काँवड़ यात्रा को बदनाम करने के लिए वामपंथी-कट्टरपंथी और मीडिया फर्जी Video, झूठे आरोप, हमले और नफरती बयान फैला रहे हैं भ्रम

सावन के पवित्र महीने में काँवड़ यात्रा का समापन हो चुका है। लाखों शिवभक्तों ने कठिन रास्तों को पार करते हुए अपनी आस्था की डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। लेकिन इस पूरी यात्रा के दौरान एक दूसरा पहलू भी देखने को मिला, जो बेहद चिंताजनक था। कुछ कट्टरपंथी ताकतों, वामपंथी विचारकों और पक्षपाती मीडिया ने मिलकर काँवड़ यात्रा और काँवड़ियों को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कहीं काँवड़ियों पर कातिलाना हमले हुए, तो कहीं सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाकर उन्हें उपद्रवी साबित करने की कोशिश की गई। इसमें हम जानेंगे कि कैसे इस साल की काँवड़ यात्रा पर सुनियोजित तरीके से हिंदू आस्था के खिलाफ भ्रम और नफरत फैलाई गई।

काँवड़ियों और हिंदुओं पर शारीरिक हमले: ग्वालियर से लखीमपुर तक हिंसा

काँवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों में शिवभक्तों को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रात के उस समय भयानक तनाव फैल गया, जब काँवड़ यात्रा में शामिल होने जा रहे कुछ युवकों पर कथित तौर पर मुस्लिम युवकों ने हमला कर दिया। कार से टक्कर लगने को लेकर उपजा विवाद पल भर में हिंसक झड़प में बदल गया।

मुस्लिम हमलावरों ने तलवारों, हथौड़ों और पत्थरों से काँवड़ियों पर हमला किया। इस बर्बर हमले में विवेक यादव नाम का युवक गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर में 18 टांके लगाने पड़े। घटना के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर विरोध किया और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में अरशद खान, गोलू खान, अकील खान और बंटू खान समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की।

 इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के थाना खीरी क्षेत्र में भी काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया गया। रुखिया गाँव से करीब 40-50 काँवड़िये नहर के पास स्थित मंदिर से जल लेकर जा रहे थे। जब उनका जत्था जुलाहनपुरवा के पास पहुँचा, तो अचानक उन पर पथराव शुरू हो गया, जिससे सड़क पर भगदड़ मच गई।

इस हमले में राजापुर के रहने वाले काँवड़िया विकास के सिर में गंभीर चोटें आईं। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति संभाली और जाँच में जुटी। हालाँकि पुलिस ने प्रारंभिक जाँच में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग का हाथ बताया, लेकिन इस तरह की घटनाएँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यात्रा के दौरान माहौल बिगाड़ने और हिंदुओं को निशाना बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे थे।

मीडिया और सोशल मीडिया का गंदा खेल: मेरठ की घटना पर फैलाया गया सफेद झूठ

सावन के महीने में वामपंथियों और कट्टरपंथियों की आँखों में काँवड़िए हमेशा से खटकते रहे हैं। वे हरसंभव तरीके से इनकी छवि को धूमिल करने की फिराक में रहते हैं। ऐसा ही एक घिनौना प्रयास मेरठ की घटना को लेकर किया गया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल किया गया, जिसमें दावा किया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है, उनकी वर्दी फाड़ी है और उन्हें पीटकर भगा दिया है।
इस फर्जी नैरेटिव को फैलाने में कई जाने-माने सोशल मीडिया हैंडल और तथाकथित पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ‘मुस्लिम वॉयस सेल’ के ट्वीट से लेकर पीयूष राय, सचिन गुप्ता और जाकिर त्यागी जैसे लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया। यहाँ तक कि चर्चित फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने भी इस भ्रामक दावे को रिपोस्ट किया।

जब इस मामले में मेरठ पुलिस का आधिकारिक बयान सामने आया, तो पूरा सच जनता के सामने आ गया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो के दावे पूरी तरह झूठे हैं। असलियत यह थी कि 3 अगस्त की रात जब दो अलग-अलग काँवड़ियों के ग्रुप आमने-सामने आए, तो सोनू और गुड्डू नाम के युवकों का दूसरे काँवड़ियों से टकराव हो गया। दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ दिखाई और उन दोनों को अपनी जीप में बैठाकर सुरक्षित करने की कोशिश की।
तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर उन्हीं लोगों को गाड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। पुलिस के साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी और न ही किसी की वर्दी फाड़ी गई थी। इसके बावजूद, मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों ने भी बिना पुलिस का पक्ष जाने ‘पुलिसकर्मियों की पिटाई’ की हेडलाइन के साथ सनसनीखेज खबरें चला दीं, जिससे साबित होता है कि मीडिया का एक वर्ग किस हद तक काँवड़ियों के खिलाफ पूर्वाग्रही है।

मुख्यधारा की मीडिया और वामपंथियों का एजेंडा: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से लेकर तुष्टिकरण का रोना

सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबारों ने भी काँवड़ यात्रा के खिलाफ अपने संपादकीय के जरिए वैचारिक जहर उगला। ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक लेख (शीर्षक: The problem isn’t the kanwar yatra. It’s a patronising state) में काँवड़ यात्रा और इसके भक्तों पर गंभीर कटाक्ष किए गए। इस लेख में तर्क दिया गया कि राज्य सरकारों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना, उन पर फूलों की वर्षा करना (जैसे प्रयागराज में आईजी और डीएम द्वारा किया गया) या यात्रा मार्ग पर गैर-वेज की दुकानों पर रोक लगाना और दुकानदारों के नाम लिखने के आदेश देना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।
लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि सरकारें भक्तों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं और उनकी तुलना जिन्ना या सावरकर की राजनीति से कर डाली। यह नजरिया पूरी तरह से दोहरे मापदंड को दिखाता है। जब अन्य मजहबों के आयोजनों या जुलूसों में प्रशासनिक व्यवस्थाएँ की जाती हैं, तब यही वर्ग मौन रहता है, लेकिन जब हिंदू युवा अपनी आस्था के साथ सड़कों पर निकलते हैं, तो उन्हें ‘असुविधा’ या ‘भीड़ का डर’ कहकर प्रोजेक्ट किया जाने लगता है।
सरकार के अधिकारियों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना या उनके रास्ते की व्यवस्था संभालना एक जन कल्याणकारी और प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसे वामपंथी विचारक हमेशा ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहिष्कार’ और ‘तुष्टिकरण’ का रंग देने की कोशिश करते हैं। यह सब इस बात का प्रमाण है कि एक खास वैचारिक वर्ग हिंदू आस्था को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाना चाहता है।

नफरती बयानों और सोशल मीडिया का जहर

काँवड़ यात्रा को बदनाम करने में मजहबी कट्टरपंथियों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने मर्यादा की सभी हदें पार करते हुए काँवड़ यात्रा पर जाने वाले शिवभक्तों को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ और नशेड़ी करार दिया। मौलाना साजिद ने अपनी नफरत भरी जुबान से आरोप लगाया कि काँवड़िए सड़कों पर नंगा नाच करते हैं, शराब पीते हैं, एंबुलेंस को रोकते हैं, स्कूल वैन के शीशे तोड़ते हैं और पुलिसवालों को पीटते हैं।
मौलाना साजिद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी अभद्र तंज कसे और काँवड़ यात्रा को रोकने की माँग की। एक तरफ जहाँ मौलाना जैसे लोग हिंदुओं की आस्था को कुचलने वाले बयान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर यह दुष्प्रचार किया गया कि काँवड़िए शिवजी का मूल मंत्र छोड़कर मनमाने नारे लगाते हैं।
हद तो तब हो गई जब मुफ्ती शाहनवाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी कर खुलेआम जहर उगला। उसने कहा, “हमारे इस्लाम में किसी गैर मुस्लिम की मदद करना, पानी पिलाना या खाना खिलाना हराम है।”  
यह बयान इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कट्टरपंथी किस तरह समाज में नफरत की दीवारें खड़ी करना चाहते हैं। एक तरफ जहाँ हिंदू समाज सहृदयता और सेवा भाव का परिचय देता है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे कट्टरपंथी उपदेश देकर दो समुदायों के बीच नफरत का जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन तमाम बयानों और पोस्टों का मकसद सिर्फ और सिर्फ काँवड़ यात्रा को सांप्रदायिक रंग देना और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाना था।

हिंदू त्योहारों पर सुनियोजित तरीके से होता हमला…

इस वर्ष (2026) की काँवड़ यात्रा को लेकर भारत में सनातन धर्म और उसके प्रतीकों को बदनाम करने के लिए किस प्रकार एक सुनियोजित इकोसिस्टम काम कर रहा है। एक तरफ जहाँ भोले-भाले शिवभक्त अपनी कठिन यात्रा पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी, वामपंथी विचारक, और कुछ बिकाऊ मीडिया संस्थान मिलकर उन पर हमले करवा रहे थे और दूसरी तरफ फर्जी वीडियो के जरिए उन्हें ही उपद्रवी साबित करने में जुटे थे।
मुहर्रम या अन्य जुलूसों के दौरान खुलेआम निकलने वाले हथियारों और हिंसक प्रदर्शनों पर आँखें मूंद लेने वाले लोग, काँवड़ियों के हाथों में एक छोटी सी लाठी या डंडे को भी बहुत बड़ा मुद्दा बना देते हैं। सरकार के कल्याणकारी कार्यों और जनता की आस्था को कुचलने का यह कुचक्र हमेशा से चलता आ रहा है। सनातन धर्म और हिंदू त्योहारों से नफरत करने वाले कट्टरपंथी और वामपंथी ऐसे समय में सुनियोजित तरीके से हमला करते हैं।

भारत का विभाजन, कुछ हद तक महाभारत दोहराया गया

सुभाष चन्द्र

महाभारत में दुर्योधन ने कहा था एक वन में दो सिंह नहीं रह सकते जिसका मतलब था युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों युवराज हैं, उनमें से एक ही रहेगा और भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर के बंटवारे की घोषणा कर दी। 

ठीक उसी तरह मुस्लिम लीग का मोहम्मद अली जिन्ना अड़ गया कि मुस्लिम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते

भारत दो राष्ट्र हैं, एक हिंदू राष्ट्र और एक मुस्लिम राष्ट्र”
 इसलिए हमें मुसलमानों के लिए अलग मुल्क चाहिए और भारत के स्वघोषित पितामह गांधी अपने पिट्ठू नेहरू के साथ मिलकर पाकिस्तान देने के लिए तैयार हो गए गांधी कहते थे देश का बटवारा उनकी लाश पर होगा लेकिन हिंदुओं की लाशों पर हुआ और गांधी को कुछ नहीं हुआ मुस्लिम पूरी तरह कौरवों की तरह देश के विभाजन पर अड़े थे

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भीष्म पितामह शरीर से कौरवों के साथ थे लेकिन मन से पांडवों के साथ थे और उनका आशीर्वाद भी पांडवों के लिए था, लेकिन हमारे आधुनिक भारत का पितामह गांधी तन से तो भारत में थे लेकिन मन से कौरवों (पाकिस्तान) के साथ थे मुसलमानों को गांधी सब कुछ मनचाहा दिया, हिंदू मरते रहे लेकिन मुस्लिमों को बचाने के लिए नोआखली में अनशन पर बैठ गया और न जाने कितने हिन्दुओं के नरसंहार के लिए गांधी जिम्मेदार थे बंगाल में कटवा दिए, मोपला में कटवा दिए और भगत सिंह को फांसी चढ़ने से नहीं रोका

गाँधी की देशभक्ति उस समय मिली जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जिन्दा या मुर्दा ब्रिटिश सरकार को सौंपने के agreement पर गाँधी के साथ साथ अन्य कांग्रेस नेताओं ने साइन किया था, क्यों? जबकि देश को आज़ादी दिलाने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर पार्टी और भगत सिंह पार्टी का बलिदान। है फिर देशवासियों को बताया जाता है कि गाँधी और कांग्रेस ने आज़ादी के लड़ाई लड़ी। क्या स्वांग रचा गया? मुस्लिम कट्टरपंथी और पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स और संविधान की दुहाई देने वाले गाँधी के नाम की माला इसलिए जपते हैं क्योकि मुस्लिम तुष्टिकरण के जन्मदाता अंग्रेज़ और महात्मा गाँधी हैं। 

दूसरे, जेहादियों और उपद्रवियों द्वारा victim card खेलने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महात्मा गाँधी ही जिम्मेदार है। याद करो जब स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या करने वालों के लिए गाँधी ने कहा था कि मेरे मुसलमान भाई किसी की हत्या नहीं कर सकते। शर्म आती है उन एंकरों और उन प्रवक्ताओं पर जो मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा नाथूराम गोडसे को पहला आतंकवादी कहने पर मुंह तोड़ जवाब दे सकें। किसी ने माँ का दूध नहीं पिया जो उन कट्टरपंथियों से पूछ सके कि गाँधी की हत्या से पहले स्वामी श्रद्धानन्द और राजपाल की हत्या किसी गोडसे ने नहीं बल्कि मुसलमानों ने की थी। मीडिया को भी अपनी TRP की फ़िक्र रहती है सच्चाई बताने की नहीं।        

नाथूराम गोडसे से गांधी का पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपया विभाजन के बाद भी देना सहन नहीं हुआ और फिर गांधी वध को RSS के नाम पर फोड़ते हुए कांग्रेस हर चुनाव में Gandhi Vadh Dividend भुनाती रही

गांधी खुलेआम कहते थे हिंदुओं को अगर मुस्लिम क़त्ल करें तो सहर्ष स्वीकार करें, उनकी महिलाओं का बलात्कार करें तो विरोध न करें मंदिरों को नमाज पढ़ते थे गांधी लेकिन किसी मस्जिद में रामायण या गीता पाठ नहीं करते थे ऐसे थे ये पितामह जो धर्म से कथित तौर पर हिंदू थे और कर्म से मुस्लिम

अफ़सोस की बात है गांधी का अपमान करने को दंडात्मक अपराध बना दिया गया लेकिन भगवान राम, शंकर जी और कृष्ण जी के अपमान की खुली छूट दी गई है कैसा संविधान दिया बाबा साहब ने?

उनका शागिर्द नेहरू तो शकुनि का अवतार था शकुनि हस्तिनापुर को तबाह करने आया था और नेहरू ने उसी की तरह भारत के टुकड़े टुकड़े कर इधर उधर बाँट दिए जिसको जितना चाहिए काट काट ले जाए ऐसा लगा जैसे टुकड़े टुकड़े गैंग को शुरू ही नेहरू ने किया

दुर्योधन जैसे हस्तिनापुर से संतुष्ट नहीं था और वो पांडवों का इंद्रप्रस्थ भी हड़पना चाहता था वैसे ही मुस्लिम पाकिस्तान लेकर भी संतुष्ट नहीं थे। एक तिहाई कश्मीर नेहरू ने दे दिया और नारा लगाते थे -”लड़ के लिया है पाकिस्तान, हंस के लेंगे हिंदुस्तान” कांग्रेस और अन्य सेकुलर कीड़े उसके मिशन को पूरा करने के लिए चाहते है “लड़ के ले गए पाकिस्तान, हम हंस के देंगे हिंदुस्तान” 

लेकिन पाकिस्तान और भारत में उनके चाहने वालों को याद रखना चाहिए कि कौरव पूरी तरह समाप्त हो गए और आज उसी तरह पाकिस्तान भी खात्मे की कगार पर है हिंदुस्तान तो क्या एक इंच भूमि भी न लड़ के ले सकता है और न हंस के ले सकता है बल्कि खुद ही खंड खंड हो जायेगा

यही एकरूपता है महाभारत और 1947 में भारत के विभाजन की जो अंग्रेज़ (ब्रिटेन) पाकिस्तान बना कर गए थे वो खुद आज एक इस्लामिक मुल्क बनने की ओर बढ़ रहे है

साभार सोशल मीडिया 

भारत माता की जय!

अभिजीत दीपके के देश से गद्दारी के सबूत, स्वतंत्रता दिवस से पहले फिर अराजकता फैलाने की बड़ी साजिश, बड़े अराजक निकले गुरु और चेला

एक प्रसिद्ध हिंदी कहावत है- “एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा”। इसका अर्थ है कि एक बुराई या समस्या के साथ दूसरी बुराई या समस्या का जुड़ जाना, जिससे स्थिति और भी अधिक खराब हो जाती है। इसे और सरल शब्दों में समझ सकते हैं कि जब कोई दुष्ट या बुरे स्वभाव का व्यक्ति किसी बुरी संगति में पड़ जाता है, तो वो और अधिक अराजक हो जाता है। यह कहावत आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके पर पूरी तरह से लागू होता है। क्योंकि गुरु अरविंद केजरीवाल खुद अपने आप को अराजक (अनार्किस्ट) बात चुके हैं, वहीं एक नए खुलासे से पता चलता है कि चेला अभिजीत दीपके तो अपने गुरु केजरीवाल से भी ज्यादा अराजक है। 

स्वतंत्रता दिवस पर अराजकता फैलाने की प्लानिंग, लोगों ने भगाया

15 अगस्त,2026 को पूरा देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, लेकिन अभिजीत दीपके ने अपने गुरु अरविंद केजरीवाल की तरह दिल्ली की सड़कों पर फिर अराजकता पैदा करने की प्लानिंग की है। उन्होंने इस प्लान का नाम ‘जंतर-मंतर सीजन 2′ दिया है। लेकिन अभिजीत और उसके साथियों को दिल्ली के एक रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क से उलटे पांव भागना पड़ा। दीपके अपनी टीम के मेंबर सौरभ दास, आशुतोष रंका और कुछ समर्थकों के साथ रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में जंतर-मंतर सीजन 2 का प्लान बनाने आए थे। सोसाइटी के लोगों को जब इसकी भनक लगी तो वे वहां बड़ी संख्या में पहुंच गए और पार्क से सभी को भगा दिया। लोगों का कहना था कि यह सोसाइटी का पार्क है कोई धरना या प्रदर्शन की जगह नहीं। यहां यह नौटंकी नहीं चलेगी।

‘जंतर-मंतर सीजन 2’ में चाहिए पीएम मोदी और अमित शाह का इस्तीफा

रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए अभिजीत ने कहा कि जल्द “जंतर-मंतर सीजन 2 शुरू होने जा रहा है। अभिजीत ने अपने समर्थकों से पूछा कि अब किसका इस्तीफा चाहिए। समर्थकों ने कहा मोदी और अमित शाह का इस्तीफा। इससे पता चलता है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से गुरु केजरीवाल का मिशन पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अभिजीत दीपके अपने गुरु का मुख्य मिशन यानी प्रधानमंत्री मोदी का इस्तीफा लेने के लिए “जंतर-मंतर सीजन 2 की तैयारी में लगा है। विक्टिम कार्ड खेलते हुए दीपके ने आरोप लगाया कि प्रशासन और राजनीतिक दबाव के चलते उन्हें वालंटियर्स की इनडोर मीटिंग के लिए हॉल की बुकिंग आखिरी समय में रद्द करनी पड़ी, जिसके बाद उन्हें खुले में बैठक करनी पड़ी।

 

20 जुलाई को दिल्ली में दिखा अभिजीत दीपके का अराजक चेहरा

20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में संसद मार्ग और जंतर-मंतर के पास युवाओं और छात्रों (कॉकरोच जनता पार्टी) के नेतृत्व में बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था। नीट परीक्षा में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ यह मार्च संसद के बेहद करीब पहुंच गया था, जहां पुलिस के साथ झड़प, आंसू गैस के इस्तेमाल और पथराव के कारण भारी अफरातफरी और तनाव का माहौल बन गया था। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प में एसीपी सहित कई पुलिसकर्मी घायल हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में सैकड़ों आपराधिक पृष्ठभूमि (हिस्ट्रीशीटर) के लोग भीड़ में शामिल थे। इससे पता चलता है कि अभिजीत दीपके और उसके इकोसिस्टम का इरादा बांग्लादेश और नेपाल की तरह दिल्ली को जलाना था, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर उनके नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया।

अभिजीत दीपके ने अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में चलाया था प्रोपेगैंडा 

2019 में अभिजीत दीपके आप (AAP) का राष्ट्रीय सोशल मीडिया समन्वयक था। अभिजीत दीपके ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया था और जम्मू-कश्मीर के लोगों को भड़काने की कोशिश की थी। अभिजीत ने सोशल मीडिया के माध्यम से कश्मीर में कार्रवाई को लेकर फर्जी खबरें (Fake News) फैलाई थीं। ट्वीटर पर एक चैट में अभिजीत दीपके ने लिखा था, I’m afraid of losing him, I don’t want him to die. But that’s a reality in Kashmir everyday” यानी “मुझे उसे खोने का डर है, मैं नहीं चाहता कि उसकी मौत हो। लेकिन कश्मीर में हर दिन यही सच्चाई है।”

कश्मीर में लोग लगातार मौत के साए/डर में जी रहे हैं- अभिजीत दीपके

अभिजीत दीपके ने नाम का खुलासा किए बिना अपने किसी कश्मीरी दोस्त के हवाले से सोशल मीडिया पर कश्मीर और देश में डर का माहौल बनाने की कोशिश की थी। साथ ही पाकिस्तान सहित अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को बताना चाहता था कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से लोग डर के साए में जी रहे हैं। अभिजीत ने ट्वीटर पर लिखा था, “People are living in a constant fear of death. I had this chat with one of my friend last night.” यानी “लोग लगातार मौत के साए/डर में जी रहे हैं। कल रात मेरी अपने एक दोस्त से यही बातचीत हुई थी।” इस पोस्ट से पता चलता है कि अभिजीत दीपके का एकमात्र मकसद कश्मीर में सक्रिय अलगाववादियों/आतंकवादियों के लिए समर्थन जुटाना था। दिल्ली की तत्कालीन केजरीवाल सरकार और पार्टी से जुड़े होने के कारण, वह ऐसा प्रोपेगैंडा चला रहा था, जिससे भारत-विरोधी शक्तियों को मदद मिल रही थी। 

अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में खड़ा होने की अपील

इस दौरान अभिजीत दीपके ने ट्विटर (अब X) पर कई पोस्ट किए थे, जिन्हें लेकर सोशल मीडिया पर काफी विवाद हुआ था। 5 अगस्त 2019 को अभिजीत दीपके ने ट्वीटर पर लिखा था, “कश्मीर के साथ खड़ा होने की जरूरत है। आज जो कुछ कश्मीर में हो रहा है, कल आपके राज्य में भी हो सकता है।” हैरानी की बात है कि 5 अगस्त 2019 को गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का संकल्प और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश किया, जिसे राज्यसभा ने उसी दिन पास किया। अभिजीत दीपके ने पास होने के थोड़ी देर बाद देर रात 1 बजकर 22 मिनट पर कश्मीर के साथ खड़े होने का ट्वीट कर दिया था। इसकी टाइमिंग देखकर लगता है कि अनुच्छेद 370 हटने से इसे कितना बड़ा झटका लगा था।

 कश्मीर में कार्रवाइयों की तुलना इजराइल से की थी

अभिजीत दीपके की मानसिकता देश और सेना विरोधी है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंद कर कर्फ्यू लगा दी गई थी। इस दौरान अभिजीत दीपके ने कश्मीर में इंटरनेट बंदी और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों की तुलना इजराइल की नीतियों से करते हुए सरकार और सुरक्षा बलों की आलोचना की थी। इसके बाद 26 सितंबर 2019 को अभिजीत दीपके ने कश्मीर के लोगों को भड़काने के लिए सोशल मीडिया में पोस्ट किया था, “कश्मीर में कब जागोंगे ? अब तो 370 भी हट गया।”
धारा 370 की क्या ज़रूरत थी?- अभिजीत दीपके
अभिजीत दीपके ने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “धारा 370 की क्या ज़रूरत थी? जम्मू और कश्मीर को भारत के अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की तुलना में अलग अधिकारों की आवश्यकता क्यों थी? आज़ादी के बाद 550 से अधिक देशी रियासतें (Princely states) बिना धारा 370 जैसी किसी शर्त के भारत के अधीन आई थीं। धारा 370 एक बहुत बड़ी विफलता (fiasco) थी, शेख अब्दुल्ला इसका इस्तेमाल एक अलग कश्मीर बनाने के लिए करना चाहते थे।”
देश और कश्मीर विरोधी प्रोपेगैंडा के लिए LRO ने दर्ज कराई थी शिकायत
अभिजीत दीपके द्वारा लगातार देश और कश्मीर विरोधी ट्वीट के बाद ‘लीगल राइट्स आब्जर्वेटरी’ (LRO) ने पुणे में एक आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई थी। उन पर कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ भड़काऊ और झूठा प्रचार करने तथा अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। लीगल राइट्स आब्जर्वेटरी (LRO) ने अपनी शिकायत में चार मांगें की थीं…
  1. देशद्रोह (राजद्रोह) और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने से संबंधित आईपीसी (IPC) की धाराओं के तहत अभिजीत दीपके के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए,
  2. यूएपीए (UAPA) के तहत अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया जाए और हुर्रियत तथा अन्य कश्मीरी अलगाववादी/आतंकवादी समूहों के साथ उसके गुप्त संबंधों की पूछताछ की जाए,
  3. यह पता लगाने, जांच करने और उजागर करने के लिए कि क्या उसने बड़े पैमाने पर भारत-विरोधी दुष्प्रचार चलाने के लिए संदिग्ध स्रोतों से धन प्राप्त किया है, उसके पिछले 5 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की जांच की जाए,
  4. किसी विदेशी खुफिया एजेंसी के साथ उसकी संभावित साँठगाँठ की जाँच के लिए उसके विदेशी दौरों के विवरण की जाँच की जाए।
दिल्ली दंगा के आरोपी उमर खालिद का समर्थक
अब सवाल उठता है कि महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अभिजीत दीपके का कश्मीर, अनुच्छेद 370 और उमर खालिद के प्रति इतना प्रेम क्यों है? दरअसल, यह प्रेम देश विरोधी इकोसिस्टम के गठजोड़ का नतीजा है, जो एक-दूसरे की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद करते हैं। वर्ष 2016 में उमर खालिद ने जेएनयू में कश्मीर के आत्मनिर्णय (Self-determination) की वकालत थी। इस दौरान प्रदर्शन में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” का नारा लगा था। इसके बाद उमर खालिद पर 2020 दिल्ली दंगों के आरोप लगे। इसके बावजूद अभिजीत दीपके ने उमर खालिद का समर्थन किया है और समय समय पर उमर खालिद की जमानत को लेकर आवाज उठाते रहते हैं। सोशल मीडिया में उन्होंने सवाल उठाया था कि उमर खालिद पिछले 5 साल से बिना ट्रायल के जेल में हैं। उनके अलग तरीके से व्यवहार क्यों किया जा रहा है?
अभिजीत दीपके को अराजकता फैलाने की ट्रेनिंग कैसे मिली है। किस तरह गुरु अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सड़कों पर अराजकता का प्रदर्शन किया है… 
गणतंत्र दिवस से ठीक पहले सड़क पर ही धरने पर बैठ थे गुरु केजरीवाल
अभिजीत दीपके का गुरु अरविंद केजरीवाल कितना बड़ा अराजकतावादी हैं, इसका प्रमाण जनवरी 2014 में गणतंत्र दिवस से ठीक पांच दिन पहले मिला था। गणतंत्र दिवास की तैयारियों को लेकर दिल्ली में राजपथ (वर्तमान में कर्तव्य पथ) पर परेड के लिए सेना, सुरक्षा बलों और विभिन्न राज्यों की झांकियों का पूर्वाभ्यास हो रहा था। ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल ने रेल भवन के पास अनिश्चितकालीन धरना दिया था। हालांकि यह प्रदर्शन दो दिनों (20 और 21 जनवरी 2014) तक चला था, लेकिन 20 जनवरी 2014 को गृह मंत्रालय की तरफ जाने से रोके जाने के बाद केजरीवाल अपने मंत्रियों और समर्थकों के साथ रेल भवन के बाहर सड़क पर ही धरने पर बैठ गए थे और कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात बिताई। गणतंत्र दिवस समारोह के ठीक पहले उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में इस तरह के प्रदर्शन से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया था।
मैं मानता हूं कि मैं अनार्किस्ट हूं- अरविंद केजरीवाल
आम आदमी पार्टी के रेलवे भवन के आगे धरने के ऐलान के कारण चार मेट्रो स्टेशन – पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, उद्योग भवन और रेस कोर्स रोड बंद कर दिया गया था। केंद्रीय सचिवालय स्टेशन पर इंटरचेंज की सुविधा भी नहीं थी। सरकारी और निजी क्षेत्र के अधिकारियों और कर्मचारियों को ऑफिस आने-जाने वालों के साथ ही आम लोगों असुविधा हो रही थी। ऐसे में अरिवंद केजरीवाल अपने मंत्रियों के साथ सड़क पर धरना दे रहे थे। 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस को लेकर दिल्ली में पूरी तरह अफरा-तफरी का माहौल था। इस दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा था, ” कुछ लोग कह रहे है कि मैं अनार्किस्ट हूं। मैं अव्यवस्था फैला रहा हूं। मैं मानता हूं कि मैं अनार्किस्ट हूं। मैं अव्यवस्था फैला रहा हूं।”
जुलाई 2026 में पेपर लीक और छात्र आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों से कहा था कि वे मुकदमों से न डरें, क्योंकि उनकी कानूनी मदद के लिए बड़े से बड़ा वकील खड़ा किया जाएगा।
अरविंद केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेताओं ने सैकड़ों समर्थकों के साथ 20 जनवरी, 2014 को दक्षिण दिल्ली में एक कथित ड्रग और वेश्यावृत्ति रैकेट पर छापा मारने से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए रेल भवन के बाहर धरना दिया था। पुलिस ने उनके खिलाफ दायर चार्जशीट में दावा किया कि 19 जनवरी, 2014 को सहायक पुलिस आयुक्त ने रेल भवन और संसद मार्ग के पास नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, विजय चौक इलाकों में निषेधाज्ञा लागू की थी, जिसके खिलाफ जाकर उन्होंने यह विरोध प्रदर्शन किया। उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए अपने 6 मंत्रियों के साथ केजरीवाल ने अपना विरोध जताने के लिए नॉर्थ ब्लॉक स्थित गृह मंत्रालय की तरफ जाने की कोशिश की।
जब एलजी ऑफिस में हड़ताल पर बैठे केजरीवाल
जून 2018 में अरविंद केजरीवाल की अराजकता फिर देखने को मिली जब वह अपने सहयोगी मंत्रियों के साथ एलजी अनिल बैजल के ऑफिस में हड़ताल पर बैठ गए। केजरीवाल और उनके मंत्री अपनी मांगों के समर्थन में 11 जून, 2018 की शाम से 20 जून, 2018 तक एलजी अनिल बैजल के कार्यालय में धरना देते रहे। 

जेएनयू में देश विरोधी नारों का समर्थन
देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशाल्लाह, इंशाल्लाह’ ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी’, ‘इंडियन आर्मी मुर्दाबाद’ और ‘कितने अफजल मारोगे-हर घर से अफजल निकलेगा’ ये देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसे नारा लगाने वालों के साथ खड़े नजर आते हैं। अरविंद केजरीवाल की तत्कालीन दिल्ली सरकार ने जेएनयू के पूर्व छात्र अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ केस चलाने के मामले में महीनों से रोड़ा बनी। वहीं तत्कालीन विधानसभा में नेता विपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा था कि बीते 22 फरवरी और 23 अगस्त 2019 को विधानसभा में टुकड़े-टुकड़े गैंग का मामला उठाया था, लेकिन सीएम केजरीवाल ने मार्शल बुलाकर भाजपा के विधायकों को सदन से बाहर निकलवा दिया। वह सिर्फ टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करना चाहते हैं। गुप्ता ने कहा कि मुकदमा चलाने की अनुमति न देकर मुख्यमंत्री केजरीवाल कानून को काम करने से रोक रहे हैं और गलत उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
केजरीवाल की शह पर गुंडागर्दी करते हैं आप विधायक
19 फरवरी, 2018 की रात 12 बजे दिल्ली के तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल के घर पर विधायकों की बैठक थी। इसमें शामिल होने के लिए राज्य के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को भी बुलाया गया था, लेकिन उसी दौरान आम आदमी पार्टी के दो विधायकों ने दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से धक्का-मुक्की और बदसलूकी की। सवाल है कि सीएम के इशारे के बिना क्या कोई विधायक उनकी मौजूदगी में ऐसी हरकत करने की हिम्मत कर सकता है? अगर ऐसा नहीं था तो केजरीवाल को स्वयं इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करवानी चाहिए थी। वे राज्य के संवैधानिक पद पर बैठे हैं इसलिए उनकी जिम्मेवारी थी कि कम से कम पुलिस को इस बात की सूचना खुद देते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 
अधिकारियों को गुलाम समझती है केजरी एंड कंपनी
4 अक्टूबर, 2017 को तत्कालीन दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कहा था, ”दिल्ली के मालिक हम हैं”। आप समझ सकते हैं जिस व्यक्ति ने जनता का सेवक बनने का वादा कर सत्ता हासिल की वे स्वयं को दिल्ली का मालिक कहते हैं। जाहिर है मूल सोच में ही जब खोट हो तो उसके परिणाम भी घातक ही होंगे। दिल्ली में कुछ ऐसा ही हो रहा है। अधिकारियों को सरेआम बेईमान कहना, उन्हें गालियां देना और मनमानी करने वाला बताना, कम से कम एक सीएम को तो शोभा नहीं देता है। केजरीवाल एंड कंपनी ने जब से सत्ता का स्वाद चखा उनका व्यवहार सामंती हो चला है। 
बीजेपी नेताओं से बदसलूकी
जब दिल्ली में चल रहे सीलिंग मुद्दे पर बैठक के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पहुंचे बीजेपी नेताओं के साथ केजरीवाल के गुंडों पर मारपीट का आरोप लगा था। इस घटना के बाद दिल्ली बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष मनोज तिवारी और अन्य नेताओं ने थाने पहुंचकर केजरीवाल एवं उनके गुर्गों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मनोज तिवारी का आरोप है कि आम आदमी पार्टी के नेता जरनैल सिंह ने उनके एक नेता से ऐसी धक्का-मुक्की की कि उनके हाथ में चोट आ गई। मनोज तिवारी ने ये भी आरोप लगाया ‌कि वे समय लेकर वहां पहुंचे थे, लेकिन केजरीवाल ने उनसे अभद्र भाषा में बात की और अपमान किया।
कपिल मिश्रा पर भी करवाया जा चुका है हमला
दिल्ली में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा पर अनशन के दौरान हमला करवाने का आरोप भी केजरीवाल की पार्टी पर लग चुका है। आरोप लगे थे कि आरोपी अंकित भारद्वाज आम आदमी पार्टी का समर्थक था। दरअसल, कपिल मिश्रा ने अपनी आंखों के सामने केजरीवाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था। इसी बात पर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो उनसे नाराज हो गए थे। 

राहुल विंची की गिरावट की कोई सीमा नहीं है; उसे खुद नींद नहीं आती और कहता है हम मोदी को सोने नहीं देंगे

सुभाष चन्द्र

कल जो ड्रामा राहुल विंची ने संदीप दीक्षित के साथ मिलकर किया और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी पर कीचड़ उछाला, उसे देख कर अब साबित हो गया कि जो 20 जुलाई को मेलोनी और मोदी को लेकर भद्दे भद्दे नारे लड़कियों ने लगाए, उसके पीछे कांग्रेस का ही दिमाग था।  उन लड़कियों में सबसे आगे रुचिका सिंह थी

राहुल विंची को याद रखना चाहिए कि नींद उसे नहीं आती जिसे शत्रु से डर होता है तुम मोदी को शत्रु मानते हो इसलिए तुम्हें नींद नहीं आती जबकि मोदी के दिल में किसी के लिए कोई शत्रु भाव नहीं है, इसलिए वो आराम की नींद सोते हैं

पिछले दिनों जब डोनाल्ड ट्रंप ने मेलोनी को लेकर टिप्पणी की थी तो न केवल मेलोनी बल्कि इटली की विपक्ष की नेता ने भी ट्रंप को फटकार लगाई थी आज इटली के दूतावास ने बयान जारी किया है और कहा है कि -

लेखक 
चर्चित YouTuber 
“राजनीतिक बहस ठीक है, अपमान नहीं, राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं लेकिन भारत के आंतरिक मामलों में इटली की PM का मजाक उड़ाने का बहाना नहीं बनाना चाहिए हम भारत के लोकतंत्र का सम्मान करते हैं और हम भी इटली के लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए नेतृत्व के लिए वही सम्मान चाहते हैं”

मैं तो कहता हूँ मेलोनी सरकार को कांग्रेस को इटली में दंड देना चाहिए और सोनिया गांधी के परिवार को बर्बाद कर देना चाहिए

मोदी तो देश और विदेश में महिलाओं से दूरी बना कर रखते हैं क्योंकि उन्हें पता है कांग्रेस की कैसी घटिया मानसिकता है और कल वो दिमाग की गंदगी राहुल विंची ने पब्लिक के सामने दिखा दी

राहुल विंची याद करो जब PLO का यासिर अराफात भारत आता था तो इंदिरा गांधी की दोनों गालों पर चुम्मी लेता था गले लगाता था - 1983 के NAM सम्मेलन के आयोजन में क्यूबा के तानाशाह Fidel Castro ने इंदिरा गांधी को Bear Hug दिया था (भालू की तरह आलिंगन किया था इंदिरा गांधी का)

नेहरू की एडविना और अन्य के साथ आशिकी को भूल गए क्या?

1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इंदिरा गांधी को OLD WITCH (बूढ़ी चुड़ैल) कहा था और अमेरिका के NSA हेनरी किसिंजर ने इंदिरा गांधी को “BITCH” कहते हुआ कहा था Indians are bastards anyway’. 

अवलोकन करें:- 

बिस्तर पर किसी मर्द से कम न थी इंदिरा गांधी :--M.O MATHAI

ये थी इज़्ज़त भारत की राहुच विंची तुम्हारी दादी के समय में जबकि मोदी को 35 देश अपना सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दे चुके हैं - तुम्हारे अंदर हिम्मत है तो तुम मोदी से मांग करो कि MO Mathai की किताब Reminiscences of the Nehru Age  से प्रतिबंध हटा दे जिससे लोग मथाई का chapter 29 “She” पढ़ सकें - Mathai originally prepared a specific chapter titled "She," which detailed an alleged 12-year romantic and physical relationship with Indira Gandhi. 

राहुल विंची तुम मोदी को बदनाम करने से पहले एक बार अपना बोस्टन का किस्सा भी खुलकर जनता को बताओ कि कैसे तुम ड्रग्स और एक लड़की के साथ एयरपोर्ट पर पकडे गए थे और और आधी रात नटवर सिंह के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सोते हुए जगा कर तुम्हे छुड़वाने के लिए पहुंची और वाजपेयी ने छुड़ाया था

कांग्रेस की राजनीति अब बस चरित्र हनन तक सीमित रह गई है तुम और तुम्हारे सभी चमचे मोदी के लिए गालियां खोजने के लिए रात रात भर जागते हो और यह काम कांग्रेस पिछले 25 साल से कर रही है लेकिन मोदी वो चट्टान है जिसका तुम एक पत्थर भी नहीं हिला सके तुम्हारी नंगई के बाद भी सरकार के तो 12 में 11 बिल संसद से पास हो गए

इंदिरा गांधी के मंत्री KGB के payrolls पर रहते थे, लेकिन आज राहुल विंची गिरोह जार्ज सोरोस और चीन के payrolls पर है

तुम कहते हो मोदी कहे कि “भाई हमारे बस की बात नहीं है, हम छोड़ रहे हैं और आप हमें छोड़ दीजिए” वो क्यों कहेगा ऐसा? तुम बताओ तुमने 20 बरस में क्या घुईया छीली हैं सिवाय विदेशो में मौज मस्ती करने के वैसे सुना है ऐसे विदेशों में आवारा घूमने वालो को खासकर बैंकाक जाने वालो को गुप्तरोग हो जाते हैं

CJP प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर हैरान रह जाएंगे, लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ और TFF से कनेक्शन

                                                                                               साभार 
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनके न सिर्फ लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ से कनेक्शन हैं, बल्कि उससे मिली फंडिंग से सरकार विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास का विदेशी फंडिंग से जुड़ा कनेक्शन सामने आते ही सवालों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि किसी पत्रकार या शोधकर्ता को विदेशी संस्था से अनुदान क्यों मिला; असली सवाल यह है कि पैसा किससे आया, किस काम के लिए आया, किन लोगों और संस्थाओं तक पहुंचा और उस फंडिंग से तैयार होने वाले कंटेंट का प्रभाव किस दिशा में जाता है? जब एक ही विदेशी फाउंडेशन पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों के अलग-अलग प्रोजेक्ट को लगातार वित्तीय सहायता देता दिखाई दे, और उन नामों के काम में वैचारिक समानताएं भी नजर आएं, तो इसे महज संयोग कहकर आगे बढ़ जाना आसान जरूर है, लेकिन सवालों से बच निकलना इतना आसान नहीं। क्योंकि सौरव दास और अमेरिका स्थित ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का संबंध इसी बड़े सवाल का एक सिरा है। उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि TFF ने सौरव दास को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया है।

सौरव दास और लेफ्ट लिबरल गैंग का विदेशी फंडिंग का कनेक्शन

सौरव दास और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का रिश्ता इसी बड़े नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। जब उसी फाउंडेशन की विस्तृत ग्रांट सूची में न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक अधिकारों से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के नाम भी दिखाई देते हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि इस फंडिंग का व्यापक उद्देश्य और उसका प्रभाव क्या है। सौरभ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी उस नेटवर्क को समझने में है, जिसमें पैसा अलग-अलग नामों और परियोजनाओं तक पहुंचता है। यदि कोई संस्था भारत में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में पैसा लगा रही है, तो यह जानने का अधिकार जनता को है कि उसके संसाधनों का स्रोत क्या है, प्राथमिकताएं क्या हैं और जवाबदेही किसकी है।

 CJP के सौरव दास और TFF का कनेक्शन क्या है?

सौरव दास का नाम TFF की अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित ग्रांट पाने वाले लोगों में मिलता है। फाउंडेशन के अनुसार उन्हें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया गया। TFF की वेबसाइट पर इस ग्रांट के साथ सौरव दास की कुछ रिपोर्टों के लिंक भी दिए गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषणों में उनके अनुदान की राशि और वर्ष को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। यहीं से असली खेल शुरू होता है। यदि किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर रिपोर्टिंग के लिए विदेशी फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि कौन-सा काम उस अनुदान के तहत हुआ, उसका दायरा क्या था और फंडर तथा प्राप्तकर्ता के बीच जवाबदेही की व्यवस्था क्या थी।
TFF से लेफ्ट लिबरल गैंग को फंडिंग की सूची छोटी नहीं
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार यह अप्रैल 2019 से भारत में सूचना तक पहुंच को बढ़ावा देने और खोजी अनुदानों के माध्यम से एक अधिक जागरूक और जवाबदेह समाज बनाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। फाउंडेशन का दावा है कि उसका लक्ष्य समस्याओं के मूल कारणों पर काम करना और रणनीति के माध्यम से जवाबदेही की संस्कृति को और मजबूत बनाना है। TFF की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और विस्तृत हो जाती है। फाउंडेशन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूज़लॉन्ड्री को रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया। मनीलाइफ फाउंडेशन के RTI सेंटर को भी समर्थन दिया गया। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को evidence-based medicine की fact-checking के लिए अनुदान दिया गया है। न्यूज लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकारों और द कारवां से जुड़े रिपोर्टरों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए फेलोशिप या अनुदान दिए गए हैं। बाद के वर्षों में फाउंडेशन की सूची और फैलती दिखाई देती है। इसमें preventive detention, custodial या extrajudicial deaths, Indian Pharmacopoeia, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पतालों में संक्रमण, HIV संक्रमण, communal harmony और policy-making में think tanks की भूमिका जैसे विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ता और संस्थाएं शामिल हैं।
द वायर, न्यूजलॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज तक पहुंच
TFF की वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उसने ऐसे मीडिया और शोध नेटवर्क को समर्थन दिया है, जिनकी पहचान सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर विवादित रिपोर्टिंग की रही है। द वायर से जुड़े पत्रकारों ने TFF फेलोशिप के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम किया। Report for the World की एक प्रोफाइल भी बताती है कि द वायर की पत्रकार बंजोत कौर ने 2020 में Thakur Foundation Fellowship के तहत public health पर investigative reporting project किया था। TFF के अपने रिकॉर्ड में न्यूजलॉन्ड्री को कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए अनुदान का उल्लेख है। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को भी evidence-based medicine पर fact-checking के लिए आर्थिक सहायता दी गई थी।
सौरव दास का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है
सौरव दास का मामला इस पूरे नेटवर्क को समझने के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो TFF की अपनी वेबसाइट पर public-health reporting के फंड लेने वाले के रूप में दर्ज हैं। दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े कुछ प्रकाशित काम public health के बजाए सरकार की नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों से संबंधित हैं। कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों ने इसी अंतर पर सवाल उठाए हैं। यहां किसी के विचारों पर रोक लगाने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिस काम के लिए आर्थिक सहायता मिली, उसका घोषित उद्देश्य और प्रकाशित काम आपस में मेल क्यों नहीं खा रहा है।
विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर बहस अक्सर राजनीतिक हो जाती है। सरकार जब विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी NGO पर सवाल उठाती है तो उसे कई बार नागरिक स्वतंत्रता पर हमला कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता की मांग कोई दमन नहीं है। NGO और मीडिया संस्थानों को यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनके किस काम को, कौन पैसा दे रहा है। यही पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए। हर grant की राशि, उद्देश्य, deliverables, final output और funding disclosure सार्वजनिक होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों के सामने यह बताना चाहिए कि किसी रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में बाहरी फंडिंग लगी है या नहीं।
TFF के बॉस की एक्टिविस्ट सेना में शामिल हुआ सौरभ
कोविड कई लोगों के लिए एक दुखद याद थी, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जैकपॉट साबित हुई। जब भारत अपनी सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहा था, तब अमेरिका में बैठा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन का फाउंडर दिनेश ठाकुर चुपचाप भारत में अपनी सेना तैयार कर रहा था। यह उसके हितों के काम करने वाले एक्टिविस्ट्स की एक सेना थी। यही समय दिल्ली के RTI एक्टिविस्ट सौरव दास के मुताबिक उसके लिए सबसे खुशी लेकर आया। क्योंकि उसको आखिरकार उस सेना में जगह मिल गई, जिसमें शामिल होने की वे लंबे समय से कोशिश कर रहा था।
फाइजर बनाम रैनबैक्सी की एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यह कहानी 2021 से शुरू नहीं होती, यह 2003 से शुरू होती है। तब फाइजर बनाम रैनबैक्सी का वार चरम पर था। अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर और भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के बीच एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई चल रही थी। फाइजर अपनी सबसे अधिक बिकने वाली दवा ‘लिपिटर’ का पेटेंट गंवा चुकी थी और रैनबैक्सी लॉन्च करने के लिए तैयार थी।
ठाकुर रैनबैक्सी कंपनी छोड़कर उसके ही खिलाफ हुए 
दरअसल, अपनी जेनेरिक दवा, जो लिपिटर से कहीं सस्ती थी। लिपिटर फाइजर की सबसे अधिक बिकने वाली दवा थी, जिसकी बिक्री अरबों डॉलर में थी और जिसे फाइजर गंवाने की कगार पर थी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तीन भारतीय दिनेश ठाकुर, स्वामीनाथन और दिनेश कस्तूरी इस सारे खेल में शामिल हुऐ। तब दिनेश ठाकुर अमेरिका की फार्मा कंपनी ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) में काम कर रहा था। उसने BMS छोड़ दी और रैनबैक्सी USA से जुड़े। वहां 2 साल (2003-05) तक काम किया। फिर रैनबैक्सी छोड़ने के बाद उसने डेटा में हेरफेर (data manipulation) को लेकर US FDA में रैनबैक्सी के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई। चूंकि वह कंपनी का अंदरूनी व्यक्ति था, इसलिए उनके पास सारी गोपनीय जानकारी थी। रैनबैक्सी केस हार गई और उस पर $500 मिलियन का जुर्माना लगा।
US फार्मा माफिया के इशारे पर भारतीय कंपनियों पर निशाना
व्हिसलब्लोअर इनाम के तौर पर दिनेश ठाकुर को US सरकार से $48 मिलियन मिले। इस केस ने रैनबैक्सी को बर्बाद कर दिया और आखिरकार 2015 में इसे सन फार्मा को बेच दिया गया। यह केस फाइजर (Pfizer) के लिए जैकपॉट साबित हुआ और उसका कॉम्पिटिशन खत्म हो गया। कई कामों में हाथ आजमाने के बाद, दिनेश ठाकुर ने खराब फार्मा कंपनियों को टारगेट करने के मकसद से फार्मा एक्टिविज्म शुरू किया, लेकिन क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है कि उनके टारगेट हमेशा भारतीय फार्मा कंपनियां होती हैं और फायदा US फार्मा कंपनियों को होता है? या फिर वह US फार्मा माफिया के इशारे पर काम करता है?
यूएस सरकार से मिले पैसे से दिनेश ने 2018 में बनाया TFF
यूएस सरकार से मिले $48 मिलियन के साथ, दिनेश ठाकुर ने 2018 में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (TFF) नाम का NGO शुरू किया। इसे टैक्स छूट का दर्जा मिला और उसने अप्रैल 2019 से ग्रांट देना शुरू किया। यानि कोविड से कुछ महीने पहले। अब ‘ठाकुर की आर्मी’ बनाने का समय आ गया था। बिकने के लिए तैयार भारतीय इसकी आर्मी में शामिल होने लगे। 2019 से 2026 के बीच, उसने कई भारतीय पत्रकारों, इन्फ्लुएंसर्स, वकीलों और एक्टिविस्ट को फंड दिया। इन्हीं में सीजेपी का प्रवक्ता सौरभ भी शामिल था। वह उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्हें TFF से फंडिंग मिली। सुचेता दलाल ने ‘मनीलाइफ फाउंडेशन’ (MLF) की सह-स्थापना की, जिसे TFF से $100K मिले और उसी समय उन्होंने सन फार्मा को टारगेट करना शुरू कर दिया। सन फार्मा का स्टॉक 40% गिर गया। यह TFF के कहने पर किया था?
मोदी सरकार ने शोषण से बचाकर आत्मनिर्भरता पर दिया जोर
कोविड का समय अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पैसे कमाने का मौका था, लेकिन भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों को भारतीयों का शोषण नहीं करने दिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। और इसी के साथ ठाकुर की सेना ने भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन और दिनेश ठाकुर दोस्त हैं। सिर्फ वायर को ही TFF से फंडिंग नहीं मिली, बल्कि उसके चार पत्रकारों प्रियंका पुल्ला, श्रेया दासगुप्ता, बनजोत कौर और अदिति प्रधान को भी TFF से फंडिंग मिली। लेकिन यह पैसा मुफ्त नहीं था। उनका काम भारत को निशाना बनाना था। यह काम प्रियंका पुल्ला ने बेहतर किया। दिनेश ठाकुर उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ब्लूमबर्ग में प्रमोट किया। 2022 उसने अफ्रीका में भारतीय फार्मा कंपनियों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत बायोटेक ने ‘द वायर’ पर किया 100 करोड़ रुपये केस
असल में, ‘द वायर’ ने इतनी गंदगी फैलाई कि भारत बायोटेक ने उस पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया और उन्हें 14 खबरें हटानी पड़ीं। इनमें से लगभग सभी खबरें भारतीय वैक्सीन की कवरेज से जुड़ी थीं, जिनमें ठाकुर की फंडिंग वाली और पुल्ला की लिखी खबरें भी शामिल थीं। 2013 में “भारतीय जेनेरिक दवाओं के खिलाफ ठाकुर के एजेंडे वाली कहानियों” का पर्दाफ़ाश हुआ था, लेकिन 2021 तक आते-आते लेफ्ट लिबरल गैंग के दो पत्रकारों को TFF से फंडिंग मिली; और ठाकुर भारतीय फार्मा के मसीहा बन गए! स्क्रॉल मीडिया ने दिनेश ठाकुर के लिए भारत को निशाना बनाते हुए बहुत सारे लेख लिखे।
कोविड में फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था गिद्ध सौरभ
जब हर कोई पैसे कमा रहा था, तो सौरव दास को भी पैसे कमाने का हक है, लेकिन उस समय तक वे कोई बड़ा नाम नहीं थे। 2021 में फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन के लिए मंज़ूरी पाने की कोशिश कर रही थी, जबकि भारत सरकार ने भारतीय वैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट को मंजूरी दे दी थी। इसलिए सौरव दास ने RTI दाखिल की। सौरभ दास ने आरटीआई दाखिल कर सरकार से पूछा कि उन्होंने भारत बायोटेक एंड सीरम इंस्टीट्यूट को किस आधार पर मंजूरी दी? सरकार ने आंकड़े देने से इनकार कर दिया। सौरभ ने यह सब दिनेश ठाकुर के इशारे पर सीरम इंस्टीट्यूट को प्रभावित करने के लिए किया था। सौरभ को उसी इकोसिस्टम के अन्य लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। इसलिए सरकार से मनाही मिलने के बावजूद, वह आरटीआई दाखिल करता रहता है। जब पूरा देश कोविड से लड़ रहा था, तब ये गिद्ध फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था।