LoP राहुल गाँधी का संसद में ‘चीनी प्रोपेगेंडा’ फैलाने का propaganda फेल, पूर्व सेना प्रमुख के नाम पर फैलाया ‘झूठ’: चीन की बीन पर नाचती रही है कांग्रेस

                                           राहुल गाँधी और राजनाथ सिंह (साभार-x@ani)
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर देश को गुमराह करने की कोशिश की है। सदन में चीन का प्रोपेगेंडा परोसते हुए उन्होंने कहा कि चीनी सेना भारतीय सीमा में घुस रही है। चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र में घुस आते हैं। इस दौरान उन्होंने पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला दिया।

इस पर रक्षा मंत्री ने राहुल गाँधी को चुनौती दी और कहा कि इस निराधार आरोप का कोई सबूत नहीं है और खुद पूर्व आर्मी चीफ नरवणे ने अपनी किताब में लिखा है कि चीनी टैंक भारतीय पोजिशन से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे। भारत ने एक इंच जमीन भी नहीं दी। रक्षा मंत्री के अलावा गृहमंत्री अमित शाह समेत पूरे सत्ता पक्ष ने मिलकर कड़ी आपत्ति जताई और सदन के माध्यम से देश में गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया।

राहुल गाँधी को स्पीकर ओम बिरला ने गैर सूचीबद्ध मुद्दे को उठाने पर सख्त चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी सदन के नियमों के तहत बोलने की इजाजत दी थी, लेकिन उन्होंने तथ्यों और संसदीय नियमों का उल्लंघन किया।

चीन को लेकर राहुल गाँधी ने सदन को किया गुमराह

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने एलएसी पर चीनी अतिक्रमण की बात कही और केन्द्र से सवाल पूछे। उनका कहना है कि एलएसी की स्थिति काफी गंभीर है और चीनी सेना घुस गई है। इन आरोपों का आधार पूर्व आर्मी चीफ नरवणे का अप्रकाशित किताब बताया गया।

इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल गाँधी के आरोपों को निराधार बताया और कहा कि माननीय सांसद ये साफ करें कि किस आधार पर ये आरोप लगा रहे हैं। इसका कोई ठोस आधार होना चाहिए। इस दौरान स्पीकर ने भी कहा कि सार्वजनिक डोमन में जो उपलब्ध न हो या जिसका प्रमाण न हो, उसके संदर्भ का जिक्र नहीं किया जा सकता। पूर्व आर्मी चीफ नरवणे के अप्रकाशित किताब को लेकर वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले कारवां ने भी झूठी खबर फैलाई है।

राहुल गाँधी का ‘चीन प्रेम’ और विवादित बयान

ये पहली बार नहीं है जब डोकलाम और चीन को लेकर राहुल गाँधी ने देश को नीचा दिखाने की कोशिश की हो। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने दावा किया था कि चीन ने 2,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। साथ ही कहा था कि चीनी सैनिक ‘अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सैनिकों की पिटाई’ कर रहे हैं। उस वक्त भी उनके पास कोई सबूत नहीं था और आज भी कोई प्रमाण नहीं है।

राहुल गाँधी पहले भी चीन की खुलकर तारीफ कर चुके हैं। मार्च 2023 में कैम्ब्रिज बिजनेस स्कूल में अपने विवादित भाषण में राहुल गाँधी ने चीन को ‘महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला’ और ‘प्राकृतिक शक्ति’ बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि चीन में ‘सामाजिक समरसता’ है।

राहुल गाँधी ने चीन की विवादित और आक्रामक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का भी समर्थन किया था। 2022 में ‘The Print’ की कॉलमनिस्ट श्रुति कपिला से बातचीत में उन्होंने कहा था कि चीन अपने आसपास के देशों की तरक्की चाहता है।

हालाँकि, 2023 में लद्दाख दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने यह भी कहा था कि “चीन ने लद्दाख में भारत की चारागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है।” लेकिन 2022 में ब्रिटेन में उन्होंने बयान दिया था कि “लद्दाख, चीन के लिए वही है, जो रूस के लिए यूक्रेन है।”

राहुल गाँधी ने 2020 में विदेशी ताकतों से भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की अपील भी की थी।

इतना ही नहीं, राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) और चीन के बीच वित्तीय लेन-देन की जानकारी 2020 में सामने आई थी। 2006 के बाद चीनी सरकार ने RGF को 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग दी थी।

नरवणे ने अपने इंटरव्यू में बताया गलवान में क्या हुआ

राहुल गाँधी जिस पूर्व आर्मी चीफ नरवणे के अप्रकाशित किताब का जिक्र कर रहे हैं, उन्होंने अपने इंटरव्यू में ऐसी कोई बात नहीं कही हैं। उन्होंने साफ कहा है कि भारत ने एक इंच जमीन भी नहीं खोई थी।

भारत-चीन बॉर्डर पर दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच ऐसे इलाके हैं, जिस पर दोनों देश अपना दावा करते हैं। ऐसी जगहों पर कोई चिन्ह, पिलर नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से ये इलाका काफी अलग है इसलिए नरवणे ने इंटरव्यू में कहा कि गलवान में पहली बार चीन को ऐसा लगा कि सीमा पर सड़क बनाने का विरोध हो सकता है। 3000 किमी तक सीमा तय नहीं होने का फायदा चीन ने उठाने की कोशिश की, लेकिन भारत ने एक इंच जमीन भी नहीं दिया।

पूर्व आर्मी चीफ ने कहा कि एक दर्जन से ज्यादा इलाका है। इन इलाकों में पेट्रोलिंग के दौरान दोनों देश की सेनाओं का आमना-सामना होता है। कई एग्रीमेंट प्रोटोकॉल भी हैं। इसका पालन चीनी सेना की तरफ से उस वक्त नहीं किया गया इसलिए दिक्कत आई।

चीनी सेना आक्रामक तरीके से सारे प्रोटोकॉल तोड़ रहे थे इसलिए हमारे जवानों ने विरोध किया। भिड़ंत में पी 14 में केजुएल्टी हुई दोनों तरफ से। 20 हमारे जवान शहीद हुए हैं। धीरे-धीरे पता चला। चीन में 2-4 महीनों बाद 4 के मरने की घोषणा की।

चीन में भी केजुएल्टी हुई। अपने पड़ोसी देश को पहली बार ऐसा लगा कि मनमर्जी नहीं चलेगी। चीन अक्सर पड़ोसी देशों के साथ अपनी मर्जी चलाता है लेकिन उसे भारत के रुख से झटका लगा।

उन्होंने कहा कि गलवान में सड़क बना रहे थे और सोच रहे थे कि विरोध में कोई कार्रवाई नहीं होगा, तो हमने उसे रोका वही वजह था। कई बार कोशिश की, लेकिन उसका विरोध किया गया। उन्होंने इससे भी इनकार किया कि मीडियो को आर्मी की तरफ से इस बात को भी दबाने के लिए कहा गया था कि वे लोग 100 बार भारत में घुसे और हम 200 बार घुसे, क्योंकि इससे चीन नाराज हो सकता था।

राहुल गाँधी को सदन में बोलने का मौका राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के तहत मिला था। राष्ट्रपति ने जो बातें कही थि उन पर उन्हें अपनी बात रखनी थी, लेकिन वे उन मुद्दों की बात की, जिसका अभिभाषण में जिक्र भी नहीं किया गया था। इस दौरान उन्होंने जिस किताब को कोट किया, उसका प्रकाशन भी नहीं हुआ है। उसकी विश्वनीयता के बारे में नहीं बताया जा सकता।

अगर पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की बात सामने आती, उनका किताब छपा होता, तो उसकी विश्वसनीयता को समझा जा सकता था। इसके बावजूद वह अपनी बात कहने पर अड़े रहे और कहते रहे कि ‘सरकार उनकी बातों से डरी हुई है’। अगर चीन के जमीन कब्जे की बात है तो 1959 से 1962 के बीच जो जमीन चीन ने कब्जा ली, उस पर क्यों नहीं राहुल गाँधी कुछ कहते हैं।

सदन की मर्यादा का सबको पालन करना जरूरी है। अगर स्पीकर ने उन्हें रोका, तो क्यों चीन और डोकलाम पर चर्चा पर अड़े रहे राहुल गाँधी। आखिर नियमों का कोई मतलब है या नहीं। सदन में कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता वेणुगोपाल जोश में दिखे और ताली बजाते नजर आए। अगर नियमों का उल्लंघन ही राहुल गाँधी की विशेषता है तो कॉन्ग्रेस का भला नहीं हो सकता।

‘बिहार के गाँव का आदमी तुम्हारी अंग्रेजी क्या समझेगा?’: सुप्रीम कोर्ट की वाट्सऐप को फटकार, कहा- डेटा चोरी कर अमीर बनना नहीं चलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Whatsapp और उसकी पैरेंट कंपनी Meta को लगाई कड़ी फटकार (साभार: आज तक, एनडीटीवी)
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को वाट्सऐप (WhatsApp) और मेटा (Meta) की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कह दिया कि भारत के लोगों के निजी डेटा के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चीफ जस्टिस सूर्याकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कंपनी से पूछा कि वह भारतीय ग्राहकों की जानकारी दूसरी कंपनियों के साथ कैसे और क्यों साझा कर रही है? कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आप देश के संविधान का मजाक उड़ा रहे हैं और डेटा चुराना आपका धंधा बन गया है।

‘बिहार के गाँव का व्यक्ति कैसे समझेगा आपकी भाषा?’

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्याकांत ने वाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कंपनी के वकीलों से पूछा, “क्या बिहार या तमिलनाडु के किसी दूर-दराज गाँव में रहने वाला व्यक्ति आपकी इस मुश्किल भाषा को समझ पाएगा? सड़क पर फल बेचने वाली एक गरीब महिला या घर में काम करने वाली बाई क्या आपकी शर्तों को समझ सकती है?”

 CJI ने आगे कहा कि आपकी पॉलिसी की भाषा इतनी चालाकी से लिखी गई है कि हम में से कुछ लोग भी उसे नहीं समझ पाते। उन्होंने कहा कि पॉलिसी साधारण ग्राहकों के नजरिए से होनी चाहिए। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, “आपने करोड़ों लोगों का डेटा ले लिया होगा। यह निजी जानकारी की चोरी करने का एक शालीन तरीका है। हम इसे इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे।”

‘डेटा साझा करना या वाट्सऐप छोड़ना- ये कोई विकल्प नहीं, एकाधिकार है’

जब वाट्सऐप की ओर से कहा गया कि ग्राहकों के पास पॉलिसी से बाहर निकलने (Opt-out) का विकल्प है, तो CJI सूर्याकांत ने इसे ‘मजाक’ बताया। उन्होंने कहा, “मार्केट में आपका पूरा एकाधिकार (Monopoly) है और आप कह रहे हैं कि आप विकल्प दे रहे हैं? आपका विकल्प यह है कि या तो वाट्सऐप छोड़ दो या हम डेटा साझा करेंगे। लोग इस सिस्टम के आदी हो चुके हैं और वे मजबूर हैं।”

CJI ने टिप्पणी की कि आप देश की प्राइवेसी के अधिकार के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “आज फेसबुक ने आपको खरीदा है, कल फेसबुक को कोई और खरीद लेगा और आप डेटा ट्रांसफर कर देंगे। आप इस देश के संविधानवाद का मजाक बना रहे हैं।”

Behaviroual डेटा और विज्ञापन का खेल: CJI ने साझा किया अपना अनुभव

जस्टिस बागची ने इस बात पर जोर दिया कि कोर्ट यह देखना चाहता है कि लोगों के व्यवहार (Behaviour) और रुझानों का विश्लेषण करके डेटा को कैसे ‘किराए’ पर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा के हर छोटे हिस्से की एक कीमत है और मेटा इसका इस्तेमाल ऑनलाइन विज्ञापनों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कर रहा है।
इस पर CJI सूर्यकांत ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा, “अगर वाट्सऐप पर किसी डॉक्टर को मैसेज भेजा जाए कि तबीयत ठीक नहीं है और डॉक्टर कुछ दवाएँ लिख दे, तो तुरंत ही मुझे वैसे ही विज्ञापन आने लगते हैं। 5-10 मिनट के भीतर ईमेल और यूट्यूब पर उन दवाओं के मैसेज मिलने शुरू हो जाते हैं। यह कैसे हो रहा है?”

अदालत ने माँगा हलफनामा, मंत्रालय को बनाया पक्षकार

कंपनियों की दलीलों के बीच सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि हमारा निजी डेटा न केवल बेचा जा रहा है, बल्कि उसका व्यावसायिक शोषण भी हो रहा है। कोर्ट ने अंततः मेटा और वाट्सऐप को अपना पक्ष रखते हुए हलफनामा दाखिल करने के लिए अगले सोमवार (9 फरवरी 2026) तक का समय दिया है। साथ ही, कोर्ट ने इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया है।
अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि कंपनियों के व्यावसायिक हित भारतीयों के मौलिक अधिकारों की कीमत पर नहीं हो सकते। यह पूरा मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा लगाए गए 213.14 करोड़ रुपए के जुर्माने से जुड़ा है, जिसे CCI ने वाट्सऐप की दबंगई और प्राइवेसी पॉलिसी के दुरुपयोग के कारण लगाया था।

भारत अमेरिकी व्यापार संधि; मोदी ने करिश्मा दिखा दिया; बिना कुछ बोले ट्रंप की अकड़ ढीली कर दी और ट्रंप दबाव में आ कर DEAD ECONOMY से डील कर गए

सुभाष चन्द्र

कभी कभी कुछ न कहना भी बहुत कुछ कह देना होता है और कुछ कार्रवाई न करना भी कार्रवाई करना होता है। ट्रंप भारत पर टैरिफ लगाते रहे और रूस से तेल न खरीदने के लिए जोर देते रहे और जब भारत फिर भी नहीं रुका तो 25% टैरिफ और लगा कर कुल टैरिफ 50% कर दिया लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने एक शब्द नहीं बोला और अपना काम करते रहे ट्रंप के 4 - 4 फ़ोन आए पर उठाए नहीं जो इशारा था कि हमें भी नाराज़ होना आता है

Trump said the decision was taken out of friendship and respect for Prime Minister Modi and at his request. मोदी की request कह कर एक बार फिर ट्रंप ने अपने को ऊपर रखने की कोशिश की है जबकि मुझे नहीं लगता मोदी ने डील के लिए कोई विनती की होगी

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अब संधि साइन होने के साथ ट्रंप ने कहा है कि मोदी ने रूस से तेल न खरीदना स्वीकार कर लिया है लेकिन यह दावा ट्रंप का जिस पर अभी मोदी या भारत सरकार ने कुछ नहीं कहा ट्रंप के दावों की क्या कीमत है उसने तो गला फाड़ फाड़ कर कहा था भारत पाकिस्तान युद्ध उसने रुकवा दिया जबकि वह स्थगित किया है भारत ने और मोदी ने संसद में खड़े होकर कहा कि किसी तीसरे पक्ष से युद्ध रोकने पर कोई बात नहीं हुई

मोदी ने EU के साथ 27 जनवरी को ट्रेड डील करके ट्रंप को बहुत बड़ा झटका दिया। उसके पहले UAE के साथ 19 जनवरी को 3 अरब डॉलर का LNG समझौता हुआ 30 जनवरी को रूस ने भारत के साथ 100% व्यापार लोकल करेंसी में करने की घोषणा की और 3 दिन पहले मोदी को  वेनेजुएला की एक्टिंग राष्ट्रपति Delcy Rodríguez का फ़ोन करना इस बात का इशारा था कि भारत वेनेजुएला से भी तेल खरीदेगा और आज ट्रंप ने यह बात स्वयं कह दी साथ ही ट्रंप ने भारत को अमेरिका से भी तेल खरीदने का प्रस्ताव कर दिया इसका मतलब यह हुआ आज भारत वैश्विक शक्तियों की धुरी बना हुआ है जो बड़ी बड़ी ताकतें एक साथ भारत को तेल सप्लाई करने की होड़ में लगी हैं अभी हाल ही में भारत ने नाइजीरिया से भी तेल खरीद बढ़ाई है

सबसे बड़ी बात है अमेरिका की तेल कंपनियों ने वेनेजुएला का “Hard Oil” निकलने से मना कर दिया था और उस तेल को निकलने का काम या तो अमेरिका कर सकता है, या चीन और फिर भारत यह वेनेजुएला का तेल भी भारत से डील किए बिना ट्रंप के लिए सर दर्द बन जाता यह वेनेजुएला के तेल की समस्या और भारत के वैश्विक बाजार में बढ़ते प्रभाव ने ट्रंप को झुकने पर मजबूर किया जो टैरिफ 50% से घटा कर 18% कर दिया और एक DEAD ECONOMY के साथ डील कर दी

मोदी ने चुप रह कर ट्रंप को अहसास करा दिया कि भारत पर उसके दबाव का असर नहीं होने वाला ये “नरेन्द्र कभी सरेंडर नहीं करता” अगर भारत को अमेरिका की जरूरत है तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की अमेरिका को उससे ज्यादा जरूरत है लेकिन मोदी ने आंख में आंख डाल कर बात की बिना झुके बिना किसी भय के सबसे बड़ा बदलाव पिछले 11 साल में यही आया है कि मोदी ने भारत को विश्व के सामने सबसे बड़ा बाजार बना कर खड़ा कर दिया और यह भी बता दिया कि पूरा विश्व हमारे लिए भी एक बाजार है इस विज़न की जीत हुई

हां जो लोग मोदी को अनाप शनाप कह रहे थे कुछ दिन पहले और उसकी कब्र खोदने की बात कर रहे थे, उन्हें समझ आ जाना चाहिए कि ये तेली बड़े काम की चीज़ है, भरोसे लायक है जो न खुद झुकता है और देश को झुकने देता है यह बात भी याद रहे विश्व में मोदी के 2-4 को छोड़ कर सभी मुल्कों के नेता दोस्त हैं लेकिन ट्रंप अधिकतर को दुश्मन बना चुका है

अमेरिका के शेयर बाजार बेसब्री से इस डील की प्रतीक्षा में थे Dow Jones आज 515 और Nasdaq 96 अंक उछला है भारत के बाजार भी आज 3-4% ऊपर भाग सकते हैं और जो बजट के दिन शिकायत कर रहे थे बाजार गिरने की, उनकी शिकायत आज दूर हो सकती है

एक ही जुर्म के लिए उलेमा को डाँट तो ‘निचले तबके’ को मौत, बच्चों-महिलाओं का यौन उत्पीड़न ‘माफ’: तालिबानी राज में लागू होने जा रहे ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के बारे में सबकुछ

                                               तालिबान का नया कानून ( साभार-x@visegrad24)
अफगानिस्तान में तालिबानी फरमान नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के तौर पर एक बार फिर सामने आया है। इसमें विरोध करने वालों के लिए मौत, ईशनिंदा के नाम पर कोड़े बरसाना, बच्चों और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के बावजूद कोई कड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना जैसी व्यवस्था है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया गया है। जनता के बीच भी ‘न्याय’ एक समान नहीं है।

एक ही जुर्म के लिए अलग-अलग सजा

 अफगानिस्तान की अदालतें नए कानून को मानने के लिए बाध्य होंगी। नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड‘ (दे महाकुमु जज़ाई ओसुलनामा) को सर्वोच्च नेता हिबतुल्ला अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। 4 जनवरी 2026 को जारी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड को तीन सेक्शन, 10 चैप्टर और 119 आर्टिकल हैं। कानून के तहत समाज को चार हिस्सों में बांटा गया है। एक ही जुर्म के लिए सोशल स्टेटस के हिसाब से अलग-अलग सजा का प्रावधान है।

यह कोड अफगानिस्तान की जनता को 4 भागों में बाँटता है। धार्मिक उलेमा या विद्वान, अशरफ यानी संपन्न वर्ग, मध्यम वर्ग और निचला तबका। धार्मिक जानकारों को सबसे ऊँची कैटेगरी में रखा गया है और उन्हें कड़ी सजा से छूट दी गई है। गलत काम करने पर सिर्फ डांटने का प्रावधान है।

दूसरी कैटेगरी में कबायली बुज़ुर्ग, मिलिट्री कमांडर और असरदार अमीर लोग शामिल हैं। इस ग्रुप के लोगों को बुलाया जा सकता है और चेतावनी दी जा सकती है, लेकिन उन्हें जेल या शारीरिक सजा नहीं दी जाएगी।

तीसरी कैटेगरी में मिडिल क्लास के लोग शामिल हैं, जिन्हें जेल हो सकती है। जबकि चौथी और सबसे निचली कैटेगरी में आम लोग शामिल हैं, जिन्हें उन्हीं जुर्मों के लिए जेल, कोड़े मारने और दूसरी कड़ी सजा मिलेगी। यानी सजा अपराधी के अपराध से तय नहीं होगा, बल्कि उसके स्टेटस से तय होगा।

यह कानून मानवाधिकार उल्लंघन और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। इस कोड में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव किया गया है और लोगों की बोलने की आजादी को रोकने से लेकर बेवजह गिरफ्तारी और सजा देने की व्यवस्था है।

सजा भी हर तबके के लिए अलग- अलग तय किया गया है। एक तरह से यह सरकारी दमन को कानूनी मान्यता देता है। इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में कहीं भी बचाव पक्ष के वकील तक पहुँच की जरूरत ही महसूस नहीं की गई है। टॉर्चर करने, मनमानी तरीके से हिरासत में लेने का अधिकार है। किसी भी मामले में मुआवजा पाने का अधिकार नहीं है।

इसके अलावा, कोड में कम से कम और ज़्यादा से ज़्यादा सजा तय नहीं की गई है, और आपराधिक कामों को साबित करने के लिए स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया को खत्म करके, इसके बजाय ‘स्वीकारोक्ति’ और ‘गवाही’ को अपराध साबित करने के मुख्य तरीके के तौर पर लागू किया गया है।

धार्मिक भेदभाव वाला कानून

नया कानून ‘हनफी इस्लाम’ को मानता है। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 2 का क्लॉज़ 8, हनफी विचारधारा को मानने वालों को मुसलमान बताता है। हनफी इस्लाम के अंतर्गत शिया, इस्लाइली, अहल ए हदीस को रखा गया है। जो लोग इसका पालन नहीं करते, उन्हें काफिर कहा गया है।

हनफी मानने वालों को अपना धर्म बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने पर दो साल जेल की सजा का प्रावधान है।

एक ऐसे देश में जहाँ जाफ़री शिया, इस्माइली, और अहल-ए-हदीस जैसे दूसरे इस्लामी नजरिए के मानने वाले, साथ ही सिख और हिंदू जैसे गैर-मुस्लिम समेत कई धार्मिक अल्पसंख्यक रहते हैं, यह भेदभाव वाला वर्गीकरण सीधे तौर पर धर्म और विश्वास के आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

‘बदात या बिदअत’ का लेबल लगाना और तालिबान के न्यायिक संस्थानों को असीमित अधिकार देना, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन, कानूनी सुरक्षा से वंचित करने और मनमानी सजा देने के हालात बनाता है।

इसके अलावा, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 14 में यह तय किया गया है कि ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के लिए, अपराधियों को मारना सही है। इसमें ईशनिंदा जैसे आरोप भी शामिल हैं। इसी तरह, आर्टिकल 17 के क्लॉज 2 में, इस्लामी फैसलों का ‘मजाक उड़ाना’ सजा के लायक माना गया है और अपराधियों के लिए दो साल की जेल की सजा तय की है। इसमें ये नहीं बताया गया है कि ‘मजाक उड़ाने’ को कैसे पहचाना जाएगा। एक तरह से जजों को अपने नजरिए से मनमाने तरीके से सजा देने का अधिकार होगा।

डांस-गानों पर पूरी तरह पाबंदी

नए कानून के आर्टिकल 59 के मुताबिक, डांस करने और उसे देखने वालों को अपराध घोषित किया गया है और उनके लिए सजा का प्रावधान है। यानी परंपरागत सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस कानून के लागू होने के बाद बंद रहेंगे और लोकल संस्कृति नष्ट हो जाएगी।

कोड का आर्टिकल 13 के तहत नैतिक भ्रष्टाचार की जगहों को खत्म करने की बात कही गई है। ये तय करने का अधिकार भी सरकार को होगा कि कौन सी जगह इस श्रेणी में आएगा। इसके बहाने ब्यूटी पार्लरों और ऐसे सार्वजनिक जगहों पर रोक लगाई जा सकती है, जहाँ महिलाएँ जाती हैं या लोग जमा होते हैं और बातचीत करते हैं। आर्टिकल 40 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो ‘भ्रष्टाचारी’ हो, तो भी उसे अपराधी माना जाएगा और उसे सजा दी जा सकती है। इसमें ‘भ्रष्टाचार’ का मतलब भी साफ न हो।

‘गुलामी’ को मान्यता देता है कानून

रावदारी का कहना है कि तालिबान का क्रिमिनल कोड ‘गुलाम’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल करके गुलामी को मान्यता देता है। कोड के आर्टिकल 15 और 4 गुलामी और उससे जुड़े अधिकारों के बारे में बताया गया है। इंटरनेशनल लॉ के तहत गुलामी अपने सभी रूपों को सिरे से खारिज किया गया है।

एक प्रोविज़न में कहा गया है: “किसी भी ऐसे जुर्म के लिए जिसके लिए कोई तय ‘हुदूद’ सज़ा तय नहीं है, अपनी मर्ज़ी से सज़ा दी जाएगी, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।”

कानून की नजर में बराबरी और गुलामी पर पूरी तरह रोक अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार की बुनियादी नियमों में एक है। लेकिन तालिबानी शासन इसे नहीं मानता। ह्यूमन राइट्स के बुनियादी उसूलों और इंटरनेशनल लॉ के ज़रूरी नियमों में से है- बराबरी का अधिकार, लेकिन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ऑफ़ कोर्ट्स का आर्टिकल 9 समाज को असरदार तरीके से चार कैटेगरी में बाँटता है।

‘स्कॉलर’ (उलेमा), ‘एलीट’ (अशरफ), ‘मिडिल क्लास’ और ‘लोअर क्लास’। इस आर्टिकल के मुताबिक, एक ही जुर्म करने पर, सज़ा का टाइप और गंभीरता जुर्म के नेचर के आधार पर नहीं, बल्कि जुर्म करने वाले की सोशल हैसियत के आधार पर तय होती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई जुर्म किसी धार्मिक जानकार ने किया है, तो उसके लिए सिर्फ सलाह दी जाती है।

अगर यह जुर्म किसी एलीट क्लास के किसी व्यक्ति ने किया है, तो इसके लिए कोर्ट में समन और सलाह दी जाती है। लेकिन, अगर वही जुर्म ‘मिडिल क्लास’ के लोगों ने किया है, तो उन्हें जेल होती है, और अगर समाज के ‘लोअर क्लास’ के लोगों ने किया है, तो जेल के अलावा, उन्हें शारीरिक सजा भी दी जाती है। यह फैसला न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को मान्यता देता है, बल्कि कानून के सामने बराबरी के सिद्धांत, भेदभाव पर रोक के सिद्धांत, जुर्म और सज़ा के बीच बराबरी के सिद्धांत, और कोड़े मारने जैसे अमानवीय सजा को मान्यता देता है।

इसके अलावा, कोड ने कई सेक्शन में ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करके गुलामी को भी सही ठहराया गया है। जैसा कि आर्टिकल 15 में कहा गया है, “किसी भी ऐसे जुर्म के मामले में जिसके लिए ‘सजा तय’ नहीं की गई है, ताज़ीर (अपनी मर्ज़ी की सज़ा) तय की जाती है, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।” इसी तरह, आर्टिकल 4 के पैराग्राफ 5 में कहा गया है कि ‘हद’ की सजा ‘इमाम’ दे सकता है और ‘ताजीर की सजा’ ‘पति’ और “मालिक” दे सकते हैं।

इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में लोगों को आजाद और गुलाम बताना, और ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करना अंतर्राष्ट्रीय कानून का खुल्मखुल्ला उल्लंघन है।

कोड शारीरिक सजा, जैसे सार्वजनिक कोड़े मारने को कानूनी मान्यता देता है और बढ़ाता है। इसे मानवाधिकारों के खिलाफ और अपमानजनक व्यवहार माना गया है, जो सिस्टम में हिंसा को स्थान देता है।

महिलाओं और बच्चों पर दमन की छूट

यह कोड महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने के तालिबान के प्रयासों को और तेज करता है। इसमें महिलाओं के लिए कड़े ड्रेस कोड, पुरुष अभिभावक (महरम) की अनिवार्य उपस्थिति, और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की आवाज सुनने पर भी सजा के प्रावधान शामिल हैं। ब्यूटी पार्लरों को बंद करने की कोशिश की जा रही है।

ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन रावदारी का कहना है कि तालिबान अपने क्रिमिनल कोर्ट के कोड ऑफ प्रोसीजर के तहत बच्चों की पिटाई को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा है। कोड के आर्टिकल 30 में सिर्फ शारीरिक हिंसा जैसे हड्डियों में फ्रैक्चर, स्किन का फटना शामिल किया गया है।

बच्चों के यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण वगैरह को इसमें कोई जगह नहीं दी गई है। आर्टिकल 48 में कहा गया है कि एक पिता अपने 10 साल के बेटे को नमाज़ न पढ़ने जैसे कामों के लिए सजा दे सकता है।

विरोध करने पर मिलेगी मौत की सजा

तालिबान कोर्ट के कोड के अनुसार, जिसकी एक कॉपी अफ़गानिस्तान इंटरनेशनल को मिली है, तालिबान ने ‘बागी’ बताए गए लोगों को मौत की सजा दी है। कोड में कहा गया है कि ‘बागी’ से जनता को नुकसान होता है और उसे मारे बिना ठीक नहीं किया जा सकता।

यह नियम कानूनी संस्थाओं को विरोधियों और आलोचकों को मौत की सजा देने का अधिकार देता है। आर्टिकल 4, क्लॉज 6, नागरिकों को किसी व्यक्ति को खुद सजा देने की इजाजत देता है अगर वे कोई ‘पाप’ करते हुए देखते हैं।

कोड में कहा गया है कि कोई भी मुसलमान जो किसी व्यक्ति को पाप करते हुए देखता है, उसे सजा देने का अधिकार है।

एक और नियम कहता है कि कोई भी व्यक्ति जो सिस्टम के विरोधियों को बैठक करते हुए देखता है या उसके बारे में जानता है, लेकिन संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करता है, उसे अपराधी माना जाएगा और उसे दो साल जेल की सज़ा दी जाएगी।

इस आर्टिकल के तहत, सभी नागरिकों को तालिबान विरोधियों की गतिविधियों की सूचना अधिकारियों को देनी होगी या खुद सजा भुगतना पड़ेगा। यानी हर तरह के जुल्म के बावजूद विरोध करने का अधिकार कानून में नहीं दिया गया है।

बजट के शेयर बाजार पर नकारात्मक असर से चिंता की जरूरत नहीं है; बाजार को बजट कुछ समय बाद ही समझ आता है

सुभाष चन्द्र

ये कोई पहला मौका नहीं है जब बजट वाले दिन शेयर बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा हो। अबकी बार BSE 1500 अंक और Nifty 500 अंक गिरने का बहाना STT बढ़ाना और विदेशी पूंजी कम आने की उम्मीद बताया गया लोग इसी से घबराहट में आ गए जबकि अगले ही दिन करीब आधा इंडेक्स बढ़ गया

STT F&O पर बढ़ाया गया है Futures पर 0.02% से 0.05% किया गया और Options पर 0.1 से 0.15% बढ़ाया गया है और इससे ही हल्ला हो गया कि बजट ने शेयर मार्किट को मार दिया इस पर बात करने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि विदेशी निवेशकों के पास और विकल्प होंगे लेकिन उनके लिए भारत एक प्रमुख बाजार है और इसलिए उनके विमुख होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता

लेखक 
चर्चित YouTuber 
STT बढ़ाने का कारण आयकर विभाग ने बताया है कि F&O के लेन देन की संख्या GDP की 500 गुणा ज्यादा है दूसरा कारण रिटेल निवेशक इस F & O ज्यादा पैसा गवां रहे हैं STT बढ़ने से सट्टेबाजी से जल्द पैसा कमाने की प्रवत्ति कम करने की कोशिश की गई है क्योंकि 90% Individual Traders को नुक्सान हो रहा है 2024 -25 में यह  सालाना नुक़सान 1.6 लाख करोड़ था Young Investors contributing to a rise of F & O volumes from 31% to 43% in just one year.

शेयर बाजार में Long Term investor को पैसा कमाने में कोई समस्या नहीं होती लेकिन साथ में धैर्य रखना जरूरी है बड़े ट्रेडर्स एंड वित्तीय संस्थाएं ऐसा माहौल बना देती हैं कि लोग नुकसान उठाकर अपने शेयर बेच देते हैं लेकिन बाजार गिराने वाले ही खरीददार होते हैं ऐसे समय में

याद कीजिए जब 2018 अरुण जेटली ने Long Term Capital Gain Tax लगाया था तब फरवरी महीने में ही 5% बाजार गिरा दिया गया था लेकिन जो धैर्य से अपने शेयर संभाल कर बैठे रहे उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ क्योंकि बाजार ने एक दिन बढ़ता भी है और घटता भी है

2014 में जब मोदी के सत्ता में आने के बाद 10 जुलाई, 2014 के पहले बजट के दिन और 2026 के बजट के एक दिन पहले बाजार के इंडेक्स का हाल अगर देखते हैं तो पता चलेगा कि बाजार कितना बढ़ा है

10 /7 /2014 

BSE -25033

Nifty- 7550

1 /02 /2026 

BSE - 80722.94 (-1546.84) - (82269.78) (Prior to budget) (228% rise from 2014)

NSE -24825.45 (-495.20)  - (25320.65) (Prior to budget) (235% rise from 2014)

इसके पहले दिसंबर 2025 में बाजार के इंडेक्स अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचे थे -

दिसंबर 2025 

BSE 86160 (Highest Level) (245% Rise from 2014 Level)

Nifty - 26129 (Highest Level) (246% Rise from 2014 Level)

दिसंबर 2025 में इंडेक्स के पीक पर पहुंचने और बजट वाले दिन से एक दिन पहले के इंडेक्स को देख कर पता चलता है कि मोदी सरकार के आने के बाद शेयर बाजार कितना बढ़ा यही शेयर बाजार आर्थिक हालत को मापने का पैमाना कहा जाता है इतना बाजार बढ़ने के बाद जाहिर है लोगों ने दबा कर पैसा भी कमाया होगा खासकर उन लोगों ने जो Future/Option की सट्टेबाज़ी नहीं करते STT बढ़ा दिया गया तो वह भी निवेशकों के हित में है, विचलित होने का विषय नहीं है

छँटनी के डर से जेफ बेजोस से नौकरी की भीख माँगता प्रांशु वर्मा, इंडिया ब्यूरो चीफ, वॉशिंगटन पोस्ट में नौकरी बचाने की शर्त बना ‘भारत विरोध’

                           Washington Post में छटनी; नौकरी बचाने भारत का विरोध करने को तैयार  
वरिष्ठ पत्रकारों का अपने ही संस्थान के मालिक से सार्वजनिक मंच पर नौकरी बचाने की अपील करना मीडिया जगत में एक असामान्य और चौंकाने वाली स्थिति है। यह घटना न सिर्फ संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है बल्कि मीडिया संस्थानों पर मालिकाना प्रभाव की वास्तविकता को भी सामने लाती है। साथ ही, यह उस धारणा को भी चुनौती देती है कि मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करता है।

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा का ऐसा ही एक मामला सामने आया है। अखबार में बड़े पैमाने पर छँटनी की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए सीधे अमेजन के संस्थापक और द वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस से हस्तक्षेप करने की अपील की है।

प्रांशु वर्मा का ट्वीट सिर्फ यह कहने तक सीमित नहीं था कि उन्हें नौकरी पर बने रहने दिया जाए। वह ट्वीट ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने सबके सामने अपना परिचय, अपने काम का ब्योरा और अखबार के प्रति अपनी निष्ठा एक साथ रख दी हो। जेफ बेजोस को टैग करते हुए वर्मा ने कहा कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ भारत के गिने-चुने मीडिया संस्थानों में से है, जो सरकार के दबाव या सेंसरशिप के डर के बिना रिपोर्टिंग करता है।

 एक ही झटके में, उन्होंने खुद को कथित तौर पर तानाशाही मीडिया इकोसिस्टम में एक बहादुर विरोधी के तौर पर पेश कर दिया। साथ ही, अखबार को कथित तौर पर दबाने वाले भारतीय शासन व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले एकमात्र ‘योद्धा’ के तौर पर पेश किया। दरअसल, लंबे वक्त से इस तरह की दुश्मनी विदेशी मीडिया निकालता रहा है। पश्चिमी संरक्षकों का समर्थन पाने के लिए इस तरह की मनगढ़ंत बातें कुछ मीडियाकर्मी लंबे वक्त से करते रहे हैं।

इसके बाद जो सामने आया, उसने लोगों को और हैरान कर दिया। प्रांशु वर्मा ने अपने ट्वीट में अपने ब्यूरो की उन खबरों की गिनती भी कर दी जिन्हें वह चर्चित मानते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर भारतीय अरबपतियों पर की गई वे रिपोर्टें गिनाईं, जिनमें दावा किया गया था कि उनके साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा मोदी सरकार के दौर में कथित भाई-भतीजावाद से जुड़ी खबरें, भारतीय कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने के आरोपों वाले लेख और भारत की घुसपैठ रोकने की कोशिशों को ‘मुसलमानों को बांग्लादेश भेजने का अभियान’ बताने वाली रिपोर्टें भी शामिल थीं।

ब्यूरो चीफ द्वारा भेजे गए हर लेख का एक मकसद साफ था। ना केवल बेजोस के सामने अपनी काबिलियत साबित करना नहीं बल्कि उस ‘ग्लोबल नजरिए’ के साथ वैचारिक जुड़ाव का संकेत देना जिसने वाशिंगटन पोस्ट की विदेशी रिपोर्टिंग को परिभाषित किया है।

वर्मा ने यह साफ कर दिया कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में काम करने और वहाँ टिके रहने का एक तय तरीका है। वहाँ भारत पर रिपोर्टिंग का मतलब सिर्फ घटनाएँ बताना नहीं है बल्कि भारत को कटघरे में खड़ा करना भी है। भारत को एक ऐसे संप्रभु लोकतांत्रिक देश के रूप में नहीं देखा जाता जो जटिल समस्याओं से जूझ रहा हो बल्कि उसे शक की नजर से देखा जाता है। उसकी नीतियों और फैसलों को अक्सर दमन, बहुसंख्यकवाद और नैतिक चूक के फ्रेम में रखकर पेश किया जाता है।

जाली दस्तावेजों, सीमा घुसपैठ और कई मामलों में आपराधिक आरोपों से जुड़े अवैध रोहिंग्याओं के जबरन देश में आने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जाता बल्कि इसे सांप्रदायिक उत्पीड़न अभियान का नाम दिया जाता है। अरबपति उदारीकरण की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्था में कारोबारी नहीं हैं, बल्कि सत्ताधारी भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। कूटनीतिक तनाव भू-राजनीति नहीं बल्कि भारत की कथित नैतिक विफलताओं के कारण उत्पन्न ‘विघटन’ है।

इसीलिए वर्मा की दलील पत्रकारिता के बचाव के लिए नहीं है बल्कि खुद को बनाए रखने की कोशिश है। इसमें साफ पता चलता है कि देखो हम कितना नुकसान करते हैं। देखो हम किस तरह की बातें फैलाते हैं। यकीनन इसे बचाना जरूरी है।

ताजा मामला ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ पर छाए संकट के बारे में बहुत कुछ बताता है। पोस्ट के पुराने मीडिया रिपोर्टर पॉल फारही की रिपोर्ट के मुताबिक, अखबार स्टाफ में भारी कटौती की तैयारी कर रहा है, जिससे 300 लोगों की नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर विदेशी डेस्क और स्पोर्ट्स डेस्क पर पड़ेगा। एडिटर्स ने कथित तौर पर चेतावनी दी है कि न्यूजरूम के आधे से ज्यादा लोगों को छँटनी का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले 2023 में करीब 240 लोगों को नौकरी से हटाया गया था।

ये छँटनी की वजह साफ है। एडवरटाइजिंग रेवेन्यू गिर गया है, सब्सक्रिप्शन रुक गए हैं और ग्लोबल जर्नलिज्म के लिए जो नैतिक दिखावा कभी होता था, वह अब बिलों का भुगतान नहीं कर रहा है। पढ़ने वाले ध्यान नहीं दे रहे हैं, इसलिए नहीं कि जवाबदेह रिपोर्टिंग का स्वागत नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि रिपोर्टिंग के रूप में लगातार ‘नैरेटिव एक्टिविज्म’ ने भरोसा खत्म कर दिया है।

वर्मा की बेजोस से सार्वजनिक अपील एक व्यापक और कुछ हद तक ‘बेशर्मी’ है। ब्यूरो चीफ और सीनियर एडिटर एक अरबपति मालिक से मेहरबानी की अपील करते हैं, साथ ही सत्ता से अपनी स्वतंत्रता का दावा करते हैं। यह एक ऐसी उलझन है जिसे #SaveThePost जैसे हैशटैग से दूर नहीं किया जा सकता।

अजीब बात है कि एक पत्रकार जो भारत सरकार पर प्रेस की आजादी को दबाने का आरोप लगाता है। उसका अपना पेशेवर भविष्य पूरी तरह से एक अमेरिकी उद्योगपति के विवेक पर निर्भर करता है। यह विडंबना ही है कि वर्मा अपने ब्यूरो की भारत के व्यापारिक समूहों पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का बखान करते हुए एक अमेरिकी व्यवसायी से अपनी नौकरी बचाने की गुहार लगा रहे थे।

हालाँकि, प्रॉब्लम यह नहीं है कि बेजोस घाटे में चल रहे डेस्क को फंडिंग देने में हिचकिचा रहे हैं। प्रॉब्लम यह है कि द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे आउटलेट्स इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि नफ़रत से भरी, सोच पर अड़ी रिपोर्टिंग अब एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल नहीं है। इसी सोच की वजह से द वॉशिंगटन पोस्ट के लिए दुनिया भर में मुश्किलें बढ़ रही हैं। ये संस्थान ऐसी हालत में आ गया है कि अब उसे बने रहने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के बारे में सोचना पड़ रहा है।

वर्मा का ट्वीट उनकी नौकरी बचाने के लिए था। अनजाने में ही इसने उस मानसिकता को उजागर कर दिया जिसने अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में से एक को पतन के कगार पर पहुँचा दिया है। यही कारण है कि न्यूजलॉन्ड्री, द वायर आदि जैसे अधिकांश भारतीय मीडिया संस्थान जो द पोस्ट की विचारधारा का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी इसी कारण से चंदा और सदस्यता के लिए लगातार अनुरोध करना पड़ता है।

चाहे वह कोई अमेरिकी प्रतिष्ठित समाचार पत्र हो या उसके भारतीय वैचारिक अनुकरणकर्ता, पाठकों ने उन मीडिया संगठनों से अपना समर्थन वापस लेना शुरू कर दिया है जो छद्म पत्रकारिता को ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता करते हैं।

‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा

                    द वायर और असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा (साभार : The Wire & thecrossbill)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

‘द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

 हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

हापुड़ : हनुमान चालीसा पाठ पर भड़के SC दबंग, प्रजापति माँ-बेटे को जूतों की माला पहनाकर निकाला जुलूस-अंबेडकर प्रतिमा के सामने रगड़वाई नाक

                      माँ-बेटे के साथ अपराध करने वाले 4 आरोपित गिरफ्तार (साभार X_@hapurpolice)
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ शाहपुर चौधरी गाँव में एक माँ और उसके बेटे को जूतों की माला पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया गया और उन्हें अमानवीय तरीके से अपमानित किया गया। इस पूरी घटना से जुड़ी FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की है और अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।

मंदिर में विवाद और जूतों की माला का ‘फरमान’

 जानकारी के अनुसार, घटना की जड़ें अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय से जुड़ी हैं। पीड़ित युवक दीपक चौधरी (प्रजापति समुदाय) के अनुसार, उस दौरान गाँव के मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था, तभी दलित समुदाय के एक युवक ने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसका दीपक ने विरोध किया था।

आरोप है कि इसी रंजिश के चलते 26 जनवरी 2026 को कुछ दलित युवकों ने दीपक को रास्ते में रोक लिया और गाली-गलौज की। इसके बाद उसकी माँ को भी मौके पर बुला लिया गया। गाँव की पंचायत ने कथित तौर पर एक ‘तालिबानी’ फरमान सुनाया कि दोनों को जूतों की माला पहनाकर घुमाया जाए ताकि धर्म पर टिप्पणी का बदला लिया जा सके।

प्रतिमा के सामने नाक रगड़वाई और निकाला जुलूस

पीड़ित ने FIR में आरोप लगाया कि उसे और माँ को जबरन बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने ले जाया गया और वहाँ उनकी नाक रगड़वाई गई। इसके बाद भीड़ ने दोनों के गले में जूतों और चप्पलों की माला डाल दी और पूरे गाँव में उनका जुलूस निकाला।
इस दौरान माँ-बेटे के साथ मारपीट भी की गई और उन्हें हाथ जोड़कर माफी माँगने पर मजबूर किया गया। यह पूरी शर्मनाक घटना गाँव में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पुलिस की कार्रवाई और गाँव में तनाव

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। गढ़ कोतवाली पुलिस ने पीड़ित की तहरीर पर तत्काल 10 नामजद युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चार आरोपितों (अनिल, अमित, सागर और विनीत) को गिरफ्तार कर लिया है।

गढ़ कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर देवेंद्र विष्ट ने बताया कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि एक आरोपित पुलिस विभाग से जुड़ा है, जिसकी जाँच की जा रही है। फिलहाल गाँव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

UGC Regulations पर कुछ लोग मोदी को कुर्सी से उतारने को मैदान में आ गए लेकिन भूल गए उसके काम जो सभी के लिए किए, किसी खास जाति के लिए नहीं; उन कामों को देख लो कृतघ्न लोगों

सुभाष चन्द्र

वामपंथियों ने जिस तरह UGC बिल में सवर्ण जाति के विरुद्ध जहर खोल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को फंसा अपना जहरीला खेल खेला उसे सवर्ण वर्ग को समझ कर वामपंथियों का ही नहीं बल्कि जातियों पर आधारित हर  पार्टियों का भी तिरस्कार करना चाहिए। इन पार्टियों में शामिल सवर्ण वर्ग के लोगों का भी सामाजिक बहिष्कार करने चाहिए। अगर अभी भी सवर्ण जाति ने अपनी आंखें नहीं खोली फिर शायद दोबारा मौका नहीं आएगा। टीवी चर्चाओं में जेएनयू के प्रो आनंद रंगनाथन ने चर्चा में शामिल RJD प्रवक्ता सुश्री कंचना यादव का वो वीडियो दिखाकर कंचना को बेनकाब कर दिया जिसमे वह सवर्ण जाति के व्यक्तियों को फंसाने के लिए उकसा रही थी। यानि सवर्ण वर्ग को अपने हित में जातिगत आधारित पार्टियों का चुनावों में खुलकर बहिष्कार करना चाहिए। जो एकजुटता बिल के विरोध में दिखाई है वही एकजुटता चुनावों में इन जातिगत आधारित पार्टियों और इनके समर्थक सवर्ण लोगों के बहिष्कार में दिखानी होगी।  

1-मिस कॉल पर गैस सिलेंडर;

2-आनलाइन बिलों का भुगतान;

3-यू पी आई पेमेंट;

4-डीजी लाॅकर;

5-जन औषधि केन्द्र;6-आयुष्मान कार्ड;7-नयी संसद भवन;8-फ्री वैक्सीनेशन;9-जन धन योजना;

10-सर्जिकल स्ट्राइक;11-ऑपरेशन सिन्दूर;

12-तीन तलाक ख़त्म;

13-आधार लिंक;

14-फास्टैग;

लेखक 
चर्चित YouTuber 
15-चिनाब ब्रिज;
16-जम्मू की सुरंग;
17-गंगा एक्सप्रेस-वे;
18-काशी कॉरिडोर;
19-विश्वनाथ कॉरिडोर;

20-केदारनाथ पुनर्निर्माण;21-श्री राम मंदिर निर्माण;

22-सुकन्या समृद्धि योजना;23-शौचालयों का निर्माण;24-रेलवे पटरियों का दोहरीकरण;

25-रेलवे स्टेशनों का विस्तार;26-टिकट बुकिंग में दिन कम;27-टिकट कैंसिलेशन सुविधा;

28-स्वर्णिम चतुर्भुज योजना;29-भारत माला प्रोजेक्ट; 30-18 एम्स का निर्माण; 31-S I R;

32-महात्मा गांधी सेतु पुनर्निर्माण; 33-भूपेन हजारिका सेतु; 34-सेना का आधुनिकीकरण;

35-मेक इन इंडिया; 36-ड्रोन क्रांति; 37-किसानों के खाते में सीधे पैसे; 38-राशन डिजिटलाइजेशन; 39-फ्री राशन; 40-कन्या सुमंगला योजना;

41-G S T लागू करना; 42-G S T में भारी कटौती।

43-सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण; 44-तालाबों का निर्माण; 45-हर घर नल से जल;

46-22 घंटे बिजली; 47-इनकम टैक्स में 12 लाख की छूट; 48-धारा 370 का हटना;

49-553 नये रेलवे स्टेशन; 50-1500 नये ओवर ब्रिज; 51-1500 से अधिक बेकार कानून हटाना;

52-भ्रष्टाचारियों पर E D के रिकार्ड तोड  छापे;

53-3000 रु में फास्टैग की वर्षभर की छूट;

54-E V M में VVPAT लागू करना;

55-कर्तव्य पथ मार्ग;

56-नोटों में सांस्कृतिक धरोहरों के चित्र;

57-नालंदा यूनिवर्सिटी का पुनर्निर्माण;

58-तेजस का घरेलू उत्पादन;

59-सेल फोन निर्माण में आत्मनिर्भरता;

60-मुद्रा योजना;

61-उज्ज्वला योजना;

62-सुरक्षा बीमा;

63-390 नये विश्वविद्यालय;

64-7 नये IIT;

65-7 नये IIM;

66-16 नये IIIT;

67-300 नये मेडिकल कॉलेज;

68-पम्बन ब्रिज का निर्माण;

69-ऋषिकेश -कर्णप्रयाग रेलवे प्रोजेक्ट;

70-उत्तराखंड चारधाम सड़क निर्माण;

71-ब्रह्मोस उत्पादन फैक्ट्री;

72-असॉल्ट राइफल निर्माण अमेठी;

73-वन्दे भारत आधुनिक ट्रेनें।

74-वक्फ बोर्ड प्रॉपर्टी पर कानून;

75-रेलवे में बायो टॉयलेट;

76-श्रम हित के श्रम कानूनों को लागू करना;

77-G RAM जी योजना लागू करना;

78-सड़कों के निर्माण में भारत चीन को पीछे छोड़ चुका है;

79- लाखों  युवाओं को सरकारी नौकरियाँ;

80-8 लाख से अधिक कार्मिशियल लाइसेंस आबंटन;

81-80,000 नये पेट्रोल पंप;

82-शौर्य स्थल का निर्माण;

83-रेल बजट का आम बजट में विलय;

84-9000 से अधिक नये स्कूल;

85-अवैध निर्माणों पर बुलडोजर;

86-बॉर्डर पर फेंसिंग;

87-आर्मी को आतंक के विरुद्ध खुली छूट;

88-विकास कौशल योजना;

89-विमुद्रीकरण;

90-टोल नाके समाप्त करके फास्टैग सुविधा;

91-चंद्रयान -3 सफल;

92-मंगल मिशन;

93-मल्टी सैटेलाइट स्टेबिलाइजेशन;

94-बिहार में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को कम करना;

95-Statue of Unity/ National War Memorial/Police Memorial निर्माण;

96-स्मार्ट सिटी विस्तार;

97-किसानों को यूरिया कोटिंग;

98-P F निकालना सुविधाजनक हुआ;

99-निजी और घरेलू क्षेत्रों में 5 करोड़ से अधिक नये रोजगार का सृजन;

100-कृर्षि कानून पारित हुए होते तो दलाली भी खत्म होती और मण्डियों पर बहुत से बांग्लादेशियों के अवैध कब्ज़े भी ख़त्म हुए होते-

अभी UCC और जनसंख्या नियंत्रण भी लागू होना है -

मोदी / भाजपा के साथ खड़े रहो -

आपके एक वोट से कश्मीर की पत्थरबाजी 90% कम हुई; राम मंदिर बना; काशी संवार दी; 370 हटा और पाकिस्तान को 3 बार घुस के मारा -

लिच्छवी राणा द्वारा संग्रहित -

मध्य प्रदेश : अब्बू ने किया गाय का रेप, हिंदू संगठनों के प्रदर्शन के बाद पुलिस ने किया गिरफ्तार: बैतूल का मामला


मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दामजीपुरा गाँव में अब्बू नाम के युवक ने गाय के साथ रेप किया। पुलिस ने वायरल वीडियो के आधार पर आरोपित अब्बू हिरासत में ले लिया है।

इस घटना से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे इलाके में तनाव और आक्रोश का माहौल बन गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रविवार (1 फरवरी 2026) की सुबह करीब 10 बजे से ही गाँव में बवाल शुरू हो गया। वीडियो सामने आते ही आक्रोशित लोगों की भीड़ ने सबसे पहले आरोपित अब्बू की दुकान में आग लगा दी।

इसके बाद पास की अन्य दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई और आगजनी की घटनाएँ हुईं। उपद्रव के दौरान टायर पंक्चर, इलेक्ट्रॉनिक, मोबाइल और टेलरिंग जैसी कई दुकानों को नुकसान पहुँचा है। कई वाहनों को भी क्षतिग्रस्त किया गया। घटना की खबर फैलते ही हिंदू संगठनों में भारी नाराजगी देखी गई और आसपास के जिलों से भी लोग दामजीपुरा पहुँचने लगे।

हालात बिगड़ते देख पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आया। भैंसदेही, चिचोली और मोहदा थानों का पुलिस बल मौके पर तैनात किया गया है। पुलिस लाइन से अतिरिक्त बल भी भेजे गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन गाँव में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है।

जिन UGC नियमों को SC ने रोका उनमें शामिल ‘वामपंथी’ इंदिरा जयसिंह की सिफारिशें


सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियम UGC इक्विटी नियम 2026 पर स्टे लगा दिया है। हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों को लेकर किए गए नोटिफिकेशन को लेकर बवाल मचा हुआ है। प्रमोशन ऑफ इक्विटी 2026 के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 27 जनवरी 2026 को छात्रों को भरोसा दिलाया कि इस नियम का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन छात्रों का डर खत्म नहीं हुआ और विरोध प्रदर्शन जारी रहा।

दरअसल ये तर्क दिया जा रहा है कि जनरल कटेगरी के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते इसलिए उनकी शिकायत को सिस्टम से बाहर रखा जा रहा है। UGC इक्विटी नियम 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए एक ‘सुधार’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्वराज्य के अनुसार, 2026 के नियमों के बजाए 2025 का नियम एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स में भेदभाव को दूर करने के लिए ज्यादा कारगर है। यह एक संतुलित नजरिया पेश करता है और ज्यादा व्यावहारिक है।

बराबरी पर UGC रेगुलेशन की शुरुआत

2019 में छात्र रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने दो पीआईएल दायर की थी, जिसके आधार पर 2025 के ड्राफ्ट तैयार किए गए थे। इन छात्रों में एक की मौत 2016 में और दूसरे की 2019 में हुई थी। उनके परिवारों ने आरोप लगाया था कि इनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया गया, जिसकी वजह से इनदोनों ने आत्महत्या कर ली थी।

दोनों याचिकाकर्ताओं की वकील सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह थी। उन्होंने एडवोकेट प्रसन्ना और दिशा वाडेकर के साथ मिलकर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की माँग की। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए गाइडलाइंस तैयार की जाए, उसी के आधार पर यूजीसी के नए नियम बनाए गए।

कहा जाता है कि PIL में पूरी तरह से नए नियम की माँग नहीं की गई थी, बल्कि मौजूदा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में बराबरी को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2012 को सख्ती से लागू करने की माँग की गई थी। 2012 के नियमों के तहत यूनिवर्सिटी को भेदभाव, खासकर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को समानता दिलाने पर जोर दिया गया था।

PIL में याचिकाकर्ताओं ने एडमिशन, मूल्यांकन, हॉस्टल अलॉटमेंट और कैंपस लाइफ में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। उन्होंने संस्थानों पर 2012 के नियम को लागू करने में पूरी तरह विफल रहने का भी आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कोई मॉनिटरिंग नहीं की जाती थी। समान अवसर वाली जगह काफी कम थी। NAAC का कोई अता-पता नहीं था।
जनवरी 2025 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) को नियमों का पालन न करने के लिए फटकार लगाई। जजों ने UGC को सेल, शिकायतों और एक्शन पर डेटा पेश करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट UGC ने बताया कि वह रेगुलेशन के नियम का ड्राफ्ट बना रही है।

2025 के रेगुलेशन ने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने के लिए एक नियम बनाया।

UGC ने फरवरी 2025 में (हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन में प्रमोशन ऑफ इक्विटी) रेगुलेशन जारी किए थे। 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन का उद्देश्य सुरक्षा, निष्पक्षता और स्वायत्तता के बीच एक संतुलित ढाँचा तैयार करना था। PIL की माँग के मुताबिक, ‘इक्विटी कमेटी’ और 24/7 हेल्पलाइन जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सभी शामिल पार्टियों (विशेषकर SC/ST छात्रों) के लिए सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

इन नियमों में संस्थानों को अपनी स्थितियों के अनुसार, नियमों को लागू करने का अधिकार दिया गया। इक्विटी कमेटी का नेतृत्व संस्था के प्रमुख द्वारा किए जाने का प्रावधान है, ताकि संस्था की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जा सके।

कमेटी में कम से कम एक सदस्य SC ​​या ST समुदाय से होना जरूरी था। ड्राफ्ट रेगुलेशन ने सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए फैकल्टी, छात्र-छात्राओं और संस्थान के प्रशासनिक स्टाफ की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है।

2026 के रेगुलेशन में इंदिरा जयसिंह की सिफारिशों को शामिल किया गया

हालाँकि याचिकाकर्ता 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन से खुश नहीं थे। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने ड्राफ्ट में दस मुख्य बदलावों का प्रस्ताव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रेगुलेशन को फाइनल करने के लिए 8 हफ्ते की डेडलाइन तय की। इसको देखते हुए नए रेगुलेशन 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किया गया।

इस रेगुलेशन में 2025 के रेगुलेशन में किए गए ‘संतुलन’ का अभाव था, और इसमें जयसिंह की कई सिफारिशें शामिल थीं।

2026 के रेगुलेशन ने पीड़ितों की कैटेगरी को SC, ST और OBC तक सीमित करके जनरल कटेगरी को जाति-आधारित हिंसा का शिकार मानने से मना कर दिया। जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए जाति-आधारित भेदभाव की शिकायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2026 के रेगुलेशन न सिर्फ यह मानते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव सिर्फ SC, ST और OBC के लोगों के साथ होता है। इसमें जनरल कटेगरी के लोगों की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि नया नियम मानता है कि इनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता।

नया फ्रेमवर्क जनरल कटेगरी के स्टूडेंट्स के खिलाफ है, जिनके पास नियमों का गलत इस्तेमाल होने पर संस्थान का सहारा नहीं होगा। यही वजह है कि 2026 के रेगुलेशन का जनरल कटेगरी के छात्र विरोध कर रहे हैं, जिन पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

यमलोक के द्वार पर बहने वाली 'वैतरणी नदी' का रहस्य

जो भी धरती पर आया है उसे मृत्युलोक को प्राप्त करना है इसका लेखाजोखा यमराज के पास होता है। लेकिन उसके पाप-पुण्य का निर्णय धर्मराज चित्रगुप्त जी महाराज करते हैं। लेकिन धरती से लेकर धर्मराज तक पहुँचने में आत्मा को अनेक पड़ाव से गुजरना पड़ता है। इन पड़ावों में कई दुर्गम पड़ाव ऐसे होते हैं जिन्हे आत्मा अपने जीवनकाल में किये दान-पुण्यों और बड़ों को दिए जाने पर हृदय से निकले आशीर्वाद के कारण सुगमता से पार करने में सक्षम कर देते हैं। इसीलिए शास्त्र बड़ों का सम्मान करने की शिक्षा देते हैं। माँ के चरणों में अगर स्वर्ग है तो उसका द्वार पिता के चरणों में होता है। घर में आए किसी भी अतिथि(परिचित अथवा अपरिचित) का आदर-सम्मान देने से परमपिता को प्रसन्न करना होता है। अगर घर पर किसी भी अतिथि पर अगर जल भी दिया तो जो घूंट गले से उतरता है दिल से निकला आशीर्वाद कर्म में लिखा जाता है। पता नहीं कब से उसने पानी या कुछ अन्न नही लिया है। यह सब निर्भर करता है संस्कारों पर।
हमारे शास्त्रों (गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण) में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी यात्रा के दौरान नरक लोक और यमलोक की सीमा पर एक भयानक नदी स्थित है, जिसे 'वैतरणी' कहा जाता है।
कैसी होती है यह नदी?
यह कोई सामान्य जल की नदी नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, यह रक्त, कीचड़, पीप, और विषैले पदार्थों से भरी है। इसका 'जल' तेजाब के समान खौलता रहता है। इसमें भयंकर साँप, बिच्छू और मगरमच्छ जैसे जीव आत्माओं को कष्ट देने के लिए रहते हैं।
इस नदी में कौन गिरता है?
गरुड़ पुराण के अनुसार, अपने जीवन में कुकर्म करने वाले लोग इस नदी में धकेले जाते हैं:
माता-पिता, गुरु और साधुओं का अपमान करने वाले।
झूठ, छल-कपट और धोखा देने वाले।
गौ-हत्या या गौ-अपमान करने वाले।
लोभी और दान न करने वाले व्यक्ति।
वैतरणी पार कैसे होती है? (गौदान का महत्त्व)
यहीं पर 'गौदान' का सबसे बड़ा महत्व बताया गया है। जिसने जीवन में निस्वार्थ भाव से गौदान किया हो, मृत्यु के पश्चात वह गाय उस आत्मा को इस भयानक नदी से पार लगाती है।
क्या है वैतरणी दान?
मृत्यु के समय या श्राद्ध पक्ष में किया जाने वाला एक विशेष दान, जिससे आत्मा को यह नदी पार करने में सहायता मिलती है।
सामग्री: काले रंग की गाय (या प्रतीकात्मक), तिल, लोहा, कंबल, जल पात्र आदि।
बचाव का मार्ग (आध्यात्मिक संदेश)
वैतरणी नदी केवल भय का प्रतीक नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। इससे बचने का उपाय है—जीवन में धर्म, करुणा, सत्य और गौ-सेवा का मार्ग अपनाना।
अच्छे कर्म ही परलोक में साथी बनते हैं।

नेहरू लियाकत समझौता रद्द करने का उपाय सोचा जाए; अंतरिम प्रधानमंत्री नेहरू के पापों की कोई सीमा नहीं थी

सुभाष चन्द्र

भारत के धर्म के आधार पर विभाजन के अनुसार मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और हिंदुओं को भारत आ जाना चाहिए था।  क्योंकि पाकिस्तान मुसलमानों की मांग पर बनाया गया था, इसलिए आज मुसलमानों को यह कहने का अधिकार नहीं है कि वे भी हिंदुस्तान में बराबर के हकदार हैं 

लेकिन गांधी और नेहरू ने बड़ी कुटिलता से मुसलमानों को भारत में रहने दिया उसी दिन उन दोनों ने दूसरा पाकिस्तान बनाने के षड्यंत्र की बुनियाद रख दी और आज उस बुनियाद पर इमारत खड़ी हो गई है

नेहरू को 2 सितंबर, 1946 को (विभाजन से पहले) Viceroy की Executive Council में Vice President बनाया गया de facto प्रधानमंत्री की हैसियत से काम करने के लिए जिसका काम सत्ता हस्तांतरण की देखभाल करना, विदेश नीति को बनाना और डिप्लोमेटिक संबंधों को बनाना था लेकिन नेहरू ने अंतरिम प्रधानमंत्री होते हुए ही विदेश मामलों में ग़दर मचा कर सर्वनाश कर दिया

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भारत के चुनाव 1951 में हुए और इसलिए नेहरू सरकार को देश विरोधी कार्य करने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि उन्हें जनता की अनुमति नहीं थी लेकिन फिर भी उसने किए नेहरू ने तो कश्मीर काट कर पाकिस्तान को दे दिया, तिब्बत काट कर चीन को दे दिया और UNO की स्थाई सीट एवं वीटो पावर चीन को दे दी RSS पर बैन भी अंतरिम प्रधानमंत्री होते हुए लगाया जो कोर्ट में पिट गया

नेहरू ने 8,अप्रैल 1950 को पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री लियाकत अली के साथ (भारत का विभाजन करने के बाद) एक समझौता करके एक बार फिर भारत के लिए सर्वनाश कर दिया। उस समझौते का उद्देश्य था

- To guarantee the rights of minorities in both countries and to reduce communal tensions.

-Key provisions: The pact included clauses on protecting minority rights, the return of abducted women and property, and the freedom of minorities to return to their homes

भारत ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की ऐसे रक्षा की कि उनकी संख्या आज 20 करोड़ से ज्यादा हो गई लेकिन पाकिस्तान अल्पसंख्यक हिंदुओं को गाजर मूली की तरह काट कर 22% से 2% पर ले आया

इसलिए कानूनी दृष्टि ने नेहरू को Elected Prime Minister न होते हुए ऐसा समझौता करने का कोई अधिकार नहीं था 1960 में नेहरू की जब Indus Water Treaty पर भारत ने रोक लगा दी तो लियाकत अली के साथ समझौते को भी रद्द किया जा सकता है इस समझौते के साइन होने तक तकनीकी रूप से मुसलमानों को वोट देने का भी अधिकार नहीं था और क्योंकि 1951 में चुनाव होने थे, नेहरू ने मुसलमानों को वोटर बनाने के लिए वह समझौता किया लियाकत अली से समझौते के वक्त नेहरू Elected PM नहीं था जबकि सिंधु जल समझौते से समय वो Elected PM था और अगर 1960 का समझौता रोका जा सकता है तो 1950 के समझौते को रोकने के भी उपाय तलाशने चाहिए

अब सवाल यह उठेगा कि 1950 के समझौते के समय के लोग तो इस वक्त होंगे नहीं तो समझौता रद्द करने का असर उन पर तो होगा नहीं ऐसी स्थिति में उनके वंशजों को इस समझौते के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए किसी संविधान विशेषज्ञ को यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाना चाहिए