस नेता भूल गए कि उनका यह यह सवाल उनके दोहरे चरित्र को बेनकाब कर देगा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लगा कि अमेरिकी व्यापारी तो असल में उसी लाइन पर भारत सरकार के खिलाफ बैटिंग कर रहे हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए वह अबतक सियासी हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी का एलन मस्क का समर्थन उनके खुद के राजनीतिक बयानों के विरोधाभास और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों के कारण उनके लिए “गले की फांस” बन गया है। उनकी चौतरफा आलोचना हो रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी एक विदेशी अरबपति के व्यावसायिक हितों का समर्थन भारतीय कंपनियों और भारत के राष्ट्रीय नियामक ढांचे के खिलाफ कर रहे हैं। बीजेपी नेता राम माधव ने कहा कि भारत कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ नहीं है जहां किसी विदेशी कंपनी के दबाव में आकर बिना सुरक्षा जांच के स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया जाए।