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पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाई कोर्ट से बड़ा झटका, अंतरिम जमानत याचिका खारिज


सुप्रीम कोर्ट के बाद अब कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाई कोर्ट से भी बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट ने खेड़ा की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है।

दरअसल, पवन खेड़ा ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रिंकी सरमा पर कई पासपोर्ट रखने और विदेश में संपत्तियाँ होने के आरोप लगाए थे। इसके बाद रिंकी सरमा ने उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कराया।

मामले की सुनवाई के दौरान खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह ज्यादा से ज्यादा मानहानि का मामला है और उनके मुवक्किल के फरार होने की कोई आशंका नहीं है, इसलिए गिरफ्तारी से राहत दी जानी चाहिए। वहीं, असम सरकार की तरफ से महाधिवक्ता देवजीत सैकिया ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मामला गंभीर है और इसमें जालसाजी जैसे आरोप शामिल हैं।

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गिरफ़्तारी से बचने हैदराबाद भागा पवन खेड़ा: असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा, कांग्रेस नेता
गिरफ़्तारी से बचने हैदराबाद भागा पवन खेड़ा: असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा, कांग्रेस नेता
 

करीब तीन घंटे चली बहस के बाद जस्टिस पार्थिव ज्योति सैकिया की एकल पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे अब सुनाते हुए कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद पवन खेड़ा की गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गई है।

उत्तर प्रदेश : अयोध्या में बाबरी के बदले मस्जिद बनाने के मंसूबों पर NOC भारी: सुप्रीम कोर्ट की कृपा से ‘खैरात’ में मिली जमीन तो चंदा खूब वसूला, लेआउट प्लान नहीं हुआ पास

                                               अयोध्या मस्जिद का प्रस्तावित डिजाइन (फोटो- टीवी9)
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने जमीन दे दी लेकिन 5 साल बाद भी उस पर काम ठप पड़ा है। मस्जिद के लिए बने ट्रस्ट ने चंदा तो जुटाया लेकिन सरकारी विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) नहीं ले सका। अब NOC ना होने के चलते इसके लेआउट प्लान को भी अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) ने खारिज कर दिया है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय पत्रकार ओम प्रकाश सिंह द्वारा दाखिल RTI में सामने आया कि विभिन्न सरकारी विभागों का अनिवार्य NOC ना होने के चलते ADA ने यह प्लान खारिज किया है।

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक अयोध्या फैसले में राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था। साथ ही, मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया था।

इसके बाद 3 अगस्त 2020 को तत्कालीन जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने अयोध्या के पास धन्नीपुर गाँव में पाँच एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को हस्तांतरित कर दी। इसके बाद मस्जिद निर्माण के लिए बनाए गए ट्रस्ट ने 23 जून 2021 को ADA में लेआउट प्लान की मंजूरी हेतु आवेदन दायर किया था।

RTI के जवाब में ADA ने स्वीकार किया कि मस्जिद ट्रस्ट ने 4 लाख रुपए आवेदन और जाँच शुल्क के रूप में जमा किए। ADA के मुताबिक, मस्जिद निर्माण के लिए लोक निर्माण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नागरिक उड्डयन, सिंचाई एवं राजस्व विभाग, नगर निगम, जिलाधिकारी कार्यालय और अग्निशमन विभाग की NOC माँगी गई थी।

मस्जिद ट्रस्ट के सचिव ने क्या कहा?

मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन ने कहा कि उन्हें अग्निशमन विभाग की ओर से आपत्तियाँ आई थीं। अग्निशमन विभाग की साइट जाँच में पाया गया कि प्रस्तावित मस्जिद और अस्पताल भवन की ऊँचाई को देखते हुए अप्रोच रोड की चौड़ाई कम से कम 12 मीटर होनी चाहिए। जबकि मौके पर दोनों मार्ग छह मीटर से ज्यादा चौड़े नहीं पाए गए और मुख्य सड़क महज चार मीटर चौड़ी निकली थी।

हुसैन ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए जमीन देने का आदेश दिया और उत्तर प्रदेश सरकार ने हमें जमीन दी। इसके बाद भी आवश्यक NOC क्यों नहीं मिलीं और ADA ने प्लान को क्यों खारिज किया, यह समझ से बाहर है।”

उन्होंने आगे कहा कि अग्निशमन विभाग की आपत्ति के बारे में उन्हें जानकारी है लेकिन बाकी किसी भी विभाग की आपत्ति को लेकर उन्हें कुछ जानकारी नहीं है। बकौल हुसैन, RTI के जवाब से स्थिति स्पष्ट हो गई है और अब हम आगे की कार्रवाई करेंगे।

इस बीच अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है और यह पूरे होने के चरण में है। तो दूसरी और मस्जिद परियोजना लापरवाहियों के चलते अभी तक अधर में ही अटकी हुई है। जो लोग शताब्दियों तक कथित ढांचे को मस्जिद बताते हुए लड़ रहे थे, उनके लिए मस्जिद की प्राथमिकता कितनी है, यह 5 जमीन आवंटन के 5 वर्ष बाद स्पष्ट हो जाता है।

क्या दूध भी नॉन-वेज होता है? भारत ने खरीदने से किया इनकार: अमेरिका के साथ क्यों नहीं बन रही बात, ट्रेड डील पर पड़ेगा क्या असर

                                        अमेरिका में गायों की डेयरी फर्म (फाइल फोटो, साभार - रॉयटर्स)
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुँच गया है, लेकिन ऐन मौके पर एक अनचाही समस्या सामने आ गई है। ये है मांसाहारी दूध, जो सौदे की राह में अड़चन बनकर उभरा है।

भारत ने अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आयात को यह कह कर खारिज कर दिया है कि उनमें ऐसी गायों का दूध होता है जिन्हें मांसाहारी या पशुओं के अवशेष युक्त आहार खिलाया जाता है। ये भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध है।

नॉन-वेज दूध क्या है?

मांसाहारी दूध से का मतलब उन गायों का दूध और डेयरी उत्पाद है, जिन्हें माँस, खून या चर्बी जैसे पशु-आधारित चारे खिलाए जाते हैं। 2004 में प्रकाशित हुई सिएटल पोस्ट-इंटेलिजेंसर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में गायों को ऐसा चारा दिया जा सकता है, जिसमें सूअर, मछली, मुर्गी, घोड़े, यहाँ तक कि बिल्ली और कुत्ते के अंग भी शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा, उन्हें सूअर और घोड़े का खून और मवेशियों के अंगों से बनी चर्बी भी खिलाई जा सकती है। हालाँकि गायें स्वभाव से शाकाहारी होती हैं, फिर भी अमेरिकी नियमों के अनुसार, उन्हें जानवरों से बनी चीजें खिलाने की अनुमति होती है। चाहे वे मांस के लिए पाली जा रही हों या दूध के लिए।

भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। यहाँ गायों को पौधों पर आधारित आहार ही दिया जाता है और जानवरों या मांस से बनी कोई चीज नहीं खिलाई जाती। इसी वजह से भारत ने अमेरिका से डेयरी उत्पादों के आयात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।

भारत का इनकार: धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ

वर्ल्ड एटलस की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 38% जनसंख्या शाकाहारी है। यहाँ दूध और घी को पवित्र माना जाता है। ये हिंदू और जैन धर्म में दैनिक पूजा और प्रसाद में इस्तेमाल किए जाते हैं।

इन धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाले दूध से बने उत्पाद शुद्ध (सात्विक) होने चाहिए। लेकिन अगर गाय को ऐसा चारा खिलाया गया हो जिसमें जानवरों के अंग, खून या मांस शामिल हों, तो उस गाय से प्राप्त दूध और उससे बने उत्पाद धार्मिक रूप से अशुद्ध और अस्वीकार्य माने जाते हैं।

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक GTRI के अजय श्रीवास्तव ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “कल्पना कीजिए, आप उस गाय का मक्खन खा रहे हैं जिसे किसी दूसरी गाय का मांस और खून खिलाया गया हो। भारत शायद ऐसा दूध उत्पाद कभी स्वीकार नहीं करेगा।”

भारत का पशुपालन और डेयरी विभाग विदेशों से आने वाले दूध और खाद्य उत्पादों के लिए पशु चिकित्सा प्रमाणपत्र (Veterinary Certificate) अनिवार्य करता है। इस प्रमाणपत्र की एक जरूरी शर्त है कि “ऐसे पशुओं को कभी भी मांस, हड्डी, खून, अंगों या सूअर से बने किसी भी पदार्थ वाला चारा नहीं खिलाया गया हो।” यह नियम यह सुनिश्चित करता है कि भारत में केवल शाकाहारी आहार पर पली हुई गायों से प्राप्त दूध उत्पाद ही आयात किए जा सकें।

भारत का इनकार: सिर्फ संस्कृति नहीं, अर्थव्यवस्था भी है वजह

भारत का अमेरिका से डेयरी उत्पादों का विरोध केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से नहीं है, बल्कि इसका एक बड़ा कारण देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रक्षा करना भी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।

2023-24 में भारत ने 239 मिलियन मीट्रिक टन दूध का उत्पादन किया, जिससे 7.5 से 9 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 2.5% से 3% है। भारत का डेयरी सेक्टर 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है।

इनमें से ज्यादातर छोटे किसान हैं जिनके पास सिर्फ 2 या 3 गाय/भैंस होती हैं। उनके लिए यही आमदनी का मुख्य जरिया है। अगर भारत ने अमेरिका जैसे देशों से सस्ते, सब्सिडी वाले डेयरी उत्पादों को आने की इजाजत दे दी, तो भारतीय बाजार में सस्ती विदेशी चीजें भर जाएँगी।

2024 में अमेरिका ने 8.22 बिलियन डॉलर का डेयरी निर्यात किया और अगर उसका भारत में आयात हुआ तो इसका भारी असर भी होगा। भारतीय स्टेट बैंक के एक विश्लेषण के अनुसार, इससे घरेलू दूध की कीमतों में कम से कम 15% गिरावट आ सकती है। इससे किसानों को हर साल लगभग 1.03 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

महाराष्ट्र के किसान महेश सकुंडे ने कहा, “सरकार को यह देखना होगा कि हम सस्ते विदेशी दूध से प्रभावित न हों। अगर ऐसा हुआ तो पूरे डेयरी उद्योग को और हम जैसे छोटे किसानों को बड़ा नुकसान होगा।”

बातचीत में रुकावट

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तय समय सीमा 1 अगस्त नजदीक आने पर समाचार सुनने को मिल रहा है कि सीमा आगे बढ़ा दी गयी है। अगर तब तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ (शुल्क) बढ़ा सकता है। डेयरी क्षेत्र को लेकर जारी विवाद भारत और अमेरिका के बीच 2030 तक व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने के बड़े लक्ष्य पर भी असर डाल सकता है।

हालाँकि बातचीत चल रही है, लेकिन भारतीय पक्ष अब भी अपने रुख पर अडिग है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने साफ कहा, “डेयरी के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा। यह हमारे लिए एक स्पष्ट सीमा है।” इस बीच, अमेरिका ने यह मामला विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी उठाया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने कहा कि नवंबर 2024 से लागू होने वाला भारत का नया डेयरी सर्टिफिकेशन नियम उनकी समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं करता।

चुनाव आयोग ने राहुल को बेनकाब करते कहा- आधारहीन और झूठी कहानियाँ न गढ़ें, कर्नाटक चुनाव में लगाया था गड़बड़ी का आरोप; LoP राहुल को अपने पद के सम्मान की चिंता नहीं


चुनाव आयोग ने गुरुवार (24 जुलाई 2025) को कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के आरोप को निराधार बताया है। दरअसल राहुल गाँधी ने कर्नाटक में मतदाता सूची में गड़बड़ियों का चुनाव आयोग पर इल्जाम लगाते हुए धमकी दी थी।

चुनाव आयोग के साथ PIB  फैक्ट चेक ने भी तीखा पलटवार करते हुए कहा कि है उन्हें आधारहीन और झूठे आरोप लगाने से बचना चाहिए। आयोग का कहना है कि कर्नाटक लोकसभा चुनाव 2024 की जिस मतदाता सूची को लेकर पार्टी गड़बड़ी के आरोप लगा रही है, उस पर लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 24 के तहत मिले अधिकारों को उस समय इस्तेमाल क्यों नहीं किया? कांग्रेस के उम्मीदवारों को मतदाता सूची को गड़बड़ियों को लेकर जिला और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष अपील करनी चाहिए थी, क्योंकि यह एक वैध कानूनी उपाय था।

आयोग ने तथ्य रखते हुए स्पष्ट किया है कि लोकसभा चुनाव 2024 की प्रक्रिया को लेकर दायर 10 चुनाव याचिकाओं में से एक भी चुनाव याचिका किसी भी हारे हुए कांग्रेस उम्मीदवार द्वारा दायर नहीं की गई, जबकि यह RP अधिनियम 1951 की धारा 80 के तहत उपलब्ध एक कानूनी उपाय था।

रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गाँधी ने कहा था कि कर्नाटक के एक चुनाव क्षेत्र में चुनाव आयोग ने धोखाधड़ी की अनुमति दी थी। उन्होंने कहा था, “चुनाव आयोग गलतफहमी में न रहे, वोट चोरी करने के आपके हथकंडों के 100 प्रतिशत पुख्ता सुबूत हैं हमारे पास। हम उन्हें सामने भी लाएँगे और आप इसके अंजाम से बच नहीं पाएँगे। लोकतंत्र और संविधान को बर्बाद करने की कोशिश करने वाले बक्शे नहीं जाएँगे।”

इसी बयान का फैक्ट आयोग द्वारा किया गया है।

BJP बनाएगी कर्नल कुरैशी- विंग कमांडर सिंह को चेहरा: Times of India में छपी फर्जी खबर की भाजपा ने खोली पोल, बताया- मीडिया ने तोड़-मरोड़ के पेश किया बयान

भारतीय जनता पार्टी ने कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को अपने अभियान का चेहरा बनाने की खबरें खारिज की हैं। भाजपा ने इन्हें फर्जी खबर करार दिया है। पार्टी ने कहा है कि वह ऐसी कोई योजना पर काम नहीं कर रही है। मीडिया में चलाया गया था कि ऐसा भाजपा महिलाओं में पैठ बढ़ाने के लिए करेगी।

भाजपा के आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक्स (पहले ट्विटर) पर यह दावा करने वाली खबरों को लेकर लिखा। उन्होंने कहा, “यह फेक न्यूज है। भाजपा की कर्नल सोफिया कुरैशी या विंग कमांडर व्योमिका सिंह को अभियान का चेहरा बनाने की कोई योजना नहीं है।”

आगे उन्होंने बताया, “भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। उन्होंने कर्नल कुरैशी को समुदाय के भीतर एक सशक्त मुस्लिम महिला के उदाहरण के रूप में दिखाने को लेकर बात कही थी।”

यह खबर Times मीडिया समूह के अखबारों ने प्रमुखता से छापी थी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी इस खबर में बताया गया था कि 9 जून, 2025 को भाजपा को मोदी सरकार के 11 वर्ष पूरे होने पर भाजपा महिलाओं को केंद्र में रख कर यह अभियान चलाएगी।

खबर में बताया गया था कि इस काम की जिम्मेदारी भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा को सौंपी गई है। इस खबर में बताया गया था कि मोर्चा को मस्जिदों, दरगाहों और बाकी जगहों पर ऐसी चौपालें आयोजित करने का आदेश भाजपा की तरफ से दिया गया है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर में यह भी दावा किया गया था कि पार्टी इससे अल्पसंख्यक समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाना चाहती है। हालाँकि, भाजपा ने इस खबर को पूरी तरह फर्जी बताया है। गौरतलब है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान विश्व के सामने जानकारी देने वाला चेहरा कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ही थीं।

इससे पहले भाजपा ने दैनिक भास्कर की उस रिपोर्ट को खारिज किया था जिसमे पार्टी के घर-घर सिंदूर भेजने के अभियान चलाने का दावा किया गया था। भाजपा ने बताया था कि उसकी ऐसी कोई योजना नहीं है।

MP निशिकांत दुबे-दिनेश शर्मा के बयान से BJP ने किया किनारा, बेशर्म नड्डा अध्यक्ष पद ही नहीं पार्टी भी छोड़ो ;‘सीमाओं को लाँघ रहा है सुप्रीम कोर्ट, धार्मिक युद्ध भड़काने का जिम्मेदार’: नड्डा बोले- ये उनके निजी विचार

भाजपा अध्यक्ष नड्डा में शर्म नाम की चीज है तो पार्टी अध्यक्ष ही नहीं पार्टी से त्याग पत्र दो। निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा ने क्या गलत कहा है? भारत को कांग्रेस मुक्त करने से पहले राज करना कांग्रेस से सीखो। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के चुनाव को रद्द कर 6 साल चुनाव न लड़ने वाले जज साहब कहाँ है? नूपुर शर्मा के केस में तो पल्ला झाड़ लिया, क्यों? बेशर्मों मुस्लिम कट्टरपंथियों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए बीजेपी को प्रेस कांफ्रेंस कर कटी-फटी वीडियो और original वीडियो दिखानी चाहिए थी और मीडिया को आदेश देना था कि जो मीडिया नहीं आएगी उसे 3 महीने का और लाइव नहीं दिखाने पर 6 महीने के लिए ban कर दिया जाएगा। दूसरे, तेलंगाना में टी राजा सिंह के मुद्दे पर भी बेशर्म बीजेपी ने पल्ला झाड़ लिया। जिसका नुकसान तेलंगाना विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कम से कम 20 से 25 नुकसान हुआ, इसके जिम्मेदार कोई और नहीं तुम्हारे जैसे दोगले अध्यक्ष जिम्मेदार है। बेशर्म नड्डा जी आंखे खोलकर देखो "सिर तन से जुदा" धमकी के बाद आज भी अपने दम पर आज़ाद घूम रहे है। चुनाव लड़े और जीते भी। तेलंगाना में अगर बीजेपी जिन्दा है तो राजा सिंह और योगी जी के दम पर। नड्डा जैसे अध्यक्ष के दम पर नहीं। 
आखिर बीजेपी को कितना नीचे गिराओगे नड्डा जी? आंखें खोले और देखो social media पर तुम्हारी कितनी थू-थू हो रही है। जज के घर नोटों के बंडल जलते हैं नड्डा जी क्यों चुप हो? क्यों नहीं महामहिम से उस जज के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कहा? या फिर खुलकर बोलो कि बीजेपी मुस्लिम कट्टरपंथियों और judiciary के आगे नतमस्तक है। सनातन को आरोपित करने वालों पर चुप रहते हो फिर कहते फिरते हो हिन्दुत्व।      
 
              
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा के सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए गए बयान से पार्टी ने किनारा कर लिया है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि दोनों के बयान उनके निजी विचार हैं और इनसे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पर न्यायिक दखल का आरोप लगाया था।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा, “भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा का न्यायपालिका एवं देश के चीफ जस्टिस पर दिए गए बयान से भारतीय जनता पार्टी का कोई लेना–देना नहीं है। यह इनका व्यक्तिगत बयान है, लेकिन भाजपा ऐसे बयानों से ना तो कोई इत्तेफाक रखती है और ना ही कभी भी ऐसे बयानों का समर्थन करती है। भाजपा इन बयान को सिरे से खारिज करती है।”

गौरतलब है कि झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने वक्फ कानून और राष्ट्रपति को दिए गए फैसले को लेकर बयान दिया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा था कि अगर शीर्ष अदालत को ही कानून बनाना है तो संसद और राज्य विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि कोर्ट कैसे राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है।

सांसद निशिकांत दुबे ने ANI को दिए बयान में कहा, “देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर बात के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही पड़े तो संसद और विधानसभाएँ बंद कर देनी चाहिए।”

 उन्होंने चीफ जस्टिस संजीव खन्ना पर भी तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि चीफ जस्टिस संजीव खन्ना इस देश में गृह युद्ध के लिए जिम्मेदार हैं। उनके साथ ही इस पर उत्तर प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान में राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने भी कहा था कि संसद को कोई चुनौती नहीं दे सकता, यह बात संविधान में साफ़ लिखी हुई है।

दिनेश शर्मा ने कहा, “लोगों में यह आशंका है कि जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान लिखा था, तो उसमें विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार स्पष्ट रूप से लिखे गए थे… भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी लोकसभा और राज्यसभा को निर्देश नहीं दे सकता है और राष्ट्रपति पहले ही इस पर अपनी सहमति दे चुके हैं। कोई भी राष्ट्रपति को चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि राष्ट्रपति सर्वोच्च हैं।”

भाजपा के इन सांसदों के बयान से किनारा करने के बाद भी विपक्ष उस पर हमलावर है। AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने न्यापालिका को धमकी देने का आरोप लगाया है। वहीं AAP ने भी भाजपा सांसदों पर कार्रवाई की माँग की है।

क्यों हो रहा विवाद?

हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल के विधेयकों को रोकने से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति की ‘जेबी वीटो’ से जुड़ी शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी। अदालत ने राष्ट्रपति से कहा था कि वह राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयकों पर तीन माह के भीतर फैसला लें। इस फैसले के कुछ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून को लेकर कई टिप्पणियाँ की। इसके बाद से ही न्यायपालिका के दखल को लेकर चर्चा चालू हो गई। 

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच VVPAT पर विपक्ष को बेनकाब करती है तो दूसरी बेंच केंद्र सरकार पर एक याचिका दायर करने के लिए 5 लाख रुपये जुर्माना लगा कर मानसिक दिवालिया होने का सबूत दे गई

सुभाष चन्द्र

अप्रैल 25 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मेघालय हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ अपील दायर करने को “तुच्छ याचिका” कह कर केंद्र सरकार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया और चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी तुच्छ याचिकाएं दायर न की जाए। 

हाई कोर्ट के फैसले कोई ब्रह्मा जी की कलम से लिखे हुए नहीं होते जिनके खिलाफ अपील न की जा सके और ऐसा करने का अधिकार यदि हर किसी को है तो केंद्र सरकार को भी है। अगर आपको अपील में जान नहीं लगती थी तो ख़ारिज कर देते लेकिन उसे तुच्छ कहना और सरकार पर जुर्माना ठोकना साबित करता है कि अहंकार से भरे आप लोग “तानाशाही” की तरफ बढ़ रहे हैं जिन्हे बस अपनी हुकूमत चलानी है। आप केंद्र को मजबूर कर रहे हैं कि मौका देख कर आपके पर क़तर दे।

लेखक 
दोनों जजों को यह मालूम होना चाहिए कि अटॉर्नी जनरल और ASGs सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही रुतबा रखते हैं, उन जजों से वो कम नहीं होते और इसलिए उनकी दायर की गई याचिकाओं को तुच्छ कह कर आप अपने आप को “तुच्छ” साबित कर रहे हैं। 

EVM के खिलाफ 40 याचिकाएं खारिज होने पर भी जो प्रशांत भूषण VVPAT पर याचिका दायर करता है और जिरह में मानता है कि EVM/VVPAT में अभी तक कोई गड़बड़ नहीं हुई लेकिन कोर्ट की दूसरी बेंच उसकी याचिका सुनती है और कोई जुर्माना नहीं लगाती। इतना ही नहीं प्रशांत भूषण के केवल इतना कहने पर कि अब तक गड़बड़ी नहीं हुई मगर हो सकती है, सुप्रीम कोर्ट कैसे सुनवाई कर सकता है। क्या 40 याचिकाएं खारिज होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट पर संशय रह गया था।

अप्रैल 26 को जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने साफ़ कह दिया कि EVM और VVPAT का 100% मिलान नहीं हो सकता और यह मांग करना पुराने दौर में वापस जाना है जो संभव नहीं है।

वोट और VVPAT से मिलान तो वोट डालते हुए ही हो जाता है। आज मैं जब वोट डालने गया तो पाया कि VVPAT इतने समय तक साफ़ Display हुआ जिसे देख कर मुझे पता चल रहा था कि वोट कहां गया लेकिन फिर भी विपक्ष हाय तौबा मचाए हुए है। 

आज के फैसले के बाद भी विपक्ष को होश नहीं आ रहा। अखिलेश यादव नारा दे रहा है। “इंडी को जिताएं, EVM हटाएं”। विपक्ष को पता है उनके पास बाहुबली हैं जो मतपेटियों को उड़ाने में और फर्जी मतपत्रों की पेटियों को सजाने में माहिर होते हैं, वो लोग भी कई साल से “बेरोजगार” बैठे हैं हर पार्टी में जिनके रोजगार का प्रबंध करना है विपक्ष को। 

अब भविष्य में यदि विपक्ष की तरफ से EVM/VVPAT के खिलाफ कोई याचिका दायर की जाए तो सुने बिना ही 10 लाख का जुर्माना लगा कर घर भेज दिया जाए। क्या इतनी हिम्मत करेगा सुप्रीम कोर्ट?

दिल्ली वक्फ बोर्ड को झटका : DDA ने ‘अवैध’ मस्जिद ढहाई, वहाँ शब-ए-बारात पर नमाज पढ़ना चाहते थे मुस्लिम: हाई कोर्ट ने नहीं दी इजाजत

दिल्ली के महरौली इलाके में 30 जनवरी 2024 को अखूंदजी मस्जिद और बहरुल उलूम मदरसे पर बुलडोजर कार्रवाई हुई थी। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने सरंक्षित रिज क्षेत्र में अवैध निर्माण को लेकर यह कार्रवाई की थी। ढहाई गई इस मस्जिद में मुस्लिम शब-ए-बारात पर नमाज पढ़ना चाहते थे। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने इसके लिए इजाजत देने से इनकार कर दिया है।

दिल्ली वक्फ बोर्ड की प्रबंध समिति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर शब-ए-बारात के दिन मस्जिद की जमीन पर बिना रोक-टोक आवाजाही की अनुमति माँगी थी। आज (23 फरवरी 2024) दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस पुरुषइंद्र कुमार कौरव ने यह कहते हुए याचिका खारिज की दी कि अब यह साइट डीडीए के नियंत्रण में है। इससे जुड़ी मुख्य याचिका पर 07 मार्च को सुनवाई होनी है। उन्होंने मौजूदा स्थिति का हवाला देते हुए नए सिरे ये निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए यथास्थिति बहाल रखने को कहा।

वकील शम्स ख्वाजा ने इस दौरान दिल्ली वक्फ बोर्ड की प्रबंध समिति की ओर से दलीलें दी। याचिका में कहा गया था कि शब-ए-बारात (प्रायश्चित की रात) पर मुस्लिम खुद और अपने पूर्वजों के पापों के लिए अल्लाह से माफी माँगते हैं। अखूंदजी मस्जिद 700 साल पुरानी थी। सालों से वहाँ नमाज अदा की जा रही थी। स्थानीय लोगों का एक कब्रिस्तान भी था। लिहाजा उन्हें शब-ए-बारात पर इस जगह पर बेरोकटोक आवाजाही की इजाजत दी जाए। हालाँकि दिल्ली वक्फ बोर्ड के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह मस्जिद न तो 700 साल पुरानी है और न ही वक्फ की प्रॉपर्टी है।

गौरतलब है कि डीडीए की कार्रवाई के बाद मुस्लिम पक्ष ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद अदालत ने उसे यथास्थिति बहाल रखने को कहा था। अदालत ने कहा था कि यह निर्देश केवल उसी हिस्से को लेकर है जहाँ अखूंदजी मस्जिद थी। उसका निर्देश संरक्षित क्षेत्रों में अन्य अवैध निर्माण पर कार्रवाई से डीडीए को नहीं रोकती। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि इस मस्जिद का निर्माण करीब सात सौ साल पहले रजिया सुल्तान के शासनकाल में हुआ था। वहीं डीडीए का कहना है कि संरक्षित क्षेत्र में कब्जा कर जो अवैध निर्माण किए गए थे उनमें यह मस्जिद और मदरसा भी शामिल था।

चुनाव आया, आन्दोलनजीवी सड़क पर आया : केजरीवाल सरकार ने कहा – ‘किसानों को गिरफ्तार करना गलत, नहीं बनाएँगे जेल’

        किसानों का दिल्ली कूच, केजरीवाल सरकार ने केंद्र के प्रस्ताव को किया नामंजूर (फोटो साभार : दैनिक जागरण)
जब भी देश में चुनाव होते हैं या कोई विदेशी मेहमान भारत आता है, आंदोलनजीवी सड़क पर उतर माहौल ख़राब करने आ जाते हैं। विदेशी चंदे पर चलते आंदोलनों पर आखिर कब लगाम लगेगी? चेहरा छुपाकर हंगामा करना क्या आंदोलनकारियों का काम है? ये काम कोई आंदोलनकारी नहीं कर सकता। तलवारों और JVC का आंदोलन में क्या काम ? उनकी मंशा को समझा जा सकता है। आंदोलनकारियों और इनके आकाओं की मंशा यह है कि सुरक्षाकर्मियों को इतना उकसा दो कि वह गोली चला दे और मरने वालों की लाशों पर अपनी खोई प्रतिष्ठा को वापस चमकाया जा सके। 

ज्वलंत प्रश्न यह है कि सरकार क्यों नहीं इन नेताओं के खातों की जाँच करती, ताकि मालूम हो कि ये कितने बड़े धन्नासेठ होने के बावजूद कर्जदार हैं? पिछले आंदोलन में यह बात भी सामने आयी थी कि वास्तविक किसान तो खेत में काम कर रहा है।  

अरविंद केजरीवाल की दिल्ली सरकार ने मंगलवार (13 फरवरी 2024) को राष्ट्रीय राजधानी में किसानों के मार्च के मद्देनजर बवाना स्टेडियम को अस्थायी जेल में बदलने के केंद्र के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। दिल्ली के गृह मंत्री कैलाश गहलोत ने मुख्य सचिव नरेश कुमार को पत्र लिखकर अनुमति देने से इनकार कर दिया और किसानों के मार्च के प्रति एकजुटता व्यक्त की।

कैलाश गहलोत के पत्र में लिखा गया, “किसानों की माँगें वास्तविक हैं। दूसरी बात, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। इसलिए, किसानों को गिरफ्तार करना गलत है।” दिल्ली सरकार ने कहा कि किसानों की माँग जायज है। किसान इस देश के अन्नदाता हैं। अन्नदाता को जेल में डालना गलत है। हम बवाना स्टेडियम को अस्थायी जेल बनाने की परमिशन नहीं दे सकते।

इससे पहले, आम आदमी पार्टी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश के अन्नदाताओं से नफरत का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दिल्ली की हरियाणा और उत्तर प्रदेश से लगती बॉर्डरों पर लोगों को राजधानी में एंट्री करने से रोकने के लिए कीलों वाली रिकेडिंग हाईवे पर कर दी है। जो अन्नदाता किसान देश का पेट भरने के लिए जमीन पर फसल उगाते हैं, पीएम मोदी ने उन्हीं किसानों को रोकने के लिए रास्ते में कीलों का जाल बिछाया है।

इस बीच, किसानों का दिल्ली मार्च जारी है। भारी संख्या में किसान दिल्ली बॉर्डर पहुँचने भी लगे हैं। किसानों ने कहा कि हम अपनी माँगों को पूरा करवाकर ही जाएँगे। हम 6 महीने का राशन लेकर आए हैं। किसान पहले दिल्ली के पास बॉर्डर पर जमा होंगे और दोपहर तीन बजे आगे की रणनीति के बारे में फैसला करेंगे। किसानों की ओर से कहा गया है कि हम अन्न उगाते हैं। सरकार ने हमारे लिए कीलों की फसल उगा रखी है। सरकार हमारे लोगों को अलग-अलग राज्यों में पकड़ रही है। हम फिर भी सरकार से बात करने को तैयार हैं।

72 हूरें’: सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट देने से इनकार, कहा- ‘कुरान का रेफरेंस ’ हटाओ

सेंसर बोद द्वारा नकारे जाने के बावजूद रिलीज हुआ '72 हूरें' का ट्रेलर
अशोक पंडित की फिल्म ’72 हूरें’ को सर्टिफिकेट देने से सेंसर बोर्ड ने इनकार कर दिया, जिसके बाद संस्था का खासा विरोध हो रहा है। ‘सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC)’ के अध्यक्ष प्रसून जोशी की भी लोग आलोचना कर रहे हैं। अशोक पंडित ने बताया कि एक लाश का पाँव इसमें दिखाया गया है, सेंसर बोर्ड ने जिसे हटाने के लिए कहा। साथ ही कुरान का एक रेफरेंस भी हटाने को कहा गया है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं जब भगवान श्रीराम, हनुमान और लक्ष्मण के अलावा माँ सीता को लेकर बनी फिल्म ‘आदिपुरुष’ में देवी-देवताओं को लेकर आपत्तिजनक संवाद और दृश्य पास हो गए, फिर ’72 हूरें’ को लेकर ही क्रिएटिव फ्रीडम का मर्दन क्यों? पशुहित के नाम पर भी एक दृश्य को हटाने के लिए कहा गया है, लेकिन निर्माताओं को इससे कोई समस्या नहीं है। अशोक पंडित ने कहा कि ये नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म है और इसे सर्टिफिकेशन सेंसर बोर्ड ने ही दिया था।

अशोक पंडित ने पूछा कि ट्रेलर में फिल्म के ही तो दृश्य हैं, फिर इससे समस्या क्यों? उन्होंने ऐलान किया कि इसके बावजूद ट्रेलर को डिजिटल रूप से रिलीज कर दिया गया है। पहले इसे PVR में रिलीज करने की योजना थी, लेकिन अब अँधेरी के एक क्लब में ये कार्यक्रम होगा। उन्होंने कहा कि वो सेंसर बोर्ड की पोल खोलेंगे, राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली एक फिल्म के ट्रेलर को रिलीज के लिए सर्टिफिकेट न देना गंभीर मुद्दा है।

IFFI में भी ’72 हूरें’ को पैनोरमा सेक्शन में अवॉर्ड मिला है। अशोक पंडित ने कहा कि सेंसर बोर्ड में कुछ बाहर के लोग बैठे हुए हैं, प्रसून जोशी को इसका जवाब देना होगा। बता दें कि फिल्म को पहले ही सेंसर बोर्ड हरी झंडी दिखा चुका है। निर्माताओं ने अब केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का दरवाजा खटखटाने की बात कही है। संजय पूरन सिंह द्वारा निर्देशित फिल्म का ट्रेलर रिलीज हो चुका है।

अशोक पंडित ने कहा, “आप विडम्बना देखिए। फिल्म में जो दृश्य है, उसे ट्रेलर में नहीं चाहिए। कुर्सी पर बैठने वालों के विरोधाभास का हम विरोध कर रहे हैं। ये फिल्म किसी भी धर्म या इंसानियत के खिलाफ नहीं है। ये आतंकवाद के खिलाफ है। जो कंटेंट्स फिल्म में हैं, वो ट्रेलर में क्यों नहीं हो सकते?” एक महिला पत्रकार ने जब प्रोपेगंडा बताया तो अशोक पंडित ने उसे करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि जिन फिल्मों को देश-विदेश में करोड़ों लोगों ने स्वीकार किया, उसकी इंटेलिजेंस पर आप सवाल उठा रहे हो?