राहुल गांधी की ओछी मानसिकता और बदजुबानी से शर्मसार हुआ देश

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 13 अगस्त 2026 को ‘रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय सम्मेलन’ के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ जिस अमर्यादित और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया, उसने संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को गंभीर आघात पहुंचाया है। संवैधानिक इतिहास में शायद ही किसी नेता प्रतिपक्ष ने देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रति ऐसी निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग किया हो। सेना के शौर्य पर बेबुनियाद सवाल खड़े करना और लगातार झूठ फैलाकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करना उनकी हताशा और मानसिक दिवालियापन को उजागर करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी लगातार ‘बिलो द बेल्ट’ हमले कर भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का एक मनोवैज्ञानिक खेल खेल रहे हैं। इस नैरेटिव की राजनीति का जवाब देने के लिए अब हर झूठ का तथ्यपरक और unapologetic तरीके से पर्दाफाश करना जरूरी हो गया है।

इटली की प्रधानमंत्री पर भद्दी टिप्पणी और महिला सम्मान पर हमला

राहुल गांधी ने सम्मेलन के दौरान इटली की महिला प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर अत्यंत अशोभनीय, फूहड़ और द्विअर्थी टिप्पणी की। मंच पर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को गले लगाने के बाद यह कहना कि “मैं अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा हूं”, एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश की महिला राष्ट्राध्यक्ष का सरेआम अपमान है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति जैसे गंभीर विषय को इस तरह सड़क छाप और ओछे स्तर पर घसीटना उनकी महिला-विरोधी और विकृत मानसिकता को साफ तौर पर उजागर करता है। यह केवल एक विदेशी नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में महिलाओं के प्रति कांग्रेस की सोच का शर्मनाक प्रदर्शन है। इस तरह के कुकृत्य से पूरे देश का सिर शर्म से झुक जाता है और यह साबित होता है कि उनमें एक जिम्मेदार राजनेता जैसी कोई गरिमा नहीं बची है।

इटली दूतावास की कड़ी आपत्ति: राहुल गांधी की ओछी बयानबाजी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत शर्मसार

राहुल गांधी की अमर्यादित और फूहड़ राजनीति का खामियाजा अब देश को वैश्विक कूटनीतिक मोर्चे पर भुगतना पड़ रहा है। नई दिल्ली स्थित इटली के दूतावास ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर की गई अशोभनीय टिप्पणी पर आधिकारिक बयान जारी कर कड़ी निंदा और गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। दूतावास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन भारत की आंतरिक राजनीति में इटली की लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाना और उनका अपमान करना कतई स्वीकार्य नहीं है। दूतावास ने याद दिलाया कि भारत और इटली के संबंध आपसी सम्मान और गरिमा पर आधारित हैं। राहुल गांधी के इस गैर-जिम्मेदाराना आचरण ने एक मित्र राष्ट्र के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों में असहज स्थिति पैदा कर दी है। नेता प्रतिपक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठकर वैश्विक मंचों पर भारत की साख को बट्टा लगाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को शर्मसार करना उनकी अदूरदर्शी और विनाशकारी मानसिकता को पूरी तरह उजागर करता है।

 राष्ट्रगान के दौरान घूमना और हाथ मिलाना: देश के सर्वोच्च सम्मान की अवहेलना

सम्मेलन से सामने आया एक वीडियो कांग्रेस नेतृत्व की राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संवेदनहीनता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। जब सभागार में राष्ट्रगान बज रहा था, उस समय सावधान की मुद्रा में खड़े होकर सम्मान देने के बजाय राहुल गांधी मंच पर इधर-उधर टहलते और नेताओं से हाथ मिलाते दिखाई दिए। राष्ट्रगान देश की आन, बान और शान का प्रतीक है तथा हर भारतीय नागरिक का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह इसके सम्मान में खड़ा हो। इसके बावजूद नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसा गैर-जिम्मेदाराना और अपमानजनक आचरण उनके देश-विरोधी रवैये और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति घोर अनादर को साबित करता है।
‘घटिया स्टैंडअप कॉमेडी’: सोशल मीडिया पर फूटा जनता का आक्रोश
सोशल मीडिया पर आम जनता और प्रबुद्ध वर्ग ने राहुल गांधी के इस आचरण को ‘सड़क छाप व्यवहार’ और ‘सस्ती स्टैंडअप कॉमेडी’ करार देते हुए भारी रोष व्यक्त किया है। यूजर्स का कहना है कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचकर भी वे गंभीर नीतिगत और राष्ट्रीय विमर्श करने के बजाय बचकानी और फूहड़ हरकतों में व्यस्त रहते हैं। राजनीतिक आलोचकों ने सवाल उठाया कि जो नेता गंभीर संवैधानिक मंचों पर मसखरे जैसा व्यवहार करता हो, वह देश का नेतृत्व करने का दावा कैसे कर सकता है। जनता यह साफ देख रही है कि वे नेता प्रतिपक्ष की गरिमा को पूरी तरह खो चुके हैं और सिर्फ अपनी हताशा मिटाने के लिए स्तरहीन हरकतें कर रहे हैं।
गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ असंसदीय भाषा का प्रयोग
राहुल गांधी ने देश के गृह मंत्री अमित शाह के लिए ‘तड़ीपार’ और ‘भाग गया’ जैसे अपमानजनक और असंसदीय शब्दों का प्रयोग कर राजनीतिक मर्यादा की सीमाएं लांघ दीं। एक संवैधानिक पद पर बैठे नेता द्वारा देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले गृह मंत्री के खिलाफ ऐसी सड़क छाप शब्दावली का प्रयोग करना यह दर्शाता है कि कांग्रेस नेतृत्व बुनियादी राजनीतिक शालीनता खो चुका है। जब कांग्रेस के पास सरकार की नीतियों और विकास कार्यों का कोई ठोस जवाब नहीं होता, तो वे इसी तरह के घटिया व्यक्तिगत हमलों पर उतर आते हैं। देश की जनता ऐसे स्तरहीन और अमर्यादित बयानों को भली-भांति देख और समझ रही है।
‘सोने नहीं देंगे, पागल कर देंगे’: राजनीतिक विमर्श में खुलेआम धमकियां
राहुल गांधी ने खुले मंच से अराजक और धमकी भरे लहजे में कहा कि जब तक प्रधानमंत्री और गृह मंत्री इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक वे उन्हें सोने नहीं देंगे और “पागल कर देंगे”। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा प्रचंड बहुमत से चुनी गई सरकार के खिलाफ इस तरह की हिंसक और अशालीन भाषा का इस्तेमाल किसी जिम्मेदार विपक्ष का काम नहीं हो सकता। यह बयान उनकी गहरी कुंठा और राजनीतिक हताशा को दर्शाता है, जिसमें वे लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करने के बजाय अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार की भाषा यह साबित करती है कि वे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से कितने दूर जा चुके हैं।
पुलिस और मीडिया के नाम पर झूठी और मनगढ़ंत कहानियां
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में एक और काल्पनिक कहानी गढ़ते हुए दावा किया कि प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने के दौरान एक पुलिसकर्मी ने उनके कान में आकर सरकार विरोधी बात कही थी। इतना ही नहीं, उन्होंने मीडियाकर्मियों के नाम पर भी सहानुभूति बटोरने के लिए यह मनगढ़ंत नैरेटिव पेश किया कि वे मजबूरी में काम कर रहे हैं। बिना किसी प्रमाण या तथ्य के देश के कर्तव्यनिष्ठ सुरक्षा बलों और पत्रकारों के नाम पर इस प्रकार की झूठी कहानियां सुनाना उनकी पुरानी कार्यशैली का हिस्सा है। जनता के बीच भ्रम फैलाने और अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए वे लगातार ऐसे झूठे प्रपंचों का सहारा लेते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था और विरोधियों को ‘जोकर्स का झुंड’ बताना
राहुल गांधी ने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और अपने वैचारिक विरोधियों को ‘बंच ऑफ जोकर्स’ और ‘क्लाउन्स’ कहकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया। भारतीय संस्कृति, प्राचीन दर्शन और राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा करने वाले संगठनों पर इस तरह की ओछी टिप्पणी करना यह साबित करता है कि वे भारत की वास्तविक आत्मा और जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं। जो व्यक्ति करोड़ों भारतीयों की आस्था और विचारधारा का सम्मान नहीं कर सकता, वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा कैसे कर सकता है। उनका यह बयान उनके भीतर भरे वैचारिक अहंकार और असहिष्णुता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
अमेरिका-ईरान संकट पर हास्यास्पद दावा और विदेश नीति का अल्पज्ञान
विदेश नीति पर अपनी समझ का प्रदर्शन करते हुए राहुल गांधी ने दावा किया कि अमेरिका-ईरान तनाव के समय यदि इंदिरा गांधी होतीं तो दोनों देशों की दोस्ती करा देतीं, लेकिन पाकिस्तान यह मौका ले गया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के अत्यंत संवेदनशील और जटिल मामलों पर इस तरह का अपरिपक्व और बेतुका विश्लेषण उनके विदेश नीति संबंधी अल्पज्ञान को उजागर करता है। वे यह भूल जाते हैं कि आज मोदी सरकार के सशक्त नेतृत्व में भारत वैश्विक स्तर पर शांति और कूटनीति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। जमीनी हकीकत को समझे बिना केवल अपने परिवार का महिमामंडन करने के लिए ऐसे हास्यास्पद दावे करना उनकी राजनीतिक नासमझी को दिखाता है।
गलवान और अरुणाचल पर सेना के पराक्रम पर फिर उठाए झूठे सवाल
राहुल गांधी ने एक बार फिर चीन सीमा, गलवान और अरुणाचल प्रदेश में सेना की पेट्रोलिंग को लेकर सरासर झूठे, भ्रामक और देश-विरोधी दावे किए हैं। सीमा पर मुस्तैद भारतीय सेना के अदम्य साहस, पराक्रम और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों को नकारते हुए सरकार पर खबरें दबाने का मनगढ़ंत आरोप लगाना सीधे तौर पर वीर जवानों के शौर्य का अपमान है। जब पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देकर पीछे धकेला, तब राहुल गांधी द्वारा इस तरह का झूठा प्रलाप करना सीधे-सीधे दुश्मन देश के नैरेटिव को मजबूत करने का काम करता है। अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर लगातार झूठ फैलाना और सेना के मनोबल पर प्रहार करना कांग्रेस की पुरानी देश-विरोधी रणनीति बन चुकी है।
संसद से कांग्रेस के मंच तक कुंठा और अराजकता 
संसद के सत्र को उद्दंडता, उच्छृंखलता और सनक के बल पर पूरी तरह बाधित करने के बाद कांग्रेस के औपचारिक मंच से राहुल गांधी द्वारा प्रयुक्त असभ्य शब्दावली उनके भीतर पनप रही कुंठा की पराकाष्ठा को उजागर करती है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुके राहुल गांधी जिस तरह देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह उनके मानसिक भटकाव का स्पष्ट प्रमाण है। सम्मेलन के मंच पर दो चेहरों की जुगलबंदी ने कांग्रेस की असलियत को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। एक तरफ संदीप दीक्षित, जिन्होंने भारतीय थल सेना प्रमुख को ‘सड़क छाप गुंडा’ कहकर पूरे सैन्य बल का अपमान किया था, और दूसरी तरफ राहुल गांधी, जो जेएनयू जाकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के देश-विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में खड़े हुए थे। सेना का अपमान करने वाले और अलगाववादी सोच की ढाल बनने वाले ये दोनों नेता मिलकर आज मां भारती के सपूत प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभद्र प्रलाप कर रहे हैं। देश की प्रबुद्ध जनता को यह भली-भांति समझना होगा कि यह केवल एक कुंठित और ईर्ष्या से ग्रस्त नेता की बचकानी हरकत है या फिर सीमा पार से जुड़े किसी सुनियोजित और गहरे राष्ट्र-विरोधी षड्यंत्र का खतरनाक हिस्सा।
नेहरू के ब्लंडर्स पर चुप्पी और मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलताओं पर हमला
विदेश नीति पर भाजपा को घेरने का प्रयास करने वाले राहुल गांधी अपने परदादा पंडित जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक ब्लंडर्स को पूरी तरह भूल जाते हैं। नेहरू के 17 वर्षों के विदेश मंत्री कार्यकाल में भारत ने 38,000 वर्ग किलोमीटर का अक्साई चिन गंवाया, कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण कर नासूर बनाया और पाकिस्तान के पक्ष में एकतरफा सिंधु जल समझौता किया। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में भारत ने अनुच्छेद 370 को समाप्त किया, सीमावर्ती इंफ्रास्ट्रक्चर को अभूतपूर्व मजबूती दी और दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया। अपने पुरखों की ऐतिहासिक गलतियों पर पर्दा डालकर मोदी सरकार की सफलताओं पर उंगली उठाना राहुल गांधी के खोखलेपन को साबित करता है।
गले मिलने की कूटनीति पर राहुल का दोहरा मापदंड: इंदिरा और प्रियंका का इतिहास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक नेताओं के साथ आत्मीय और कूटनीतिक शिष्टाचार का उपहास उड़ाने वाले राहुल गांधी को अपने ही परिवार का इतिहास देखना चाहिए। इतिहास साक्षी है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो से आत्मीयता से मुलाकात की थी और उनकी बहन प्रियंका गांधी भी सार्वजनिक मंचों पर वरिष्ठ नेताओं से इसी तरह मिलती रही हैं। जब उनके परिवार के सदस्य ऐसा करते हैं तो वह कूटनीति कहलाती है, लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी देश के हितों को साधने के लिए वैश्विक नेताओं से आत्मीय संबंध बनाते हैं, तो कांग्रेस को इसमें राजनीति दिखने लगती है। यह दोहरा रवैया उनके पाखंड को बेनकाब करता है।
राहुल गांधी भूल गए राजीव गांधी का दौर: आतंकवाद के जनक जिया उल हक को लगाया था गले
विदेश नीति पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को शायद अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौर का इतिहास याद नहीं है। अस्सी के दशक में जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद कश्मीर को लहूलुहान कर रहा था, कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हो रहा था और वहां के सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक ने खुलेआम अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने स्वीकार किया था कि वे कश्मीर में जेकेएलएफ को ट्रेनिंग और हथियार देकर आतंकवाद फैला रहे हैं, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कोई कठोर कदम नहीं उठाया। इसके विपरीत, तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल के. सुंदर जी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ के तहत सीमा पर ऐतिहासिक सैन्य जमावड़ा किया, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाकर सीमा पार आतंकवाद को हमेशा के लिए समाप्त करना और रणनीतिक बढ़त बनाना था। भारतीय सेना के इस अप्रत्याशित पराक्रम से घबराकर जनरल जिया उल हक अचानक ‘क्रिकेट डिप्लोमेसी’ के बहाने भारत पहुंचे। देश के स्वाभिमान को ताक पर रखते हुए राजीव गांधी ने सोनिया गांधी के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर उस तानाशाह का भव्य स्वागत किया, उसे गले लगाया और जयपुर में साथ बैठकर मैच देखा। इसके तुरंत बाद भारतीय सेना को अपनी चौकियों से वापस बैरकों में लौटने का आदेश दे दिया गया, जिससे सेना के मनोबल को भारी आघात पहुंचा और पाकिस्तान के हौसले बुलंद हुए। ऐसे शर्मनाक कूटनीतिक इतिहास को दबाकर आज मोदी सरकार की मजबूत और स्वाभिमानी विदेश नीति पर सवाल उठाना राहुल गांधी के खोखलेपन को ही दर्शाता है।  
कपड़ों के रंग से कूटनीति की व्याख्या: राहुल गांधी का हास्यास्पद ‘लीडरशिप लेसन’
‘रचनात्मक कांग्रेस’ के मंच से नेतृत्व और विदेश नीति पर लंबा भाषण देने वाले राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी के अमेरिका दौरे का एक बेतुका किस्सा सुनाकर खुद को हास्य का पात्र बना लिया। उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की पत्नी नैन्सी रीगन ने जानबूझकर इंदिरा गांधी की साड़ी के रंग से मिलती-जुलती ड्रेस पहनी थी, जिससे इंदिरा जी नाराज हो गईं कि अमेरिकी उन्हें ‘कलर मैचिंग’ के जरिए अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी ने मंच पर ठहाके लगवाते हुए इसे कूटनीतिक ‘लीडरशिप’ का बड़ा पाठ बताया। जबकि ऐतिहासिक तथ्यों और तस्वीरों से साफ है कि दोनों के परिधानों के रंगों में कोई मेल ही नहीं था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, भू-राजनीतिक समीकरणों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों को कपड़ों के रंग और बचकाने घरेलू किस्सों तक सीमित कर देना नेता प्रतिपक्ष के सतही बौद्धिक स्तर को उजागर करता है। विश्व के राष्ट्राध्यक्षों के कूटनीतिक शिष्टाचार को ‘समझौता’ और ‘कलर मैचिंग’ जैसी फूहड़ व्याख्याओं में बांधना यह साबित करता है कि राहुल गांधी के पास नेतृत्व की न तो कोई ठोस समझ है और न ही कोई दृष्टि।
अभिव्यक्ति की आजादी पर पाखंड: दिल्ली में ढोंग, राज्यों में दमन
राहुल गांधी ने दिल्ली के मंच से यह दावा किया कि वे आरएसएस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, जबकि ठीक उसी दिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर संघ और अन्य संगठनों की गतिविधियों को रोकने वाला बिल पेश कर दिया। आपातकाल थोपने वाली और प्रेस की आजादी पर ताला लगाने का इतिहास रखने वाली कांग्रेस पार्टी का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह पाखंड देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। कांग्रेस शासित राज्यों में सोशल मीडिया क्रिएटर्स और आलोचकों पर लगातार मुकदमे दर्ज कर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। राहुल गांधी का दोहरा चेहरा यह साफ करता है कि वे केवल भाषणों में लोकतंत्र की बात करते हैं, हकीकत में नहीं।
आरएसएस के इतिहास पर कांग्रेस का अचानक यू-टर्न
दशकों तक जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कांग्रेस पार्टी ने हर मंच से बदनाम किया, चरमपंथी बताया और अनर्गल आरोप लगाए, आज राहुल गांधी अचानक दावा कर रहे हैं कि संघ मूल रूप से सुनारों और छोटे व्यापारियों का संगठन था। बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण के अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार अपने ही दशकों पुराने स्टैंड से पूरी तरह पलट जाना कांग्रेस की वैचारिक कंगाली को दर्शाता है। जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या कांग्रेस इतने सालों से संघ के बारे में झूठ बोल रही थी या आज राहुल गांधी नया भ्रम फैला रहे हैं। यह यू-टर्न उनकी दिशाहीन राजनीति का सबसे बड़ा सबूत है।
खुद के कार्यक्रम का सही नाम तक नहीं ले पाए राहुल गांधी
अपनी पार्टी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे राहुल गांधी मंच से अपने ही कार्यक्रम का नाम ठीक से उच्चारित नहीं कर सके। वे पूरे भाषण के दौरान ‘रचनात्मक’ शब्द का सही उच्चारण न करते हुए उसे बार-बार ‘रचनातक’ बोलते रहे, जिससे मंच पर मौजूद नेता भी असहज नजर आए। जो व्यक्ति अपनी ही पार्टी के कार्यक्रम के शीर्षक और विषय के प्रति सजग नहीं है, वह देश की जटिल समस्याओं और नीतियों को कैसे समझ सकता है। यह छोटी सी घटना भी उनकी गंभीरता और बुनियादी समझ की भारी कमी को दर्शाने के लिए काफी है।
51 कार्टन बॉक्स और नेहरू के गुप्त पन्नों पर रहस्यमयी चुप्पी
विदेश नीति पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने वाले राहुल गांधी इस बात का कोई जवाब नहीं देते कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के 51 कार्टन बॉक्स पत्रों पर अब तक पर्दा क्यों पड़ा हुआ है। कांग्रेस का प्रथम परिवार इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से क्यों बचता रहा है, जिनमें एडविना माउंटबेटन और नेहरू के बीच हुए संवाद भी शामिल हैं। अपनी पार्टी और परिवार के संदेहास्पद इतिहास को छिपाकर मोदी सरकार की पारदर्शी नीतियों पर लांछन लगाना कांग्रेस के पाखंड का सबसे बड़ा प्रमाण है।
नेहरू की ‘गले पड़ने’ वाली कूटनीति और सेना की उपेक्षा: जब चीन ने हड़प ली थी देश की जमीन
कूटनीति और गले मिलने के शिष्टाचार पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को अपने नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर की आत्मघाती नीतियों का स्मरण करना चाहिए। 1957 में जब तिब्बत पर अवैध कब्जा करने के बाद चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई भारत आया, तब नेहरू ने प्रोटोकॉल और सामरिक संवेदनशीलता को दरकिनार कर जबरन उन्हें गले लगाया था। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के खोखले नारों के बीच चाऊ एन लाई को देश की संवेदनशील ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का दौरा तक करवाया गया, जहां सैन्य हथियारों और गोला-बारूद के उत्पादन की जगह कपड़े और मोजे बनाने की शांतिवादी नीतियां दिखाई गईं। देश की रक्षा तैयारियों और सेना की इस उपेक्षा को भांपकर ही चीन ने भारत के खिलाफ आक्रामकता की योजना बनाई, जिसका दुष्परिणाम 1962 में अक्साई चिन और हजारों वर्ग किलोमीटर भारतीय भूभाग गंवाने के रूप में सामने आया। इसके बावजूद उस समय संसद में यह तर्क देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की गई कि उस जमीन पर ‘घास का एक तिनका भी नहीं उगता’, जिस पर तत्कालीन सांसद महावीर त्यागी ने तीखा प्रतिवाद किया था। अपने पुरखों की इन ऐतिहासिक रणनीतिक भूलों पर पर्दा डालकर आज मोदी सरकार की मजबूत रक्षा और कूटनीतिक नीति पर सवाल उठाना राहुल गांधी के दोहरे चरित्र और अज्ञान को ही उजागर करता है।
कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के नाम पर बेबुनियाद भ्रम फैलाने की पुरानी आदत
राहुल गांधी जब भी नीतिगत मुद्दों पर घिरते हैं, तो वे बिना किसी तथ्य के उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों के नाम पर अनर्गल आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने देश के आर्थिक विकास में योगदान देने वाले उद्यमों पर बेबुनियाद हमले किए और आरोप लगाया कि सरकार का पूरा ढांचा केवल चंद लोगों से लाभ लेने के लिए काम कर रहा है। देश के औद्योगिकीकरण और विकास यात्रा को बदनाम कर भ्रम की राजनीति फैलाना कांग्रेस की नकारात्मक सोच को दिखाता है।
कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का साइकोलॉजिकल वार: नैरेटिव युद्ध की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी द्वारा लगातार शीर्ष नेतृत्व पर व्यक्तिगत और अमर्यादित हमले करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे ‘बिलो द बेल्ट’ हमलों के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ना चाहते हैं, ताकि बार-बार बोले गए झूठ को सच के रूप में स्थापित किया जा सके। इस परसेप्शन और नैरेटिव की राजनीति का मुकाबला करने के लिए भाजपा को भी आक्रामक, संगठित और पूरी मजबूती के साथ इन झूठे प्रचारों की हवा निकालनी होगी।
खोखले दावे बनाम मोदी सरकार का ठोस जमीनी रिकॉर्ड
राहुल गांधी विदेश नीति, मेक इन इंडिया, किसान कल्याण, आंतरिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे तमाम गंभीर विषयों पर केवल मनगढ़ंत आरोप लगाते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जबकि तथ्य और जमीनी आंकड़े यह गवाही देते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता आई और सीमावर्ती ढांचा पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ। राहुल गांधी के झूठे नारों और राजनीतिक ड्रामे के सामने मोदी सरकार का ठोस रिपोर्ट कार्ड और विकास के कार्य पूरी मजबूती से खड़े हैं।
विजनविहीन राजनीति: सिर्फ मोदी-विरोध के सहारे टिकने की नाकाम कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि राहुल गांधी के पास देश के भविष्य, युवाओं के रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए कोई सकारात्मक विजन या ठोस कार्ययोजना नहीं है। वे अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा और समय केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्द कहने, व्यक्तिगत आक्षेप लगाने और सस्ती बयानबाजी करने में नष्ट कर रहे हैं। लोकतंत्र में जनता एक सकारात्मक और जिम्मेदार विकल्प चुनती है, न कि केवल निराधार विरोध और गाली-गलौज करने वाले नेतृत्व को। जब तक वे इस नकारात्मक राजनीति से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक वे देश के लिए केवल एक राजनीतिक बोझ बने रहेंगे।
संसदीय मर्यादा और संवैधानिक आचरण का लगातार हनन
नेता प्रतिपक्ष का पद एक अत्यंत गरिमामयी और महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व होता है, जिसमें सरकार की नीतियों की आलोचना तर्कों, तथ्यों और संसदीय मर्यादा के दायरे में रहकर की जाती है। लेकिन राहुल गांधी लगातार संसद के भीतर और बाहर सार्वजनिक मंचों पर अभद्र, अमर्यादित और अलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग कर लोकतांत्रिक संवाद के स्तर को गिराने का काम कर रहे हैं। नीतिगत बहस करने के बजाय व्यक्तिगत हमलों पर उतरना यह साबित करता है कि वे इस संवैधानिक पद की गंभीरता और महत्व को समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं।
विदेशी मंचों पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र
राहुल गांधी का यह गैर-जिम्मेदाराना आचरण सिर्फ देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विदेशी दौरों और वैश्विक मंचों पर भी भारत की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका और चुनाव प्रणाली पर बेबुनियाद सवाल उठाते रहे हैं। अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए देश की वैश्विक प्रतिष्ठा, संप्रभुता और कूटनीतिक साख को दांव पर लगाना अत्यंत निंदनीय और अक्षम्य है। देश की जनता भली-भांति देख रही है कि कैसे सत्ता की चाह में वे राष्ट्रीय हितों से समझौता करने से भी पीछे नहीं हटते।
नकारात्मकता और अमर्यादित भाषा कभी नहीं बन सकती राष्ट्रीय विकल्प
राहुल गांधी के हालिया बयानों और आचरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे नेता प्रतिपक्ष जैसे उच्च संवैधानिक पद की गरिमा और उत्तरदायित्व को निभाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में विपक्ष का काम नीतियों की तथ्यपरक समीक्षा करना और जनता के समक्ष एक सकारात्मक, ठोस और सशक्त वैकल्पिक विजन प्रस्तुत करना होता है। इसके विपरीत, राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक अस्तित्व सिर्फ व्यक्तिगत द्वेष, अपशब्दों, विदेशी नेताओं पर भद्दी टिप्पणियों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर झूठ फैलाने तक सीमित होकर रह गया है।
लगातार झूठ बोलकर और देश की संस्थाओं पर आक्षेप लगाकर कोई भी नेता जनविश्वास हासिल नहीं कर सकता। भारतीय लोकतंत्र परिपक्व है और देश की जनता भली-भांति जानती है कि फूहड़ स्टैंडअप कॉमेडी, देश-विरोधी नैरेटिव और गटर-स्तरीय राजनीति के बल पर 140 करोड़ भारतीयों के भविष्य का नेतृत्व नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी जब तक इस स्तरहीन नकारात्मकता से बाहर निकलकर राष्ट्रहित की राजनीति नहीं करेंगे, तब तक वे भारतीय राजनीति में केवल एक अप्रासंगिक और गैर-जिम्मेदार चेहरे के रूप में ही देखे जाएंगे।

काँवड़ यात्रा को बदनाम करने के लिए वामपंथी-कट्टरपंथी और मीडिया फर्जी Video, झूठे आरोप, हमले और नफरती बयान फैला रहे हैं भ्रम

सावन के पवित्र महीने में काँवड़ यात्रा का समापन हो चुका है। लाखों शिवभक्तों ने कठिन रास्तों को पार करते हुए अपनी आस्था की डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। लेकिन इस पूरी यात्रा के दौरान एक दूसरा पहलू भी देखने को मिला, जो बेहद चिंताजनक था। कुछ कट्टरपंथी ताकतों, वामपंथी विचारकों और पक्षपाती मीडिया ने मिलकर काँवड़ यात्रा और काँवड़ियों को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कहीं काँवड़ियों पर कातिलाना हमले हुए, तो कहीं सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाकर उन्हें उपद्रवी साबित करने की कोशिश की गई। इसमें हम जानेंगे कि कैसे इस साल की काँवड़ यात्रा पर सुनियोजित तरीके से हिंदू आस्था के खिलाफ भ्रम और नफरत फैलाई गई।

काँवड़ियों और हिंदुओं पर शारीरिक हमले: ग्वालियर से लखीमपुर तक हिंसा

काँवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों में शिवभक्तों को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रात के उस समय भयानक तनाव फैल गया, जब काँवड़ यात्रा में शामिल होने जा रहे कुछ युवकों पर कथित तौर पर मुस्लिम युवकों ने हमला कर दिया। कार से टक्कर लगने को लेकर उपजा विवाद पल भर में हिंसक झड़प में बदल गया।

मुस्लिम हमलावरों ने तलवारों, हथौड़ों और पत्थरों से काँवड़ियों पर हमला किया। इस बर्बर हमले में विवेक यादव नाम का युवक गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर में 18 टांके लगाने पड़े। घटना के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर विरोध किया और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में अरशद खान, गोलू खान, अकील खान और बंटू खान समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की।

 इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के थाना खीरी क्षेत्र में भी काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया गया। रुखिया गाँव से करीब 40-50 काँवड़िये नहर के पास स्थित मंदिर से जल लेकर जा रहे थे। जब उनका जत्था जुलाहनपुरवा के पास पहुँचा, तो अचानक उन पर पथराव शुरू हो गया, जिससे सड़क पर भगदड़ मच गई।

इस हमले में राजापुर के रहने वाले काँवड़िया विकास के सिर में गंभीर चोटें आईं। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति संभाली और जाँच में जुटी। हालाँकि पुलिस ने प्रारंभिक जाँच में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग का हाथ बताया, लेकिन इस तरह की घटनाएँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यात्रा के दौरान माहौल बिगाड़ने और हिंदुओं को निशाना बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे थे।

मीडिया और सोशल मीडिया का गंदा खेल: मेरठ की घटना पर फैलाया गया सफेद झूठ

सावन के महीने में वामपंथियों और कट्टरपंथियों की आँखों में काँवड़िए हमेशा से खटकते रहे हैं। वे हरसंभव तरीके से इनकी छवि को धूमिल करने की फिराक में रहते हैं। ऐसा ही एक घिनौना प्रयास मेरठ की घटना को लेकर किया गया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल किया गया, जिसमें दावा किया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है, उनकी वर्दी फाड़ी है और उन्हें पीटकर भगा दिया है।
इस फर्जी नैरेटिव को फैलाने में कई जाने-माने सोशल मीडिया हैंडल और तथाकथित पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ‘मुस्लिम वॉयस सेल’ के ट्वीट से लेकर पीयूष राय, सचिन गुप्ता और जाकिर त्यागी जैसे लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया। यहाँ तक कि चर्चित फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने भी इस भ्रामक दावे को रिपोस्ट किया।

जब इस मामले में मेरठ पुलिस का आधिकारिक बयान सामने आया, तो पूरा सच जनता के सामने आ गया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो के दावे पूरी तरह झूठे हैं। असलियत यह थी कि 3 अगस्त की रात जब दो अलग-अलग काँवड़ियों के ग्रुप आमने-सामने आए, तो सोनू और गुड्डू नाम के युवकों का दूसरे काँवड़ियों से टकराव हो गया। दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ दिखाई और उन दोनों को अपनी जीप में बैठाकर सुरक्षित करने की कोशिश की।
तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर उन्हीं लोगों को गाड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। पुलिस के साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी और न ही किसी की वर्दी फाड़ी गई थी। इसके बावजूद, मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों ने भी बिना पुलिस का पक्ष जाने ‘पुलिसकर्मियों की पिटाई’ की हेडलाइन के साथ सनसनीखेज खबरें चला दीं, जिससे साबित होता है कि मीडिया का एक वर्ग किस हद तक काँवड़ियों के खिलाफ पूर्वाग्रही है।

मुख्यधारा की मीडिया और वामपंथियों का एजेंडा: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से लेकर तुष्टिकरण का रोना

सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबारों ने भी काँवड़ यात्रा के खिलाफ अपने संपादकीय के जरिए वैचारिक जहर उगला। ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक लेख (शीर्षक: The problem isn’t the kanwar yatra. It’s a patronising state) में काँवड़ यात्रा और इसके भक्तों पर गंभीर कटाक्ष किए गए। इस लेख में तर्क दिया गया कि राज्य सरकारों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना, उन पर फूलों की वर्षा करना (जैसे प्रयागराज में आईजी और डीएम द्वारा किया गया) या यात्रा मार्ग पर गैर-वेज की दुकानों पर रोक लगाना और दुकानदारों के नाम लिखने के आदेश देना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।
लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि सरकारें भक्तों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं और उनकी तुलना जिन्ना या सावरकर की राजनीति से कर डाली। यह नजरिया पूरी तरह से दोहरे मापदंड को दिखाता है। जब अन्य मजहबों के आयोजनों या जुलूसों में प्रशासनिक व्यवस्थाएँ की जाती हैं, तब यही वर्ग मौन रहता है, लेकिन जब हिंदू युवा अपनी आस्था के साथ सड़कों पर निकलते हैं, तो उन्हें ‘असुविधा’ या ‘भीड़ का डर’ कहकर प्रोजेक्ट किया जाने लगता है।
सरकार के अधिकारियों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना या उनके रास्ते की व्यवस्था संभालना एक जन कल्याणकारी और प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसे वामपंथी विचारक हमेशा ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहिष्कार’ और ‘तुष्टिकरण’ का रंग देने की कोशिश करते हैं। यह सब इस बात का प्रमाण है कि एक खास वैचारिक वर्ग हिंदू आस्था को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाना चाहता है।

नफरती बयानों और सोशल मीडिया का जहर

काँवड़ यात्रा को बदनाम करने में मजहबी कट्टरपंथियों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने मर्यादा की सभी हदें पार करते हुए काँवड़ यात्रा पर जाने वाले शिवभक्तों को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ और नशेड़ी करार दिया। मौलाना साजिद ने अपनी नफरत भरी जुबान से आरोप लगाया कि काँवड़िए सड़कों पर नंगा नाच करते हैं, शराब पीते हैं, एंबुलेंस को रोकते हैं, स्कूल वैन के शीशे तोड़ते हैं और पुलिसवालों को पीटते हैं।
मौलाना साजिद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी अभद्र तंज कसे और काँवड़ यात्रा को रोकने की माँग की। एक तरफ जहाँ मौलाना जैसे लोग हिंदुओं की आस्था को कुचलने वाले बयान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर यह दुष्प्रचार किया गया कि काँवड़िए शिवजी का मूल मंत्र छोड़कर मनमाने नारे लगाते हैं।
हद तो तब हो गई जब मुफ्ती शाहनवाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी कर खुलेआम जहर उगला। उसने कहा, “हमारे इस्लाम में किसी गैर मुस्लिम की मदद करना, पानी पिलाना या खाना खिलाना हराम है।”  
यह बयान इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कट्टरपंथी किस तरह समाज में नफरत की दीवारें खड़ी करना चाहते हैं। एक तरफ जहाँ हिंदू समाज सहृदयता और सेवा भाव का परिचय देता है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे कट्टरपंथी उपदेश देकर दो समुदायों के बीच नफरत का जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन तमाम बयानों और पोस्टों का मकसद सिर्फ और सिर्फ काँवड़ यात्रा को सांप्रदायिक रंग देना और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाना था।

हिंदू त्योहारों पर सुनियोजित तरीके से होता हमला…

इस वर्ष (2026) की काँवड़ यात्रा को लेकर भारत में सनातन धर्म और उसके प्रतीकों को बदनाम करने के लिए किस प्रकार एक सुनियोजित इकोसिस्टम काम कर रहा है। एक तरफ जहाँ भोले-भाले शिवभक्त अपनी कठिन यात्रा पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी, वामपंथी विचारक, और कुछ बिकाऊ मीडिया संस्थान मिलकर उन पर हमले करवा रहे थे और दूसरी तरफ फर्जी वीडियो के जरिए उन्हें ही उपद्रवी साबित करने में जुटे थे।
मुहर्रम या अन्य जुलूसों के दौरान खुलेआम निकलने वाले हथियारों और हिंसक प्रदर्शनों पर आँखें मूंद लेने वाले लोग, काँवड़ियों के हाथों में एक छोटी सी लाठी या डंडे को भी बहुत बड़ा मुद्दा बना देते हैं। सरकार के कल्याणकारी कार्यों और जनता की आस्था को कुचलने का यह कुचक्र हमेशा से चलता आ रहा है। सनातन धर्म और हिंदू त्योहारों से नफरत करने वाले कट्टरपंथी और वामपंथी ऐसे समय में सुनियोजित तरीके से हमला करते हैं।

भारत का विभाजन, कुछ हद तक महाभारत दोहराया गया

सुभाष चन्द्र

महाभारत में दुर्योधन ने कहा था एक वन में दो सिंह नहीं रह सकते जिसका मतलब था युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों युवराज हैं, उनमें से एक ही रहेगा और भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर के बंटवारे की घोषणा कर दी। 

ठीक उसी तरह मुस्लिम लीग का मोहम्मद अली जिन्ना अड़ गया कि मुस्लिम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते

भारत दो राष्ट्र हैं, एक हिंदू राष्ट्र और एक मुस्लिम राष्ट्र”
 इसलिए हमें मुसलमानों के लिए अलग मुल्क चाहिए और भारत के स्वघोषित पितामह गांधी अपने पिट्ठू नेहरू के साथ मिलकर पाकिस्तान देने के लिए तैयार हो गए गांधी कहते थे देश का बटवारा उनकी लाश पर होगा लेकिन हिंदुओं की लाशों पर हुआ और गांधी को कुछ नहीं हुआ मुस्लिम पूरी तरह कौरवों की तरह देश के विभाजन पर अड़े थे

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भीष्म पितामह शरीर से कौरवों के साथ थे लेकिन मन से पांडवों के साथ थे और उनका आशीर्वाद भी पांडवों के लिए था, लेकिन हमारे आधुनिक भारत का पितामह गांधी तन से तो भारत में थे लेकिन मन से कौरवों (पाकिस्तान) के साथ थे मुसलमानों को गांधी सब कुछ मनचाहा दिया, हिंदू मरते रहे लेकिन मुस्लिमों को बचाने के लिए नोआखली में अनशन पर बैठ गया और न जाने कितने हिन्दुओं के नरसंहार के लिए गांधी जिम्मेदार थे बंगाल में कटवा दिए, मोपला में कटवा दिए और भगत सिंह को फांसी चढ़ने से नहीं रोका

गाँधी की देशभक्ति उस समय मिली जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जिन्दा या मुर्दा ब्रिटिश सरकार को सौंपने के agreement पर गाँधी के साथ साथ अन्य कांग्रेस नेताओं ने साइन किया था, क्यों? जबकि देश को आज़ादी दिलाने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर पार्टी और भगत सिंह पार्टी का बलिदान। है फिर देशवासियों को बताया जाता है कि गाँधी और कांग्रेस ने आज़ादी के लड़ाई लड़ी। क्या स्वांग रचा गया? मुस्लिम कट्टरपंथी और पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स और संविधान की दुहाई देने वाले गाँधी के नाम की माला इसलिए जपते हैं क्योकि मुस्लिम तुष्टिकरण के जन्मदाता अंग्रेज़ और महात्मा गाँधी हैं। 

दूसरे, जेहादियों और उपद्रवियों द्वारा victim card खेलने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महात्मा गाँधी ही जिम्मेदार है। याद करो जब स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या करने वालों के लिए गाँधी ने कहा था कि मेरे मुसलमान भाई किसी की हत्या नहीं कर सकते। शर्म आती है उन एंकरों और उन प्रवक्ताओं पर जो मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा नाथूराम गोडसे को पहला आतंकवादी कहने पर मुंह तोड़ जवाब दे सकें। किसी ने माँ का दूध नहीं पिया जो उन कट्टरपंथियों से पूछ सके कि गाँधी की हत्या से पहले स्वामी श्रद्धानन्द और राजपाल की हत्या किसी गोडसे ने नहीं बल्कि मुसलमानों ने की थी। मीडिया को भी अपनी TRP की फ़िक्र रहती है सच्चाई बताने की नहीं।        

नाथूराम गोडसे से गांधी का पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपया विभाजन के बाद भी देना सहन नहीं हुआ और फिर गांधी वध को RSS के नाम पर फोड़ते हुए कांग्रेस हर चुनाव में Gandhi Vadh Dividend भुनाती रही

गांधी खुलेआम कहते थे हिंदुओं को अगर मुस्लिम क़त्ल करें तो सहर्ष स्वीकार करें, उनकी महिलाओं का बलात्कार करें तो विरोध न करें मंदिरों को नमाज पढ़ते थे गांधी लेकिन किसी मस्जिद में रामायण या गीता पाठ नहीं करते थे ऐसे थे ये पितामह जो धर्म से कथित तौर पर हिंदू थे और कर्म से मुस्लिम

अफ़सोस की बात है गांधी का अपमान करने को दंडात्मक अपराध बना दिया गया लेकिन भगवान राम, शंकर जी और कृष्ण जी के अपमान की खुली छूट दी गई है कैसा संविधान दिया बाबा साहब ने?

उनका शागिर्द नेहरू तो शकुनि का अवतार था शकुनि हस्तिनापुर को तबाह करने आया था और नेहरू ने उसी की तरह भारत के टुकड़े टुकड़े कर इधर उधर बाँट दिए जिसको जितना चाहिए काट काट ले जाए ऐसा लगा जैसे टुकड़े टुकड़े गैंग को शुरू ही नेहरू ने किया

दुर्योधन जैसे हस्तिनापुर से संतुष्ट नहीं था और वो पांडवों का इंद्रप्रस्थ भी हड़पना चाहता था वैसे ही मुस्लिम पाकिस्तान लेकर भी संतुष्ट नहीं थे। एक तिहाई कश्मीर नेहरू ने दे दिया और नारा लगाते थे -”लड़ के लिया है पाकिस्तान, हंस के लेंगे हिंदुस्तान” कांग्रेस और अन्य सेकुलर कीड़े उसके मिशन को पूरा करने के लिए चाहते है “लड़ के ले गए पाकिस्तान, हम हंस के देंगे हिंदुस्तान” 

लेकिन पाकिस्तान और भारत में उनके चाहने वालों को याद रखना चाहिए कि कौरव पूरी तरह समाप्त हो गए और आज उसी तरह पाकिस्तान भी खात्मे की कगार पर है हिंदुस्तान तो क्या एक इंच भूमि भी न लड़ के ले सकता है और न हंस के ले सकता है बल्कि खुद ही खंड खंड हो जायेगा

यही एकरूपता है महाभारत और 1947 में भारत के विभाजन की जो अंग्रेज़ (ब्रिटेन) पाकिस्तान बना कर गए थे वो खुद आज एक इस्लामिक मुल्क बनने की ओर बढ़ रहे है

साभार सोशल मीडिया 

भारत माता की जय!

अभिजीत दीपके के देश से गद्दारी के सबूत, स्वतंत्रता दिवस से पहले फिर अराजकता फैलाने की बड़ी साजिश, बड़े अराजक निकले गुरु और चेला

एक प्रसिद्ध हिंदी कहावत है- “एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा”। इसका अर्थ है कि एक बुराई या समस्या के साथ दूसरी बुराई या समस्या का जुड़ जाना, जिससे स्थिति और भी अधिक खराब हो जाती है। इसे और सरल शब्दों में समझ सकते हैं कि जब कोई दुष्ट या बुरे स्वभाव का व्यक्ति किसी बुरी संगति में पड़ जाता है, तो वो और अधिक अराजक हो जाता है। यह कहावत आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके पर पूरी तरह से लागू होता है। क्योंकि गुरु अरविंद केजरीवाल खुद अपने आप को अराजक (अनार्किस्ट) बात चुके हैं, वहीं एक नए खुलासे से पता चलता है कि चेला अभिजीत दीपके तो अपने गुरु केजरीवाल से भी ज्यादा अराजक है। 

स्वतंत्रता दिवस पर अराजकता फैलाने की प्लानिंग, लोगों ने भगाया

15 अगस्त,2026 को पूरा देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, लेकिन अभिजीत दीपके ने अपने गुरु अरविंद केजरीवाल की तरह दिल्ली की सड़कों पर फिर अराजकता पैदा करने की प्लानिंग की है। उन्होंने इस प्लान का नाम ‘जंतर-मंतर सीजन 2′ दिया है। लेकिन अभिजीत और उसके साथियों को दिल्ली के एक रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क से उलटे पांव भागना पड़ा। दीपके अपनी टीम के मेंबर सौरभ दास, आशुतोष रंका और कुछ समर्थकों के साथ रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में जंतर-मंतर सीजन 2 का प्लान बनाने आए थे। सोसाइटी के लोगों को जब इसकी भनक लगी तो वे वहां बड़ी संख्या में पहुंच गए और पार्क से सभी को भगा दिया। लोगों का कहना था कि यह सोसाइटी का पार्क है कोई धरना या प्रदर्शन की जगह नहीं। यहां यह नौटंकी नहीं चलेगी।

‘जंतर-मंतर सीजन 2’ में चाहिए पीएम मोदी और अमित शाह का इस्तीफा

रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए अभिजीत ने कहा कि जल्द “जंतर-मंतर सीजन 2 शुरू होने जा रहा है। अभिजीत ने अपने समर्थकों से पूछा कि अब किसका इस्तीफा चाहिए। समर्थकों ने कहा मोदी और अमित शाह का इस्तीफा। इससे पता चलता है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से गुरु केजरीवाल का मिशन पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अभिजीत दीपके अपने गुरु का मुख्य मिशन यानी प्रधानमंत्री मोदी का इस्तीफा लेने के लिए “जंतर-मंतर सीजन 2 की तैयारी में लगा है। विक्टिम कार्ड खेलते हुए दीपके ने आरोप लगाया कि प्रशासन और राजनीतिक दबाव के चलते उन्हें वालंटियर्स की इनडोर मीटिंग के लिए हॉल की बुकिंग आखिरी समय में रद्द करनी पड़ी, जिसके बाद उन्हें खुले में बैठक करनी पड़ी।

 

20 जुलाई को दिल्ली में दिखा अभिजीत दीपके का अराजक चेहरा

20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में संसद मार्ग और जंतर-मंतर के पास युवाओं और छात्रों (कॉकरोच जनता पार्टी) के नेतृत्व में बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था। नीट परीक्षा में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ यह मार्च संसद के बेहद करीब पहुंच गया था, जहां पुलिस के साथ झड़प, आंसू गैस के इस्तेमाल और पथराव के कारण भारी अफरातफरी और तनाव का माहौल बन गया था। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प में एसीपी सहित कई पुलिसकर्मी घायल हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में सैकड़ों आपराधिक पृष्ठभूमि (हिस्ट्रीशीटर) के लोग भीड़ में शामिल थे। इससे पता चलता है कि अभिजीत दीपके और उसके इकोसिस्टम का इरादा बांग्लादेश और नेपाल की तरह दिल्ली को जलाना था, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर उनके नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया।

अभिजीत दीपके ने अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में चलाया था प्रोपेगैंडा 

2019 में अभिजीत दीपके आप (AAP) का राष्ट्रीय सोशल मीडिया समन्वयक था। अभिजीत दीपके ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया था और जम्मू-कश्मीर के लोगों को भड़काने की कोशिश की थी। अभिजीत ने सोशल मीडिया के माध्यम से कश्मीर में कार्रवाई को लेकर फर्जी खबरें (Fake News) फैलाई थीं। ट्वीटर पर एक चैट में अभिजीत दीपके ने लिखा था, I’m afraid of losing him, I don’t want him to die. But that’s a reality in Kashmir everyday” यानी “मुझे उसे खोने का डर है, मैं नहीं चाहता कि उसकी मौत हो। लेकिन कश्मीर में हर दिन यही सच्चाई है।”

कश्मीर में लोग लगातार मौत के साए/डर में जी रहे हैं- अभिजीत दीपके

अभिजीत दीपके ने नाम का खुलासा किए बिना अपने किसी कश्मीरी दोस्त के हवाले से सोशल मीडिया पर कश्मीर और देश में डर का माहौल बनाने की कोशिश की थी। साथ ही पाकिस्तान सहित अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को बताना चाहता था कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से लोग डर के साए में जी रहे हैं। अभिजीत ने ट्वीटर पर लिखा था, “People are living in a constant fear of death. I had this chat with one of my friend last night.” यानी “लोग लगातार मौत के साए/डर में जी रहे हैं। कल रात मेरी अपने एक दोस्त से यही बातचीत हुई थी।” इस पोस्ट से पता चलता है कि अभिजीत दीपके का एकमात्र मकसद कश्मीर में सक्रिय अलगाववादियों/आतंकवादियों के लिए समर्थन जुटाना था। दिल्ली की तत्कालीन केजरीवाल सरकार और पार्टी से जुड़े होने के कारण, वह ऐसा प्रोपेगैंडा चला रहा था, जिससे भारत-विरोधी शक्तियों को मदद मिल रही थी। 

अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में खड़ा होने की अपील

इस दौरान अभिजीत दीपके ने ट्विटर (अब X) पर कई पोस्ट किए थे, जिन्हें लेकर सोशल मीडिया पर काफी विवाद हुआ था। 5 अगस्त 2019 को अभिजीत दीपके ने ट्वीटर पर लिखा था, “कश्मीर के साथ खड़ा होने की जरूरत है। आज जो कुछ कश्मीर में हो रहा है, कल आपके राज्य में भी हो सकता है।” हैरानी की बात है कि 5 अगस्त 2019 को गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का संकल्प और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश किया, जिसे राज्यसभा ने उसी दिन पास किया। अभिजीत दीपके ने पास होने के थोड़ी देर बाद देर रात 1 बजकर 22 मिनट पर कश्मीर के साथ खड़े होने का ट्वीट कर दिया था। इसकी टाइमिंग देखकर लगता है कि अनुच्छेद 370 हटने से इसे कितना बड़ा झटका लगा था।

 कश्मीर में कार्रवाइयों की तुलना इजराइल से की थी

अभिजीत दीपके की मानसिकता देश और सेना विरोधी है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंद कर कर्फ्यू लगा दी गई थी। इस दौरान अभिजीत दीपके ने कश्मीर में इंटरनेट बंदी और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों की तुलना इजराइल की नीतियों से करते हुए सरकार और सुरक्षा बलों की आलोचना की थी। इसके बाद 26 सितंबर 2019 को अभिजीत दीपके ने कश्मीर के लोगों को भड़काने के लिए सोशल मीडिया में पोस्ट किया था, “कश्मीर में कब जागोंगे ? अब तो 370 भी हट गया।”
धारा 370 की क्या ज़रूरत थी?- अभिजीत दीपके
अभिजीत दीपके ने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “धारा 370 की क्या ज़रूरत थी? जम्मू और कश्मीर को भारत के अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की तुलना में अलग अधिकारों की आवश्यकता क्यों थी? आज़ादी के बाद 550 से अधिक देशी रियासतें (Princely states) बिना धारा 370 जैसी किसी शर्त के भारत के अधीन आई थीं। धारा 370 एक बहुत बड़ी विफलता (fiasco) थी, शेख अब्दुल्ला इसका इस्तेमाल एक अलग कश्मीर बनाने के लिए करना चाहते थे।”
देश और कश्मीर विरोधी प्रोपेगैंडा के लिए LRO ने दर्ज कराई थी शिकायत
अभिजीत दीपके द्वारा लगातार देश और कश्मीर विरोधी ट्वीट के बाद ‘लीगल राइट्स आब्जर्वेटरी’ (LRO) ने पुणे में एक आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई थी। उन पर कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ भड़काऊ और झूठा प्रचार करने तथा अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। लीगल राइट्स आब्जर्वेटरी (LRO) ने अपनी शिकायत में चार मांगें की थीं…
  1. देशद्रोह (राजद्रोह) और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने से संबंधित आईपीसी (IPC) की धाराओं के तहत अभिजीत दीपके के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए,
  2. यूएपीए (UAPA) के तहत अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया जाए और हुर्रियत तथा अन्य कश्मीरी अलगाववादी/आतंकवादी समूहों के साथ उसके गुप्त संबंधों की पूछताछ की जाए,
  3. यह पता लगाने, जांच करने और उजागर करने के लिए कि क्या उसने बड़े पैमाने पर भारत-विरोधी दुष्प्रचार चलाने के लिए संदिग्ध स्रोतों से धन प्राप्त किया है, उसके पिछले 5 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की जांच की जाए,
  4. किसी विदेशी खुफिया एजेंसी के साथ उसकी संभावित साँठगाँठ की जाँच के लिए उसके विदेशी दौरों के विवरण की जाँच की जाए।
दिल्ली दंगा के आरोपी उमर खालिद का समर्थक
अब सवाल उठता है कि महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अभिजीत दीपके का कश्मीर, अनुच्छेद 370 और उमर खालिद के प्रति इतना प्रेम क्यों है? दरअसल, यह प्रेम देश विरोधी इकोसिस्टम के गठजोड़ का नतीजा है, जो एक-दूसरे की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद करते हैं। वर्ष 2016 में उमर खालिद ने जेएनयू में कश्मीर के आत्मनिर्णय (Self-determination) की वकालत थी। इस दौरान प्रदर्शन में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” का नारा लगा था। इसके बाद उमर खालिद पर 2020 दिल्ली दंगों के आरोप लगे। इसके बावजूद अभिजीत दीपके ने उमर खालिद का समर्थन किया है और समय समय पर उमर खालिद की जमानत को लेकर आवाज उठाते रहते हैं। सोशल मीडिया में उन्होंने सवाल उठाया था कि उमर खालिद पिछले 5 साल से बिना ट्रायल के जेल में हैं। उनके अलग तरीके से व्यवहार क्यों किया जा रहा है?
अभिजीत दीपके को अराजकता फैलाने की ट्रेनिंग कैसे मिली है। किस तरह गुरु अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सड़कों पर अराजकता का प्रदर्शन किया है… 
गणतंत्र दिवस से ठीक पहले सड़क पर ही धरने पर बैठ थे गुरु केजरीवाल
अभिजीत दीपके का गुरु अरविंद केजरीवाल कितना बड़ा अराजकतावादी हैं, इसका प्रमाण जनवरी 2014 में गणतंत्र दिवस से ठीक पांच दिन पहले मिला था। गणतंत्र दिवास की तैयारियों को लेकर दिल्ली में राजपथ (वर्तमान में कर्तव्य पथ) पर परेड के लिए सेना, सुरक्षा बलों और विभिन्न राज्यों की झांकियों का पूर्वाभ्यास हो रहा था। ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल ने रेल भवन के पास अनिश्चितकालीन धरना दिया था। हालांकि यह प्रदर्शन दो दिनों (20 और 21 जनवरी 2014) तक चला था, लेकिन 20 जनवरी 2014 को गृह मंत्रालय की तरफ जाने से रोके जाने के बाद केजरीवाल अपने मंत्रियों और समर्थकों के साथ रेल भवन के बाहर सड़क पर ही धरने पर बैठ गए थे और कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात बिताई। गणतंत्र दिवस समारोह के ठीक पहले उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में इस तरह के प्रदर्शन से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया था।
मैं मानता हूं कि मैं अनार्किस्ट हूं- अरविंद केजरीवाल
आम आदमी पार्टी के रेलवे भवन के आगे धरने के ऐलान के कारण चार मेट्रो स्टेशन – पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, उद्योग भवन और रेस कोर्स रोड बंद कर दिया गया था। केंद्रीय सचिवालय स्टेशन पर इंटरचेंज की सुविधा भी नहीं थी। सरकारी और निजी क्षेत्र के अधिकारियों और कर्मचारियों को ऑफिस आने-जाने वालों के साथ ही आम लोगों असुविधा हो रही थी। ऐसे में अरिवंद केजरीवाल अपने मंत्रियों के साथ सड़क पर धरना दे रहे थे। 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस को लेकर दिल्ली में पूरी तरह अफरा-तफरी का माहौल था। इस दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा था, ” कुछ लोग कह रहे है कि मैं अनार्किस्ट हूं। मैं अव्यवस्था फैला रहा हूं। मैं मानता हूं कि मैं अनार्किस्ट हूं। मैं अव्यवस्था फैला रहा हूं।”
जुलाई 2026 में पेपर लीक और छात्र आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों से कहा था कि वे मुकदमों से न डरें, क्योंकि उनकी कानूनी मदद के लिए बड़े से बड़ा वकील खड़ा किया जाएगा।
अरविंद केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेताओं ने सैकड़ों समर्थकों के साथ 20 जनवरी, 2014 को दक्षिण दिल्ली में एक कथित ड्रग और वेश्यावृत्ति रैकेट पर छापा मारने से इनकार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए रेल भवन के बाहर धरना दिया था। पुलिस ने उनके खिलाफ दायर चार्जशीट में दावा किया कि 19 जनवरी, 2014 को सहायक पुलिस आयुक्त ने रेल भवन और संसद मार्ग के पास नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, विजय चौक इलाकों में निषेधाज्ञा लागू की थी, जिसके खिलाफ जाकर उन्होंने यह विरोध प्रदर्शन किया। उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए अपने 6 मंत्रियों के साथ केजरीवाल ने अपना विरोध जताने के लिए नॉर्थ ब्लॉक स्थित गृह मंत्रालय की तरफ जाने की कोशिश की।
जब एलजी ऑफिस में हड़ताल पर बैठे केजरीवाल
जून 2018 में अरविंद केजरीवाल की अराजकता फिर देखने को मिली जब वह अपने सहयोगी मंत्रियों के साथ एलजी अनिल बैजल के ऑफिस में हड़ताल पर बैठ गए। केजरीवाल और उनके मंत्री अपनी मांगों के समर्थन में 11 जून, 2018 की शाम से 20 जून, 2018 तक एलजी अनिल बैजल के कार्यालय में धरना देते रहे। 

जेएनयू में देश विरोधी नारों का समर्थन
देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशाल्लाह, इंशाल्लाह’ ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी’, ‘इंडियन आर्मी मुर्दाबाद’ और ‘कितने अफजल मारोगे-हर घर से अफजल निकलेगा’ ये देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसे नारा लगाने वालों के साथ खड़े नजर आते हैं। अरविंद केजरीवाल की तत्कालीन दिल्ली सरकार ने जेएनयू के पूर्व छात्र अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ केस चलाने के मामले में महीनों से रोड़ा बनी। वहीं तत्कालीन विधानसभा में नेता विपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा था कि बीते 22 फरवरी और 23 अगस्त 2019 को विधानसभा में टुकड़े-टुकड़े गैंग का मामला उठाया था, लेकिन सीएम केजरीवाल ने मार्शल बुलाकर भाजपा के विधायकों को सदन से बाहर निकलवा दिया। वह सिर्फ टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करना चाहते हैं। गुप्ता ने कहा कि मुकदमा चलाने की अनुमति न देकर मुख्यमंत्री केजरीवाल कानून को काम करने से रोक रहे हैं और गलत उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
केजरीवाल की शह पर गुंडागर्दी करते हैं आप विधायक
19 फरवरी, 2018 की रात 12 बजे दिल्ली के तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल के घर पर विधायकों की बैठक थी। इसमें शामिल होने के लिए राज्य के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को भी बुलाया गया था, लेकिन उसी दौरान आम आदमी पार्टी के दो विधायकों ने दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से धक्का-मुक्की और बदसलूकी की। सवाल है कि सीएम के इशारे के बिना क्या कोई विधायक उनकी मौजूदगी में ऐसी हरकत करने की हिम्मत कर सकता है? अगर ऐसा नहीं था तो केजरीवाल को स्वयं इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करवानी चाहिए थी। वे राज्य के संवैधानिक पद पर बैठे हैं इसलिए उनकी जिम्मेवारी थी कि कम से कम पुलिस को इस बात की सूचना खुद देते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 
अधिकारियों को गुलाम समझती है केजरी एंड कंपनी
4 अक्टूबर, 2017 को तत्कालीन दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कहा था, ”दिल्ली के मालिक हम हैं”। आप समझ सकते हैं जिस व्यक्ति ने जनता का सेवक बनने का वादा कर सत्ता हासिल की वे स्वयं को दिल्ली का मालिक कहते हैं। जाहिर है मूल सोच में ही जब खोट हो तो उसके परिणाम भी घातक ही होंगे। दिल्ली में कुछ ऐसा ही हो रहा है। अधिकारियों को सरेआम बेईमान कहना, उन्हें गालियां देना और मनमानी करने वाला बताना, कम से कम एक सीएम को तो शोभा नहीं देता है। केजरीवाल एंड कंपनी ने जब से सत्ता का स्वाद चखा उनका व्यवहार सामंती हो चला है। 
बीजेपी नेताओं से बदसलूकी
जब दिल्ली में चल रहे सीलिंग मुद्दे पर बैठक के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पहुंचे बीजेपी नेताओं के साथ केजरीवाल के गुंडों पर मारपीट का आरोप लगा था। इस घटना के बाद दिल्ली बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष मनोज तिवारी और अन्य नेताओं ने थाने पहुंचकर केजरीवाल एवं उनके गुर्गों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मनोज तिवारी का आरोप है कि आम आदमी पार्टी के नेता जरनैल सिंह ने उनके एक नेता से ऐसी धक्का-मुक्की की कि उनके हाथ में चोट आ गई। मनोज तिवारी ने ये भी आरोप लगाया ‌कि वे समय लेकर वहां पहुंचे थे, लेकिन केजरीवाल ने उनसे अभद्र भाषा में बात की और अपमान किया।
कपिल मिश्रा पर भी करवाया जा चुका है हमला
दिल्ली में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा पर अनशन के दौरान हमला करवाने का आरोप भी केजरीवाल की पार्टी पर लग चुका है। आरोप लगे थे कि आरोपी अंकित भारद्वाज आम आदमी पार्टी का समर्थक था। दरअसल, कपिल मिश्रा ने अपनी आंखों के सामने केजरीवाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था। इसी बात पर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो उनसे नाराज हो गए थे।