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बरेली हिंसा में मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- आरोप बेहद संगीन: लगवाए थे ‘सर तन से जुदा’ के नारे, पुलिसकर्मी भी हुए थे घायल

                                                              मौलाना तौकीर रजा खान 
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य आरोपित और साजिशकर्ता मौलाना तौकीर रजा खान को बड़ा झटका देते हुए उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता और आरोपित के आपराधिक इतिहास को देखते हुए उसे राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने शुक्रवार (5 जून 2026) को यह कड़ा आदेश पारित किया। जो इस मौलाना के लिए बहुत जरुरी भी था। 

हाईकोर्ट ने जमानत याचिका नामंजूर करते हुए सख्त टिप्पणी की कि आरोपित को जेल से बाहर भेजने पर समाज की शांति को खतरा पैदा हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आवेदक(तौकीर रजा) ने एक सार्वजनिक सभा में मुस्लिम समुदाय के कई युवाओं को इस्लामिया इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने के लिए उकसाया था। गवाहों के बयान और वीडियो क्लिप से ये संकेत मिलता है कि तौकीर रजा खान ने भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को इकट्ठा होने के लिए प्रेरित किया। भीड़ द्वारा किए गए अपराध के लिए मुख्य साजिशकर्ता होने के नाते खान पूरी तरह जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनके द्वारा भड़काने के बाद ही भीड़ ने कानून-व्यवस्था हाथ में ली।

सुनवाई के दौरान अदालत ने उस समय लगी पाबंदियों और उपद्रवियों के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 163(पूर्व में धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद आरोपित के उकसावे में आकर भारी भीड़ सड़कों पर उतरी।

अदालत ने भीड़ द्वारा लगाए गए विवादित नारों को देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। जज ने आदेश में लिखा, “भीड़ द्वारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ जैसे विवादित नारे लगाना देश के कानून की सत्ता के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को एक सीधी चुनौती है। ये कृत्य सीधे तौर पर एक सशस्त्र विद्रोह की अपील करता है। इस तरह की हिंसक और भड़काऊ नारेबाजी करना न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है, बल्कि ये कृत्य इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों और शिक्षाओं के भी पूरी तरह खिलाफ है।”

जमानत याचिका खारिज करने का मुख्य आधार तौकीर रजा के पुराने रिकॉर्ड को बनाया गया। कोर्ट ने कहा, “तौकीर रजा खान का इसी तरह के मामलों में एक लंबा और विस्तृत आपराधिक इतिहास रहा है। ऐसे में इस बात का बड़ा जोखिम है कि यदि उन्हें जमानत पर रिहा किया गया, तो वो फिर से एक विशेष समुदाय को भड़का सकते हैं और समाज की शांति व सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं।”

यह पूरा मामला पिछले साल 26 सितंबर 2025 को दर्ज पुलिस एफआईआर से जुड़ा है। आरोप है कि तौकीर रजा ने प्रशासन के कड़े प्रतिबंधों को दरकिनार कर मुस्लिमों को बरेली के इस्लामिया इंटर कॉलेज में एकत्र होने का आह्वान किया था। इसके बाद करीब 200 से 250 लोगों की उग्र इस्लामी भीड़ हाथों में भड़काऊ बोर्ड लेकर मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की तरफ बढ़ने लगी।

जब मौके पर तैनात पुलिस टीम ने उग्र हो रही भीड़ को समझाने और आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया, तो उपद्रवी हिंसक हो गए। भीड़ ने पुलिस टीम को निशाना बनाते हुए उन पर ईंट-पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब (एसिड) की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं।

सरकार को उपद्रवियों के सरगनाओं पर कार्यवाही करने के साथ-साथ एसिड, पेट्रोल और पत्थर सप्लाई करने वालों पर भी कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं इन दंगाइयों को समर्थन में victim card खेल बचाने वालों पर नकेल जरुरी है।    

इस भयानक हिंसा और पथराव के दौरान उपद्रवियों ने कई राउंड फायरिंग भी की और पुलिसकर्मियों के कपड़े तक फाड़ दिए। इस हिंसक टकराव में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया था। अदालत ने इन सभी तथ्यों को बेहद संगीन माना।

सच्चाई छिपाने पर दिल्ली हाई कोर्ट की The Wire के सिद्धार्थ वरदराजन को फटकार, वकील को भी नहीं बक्शा; वकील की मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार

दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने प्रोपेगेडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन (Siddharth Varadarajan) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के एक पुराने आदेश को ‘छिपाने’ के लिए कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushendra Kumar Kaurav) की पीठ ने गुरुवार (14 मई 2026) को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही में तथ्यों को दबाना एक बेहद गंभीर मामला है और इसके दूरगामी कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
साभार :Bar and Bench 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला तब सामने आया जब वरदराजन ने अपनी विदेश यात्रा की अनुमति के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने 2020 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला दिया। उस आदेश में वरदराजन को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जा सकते।

अदालत ने पाया कि वरदराजन ने अपनी याचिका में इस महत्वपूर्ण शर्त का उल्लेख नहीं किया था। इस पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति कौरव ने कहा, “यह बहुत गंभीर मुद्दा है और इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह याचिकाकर्ता की (इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष) जमानत अर्जी से जुड़ा मामला है। जमानत आदेश में लगाई गई शर्तों को इस अदालत के संज्ञान में नहीं लाया गया।”

न्यायाधीश ने आगे तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें आपकी रिट याचिका खारिज करनी होगी। कुछ सख्त कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है… मैं वरदराजन की वकील नित्या रामकृष्णन द्वारा माँगी गई माफी पर केवल कार्रवाई न करने की हद तक विचार कर सकता हूँ, लेकिन जानकारी छिपाने के कारण वह अदालत से किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।

वरदराजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रिकॉर्ड पर न रखने के लिए अदालत से बिना शर्त माफी माँगी। हालाँकि पीठ ने इस मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील और कानूनी पेचीदगियों वाले मामले में केवल मौखिक दलीलें काफी नहीं हैं।

परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने सिद्धार्थ वरदराजन को औपचारिक नोटिस जारी किया है और सात दिनों के भीतर हलफनामे के माध्यम से अपनी इस चूक पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने अपने उन सभी पिछले आदेशों को वापस ले लिया (Recall) है, जिनसे वरदराजन को राहत मिली थी।

सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अदालत ने अप्रैल 2026 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा वरदराजन का ओसीआई (OCI) कार्ड रद्द करने के फैसले को क्वैश (निरस्त) किया गया था। इसका अर्थ है कि अब उनका ओसीआई कार्ड मामला फिर से कानूनी संकट में फंस गया है।

धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

                               आरक्षण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला (साभार: AI ChatGPT/Canva)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

                                                         साहनी की याचिका

                                   याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
                                                            गवाह का बयान रहा अहम
                                                       गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
                                           तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
                                                            सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
                                  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
                                                            हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।

‘सर तन से जुदा’ का नारा भारत की संप्रभुता-अखंडता को खुली चुनौती: इलाहाबाद हाई कोर्ट


बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ नारे को भारत की संप्रभुता, अखंडता और भारतीय न्याय व्यवस्था के खिलाफ बताते हुए सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा नारा न केवल कानून के शासन को चुनौती देता है, बल्कि लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत एक संवैधानिक देश है जहाँ सजा का निर्धारण कानून करता है, न कि कोई भीड़। इसी आधार पर कोर्ट ने बरेली हिंसा का आरोपि रिहान की जमानत याचिका खारिज कर दी।

कानून और देश के खिलाफ नारा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा, चाहे कोई अकेला व्यक्ति लगाए या कोई भीड़, यह सीधे तौर पर कानून की ताकत को चुनौती देता है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे नारे लोगों को हिंसा और हथियार उठाने के लिए उकसाते हैं, जिससे देश की एकता और सुरक्षा को खतरा होता है।

कोर्ट ने बताया कि इसी कारण ऐसा नारा लगाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध है। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि कोई भी नारा जो कानून की प्रक्रिया के बाहर मौत की सजा की वकालत करता है, वह सीधे तौर पर भारतीय कानूनी व्यवस्था के अधिकार को चुनौती देता है।

नारों का धार्मिक और आपराधिक अंतर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में समझाया कि अलग-अलग धर्मों में बोले जाने वाले नारों का उद्देश्य क्या होता है और कब वे गलत माने जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर ये नारे ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए होते हैं।

कोर्ट के अनुसार, इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे नारे श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक हैं। इन्हें खुशी, आस्था और धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बोला जाता है, इसलिए अपने आप में ये किसी भी तरह से अपराध नहीं हैं।

हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन्हीं नारों का इस्तेमाल किसी दूसरे धर्म के लोगों को डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के मकसद से किया जाए, तो वह अपराध की श्रेणी में आ जाता है। कोर्ट ने कहा कि नारे तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक उनका उपयोग गलत इरादे और कानून व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के लिए न किया जाए।

कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कुरान या इस्लाम के किसी भी प्रामाणिक मजहबी ग्रंथ में कहीं नहीं मिलता। अदालत के अनुसार, इस नारे को इस्लाम से जोड़ना गलत है, क्योंकि इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है।

                                                  कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने अपने जीवन में अपमान और तकलीफ सहने के बावजूद हमेशा दया, करुणा और क्षमा का रास्ता चुना। उन्होंने कभी भी किसी के खिलाफ हिंसा करने या सिर कलम करने की बात नहीं कही।

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि पैगंबर के नाम पर हत्या या हिंसा की बात करना उनके आदर्शों के खिलाफ है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी सोच पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का पालन नहीं, बल्कि उनका अपमान है।

‘सर तन से जुदा’ नारे की जड़ें कहाँ से जुड़ी हैं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस नारे की पृष्ठभूमि पर भी विस्तार से बात की। कोर्ट ने बताया कि अविभाजित भारत में ईशनिंदा से जुड़ा कानून वर्ष 1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था, ताकि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले मामलों को रोका जा सके।

कोर्ट ने कहा कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसी कानून में बदलाव किए और उसमें ईशनिंदा के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान जोड़ दिया। कोर्ट के अनुसार, ‘सर तन से जुदा’ का नारा वहीं से पैदा हुआ और धीरे-धीरे पाकिस्तान से भारत समेत अन्य देशों में फैल गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ असामाजिक तत्व इस नारे का इस्तेमाल धार्मिक भावना के नाम पर राज्य की सत्ता को चुनौती देने और दूसरे समुदायों में डर का माहौल बनाने के लिए कर रहे हैं, जो पूरी तरह गलत और कानून के खिलाफ है।

बरेली हिंसा और जमानत याचिका खारिज

यह पूरा मामला सितंबर में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है, जहाँ इत्तेफाक मिन्नत काउंसिल (INC) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर भीड़ जमा हुई थी। आरोप है कि इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए, पुलिस पर हमला हुआ और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया।

आरोपित रिहान ने जमानत माँगते हुए खुद को निर्दोष बताया था, लेकिन कोर्ट ने केस डायरी के सबूतों को देखते हुए कहा कि आरोपित रिहान उस अवैध भीड़ का हिस्सा था जिसने न केवल आपत्तिजनक नारे लगाए बल्कि सार्वजनिक शांति को भी भंग किया। साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी।

प्रधानमंत्री मोदी पर आपत्तिजनक पोस्ट : PAK से समर्थन और बीमारी के बहाने बचने की कोशिश करने वाली नेहा सिंह राठौर की जमानत याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की खारिज

नेहा सिंह राठौर और इलाहाबाद हाईकोर्ट (फोटो साभार: इंडिया टीवी)
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लोक गायिका नेहा सिंह राठौर द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। दरअसल, नेहा सिंह राठौर के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पहलगाम आतंकी हमले को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट करने के आरोप में FIR दर्ज की गई थी। इसी मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए नेहा हाई कोर्ट पहुँची थीं।

नेहा सिंह राठौर पर क्या हैं आरोप?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 पन्नों के आदेश में नेहा पर लगाए आरोपों की जानकारी दी गई है। आदेश के मुताबिक, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने धर्म पूछकर हिंदू पर्यटकों को गोली मार दी थी जिसमें 26 पर्यटकों की मौत हो गई। भारत सरकार भी इस हमले का बदला लेने की तैयारी करते हुए Indus Water Treaty को रोकने समेत पाकिस्तान पर कई कड़े कदम उठाए।

आदेश में कहा गया है, “इसी माहौल में लोकगायिका और स्वयं को कवयित्री बताने वाली नेहा सिंह राठौर अपने X अकाउंट (Neha Singh Rathore @nehafolksinger) से लगातार ऐसे आपत्तिजनक पोस्ट कर रही थीं जो राष्ट्रीय एकता के खिलाफ थे और जो लोगों को धर्म और जाति के आधार पर एक-दूसरे के खिलाफ अपराध करने के लिए भड़का सकते हैं। सोशल मीडिया पर उनके द्वारा कई वीडियो भी शेयर किए जा रहे हैं।”

साथ ही, पाकिस्तान में नेहा सिंह राठौर के वायरल बयानों का भी जिक्र किया गया है। आदेश में लिखा है, “नेहा राठौर के सभी भारत विरोधी बयान पाकिस्तान में लगातार वायरल हो रहे हैं और वहाँ उनकी तारीफ की जा रही है। पाकिस्तान की मीडिया इन देश-विरोधी बयानों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रही है और भारत पर सवाल उठाए जा रहे हैं। नेहा सिंह राठौर के भारत विरोधी बयानों से भारत के कवि समुदाय की प्रतिष्ठा ही नहीं बल्कि पूरे देश का सम्मान भी आहत हो रहा है।”

नेहा सिंह राठौर के वकील ने दीं क्या दलीलें?

नेहा सिंह राठौर के वकील ने अपने पक्ष में दलीलें देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। वकील ने 2001 के आनंद चिंतामणि दिघे और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले का हवाला दिया। इसमें कहा गया है, “भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी को मौजूदा नजरिए से पढ़ा जाना चाहिए और सरकार के काम के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब यह नहीं है कि एप्लीकेंट (नेहा) ने देश के खिलाफ कोई अपराध किया है।”

साथ ही, वकील ने 2025 के इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य और अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी हवाला दिया है। इसमें कहा गया है, “विचारों और नजरियों को व्यक्त करने की आजादी के बिना, भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सम्मानजनक जीवन जीना नामुमकिन है।” वकील ने कहा, “एप्लीकेंट द्वारा इस्तेमाल किया गया ट्विटर हैंडल अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है और उसने जो कुछ भी कहा है, वह सरकार के खिलाफ उसकी असहमति वाली आवाज़ है और इसे देशद्रोह के आरोप के तौर पर नहीं माना जाना चाहिए।”

सरकार के वकील ने क्या कहा?

वहीं, सरकार के वकील ने नेहा सिंह राठौर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट में ही दायर की गई इसी केस से जुड़ी FIR रद्द करने की पुरानी याचिका का हवाला दिया। वकील ने बताया कि कोर्ट ने लोक गायिका की पुरानी याचिका खारिज कर उन्हें मामले में सहयोग देने को कहा गया था। हालाँकि, इसके खिलाफ नेहा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और वहाँ भी उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। वकील ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया।

वकील ने नेहा की अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें FIR में लगे आरोपों से जुड़े मुद्दों को आरोप तय किए जाते समय उठाने की आजादी दी थी। अगर चार्जशीट दाखिल हो चुकी है तो उचित समय पर अदालत में डिस्चार्ज की माँग कर सकती थीं। इसलिए हाई कोर्ट को अभी इस मामले पर विचार नहीं करना चाहिए।

सरकारी वकील ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आवेदक को जाँच अधिकारी के सामने पेश होना चाहिए था लेकिन वह पुलिस जाँच से बच रही हैं। इसलिए, उन्हें किसी भी तरह की राहत नहीं मिलनी चाहिए। साथ ही, इस आदेश में नेहा का कुछ ट्वीट्स को भी जिक्र किया गया है।

नेहा सिंह राठौर के ट्वीट्स (फोटो साभार: इलाहाबाद हाईकोर्ट)

बीमारी का बहाना कर जाँच से बच रहीं नेहा

कोर्ट के आदेश में हजरतगंज के थाना प्रभारी द्वारा 27 नवंबर 2025 को भेजे गए लिखित निर्देशों का भी जिक्र किया गया है। इसमें लिखा है, “नेहा सिंह राठौर की गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं। नेहा को उपस्थित होने के निर्देश दिए गए थे लेकिन वह बीमारी का बहाना बनाते हुए उपस्थित नहीं हुई। उनके ठिकानों पर दबिश दी गई है लेकिन उनकी कोई जानकारी नहीं मिली है। नेहा सिंह राठौर बार-बार अपना निवास बदल रही है।”

पाकिस्तान में नेहा का समर्थन

सरकारी वकील ने आगे कहा कि आवेदक का ट्विटर अकाउंट दुनिया भर में खासकर पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हो चुका है और जाँच के दौरान पाकिस्तान से भी बहुत सारे पोस्ट मिले हैं जो आवेदक के ट्वीट्स का समर्थन कर रहे हैं। वकील के मुताबिक, पहलगाम आतंकी हमले के बाद उस समय देश की सुरक्षा और अखंडता खतरे में थी और सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हर संभव कदम उठाए थे लेकिन नेहा ने संवेदनशील स्थिति में ही ट्वीट करने शुरू कर दिए थे। ऐसे ट्वीट लोगों की भावनाओं को भड़का सकते थे।

सरकारी वकील ने यह भी दावा किया कि ऐसा लगता है कि नेहा की भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं जैसे प्रधानमंत्री के प्रति मंशा सही नहीं थी। वकील ने कहा, “उन्होंने (नेहा) हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच नफरत पैदा करने की भी कोशिश की ताकि देश का बुनियादी सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सके।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि FIR को दर्ज हुए 7 महीने से अधिक का समय बीत गया है लेकिन नेहा अभी भी जाँच में सहयोग नहीं कर रही हैं। कोर्ट ने कहा, “जहाँ तक अग्रिम जमानत का सवाल है, संविधान के अनुच्छेद 19 से नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मिलता है लेकिन यह अधिकार लोक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के लिए लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन होता है।”

जस्टिस सिंह ने कहा कि आवेदक ने कुछ ट्वीट उस संवेदनशील समय पर किए थे जब पहलगाम का दुर्भाग्यपूर्ण हमला हुआ था। कोर्ट ने कहा, “केस डायरी और FIR दोनों से यह पता चलता है कि आवेदक द्वारा किए गए ट्वीट भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ थे। प्रधानमंत्री का नाम अनादरपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया गया था।”

जस्टिस ब्रज लाल ने कहा कि 27 नवंबर के निर्देश और रिकॉर्ड देखने के बाद पता चलता है कि आवेदक (नेहा) जाँच में सहयोग नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा, “नेहा की FIR के खिलाफ दर्ज की गई रिट याचिका को इसी कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज किया था कि वहा जाँच में सहयोग करेंगी और जाँच अधिकारी के सामने पेश होंगी।” साथ ही, उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी SLP पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने आवेदक द्वारा दायर की गई स्पेशल लीव पिटिशन में यह कहा कि उस समय याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनने के बाद भी बगावत (mutiny) और अन्य धाराओं के तहत लगे आरोपों को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता था। इससे साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि जिस FIR को आवेदक ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी, उसमें उसकी दलीलों में दम नहीं है।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेहा सिंह राठौर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा कि वह कानून के दायरे में कोई भी दूसरा उपाय अपना सकती हैं।

मनुस्मृति के पन्ने फाड़ना एक अपराध, नहीं होगी कोई FIR रद्द: Allahabad High Court ने RJD प्रवक्ता प्रियंका भारती को फटकारा, गिरफ्तारी पर रोक लगाने से भी किया इनकार

    प्रियंका भारती को इलाहाबाद हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है (साभार: Priyanka Bharati/FB & Livelaw)
वोट बैंक को साधने विपक्ष द्वारा सनातन को अपमानित किया जाता है। जब तक इन सभी को कानून द्वारा दण्डित नहीं किया जाएगा, ऐसी हरकतें बंद नहीं होंगी। ये तो हिन्दू है जो कोर्ट पहुँच गया अगर स्थिति विपरीत होती "सिर तन से जुदा" गैंग मैदान में आ चुका होता और पूरा INDI गंठबंधन 
राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता प्रियंका भारती को बचाने नहीं आता।   

राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता प्रियंका भारती की मुश्किलें बढ़ गई हैं। लाइव टीवी पर हिन्दू ग्रन्थ मनुस्मृति के पन्ने फाड़ने के मामले में उन पर दर्ज FIR रद्द नहीं होगी। ऐसा करने से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मना कर दिया है। हाई कोर्ट ने इसे एक संज्ञेय अपराध करार दिया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 28 फरवरी को सुनवाई में कहा, “हमें लगता है कि हैं कि दो टीवी चैनल ‘इंडिया टीवी’ और ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ द्वारा आयोजित लाइव टीवी बहस में एक विशेष धर्म की पवित्र पुस्तक ‘मनुस्मृति’ के पन्नों को फाड़ने का कृत्य और कुछ नहीं बल्कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के दुर्भावनापूर्ण भावना का प्रदर्शन था और इसे बिना किसी वैध कारण के किया गया।”

 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रियंका भारती को फटकार लगाते हुए कहा, “हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि याचिकाकर्ता एक पढ़ी-लिखी और उच्च योग्यता वाली महिला हैं और वह बहस में एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता के रूप में भाग ले रहीं थी। ऐसे में यह बात नहीं मानी जा सकती कि यह कार्य अनजाने में किया गया।”

मनुस्मृति के पन्ने फाड़ने के को इसके बाद हाई कोर्ट ने एक अपराध करार दिया। हाई कोर्ट ने कहा, “वर्तमान मामले में एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता द्वारा लाइव टीवी बहस में एक विशेष धर्म की पवित्र पुस्तक ‘मनुस्मृति’ के कुछ पृष्ठ फाड़ने का कृत्य, प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि एक संज्ञेय अपराध किया गया है।”

प्रियंका भारती की याचिका इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द कर दी और कोई भी राहत देने से मना कर दिया। यह याचिका प्रियंका भारती ने अलीगढ़ में उनके खिलाफ दर्ज एक मुकदमे के बाद के बाद दायर की थी। उन्होंने माँग की थी कि उनके खिलाफ FIR को रद्द कर दिया जाए।

प्रियंका भारती ने मनुस्मृति पर चालू बवाल के बीच दो टीवी चैनल पर उसके कुछ पन्ने फाड़ दिए थे। इसके बाद उनके खिलाफ कीई जगह विरोध प्रदर्शन हुए थे। अलीगढ़ में उनके खिलाफ FIR राष्ट्रीय स्वर्ण परिषद के संगठन मंत्री भरत तिवारी की तरफ से 28 दिसंबर, 2024 को दर्ज करवाई गई थी।

भरत तिवारी ने कहा था कि प्रियंका भारती की करतूत देश में सामजिक वैमन्यस्यता फैलाने वाली है। उन्होंने इंडिया TV के मालिक रजत शर्मा और TV9 चैनल के मालिक वरुण दास पर भी TRP की नीयत से प्रियंका भारती की हरकतों को बढ़ावा दिए जाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि इस कृत्य के चलते उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं।

मामला जबरन धर्म परिवर्तन और लव जिहाद का : तुष्टिकरणपस्त मीडिया ने अफाक अहमद के केस को दिया नया एंगल, छिपाई गई आरिफ-सादिक की करतूत

                            मीडिया रिपोर्टों के स्क्रीनशॉट (साभार - ऑपइंडिया इंग्लिश)
हाल में इलाहाबाद कोर्ट की एक टिप्पणी पर मीडिया में जमकर खबरें चल रही हैं। हेडलाइन दी जा रही है कि कोर्ट ने कहा है कि वॉट्सऐप पर भेजे गए ‘अनकहे शब्द’ भी नफरत फैला सकते हैं। कई जगह इस हेडलाइन को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे अदालत किसी के चुप रहने को भी दोषी बता रहा है, जबकि हकीकत यह है कि यह पूरा मामला लव जिहाद से जुड़ा है।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी बिजनौर से जुड़े एक केस में की है जहाँ एक मुस्लिम युवक अफाक अहमद ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ये जरूर कहा है, “वॉट्सऐप पर भेजा गया कोई संदेश भले ही सीधे तौर पर धर्म का जिक्र न करे, लेकिन अगर उसमें अनकहे शब्दों और संकेतों के जरिए किसी समुदाय के खिलाफ नफरत, वैमनस्य या दुर्भावना फैलाने का भाव है, तो वह भी अपराध की श्रेणी में आएगा।”

कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? 

पूरा मामला दरअसल लव जिहाद और जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़ा है। अफाक अहमद का भाई आरिफ अहमद फिलहाल जेल में है। उस पर आरोप है कि उसने एक हिंदू युवती से संबंध बनाकर उसे धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने की कोशिश की और उसे दुबई ले जाने की योजना थी।

यह शिकायत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ता संदीप कौशिक ने दर्ज कराई थी। शुरुआती तौर पर मामूली धाराओं में दर्ज FIR बाद में गंभीर धाराओं में तब्दील कर दी गई, जिसमें बलात्कार, धोखाधड़ी, जहर देना, फर्जीवाड़ा, और धर्म परिवर्तन अधिनियम, 2021 के तहत अपराध शामिल हैं।

इसी गिरफ्तारी के बाद अफाक अहमद ने अपने परिचितों को एक वॉट्सऐप मैसेज भेजा। उसने लिखा कि उसके भाई को राजनीतिक दबाव में झूठे मामले में फँसाया गया है और उसके परिवार के बहिष्कार की बाट कही जा रही है। उसने यह भी लिखा कि “उसे डर है कि कहीं भीड़ उसे मार न दे” लेकिन साथ ही उसने अदालत और न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताया।

यह संदेश देखने में साधारण लगा पर अदालत ने इसे बहुत गंभीरता से लिया। जस्टिस जे जे मुनिर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने कहा कि “संदेश के शब्द सीधे तौर पर धर्म का उल्लेख नहीं करते, लेकिन उसमें जो अनकहा संदेश है, वह साफ तौर पर यह धारणा देता है कि आरोपित का भाई मुसलमान होने की वजह से निशाना बनाया गया है।” अदालत ने कहा “यह वही ‘unsaid words’ हैं जो किसी खास समुदाय की धार्मिक भावनाएँ भड़का सकते हैं और दो समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा और अविश्वास का माहौल पैदा कर सकते हैं।”

कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(3) (धार्मिक स्थल पर अपराध) के अंतर्गत न आता हो, लेकिन धारा 353(2) के तहत यह अपराध बनता है क्योंकि यह संदेश नफरत फैलाने की क्षमता रखता है। अदालत ने कहा कि “यह मामला केवल एक व्यक्ति की निजी पीड़ा का नहीं है, बल्कि यह समाज के साम्प्रदायिक ताने-बाने को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।”

इसलिए कोर्ट ने अफाक अहमद की याचिका को खारिज करते हुए कहा, “मामला जाँच के योग्य है और इसे शुरुआती चरण में रोका नहीं जा सकता।”

यह पहला मौका नहीं है जब किसी मुस्लिम परिवार पर  लव जिहाद  के आरोपों के बाद ऐसे विवाद खड़े हुए हों। अदालत ने इस बार यह स्पष्ट किया कि धार्मिक पहचान के नाम पर खुद को पीड़ित बताने वाले बयान भी अप्रत्यक्ष रूप से नफरत फैलाने का जरिया बन सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अफाक के परिवार पर एक नहीं बल्कि तीन-तीन FIR दर्ज हो चुकी हैं, एक उसके भाई आरिफ पर, दूसरी खुद अफाक पर और तीसरी उनके चाचा सादिक पर, जिन्होंने स्थानीय चैनल पर बयान दिया था कि “उसके भतीजे को फँसाया गया है।”

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‘CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को लगाई लताड़, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI के ‘एक्शन’ पर उठा रहे थे सवाल

                           कपिल सिब्बल को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार ( फोटो साभार: Bar and Bench)
आज मोबाइल युग से चिट्ठी लिखने का युग था। जब मन अपने किसी भी रिश्तेदार या परिचित को पत्र लिख लेटर बॉक्स में डालने चले जाते/जाती, लेकिन पोस्टकार्ड आदि लेने के लिए डाकखाने में लम्बी लाइन में लगना पड़ता था। लेकिन कपिल सिबल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को ही पोस्टऑफिस बना डाला। और लोग समझते हैं कि देखो कितने बड़े वकील हैं। दरअसल अगर इनकी सेटिंग नहीं हो तो इनसे बढ़िया वकील तो किसी भी जिला कोर्ट का समझदार वकील होता है। अगर इस वकील गैंग की सेटिंग नहीं हो, हर केस जीत नहीं सकते। यशवंत वर्मा के घर मिले/जले नोट बहुत कुछ चीख-चीखकर कह रहा है। जाँच तो उन जजों की भी होने चाहिए जिन्होंने देर रात सीतलवार और आतंकियों के लिए अदालत खोली।      
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को फटकार लगाई। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि CJI को पोस्ट ऑफिस मत समिझए, जो सिर्फ फाइलें आगे बढ़ाते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया है।

30 जुलाई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “भारत के CJI का काम केवल पोस्ट ऑफिस की तरह चिट्ठी भेजना नहीं है। अगर उनके पास किसी जज के गलत आचरण का सबूत है तो वे उसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करना उनका अधिकार है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ जस्टिस यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। जिसमें उन्होंने आंतरिक जाँच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में CJI संजीव खन्ना की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश की गई थी। सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने की।

इस दौरान कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इन-हाउस कमेटी के जज की बर्खास्तगी की सिफारिश करना गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 124 के तहत ही महाभियोग प्रक्रिया हो सकती है। सिब्बल ने कहा कि ऐसा करके CJI संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं, यह ‘अस्वीकार्य’ है। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लताड़ लगाई।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा के रवैए पर भी प्रश्न उठाए। कोर्ट ने कहा, “आप जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं लेकिन पहले भी उठाए जा सकते थे, इसलिए आपका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता और आपका आचरण बहुत कुछ कहता है। आप नहीं चाहते कि यहाँ कुछ भी उजागर हो। संसद को फैसला करने दीजिए। हम यह क्यों तय करें कि यह आपका पैसा है या नहीं? यह आंतरिक समिति का काम नहीं था।”

साथ ही जस्टिस दत्ता ने इन-हाउस रिपोर्ट पर कहा कि यह केवल शुरुआती जाँच का निष्कर्ष है और CJI की सिफारिश केवल एक ‘सलाह’ है। कोर्ट ने कहा कि निष्कासन केवल संसद की प्रक्रिया के अनुसार हो सकता है, इन-हाउस रिपोर्ट के अनुसार बिल्कुल भी नहीं हो सकता।

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही अपने किसी वरिष्ठ को सूचना दी थी।

बूढ़ा हूँ, जमानत दे दो… पहलगाम आतंकी हमले के बाद पोस्ट में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखने वाला अंसर अहमद इलाहाबाद HC के आगे गिड़गिड़ाया, अदालत ने खारिज की याचिका; बार एसोसिएशन को जेहादियों की पैरवी करने वाले वकीलों को ब्लैकलिस्ट करने का निर्णय लेना चाहिए

                                                                                                 साभार 
जेहादी जब कानून की गिरफ्त में आने पर victim card खेलना शुरू कर देते हैं। इन जेहादियों की वकालत करने बेशर्म वकील भी अपनी तिजोरी भरने इन गद्दारों की पैरवी करने खड़े हो जाते हैं। क्यों नहीं कोर्ट भी इन लालची वकीलों को भी उसी श्रेणी में डालते? ईरान ने गद्दारों को दे दी फांसी। कोई वकील उनके बचाव में खड़ा हुआ। लेकिन ये भारत में ही संभव है कि जहां वकीलों को गद्दारों/जेहादियों की पैरवी करने की छूट दे दी जाती है। बार एसोसिएशन ऐसे वकीलों पर क्यों नहीं कोई कार्यवाही करती? अपनी कमाई के चक्कर में गद्दारों का साथ दोगे? "पाकिस्तान ज़िन्दाबाद" गद्दार ने 62 साल की उम्र में ही लिखा है जवानी में नहीं। बार एसोसिएशन को इस गंभीर मुद्दे पर निर्णय लेना चाहिए। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 62 वर्षीय अंसर अहमद सिद्दीकी को जमानत देने से इनकार कर दिया है। सिद्दीकी पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखे फेसबुक पोस्ट शेयर करने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि यह अपराध संविधान के विरुद्ध और देश की स्वतंत्रता को चुनौती देने जैसा है।

आरोपित के वकील ने कोर्ट से कहा कि वह 62 साल के वृद्ध हैं और उनका मेडिकल ट्रीटमेंट चल रहा है। लेकिन कोर्ट ने इसके बाद भी जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपित का अपराध राष्ट्रीय हित के खिलाफ है। वहीं, प्रोसेक्यूटर ने कोर्ट को बताया कि यह फेसबुक पोस्ट पहलगाम आतंकी हमले के बाद ही शेयर किया गया था।

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कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते हुए यह भी कहा, “आवेदक एक वरिष्ठ नागरिक है और उसकी उम्र से पता चलता है कि वह स्वतंत्र भारत में पैदा हुआ है। उसका गैर-जिम्मेदाराना और राष्ट्र-विरोधी आचरण उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा माँगने का अधिकार नहीं देता है।” 

भ्रष्टाचारियों और विवादित मुद्दों का वकील कपिल सिबल ही क्यों होता है? ‘पैसों का पहाड़’ पर जस्टिस वर्मा के पास कोई जवाब नहीं, पर्सनल सेक्रेटरी ने आग बुझाने वालों से कहा था- किसी को बताना मत: केस की जाँच रिपोर्ट में खुलासा, कपिल सिब्बल जज के बचाव में उतरे

   जस्टिस यशवंत वर्मा (बाएँ), वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल (दाएँ), (फोटो साभार : The Times Of India & NDTV)
सुप्रीम कोर्ट की एक 3 जजों की कमेटी ने जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश पेश की है। इसके बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। इसी मामले में भ्रष्टाचार के आरोप में फँसे जस्टिस यशवंत वर्मा का सपोर्ट वकील कपिल सिब्बल ने किया है। कपिल सिब्बल ने कहा कि जस्टिस वर्मा अब तक के सबसे बेस्ट जजों में से एक है।

64 पेज रिपोर्ट की मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की कमेटी ने जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की है। यह सिफारिश 64 पेज की एक रिपोर्ट में की गई है, जिसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि जले हुए नोट जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में ही मिले थे।

स्टोररूम तक सिर्फ जस्टिस वर्मा और उनके परिवार की ही पहुँच थी, किसी बाहरी व्यक्ति की नहीं थी। जाँच में सामने आया है कि आग बुझाने के दौरान फायरफाइटर्स ने ‘आधे जले हुए नोट’ देखे थे। एक गवाह ने तो यहाँ तक कहा कि उसने जिंदगी में पहली बार इतना ज्यादा कैश का पहाड़ देखा था। कमेटी ने माना है कि इतने सारे नोट बिना जस्टिस वर्मा या उनके परिवार की मर्जी के वहाँ नहीं रखे जा सकते थे।

कमेटी ने जस्टिस वर्मा की बेटी दिया वर्मा और उनके निजी सचिव राजिंदर कार्की की भूमिका की भी जाँच की है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने फायरफाइटर्स को कैश की जानकारी किसी को भी बताने को मना किया था। इन सभी बातों के आधार पर कमेटी ने कहा है कि जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं।

हालाँकि, जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें या उनके परिवार को इस कैश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जस्टिस वर्मा ने यह भी कहा था कि स्टोररूम में कोई भी आ-जा सकता था।

जून 2025 महीने की शुरुआत में खबर आई थी कि जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो सकती है। यह भारत के इतिहास में किसी सिटिंग जज को जबरन हटाने का पहला मामला होगा।

जाँच में क्या सामने आया?

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा केस में एक जाँच कमेटी बनाई थी। मामले में 55 गवाहों से पूछताछ की गई थी। इसमें जस्टिस वर्मा की बेटी दिया वर्मा भी शामिल थीं। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही किसी बड़े ज्यूडिशियल ऑफिसर को इसकी जानकारी दी थी। कमेटी ने इसे विचित्र व्यवहार बताया था।

कमेटी ने यह साफ किया कि जस्टिस वर्मा को जले हुए कैश की जानकारी ना होने का दावा करना एक अविश्वसनीय है। कमेटी ने सवाल किया, “अगर कोई साजिश थी, तो जस्टिस वर्मा ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस या भारत के चीफ जस्टिस को सूचित क्यों नहीं किया?”

फायर और पुलिस कर्मियों ने भी बताया कि उन्होंने आग बुझाने के बाद स्टोररूम में 500 रुपये के नोटों का ‘बड़ा पहाड़’ देखा था। हालाँकि, घर के नौकरों ने कैश देखने से मना किया, पर कमेटी ने सरकारी अधिकारियों के बयानों को सच माना।

जाँच में यह भी सामने आया कि जिस स्टोररूम में आग लगी थी, उसका कंट्रोल केवल और केवल जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के पास था। इसके अलावा घटना के बाद कथित तौर पर जला हुआ कैश ‘गायब’ हो गया और कमरा साफ कर दिया गया।

कमेटी ने कहा है कि जस्टिस वर्मा के निजी सचिव राजिंदर सिंह कार्की ने फायर ऑफिसर को कहा था, कि वे अपनी रिपोर्ट में कैश का जिक्र न करे। फायर सर्विस के ऑफिसर ने यह भी दावा किया था कि उन्हें इस मामले को आगे न बढ़ाने के लिए कहा गया था, क्योंकि इसमें ‘ऊपर के लोग शामिल थे।’

मार्च 2025 में, दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान फायरफाइटर्स को स्टोररूम में जले हुए 500 रुपए के नोटों का एक बड़ा पहाड़ मिला था। इस घटना के बाद तत्कालीन CJI ने जस्टिस वर्मा पर आरोप लगाए थे।

फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई थी। जस्टिस वर्मा को इस घटना के कुछ ही दिनों बाद दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्राँसफर कर दिया गया था। ऐसा करने पर कुछ वकीलों और लीगल वर्कर्स ने इसका विरोध किया था।

जस्टिस वर्मा पर क्या-क्या कार्रवाई हो चुकी है?

जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक 3 सदस्यीय जाँच कमेटी का गठन किया है। कमेटी ने 55 गवाहों से पूछताछ की और जस्टिस वर्मा का बयान दर्ज किया है। कमेटी ने अपनी 64 पेज की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सौंपी थी, जिसमें जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की गई थी।

जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्राँसफर कर दिया गया है, लेकिन उन्हें कोई ज्यूडिशियल काम नहीं सौंपा गया है। जस्टिस वर्मा ने अभी तक ना तो इस्तीफा दिया है और ना ही वॉलंटरी रिटायरमेंट लिया है।

अब संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना जताई जा रही है, जो भारत में किसी सिटिंग जज को हटाने का पहला मामला होगा।

जस्टिस वर्मा ने जाँच को ‘फंडामेंटल रूप से गलत’ बताया है, लेकिन कमेटी ने उनके बचाव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ‘करेंसी नोट कई लोगों ने देखे और वास्तविक समय में रिकॉर्ड किए गए। यह असंभव है कि उन्हें फँसाने के लिए लगाया गया हो” कमेटी ने सबूत हटाने या घटनास्थल को साफ करने में उनकी बेटी और निजी सचिव की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।

अब तक के बेस्ट जज वर्मा- कपिल सिब्बल

वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा का बचाव किया है। मंगलवार (17 जून 2025) को सिब्बल ने जस्टिस वर्मा को ‘सबसे बेहतरीन जजों में से एक’ बताया और सरकार की इस कार्रवाई की आलोचना की है। सिब्बल का आरोप है कि सरकार का असली मकसद कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करना और न्यायिक नियुक्तियों पर कंट्रोल पाना है।
सिब्बल ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जस्टिस वर्मा के खिलाफ तो मामला चला रही है, लेकिन जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई नहीं कर रही है। जस्टिस शेखर यादव पर पिछले साल कुछ ‘सांप्रदायिक’ टिप्पणियों के आरोप लगे थे और उनके खिलाफ विपक्ष के सांसदों ने महाभियोग का नोटिस भी दिया था।
सिब्बल ने कहा, “मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि वह (वर्मा) सबसे बेहतरीन जजों में से एक हैं जिनके सामने मैंने बहस की है। आप हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी वकील से पूछ लें, इस जज पर कोई गलत काम करने का आरोप नहीं है।”
सिब्बल ने आगे कहा, “यह चौंकाने वाला है कि आप (सरकार) एक ऐसे जज को निशाना बना रहे हैं जिसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है और आप एक ऐसे जज की रक्षा कर रहे हैं जिसके खिलाफ सबूत की जरूरत नहीं है क्योंकि उनका बयान सार्वजनिक डोमेन में है और अध्यक्ष के पास एक महाभियोग प्रस्ताव लंबित है और वह हस्ताक्षर सत्यापन के लिए इस पर बैठे हैं।”
हालाँकि, सिब्बल के दावों के विपरीत, चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को भेजी गई एक तीन-जजों की जाँच पैनल की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के तुगलक रोड वाले घर में 14 मार्च 2025 को बड़ी मात्रा में कैश मिला था।