इराक : 13 साल की बच्ची कौसर द्वारा निकाह से मना करने पर अब्बा-मंगेतर ने सीने में उतारी 10 गोलियाँ: बाद में हैवानों ने मनाया जश्न

                                              इराक में बच्ची की हत्या ( फोटो साभार-X@ndtv)
इराक की राजधानी बगदाद में एक 13 साल की मासूम बच्ची कौसर बशर अल हुसैजावी को उसके अब्बा, चचाजान और मंगेतर ने मिलकर हत्या कर दी। बच्ची का कसूर सिर्फ इतना था कि वह निकाह नहीं करना चाहती थी, क्योंकि मंगेतर शराबी और ड्रग्स डीलर था। इतना ही नहीं हत्यारों ने उसकी हत्या कर जश्न मनाया। ढोल-नगाड़े बजाए गए और पुरुषों की जमात उस पर ताल मिलाती नजर आई।

उसे मारने का तरीका भी विभत्स था। मृतक की एक रिश्तेदार के मुताबिक, मेरे कबीले के आदमियों ने मेरी रिश्तेदार 15 साल की कौसर बशर अल-हुसैजावी को एक गड्ढे में फेंक दिया और उसके शरीर पर मिट्टी डाल दी। उन्होंने कुल्हाड़ी से उसका सिर फोड़ दिया और फिर 10 गोलियाँ दाग दी। फिर मेरा परिवार भी दूसरों के साथ सड़कों पर आकर नाचने और उसकी मौत का जश्न मनाने लगा।

दरअसल कौसर की 13 साल की उम्र में पहला निकाह हुआ था। बगदाद के दक्षिण-पूर्व में कवथर जिले के अल-नहरावन में रहती थी। उसे स्कूल छुड़वाया गया और 13 साल की उम्र में उससे कई साल बड़े एक शराबी से निकाह कर दिया गया।

वह एक साल तक हिंसा का शिकार होती रही। मौका पाते ही वह अपने परिवार के पास वापस भाग गई। परिवारवालों ने उसे घर में नजरबंद रखा और उसे अपने पति के पास जाने के लिए मजबूर करता रहा। इस दौरान कौसर ने अपनी जान लेने की धमकी दी और आखिरकार 2025 के आखिर में कोर्ट में उसका तलाक हो गया।

इसके तुरंत बाद उसका कजिन जेल से रिहा हो गया और उसने कौसर के माता-पिता से निकाह करने की बात कही। कौसर ने मना कर दिया। परिजनों को भी पता था कि दूल्हा ड्रग्स और शराब का धंधा करता है। उसके परिवार ने फिर भी कौसर पर निकाह का दबाव डाला। कबीले की नीति के मुताबिक, ‘लड़की किसी आदमी की बात नहीं टाल सकती।’ घर पर उसकी माँ और महिला रिश्तेदार उसके पक्ष में खड़ी नहीं हो सकी। वह अकेली पड़ गई।

जैसे-जैसे निकाह का दिन नजदीक आ रहा था, उसे लगता था कि रेप और हिंसा का एक नया दौर पास आ रहा है। डर के साए में जी रही कौसर ने अपना घर छोड़ दिया। उसने न तो पढ़ाई ठीक से की थी और न ही उसे पैसा कमाना आता था। वह अकेले अपने कुछ कपड़े लेकर घर से निकल गई।

घर से भागते हुए उसे एक पड़ोसी ने देख लिया, फिर क्या था मौके का फायदा उठाकर उसे 3 दिनों तक अपने कब्जे में रखा और उसके साथ ‘बहुत बुरा’ किया। कौसर की रिश्तेदार ने ये नहीं बताया कि उन तीन दिनों में उसके साथ क्या हुआ। परिवार को लगा कि वह उसके साथ जानबूझकर गई है। हालाँकि कौसर ये विश्वास दिलाती रही कि उसका किडनेप हुआ है और वह अपनी मर्जी से वहाँ नहीं थी।

सर्विलांस कैमरों में भी उसे जबरदस्ती घसीट कर ले जाते हुए वीडियो सामने आए, लेकिन परिवार ने लड़की को सजा दी। उसे गड्ढे में फेंक दिया गया और मिट्टी डाल दी गई। सभी वहाँ जमा होने लगे। थोड़ी देर बाद उसे निकाल कर पीटा। सिर फोड़ दिया और अंत में 10 गोलियाँ दाग दी।

उत्तराखंड : बकरीद के दिन कॉन्स्टेबल मोहम्मद अजीम द्वारा मंदिर के गेट पर मांस के टुकड़े फेंकने के आरोप में रुद्रपुर में गिरफ्तार, ड्यूटी से भी सस्पेंड

                  वाल्मीकि मंदिर (बाएँ), कॉन्स्टबेल मोहम्मद अजीम (दाएँ), (फोटो साभार : Bhaskar)
उत्तराखंड के रुद्रपुर में वाल्मीकि मंदिर के गेट पर मांस के टुकड़े फेंकने के आरोपित पुलिस कॉन्स्टेबल मोहम्मद अजीम को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस शर्मनाक हरकत के बाद SSP अजय गणपति ने आरोपित कॉन्स्टेबल को तुरंत सस्पेंड भी कर दिया है।

पुलिस ने आरोपित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे कोर्ट में पेश किया है। यह मामला रुद्रपुर के भूत बंगला इलाके का है। आरोप है कि कॉन्स्टेबल अजीम ने कुर्बानी के मांस के टुकड़े मंदिर के मुख्य गेट पर फेंक दिए थे।

शुक्रवार (29 मई 2026) को जब लोगों ने यह देखा, तो पूरे इलाके में तनाव फैल गया। इस घटना से नाराज वाल्मीकि समाज के लोगों ने मौके पर भारी हंगामा किया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विरोध करने पर उनके साथ गाली-गलौज भी की गई।

इसके बाद पीड़ित पक्ष ने कोतवाली पहुँचकर तहरीर दी। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने यह बड़ी कार्रवाई की है।

‘तुम पूरी तरह पागल हो, मेरी वजह से जेल जाने से बचे’: ट्रंप का दिमाग अब नेतन्याहू पर खिसका

             डोनाल्ड ट्रम्प (बाएँ) और बेंजामिन नेतन्याहू (दाएँ)(फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इजरायल, न्यूजवीक)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भारी नाराजगी जताई है। 1 जून 2026 को दोनों के बीच फोन पर बहुत तीखी बातचीत हुई। ट्रंप ने आरोप लगाया कि नेतन्याहू लेबनान में जानबूझकर जंग भड़का रहे हैं। इससे अमेरिका और ईरान की शांति बातचीत खतरे में पड़ रही है।

ट्रंप ने नेतन्याहू को सीधे क्या-क्या कहा?

‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप इजरायल के हमलों से बेहद गुस्से में थे। ट्रंप ने नेतन्याहू को ‘पूरी तरह पागल’ कह दिया। ट्रंप ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, “तुम आखिर कर क्या रहे हो?” उन्होंने आगे कहा, “अगर मैं नहीं होता तो तुम जेल में होते। मैं तुम्हें बचा रहा हूँ। अब हर कोई तुमसे नफरत करता है। इस वजह से हर कोई इजरायल से भी नफरत करता है।”

क्यों गुस्से में थे अमेरिकी राष्ट्रपति?

ट्रंप लेबनान में इजरायल की लगातार सैन्य कार्रवाई से नाराज थे। इजरायल बेरूत में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बड़े हमले की तैयारी में था। वह दक्षिणी लेबनान में भी सेना बढ़ा रहा था। ट्रंप को लगा कि इजरायल जरूरत से ज्यादा आक्रामक हो रहा है। वे लेबनान में आम नागरिकों की मौतों और हिजबुल्लाह कमांडरों पर बड़े हमलों से परेशान थे। उन्हें डर था कि इससे अमेरिका-ईरान के कूटनीतिक प्रयास बर्बाद हो जाएँगे।

ईरान की सीधी चेतावनी

यह तीखी बहस तब हुई जब ईरान ने अमेरिका को खुली चेतावनी दी। ईरान ने कहा कि अगर लेबनान पर इजरायली हमले नहीं रुके, तो वह वाशिंगटन के साथ चल रही बातचीत रोक देगा। तेहरान ने साफ किया कि किसी भी समझौते के लिए लेबनान में युद्धविराम पहली शर्त है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने भी लेबनान को भरोसा दिया कि हमला जारी रहने पर वे अमेरिका से बातचीत सस्पेंड कर सकते हैं।

फोन कॉल के बाद क्या बदला?

इस डांट के बाद एक इजरायली अधिकारी ने बताया कि इजरायल ने बेरूत पर हमले की योजना टाल दी है। ट्रंप ने बाद में दावा किया कि बातचीत सकारात्मक रही। उन्होंने कहा कि बेरूत की तरफ बढ़ रहे इजरायली सैनिकों को वापस मोड़ दिया गया है। मध्यस्थों के जरिए हिजबुल्लाह भी इजरायल पर हमले रोकने को तैयार हो गया है।

नेतन्याहू की जिद और आंशिक युद्धविराम

दूसरी तरफ नेतन्याहू ने जनता के सामने अलग बयान दिया। उन्होंने कहा कि इजरायल का रुख नहीं बदला है। वे दक्षिणी लेबनान में अभियान जारी रखेंगे। अगर हिजबुल्लाह ने हमला किया, तो बेरूत पर फिर बमबारी होगी। इस बीच, 1 जून को लेबनान ने एक आंशिक युद्धविराम की घोषणा की। इसके तहत इजरायल बेरूत पर हमले नहीं करेगा और हिजबुल्लाह इजरायल पर रॉकेट नहीं दागेगा।

मुलायम से अखिलेश यादव तक आतंकियों को बचाने समाजवादी पार्टी की नापाक कोशिशें


समाजवादी राजनीति का केवल कहने और दिखाने के लिए दर्शन सामाजिक न्याय, पिछड़ों की आवाज़ और लोकतांत्रिक संघर्ष है, लेकिन वास्तविकता में पार्टी के नेताओं की करनी इससे ठीक उलट है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! यही कारण है कि पीएम से लेकर सीएम तक और अन्य बीजेपी नेता लगातार चुनावी मंचों से सपा पर आतंकियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। सपा के कई फैसलों और बयानों ने बार-बार यह धारणा बनी कि उसने आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा। अदालतों की फटकार, सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल और आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की कोशिशें सपा की राजनीति पर अब भी सबसे बड़े सवालिया निशान हैं।

तुष्टिकरण के लिए आतंकियों के पोषक बने समाजवादी पार्टी के नेता
सबसे बड़ा प्रश्न केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का है जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिश की गई, सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए और कई बार आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाया गया। अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई मामलों में सरकार की मंशा पर तीखी टिप्पणियां करनी पड़ीं। यही घटनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में “तुष्टिकरण बनाम राष्ट्र सुरक्षा” की सबसे बड़ी बहस के रूप में सामने आती हैं।

आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
19 फरवरी 2022
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।

अयोध्या राम मंदिर हमले के आरोपियों पर नरमी का आरोप
14 फरवरी 2022
यूपी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी ने आरोप लगाया कि जब अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुकदमों को वापस लेने वाली फाइल पर साइन किए थे। बीजेपी ने इसे “राष्ट्र और आस्था दोनों के खिलाफ अपराध” बताया। यह आरोप इसलिए और गंभीर बना क्योंकि अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। आतंकवाद के ऐसे मामलों में नरमी दिखाना सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा दाग बन गया। काबिले जिक्र है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर में स्थित अस्थायी राम मंदिर पर आतंकी हमला 5 जुलाई 2005 को हुआ था।

अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
12 जुलाई 2021
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?

अखिलेश सरकार द्वारा आतंकवाद मामलों को वापस लेने की कोशिश
12 दिसंबर 2013
यूपी की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन मामलों की समीक्षा शुरू की, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे थे। सरकार ने करीब 14 आतंकवाद मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इनमें गोरखपुर ब्लास्ट, लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे गंभीर मामले शामिल थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह कदम न्याय व्यवस्था को कमजोर करने और कट्टरपंथी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसा है। बाद में अदालतों ने कई मामलों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए मुकदमे वापस लेने की अनुमति नहीं दी।

आतंकी खालिद मुजाहिद के परिजनों को सपा सरकार में मुआवजा!
31 मई 2013
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित वाराणसी और फैजाबाद के अदालत परिसरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी खालिद मुजाहिद अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया था। दरअसल, खालिद की मौत के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दी गई मुआवजे की राशि को परिवार ने लेने से ही इनकार कर दिया था। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव-2014 में जहां एक खास वर्ग के मुस्लिमों की नाराजगी का भय सता रहा है तो वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस निर्णय को मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने कहा कि सपा सरकार आतंकवाद के आरोपियों के प्रति इतनी नरम थी कि उसने प्रशासनिक मशीनरी पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण ने यह धारणा और मजबूत की कि सपा आतंकवाद के मामलों में हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के बजाय आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल और आतंकियों के प्रति सहानुभूति
19 सितंबर 2008
दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों को मार गिराया गया था। उस समय पूरे देश में आतंकवादी हमलों का भय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मुलायम सिंह यादव ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग की। दरअसल, सपा आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर एक विशेष वोट बैंक को साधना चाहती थी। जिस समय देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता चाहता था, उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अविश्वास खड़ा करना सपा की राजनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

वाराणसी ब्लास्ट आरोपी वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास
7 मार्च 2006
वाराणसी सीरियल ब्लास्ट में निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। लेकिन अखिलेश सरकार ने इस मामले के आरोपी वलीउल्लाह सहित कुछ आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कदम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि क्या सरकार आतंकवादियों को “पद्मभूषण” देना चाहती है? अदालत की यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक बन गई कि सरकार का कदम कितना विवादास्पद माना गया। आलोचकों ने कहा कि सपा सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जगह उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगी थी।

आतंकवादियों के प्रति फर्जी मुकदमे का सपा का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी ने कई बार यह तर्क दिया कि आतंकवाद के मामलों में कुछ युवकों को झूठा फंसाया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इस तर्क के जरिए आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा किया गया। जब अदालतों में कई आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत हुए और सजा भी हुई, तब सपा की राजनीतिक लाइन पर और सवाल उठे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा ने “निर्दोष” का नैरेटिव बनाकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की। यहां तक कि सपा सरकार को अदालतों से फटकार मिली। फिर भी उसने आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की नापाक कोशिशें कीं। समाजवादी पार्टी के कई बयानों ने यह धारणा और मजबूत हुई कि उसने हमेशा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरण और तुष्टिकरण के चश्मे से देखा।

लिपुलेख-कालापानी पर शेखी बघार अपने ही देश में घिरे बालेन शाह, सुगौली संधि से ब्रिटेन का भी कनेक्शन: जानिए भारत-नेपाल सीमा विवाद के बारे में सब कुछ

       भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दों को लेकर नेपाल PM बालेन शाह ने ब्रिटेन के आगे फैलाया हाथ (साभार: AI)
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर दिया गया बयान नेपाल की राजनीति से लेकर भारत-नेपाल संबंधों तक चर्चा का विषय बन गया है। संसद में सीमा विवाद से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा कि नेपाल केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन (UK) से भी बातचीत कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर भारत ने नेपाल और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसदों ने तर्क दिया कि भारत और नेपाल की खुली सीमा वाले क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि का उपयोग और किसी राज्य द्वारा दूसरे देश की जमीन पर कब्जा करने में बड़ा अंतर है।

दशकों पुरानी खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग खेती, व्यापार और आवागमन के लिए एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। इसलिए इसे अतिक्रमण या कब्जा कहना उचित नहीं है।

इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

हालाँकि बालेन शाह के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा ब्रिटेन के सामने उनका हाथ फैलाकर मदद माँगना था। सवाल उठने लगा कि आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटेन का नाम क्यों आया और नेपाल इस मुद्दे को ब्रिटेन से क्यों जोड़ रहा है। इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर 210 साल पुरानी सुगौली संधि और लिपुलेख-कालापानी विवाद से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटेन का जिक्र क्यों आया?

नेपाल का तर्क है कि सीमा विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। इसलिए नेपाल के कुछ नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड हो सकते हैं जो सीमा विवाद की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट कर सकें।

इसी के तहत बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यंजनकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि यूनाइटेड किंगडम इस विवाद को सुलझाने में कैसे मदद कर सकता है। हालाँकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन ने इस मुद्दे को भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला माना है और किसी तरह की मध्यस्थता में रुचि नहीं दिखाई है।

आलोचकों का कहना है कि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन का नाम लेने से विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा गया।

आखिर क्या है लिपुलेख दर्रा? भारत के पास मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य

लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के करीब स्थित है। भारतीय पक्ष से यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है और तिब्बत के पुरांग (तकलाकोट) क्षेत्र को जोड़ता है।

भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से यह दर्रा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सदियों से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क का रास्ता रहा है। इसके अलावा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। भारत और चीन के बीच होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा के दो प्रमुख मार्गों में से एक लिपुलेख होकर गुजरता है।

हाल ही में भारत और चीन ने 2026 से कैलास मानसरोवर यात्रा फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसी घोषणा के बाद लिपुलेख एक बार फिर चर्चा में आ गया, क्योंकि नेपाल ने इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई और कहा कि विवादित क्षेत्र से जुड़े मामलों पर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।

बालेन शाह सरकार ने दावा किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, इसीलिए वहाँ से गुजरना नेपाल के कानून के खिलाफ है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत और चीन को इस स्थिति से अवगत कराया। बयान में कहा गया कि नेपाल सरकार अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।

नेपाल के इस दावे को लेकर भारत ने कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और एक जैसा रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पारंपरिक मार्ग रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। यह कोई नई बात नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह के एकतरफा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है। भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।”

लिपुलेख विवाद की जड़ क्या है और क्या दावा करता है नेपाल?

भारत और नेपाल के बीच वास्तविक विवाद केवल लिपुलेख दर्रे तक सीमित नहीं है। इसके साथ कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।

इस पूरे विवाद की जड़ काली नदी (महाकाली नदी) के उद्गम स्थल को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच प्राकृतिक सीमा माना गया था। लेकिन समस्या यह है कि दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम को अलग-अलग स्थान मानते हैं।

नेपाल बिना किसी साक्ष्य के दावा करता है कि काली नदी का मूल स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है और कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र में आते हैं।

वहीं भारत ने हमेशा इस दावे का खंडन किया है। भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे स्थित है। भारत के अनुसार, सीमा निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए, जिसके चलते कालापानी, लिपुलेख और आसपास का क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा बनता है।

भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।

सुगौली संधि क्या थी?

लिपुलेख विवाद को समझने के लिए सुगौली संधि को समझना बेहद जरूरी है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में गोरखा साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। इस विस्तार के कारण नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हुआ।
1814 से 1816 के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध लड़ा गया। युद्ध में नेपाल को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए और 4 मार्च 1816 से यह प्रभावी हो गई। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्रों पर दावा छोड़ दिया।
साथ ही यह तय किया गया कि काली नदी दोनों पक्षों के बीच सीमा का काम करेगी। नेपाल आज भी अपने दावों के समर्थन में इसी संधि और ब्रिटिश काल के कई पुराने नक्शों का हवाला देता है। नेपाल का तर्क है कि यदि मूल संधि और शुरुआती नक्शों को आधार बनाया जाए तो कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके हिस्से में आते हैं।

2020 में क्यों बढ़ा था विवाद और क्या है भारत का पक्ष?

लिपुलेख विवाद 2020 में भी सुर्खियों में आया था। भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था। इस सड़क का उद्देश्य कैलास मानसरोवर यात्रियों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच आसान बनाना था। नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया और कहा कि सड़क विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है।
इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया। बाद में नेपाल ने इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दे दी। भारत ने नेपाल की इस कार्रवाई को एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए।

भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक सीमाएँ विरासत में प्राप्त कीं और उसी आधार पर इन क्षेत्रों का प्रबंधन किया जाता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया।

भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मौजूदगी मजबूत की। भारत का यह भी तर्क है कि कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग दशकों से किया जाता रहा है और यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध बेहद गहरे हैं। यही कारण है कि सीमा से जुड़े अधिकांश मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए किया जाता रहा है, लेकिन नेपाल ने एक बार फिर बिना सबूतों के दावा तो ठोका ही साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के बजाय तीसरे देश को भी बेवजह शामिल करने की कोशिश की।(साभार) 

भारत विरोधी बड़बोलेपन के कारण अपने ही देश की संसद में घिरे नेपाल के PM बालेन शाह, चीन प्रेम पर भी सांसदों ने लताड़ा


नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपने पहले संसदीय प्रश्नकाल के दौरान दिए गए बयानों को लेकर विवादों में घिर गए हैं। प्रतिनिधि सभा में सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दों पर उन्होंने ब्रिटेन से मदद माँगी है। बालेन शाह ने यह भी दावा किया कि नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है।

शाह ने कहा, “हमने ना केवल भारत और चीन से बात की है बल्कि ब्रिटेन सरकार से भी संपर्क किया है। हमारा मानना है कि ब्रिटेन को इसमें दिलचस्पी लेनी चाहिए क्योंकि यह विवाद उस दौर का है, जब ब्रिटिश भारत ने इस इलाके को छोड़ा था।”

CPN-UPL की सांसद पद्मा अर्याल के सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा, “प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा नहीं किया है। नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा जमा रखा है। इसका सही तरीका यही होगा कि दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को सुलझा लें।”

पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसद बसाना थापा ने आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री ने बिना किसी तथ्य या सबूत के इतना गंभीर बयान दिया है और यह बयान राष्ट्रीय अखंडता को ठेस पहुँचाएगा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को नुकसान पहुँचाएगा।

चीन का उदाहरण देने पर भी बालेन शाह को सांसदों ने घेरा

इसके अलावा पीएम बालेन शाह को चीन का उदाहरण देने पर भी सांसदों ने घेरा। उन्होंने नेपाल के सबसे कम विकसित देश से विकासशील देश का दर्जा प्राप्त करने में दो साल की देरी के संबंध में सांसदों के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा, “पड़ोसी देश चीन हाल ही में विकासशील से विकसित देश बन गया है।”

सांसदों ने इसे तथ्यों की गलती बताते हुए प्रधानमंत्री बालेन शाह की आलोचना की। सांसद खुशबू ओली ने काउंटर किया कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय निकाय अभी भी चीन को ‘विकासशील देश’ की श्रेणी में रखते हैं।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने दी सफाई

प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत की भूमि पर कब्जा करने वाले बयान को अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया ने कवर किया। सोशल मीडिया पर भी इस बयान की कड़ी आलोचना की गई। इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय से सफाई देते हुए बयान जारी किया गया।

                                                       फोटो साभार: Government of Nepal

बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ और ‘ऑक्युपेशन’ से उनका मतलब उन नागरिकों से था जो सीमा के दूसरी ओर जमीन की खेती करते हैं या वहाँ रह रहे हैं।

समय बदलने में देर भले ही हो जाए लेकिन हिसाब होता जरूर है; ममता और उसके गिरोह को समझ आ जाना चाहिए

सुभाष चन्द्र

भारत की राजनीति में अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी और ममता बनर्जी ऐसे परकोटे हैं जो जो खेल खेलने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अभिषेक के लिए सहानुभूति बटोरने वाले बताएं कि "अभिषेक हेलमेट पहनकर क्यों निकला था?" मंशा साफ है सारा खेल पहले से ही सुनियोचित था। जहाँ तक कल्याण बनर्जी की बात है ये तो किसी ड्रामेबाज़ से कम नहीं। इसे तो किसी ड्रामा ट्रूप में या फिल्मों में चले जाना चाहिए। पागल सिर पर कहाँ खून था जो कपडा रख रहा था?    

याद है 2 मई, 2021 को जब बंगाल के चुनाव नतीजे आए थे तो ममता की पार्टी के गुंडों ने हिंदुओं पर सामूहिक हमले किए थे, उनके घर जलाए गए, बहु बेटियों के बलात्कार किए गए और 80 हजार हिंदुओं को असम की तरफ पलायन करना पड़ा जब 2020 में भाजपा अध्यक्ष नड्डा पर TMC के लोगो ने हमला किया तो अभिषेक बनर्जी ने कहा - "Nadda was in trouble today. What can I do? Outburst of people's anger is not my responsibility". महुआ मोइत्रा ने भी पल्ला झड़ते हुए कहा था, “ये कोई नई बात नहीं है, बंगालियों का खून गरम होता है, इसको आप राजनीतिक हिंसा के तौर पर मत देखिए, यह बंगाल के लोगो का इतिहास है”

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन अब अभिषेक बनर्जी पर हमला हुआ तो उसे जनता का गुस्सा क्यों नहीं मानते? इसको राजनीतिक हिंसा के तौर पर क्यों देख रहे हो? मजे की बात तो यह है कि हमले के दोषी पकड़े गए लोग ममता की ही पार्टी के हैं क्या यह ममता की पार्टी का प्रायोजित खेल था? ऐसा खेल केजरीवाल ने शुरू करके नई तरह की राजनीति शुरू की थी

हिंसा नहीं होनी चाहिए लेकिन आपने 15 साल क्या किया, उसे भी तो याद करो आप क्यों भूल जाते हो कि 15 साल लेडी बगदादी बनकर ममता ने क्या क्या जुल्म किए हिंदुओं पर, उन्हें उनके त्योहार तक नहीं मनाने दिए तब सारे बेशर्म विपक्षी नेता खामोश रहते थे लेकिन आज उन्हें लोकतंत्र खतरे में दिखाई दे रहा है 

कल कल्याण बनर्जी भी रोया है कि “मुझे मार गया, पत्थर फेंके गए, मेरे सिर में चोट लगी, मुझे भाजपा के लोगों ने मारने की कोशिश की, पुलिस ने कुछ नहीं किया” ममता कल्याण को मिलने उसके घर गई ममता को याद है ममता के राज में पुलिस TMC के गुंडों के साथ होती थी, पार्टी के नेता की अनुमति बिना रिपोर्ट तक नहीं लिखती थी, आज रो रहे हो 

कल्याण बनर्जी पर हमले को सब विपक्षी नेता संसद में भी रोएंगे लेकिन उस वक्त वो सब हंस रहे थे जब कल्याण बनर्जी उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की मिमिकरी कर रहा था, उनके चलने की, बोलने की और एक्शन्स का मजाक उड़ा रहा था कल्याण बनर्जी तुम पर जो हमला हुआ, उससे बड़ा हमला तो तुमने धनखड़ पर किया था

इसी कल्याण बनर्जी ने नतीजे आने से 2 दिन पहले कहा था - “अमित शाह को मैं उल्टा लटका दूँगा, वो एक जल्लाद है, एक गुंडा है, गुंडागर्दी उसके खून में है और वह एक अत्यंत घटिया आदमी है” नशे में धुत्त थे कल्याण क्योंकि सपने में भी नहीं सोचा था कि ममता हार जाएगी ये शब्द असली पत्थरों से भी बड़े पत्थर थे जो आपने अमित शाह को मारे और ऐसे ही पत्थर अभिषेक बनर्जी ने मारे थे 

ममता की हताशा अभी और बढ़ेगी क्योंकि कर्मो का फल मिलना तो निश्चित होता है आज पार्टी खंड खंड होती नज़र आ रही है अभिषेक पर हुए हमले का विरोध करने के लिए विधायकों की बुलाई गई बैठक में 80 में से केवल 20 ही पहुंचे मतलब है सारे 32 मुस्लिम विधायक भी नहीं पहुंचे

क्या क्या अपराध नहीं किए ममता की पार्टी ने! आज एक सांसद के पार्टी कार्यालय पर तोड़फोड़ की खबर थी क्योंकि वह ऑफिस तालाब को पाट कर बनाया हुआ था कांग्रेस और सी.पी.एम. के ऑफिस छीन लिए थे लेकिन भाजपा आने के बाद जब उन्हें वो ऑफिस मिल गए तब भी भाजपा का धन्यवाद नहीं किया 

एक नेता तो TMC का अपने आप को भाजपा का घोषित करके मजे करने लगा जिससे कोई उस पर हमला न करे ऐसे लोगों से ही नहीं, तृणमूल कांग्रेस के लोगो को भाजपा में एंट्री देने से सावधान रहना चाहिए क्या पता कौन किस अपराध से जुड़ा हुआ हो? 

ममता उबलने की बजाय घर में बैठ कर याद करे पिछले 15 साल में क्या क्या किया जिसका दंड जनता ने दिया अलबत्ता बांग्लादेशी अभी भी उम्मीद लगाए बैठे है कि जब ममता वापस आएगी तो हम फिर बंगाल में घुस सकेंगी

पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी, केजरीवाल-मान-सिसोदिया के साथ तस्वीरें: कौन है AAP नेता अशोक ओझा, जो अपनी ही पार्टी के नेताओं को IB के नाम पर धमकाने के आरोप में हुआ गिरफ्तार

                            अरविंद केजरीवाल के साथ अशोक ओझा (फोटो साभार: ऑपइंडिया गुजराती)
गुजरात में आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) के नाम पर आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं और कार्यकर्ताओं को धमकियाँ दिए जाने का मुद्दा उठाकर अरविंद केजरीवाल, गोपाल इटालिया और दुर्गेश पाठक ने भारी हंगामा खड़ा किया था। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं, सवाल उठाए गए और पूरी घटना को राजनीतिक रंग दिया गया। लेकिन जाँच आगे बढ़ते ही पूरा खेल पलट गया। जिस ‘आईबी कॉल’ को लेकर परोक्ष रूप से सरकार और प्रशासन पर निशाना साधा जा रहा था, उसमें अब आप (AAP) का वडोदरा शहर अध्यक्ष अशोक ओझा ही आरोपित के रूप में सामने आया है।

खास बात यह है कि अशोक ओझा कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे पार्टी में कोई न जानता हो। गुजरात में आप का संगठन खड़ा करने की प्रक्रिया के दौरान अशोक ओझा लगातार पार्टी के शीर्ष नेताओं के आसपास देखा जाता रहा है। वह लंबे समय से गुजरात आप में सक्रिय है और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक उसकी सीधी पहुँच है।

अरविंद केजरीवाल से लेकर इसुदान गढ़वी, गोपाल इटालिया और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान तथा मनीष सिसोदिया तक, अशोक ओझा कई मौकों पर पार्टी के बड़े चेहरों के साथ नजर आया है। गुजरात में पार्टी संगठन के विस्तार के काम के दौरान भी वह सक्रिय रहा और कई बार दिल्ली जाकर भी पार्टी का काम संभाला।

                                                गोपाल राय और भगवंत मान के साथ अशोक ओझा

गुजरात आप के संगठन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति देखी गई है। पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के साथ उसके संपर्कों और नजदीकी के प्रमाण के रूप में कई तस्वीरें और कार्यक्रमों के रिकॉर्ड मौजूद हैं। गुजरात में आप के प्रभारी के रूप में काम कर चुके गोपाल राय के साथ भी वह कई बार देखा गया था। संक्षेप में कहें तो अशोक ओझा केवल शहर स्तर का पदाधिकारी नहीं था, बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सीधा संपर्क रखने वाला और संगठन में पहचान रखने वाला चेहरा था।

                                     मनीष सिसोदिया और मनोज सोरठिया के साथ अशोक ओझा

इसके अलावा गुजरात के आम आदमी पार्टी के कई नेताओं के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इसुदान गढ़वी के साथ भी उसके संबंध करीबी हैं। इसके अलावा गोपाल इटालिया और मनोज सोरठिया के साथ भी वह कई बार दिखाई देता है। इन सभी नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें भी इस समय उपलब्ध हैं।

मामला, जिस पर राजनीतिक रोटियाँ सेंक रही थी केजरीवाल एंड कंपनी

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने दावा करना शुरू किया कि गुजरात में उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के नाम पर फोन करके धमकाया जा रहा है। मामला तब और ज्यादा चर्चा में आया जब दिल्ली के पूर्व विधायक और आप नेता दुर्गेश पाठक ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि गुजरात में काम कर रहे आप कार्यकर्ताओं को एक विशेष नंबर से फोन आ रहे हैं और फोन करने वाला खुद को आईबी का अधिकारी बता रहा है।

कुछ ही समय में आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे को हाथ में ले लिया। केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके दावा किया था कि उनके एक कार्यकर्ता को इस प्रकार का फोन आया था। उन्होंने आगे यह भी दावा किया था कि उन्होंने खुद उस नंबर पर फोन करके पूछा था कि क्या वे आईबी से बोल रहे हैं? और सामने से सकारात्मक जवाब मिलने के बाद जैसे ही उन्होंने बताया कि वे अरविंद केजरीवाल बोल रहे हैं, तो फोन काट दिया गया। इसके बाद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से सवाल किया था कि एक राज्य से दूसरे राज्य में राजनीतिक काम करने जाने वाले नागरिकों का आईबी द्वारा वेरिफिकेशन किस कानून के तहत किया जाता है।

आप के अन्य नेताओं ने भी इस मुद्दे को आगे बढ़ाया। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं, बयान दिए गए और पूरे मामले को ऐसा रंग दिया गया जैसे कोई सरकारी एजेंसी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही हो। परिणामस्वरूप यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया।

हालाँकि इस बीच आणंद के आप कार्यकर्ता केशव चौहान को भी इसी तरह का फोन आने की बात कहे जाने पर मामला पुलिस तक पहुँच गया। केशव चौहान ने आणंद साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस ने मोबाइल नंबर, कॉल डिटेल्स और तकनीकी डेटा की जाँच शुरू की।

जांच के दौरान सबसे पहला चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब जिस नंबर को लेकर हंगामा मचाया जा रहा था, वह नंबर आणंद के नितिन डोबरिया के नाम पर होने की बात सामने आई। पुलिस ने जब नितिन डोबरिया से पूछताछ शुरू की तो पूरी कहानी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया। पूछताछ के दौरान नितिन डोबरिया ने बताया कि उसने वडोदरा शहर आप अध्यक्ष अशोक ओझा के कहने पर फोन किए थे और कुछ मामलों में खुद को आईबी अधिकारी के रूप में पेश किया था।

इस खुलासे के बाद पुलिस ने अशोक ओझा से भी पूछताछ शुरू की। जिसके बाद जाँच में सामने आया कि यह पूरा मामला किसी बाहरी एजेंसी या राजनीतिक विरोधियों से जुड़ा नहीं था, बल्कि आप की आंतरिक गुटबाजी और संगठन के भीतर की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली के नेता दुर्गेश पाठक को वडोदरा और गुजरात में अधिक सक्रिय भूमिका दिए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर असंतोष पैदा हुआ था। जाँच में यह दावा किया गया कि अशोक ओझा को डर था कि केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते हस्तक्षेप से स्थानीय संगठन में उसका वर्चस्व कम हो सकता है। इसी वजह से फर्जी आईबी अधिकारी का खेल रचा गया था, ताकि कुछ नेताओं पर दबाव बनाया जा सके।

अंततः जिस मुद्दे पर आप के शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक रूप से हंगामा मचाया था, जिस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार और प्रशासन के खिलाफ सवाल उठाए गए थे, उसी मामले में अब आप के अपने ही एक शहर अध्यक्ष और उसके साथी की गिरफ्तारी होने की बात सामने आई है।

सूर्या चौहान के हत्‍यारे असद के परिवार की बैंड बज गई.. बुलडोज़र की तैयारी; DM ऑफिस ने घर पर लगाया नोटिस

                                सूर्या चौहान के हत्यारे असद के घर पर गाजियाबाद प्रशासन बड़ा एक्शन
खोड़ा कॉलोनी में सूर्या चौहान हत्याकांड में नई कार्रवाई हुई है. प्रशासन इस केस में सख्‍त रुख अपनाए हुए हैं. अब इस केस के मुख्य आरोपी असद के घर के बाहर प्रशासन ने एक नोटिस चस्पा कर दिया है. इसमें नवनीत विहार में असद के घर पर अवैध कब्‍जे का नोटिस चस्‍पा दिया गया है. बाकायदा अफसरों ने वहां ढोल बजवाकर माइक से मुनादी की 15 दिन के भीतर  बड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं.

दरअसल, गाजियाबाद के खोड़ा क्षेत्र में चर्चित सूर्या चौहान हत्याकांड के बाद प्रशासन ने अब मुख्य आरोपी असद के खिलाफ एक और बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी गई है. खोड़ा के नवनीत विहार स्थित उसके मकान पर प्रशासनिक टीम पहुंची और उप जिलाधिकारी की ओर से जारी नोटिस को घर के बाहर चस्पा कराया. इस दौरान इलाके में ढोल बजाकर और माइक के जरिये मुनादी कर लोगों को कार्रवाई की जानकारी दी गई.

मौके पर पहुंचे तहसीलदार और राजस्व विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संबंधित भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायतों और जांच के आधार पर नोटिस जारी किया गया है.

नोटिस में संबंधित पक्ष को 15 दिनों के भीतर इस अवैध कब्‍जे को हटा लेने के निर्देश दिए गए हैं. साथ ही साफ चेतावनी दी गई है कि अगर तय अवधि के भीतर खुद कब्जा स्वयं नहीं हटाया जाता है तो प्रशासन नियमानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करेगा. इसे हटाए या तोड़े जाने का पैसा भी असद के परिवारवालों से लिया जाएगा.

इस दौरान बड़ी संख्‍या में स्थानीय लोग वहां इकट्ठा हो गए और उन्‍होंने अफसरों की बात ध्‍यान से सुनी. कई लोग तो बाकायदा इस नोटिस की फोटो खींचकर भी ले जा रहे हैं. यहां तक की लोग असद के घर को भी दूर-दूर से देखने के लिए आ रहे हैं. वह पूछ रहे हैं कि ये असद का ही घर है क्‍या? 

अखलाख, हमास, फिलिस्तीन और गाज़ा पर मातम करने वाले ईद पर सूर्या की क़ुरबानी पर खामोश क्यों? पड़ोसी मुस्लिमों के मुँह से भी कट्टरपंथियों के लिए नहीं फूट रहा एक भी शब्द

गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। गंगा-जमुना की तहजीब और सेकुलरिज्म का रोना वाले सूर्या की क़ुरबानी पर क्यों खामोश हैं? टीवी पर चर्चाओं में जब घिरने पर बेशर्म संविधान की दुहाई देने लगते हैं। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।

सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग का मुँह नहीं खुला।

घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।

Republic Bharat पर अपने शो महाभारत पर एंकर राम मोहन शर्मा जब इस दुर्घटना की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे तब एक महिला ने कहा कि सरकार को इन लोगों को मिलने वाली हर सुविधा वापस ले लेनी चाहिए। यह सच भी है। जब तक सरकार ऐसे ठोस कदम नहीं उठाएगी इस तरह की हरकतों, दंगों और हिन्दू त्यौहारों पर होने वाली पत्थरबाज़ी बंद नहीं होगी। दूसरे, इन कट्टरपंथी और इनके समर्थकों को मालूम है कि मोदी सरकार सिर्फ पाकिस्तान के लिए सख्त हो सकती है, किसी और के लिए नहीं। बांग्लादेश में हिन्दुओं का नरसंहार होने के बावजूद मानवीय आधार पर आर्थिक मदद बंद नहीं की जबकि पाकिस्तान का पानी बंद कर दिया।      

प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग

हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, मुख्यमंत्री योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।

हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”

वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।

क्यों की गई सूर्या की हत्या

सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।

चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।

सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।

पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता

घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।

सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।

सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया

मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।

इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।

लॉन्जरी वाली इस तस्वीर को तो झेल गईं इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, पर कई खुद की जान लेने को हो जाते हैं मजबूर: जानिए AI का यह खेल कितना खतरनाक

                                          जॉर्जिया मेलोनी की AI से बने तस्वीर पर विवाद
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की डीपफेक और अश्लील तस्वीरें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बनाकर शेयर की जा रही हैं। उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर अपनी एक ऐसी ही तस्वीर शेयर कर ना सिर्फ नाराजगी जताई बल्कि इसे समाज के लिए एक खतरनाक संकेत भी बताया है। उन्होंने डीपफेक को लेकर कहा कि वह तो सक्षम हैं लेकिन बहुत से लोग इससे अपना बचाव नहीं कर सकते हैं। इससे AI के गलत इस्तेमाल को लेकर चल रही बहस एक बार फिर तेज हो गई है।

जॉर्जिया मेलोनी ने क्या कहा?

 मेलोनी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपनी एक डीपफेक फोटो शेयर कर एक लंबा संदेश लिखा है। इस तस्वीर में वह लॉन्जरी पहने हुए बेड पर बैठी दिख रही हैं। उन्होंने लिखा, “पिछले कुछ दिनों से मेरी कई फर्जी तस्वीरें फैलाई जा रही हैं। ये AI से बनाई गई हैं लेकिन असली बताकर शेयर किया जा रहा है।” मेलोनी ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि जिसने भी उनकी ये तस्वीरें बनाई हैं, उसने उनके लुक को निखार दिया है लेकिन उन्होंने इस पर चिंता भी जताई है।

मेलोनी ने इससे जुड़ा एक गंभीर मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि वह खुद तो अपनी रक्षा करने की स्थिति में हैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे नहीं हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी भी चीज को सच मानने या आगे शेयर करने से पहले उसकी सच्चाई जरूर जाँच लें। मेलोनी ने कहा, “यह मुद्दा सिर्फ मुझ तक सीमित नहीं है। डीपफेक एक खतरनाक हथियार है। क्योंकि यह किसी को भी धोखा दे सकता है, उसे गुमराह कर सकता है और नुकसान पहुँचा सकता है। मैं अपनी रक्षा कर सकती हूँ लेकिन बहुत से लोग ऐसा नहीं कर सकते।”

डीपफेक के डर से अपनी जान ले रहे लोग

मेलोनी ने जो कहा है वो वाकई गंभीर है और उस पर अधिक चर्चा किए जाने की जरूरत है। मेलोनी प्रधानमंत्री है, मानसिक रूप से ऐसे हमलों के लिए तैयार होती हैं लेकिन आम लोगों के लिए यह खतरा बहुत गंभीर है। यह खतरा किसी एक देश तक सीमित नहीं है, दुनियाभर में डीपफेक का खतरा लोगों के लिए जानलेवा तक बन जाता है। आम लोग मानसिक रूप से ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं और कई बार अपना जीवन तक ले लेते हैं। इसे कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं।

अप्रैल 2025 में महाराष्ट्र के नागपुर में एक 28 वर्षीय महिला ने ऐसे ही एक फर्जी वीडियो के चलते आत्महत्या कर ली थी। महिला ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उसे एक फर्जी वीडियो के जरिए फँसाया जा रहा था जिसमें उसकी कोई हमशक्ल थी। उसकी कथित धार्मिक टिप्पणी की वीडियो बनाकर उसे धमकाया जाने लगा और डर से महिला ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

अक्टूबर 2025 में हरियाणा के फरीदाबाद से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया। फरीदाबाद में एक 19 साल के लड़के ने आत्महत्या कर ली क्योंकि आरोपितों ने AI से उसकी व उसकी बहन की फेक तस्वीरें बन ली थीं और उससे पैसों की माँग कर रहे थे। वो युवक दबाव को नहीं सह पाया और उसने अपनी जान दे दी। ये केवल भारत की बात नहीं है, दुनियाभर में ऐसा हो रहा है।

ब्रिटेन में जनवरी 2024 में 14 साल की स्कूली छात्रा मिया जानिन ने स्नैपचेट पर उसकी नकली न्यूड तस्वीरें पोस्ट किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी। लड़कों ने लड़कियों के चेहरों को पोर्नोग्राफी कलाकारों के शरीर पर फोटोशॉप किया और उन्हें शेयर कर दिया। उन छात्रों को शायद से छोटी शरारत लगी होगी लेकिन यह मिया के लिए जानलेवा साबित हुई, वो इस दबाव को नहीं झेल पाई और आत्महत्या कर ली।

अमेरिका में फरवरी 2025 में 16 साल के एलिजा हीकॉक ने आत्महत्या कर ली थी। उसे AI से बनी अपनी ही एक न्यूड तस्वीर मिली थी, जिसके साथ एक धमकी भरा मैसेज था जिसमें 2.5 लाख रुपए ($3,000) की माँग की गई थी। कहा गया कि अगर वो पैसे नहीं दे पाएगा तो यह तस्वीर दोस्तों रिश्तेदारों को भेज दी जाएगी। बच्चा दबाव नहीं झेल सका और उसने आत्महत्या कर ली।

AI के या डीपफेक के या मार्फ्ड तस्वीरों के जरिए किए ब्लैकमेल के ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति, खासकर किशोर और महिलाएँ समाज में बदनामी के डर से टूट जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी सामाजिक पहचान खत्म हो जाएगी, परिवार और समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। यही डर कई बार उन्हें एक ऐसे अंधेरे रास्ते पर धकेल देता है। जहाँ वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

डीपफेक के निशाने पर महिलाएँ: 98% पोर्नोग्राफी, 99% में महिलाएँ

डीपफेक के निशाने पर सबसे अधिक महिलाएँ हैं और इसके केस तेजी से बढ़ रहे हैं। UN Women ने 2023 की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि ऑनलाइन मौजूद सभी डीपफेक वीडियो में से 98% डीपफेक पोर्नोग्राफी थी और 99% में महिलाओं को दिखाया गया था। अनुमान लगाया गया है कि 2023 में डीपफेक वीडियो 2019 के मुकाबले 550% ज्यादा थे। कई बड़ी हस्तियों को AI का शिकार बनाया गया है।

क्या होता है डीपफेक और कैसे करता है काम?

डीपफेक वह वीडियो, फोटो या ऑडियो होता है जो असली जैसा दिखता या सुनाई देता है लेकिन उसे AI की मदद से बदला गया होता है। इस तकनीक के जरिए किसी का चेहरा बदलना, चेहरे के हाव-भाव बदलना, नया चेहरा बनाना या आवाज तैयार करना संभव होता है। ‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डीपफेक सबसे पहले सोशल मीडिया एप रेडिट (Reddit) पर सामने आया था। तब एक Deepfake नाम के यूजर ने टेलर स्विफ्ट जैसी कई अभिनेत्रियों के फर्जी पोर्न क्लिप डाल दिए। इसके बाद से ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई।

डीपफेक तकनीक दो प्रोग्राम जनरेटर (Generator) और डिस्क्रिमिनेटर (Discriminator) पर काम करती है। जहाँ जनरेटर असली फोटो, वीडियो और आवाज से सीखकर नकली कंटेंट बनाता है जबकि डिस्क्रिमिनेटर यह जाँचता है कि वह कितना असली लग रहा है और अपनी फीडबैक देकर जनरेटर को सुधारने में मदद करता है इसी आपसी ‘मुकाबले’ को Generative Adversarial Networks (GANs) कहा जाता है।

इसमें दोनों बार-बार सीखते हैं और धीरे-धीरे इतना रियलिस्टिक कंटेंट तैयार कर देते हैं कि असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए बहुत ज्यादा डेटा (तस्वीरें, वीडियो, ऑडियो) जरूरी होता है यानी जितना ज्यादा डेटा, उतना बेहतर डीपफेक और जहाँ पहले इसे बनाने के लिए महँगे सॉफ्टवेयर, ताकतवर कंप्यूटर और एक्सपर्ट स्किल्स की जरूरत होती थी तो वहीं आज यह तकनीक काफी आसान हो गई है और कई टूल्स फ्री में साधारण डिवाइस या क्लाउड प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध हैं।

सजा से क्यों बच जाते हैं डीपफेक बनाने वाले

UN की एक रिपोर्ट बताती है कि डीपफेक से नुकसान बहुत बड़ा होता है लेकिन ऐसे मामलों में सजा कम मिलती है। सबसे बड़ी वजह यह है कि कानून अभी इस तकनीक के हिसाब से अपडेट नहीं हुए हैं। कई देशों में डीपफेक से जुड़ा कोई साफ कानून ही नहीं है और पुराने ‘रिवेंज पोर्न’ कानून भी इसमें पूरी तरह लागू नहीं होते। इससे पीड़ित लोग समझ नहीं पाते कि उनके साथ हुआ गलत काम अपराध है या नहीं।
दूसरी समस्या है जाँच में कमी एजेंसियों के पास डिजिटल सबूत जुटाने, दूसरे देशों से सहयोग लेने और प्लेटफॉर्म से डेटा हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। इस दौरान सबूत जल्दी गायब हो जाते हैं और कंटेंट तेजी से फैलता रहता है। अपराधी अक्सर अपनी पहचान छिपा लेते हैं या दूसरे देशों में रहकर बच जाते हैं। वहीं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी जिम्मेदारी से बचते हैं, कंटेंट हटाने में देर करते हैं और पीड़ितों को बार-बार शिकायत करने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे उन्हें और परेशानी होती है।

क्या हो आगे की राह

डीपफेक के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार, संस्थान और टेक कंपनियों को मिलकर तुरंत कदम उठाने होंगे। सबसे पहले ऐसे साफ और मजबूत कानून बनने चाहिए जो AI से बने कंटेंट और सहमति (consent) को स्पष्ट करें, अपराधियों को जिम्मेदार ठहराएँ और प्लेटफॉर्म को तय समय में कंटेंट हटाने के लिए मजबूर करें।

साथ ही अलग-अलग देशों के बीच कार्रवाई आसान होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था को भी मजबूत करना जरूरी है ताकि पुलिस और जाँच एजेंसियों को सही ट्रेनिंग, तकनीक और संसाधन मिल सकें और वे डिजिटल सबूत ठीक से इकट्ठा कर सकें।

टेक कंपनियों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी कि उन्हें खुद ऐसे कंटेंट पहचानकर जल्दी हटाना चाहिए और कानून एजेंसियों के साथ सहयोग करना चाहिए, वरना उन पर जुर्माना लगे। पीड़ितों को भी सही मदद मिलनी चाहिए जैसे कानूनी सहायता और संवेदनशील व्यवहार। इसके अलावा लोगों को डिजिटल सुरक्षा और सहमति के बारे में जागरूक करना भी बहुत जरूरी है।

सुनवाई के बाद 3 महीने में फैसला सुनाया जाए :एस सी; लेकिन सुनवाई शुरू करने की भी समय सीमा तय कीजिए

सुभाष चन्द्र 

सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 में प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हाई कोर्टों को दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा है कि सुनवाई पूरी होने के बाद 3 महीने में फैसला सुनाया जाना चाहिए ये निर्देश फैसलों में देरी रोकने के लिए दिए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि फैसलों में देरी से मुकदमों में शामिल लोगों को ऐसा नुकसान होता है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती

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सही कहा सुप्रीम कोर्ट ने लेकिन मामलों की सुनवाई तो पूरी तब होगी जब मामलों की सुनवाई होगी ट्रायल कोर्ट के फैसलों के खिलाफ हाई कोर्ट में अपीलों पर सुनवाई शुरू ही नहीं होती और यह कभी कभी अपराधियों की मौज करा देता है स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई 7 साल के बाद शुरू की AMU के minority status के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला 1 फरवरी, 2024 को सुरक्षित कर लिया था जो 9 महीने बाद 8 नवंबर, 2024 को सुनाया गया

दूसरी तरफ तत्कालीन चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने 7 साल पुराने Electoral Bonds केस का फैसला 2 नवंबर, 2023 को सुरक्षित किया था और 19 अप्रैल 2024 को शुरू होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक 2 महीने पहले 15 फरवरी को सुना दिया (यानी 3 महीने बाद) क्योंकि उससे मोदी को नुकसान हो सकता था ये राजनीति खेली थी चंद्रचूड़ ने लेकिन फिर भी निराशा हाथ लगी और मोदी प्रधानमंत्री बन गए 

सुनवाई न शुरू होने के कई उदाहरण हैं झारखंड हाई कोर्ट में 2012 से अब तक 10 चीफ जस्टिस रहे हैं और उनमे 2 तो सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए लेकिन लालू यादव की सजा के खिलाफ 5 अपीलों पर 12 साल में कोई सुनवाई नहीं हुई है पहली अपील लालू ने 13 दिसंबर 2013 को दायर की थी हर सजा के खिलाफ जमानत पर है और मौज ले रहा है जबकि उसे 32 साल की सजा हुई थी 

दूसरा मामला 2G का है जिसमें A Raja और कनिमोझी समेत सभी आरोपियों को 21 दिसंबर, 2017 को बरी कर दिया गया था CBI और ED ने मार्च, 2018 में  दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की थी 8 साल में भी सुनवाई का नामोनिशान नहीं है उसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत कर वो सांसद बने हुए हैं अगर अपील स्वीकार हो जाती हैं और ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट कर हाई कोर्ट उन्हें दोषी करार देता है तो इतने समय तक वो फ़ालतू में सांसद रहेंगे जबकि अयोग्य हो सकते थे

सुप्रीम कोर्ट में सलमान खान के Hit n Run केस में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उसे बरी किये जाने के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की अपील 2016 से लंबित है जिस पर सुनवाई नहीं हुई जब सुनवाई ही नहीं हुई तो फैसला कब होगा

जयपुर हाई कोर्ट ने 17 मार्च, 2023 को 2008 के जयपुर धमाकों के 4 अभियुक्तों की फांसी की सजा रद्द करते हुए बरी कर दिया था उन धमाकों में  63 लोगों की जान गई थी परिजनों ने  हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपीलें दायर की हुई है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चारों को रिहा तो कर दिया लेकिन 3 साल से अपीलों पर कोई सुनवाई नहीं हुई

हाई कोर्टों से अलावा ट्रायल कोर्टों में देखिए क्या हाल है राहुल गांधी के खिलाफ 12-12 साल से मुक़दमे चल रहे हैं एक मुकदमा बस सिरे चढ़ा था लेकिन कांग्रेस परिवार से आने वाले जस्टिस गवई ने उसे बचा लिया हेराल्ड केस में सोनिया और राहुल जमानत पर हैं लेकिन 14 साल से केस पटियाला हाउस कोर्ट में पता नहीं किस स्टेज पर पड़ा है केजरीवाल का 2014 से सुल्तानपुर में केस लटका है

सुनवाई के बाद 3 महीने में फैसला देने का आदेश तो ठीक है लेकिन केस या अपील दायर होने के बाद 3 महीने में सुनवाई भी शुरू होनी चाहिए जिसे 6 महीने में समाप्त भी होनी चाहिए तब काम चलेगा। अक्सर देखा जाता है कि मामले को लटकाने-भटकाने के लिए अपील दायर की जाती है। दूसरे, यह कि अगर जज ही केस फाइल को गंभीरता से पढ़ ले तो कई केस तो पहली/दूसरी तारीख में ही ख़त्म हो सकता है। जिन केसों में मुर्दों(जो अपने जीवन काल में उस मकान को कई पहले छोड़ अपने स्थाई मकान में अंतिम सांस ले चुका है, फिर भी उसको जीवित अपराधी दिखाया जाता है) को पार्टी बनाया गया हो, जब डिफेन्डन्ट का वकील पहली तारीख पर जज से सवाल करता है कि "क्या अब मुर्दों को भी नोटिस दिए जाएंगे?" और पेटिशनर और उसका वकील जब एक-दूसरे की बगलें झाँकने लगे साबित करता है कि "केस झूठा और दूसरी पार्टी को ब्लैकमेल करने के इरादे से किया गया है "क्यों नहीं ऐसे केसों को उसी समय ख़ारिज किया जाता?"       

TMC के पूर्व विधायक तपन चटर्जी के घर मिला सरकारी राहत सामग्री तिरपाल-कंबल-फुटबॉल का जखीरा, पुलिस ने किया गिरफ्तार: लोगों ने लगाए ‘चोर-चोर’ के नारे

                                                           पूर्व MLA तपन चटर्जी गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल पुलिस ने रविवार (31 मई 2026) को को पूर्व बर्धमान जिले के पूर्वस्थली उत्तर से पूर्व TMC विधायक तपन चटर्जी के घर पर छापेमारी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस को सरकारी राहत सामग्री जमा करके रखने की सूचना मिली थी। तलाशी के दौरान घर से बड़ी संख्या में तिरपाल, कंबल, फुटबॉल, वॉलीबॉल और अन्य सामान बरामद हुआ जो आमतौर पर आपदा प्रभावित लोगों, युवा क्लबों और शैक्षणिक संस्थानों में बाँटने के लिए होता है।

राहत सामग्री के साथ-साथ घर से भारी मात्रा में खेल सामग्री भी बरामद हुई जिनमें फुटबॉल और वॉलीबॉल शामिल हैं। आमतौर पर ये सामान युवा क्लबों और शैक्षणिक संस्थानों में बाँटने के लिए होते हैं। बताया जा रहा है कि ये सामान घर के किचन से जुड़े एक कमरे में जमा करके रखा गया था। पुलिस की छापेमारी के दौरान TMC नेता के घर के बाहर केंद्रीय बलों की भी तैनाती की गई थी।

छापेमारी के दौरान पुलिस ने तपन चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया है। सरकारी राहत सामग्री के कथित दुरुपयोग और हेराफेरी के मामले में उनसे पूछताछ की जा रही है। जब पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर जा रही थी। तब स्थानीय लोगों ने पूर्व विधायक के खिलाफ ‘चोर-चोर’ के नारे लगाए। घर पर छापेमारी के बाद अब पुलिस तपन चटर्जी से जुड़े कई गोदामों की भी तलाशी ले रही है।

यह कार्रवाई राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद TMC नेताओं द्वारा सरकारी राहत सामग्री की कथित जमाखोरी और हेराफेरी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा मानी जा रही है। इस बरामदगी के बाद ममता बनर्जी सरकार के दौरान सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और वितरण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।

बीते कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में TMC नेताओं से जुड़े ऐसे कई मामले सामने आए हैं। उत्तर 24 परगना जिले में बदुरिया नगर पालिका के चेयरमैन दीपंकर भट्टाचार्य को पुलिस ने उस समय गिरफ्तार किया था, जब उनके ठिकानों से भारी मात्रा में नकदी और हजारों सरकारी तिरपाल बरामद हुए थे। वहीं, पूर्व मेदिनीपुर में पूर्व TMC विधायक तरुण कुमार मैती से जुड़े इलाकों से भी राहत तिरपाल बरामद किए गए थे। इसके अलावा कई अन्य TMC नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ वसूली, हथियार बरामदगी और राहत सामग्री जमा करके रखने के मामलों में भी कार्रवाई हुई है।