पंजाब में भी ‘केजरी मॉडल’ के गुब्बारे की निकली हवा, वादों के भंवर में फंसे लाखों नाराज कर्मचारी


पंजाब में साल 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान ‘बदलाव’ की आंधी पर सवार होकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी और उसके बहुचर्चित ‘केजरी मॉडल’ की कलई अब पूरी तरह खुल चुकी है। मुफ्त बिजली और लोक-लुभावन गारंटी के विज्ञापनों की चमक के पीछे वित्तीय कुप्रबंधन का एक ऐसा दलदल तैयार हो गया है, जिसमें राज्य की रीढ़ कहे जाने वाले सरकारी कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस प्रदेश को देश के सामने एक आदर्श गवर्नेंस मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था, आज उसी पंजाब के 3 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी सड़कों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह अभूतपूर्व संकट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह उन झूठे चुनावी वादों, प्रशासनिक अहंकार और वित्तीय कंगाली का सीधा परिणाम है, जिसने पंजाब की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह वेंटिलेटर पर लाकर खड़ा कर दिया है।

महा-हड़ताल ने आर्थिक रूप से पंगु बने राज्य की पोल खुली
राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए हवा में उछाले गए ‘केजरी मॉडल’ की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो पार्टी कल तक कर्मचारियों के हर धरने में जाकर उनके हक की वकालत करती थी, आज सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही वह उनके प्रति क्रूर और उदासीन हो गई है। इससे साफ है कि कर्मचारियों के हक की बातें सिर्फ झूठा स्वांग भर ही थीं। मुख्यमंत्री भगवंत मान का आंदोलनकारी कर्मचारियों से बात करने से साफ इनकार कर देना और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकियां देना साफ दर्शाता है कि ‘आप’ सरकार संवादहीनता के उस दौर में पहुंच चुकी है, जहां जनता और कर्मचारियों की जायज मांगें भी उसे गुनाह नजर आती हैं। 27 अगस्त की ऐतिहासिक महा-हड़ताल ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब का कर्मचारी अब केवल कागजी आश्वासनों से बहलने वाला नहीं है। मुफ्तखोरी की राजनीति और बजटीय प्राथमिकताओं को दरकिनार करने के कारण समृद्ध राज्य आर्थिक रूप से पंगु हो चुका है और उसके कर्मचारी अपने ही हक के लिए लाठियां और पानी की बौछारें सहने को विवश हैं।

भगवंत मान सरकार ने चार सालों में केवल आश्वासन दिए
पंजाब की आप सरकार पर सवालिया निशान यह है कि आखिरकार राज्य के कर्मचारी इतने उग्र क्यों हो रहे हैं। वे सामूहिक अवकाश लेकर पूरे राज्य को ठप करने जैसा आत्मघाती कदम उठाने को क्योकर विवश हो रहे हैं? इसका सीधा-सा जवाब है कि लगातार टूटते वादे और आर्थिक शोषण। कर्मचारियों का आरोप है कि भगवंत मान सरकार ने पिछले चार सालों में केवल आश्वासन दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर एक भी वित्तीय मांग को पूरा नहीं किया। यह आंदोलन तब और भड़क उठा जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा कर्मचारियों के हक में फैसला दिए जाने के बावजूद मान सरकार ने उनके बकाया भत्तों का भुगतान नहीं किया। इसे कर्मचारी न्यायपालिका का अपमान और अपने अधिकारों पर डकैती मान रहे हैं।

कर्मचारियों को न महंगाई भत्ता न ही मिल रहा पूरा वेतन
सबसे अहम बात यह है कि राज्य के कर्मचारी संगठनों (सांझा मुलाजम मंच और पेंशनर्स फ्रंट) की मांगें कोई नई या नाजायज नहीं हैं। उनकी सबसे पहली मांग है पिछले लंबे समय से लंबित 18 प्रतिशत महंगाई भत्ता (DA) और छठे वेतन आयोग (6th Pay Commission) के बकाए का तुरंत भुगतान किया जाए। यह लगातार लेटलतीफी के चलते करीब 20,161 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू रहा है। इसके अलावा, पुरानी पेंशन योजना (OPS) की पूर्ण बहाली, कच्चे और कॉन्ट्रैक्ट (ठेके) पर काम कर रहे कर्मचारियों का नियमितीकरण, और 17 जुलाई 2020 के उस काले नोटिफिकेशन को रद्द करना जिसके तहत नए भर्ती कर्मचारियों को केवल मूल वेतन दिया जा रहा है। ये ऐसी मांगें हैं जिन पर आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए कर्मचारियों के साथ धरने पर बैठकर सहमति जताई थी।

‘केजरी मुफ्त मॉडल’ के चलते सरकार पर कर्ज का बोझ
सरकार की नीयत पर उठने वाला बड़ा सवाल यह है कि जो सरकार विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, वह अपने कर्मचारियों की मांगें पूरी क्यों नहीं कर पा रही? असल में, ‘केजरी मॉडल’ का पूरा ढांचा मुफ्त बिजली, महिलाओं को भत्ते और अन्य लोक-लुभावन गारंटियों पर टिका है। इन गारंटियों को पूरा करने के चक्कर में पंजाब का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है। राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार अधिक से अधिक होते हुए अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सरकार के पास दैनिक प्रशासनिक खर्चे और कर्मचारियों को समय पर वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं, तो वह 20 हजार करोड़ से अधिक का डीए बकाया कहां से चुकाएगी? अपनी इसी वित्तीय विफलता को छिपाने के लिए सरकार कभी अदालतों का बहाना बनाती है तो कभी केंद्र सरकार पर फंड रोकने का आरोप लगाती फिरती है।

चपेट में कई प्रमुख विभाग: सचिवालय से अस्पताल तक ठप
राज्य के कर्मचारियों की इस महा-हड़ताल का असर पंजाब के किसी एक कोने में नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है। पंजाब सिविल सचिवालय के कर्मचारी, डीसी दफ्तरों के कर्मचारी, राजस्व विभाग के तहसीलदार (जो पहले से ही सतर्कता छापों के खिलाफ हड़ताल पर थे), शिक्षा विभाग के सरकारी शिक्षक और पंजाब रोडवेज के कर्मचारी समेत कई संगठनों के कर्मचारी इसमें शामिल हैं। सबसे दुखद स्थिति स्वास्थ्य विभाग की है, जहां सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के हड़ताल पर जाने के कारण ओपीडी सेवाएं पूरी तरह बंद रहीं। गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकते रहे, लेकिन भगवंत मान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है।

आप के चुनावी वादों की फेहरिस्त अब तो ‘जुमला’ बन गई
साल 2022 के चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने पंजाब के हर वर्ग के कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्होंने कहा था कि सरकार बनते ही कैबिनेट की पहली बैठक में सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का कर दिया जाएगा। उन्होंने हिमाचल और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर पंजाब में भी पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने का ढिंढोरा पीटा था। लेकिन सत्ता में आने के बाद ओपीएस के नाम पर केवल एक कागजी अधिसूचना जारी करके छोड़ दी गई, जिसे आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने की फाइलें आज भी सचिवालय की अलमारियों में धूल फांक रही हैं।

पंजाब के इतिहास में यह पहली बार सड़कों पर इतने कर्मचारी – भाजपा
भाजपा पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने राज्य में कर्मचारियों और पेंशनरों द्वारा की गई महा-हड़ताल को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि कर्मचारी हर सरकार की रीढ़ की हड्डी होते हैं, लेकिन पंजाब के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी और पेंशनर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हुए हैं। ढिल्लों ने आरोप लगाया कि ‘आप’ सरकार ने कर्मचारियों का लगभग 15,000 करोड़ रुपये का महंगाई भत्ता नहीं देकर उनके साथ सीधे तौर पर धोखा किया है। माननीय हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सरकार डीए जारी करने से बच रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दूसरे राज्यों के चुनावों में वोट बटोरने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च कर दिए, लेकिन अपने ही राज्य के कर्मचारियों को उनका हक देने के समय खजाना खाली होने का बहाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा कर्मचारी संगठनों के साथ तय बैठकों से दो-दो बार पीछे हटना बेहद निंदनीय है। सरकार की इस टालमटोल की नीति के कारण आज आम जनता को सरकारी कार्यालयों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी भगवंत मान सरकार की है।

मोहन भागवत जी ने जीवन दर्शन विस्तार से समझाया; नहीं हिंदू राष्ट्र की बात की और न मुसलमानों के लिए कुछ कहा

सुभाष चन्द्र
मैंने मोहन भागवत जी का अगस्त 29 मेडिसन स्क्वायर में दिया हुआ पूरा भाषण सुना उन्होंने मानवता और मानव के जीवन दर्शन का व्याख्यान किया और कहीं भी न हिंदू राष्ट्र की बात की और न एक शब्द मुसलमानों के लिए कहा लेकिन फिर भी प्रिंट मीडिया ने अपने शब्द उनके मुंह में घुसेड़ दिए कि उन्होंने कहा कि मुसलमानों भारत से भगाने की इच्छा रखने वाले हिंदू नहीं है जबकि यह बात उन्होंने कही ही नहीं चाहे तो कोई उनका भाषण यूट्यूब पर सुन सकता है। 

मीडिया की इस शरारत को देख लगता है मीडिया आरएसएस विरोधियों की तरह संघ का विरोधी है। क्या कभी किसी पार्टी या मीडिया को मुस्लिम लीग, हिन्दू उत्सवों पर पत्थरबाज़ी करने वालों का विरोध करते देखा है? क्योकि इन लोगों ने माँ का दूध ही नहीं पिया।   

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भागवत जी के व्याख्यान में एक बहुत विशेष बात थी जो उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से कही कि अमेरिका आप की कर्मभूमि है, आपको इसके प्रति निष्ठावान होना चाहिए जन्मभूमि/मातृभूमि के लिए कुछ कर सकते हो तो करो लेकिन जन्मभूमि/मातृभूमि आपसे यह अपेक्षा नहीं करती यह संदेश हर देश के लोगों के लिए था

उनके भाषण में एक और वृतांत प्रमुख था उन्होंने कहा कि एक समय में कुछ लोग जीविका की तलाश में निकले सब आपस में जानते थे लेकिन उनमे दो विपरीत विचार थे एक विचार था जियो और जीने दो और दूसरा विचार था, हम जिएंगे लेकिन उनको रहने देंगे जो हमारे कहे अनुसार चलेंगे, अब इसका मतलब कोई भी समझ सकता है किसके लिए कहा होगा

भागवत जी के भाषण के प्रमुख बिंदु नीचे दिए है और कोई भी उनमें किसी प्रकार की कमी निकाल कर दिखा दे, अलबत्ता राहुल विंची जरूर उनके भाषण को नफरत भरा कह सकता है जबकि उसमें नफरत की कोई बात नहीं थी

“मानवता एक है, धर्म अलग-अलग हो सकते हैं”

उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्मों और धार्मिक परंपराओं के बावजूद मानवता मूल रूप से एक है। उनके अनुसार सत्य एक है, लेकिन उसे समझने और उस तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं।

2. विविधता में हमारी एकता की सजावट है

उन्होंने विविधता को विभाजन का कारण नहीं बल्कि अंतर्निहित एकता का सौंदर्य और विस्तार बताया। विभिन्न समुदायों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों का सम्मान, संरक्षण और स्वीकार करना आवश्यक है।

3. “मैं” और “मेरा” की बजाय “हम” और “हमारा”

भाषण का एक महत्वपूर्ण संदेश था कि केवल व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना समस्याएं पैदा करती है, जबकि “हम” और “हमारा” की भावना समाधान की दिशा देती है।

4. धर्म का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं

उन्होंने कहा कि आज धर्म को अक्सर उसके rituals और बाहरी practices से पहचाना जाता है। उनके अनुसार कर्मकांड का अपना स्थान है, लेकिन धर्म का अंतिम उद्देश्य सत्य और उच्चतर आध्यात्मिक समझ की ओर ले जाना है।

5. हर व्यक्ति की गरिमा और समानता

उन्होंने मानव गरिमा और मनुष्यों की मूलभूत समानता पर जोर दिया। उनके अनुसार बाहरी भिन्नताएँ प्रकृति की विविधता का हिस्सा हैं और उनसे मानवता की मूल एकता समाप्त नहीं होती।

6. राजनीति से अधिक समाज की शक्ति

उन्होंने यह विचार भी रखा कि स्थायी और वास्तविक परिवर्तन केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि समाज के भीतर परिवर्तन और जन-सहमति से आता है।

7. सेवा कार्यों का उल्लेख

उन्होंने RSS के सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवा कार्य लोगों के प्रति भेदभाव किए बिना किए जाते हैं।की 

मनुस्मृति पर राहुल विंची को करारा जवाब

           चित्र में पहली ईसाई है, दूसरी मुस्लिम, और तीसरी साड़ी में मनुस्मृति द्वारा गुलाम बनाई हुई महिला है।

जब से राहुल गाँधी ने मनुस्मृति को लेकर जहर उगला है, तब से सोशल मीडिया पर निम्न लेख खूब चर्चित हो रहा है। सनातन पर हमला करना आसान है क्योकि हिन्दू सहिष्णु है हिंसक नहीं। लेकिन जब सीमा पार हो जाती है, हाथ में हथियार उठाने से पीछे नहीं हटता। हिन्दू शास्त्र साक्षी है। जब-जब राक्षसों ने अति की हमारे देवी-देवताओं ने शस्त्र उठाए। जब कोई राक्षस देवताओं से पराजित नहीं हुआ देवी माता का आव्हान कर नाना प्रकार के शस्त्रों से सुशोभित कर राक्षसों का वध किया। यही शायद मुख्य कारण है वर्ष में दो बार नवरात्रों में माता रानी का गुणगान किया जाता है। इतना ही नहीं नारी कितनी बलशाली है इसका भी उदाहरण ज्येष्ठ माह में बढमवास, सावन में रक्षा बंधन और कार्तिक माह में करवाचौथ। क्या राहुल किसी अन्य मजहब में नारी का इतना सम्मान दिखा सकने की हिम्मत रखते हैं?

    " मनुस्मृति "

मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं आप?
मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?
मनुस्मृति कहती है - "विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?
" पुत्रेण दुहिता समा" - अर्थात, पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप?
क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए। स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर। मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अब तक लेकर आए आप?
बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते।
"आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः- अर्थात, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती है, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप?
धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?
पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या।
जीवेच्छिल्पैर गर्हितः- आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः- धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है, आधी आबादी। पूरे पचास प्रतिशत - उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। इससे एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की जिम्मेदारियां हैं।
मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।
मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः सौभाग्य शालिनी और सौभाग्य लाने वाली कहा।
मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः सम्मान की अधिकारी कहा।
मनुस्मृति ने स्त्री को गृह दीप्तयः घर को प्रकाश और प्रसन्न रखने वाली कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।
अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसंग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।
लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। कुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गांधी आज स्त्रीवादी बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हमने भी नहीं है, इसलिए जो कहा जाता है मान लेते हैं। सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी।
अब राहुल गांधी हिंदू लड़की और महिलाओं को सनातन धर्म के खिलाफ बरगलाने का काम कर रहा है। अभी हाल में मनुस्मृति पर जहर उगलते हुए बोला कि हिंदू महिलाएं गुलाम है मनुस्मृति ने उन्हें पिंजरे में कैद कर रखा है।
राहुल गांधी चाहते है कि हिंदू महिलाएं अपनी सनातनी परंपरा से बगावत कर मुस्लिम या ईसाई बनकर खुद को प्रगतिशील बनाए।

भारत की छवि खराब करने की बड़ी साजिश, मोहरा बनी CJP, ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हंगामा करने का टूलिकट तैयार; संयम की अग्नि परीक्षा मत लो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधी इतनी नीचता पर गिर चुके हैं कि जब भी देश में कोई विदेशी आता है विरोधी कोई न कोई हंगामा कर भारत की छवि ख़राब इस तरह कर रहे जैसे वो कोई भारतीय नहीं बल्कि किराये के टट्टू हों। जिन्हे जहाँ चाहो छोड़ दो। क्या ये उपद्रवी चाहते हैं कि देशप्रेमी पुलिस और अन्य सुरक्षाकर्मियों को पीछे कर इन्हे छटी दूध पिलाने सड़क पर उतरें? आखिर बर्दाश्त की भी एक हद होती है।  

भारत वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, कूटनीति और तकनीकी प्रगति के कारण तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यह जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। वैश्विक स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बढ़ता कद, अपनी शर्तों पर ट्रेड एग्रिमेंट और बहुपक्षीय मंचों (जैसे ब्रिक्स और जी20) पर अग्रणी भूमिका ने विश्व के शक्तिशाली देशों को हैरान कर दिया है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय ताकतें भारत की छवि खराब करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के विरोधियों को मोहरा बना रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, घरेलू असंतोष (जैसे परीक्षा पत्र लीक और छात्र मुद्दों) को हथियार बनाकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक अस्थिर राष्ट्र के रूप में पेश करने की बड़ी साज़िश रची जा रही है। इसके तहत 12 और 13 सितंबर 2026 को होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान फिर बड़े हिंसक आंदोलन का टूलकिट तैयार किया गया है।

CJP का 5 सितंबर को दिल्ली में विरोध मार्च का ऐलान
दरअसल, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 5 सितंबर 2026 को दिल्ली में बंद और राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण विरोध मार्च का ऐलान किया है। सीजेपी ने भारत सरकार पर युवाओं से किए गए वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया है। कॉकरोच जनता पार्टी की नेशनल वर्किंग कमेटी की 24 अगस्त, 2025 को 2 बजे ऑलाइन मीटिंग हुई। इसमें फैसला लिया गया कि 5 सितंबर को शांतिपूर्ण मार्च नई दिल्ली के इंडिया गेट से शुरू होगा। प्रदर्शनकारी यहां से नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय की ओर आगे बढ़ेंगे। CJP ने बताया कि मार्च का नेतृत्व NEET परीक्षा से जुड़े मामलों में जान गंवाने वाले छात्रों के परिजन और पुलिस बर्बरता के पीड़ितों के परिवार करेंगे। सीजेपी के मुताबिक, इन परिवारों के साथ छात्र और युवा संगठन भी मार्च में शामिल होंगे। इसके अलावा देशभर से युवा नागरिकों के दिल्ली पहुंचने की उम्मीद है।

CJP ने वादों को पूरा नहीं करने का लगाया आरोप
नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान सीजेपी सरकार के सामने तीन मांगें रखी थीं। सबसे बड़ी मांग थी शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। यह मांग पूरी होने के बाद सीजेपी ने आंदोलन को वापस ले लिया था। सरकार के सामने दो और मांगें रखी गईं थीं, नीट पेपर लीक की वजह से खुदकुशी करने वालों के परिवारों को एक करोड़ रुपये मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को रद्द करना। सीजेपी का कहना है कि केंद्र सरकार ने उन्हें इन दोनों वादों को पूरा करने का भरोसा दिया था, जो अब तक नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का धैर्य एक महीने में ही टूट गया है और उन्हें सरकार के वादे याद आ रहे हैं, जबकि झारखंड में छात्र अभी तक आंदोलन कर रहे हैं।

 

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की टाइमिंग पर उठे सवाल
सीजेपी के नेताओं को झारखंड में कई हफ्तों से आंदोलन कर रहे छात्र याद नहीं आ रहे हैं। झारखंड की राजधानी रांची में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच पुलिस ने आंदोलन के नेताओं और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। 21 अगस्त को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प के मामले में रांची पुलिस ने कम से कम तीन FIR दर्ज की हैं। इन मामलों में 14 लोगों को नामजद किया गया है, जबकि 200 से अधिक अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। छात्रों के आंदोलन स्थल रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और उसके आसपास प्रशासन ने धारा 163 (निषेधाज्ञा) लागू कर दी है और स्टेडियम के गेट बंद कर दिए गए हैं। झारखंड सरकार की इस सख्ती के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी को झारखंड के छात्रों के साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है,क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का मकसद कुछ और है। 5 सितंबर को होने वाले बंद और राष्ट्रव्यापी विरोध मार्च की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

12 और 13 सितंबर 2026 को दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन
राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर 2026 को 18वां ब्रिक्स सम्मेलन होने जा रहा है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में ग्यारह सदस्य देश- ब्राज़ील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात शामिल हो रहे हैं। इनके अलावा दस भागीदार देश भी शामिल होंगे। ब्रिक्स सम्मेलन से पहले देश के विभिन्न शहरों में कई sectoral और मंत्रिस्तरीय बैठकें आयोजित की जा रही हैं। ब्रिक्स युवा एवं खेल मंत्रियों की बैठक 22 और 23 अगस्त, 2026 को विशाखापत्तनम में आयोजित की गई। इससे पहले 21 अगस्त को जयपुर के रामबाग पैलेस में ब्रिक्स देशों के पर्यटन मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक हुई। दो दिवसीय मंत्रिस्तरीय बैठक में ब्रिक्स सदस्य देशों के पर्यटन मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इस तरह 12-13 सितंबर को होने वाले मुख्य सम्मेलन से पहले कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

11 सदस्य देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष, शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधिमंडल होंगे शामिल
इस उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन में लगभग 20 देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष, शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधिमंडल भाग लेंगे। सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकीयन सहित कई वैश्विक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। इसको देखते हुए व्यापक तैयारियां की जा रही हैं।समिट से जुड़े बड़े कार्यक्रमों, जैसे ब्रिक्स बाजार, ब्रिक्स रन एंड राइड, ब्रिक्स म्यूरल्स एंड पेंटिंग और ब्रिक्स फूड फेस्टिवल के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। समिट शुरू होने से पहले 30 अगस्त को एनडीएमसी द्वारा ब्रिक्स रन एंड राइड का भी आयोजन किया जाएगा। समिट से जुड़े लगभग सभी कार्यक्रम भारत मंडपम् में आयोजित होंगे। इसके अलावा ज्यादातर विदेशी मेहमान NDMC के तहत आने वाले फाइव स्टार होटल्स में ठहरेंगे। लेकिन समिट में शामिल होने वाले 20 देशों के मेहमानों की नजर में भारत की अच्छी छवि बनाने के लिए अलग से बंदोबस्त करने के लिए कहा गया है।

BRICS समिट में शामिल हो सकते हैं रूसी राष्ट्रपति पुतिन 
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी ब्रिक्स समिट में शामिल हो सकते हैं। मॉस्को में सोमवार 24 अगस्त, 2026 को भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जल्द मुलाकात की उम्मीद जताई। दोनों नेताओं ने भारत-रूस के रिश्तों और आपसी सहयोग को लेकर भी चर्चा की। जयशंकर रविवार को मॉस्को पहुंचे थे। वह रूस के अपने दो दिन के दौरे पर हैं। जयशंकर ने पुतिन से कहा कि पीएम मोदी ब्रिक्स समिट के लिए पुतिन का भारत में स्वागत करेंगे। दोनों नेताओं की सालाना बैठक भी जल्द होगी। उन्होंने बताया कि पीएम मोदी किर्गिजस्तान में होने वाली SCO समिट में उनसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

चीन के राष्ट्रपति की BRICS समिट में शामिल होने की उम्मीद
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS समिट में शामिल हो सकते हैं। यह उनका 7 साल बाद भारत का पहला दौरा होगा। भारत 12-13 सितंबर को BRICS सम्मेलन की मेजबानी करेगा। रॉयटर्स के मुताबिक, जिनपिंग के साथ करीब 400 अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल आ सकता है। जिनपिंग आखिरी बार 2019 में भारत आए थे। तब उनके साथ 200 से कम अधिकारी थे। जिनपिंग के भारत दौरे की तैयारियों में LAC पर शांति और सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दों में है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं, जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर न पड़े। भारत और चीन के बीच सिर्फ सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि व्यापार और आर्थिक रिश्ते भी बातचीत का हिस्सा हैं। भारत चीन के साथ अपने बड़े व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। इसके अलावा रेयर अर्थ मैगनेट और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जैसे जरूरी सामान की सप्लाई को लेकर भी भारत अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।

एनएसए अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की मुलाकात
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच मंगलवार 25 अगस्त,2026 को Special Representatives स्तर की महत्वपूर्ण वार्ता हुई। बातचीत में भारत-चीन सीमा विवाद के साथ-साथ दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में सुधार और आगे की राह पर चर्चा हुई। यह वार्ता ऐसे समय में हुई है जब भारत और चीन के बीच संबंधों को स्थिर करने तथा सीमा पर शांति एवं विश्वास बहाल करने के प्रयास जारी हैं। बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित BRICS Summit में शामिल होने की उम्मीद है। ऐसे में डोभाल-वांग वार्ता को दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ब्रिक्स सम्मेलन पर अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व और भू-राजनीतिक तनाव का साया
सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले BRICS सम्मेलन को लेकर अमेरिका की मुख्य चिंता ब्रिक्स देशों द्वारा अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को अपनाने की कोशिशों से जुड़ी है। ईरान और अन्य सदस्य देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता खत्म करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं और डिजिटल करेंसी लिंकेज पर जोर दे रहे हैं, जिससे अमेरिकी आर्थिक हितों को चुनौती मिल रही है। अमेरिका ने ईरान या अन्य विरोधी देशों के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भारी टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है, जिससे भारत जैसे देशों के सामने रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती पैदा हो गई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण ब्रिक्स मंच पर भी सदस्य देशों के बीच स्पष्ट मतभेद देखे जा रहे हैं, जिसे कूटनीतिक हलकों में पश्चिमी प्रभाव और ब्रिक्स की एकजुटता के बीच खिंचाव के रूप में देखा जाता है।

वैश्विक मीडिया की मौजूदगी में भारत की छवि खराब करने की साजिश 
प्रधानमंत्री मोदी और देश विरोधी ताकतें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान वैश्विक मीडिया की मौजूदगी का फायदा उठाकर भारत की छवि खराब करने की कोशिश में हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन जैसे वैश्विक मंचों के दौरान बड़े पैमाने पर डिजिटल टूलकिट अभियान और जमीनी विरोध प्रदर्शन की तैयारी के संकेत मिल रहे हैं, ताकि भारत में मानवाधिकार और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए जा सकें। अगर 5 सितंबर से शुरू होने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के मार्च के दौरान कोई हिंसा होती है, तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है। ऐसी स्थिति में वैश्विक मीडिया और मानवाधिकार निकायों द्वारा सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश की जा सकती है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया का हुआ था गलत इस्तेमाल
हाल ही में दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के ‘चलो संसद’ मार्च और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान जिस तरह सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल किया गया, वो आंतर्राष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल अभियानों और ‘टूलकिट’ के ज़रिए किसी देश की घरेलू राजनीति या अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करने की रणनीति आधुनिक हाइब्रिड वॉरफेयर (Hybrid Warfare) का एक प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। टूलकिट का इस्तेमाल मुख्य रूप से सामाजिक असंतोष को भड़काने, विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी मुद्दे को बड़ा बनाने के लिए किया जा रहा है। सीजेपी प्रदर्शन के दौरान एल्गोरिदम के कारण उपयोगकर्ताओं को ध्रुवीकृत या अतिवादी वीडियो (जैसे केवल पुलिस कार्रवाई या केवल प्रदर्शनकारियों की आक्रामकता) अधिक दिखाए गए, जिससे समाज में अलग-अलग और परस्पर विरोधी धारणाएं बनीं। एल्गोरिदम को प्रभावित कर भीड़ के आक्रोश को और बढ़ाया गया।

अतीत में कांग्रेस और मोदी विरोधी ताकतों ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और महत्वपूर्ण अवसरों पर भारत की छवि खराब करने की कोशिश की

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दौरान युवा कांग्रेस का अर्धनग्न प्रदर्शन
20 फरवरी 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का आयोजन किया गया था। इसमें देश व विदेश के भी काफी प्रमुख लोग आमंत्रित थे तथा यह इवेन्ट अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में था। इसमें 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष, 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि, कंपनियों के सीईओ और एआई एक्सपर्ट शामिल हुए थे। इस दौरान भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) के कार्यकर्ताओं ने अर्धनग्न (शर्टलेस) होकर विरोध प्रदर्शन किया था। युवा कांग्रेस के करीब 6-10 कार्यकर्ताओं ने अंदर पहुंचकर अपनी शर्ट और जैकेट उतारकर नारेबाज़ी की।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल करने की कांग्रेस की कोशिश
युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की शॉर्ट लेस प्रदेश की पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। कई राजनीतिक दलों ने प्रदर्शन करने के तरीके पर सवाल खड़े किए। भाजपा ने इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुए विरोध को देश की छवि धूमिल करने वाला और शर्मनाक बताया था। देश को बदनाम करने के लिए रची गई इस साजिश का पर्दाफाश करने के लिए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मात्र तीन दिनों में दो राज्यों में ताबड़तोड़ छापेमारी करते हुए कांग्रेस के सात नेताओं को गिरफ्तार किया था। इसमें भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव कृष्णा हरि, राष्ट्रीय समन्वयक नरसिम्हा यादव सहित कई कार्यकर्ता शामिल थे।

2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान उमर खालिद का ऐलान और दिल्ली दंगा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 24 और 25 फरवरी 2020 को भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए थे। जब ट्रंप अहमदाबाद और नई दिल्ली में आधिकारिक कार्यक्रमों में व्यस्त थे, उसी दौरान 24-25 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली (जैसे सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, खजूरी खास) में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर हिंसक झड़पें और सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। राजधानी में हुई इस हिंसक घटना से वैश्विक स्तर पर भारत की छवि पर असर पड़ा और ट्रंप के दौरे की चमक फीकी पड़ गई। दिल्ली पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट और गृह मंत्रालय के अनुसार, यह हिंसा सुनियोजित थी। पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि हिंसा का समय जानबूझकर ट्रंप के दौरे के वक्त रखा गया था, क्योंकि उस दौरान प्रशासनिक अमला और सुरक्षा एजेंसियां वीआईपी मेहमान की सुरक्षा व व्यवस्था में व्यस्त थीं। इस हिंसा में 50 से अधिक लोगों की जान गई थी और भारी नुकसान हुआ था। दिल्ली दंगे से पहले उमर खालिद ने ऐलान किया था, “हम वादा करते हैं कि 24 तारीख को जब डोनाल्ड ट्रंप हिन्दुस्तान आएंगे, तो हम ये बताएंगे कि हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री और हिन्दुस्तान की सरकार हिन्दुस्तान को बांटने का काम कर रही है। महात्मा गांधी के वसूलों की धज्जियां उड़ा रही हैं। ये बताएंगे कि हिन्दुस्तान की आवाम हिन्दुस्तान के हुक्मरानों के खिलाफ लड़ रही है। हम तमाम लोग सड़कों पर निकलकर आएंगे।”

आंबेडकर का हर पार्टी कर रही अपमान; आरक्षण हटाओ आंदोलन करने वाले अगर खुद सत्ता में बैठ जाएं तो क्या वो उसे समाप्त कर सकेंगे?

सुभाष चन्द्र

हो सकता है मेरे लेख पर मुझे बहुत कुछ भला बुरा सुनने को मिलेगा लेकिन एक सीधी बात आरक्षण हटाओ आंदोलन करने वालों को कहना चाहता हूँ कि अगर आप सोचते हैं कि मोदी विरोध कर उसे हटा कर आप आरक्षण समाप्त करा सकेंगे, तो यह आपकी भूल है।

गौरतलब बात है कि आरक्षण का दुरुयोग होते देख डॉ भीमराव अम्बेडकर ने आरक्षण को ख़त्म करने की बात कही थी जिसे कोई आंबेडकर प्रेमी पार्टी लागु करनी की हिम्मत नहीं कर रहा विपरीत इसके जातिगत पार्टियां बनाकर जनता को गुमराह कर रही हैं। आरक्षण ख़त्म करने के लिए सबसे पहला आरक्षण विरोधियों को जातिगत आधारित पार्टियों को वोट देना बंद करना होगा। जबतक इन पार्टियों का खात्मा नहीं होगा आरक्षण ख़त्म नहीं हो सकता। दूसरे, चुनाव आयोग द्वारा घोषित आरक्षित सीटों पर भी वोट के अधिकार का उपयोग नहीं करना होगा।     

आरक्षण को केवल एक अकेली भाजपा चाहे भी तो ख़त्म नहीं कर सकती क्योंकि आरक्षण को कोई भी पार्टी समाप्त नहीं करना चाहती एक बार आंदोलन चलाने वाले खुद अपने नेताओं की सभी दलों से मीटिंग करें और चर्चा करे के देखें कि आरक्षण कैसे समाप्त किया जा सकता है

कोई दल आपके साथ नहीं खड़ा होगा और बिना सबकी सहमति के उसे समाप्त नहीं किया जा सकता अगर आंदोलन चलाने वाले स्वयं सत्ता में आ जाएं जिसकी कोई संभावना नहीं है, तब भी वे सत्ता में बैठ कर आरक्षण समाप्त नहीं कर सकेंगे किसी अध्यादेश जारी करने से भी ख़त्म नहीं हो सकता क्योंकि सुप्रीम कोर्ट उसे स्टे कर देगा 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
आरक्षित श्रेणी 75-76% लोगों की है जिसमें SC/ST/OBC शामिल हैं और जनरल कैटेगरी जिसे सवर्ण भी कहते हैं 24-25% है आप भाजपा की वोट में सेंध तो लगा सकते हैं लेकिन उससे क्या मिलेगा क्योंकि अगर कोई दूसरा आएगा तो वह वर्तमान आरक्षण को और बढ़ा देगा, जैसे राहुल गांधी और अन्य दल तो प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण देने की बात करते हैं

भाजपा को हटाकर दूसरा आने वाला दल सवर्णों की क्या दुर्दशा करेगा इसकी आप लोग  कर सकते अभी दो दिन पहले ही राहुल गांधी ने मनुस्मृति का अपमान करके हिंदू मानस का अपमान किया है राहुल गांधी आरक्षण को 50% से ज्यादा करने की भी बात करता है तो फिर विरोध उसके खिलाफ क्यों नहीं करते?

समाजवादी पार्टी ने नेता राजकुमार भाटी ने ब्राह्मणों को वेश्याओं से भी गिरा हुआ कहा था और अखिलेश यादव ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की 

विपक्ष को दीवारों पर लिखा दिखाई दे रहा है कि अगर हिंदू वोट एकजुट हो गया तो मुस्लिम वोट बैंक उनके लिए किसी काम का नहीं रहेगा और यह बंगाल में देख लिया एकमात्र उपाय विपक्ष के सामने बचा है हिंदुओं को तोड़ने का और आरक्षण की आग लगा कर उनका उद्देश्य पूरा हो सकता है, तो क्या आरक्षण विरोधी विपक्ष के इशारों पर खेल रहे हैं और उसके लिए उत्तर प्रदेश और 2029 के चुनाव के लिए पिच तैयार कर रहे हैं 

आरक्षण कोई नई चीज़ नहीं है 1932 के पूना पैक्ट में विधायिका और केंद्र सरकार की नौकरियों में SC/ST 1942-43 से लागू करके संविधान में 1950 में स्थाई रूप से जोड़ दिया गया था विधायिका में आरक्षण जो 10 वर्ष के लिए दिया गया था उसे 1960 में ख़त्म होना था लेकिन उसे हर सरकार 10-10 वर्ष के लिए बढाती और अब यह 2030 तक चलेगा सबसे मजे  की बात है कि आरक्षण बढ़ाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों  सर्वसम्मति से पारित होता है और कोई दल विरोध नहीं करता

कई राज्यों ने आरक्षण 50% से ज्यादा करने की कोशिश की हैं लेकिन अदालत से स्वीकार नहीं हुआ - एक तमिलनाडू ऐसा राज्य है जहां आरक्षण 69% है - SC के लिए 18%, 30% for Backward Classes (BC), 20% for Most Backward Classes (MBC) और 1% ST  के लिए है - केंद्र सरकार से आरक्षण हटाने की मांग करने से पहले तमिलनाडु में हल्ला बोल करना चाहिए क्योंकि वहां तो निर्धारित 50% की सीमा के ऊपर आरक्षण दिया जा रहा है -

ऐसा नहीं है जनरल कैटेगरी वाले कुछ नहीं कर रहे हैं - देश में Startups के बारे में जानकारी ज्ञानवर्धक हो सकती है जहां कोई आरक्षण नहीं है -

Total Startups: Recognized by the Department for Promotion of Industry and Internal Trade (DPIIT) surpassing 2.23 lakh as of March 2026.

Total Unicorns: India hosts around 110–130+ private companies valued at over $1 billion.

Total Workforce: Government data reports more than 23.36 lakh direct jobs created across these recognized entities

देश में पहले ही कई समस्याएं है - नए नए आंदोलन शुरू कर देश को आग लगाने से सभी का नुकसान होगा - 

फैक्ट चेक से डरीं सोनिया गांधी? पेंगुइन ने नकारी आत्मकथा, इतिहास बदलने की कोशिश नाकाम! 2004 के ‘त्याग’ वाले नैरेटिव पर पर्दा और असल वजहों को छिपाने की कोशिश


कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने इस किताब को भारत में प्रकाशित करने से साफ इनकार कर दिया है। पब्लिशर ने पांडुलिपि में जरूरी संपादकीय बदलाव, तथ्य जांच (फैक्ट चेक) और कुछ असत्यापित अंशों को हटाने का सुझाव दिया था, जिसे सोनिया गांधी ने मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद प्रकाशक ने अपने हाथ पीछे खींच लिए, जिसके चलते अब कांग्रेस पार्टी हताशा में वैश्विक प्रकाशन का हवाला देकर अपनी साख बचाने की जुगत में लगी है।

फैक्ट चेक से क्यों पीछे हटीं सोनिया गांधी?
प्रकाशक पेंगुइन इंडिया का साफ कहना है कि किसी भी प्रतिष्ठित पब्लिशर के लिए तथ्यों की जांच करना और जरूरी संपादकीय सुधार सुझाना एक सामान्य और जिम्मेदार प्रक्रिया है। लेकिन सोनिया गांधी ने इन बदलावों को मानने से इनकार कर दिया। इस रुख ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आत्मकथा के जरिए ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाओं को एकतरफा नजरिए से थोपने की तैयारी थी? जब भारतीय कानूनों और ऐतिहासिक कसौटियों पर दावों को परखा गया, तो सोनिया गांधी सुधार के लिए तैयार क्यों नहीं हुईं?

गांधी परिवार की कहानी पर पब्लिशर की असहमति
यह किताब इटली से भारत आने, राजीव गांधी से विवाह और सत्ता के गलियारों में बिताए गए दशकों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े कई राजनीतिक घटनाक्रमों और इंदिरा गांधी, संजय गांधी व राजीव गांधी की मौतों से जुड़ी त्रासदियों को इसमें शामिल किया गया है। लेकिन पेंगुइन इंडिया द्वारा भारत में इसे न छापने का फैसला यह साबित करता है कि घरेलू स्तर पर कानूनी और ऐतिहासिक तथ्यों के मामले में किताब के दावे कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे थे। बिना बदलाव किए केवल एकतरफा नैरेटिव थोपने की कोशिश को बड़ा झटका लगा है।

कानूनी मुकदमों और मानहानि के डर से पब्लिशर की दूरी
भारत में मानहानि और संवेदनशील राजनीतिक दावों को लेकर सख्त कानूनी प्रावधान हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पेंगुइन इंडिया द्वारा संपादकीय कटौती की मांग इसी डर से की गई होगी ताकि किताब कानूनी विवादों में न फंसे। जब सोनिया गांधी ने आपत्तिजनक या अपुष्ट दावों को हटाने से मना कर दिया, तो प्रकाशक ने संभावित अदालती मुकदमों और विवादों से बचने के लिए खुद को इस प्रोजेक्ट से पूरी तरह अलग करना ही बेहतर समझा।

नरवणे की किताब पर संसद में ड्रामा, अपनी आत्मकथा पर बैकफुट पर कांग्रेस
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के दोहरे चरित्र को भी उजागर कर दिया है। कुछ समय पहले जब पेंगुइन ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की किताब को नहीं छापा था, तब राहुल गांधी संसद में उसकी अनधिकृत हार्ड कॉपी लहराकर खूब राजनीति कर रहे थे। आज जब उसी पब्लिशर ने सोनिया गांधी की किताब में तथ्यात्मक और संपादकीय सुधार मांगे तो कांग्रेस भड़क उठी और पब्लिशर की प्रक्रिया पर ही सवाल उठाने लगी। जब मामला खुद के परिवार का आया तो कांग्रेस का यह दोहरा रवैया पूरी तरह बेनकाब हो गया है।

मोदी से मुलाकातों और नीतियों पर तथ्य जांच से इनकार
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन पर लगे ब्रेक की एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े संदर्भ बताए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, पांडुलिपि में प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई मुलाकातों, उनकी कार्यशैली और केंद्र सरकार की नीतियों पर राजनीतिक हमले किए गए थे। पेंगुइन इंडिया इन बयानों और दावों की सत्यता को लेकर जरूरी तथ्यात्मक प्रमाण और संपादन चाहता था। लेकिन सोनिया गांधी ने किसी भी बदलाव से साफ मना कर दिया। बिना पुख्ता आधार के देश के शीर्ष नेतृत्व पर किए गए दावों की जवाबदेही से बचने के कारण प्रकाशक ने घरेलू प्रकाशन से अपने हाथ खींच लिए।

संघ पर बेबुनियाद आरोपों और पुराने नैरेटिव को पब्लिशर की ना
आत्मकथा में दूसरा बड़ा विवाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका और देश के सामाजिक ताने-बाने पर उसके प्रभाव को लेकर किए गए दावों पर खड़ा हुआ। किताब में संघ पर कांग्रेस के पुराने और अप्रमाणित आरोपों को दोहराने की कोशिश की गई थी। कानूनी और ऐतिहासिक कसौटियों पर परखे जाने के दौरान प्रकाशक ने इन संवेदनशील और अपुष्ट टिप्पणियों में संशोधन या जरूरी कटौती की मांग की। सोनिया गांधी के इस पर अड़ जाने से यह साफ हो गया कि वह ऐतिहासिक निष्पक्षता के बजाय केवल राजनीतिक दुर्भावना से भरा एजेंडा आगे बढ़ाना चाहती थीं, जिसे जिम्मेदार प्रकाशक ने छापने से इनकार कर दिया।

यूपीए काल की ‘सुपर पीएम’ छवि पर पर्दा डालने की कोशिश?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आत्मकथा का मुख्य मकसद 2004 से 2014 के बीच के यूपीए शासनकाल में सोनिया गांधी की कथित ‘सुपर पीएम’ वाली भूमिका को एक नया भावनात्मक रंग देना हो सकता है। पर्दे के पीछे से सरकार चलाने और बिना किसी जवाबदेही के असीमित अधिकारों के इस्तेमाल पर विपक्ष हमेशा से सवाल उठाता रहा है। आशंका जताई जा रही है कि किताब में इन दस वर्षों के घोटालों और नीतिगत पंगुता (पॉलिसी पैरालिसिस) से जुड़े कड़वे सच को दरकिनार कर केवल एकतरफा सहानुभूति बटोरने की पटकथा तैयार की गई थी, जिस पर पब्लिशर के संपादन ने ब्रेक लगा दिया।

कड़वे सच पर खामोशी: क्या इन असहज सवालों का जवाब दे पाएंगी सोनिया गांधी?
राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या सोनिया गांधी अपनी इस आत्मकथा में उन असहज और कड़वे पन्नों को छूने की हिम्मत जुटा पाएंगी, जिन पर गांधी परिवार हमेशा से पर्दा डालता रहा है? क्या वह राजीव गांधी से मिलने से पहले अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि और शुरुआती कामकाज के सच को सामने रखेंगी? क्या इसमें पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ हुए कथित अपमानजनक दुर्व्यवहार की सच्चाई दर्ज होगी? यही नहीं, 2004 में प्रधानमंत्री न बन पाने की असली वजहों, मेनका गांधी को परिवार से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के पारिवारिक विवादों और वर्षों की कोशिशों के बाद भी राहुल गांधी को सत्ता के शीर्ष तक न पहुंचा पाने की राजनीतिक व्यथा का क्या कोई निष्पक्ष जिक्र होगा? आलोचकों का साफ कहना है कि तथ्य जांच से बचने की असली वजह यही है कि आत्मकथा में इन असहज सच्चाइयों को स्वीकार करने के बजाय केवल चुनिंदा और सुविधाजनक इतिहास परोसने की तैयारी थी।

2004 के ‘त्याग’ वाले नैरेटिव पर पर्दा और असल वजहों को छिपाने की कोशिश
किताब में 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने के फैसले को एक बड़े ‘त्याग’ और ‘अंतरात्मा की आवाज’ के तौर पर पेश किए जाने का दावा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उस समय विदेशी मूल के मुद्दे और संवैधानिक पेचीदगियों के कारण बने वास्तविक राजनीतिक दबाव को आत्मकथा में नजरअंदाज करने की कोशिश की गई है। पब्लिशर संभवतः इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के सभी पक्षों और निष्पक्ष तथ्यों का संतुलन चाहता था, लेकिन सोनिया गांधी केवल अपने गढ़े हुए त्याग वाले नैरेटिव पर अड़ी रहीं।

पूर्व किताबों बनाम इस आत्मकथा का विरोधाभास: निजी जवाबदेही से असहजता
सोनिया गांधी ने इससे पहले भी राजीव गांधी और इंदिरा गांधी पर किताबें लिखी और संपादित की हैं, लेकिन तब कभी इस तरह का कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ। उस समय केवल पारिवारिक यादों और चुनिंदा संस्मरणों को पेश किया गया था। लेकिन इस बार जैसे ही उन्होंने अपने खुद के सक्रिय राजनीतिक जीवन, नीतिगत फैसलों और सत्ता के दौर पर लिखना शुरू किया, तथ्यों की जांच होते ही बड़ा विवाद खड़ा हो गया। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि जब अपने खुद के फैसलों और राजनीतिक भूमिका की वास्तविक जवाबदेही की बात आई, तो गांधी परिवार के लिए निष्पक्ष जांच का सामना करना असहज हो गया।

परिवारवाद और राहुल गांधी की री-ब्रांडिंग का विफल प्रयास
आत्मकथा के समय (टाइमिंग) पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई जानकारों का मानना है कि इस किताब के जरिए गांधी परिवार के त्याग और संघर्ष की भावनात्मक कहानी को दोबारा स्थापित करने की कोशिश थी, ताकि राहुल गांधी के नेतृत्व को एक बार फिर से नई मजबूती और पारिवारिक विरासत का सहारा मिल सके। लेकिन पब्लिशर के इनकार ने इस सोची-समझी पीआर और री-ब्रांडिंग की मुहिम को रिलीज से पहले ही बड़ा झटका दे दिया है।

‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का राग अलापने वाली कांग्रेस का दोहरा मापदंड
कांग्रेस पार्टी अक्सर देश में असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा होने का झूठा नैरेटिव बनाती रही है। लेकिन आज जब एक वैश्विक और स्वतंत्र प्रकाशक (पेंगुइन इंडिया) ने संपादकीय स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हुए किताब में तथ्यात्मक सुधार और संतुलन की बात कही, तो कांग्रेस ने पब्लिशर की स्वतंत्रता पर ही सवाल खड़े कर दिए। यह रुख दिखाता है कि कांग्रेस के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब केवल उनकी मनमर्जी और एकतरफा प्रचार होना है।

सोनिया गांधी की चुप्पी पर उठे सवाल, एजेंट भी साधे रहे मौन
इस पूरे विवाद पर जहां पेंगुइन इंडिया ने पेशेवर रुख अपनाते हुए तथ्य जांच को अपनी प्राथमिकता बताया, वहीं सोनिया गांधी और उनके विदेशी एजेंट डेविड गॉडविन ने सवालों पर साधी चुप्पी से संदेह को और गहरा कर दिया है। न तो नॉफ पब्लिकेशन और न ही सोनिया गांधी की टीम यह स्पष्ट कर पाई कि पांडुलिपि के किन हिस्सों पर पब्लिशर को आपत्ति थी। क्या वे अंश राष्ट्रीय सुरक्षा, पूर्व सरकारों के गोपनीय फैसलों या परिवार के राजनीतिक इतिहास से जुड़े थे? यह खामोशी साबित करती है कि पार्टी के पास पेशेवर सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं है।

विदेशी धरती से भारत में एजेंडा सेट करने का पुराना पैटर्न
कांग्रेस पार्टी का यह तर्क कि अमेरिका में अल्फ्रेड ए नॉफ इसे छाप रहा है तो भारत में समस्या क्यों है, खुद उनकी मंशा को उजागर करता है। आलोचकों का कहना है कि विदेशी पब्लिशिंग का सहारा लेकर भारत के भीतर अपना अनुकूल नैरेटिव थोपना कांग्रेस की पुरानी रणनीति रही है। भारत के सख्त कानूनी और ऐतिहासिक मानकों से बचने के लिए विदेशी प्रकाशक का कवच इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन जब घरेलू प्रकाशक ने जवाबदेही की मांग की, तो कांग्रेस तिलमिला गई।

1 लाख कॉपियों का अंतरराष्ट्रीय पीआर और जमीनी हकीकत
अमेरिका की नॉफ पब्लिकेशन द्वारा 1 लाख प्रतियों की पहली प्रिंटिंग का भारी प्रचार किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक भव्य माहौल बनाने की रणनीति है। असल सवाल यह है कि जब किताब के मुख्य पात्र और घटनाएं भारत से जुड़ी हैं, तो भारतीय पाठकों के सामने आने से पहले तथ्यों की कसौटी पर खरी क्यों नहीं उतरी? विदेशों में किताब बेचकर भारतीय मतदाताओं के बीच साख वापस पाने की यह कोशिश नाकाम साबित हो रही है।

घरेलू जवाबदेही से बचने के लिए विदेशी पब्लिशिंग हाउस का सहारा
किताब के मुख्य विषय, घटनाएं और प्रभाव पूरी तरह से भारतीय राजनीति और इतिहास से जुड़े हैं। इसके बावजूद भारतीय कानूनों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और घरेलू पब्लिशर की जांच से बचकर सीधे अमेरिका की एजेंसी के जरिए दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। देश के नागरिकों को यह जानने का पूरा हक है कि भारत की जनता पर राज करने वाले परिवार की आत्मकथा को घरेलू पब्लिशर की कसौटियों पर खरी उतरने से क्यों रोका गया।

इतिहास को दोबारा लिखने का कांग्रेस का प्रयास विफल
आजादी के बाद से ही नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भारतीय इतिहास को सीमित रखने का आरोप कांग्रेस पर लगता रहा है। इस किताब के जरिए भी इटली से लेकर भारत के सत्ता शीर्ष तक के सफर को एक पारिवारिक गाथा के रूप में पेश करने की तैयारी थी, जिसमें ऐतिहासिक भूलों पर लीपापोती की गई हो। पेंगुइन इंडिया द्वारा भारत में इसे छापने से इनकार करना इस बात का सबूत है कि अब बिना तथ्य और ऐतिहासिक प्रमाण के गढ़े गए राजनीतिक आख्यानों को देश में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नए प्रकाशक की तलाश में कांग्रेस, हार्पर कॉलिन्स पर नजर
पेंगुइन इंडिया के पल्ला झाड़ने के बाद अब कांग्रेस पार्टी इस विवाद पर पर्दा डालने में जुट गई है। अमेरिका में अल्फ्रेड ए नॉफ द्वारा इसे प्रकाशित किए जाने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, लेकिन भारत में वितरण के लिए अब आनन-फानन में हार्पर कॉलिन्स इंडिया जैसे दूसरे प्रकाशकों के साथ बात आगे बढ़ाई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तथ्य जांच के अभाव में आने वाली किसी भी किताब से राजनीतिक और ऐतिहासिक बहसों में कांग्रेस के पुराने नैरेटिव की कलई खुल सकती है।

सच की कसौटी से भागकर नहीं गढ़े जा सकते इतिहास के नए पन्ने
पेंगुइन इंडिया द्वारा सोनिया गांधी की आत्मकथा से हाथ खींचने का यह फैसला केवल एक पब्लिशिंग विवाद नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उस दौर का आईना है जहां अब केवल राजनीतिक रसूख के दम पर एकतरफा नैरेटिव नहीं थोपा जा सकता। ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों की जवाबदेही और अतीत की कड़वी सच्चाइयों से मुंह मोड़कर कोई भी राजनीतिक दल अपनी साख दोबारा हासिल नहीं कर सकता। विदेशी पब्लिशर का सहारा लेकर या किसी अन्य प्रकाशक के जरिए किताब को बाजार में उतारने की कोशिश भले ही कर ली जाए, लेकिन तथ्य जांच से पीछे हटने की इस घटना ने जनता के सामने यह साफ कर दिया है कि जब सच की कसौटी पर कसने की बारी आई, तो गांधी परिवार के पास ठोस जवाबों की जगह केवल खामोशी और असहजता ही बची।