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कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनके न सिर्फ लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ से कनेक्शन हैं, बल्कि उससे मिली फंडिंग से सरकार विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास का विदेशी फंडिंग से जुड़ा कनेक्शन सामने आते ही सवालों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि किसी पत्रकार या शोधकर्ता को विदेशी संस्था से अनुदान क्यों मिला; असली सवाल यह है कि पैसा किससे आया, किस काम के लिए आया, किन लोगों और संस्थाओं तक पहुंचा और उस फंडिंग से तैयार होने वाले कंटेंट का प्रभाव किस दिशा में जाता है? जब एक ही विदेशी फाउंडेशन पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों के अलग-अलग प्रोजेक्ट को लगातार वित्तीय सहायता देता दिखाई दे, और उन नामों के काम में वैचारिक समानताएं भी नजर आएं, तो इसे महज संयोग कहकर आगे बढ़ जाना आसान जरूर है, लेकिन सवालों से बच निकलना इतना आसान नहीं। क्योंकि सौरव दास और अमेरिका स्थित ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का संबंध इसी बड़े सवाल का एक सिरा है। उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि TFF ने सौरव दास को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया है।सौरव दास और लेफ्ट लिबरल गैंग का विदेशी फंडिंग का कनेक्शन
सौरव दास और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का रिश्ता इसी बड़े नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। जब उसी फाउंडेशन की विस्तृत ग्रांट सूची में न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक अधिकारों से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के नाम भी दिखाई देते हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि इस फंडिंग का व्यापक उद्देश्य और उसका प्रभाव क्या है। सौरभ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी उस नेटवर्क को समझने में है, जिसमें पैसा अलग-अलग नामों और परियोजनाओं तक पहुंचता है। यदि कोई संस्था भारत में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में पैसा लगा रही है, तो यह जानने का अधिकार जनता को है कि उसके संसाधनों का स्रोत क्या है, प्राथमिकताएं क्या हैं और जवाबदेही किसकी है।
CJP के सौरव दास और TFF का कनेक्शन क्या है?
सौरव दास का नाम TFF की अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित ग्रांट पाने वाले लोगों में मिलता है। फाउंडेशन के अनुसार उन्हें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया गया। TFF की वेबसाइट पर इस ग्रांट के साथ सौरव दास की कुछ रिपोर्टों के लिंक भी दिए गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषणों में उनके अनुदान की राशि और वर्ष को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। यहीं से असली खेल शुरू होता है। यदि किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर रिपोर्टिंग के लिए विदेशी फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि कौन-सा काम उस अनुदान के तहत हुआ, उसका दायरा क्या था और फंडर तथा प्राप्तकर्ता के बीच जवाबदेही की व्यवस्था क्या थी।ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार यह अप्रैल 2019 से भारत में सूचना तक पहुंच को बढ़ावा देने और खोजी अनुदानों के माध्यम से एक अधिक जागरूक और जवाबदेह समाज बनाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। फाउंडेशन का दावा है कि उसका लक्ष्य समस्याओं के मूल कारणों पर काम करना और रणनीति के माध्यम से जवाबदेही की संस्कृति को और मजबूत बनाना है। TFF की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और विस्तृत हो जाती है। फाउंडेशन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूज़लॉन्ड्री को रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया। मनीलाइफ फाउंडेशन के RTI सेंटर को भी समर्थन दिया गया। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को evidence-based medicine की fact-checking के लिए अनुदान दिया गया है। न्यूज लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकारों और द कारवां से जुड़े रिपोर्टरों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए फेलोशिप या अनुदान दिए गए हैं। बाद के वर्षों में फाउंडेशन की सूची और फैलती दिखाई देती है। इसमें preventive detention, custodial या extrajudicial deaths, Indian Pharmacopoeia, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पतालों में संक्रमण, HIV संक्रमण, communal harmony और policy-making में think tanks की भूमिका जैसे विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ता और संस्थाएं शामिल हैं।
TFF की वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उसने ऐसे मीडिया और शोध नेटवर्क को समर्थन दिया है, जिनकी पहचान सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर विवादित रिपोर्टिंग की रही है। द वायर से जुड़े पत्रकारों ने TFF फेलोशिप के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम किया। Report for the World की एक प्रोफाइल भी बताती है कि द वायर की पत्रकार बंजोत कौर ने 2020 में Thakur Foundation Fellowship के तहत public health पर investigative reporting project किया था। TFF के अपने रिकॉर्ड में न्यूजलॉन्ड्री को कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए अनुदान का उल्लेख है। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को भी evidence-based medicine पर fact-checking के लिए आर्थिक सहायता दी गई थी।
सौरव दास का मामला इस पूरे नेटवर्क को समझने के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो TFF की अपनी वेबसाइट पर public-health reporting के फंड लेने वाले के रूप में दर्ज हैं। दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े कुछ प्रकाशित काम public health के बजाए सरकार की नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों से संबंधित हैं। कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों ने इसी अंतर पर सवाल उठाए हैं। यहां किसी के विचारों पर रोक लगाने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिस काम के लिए आर्थिक सहायता मिली, उसका घोषित उद्देश्य और प्रकाशित काम आपस में मेल क्यों नहीं खा रहा है।
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर बहस अक्सर राजनीतिक हो जाती है। सरकार जब विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी NGO पर सवाल उठाती है तो उसे कई बार नागरिक स्वतंत्रता पर हमला कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता की मांग कोई दमन नहीं है। NGO और मीडिया संस्थानों को यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनके किस काम को, कौन पैसा दे रहा है। यही पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए। हर grant की राशि, उद्देश्य, deliverables, final output और funding disclosure सार्वजनिक होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों के सामने यह बताना चाहिए कि किसी रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में बाहरी फंडिंग लगी है या नहीं।
कोविड कई लोगों के लिए एक दुखद याद थी, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जैकपॉट साबित हुई। जब भारत अपनी सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहा था, तब अमेरिका में बैठा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन का फाउंडर दिनेश ठाकुर चुपचाप भारत में अपनी सेना तैयार कर रहा था। यह उसके हितों के काम करने वाले एक्टिविस्ट्स की एक सेना थी। यही समय दिल्ली के RTI एक्टिविस्ट सौरव दास के मुताबिक उसके लिए सबसे खुशी लेकर आया। क्योंकि उसको आखिरकार उस सेना में जगह मिल गई, जिसमें शामिल होने की वे लंबे समय से कोशिश कर रहा था।
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यह कहानी 2021 से शुरू नहीं होती, यह 2003 से शुरू होती है। तब फाइजर बनाम रैनबैक्सी का वार चरम पर था। अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर और भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के बीच एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई चल रही थी। फाइजर अपनी सबसे अधिक बिकने वाली दवा ‘लिपिटर’ का पेटेंट गंवा चुकी थी और रैनबैक्सी लॉन्च करने के लिए तैयार थी।
दरअसल, अपनी जेनेरिक दवा, जो लिपिटर से कहीं सस्ती थी। लिपिटर फाइजर की सबसे अधिक बिकने वाली दवा थी, जिसकी बिक्री अरबों डॉलर में थी और जिसे फाइजर गंवाने की कगार पर थी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तीन भारतीय दिनेश ठाकुर, स्वामीनाथन और दिनेश कस्तूरी इस सारे खेल में शामिल हुऐ। तब दिनेश ठाकुर अमेरिका की फार्मा कंपनी ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) में काम कर रहा था। उसने BMS छोड़ दी और रैनबैक्सी USA से जुड़े। वहां 2 साल (2003-05) तक काम किया। फिर रैनबैक्सी छोड़ने के बाद उसने डेटा में हेरफेर (data manipulation) को लेकर US FDA में रैनबैक्सी के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई। चूंकि वह कंपनी का अंदरूनी व्यक्ति था, इसलिए उनके पास सारी गोपनीय जानकारी थी। रैनबैक्सी केस हार गई और उस पर $500 मिलियन का जुर्माना लगा।
व्हिसलब्लोअर इनाम के तौर पर दिनेश ठाकुर को US सरकार से $48 मिलियन मिले। इस केस ने रैनबैक्सी को बर्बाद कर दिया और आखिरकार 2015 में इसे सन फार्मा को बेच दिया गया। यह केस फाइजर (Pfizer) के लिए जैकपॉट साबित हुआ और उसका कॉम्पिटिशन खत्म हो गया। कई कामों में हाथ आजमाने के बाद, दिनेश ठाकुर ने खराब फार्मा कंपनियों को टारगेट करने के मकसद से फार्मा एक्टिविज्म शुरू किया, लेकिन क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है कि उनके टारगेट हमेशा भारतीय फार्मा कंपनियां होती हैं और फायदा US फार्मा कंपनियों को होता है? या फिर वह US फार्मा माफिया के इशारे पर काम करता है?
यूएस सरकार से मिले $48 मिलियन के साथ, दिनेश ठाकुर ने 2018 में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (TFF) नाम का NGO शुरू किया। इसे टैक्स छूट का दर्जा मिला और उसने अप्रैल 2019 से ग्रांट देना शुरू किया। यानि कोविड से कुछ महीने पहले। अब ‘ठाकुर की आर्मी’ बनाने का समय आ गया था। बिकने के लिए तैयार भारतीय इसकी आर्मी में शामिल होने लगे। 2019 से 2026 के बीच, उसने कई भारतीय पत्रकारों, इन्फ्लुएंसर्स, वकीलों और एक्टिविस्ट को फंड दिया। इन्हीं में सीजेपी का प्रवक्ता सौरभ भी शामिल था। वह उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्हें TFF से फंडिंग मिली। सुचेता दलाल ने ‘मनीलाइफ फाउंडेशन’ (MLF) की सह-स्थापना की, जिसे TFF से $100K मिले और उसी समय उन्होंने सन फार्मा को टारगेट करना शुरू कर दिया। सन फार्मा का स्टॉक 40% गिर गया। यह TFF के कहने पर किया था?
कोविड का समय अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पैसे कमाने का मौका था, लेकिन भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों को भारतीयों का शोषण नहीं करने दिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। और इसी के साथ ठाकुर की सेना ने भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन और दिनेश ठाकुर दोस्त हैं। सिर्फ वायर को ही TFF से फंडिंग नहीं मिली, बल्कि उसके चार पत्रकारों प्रियंका पुल्ला, श्रेया दासगुप्ता, बनजोत कौर और अदिति प्रधान को भी TFF से फंडिंग मिली। लेकिन यह पैसा मुफ्त नहीं था। उनका काम भारत को निशाना बनाना था। यह काम प्रियंका पुल्ला ने बेहतर किया। दिनेश ठाकुर उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ब्लूमबर्ग में प्रमोट किया। 2022 उसने अफ्रीका में भारतीय फार्मा कंपनियों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
असल में, ‘द वायर’ ने इतनी गंदगी फैलाई कि भारत बायोटेक ने उस पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया और उन्हें 14 खबरें हटानी पड़ीं। इनमें से लगभग सभी खबरें भारतीय वैक्सीन की कवरेज से जुड़ी थीं, जिनमें ठाकुर की फंडिंग वाली और पुल्ला की लिखी खबरें भी शामिल थीं। 2013 में “भारतीय जेनेरिक दवाओं के खिलाफ ठाकुर के एजेंडे वाली कहानियों” का पर्दाफ़ाश हुआ था, लेकिन 2021 तक आते-आते लेफ्ट लिबरल गैंग के दो पत्रकारों को TFF से फंडिंग मिली; और ठाकुर भारतीय फार्मा के मसीहा बन गए! स्क्रॉल मीडिया ने दिनेश ठाकुर के लिए भारत को निशाना बनाते हुए बहुत सारे लेख लिखे।
जब हर कोई पैसे कमा रहा था, तो सौरव दास को भी पैसे कमाने का हक है, लेकिन उस समय तक वे कोई बड़ा नाम नहीं थे। 2021 में फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन के लिए मंज़ूरी पाने की कोशिश कर रही थी, जबकि भारत सरकार ने भारतीय वैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट को मंजूरी दे दी थी। इसलिए सौरव दास ने RTI दाखिल की। सौरभ दास ने आरटीआई दाखिल कर सरकार से पूछा कि उन्होंने भारत बायोटेक एंड सीरम इंस्टीट्यूट को किस आधार पर मंजूरी दी? सरकार ने आंकड़े देने से इनकार कर दिया। सौरभ ने यह सब दिनेश ठाकुर के इशारे पर सीरम इंस्टीट्यूट को प्रभावित करने के लिए किया था। सौरभ को उसी इकोसिस्टम के अन्य लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। इसलिए सरकार से मनाही मिलने के बावजूद, वह आरटीआई दाखिल करता रहता है। जब पूरा देश कोविड से लड़ रहा था, तब ये गिद्ध फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था।


