यह बड़ा गंभीर प्रश्न है कि आखिर राज्यों के मामले वकील लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट कैसे ले जाते हैं और सुप्रीम कोर्ट उन्हें Admission Stage पर ही खारिज क्यों नहीं करता। दो दिन पहले एक वकील विशाल तिवारी भारत भूषण तिवारी के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट चला गया था जबकि उसे पहले हाई कोर्ट जाना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट जाना साबित करता है कि जो घोटाला हुआ है इसमें 2027 में योगी को हराने के लिए विपक्ष की भूमिका होने का शक है। सुप्रीम कोर्ट जाने वाले वकील चुनाव तक तारीख पे तारीख लेते रहेंगे, ताकि हिन्दुओं में बीजेपी के खिलाफ भड़काया जा सके।
आज राम मंदिर के चोरी के मामले को लेकर कुछ वकील सीधे सुप्रीम कोर्ट चले गए। उनमें ये वकील शामिल हैं -
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-अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव। उन्होंने PIL दायर करके मांग की है कि FIR दर्ज की जाए; CCTV के रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं और समयबढ़ सीमा में सीबीआई के आधीन एक SIT जांच करे;
-एडवोकेट नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने भी Digital Payment logs, CCTV footage और मंदिर की DVR रिकॉर्डिंग को सुरक्षित करने की मांग की है;
-Advocate-on-record अनूप प्रकाश अवस्थी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मामले का संज्ञान लेने और अपनी निगरानी में CBI जांच और ट्रस्ट के खातों की Forensic Audit की मांग की है।
इन तीनो की याचिकाओं में कोई विषय ऐसा नहीं है जिस पर भारत का सबसे बड़ा हाई कोर्ट, इलाहबाद हाई कोर्ट निर्णय नहीं ले सकता लेकिन ये सभी लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट भागे हैं। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने तुरंत सुनवाई से इंकार कर दिया और कहा कि कोर्ट रजिस्ट्री के द्वारा मामलों को लिस्ट किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट लिस्टिंग बाद भी कह सकता है कि पहले हाई कोर्ट जाओ लेकिन ये आज ही कह देनी चाहिए थी। देश के High Courts को अगर नज़रअंदाज करके किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट सीधे सुनवाई करता है तो वह अपनी सीमाओं को लांघने का काम करेगा और हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करेगा।
ये वकील लोग इतने उतावले क्यों थे? उत्तर प्रदेश सरकार ने SIT गठित की थी जिसने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में FIR दर्ज करने की संस्तुति की है। अब कुछ समय तो दीजिए राज्य सरकार को SIT की Recommendation पर अमल करने के लिए। लेकिन ये वकील तो ऐसा कर रहे हैं जैसे आसमान ही गिर गया हो क्योंकि योगी सरकार ने कुछ किया ही नहीं। क्यों भूल जाते हैं ये लोग, वो योगी है, चोरों की कब्रों में से भी उगाही करवा देगा?
सुप्रीम कोर्ट को दिशा निर्देश तय करने चाहिए कि कौन सा मामला पहले हाई कोर्ट जाएगा और कौन से मामले वह सीधे सुनेगा। केंद्र सरकार का आदेश अगर पूरे देश पर लागू होता है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं; दो या उससे ज्यादा राज्यों का अगर एक ही मामला है तो वह भी सुप्रीम कोर्ट जा सकता है लेकिन जो मामला राज्य सरकार से ही संबंधित है वह पहले हाई कोर्ट ही जाना चाहिए।
मनमर्जी नहीं चलनी चाहिए जैसे चंद्रचूड़ ने कोरोना के विषय में किया था जब हर हाई कोर्ट को सुनवाई करने के लिए कह दिया और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में वो 24-24 घंटे में केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांग रहे थे। केंद्र और राज्यों की सरकार कोरोना से निबटे या अदालतों के चक्कर लगाती रहें, इसका ख्याल नहीं आया चंद्रचूड़ को और हर सर्कार को चकरी बना कर रख दिया था लेकिन फिर हुआ क्या, जो सबसे ज्यादा छातियां पीट रहा था ऑक्सीजन के लिए, वह केजरीवाल ही जरूरत से चार गुना ऑक्सीजन लिए बैठा था लेकिन उस पर कुछ नहीं बोले मीलॉर्ड।
कुछ साल पहले जाति आधारित हिन्दू लड़कियों की रेट लिस्ट बहुत चर्चित थी। शायद एक-दो चैनल ने इस मुद्दे पर चर्चा भी की थी। लव जिहाद हो या हिन्दू नाम रख हिन्दू लड़कियों को फंसाना, गैंग रेप और अब ग्रूमिंग गैंग। अगर यही काम हिन्दुओं द्वारा किया जा रहा होता अब तक सरकार द्वारा कानून बनाकर इनके बैंक खाते तक जब्त कर लिए होते लेकिन अब शांतिदूत कर रहे सरकार बहुत ही संभलकर कदम उठा रही है। ऐसे जितने भी मामले हैं सरकार को इनके victim card जाल में फंसने की बजाए इनके, इनके परिवार के बैंक खाते फ्रीज़ करने के साथ-साथ इनके आतंकवादियों के sleeper cell होने की भी जाँच करनी चाहिए।
जिसे देखो रोना रोता रहता है कि भारत में मुसलमान डरा हुआ है, जो डरी हुई कौम इतना उपद्रव कर सकती है अगर डरी हुई नहीं होती, अंजाम समझ सकते हैं। किसी मुस्लिम के साथ कोई दुर्घटना होने पर हामिद अंसारी से लेकर आमिर खान और बॉलीवुड को भारत में रहने पर डर सताने लगता था, लेकिन अब सबको सांप सूंघ गया है। शायद अब ऐसी घटनाओं से उनके लिए भारत सुरक्षित हो गया है? मजे की बात यह है कि संविधान हाथ में लेकर डोलने वाले, संविधान की दुहाई देने वाले सब पता नहीं किस काल कोठरी में छिपे बैठे हैं? मीडिया भी अपनी TRP बढ़ाने के लिए ऐसे लोगो को खूब प्रचार करता है।
उन सभी नेताओं और उनकी पार्टियों से दूरी बनानी होगी। योगी की बात याद रखनी होगी कि "हिन्दुओं बटोगे तो कटोगे"। जो हिन्दुओं को जातियों में बाँटने की बात करते हैं उनसे पूछने का समय आ गया है कि "क्या दूसरे मजहब की जातियों में हो रहे भेदभाव के बारे में बोलने की हिम्मत है।" हिन्दुओं से कहीं ज्यादा उत्पीड़न ईसाई और मुस्लिमों में है जिसे कोई इंकार नहीं कर सकता। एक जाति दूसरी जाति की मस्जिद या चर्च में नहीं जा सकता। दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकते। किसी भी जाति का हिन्दू एक ही मन्दिर में जाकर पूजा कर सकता/सकती है, मरने पर एक ही शमशान में अंतिम संस्कार होता है। अब हिन्दुओं सोंचों उत्पीड़न कहाँ है।
इनके पक्ष में खड़े होने वाले वकीलों पर भी नकेल कसनी होगी। क्योकि इन केसों की पैरवी के इन्हे मोटे पैसे मिलते हैं। Advocate Bar Associations को भी इस गंभीर मसले पर चिंतन करने की जरुरत है। क्योकि जब तक चौतरफा हमला नहीं होगा सरकार और पुलिस भी किसी निर्णय पर पहुँचने में नाकाम होंगे, लेकिन इस काम में अदालतों को भी साथ देना होगा। लेकिन हिन्दू लड़कियों को भी ऐसे किसी प्रेमजाल से दूर रहने की जरुरत है।
ब्रिटेन में दशकों से चले ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल की परतें अब एक-एक कर उठ रही हैं। रोजाना नए खुलासे और पीड़ितों की झकझोर देने वाली गवाहियाँ, कोर्ट की कार्यवाही और यहाँ तक कि ब्रिटेन की संसद में इस स्कैंडल को लेकर होने वाली बहस भी लोगों के लिए एक कौतूहल और सच्चाई जानने का आईना बनती जा रही है। ये कहानियाँ बिलकुल वैसी हैं जो आपको सीधा भारत के लव जिहाद के खेल और ‘मुस्लिम गैंग’ के कुकर्मों से मेल खाती मिलेगी।
पीड़ितों की गवाहियों में उनके साथ होने वाले रेप की भयावह दास्तान जहाँ रोंगटे खड़े दे रही है वहीं पुलिस अधिकारियों का भी पीड़ितों के साथ दुष्कर्म करने और नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने के तरीकों के बारे में खुलकर बात की जा रही है।
ब्रिटेन के ग्रेट यारमाउथ से सांसद रूपर्ट लोव ने भरी संसद में कई लड़कियों की गवाहियाँ पढ़ीं। उन्होंने बताया कि किस तरह से लाखों लड़कियों ने कई वर्षों तक अत्याचार झेला और बार-बार पुलिस और प्रशासन के दरवाजे खटखटाए। इसके बावजूद उनकी शिकायतों को प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया। इसकी वजह से ग्रूमिंग गैंग का मामला इतने बड़े स्तर पर फल-फूल कर हजारों लड़कियों की जिंदगियाँ तबाह करता रहा।
ब्रिटिश नेशनलिटी एक्ट – 1948 के बाद बड़े पैमाने पर इमिग्रेशन शुरू हुआ और इसके लगभग साथ ही ऐसे मामले सामने आने लगे। पहला दर्ज मामला 1955 का है, जब ब्रैडफोर्ड में चार पाकिस्तानी पुरुषों पर एक 15 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगा।
इंडिपेंडेंट इंक्वायरी इनटू चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज यानी IICSA की रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक तक यह प्रवृत्ति एक सोची-समझी साजिश का रूप ले चुकी थी। 1997 के बाद इमिग्रेशन की नई लहर ने इस नेटवर्क को और विस्तार दिया और इसके साथ ही शोषण के मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ने लगी। अपराधियों में ज्यादातर पाकिस्तान से आए मुस्लिम पुरुष थे।
जाँच में यह भी सामने आया कि 87% अपराधी पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुष थे जो टैक्सी चालक, रेस्तराँ मालिक, केयर होम कर्मचारी या अन्य ऐसी भूमिकाओं में थे जहाँ कमजोर लड़कियों तक उनकी आसान पहुँच थी।
उन्होंने टैक्सी, होटल, घरों और कुछ अन्य जगहों पर लड़कियों को ले जाकर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। उन्हें सिगरेट से जलाया, उनके प्राइवेट पार्ट में बोतल फोड़ी, ब्लैकमेल किया, एक शहर से दूसरे शहर में तस्करी की और पीड़िताओं का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया।
ग्रूमिंग गैंग
ग्रूमिंग गैंग उस संगठित आपराधिक नेटवर्क को कहा जा सकता है, जिसमें नाबालिग या कमजोर स्थिति की लड़कियों को पहले अपने झाँसे में फँसाया जाता है। फिर उन्हें उपहार, झूठे प्रेम, नशे, धमकी या सामाजिक दबाव में लाया जाता है। इसके बाद उनका यौन शोषण किया जाता है।
यह एक ऐसी प्रणाली थी जो वर्षों की आजमाइश के बाद ईजाद की गई थी। सबसे दुखद यह है कि जब-जब संकेत मिले जिनमें लड़कियों का गायब होना, संदिग्ध पुरुषों का स्कूलों के बाहर मंडराना, कम उम्र की लड़कियों का बड़े पुरुषों के साथ दिखना जैसी बातें शामिल रहीं, तब-तब पुलिस और प्रशासन ने इसे ‘सांस्कृतिक संवेदनशीलता’ के नाम पर दरकिनार कर दिया। दशकों तक यही होता रहा।
ब्रिटेन के रॉदरहैम मामले में आधिकारिक जाँच ने 1997 से 2013 के बीच कम-से-कम 1,400 बच्चों के शोषण का अनुमान दर्ज किया था और इसमें प्रशासनिक विफलता भी सामने आई।
लाखों पीड़िताएँ और ग्रूमिंग गैंग का नेटवर्क
इस पूरे मामले में कम से कम 2,50,000 युवा लड़कियाँ ग्रूमिंग गैंग का शिकार बनीं। 87% अपराधियों में पाकिस्तानी मुस्लिम शामिल थे। ब्रिटेन के 149 जिलों में ग्रूमिंग गैंग ने लड़कियों को निशाना बनाया। इनमें रॉदरहैम में 1400+, टेल्फोर्ड में 1000+ पीड़ित समेत कई अन्य जिलों से लड़कियाँ शामिल थीं।
ब्रिटेन में जब इस तरह के मामले सामने आए तो शुरुआत में सरकार ने भी इन मामलों को नजरअंदाज कर दिया। कई संस्थाओं ने इस सामुदायिक सद्भाव का नाम देकर पूरी सच्चाई छुप दी और इसी की वजह से हजारों जिंदगियां खराब हुई, कई परिवार टूटे और लोगों का पुलिस और प्रशासन से भरोसा खत्म हो गया।
रूपर्ट लोव के अनुसार, जिन लड़कियों के साथ ज्यादतियाँ हुई है, उनमें एक ऐसी पीड़िता भी थी जिसके अब्बा इमाम थे। उस पीड़िता ने बताया कि उसके साथ 600 से 700 पुरुषों ने बार-बार रेप किया।
उसके अलावा एक अन्य पीड़िता जब 12 साल की थी, तब उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डालकर फोड़ दी गई और नस्लीय टिप्पणियों के ताने दिए गए। उन टिप्पणियों में यह बात शामिल थी कि ‘गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं।’
भारत में ग्रूमिंग गैंग से कम नहीं लव जिहाद के मामले
ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग के जैसे मामले भारत में भी कई वर्षों से सामने आते रहे हैं।भारत में हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए अलग-अलग पैटर्न अपनाए जा रहे हैं। इसमें 1992 का अजमेर का सेक्स स्कैंडल मामला था। इसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले में स्कूली छात्राओं को निशाना बनाया गया। उन्हें भरोसे में लिया गया, उनके साथ सम्बन्ध बनाए गए। फिर उनकी आपत्तिजनक तस्वीरें लेकर ब्लैकमेल कर उनका शोषण किया गया। इस मामले में 32 साल बाद, 2024 में जयपुर की पोक्सो अदालत में 6 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
अजमेर ही एकलौता ऐसा मामला नहीं है, बल्कि भारत में बीते वर्षों में मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल और उत्तर प्रदेश के भी कई शहरों से ऐसे नेटवर्क सामने आ चुके हैं जिनमें मुस्लिम आरोपितों ने कॉलेज की छात्राओं को अपने प्रेम जाल में फँसाया, उन्हें ड्रग्स दिए और उनके अश्लील वीडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल और धर्मांतरण के लिए मजबूर किया।
उत्तर प्रदेश के कुछ मामलों में तो आरोपियों ने झूठी हिंदू पहचान अपनाकर लड़कियों का विश्वास जीता। ‘राम’, ‘सुनील’ या ‘विक्की’ जैसे हिंदू नाम रखे, नौकरी और शादी के सपने दिखाए और जब लड़की पूरी तरह उनके जाल में आ गई, तब असली चेहरा सामने आया। दुष्कर्म, ब्लैकमेल और मतांतरण का वही पुराना तंत्र देखने को मिला।
कहाँ क्या मामले देखने को मिले
शुरूआत अगर मध्यप्रदेश के भोपाल वाले मामले से करें तो इस केस का खुलासा जुलाई 2025 में हुआ। एक ड्रग गैंग चलाने वाले यासीन मछली और शाहवर मछली की गिरफ्तारी हुई। छानबीन में पता चला कि इनका मकसद सिर्फ ड्रग्स की तस्करी करना नहीं था बल्कि इनके निशाने पर हिंदू लड़कियाँ थीं। ये लोग हिंदू युवतियों को एमडी (MD) ड्रग देकर शारीरिक शोषण करते थे और उनसे ड्रग भी बिकवाते थे। इनका मकसद लड़कियों को बर्बाद करते हुए धर्मांतरण करवाना था ताकि उनके पास और कोई विकल्प न बचे।
भोपाल और इंदौर से ऐसी ही एक मुस्लिम गैंग का खुलासा हुआ था। गैंग का मास्टरमाइंड फरहान था। इस गैंग ने निजी कॉलेज में पढ़ने वाली हिंदू लड़कियों को निशाने पर लिया हुआ था। पीड़िताएँ इस मामले में लंबे समय तक चुप थीं, लेकिन बाद में जब एक मामला सामने आया तो एक-एक करके कई लड़कियाँ सामने आईं। उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें नशा देकर उनसे बलात्कार होता था और इसके बाद उनपर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।
इसी तरह का मामला नैनीताल से भी जुलाई में ही सामने आया था। यहाँ 11 वीं क्लास की हिंदू युवती को 30 साल के मुस्लिम युवक ने प्रेम जाल में फँसा रखा था। लड़की का परिवार इतना बेबस था कि उन्हें मदद के लिए हिंदू संगठनों का सहारा लेना पड़ा। परिवार ने गिड़गिड़ा कर बताया कि उनकी बेटी को नशा दिया जाता है, उसे लत लगवा दी गई है। घरवाले इसलिए मजबूर हो गए हैं क्योंकि बेटी परिवार के विरोध पर उतर आई है।
इंदौर के मूसाखेड़ी में भी जीशान खान ने ‘अभिषेक ठाकुर’ बनकर हिंदू युवती को फँसाया हुआ था। उसने लड़की को अपने जाल में उलझाए रखने के लिए उसको ड्रग्स की लत लगाई, फिर उसका यौन शोषण किया और उसे ब्लैकमेल करके उसपर धर्मांतरण का दबाव बनाने लगा।
एक अन्य मामला इंदौर से ही सामने आया। यहाँ सुल्तान रोशन नागोरी ने कोचिंग सेंटर में जाने वाली हिंदू युवतियों को टारगेट करता था। पोल तब खुली जब एक ब्राह्मण लड़की पुलिस के पास शिकायत लेकर पहुँची। युवती ने बताया कि सुल्तान ने उसके साथ शारीरिक शोषण तो किया ही था। साथ में उसे अश्लील फोटो-वीडियो वायरल की धमकी देकर धर्म परिवर्तन का दबाव भी बना रहा था।
इस मामले में पीड़िता ने कॉल सेंटर्स में एक्टिव धर्मांतरण सेल का भी खुलासा किया था। उसका दावा था कि इस सेल में हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए मुस्लिम लड़कों को रखा जाता था। उनका ब्रेनवॉश ये कहकर होता था कि अल्लाह ने तुम्हें हमारे लिए बनाया है। बाद में उन लड़कियों को नशे का आदी बनाया जाता था और उनका शारीरिक शोषण होता था।
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में एक दिन एक 17 साल की लड़की अपने घर से अचानक गायब हो गई। घरवालों ने परेशान होकर पुलिस में शिकायत दी। छानबीन हुई तो पता चला कि वो इंस्टाग्राम पर एक मुस्लिम लड़के से बात करती थी। लड़के का नाम अब्दुल्ला था। उसी ने उसे अगवा किया है। पुलिस जहा इसके बाद अब्दुल्ला और लड़की की तलाश में जुटी। वहीं परिवार केवल ये सोचता रहा कि उनकी बेटी के साथ ये सब कैसे हुआ।
बिहार में अंडा बेचने वाले सलमान ने एक मध्य प्रदेश में रहने वाली हिंदू युवती को पबजी खेलने के दौरान हिंदू नाम से प्रेम जाल में फँसाया। लड़की प्रेम में इतना पागल हुई कि वो अपना घर-बार छोड़कर मधुबनी आ गई। यहाँ उसे सलमान ने अपनी असली पहचान बताई। फिर उसे जबरन कलमा पढ़वाकर उसे निकाह किया। लड़की के साथ हुए इस धोखे का खुलासा उस समय हुआ जब लड़की के पिता की शिकायत पर पुलिस ने उसका इंस्टा जाँचा और सामने आया कि वो किसी सलमान के चक्कर में पड़ी हुई थी।
इसी साल मार्च में सामने आए महाराष्ट्र के नासिक में TCS के दफ्तर में हिंदू महिलाओं के यौन शोषण और जबरन धर्म परिवर्तन की कोशिश का मामले में आरोपितों में दानिश शेख, तौफिक अत्तार के साथ निदा खान नाम की ख्वातीन भी शामिल थी। वह लड़कियों को व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़कर धर्म से जुड़ी बातें बताती थी। निदा लड़कियों को मुस्लिम मजहब के रीति-रिवाज अपनाने के लिए प्रेरित करती थी और उन्हें नमाज पढ़ने से लेकर बुर्का पहनने तक की जानकारी और ट्रेनिंग देती थी। मामले की जाँच में हिंदू पीड़िता के फोन से इस्लाम से जुड़े 37 ऑडियो क्लिप और 4 मजहबी ऐप्स भी मिले।
एक व्यक्ति नहीं, पूरा नेटवर्क करता है काम
ब्रिटेन हो या भारत- इन मामलों को समझने के लिए इनके तंत्र को समझना जरूरी है। सतह पर एक आरोपी दिखता है, लेकिन असल में एक पूरा नेटवर्क काम कर रहा होता है। कोई लड़की की पहचान करता है। कौन सी लड़की घर में अकेली है, किसके माता-पिता का झगड़ा है, कौन भावनात्मक रूप से कमजोर है।
इसी तरह कोई अन्य उससे दोस्ती या प्रेम संबंध बनाता है, इसके बाद कोई आर्थिक मदद या सुरक्षा का भ्रम पैदा करता है, कोई वीडियो या फोटो बनाकर ब्लैकमेल करता है और फिर कोई दूसरा व्यक्ति आगे शोषण या दबाव की कड़ी संभालता है ।
अजमेर कांड की रिपोर्टिंग में भी यह सामने आया कि एक पीड़िता को अगली पीड़िता तक पहुँचने के माध्यम की तरह इस्तेमाल किया गया। ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग्स में भी लड़कियों को शराब, नशा, उपहार, वाहन, ठिकाने और भावनात्मक नियंत्रण के जरिए गैंग के भीतर घुमाया जाता था। यही कारण है कि ऐसे मामलों को केवल ‘लड़का-लड़की का निजी मामला’ कहकर टाल देना कई बार गंभीर भूल साबित हो सकता है ।
मध्य प्रदेश में लव जिहाद को लेकर कुछ रिपोर्टों में 283 मामलों का उल्लेख किया गया, जबकि विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के तहत दर्ज मामलों की संख्या भी चर्चा में रही।
ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग्स का मामला भारत के लिए एक कठोर चेतावनी है। यह चेतावनी किसी एक समुदाय के खिलाफ नारेबाजी की नहीं, बल्कि संगठित शोषण, यौन अपराध, ब्लैकमेल और मजबूरन धर्मांतरण जैसे आरोपों की गंभीर, निष्पक्ष और नेटवर्क-आधारित जाँच की है ।
दिल्ली के सीलमपुर में 16 साल के लक्क की चाकू से गोदकर हत्या (फोटो साभार: NDTV) केजरीवाल सरकार के समय किसी हिन्दू की हत्या होने पर जो बीजेपी शोर मचाती थी, आज उसी बीजेपी के राज में भी वही हो रहा है। जब तक इन जेहादियों के परिवार को मिलने वाली हर सरकारी सुविधा बंद नहीं होगी ये इस तरह आतंक करते रहेंगे। Victim card खेला जाएगा, कोई भटका हुआ मासूम बताएगा तो कोई दिमाग से पैदल आदि आदि इन जेहादियों के इस Victim card को नज़रअंदाज़ कर सरकारी सुविधाओं को बंद करना होगा।
पहले जगह-जगह बम धमाके से आतंक फैलाया जाता था अब क़त्ल करके आतंक फैलाया जा रहा है। सरकार, पुलिस और अदालतों को इस बात की गंभीरता से जाँच करनी होगी कि कहीं ये जेहादी आतंकियों के sleeper cell तो नहीं?
दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाके सीलमपुर में 16 साल के नाबालिग लड़के की चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई। घटना के बाद इलाके में हड़कंप मच गया है। पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। फिलहाल हत्या के पीछे की वजह सामने नहीं आई है। बताया जा रहा है कि आरोपितों में से एक लड़के का नाम फैजान है, जिसने अपने साथियों संग मिलकर लक्की की हत्या को अंजाम दिया।
अगर यही काम हिन्दुओं ने किया होता सारे सेक्युलरिस्ट्स सडकों पर आकर चील-कौओं की तरह चिल्ला रहे होते। संविधान की दुहाई दे रहे होते लेकिन अब ये काम उनके शांतिदूतों ने किया है सबको सांप सूंघ गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना सीलमपुर थाना क्षेत्र के गौतमपुरी इलाके की है। यहाँ लक्की नाम के लड़के की बुधवार (24 जून 2026) की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जानकारी के अनुसार, देर रात फैजान और उसके चार से ज्यादा साथियों ने लक्की को घेर लिया और उस पर ताबड़तोड़ चाकू से वार किए। गंभीर रूप से घायल लक्की सड़क पर गिर गया।
Delhi: A 16-year-old boy, Lucky, was stabbed to death in Gautampuri under Seelampur police station jurisdiction in Northeast Delhi, triggering tension. Police have cordoned off the area, are scanning CCTV footage, and questioning witnesses. Investigation is underway to identify… pic.twitter.com/A8QyItdEzG
आसपास के लोगों ने बताया कि वारदात को अंजाम देने के बाद हमलावर मौके से फरार हो गए। लक्की को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ ज्यादा खून बहने से उसकी मौत हो गई। सूचना पर पुलिस भी मौके पर पहुँची और इलाके का घेराव कर जाँच शुरू कर दी।
पुलिस ने लक्की के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। फिलहाल घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और परिजनों व स्थानीय लोगों से पूछताछ की जा रही है। बताया गया कि लक्की अक्सर माता की चौकी और जागरण में शामिल हुआ करता था, घटना वाले दिन भी वह माता की चौकी से ही लौट रहा था जब उसकी हत्या को अंजाम दिया गया। पुलिस ने बताया कि फिलहाल हत्या के पीछे की वजह स्पष्ट नहीं है, हर पहलू से जाँच की जा रही है।
कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदला, अब वीर गोपाल मुखर्जी रोड से जाना जाएगा, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT) पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘नाम बदलने’ के एक फैसले ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। कोलकाता की ऐतिहासिक और बेहद व्यस्त सड़कों में से एक ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ (Suhrawardy Avenue) का नाम अब बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ (Gopal Mukherjee Road) कर दिया गया है। कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा जारी इस आधिकारिक नोटिफिकेशन के बाद जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे ‘ऐतिहासिक न्याय’ और ‘हिंदुओं के स्वाभिमान की बहाली’ बताकर जश्न मना रही है, वहीं कांग्रेस और वामपंथी खेमे में इसके खिलाफ तीखा विरोध देखा जा रहा है।
पूरी दुनिया में भारत ही ऐसा अनोखा देश है जहाँ की जनता अपने ही गौरवशाली इतिहास से अज्ञान है। और महाज्ञानी गलत इतिहास को सही बताने का ज्ञान पेल अपनी गुलामी मानसिकता का प्रमाण देते नज़र आते हैं। दरअसल कांग्रेस और वामपंथ गठजोड़ ने भारतीय इतिहास को इतना अधिक धूमिल कर दिया कि असली इतिहास बताने वाले को फिरकापरस्त/हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का दुश्मन/गंगा-जमुनी तहजीब का दुश्मन आदि आदि सभी जानते हैं कि कितना उनको कलंकित किया जाता है। देखिए(संलग्न) मेरा प्रकाशित स्तम्भ। सिकंदर जिसके भारत की पुण्यभूमि पर कदम पड़ते ही हिन्दू सम्राट पोरस ने ऐसा पेला जिंदगी में भारत की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई। हिन्दू सम्राट पोरस के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर पढ़ाया गया 'दुनिया को फ़तेह करने वाला मुकद्दर का सिकंदर'।
फिर जिस अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक हर प्रधानमंत्री चादर भेजते रहे उसका क्या है इतिहास? फिर दिल्ली में गोलचा सिनेमा के पीछे तिराहा बहराम खान है, क्या है बहराम खान का इतिहास? कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने ऐसा जहरीला जाल बिछाया कि भारतवासी अपने वास्तविक इतिहास से अज्ञान है। देश में ऐसा कोई राज्य नहीं जहां मुग़ल आक्रांताओं के नाम पर सड़कों के नाम रखे हुए हैं, क्यों? ये कालनेमि हिन्दुओं ने भी बहुत गंद मचाया हुआ है। पहुँच जाते हैं कब्रों को पूजने। अपने देवी-देवताओं को पूजा नहीं जाता, त्यौहार ठंग से मनाए जाते। उन्हें बोझा समझते हैं। देखों पागल कालनेमि हिन्दुओं का पागलपन, दिल्ली में अशोक विहार फ्लाईओवर पर कट्टरपंथियों ने कब्र बना दी हर बृहस्पतिवार को पूजना कर दिया शुरू। अब तो कोर्ट के आदेश से उसे हटा दिया गया है।
मुसलमानों द्वारा टेलीग्राम पर एक ग्रुप बनाया गया
ग्रुप का नाम - सनातनियों की नीलामी ग्रुप का काम - हिंदू लड़कियों को फसाना,हिंदू देवी देवताओं से हिन्दू लड़कियों को दूर करना
ग्रुप की चैट सामने आई उसमें लिखा कि एक हिंदू लड़की से 3 4 हिन्दू लड़कियां और फसाओ और हिंदू लड़कियों को… pic.twitter.com/cQWGufaj2b
कांग्रेस इस फैसले को भाजपा की ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ करार दे रही है और सोशल मीडिया पर आम हिंदुओं को भाजपा कार्यकर्ता बताकर उनका मजाक उड़ा रही है। कांग्रेस का तर्क है कि यह सड़क ‘बंगाल के कसाई’ कहे जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उसके चाचा और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति (VC) डॉ. हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी।
मूर्खों की जमात है यह भाजपाइयों की। हसन सुहरावर्दी और हुसैन सुहरावर्दी में फ़र्क़ ही नहीं पता इन जाहिलों को। https://t.co/DR8GXy93Ly
— Pawan Khera 🇮🇳 ಪವನ್ ಖೇರಾ (@Pawankhera) June 21, 2026
लेकिन क्या वाकई इतिहास इतना सीधा और साफ है? क्या सिर्फ नाम का अंतर होने से एक देशद्रोही और अंग्रेजों के मददगार परिवार का दाग धुल जाता है? क्या कांग्रेस का इस सुहरावर्दी परिवार से लगाव सिर्फ आज का है या इसके तार देश के बंटवारे, जवाहरलाल नेहरू और पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति हिदायतुल्लाह तक जुड़े हुए हैं? आइए इस पूरी कड़वी हकीकत, दफन इतिहास और ‘गोपाल पाठा’ के शौर्य की कहानी को विस्तार से समझते हैं।
कौन था हसन सुहरावर्दी? अंग्रेजों की चाटुकारिता और ‘सर’ की उपाधि का सच
कांग्रेस का इकोसिस्टम आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम साल 1933 में डॉ. हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, जो एक बड़े सर्जन और शिक्षाविद थे। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि हसन सुहरावर्दी को अंग्रेजों ने ‘सर’ (Sir) की उपाधि और यह सड़क उनके किसी ‘अकादमिक योगदान’ के लिए नहीं, बल्कि भारत की एक महान बेटी और स्वतंत्रता सेनानी के साथ गद्दारी करने के इनाम में दी थी।
बात 6 फरवरी 1932 की है। कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह (Convocation) चल रहा था। मंच पर ब्रिटिश गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन (Sir Stanley Jackson) भाषण दे रहा था। उसी समय 21 साल की एक निडर बंगाली स्वतंत्रता सेनानी बीना दास (Bina Das) अपनी डिग्री लेने के बहाने वहाँ पहुँचीं। उनके पास एक रिवॉल्वर थी, जिसे उन्होंने अपनी पोशाक में छुपा रखा था। भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के संकल्प के साथ बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर एक के बाद एक 5 गोलियाँ दाग दीं।
गवर्नर जैक्सन ने किसी तरह झुककर अपनी जान बचाई। इसी दौरान वहाँ मौजूद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. हसन सुहरावर्दी ने देशभक्त बीना दास को पीछे से दबोच लिया और उन्हें ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया।
इतिहास की गवाही: हसन सुहरावर्दी ने एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी की जान बचाने के लिए अपने ही देश की एक क्रांतिकारी बेटी को अंग्रेजों के क्रूर शिकंजे में सौंप दिया। इस ‘वफादारी’ से खुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने हसन सुहरावर्दी को ‘सर’ (Knighthood) की उपाधि से नवाजा और साल 1933 में उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ रख दिया।
इस घटना के बाद बीना दास को 9 साल की कठोर जेल हुई। उनके साथ जुड़ीं अन्य महिला क्रांतिकारियों, जैसे कमला दासगुप्ता (जिन्होंने रिवॉल्वर का इंतजाम किया था), को लंबे समय तक जेल की कालकोठरी में यातनाएँ सहनी पड़ीं। कांग्रेस आज जिस हसन सुहरावर्दी के नाम का बचाव कर रही है, वह असल में अंग्रेजों का वो पिट्ठू था जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के खून और आंसुओं की कीमत पर ब्रिटिश सरकार से जागीरें और सम्मान पाया था। इतना ही नहीं, हसन सुहरावर्दी मुस्लिम लीग और ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) का कट्टर समर्थक था और उसकी बेटी बाद में पाकिस्तान जाकर वहाँ की राजनीति में सक्रिय हो गई।
‘बंगाल के कसाई’ हुसैन सुहरावर्दी से क्या था हसन का रिश्ता?
भाजपा और राष्ट्रवादी विचारकों का कहना है कि सुहरावर्दी चाहे ‘हसन’ हो या ‘हुसैन’ दोनों एक ही कट्टरपंथी और भारत-विरोधी सुहरावर्दी परिवार के सदस्य थे। हसन सुहरावर्दी रिश्ते में हुसैन शहीद सुहरावर्दी (Huseyn Shaheed Suhrawardy) का सगा चाचा था। और यह हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन था? इसे इतिहास ‘बंगाल का कसाई’ (Butcher of Bengal) के नाम से जानता है।
साल 1946 में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के टुकड़े करने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) का आह्वान किया, तब बंगाल का मुख्यमंत्री यही हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त 1946 को कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं का जो कत्लेआम हुआ, उसकी पूरी स्क्रिप्ट इसी हुसैन सुहरावर्दी ने लिखी थी।
हुसैन ने मुख्यमंत्री रहते हुए पुलिस को बैरकों में रहने का आदेश दिया और मुस्लिम लीग के गुंडों को खुली छूट दे दी। देखते ही देखते कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से पट गईं, माताओं-बहनों की अस्मत लूटी गई और घरों को फूंक दिया गया। इस नरसंहार के पीछे इसी सुहरावर्दी परिवार का हाथ था।
नेहरू का ‘सुहरावर्दी प्रेम’ और कांग्रेस का पुराना तुष्टिकरण
अब सवाल उठता है कि कांग्रेस को इस सुहरावर्दी परिवार से इतनी हमदर्दी क्यों है? आर्काइवल रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि हसन सुहरावर्दी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी जो जीवनभर रही।
यही वजह थी कि जब दिसंबर 1948 में यानी देश के बँटवारे और कोलकाता नरसंहार के दो साल बाद जब ‘बंगाल के कसाई’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर भारत सरकार ने इनकम टैक्स (आयकर) की देनदारी का शिकंजा कसा, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद उसके बचाव में उतर आए। नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखे। नेहरू ने चिंता जताई कि सुहरावर्दी पर कार्रवाई करने से ‘राजनीतिक परिणाम’ खराब हो सकते हैं, इसलिए मामले को रफा-दफा किया जाए या ढील दी जाए।
यह वही हुसैन सुहरावर्दी था जो भारत में करोड़ों की संपत्ति और अपनी काली यादें छोड़कर बाद में पाकिस्तान भाग गया और वहाँ का प्रधानमंत्री बना। कांग्रेस के इसी सुहरावर्दी प्रेम के कारण दशकों तक कोलकाता के दिल में हिंदुओं के हत्यारों और स्वतंत्रता सेनानियों के गद्दारों के परिवार का नाम चमकता रहा।
हिदायतुल्लाह कनेक्शन: कार्यवाहक राष्ट्रपति और पाकिस्तान जाने वाला परिवार
कांग्रेस के शासनकाल में तुष्टिकरण की जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका एक और उदाहरण मोहम्मद हिदायतुल्लाह (M. Hidayatullah) का देश के शीर्ष पदों पर बैठना है। हिदायतुल्लाह भारत के मुख्य न्यायाधीश और बाद में कांग्रेस सरकार के दौरान देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) भी बने।
यहाँ हिदायतुल्लाह और सुहरावर्दी परिवार के तार जोड़ना महत्वपूर्ण है। हसन सुहरावर्दी की बेटी शाइस्ता सुहरावर्दी का निकाह मोहम्मद इकरामुल्लाह से हुआ था। शाइस्ता सुहरावर्दी मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत रही थी। उसके शौहर मोहम्मद इकरामुल्लाह पाकिस्तान के लिए लगा और मोहम्मद अली जिन्नाह का बहुत करीबी था। हिदायतुल्लाह इसी इकारामुल्लाह का सगा छोटा भाई था।
एक तरफ इकरामुल्लाह पाकिस्तान का पहला विदेश सचिव था और बाद में कनाडा, फ्रांस, पुर्तगाल और यूके में पाकिस्तान का राजदूत था और 1963 में मरा, तो दूसरी तरफ मोहम्मद हिदायतुल्लाह यहाँ भारत में न्यापालिका में सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। आज़ादी से पहले वो सेंट्रल प्रोविंस का जज था और 1954 में वो नागपुर हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना, जो उस समय देश का सबसे कम उम्र का चीफ जस्टिस था।
साल 1956 में वो एमपी का चीफ जस्टिस बना और 1968 में भारत का चीफ जस्टिस। इसके बाद 1969 में वो कार्यवाहक राष्ट्रपति रहा, जब देश में इंदिरा गाँधी की सरकार थी और फिर CJI पद से रिटायर होने के बाद 1979 में देश का उप राष्ट्रपति भी बना। इस बीच 1982 में कुछ समय वो देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति एक बार फिर से बना। तब भी केंद्र में इंदिरा गाँधी की ही सरकार थी। सोचिए सुहरावर्दी परिवार की जड़ें देश में कहाँ से कहाँ तक फैली रही और कांग्रेस कैसे उसे पालती-पोसती रही। आज के जमाने में भी सवाल पूछ लिए जाए तो शायद कांग्रेस के पास कोई ढंग का जवाब न हो।
हकीकत यह है कि हिदायतुल्लाह का परिवार भी उसी सुहरावर्दी नेटवर्क और मुस्लिम लीग की विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। देश के विभाजन के बाद हिदायतुल्लाह के परिवार के कई करीबी लोग और रिश्तेदार भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे और वहाँ बड़े पदों पर आसीन हुए। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज जब सुहरावर्दी के नाम पर चोट होती है, तो कांग्रेस के पूरे इकोसिस्टम को दर्द होता है।
BJP is gloating over changing the name of a lane on Kolkata which was named after Hassan Suhrawardy
Hassan Suhrawardy was a prominent physician and the Vice-Chancellor of the University of Calcutta between 1930 and 1934
कौन थे गोपाल पाठा? जिन्होंने कोलकाता के हिंदुओं को कटने से बचाया
अब बात करते हैं उस महानायक की, जिनके नाम पर अब इस सड़क का नाम ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ रखा गया है। कोलकाता के लोग उन्हें आदर और गर्व से ‘गोपाल पाठा’ (Gopal Patha) कहते हैं। ‘पाठा’ बांग्ला शब्द है जिसका अर्थ होता है बकरा। गोपाल जी का कॉलेज स्ट्रीट पर मीट का पारिवारिक व्यवसाय था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से इस नाम से बुलाते थे।
16 अगस्त 1946 को जब हुसैन शहीद सुहरावर्दी के गुंडों ने हिंदुओं का सामूहिक संहार शुरू किया, तब हिंदू समाज नेतृत्वविहीन और असहाय था। उस समय महज 5 फीट 4 इंच के कद वाले गोपाल पाठा हिंदुओं के रक्षक बनकर सामने आए। उन्होंने नारा दिया, “अगर वो हमारा एक मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे। हम कायरों की तरह नहीं मरेंगे।”
गोपाल पाठा ने स्थानीय युवाओं को एकजुट किया और ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ (Indian National Force) नाम का एक संगठन बनाया। उन्होंने कसाई सुहरावर्दी के दंगाइयों को करारा जवाब दिया। गोपाल पाठा और उनके साथियों के इसी पराक्रम का परिणाम था कि मुस्लिम लीग का कोलकाता को पूरी तरह से पाकिस्तान में मिलाने और हिंदुओं को खदेड़ने का मंसूबा मिट्टी में मिल गया। उन्होंने अपनी जान पर खेलकर हजारों हिंदू परिवारों, माताओं और बहनों की रक्षा की।
सितंबर 1946 में महात्मा गाँधी कोलकाता आए। उन्होंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों से शांति की अपील करते हुए अपने-अपने हथियार उनके चरणों में सरेंडर करने को कहा। मुस्लिम लीग के गुंडों ने अपने कुछ जंग लगे हथियार गाँधी जी के सामने रख दिए।
जब गाँधी जी के दूत गोपाल पाठा के पास पहुँचे और उनसे हथियार डालने को कहा, तो गोपाल पाठा ने गाँधी जी के सामने जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने संदेश भिजवाया, “मैं अपने हथियार गाँधी जी के चरणों में क्यों रखूँ? जब हम पर हमले हो रहे थे, हमारी महिलाओं को उठाया जा रहा था, तब गाँधी जी कहाँ थे? क्या गाँधी जी हमारी महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेंगे? अगर कोई अपराधी मेरी बहन पर हाथ उठाएगा, तो मैं उसकी कलाई काट दूँगा, यह मेरी नजर में हिंसा नहीं, मेरा धर्म है। मैं हथियार नहीं डालूँगा।”
गोपाल पाठा ने अंत तक हथियार सरेंडर नहीं किए, क्योंकि वे जानते थे कि कायरता से शांति नहीं खरीदी जा सकती।
गोपाल मुखर्जी रोड हिंदुओं के सम्मान की बहाली, ये बीजेपी सरकार का साहसिक कदम
दशकों तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों और तृणमूल कांग्रेस (TMC) का राज रहा, जिन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते गोपाल पाठा जैसे नायक को इतिहास की किताबों से गायब कर दिया और गद्दारों के नाम पर बनी सड़कों को सहेज कर रखा।
लेकिन पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता नगर निगम के माध्यम से ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ करके एक ऐतिहासिक भूल को सुधारा है।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा, “दशकों तक हमारे शहर की एक मुख्य सड़क का नाम उस व्यक्ति (या परिवार) के नाम पर रहा जिसने राजनीतिक लाभ के लिए निर्दोष नागरिकों के नरसंहार की साजिश रची और सत्ता का दुरुपयोग किया। वीर गोपाल मुखर्जी के नाम पर इस सड़क का नामकरण कर, जिन्होंने हजारों मासूमों की जान बचाई, आखिरकार इतिहास के साथ न्याय किया गया है। यह समय पश्चिम बंगाल के असली नायकों को याद करने और उन्हें सम्मान देने का है।”
I commend the historic decision taken by the Kolkata Municipal Corporation, yesterday, on the solemn occasion of Paschimbanga Divas, which would be instrumental in rectifying a historical wrong. Suhrawardy Avenue will now be renamed as Gopal Mukherjee Road.
कांग्रेस आज भले ही ‘हसन’ और ‘हुसैन’ के नाम का तकनीकी खेल खेलकर हिंदुओं का मजाक उड़ाए, लेकिन सच यही है कि हसन सुहरावर्दी ने देश की बेटी बीना दास को गिरफ्तार करवाकर अंग्रेजों से वफादारी निभाई थी, और उसी के परिवार ने भारत मां के टुकड़े किए थे। ऐसे किसी भी व्यक्ति या परिवार का नाम स्वतंत्र भारत की सड़कों पर होना देश के स्वतंत्रता सेनानियों और विभाजन के शिकार हुए लाखों निर्दोष हिंदुओं का अपमान था।
भाजपा सरकार ने गोपाल पाठा के नाम पर सड़क का नाम रखकर यह साबित किया है कि अब देश अपने रक्षकों का सम्मान करेगा, न कि भक्षकों और गद्दारों का। यह फैसला केवल एक सड़क का नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह बंगाली हिंदुओं के खोए हुए गौरव, पराक्रम और आत्मसम्मान को वापस लौटाने वाला एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है।
AI द्वारा निर्मित प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: ChatGPT) देश के अलग-अलग हिस्सों से बीते कुछ सालों में सामने आई कई दर्दनाक दुर्घटनाओं ने एक गंभीर सुरक्षा सवाल खड़ा कर दिया है। दिल्ली के ओल्ड राजिंदर नगर में बेसमेंट में पानी भरने की घटना हो, मालवीय नगर के एक होटल में लगी आग हो या फिर लखनऊ की एक लाइब्रेरी का अग्निकांड… इन सभी हादसों में एक भयावह समानता देखने को मिली। आपात स्थिति के दौरान जैसे ही बिजली गुल हुई, बायोमेट्रिक और स्मार्ट लॉक वाले दरवाजे पूरी तरह जाम हो गए। नतीजा यह हुआ कि लोग अंदर ही फंसे रह गए और समय रहते बाहर न निकलने के कारण कई मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
जानकारों के मुताबिक, यह जानलेवा संकट स्मार्ट डोर्स की एक खास कार्यप्रणाली यानी मैकेनिज्म के कारण पैदा होता है। आज के समय में बायोमेट्रिक दरवाजे मुख्य रूप से दो सिद्धांतों पर काम करते हैं: पहला ‘फेल सिक्योर’ (Fail Secure) और दूसरा ‘फेल सेफ’ (Fail Safe)। इनमें से ‘फेल सिक्योर’ तकनीक सबसे घातक साबित हो रही है। इस तकनीक का सीधा मतलब यह है कि बिजली रहे या न रहे, दरवाजा हर हाल में लॉक ही रहेगा।
ऐसे दरवाजों को खोलने के लिए बिजली का होना एक अनिवार्य शर्त (प्री-रिक्विजिट) है। सामान्य स्थिति में जब आप अपना थंब या फेस दिखाते हैं, तो बिजली का सिग्नल अंदर लगे मैग्नेट को एक्टिवेट करता है, स्प्रिंग पीछे हटता है और दरवाजा खुलता है। लेकिन बिजली कटते ही यह सिस्टम पूरी तरह ठप हो जाता है।
इसके विपरीत ‘फेल सेफ’ लॉक्स बिल्कुल उल्टे सिद्धांत पर काम करते हैं। इसमें परमानेंट मैग्नेट दरवाजे को हर वक्त चिपका कर रखता है। बायोमेट्रिक देने पर मैग्नेट की पावर कटती है और दरवाजा खुल जाता है। यानी अगर बिजली चली जाए तो ‘फेल सेफ’ दरवाजे अपने आप अनलॉक हो जाते हैं। भारत में इस सुरक्षित तकनीक का इस्तेमाल न होने के पीछे सामाजिक अविश्वास एक बड़ी वजह है।
वैसे, आम लोगों में ये बात कही जाती है कि भारत एक लो-ट्रस्ट सोसायटी है, जहाँ लोगों को यह डर सताता है कि बिजली जाने पर दरवाजा खुला रहने से चोरी हो जाएगी। लोग सुरक्षा से ज्यादा संपत्ति को तवज्जो देते हैं।
नियमों के मुताबिक, फेल सिक्योर दरवाजों का इस्तेमाल सिर्फ उन जगहों पर होना चाहिए जहाँ कोई बेहद महँगा एसेट सुरक्षित रखना हो, न कि इंसानी आवाजाही वाली जगहों पर। इसके अलावा हर ऐसे स्मार्ट दरवाजे में एक ‘मैकेनिकल ओवरराइड’ यानी मैनुअल लॉक सिस्टम होना अनिवार्य है, ताकि आपातकाल में उसे हाथ से खोला जा सके। लेकिन देश में सेफ्टी गाइडलाइंस की धज्जियाँ खुलेआम उड़ाई जा रही हैं।
लखनऊ और दिल्ली के हादसों से साफ है कि मालिकों को बच्चों की जिंदगी से ज्यादा अपने कीमती फर्नीचर और सामान की फिक्र थी, जिसका खामियाजा मासूमों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा।
माननीय सूर्यकांत जी कथनी और करनी में अंतर जिस दिन समझ जाओगे भ्रष्टाचार अपने आप समझ आ जाएगा। जब निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक फैले भ्रष्टाचार पर स्वयं संज्ञान लेने की कोशिश करोगे आंखे फट जाएँगी। जब मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस GR Swaminathan और जस्टिस Lakshminarayanan ने अदालतों में भ्रष्टाचार की बात कही थी आपको उसी समय सतर्क होकर कार्यवाही करनी थी। जबकि देश का हर नागरिक जानता है कि अदालतें, पुलिस और जितने भी पब्लिक डीलिंग विभाग कोई भ्रष्टाचार से अछूता नहीं। दूसरे, कुछ दलाल वकीलों द्वारा दायर केसों को क्यों प्राथमिकता दी जाती है? इसीलिए ये वकील एक पेशी के लाखों रूपए लेते हैं। इनके इशारे पर काम होते हैं। इस कटु सच्चाई को समझना होगा। क्योकि यह भी भ्रष्टाचार ही है।
लेखक चर्चित YouTuber
NCERT की एक किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में लिखा गया था। उस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत बिफर गए थे और किताब को तत्काल प्रभाव से हटा दिया था। 2.50 लाख पुस्तके बाजार से वापस करा दी गई थी। तब सूर्यकांत जी ने कहा था - हमें बताओ, कौन भ्रष्ट है, हम कार्रवाई करेंगे।
लेकिन क्या कॉलेजियम में चल रहा खेल साबित नहीं करता कि वह भी भ्रष्टाचार का अड्डा है। आप जनता को कुछ जानने का अधिकार ही नहीं देना चाहते। एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Justice M.R. Shah and Justice C.T. Ravikumar ने कहा है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की चयन की प्रक्रिया (कॉलेजियम के फैसले) RTI और न्यायिक समीक्षा के बाहर हैं। जजों की न्यायिक प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा भी नहीं की जा सकती।
जजों के चयन में यह पारदर्शिता का न होना अपने आप में कॉलेजियम में भ्रष्टाचार का सबूत देता है। अगर कॉलेजियम द्वारा चयन प्रक्रिया सार्वजनिक होती तब तो किसी को RTI में सूचना मांगने की जरूरत ही नहीं होती लेकिन कॉलेजियम हर तरह अपनी गतिविधियां गोपनीय रखना चाहता है और यह किसी के भी मन में शंका पैदा कर सकता है। कॉलेजियम में मेरी नज़र में सबसे बड़ा झोल वकीलों को जज बनाने में होता है।
किसी को क्या पता किसी हाई कोर्ट के लाखों वकीलों में से 2-4 को जज बनाने में क्या गड़बड़घोटाला होता है? उनका चयन UPSC से परीक्षा द्वारा क्यों नहीं किया जा सकता लेकिन लगता है फिर भाईभतीजावाद नहीं हो सकेगा।
एक यशवंत वर्मा का मामला तो आपके सामने था लेकिन उसमें क्या कार्रवाई की गई? FIR तक होने दी। सबसे बड़ा मकड़जाल न्यायपालिका ने फैला रखा है कि किसी भी जज के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी आवश्यक है और ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में निर्धारित कर दिया था।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले हैं। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से केस फाइल का गायब हो जाना अपने आप में भ्रष्टाचार है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच के निर्णय के बाद भी रजिस्ट्री अमुक पार्टी को नोटिस जारी न करे, वह भी भ्रष्टाचार है। सुप्रीम कोर्ट के जज अगर अपनी संपत्ति का ब्यौरा नहीं देते, वह भी भ्रष्टाचार है।
केजरीवाल को 12 जुलाई, 2024 को जमानत देकर जस्टिस खन्ना का उसकी ED की गिरफ़्तारी वैधता के लिए 5 जजों की बेंच को भेजना भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। उस बेंच का 2 साल में गठन न होना भी भ्रष्टाचार है। वर्षो तक मामले लटकते रहते हैं सुप्रीम कोर्ट में लेकिन रजिस्ट्री केस आगे नहीं बढ़ाती, वह भी भ्रष्टाचार है। लालू यादव 32 साल की सजा पा कर भी जमानत पर मौज कर रहा है लेकिन किसी केस में हाई कोर्ट का फैसला न करना सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है।
अभी कुछ दिन पहले 21 मई, 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस GR Swaminathan और जस्टिस Lakshminarayanan ने टिप्पणी की थी कि “NONE CAN DENY THERE IS CORRUPTION IN JUDICIARY, THERE WERE AND ARE CORRUPT JUDGES”.
अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत दोनों जजों से पूछें कि कौन से जज भ्रष्ट हैं-
इसके अलावा मद्रास हाई कोर्ट के ही Justice G. Jayachandran ने हाल ही में कहा है कि चुनाव याचिकाओं के निबटारे में विलम्ब Autocracy को जन्म देती है और यह लोकतंत्र के लिए खतरा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की विशेष रूप से निंदा की जहां 6 साल से 2016 चुनाव के मामले में 2019 से अपील लंबित है। उन्होंने कहा कि “DECADE LONG DELAY A ‘GRAVE MOCKERY OF JUSTICE’ AND THREAT TO DEMOCRACY” जबकि Representation of People Act के सेक्शन 86 के अनुसार चुनाव याचिका पर 6 महीने में निर्णय हो जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने NEET परीक्षा में पारदर्शिता चाही थी और सरकार ने वह करा दी। अब अपने आचरण पर भी ध्यान दीजिये मीलॉर्ड।
यह भारत का दुर्भाग्य है कि ऐसा Leader of Opposition मिला है जो देश को लाभ पहुँचाने की बजाए नुकसान ज्यादा कर रहा है। गौतम अडानी के विरुद्ध बोलने से जो लाभ भारत को मिला था केन्या ने वह अनुबंध Leader of Opposition के आका चीन को दे दिया। वैसे भी राहुल गाँधी जब भी कोई बात बोलते हैं उसकी पोल खुलने से पहले देश को नुकसान हो चूका होता है। समझ में नहीं आता जनता ऐसे नेता को वोट देती ही क्यों है? राहुल और उनकी पार्टी बताए कि Leader of Opposition द्वारा बोली गयी किसी भी बात में दम हो? झूठ का पिटारा से ज्यादा कुछ नहीं। Leader of Opposition और INDI गठबंधन को देशभक्ति ईरान और इजराइल से सीखनी चाहिए जहाँ युद्ध के दौरान विपक्ष भी सरकार के साथ खड़ा है, लेकिन यहाँ दुश्मन देश की बोली बोल जनता को गुमराह किया जाता है।
क्या कोई युद्ध के दौरान अपने सरकार से नुकसान होने की बात पूछता है लेकिन हमारा Leader of Opposition और INDI गठबंधन पूछता है जो दुश्मन देश की सुर्खियां बन जाती है। कसूर राहुल का नहीं राहुल के इशारे पर नाचने वाली पार्टियों का भी है।
भारत और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी ताकतें तरह-तरह के नैरेटिव बनाती हैं। इनको आगे बढ़ाने का काम बिना किसी तथ्य के कांग्रेस के युवराज और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करते हैं। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति अब तथ्यों, तर्कों और जिम्मेदारी से ज्यादा सनसनी, भ्रम और झूठे नैरेटिव पर टिकती दिख रही है। संसद से सड़क तक वे लगातार ऐसे झूठे आरोप उछालते रहते हैं, जिनका या तो बाद में खुद उनके ही दावों से खंडन हो गया, या फिर अदालत, सेना, चुनाव आयोग और सरकारी रिकॉर्ड ने उनकी बातों की धज्जियां उड़ा दीं। कभी सेना के “हाथ बांध देने” का आरोप लगाकर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, तो कभी चुनाव आयोग को “वोट चोरी” का औजार बताकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। संसद में बोलने नहीं देने का रोना रोने वाले राहुल गांधी की पोल खुद लोकसभा के रिकॉर्ड ने खोल दी।
कई महत्वपूर्ण बहसों में राहुल ने स्वयं हिस्सा तक नहीं लिया। यह सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि झूठ को हथियार बनाकर देश में अविश्वास फैलाने की राजनीति है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राहुल गांधी के आरोप अक्सर अधूरी जानकारी, गलत तथ्यों और भावनात्मक उकसावे पर आधारित होते हैं। राफेल से लेकर अग्निवीर, EVM से लेकर विदेशी नेताओं की मुलाकातों तक, बार-बार उनके दावों की हवा निकलती रही, लेकिन झूठ का सिलसिला नहीं रुका। कभी सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी, तो कभी सेना और चुनाव आयोग को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। यदि नेता प्रतिपक्ष ही बिना प्रमाण के आरोपों की राजनीति करेगा, तो इससे सिर्फ उसकी विश्वसनीयता नहीं गिरेगी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी कमजोर होगा। हिट और रन की पॉलिटिक्स कभी भी मेहनत और परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती।दरअसल, राहुल हर हार, हर विवाद और हर असफलता का दोष किसी न किसी संस्था पर डालते हैं, लेकिन आत्ममंथन से लगातार बचते रहते हैं।
कांग्रेस द्वारा अडानी पर वार ने अपने आका चीन को पहुँचा सीधा फायदा: भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधी
EVM को बताया ब्लैक बॉक्स और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल राहुल गांधी ने 16 जून 2024 को एक्स पर लिखा, “भारत में ईवीएम एक ‘ब्लैक बॉक्स’ है. किसी को भी इनकी स्क्रूटनी करने की अनुमति नहीं है. हमारी चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं. जब संस्थाओं में जवाबदेही की कमी होती है, तो लोकतंत्र एक दिखावा बन जाता है और धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाती है.” हकीकत में हमारी चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और EVM प्रणाली का लोहा दुनिया मान चुकी है। भारत का चुनाव आयोग लगातार कहता रहा है कि EVM मशीनें सुरक्षित हैं और VVPAT प्रणाली के कारण मतदान का सत्यापन संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने भी EVM को पूरी तरह हटाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। चुनाव आयोग ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में ईवीएम से चुनाव हिंसा रहित कराए हैं।
EVMs in India are a "black box," and nobody is allowed to scrutinize them.
Serious concerns are being raised about transparency in our electoral process.
संसद में बोलने नहीं दिया जाता राहुल गांधी ने 26 मार्च 2025 को आरोप लगाते हुए कहा कि संसद में विपक्ष की और उनकी आवाज दबाई जाती है और उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने का अवसर नहीं मिलता। उनके इस झूठ की पोल खोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने उनके सदन से अनुपस्थित रहने के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए पलटवार किया है कि विपक्ष केवल हंगामा करना चाहता है, सार्थक चर्चा नहीं। सरकार और भाजपा नेताओं का आरोप है कि राहुल गांधी खुद सदन में नियमों के तहत नहीं बोलते या चर्चा से भागते हैं।
रक्षा बजट घटाने का आरोप, जबकि 15 प्रतिशत बढ़ा राहुल गांधी ने कई मौकों पर कहा कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीर नहीं है और रक्षा तैयारियों में कमियां हैं। 12 नवंबर 2021 को राहुल ने फिर कहा कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा से आपराधिक खिलवाड़ किया जा रहा है, क्योंकि मोदी सरकार के पास कोई स्ट्रैटेजी नहीं है । दूसरी ओर हकीकत यह है कि भारत का रक्षा बजट पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है और यह विश्व के सबसे बड़े रक्षा व्ययों में शामिल है। मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय के केंद्रीय बजट 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये का सर्वकालिक उच्च आवंटन किया, जो वित्त वर्ष 2025-26 के बजटीय अनुमानों से 15 प्रतिशत अधिक है।
लद्दाख में चरागाह और जमीन खोने का आरोप राहुल गांधी ने 20 अगस्त 2023 को झूठा आरोप लगाते हुए कहा कि लद्दाख के लोगों के चरागाह क्षेत्र चीन के नियंत्रण में चले गए हैं। हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। चीनी कब्जे की तरह यह आरोप भी बेदम ही निकला। राहुल ने आरोप लगाया था कि लद्दाख के कुछ स्थानीय प्रतिनिधियों और चरवाहों ने उनसे चराई क्षेत्रों तक पहुंच कम होने की शिकायत की है। वहीं सरकार ने स्पष्ट किया कि सीमा पर भारत की स्थिति बेहद मजबूत है और संप्रभुता से समझौता नहीं किया गया। ना ही लद्दाख में चरवारों को जमीन का नुकसान हुआ है।
हिंडनबर्ग रिपोर्ट को लेकर सरकार पर सवाल राहुल गांधी ने 11 अगस्त 2024 को आरोप लगाते हुए कहा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद सरकार को अडानी मामले पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आम जनता के धन की रक्षा करने वाली नियामक संस्था SEBI की सत्यनिष्ठा गंभीर रूप से प्रभावित और समझौता-युक्त हो चुकी है। हकीकत में उनका झूठ पकड़ा गया। हिंडनबर्ग एक शॉर्ट-सेलिंग रिसर्च फर्म है, जिसकी रिपोर्ट ने अडानी समूह पर गंभीर आरोप लगाए थे। अडानी समूह ने इन आरोपों को खारिज किया। मामला SEBI और न्यायिक निगरानी में जांच का विषय रहा। बाद में कोर्ट से भी अडानी की हिंडनबर्ग के आरोपों में क्लीन चिट मिल गई।
LIC और बैंकों का पैसा खतरे में, रिपोर्ट में पैसा सुरक्षित राहुल गांधी ने 9 सितंबर 2020 को एक बार फिर से अपने आरोप में कहा कि अडानी समूह में निवेश के कारण LIC और सरकारी बैंकों का पैसा खतरे में है। लेकिन उनके इस झूठ की भी कलई जल्द ही खुल गई। लाइफ इन्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि उसका निवेश कुल निवेश पोर्टफोलियो का छोटा हिस्सा है और वह वित्तीय रूप से बेहद सुरक्षित है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने भी अपने एक्सपोजर को सुरक्षित सीमा में बताया।
भगवंत मान की विवादित वीडियो को फर्जी बताने के लिए पंजाब सरकार ने फोरेंसिक एक्सपर्ट को दी गई घूस विवादों से जन्मी अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी लगता है विवादों से ही ख़त्म हो जाएगी। दिल्ली में सत्ता में रहते नितरोज कोई नया विवाद चलता रहता था लेकिन जनता मुफ्त की रेवड़ियों में केजरीवाल पार्टी को वोट देती रही। अब जिस तरह पंजाब में बेअदबी के असली वीडियो को राज्य सरकार फर्जी बताने में शामिल बताई जा रही है, बंगाल में ममता की सरकार और पंजाब में केजरीवाल सरकार की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं।
अगर अकाल तख़्त इस मुद्दे को गंभीरता से लेती है भगवंत सिंह मान ऐसी मुसीबत में फंस जायेंगे जहाँ से इनका निकलना बहुत मुश्किल हो सकता है।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इन दिनों सिख गुरुओं की बेअदबी वाले वीडियो को लेकर विवादों में घिरे हुए हैं। वीडियो में सिख गुरुओं और भिंडरावाले की तस्वीरों के साथ आपत्तिजनक हरकतें करते दिख रहे हैं। इस वीडियो को फर्जी साबित करने के लिए अब पूरी पंजाब पुलिस विवादों में है। हरियाणा के एक फोरेंसिक एक्सपर्ट ने दावा किया है कि पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने ₹10 लाख का लालच देकर वीडियो को फर्जी साबित करने को कहा था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के एक साइबर-फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट जसप्रीत ने दावा कि 15 जून 2026 को पंजाब पुलिस के अधिकारी बनकर कुछ लोग उनके पास आए और उनसे ऐसी रिपोर्ट बनवाने को कहा जो साबित करे कि सीएम भगवंत मान का यह वीडियो AI से बना हुआ फर्जी वीडियो है। जसप्रीत ने आरोप लगाया कि उन्हें फाइव स्टार क्राउन प्लाजा होटल में बुलाया गया और उनकी गाड़ी में जबरदस्ती ₹10 लाख नकद रखे गए। होटल का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है।
15 जून को, श्री अकाल तख्त साहिब के भगवंत मान के खिलाफ आदेश के बाद, भगवंत मान ने लुधियाना के सीपी स्वपन शर्मा और एसपी जसनदीप को अपने पक्ष में एक फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराने का काम सौंपा।
16 जून को स्वपन शर्मा और जसनदीप गुरुग्राम आए और 10 लाख रुपये की डील करने के लिए क्राउन… pic.twitter.com/wbq4Qqhg0h
जसप्रीत ने विरोध किया तो उन्हें सिरसा के अरुण महेंद्रा और जींद के अंकित से मिलवाया गया, जिन्हें अधिकारियों ने पेन ड्राइव सौंपी थी।
हरियाणा पुलिस ने जसप्रीत की शिकायत के आधार पर इन दोनों को 23 जून 2026 को गुड़गाँव के सेक्टर 29 से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने बताया कि अरुण हरियाणा सरकार का ही एक कर्मचारी है और अंकित दिल्ली सरकार में कॉन्ट्रैक्ट बेस्ड कर्मचारी है।
वहीं शिरोमणि अकाली दल के महासचिव विक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा कि पंजाब पुलिस के कर्मचारी सीएम भगवंत मान की फर्जी वीडियो तैयार करने में शामिल थे। उन्होंने एक व्हाट्सऐप चैट भी शेयर की है, जिसमें फर्जी रिपोर्ट तैयार करने का दावा किया गया है। उन्होंने फॉरेंसिक एक्सपर्ट जसप्रीत की वीडियो शेयर करते हुए बताया कि पंजाब पुलिस लगातार उसे धमकियाँ दे रही है।
इसके अलावा दिल्ली के मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने भी इस विवाद को लेकर आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “…भगवंत मान चुप रहे, अरविंद केजरीवाल भी चुप रहे, और आज उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया और उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया जिन्होंने यह फ़ोरेंसिक रिपोर्ट दी थी… जिस तरह से इतना बड़ा गुनाह किया गया है और पैसे व पुलिस की मदद से इसे दबाने की कोशिश की गई है, उसे चुनौती दी गई है।” उन्होंने पंजाब के सीएम भगवंत मान के खिलाफ केस दर्ज करने की भी माँग की है।
#WATCH | Delhi | Over purported video allegedly showing desecration of Sikh Guru photos by Punjab CM, Delhi Minister Manjinder Singh Sirsa says, "...Bhagwant Mann remained silent, Arvind Kejriwal also remained silent, and today the arrests and case filed against those who… pic.twitter.com/mVvQfaPuQ7
कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो को लेकर दावा किया गया कि इसमें दिख रहा शख्स सिख गुरुओं और भिंडारवाले की तस्वीरों के साथ कुछ आपत्तिजनक हरकतें करता दिखाई दे रहा है। इस पर सिख संगठनों और अकाल तख्त ने सीएम मान को खालसा पंथ विरोधी करार दिया था।