US Federal Court ने चीनी जालसाज को दी 30 साल की सजा, पश्चिमी मीडिया बताता था ‘बागी’: जानें गुओ वेनगुई की कहानी और जालसाज़ राणा अय्यूब के साथ उसकी समानताएँ

                                               गुओ वेनगुई और राणा अय्यूब (फोटो साभार: Opindia)
चीन का एक भगोड़ा अरबपति गुओ वेनगुई (जिसे हो वान क्वोक, गुओ माइल्स, माइल्स क्वोक और “ब्रदर सेवन” जैसे कई नामों से जाना जाता है) कई सालों तक पश्चिमी मीडिया के बीच एक नायक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विरोधी बागी के रूप में ऐश की जिंदगी जी रहा था। गुओ वेनगुई ने पश्चिम में इस दावे के दम पर अपने लाखों समर्थक बना लिए थे कि ‘चीनी सरकार मेरे पीछे पड़ी है’। लेकिन आखिरकार अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उसे अपने ही समर्थकों से 1 अरब डॉलर (करीब 83 अरब रुपए) से ज्यादा की धोखाधड़ी का दोषी पाया। 29 जून 2026 को फेडरल कोर्ट ने गुओ वेनगुई को 30 साल जेल की सजा सुनाई।

धोखाधड़ी के आरोप और गुओ वेनगुई का चीन से पलायन

इस अभियान में वेनगुई के साथी, जिनमें पूर्व खुफिया अधिकारी मा जियान भी शामिल थे, निशाने पर आए। गुओ वेनगुई उर्फ गुओ माइल्स ने चीनी अधिकारियों की इस कार्रवाई को एक राजनीतिक साजिश बताया। उसने दावा किया कि चीनी सरकार के बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के कारण उसे निशाना बनाया जा रहा है।

भागने के शुरुआती सालों में चीनी अधिकारियों ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया और उसके खिलाफ इंटरपोल नोटिस भी जारी कराया। चीन सरकार ने उस पर रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, अपनी पूर्व सहायक के साथ बलात्कार, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे।

हांगकांग समेत कई जगहों पर वेनगुई की संपत्तियाँ सील कर दी गईं। चीन ने अमेरिका से इस जालसाज को वापस सौंपने की माँग भी की थी।

चीन में धोखेबाज, पश्चिम में बागी: बिकाऊ मीडिया की मदद से कैसे बनाई ‘एक्टिविस्ट’ की छवि

खुद को देश से बाहर रखने के दौरान गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े आलोचक के रूप में खुद को नए सिरे से पेश किया। वेनगुई ने अमेरिका सरकार की फंडिंग से चलने वाले वॉयस ऑफ अमेरिका (VoA), बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स और फोर्ब्स सहित कई बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों को इंटरव्यू दिए। वह कई ऑडियो पॉडकास्ट में भी शामिल हुआ।
अमेरिकी मीडिया एक्जीक्यूटिव, इन्वेस्टमेंट बैंकर और व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ मिलकर गुओ वेनगुई ने ‘जीटीवी’ (GTV) नाम की एक मीडिया कंपनी बनाई।
साल 2018 में, स्टीव बैनन और गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) की स्थापना की, जिसका नाम उसने ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ (Rule of Law Society) रखा। शुरुआत में इस संस्था को गुओ वेनगुई की तरफ से 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया था।
हालाँकि जब इस संस्था के पैसों की जाँच शुरू हुई और दस्तावेज देने से इनकार किया गया, तो स्टीव बैनन ने 2021 में ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।
इस जोड़ी ने साल 2020 में एक लग्जरी नाव (याट) से ‘न्यू फेडरल स्टेट ऑफ चाइना’ की घोषणा की और गुओ ने दावा किया कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंकेगा। गुओ के मीडिया वेंचर्स पर कोविड की शुरुआत और अमेरिकी राजनीति को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप भी लगे और आलोचना हुई।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने वाले अपने इस ‘एक्टिविज्म’ और मीडिया इंटरव्यूज के जरिए गुओ वेनगुई ने विदेशों में रहने वाले चीनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधियों के बीच अपने कट्टर समर्थक तैयार कर लिए। वेनगुई ने अपने इस फर्जी एक्टिविज्म को ‘लोकतंत्र और चीनी तानाशाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध’ के रूप में पेश किया।
जनवरी 2025 में इस 1 अरब डॉलर के घोटाले में भूमिका के लिए गुओ की सहयोगी यवेट वांग को भी 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, पश्चिमी मीडिया और मशहूर हस्तियों ने गुओ वेनगुई को एक हीरो की तरह पेश किया। आखिरकार अमेरिकी प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए ‘चीनी सरकार की प्रताड़ना’ का शिकार बने एक चीनी अरबपति से बेहतर और क्या हो सकता था। अमेरिका में गुओ के आगे बढ़ने की वजह चीन विरोधी आवाजों को मिलने वाला खुला समर्थन था, शायद इसी वजह से शुरुआत में उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई।
चूँकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी विरोधियों की आवाज दबाने के लिए जानी जाती है, इसलिए पश्चिम के लोगों को वेनगुई की मनगढ़ंत कहानी बिल्कुल सच लगी।

गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने हजारों फॉलोअर्स को कैसे ठगा, अमेरिकी अधिकारियों ने किया खुलासा

गुओ वेनगुई को मार्च 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इंटरनेट पर अपने हजारों फॉलोअर्स से 1 अरब डॉलर की ठगी करने की बड़ी साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह धोखाधड़ी जीटीवी (GTV) के प्राइवेट शेयर, लोन, जी|क्लब्स (G|CLUBS) की मेंबरशिप, हिमालय फार्म और ‘हिमालय कॉइन/एक्सचेंज’ नाम की क्रिप्टोकरेंसी के जरिए की गई थी।

सरकारी वकीलों ने आरोप लगाया कि गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने अपने चीन विरोधी ‘आंदोलन’ से जुड़े निवेशों पर भारी मुनाफे का वादा किया था। इसके बाद उसने इन पैसों में से करोड़ों डॉलर अपनी निजी विलासिता पर उड़ा दिए। उसने 50,000 वर्ग फुट का एक महल जैसा बंगला, एक फेरारी, 4.4 मिलियन डॉलर की बुगाटी स्पोर्ट्स कार, 37 मिलियन डॉलर की एक लग्जरी नाव (याट) और बेहद महँगे गद्दे खरीदे।

गुओ ने लंदन में रहने वाले अपने बिजनेस पार्टनर किम मिंग जे के साथ मिलकर हेज फंड में निवेश किया, 10 लाख डॉलर के कालीन और 1,40,000 डॉलर का पियानो खरीदने जैसी फिजूलखर्ची की।

अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ‘अफ़िनिटी फ्रॉड’ (भरोसे की धोखाधड़ी) कहा, क्योंकि गुओ ने अपनी चीन विरोधी छवि का इस्तेमाल करके अपने फॉलोअर्स के भरोसे का गलत फायदा उठाया था।

गुओ की हरकतों की जाँच से पता चला कि उसने चुराए गए करोड़ों डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग की ताकि अपनी इस अवैध साजिश को छुपा सके और धोखाधड़ी का धंधा चालू रख सके।

साल 2021 में माइल्स गुओ उर्फ हान वो क्वोक ने अवैध रूप से फंड जुटाने के एक मामले में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ 539 मिलियन डॉलर का समझौता किया था।

जुलाई 2024 में गुओ को जालसाजी की साजिश, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सिक्योरिटीज धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग समेत 12 में से 9 मामलों में दोषी ठहराया गया।

आखिरकार 29 जून 2026 को गुओ वेनगुई उर्फ हान वो क्वोक को 30 साल जेल की सजा सुनाई गई और 889 मिलियन डॉलर जब्त करने का आदेश दिया गया। फैसला सुनाते समय फेडरल जज ने कहा कि गुओ वेनगुई ने उन लोगों को अपना शिकार बनाया जो चीन में लोकतंत्र चाहते थे।

मुकदमे के दौरान भी गुओ वेनगुई खुद को पीड़ित बताता रहा और उसके बचे हुए समर्थकों का दावा है कि अमेरिकी आरोप चीनी सरकार के इशारे पर लगाए गए हैं ताकि उसकी आवाज दबाई जा सके। हालाँकि वकीलों ने गुओ के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए सबूत उसके फॉलोअर्स के साथ की गई वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं, न कि किसी मनगढ़ंत राजनीतिक आरोपों से।

गुओ वेनगुई चीन में अपने कथित घोटाले की कानूनी आँच से बचकर अमेरिका भागा, पश्चिमी मीडिया की मदद से खुद को हीरो साबित करने की कहानी रची, प्रताड़ना का रोना रोया, अपनी इस ‘हीरो’ वाली कहानी को बेचकर पैसे कमाए, लोगों का ध्यान और फॉलोअर्स खींचे, और फिर उसी मंच और फॉलोअर्स के भरोसे का इस्तेमाल एक बहुत बड़े घोटाले के लिए किया।

यह याद रखना भी दिलचस्प है कि गुओ वेनगुई ने अगस्त 2019 में भविष्यवाणी की थी कि अलीबाबा के संस्थापक जैक मा या तो जेल जाएँगे या मारे जाएँगे, क्योंकि चीनी सरकार जैक मा के ‘एएनटी ग्रुप’ (ANT Group) को ‘वापस लेना यानी हड़पना’ चाहती है।

झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़ना, विदेश में नापसंद की जाने वाली सरकार या विचारधारा पर हमला करके फॉलोअर्स जुटाना, लोगों को ठगना और जब जवाबदेही की बारी आए तो किसी तानाशाह या फासीवादी शासन द्वारा ‘राजनीति से प्रेरित प्रताड़ना’ का रोना रोना—गुओ वेनगुई का यह मामला वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब की याद दिलाता है।

राणा अय्यूब: भारत की गुओ वेनगुई?

राणा अय्यूब को 2016 में खुद से प्रकाशित की गई किताब ‘गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर-अप’ से काफी चर्चा मिली थी। उनका दावा था कि यह किताब 2010 में गुजरात के अधिकारियों की की गई अंडरकवर रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों के बाद मामलों को दबाने और एनकाउंटर की बात ‘कबूल’ की थी।

अय्यूब की तत्कालीन कंपनी ‘तहलका’ ने कहानी अधूरी होने और अन्य संपादकीय कमियों का हवाला देते हुए इसे छापने से मना कर दिया था। हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहान ने खुलासा किया था कि उन्होंने तहलका के मंच पर इन टेपों को चलाने का ऑफर दिया था, लेकिन राणा अय्यूब ने मना कर दिया था।

इस पत्रकार ने दंगों के इर्द-गिर्द अपनी पक्षपातपूर्ण और बेतुकी पत्रकारिता के जरिए खुद को ‘हिंदुत्ववादियों के अत्याचार के खिलाफ एक निडर आवाज’ के रूप में स्थापित कर लिया।

नरेंद्र मोदी के खिलाफ लंबे समय से एजेंडा चला रहीं राणा अय्यूब को तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों पर लिखी उनकी इस तथाकथित ‘खोजी’ किताब को कूड़ेदान में डाल दिया।

अय्यूब की किताब में एक इशारा यह भी था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की साजिश रची थी, जिनकी 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

निचली अदालत ने हरेन पंड्या की हत्या में मुख्य आरोपी असगर अली समेत 12 मुस्लिम पुरुषों को दोषी पाया था। सीबीआई जाँच के मुताबिक, यह हत्या गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए मुफ्ती सूफियान नाम के एक मुस्लिम मौलवी के इशारे पर की गई थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने सीबीआई की ‘खराब जाँच’ का हवाला देते हुए इन लोगों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आपराधिक साजिश और हत्या के प्रयास के आरोप बरकरार रखे थे।

सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने आखिरकार निचली अदालत के मूल फैसले को सही ठहराया।

अय्यूब के ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (मुसलमानों को पीड़ित दिखाने) के एजेंडे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही में राणा अय्यूब की किताब ‘गुजरात फाइल्स’ पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस किताब को फटकारते हुए कहा कि यह सिर्फ अनुमानों, अटकलों और कयासों पर आधारित है।

असल में राणा अय्यूब की किताब के दावे इतने संदिग्ध हैं कि धुर-वामपंथी (लेफ्ट विंग) पब्लिकेशंस ने भी इसे छापने से मना कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार अय्यूब को इसे खुद ही पब्लिश करना पड़ा। यह किताब एक कथित स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इसके वीडियो जारी नहीं किए।

अपनी इस तथाकथित प्रसिद्धि के बाद से, राणा अय्यूब लगातार विदेशी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्प्रचार में लगी रही हैं। सीएए विरोधी शाहीन बाग प्रदर्शन, 2020 के दिल्ली दंगे, कोविड महामारी के दौरान सरकार विरोधी दुष्प्रचार, हर मुद्दे में मुस्लिम उत्पीड़न का एंगल घुसाना, ‘भारतीय सेना कश्मीरी लड़कों को प्रताड़ित कर रही है’ जैसे झूठ फैलाना, 2015 में रानाघाट में एक नन के साथ हुए बलात्कार के लिए आरएसएस और ‘हिंदू आतंकवादियों’ को जिम्मेदार ठहराना राणा अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ हमेशा एजेंडा और भाजपा-आरएसएस के विरोध पर टिकी रही है।

उनके इस दुष्प्रचार ने उन्हें वामपंथी और कुछ खास विचारधारा वाले हलकों में लोकप्रिय बना दिया। लेकिन जो बात राणा अय्यूब को गुओ वेनगुई के जैसा बनाती है, वह है कोविड के नाम पर चंदा जुटाने का कथित घोटाला, जिसे अंजाम देने का उन पर आरोप है।

जब भारत कोविड महामारी से जूझ रहा था, तब राणा अय्यूब ने ‘केटो’ (Ketto) प्लेटफॉर्म पर 3 क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए 2,69,50,695 रूपए की भारी-भरकम रकम जुटाई थी।

राणा को मिले हुए 2.69 करोड़ रूपए में से लगभग 80,49,856 रूपए विदेशी मुद्रा में प्राप्त हुए थे, जो फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) 2010 का सीधा उल्लंघन था।

राणा अय्यूब ने कोविड राहत कार्य के लिए मिलने वाले इस चंदे को अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख के बैंक खाते में 1.60 रूपए करोड़ और अपनी बहन इफ्फत शेख के खाते में 37.15 लाख रूपए ट्रांसफर करवाए।

इसके बाद राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से 84.40 लाख रूपए और अपनी बहन के खाते से 36.40 रूपए लाख अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए। कुल मिलाकर करीब 1,20,80,000 रूपए राणा अय्यूब के निजी खाते में भेजे गए।

हैरानी की बात यह है कि अप्रैल 2022 में उन्होंने इतनी बड़ी रकम के हेरफेर को ‘महज 20,000 डॉलर की छोटी सी रकम’ कहकर टालने की कोशिश की, जबकि असल में यह रकम 2.69 करोड़ रूपए (लगभग $3,14,500) थी।

जुलाई 2025 के अपने आदेश में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने साफ कहा कि चंदे के तौर पर जुटाए गए पैसों में से करीब 2.4 करोड़ रूपए का अभियान के एक साल बाद भी कोई इस्तेमाल नहीं किया गया था।

अदालत ने कहा, “जिस खाते से करदाता या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा पैसे निकाले गए, वह एक पर्सनल सेविंग अकाउंट (निजी बचत खाता) था। इसके अलावा, कोई राहत कार्य करने के बजाय, करदाता ने एक नया करंट अकाउंट खोला और अपने नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर लिया और उसी सेविंग अकाउंट से अपने निजी खर्चे भी किए जिसमें चंदे का पैसा आया था।”

अय्यूब ने आयकर विभाग के सामने दावा किया था कि 2.69 करोड़ रूपए में से एक ‘छोटा हिस्सा (28 लाख रूपए)’ प्रवासी मजदूरों को घर भेजने, राशन खरीदने, इलाज, परिवहन और पश्चिम बंगाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किया गया था।

उन्होंने 19 लाख रूपए अपने ‘निजी खर्चों’ को पूरा करने में उड़ा दिए। यह भी सामने आया कि इस विवादित ‘पत्रकार’ ने कोविड राहत कार्य के लिए मिले पैसों में से 50 लाख रूपए की अपने नाम पर पर्सनल फिक्स डिपॉजिट (FD) करवा ली थी।

आयकर विभाग ने सवाल उठाया कि अगर अय्यूब की कोई गलत नीयत नहीं थी, तो उन्होंने अपने निजी नाम पर 50,00,000 रूपए की एफडी रसीदें क्यों खरीदीं?

जाँच में पता चला कि केटो पर पहले अभियान के जरिए राणा अय्यूब को मिले 1.23 करोड़ रूपए में से राहत कार्य के लिए सिर्फ 18 लाख रूपए का इस्तेमाल किया गया था। अपने बचाव में अय्यूब ने दावा किया कि बचे हुए पैसे ‘अस्पताल बनाने के लिए रिजर्व’ रखे गए थे।

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि राणा अय्यूब ने एफसीआरए (FCRA) 2010 का उल्लंघन किया है, क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट की यह ‘पत्रकार’ एफसीआरए की धारा 3(1)(h) के तहत विदेशी चंदा पाने की हकदार ही नहीं है।

अय्यूब ने समर्थकों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों से कोविड राहत के नाम पर चैरिटी के लिए पैसे जुटाए, लेकिन चैरिटी के लिए इन पैसों के इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं मिला। इस विवादित ‘पत्रकार’ ने दान का पैसा अपने रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराया और कथित सामाजिक कार्यों के लिए कोई अलग खाता तक नहीं रखा।

इससे पहले, फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अय्यूब की 1.77 करोड़ रूपए की संपत्ति कुर्क की थी। वह जाहिर तौर पर अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करती हैं और इसे अपनी आवाज दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित उत्पीड़न बताती हैं।

चूंकि राणा अय्यूब की पत्रकारिता के नाम पर किए जाने वाले इस एक्टिविज्म और चंदे की धोखाधड़ी के आरोपों के कारण पश्चिमी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स ने भी उनसे दूरी बना ली, फिर भी उन्हें विदेशी वामपंथी और कुछ राजनीतिक हलकों में नियोक्ता और समर्थक मिल गए, जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के विरोधी हैं।

अयोध्या राममन्दिर चढ़ावा : चोरों के घर बाबा के बुलडोज़र तैयार : 20000 रूपए की नौकरी, राम मंदिर में चोरी… लवकुश ने चंदे के पैसों से खड़ा कर दिया 1.5 करोड़ रूपए का आलीशान महल

     मंदिर से चंदा चोरी करके लवकुश ने बनाया करोड़ों का महल, अब चलेगा बुलडोजर (फोटो साभार : X_@Bhupend29375158)
प्रभु श्रीराम के चढ़ावे की चोरी करने वालों को यह सोंचना था कि उत्तर प्रदेश में अब मुलायम सिंह/अखिलेश यादव की नहीं योगी आदित्यनाथ की सरकार है। जहां अपराध भी जितनी मुस्तैदी से होता है उसी मुस्तैदी से योगी का बुलडोज़र भी हरकत में आने को तड़पने लगते हैं। चोर खेल तो खेल गए लेकिन प्रभु श्रीराम के प्रकोप से नहीं बच सकते। प्रभु ने सैकड़ों वर्ष संघर्ष किया। अब उनको भव्य स्थान मिलने पर जो चढ़ावा आया उसमे चोरी। कोई चोर और इनके आका किसी भूल में नहीं रहे। प्रभु जब अपने आशीर्वाद से देते हैं तो झोलियां छोटी पड़ जाती हैं, लेकिन छल से उनके भंडारे को लूटने वालों(किसी बीमारी, बेटी की शादी या फिर किसी असहाय स्थित आदि में कोई सहायता नहीं मिलने पर स्थिति ठीक होने पर वापस करने की शर्त पर क्षमा) को क्षमा नहीं दंड देते हैं। 

चोरों को 80 के दशक में संजीव कुमार की बहुचर्चित फिल्म "यही है जिन्दगी" में घर के मन्दिर से शर्त के साथ चोरी करने पर प्रभु किस रूप में वापस लेते हैं प्राणी को पता तक नहीं होता। दूसरे, आज सनातन विरोधियों की क्या हालत हो रही है, उसे देख कर भी अगर किसी की आंखें नहीं खुलती उस हालत में कोई कुछ नहीं कर सकता।       

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोपित लवकुश मिश्रा पर अब प्रशासन का बड़ा हंटर चलने वाला है। लवकुश मिश्रा की पत्नी के नाम पर बन रहे एक करोड़ से ज्यादा के आलीशान मकान को अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी ने ढहाने को नोटिस थमा दिया है।

परिवार के पास जवाब देने के लिए सिर्फ एक हफ्ते का समय मिला है, वरना मकान पर सीधे बुलडोजर चला दिया जाएगा। राम मंदिर में हुए इस महा-घोटाले के बाद राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अंदर भी आपसी लड़ाई शुरू हो गई है। ट्रस्ट के ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास महाराज ने खुलकर इस पर नाराजगी जताई है।

महंत दिनेंद्र ने इसके लिए सीधे तौर पर ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी गोपाल राव को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया कि गोपाल राव राम परंपरा को नहीं मानते हैं और उन्हीं की लापरवाही के कारण इतनी बड़ी चोरी हुई।

20 हजार की नौकरी और डेढ़ करोड़ का निवेश

चोरी के आरोपित लवकुश मिश्रा की असलियत देखकर हर कोई हैरान है। वह महज 20 हजार रुपए की नौकरी करता था। लेकिन उसने अयोध्या के शहादतगंज इलाके में जयपुरिया स्कूल के पास करीब डेढ़ करोड़ रुपए का निवेश कर डाला। उसने अक्टूबर 2025 में अपनी पत्नी सुप्रिया मिश्रा के नाम पर 25 लाख रुपए की जमीन खरीदी थी। इसके बाद उसने वहाँ बड़ी तेजी से आलीशान मकान बनवाना शुरू कर दिया।

पड़ोसियों के मुताबिक लवकुश इस मकान को बनाने में अब तक 80 से 90 लाख रुपए पानी की तरह बहा चुका है। यह तीन मंजिला मकान अगले 3-4 महीनों में बनकर तैयार होने वाला था। इस मकान के पहले फ्लोर पर एक बड़ा किचन, चार कमरे और बकायदा लिफ्ट लगाने की जगह छोड़ी गई थी। दूसरे फ्लोर पर पाँच कमरे बनाए जा रहे थे और तीसरे फ्लोर को भी खड़ा करने की पूरी तैयारी थी।

पुलिस रेड के बाद से पूरा परिवार फरार

राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का खुलासा होने के बाद पुलिस ने लवकुश के घर पर छापेमारी की थी। पुलिस ने वहाँ से 14 लाख 25 हजार रुपए कैश बरामद किए थे। लवकुश की गिरफ्तारी होते ही उसका पूरा परिवार घर पर ताला लगाकर फरार हो गया है। फिलहाल वहाँ चल रहा निर्माण कार्य पूरी तरह से बंद है और प्रशासन अब उसकी पूरी संपत्ति की कुंडली खंगाल रहा है।

पाकिस्तान के दलालों कहां हो? दिल्ली को फिर दहलाने की साजिश को पुलिस ने किया नाकाम, ISI के 4 आतंकी गिरफ्तार: पाकिस्तान भेजे थानों-मंदिरों के Video, भीड़भाड़ वाले इलाके में अंधाधुंध फायरिंग का था प्लान

                          दिल्ली पुलिस ने ISI के चार आतंकी गिरफ्तार किए (फोटो साभार : News18)
एक तरफ भारत में पल रहे पाकिस्तानी दलाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख अपने आका पाकिस्तान से बातचीत और व्यापार शुरू करने की वकालत कर रहे हैं ताकि उनके गुर्गे फिर से भारत में खून-खराबा कर अशांति फ़ैलाने में कामयाब हो सके और पकडे जाने पर victim card खेल आतंकिस्तान यानि पाकिस्तान को बेकसूर बताने की कहानियां गढ़ने लगे। पाकिस्तान के दलालों देखो दिल्ली पुलिस ने तुम्हारे आका के मंसूबों पर पानी फेर दिया। अब मुस्लिम की बजाए हिन्दुओं को फंसा खुनी खेल खेलने की तैयारी चल रही है।    

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक बड़े ऑपरेशन में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI समर्थित आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने दिल्ली और पंजाब से चार खतरनाक आतंकियों को गिरफ्तार किया है। इनके नाम साजन उर्फ हनी, गगनप्रीत, रिषी, शुभदीप है।

ये चारों आतंकी पाकिस्तान में बैठे हैंडलर शाहजाद भट्टी के इशारे पर राजधानी को दहलाने की साजिश रह रहे थे। पुलिस ने इनके पास से तुर्की की मशहूर जिगाना पिस्टल समेत विदेशी हथियार और कारतूस बरामद किए हैं।

जाँच में सामने आया है कि पकड़े गए आतंकियों में से गगनप्रीत को बेहद खतरनाक काम सौंपा गया था। वह दिल्ली के पुलिस थानों, चौकियों और प्रमुख धार्मिक स्थलों की रेकी कर रहा था। उसने इन जगहों के Video बनाकर पाकिस्तान भी भेजे थे।

उसे दिल्ली में किसी भीड़भाड़ वाली जगह पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दहशत फैलाने का टास्क मिला था। इस नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए पुलिस ने पंजाब के अमृतसर और दिल्ली में ताबड़तोड़ छापेमारी की थी।

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117 भारतीय और पाकिस्तानी हस्तियों ने मोदी-शहबाज को पत्र लिखने वाले गद्दारों को बीजेपी का जवाब - आत

सबसे पहले शुभदीप सिंह को पकड़ा गया, जो ड्रोन से आने वाले हथियारों की खेप लेता था। उसकी निशानदेही पर गुरजंत सिंह, और गगनप्रीत को दबोचा गया। पुलिस अब इनके बाकी मददगारों की तलाश कर रही है।

117 भारतीय और पाकिस्तानी हस्तियों ने मोदी-शहबाज को पत्र लिखने वाले गद्दारों को बीजेपी का जवाब - आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते


भारत में पल रहे पकिस्तानपरस्तों की लगता है कि उनकी आत्मा मर चुकी है। 2014 चुनाव से पहले आतंकवाद ने भारत में कितना खून-खराबा किया भूल गए। ये पाकिस्तानपरस्त भूल गए कि 2014 चुनाव से पहले सरकारें आतंकवादियों का महिमामंथन कर हिन्दू आतंकवाद और भगवा आतंकवाद का शोर मचाकर हिन्दुओं को बदनाम किया जाता था। बेगुनाह साधु/संत और साध्वी को आतंकवाद के झूठे आरोप में गिरफ्तार कर जेलों में अमानवीय व्यवहार किसी जाता था। अगर वही व्यवहार आतंकियों के साथ किया होता इन पाकिस्तानपरस्तों ने सड़क से संसद तक आसमान सिर पर उठा लिया होता। जिस ATS करकरे की मौत होने पर साध्वी प्रज्ञा द्वारा ख़ुशी जाहिर करने पर विपक्ष चुनाव आयोग तक पहुँच गया। इन बेगैरतों ने स्वामी असीमानन्द, साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित पर कितने अत्याचार किए थे उस पीड़ा को समझने की कोशिश की? दूसरे, ये बेशर्म पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों पर क्यों नहीं बोले? क्या इन लोगों के घर मातम मच जाता है कि मातम में डूबे होने की वजह से मुंह नहीं खुलता? बटवारे के बाद पाकिस्तान में कितने प्रतिशत हिन्दू थे आज कितने ये बेशर्म जवाब देंगे? आखिर ये दोगलापन क्यों?

भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच दोनों देशों की 117 प्रमुख हस्तियों ने एक संयुक्त पहल करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को खुला पत्र लिखा है। पत्र में दोनों देशों से टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने और आपसी रिश्तों को फिर से सामान्य बनाने की अपील की गई है। इस पत्र पर भारत की 61 और पाकिस्तान की 56 प्रमुख हस्तियों के हस्ताक्षर हैं। भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, आरजेडी सांसद मनोज झा सहित कई पूर्व अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक हस्तियां शामिल हैं। वहीं पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी समेत कई प्रमुख लोगों ने इस पहल का समर्थन किया है।

पत्र में कहा गया है कि लगातार बढ़ती शत्रुता से दोनों देशों के विकास, क्षेत्रीय स्थिरता और आम नागरिकों के हित प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए भारत और पाकिस्तान को संवाद का रास्ता अपनाकर दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग का माहौल बनाना चाहिए।हस्तियों ने दोनों सरकारों के सामने 11 प्रमुख मांगें रखी हैं, जिनमें—

  • भारत-पाकिस्तान के बीच आधिकारिक वार्ता दोबारा शुरू हो।
  • जम्मू-कश्मीर समेत सभी विवादित मुद्दों पर बातचीत हो।
  • सीमा पर सैन्य तनाव कम किया जाए।
  • दोनों देशों के नागरिकों के बीच संपर्क बढ़ाया जाए।
  • सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान फिर शुरू किया जाए।
  • क्रिकेट और अन्य खेलों की द्विपक्षीय सीरीज बहाल की जाए।
  • सीधी हवाई सेवाएं दोबारा शुरू हों।
  • वीजा प्रक्रिया आसान बनाई जाए।
  • दोनों देशों में हाई कमिश्नर की नियुक्ति फिर से हो।
  • बस सेवाएं, करतारपुर कॉरिडोर और अटारी-वाघा बॉर्डर पर सामान्य आवाजाही बहाल की जाए।
  • दोनों देशों के बीच व्यापार दोबारा शुरू किया जाए।
भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले कई वर्षों से द्विपक्षीय वार्ता लगभग ठप है। 2016 के पठानकोट आतंकी हमले के बाद औपचारिक बातचीत बंद हो गई थी। वहीं 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और तनाव बढ़ गया। हाल के वर्षों में आतंकवादी घटनाओं और सीमा पर तनाव के चलते व्यापार, वीजा, हवाई सेवाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रभावित रहे हैं।इस पत्र पर जम्मू-कश्मीर बीजेपी नेता रविंदर रैना ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत हमेशा अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध चाहता है, लेकिन “आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।”उन्होंने कहा कि अतीत में भी भारत ने कई बार शांति की पहल की, लेकिन उसके बाद कारगिल युद्ध और आतंकी हमलों जैसी घटनाएं हुईं। रैना ने सवाल उठाया कि जो लोग वार्ता की मांग कर रहे हैं, क्या वे इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि भविष्य में पाकिस्तान की ओर से कोई आतंकी कार्रवाई नहीं होगी।अब यह देखना होगा कि 117 हस्तियों की इस संयुक्त अपील पर दोनों देशों की सरकारें कोई सकारात्मक पहल करती हैं या भारत-पाकिस्तान के रिश्ते फिलहाल पहले की तरह ही तनावपूर्ण बने रहते हैं।

पाकिस्तान को पता है, भारत में उसके दलाल बैठे हैं, जो उसके लिए मोदी से भिड़े रहेंगे; इसलिए युद्ध की धमकी देता है पाकिस्तान

सुभाष चन्द्र

पाकिस्तान की ताकत उसके परमाणु नहीं बल्कि भारत में पल रहे उसके जासूस हैं। क्या भारत में पल रहे गद्दार भारत को दोबारा आतंकियों के बारूद के ढेर पर बैठाना चाहते हैं? क्या फिर से सडकों को बेगुनाहों के खून से लाल करना चाहते हैं? हर देशप्रेमी-चाहे वह किसी भी जाति या मजहब से हो- यह नहीं भूलना चाहिए भारतीय विपक्ष जितना कमजोर होगा उससे ज्यादा पाकिस्तान कमजोर होगा। मोदी सरकार से जनता जानना चाहती है कि इन गद्दारों को कब जेलों में भरेगी और जनता को भी चुनावों में इन पाकिस्तान प्रेमियों को चारों खाने चित करना चाहिए?  यही जनता इन गद्दारों को सुरमा भोपाली बनाये हुए है।    

आज फिर कांग्रेस के बुझे हुए दीये मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने चाहिए, कांग्रेस को सत्ता में ले आओ तो रिश्ते सुधर सकते है। फारूक अब्दुल्ला डर दिखा कर कहता था कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं, उससे डरना चाहिए और महबूबा भी कम पाकिस्तानी नहीं है। राहुल गांधी तो पाकिस्तान से हर टकराव में भारत की जीत के सबूत मांगता रहता है चाहे वो सर्जिकल स्ट्राइक हो, एयर स्ट्राइक हो या ऑपरेशन सिंदूर हो। राहुल गांधी हर चीज़ के सेना से सबूत मांगने वालों का लीडर बन जाता है। वो Leader of Opposition नहीं Leader of Opposition for Bharat बन चुका है। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
राहुल गांधी को पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा दर्द तो मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी करके दिया था जिससे पाकिस्तान की कमर टूट गई क्योंकि भारत के जाली नोटों से ही उसकी इकॉनमी चलती थी और इसलिए राहुल गांधी ने कहा था कि नोटबंदी ने हजारों लोगों को बेरोजगार कर दिया (जो पाकिस्तान में हुए)। याद करो, नोटबंदी के दौरान कार्टन भर-भरकर जाली नोट कब्रिस्तानों और नदियों में फेंका गया था।    

अमेरिकी एजेंसियां, यूरोप के कुछ देश और राहुल गांधी की मित्र इल्हान ओमर भारत में मुसलमानों पर होने वाले कथित अत्याचारों के लिए भौंकते रहते हैं। एक और है भारत में अरफ़ा खानुम जो मोदी से ऐसे जली भुनी रहती है जैसे होलिका की तरह उसका दहन हो रहा हो। वह भी पाकिस्तान के गुणगान करने और मोदी को गाली देने में आगे रहती है। 

पहले हाफिज सईद जैसे आतंकी भी कहते थे कि कांग्रेस और बरखा दत्त जैसे लोग भारत में हैं जो पाकिस्तान को चाहते हैं

पाकिस्तान को पता है ये सब उसके दल्ले हैं और जरूरत पड़ने पर ये सब पाकिस्तान के लिए भारत में दंगे भी करा सकते हैं। मोदी जी ने (उनकी सरकार ने) सिंधु जल समझौते को पहलगाम में पाकिस्तानी हमले के बाद रद्द कर दिया और पाकिस्तान पानी के तरस गया। चिट्ठियां पर चिट्ठियां भेज रहा है और गिड़गिड़ा भी रहा है कि हमें पानी दे दो लेकिन साथ ही उसके नेता युद्ध की धमकी भी दे रहे हैं। याद रहे मनमोहन सिंह सरकार आतंकी हमलों के डोजियर पर डोजियर भेजती थी और पाकिस्तान पानी के लिए चिट्ठियां भेज रहा है 

कुछ दिन पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने धमकी दी थी कि अगर हमारी पानी की जरूरतें पूरी नहीं हुई तो हम भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ सकते हैं

   

पाकिस्तान के “पप्पू” बिलावल भुट्टो ने सिंधु जल समझौते को लेकर भारत को चेतावनी दी है और उसने कहा कि “India was using the river as a "weapon", but  it was Pakistan's "life line" and the people living by these rivers wanted "peace by dignity" and not "submission".

पाकिस्तान का सबसे बड़ा दलाल नेहरू था जिसने 19 सितंबर, 1960 को पकिस्तान में जाकर अय्यूब खान के साथ यह सिंधु जल समझौता किया और 80% पानी पाकिस्तान को दे दिया। सबसे मजेदार बात यह है कि नेहरू ऐसा तानाशाह था कि ऐसा समझौता करने के लिए उसने संसद में पहले मंजूरी नहीं ली और समझौते करने के बाद भी संसद को कोई सूचना नहीं दी। जब संसद में यह मुद्दा उठा तो नेहरू ने कहा था एक प्रधानमंत्री की हैसियत से क्या मुझे कोई अधिकार नहीं हैं और क्या छोटी मोटी बातों को संसद mein बताना जरूरी है

लेकिन अब समय ने करवट ली जो नेहरू की जगह मोदी आकर बैठ गया और उसने नेहरू की गलती को सुधारा, पाकिस्तान और उसके दलाल अब सोच समझ कर बोलें क्योंकि पाकिस्तान को उसके कर्मो की सजा देना ही मोदी का लक्ष्य है 

उत्तर प्रदेश : सपा के सचेतक कमाल अख्तर ने पहले किया MP रुचि वीरा को बेईज्जत, अब दिया पद से इस्तीफा: कुछ दिन पहले विशंभर यादव ने MP कृष्णा पटेल को सिखाई थी ‘तमीज’, क्या फँस रहे अखिलेश?

                 अखिलेश यादव के आगे हाथ जोड़ खड़े होने वाले कुँवर रेवती रमण सिंह स्टूल पर पैर फैलाये बैठे 
उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने जो जख्म दिए है योगी ने तो उसका पासंग भी वसूल नहीं किया। पंचायत से लेकर लोक सभा और राज्य सभा में अधिकतर सदस्य मुलायम सिंह परिवार से हैं। इस पार्टी ने अपने परिवार के अलावा किसी का भला नहीं किया। हिन्दू त्यौहारों पर इतनी पाबंदियां थी कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के निकट रहने वाले हिन्दू खुलकर अपना त्यौहार नहीं मना सकते थे, लेकिन आज खुलकर मनाते हैं।  

उत्तर प्रदेश में सियासत नितरोज हिचकोले ले रही है जिसे समझना बहुत मुश्किल हो रहा है। इधर अखिलेश यादव राममन्दिर चढ़ावे की चोरी को लेकर योगी आदित्यनाथ और बीजेपी को घेर रहे हैं तो उधर इनकी ही समाजवादी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रभु श्रीराम की अगर यही लीला रही 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव में अखिलेश की नैया डूबने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। सूत्रों के हवाले से इस चुनाव में MY(मुस्लिम-यादव) भी नाकाम हो रहा है। जिस तरह 2017 से मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने सनातन पर कीजड़ फेंके जाने अन्य हिन्दुओं के अलावा यादव समाज भी समाजवादी पार्टी से नाराज है। दूसरे, योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि "अखिलेश यादव मथुरा मन्दिर पर खुलकर बोलकर दिखाएं।"         

कुँवर रेवती रमण सिंह ने अखिलेश यादव को उनकी औक़ात दिखा दी है। किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा होगा।
'व्हाइट हाउस' में रहने वाले सामंतवादी अखिलेश यादव जब उनसे मिलने प्रयागराज पहुँचे तो रेवती रमण सिंह ने एक स्टूल मँगाया। उस स्टूल को अखिलेश यादव के सामने रखा गया। फिर कुँवर साहब ने उसी पर पाँव रखा।
इसके पीछे भी कारण है। अब चुनाव है तो अखिलेश यादव उनके दरवाजे पर हाजिरी लगा रहे हैं।
ये वही अखिलेश यादव हैं जिन्होंने 2024 में कुँवर साहब की जगह राम मंदिर के विरोध में केस लड़ने वाले कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजा था।
इसके बाद सिंह परिवार ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी, जबकि कुँवर रेवती रमण सिंह सपा के सह-संस्थापक रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को पहली बार औक़ात तब दिखाई जब उन्होंने अपने बेटे को न केवल कांग्रेस का टिकट दिलवाया बल्कि प्रयागराज लोकसभा क्षेत्र से जिता भी दिया। 42 साल बाद इस सीट पर कांग्रेस जीती।
अखिलेश यादव को याद रखना चाहिए कि जब उनके पिता मुलायम सिंह यादव की कोई औक़ात नहीं हुआ करती थी, तब कुँवर साहब संयुक्त उत्तर प्रदेश में नेता-प्रतिपक्ष हुआ करते थे। 'जनता दल' के स्तम्भ थे। स्वयं 8 बार विधायक, 2 बार लोकसभा सांसद रहे। मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता को हराया। राज्यसभा सांसद बने। बेटे को भी विधायक, मंत्री और सांसद बनाया।
अखिलेश यादव को इस बेइज़्ज़ती के बाद अब याद करना चाहिए कि कैसे 2 वर्ष पूर्व जब कुँवर रेवती रमण सिंह लखनऊ में अस्पताल में भर्ती थे तब यही अखिलेश यादव उनका हालचाल तक लेने नहीं गए थे। प्रयागराज गए तो उनसे मिले नहीं।

अब चिड़िया चुग गई खेत तो...

समाजवादी पार्टी के अंदरखाने बीते एक हफ्ते में प्रदेश के अलग-अलग जिलों में समाजवादी पार्टी के नेता कभी मुखिया अखिलेश यादव के सामने अनाप-शनाप बातें तो कभी उनके खिलाफ नारेबाजी करते दिख रहे हैं। पार्टी में MY समीकरण हावी हो रहा है। इसके 2 हालिया उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें सपा की महिला सांसदों को यादव-मुस्लिम नेताओं के हाथों सार्वजनिक रूप से बेईज्जत होना पड़ा।

पिछले हफ्ते पीडीए की बैठक में मुरादाबाद से सांसद रुचि वीरा को न बुलाने और कार्यक्रम में पोस्टर और बैनर से उनका फोटो हटाने का विवाद गरमाया। इसके बाद लखनऊ में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बैठक बुलाई जिसमें मुरादाबाद के 5 बड़े नेताओं को शामिल किया गया।

बैठक में शामिल राज्यसभा सांसद जावेद अली, पूर्व मंत्री और विधायक कमाल अख्तर, जिला अध्यक्ष जयवीर यादव और पूर्व विधायक युसूफ अंसारी के सामने सांसद रुचि वीरा ने अपनी शिकायत रखी और इसके पीछे कमाल अख्तर की भूमिका की बात भी कह डाली।

हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैठक में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ही रुचि वीरा और कमाल अख्तर के बीच तीखी बहस हुई। इसके बाद रुचि वीरा ने कमाल अख्तर पर कार्रवाई की माँग कर डाली।

हालाँकि इसके बाद मंगलवार (30 जून 2026) को कमाल अख्तर ने अपने मुख्य सचेतक के पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे ने एक बार फिर यह जता दिया कि रुचि वीरा के साथ हुए उनके विवाद केवल बहस नहीं थी, बल्कि यह मामला अब संगठनात्मक स्तर तक पहुँच चुका है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के बांदा में समाजवादी पार्टी की बैठक हुई, जिसमें सांसद कृष्णा देवी और विधायक विशंभर यादव के बीच विवाद हो गया। इस दौरान विधायक ने सांसद कृष्णा देवी को उंगली दिखाते हुए तमीज से बात करने का ज्ञान दे डाला। लगभग आधे घंटे तक चली इस गहमागहमी दौरान सपा कार्यकर्ता दोनों को शांत करने की जद्दोजहद में लग रहे।

बांदा वाला मामला अब तक ठंडा नहीं हुआ था कि तीसरा मामला प्रयागराज से आ गया। जहाँ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पहुँचने पर अंजान आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाये और ‘गो बैक’ के नारे लगाए।

इसके बाद सपा के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने गुंडई दिखानी शुरू कर दी और काला झंडा दिखा रहे अंजान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आशीष दुबे और भदोही के जिला अध्यक्ष की जमकर पिटाई कर दी। पुलिस के पहुँचने पर मामला शांत हुआ।

यह सभी घटनाएँ समाजवादी पार्टी के अंदर चल रही उठापटक को जनता के सामने लेकर आ रही हैं। रुचि वीरा और सांसद कृष्णा देवी के साथ चल रहे विवाद समाजवादी पार्टी के लिहाज से इस बात को जनता के सामने लेकर आ रहे हैं कि सपा में महिला जनप्रतिनिधि की भूमिका कुछ खास बेहतर स्थिति में नहीं है।

छोटे से वानुअतू ने तोड़ा ‘ड्रैगन’ का गुरूर, कहा- अपनी जमीन का नहीं करने देंगे सैन्य इस्तेमाल: ऑस्ट्रेलिया के साथ की खास डील, बौखलाया चीन


ऑस्ट्रेलिया और वानुअतू ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसे नाकामल समझौता कहा जा रहा है। समझौते को चीन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि अब वानुअतू अपनी जमीन को चीनी मिलिट्री बेस के लिए इस्तेमाल करने नहीं देगा।

वानुअतू के एयरपोर्ट और पावर ग्रिड जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को किसी भी विदेशी सैन्य हस्तक्षेप या अनधिकृत पहुँच से मुक्त रखा जाएगा। चीन अक्सर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के बहाने छोटे देशों में अपनी दखलअंदाजी बढ़ाने में लगा हुआ है। वह प्रशांत महासागर के छोटे-छोटे द्वीप देशों में अपना नौसैनिक ठिकाना बनाने की कोशिश कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया में वानुअतू के प्रधानमंत्री जोथम नापत के साथ ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री अल्बानीज ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बानीज ने कहा, “यह समझौता ऑस्ट्रेलिया को यह आश्वासन देता है कि वानुअतू में कोई भी विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित नहीं किया जाएगा।”

प्रधानमंत्री अल्बानीज ने कहा कि दोनों पक्ष सामूहिक सुरक्षा, प्रत्येक राष्ट्र की सुरक्षा के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया और वानुअतू दोनों की संप्रभुता की रक्षा के उद्देश्य से ‘संतुलित समझौते’ पर पहुँचे हैं।

ऑस्ट्रेलिया लगातार इस बात पर चिंता जताता रहा है कि चीन दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में दीर्घकालिक मौजूदगी को बनाए रखने के लिए मिलिट्री बेस बनाने में लगा हुआ है। चीनी नौसेना ने भी बार-बार वानुअतू के बंदरगाहों पर जहाज भेजे हैं।

वानुअतू के प्रधानमंत्री ने कहा कि यह समझौता बुनियादी ढाँचे के सैन्यीकरण को रोकने के लिए देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा, “एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में, हमने संसद में एक कानून पारित किया है। इसके तहत किसी भी महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

एएफपी के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य ‘सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना और प्रशांत द्वीपीय देशों की संप्रभुता की रक्षा करना’ है

नए समझौते के तहत, ऑस्ट्रेलिया और वानुअतू पुलिस प्रशिक्षण और उपकरण, कानून प्रवर्तन, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और बुनियादी ढाँचागत विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करेंगे।

पाकिस्तान में छिपे ISIS आतंकियों को अफगान फोर्स ने चुन-चुनकर मारा, कई जगह बम बरसाकर ठिकाने किए तबाह


आतंकवादियों का अड्डा बना पाकिस्तान आखिर कब तक आतंकवाद को पालता रहेगा? वैसे इसका कारण भी है कि इन्ही आतंकियों के लालन-पालन के नाम पर पाकिस्तान हाथ में कटोरा लिए घूमता रहता है। और आतंकवाद को गुप्त समर्थन देने वाले भीख देते रहते हैं। ओसामा बिन लादेन को घर में छिपाए रखने के बावजूद उसे ढूंढने के नाम पर अमेरिका से माल खींचता रहा, आखिर में मिला पाकिस्तान में ही और अमेरिका ने 72 हूरों के पहुंचा दिया।    

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव की वजह से हालात तनावपूर्ण हैं। अफगान वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर ISIS के ठिकानों पर हमला किया है। उन्होंने कहा है कि ‘हम हर खतरे को निशाना बनाएंगे’।

अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने दावा किया है कि पाकिस्तान में मौजूद आईएसआईएस के ठिकानों से अफगानिस्तान में हमले की साजिश रची जा रही थी। अफगानिस्तान का ये हमला पाकिस्तानी हवाई हमले के दो दिन बाद किया गया है।

तालिबान का कहना है कि ये कार्रवाई बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में की गई है। तालिबानी हवाई हमले में खैबर पख्तूनख्वा के एक स्कूल को टारगेट किया गया क्योंकि यहाँ आईएसआईएस-के आतंकियों के छिपे होने की बात कही जा रही थी। अफगानिस्तान का दावा है कि इस हमले में कई आतंकी ढेर हुए हैं, लेकिन नागरिकों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है।

अफगानिस्तानी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि बलूचिस्तान के पिशिन जिला स्थित सरनान इलाके में आईएसआईएस के ज्वाइंटर सेंटर को इस एयरस्ट्राइक के दौरान तबाह कर दिया गया है। इतना ही नहीं, अफगान फाइटर जेट्स् ने पाकिस्तान में चित्राल की शाह सलीम घाटी में मौजूद आईएसआईएस ठिकानों को बम से उड़ा दिया है। इससे आतंकियों को काफी नुकसान हुआ है।

पाकिस्तान ने अभी तक इस हमले को लेकर बयान जारी नहीं किया है। इससे पहले पाकिस्तान ने 29 जून 2026 को अफगानिस्तान पर एयरस्ट्राइक किया था, जिसमें 36 नागरिकों की मौत हो गई थी और 160 से ज्यादा घायल हो गए थे। अफगानिस्तान ने ताजा हमलों को इसका जवाब कहा है।

राम मंदिर से कथित चोरी पर वो छातियां पीट रहे हैं जो कहते थे मंदिर नहीं बनने देंगे; दक्षिण भारत के मंदिरों से तो सरकार लूटती हैं पैसा; उन मंदिरों से चोरी हुए सोने की बात नहीं करते सेकुलर नेता

सुभाषचन्द्र

आज रामविरोधियों का एकजुट होकर चील-कौओं की तरह इसलिए चिल्ला रहे हैं क्योकि कांड बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश में हुआ है। लेकिन गैर-शासित राज्यों और यूपीए कार्यकाल में मन्दिरों से चोरी हुए सोने पर सब ऐसे चुप रहते हैं जैसे उनके घर कोई मातम हो गया है। कल(30 जून) को Republic Bharat पर एंकर राम मोहन शर्मा ने अपने शो महाभारत में दिल्ली की जामा मस्जिद और अजमेर में चिश्ती की मजार पर सवाल करने पर मुस्लिम कट्टरपंथी शो के आखिर तक टालते रहे। सवाल था: यहाँ आने वाला चढ़ावा कहां जा रहा है?        

किसी की नानी कहती थी कि मस्जिद तोड़ कर जो मंदिर बनाया गया उसमे जाना पाप है और आज वह गिरा हुआ आदमी उसी मंदिर में माथा रगड़ रहा है और अमृतसर में सीता माता और लव-कुश मंदिर बनाने का झांसा दे रहा है। जबकि जब तक मंदिर बनना शुरू होगा, तब तक मान सरकार का अंतिम संस्कार हो चुका होगा

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चर्चित YouTuber 
जो अखिलेश छाती ठोक कर कहता था कि “किसी हाल में राम मंदिर नहीं बनने देंगे” वो आज सबसे ज्यादा बवाल काट रहा है लेकिन रामालय ट्रस्ट के गबन की बात नहीं करता। जो राहुल गांधी भगवान राम को काल्पनिक कहता था, कांग्रेस ने वकीलों की फ़ौज खड़ी कर दी सुप्रीम कोर्ट में मंदिर निर्माण  रोकने के लिए और उसके वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मंदिर की सुनवाई रोकने की दलील दी, उस राहुल की पार्टी आज दहाड़ें मार रही है

मंदिर में कथित चोरी का आरोप सबसे पहले Mahipal Singh (a former supervisor of the temple trust's accounting team) ने लगाया लेकिन उसने यह नहीं बताया कि कितना पैसा चोरी हुआ? फिर अखिलेश ने किस आधार पर कह दिया कि 7 करोड़ की चोरी हुई? क्या महिपाल सिंह ने उसे गुप्त सूचना दी अगर नहीं तो अखिलेश को बताना चाहिए उसे रकम के बारे में कैसे पता चला?

जो वकील आज सुप्रीम कोर्ट गए है राम मंदिर की चोरी के मामले को लेकर, वो बताएं कि क्या वे सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में मंदिर के पक्ष में खड़े थे या विरोध में?

दूसरी तरफ SIT ने मंदिर ट्रस्ट में CEO नियुक्त करने की सलाह देकर मंदिर प्रशासन को कार्यपालिका के सुपुर्द करने का अभियान चला दिया? दक्षिण भारत के मंदिरों में ऐसे ही राज्य सरकार Administrator (CEO जैसे) नियुक्त करके रखती है और उनके जरिए मंदिरों से जब मर्जी जितना मर्जी धन निकाल कर अपनी योजनाओं, मस्जिदों और चर्चों के लिए इस्तेमाल करती है। ये मंदिरों से चोरी नहीं बल्कि सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से “वैध डकैती” है जिसके बारे में आज सेक्युलर नेता खामोश हैं

दक्षिण भारत में केरल के पद्मनाभ मंदिर से 2016 में 776 किलो सोना गायब हुआ। मुख्यमंत्री थे पिनराई विजयन। यह CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा लेकिन उसे गलत करार दे दिया गया। वर्ष 2026 में भी मंदिर परिसर में भारी सुरक्षा चूक और लगभग 78 ग्राम सोने के बिस्कुट/सिक्के और कुछ कीमती पुरावशेष (एंटीक) गायब होने के नए मामले सामने आए, जिसकी जांच चल रही है। मुख्यमंत्री थे विजयन;

र्ष 2016 में ही तमिलनाडु के कांचीपुरम के एकंबरनाथ मंदिर से 5.75 किलो सोना चोरी हुआ सरकार थी AIADMK की; तमिलनाडु सरकार की endowment trust के कमिश्नर M Veera shanmuga Moni और एक विदेशी पुजारी को गिरफ्तार किया गया लेकिन हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी क्यों? अभी chargesheet को रद्द करने के केस चल रहे हैं जैसे कोई चोरी हुई ही न हो

वर्ष 2019 में सबरीमाला मंदिर 2019 -4.5 किलो सोना गायब हुआ। मुख्यमंत्री विजयन;

वर्ष 2022 में तमिलनाडु के विरुथागिरीश्वर (शिव मंदिर) मंदिर से 900 किलो के कलश चोरी हुए लेकिन 49 साल के पी संतोष को गिरफ्तार किया गया और उससे वो कलश बरामद हो गए  

इन मंदिरों में चोरी के मामले बताने का मेरा अभिप्राय यह है कि चोरी CEO/Administrator नियुक्त करने के बाद भी हो सकती है और कल को कोई उत्तर प्रदेश में “सेक्युलर सरकार” आ गई तो वह तो राम मंदिर के धन को लूट खाएगी जैसे लूट दक्षिण भारत के मंदिरों में होती है। अभी जो राम मंदिर ट्रस्ट है वो चाहे तो संगठन में बदलाव करे लेकिन उसमें CEO बिठाना ठीक नहीं है 

दिल्ली में शुरू हो गया SIR… 13000+ BLO घर-घर जाकर भरवाएँगे फॉर्म: 29 जुलाई तक चलेगा पहला चरण


राजधानी दिल्ली में मंगलवार (30 जून 2026) से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके लिए दिल्ली में 13 हजार से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों (SIR) की ड्यूटी लगाई गई है। पहले चरण के तहत आज से एन्यूमरेशन फॉर्म बाँटे जाएँगे। पहला चरण 29 जुलाई को खत्म होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (29 जून 2026) को दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) अशोक कुमार ने एक महीने तक चलने वाली इस SIR प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी। दिल्ली की 70 विधानसभाओं में 13,033 BLO और राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त BLA घर-घर जाकर सर्वे करेंगे।

 BLO एन्युमरेशन फॉर्म की दो कॉपियाँ देंगे, जिसको भरने के बाद एक BLO को वापस करनी होगी और दूसरी अपने पास रहेगी। इस फॉर्म के साथ कोई भी पहचान पत्र या दस्तावेज जमा नहीं करना है। BLO को आदेश है कि अगर घर पर कोई नहीं मिलता है तो वह फॉर्म को घर में डालकर चला जाए और फिर कम से कम तीन बार चक्कर लगाए।


कश्मीर : जब गैंगरेप करके सड़क पर फेंकी गई हिंदू नर्स की क्षत-विक्षत लाश… सरला भट्ट केस में 36 साल बाद आतंकी यासीन मलिक समेत 5 के खिलाफ चार्जशीट दायर

                     यासीन मलिक पर सरला भट हत्याकांड में चार्जशीट दायर (फोटो साभार- दैनिक भास्कर)
वो भी क्या दिन थे जब शेख जी फाख्ता उड़ाते थे यानि आतंकवाद को बढ़ावा, सेना के जवानों को मारने और हिन्दुओं को मारने वालों को कांग्रेस से लेकर यूपीए(यानि वर्तमान INDI गठबंधन) बहुत सम्मान दिया करते थे, प्रधानमंत्री आवास में किसी सम्मानित की तरह आओभगत होती थी। वक़्त का चक्र ऐसा घुमा आज जेल में ज़िंदगी काटने को मजबूर।

टेरर फंडिंग के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा जेकेएलएफ का पूर्व प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ 36 साल बाद कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट हत्याकांड में बड़ी कार्रवाई हुई है। जम्मू-कश्मीर की एसआईए ने 36 साल पुराने मामले में 737 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें उसे मुख्य आरोपितों में शामिल किया है।

इसके तीन आरोपितों, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है। चौथा आरोपित मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है और उसके पीओके में छिपे होने की आशंका है। सरला को उसी ने गोली मारी थी। चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने अप्रैल 1990 में सरला भट्ट को अगवा किया और उसकी हत्या की साजिश रची।

सरला भट्ट कौन थी?

कश्मीरी पंडित सरला भट्ट उस वक्त श्रीनगर के शेर ए कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (SKIMS) में स्टाफ नर्स थीं। 36 साल पहले उनका अपहरण किया गया। उन्हें यातनाएँ दी गईं। बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। सरला अनंतगाग की रहने वाली थी।

18 अप्रैल 1990 को सरला ड्यूटी पर जा रही थीं। इसी दौरान अस्पताल परिसर के पास से उन्हें उठा लिया गया। चार दिन तक अलग-अलग जगह रख कर बुरी तरह टॉर्चर किया गया। बाद में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका शव श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में मिला। शरीर पर गोलियों के साथ साथ उन यातनाओं के भी निशान थे, जो चार दिनों तक उन्हें दिए गए।

शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उसे ‘सुरक्षाबलों का मुखबिर’ होने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं सरला के परिवार वालों पर भी जुल्म ढाए गए। उसके घर पर ग्रेनेड से हमला किया गया और कश्मीर से पलायन के लिए मजबूर किया गया। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि इस हत्या का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों में भय पैदा करना था, ताकि उनका घाटी से पलायन तेज हो।

एसआईए ने 737 पन्नों की चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल की। इसमें यासीन मलिक सहित 5 लोगों को आरोपी बनाया गया। चार्जशीट में प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, मेडिकल और फॉरेंसिक सामग्री तथा नई जाँच के आधार पर आरोप तय किए गए।

यासीन मलिक पर अब तक किन-किन मामलों में कार्रवाई हुई?

यासीन मलिक आतंकियों की फंडिंग का दोषी है। इस मामले में उसे उम्रकैद की सजा मिली है। NIA ने 2017 में यह मामला दर्ज किया था। उसने घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए हवाला के जरिए धन जुटाया। 2022 में यासीन मलिक ने अदालत में कई आरोप स्वीकार किए। दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।

उस पर आतंकवाद, आपराधिक साजिश और UAPA के तहत भी कई मामले दर्ज हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े आरोप है।

इन मामलों में भी उन्हें दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई।

जनवरी 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के जवानों पर हुए हमले के मामले में भी यासीन मलिक का नाम आया था।

इस मामले में भी NIA ने कार्रवाई की है और मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया में है।

1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के मामले में भी यासीन मलिक का नाम जाँच के दौरान आया। इस मामले में भी अदालत में मुकदमा चल रहा है और अंतिम फैसला नहीं आया है।

1990 के दशक में उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुई थीं। जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ दर्जनों आपराधिक और आतंकवाद संबंधी मामले अलग-अलग वक्त पर दर्ज हुए हैं। इनमें से कुछ में वह दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कुछ अभी भी न्यायालय में लंबित हैं।

फिलहाल यासीन मलिक आतंकवाद फंडिंग मामले में तिहाड़ में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। NIA ने उनकी सजा बढ़ाकर मृत्युदंड किए जाने की भी अपील की है, जिस पर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। सरला भट्ट हत्याकांड की नई चार्जशीट उनके खिलाफ एक अलग और महत्वपूर्ण कानूनी कार्रवाई है, जिसकी सुनवाई आगे होगी।

पंजाब : भगवंत मान सरकार में केजरीवाल के गुलाम AAP विधायकों ने कबूला, बिना पढ़े बनाया बेअदबी कानून

दिल्ली से लेकर पंजाब तक अरविन्द केजरीवाल ने साबित कर दिया कि उसे राज से नहीं उपद्रव से मतलब है। और उपद्रव होने पर उसका इल्जाम बीजेपी पर थोप कर अपने आपको ईमानदार बनने का ढोंग रच दिया जायेगा और जनता भी सच मान लेती है। लेकिन सच्चाई ज्यादा दिन छिपी नहीं रहती। काली करतूतें अपने आप केजरीवाल पार्टी को बेनकाब कर रही है। दूसरे राज्यों में जहां सत्ता में नहीं होते हुए भी केजरीवाल के तथाकथित नेता किसी न किसी घोटाले में शामिल होने पर कानून की गिरफ्त में आ रहे हैं।  

खैर, पंजाब की राजनीति में कई बार ऐसे अवसर आए हैं, जब धार्मिक संस्थाओं और निर्वाचित सरकारों के बीच मतभेद हो गए। लेकिन बहुत कम अवसर ऐसे रहे हैं, जब सत्तारूढ़ दल के मंत्री, विधायक और जनप्रतिनिधि नंगे पैर अकाल तख्त की चौखट पर पहुंचकर अपने ही बनाए कानून के लिए स्पष्टीकरण देने को विवश हुए हों। मुख्यमंत्री भगवंत मान की आप सरकार के कार्यकाल में यह अनोखा रिकॉर्ड बना है। श्री अकाल तख्त साहिब के सामने  सोमवार यानि 29 जनवरी को पंजाब के 78 सिख विधायकों और 9 सिख मंत्रियों को तलब हुए।  

दरअसल, जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2026 को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने केवल एक कानून की तकनीकी खामियों का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि यह भी दिखाया कि धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर राजनीतिक जल्दबाजी कितनी भारी पड़ सकती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सुनवाई के दौरान कई आम आदमी पार्टी के विधायकों ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने इतने संवेदनशील विधेयक को बिना पढ़े ही पारित कर दिया था। किसी भी संसदीय लोकतंत्र में इससे अधिक गंभीर स्वीकारोक्ति शायद ही हो सकती है। यह केवल आप विधायकों की व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि पूरी विधायी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न है। अकाल तख्त ने आप सरकार को एक महीने के भीतर कानून में संशोधन करने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है। इसके साथ ही स्पष्ट संकेत दिया है कि सिख पंथ से जुड़े विषयों पर केवल राजनीतिक बहुमत पर्याप्त नहीं, बल्कि धार्मिक परामर्श और पंथ की मर्यादा का सम्मान भी अनिवार्य है।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम और शाश्वत गुरु का दर्जा दिया

दरअसल, पंजाब सरकार ने हाल ही में गुरुग्रंथ साहिब और गुरुओं की बेअदबी की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से एक कानून पारित किया है। इस कानून में श्री गुरु ग्रंथ साहिब, भगवद्गीता, कुरआन और बाइबिल सहित विभिन्न पवित्र ग्रंथों के अपमान पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। सरकार ने इसे सभी धर्मों की आस्था की रक्षा का प्रयास बताया है, लेकिन अकाल तख्त की आपत्ति इसी समान श्रेणीकरण पर है। अकाल तख्त और कई सिख विद्वानों का तर्क है कि सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ साहिब कोई पुस्तक मात्र नहीं, बल्कि साक्षात जीवित गुरु परंपरा हैं। सिख परंपरा में दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम और शाश्वत गुरु का दर्जा दिया था। ऐसे में किसी कानून में गुरु ग्रंथ साहिब को अन्य धार्मिक पुस्तकों के साथ “पवित्र ग्रंथ” की श्रेणी में रखकर उल्लेख करना, अकाल तख्त के अनुसार, गुरुओं द्वारा प्रदान की गई सर्वोच्च स्थिति को कमतर करने जैसा है।

बिना किसी विमर्श के सरकार ने बनाया बेअदबी कानून

पंजाब विधानसभा ने अप्रैल 2026 में इस कानून को पारित किया था। इसका घोषित उद्देश्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों में कठोर दंड सुनिश्चित करना था। संशोधन के तहत बेअदबी को गंभीर अपराध मानते हुए आजीवन कारावास सहित कड़े दंड का प्रावधान किया गया। इतने अहम और धार्मिक रूप से संवेदनशील कानून बनाने से पहले पंजाब की भगवंत मान सरकार ने अकाल तख्त, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और सिख पंथक संगठनों से इस बारे में राय लेने की जरूरत भी नहीं समझी। उलटे इसके बारे में सीएम ने वीडियो में गलतबयानी कर दी। जिसके तुरंत बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), अकाल तख्त और अनेक पंथक संगठनों ने आपत्ति जताई कि सरकार ने कानून बनाने से पहले न तो पंथ से व्यापक संवाद किया और न ही धार्मिक संस्थाओं की राय ली। उनका तर्क था कि दंड कठोर होना पर्याप्त नहीं है; कानून की भाषा, परिभाषाएं और अधिकार-क्षेत्र भी सिख मर्यादा के अनुरूप होने चाहिए।

सिखों के धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या ही सही नहीं

अकाल तख्त का सबसे मूलभूत एतराज यही था कि इतना महत्वपूर्ण कानून बिना व्यापक पंथक विमर्श के पारित किया गया। सिख परंपरा में गुरु ग्रंथ साहिब केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवित गुरु का स्वरूप हैं। इसलिए उनसे संबंधित किसी भी कानून को बनाने से पहले पंथक संस्थाओं, विद्वानों और धार्मिक प्रतिनिधियों से सलाह लेना आवश्यक माना जाता है। अकाल तख्त का मत था कि विधानसभा विधायी संस्था अवश्य है, लेकिन धार्मिक सिद्धांतों की अंतिम व्याख्या उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसी कारण कानून को पंथ की सहमति के बिना पारित करना मूल प्रक्रिया की त्रुटि माना गया।

आप विधायकों ने बिना पढ़े कानून पारित कर दिया

सुनवाई का सबसे हैरतअंगेज पहलू वह स्वीकारोक्ति रही, जिसमें कई आप विधायकों ने माना कि उन्होंने विधेयक को पढ़े बिना ही समर्थन दे दिया था। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि इतने संवेदनशील कानून में आखिर क्या प्रावधान हैं। लोकतंत्र में विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं और प्रत्येक कानून पर विचार कर मतदान करना उनका संवैधानिक दायित्व है। यदि स्वयं विधायक स्वीकार करें कि उन्होंने कानून का अध्ययन नहीं किया, तो यह केवल राजनीतिक लापरवाही नहीं, बल्कि संसदीय उत्तरदायित्व की विफलता भी है। यही कारण था कि अकाल तख्त ने इसे गंभीरता से लिया और विधायकों से आत्ममंथन करने को कहा।

बेअदबी कानून में अकाल तख्त के छह प्रमुख एतराज

जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने कानून पर छह व्यापक आपत्तियां दर्ज कीं। अकाल तख्त ने सरकार को एक महीने में इन आपत्तियों का समाधान करने का निर्देश दिया। अकाल तख्त के छह एतराज इस प्रकार हैं…
(1) कानून में प्रयुक्त कई शब्द और परिभाषाएं सिख धार्मिक शब्दावली तथा मर्यादा के अनुरूप नहीं हैं।
(2) गुरु ग्रंथ साहिब से जुड़े धार्मिक विषयों का अंतिम निर्णय विधानसभा नहीं कर सकती।
(3) कानून बनाने से पहले पंथ और एसजीपीसी से समुचित परामर्श नहीं लिया गया।
(4) कानून की कुछ धाराएं धार्मिक अधिकार-क्षेत्र और राज्य के अधिकार-क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट नहीं करतीं
(5) सरकार को कानून लागू करने से पहले पंथक सुझावों को शामिल करना चाहिए।

(6) जब तक संशोधन नहीं हो जाता, कानून के विवादित प्रावधानों पर आगे कार्रवाई रोकने की सलाह दी गई।

मुख्यमंत्री मान के दो वीडियो पर इसलिए भड़का अकाल तख्त

सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े दो वीडियो भी चर्चा का विषय बने। यह विवाद उन वायरल वीडियो से जुड़ा है जिनके बारे में अकाल तख्त ने दावा किया कि दो फोरेंसिक जांचों में वीडियो को छेड़छाड़ या एआई-जनित नहीं पाया गया, जबकि मुख्यमंत्री की ओर से पहले इन्हें फर्जी या एआई आधारित बताए जाने की बात सामने आई थी। इसी विरोधाभास को लेकर अकाल तख्त ने नाराजगी जताई और कहा कि यदि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामले में तथ्यात्मक स्थिति को लेकर भिन्न दावा किया है, तो उसे स्पष्ट स्पष्टीकरण देना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अपना लिखित पक्ष देने की बात कही। इस विषय पर विभिन्न पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। अधिकतर का मानना है कि मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद पर होने के दौरान मान को धार्मिक मामलों में इस तरह के वक्तव्य नहीं देने चाहिए।

भगवंत मान का वीडियो फोरेंसिक लैब की जांच में प्रामाणिक

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने अमृतसर में ‘पांच सिंह साहिबानों’ की बैठक के बाद अकाल तख्त की फसील (मंच) से यह आदेश सुनाया। भगवंत मान पर ‘गुरु की गोलक’ (गुरुद्वारे के दान पात्र) पर आपत्तिजनक टिप्पणी, सिख गुरुओं के अपमान का आरोप है। ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने दावा किया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वह वीडियो, जिसमें एक व्यक्ति मुख्यमंत्री भगवंत मान जैसा दिखाई देता है, वो फोरेंसिक लैब की जांच में प्रामाणिक पाया गया है। उन्होंने कहा कि वीडियो के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई और न ही यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किया गया है। गर्गज ने बताया कि जनवरी में अकाल तख्त सचिवालय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर वीडियो की जांच के संबंध में संपर्क किया था। उस समय भगवंत मान ने स्वयं कहा था कि वह वीडियो की फोरेंसिक जांच के लिए तैयार हैं। हालांकि, सचिवालय को उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

अकाल तख्त सचिवालय ने वीडियो की दो लैब से जांच करवाई

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज के अनुसार इसके बाद अकाल तख्त सचिवालय ने वीडियो की दो अलग-अलग लैब से जांच करवाई। ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने कहा, “मुख्यमंत्री का पद सम्मानजनक होता है, लेकिन भगवंत सिंह मान ने अकाल तख्त के समक्ष वीडियो के मामले में झूठ बोला।” उन्होंने कहा कि पांच सिंह साहिबानों ने सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री को ‘गुरु दोषी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित किया है। बेअदबी विरोधी कानून के मुद्दे पर अकाल तख्त के जत्थेदार ने कहा कि ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ के संबंध में सभी सिख विधायक और पंजाब मंत्रिमंडल को 29 जून को अकाल तख्त के समक्ष उपस्थित होना होगा।

सरकार ने धार्मिक विषय पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई

इस सारे मामले पर माफी और स्पष्टीकरण की नौबत इसलिए आई, क्योंकि सीएम, कैबिनेट और विधायकों ने पहले इस धार्मिक विषय पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दरअसल, अकाल तख्त के समक्ष पेशी केवल औपचारिकता भर नहीं है। आप सरकार के सिख मंत्री और विधायक नंगे पैर पहुंचे, लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया और माफी के साथ पंथ की भावनाओं का सम्मान करने की बात कही। यह दृश्य अपने आप में असाधारण रहा। इसका कारण केवल कानून की भाषा नहीं है, बल्कि यह भावना भी है कि सरकार ने धार्मिक विषय पर वह सोच और विजन नहीं दिखाया, जिसकी दरकार रही। राजनीतिक दृष्टि से यह स्वीकारोक्ति कि संवाद की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है और सिख पंथ की आशंकाओं को पहले दूर किया जाना चाहिए था।

आस्था से जुड़े विवाद का विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर

राजनीतिक दृष्टि से यह विवाद आम आदमी पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। 2022 में पार्टी ने पंजाब में भारी बहुमत सामाजिक बदलाव और नई राजनीति के वादे पर हासिल किया था। यदि सिख समाज के एक प्रभावशाली वर्ग में यह धारणा बनती है कि सरकार ने धार्मिक मामलों में जल्दबाजी या पर्याप्त परामर्श के बिना निर्णय लिए, तो अगले विधानसभा चुनाव में आप के खिलाफ माहौल बन सकता है। विपक्ष पहले ही इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है, जो चुनाव में भी गूंजेगा। शिरोमणि अकाली दल पहले से ही स्वयं को पंथक राजनीति का प्रतिनिधि बताता रहा है। कांग्रेस के पास भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के अलावा की चारा नहीं। भाजपा ने पहले ही इस बेअदबी कानून को सिख समुदाय की आस्था और धार्मिक भावनाओं के विपरीत बताया है।

भगवंत मान का मकसद सिर्फ राजनीति करना – मजीठिया

अकाली नेता बिक्रम मजीठिया ने कहा कि जब जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 – तैयार किया जा रहा था, तब श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार साहिब ने स्पष्ट निर्देश और एक आदेश जारी किया था। उन्होंने आदेश दिया था कि अगर श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज के मामले से जुड़ा कोई बिल या कानून बनाया जाना है, तो उसका मसौदा श्री अकाल तख्त साहिब, शिरोमणि जत्थेबंदी, अन्य सिख संस्थाओं और पूरी गुरु नानक नाम लेवा संगत की मंजूरी लेने के बाद ही तैयार किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी महत्वपूर्ण बात छूट न जाए। भगवंत मान और केजरीवाल का एकमात्र मकसद राजनीति करना है। बैसाखी के दिन जो बिल तैयार किया गया वह पूरी तरह से और केवल राजनीति के लिए बनाया गया था। संगत इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती क्योंकि इसमें ऐसी धाराएं और फैसले शामिल किए गए हैं जो संगत को गुरु ग्रंथ साहिब महाराज से दूर करने की साजिश जैसे लगते हैं। आप गुरु नानक नाम लेवा संगत को साथ लिए बिना किसी चीज को पारित करने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? अकाल तख्त की मंजूरी के बिना इसे पारित करने का तो सवाल ही नहीं उठता।