Washinton Post से 300 की छंटनी, एंटी-इंडिया प्रोपेगैंडा के ‘पोस्टरबॉय्ज’ प्रांशु वर्मा और गैरी शिह पर भी गिरी गाज: भारत के खिलाफ उगलते थे आग

           अखबार ने 300 से ज्यादा स्टाफ को नौकरी से निकाल दिया है (साभार - सीबीएस न्यूज/द वाशिंगटन पोस्ट)
अमेरिका के प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने अपने कर्मचारियों की लगभग एक-तिहाई संख्या में कटौती करने का फैसला किया है। यह बड़े पैमाने पर छंटनी बुधवार (4 जनवरी 2026) को घोषित की गई, जो कंपनी के सभी विभागों को प्रभावित करेगी। इस फैसले से अखबार की अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों की कवरेज में भारी कमी आने की आशंका है।

छंटनी के तहत स्पोर्ट्स सेक्शन को पूरी तरह बंद किया जा रहा है, जबकि कुछ खेल संवाददाताओं को फीचर्स सेक्शन में स्पोर्ट्स कल्चर कवर करने के लिए शिफ्ट किया जाएगा। इसके अलावा बुक्स, मेट्रो सेक्शन और प्रमुख न्यूज पॉडकास्ट ‘Post Reports’ को भी बंद करने की योजना है।

एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने इस कदम को कंपनी के लिए स्थिरता लाने वाला बताया, लेकिन कर्मचारियों और पत्रकारों ने इसे अखबार के इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से एक और खून-खराबे जैसा फैसला करार दिया है। गौरतलब है कि वाशिंगटन पोस्ट के मालिक अमेजन के संस्थापक और अरबपति जेफ बेजोस हैं।

मैट मरे ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पाठकों तक पहुँचने में आ रही मुश्किलों के कारण यह फैसला लेना जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ओवरसीज कवरेज भी कम की जाएगी, हालाँकि करीब 12 विदेशी ब्यूरो बनाए रखे जाएँगे, जिनका फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर होगा।

कर्मचारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने माना कि यह फैसला परेशान करने और चौंकाने वाला है। इससे पहले स्थानीय और विदेशी पत्रकारों ने जेफ बेज़ोस से अपनी नौकरियाँ बचाने की अपील भी की थी, लेकिन उनकी अपील सफल नहीं हो सकी।

वाशिंगटन पोस्ट की इस बड़ी छंटनी का असर भारत में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी पड़ा है। 300 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिनमें कई जाने-माने नाम शामिल हैं। इनमें शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर भी शामिल हैं।

इसके अलावा, नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा और यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह (Gerry Shih) को भी हटाया गया है। दोनों पहले से ही अखबार की भारत-विरोधी रिपोर्टिंग और पश्चिमी मीडिया के पक्षपाती रवैये से जुड़े चर्चित चेहरे माने जाते रहे हैं।

छंटनी के बाद कई प्रभावित पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। प्रांशु वर्मा ने लिखा कि उन्हें यह बताते हुए दिल टूट गया है कि उन्हें वाशिंगटन पोस्ट से निकाल दिया गया। उन्होंने अपने चार साल के अनुभव को सम्मान की बात बताया और कहा कि वे अपने कई प्रतिभाशाली साथियों के लिए भी दुखी हैं, जिन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

वाशिंगटन पोस्ट से निकाले जाने के बाद यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह ने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि अखबार के साथ उनका समय उनके लिए एक सम्मान और सौभाग्य जैसा रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने सात साल से अधिक समय तक दुनिया भर की यात्रा की, एक ऐसे अखबार के लिए, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था।

गैरी शिह ने कहा कि उन्हें मिडिल ईस्ट टीम के बाकी सदस्यों के साथ हटा दिया गया है और दिल्ली से लेकर बीजिंग, कीव और लैटिन अमेरिका तक के अधिकांश सहयोगियों की भी नौकरी चली गई है। उन्होंने इस दिन को दुखद बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह सफर मजेदार, यादगार और चुनौतीपूर्ण रहा और उनकी टीम ने अपने काम के दौरान खूब असरदार काम किया।

प्रांशु वर्मा से जिन्होंने अपनी नौकरी बचाने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की

वाशिंगटन पोस्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, प्रांशु वर्मा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान से जुड़ी खबरों की कवरेज के जिम्मेदार थे। वे 2022 में द पोस्ट से जुड़े थे और इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समेत कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग की। इससे पहले वे बोस्टन ग्लोब में टेक्नोलॉजी पर लिख चुके थे और न्यूयॉर्क टाइम्स में कूटनीति और परिवहन से जुड़ी रिपोर्टिंग कर चुके हैं।

उनका पत्रकारिता करियर फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर से शुरू हुआ था, जहाँ उन्होंने न्यू जर्सी की राजनीति और जेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया। वे डेलावेयर विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से डिग्री हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद अब छंटनी की मार उनकी नौकरी पर भी पड़ी।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्मा ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से अपनी नौकरी बचाने की अपील भी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनका मीडिया संस्थान भारत में उन गिने-चुने प्लेटफॉर्म्स में से है, जो सरकार के डर के बिना अकाउंटेबिलिटी रिपोर्टिंग कर सकता है। हालाँकि, उनकी यह कोशिश काम नहीं आई।

बताया गया है कि वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग में मोदी सरकार के खिलाफ बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया और कई लेखों में सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले आरोप लगाए। उन्होंने गर्व के साथ उन रिपोर्ट्स का जिक्र किया, जिनमें भारतीय अरबपतियों को विशेष लाभ मिलने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में क्रोनी कैपिटलिज़्म, भारत की कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका निभाने के आरोप और अवैध घुसपैठ रोकने की भारत की मुहिम को मुसलमानों के खिलाफ कठोर निर्वासन अभियान के रूप में दिखाया गया था।

इन उदाहरणों को वर्मा ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया, जो वाशिंगटन पोस्ट की भारत को लेकर आलोचनात्मक और पक्षपाती अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग की छवि से मेल खाती रही है। फिर भी, इन सबके बावजूद छंटनी से उनकी नौकरी नहीं बच पाई।

वाशिंगटन पोस्ट में जर्नलिस्ट बनने के लिए ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की अहम भूमिका

जानकारी के मुताबिक, प्रांशु वर्मा ने यह साफ कर दिया था कि वाशिंगटन पोस्ट में भारतीय संवाददाता बनने के लिए क्या अपेक्षित है। उनके मुताबिक, भारत जो वर्तमान में राइट-विंग सरकार के तहत है और जिसे उदार (लिबरल) नजरियों में आलोचना का सामना करना पड़ता है, उसे संदिग्ध और आलोचनात्मक रूप में पेश करना चाहिए। देश की कार्रवाइयों को संवैधानिक लोकतंत्र की चुनौती के बजाय तानाशाही, बहुसंख्यकवाद और नैतिक गिरावट के नजरिए से दिखाना जरूरी था।

उदाहरण के तौर पर, वर्मा ने अवैध रोहिंग्या प्रवास से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों को, जिसमें जाली दस्तावेज, सीमा में घुसपैठ और आपराधिक आरोप शामिल हैं, साम्प्रदायिक उत्पीड़न की कहानी के रूप में पेश किया। इसी तरह, अरबपतियों को सरकारी भ्रष्टाचार के साधन के रूप में दिखाया गया, जबकि वे फ्री मार्केट के व्यावसायिक खिलाड़ी हैं।

उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के तनाव का स्रोत भौगोलिक या रणनीतिक कारण नहीं, बल्कि भारत की कथित नैतिक असफलताओं में हैं। नई दिल्ली की संसदीय संप्रभुता और नागरिक कल्याण की रक्षा की कोशिशों को बार-बार नकारात्मक रूप में दिखाया गया।

वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए फैलाई गई नैरेटिव पर गर्व किया और इस पक्षपाती और गलतियों से भरी  रिपोर्टिंग के भारत पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को अपने नौकरी बचाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। विडंबना यह है कि उन्होंने भारतीय अरबपतियों पर लगातार हमला किया और भारत में सेंसरशिप की चिंता जताई, लेकिन खुद एक अमेरिकी अरबपति के कंधों पर काम के लिए निर्भर रहे।

उनकी बातों में शक्ति से स्वतंत्रता की चर्चा थी, लेकिन यह अमीर मालिक की कृपा पर आश्रित अपीलों से विरोधाभासी दिखती है। वर्मा के मामले ने यह साबित किया कि लिबरलवाद कभी-कभी स्पष्ट पाखंड और डबल स्टैंडर्ड से जुड़ा हो सकता है।

गैरी शिह का प्रोफाइल और विवादास्पद रिपोर्टिंग

वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, गैरी शिह ने 2018 में अखबार में शामिल होकर यरुशलम ब्यूरो चीफ के रूप में इजराइल, फिलिस्तीनी इलाके और मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों की कवरेज की। इससे पहले वे 2021-2025 तक नई दिल्ली ब्यूरो चीफ रहे और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में राजनीति, विदेश नीति, खुफिया और टेक्नोलॉजी पर रिपोर्टिंग की।

शिह ने इससे पहले एसोसिएटेड प्रेस, रॉयटर्स और द न्यूयॉर्क टाइम्स में भी काम किया। उनकी भारत पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग के लिए 2024 में पुलित्जर पुरस्कार के फाइनलिस्ट होने का गौरव हासिल हुआ और उन्हें 2020 ओसबोर्न इलियट पुरस्कार भी मिला। वह चीनी मूल के हैं।

मीडिया रंबल के अनुसार, शिह ने बीजिंग से AP के लिए रिपोर्टिंग की, जहाँ उन्होंने चीन में सरकार की कार्रवाई, घरेलू राजनीति और विदेश नीति को कवर किया। उन्होंने रॉयटर्स के लिए सिलिकॉन वैली की सोशल मीडिया कंपनियों और न्यू यौर्क टाइम्स के लिए नॉर्दर्न कैलिफ़ोर्निया की रिपोर्टिंग भी की।

विशेष रूप से यह कहा जा सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट में भारत-विरोधी रुख रखना कोई अनोखी बात नहीं, बल्कि यह कर्मचारी बनने की प्रवृत्ति मानी जाती है। इसी परंपरा के अनुरूप, गैरी शिह ने अपने लेखन का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की सरकार के साथ मिलकर भारत पर बिना ठोस प्रमाण आरोप लगाने के लिए भी किया।

इस मिलीभगत ने पत्रकारिता की ईमानदारी की काँच की दीवारों को तोड़ दिया

रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) और कनाडाई सरकार ने 14 अक्टूबर 2024 को भारत के खिलाफ गंभीर, लेकिन बिना आधार के आरोप लगाए। आरोप यह थे कि भारतीय एजेंट, अधिकारी और वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ, जिनमें उस समय भारत के उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा भी शामिल थे, उन्होंने कनाडाई धरती पर अपराधिक गतिविधियों में भाग लिया।

कनाडा के इन दावों पर वाशिंगटन पोस्ट ने घंटों के भीतर एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसे गैरी शिह और ग्रेग मिलर ने लिखा। इस रिपोर्ट में अमित शाह को भी कथित अवैध आपराधिक ऑपरेशंस में शामिल बताया गया। लेख में सूत्र के रूप में कनाडा की नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर नतालि ड्रूइन और विदेश मंत्रालय के डिप्टी मिनिस्टर डेविड मॉरिसन को उद्धृत किया गया।

हालाँकि बाद में यह खुलासा हुआ कि अखबार को RCMP और कनाडाई अधिकारियों के आरोपों से पहले ही तैयार ब्रीफिंग मिल चुकी थी। रिपोर्ट वास्तव में प्रेस कॉन्फ़्रेंस का इंतजार कर रही थी। इसमें आतंकवादी हरेदीप सिंह निज्जर की हत्या और अन्य लक्षित हमलों को भारत पर आरोपित किया गया। कनाडा के NSA ने सभी आरोपों को मीडिया हाउस तक पहुँचाने का आदेश पहले ही दे दिया था, जबकि कोई औपचारिक निष्कर्ष या सबूत सार्वजनिक नहीं हुए थे।

इस खुलासे ने वाशिंगटन पोस्ट की स्वतंत्र पत्रकारिता और अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। यह साबित हो गया कि इसके लेखक ओटावा के प्रभाव में आकर न्यू दिल्ली की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले औजार के रूप में काम कर रहे थे।

अगर आप चाहें, मैं अब तक के सभी घटनाक्रम और पत्रकारों के प्रोफाइल को मिलाकर एक संयुक्त हिंदी न्यूज आर्टिकल तैयार कर सकता हूँ, जो वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी, विवादास्पद रिपोर्टिंग और भारत-विरोधी गतिविधियों को पूरी तरह कवर करे।

भारत पर लगातार हमले, कॉन्सपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा

वाशिंगटन पोस्ट के माध्यम से गैरी शिह ने भारत पर कई तरह के आरोप लगाए है। उनके अनुसार भारत ने नेटफ्लिक्स और अमेजन से दर्दनाक कंटेंट हटवाया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक पर घृणा भाषण फैलाया और पाकिस्तान में आतंकवादियों की हत्या करवाई।

उनके लिए सुनहरा मौका तब आया जब अमेरिका ने कहा कि भारत ने 2023 में प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नून को मारने का प्रयास किया।

इस पर गैरी शिह ने प्रचार चैनल द वायर पर करण थापर से बातचीत में दावा किया कि पूर्व R&AW प्रमुख समंत कुमार गोयल पूरी साजिश में शामिल थे। उन्होंने अपने लेख में लिखा, “अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया है कि पन्नून को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन को उस समय के रॉ प्रमुख सामंत गोयल ने मंजूरी दी थी।” बाद में 2024 में अपने इंटरव्यू में उन्होंने इसे “अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ की समझ के अनुसार” के रूप में बचाव करने की कोशिश की। यह मामला भी दिखाता है कि शिह ने लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे चुनौतीपूर्ण रूप में पेश करने का प्रयास किया।

गैरी शिह ने अपने बयान में कहा “यह कोई अकेली या अलग घटना नहीं थी, बल्कि इस पर एजेंसी के उच्च अधिकारियों, जिनमें सचिव समंत कुमार गोयल भी शामिल हैं की मंजूरी थी। यदि हम अपने स्रोतों से मिली जानकारी पर ध्यान दें, तो यह साफ है कि उन्हें इन खतरों को खत्म करने के लिए दबाव डाला गया था और यही हमारी समझ का आधार है कि यह एक ऑपरेशन था।”

हालाँकि, उनकी यह रिपोर्टिंग कई सवालों के घेरे में आई, खासकर कनाडाई सरकार के साथ उनकी साझेदारी और भारत पर बार-बार झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को देखते हुए। शिह ने 2022 में भारत की तुलना चीन से करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई, जो उनके बौद्धिक धोखे और पक्षपात को उजागर करता है।

मोदी सरकार ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और रूस-यूक्रेन युद्ध में पश्चिमी दबाव के सामने झुकी नहीं, लेकिन शिह ने इसे भी आलोचना का विषय बनाया क्योंकि सरकार ने उनके पसंदीदा पश्चिमी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया।

उन्होंने कहा “मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक अल्पसंख्यकों का व्यवहार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर मोदी चीन के समान पृष्ठ पर हैं। पश्चिमी पाखंड की यह धारणा भारतीय कूटनीतिज्ञों की ओर से आ सकती है, लेकिन यह वास्तव में चीनी कूटनीतिज्ञों से आती हो सकती है।”

यह टिप्पणी उन्होंने कारवाँ के एक लेख पर प्रतिक्रिया में दी थी, जो लिबरल लेखक सुषांत सिंह  द्वारा लिखा गया था। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कन्वल सिब्बल ने शिह की इस तुलना को सटीक रूप से खारिज करते हुए कहा।

“कोई भी व्यक्ति जो बौद्धिक ईमानदारी रखता है, भारत और चीन को इन मुद्दों पर बराबर नहीं मान सकता। शिह को चीन से निकाला गया और अब वह भारत की स्वतंत्रता का लाभ उठा रहा है।” यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि गैरी शिह लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में लगे रहे।

वाशिंगटन पोस्ट की हालिया छंटनी और कर्मचारियों की बर्खास्तगी मीडिया हाउस में पिछले कुछ वर्षों में जारी बायआउट और स्टाफ कटौती का हिस्सा है। ये बदलाव उस समय की आलोचना और संपादकीय निर्णयों के कारण हुए, जब अखबार ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले किसी राष्ट्रपति उम्मीदवार का समर्थन न करने का निर्णय लिया। यह निर्णय अमेज़न के संस्थापक जेफ बेज़ोस ने लिया था। इसके बाद अखबार ने कई हजार सब्सक्राइबर खो दिए।

दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक से अधिकांश राष्ट्रपति चुनावों में अखबार ने उम्मीदवार का समर्थन किया और सभी उम्मीदवार डेमोक्रेट्स रहे। इसके अलावा, बेज़ोस द्वारा पिछले साल अखबार के ओपिनियन सेक्शन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार के दृष्टिकोण पर केंद्रित करने का निर्णय लेने के बाद, उस विभाग के संपादक ने इस्तीफा दे दिया था।

कंपनी को पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है और इसमें भारत और मोदी सरकार के प्रति गहरी पूर्वाग्रह और नफरत रही है। प्रांशु वर्मा और गैरी शिह ने इस पक्षपाती नैरेटिव को आगे बढ़ाने में पूरी मेहनत की और इस अनैतिक परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालाँकि, इस नए घटनाक्रम ने कंपनी की आंतरिक समस्याओं पर फिर से ध्यान आकर्षित किया। यह साबित हुआ कि विशेष रूप से भारत को निशाना बनाकर रिपोर्टिंग करने वाले आधुनिक पत्रकार (ब्राउन सेपियंस) भी लिबरल मीडिया में नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं रखते। चाहे उनका देश विरोधी दृष्टिकोण कितना भी स्पष्ट क्यों न हो, वे आखिरकार हटा दिए जाते हैं या आसानी से बदल दिए जाते हैं।

India-US Trade Deal की सबसे जरूरी बातों को समझें: मोदी सरकार ने कृषि-डेयरी सेक्टर को प्रोटेक्ट करने के लिए उठाए कदम


भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में जिस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Agreement के ढाँचे पर सहमति बनी है, उसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है।

भारत और अमेरिका, दोनों ही देश इस बात को समझते हैं कि आने वाले समय में व्यापार केवल मुनाफे का साधन नहीं रहेगा, बल्कि भरोसेमंद साझेदारी, तकनीकी सहयोग और रोजगार सृजन का मजबूत आधार बनेगा।

यही वजह है कि इस अंतरिम ट्रेड डील को जल्दबाजी में किया गया फैसला नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक संतुलित ढाँचा कहा जा रहा है।

इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुलने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।

मोदी ने बताया दोनों देशों के लिए अच्छी खबर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को X पर एक पोस्ट में इसे भारत-अमेरिका के लिए बहुत अच्छी खबर बताया है। PM मोदी ने कहा, “दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) के लिए एक ढाँचा तय हुआ है। मैं राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाने में व्यक्तिगत रुचि दिखाई।”

उन्होंने लिखा, “यह ढाँचा हमारे साझेदारी संबंधों में बढ़ती गहराई, भरोसे और ऊर्जा को दिखाता है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी और भारत के मेहनती किसानों, उद्यमियों, MSMEs, स्टार्टअप इनोवेटर्स, मछुआरों और अन्य लोगों के लिए नए अवसर खुलेंगे। इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। भारत और अमेरिका दोनों नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह ढाँचा निवेश और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करेगा।”

वहीं केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बताया है कि इससे भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार के दरवाजे खुलेंगे। उन्होंने कहा, “इसका सबसे ज्यादा फायदा छोटे उद्योगों (MSMEs), किसानों और मछुआरों को होगा। निर्यात बढ़ने से महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।”

अंतरिम ट्रेड डील का मतलब क्या है और यह क्यों जरूरी थी?

अंतरिम ट्रेड डील का सीधा मतलब है कि यह कोई अंतिम या पूर्ण व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाले बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement- BTA) की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।

फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BTA की औपचारिक शुरुआत की थी, लेकिन ऐसे व्यापक समझौतों को अंतिम रूप देने में आमतौर पर कई साल लग जाते हैं। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने तय किया कि पहले एक ऐसा ढाँचा बनाया जाए, जिससे व्यापारिक रिश्तों को तुरंत गति मिल सके।

इस अंतरिम ढाँचे के जरिए दोनों देशों ने बाजार तक पहुँच बढ़ाने, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत व भरोसेमंद बनाने पर सहमति जताई है।

यह समझौता इस बात का भी संकेत देता है कि भारत और अमेरिका लंबे समय तक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वे वैश्विक व्यापार में एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।

अमेरिका का बाजार खुला: भारत को व्यापार और निर्यात में क्या मिला?

इस समझौते से भारत को जो सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है, वह है अमेरिका के 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार तक बेहतर और आसान पहुँच। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, इससे भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा होंगे।

खास बात यह है कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% करने पर सहमति जताई है, जिससे भारतीय सामान वहाँ पहले के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। कपड़ा और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प और कुछ चुनिंदा मशीनरी जैसे सेक्टरों को इस फैसले से सीधा फायदा मिलेगा।

ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत में बड़ी संख्या में छोटे उद्योग, कारीगर और श्रमिक काम करते हैं। इसके अलावा जेनेरिक दवाओं, रत्न और आभूषण, हीरे और विमान के पुर्जों जैसे उत्पादों पर अमेरिका ने टैरिफ पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई मजबूती मिलेगी।

इसके अलावा दोनों दोनों देश टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स, जिसमें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले दूसरे इक्विपमेंट शामिल हैं, इनमें ट्रेड बढ़ाने और उभरते टेक्नोलॉजी सेक्टर में जॉइंट कोऑपरेशन को बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं।

किन सेक्टरों में रोजगार और MSMEs को होगा सबसे ज्यादा फायदा?

यह अंतरिम ट्रेड डील केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए नहीं, बल्कि छोटे उद्योगों के लिए भी अहम मानी जा रही है। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प और होम डेकोर जैसे क्षेत्रों में MSMEs की बड़ी भागीदारी है। अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की माँग पहले से मौजूद है और अब टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद वहां और तेजी से पहुंच सकेंगे।

सरकार का दावा है कि निर्यात बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। महिलाओं और युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ श्रम की जरूरत ज्यादा होती है। मछुआरों और फिशरी सेक्टर को भी अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है, जिससे तटीय इलाकों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।

अनाज, मसाले और सब्जियाँ: किसानों को कैसे मिला पूरा संरक्षण?

इस समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख अनाजों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।

                                                         (साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

इसका मतलब यह है कि अमेरिकी अनाज भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर नहीं आ सकेंगे और घरेलू किसानों को कीमतों में गिरावट का डर नहीं रहेगा।

गौरतलब है कि इस ट्रेड डील को लेकर विपक्ष ने भी अफवाहें फैला कर किसानों और छोटे उद्यमियों के भड़काने की कम कोशिश नहीं की थी। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे केंद्र सरकार को भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की भी चेतावनी दी थी।

उस दौरान भी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान का हवाला देते हुए खरगे के तमाम आरोपों का खंडन करते हुए बताया था कि यह समझौता समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाएगा। भाषण में खरगे ने कहा था कि व्यापार समझौता किसानों को बर्बाद कर देगा।

इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था, “मोदी सरकार ने अमेरिका के सभी कृषि उत्पादों पर जीरो शुल्क लगाने का जो निर्णय किया है उससे एक बात साफ है कि अमेरिका से आने वाला कपास, गेहूँ, सब्जियाँ और दूसरे कृषि उत्पाद भारतीय किसानों की फसलों पर संकट होगा।”

जबकि आँकड़े साफ कहते हैं कि यह समझौता सिर्फ किसानों के हितों को ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र के तमाम कारीगरों को भी पूरी तरह से ध्यान में रखकर लिया गया है। मसालों के मामले में भी भारत ने पूरी सख्ती दिखाई है। काली मिर्च, लौंग, सूखी हरी मिर्च, दालचीनी, धनिया, जीरा, हींग, अदरक, हल्दी, अजवाइन, मेथी, चक्रफूल, कसिया, सरसों, राई और अन्य पाउडर मसालों को पूरा संरक्षण दिया गया है।

                                                     (साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

भारत की पहचान ही मसालों से जुड़ी हुई है और इनसे लाखों किसानों की रोजी-रोटी चलती है। इस समझौते में यह सुनिश्चित किया गया है कि अमेरिकी मसाले या उनके विकल्प भारतीय बाजार में आकर घरेलू उत्पादन को नुकसान न पहुँचा सकें।

सब्जियों के मामले में भी आलू, मटर, बीन्स और अन्य दलहनी सब्जियों के साथ-साथ फ्रोजन, डिब्बाबंद और अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियों पर कड़ा नियंत्रण रखा गया है, ताकि सब्जियों के मामले में भी भारतीय किसानों की आमदनी सुरक्षित रहे।

                                                         (साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

डेयरी सेक्टर क्यों रहा सरकार की ‘रेड लाइन’?

डेयरी सेक्टर को लेकर भारत ने इस समझौते में सबसे कड़ा रुख अपनाया है। दूध, क्रीम, बटर, घी, चीज, योगर्ट, बटर मिल्क, व्हे प्रोडक्ट्स और अन्य डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका जैसे देश की बड़ी डेयरी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधी एंट्री नहीं दी गई है।

                                                       (साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

इसका सीधा फायदा भारत के करोड़ों छोटे पशुपालकों को मिलेगा, जिनकी आजीविका दूध उत्पादन पर निर्भर है। भारत का डेयरी सेक्टर सहकारी मॉडल पर आधारित है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस समझौते ने यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के नाम पर इस सेक्टर को कमजोर न किया जाए।

मेक इन इंडिया, तकनीक और भविष्य की साझेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत और अमेरिका दोनों के लिए अच्छी खबर बताते हुए कहा है कि यह ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती देगा और निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ाएगा। दोनों देश इनोवेशन, डेटा सेंटर्स, जीपीयू, ऊर्जा और उन्नत तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में मिलकर काम करने पर सहमत हुए हैं।

भारत ने अगले पाँच साल में अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पाद, विमान और तकनीक खरीदने का इरादा भी जताया है, जिससे व्यापार संतुलन बना रहेगा और सप्लाई चेन मजबूत होगी। भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील का यह ढाँचा केवल व्यापार बढ़ाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक संतुलित समझौता है, जिसमें भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

एक तरफ जहाँ भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील कृषि और खाद्य उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। यही संतुलन इस समझौते को खास बनाता है और यही कारण है कि इसे भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों के लिए एक मजबूत कदम माना जा रहा है।

‘हिंदू संगठन शेख हसीना के पालतू कुत्ते’: युनूस के एडवाइजर शफीकुल आलम ने उगला जहर

                                                              शेख हसीना और मोहम्मद युनूस
बांग्लादेश में हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों का अत्याचार बढ़ रहा है और उसे सरकारी संरक्षण प्राप्त है यह बात किसी से अब छिपी नहीं है। हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बांग्लादेश की सरकार में नफरत किस कदर हावी हो गई है उसका अंदाजा यूनुस के चीफ एडवाइजर और प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम के बयान से लगाया जा सकता है। शफीकुल आलम ने एक इंटरव्यू में हिंदू संगठनों की तुलना पालतू कुत्तों से की है।

शफीकुल आलम ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ‘भारत-बांग्लादेश’ के रिश्तों को लेकर कहा है कि भारत को बांग्लादेश को भूटान नहीं समझना चाहिए। आलम ने कहा, “हसीना के दौर में खुलेआम चुनाव में धांधली हुई। इसके बावजूद किसने हसीना का समर्थन किया, लोग ये सब समझते हैं। मुझे लगता है कि यूनुस, शेख हसीना की वापसी चाहते हैं। वे वहाँ रहकर बांग्लादेश में लोगों को भड़का रही हैं।”

कट्टरंपथी उस्मान हादी की हत्या को लेकर आलम ने कहा कि उस्मान को अवामी लीग (शेख हसीना की पार्टी) के समर्थकों ने मारा है। आलम ने कहा, “हमारी रिपोर्ट्स बताती हैं कि अवामी लीग के सीनियर लीडर ने हादी को मरवाने के लिए फंडिंग की है।” बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर भी आलम ने खुलेआम झूठ बोला है। आलम का दावा है कि कम्युनल और हेट क्राइम के मामले में पिछले एक साल में सिर्फ एक ही हत्या हुई है, जिसमें दीपू चंद्र दास का मामला है। उसके मुताबिक, अवामी लीग हर हिंदू की हत्या को धार्मिक हिंसा में हुई मौत बता रही है।

वहीं, जब आलम से सवाल किया गया कि ‘हिंदू अल्पसंख्यक कम्युनिटी’ अपराध बढ़ने का डेटा जारी किया है। इस पर आलम ने कहा कि ऐसे संगठनों के नेता अवामी लीग से मिले हुए हैं। आलम ने कहा, “डेटा में से कोई भी घटना कम्युनल किलिंग की नहीं है। ज्यादातर मामले लूटपाट, आपसी रंजिश के हैं। बांग्लादेश हिंदू, बुद्ध, क्रिश्चियन परिषद नाम के संगठन और लोग हसीना के पालतू कुत्तों की तरह के हैं।”

उत्तराखंड : मदरसा बोर्ड खत्म, USMEA का हुआ गठन: अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्या-क्या बदलेगा

                                डॉ सैयद अली हामिद और पुष्कर सिंह धामी (साभार - एबीपी/इंडियन एक्स्प्रेस)
उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।

अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।

राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।

अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव

मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।
इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।

क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?

नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।
सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।
अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।

पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?

नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।
मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।

कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?

सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।
डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।

मान्यता के लिए सख्त नियम लागू

नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।
यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।

आधी रात गिरफ्तार पप्पू यादव, आवास पर पहुँचे 100 पुलिसकर्मी: 31 साल पुराना मामला जिसमें अरेस्ट हुए सांसद

                                             पप्पू यादव गिरफ्तार (साभार: ABP न्यूज)
बिहार के पूर्णिया से लोकसभा सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को पटना पुलिस ने शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को देर रात करीब 12 बजे गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई 31 साल पुराने एक मामले में पटना की विशेष अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी आदेश के बाद की गई, जिसमें पप्पू यादव समेत तीन आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस की टीम शुक्रवार रात करीब 12 बजे मंदिरी स्थित पप्पू यादव के आवास पर पहुँची थी। गिरफ्तारी की प्रक्रिया के दौरान लगभग तीन घंटे तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही। इस दौरान पप्पू यादव की तबीयत अचानक बिगड़ गई और वे बेहोश हो गए जिसके बाद उनके समर्थकों में नाराजगी फैल गई और माहौल कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गया।

स्थिति सामान्य होने के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और अपने साथ ले गई। गिरफ्तारी के समय पप्पू यादव ने कहा कि उन्हें मामले को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा, “यह ठीक नहीं है, मेरे साथ क्या होगा यह कहना मुश्किल है।”

गिरफ्तारी के बाद देर रात उन्हें हेल्थ चेक-अप के लिए इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) ले जाया गया, जहाँ उनका मेडिकल चेकअप कराया गया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, आज (शनिवार, 7 फरवरी) उन्हें संबंधित अदालत में पेश किया जाएगा।

पप्पू यादव की गिरफ्तारी के लिए उनके आवास पर बड़े पैमाने पर पुलिस बल तैनात किया गया। कार्रवाई के दौरान सिटी एसपी के नेतृत्व में 5 डीएसपी, 6 थानेदार और करीब 100 पुलिसकर्मी मौके पर पहुँचे।

पटना के एसपी सिटी भानु प्रताप सिंह ने बताया कि यह मामला वर्ष 1995 से जुड़ा हुआ है, जिसमें न्यायिक प्रक्रिया के तहत ट्रायल चल रहा है। उन्होंने कहा कि संबंधित मामले में सांसद को अदालत में उपस्थित होना था, लेकिन तय तिथि पर उनकी उपस्थिति नहीं हुई। इसी वजह से अदालत के आदेश पर उनकी गिरफ्तारी की गई।

क्या है 31 साल पुराना केस?

विवाद की जड़ वर्ष 1995 का एक मामला है, जिसमें आरोप है कि पप्पू यादव ने पटना के गर्दनीबाग इलाके में स्थित एक मकान को किराए पर लिया था लेकिन उन्होंने इस घर पर कब्जा कर लिया। शिकायतकर्ता विनोद बिहारी लाल के अनुसार, पप्पू यादव ने मकान को व्यक्तिगत उपयोग के लिए लेने की बात कही थी बकि बाद में उसी मकान को राजनीतिक कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया गया। जब मकान मालिक को इसकी जानकारी हुई तो दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके बाद उन्होंने गर्दनीबाग थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।

यह मामला गर्दनीबाग थाना कांड संख्या 552/1995 के तहत दर्ज हुआ था, जिसमें पप्पू यादव पर धोखाधड़ी, जालसाजी, घर में अवैध प्रवेश, आपराधिक धमकी और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। लंबे समय से यह मामला सांसद-विधायक (MP-MLA) विशेष अदालत में विचाराधीन था और वहाँ इसकी नियमित सुनवाई चल रही थी।

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, पप्पू यादव को कई बार समन जारी कर अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया, लेकिन वे निर्धारित तिथियों पर पेश नहीं हुए। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना मानते हुए पहले उनकी संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया और उसके बाद उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। कोर्ट के आदेश के अनुपालन में पटना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए शुक्रवार आधी रात उन्हें गिरफ्तार किया।

“मोदी तेरी कब्र खुदेगी” नारे ने मोदी का विरोध ही नहीं बल्कि इस नारे ने मोदी की आत्मा को घायल किया है; राज्यसभा में मोदी वाणी उसकी आत्मा के श्राप जैसे थे; ईश्वर ऐसे नारे लगाने वालों की रक्षा करे

सुभाष चन्द्र

यही सत्य है कि “मोदी तेरी कब्र खुदेगी” नारे में केवल मोदी का विरोध नहीं छुपा है बल्कि इस जिसने भी यह नारा लगाया है उसने मोदी की आत्मा को जैसे किसी शूल से छलनी किया है। इस नारे को लगाने के पीछे के कारण बताते हुए राज्यसभा में मोदी वाणी ऐसी थी जैसे उसके मुंह से श्राप निकल रहे हों 

जब किसी व्यक्ति की आत्मा घायल होती है तो उसके शब्दों से सावधान रहना चाहिए। 

कांग्रेस ही नहीं INDI गठबंधन को महाराज कृत्यानी द्वारा 7 नवम्बर 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दिए श्राप को याद करना होगा, जब इंदिरा गो हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेलते हुए पार्लियामेंट स्ट्रीट को लाल कर रही थी, तब उन्होंने श्राप दिया था कि "इंदिरा जिस तरह गोपाष्टमी के दिन हम निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेली जा रही है तेरी भी मौत गोपाष्टमी के दिन होगी। तेरी पार्टी को बर्बाद करने हिमालय से आधुनिक ड्रेस में एक तपस्वी आएगा..." याद करिए 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्टमी ही थी। यानि जिस तरह मोदी पर कांग्रेस और INDI गठबंधन द्वारा गालियां देने के साथ अब सफेदपोशी नक्सलियों का रूप धारण कर शारीरिक हमले की साज़िश रची जा रही है, मोदी के दिल से निकलने वाली हाय इन सबको बर्बादी की ओर धकेल रही है। हाय कभी खाली नहीं जाती।        

मोदी के जीवन में बहुत आए धोखा देने वाले जो अधिकांश राजनीतिक मिट्टी में मिल गए और अब तो बिना सोचे समझे यह नारा लगाना फैशन बन गया है। यह नारा लगाने वालों में UGC प्रकरण में मोदी को फांसी लगाने वाले भी शामिल हो गए। 

यह बात याद रखनी चाहिए कि कांग्रेस ने मोदी के 12 साल गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए कैसे कैसे षड़यंत्र किए वो भी सुप्रीम कोर्ट के जजों से मिलकर और मौत का सौदागर तक कहा लेकिन वह कांग्रेस 2014 में आज़ादी के बाद लोकसभा में सबसे कम 44 सीट लेकर शहीद हो गई जिसकी कुछ सांसे चल रही थी। कांग्रेस की खुद की कब्र खुद गई

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कांग्रेस को मोदी ने उसकी कब्र खोदने के कारण गिनाए। मोदी ने कहा कांग्रेस मोदी की कब्र खोदना चाहती है क्योंकि -

-उसे मोदी से नफरत है, उसे इस बात से नफरत है कि एक गरीब परिवार का आदमी प्रधानमंत्री कैसे बन गया और अब तक टिका हुआ है, क्योंकि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर तो कांग्रेस अपना अधिकार समझती है;

-क्योंकि हमने 370 हटा दी और J&K का स्पेशल स्टेटस ख़त्म कर दिया, इसलिए मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं;

-हमने माओवादियों को जड़ से ख़त्म करने का काम किया, इसलिए कब्र खोदना चाहते हैं;

- हमने आतंकियों पर प्रहार किया और पाकिस्तान को घर में घुस कर मारा, इसलिए कब्र खोदनी है;

-हमने Northeast में बम, बंदूक और आतंकवाद से मुक्ति दिलाई, इसलिए कब्र खोदना चाहते हैं;

-सिंधु जल समझौता जो देश हित में नहीं था, हमने उसे ख़त्म किया, इसलिए मोदी की कब्र खोदना चाहती है कांग्रेस;

-हमने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को ठोका, इसलिए कांग्रेस को कब्र खोदनी है;

- ये “मोहब्बत की दुकान” चलाने वाले देश के एक नागरिक के हत्या कर उसकी कब्र खोदना चाहते है और फिर संविधान की किताब उठाए घूमते हैं। आखिर कौन सा कानून है संविधान में जो किसी की भी हत्या करने की अनुमति देता है।

 

मोदी ने कांग्रेस को चुनौती दी कि वो मेरी कब्र खोदने के नारे लगाते रहें लेकिन मुझे देश के 140 करोड़ लोगों के आशीर्वाद मिलते हैं, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा

लोकसभा में एक दिन पहले कांग्रेस ने मोदी को बोलने से रोकने के लिए षड़यंत्र खेला लेकिन कुछ कथित मोदी समर्थक ही ओम बिरला को निकम्मा कह रहे है कि वो मोदी की रक्षा नहीं कर पाए जबकि ये लोग नहीं समझते कि कांग्रेस की महिला सांसदों को तैयार किया गया था मोदी से सामने जाकर हल्ला कर अपने कपडे फाड़ने का ड्रामा कर मोदी को बदनाम करने के लिए। 

जो लोग ओम बिरला का विरोध कर रहे हैं, वो क्या ऐसी हालत में वहां खड़े होते। कुछ जरूरत से ज्यादा श्याणे UGC रेगुलेशन के विरोध में इतने पागल हो गए हैं कि वो मोदी को दोष दे रहे है कि उसका लोकसभा में न बोलना एक अपराधबोध है। शर्म आनी चाहिए

मोदी का विरोध करने वाले लगता है बंगाल में चौथी बार ममता की सरकार बना कर मानेंगे क्योंकि ये UGC विरोध की छूत की बीमारी बंगाल में भी फैलाई जाएगी और बंगाल के हिंदू बिना किसी जातीय भेदभाव के ममता के गुंडों और बांग्लादेशी मुस्लिमों का 5 साल और शिकार बनेंगे

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में शिया मस्जिद में नमाज के दौरान अचानक बम फटा: 15 की मौत, कम से कम 80 घायल


पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बड़ा आत्मधाती हमला हुआ है। द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार इस्लामाबाद के इमाम बारगाह खदीजत-उल-कुबरा मस्जिद में सुसाइड अटैक के बाद 15 लोगों की मौत हो गई है, वहीं 80 लोग बुरी तरह घायल हुए हैं. धमाके के बाद शिया मस्जिद के अंदर का दृश्य डरा देने वाला है
 लोग घायल और खून से लथपथ हालत में जमीन पर पड़े हुए नजर आ रहे हैं बड़ी संख्या में लोग जमीन पर पड़े हुए हैं. वहां अफरातफरी का माहौल है 

पाकिस्तान के इस्लामाबाद के इमाम बारगाह खदीजत-उल-कुबरा मस्जिद में में हुए भीषण विस्फोट में कम से कम 15 से 20 लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि करीब 80 लोग घायल हो गए। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, धमाके के तुरंत बाद पुलिस और राहत एवं बचाव दल मौके पर पहुँचे और घायलों को अस्पताल पहुँचाने का अभियान शुरू किया।

विस्फोट के बाद पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में आपातकाल घोषित कर दिया गया, जहाँ बड़ी संख्या में घायलों को भर्ती कराया गया है। अधिकारियों का कहना है कि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह आत्मघाती हमला था या पहले से लगाए गए बम के जरिए धमाका किया गया।

वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यह सुसाइड अटैक था और शिया मस्जिद में आत्मघाती हमलावर ने खुद को अंदर आने के बाद गेट के पास उड़ा लिया। मामले की गहन जाँच की जा रही है और सुरक्षा एजेंसियाँ हर पहलू से पड़ताल में जुटी हैं।

यह विस्फोट ऐसे समय हुआ है, जब कुछ दिन पहले ही पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के बीच घातक मुठभेड़ हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इससे पहले नवंबर में भी इस्लामाबाद में एक आत्मघाती विस्फोट हुआ था, जिसमें 12 लोगों की जान गई थी।

मस्जिद में कैसे हुआ धमाका?

इस्लामाबाद के शहजाद टाउन इलाके में स्थित टेरलाई इमाम बारगाह में जुमे की नमाज के दौरान यह धमाका हुआ है आत्मघाती हमलावर ने खुद को अंदर आने के बाद गेट के पास उड़ा लिया इस घटना में पहले 5 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई थी मरने वालों की संख्या अब 15 पहुंच गई है वहीं 80 लोगों के हताहत होने की जानकारी सामने आई है विस्फोट की सूचना मिलने के बाद पुलिस और बचाव दल घटनास्थल पर पहुंच गया और बचाव कार्य जारी है

शिया समुदाय को बनाया निशाना

इस हमले के जरिए शिया समुदाय को निशाना बनाया गया है। धमाके के बाद शिया मस्जिद के अंदर का दृश्य डरा देने वाला है। लोग घायल और खून से लथपथ हालत में जमीन पर पड़े हुए नजर आ रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग जमीन पर पड़े हुए हैं। वहां अफरातफरी का माहौल है। रेस्क्यू टीम मौके पर मौजूद है। इमाम बारगाह के आसपास के इलाके को घेर लिया गया है। हर एक जगह पर बारीकी से नजर रखी जा रही है। खबर ये भी सामने आ रही है कि  सुरक्षा के मद्देनजर अधिकारियों ने पूरे शहर में आपातकाल लागू कर दिया है।

अस्पताल में इमरजेंसी लागू

इस विस्फोट के बाद इस्लामाबाद के पॉलीक्लिनिक, पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (पिम्स) और सीडीए अस्पताल में आपातकाल लगा दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार हॉस्पिटल के एक प्रवक्ता ने डॉन को इसकी पुष्टि की। उन्होंने बताया कि कार्यकारी निदेशक (ईडी) पिम्स के निर्देश पर, अस्पताल में आपातकाल लागू कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्य आपातकालीन, आर्थोपेडिक, बर्न सेंटर और न्यूरोलॉजी विभाग सक्रिय कर दिए गए हैं। घायलों को पिम्स और पॉलीक्लिनिक अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है।

हमलावर को एंट्री गेट पर रोका, फिर हुआ तेज धमाका

द टाइम्स ऑफ इस्लामाबाद ने सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से बताया कि हमलावर को एंट्री गेट पर पहले से अलर्ट सुरक्षाकर्मियों ने रोक लिया था, जिसकी वजह से वह मस्जिद के मुख्य हॉल में प्रवेश नहीं कर सका, जहां पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। उसे रोके जाने के बावजूद, धमाके वाली जगह के वीडियो फुटेज में दिख रहा है कि गेट को भारी नुकसान पहुंचा है. धमाका इतना तेज था कि आसपास की इमारतों की खिड़कियां भी चकनाचूर हो गईं और मलबा सड़क पर बिखर गया।

क्या राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बन गई है ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया गैंग? प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।


लगातार चुनावों में हार झेल रही कांग्रेस सत्ता के लिए ऐसे तरप रही है जैसे बिना पानी के मछली। और चुनावों में मिल रही हार की जिम्मेदार है सोनिया परिवार। चर्चा यह है कि राहुल की उद्दंता पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आंखें मिचने के पीछे भी बहुत राजनीति है। वह यह कि राहुल जितना ऊलजलूल बोलेगा कांग्रेस को उतना ही नुकसान होगा। जबसे राहुल सक्रीय हुए है कांग्रेस 100 का अंक भी पार सकी। विपरीत इसके इसका जनाधार भी कम होने लगा है। वह दिन भी दूर नहीं जब कांग्रेस की स्थिति क्षेत्रीय दलों से भी बदतर होने वाली है।  

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपनी विचारधारा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। राजनीति में विरोध लाजमी है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर देश को अस्थिर करना सही है? दरअसल में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन में जो खुलासा किया है वह चौंकाने वाला है। बुधवार, 4 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण टाले जाने के पीछे की वजह बताते हुए बिरला ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के साथ ‘मिसहैप’ (कोई अप्रिय घटना) करने की फिराक में थे। स्पीकर ने खुद अपनी आंखों से सांसदों को पीएम की कुर्सी की तरफ हिंसक तरीके से बढ़ते देखा, जिसके बाद उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से पीएम को सदन में न आने की सलाह दी।

क्या कांग्रेस का एजेंडा अब विदेशों से तय हो रहा है? क्या राहुल के इशारे पर प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है?

इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अब ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया अड्डा बन चुकी है? राहुल गांधी के हालिया बयानों और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या सत्ता की लालच में देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है?

प्रमाण

इस ट्वीट में साफ दिख रहा है कि कैसे कांग्रेस का नैरेटिव देश विरोधी ताकतों से मेल खा रहा है। प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।

 संस्थानों पर हमला: नक्सलियों जैसी रणनीति?

अर्बन नक्सल का पहला काम होता है देश की संवैधानिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा उठाना। राहुल गांधी आज वही कर रहे हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी सुप्रीम कोर्ट, तो कभी भारतीय सेना पर सवाल उठाकर वह सिस्टम को पंगु बनाना चाहते हैं। यह वही अराजकता की थ्योरी है, जो नक्सली जंगलों में इस्तेमाल करते हैं और अर्बन नक्सल शहरों में। जानकारों का कहना है कि जब एक राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत की छवि खराब करता है, तो वह सीधे तौर पर उसी नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देता है।
राहुल गांधी की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति का असली चेहरा यहां बेनकाब हो रहा है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर पीएम पर हमला करने की कोशिश? क्या कांग्रेस अब प्रोफेशनल नक्सलियों की तरह ट्रेनिंग ले रही है?
विदेशी फंडिंग और बाहरी मदद का शक
डिजिटल मीडिया पर यह बहस छिड़ी है कि राहुल गांधी के सुर अचानक विदेशों में जाकर क्यों बदल जाते हैं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल टूलकिट’ का इस्तेमाल हो रहा है? अडानी-हिंडनबर्ग जैसे मुद्दों पर देश में आग लगाने की कोशिश करना, इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है।
‘मोहब्बत की दुकान’ में ‘नफरत का सामान’?
जनता अब जागरूक हो चुकी है। राहुल गांधी जिसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहते हैं, आलोचक उसे ‘अर्बन नक्सलवाद का शोरूम’ बता रहे हैं। जाति के नाम पर समाज को तोड़ना और माओवादी भाषा का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि भारत की एकता बनाम ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग की है।

क्रिकेट पर नासिर हुसैन की भारत से नफरत आई सामने, पाकिस्तान-बांग्लादेश के समर्थन में कर रही बैटिंग: ‘उम्माह’ के लिए BCCI-ICC को कोस रहा पूर्व ‘ब्रिटिश’ कैप्टन

                                            क्रिकेटर नासिर हुसैन (साभार-x@sarkarstix )
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।

यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।

हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।

सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।

यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।

बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी

जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।

नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।

अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।

ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।

हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।

इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।

बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।

क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।

फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”

यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।

बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।

नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?

ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।

जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।

उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।

2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया

साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।

दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।

क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।

जहाँ तक ​​नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।