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हाई कोर्ट के आदेश के बाद भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई दिल्ली पुलिस; बड़ा खुलासा : देश, हिन्दुत्व और मोदी विरोधी ताकतों की अराजकता फैलाने की खतरनाक साजिश, हटाए गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा


दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार (18 जुलाई 2026) को दिल्ली पुलिस ने जबरन अस्पताल ले गई है। यह कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश और उनकी लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और मेडिकल निगरानी सुनिश्चित करने के लिए की गई। अरविन्द केजरीवाल गैंग के मंसूबों पर पानी फिर गया।  

पुलिस के अस्पताल ले जाने के दौरान प्रदर्शन स्थल पर कुछ समय के लिए तनाव का माहौल भी देखने को मिला। दिल्ली पुलिस का कहना है कि कोर्ट के आदेशों और मेडिकल एक्सपर्ट्स की सलाह के अनुसार, सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए उन्हें जरूरी मेडिकल देखभाल के लिए सफदरजंग अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।

सोनम वांगचुक 28 जून 2026 से नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे समेत विभिन्न माँगों को लेकर धरने और भूख हड़ताल पर बैठे थे। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में उनकी सेहत को देखते हुए नियमित चिकित्सकीय जाँच और आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी नागरिक के जीवन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह पुलिस की टीम जंतर-मंतर पहुँची और मेडिकल सहायता के लिए वांगचुक को अस्पताल ले गई। इस दौरान वहाँ मौजूद छात्रों और समर्थकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

हालाँकि पुलिस उन्हें अपने साथ लेकर रवाना हो गई। इसके बाद जंतर-मंतर पर मौजूद अन्य प्रदर्शनकारियों को भी वहाँ से हटाया जाने लगा। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आरोप लगाया गया कि पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को उनके ठहरने के स्थान पर रोककर हिरासत में लिया गया।

अभिजीत दीपके ने दावा किया कि पुलिस ने उनके साथ मारपीट की। वहीं पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ दास ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया और कई लोगों को हटाया गया। हालांकि इन आरोपों पर दिल्ली पुलिस की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

वांगचुक ने शुक्रवार (17 जुलाई 2026) की रात एक वीडियो संदेश जारी कर कहा था कि उनके शरीर का करीब 20 प्रतिशत वजन कम हो चुका है. उन्होंने बताया कि शरीर की मांसपेशियाँ भी प्रभावित हो चुकी हैं, लेकिन उनका हौसला और मानसिक स्थिति अब भी मजबूत है।

वीडियो संदेश में वांगचुक ने देशवासियों से 20 जुलाई को प्रस्तावित ‘चलो संसद’ मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे मशहूर एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को 20 दिन पूरे हो चुके हैं। 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक नीट (NEET) जैसी बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। अभिजीत दीपके द्वारा संचालित आंदोलन में वांगचुक जब भूख हड़ताल पर बैठे तो उन्हें लगा कि वो महात्मा गांधी और समाज सेवी अन्ना हजारे की तरह एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे भीड़ गायब होती चली गई। इससे ना सिर्फ वांगचुक की हताशा बढ़ने लगी, बल्कि उन्हें मोहरा बनाने वाले देश, हिन्दुत्व और मोदी विरोधी ताकतों की बेचैनी भी बढ़ने लगी। अब ये ताकतें संसद के मानसून सत्र के दौरान अराजकता पैदा कर दिल्ली सहित पूरे देश का माहौल खराब करना चाहती हैं। इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ आंदोलन का आह्वान किया है। वहीं खुफिया एजेंसियों से मिली गोपनीय रिपोर्ट के बाद केंद्र की मोदी सरकार भी सतर्क हो गई है।

क्यों हटाए गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा? 
दिल्ली में कानून व्यवस्था के स्तर पर शुक्रवार 17 जुलाई, 2026 को बड़ा बदलाव हुआ। सतीश गोलचा को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पद से हटा दिया गया। सतीश की जगह वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अनुराग कुमार को दिल्ली पुलिस का नया कमिश्नर नियुक्त किया गया है। उन्होंने चंद घंटों में पदभार संभाल लिया। हैरानी की बात यह है कि सतीश गोलचा का कार्यकाल अभी खत्म नहीं हुआ था। करीब 11 माह पहले गोलचा को पद से क्यों हटाया गया इसको लेकर तरह-तरह की चर्चा की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, यह नियुक्ति दिल्ली की सुरक्षा स्थिति और आने वाली चुनौतियों को देखते हुए की गई है। साथ ही राजधानी में खुफिया जानकारी पर आधारित पुलिसिंग को मजबूत करने की जरूरत को भी ध्यान में रखा गया है। अनुराग कुमार लंबे समय से इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम कर रहे थे और उन्होंने अपने कार्यकाल में कई अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनका खुफिया एजेंसी में काम करने का अनुभव इस काम में मदद करेगा।

संसद के मानसून सत्र को बाधित करने की बड़ी साजिश
अभिजीत दीपके द्वारा संचालित आंदोलन की शुरुआत से ही बातें कही जा रही थीं कि सोनम वांगचुक तो सिर्फ मोहरा है। असली खिलाड़ी तो डीप स्टेट से जुड़ी वो ताकतें हैं, जो देश के अंदर और बाहर से इस फर्जी आंदोलन के लिए साजिशें रच रही हैं। आंदोलन की हवा निकलती देख दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी 16 जुलाई,2026 को वांगचुक से मिलने जंतर-मंतर पहुंच गए। इस दौरान सोनम वांगचुक और अरविंद केजरीवाल के बीच जो बातचीत हुई, वो एक बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही है। केजरीवाल ने सोशल मीडिया में एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें 0.25 सेकंड से लेकर 0.46 सेकंड तक उनकी बातचीत सुनी जा सकती है। 

केजरीवाल और वांगचुक के बीच बातचीत
वांगचुक – 28 को सफल बनाएंगे।
केजरीवाल – 28 को,
वांगचुक – सफल बनाए।
केजरीवाल – हां, सफल बनाएंगे।
वांगचुक – सफल बनाकर छोड़ूंगा नहीं तो भूत बन जाऊंगा।
केजरीवाल – आपको कुछ नहीं होगा। आपको कुछ नहीं होने देंगे।
वांगचुक – 20 को सफल बनाएंगे।
केजरीवाल – आपने पूरे देश को जगा दिया है।

20 तारीख को दिल्ली में अराजकता पैदा करने की होगी कोशिश
अरविंद केजरीवाल ने कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से कहा कि हमें सोनम वांगचुक जैसा शिक्षा मंत्री भी चाहिए और उसके क्रांतिकारी कदम भी चाहिए। 20 तारीख को देश के कोने कोने में जो लोग सुन रहे हैं। जो लोग सोशल मीडिया में देखेंगे, जो लोग मीडिया के जरिए देखेंगे, सबको अपील करना चाहता हूं। ज्यादा से ज्याद संख्या में यहां पर आएंगे। 20 तारीख के आंदोलन को, इनके कॉल को, पार्लियामेंट तक की जो यात्रा है उसको सफल बनाना है। ज्यादा से ज्यादा संख्या में आना है। गौरतलब है कि 20 जुलाई, 2026 से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है, जो 13 जुलाई तक चलेगा।

वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री क्यों नहीं बना रहे केजरीवाल ? 
सोनम वांगचुक से मुलाकात के दौरान अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार अहंकार में डूबी हुई है। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि युवाओं की आवाज सुन लीजिए, नहीं तो यही युवा 2029 में आपको सत्ता से बाहर कर देंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर असल में शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते तो सोनम वांगचुक को देश का शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं प्रधानमंत्री ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें डर होगा कि सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव कर देंगे। अगर अरविंद केजरीवाल को सोनम वांगचुक पर इतना भरोसा है तो उनके पास वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री बनाने का सुनहरा मौका है। पंजाब में भगवंत मान सरकार की लोकप्रियता खत्म हो चुकी है। अगले साल 2027 की शुरुआत में वहां चुनाव होने वाला है, ऐसे में केजरीवाल वांगचुक को पंजाब का शिक्षा मंत्री बनाकर अपनी सरकार की साख बचा सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे।

वांगचुक को अन्ना हजारे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं केजरीवाल 
दरअसल, अरविंद केजरीवाल का मकसद अन्ना हजारे की तरह वांगचुक को मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करना है। वांगचुक से मुलाकात के दौरान केजरीवाल के अंदर की बात सामने आ गई। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि इतिहास खुद को दोहराता है। इसी जंतर-मंतर पर 4 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे आंदोलन पर बैठे थे और तीन साल बाद उस समय की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। केजरीवाल चाहते हैं कि वांगचुक को मोहरा बनाकर वो फिर से दिल्ली में खिसकी हुई अपनी सियासी जमीन को हासिल कर सकते हैं। केजरीवाल के इस सियासी मकसद को पूरा करने के लिए इससे पहले आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना, मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज भी जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके है।

 

अभिजीत दीपके और उसके दोस्त ने खोली केजरीवाल की पोल


अभिजीत दीपके के दोस्त ने खुलासा किया कि हम दोनों एक-दूसरे को करीब सात साल से जानते हैं। हम दोनों अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया टीम से जुड़े हुए थे। 2019-20 में अभिजीत दीपके आम आदमी पार्टी का ट्वीटर हैंडल देखता था। मैं व्हाट्सएप टीम देखता था। तब से हम लोग एक-दूसरे से परिचित थे। अभिजीत दीपके के दोस्त ने आगे कहा कि हैरानी की बात है कि कॉकरोच वाले बयान के एक हफ्ते पहले मेरी और दीपके की बात हुई थी, क्योंकि दीपके जॉब ढूंढ़ रहा था।  

रोहिणी कोर्ट के जज का वीडियो वायरल करने पर DJSA ने जताई कड़ी आपत्ति, वकीलों की ओर से जजों को धमकाने को न्यायपालिका पर बताया सीधा हमला

                                          रोहिणी कोर्ट के वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट
दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन (DJSA) ने रोहिणी कोर्ट के डिस्ट्रिक्ट जज राकेश कुमार-V का अदालती कार्यवाही के दौरान बिना अनुमति वीडियो रिकॉर्ड करने और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने की घटना की कड़ी निंदा की है। एसोसिएशन ने रविवार (18 मई 2026) को जारी एक आधिकारिक बयान में इस कृत्य पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा के लिए एक गंभीर खतरा बताया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस विवादित वीडियो के सामने आने के बाद जज राकेश कुमार-V को न्यायिक कार्य से मुक्त कर दिल्ली न्यायिक अकादमी से संबद्ध कर दिया है।

एसोसिएशन ने अपने पत्र में सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “न्यायिक कार्यवाही की गुप्त रूप से रिकॉर्डिंग करना और उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल करना न केवल घोर अनुचित है, बल्कि यह न्यायिक संस्थान की गरिमा, स्वतंत्रता और महिमा पर सीधा हमला है। ऐसे गैर-कानूनी और लापरवाही भरे कृत्य अदालतों को बदनाम करने, न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को कमजोर करने और न्यायिक अधिकारियों को उनके संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान डराने, बदनाम करने और सार्वजनिक दबाव में लाने के उद्देश्य से किए जाते हैं।”

इसके साथ ही वकीलों के एक वर्ग द्वारा न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने और काम का बहिष्कार करने पर भी एसोसिएशन ने तीखी आपत्ति जताई। पत्र में आगे कहा गया, “बार के कुछ सदस्यों द्वारा न्यायिक अधिकारियों को खुलेआम धमकी देना, डराना और उनके कानूनी कर्तव्यों में बाधा डालने का प्रयास करना कानून के शासन वाले संवैधानिक लोकतंत्र में पूरी तरह से अस्वीकार्य है। अगर ऐसे दबाव और सार्वजनिक बदनामी को बर्दाश्त किया गया, तो कोई भी न्यायिक अधिकारी निडर होकर काम नहीं कर पाएगा। हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी वकीलों द्वारा न्यायिक कार्य से दूर रहना जनता को बंधक बनाने और न्याय व्यवस्था को पंगु बनाने जैसा है।”

डीजेएसए ने जज राकेश कुमार और पूरे न्यायिक बिरादरी के साथ एकजुटता दोहराते हुए कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। एसोसिएशन ने दिल्ली हाई कोर्ट से सोशल मीडिया से इन वायरल वीडियो क्लिपों को तुरंत हटाने का निर्देश देने की मांग की है। यह पूरा विवाद को-ऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ ऑल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशंस द्वारा जज के तबादले और जांच की मांग को लेकर काम बंद करने के आह्वान के बाद और गरमा गया है।

सच्चाई छिपाने पर दिल्ली हाई कोर्ट की The Wire के सिद्धार्थ वरदराजन को फटकार, वकील को भी नहीं बक्शा; वकील की मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार

दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने प्रोपेगेडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन (Siddharth Varadarajan) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के एक पुराने आदेश को ‘छिपाने’ के लिए कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushendra Kumar Kaurav) की पीठ ने गुरुवार (14 मई 2026) को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही में तथ्यों को दबाना एक बेहद गंभीर मामला है और इसके दूरगामी कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
साभार :Bar and Bench 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला तब सामने आया जब वरदराजन ने अपनी विदेश यात्रा की अनुमति के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने 2020 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला दिया। उस आदेश में वरदराजन को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जा सकते।

अदालत ने पाया कि वरदराजन ने अपनी याचिका में इस महत्वपूर्ण शर्त का उल्लेख नहीं किया था। इस पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति कौरव ने कहा, “यह बहुत गंभीर मुद्दा है और इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह याचिकाकर्ता की (इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष) जमानत अर्जी से जुड़ा मामला है। जमानत आदेश में लगाई गई शर्तों को इस अदालत के संज्ञान में नहीं लाया गया।”

न्यायाधीश ने आगे तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें आपकी रिट याचिका खारिज करनी होगी। कुछ सख्त कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है… मैं वरदराजन की वकील नित्या रामकृष्णन द्वारा माँगी गई माफी पर केवल कार्रवाई न करने की हद तक विचार कर सकता हूँ, लेकिन जानकारी छिपाने के कारण वह अदालत से किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।

वरदराजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रिकॉर्ड पर न रखने के लिए अदालत से बिना शर्त माफी माँगी। हालाँकि पीठ ने इस मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील और कानूनी पेचीदगियों वाले मामले में केवल मौखिक दलीलें काफी नहीं हैं।

परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने सिद्धार्थ वरदराजन को औपचारिक नोटिस जारी किया है और सात दिनों के भीतर हलफनामे के माध्यम से अपनी इस चूक पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने अपने उन सभी पिछले आदेशों को वापस ले लिया (Recall) है, जिनसे वरदराजन को राहत मिली थी।

सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अदालत ने अप्रैल 2026 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा वरदराजन का ओसीआई (OCI) कार्ड रद्द करने के फैसले को क्वैश (निरस्त) किया गया था। इसका अर्थ है कि अब उनका ओसीआई कार्ड मामला फिर से कानूनी संकट में फंस गया है।

राहुल और केजरीवाल में मची "उपद्रवी नंबर 1" बनने की होड़; ‘अंतरात्मा की आवाज’ के नाम केजरीवाल ने कोर्ट को दिखाई ‘पीठ’, बताया ‘गाँधी’ का रास्ता: कैसे न्यायपालिका को चोट पहुँचाने का है प्रयास

              अरविंद केजरीवाल, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा (साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यूज ऑन एआईआर)
इस समय कांग्रेस के राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल दोनों में "उपद्रवी नंबर 1" बनने की जबरदस्त होड़ मची हुई है। दोनों ही की पार्टियां चुनाव हार रही है। गुजरात निकाय चुनावों में तो केजरीवाल पार्टी हवा हो गयी। पांच राज्यों में हुए चुनावों में कहीं नहीं। अब जनता में बने रहने के लिए कोई उपद्रव तो करना है। राहुल का लोकसभा में हंगामा और लोकसभा बाधित करने का ड्रामा देखते ही रहते हैं। संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। ऐसे में केजरीवाल क्यों पीछे रहे। केजरीवाल ने तो जस्टिस स्वर्ण कान्ता शर्मा पर ही सवाल खड़ा कर तीसमारखाँ बन सुर्खियां बटोरने में लगे हैं। वैसे इन दोनों के उछलने में न्यायपालिका का भी बहुत बड़ा योगदान है, जिसे न्यायपालिका झुठला नहीं सकती। प्राथमिकता पर इनके मुकदमों की सुनवाई और जमानत दे देना। वकील का नाम और शक्ल देख केस को तावोच्य देना।  

खैर, केजरीवाल ने जो जस्टिस स्वर्ण कान्ता शर्मा पर आरोप लगाए है सुप्रीम कोर्ट ने क्या कार्रवाही की? क्या कोई जज को किसी आयोजन में जाने के लिए नेताओं से इजाजत लेनी पड़ेगी? नेता चाहे किसी भी फंक्शन में चला जाए लेकिन जज नहीं, क्यों? इस गंभीर मसले पर सुप्रीम कोर्ट को मंथन करना चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब इन नेताओं का अनुसरण करते अन्य आरोपी कोर्ट का बहिष्कार करे तो उस पर भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो। क्योकि आरोपी का वकील भी इन्ही केसों का reference देगा। नेताओं और सामान्य के लिए अलग कानून नहीं होना चाहिए।         

दिल्ली के शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अब उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से पेश नहीं होंगे। 

पत्र में केजरीवाल ने क्या कहा?

केजरीवाल के अनुसार, यह फैसला उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया। उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘सत्याग्रह’ का हवाला देते हुए लिखा कि जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, न्याय की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कदम उठाना चाहिए, चाहे उसके परिणाम उसके खिलाफ ही क्यों न जाएँ।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अब इस केस में न तो खुद कोर्ट में पेश होंगे और न ही उनके वकील उनकी ओर से कोई दलील देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस निर्णय के संभावित कानूनी परिणामों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगे चलकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जाने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

जानिए क्या कहता है कानून?

अब यहाँ सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि कानून इस पूरे घटनाक्रम को किस नजरिए से देखता है। आज तक ने इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत की है और बताया है कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तामता ने विस्तार से कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।

उनके अनुसार, जब किसी आरोपित को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलती है, तब भी उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत एक बॉन्ड भरना होता है। यह बॉन्ड आमतौर पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत होता है, जिसमें आरोपित यह वादा करता है कि यदि हाई कोर्ट में अपील होती है, तो वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होगा।

इस मामले में भी केजरीवाल ने ऐसा बॉन्ड भरा है। मतलब वह कानूनी रूप से बाध्य हैं कि हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान उपस्थित रहें। यदि वह कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो यह बॉन्ड का उल्लंघन माना जाएगा और कोर्ट उनके खिलाफ पहले जमानती वारंट जारी कर सकती है।

यदि इसके बावजूद भी वे पेश नहीं होते हैं, तो गैर-जमानती वारंट भी जारी किया जा सकता है। कानून का एक और महत्वपूर्ण पहलू इस मामले में सामने आता है, जिसे ‘एकतरफा सुनवाई’ या Ex-Parte कहा जाता है। यदि कोई आरोपित कोर्ट में उपस्थित नहीं होता है, तो कोर्ट उसके बिना ही सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।

इसका मतलब यह होता है कि केवल जाँच एजेंसी या विरोधी पक्ष की दलीलें सुनी जाएँगी और आरोपित को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलेगा। यदि इस तरह की सुनवाई में फैसला जाँच एजेंसी के पक्ष में जाता है, तो ट्रायल कोर्ट का राहत देने वाला फैसला पलट सकता है और मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है।

ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल को फिर से आरोपित के रूप में पेश होना पड़ सकता है और पूरी कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हो सकती है।

 जानिए क्या है पूरा मामला?

मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की शराब नीति से जुड़ा है, जिस पर आरोप लगे कि इसमें नियमों को बदलकर कुछ निजी पक्षों को फायदा पहुँचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। जाँच एजेंसियों ने इस केस में केजरीवाल समेत कई लोगों को आरोपित बनाया और लंबी जाँच के बाद मामला कोर्ट तक पहुँचा।

इस केस में 27 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए केजरीवाल और अन्य आरोपितों को राहत दे दी। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने जाँच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए और जाँच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश तक कर दी।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जाँच एजेंसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। यह अपील जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने आई। हाई कोर्ट ने सुनवाई के शुरुआती चरण में ट्रायल कोर्ट के कुछ निर्देशों पर रोक लगाई और मामले को आगे सुनने का निर्णय लिया।

यहीं से इस केस ने एक नया मोड़ लिया, क्योंकि अब यह सिर्फ ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा नहीं रह गया था, बल्कि हाईकोर्ट में पूरी प्रक्रिया फिर से खुलने की स्थिति बन गई थी।

अरविंद केजरीवाल के बेतुके माँग ने मोड़ा केस का रुख

इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने माँग की कि इस केस की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से हटाकर किसी दूसरी बेंच को दे दी जाए। इस माँग के पीछे उन्होंने ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं।

चूँकि इस केस में जाँच एजेंसी केंद्र सरकार के अधीन है और उसकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश होते हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि किसी जज के रिश्तेदार वकालत करते हैं या किसी पैनल में हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वह पक्षपाती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह के आधार पर जज खुद को अलग करने लगें, तो न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा और हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की कोशिश करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी आरोपित या पक्षकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह तय करे कि उसका केस कौन सा जज सुनेगा।

जब उनकी यह माँग खारिज हो गई, तो इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को एक विस्तृत पत्र लिखा। यह पत्र इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। इस पत्र में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अब इस कोर्ट से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट की कार्यवाही सख्त नियमों और प्रक्रियाओं के तहत चलती है। इसमें व्यक्तिगत असहमति के आधार पर कोर्ट में पेश न होना न केवल खुद के केस को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।

यदि केजरीवाल कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो हाई कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है, जिसमें वारंट जारी करना और एकतरफा सुनवाई शामिल है। वहीं यदि हाई कोर्ट जाँच एजेंसी की अपील को स्वीकार कर लेता है, तो मामला फिर से निचली अदालत में जा सकता है और कानूनी लड़ाई एक बार फिर नए सिरे से शुरू हो सकती है।

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस तेजस कारिया केजरीवाल मामले की सुनवाई से क्यों हटे?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल से जुड़े एक मामले में नया मोड़ आ गया है। दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस तेजस कारिया ने अदालत की अवमानना ​​की कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है
। इस कारण केजरीवाल और अन्य के खिलाफ याचिका पर सुनवाई टल गई है। यह मामला अदालत का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने से जुड़ा है। यह मामला बुधवार(अप्रैल 22) को चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था। इस मामले की सुनवाई अब गुरुवार को एक अलग पीठ द्वारा की जाएगी।

यह मामला उस जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं और वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई है। आरोप है कि इन लोगों ने एक्साइज नीति मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर साझा किए। यह याचिका वकील वैभव सिंह द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग और उसे सार्वजनिक करना नियमों का उल्लंघन है। याचिका में यह भी मांग की गई है कि इन वीडियो को सोशल मीडिया से हटाया जाए। इस मामले में केवल केजरीवाल और रविश कुमार ही नहीं, बल्कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य नेताओं के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई है।

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रवीश कुमार-केजरीवाल-दिग्विजय सिंह के खिलाफ दिल्ली HC में याचिका, कोर्ट का वीडियो शेयर करने पर का

जस्टिस स्वर्णकांता ने खुद को नहीं किया अलग

इससे पहले सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट से एक अन्य मामले में केजरीवाल को झटका लगा था। हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार करते हुए केजरीवाल और अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था। एक घंटे से अधिक समय तक हुई सुनवाई में जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी भी वादी को बिना किसी सबूत के जज पर फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है और जज किसी वादी के पूर्वाग्रह के निराधार डर को दूर करने के लिए खुद को मामले से अलग नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक नेता को बिना किसी आधार के किसी संस्था को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि किसी जज पर व्यक्तिगत हमला न्यायपालिका पर ही हमला होता है। जस्टिस शर्मा ने निष्कर्ष निकाला कि उन्हें मामले की सुनवाई से हटाने की याचिकाओं में वर्णित विवरण अनुमानों और कथित झुकावों पर आधारित था। जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह अदालत अपने और संस्था के लिए खड़ी रहेगी… मैं खुद को इस मामले से अलग नहीं करूंगी।

रवीश कुमार-केजरीवाल-दिग्विजय सिंह के खिलाफ दिल्ली HC में याचिका, कोर्ट का वीडियो शेयर करने पर कार्यवाही की माँग


दिल्ली हाई कोर्ट में मंगलवार (21 अप्रैल 2026) को आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और यूट्यूबर रवीश कुमार के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में दोनों पर अवमानना की कार्रवाई करने की माँग की गई है।

यह याचिका एडवोटेक वैभव सिंह ने दायर की है। इसमें कहा गया है कि आबकारी नीति (Excise Policy) मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही का वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, जो गलत है।

याचिका में खासतौर पर उस वीडियो पर आपत्ति जताई गई है, जिसमें अरविंद केजरीवाल जस्टिस शर्मा से खुद को केस से अलग करने की माँग करते हुए अपनी दलील रख रहे थे। ये वीडियो अब तेजी से वायरल हो रहा है। याचिका में इन वीडियो को सोशल मीडिया से हटाने का निर्देश दिए जाने की भी माँग की गई।

इस मामले में अरविंद केजरीवाल और रवीश कुमार के अलावा कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, AAP नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, संजीव झा, पुरनदीप सिंह साहनी, जरनैल सिंह, मुकेश अहलावत और विनय मिश्रा के खिलाफ भी कार्रवाई की माँग की गई है। इस मामले की सुनवाई 22 अप्रैल 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच करेगी, जिसमें चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया शामिल हैं।

याचिका में क्या कहा गया?

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में कहा गया कि AAP के कई नेताओं और अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों ने जानबूझकर और सोच-समझकर कोर्ट की छवि खराब करने की कोशिश की। इसमें कहा गया है कि इन लोगों ने कोर्ट की कार्यवाही की वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग करके उसे सोशल मीडिया पर फैलाया, ताकि देश और विदेश में न्यायपालिका की छवि खराब हो और आम लोगों को गुमराह किया जा सके।

याचिकाकर्ता एडवोकेट वैभव ने यह भी बताया कि ये वीडियो और ऑडियो क्लिप फेसबुक, इंस्टाग्राम, यू्ट्यूब और कई न्यूज चैनलों पर साझा किए गए। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि जिस तरह से ये रिकॉर्डिंग की गई और फिर अलग-अलग नेताओं ने इसे शेयर, रीट्वीट और पोस्ट किया। उससे यह एक बड़ी साजिश जैसी लगती है।

याचिका में आरोप लगाया गया कि केजरीवाल और AAP के अन्य नेताओं ने मिलकर कोर्ट की छवि खराब करने, आम जनता को गुमराह करने और यह दिखाने की कोशिश की कि न्यायपालिका किसी राजनीतिक दबाव में काम कर रही है।

‘नेता नहीं बताएँगे जज फैसला देने के काबिल हैं या नहीं’: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल को लताड़ा, साफ बोलीं- नहीं छोड़ूँगी दारू घोटाला केस

                              केजरीवाल की रेक्यूजल माँग को जस्टिस शर्मा ने किया खारिज (साभार: TOI)
सीबीआई और ED पर ऊँगली उठाने वाले जब जजों पर ऊँगली उठाने लग जाएं समझ जाना चाहिए ऐसी मानसिकता वाले नेता और उनकी पार्टी देश को किस मझधार में डुबेने जा रहे हैं। इनको देश या समाज से कोई लेना-देना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार कर अपने परिवार और आने वाली पीढ़ियों के लिए धन अर्जित करना है।  
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल 2026) को शराब नीति केस (एक्साइज पॉलिसी केस) में AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recusal) करने की माँग की गई थी। कोर्ट ने इस माँग को खारिज कर दिया है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी नेता को यह तय करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता कि जज सक्षम है या नहीं।

यह मामला दिल्ली की शराब नीति (एक्साइज पॉलिसी) केस से जुड़ा है। इसमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरिपतों ने कहा था कि जस्टिस शर्मा पहले भी उनके खिलाफ फैसले दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज के बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में है, जिससे ‘हितों का टकराव’ हो सकता है।

जस्टिस शर्मा ने मामले को कहा ‘कैच-22’

जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में केजरीवाल की इन सभी आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने साफ कहा कि केवल आरोप लगाने से यह साबित नहीं होता कि जज पक्षपाती है। उन्होंने कहा कि कानून के आधार पर ही फैसला होगा, किसी की बनाई कहानी या धारणा के आधार पर नहीं।

उन्होंने इस स्थिति को ‘कैच-22‘ बताया। इसका मतलब है कि चाहे वह केस से हटें या न हटें, दोनी ही स्थिति में सवाल उठेंगे। जज ने कहा कि यह स्थिति केजरीवाल के लिए ‘विन-विन’ है। अगर उन्हें राहत नहीं मिलती, तो वे कह सकते हैं कि पहले से ही ऐसा होने वाला था। और अगर राहत मिलती है, तो वे कह सकते हैं कि कोर्ट दबाव में आ गया।

जस्टिस के कदम से न्यायपालिका की छवि को होता नुकसान

जस्टिस शर्मा ने कहा कि अगर वह इस केस से खुद को अलग कर लेतीं, तो इससे लोगों में गलत संदेश जाता कि जज किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करना न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुँचाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि उनके सामने सबसे आसान रास्ता यह था कि बिना सुनवाई के ही खुद को केस से अलग कर लें। लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि यह सिर्फ उनका नहीं, बल्कि पूरे न्यायपालिका का सवाल था। उन्होंने 34 साल के अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने बिना किसी दबाव या आरोप से प्रभावित हुए फैसला लिया है।

नेता की पत्नी राजनीति में आ सकती, तो जज के बच्चे वकालत में क्यों नहीं: जस्टिस

जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल के ‘हितों के टकराव’ वाले आरोप पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा, “जैसे किसी नेता की पत्नी या बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, वैसे ही जज के बच्चे वकालत के पेशे में आ सकते हैं। इसे गलत नहीं कहा जा सकता।”
उन्होंने कहा कि सिर्फ इतना कह देना कि उनके रिश्तेदार सरकारी वकील हैं, काफी नहीं है। यह भी दिखाना होगा कि इसका केस पर क्या असर पड़ रहा है, जो कि नहीं दिखाया गया। जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि अगर कोई झूठ बार-बार बोला जाए, तो वह सच नहीं बन जाता, सच हमेशा सच ही रहता है।
अंत में जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मामले में खुद को अलग करना समझदारी नहीं होती, बल्कि अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना होता। इसीलिए उन्होंने केजरीवाल और अन्य आरोपितों की रिक्यूजल की माँग को खारिज कर दिया।


दिल्ली : जिस भारतीय तेल कम्पनी में रूस की हिस्सेदारी, उसके अकाउंट माइक्रोसॉफ्ट ने बिन बताए किए ब्लॉक: एक्सेल का डाटा भी रोका, नायरा एनर्जी ने हाई कोर्ट से माँगा न्याय

यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के कारण सेवाओं के अचानक निलंबन को लेकर नायरा एनर्जी ने माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का किया रुख किया (फोटो साभार: माइक्रोसॉफ्ट, डेल-ई)
मार्केटिंग कंपनी नायरा एनर्जी ने माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह रूस की भागीदारी वाली भारत की एक प्रमुख तेल रिफाइनिंग और मार्केटिंग कंपनी है। कंपनी का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट ने बिना किसी पूर्व सूचना के उसके ईमेल एक्सेस जैसी जरूरी डिजिटल सेवाएँ अचानक बंद कर दी।

नायरा एनर्जी का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट के इस कदम से पूरे भारत भर के संचालन पर बुरा असर पड़ा है और कंपनी की रोजमर्रा की गतिविधियाँ बाधित हो गई हैं।

प्रतिबंधों का परिणाम और परिचालन पर प्रभाव

हाल ही में यूरोपीय संघ (EU) ने नायरा एनर्जी पर प्रतिबंध लगाए हैं क्योंकि उसका संबंध रूसी तेल कंपनी रोजनेफ्ट (Rosneft) से है। इस फैसले के बाद कई असर दिखाई दिए। हालाँकि माइक्रोसॉफ्ट का मुख्यालय अमेरिका में है और नायरा का तर्क है कि माइक्रोसॉप्ट कंपनी अमेरिकी या भारतीय कानूनों के तहत किसी भी तरह से यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों को लागू नहीं कर सकती।

EU के प्रतिबंधों के बाद कम से कम दो जहाजों ने नायरा की वडिनार रिफाइनरी से रिफाइंड प्रोडक्ट्स की लोडिंग टाल दी। साथ ही एक टैंकर जो रूसी Urals क्रूड लेकर आ रहा था, उसे रास्ते में ही मोड़ दिया गया। इस पूरे संकट के बीच नायरा के CEO ने इस्तीफा दे दिया है और उनकी जगह अब सर्गेई डेनिसोव (Sergey Denisov) को नया CEO नियुक्त किया गया है।

नायरा ने की कोर्ट से तत्काल राहत की माँग

याचिका में अंतरिम आदेश और सेवाओं की तुरंत बहाली की माँग की गई है। नायरा का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट ने यह कदम ‘एकतरफा, बिना किसी पूर्व सूचना, सलाह या बातचीत के’ उठाया और इसे ‘कानूनी अनुपालन (compliance)’ के नाम पर किया गया।

खास बात यह है कि नायरा ने जिन सेवाओं का उपयोग किया, वे ‘पूरी तरह से भुगतान की गई लाइसेंस (fully paid-up licences)’ के तहत ली गई थीं। यही वजह है कि यह कार्रवाई और भी अनुचित लगती है।

नायरा का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट की इस कार्रवाई की वजह से उन्हें अपने ही डाटा और खुद के बनाए टूल्स और प्रोडक्ट्स तक पहुँच नहीं मिल पा रही है। मंगलवार (29 जुलाई 2025) को लगाई गई इस रोक से उनके रोजमर्रा के कामकाज पर सीधा असर पड़ा है।

भारत की ईंधन अर्थव्यवस्था में रणनीतिक महत्व

अपनी याचिका में कंपनी ने भारत के ऊर्जा बुनियादी ढाँचे में अपने महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया है। कंपनी देश की कुल रिफाइनिंग क्षमता के लगभग 8% हिस्से के लिए जिम्मेदार है और 7% पेट्रोल पंप का संचालन करती है। इसके अलावा कंपनी भारत की 8% पॉलीप्रोपाइलीन उत्पादन क्षमता भी विकसित कर रही है।

कंपनी ने मौजूदा चुनौतियों के बावजूद यह भरोसा दिलाया है कि वह पूरे देश में ईंधन की आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रखेगी और भारतीय नियमों का पूरी तरह से पालन करते हुए काम करती रहेगी।

इस महीने की शुरुआत में यूरोपीय संघ ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों के 18वें पैकेज के तहत नायरा की वाडिनार रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों में संपत्तियों को फ्रीज करना, शिपिंग और बीमा पर रोक, और रूसी कच्चे तेल की कीमत की सीमा में कटौती शामिल हैं। हालाँकि, भारत सरकार ने एकतरफा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को मानने से स्पष्ट इनकार किया है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नायरा एनर्जी ने यूरोपीय संघ के इस कदम को ‘अनुचित और गैरकानूनी’ बताया। कंपनी ने कहा, “नायरा एनर्जी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दबाव और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है, जिनका कोई कानूनी आधार भी नहीं है। यह एकतरफा कदम बिल्कुल निराधार आरोपों पर आधारित है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है।

नायरा ने कहा, “ध्यान देने योग्य बात यह है कि कई यूरोपीय देश आज भी रूसी ऊर्जा का आयात कर रहे हैं, लेकिन एक ऊँचे नैतिक स्तर का दिखावा करते हुए एक भारतीय रिफाइनरी पर सवाल उठा रहे हैं, जो कि रूसी कच्चे तेल को परिशोधित करके भारत की 1.4 अरब आबादी और व्यवसायों के लिए उपयोग करती है।”

इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में जल्दी ही होने की उम्मीद है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट ने इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

पश्चिमी प्रतिबंधों की रणनीति में भू-राजनीतिक हथियार के रूप में बिग टेक

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कई बड़ी पश्चिमी कंपनियों ने रूस में अपने कामकाज को निलंबित कर दिया था। इन कंपनियों ने इसका कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का पालन करना और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को बताया।

वीजा और मास्टरकार्ड जैसी बड़ी वित्तीय कंपनियों ने रूसी बैंकों से जुड़ी सेवाएँ बंद कर दीं, जिससे रूस के बाहर लेन-देन (cross-border payments) पर बड़ा असर पड़ा।

गूगल जैसी टेक कंपनियों ने भी कई सेवाएँ, विज्ञापन और कमाई के रास्ते (monetisation channels) रूस में सीमित कर दिए। मैकडॉनल्ड्स जैसी कंपनियों ने भी रूस से पूरी तरह कारोबार समेट लिया, लेकिन बाद में उनकी जगह स्थानीय ब्रांडों ने ले ली।

ये सभी कदम उस समय उठाए गए जब कंपनियाँ युद्ध और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को देखते हुए कानूनी, नैतिक और अपनी छवि से जुड़ी जोखिमों का फिर से मूल्यांकन कर रही थीं। इस तरह रूस से कंपनियों का एक बड़ा पलायन देखने को मिला।

दिल्ली हाई कोर्ट :15-20 लाख रिश्वत दो, जमानत लो… क्लर्क के भ्रष्टाचार में शामिल था स्पेशल जज भी ; क्या काले धब्बों को छुपाने के लिए वकील से लेकर जज पहनते हैं काला कोट?

बुजुर्गों का कहना है कि कोर्ट में सिर्फ वही खड़ा रह सकता है जिसके हाथ सोने के और पैरों में लोहे का जूता। वरना केस चाहे जितना भी मजबूत क्यों न हो मुवक्किल मुकदमा हार जाएगा। घोटालेबाज़ों और कातिलों को जमानत मिलना इसका जीताजागता उदाहरण है। व्यक्तिगत कटु कोर्ट अनुभव। आधे से ज्यादा तो झूठे केस लंबित है। अगर जज/मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट गंभीरता से केस फाइल पढ़ ले कई केस dismiss हो सकते हैं। तथाकथित आरोपी मजिस्ट्रेट से चीख-चीखकर कहता है कि "ये है मेरी बेगुनाही का सबूत" लेकिन नहीं देखा जाता तारीख दे देता है। क्यों? जबकि तथाकथित आरोपी जालसाज़ द्वारा 2011 में सिविल केस में दर्ज गवाही जिसमे उसने माना कि "मै कभी मकान में नहीं गया और मेरा कोई सामान वहां नहीं था।" 2013 के जजमेंट को देखने को मजिस्ट्रेट के आगे रोता था। 2009 में दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट में स्त्री-धन की चोरी का केस दर्ज होता है, जिसे 2024 में वापस ले लिया जाता है। जबकि जालसाज़ का वकील भी अच्छी तरह जानता था कि केस झूठा है। लेकिन उसे भी अपनी तिजोरी भरनी थी। क्यों नहीं मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने उस जालसाज़ पर कोर्ट को इतने सालों तक गुमराह करने और एक शरीफ को ब्लैकमेल करने के आरोप में दण्डित किया? क्या राज था? कोर्ट न्याय के लिए होती है अन्याय के लिए नहीं।          
दिल्ली में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के बाद अब राउज एवेन्यू कोर्ट में बेल के बदले रिश्वत का मामला सामने आया है। दिल्ली सरकार की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने न्याय और विधायी मामलों के विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को चिट्ठी लिखकर राउज एवेन्यू कोर्ट के एक स्पेशल जज और उनके कोर्ट स्टाफ (अहलमद) के खिलाफ जांच की अनुमति मांगी है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर देते हुए बताया है कि एसीबी ने आरोप लगाया है कि जज और कोर्ट स्टाफ ने आरोपियों को जमानत देने के बदले रिश्वत मांगी है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक विशेष न्यायाधीश का तबादला कर दिया है, जिन पर एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) ने आरोप लगाया था कि वे कोर्ट क्लर्क के साथ मिलकर आरोपितों की जमानत के बदले रिश्वत माँगते थे।

एसीबी ने इस साल जनवरी में दावा किया था कि उसके पास ऐसे कई मामलों के सबूत हैं, जिसमें न्यायाधीश और क्लर्क की संलिप्तता पाई गई है। आरोप था कि कुछ मामलों में आरोपितों के परिजनों से 15-20 लाख रुपए से लेकर एक करोड़ रुपए तक की रिश्वत की माँग की गई।

हालाँकि, फरवरी में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था, यह कहते हुए कि न्यायाधीश के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उच्च न्यायालय के विजिलेंस रजिस्ट्रार  ने एसीबी को पत्र के माध्यम से बताया था, कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोई अनुमति आवश्यक नहीं है। लेकिन, यदि जाँच के दौरान ठोस सबूत मिलते हैं, तो जाँच एजेंसी नए सिरे से अनुमति माँग सकती है।

16 मई को एसीबी ने कोर्ट क्लर्क (अहलमाद) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, जिसमें रजिस्ट्रार के जवाब का भी जिक्र किया गया था। जिसके चार दिन बाद, मंगलवार (20 मई 2025) को विशेष न्यायाधीश का तबादला कर दिया गया, वही मामले की जाँच अभी भी जारी है।

क्या है केस?

2023 में एक GST अधिकारी पर फर्जी कंपनियों को गलत टैक्स रिफंड देने का आरोप लगा। ACB ने 16 लोगों को गिरफ्तार किया। जमानत की अर्जी पर सुनवाई लगातार टलती रही। 30 दिसंबर 2024 को GST अधिकारी के रिश्तेदार ने आरोप लगाया कि कोर्ट ने अधिकारियों से जमानत के बदले भारी रिश्वत मांगी और इनकार पर जमानत अटकाई। बाद में हाईकोर्ट से राहत मिली, लेकिन धमकियां दी गईं।

एसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, 20 जनवरी को एक और शिकायत मिली। जिसमें कोर्ट के कर्मचारी पर जमानत के बदले 15-20 लाख रुपये रिश्वत मांगने का आरोप था। ACB की जांच में आरोपों को समर्थन देने वाले ऑडियो साक्ष्य मिले। FIR के बाद कोर्ट स्टाफ ने अग्रिम जमानत मांगी। ACB ने इसका विरोध करते हुए उन्हें मुख्य आरोपी बताया और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका जताई। 22 मई को कोर्ट ने अग्रिम जमानत खारिज कर दी।

दिल्ली में जस्टिस वर्मा केस

14 मार्च 2025 को दिल्ली में होली की रात, हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास के स्टाफ क्वार्टर के पास स्थित एक स्टोर रूम में आग लग गई। आग बुझाने पहुंची दमकल टीम को वहां से कथित रूप से भारी मात्रा में अधजली नकदी की गड्डियां मिलीं। जस्टिस वर्मा उस समय दिल्ली से बाहर थे। घटना के बाद उन्होंने सफाई दी कि जिस कमरे में नकदी मिली, वह उनके मुख्य निवास का हिस्सा नहीं है और वह स्टाफ व अन्य लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाता था। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर करने का निर्णय लिया और मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उनके खिलाफ जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।
जस्टिस वर्मा ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिए गए स्पष्टीकरण में कहा “यह कमरा सभी के लिए खुला था और इसका इस्तेमाल पुराना सामान, गार्डनिंग टूल्स, फर्नीचर आदि रखने के लिए होता था। यह मुख्य आवास से अलग स्थित है।” इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति को आगे की कार्रवाई के लिए लिख दिया है।

अदालतों में सामने आते रहे हैं ऐसे मामले

जस्टिस निर्मल यादव केस : साल 2009 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज निर्मल यादव पर 15 लाख रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगा था। एक वकील ने यह रकम गलती से किसी और जज के घर पहुंचा दी। जिससे पूरा मामला उजागर हुआ। यह केस सालों तक चर्चा में रहा।
जस्टिस दिनाकरण का इस्तीफा : मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पीडी दिनाकरण साल 2009 से 2011 के बीच तमिलनाडु में अवैध भूमि अधिग्रहण और संपत्ति संचय के आरोप लगे। उनके खिलाफ 16 शिकायतें दर्ज हुईं और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनकी पदोन्नति रोक दी। बाद में दिनाकरण ने साल 2011 में इस्तीफा दे दिया।
आवाज उठाने वाले जज पर जब हुआ एक्शन : ऐसे ही कलकत्ता हाईकोर्ट में जस्टिस सीएस कर्णन ने साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। इसके बाद उनके खिलाफ अवमानना का मामला चला और उन्हें छह महीने की जेल हुई। यह भारतीय न्यायपालिका में एक अभूतपूर्व घटना थी।

… एक अभूतपूर्व मामला भी आया सामने

इसके साथ ही साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर मुकदमों के गलत बंटवारे और न्याय व्यवस्‍था में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगा। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार जजों ने सार्वजनिक तौर पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वालों में जस्टिस चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ शामिल थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं ने एक बार फिर यह दिखाया है कि भारतीय न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता की गंभीर कमी है। जजों के खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र संवैधानिक उपाय महाभियोग है, लेकिन आज तक किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी नहीं हो पाई है।