विपक्ष का एक ही एजेंडा ! संसद चलने मत दो! जनता जाए भाड़ में


विपक्ष को जनता का डर नहीं लगता या जनता को मूर्ख समझ लिया है?
कुछ समय से विपक्ष का एक ही एजेंडा दिखाई दे रहा है! संसद चलने मत दो!
अरे भाई, जनता ने आपको संसद में नारे लगाने और हंगामा करने के लिए नहीं भेजा है। सरकार से सवाल है तो पूछिए, सरकार से असहमति है तो बहस कीजिए, कोई गंभीर मुद्दा है तो उसके तथ्य रखिए।
लेकिन संसद ही नहीं चलने देंगे तो फिर जनता पूछेगी।
आपको संसद में बहस करने का जनादेश मिला है या संसद को बंधक बनाने का?
दिलचस्प बात यह है कि जो लोग हर वक्त लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देते हैं, वही संसद की कार्यवाही रोकने को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि समझ रहे हैं।
शायद उन्हें लगता है कि जनता कुछ देखती-सुनती नहीं है और उसे आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है।
लेकिन अब जनता पहले वाली जनता नहीं है। वह देख रही है कि कौन काम करना चाहता है, कौन सवाल पूछना चाहता है और कौन सिर्फ हंगामा करके कैमरे में दिखना चाहता है।
अगली बार चुनाव में जनता जब हिसाब-किताब करेगी, तब शायद समझ आएगा कि संसद को ठप करना विपक्ष की जीत नहीं, जनता के भरोसे की हार है।
राहुल गांधी के अहितकारी कार्यों की लंबी फेहरिस्त
पिछले दस वर्षों में देश ने विकास के कई नए आयाम देखे हैं, लेकिन विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके समर्थक एक भी ठोस कार्य गिनाने में असमर्थ रहते हैं जो देशहित में किया गया हो, लेकिन अहित की सूची इतनी लंबी है कि एक लेख कम पड़ जाए।
पहली फेहरिस्त है - सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा पर अविश्वास। जब देश की सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके दुश्मन को सबक सिखाया, तब राहुल गांधी ने सबसे पहले सबूत मांग कर सेना के शौर्य का अपमान किया। गलवान में हमारे वीर जवानों के बलिदान के बाद भी उन्होंने सेना के बजाय चीन के नैरेटिव को मजबूत करने वाले बयान दिए। यह देश की सुरक्षा के साथ सीधा अहित है।
दूसरा बड़ा अहित है - विदेशी धरती पर भारत को बदनाम करना। लंदन, अमेरिका और यूरोप के मंचों से उन्होंने बार-बार कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, संसद में बोलने नहीं दिया जाता, अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश का वे सांसद हैं, उसी देश की छवि को विदेशों में धूमिल करना किस श्रेणी का देशहित है?
तीसरा है - हर जनहितकारी योजना का बिना वजह विरोध। चाहे वह धारा 370 हटाना हो, राम मंदिर निर्माण हो, जीएसटी हो, नोटबंदी हो, तीन तलाक पर कानून हो या CAA हो - उन्होंने हर फैसले का विरोध केवल विरोध के लिए किया, समाज में भ्रम और विभाजन फैलाया। धारा 370 हटने से जम्मू-कश्मीर में शांति आई, लेकिन कांग्रेस ने आज तक उसका समर्थन नहीं किया।
चौथा है - झूठ और भ्रम की राजनीति। राफेल जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर उन्होंने "चौकीदार चोर है" जैसा नारा दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया। बाद में उन्हें माफी तक मांगनी पड़ी। ऐसे झूठे प्रचार से देश की रक्षा सौदों की विश्वसनीयता को चोट पहुंचती है।
पांचवां है - टुकड़े-टुकड़े गैंग और अराजक तत्वों को समर्थन। JNU में देश-विरोधी नारे लगने पर वहां पहुंच कर समर्थन देना, किसानों के नाम पर हुए आंदोलन में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप पर चुप रहना, यह सब उनके राजनीतिक एजेंडे को दिखाता है।
दस साल में देश आगे बढ़ा है, पर राहुल गांधी की राजनीति वहीं अटकी है - नकारात्मकता, वंशवाद, और केवल मोदी विरोध। देशहित में एक कार्य पूछो तो सन्नाटा है, और अहित की गिनती करो तो फेहरिस्त खत्म होने का नाम नहीं लेती।
वही आंदोलन है, वही जेनजी, वही मांगे... ऊपर के आदेश से बंधे वही पुलिसवाले... लाठी भी वही, पानी की बौछारें भी वही, अश्रुगैस के गोले भी वैसे ही... अटल जी ने कहा था, "सत्ता का चरित्र लगभग एक सा ही होता है।" ठीक ही तो कहा था। पर इन सब के बीच कुछ है जो अलग है...
लाठी खाने के बाद भी बच्चे मुख्यमंत्री की मां को गाली नहीं दे रहे। पुलिस के जवानों का भद्दा मजाक नहीं उड़ाया जा रहा है। उन्हें घेर कर मारा पीटा नहीं जा रहा है। इंस्टा की रील के लिए नंगे नाचने वाले कथित इन्फ्लुएंसर अपने बाप से अधिक उम्र के किसी पुलिस वाले के ऊपर अभद्र टिप्पणियां नहीं कर रहे। क्यों? क्योंकि लड़कों ने आंदोलन में बामी अभद्रों का प्रवेश नहीं होने दिया।
आधी रात को हुए लाठी चार्ज में अनेक बच्चों की हड्डियां टूटी हैं। रांची के अस्पतालों में छात्रों की कराह गूंज रही है। उसके बाद भी कहीं गाली गलौज नहीं है, अश्लील पोस्टर नहीं हैं।
पिछले दिनों पटना में लड़कों पर पानी की बौछार हुई थी, तब वे नाच रहे थे। झारखंड वाले बच्चे भी पानी की बौछारों पर नाचने लगे थे। यह खुश होने की बात तो नहीं है पर एक हल्की मुस्कुराहट तैर गई थी। जवानी का उत्साही मन, पीड़ा में आनंद ढूंढ लेने वाला भारत भाव... सरकारों को इन बच्चों की बात सुन लेनी चाहिए। वैसे भी ये न किसी का इस्तीफा मांग रहे हैं, न मुख्यमंत्री को हटा कर खुद गद्दी पर बैठने का ख्वाब लेकर गए हैं। परीक्षा की गड़बड़ी का मामला है, बात इतनी भी बड़ी नहीं कि न सुनी जा सके।
जंतर मंतर के आंदोलन के समय उग्र हो गए वामी झारखंड के बच्चों के लिए नहीं बोलेंगे। बोलते, पर आंदोलन की डोर उनके हाथ में होती तब बोलते... आंदोलन शिक्षा से हट कर LGBTQ के विशेषाधिकारों पर, आजादी मांगने पर, पाकिस्तानी प्रेम पर, देश तोड़ने के नारे लगाने वालों के समर्थन पर, सनातन परम्पराओं को गाली देने पर होता तब बोलते... लेकिन झारखंड के बच्चों ने उनके एजेंट को खदेड़ दिया, वे अड़ गए कि यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं को केंद्र में रख कर ही होगा, फिर वे क्यों ही बोलें। उनका भी दोष नहीं, यह उनका मामला ही नहीं है।
एक प्रश्न हम जैसों से भी हो सकता है कि हम जंतर मंतर वालों के साथ नहीं थे तो इनके साथ क्यों है? इसका उत्तर बहुत सहज है। ये बच्चे भी कल उसी अभद्र भाषा पर उतर जाएं, वैसी ही गालीबाजी करने लगें तो इनके साथ भी कोई संवेदना नहीं रहेगी। वैसी भाषा जब हम अपने बच्चों की नहीं चाहते, अपने छात्रों से नहीं चाहते, तो दूसरे बच्चों की अभद्र भाषा का समर्थन कैसे कर सकते हैं?
झारखंड के बच्चों पर कल खूब लाठियां चली हैं। चलवाने वाले प्रसन्न ही होंगे। राहुल जी मंचो पर छात्रों से संवाद की नौटंकी कर रहे हैं, उनकी पुलिस निहत्थे बच्चों को लाठी से तोड़ रही है। यही राजनीति है...
केंद्र हो या राज्य, पेपर लीक और परिक्षाओं की अनियमितता माथे के कलंक जैसा है। इसका हल निकालना ही होगा... बाकी झारखंड के जेनजी को धन्यवाद कि उन्होंने विश्वास दिलाया, "देश का युवा अभद्र, अश्लील, फूहड़ नहीं है... जो थे, वे अपवाद थे।"

जनता को मूर्ख समझने की भूल मत कीजिए।  

कैसा लोकतंत्र है अमेरिका में? मोहन भागवत जी के अमेरिका जाने में भी तकलीफ हो रही है; ट्रंप और गोर कुछ बोल रहे हैं और USCIRF नफरत का एजेंडा चला रहा है

सुभाष चन्द्र 

INDI गठबंधन से लेकर विदेशों में बैठे इनके आका आरएसएस पर जो हमले कर रहे हैं, यह एक सोंची-समझी साज़िश है। गौरतलब, 1947 में भारत के टुकड़े हुए थे तब पाकिस्तान के बहुचर्चित समाचार पत्र Dawn ने लिखा था कि आरएसएस 1925 से पहले बन गया होता हिन्दुस्तान का बटवारा नहीं होता। तभी से संघ भारत विरोधियों की आँखों में घटकता रहता है। देश में किसी भी विपत्ति के आने पर ये संघ ही है जो सबसे पहले राहत कार्य में जुटता है। जबकि देश में इतने NGOs और लगभग हर पार्टी का सेवा दल है, कोई नहीं आता। सब इन सेवा दलों के नाम पर अपनी तिजोरियां भर ऐश कर जनता को गुमराह ही नहीं पागल बनाते हैं और अक्लबंध इन पार्टियों को हितकारी समझती है। वैसे इसमें हमारी मीडिया भी पीछे नहीं। जब आरएसएस के ऑफिस पर तिरंगा नहीं फहराने की बात होती है तो किसी एंकर ने माँ का दूध नहीं पिया किया कि 2014 में मोदी सरकार से पहले किसी को तिरंगा फहराने की इजाजत नहीं थी तो संघ कैसे फहराता?      

अमेरिका की एक संस्था है USCIRF (US Commission on International Religious Freedom)। उसके कमिश्नर Gene Mills और चेयरमैन Asif Mahmood ने कहा है कि 29 अगस्त को मोहन भागवत जी के न्यूयॉर्क आने के खिलाफ Sanctions लगाई जाए, उनके लिए कोई राजनयिक शिष्टाचार न दिखाया जाए और अमेरिकी अधिकारियों को उनसे न मिलने दिया जाए

लेखक 
चर्चित YouTuber 
आसिफ महमूद ने कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के सदस्य हैं और RSS एक Umbrella Organization है जिसके subgroups अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करते हैं ऐसा दुष्प्रचार भारत के लिए यह संस्था अपनी हर रिपोर्ट में करती है और लगता है यही संगठन अमेरिका में यहूदियों की खिलाफ भी आंदोलन में भूमिका निभाता है Asif Mahmood नाम ही काफी है इस संगठन की RSS और हिंदुओं के प्रति नफरत समझने के लिए, वैसे भी यह व्यक्ति originally एक पाकिस्तानी है और इसलिए अंधा हुआ रहता है 

संघ प्रमुख 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर होंगे और 29 अगस्त को Madison Square में Universal Oneness Celebration वे लोगों को संबोधित करेंगे

ये कैसा लोकतंत्र है अमेरिका में कि जिसे तुम पसंद नहीं करते उसे अपने देश में आने भी नहीं दोगे? जिस मोदी पर Asif Mahmood RSS का टैग लगा रहा है, उस पाकिस्तानी हरामखोर को पता नहीं कि कल ही अमेरिका के राजदूत Sergio Gor ने जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया है और वहां की कानून व्यवस्था की प्रशंसा की है ये काम RSS सदस्य मोदी के राज में हुआ है जैसे Sergio Gor के बयान पर पाकिस्तान सुलग रहा है, वैसे ही Asif Mahmood भी सुलग रहा होगा?

उसे यह भी नहीं पता कि दो दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा की है और भारत की तरह अमेरिका में भी वोटर पहचान पत्र बना कर EVM से चुनाव कराने को कहा है

ये USCIRF POJK में पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे दमन पर खामोश है और बांग्लादेश में हुए हिंदुओं के कत्लेआम पर भी खामोश था इसे बलूचिस्तान दिखाई नहीं देता और न चीन के उइघर मुसलमान दिखाई देते इसने कभी 7 अक्टूबर, 2023 के हमास के इज़रायल पर बर्बर हमले की भी निंदा नहीं की इस संस्था को अगस्त में पाकिस्तान के भारत में आतंकी हमले की साजिश भी नज़र नहीं आई जिसे विफल कर दिया गया और 250 से ज्यादा आतंकी पकड़े गए मुझे तो लगता है अमेरिका में बैठ कर ये एक पाकिस्तानी हैंडलर का काम कर रहा है

इसे बस भारत में मुस्लिमों की हालत ख़राब नज़र आती है जबकि RSS का सदस्य प्रधानमंत्री मोदी बिना किसी भेदभाव मुस्लिमों को सभी सुविधाएं दे रहा है

इस संगठन की बातों को हलके में नहीं लेना चाहिए क्योंकि यह अमेरिकी सरकार की संस्था है और सरकार के दिमाग में भारत और इज़रायल के लिए जहर घोलती है इस संस्था का नजरिया अमेरिका के Democrats का लगता है

अगर मोहन भागवत जी के आने पर आपत्ति है तो फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अमेरिका में मत आने दिया करो क्योंकि वह भी तो उसी RSS का सदस्य है जिसके प्रमुख मोहन भागवत हैं 

कांग्रेस राज में हिमाचल दिवालिया! पहली बार बजट में कटौती और कर्ज 1 लाख करोड़ पार, IAS,IPS,IFS अधिकारियों को वेतन देने के पैसे नहीं

हिमाचल प्रदेश में सत्ता बदलने पर बीजेपी के सत्ता में आने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी सरकारी कर्मचारियों और बिकाऊ लोगों को जमाकर सरकार के खिलाफ हंगामा करवाएंगे। कोई अक्ल का अंधा ये नहीं देख रहा कांग्रेस कितना नुकसान कर रही है। इस समय मजा आ रहा है और बीजेपी गवर्नमेंट बनने पर चिल्लाएंगे हमारे घर का चूल्हा नहीं जल रहा। जनता को उन आन्दोलनजीवियों से सावधान रहने की जरुरत है।  

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने राज्य को दिवालिया बना दिया है। वित्तीय कुप्रबंधन, मुफ्त की योजनाओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के चुनावी वादों (‘रेवड़ी कल्चर’) के कारण राज्य का खजाना खाली हो गया है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि सरकार को मंत्रियों और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है, जिसकी वजह से कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए कांग्रेस की सुक्खू सरकार तरह तरह के हथंकडे अपना रही है। अब सरकार ने राज्य में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और भारतीय वन सेवा (IFS) के काडर की स्वीकृत संख्या को कम करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का निर्णय लिया है, ताकि प्रशासनिक खर्चों और भारी भरकम प्रशासनिक तंत्र के बोझ को कम किया जा सके।

खर्च में कटौती का नया हथकंडा, कैडर कटौती का प्रस्ताव

आईएएस (IAS) पद: स्वीकृत संख्या 153 से घटाकर 130 करने का प्रस्ताव, (यानी 23 अधिकारियों की कमी)

आईएफएस (IFS) पद: स्वीकृत संख्या 118 से घटाकर 83 करने का प्रस्ताव, (यानी 35 अधिकारियों की कमी)

आईपीएस (IPS) पदों की संख्या में भी कटौती पर विचार, फिलहाल 96 IPS पद

सुक्खू ने बनाया अवश्यकता से अधिक अधिकारियों का बहाना 
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य सरकार के मुफ्त की योजनाओं में कटौती की जगह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या में कमी करने का फैसला लिया है। उन्होंने दलील दी है कि IAS, IPS और IFS के बहुत अधिक पद हिमाचल प्रदेश में है। इतने अधिक अधिकारियों की हिमाचल प्रदेश को जरूरत नहीं है। हिमाचल प्रदेश में 153 IAS अफसर हैं। हमने IAS कैडर को 153 से 130 करने की कोशिश की है। मेरा विचार इसे 110 करना है लेकिन पहले 130 किया है। इससे सरकार के राजस्व खर्चे में 100-150 करोड़ की कमी आई है। बड़े कैडर को बनाए रखने पर राज्य को हर साल करीब 200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुनने की इजाज़त देती रहेगी और उन्हें तुरंत जाने की मंजूरी भी देगी।

 

जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा प्रस्ताव
अधिकारियों के मुताबिक, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या कम करने का एक औपचारिक प्रस्ताव जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। अभी 20 से ज्यादा आईएएस अधिकारी और 12 से ज्यादा आईपीएस और आईएफएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं, जिनमें से कुछ राज्य में गैर संवर्ग पदों पर हैं। हिमाचल की सुक्खू सरकार ने केंद्र सरकार से अपील करने का फैसला किया है कि केंद्र सरकार राज्य को और ज्यादा केंद्रीय सेवा अधिकारी आवंटित न करे, क्योंकि अनुमान है कि हर अधिकारी पर सालाना खर्च 40 से 50 लाख रुपये के बीच होता है जिसमें वेतन, महंगाई भत्ता, उनसे जुड़े कर्मी और दूसरी सुविधाएं शामिल हैं।

नई भर्ती और नया काम नहीं, 30% संस्थानों को बंद करने का सुझाव
फरवरी 2026 में सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वित्त विभाग से एक प्रेजेंटेशन तैयार करने को कहा था। उस प्रेजेंटेशन में हिमाचल के खजाने की सारी स्थितियों को स्पष्ट करने के लिए कहा था। प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवीर के प्रजेंटेशन में कहा था कि कोई नई भर्ती की स्थिति में सरकार नहीं है। मौजूदा स्थिति में जो स्टाफ है, उसी का युक्तिकरण करना होगा, जो संस्थान हैं, उनमें से 30 फीसदी बंद किए जाएं, कोई भी नए काम शुरू करने की स्थिति में सरकार नहीं है। हिमाचल की स्थिति ये है कि नया पे-स्केल तो छोड़ दें, हम पे-रिवीजन का भी नहीं सोच सकते। एचआरटीसी को कोई सब्सिडी नहीं दे पाएंगे। पानी-बिजली के बिल चार्ज करने की सलाह है। एमआईएस की सब्सिडी भी जीरो करनी पड़ेगी।

अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का 20-30% छह महीने के लिए स्थगित  
वित्त विभाग द्वारा अप्रैल 2026 में जारी एक अधिसूचना के अनुसार, वित्तीय संसाधनों के कुशल प्रबंधन के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा छह महीने के लिए स्थगित कर दिया गया। ये कटौती 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगी। अधिसूचना के अनुसार, यह स्थगन मई 2026 से प्रभावी हुआ। मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों, पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के वेतन का तीस प्रतिशत स्थगित किया गया। इसके अलावा सचिवों, विभागाध्यक्षों, पुलिस महानिरीक्षकों, उप पुलिस महानिरीक्षकों, पुलिस अधीक्षकों, एसपी स्तर तक के पुलिस अधिकारियों, मुख्य वन संरक्षकों, वन संरक्षकों और जिला वन अधिकारी स्तर तक के अन्य वन अधिकारियों के वेतन का बीस प्रतिशत स्थगित कर दिया गया।

कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित, सोशल मीडिया में तंज 
हिमाचल प्रदेश में इस समय कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित है। यदि सारा डीए देना हो तो सरकार के खजाने में करीब दस हजार करोड़ रुपए की रकम इसी मद में चाहिए। गौरतलब है कि
केंद्र सरकार के कर्मचारी 60% डीए पा रहे हैं, जबकि हिमाचल के कर्मचारियों को 45% ही मिल रहा है। फिर कर्मचारी एक्ट खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीनियोरिटी से उपजे वित्तीय लाभ भी करीब-करीब इतने ही होंगे। यानी इन दो मदों में ही 20 हजार करोड़ रुपए चाहिए। यदि चरणबद्ध तरीके से भी भुगतान किया जाए तो भी सरकार को कुछ न कुछ अतिरिक्त इंतजाम करना होगा। वहीं हिमाचल सर्व अनुबंध कर्मचारी संघ ने 15 अगस्त,2026 से पहले सोशल मीडिया में पोस्ट करते हुए लिखा, ‘क्या 15 अगस्त को हिमाचल के कर्मचारियों को डीए मिल जाएगा? आप सबको कितनी उम्मीद है’ इसके जवाब में नसीब सैनी ने लिखा ‘ओपीएस मिल गई…डीए भूल जाओ’ 

15 अगस्त को भी कर्मचारियों के उम्मीदों पर फिरा पानी
15 अगस्त,2026 के आगमन से पहले ही सोशल मीडिया पर कर्मचारी ग्रुप्स में डीए व एरियर को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं थीं। कुछ को उम्मीद थी कि कम से कम तीन फीसदी की किश्त मिल जाएगी, लेकिन बहुत से लोग ये मान कर चल रहे थे कि डीए की घोषणा नहीं होगी। न्यू पेंशन स्कीम कर्मचारी महासंघ के नेता राजिंद्र मन्हास ने कर्मचारियों से सवाल किया था कि कितने साथियों को मेरी तरह लगता है कि डीए की घोषणा नहीं होगी? उसमें कमेंट बॉक्स में अधिकांश का मत यही था कि डीए मिलने के आसार न के बराबर हैं। जैसे ही 15 अगस्त को सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का संबोधन खत्म हुआ, सोशल मीडिया कर्मचारियों के तंज से भर गया।

खजाना खाली, डीए फ्रीज करने और OPS की जगह UPS का सुझाव
प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवरी 2026 के प्रेजेंटेशन में सभी आंकड़ों को स्पष्ट करते हुए राज्य सरकार को सलाह दी थी कि अभी स्थिति ऐसी है कि डीए फ्रीज करना होगा और एरियर की देनदारी संभव नहीं है। यही नहीं, ओपीएस की जगह यूपीएस का विकल्प देखने की बात भी देवेश कुमार ने कही थी। देवेश कुमार ने याद दिलाया कि ओपीएस जब लागू की थी तो हिमाचल को 1800 करोड़ रुपए के एडिशनल लोन की कटौती का सामना करना पड़ा था। देवेश कुमार ने प्रेजेंटेशन में बताया था कि कर्मचारियों व पेंशनर्स के लिए पिछले वेतन आयोग के एरियर का 8500 करोड़ रुपए बकाया है। इसके अलावा पांच हजार करोड़ रुपए का डीए व डीआर एरियर बकाया है, सरकार ये नहीं दे पाई है। वित्त सचिव ने इसी दौरान टिप्पणी की-सर, मैं यहां कहना चाहूंगा कि ये रकम हम दे भी नहीं पाएंगे। क्योंकि हमारे पास धन ही नहीं है। इसके साथ ही आगे भी डीए व डीआर देने की स्थिति में नहीं है। 

इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती 
फरवरी में प्रधान वित्त सचिव ने अपनी प्रेजेंटेशन में खजाने की दयनीय हालत का वर्णन किया और फिर मार्च महीने में सुक्खू सरकार के बजट में उसका असर दिख गया। हिमाचल के इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती की गई। गौरतलब है कि इस बार वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सीएम सुक्खू ने 54,928 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। जबकि पिछली बार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 58,514 करोड़ का बजट था। इस हिसाब से ये अंतर 3586 करोड़ रुपये का था। यही नहीं, सीएम, कैबिनेट मिनिस्टर्स व अफसरों-कर्मियों की सेलेरी भी स्थगित (डेफर) की गई।

इतिहास में पहली बार कर्ज 1 लाख करोड़ के पार 
हिमाचल सरकार की बजट रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक हिमाचल प्रदेश की कुल देनदारियां 1 लाख 4 हजार 410 करोड़ रूपए तक पहुंच गई हैं, जो राज्य के इतिहास में पहली बार 1 लाख करोड़ के पार गई। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा 96 हजार 522 करोड़ रूपए था, जिससे साफ है कि कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में राज्य का सार्वजनिक कर्ज भी बढ़कर 75 हजार 554 करोड़ रुपये हो गया है, जबकि एक साल पहले यह 70 हजार 369 करोड़ था। वर्ष 2024–25 के दौरान सरकार ने 26 हजार 622 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया और 18 हजार 168 करोड़ की अदायगी की, जिससे कुल कर्ज में शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई। कैग (Comptroller and Auditor General of India) की रिपोर्ट के अनुसार कुल राजस्व का लगभग 79% केवल वेतन, पेंशन, और कर्ज के ब्याज के भुगतान में चला जाता है।

हिमाचल प्रदेश पर कैसे बढ़ा कर्ज का बोझ?

पुरानी पेंशन योजना (OPS) :  पुरानी पेंशन योजना (OPS) को पुनः लागू करने के कारण राज्य सरकार के बजट पर अतिरिक्त वार्षिक वित्तीय बोझ पड़ा है, जिससे प्रतिबद्ध देनदारियां बढ़ गई हैं। ओपीएस बहाल होने से राज्य के लगभग 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ मिला, लेकिन कैग (CAG) और रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में पेंशन का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। 

महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह : राज्य की लाखों महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने के वादे से सरकारी खजाने पर सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। सीमित राजस्व संग्रह के कारण इस योजना को पूरी तरह लागू करने में सरकार को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

मुफ्त बिजली और पानी : राज्य में घरेलू उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली और ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ्त पानी देने से राज्य बिजली बोर्ड (HPSEB) और जल शक्ति विभाग का घाटा काफी बढ़ गया। सब्सिडी का भुगतान समय पर न होने से इन बोर्डों की वित्तीय स्थिति चरमरा गई।

कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी:  कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी योजनाओं ने भी राज्य के बजट में गैर-उत्पादक व्यय (Non-Developmental Expenditure) को बढ़ाया।

वेतन, पेंशन और सब्सिडी पर बढ़ते खर्च :  राजस्व स्रोत सीमित होने के कारण, राज्य इन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए उधार पर तेजी से निर्भर हो गया है। प्रदेश का सालाना वेतन और पेंशन का भुगतान लगभग 27,000 करोड़ रुपये है, जबकि अपने स्रोतों से कुल राजस्व करीब 18,000 करोड़ रुपये ही आता है।

आंतरिक आय के साधन सीमित : पर्यटन, जलविद्युत और कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण राज्य के आंतरिक आय के साधन सीमित हैं, जबकि कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों का दबाव लगातार बना हुआ है।

बढ़ता बजट घाटा (Budget Deficit) : हिमाचल सरकार की सलाना आय – 42 हजार करोड़ रुपये, सलाना खर्च – 48 हजार करोड़ रुपये और हर साल 6000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट घाटा।

हिमाचल में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का खटाखट मॉडल बना खटारा मॉडल


हिमाचल प्रदेश का आर्थिक संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। इसको ठीक करने के गंभीर प्रयास की जगह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सिर्फ केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ कर अपने जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया में लिखा कि हिमाचल प्रदेश में राहुल गांधी जी व प्रियंका गांधी जी का खटाखट मॉडल अब खटारा मॉडल बन चुका है।

हिमाचल में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राज्य सरकार की तरफ़ से की गई सेस के माध्यम से बढ़ोत्तरी आम आदमी की जेब पर हमला है। जब से कांग्रेस सरकार आई है, जनता की जेब पर लगातार अतिरिक्त भार ही डाल रही है। कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के महज दो महीनों में ही वैट में लगातार वृद्धि की गई, डीजल पर वैट बढ़ाकर 10.40 रुपए कर दिया गया… उसके बाद अतिरिक्त 5 रुपए का सेस भी लगाया गया।

ये हिमाचल के इतिहास की सबसे विफल सरकार है जिसने प्रदेश के हर वर्ग को सिर्फ़ ठगने और जनता पर महंगाई का बोझ डालने का काम किया है। पहले पेट्रोल, डीजल, बस किराए व सीमेंट के दामों में बढ़ोत्तरी के बाद अब फिर एक बार पेट्रोल डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी करके हिमाचलवासियों की परेशानी बढ़ाने व उन पर आर्थिक बोझ लादकर उनका मासिक बजट खराब कर दिया है। आज हिमाचल में ट्रक ड्राइवर, किसान, व्यापारी व आम आदमी पेट्रोल और डीजल की इस बढ़ी कीमत से कराह रहे हैं, मगर यह सरकार बेसुधी की चादर ताने सो रही है।

शीला दीक्षित से लेकर मनमोहन-राहुल तक मौकापरस्त केजरीवाल के आरोपों का नाटक और दोस्ती भी

भारतीय राजनीति में मौकापरस्ती और अवसरवादिता का सबसे ज्वलंत उदाहरण तलाशा जाए तो सबसे ऊपर नाम आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल का ही आएगा। अपने फायदे के लिए ऐसी कोई पार्टी को बीजेपी की B टीम बताया। उसके बावजूद बीजेपी विरोधियों द्वारा केजरीवाल से हाथ मिलाने को मूर्खता ही कहा जाएगा। दरअसल, केजरीवाल की राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय कांग्रेस सरकारों और गांधी परिवार पर लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। केजरीवाल ने इन्हीं पर आरोप लगाए और इनके साथ मिलकर बेशर्मी से सरकार बनाई। मनमोहन सिंह सरकार को भ्रष्टाचार का केंद्र बताकर केजरीवाल ने 2G, कोयला आवंटन और कॉमनवेल्थ जैसे मामलों पर हमला करते हुए राहुल गांधी को भ्रष्ट नेताओं की सूची में शामिल किया था। दिल्ली के पूर्व सीएम केजरीवाल ने कांग्रेस को और भाजपा की बी-टीम बताते हुए भी आरोप लगाए। फिर अवसरवादी राजनीति बदली और 2024 में वही कांग्रेस INDIA गठबंधन की सहयोगी बनी और केजरीवाल ने कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार भी किया। लेकिन 2025 में गठबंधन की राजनीति टूटते ही पुराने आरोप फिर केजरीवाल के बस्ते से बाहर आ गए। तब केजरीवाल ने नेशनल हेराल्ड से लेकर गांधी परिवार और कांग्रेस की कथित ‘जुगलबंदी’ तक के आरोप दोहराए। अगले साल पंजाब के विधानसभा चुनाव में दोनों आमने-सामने है। यानी डेढ़ दशक की इस यात्रा में दिखाने के आरोप, दोस्ती और तकरार पर जनता जरूर जानना चाहती है कि कांग्रेस-केजरीवाल का रिश्ता क्या कहलाता है?

कलह में उलझी पंजाब कांग्रेस, केजरीवाल के खिलाफ राहुल

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी पारा चढ़ चुका है। संसद का सत्र खत्म होते ही राहुल गांधी ने पंजाब का रुख करने की पूरी तैयारी कर ली है। राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ दिखने का नाटक करने वाले राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल अब पांच नदियों के इस सरहदी सूबे में आमने-सामने होंगे। कांग्रेस ने राहुल गांधी को चुनाव का मुख्य चेहरा घोषित कर दिया है। इस ऐलान के साथ ही दोनों दलों के बीच सियासी जंग का बिगुल बज चुका है। राहुल गांधी पंजाब के गांव-कस्बों में उतरकर सीधे जनता से संवाद करने की तैयारी में हैं। राहुल गांधी जमीनी स्तर पर आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार को नशे, कानून व्यवस्था और किसानों के मुद्दे पर घेरेंगे। दिल्ली से लेकर पंजाब तक अरविंद केजरीवाल की नीतियों पर सीधा प्रहार करने का कांग्रेस मन बना चुकी है।

अवसरवादी राजनीति के संयोजक अरविंद केजरीवाल कब-कब राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेताओं पर आरोप लगाने की नौटंकी

2026: राहुल के धरने से चिढ़ी आप बोली- यह मिलीभगत

आम आदमी पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस पर बीजेपी के साथ मिलकर खेल खेलने का आरोप दोहराया है। दरअसल, कभी राहुल के सहयोगी रहे केजरीवाल को अब राहुल के धरने से पेट में दर्द हो गया। आप नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार ने राहुल के नेतृत्व में उनके आवास के बाहर हुए प्रदर्शन पर तो तुरंत प्रतिक्रिया दी, लेकिन जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के कई सप्ताह तक चले आंदोलन की लगातार अनदेखी करती रही। सभी जानते हैं कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस का विरोध करके ही बनी थी और दिल्ली में उसने कांग्रेस को ही सत्ता से बेदखल किया था। लेकिन मौकापरस्त केजरीवाल पहली बार 2013 में दिल्ली के मुख्यमंत्री कांग्रेस के समर्थन से ही बने थे। अब AAP और कांग्रेस के बीच राजनीतिक दूरी दिखावे के लिए फिर से बढ़ी है। जंतर-मंतर के ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस और AAP के बीच दूरी ही बनी रही। दोनों का अलग-अलग विरोध ही सामना आया।

 2025 : National Herald से गांधी परिवार पर फिर हमला

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और राहुल गांधी पर केजरीवाल का हमला फिर तीखा हुआ। केजरीवाल ने कहा कि लोग पूछ रहे हैं कि राहुल गांधी जी “राजमहल” पर चुप क्यों है? राहुल ने दिल्ली में पूरा बीजेपी वालों का भाषण दोहराया है। राहुल गांधी ने भी शीशमहल और शराब घोटाले पर केजरीवाल को घेरा। AAP ने राहुल गांधी को ‘dishonest’ नेताओं वाले पोस्टर में शामिल किया, जिस पर कांग्रेस ने चुनाव आयोग में शिकायत की। इसके अलावा केजरीवाल ने National Herald मामले को उठाते हुए राहुल गांधी और गांधी परिवार पर सवाल खड़े किए तथा पूछा कि यदि मामला इतना गंभीर है तो गांधी परिवार के बड़े नेता जेल क्यों नहीं गए।
2025: कांग्रेस अपने विधायकों को थोक में बीजेपी को बेचती है
अरविंद केजरीवाल ने 2027 के गोवा विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ किसी भी गठबंधन से साफ इनकार किया है। उन्होंने कांग्रेस पर गोवा के लोगों को धोखा देने और उसके विधायकों के थोक में भाजपा में शामिल होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 2017 से 2019 के बीच 13 कांग्रेस विधायक BJP में चले गए थे। इसके बाद, 2022 में 10 और कांग्रेस विधायक BJP में शामिल हो गए। केजरीवाल ने पूछा कि क्या कांग्रेस यह भरोसा दे सकती है कि चुनाव जीतने के बाद कोई भी विधायक BJP में नहीं जाएगा।
2025: कांग्रेस-भाजपा के बीच ‘जुगलबंदी’ का आरोप
आप संयोजक केजरीवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक ‘जुगलबंदी’ है और दिल्ली चुनाव इस कथित मिलीभगत को उजागर करेगा। बाद में उन्होंने AAP नेताओं पर हुई कार्रवाई को भी इसी कथित कांग्रेस-BJP सहयोग से जोड़ने की कोशिश की।
2024: जिस कांग्रेस पर हमला किया, केजरी का उसी से गठबंधन
इस वर्ष केजरीवाल की कांग्रेस-विरोधी राजनीति में सबसे बड़ा नाटकीय मोड़ आया। एक-दूसरे पर जबर्दस्त आरोप लगाने वाले AAP और कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के तहत दिल्ली में लोकसभा चुनाव साथ लड़ा। यहां तक कि केजरीवाल ने कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए प्रचार भी किया। यानी जिस कांग्रेस को वह वर्षों तक भ्रष्टाचार और राजनीतिक मिलीभगत का प्रतीक बताते रहे, वही 2024 में भाजपा के खिलाफ उनकी राजनीतिक सहयोगी बन गई।
2023: कांग्रेस पर भाजपा से ‘डील’ का आरोप
दिल्ली के अधिकारों से जुड़े केंद्र के अध्यादेश के विवाद के दौरान आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के संबंधों में तनाव बढ़ गया। केजरीवाल और उनकी पार्टी ने कांग्रेस पर भाजपा के साथ ‘डील’ करने का आरोप लगाया और स्पष्ट रुख अपनाने का दबाव बनाया। यह वह दौर था जब INDIA गठबंधन बनने से पहले विपक्षी एकता के भीतर ही कांग्रेस और AAP के बीच अविश्वास दिखाई दे रहा था।
2023: मानहानि मामले पर केजरी का राहुल को समर्थन
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने रुख में बदलाव दिखाते हुए मानहानि के एक मामले में दो साल की जेल की सजा पाए कांग्रेस नेता राहुल गांधी का खुले तौर पर समर्थन किया। सीएम ने आरोप लगाया कि गैर-भाजपा नेताओं और पार्टियों को मुकदमा चलाकर “खत्म” करने की साजिश रची जा रही है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अतीत में विभिन्न मुद्दों पर एक-दूसरे का पक्ष लेने से परहेज किया है। हालांकि, आम आदमी पार्टी द्वारा राहुल गांधी को दिया गया समर्थन ऐसे समय में आया है जब केजरीवाल अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले “समान विचारधारा वाली” पार्टियों का गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि गुजरात के सूरत की एक अदालत द्वारा राहुल गांधी को उनके 2019 के “मोदी उपनाम” वाले बयान के लिए मानहानि का दोषी ठहराए जाने के बाद, आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के प्रति अपने रुख में नरमी के संकेत दिए हैं।
2022: राहुल की नेतृत्व क्षमता पर केजरी का राजनीतिक हमला
राहुल गांधी द्वारा केजरीवाल को आतंकवाद से जोड़कर हमला किए जाने के बाद केजरीवाल ने पलटवार किया। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब कांग्रेस उन्हें आतंकवादी कहती है तो कांग्रेस स्वयं लोगों को ‘terrorise’ कर रही है। इसी वर्ष केजरीवाल ने राहुल गांधी पर तंज कसते हुए कहा था कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए उन्हें उनकी जरूरत नहीं है- “Isn’t Rahul Gandhi enough?” यह राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उनका सीधा राजनीतिक हमला था। राहुल गांधी ने जब भ्रष्टाचार और प्रदूषण पर केजरीवाल को घेरा तो इस बयान के कुछ देर बाद ही केजरीवाल ने एक्स पर लिखा, “आज राहुल गांधी जी दिल्ली आए। उन्होंने मुझे गालियां दीं। पर मैं उनके बयानों पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। उनकी लड़ाई कांग्रेस बचाने की है, मेरी लड़ाई देश बचाने की है।”
2021: कांग्रेस को बताया भाजपा की ‘B-Team’
दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल ने कांग्रेस को भाजपा की ‘B-Team’ तक कह दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस कमजोर हो चुकी है और उसकी राजनीति अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाती है। दूसरी ओर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने आम आदमी पार्टी को BJP की ‘B’ टीम बता दिया। संदीप दीक्षित ने कांग्रेस पर पुराने आरोपों को लेकर अरविंद केजरीवाल की जमकर आलोचना की।
2019: मोदी की वापसी के लिए राहुल को जिम्मेदार ठहराया
AAP-कांग्रेस गठबंधन की बातचीत विफल होने के बाद केजरीवाल ने बेहद तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र की सत्ता में पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोबारा आते हैं तो इसके लिए राहुल गांधी पूरी तरह जिम्मेदार होंगे। उनका आरोप था कि कांग्रेस विपक्षी वोटों को विभाजित करके भाजपा की मदद कर रही है।
2018: घोटालेबाज कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने “राफेल घोटाले” को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला। पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और भाजपा के असंतुष्ट सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने भी नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना में उनका साथ दिया। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां “घोटालेबाज” हैं। केजरीवाल ने कहा कि लगभग पांच साल पहले लोगों ने भ्रष्टाचार में लिप्त कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था।
2017: कांग्रेस और अकालियों ने मिलकर लूटा पंजाब, माफी मांगी
पंजाब चुनाव के दौरान केजरीवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और अकाली दल ने मिलकर पंजाब को वर्षों तक ‘लूटा’ है। राहुल गांधी पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने बिक्रम सिंह मजीठिया के कथित ड्रग कारोबार का मुद्दा पर्याप्त रूप से नहीं उठाया। इन आरोपों के बाद बिक्रम सिंह मजीठिया ने अरविंद केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। मार्च 2018 में अरविंद केजरीवाल ने मजीठिया पर लगाए गए ड्रग्स तस्करी के आरोपों को निराधार मानते हुए उनसे लिखित में अदालत में माफी मांग ली थी, जिसके बाद यह मामला बंद हुआ।
2016: राहुल को मोदी के खिलाफ सबूत लाने की चुनौती
नोटबंदी के बाद राहुल गांधी द्वारा नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाने पर केजरीवाल ने राहुल गांधी को चुनौती दी कि अगर उनके पास प्रधानमंत्री के खिलाफ सबूत हैं तो उन्हें संसद के बाहर सार्वजनिक करें। उन्होंने राहुल की राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनमें मोदी को बेनकाब करने का साहस नहीं है।
2014: केजरीवाल ने राहुल को ‘भ्रष्ट नेताओं’ की सूची में रखा
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल ने कथित भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी की, जिसमें राहुल गांधी का नाम भी शामिल था। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों पर भ्रष्टाचार और वंशवादी राजनीति के आरोप लगाए। इसी दौर में उन्होंने राहुल गांधी की चुनावी ब्रांडिंग और प्रचार पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठाए। इसी वर्ष केजरीवाल सरकार ने KG Basin गैस कीमत विवाद में तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों वीरप्पा मोइली और मुरली देवड़ा तथा रिलायंस इंडस्ट्रीज के खिलाफ FIR की दिशा में कदम उठाया।
2013: शीला सरकार की बिजली कंपनियों से सांठगांठ
दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ भी केजरीवाल ने बिजली दरों और बिजली वितरण कंपनियों के बीच कथित मिलीभगत का मुद्दा उठाया और कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। अन्ना आंदोलन से निकलकर सक्रिय राजनीति में आने के दौर में केजरीवाल ने कांग्रेस के कई केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ FIR दर्ज करने और जांच की मांग की। इस सूची में शरद पवार, पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, कमलनाथ, पवन बंसल और सुशील कुमार शिंदे जैसे नाम शामिल थे।
2012: कोयला घोटाले में मनमोहन सरकार पर सबसे बड़ा हमला
2012 में केजरीवाल का मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ हमला अपने चरम पर पहुंचा। कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद को लेकर उन्होंने कांग्रेस पर देश को लूटने का आरोप लगाया और कथित ₹1.86 लाख करोड़ के नुकसान का मुद्दा उठाया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आवास के घेराव का भी आह्वान किया।
2012 – रॉबर्ट वाड्रा और DLF कनेक्शन का आरोप
चंद रोज पहले अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने बनाने वाले अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर सैकड़ों करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के आरोप लगाए। केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर DLF से 65 करोड़ रुपये के ब्याज-मुक्त ऋण और संपत्ति लेनदेन में अनुचित लाभ का आरोप लगाया। उन्होंने वाड्रा और तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के बीच कथित राजनीतिक-व्यावसायिक संबंधों पर सवाल उठाए। वाड्रा-DLF विवाद को आगे बढ़ाते हुए केजरीवाल ने तत्कालीन हरियाणा सरकार पर भी आरोप लगाए और यहां तक कहा कि राज्य सरकार DLF के ‘एजेंट’ की तरह काम कर रही है।

क्या राहुल गांधी अमित शाह के पीछे पड़ कर पाकिस्तान के इशारों पर नाच रहा था और पाकिस्तान के आतंकियों के लिए रास्ता बना रहा था?

सुभाष चन्द्र

जब कोई आदमी अपनी अक्ल पर चलने की बजाए किसी की लिखी पटकथा पर चलता है, उसे समझाना बहुत मुश्किल है। ठीक यही हालत हमारे LoP राहुल की है। राहुल बताए विपक्ष में रहते इसने ऐसा कौन-सा काम किया है जिसे जनता से लेकर सरकार तक माने? LoP बन सबको मूर्ख बना रहा है। इस LoP की बातें दुश्मन देश की सुर्खियां बनती है। मतलब साफ है ये LoP तो भारत में है शायद काम दुश्मन देशों के लिए किया जा रहा है।    

राहुल गांधी ने अमित शाह पर सबसे भीषण हमला 10 से 12 अगस्त के  बीच बोला था और अमित शाह को मजबूर कर रहा था कि किसी तरह उनका ध्यान भटके और राहुल के उकसावे में आ जाएं

लेकिन राहुल गांधी भूल गया कि जब अमित शाह silent mode में चले जाते हैं तो इसका मतलब होता है वो किसी खास मिशन पर हैं

लेखक 
चर्चित YouTuber   
वह समय था जब अमित शाह रोज संसद जा रहे थे लेकिन अजित डोभाल और RAW Chief के साथ गुप्त मंत्रणा कर पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करने में लगे थे पल पल की monitoring की जा रही थी 

अमित शाह ने खुद बताया - 

“Modi govt destroyed the ISI-backed terror group Shahzad Bhatti Network ahead of Independence Day and thwarted its plans for subversive attacks by arresting more than 200 operatives.

Indian security forces ripped apart the network by launching coordinated operations across different locations in 14 states, upholding a brilliant example of India's zero-tolerance towards terrorism.

Substantial recoveries, including IEDs, grenades bearing Pakistan Ordnance Factory markings, pistols, live cartridges, and CCTV cameras used for espionage, were made from the ISI-funded group. The network was involved in several terrorist activities.

अमित शाह ने यूपी के 62 शहरों को बचाया हरियाणा के 52 इलाकों तक आतंकवादी रेकी कर चुके थे दिल्ली में 51 जगहों पर आतंकवादी देखे गए थे पंजाब के 44 ठिकानों पर पाकिस्तान से पैसा लेकर आतंकी नजर गड़ाए हुए थे ये 14 राज्य केवल भाजपा शासित राज्य नहीं थे क्योंकि कांग्रेस शासित राज्यों से भी आतंकी पकड़े गए

UP से 62...हरियाणा से 52...दिल्ली से 51...पंजाब से 44....राजस्थान से 15....महाराष्ट्र से 8....उत्तराखंड से 5....कर्नाटक....बिहार और गुजरात से 3-3....तेलंगाना...J&K...केरल और हिमाचल से 2-2 आतंकी पाकिस्तान में बने हथियारों के साथ पकड़े गए.....जो ड्रोन के जरिए पंजाब के रास्ते भेजे गए थे

ये हमले 20 जुलाई से 15 अगस्त तक होने थे और इसी समय में राहुल गांधी ने अमित शाह पर जमकर बवाल काटा जिसका सीधा अभिप्राय यही निकलता है कि उसे पाकिस्तान के मंसूबों की पूरी जानकारी थी और पाकिस्तान से उसे हिदायत थी कि तुम अमित शाह को उलझा कर रखो जिससे हमारे लोग भारत को दहला सके ऐसा ही किया राहुल गांधी ने जो CJP से सड़कों पर उत्पात कराया और संसद चलने नहीं दी बस हल्ला अमित शाह पर बोले रखा जिससे वह पाकिस्तानी आतंकी नेटवर्क को ख़त्म न कर सके

अमित शाह के बयान पर पाकिस्तान के पिछवाड़े में आग लगी है लेकिन किसी “दिमागी नक्सल” ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस बल की इस नेटवर्क को ध्वस्त करने की प्रशंसा नहीं की जो अपने आप में बहुत कुछ कहता है

मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि CJP के आंदोलन की आड़ में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने देश के खिलाफ एक भयंकर षड़यंत्र रचा जिसे अमित शाह ने अजित डोभाल और RAW चीफ के साथ मिलकर विफल कर दिया जो 250 लोग पकड़े गए हैं उनसे गहन पूछताछ होनी चाहिए जिससे शायद पता चल सके कि उनकी जड़ें कहां तक फैली हुई थीं