पाकिस्तान के इस्लामाबाद में शिया मस्जिद में नमाज के दौरान अचानक बम फटा: 15 की मौत, कम से कम 80 घायल


पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बड़ा आत्मधाती हमला हुआ है। द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार इस्लामाबाद के इमाम बारगाह खदीजत-उल-कुबरा मस्जिद में सुसाइड अटैक के बाद 15 लोगों की मौत हो गई है, वहीं 80 लोग बुरी तरह घायल हुए हैं. धमाके के बाद शिया मस्जिद के अंदर का दृश्य डरा देने वाला है
 लोग घायल और खून से लथपथ हालत में जमीन पर पड़े हुए नजर आ रहे हैं बड़ी संख्या में लोग जमीन पर पड़े हुए हैं. वहां अफरातफरी का माहौल है 

पाकिस्तान के इस्लामाबाद के इमाम बारगाह खदीजत-उल-कुबरा मस्जिद में में हुए भीषण विस्फोट में कम से कम 15 से 20 लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि करीब 80 लोग घायल हो गए। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, धमाके के तुरंत बाद पुलिस और राहत एवं बचाव दल मौके पर पहुँचे और घायलों को अस्पताल पहुँचाने का अभियान शुरू किया।

विस्फोट के बाद पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में आपातकाल घोषित कर दिया गया, जहाँ बड़ी संख्या में घायलों को भर्ती कराया गया है। अधिकारियों का कहना है कि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह आत्मघाती हमला था या पहले से लगाए गए बम के जरिए धमाका किया गया।

वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यह सुसाइड अटैक था और शिया मस्जिद में आत्मघाती हमलावर ने खुद को अंदर आने के बाद गेट के पास उड़ा लिया। मामले की गहन जाँच की जा रही है और सुरक्षा एजेंसियाँ हर पहलू से पड़ताल में जुटी हैं।

यह विस्फोट ऐसे समय हुआ है, जब कुछ दिन पहले ही पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के बीच घातक मुठभेड़ हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इससे पहले नवंबर में भी इस्लामाबाद में एक आत्मघाती विस्फोट हुआ था, जिसमें 12 लोगों की जान गई थी।

मस्जिद में कैसे हुआ धमाका?

इस्लामाबाद के शहजाद टाउन इलाके में स्थित टेरलाई इमाम बारगाह में जुमे की नमाज के दौरान यह धमाका हुआ है आत्मघाती हमलावर ने खुद को अंदर आने के बाद गेट के पास उड़ा लिया इस घटना में पहले 5 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई थी मरने वालों की संख्या अब 15 पहुंच गई है वहीं 80 लोगों के हताहत होने की जानकारी सामने आई है विस्फोट की सूचना मिलने के बाद पुलिस और बचाव दल घटनास्थल पर पहुंच गया और बचाव कार्य जारी है

शिया समुदाय को बनाया निशाना

इस हमले के जरिए शिया समुदाय को निशाना बनाया गया है। धमाके के बाद शिया मस्जिद के अंदर का दृश्य डरा देने वाला है। लोग घायल और खून से लथपथ हालत में जमीन पर पड़े हुए नजर आ रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग जमीन पर पड़े हुए हैं। वहां अफरातफरी का माहौल है। रेस्क्यू टीम मौके पर मौजूद है। इमाम बारगाह के आसपास के इलाके को घेर लिया गया है। हर एक जगह पर बारीकी से नजर रखी जा रही है। खबर ये भी सामने आ रही है कि  सुरक्षा के मद्देनजर अधिकारियों ने पूरे शहर में आपातकाल लागू कर दिया है।

अस्पताल में इमरजेंसी लागू

इस विस्फोट के बाद इस्लामाबाद के पॉलीक्लिनिक, पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (पिम्स) और सीडीए अस्पताल में आपातकाल लगा दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार हॉस्पिटल के एक प्रवक्ता ने डॉन को इसकी पुष्टि की। उन्होंने बताया कि कार्यकारी निदेशक (ईडी) पिम्स के निर्देश पर, अस्पताल में आपातकाल लागू कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्य आपातकालीन, आर्थोपेडिक, बर्न सेंटर और न्यूरोलॉजी विभाग सक्रिय कर दिए गए हैं। घायलों को पिम्स और पॉलीक्लिनिक अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है।

हमलावर को एंट्री गेट पर रोका, फिर हुआ तेज धमाका

द टाइम्स ऑफ इस्लामाबाद ने सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से बताया कि हमलावर को एंट्री गेट पर पहले से अलर्ट सुरक्षाकर्मियों ने रोक लिया था, जिसकी वजह से वह मस्जिद के मुख्य हॉल में प्रवेश नहीं कर सका, जहां पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। उसे रोके जाने के बावजूद, धमाके वाली जगह के वीडियो फुटेज में दिख रहा है कि गेट को भारी नुकसान पहुंचा है. धमाका इतना तेज था कि आसपास की इमारतों की खिड़कियां भी चकनाचूर हो गईं और मलबा सड़क पर बिखर गया।

क्या राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बन गई है ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया गैंग? प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।


लगातार चुनावों में हार झेल रही कांग्रेस सत्ता के लिए ऐसे तरप रही है जैसे बिना पानी के मछली। और चुनावों में मिल रही हार की जिम्मेदार है सोनिया परिवार। चर्चा यह है कि राहुल की उद्दंता पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आंखें मिचने के पीछे भी बहुत राजनीति है। वह यह कि राहुल जितना ऊलजलूल बोलेगा कांग्रेस को उतना ही नुकसान होगा। जबसे राहुल सक्रीय हुए है कांग्रेस 100 का अंक भी पार सकी। विपरीत इसके इसका जनाधार भी कम होने लगा है। वह दिन भी दूर नहीं जब कांग्रेस की स्थिति क्षेत्रीय दलों से भी बदतर होने वाली है।  

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपनी विचारधारा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। राजनीति में विरोध लाजमी है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर देश को अस्थिर करना सही है? दरअसल में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन में जो खुलासा किया है वह चौंकाने वाला है। बुधवार, 4 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण टाले जाने के पीछे की वजह बताते हुए बिरला ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के साथ ‘मिसहैप’ (कोई अप्रिय घटना) करने की फिराक में थे। स्पीकर ने खुद अपनी आंखों से सांसदों को पीएम की कुर्सी की तरफ हिंसक तरीके से बढ़ते देखा, जिसके बाद उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से पीएम को सदन में न आने की सलाह दी।

क्या कांग्रेस का एजेंडा अब विदेशों से तय हो रहा है? क्या राहुल के इशारे पर प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है?

इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अब ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया अड्डा बन चुकी है? राहुल गांधी के हालिया बयानों और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या सत्ता की लालच में देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है?

प्रमाण

इस ट्वीट में साफ दिख रहा है कि कैसे कांग्रेस का नैरेटिव देश विरोधी ताकतों से मेल खा रहा है। प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।

 संस्थानों पर हमला: नक्सलियों जैसी रणनीति?

अर्बन नक्सल का पहला काम होता है देश की संवैधानिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा उठाना। राहुल गांधी आज वही कर रहे हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी सुप्रीम कोर्ट, तो कभी भारतीय सेना पर सवाल उठाकर वह सिस्टम को पंगु बनाना चाहते हैं। यह वही अराजकता की थ्योरी है, जो नक्सली जंगलों में इस्तेमाल करते हैं और अर्बन नक्सल शहरों में। जानकारों का कहना है कि जब एक राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत की छवि खराब करता है, तो वह सीधे तौर पर उसी नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देता है।
राहुल गांधी की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति का असली चेहरा यहां बेनकाब हो रहा है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर पीएम पर हमला करने की कोशिश? क्या कांग्रेस अब प्रोफेशनल नक्सलियों की तरह ट्रेनिंग ले रही है?
विदेशी फंडिंग और बाहरी मदद का शक
डिजिटल मीडिया पर यह बहस छिड़ी है कि राहुल गांधी के सुर अचानक विदेशों में जाकर क्यों बदल जाते हैं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल टूलकिट’ का इस्तेमाल हो रहा है? अडानी-हिंडनबर्ग जैसे मुद्दों पर देश में आग लगाने की कोशिश करना, इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है।
‘मोहब्बत की दुकान’ में ‘नफरत का सामान’?
जनता अब जागरूक हो चुकी है। राहुल गांधी जिसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहते हैं, आलोचक उसे ‘अर्बन नक्सलवाद का शोरूम’ बता रहे हैं। जाति के नाम पर समाज को तोड़ना और माओवादी भाषा का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि भारत की एकता बनाम ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग की है।

क्रिकेट पर नासिर हुसैन की भारत से नफरत आई सामने, पाकिस्तान-बांग्लादेश के समर्थन में कर रही बैटिंग: ‘उम्माह’ के लिए BCCI-ICC को कोस रहा पूर्व ‘ब्रिटिश’ कैप्टन

                                            क्रिकेटर नासिर हुसैन (साभार-x@sarkarstix )
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।

यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।

हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।

सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।

यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।

बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी

जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।

नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।

अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।

ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।

हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।

इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।

बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।

क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।

फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”

यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।

बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।

नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?

ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।

जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।

उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।

2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया

साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।

दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।

क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।

जहाँ तक ​​नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।

राहुल और विपक्ष के पास मोदी की कब्र खोदने के अलावा क्या कोई काम नहीं? क्यों नहीं बेशर्मों ने बजट पर चर्चा की?

लोकसभा में बजट और महामहिम राष्ट्रपति के भाषण पर चर्चा करने की बजाए राहुल गाँधी के  गुलाम विपक्ष ने जिस गुंडागर्दी का प्रदर्शन किया वह कौन से संविधान में लिखा है? कौन से संविधान या लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पर लोकसभा में अप्रिय घटना करने का उल्लेख है? क्या जनता ने संसद में ऐसी गुंडागर्दी के लिए वोट दिया था? फरवरी 5 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का संसद में यह कहना कि "प्रधानमंत्री ने सदन में नहीं आने का अनुरोध स्वीकार किया... जिस तरह महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी का घेराव किया था किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने की योजना थी।" विपक्ष में सिर्फ समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने यह बोलने की हिम्मत दिखाई कि "प्रधानमंत्री को नहीं बोलने देना शर्मनाक..." अखिलेश यादव को रामगोपाल से कुछ सीखना चाहिए। राहुल की गुलामी कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारे।      
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उनका भाषण तीखा और तंज से भरा था। उन्होंने कहा कि जो लोग ‘मोहब्बत की दुकान’ चलाने का दावा करते हैं, वे असल में उनकी ‘कब्र खोदने’ की बातें कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि विपक्ष की यह बौखलाहट इसलिए है क्योंकि वे इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि एक गरीब का बेटा इतने समय से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कैसे बैठा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि यह बयानबाजी इसलिए हो रही है क्योंकि गांधी परिवार को लगता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी उनकी पारिवारिक संपत्ति है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस बात को पचा नहीं पा रही कि एक सामान्य परिवार से आया व्यक्ति इतने सालों तक देश की सेवा कैसे कर रहा है और लगातार जनता का भरोसा कैसे जीत रहा है। उन्होंने कहा कि मोहब्बत की दुकान से मोदी की कब्र खोदने जैसे नारे निकल रहे हैं। वे ऐसा इसलिए चाहते हैं क्योंकि मोदी ने धारा 370 की दीवार गिरा दी, नॉर्थ ईस्ट में शांति लाए और आतंकवाद पर निर्णायक प्रहार किया। पीएम ने मजाकिया लहजे में यह भी कहा कि जब लोग उनके स्वास्थ्य का राज पूछते हैं, तो वे बताते हैं कि वह रोज 2 किलो गाली खाते हैं, जो उन्हें ऊर्जा देती है। सदन में यह टिप्पणी आते ही सत्ता पक्ष की तरफ से ठहाके और मेज थपथपाने की आवाजें सुनाई दीं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने दशकों तक सिर्फ ‘गरीबी हटाओ’ का खोखला नारा दिया, लेकिन उनकी सरकार ने पिछले 10 साल में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। उन्होंने गिनाया कि कैसे उनकी सरकार ने बिना बिजली वाले 18 हजार गांवों को रोशन किया, मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग खत्म की और करोड़ों गरीबों को पक्के घर, गैस, पानी और शौचालय की सुविधा दी। उन्होंने कहा कि करोड़ों लोगों का यही आशीर्वाद विपक्ष को चुभ रहा है।

धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देते हुए उन्होंने कांग्रेस के समय की ‘फोन बैंकिंग’ पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि पहले नेताओं के फोन पर चहेतों को लोन मिलते थे जिससे एनपीए का पहाड़ खड़ा हो गया था। पीएम मोदी ने दावा किया कि आज बैंकिंग सेक्टर स्वस्थ है और एनपीए एक प्रतिशत से भी कम है। उन्होंने एलआईसी और एसबीआई जैसी सरकारी कंपनियों के बारे में कहा कि जिन्हें कांग्रेस ने बर्बाद होने के कगार पर छोड़ दिया था, वे आज रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं और युवाओं के लिए रोजगार पैदा कर रही हैं।

मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक पुराने किस्से का जिक्र करते हुए कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि कैसे उस दौर में पॉलिसी न होने के कारण खच्चरों की जगह जीप के लिए पैसे दिए जाते थे, जबकि सड़कें ही नहीं थीं। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने इस ‘अटकाने-लटकाने’ वाले कल्चर को खत्म कर ‘नीति आयोग’ और ‘प्रगति’ प्लेटफॉर्म बनाया। उन्होंने बताया कि ‘प्रगति’ के माध्यम से 85 लाख करोड़ रुपये के अटके हुए प्रोजेक्ट्स को गति दी गई है, जिसमें बोगीबील ब्रिज और जम्मू-कश्मीर की रेल लाइन शामिल है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नेहरू और इंदिरा गांधी के बयानों को कोट करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा से देश की जनता को एक ‘समस्या’ मानती आई है। उन्होंने कहा कि नेहरू जी कहते थे कि उनके सामने 35 करोड़ समस्याएं हैं। लेकिन मेरी सोच अलग है। अगर देश की आबादी 140 करोड़ है, तो मेरे पास 140 करोड़ समाधान हैं। उन्होंने विपक्ष पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, आदिवासी समाज, नॉर्थ ईस्ट के सांसदों और सिख समुदाय के अपमान का भी आरोप लगाया।

विपक्ष पर पलटवार करते हुए प्रधानमंत्री ने कुछ नेताओं पर तंज भी कसा। उन्होंने टीएमसी, डीएमके, लेफ्ट और आम आदमी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि ये पार्टियां दशकों तक सत्ता में रहीं, लेकिन इनका एक ही लक्ष्य रहा अपनी जेब भरना। दिल्ली शराब घोटाले और ‘शीशमहल’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग ‘काला दिन’ कहते नहीं थकते, लेकिन “ब्लैक” से उनका पुराना रिश्ता रहा है। इस पर भी सत्ता पक्ष में हल्की हंसी देखने को मिली। उन्होंने कहा कि ये लोग दूसरों को उपदेश देने से पहले अपने गिरेबान में झांकें।

भारत की वैश्विक स्थिति पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज दुनिया एक नए ग्लोबल ऑर्डर की तरफ बढ़ रही है और भारत आत्मविश्वास के साथ उसमें अपनी भूमिका निभा रहा है। भारत आज ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर उभरा है और बड़े-बड़े देशों के साथ फ्यूचर-रेडी ट्रेड डील्स कर रहा है। प्रधानमंत्री ने भारत के हाई ग्रोथ और लो इन्फ्लेशन का उदाहरण देते हुए कहा कि हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत का युवा टैलेंट और इनोवेशन आज दुनिया की चुनौतियों का समाधान दे रहा है।

जो किताब जनरल नरवणे की अभी छपी नहीं, उसे लेकर एक कुत्ता अमेरिका से भोंका और दिल्ली की गलियों के कुत्ते भी भौंकने लगे ब्लिट्स के एडिटर शोएब चौधरी की किताब पढ़ कर पूछो राहुल के बीवी बच्चे कहां हैं?

सुभाष चन्द्र

एक ढकोसला खड़ा किया राहुल गांधी ने अमेरिका में बैठे The Caravan में लिखने वाले सुशांत सिन्हा के लेख में लिखी जनरल नरवणे के कथित शब्दों को लेकर, जो लिए गए उस किताब से जो अभी छपी नहीं। राहुल गांधी को पता था कि सुशांत सिंह पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा और क्यूंकि वो लोकसभा में आरोप लगा रहा है, इसलिए उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं होगी 

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विपक्ष की, खासकर कांग्रेस की संसद में ऐसी अराजकता लोकसभा के इतिहास में कभी नहीं हुई जो प्रधानमंत्री के बोलने से पहले जानवरों की तरह कांग्रेस की महिला ब्रिगेड ने मोदी जी की कुर्सी के चारों तरफ तांडव किया सब कुछ राहुल गांधी ने झूठ बोला कथित किताब को लेकर लेकिन फिर भी शोर मचाया “मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा” सारा हुड़दंग कांग्रेस के लोगों ने मचाया लेकिन फिर भी आरोप कि बोलने नहीं दिया जाता नरवणे साहब ने सुशांत सिन्हा को दिए एक इंटरव्यू में राहुल के झूठ को बेनकाब कर दिया लेकिन हंगामा नहीं रोक रही कांग्रेस

लेखक 
चर्चित YouTuber 
कांग्रेस ने लोकसभा में परले दर्जे की गुंडागर्दी दिखाई और सड़कछाप बर्ताव किया जिस पर स्पीकर ने मात्र 6-8 सदस्यों को निलंबित किया है जबकि राहुल गांधी समेत कांग्रेस के सभी सांसदों को सदन से निलंबित कर देना चाहिए जनता ने उन्हें गुंडागर्दी के लिए नहीं भेजा 

सेना प्रमुख को प्रधानमंत्री का युद्ध जैसी स्थिति में कहना कि जो उचित लगे वह करो, इससे बड़ी छूट हो नहीं सकती जबकि राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि नरवणे को अकेला छोड़ दिया गया

अपनी कांग्रेस का समय भूल गया राहुल गांधी जब सेना के हाथ बांध दिए थे मनमोहन सिंह और सुपर PM सोनिया गांधी ने 26/11 हमले के बाद और सेना को पाकिस्तान पर बदला लेने से रोक दिया था

अमेरिका के साथ ट्रेड डील नहीं हुई तब भी मोदी को कह रहे थे कि मोदी ट्रंप से डरा हुआ है और अब जब डील हो गई तब भी पागलों की तरह बोल रहे हैं कि मोदी ट्रंप से डर गया एक कहावत है कि बहु आटा गूंथते हुए हिलती नहीं तो सास को शिकायत होती है कि हिलती क्यों नहीं और न हिले तो भी शिकायत कि हिलती क्यों नहीं? यानी मोदी स्याह करे या सफ़ेद, इन लोगों ने सुबह उठकर मोदी को गरियाना ही है

कांग्रेस के लोग इंसान कहने लायक नहीं रह गए हैं ये लोग तो भौंकने वाले खुजली वाले कुत्ते हो गए हैं जिनमें शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं है बस हर कीमत पर भाजपा, मोदी और देश का विरोध करना है एक तो राहुल गांधी अपने आप में “पनौती” है दूसरा उसके साथ 5 “पनौती” और चलती हैं, “पवन खेड़ा, जयराम रमेश, सुप्रिया श्रीनेत, रणदीप सुरजेवाला और के सी वेणुगोपाल

ये 6 कांग्रेस की अर्थी उठा देंगे  

राहुल ने नरवणे साहब की कथित किताब को लेकर कर झूठ फैलाया जबकि किताब छपी नहीं लेकिन बांग्लादेशी सलाह उद्दीन शोएब चौधरी की किताब तो छप चुकी है उसे भाजपा के सांसद एक एक करके लोकसभा में पढ़ें और पूछें कि राहुल की पत्नी जोनिता विन्सी और उससे 2 बच्चे कहां हैं? संसद में किताब पढने पर तो कोई कार्रवाई नहीं हो सकती सोनिया गांधी पर भी उसने आरोप लगाए हैं, वो भी पढ़े जाएं

भाजपा के निशिकांत दुबे ने कल MO मथाई की किताबों Reminiscences of the Nehru Age and My Days with Nehru से कुछ पढ़ा था जो कांग्रेस के लोग बर्दाश्त नहीं कर सके

मथाई ने जो इंदिरा के साथ काम संबंधों के बारे  लिखा, वो बुलंद आवाज़ में पढ़ा जाए इसके अलावा रूस की किताबों को भी पढ़ा जाए जो कहती हैं कैसे इंदिरा गांधी की कैबिनेट के लोग सोवियत संघ के Payrolls पर थे

तीन तलाक की पैरवी करने वाले मुनव्वर राना की सबसे छोटी बेटी हिबा को शौहर से मिले धक्के, गाली और कुटाई: हिस्से में तीन तलाक आई

                    हिबा राना (बाएँ), मुनव्वर राना (दाएँ), (साभार : Aajtak & naidunia & Grok)
‘किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई, मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई’
… ये शायर मुनव्वर राना का शेर है। जब मोदी सरकार तीन तलाक के खिलाफ कानून लेकर आई थी, तब मुनव्वर राना और उनका खानदान इस कानून के विरोध में संसद से सड़क तक उतरा था। अब दुर्भाग्य देखिए कि उनकी ही सबसे छोटी बेटी के हिस्से में तीन तलाक आया है।

दरअसल, लखनऊ में मुनव्वर राना की बेटी हिबा राना ने अपने शौहर सैय्यद मोहम्मद साकिब और ससुराल वालों पर तीन तलाक, दहेज के लिए प्रताड़ना और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए हैं। लखनऊ के सआदतगंज थाने में दर्ज FIR के मुताबिक, हिबा को उनके शौहर ने 20 लाख रुपए और एक फ्लैट की माँग पूरी न होने पर बेरहमी से पीटा और ‘तीन तलाक’ बोलकर घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।

यह वही मुनव्वर राना का परिवार है, जिसने केंद्र सरकार के तीन तलाक विरोधी कानून का सड़कों पर उतरकर विरोध किया था। आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि जिस कानून को उन्होंने ‘इस्लाम में हस्तक्षेप’ बताया था, आज उसी कानून की धाराओं के तहत हिबा राना न्याय की गुहार लगा रही हैं।

20 लाख की भूख और सुसराल का असली चेहरा

हिबा राना ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया कि उनकी निकाह 19 दिसंबर 2013 को हुई थी। निकाह के समय उनके परिवार ने अपनी हैसियत से बढ़कर करीब 10 लाख रुपए नकद और सोने-हीरे के आभूषण दिए थे। लेकिन ससुराल वालों की लालच की भूख कभी शांत नहीं हुई। निकाह के कुछ समय बाद ही शौहर और ससुर ने 20 लाख रुपए नकद और एक अलग फ्लैट की माँग शुरू कर दी।

हिबा राना का आरोप है कि इस माँग को पूरा न करने पर उन्हें लगातार शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया। कई बार उनके साथ जानवरों की तरह मारपीट की गई और जान से मारने की धमकियाँ दी गईं। हिबा के अनुसार, 9 अप्रैल 2025 को विवाद इतना बढ़ गया कि शौहर साकिब ने उनके साथ गाली-गलौज की और मारपीट शुरू कर दी।

जब हिबा की बहन उन्हें बचाने पहुँची, तो आरोपित और भी भड़क गया। उसने चिल्लाते हुए तीन बार ‘तलाक’ बोला और हिबा को धक्के मारकर घर से बाहर निकाल दिया। इतना ही नहीं, हिबा के दोनों मासूम बच्चों को कमरे में बंद कर दिया गया।

हिबा किसी तरह अपनी जान बचाकर मायके पहुँची और अब पुलिस के पास अपनी सुरक्षा और न्याय के लिए खड़ी हैं। सआदतगंज पुलिस ने शौहर और ससुर के खिलाफ दहेज प्रतिषेध अधिनियम और मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

FIR: आरोपों और धाराओं का जाल

लखनऊ पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर (संख्या 31/2026) में हिबा राना ने अपने शौहर सैय्यद मोहम्मद साकिब और ससुर सैय्यद हसीब अहमद को मुख्य आरोपित बनाया है। पुलिस ने इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 (क्रूरता), 115(2) (चोट पहुँचाना), 351(2) (आपराधिक धमकी) और 352 के साथ-साथ मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम की धारा 3 और 4 लगाई है। यह वही धाराएँ हैं जिनके तहत ‘तीन तलाक’ देना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है, जिसमें तीन साल तक की जेल का प्रावधान है।

                                                                     सोर्स: यूपी पुलिस

मुनव्वर की बेटी हिबा ने अपनी शिकायत में विस्तार से बताया है कि कैसे उनके ससुर भी इस दहेज की माँग और धमकियों में शामिल थे। आरोपितों ने उन्हें मानसिक और शारीरिक यातनाएँ दीं। शिकायत में यह भी दर्ज है कि आरोपित शौहर और उसका परिवार लगातार हिबा को डरा-धमका रहा है। हिबा ने अपनी तहरीर में लिखा है कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर भय है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सबूत जुटाने शुरू कर दिए हैं और जल्द ही आरोपितों की गिरफ्तारी हो सकती है। यह FIR एक दस्तावेज है जो बताता है कि जब रसूखदार परिवारों में भी बेटियाँ सुरक्षित नहीं होतीं, तब सख्त कानूनों की कितनी जरूरत होती है।

                                                                       सोर्स: यूपी पुलिस

जब जुबाँ पर था विरोध और हकीकत ने दी पटकनी

आजतक चैनल पर एंकर अंजना ओम कश्यप के साथ बहस के दौरान मुनव्वर राना की बेटी ने इस कानून को लेकर जहर उगला था। उरूसा राना का तर्क था कि तलाक की प्रक्रिया में वक्त इसलिए दिया जाता है ताकि सुलह हो सके, इसलिए कानूनी दखल की जरूरत नहीं है। आज विडंबना देखिए, जिस ‘तीन तलाक’ को ये बहनें अस्तित्वहीन बता रही थीं, उसी के जरिए हिबा को घर से निकाला गया।

जब ‘मजहबी रवायत’ के पैरोकारों पर ही गिरी गाज

यह मामला केवल एक महिला के साथ हुई हिंसा का नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के दोहरे मापदंडों की पोल खोलता है जो प्रगतिशीलता का नकाब ओढ़कर कट्टरपंथी कुरीतियों का समर्थन करते हैं। मुनव्वर राना ने साल 2016-17 में तीन तलाक कानून का खुलकर विरोध किया था।

मुनव्वर राना ने सार्वजनिक मंचों से उलेमाओं का साथ देते हुए कहा था कि सरकार को मजहबी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया था कि ‘जब मुसलमान किसी दूसरे मुल्क का चाँद देखकर ईद नहीं मनाते, तो पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे कानून से यहाँ के मामले कैसे हल हो सकते हैं?’

मुनव्वर राना और उनकी बेटियों- ‘सुमैया और हिबा’ ने इस कानून को मुस्लिम पुरुषों को फँसाने की साजिश करार दिया था। उनका कहना था कि अगर शौहर जेल चला जाएगा, तो औरत और बच्चों का खर्च कौन उठाएगा? लेकिन आज जब हिबा खुद उसी कुप्रथा का शिकार हुईं, तो उन्हें उलेमाओं के फतवों में नहीं, बल्कि भारतीय संविधान और मोदी सरकार के बनाए उसी कानून में सुरक्षा दिखी। यह विडंबना ही है कि जिन रिवाजों को ये लोग अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं, वही रवायतें जब इनके घर की बेटियों को बेघर करती हैं, तब इन्हें ‘सेकुलर’ और ‘आधुनिक’ कानून की याद आती है।

इस्लामी रवायत बनाम आधुनिक बेड़ियाँ: सोशल मीडिया पर उठे सवाल

यह अक्सर देखा गया है कि एक विशेष विचारधारा के लोग इस्लामी रवायतों के पक्ष में बड़े-बड़े तर्क देते हैं। वे इसे अपनी धार्मिक स्वायत्तता बताते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई रवायत किसी इंसान की गरिमा से बड़ी हो सकती है? मुनव्वर राना जैसे लोग, जो अपनी शायरी में ‘माँ’ और ‘ममताबोध’ की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे तीन तलाक जैसी महिला विरोधी प्रथा पर उलेमाओं के साथ खड़े नजर आए थे। इन लोगों के लिए मजहबी पहचान अक्सर मानवाधिकारों से ऊपर हो जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि ये रवायतें अक्सर महिलाओं के लिए बेड़ियाँ बन जाती हैं।

हिबा राना का केस यह साबित करता है कि धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद का समर्थन करना तब तक अच्छा लगता है जब तक आग पड़ोसी के घर में लगी हो। जब अपनी ही बेटी को सड़क पर खड़ा कर दिया गया, तब समझ आया कि ‘तलाक-ए-बिद्दत’ (एक बार में तीन तलाक) कितनी खतरनाक बीमारी है। इन लोगों ने जिस कानून को ‘बेवजह’ बताया था, आज वही कानून हिबा के लिए आखिरी उम्मीद की किरण है।

सोशल मीडिया पर नेटिजन्स अब जायज सवाल पूछ रहे हैं कि जब आप इस कानून के खिलाफ थे, तो अब इसका सहारा क्यों ले रहे हैं? एक यूजर ने लिखा कि हिबा और मुनव्वर राना तो तीन तलाक के कट्टर समर्थक थे। जिस कानून का विरोध कर रहे थे, अब उसी की शरण में जाना पड़ रहा है।

एक यूजर ने तीन तलाक कानून के विरोध करने वालों के लिए लिखा, “कुकर्मों का फल”।

एक अन्य यूजर ने लिखा, “दर्दनाक सच सामने है। ट्रिपल तलाक सिर्फ बहस का मुद्दा नहीं, महिलाओं की ज़िंदगी का सवाल है। आज फिर साबित हुआ- कड़ा क़ानून क्यों ज़रूरी था।”

सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत प्रशांत उमराव ने भी लिखा, “जब ट्रिपल तलाक का कानून बन रहा था तब इसका विरोध करने वालों में प्रमुख शायर मुनव्वर राणा और उनकी बेटियाँ थी। अब दिवंगत शायर मुनव्वर राना की बेटी हिबा राना को उनके शौहर ने तीन तलाक दे दिया है। हिबा राना ने अपने शौहर मोहम्मद साकिब और ससुर हसीब अहमद के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया है।”

दोहरेपन की हार और इंसाफ की पुकार

अंत में, यह मामला मुनव्वर राना के उस पूरे नैरेटिव को ध्वस्त कर देता है जिसमें वे खुद को लोकतंत्र और आजादी का सिपाही बताते थे। साक्षर समाज और प्रभावशाली परिवारों में भी अगर ‘तीन तलाक’ जैसा जहर मौजूद है, तो कल्पना कीजिए कि आम गरीब मुस्लिम महिलाओं का क्या हाल होता होगा। यह कानून किसी मजहब के खिलाफ नहीं, बल्कि उन जालिम मर्दों के खिलाफ है जो अपनी बीवी को एक इस्तेमाल की हुई वस्तु समझकर तीन शब्दों में बाहर फेंक देते हैं।

हिबा राना के साथ जो हुआ वह निंदनीय है, लेकिन उनके परिवार का जो वैचारिक पतन दिखा, वह शर्मनाक है। जिस कानून को मुनव्वर राना और उनकी बेटियों ने कोसते हुए संसद से सड़क तक विरोध किया, आज उसी कानून के नीचे शरण लेना उनकी सबसे बड़ी नैतिक हार है। यह उन तमाम लोगों के लिए सबक है जो तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के लिए महिला अधिकारों की बलि चढ़ा देते हैं। आज मोदी सरकार का वही ‘कड़ा’ कानून हिबा राना को उनके बच्चों की कस्टडी और गुजारा भत्ता दिलाने का आधार बनेगा।

AI वीडियो-अप्रकाशित किताब के प्रोपेगेंडा को निशिकांत दुबे ने किताबों के सत्य से धोया, नेहरू-इंदिरा-सोनिया सबकी एक साथ पोल खुलने से बौखलाई कांग्रेस

बिना छपी किताब से सरकार को बदनाम करने की साजिश करने वाले राहुल गाँधी को निशिकांत दुबे की छपी हुई किताबों से क्यों दिक्कत? (साभार: SansadTV)
लोकसभा में बहस होनी थी महामहिम राष्ट्रपति के भाषण और बजट पर, लेकिन LoP राहुल गाँधी ने उन मुद्दों पर न बोलकर लोकतंत्र को तार-तार कर दिया। राहुल जब भी विदेश जाकर अपने आकाओं से मिलकर आते कोई न कोई बिनसिर पैर के विवाद खड़ा कर माहौल ख़राब करते हैं। फरवरी 4 को जिस तरह प्रधानमंत्री की कुर्सी को महिला सांसदों द्वारा घेरा गया लोकतंत्र के लिए कलंक है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में होते और कोई अप्रिय घटना हो गयी होती कौन जिम्मेदार होता?     

पिछले चार दिनों से संसद में राहुल गाँधी और उनके कांग्रेसी नेता बवाल मचाए हुए हैं। मुद्दा है चीन का। राहुल गाँधी संसद के भीतर एक ऐसी किताब के अंशों का हवाला दे रहे हैं, जो अभी तक छपी ही नहीं है। उसी किताब के आधार पर सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि चीन के मुद्दे पर सच्चाई छुपाई जा रही है।

लेकिन बुधवार (04 फरवरी 2027) को तस्वीर अचानक बदल गई। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने राहुल गाँधी की पूरी हवाबाजी महज एक मिनट में धराशायी कर दी। उन्होंने सदन में पहले से छपी हुई किताब के कुछ अंश पढ़कर सुनाए। इसके बाद न सिर्फ राहुल गाँधी, बल्कि कांग्रेस के बाकी नेता भी सन्न रह गए।

बिना छपी किताब और AI वीडियो के सहारे सरकार को बदनाम करने की कोशिश

मामले की शुरुआत 02 फरवरी 2026 को हुई, जब राहुल गाँधी अचानक संसद में कुछ पन्ने निकालकर पढ़ने लगे। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा मुद्दा बताया। राहुल गाँधी ने दावा किया कि ये अंश पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब से हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि इस किताब में लिखा है कि चीन के साथ युद्ध जैसे हालात में सरकार ने कोई आदेश नहीं दिया। राहुल गाँधी का दावा है कि नरवणे उस वक्त अकेले पड़ गए थे और सरकार ने जानबूझकर पीछे हटने का फैसला लिया।
राहुल गाँधी के इस दावे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत सवाल उठाए। उन्होंने साफ पूछा कि ये कहानी आखिर आ कहाँ से रही है? राजनाथ सिंह ने कहा कि जिस किताब के अंश संसद में पढ़े जा रहे हैं, वह किताब अब तक छपी ही नहीं है। जब किताब छपी ही नहीं, तो उसके अंशों के आधार पर सरकार पर सवाल कैसे खड़े किए जा सकते हैं?
इसके बाद संसद में जोरदार हंगामा शुरू हो गया, जो अगले दिन के सत्र तक चलता रहा। विपक्ष के नेता टेबल पर चढ़े, स्पीकर की ओर कागज उछाले गए और नारेबाजी से सदन का कामकाज ठप हो गया।
लेकिन सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश संसद तक ही सीमित नहीं रही। कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल से एक AI वीडियो जारी किया, जिसमें उसी बिना छपी किताब की कहानी को विजुअल के रूप में दिखाया गया। इस वीडियो के सहारे से सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश की गई।

कांग्रेस की साजिश, निशिकांत दुबे ने की धराशायी

कांग्रेस की सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साजिश का जवाब देने संसद में बीजेपी नेता निशिकांत दुबे मैदान में उतरे। 04 फरवरी 2027 को उन्होंने राहुल गाँधी को सीधे-सीधे जवाब देते हुए जवाहर लाल नेहरू, सोनिया गँधी और इंदिरा गाँधी समेत गाँधी परिवार के अतीत को सदन के सामने खोलकर रख दिया, वह भी सारी छपी हुई किताबों से।

निशिकांत दुबे हाथ में छपी हुई किताबें लेकर आए और कहा कि अगर बिना छपी किताब के पन्ने लहराकर तीन दिन तक संसद ठप की जा सकती है, तो फिर उन किताबों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो छप चुकी है और जिनमें कांग्रेस और नेहरू के कारनामें दर्ज हैं। उन्होंने ‘नेहरू: ए बायोग्राफी’, ‘एडविना एंड नेहरू’ और दूसरी पुस्तकों के अंश पढ़ते हुए नेहरू पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और निजी जीवन की अय्याशियों की पोल खोली।

निशिकांत दुबे ने कहा कि देश को गुमराह करने की कांग्रेस की आदत पुरानी है और आज वही पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी झूठे नैरेटिव के सहारे प्रधानमंत्री और सरकार को बदनाम करने में लगी है। निशिकांत दुबे का हमाल यही नहीं रुका। उन्होंने राहुल गाँधी से सीधा सवाल किया क्या कांग्रेस इन किताबों को भी फर्जी बताएगी या फिर सच सामने आने पर चुप्पी साध लेगी?

इस पर कांग्रेस बौखला गई। प्रियंका गाँधी ने दुबे के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संसद में इस तरह कि किताबें पढ़ना नियमों के खिलाफ है और बीजेपी जानबूझकर नेहरू का नाम उछालकर ध्यान भटकाना चाहती है। कांग्रेस नेताओं ने इसे निजी हमला बताया और हंगामा शुरू कर दिया।

कांग्रेस का असली चेहरा

इससे पता चलता है कि कांग्रेस अब हर उस हद तक जाने को तैयार दिख रही है, जहाँ से सरकार और प्रधानमंत्री को नीचा दिखाया जा सके। पहले संसद में बिना छपी किताब के पन्ने लहराए गए, फिर उसी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिए कांग्रेस ने AI वीडिया बनाकर चलाया। सवाल साफ है, जिस किताब का अस्तित्व ही सार्वजनिक तौर पर नहीं है, उसके सहारे कांग्रेस ने सरकार और प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की। यह सोची-समझी साजिश नजर आती है।

लेकिन जैसे ही बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में छपी हुई किताबों का जिक्र कर दिया, कांग्रेस घबरा गई। जिन किताबों को कोई नकार नहीं सकता, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है, जिनके लेखक और पन्ने सबके सामने हैं। उन्हीं से कांग्रेस को सबसे ज्यादा डर लगने लगा। साफ है, जो पार्टी अप्रकाशित किताब और AI वीडियो के सहारे झूठ गढ़ सकती है, वही पार्टी सच सामने आते ही बौखला जाती है। यही कांग्रेस का असली चेहरा है।

सुप्रीम कोर्ट का राहुल गांधी को “दामाद” बनाना वजह है उसकी उद्दंत्ता की; कानून से ऊपर रख दिया कोर्ट ने राहुल गांधी को जो अब पूरा देश भुगत रहा है; कांग्रेसी जस्टिस बीआर गवई जिम्मेदार हैं राहुल की अराजकता के लिए

सुभाष चन्द्र

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट और उसके कुछ जज देश में अराजकता फ़ैलाने में राहुल गांधी की मदद कर रहे हैं जैसे वे भी नरेंद्र मोदी के साथ कोई खेल खेल रहे है। 

सबसे पहले तो खुद को कांग्रेस परिवार का कहने वाले जस्टिस बीआर गवई ने 4 अगस्त, 2023 को ट्रायल कोर्ट एवं हाई कोर्ट के फैसलों को दरकिनार करते हुए राहुल गांधी की मोदी सरनेम केस में सजा पर रोक लगा कर उसके अपराध को माफ़ कर दिया वह केस अभी तक चल रहा है जिसे गवई ऐसा उलझा गए कि फैसला होना ही मुश्किल हो गया सजा को 2 साल गलत बता गए जो सभी ट्रायल कोर्ट्स को इशारा था कि कोई भी उसे मानहानि के मामले में 2 साल की  सजा न दे 

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उसके बाद अगस्त 4, 2025  को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मसीह की पीठ के सामने राहुल गांधी का सेना को अपमानित करने वाले बयान का मामला आया जिसमें उसने दावा किया था कि सेना के जवानों की चीनी सेना ने पिटाई की और भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर भूमि चीन ने कब्जे में ले ली इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने फटकार लगाते हुए कहा था कि “अगर आप एक सच्चे भारतीय हो तो ऐसी बात न कहते” राहुल गांधी पर लखनऊ ट्रायल कोर्ट में चल रहे सेना की मानहानि के केस में जारी किए गए Summon और सुनवाई  स्टे करते हुए बेंच ने राहुल गांधी की याचिका पर नोटिस जारी कर दिया

प्रियंका वाड्रा ने सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के जज यह तय नहीं कर सकते कि कौन सच्चा भारतीय हैउसका भाई सेना का सम्मान करता है और कभी उसके खिलाफ कुछ नहीं कहेंगे

उससे भी बड़ा सेना का अपमान अब राहुल गांधी ने कर दिया

लेकिन प्रियंका वाड्रा के जजों पर उंगली उठाने का परिणाम देखिए गवई तब चीफ जस्टिस हो गए और उन्होंने दीपांकर दत्ता और और मसीह को ही बेंच से हटा दिया यानी Bench Fixing कर दी और Justices MM Sundresh and Satish Chandra Sharma की बेंच बना दी

उनकी बेंच के पास केस पहले स्थगित हुआ 20 नवंबर के लिए और फिर सुनवाई हुई 4 दिसंबर 2025 को जिस दिन दोनों महान जजों की बेंच ने केस को 22 अप्रैल, 2026 यानी 5 महीने बाद के लिए स्थगित कर दिया और स्टे को कायम रखा सेना का अपमान तो लगता है सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए जैसे कोई खेल हो गया मैं उसे सरासर जजों की मक्कारी कहूंगा जो ऐसे संगीन मामले की सुनवाई 5 महीने के टाल दी 

वीर सावरकर के अपमान के मामले में भी उन्हीं दोनों जजों की (दीपांकर दत्ता और मसीह) बेंच ने सुनवाई में राहुल गांधी को फटकार लगाते हुए कहा था कि आपको स्वतंत्रता सेनानियों पर सोच समझ कर बोलना चाहिए Yours Faithfully, Yours Obediently जैसे शब्द यह साबित नहीं करते कि लिखने वाला सामने वाले का गुलाम है 

सावरकर मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 25 जुलाई 2025 को ट्रायल कोर्ट के स्टे के 4 अप्रैल 2025 के आदेश को आगे बढ़ा दिया लेकिन उसके बाद केस का क्या हुआ, उसकी कोई रिपोर्ट नहीं है हो सकता है वह बेंच भी बदल दी गई हो और नई बेंच बनी ही न हो क्योंकि केस 7 महीने से बंद है

सुप्रीम कोर्ट राहुल गांधी के हर मामले में ट्रायल कोर्ट के समन पर रोक लगा कर ट्रायल ही नहीं होने दे रहा रोक हटने के बाद ट्रायल कोर्ट में केस ख़त्म होने में भी वर्षों लग जाएंगे

28 जनवरी को लखनऊ MP/MLA कोर्ट के जज ने राहुल की ब्रिटिश नागरिकता मामले में 8 दिन सुनवाई के बाद मामले को बंद करते हुए कहा कि नागरिकता तय करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है जबकि शिकायतकर्ता ने तो केवल राहुल पर FIR दर्ज करने के आदेश देने के लिए कहा था नागरिकता तय करने के लिए नहीं

‘देश छोड़कर नहीं जाएँगे अनिल अंबानी’: सुप्रीम कोर्ट को दिलाया भरोसा, ED को बैंक फ्रॉड मामले में SIT बनाने का निर्देश

      अनिल अंबानी बैंक फ्रॉड केस सुप्रीम कोर्ट ने ED को SIT गठित करने को कहा (साभार : Aajtak & jansatta)
रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) की बैंकों के साथ धोखाधड़ी मामले में बुधवार (4 फरवरी 2026) को सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस हुई। सुनवाई के दौरान जब अनिल अंबानी के विदेश भागने की आशंका जताई गई, तो उनके वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत को साफ शब्दों में भरोसा दिलाया। रोहतगी ने कहा, “वह भागेंगे क्यों? वह यहीं हैं। वह इस अदालत की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे।”

जानकारी के अनुसार, कोर्ट ने इस बयान को आधिकारिक तौर पर दर्ज कर लिया है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने ED को आदेश दिया है कि वह इस भारी-भरकम बैंक फ्रॉड की जाँच के लिए एक ‘विशेष जाँच दल’ (SIT) का गठन करे।

अदालत ने केवल अंबानी ही नहीं, बल्कि बैंक अफसरों पर भी कड़ा रुख अपनाया है। बेंच ने कहा कि CBI इस बात की जाँच करे कि क्या अफसरों की मिलीभगत से फंड रिलीज किए गए थे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि फॉरेंसिक ऑडिट में पैसों की हेराफेरी (Siphoning) की बात सामने आई है।

वहीं, प्रशांत भूषण ने इसे देश का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट फ्रॉड करार दिया। कोर्ट ने ED और CBI को निर्देश दिया है कि वे अपनी जाँच को तार्किक अंजाम तक ले जाएँ। अब दोनों एजेंसियों को हर महीने जाँच की प्रोग्रेस रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी।

पाकिस्तान को सबक सिखाने का वक्त, IND-PAK मैच छोड़ने पर बांग्लादेश से कड़ी सजा जरूरी: PCB का निकलना चाहिए दिवाला

                       पाकिस्तान को सबक सिखाने का वक्त, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
T20 विश्वकप 2026 में भारत-पाकिस्तान मैच क्रिकेट का सबसे बड़ा त्योहार होता है। कोलंबो में 15 फरवरी को होने वाला यह मुकाबला अरबों दर्शकों की नजरों में होता, ब्रॉडकास्टर्स के लिए सोने की खान। लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने आधिकारिक घोषणा कर दी कि वह इस मैच को नहीं खेलेगा। तटस्थ स्थल पर खेलने का बाध्यकारी अनुबंध होने के बावजूद पाकिस्तान सरकार और PCB ने राजनीतिक ड्रामा शुरू कर दिया।

पाकिस्तान द्वारा यह सिर्फ एक मैच का बहिष्कार नहीं, बल्कि ICC की पूरी व्यवस्था पर हमला है। बांग्लादेश के साथ जो हुआ- सुरक्षा कारणों का हवाला देकर भारत में मैच न खेलने पर उन्हें पूरे टूर्नामेंट से बाहर कर स्कॉटलैंड को जगह दे दी गई, ठीक वही या उससे कड़ी सजा पाकिस्तान को मिलनी चाहिए। अगर पाकिस्तान आखिरी समय पर यह नाटक करता है, तो उसे न सिर्फ विश्वकप से बाहर करना चाहिए, बल्कि आर्थिक रूप से ऐसा कुचलना चाहिए कि PCB कटोरा लेकर ICC के दरवाजे पर भीख माँगने लायक न रहे।

पहले भी मैच खेलने से मना कर चुकी हैं टीमें, लेकिन इस बार…

क्रिकेट इतिहास में कई बार टीमें सुरक्षा या अन्य गंभीर कारणों से मैच छोड़ चुकी हैं। सामान्य नियम यही रहा कि विरोधी टीम को दो पॉइंट्स दे दिए जाते हैं। जैसे- 1996 विश्वकप में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज ने श्रीलंका में सुरक्षा कारणों से इनकार किया, श्रीलंका को पॉइंट्स मिले। साल 2003 में न्यूजीलैंड ने केन्या में, इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे में राजनीतिक-सुरक्षा कारणों से मना किया। लेकिन यहाँ सिर्फ पॉइंट्स कटे। कुल 6-7 ऐसे बड़े मौके आए, जहाँ वजहें पहले से स्पष्ट थीं और टीमें पहले बता चुकी थीं।

लेकिन पाकिस्तान का मामला अलग है। यहाँ कोई ठोस सुरक्षा खतरा नहीं बल्कि सिर्फ राजनीतिक अडंगेबाजी है। ओलंपिक खेलों में ऐसी अडंगेबाजी में सीधे-सीधे देश को ही ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है। लेकिन आईसीसी ने अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।

दरअसल, ओलंपिक कमेटी अक्सर ऐसे देशों को ओलंपिक से बाहर कर देती है, जिनके खेल संघों में सरकारी दखल हो और वो निश्चित प्रक्रिया या मापदंडों को पूरा नहीं कर पाते हो। आपको याद न हो तो बता दें कि भारत की हॉकी कमेटी पहले लालफीताशाही के दौर पर ब्लैकलिस्ट हो चुकी है। ऐसे में इस बार पाकिस्तान को लेकर भी आईसीसी को यही कदम उठाना होगा। बता दें कि पीसीबी का चीफ मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान का गृहमंत्री है, तो ऐसे में यहाँ सीधे-सीधे राजनीतिक दखल ही है। आईसीसी इसे एक मुद्दा बनाकर भी कदम उठा सकती है।

चूँकि भारत-पाक मैच ICC का सबसे बड़ा रेवेन्यू जनरेटर है। इसमें विज्ञापन दरें 25-40 लाख रुपये प्रति 10 सेकंड की होती है। सिर्फ इसी मैच से 200 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। ऐसे में आईसीसी को न सिर्फ कड़े फैसले लेने होंगे, बल्कि नुकसान की भरपाई भी करानी चाहिए। इसकी वजह ये है कि पहले के मामलों में टीमों के मना करने की वजहें वैध होती थी, इसलिए ढील दी जाती थी। लेकिन यहाँ सिर्फ ड्रामा है, जो क्रिकेट को राजनीति का शिकार बना रहा है।

बहरहाल, इसके लिए आईसीसी अब एक बैठक भी करने वाला है। इसी में तय किया जाएगा कि पाकिस्तान को टूर्नामेंट में खेलने की इजाजत मिलेगी या नहीं। अगर मिलती है तो भी कड़ी सजा होगी। लेकिन सवाल यह है कि पाकिस्तान को टी-20 विश्वकप में खेलने की इजाजत दी ही क्यों जाए?

बांग्लादेश को तो पूरी तरह बाहर कर दिया गया क्योंकि उसने आखिरी समय में भारत से मैच शिफ्ट करने की माँग की और ICC ने मना किया। लेकिन पाकिस्तान तटस्थ स्थल कोलंबो में भी नहीं खेलना चाहता। यह दोहरा मापदंड क्यों? ICC अगर ढील देता है, तो कल कोई और टीम भी यही करेगी। जैसे को तैसे का जवाब ही सही रास्ता है।

आईसीसी के पास पाकिस्तान को सबक सिखाने के कई हथियार

पहला: ICC के पास पाकिस्तान को सबक सिखाने के कई हथियार हैं। पहला और सबसे सख्त है- पाकिस्तान को पूरे टूर्नामेंट से प्रतिबंधित कर देगा। पाकिस्तान को बाहर कर युगांडा को जगह दी जा सकती है, जैसा बोर्ड बैठक के बाद तय होगा।

दूसरा: ICC का सालाना रेवेन्यू शेयर रोकना। चूँकि PCB पहले से आर्थिक संकट में है, यह राशि बंद होने से वे दिवालिया हो जाएँगे।

तीसरा: जियो-स्टार जैसे ब्रॉडकास्टर्स को हुए नुकसान की भरपाई PCB से कराना। जिसमें पाकिस्तान को लाखों डॉलर की रकम भरनी पड़ेगी और वो पूरी तरह से भिखारी बन कर हाथ में कटोरा थामने की नौबत में आ जाएगा।

चौथा: द्विपक्षीय सीरीज पर पूरी रोक, WTC अंकों में कटौती और ICC रैंकिंग गिराना।

पाँचवाँ और सबसे घातक: PSL में विदेशी खिलाड़ियों के लिए एनओसी पर ही रोक। यानी पाकिस्तान की लीग पर बाहरी खिलाड़ियों के लिए सीधे-सीधे बैन, हालाँकि सन्न्यास ले चुके या फ्री एजेंट्स पर ये रोक लागू नहीं होगी, लेकिन ऐसे कितने ही खिलाड़ी हैं? चूँकि ऐसे खिलाड़ियों पर आईसीसी से मान्यताप्राप्त सभी टूर्नामेंट्स से बाहर होने का डर रहेगा, तो वो भी पीएसएल से किनारा कर लेंगे।

PSL पाकिस्तान क्रिकेट की लाइफलाइन है। विदेशी स्टार न आएँ तो लीग फ्लॉप हो जाएगी। चूँकि स्पॉन्सर ही नहीं रहेंगे, तो PCB पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा और वो इसका आयोजन भी नहीं करना पाएगा।

ये सजाएँ सिर्फ दंड नहीं बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी भी होगी। क्योंकि भारत-पाकिस्तान मैच न होने से सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि क्रिकेट की गरिमा को भी ठेस पहुँची है। ऐसे में ICC अगर सख्त नहीं हुआ, तो उसकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी। बांग्लादेश के साथ जो हुआ, पाकिस्तान के साथ उससे कड़ा होना चाहिए। यानी उसे सीधे टूर्नामेंट से बाहर करना और दंडात्मक कार्रवाई करना। अगर तब भी पाकिस्तान अकड़ दिखाए, तो सीधे पीसीबी को आईसीसी से बैन कर देना।

बजट के दिन जितना शेयर बाजार गिरा, उससे दोगुना 2 दिन में बढ़ गया

सुभाष चन्द्र

बजट में STT लगाए जाने से शेयर बाजार अच्छा खासा गिरा और लोग निर्मला सीतारमण और मोदी से ये टैक्स लगाने पर बहुत नाराज हो रहे थे। मैंने कल ही लिखा था कि बाजार पर ऐसे नकारात्मक असर से चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि बाजार को कभी कभी बजट बाद में समझ आता है

लेखक 
चर्चित YouTuber 
बजट के अगले ही दिन बजट वाले दिन के 50% नुकसान की भरपाई हो गई और आज तो मामला ही कुछ और हो गया जो अमेरिका से ट्रेड डील ने बाजार को पंख लगा दिए सच बात तो यह है कि बाजार में उतार चढ़ाव होता रहता है जो चिंता का विषय नहीं होना चाहिए

तीन दिन में बाजार का यह हाल रहा -

1/2/2026 (बजट का दिन)

(-)1546.84 और (-) 495.20 

बजट से अगला दिन -

+943.52 और +262.95 

आज ट्रेड डील के बाद -

+2072.67 और +639.15 

Total Rise in 2 days - (+) 3016.19 और (+) 902.01 

यानी दो दिन में बजट वाले गिरे इंडेक्स से 2 दिन में दोगुना बढ़ गया

यह इंडेक्स आगे कम भी हो सकता है लेकिन यह रखना चाहिए कि बाजार अगर ऊपर जाता है तो नीचे भी आता है और नीचे आने के बाद ऊपर भी जाता है उतार और गिरावट कभी स्थाई नहीं होते