‘भ$वा*# करो… तू जा भो$@%’ : कांग्रेस प्रवक्ता ने टीवी डिबेट में ‘कर्नल’ को दी गाली, सैनिक बोले- पार्टी इसे निलंबित करे

                    कांग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा (बाएँ) और कर्नल दानवीर सिंह (दाएँ) (फोटो साभार: News18)
कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक शर्मा का मार्च 3 को एक टीवी डिबेट के दौरान सेना के रिटायर्ड कर्नल दानवीर सिंह को गाली देने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। News18 इंडिया पर यह डिबेट इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को लेकर हो रही थी, इस बीच आलोक शर्मा भड़क गए और कर्नल के साथ अपशब्दों का प्रयोग करने लगे। कर्नल दानवीर ने खुद इस डिबेट के एक हिस्से का वीडियो शेयर किया है।

इस वीडियो में आलोक शर्मा कह रहे हैं, “आप डिबेट कराइए, $वा*# कराइए, दलाली कराइए इनसे आप।” इस पर कर्नल दानवीर ने कहा, “अबे जा”, तुरंत आलोक शर्मा चिल्लाकर कर्नल से बोले, “तू जा भो$@%।” कर्नल दानवीर ने वीडियो शेयर करते हुए X पर लिखा, “उम्मीद है राहुल गाँधी जी आलोक शर्मा को आप कांग्रेस से निलंबित करेंगे। जयहिंद।”

इस डिबेट के एंकर अमिश देवगन ने भी इस बहस का एक वीडियो शेयर किया है जिसमें आलोक शर्मा और कर्नल दानवीर एक-दूसरे से उलझते नजर आ रहे हैं। वीडियो में जहाँ आलोक शर्मा ‘कोर्ट मार्शल’ की बात कर रहे हैं तो वहीं कर्नल दानवीर ‘छपरी’ कहते नजर आ रहे हैं।

अमिश देवगन ने वीडियो शेयर करते हुए X पर लिखा, “डिबेट में विरोध हो सकता है। लेकिन इस स्तर की भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती। पूरा देश फौजियों का सम्मान करता है। मैंने भी आलोक शर्मा की भाषा पर घोर आपत्ति जताई।”

बीजेपी प्रवक्ता राधिका खेड़ा ने कांग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लिया है। राधिका ने X पर वीडियो शेयर कर लिखा, “राहुल गाँधी संसद में गुंडागर्दी करते हैं, युवा कांग्रेस अंतरराष्ट्रीय मंच पे नंगई। नेता PM की ‘बोटी-बोटी’,’कब्र खोदने’ की धमकी देते है, सोशल मीडिया हेड महिला सांसद की मंडी में बोली लगाती है और प्रवक्ता सेना को भद्दी गालियाँ देते हैं।” उन्होंने आगे लिखा, “मोहब्बत की दुकान नहीं, ‘राहुल की नफरत का गोदाम’।”

सोशल मीडिया पर यह वीडियो जमकर शेयर किया जा रहा है और कांग्रेस प्रवक्ता की भाषा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। डिबेट में तर्क-वितर्क ठीक है, कई बार नाराजगी भी जायज है लेकिन इस तरह की भाषा कतई ठीक नहीं है और लोग अब कांग्रेस से माँग कर रहे हैं कि आलोक शर्मा के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

खामेनेई की मौत पर रोने वाली सोनिया गाँधी 'गद्दाफी, सद्दाम और बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्याओं पर क्यों खामोश रहीं?


कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर मोदी सरकार की चुप्पी को लेकर केंद्र पर निशाना साधा
 उन्होंने कहा कि सरकार का ये रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है सोनिया गांधी के इस हमले पर बीजेपी ने पलटवार किया है। 2011 में लीबिया में गद्दाफी की मौत के समय यूपीए की सरकार थी, लेकिन तब सरकार ने गद्दाफी की मौत पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया था और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई थी

"2011 में जब लीबिया में नाटो हमलों के बीच भागते समय मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हुई थी, तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी उस समय भारत और लीबिया के बीच मजबूत संबंध थे वर्ष 2004 से 2007 के बीच भारत के सात मंत्रियों ने लीबिया का दौरा किया था, जिनमें तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे इसके बावजूद गद्दाफी की मृत्यु पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई उस समय न तो 'नैतिक जिम्मेदारी' पर भाषण दिए गए और न ही 'सभ्यतागत संबंधों' का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया "


विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति का संचालन भावनात्मक या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर किया जाता है भारत ने वर्तमान संकट के दौरान संयम, संप्रभुता के सम्मान और तनाव कम करने की अपील लगातार दोहराई है यह कहना कि भारत चुप है, तथ्यों का सरलीकरण है कूटनीति सार्वजनिक मंचों पर आक्रामक बयान देने का नाम नहीं, बल्कि परदे के पीछे संतुलित और सावधान संवाद की प्रक्रिया है

कहा गया कि आज खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक रह रहे हैं इनमें बड़ी संख्या केरल से है उनकी सुरक्षा, रोजगार और परिवारों की स्थिरता भारत सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय है क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण कुछ स्थानों पर सीबीएसई स्कूलों की परीक्षाएं स्थगित होने की खबरें भी सामने आईं, जिससे भारतीय छात्रों के शैक्षणिक जीवन पर असर पड़ा ऊर्जा क्षेत्र और समुद्री परिवहन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के सामने भी प्रत्यक्ष जोखिम की स्थिति बनी ऐसे में कोई भी गैर-जिम्मेदाराना बयान सीधे भारतीय समुदाय को प्रभावित कर सकता है

कांग्रेस नेतृत्व पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह चुनिंदा मुद्दों पर ही मुखर होता है आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के समय वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं दिखी, जैसी आज सरकार की कूटनीतिक भाषा पर दिखाई जा रही है. विदेश नीति को सांप्रदायिक या चुनावी नजरिए से देखना क्या उचित है, यह भी बहस का विषय बना हुआ है

ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई का रिकॉर्ड भी चर्चा में है बीते वर्षों में उन्होंने कई बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की दिल्ली दंगों को लेकर बयान, कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर टिप्पणियां, तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम पर प्रतिक्रिया—इन सब पर भारत ने सार्वजनिक आक्रामकता से बचते हुए संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया 2017 में उन्होंने कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की अपील की थी इसके बावजूद भारत ने संबंधों को पूरी तरह से तनावपूर्ण दिशा में नहीं जाने दिया

2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी तेहरान की प्रतिक्रिया को लेकर भारत में निराशा रही थी उस समय की रिपोर्टों में संकेत मिले थे कि ईरानी मीडिया के कुछ हिस्सों ने पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति दिखाई थी इसके बावजूद भारत ने संवाद के दरवाजे बंद नहीं किए

इतिहास के एक और अध्याय की ओर इशारा किया जा रहा है यूपीए सरकार के दौरान भारत ने 2005, 2006 और 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ मतदान किया था उस समय भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर वार्ता चल रही थी और भारत ने पश्चिमी देशों के साथ कदम मिलाया तब “सभ्यतागत संबंधों” की चर्चा उतनी प्रमुख नहीं थी, जितनी आज की राजनीतिक बहसों में दिखाई देती है

वैश्विक परिप्रेक्ष्य भी महत्वपूर्ण है. मौजूदा घटनाक्रम पर दुनिया के अधिकांश प्रमुख देशों ने अत्यधिक तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है रूस जैसे देश, जिन्हें ईरान का करीबी माना जाता है, उन्होंने भी संतुलित भाषा का प्रयोग किया है यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने भी संयम बरता है ऐसे में भारत पर यह अपेक्षा करना कि वह सबसे मुखर और आक्रामक बयान दे, क्या व्यावहारिक है?

विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश नीति को “चयनात्मक आक्रोश” के आधार पर नहीं चलाया जा सकता राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होती है भारत की ऊर्जा जरूरतें, खाड़ी देशों के साथ आर्थिक संबंध और वहां बसे करोड़ों भारतीयों का भविष्य किसी भी बयान से जुड़ा होता है

अंततः यह बहस ईरान या लीबिया से अधिक घरेलू राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है सवाल यह है कि क्या विदेश नीति को नैतिकता की सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनाया जाए या रणनीतिक संतुलन का उपकरण समझा जाए? 2011 में भी भारत ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी थी और आज भी वही सिद्धांत लागू होता दिखाई देता है

भारत कब और कैसे बोलेगा, यह उसका संप्रभु निर्णय है हर स्थिति में ऊंची आवाज ही प्रभावी कूटनीति का प्रमाण नहीं होती कई बार संयम ही सबसे सशक्त संदेश होता है। यही राज्यकला है, और यही परिपक्व कूटनीति की पहचान भी

सोनिया गांधी जो प्रधानमंत्री मोदी के ईरान पर कुछ ना बोलने पर विलाप कर रही है, उसका जवाब यह है: भारत की चुप्पी ही इस युद्ध में सबसे ऊँचा बयान है

सुभाष चन्द्र

"2011 में जब लीबिया में नाटो हमलों के बीच भागते समय मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हुई थी, तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। उस समय भारत और लीबिया के बीच मजबूत संबंध थे वर्ष 2004 से 2007 के बीच भारत के सात मंत्रियों ने लीबिया का दौरा किया था, जिनमें तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे इसके बावजूद गद्दाफी की मृत्यु पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई उस समय न तो 'नैतिक जिम्मेदारी' पर भाषण दिए गए और न ही 'सभ्यतागत संबंधों' का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया"

खामनेई अब नहीं रहे

अमेरिका और इजरायल ने मध्य-पूर्व की तस्वीर बदल दी

और भारत? कुछ नहीं बोला

न हमलों की निंदा,

न खामनेई के लिए शोक-संदेश,

न “हम ईरान के साथ हैं” का बयान

पूर्ण मौन

लोग पूछ रहे हैं: क्यों?

लेखक 
चर्चित YouTuber 
यह है असहज करने वाला सच

ईरान कभी भारत का मित्र नहीं था कभी भी नहीं

उसने मित्रता का अभिनय किया

मेज़ पर मुस्कुराया

चाबहार में भारत के निवेश का लाभ उठाया

दशकों तक भारत की सद्भावना को अपने हित में इस्तेमाल किया

और फिर क्या?

हर बार जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों ने भारतीय धरती पर भारतीयों का नरसंहार किया, ईरान मौन रहा

हर बार जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की, ईरान ने ओआईसी में भारत की निंदा की

कश्मीर के मुद्दे पर?

ईरान हर बार पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ

हर एक बार

चालीस वर्षों तक ईरान ने इस्लामी एकजुटता को हथियार की तरह इस्तेमाल किया

और उस हथियार का निशाना अक्सर भारत ही रहा

भारत ने हर बार यह याद रखा

यह चुप्पी कूटनीति नहीं है

यह स्मृति है

वह शासन, जिसने भारत की आतंकरोधी कार्रवाई को “आक्रामकता” कहा, अब समाप्त हो चुका है

वह सर्वोच्च नेता, जिसने 1.4 अरब भारतीयों के साथ आतंकवाद के विरुद्ध कभी खुलकर साथ नहीं दिया, अब नहीं रहा

और मोदी ने एक भी कूटनीतिक आँसू नहीं बहाया

यह कोई चूक नहीं है, यह एक निर्णय है

जो मौन में सुनाया गया — किसी भी प्रेस विज्ञप्ति से अधिक मुखर

लेकिन अधिकांश विश्लेषक एक बात समझ नहीं पा रहे हैं

भारत केवल इस युद्ध को देख नहीं रहा है

भारत उस स्थिति की रूपरेखा तैयार कर रहा है जो इसके बाद बनेगी

एक कठोर सत्य है, जिसे नकारना आसान नहीं

यह लेख किसी का whatsapp पर मिला है 

खामनेई का खुद का बयान भी सुनिए -

20 अगस्त 2018 को खामेनेई का ट्विटर पर संदेश

“प्रिय हज यात्रियों,

इस्लामिक उम्माह (मुस्लिम समुदाय) के लिए,

सीरिया, इराक, फिलिस्तीन, अफ़ग़ानिस्तान, यमन, बहरीन, लीबिया, पाकिस्तान, कश्मीर और म्यांमार तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में पीड़ित लोगों के लिए दुआ करना न भूलें

और आप अल्लाह से प्रार्थना करें कि वह अमेरिका और अन्य घमंडी शक्तियों तथा उनके समर्थकों के हाथ काट दे”

आज ईरान स्वयं इराक और बहरीन पर हमले कर रहा है

ऐसे में भारत का चुप रहना क्या गलत है?

कहीं खामेनेई के नाम पर रोना, कहीं लाशें बिछाने की धमकी: होली से पहले माहौल बिगाड़ने की तैयारी में फिर से इस्लामी कट्टरपंथी

                 होली में हिंदुओं को निशाना बनाने वाली घटनाएँ (प्रतीकात्मक फोटो साभार: AI-ChatGPT)
होली का त्योहार खुशियों, रंगों और मेल-मिलाप का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस बार माहौल सामान्य नहीं दिख रहा है। होली नजदीक आते ही कुछ जगहों पर अलग तरह की हलचल देखने को मिल रही है। कहीं ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई का रोना लेकर सड़कों पर उतरने की अपील की जा रही है, तो कहीं होली को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है। इसके मद्देनजर पुलिस प्रशासन भी सख्ती बरत रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी हिंदू त्योहार के आसपास तनाव खड़ा करने की कोशिश हुई हो। पिछले सालों में भी होली के समय हिंदुओं को निशाना बनाकर हिंसा फैलाई जाती रही है। कभी धमकियों से काम चलाया जाता है, तो कभी होली मना रहे हिंदुओं पर सीधा हमला किया जाता है। इसीलिए बीते कुछ सालों की घटनाओं को समझना जरूरी है, ताकि इसके पीछे कट्टरपंथियों का मकसद समझा जा सके।

दुनिया में जंग के बीच भारत में कट्टरपंथी बना रहे माहौल

जहाँ आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता का माहौल है, वहीं भारत शांति और सौहार्द के साथ होली की तैयारी कर रहा है। यह अपने आप में किसी अच्छे दिन से कम नहीं है। लेकिन कुछ कट्टरपंथी और वामपंथी समूहों को शायद यही बात खटक रही है। उन्हें यह स्वीकार नहीं हो पा रहा कि भारत में त्योहार शांति से मनाए जा रहे हैं, इसलिए होली से ठीक पहले माहौल बिगाड़ने की कोशिशें तेज होती दिख रही हैं।

अमेरिका और इजरायल के हमले में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत को लेकर कुछ समूहों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। दिल्ली के जामिया नगर, जंतर मंतर से लेकर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, लखनऊ और जम्मू-कश्मीर में बुर्का पहने महिलाएँ और कुर्ता-पायजामा पहने मर्द खामेनेई को ‘रहबर’ बताकर आँसू बहा रहे हैं और दूसरी तरफ अपने प्रधानमंत्री मोदी को गाली दे रहे हैं।

इस बीच सरकार ने संभावित हिंसा की आशंका को देखते हुए सतर्कता बढ़ा दी है। राज्य सरकारों को निर्देश दिए गए हैं कि ईरान-समर्थक कट्टरपंथियों की पहचान करें। इसके अलावा प्रो-ईरान कट्टरपंथी संगठनों, वैश्विक आतंकी संगठनों जैसे ISIS और अल-कायदा से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल्स पर भी कड़ी निगरानी रखने को कहा गया है।

होली के मद्देनजर नूहं में 600 जवान तैनात

हरियाणा के नूहं का नाम बीते कुछ सालों में कई बार तनाव और सांप्रदायिक हिंसा की खबरों के कारण चर्चा में रहा है। खासकर मजहबी जुलूसों के दौरान यहाँ माहौल बिगाड़ने की घटनाएँ सामने आई थीं, जिसके बाद प्रशासन को कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और भारी पुलिस बल की तैनाती जैसे कदम उठाने पड़े थे। इन घटनाओं ने नूहं को संवेदनशील श्रेणी में ला खड़ा किया, जहाँ हर बड़े त्योहार से पहले अतिरिक्त सतर्कता जरूरी मानी जाती है।

इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए साल 2026 की होली से पहले भी नूहं में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस के 600 जवान तैनात किए गए हैं। संवेदनशील इलाकों में ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी की तैयारी है और अफवाहों पर नजर रखने के लिए साइबर टीम को सक्रिय किया गया है।

मथुरा की होली पर भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए 9 यूट्यूबरों पर FIR

मथुरा की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार और लड्डूमार होली को लेकर सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 9 यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। इन लोगों ने पिछले साल के विवादित वीडियो क्लिप्स को इस साल 2026 की होली से जोड़कर वायरल किए।

इन एडिटेड वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि बरसाना और नंदगाँव की होली के दौरान अव्यवस्था और अभद्रता हुई है। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(2) (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाना) और 353(2) के साथ-साथ IT ऐक्ट की धारा 67/67A के तहत मामला FIR दर्ज की है।

होली पर हिंदुओं को जान से मारने की धमकी

इसी तरह साल 2025 की होली में भी माहौल खराब करने का प्रयास किया गया था। उत्तर प्रदेश के बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र से 22 फरवरी 2025 को खबर आई थी कि वहाँ कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू युवकों को धमकी दी कि अगर उन्होंने होली मनाई तो उनकी लाशें बिछा दी जाएँगी। जब मामला उठा तो पुलिस ने मामले की जाँच की और इस केस में अयान, सलमान, अमन, रेहान, समेत कई के खिलाफ एक्शन लिया गया।

AMU में हिंदुओं को होली मनाने से इनकार, बाद में मिली परमिशन

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदू छात्रों ने होली मनाने की परमिशन माँगी थी, लेकिन प्रशासन ने ये कहकर साफ इनकार कर दिया कि वो नियमों में बदलाव नहीं करेंगे और जिसे होली मनानी है वो हॉस्टल में रहकर मनाए। हालाँकि, बाद में खबर आई कि वहाँ मशक्कत के बाद हिंदू छात्रों को होली खेलने की परमिशन दी गई।

हिंदू पिता और बेटी पर फैजान ने फेंका खौलता पानी

इसी तरह, साल 2024 में मध्यप्रदेश के धार के घाटाबिल्लोद गाँव से होली वाले दिन हिंदू बेटी-पिता पर खौलता पानी डालने का मामला प्रकाश में आया था। दरअसल, गाँव में पायल तिवारी नाम की लड़की और उसके पिता राकेश तिवारी ने अपने पड़ोसी फैजान से रंग धुलने के लिए पानी माँगा था, उस समय फैजान ने पानी देने की बजाए उनके ऊपर खौलता पानी डाल दिया था।इस घटना में लड़की का चेहरा बुरा तरह जल गया था।

‘नमाज के वक्त नहीं बज सकते गाने’

एक अन्य घटना 25 मार्च 2024 की है। तेलंगाना के मेडचल-मलकजगिरी जिले के चेंगिचेरला इलाके में होली का त्योहार मनाते समय हिंदुओं पर मुस्लिमों की भीड़ ने धावा बोल दिया था और धमकी देकर हिंदुओं को कहा गया था कि नमाज के वक्त कोई गाने नहीं बजा सकते। इस हमले के वक्त भीड़ ने महिलाओं को भी निशाना बनाया था।

होली के वक्त पथराव

साल 2024 में होली पर हिंदुओं को निशाना बनाने का एक मामला आगरा के रकाबगंज से भी आया था। इस घटना में मुस्लिम समुदाय के लगभद दो दर्जन उपद्रवियों ने जमील नामक व्यक्ति के नेतृत्व में हिंदुओं पर पथराव किया था जिसमें कई लोग घायल हुए थे। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए जमील, सलीम, रहीस, शौकत समेत 34 नामजद और 50 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।

AMU में होली पर हमला

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इस बार हिंदुओं को जहाँ पहले होली मिलन समारोह आयोजित करने से ही मना कर दिया गया था। वहीं, 2024 में 21 मार्च को जब एएमयू में हिंदुओं ने परिसर में होली खेलने का प्रयास किया था तो उस दिन उनपर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा बड़ा हमला कर दिया गया था। इस घटना में अलीगढ़ पुलिस ने मिसवा, जाकीउर्ररमान, जैद, शेरबानी, शाहरुख सबरी और अन्य मुस्लिम छात्रों पर एफआईआर भी की थी।

चंदा वसूली के दौरान टूटे इस्लामी कट्टरपंथी

2023 की बात करें तो होलिका दहन के दिन उत्तर प्रदेश के मेरठ में चंदा वसूली के दौरान हालात बिगड़े थे। उस समय चंदा इकट्ठा करने गए हिंदुओं पर मुस्लिम समूह ने न केवल होलिका पर लात मारी थी बल्कि हिंदुओं पर हमला किया था और फिर जमकर पत्थरबाजी हुई थी। पुलिस ने इस विवाद के बाद तीन लोगों को हिरासत में लेकर अपनी कार्रवाई की थी।

रंग लगने पर भड़का शब्बीर, दोस्त को पेट्रोल डाल जलाया

तेलंगाना के मेदक के मारापल्ली गाँव से विवाद 2023 में भी होली पर उठा था। उस समय होली के दिन एक मोहम्मद शब्बीर नामक मुस्लिम व्यक्ति ने रंग लगने से नाराज होकर दोस्त अंजैया को पेट्रोल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया था।

खामेनेई का अंत और इतिहास की परिक्रमा

डॉ राकेश कुमार आर्य
अमेरिका और इजरायल ने अपनी संयुक्त रणनीति के अंतर्गत काम करते हुए ईरान के राष्ट्रपति खामेनेई का अंत कर दिया है। अमेरिका ने एक बार फिर दिखाया है कि वह अपने शत्रु का अंत करके ही रुकता है। अबसे पहले उसने ओसामा बिन लादेन, कर्नल गद्दाफी जैसे एक नहीं अनेक तानाशाहों या आतंकियों को ठिकाने लगाकर ही दम लिया है। खामेनेई इस समय अमेरिका और इजरायल के निशाने पर था। इसराइल ने भी अपने राष्ट्रीय पराक्रम का परिचय दिया है और संसार के लिए नया संदेश दिया है कि शत्रु चाहे कितना ही बड़ा हो, यदि आपके हौसले बुलंद हैं तो शत्रु का मिटना निश्चित है।
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता
तनिक याद कीजिए 1979 से 1989 के बीच का वह दौर, जब ईरान पर आयतुल्लाह खुमैनी का शासन हुआ करता था। उस दौर में वहां पर शासन के द्वारा ही हजारों लोगों की हत्या की गई थी। अभी जनवरी 2026 में भी वहां पर हजारों की संख्या में उन लोगों की हत्या कर दी गई जो खामेनेई शासन का विरोध कर रहे थे। इस प्रकार आयतुल्लाह खुमैनी और उनके उत्तराधिकारी के द्वारा बड़ी संख्या में अपने ही देश के लोगों का नरसंहार किया गया। इस प्रकार के नरसंहार पर भारत का कोई भी राजनीतिक दल, मुस्लिम संगठन या कोई भी राजनीतिक नेता कुछ भी नहीं कह रहा है। लगता है यह सब कुछ वैधानिक ढंग से हुआ और जिन लोगों की हत्याएं आयतुल्लाह परिवार के शासनकाल में की गईं, वे सचमुच अपराधी थे ?
अपने मूल विषय पर आने से पहले हम यह भी कहना चाहते हैं कि क्या यहूदियों , पारसियों या किसी भी अन्य मजहब के व्यक्ति को किसी मुस्लिम देश में रहने का अधिकार नहीं है ? क्या उन्हें इस धरती पर भी रहने का अधिकार नहीं है ? यदि है तो हमारी सोच में दोगलापन क्यों है कि हमें एक की हत्या पर आंसू बहाते हैं और दूसरे की हजारों हत्याओं को भी हम मानवता के हित में किया गया पुण्य कार्य मान लेते हैं ? यहूदी लोगों ने अपनी जान हथेली पर रखकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी है। आज भी लड़ रहे हैं और उनके पराक्रमी स्वभाव को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि वह भविष्य में भी तब तक लड़ते रहेंगे, जब तक वह अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं कर लेंगे या किन्हीं शक्तियों के द्वारा उनका अस्तित्व पूर्णतया मिटा नहीं दिया जाएगा । क्या अस्तित्व के लिए लड़ना भी पाप है या उनका अल्पसंख्यक होना केवल उन्हें मृत्यु का अधिकारी बना देता है ?
जो लोग इस प्रकार की सोच से ग्रसित हैं कि यहूदियों के लिए केवल मौत ही एकमात्र ईलाज है, वह मानवता के शत्रु हैं और जो लोग इन मानवता के शत्रुओं का मौन रहकर या स्पष्ट शब्दों में समर्थन करते हैं वह और भी बड़े अपराधी हैं।
आज जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला , वहां की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सहित कुछ दूसरे मुस्लिम संगठन ,राजनीतिक दलों के नेता और कुछ दूसरे सेक्युलरिस्ट जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति खामेनेई की हत्या पर छाती पीट रहे हैं या कठोर टिप्पणी देकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं और कह रहे हैं कि यह नाइंसाफी है, उन्हें ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के पापों को देखना चाहिए। उसके परिवार के द्वारा किए गए अपराधों को देखना चाहिए ,उसके शासन में मानवता के विरुद्ध हुए अपराधों की जांच पड़ताल करनी चाहिए। इजरायल ईरान के इस युद्ध में यह देखना चाहिए कि मानवता के विरुद्ध अपराध कौन कर रहा है ? अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाला इसराइल या दूसरे के अस्तित्व को मिटाने के लिए कृतसंकल्प ईरान?
किसी भी देश को और संसार को सांप्रदायिक मान्यताओं के आधार पर हांका नहीं जा सकता । यदि सांप्रदायिक मान्यताओं के आधार पर संसार को हांकने का प्रयास किया गया तो जंगलराज आना स्वाभाविक है । वैसे हमें इस प्रकार के जंगलराज के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जहां-जहां सांप्रदायिकता अपना नंगा नाच दिखा रही है, वहां-वहां पर जंगलराज स्थापित हो चुका है। जितने भर भी युद्ध हो रहे हैं वह सभी सांप्रदायिक शक्तियों के द्वारा लड़े जा रहे हैं। यहां तक कि शासन में बैठे लोगों को भी हमें निष्पक्ष शासक वर्ग नहीं समझना चाहिए। उनकी सोच भी उस समय सांप्रदायिक हो जाती है. जब वह अपने देश की जनता की सांप्रदायिक भावनाओं के अनुरूप दूसरे देशों को डराते धमकाते हैं या किसी दूसरे मजहब के लोगों के अस्तित्व को मिटाने के लिए अपना खुला या मौन समर्थन देते हैं। शासन में बैठे लोगों का राजधर्म यह नहीं होता कि वह जनता की सांप्रदायिक भावनाओं के अनुसार चलें। इसके विपरीत उनका राजधर्म होता है कि वह अपने देश की जनता को संस्कारवान और चरित्रवान बनाएं। संसार भर में दूसरे मजहबों के लोगों को भी जीने का अधिकार देने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें। इस दिशा में कदम उठाते हुए ईरान के अयातुल्लाह खुमैनी परिवार ने क्या अपने देश में कोई भी ऐसी यूनिवर्सिटी स्थापित की, जिसमें चरित्रवान, ज्ञानवान और संस्कारवान समाज बनाने पर बल दिया जाए ? लोगों को दूसरे लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए ? दूसरों के जीवन का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए ? और संसार को स्वर्ग बनाने के लिए एक वृहद योजना पर काम किया जाए ? यदि इस दिशा में एक भी काम नहीं किया गया है तो फिर ऐसे किसी भी तानाशाह का मर जाना ही अच्छा होता है जो लोगों को खूनी जंग में भेजने के अतिरिक्त कुछ दूसरा काम ही न कर पाए।
जो राजा जनता के अधिकारों पर हावी होकर शासन करता हो अर्थात रक्तपात में विश्वास करता हो, वह राजा नहीं होता।
जितनी सांप्रदायिक शक्तियां अर्थात देश की सेना और देश के शासनाध्यक्ष या राष्ट्राध्यक्ष इस प्रकार की लड़ाई को अपना समर्थन दे रहे हैं, उन सबके बारे में समझ लेना चाहिए कि वे सभी के सभी आतंकवादी हैं। जो मजहबी मान्यताओं से संसार को हांकने का उपक्रम कर रहे हैं , उनका यह उपक्रम संसार को मिटाने के लिए किया जाने वाला कार्य समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि आतंकवाद की कमर टूटनी ही चाहिए।
भारत में जो लोग ईरान के राष्ट्रपति की हत्या पर छाती पीट रहे हैं उन्हें ईरान के शहरों में हो रहे उन प्रदर्शनों की ओर भी ध्यान देना चाहिए जिनमें सम्मिलित लोग अपने राष्ट्रपति की हत्या के उपरांत उत्सव मना रहे हैं। कॉलेजों में पढ़ रही लड़कियों ने अपने हिजाब फेंक दिए हैं और वह अब अपने आप को आजाद अनुभव कर रही हैं। इधर भारत में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत पर कहा है, "हमें यह भी पक्का करना चाहिए कि जम्मू और कश्मीर में जो लोग शोक मना रहे हैं, उन्हें शांति से शोक मनाने दिया जाए. पुलिस और प्रशासन को बहुत संयम बरतना चाहिए और बल या रोक लगाने वाले तरीकों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। "
इन्हीं उमर अब्दुल्ला ने अपने ही प्रदेश से जबरन निकाले गए उन लाखों हिंदुओं के बारे में कुछ नहीं कहा है जो आज देश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और जिन्हें उनके ही पिता के शासनकाल में जम्मू कश्मीर से निकाल दिया गया था। इन्हें यहूदियों के मारे जाने पर भी कोई शिकायत नहीं है, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मारे गए लाखों करोड़ों हिंदुओं का दर्द भी इन्हें दर्द दिखाई नहीं देता। जब शासन में बैठे लोग भी हर चीज को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखने लगते हैं तो जनसाधारण की जिंदगी बहुत सस्ती हो जाती है। उनका खून भी पानी के भाव सड़क पर बहने के लिए विवश हो जाता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में मारे गए लाखों करोड़ों हिंदुओं की हत्या पर या उनके साथ की ज्यादतियों पर यदि भारत के मुस्लिम संगठनों, नेताओं से कुछ बोलने के लिए कहा जाता है तो कह देते हैं कि यह उन देशों का अंदरूनी मामला है। इस पर हम कुछ नहीं बोलेंगे और जब ईरान का राष्ट्रपति मारा जाता है तो भारत में प्रदर्शन करने के लिए इसे एक अच्छा हथियार बनाया जाता है। तब कहा जाता है कि यह इंसानियत का मामला है, यानी हिंदू का मामला इंसानियत का मामला नहीं है, मुसलमान का मामला इंसानियत का मामला है।
पीडीपी नेता और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने ईरान के राष्ट्रपति की मृत्यु पर कहती हैं, "आज इतिहास में एक बहुत ही दुखद और शर्मनाक मोड़ आया है, जब इसराइल और अमेरिका ईरान के प्रिय नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर शेखी बघार रहे हैं।"
उनका कहना है, "इससे भी ज़्यादा शर्मनाक और चौंकाने वाली बात यह है कि मुस्लिम देशों ने खुले तौर या ख़ामोशी से इसका समर्थन किया, जिन्होंने ज़मीर के बजाय सुविधा और फ़ायदे को चुना। इतिहास इस बात का सबूत होगा कि किसने न्याय के लिए लड़ाई लड़ी और किसने ज़ालिमों की मदद की।"
ध्यान रहे कि महबूबा मुफ्ती ने भी आज तक जम्मू कश्मीर से निकाले गए लाखों हिंदू पंडितों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए एक शब्द भी नहीं कहा है। जिनकी सोच में मजहब रहता है, जिनके कार्य में मजहब रहता है, जिनकी नीतियों में मजहब रहता है, उनसे आप इस प्रकार की सांप्रदायिक सोच के अतिरिक्त दूसरी बातों की अपेक्षा भी नहीं कर सकते।
वास्तव में जिन लोगों ने पिछली कई शताब्दियों में दूसरे मजहबों के लोगों पर अत्याचार किए हैं,उनके घरों में आज भी शांति नहीं है। अतीत में किए गए पाप उन्हें चैन से सोने नहीं दे रहे हैं। वह आज भी हिंसा में संलिप्त हैं और बुरी मौत मारे जा रहे हैं। ब्रिटेन जो कभी 1947 में भारत को सांप्रदायिक आधार पर बांट कर गया था और मुसलमानों का हितैषी बनता था, आज इस्लामिक आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित है। वहां की सड़कों पर इस्लाम को मानने वालों ने वहां के मूल निवासियों का निकलना बंद कर दिया है। इतिहास जब अपनी परिक्रमा पूर्ण करता है तो वह बड़ी भयानक होती है। इसी को नियति कहते हैं।  

लड़ाई के लिए उकसाने वाले सऊदी अरब पर चुप्पी क्यों? शिया उबल रहे हैं लेकिन सुन्नी क्यों खामोश हैं जबकि ईरान सुन्नी देशों पर हमले कर रहा है; कांग्रेस एक बार फिर नग्न हुई

सुभाष चन्द्र

ईरान-अमेरिका-इजराइल लड़ाई ने नूपुर शर्मा विवाद को ताज़ा कर दिया। नूपुर ने वही कहा जो इनकी इस्लामिक किताबों में लिखा है और उस बात को बोलने के उकसाने वाले तास्सुबी तस्लीम पर सभी मुस्लिम कट्टरपंथियों ने चुप्पी साध ली और हिन्दू नूपुर को कसूरवार ठहरा दिया। ठीक वही हालत ईरान-अमेरिका-इजराइल लड़ाई में सामने आयी है। मार्च 2 को टीवी पर जमी चौपालों(परिचर्चाओं) में सऊदी अरब का नाम सामने आया, जिसके उकसाने पर ईरान पर हमला हुआ। लेकिन महामूर्ख अमेरिका और इजराइल को कसूरवार बता मुस्लिम मुल्क सऊदी अरब के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा, क्यों? गैर-मुस्लिम को दोषी बताकर असली दोषी मुस्लिम मुल्क सऊदी अरब को बचाया जा रहा है, क्यों? आखिर दोगलेपन की भी हद होती है। बिना सच्चाई जाने क्यों गैर-मुस्लिमों को कसूरवार ठहराया जाता है?     

अमेरिका और इज़रायल का ईरान पर हमला हुआ जिसमें सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत हो गई लेकिन कांग्रेस की बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिए कि इस हमले के लिए भी मोदी को दोष दे रहे हैं क्योंकि हमला मोदी की इज़रायल यात्रा ख़त्म होने के अगले दिन शुरू हुआ ओवैसी मोदी से पूछ रहा है कि आपने बताया क्यों नहीं कि इज़रायल हमला करेगा ऐसे सवाल कांग्रेस के ढक्कन भी कर रहे हैं। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नेतन्याहू और ट्रंप क्या मोदी को बता कर हमला करते और मोदी को अगर हमले की भनक थी भी तो क्या उससे उम्मीद करते हो कि वो ढोल बजा कर ऐलान करता कि कल ईरान को पेला जाएगा वह भी तब, जब ईरान के साथ भी हमारे संबंध ख़राब नहीं हैं वह बात अलग है कि खामनेई Operation Sindoor में पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा था

ईरान के लिए भारत में टसुए बहाने वालों को यह मालूम होना चाहिए कि ईरान एक बार नहीं बार बार ऐलान कर चुका है और उसने आज भी कहा है कि वो इज़रायल को दुनिया के नक़्शे से मिटा देगा और उसी के लिए वह एटम बम बना रहा है ऐसे में क्या इज़रायल हाथ पे हाथ धरे बैठा रह सकता है ईरान की पहुंच अमेरिका तक सीधे तो नहीं है और इसलिए वह अमेरिका के गल्फ देशों में उसके ठिकानों को निशाना बना रहा है, साथ में इज़रायल को भी पहले ही दिन ईरान खामनेई के साथ 40 वरिष्ठ लीडर भी खो चुका है वो 40 लोग कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे क्योंकि उनके साथ खामनेई गुप्त बैठक कर रहा था जब हमले में सब मारे गए जिनमें खामनेई के परिजन भी शामिल थे

कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा है कि “हम भारत के लोग मोदी, नेतन्याहू और ट्रंप के खिलाफ खड़े हैं” कांग्रेस अपने को भारत के लोग कैसे समझ बैठी और कल तक तो ट्रंप के लिए ताली बजाता था राहुल गांधी जब उसने भारत की इकोनॉमी को डेड कहा था कांग्रेस ने अमेरिका और इज़रायल के हमले को शिया मुसलमानों पर हमला बताया है। कांग्रेस केवल भारत के खिलाफ है

शायद इसलिए ही कश्मीर और लखनऊ में शिया मुसलमान छातियां पीट रहे हैं और खामनेई की मौत पर मातम मना रहे हैं इधर दिल्ली में भी धरना प्रदर्शन किया है शियाओं ने और कुछ महिलाएं कह रही हैं कि मोदी उन्हें इज़ाज़त दे कि वो ईरान जाकर इज़रायल और अमेरिका से लड़ सकें सारे शिया जाएं कौन रोकता है, गाज़ा तो कोई नहीं गया पहले देख लो ऐसे माहौल में ईरान वीसा भी देगा

लेकिन सवाल यह उठता है कि शियाओं का खामनेई मारा गया तो वो उबल रहे हैं मगर सुन्नी क्यों चुप है जब शिया ईरान सुन्नी देशों पर हमले कर रहा है Bahrain, Kuwait, Qatar, UAE, Jordan, Qatar और Oman सब पर ईरान हमले कर रहा है और सभी सुन्नी देश हैं, फिर भारत के सुन्नी मुसलमानों का खून ईरान के खिलाफ क्यों नहीं उबल रहा क्या उन्हें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता

जो कश्मीर, लखनऊ और दिल्ली में शिया मुसलमान विलाप कर रहे हैं, उन्हें सोचना पड़ेगा कि उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी पर कैसे विश्वास किया जा सकता है मतलब साफ़ है कि कल को अगर ईरान ही भारत पर हमला कर दे तो ये लोग तो भारत के खिलाफ ही लड़ेंगे

Jammu Kashmir Students Association ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की है कि वो ईरान में फंसे 1200 कश्मीरी छात्रों को निकालने का प्रबंध करें यहां से ईरान जाकर लड़ने की बात कर रहे हैं शिया तो उन्हें लाने का क्या फायदा

एक बात और, POJK में भी शिया आबादी ज्यादा है और वहां के मुसलमान हंगामा कर रहे हैं ट्रंप और नेतन्याहू के खिलाफ फिर POJK ऐसे मुसलमानों के साथ भारत में मिलाने से क्या फायदा क्योंकि वो और कश्मीर के शिया दोनों मिलकर भारत के विरुद्ध ही लड़ेंगे इसलिए POJK लेना है तो बिना वहां की आवाम के जिन्हें पाकिस्तान में धकेल देना चाहिए

 

US-इजरायल ने ईरान में 30 ठिकानों को बनाया निशाना, राष्ट्रपति के आवास और इंटेलिजेंस मुख्यालय पर भी हमला: ‘सुरक्षित ठिकाने’ पर छिपे खामेनई

                                            ईरान के 30 ठिकानों पर हमला (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
अमेरिका और इजरायल ने शनिवार (28 फरवरी 2026) को ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया। राजधानी तेहरान में एक के बाद एक कई जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं जिससे पूरे शहर में दहशत का माहौल बन गया। US और इजरायल ने ईरान में एक साथ 30 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन हमलों में ईरानी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास और एक खुफिया मुख्यालय को भी निशाने पर लिया गया है। हमले इतने व्यापक थे कि कुछ ही घंटों में कई प्रमुख जगहों पर धमाकों की खबरें सामने आईं। वहीं, रॉयटर्स को एक सूत्र ने बताया कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनई तेहरान में नहीं हैं और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया गया है।

ईरानी अखबार Shargh की रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान के उस इलाके से धुआँ उठता दिखाई दिया है जहाँ ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई रहते हैं। तेहरान के कई स्थानीय निवासियों ने भी बताया कि उसी क्षेत्र से धुआँ उठता देखा गया जहाँ राष्ट्रपति भवन और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का मुख्यालय भी स्थित है।

ये हमले शनिवार सुबह हुए उस समय हुए जब लाखों लोग अपने काम पर थे और बच्चे स्कूल में मौजूद थे। तेहरान के लोगों ने शहर में अफरातफरी और दहशत जैसे हालात होने की बात कही है। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका की ओर से दर्जनों हवाई हमले किए जा रहे हैं। इन हमलों को मध्य पूर्व के विभिन्न सैन्य ठिकानों और एक या उससे अधिक विमानवाहक पोतों से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमानों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई पिछले साल जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए अमेरिकी हमलों से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है।

इजरायल ने ईरान पर किया हमला, तेहरान में सुने गए कई धमाके: हाई अलर्ट पर यहूदी मुल्क

                                                             तेहरान पर इजरायल का हमला

मीडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। इजरायल ने शनिवार (28 फरवरी 2026) को दावा किया कि उसने ईरान के खिलाफ ‘प्री-एम्प्टिव अटैक’ यानी संभावित खतरे को रोकने के लिए अग्रिम हमला किया है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल कैट्ज ने बयान जारी कर कहा, “इजरायल राज्य ने अपने ऊपर मंडरा रहे खतरों को खत्म करने के लिए ईरान पर प्री-एम्प्टिव हमला किया है।” ईरानी मीडिया के अनुसार, शनिवार को राजधानी तेहरान में कई विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं।

यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब जून में इजरायल और ईरान के बीच 12 दिन तक हवाई हमलों का दौर चला था। उस संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी लेकिन ताजा घटनाक्रम ने हालात को फिर से गंभीर बना दिया है।

क्या बिना trial के निचली अदालत राउज एवेन्यू कोर्ट केजरीवाल और अन्य को बरी किया? सोशल मीडिया पर विज्ञापन की लालची राष्ट्रीय मीडिया की हो रही थू-थू


फरवरी 27 को राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा बिना ट्रायल के अरविन्द केजरीवाल और अन्य को बिना ट्रायल के दोषमुक्त करना न्याय प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। जब केजरीवाल कोर्ट जाते हैं तो हँसते हुए, क्यों? क्या उनको न्याय मालूम था। गौरतलब बात है कि जब राउज एवेन्यू कोर्ट में याचिका दायर की थी तब इसी कोर्ट ने केस चलाने की बात कही थी लेकिन आज वही कोर्ट चर्चा है कि बिना ट्रायल के सबको बरी कर देती है और राष्ट्रीय मीडिया बरी करने पर सवाल करने की बजाए केजरीवाल से ज्यादा उछल रहा है।
जांच एजेंसी भी इस बात को बार-बार दोहराती रही है कि केजरीवाल-सिसोदिया ने सबूतों को तहस-नहस करने का काम किया है
 बार-बार सिम कार्ड, मोबाईल फोन जो तोड़े गए उसका आज तक कोई डिटेल नहीं मिला जिसका जिक्र आज के निर्णय में भी है

इस घोटाले के नाम पर ही दिल्ली का पूरा चुनाव ही लड़ा गया था मगर केजरीवाल आज जिस तरह से फूट फूट कर रोए उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले साल में पंजाब के चुनाव में यही घोटाला आम आदमी पार्टी को फायदा और सहानुभूति भी दिला सकता है अरविंद केजरीवाल के पास आज भी कुछ सवालों के जवाब नहीं है कि आखिर जब शराब नीति ठीक थी तो उस पर जांच शुरु होते ही उसको वापस क्यों लिया गया और ठेकेदारों के परसेंटेज बढ़ाने का उद्देश्य क्या था? भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने ये भी सवाल उठाए कि अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचारी हैं और उनके पास इसको साबित करने के लिए कोई प्रमाण नहीं है

कांग्रेस नेता राजा वारिंग ने फैसले पर उठाए सवाल 

चंडीगढ़ में आम आदमी पार्टी कार्यालय में ढोल बजाए गए और भांगड़ा किया गया और मिठाइयां भी बांटी गईं वहीं दूसरी तरफ, विपक्षी कांग्रेस नेता अमरिंदर सिंह राजा वारिंग ने शराब घोटाला मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बरी किए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अदालत के फैसले पर सवाल उठाए

क्या बोले राजा वारिंग

कांग्रेस नेता वारिंग ने केजरीवाल और सिसोदिया को बधाई देते हुए कहा कि, केंद्र सरकार ने बहुत बड़े आरोप लगाए उन्हें डेढ़ साल तक जेल में रखा कांग्रेस नेता ने कहा कि, वे सभी 6-8 महीने से लेकर डेढ़ साल तक जेल में रहे वारिंग ने कहा, "मैंने सुना है कि मर्डर या गंभीर मामलों में लेट बेल मिल जाती है लेकिन, अगर इतने बड़े आरोप नहीं थे, तो वे इतने लंबे समय तक जेल में क्यों रहे? तो अगर इतने बड़े आरोप थे, तो उन्हें क्लीन चिट कैसे मिली? अब तो सम्मानित न्यायपालिका, केजरीवाल या पीएम मोदी, अमित शाह ही बता सकते हैं कि यह कैसे हुआ?

हालांकि, सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील करने का निर्णय लिया है. अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का मानना ​​है कि अपील आवश्यक है क्योंकि जांच के कई पहलुओं को अधीनस्थ अदालत द्वारा या तो "नजरअंदाज किया गया है या उन पर विचार नहीं किया गया है." सीबीआई के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा, "सीबीआई ने अधीनस्थ अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में तत्काल अपील करने का फैसला किया है क्योंकि जांच के कई पहलुओं को या तो नजरअंदाज किया गया है या उन पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया गया है."

आज से 176 साल पहले 1850 में मिर्ज़ा ग़ालिब एक शेर लिख गये थे... आज उसी शेर के नशे में धुत्त दिखी दिल्ली... वो शेर यह है कि.....

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
इतना और समझ लीजिए कि, "बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल" का अर्थ है बच्चों के खेल का मैदान। अब बात मुद्दे की....
दिल्ली की निचली अदालत राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली शराब घोटाले में केजरीवाल और सिसोदिया समेत सभी 23 नामजद लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया है।
फैसले के बाद कैमरों के सामने केजरी खुशी के कारण फूट फूटकर रोया। फिर सिसोदिया खुशी से नाचा। अदालत से लेकर केजरी के घर तक यह रोना-धोना, नाच-गाना चला और अभी चलेगा।
लेकिन इस पूरे न्यायिक/राजनीतिक प्रहसन में आश्चर्यजनक यह है कि, केजरी गैंग से अधिक हर्षोल्लास में देश के न्यूजचैनल डूबे नज़र आ रहे हैं। इस खुशी के नशे में "आजतक" न्यूजचैनल ने शेष न्यूजचैनलों को पीछे छोड़ दिया है।
लेकिन आप सभी मित्र यह सोच रहे होंगे कि, इस पूरे परिदृश्य का मिर्ज़ा ग़ालिब के उस शेर से क्या संबंध जिसका उल्लेख मैंने शुरू में ही किया है।
अतः अब बताता हूं कि, क्या और कैसा संबंध है।
केजरी और उसके फेंके विज्ञापनी टुकड़ों पर 10 साल तक प्रचंड बेशर्मी से पले न्यूजचैनल उपरोक्त फैसले पर इस तरह खुश हो रहे हैं, मानो इस फैसले के बाद देश के सभी हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट हमेशा के लिए बंद कर दिए गए हैं। अतः यह फैसला फाइनल है।
अतः याद दिला दूं कि, इसी तरह जयपुर हाईकोर्ट ने जब निचली अदालत अदालत द्वारा सभी आतंकियों को दिए गए मृत्युदंड और आजीवन कारावास के दंड के बाद हाईकोर्ट ने पर्याप्त सबूत ना होने की बात कह कर सभी आतंकियों को बाइज्जत बरी किया था,
तब भी यही न्यूज चैनल उस फैसले को न्याय की जीत, सेक्युलरिज्म की जीत बताकर उसी तरह बेसुध होकर नाचे थे, जिस तरह आज नाच रहे हैं। यानि जयपुर आतंकी धमाकों में निचली अदालत के फैसले को गलत मानकर नाचे थे।
आज निचली अदालत के फैसले को सही मानकर नाच रहे हैं। इनकी यही नौटंकी मुम्बई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में भी अभी कुछ महीनों पहले ही पूरा देश देख चुका है।
पत्रकारिता के नाम पर इन बेशर्म न्यूजचैनलों पर "तमाशा" करने और दिखाने का जो गोरखधंधा चलता है, उसे देखकर यह लगता है कि, 176 साल पहले मिर्ज़ा ग़ालिब जो शेर लिख गए थे, वो इसी न्यूज़चैनली गोरखधंधे के लिए ही लिख गये थे कि...
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।

PAK फौजियों का काम तमाम, पुलिस चौकियों पर कब्जा और ताबड़तोड़ हवाई हमले: रमजान के बीच ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान में शुरू हुई जंग

चमन बॉर्डर क्रॉसिंग के पास पाकिस्तानी फौज (बाएँ), तोरखम बॉर्डर क्रॉसिंग पर तालिबान फौज (दाएँ), ( साभार : aljazeera)
रमजान के महीने के बीच डूरंड लाइन पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया है। गुरुवार (26 फरवरी) रात से जारी इस खूनी संघर्ष में तालिबान ने 55 पाकिस्तानी फौजियों को मार गिराने और 19 सैन्य चौकियों पर कब्जा करने का दावा किया है। अफगानिस्तान का कहना है कि यह कार्रवाई पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों के जवाब में की गई है।

वहीं, बुरी तरह घिरे पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपनी विफलता का ठीकरा भारत पर फोड़ते हुए तालिबान को ‘भारत का प्रॉक्सी‘ करार दिया है। इस टकराव ने दोनों देशों के बीच तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है।

पाकिस्तान ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उसके सिर्फ दो फौजी मारे गए हैं और 36 अफगान लड़ाके मारे गए हैं। दोनों देशों के दावे एक-दूसरे से बिल्कुल उलट हैं। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह सैन्य कार्रवाई गुरुवार (26 फरवरी 2026) की रात शुरू हुई, जो इस्लामी कैलेंडर के अनुसार 9 रमजान 1447 के दिन थी।

अफगानिस्तानी मंत्रालय ने कहा कि कुछ दिन पहले पाकिस्तानी फौज ने अफगान क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए मिसाइल और हवाई हमले किए थे, जिनमें महिलाएँ और बच्चे मारे गए थे। इसी के जवाब में तालिबान बलों ने पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान के पक्तिका, पक्तिया, खोस्त, नंगरहार, कुनार और नूरिस्तान प्रांतों से लगे डूरंड लाइन के पार समन्वित जवाबी हमले किए।

अफगान रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार, करीब चार घंटे चली इस लड़ाई में तालिबान बलों ने पाकिस्तान के दो सैन्य अड्डों और 19 चौकियों पर कब्जा कर लिया, जबकि चार अन्य चौकियों से पाकिस्तानी फौजी भाग खड़े हुए। मंत्रालय ने दावा किया कि इस दौरान 55 पाकिस्तानी फौजी मारे गए, कई को जिंदा पकड़ा गया।

वहीं कुछ शव अफगानिस्तान लाए गए और भारी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद भी जब्त किए गए हैं। एक पाकिस्तानी टैंक को नष्ट करने और एक सैन्य परिवहन वाहन को कब्जे में लेने का भी दावा किया गया। तालिबान ने माना कि 8 तालिबान लड़ाके मारे गए और 11 घायल हुए।

तालिबान का आरोप: काबुल, कंधार और पक्तिया पर हवाई हमले

तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “कायर पाकिस्तानी फौजियों ने काबुल, कंधार और पक्तिया के कुछ इलाकों में हवाई हमले किए हैं, सौभाग्य से अब तक किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।”

प्रवक्ता जबीहुल्लाह ने कहा कि इन हमलों के बाद अफगान बलों ने कड़ी जवाबी कार्रवाई की। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अफगान वायु रक्षा बलों ने अफगान हवाई क्षेत्र में घुसे एक पाकिस्तानी विमान को भी मार गिराया है। हालाँकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी।

तालिबान सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान की ओर से नंगरहार में स्थित एक शरणार्थी शिविर पर मिसाइल हमला किया गया, जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत 13 अफगान नागरिक घायल हुए।

पाकिस्तान का पलटवार: तालिबान ने बिना उकसावे के की फायरिंग

पाकिस्तान ने तालिबान के सभी दावों को खारिज करते हुए कहा कि सीमा पर झड़प की शुरुआत अफगान-तालिबान बलों ने की थी। पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिर्फ उनके दो फौजी मारे गए और तीन घायल हुए हैं, जबकि 36 अफगान लड़ाके मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान बिना उकसावे की गई फायरिंग का जवाब दे रहा है।

पीएम शहबाद शरीफ के प्रवक्ता मुशर्रफ अली जैदी ने कहा कि पाकिस्तानी फौजियों के पकड़े जाने की खबर गलत है। पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, “अफगान-तालिबान शासन ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पाकिस्तान-अफगान सीमा पर बिना उकसावे के फायरिंग शुरू की। इसका पाकिस्तान द्वारा प्रभावी जवाब दिया जा रहा है।”

इसके अलावा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी बयान जारी करते हुए कहा, “पाकिस्तान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं करेगा। हमारी सशस्त्र फौजियों की प्रतिक्रिया व्यापक और निर्णायक है। जो लोग हमारी शांति को हमारी कमजोरी समझते हैं, उन्हें कड़ा जवाब मिलेगा।”

संघर्ष का असर तोरखम सीमा चौकी तक फैल गया, जो दोनों देशों के बीच एक प्रमुख व्यापारिक और आवागमन मार्ग है। अफगान अधिकारियों ने सीमा के पास स्थित एक शरणार्थी शिविर को खाली कराना शुरू कर दिया, क्योंकि कई शरणार्थी घायल हो गए थे। वहीं पाकिस्तानी पुलिस ने बताया कि सीमा से सटे गाँवों के लोग सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं।

पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि अफगान क्षेत्र से दागे गए मोर्टार गोले सीमावर्ती गाँवों में गिरे, हालाँकि किसी नागरिक के हताहत होने की पुष्टि नहीं हुई।

क्यों बार-बार भड़कता है विवाद

डूरंड रेखा अफगनिस्तान और पाकिस्तान के बीच लगभग 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा है जो 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच स्थापित की गई थी। अंग्रेजों के बनाए इस सीमा रेखा को अफगानिस्तान नहीं मानता है। रेखा के एक ओर अफगानिस्तान के 12 प्रांत हैं, दूसरी ओर पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान।

दोनों देशों के लोग इस खुली सीमा के आर-पार आते जाते हैं और परंपरागत रूप से जुड़े हुए हैं। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर काफी समानताएँ हैं। यही वजह है कि खैबर पखतूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित जैसे इलाकों में पाकिस्तानी फौज के खिलाफ लोग विद्रोह कर रहे हैं। यहाँ पाकिस्तानी फौज का जुर्म सुर्खियों में भी रहा है।

महिलाओं-बच्चों के साथ अमानवीय हरकत, पुरुषों का लगातार गायब होने को लेकर लोग पाकिस्तान के फौज को जिम्मेदार मानते हैं। अफगानिस्तान के लिए यह एक संवेदनशील मामला है। यहाँ कोई भी शासन में आ जाए, वह डूरंड रेखा को नहीं मानेगा, क्योंकि ये भावनाओं से जुड़ा है।

अफगानिस्तान ने पश्तून प्रभाव वाले क्षेत्र खैबर पख्तूनख्वाह को पश्तूनिस्तान बनाने का भी समर्थन किया है। पाकिस्तान ने जब पख्तूनख्वाह सीमा पर वीजा और पासपोर्ट अनिवार्य किया, तो पख्तूनों ने प्रदर्शन किया। ब्रिटिश विदेश सचिव सर मोर्टिमर डूरंड ने 1893 में अफगानिस्तान और भारत के बीच सीमा की स्थापना की थी और पख्तून प्रांत को अलग कर दिया था।

दोनों देशों के बीच फैली हुई लंबी डूरंड रेखा पख्तून जनजातीय क्षेत्रों से होकर गुजरती है और उन्हें दो अलग-अलग मुल्कों में विभाजित करती है। पाकिस्तान बनने के बाद डूरंड रेखा उसे विरासत में मिली, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता या मान्यता नहीं है।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) के उपाध्यक्ष काशिफ पानेजई के मुताबिक, सीमा पर जो इलाका बँटा हुआ है, वह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, वह उनका घर है। उन्होंने कहा, “डूरंड रेखा कई गाँवों को आधे में विभाजित करती है और कई लोगों को उनके कृषि वाली भूमि से विभाजित करती है। यह जनजातियों और अन्य समूहों को बीच से बाँटता है।”

डूरंड रेखा के बावजूद कई इलाके ऐसे भी हैं, जहाँ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की रेखा अस्पष्ट है। ये दुर्गम और सुलेमान पर्वत श्रृंखला वाला इलाका है। ओरकजई, स्पिन बोल्डक से गजनी तक कई क्षेत्र ऐसे हैं। इसको लेकर भी दोनों देशों में तनाव रहता है।

INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।