सोनिया गांधी का इलाज किसी दलित डॉक्टर से ही होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

यह बात केवल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि राहुल गांधी हर जगह दलित आदिवासी या OBC ढूढ़ता फिरता है। उसने अडानी की कंपनी के लिए भी पूछा था कि कंपनी में कितने दलित आदिवासी या OBC काम करते हैं किसी भी भवन निर्माण के लिए कहता है यह दलित आदिवासी या OBC ने बनाया लेकिन वे इसमें रहते नहीं 

अब सोनिया गांधी सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती हैं राहुल गांधी को चाहिए कि वह अस्पताल के प्रबंधन से कहे कि सोनिया जी का इलाज केवल किसी दलित आदिवासी या OBC डॉक्टर से ही किया जाए या सोनिया गांधी को इलाज के लिए ईरान भेजना चाहिए क्योंकि ईरान के लिए कांग्रेस बहुत तड़प रही है

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क्या राहुल हॉस्पिटल प्रबंधन से सोनिया का इलाज किसी OBC, Adivasi या SC/ST डॉक्टर से करवाने को नहीं कहते हैं फिर OBC, Adivasi या SC/ST कार्ड खेलकर जनता को पागल बनाना छोड़ दे और इन समाजों को भी राहुल और कांग्रेस से पूछना चाहिए कि क्यों नहीं हमारे समाज के डॉक्टर से सोनिया का इलाज करवाते? राहुल और कांग्रेस को बेनकाब करने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा।   

राजनीति बाहर मत खेलो, अब उस राजनीति को अपने घर में करो अगर हिम्मत है, राहुल गांधी को अस्पताल से पूछना चाहिए कि अस्पताल के बनाने में अगर दलित आदिवासी और OBC ने काम किया तो उन समुदायों के कितने लोग अस्पताल में  काम करते हैं और कितने डॉक्टर दलित आदिवासी या OBC समुदाय के हैं, नहीं हैं तो क्यों नहीं? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?

हिंदू सिख बौद्ध धर्म छोड़ कर ईसाई या मुसलमान बनने पर SC/ST का लाभ नहीं मिल सकता: सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में कोई नई बात नहीं कही; फिर आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों को मिल रहे 4% आरक्षण का मामला 16 साल से क्यों लिए बैठा है सुप्रीम कोर्ट

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि अगर कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत केस नहीं कर सकता

पीठ ने कहा “जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा, किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर SC का दर्जा ख़त्म हो जाता है”

एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद ने अक्काला रामिरेड्डी के खिलाफ SC/ST एक्ट में केस दर्ज किया और FIR भी रेड्डी हाई कोर्ट चला गया और कहा कि आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है और उसका SC दर्जा ख़त्म हो गया है। हाई कोर्ट ने रेड्डी के पक्ष में फैसला दिया इसके खिलाफ पादरी सुप्रीम कोर्ट चला गया लेकिन वहां भी उसकी याचिका ख़ारिज हो गई

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चर्चित YouTuber 
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा अगर कोई दूसरे धर्म में जाने के बाद वापस हिंदू, सिख या बौद्ध हो जाता है तो कुछ शर्तो के साथ ही उसे SC का लाभ मिल सकता है उसे साबित करना होगा कि वह मूल रूप से उस जाति से संबंधित था जिसे Constitution (Scheduled Caste) Order 1950 के तहत अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है दूसरा, उसे साबित करना होगा कि जिस धर्म में वह गया था, उसे वह पूरी तरह त्याग चुका है और मूल धर्म को अपना कर उसकी परम्पराओं, रीति रिवाजों, प्रथाओं और धार्मिक कर्तव्यों का वास्तविक रूप से पालन कर रहा है

तीसरी बात कोर्ट ने यह भी कही कि मूल धर्म में वापसी के बाद उसके समुदाय को भी उसे अपने सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी

लोग कानूनी दाव पेच में लगे रहते है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कुछ नया नहीं है सरकार के Brochure on Reservation for SC/ST में ये सब नियम पहले से ही दिए हुए हैं यह मुझे इसलिए भी पता है क्योंकि मैंने अपनी नौकरी में रहते हुए Corporate level पर Reservation मामले पर 10 वर्ष काम किया है - कुछ लोग ग़लतफ़हमी में आरक्षण का लाभ लेने के लिए शादी भी SC/ST से कर लेते हैं जबकि आरक्षण का लाभ किसी गैर SC/ST को शादी करने के बाद भी नहीं मिलता पिता की जाति से ही बच्चो की जाति तय होती है और अगर कोई लड़की SC है लेकिन उसका पति SC नहीं है तो उसके बच्चो को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दे दिया है कि ईसाई या इस्लाम के मानने वाले को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता तो फिर आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को 4% पिछड़े वर्ग का होने के बहाने आरक्षण कैसे दिया जा रहा है हाई कोर्ट ने उसे गैर कानूनी घोषित किया था लेकिन  सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले

यानी आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण 16 साल से मिल रहा है और अब कल के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार वह आरक्षण रद्द होता है तो कोर्ट क्या ऐसे गैर कानूनी रूप से भर्ती लोगों को नौकरी से  कैसे निकालेगा

इस विषय को 16 साल से लटकाना अपने आप में एक फ्रॉड सा लगता है कल की पीठ ने एक वर्ष में फैसला दे दिया लेकिन 4% आरक्षण का मामला 16 साल से लटकाया हुआ है एक मामला प्रशांत भूषण भी लड़ रहा है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण मिलते रहना चाहिए जो अभी लंबित है

ममता को झटका : बंगाल में ओवैसी-कबीर का नया गठबंधन, बहुकोणीय मुकाबले में मुस्लिम मतों का बंटना तय


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम चीफ प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की मुश्किलें बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली है। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के चर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय और जटिल रही है, जहां जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक रणनीति एक साथ मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नये आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम वोट बैंक की पुनर्संरचना कर परिणामों को प्रभावित करेगा। खासकर उस राज्य में, जहां करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है, वहां इस नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राज्य की सौ से अधिक सीटों पर इस गठबंधन का टीएमसी को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खामियाजा ममता बनर्जी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा।

मुस्लिम वोट बैंक: पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर निर्णायक

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है, जो राज्य की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और कुछ हद तक नदिया जैसे जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक यह वोट बैंक काफी हद तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा है, जिसने खुद को अल्पसंख्यकों के भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकालकर ममता ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और अपने वोट बैंक को नाराज कर लिया है। हुमायूं कबीर अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में मस्जिद बनवा रहे हैं, जिसका नाम भी उन्होंने बाबरी मस्जिद ही रखा है। हुमायूं कबीर और ओवैसी का गठबंधन ममता बनर्जी के इसी स्थिर समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है।

 ओवैसी की एंट्री: रणनीतिक सेंधमारी खिलाएगी नया गुल

ओवैसी की राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है, जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है। बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एआईएमआईएम की मुस्लिम वोटों में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दी है। ओवैसी-कबीर की जोड़ी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर जाता है, तो यह सीधे तौर पर तृणमूल के नुकसान और विपक्ष, खासकर भाजपा, के लिए लाभ का कारण बन सकता है।
हुमायूं कबीर फैक्टर: स्थानीय प्रभाव और असंतोष की राजनीति
हुमायूं कबीर का राजनीतिक महत्व उनके स्थानीय प्रभाव और टीएमसी से अलगाव के कारण बढ़ जाता है। टीएमसी से निष्कासन के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाकर खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दावा कि ममता की टीएमसी में मुस्लिम समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा, एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकती है। उनके द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं।
मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों को उठाकर हुमायूं कबीर ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को सीधे छूने की कोशिश की है। यह मुद्दा भावनात्मक रूप से कुछ वर्गों को प्रभावित कर सकता है। यह तो तय है कि इसका सियासी चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। लेकिन यह कितना व्यापक असर डालेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। बंगाल की राजनीति परंपरागत रूप से धार्मिक मुद्दों पर भी आधारित रही है। एक ओर जहां हिंदू समुदाय की मां दुर्गा में आस्था है, वहीं दूसरे धर्म के लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। यहां सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित जरूर करते हैं।
ममता के मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भाजपा को मिलेगा लाभ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुस्लिम धर्म के आधार पर नया गठबंधन आने से यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन एकजुट मुस्लिम वोटिंग ने टीएमसी को बढ़त दिलाई। अब अगर यही वोट बैंक विभाजित होता है, तो इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जहां वह पहले मामूली अंतर से पीछे रह गई थी। इसके अलावा एंटी एन्कंबेंसी फैक्टर भी ममता बनर्जी की टीएमसी को मुश्किलों में डाल सकता है।
बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता बंगाल का विधानसभा चुनाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया गठबंधन चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से बदल पाएगा। इसका जवाब कई कारकों पर निर्भर करता है। गठबंधन की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, और मतदाताओं का वास्तविक रुझान। अभी तक के संकेत बताते हैं कि यह गठबंधन सीधे सत्ता परिवर्तन का कारण भले न बने, लेकिन कई सीटों पर “स्पॉइलर” की भूमिका निभा सकता है। दरअसल, बड़े तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। अब ओवैसी-कबीर के गठबंधन के भी आ जाने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन इस बदलाव का प्रतीक है, जो चुनावी समीकरणों को जटिल बना सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मतदाता ही करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव टीएमसी को झटका देने वाला हो सकता है।
पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।
राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

ममता राज का हिंदू विरोध फिर उजागर, ‘जिहादियों’ ने भगवान राम की मूर्ति का सिर काटा, TMC नेता बोले- राम केवल उत्तर भारत के देवता


पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।

राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

राम केवल उत्तर भारतीयों के देवता, हम काली के भक्त – सिन्हा
नंदीग्राम में प्रभु श्रीराम की मूर्ति का सिर काटने की घटना इसलिए और चिंताजनक हो गई है, क्योंकि टीएमसी सरकार इसकी परवाह करने की बजाए प्रभु श्रीराम का अपना भगवान ही नहीं मानती। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने जहां इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेता औरे पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के बयान ने आग में घी का काम किया है। सिन्हा ने अपने विवादित बयान में कहा है कि रामचंद्र तो केवल उत्तर भारत के देवता हैं। सिन्हा ने उल्टे भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में रामचंद्र नहीं चलेगा। बंगाल के लोग तो मां काली के भक्त हैं। भाजपा नेताओं ने सिन्हा की बयान की आलोचना करते हुए इसे भगवान श्रीराम का अपमान बताया है। ऐसे में हर स्तर पर मुख्यमंत्री, सरकार और प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आस्था का सम्मान बना रहे और कानून-व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत हो।

ममता का राज हिंदू विरोधी घटनाओं के लिए रहा है कुख्यात
पश्चिम बंगाल में समय-समय पर धार्मिक स्थलों या प्रतीकों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मंदिरों में तोड़फोड़, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने या धार्मिक जुलूसों के दौरान तनाव जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन घटनाओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएं सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बनती हैं। इसलिए इनका समाधान केवल राजनीतिक विमर्श से नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई से ही संभव है। लेकिन ममता सरकार ने अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते इनमें लापहवाही ही दिखाई है। किसी भी राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना होती है। चाहे घटना किसी भी धर्म से जुड़ी हो, प्रशासन को निष्पक्षता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। दोषियों की पहचान, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है, ताकि यह संदेश जाए कि ऐसी घटनाओं को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति की हदें पार कीं

पश्चिम बंगाल पिछले डेढ़ दशक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति का गवाह रहा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए खुलकर खजाना खोला है और इसमें राज्य की माली हालत की भी चिंता नहीं की है। अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए ममता सरकार ने सारी सीमाएं ही लांघ ली है और आंखें बंद कर इन पर पैसा लुटाया जा रहा है। इसका अंदाजा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2010-11 में राज्य का जो अल्पसंख्यक बजट मात्र 472 करोड़ था, वह आज 5,600 करोड़ को पार कर चुका है। अल्पसंख्यक युवाओं का वोट बैंक पक्का करने के लिए करोड़ों रुपये का ऋण दिया गया है। खास बात यह कि तृणमूल सरकार ने इनसे ऋण वापसी पर कोई फोकस नहीं किया है। इतना ही नहीं इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक मानदेय में भी कई गुना की वृद्धि की गई है। दूसरी ओर प्रभु श्रीराम के नाम से लेकर हिंदुत्व और सनातन विरोध के कई उदाहरण ममता बनर्जी के हैं। इससे यह शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल सरकार ने अल्पसंख्यकों और घुसपैठियों को खूब पाला-पोसा है।

राम नाम मास्क बांटने पर बीजेपी नेता गिरफ्तार
राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है।

हिंदू-सिख-बौद्ध ही हो सकते हैं SC: धर्म बदलते ही खत्म हो जाएगा दर्जा: धर्म में वापस आने के बाद मिल सकता है अनुसूचित जाति का लाभ :सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 मार्च 2026) को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा पा सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में बदल जाता है, तो उसका SC दर्जा खत्म हो जाएगा।

इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने की। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत केस नहीं कर सकता। यह टिप्पणी कोर्ट ने एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद की अपील पर सुनवाई करते हुए की। उन्होंने साल 2025 में आए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

चिन्थाडा आनंद ने आरोप लगाया था कि उनके साथ अक्काला रामिरेड्डी ने जातिगत भेदभाव किया। इसके बाद उन्होंने SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज कराया और पुलिस ने उनकी शिकायत पर FIR भी दर्ज की।

इसके बाद अक्काला रामिरेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जाकर इस केस को रद्द करने की माँग की। उनका कहना था कि चिन्थाडा आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए उनका SC दर्जा खत्म हो चुका है। हाई कोर्ट ने रामिरेड्डी के पक्ष में फैसला दिया।

इसके बाद पादरी चिन्थाडा आनंद सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। मंगलवार (24 मार्च 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, “जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर SC का दर्ज खत्म हो जाता है।”

धर्म में वापस आने के बाद मिल सकता है अनुसूचित जाति का लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में जाने के बाद दोबारा हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में लौटने का दावा करता है और अनुसूचित जाति (SC) का लाभ लेना चाहता है तो उसे इसके लिए सख्त और स्पष्ट शर्तों को पूरा करना होगा।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल दावा करना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि तीनों शर्तों को एक साथ और पूरी तरह साबित करना अनिवार्य होगा। इनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं होने पर दावा मान्य नहीं होगा।

क्या हैं सुप्रीम कोर्ट की तीन अनिवार्य शर्तें?

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पहली शर्त बताई है कि व्यक्ति के पास यह स्पष्ट और पुख्ता प्रमाण होना चाहिए कि वह मूल रूप से उस जाति से संबंधित था जिसे Constitution (Scheduled Castes) Order 1950 के तहत अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है।

दूसरी शर्त के तौर पर कोर्ट ने कहा है कि व्यक्ति को यह भी साबित करना होगा कि उसने जिस धर्म को पहले अपनाया था उससे उसने पूरी तरह और बिना किसी संदेह के त्याग कर दिया है। इसके साथ ही यह भी दिखाना जरूरी होगा कि उसने अपने मूल धर्म (हिंदू, सिख या बौद्ध) को सच्चे मन से दोबारा अपनाया है और उस धर्म की परंपराओं, रीति-रिवाजों, प्रथाओं और धार्मिक कर्तव्यों का वास्तविक रूप से पालन कर रहा है। कोर्ट ने इसे ‘बोनाफाइड रिकन्वर्जन’ यानी वास्तविक और ईमानदार पुनः धर्म-ग्रहण बताया है।

तीसरी और सबसे अहम शर्त यह बताई गई कि व्यक्ति को अपनी मूल जाति और समुदाय द्वारा स्वीकार किया जाना जरूरी है। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल खुद को उस जाति का बताना पर्याप्त नहीं है बल्कि संबंधित समुदाय को भी उसे अपने सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी और उसे सामाजिक रूप से स्वीकार करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ये तीनों शर्तें अनिवार्य और एक साथ लागू (cumulative) हैं। यानी अगर कोई व्यक्ति इनमें से एक भी शर्त को साबित नहीं कर पाता है तो उसका फिर से अनुसूचित जाति का दावा खारिज कर दिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन सभी बातों को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (burden of proof) उस व्यक्ति पर ही होगी, जो फिर से धर्म में वापसी और SC दर्जे का दावा कर रहा है।

ट्रंप के ईरान पर U-Turn से 20 मिनट में 840 करोड़ रूपए की कमाई, किसने बनाया अमेरिकी राष्ट्रपति के दाँव से मोटा पैसा?


वैश्विक बाजारों में सोमवार(23 जनवरी 2026) को एक बेहद चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के पावर प्लांट पर हमलों को 5 दिनों के लिए रोकने के ऐलान किया तो उससे ठीक पहले भारी और असामान्य ट्रेडिंग देखी गई। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस पूरे घटनाक्रम में महज 20 मिनट के भीतर करीब 840 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया गया।

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूयॉर्क समय के अनुसार सुबह 6:50 बजे (भारत में शाम 4:20 बजे), CME पर S&P 500 E-mini फ्यूचर्स में अचानक ट्रेडिंग वॉल्यूम कई गुना बढ़ गया। इसी दौरान तेल बाजार में भी बड़ी हलचल दिखी। यह समय सामान्य नहीं माना जाता क्योंकि प्री-मार्केट में आमतौर पर कम ट्रेडिंग और कम लिक्विडिटी होती है।

करीब 15 मिनट बाद यानी सुबह 7:05 बजे डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर पोस्ट कर बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत हुई है और फिलहाल ऊर्जा ढाँचे पर हमले टाल दिए गए हैं लेकिन तब तक बड़े ट्रेड पहले ही किए जा चुके थे।

ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म अनयूजुअल व्हेल्स (Unusual Whales) के अनुसार, इन ट्रेड्स में दो बड़े दाँव लगाए गए। पहला करीब 1.5 बिलियन डॉलर (लगभग 12,600 करोड़ रुपए) के S&P 500 फ्यूचर्स खरीदे गए जिससे बाजार में तेजी का फायदा उठाया जा सके। दूसरा करीब 192 मिलियन डॉलर (लगभग 1,615 करोड़ रुपए) के तेल फ्यूचर्स बेचे गए ताकि कीमत गिरने पर लाभ कमाया जा सके।

सिर्फ एक मिनट में लगभग 6,200 ब्रेंट और WTI फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स का लेन-देन हुआ जो सामान्य से 4-6 गुना ज्यादा था। ट्रंप के ऐलान के बाद S&P 500 फ्यूचर्स में 2.5% से ज्यादा तेजी आई जबकि ब्रेंट क्रूड 109 डॉलर से गिरकर 92 डॉलर और WTI करीब 6% टूट गया। हेज फंड मैनेजर मेट विलियम ने इसे 25 साल में सबसे असामान्य पैटर्न बताया। उनका कहना है कि बिना किसी बड़े डेटा या संकेत के इतने बड़े ट्रेड संदेह पैदा करते हैं।

अब सवाल उठ रहा है कि ट्रंप के ऐलान से पहले इतनी सटीक जानकारी किसके पास थी। हालाँकि, अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (US SEC) ने अभी तक इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

तेजस्वी यादव और राहुल गांधी ने भुगता, अब अखिलेश यादव भी भुगतेगा; कालचक्र किसी को नहीं छोड़ता

सुभाष चन्द्र

मोदी-योगी-अमित विरोध में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उम्मा को चूमने के लिए सनातन संस्कृति को कलंकित करने का कोई मौका नहीं चूक रहे। अगर हिन्दू संस्कृति इतनी बुरी है तो इस्लाम क्यों नहीं कबूल कर लेते?    

गंगा नदी में मुस्लिमों ने जानबूझकर इफ्तार पार्टी की और पवित्र गंगा में चिकेन और मांस के झूठे टुकड़े फेंके उन्हें पता था हिंदू इसे कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे वैसे हिंदू त्योहारों पर मुस्लिम म्यूजिक बजने पर भड़कते हैं और पत्थरबाजी करते हैं लेकिन गंगा की इफ्तार में सब कुछ किया लेकिन कूद कर अखिलेश और कांग्रेस उनके समर्थन में खड़े हो गए। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अखिलेश यादव और कांग्रेस का हिंदू विरोध जगजाहिर है लेकिन मोक्षदायिनी माँ गंगा को अपवित्र करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं जो बताता है मुस्लिम वोटो के लिए ये लोग किस कदर पागल हैं और मुस्लिम हिंदुओं को उकसाने के लिए तैयार रहते हैं अखिलेश ने कहा गंगा में इफ्तार क्यों नहीं हो सकती? तो फिर सड़कों पर इफ्तार क्यों करते हो? वैसे भी मुस्लिमों के दिल में गंगा के लिए कोई सम्मान हो, ऐसा कभी देखने को नहीं मिलता इसलिए ही उन्हें महाकुम्भ से दूर रखा गया था

अखिलेश तो और आगे बढ़ गया उसने कहा इफ्तार करने वालों ने पुलिस वालो और DM को अच्छा खाना नहीं खिलाया होगा और उनकी हथेली गर्म नहीं की होगी  हथेली गरम पुलिस नरम, ये तो आम बात है। यानि अखिलेश के राज में उत्तर प्रदेश में यही होता रहा है। 

अखिलेश यादव अपनी ये बाते याद रखना गंगा माँ है वो अगर पाप धोती है तो दंड भी देती है और जो पाप आपने किया वह धुल भी नहीं सकता कुछ याद कीजिए तेजस्वी यादव की करतूत जिसका परिणाम उसे मिला माँ भगवती से

तेजस्वी यादव ने 9 अप्रैल, 2024 को नवरात्री के पहले दिन हेलीकाप्टर में मुकेश सहनी के साथ चटकारे ले ले कर मछली पार्टी करते हुए वीडियो पोस्ट किया था लेकिन जब भाजपा ने ऐतराज किया तो कह दिया कि वो तो एक दिन पहले 8 अप्रैल का वीडियो था मगर वीडियो पोस्ट तो  जानबूझकर नवरात्री के पहले दिन किया बाप लालू यादव भगवान राम का अपमान करता है और बेटे ने माँ भगवती का अपमान कर दिया

दूसरी तरफ दत्तात्रेय राहुल गांधी भी दिसंबर, 25 में मछली पार्टी उड़ा रहा था और उसकी रैली में मोदी की दिवंगत माताश्री के नाम से मोदी को माँ की गाली दी गई लेकिन राहुल गांधी खामोश रहा मोदी तेरी कब्र खुदेगी कांग्रेस ये नारे खुल कर लगाती है

नतीजा क्या हुआ? तेजस्वी की पार्टी 75 से 25 सीट पर आ गई, राहुल की कांग्रेस 18 से 6 सीट पर और उपमुख्यमंत्री बनने वाले मुकेश सहनी की पार्टी का खाता भी बिहार चुनाव में नहीं खुला

और उड़ाओ हिंदू भगवानों का मजाक - 

बस अब अखिलेश यादव इस सबकी दुर्दशा को याद कर ले और अपनी पिछली 111 की एक तिहाई यानी 37 सीट अभी से अगले चुनाव में अपने खाते में लिख ले माँ भगवती का रौद्र रूप तो तेजस्वी & कंपनी ने देख लिया और माँ गंगा का रौद्र रूप देखने के लिए अखिलेश तैयार रहे

बाद में चुनाव नतीजों की समीक्षा करते मत करते फिरना जैसे अपनी किस्मत तेजस्वी & कंपनी ने खुद लिख ली थी, वैसे ही अखिलेश ने लिख ली है अखिलेश के खाते में तो सनातन धर्म के अनेक अपमान लिखे हैं 

दिल्ली HC के आदेश पर पुलिस ने UNI न्यूज एजेंसी का ऑफिस किया सील

      दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद UNI ऑफिस सील कर दिया गया (साभार -द हिंदू, एआईआर और न्यूज़क्लिक)
राष्ट्रीय राजधानी में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब देश की सबसे पुरानी समाचार एजेंसियों में से एक यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के दफ्तर पर पुलिस कार्रवाई की गई। शुक्रवार (20 मार्च 2026) की शाम दिल्ली पुलिस के अधिकारी अर्धसैनिक बलों के साथ रफी मार्ग स्थित UNI के कार्यालय पहुँचे और अदालत के आदेश के बाद वहाँ खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दफ्तर में मौजूद करीब 50 पत्रकारों और कर्मचारियों को तुरंत परिसर खाली करने के लिए कहा गया। यह भी सामने आया कि कार्रवाई के दौरान कुछ कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाला गया।

इस मामले पर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा ने कहा कि पुलिस केवल सरकारी अधिकारियों की मदद के लिए वहाँ मौजूद थी। उन्होंने बताया, “हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार हम L&DO अधिकारियों को सुरक्षा देने पहुँचे थे और UNI के स्टाफ से परिसर खाली करने को कहा गया।”

यह पूरी कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा UNI की उस याचिका को खारिज किए जाने के कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें जमीन आवंटन रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। इसके तुरंत बाद अधिकारियों ने संपत्ति को सील कर दिया, जिसके बाद प्रेस की आजादी और सरकारी कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई।

                                                                 साभार – TIE

UNI के खिलाफ कार्रवाई को ‘प्रेस की आजादी’ पर हमला बताकर जनता को किया जा रहा गुमराह

इस घटना के बाद कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग, एक्टिविस्ट और खुद को पत्रकार बताने वाले लोग सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने लगे। कई लोगों ने कहा कि यह कदम भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए कम होती जगह को दिखाता है।

कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ता श्रीनिवास ने इस स्थिति की तुलना एक तानाशाही व्यवस्था से की और कहा कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा है। उन्होंने लिखा, “बधाई हो, भारत में उत्तर कोरिया पैदा हो गया…”

पत्रकार ममता त्रिपाठी ने भी इस मामले पर चिंता जताई और आरोप लगाया कि मीडिया इंडस्ट्री पर नियंत्रण किया जा रहा है। उन्होंने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “क्या लाला जी अब UNI पर भी कब्जा कर लेंगे? आज दिल्ली पुलिस ने UNI के दफ्तर पर छापा मारा!! पूरे न्यूज इंडस्ट्री को अपनी मुट्ठी में कर रखा है।”

इसी तरह पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना की और सामने आए दृश्य को परेशान करने वाला बताया। उन्होंने लिखा, “दिल्ली पुलिस ने UNI पर छापा मारा है। ‘द स्टेट्समैन’ अखबार भी इसी समूह का हिस्सा है। यह शर्मनाक दृश्य है।”

वहीं एक अन्य पत्रकार नमिता शर्मा ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि सिस्टम खुद मीडिया को निशाना बना रहा है। उन्होंने लिखा, “कोई गोली से मरता है, कोई भूख से… तो कोई सिस्टम से मरेगा, सब मरेंगे, दिल्ली पुलिस द्वारा UNI न्यूज पर रेड… मीडिया के लिए साफ संदेश है, जो चाटेगा, वो काटा जाएगा। आज UNI की बारी है, कल आपकी होगी, चापलूसी करने वाली पत्रकारिता ने भ्रष्ट सरकारों को महान बना दिया है…”

राजनीतिक नेताओं ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी। पी संतोष कुमार ने इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताया।

इसी बीच गुजरात के एक अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता सरल पटेल ने इस कार्रवाई को अघोषित आपातकाल जैसा बताया और अधिकारियों पर सख्ती से काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “मोदी बीजेपी सरकार के पिछले 12 सालों के अघोषित आपातकाल की एक झलक है यह। भारत की सबसे पुरानी न्यूज एजेंसी UNI के दफ्तर पर दिल्ली पुलिस ने ऐसे छापा मारा और सील कर दिया, जैसे किसी आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई हो रही हो। कर्मचारियों को अपना सामान तक लेने का समय नहीं दिया गया। यह प्रेस की आजादी पर खुला हमला है!”

इन प्रतिक्रियाओं ने इस नैरेटिव को और हवा दी है कि प्रेस की आजादी खतरे में है। हालाँकि, कुछ अन्य लोगों का मानना है कि इस तरह के बयान बिना पूरे कानूनी और न्यायिक संदर्भ को समझे अनावश्यक घबराहट और डर का माहौल पैदा कर रहे हैं।

कार्रवाई की वजह क्या थी? कानूनी बैकग्राउंड

इस पूरे विवाद के केंद्र में UNI और सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) के बीच लंबे समय से चला आ रहा जमीन का विवाद है, जो आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आता है।

यह संपत्ति केंद्रीय दिल्ली के 9 रफी मार्ग पर स्थित है और इसे बेहद कीमती सार्वजनिक जमीन माना जाता है। UNI को यह जमीन कई दशक पहले इस साफ शर्त के साथ दी गई थी कि वह तय समय के भीतर यहाँ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के साथ मिलकर एक संयुक्त कार्यालय भवन बनाएगा।

लेकिन सरकार और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, यह शर्त कभी पूरी नहीं की गई। अपने हालिया आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने UNI के खिलाफ कड़ी टिप्पणियाँ कीं। न्यायमूर्ति सचिन दत्त ने कहा कि संगठन ने वर्षों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी किए बिना ही कीमती सार्वजनिक जमीन पर कब्जा बनाए रखा।

अदालत ने कहा, “इस मामले के तथ्य दिखाते हैं कि एक ऐसी स्थिति बनी हुई थी, जहाँ एक लाइसेंसी ने दशकों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं और कीमती सार्वजनिक जमीन को जैसे बंधक बनाकर रखा।”

अदालत ने आगे कहा कि इस तरह का व्यवहार “सार्वजनिक जमीन के आवंटन की व्यवस्था की बुनियाद पर चोट करता है” और यह निष्कर्ष निकाला कि “आवंटन रद्द किया जाना पूरी तरह सही और कानूनी रूप से अनिवार्य था।”

दशकों से नियमों का पालन न करना और डेडलाइन चूकना

यह मामला नया नहीं है, बल्कि 45 साल से भी ज्यादा पुराना है। UNI को रफी मार्ग स्थित जमीन पहली बार 1979 में इस योजना के साथ दी गई थी कि यहाँ कई मीडिया संस्थानों के लिए एक साझा ऑफिस कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा, लेकिन यह परियोजना कभी शुरू ही नहीं हो सकी।

इसके बाद 1986, 1999 और 2000 में कई बार संशोधित आवंटन पत्र जारी किए गए, जिनमें हर बार भवन निर्माण की शर्त दोहराई गई। इसके बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हुई। यहाँ तक कि 2012 में निर्माण की मंजूरी मिलने के बाद भी परियोजना ठप ही रही।

साल 2023 में, कारण बताओ नोटिस जारी करने और संतोषजनक जवाब न मिलने के बाद, L&DO ने लीज की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए आवंटन रद्द कर दिया। UNI ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि “45 साल से अधिक समय तक लगातार काम न करने” को इस आधार पर माफ नहीं किया जा सकता कि अब संगठन कार्रवाई करने को तैयार है।

इस बीच UNI की आर्थिक समस्याओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया। एजेंसी दिवालियापन प्रक्रिया से गुजरी और 2025 में द स्टेट्समैन लिमिटेड ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार का तर्क था कि इस स्वामित्व परिवर्तन से आवंटी की प्रकृति बदल गई, क्योंकि यह जमीन मूल रूप से एक गैर-लाभकारी संस्था को दी गई थी, न कि किसी निजी व्यावसायिक संगठन को।

न्यायालय ने जनहित पर जोर दिया

अदालत ने एक और अहम बिंदु यह उठाया कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। जिस जमीन की बात हो रही है, उसकी कीमत करीब 409 करोड़ रुपए आंकी गई है, जिससे यह एक बहुत ही कीमती सार्वजनिक संसाधन बन जाती है।
अदालत ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक जमीन को निजी संपत्ति की तरह नहीं माना जा सकता। उसने कहा, “सार्वजनिक जमीन को ऐसे किसी डिफॉल्टर लाइसेंसी के पास बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता, जिसने उस उद्देश्य को ही पूरा नहीं किया, जिसके लिए लाइसेंस दिया गया था।”
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए जमीन आवंटन की शर्तों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इस तरह की लंबी देरी और दुरुपयोग न हो।

सरकार की भूमिका: हाई कोर्ट के आदेश को लागू करना

इस पूरे विवाद में एक बड़ा सवाल यह भी है कि सरकार ने यह कार्रवाई अपने स्तर पर की या फिर सिर्फ अदालत के निर्देशों का पालन किया। घटनाक्रम को ध्यान से देखने पर लगता है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद की गई, जिसमें साफ तौर पर अधिकारियों को “तुरंत जमीन का कब्जा लेने” के लिए कहा गया था।
पुलिस अधिकारियों ने भी कहा है कि उनकी भूमिका केवल खाली कराने की प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा देने तक सीमित थी। यह पूरी कार्रवाई L&DO के समर्थन में की गई, जो सरकारी जमीन के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार की कार्रवाई मनमानी नहीं, बल्कि अदालत के निर्देशों के अनुरूप दिखाई देती है।

मामला कानूनी कार्रवाई का है, प्रेस की आजादी का नहीं

UNI विवाद ने एक बार फिर प्रेस की आजादी को लेकर बहस को सुर्खियों में ला दिया है। जहाँ कुछ एक्टिविस्ट और पत्रकार इस घटना को मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, वहीं कानूनी रिकॉर्ड एक ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करता है।
यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई, बल्कि जमीन के इस्तेमाल को लेकर दशकों पुराने विवाद का नतीजा है। दिल्ली हाईकोर्ट की विस्तृत टिप्पणियाँ बताती हैं कि UNI लगातार अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रहा।
साथ ही, सरकार एक इम्प्लीमेंटेशन एजेंसी के रूप में अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होती है। ऐसे निर्देशों को नजरअंदाज करना शासन और कानून के राज पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
जहाँ एक ओर प्रेस की आजादी को लेकर चिंताएँ किसी भी लोकतंत्र में अहम होती हैं, वहीं कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक नैरेटिव के बीच फर्क करना भी उतना ही जरूरी है। इस मामले में उपलब्ध तथ्यों से यही संकेत मिलता है कि UNI के खिलाफ की गई कार्रवाई एक न्यायिक फैसले पर आधारित थी, न कि मीडिया पर किसी स्वतंत्र कार्रवाई का हिस्सा।
हालाँकि, इस घटना ने साफ तौर पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया है और मीडिया की आजादी, सरकारी कार्रवाई और जवाबदेही को लेकर चर्चा आने वाले दिनों में जारी रहने की संभावना है।

सनातन की एकजुटता पर उठाओ सवाल ताकि उम्माह का रहे बोलबाला : क्यों तरुण हत्याकांड में वामपंथी हिंदुओं में ही भर रहे ‘ग्लानि’, क्या है स्ट्रैटेजी?

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान एक हिंदू दलित परिवार की खुशियाँ मातम में बदल गईं। एक बच्ची के पानी के गुब्बारे की छींटें मुस्लिम महिला पर पड़ने के बाद शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि तरुण को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। परिवार माफी माँगता रहा लेकिन इसकी कीमत उसकी जान देकर चुकानी पड़ी। घटना के दौरान भीड़ में शामिल लोग ‘खूनी होली’ की बात करते दिखे।

घटना के बाद वामपंथियों का प्रोपेगेंडा पैटर्न देखने को मिला। इसमें पहले इसे सामान्य झगड़ा बताने की कोशिश हुई। कहा गया कि दोनों पक्षों में मारपीट हुई और एक व्यक्ति की गलती से मौत हो गई। जब यह नैरेटिव नहीं चला तो सोशल मीडिया पर तरुण पर ही आरोप लगाए जाने लगे कि वही उकसा रहा था और वही मारने गया था। लेकिन स्थानीय लोगों और तथ्यों ने इन दावों को खारिज कर दिया।

इसके बाद फोकस पूरी तरह बदल दिया गया। तरुण के लिए न्याय की माँग कर रहे हिंदुओं के गुस्से को ही सवालों के घेरे में लाया गया। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन को साजिश और हिंसा से जोड़ने की कोशिश की गई जबकि हत्या के मुद्दे को पीछे धकेला गया। यह पूरा मामला अब केवल एक हत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उस नैरेटिव की लड़ाई का उदाहरण बन गया है जिसमें घटना से ज्यादा उसकी कहानी को प्रभावित करने की कोशिश होती है।

हिंदुओं को ‘अपराधी बनाने’ की सिस्टेमेटिक कोशिश

इस हिंसा में लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने तरुण के लिए न्याय की माँग करना तो छोड़िए, हिंदुओं को ही अपराधी बताने की सिस्टेमेटिक कोशिशें शुरू कर दी। सबसे पहले ‘अस्वीकार’- इस गिरोह और इससे जुड़े पत्रकारों ने सबसे पहले इस घटना को सही रूप में दिखाने के बजाय इसे मामूली झगड़े को तौर पर पेश करनी कोशिश की। ऐसा दिखाया गया है कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मारा और उनमें एक आदमी ‘गलती’ से मर गया। यह दिखानी कोशिश की गई कि स्थानीय झगड़े को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी आपको कई ऐसे वीडियो दिखेंगे, जिसमें यह बताने की कोशिश की गई कि यह स्थानीय लोगों का झगड़ा था। हालाँकि, तथ्य सामने थे तो यहाँ इस गिरोह की दाल नहीं गली।

इसके बाद यह कोशिश शुरू की गई कि तरुण पर ही इल्जाम लगा दिया जाए। सोशल मीडिया पर दावे वायरल होने लगे कि तरुण ही छेड़छाड़ कर रहा था और वही इन कट्टरपंथियों को मारने गया था लेकिन ये दावे भी नहीं टिके और पड़ोसियों और अन्य लोगों ने इस गिरोह का यह प्रोपेगेंडा भी फेल कर दिया।

इसके बाद एक और कोशिश शुरू की गई, इस बार निशाने पर तरुण की जगह पूरा हिंदू समाज था। इस हत्या के बाद हिंदू समुदाय ने तरुण कुमार की हत्या के लिए न्याय की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों ने खुलेआम प्रदर्शन का ऐलान किया जिसके बाद भारी संख्या में न्याय की माँग के लिए लोग सड़कों पर उतर गए। लोग सड़कों पर उतरे तो उनमें से कई आक्रोशित भी थे और इसी आक्रोश की आड़ में हत्या को ढकने की साजिश शुरू कर दी गई। बताया जाना लगा कि तरुण की हत्या तो मामूली बात है असल दिक्कत हिंदुओं से ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता भी इसी प्रोपेगेंडा को हवा देने लगे, पवन खेड़ा जैसे वरिष्ठ नेता तक यह दावा करने लगे कि तरुण की हत्या तो महज दो लोगों का झगड़ा थी, लेकिन RSS-BJP ने इस मामले को उग्र कर दिया। यानी हिंदू अगर न्याय माँगते हुए आक्रोशित भी हो जाएँ तो यह हिंदुओं के लिए गुनाह है। हत्या भी उन्हीं की होगी, आरोप भी उनपर लगेगा और अंत में अगर संभलकर नहीं बोले तो अपराधी भी वही ठहरा दिए जाएँगे।

यह पैटर्न कोई अभी का नहीं है। इसी दिल्ली में 2020 के दंगों को देखिए, शरजील इमाम जैसे लोगों के भड़काऊ भाषण दिए पैटर्न के तहत रोड ब्लॉक की गईं, जिसे जाँच में साजिश करार दिया गया। लेकिन यह गिरोह अंकित शर्मा की हत्या को छिपाकर इस मामले में सिर्फ इस पीड़ित को दिखाता है और वो है शरजील इमाम। उदयपुर में कन्हैयालाल की निर्मम हत्या को आइसोलेटेड घटना बताकर हिंदू एकजुटता पर ही सवाल उठा दिए गए। केरल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लव जिहाद के सैकड़ों मामले सामने आने के बावजूद इन्हें मिथ करार दिया जाता रहा है।

विरोध प्रदर्शनों का पैटर्न: हिंदुओं की उदारता ही उनका अपराध है?

हिंदू समाज को हमेशा से सहिष्णु और उदार माना जाता है। यह समाज अलग-अलग मतों को स्वीकार करता है और इसी से जुड़कर भी रहता है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ज्यादा सहन करना कमजोरी समझ लिया जाता है। हिंदुओं की ‘उदारता’ ही उनका ‘अपराध’ बन जाती है। इसे प्रदर्शनों के पैटर्न के जरिए भी समझा जा सकता है। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन का पैटर्न भी आम तौर पर यही रहता है कि लोग प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाने का आह्वान करते हैं, अपनी माँगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, पुलिस-प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाते हैं और फिर न्याय का इंतजार करते हैं। यही दिल्ली में भी हुआ। इसे के लिए हिंदुओं को अपराधी बनाया जा रहा है।

अब दूसरी तरफ कट्टरपंथियों के इस प्रदर्शन के पैटर्न को देखिए। कई बार तो किसी को भनक तक नहीं लगती कि यहाँ कोई प्रदर्शन होने वाला है। ना कोई सार्वजनिक पोस्टर, ना सोशल मीडिया पर चर्चा। बस गुप्त बैठकें होती हैं, बंद कमरों में प्लानिंग होती है, वॉट्सऐपर पर कोडेड मेसेज चलते हैं और अचानक दंगा भड़क जाता है, हिंसा शुरू हो जाती है और सड़कों पर पत्थरबाजी देखने को मिलती है।

2020 दिल्ली दंगे इसका सबसे खतरनाक उदाहरण हैं। दिखावे के लिए महीनों तक ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन चल रहे थे लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा था। दिल्ली में देखते ही देखते प्रदर्शन हिंसक हो गया और दर्जनों हिंदू मारे गए। इसके अलावा आगजनी और मंदिरों पर हमले की घटनाएँ भी हुई। मुस्लिमों की घरों से पत्थरबाजी की गई तो जाहिर है कि ये पत्थर एक दिन में नहीं इकट्ठा हुए होंगे। यह साजिश लंबे समय से रची जा रही थी। ताहिर हुसैन की छत पर बाहुबली गुलेल और पेट्रोल बम जैसी चीजें मिलीं जो हिंसक प्रदर्शनों के सुनियोजित होने पर सवाल उठा रही थीं।

उत्तर प्रदेश के बरेली में सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद ‘आई लव मोहम्मद‘ को लेकर हुई हिंसा भी इसी तरह का उदाहरण है। लोगों को जो आम विरोध प्रदर्शन लग रहा था, वो अचानक हिंसक हो गया और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई। जाँच में पता चला कि यह आम या विरोध भी पूरी प्लानिंग के तहत अंजाम दिया जा रहा था।

बरेली में कुछ लोग इस्लामिया मैदान में जाने की जिद कर रहे थे और पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव कर दिया। इस दंगे के लिए करीब 5000 उपद्रवियों की फौज तैयार की गई थी। ये उपद्रवी शहर की 390 मस्जिदों में ठहराए गए थे और उनके पास पहले से ईंट, पत्थर और पेट्रोल बम जैसे हथियार मौजूद थे। अगर ये कट्टरपंथी अपनी इस साजिश में सफल हो जाते तो शायद सैकड़ों लोगों की जान जाती लेकिन पुलिस ने इन्हें काबू कर लिया।

राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य धार्मिक जुलूसों के कार्यक्रमों पर हमलों की खबरें हम सब सुनते हैं। अचानक मस्जिदों और घरों की छतों से पत्थरबाजी होने लगती है, ऐसी दर्जनों घटनाएँ हैं। बीते दिनों शिवाजी महाराज की जयंती के मौके जुलूस पर हमला हुआ और मस्जिद से पत्थरबाजी की गई।

अब पत्थरबाजी के लिए ये पत्थर कैसे और क्यों इकट्ठा होते होंगे ये सवाल ही इन प्रदर्शनों की आड़ में होने वाली साजिश का सबसे बड़ा जवाब है। इन पैटर्न से आपको अंदाजा होगा कि दिल्ली के जिन हिंदुओं को अपराधी बताया जा रहा है वो असल में सिर्फ अपने बेटे-भाई को होने से ही पीड़ित नहीं है बल्कि वो उस प्रोपेगेंडाबाज गिरोह से भी पीड़िता है जो उनकी आवाज तक उठाने पर उन्हें अपराधी घोषित कर देता है।

तरुण पर चुप्पी, रिजवान के लिए दर्द?

इस घटना में वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने तरुण की हत्या से ध्यान हटाने के लिए ‘रिजवान कहाँ है‘ का नैरेटिव भी चलाया था। इस घिनौने नैरेटिव को हवा देने में तथाकथित सेकुलर और पत्रकारिता का चोला पहनने वाले लोग खुलकर सामने आ गए। आरजे सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा और वारिस पठान समेत कई इस्लामी कट्टरपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने यह प्रोपेगेंडा फैलाया था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनके इस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल दी।

इसका मकसद बिल्कुल साफ था कि तरुण की हत्या वाले मुद्दे से लोगों का ध्यान भटका दिया जाए। यह धारणा बना दी जाए कि इस घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ही नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार ने भी अपना बच्चा खो दिया है। पुलिस को बार-बार टैग करके इसे गंभीरता का रंग देने की रणनीति अपनाई गई ताकि आम आदमी सोचे कि शायद पुलिस कुछ छुपा रही है। लेकिन सच सामने आया तो इन सब प्रोपेगेंडाबाजों की पोल खुल गई।

हिंदुओं के लिए सच को पहचानने का समय

तरुण की हत्या के अपराध को छिपाने के लिए उस अपराध पर खड़ा किया गया दोहरा नैरेटिव भी कम अपराध नहीं है। न्याय माँगने वालों को ही साजिशकर्ता या हिंसक बता देना असल में पूरे देश में एक डर का माहौल खड़ा करने की साजिश है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि यह इस गिरोह द्वारा हिंदू विरोध की धारणा बनाने की प्रक्रिया है।

यह गिरोह बस यही तय करता है कि कैसे अपने पर हुए अपराध के बाद भी हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी की तरह दिखाया जाए जबकि दूसरे पक्ष को बेबस और पीड़ित की तरह पेश किया जाए। यह वक्त इस पूरे नैरेटिव को चुनौती देने का है। क्योंकि अगर आज भी हम यह नहीं समझ पाए कि हमारे सामने जो परोसा जा रहा है वो पूरी सच्चाई नहीं है तो आने वाले समय में हर घटना इसी तरह किसी एजेंडे की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा। तब न कोई तरुण याद रहेगा, न उसकी हत्या केवल इस गिरोह के द्वारा बनाई एक कहानी बची रहेगी जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित किया जाएगा।

नजरिया: ‘विक्टिम’ को ‘विलेन’ बनाने का खतरनाक इकोसिस्टम

उत्तम नगर के तरुण हत्याकांड ने एक बार फिर उस ‘नैरेटिव वॉर’ को सतह पर ला दिया है, जहाँ अपराधी के मजहब को ढाल बनाने के लिए पीड़ित के अस्तित्व को ही मिटाने की कोशिश की जाती है। यह महज एक स्थानीय झगड़ा या गुब्बारे से शुरू हुई हिंसा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी ‘मनोवैज्ञानिक युद्धनीति’ का हिस्सा है।

दिल्ली से लेकर बरेली तक, पैटर्न एक ही है। जहाँ एक पक्ष की ‘सुनियोजित हिंसा’ को ‘हताशा’ बताकर डिफेंड किया जाता है, वहीं दूसरे पक्ष की ‘प्रतिक्रिया’ को ‘आतंक’ करार दिया जाता है। सनातन समाज को यह समझना होगा कि यह लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन और अखबारों की सुर्खियों में लड़ी जा रही है।

अगर आज तरुण के लिए न्याय की माँग को ‘गुंडागर्दी’ मानकर हिंदू पीछे हटा, तो कल हर घर का दरवाजा इसी कट्टरता की दस्तक सुनेगा। यह ‘ग्लानि’ से बाहर निकलकर ‘सत्य’ को पहचानने और संगठित होने का समय है, क्योंकि नैरेटिव की इस जंग में चुप रहना ही पराजय स्वीकार करना है।

महात्मा गाँधी की Expensive Poverty


 अंग्रेजी में एक शब्द है– "एक्सपेंसिव पावर्टी"

इसका मतलब होता है "महंगी- गरीबी" अर्थात... गरीब दिखने के लिए आपको बहुत खर्चा करना पड़ता है।
गांधीजी की गरीबी ऐसी ही थी।
एक बार सरोजनी नायडू ने उनको मज़ाक में कहा भी था कि “आप को गरीब रखना हमें बहुत महंगा पड़ता है।”
ऐसा क्यों ?......
गांधी जी जब भी तीसरे दर्जे में रेल सफर करते थे तो वह सामान्य तीसरा दर्जा नहीं होता था।
अंग्रेज नहीं चाहते थे की गांधी जी की खराब हालातों में, भीड़ में यात्रा करती हुई तस्वीरें अखबारों में छपे उनको पीड़ित (विक्टिम) कार्ड का लाभ मिले।
इसलिए जब भी वह रेल यात्रा करते थे तो उनको विशेष ट्रेन दी जाती थी जिसमें कुल 3 डिब्बे होते थे..... जो केवल गांधी जी और उनके साथियों के लिए होते थे,क्योंकि हर स्टेशन पर लोग उनसे मिलने आते थे। इस सब का खर्चा बाद में गांधीजी के ट्रस्ट की ओर से अंग्रेज सरकार को दे दिया जाता था।
इसीलिए एक बार मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था की.... “जितने पैसो में मैं प्रथम श्रेणी यात्रा करता हूँ उस से कई गुना में गांधीजी तृतीय श्रेणी की यात्रा करते हैं।”
गांधीजी ने प्रण लिया था कि वे केवल बकरी का दूध पिएंगे।
बकरी का दूध आज भी महंगा मिलता है, तब भी महंगा ही था... अपने आश्रम में तो बकरी पाल सकते थे,पर गांधी जी तो बहुत घूमते थे। ज़रूरी नही की हर जगह बकरी का दूध आसानी से मिलता ही हो।
इस बात का वर्णन स्वयं गांधीजी की पुस्तकों में है,कैसे लंदन में बकरी का दूध ढूंढा जाता था,महंगे दामों में खरीदा जाता था क्योंकि गांधी जी गरीब थे,वो सिर्फ बकरी का दूध ही पीते थे...😊
ये बात अलग है कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि... गांधी जी ने दूध के लिए जो बकरियां पाली थी,उनको नित्य साबुन से नहलाया जाता था, उनको प्रोटीन खिलाया जाता था उनपर 20 रुपये प्रतिदिन का खर्च होता था।
90 साल पहले 20 रुपये मतलब आज हज़ारों रुपये... बाकी खर्च का तो ऐसा है कि गांधीजी अपने साथ एक दान पात्र रखते थे जिसमें वह सभी से कुछ न कुछ धनराशि डालने का अनुरोध करते थे। इसके अलावा कई उद्योगपति, उनके मित्र उनको चंदा देते थे। उनका एक न्यास(ट्रस्ट)था जो गांधी के नाम पर चंदा एकत्र करता था।
उनके 75 वें जन्मदिन पर 75 लाख रुपए का चंदा जमा करने का लक्ष्य था, पर एक करोड़ से ज्यादा जमा हुए। सोने के भाव के हिसाब से तुलना करें तो आज के 650 करोड़ रुपये हुए।
गांधी उतने गरीब भी नहीं थे, जितना हमको घुट्टी पिला पिलाकर रटाया गया है।(LBBhuva की वॉल से)

मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 8931 दिन सबसे आगे मोदी… बनाया सबसे लंबे समय तक सरकार का प्रमुख रहने का रिकॉर्ड


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (22 मार्च 2026) को भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। वे देश में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले सरकार के प्रमुख बन गए हैं। इस मामले में उन्होंने पवन कुमार चामलिंग का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जिन्होंने सिक्किम के मुख्यमंत्री के रूप में 8,930 दिनों तक पद सँभाला था।

अब पीएम मोदी 8,931 दिनों के साथ इस सूची में शीर्ष पर पहुँच गए हैं। उनके इस कार्यकाल में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बिताया गया समय और प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल दोनों शामिल हैं। यह उपलब्धि न केवल उनके लंबे राजनीतिक करियर को दर्शाती है बल्कि देश की राजनीति में उनकी निरंतर पकड़ और प्रभाव को भी उजागर करती है।

नरेंद्र मोदी ने 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी और 2014 तक इस पद पर बने रहे। इसके बाद वे देश के प्रधानमंत्री बने और लगातार तीन लोकसभा चुनाव 2014, 2019 और 2024 में अपनी पार्टी को जीत दिलाई। अपने राजनीतिक सफर में मोदी ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं।

 वे गुजरात के सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री रहे हैं और साथ ही ऐसे प्रधानमंत्री भी हैं जिनके पास मुख्यमंत्री के रूप में सबसे ज्यादा अनुभव रहा है। वे स्वतंत्र भारत के बाद जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री भी हैं। इसके अलावा  वे ऐसे पहले गैर-कॉन्ग्रेसी नेता हैं जिन्होंने केंद्र में लगातार दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने PM मोदी की इस उपलब्धि पर कहा कि यह सेवा, कड़ी मेहनत और अटूट समर्पण से जुड़ी एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने X पर लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी जी के 8,931 दिनों का सार्वजनिक जीवन देश को सबसे ऊपर रखने वाली सोच, ईमानदार कार्यशैली और हर नागरिक की सेवा के प्रति उनकी निरंतर मेहनत को दिखाता है। यह एक ऐसी विरासत है जो विश्वास और सेवा के दम पर बनी है।”

उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की दशकों की सेवा ने एक नए युग की शुरुआत की है। उन्होंने कहा, “इस नए भारत के निर्माण के लिए पूरी जिंदगी की मेहनत लगी है, और प्रधानमंत्री मोदी जी ने इसे पूरा किया। पिछले 24 सालों से बिना छुट्टी लिए देश की सेवा करना उनके समर्पण को दर्शाता है।”

X पर सक्रिय ट्रोल पर हुई कार्रवाई तो भड़क गई कांग्रेस, मोदी सरकार को बनाने लगे निशाना: इन हैंडल्स से फैलाया जा रहा था एंटी इंडिया प्रोपगैंडा

सुप्रिया श्रीनेत ने किया प्रेस कॉन्फ्रेंस (साभार: X_SupriyaShrinate)

केंद्र सरकार ने IT एक्ट की धारा 69ए का इस्तेमाल करते हुए बुधवार (18 मार्च 2026) को कई ऐसे एक्स हैंडल्स पर कार्रवाई की है, जिनके माध्यम से सोशल मीडिया पर एंटी-इंडिया प्रोपगैंडा फैलाया जा रहा था। ये एक्स हैंडल अधिककर विपक्षी पार्टियों और उसके इकोसिस्टम से जुड़े थे, जिन्हें भारत में अब ‘Withheld’ कर दिया गया है। इस कार्रवाई का मकसद ऐसे कटेंट का प्रसार रोकना है, जो समाज में अव्यवस्था और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।

इस घटना के तुरंत बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार पर अभिव्यक्ति की आजादी छीनने का आरोप लगाते हुए अभियान शुरू कर दिया। दिल्ली में पार्टी की सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म विभाग की प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

श्रीनेत ने इस कदम को बढ़ती सेंसरशिप की संस्कृति बताया और केंद्र पर आरोप लगाया कि वो असहमति को दबा रही है डिजिटल चर्चा पर अपना कब्जा मजबूत कर रही है और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र असहमति वाली आवाजों को चुप कराने का पैटर्न अपनाया है।

श्रीनेत ने कहा कि ऐसे कदम दरअसल नौकरशाहों को खुली जानकारी तक पहुँचने के फैसले पर पावर दे देते हैं। सुप्रिया ने कहा, “यह सिर्फ कहानी गढ़ने की बात नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की आत्मा पर हमला है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार मुख्यधारा के मीडिया में दखल के बाद अब सोशल मीडिया की दुनिया में भी अपना दखल बढ़ा रही है।

श्रीनेत ने आगे लिखा, “जिन लोगों पर असर पड़ा है उनमें से कई कांग्रेस के साथ नहीं हैं। कुछ तो हमारी फैसलों की आलोचना भी करते हैं लेकिन हम उनके समर्थन में आवाज उठाते हैं। हमने राहुल गाँधी से सीखा है कि किसी भी अन्याय का सामना करने वाले का साथ दें चाहे वो हमारे खिलाफ रहे हों और वो हमारे आधिकारिक सिस्टम का हिस्सा न हों बावजूद इसके कि भाजपा और उसके ट्रोल्स क्या कहते हैं।”

श्रीनेत यहीं नहीं रुकी, बल्कि कहा कि अकाउंट्स ब्लॉक करने से सवाल नहीं रुकेंगे। उन्होंने यह भी शिकायत की कि यह मुद्दा एक बड़ी समस्या का हिस्सा है और सरकार को बढ़ते संसदीय आर्थिक चुनौतियों और विदेश नीति की कमियों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया।

श्रीनेत ने इसी तरह के तर्कों वाला एक वीडियो भी अपलोड किया और बैन किए गए अकाउंट्स के समर्थन में ट्वीट किया जिसमें उन्होंने फैसले को ‘अस्वीकार्य’ बताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कायर’ कहा।

दिलचस्प बात यह है कि यह पुरानी बड़ी पार्टी असहमति कुचलने का लंबा इतिहास रखती है और अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करती रही है। फिर भी वह इन लोगों के पीछे खड़ी हो गई है न कि ऊँचे आदर्शों की सच्ची चिंता से बल्कि इसलिए कि वे विपक्ष की कहानी फैलाते हैं। बेशक यह उनके खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र कारण नहीं हो सकता क्योंकि उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में काफी कुछ शामिल है।

फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं ये अकाउंट

नेहर_हू 2 लाख 42 हजार 300 फॉलोअर्स वाला एक पॉपुलर अकाउंट है जो इस्लामो-लिबरल गुट का है जिस पर रोक लगी है। इसने बार-बार न सिर्फ झूठी खबरें फैलाईं बल्कि नस्लवाद दिखाया और भारतीय सेना पर आरोप लगाए। उसने न्यायपालिका की भी निंदा की क्योंकि उसने मशहूर जिम मालिक ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार को सुरक्षा नहीं दी जो पहलगाम आतंकी हमले के शिकारों का मजाक उड़ा रहा था और कह रहा था ‘केवल भारत में हीरो को विलेन बना दिया जाता है।’

उसने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का भाषण शेयर किया जिसमें ब्रिटेन की विविधता का जश्न था और कहा कि ‘भारत में ठीक उलटा है’ देश की निंदा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा भले ही झूठ बोलकर। यह अकाउंट ‘अल्पसंख्यक खतरे में’ वाली बनाई गई कहानियाँ फैलाने में सबसे आगे रहा जबकि हिंदुओं पर हमलों को साफ कर दिया या उनके नरसंहार का मजाक उड़ाया।

साल 2024 में उसने ओपइंडिया के हिंदूफोबिया ट्रैकर का हवाला देकर कहा कि कश्मीर में हिंदू उत्तर प्रदेश से ज्यादा सुरक्षित हैं ताकि अपनी आश्चर्यजनक अपमानजनक और असंवेदनशील सोच दिखा सके। वह कश्मीरी पंडितों के जिहादियों के कारण पलायन को जानता है लेकिन फिर भी उनके दर्द का मजाक उड़ाता है।

इसी महीने अमेरिका के भारत राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर सैमुअल जे पापारो भारत की वेस्टर्न आर्मी कमांड के चंडीगढ़ मुख्यालय गए। बातचीत पश्चिमी थिएटर की गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित थी जो पाकिस्तान से सैन्य गतिरोध और दुश्मनी के कारण महत्वपूर्ण है।

लेकिन इस मीटिंग का इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी को समझौता करने का आरोप लगाने के लिए किया गया जो कांग्रेस पार्टी अक्सर लगाती है और इससे रक्षा बलों की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए।

नेहर_हू ने बिहार के लोगों पर उनके वोटिंग चॉइस के लिए नस्लवादी हमला किया और कहा ‘टॉयलेट में माइग्रेशन का मजा लो अगले 5 साल’ मेहनतकश मजदूर वर्ग का अपमान करने के लिए सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने उसकी पसंदीदा पार्टियों को वोट नहीं दिया।

“उत्तर प्रदेश और बिहार से लाखों प्रवासी त्योहार पर घर जाने के लिए भयानक तकलीफ झेलते हैं। कुछ तो मर भी जाते हैं” उसने 2024 में इसी तरह कहा और उन्हें केसरिया पार्टी को सपोर्ट करने के लिए कोसा और आरोप लगाया कि उसकी सरकार ने वंदे भारत अमीरों के लिए शुरू किया। उसने इसमें ‘जैसा बोया वैसा काटा’ जैसे तंज भी खुशी खुशी जोड़े। इस आदमी ने लगातार राज्य और उसके रहने वालों को स्वच्छता और दूसरी चीजों पर नीचा दिखाया है।

एक महिला ने बताया कि उसने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था लेकिन उसे भाजपा का स्लिप मिल गया। हालाँकि उसने ये भी कहा कि मेरे साथ छोटा बच्चा था वोटिंग के समय जिस वजह से गलत बटन दब गया और मुझे ईवीएम से कोई समस्या नहीं है।” लेकिन उसकी झूठी बात का इस्तेमाल करके उसने भारत के चुनाव आयोग की निंदा की।

उसने और अल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने पत्रकार निशा पाल को निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि उन्होंने पहलगाम आतंकी घटना ऑपरेशन सिंदूर और इजराइल-हमास युद्ध के बारे में कुछ मुस्लिम बच्चों से सवाल पूछे थे।

उसने एक वीडियो भी अपलोड किया जिसमें कथित पाकिस्तानी आदमी भारतीय क्रिकेट टीम की जीत का जश्न मना रहा था और कह रहा था कि इस्लामिक रिपब्लिक भारत से बेहतर देश है जबकि अपने देश के खिलाफ आतंकवाद समेत सभी बड़े अपराधों को नजरअंदाज कर रहा था।

मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी के रूप में छिपा एंटी इंडिया प्रोपगैंडा

डॉ निमो यादव 2.0 एक और प्रमुख अकाउंट जो भारत में बैन हो गया है उसने दो केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से जोड़ने तक की हद पार कर दी। उसने कहा, “क्या यह सच है कि एन सीतारमण का ऑफिस और राजीव चंद्रशेखर ट्विटर पर उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे थे जो भारत में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा था।” इसने इन नेताओं की जाँच NIA से कराने की डिमांड तक रख डाली।

इस बीच जिन पार्टियों को ये लोग सपोर्ट करते हैं वे वोट बैंक के लिए माफिया और गैंगस्टरों को बढ़ावा दे रही हैं और अपनी एजेंडा थोपने के लिए मानवीय सीमाओं को पार कर रही हैं। उसने भारतीय सेना के अधिकारियों के दिखने पर मजाक भी किया और कहा, “यह तब होता है जब मिड-डे मील में अंडे बैन कर दो।” इस तरह से वो वर्दीधारी सैनिकों का सम्मान करता है, जिन्होंने युद्धक्षेत्र में पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों से लड़ते हुए अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया।

इन हैंडल्स पर निखिल गुप्ता की गिरफ्तारी पर मजा लिया जो खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के असफल हत्या षड्यंत्र में शामिल था और चाहा कि उसकी कहानी धुरंधर 2 में दिखाई जाए, जिसमें आर माधवन भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का रोल करते हैं। यह भारतीय खुफिया एजेंसियों का मजाक उड़ाने का उसका दयनीय प्रयास था।

डॉ निमो यादव 2.0 ने एक और पोस्ट में दावा किया कि ‘भारत के लिए चीजें अच्छी नहीं लग रही’ क्योंकि ‘रूस ने पाकिस्तान को सस्ते दाम पर कच्चा तेल ऑफर किया’ जिसे उसने सरकार की बड़ी असफलता बताया। दूसरी तरफ भारत रूस से बहुत सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है खासकर 2022 में अमेरिका की धमकियों और टैरिफ के बावजूद।

वह जानता है कि रूस का पाकिस्तान को ऑफर भारत की इजराइल से निकटता की तरह दोनों देशों के रिश्तों में बाधा नहीं डालता फिर भी उसने अपनी प्रचार से मुँह नहीं मोड़ा।

अलग-अलग अकाउंट्स लेकिन काम एक जैसा

इसी तरह की पाबंदी मनीष आरजे के अकाउंट पर भी लगी है। उसने दावा किया था कि बिहारी वोटरों ने अपनी आत्मा 10 हजार में बेच दी क्योंकि उन्होंने भाजपा को सपोर्ट किया। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस गुट को तभी स्वीकार्य लगती है जब उनकी पसंदीदा पार्टियाँ जीतती हैं।

उसने भी बाकियों की तरह झूठी जानकारी फैलाने से खुद को नहीं रोका और इजराइल को ‘फादरलैंड’ कहा गलत तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को इसका श्रेय देते हुए जबकि मोदी ने भारतीय यहूदियों के बारे में कहा था कि वे पश्चिम एशिया के उस देश को अपना पिता मानते हैं जबकि भारत को मातृभूमि।

आरजे ने कोलकाता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुई भयानक बलात्कार और हत्या की घटना में पीड़िता की माँ को भी अपनी छोटी राजनीति में घसीट लिया और आरोप लगाया कि न्याय की उनकी गुहार दरअसल भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा से थी। उसने शोक संतप्त महिला की बेइज्जती की, जबकि उसे सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार से जवाब माँगना चाहिए था।

उसने लगातार उन पोस्ट्स को रीट्वीट किया जो भू-राजनीतिक संकट से भारतीयों पर पड़ने वाले नुकसान का मजाक उड़ाती हैं।

‘एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर’ संदीप सिंह लिस्ट में एक और नाम है जो कांग्रेस का खासकर हरियाणा यूनिट का खुलकर समर्थन कर रहा है कई पोस्ट्स के जरिए जो श्रीनेत के दावे का खंडन करता है कि ये अकाउंट उनकी पार्टी को सपोर्ट नहीं करते।

इसके अलावा वह भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध चाहता है जैसा कि हालिया विवादित रिपोर्ट में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने कहा है धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर और भेदभाव रोकने के लिए। रिपोर्ट ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग पर टारगेटेड सैंक्शंस की भी सिफारिश की।

डॉ रंजन जिनके अकाउंट का भी यही हाल हुआ। उसने एक कार्यक्रम का वीडियो पोस्ट किया और गलत दावा किया कि मोदी सरकार के प्रभाव में भारतीय मीडिया नागरिकों से संकट और आपदाएँ छिपा रही है। उसका साफ मकसद है लोगों में डर पैदा करना और सरकार के खिलाफ नफरत भड़काना, बिना देश पर पड़ने वाले असर को सोचे।

उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान को भी तोड़ मरोड़ कर पोस्ट किया और जातीय विभाजन पैदा करने की कोशिश की।

कुछ लोगों ने घटना के बाद अपने ट्वीट्स लॉक कर लिए जिससे कई सवाल उठे।

ये वही लोग हैं, जो हिंदू एक्टिविस्ट विजय पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर खुश थे और मालाबार गोल्ड चाहता था कि उन्हें जेल भेजा जाए क्योंकि उन्होंने उनके पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर्स को हायर करने की आलोचना की थी जो ऑपरेशन सिंदूर की निंदा कर रहे थे। वे ‘सेंसरशिप’ का मजा लेते हैं जब तक वो उनके विरोधियों पर अन्यायपूर्ण तरीके से लगे। पाखंड और दोहरे मापदंड वाकई हैरान करने वाले हैं।

अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने कांग्रेस को उसके एडिटेड वीडियो का इस्तेमाल करने के लिए फटकार लगाई जिसमें आरोप था कि भाजपा की सत्ता आने पर आरक्षण खत्म हो जाएगा। यह वीडियो कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन और उनके पूरे नेटवर्क द्वारा असली बताकर फैलाया गया था। इस तरह नुकसान पहुँचाने के इरादे से गलत सूचना फैलाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ठीक वैसे ही देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी जो ऐसी तकनीकें इस्तेमाल करती रही है उसके इन अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई के बाद नाराज होना आश्चर्य की बात नहीं है।