मंदिर के ख़ज़ाने में जाए दान की पाई पाई; बांके बिहारी मंदिर में आने वाले दान और चढ़ावे पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश; लेकिन यह नियम तो सभी मंदिरों, चर्चों और दरगाहों पर भी लागू होना चाहिए

सुभाष चन्द्र

सनातन को बदनाम करने हिन्दू विरोधी नितरोज कोई न कोई हत्कण्डा अपना रहे हैं। लेकिन किसी में दिल्ली की जामा मस्जिद, निजामुद्दीन दरगाह और अजमेर शरीफ आदि में आ रहे चढ़ावे पर बोलने की हिम्मत नहीं। जिस दिन हिन्दू विरोधी मस्जिदों और दरगाहों में आने वाले चन्दे का हिसाब मांगना शुरू किया वक़्फ़ में बेशुमार धन होगा। किसी सरकारी अनुदान की जरुरत नहीं होगी।  

अगस्त 25 को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने बांके बिहारी मंदिर में आने वाले दान और चढ़ावे पर सख्त निर्देश देते हुए कहा कि दान की पाई पाई मंदिर के ख़ज़ाने में जानी चाहिए। मंदिर की मैनेजिंग समिति को दान की रकम के लिए पारदर्शी व्यवस्था लागू करनी चाहिए कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले दान देवता को समर्पित होना चाहिए सेवायत उस रकम पर पहले अपना हिस्सा नहीं ले सकता जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि पुजारी का देवता पर “गार्निशी राइट” नहीं हो सकता

बहुत अच्छा निर्णय है लेकिन यह निर्णय देश के सभी मंदिरों पर लागू होना चाहिए - मंदिरों पर ही क्यों, चर्चों, दरगाहों और मस्जिदों पर भी लागू होना चाहिए - चर्च का धन क्या जीसस का नहीं होना चाहिए और दरगाह का चढ़ावा जिसके नाम पर दरगाह है उसका नहीं होना चाहिए - इसी तरह मस्जिद का धन भी अल्लाह का होना चाहिए

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चर्चित YouTuber 
देश में अनेक राज्यों ने मंदिरों को अपने अपने नियम/कानून बना कर कब्जे में लिए हुए हैं और राज्य सरकार अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मंदिरों के धन को लूटती हैं
-तमिलनाडु में केवल मंदिरों के लिए Tamil Nadu Hindu Religious and Charitable Endowment act, 1959 लागू है;

-आंध्र प्रदेश में A.P. Charitable and Hindu Religious Institution and Endowment Act, 1987 लागू है;

-कर्नाटक में Karnataka Hindu Religious Institutions and Charitable Endowment Act, 1997 लागू है;

-तेलंगाना में Telangana Endowment Act लागू है;

-केरल में Travancore - Cochin Hindu Religious Institution Act, 1950 लागू है (जो Guruvayur or Devaswom boards के लिए है);

- ओडिशा में Odisha Hindu Religious Act, 1951 से लागू है;

-बिहार में Bihar Hindu Religious Trust Act, 1950 से लागू है;

-मध्य प्रदेश में Madhya Pradesh Public Trust act, 1951 लागू है;

महाराष्ट्र अपने Maharashtra Public Trusts Act, 1950 से और बड़े  पब्लिक ट्रस्ट और Prominent Temples की देखरेख विधानसभा से पारित कानूनों से करता है

ये सभी कानून केवल हिंदुओं के लिए हैं, कोई कानून मुस्लिमों और ईसाइयों के लिए नहीं हैं इसका उद्देश्य राज्य सरकार को मंदिर प्रशासन पर कंट्रोल रखना, मंदिरों की वित्त व्यवस्था, प्रॉपर्टी और मंदिरों की जमीन जायदाद पर नियंत्रण रखना है इन मंदिरों में राज्य सरकार मंदिर प्रशासन को संभालने के लिए अपने कमिश्नर नियुक्त करती हैं

यानी देवता का धन सीधे सीधे राज्य सरकार के अधीन है

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए suo moto संज्ञान लेकर राज्यों के ऐसे सभी ट्रस्टों की जाँच करने के आदेश दे कई राज्यों में मंदिरों का धन निकाल कर मस्जिदों और चर्चों पर खर्च किया जाता है 

निर्णय केवल मंदिरों के लिए नहीं होने चाहिए बल्कि अन्य मजहबों के लिए भी होने चाहिए और मंदिरों के लिए निर्णय करना जरूरी है तो जो मंदिर राज्य सरकार के कब्जे में हैं, उन पर भी नियम लागू किये जाने चाहिए

राहुल गांधी का पाखंड: मनुस्मृति की आड़ में प्रहार और ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर क्यों इनकार?


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
अर्थात: जहां स्त्रियों का आदर और सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं और सुख-समृद्धि रहती है। जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां किए गए सभी अच्छे कर्म और प्रयास निष्फल हो जाते हैं। महिलाओं के आदर की सर्वोच्चता का यह श्लोक उसी मनुस्मृति का है, जिसे राहुल गांधी ने पुणे में युवाओं और GenZ को दिग्भ्रमित करने के लिए शर्मनाक बताया है। 
फिर जितनी सहजता से राहुल और अन्य विपक्षी पार्टियां सनातन पर प्रहार कर रही हैं, क्या किसी में दूसरे मजहबों में बेशुमार कमियों पर बोलने की हिम्मत है? शायद नहीं, क्योकि इनका मकसद सनातन पर प्रहार कर अपने वोटबैंक को खुश करना है।     
सहज ही पूछा जा सकता है कि यदि राहुल वास्तव में महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और सशक्तीकरण के लिए इतने ही चिंतित हैं, तो उन्होंने ‘नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम’ का विरोध क्यों किया? यह वही ऐतिहासिक विधेयक था, जिसने देशभर की महिलाओं को राजनीति में सीधे 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की। महिलाओं के प्रति उनकी ओछी सोच इससे भी जाहिर होती है कि राहुल ने तो अपनी बहन प्रियंका तक को चुनावी राजनीति में खुद के दो दशक बाद उतारा। वह भी मजबूरी में, क्योंकि खुद उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही और लगातार चुनाव हार रहे हैं। 
सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह राहुल प्राचीन हिंदू संहिताओं, सनातन ग्रंथों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। या राजनीतिक फायदे के लिए सलेक्टिव सोच दिखाते हैं। क्या उनमें दूसरे धर्मों के ग्रंथों में महिलाओं की स्थिति और अधिकारों पर सार्वजनिक मंचों से बोलने का साहस है? जब राहुल केवल बहुसंख्यक समाज के ग्रंथों को चुन-चुनकर निशाना बनाते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका इरादा महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि सोची-समझी तुष्टिकरण की राजनीति साधना और सनातन आस्था को नीचा दिखाना है।
नारीशक्ति से हर कालखंड में भारत की उन्नति और खुशहाली
राहुल गांधी अनर्गल आरोप लगा रहे हैं कि मनुस्मृति जैसे महान ग्रंथ से भारत में महिलाओं को दबाने का माइंसेट आता है। शायद उन्हें पता नहीं कि भारतभूमि सदियों ही से मातृशक्ति के सम्मान और गौरव की साक्षी रही है। मनुस्मृति में भी नारी को केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि शक्ति, विद्या और समृद्धि का साक्षात रूप माना गया है। सनातन संस्कृति में ‘नारी’ के आदर को सर्वोच्च स्थान देते हुए भगवान शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप की कल्पना की गई, जो पुरुष और महिला की समानता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण है। 
इतिहास और पुराणों में जब भी ज्ञान की आवश्यकता हुई तो मां सरस्वती, धन के लिए मां लक्ष्मी और संकटकाल में शक्ति के लिए मां दुर्गा का आह्वान किया गया, जो महिलाओं के प्रति अगाध श्रद्धा को दर्शाता है। व्यावहारिक जगत में भी अनुसूया, गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने अपने ज्ञान से समाज का मार्गदर्शन किया, तो राजमाता जीजाबाई ने छत्रपति शिवाजी महाराज को संस्कार देकर राष्ट्रभक्ति की नींव रखी। आधुनिक युग में भी रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, अहिल्याबाई होल्कर का कुशल प्रशासन और मां शारदा का वात्सल्य इसी पावन भूमि पर फला-फूला। ये ऐतिहासिक उदाहरण हमें स्मरण कराते हैं कि भारत की उन्नति और खुशहाली हर कालखंड में नारी के अधिकारों, उसकी गरिमा और उसके स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखने से आई है।
मनुस्मृति: महिलाओं के पक्ष में एक नहीं, अनेक उदाहरण
दरअसल, कांग्रेस और इंडी गठबंधन के नेताओं की यह सोची-समझी, लेकिन घटिया राजनीति है कि जब मुद्दाविहीन हो जाओ तो सनातन संस्कृति पर उंगली उठाओ। मनुस्मृति को गाली दे दो। जब स्वयं को आधुनिक व बुद्धिजीवी दिखाना हो तो रामचरितमानस और मनुस्मृति को शर्मनाक बता दो। राहुल जिस मनुस्मृति के श्लोक पर सवाल उठा रहे हैं, वही मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है? मनुस्मृति कहती है – विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर कोई कैसे परिभाषित कर सकता है? इतना ही नहीं, मनुस्मृति ही कहती है – पुत्रेण दुहिता समा। यानि पुत्री और पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर ग्रंथ और कौनसा हो सकता है?
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी माना था मनुस्मृति का लोहा
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जिन डॉ. आंबेडकर के संविधान की किताब को लेकर दिखावा करते रहते हैं, उन डॉ. आंबेडकर ने भी मनुस्मृति का लोहा माना था। उन्होंने हिंदू कोड बिल (Hindu Code Bill) के समय 24 फरवरी 1949 को संसद में चर्चा के दौरान मनुस्मृति का हवाला दिया था। उन्होंने तार्किक स्वर में कहा था कि कुल 137 स्मृतियों में याज्ञवल्क्य और मनु का स्तर सबसे ऊंचा है। उन्होंने रेखांकित किया कि स्वयं मनुस्मृति भी कुछ विशेष परिस्थितियों में (जैसे विधवा या पुत्र न होने पर) बेटियों को भाइयों के हिस्से का एक-चौथाई (1/4) उत्तराधिकार देने का समर्थन करती है। उनका उद्देश्य यह साबित करना था कि महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देना कोई आधुनिक या विदेशी विचार नहीं है, बल्कि भारत की सनातन प्राचीन कानूनी परंपराओं में भी इसका आधार पहले से ही मौजूद रहा है।
पुणे के मंच से छात्रों की नहीं, ‘पाखंड’ के नए अध्याय की गूंज
राहुल गांधी ने 22 अगस्त को पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान एक बार फिर अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए सनातन संस्कृति और देश के गौरवशाली इतिहास को कठघरे में खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया। मनुस्मृति के एक श्लोक को संदर्भ से काटकर पेश करना और उसे ‘शर्मनाक’ करार देना, राहुल गांधी की हताशा को दर्शाता है। एक ऐसे मंच पर, जहां युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए था, वहां एक ऐसे नेता का अपनी तुच्छ राजनीति के लिए प्राचीन ग्रंथों को बदनाम करना, न केवल निंदनीय है, बल्कि उनकी बौद्धिक और सांस्कृतिक समझ के स्तर को भी रेखांकित करता है।
महिलाओं के सम्मान नहीं, सनातन के अपमान के लिए व्यग्र
यह कोई पहला मौका नहीं है जब राहुल गांधी ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीकों और ग्रंथों को निशाना बनाया है। राहुल गांधी अक्सर अपनी सुविधा के अनुसार सिर्फ उन अंशों को चुनते हैं जो उनके विभाजनकारी नैरेटिव में फिट बैठते हैं। उनका यह आचरण साफ दर्शाता है कि वे महिलाओं के सम्मान के प्रति नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति को बदनाम करने के प्रति ‘व्यग्र’ हैं। राहुल गांधी का यह प्रयास कि वे मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को शर्मनाक बताएं, केवल भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के प्रति उनके द्वेष को उजागर करता है। शायद उन्हें पता हो कि जिस प्राचीन भारत की वे आलोचना कर रहे हैं, उसी ने गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं को जन्म दिया? समस्या ग्रंथों में नहीं, बल्कि राहुल गांधी की उस मानसिकता में है जो हिंदू परंपराओं को बदनाम करके वोट बैंक की राजनीति करना चाहती है।
कांग्रेस का ‘महिला विरोधी’ चरित्र: अभद्र टिप्पणियों पर चुप्पी
राहुल गांधी की पार्टी के नेताओं द्वारा महिलाओं पर की गई अभद्र टिप्पणियां जगजाहिर हैं। जब कांग्रेस के नेता महिलाओं के प्रति अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तब राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी की की ‘स्वतंत्र पहचान’ की नैतिकता कहां चली जाती है? तब वे क्यों चुप्पी साध लेते हैं? कांग्रेस सरकारें हों या इंडी गठबंधन की सरकारें, इनमें महिलाओं पर जुल्म, शोषण और रेप पर इनके होंठ सिले ही रहते हैं। यह चुप्पी कायरता और मौन सहमति का प्रतीक है। यह दिखाता है कि कांग्रेस की संस्कृति में महिलाओं के प्रति सम्मान का अभाव है, और राहुल गांधी की बातें सिर्फ दिखावा मात्र ही हैं। राहुल का इस पर ‘मौन’ रहना यह साबित करता है कि वे भी इस तरह की मानसिकता का हिस्सा हैं। जब तक राहुल अपने नेताओं की इस अभद्र भाषा की निंदा नहीं करते, तब तक महिलाओं के प्रति उनके ‘सम्मान’ की बात एक छलावा मात्र है। 
दोगलेपन की पराकाष्ठा: नारी शक्ति वंदन अधिनियम का विरोध क्यों?
यदि राहुल गांधी महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और सशक्तिकरण के लिए वास्तव में चिंतित हैं, तो उन्होंने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का विरोध क्यों किया? यह एक ऐतिहासिक विधेयक था, जिसने महिलाओं को राजनीति में सीधे 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की। क्या यह महिलाओं को स्वतंत्र पहचान और देशसेवा का मार्ग प्रशस्त करने का सबसे बड़ा अवसर नहीं था? कांग्रेस, राहुल गांधी और उनके सहयोगी दलों ने इस विधेयक का न केवल विरोध किया, बल्कि इस पर सवाल भी उठाए। यह दोगलेपन की पराकाष्ठा है कि एक तरफ आप महिलाओं के ‘स्वतंत्र’ होने की बात करते हैं और दूसरी तरफ उन्हें सशक्त बनाने वाले कानून का विरोध करते हैं। दरअसल, जब उन्हें लगा कि महिलाएं अब उनके झांसे में नहीं आएंगी, तो उन्होंने ‘नारी शक्ति’ को एक ऐसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास किया, जिससे वे सरकार को घेर सकें। लेकिन देश की महिलाएं अब जागरूक हैं और वे जानती हैं कि ‘नारी शक्ति’ की असली हिमायती मोदी सरकार और उसकी नीतियां हैं।
प्रियंका गांधी की एंट्री: विफलताओं में बहना का सशक्तिकरण
इतना ही नहीं राहुल गांधी का दोहरा रवैया तो उनके अपने परिवार में भी साफ नजर आता है। उन्होंने अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनावी राजनीति में तब उतारा, जब कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही थी और खुद राहुल की अपनी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ रहे थे। दो दशक से अधिक समय तक जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब महिलाओं को ‘स्वतंत्र पहचान’ क्यों नहीं दी गई? जब खुद का वजूद खतरे में दिखा, तब महिलाओं की याद आई। यह साफ़ करता है कि राहुल गांधी के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण केवल एक राजनीतिक उपकरण है, न कि कोई वैचारिक प्रतिबद्धता है।
बेटियों को लेकर कांग्रेसियों की ऐसी रही है निकृष्ट सोच
  • कांग्रेस की गहलोत सरकार में बेतहाशा रेप पर उनके मंत्री शांति धारीवाल ने शर्मनाक बयान दिया कि राजस्थान तो मर्दों का प्रदेश रहा है यार, अब उसका क्या करें।
  • पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का महिलाओं के प्रति नजरिया देखिए- “जैसे-जैसे समय बीतता है, जीत का मजा फीका पड़ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पत्नी पुरानी होने पर अपनी चमक खो देती है।
  • पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने अपनी पार्टी की महिला नेता को 100 टके की टंच माल कहा।
  • कांग्रेस नेता सत्यदेव कटारे के मुताबिक जब तक महिला तिरछी नजर से नहीं देखेगी, तब तक पुरुष उसे नहीं छेड़ेगा।
  • कांग्रेस नेत बोटचा सत्यनारायण निर्भया कांड के बाद महिलाओं को रात में न घूमने की सलाह ही दे दी।
  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने तो हेमा मालिनी पर घटिया बयान दे दिया। EC ने प्रचार पर 48 घंटे का प्रतिबंध लगाया।
  • राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो केस में एक असहाय महिला के अधिकारों को कुचला।
  • कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर को ‘चिल्लर’ तक कह दिया।
राजस्थान में जब कांग्रेस की गहलोत सरकार थी, तब महिलाओं के शोषण और उनपर अत्याचार का यह हाल था…
यह राजस्थान मर्दों का प्रदेश रहा है यार…उसका क्या करें ?
तब विधानसभा में पुलिस और जेल की अनुदान मांगों पर बहस का जवाब देने के दौरान संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल ने राजस्थान को रेप में नंबर वन बताने के साथ उसके कारणों पर बेहद आपत्तिजनक बयान भी दे दिया। शांति धारीवाल ने कहा कि ये सच है कि राजस्थान रेप के मामलों में नंबर वन है. कुछ देर चुप रहकर बोले कि अब ये रेप के मामले क्यों हैं? फिर हंसते हुए कहा- वैसे भी यह राजस्थान तो मर्दों का प्रदेश रहा है यार…उसका क्या करें ? धारीवाल ने जब रेप के मामले बढ़ने को मर्दों के प्रदेश से जोड़कर बयान दिया तो किसी को गलती का अहसास नहीं हुआ।
रेप को मर्दानगी से जोड़ने के बयान का यू-ट्यूब पर सीधा प्रसारण
यह कहकर धारीवाल फिर हंसे तो कई मंत्री और कांग्रेस विधायक भी हंसने लगे। किसी ने धारीवाल को टोका तक नहीं। इस मौके पर सरकार के मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के विधायक हंसते रहे। सरकार में तीन-तीन महिला मंत्री भी हैं, उनमें से भी किसी ने नहीं टोका। संसदीय कार्यमंत्री धारीवाल ने बताया कि रेप के मामले में रेप और रेप विद मर्डर के आंकड़े अलग-अलग हैं। रेप विथ मर्डर में राजस्थान 11 वें नंबर पर है। धारीवाल जिस वक्त रेप को मर्दानगी से जोड़ने का बयान दे रहे थे, उस वक्त विधानसभा की कार्यवाही का यू-ट्यूब पर सीधा प्रसारण चल रहा था। बड़ी संख्या में आम लोगों ने भी उनके बयान को सुना।
विपक्ष के विधायक सदन से बायकॉट करके चले गए थे
संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल ने जिस वक्त यह बयान दिया, उस वक्त सदन में विपक्ष के बीजेपी विधायक मौजूद नहीं थे। धारीवाल के जवाब शुरू होते ही उनकी टिप्पणियों से नाराज होकर बीजेपी विधायक सदन से बहिष्कार कर गए थे। ऐसे में विपक्ष की गैर मौजूदगी में दिए गए बयान पर किसी ने आपत्ति नहीं की। आपत्ति करना तो दूर सत्ता पक्ष के विधायक संसदीय कार्यमंत्री के गैर-जिम्मेदाराना बयान पर ठहाके ही लगाते रहे।
अपने मंत्री की निर्लज्ज स्वीकारोक्ति पर प्रियंका क्या कहेंगी
तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री धारीवाल के बयान पर बीजेपी नेता सतीश पूनिया ने कहा कि सदन में प्रदेश में बलात्कार में एक नंबर पर होने की निर्लज्ज स्वीकारोक्ति और मर्दों की आड़ में नारी के प्रति स्तरहीन बयान प्रदेश की महिलाओं का अपमान है। पूनिया ने कहा कि धारीवाल ने इस बयान से पुरुषों की गरिमा को भी गिराया है। उन्हें सदन और महिलाओं से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अपने मंत्री के इस तरह के बयान पर अब प्रियंका जी क्या कहेंगी।
शांति धारीवाल ने सदन को कलंकित किया, माफी मांगें
भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि मंत्री ने सदन को कलंकित करने का काम किया है। भाजपा इसकी निंदा करती है, उन्हें सदन में माफी मांगनी होगी। बलात्कार के मामलों को लेकर राजस्थान को मर्दो का प्रदेश कहना और हंसना, साथ ही कांग्रेस के अन्य विधायकों का भी हंसना, बड़ा ही शर्मनाक है। कांग्रेसियों की इस हंसी ने सदन की गरिमा को गिराया है। राठौड़ ने धारीवाल की बात का जवाब देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी कानून व्यवस्था के बल पर ही सत्ता में लौटी है। लेकिन राजस्थान में बिगड़ी कानून व्यवस्था चर्चा में हैं। यहां रोज 18 मामले बलात्कार के दर्ज हो रहे हैं। सरकार इस दिशा में कुछ नहीं कर रही है।
अबलाओं की अस्मत पर यूपी में हंगामा, राजस्थान में चुप्पी
कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी को महिला होने के बावजूद लगता है महिलाओं की पीड़ा के कोई सरोकार नहीं है। न ही उनकी बेटी प्रियंका गांधी को राजस्थान की महिलाओं पर हो रहे अत्याचार नजर आते थे। यह और बात है कि यदि यही अत्याचार उत्तर प्रदेश या अन्य किसी बीजेपी शासित राज्य में घटित हो जाएं तो वह सियासत करने का कोई मौका नहीं गंवाती हैे। महिलाओं की अस्मत लुटने के मामले में राजस्थान देशभर में शर्मसार हुआ, तब राहुल-प्रियंका ने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। क्योंकि यहां पर उनकी पार्टी की सरकार थी। तब शिक्षा के मंदिरों में शिक्षकों के द्वारा छात्राओं के साथ यौैन अपराध सुर्खियों में रहा था।

हिज़ाब पर एक और हाई कोर्ट का फैसला, लेकिन सुप्रीम कोर्ट लिए बैठा है

सुभाष चन्द्र

भारत में कट्टरपंथियों ने हिजाब/नकाब/बुर्का पर जितना उपद्रव मचाया हुआ है किसी भी मुस्लिम मुल्क ने इसका पासंग भी नहीं। कई गैर-मुस्लिम देश तो पहले ही बैन कर चुके हैं।    

अगस्त 24 इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने निर्णय सुनाया कि स्कूल में स्कार्फ़ या हिजाब पहनने की अनुमति नहीं है, स्कूल यूनिफार्म अनुशासन, बच्चों की बीच समानता, सस्थागत पहचान और धर्मनिरपेक्ष माहौल को बढ़ावा देती है, क्योंकि यह सभी धर्मों के छात्रों पर समान रूप से लागू है।  

यह टिप्पणियां पीठ ने प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की नाबालिग छात्रा सुकैना रिज़वी की याचिका ख़ारिज करते हुए की सुकैना ने ड्रेस कोड के अतिरिक्त हिज़ाब पहन कर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी

पीठ ने कहा कि हिज़ाब पहनना इस्लाम की धार्मिक प्रथा नहीं है

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यह किसी हाई कोर्ट का इस विषय में पहला निर्णय नहीं है 15 मार्च, 2022 को कर्नाटक हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ऋतुराज अवस्थी, जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित और जस्टिस केएम खाजी की पीठ ने भी सरकार द्वारा हिज़ाब पर बैन को सही कहा था और कहा था कि हिज़ाब पहनना इस्लाम के अनुसार अनिवार्य प्रथा नहीं है

कर्नाटक हाई कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील में 2 जजों की बेंच ने 13 अक्टूबर, 2022 को Split Verdict दिया जस्टिस हेमंत गुप्ता ने हिज़ाब पर बैन को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी लेकिन जस्टिस सुधांशु धुलिया ने हिज़ाब पर बैन को गैर संवैधानिक कहा मामला फिर चीफ जस्टिस को भेजा गया बड़ी बेंच गठित करने के लिए लेकिन 4 साल बाद भी बड़ी बेंच गठित नहीं हुई है

केरल हाई कोर्ट के Justice A. Muhamed Mustaque की एकल पीठ ने फातिमा बनाम केरल राज्य मामले में कहा था कि छात्रा को ड्रेस कोड चुनने का अधिकार और संस्था का प्रबंधन करने का अधिकार दोनों मौलिक हैं लेकिन जब टकराव हो तो संस्था के व्यापक हित को वरीयता मिलनी चाहिए इसके खिलाफ खंडपीठ ने भी अपील ख़ारिज कर दी थी

बॉम्बे हाई कोर्ट के Justice A. S. Chandurkar और Justice Rajesh S. Patil ने भी  जून, 2024 में टिप्पणी की थी कि सिर ढकना इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा साबित नहीं होता

देश में इस विषय पर राजनीतिक दलों द्वारा बवाल काटना कुछ वर्षों से ही शुरू हुआ है जमीयत उलेमा ए हिंद ने बंगलुरु की मुस्कान खान को स्कूल नियमों को ताक पर रख कर हिज़ाब पहनने पर 5 लाख रुपए का इनाम भी दिया था और इससे ही लगा था कि उस वक्त का आंदोलन एक राजनीतिक आंदोलन था

ऐसा तो कहना उचित नहीं होगा कि हिज़ाब पहने या न पहने, यह महिला की मर्जी है इस्लाम में अनिवार्य है तो पहनना चाहिए अरफ़ा खानुम भारत में हिज़ाब नहीं पहनती लेकिन ईरान गई तो हिज़ाब में गई अभी हाल ही में अकबरूद्दीन ओवैसी की बेटी की शादी लंदन में हुई है कोई बुरका हिज़ाब नहीं था

सुप्रीम कोर्ट को मामलों को लेकर सो नहीं जाना चाहिए जब हाई कोर्ट फैसले कर सकते हैं तो सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं कर सकता? फैसला तो तब होगा जब बड़ी बेंच का गठन होगा में 

पीएम केयर्स फंड मामले में बुरे फंसे केजरीवाल के ‘कॉकरोच’, झूठ बोलकर करा बैठे फजीहत

                                                                                              साभार 
कहावत है- “जैसा गुरु वैसा चेला”। यह कहावत आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके चलों (कॉकरोचों) पर पूरी तरह से खरा उतरता है। जहां गुरु अरविंद केजरीवाल झूठ बोलने और माफी मांगने में सारा रिकॉर्ड तोड़ चुके है, वहीं केजरीवाल के चेले कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रंका भी उनके नक्शे कदम पर चल रहे हैं। वो पीएम केयर्स फंड को लेकर झूठ और प्रोपेगैंडा फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। लेकिन वो अब अपने ही बुने जाल में फंस गए हैं। पीएम केयर्स फंड को लेकर उन्होंने जो दलीलें दी हैं, वो काफी हास्यास्पद और आधारहीन है। बीजेपी ने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल अपने चेलों (कॉकरोचों) को बुनियादी तथ्य सिखाने में भी नाकाम रहे हैं।

पीएम केयर फंड को लेकर अभिजीत दीपके का झूठ
कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने अपने अभियान “स्कूल ठीक करो” के तहत एक वीडियो संदेश जारी कर पीएम केयर्स फंड के अप्रयुक्त पैसों पर सवाल उठाए थे। दीपके ने कहा कि हाल ही में सामने आई ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक पीएम केयर्स फंड में करीब 8,500 करोड़ की रकम पड़ी हुई है, जिसका कहीं इस्तेमाल नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में बच्चे पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। दीपके ने कहा, “एक तरफ कहा जाता है कि स्कूलों के लिए बजट नहीं है और दूसरी तरफ 8,500 करोड़ की राशि खाली पड़ी है। इस पैसे का उपयोग नए स्कूल बनाने और बच्चों के लिए सुविधाएं सुधारने में क्यों नहीं किया जा रहा? अगर एक स्कूल बनाने के लिए 8 करोड़ रुपये लें तो अच्छी सुविधाओं के साथ एक हजार से ज्यादा नए हाइटेक मॉडल स्कूल बनाए जा सकते थे। लेकिन ये सब नहीं हो रहा है। ये पैसा जनता का पैसा है, पीएम का नहीं है।”

सौरव दास को भी पीएम केयर्स फंड का पैसा चाहिए
काॅकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के सह-संयोजक सौरव दास एक छात्र हैं, लेकिन घर का सलाना किराया सुनकर एक गरीब छात्र के पसीने छूट जाएं। पढ़ाई कर रहे एक छात्र द्वारा एक बेहद पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश की एक भव्य कोठी में रहना और सालाना 12 लाख (एक लाख प्रतिमाह) का किराया चुकाना अपने आप में एक पहेली है। प्रति माह लाखों का किराया देने वाले सौरव दास पीएम केयर्स फंड पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया में पोस्ट किया, “PM-CARES फंड का उपयोग देश भर में स्कूलों के विकास के लिए तत्काल किया जाना चाहिए। 8400+ करोड़ रुपये बिना इस्तेमाल के क्यों पड़े हैं? उस पैसे का 93% फिक्स्ड डिपॉजिट में क्यों है? बैंकों से मिलने वाला वह उच्च ब्याज कौन खा रहा है? हमारा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान हमारे स्कूलों की बदहाली को उजागर कर रहा है! अब उस पैसे का इस्तेमाल कीजिए, प्रधानमंत्री जी!”

CJP का दावा – पीएम केयर्स फंड का इस्तेमाल सरकारी स्कूलों पर होना चाहिए
पीएम केयर्स फंड (PM CARES Fund) को लेकर मुख्य विवाद पारदर्शिता की कमी, आरटीआई (RTI) के दायरे से बाहर होने और भारी मात्रा में फंड जमा होने के बावजूद बेहद कम राशि खर्च किए जाने को लेकर है। कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकारी संसाधनों और पीएसयू के पैसों का उपयोग होने के बावजूद इसे निजी ट्रस्ट बताना विरोधाभासी है। आलोचकों का कहना है कि इसके पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं और गृह, रक्षा तथा वित्त मंत्री इसके ट्रस्टी हैं। साथ ही, इसके प्रचार में सरकारी प्रतीकों और डोमेन का उपयोग किया गया है, जिससे इसके निजी होने के दावे पर सवाल उठते हैं। हालिया ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, फंड में हजारों करोड़ रुपये जमा हैं (जैसे 2024-25 तक लगभग ₹8,450 करोड़ से अधिक), जिसका अधिकांश हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में है, जबकि आपदा या सहायता कार्यों में बहुत कम हिस्सा खर्च हुआ है। इसलिए इस फंड का इस्तेमाल सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने में किया जाना चाहिए।

कॉकरोच जनता पार्टी, लेफ्ट, लिबरल इकोसिस्टम और टुकड़े-टुकड़े गैंग के दावे में कितना दम है

क्या 8,452 करोड़ रुपये “सरकार का पैसा” है?
पीएम केयर्स फंड में दर्ज लगभग 8,452 करोड़ रुपये की राशि को सीधे “भारत सरकार का पैसा” कहना गलत है। 8,452 करोड़ रुपये भारत सरकार के बजट की राशि नहीं, बल्कि PM CARES Trust में जमा कोष (Corpus) है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार पीएम केयर्स एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास (Public Charitable Trust) है, जिसे मुख्य रूप से स्वैच्छिक योगदान से धन प्राप्त होता है। इसे केंद्र सरकार के बजट से नियमित बजटीय सहायता नहीं मिलती। 2023 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिल्ली हाई कोर्ट में इसी आधार पर कहा था कि पीएम केयर्स फंड आर्टिकल 12 के तहत “राज्य” तथा RTI Act के तहत “सार्वजनिक संपत्ति” नहीं है। 

कोविड-19 महामारी के दौरान मार्च 2020 में पीएम केयर्स फंड का गठन किया गया था। सरकार का तर्क है कि यह एक निजी चैरिटेबल ट्रस्ट है, इसलिए यह आरटीआई अधिनियम के दायरे में नहीं आता है। प्रधानमंत्री पीएम केयर्स फंड के अध्यक्ष हैं। तीन केंद्रीय मंत्री इसके ट्रस्टी हैं। पीएम केयर्स फंड संविधान से निर्मित संस्था नहीं है। संसद या किसी राज्य विधानसभा के कानून से स्थापित नहीं है।

क्या 8,452 करोड़ सरकारी स्कूलों को दे देना चाहिए ?
पीएम केयर्स फंड का प्राथमिक उद्देश्य आपातकाल, आपदा, सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट तथा प्रभावित लोगों को राहत देना है। इसके उद्देश्यों में स्वास्थ्य सुविधाओं और आवश्यक infrastructure का निर्माण/उन्नयन भी शामिल है। इसलिए इसे बिना ट्रस्ट के उद्देश्यों और ट्रस्टी के निर्णय के सीधे सरकारी स्कूलों के बजट में स्थानांतरित करना सामान्य सरकारी बजट आवंटन जैसा नहीं है। 2024-25 में लगभग 8,452 करोड़ रुपये का कोष रिपोर्ट हुआ है, लेकिन इसे यह समझना सही नहीं होगा कि पूरा 8,452 करोड़ रुपये का कोष तत्काल खर्च करने के लिए पड़ा हुआ कैश है। रिपोर्टेड आंकड़ों में लगभग 7,846.65 करोड़ रुपये fixed deposits में होने की बात भी सामने आई है। सरकार के पास सरकारी स्कूलों के लिए अलग बजटीय व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, 2026-27 में Department of School Education & Literacy का बजट 83,562 करोड़ रुपये रखा गया है।

कोविड-19 महामारी के दौरान हुआ था पीएम केयर्स फंड का इस्तेमाल
कोविड-19 महामारी के दौरान आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए मार्च 2020 में पीएम केयर्स फंड (PM CARES Fund) बनाया गया था। इस फंड का मुख्य उपयोग वेंटिलेटर खरीदने, ऑक्सीजन प्लांट लगाने, चिकित्सा उपकरण जुटाने और महामारी से प्रभावित लोगों व बच्चों की मदद (जैसे पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन स्कीम) के लिए किया गया था। मार्च 2020 से मार्च 2021 के बीच लगभग 10,990 करोड़ रुपये जमा हुए थे। महामारी के पहले वित्तीय वर्ष (2020-21) के दौरान लगभग 3,976 करोड़ रुपये खर्च किए गए। शुरुआती खर्च के बाद करीब 7,044 करोड़ रुपये बिना खर्च के बचे थे, जो बाद में ब्याज और अन्य योगदानों के साथ बढ़कर 31 मार्च 2025 तक 8,452 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं।

कैसे होता है पीएम केयर्स फंड का ऑडिट?
पीएम केयर्स फंड के खर्च और प्रबंधन को लेकर समय-समय पर आंकड़े और ऑडिट रिपोर्ट्स जारी किए जाते हैं, जिन पर सार्वजनिक चर्चा भी होती रही है। PM CARES की आधिकारिक FAQ के अनुसार ट्रस्टी ने स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त किया है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक M/s KKC & Associates LLP, Chartered Accountants, Mumbai को तीन वर्ष के लिए auditor नियुक्त किया गया है। लेकिन सीएजी ऑडिट और स्वतंत्र ऑडिटर से ऑडिट कराने में अंतर होता है, क्योंकि पीएम केयर्स की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका ऑडिट स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा होता है। लेकिन यह CAG के नियमित audit के समान नहीं है।

पीएम केयर्स फंड का ताजा ऑडिट
हाल ही में जारी वित्तीय वर्ष 2024-25 के ऑडिटेड स्टेटमेंट के अनुसार, पीएम केयर्स फंड का कुल कॉर्पस 17.8% बढ़कर 8,452.07 करोड़ हो गया है जो 2023-24 में 7,173.03 करोड़ था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस फंड का एक बड़ा हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा है, जिससे मिली ब्याज आय ने इसके कॉर्पस को बढ़ाने में योगदान दिया है। दीपके इसी राशि का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए करने की मांग कर रहे हैं।

पीएम केयर्स फंड को विदेशों से डोनेशन
वित्त वर्ष 2024-25 में पीएम केयर्स फंड को 92.8 लाख रुपये का विदेशी दान मिला है, जो पिछले वर्ष (1.13 करोड़ रुपये) की तुलना में करीब 18% कम है। इस फंड में अब तक कुल शेष राशि बढ़कर 31 मार्च 2025 तक 8,452 करोड़ रुपये हो गई है।

PMNRF पहले से था, फिर PM CARES क्यों बनाया गया?
भारत में पहले से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) मौजूद था। इसलिए आलोचक पूछते हैं कि नया आपातकालिक ट्रस्ट (पीएम केयर्स फंड) बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। सरकार का मूल तर्क यह रहा कि पीएम केयर्स का उद्देश्य व्यापक emergency situations—विशेषकर COVID जैसी राष्ट्रीय आपदाओं—के लिए dedicated response mechanism बनाना था।

दरअसल, भारत में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) जनवरी 1948 से मौजूद है। इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अपील पर पाकिस्तान से विस्थापित लोगों की सहायता के लिए बनाया गया था। इसका इस्तेमाल बाढ़, भूकंप, बड़ी दुर्घटना और गंभीर बीमारी जैसी परिस्थितियों में जरूरतमंद लोगों को आर्थिक सहायता देने के लिए किया जाता रहा है।

PM CARES को 2020 में कोविड जैसी बड़ी आपात स्थिति के लिए अलग से बनाया गया। इसका उद्देश्य सिर्फ लोगों को राहत देना नहीं, बल्कि बड़ी emergency में लोगों की मदद के साथ-साथ स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए है। कोविड के दौरान बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में भी पैसा लगाना था—जैसे वेंटिलेटर, ऑक्सीजन प्लांट, वैक्सीन और स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत ढांचा। PM CARES का दायरा सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल, अनुसंधान, और आपातकालीन क्षमताओं के निर्माण तक विस्तृत है।

PMNRF का प्रबंधन पारंपरिक रूप से प्रधानमंत्री के विवेक पर होता है, जबकि PM CARES एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट है, जिसमें देश के रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसके पदेन सदस्य/ट्रस्टी के रूप में शामिल होते हैं।

यूपीए सरकार में PMNRF से राजीव गांधी फाउंडेशन को दिया गया था फंड
यूपीए (UPA) सरकार के शासनकाल के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से राजीव गांधी फाउंडेशन (RGF) को फंड दिए जाने का मामला सामने आया था। वर्ष 2020 में राजनीतिक बयानों और आरोपों के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पीएमएनआरएफ के बोर्ड में भी थीं और आरजीएफ की अध्यक्ष भी थीं। इस फंड की रकम को एक परिवार के फाउंडेशन में डायवर्ट करना ना सिर्फ फ्रॉड था, बल्कि देश की जनता से धोखा भी था।

मोदी सरकार में स्कूलों के कायाकल्प पर बढ़ा खर्च
2014-15 से 2020-21 के बीच Department of School Education & Literacy का वास्तविक खर्च लगभग 5.42 लाख करोड़ रुपये रहा। संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार इन सात वर्षों में वास्तविक व्यय क्रमशः 68,926 करोड़ रुपये, 67,352 करोड़ रुपये, 71,931 करोड़ रुपये, 80,246 करोड़ रुपये, 79,983 करोड़ रुपये, 89,513 करोड़ रुपये और 84,030 करोड़ रुपये रहा। इसमें केवल भवन निर्माण ही नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण, छात्र सहायता, मिड-डे मील, स्कूल infrastructure और अन्य मद शामिल हैं।

पीएम मोदी ने लॉन्च किया था ‘स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय’ अभियान

सरकारी योजनाओं के अंतर्गत केवल नए स्कूल बनाने पर ही खर्च नहीं किया जाता, बल्कि स्कूलों की आधारभूत ढांचा के विकास पर खर्च किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सभी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित करने के वास्ते 15 अगस्त 2014 को अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में घोषणा की थी, जिसे बाद में ‘स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय’ अभियान के रूप में लॉन्च किया गया।

स्कूलों का बुनियादी ढाँचा

  • नए स्कूल भवन
  • अतिरिक्त कक्षाएँ
  • विज्ञान प्रयोगशालाएँ
  • शौचालय
  • स्वच्छ पेयजल
  • बिजली की सुविधा
  • दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप एवं सुगम सुविधाएँ

स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय

  • स्कूलों में स्वच्छ एवं अलग शौचालय
  • छात्राओं के लिए विशेष स्वच्छता सुविधाएँ
  • सुरक्षित पेयजल
  • हाथ धोने की व्यवस्था
  • स्वच्छ एवं स्वस्थ विद्यालय परिसर
  • बच्चों में स्वच्छता की आदतों को बढ़ावा
बीजेपी शासित राज्यों में भी स्कूलों पर बढ़ा खर्च, पकड़ा गया अभिजीत का झूठ
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने राजस्थान में जर्जर स्कूलों के पुनर्निर्माण (300 स्कूलों की मरम्मत/भवन) को अपनी पार्टी के अभियान का असर बताया था। सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका और उनकी टीम के दौरों को श्रेय दिया था। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह दावा गलत साबित हुआ क्योंकि यह पुराना और केंद्र/राज्य सरकार का स्वीकृत फैसला था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने मार्च में ही राजस्थान के स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 300 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, और राज्य सरकार ने 10 जुलाई को ही जर्जर विद्यालयों पर प्रेस रिलीज जारी कर दी थी—जबकि CJP की ‘स्कूल ठीक करो’ मुहिम की शुरुआत 15 अगस्त को हुई थी।
FCRA BILL और IT जांच से लेफ्ट, लिबरल इकोसिस्टम में हड़कंप
आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थकों के साथ ही लेफ्ट, लिबरल इकोसिस्टम और टुकड़े-टुकड़े गैंग भी पीएम केयर्स फंड के खिलाफ मैदान में कूद पड़ा है। आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर नए-नए नैरेटिव तैयार किए जा रहे हैं। आधारहीन तथ्यों के आधार पर सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने की कोशिश हो रही है। यह सब प्रोपेगैंड कॉकरोच जनता पार्टी और उन तमाम स्वयं सेवी संस्थाओं को बचाने और लोगों का ध्यान अपनी तरफ से हटाने के लिए हो रहा है, जो विदेशों से फंड लेते हैं। मोदी सरकार ने विदेशी फंड को पारदर्शी बनाने के लिए एफसीआरए बिल लाया है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने विदेश से संदिग्ध लेन-देन की जांच के लिए एक वेरिफिकेशन शुरू किया है। जिसके तहत 394 संस्थाएं और 36 प्रोफेशनल्स रडार पर हैं। इससे संदिग्ध विदेशी फंड लेने वालों के बीच खलबली मची हुई है।

गर्त में स्वयं जाने को उत्सुक है कांग्रेस; राहुल विंची कांग्रेस के लिए भस्मासुर साबित हो रहा है

सुभाष चन्द्र

जिस मनुस्मृति को लेकर सनातन विरोधी राहुल और इसकी पटकथा लिखने वाले मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने हिन्दू नारी पर टिप्पणी कर सनातन को बदनाम करने की नाकाम कोशिश करने वाले भूल रहे हैं कांग्रेस में ही महिलाओं का जितना अपमान हो रहा है शायद ही किसी अन्य पार्टी में होता हो। 'टंच माल' आदि क्या क्या नहीं कहा गया। नारी का अपमान करने में इटली की महिला प्रधानमंत्री तक को नहीं बक्शा।  

आधा अधूरा ज्ञान सबसे ज्यादा सामाजिक प्रदूषण फैलाता है। एक समय था और शायद अभी भी बसपा और अन्य सेक्युलर दल मनुस्मृति को घृणा की दृष्टि से देखते हैं अब इस बारे में राहुल विंची अपना आधा अधूरा ज्ञान बांट कर महिलाओं को बरगलाने की कोशिश कर रहा है लेकिन महिला आरक्षण का समर्थन नहीं करता

मनुस्मृति के बारे में भ्रांति फ़ैलाने वालों को यह भी नहीं पता होगा कि मनु कौन थे? हिन्दू पौराणिक मान्यताओं और ग्रंथों के अनुसार, हाँ, स्वयंभू मनु और उनकी पत्नी शतरूपा को ही पृथ्वी पर मानव जाति (संसार के मनुष्यों) का पहला जोड़ा माना गया है इन्हीं दोनों की संतानों से आगे चलकर पूरी मानव सृष्टि की उत्पत्ति और विस्तार हुआ

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
मनुस्मृति में नारी को पूजनीय कहा गया है और राहुल विंची महिलाओं को उल्टा पाठ पढ़ा रहा है मनुस्मृति में कहा गया है -

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

श्लोक का अर्थ

जहाँ नारियों का सम्मान (पूजा) होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ किए गए सारे अच्छे कार्य भी निष्फल हो जाते हैं

मनुस्मृति में समाज को चार मुख्य वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में विभाजित किया गया है और इसे एक कठोर व पदानुक्रमित (hierarchical) सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें जन्म आधारित श्रेष्ठता और अलग-अलग कर्तव्यों का विधान है 

बस इतना पढ़ कर मनुस्मृति को ये राहुल जैसे नेता कोसने लगते हैं

लेकिन वे कभी नहीं पढ़ते कि भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में वर्ण और जाति व्यवस्था का आधार जन्म के बजाय गुण और कर्म (स्वभाव) को बताया है

कई विद्वान मानते हैं कि यदि मनुस्मृति केवल जन्मगत श्रेष्ठता पर बल देती है, तो वह गीता के आध्यात्मिक समता और कर्म-प्रधान संदेश से मेल नहीं खाती हालांकि, पारंपरिक व्याख्याकार यह भी कहते हैं कि मनुस्मृति का मूल उद्देश्य भी कर्म और आचरण पर आधारित था, जो समय के साथ विकृत हो गया हो सकता है जैसा आज राहुल जैसे लोग विकृत कर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं

राहुल विंची हिंदू मान्यताओं पर बढ़चढ़ कर व्याख्यान देता है और महिलाओं की हालत ख़राब होने के लिए मनुस्मृति को दोष दे रहा है लेकिन कभी इस्लाम में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण के बारे कुछ क्यों नहीं बोलता। हलाला पर बोलने की हिम्मत नहीं।

 

राजीव गांधी ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार कुचलने के लिए सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो का फैसला ही पलट दिया बड़े बड़े इस्लामिक स्कॉलर महिलाओं को “खेत” कहते हैं और उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं हैं। तीन तलाक़ आम बात थी जो प्रथा मोदी सरकार ने ख़त्म कर दी लेकिन कांग्रेस ने समर्थन नहीं किया

मुस्लिमों में महिलाओं की क्या हालत है यह जानने के लिए राहुल गांधी अपने ही सांसद इमरान मसूद के बेटी के साथ उसके पति ने क्या सलूक किया, वो ही पता कर ले बेटी को मारा पीटा गया और घर से निकाल दिया 

जहां तक जाति व्यवस्था का प्रश्न है वो ईसाइयों और मुसलमानों में भी व्याप्त है। एक जाति का मुर्दा दूसरी जाति के कब्रिस्तान में दफ़न नहीं कर सकता। शादी नहीं कर सकते। इतना ही नहीं, एक दूसरे के चर्च और मस्जिद में नहीं जा सकते।  

नवरात्रों में तेजस्वी यादव और राहुल गांधी ने मछली मांस पार्टी की थी राजद और कांग्रेस की विधानसभा में एक तिहाई सीट रह गई अखिलेश यादव ने भी गंगा जी पर मांसाहार की इफ्तार पार्टी और हड्डियों के टुकड़े और मांस का झूठन फेकने को सही कहा, वो भी एक तिहाई रह जायेगा और अब अजय राय सावन के महीने में मछली पार्टी कर रहा है वो कही कांग्रेस को 99 से 33 पर न ले आए

जज कोई भगवान नहीं होते, उनसे भी गलतियां हो सकती हैं, रिटायरमेंट पर बोले जस्टिस करोल; क्या ऐसा कोई जज कुर्सी पर बैठे हुए सोचता है?

सुभाष चन्द्र

अगस्त 22 को जस्टिस संजय करोल ने अपनी रिटायरमेंट के विदाई समारोह में कहा कि “जज कोई भगवान नहीं होते, उनसे भी गलतियां हो सकती हैं, उनसे हर फैसला सही नहीं हो सकता लेकिन न्याय करने के लिए विनम्रता और मानवीय संवेदना का होना सबसे ज्यादा जरूरी है, संविधान हमसे सिर्फ कानून को सही ढंग से लागू करने के लिए नहीं कहता, बल्कि वह उसे न्यायपूर्ण ढंग से लागू करने के लिए कहता है; न्याय केवल शब्दों और वकीलों का खेल नहीं है बल्कि वह न्याय की उस पुकार को सुनने का नाम है जो अक्सर शब्दों के बीच की ख़ामोशी में छिपी होती है”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
ऐसे प्रवचन तब ही दिमाग में आते हैं जब कुर्सी दूर होती दिखाई देती है पर सच्चाई तो यह है कि जज की कुर्सी पर बैठे हुए तो हर जज अपने को पृथ्वी का भगवान ही मानता है। कुर्सी पर बैठे हुए वो इंसान को इंसान नहीं समझता, जिसको जो मर्जी बोल देता है

क्या किसी जज ने आज तक अपने किसी फैसले को गलत मानकर उसे वापस लिया है या गलती भी मानी है? आप कह रहे हैं कि न्याय केवल शब्दों और वकीलों का खेल नहीं है जबकि सच यही है कि आज न्याय शब्दों और वकीलों का खेल बनकर रह गया है

संविधान तो एक ही है लेकिन यह शब्दों का ही तो खेल है वकीलों की बहसबाजी से अनेक कानूनों की व्याख्या ही बदल दी जाती है कानूनों में सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों ने इतने बदलाव किए हैं कि उन बदलावों को अगर संग्रहित किया जाए कई संविधान लिखे जा सकते हैं कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है समाज के प्रति संवेदनहीन अगर कोर्ट फैसला करे कि महिला को शादी के बाहर “sexual autonomy” का अधिकार है तो क्या समाज में बिखराव नहीं होगा

महिलाओं को sex worker के रूप में काम करना जब व्यवसाय बता दिया तो समाज कहां जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट के जज को यह शक्ति संविधान नहीं देता कि वह राष्ट्रपति को आदेश दे फिर भी ऐसे आदेश दिए गए लेकिन न जजों ने कोई माफ़ी मांगी और न फैसला वापस लिया नूपुर शर्मा को भरी कोर्ट में ऐसा अपमानित किया गया कि वो वकील होने के बाद भी आज घर बैठी है क्या किसी जज ने अपनी गलती स्वीकार की?

जब तक जज कुर्सी पर होते हैं कॉलेजियम सिस्टम बहुत अच्छा लगता है लेकिन रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के कई जज इस सिस्टम में कमियां निकाल चुके हैं फिर क्यों नहीं हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति UPSC परीक्षा प्रणाली से शुरू क्यों नहीं की जा सकती? वकीलों को सीधे हाई कोर्ट का जज बनाने में भ्रष्टाचार की दुर्गंध आती है

यशवंत वर्मा के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक आंतरिक समिति बनाने के सिवाय कुछ नहीं किया कौन सा कानून कहता है कि लालू यादव को 32 साल की सजा होने पर भी जमानत पर मौज करने दी जाए राहुल गांधी का जो केस सुप्रीम कोर्ट जाता है लटका दिया जाता है - “सारे मोदी चोर हैं” मामले में जस्टिस गवई ने उसकी दोषसिद्धि पर रोक लगाते हुए शब्दों की ही जादूगरी दिखाई थी और पूछा था कि सजा दो साल तक की दी जा सकती है तो अधिकतम सजा क्यों दी गई? 

CJI को सरकार जो जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले देती है, उन पर क्या कार्रवाई की जाती है किसी को पता नहीं चलता क्योंकि न्यायपालिका ने सब कुछ अपने अधिकार क्षेत्र में लिया हुआ है

आज 4 साल बाद सुप्रीम कोर्ट अपने ही PML एक्ट पर दिए गए फैसले की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई को तैयार हो गया है जबकि ED की शक्तियां पहले ही हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट ने क्षीण कर दी हैं

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे”