तमिलनाडु : शपथ में उडी संविधान की धज्जियाँ ; कांग्रेस मंत्री शपथ लेने के बीच चिल्लाकर लगाने लगे राहुल-राजीव गाँधी का नाम: राज्यपाल ने फटकारा, कहा- ये सब नहीं चलेगा

     कांग्रेस नेता ने शपथ के दौरान राहुल-राजीव गाँधी के नारे लगाए, राज्यपाल ने टोका (साभार : PTI Video SS)
तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली कैबिनेट का गुरुवार (21 मई 2026) को विस्तार हुआ। इस दौरान कुल 23 मंत्रियों ने शपथ ली। शपथ ग्रहण में तब विवाद हो गया जब कांग्रेस  मंत्री एस राजेश कुमार ने राहुल गाँधी और राजीव गाँधी के नाम के नारे लगाए।

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें तुरंत बीच में ही रोक दिया। राज्यपाल ने कड़े शब्दों में कहा कि यह शपथ का हिस्सा नहीं है। इस घटना का Video सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

कांग्रेस पार्टी पूरे 59 साल बाद राज्य सरकार का हिस्सा बनी है। इससे पहले कॉन्ग्रेस 1967 में सत्ता में थी। 2026 के विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी (TVK) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बहुमत के लिए उन्होंने कॉन्ग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया।

‘गाय की कुर्बानी तो होगी, 1400 साल से होती आ रही है’: हुमायूँ कबीर ने शुभेंदु अधिकारी को दिया चैलेंज, कहा- आग से मत खेलो, मुश्किलें खड़ी होंगी


पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखने वाले आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के चीफ और विधायक हुमायूँ कबीर ने बकरीद से पहले विवादित बयान देने शुरू कर दिए हैं। हुमायूँ कबीर ने गाय की कुर्बानी को लेकर विवादित बयान दिया है। हुमायूँ कबीर ने कहा कि 1400 साल पहले से कुर्बानी हो रही है और जब तक दुनिया रहेगी, तब तक कुर्बानी होती रहेगी।

हुमायूँ कबीर ने सीधे-सीधे सरकारी आदेश को ताक पर रखते हुए कहा, “कुर्बानी कोई मना करेगा भी तो उसे नहीं सुना जाएगा। सत्ता में शुभेंदु अधिकारी आ गए हैं, ये ठीक है कि लोगों ने उनको वोट दिए हैं, वो सरकार चलाएँगे लेकिन मेरा कहना है कि 1400 साल पहले से ये कुर्बानी होती आ रही है। जितने दिन तक दुनिया रहेगी, ये कुर्बानी होगी।”

उन्होंने कहा, “संविधान का सम्मान करना चाहिए लेकिन कुर्बानी होगी। गाय की भी होगी, बकरे की भी होगी और ऊंट की भी होगी। कुर्बानी के लिए जो पशु जायज हैं, उनकी कुर्बानी होंगी। बीजेपी सरकार को मैं चेतावनी देता हूँ, शुभेंदु अधिकारी से सीधे तौर पर कह रहा हूँ कि आग से मत खेलो। अगर वे कुर्बानी पर रोक लगाने की कोशिश करते हैं, तो इससे उनके लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी। मुस्लिम समुदाय किसी भी हाल में कुर्बानी के मामले में कोई समझौता नहीं करेगा।”

कबीर ने कहा कि वे मुसलमानों को गाय खाने से मना कर रहे हैं, उनकी सरकार है, वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन कुर्बानी तो होगी ही। उन्होंने कहा, “37% से अधिक मुसलमान गाय का गोश्त खाते हैं। सबसे पहले स्लॉटर हाउस बंद करना चाहिए। ईद की नमाज पढ़ने के लिए सरकार को हमें बड़ा मैदान देना चाहिए। अगर मैदान की व्यवस्था नहीं होगी, तो सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।”

बंगाल : पाकिस्तानी औरत से निकाह कर कोलकाता का जफर रियाज बना ISI का जासूस, 20 साल तक भारत के इनपुट आतंकी मुल्क को बेचे: सरकार बदलने के बाद NIA ने दबोचा


जिस तरह बंगाल में सत्ता बदलने के बाद मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी काम कर रहे हैं उनसे दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखने की जरुरत है। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री "मामाजी" शिवराज सिंह के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत सरमा अपने काम के बलबूते पर मोदी के हाथ मजबूत कर मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। जिस तरह बंगाल में वामपंथी सरकारों से लेकर ममता बनर्जी के राज में हुए अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा हुआ, उसी तरह दिल्ली में भी शीला दीक्षित से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक जो अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीनों पर कब्जे हुए हैं लेकिन रेखा गुप्ता द्वारा मुख्यमंत्री बनने के इतने दिनों राज करने पर भी कोई कार्रवाही नज़र नहीं आ रही। यमुना नदी वही गन्दी।  

क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स का? कहाँ गए बांग्लादेशी, रोहिंग्या और पाकिस्तानी घुसपैठिये? चुनावों में बहुत शोर मचाया था। कुर्सी मिल गयी जाए जनता भाड़ में। लगभग हर मेट्रो और लाल बत्ती(चौक)पर रिक्शाओं और थ्री-व्हीलर का जमावड़ा। चावड़ी बाजार, लाल कुआँ, नई सड़क, जामा मस्जिद और अन्य क्षेत्रों में पटरियों पर कब्जे। जनता पटरी पर चलने की बजाए सड़क पर चलने को मजबूर। पुराने समय में निकले छज्जों के नीचे सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर दुकानों, ढाबे और होटलों में शामिल आदि आदि।   

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले जफर रियाज उर्फ रिजवी को गिरफ्तार किया है। वह कोलकाता का रहने वाला है और उसने पाकिस्तानी से निकाह किया है। फिलहाल जफर की बीवी और बच्चे पाकिस्तान में ही रहते हैं।

मंगलवार (20 मई 2026) देर रात NIA ने जानकारी दी कि जफर रियाज के खिलाफ पहले से ही लुक आउट सर्कुलर जारी था। साथ ही उसे अपराधी घोषित करने की प्रक्रिया भी चल रही थी। इसी दौरान एजेंसी ने उसे गिरफ्तार कर लिया। आरोपित पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) , आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत केस दर्ज किया गया है।

पाकिस्तानी एजेंसियों से कैसे बिठाए संपर्क?

जाँच एजेंसी के अनुसार जफर रियाज का निकाह एक पाकिस्तानी औरत से हुआ था और उसके बच्चे भी पाकिस्तान के नागरिक हैं। NIA की जाँच में सामने आया कि वह साल 2005 से लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच यात्रा करता रहा। इसी दौरान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के अधिकारियों ने उसे अपने संपर्क में लिया और जासूसी की ट्रेनिंग दी।

पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों ने जफर को पैसों का लालच दिया था। इसके अलावा उसे पाकिस्तान की नागरिकता दिलाने का भी वादा किया गया था। इसके बदले आरोपित भारत से जुड़ी संवेदनशील और गोपनीय सुरक्षा जानकारियाँ पाकिस्तान तक पहुँचाने का काम कर रहा था।

जासूसी के आरोप में पहले भी गिरफ्तार हो चुका जफर

NIA ने बताया कि जफर रियाज पहले भी जासूसी के एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। उस समय उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई हुई थी। इसके बावजूद वह लगातार पाकिस्तान के संपर्क में बना रहा।

NIA अब इस पूरे जासूसी नेटवर्क की गहराई से जाँच कर रही है। एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और भारत-विरोधी साजिश कितनी बड़ी थी। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

अधूरा सच बेहद घातक होता है। सोरोस और कांग्रेस की propagandist हेले लिंग ने दिखा दिया मोदी और देश विरोध का अन्तर

एक बार एक बड़े धर्मगुरु अमेरिका पहुंचे। वहां पहुंचते ही एक पत्रकार ने उन्हें परेशान करने की नीयत से पूछा - Do you want to see any nude club? (क्या आप नंगो का क्लब देखना पसंद करेंगे? )
धर्मगुरु ने चौंकते हुए पूछा - what, is there a nude club here too? (क्या, यहां नंगो का क्लब भी है?)
दूसरे दिन अख़बार की सुर्खियां थीं।
धर्मगुरु ने अमेरिका की धरती पर कदम रखते ही पहला सवाल पूछा - "is there a nude club here too?"
जिसने भी अख़बार पढ़ा वही चौंक गया - अरे बाप रे!
तथ्यात्मक रूप से ये बिल्कुल सत्य बात है। अमेरिका की धरती पर धर्मगुरु के मुंह से निकले पहले शब्द यही थे पर क्या ये सच, सच था? अख़बार की सुर्खियां जो कह रही थी बात बिल्कुल उसके विपरीत थी। एक अधूरे सच ने भावार्थ बदल दिए थे।
जब भी किसी देश के प्रधानमंत्री दूसरे देश की यात्रा पर होते हैं तो उनकी कूटनीतिक वार्ता के बाद औपचारिक तौर पर एक साझा प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की जाती है। जिसमें दोनों देशों के प्रधानमंत्री मंच साझा करते हैं। पहले मेहमान और फिर मेज़बान देश के प्रधानमंत्री ओपचारिक तौर पर एक दूसरे का धन्यवाद करते हैं, दोनों पूर्व से तैयार अपना वक्तब्य पढ़ते हैं जिसमें वार्ता में शामिल कूटनीतिक मुद्दों पर बने आपसी सहयोग की बात करते हैं, यदि कोई समझौता (MOU) हुआ हो तो उसकी चर्चा करते हैं। फिर हाथ मिलाते हैं और मंच से चले जाते हैं। हां यदि पहले से तय हो तो दोनों प्रधानमंत्री दूसरे देश के पत्रकार के एक या दो सवाल का जवाब देते हैं पर यहां ये बात पहले ही तय कर ली जाती है कि कौन सा पत्रकार सवाल पूछेगा, जैसा हर देश में होता है और अमूमन ये भी तय कर लिया जाता है कि क्या सवाल पूछा जाएगा। कोई पत्रकार ऐसा सवाल नहीं कर सकता जिससे दो देशों के संबंधों को प्रभावित करने वाली कूटनीतिक असहजता पैदा न हो इसलिए संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग का यही प्रोटोकॉल है। पूरी प्रेस ब्रीफिंग का एक-एक मिनट पूर्णतः स्क्रिप्टेड होता है।
इस समय देश में सबसे ज्यादा चर्चा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नार्वेजियन पत्रकार हेले लिंग के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। ये सच भी है पर ये अधूरा सच है। तो सच क्या है? भारत - नार्वे के प्रधानमंत्रियों की साझा प्रेस ब्रीफिंग में पत्रकारों के सवाल लेने का समय प्रोटोकॉल में शामिल ही नहीं था। ना तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस से कोई सवाल लिया ना ही नार्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने प्रेस से कोई सवाल लिया। दोनों ने प्रेस ब्रीफिंग की हाथ मिलाया और मंच से चल दिए। लेकिन उसी समय नार्वे की propagandist पत्रकार हेले लिंग ने अपना कैमरा भारत के प्रधानमंत्री पर फोकस किया और चीख कर कुछ सवाल दाग दिए। स्वाभाविक है कोई भी प्रधानमंत्री ऐसी स्थिति में जवाब नहीं देगा। यहां अधूरा सच ये है कि भारत के प्रधानमंत्री ने हेले के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया पर पूरा सच ये है कि वो प्रश्न समुचित तरीके से पूछे ही नहीं गए थे बल्कि उनका अनुत्तरित रहना बिल्कुल तय था बस इस काम के मिले धन को वसूलने के लिए एक वीडियो रिकॉर्डिंग होनी थी वो हो गई।
ये नार्वे सरकार की व्यवस्था की विफलता थी। किसी मेहमान प्रधानमंत्री के साथ ये व्यवहार सर्वथा अनुचित था और कूटनीतिक संबंधों के लिए प्रतिकूल भी। शायद नार्वे की सरकार ने हेले द्वारा प्रोटोकॉल के इस उल्लंघन को समझा और हेले के ट्विटर-इंस्टा एकाउंट को सस्पेंड कर दिया।
भारत के प्रधानमंत्री की अस्मिता में गुस्ताख़ी की इस घटना को भारत के नामचीन पत्रकार जिस तरह उद्धृत कर रहे हैं वो अचंभित करता है। होना तो ये चाहिए था कि हमें प्रोटोकॉल की असफलता पर, हेले के गरिमाहीन व्यवहार पर प्रश्न उठाना चाहिए था।
देश के प्रधानमंत्री जब विदेशी दौरे पर जाते हैं तो वो व्यक्ति विशेष नहीं होते बल्कि अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं ऐसे में जब कोई आउट ऑफ बॉक्स जाकर हमारे प्रधानमंत्री के समक्ष घटिया व्यवहार करता है तो ये बात निसंदेह निंदनीय है। आप प्रधानमंत्री से सवाल पूछिए, उनकी नीतियों की आलोचना कीजिए किन्तु किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो मुद्दा है ही नहीं, साफ़-साफ fabricated झूठ दिखता है उस पर आपका ये रवैया?
मुझे दो बातें याद आती हैं -
1. जब भारत ने अमेरिका से बैर मोल लिया था तब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था - मुझे व्यक्तिगत हानि उठानी पड़ेगी।
2. फ़िल्म धुरंधर देख कर ये धारणा पुष्ट हुई कि हर देश में दुसरे देशों के एजेंट(sleeper cells) होते हैं जो घटनाओं को अपने आका देशों के मुताबिक़ मोड़ने की कोशिश कर देश में अराजकता पैदा कर अपने आका को गुप्त समर्थन देते है ताकि जनता उनकी गद्दारी को न भांप सके। लेकिन दुर्भाग्य से हमारा समूचा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथ की कठपुतली बन जनता को गुमराह करने का कोई मौका नहीं चूक रहा। हिन्दुओं को जातिगत सियासत में विभाजित कर मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथ मजबूत कर रहा है।
हिन्दुओं को Secularism के नशे को छोड़ सनातन पर कीजड़ फेंकने वालों से पूछना चाहिए क्या तुममें से किसी में ईसाई और इस्लाम की कुरीतियों पर बोलने की हिम्मत है?
मोदी विरोध और भारत विरोध के फ़र्क को समझना तो होगा!

जॉर्ज सोरोस और कांग्रेस की Plant की हुई Helle Lyng ने कांग्रेस का ही चीरहरण करा दिया; राहुल गांधी ने मीडिया को कितने इंटरव्यू दिए है?

सुभाष चन्द्र

जब देश में राजनीति होती है देश की वास्तविक समस्याओं का समाधान होने की आशा होती है लेकिन जब सियासत होती है देश के लिए घातक होती है। 2000 से नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखते ही घिनौनी सियासत खिलनी शुरू हो गयी। और निचले स्तर पर गिर चुकी है कि मोदी-योगी-अमित विरोधी इनका विरोध करते-करते भारत विरोधी ताकतों की कठपुतली बन नाच रहे हैं। देशहित में जनता को जागरूक होकर विपक्ष को उसकी औकात दिखानी होगी।INDI गठबंधन में शामिल सारी पार्टियों को एक बात अब तक समझ आ जानी चाहिए कि जब तक कांग्रेस की गुलामी करती रहेंगी क्षेत्रीय पार्टी भी नहीं रहेंगी। कांग्रेस के साथ-साथ इन सबका डूबना तय है, या तो विपक्ष देश विरोधियों को ठोकर मार देश और जनहित में काम करे या फिर खुद किसी अंधे कुँए में चले जाएं। जॉर्ज सोरोस जैसे भारत का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।       

नॉर्वे की कथित पत्रकार Helle Lyng को प्रधानमंत्री मोदी से नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त बयान में सवाल पूछने के लिए कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी ने plant किया था, ये कांग्रेस के इको सिस्टम के मचाये बवाल से सिद्ध हो गया लेकिन Lyng ने कांग्रेस का ही चीरहरण करा दिया। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
Lyng ने मोदी से (पढ़ाया हुआ) सवाल पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते” ये प्रश्न नहीं था मोदी के खिलाफ एक नेरेटिव गढ़ने की साजिश थी Lyng को नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने झटका दिया और कहा “भारत दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है, शानदार बढ़ता हुआ देश है, उसकी वैल्यूज हमसे भिन्न हैं और हमें उसका सम्मान करना चाहिए”

अब राहुल गांधी समेत कांग्रेस के सभी दुमछल्ले घाघरा उठा कर नाचने लगे इतना ही नहीं अभिसार शर्मा ने भी मोदी से सवाल पूछने चाहे लेकिन उसे भी कोई भाव नहीं दिया गया उसको तो कांग्रेस की वकालत करने वाले तहसीन पूनावाला ने रगड़ दिया और उसकी पोल खोलते हुए कहा कि आपने तो अडानी से मिल कर उनसे माफ़ी मांगने की कोशिश की थी पूनावाला ने कहा कि वो तो रोज टीवी चैनल्स पर सरकार की और मोदी की निंदा करता है लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई

सुप्रिया श्रीनेत और भोंकी की है उसने कहा एक पत्रकार ने नॉर्वे में सवाल किया मोदी जी ऐसा दुम दबाकर भागे मानो पीछे कोई भूत लग गया हो उनको डर लगा कहीं एपस्टीन या अडानी पर कोई सवाल न पूछ ले सोचिए अगर भारत मीडिया सवाल पूछना शुरू कर दे तो मोदी जी की क्या हालत होगी? लेकिन यहां मीडिया नहीं ‘चरण चुंबक हैं” कमीनों एक दिन बता ही दो एपस्टीन फाइल में मोदी के लिए क्या लिखा है जो तुम रोज भौंकते हो कुत्तों की तरह

इस बात पर तो हमारे मीडिया को उसे चरण चुंबक कहने पर सुप्रिया की बखिया उधेड़ देनी चाहिए सुप्रिया भूल गई कि मोदी ने 2024 चुनाव से पहले 50 चैनलों को इंटरव्यू दिए लेकिन राहुल गांधी ने कभी किसी चैनल से बात बात नहीं की उसे डर रहता है कहीं अर्णव गोस्वामी की तरह कोई उसकी खाल ना खींच ले अर्णव ने राहुल का इंटरव्यू 27 जनवरी 2014 को लिया था और तब से राहुल का पिछवाड़ा सूजा हुआ है। 

आज वही Lyng खुद कबूल कर रही है कि उसे पता था कि जॉइंट ब्रीफिंग में सवाल नहीं पूछने चाहिए लेकिन फिर भी पूछा और अप्रैल, 2024 के बाद पहली बार धड़ाधड़ उसके पोस्ट X पर आने लगे कौन था फिर उसके सवाल पूछने के पीछे? ऐसा तो नहीं सितंबर, 2023 के अपने नॉर्वे के दौरे में ही राहुल गांधी पहले ही सेटिंग कर आया हो और आज वह सामने आया? Lyng किसी न्यूज़ पोर्टल की Political Commentrator है कोई पत्रकार नहीं है और ऐसा बताया गया है उस पोर्टल की फंडिंग जॉर्ज सोरोस करता है तो लिंक अपने आप जुड़ गया राहुल गांधी से 

आपको याद होगा 22 जून, 2023 को White House में मोदी और बाइडन की Rare Joint Press Conference में The Wall Street Journal की पत्रकार सबरीना सिद्दीकी ने भी मोदी को घेरने की कोशिश की थी और पूछा था अल्पसंख्यकों के अधिकारों और freedom of speech के लिए आपकी सरकार क्या कदम उठा रही है? उस वक्त मोदी ने उसे ठोक कर जवाब दिया था कि भारत में सभी को बोलने की आज़ादी है और हर किसी समुदाय के अधिकार सुरक्षित हैं

राहुल गांधी विदेश जाता है तब भी भारत की निंदा करता है और भारत को नीचे दिखाता है और भारत में रहकर भी विदेशी घटनाओं पर भारत और केवल मोदी को बदनाम करता है

कांग्रेस के हरामखोर नेता यह देख कर जले भुने रहते हैं कि जिस मोदी को हम सुबह शाम, दिन रात गाली बकते है, उसे 32 देशों ने अपने सर्वोच्च सम्मान कैसे दे दिए

नॉर्वे की प्रोपेगेंडाबाज Helle Lyng ने खुद कबूला- मुझे पता था ज्वाइंट ब्रीफिंग में पत्रकारों को नहीं पूछना सवाल

                                                                                              साभार - हेले लिंग का सोशल मीडिया हैंडल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान हेले लिंग (Helle Lyng) नाम की पत्रकार की करतूत ने खूब चर्चा बटोरी। उसकी एक वीडियो के कारण भारत के वामपंथी उसे ‘हीरो’ बताने लगे और ऐसा फैलाया जैसे पीएम मोदी उसके पूछे सवालों से भागे हों। अब उसी हेले ने बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में खुद अपनी हरकत के पीछे की सच्चाई को बताया है।

हेले लिंग ने साफ कहा कि उन्हें पहले से पता था कि यह कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं बल्कि सिर्फ जॉइंट स्टेटमेंट था और दोनों देशों के प्रधानमंत्री सवाल नहीं लेने वाले थे। उन्होंने कहा, “मुझे अच्छी तरह पता था कि यह सिर्फ ज्वाइंट ब्रीफिंग है और कोई सवाल नहीं लिया जाएगा।”

दरअसल पीएम मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर की संयुक्त उपस्थिति के दौरान पत्रकारों के सवाल पूछने का कार्यक्रम तय नहीं था। बाद में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की अलग टीम ने मीडिया के सवाल लिए।

पहले से पता था कि सवाल नहीं लिए जाएँगे

BBC हिन्दी से बातचीत में हेले लिंग ने माना कि पत्रकारों को पहले ही बता दिया गया था कि दोनों नेता सवाल नहीं लेंगे। इसके बावजूद उन्होंने पीएम मोदी के मंच से उतरते समय आवाज लगाई, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे आजाद प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते?”

पीएम मोदी बिना जवाब दिए अपने नॉर्वेजियन समकक्ष के साथ आगे बढ़ गए। बाद में हेले लिंग ने खुद कहा कि उन्हें पहले से उम्मीद थी कि पीएम मोदी उनके सवाल का जवाब नहीं देंगे।

हेले लिंग ने सफाई दी कि उन्हें यह करना था क्योंकि पत्रकार के रूप में ये उनका काम है। वो किसी विदेशी नेता को उनके देश में लोकतंत्र के बारे में बात करने की अनुमति नहीं दे सकतीं।

उनकी यही हरकत वजह रही कि सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। कुछ लोगों ने इसे प्रेस की आजादी का मुद्दा बताया, जबकि कई लोगों ने कहा कि पत्रकार ने जानबूझकर तय प्रोटोकॉल तोड़कर सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश की।

मानवाधिकार रिपोर्टों और एक्टिविज्म पर भी उठे सवाल

इंटरव्यू में हेले लिंग ने यह भी कहा कि भारत में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर उनकी जानकारी का बड़ा स्रोत एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएँ हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उन पर पक्षपातपूर्ण सोच रखने का आरोप लगाया।

अवलोकन करें:-

नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल
नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल
 

जानकारी के अनुसार, हेले लिंग नॉर्वे के छोटे मीडिया संस्थान डगसाविसेन से जुड़ी हैं। घटना से पहले उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर ज्यादा सक्रियता नहीं थी और फॉलोअर्स की संख्या भी काफी कम थी। लेकिन, पीएम मोदी से सवाल पूछने के बाद अचानक उन्हें भारत में बड़ी पहचान, समर्थन, आलोचना और मीडिया इंटरव्यू मिलने लगे।

मोदी ने जॉर्जिया मेलोनी को गिफ्ट की ‘Melody’ टॉफी, इटली की प्रधानमंत्री मुस्कुराते हुए बोलीं- Thank You

                                     मोदी और जॉर्जिया मेलोनी (फोटो साभार: X/@GiorgiaMeloni)
इटली दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी इटैलियन समकक्ष जॉर्जिया मेलोनी को भारत की एक खास मिठास से रूबरू कराया। पीएम मोदी ने मेलोनी को मशहूर भारतीय टॉफी ‘मेलोडी’ गिफ्ट की जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

मेलोनी ने इस खास पल का वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा करते हुए लिखा, “गिफ्ट के लिए धन्यवाद।” वीडियो में पीएम मोदी के हाथ में ‘मेलोडी’ टॉफी का पैकेट दिखाई देता है। बातचीत के दौरान मेलोनी मुस्कुराते हुए कहती हैं, “प्रधानमंत्री मोदी मेरे लिए एक बहुत-बहुत अच्छी टॉफी गिफ्ट लेकर आए हैं।” इसके बाद पीएम मोदी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “मेलोडी।”

दोनों नेताओं के बीच का यह हल्का-फुल्का और दोस्ताना अंदाज लोगों को काफी पसंद आ रहा है। सोशल मीडिया पर यूजर्स इसे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और भारतीय स्वाद की अनोखी झलक बता रहे हैं।


नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल


अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में शब्दों का चयन, मंच की मर्यादा और संवाद की प्रकृति बहुत मायने रखती है। दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों या प्रधानमंत्रियों की आधिकारिक बैठकों के दौरान होने वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई टीवी डिबेट नहीं होती, जहां अचानक सवालों की बौछार कर दी जाए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इतने सालों तक सांसद रहने और राजनीतिक जीवन जीने के बावजूद इतनी भी जानकारी नहीं है कि इन कार्यक्रमों का स्वरूप पहले से तय होता है। वक्तव्य निर्धारित होते हैं और कई बार प्रश्न पूछने की व्यवस्था भी सीमित या नियंत्रित रहती है। दुनियाभर के लगभग सभी बड़े लोकतांत्रिक देशों में यह सामान्य प्रक्रिया है। इसके बावजूद नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के बहाने राहुल गांधी ऐसे नकारात्मक ट्वीट करते हैं तो साफ पता चलता है कि वे भी इस सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा हैं। क्योंकि जब बात भारत और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आती है, तब कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार और भारत के भीतर बैठे राजनीतिक विरोधी हर सामान्य प्रक्रिया को “लोकतंत्र के संकट” का रंग देने लगते हैं। पत्रकार हेले लिंग का विवादित सवाल इसी रणनीति का ताजा उदाहरण है।
                                                                                                    साभार : सोशल मीडिया 

कूटनीतिक मंच को राजनीतिक रंग देने की कोशिश

दरअसल, नॉर्वे में आयोजित संयुक्त प्रेस कार्यक्रम के दौरान पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से अचानक सवाल पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?” पहली नजर में यह सामान्य प्रश्न लग सकता है, लेकिन सवाल का तरीका, उसका समय, उसके पीछे की मंशा और उसके बाद हेले के ट्वीट सारे सुनियोजित नैरेटिव की ओर साफ-साफ इशारा कर देते हैं। क्योंकि यह कोई स्वतंत्र मीडिया संवाद कार्यक्रम नहीं था। यह दो देशों के बीच आधिकारिक कूटनीतिक कार्यक्रम था। ऐसे आयोजनों में आमतौर पर कई बार कोई प्रश्नोत्तर सत्र होता ही नहीं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, जापान समेत दुनिया के अनेक देशों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहां राष्ट्राध्यक्ष बिना सवाल लिए मंच से चले गए। लेकिन उन मौकों पर “लोकतंत्र खतरे में है” जैसा वैश्विक शोर नहीं मचाया गया। स्पष्ट है कि यहां उद्देश्य जवाब पाना कम और एक राजनीतिक मसौदा तैयार करना ज्यादा था। हेले जिस नार्वे की प्रेस को दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रे बता रही हैं, वहीं के पीएम ने पत्रकारों के सवालों पर चुप्पी साथ ली थी।

सवाल पूछने से ज्यादा ट्विटर पोस्ट का था हेले का मकसद

एक छोटे से जिस अखबार Dagsavisen के लिए पत्रकार हेले लिंग काम करती हैं, उसके फॉलोवर्स 50 हजार भी नहीं हैं। इसलिए साफ है कि ऐसे टुच्चे मीडिया संस्थान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवादित सवाल पूछकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करते हैं। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि भारत से जुड़े मुद्दों पर पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। यह विवाद तब और गहरा हो गया जब प्रेस कार्यक्रम के बाद हेले लिंग ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की। यदि उनका उद्देश्य सिर्फ पत्रकारिता था, तो सवाल पूछने के बाद मामला वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन सोशल मीडिया पर राजनीतिक शैली में टिप्पणी करना यह संकेत देता है कि पूरा प्रकरण केवल पेशेवर पत्रकारिता तक सीमित नहीं था।

मोदी विरोधी द वायर को फोलो करती है हेले

यहीं से यह मामला एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देने लगता है। पहले सार्वजनिक मंच पर सवाल उछालो। जहां पहले से ही पता है कि इसका जवाब देने प्रोटोकॉल में ही नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर उसे वैचारिक रंग दो और उसके बाद भारत विरोधी समूहों तथा राजनीतिक दलों द्वारा उसे amplify कराया जाए। यही पैटर्न वर्षों से दिखाई देता रहा है। हालांकि नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने मंगलवार को नॉर्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई अपनी टिप्पणियों के बाद हुई आलोचना और ऑनलाइन हमलों का जवाब देते हुए कहना ही पड़ा कि वह “किसी भी तरह की विदेशी जासूस नहीं हैं”। यह भी तथ्य है कि हेले ट्वीटर पर जिनको फोलो करती है, उनमें एकमात्र भारतीय डिजिटल कंपनी द वायर भी है, जिसके मोदी विरोधी होने पर कोई शक नहीं है। The Wire ने नरेंद्र मोदी सरकार की कई नीतियों जैसे नागरिकता कानून, मीडिया स्वतंत्रता, पेगासस जासूसी विवाद, चुनावी बॉन्ड, नोटबंदी, संस्थागत स्वायत्तता आदि पर लगातार नेगेटिव रिपोर्टिंग की है।

राहुल गांधी की राजनीति और विदेशी मंचों का सहारा

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को तुरंत राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने विदेशी मंचों, विदेशी रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों का सहारा लेकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाने की कोशिश की हो। राहुल गांधी कभी विदेशी विश्वविद्यालयों में जाकर भारतीय लोकतंत्र पर टिप्पणी, कभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों का हवाला, तो कभी विदेशी पत्रकारों के बयान, यह सब एक लगातार चलने वाली राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।

भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करते हैं राहुल गांधी

विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना जरूर है, लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर हों और उस समय विदेशी मीडिया द्वारा उठाए गए राजनीतिक नैरेटिव को भारत के भीतर का विपक्ष और राहुल गांधी आगे बढ़ाने लगें, तब सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। क्या यह सिर्फ सरकार का विरोध है या फिर भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास भी है? वास्तविकता यह है कि भारत में प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना प्रतिदिन टीवी बहसों, अखबारों, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया पर खुले तौर पर होती है। विपक्ष सरकार पर लगातार हमले करता है। सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र है, चुनाव आयोग सक्रिय है और जनता हर चुनाव में अपना निर्णय खुलकर देती है। ऐसे देश को “लोकतंत्र संकट” के फ्रेम में फिट करने की कोशिश वस्तुतः वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाती है।

अवलोकन करें:-

नॉर्वेजियन पत्रकार Helle Lyng के फेर में यूट्यूबर दलाल पत्रकार अभिसार शर्मा की पोल खुली, गौतम अडानी स
हेले का सवाल नहीं एजेंडा, उसका पिछला ट्वीट दो साल पहले

नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल पूछने पर विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैला रही हैं। उनका सवाल एजेंडे से प्रेरित था। जबकि कुछ लोग इसे प्रेस की आजादी बता रहे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पश्चिमी देशों के कुछ मीडिया संस्थान भारत की छवि को लेकर पहले से तय नैरेटिव के साथ काम करते हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि पत्रकार हेल्ले लिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आखिरी पोस्ट 10 अप्रैल 2024 को किया था। इसके बाद उनका अगला पोस्ट प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ही था।

हेले की नीयत पर भी सवाल कि पत्रकारिता या प्रोपेगेंडा?

पत्रकार हेले लिंग भले ही कुछ भी सफाई दे लेकिन वो भारत को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित महसूस हो रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत में भी कई पत्रकार पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। क्योंकि हेले लिंग ने जहां प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछा असल में वो एक पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं था बल्कि वो एक ऐसा प्रेस कॉन्फ्रेंस था जहां दोनों देशों के नेता समझौतों के बारे में आधिकारिक बातें बताते हैं। किसी भी देश में ऐसे कार्यक्रम में अमूमन सवाल जवाब नहीं होते हैं। इसीलिए हेले लिंग की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उन्होंने सवाल पूछने के लिए एक ऐसे मंच को क्यों चुना जहां पारंपरिक तौर पर सवाल जवाब नहीं होते हैं।

वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी

यह भी समझना होगा कि नरेंद्र मोदी आज केवल भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक मंचों पर उसकी मजबूत उपस्थिति, जी-20 की सफल मेजबानी, रूस-यूक्रेन जैसे मुद्दों पर संतुलित कूटनीति और विकसित भारत का विजन, इन सबने भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत किया है। ऐसे समय में भारत विरोधी नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशें भी तेज हुई हैं। कभी मानवाधिकार के नाम पर, कभी प्रेस स्वतंत्रता के नाम पर, तो कभी लोकतंत्र के नाम पर। उद्देश्य एक ही दिखाई देता है कि भारत की उभरती हुई वैश्विक छवि को संदेह के घेरे में खड़ा करना। भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से का रवैया लंबे समय से चयनात्मक रहा है। जिन देशों में प्रेस पर खुला नियंत्रण है, वहां अक्सर यही मीडिया बेहद नरम दिखाई देता है। लेकिन भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र, जहां हजारों समाचारपत्र, सैकड़ों टीवी चैनल, अनगिनत डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकार की आलोचना करने वाले असंख्य पत्रकार सक्रिय हैं, वहां “प्रेस की आजादी खत्म” होने का नैरेटिव गढ़ा जाता है।

पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच की महीन रेखा

यह सही है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सवाल पूछना है, लेकिन पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच एक महीन रेखा भी होती है। जब कोई पत्रकार प्रश्न पूछने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करने लगे और उसका उपयोग विपक्षी दल अपने एजेंडे के लिए करने लगें, तब निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं है। बल्कि इसमें राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने के सुनियोजित साजिश भी नजर आती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है, लेकिन सवालों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपेगेंडा के औजार की तरह करना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। दुर्भाग्य यह है कि आज दुनिया के कुछ हिस्सों में भारत को देखने के लिए उसी चश्मे का इस्तेमाल करते है, जिसे राहुल गांधी ने धारण किया हुआ है।

भारत को लेकर बदली हुई वैश्विक मानसिकता

दुनियाभर के सामने अब यह शीशे की तरह साफ हो गया है कि आज का भारत 15 साल पहले वाला भारत नहीं है। भारत अब दबाव में आने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि अपने हितों और अपनी आवाज को मजबूती से रखने वाला आत्मविश्वासी देश है। यही आत्मविश्वास कई वैश्विक शक्तियों और वैचारिक समूहों को असहज करता है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। यही कारण है कि भारत विरोधी नैरेटिव बनाने की हर छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। हेले लिंग प्रकरण भी उसी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होता है, जहां एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया को “लोकतंत्र बनाम तानाशाही” जैसी अतिरंजित बहस में बदलने की कोशिश की गई। 

नॉर्वेजियन पत्रकार Helle Lyng के फेर में यूट्यूबर दलाल पत्रकार अभिसार शर्मा की पोल खुली, गौतम अडानी से मिलकर माँगना चाहता था माफी: कांग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला ने किया खुलासा

         अभिसार शर्मा और तहसीन पूनावाला ( फोटो साभार-x@abhisarsharma,x@tahseenpoonawala)
इस देश को सबसे ज्यादा नुकसान अगर पहुंचा रहे हैं तो विदेशों में बैठे भारत विरोधी नहीं बल्कि इनके उनके दलाल। इसमें विरोधी तो शामिल हैं ही कुछ पत्रकार भी शामिल हैं। ये वही दलाल पत्रकार जिनके कहने पर 2014 से पहले की सरकारों में मंत्री और संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां होती थी। लेकिन वर्तमान मोदी सरकार ऐसे किसी दलाल को घास तक नहीं डालती।  
सरकार की कार्यशैली की आलोचना करना गलत नहीं है, करनी चाहिए लेकिन भारत विरोधियों की मंशा पूरी करने के लिए नहीं। देश का दुर्भाग्य है कि दलाल पत्रकारों की फ़ौज जनता की समस्याओं की नहीं बल्कि विदेशों में बैठे अपने आकाओं की जी-हजूरी कर पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं।   

इतना ही नहीं, चर्चा थी कि जिस नॉर्वेजियन पत्रकार Helle Lyng की अभिसार शर्मा दलाली करता घूम रहा है उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी कुछ प्रश्न करने की इच्छा जाहिर की थी लेकिन मोदी ने भी इसे घास नहीं डाली। 

 

कांग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला ने खुलासा किया है कि यूट्यूबर अभिसार शर्मा ने गौतम अडानी से मिलकर उनसे रहम की भीख माँगी थी।इस मुद्दे पर मंगलवार (19 मई 2026) को सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला और यूट्यूबर अभिसार शर्मा के बीच तीखी बहस छिड़ गई।

दरअसल नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बदसलूकी और विदेश मंत्रालय (MEA) की प्रेस ब्रीफिंग में की गई टिप्पणियों से जुड़े विवाद को लेकर पूनावाला ने भारत के रुख का समर्थन किया था।

हेले लिंग को संबोधित अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा- “मैं भारत में विपक्ष की आवाज में से एक हूँ और रोजाना टेलीविजन और सोशल मीडिया पर सरकार पर हमला करता हूँ, प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों की कड़ी आलोचना करता हूँ, लेकिन आज तक किसी ने मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। मुझे यह बात बेहद आपत्तिजनक लगती है कि आप मेरे देश की प्रेस की स्वतंत्रता की तुलना अमीरात या क्यूबा से कर रहे हैं… बेशक, सभी भारतीय अभिव्यक्ति की और भी अधिक स्वतंत्रता चाहेंगे, लेकिन भारत में मीडिया की स्वतंत्रता की तुलना उन शासन व्यवस्थाओं से करना, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाती हैं, सरासर गलत और दुर्भाग्यपूर्ण है।”

इस पर यूट्यूबर शर्मा ने पोस्ट कर पूनावाला पर बीजेपी के लिए काम करने और विपक्षी रुख को छोड़ने का आरोप लगाया। शर्मा ने कहा, “विपक्ष की आवाज होने का दिखावा करना बंद करो। तुम भाजपा और उसके समर्थकों की नफरत को नॉर्मल बना रहे हो। तुम सत्ता प्रतिष्ठान के चाटुकार के सिवा कुछ नहीं हो। विपक्ष की आवाज होने का यह ढोंग बंद करो,”

सोशल मीडिया पर हो रही बहस के बीच एक यूजर ने पूनावाला पर अडानी एजेंट होने का आरोप लगाया। इसका जवाब देते हुए पूनावाला ने अभिसार शर्मा पर पलटवार किया।

पूनावाला ने आरोप लगाया कि शर्मा ने खुद अडानी ग्रुप ने जो कानूनी कार्रवाई शुरू की थी, उस सिलसिले में उद्योगपति गौतम अडानी से मिलने का समय माँगा था। उन्होंने कहा कि शर्मा सार्वजनिक टिप्पणियों में अक्सर अडानी ग्रुप पर निशाना साधते हैं। इसके बावजूद गौतम अडानी से संपर्क करने की कोशिश की थी।

दिलचस्प बात यह है कि शर्मा का आत्मविश्वास जल्द ही गायब होता दिखा और उन्होंने पूनावाला के दावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

माना जा रहा है कि यह विवाद अभिसार शर्मा और ब्लॉगर राजू पारुलेकर के खिलाफ अडानी ग्रुप के किए गए आपराधिक मानहानि मामले से जुड़ा है।

सितंबर 2025 में अडानी ग्रुप ने शर्मा और पारुलेकर के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद गाँधीनगर की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें नोटिस जारी किए थे। अडानी ग्रुप के वकील संजय ठक्कर ने कथित तौर पर कहा कि ये नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 के तहत जारी किए गए थे। इसके मुताबिक किसी अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है।

शिकायतों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 356(1-3) के तहत प्रावधानों का हवाला दिया गया, जो पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता के तहत मानहानि प्रावधानों के अनुरूप हैं।

अडानी ग्रुप ने आरोप लगाया कि शर्मा ने एक वीडियो अपलोड किए थे, जिसमें असम में भूमि आवंटन और कथित राजनीतिक पक्षपात के संबंध में आपत्तिजनक दावे किए गए थे, जबकि परुलेकर पर कथित ‘घोटालों’ और ‘राजनीतिक पक्षपात’ का जिक्र करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट करने का आरोप लगाया गया था। अडानी ग्रुप ने इन आरोपों को ‘बेबुनियाद और भ्रामक’ बताया था और दोनों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था।

सुप्रीम कोर्ट कैसे केंद्र को अपमानित करता है?

सुभाष चन्द्र

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की एक सभा में  Justice B.V. Nagarathna ने कहा कि केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें देश में मुकदमेबाजी की सबसे बड़ी जनक हैं और वे लगातार सामान्य मामलों तथा अपीलों को अंत तक लड़कर अदालतों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ाती है। 

* सबसे बड़ी वादी (Primary Litigant):

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
सरकार केवल न्याय व्यवस्था की सहभागी नहीं है, बल्कि मुकदमेबाजी की सबसे बड़ी वजह भी है। केंद्र और राज्य सरकारें देश में सबसे अधिक मुकदमों के लिए जिम्मेदार हैं;

* लगातार अपीलें (Relentless Appeals):

हालाँकि सरकार सार्वजनिक रूप से अदालतों में लंबित मामलों पर चिंता व्यक्त करती है, लेकिन वही सरकार नियमित मामलों और अपीलों को अंतिम स्तर तक लड़कर इस लंबित बोझ को और बढ़ाती है;

* “मॉडल लिटिगेंट” का विरोधाभास:

 राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह संयमित तरीके से मुकदमे लड़े और एक “आदर्शवादी” की तरह व्यवहार करे, लेकिन न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि व्यवहार में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है;

* संस्थागत कारण (Institutional Drivers):

 उन्होंने कहा कि अक्सर नौकरशाही में जवाबदेही और जांच के भय के कारण ये अपीलें की जाती हैं। अधिकारी विवादों को सुलझाने के बजाय अदालतों में मामला जारी रखना अधिक सुरक्षित समझते हैं, ताकि उन पर लापरवाही का आरोप न लगे;

कुछ दिन पहले जस्टिस नागरत्ना ने कहा है कि “Judges who are unable to live within their known source of income and fall prey to greed and temptation must be weeded out of the system” - मतलब साफ है जज भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं

उसके भी पहले कहा था -“नोटबंदी से काला धन सफ़ेद में बदला; हम सब जानते हैं कि 8 नवंबर 2016 को क्या हुआ था, कालेधन का खत्म कहां हुआ? यह कालेधन को सफ़ेद बनाने का एक अच्छा तरीका था” यानी सीधे मोदी जी को चुनौती दी थी

यह कोई नया राग नहीं है जो जस्टिस नागरत्ना ने अलापा है

इसके पहले भी 11th August, 2023 को Justices BR Gavai, PS Narasimha, and Prashant Kumar Mishra की पीठ ने कहा था करीब 70% सरकार के केस Frivolous होते हैं सरकार litigation policy को क्रियान्वित करने की बात करती है लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है

मई, 2023 में भी जस्टिस गवई की बेंच ने कहा था करीब 40% केंद्र और राज्य सरकारों के केस आधारहीन होते हैं

मैंने एक RTI में सुप्रीम कोर्ट से जस्टिस गवई की बेंच की टिप्पणी पर पूछा था कि केंद्र सरकार कितने cases में पार्टी है मुझे 10 नवंबर, 2023 के जवाब में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हैरान करने वाली जानकारी दी गई जिसमें बताया गया कि केंद्र सरकार 11349 मामलों में Petitioner है और 35601 मामलों में Respondent है यानी 46950 मामलों में मात्र 24% केस में सरकार वादी है मतलब केवल 24% केस सरकार ने फाइल किये हुए थे

जाहिर है 11349 मामलों में सरकार की अपील भी शामिल होंगी जो हाई कोर्ट के उसके खिलाफ फैसलों के विरुद्ध फाइल की गई होंगी और इसलिए गवई बेंच का सरकार के cases को frivolous कहना उचित नहीं था

इसका मतलब साफ़ है केंद्र सरकार मुख्य Litigant है वो भी frivolous cases में कहना सही नहीं है 

ऐसा ही  सर्टिफिकेट जस्टिस नागरत्ना ने भी दे दिया क्या सरकार को किसी मामले में अपील करने का भी अधिकार नहीं है? उदाहरण के लिए क्या ट्रायल कोर्ट के शराब घोटाले में केजरीवाल गैंग को डिस्चार्ज करने के खिलाफ भी अपील नहीं करनी चाहिए? और अगर हाई कोर्ट सरकार की अपील खारिज करती है तो क्या उसे सुप्रीम कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं है?