6 क़त्ल बलात्कारी ने नहीं किए बल्कि उसे मंदिर के “प्रसाद” की तरह जमानत देने वाले जज ने किए उस जज को सजा कौन देगा, जनता?

सुभाष चन्द्र

तेलंगाना के 28 वर्षीय राजकुमार के खिलाफ 16 मई 2026 एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की पोक्सो कानून में यौन शोषण की शिकायत दर्ज करती है। जून, 2026 में शाहबाद तेलंगाना की लोकल अदालत उसे “अग्रिम जमानत” दे देती है जिसका मतलब है बलात्कार का आरोपी गिरफ्तार ही नहीं हुआ कोर्ट की उदारता उस आरोपी के लिए वरदान बन गया क्योंकि कोर्ट ने आजकल के चलन के अनुसार मंदिर के प्रसाद की तरह जमानत दे दी - Bail is a rule and jail is an exeption. यही philosophy आजकल हर कोर्ट झाड़ रहा है

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नतीजा क्या हुआ? राजकुमार ने सबसे पहले उस लड़की का कत्ल किया जिसने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज की थी, फिर उसके घर जाकर लड़की की माँ और दादी की जान ली इतना ही नहीं, वो अपने घर गया और वहां अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों का भी खून कर दिया

कुछ समय पहले असम में भी पोक्सो एक्ट के आरोपी को जमानत दे दी गई और उसने सीधे उस महिला के घर जाकर उसकी हत्या कर दी जिसने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज की थी

अब राजकुमार के जघन्य अपराध के लिए बड़ी बड़ी बहस शुरू हो जाएंगी और उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त साबित करने की कोशिश की जाएगी जबकि उसके खिलाफ तुरंत मुकदमा शुरू करके फांसी की सजा दे देनी चाहिए लेकिन अदालत सबूत ढूढ़ती फिरेंगी और अगर सजा दे भी दी तो हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट वर्षों लगाकर उसकी फांसी की सजा घटा कर आजीवन कारावास में बदल देंगी शायद एक बात ध्यान में रख कर कि Every Sinner has a future.

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या शाहबाद लोकल कोर्ट का जज जिम्मेदार नहीं है इन 6 लोगों की हत्या के लिए क्योंकि उसने राजकुमार को गिरफ़्तारी से पहले “अग्रिम जमानत” दे दी और उसने 6 मासूम लोगों की हत्या को अंजाम दे दिया उस जज का न्याय कौन करेगा - जनता ?

वकील प्रबल प्रताप का अपराध क्या राकेश किशोर से कम है क्या जो BCI ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की

सुभाष चन्द्र

लगभग 16/17 साल की बात है, बस में यात्रा करते दो यात्री आपस में बातचीत कर रहे थे, बातचीत करते-करते एक यात्री ने कहा "जो दौर चल रहा है वो दिन दूर नहीं जब पार्लियामेंट में मिर्च पाउडर उछाला जायेगा।" जिस तरह संसद से लेकर अब सुप्रीम कोर्ट तक में जो हरकतें हो रही है वास्तव में इन सबके लिए चिंता का विषय है। संसद में पेपर उछाले जाते हैं, टेबल पर खड़े होकर ऐसे नारेबाजी होती है जैसे कोई गली का गुंडा हो और सदन अध्यक्ष तमाशबीनों की तरह देखते रहता है, क्यों? क्यों नहीं मार्शल को बुलाकर सदन से बाहर फेंका जाता? क्यों नहीं ऐसे उप्रदवी सदस्यों को सदन से निष्काषित किया जाता? इसीलिए दोषियों को पालने में ये दोनों संस्थाएं जिम्मेदार है। नेताओं को प्रसाद की तरह जमानत दी जाती है। और जमानत देने के बाद फाइल ठंठे बस्ते में पटक जाती है। कानून मंत्री और संसद भी बेसूद हो कर सोई पड़ी रहती है। क्या देश में सफेदपोशी गुंडों का राज होगा?   

सेम ओंन यू (ले लोटा)
इन जहीलों को समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट कोई चौपाल, चुनावी मंच या सड़क का धरना स्थल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में यह घटना शुक्रवार की सुबह करीब 11 बजे जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने हुई। याचिकाकर्ता, जिसकी पहचान प्रबल प्रताप के तौर पर हुई, बेंच के सामने पेश हुआ और खुद को संप्रभु बताया और जजों को "न्यायिक सेवक" कहकर संबोधित करते हुए उसने कहा, "मिस्टर न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के ASP के खिलाफ साइबर क्राइम सिंडिकेट चलाने के लिए FIR दर्ज करने का आदेश दें।"
वह पहले भी व्यक्तिगत रूप से (Petitioner-in-Person) इलाहाबाद हाईकोर्ट में उपस्थित होकर मुकदमा लड़ चुके हैं। उदाहरण के लिए, उनकी Criminal Misc. Writ Petition No. 2989 of 2026 में भी रिकॉर्ड पर "Counsel for Petitioner: In Person" दर्ज है
यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के भीतर खड़े होकर न्यायाधीशों को आदेश देने की मुद्रा में कहे—"आप इसके खिलाफ FIR दर्ज करने का डायरेक्शन दीजिए"—और कागज़ लहराकर न्यायालय पर दबाव बनाने का प्रयास करे, तो यह न्यायिक मर्यादा की खुली अवमानना जैसा आचरण प्रतीत होता है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति की आवाज़ की ऊँचाई, आक्रोश या दबाव से नहीं, बल्कि संविधान, कानून और न्यायिक सिद्धांतों से संचालित होता है।
अदालत में आदेश नहीं दिए जाते, प्रार्थना की जाती है।
दबाव नहीं बनाया जाता, विधिक तर्क दिए जाते हैं।
कागज़ लहराने से न्याय नहीं मिलता, साक्ष्य और कानून से न्याय मिलता है।
यदि अदालतों में भी लोग न्यायाधीशों को निर्देश देने लगें, तो वह न्यायिक व्यवस्था नहीं, भीड़तंत्र की शुरुआत होगी।

न्यायालय की गरिमा लोकतंत्र की रीढ़ है। उसकी मर्यादा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

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सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने वाले कार्य वैसे तो सहन नहीं किए जाने चाहिए लेकिन हर मामले को देखने के लिए एक ही मापदंड होना चाहिए

जुलाई 10 को सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रबल प्रताप ने एक याची के तौर पर जिरह करते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अलोक अराधे को कहा कि “माई जुडिशल सर्वेंट, मैं तुम्हे आदेश देता हूं कि तुम लखनऊ के एसपी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश दो इस पर जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि तुम मुझे आदेश दे रहे हो याचिकाकर्ता ने कहा कि बस इतना ही हमारी तरफ से था, बाकी सब रिकॉर्ड पर है इसके साथ ही उसने न्यायाधीश के लिए अपशब्द कहते हुए फ़ाइल और दस्तावेज़ पीठ की तरफ उछाल दिए 

कुछ जगह यह रिपोर्ट किया गया है कि प्रबल प्रताप ने फ़ाइल और दस्तावेज़ फेंकते हुए कहा -”ये दे देना उस (गाली) CJI को” न्यायाधीशों ने यह उसकी निराशा (frustration) कहते हुए कोई कार्रवाई नहीं की उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया और पूछताछ कर रही है

अगर प्रबल प्रताप वकील है जैसा कई जगह बताया गया है तो अभी तक बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) ने उसका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने उसकी सदस्य्ता रद्द क्यों नहीं की और इलाहाबाद बार एसोसिएशन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दोनों माननीय जजों की तरफ से कोई उत्तेजनात्मक बात नहीं कही गई परंतु 6 दिसंबर 2025 को वकील राकेश किशोर का तत्कालीन चीफ जस्टिस बीआर गवई पर भड़काना तो हर तरह से जायज था लेकिन BCI ने तत्काल उसका लाइसेंस रद्द कर 71 वर्षीय वकील किशोर की प्रैक्टिस पर आजीवन प्रतिबन्ध लगा दिया और SCBA ने भी उसकी सदस्य्ता रद्द कर दी 

चीफ जस्टिस गवई एक बौद्ध हैं और उन्होंने खजुराहो के मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति को ठीक करने की आदेश मांगने वाली याचिका पर याचिकाकर्ता से कहा कि भगवान विष्णु के पास जाओ, वो ही कुछ कर सकते हैं एक अल्पसंख्यक समुदाय के जज ने खुलेआम सनातन धर्म और भगवान विष्णु का अपमान किया जिसे देख कर वकील राकेश किशोर का खून खौल गया और उन्होंने चीफ जस्टिस की तरफ जूता फेंकने की कोशिश की जूता फ़ेंक पाए या नहीं कोई नहीं जानता

चीफ जस्टिस गवई ने भी राकेश किशोर के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया था लेकिन उनके देखते देखते BCI और SCBA ने उसके प्रैक्टिस पर पाबंदी लगा कर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी इससे बड़ी कार्रवाई और क्या हो सकती थी 

मतलब गवई साहब कोई कार्रवाई न करके बड़प्पन का सबूत देना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें BCI और SCBA को भी रोकना चाहिए था हो सकता है राकेश किशोर को आभास रहा हो कि सनातन धर्म के लिए ऐसे कार्य की उन्हें क्या सजा भुगतनी पड़ सकती है और इसलिए उन्होंने सनातन धर्म के लिए अपनी यह क़ुरबानी दे दी

गवई साहब का बयान कोई नई बात नहीं है आए दिन अदालतों में बहुत कुछ कहा जाता है जो नाकाबिले बर्दाश्त होता है और किसी की भी जीवन बर्बाद कर सकता है याद तो होगा आज के चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जब उन्होंने जस्टिस परदीवाला के साथ मिलकर नूपुर शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे भयानक Hate Speech दी थी और उसका करियर चौपट कर दिया था जबकि नूपुर को उकसाने वाले और भगवान शंकर का अपमान करने वाले तस्लीम रहमानी के खिलाफ न तो कोई एक शब्द बोला और न कोई कार्रवाई करने के आदेश दिए और आज भी नूपुर शर्मा खौफ के साये में जी रही है सुरक्षा कर्मियों को साथ लेकर

US में साइक्लोस्पोरियासिस का प्रकोप, तेजी से फैल रहा आँखों से न दिखने वाला यह खतरनाक पैरासाइट: जानिए, कैसे ये भारत में भी फैल सकता है, बचाव के लिए करें कौन से उपाय

अमेरिका के कई राज्यों में इन दिनों एक छोटा पैरासाइट यानी पैरासाइट के कारण फैली बीमारी ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम जनता की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। इस बीमारी का नाम साइक्लोस्पोरियासिस है, जो मुख्य रूप से हमारे पाचन तंत्र पर हमला करती है।

हाल के हफ्तों में इस संक्रमण के मामलों में अप्रत्याशित और बहुत तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके कारण अस्पतालों और जाँच प्रयोगशालाओं पर भारी दबाव बन गया है।

इस बीमारी की चपेट में आने वाले मरीजों को बेहद गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें हफ्तों तक चलने वाले अनियंत्रित और बहुत तेज दस्त यानी डायरिया की शिकायत सबसे ज्यादा है।

मिशिगन जैसे राज्य में तो स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वहाँ कुछ ही दिनों के भीतर सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं, जो आम दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा हैं। हालाँकि स्वास्थ्य विभाग और संघीय एजेंसियाँ लगातार इस बात की जाँच कर रही हैं कि आखिर इस संक्रमण की मुख्य वजह क्या है, लेकिन अभी तक किसी भी एक विशेष खाद्य पदार्थ, ब्रांड या सप्लायर की पहचान नहीं हो सकी है।

शुरुआती जाँच में दूषित ताजे फल और सब्जियों को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है, क्योंकि यह पैरासाइट अक्सर खेतों और फसलों के जरिए ही इंसानी आबादी तक पहुँचता है। चूँकि भोजन की आपूर्ति श्रृंखला कई राज्यों से होकर गुजरती है, इसलिए इस संक्रमण के सटीक स्रोत का पता लगाना जाँच कर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

क्या है साइक्लोस्पोरियासिस और कैसे होता है इसका हमला

साइक्लोस्पोरियासिस असल में भोजन या पानी के जरिए फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है, जो एक बेहद छोटे और छोटा  पैरासाइट  साइक्लोस्पोरा कायटैनेन्सिस के कारण होती है।

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी CDC के मुताबिक, यह पैरासाइट इंसानी आँखों से दिखाई नहीं देता और जब कोई व्यक्ति इससे दूषित खाना या पानी लेता है, तो यह उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।

शरीर में पहुँचने के बाद यह पैरासाइट मुख्य रूप से छोटी आंत को अपना निशाना बनाता है और वहाँ जाकर अपनी संख्या बढ़ाने लगता है, जिससे आँतों का सामान्य कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।

यह संक्रमण आम तौर पर गर्मी के महीनों में यानी मई की शुरुआत से लेकर अगस्त के अंत तक बहुत ज्यादा सक्रिय रहता है क्योंकि इस मौसम में इस पैरासाइट के पनपने की अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

हालाँकि यह बीमारी आमतौर पर जानलेवा नहीं मानी जाती है, लेकिन अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए तो यह हफ्तों तक शरीर को निचोड़ सकती है। सबसे खास बात यह है कि इसके लक्षण एक बार ठीक होने के बाद दोबारा वापस आ सकते हैं, जिससे मरीज लंबे समय तक कमजोरी और थकावट महसूस करता रहता है।

शरीर पर दिखने वाले लक्षण और डायरिया का खतरनाक रूप

जब कोई व्यक्ति इस खतरनाक पैरासाइट के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर में तुरंत लक्षण दिखाई नहीं देते बल्कि इसे उभरने में दो दिन से लेकर चौदह दिन तक का समय लग सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस संक्रमण का सबसे प्रमुख और डरावना लक्षण पानी जैसा तेज दस्त होना है, जिसे कई बार विस्फोटक मलत्याग भी कहा जाता है। इसके अलावा मरीजों को पेट में बहुत तेज और असहनीय मरोड़ या ऐंठन महसूस होती है, जो उन्हें पूरी तरह से बेहाल कर देती है।

संक्रमण के अन्य लक्षणों में लगातार जी मिचलाना, उल्टी होना, शरीर में भारी थकान, भूख में भारी कमी आना और बहुत तेजी से वजन का घटना शामिल है। इसके अतिरिक्त मरीजों को पेट में बहुत ज्यादा गैस बनने, शरीर में तेज दर्द होने और हल्का बुखार रहने की शिकायत भी होती है।

नोरोवायरस जैसे आम पेट के इन्फेक्शन के विपरीत, जो कुछ ही दिनों में खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है, साइक्लोस्पोरियासिस का असर बहुत लंबा चलता है। इसके गंभीर दौर में मरीजों के शरीर से पानी इतनी तेजी से निकलता है कि उन्हें डिहाइड्रेशन यानी पानी की गंभीर कमी के कारण अस्पताल में भर्ती तक कराना पड़ जाता है।

अमेरिका में अचानक बढ़े मामले और जाँच की जमीनी हकीकत

इस समय अमेरिका के कई राज्यों जैसे मिशिगन, ओहियो, इलिनोइस, न्यूयॉर्क, टेक्सास, नॉर्थ कैरोलिना और इंडियाना में इस संक्रमण के मामलों में भारी उछाल आया है।

मिशिगन के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वहाँ पिछले कुछ ही हफ्तों में मामलों की संख्या तेजी से बढ़कर सात सौ से ऊपर पहुँच गई है, जबकि आम तौर पर इस पूरे राज्य में सालभर में सिर्फ चालीस से पचास मामले ही सामने आते थे।

मिशिगन के दक्षिण-पूर्वी हिस्से के कई काउंटियों जैसे मोनरो, वाश्टेनॉ, लेनावी, शियावासी, वेन, जैक्सन, ओकलैंड और लिविंगस्टन में इसका सबसे घातक असर देखा जा रहा है। 

मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि मरीजों का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाएँ पूरी तरह से थक चुकी हैं और जहाँ पहले टेस्ट की रिपोर्ट चौबीस घंटे में आ जाती थी, वहीं अब इसमें दो से तीन दिन का समय लग रहा है।

इस भारी दबाव के कारण डॉक्टरों को यह भी सोचना पड़ रहा है कि अगर जाँच में देरी जारी रही, तो वे केवल लक्षणों के आधार पर ही इलाज शुरू कर देंगे। मिशिगन की मुख्य चिकित्सा कार्यकारी डॉ नताशा बगदासारियन ने बताया कि इतने बड़े पैमाने पर मरीजों का इंटरव्यू लेना और उनके खान-पान का पता लगाना मुस्किल काम हो गया है।

स्वास्थ्य कर्मी दिन-रात काम करके मरीजों की ग्रोसरी लिस्ट खंगाल रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने पिछले दिनों में किस रेस्टोरेंट में क्या खाया था।

कैसे फैलता है यह पैरासाइट और क्यों है इसे ढूँढना मुश्किल

साइक्लोस्पोरा पैरासाइट के फैलने का मुख्य जरिया इंसानी मल यानी व्हीकल-ओरल रूट होता है, जब किसी संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित हुआ पानी या मिट्टी फसलों के संपर्क में आती है।

हालाँकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह साफ किया है कि यह बीमारी सीधे तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तुरंत नहीं फैलती है, क्योंकि शरीर से बाहर निकलने के बाद इस पैरासाइट के अंडों को पर्यावरण में संक्रामक यानी एक्टिव होने के लिए कम से कम एक से दो सप्ताह का समय चाहिए होता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यह संक्रमण घर में खाना पकाने के दौरान नहीं, बल्कि सीधे खेतों के स्तर पर असुरक्षित सिंचाई जल या खराब स्वच्छता के कारण फैलता है। चूँकि बहुत से फल और सब्जियाँ कच्चे ही खाए जाते हैं, इसलिए वे इस संक्रमण को फैलाने के सबसे बड़े वाहक बन जाते हैं।

इस जाँच को सबसे ज्यादा जटिल अमेरिका की विशाल फूड सप्लाई चेन बनाती है, जहाँ एक राज्य में उगाई गई फसल को दूसरे राज्य में पैक और प्रोसेस किया जाता है और फिर उसे देश के दर्जनों अलग-अलग राज्यों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।

पूर्व में हुए इसके आउटब्रेक बताते हैं कि पैक्ड सलाद, धनिया, तुलसी, रास्पबेरी, स्नो पीज और हरी प्याज जैसी चीजें इसके फैलने का मुख्य कारण रही हैं और इस बार भी FDA and CDC प्याज, खीरा और धनिए जैसी चीजों पर अपनी जाँच केंद्रित कर रहे हैं।

संक्रमण से बचाव के उपाय और फल-सब्जियों को साफ करने के तरीके

इस पैरासाइट से सुरक्षित रहने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों और न्यूयॉर्क राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने बहुत ही कड़े दिशा-निर्देश और व्यावहारिक सुझाव जारी किए हैं। चूँकि यह पैरासाइट फल और सब्जियों की सतह से बहुत मजबूती से चिपक जाता है, इसलिए केवल साधारण पानी से इसे ऊपर-ऊपर से धो देना काफी नहीं होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रास्पबेरी जैसी बेरीज को साफ करना और भी मुश्किल होता है क्योंकि उनके ऊपर छोटे-छोटे बाल होते हैं जिनमें यह पैरासाइट आसानी से छिपा रहता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले ताजी सब्जियाँ या फल छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को साबुन और पानी से बहुत अच्छे से धोना चाहिए।

सभी कटी हुई या पकी हुई सब्जियों को तैयार करने के दो घंटे के भीतर तुरंत रेफ्रिजरेटर में रख देना चाहिए। इसके अलावा सलाद के पत्तों को इस्तेमाल करने से पहले उनके बाहरी पत्तों को पूरी तरह से हटाकर फेंक देना चाहिए और खीरे या तरबूज जैसी सख्त चीजों को साफ ब्रश से अच्छी तरह रगड़कर धोना चाहिए।

किसी भी फल या सब्जी के खराब हिस्से को खाने से पहले काटकर अलग कर देना चाहिए। हालाँकि इसे जमाने यानी फ्रीज करने से इस पैरासाइट के मरने की कोई गारंटी नहीं होती है, लेकिन भोजन को कम से कम 158 डिग्री फारेनहाइट यानी 70 डिग्री सेल्सियस तक अच्छी तरह पकाना इसे खत्म करने का एकमात्र सबसे सुरक्षित और निश्चित तरीका है।

चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता और इलाज के उपलब्ध विकल्प

यदि किसी व्यक्ति को लगातार कई दिनों तक पानी जैसे दस्त हो रहे हों, पेट में तेज मरोड़ उठ रही हो या शरीर में पानी की कमी के लक्षण जैसे चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, पेशाब कम होना और बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही हो, तो उसे बिना किसी देरी के तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड यानी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह संक्रमण और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनके शरीर में यह बीमारी लंबे समय तक टिकी रह सकती है और उन्हें ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लगता है।

हालाँकि अभी तक इस संक्रमण से किसी के भी मौत की खबर नहीं आई है, लेकिन स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए समय पर इलाज बहुत जरूरी है।

सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र का विरोध करने वालों को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से झटका, कोर्ट ने कहा- संस्कार सिखाना गलत नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी प्रार्थनाएं कराने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह फैसला बिल्कुल सही है, क्योंकि किसी भी छात्र को जबरदस्ती ये प्रार्थनाएं गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। राज्य के सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र के पाठ को शुरू करने के सरकारी आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर हाई कोर्ट ने एक बड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि स्कूलों में संस्कार सिखाना गलत नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने न केवल इस याचिका को  खारिज किया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और नैतिक शिक्षा को किसी संकीर्ण सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह फैसला देश में ‘सांस्कृतिक जागरूकता बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता’ की बहस में एक मील का पत्थर साबित होगा।

वंदना के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की मंशा राजनीतिक तुष्टिकरण

इस पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जबकि राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग का 12 जून 2026 को एक सर्कुलर जारी किया। इसमें शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ-साथ सरस्वती वंदना और छुट्टी के समय गायत्री मंत्र के गायन का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के आते ही देश का एक खास वर्ग सक्रिय हो उठा। हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देने वालों में छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद शामिल थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकारी धन से चलने वाले स्कूलों में इन मंत्रों का पाठ संविधान का उल्लंघन है, जो धार्मिक शिक्षा देने पर रोक लगाते हैं। हालांकि, इसके पीछे छिपी कुत्सित मंशा साफ तौर पर राजनीतिक तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक विरासत को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने की थी।

किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं

राज्य सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखा। सरकार ने कहा कि ये मंत्र और वंदनाएं किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और अच्छे संस्कारों का हिस्सा हैं। इनका मकसद बच्चों में अनुशासन, बड़ों के प्रति आदर और पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाना है। सरकार ने यह भी बताया कि यह नियम लागू हो चुका है और किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग के इस नियम के मुताबिक, राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ करना होता है। इसके साथ ही महापुरुषों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। दोपहर के खाने से पहले भोजन मंत्र और स्कूल की छुट्टी होने से पहले गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ किया जाता है।

देश के राज्यों की स्थिति: कहां-कहां गूंजते हैं ये मंत्र?
भारत के कई राज्यों में सुबह की प्रार्थना सभाओं में सरस्वती वंदना और वैदिक मंत्रों का गायन एक पुरानी और स्थापित परंपरा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ में शैक्षणिक परिसरों में अनुशासन, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाले वैदिक श्लोकों को जबरन अल्पसंख्यक अधिकारों के हनन से जोड़कर समाज में एक विभाजनकारी विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया गया। उनकी मंशा भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शिक्षा से दूर रखकर छात्रों को अपनी ही जड़ों से काटने की थी।
1. किन राज्यों में लागू: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों के अधिकांश सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना और शांति पाठ को नैतिक शिक्षा का अभिन्न अंग माना गया है।
2. सांस्कृतिक शुरुआत: इन राज्यों का मानना है कि विद्या की देवी सरस्वती की वंदना किसी विशिष्ट पूजा पद्धति की अनिवार्य ही नहीं, बल्कि ज्ञान की साधना की एक सांस्कृतिक शुरुआत भी है।

3. रोक की स्थिति: देश के किसी भी राज्य में कानूनन सरस्वती वंदना पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन केरल, तमिलनाडु और कुछ गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारी स्तर पर ऐसी प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने से परहेज किया जाता है। वहां केवल राष्ट्रगान या धर्मनिरपेक्ष प्रार्थनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। 

मन पर तीन प्रभाव डालती है यह वंदना

मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का मानना है कि सुबह की सभा में सामूहिक मंत्रोच्चार का बच्चों के मानस पर गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गायत्री मंत्र और सरस्वती वंदना केवल धार्मिक श्लोक नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर छिपी ध्वनि तरंगें और शब्द विन्यास वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं:

  1. एकाग्रता और मानसिक शांति: गायत्री मंत्र का सस्वर पाठ मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करता है, जिससे छात्रों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति का विकास होता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: सुबह-सुबह सामूहिक स्वर में तमसो मा ज्योतिर्गमय या ‘शिल्प-ज्ञान-विवर्धिनी’ जैसे श्लोकों का उच्चारण बाल मन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाता है।
  3. संस्कार और अनुशासन: यह बच्चों के मन में शुरू से ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गौरव का भाव पैदा करता है और उन्हें नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है, जो आज की आधुनिक और तनावपूर्ण जीवनशैली में बेहद जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में पक्ष-विपक्ष का राजनीतिक घमासान
अदालत के बाहर इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में पक्ष-विपक्ष आमने सामने आ गए हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री अरुण साव और शिक्षा मंत्री ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह कदम हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2000 के सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य छात्रों को भारतीय ज्ञान प्रणालियों से जोड़ना है। भाजपा के अनुसार, यह नई पीढ़ी में देशभक्ति, अनुशासन और उच्च नैतिक संस्कारों को सिंचित करने का एक ऐतिहासिक अभियान है। दूसरी ओर तुष्टिकरण की नीति के चलते विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे हिन्दुत्व के एजेंडे को लागू करने और शिक्षा के ‘भगवाकरण’ का प्रयास बताया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर धार्मिक और संवेदनशील मुद्दों को हवा दे रही है।
फैसले से कानून और संस्कृति के बीच बेहतरीन संतुलन
वास्तविकता यह है कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए कानून और संस्कृति के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम किया है। अदालत ने यह स्पष्ट करके विपक्ष और याचिकाकर्ताओं के डर को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यह आदेश ‘बाध्यकारी’ या ‘दबाव डालने वाला’ नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 28(1) भले ही राज्य पोषित संस्थानों में ‘धार्मिक कर्मकांड या संकीर्ण धार्मिक शिक्षा’ पर रोक लगाता हो, लेकिन वह देश की साझा सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना सिखाने वाले सार्वभौमिक विचारों पर पाबंदी नहीं लगाता। स्कूल केवल किताबी ज्ञान देने वाले कारखाने नहीं हैं; वे नागरिक गढ़ने के केंद्र हैं। ऐसे में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी पावन परंपराओं को विवादों के घेरे में खींचना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। हाई कोर्ट के इस फटकार के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि तुष्टिकरण की संकीर्ण राजनीति अब शिक्षा के पवित्र प्रांगण से दूर रहेगी।

 

राम मंदिर में चोरी पर बिलखने वाली कांग्रेस अपने राज में चोरी की केवल 13 कलाकृतियां वापस ला सकी जबकि मोदी 668 ले आया

सुभाष चन्द्र

देश के विघटन के बाद 1947 से 2014 के 67 साल के कालखंड में जिसमें कांग्रेस ने 55 साल राज किया, चोरी हुई और तस्करी से विदेशों में भेजी गई मात्र 13 कलाकृतियां वापस आ सकी जबकि 2014 में मोदी के आने के बाद अभी तक 12 साल में 668 कलाकृतियां विदेशों से भारत लाई जा चुकी है - और ये कांग्रेस आज बिलख रही है राम मंदिर में चोरी को लेकर जबकि कांग्रेस ने हमेशा राम मंदिर बनाने का विरोध किया - कलाकृतियों का वापस आना मोदी की सफल कूटनीति का परिणाम है -

गौरतलब बात है कि जब कांग्रेस राज में सबरीमाला मन्दिर से सोने की चोरी होने पर सोनिया गाँधी पर आरोप लगा था, जिसे विपक्ष गोदी मीडिया ने कोई चौपाल नहीं बैठाई जिस तरह आज राममन्दिर में हुई चोरी को उछाल रहा है। राहुल की दोहरी नागरिकता पर, वक़्फ़ बोर्ड, मस्जिद, दरगाहों और मदरसों में हो रहे घोटालों पर सबको सांप सूंघ गया है। राहुल के आगे-पीछे डोलने वाला मीडिया राहुल विदेशों में जाकर किस-किस से मिल रहा है नहीं बताने की हिम्मत, क्यों? दूसरे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक जो 668 कलाकृतियां वापस लेकर आये हैं विपक्ष समर्पित मीडिया चुप है। कोई यह बताने को तैयार नहीं की ये कलाकृतियां किस तरह भारत से चोरी हुईं। लगता है मीडिया ने विपक्ष के आगे सरेंडर किया हुआ है।          

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इन 668 पुरावशेषों में से लगभग सभी भारत के मंदिरों, पुरातात्विक स्थलों तथा क्षेत्रीय संग्रहालयों से चोरी, लूट अथवा अवैध तस्करी के माध्यम से विदेश ले जाए गए थे-

पुरावशेष लौटाने वाले प्रमुख देश

इन पुरावशेषों की वापसी में संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे बड़ा योगदान रहा है जिसने  अकेले लगभग 578 पुरावशेष भारत को लौटाए हैं, जो कुल वापसी का लगभग 90 प्रतिशत है- इसके अतिरिक्त ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), कनाडा, सिंगापुर तथा नीदरलैंड ने भी भारत से चोरी कर ले जाए गए अनेक सांस्कृतिक धरोहरों को वापस किया है -

बरामद किए गए प्रमुख चोरी के पुरावशेष

1. अवलोकितेश्वर की प्रतिमा

लगभग 20 लाख अमेरिकी डॉलर मूल्य की यह दुर्लभ कांस्य प्रतिमा रायपुर स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय से चोरी कर अमेरिका तस्करी के माध्यम से पहुंच गई थी;

2. चोलकालीन कांस्य प्रतिमा-

तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी की गई अत्यंत मूल्यवान चोलकालीन प्रतिमाओं में 12वीं शताब्दी की श्रीपुरंथन नटराज प्रतिमा तथा लगभग 500 वर्ष पुरानी तिरुमंगई आळवार प्रतिमा प्रमुख हैं;

3. माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा

18वीं शताब्दी की यह ऐतिहासिक प्रतिमा लगभग एक शताब्दी पूर्व काशी के एक मंदिर से चोरी हो गई थी। बाद में इसे कनाडा से भारत वापस लाया गया;

2020 नवंबर की बात है. मन की बात कार्यक्रम का 29वां एपिसोड था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा था कि एक सदी पहले भारत से चोरी की गई देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति को कनाडा से वापस लाया जाएगा. यह मूर्ति पीएम मोदी के वर्तमान संसदीय क्षेत्र वाराणसी से वर्ष 1913 के आसपास चोरी हुई थी और तस्करी कर कनाडा भेज दी गई थी.

4. नृत्यरत गणेश की प्रतिमा

मध्य प्रदेश के एक मंदिर से वर्ष 2000 में चोरी की गई यह बलुआ पत्थर की प्रतिमा अमेरिका में सक्रिय अवैध कला-तस्करी नेटवर्क के माध्यम से खोजी गई और सफलतापूर्वक भारत वापस लाई गई-

अब ऑस्ट्रेलिया ने भी तीन प्राचीन भारतीय पुरावशेष स्वेच्छा से लौटाने पर सहमति व्यक्त की है

ऑस्ट्रेलिया ने 11वीं और 12वीं शताब्दी के तीन प्राचीन भारतीय पुरावशेष भारत को स्वेच्छा से लौटाने का निर्णय लिया है - ये सभी पुरावशेष भारत से तस्करी के माध्यम से बाहर ले जाकर अवैध रूप से निर्यात किए गए थे-

भारत को लौटाए जाने वाले तीन सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण पुरावशेष-

1. देवी भद्रकाली सहित कांस्य त्रिशूल

यह त्रिशूल मूलतः तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले के कोल्लुमंगुडी स्थित श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर का है - इसकी पहचान अमेरिका के एक कला-विक्रेता के माध्यम से हुई तथा जस्टिस क्रेनन द्वारा की गई उत्पत्ति (Provenance) संबंधी जांच में यह सिद्ध हुआ कि इसके निर्यात का कोई वैध इतिहास नहीं था;

2. नंदी की पाषाण प्रतिमा-

यह प्रतिमा तमिलनाडु के एक मंदिर से चोरी की गई थी। इसे वैध सिद्ध करने के लिए मेक्सिको और गोवा के माध्यम से एक विस्तृत फर्जी स्वामित्व (Provenance) दस्तावेज़ी श्रृंखला तैयार की गई थी, किंतु जांच में उसकी वास्तविक उत्पत्ति का पता चल गया;

3. षण्मुख (छह मुख वाले) भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा

यह प्रतिमा भी अवैध कला-तस्करी नेटवर्क के माध्यम से विदेश पहुंचाई गई थी - जांच में यह प्रमाणित हुआ कि इसका मूल स्रोत 11वीं शताब्दी का नागनाथस्वामी मंदिर, मन बाड़ी (जिला तंजावुर, तमिलनाडु) है, जिसका निर्माण राजेंद्र चोल प्रथम ने कराया था-

ऑस्ट्रेलिया के लोगों को अपना बुढ़ापा सँवारने के लिए भारत से आस, इन्वेस्ट किए 2800 करोड़ रूपए: कौन सी स्कीम में मुनाफा पाकर AustralianSuper हुई गदगद

ऑस्ट्रेलिया की एक बहुत बड़ी कंपनी है। इसका नाम ‘ऑस्ट्रेलियनसुपर’ है। यह कंपनी वहाँ के लोगों के बुढ़ापे का पैसा यानी पेंशन संभालती है। यह ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा पेंशन फंड है। इस कंपनी ने भारत को लेकर एक बहुत बड़ा फैसला किया है। वह भारत सरकार के कामकाज और नीतियों से बहुत खुश है। इसी वजह से कंपनी ने भारत में और ज्यादा पैसा लगाने का एलान किया है।

यह कंपनी भारत की एक खास सरकारी स्कीम में पैसा लगा रही है। इस स्कीम का नाम ‘नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ (NIIF) है। इस बार कंपनी भारत में 2,800 करोड़ रूपए का नया निवेश करने जा रही है। भारत के लिए यह बहुत बड़ी बात है। इस नए निवेश को मिलाकर कंपनी अब तक भारत में बहुत सारा पैसा लगा चुकी है। अब भारत के अलग-अलग बाजारों में इस कंपनी का कुल निवेश 18,600 करोड़ रूपए से भी ज्यादा हो गया है। इससे साफ पता चलता है कि दुनिया का भारत पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

भारत की स्कीम से मिला रिकॉर्ड तोड़ मुनाफा

यह पूरी कहानी भारत की तरक्की को दिखाती है। इस ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने भारत में पहली बार निवेश नहीं किया है। इससे पहले साल 2019 में भी कंपनी ने भारत की इसी एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम पर भरोसा जताया था। तब कंपनी ने भारत में 1,350 करोड़ रूपए का निवेश किया था। कंपनी के मुख्य निवेश अधिकारी शॉन मैनुएल हैं। उन्होंने खुद इस निवेश को लेकर एक बड़ी बात बताई है।

शॉन मैनुएल ने कहा कि साल 2019 में किया गया वह निवेश उनके लिए वरदान साबित हुआ। वह निवेश उनकी कंपनी के इतिहास में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाले प्रोजेक्ट्स में से एक रहा। इस भारतीय स्कीम से कंपनी को उम्मीद से कहीं ज्यादा फायदा मिला। उन्हें यहाँ बहुत तगड़ा रिटर्न मिला। इसी शानदार मुनाफे और अच्छे अनुभव को देखकर कंपनी के लोग गदगद हो गए। यही वजह है कि वे भारत में दोबारा पैसा लगाने के लिए खुद आगे आए हैं।

ऑस्ट्रेलिया के बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाएगा भारत

भारत और ऑस्ट्रेलिया में पेंशन का सिस्टम बिल्कुल अलग है। हमारे भारत में नौकरी करने वालों के लिए एक सरकारी व्यवस्था है। इसे हम ईपीएफओ (EPFO) कहते हैं। यहाँ हर महीने सैलरी से कटने वाला PF का पैसा एक ही सरकारी जगह जमा होता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई एक बड़ा सरकारी सिस्टम नहीं है। वहाँ का नियम अलग है।

ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियनसुपर जैसी बड़ी प्राइवेट कंपनियाँ यह काम करती हैं। ये कंपनियाँ लोगों की नौकरी के दौरान उनका पैसा जमा करती हैं। फिर बुढ़ापे में उन्हें पेंशन देती हैं। इसे वहाँ रिटायरमेंट फंड भी कहते हैं। अब ऑस्ट्रेलिया के आम लोग भारत पर बहुत बड़ा भरोसा कर रहे हैं। वे अपने बुढ़ापे की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

साथ ही वे उस पैसे पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा भी कमाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें भारत सबसे सुरक्षित और अच्छा देश लग रहा है। ऑस्ट्रेलियनसुपर कोई छोटी-मोटी कंपनी नहीं है। इस अकेली कंपनी के पास ऑस्ट्रेलिया के 36 लाख से ज्यादा लोगों का पैसा जमा है। अगर इस पूरे पैसे को भारतीय रुपए में देखें, तो यह करीब 23,12,000 करोड़ रूपए से भी ज्यादा बनता है। यह बहुत बड़ी रकम होती है।

अब इस विशाल फंड का एक बड़ा हिस्सा भारत में आने जा रहा है। कंपनी इस पैसे को भारत के विकास से जुड़े कामों में लगाएगी। इस निवेश से दोनों देशों को बहुत बड़ा फायदा होगा। पहला फायदा ऑस्ट्रेलिया के बुजुर्गों को मिलेगा।

जब भारत की सरकारी स्कीम से कंपनी को बढ़िया मुनाफा होगा, तो वहाँ के बुजुर्गों की पेंशन की रकम बढ़ जाएगी। दूसरा बड़ा फायदा हमारे अपने देश भारत को होगा। इस विदेशी पैसे से भारत में बड़े-बड़े हाईवे, पुल, बिजली और पानी जैसे जरूरी प्रोजेक्ट्स तैयार होंगे। इससे हमारे देश का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत मजबूत हो जाएगा।

भारत की तारीफ में पढ़े कसीदे

ऑस्ट्रेलिया की इस बड़ी कंपनी के बड़े अधिकारियों ने भारत सरकार की खुलकर तारीफ की है। उन्होंने भारत के काम करने के तरीके को बहुत सराहा है। अधिकारियों ने बताया कि वे भारत में पैसा क्यों लगा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत में हो रही तेज तरक्की है। भारत की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूती से आगे बढ़ रही है। यहाँ का मध्यम वर्ग यानि मिडिल क्लास भी बहुत तेजी से बड़ा हो रहा है।

इसके पास सामान खरीदने और खर्च करने के लिए अच्छा पैसा है। बाजार में इस रौनक को देखकर विदेशी कंपनियाँ भारत की तरफ आकर्षित हो रही हैं। इसके अलावा एक और सबसे बड़ी बात है। वह बात है भारत सरकार के नियम और कानून। अधिकारियों ने कहा कि भारत सरकार की नीतियाँ हमेशा एक जैसी रहती हैं। यहाँ बार-बार नियम बदलते नहीं हैं। इससे विदेशी कंपनियों का काम करना आसान हो जाता है। वे सरकार पर पूरा भरोसा कर पाती हैं।

भारत सरकार ने बाहर के देशों से आने वाले पैसे के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। अब विदेशियों के लिए भारत में पैसा लगाना और बिजनेस शुरू करना बहुत आसान हो चुका है। कागजी काम भी अब ज्यादा पेचीदा नहीं रहा। भारत सरकार की इसी ईमानदारी और अच्छे माहौल को देखकर कंपनी का भरोसा मजबूत हुआ है। इसी पक्के भरोसे के कारण ऑस्ट्रेलियनसुपर ने भारत में अपना निवेश इतना ज्यादा बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है।

क्या है यह एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम?

एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम का पूरा नाम ‘नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ है। भारत सरकार ने इस स्कीम को साल 2015 में शुरू किया था। इसे आप सरकार का एक बहुत बड़ा गुल्लक कह सकते हैं। सरकार ने यह गुल्लक क्यों बनाया? इसका एक बहुत बड़ा कारण था। सरकार चाहती थी कि दुनिया भर के अमीर और बड़े निवेशक भारत में अपना पैसा लगाएँ। वे भारत के विकास में भागीदार बनें। इसी सोच के साथ इस खास फंड की शुरुआत की गई थी।

अब समझते हैं कि इस स्कीम में काम कैसे होता है। जब विदेशी कंपनियाँ या बड़े बैंक इस फंड में अपना पैसा डालते हैं, तो भारत सरकार उस पैसे को देश के विकास में लगाती है। इस पैसे से हमारे देश में बड़े-बड़े काम होते हैं। जैसे आलीशान और चौड़े हाईवे बनाए जाते हैं। नदियों पर मजबूत पुल तैयार होते हैं। बड़े-बड़े समुद्री बंदरगाह और नए एयरपोर्ट बनाए जाते हैं। इसके अलावा बिजली, पानी और अन्य जरूरी सुविधाएँ भी इसी पैसे से सुधारी जाती हैं। यानी विदेशियों के पैसे से हमारे देश का ढांचा मजबूत होता है।

इस स्कीम की सबसे अच्छी बात इसका सुरक्षित होना है। जब विदेशी कंपनियाँ इस सरकारी स्कीम में पैसा लगाती हैं, तो उन्हें डूबने का कोई डर नहीं रहता। मोदी सरकार उन्हें पूरी सुरक्षा देती है। साथ ही उन्हें इस पैसे पर बहुत अच्छा और तय मुनाफा भी मिलता है। दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत में निवेश करना बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है। जब विदेशी कंपनियों को दिखता है कि उनका पैसा यहाँ पूरी तरह सुरक्षित है और कमाई भी तगड़ी हो रही है, तो वे खुद-ब-खुद भारत की तरफ खींची चली आती हैं। यही वजह है कि आज दुनिया भर के बड़े निवेशक भारत पर आँख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं।

मेलबर्न में जुटे दोनों देशों के प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े बिजनेसमैन

इस बहुत बड़े और ऐतिहासिक निवेश का एलान मेलबर्न शहर में किया गया। वहाँ ‘ऑस्ट्रेलिया-इंडिया सीईओ फोरम‘ नाम की एक बहुत बड़ी बैठक चल रही थी। इसी बैठक के दौरान इस निवेश की घोषणा हुई। यह मौका दोनों देशों के लिए बेहद खास था। इस बड़े कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मौजूद थे। उनके साथ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज भी वहाँ बैठे थे। दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों का एक साथ आना इस बात का सबूत है कि यह डील कितनी बड़ी है।

इस बैठक में सिर्फ दोनों देशों के प्रधानमंत्री ही नहीं थे। उनके अलावा वहाँ दुनिया भर के दिग्गज लोग जुटे थे। बैठक में दोनों देशों के 200 से भी ज्यादा बड़े-बड़े बिजनेस लीडर्स और बिजनेसमैन शामिल हुए थे। इसके साथ ही दोनों देशों की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के चांसलर और वाइस-चांसलर भी वहाँ आए हुए थे।

इस महा-सम्मेलन में ऑस्ट्रेलियनसुपर कंपनी के सबसे बड़े अधिकारी पॉल श्रोडर ने भी हिस्सा लिया था। उन्होंने भारत के साथ काम करने और इस नई साझेदारी को लेकर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने माना कि भारत के साथ मिलकर काम करना उनके लिए फायदे का सौदा है।

मोदी के भारत में हर तरफ हैं निवेश के बड़े मौके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बड़ी बैठक में विदेशी निवेशकों का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने दुनिया के सामने नए भारत की असली ताकत और खूबियों को रखा। आज का भारत बहुत तेजी से बदल रहा है। यहाँ डिजिटल क्रांति आ चुकी है और हर काम मोबाइल-इंटरनेट से चुटकियों में हो जाता है। सरकार लगातार नए और अच्छे आर्थिक सुधार कर रही है, जिससे भारत में व्यापार करना बहुत आसान और तेज हो गया है।

PM मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनियों को भारत आने का खुला न्योता दिया। उन्होंने कंपनियों से यहाँ अपनी फैक्ट्रियाँ लगाने, प्रदूषण मुक्त बिजली बनाने और मोबाइल-कंप्यूटर की चिप (सेमीकंडक्टर) तैयार करने को कहा। आजकल भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EV), ऑनलाइन बिजनेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ विदेशी कंपनियों के लिए कमाई के बहुत बड़े मौके हैं।

इस महा-बैठक में दोनों देशों के बीच रक्षा यानी देश की सुरक्षा को लेकर भी कई ऐतिहासिक फैसले हुए हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया मिलकर सेना से जुड़े आधुनिक सामान बनाने के लिए एक ‘डिफेंस इनोवेशन कॉरिडोर’ तैयार करेंगे। दोनों देशों ने मिलकर आतंकवाद को जड़ से खत्म करने पर बहुत जोर दिया है। एक संयुक्त रक्षा घोषणा के जरिए दोनों देशों की सेनाओं के बीच आपसी तालमेल को और मजबूत किया जाएगा, जिससे वे एक-दूसरे से नई तकनीक और हुनर सीखेंगी। इसके साथ ही समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और निगरानी को बेहतर बनाने के लिए ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी रोडमैप’ पर काम तेज होगा। इस दोस्ती और भरोसे को और बढ़ाने के लिए भारतीय सेना के एक अधिकारी को ऑस्ट्रेलिया के डिफेंस कॉलेज में तैनात भी किया जाएगा।

बिजली और ऊर्जा के मामले में भी दोनों देशों ने एक नया इतिहास रच दिया है। भारत में बिजली की जरूरतों को पूरा करने और इसकी कमी को दूर करने के लिए दोनों देशों के बीच यूरेनियम को लेकर एक बहुत बड़ा समझौता हुआ है। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया अब भारत को यूरेनियम की सुरक्षित सप्लाई करेगा, जो भारत के परमाणु बिजली घरों के काम आएगा। इससे हमारे देश में बिना किसी प्रदूषण के भारी मात्रा में बिजली बनाई जा सकेगी। इतना ही नहीं, भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए ऑस्ट्रेलिया से एलएनजी (LNG) गैस, कोयला और डीजल जैसी चीजें भी ज्यादा मात्रा में मँगाने का फैसला किया है। इससे भारत के उद्योगों और गाड़ियों के लिए भविष्य में कभी भी ईंधन की कमी नहीं होगी।

आने वाले समय की आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने एक और बड़ा कदम उठाया है। दोनों देश मिलकर ‘क्रिटिकल मिनरल कॉरिडोर’ यानी जरूरी खनिजों के लिए एक खास रास्ता बनाएँगे। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों की बैटरी और कंप्यूटर चिप्स बनाने के लिए कुछ खास खनिजों की जरूरत होती है, जो इस समझौते के बाद भारत को बहुत आसानी से मिल सकेंगे। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच इंटरनेट पर होने वाले फ्रॉड और हैकिंग को रोकने के लिए एक खास ‘PACTS’ साइबर सुरक्षा समझौता हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि भारत का बड़ा बाजार और ऑस्ट्रेलिया की बेहतरीन तकनीक मिलकर दोनों देशों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। यह पूरा समझौता दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहा है।

अयोध्या में विशाल मस्जिद ना बनने के पीछे चंदे का अकाल नहीं, जिहादी मानसिकता: ‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो’

यह खबर देश के हर नागरिक के लिए बेहद विचारणीय है। अयोध्या के धन्नीपुर में बनने वाली प्रस्तावित भव्य मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय से उतने पैसे भी नहीं मिले, जितने की उम्मीद की जा रही थी। सुनने में शायद यह बात अजीब लगे लेकिन हकीकत में यह हँसने की नहीं बल्कि गहराई से सोचने की बात है। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि एक खास समुदाय की सोच में कितना कट्टरपंथ और जिद्द बसी है।

Secularism का चोला ओढे पहने घूम रहे हिन्दुओं से लेकर राज्य/केन्द्र सरकारें, पुलिस और सुप्रीम कोर्ट को आंखें खोलनी चाहिए। राममन्दिर बनने के बाद से शोभायात्राओं पर होने वाली पत्थरबाज़ी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। ये सब सुनियोजित षड़यंत्र है। भड़काऊ नारेबाजी, डीजे बजाना आदि victim card से ज्यादा कुछ नहीं। इनसे सख्ती से यह पूछना चाहिए कि इतना पत्थर कहाँ से/कब आया और किसके कहने पर?     

ये मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली दूसरी जगह पर एक भव्य मस्जिद, अस्पताल या लाइब्रेरी बनाने के लिए अपनी जेब से पैसा देने को तैयार नहीं हैं। वे आज भी इसी बात पर अड़े हैं कि राम जन्मभूमि की वही जमीन उनकी थी और वे उसी जमीन के मोह में फँसे हैं। यह मानसिकता केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में वक्फ की हर संपत्ति और विवादित ढांचे पर उनकी इसी सोच को बयाँ करती है।

क्यों औंधे मुँह गिरी भव्य मस्जिद की योजना?

साल 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया, तो उसके बाद सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दी थी। इस जमीन पर मुस्लिम ट्रस्ट ने बहुत बड़ा प्लान बनाया था। उन्होंने सोचा था कि यहाँ एक शानदार और भव्य मस्जिद बनेगी। साथ ही, लोगों की भलाई के लिए 300 बेड का एक बड़ा अस्पताल, एक बढ़िया लाइब्रेरी और एक बड़ा लंगर (कम्युनिटी किचन) भी तैयार किया जाएगा। पूरा नक्शा और तैयारी एकदम पक्की थी।

लेकिन असलियत में हुआ इसके ठीक उलटा। खुद मुस्लिम समाज के लोगों ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इससे अपना मुँह मोड़ लिया। अपनों के इस तरह साथ छोड़ने की वजह से यह बड़ा और खूबसूरत प्लान पूरी तरह ठप हो गया। अब संस्था के बड़े अधिकारियों का कहना है कि वे यहाँ कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सिर्फ एक बहुत छोटी सी मस्जिद बनाएँगे। इस छोटी मस्जिद को खड़ा करने के लिए भी कम से कम 3 से 5 करोड़ रुपए चाहिए, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी समाज से सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए का ही चंदा मिल पाया है।

मजहबी किताबों की उल्टी व्याख्या और जमीन का मोह

देखिए, मस्जिद के लिए चंदा न मिलने की असली वजह यह बिल्कुल नहीं है कि लोगों के पास पैसे खत्म हो गए हैं। इसके पीछे असल में एक गहरी मजहबी और राजनीतिक सोच काम कर रही है। इस पुरानी और कट्टरपंथी सोच में जीत और हार का पैमाना हमारे आज के रक्षा विज्ञान से बिल्कुल अलग है। इस मानसिकता में लोग तब तक खुद को हारा हुआ मानते ही नहीं, जब तक कि उनके कब्जे से जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी हमेशा के लिए न चला जाए। सीधा सा नियम समझ लीजिए… इनके लिए किसी भी तरह जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखना ही सबसे बड़ी जीत है।

इस अजीब जिद के पीछे कुछ कट्टरपंथी विचारकों की अपनी तरह से की गई व्याख्या है। जैसे, कुरान के सूरा अल-बकरा की आयत 191 में एक जिक्र आता है कि ‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो।’ शुरुआत में यह बात सिर्फ मक्का की जमीन को वापस पाने के लिए कही गई थी, लेकिन समय के साथ कट्टरपंथी सोच के लोगों ने इसे पूरी दुनिया की जमीनों से जोड़ दिया। उनकी सोच यह बन गई कि जो जमीन एक बार ‘दार-अल-इस्लाम’ यानी इस्लामिक शासन के नीचे आ गई, वह हमेशा के लिए उन्हीं की हो गई। उसे किसी भी गैर-मुस्लिम के हाथ में जाने देना ये अपनी सबसे बड़ी मजहबी हार मानते हैं। यही वजह है कि इतिहास में सदियों पहले स्पेन (अंडालूसिया) में हुई अपनी हार का रोना ये लोग आज भी रोते हैं।

वक्फ संपत्तियों पर अवैध दावा और जमीन हड़पने की वही पुरानी नीति

यही रवैया हमें वक्फ बोर्ड और बाकी जमीनी विवादों में भी साफ देखने को मिलता है। इनकी सोच बहुत सीधी है, जिस भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर एक बार हक जता दिया या जिसे अपना मान लिया, उसे फिर किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है। उसे छोड़ना ये अपनी नाक कटने जैसा या अपनी हार मानते हैं।

यही वजह है कि जब भी सरकार या अदालतें वक्फ की जमीनों की जाँच करने या उनके नियमों को सुधारने की कोशिश करती हैं, तो ये लोग तुरंत विरोध में खड़े हो जाते हैं और हंगामा शुरू कर देते हैं। इनके लिए जमीन हाथ से जाने का सीधा मतलब है अपनी ताकत का कम होना। पुरानी सोच के मुताबिक, जो जमीन एक बार इनके कब्जे में आ गई, उसे किसी और को देना ये अपनी सबसे बड़ी हार समझते हैं। इसी चक्कर में ये अदालती फैसलों को भी मन से स्वीकार नहीं कर पाते और हर जगह कोई न कोई नया विवाद खड़ा रखते हैं।

प्रशासनिक पेंच और अब सरकारी सहायता पर टिकी निगाहें

अयोध्या के धन्नीपुर में इस काम के समय पर शुरू न होने की वजह सिर्फ पैसों की कमी ही नहीं थी, बल्कि इस मस्जिद को बनाने वाले ट्रस्ट की अपनी कमियाँ भी थीं। सरकारी दफ्तर से नक्शा पास कराने और उसकी फीस जमा करने जैसे कागजी कामों में ही इस ट्रस्ट ने बहुत लंबा समय खराब कर दिया। छोटे-छोटे तकनीकी कामों को भी ये लोग समय पर नहीं संभाल पाए।

अब जब मुस्लिम समाज के लोगों ने इस बड़े प्रोजेक्ट को पूरी तरह नकार दिया है और चंदा देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो ये लोग अंदर ही अंदर एक नया रास्ता ढूँढ रहे हैं। ट्रस्ट के लोगों की बातों से अब ऐसा लग रहा है कि जब अपनों से कोई मदद नहीं मिली, तो इनकी नजरें सरकार की तरफ टिक गई हैं। अब ये जुगाड़ लगाने में जुटे हैं कि कैसे भी करके सरकारी मदद या विकास का पैसा मिल जाए, ताकि किसी तरह इनकी इज्जत बच सके।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ खोखली जिद

अगर आप इस पूरे मामले को ध्यान से देखें, तो यह एक तरफ भारत के गौरव और हमारे भव्य राम मंदिर के शानदार निर्माण को दिखाता है। वहीं दूसरी तरफ, यह कुछ लोगों की पुरानी और जिद से भरी सोच की पोल भी खोलता है। एक तरफ जहाँ देश-विदेश से करोड़ों हिंदुओं ने अपनी मर्जी से दिल खोलकर चंदा दिया और राम मंदिर का सपना पूरा कर दिखाया, वहीं दूसरी तरफ सिर्फ जिद और कट्टरपंथ के चक्कर में मुस्लिम समाज अपनी ही इस नई मस्जिद के लिए थोड़ी सी रकम भी जमा नहीं कर पाया।

चाहे वाराणसी का ज्ञानवापी मामला हो, धार की भोजशाला का विवाद हो या फिर वक्फ कानून में सुधार की बात… हर जगह सिर्फ जमीन पर अपना कब्जा जमाए रखने की यह मानसिक लड़ाई साफ दिखती है। अयोध्या के धन्नीपुर की मस्जिद का इतना बड़ा प्लान अचानक बहुत छोटा हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। जब तक लोग सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक सिर्फ विरोध और जिद के दम पर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

ऑस्ट्रेलिया लौटाएगा तमिलनाडु के मंदिरों की 3 दुर्लभ कलाकृतियाँ: भद्रकाली का त्रिशूल, नंदी की मूर्ति और 6 मुख वाले कार्तिकेय

                             भद्रकाली, नंदी और कार्तिकेय की दुर्लभ प्रतिमाएँ (फोटो साभार - एनडीटीवी)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भारत के लिए एक बड़ी सांस्कृतिक खुशखबरी सामने आई है। ऑस्ट्रेलिया ने घोषणा की है कि वह भारत की तीन प्राचीन धार्मिक कलाकृतियाँ वापस लौटाएगा।

इनमें देवी भद्रकाली की छवि वाला धातु का त्रिशूल, भगवान शिव के वाहन नंदी की पत्थर की मूर्ति और छह सिर वाले भगवान कार्तिकेय की दुर्लभ पत्थर की प्रतिमा शामिल हैं। इन सभी धरोहरों का संबंध तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से है।

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि यह फैसला दोनों देशों के बीच दोस्ती और सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है।

ऑस्ट्रेलिया ने क्यों लौटाईं ये प्राचीन धरोहरें?

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने बताया कि ये कलाकृतियाँ पहले ऑस्ट्रेलिया की नेशनल गैलरी और न्यू साउथ वेल्स की आर्ट गैलरी के संग्रह में रखी गई थीं। अब इन्हें स्वेच्छा से भारत को लौटाया जाएगा। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना और ऐतिहासिक धरोहरों को उनके मूल स्थान तक पहुँचाना ऑस्ट्रेलिया की जिम्मेदारी है।

भारत लौटाई जा रही धरोहरों में सबसे खास देवी भद्रकाली की आकृति वाला धातु का त्रिशूल है, जो तमिलनाडु के कोल्लुमंगुडी स्थित श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर से जुड़ा माना जाता है और 13वीं से 16वीं शताब्दी का बताया जाता है।

इसके अलावा नंदी की पत्थर की मूर्ति भी इसी मंदिर से संबंधित है। वहीं तीसरी प्रतिमा चोल काल की छह सिर वाले भगवान कार्तिकेय की है, जो तंजावुर जिले के मनमबाड़ी स्थित नागनाथस्वामी मंदिर से जुड़ी मानी जाती है।

मोदी-अल्बनीज की मुलाकात में सांस्कृतिक रिश्तों पर भी जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने मेलबर्न में तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की। दोनों नेताओं ने पहले आमने-सामने बातचीत की और फिर प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई।

इस दौरान दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी के छह वर्ष पूरे होने पर संतोष जताया गया। साथ ही बढ़ते सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच मजबूत होते संबंधों पर भी चर्चा हुई।

इस मौके पर ऑस्ट्रेलिया ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा की। अल्बनीज ने बताया कि चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में सुरक्षित ऑस्ट्रेलिया के ‘फर्स्ट नेशंस’ समुदाय के एक पूर्वज के अवशेष भी उनके पारंपरिक संरक्षकों को वापस सौंपे जाएँगे।

उन्होंने कहा कि यह कदम न्याय, सम्मान, मेल-मिलाप और ऐतिहासिक घावों को भरने की दिशा में महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस प्रक्रिया में सहयोग का भरोसा दिया। दोनों नेताओं ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहरों और ऐतिहासिक विरासत का सम्मान भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्तों को भविष्य में और मजबूत बनाएगा।

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती करने वाले 23 कर्मचारियों ने दिया सामूहिक इस्तीफा


अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले के बीच दान की गणना करने वाले 23 कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। कर्मचारियों के काम पर नहीं पहुँचने के कारण गुरुवार (9 जुलाई 2026) को केवल 13 गणनाकर्मियों से चढ़ावे की गिनती कराई गई। अचानक हुए इस घटनाक्रम से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, भारतीय स्टेट बैंक और कर्मचारियों की व्यवस्था करने वाली एजेंसी के सामने परेशानी खड़ी हो गई है।

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्तीफा देने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि पहले मंदिर में चढ़ावे की गणना दो शिफ्टों में होती थी। प्रत्येक कर्मचारी से करीब छह घंटे काम लिया जाता था। चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद कई कर्मचारियों को हटा दिया गया और सुरक्षा के मद्देनजर दोनों शिफ्टों का काम एक ही शिफ्ट में कर दिया गया। इसके बाद कर्मचारियों की ड्यूटी सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक, यानी नौ घंटे कर दी गई।

कर्मचारी का दावा है कि पहले सभी को 14,755 रुपए मासिक वेतन मिलता था लेकिन बाद में इसे घटाकर अलग-अलग कर दिया गया। किसी कर्मचारी को 8,000 रुपए तो किसी को 11,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाने लगे। महीने में मिलने वाली छुट्टियों की संख्या भी कम कर दी गई है।

जुलाई 8 को शाम काम समाप्त होने के बाद कर्मचारियों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। उन्होंने काम के घंटे, वेतन और छुट्टियों की व्यवस्था पहले की तरह करने की माँग रखी। एसबीआई की तुलसी उद्यान शाखा के अधिकारियों और सैनिक सिक्योरिटी के सुपरवाइजर जयराम यादव से भी शिकायत की गई लेकिन माँगें स्वीकार नहीं हुईं। इसके बाद 23 कर्मचारियों ने हस्ताक्षरयुक्त सामूहिक इस्तीफा और मांगपत्र सौंप दिया।

जुलाई 9 की सुबह इस्तीफा देने वाला कोई कर्मचारी काम पर नहीं पहुँचा तो बैंक, ट्रस्ट और एजेंसी के अधिकारी सक्रिय हो गए। बैंक के अनुसार केवल 13 कर्मचारियों ने गणना की जिससे काम प्रभावित हुआ है। नए कर्मचारियों की भर्ती की तैयारी है लेकिन चोरी के मामले के बाद पूरी तरह सत्यापन के बिना किसी को नियुक्त नहीं किया जा सकता।

वहीं, बैंक के एक कर्मचारी ने दावा किया कि कर्मचारियों को हटाया गया है और अब इतने कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है। इसी बीच ट्रस्ट के कार्यवाहक महासचिव कृष्ण मोहन ने अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास से मुलाकात की। करीब एक घंटे चली इस बैठक को भी इस्तीफा प्रकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।

क्या कभी कांग्रेस ने एडविना से इश्क़ लड़ाने वाले नेहरू को कहा “control papa Control”? बेशर्म कांग्रेसियों नेहरू जैसा देश के टुकड़े करने वाला घटिया आदमी कोई हो भी नहीं सकता

सुभाष चन्द्र

जिस मोदी को 35 देशों ने अपना सर्वोच्च सम्मान देकर सिर आंखों पर बिठाया, उस मोदी से कांग्रेस की घृणा ही कांग्रेस को डुबो रही है।  किस हद तक गिर रहे हैं कांग्रेस के नेता, कोई इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी को तो बदनाम किया ही, साथ में इंडोनेशिया की स्पीकर पुआन महारानी को भी लपेट दिया। मोदी के साथ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भी बैठे थे लेकिन कांग्रेस ने केवल मोदी और स्पीकर महारानी की फोटो दिखा कर घटिया टिप्पणी करते हुए लिखा “कंट्रोल उदय कंट्रोल”! 

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कांग्रेस के बकैत सुप्रिया श्रीनेत ने मोदी की फोटो लगा कर लिखा “International Shame” और नेहरू की फोटो से साथ लिखा “International Fame”। कांग्रेस की तरफ से यह भी कहा गया कि मोदी नेहरू बनने की कोशिश न करे। ऐसी ही बात कुछ दिन पहले तीसरे दर्जे के पत्रकार आशुतोष ने भी कही थी कि नेहरू बनना आसान नहीं है जब मोदी ने नेहरू के elected प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू का रिकॉर्ड तोडा था

कांग्रेस के कुछ नेता बिल्कुल कुत्तों की तरह भौंक रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं खुद राहुल विन्ची और अन्य है खड़गे, सुप्रिया श्रीनेत, पवन खेड़ा और जयराम रमेश। लेकिन कांग्रेस का दुर्भाग्य ये है कि जब चुनाव हारती है कांग्रेस तो कोई इन ढक्कनों को दोष नहीं देता

इन कांग्रेसियों का कलेजा मोदी को दुनियाभर में मिलने वाले सम्मान से जला भुना रहता है और बात बे बात नेहरू को बीच में घुसेड़ देते हैं जबकि सच यह है कि नेहरू को मोदी के चरणों की धूल  के एक कण के बराबर भी नहीं माना जा सकता

नेहरू की बराबरी कौन कर सकता है जो अपनी कथित आज़ादी की लड़ाई के समय माउंटबेटन की बीवी एडविना से इश्क़ लड़ा रहा था और ये कोई कही सुनी बात नहीं है, ये एडविना की बेटी ने खुद कही है। अमेरिका में नेहरू से केनेडी UN में स्थाई सीट की बात कर रहे थे लेकिन नेहरू की रूचि उनकी बीवी में थी। नेहरू ने देश के टुकड़े कर कर के बांट दिए, कुछ चीन को दे दिया, कुछ पाकिस्तान और कुछ म्यांमार और अन्य देशों को

नेहरू से बराबरी मोदी कैसे कर सकते हैं। नेहरू और उनका सारा परिवार तो बाबर की कब्र पर माथा टेकने जाता रहा है। नेहरू ने सोमनाथ मंदिर बनने के बाद उसके उद्घाटन में डॉ राजेंद्र प्रसाद और अपने सारे मंत्रियों को जाने से रोक दिया और मोदी ने 40 से ज्यादा देशों में प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार करा दिया, राम मंदिर बनवा दिया जिसे बनाने में नेहरू और आज की कांग्रेस को कोई रुचि नहीं थी। फिर मोदी कैसे नेहरू के बराबर हुए। पाकिस्तान को हमारी नदियों का 80% पानी दे दिया और मंत्री होते हुए caretaker प्रधानमंत्री बनकर लियाकत अली से समझौता कर देश में मुसलमानों को सुरक्षा दे दी जबकि पाकिस्तान ने हिंदुओं को ख़त्म कर दिया

नेहरू के लिए 555 नंबर की सिगरेट का ब्रांड भी विदेश से आता था और मोदी विदेशों से मिले उपहार भी नीलाम कर देता है। फिर मोदी कैसे बराबरी कर सकते हैं नेहरू से। अनेक किस्से हैं नेहरू के कुकर्मों के। सबसे बड़ी बात तो यह कि वह हिंदू न होते हुए भी खुद को accidental हिंदू कहता था जबकि मोदी डंके की चोट पर अपने को हिंदू कहता है। NEHRU WAS IN FACT A MAN OF AN INETNATIONAL SHAME BUT MODI IS A MAN OF INTERNATIONAL FAME.

उद्धव ठाकरे की पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा है कि मोदी की फोटो स्पीकर महारानी के साथ लगा कर उन दोनों का अपमान करना कांग्रेस को शोभा नहीं देता। सच्चाई यह है कि मोदी को अपमानित करना और उसके लिए गलियां बकना ही कांग्रेस को शोभा देता है

इस्लामियों ने 5 करोड़ रूपए चंदे का देखा था सपना, ‘उम्माह’ से 1.5 करोड़ रूपए भी नहीं मिला: अयोध्या में ‘बड़ा मस्जिद’ बनाने का सपना टूटा, अब बनेगी छोटी सी इमारत


बाबरी मस्जिद के नाम पर मुसलमानों ने करोड़ों रूपए फूंक दिए। ईरान को मदद देने 18 करोड़ इकठे करने वाला मुसलमान अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिली जमीन पर मस्जिद बनाने के लिए किसी मुस्लिम मुल्क से मदद नहीं मिल रही। भारत का इस्लामिक कट्टरपंथी भारत की तरह उम्माह और दूसरे मुस्लिम संगठनों को भी बेवकूफ समझता है। वो भी समझता है कि आज की तारीख में भारत का मुसलमान इतना गरीब नहीं कि मस्जिद के लिए खैरात/जकात देने की हैसियत नहीं। राममन्दिर बनकर तैयार हो गया लेकिन इस्लामी हाथ में कटोरा लिए घूम रहा है।   

अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धन्नीपुर में बनने वाली मस्जिद परियोजना का पूरा ढांचा ही ध्वस्त हो गया है। भव्य राम मंदिर के निर्माण पर तमाम तरह की बयानबाजी करने वाले और राम विरोधियों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि अब मुस्लिम समुदाय की बेरुखी और चंदे के महासंकट के कारण इस मस्जिद का आकार बेहद छोटा कर दिया गया है।

इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) ने अस्पताल और लाइब्रेरी जैसी बड़ी योजनाओं को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया है। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में 5 एकड़ जमीन आवंटित की थी। यह जगह राम मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर लखनऊ-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।

इस जमीन पर पहले एक बेहद भव्य मस्जिद बनाने का बड़ा दावा किया गया था। इस परियोजना में मुख्य मस्जिद के साथ-साथ एक 300 बिस्तरों का मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, एक समृद्ध केंद्रीय पुस्तकालय और कम्युनिटी किचन बनाने का पूरा खाका तैयार था। लेकिन खुद मुस्लिम समुदाय ने ही इस परियोजना से पूरी तरह मुँह मोड़ लिया। अपनों की इस भारी बेरुखी के कारण अब यह पूरा भव्य प्रोजेक्ट औंधे मुँह गिर गया है।

चंदे की भारी किल्लत, तिजोरी में नहीं बचा पैसा

जो लोग भव्य राम मंदिर को लेकर आए दिन मीडिया में बड़ी-बड़ी बयानबाजी करते थे, आज उनके खुद के प्रोजेक्ट के लिए चंदे का बड़ा अकाल पड़ गया है। फाउंडेशन के सचिव अतहर हुसैन ने साफ किया कि अब इस जगह पर केवल एक ‘छोटी मस्जिद’ का निर्माण किया जाएगा।

इस छोटी सी मस्जिद को बनाने के लिए भी कम से कम 3 करोड़ से 5 करोड़ रुपए के फंड की जरूरत है। लेकिन असलियत यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी फाउंडेशन अब तक सिर्फ 1.5 करोड़ रुपए का ही चंदा जुटा पाया है। यह रकम इस योजना के लिए पूरी तरह नाकाफी साबित हुई है, जिसके कारण ट्रस्ट को घुटने टेकने पड़े हैं।

खुद के फायदे के लिए सरकारी फंड के इस्तेमाल पर टिकी निगाहें

मुस्लिम समुदाय से अपेक्षित चंदा और सहयोग न मिलने के कारण अब ट्रस्ट की हालत खराब है। सूत्रों के अनुसार, चंदा इकट्ठा करने में नाकाम रहने के बाद अब अंदरखाने सरकारी सहायता और फंड को अपने तरीके से इस्तेमाल करने की जुगत लगाई जा रही है।

आईआईसीएफ के अध्यक्ष जुफर अहमद फारूकी ने खुद माना कि समुदाय की ओर से इस प्रोजेक्ट को लेकर भारी उदासीनता और अरुचि देखी जा रही है। लोगों ने इस काम के लिए बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाई, जिससे चंदे का यह संकट खड़ा हुआ है।

प्रशासनिक लेटलतीफी और नक्शे का पेंच

परियोजना के समय पर शुरू न हो पाने के पीछे केवल पैसों की कमी ही नहीं थी। ट्रस्ट की प्रशासनिक और तकनीकी कमियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार रहीं। अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) से मस्जिद और पूरे परिसर का नक्शा पास कराने की प्रक्रिया में ट्रस्ट को लंबा वक्त लग गया।

शुरुआत में इस 5 एकड़ की जमीन के लैंड यूज (भू-उपयोग) को बदलने में पेंच फँसा। इसके बाद विकास शुल्क (डेवलपमेंट चार्ज) के रूप में एक बड़ी सरकारी राशि जमा करने की तकनीकी बाध्यता सामने आई। हालाँकि बाद में विकास प्राधिकरण ने इस नक्शे को मंजूरी दे दी थी, लेकिन तब तक बजट का संकट इतना बढ़ गया कि ट्रस्ट जमीन पर कोई भी काम शुरू नहीं कर सका।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ बदहाली

अयोध्या का यह विवाद दशकों पुराना रहा है। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पूरे देश में बड़े दंगे हुए थे, जिसमें करीब 2,000 लोग मारे गए थे। इसके बाद साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी जमीन का मालिकाना हक हिंदुओं को सौंपते हुए भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था।

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को पूरा करते हुए उस पवित्र स्थान पर एक बेहद भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले इस मंदिर का भव्य उद्घाटन भी किया था।

राम मंदिर को लेकर छिड़ा ताजा राजनीतिक घमासान

एक तरफ जहाँ मस्जिद का काम पूरी तरह ठप हो चुका है, वहीं राम मंदिर का प्रबंधन भी इस समय राजनीतिक हमलों का सामना कर रहा है। मंदिर के चंदे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के कुछ आरोपों के बाद हाल ही में इसके प्रबंधन और नेतृत्व में बड़ा फेरबदल किया गया है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसे देखते हुए विपक्षी दल इस मामले को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तमाम विवादों के बीच, मस्जिद का भव्य सपना टूटना और इसका आकार बेहद छोटा होना अब सबसे बड़ी सच्चाई बन चुका है।