महरंग बलोच पर मलाला मौन… अफगान महिलाओं के लिए मंच-मंच भाषण, लेकिन पाकिस्तानी फौज के बलोचों के दमन पर नोबेल विजेता मलाला यूसुफजई खामोश क्यों?

                                      महरंग बलोच (बाएँ), मलाला यूसुफजई (दाएँ), (फोटो साभार : ChatGPT)
पाकिस्तान में अत्याचारों का कोई अंत नहीं होता है। बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन के खिलाफ संघर्ष करने वाली बलोच याकजेहती कमेटी (BYC) की मुखिया महरंग बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। जिस डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप के बदले जनता की आवाज को हथियार बनाया था, जिसे टाइम मैगजीन ने 2024 में ‘TIME100 नेक्स्ट’ में शामिल किया था और BBC ने 100 सबसे प्रेरणादायक महिलाओं में जगह दी थी उसे उम्रभर के लिए जेल में डाल दिया।

तभी से सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक गूँज रहा है… लेकिन तब दुनिया के कोने-कोने से मानवाधिकार का झंडा उठाने वाली नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला युसूफजई की टाइमलाइन पर सन्नाटा है। हाँ, उन्हें फिक्र है तो अफगानिस्ता की, तालिबान की और वहाँ की महिलाओं की.. बाकी उनके खुद के मुल्क में महिलाओं के साथ जो होता हो वो होता रहे, उस पर कोई चिंता नहीं।

महरंग बलोच: ‘बलूचिस्तान की शेरनी’

महरंग बलोच को समझना हो तो पहले बलूचिस्तान को समझना होगा। पाकिस्तान का यह सबसे बड़ा प्रांत दशकों से ‘एनफोर्स्ड डिसअपियरेंस’ यानी सरकारी तंत्र द्वारा लोगों के जबरन गायब कर दिए जाने की त्रासदी झेल रहा है। महरंग के अब्बू अब्दुल गफ्फार लंगोव खुद इस तंत्र के शिकार हुए। जब महरंग मात्र 16 साल की थी तब 2009 में उनके अब्बू को हिरासत में ले लिया गया। तभी से इस लड़की ने विरोध को अपनी जिंदगी बना लिया।
बलोच मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई करते हुए भी महरंग सड़कों पर रही। उनके अब्बू का तो शव कुछ समय बाद मिल गया और तब से उन्होंने BYC के बैनर तले लॉन्ग मार्च निकाले, धरने दिए और हजारों लापता बलोचों के परिजनों की आवाज बनीं।
जुलाई 2024 में ग्वादर में हुए ‘राजी मुची’ बलोच राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुई हिंसा में फ्रंटियर कॉर्प्स के एक सिपाही शब्बीर बलोच की मृत्यु हो गई। पाकिस्तानी सरकार ने इसका ठीकरा महरंग पर फोड़ा। मार्च 2025 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। फिर ट्रायल को खुली अदालत से जेल ट्रायल में बदला और फिर उन्हें उम्रकैद मिली। लेकिन इस पर दुनियाभर में महिला अधिकारों की झंडाबरदार मलाला युसूफजई खामोश हैं।

मलाला के मौन पर सवाल

आप में से कई लोग इस नाम से परिचित होंगे, जो नहीं जानते होंगे उन्हें बताएँ कि मलाला आतंक के खिलाफ महिलाओं की आवाज का कथित प्रतीक हैं। मलाला यूसुफजई का जन्म 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान की स्वात घाटी में हुआ था।। जब तालिबान ने स्वात पर कब्जा किया और लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगाई, तब ग्यारह साल की मलाला ने BBC उर्दू के लिए ‘गुल मकई’ नाम से डायरी लिखनी शुरू की। अक्टूबर 2012 में तालिबान के एक बंदूकधारी ने उनके स्कूली बस में उन्हें गोली मार दी। मलाला बचीं और ब्रिटेन में इलाज के बाद महिला अधिकारों की आवाज बन गईं। 2014 में महज 17 साल की उम्र में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
अब वह महिलाओं के लिए आवाज तो उठाती हैं लेकिन कहा जाता है कि तभी तक जब तक कि उनकी अपनी छवि को कोई नुकसान न हो? मार्च 2025 में जब महरंग को पहली बार गिरफ्तार किया गया था, तब मलाला ने कहा था, “मैं महरंग बलोच की हिरासत को लेकर परेशान और चिंतित हूँ, यह उनका अधिकार है कि वे आवाज उठाएँ। उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।” यह सराहनीय था।
लेकिन 22 जून 2026 को जब उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जब दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन बोल उठे, जब BYC ने इसे ‘बलोच राष्ट्र के प्रति नफरत की अभिव्यक्ति’ कहा तब मलाला की आवाज कहाँ थी? दूसरी तरफ अफगानिस्तान की महिलाओं के लिए मलाला की आवाज निरंतर और मुखर है। वे तालिबान को ‘जेंडर अपार्थेड’ का दोषी कहती हैं, UN में भाषण देती हैं, हार्वर्ड में सेमिनार करती हैं। यह काम जरूरी है और इसकी तारीफ होनी चाहिए। लेकिन एक सवाल अनुत्तरित रहता है कि अफगानिस्तान की महिलाओं पर तालिबान का जुल्म जितना बड़ा मुद्दा है, क्या बलोचिस्तान में राज्य-प्रायोजित गुमशुदगियाँ, बलोच महिलाओं की पुकार और एक डॉक्टर-एक्टिविस्ट की उम्रकैद उतना बड़ा मुद्दा नहीं?
इससे और आगे बढ़ें तो पाकिस्तान में हर साल हजारों हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म-परिवर्तन और शादी करवाई जाती है। संयुक्त राष्ट्र के 2025 के विश्लेषण के अनुसार, इन मामलों में 75% पीड़ित हिंदू महिलाएँ हैं और 80% मामले सिंध प्रांत से हैं।
मलाला ने कभी सीधे पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म-परिवर्तन को नाम लेकर नहीं कोसा। जब एक ट्विटर यूजर ने उनसे इन लड़कियों के लिए आवाज उठाने की गुजारिश की, तो मलाला ने उन्हें ब्लॉक कर दिया। यहाँ सवाल चुनाव का है। जब मलाला तालिबान को ‘जेंडर अपार्थेड’ का मुजरिम कहती हैं तो वे सही हैं। लेकिन जब उसी पाकिस्तान में हिंदू बच्चियों को उठाकर उनकी जिंदगी तबाह की जाती है और जब एक बलोच डॉक्टर को उम्रकैद की सजा मिलती है तो यही मलाला क्यों चुप हो जाती हैं?
अफगानिस्तान की महिला पर बोलना आसान है क्योंकि तालिबान उनकी दुश्मन है, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उनकी बात सुनता है और वहाँ उन्हें नहीं जाना है तो कोई बड़ा राजनीतिक जोखिम नहीं है। लेकिन पाकिस्तान की फौज के खिलाफ बलोचों के दमन पर बोलना, वहाँ की हिंदू अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए लड़ना यह राजनीतिक रूप से जोखिमभरा है। और शायद यही कारण है कि मलाला की आवाज वहाँ पहुँचते-पहुँचते दब जाती है।

 

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के सवाल से फंस गए राहुल गांधी, खुल गया कच्चा चिट्ठा

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। यह कहावत कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत पर बिल्कुल सटीक बैठती है। सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया विदेशी दौरों को लेकर सवाल उठाया है।  सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए पोस्ट में उन्होंने लिखा कि एक ओर प्रधानमंत्री भारतीयों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री लगातार विदेशी दौरों पर हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने पिछले 57 दिनों में 11 देशों का दौरा किया है। सुप्रिया श्रीनेत के इस सवाल ने जहां राहुल गांधी को बुरी तरह फंसा दिया है, वहीं प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों से मिली उपलब्धियों को नजरअंदाज कर देश की 140 करोड़ जनता को गुमराह किया है।

57 दिनों में 11 देशों के दौरे का किया जिक्र
सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों की लिस्ट भी शेयर की। उनके मुताबिक, ‘प्रधानमंत्री ने 15-16 मई को UAE, 17 मई को नीदरलैंड, 18 मई को स्वीडन, 19 मई को नॉर्वे, 20 मई को इटली, 13-16 जून को फ्रांस, 17-18 जून को स्लोवाकिया, 27-29 जून को सेशेल्स, 6-7 जुलाई को इंडोनेशिया, 8-9 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया और 10-11 जुलाई को न्यूजीलैंड का दौरा किया।’ कांग्रेस नेता ने आगे लिखा कि प्रधानमंत्री ने भारतीय नागरिकों को विदेश यात्रा से बचने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री स्वयं पिछले 57 दिनों में 11 देशों की यात्रा कर चुके हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों ने कांग्रेस की नाकामियों को किया उजागर 
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सवाल तो उठाया दिया, लेकिन ये नहीं बताया कि इन विदेशी दौरों से देश को क्या हासिल हुआ। उन्होंने जनता को गुमराह करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को विरोधाभासी साबित करने की पूरी कोशिश की है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों से मिली कामयाबी ही कांग्रेस के प्रोपेगैंडा और झूठ को बेनकाब करने के लिए काफी है। अब प्रधानमंत्री मोदी के उन प्रमुख विदेशी दौरों पर एक नजर डालते हैं, जिन्होंने ना सिर्फ देश को लाभान्वित और सुरक्षित किया है, बल्कि पूर्ववर्ती कांग्रेस शासन की विदेश नीति और उसकी नाकामियों को भी उजागर किया है। 

न्यूजीलैंड दौरा : मुक्त व्यापार समझौता,20 बिलियन डॉलर के भारी निवेश
रिकॉर्ड 9 महीने के समय में हुए मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच बाजार की पहुंच, निवेश, टेक्नोलॉजी और सेवाओं के नए द्वार खुलेंगे। इसके तहत न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 बिलियन डॉलर के भारी निवेश का वादा किया है।

ऑस्ट्रेलिया दौरा : यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स का समझौता
ऑस्‍ट्रेलिया में ऊर्जा सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर बड़ा समझौता किया गया। भारत को यूरेनियम की आपूर्ति के लिए ‘इंडिया-ऑस्ट्रेलिया सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट’ को अंतिम रूप दिया गया। इसे भारत की एक बड़ी जीत माना जा रहा है। गौरतलब है कि साल 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम बेचने से साफ मना कर दिया था। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के कोकोस द्वीप पर अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल स्थापित किया जाएगा, जो भारत के गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन को तकनीकी सहयोग देगा।

इंडोनेशिया दौरा : ब्रह्मोस मिसाइल, समुद्री सुरक्षा और क्रिटिकल मिनरल्स
दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग और समुद्री सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण समझौते हुए। इंडोनेशिया भारत को क्रिटिकल मिनरल्स देगा। भारत और इंडोनेशिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए सहयोग का विस्तार किया है। 

सेशेल्स दौरा : समुद्री सुरक्षा लेकर दोनों देशों के बीच समझौत
इस ऐतिहासिक दौरे में भारत और सेशेल्स के बीच अगले 50 वर्षों के लिए रोडमैप तैयार हुआ तथा डिजिटल पेमेंट (UPI) सहित 9 महत्वपूर्ण समझौते किए गए। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, समुद्री सुरक्षा और रक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग और मजबूत हुआ। इसके साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय भागीदार की भूमिका और सशक्त होगी।

क्यों जरूरी थे प्रधानमंत्री मोदी के ये विदेशी दौरे 
प्रधानमंत्री मोदी का 4 देशों का दौरा यूं ही नहीं हुआ। इसका आधार 16 जून 2026 को अमेरिका में हुई एक घटना को माना जा रहा है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जून को अपनी सबसे बड़ी सैन्य कमांड, ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड’ (USINDOPACOM) का नाम बदलकर फिर से ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ (USPACOM) कर दिया। माना जा रहा है कि अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्‍स को लेकर चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि रेयर अर्थ मिनरल्‍स सेमी-कंडक्‍टर निर्माण, बैटरी वाली गाड़ियों, स्मार्टफोन और डिफेंस सेक्‍टर के लिए काफी महत्‍वपूर्ण होते हैं। रेयर अर्थ मिनरल्‍स पर चीन का एकाधिकार है। इसके चलते हिंद और प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों ने आपसी कूटनीति को नई दिशा देने की शुरुआत कर दी है। इसी को धार देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने प्रशांत महासागर क्षेत्र के तीन देशों इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र के देश सेशेल्स की यात्रा की।

बीजेपी ने पेश किया पीएम मोदी के विदेश दौरों का ‘रिपोर्ट कार्ड’
बीजेपी ने रविवार (12 जुलाई,2026) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया विदेश दौरों का ‘रिपोर्ट कार्ड’ पेश करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला। बीजेपी मुख्यालय में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के दौरों से देश को महत्वपूर्ण रणनीतिक, रक्षा और आर्थिक लाभ हुए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के सेशेल्स, इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरों तथा जापान के शीर्ष नेतृत्व की भारत यात्रा का जिक्र करते हुए अपनी प्रस्तुति को ’10 कदम, 10 का दम’ नाम दिया। पात्रा ने कहा कि भारत हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्रों में एक ‘स्थिरता की ताकत’ के रूप में उभर रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि विदेश में मौजूद कांग्रेस नेता बंद कमरों में ‘साजिश’ रच रहे होंगे। पात्रा ने आरोप लगाया कि राहुल इस बात की ‘साजिशन’ रच रहे होंगे कि मोदी सरकार के अच्छे कामों में कैसे बाधा डाली जाए।

सुप्रिया श्रीनेत के सवाल से कैसे फंस गए राहुल गांधी ?
प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर सवाल उठने के बाद अब राहुल गांधी के विदेशी दौरों को लेकर बहस तेज हो गई है। अब पूछा जा रहा है कि राहुल गांधी अभी कहा है? केरल के वायनाड में हाल में हुए भूस्खलन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हादसे के कई दिन बाद भी राहुल गांधी प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने व पीड़ितों से मिलने नहीं पहुंचे। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दावा किया कि, ‘राहुल गांधी काफी समय से भारत से बाहर हैं और किसी को उनके ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं है। उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा, ‘क्या किसी को पता है कि राहुल गांधी कहां हैं? वह किस देश में छुट्टियां मना रहे हैं? वह किसके साथ हैं? वह अक्सर किससे मिलने जाते हैं?’

वायनाड में हालिया भूस्खलन, राहुल और प्रियंका गायब
वहीं एक अन्य पोस्ट में बीजेपी नेता ने लिखा कि ‘वायनाड में हालिया भूस्खलन में लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर तबाही हुई, लेकिन इसके बावजूद न राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रभावित इलाके में जाकर पीड़ितों से मुलाकात की।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘किसी भी जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता इस बात से मापी जाती है कि वह लोगों के सबसे कठिन समय में उनके साथ खड़ा हो, न कि केवल चुनाव के समय उनके बीच पहुंचे।’ बता दें कि 7 जुलाई को केरल के वायनाड में भूस्खलन हुआ था। भारी बारिश होने के कारण मिट्टी खिसकने से दुर्घटना हुई थी जिसमें जान-माल का नुकसान हुआ था।

राहुल गांधी की विदेश यात्रा अभी भी रहस्य के घेरे में
अमित मालवीय ने सोशल मीडिया एक्स पर एक और पोस्ट करते हुए सवाल उठाया कि 22 जून से 13 जुलाई के बीच राहुल गांधी की विदेश यात्रा अभी भी रहस्य के घेरे में है। वह कहाँ गए थे? उन्होंने किससे मुलाकात की? उनकी यात्रा और वहां ठहरने का खर्च किसने उठाया? ये कुछ ऐसे जायज सवाल हैं, जिन्हें लेकर नेता प्रतिपक्ष को खुलकर सामने आना चाहिए। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि क्या उनकी इन विदेशी मुलाकातों में ऐसी बैठकें शामिल थीं, जिनका भारत के राजनीतिक या रणनीतिक हितों पर कोई असर पड़ सकता है।

देश और पार्टी की जरूरत के समय राहुल गांधी की विदेश यात्रा
राहुल गांधी की विदेश यात्रा उस वक्त होती है जब कांग्रेस पार्टी को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। अब सवाल है कि पार्टी की स्थिति को ठीक करने के बजाए राहुल गुपचुप विदेश यात्राओं पर क्यों निकल जाते हैं? कांग्रेस द्वारा जारी प्रचार कार्यक्रम के अनुसार, देहरादून में अगले बड़े जनसभा से पहले 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियां होनी थीं। हालांकि, राहुल गांधी की विदेश यात्रा बढ़ने के कारण इन्हें स्थगित करना पड़ा है और उनके 17 जुलाई के आसपास लौटने की उम्मीद है। सूत्रों का यह भी कहना है कि राहुल गांधी पिछले 20 दिन से सार्वजनिक गतिविधियों में नजर नहीं आए हैं। अब सवाल उठ रहे हैं कि राहुल गांधी आखिर हैं कहां। सूत्रों का दावा है कि राहुल गांधी विदेश दौरे पर हैं। लेकिन इसे लेकर न तो कोई यात्रा कार्यक्रम जारी किया गया और ना ही उन्होंने खुद इसे लेकर सोशल मीडिया पर ही कोई पोस्ट किया। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान उनका अधिकांश समय इंग्लैंड और फिनलैंड सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों में बीता है। 

खास मौकों पर गायब रहे राहुल गांधी
सितंबर 2025 में, राहुल गांधी ने उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के शपथ ग्रहण समारोह में भाग नहीं लिया, जिस पर भाजपा ने आरोप लगाया कि वह उस समय विदेश यात्रा पर थे।

अक्टूबर 2024 में, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान चिली की उनकी यात्रा भी एक राजनीतिक विवाद का मुद्दा बन गई।

30 दिसंबर,2024 को राहुल गांधी वियतनाम में थे। राहुल गांधी का वियतनाम दौरा ऐसे समय पर हुआ था, जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन हुआ था और देश में सात दिन का शोक घोषित था। 

दिसंबर 2020 में, राहुल गांधी ने विदेश यात्रा की क्योंकि कांग्रेस ने किसानों के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में अपना अभियान तेज कर दिया था।

2016 में, नए साल के मौके़ पर वह पाँच राज्यों के चुनाव से ठीक पहले विदेश यात्रा पर गए। इस मौके़ पर भी पंजाब कांग्रेस के नेताओं की ओर से काफ़ी नाराज़गी का भाव मीडिया में सामने आया।

2015 में, राहुल गांधी ने लगभग दो महीने की छुट्टी लेकर विदेश में अवकाश लिया, जिसके चलते वे संसद के बजट सत्र के एक महत्वपूर्ण हिस्से और विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक पर हुई बहस में शामिल नहीं हो पाए।

22 साल में 54 विदेश यात्रा, राहुल की ट्रिप पर 60 करोड़ खर्च
बीजेपी ने राहुल गांधी की विदेश यात्रा का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने रखते हुए विस्तृत जानकारी दी। राहुल गांधी ने साल 2004 से 2026 तक कुल 54 व्यक्तिगत विदेश यात्राएं की हैं, जिसमें अमेरिका, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, वियतनाम, कम्बोडिया, सिंगापुर, बहरीन, मालदीव, कतर, यूएई शामिल है। इसके अलावा वो 3 मई,2026 को बिना जानकारी के मस्कट ओमान भी गए, जिसकी फुटेज सोशल मीडिया पर मौजूद है। बीजेपी ने दावा किया कि राहुल गांधी 22 साल में 54 बार विदेश यात्रा पर गए, जिन पर 60 करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। अब सवाल उठ रहे कि राहुल की इन यात्राओं की फंडिंग किसने की।

सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़कर गोपनीय रूप से विदेश जाने का आरोप
राहुल गांधी के विदेशी दौरों को लेकर उन पर सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़कर गोपनीय रूप से यात्रा करने के आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से बचाव में कहा जाता है कि राहुल गांधी अपनी निजी जिंदगी को राजनीतिक जीवन से अलग रखते हैं। कई बार वह ध्यान (विपासना) लगाने, आराम करने या छुट्टियां बिताने के लिए एकदम गोपनीय तरीके से यात्रा करते हैं। उनके कई दौरों को लेकर सत्ता पक्ष और जानकारों का मानना है कि वे विदेशों में छिपी हुई राजनीतिक बैठकों, विचार-विमर्श या अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ संपर्क साधने के लिए जाते हैं। उनके लंबे विदेश दौरों के कारण कभी-कभी उनकी घरेलू राजनीति और संसद में उपस्थिति पर सवाल उठते हैं। बीजेपी अक्सर उन पर विदेशों में देश विरोधी ‘साजिश’ रचने का आरोप लगाती है, जबकि कांग्रेस उनके विचारों और संवादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बताती है।

25 सालों बाद हिन्दू आतंकवाद की सच्चाई सामने आई :‘कांग्रेस ने भगवा आतंकवाद बोलने को कहा’: UPA सरकार में मंत्री रहे सुशील शिंदे ने खोल दी पार्टी की असलियत, पुराना वीडियो Viral

कांग्रेस आलाकमान सोनिया गाँधी के साथ पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे (फोटो साभार: IndiaToday)
केंद्र में कांग्रेस की सरकार में 2012 से 2014 तक गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ को लेकर बड़ा बयान दे रहे हैं। उन्होंने माना कि यह शब्द इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था और इसके पीछे पार्टी का हाथ बताया। अब सच्चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग कांग्रेस को खूब लताड़ लगा रहे हैं।

वीडियो में सुशील कुमार शिंदे से जब पूछा गया कि ‘भगवा आतंकवाद' टर्म सही था या नहीं तब वह कहते हैं, “पार्टी (कांग्रेस) ने बताया था कि भगवा आतंकवाद बोलना है, मैंने वही किया। गलत तो था। मैं यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। ऐसा नहीं होना चाहिए था। ये उस पार्टी की विचारधारा होती है। ये चाहे भगवा हो या रेड हो या सफेद हो। ऐसा कोई आतंकवाद नहीं होता है।”

हालाँकि, सुशील शिंदे का यह बयान डेढ़ साल पुराना है। जब यूट्यूबर और पत्रकार शुभांकर मिश्रा ने सुशील कुमार शिंदे के साथ पॉडकास्ट किया था। अब इस वीडियो के एक अंश वायरल हो रहा है, जिसमें शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे भद्दे प्रोपेगेंडा को गलत बताकर अपना कबूलनामा सौंप रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

अब डेढ़ साल बाद सोशल मीडिया पर शिंदे के इस बयान का वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। लोग इसे कांग्रेस की ‘झूठों’ से पर्दा उठाने और कांग्रेस की हिंदू-घृणा जैसी बातें कह रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कबूलनामा बताया है। बीजेपी ने सवाल उठाया कि क्या यह सनातन संस्कृति को बदनाम करने की कांग्रेस की एक सोची-समझी साजिश थी?

बीजेपी नेता डॉ. निखिल आनंद कहते हैं कि सुशील कुमार शिंदे का बयान कांग्रेस की वैचारिक सोच को उजागर करता है। उनके मुताबिक कांग्रेस और उससे जुड़ी विचारधारा ने हमेशा भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सनातन आस्था को निशाना बनाया है तथा राजनीतिक हितों के लिए कट्टरपंथी ताकतों के साथ समझौता किया है। उन्होंने लोगों से ऐसे तत्वों के प्रति सतर्क रहने और लोकतांत्रिक तरीके से उनका जवाब देने की बात कही।

कपिल बिश्नोई कहते हैं, “कांग्रेस पार्टी की हिंदुओं और भगवा रंग से नफरत किसी से ढकी छिपी नहीं है। रह रह कर ये नफरत किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाती है।”

एक्स हैंडल ‘जनार्दन मिश्रा’ ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “अब तो पूर्व कांग्रेसी भी सच बोलने लगे लेकिन चमचे फिर भी नहीं मानेगे…!!”

‘भगवा आतंकवाद’ पर शिंदे ने क्या कहा था?

भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने साल जनवरी 2013 में कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस बयान को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी। हालाँकि, इन आलोचनाओं के बाद भी वे अपने बयान पर कायम थे।

तब गृहमंत्री शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।” दरअसल, 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान शिंदे ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाया था।

अपने बयान के पीछे शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं। समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि ऐसी कोशिशों से देश को सतर्क रहना चाहिए। शिंदे के इस बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकवाद दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रहते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने साल 2010 में सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।

भगवा आतंकवाद पर केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”

अमेरिका और यूरोप के देश भारत के अल्पसंख्यकों की चिंता छोड़ें; उन्हें अगर मुस्लिम भारत में पीड़ित लगते हैं तो अपने यहां ले जाएं; ये देश सच्चाई नहीं जानते

सुभाष चन्द्र 

आज जिसे देखो victim card खेलने का आदी हो गया है। अपनी गिरिवान में देखा नहीं जाता जिसे देखो भारत के अल्पसंख्यकों के शुभ चिंतक बन रहा है। इन लोगों को नहीं मालूम कि जितना अल्पसंख्यक यानि मुसलमान भारत में खुश है उतना सारे विश्व में नहीं यहाँ तक अपने मुस्लिम मुल्कों में भी नहीं। अगर देखा जाए तो मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं क्योकि जो देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हो उसे अल्पसंख्यक कहना अल्पसंख्यक के नाम पर गाली है। इस कड़वी सच्चाई को समझना होगा।   

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 मई, 2026 को नीदरलैंड गए थे। वहां के प्रधानमंत्री Rob Jetten ने मोदी से मुलाकात से पहले कहा था कि नीदरलैंड और यूरोप के अन्य देश भारत के अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों को लेकर चिंतित है।  

उसके बाद अभी हाल ही में स्विट्ज़रलैंड ने UN में कहा “ we urge India to protect minorities  & uphold Foe” जिसके जवाब में हमारे विदेश मंत्री डॉ जयशंकर ने लताड़ मारते हुए कहा कि “We offer to help Switzerland teckle Racism, Systematic Discrimation and Xenophobia (a fear or hatred of foreign people and cultures)”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अमेरिका की संस्था USCIRF अपनी हर रिपोर्ट में आरोप लगाती है कि भारत में अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) पर अत्याचार हो रहे हैं

अमेरिका भूल जाता है कि जो षड़यंत्र भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए चल रहा है, वो अमेरिका को भी इस्लामिक देश बनाने के लिए चल रहा है अमेरिका और यूरोप को अमेरिकी मौलाना Uthman Farooq का बयान सुनना चाहिए जिसमें उसने कहा -”A MUSLIM EUROPE WILL COME TRUE AND AMERICA WILL BE A MUSLIM COUNTRY, ISLAM WILL ENTER EVERY HOUSE, THEY CAN BE AS MAD AS THEY WANT, I DON’T CARE”.

ऐसे बयान बहुत से अमेरिकी मौलाना देते रहते हैं और इसलिए ही शायद अमेरिका के कुछ राज्यों ने शरिया को बैन किया है लेकिन जब भारत की बात आती है तो अमेरिका के दिल में भारत के मुसलमानों के लिए दर्द छलक जाता है एक समय था भारत में आतंकवाद को अमेरिका हमारी Law & Order problem कहता था लेकिन 9/11 के बाद उसे पता चला आतंकवाद क्या होता है

अब ब्रिटेन यूरोप का हिस्सा नहीं है लेकिन यूरोप के देशों को ब्रिटेन के Grooming Gangs द्वारा पिछले कुछ वर्षों में 2.5 लाख से ज्यादा अंग्रेज़ बच्चियों के बलात्कार याद रखने चाहिए और ये दुष्कर्म करने वाले अधिकांश पाकिस्तानी थे जर्मनी और ग्रीस को पाकिस्तानियों द्वारा चलाई जा रही 60-60 मस्जिदों को बंद करना पड़ा है फिर नीदरलैंड और स्विट्ज़रलैंड को भारत के मुसलमानों से इतनी मोहब्बत क्यों है? क्या अपने यहां भी वो यह सब कुछ देखना चाहते हैं?

नीदरलैंड और स्विट्ज़रलैंड को जर्मनी के Bishop Athanasius Schneider की बात सुननी चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है -”ISLAMISTS ARE NOT REFUGEES, THEY ARE INVADERS WHO WANT TO ISLAMIZE EUROPE, THEY WANT TO DESTROY THE HISTORICAL CULTURE OF EUROPE”.

नीदरलैंड के प्रधानमंत्री Rob Jetten को अपने ही देश के Geert Wilders की भी बात सुननी चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था -”ISLAM IS THE BIGGEST THREAT TO OUR SURVIVAL AND SHARIA SHOULD NOT BE MIXED WITH FREE SOCIETY”.

यूरोप के देशों को भारत के अल्पसंख्यकों के हित में बोलने से पहले नीदरलैंड, इटली, पेरिस, अमेरिका, स्वीडन, हंगरी, बुल्गारिया, स्पेन, बेल्जियम, डेनमार्क और ऑस्ट्रेलिया में इस्लामिक दंगों में हुई आगजनी को याद करना चाहिए जनवरी 2016 के फ्रांस में आगजनी करने वाले 90% नाबालिग थे

स्विट्ज़रलैंड की आबादी करीब 90 लाख है जिसमें करीब 5 लाख (यानी 5-6%) मुस्लिम हैं इसी तरह नीदरलैंड की आबादी 1 करोड़ 80 लाख है जिसमें करीब 6% मुस्लिम हैं जबकि भारत में मुस्लिम 15 से 20% हैं जिसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश के और रोहिंग्या घुसपैठिये भी शामिल हैं 

स्विट्ज़रलैंड और नीदरलैंड या किसी भी अन्य यूरोप के देश को अपने यहां अल्पसंख्यक (मुस्लिम) बढ़ाने में रूचि है तो वह भारत से ले जा सकते हैं वो वहां जाकर बहुत खुश रहेंगे क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोप के 74 करोड़ लोगों में 6 से 8% यानी 5 करोड़ में से 4 करोड़ अपनी अपनी सरकार के Welfare aur Social Benefits पर जीते हैं

बेटा UP पुलिस में SI, बाप लोगों को बनाता है ईसाई: मीडिया रिपोर्ट, शिकायत के बाद प्रेमपाल गिरफ्तार, बरेली SP ने क्या बताया, मजहबी किताबें हुई बरामद

उत्तर प्रदेश के बरेली में ईसाई धर्मांतरण का मामला सामने आया है। पुलिस ने ईसाई मिशनरी के एक आरोपित को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, 09 जुलाई 2026 को गाँव में एक प्रार्थना सभा के दौरान लोगों को ईसाई बनने के लिए लालच दिया जा रहा था। इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज में मुकदमा दर्ज किया गया और अगले ही दिन आरोपित प्रेमपाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव का रहने वाला है। उसके पास से बाइबल समेत 6 ईसाइयत की किताबें, एक हाथ से लिखी नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ है। यह भी सामने आया कि प्रेमपाल यादव वर्षों पहले खुद धर्मांतरण कर चुका है और अब हिंदुओं को धर्मांतरण करवाने वाले नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।

सैजना गाँव में प्रार्थना सभा से FIR तक, जानिए कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

बरेली के मीरगंज थाना क्षेत्र के सैजना गाँव में धर्मांतरण का मामला 09 जुलाई 2026 को सामने आया। थाना मीरगंज में दर्ज FIR के मुताबिक, गाँव के रहने वाले अंकित पुत्र खूबकरन ने पुलिस को शिकायत देकर आरोप लगाया कि शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव निवासी 51 वर्षीय प्रेमपाल ने गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर एक प्रार्थना सभा आयोजित की थी।

शिकायत में कहा गया कि इस प्रार्थना सभा के दौरान हिंदुओं को ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। बताया गया कि वहाँ मौजूद लोगों को ईसाइयत से जुड़ी प्रचार सामग्री दी गई, नौकरी और पैसों का लालच दिया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि सभा के दौरान हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी की गईं।

इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज पुलिस ने प्रेमपाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 62 और 299 के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध संपरिवर्तन अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी।

भागने की फिराक में प्रेमपाल को पुलिस ने धरा, ईसाइयत की किताबें बरामद

प्रेमपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना मीरगंज पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। पुलिस के मुताबिक, 10 जुलाई 2026 को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपित प्रेमपाल इलाके से निकलने की फिराक में है। इसके बाद पुलिस टीम ने नगरिया सादात फाटक के सामने अंडरपास के नीचे घेराबंदी कर उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित की पहचान प्रेमपाल पुत्र पातीराम, निवासी ग्राम भुडासी, थाना शीशगढ़, जनपद बरेली के रूप में हुई। तलाशी के दौरान उसके पास से एक बाइबल, ‘शास्त्र भजनसंहिता और नीतिवचन’, ‘नया नियम’, ‘मुक्तिदाता कौन’, ‘बेदारी के गीत’ नाम से 6 ईसाइयत की किताबें, एक हस्तलिखित नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया। पुलिस ने इन सभी सामानों को कब्जे में लेकर उन्हें जाँच का हिस्सा बनाया है।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, गिरफ्तारी की कार्रवाई उपनिरीक्षक नितिन शिरीष, उपनिरीक्षक राजवीर सिंह, हेड कांस्टेबल मोहम्मद उमर और कॉन्स्टेबल अमित कुमार की टीम ने की। पुलिस का कहना है कि आरोपित के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई पूरी करते हुए उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।

पुलिस हिरासत में माफी माँगने लगा आरोपित प्रेमपाल

मामले में पुलिस की ओर से जारी किए गए प्रेस नोट के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल ने खुद को ईसाई धर्म का प्रचारक बताया है। पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि 09 जुलाई 2026 को सैजना गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर ईसाइयत के प्रचार और धर्म परिवर्तन के संबंध में एक सभा आयोजित की गई थी।

पुलिस के मुताबिक, आरोपित ने पूछताछ में बताया कि उस सभा में अमित, रोहित, धर्मेंद्र और तीरथराम समेत कई लोग मौजूद थे। उसका यह भी कहना था कि काफी प्रयास करने के बावजूद वहाँ मौजूद ये लोग ईसाई नहीं बने। पुलिस को आरोपित ने यह भी बताया कि उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिलने के बाद वह वहाँ से भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताते हुए कहा कि उससे गलती हो गई।

ईसाई धर्मांतरण करवाने वाले प्रेमपाल का बेटा सब-इंस्पेक्टर: रिपोर्ट्स

धर्मांतरण का मामले सामने आने के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में कई दावे भी किए गए हैं, जिनका उल्लेख पुलिस की FIR या आधिकारिक प्रेस नोट में नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गिरफ्तार प्रेमपाल वर्षों पहले ईसाई में परिवर्तित हुआ था। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि उसका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात है।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि प्रेमपाल लंबे समय से ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ था और गाँवों में प्रार्थना सभाएँ आयोजित करता था। कुछ रिपोर्ट्स में इसे धर्म परिवर्तन के नेटवर्क पर प्रशासन की बड़ी कार्रवाई बताया गया है। हालाँकि, पुलिस ने इसको लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिलहाल पुलिस केवल आरोपों और जाँच के आधार पर आगे बढ़ रही है।

चीफ जस्टिस साहब, आज 12 जुलाई है, दो साल पहले आज ही के दिन आपकी कोर्ट ने केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी थी और फिर क्या हुआ?

सुभाष चन्द्र

12 जुलाई, 2026, आज से 2 साल पहले 12 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने केजरीवाल को शराब घोटाले में ED के केस में अंतरिम जमानत देते हुए कहा था कि ED को किसी को भी अपनी मर्जी से गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है।  

केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर जब दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगाने से मना कर दिया और उसके खिलाफ सबूतों को देख कर यहां तक कह दिया कि ये अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ, उसी दिन ED ने उसे 21 मार्च, 2024 को गिरफ्तार कर लिया था उसकी गिरफ़्तारी को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने बिंदुवार दलीलें देकर उचित ठहराया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ जस्टिस शर्मा के फैसले को काट नहीं सकी

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मुझे लगता था कि शायद जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता में मतभेद थे और इसलिए उन्होंने अपना पल्ला झाड़ते हुए केजरीवाल की गिरफ़्तारी की संवैधानिक वैधता को जांचने के लिए मामला संविधान पीठ को सरका दिया

जब सुप्रीम कोर्ट के 2 जज जस्टिस परदीवाला और जस्टिस महादेवन राष्ट्रपति को आदेश दे सकते थे और इस मामले को संविधान पीठ को भेजने की जरूरत नहीं समझते थे जबकि वह पूरी तरह संवैधानिक मामला था और संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए था तो फिर दो जज, जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता गिरफ़्तारी की वैधता पर निर्णय क्यों नहीं दे सके

केजरीवाल को तब तक के लिए अंतरिम जमानत दी गई थी जब तक संविधान पीठ अपना निर्णय न सुना दे 

लेकिन आज दो वर्ष बाद भी केजरीवाल के मामले के लिए संविधान पीठ का गठन नहीं किया गया है कैसे काम करता है सुप्रीम कोर्ट? क्या अंतरिम जमानत देकर काम पूरा हो गया और संविधान पीठ बनाना सुप्रीम कोर्ट भूल गया जबकि इस व्यक्ति ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर ही कीचड़ नहीं उछाली, उसने पूरी न्यायपालिका का अपमान किया 

अंतरिम जमानत तो अभिषेक मनु सिंघवी ने दिला दी, कैसे दिला दी, इस पर कुछ कहना उचित नहीं होगा लेकिन संविधान पीठ का गठन न होने में क्या गोलमाल है जबकि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या लगभग पूरी है? 

6 क़त्ल बलात्कारी ने नहीं किए बल्कि उसे मंदिर के “प्रसाद” की तरह जमानत देने वाले जज ने किए उस जज को सजा कौन देगा, जनता?

सुभाष चन्द्र

तेलंगाना के 28 वर्षीय राजकुमार के खिलाफ 16 मई 2026 एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की पोक्सो कानून में यौन शोषण की शिकायत दर्ज करती है। जून, 2026 में शाहबाद तेलंगाना की लोकल अदालत उसे “अग्रिम जमानत” दे देती है जिसका मतलब है बलात्कार का आरोपी गिरफ्तार ही नहीं हुआ कोर्ट की उदारता उस आरोपी के लिए वरदान बन गया क्योंकि कोर्ट ने आजकल के चलन के अनुसार मंदिर के प्रसाद की तरह जमानत दे दी - Bail is a rule and jail is an exeption. यही philosophy आजकल हर कोर्ट झाड़ रहा है

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नतीजा क्या हुआ? राजकुमार ने सबसे पहले उस लड़की का कत्ल किया जिसने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज की थी, फिर उसके घर जाकर लड़की की माँ और दादी की जान ली इतना ही नहीं, वो अपने घर गया और वहां अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों का भी खून कर दिया

कुछ समय पहले असम में भी पोक्सो एक्ट के आरोपी को जमानत दे दी गई और उसने सीधे उस महिला के घर जाकर उसकी हत्या कर दी जिसने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज की थी

अब राजकुमार के जघन्य अपराध के लिए बड़ी बड़ी बहस शुरू हो जाएंगी और उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त साबित करने की कोशिश की जाएगी जबकि उसके खिलाफ तुरंत मुकदमा शुरू करके फांसी की सजा दे देनी चाहिए लेकिन अदालत सबूत ढूढ़ती फिरेंगी और अगर सजा दे भी दी तो हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट वर्षों लगाकर उसकी फांसी की सजा घटा कर आजीवन कारावास में बदल देंगी शायद एक बात ध्यान में रख कर कि Every Sinner has a future.

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या शाहबाद लोकल कोर्ट का जज जिम्मेदार नहीं है इन 6 लोगों की हत्या के लिए क्योंकि उसने राजकुमार को गिरफ़्तारी से पहले “अग्रिम जमानत” दे दी और उसने 6 मासूम लोगों की हत्या को अंजाम दे दिया उस जज का न्याय कौन करेगा - जनता ?

वकील प्रबल प्रताप का अपराध क्या राकेश किशोर से कम है क्या जो BCI ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की

सुभाष चन्द्र

लगभग 16/17 साल की बात है, बस में यात्रा करते दो यात्री आपस में बातचीत कर रहे थे, बातचीत करते-करते एक यात्री ने कहा "जो दौर चल रहा है वो दिन दूर नहीं जब पार्लियामेंट में मिर्च पाउडर उछाला जायेगा।" जिस तरह संसद से लेकर अब सुप्रीम कोर्ट तक में जो हरकतें हो रही है वास्तव में इन सबके लिए चिंता का विषय है। संसद में पेपर उछाले जाते हैं, टेबल पर खड़े होकर ऐसे नारेबाजी होती है जैसे कोई गली का गुंडा हो और सदन अध्यक्ष तमाशबीनों की तरह देखते रहता है, क्यों? क्यों नहीं मार्शल को बुलाकर सदन से बाहर फेंका जाता? क्यों नहीं ऐसे उप्रदवी सदस्यों को सदन से निष्काषित किया जाता? इसीलिए दोषियों को पालने में ये दोनों संस्थाएं जिम्मेदार है। नेताओं को प्रसाद की तरह जमानत दी जाती है। और जमानत देने के बाद फाइल ठंठे बस्ते में पटक जाती है। कानून मंत्री और संसद भी बेसूद हो कर सोई पड़ी रहती है। क्या देश में सफेदपोशी गुंडों का राज होगा?   

सेम ओंन यू (ले लोटा)
इन जहीलों को समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट कोई चौपाल, चुनावी मंच या सड़क का धरना स्थल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में यह घटना शुक्रवार की सुबह करीब 11 बजे जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने हुई। याचिकाकर्ता, जिसकी पहचान प्रबल प्रताप के तौर पर हुई, बेंच के सामने पेश हुआ और खुद को संप्रभु बताया और जजों को "न्यायिक सेवक" कहकर संबोधित करते हुए उसने कहा, "मिस्टर न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के ASP के खिलाफ साइबर क्राइम सिंडिकेट चलाने के लिए FIR दर्ज करने का आदेश दें।"
वह पहले भी व्यक्तिगत रूप से (Petitioner-in-Person) इलाहाबाद हाईकोर्ट में उपस्थित होकर मुकदमा लड़ चुके हैं। उदाहरण के लिए, उनकी Criminal Misc. Writ Petition No. 2989 of 2026 में भी रिकॉर्ड पर "Counsel for Petitioner: In Person" दर्ज है
यदि कोई व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के भीतर खड़े होकर न्यायाधीशों को आदेश देने की मुद्रा में कहे—"आप इसके खिलाफ FIR दर्ज करने का डायरेक्शन दीजिए"—और कागज़ लहराकर न्यायालय पर दबाव बनाने का प्रयास करे, तो यह न्यायिक मर्यादा की खुली अवमानना जैसा आचरण प्रतीत होता है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति की आवाज़ की ऊँचाई, आक्रोश या दबाव से नहीं, बल्कि संविधान, कानून और न्यायिक सिद्धांतों से संचालित होता है।
अदालत में आदेश नहीं दिए जाते, प्रार्थना की जाती है।
दबाव नहीं बनाया जाता, विधिक तर्क दिए जाते हैं।
कागज़ लहराने से न्याय नहीं मिलता, साक्ष्य और कानून से न्याय मिलता है।
यदि अदालतों में भी लोग न्यायाधीशों को निर्देश देने लगें, तो वह न्यायिक व्यवस्था नहीं, भीड़तंत्र की शुरुआत होगी।

न्यायालय की गरिमा लोकतंत्र की रीढ़ है। उसकी मर्यादा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

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सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने वाले कार्य वैसे तो सहन नहीं किए जाने चाहिए लेकिन हर मामले को देखने के लिए एक ही मापदंड होना चाहिए

जुलाई 10 को सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रबल प्रताप ने एक याची के तौर पर जिरह करते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अलोक अराधे को कहा कि “माई जुडिशल सर्वेंट, मैं तुम्हे आदेश देता हूं कि तुम लखनऊ के एसपी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश दो इस पर जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि तुम मुझे आदेश दे रहे हो याचिकाकर्ता ने कहा कि बस इतना ही हमारी तरफ से था, बाकी सब रिकॉर्ड पर है इसके साथ ही उसने न्यायाधीश के लिए अपशब्द कहते हुए फ़ाइल और दस्तावेज़ पीठ की तरफ उछाल दिए 

कुछ जगह यह रिपोर्ट किया गया है कि प्रबल प्रताप ने फ़ाइल और दस्तावेज़ फेंकते हुए कहा -”ये दे देना उस (गाली) CJI को” न्यायाधीशों ने यह उसकी निराशा (frustration) कहते हुए कोई कार्रवाई नहीं की उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया और पूछताछ कर रही है

अगर प्रबल प्रताप वकील है जैसा कई जगह बताया गया है तो अभी तक बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) ने उसका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने उसकी सदस्य्ता रद्द क्यों नहीं की और इलाहाबाद बार एसोसिएशन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दोनों माननीय जजों की तरफ से कोई उत्तेजनात्मक बात नहीं कही गई परंतु 6 दिसंबर 2025 को वकील राकेश किशोर का तत्कालीन चीफ जस्टिस बीआर गवई पर भड़काना तो हर तरह से जायज था लेकिन BCI ने तत्काल उसका लाइसेंस रद्द कर 71 वर्षीय वकील किशोर की प्रैक्टिस पर आजीवन प्रतिबन्ध लगा दिया और SCBA ने भी उसकी सदस्य्ता रद्द कर दी 

चीफ जस्टिस गवई एक बौद्ध हैं और उन्होंने खजुराहो के मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति को ठीक करने की आदेश मांगने वाली याचिका पर याचिकाकर्ता से कहा कि भगवान विष्णु के पास जाओ, वो ही कुछ कर सकते हैं एक अल्पसंख्यक समुदाय के जज ने खुलेआम सनातन धर्म और भगवान विष्णु का अपमान किया जिसे देख कर वकील राकेश किशोर का खून खौल गया और उन्होंने चीफ जस्टिस की तरफ जूता फेंकने की कोशिश की जूता फ़ेंक पाए या नहीं कोई नहीं जानता

चीफ जस्टिस गवई ने भी राकेश किशोर के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया था लेकिन उनके देखते देखते BCI और SCBA ने उसके प्रैक्टिस पर पाबंदी लगा कर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी इससे बड़ी कार्रवाई और क्या हो सकती थी 

मतलब गवई साहब कोई कार्रवाई न करके बड़प्पन का सबूत देना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें BCI और SCBA को भी रोकना चाहिए था हो सकता है राकेश किशोर को आभास रहा हो कि सनातन धर्म के लिए ऐसे कार्य की उन्हें क्या सजा भुगतनी पड़ सकती है और इसलिए उन्होंने सनातन धर्म के लिए अपनी यह क़ुरबानी दे दी

गवई साहब का बयान कोई नई बात नहीं है आए दिन अदालतों में बहुत कुछ कहा जाता है जो नाकाबिले बर्दाश्त होता है और किसी की भी जीवन बर्बाद कर सकता है याद तो होगा आज के चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जब उन्होंने जस्टिस परदीवाला के साथ मिलकर नूपुर शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे भयानक Hate Speech दी थी और उसका करियर चौपट कर दिया था जबकि नूपुर को उकसाने वाले और भगवान शंकर का अपमान करने वाले तस्लीम रहमानी के खिलाफ न तो कोई एक शब्द बोला और न कोई कार्रवाई करने के आदेश दिए और आज भी नूपुर शर्मा खौफ के साये में जी रही है सुरक्षा कर्मियों को साथ लेकर

US में साइक्लोस्पोरियासिस का प्रकोप, तेजी से फैल रहा आँखों से न दिखने वाला यह खतरनाक पैरासाइट: जानिए, कैसे ये भारत में भी फैल सकता है, बचाव के लिए करें कौन से उपाय

अमेरिका के कई राज्यों में इन दिनों एक छोटा पैरासाइट यानी पैरासाइट के कारण फैली बीमारी ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम जनता की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। इस बीमारी का नाम साइक्लोस्पोरियासिस है, जो मुख्य रूप से हमारे पाचन तंत्र पर हमला करती है।

हाल के हफ्तों में इस संक्रमण के मामलों में अप्रत्याशित और बहुत तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके कारण अस्पतालों और जाँच प्रयोगशालाओं पर भारी दबाव बन गया है।

इस बीमारी की चपेट में आने वाले मरीजों को बेहद गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें हफ्तों तक चलने वाले अनियंत्रित और बहुत तेज दस्त यानी डायरिया की शिकायत सबसे ज्यादा है।

मिशिगन जैसे राज्य में तो स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वहाँ कुछ ही दिनों के भीतर सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं, जो आम दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा हैं। हालाँकि स्वास्थ्य विभाग और संघीय एजेंसियाँ लगातार इस बात की जाँच कर रही हैं कि आखिर इस संक्रमण की मुख्य वजह क्या है, लेकिन अभी तक किसी भी एक विशेष खाद्य पदार्थ, ब्रांड या सप्लायर की पहचान नहीं हो सकी है।

शुरुआती जाँच में दूषित ताजे फल और सब्जियों को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है, क्योंकि यह पैरासाइट अक्सर खेतों और फसलों के जरिए ही इंसानी आबादी तक पहुँचता है। चूँकि भोजन की आपूर्ति श्रृंखला कई राज्यों से होकर गुजरती है, इसलिए इस संक्रमण के सटीक स्रोत का पता लगाना जाँच कर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

क्या है साइक्लोस्पोरियासिस और कैसे होता है इसका हमला

साइक्लोस्पोरियासिस असल में भोजन या पानी के जरिए फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है, जो एक बेहद छोटे और छोटा  पैरासाइट  साइक्लोस्पोरा कायटैनेन्सिस के कारण होती है।

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी CDC के मुताबिक, यह पैरासाइट इंसानी आँखों से दिखाई नहीं देता और जब कोई व्यक्ति इससे दूषित खाना या पानी लेता है, तो यह उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।

शरीर में पहुँचने के बाद यह पैरासाइट मुख्य रूप से छोटी आंत को अपना निशाना बनाता है और वहाँ जाकर अपनी संख्या बढ़ाने लगता है, जिससे आँतों का सामान्य कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।

यह संक्रमण आम तौर पर गर्मी के महीनों में यानी मई की शुरुआत से लेकर अगस्त के अंत तक बहुत ज्यादा सक्रिय रहता है क्योंकि इस मौसम में इस पैरासाइट के पनपने की अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

हालाँकि यह बीमारी आमतौर पर जानलेवा नहीं मानी जाती है, लेकिन अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए तो यह हफ्तों तक शरीर को निचोड़ सकती है। सबसे खास बात यह है कि इसके लक्षण एक बार ठीक होने के बाद दोबारा वापस आ सकते हैं, जिससे मरीज लंबे समय तक कमजोरी और थकावट महसूस करता रहता है।

शरीर पर दिखने वाले लक्षण और डायरिया का खतरनाक रूप

जब कोई व्यक्ति इस खतरनाक पैरासाइट के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर में तुरंत लक्षण दिखाई नहीं देते बल्कि इसे उभरने में दो दिन से लेकर चौदह दिन तक का समय लग सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस संक्रमण का सबसे प्रमुख और डरावना लक्षण पानी जैसा तेज दस्त होना है, जिसे कई बार विस्फोटक मलत्याग भी कहा जाता है। इसके अलावा मरीजों को पेट में बहुत तेज और असहनीय मरोड़ या ऐंठन महसूस होती है, जो उन्हें पूरी तरह से बेहाल कर देती है।

संक्रमण के अन्य लक्षणों में लगातार जी मिचलाना, उल्टी होना, शरीर में भारी थकान, भूख में भारी कमी आना और बहुत तेजी से वजन का घटना शामिल है। इसके अतिरिक्त मरीजों को पेट में बहुत ज्यादा गैस बनने, शरीर में तेज दर्द होने और हल्का बुखार रहने की शिकायत भी होती है।

नोरोवायरस जैसे आम पेट के इन्फेक्शन के विपरीत, जो कुछ ही दिनों में खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है, साइक्लोस्पोरियासिस का असर बहुत लंबा चलता है। इसके गंभीर दौर में मरीजों के शरीर से पानी इतनी तेजी से निकलता है कि उन्हें डिहाइड्रेशन यानी पानी की गंभीर कमी के कारण अस्पताल में भर्ती तक कराना पड़ जाता है।

अमेरिका में अचानक बढ़े मामले और जाँच की जमीनी हकीकत

इस समय अमेरिका के कई राज्यों जैसे मिशिगन, ओहियो, इलिनोइस, न्यूयॉर्क, टेक्सास, नॉर्थ कैरोलिना और इंडियाना में इस संक्रमण के मामलों में भारी उछाल आया है।

मिशिगन के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वहाँ पिछले कुछ ही हफ्तों में मामलों की संख्या तेजी से बढ़कर सात सौ से ऊपर पहुँच गई है, जबकि आम तौर पर इस पूरे राज्य में सालभर में सिर्फ चालीस से पचास मामले ही सामने आते थे।

मिशिगन के दक्षिण-पूर्वी हिस्से के कई काउंटियों जैसे मोनरो, वाश्टेनॉ, लेनावी, शियावासी, वेन, जैक्सन, ओकलैंड और लिविंगस्टन में इसका सबसे घातक असर देखा जा रहा है। 

मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि मरीजों का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाएँ पूरी तरह से थक चुकी हैं और जहाँ पहले टेस्ट की रिपोर्ट चौबीस घंटे में आ जाती थी, वहीं अब इसमें दो से तीन दिन का समय लग रहा है।

इस भारी दबाव के कारण डॉक्टरों को यह भी सोचना पड़ रहा है कि अगर जाँच में देरी जारी रही, तो वे केवल लक्षणों के आधार पर ही इलाज शुरू कर देंगे। मिशिगन की मुख्य चिकित्सा कार्यकारी डॉ नताशा बगदासारियन ने बताया कि इतने बड़े पैमाने पर मरीजों का इंटरव्यू लेना और उनके खान-पान का पता लगाना मुस्किल काम हो गया है।

स्वास्थ्य कर्मी दिन-रात काम करके मरीजों की ग्रोसरी लिस्ट खंगाल रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने पिछले दिनों में किस रेस्टोरेंट में क्या खाया था।

कैसे फैलता है यह पैरासाइट और क्यों है इसे ढूँढना मुश्किल

साइक्लोस्पोरा पैरासाइट के फैलने का मुख्य जरिया इंसानी मल यानी व्हीकल-ओरल रूट होता है, जब किसी संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित हुआ पानी या मिट्टी फसलों के संपर्क में आती है।

हालाँकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह साफ किया है कि यह बीमारी सीधे तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तुरंत नहीं फैलती है, क्योंकि शरीर से बाहर निकलने के बाद इस पैरासाइट के अंडों को पर्यावरण में संक्रामक यानी एक्टिव होने के लिए कम से कम एक से दो सप्ताह का समय चाहिए होता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यह संक्रमण घर में खाना पकाने के दौरान नहीं, बल्कि सीधे खेतों के स्तर पर असुरक्षित सिंचाई जल या खराब स्वच्छता के कारण फैलता है। चूँकि बहुत से फल और सब्जियाँ कच्चे ही खाए जाते हैं, इसलिए वे इस संक्रमण को फैलाने के सबसे बड़े वाहक बन जाते हैं।

इस जाँच को सबसे ज्यादा जटिल अमेरिका की विशाल फूड सप्लाई चेन बनाती है, जहाँ एक राज्य में उगाई गई फसल को दूसरे राज्य में पैक और प्रोसेस किया जाता है और फिर उसे देश के दर्जनों अलग-अलग राज्यों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।

पूर्व में हुए इसके आउटब्रेक बताते हैं कि पैक्ड सलाद, धनिया, तुलसी, रास्पबेरी, स्नो पीज और हरी प्याज जैसी चीजें इसके फैलने का मुख्य कारण रही हैं और इस बार भी FDA and CDC प्याज, खीरा और धनिए जैसी चीजों पर अपनी जाँच केंद्रित कर रहे हैं।

संक्रमण से बचाव के उपाय और फल-सब्जियों को साफ करने के तरीके

इस पैरासाइट से सुरक्षित रहने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों और न्यूयॉर्क राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने बहुत ही कड़े दिशा-निर्देश और व्यावहारिक सुझाव जारी किए हैं। चूँकि यह पैरासाइट फल और सब्जियों की सतह से बहुत मजबूती से चिपक जाता है, इसलिए केवल साधारण पानी से इसे ऊपर-ऊपर से धो देना काफी नहीं होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रास्पबेरी जैसी बेरीज को साफ करना और भी मुश्किल होता है क्योंकि उनके ऊपर छोटे-छोटे बाल होते हैं जिनमें यह पैरासाइट आसानी से छिपा रहता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले ताजी सब्जियाँ या फल छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को साबुन और पानी से बहुत अच्छे से धोना चाहिए।

सभी कटी हुई या पकी हुई सब्जियों को तैयार करने के दो घंटे के भीतर तुरंत रेफ्रिजरेटर में रख देना चाहिए। इसके अलावा सलाद के पत्तों को इस्तेमाल करने से पहले उनके बाहरी पत्तों को पूरी तरह से हटाकर फेंक देना चाहिए और खीरे या तरबूज जैसी सख्त चीजों को साफ ब्रश से अच्छी तरह रगड़कर धोना चाहिए।

किसी भी फल या सब्जी के खराब हिस्से को खाने से पहले काटकर अलग कर देना चाहिए। हालाँकि इसे जमाने यानी फ्रीज करने से इस पैरासाइट के मरने की कोई गारंटी नहीं होती है, लेकिन भोजन को कम से कम 158 डिग्री फारेनहाइट यानी 70 डिग्री सेल्सियस तक अच्छी तरह पकाना इसे खत्म करने का एकमात्र सबसे सुरक्षित और निश्चित तरीका है।

चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता और इलाज के उपलब्ध विकल्प

यदि किसी व्यक्ति को लगातार कई दिनों तक पानी जैसे दस्त हो रहे हों, पेट में तेज मरोड़ उठ रही हो या शरीर में पानी की कमी के लक्षण जैसे चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, पेशाब कम होना और बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही हो, तो उसे बिना किसी देरी के तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड यानी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह संक्रमण और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनके शरीर में यह बीमारी लंबे समय तक टिकी रह सकती है और उन्हें ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लगता है।

हालाँकि अभी तक इस संक्रमण से किसी के भी मौत की खबर नहीं आई है, लेकिन स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए समय पर इलाज बहुत जरूरी है।

सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र का विरोध करने वालों को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से झटका, कोर्ट ने कहा- संस्कार सिखाना गलत नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी प्रार्थनाएं कराने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह फैसला बिल्कुल सही है, क्योंकि किसी भी छात्र को जबरदस्ती ये प्रार्थनाएं गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। राज्य के सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र के पाठ को शुरू करने के सरकारी आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर हाई कोर्ट ने एक बड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि स्कूलों में संस्कार सिखाना गलत नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने न केवल इस याचिका को  खारिज किया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और नैतिक शिक्षा को किसी संकीर्ण सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह फैसला देश में ‘सांस्कृतिक जागरूकता बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता’ की बहस में एक मील का पत्थर साबित होगा।

वंदना के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की मंशा राजनीतिक तुष्टिकरण

इस पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जबकि राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग का 12 जून 2026 को एक सर्कुलर जारी किया। इसमें शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ-साथ सरस्वती वंदना और छुट्टी के समय गायत्री मंत्र के गायन का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के आते ही देश का एक खास वर्ग सक्रिय हो उठा। हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देने वालों में छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद शामिल थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकारी धन से चलने वाले स्कूलों में इन मंत्रों का पाठ संविधान का उल्लंघन है, जो धार्मिक शिक्षा देने पर रोक लगाते हैं। हालांकि, इसके पीछे छिपी कुत्सित मंशा साफ तौर पर राजनीतिक तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक विरासत को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने की थी।

किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं

राज्य सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखा। सरकार ने कहा कि ये मंत्र और वंदनाएं किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और अच्छे संस्कारों का हिस्सा हैं। इनका मकसद बच्चों में अनुशासन, बड़ों के प्रति आदर और पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाना है। सरकार ने यह भी बताया कि यह नियम लागू हो चुका है और किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग के इस नियम के मुताबिक, राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ करना होता है। इसके साथ ही महापुरुषों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। दोपहर के खाने से पहले भोजन मंत्र और स्कूल की छुट्टी होने से पहले गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ किया जाता है।

देश के राज्यों की स्थिति: कहां-कहां गूंजते हैं ये मंत्र?
भारत के कई राज्यों में सुबह की प्रार्थना सभाओं में सरस्वती वंदना और वैदिक मंत्रों का गायन एक पुरानी और स्थापित परंपरा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ में शैक्षणिक परिसरों में अनुशासन, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाले वैदिक श्लोकों को जबरन अल्पसंख्यक अधिकारों के हनन से जोड़कर समाज में एक विभाजनकारी विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया गया। उनकी मंशा भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शिक्षा से दूर रखकर छात्रों को अपनी ही जड़ों से काटने की थी।
1. किन राज्यों में लागू: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों के अधिकांश सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना और शांति पाठ को नैतिक शिक्षा का अभिन्न अंग माना गया है।
2. सांस्कृतिक शुरुआत: इन राज्यों का मानना है कि विद्या की देवी सरस्वती की वंदना किसी विशिष्ट पूजा पद्धति की अनिवार्य ही नहीं, बल्कि ज्ञान की साधना की एक सांस्कृतिक शुरुआत भी है।

3. रोक की स्थिति: देश के किसी भी राज्य में कानूनन सरस्वती वंदना पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन केरल, तमिलनाडु और कुछ गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारी स्तर पर ऐसी प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने से परहेज किया जाता है। वहां केवल राष्ट्रगान या धर्मनिरपेक्ष प्रार्थनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। 

मन पर तीन प्रभाव डालती है यह वंदना

मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का मानना है कि सुबह की सभा में सामूहिक मंत्रोच्चार का बच्चों के मानस पर गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गायत्री मंत्र और सरस्वती वंदना केवल धार्मिक श्लोक नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर छिपी ध्वनि तरंगें और शब्द विन्यास वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं:

  1. एकाग्रता और मानसिक शांति: गायत्री मंत्र का सस्वर पाठ मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करता है, जिससे छात्रों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति का विकास होता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: सुबह-सुबह सामूहिक स्वर में तमसो मा ज्योतिर्गमय या ‘शिल्प-ज्ञान-विवर्धिनी’ जैसे श्लोकों का उच्चारण बाल मन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाता है।
  3. संस्कार और अनुशासन: यह बच्चों के मन में शुरू से ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गौरव का भाव पैदा करता है और उन्हें नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है, जो आज की आधुनिक और तनावपूर्ण जीवनशैली में बेहद जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में पक्ष-विपक्ष का राजनीतिक घमासान
अदालत के बाहर इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में पक्ष-विपक्ष आमने सामने आ गए हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री अरुण साव और शिक्षा मंत्री ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह कदम हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2000 के सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य छात्रों को भारतीय ज्ञान प्रणालियों से जोड़ना है। भाजपा के अनुसार, यह नई पीढ़ी में देशभक्ति, अनुशासन और उच्च नैतिक संस्कारों को सिंचित करने का एक ऐतिहासिक अभियान है। दूसरी ओर तुष्टिकरण की नीति के चलते विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे हिन्दुत्व के एजेंडे को लागू करने और शिक्षा के ‘भगवाकरण’ का प्रयास बताया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर धार्मिक और संवेदनशील मुद्दों को हवा दे रही है।
फैसले से कानून और संस्कृति के बीच बेहतरीन संतुलन
वास्तविकता यह है कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए कानून और संस्कृति के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम किया है। अदालत ने यह स्पष्ट करके विपक्ष और याचिकाकर्ताओं के डर को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यह आदेश ‘बाध्यकारी’ या ‘दबाव डालने वाला’ नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 28(1) भले ही राज्य पोषित संस्थानों में ‘धार्मिक कर्मकांड या संकीर्ण धार्मिक शिक्षा’ पर रोक लगाता हो, लेकिन वह देश की साझा सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना सिखाने वाले सार्वभौमिक विचारों पर पाबंदी नहीं लगाता। स्कूल केवल किताबी ज्ञान देने वाले कारखाने नहीं हैं; वे नागरिक गढ़ने के केंद्र हैं। ऐसे में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी पावन परंपराओं को विवादों के घेरे में खींचना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। हाई कोर्ट के इस फटकार के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि तुष्टिकरण की संकीर्ण राजनीति अब शिक्षा के पवित्र प्रांगण से दूर रहेगी।