‘मुझे झाँ* फर्क नहीं पड़ता’: ममता बनर्जी ने मोदी के लिए किया अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल; और कितनी गन्दी गालियां सुनेगा मोदी; मीडिया खामोश


नरेंद्र मोदी भारत का पहला ऐसा प्रधानमंत्री है जिसे सबसे ज्यादा गालियां पड़ी हैं। फिर भी मस्त हाथी की तरह अपने काम में लगा हुआ है। हद तो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुंडों द्वारा दी जाने वाली गाली दे दी। लेकिन सारा मीडिया इस गुण्डई गाली पर खामोश है। अगर यही गाली किसी बीजेपी वाले ने दे दी होती सारा मीडिया breaking news चलाकर उछाल रहा होता।   

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस(TMC) की प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद अभद्र और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है।

अरामबाग टीवी के पत्रकार शफीकुल इस्लाम द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में ममता बनर्जी कहती सुनाई दीं, “वह (नरेंद्र मोदी) दूरदर्शन का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और राजनीतिक प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने महिला आरक्षण बिल के बारे में कुछ कहा था। मैं उनके भाषण नहीं सुनती।”

इसके बाद उन्होंने हैरान करते हुए कहा, “अमार ब** लागे ना”। जानकारी के लिए बता दें कि ‘ब**’ एक बेहद आपत्तिजनक बंगाली शब्द है जिसका इस्तेमाल जननांगों के बाल के रूप में किया जाता है। जिस तरह हिंदी में ‘मुझे झाँ** फर्क नहीं पड़ता’ का इस्तेमाल होता है, उसी तरह बंगाली में इसका इस्तेमाल किया गया है। ममता बनर्जी के इस बयान पर लोगों में आक्रोश है और उन पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाषा के स्तर को और नीचे गिराने के आरोप लग रहे हैं।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया हो। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी ममता बनर्जी ने ‘B#ra’ जैसे सेक्सिस्ट शब्द का इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा था। इसका इस्तेमाल पुरुषों के जननांग के लिए किया जाता है।

उस समय भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने कहा था, “आज के समय में ममता बनर्जी जितनी घृणित और आपत्तिजनक कोई भी नेता नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल के लोग अब उनसे तंग आ चुके हैं।”

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के केजरीवाल की याचिका ख़ारिज करने वाले निर्णय के मुख्य बिंदु; अब बेटा केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे इस निर्णय को अगर हिम्मत है?

सुभाष चन्द्र 

-"अविश्वास के बीज बोने के लिए बाढ़ के द्वार नहीं खोले जा सकते”;

-"न्यायाधीश की निष्पक्षता का एक अनुमान होता है और जो पक्ष न्यायाधीश के स्वयं को अलग करने की मांग करता है, उसे इस अनुमान का खंडन करना होता है";

-"वादकारी ने न्यायपालिका संस्था को ही परीक्षण पर खड़ा कर दिया है - मैंने इस विवाद का समाधान करने का मार्ग चुना है - न्यायपालिका की शक्ति आरोपों का निर्णय करने के उसके दृढ़ संकल्प में निहित है - मैंने यह आदेश बिना किसी प्रभाव में आए लिखा है";

-"वे नए आपराधिक कानूनों, महिला दिवस कार्यक्रमों या युवा अधिवक्ताओं से संवाद के कार्यक्रम थे - अनेक न्यायाधीश ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं - ऐसी भागीदारी को वैचारिक पक्षपात का संकेत नहीं माना जा सकता";

लेखक 
चर्चित YouTuber 
-"यदि इस न्यायालय के परिजन सरकारी पैनल में हैं, तब भी वादकारी को यह दिखाना होगा कि उसका वर्तमान मामले या न्यायालय की निर्णय प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा है - ऐसा कोई संबंध नहीं दिखाया गया है"

-"यदि किसी राजनेता की पत्नी राजनेता बन सकती है, यदि किसी राजनेता के बच्चे राजनेता बन सकते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि न्यायाधीश के बच्चे विधि व्यवसाय में नहीं आ सकते? इसका अर्थ होगा न्यायाधीश के परिवार के मौलिक अधिकार छीन लेना";

-"इस न्यायालय की अधिकारी होने के नाते मैं इस तथ्य से अवगत हूँ कि झूठ, चाहे अदालत में या सोशल मीडिया पर हजार बार दोहराया जाए, सत्य नहीं बनता - वह झूठ ही रहता है - सत्य अपनी शक्ति नहीं खोता, केवल इसलिए कि झूठ बार-बार दोहराया गया हो”;

-"यह रिक्यूज़ल मांगने की कैच-22 स्थिति है। आवेदक (केजरीवाल) ने अपने लिए जीत-जीत की स्थिति बना ली है। यदि राहत नहीं मिलती तो वह कहेंगे कि उन्होंने परिणाम पहले ही बता दिया था यदि राहत मिलती है तो कहेंगे कि अदालत दबाव में आई वादकारी परिस्थिति को अपने कथानक के अनुसार प्रस्तुत कर सकता है"

-"यह न्यायालय ऐसा होने नहीं दे सकता। मैंने स्वयं से पूछा कि यदि मैं अलग नहीं होती तो क्या होगा, फिर सोचा कि यदि मैं अलग होती हूँ तो क्या होगा";

-"इन आवेदनों में प्रस्तुत कथाएं केवल अटकलों पर आधारित थीं। यदि मैं इन्हें स्वीकार कर लेती, तो यह एक चिंताजनक मिसाल बनती। मैंने अपने समक्ष आए सभी प्रश्नों का निडर होकर निर्णय किया है। यह न्यायालय आरोपों और लांछनों के बोझ तले नहीं दबेगा। जब ऐसा करना संस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करे, तब यह न्यायालय न झुकेगा, न पीछे हटेगा। तब न्याय नहीं होगा, बल्कि न्याय का प्रबंधन होगा";

-निर्णय में कहा गया कि आवेदकों की व्यक्तिगत आशंका उचित पक्षपात आशंका की कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरी

-उन्होंने यह भी कहा कि उनके स्वयं को अलग करने की मांग वाला आवेदन साक्ष्यों के साथ नहीं, बल्कि लांछनों और आरोपों के साथ दायर किया गया था

-"जब परदा गिर रहा है, तब मुझे यह जोड़ना होगा कि यह आवेदन साक्ष्य लेकर नहीं आया; यह मेरी मेज पर मेरी सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और ईमानदारी पर संदेह, आरोप और लांछन  लेकर आया";

-"और भी अधिक चिंता की बात यह है कि कार्यवाही से जोड़कर मीडिया-प्रेरित कथानक खड़ा करने का प्रयास किया गया, जिसमें बिना जवाबदेही के चरित्र हनन के उदाहरण शामिल हैं"

अंत में अदालत ने कहा कि स्वयं को अलग करना विवेकपूर्ण कदम नहीं, बल्कि कर्तव्य से पलायन और आत्मसमर्पण का कार्य होता। इसलिए याचिका खारिज की जाती है

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‘नेता नहीं बताएँगे जज फैसला देने के काबिल हैं या नहीं’: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केज

‘नेता नहीं बताएँगे जज फैसला देने के काबिल हैं या नहीं’: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल को लताड़ा, साफ बोलीं- नहीं छोड़ूँगी दारू घोटाला केस

                              केजरीवाल की रेक्यूजल माँग को जस्टिस शर्मा ने किया खारिज (साभार: TOI)
सीबीआई और ED पर ऊँगली उठाने वाले जब जजों पर ऊँगली उठाने लग जाएं समझ जाना चाहिए ऐसी मानसिकता वाले नेता और उनकी पार्टी देश को किस मझधार में डुबेने जा रहे हैं। इनको देश या समाज से कोई लेना-देना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार कर अपने परिवार और आने वाली पीढ़ियों के लिए धन अर्जित करना है।  
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल 2026) को शराब नीति केस (एक्साइज पॉलिसी केस) में AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recusal) करने की माँग की गई थी। कोर्ट ने इस माँग को खारिज कर दिया है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी नेता को यह तय करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता कि जज सक्षम है या नहीं।

यह मामला दिल्ली की शराब नीति (एक्साइज पॉलिसी) केस से जुड़ा है। इसमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरिपतों ने कहा था कि जस्टिस शर्मा पहले भी उनके खिलाफ फैसले दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज के बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में है, जिससे ‘हितों का टकराव’ हो सकता है।

जस्टिस शर्मा ने मामले को कहा ‘कैच-22’

जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में केजरीवाल की इन सभी आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने साफ कहा कि केवल आरोप लगाने से यह साबित नहीं होता कि जज पक्षपाती है। उन्होंने कहा कि कानून के आधार पर ही फैसला होगा, किसी की बनाई कहानी या धारणा के आधार पर नहीं।

उन्होंने इस स्थिति को ‘कैच-22‘ बताया। इसका मतलब है कि चाहे वह केस से हटें या न हटें, दोनी ही स्थिति में सवाल उठेंगे। जज ने कहा कि यह स्थिति केजरीवाल के लिए ‘विन-विन’ है। अगर उन्हें राहत नहीं मिलती, तो वे कह सकते हैं कि पहले से ही ऐसा होने वाला था। और अगर राहत मिलती है, तो वे कह सकते हैं कि कोर्ट दबाव में आ गया।

जस्टिस के कदम से न्यायपालिका की छवि को होता नुकसान

जस्टिस शर्मा ने कहा कि अगर वह इस केस से खुद को अलग कर लेतीं, तो इससे लोगों में गलत संदेश जाता कि जज किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करना न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुँचाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि उनके सामने सबसे आसान रास्ता यह था कि बिना सुनवाई के ही खुद को केस से अलग कर लें। लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि यह सिर्फ उनका नहीं, बल्कि पूरे न्यायपालिका का सवाल था। उन्होंने 34 साल के अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने बिना किसी दबाव या आरोप से प्रभावित हुए फैसला लिया है।

नेता की पत्नी राजनीति में आ सकती, तो जज के बच्चे वकालत में क्यों नहीं: जस्टिस

जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल के ‘हितों के टकराव’ वाले आरोप पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा, “जैसे किसी नेता की पत्नी या बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, वैसे ही जज के बच्चे वकालत के पेशे में आ सकते हैं। इसे गलत नहीं कहा जा सकता।”
उन्होंने कहा कि सिर्फ इतना कह देना कि उनके रिश्तेदार सरकारी वकील हैं, काफी नहीं है। यह भी दिखाना होगा कि इसका केस पर क्या असर पड़ रहा है, जो कि नहीं दिखाया गया। जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि अगर कोई झूठ बार-बार बोला जाए, तो वह सच नहीं बन जाता, सच हमेशा सच ही रहता है।
अंत में जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मामले में खुद को अलग करना समझदारी नहीं होती, बल्कि अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना होता। इसीलिए उन्होंने केजरीवाल और अन्य आरोपितों की रिक्यूजल की माँग को खारिज कर दिया।


ऑफिसों में कर्मचारियों की संख्या कम हो रही हैं लेकिन संसद में सीटें बढ़ाना क्या दोगलापन नहीं? राहुल देश विरोधी भाषा बोल रहा है उसकी जिम्मेदार अदालतें और मोदी सरकार है; भड़काऊ बयानबाज़ी और दोहरी नागरिकता पर सरकार क्यों हाथ में चूड़ियाँ पहने बैठी है?


राहुल गाँधी के भाषण से झलकता है कि राहुल गाँधी देश विरोधी मानसिकता से ग्रसित हो चुके हैं।
सभी जानते ही है कि जब महिला आरक्षण बिल पर एक ऐतिहासिक फैसला सरकार लेने वाली थी जिसके लिए पूरा देश इंतजार कर रहा है 35 सालों से जिसमें उम्मीद यह जताई जा रही थी कि विपक्ष भी इस फैसले में साथ देगा। ड्रामा खेलने में नाही सत्ता पक्ष पीछे है और नाही विपक्ष। अगर सत्ता को महिलाओं को आरक्षण देना है तो वर्तमान संख्या में क्यों नहीं देता? क्यों सीटें बढ़ाई जा रही है। जनता की समस्याओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कर्मचारी को कुछ वर्ष नौकरी करने बाद पेंशन मिलती है लेकिन इन सफेदपोश लुटेरों को शपथ लेते ही, क्यों? जब ये जनसेवक के नाम पर वोट मांगते हैं फिर पेंशन क्यों? जिस दिन समस्त सांसद इस खुली लूट के लिए एकजुट होकर बंद करवा देंगे देश को हर महीने करोड़ों की बचत होगी। और जब सांसदों की संख्या बढ़ेगी उनको मिलने वाली पेंशन का भी बोझ बढ़ेगा। BPL के नाम पर फ्री में राशन दिया जा रहा है क्यों? फ्री में राशन लेने वालों की आर्थिक स्थिति की जाँच की? जनता को मुफ्त रेवड़ियां बांट मुर्ख बनाया जा रहा है। फ्री में राशन जरूरतमंद को मिले हर किसी को नहीं। जबकि कई स्वयंसेवी संस्थाएं रोज गरीबों में भोजन वितरण करती हैं।
जनता को उन पार्टियों को भी चुनाव में धूल चटानी होगी जो बढ़ने वाली सीटों को सिर्फ मुस्लिमों के लिए आरक्षित किये जाने पर सरकार का समर्थन करने को तैयार है। महिला महिला ही होती है। जो दर्शाता है विपक्ष की मंदबुद्धि और मुस्लिम तुष्टिकरण सोंच। जनता को विपक्ष और सत्ता की इस लूट से सावधान होना पड़ेगा। वरना आने वाली पीढ़ियां तुमको कोसेंगी। याद करो 543 से पहले संसद में कितनी सीटें थीं, सीटें बढ़ने से क्या फर्क पड़ा जनता की समस्याएं ज्यों की त्यों है। पुरुष सांसद को तो दो शब्द बोल सकते हो महिला को बोलना बहुत भारी पड़ेगा। इस मकड़जाल से दूर रहने में ही समझदारी है। ऑफिसों के कर्मचारियों की संख्या कम हो रही हैं लेकिन संसद में सीटें बढ़ाना क्या दोगलापन नहीं?
आजादी से लेकर आजतक भारत में लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सांसद मिलाकर करीब 15 हजार से 17000 हजार सांसद देश में बने है
जो लगातार जीतते आए है उनको हर बार की जीत की पेंशन मिलती आ रही है कोई 5 बार सांसद रहा तो उसको 5 बार की पेंशन , वर्तमान ने अगर सांसद है तो उसकी अलग से सैलरी भत्ते फंड यात्राएं दैनिक भत्ते फोन मेडिकल सुविधा सब मिल रही है
आप देखिए देश की जनता का दिया टैक्स कहा जा रहा है कैसे हमारे पैसे से नेता लोग मौज ले रहे है इतने में भी काम नहीं चलता इनका तो कमीशन खाते है घोटाले करते है
अब इनकी संख्या मोदी जी 850 कर रहे है विपक्ष विरोध करे या ना करे , लेकिन जनता को खुलकर विरोध करना चाहिए
क्योंकि इन 850 VIP लोगों का खर्चा हमको उठाना होगा ,वो भी 8 से 10 हजार की नौकरी 12 - 12 घंटे करके ,
बेसिक सैलरी 1 लाख रुपया
निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 70 हजार रुपया
ऑफिस खर्च भत्ता 60 हजार रुपया
दैनिक भत्ता 2000 हजार दिन का
फर्स्ट क्लास AC ट्रेन पूरी तरह फ्री साथ में एक और व्यक्ति भी
34 फ्री फ्लाइट ट्रिप/साल
परिवार के साथ भी उपयोग कर सकते
सड़क पर चलेंगे तो 16 रुपया प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलेगा
दिल्ली में फ्री सरकारी बंगला/फ्लैट
बिजली-पानी भी काफी हद तक मुफ्त
3 लैंडलाइन + 1 मोबाइल
1.5 लाख कॉल/साल मुफ्त
इंटरनेट भी उपलब्ध
पूरे परिवार का सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज मुफ्त
25000 हजार रुपया पेंशन
2000 हजार एक्स्ट्रा
Y+ सिक्योरिटी
बिना गारंटी के मोटा लोन
अगर राजनीति सेवा है तो फिर इतनी सैलरी , भत्ते , फंड , यात्राएं , दैनिक भत्ते , मेडिकल सुविधा , Y+ सिक्योरिटी क्यों ?
ये तो एक सबसे बड़ी नौकरी की तरह हो गई है जिसके लिए कोई पढ़ाई लिखाई की जरूरत नहीं है ना ही कोई एग्जाम और टेस्ट देना , चाहे कितने भी अपराधिक मुकदमे लगे हुए हो
कोई दिक्कत नहीं किसी भी प्रकार की , जितने अधिक मुकदमे उतना ही बड़ा नेता
इनकी संख्या अब 850 होगी तो कांग्रेस और बीजेपी का कुछ जाना वाला नहीं है इनकी तो मौज होगी उल्टा , पहले बेटे और नातियों को राजनीति में सेट करते आए थे
अब नातिन और बेटियों को भी राजनीति में सेट करने का बढ़िया जुगाड बना दिया है , इनके खर्च जनता को अपनी खून पसीने की कमाई से चुकाने होंगे
तो सबसे बड़ा विरोध तो जनता को ही करना चाहिए ना ?
सिर्फ महिला उत्थान की बात विपक्षी पार्टियों के लिए सिर्फ चुनाव में छेड़े जाना वाला शिगूफा मात्र है यह सिद्ध हो गया है क्योंकि सिर्फ अपने लालच ओर सत्ता सुख के लिए राजनीति करने वाले नेताओं ने इस बिल को बहुमत देने के बजाए गिरा दिया। जिसका पेश होने से पहले ही मोदी सरकार को मालूम था कि बिल के समर्थन में बहुमत नहीं हो सकता। जिसका चुनावों में लाभ उठाया जाएगा। और मुर्ख जनता विशेषकर महिला समाज इस जाल में फंस जाएगा। क्योकि देश की जनता अपने आपको लुटवाने में ही खुश होती है। जनता नहीं समझ रही कि सांसदों की संख्या बढ़ने से अर्थव्यवस्था पर हर महीने करोड़ों का बोझ पड़ेगा जो महंगाई के रूप में हमसे ही वसूला जायेगा फिर चिल्लाएंगे हाय महंगाई, और ये नेता ऐश करेंगे।
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महिला सशक्तिकरण के नाम पर लोकसभा सीटें बढ़ाने का सीधा-सीधा अर्थव्यवस्था पर महीना का करोड़ों का अ
देश के महिलाओं के प्रति अपमान विपक्षी पार्टियों द्वारा किया गया है, लेकिन इससे भी ज्यादा शर्मनाक और चिंताजनक बात थी देश के विपक्ष के नेता राहुल गाँधी द्वारा अपने भाषण में किए गए बातों का जिक्र जिन्हें सुनकर हर देशवासी को एक बात समझ आ गई है कि राहुल गांधी की सोच देश के लिए खतरा बनती जा रही है। आखिर राहुल इतनी भड़काऊ बयानबाज़ी करता है सरकार क्यों हाथ में चूड़ियां पहनकर बैठी रहती है। सिर्फ FIR या मुकदमा दर्ज करना ही हल नहीं है कार्यवाही जरुरी है। अन्यथा किसी नागरिक द्वारा प्रधानमंत्री की विरुद्ध टिप्पणी करने पर कार्यवाही बंद हो। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में जब महाराष्ट्र में ठाकरे के शिवसैनिक उत्तरी भारतीयों के विरुद्ध उपद्रव कर रहे थे तब चंद्रशेखर ने उस बालासाहेब पर हंटर चलाया जिनसे सब डरते थे। महाराष्ट्र में उनकी तूती बोलती थी।
राहुल गांधी द्वारा अपने भाषण मैं जिन मुद्दों के खिलाफ बोले वो हैं–
देश में नोटबंदी
पुलवामा हमला
बालाकोट एयर स्ट्राइक
ऑपरेशन सिंदूर
ऑटो वाले भाई को दिल से सैल्यूट
हर अच्छे काम का विरोध, अब कांग्रेस की आदत
*अनुच्छेद 370 का विरोध
*भव्य राम मंदिर के निर्माण का विरोध
*आयुष्मान भारत और GST का विरोध
*सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर सवाल
*ट्रिपल तलाक़ का विरोध
*देश की नई संसद का विरोध
राहुल गांधी के द्वारा इन सभी देश के सम्मान की बात को झूठ लगता है और उन्हें लगता है कि यह सब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बनाया गया मुद्दा है
लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि जो सोच राहुल गांधी रखते है वहीं सोच पाकिस्तान, चीन, विदेश में बैठे भारत विरोधी संगठन,ओर हमारे देश में छुपे हुए देश के गद्दार भी यही सोचते है
बल्कि यह साफ तौर पर सिद्ध हो चुका है कि भारत में नोटबंदी आवश्यक थी वरना ना जाने कितना जाली नोट हमारे देश में आ जाता जिससे हमारी देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह डूब जाती,
पूरे देश ने देखा था कि किस तरह पाकिस्तान और वहां बैठे दहशतगर्दों ने हमारे देश में पुलवामा, से लेकर पहलगाम जैसी बुजदिल घटना को अंजाम दिया जिसके बदले में हमारी सेना ने अपना सर्वोच्च पराक्रम दिखा कर पाकिस्तान को उसके घर मैं घुसकर मार कर आए
लेकिन कितने शर्मनाक बात है कि हमारे देश का एक ऐसा नेता जो कहता है कि मेरे परिवार ने देश के बलिदान दिया जिसके परिवार ने देश पर सालों राज किया आज वही परिवार का अबोध बुद्धि वाला देश विरोधी मानसिकता से बीमार नेता उसी पाकिस्तान को क्लीन चिट दे रहा है और हमारे देश की सेना का अपमान कर रहा है
शर्म आती है कि हमारे देश के संविधान और लोकतंत्र ने ऐसे नेता को खुला घूमने और इस तरह की भाषा का प्रयोग करने की छूट दे रखी है। इसमें सबसे कसूरवार हमारी अदालतें हैं जो जमानत देकर इस Leader of Propaganda को ऑक्सीजन देने का काम कर देती हैं।
हमारे देश को बर्बाद करने ओर देश के बर्बादी के सपने देखने वालों की असली जगह जेल की काल कोठरी है ना कि देश की जनता के पैसे से आरामदायक जीवन जीने वाले बंगले
चाणक्य की बात राहुल गांधी की बहन कर रही थी तो प्रियंका वाड्रा को भी यह भी ध्यान होना चाहिए कि चाणक्य ने ही कहा कि विदेशी महिला से जन्मा बालक कभी राष्ट्र भक्त नहीं हो सकता
लेकिन अब कहने की या बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि राहुल गांधी खुद ही बता रहे है कि वो देश विरोधी है....!
राहुल गांधी की विदेशी नागरिकता केस नौ दिन चले अढ़ाई कोस ही साबित हो रहा था लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब गृह मंत्रालय को भी पार्टी बनाया और राहुल की नागरिकता संबंधित सभी दस्तावेज कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया तो इस केस में अचानक से तेजी आ गई
गृह मंत्रालय ने कड़ी सुरक्षा में 6 अप्रैल की सुनवाई में 4 हजार पन्नो के दस्तावेज कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर दिए। जो यह भी साबित करता है कि सरकार को मालूम था कि राहुल के पास दोहरी नागरिकता है और ब्रिटिश नागरिकता में नाम Rahul Vinci है। मानों या न मानों केंद्र सरकार भी परिवार पर मेहरबान रही है। सोनिया गाँधी की धांधली तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में आयी थी। जिसे सोनिया ने टाइपिंग मिस्टेक बताने पर ठंठे बस्ते में डाल दिया, क्यों? कोर्ट में केस कर चुनाव रद्द करवाना था। जैसे राजनारायण ने इंदिरा गाँधी के चुनाव को रद्द करवाया था। लेकिन तानाशाह इंदिरा गाँधी ने देश में इमरजेंसी लगा कम्युनिस्टों को छोड़ समूचे विपक्ष को जेल में ढूंस दिया था।   

यहां से कोर्ट निर्णायक स्थिति में पहुंचा और सुनवाई में राहुल के ऊपर FIR दर्ज करने का आदेश सुना दिया, अब सुनने में आया है कि जज विद्यार्थी ने अपने आपको केस से पीछे कर लिया है। अगर दोहरी नागरिकता का मुकदमा राहुल की बजाए किसी सामान्य नागरिक के विरुद्ध होता तो क्या जज विद्यार्थी अपने आपको अलग करते? अगर इस खबर में सच्चाई है तो मुख्य न्यायाधीश को ऐसे जज को तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए। ऐसे जज सिर्फ आम नागरिकों पर कानून का चाबुक चला जज कहलवाना पसंद करते हैं।  
अब उत्तरप्रदेश की पुलिस को करना क्या है? केवल इतना कि कोर्ट को बताना है कि हमने गृहमंत्रालय के सभी दस्तावेज चेक कर लिए वो सभी सही व प्रामाणिक हैं.....

इस विषय पर राहुल & गैंग की चुप्पी देखिए, कोई एक शब्द बोलने को तैयार नहीं

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने निकाल दी अपनी ही “विद्या की अर्थी”; आप हाई कोर्ट में नहीं भड़भूजे की दुकान पर बैठने लायक हैं

सुभाष चन्द्र

कल और परसों मैंने राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता को लेकर विस्तार से लिखा था। 18 अप्रैल को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने राहुल गांधी पर FIR दर्ज कर CBI से जांच कराने के आदेश दिए थे क्योंकि उन्होंने पाया था कि प्रथम दृष्टया ये अपराध बनता है

लेकिन फिर उसी दिन अपने आदेश पर रोक लगा कर राहुल गांधी को नोटिस जारी कर आज की तारीख तय की थी

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
आज जस्टिस विद्यार्थी ने खुद को केस से अलग कर लिया जिसका कोई कारण नहीं दिया मैंने कल ही लिखा था कि राहुल गांधी इतना शरीफ आदमी नहीं है जो दो दिन में जवाब दाखिल कर दे और आज कहीं उसका नाम नहीं है कि किसी भी वकील ने उसकी तरफ से कोई पैरवी की हो लेकिन फिर भी जस्टिस विद्यार्थी ने खुद को केस से अलग कर लिया

यह साफ़ दर्शाता है कि कोई राजनीतिक दबाव जज साहब पर डाला गया क्योंकि हो सकता था वो सही दिशा में चल कर राहुल गांधी की जाँच CBI से ही कराने के आदेश पर कायम रहते

आज जस्टिस विद्यार्थी ने कहा “टिप्पणी की कि इस मामले में वकील, जिसमें राज्य सरकार के वकील और डिप्टी सॉलिसिटर जनरल भी शामिल हैं, सही कानून और संबंधित केस लॉ अदालत के सामने रखने में विफल रहे अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के खिलाफ बोलना कैसे उचित हो सकता है और शिशिर ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए कोर्ट का इस्तेमाल किया है, साथ ही मीडिया में दिए गए उनके बयान भी आपत्तिजनक हैं सरकार के वकील और डिप्टी एसजीआई ने भी कहा कि आवेदक के सोशल मीडिया पोस्ट का बचाव नहीं किया जा सकता”

आप क्या लोगों को मूर्ख समझ बैठे है अगर याचिकाकर्ता और राज्य के वकील सही कानून और संबंधित केस लॉ अदालत में रखने में विफल रहे तो आपने किस आधार पर राहुल के खिलाफ केस दर्ज कर राज्य सरकार से CBI जांच कराने के आदेश दिए ये हाई कोर्ट है या किसी भड़भूजे की दुकान MPMLA कोर्ट ने 27 घंटे सुनवाई करके यह कह कर केस खारिज कर दिया कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है और जस्टिस विद्यार्थी ने याचिकाकर्ता, राज्य सरकार के वकील और गृह मंत्रालय के दस्तावेज़ देख कर पहले राहुल के खिलाफ केस दर्ज कर CBI जांच के आदेश दिए और आज कह दिया कि ये सभी वकील केस प्रस्तुत करने में विफल रहे, ये कैसे न्यायालय हैं और क्या इनसे किसी को न्याय की आशा करनी चाहिए

इतना बड़ा झोल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है कोई भी कह सकता है जस्टिस विद्यार्थी को खरीद लिया गया

विग्नेश शिशिर एक याचिकाकर्ता है और आपके आज के निर्णय से पीड़ित है उसे सोशल मीडिया तो क्या कही भी कुछ भी कहने का अधिकार है आप उसकी बातों पर एतराज कर रहे हैं लेकिन कोर्ट की असली अवमानना तो आपने खुद की है 

सुप्रीम कोर्ट पहले भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों की कुछ बातों पर suo moto ले चुका है यह मामला भी इतना गंभीर है कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत को suo moto संज्ञान लेकर जांच करनी चाहिए कि किन परिस्थितियों में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी केस से अलग हुए

काका हाथरसी ने एक कविता में लिखा था “वो ही सच्चा विद्यार्थी, जो निकाल कर दिखा दे विद्या की अर्थी” जस्टिस विद्यार्थी ने भी अपनी विद्या की अर्थी निकाल दी

भगवान ही जानता है देश की न्यायपालिका का क्या होगा जो वर्तमान में दिशाहीन लगती है, जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप प्रथम दृष्टया सच लगते है और यही Public Perception है

अवलोकन करें:-

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की आत्मा मर गई या किसी ने खरीद लिया; हाई कोर्ट का जज बिना सोचे आदेश कैसे

जब तक न्यायपालिका सोशल मीडिया में लोगों की बातों पर ध्यान देना शुरू नहीं करेगी, कोई सुधार संभव नहीं है