इजरायल का फॉस्फोरस बम धमाका ( फोटो साभार-abp) इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।
ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।
ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”
गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा
मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।
3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।
इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।
क्या है सफेद फॉस्फोरस
सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।
इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।
प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना
इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।
मोदी ने की ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बातचीत (साभार : NDTV) पश्चिम एशिया में मचे भारी घमासान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से फोन पर बातचीत की है। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों और सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली बातचीत है।
मोदी ने इस तनाव पर गहरी चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से माल और ऊर्जा की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के होनी चाहिए, क्योंकि यह भारत की बड़ी प्राथमिकता है।
तनाव कम करने और भारतीयों की सुरक्षा पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बातचीत की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि भारत शांति और स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। पीएम ने जोर देकर कहा कि किसी भी विवाद का हल युद्ध नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से ही निकल सकता है। भारत ने ईरान और इजरायल दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है ताकि एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को टाला जा सके।
Had a conversation with Iranian President, Dr. Masoud Pezeshkian, to discuss the serious situation in the region.
Expressed deep concern over the escalation of tensions and the loss of civilian lives as well as damage to civilian infrastructure.
हाल ही में फारस की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों में कम से कम तीन भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है। पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पेजेश्कियान से बातचीत में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता जताई। इसके अलावा, भारत के लिए यह क्षेत्र व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए पीएम ने सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने की बात दोहराई।
با رئیسجمهور ایران، دکتر مسعود پزشکیان، گفتوگو کردم تا وضعیت جدی در منطقه را مورد بحث قرار دهم.
نگرانی عمیق خود را نسبت به تشدید تنشها، از دست رفتن جان غیرنظامیان و همچنین آسیب به زیرساختهای غیرنظامی ابراز کردم.
ایمنی و امنیت شهروندان هندی، همراه با ضرورت تداوم بدون مانعِ…
ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने बातचीत के दौरान भारत के स्टैंड को सराहा। उन्होंने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक ‘संतुलित और रचनात्मक’ भूमिका निभाई है। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह भारत को अपना एक सच्चा दोस्त मानता है। पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को बताया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता था और कूटनीति से मसले हल कर रहा था, लेकिन अमेरिका और इजरायल के हमलों ने स्थिति बिगाड़ दी। ईरान ने माना कि भारत की कोशिशें जंग खत्म करने की दिशा में बहुत प्रभावी रही हैं।
सबकी बात सुनने वाला इकलौता नेता
आज के दौर में पीएम मोदी दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो संघर्ष के दोनों पक्षों से सीधे बात कर सकते हैं। उन्होंने हाल के दिनों में इजरायली पीएम नेतन्याहू के साथ-साथ कतर, सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे देशों के नेताओं से भी संपर्क साधा है। भारत किसी एक गुट या गठबंधन का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और जिम्मेदार शक्ति के रूप में अपनी बात रख रहा है।
मध्यस्थ के रूप में भारत की साख
पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक और रणनीतिक ताकत लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र के देश भारत को एक ‘स्थिरता लाने वाली शक्ति’ के रूप में देखते हैं। चूंकि भारत का रिश्ता ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों, तीनों के साथ गहरा है, इसलिए शांति और संयम बरतने की भारत की अपील को पूरी दुनिया में गंभीरता से सुना जा रहा है। भारत का एकमात्र उद्देश्य एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोकना और मानवीय हितों की रक्षा करना है।
भारत को घसीटने की कोशिश में इस्लामी-कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT) भारत में विपक्षी नेता, कांग्रेसी इकोसिस्टम, वामपंथी इकोसिस्टम और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम से जुड़े लोग चाहते हैं कि भारत ईरान के साथ युद्ध में कूद जाए और अमेरिका के साथ जंग कर पूरा देश बर्बाद कर ले। दरअसल, ऐसा सिर्फ उनकी हरकतों से लग रहा है। क्योंकि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से वो भारत सरकार को इस युद्ध में घसीटने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे।
पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को निशाने पर लिया और इजरायल के साथ ईरान के युद्ध में भारत की साजिश कहकर घसीटने की कोशिश की। फिर ईरान के कट्टरपंथी तानाशाह खामेनेई की मौत के बाद पीएम मोदी ने दुख क्यों नहीं जताया (हालाँकि डिप्लोमेटिक चैनल्स के माध्यम से तय प्रक्रिया होती है और भारत के विदेश सचिव में ईरान के दूतावास में जाकर रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए हैं।) और अमेरिका-इजरायल का विरोध क्यों नहीं किया.. ये कहकर भारत को उकसाने की कोशिश की।
इस बीच, अब जब हिंद महासागर में ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena को जब अमेरिकी पनडुब्बी ने मार गिराया, तो उसे भी भारत पर हमले से जोड़कर बयानबाजी करने लगे। राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि ईरानी भारत के मेहमान थे, जब उनकी फ्रिगेट को मार गिराया गया।
हैरानी की बात है कि ईरान समेत 75 देशों की नेवी और उनके जहाज, एयरक्राफ्ट इस International Fleet Review 2026 में शामिल थे, जिसमें ईरान का जहाज भी शामिल था। ये इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 15 से 25 फरवरी तक विशाखापटनम में हुआ, जो भारतीय नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड का हिस्सा है। ये कार्यक्रम 25 फरवरी 2026 को खत्म हो गया और सभी देशों की नेवी अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गई।
इसके करीब 1 सप्ताह बाद 4 मार्च 2026 को अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी जहाज IRIS Dena को इंटरनेशनल वॉटर में टारपीडो से मारा। वो भारतीय सीमा से दूर हिंद महासागर में था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की तरफ बढ़ रहा था। ऐसे में उसका भारत से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन राहुल गाँधी समेत विपक्षी नेता और वामपंथी-इस्लामी इकोसिस्टम ये अफवाह फैलाने लगा कि अमेरिकी नेवी ने भारत के गेस्ट को मार गिराया।
यहाँ समझने वाली बात ये भी है कि भारत के पानी में जब तक ये जहाज रहा, उसे अमेरिकियों ने हाथ नहीं लगाया। वो हमले से पहले ही इंटरनेशनल वॉटर जोन में था। जहाँ किसी संपर्क कॉल पर जवाब देना भी श्रीलंकाई नेवी का काम था, वो उसने किया भी। लेकिन उसे भारत के पानी में मार गिराया गया, ऐसा दावा करके कांग्रेसी इकोसिस्टम सिर्फ भारतवासियों को गुमराह ही कर रहा है।
वैसे, यहाँ ये बात भी समझनी होगी कि जब युद्ध होता है, तो पनडुब्बियों का काम दुश्मन को पानी में खोज कर खत्म करना है। अमेरिकी नेवी ने ईरानी जहाज को इंटरनेशनल पानी में मारा। डिस्ट्रेस कॉल श्रीलंका में गई, लेकिन छाती यहाँ कांग्रेसियों-वामपंथियों की छाती फटने लगी? क्यों? क्योंकि वो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह से भारत सरकार के नेतृत्व को नीचा दिखाया जाए।
इस मामले से कुछ समय पहले ही अमेरिकी मीडिया ने फेक खबरें चलाई कि अमेरिका भारतीय नौसैनिक अड्डों का इस्तेमाल कर रहा है, जोकि पूरी तरह से झूठ था। और अब ऐसी ही फर्जी खबरें बनाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश ये इकोसिस्टम कर रहा है।
इसे इस उदाहरण से समझें कि कोई मेरा गेस्ट कई दिन पहले ही मेरे घर से रवाना हो चुका है। उसका देश जंग में फंसा है और वो रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो इसमें पूर्व मेजबान का क्या लेना देना? लेकिन नहीं… इसे भारत सरकार को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटना है, क्योंकि ये भारत की तरक्की देख नहीं पा रहे हैं। सरकार का जनता के साथ मजबूत कनेक्शन नहीं देख पा रहे हैं।
ऐसे में झूठा माहौल खड़ा किया जा रहा है कि भारत अमेरिका-इजरायल जैसे देशों के दबाव में है, जबकि उनकी सरकारों के समय ये दबाव स्पष्ट दिखता था, जिसमें भारत के वीर सैनिकों ने अपना खून बहाकर जंगें जीती और बातचीत की मेजों पर इनकी सरकारों ने वो बढ़त गवाँ दिए।
चलिए, ये पूरा मामला समझाने के लिए आपको विस्तार से हरेक कड़ी के बारे में बताते हैं। इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 की पृष्ठभूमि, युद्धपोत के डूबने की घटना, ईरानी दावे, अमेरिकी पुष्टि, भारतीय सरकार की प्रतिक्रिया और विपक्ष की बयानबाजी शामिल है। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे यह कॉन्ग्रेसी-वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का इकोसिस्टम झूठी खबरें फैलाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 को समझें
यह सब शुरू होता है फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 से, जो भारतीय नौसेना द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से आयोजित एक प्रमुख समुद्री कार्यक्रम था। यह आयोजन 15 से 25 फरवरी तक चला और इसका उद्देश्य वैश्विक नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और भारत की नौसैनिक क्षमताओं का प्रदर्शन करना था।
आईएफआर 2026 में 74 देशों की भागीदारी हुई, जिसमें 66 भारतीय जहाज, भारतीय तटर रक्षक, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी के जहाज शामिल थे। विदेशी नौसेनाओं से 19 जहाज और 45 मार्चिंग कंटिंजेंट आए, साथ ही तीन देशों के 60 से अधिक विमान भी भाग लिए।
यह आयोजन पूर्वी नौसेना कमान (ईएनसी) के तहत विशाखापत्तनम में हुआ, जहाँ राष्ट्रपति मुर्मू ने आईएनएस सुमेधा से फ्लीट की समीक्षा की। प्रमुख जहाजों में आईएनएस विक्रांत (भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत), आईएनएस विशाखापत्तनम (विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर) और अन्य आधुनिक जहाज शामिल थे। ईरान का युद्धपोत आईआरआईएस डेना भी इस आयोजन में शामिल था, जो एक माउज क्लास फ्रिगेट था।
यह जहाज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस (हालाँकि ये साफ है कि किसी एक्सरसाइज में नेवी अपने हथियारों को साथ नहीं रखती, ऐसे में डेना के पास भी हथियार नहीं थे) हो सकता था और इसमें एक हेलीकॉप्टर भी रखने की क्षमता थी। आयोजन 25 फरवरी को समाप्त हुआ, और सभी भाग लेने वाले देशों की नौसेनाएँ अपने गंतव्यों की ओर रवाना हो गईं।
इस समय तक कोई युद्ध की स्थिति नहीं थी, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर आश्चर्यजनक हमला किया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस हमले ने मध्य पूर्व में संघर्ष को तेज कर दिया और ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले शुरू कर दिए।
आईएफआर 2026 न केवल एक सैन्य प्रदर्शन था, बल्कि यह भारत की नौसैनिक कूटनीति का प्रतीक था। आयोजन में भाग लेने वाले जहाजों ने बंगाल की खाड़ी में अभ्यास किया, और यह भारत की ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) नीति को मजबूत करने का माध्यम था। लेकिन विपक्ष ने इस आयोजन को भी विवादास्पद बनाने की कोशिश की, खासकर जब आईआरआईएस डेना की घटना हुई।
आईआरआईएस डेना के डूबने से जुड़ी घटनाएँ
आईआरआईएस डेना को बुधवार (4 मार्च 2026) को अमेरिकी वर्जीनिया क्लास परमाणु पनडुब्बी ने हिंद महासागर में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टॉरपीडो से मार गिराया। यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 40 किलोमीटर दूर हुई, जो भारतीय क्षेत्र से काफी दूर थी।
जहाज पर सवार कम से कम 87 नाविकों की मौत हो गई, जबकि 32 को बचाया गया और गाले अस्पताल में भर्ती किया गया। दर्जनों अभी भी लापता हैं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इसकी पुष्टि की और कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा टॉरपीडो से किसी जहाज को डुबाने की पहली घटना है। उन्होंने इसे ‘साइलेंट डेथ’ करार दिया।
ईरान ने इस हमले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कहा कि आईआरआईएस डेना ‘भारतीय नौसेना का मेहमान’ था और अमेरिका इसे बिना चेतावनी के मार गिराया। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी कि ‘अमेरिका इस कायराना हरकत (बिना चेतावनी हमला, वैसे युद्धकाल में कैसी चेतावनी?) का कड़वा अफसोस करेगा।’
ईरान का दावा था कि जहाज आईएफआर 2026 से लौट रहा था, इसलिए यह भारत से जुड़ा था। लेकिन तथ्य बताते हैं कि जहाज 25 फरवरी को विशाखापत्तनम से रवाना हो चुका था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की ओर जा रहा था। डिस्ट्रेस सिग्नल श्रीलंका की नौसेना को 5:08 बजे सुबह मिला, और बचाव अभियान श्रीलंका ने चलाया।
इस घटना ने मध्य पूर्व में संघर्ष को और तेज कर दिया। ईरान ने इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर नए हमले किए, जबकि इजरायल ने तेहरान पर ‘बड़े पैमाने’ के हमले शुरू किए। वैश्विक स्तर पर यह घटना हिंद महासागर में युद्ध के विस्तार का संकेत थी, जो 2500 नॉटिकल मील दूर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से काफी दूर था।
भारत सरकार की तटस्थता सही, प्रतिक्रिया भी संतुलित, फेक न्यूज की भी खोली पोल
भारतीय सरकार ने इस घटना पर सतर्क रुख अपनाया। सरकारी सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि आईआरआईएस डेना और उसके क्रू केवल 16 से 25 फरवरी 2026 तक भारत के मेहमान थे। 28 फरवरी 2026 को युद्ध घोषित होने के बाद जहाज ने भारत से कोई मदद नहीं माँगी। घटना भारतीय क्षेत्र से बाहर अंतरराष्ट्रीय जल में हुई, इसलिए भारत का इससे कोई सीधा लेना-देना नहीं था।
विदेश मंत्रालय की फैक्ट-चेकिंग यूनिट ने अमेरिकी मीडिया की उन खबरों का खंडन किया, जिसमें दावा किया गया कि अमेरिकी नौसेना भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए कर रही है। मंत्रालय ने कहा, “अमेरिकी चैनल ओएएन पर किए जा रहे दावे फेक और झूठे हैं।” यह स्पष्टीकरण सेवानिवृत्त अमेरिकी आर्मी कर्नल डगलस मैकग्रेगर के दावे के जवाब में आया, जिन्होंने कहा था कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपने बेस नष्ट होने के बाद भारतीय बंदरगाहों पर निर्भर है।
भारत ने संघर्ष पर तटस्थ रुख अपनाते हुए संवाद और कूटनीति की अपील की। सरकार ने पश्चिम एशिया में रहने वाले करीब 10 मिलियन भारतीयों के हितों की रक्षा पर जोर दिया। यह रुख भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, जहाँ वह किसी गुट में शामिल नहीं होता।
विपक्ष कर रहा भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश
विपक्ष ने इस घटना को भारत सरकार पर हमला करने का मौका बना लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने एक्स पर पोस्ट किया, “दुनिया एक अस्थिर चरण में प्रवेश कर चुकी है। आगे तूफानी समुद्र हैं। भारत की तेल आपूर्ति खतरे में है, क्योंकि 40% से अधिक आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। एलपीजी और एलएनजी की स्थिति और भी खराब है। संघर्ष हमारे पिछवाड़े तक पहुँच गया है, जहाँ हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत डुबो दिया गया। फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। ऐसे समय में हमें पहिये पर मजबूत हाथ की जरूरत है। इसके बजाय भारत के पास एक समझौता करने वाला पीएम है जिसने हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को आत्मसमर्पण कर दिया है।”
The world has entered a volatile phase. Stormy seas lie ahead.
India’s oil supplies are under threat, with more than 40% of our imports transiting the Strait of Hormuz. The situation is even worse for LPG and LNG.
The conflict has reached our backyard, with an Iranian warship…
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी एक्स पर लिखा: “वाशिंगटन की कार्रवाई का भारत के लिए अपार प्रभाव है और यह चौंकाने वाला है कि अब तक डूबने पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। मोदी सरकार का इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान न देना आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए, क्योंकि सरकार ने अभी तक ईरान में टारगेटेड हत्याओं पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है, जो ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का संदर्भ है। भारतीय सरकार कभी इतनी डरपोक और भयभीत नहीं लगी।”
भारतीय नौसेना का प्रमुख बहुपक्षीय अभ्यास MILAN पहली बार 1995 में आयोजित किया गया था। इसका 13वां संस्करण 19 फरवरी से 25 फरवरी 2026 तक विशाखापट्टनम में आयोजित हुआ, जिसमें अमेरिका और ईरान सहित अन्य देशों के 18 युद्धपोतों ने भाग लिया। इस अभ्यास का उद्घाटन रक्षा मंत्री ने किया था।…
ये बयान विपक्ष की रणनीति को दर्शाते हैं, जहाँ वे भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहे हैं। पहले उन्होंने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को निशाना बनाया और इसे ईरान-इजरायल युद्ध में भारत की साजिश बताया। फिर, खामेनेई की मौत पर दुख न जताने और अमेरिका-इजरायल का विरोध न करने पर आलोचना की। अब, आईआरआईएस डेना को ‘भारत का मेहमान’ बताकर अमेरिका के हमले को भारत से जोड़ा जा रहा है।
राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कहा कि ईरानी भारत के मेहमान थे जब उनकी फ्रिगेट मार गिराई गई। लेकिन तथ्य है कि जहाज 25 फरवरी को रवाना हो चुका था, और घटना 4 मार्च को हुई।
फर्जी नरेटिव को आगे बढ़ाने में जुटा वामपंथी इकोसिस्टम
वामपंथी और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम भी इस नरेटिव को बढ़ावा दे रहा है। वे अफवाह फैला रहे हैं कि अमेरिकी नौसेना ने भारत के गेस्ट को मार गिराया, जबकि पनडुब्बियों का काम युद्ध में दुश्मन को खोजकर खत्म करना है। यह सब भारत सरकार को नीचा दिखाने का प्रयास है। उदाहरण के लिए, अगर कोई मेहमान कई दिन पहले घर से रवाना हो चुका है और रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो पूर्व मेजबान का क्या दोष? लेकिन विपक्ष इसे भारत को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटने का बहाना बना रहा है।
मेजों पर जीते युद्ध गँवाने वाले दे रहे कूटनीति का ज्ञान
यह इकोसिस्टम भारत की तरक्की नहीं देख पा रहा। मोदी सरकार का जनता से मजबूत कनेक्शन उन्हें खटक रहा है। वे दावा कर रहे हैं कि भारत अमेरिका-इजरायल के दबाव में है, जबकि पिछली कॉन्ग्रेस सरकारों में दबाव स्पष्ट था, जहाँ भारतीय सैनिकों ने खून बहाकर जंगें जीतीं, लेकिन बातचीत की मेज पर बढ़त गँवा दी।
चाहे वो लाहौर जीतकर भी ताशकंद में उसे लौटा देना हो, या ढाका से लेकर सियालकोट शहर तक पहुँचकर भी उसे शिमला समझौते में छोड़ देना, जबकि उस समय का नेतृत्व चाहता तो पाकिस्तान को अपनी शर्तों पर घुटने को मजबूत करता और पूरा कश्मीर विवाद खत्म करा सकता था। जबकि इसकी जगह हमने 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों को ‘पालने’ की सेवा की।
आम जन को विपक्ष के नरेटिव को समझने की जरूरत
सभी घटनाक्रमों को जोड़ देखने पर ये साफ हो जाता है कि जिन चीजों से भारत का कोई लेना-देना नहीं, उन बातों को लेकर मोदी सरकार को बेवजह घसीटकर भारत के अंदर का माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में ये साफ है कि राहुल गाँधी और उनके पूरे गैंग बयानबाजी सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भर है, जो राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान पहुँचा सकती है।
यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे विपक्ष भारत को युद्ध में घसीटकर देश को बर्बाद करने की कोशिश कर रहा है। बहलहाल, भारत देश के लोग इतने समझदार हैं कि वो वैश्विक मुद्दों पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष की बातों में नहीं ही जाएगी।
हिंदू की हत्या में पीड़ित मुस्लिम को दिखाया जा रहा, पूछा जा रहा कहाँ है रिजवान? (साभार : Grok & Social Media Tweets) दिल्ली के उत्तम नगर में हुए तरुण हत्याकांड को लेकर सोशल मीडिया पर अब एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तेज हो गई है। पहले जहाँ हिंदू लड़के की हत्या मामले में असली पीड़ित मुस्लिम परिवार को दिखाने की गई। वहीं अब ध्यान ज्यादा भटकाने के लिए यह दावा फैलाया जा रहा है कि 4 मार्च को हुए विवाद के बाद मुस्लिम परिवार का 14 साल का लड़का रिजवान भी ‘गायब’ है। उसका कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा है।
इस नैरेटिव को हवा देने में कई तथाकथित सेकुलर और इस्लाम के नाम पर राजनीति और पत्रकारिता करने वाले कई चेहरे खुलकर सामने आ गए हैं। RJ सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी हीरोइन सोनाक्षी सिन्हा तक ने एक जैसा अभियान चलाते हुए सोशल मीडिया पर सवाल उठाया- “हेलो दिल्ली पुलिस, रिजवान कहाँ है?”
सवाल को उठाने का मकसद साफ है। पढ़ने वाले के मन में यह बैठाना कि उत्तम नगर की घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ने ही अपना बेटा नहीं खोया, बल्कि आरोपित मुस्लिम परिवार का भी एक बच्चा लापता है। पुलिस को टैग करने की रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि आरोपों को गंभीरता का रंग दिया जा सके। आम पाठक को लगे कि जब सीधे पुलिस से सवाल किया जा रहा है तो शायद बात में दम होगा।
इस अभियान में AIMIM से जुड़े नेता वारिस पठान से लेकर कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और इस्लामी कट्टरपंथी शामिल हैं। देख सकते हैं कैसे सबने लगभग एक जैसे शब्दों में ट्वीट कर इस कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
हालाँकि, यह नैरेटिव ज्यादा देर टिक नहीं पाया क्योंकि द्वारका जिले के डीसीपी ने खुद पोस्ट करके इस सवाल का जवाब दिया। उन्होंने बताया कि जिस रिजवान को ‘लापता’ बताया जा रहा है, वह दरअसल इस मामले के मुख्य आरोपितों में से एक है। उसे गिरफ्तार किया जा चुका है और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेश पर ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया गया है। यानी उसके गायब होने की कहानी पूरी तरह झूठी और भ्रामक है।
🚨 **PUBLIC APPEAL | Uttam Nagar Incident** 🚨
Dwarka District Police appeals to all citizens to maintain peace and harmony in view of the Uttam Nagar incident.
Do not trust or forward rumours and unverified information circulating on social media.
सोशल मीडिया पर सक्रिय जाकिर अली त्यागी ने भी इसी सुर में लिखा कि परिवार के अनुसार वह ‘मासूम’ अभी 13–14 साल का है और उसे भी नहीं छोड़ा गया। उनके मुताबिक एक अकेले तरुण नाम के युवक की हत्या के आरोप में इतने लोगों- खासकर महिलाओं और बच्चों को घसीटना गलत है।
दिल्ली पुलिस ने Where is Rizwan पूछने वालों को जवाब दे दिया है कि "पुलिस ने उसे तरुण के हत्यारोपियों में शामिल कर उसे भी हत्यारोपी बना जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में पेश कर ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया हैं।"
एक मासूम जिसकी उम्र परिवार के मुताबिक़ अभी महज़ 13 साल के आस पास है, उसे भी नहीं… pic.twitter.com/JjIPRCvCeC
यह तर्क अपने आप में अजीब है। क्या किसी अपराध में शामिल व्यक्ति को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि उसकी उम्र कम है या वह किसी खास परिवार से आता है? अगर पुलिस के पास सबूत हैं कि रिजवान इस हत्या में शामिल था, तो कानून के मुताबिक उसे हिरासत में लिया जाना स्वाभाविक है।
दरअसल समस्या यह है कि कुछ लोग भीड़ हिंसा के उस पैटर्न को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं, जिसे देश कई बार देख चुका है। दिल्ली दंगों में बुर्का पहने महिलाओं की भीड़ द्वारा पुलिस पर हमला करने की घटनाएँ सामने आई थीं। कश्मीर में पत्थरबाजी के दौरान बच्चों को भीड़ का हिस्सा बनाकर आगे किया गया। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि कट्टरपंथी तत्व भीड़ तैयार करते समय उम्र और लिंग की परवाह नहीं करते।
उत्तम नगर की घटना में भी 4 मार्च को होली के दिन हुई हिंसा को लेकर कई चश्मदीद अपने बयान दे चुके हैं। पुलिस की जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की भूमिका खंगाली जा रही है। लेकिन इन सबके बीच ये वर्ग लगातार कोशिश कर रहा है कि असली मुद्दे से ध्यान भटक जाए। इनकी चिंता तरुण की हत्या पर नहीं, उसके परिवार के लिए नहीं, बल्कि आरोपितों के बचाव में है।
आज तरुण की हत्या पर संदेह करना साफ बताता है कि इस सेकुलर जमात के लिए सामने दिख रहा सच कोई महत्व नहीं रखता, इन्हें सिर्फ मजहब देखकर आवाज पीड़ित के लिए आवाज उठानी है। लेकिन ऐसे लोग ध्यान रखें, नैरेटिव कितना भी गढ़ा जाए, लेकिन तथ्य नहीं बदलते।
सपा नेता अब्दुल रेहान के घर मिले 55 गैस सिलेंडर (फोटो साभार : NBT) उत्तर प्रदेश में गैस सिलेंडरों की किल्लत के बीच कालाबाजारी करने वालों पर पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। हापुड़ के गाँव असौड़ा में समाजवादी पार्टी के नेता अब्दुल रेहान के घर पर पुलिस और जिला पूर्ति विभाग ने छापेमारी की। इस कार्रवाई में रेहान के घर से 55 भरे हुए और कई खाली गैस सिलेंडर बरामद हुए हैं। छापेमारी की भनक लगते ही आरोपित नेता मौके से फरार हो गया, जिसकी तलाश में पुलिस जुटी है।
सरकार और पुलिस को सिलेंडर सप्लाई करने वाली एजेंसी पर सख्त कार्यवाही कर उसका लाइसेंस तुरंत कैंसिल कर उसके बैंक अकाउंट और दुकान को भी सील कर देना चाहिए।
महँगे दामों पर बेच रहे थे सिलेंडर
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि अब्दुल रेहान मजबूरी का फायदा उठाकर जरूरतमंदों को एक सिलेंडर 2000 रुपए तक में बेच रहा था। पुलिस को सूचना मिली थी कि पंचायती घर के पास रहने वाला रेहान अपने घर में अवैध रूप से सिलेंडरों का बड़ा स्टॉक जमा किए हुए है। सूचना मिलते ही टीम ने दबिश दी और सभी सिलेंडरों को जब्त कर लिया।
यूपी हापुड़ में सपा नेता अब्दुल रेहान के घर से 55 भरे और कई खाली सिलेंडर बरामद हुये।
योगी जी को बदनाम करने की करारी साजिश-
जनता सब देख रही है... आपके आसपास कोई कालाबाजारी दिखे तो तुरंत पुलिस से शिकायत करें! pic.twitter.com/6nKxLF2LRs
प्रदेश में सिलेंडरों की कमी के बीच इस तरह की कालाबाजारी को योगी सरकार को बदनाम करने की साजिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि अवैध भंडारण के खिलाफ यह अभियान जारी रहेगा। साथ ही जनता से अपील की गई है कि यदि कहीं भी ऐसी कालाबाजारी दिखे, तो तुरंत पुलिस को सूचित करें।
पिछले महीने 23 फरवरी को चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी ने वरिष्ठ वकील Mathews J Nedumpara को उनके द्वारा कॉलेजियम को ख़त्म करके NJAC बहाल करने की याचिका की लिस्टिंग को लेकर जबरदस्त फटकार लगाई। उनकी याचिका पहले 17 नवंबर, 2022 को दायर हुई थी और CJI चंद्रचूड़ ने उस पर सुनवाई का आश्वासन भी दिया था। इसका मतलब था याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार हो गई थी, लेकिन याचिका लिस्ट नहीं हुई।
लेखक चर्चित YouTuber
चंद्रचूड़ जी द्वारा सुनवाई छोड़िए, 26 अप्रैल, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार पुनीत सहगल ने एडवोकेट मैथूस नेदमपरा की कॉलेजियम को ख़त्म करने और NJAC को बहाल करने की याचिका को accept करने से मना करते हुए कहा कि -
“कॉलेजियम को पहले ही Upheld किया जा चुका है और NJAC को, जिसमे जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार को बराबर के अधिकार दिए गए थे, संविधान पीठ ने October, 2015 में ख़ारिज कर दिया था। review petition भी 2018 में ख़ारिज हो गई थी। इसलिए Repeat litigation न्यायपालिका के समय और energy की बर्बादी करना है”।
पुनीत सहगल ने 2013 के सुप्रीम कोर्ट के Rules का सहारा लेते हुए कहा कि -
“I hold that the registration of the present case was not proper and by virtue of order XV Rule 5 of the Supreme Court Rules, 2013 I hereby decline to receive the same”.
2013 के rule के अनुसार रजिस्ट्रार याचिका को Receive करने से मना कर सकता है अगर याचिकाकर्ता ने कोई reasonable cause नहीं बताया या यह याचिका तुच्छ है या इसमें scandalous matter है।
CJI सूर्यकांत ने भी आश्वासन दिया था कि वो कॉलेजियम को ख़त्म करने पर विचार करेंगे और उनकी याचिका सुनेंगे। वकील Nedumpara 23 फरवरी को अपनी याचिका की लिस्टिंग की मांग करने की जिद की और लगता है वे Out of Desperation कह गए कि अंबानी/अडानी के मामलों के लिए संविधान पीठ बन जाती हैं लेकिन आम आदमी के विषयों की सुनवाई नहीं होती।
इस बात पर सूर्यकांत जी को घोर आपत्ति हुई और उन्होंने Nedumpara को कहा “Mr Nedumpara, be careful with what you submit in my court, you have seen me in Chandigarh, in Delhi ... I am warning you, be careful. Don’t think you will be able to continue misbehaving as you have been doing with other benches, I am warning you”. Nedumpara को यह भी कहा गया कि उनकी याचिका रजिस्ट्री के पास नहीं है। उनकी 3 लंबित याचिकाओं में एक तो 27 जनवरी, 2026 को दायर हुई थी।
आप चीफ जस्टिस हैं और किसी भी वकील के बर्ताव पर आपको नाराज़ होने का पूरा अधिकार हैं लेकिन एक बार Nedumpara का दर्द भी समझाना जरूरी था। क्या यह सत्य नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की चांडाल चौकड़ी अपने मामलों की लिस्टिंग अपनी मर्जी से करवाते रहे हैं और इसलिए ही उन्हें 30-35 लाख रूपए फीस एक दिन की मिलती है।
ठीक है आपको Nedumpara के शब्द बुरे लगे लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट में CJI रंजन गोगोई की पीठ के सामने वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने 16 अक्टूबर, 2019 को Official Documents फाड़ कर बेंच की तरफ फ़ेंक दिए थे लेकिन उन्हें ऐसे नहीं धमकाया गया जैसे Nedumpara की बात को Misbehaviour समझ कर फटकार मारी गई।
इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने राष्ट्रपति को आदेश दे दिए जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था। दो जज राष्ट्रपति को आदेश दे सकते थे लेकिन दो जज केजरीवाल की गिरफ़्तारी की वैधता पर फैसला नहीं कर सकते थे जो उन्होंने संविधान पीठ को फैसला करने को छोड़ दिया लेकिन वह पीठ आज 2 साल में भी नहीं बनी।
कॉलेजियम पर फैसला तो करना होगा। जो फैसला 2015 में दिया वह गलत था क्योंकि उसने 125 करोड़ जनता की भावनाओं की अनदेखी की थी क्योंकि वह क़ानून संसद ने सर्वसम्मति से पास किया था और 16 राज्यों ने अनुमोदन किया था। उसे 4 जज कैसे ख़ारिज कर सकते थे जिनकी जवाबदेही जनता के प्रति नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट इस कॉलेजियम के मामले में stakeholder और interested party है, इसलिए वह सही निर्णय नहीं ले सकता। इसके निर्णय के लिए कोई और मार्ग ढूंढना होगा।
दोस्त से दुश्मन बन गए ईरान और इजरायल (साभार: Britannica, CNN और NBC News) आज ईरान और इजरायल सीधे हमले कर रहे हैं और खुले युद्ध की मुहाने पर दोनों देश खड़े हैं। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हजारों मिसाइलें दागी हैं जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुँच गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है।
ऐसी खुली दुश्मनी के माहौल में यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि कभी इजरायल और ईरान गुप्त साझेदार हुआ करते थे। लेकिन अगर हम कुछ दशक पीछे जाएँ तो याद आता है कि दोनों देश एक समय गुप्त सहयोगी थे और उनका निशाना एक साझा दुश्मन था- इराक।
एक साझा दुश्मन: सद्दाम का इराक
1960 और 1970 के दशक में जब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक नहीं बना था तब वहाँ शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस समय ईरान के पश्चिमी देशों से दोस्ताना संबंध थे और इजरायल के साथ भी उसके करीबी रिश्ते थे।
दोनों देशों के लिए इराक एक बड़ा खतरा था। इजरायल अपने चारों ओर दुश्मन अरब देशों से घिरा हुआ था। वहीं, शाह के शासन वाला ईरान, इराक के बढ़ते अरब राष्ट्रवादी नेतृत्व और उसके महत्वाकांक्षी रुख से चिंतित था। खासकर सद्दाम के दौर में इराक की क्षेत्रीय प्रभुत्व की कोशिशों ने ईरान और इजरायल दोनों को परेशान कर दिया था।
इसी साझा चिंता ने गहरे सहयोग की नींव रखी। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की गुप्त पुलिस SAVAK ने मिलकर इराक के भीतर कुर्द विद्रोहियों का समर्थन किया। रणनीति साफ थी कि बगदाद को अंदर से कमजोर करना है।
1958 तक इजरायल, ईरान और तुर्की ने मिलकर एक गुप्त खुफिया गठबंधन बना लिया था जिसे ‘ट्राइडेंट’ कहा जाता था। विश्लेषक ट्रीटा पारसी के अनुसार इसकी सोच यह थी कि इजरायल को मध्य पूर्व के ‘किनारे’ पर मौजूद गैर-अरब देशों के साथ दोस्ती करनी चाहिए। ईरान इनमें सबसे महत्वपूर्ण था। इसकी वजह सिर्फ उसकी सैन्य ताकत नहीं थी बल्कि यह भी था कि उसके पास तेल था, जिसे अरब देश इजरायल को बेचने से मना कर रहे थे।
इस्लामिक क्रांति ने सब बदल दिया
1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति के साथ ही सब कुछ बदल गया। शाह देश छोड़कर भाग गए और ईरान एक पश्चिम समर्थक राजशाही से बदलकर शरिया कानून पर आधारित इस्लामिक गणराज्य बन गया। खामेनेई ने खुले तौर पर अमेरिका को ‘ग्रेट सैटन’ (बड़ा शैतान) और इजरायल को ‘लिटिल सैटन’ (छोटा शैतान) कहा था।
ईरान सार्वजनिक रूप से इजरायल का कट्टर विरोधी बन गया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति अक्सर पर्दे के पीछे अलग तरह से काम करती है।
क्रांति के सिर्फ 18 महीने बाद सितंबर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया। ईरान-इराक युद्ध शुरू हो चुका था। सद्दाम ने सोचा कि वह ईरान की अंदरूनी अराजकता का फायदा उठाकर पुराने सीमा विवाद (खासकर शत्त-अल-अरब जलमार्ग से जुड़ा) निपटा सकता है। यह युद्ध 8 साल तक चला और इसमें लाखों लोगों की जान गई।
वैचारिक दुश्मनी के बावजूद, ईरान और इजरायल ने एक बार फिर खुद को एक ही दुश्मन ‘सद्दाम के इराक’ के सामने खड़ा पाया।
गुप्त हथियार, शांत सौदे
ईरान की सेना बहुत हद तक शाह के दौर में खरीदे गए अमेरिकी हथियारों और उपकरणों पर निर्भर थी। 1979 के बंधक संकट के बाद, जब ईरानी छात्रों ने 50 से अधिक अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा, तब अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इससे ईरान के सामने हथियारों और कल-पुर्जों की भारी कमी हो गई। ऐसे समय में इजरायल ने हस्तक्षेप किया।
1980 में इजरायल ने गुप्त रूप से ईरान को एफ-4 फैंटम लड़ाकू विमानों के लिए कल-पुर्जे उपलब्ध कराए। इनके बिना ईरान की वायुसेना का बड़ा हिस्सा जमीन पर ही खड़ा रह जाता। हथियारों की यह आपूर्ति यूरोप के रास्ते अक्सर तीसरे देशों के माध्यम से जारी रही।
इज़रायल के नजरिए से इराक की जीत को रोकना बेहद जरूरी था। सद्दाम हुसैन की सरकार को तत्काल और बड़ा खतरा माना जाता था। ईरान की मदद करके इराक को कमजोर करना रणनीतिक रूप से सही कदम समझा गया। एक और चिंता भी थी और वह थी, ईरान में रह रहे लगभग 60,000 यहूदियों की सुरक्षा।
ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण
1980 के दशक के मध्य में ‘ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण’ के दौरान यह गुप्त रिश्ता दुनिया के सामने आया। अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुप्त रूप से (आंशिक रूप से इजरायली रास्ते से) ईरान को हथियार बेचने में मदद की। बदले में लेबनान में हिज्बुल्लाह द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई की कोशिश की गई।
इस धन का कुछ हिस्सा अवैध रूप से निकारागुआ के कॉन्ट्रा विद्रोहियों को दिया गया। इस घोटाले से रीगन सरकार की साख को नुकसान पहुँचा और वॉशिंगटन, यरुशलम और तेहरान के बीच गुप्त सौदों का खुलासा हुआ। विवाद के बावजूद ईरान-इराक युद्ध के दौरान हथियारों की आपूर्ति जारी रही।
रणनीतिक सहयोगी से कट्टर दुश्मन तक
1988 में ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद इजरायल और ईरान की गुप्त नज़दीकी कमजोर पड़ने लगी। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ने सत्ता संभाली और इजरायल विरोधी कड़ा रुख जारी रखा।
1990 के दशक तक हालात बदल चुके थे। खाड़ी युद्ध के बाद इराक कमजोर हो गया और सोवियत संघ टूट गया। वे कारण खत्म हो गए जिन्होंने कभी इजरायल और ईरान को साथ लाया था।
इसके बाद ईरान ने खुद को इजरायल का दुश्मन बना लिया। उसने लेबनान में हिज्बुल्लाह और गाजा में हमास का समर्थन किया जिन्होंने 2006 और 2008 में इजरायल से सीधे युद्ध लड़े। ईरानी नेता अक्सर इजरायल के विनाश की बात करते रहे।
2026: युद्ध के कगार पर
आज हालात सीधे टकराव तक पहुँच चुके हैं। अमेरिकी चेतावनियों के बावजूद खामेनेई के नेतृत्व में आगे बढ़ाए गए ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने तनाव बढ़ाया है। पिछले एक साल में आर्थिक संकट और राजनीतिक दमन के कारण 31 प्रांतों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों पर सख्ती से वैश्विक आलोचना बढ़ी और वॉशिंगटन का दबाव भी तेज हुआ।
घरेलू अशांति, परमाणु तनाव और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्षों के बीच हाल में US-इजरायल के हमलों में खामेनेई की मौत हुई। जवाब में ईरान ने इजरायल पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले किए। इज़रायल पहले से ही ईरान समर्थित गुटों गाजा में हमास, लेबनान में हिज्बुल्लाह और यमन में हूती से लड़ रहा है। दोनों देश अब पूर्ण युद्ध के सबसे करीब हैं।
इतिहास बताता है कि भू-राजनीति स्थायी नहीं होती। कभी इजरायल और ईरान ने इराक के खिलाफ साथ काम किया था। वह साथ विचारधारा नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत पर आधारित था। आज मिसाइलों और धमकियों के बीच वह दौर अकल्पनीय लगता है। पर मध्य पूर्व में रिश्ते बदलते हैं कल के गुप्त साझेदार आज के कट्टर दुश्मन बन सकते हैं।
तरुण हत्याकांड पर नया Victim card नैरेटिव फैलाने पर लगे वामपंथी-कट्टरपंथी दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन इस्लामी भीड़ द्वारा की गई हिंदू युवक की हत्या मामले में अब नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश शुरू हो गई है। एक तरफ जहाँ वामपंथी रिपोर्टिंग के लिए कुख्यात बीबीसी इस कोशिश में जुटा है कि कैसे पूरे मामले में मजहब वाले एंगल को साइड किया जाए, तो वहीं सोशल मीडिया पर वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी समूह के लोग ये फैला रहे हैं कि तरुण हत्याकांड में असलियत में हिंदू पक्ष नहीं बल्कि मुस्लिम पक्ष पीड़ित है।
तरुण खटीक की मौत- मुस्लिम लड़की के लिए छोटी सी बात
इस नैरेटिव को गढ़ने के लिए सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से फैलाया जा रहा है। इस वीडियो में आरोपित मुस्लिम परिवार की महिला रोते-बिलखते यह दावा कर रही है कि हर कोई हिंदुओं का पक्ष दिखा रहा है जबकि असल में ‘पीड़ित’ उनका परिवार है। वह कहती है- हिंदू-मुस्लिम सबको उन लोगों के उनके समर्थन में सड़कों पर उतरना चाहिए और उनके लिए न्याय माँगना चाहिए।
वीडियो में ये लड़की उस घटना को, उस विवाद को, मजहबी कट्टरता को छोटी सी बात बता रही है जिसके कारण निर्ममता से तरुण की हत्या कर दी गई। सुन सकते हैं कि लड़की कहती है- छोटी सी बात को इस बढ़ा दिया, क्या किसी के घर पर बुलडोजर चलाया जाता है?
दिल्ली के Uttam Nagar मामले में मीडिया और संघ के लोग एकतरफा नॉरेटिव दिखाकर माहौल खराब करना चाहते हैं, सच्चाई क्या है, दूसरे पक्ष की मुस्लिम लड़की ने खुद सामने आ कर बताया.मामला छेड़खानी से शुरू हुआ था. वीडियो पूरा देखिये और ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए. सवाल यह है कि पीड़ित कौन… pic.twitter.com/NQbxLFXpTD
वीडियो में लड़की आगे मुस्लिम कार्ड खेलते हुए दोहराती है कि उन्हें सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। असलियत ये है कि होली के दिन उसकी बुआ सहरी के लिए सामान लेने गई थी जब उनपर गंदे पानी का गुब्बारा फेंका गया। इसके बाद हिंदू परिवार ने लड़ाई शुरू की, उसके घर के लड़कों ने कुछ नहीं किया। यहाँ तक तरुण की हत्या का इल्जाम भी लड़की तरुण के घरवालों पर ही लगाती है।
इस्लामी कट्टरपंथी और वामपंथी हुए एक्टिव
अब यही वीडियो को साझा करते दिल्ली में AIMIM पार्टी के अध्यक्ष शोएब जमई ने संघ पर निशाना साधा है। जमई ने कहा है- संघ से जुड़े लोग एकतरफा नैरेटिव दिखाकर माहौल खराब करना चाहते हैं। उनके अनुसार सच्चाई जानने के लिए मुस्लिम पक्ष की इस लड़की की बात भी सुनी जानी चाहिए। जमई ने ये बताना चाहा कि मामला छेड़खानी से शुरू हुआ था और जो मुस्लिम भीड़ टूटी उसे हिंदू ‘आत्मरक्षा’ के नजरिए से देखें और दिल्ली सरकार मुस्लिम पक्ष के साथ न्याय करे।
दिल्ली के Uttam Nagar मामले में मीडिया और संघ के लोग एकतरफा नॉरेटिव दिखाकर माहौल खराब करना चाहते हैं, सच्चाई क्या है, दूसरे पक्ष की मुस्लिम लड़की ने खुद सामने आ कर बताया.मामला छेड़खानी से शुरू हुआ था. वीडियो पूरा देखिये और ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए. सवाल यह है कि पीड़ित कौन… pic.twitter.com/NQbxLFXpTD
इसी तरह मुस्लिम आईटी सेल से जुड़े कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने भी इस वीडियो को साझा किया। उनके दावों के अनुसार, गुब्बारा किसी बच्चे ने नहीं बल्कि 20 साल के युवक ने महिला पर फेंका था। विरोध करने पर नशे में धुत लोगों ने महिला के साथ बदसलूकी की और बाद में तरुण के घरवालों ने ही दूसरे पक्ष को बुरी तरह पीटा।
Uttam Nagar | The truth behind the one-sided narrative.
According to a woman seen in a video, the incident started when a 20-year-old named Prince threw dirty water balloons at a Muslim woman during Holi.
वामपंथी नेता सुभाषिनी अली की बात करें तो वो भी इस नैरेटिव को हवा देने में पीछे नहीं रहीं। उन्होंने अपने फॉलोवर्स को ये बताने की कोशिश की कि तरुण हत्याकांड बहुत जटिल है। मामले में मुस्लिम लोग भी घायल हुए हैं और अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ घरों को लूट लिया गया और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
सुहासिनी अली का प्रयास था कि कैसे भी करके जो तरुण के लिए आवाज उठा रहे हैं उनके भीतर एक ग्लानि आ जाए। ऐसी ग्लानि कि वो लोग भी तरुण हत्याकांड की बात छोड़कर उन लोगों की बात करने लगें जिन्हें चोट उस समय लगी जब वह तरुण को लाठी-डंडे और सरिए से मारने आए थे।
रिपोर्टिंग के नाम पर BBC की ओछी हरकत
अब बात करें मीडिया की तो वामपंथी मीडिया संस्थान बीबीसी की तो उन्होंने इस मुद्दे पर कितना बचाव करते हुए रिपोर्टिंग की है ये देखने लायक है। उन्होंने हिंदू युवक की हत्या केस में 3 मिनट की अपनी रिपोर्ट प्रसारित की है। इसके शीर्षक में उन्होंने ये नहीं बताया कि घटना में कौन मरा, किसने मारा। उन्होंने टाइटल में लिखा कि तरुण के साथ जो हुआ वो दो समुदायों की झड़प का नतीजा था, इसमें एक युवक की मौत हो गई है और जानिए पुलिस ने क्या बताया है।
रिपोर्ट देखते हुए पता चलेगा कि इसमें बीबीसी कुछ खंगालने की जगह ये कहते हुए बचता दिखा कि अभी इलाके में सुरक्षाबल तैनात है और किसी से बात नहीं करने दिया जा रही है। रिपोर्ट में पीड़िता पिता की बाइट लगाई गई। पुलिस का बयान लगाया जिससे कम्युनल एंगल खारिज हो और और बाद में दो ऐसे स्थानीयों की बाइट ली गई जो सिर्फ ये बताते रहे कि इलाके में शांति थी। शरारती तत्व तो हर समाज में होते हैं, उन्हें इंतजार है स्थिति दोबारा पहले जैसे होगी। इनमें एक हरीश और दूसरा अब्दुल है।
अब आएँगे सेकुलरों के न्यूट्रल पोस्ट
ध्यान देने वाली बात यह है उत्तम नगर में 4 मार्च 2026 को हुई तरुण की हत्या के बाद से आसपास के चश्मदीद, पीड़ित परिवार, पड़ोसी लगातार एक ही तरह की बात बता रहे हैं कि बच्ची ने गुब्बारा फेंका, बुर्काधारी महिला बिदकी और इस्लामी भीड़ आकर हिंदू परिवार पर टूट पड़ी।
इन सब बयानों के बावजूद सोशल मीडिया पर अब नई कहानी गढ़ी जा रही है, ताकि तरुण की मौत से ध्यान हटाया जा सके। नए नैरेटिव में ये बताने का प्रयास हो रहा है कि होली के दिन मुस्लिम परिवार शांति से ही था। लड़ाई हिंदू परिवार ने की थी। उन्होंने जानकर मुस्लिम महिला को निशाना बनाया, फिर विरोध करने पर मारपीट करने लगे।
4 मार्च के बाद से ये पूरा एंगल अब तक सामने नहीं आया था। घटना के 5 दिन बाद अचानक से ये कहानी फैलना शुरू हुई और इसे फैलाने वाले वही लोग हैं जिन्होंने इतने दिन से तरुण हत्याकांड पर एक शब्द नहीं बोला। शायद इन्हें इंतजार था कि ऐसा कुछ नैरेटिव सामने आए तो कुछ बोलें।
अब देखना है कि कि पूरे मामले पर तथाकथित ‘न्यूट्रल’ पत्रकार अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता करते हुए आरफा खानम शेरवानी, आरजे सायमा और रवीश कुमार क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
संभव है कि इस मामले पर इन लोगों के ऐसे पोस्ट सामने आएँ- उत्तम नगर में तरुण की मौत होना दुखद है, लेकिन दूसरे पक्ष की आवाज भी सुनी जानी चाहिए। या कह दिया जाए कि जो दिख रहा है और जो लोग बता रहे हैं हो सकता है वो सच न हो… सच वो हो जो ये मुस्लिम लड़की बोल रही है।
कांग्रेस ने कुछ विपक्षी दलों के साथ मिलकर स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ No Confidence Motion पेश किया। 10 घंटे की बहस में खुद विपक्षी नेता जो मर्जी बोलते रहे लेकिन दूल्हे राजा LoP राहुल गांधी सदन से गायब रहे। यानी कांग्रेस ने अपने ही नेता को खुद ही नंगा कर दिया क्योंकि उसके पास बोलने के लिए कुछ था ही नहीं जबकि सबसे ज्यादा तकलीफ बिरला जी से उसे ही थी। उसे सबसे आगे बढ़ कर बिरला का विरोध करना चाहिए था लेकिन उसे आदत है बिना वजह बकबक करने की और फिर भागने की। आखिर कांग्रेस को बिरला के खिलाफ प्रस्ताव लाकर क्या हांसिल हुआ।
लेखक चर्चित YouTuber
मजे की बात है अमित शाह ने जब लोकसभा में राहुल गांधी की कई सदनों में हाजिरी बताई, उसका विशेष मामलों में सदन से गायब रहा बताया, उसका सदन में आंख मारना बताया, प्रधानमंत्री मोदी को उसने जबरन गले लगाया और सदन में Flying Kiss उछाले तो ये सब कांग्रेसी बर्दाश्त नहीं कर सके और शाह के पूरे भाषण में नारे लगाते रहे “अमित शाह माफ़ी मांगो”।
मतलब बहस के विषय से कोई सरोकार ही नहीं था बस हो हल्ला मचाना था।
सदन के बाहर विपक्षी दलों के नेताओं का एक जमावड़ा हाथ में बैनर लिए प्रदर्शन कर रहा था जिसमें लिखा था “Modi Compromised”। बस इसी शब्द को लेकर सारे नेता बौंक रहे हैं जैसे गली का एक कुत्ता कुछ देख कर बिना सोचे भौंकना शुरू करता है तो उसे देख कर पूरी गली के कुत्ते भौंकने लगते हैं।
इन कमीनो को पता नहीं जिस मोदी ने ट्रंप के 4 फ़ोन नहीं उठाए वो कैसे Compromise हो सकता है।
एक एक वाक्य इन नेताओं को दे दिया गया है कि बस उसे ही पीटते रहो चाहे ऐसे नेताओं की औकात दो कौड़ी की भी न हो। केजरीवाल जैसा ढक्कन कह रहा है ट्रंप के आगे मोदी नतमस्तक हो गया है। जो नाम के लिए लोकसभा में बैठी है, वो डिंपल यादव कह रही है ‘अमेरिका के कहने में मोदी सरकार चल रही है”। कांग्रेस के नेताओं और विपक्ष ने बवाल काट रखा है कि ईरान से संबंध ख़राब कर लिए मोदी ने जिससे तेल और गैस की किल्लत हो गई।
कांग्रेस को याद होना चाहिए उसके राज में गैस सिलिंडरों की कैसी लाइन लगती थी - किसानों को यूरिया के लिए रात रात भी धक्के खाने पड़ते थे। गैस सिलिंडरों के लिए होड़ रहती थी 9 मिलेंगे या 12 मिलेंगे। कौन सी ऐसी वस्तु थी जिसके लिए लोग लाइनों में न खड़े होते हो। और तो और बम धमाके भी लाइन से होते थे। मोबाइल फ़ोन पर भी लोग missed call देते थे क्योंकि बात करने पर पैसे खर्च होते थे।
आज सब कुछ बदल गया। क्या 12 साल में ऐसी किल्लत किसी चीज़ की देखी किसी ने। लेकिन कांग्रेस और विपक्ष लोगो को भड़काने में लगा है जबकि दुनियाभर में पेट्रोल के दाम बढे हैं पर भारत में नहीं बढे। कांग्रेस के लाड़ले मुल्क पाकिस्तान में इमरजेंसी लग गई है और पेट्रोल 350 लीटर हो गया है।
मोदी की जगह अगर कांग्रेस सरकार होती तो भारत में पेट्रोल 300 के पार होता और जो 80 करोड़ लोगो को फ्री राशन मिल रहा है वो पाकिस्तान के भूखों को दे रही होती कांग्रेस। बजट में पाकिस्तान को 5000 करोड़ देती जिससे वह हम पर आतंकी हमले करता।
सौ बात की एक बात है कांग्रेस के लिए कुछ भी भारत के लिए बुरा हो, उससे उसे अपार खुशी मिलती है और निशाने पर मोदी रहता है लेकिन वह मोदी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती क्योंकि अब कांग्रेस पूरी तरह “गद्दार पार्टी” बन चुकी है।
पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी अपनी मनमानी कार्यशैली और अकर्मण्यता से बाज नहीं आ रही हैं। उन्होंने पहले चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं की पुरजोर खिलाफत की है। इस बार तो राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद का खुलेआम अपमान किया है। ममता सरकार ने जानते-बूझते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर दिया है। इसके पीछे आदिवासी वोट बैंक को राष्ट्रपति से दूर रखने की सियासी रणनीति सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे राष्ट्रपति का ही नहीं, बल्कि संविधान का अपमान बताया है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना के आरोप लगे हों। इससे पहले भी उन्होंने कई बार केंद्रीय संस्थाओं और संवैधानिक पदों को लेकर तीखे बयान देकर अपमानित किया है। अब जब राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक सीमा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। पश्चिम बंगाल से उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक मतभेद चाहे कितने भी तीखे क्यों न हों, संवैधानिक मर्यादाओं से समझौता किसी भी सूरत में देश बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगकर उसकी हालत इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे तो खाई वाली कर दी है।
संवैधानिक मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसकी संवैधानिक मर्यादाओं में बसती है। इन मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद होता है, जिसे संविधान ने राष्ट्र के प्रथम नागरिक का स्थान दिया है। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार या उसका मुखिया राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल की अनदेखी करता है, तो यह केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं के अपमान से जुड़ा विषय बन जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से जुड़ा विवाद इसी गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। सीएम ममता बनर्जी को यह समझना होगा कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के साथ टकराव का संदेश केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत है। जब संस्थाओं का सम्मान दांव पर लग जाता है, तो नुकसान केवल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मर्यादा और जिम्मेदारी भी दी है। यदि इन मर्यादाओं का सम्मान नहीं होगा, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होगी। इस पूरे विवाद की यही सबसे बड़ी चेतावनी है।
राष्ट्रपति के कार्यक्रम में ममता सरकार की उदासीनता और कुप्रबंधन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हालिया विवाद संवैधानिक प्रोटोकॉल के उल्लंघन से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रपति के सिलीगुड़ी दौरे पर थीं। ममता बनर्जी या उनके किसी भी मंत्री ने उनकी अगवानी नहीं की, जिसे राष्ट्रपति ने अपने पद और आदिवासी समुदाय के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने सार्वजनिक मंच से राज्य सरकार की उदासीनता और कार्यक्रम के कुप्रबंधन पर सवाल उठाए। तृणमूल सरकार की ओर से वह सम्मानजनक व्यवहार और औपचारिक व्यवस्था नहीं दिखाई गई, जो सामान्यतः राष्ट्रपति के दौरे के समय अनिवार्य मानी जाती है। ममता बनर्जी ने इस अक्षम्य गलती को मानने के बजाए, उल्टा राष्ट्रपति पर ही सवाल उठाकर आग में घी का काम किया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कार्यक्रमों के समन्वय और आयोजन को लेकर राज्य सरकार में आपसी मतभेद थे। ममता बनर्जी से गलती को स्वीकारने के बजाए उल्टे आरोप लगा दिए, जिससे यह मतभेद से बढ़कर एक संवैधानिक गतिरोध में बदल गया।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति पद का सम्मान करना अनिवार्य अब गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में रिपोर्ट मांगे जाने से इस विवाद को और भी गहरा दिया है, जिससे केंद्र और पश्चिम बंगाल के बीच पहले से जारी तनाव एक नए स्तर पर पहुँच गया है। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख माना गया है। राष्ट्रपति केवल औपचारिक पद नहीं हैं, बल्कि वह राष्ट्र की एकता, गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक हैं। संसद का संचालन हो, सरकार का गठन हो या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कई संवैधानिक औपचारिकताएं, इन सभी में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण राष्ट्रपति के कार्यक्रमों और दौरों के दौरान राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करें। यह केवल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का हिस्सा है। यदि किसी स्तर पर इस मर्यादा की अनदेखी होती है तो उसे केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जाता, बल्कि उसे संविधान के प्रति असम्मान के रूप में देखा जाता है।
ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता राष्ट्रपति पद की गरिमा के कारण सार्वजनिक प्रतिक्रिया अक्सर संयमित होती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ममता सरकार की उदासीनता और लापरवाह कार्यशैली ने राष्ट्रपति की नाराजगी और असंतोष बढ़ा दिया है। यह असंतोष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति का पद किसी दल या सरकार से नहीं, बल्कि पूरे संविधान से जुड़ा होता है। जब इस पद से जुड़े प्रोटोकॉल की अनदेखी होती है, तो यह संकेत देता है कि राजनीतिक टकराव अब संवैधानिक मर्यादाओं तक पहुंच गया है। यही कारण है कि ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता व्यक्त की जा रही है।
राष्ट्रपति का नहीं, संविधान और लोकतंत्र का अपमान- पीएम मोदी इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यह केवल राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र का अपमान है। पीएम मोदी ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि आज देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है और कल बंगाल की टीएमसी सरकार ने महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू घोर अपमान किया है। राष्ट्रपति मुर्मू संथाल समुदाय के एक बड़े उत्सव में भाग लेने गई थीं, लेकिन टीएमसी सरकार ने इस आयोजन का बहिष्कार किया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति देश की एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च प्रतीक होते हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार उनके प्रोटोकॉल की अनदेखी करती है, तो यह पूरे राष्ट्र की संवैधानिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है।
आज देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है और कल पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार ने देश की राष्ट्रपति आदरणीय द्रौपदी मुर्मु जी का घोर अपमान किया। उनका कार्यक्रम बदइंतजामी के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल की प्रबुद्ध जनता टीएमसी को एक नारी के अपमान, एक आदिवासी के अपमान और देश की… pic.twitter.com/qa4c6xjGPj
आदिवासी समुदायों में ममता सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष इस विवाद को केवल प्रोटोकॉल की चूक मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे आदिवासी राजनीति का पहलू भी जुड़ा हुआ है। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी समाज में एक नई राजनीतिक चेतना और सम्मान की भावना पैदा हुई है। ऐसे में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां आदिवासी आबादी महत्वपूर्ण है, वहां पर आदिवासी समुदाय के कार्यक्रम का बहिष्कार करना अपने आप में राजनीतिक भेदभाव का प्रतीक है। इसलिए भी देशभर के आदिवासी समुदायों में ममता बनर्जी सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष व्याप्त है।
संघीय व्यवस्था का अपमान, प्रशासनिक भूल या राजनीतिक रणनीति भारत एक संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों और संस्थाओं के सम्मान को लेकर एक साझा मर्यादा कायम रहती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में आए दिन इसकी धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। वह कभी राज्यपाल से टकरा जाती हैं तो कभी अदालतों के निर्णयों पर सवाल उठाती फिरती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी हो जाए कि वह संवैधानिक शिष्टाचार को ही चुनौती देने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि लगातार संवैधानिक संस्थाओं के साथ टकराव की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यह केवल भूल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है। लोकतंत्र की असली ताकत उसके संस्थानों में विश्वास से आती है। यदि राजनीतिक दल और सरकारें इन संस्थानों का सम्मान नहीं करेंगी, तो जनता के बीच भी उनका विश्वास कमजोर होगा। राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका जैसे पद और संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई भी कुत्सित प्रयास अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की नापाक कोशिश है।
चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों पर ममता के लगातार हमले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वभाव में आक्रामकता दिखाई है। लेकिन सवाल तब उठता है जब यह आक्रामकता संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच जाती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन संस्थाओं के सम्मान की एक सीमा भी होती है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान किया हो। इससे पहले चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उनका टकराव चुनाव आयोग से भी हो चुका है। उन्होंने कई मौकों पर चुनाव आयोग के निर्णयों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खुलकर आलोचना की थी। इसी प्रकार ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कई बार केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ भी मुखर रही है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से ईडी और सीबीआई की कार्रवाइयों पर सवाल उठाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के छापों के दौरान भी मुख्यमंत्री ने अनाश्यक दखलंदाजी की और महत्वपूर्ण फाइलों को उठाकर ले गईं। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह संवैधानिक संस्था की सार्वजनिक अवमानना करनी चाहिए।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी को सत्ता–संरक्षण देने के भंवर में फंस गई है। इस साल की शुरुआत में 8 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।
एक किताब को हटवा कर न्यायपालिका क्या बेदाग़ हो गई। क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के दाग साफ़ हो गए। पिछली सुनवाई में किताब हटाने के आदेश देते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, आप नाम बताओ, हम एक्शन लेंगे। यह बात सुनकर मुझे ताज्जुब भी हुआ और हंसी भी आई। क्या जनाब सूर्यकांत जी को नाम नहीं पता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। लेकिन आपके एक्शन भी इतने गोपनीय होते हैं जो किसी को कानों कान खबर नहीं लगती।
लेखक चर्चित YouTuber
अभी कुछ दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा था 2016 से 2026 के बीच हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की 8630 शिकायतें आई। क्या चीफ जस्टिस को उनके नाम नहीं पता चले? क्या एक्शन हुआ? यशवंत वर्मा का नाम तो एक साल पहले सामने आया था जब उनके घर से 15 करोड़ के अधजले नोट मिले थे। क्या वह भ्रष्टाचार नहीं था?
सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का जनक न्यायपालिका में कॉलेजियम हैं जिसका जिक्र संविधान में नहीं है लेकिन देश पर थोपा हुआ है। ऐसी गोपनीयता रहती है कि किसी को पता नहीं चलता कैसे जज बनाये जाते हैं - सरकार अपने विवेक से कॉलेजियम की अनुशंसा पर जजों की नियुक्ति करती है और जहां गलत लगता उन मामलो पर ही रोक लगाई जाती है। फिर 5 रिटायर्ड हाई कोर्ट के जजों को हाई कोर्ट के जज Contractual basis पर नियुक्त करने की क्या जरूरत पड़ गई। इसमें भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध आती है।
अभिषेक मनु सिंघवी का नाम तो सुना ही होगा। 2009 में सिंघवी की संपत्ति 43 करोड़ थी और आज वह 2869 करोड़ कैसे हो गई? ये सीधा सीधा भ्रष्टाचार का मामला है। 2012 में सिंघवी का वीडियो सामने आया था जिसमें वह एक महिला वकील को जज बना रहा था लेकिन उस केस को दबा दिया गया। उसने अपने ड्राइवर पर आरोप लगाया कि उसने फर्जी वीडियो बनाया लेकिन वैसे तो हर वीडियो की फॉरेंसिक जांच होती है लेकिन उसके वीडियो की कोई जांच नहीं हुई और दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस रेवा खेत्रपाल ने वीडियो पर पाबंदी लगा दी। खेत्रपाल रिटायर होने के बाद नवंबर, 2015 में दिल्ली की लोकायुक्त बन गई जब केजरीवाल सत्ता में आ गया और सिंघवी केजरीवाल का वकील रहा है। इसमें भ्रष्टाचार की दुर्गन्ध आती है।
लालू यादव 12 साल से 5 मामलों में 32 साल की सजा पा कर भी जमानत पर मौज में घूम रहा है और झारखंड हाई कोर्ट उसकी किसी अपील पर सुनवाई नहीं कर रहा। ये है भ्रष्टाचार। दिल्ली हाई कोर्ट 2G मामलों में CBI और ED की अपील लिए बैठा है। ये है भ्रष्टाचार। CBI जज ओ पी सैनी 18 महीने तक चिदंबरम की गिरफ़्तारी पर रोक लगाए रहे। यह था भ्रष्टाचार। सैनी ने ही फिल्म की स्टोरी बता कर 2G में सभी को बरी कर दिया था। सलमान खान का hit n run कस में महाराष्ट्र सरकार की अपील स्वयं सुप्रीम कोर्ट 10 साल से लिए बैठा है। क्या कहेंगे इसे?
दो दो अदालतों ने राहुल गांधी को दोषी करार दिया और 2 वर्ष की सजा सुनाई लेकिन जस्टिस गवई ने खुद को कांग्रेसी परिवार का जज स्वीकार करते हुए राहुल गांधी को छोड़ दिया। और सुनिए, एक दिन में दो बेंच गठित करके तीस्ता सीतलवाड़ को जमानत दे दी। हर भ्रष्टाचार के सबूत नहीं होते लेकिन शंका तो पैदा होती ही हैं।
चीफ जस्टिस साहेब, आपको NCERT की एक किताब ने हिला दिया लेकिन कभी सुप्रीम कोर्ट का कलेजा नहीं फटा जब वही NCERT भारत की आत्मा को लहूलुहान करता रहा वामपंथियों की किताबो में हिंदू संस्कृति की हत्या करते हुए।
आत्मनिरीक्षण की जरूरत है न्यायपालिका को। अपने चैम्बर के झरोखों से बाहर झांकिए और देखिए कि क्या जनता सच में न्यायपालिका को भ्रष्ट नहीं समझती।