हैलो, मैं चन्द्रशेखर बोल रहा हूँ.....बेकाबू शिव सैनिकों को काबू में करो ठाकरे


हैलो, मैं चन्द्रशेखर बोल रहा हूँ.....
(जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर शिवसैनिकों के अ'त्याचार के बाद देश के प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर सिंह जी की शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे को दी गयी चेतावनी)
यह बात उस समय की है जब,
देश के प्रधानमंत्री श्रद्धेय चन्द्रशेखर जी थे!
प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर जी ने शिवसेना प्रमुख से कहा ~
बेकाबू शिव सैनिकों को काबू में करो ठाकरे !
यह मत भूलो मुंबई और महाराष्ट्र हिंदुस्तान का ही हिस्सा है!
वरना मैं बता दूंगा कि कानून का राज कैसे चलता है ...?
यह बातें हवा हवाई नहीं हैं,
सन 1991 की हैं, जब शिव सैनिक मुंबई में उत्तर भारतीयों के साथ जाति और भाषा के आधार पर सड़कों पर उतर कर हिंसा कर रहे थे,
तभी प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर जी ने बाला साहब ठाकरे को सलाह देते हुए कहा :-
मेरा नाम चन्द्रशेखर सिंह है!
मैं जो सड़क पर बोलता हूँ,
वह संसद में भी बोलता हूँ!
इसलिए आप थोड़ा गम्भीर हो जाओ और बेवजह इन उत्तर भारतीयों को अपनी राजनीतिक हिंसा का शिकार मत बनाओ!
आज शाम तक मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में यह राजनैतिक हिंसा पूरी तरह रुक जानी चाहिए!
और आप यह भी ध्यान रखियेगा कि देशवासियों की जान बचाने के लिए मुझे राज्य सरकार के किसी कंधे की आवश्यकता नहीं पड़ेगी!
बाला साहब ठाकरे को यह सख्त चेतावनी देते हुए चंद्रशेखर जी फोन क!ट देते हैं!
प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर जी की इसी कड़ी चेतावनी के बाद ठीक कुछ ही घंटों में मुम्बई और पूरे महाराष्ट्र के हालात सामान्य हो गए!
शिवसेना प्रमुख ठाकरे ने शिव सैनिकों को आदेश दिया कि अब संयम बरतो, शांत हो जाओ।
ऐसी थी भारत के 9वें प्रधानमंत्री, नेताओं के नेता, युवा तुर्क श्रद्धेय श्री चंद्रशेखर जी की शख्सियत!
तभी तो साहस और स्वाभिमान के पर्याय श्रद्धेय चन्द्रशेखर जी को प्रणाम

महिला सशक्तिकरण के नाम पर लोकसभा सीटें बढ़ाने का सीधा-सीधा अर्थव्यवस्था पर महीने का करोड़ों का अतिरिक्त बोझा; नई दुकाने खुलने से महंगाई को खुला निमन्त्रण

देश में 543 लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव महिला सशक्तिकरण के नाम से बेचा जा रहा है जबकि असलियत में ये जनता की जेब काटकर नेताओं की नई कॉलोनी बसाने का प्लान है।  तिजोरियां भरने का प्लान है। जनता जाए भाड़ में नेता जाएं महलों में। 
आज का सांसद किसी राजा से कम नहीं। कितने बड़े-बड़े बंगलों में रहते हैं। इस समय विपक्ष और सत्तारूढ़ पार्टी के पास वोट मांगने का कोई मुद्दा नहीं। नए सांसदों के लिए भी नए बंगले बनेंगे मुफ्त तो बनेंगे नहीं धन खर्च होगा कहाँ से आएगा वसूली जनता से ही होगी।  
लोक सभा के बाद यही झुनझुना विधान सभा और फिर नगर निगमों तक बोझा बढ़ाएगा। इस नौटंकी से दूर रहना होगा। फर्क बस इतना ही है कि विपक्ष वास्तविक बिंदुओं को उठाने में पूर्णरूप से फेल रहा। समाजवादी पार्टी तो हिन्दू-मुस्लिम करने में लगी रही। हिन्दू-मुस्लिम मानसिकता से अखिलेश यादव यानि समाजवादी पार्टी इसलिए दूर नहीं हो पायी क्योकि सच्चाई बोलने से निगम पार्षद से लेकर 543 सांसद बेनकाब हो जाते।     
भगोने में बहुत सारे चावल होते है लेकिन एक चावल से देखा जाता है कि चावल पका है या नहीं। एक मिसाल दिल्ली की लो। कुछ वर्ष पहले तक नगर निगम में लगभग 100 पार्षद होते थे और आज 300 के लगभग; महानगर परिषद् वर्तमान विधानसभा में 50 महानगर पार्षद होते थे, वर्तमान में उन्हें विधायक कहते हैं और आज हैं 70, समस्याएं कम नहीं हुई। बल्कि अर्थव्यवस्था पर बोझ जरूर बढ़ गया। बहते सीवर, भ्रष्टाचार का बोलबाला, बढ़ते अतिक्रमण आदि आदि। घर-घर पीने का पानी पहुँचाने की माला जपी जाती है लेकिन दिल्ली में ही 30 मिनट से 45 मिनट ही पानी पहुँचता है। लेकिन कई क्षेत्रों में वही पानी भी साफ नहीं होता। शायद दिल्ली सरकार या जल बोर्ड का पानी माफिया/RO कंपनी से गुप्त समझौता हो। 
याद करिए, तत्कालीन बीजेपी सांसद ताराचन्द खंडेलवाल की मृत्यु। यमुना तब भी मैली थी और आज भी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने निगम बोधघाट पर शव को अंतिम स्नान करवाने संगम घाट जरूर बनवा दिया लेकिन आज भी यमुना मैली ही है। बल्कि पहले से कहीं ज्यादा।   
अभी 543 सांसद हैं, हर एक पर सरकार महीने का लगभग 8 से 12 लाख खर्च करती है। मतलब एक सांसद साल का लगभग 1 करोड़ के आसपास बैठता है। अब 300 नए सांसद जोड़ दे तो हर साल 500 से 700 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ सीधे आपके टैक्स से जाएगा।
ये तो सिर्फ वेतन-भत्ते हैं, अगर बंगले, सुरक्षा, हवाई यात्रा, मुफ्त बिजली 50,000 यूनिट, पानी लाखों लीटर जोड़ दे, तो सालाना खर्च 1500 करोड़ पार जाएगा केवल एक सांसद का। और सोच रहे हो देश आगे बढ़ रहा है।
भाजपा ने महिला आरक्षण के लिए 2023 में कानून पास किया, ढोल पीटा कि 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं को देंगे। लेकिन अंदर ऐसा जाल बिछाया कि पहले जनगणना, फिर परिसीमन, होगा तब जाकर लागू किया जाएगा। यानी सीधा-सीधा 2029 तक ठंडे बस्ते में डाल दिया।
अगर नीयत साफ होती तो अभी 543 में से करीब 180 सीटें महिलाओं को दे देते। लेकिन ऐसा करते ही आधे बड़े-बड़े नेताओं की कुर्सी जाती और पार्टी में बगावत खड़ी हो जाती। क्योंकि 543 सांसदों में 180 महिला सांसदों को एडजस्ट करते तो बीजेपी के लगभग 120 पुरुष सांसद घर पर बैठते

तो क्या किया सीटें 850 कर दो और 280 सीटें महिलाओं के नाम पर दे दो, बाकी में पुराने नेता भी सेट हो जाएंगे। मतलब जनता को लगा क्रांति हो गई, और नेताओं का भी कुछ नहीं बिगड़ा। राजनीति में इसे कहते हैं “दोनों तरफ माल”।
आज भी पंचायत में महिला सरपंच जीतती है, लेकिन कुर्सी पर उसका पति बैठता है। “प्रधान पति” नाम यूं ही नहीं पड़ा। उसमें आज तक सरकार ने कोई सुधार नहीं किया और वही मॉडल अब संसद में लागू होगा। बड़े नेता अपनी पत्नी-बेटी को टिकट देंगे और खुद पीछे से रिमोट से चलाएंगे। नाम महिला का, सत्ता आदमी की होगी। ये सशक्तिकरण नहीं, ये सेटिंग है।
ये वही सरकार है जो खुद को महिला हितैषी बताती है। लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है? लड़कियों का बलात्कार हो रहा है, लव जिहाद के नाम पर लड़कियों की ज़िंदगियां बर्बाद हो रही हैं। गेस्ट हाउस कांड होते हैं, बच्चे हैं गलती हो जाती है कहने वाले को सर्वोच्च सांसद के इनाम से सम्मानित किया जाता है, क्या है ये सब ड्रामा? महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े हर साल बढ़ रहे हैं, लेकिन भाषणों में “नारी शक्ति” का जप चलता रहता है।
जिन राज्यों ने जनसंख्या कंट्रोल किया, जैसे तमिलनाडु, केरल उनकी सीटें कम बढ़ेंगी। और जहां आबादी बेकाबू बढ़ी, जैसे यूपी, बिहार वहां सीटों की बरसात होगी। मतलब जिसने जिम्मेदारी निभाई वो सजा पाएगा, जिसने लापरवाही की वो इनाम ले जाएगा।
कल को सिर्फ हिंदी बेल्ट जीतकर कोई भी सरकार बना लेगा, दक्षिण की आवाज साइड में डाल दी जाएगी।
जिन राज्यों में विपक्ष की पकड़ है, वहां सीटें कम बढ़ेंगी। जहां भाजपा मजबूत है, वहां सीटें ज्यादा। मतलब चुनाव शुरू होने से पहले ही मैदान झुका दिया गया।
अभी 543 सांसदों में ही बहस का टाइम नहीं मिलता, 850 में क्या होगा? संसद नहीं, मेला लगेगा। कानून ऐसे पास होंगे जैसे टिकट कटते हैं बस स्टैंड पर।
ये महिला आरक्षण नहीं है, ये 2029 का चुनावी ट्रैप है। ये सीटें बढ़ाना नहीं है, ये नेताओं की फौज खड़ी करना है। ये सुधार नहीं है, ये सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ना है।
अगर अभी भी किसी को लग रहा है कि ये सब महिलाओं के भले के लिए हो रहा है, तो वो या तो भक्ति में डूबा है या फिर उसे सच सुनने की हिम्मत नहीं है।
ये कहना कि किसी संसदीय क्षेत्र में इतने लाख वोटर है एक सांसद सबके पास नहीं जा सकता, लेकिन जब वोट लेने की बात होती है हर गली-कूचे में पहुँच जाता है। दूसरे, निगम पार्षद ही जीतने के बाद कितनी गलियों में घूमकर समस्याएं सुनता है।    

जनता को भावनाओं में उलझाओ, आंकड़ों से डराओ, और फिर टैक्स के पैसे से अपना साम्राज्य बढ़ाओ यही चल रहा है इस समय देश में। जनता को नई दुकानें खोलकर लुटने की बजाए महंगाई, भ्रष्टाचार और अतिक्रमण से राहत दो।   

Lenskart controversy : CEO की पत्नी निधि मित्तल बंसल ने बंद किया अपना X अकाउंट; ये कालनेमि हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथियों से ज्यादा जहरीले


लेंसकार्ट की जितनी जाँच हो रही है उतनी सच्चाई सामने आ रही है। अरविन्द केजरीवाल जो अपने आपको बड़ा ईमानदार और राजनीति को बदलने वाला कहता था हिन्दू होकर हिन्दुओं के ही खिलाफ काम कर रहा है। पूरी पार्टी हिन्दुओं को प्रताड़ित करने में लगी हुई है। इन सभी हिन्दू जेहादियों को मुस्लिम कट्टरपंथियों से सीखना चाहिए जो अपने मजहब की बुराई बर्दाश्त नहीं कर सकते। लेकिन कालनेमि हिन्दू हिन्दू होकर हिन्दुओं को कलंकित कर रहे हैं। जनता को जितनी जल्दी से केजरीवाल पार्टी को धराशाही ही नहीं सामाजिक बहिष्कार करना होगा। जब तक हिन्दू इन कालनेमि हिन्दुओं, चाहे वह किसी भी पार्टी से हो, सामाजिक बहिष्कार नहीं करेगा हिन्दू प्रताड़ित होता रहेगा। इन लालची(???) की वजह से मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं पर हमला करते हैं। मुस्लिम कट्टरपंथियों से कहीं ज्यादा हिन्दुओं के ये कालनेमि हिन्दू हैं।    

लेंसकार्ट सीईओ पीयूष बंसल की पत्नी निधि मित्तल बंसल के पुराने ट्वीट्स वायरल होने के बाद उनका एक्स अकाउंट डिएक्टिवेट हो गया। जिसमें उन्होंने पीएम मोदी बीजेपी और हिंदू संगठनों पर तीखे हमले किए थे। इस बीच, कंपनी के स्टाइल गाइड में हिंदू प्रतीकों जैसे बिंदी तिलक और कलावा पर भेदभाव का विवाद भी तेज हो गया है जिससे सोशल मीडिया पर भारी बवाल मचा हुआ है।

लेंसकार्ट के सीईओ पीयूष बंसल की पत्नी निधि मित्तल बंसल ने आम आदमी पार्टी का सपोर्ट किया था और बीजेपी पीएम मोदी तथा हिंदू संगठनों के खिलाफ तेज टिप्पणियाँ पोस्ट की थीं। हैशटैग जैसे वोट फॉर मफलरमैन और दिल्ली डिसाइड्स भी इस्तेमाल किए गए थे।

अब वायरल हो चुके स्क्रीनशॉट्स जो 2013 से 2015 के बीच के हैं उनमें निधि मित्तल बंसल आम आदमी पार्टी यानी एएपी का सपोर्ट दिखा रही हैं जबकि बीजेपी और हिंदू संगठनों के खिलाफ तेज टिप्पणियाँ पोस्ट कर रही हैं। कुछ पोस्ट्स में हैशटैग जैसे #vote4mufflerman और #DelhiDecides थे जबकि दूसरों में हिंदू महासभा की आलोचना की गई और बीजेपी के बारे में अपमानजनक बातें कही गईं। जैसे-जैसे ये पोस्ट्स सोशल मीडिया पर फैल गए उनके अकाउंट @nidhimittal13 अनुपलब्ध हो गया जो बताता है कि बढ़ती आलोचना के बीच इसे हटा दिया गया है।

इस घटना के साथ लेंसकार्ट कंपनी पर भी विवाद गहरा गया है। कंपनी का 23 पेज का इंटरनल स्टाफ यूनिफॉर्म और ग्रूमिंग गाइड फरवरी 2026 का डॉक्यूमेंट ऑनलाइन आया जिसमें कर्मचारियों को बिंदी कलावा और धार्मिक कलाई बैंड पहनने से मना किया गया था। वहीं हिजाब और टर्बन को काले रंग की शर्त के साथ अनुमति दी गई थी। सिंदूर को भी कम लगाने की सलाह थी। इस असमानता ने हिंदू प्रतीकों पर भेदभाव का आरोप लगाया और सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया।

पीयूष बंसल ने 15 अप्रैल को पहला बयान दिया। उन्होंने कहा कि वायरल डॉक्यूमेंट गलत है और ये लेंसकार्ट की मौजूदा नीति नहीं दिखाता। लेकिन एक्स पर कम्युनिटी नोट ने इसे चुनौती दी क्योंकि डॉक्यूमेंट पर फरवरी 2026 की डेट और ऑफिशियल ब्रांडिंग थी।

फिर पीयूष बंसल ने अपना बयान बदला। उन्होंने माना कि डॉक्यूमेंट असली है लेकिन इसे पुराना इंटरनल ट्रेनिंग पेपर बताया। उन्होंने कहा कि बिंदी और तिलक वाली लाइन कभी नहीं लिखी जानी चाहिए थी और 17 फरवरी को इसे हटा दिया गया था। उन्होंने कहा मैं फाउंडर और सीईओ के रूप में इस चूक की पूरी जिम्मेदारी लेता हूँ। लेंसकार्ट किसी भी सम्मानजनक धार्मिक अभिव्यक्ति को कभी प्रतिबंधित नहीं करता और आगे भी नहीं करेगा।

स्पष्टीकरण के बावजूद सवाल बाकी

 माफी के बावजूद कई असंगतियाँ चिंता बढ़ा रही हैं। अगर डॉक्यूमेंट को सच में 17 फरवरी 2026 को हटा दिया गया था तो सवाल ये है कि फरवरी 2026 वाली वर्जन कर्मचारियों के बीच अभी भी क्यों घूम रही थी। कंपनी ने कोई अपडेटेड या सुधारा हुआ पॉलिसी भी पब्लिक नहीं किया है जिससे पारदर्शिता की कमी रह गई है जब कंज्यूमर ट्रस्ट पर दबाव है।

अवलोकन करें:-

सावधान: लेंसकार्ट "कन्वर्ट-कार्ट" का धंधा भी चला रहा है। बॉयकॉट #lenskart

इसके अलावा कई सोशल मीडिया यूजर्स ने अब कहा है कि मार्च के इंटरनल ऑडिट्स से पता चला कि कंपनी तिलक और बिंदी लगाने के खिलाफ भेदभाव जारी रखे हुए थी जिससे और गुस्सा भड़क गया है।

तुम्हारे आने वाली पीढ़ियों में भी कोई गुंडा पैदा नहीं होगा : चंद्रशेखर की शरद यादव और रामबिलास को चेतावनी


अगर आज संसद में चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता होते तो संसद का मिजाज ही ऐसा होता पूरा देश कहीं का कहीं पहुँच चूका होता। दुर्भाग्य से जनता ने गाँधी परिवार, मुलायम परिवार, लालू और शरद पवार आदि के परिवारों को पहुंचा अपने परिवारों को धन-संपन्न कर देश का नुकसान करवा रहे हैं।   
बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद का समय । स्थान - देश की संसद 

अटल बिहारी संसद में अकेले सभी 'सिक्युलरों' से लोहा ले रहे थे। उस समय दो युवा नेता सबसे बड़े दबंग और उद्दंड माने जाते थे। ये दो सांसद थे शरद यादव और राम बिलास पासवान। एक दिन संसद में चर्चा के दौरान अटल जी के सामने ये दोनों उद्दंडता करने लगे । तब वरिष्ठ नेता और जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर जी ने कहा - "शरद, राम बिलास तुम्हारे पिछले जन्म के कुछ पुण्य कर्म है जिसके कारण तुम्हे अटल जी को सुनने का मौका मिला है, इन्हे ध्यान से सुनो। ये राजनीती के महाग्रंथ है।"
तब शरद यादव ने अपनी दबंगई दिखाते हुए चंद्रशेखर जी को टोका और कहा "अध्यक्ष जी आप बीच में मत बोलिये।" बस फिर क्या था!
चंद्रशेखर जी ने भरी संसद में अपना जो रौद्र रूप दिखाया तो इन तथाकथित उस जमाने के इन युवा नेताओं के छक्के छूटने लगे।
चंद्रशेखर जी ने उस समय कड़कती आवाज में कहा था: "मुझसे ऐसी भाषा में बात करते हो। संसद भवन के बाहर ऐसी भाषा बोलो शरद। मैं तुम दोनों को यकीन दिलाता हूँ, तुम्हारे आने वाली पीढ़ियों में भी कोई गुंडा पैदा नहीं हो पायेगा,
 यह सुनते ही दोनों को सांप सूंघ गया और वे भयभीत नजर आने लगे।
दोनो ने सदन से बाहर निकलते ही चंद्रशेखर के पैर पकड़ लिए और दया की भीख मांगने लगे। चंद्रशेखर दबंगों के भी दबंग थे। कहते हैं चंद्रशेखर के मौन रहने के दौरान भारत के सबसे बडे बददिमाग वकील राम जेठमलानी ने उनके खिलाफ कोई टिप्पणी कर दी। इसके बाद उनके समर्थको ने जेठमलानी की हाथो और लातो से जमकर पूजा की थी। उसके बाद जब तक चंद्रशेखर जिन्दा रहे इस जेठमलानी ने उनकी तरफ आँख भी नहीं उठायी। चन्द्रशेखर जी ने सभी के लिए सामान कानून के लिए कहा था कि "अगर हमारे फौजदारी के मामले और शादी विवाह समान हैं तो यूनिफार्म सिविल कोड क्यों नहीं?"
कांग्रेस ने देश में ऐसा माहौल बनाया, ऐसी बातें जानबूझ कर छुपाने का काम किया l देश का महा दुर्भाग्य कांग्रेसl
एक अक्खड़, मनमौजी, गंभीर, फौलादी जिगर वाला नेता जिसने राजनीती अपने शर्तो पे की। किसी की मेहरबानी को कबूल नहीं किया। देश का प्रधानमंत्री बना और कांग्रेस के दुष्चरित्र को भांप कर उस कुर्सी को ठोकर मार दी। ऐसी शख्सियत तो राजाओं की राजा ही कहलायेगी। उस बलिया के शेर, महान तेजस्वी नेता चंद्रशेखर जी की आज जन्म जयंती पर कोटि कोटि नमन !!

यशवंत वर्मा को तो आप निकाल नहीं सकी जस्टिस नागरत्ना, फिरअन्य भ्रष्ट जजों को कैसे निकाल सकेंगी? नोटबंदी का दर्द आपको अब तक क्यों सता रहा है

सुभाष चन्द्र 

कुछ सुप्रीम कोर्ट के जज आजकल बेलगाम हुए जो मर्जी बोल रहे हैं।  क्या वे लोग मीडिया की सुर्ख़ियों में रहना चाहते हैं?

अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि “नोटबंदी से काला धन सफ़ेद में बदला; हम सब जानते हैं कि 8 नवंबर 2016 को क्या हुआ था, कालेधन का खत्म कहां हुआ? यह कालेधन को सफ़ेद बनाने का एक अच्छा तरीका था”

यह बात जस्टिस नागरत्ना कोई नई नहीं कह रही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 5:1 के फैसले में नोटबंदी पर मुहर लगा दी थी लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने Dissenting Judgement देते हुए उसे गैर कानूनी कहा था मुझे लगता है नोटबंदी से उन्हें सबसे ज्यादा दर्द हुआ है जो अभी तक जाने का नाम नहीं ले रहा यह दर्द उन्हें क्यों हुआ, ये वो ही जानती होंगी

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
एक वरिष्ठ जज विपक्ष की भाषा बोल रही हैं जबकि उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि नोटबंदी ने पाकिस्तान की चूलें हिला दी जहां भारत का जाली नोट छप कर भारत में आता था क्या उसे नागरत्ना जी वैध कारोबार मानती हैं जो बंद हो गया और पाकिस्तान के हाथ में कटोरा आ गया? कौन है जो आपको यह मामला रह रह कर उठाने के लिए प्रेरित कर रहा है या मोदी जी से आपकी  कुछ निजी शत्रुता है जो उनके नोटबंदी के कदम पर आप हमला करती हैं? संविधान पीठ ने फैसला दे दिया और मामला ख़त्म हो गया फिर आप यह राग क्यों अलाप रही हैं?

कल जस्टिस नागरत्ना ने कहा है कि “Judges who are unable to live within their known source of income and fall prey to greed and temptation must be weeded out of the system”. मतलब साफ है जज भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं

कहने को यह प्रवचन बहुत आकर्षक है लेकिन क्या इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि आप ऐसे भ्रष्ट जजों को जानती हैं? फिर निकालेगा कौन उन्हें? आप सुप्रीम कोर्ट के CJI से कहें कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की समिति बना कर ऐसे जजों को चिन्हित करे और उन्हें निकालने के कदम उठाए जाएं लेकिन क्या ऐसा किया जा सकता है जब यशवंत वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कोई कार्रवाई नहीं की?

जस्टिस वर्मा ने तो न्यायपालिका के मुख पर कालिख पोत दी और सुप्रीम कोर्ट चुपचाप देखता रहा आप कहिये चीफ जस्टिस से कि अब तो वर्मा ने रिटायरमेंट ले ली है, अब तो उनके खिलाफ FIR दर्ज कर CBI को जांच करने के लिए कहें अगर ऐसा नहीं कर सकती तो आलतू फ़ालतू बयानबाजी का कोई औचित्य नहीं है 

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार दूर करने के लिए खुद न्यायपालिका को सामने आना पड़ेगा लेकिन वह तो NCERT की किताब भी बर्दाश्त नहीं कर सकती न्यायपालिका ने वह किताब तो रोक दी लेकिन चीफ जस्टिस और पूरी न्यायपालिका यह नहीं समझती कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के लिए Public Perception क्या है? आज के जस्टिस नागरत्ना के बयान ने यह तो साबित कर दिया कि न्यायपालिका में Corruption है, फिर NCERT की किताब वापस पाठ्यक्रम में शामिल करने के आदेश दिए जाएं 

J&K में श्रीनगर एयरपोर्ट पर हिरासत में लिए गए 2 अमेरिकी नागरिक, सैटेलाइट फोन के साथ पकड़े गए: एयरपोर्ट सिक्योरिटी ने पूछताछ के बाद पुलिस के हवाले किया

                                                                       

                                                                                                                        साभार : ZEENews  
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में सुरक्षा एजेंसियों ने एयरपोर्ट पर दो अमेरिकी नागरिकों को रविवार (19 अप्रैल 2026) को सैटेलाइट फोन रखने के आरोप में हिरासत में लिया है। पकड़े गए लोगों की पहचान जेफ्री स्कॉट और हालदार कौशिक के रूप में हुई है।

अधिकारियों के मुताबिक, नियमित जाँच के दौरान उनके पास सैटेलाइट फोन पाए गए जो जम्मू-कश्मीर में बिना अनुमति रखना और इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है। एयरपोर्ट सिक्योरिटी ने दोनों से पूछताछ की और बाद में उन्हें आगे की जाँच के लिए पुलिस के हवाले कर दिया।

सुरक्षा एजेंसियों ने दोनों से पूछताछ शुरू कर दी है और यह जानने की कोशिश की जा रही है कि वे इन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से कर रहे थे। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, दोनों श्रीनगर से बाहर जाने की तैयारी में थे। इस मामले में उनके साथ मौजूद कोलकाता के हलदर कौशिक को भी पकड़ गया है। फिलहाल मामले की जाँच जारी है और संबंधित एजेंसियाँ सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्रवाई कर रही हैं।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की आत्मा मर गई या किसी ने खरीद लिया; हाई कोर्ट का जज बिना सोचे आदेश कैसे दे सकता है?

सुभाष चन्द्र 

कल मैंने अपने लेख में विस्तार से लिखा था कि जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी को सरकार और विग्नेश शिशिर के दस्तावेज़ देख कर लगा था कि प्रथम दृष्टया राहुल गांधी के पास ब्रिटिश नागरिकता है तो FIR दर्ज करने और CBI जांच के आदेश देने की क्या जरूरत थी? खुद ही निर्णय दे देना चाहिए था कि वह ब्रिटिश नागरिक है। फिर उस आदेश को राहुल गांधी चुनौती देता फिरता

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन जस्टिस विद्यार्थी ने अपना आदेश रायबरेली की ट्रायल कोर्ट और जिला अधिकारी तक पहुँचने और अपने हस्ताक्षर करने से पहले ही रोक दिए और राहुल गांधी को नोटिस जारी कर 20 अप्रैल की सुनवाई तय कर दी  क्या राहुल गांधी इतना शरीफ आदमी है कि वो एक दिन में आपके नोटिस का जवाब दे देगा? 

कल हाई कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध आदेश में कोर्ट ने कहा है कि-

”शुक्रवार को सुनवाई के दौरान याची समेत केंद्र और राज्य सरकार के अधिवक्ताओं से पूछा गया था कि क्या इस मामले में विपक्षी संख्या एक(राहुल गांधी) को नोटिस जारी किए जाने की आवश्यकता है अधिवक्ताओं ने बताया कि नोटिस जारी किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, तत्पश्चात खुली अदालत में FIR का विस्तृत आदेश पारित कर दिया गया कोर्ट ने कहा कि बिना राहुल को नोटिस जारी किए मामले को निर्णीत करना उचित नहीं है”

कैसे न्यायाधीश है आप सुभाष विद्यार्थी जी जो याची, केंद्र और राज्य सरकार के अधिवक्ताओं का कहना मान कर आपने राहुल गांधी को नोटिस जारी करने की जरूरत नहीं समझी? अपना दिमाग लगाए बिना आदेश पारित कर दिया और इसका मतलब यही निकलता है कि आप उन अधिवक्ताओं की बात से सहमत थे कि नोटिस की जरूरत नहीं है 

अब राहुल गांधी को नोटिस जारी करने का दूसरा आदेश देने के लिए क्या आपकी आत्मा मर गई या किसी ने आपके पहले आदेश के बाद “डोज़” दे दी जो अपना ही आदेश रोक दिया? शिशिर ने आपके पास लखनऊ के MPMLA कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की थी जहाँ राहुल गांधी को अपना पक्ष रखने का मौका मिला था लेकिन एक सुनवाई में उसके चेलों ने हंगामा खड़ा कर दिया था और शायद उसी दबाव में जज ने 27 घंटे की सुनवाई के बाद कह दिया कि यह मामला मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है 

ऐसा ही प्रकरण जस्टिस सुभाष विद्यार्थी आप क्या अपनी अदालत में भी देखना चाहते हैं? राहुल गांधी कल तो किसी हालत में जवाब नहीं देगा और कम से कम एक महीना का समय मांगेगा अब समय कितना देना है ये पहले से सोच कर रखें या क्या उसके लिए भी किसी के निर्देश आएंगे, लेकिन एक बात याद रखिए, आप याची और केंद्र सरकार के गोपनीय दस्तावेज़ों से मान चुके हैं कि राहुल गांधी के पास ब्रिटिश नागरिकता थी

अवलोकन करें:-

केंद्र सरकार की लापरवाही से राहुल गांधी 26 साल से कथित रूप से ब्रिटिश नागरिक होकर संसद में बैठा ह
केंद्र सरकार की लापरवाही से राहुल गांधी 26 साल से कथित रूप से ब्रिटिश नागरिक होकर संसद में बैठा ह
 

इसलिए कल अगर राहुल गांधी जवाब नहीं देता तो उसे सीधा “कारण बताओ नोटिस दीजिए कि सभी दस्तावेज़ों के मद्देनज़र कोर्ट ने पाया है कि आप ब्रिटिश नागरिक थे और आपने भारतीय नागरिकता भी नहीं छोड़ी थी, इसलिए क्यों न आपकी भारत की नागरिकता रद्द कर दी जाए”

अगर आप ऐसा नहीं करते तो माना जाएगा कि आपने कांग्रेस के दबाव में कार्य किया और आप राहुल गांधी को आरोप मुक्त करना चाहते हैं

कांग्रेस ने 2005 में ही रख दी थी भारत को इस्लामिक देश बनाने की नींव

आज जो कांग्रेसी खुशी मना रहे है और उनकी खुशी मैं हिंदू शामिल है तो उन  हिन्दुओं को मालूम होना चाहिए कि साल 2005 मैं कांग्रेस एक ऐसा कानून लेकर आई थी जिसे अगर बीजेपी के विरोध की वजह से गिराया नहीं गया होता तो भारत देश आज इस्लामिक राष्ट्र बन गया होता!
यह सच्चाई CAA विरोध में भी सामने आयी थी जब हिन्दुओं की गैर-हाजिरी में मुसलमानों को कहा जाता था कि जब तक भारत इस्लामिक मुल्क नहीं बन जाता तिरंगा थामो भारत माता की जय जय बोल हिन्दुओं को गुमराह करो। इसी CAA में हिन्दुत्व के खिलाफ जितने आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल हुआ था अगर उसका .0000001% भी इस्लाम के खिलाफ इस्तेमाल हो गया होता CAA विरोध के जितने भी आन्दोलनजीवी थे कितने जिन्दा बचते कहना मुश्किल था। लेकिन हिन्दू है बेहोश पड़ा है और सनातन का अपमान बर्दाश्त कर रहा है। हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को विवादित बना दिया। और उनकी वकालत करने खड़ा होता है कपिल सिबल जैसे हिन्दू वकील। 
गौर करने वाली बात है कि यूपीए कार्यकाल में कश्मीर में शंकराचार्य हिल्स को सुलेमान हिल्स नाम दे दिया गया था। अगर बीजेपी ने घोर विरोध किया होता आज उस पूजनीय स्थल को सुलेमान के नाम से जाना जा रहा होता।   
इतना ही नहीं, कांग्रेस अपने समर्थक दलों की सहायता से एक और बिल लेकर आई थी वह भी बीजेपी की वजह से पास नही हो पाया। वह बिल था Anti-Communal Violence Bill, यह बिल भी जीते-जी हिन्दुओं की राम नाम सत्य करने वाला था। इस बिल में दंगा होने पर दंगाई मुस्लिम कट्टरपंथी नहीं पीड़ित हिन्दू साबित होता। वैसा ही खेल कहीं दंगा होने पर दंगाइयों के पकडे जाने पर देखने को मिलता है। गरीब, मजलूम, दिमाग से पागल,भटका हुआ और  मुसलमानों पर जुल्म आदि आदि कहकर बचाव में खड़े हो जाते हैं।          

ये बात गलत नहीं कटु सत्य है। हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में सोकर हिन्दुत्व को ख़त्म करने कांग्रेस और INDI गठबंधन को अपना हितैषी मान रहा है। जिस इन्दिरा गांधी के शौहर फिरोज खान जहांगीर को दफनाया जाता लेकिन उसकी बीबी और बच्चों(राजीव और संजय) का हिन्दू संस्कृति से दाह संस्कार किया गया, क्यों? किस मायाजाल में खोया है हिन्दू?
कांग्रेस पार्टी मे घुसे हिन्दू जाग जाओ। वैसे सोते को जगाना आसान है लेकिन जो जागकर सो रहा है उसे उठाना मुश्किल है। जिस बात को हिन्दू इतने सालों में नहीं समझ पाया मुसलमान मोदी के 11 सालों में समझ गया कि बीजेपी को हराने एकजुट होकर एकतरफा वोट करो जबकि हिन्दू जाति में बंट खुद ही अपने आपको कटवाने में लग कांग्रेस और INDI गठबंधन को वोट कर रहा है। इन पागल हिन्दुओं को मालूम होना चाहिए कि हिन्दुओं से कहीं ज्यादा मुसलमानों में है लेकिन बीजेपी को हराने सभी एकजुट हो जाते हैं। कोई शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पठान आदि नहीं।
मुसलमानों का एक वोट बराबर हिन्दुओं का दो वोट माना जाने वाला नियम
क्या आपको पता है की ये ओवैसी हर सभा में सच्चर आयोग को लागू करने की मांग बार-बार क्यों करता है?
क्या आपको पता है की सच्चर आयोग क्या है और किस पार्टी ने इस आयोग का विरोध किया था?
शायद बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी की यदि बीजेपी ने इसका विरोध नहीं किया होता, तो सच्चर आयोग की रिपोर्ट बहुत पहले ही लागू हो चुकी होती,
अब आते हैं की ये सच्चर आयोग है कौन सी बला है
कहने का मतलब अगर सीधी भाषा मे कहा जाए तो एक मुस्लिम एक वोट डाले तो वो मुस्लिम का एक वोट हिन्दू के दो वोटों के बराबर माना जाए और यही है सच्चर आयोग की मांग का सार
सच्चर आयोग जिसे सन् 2005 में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के द्वारा कांग्रेस पार्टी ने शुरू किया
सोनिया गांधी ने सन् 2005 भारत के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति की समीक्षा के लिए सच्चर आयोग बनाने का आदेश दिया था
अगर इसे सीधे शब्दों में कहा जाए तो कांग्रेस सरकार ने सन् 2005 में ही सच्चर आयोग की स्थापना भारत को पूर्ण रूप से तालिबान जैसा राज्य बनाने के लिए की थी
जिसमे सोनिया गांधी के निर्देशानुसार सच्चर आयोग ने सदन मे एक फर्जी रिपोर्ट पेश की और उस रिपोर्ट मे इस बात का झूठा दावा किया गया की भारत में मुसलमानों की हालत दलितों और आदिवासियों से भी ज्यादा खराब है
और इसके बाद सच्चर आयोग ने मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मुसलमानों की स्थिति सुधारने के लिए 10 प्रमुख सिफारिशें दीं,
सच्चर आयोग की सरकार से 10 मुख्य मांगें,
नंबर(1)--- मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुसार दोहरे अधिकार दिए जाएं मतलब अगर एक मुसलमान एक वोट डाले, तो उसे हिन्दुओं के दो वोटों के बराबर गिना जाए,
नंबर(2)--- मुस्लिमों को ओबीसी आरक्षण के साथ साथ SC/ST कोटे में भी इन्हें हिस्सा मिले,
नंबर(3)--- यदि कोई मुसलमान किसी बैंक से लोन लेता है तो उसका आधा लोन केंद्र और राज्य सरकार चुकाएं और इसके साथ साथ भारत के कुल बजट का 20% केवल मुसलमानों के लिए रिजर्ब किया जाए,
नंबर(4)--- अल्पसंख्यक मामलों मे मुसलमानों को मंत्रालय के तहत IIT, IIM, और MBBS जैसे क्षेत्रों में भी मुफ्त शिक्षा मिले,
नंबर(5)---इनकी मदरसे की डिग्री को IAS, IPS, PCS और जज की नियुक्ति के लिए भी मान्यता दी जाए,
नंबर(6)--- लोकसभा की 30%और राज्य की विधानसभा की 40%सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित की जाएं वो भी हर राज्य मे
नंबर(7)--- सभी राज्य सरकार के बोर्डों, निगमों और सरकारी नौकरियों में 50% सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित की जाएं,
नंबर(8)--- हर राज्य में मुसलमानों के लिए विशेष औद्योगिक क्षेत्र हो वो भी मुफ्त बिजली, मुफ्त जमीन, और ब्याज मुक्त ऋण के साथ,
नंबर(9)--- मुस्लिम लड़कियों को केंद्र सरकार से 5 लाख रूपए और राज्य सरकार से 2 लाख रूपए मिलें, तथा मुस्लिम लड़कों को स्वरोजगार के लिए 10 लाख रूपए दिए जाएं,
नंबर(10)--- जिन गांवों, कस्बों, शहरों अथवा जिलों में मुसलमानों की आबादी 25% से अधिक हो वहां केवल और केवल मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए ही चुनाव क्षेत्र आरक्षित किए जाएं
लेकिन बीजेपी के कड़े विरोध के चलते कांग्रेस का ये सच्चर आयोग लागू नहीं हो सका वरना एक मुस्लिम वोट के मुकाबले दो हिन्दू वोट गिने जाते और भारत की राजनीति और राष्ट्रीय संसाधन पूरी तरह से मुस्लिम समाज को सौंप दिए जाते
कांग्रेस अंग्रेजो का बनाया हुआ इसायत इस्लामिक आतंकवादी संगठन जिसने भारत के तीन टुकड़े किये वो खानदान महान पढ़ाया बताया गया!
नयी संसद बनने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस चोल साम्राज्य के राजदंड की स्थापना की जिसे जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जागीर समझ अपने पास रख लिया था। उसका भी कांग्रेस और इसके समर्थक पार्टियों ने विरोध किया था और हिन्दू भी इनके जहर को समर्थन देता रहा।

सावधान: लेंसकार्ट "कन्वर्ट-कार्ट" का धंधा भी चला रहा है। बॉयकॉट #lenskart

पीयूष बंसल, जिन पर लेंस कार्ट बनाने के लिए अपने दोस्त का विचार चुराने और उसे धोखा देने का आरोप है,
टीवी पर हिंदू भावनाओं का मज़ाक उड़ाते हुए देखे गए हैं,
जबकि अपने कार्यालय में बुर्का की अनुमति देकर इस्लामी सांस्कृतिक प्रथाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, तिलक, कलावा और चंदन पर कथित तौर पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
कॉर्पोरेट जिहाद इस देश को दीमक की तरह खा रहा है
टीसीएस के बाद अब लेंस कार्ट
हिजाब, पगड़ी की अनुमति है लेकिन कलावा, बिंदी की नहीं
सिन्दूर दिखाई नहीं देना चाहिए
अगर जांच होगी तो यहां भी बहुत कुछ सामने आएगा।

पोस्ट सोर्स इंटरनेट 

पौराणिक गाथा : अन्नदान नहीं करने पर जब चित्रगुप्त जी महाराज ने दानवीर कर्ण को मोक्ष देने से इंकार कर दिया और प्रारम्भ हुई श्राद्ध परम्परा


आज पश्चिमी सभ्यता हमारे पर इतनी हावी हो चुकी है कि अपने सनातनी संस्कार ही भूल गए। सनातन में प्रत्येक त्यौहार और दान का अपना महत्व है। ज्येष्ठ माह की एकादशी पर लोग प्याऊ लगाते थे और दूध-दही की लस्सी बांटते थे। इतना ही नहीं गर्मी के दिनों में जगह-जगह प्याऊ लगवाते थे ताकि गर्मी में पथिक को दो घूंट पानी मिलने पर लू के प्रकोप से बच सके। बदलते परिवेश में सब इतिहास बन गए। क्योकि लोगों को ही पीने का पानी नहीं मिल रहा प्याऊ कहाँ से लगवाएं। सनातन परम्परा को धूमिल करने में जितनी पश्चिमी सभ्यता है उससे कहीं अधिक हमारी सरकारें और सनातन को बदनाम करते कालनेमि बने फिर रहे हिन्दू।

एक समय था जब श्राद्ध प्रारम्भ होते ही हिन्दू त्योहारों का आगमन मानते थे, जबकि श्राद्ध अच्छे दिन नहीं होते इन दिनों कोई शुभ काम नहीं होते फिर ख़ुशी-ख़ुशी श्राद्ध मनाते थे, क्योकि जिसके घर में श्राद्ध होता था वह अपने परिवार, निजी रिश्तेदार और मौहल्ले में खास मिलने वालों को बुलाकर श्राद्ध को त्यौहार की भांति मनाते थे, अनाथालय या निकट के मन्दिर में अपने पितरों के नाम से घर में बने पकवान का भोग देते थे, लेकिन सब बेमानी हो गया। श्राद्ध तो लगभग ख़त्म हुए बराबर समझो। पितरों पर अहसान कर किसी मंदिर में रूपए देकर बला टाल अपने आपको धन्य मानना शुरू कर दिया। वर्तमान पीढ़ी को नहीं मालूम कि उनके नाम से भोजन दान करने से हमारे पितृ कितने खुश होते हैं अपना आशीष देते हैं परमपिता परमेश्वर अपनी फुलवारी पर अपनी अनुकम्पा बनाये रखने की विनती करते हैं। घर-परिवार और अतिथि जब भोजन उपरांत जल पीते हैं वह जल उनके माध्यम से हमारे पितृ पीकर अपनी फुलवारी की मंगल कामना करते हैं।

श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि आत्मा कभी मरती नहीं, ये बस एक शरीर से दूसरे शरीर में बदलती है। इसलिये आप अपने पूर्वजों को जब भी कुछ अर्पित करते हो तो वो उन्हें मिलता है।

महाभारत की कथा के अनुसार मृत्यु के उपरांत जब दानवीर कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इंकार कर दिया था। तब कर्ण ने चित्रगुप्त से पूछा कि मैंने अपनी सारी सम्पदा सदैव दान पुण्य में ही समर्पित की है तो फिर मुझ पर यह कैसा ऋण शेष रह गया है, तब चित्रगुप्त ने बताया, राजन आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुकता कर दिया परंतु आप पर पितृ ऋण शेष है। आपने अपने काल में सम्पदा एवं सोने का दान किया है। अन्न का दान नहीं किया। जब तक आप यह ऋण नहीं उतारते आपको मोक्ष मिलना संभव नहीं। इसके उपरांत धर्मराज ने दानवीर कर्ण को व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पृथ्वी पर जाकर अपने ज्ञात एवं अज्ञात पितरों को प्रसन्न करने के लिए विधिवत श्राद्ध-तर्पण तथा पिंड दान करके आइए तभी आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। दानवीर कर्ण ने वैसा ही किया तभी उन्हें मोक्ष मिला। किंवदंती है कि तभी से श्राद्ध की प्रथा आरंभ हुई।
पितृपक्ष में संत, गुरुजन और रोगी वृद्ध या जरूरतमंदों की जितनी सेवा हो सके करना चाहिए। साथ ही अपने परलोक सुधार के लिए भी दान-पुण्य करना चाहिए। त्योहारों पर दान करना इसलिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। श्राद्ध के दिनों में घर पर कोई भिक्षा मांगने आए तो उसे कभी खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए। मान्यता है कि यदि पितृ प्रसन्न नहीं होते तो परिवार में बाधाएं आती हैं। अकाल मृत्यु का भय बना रहता है।
पितृ पक्ष की पौराणिक कथा के अनुसार जोगे तथा भोगे दो भाई थे। दोनों अलग-अलग रहते थे। जोगे धनी था और भोगे निर्धन। दोनों में परस्पर बड़ा प्रेम था। जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, किंतु भोगे की पत्नी बड़ी सरल हृदय थी।
पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की चेष्टा करने लगा, किंतु उसकी पत्नी समझती थी कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग बातें बनाएंगे। फिर उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाने और अपनी शान दिखाने का यह उचित अवसर लगा।
अतः वह बोली- 'आप शायद मेरी परेशानी की वजह से ऐसा कह रहे हैं, किंतु इसमें मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी। दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी।' फिर उसने जोगे को अपने पीहर न्यौता देने के लिए भेज दिया।
दूसरे दिन उसके बुलाने पर भोगे की पत्नी सुबह-सवेरे आकर काम में जुट गई। उसने रसोई तैयार की। अनेक पकवान बनाए फिर सभी काम निपटाकर अपने घर आ गई। आखिर उसे भी तो पितरों का श्राद्ध-तर्पण करना था।
इस अवसर पर न जोगे की पत्नी ने उसे रोका, न वह रुकी। शीघ्र ही दोपहर हो गई। पितर भूमि पर उतरे। जोगे-भोगे के पितर पहले जोगे के यहां गए तो क्या देखते हैं कि उसके ससुराल वाले वहां भोजन पर जुटे हुए हैं। निराश होकर वे भोगे के यहां गए। वहां क्या था? मात्र पितरों के नाम पर 'अगियारी' दे दी गई थी। पितरों ने उसकी राख चाटी और भूखे ही नदी के तट पर जा पहुंचे।
थोड़ी देर में सारे पितर इकट्ठे हो गए और अपने-अपने यहां के श्राद्धों की बढ़ाई करने लगे। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपनी आपबीती सुनाई। फिर वे सोचने लगे- अगर भोगे समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा न रहना पड़ता, मगर भोगे के घर में तो दो जून की रोटी भी खाने को नहीं थी। यही सब सोचकर उन्हें भोगे पर दया आ गई। अचानक वे नाच-नाचकर गाने लगे- 'भोगे के घर धन हो जाए। भोगे के घर धन हो जाए।'
सांझ होने को हुई। भोगे के बच्चों को कुछ भी खाने को नहीं मिला था। उन्होंने मां से कहा- भूख लगी है। तब उन्हें टालने की गरज से भोगे की पत्नी ने कहा- 'जाओ! आंगन में हौदी औंधी रखी है, उसे जाकर खोल लो और जो कुछ मिले, बांटकर खा लेना।'
बच्चे वहां पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि हौदी मोहरों से भरी पड़ी है। वे दौड़े-दौड़े मां के पास पहुंचे और उसे सारी बातें बताईं। आंगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह सब कुछ देखा तो वह भी हैरान रह गई।
इस प्रकार भोगे भी धनी हो गया, मगर धन पाकर वह घमंडी नहीं हुआ। दूसरे साल का पितृ पक्ष आया। श्राद्ध के दिन भोगे की स्त्री ने छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाएं। ब्राह्मणों को बुलाकर श्राद्ध किया। भोजन कराया, दक्षिणा दी। जेठ-जेठानी को सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन कराया। इससे पितर बड़े प्रसन्न तथा तृप्त हुए।।