राहुल गांधी का देश विरोधी एजेंडा, एलन मस्क के ‘स्टारलिंक’ का स्वागत, भारत की आईटी कंपनियों पर चुप्पी

मुख्य चुनाव आयुक्त और विशेष गहन पुनरावलोकन (एसआईआर) के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन संयोग नहीं, बल्कि खतरनाक प्रयोग है। एक तरफ राहुल गांधी देश के भीतर रोजगार और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी ‘स्टारलिंक’ के लाइसेंस में हो रही देरी पर अमेरिकी अरबपति एलन मस्क के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस पहले एलन मस्क के ‘स्टारलिंक’ का विरोध करती थी, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार को घेरने, राजनीतिक लाभ और सरकार विरोधी नैरेटिव को धार देने के लिए राहुल गांधी इसका स्वागत कर रहे हैं, भले ही देश में किसी विदेशी हस्ती या बाहरी कंपनी का हस्तक्षेप क्यों न शामिल हो। विदेश मामलों के जानकार और कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के बयान से असहज महसूस कर रहे हैं। राहुल गांधी के स्टैंड में अचानक आया यह बदलाव किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश और गठजोड़ की ओर इशारा कर रहा है।

क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं?- एलन मस्क
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी 8 अक्टूबर को दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एलन मस्क के एक पोस्ट ने खलबली मचा दी। मस्क का पोस्ट उसी टूलकिट का हिस्सा था, जिसे विदेशी ताकतें भारत में लागू करने की कोशिश कर रही हैं। एक भारतीय यूजर डॉ. अनुरूद्ध ने X पर एक पोस्ट में लिखा था कि क्या सरकार भारतीय सिटिजन को छोड़ कर क्रोनी कैपिटिलिज्म को बचा रही है? इसी पोस्ट को कोट करते हुए एलन मस्क ने X पर जवाब दिया, ‘Starlink को 165 देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और पांच साल तक हर कंप्पलायंस पूरा करने के बावजूद भारत में उन्हें लाइसेंस क्यों नहीं मिल रहा? क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? मस्क के मुताबिक ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि भारतीयों पर अपना “monopolistic chokehold” बनाया रखा जा सके। मस्क ने इसे भारतीय जनता के साथ “crime” तक बताया। इसके जवाब में भारत सरकार ने साफ कहा कि सैटेलाइट कम्युनिकेशन सेवाओं के लिए बनाई गई उसकी रेगुलेटरी व्यवस्था किसी कंपनी के साथ भेदभाव नहीं करती।

राहुल ने कहा, ‘भारत में आपका स्वागत है, एलन’
एलन मस्क के इस बयान के तुरंत बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, ‘भारत में आपका स्वागत है, एलन। तब तक इंतजार करें जब तक आप दूसरे व्यक्ति को नहीं खोज लेते।’ राहुल के इस बयान पर एलन मस्क ने प्रतिक्रिया भी दी। उन्होंने लिखा, ‘थैंक्यू राहुल। ये वाकई परेशान करने वाला है।’ जब एक विदेशी व्यापारी द्वारा अपने प्रतिस्पर्धी भारतीय व्यापारी पर सवाल उठाया जाता है,तो एक भारतीय का कर्तव्य है कि वो अपने भारतीय व्यापारी का समर्थन करें। लेकिन समर्थन देने के बजाए एक ऐसे विदेशी व्यापारी का स्वागत करना हैरान करने वाला है। भारत की सुरक्षा और भारतीय व्यापारियों के हितों की अनदेखी कर समर्थन करने से स्पष्ट है कि राहुल गांधी का एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन सिर्फ बहाना है। उनका मकसद अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए विदेशी कंपनियों और ताकतों के लिए लॉबिंग करना है।

अमेरिका में भारतीय आईटी कंपनियों पर सख्त फैसला
जब एलन मस्क और राहुल गांधी ‘X’ पर एक-दूसरे का समर्थन कर रहे थे। इसी दौरान अमेरिका की ट्रंप सरकार के फैसले ने दोनों को बेनकाब कर दिया। अमेरिकी प्रशासन ने आठ बड़ी आईटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) से निलंबित कर दिया। इनमें भारत से जुड़ी टेक कंपनियां कॉग्निजेंट (Cognizant), इंफोसिस (Infosys), टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो (Wipro) और एचसीएल (HCL) शामिल हैं। इस कार्रवाई के बाद इन कंपनियों से जुड़े नए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम एप्लीकेशन पर रोक लगेगी। पहले से पेंडिंग एप्लीकेशन पर भी फिलहाल कार्रवाई नहीं होगी। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन विदेशी पेशेवरों को नौकरी देने वाली कंपनियों की जांच तेज कर रहा है। ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के लिए वीजा सिस्टम का गलत इस्तेमाल कर रही हैं और इससे अमेरिकी पेशेवरों के रोजगार पर असर पड़ रहा है।

राहुल गांधी की भारतीय आईटी कंपनियों पर चुप्पी
ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से सबसे बड़ा सवाल उन भारतीय कर्मचारियों को लेकर है, जो H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं और जिनकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया इन कंपनियों के जरिए आगे बढ़ रही है। अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल ने माइक्रोसॉफ्ट को PERM ग्रीन कार्ड कार्यक्रम से निलंबित किए जाने के फैसले की आलोचना की। उन्होंने इसे कानूनी तरीके से अमेरिका आने वाले प्रवासियों पर हमला बताया। डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता जयपाल ने चेतावनी दी कि इस तरह के कदम से अमेरिका की इनोवेशन कैपेसिटी कमजोर हो सकती है और प्रवासी कामगारों को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन ट्रंप प्रशासन के इस फैसले पर एलन मस्क का भारत में स्वागत करने के लिए तैयार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मौन है। उन्हें भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स की चिंता नहीं है। उन्हें तो बस किसी तरह तरह से केंद्र की सत्ता चाहिए, चाहे उसके लिए विदेशी ताकतों की मदद क्यों न लेनी पड़े।

पहले विरोध और अब समर्थन, कांग्रेस का अचानक यू-टर्न 
पहले कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनिंदा कारोबारियों को फायदा पहुंचाने का हवाला देकर स्टारलिंक का विरोध किया था, लेकिन अब राहुल गांधी मस्क के बयान का समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी पर ट्रंप के दबाव में आने का आरोप लगाया था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मार्च 2025 में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक और भारतीय टेलीकॉम कंपनियों (जियो और एयरटेल) के बीच हुई डील और केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति में इंटरनेट कनेक्टिविटी को बंद करने का अधिकार किसके पास होगा—स्टारलिंक के पास या उसकी भारतीय साझीदार कंपनियों के पास। उन्होंने यह आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने और उनका समर्थन पाने के लिए जल्दबाजी में स्टारलिंक को भारत में लाने का रास्ता साफ किया है। लेकिन अब कांग्रेस के अचानक यू-टर्न से सवाल खड़े हो रहे हैं।

जयराम रमेश ने टेस्ला पर भी उठाया था सवाल
कांग्रेस ने स्टारलिंक का विरोध करते हुए भारत के महत्वपूर्ण डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर विदेशी नियंत्रण और सख्त नियामक जांच  की जरूरत पर जोर दिया था। हालांकि इससे पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भारत में टेस्ला के मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) पर भी सवाल उठाया था। जब एलन मस्क ने 21 अप्रैल 2024 को अपनी भारत यात्रा टाली तो जयराम रमेश ने बीजेपी पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि यह अजीब है कि एलन मस्क एक निवर्तमान प्रधानमंत्री से मिलने के लिए आ रहे थे। कांग्रेस नेता ने पोस्ट किया कि उन्होंने भी अब दीवार पर लिखी इबारत पढ़ ली है और अपनी यात्रा टालने का फैसला किया है। भारत के प्रधानमंत्री जल्द ही उनका स्वागत करेंगे और भारत सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को और भी अधिक आक्रामक तरीके से बढ़ावा देगी।

राहुल गांधी के “गले की फांस” बना एलन मस्क का समर्थन
स्टारलिंक और टेस्ला के मैन्युफैक्चरिंग पर सवाल उठाने वाले कांग्रेस नेता भूल गए कि उनका यह यह सवाल उनके दोहरे चरित्र को बेनकाब कर देगा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लगा कि अमेरिकी व्यापारी तो असल में उसी लाइन पर भारत सरकार के खिलाफ बैटिंग कर रहे हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए वह अबतक सियासी हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी का एलन मस्क का समर्थन उनके खुद के राजनीतिक बयानों के विरोधाभास और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों के कारण उनके लिए “गले की फांस” बन गया है। उनकी चौतरफा आलोचना हो रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी एक विदेशी अरबपति के व्यावसायिक हितों का समर्थन भारतीय कंपनियों और भारत के राष्ट्रीय नियामक ढांचे के खिलाफ कर रहे हैं। बीजेपी नेता राम माधव ने कहा कि भारत कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ नहीं है जहां किसी विदेशी कंपनी के दबाव में आकर बिना सुरक्षा जांच के स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया जाए।

तो क्या TN Seshan कांग्रेस को वोट चोरी से जिताते थे?

सुभाष चन्द्र

कहते हैं सबसे कड़क CEC टी एन शेषन थे। वो 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक पद पर रहे। उस समय 3 चुनाव आयुक्त नहीं होते थे और इसलिए शेषन अकेले ही सर्वेसर्वा थे।

शेषन के समय में मई/जून 1991 में लोकसभा चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस की पिछले चुनाव से 47 सीट बढ़ कर 244 हो गई जबकि भाजपा की 35 सीट बढ़ कर 120 हुई। तो क्या शेषन ने भी कांग्रेस के लिए वोट चोरी करवाई थी?

उसके बाद शेषन के कार्यकाल में कांग्रेस ने अनेक राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई लेकिन किसी ने उन पर वोट चोरी का आरोप नहीं लगाया।

कहां कहां कांग्रेस जीती वो देखिये -

-1991 -असम, हरियाणा, केरल (कांग्रेस का UDF) और पुडुचेरी में कांग्रेस ने गठबंधन सरकार बनाई;

-1992 - पंजाब में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला;

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-1993 -हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और नागालैंड में पूर्ण बहुमत से कांग्रेस ने सरकार बनाई और मेघालय एवं मिज़ोरम में कांग्रेस ने अपने नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई;

-1994 - गोवा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला;

अन्य राज्यों में विपक्षी दलों की और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी -

-1991 - तमिलनाडु में AIADMK ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, उत्तर प्रदेश में बीजेपी और बंगाल में सी.पी.एम. की सरकार बनी;

-1993 में दिल्ली और राजस्थान में बीजेपी की सरकार, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की गठबंधन सरकार और त्रिपुरा में सी.पी.एम. की सरकार बनी;

-1994 में आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम, कर्नाटक में जनता दल और सिक्किम में SDF की सरकार बनी;

- 1995 में अरुणाचल प्रदेश में जनता दल गठबंधन, बिहार में जनता दल, गुजरात में बीजेपी, महाराष्ट्र में शिवसेना+बीजेपी गठबंधन, मणिपुर में क्षेत्रीय दलों के गठबंधन और ओडिशा में जनता दल की सरकार बनी; और 

-1996 में असम में असम गण परिषद, हरियाणा में HVP+BJP, जम्मू कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और केरल में वामपंथी गठबंधन, पुडुचेरी में DMK+TMC, बंगाल में सी.पी.एम. की सरकार बनी लेकिन उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा होने के कारण राष्ट्रपति शासन लगाया गया 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तब शेषन के कार्यकाल में किसी दल के दिमाग में वोट चोरी का कीड़ा नहीं उठा। यह EVM और वोट चोरी का बेसुरा राग 2014 के बाद शुरू हुआ जबकि कांग्रेस स्वयं 2004 और 2009 में EVM के जरिए ही सत्ता में आ सकी।

एक बात और महत्वपूर्ण है कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में 2026 का बंगाल का पहला चुनाव था जब हिंसा नहीं हुई और कोई मौत नहीं हुई जबकि शेषन से समय 1991 के बंगाल चुनाव में 20 से ज्यादा और 1996 के चुनाव में 25 से ज्यादा मौतें हुई।

लेकिन आज इतने साफ़ सुथरे चुनाव होने पर भी CEC ज्ञानेश कुमार की बलि लेना चाहते है कांग्रेस और विपक्ष के लोग और कॉकरोच भी जो कभी चुनाव नहीं लड़े। 

आज SIR को रो रहे हैं जबकि कांग्रेस शासन में देश के विभिन्न हिस्सों में SIR 1952–56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983–84, 1987–89, 1992, 1993, 1995, 2002, 2003, and 2004 में हुआ और बिहार में  2003 में SIR हुआ था। रोना इस बात का है इस बार के SIR में मरे हुए लोग और विदेशी बांग्लादेशी/रोहिंग्या लपेटे में आ गए। 

राहुल गांधी ने पैरों में फेंका संविधान, विदेशी आकाओं का आदेश, लागू किया ‘भारत की बर्बादी’ का टूलकिट


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरकार के मुखिया के रूप में लगातार 25 वर्ष पूरे करने के अवसर पर ‘We Will Do It’ का नारा दिया। इस नारे के माध्यम से उन्होंने भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने का दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास व्यक्त किया। प्रधानमंत्री मोदी का यही आत्मविश्वास और
भारत का तेजी से बढ़ता आर्थिक, रणनीतिक तथा कूटनीतिक कद कई वैश्विक ताकतों और प्रतिद्वंदियों के लिए असहजता पैदा कर रहा है। इसलिए उभरते भारत को रोकने, उसकी विकास दर को धीमा करने और देश में अस्थिरता पैदा करने के लिए बहुआयामी अंतरराष्ट्रीय प्रयास किए जा रहे हैं। “विदेशी डीप स्टेट” यानी विदेशी ताकतों का गुप्त नेटवर्क फंडिंग के माध्यम से भारत के विभीषणों, विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को अपने इशारों पर नचा रहा है, जिसकी झलक दिल्ली की सड़कों पर देखने को मिल रही है।

प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने पैरों में फेंका संविधान
राहुल गांधी अपनी रैलियों और जनसभाओं में लगातार एक लाल रंग की किताब साथ रखते हैं, जिस पर ‘Constitution of India’ लिखा होता है। उनका और उनकी पार्टी का यह मानना है कि यह किताब देश के मूल लोकतांत्रिक मूल्यों, आरक्षण और डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर के विचारों का प्रतीक है। कांग्रेस का यह तर्क है कि वे इसके माध्यम से संविधान को बचाने की वैचारिक लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन संविधान बचाने की लड़ाई की सच्चाई 7 अक्टूबर, 2026 को दिल्ली की सड़कों पर सामने आई, जब राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर चल रहे प्रदर्शन में संविधान को अपने पैर के पास नीचे फेंक दिया। राहुल गांधी की इस अपमानजनक हरकत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें देखा जा सकता है कि राहुल गांधी संविधान फेंक कर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का अपमान कर रहे हैं।

राहुल ने संविधान फेंक थामा भारत की बर्बादी का टूलकिट
राहुल गांधी ने संविधान फेंक कर संदेश दिया है कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर के विचारों को भी अपने पैरों तले रौंद दिया है। अब संविधान और लोकतंत्र बचाना उनका मकसद नहीं है। उन्होंने संविधान फेंकर अपने हाथों में विदेशी ताकतों का ‘टूलकिट’ (ऐसी पुस्तिका, जिसमें आंदोलन की कार्ययोजना हो) थाम लिया है, जिसमें भारत की बर्बादी की पटकथा लिखी हुई है। हाल के दिनों में राहुल गांधी इसी पटकथा के मुताबिक दिल्ली की सड़कों पर अराजकता पैदा करते नजर आ रहे हैं। अपने विदेशी आकाओं को खुश करने के लिए कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं। दिल्ली पुलिस का अधिकारी बार-बार अनुरोध करता रहा, “मैं आप से रिक्वेंस्ट कर रहा हूं, हजारों की भीड़ है, किसी को चोट लग जाएगी। आप बताएं कैसे होगा ? आप कोऑपरेट कीजिए सर…।’ इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी जिद पर अड़े रहे और राजशाही मानसिकता और अहंकार का परिचय देते रहे।

राहुल गांधी ने महिला पुलिसकर्मी के साथ की बदसलूकी
राहुल गांधी ने प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की एक महिला कांस्टेबल को गलत तरीके से छूने की कोशिश की। उन्होंने महिला कांस्टेबल को धक्का दिया और उससे बदसलूकी की। राहुल गांधी ने महिला कांस्टेबल को तब धक्का दिया, जब वह अपनी टीम के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर बुधवार 7 अक्टूबर को प्रदर्शन में शामिल एक महिला प्रदर्शनकारी को हटाने की कोशिश कर रही थी। दिल्ली पुलिस ने वायरल वीडियो की जांच शुरू कर दी है और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से मारपीट, धक्का-मुक्की और महिलाकर्मियों पर हमले के संबंध में विभिन्न थानों में एफआईआर (FIR) दर्ज की हैं। पुलिस यह भी देख रही है कि प्रदर्शन के दौरान किन लोगों की ओर से पुलिसकर्मियों के साथ कथित तौर पर मारपीट या ड्यूटी में बाधा डालने की घटना हुई।

महिला पुलिसकर्मी को कोहनी मारते नजर आईं प्रियंका वाड्रा 
भाई राहुल गांधी से कम बहन प्रियंका गांधी वाड्रा भी नहीं है। लोकसभा में चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर भाषण देने वाली और ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ का नारा देने वाली कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी का असली चेहरा दिल्ली की सड़क पर देखने को मिला, जब विरोध प्रदर्शन के दौरान एक महिला पुलिसकर्मी से बदसलूकी और मारपीट की। महिला पुलिसकर्मी सीमा के साथ धक्का-मुक्की करने और कोहनी मारने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पीड़ित महिला पुलिसकर्मी ने इस घटना के बारे में बताया कि अराजकता और धक्का-मुक्की के माहौल में उन्हें कोहनी लगी और धक्का दिया गया, जिससे उन्हें चोट आई। इस घटना से पता चलता है कि महिला सम्मान की बात करना कांग्रेस के लिए सिर्फ दिखावा है। सत्ता की राजनीति से लेकर सड़क पर मारपीट ही कांग्रेस का असली चेहरा है।

दिल्ली की सड़क पर बहन और भाई का अराजक ड्रामा
प्रदर्शन के दौरान दिल्ली की सड़क पर बहन और भाई का ड्रामा देखने को मिला। एक तरफ जहां भाई संविधान की कॉपी को पैर के पास नीचे फेंकते नजर आया, वहीं बहन प्रियंका गांधी वाड्रा अन्य महिला नेताओं के साथ हाथ में संविधान की कॉपी लेकर सड़क पर ही लेट गईं। इस दौरान राहुल गांधी प्रियंका गांधी के पैर के पास खड़े रहे। काफी मशक्कत के बाद पुलिस ने उन्हें और अन्य नेताओं को सड़क से हटाकर हिरासत में लिया। दरअसल, बुधवार को कांग्रेस के नेताओं ने जनपथ स्थित एक दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में दोपहर के भोजन के बाद जंतर-मंतर की ओर अचानक धरना देने के लिए मार्च निकाला। जब पुलिस ने विपक्षी सांसदों की बसों को रास्ते में ही रोक दिया, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई और पुलिसकर्मियों तथा प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी बहस और धक्का-मुक्की देखने को मिली।

धक्का-मुक्की, मारपीट का आरोप,राहुल-प्रियंका पर 3 और FIR
दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ कांग्रेस और INDIA गठबंधन के प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR दर्ज की है। पुलिस से कथित धक्का-मुक्की, मारपीट और सरकारी काम में बाधा जैसे आरोप लगाया है। इस FIR में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम शामिल हैं। इससे एक दिन पहले दिल्ली पुलिस ने आकाशवाणी भवन की घटना को लेकर भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खिलाफ FIR दर्ज की थी।

कांग्रेसियों की गुंडागर्दी, मोदी समर्थक कश्मीरी युवक की पिटाई
जब कांग्रेस का आलाकमान दिल्ली की सड़कों पर अराजकता फैला रहा हो, तो उस पार्टी के कार्यकर्ताओं से संयम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच अराजकता और हिंसा फैलाने की होड़ मची है। दोनों अपने झूठे और मनगढ़ंत आरोपों के खिलाफ एक शब्द सुनना नहीं चाहते हैं। इसलिए वो पुलिसकर्मियों के साथ ही आम लोगों पर भी हमले कर रहे हैं। 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित एक होटल के बाहर एक कश्मीरी युवक फईम नजीर शाह की कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पिटाई कर दी। युवक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी नीतियों की तारीफ की और राहुल गांधी तथा विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों पर सवाल उठाए। घटना के बाद होटल के बाहर हंगामा भी हुआ। इसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ता फईम पर टूट पड़े। फिलहाल इस मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

मोदी का समर्थन करने पर कश्मीरी युवक से मारपीट 
कश्मीरी युवक फईम का कहना है कि उसने कोई गाली-गलौज नहीं की थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करने और घाटी में आतंकवाद कम होने का श्रेय मोदी सरकार को देने पर कांग्रेस कार्यकर्ता भड़क गए। फईम ने कहा, “मैंने राहुल गांधी को गाली नहीं दी। हमने सवाल किया कि जब विपक्ष जीत जाता है तो ईवीएम में खराबी नहीं होती है…ईवीएम राजीव गांधी ने लाया था। मैं देश को समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि देश को नेपाल और बांग्लादेश बनाने की साजिशें चल रही हैं। मैं देश का नागरिक हूं। मेरी जिम्मेदारी है कि देश को नेपाल और बांग्लादेश नहीं बनने देना है। करो राहुल गांधी से सवाल…ये हैं फ्रीडम ऑफ स्पीच।” इस घटना के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाली कांग्रेस दूसरे लोगों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है।

बेंगलुरु में जुटे विदेशी फंडिंग पर पलने वाले कॉकरोच  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को अपदस्त करने और भारत में अराजकता फैलाने के लिए विदेशी ताकतों ने पूरी ताकत झोंक दी है। विदेशी फंडिंग पर पलने वाले यूट्यूबर ध्रुव राठी जैसे सभी गुर्गों को भारत भेज दिया है। इनका जमावड़ा 7 अक्टूबर को कर्नाटक में देखने को मिला। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया। इसमें ध्रुव राठी, प्रकाश राज, आशुतोष रांका, जुबैर समेत कई बड़े चेहरे बैठे हुए नजर आ रहे हैं। इसमें दीपके को कहते सुना जा सकता है कि वह कल के प्रोटेस्ट के लिए बेंगलुरु में हैं। लेकिन इसके पहले वह सभी के लिए एक सरप्राइज लाए हैं। इसके बाद ध्रुव राठी दिखाई देते हैं। राठी ने कहा, “यह लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। कल आठ अक्तूबर को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में मिलते हैं।” इसके बाद उन्होंने दिल्ली के जंतर मंतर प्रोटेस्ट का भी जिक्र किया। इसके बाद अभिनेता प्रकार राज ने फिल्मी अंदाज में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निशाना साधा।

ध्रुव राठी का CJP प्रदर्शन में शामिल होना विदेशी टूलकिट का हिस्सा
8 अक्टूबर को कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित फ्रीडम पार्क में एसआईआर के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित एक विशाल विरोध प्रदर्शन और ‘पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ में अभिजीत दीपके, ध्रुव राठी और अभिनेता-कार्यकर्ता प्रकाश राज शामिल हुए। जर्मनी से आकर ध्रुव राठी का कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल होना और सभा को संबोधित करना अंतरराष्ट्रीय टूलकिट का हिस्सा है। चाहे कांग्रेस सरकार के संरक्ष बेंगलुरु का प्रदर्शन हो या दिल्ली में राहुल गांधी के नेतृत्व में दिल्ली का प्रदर्शन हो, दोनों का मकसद समान है। भारत के आंतरिक राजनीतिक मुद्दों को सोशल मीडिया के जरिए वैश्विक स्तर पर इस तरह से प्रचारित किया जाए ताकि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग और न्यायपालिका) की साख पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ सकें।

राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार को मुकम्मल इलाज करना चाहिए; वोट चोरी कहना भूल जायेगा

सुभाष चन्द्र

INDI गठबंधन में शामिल पार्टियां राहुल गाँधी द्वारा किये जाने वाले उपद्रव से परेशान देख अलग होनी शुरू हो रही है। अखिलेश, तेजस्वी और ममता ने भी दूरी बनानी शुरू करने के अलावा कांग्रेस में भी लोग दूरी बना रहे हैं। सभी जनविरोधी हरकतों से अपना सियासती जिंदगी दावं पर देख रहे हैं। संसद नहीं चलने देने से भी जनता पर भी गलत सन्देश जा रहा है। राहुल तो कोर्ट में माफ़ी मांगकर बच जायेंगे हमारा क्या होगा? माफ़ी मांग राहुल को तो सोशल मीडिया पर माफीवीर के नाम से कहा जाने लगा है। बस कमी यह है कि माफ़ी स्वीकार करने वालों ने कोर्ट से राहुल की माफ़ी को मीडिया में प्रसारित करने के लिए नहीं बोला। जिस दिन यह काम हो गया कांग्रेस एक/दो चुनाव के बाद इतिहास बन जाएगी। जब तक परिवार पार्टी पर कुंडली जमाए बैठा रहेगा कांग्रेस को डूबने से कोई नहीं बचा सकता।     

ऐसा कहते है चुनाव आयोग एक संस्था के रूप में आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर नहीं कर सकता लेकिन आयोग के Individual officers or staff members of the ECI who are personally and specifically targeted by defamatory allegations can file a criminal defamation case in their individual capacity.

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इसलिए ज्ञानेश कुमार को अपनी individual capacity में आयोग के सदस्य के तौर पर राहुल गांधी और अन्य के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दर्ज कर देना चाहिए क्योंकि मुख्य निशाना उन्हें ही बनाया जा रहा है वह भी झूठ पर आधारित प्रचार के द्वारा। 

कुछ केस बताता हूँ जो दायर होने के बाद राहुल गांधी की बोलती बंद हो गई -

-आए दिन राहुल गांधी RSS को महात्मा गांधी का हत्यारा कहता था - भिवंडी कोर्ट में RSS Activist राजेश कुंटे ने RSS की मानहानि का केस दायर कर दिया जो अभी भी चल रहा है। उसके बाद क्या कभी राहुल गांधी को महात्मा गांधी की हत्या का RSS को दोषी कहते सुना है?

-प्रधानमंत्री मोदी के लिए 2018 के भाषण में राहुल गांधी ने “चोरों का सरदार (Commander-in-Thief) कहा। बीजेपी कार्यकर्ता महेश श्रीमल ने मानहानि का केस दायर कर दिया। उसके बाद क्या कभी राहुल गांधी को मोदी के लिए ऐसे शब्द बोलते सुना है?

-राहुल गांधी ने 2019 में कहा था कि “सारे मोदी सरनेम के लोग चोर क्यों होते हैं, चाहे वो नीरव मोदी हो, ललित मोदी हो या नरेंद्र मोदी”। बीजेपी विधायक पूर्णेश मोदी ने केस दायर किया, 2 साल की सजा हुई सांसदी गई  लेकिन सुप्रीम कोर्ट में बैठे कांग्रेस परिवार से आने वाले जस्टिस बीआर गवई ने छोड़ दिया। Technically वो केस अभी लंबित है लेकिन क्या उसके बाद राहुल गांधी को मोदी सरनेम वालों चोर कहते सुना?

साभार सोशल मीडिया 
-2018 में बेंगलुरु की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने अमित शाह के लिए कहा “एक हत्यारा अभी भी भाजपा का अध्यक्ष है”। बीजेपी कार्यकर्ता विजय मिश्रा ने सुल्तानपुर MP/MLA कोर्ट में केस दायर किया जिसमें राहुल गांधी बेल पर है। केस अब सुनवाई के अंतिम चरण में है। उसके बाद क्या राहुल गांधी को अमित शाह के लिए “हत्यारा” शब्द कहते सुना जबकि वे अब गृह मंत्री हैं?

-अमित शाह को हत्यारा कहने वाला एक मुकदमा राहुल गांधी के खिलाफ झारखंड के ट्रायल कोर्ट में भी चल रहा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से उस पर स्टे लगा हुआ है।

-वीर सावरकर के लिए आए दिन राहुल गांधी “माफीवीर” कहता था। एक केस दायर हुआ सुप्रीम कोर्ट से फटकार भी पड़ी। उसके बाद वह केस सुप्रीम कोर्ट ने बंद कर दिया। लेकिन उसके बाद अब कभी सावरकर को माफीवीर कहते राहुल गांधी को नहीं सुना गया।

-सेना के जवानों का अपमान करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि हमारे सैनिक चीनी सैनिकों से पिट रहे हैं। BRO के पूर्व डायरेक्टर ने मानहानि का केस दर्ज किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट तो है न जिसने ट्रायल कोर्ट के केस को स्टे कर दिया। लेकिन फिर वैसा बयान राहुल गांधी को देते नहीं सुना।

इसलिए मेरा ज्ञानेश कुमार को सुझाव है कि वे As Individual राहुल गांधी और अन्य ऐसे ही लोगों के खिलाफ वोट चोरी और SIR के दुष्प्रचार के लिए आपराधिक मानहानि का केस दायर करें। तथ्य आपके पक्ष में हैं क्योंकि अगर वोट चोरी होती तो केरल और तमिलनाडु में विपक्षी दलों की सरकार न बनती। 

आज देश के 44 पूर्व जजों ने एक खुला पत्र लिख कर चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार का समर्थन किया है। बेहतर होगा इनमें से ही कोई जज ज्ञानेश कुमार का मुकदमा दायर कर दे।

एक बार मुकदमा दायर हो गया तो राहुल गांधी को “वोट चोरी और SIR” बस सपने में दिखाई देंगे। बोलती बंद हो जाएगी।

असम : जनता ने बैलेट पेपर से दिया राहुल गांधी को मुंह तोड़ जवाब, झूठ हुआ तार-तार


कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन समय-समय पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की पारदर्शिता पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने ईवीएम को एक ‘ब्लैक बॉक्स’ करार देते हुए इसकी निष्पक्षता पर संदेह जताया है और कई बार चुनाव बैलेट पेपर (मतपत्र) से कराने की मांग की। विपक्षी दलों का यह तर्क रहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए मतपत्र प्रणाली को दोबारा लाया जाना चाहिए, ताकि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो सके। विपक्ष समय-समय पर यह दावा करता आया है कि यदि चुनाव पूरी तरह से बैलेट पेपर के माध्यम से कराए जाएं और चुनावी तंत्र निष्पक्ष रूप से काम करे, तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा, क्योंकि जनता के वास्तविक मुद्दे (जैसे बेरोजगारी और महंगाई) उनके खिलाफ जाते हैं। राहुल गांधी ने बैलेट पेपर की वकालत करते हुए कहा था,
“राजा की आत्मा ईवीएम में हैं। ईवीएम के बिना नरेन्द्र मोदी चुनाव नहीं जीत सकते। वोट मशीन में नहीं है, कागज में है।”

ईवीएम छोड़ दो, सिर्फ बैलेट पेपर से चुनाव कराओ – खड़गे
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ईवीएम के खिलाफ जहर उगलते हुए बैलेट पेपर से चुनाव कराने की वकालत की थी। उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था,”एक बात तो जरूर करूंगा। हमारे प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी जी भी इसको मानेंगे। हमने जितनी भी शक्ति लगाकर, एससी, एसटी, ओबीसी, गरीब तबके के लोग, छोटे समुदाय के लोग, ये लोग जो अपना वोट दे रहे हैं, वो वोट फिजूल जा रहा है। ईवीएम छोड़ दो, ईवीएम, बीवीएम कुछ नहीं…चुनाव सिर्फ बैलेट पेपर से हो बस…वो मशीन उनके घर में रख लेने दो…या मोदी साहब के घर में रहने दो या शाह के घर में रहने दो। अहमदाबाद में बहुत से गोडाउन बने हैं, वहां ले जाकर रख लेने दो। चुनाव बस पेपर पर कराओ। और आपको मालूम होगा। उस वक्त तुम्हारा हाल क्या है? कहां खड़े हो? उस वक्त आपको मालूम होगा।”

असम की जनता ने बैलेट पेपर से कांग्रेस को दिया जवाब
देश की जागरूक जनता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रोपेगैंडा को भलीभांति समझ रही है। इसलिए SIR के खिलाफ प्रदर्शन के बीच असम की जनता ने कांग्रेस नेताओं को बैलेट पेपर से करारा जवाब दिया है। सिलचर नगर निगम के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की। वहीं कांग्रेस को चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव की सबसे खास बात यह रही कि मतदान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से नहीं, बल्कि बैलट पेपर से कराए गए थे। सिलचर नगर निगम को 42 वार्डों वाले म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में अपग्रेड किए जाने के बाद यह पहला निकाय चुनाव था। कॉर्पोरेशन जून 2025 में काम करने लगा था।

एनडीए को 42 में से 34 और कांग्रेस को 2 सीटें
एनडीए ने सिलचर नगर निगम के पहले चुनाव में 42 में से 34 सीटों पर जीत हासिल की। अधिकारियों के मुताबिक, मंगलवार 6 अक्टूबर को सामने आए परिणाम में कांग्रेस ने 2 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 6 सीटों पर जीत हासिल की। कुल 42 वार्ड में से 40 वार्ड के लिए तीन अक्टूबर को मतदान हुआ था, जबकि वार्ड संख्या 9 और 20 से भाजपा उम्मीदवार बिजेंद्र प्रसाद सिंह व भक्ति सेन तालुकदार निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। इस चुनाव में कुल 133 प्रत्याशी मैदान में उतरे थे। चुनाव में 70.22 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।

बैलेट पेपर पर कांग्रेस और बुरी तरह हारती है-सीएम सरमा
अब इस हार पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने तंज कसा कि कांग्रेस बैलेट पेपर पर भी नहीं जीत सकती है। सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, ‘आप देखिए कि बैलेट पेपर पर भी कांग्रेस हार गई। बैलेट पेपर पर कांग्रेस थोड़ा ज्यादा ही हार गई। इसलिए EVM में लोग नोटा भी दबा देते हैं। मशीन देखकर कुछ लोग घबरा जाते हैं और कभी गलत जगह पर वोट मार देते हैं, लेकिन बैलेट में तो वोट देने के बारे में लोग जानते हैं। तो जब तक बैलेट पेपर में वोट होते हैं, तब कांग्रेस और ज्यादा हारती है।’ इस चुनाव में मिली जीत से भाजपा में जश्न का माहौल है। मुख्यमंत्री सरमा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “असम में हम लोग दिवाली इस बार advance में मना रहे हैं । रुको जरा”

अल्पसंख्यक सीटों पर भी हारी कांग्रेस- सीएम सरमा
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, ‘आज आप देखिए कि सिलचर इलाका में 10 सीटें धार्मिक अल्पसंख्यकों की ही सीटें थीं। मतलब 10 सीट ऐसी थी, जहां कांग्रेस अल्पसंख्यकों के वोट से जीत सकती थी। लेकिन वहां भी कांग्रेस को वोट नहीं मिला और बस दो सीटें मिलीं और निर्दलीय को 5 सीटें मिलीं। तो पहला हुआ भाजपा-एजेपी, दूसरे हुए निर्दलीय और तीसरे पर कांग्रेस और बैलेट पेपर पर। आज के लिए हम लोग नारा दिए हैं कि आप मशीन पर भी हारने वाले हैं और बैलेट पर भी हारने वाले हैं।’ 

बैलेट पेपर से हुए त्रिपुरा विलेज कमेटी चुनाव, एनडीए की बंपर जीत
त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (TTAADC) के अंतर्गत हाल ही में संपन्न हुए ग्राम समिति चुनावों में बैलेट पेपर के माध्यम से मतदान हुआ था, जिसके परिणाम अक्टूबर 2026 में घोषित किए गए। इस चुनावों में एनडीए ने एक बार फिर बड़ी जीत दर्ज की। त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद के तहत हुए इन चुनावों में जनता ने मतपत्रों के माध्यम से विकास और सुशासन की राजनीति के पक्ष में अपना स्पष्ट जनादेश दिया। सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल टिपरा मोथा पार्टी (टीएमपी) और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर शानदार प्रदर्शन किया। 587 विलेज कमेटियों की कुल 4,594 सीटों में से टीएमपी ने 3,428 सीटें (74.61 प्रतिशत) जीती, जबकि भाजपा को 859 सीटें (18.70 प्रतिशत) मिलीं। उनके आदिवासी-आधारित सहयोगी, इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा ने 33 सीटें (0.72 प्रतिशत) हासिल की। विपक्षी सीपीआई (एम) को 87 सीटें (1.89 प्रतिशत) और कांग्रेस को 14 सीटें (0.30 प्रतिशत) मिली, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों ने 173 सीटें (3.77 प्रतिशत) जीती।

पंजाब यूनिवर्सिटी में बैलेट पेपर से चुनाव, Gen-Z की पसंद बनी ABVP
पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने लगातार दूसरी बार धमाकेदार अंदाज में अध्यक्ष पद जीतकर  कैंपस की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। जीत के बाद प्रधान बने अंकित बिधान ने इसे Gen-Z की जीत बताया। पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले एबीवीपी की इस जीत को कांग्रेस और आप दोनों के लिए जोरदार झटका माना जा रहा है। दरअसल, यह चुनाव परिणाम केवल कैंपस के भीतर छात्र प्रतिनिधियों के चयन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश और विशेष रूप से पंजाब की मुख्यधारा की राजनीति में आ रहे एक गहरे रणनीतिक बदलाव का स्पष्ट संकेत है। इस चुनाव में जिस प्रकार आरएसएस और शिरोमणि अकाली दल की छात्र विंग ने गठबंधन कर जीत का परचम लहराया, उसने पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। यह परिणाम सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि यह जीत विधानसभा चुनाव से ठीक छह महीने पहले सामने आई है। सबसे खास बात यह है कि पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव बैलेट पेपर से कराया गया था।

कर्नाटक स्थानीय निकाय चुनावों में बैलेट पेपर से कांग्रेस की करारी हार
इससे पहले दिसंबर 2025 में कर्नाटक स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ करते हुए ‘क्लीन स्वीप’ किया। दिलचस्प बात यह है कि ये चुनाव कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के गृह राज्य में हुए, जहां सत्ता भी कांग्रेस की है और मतदान भी बैलेट पेपर से हुआ। ऐसे में अब कांग्रेस के पास न तो ‘ईवीएम’ को दोष देने का बहाना बचा और न ही ‘सरकारी मशीनरी’ के दुरुपयोग का विलाप करने का अवसर। बीजेपी की यह प्रचंड जीत दर्शाती है कि जनता कांग्रेस के कुप्रबंधन और झूठे वादों से तंग आ चुकी है। लोकसभा चुनाव की हार से सबक लेने के बजाय केवल बहानों की राजनीति करने वाली कांग्रेस के लिए यह नतीजे एक बड़ा आईना हैं कि संगठन अब जमीन से गायब हो चुका है और नेतृत्व केवल आत्ममुग्धता में जी रहा है। बीजेपी ने 4 टाउन पंचायतों की कुल 76 सीटों में से 48 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि सत्ताधारी कांग्रेस महज 23 सीटों पर सिमट गई। इतना ही नहीं, बीजेपी ने 2 वार्ड उपचुनावों में भी शानदार जीत हासिल कर अपनी पकड़ साबित कर दी।

 एक वीडियो में राहुल गाँधी ने कहा

​"आपका प्रधानमंत्री गद्दार है! आपका होम मिनिस्टर गद्दार है!
​ देश के पीएम को गद्दार कहने वाले राहुल गांधी, मैं बताती हूँ गद्दारी किसे कहते हैं।
​ गद्दारी वो थी जो तुम्हारे पिताजी ने भोपाल गैस कांड के बाद की थी—जब भोपाल में हज़ारों बेकसूर भारतीय ज़हरीली गैस से तड़प-तड़प कर मर रहे थे, तब तुम्हारी कांग्रेस सरकार ने मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को सरकारी विमान में बैठाकर भारत से सुरक्षित भगा दिया था। इसे कहते हैं जनता के खून के साथ गद्दारी।
​ गद्दारी उसे कहते हैं जो बोफोर्स घोटाले के समय हुई थी—जब देश की सेना के लिए तोपें खरीदी जा रही थीं, तब दलाली खाई गई और जब जाँच शुरू हुई तो गांधी परिवार का सबसे करीबी क्वात्रोची रातों-रात भारत की एजेंसियों की नाक के नीचे से फरार करवा दिया गया था।
​ गद्दारी वो थी जो साल 1974 में तुम्हारी दादी ने कच्छाथीवू द्वीप के साथ की थी—तुम्हारी दादी इंदिरा गांधी ने बिना संसद को भरोसे में लिए भारत का अधिकार क्षेत्र वाला कच्छाथीवू द्वीप श्रीलंका को खैरात में दान में दे दिया था, जिसका खामियाजा आज तक हमारे गरीब मछुआरे भुगत रहे हैं।
गद्दारी उसे कहते हैं राहुल गाँधी जो तुम्हारे नाना नेहरु ने किया था। पंचशील एग्रीमेंट पर दस्तखत करके tibet को चाइना की एक हिस्सा की मान्यता देकर चाइना को पडोसी बनाया और आज हम चाइना की साथ हर दिन तनाव से जि रहे हैं।
गद्दारी उसे कहते हैं जो साल 1962 की जंग में अक्साई चिन के साथ हुई थी—जब तुम्हारे परदादा जवाहरलाल नेहरू के राज में चीन ने भारत की 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया था और संसद में खड़े होकर उन्होंने शर्मनाक बयान दिया था कि 'वहाँ तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता'..."

सुप्रीम कोर्ट में किसी वकील नरेंद्र मिश्रा ने याचिका दायर करके मांग की है कि दिल्ली पुलिस को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बाधा डालने से रोका जाये; CJI को मिश्रा से पूछना चाहिए वहां लग रहे नारों का क्या मतलब है

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट में एक वकील नरेंद्र मिश्रा ने याचिका दायर कर कहा है कि “Delhi Police was preventing students, citizens, political party office-bearers, MLAs, and Members of Parliament from staging peaceful demonstrations”.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिका को लिस्ट करने के लिए हां कह दिया है। 

CJI इस याचिका को सुनने से पहले एक बार ध्यान कर लें कि 20-25 जुलाई के बीच के उद्दंड कथित छात्रों पर FIR न करने के आदेश दिए थे और उसी से अबकी बार फिर लोगों को उद्दंत्ता दिखाने का साहस मिला है।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
जुलाई के प्रदर्शन में अर्धनग्न लड़कियों ने बैनर लिए हुए प्रोटेस्ट किया था जिनमें कुछ में लिखा था “मेरा लिंग मेरी मर्जी” और “Fuck me”। रुचिका सिंह ने तो प्रधानमंत्री के खिलाफ अश्लील भाषा इस्तेमाल करने की हदें ही पार दी थी। जिस नीशू आज़ाद के केस पर सूर्यकांत जी क्रोध में आ गए थे, वो मोदी की तेरहवी के भोज के लिए समोसे और खाना बांट रही थी जबकि वो 14 साल की है और NEET से उसका कुछ लेना देना नहीं था। और जब उसका अभी तक वोट नहीं है, तब भी वो ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रदर्शन में पहुंची हुई थी। अधिकार कथित छात्र छात्र थे ही नहीं। और अब नए खिलाड़ी मैदान में आए हैं ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा मांगने के लिए। 

CJI सूर्यकांत जी सुनवाई शुरू करने से पहले वकील नरेंद्र मिश्रा से पूछें कि ज्ञानेश कुमार से उन नारों का मतलब है जो वहां लगाए गए हैं। वो नारे हैं -

1. एक कचौरी, दो समोसा — इन मर्दों का क्या भरोसा!

2. एक सुट्टा, दो चाय — मर्द जात हाय-हाय!

3. मेरे सिर में दर्द है — इसका कारण मर्द है!

4. ठंडे समोसे गर्म करो — मर्द जात शर्म करो!

5. चाय गरम, दूध गरम — मर्द समाज बेशर्म!

6. आलू लो, पूरी लो — इन मर्दों से दूरी लो!

7. एक जीरा, दो अजवाइन — मर्द जात, दो रिजाइन!

8. हमारी आजादी से जिसको दर्द है — वो सब नामर्द है!

9. शर्म नहीं है मर्दों में — औरत क्यों है पर्दों में!

10. नारी अपने आप की — नहीं किसी के बाप की!

11. मुन्ना करे कुछ भी कांड — हर बार होगी मुन्नी बदनाम!

12. एक पेड़ पर दो बंदर — मर्द बैठो घर के अंदर!

(ये नारे सूर्यकांत जी समेत सभी पुरुषों पर लागू हैं)

इस बार भी  लड़कियां अंगप्रदर्शन करते हुए प्रोटेस्ट कर रही हैं - एक लड़की ने बैनर उठाया हुआ है जिस पर लिखा है -

WE DEMAND 4B RIGHTS -

-NO DATING WITH MEN 

-NO SEX WITH MEN 

-NO MARRIAGE 

-NO CHILDBIRTH 

इसके अलावा एक कथित पत्रकार रोज़ी ने सम्मानित आईपीएस अधिकारी विवेक भगत पर उसके स्तन दबाने का आरोप लगा दिया लेकिन पुलिस ने एक 24 साल के  नदीम अहमद को गिरफ्तार किया है जिसने AI से विवेक भगत की रोजी के साथ अश्लील वीडियो बनाई और सुना है उसे राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने भी शेयर किया था। गिरफ़्तारी तो रोज़ी की भी होनी चाहिए और फेक वीडियो फ़ैलाने के लिए राहुल/प्रियंका पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।

लड़कियां ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए कैसे अर्धनग्न आ रही हैं प्रदर्शन में, यह देखना चाहिए सूर्यकांत जी को। जिस क्षेत्र में पुलिस घुसने पर बैन लगा देती है और बैरिकेड लगा देती है, वहां राहुल गांधी का अपनी जमात के साथ बेरिकेड तोड़ने की कोशिश करना कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं है। 

CJI सूर्यकांत जी को यह समझना होगा कि जब आपने ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग ठुकरा दी तो फिर प्रदर्शन का क्या मतलब है? राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट में सबूतों के साथ ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध अपना पक्ष रखना चाहिए था लेकिन उसे तो “नंगई” करनी है।

दिल्ली पुलिस का एक ही नारा चलने दे सुप्रीम कोर्ट - “जहां करोगे दंगा, वहां करेंगे नंगा”।

जस्टिस उज्जवल भुईया या तो पागल हैं, या CJI के खिलाफ बगावत पर उतारू हो गए हैं

सुभाष चन्द्र 
SIR पर जस्टिस भुईया का बयान उन्हें पागल साबित करने के लिए काफी है। जिस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के बेंच शुरू से वैध करार दिया है, उस पर जस्टिस भुईया ने कहा है कि “कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करती है, वह मूल रूप से मनमानी व संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है और उसे सही नहीं ठहराया जा सकता”। 
ऐसे ही विचार घोर हिंदू विरोधी रहे रिटायर्ड जस्टिस नरीमन ने भी व्यक्त किए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि CJI सूर्यकांत के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में वैसी ही कुछ साजिश चल रही है जैसी तत्कालीन CJI दिपक मिश्रा के खिलाफ 12 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके की थी।
लेखक 
चर्चित YouTuber 
जस्टिस भुइया लगता है कांग्रेस के लिए पिच तैयार कर रहे हैं, तभी तो कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने तपाक से X पर लिखा कि जस्टिस भुईया ने सीईसी को बेनकाब कर दिया
।
जस्टिस भुईया क्या चाहते हैं कि जो 2.8 करोड़ लोग मर गए, 6.3 करोड़ जगह छोड़ कर चले गए और एक करोड़ डुप्लीकेट नाम के वोटर थे, उन्हें भी वोटर लिस्ट में रहने दिया जाना चाहिए था।
अभी किसी ने बताया है कि जस्टिस भुईया के पिता सुचेंद्र नाथ भुइया CPI से जुड़े थे। बाद में कांग्रेस राज में वे 1983-1986 और 1993-1996 असम के एडवोकेट जनरल भी रहे। जस्टिस भुईया स्वयं 2011 में कांग्रेस की असम सरकार में एडवोकेट जनरल रहे।
इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जस्टिस भुइया के दिमाग में वामपंथी और कांग्रेस का कीड़ा क्यों मचल रहा है।
जस्टिस भुईया कई बारे ऐसे बयान देते रहे हैं जिनका कोई औचित्य नहीं है। उनके कुछ बयान बता रहा हूँ।
-उन्होंने कहा विश्वविद्यालय में ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां स्थापित विचारों की जांच की जा सके, उन पर सवाल उठाए जा सके और छात्र मुश्किल सवाल पूछने से नहीं हिचकिचाएं, सवाल पूछने का अधिकार बगावत या अवज्ञा नहीं है और “असहिष्णु मानसिकता” संविधान की भावना के विपरीत है।
-76 वर्षों से कोई भी “Distinguished Jurist” सुप्रीम कोर्ट का जज क्यों नहीं बना जबकि हाई कोर्ट के जज और वकील ही सुप्रीम कोर्ट के जज बनते है (एक दूसरा सिस्टम लागू करना चाहते हैं)।
-उन्होंने असहमति जताने पर नागरिकों को गिरफ्तार करने पर भी टिप्प्णी की, -"उदाहरण के लिए, कुछ युवकों का मामला लें, जो गंगा नदी पर नाव में रोजा खोलते समय चिकन बिरयानी खा रहे थे। मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो ही नहीं सकता। गंगा नदी पर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। फिर भी उन्हें केवल इसी कारण गिरफ्तार किया गया और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा"।
-उन्होंने कहा कि “UAPA के अत्यधिक उपयोग से हासिल नहीं हो सकता विकसित भारत का लक्ष्य। (तो क्या आतंकियों को भी छोड़ देना चाहिए- यह कानून मोदी ने नहीं बनाया, ये 1967 में बना था)।
- “केंद्र के अनुशंसा पर जजों का ट्रांसफर करके न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता। एक जज का केवल इसलिए ट्रांसफर नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कोई फैसला दिया है क्योंकि उससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता compromise होती है”। (जजों के ट्रांसफर में केंद्र सरकार का कोई रोल नहीं होता। ट्रांसफर केवल कॉलेजियम करता है ) 
लुटेरो/डकैतों के भी अपने इलाके होते है जहां वो किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करते लेकिन वे खुद हर किसी के इलाके में मुंह मारते हैं। SIR से भुईया का कोई लेनादेना नहीं है तो फिर क्यों अपनी मुंडी घुसेड़ रहे है उस मामले में, कांग्रेस के वफादार हैं केवल इसलिए।
अब समझ मैं आया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुईया को SIR से असली दिक्कत क्या है,अब यह कहना गलत नहीं होगा कि कानून के रक्षक अपने निजी स्वार्थ के चलते आदेश ओर जजमेंट दे रहे है।

अभी आप एक नाम सोशल मीडिया ओर न्यूज चैनल मैं देख रहे होंगे जो कि सबसे ज्यादा सुर्खियों मैं है जस्टिस उज्जवल भुईया जिन्होंने SIR के नाम पर देश में हो रहे प्रदर्शन पर बिना कुछ सोचे समझे SIR को गलत बता दिया यहां तक कि जिन घुसपैठियों के नाम कटे हैं उनके प्रति जो मन मैं SOFT CORNER है वो भी दिखा दिया।
क्या आप जानते है जस्टिस उज्जवल भुईया कौन है यह—
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां के पिता सुचेंद्र नाथ भुइयां (Suchendra Nath Bhuyan) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से जुड़े रहे थे।
• कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ाव: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे कम्युनिस्ट विचारधारा से आकर्षित हुए और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से जुड़े।
• भूमिगत और सक्रिय जीवन: जब कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिबंधित थी, तब वे भूमिगत रहकर सक्रिय रहे और 1951 में उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी।
• छात्र राजनीति: वे असम छात्र सम्मेलन (Assam Chhatra Sanmilan) के जनरल सेक्रेटरी भी रहे थे।
• कानूनी करियर: राजनीतिक गतिविधियों के बाद उन्होंने वकालत में ख्याति अर्जित की और वे कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान दो बार (1983–1986 और 1993–1996) असम के एडवोकेट जनरल (Advocate General) भी रहे।
असली परेशानी SIR से इन महोदय को इसी बात से है क्योंकि CPI का नामोनिशान बंगाल से मिट गया है यहां तक कि केरल मैं भी सुपड़ा साफ हो चुका है यही असली तकलीफ हो सकती है क्योंकि देश की जनता जानती है SIR देश के लिए जरूरी है क्योंकि देश मैं बढ़ती घुसपैठियों की भीड़ देश को बर्बादी की तरफ ले जा रही है।
अब अगर यह अपनी CPI वाली विचारधारा के तहत ऐसा कर रहे हैं तो देश की आम जनता क्या ही हमारी न्याय प्रणाली पर विश्वास कर सकेगी?