DU की advisory पर भड़क गए राहुल, DU को धमकाया:JNU छात्रों को बांग्लादेश की तर्ज पर उकसा रही जिहादन आरफा, छात्रों को हिंसा की तरफ ढकेल रहा इस्लामी-कांग्रेसी इकोसिस्टम

                      प्रदर्शन को लेकर यूनिवर्सिटी की एडवाइजरी से क्यों किलसे राहुल गाँधी और आरफा खानुम
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में पिछले 4 दिनों से लगातार हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं। इसी बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) ने अपने छात्रों के लिए एडवाइजरी जारी की है। दोनों यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि छात्र और शिक्षक जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल न हों और वहाँ जाने से भी बचें।

इससे पहले एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) ने भी सभी यूनिवर्सिटी को एडवाइजरी भेजी, जिसमें छात्रों से पढ़ाई पर ध्यान देने और अपनी ऊर्जा किसी और दिशा में न लगाने की सलाह दी गई।

छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जारी की गई इन एडवाइजरी के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और आरफा खानुम शेरवानी जैसे तथाकथित पत्रकारों को परेशानी हो गई। जहाँ राहुल गाँधी ने इन यूनिवर्सिटीज को छात्रों को रोकने के लिए धमकाया है, वहीं आरफा खानुम ने छात्रों को ‘वाइस चांसलर के इस्तीफे’ की माँग का नया एजेंडा सौंप दिया है।

यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी में क्या कहा गया?

JNU की एडवाइजरी में लिखा गया है कि यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षकों, छात्रों और अन्य सदस्यों को जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए और अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एडवाइजरी में साफ कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के सार्वजनिक प्रदर्शनों को लेकर दिए गए निर्देशों के मुताबिक, सभी को जंतर-मंतर पर या उसके आसपास होने वाले जमावड़ों में शामिल होने या वहाँ जाने से बचना चाहिए।

साथ ही सोशल मीडिया पर भी जिम्मेदारी से व्यवहार करने की सलाह दी गई है। एडवाइजरी में यह भी लिखा है कि अगर कोई इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ साथ यूनिवर्सिटी की आचार संहिता के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। इसके अलावा छात्रों को शैक्षणिक जिम्मेदारी और जिम्मेदार नागरिकता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है।

वहीं DU की एडवाइजरी में कहा गया कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा यूनिवर्सिटी के लिए बहुत मायने रखती है। एडवाइजरी में बताया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाली किसी भी गैरकानूनी सभा या प्रदर्शन में शामिल होना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन माना जाएगा और इससे कानूनी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसी गतिविधियाँ छात्रों की व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ साथ उनकी पढ़ाई और आगे के करियर पर भी गंभीर असर डाल सकती हैं।

इसी वजह से सभी छात्रों से जंतर मंतर से दूर रहने और कानून का पालन करते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की गई है। इसके अलावा DU ने छात्रों को यह भी सतर्क किया है कि सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर काफी फर्जी और भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है, इसलिए छात्रों को सावधान रहना चाहिए।

AIU ने भी अपनी एडवाइजरी में यही संदेश दोहराया है कि छात्रों को अपनी ऊर्जा पढ़ाई में लगानी चाहिए, न कि किसी और दिशा में भटकानी चाहिए।

राहुल गाँधी और आरफा खानुम को हुई दिक्कत

इन एडवाइजरी के सामने आते ही कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि छात्रों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने की हिम्मत कैसे हो सकती है। उन्होंने आगे चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग आज छात्रों को धमका रहे हैं, आने वाले समय में उन्हें भी इसका हिसाब देना होगा।

वहीं तथाकथित पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने भी यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी का विरोध किया। आरफा ने छात्रों को उकसाते हुए कहा कि अब अपनी ‘इस्तीफे की सूची में एक और नाम जोड़ेंगे, और वह नाम है दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति का।”

एक तरफ यूनिवर्सिटी छात्रों को आगाह कर रही हैं कि प्रदर्शन में हो रही हिंसा और कानूनी कार्रवाई में पड़ने से उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है, पर दूसरी ओर राहुल गाँधी और आरफा खानुम को यह रास नहीं आ रहा है। क्योंकि अगर छात्रों ने यूनिवर्सिटी का आदेश पालन किया तो ये उनके मंसूबे पूरे नहीं करेगा। यह उसी प्रकार का मॉडल है, जो दो साल पहले बांग्लादेश में ‘छात्र आंदोलन’ के समय पर देखा गया था, जहाँ बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया था।

बांग्लादेश में शिक्षकों से लिए गए थे जबरन इस्तीफे, हुई थी हिंसा

जब साल 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार एक ‘छात्र आंदोलन’ के नाम पर गिराई गई थी, तब भी यही मॉडल सामने आया था। आंदोलन के नाम पर बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, प्रिंसिपल और हेड टीचर को इस्तीफा माँगा गया था। और रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैंकड़ों शिक्षकों को जबरन पद से इस्तीफा दिलावाया भी गया था।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, UGC के चेयरमैन प्रोफेसर काजी शाहीदुल्लाह, नेशनल यूनिवर्सीट के वाइस चांसलर प्रोफेसर मशियुर रहमान, जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सादेका हलीम, बांग्लादेश एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एमदादुल हक चौधरी, कोमिला यूनिवर्सिी के कुलपति प्रोफेसर एएफएम अब्दुल मोईन ने इस्तीफा दे दिया था और यह सामने आया था कि इनमें से कई को जबरन हटने के लिए मजबूर किया गया था।

इसीलिए राहुल गाँधी और आरफा खानुम का यूनिवर्सिटी की एडवाइजरी का न सिर्फ विरोध करना, बल्कि धमकाया और छात्रों को VCs के इस्तीफे के लिए उकसाना एकदम उसी तरह से है, जैसे बांग्लादेश में हुआ था।

‘हीरो’ से ‘गद्दार’ बने सोनम वांगचुक: अनशन खत्म करते ही टूट पड़ा इस्लामी-वामपंथी गिरोह

       
                                         सोनम वांगचुक ने तोड़ा अनशन (X/Sonam Wangchuk)
सोनम वांगचुक ने गुरुवार (23 जुलाई 2026) को देर रात केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में अपना 26 दिन लंबा अनशन खत्म कर दिया। इस दौरान एपेक्स बॉडी ऑफ लेह-लद्दाख के कई प्रमुख सदस्य भी उनके साथ मौजूद रहे।

सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर लिखा, “इससे पहले अलग-अलग राजनीतिक दलों के 65 सांसदों ने मुझसे अनशन खत्म करने की अपील की थी। कुछ सांसद मुझसे मिलने आए थे जबकि कुछ ने पत्र लिखकर अनुरोध किया था। विभिन्न शर्तों पर लंबी बातचीत और देश में संभावित हिंसा को देखते हुए मैंने यह फैसला लिया।” उन्होंने प्रदर्शनकारियों से अपील करते हुए कहा, “हर जगह किसी भी तरह की हिंसा न होने दें और इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहें।”

 उन्होंने एक अन्य पोस्ट में बताया कि केंद्र सरकार और सभी राजनीतिक दलों के सांसदों ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि परीक्षा व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों की जवाबदेही पर संसद में चर्चा होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने आश्वासन दिया है कि हालिया NEET पेपर लीक मामले में आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाएगा। साथ ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया जाएगा।

हालाँकि, इस शांति से इस्लामी-वामपंथी गुट वांगचुक पर ही भड़क गया। दावा किया गया कि जैसे ही उन्हें सोनम वांगचुक के अनशन खत्म करने की जानकारी मिली उन्होंने उनके खिलाफ हमले शुरू कर दिए।

जिससे शक होता है कि मोदी और अमित के लिए अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने वाली इसी इस्लामी-वामपंथी गुट की लड़कियां हैं। इस तरह की अश्लील भाषा किसी सभ्य परिवार की लड़की नहीं कर सकती। ये गैंग ये ना समझे कि सरकार झुक गयी है, उन्हें शायद नहीं मालूम कि इसके बाद क्या खेल होने वाला है। भारत विरोधी विदेशियों भीख पर आंदोलन करने वाले मोदी सरकार को जो हल्के में ले रहे हैं वही इनकी भयंकर भूल है। आग तो लगा दी अब इस आग में कौन-कौन जलेगा यह भविष्य की गर्भ में छिपा है।    

एक एक्स (X) यूजर ने दावा किया कि सोनम वांगचुक को राम मंदिर में हुई चोरी और एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से जुड़े विवाद से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ‘प्लांट’ किया गया था। यूजर ने यह भी कहा कि अब मामला उनके नियंत्रण से बाहर हो गया है और जेन-जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहते ही हैं अब चाहे सोनम वांगचुक उनका समर्थन करें या नहीं।

एक यूजर ने सवाल किया कि कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके का नाम इस पोस्ट में क्यों नहीं है। उसने यह भी पूछा कि क्या सोनम वांगचुक ने अपना पक्ष बदल लिया है और क्या उन्होंने अब तक सभी को गुमराह किया।

एक अन्य यूजर ने दावा किया कि इस आंदोलन का असली मकसद गैर-लोकतांत्रिक तरीकों और ताकत के जरिए मोदी सरकार को हटाना है। जाहिद जावली नाम के यूजर ने कहा कि इस आंदोलन का उद्देश्य सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके जैसे नेताओं से भी बड़ा है। इसके बाद उसने इन आरोपों को लोगों का विरोध प्रदर्शन बताते हुए कहा कि ‘तानाशाही शासन’ हर मोर्चे पर विफल हो चुका है और उसके पास व्यवस्था को सुधारने के लिए सही लोग नहीं हैं।

वहीं, सलाहुद्दीन अय्यूब ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ ‘समझौता’ कर लिया है और आंदोलन की माँगों को नजरअंदाज कर दिया है।

कॉन्ग्रेस समर्थक एक यूजर ने भी सोनम वांगचुक को ‘समझौता कर लेने वाला’ बताया। उसने आरोप लगाया कि वांगचुक ने जेन-जी के साथ विश्वासघात किया है। साथ ही उसने कहा कि BJP के खिलाफ किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता और राहुल गाँधी ही एकमात्र विकल्प हैं।

एक अन्य यूजर ने सोनम वांगचुक का मजाक उड़ाते हुए कहा कि उन्हें भाजपा में शामिल हो जाना चाहिए और ‘हिंदू रक्षक, देशभक्त और राष्ट्रवादी’ बन जाना चाहिए। शख्स ने हिंदू धर्म या भारत के प्रति निष्ठा जताने तक का भी मजाक बना दिया। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि यह समूह हिंदू धर्म और भारत के प्रति किस तरह की सोच रखता है।

इस बीच, ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने सोनम वांगचुक को ‘बेकार’ बताते हुए लिखा, “अब उनके घर जाने, अच्छा खाना खाने और आराम करने का समय आ गया है। अब उनकी जरूरत नहीं है।” 

सोनम वांगचुक ने 28 जून को जंतर-मंतर पर अपना अनशन शुरू किया था। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में हिस्सा लिया था जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार और नीट पेपर लीक मामले के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर शुरू किया गया था। हालाँकि, इसके कुछ ही समय बाद इस प्रदर्शन ने एक हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया। पुलिसकर्मियों और संस्थाओं को निशाना बनाया गया और धीरे-धीरे यह आंदोलन छात्रों को आगे रखकर भारत में सत्ता परिवर्तन की कोशिश का प्रोपेगेंडा बनता जा रहा है।

वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल? विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब NEET पेपर लीक तक विपक्ष ने जितने भी धरने/प्रदर्शन हुए हैं सभी अपने असली मुद्दे से भटके हैं। दूसरे विपक्ष का किसी न किसी बहाने संसद को बाधित करना रहा है। तीसरे, अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मुग़ल आक्रांताओं के गुणगान की बजाए उनकी असलियत पुस्तकों में लाई गयी होती कोई प्रधान का इस्तीफा नहीं मांगता। सभी धरनों में भोजन मिलना पहली बार देखा गया है। जो इस बात को साबित करता है कि हमारा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथों बिका हुआ है। जनता समझती है ये नेता जनता के हित में काम कर रहे हैं जबकि संसद से लेकर सड़क तक जो भी उपद्रव हो रहा है सब विदेशी फंडिंग से हो रहा है। जिसका तक़रीबन हर चैनल पर जिक्र किया जा रहा है। चुनावों में जनता से मदद मांगी जाती है लेकिन धरनों में भारत विरोधियों की शरण में, ये क्या तमाशा है?     
राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है। https://www.facebook.com/share/r/1F4fka4oWh/

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।
कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।
स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।
वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

नग्न अवस्था में दिखी 24 साल की युवती, मंदिर से मूर्ति उठाकर तालाब में लगा दी छलाँग… हैदराबाद की सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत में CCTV से आया नया मोड़

                              हैदराबाद में युवती की आत्महत्या का मामला (फोटो साभार-X@abp)
हैदराबाद में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत की जाँच में अजीब बातें सामने आई है। जानकारी के मुताबिक, 24 साल की मृतक तेजस्विनी ने अपने कपड़े उतारे और सड़क पर दौड़ती हुई पास अम्मावरु मंदिर में गई और देवी माँ की प्रतिमा उठा कर नजदीक के तालाब में कूद गई। इसका सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है।

मामले की जाँच कर रही पुलिस लगातार तालाब में देवी प्रतिमा की तलाश कर रही है, लेकिन उसे अब तक प्रतिमा नहीं मिली है। तेजस्विनी का शव तालाब से बरामद कर लिया गया है।

डीआरएफ अब नौकाओं से मूर्ति को तलाश रही है। जाँचकर्ताओं का मानना ​​है कि प्रतिमा का मिलना इस मामले में काफी अहम है। पर्सनल दुश्मनी और घटना के दिन की गतिविधियों को लेकर पूछताछ हो रही है।

पुलिस मृतक तेजस्विनी की माँ अरुणा से भी पूछताछ कर रही है। वे महिला के वित्तीय लेनदेन, किसी जाँच के दौरान ये भी सामने आया है कि तेजस्विनी एक किराए के फ्लैट में रह रही थी, वहाँ प्रतिदिन 3500 रुपए उसे देना पड़ता था यानी महीने में उसका किराया करीब 1 लाख रुपए था। पुलिस को यह भी पता चला है कि इमारत की ऊपरी दो मंजिलों को कथित तौर पर एक लॉज की तरह चलाया जा रहा था। पुलिस ये भी पता कर रही है कि क्या इसका इस मामले से कोई संबंध है या नहीं। 

पुलिस पहले ही बता चुकी है कि तेजस्विनी ने आत्महत्या की है। हालाँकि इसके पीछे की वजह अभी तक नहीं बता पाई है। घटना की जाँच कर रही टीम अब सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान और फोरेंसिक सबूतों का विश्लेषण कर रहे हैं, लेकिन मौत की वजह तक नहीं पहुँच पाए हैं।

यह बात भी कही जा रही है कि तेजस्विनी के माता-पिता के बीच विवाद चल रहा है। माँ हैदराबाद के पीरजादिगुडा में रहती हैं। उनके साथ ही तेजस्विनी रह रही थी। वह पहले बंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करती थी। इसके बाद वह विशाखापत्तनम में रहने लगी थी, लेकिन अभी काफी दिनों से हैदराबाद में रहती थी।

ये बात भी सामने आई है कि तेजस्विनी मानसिक तौर पर परेशान थी। काफी दिनों से दोनों माँ-बेटी मानसिक रूप बीमार हैं।

MULTIPLE FRONTS पर मुसीबत खड़ी की जा रही है; जो कथित छात्र दंगे में शामिल हैं, उनके माता-पिता ने स्वयं अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद किया है

सुभाष चन्द्र

NEET तो एक बहाना है असली बात क्या जनता ने सोंचा कि आखिर क्यों धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की पीछे पड़ा है विपक्ष और कॉक्रोच गैंग? धर्मेंद्र ने उस काम को अंजाम दिया है जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शिक्षा मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी कर रहे थे। जब भारतीय इतिहास को डॉ जोशी जीवंत कर रहे थे तब सरकार में शामिल पाखंडी धर्म निर्पेक्षों के दबाव में वाजपेयी ने जोशी को कदम पीछे करने को कहा था और जोशी को अपने कदम पीछे हटाने पड़े थे। क्योकि पाखंडी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां नहीं चाहती कि उनके दामादों का नाम इतिहास से ख़त्म हो।  

कोई भी माता पिता अपने बच्चों को झगड़े झंझट से दूर रहने के लिए कहते हैं लेकिन जंतर मंतर में CJP के उत्पात में शामिल होने से बहुत से अभिभावकों ने अपने बच्चो को नहीं रोका जो वहां अपनी अपनी जुबान से मोदी और अन्य लोगों के गदंगी उगल रहे हैं। उनकी भाषा सुन कर (खासकर लड़कियों की) नहीं लगता वो किसी अच्छे खानदान से हैं लड़कियां तो जो भाषा बोल रही है उन्हें देख कर लगता है वह भाषा “बाजारू औरतों” की है

इन महिलाओं की बोली और भाषा से साबित हो रहा है कि ये सब संस्कारविहीन परिवारों से हैं। इनके माता-पिता और बुजुर्ग परिवार में ऐसी हो भाषा बोलते रहे हैं तभी ये महिलाएं अभद्र गालियां दे रही हैं। हकीकत यह है कि छात्रों के कन्धों पर बन्दुक रख और भारत विरोधी और गुंडे गुंडाई कर रहे हैं।   

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
अभिभावकों को नहीं पता कि जिसके खिलाफ भी केस दर्ज हो गया, पकड़ा गया वो तो सदा के लिए पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हो जायेगा आज communication system इतना तेज है कि उनका डाटा और finger prints देश भर के पुलिस थानों में चिपका दिया जाएगा और फिर न कोई सरकारी नौकरी मिलेगी और न प्राइवेट क्योंकि प्राइवेट कंपनियां भी प्रोफाइल चेक करती हैं, और इसका मतलब है कथित छात्रों ने और उनके माता पिता ने खुद ही भविष्य बर्बाद कर लिया 

फिर उन्हें बचाने कोई नहीं आएगा, सोनम वांगचुक, अभिजीत दिपके, सौरव दास, प्रकाश राज, संजय सिंह,  केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, डिंपल यादव, राहुल गांधी और अखिलेश यादव इन लोगों को दंगबाजी में कुछ नहीं हुआ क्योंकि ये सब लोग पतली गली से निकल लिए कथित छात्रों को मरने के लिए छोड़ कर और अपने भेजे हुए पालतू गुंडों की कारस्तानी का शिकार होने के लिए

मोदी की माँ को गाली दे रहे हैं, एक लड़की कहती है मेरे पीरियड्स में मेरा पैड भी उतना लीक नहीं होता जितने पेपर मोदी के लीक होते हैं एक लड़की कहती है -"चूतियो! मुठ मारो/हम बच्चों को नहीं" एक और लड़की ने कहा "गोली मार दूंगी साले उस मोदी को" इन लोगों के दादा के उम्र के हैं मोदी और कल इनके माता पिता पुलिस को कहेंगे हमारे बच्चो से गलती हो गई, उन्हें माफ़ कर दो तब कहने से क्या होगा जब आज नहीं रोका 

उधर संसद नहीं चलने दे रहा विपक्ष वैसे तो 12 साल से संसद ठप कर रहा विपक्ष और हर बार नया फिजूल मुद्दा खड़ा कर लेते हैं  अबकी बार NEET और राम मंदिर पकड़ लिया सरकार चर्चा को तैयार है लेकिन विपक्ष को बाहर हल्ला करना है स्पीकर लोकसभा और सभापति राज्यसभा को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर हंगामा करने वालों को पूरे संसद सत्र के लिए सस्पेंड कर देना चाहिए जनता का पैसा बर्बाद नहीं होना चाहिए

दिल्ली मेट्रो ने सभी 16 स्टेशन सुरक्षा कारणों से बंद कर दिए तो इस पर SCBA अध्यक्ष विकास सिंह चीफ जस्टिस के पास पहुंच गए कि सुप्रीम कोर्ट का मेट्रो स्टेशन खुलना चाहिए और चीफ जस्टिस ने भी कह दिया कि लंच तक नहीं खुले तो हम दखल देंगे मगर एक स्टेशन खोलने  से कुछ नहीं होगा सभी खोलने होंगे फिर सुरक्षा का जिम्मा किसका होगा? मुख्य न्यायाधीश को मेट्रो गेट खुलवाने से अपनी दिमाग को खोलना होगा यानि सुप्रीम कोर्ट मेट्रो गेट से सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन और संसद ज्यादा दूर नहीं। अगर उपद्रवी सुप्रीम कोर्ट में ही घुस गए फिर पुलिस और सरकार को रोने मत बैठ जाना।    

सुप्रीम कोर्ट के वकील काले कोट पहने जंतर मंतर के हुड़दंगियों के साथ खड़े हो गए जैसे वो सब शरीफ लोग हों विकास सिंह और शंकरनारायणन दिल्ली हाई कोर्ट में दहाड़ रहे थे कि पुलिस ने बर्बरता से “छात्रों” को पीटा लेकिन उन्हें यह दिखाई नहीं दिया कि पुलिस वालों को उन कथित “छात्रों” ने घेर घेर कर मारा। पेट्रोल पंप को नुकसान पहुँचाया, क्यों?   

सबसे मजे की बात जंतर मंतर पर मौज करने वाले खाना खाते हुए बता रहे हैं कि उनके लिए खाना दुबई, कतर और बांग्लादेश के आर्डर पर आ रहा है

70-70 साल पुराने नक्सली और 370 के कोढ़ और 17 साल पुराने PFI को ख़त्म करने वाली सरकार के लिए लिए तुम्हारी क्या औकात है जिस दिन अपनी सी पे आ गई सरकार, उस दिन कॉकरोच दिखाई भी नहीं दोगे केजरीवाल पंजाब के लिए पिच तैयार कर रहा है, उसके बहकावे में न आओ

दिल्ली पुलिस कमिश्नर को NSA के तहत मिली हिरासत में लेने की शक्ति, छात्रों के नाम पर हिंसा के बीच केंद्र का बड़ा फैसला : पुलिस ने बताया- रूटीन प्रक्रिया

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत लोगों को हिरासत में लेने की शक्तियाँ दे दी हैं। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब छात्रों के नाम पर शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ (CJP) का प्रदर्शन हिंसक और उग्र हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संबंध में बुधवार (22 जुलाई 2026) को दिल्ली गजट (असाधारण) में आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। हालाँकि, इस अधिसूचना पर 15 जुलाई की तारीख दर्ज है। अनुराग कुमार की हाल ही में दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्ति हुई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना औपचारिक आरोप तय किए 12 दिन से लेकर 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। नई अधिसूचना के अनुसार, 19 जुलाई से 18 अक्टूबर तक तीन महीने की अवधि के लिए यह निवारक हिरासत (Preventive Detention) की शक्ति लागू रहेगी। अधिसूचना में कहा गया है कि दिल्ली के उपराज्यपाल को यह यकीन है कि सार्वजनिक सुरक्षा के हित में हिरासत की यह शक्ति सौंपना आवश्यक है।

अधिसूचना में कहा गया है, “राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 2(ई) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 3(3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, दिल्ली के उपराज्यपाल ने निर्देश दिया है कि निर्धारित अवधि के दौरान दिल्ली पुलिस आयुक्त भी कानून की धारा 3(2) के तहत निरोधक प्राधिकारी (Detaining Authority) की शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे।”

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अनुसार, इस अधिकार के तहत दिल्ली पुलिस आयुक्त उन लोगों के खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी कर सकते हैं जिनकी गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा या आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति एवं रखरखाव के लिए हानिकारक मानी जाएँ। इस कानून के तहत सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित प्राधिकरण जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस प्रमुखों को भी निरोधक प्राधिकारी नियुक्त कर सकता है।

पिछले वर्ष 26 सितंबर को लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने एक आदेश जारी किया था जिसके बाद सोनम वांगचुक को NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। उनके आंदोलन के दौरान क्षेत्र में हुई घातक हिंसा के बाद यह कार्रवाई की गई थी। उन्हें 170 दिनों तक हिरासत में रखा गया था।

जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब हिंसक हो गया है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ मारपीट की गई है और पत्थर-बोतलें भी फेंकी गईं। इससे पहले मानसून सत्र के पहले दिन CJP के सदस्य संसद तक मार्च करने के लिए बैरिकेड तोड़ने की कोशिश कर चुके थे जिसके बाद दिल्ली में झड़पें और तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी।

सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधि पहले ही कह चुके हैं कि केंद्र सरकार ने न तो हुई गलती को कम करके दिखाया है और न ही जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार उनकी ‘राजनीतिक’ माँग मानने का कोई इरादा नहीं रखती। एक अधिकारी ने कहा, “समस्या हुई थी। हमने इसे रिकॉर्ड पर स्वीकार किया है और रिकॉर्ड पर ही इसकी जिम्मेदारी भी ली है। सरकार इससे भाग नहीं रही है।”

एक अन्य अधिकारी ने कहा, “हम यह नहीं कह रहे कि लोगों को विरोध नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को विरोध करने का पूरा अधिकार है। लेकिन मुद्दा कौन उठा रहा है, किस तरीके से उठा रहा है और उसके पीछे कौन लोग हैं, ये अलग सवाल हैं। क्या हमें राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाना चाहिए?”

उन्होंने आगे कहा, “जिस व्यवस्था पर हमने भरोसा किया था, उसी के लोगों ने उसे कमजोर कर दिया। हम पेपर माफिया नहीं हैं। व्यवस्था के भीतर के लोगों ने हमें निराश किया, हमने उन पर भरोसा किया था। हमने पेपर लीक की घटना नहीं छिपाई। हमने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की और इसे ठीक करने की कोशिश की।”

दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (23 जुलाई 2026) को आधिकारिक बयान जारी कर उन खबरों का खंडन किया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि राष्ट्रीय राजधानी में चल रहे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रदर्शनों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस आयुक्त को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत विशेष रूप से निवारक हिरासत (Preventive Detention) की शक्तियाँ दी गई हैं।

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि यह एक नियमित आदेश है जिसे हर तीन महीने में रीन्यू किया जाता है। पुलिस ने कहा कि इस आदेश का मौजूदा CJP प्रदर्शनों से कोई संबंध नहीं है। मौजूदा आदेश 7 जुलाई 2026 को जारी किया गया था, जो 19 जुलाई 2026 से 18 अक्टूबर 2026 तक की अवधि के लिए प्रभावी है।

(नोट इस खबर को दिल्ली पुलिस के बयान के बाद अपडेट किया गया है)

चेहरे चमक गए, पर मुद्दे धुंधले पड़े: CJP की अंदरूनी लड़ाई ने आंदोलन की साख पर उठाए सवाल


NEET पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।

लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।

साभार : सोशल मीडिया 

CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।

अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।

दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है। 

दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”

असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।

जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।

इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।

वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।

उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।

जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।

किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।

ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।

CJP के गुंडों ने महिला रिपोर्टरों से की बदसलूकी, कपड़े फाड़े, मारा-पीटा : ‘संसद चलो’ प्रदर्शन में हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को चुन-चुनकर बनाया निशाना, हमले की 10+ घटनाएँ

                                              सीजेपी प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों पर हमले
जंतर-मंतर पर पिछले डेढ़ महीने से ‘छात्र हितों’ के नाम पर धरना देकर बैठे ‘कॉकरोचों’ का असली चेहरा 20 जुलाई 2026 के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के वक्त सामने आ गया। इस दौरान उपद्रवियों ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि ग्राउंड जीरों पर सच दिखाने पहुँचे पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना भी बनाया।

कॉकरोचों के इस हिंसक प्रदर्शन में छात्र काम और गुंडों का जमावड़ा है जिसने इनके असली मुद्दे को बिलकुल ख़त्म कर दिया है। दूसरे, भारत विरोधी ताकतों की नचनिया बना विपक्ष अगर देश को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका बनाने के रास्ते पर जा रहे हैं वह इनके अंजामों से बेखबर होना इनके दिवालिया मानसिकता का सबूत है। जितना ज्यादा प्रदर्शन हिंसक होगा उतना ही विपक्ष को नुकसान होने वाला है। जनता भी चुपचाप इनकी जहरीली सोंच को देख रही है।   

कथित ‘प्रदर्शनकारियों’ में शायद इस बात का डर था कि जमीन पर मौजूद मीडियाकर्मी उनकी हकीकत देश के सामने ले आएँगे, इसलिए अपनी विचारधारा से अलग सवाल पूछने या तथ्यों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना बना लिया गया।

20 और 21 जुलाई से सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो CJP के प्रदर्शन में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए पत्रकारों के साथ हुई बर्बरता को उजागर करते हैं। कहीं रिपोर्टरों को उग्र भीड़ बीच सड़क पर घेरकर धक्के दे रही है, तो कहीं उनके साथ मारपीट की जा रही है।

महिला पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी और खींचतान की तस्वीरें सामने आई हैं। जो भी पत्रकार अपनी ड्यूटी निभाने वहाँ पहुँचा, उसे ‘गोदी मीडिया’ का टैग देकर डराने, रोकने और हाथापाई करने की कोशिश की गई- यहाँ तक कि उनके कपड़े फाड़े गए और चश्मे-कैमरे तक तोड़ दिए गए।

आपको कम से कम ऐसी 10 घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिनसे पता चले कि CJP प्रदर्शन के दौरान कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ कैसे बर्बरता हुई।

ऑपइंडिया के अनुराग मिश्रा पर बार-बार हमले

ऑपइंडिया के निर्भीक पत्रकार अनुराग मिश्रा को इस प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान बार-बार निशाना बनाया गया। 18 जुलाई को जब अनुराग जंतर-मंतर पर सामान्य सवाल पूछ रहे थे, तब भीड़ ने उन्हें घेरकर हाथापाई की। इसके बाद जब 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने उन्हें दोबारा निशाना बनाया और ‘गोदी मीडिया’ का कहकर, उन पर दोबारा हिंसक हमला किया।   

Times Now के देव कोटक की शर्ट फाड़ी, चश्मा तोड़कर चेहरे पर मारा

टाइम्स नाऊ के रिपोर्टर देव कोटक पर हुआ हमला इस हिंसक भीड़ की क्रूरता को बयाँ करता है। अभिजीत दीपके का इंटरव्यू लेने जंतर-मंतर पहुँचे देव पर ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारों के बीच अचानक चारों तरफ से लात-घूँसे, मुक्के और बोतलें बरसाई गईं। धक्का देकर उन्हें जमीन पर गिरा दिया गया, उनकी शर्ट फाड़ दी गई और घड़ी व मोबाइल छीन लिया गया। जब देव ने चिल्लाकर कहा कि चश्मे को न छुआ जाए, उन्हें उसके बिना धुंधला दिखता है, तो उपद्रवियों ने उनका चश्मा छीनकर तोड़ दिया और उसी टूटे चश्मे से उनके मुँह पर वार किया।

एबीपी न्यूज के वरुण भसीन और मीडिया गाड़ियों पर पथराव

अनुराग और देव की तरह ही एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन के साथ भी बदसलूकी हुई। रिपोर्टिंग के दौरान प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेरकर नारेबाजी की। वरुण ने अपनी आपबीती में बताया कि आंदोलन में शामिल युवा पूरी तरह हिंसक हो चुके थे। वे न केवल पत्रकारों को डरा रहे थे, बल्कि मीडिया की गाड़ियों पर पथराव कर रहे थे और कैमरे तोड़ने की फिराक में थे। सामने आई वीडियो में भीड़ को उनका पीछा करते हुए, उनपर स्प्रे मारते हुए देखा जा सकता है।

ऑपइंडिया की रितिका चंडोला को निशाना बनाया

महिला पत्रकारों के साथ इस भीड़ का रवैया बेहद शर्मनाक रहा। ऑपइंडिया की महिला पत्रकार रितिका चंडोला ने जब ग्राउंड पर जाकर शिक्षा के नाम पर शुरू हुए इस प्रदर्शन में छिपी गंदी राजनीति और ‘ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ लग रहे नारों पर सहजता से सवाल पूछे, तो जय भीम का नारेबाजी करने वाले आंदोलनकारी बौखला गए। तर्क का जवाब तर्क से देने के बजाय रितिका पर ‘गोदी मीडिया’ का टैग लगाकर उन्हें चुप कराने और डराने का प्रयास किया गया।

बैंक में छिपकर ज्योति मिश्रा ने बचाई जान, शेफाली निगम से भी बदसलूकी

टाइम्स नाऊ की ज्योति मिश्रा जब जनता की बात दिखाने पहुँचीं, तो उग्र भीड़ उनके पीछे पड़ गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने भांप लिया कि अगर ज्योति का सिर दिखा तो भीड़ पत्थर मारकर उनकी जान ले सकती है।

ज्योति को अपनी जान बचाने के लिए एक पास के बैंक में शरण लेनी पड़ी। बैंक कर्मी के अनुसार, हमलावरों की संख्या एक हजार से अधिक थी, जिन्होंने बैंक के अंदर घुसकर हमला करने की कोशिश की।

इसी तरह शेफाली निगम को भी प्रदर्शनकारियों द्वारा बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि भीड़ पीछे से आकर शेफाली को घेरती है और फिर पीछे से मारा जाता है।

2 महिला पत्रकारों के साथ खींचतान और छेड़छाड़

सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक और वीडियो में दो महिला पत्रकारों को भीड़ द्वारा घेरकर उनके साथ बदसलूकी हो रही है। दोनों पत्रकार भड़की हुई हैं। वह भीड़ से सवाल करती हैं, लेकिन उग्र भीड़ उन पर शारीरिक रूप से हावी होने लगती है और लोग उन्हें ज़बरदस्ती घसीटने लगते हैं। घटना की वीडियो हर जगह वायरल है।

NDTV पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोका

प्रदर्शन के दौरान भीड़ इस कदर पत्रकारों पर हावी थी कि उन्होंने एनडीटीवी की महिला पत्रकार को भी बख्शा नहीं। लाइव कवरेज के दौरान भीड़ उनके पीछे खड़े होकर ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाती रही और उन्हें बोलने तक नहीं दिया। सोशल मीडिया पर इस हरकत को यह कहकर जायज ठहराया गया कि ‘एनडीटीवी को अडानी ने खरीद लिया है’।

NDTV के रवीश रंजन शुक्ला के साथ भी बदसलूकी

वरिष्ठ पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला को भी इस उग्र भीड़ ने बख्शा नहीं। सोशल मीडिया पर आए वीडियो में दिखा कि रवीश सड़क पर बैठे हुए थे और चारों तरफ से भीड़ उन पर चीखते हुए ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही थी तथा उनसे तेज आवाज में ये पूछा जा रहा था कि इतने दिन से वो लोग प्रोटेस्ट कवर करने क्यों नहीं आ रहे थे।
सोशल मीडिया पर रवीश रंजन की वीडियो देख लोगों ने कहा कि ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उनके हाथ में एनडीटीवी का माइक था, जिसे अडाणी ग्रुप खरीद चुका है।

न्यूज 24 के राजीव रंजन की रिपोर्टिंग में अड़ंगा

न्यूज 24 के जाने-माने रिपोर्टर राजीव रंजन को छात्रों ने घेरकर ‘गोदी मीडिया वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनका मज़ाक उड़ाया। हालाँकि, राजीव पीछे नहीं हटे, उन्होंने अपने कैमरामैन के साथ डटकर खड़े रहकर पूरी घटना और भीड़ की गुंडागर्दी को कैमरे में कैद किया।

गौरतलब हो कि 10+ घटनाएँ केवल चंद मामले हैं जिनकी वीडियोज वायरल हुईं, वरना जैसा पैटर्न इन पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के वक्त दिख रहा है, उससे साफ है कि वहाँ सवाल पूछने वाले हर पत्रकार से भीड़ ने ऐसा ही बर्ताव किया होगा।

खबर है कि बिहार के पटना में भी छात्रों के नाम पर प्रदर्शन करने उतरी हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाया है।

पत्रकारों पर हमले की घटना पर एडिटर्स गिल्ड की चुप्पी

दुखद और शर्मनाक बात यह है कि इन घटनाओं को लेकर वो ‘एडिटर्स गिल्ड’ और वामपंथी धड़ा दिन-रात एकदम मौन है, जो समय-समय पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर ढोल पीटता है, लेकिन इन घटनाओं पर उससे कुछ नहीं बोला जा रहा- शायद इनके लिए पत्रकारों का अर्थ सिर्फ वामपंथी ईकोसिस्टम है। 

आरफा खानुम शेरवानी जैसी तथाकथित पत्रकार इन हमलों की निंदा करने के बजाय पत्रकारों की ही निंदा पर उतर आई हैं और पत्रकारों के साथ हुई मारपीट को जायज ठहरा रही हैं। वहीं, द हिंदू की विजेता सिंह जैसे लोग नफरत का बचाव करते हुए उलटे पत्रकारों पर ही ‘घृणा फैलाने’ का आरोप मढ़ रहे हैं।

वामपंथियों की ये समस्या पुरानी है कि जब उनके अनुकूल बात नहीं होती तो वो ऐसा ही रवैया अपनाते हैं। इस बार सीजेपी प्रदर्शन में यही देखने को मिला। उन पत्रकारों को जमकर एंट्री दी गई जो सीजेपी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले लग रहे थे। वहीं राष्ट्रवादी मुद्दों की बात करने वाले पत्रकार, इन्फ्लुएंसर को भगाने का, धमकाने का खूब काम हुआ। 20-21 जुलाई के बाद सामने आई आंदोलन की तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि यह विरोध प्रदर्शन किसी हक की लड़ाई नहीं, बल्कि वामपंथी नफरत और अराजकता का प्रायोजित खेल है।

तमिलनाडु में गोहत्या पर मद्रास हाई कोर्ट ने बैन लगाया; सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगाई

सुभाष चन्द्र

ईसाई स्टालिन सरकार पहले ही हिंदुओं के खिलाफ थी और कार्तिकेय दीपम पर अदालतों के आदेशों की अवहेलना कर रही थी। उस सरकार के जाने के बाद विजय जोसेफ, दूसरा ईसाई 10 मई, 2026 को मुख्यमंत्री बना 

27 मई, 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के Justice GR Swaminathan और Justice वी Lakshminarayanan की खंडपीठ ने राज्य में गायों और बछड़ों की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि गौ हत्या इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और राज्य को दूध उत्पादन व ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए 1976 के सरकारी आदेश को सख्ती से लागू करना चाहिए

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मद्रास हाई कोर्ट के इस आदेश से जुड़ी मुख्य बातें और घटनाक्रम निम्नलिखित हैं:

कब और क्या कहा: हाई कोर्ट ने 27 मई 2026 को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बकरीद या किसी भी अन्य दिन राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े का वध नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 का हवाला देते हुए राज्य को 30 अगस्त 1976 के राज्य के सरकारी आदेश का पालन करने का निर्देश दिया

दो महीने बाद विजय जोसेफ सरकार हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और 13 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के Justice Vikram Nath और Justice Sandeep Mehta की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी

राज्य सरकार की दलील:

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी थी सरकार ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट का यह निर्देश राज्य के मौजूदा 'तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958' के खिलाफ है, जो कुछ शर्तों के साथ पशु वध की अनुमति देता है

आर्टिकल 48 और राज्य सरकार के 30 अगस्त, 1976 के आदेश में दुधारू और भार ढोने वाले पशुओं विशेषकर गायों बछड़ों के वध पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है

देश में अनेक राज्यों में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध है जिसमें शामिल हैं -

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना और कर्नाटक

कुछ राज्यों में इन पशुओं के वध के लिए “Fit for Slaughter Certificate” होना आवश्यक है ये राज्य हैं -अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम - दक्षिण भारत के राज्य हैं केरल और लक्षद्वीप

जब इतने राज्यों में गोवध निषेध हो सकता है तो तमिलनाडु में क्यों नहीं जहां 87% हिन्दू आबादी है लगता है विजय जोसेफ स्टालिन से भी एक कदम आगे है

आशा की जाती है सुप्रीम कोर्ट विजय सरकार की अपील पर जल्द सुनवाई कर हाई कोर्ट के निर्णय को बरक़रार रखेगा