ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस(TMC) में मचे अभूतपूर्व राष्ट्रीय विद्रोह (20 लोकसभा सांसदों और अब शायद 65 विधायकों का दलबदल) की गूंज अब कोलकाता और दिल्ली तक सीमित नहीं रही। भारत के इस सबसे बड़े राजनीतिक उलटफेर को ग्लोबल मीडिया ने भी अपने मुख्य पन्नों पर प्रमुखता से जगह दी।द न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी, द गार्जियन और ले मोंडे आदि मीडिया संस्थाओं ने ममता बनर्जी की बिखरती पार्टी पर विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित किये।
दुनिया भर के विश्लेषकों ने ममता बनर्जी को ‘जुझारू और अदम्य लड़ाकू’ (Tenacious Leader) नेता बताया। यह भी बताया कि कैसे अपने ही भतीजे अभिषेक बनर्जी के अंधमोह और कॉरपोरेट सिंडिकेट (I-PAC) के चक्रव्यूह में फंसकर उन्होंने अपनी ही बनायी सल्तनत पर से अपना पूरा नियंत्रण खो दिया।
शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस टूट में अन्तर
महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना में भी दो फाड़ हुए। एक शिंदे गुट दूसरा उद्धव ठाकरे गुट। लेकिन वो फाड़ हुए थे विचारधारा को लेकर। लेकिन तृणमूल में जो टूट हुई है यह विचारधारा को नहीं बल्कि अवसरवादिता को लेकर। जब तक ममता राज में इन लोगों को मलाई खाने को मिलती रही ममता के हर अनुचित कदम का साथ देते रहे, अब जब देखा मलाई की बजाए प्रहार सहने पड़ेंगे उसी ममता को बीच मंझधार में छोड़कर भाग रहे हैं। यानि जहाँ दिखी तवा परत वहीँ बिताई सारी रात।ममता के असली वफादार सिपाही वही हैं जो संकट की इस घडी में साथ खड़े हैं। शिवसेना में तो नेता मान लिया गया उस नेता के नेतृत्व में चुनाव भी लड़ लिए परन्तु तृणमूल से अलग हुआ गुट किसे नेता मानेगा? अगर तिजोरी के चक्कर में फ़िलहाल किसी को नेता मान लिया क्या उसके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की हिम्मत है किसी में? 15 सालों तक इनकी नैतिकता कहां थी?ऐसे लोगों को नेता नहीं अवसरवादी कहते हैं। इन्हे पार्टी से नहीं अपनी तिजोरी से मतलब होता है।
मित्र और शत्रु की सही पहचान संकट के समय होती है। जो संकट में साथ नहीं दे उसे अवसरवादी कहते हैं। दूसरे, सत्ता परिवर्तन होते ही घुसपैठियों का भागना भी ममता को भारी पड़ रहा है। यही वजह है कि जितने भी नेता TMC को छोड़ भाग रहे हैं, उन्हें डर है कि कहीं घुसपैठियों को बसाने में सरकार उन्हें न लपेट ले। इसलिए अपने आपको दूध का धुला साबित करने पाखंडी नेता मुसीबत के समय ममता को अकेला छोड़ भगदड़ में लगे हैं। अगर बंगाल में घुसपैठियों की भरमार थी तब पार्टी छोड़ भागने वालों ने क्यों नहीं विरोध किया? जब हिन्दू त्यौहारों पर हमले और हिन्दू महिलाओं का बलात्कार हो रहा था तब क्यों नहीं इनका जमीर जागा? तब तो ये सब ममता की गोद में बैठ मलाई खाने में लगे थे, और अब मलाई खिलाने वाली उसी ममता की गोद को छोड़कर भागने वाले कभी किसी पार्टी के नहीं हो सकते। कल तक NDA और बीजेपी को कोसने वाले क्यों NDA की गोदी में जा रहे हैं? ममता का शासन चाहे जैसा था इन अवसरवादियों की हरकतों को अपने आंचल में समेट सबको बचा रही थी लेकिन जब ममता को उनका सहारा चाहिए छोड़कर भाग रहे हो। NDA हो या बीजेपी अगर इन अवसरवादियों को शामिल करती है तो नुकसान उठाना पड़ सकता है।
वैश्विक मीडिया की नजरों में ममता बनर्जी की क्रोनोलॉजी
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ममता बनर्जी के राजनीतिक ग्राफ को 3 मुख्य हिस्सों में बांटकर दुनिया के सामने पेश किया है, जो इस संकट की कड़वी हकीकत बयां करता है।
वैश्विक लेखों में कहा गया है कि ममता बनर्जी ने 3 दशक पहले अपने दम पर वामपंथ के क्रूर शासन के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खाकर तृणमूल कांग्रेस खड़ी की थी। वह भारत की सबसे जुझारू महिला नेताओं में शुमार थीं, जिन्होंने जमीन से उठकर कोलकाता की सत्ता पर कब्जा किया था।
द गार्जियन’ के एक विशेष लेख के अनुसार, ममता बनर्जी की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अघोषित ‘युवराज’ घोषित करना रही। इसके चलते पार्टी के संस्थापक और सबसे वफादार जमीनी चेहरे (ओल्ड गार्ड) पूरी तरह अलग-थलग पड़ते चले गये।
विदेशी अखबारों ने लिखा है कि चुनावी रणनीतिकार एजेंसी आई-पैक (I-PAC) के कॉरपोरेट दखल ने विधायकों और सांसदों के टिकट तय करने शुरू कर दिये, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का भरोसा कालीघाट से टूट गया। इसी का नतीजा रहा कि 2026 के चुनाव में जनता ने उन्हें नकार दिया और पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी।
दलबदल और साइन-गेट ने धूमिल की छवि
वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि किसी राष्ट्रीय दल के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों का एक साथ पाला बदलकर एनडीए (NDA) को समर्थन दे देना भारतीय संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी बगावतों में से एक है।
डॉ काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चल रही साइन-गेट(फर्जी हस्ताक्षर मामले) की सीआईडी जांच ने साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर का अनुशासन पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
‘बीबीसी’ की रिपोर्ट में दिल्ली में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की भावुक मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि जो क्षेत्रीय क्षत्रप कभी दिल्ली की सत्ता में ‘किंगमेकर’ बनने का सपना देख रही थीं, आज वे राष्ट्रीय राजनीति में अपने वजूद को बचाने के लिए बेहद असहाय और अकेली खड़ी नजर आ रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी के लिए अब इस गहरे दलदल से बाहर निकलना लगभग असंभव प्रतीत होता है। राज्य में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की नयी सरकार का तेजी से पैर पसारना और सचिवालय ‘नबान्न’ की दीवारों का भगवाकरण यह दिखाता है कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति अब पूरी तरह बदल चुकी है।
विदेशी मीडिया ने अपने निष्कर्ष में लिखा है कि तृणमूल कांग्रेस इस समय बिल्कुल उसी तरह के लिविंग इन्फर्नो (अंदरूनी विनाश) से गुजर रही है, जैसा कुछ साल पहले महाराष्ट्र की शिवसेना और एनसीपी ने झेला था। महुआ मोईत्रा और कल्याण बनर्जी जैसे गिने-चुने वफादार नेताओं के तीखे बयानों के बावजूद यूसुफ पठान जैसे बड़े चेहरों की रहस्यमयी चुप्पी यह साफ बयां करती है कि ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी की कमान हमेशा के लिए फिसल चुकी है।
सड़क पर नारियल बेचने वाले बांग्लादेशी रमजान-सादिना निकले करोड़ों के मालिक(फोटो साभार : ChatGPT) अक्सर फल-सब्ज़ी और खोमचे वाले को लोग गरीब कहते हैं, जबकि वह किसी वेतनभोगी से ज्यादा खुशहाल होते हैं। वेतनभोगी एक छोटा-सा मकान लेने से पहले हज़ार बार सोंचता है लेकिन ये खड़े-खड़े शानदार मकान का सौदा करने की हिम्मत रखते हैं। दिल्ली गोलचा सिनेमा के पीछे तिराहे बहराम खां पर रेहड़ी पर फल बेचने वाले मकान मालिक बने बैठे हैं।
दो बार एक जूस बेचने वाले और एक गोलगप्पे बेचने वाले के बच्चों की शादी में जाने का मौका मिला। कोई वेतनभोगी उस तरह की शादी नहीं कर सकता जिस तरह की शानदार शादी इन लोगों ने की।
इतना ही नहीं, जामा मस्जिद पर कल्लन स्वीट्स के थोड़ा-सा आगे शाम के समय एक माँ-बेटी भीख मांगती थी। कई दिन से नहीं दिखने पर जानकर दुकानदारों से पूछने पर मालूम हुआ की लड़की का निकाह हो गया। उन्होंने जो खुलासा किया वाकई चौकाने वाला था। महावीर वाटिका में निकाह हुआ, दहेज़ में कार, चिकन और मटन(कोई दूसरा मीट नहीं) की दावत। दहेज़ में कार सुनकर हैरानी तो हुई लेकिन उन्होंने बताया कि इसकी दो कारें पहले ही किराये पर चल रही है।
भीखना मांगना अपने आपमें एक बहुत बड़ा व्यापार है। शायद ध्यान हो, कुछ महीने पहले शायद मुंबई से एक भिखारी को गिरफ्तार करने पर मालूम हुआ कि वह करोड़ों का मालिक है और सैकड़ों भिखारी उसके अंतर्गत भीख मांग रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहुत उस करोड़पति व्यापारी की फोटो भी खूब वायरल हुई थी। देखिए वीडियो
पश्चिम बंगाल के हावड़ा से पुलिस ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठिया दंपती रमजान गाजी और उसकी बीवी सादिना बेगम को गिरफ्तार कर लिया है। जाँच में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
कभी सड़क किनारे कच्चा नारियल (डाब) और ताड़ के फल बेचने वाला यह दंपती महज कुछ ही सालों में करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन बैठा। अब पुलिस और जाँच एजेंसियाँ इस बात का पता लगा रही हैं कि क्या इस खेल के पीछे सत्ताधारी पार्टी TMC के स्थानीय नेताओं का हाथ है।
दलालों के सहारे आए, प्रमोटर बनकर छाए
यह दंपती करीब 14 साल पहले दलालों की मदद से बांग्लादेश से अवैध तरीके से भारत घुसा था। शुरुआत में दोनों ने पेट पालने के लिए फल बेचे। इसके बाद रमजान गाजी ने चालाकी से स्थानीय प्रमोटरों से साँठगाँठ कर ली। वह पुराने मकान तोड़ने और जमीन की खरीद-बिक्री के धँधे में उतर गया।
कारोबार चमकते ही रमजान ने मलबा ढोने के लिए अपना ट्रक खरीद लिया और जमीनों की डीलिंग करने लगा। इसी अवैध कमाई से उसने कई जमीनें खरीदीं और अपना एक आलीशान दोमंजिला पक्का मकान भी बना लिया। पुलिस अब इनके पूरे सिंडिकेट और पॉलिटिकल नेटवर्क को खंगाल रही है।
दरगाह पर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला (प्रतिकात्मक फोटो, साभार- chatgpt) मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।
240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।
न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।
कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।
240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख
ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।
लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।
कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।
कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”
वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है।
सनातन धर्म में गायत्री मन्त्र से महान कोई मन्त्र नहीं। यह केवल मन्त्र ही नहीं जीवनशैली है। इस महान मन्त्र की शक्ति अपरम्पार है। दुःख-सुख सब विधि का विधान है जैसे प्रातः और रात्रि। इस प्रक्रिया से कोई प्राणी अछूता नहीं। फिर भी प्रभु का आशीर्वाद लेना भी जरुरी है। उसी तरह प्रतिदिन गायत्री मन्त्र जाप करने से प्राणी कई अनसुने दुःखों को पार करने की क्षमता स्वतः आ जाती है। जीवन को जीवन की तरह जीने की शक्ति दुःखों को सहन की शक्ति प्राप्त होती है। इसका जप करने से समस्त देवी-देवताओं की वंदना हो जाती है। बस एक बार सच्चे मन से जाप कर ले।
एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान-पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।
शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज चलता है। भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।
रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जाएगा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है। खैर, करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है। शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ? वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें। सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आपने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा। वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई। कथा के विराम होने उपरांत और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।
शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से ऊँ भूर्भुवः स्वः .... ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई। शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो? महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ। शास्त्री जी बोले: क्या मतलब ? महिला बोली कि आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा भव सागर तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की। शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा। इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूँ। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले माँ चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।
सोनिया गाँधी और खरगे के साथ ममता बनर्जी (साभार: आज तक) शरद पवार कांग्रेस से अलग हुए सोनिया गाँधी को विदेशी महिला कहकर और ममता बनर्जी भी यही आरोप लगाकर कांग्रेस से अलग हुई। लेकिन आज दोनों ही उसी विदेशी महिला के चरणों में नतमस्तक।
पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस(TMC) में लगातार भगदड़ मची हुई है। एक के बाद एक नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। इस बीच मीडिया में सूत्रों के हवाले से कई दिनों से खबरें चल रही हैं कि कांग्रेस पार्टी और सोनिया गाँधी ने ममता बनर्जी को अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने का प्रस्ताव दिया है। अब ABP न्यूज ने सूत्रों के हवाले से यह बताया है कि ममता बनर्जी सशर्त इस बात के लिए जारी हो गई हैं।
ABP न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया गाँधी की ओर से मिले ऑफर पर ममता बनर्जी तैयार हैं लेकिन उन्होंने अभिषेक बनर्जी के जरिए राहुल गाँधी के सामने कुछ शर्तें भी रखवाई हैं। बताया जा रहा है कि अभिषेक बनर्जी ने राहुल गाँधी के साथ मीटिंग में इस विषय पर बात की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस लीडरशिप के सामने TMC की तरफ से माँग रखी गई है कि ममता बनर्जी को राज्यसभा भेजा जाए और उन्हें राज्यसभा में नेता विपक्ष का पद भी दिया जाए। हालाँकि, इस पर कांग्रेस ने क्या कहा है यह बात अब तक सामने नहीं आई है।
गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से ही की थी और पार्टी में उन्होंने कई अहम पदों पर काम किया था। हालाँकि, पार्टी से मतभेदों के चलते वह 1998 में अलग हो गई थीं और बंगाल की राजनीति करने के लिए अलग TMC का गठन किया था। अब अगर वह वापस पार्टी में लौटती हैं तो फिर से इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव की मुलाकात (साभार : Indiatoday) कहते है कि बुरे वक़्त में साया भी साथ छोड़ देता है। जिस तरह अखाड़े में दो पहलवानों की कुश्ती में एक हारता है और एक जीतता है ठीक उसी तरह चुनावों में उम्मीदवार बहुत होते हैं लेकिन जीतता सिर्फ एक ही है। लेकिन बंगाल का चुनाव तो एकदम अनोखा जान दिखाई पड़ता है जहाँ TMC के हारने पर पूरी पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह रही है। पार्टी छोड़ने वालों का यही सिलसिला जारी रहा तो शायद दो महीने से पहले ही ममता बनर्जी और उसकी पार्टी TMC इतिहास के गर्द में ऐसी दबेगी जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल होगा। जितनी दुर्दशा ममता और उसकी पार्टी TMC की हो रही है किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यही एक चुनाव ऐसा था जब चुनाव अभियान में ममता चोटिल होने का ड्रामा भी नहीं कर पायी। वरना हर चुनाव में हार सामने देख चोटिल होने का ड्रामा कर सहानुभूति वोट लेकर सत्ता में आ जाती थी। चोट भी ऐसी जो वोटिंग होते ही ठीक जो जाती थी।
जितना तानाशाह का आतंक ममता के मुख्यमंत्री रहते बंगाल में देखने को मिला शायद ही भारत के इतिहास में ऐसा हुआ हो। INDI गठबंधन के शामिल किसी भी पार्टी में ममता के अत्याचारों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर सकी। किसी INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाली ममता उसी INDI गठबंधन की चौखट पर माथा टेक रही है। घुसपैठियों को दामाद की तरह पाला-पोसा जा रहा था और ममता की सत्ता जाते ही वो भी बंगाल छोड़ भागने शुरू हो गए। वैसे जितनी भी पार्टियां हैं बंगाल चुनाव से सीखते हुए घुसपैठियों को पालना बंद करे। जिन रोहिंग्यों को कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं तुम उनको दामाद बना संरक्षण दे रहे हो। उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनवा रहे हो।
पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की पार्टी TMC बिखरने लगी है। बुधवार (10 जून) को ममता की बेहद करीबी राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुखेंदु शेखर के बाद इस्तीफा देने वाली वह दूसरी बड़ी नेता हैं।
इस्तीफे के बाद सांसद सुष्मिता देव ने असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से मुलाकात की है। इससे पहले TMC के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बागी रुख अपनाया था और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था माँगी थी। यह गुट बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दे सकता है।
पार्टी के अंदर मचे इस घमासान से ममता बनर्जी अब बिल्कुल अकेली पड़ती जा रही हैं। इससे पहले TMC के विधायक दल भी दोफाड़ हो चुका है। बागी गुट का नेतृत्व कर रही सांसद काकोली घोष के साथ फिलहाल 14 सांसदों के नाम साफ हो चुके हैं।
इनमें शताब्दी रॉय, सुपरस्टार देव (दीपक अधिकारी) और जून मालिया जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। सुष्मिता देव के इस्तीफे की असली वजह अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इसे TMC के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हमला किया, मासूम बच्चों की मौत (फोटो साभार : ChatGPT) इजराइल द्वारा हमास और फिलिस्तीन आतंकियों पर हमला करने पर भारत में कितना सियापा मचा, लेकिन जब उनके लाडले पाकिस्तान द्वारा दो दिन से मारामारी मचाई हुई है सबको सांप सूंघ गया है। मरने वाले हिन्दू नहीं मुसलमान ही है। क्यों नहीं पाकिस्तान के विरुद्ध आवाज़ निकालते? नहीं बोलेंगे मुस्लिम वोट बैंक को नाराज नहीं करना।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है। तालिबान सरकार का कहना है कि पाकिस्तान ने मंगलवार (9 जून 2026) की रात अफगानिस्तान की हवाई सीमा का उल्लंघन करते हुए सीमावर्ती इलाकों में भीषण हवाई हमले किए।
इन हमलों में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई जबकि 14 अन्य घायल हैं। यह पिछले कई हफ्तों में पाकिस्तान द्वारा किया गया सबसे घातक हमला माना जा रहा है। तालिबान सरकार के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इस हमले को लेकर बुधवार (10 जून 2026) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान जारी किया है।
साथ ही, जबीहुल्लाह मुजाहिद ने पाकिस्तान के हमलों में मारे गए बच्चो की दर्दनाक तस्वीरें भी शेयर की हैं। एक तस्वीर में एक बच्चे का सिर फटा हुआ नजर आ रहा है। जबीहुल्लाह मुजाहिद ने लिखा, “बीती रात पाकिस्तानी सेना ने एक बार फिर अफगानिस्तान के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया और कुनार, खोस्त तथा पक्तिका प्रांतों में नागरिकों के घरों पर बमबारी की। इन हमलों में 11 बच्चों, एक महिला और एक बुजुर्ग व्यक्ति की मौत हो गई जबकि 14 अन्य महिलाएँ और बच्चे घायल हुए हैं। हम इस मानवीय अपराध और आक्रामक कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं।”
मुजाहिद के अनुसार, पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान के तीन प्रमुख प्रांत कुनार, खोस्त और पक्तिका के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया। आरोप है कि रात के अँधेरे में आम नागरिकों के घरों पर अँधाधुँध बमबारी की गई, जिससे कई मकान पूरी तरह तबाह हो गए।
न्यूज एजेंसी AFP की रिपोर्ट के मुताबिक, खोस्त प्रांत के स्पेरा जिले में एक घर पर हुए हमले में 9 लोगों की मौत हुई जबकि 10 अन्य घायल हो गए। वहीं, पड़ोसी पक्तिका प्रांत के बरमल जिले में अलग हमले में 3 नागरिकों की जान चली गई। स्थानीय निवासियों के अनुसार, मरने वालों में सभी बच्चे शामिल थे। अफगानिस्तान ने इसे ‘मानवीय अपराध’ और ‘खुला आक्रामक हमला’ करार दिया है।
भारत ने जम्मू & कश्मीर विधानसभा में 24 सीट POJK के लिए खाली रखी हुई है। अभी विधानसभा में 95 सीटें हैं जो POJK के भारत में मिलने के बाद 123 हो जाएंगी। लेकिन एक गंभीर विषय विचार करने योग्य है कि अगर POJK को भारत में मिलाने के लिए कोशिश की जाती है तो क्या वहां रहने वाले 46 लाख लोग मोदी का साथ देंगे और क्या भारत के प्रति वफादार रहेंगे? मुझे ऐसा नहीं लगता।
लेखक चर्चित YouTuber
वो लोग तो जम्मू कश्मीर के 86 लाख मुस्लिमों के साथ मिलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी में बंट जाएंगे। कश्मीर का क्या पूरे भारत का मुसलमान मोदी को वोट नहीं देता लेकिन सुविधाएं सब लेता है। कश्मीर के मुस्लिम ईरान के लिए 600 करोड़ रुपया और गहने दे सकते हैं लेकिन क्या कभी भारत के लिए एक पैसा भी दिया है? भारत की सेना पर तो पत्थरबाजी करते थे।
एक बात स्मरणीय है कि 95% मुस्लिमों ने पाकिस्तान बनाने के लिए वोट किया था लेकिन अधिकांश भारत में ही रह गए, पाकिस्तान नहीं गए और आज वो भारत के साथ नहीं खड़े। बांग्लादेश को भारत ने पाकिस्तान के चंगुल से आज़ाद कराया लेकिन मोहमद यूनुस की सरकार पाकिस्तान के साथ मिल गई और अपनी आज़ादी के लिए भारत के योगदान को नकार दिया जबकि पाकिस्तान ने अपने ही प्रान्त के लोगों पर बर्बरता करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
Pakistan wants Kashmir only so that their greedy military has another territory to loot and target innocent civilians. In your face @POTUS@UN
आज जम्मू कश्मीर का मुसलमान भी भारत से पूरी मदद पाकर भी दिल से भारत के साथ नहीं है तो POJK और बलूचिस्तान वाले भी कल को आज़ाद होने के बाद सब अत्याचार भूल कर भारत के साथ खड़े नहीं होंगे। यह एक कड़वा सच है जो सभी मुस्लिमो को मानना होगा।
मुस्लिमों का जितना दिल पाकिस्तान के लिए धड़कता है भारत के लिए नहीं। इस कड़वी बात को भी मुस्लिमों को मानना होगा। 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान कितने पाकिस्तान समर्थक गिरफ्तार हुए थे बताने की जरुरत नहीं। ये तो देश का दुर्भाग्य था कि ताशकंत से तत्कालीन प्रधानमंत्री का शव आया अगर जीवित आए होते और भी पता नहीं कितने जेलों में जाते। दूसरे, जब दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम का उद्घाटन भारत-पाकिस्तान के डे-नाईट क्रिकेट मैच से हुआ था। भारत हार की कगार पर खड़ा था लेकिन मदन लाल और कीर्ति आज़ाद की जोड़ी ने धमाकेदार बैटिंग कर भारत को जीत दिलवाई थी। भारत के जीतते ही 24 घंटे चलने वाले जामा मस्जिद क्षेत्र में ऐसा सन्नाटा पसरा था जैसे कर्फ्यू लग गया हो।
आज POJK में आंदोलन हो रहा है - मुद्दे हैं - 4 अक्टूबर, 2025 को पाकिस्तान ने JAAC के साथ 32 सूत्रीय समझौता किया था, उसे न निभाने के खिलाफ आंदोलन है जो अनिश्चितकाल के लिए शुरू किया गया है। बढ़ती महंगाई, बिजली कटौती, बुनियादी सुविधाओं की कमी, गैस सिलेंडरों की बढ़ी कीमतें, गेंहूं की सब्सिडी, स्कूलों की बढ़ी फीस, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और गवर्नेंस रिफार्म को लेकर सभी मुद्दों पर विद्रोह हो रहा है। पाकिस्तान की पुलिस और रेंजरों ने प्रदर्शन करने वालों पर गोलियां बरसा दी। ऐसा कहते ही 2 लोग मारे गए, हकीकत में कितने मरे होंगे, कुछ नहीं कह सकते।
ये आंदोलनकारी भी बांग्लादेशियों की आज़ाद होने और भारत में मिलने के बाद सब कुछ भूल जाएंगे। अभी आप कहेंगे तो वे भारत माता की जय भी बोल देंगे, वंदे मातरम भी गा देंगे और नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के नारे भी लगा देंगे लेकिन भारत में आने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस, पीडीपी और अन्य सेकुलर दलों से “सेकुलरिज्म” का पाठ पढ़ कर मोदी/भाजपा और आरएसएस को गाली बकने लगेंगे। ऐसा वे तुरंत बेशक न करें लेकिन कुछ समय बाद करेंगे।
पाकिस्तान को तो वैसे खुद ही POJK को आज़ाद कर देना चाहिए क्योंकि उसने खुद 31 मई, 2024 को इस्लामाबाद हाई कोर्ट में एक अगवा शायर अहमद फरहाद को अदालत में पेश करने से मना करते हुए कहा था कि वो पुलिस हिरासत में है और “गुलाम कश्मीर” में है जो पाकिस्तान के अधिकार का क्षेत्र नहीं है और वह एक विदेशी भूमि है।
अमेरिका की USCIRF और यूरोपीय यूनियन हमेशा भारत में अल्पसंख्यकों पर होने वाले कथित अत्याचारों का रोना रोते है। ऐसा रोना पिछले दिनों नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने भी रोया था लेकिन मज़ाल है किसी की आवाज़ POJK के लोगों के समर्थन में निकले।
POJK को भारत में मिलाना क्या देश के लिए फायदे का सौदा रहेगा, इस पर गहन विचार होना चाहिए।
ईरान को पैसे भेजने के चक्कर में फँसे 2 मुस्लिम भाई, सऊदी अरब पुलिस ने पकड़ा (फोटो साभार : NDTV) उत्तर प्रदेश के अमरोहा के रहने वाले दो सगे मुस्लिम भाइयों, मोहम्मद जफर और मोहम्मद राहिब को सऊदी अरब की पुलिस ने दम्माम से गिरफ्तार कर लिया है। दोनों भाइयों पर सऊदी अरब से ईरान फंड ट्रांसफर करने का आरोप है।
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च महीने में हुई इस गिरफ्तारी के बाद से दोनों का कुछ पता नहीं चल रहा है। इस बीच रियाद में भारतीय दूतावास ने परिवार को ईमेल कर बताया है कि दोनों को सुरक्षा से जुड़े एक मामले में हिरासत में लिया गया है। अब मुस्लिम पीड़ित परिवार ने विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से दोनों बेटों को सुरक्षित वापस लाने की गुहार लगाई है।
वैसे तो मुसलमान दुनिया भर की खबर रखता है लेकिन षड़यंत्र करने से बाज नहीं आता। जब मालूम है कि सऊदी अरब और ईरान के जंग का माहौल है फिर क्यों सऊदी अरब से ईरान मदद भेजी? अब जब पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया तो अब्बू अपनी बीमारी का victim card खेल कर मासूमियत दिखा रहे हैं। आखिर ये victim card खेल कर कब तक दुनिया को पागल बनाओगे? भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा सकते हो लेकिन सऊदी अरब में रहकर उसके दुश्मन मुल्क ईरान की मदद करने पर गिरफ़्तारी ही होगी। सऊदी अरब में कोई विपक्ष इनकी हिमायत में नहीं बोल रहा। वो भारत नहीं सऊदी अरब है।
अम्मी के कहने पर भेजे थे पैसे
अमरोहा के नौगावां के रहने वाले जफर पिछले 5 साल से दम्माम के एक स्टोर में काम कर रहे थे। बाद में उन्होंने अपने छोटे भाई राहिब को भी वहीं नौकरी पर लगवा दिया था। फरवरी में इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हुआ।
इसके बाद दोनों भाइयों की अम्मी ने ईरान के पीड़ित लोगों की मदद करने की इच्छा जताई। अम्मी के कहने पर जफर ने छोटे भाई राहिब के मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया और भारत में मौजूद ईरानी दूतावास के बैंक खाते में 200 रियाल ट्रांसफर कर दिए।
फोन के चक्कर में छोटा भाई भी फँसा
सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। जैसे ही राहिब के फोन से ईरान से जुड़े खाते में ट्रांजैक्शन हुआ, सऊदी की सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गईं। 27 मार्च को सऊदी पुलिस ने राहिब को उसके घर से हिरासत में ले लिया, क्योंकि फोन उसी का था। इसके तीन दिन बाद यानी 30 मार्च को पुलिस ने बड़े भाई जफर को भी गिरफ्तार कर लिया। तब से परिवार का अपने दोनों बेटों से कोई संपर्क नहीं हो पाया है।
भारतीय दूतावास ने क्या कहा?
रियाद में भारतीय दूतावास के कम्युनिटी वेलफेयर विंग के अधिकारी सुमित कुमार ने पीड़ित परिवार को एक ईमेल भेजा है। इस ईमेल में लिखा है, “उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोहम्मद राहिब हसन और मोहम्मद जफर हसन को सुरक्षा से जुड़े एक मामले में हिरासत में लिया गया है। भारतीय दूतावास ने इस संबंध में और अधिक जानकारी जुटाने के लिए सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय से संपर्क किया है। अभी और विवरण मिलना बाकी है।”
अब्बू ने जयशंकर से माँगी मदद
दोनों भाइयों के अब्बू हसन अब्बास पूरी तरह से पैरालिसिस (लकवा) के शिकार हैं। उनका पूरा खर्च उनके ये दोनों बेटे ही उठा रहे थे। हसन अब्बास ने एक Video जारी कर विदेश मंत्री एस जयशंकर से अपील की है। उन्होंने कहा, “मेरे दोनों बच्चे सऊदी अरब में लापता हैं। मेरे घर का पूरा खर्च बच्चे ही उठाते थे। मैं आपसे अपील करता हूँ कि कृपया मेरे बच्चों का पता लगाएँ और उन्हें वापस लाएँ।”
राजनाथ सिंह तक पहुँचा मामला
इस बीच ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। उन्होंने रक्षा मंत्री के सामने इस गंभीर मुद्दे को उठाया है। उन्होंने बताया कि मोहम्मद शबी नाम के एक अन्य भारतीय नागरिक को भी दुबई एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया है। मौलाना यासूब अब्बास ने भी विदेश मंत्रालय से अपील की है कि मिडिल ईस्ट में फँसे शिया भारतीयों की तुरंत मदद की जाए।
दिल्ली की पूर्व केजरीवाल सरकार की शराब नीति के बाद अब पश्चिम बंगाल की 2017 में लागू नई आबकारी नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है। राज्य की तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) का गठन किया गया।
बंगाल में सरकार बने जुम्मा-जुम्मा आठ दिन नहीं हुए नितरोज ममता बनर्जी के कार्यकाल में हुए घोटाले सामने ही नहीं आ रहे कार्यवाही भी हो रही है और एक तरफ दिल्ली सरकार है जो अरविन्द केजरीवाल के कार्यकाल में हुए घोटालों पर सोई हुई है। CAG रिपोर्ट पर कितना शोर मचाया चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात वाली बात हो गयी।
एजेंसी ने राज्य के सभी 55 प्राइवेट शराब होलसेलर्स की जगह लेकर शराब वितरण पर सीधा राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इसने वितरण और थोक विक्रेता दोनों के रूप में काम करने की कोशिश की, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुआ। खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वसूले गए।
दरअसल टीएमसी सरकार के कार्यकाल में हुए राज्य में शराब व्यापार से जुड़ी एक रिपोर्टें सामने आई है। इसमें उत्पाद शुल्क विभाग के एक गोपनीय दस्तावेज से पता चलता है कि शराब वितरण नेटवर्क का इस तरह से पुनर्गठन किया गया था, जिससे कुछ खास प्राइवेट शराब विक्रेताओं को लाभ हुआ और इस तरह सिस्टम काम कर रहा था, जिससे उनका एकाधिकार स्थापित हुआ।
रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 में शराब वितरण नीति में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारे पर ये बदलाव किए गए।
ऑपइंडिया को एक रिपोर्ट की कॉपी मिली है, जिसमें दावा किया गया है कि नए सिस्टम में धीरे-धीरे थोक वितरण के पुराने मॉडल को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह ऐसी व्यवस्था की गई जिससे चुनिंदा बिचौलियों की शराब वितरण के सिस्टम में एकाधिकार हो गया।
After the Delhi Liquor Excise scam, it is now Bengal’s turn. The Excise Department altered policy and bottlers were extorted on every crate of liquor and beer. The proceeds, amounting to thousands of crores, found their way to the TMC and Abhishek Banerjee.https://t.co/xmxYRk7VVK
इससे पता चलता है कि जिसे आधिकारिक तौर पर शराब वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह वास्तव में निजी बोतलबंद शराब विक्रेताओं और शराब निर्माताओं से पैसा वसूलने का एक सिस्टम बन गया।
आबकारी विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें इन बदलावों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लागू हुए राज्य की नई आबकारी नीति के बाद शराब निर्माताओं से उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीका बदल गया। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मुक्त प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत वितरण के पारंपरिक सिद्धांतों को एक कड़े नियंत्रण वाले नेटवर्क से बदल दिया गया, जिसने कुछ चुनिंदा वितरकों के हाथों में पूरा सिस्टम आ गया।
टीएमसी ने शराब वितरण की पूरी प्रक्रिया को सेंट्रलाइज कर दिया
रिपोर्ट में एक चार्ट दिखाया गया है, जो बताता है कि शराब उत्पाद पारंपरिक रूप से बाजार में कैसे पहुँचते थे और पिछली ममता सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में यह प्रणाली कैसे विकसित हुई।
(रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट)
यह चार्ट निर्माता के गोदाम यानी ‘मदर गोदाम’ से शुरू होता है, जहाँ से उत्पाद कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी (C&FA) को भेजे जाते हैं। C&FA माल को सिस्टम में आगे बढ़ने से पहले भंडारण और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में कार्य करती है।
वहाँ से उत्पाद आमतौर पर वितरकों या सुपर स्टॉकिस्टों को आपूर्ति किए जाते हैं। ये वितरक कंपनी के अधिकृत व्यावसायिक भागीदार होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं तक कैसे पहुँचे।
यह चार्ट दर्शाता है कि वितरक, निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे बिक्री टीमों का प्रबंधन करते हैं, बाजार से ऑर्डर प्राप्त करते हैं, स्टॉक की आवाजाही को संभालते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद सभी खुदरा दुकानों पर उपलब्ध हों। कई उद्योगों में, वितरक खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं को लोन भी मुहैया कराते हैं, जिससे बाजार में नकदी की कमी नहीं होती है।
थोक विक्रेता इस सिस्टम में एक और अहम कड़ी हैं। वे वितरकों से थोक में उत्पाद खरीदते हैं और फिर उनको खुदरा विक्रेताओं तक छोटी-छोटी खेप में पहुँचाते हैं। छोटे विक्रेताओं का लाभ खरीद मूल्य और उपभोक्ताओं को बेचने के मूल्य में अंतर से मिलता है।
एक बाजार के निर्माण में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। कई बार वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा भी बाजार को मिलता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में किए गए बदलावों ने वितरण व्यवस्था पर एक छोटे- से ग्रुप का कब्जा हो गया। प्रतिस्पर्धा कम हो गया और उनका एकाधिकार होने से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का उन्हें अवसर मिला। इसकी वजह से पारंपरिक बाजार सिद्धांतों को काफी नुकसान हुआ।
वितरक और थोक विक्रेता क्यों महत्वपूर्ण हैं?
रिपोर्ट में वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच अंतर को विस्तार से बताया गया है। वितरक आम तौर पर निर्माताओं के साथ समझौते करते हैं और आधिकारिक चैनल पार्टनर के रूप में कार्य करते हैं। वितरक न केवल उत्पादों की बिक्री के लिए बल्कि उनकी मार्केटिंग, आपूर्ति नेटवर्क के रखरखाव और बाजार तक पहुँच के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। वे आमतौर पर बड़े क्षेत्रों में काम करते हैं और खुदरा विक्रेताओं, थोक विक्रेताओं और कभी-कभी सीधे उपभोक्ताओं से भी संपर्क करते हैं।
दूसरी ओर, थोक विक्रेता मुख्य रूप से बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदते हैं और उन्हें खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं। वे मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं ,जिनका उद्देश्य भंडारण, प्रबंधन और थोक खरीद के माध्यम से लाभ कमाना होता है। वितरक आमतौर पर वितरण से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को वहन करते हैं, जबकि थोक विक्रेता माल की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लागू किए गए शराब वितरण सुधारों ने इन भेदों को धुंधला कर दिया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जो स्थापित व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
2017 में सरकार द्वारा नियंत्रित वितरण संरचना में बदलाव
2017 को पश्चिम बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीएसबीसीएल) का गठन हुआ, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी थी और जिसने राज्य में पैकेटबंद शराब के थोक वितरण का कार्यभार संभाला। डब्ल्यूबीएसबीसीएल के माध्यम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने शराब के कारोबार में कदम रखा।
(रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉर्ट)
डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अस्तित्व में आने से पहले, थोक वितरण का काम बड़े पैमाने पर 1909 के बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत संचालित निजी लाइसेंस धारकों द्वारा किया जाता था। ये निजी थोक विक्रेता निर्माताओं से उत्पाद खरीदते थे और उन्हें पूरे राज्य में खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति करते थे।
डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन के बाद निगम शराब खरीदने वाला और वितरण करने वाला दोनों बन गया। इसने पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से शराब खरीदना शुरू किया और इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 5200 खुदरा दुकानों को बेचना शुरू किया।
बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 20 के तहत शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन विदेशी शराब क्षेत्र के कई आपूर्तिकर्ता कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं के बजाय केवल पंजीकृत ब्रांड मालिक या आयातक के रूप में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें निगम को उत्पाद बेचने और बिल जारी करने की अनुमति दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जो अधिनियम की भावना के विपरीत थी।
खुदरा विक्रेताओं और निर्माताओं ने शिकायत क्यों की?
रिपोर्ट में नए मॉडल से उत्पन्न होने वाले कई परिचालन और वित्तीय गड़बड़ियों के बारे में बताया गया है।
एक अहम शिकायत ऋण सुविधाओं के अभाव से संबंधित थी। पूर्व की निजी थोक प्रणाली के तहत खुदरा विक्रेताओं को अक्सर उधार पर उत्पाद प्राप्त होते थे। इससे उन्हें बड़ी अग्रिम राशि का भुगतान किए बिना स्टॉक बनाए रखने की सुविधा मिलती थी।
डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अधिग्रहण के बाद खुदरा विक्रेताओं को कथित तौर पर खरीद की पूरी लागत अग्रिम रूप से चुकानी पड़ी। चूँकि शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का लगभग 70-80% हिस्सा करों और शुल्कों का होता है, इसलिए इससे खुदरा विक्रेताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया।
रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इस बदलाव के कारण सप्लाई चेन में पूँजी की कमी हुई। छोटे खुदरा विक्रेता विशेष रूप से प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें अब लोन से मदद नहीं मिल रही थी, बल्कि ज्यादा निवेश करना पड़ रहा था। इसकी वजह से बाजार में कथित तौर पर गिरावट आई और राजस्व प्रभावित हुआ।
मोनोपॉली की शुरुआत
रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूबीएसबीसीएल के आने से हालात बदल गए। नई नीति के माध्यम से टीएमसी सरकार ने शराब निर्माताओं और बॉटलर्स को बाध्य किया कि वे केवल WBSBCL के नियुक्त वितरकों के माध्यम से ही व्यापार करें। व्होलसेलर्स की जगह आए नए वितरकों पर आरोप लगे कि वे बॉटलर्स से अनुचित दरें वसूलते थे। प्रत्येक क्रेट पर गोडाउन रेंटल (4 रूपए) और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट (3 रूपए) के नाम पर भारी रकम वसूली गई।
रिपोर्ट्स के अनुसार, वितरकों को मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा राज्य के राजस्व खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर टीएमसी नेताओं को जाता था। रिपोर्ट के हवाले से आरोप लगाए गए कि यह पूरी अवैध वसूली सिंडिकेट के जरिए सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के करीबी परिसरों, जैसे- 9, कैमक स्ट्रीट, कोलकाता तक पहुँचाई जाती थी।
रिपोर्ट के अनुसार, “विकेंद्रीकृत व्यवसाय, निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और बहु-आपूर्ति बिंदुओं की अवधारणा ने एकाधिकारवादी व्यवसाय मॉडल को जन्म दिया।”
बोतल बनाने वाली कंपनियों पर सिस्टम में शामिल होने का दबाव
रिपोर्ट और संबंधित विवरणों में यह भी दावा किया गया है कि नई व्यवस्था का विरोध करने वाले बोतल निर्माताओं को काफी दबाव का सामना करना पड़ा। इसका उदाहरण अक्सर आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के रूप में दिया जाता है। कंपनी ने उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को कई पत्र लिखकर गैरकानूनी हस्तक्षेप और दबाव को लेकर चिंता व्यक्त की।
एक पत्र में, कंपनी ने कहा कि उसने ‘कुछ उत्पाद शुल्क अधिकारियों द्वारा अवैध हस्तक्षेप’ के संबंध में बार-बार चिंता व्यक्त की थी, जो उनसे गैरकानूनी माँग पूरा नहीं करने पर परेशान कर रहे थे।
कंपनी ने आगे अनुरोध किया कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाए और कार्रवाई की जाए।
रिपोर्ट में उन 5 अधिकारियों के नाम बताए गए हैं जो डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन की दिशा में नीतिगत ढाँचे को तैयार करने में शामिल थे। इनमें पूर्व विशेष आयुक्त (राजस्व) और महाप्रबंधक (संचालन) गौतम घोष, वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त शांतनु आचार्य, उपायुक्त संचयन गांगुली, अतिरिक्त आयुक्त राजर्षि चक्रवर्ती और विशेष आयुक्त कुनास बिस्वास शामिल थे।
पहले, शुल्क का संग्रह मुख्य रूप से विनिर्माण चरण में होता था, जिसे आम तौर पर राजस्व संग्रह का सबसे सुरक्षित और सबसे कुशल तरीका माना जाता है। नए मॉडल में शुल्क संग्रह को विनिर्माण चरण और वितरक चरण के बीच विभाजित किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप राजस्व प्राप्ति में देरी हुई और वितरण नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हुआ, क्योंकि वितरक अक्सर अतिरिक्त शुल्क वक्त पर जमा करने में विफल रहते थे। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे न केवल प्रणाली जटिल हो गई बल्कि राजस्व दक्षता भी कमजोर हो गई।
करोड़ों की वसूली में TMC नेता सब्यसाची दत्ता गिरफ्तार (फोटो साभार : ETVbharat) पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने TMC को एक और बड़ा झटका दिया है। पुलिस ने बिधाननगर नगर निगम के पूर्व चेयरमैन और दिग्गज TMC नेता सब्यसाची दत्ता को गिरफ्तार कर लिया है। सब्यसाची दत्ता पर करोड़ों रुपए की रंगदारी और उगाही करने का गंभीर आरोप है।
बिधाननगर नॉर्थ पुलिस ने सोमवार (8 जून) को उन्हें राजारहाट स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया। राज्य में सरकार बदलने के बाद से TMC नेताओं पर कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। सब्यसाची दत्ता बिधाननगर-राजारहाट इलाके के बेहद प्रभावशाली नेता माने जाते हैं।
जानकारी के अनुसार, सब्यसाची दत्ता पर दंगा करने का आरोप है। एक व्यापारी ने सब्यसाची के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई थी। इसी एफआईआर के आधार पर पुलिस ने तृणमूल के पूर्व विधायक को गिरफ्तार किया। सब्यसाची ने 26वें चुनाव में तृणमूल के टिकट पर बारासात से चुनाव लड़ा था। इससे पहले वे राजारहाट-न्यूटाउन निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल के विधायक रह चुके हैं। सब्यसाची बिधाननगर नगरपालिका के महापौर भी रह चुके हैं।
पुलिस काफी समय से इन आरोपों की जाँच कर रही थी। यह गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई है जब TMC में बड़ी बगावत के संकेत मिल रहे हैं। पार्टी के करीब 20 विधायक दिल्ली में एनडीए (NDA) के बड़े नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। ये सभी विधायक जल्द ही एनडीए में शामिल होना चाहते हैं।
देर रात हुए गिरफ्तार
उस शिकायत के आधार पर, सब्यसाची को सोमवार रात को उनके न्यूटाउन स्थित फ्लैट से गिरफ्तार कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया। लंबी पूछताछ के बाद, जब उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो पुलिस ने उन्हें देर रात गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मंगलवार(9 जून) को बिधाननगर अदालत में पेश किया जाएगा। हालांकि, बिधाननगर उत्तर पुलिस स्टेशन ने इस संबंध में अब तक कोई घोषणा नहीं की है। सब्यसाची के खिलाफ जबरन वसूली या मानसिक उत्पीड़न के आरोप नए नहीं हैं। न सिर्फ व्यापारी और आम लोग, बल्कि पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ कई आरोप लग चुके हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं।
पहले भी होती रही है शिकायत
मधुसूदन चक्रवर्ती ने पहले भी कई बार पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, तृणमूल सरकार के दौरान पुलिस की निष्क्रियता के आरोप लगे थे। आरोप है कि पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन सरकार बदलने के बाद वही पुलिस अब सक्रिय हो गई है। राज्य में सत्ता में आने के बाद से भाजपा सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को किसी भी तरह से बख्शा नहीं जाएगा। तब से पुलिस लगातार सक्रिय है। तृणमूल नेताओं और पार्षदों को एक के बाद एक गिरफ्तार किया जा रहा है। इस बार सब्यसाची का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है।
बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने पर जिस रफ़्तार से TMC नेताओं पर कानूनी डंडा चल रहा है यह हकीकत है या कोई सपना? उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ द्वारा गुंडों और माफिया गैंग पर होती कार्यवाही पर तो सारा INDI गठबंधन चिल्ला रहा है लेकिन बंगाल में सब खामोश। जबकि दोनों जगह बीजेपी। इतना ही नहीं मुसलमान तक वर्तमान सरकार की कार्यवाहियों से खुश हैं। वही पुलिस वही मुस्लिम! अब कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं हो रहा। इतना ही नहीं जनता TMC नेताओं को जूतों का हार पहना रही है, अंडे और टमाटर फेंक रही है। क्या वाकई वामपंथियों से लेकर ममता राज तक जनता इतनी दुखी थी? सारा विपक्ष खामोश? जिसको देखो अपनी पार्टी को बचाए रखने की कोशिश में लगा है।अपने-अपने नेताओं तक की फ़िक्र नहीं। अजीब तमाशा चल रहा है बंगाल में।
पश्चिम बंगाल पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने TMC नेता जहाँगीर खान को नेपाल बॉर्डर से गिरफ्तार कर लिया है। जहाँगीर खान फाल्टा विधानसभा सीट से TMC के उम्मीदवार थे लेकिन चुनाव के दौरान हुईं गड़बड़ियों के बाद फिर से मतदान हुआ था। इसके बाद यहाँ दोबारा मतदान हुआ और जहाँगीर खान ने मैदान छोड़ दिया था।
जहाँगीर खान को ममता बनर्जी के भतीजी और TMC के सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। जहाँगीर खान का यूपी के चर्चित IPS ऑफिसर अजयपाल शर्मा की चुनाव के दौरान तनातनी खूब चर्चा में रही थी। जहाँगीर खाने ने अजयपाल शर्मा को चुनौती देते हुए कहा था कि वो सिंघम हैं तो मैं पुष्पा हूँ झुकूँगा नहीं।
जहाँगीर के खिलाफ हत्या के प्रयास, जबरन वसूली और दंगा भड़काने समेत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज हैं। जहाँगीर के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी दर्ज है और ED उस मामले की जाँच कर रही है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने पुलिस के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए राज्य के सभी प्रशासनिक अधिकारियों को नकारा कह दिया। पहले उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस अफसरों की वफ़ादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी पक्ष के प्रति है। वो ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग इकॉनमी’ ध्यान में रखकर आचरण करते है।
जस्टिस दिवाकर को यह नहीं भूलना चाहिए कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले उत्तर प्रदेश की कितनी दुर्गति थी। अगर जस्टिस दिवाकर योगी से पहले और बाद के प्रदेश की तुलना नहीं कर सकते उनकी मंशा पर प्रश्न खड़ा हो सकता है।
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उसके बाद जस्टिस दिवाकर ने कहा कि “यह कड़वा सच है कि कई सरकारों में राज्य की प्रशासनिक मशीनरी राजनीतिक घुसपैठ का शिकार रही है। ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मेरिट के आधार पर न होकर राजनीतिक सरपरस्ती के औजार बन गए हैं। वफादार अफसरों को मलाईदार जिले इनाम में मिलते हैं, जबकि स्वतंत्रता से काम करने वाले अफसरों को महत्वहीन जगहों पर भेज दिया जाता है”। यह टिप्पणी करने से पहले जस्टिस दिवाकर को न्यायपालिका की कार्यशैली को भी देखना चाहिए था।
मामला गाजियाबाद के 3 व्यक्तियों पर लगे गैंगस्टर एक्ट का था जिसे जस्टिस दिवाकर ने निरस्त कर दिया। मुझे उन लोगों पर लगे गैंगस्टर एक्ट निरस्त करने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यह मान लेना कि वे प्रतिशोध की भावना से लगाए गए, यह भी उचित नहीं है।
आपने बिकरू कांड का जिक्र किया और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए जबकि उस कांड में मरने वाला विकास दुबे भी कोई शरीफजादा नहीं था और 8 पुलिसकर्मी भी बलिदान हो गए थे।
जस्टिस दिवाकर को एक कड़वा सच और भी स्वीकार करना चाहिए कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के 10 जजों ने मुख़्तार अंसारी की जमानत अर्जी सुनने से मना कर दिया था। उनकी वफ़ादारी किसके लिए थी, संविधान के प्रति या मुख़्तार अंसारी जैसे खूंखार अपराधी के प्रति? शायद जस्टिस दिवाकर के पास इसका जवाब नहीं होगा?
जिस जज दिनेश कुमार सिंह ने मुख़्तार अंसारी को 7 साल की सजा सुनाई, उसका कुछ दिन बाद कर्नाटक हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी एक दिन राहुल गांधी पर एफ आई आर के आदेश देते हैं और अगले दिन वापस ले लेते हैं और केस ही छोड़ देते हैं।
जस्टिस गोविन्द माथुर ने दंगाइयों के फोटो हज़रतगंज चौक पर लगाने से मना कर दिया और जस्टिस चंद्रचूड़ ने दंगाइयों से 275 करोड़ के नुकसान की भरपाई करने के लिए मना कर दिया।
उत्तर प्रदेश के पुलिस और कार्यपालिका के अधिकारियों का उत्तर प्रदेश की पिछले 9 साल में हुई प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान है जिसे जस्टिस दिवाकर ने प्रदेश के सभी अधिकारियों को एक लाठी से हांक कर भुला दिया। नेतृत्व योगी जी का है लेकिन उनकी योजनाओं का क्रियान्वयन तो अधिकारी ही करते है। आज प्रदेश माफिया और बाहुबलियों से मुक्त है। 9 साल में 293 अपराधी एनकाउंटर में मारे गए और अगर न मारे जाते तो उनके मुक़दमे 20-20 साल आपकी अदालतों में धक्के खाते।
प्रदेश ने चहुंओर प्रगति की है। 2016-17 में राज्य का जीडीपी 13.30 लाख करोड़ था जो अब 30.25 लाख करोड़ है। राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान 8.6% से बढ़ कर 9.5% हो गया है और राज्य देश में दूसरे नंबर की इकॉनमी है। निर्यात वैल्यू 88,000 करोड़ से बढ़कर 1.86 लाख करोड़ रुपए हो गई। टूरिज्म का रेवेनुए 11,000 करोड़ से बढ़ कर 70,000 करोड़ रूपए हो गया। इतना ही नहीं इंफ्रास्टचर में निवेश जो एक्सप्रेस वेज़, एयरपोर्ट्स, और आने वाले प्रोजेक्ट्स में होगा वह राज्य की इकॉनमी को एक ट्रिलियन डॉलर की तरफ ले जा रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल भी प्रदेश में बन रही है।
दौड़ते घोड़े को चाबुक मारना ठीक नहीं है। एक साधु योगी ने प्रदेश का कायापलट कर दिया। एक दो मामलों की वजह से पूरी कार्यपालिका के अधिकारियों पर कलंक लगाना उचित नहीं है।