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‘CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को लगाई लताड़, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI के ‘एक्शन’ पर उठा रहे थे सवाल

                           कपिल सिब्बल को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार ( फोटो साभार: Bar and Bench)
आज मोबाइल युग से चिट्ठी लिखने का युग था। जब मन अपने किसी भी रिश्तेदार या परिचित को पत्र लिख लेटर बॉक्स में डालने चले जाते/जाती, लेकिन पोस्टकार्ड आदि लेने के लिए डाकखाने में लम्बी लाइन में लगना पड़ता था। लेकिन कपिल सिबल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को ही पोस्टऑफिस बना डाला। और लोग समझते हैं कि देखो कितने बड़े वकील हैं। दरअसल अगर इनकी सेटिंग नहीं हो तो इनसे बढ़िया वकील तो किसी भी जिला कोर्ट का समझदार वकील होता है। अगर इस वकील गैंग की सेटिंग नहीं हो, हर केस जीत नहीं सकते। यशवंत वर्मा के घर मिले/जले नोट बहुत कुछ चीख-चीखकर कह रहा है। जाँच तो उन जजों की भी होने चाहिए जिन्होंने देर रात सीतलवार और आतंकियों के लिए अदालत खोली।      
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को फटकार लगाई। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि CJI को पोस्ट ऑफिस मत समिझए, जो सिर्फ फाइलें आगे बढ़ाते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया है।

30 जुलाई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “भारत के CJI का काम केवल पोस्ट ऑफिस की तरह चिट्ठी भेजना नहीं है। अगर उनके पास किसी जज के गलत आचरण का सबूत है तो वे उसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करना उनका अधिकार है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ जस्टिस यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। जिसमें उन्होंने आंतरिक जाँच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में CJI संजीव खन्ना की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश की गई थी। सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने की।

इस दौरान कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इन-हाउस कमेटी के जज की बर्खास्तगी की सिफारिश करना गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 124 के तहत ही महाभियोग प्रक्रिया हो सकती है। सिब्बल ने कहा कि ऐसा करके CJI संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं, यह ‘अस्वीकार्य’ है। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लताड़ लगाई।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा के रवैए पर भी प्रश्न उठाए। कोर्ट ने कहा, “आप जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं लेकिन पहले भी उठाए जा सकते थे, इसलिए आपका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता और आपका आचरण बहुत कुछ कहता है। आप नहीं चाहते कि यहाँ कुछ भी उजागर हो। संसद को फैसला करने दीजिए। हम यह क्यों तय करें कि यह आपका पैसा है या नहीं? यह आंतरिक समिति का काम नहीं था।”

साथ ही जस्टिस दत्ता ने इन-हाउस रिपोर्ट पर कहा कि यह केवल शुरुआती जाँच का निष्कर्ष है और CJI की सिफारिश केवल एक ‘सलाह’ है। कोर्ट ने कहा कि निष्कासन केवल संसद की प्रक्रिया के अनुसार हो सकता है, इन-हाउस रिपोर्ट के अनुसार बिल्कुल भी नहीं हो सकता।

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही अपने किसी वरिष्ठ को सूचना दी थी।

जस्टिस शेखर यादव पर हल्ला, जस्टिस यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार पर चुप्पी: सियासतखोरों की नौटंकी समझने लगी है जनता

                 जस्टिस शेखर यादव, जस्टिस यशवंत वर्मा, पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल (साभार: AI ChatGPT)
भारतीय राजनीति में इन दिनों दोहरे मापदंडों का ‘नंगा नाच’ चल रहा है और इस नाटक के मुख्य किरदार हैं विपक्षी सांसद, जो अपनी सुविधा के हिसाब से मुद्दों को उठाते और दबाते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव और जस्टिस यशवंत वर्मा के मामलों में विपक्ष का रवैया उनकी नीयत को साफ उजागर करता है।

एक तरफ जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग की माँग को लेकर सांसदों की बेचैनी चरम पर है, भले ही उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस नोटिस को खारिज नहीं किया हो। दूसरी तरफ जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की कमेटी की सिफारिश के बावजूद विपक्षी सांसदों ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।

यह दोहरापन न केवल उनकी मंशा पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जनता की भलाई से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे केवल अपना एजेंडा चलाने और सरकार के खिलाफ हल्ला मचाने में मशगूल हैं।

जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग क्यों?

दरअसल, जस्टिस शेखर यादव का मामला पिछले साल दिसंबर में तब सुर्खियों में आया, जब उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में कथित तौर पर सांप्रदायिक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने कहा था, “यह हिंदुस्तान है… और देश बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा।” इसके साथ ही उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन करते हुए मुस्लिम समुदाय की कुछ प्रथाओं पर टिप्पणी की थी।

पीछे ही पड़ गए विपक्षी सांसद

इस बयान पर विपक्षी सांसदों ने तुरंत महाभियोग का नोटिस तैयार कर लिया। 54 राज्यसभा सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉ्नग्रेस, आप, राजद और अन्य दलों के नेता शामिल थे। लेकिन इस नोटिस की प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ सामने आईं। नौ सांसदों के हस्ताक्षर रिकॉर्ड से मेल नहीं खाए और एक सांसद के हस्ताक्षर दो बार पाए गए।

इसके बावजूद कपिल सिब्बल जैसे सांसद इस मुद्दे को बार-बार उठा रहे हैं, यह दावा करते हुए कि उप-राष्ट्रपति इस पर कार्रवाई नहीं कर रहे। सिब्बल ने तो यह तक कह दिया कि अगर नोटिस खारिज होता है, तो वे सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। यह बेचैनी और जल्दबाजी क्या दर्शाती है? यह साफ है कि विपक्ष इस मामले को तूल देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ उठाना चाहता है, ताकि जनता के बीच यह संदेश जाए कि वे ‘सेकुलरिज्म’ के रक्षक हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा पर साध ली चुप्पी

लेकिन जब बात जस्टिस यशवंत वर्मा की आती है, तो यही सांसद अचानक चुप्पी साध लेते हैं। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में मार्च 2025 में आग लगी, और फायरफाइटर्स को वहाँ ‘जले हुए नोटों का पहाड़’ मिला। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की कमेटी ने 64 पेज की रिपोर्ट में साफ कहा कि ये नोट जस्टिस वर्मा के स्टोररूम में थे, जहाँ केवल उनके परिवार की पहुँच थी। कमेटी ने यह भी पाया कि जस्टिस वर्मा और उनके निजी सचिव ने फायर ऑफिसरों को इस मामले को दबाने के लिए कहा था।

कपिल सिब्बल ने बताया सबसे बेहतरीन जज

इतने गंभीर आरोपों के बावजूद जस्टिस वर्मा को न कोई ज्यूडिशियल काम सौंपा गया है, न उन्होंने इस्तीफा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की है और संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। लेकिन विपक्ष, खासकर कपिल सिब्बल इस मामले में जस्टिस वर्मा का बचाव कर रहे हैं। कपिल सिब्बल ने जस्टिस यशवंत वर्मा को ‘देश के सबसे बेहतरीन जजों में से एक’ करार दिया और सरकार पर आरोप लगाया कि वह कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने की साजिश रच रही है।

यह दोहरापन क्यों? जब जस्टिस यादव के बयान का मामला आया, तो सिब्बल और उनके साथी सांसदों ने तुरंत महाभियोग की माँग की, लेकिन जस्टिस वर्मा के खिलाफ ठोस सबूत होने के बावजूद वे उनका बचाव कर रहे हैं। क्या यह उनकी अपनी सुविधा और एजेंडे का हिस्सा नहीं है?

न्यापालिका में सुधार नहीं, नरेटिव सेट करना है एजेंडा

विपक्ष का यह रवैया केवल सत्ता के खिलाफ हल्ला मचाने का हिस्सा है। जस्टिस यादव का मामला उनके लिए एक मौका है, जिसे वे सांप्रदायिक रंग देकर अपनी वोट बैंक की राजनीति चमकाना चाहते हैं। लेकिन जस्टिस वर्मा के मामले में, जहाँ भ्रष्टाचार का आरोप साफ तौर पर सिद्ध हो चुका है, वे चुप हैं, क्योंकि यह उनके ‘सेकुलर’ नैरेटिव में फिट नहीं बैठता। यह दोहरापन न केवल उनकी विश्वसनीयता को कम करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि उन्हें न्यायपालिका में सुधार या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ सरकार को घेरना और जनता को गुमराह करना है।

विपक्षी सांसदों की यह रणनीति नई नहीं है। वे हमेशा से चुनिंदा मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते रहे हैं। उदाहरण के लिए जब 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, तब भी विपक्ष ने इसे सरकार के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। उस समय भी कपिल सिब्बल इस अभियान में सबसे आगे थे। लेकिन जब बात भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दों की आती है, तो यही नेता पीछे हट जाते हैं। यह साफ है कि उनकी लड़ाई सिद्धांतों के लिए नहीं, बल्कि सियासी फायदे के लिए है।

विपक्ष का यह नाटक जनता के सामने भी अब खुल चुका है। सोशल मीडिया खासकर एक्स पर भी लोग इस दोहरे रवैये की आलोचना कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “जब जज सांप्रदायिक बयान देता है, तो विपक्ष को महाभियोग चाहिए, लेकिन जब जज के घर से नोटों का पहाड़ मिलता है, तो वही लोग उसे ‘बेस्ट जज’ बताते हैं। यह कैसी राजनीति है?” एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “विपक्ष को भ्रष्टाचार से कोई दिक्कत नहीं, बस मुद्दा ऐसा चाहिए जो सरकार को घेर सके।” ये प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं कि जनता अब विपक्ष के इस नकली नैरेटिव को समझ चुकी है।

न्यायपालिका में सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दे बेहद गंभीर हैं। लेकिन राजनीतिक दल इनका इस्तेमाल केवल अपनी सियासत चमकाने के लिए कर रहा है। जस्टिस यादव के मामले में उनकी बेचैनी और जस्टिस वर्मा के मामले में उनकी चुप्पी यह साफ करती है कि उनका मकसद जनता की भलाई नहीं, बल्कि सत्ता के खिलाफ नाटक करना है। जनता को अब इस नौटंकी को समझने और इन नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनकाब करने की जरूरत है। अगर नेता गण वाकई में न्यायपालिका को मजबूत करना चाहता है, तो उसे दोनों मामलों में एक समान रुख अपनाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे केवल अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं और यह जनता के साथ धोखा है।

भ्रष्टाचारियों और विवादित मुद्दों का वकील कपिल सिबल ही क्यों होता है? ‘पैसों का पहाड़’ पर जस्टिस वर्मा के पास कोई जवाब नहीं, पर्सनल सेक्रेटरी ने आग बुझाने वालों से कहा था- किसी को बताना मत: केस की जाँच रिपोर्ट में खुलासा, कपिल सिब्बल जज के बचाव में उतरे

   जस्टिस यशवंत वर्मा (बाएँ), वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल (दाएँ), (फोटो साभार : The Times Of India & NDTV)
सुप्रीम कोर्ट की एक 3 जजों की कमेटी ने जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश पेश की है। इसके बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। इसी मामले में भ्रष्टाचार के आरोप में फँसे जस्टिस यशवंत वर्मा का सपोर्ट वकील कपिल सिब्बल ने किया है। कपिल सिब्बल ने कहा कि जस्टिस वर्मा अब तक के सबसे बेस्ट जजों में से एक है।

64 पेज रिपोर्ट की मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की कमेटी ने जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की है। यह सिफारिश 64 पेज की एक रिपोर्ट में की गई है, जिसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि जले हुए नोट जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में ही मिले थे।

स्टोररूम तक सिर्फ जस्टिस वर्मा और उनके परिवार की ही पहुँच थी, किसी बाहरी व्यक्ति की नहीं थी। जाँच में सामने आया है कि आग बुझाने के दौरान फायरफाइटर्स ने ‘आधे जले हुए नोट’ देखे थे। एक गवाह ने तो यहाँ तक कहा कि उसने जिंदगी में पहली बार इतना ज्यादा कैश का पहाड़ देखा था। कमेटी ने माना है कि इतने सारे नोट बिना जस्टिस वर्मा या उनके परिवार की मर्जी के वहाँ नहीं रखे जा सकते थे।

कमेटी ने जस्टिस वर्मा की बेटी दिया वर्मा और उनके निजी सचिव राजिंदर कार्की की भूमिका की भी जाँच की है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने फायरफाइटर्स को कैश की जानकारी किसी को भी बताने को मना किया था। इन सभी बातों के आधार पर कमेटी ने कहा है कि जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं।

हालाँकि, जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें या उनके परिवार को इस कैश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जस्टिस वर्मा ने यह भी कहा था कि स्टोररूम में कोई भी आ-जा सकता था।

जून 2025 महीने की शुरुआत में खबर आई थी कि जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो सकती है। यह भारत के इतिहास में किसी सिटिंग जज को जबरन हटाने का पहला मामला होगा।

जाँच में क्या सामने आया?

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा केस में एक जाँच कमेटी बनाई थी। मामले में 55 गवाहों से पूछताछ की गई थी। इसमें जस्टिस वर्मा की बेटी दिया वर्मा भी शामिल थीं। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही किसी बड़े ज्यूडिशियल ऑफिसर को इसकी जानकारी दी थी। कमेटी ने इसे विचित्र व्यवहार बताया था।

कमेटी ने यह साफ किया कि जस्टिस वर्मा को जले हुए कैश की जानकारी ना होने का दावा करना एक अविश्वसनीय है। कमेटी ने सवाल किया, “अगर कोई साजिश थी, तो जस्टिस वर्मा ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस या भारत के चीफ जस्टिस को सूचित क्यों नहीं किया?”

फायर और पुलिस कर्मियों ने भी बताया कि उन्होंने आग बुझाने के बाद स्टोररूम में 500 रुपये के नोटों का ‘बड़ा पहाड़’ देखा था। हालाँकि, घर के नौकरों ने कैश देखने से मना किया, पर कमेटी ने सरकारी अधिकारियों के बयानों को सच माना।

जाँच में यह भी सामने आया कि जिस स्टोररूम में आग लगी थी, उसका कंट्रोल केवल और केवल जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के पास था। इसके अलावा घटना के बाद कथित तौर पर जला हुआ कैश ‘गायब’ हो गया और कमरा साफ कर दिया गया।

कमेटी ने कहा है कि जस्टिस वर्मा के निजी सचिव राजिंदर सिंह कार्की ने फायर ऑफिसर को कहा था, कि वे अपनी रिपोर्ट में कैश का जिक्र न करे। फायर सर्विस के ऑफिसर ने यह भी दावा किया था कि उन्हें इस मामले को आगे न बढ़ाने के लिए कहा गया था, क्योंकि इसमें ‘ऊपर के लोग शामिल थे।’

मार्च 2025 में, दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान फायरफाइटर्स को स्टोररूम में जले हुए 500 रुपए के नोटों का एक बड़ा पहाड़ मिला था। इस घटना के बाद तत्कालीन CJI ने जस्टिस वर्मा पर आरोप लगाए थे।

फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई थी। जस्टिस वर्मा को इस घटना के कुछ ही दिनों बाद दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्राँसफर कर दिया गया था। ऐसा करने पर कुछ वकीलों और लीगल वर्कर्स ने इसका विरोध किया था।

जस्टिस वर्मा पर क्या-क्या कार्रवाई हो चुकी है?

जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक 3 सदस्यीय जाँच कमेटी का गठन किया है। कमेटी ने 55 गवाहों से पूछताछ की और जस्टिस वर्मा का बयान दर्ज किया है। कमेटी ने अपनी 64 पेज की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सौंपी थी, जिसमें जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की गई थी।

जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्राँसफर कर दिया गया है, लेकिन उन्हें कोई ज्यूडिशियल काम नहीं सौंपा गया है। जस्टिस वर्मा ने अभी तक ना तो इस्तीफा दिया है और ना ही वॉलंटरी रिटायरमेंट लिया है।

अब संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना जताई जा रही है, जो भारत में किसी सिटिंग जज को हटाने का पहला मामला होगा।

जस्टिस वर्मा ने जाँच को ‘फंडामेंटल रूप से गलत’ बताया है, लेकिन कमेटी ने उनके बचाव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ‘करेंसी नोट कई लोगों ने देखे और वास्तविक समय में रिकॉर्ड किए गए। यह असंभव है कि उन्हें फँसाने के लिए लगाया गया हो” कमेटी ने सबूत हटाने या घटनास्थल को साफ करने में उनकी बेटी और निजी सचिव की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।

अब तक के बेस्ट जज वर्मा- कपिल सिब्बल

वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा का बचाव किया है। मंगलवार (17 जून 2025) को सिब्बल ने जस्टिस वर्मा को ‘सबसे बेहतरीन जजों में से एक’ बताया और सरकार की इस कार्रवाई की आलोचना की है। सिब्बल का आरोप है कि सरकार का असली मकसद कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करना और न्यायिक नियुक्तियों पर कंट्रोल पाना है।
सिब्बल ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जस्टिस वर्मा के खिलाफ तो मामला चला रही है, लेकिन जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई नहीं कर रही है। जस्टिस शेखर यादव पर पिछले साल कुछ ‘सांप्रदायिक’ टिप्पणियों के आरोप लगे थे और उनके खिलाफ विपक्ष के सांसदों ने महाभियोग का नोटिस भी दिया था।
सिब्बल ने कहा, “मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि वह (वर्मा) सबसे बेहतरीन जजों में से एक हैं जिनके सामने मैंने बहस की है। आप हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी वकील से पूछ लें, इस जज पर कोई गलत काम करने का आरोप नहीं है।”
सिब्बल ने आगे कहा, “यह चौंकाने वाला है कि आप (सरकार) एक ऐसे जज को निशाना बना रहे हैं जिसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है और आप एक ऐसे जज की रक्षा कर रहे हैं जिसके खिलाफ सबूत की जरूरत नहीं है क्योंकि उनका बयान सार्वजनिक डोमेन में है और अध्यक्ष के पास एक महाभियोग प्रस्ताव लंबित है और वह हस्ताक्षर सत्यापन के लिए इस पर बैठे हैं।”
हालाँकि, सिब्बल के दावों के विपरीत, चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को भेजी गई एक तीन-जजों की जाँच पैनल की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के तुगलक रोड वाले घर में 14 मार्च 2025 को बड़ी मात्रा में कैश मिला था।

अयोध्या से लेकर वक़्फ़ बोर्ड तक मुसलमानों को लुटते रहे कट्टरपंथी और कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी गैंग; आखिर कब कट्टरपंथियों के चुंगल से बाहर आएगा मुसलमान? पूछो इस गैंग से कि बाबरी मस्जिद के नाम पर मिली जमीन पर मस्जिद क्यों नहीं बनी?

कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंगवी, हुजेफा अहमदी और राजीव धवन (फोटो साभार: Bhaskar/Jagran/Amar Ujala/India Today)

विवाद चाहे अयोध्या का हो या अब वक़्फ़ बोर्ड कानून का, आखिर कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी आदि वकील ही खड़े होते हैं, क्या मुसलमानों ने सोंचा? जितनी दौलत अयोध्या विवाद पर मुक़दमेबाज़ी में गवाई है पता नहीं कितनी गरीब मुस्लिम महिलाओं का घर आबाद हो गया होता। मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर ये वकील गैंग अपनी तिजोरियां भरने के चक्कर में आम मुसलमानों को हमेशा सूली पर टंगे रहते हैं। CAA विरोध में क्या हुआ, दंगे और इन लोगों के चक्कर में बदनाम हुआ मुसलमान। ये मुस्लिम विरोधी गैंग आम मुसलमान को सच्चाई से दूर रख मालपुए खा रहा है। 
सच्चाई यह है कि अधिकतर मुसलमानों को न ही CAA की, हिन्दू धार्मिक स्थलों के विवाद की और न ही वक़्फ़ बोर्ड की कोई जानकारी है। इन्हे डराया जाता है कि तुम्हारी मस्जिदें और कब्रिस्तान छिन जाएंगे। बस इसी डर से मुसलमान इन कट्टरपंथियों के मकड़जाल में फंसा रहता है। क्या किसी मुसलमान ने इस गैंग से पूछने की हिम्मत की कि अयोध्या में तो हिन्दुओं ने अपना मन्दिर बना लिया लेकिन बाबरी मस्जिद के नाम पर मिली जमीन पर अब तक मस्जिद क्यों नहीं बनी?      

सुप्रीम कोर्ट में मामले में पहले दिन की सुनवाई 20 मई 2025 को सुबह 11:41 बजे शुरू हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने दलीलें दीं, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन, ए.एम. सिंघवी, सी.यू. सिंह और हुजेफा अहमदी ने तर्क रखे। कोर्ट ने पहले तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कई अन्य बिंदु भी उठाए।सुप्रीम कोर्ट में 20 मई 2025 से वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। यह कानून 1995 के वक्फ अधिनियम में बदलाव करता है, जो वक्फ संपत्तियों (इस्लामिक कानून के तहत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियों) के प्रबंधन से संबंधित है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव करता है और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का दावा है कि यह संशोधन वक्फ प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए लाया गया है। सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने याचिकाकर्ताओं, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों के तर्क सुने।

सुनवाई के पहले दिन याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील


कपिल सिब्बल ने दी ये दलीलें
  • कपिल सिब्बल ने कहा, “यह कानून वक्फ की सुरक्षा के लिए लाया गया है, लेकिन इसका असली मकसद वक्फ संपत्तियों को हड़पना है। यह कानून इस तरह बनाया गया है कि बिना किसी प्रक्रिया के वक्फ संपत्ति छीनी जा सकती है। कोई सरकारी अधिकारी फैसला करता है और संपत्ति तुरंत वक्फ नहीं रह जाती। कोई भी विवाद खड़ा कर सकता है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर (लंबे समय तक उपयोग से बनी वक्फ संपत्ति) को खत्म करने पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा को खत्म कर दिया गया है, जिसे बाबरी मस्जिद केस में मान्यता मिली थी। 1925 के कानून में पंजीकरण का प्रावधान था, लेकिन अगर पंजीकरण नहीं हुआ तो संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, यह नया है।”
  • प्राचीन स्मारकों पर सिब्बल ने तर्क दिया, “अगर कोई संपत्ति प्राचीन स्मारक घोषित हो जाती है, तो वह वक्फ नहीं रहती। इससे धार्मिक अधिकार छिन जाते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है।”
  • धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत बिना जाँच के संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती। कोई ज्यूडिशियल प्रक्रिया नहीं है। वक्फ बनाने वाले को कोर्ट जाना पड़ता है और तब तक संपत्ति का दर्जा बदल जाता है। यह अनुच्छेद 25, 26 और 27 का उल्लंघन है।”
  • 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास करने की शर्त पर सिब्बल ने तंज कसते हुए कहा, “मुझे यह साबित करना होगा कि मैं 5 साल से मुस्लिम हूँ। कौन तय करेगा कि मैं मुस्लिम हूँ? अगर मैं मरने से पहले वक्फ बनाना चाहूँ, तो क्या मुझे 5 साल इंतजार करना होगा? यह अपने आप में असंवैधानिक है।”
  • गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने पर सिब्बल ने कहा, “पहले वक्फ बोर्ड में सभी मुस्लिम थे, अब 12 में से 7 गैर-मुस्लिम हो सकते हैं। यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है और अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है।” सिब्बल ने धारा 3(डी) और 3(ई) पर सवाल उठाया, “ये धाराएँ मूल बिल में नहीं थीं और जेपीसी में इन पर चर्चा नहीं हुई। यह प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”
राजीव धवन की दलीलें
राजीव धवन ने कहा, “यह कानून धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। ब्रिटिश काल में भी वक्फ की परिभाषा नहीं बदली गई। इस बड़े पैमाने पर वक्फ की अवधारणा को खत्म करने की क्या जरूरत थी? यह हर धर्म के लिए खतरा है।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 29 संस्कृति संरक्षण का अधिकार देता है। इसे छीनने से धर्मनिरपेक्ष ढाँचा खत्म हो जाएगा।”
अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें
  • सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील पेश करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “यह कानून मुस्लिमों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करता है। यह आतंक पैदा करने की रेसिपी है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर ज्यादातर गैर-पंजीकृत होते हैं। इसे खत्म करना और 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास साबित करने की शर्त केवल मुस्लिमों के लिए है। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
  • धारा 3(डी) पर सिंघवी ने तर्क दिया, “यह धारा प्राचीन स्मारक अधिनियम को वक्फ कानून पर हावी करती है, जिससे 1991 के पूजा स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित स्मारकों पर भी असर पड़ता है।”
  • सरकार के दावे का खंडन करते हुए उन्होंने कहा, “सरकार कहती है कि 2013 के बाद वक्फ संपत्तियों में 116% की वृद्धि हुई। यह वृद्धि नहीं, बल्कि डिजिटाइजेशन का नतीजा है।”
इस मामले में वकील चंदर उदय सिंह ने अपनी दलील में कहा, “पहले गैर-पंजीकरण की सजा सिर्फ मुतवल्ली पर जुर्माना था। अब 2025 के कानून में पूरी वक्फ संपत्ति ही खत्म हो जाती है।”
सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी की दलीलें
  • अहमदी ने कहा, “धारा 3(डी) का प्रभाव बहुत गंभीर है। यह पुरानी मस्जिदों को भी प्रभावित करता है। इसे तुरंत रोकना चाहिए।”
  • 5 साल की शर्त पर उन्होंने पूछा, “क्या कोई मुझसे पूछेगा कि मैं 5 बार नमाज पढ़ता हूँ या शराब पीता हूँ? प्रैक्टिसिंग इस्लाम का कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है।”
  • धारा 107 और 108 पर अहमदी ने कहा, “ये धाराएँ पुरानी वक्फ संपत्तियों को रेट्रोस्पेक्टिव रूप से खत्म करती हैं। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
केंद्र सरकार की तरह से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा पक्ष
  • तुषार मेहता ने कहा, “कोर्ट ने तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ता कई अन्य बिंदु उठा रहे हैं। मैं अनुरोध करता हूँ कि सुनवाई इन्हीं तीन मुद्दों तक सीमित रहे।”
  • उन्होंने जोड़ा, “यह कानून वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए है।” साथ ही उन्होंने जोड़ा कि वक्फ इस्लाम के पालन की आवश्यक शर्त नहीं है।
  • मेहता ने कहा, “17 अप्रैल को सरकार ने आश्वासन दिया था कि कुछ प्रमुख प्रावधान लागू नहीं किए जाएँगे। इसलिए कानून पर पूरी तरह रोक की जरूरत नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने की ये टिप्पणियाँ
सीजेआई गवई ने कहा, “किसी कानून को असंवैधानिक मानने के लिए बहुत मजबूत आधार चाहिए। कानून की संवैधानिकता की धारणा होती है।”
सिब्बल से पूछा, “पुराने कानून में पंजीकरण अनिवार्य था या स्वैच्छिक?” सिब्बल ने जवाब दिया, “1923 के कानून में ‘शैल’ शब्द था, लेकिन गैर-पंजीकरण की कोई सजा नहीं थी, सिवाय मुतवल्ली को हटाने के।”
प्राचीन स्मारकों पर सीजेआई ने कहा, “खजुराहो मंदिर में लोग प्रार्थना करते हैं, भले ही वह प्राचीन स्मारक है। क्या इससे प्रार्थना का अधिकार छिनता है?”

सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं

सुप्रीम कोर्ट में वक्फ मामले की दूसरे दिन बुधवार (21 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:15 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं। जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की।
  • मेहता ने कहा, “यह कानून 1923 से चली आ रही वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की समस्या को खत्म करने के लिए है। जेपीसी ने 36 बैठकों में 96 लाख प्रतिनिधित्वों को सुना और व्यापक चर्चा के बाद यह कानून पारित हुआ।”
  • धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत राजस्व अधिकारी केवल राजस्व रिकॉर्ड ठीक करते हैं। यह अंतिम निर्णय नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है।”
  • मेहता ने जोड़ा, “धारा 3(सी) का फैसला सिर्फ पेपर एंट्री है। सरकार को स्वामित्व लेने के लिए टाइटल सूट दायर करना होगा।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर मेहता ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बिना पंजीकरण के कोई संपत्ति वक्फ न बने। इससे निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण रुकेगा।”
  • मजहबी अधिकारों पर मेहता ने तर्क दिया, “वक्फ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। दान हर धर्म में होता है, लेकिन इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया।”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह समावेशिता के लिए है। वक्फ संपत्ति, जैसे स्कूल या अनाथालय, गैर-मुस्लिमों के लिए भी हो सकती है।”
  • 5 साल की शर्त पर मेहता ने कहा, “शरिया कानून में निकाह, तलाक या वसीयत के लिए भी खुद को मुस्लिम साबित करना होता है। इस कानून में बस 5 साल की समय सीमा तय की गई है।”
  • पंजीकरण पर मेहता ने सिब्बल की दलील का खंडन किया, “यह कहना गलत है कि 1923 में पंजीकरण नहीं था। बंगाल वक्फ अधिनियम में भी वक्फ-बाय-यूजर था और पंजीकरण जरूरी था।”
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
  • एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करना और गैर-पंजीकृत वक्फ को अमान्य करना धार्मिक और संपत्ति के अधिकारों का हनन है।”
  • सिब्बल ने दोहराया, “धारा 3(डी) और 3(ई) को बिना जेपीसी चर्चा के शामिल किया गया, जो प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
  • सीजेआई ने मेहता से पूछा, “क्या धारा 3(सी) के तहत सरकार अपने ही दावे का फैसला करेगी?” मेहता ने जवाब दिया, “राजस्व अधिकारी केवल रिकॉर्ड ठीक करते हैं, टाइटल का फैसला नहीं।”
  • कोर्ट ने कहा, “धारा 3(सी) के तहत संपत्ति का कब्जा तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक धारा 83 की प्रक्रिया पूरी न हो।”
  • सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने कहा, “मेहता तकनीकी रूप से सही हैं कि 1923 में भी पंजीकरण का प्रावधान था।”

सुनवाई के तीसरे दिन की अहम दलीलें

वक्फ कानून को लेकर सुनवाई तीसरे दिन भी चली। गुरुवार (22 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:06 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार और अन्य पक्षों ने अपनी दलीलें पूरी कीं, और कोर्ट ने कुछ अहम टिप्पणियाँ कीं।
केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा
  • मेहता ने अपनी दलील शुरू करते हुए कहा, “1923 के बाद से वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें थीं। 1954 में एक और कानून आया। 1995 में नया वक्फ अधिनियम बना। लेकिन 2013 में धारा 40 ने वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार दे दिए, जिसके कारण निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण बढ़ा।”
  • उन्होंने कहा, “लाखों की संख्या में शिकायतें थीं कि गांव के गांव वक्फ संपत्ति घोषित हो रहे हैं। निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड हड़प रहा है। यह कानून उस दुरुपयोग को रोकने के लिए है।”
  • धारा 3(सी) पर मेहता ने दोहराया, “यह केवल राजस्व रिकॉर्ड को ठीक करने की प्रक्रिया है। अगर कोई विवाद है, तो कलेक्टर जांच करता है। यह अंतिम फैसला नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल या कोर्ट जा सकता है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा पुराने कानून में भी थी, लेकिन इसे और सख्त करना जरूरी था ताकि बिना दस्तावेज के संपत्तियां वक्फ न बनें।”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर मेहता ने कहा, “वक्फ बोर्ड का काम धार्मिक नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष है। स्कूल, अस्पताल जैसी वक्फ संपत्तियां सभी के लिए होती हैं। गैर-मुस्लिमों को शामिल करना समावेशिता के लिए है।”
  • 5 साल की शर्त का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह शरिया कानून के हिसाब से है। वक्फ बनाने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम होना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए 5 साल की शर्त रखी गई है।”
  • मेहता ने जोड़ा, “यह कानून जेपीसी की 36 बैठकों और 96 लाख प्रतिनिधित्वों के बाद बनाया गया है। यह एक सोचा-समझा कदम है।”
अन्य पक्षों की दलीलें-
वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे (1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता की ओर से) कहा, “1995 के वक्फ अधिनियम के कई प्रावधान 2025 के संशोधन में भी हैं। सुप्रीम कोर्ट को दोनों कानूनों पर एक साथ विचार करना चाहिए। हाई कोर्ट की याचिकाओं को यहाँ लाने की जरूरत नहीं है।” उन्होंने जोड़ा, “अगर 100 साल पुरानी वक्फ संपत्तियाँ अब वक्फ नहीं रहेंगी, तो यह गंभीर समस्या है।”
के. परमेश्वर (याचिकाकर्ता की ओर से) ने कहा, “लिखित दलीलें पूरी याचिका की तरह हैं। हमें सभी मुद्दों पर बहस करने की इजाजत दी जानी चाहिए।” उन्होंने धारा 3(सी) पर कहा, “यह धारा संपत्ति का दर्जा बदल देती है बिना किसी ज्यूडिशियल प्रक्रिया के। यह गलत है।”
डॉ. जी. मोहन गोपाल (श्री नारायण मानव धर्मम ट्रस्ट की ओर से) ने कहा, “सभी पाँच मुख्य याचिकाएँ मुस्लिम पक्षों की हैं। इससे यह धारणा बनती है कि मामला ध्रुवीकृत है। गैर-मुस्लिम पक्षों को भी सुनना चाहिए।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून केवल मुस्लिमों के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लिए खतरा है।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार (वक्फ बोर्ड) ने कहा, “धारा 32 कहती है, ‘वक्फ बोर्ड वक्फकर्ता (Waqif) की इच्छाओं के अनुसार काम करता है।’ धारा 96 और 97 भी इस पर चर्चा करती हैं, जो राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्र सरकार के निर्देशों से जुड़ी हैं।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने कहा, “280 एएसआई (ASI) स्मारकों पर वक्फ दावा किया गया है। धारा 25(2)(ए) राज्यों को आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर कानून बनाने की अनुमति देती है।” उन्होंने कहा, “न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पर एक नौ-सदस्यीय पीठ (Nine-Judge Bench) विचार कर रही है। शरूर मठ (Shrur Mutt) मामला अंतरिम आदेश (Interim Order) पर प्रासंगिक है।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “CEO (Chief Executive Officer) पहले मुस्लिम होना चाहिए था, लेकिन अब यह ‘Enabling Provision’ (सक्षम करने वाला प्रावधान) है। धारा 38 कहती है, ‘Executive Officer (Executive Officer) मुस्लिम होना चाहिए।'” उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड संविधान के अनुच्छेद 12 (Article 12) के तहत ‘State’ (राज्य) है। इसमें ‘Community Restriction’ (समुदाय पाबंदी) नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
सीजेआई गवई ने कहा, “हमने पहले कहा था कि 1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को इस मामले में नहीं सुना जाएगा। हम केवल 2025 के संशोधन पर ध्यान देंगे।”
  • धारा 3(सी) पर सीजेआई ने पूछा, “क्या कलेक्टर अपने ही दावे का फैसला करेगा?” मेहता ने जवाब दिया, “यह भ्रामक और गलत तर्क है। कलेक्टर केवल रिकॉर्ड ठीक करता है, स्वामित्व का फैसला नहीं।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर कोर्ट ने कहा, “अगर जामा मस्जिद जैसे स्मारक को वक्फ-बाय-यूजर के तहत मान्यता मिली है, तो उसे कैसे खत्म किया जा सकता है?”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर कोर्ट ने पूछा, “क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्ट में मुस्लिमों को शामिल किया जा सकता है?” मेहता ने जवाब दिया, “यह समावेशिता का सवाल है। वक्फ बोर्ड का काम धर्मनिरपेक्ष है।”
  • सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने टोका, “आप कहते हैं कि मस्जिदों में चढ़ावा नहीं चढ़ता। मैं दरगाह गया हूँ और मैंने देखा है कि वहाँ भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है।”
तीनों दिनों की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हमले की बात कही, जबकि सरकार ने इसे वक्फ मैनेजमेंट सुधारने का कदम बताया। कोर्ट ने अभी तक कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है और अगली सुनवाई 5 जून 2025 को होगी। यह मामला धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं से जुड़ा है, इसलिए सभी पक्षों की चिंताओं को संतुलित करना जरूरी है।

‘देश की सुरक्षा के लिए स्पाइवेयर का इस्तेमाल गलत नहीं’: पेगासस जासूसी केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- ‘रिपोर्ट को लेकर सड़कों पर चर्चा नहीं होने देंगे’


सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 अप्रैल 2025) को पेगासस जासूसी मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए जासूसी सॉफ्टवेयर (स्पाइवेयर) का इस्तेमाल करने में कोई गलती नहीं है, लेकिन इसका निजी व्यक्तियों के खिलाफ दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में कई याचिकाओं पर सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया है कि भारत सरकार ने पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों, जजों, कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों की जासूसी के लिए किया।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान देश की मौजूदा सुरक्षा स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे कठिन समय में सावधानी बरतनी जरूरी है। एक वकील ने जब कहा कि अगर सरकार ने स्पाइवेयर खरीदा है तो उसे इस्तेमाल करने से कोई नहीं रोक सकता, तो जस्टिस सूर्यकांत ने जवाब दिया, “अगर देश इस स्पाइवेयर का इस्तेमाल खतरनाक तत्वों के खिलाफ कर रहा है तो इसमें क्या गलत है? स्पाइवेयर रखने में कोई गलती नहीं है… हम देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकते। निजी नागरिक, जिन्हें निजता का अधिकार है, उनकी रक्षा संविधान के तहत होगी… उनकी शिकायतों को हमेशा देखा जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पेगासस के कथित दुरुपयोग की जाँच के लिए गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यह रिपोर्ट देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी है, इसलिए इसे सड़कों पर चर्चा का विषय नहीं बनाया जा सकता। हालाँकि कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रभावित व्यक्तियों को उनकी स्थिति के बारे में सूचित किया जा सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “हाँ, व्यक्तिगत शंकाओं का समाधान होना चाहिए, लेकिन इसे सड़कों पर चर्चा का दस्तावेज नहीं बनाया जा सकता।”

यह मामला 2021 में उस समय सुर्खियों में आया था, जब न्यूज पोर्टल्स ने खुलासा किया था कि इजरायल की कंपनी एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल भारत में पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, अधिकारियों, एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज और अन्य लोगों के मोबाइल फोन में सेंधमारी के लिए किया गया। इन रिपोर्ट्स में एक लिस्ट का जिक्र था, जिसमें संभावित टारगेट्स के फोन नंबर शामिल थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल की जाँच में कुछ फोन नंबरों में पेगासस की घुसपैठ के निशान मिले, जबकि कुछ में घुसपैठ की कोशिश के सबूत थे।

इस खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएँ दाखिल हुईं, जिनमें वकील एमएल शर्मा, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, हिंदू ग्रुप के निदेशक एन. राम, एशियानेट के संस्थापक शशि कुमार, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पत्रकार रूपेश कुमार सिंह, इप्सा शताक्षी, परंजॉय गुहा ठाकुरता, एसएनएम आबिदी और प्रेम शंकर झा शामिल हैं। इन याचिकाओं में पेगासस के कथित इस्तेमाल की स्वतंत्र जाँच की माँग की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में इस मामले की जाँच के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आरवी रविंद्रन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी। समिति ने जुलाई 2022 में अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया कि जाँच किए गए 29 मोबाइल फोनों में पेगासस स्पाइवेयर नहीं मिला। हालाँकि 5 डिवाइस में कुछ मालवेयर पाए गए, लेकिन वे पेगासस नहीं थे। समिति ने यह भी बताया कि भारत सरकार ने जाँच में सहयोग नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि अमेरिका की एक जिला अदालत में व्हाट्सएप ने स्वीकार किया है कि पेगासस के जरिए हैकिंग हुई थी। सिब्बल ने कहा, “अब कोर्ट का सबूत है और व्हाट्सएप का सबूत है।” उन्होंने माँग की कि कम से कम समिति की जाँच रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं को दी जाए। लेकिन कोर्ट ने कहा, “यह एक ऑब्जेक्टिव प्रश्न-उत्तर प्रकार का हो सकता है। आप पूछ सकते हैं कि क्या मैं इसमें शामिल हूँ। हम हाँ या ना में जवाब दे सकते हैं।”

वकील श्याम दीवान ने मामले की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा, “राज्य ने अपने नागरिकों के खिलाफ स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया। यह और भी बुरा है।” उन्होंने कहा कि इसमें पत्रकारों और जजों के खिलाफ इस्तेमाल के सबूत हैं। जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसी दलीलें किसी और मंशा के साथ दी जा रही हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि ये अभी सिर्फ आरोप हैं और व्यक्तियों को यह जानने का हक है कि क्या वे प्रभावित हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई 2025 को तय की है। सिब्बल को दो हफ्ते में अमेरिकी कोर्ट का फैसला और अन्य दस्तावेज जमा करने की इजाजत दी गई है।

अंतरराष्ट्रीय कोर्ट नहीं, पाकिस्तान की कुटाई है पहलगाम में हुए इस्लामी आतंकी हमले का जवाब: कपिल सिब्बल चाहते हैं कश्मीर पर नेहरू वाली भूल फिर करे भारत

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद लगातार आंतकियों पर कार्रवाई की माँग हो रही है। हमले में शामिल 2 आतंकी पाकिस्तानी भी थे। लोगों की माँग है कि पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए। लेकिन इस बीच पहलगाम आतंकी हमले के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने की लिबरल जमात ने माँग कर दी है। इस बार यह अटपटी माँग करने वाले कपिल सिब्बल हैं।

राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने पहलगाम हमले के बाद कहा, “यह मामला राज्य प्रायोजित आतंकवाद का है। हमारे कानूनों के अनुसार, पाकिस्तान को आंतकी राष्ट्र ठहराया जाना चाहिए। इस आतंकी हमले के जिम्मेदारों को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में दोषी ठहराया जाना चाहिए।”

 सिब्बल ने आगे कहा, “मैं गृह मंत्री से माँग करता हूँ कि पाकिस्तान को हमारे क़ानून के अनुसार आतंकी राष्ट्र घोषित किया जाए और फिर इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय लेकर जाया जाए। वह इस न्यायालय में पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित करने की माँग करें।”

जहाँ यह 100% सच है कि पाकिस्तान की शह पर यह हमला हुआ है और वह स्वयं में एक आतंकी राष्ट्र है, लेकिन इस मामले को अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता। इस मामले पर भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि भारत पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ के मसले को खुद ही निपटा लेगा।

भारत का स्टैंड है कि कश्मीर और उससे जुड़ा कोई भी मामला अंतरराष्ट्रीय नहीं है और इसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं ले जाया जाएगा। कश्मीर का सीमा विवाद का मामला हो या फिर पाकिस्तान का कश्मीर के बड़े हिस्से पर अनाधिकृत कब्जा, भारत इसे द्विपक्षीय तरीके से हल करने की बात करता आया है।

ऐसे में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाना कहीं से भी ठीक नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर का मुद्दा ले जाना भारत के लिए कभी लाभदायक नहीं रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू यह गलती एक बार कर चुके हैं। आजादी के बाद पाकिस्तान में कश्मीर पर हमले को वह संयुक्त राष्ट्र लेकर गए थे।

इसके बाद कश्मीर का मामला फंस कर रह गया और भारतीय सेना आगे के आगे बढ़ने के बजाय भारत को भी सीजफायर करना पड़ा। इसके चलते कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान समेत तमाम इलाका पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे में चला गया। यह कब्ज़ा 7 दशक के बाद भी जारी है।

इस बीच स्पष्ट हो चुका है कि यह अंतरराष्ट्रीय मंच भारत को लेकर पक्षपात करते हैं। 3 दशक से कश्मीर को आतंक की आग में झोंकने के बाद भी पाकिस्तान पर वह कोई कार्रवाई नहीं कर पाए हैं। ना ही वह पाकिस्तान से यह कह पाए हैं कि वह भारत को उसका इलाका वापस करे।

पहलगाम हमले के बाद जहाँ पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने की सलाह देना मूर्खता भरी बात है। यह तब और मूर्खता भरा काम होगा जब भारत 1972 में पाकिस्तान के साथ शिमला समझौता कर चुका है। इसमें पाकिस्तान ने इस बात पर हामी भरी थी कि वह भारत के मामले को द्विपक्षीय स्तर पर हल करेगा।

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी मामले को ले जाने का मतलब यह होगा कि भारत इन मामलों में अपने स्तर हल नहीं कर सकता। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मदद माँगना दिखाएगा कि वह अकेले ही पाकिस्तान को उसके पापों के लिए भी नहीं दण्डित कर सकता।

ऐसे में कपिल सिब्बल की यह राय एकदम अप्रासंगिक है और सच्चाई से कोसों दूर है। यह राय उसी कॉन्ग्रेसी मानसिकता से उपजती है जो सोचता है कि पाकिस्तान को दशकों तक शह देने वाले अंग्रेज अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के साथ न्याय करेंगे। पाकिस्तान का एक ही इलाज है जो मोदी सरकार करती आई है।

एक तरफ उसे अप्रासंगिक बना देना और जब भी वह कोई ऐसी हरकत करे तो उसे ऐसी सजा देना कि वह खुद काँप जाए। 2016 में आतंक के कैम्पों पर सर्जिकल स्ट्राइक और 1019 में बालाकोट में हुआ हवाई हमला मोदी सरकार की इसी दृढ़ता का उदाहरण था। पहलगाम का जवाब इससे भी बड़ा होना चाहिए।


राहुल सहित INDI Alliance के सिर्फ सात सांसदों को ही पाक ने आम भेजे


बांग्लादेश संकट के बीच पाकिस्तान सरकार ने मैंगो डिप्लोमेसी के तहत कुछ भारतीय नेताओं के यहां आम की टोकरियां भिजवाई हैं। नई दिल्ली में जिन भारतीय नेताओं को आम भेजे गए हैं, उनमें कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मोहिबुल्लाह नदवी, जिया उर रहमान वर्क, अफजाल अंसारी और इकरा हसन शामिल हैं। सोशल मीडिया पर इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है। लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर देश में सैकड़ों सांसद हैं, लेकिन पाकिस्तान ने INDI Alliance के ही सिर्फ सात सांसदों को आम क्यों भेजे हैं? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोग ये भी पूछ रहे हैं कि सिर्फ विपक्षी सांसदों को आम भेजे गए हैं, आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है? आप भी देखिए लोग क्या कह रहे हैं…

 

जैसे कालनेमि करता था राम का गुणगान, वैसे ही राम भजन गुनगुना रहे फारूक अब्दुल्ला, महिमा बाँच रहे कपिल सिब्बल, ज़ुबैर कह रहा – मंदिर वहीं बना

कपिल सिब्बल और फारूक अब्दुल्ला ने राम पर की चर्चा, मोहम्मद ज़ुबैर (बीच में) कह रहा - मंदिर वहीं बन रहा है
हाल ही में कुछ लोगों ने अफवाह उड़ाई कि राम मंदिर वहाँ नहीं बन रहा है जहाँ बाबरी ढाँचे को ध्वस्त किया गया है। वैसे मौलाना रशीदी जैसों को टीवी परिचर्चा में ऐसा कहते सुना भी जा सकता है। जिसका परिचर्चा में उपस्थित साधु-संतों द्वारा जवाब भी दिया जाता है, लेकिन वह अपनी ही बात पर अडिग रहते हैं। इस पर फैक्ट-चेक कर के मोहम्मद ज़ुबैर ने ट्वीट किया कि मंदिर वहीं बन रहा है जहाँ ढाँचा गिरा था। सोचिए, ALTNews वाले मोहम्मद ज़ुबैर ने दिल पर कितना भारी पत्थर रख कर लिखा होगा – “मंदिर वहीं बन रहा है।” ठीक उसी तरह, अब जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला भी राम भजन गा रहे हैं। वहीं फारुख अब्दुल्ला, जो पाकिस्तान के हिमायती रहे हैं।

वैसे ही कपिल सिब्बल यूपीए काल में केंद्रीय मंत्री थे, जब अदालत में एफिडेविट डाल कर भगवान श्रीराम को काल्पनिक बताया था। राम मंदिर का फैसला अटकाने के लिए कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचे थे। आज वही कपिल सिब्बल रामभक्त बने पड़े हैं। ‘The Wire’ जैसे वामपंथी मीडिया संस्थान जोशीमठ स्थित ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के इंटरव्यू ले रहे हैं, ताकि वो पीएम मोदी को गलत साबित कर सकें। क्या यही वो ‘अच्छे दिन’ हैं, जिनकी हिन्दू बात करते थे?

अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने राम भजन गाया है। उन्होंने राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल के ‘दिल से विद कपिल सिब्बल’ एपिसोड में उनके कहने पर ये भजन सुनाया।

फारूक अब्दुल्ला के गाए भजन ‘किस गली गयो मेरो राम, आँगन मेरो सूना-सूना’ का वीडियो सोशल मीडिया पर खासा वायरल हो रहा है। इस दौरान कपिल सिब्बल के साथ फारूक अब्दुल्ला ने देश के कई मुद्दों पर अपनी राय रखी तो भगवान राम के बारे में भी बात की। ऐसा नहीं है कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने पहली बार राम धुन गयी है, पहले भी गा चुके हैं, देखिए उनका एक पुराना वीडियो:  

‘राम बादशाह थे उसकी मेहरबानी से’

कपिल सिब्बल ने जब उनसे पूछा कि आप ये कहते रहे हैं कि भगवान राम हमारे भी भगवान है। इस पर फारूक अब्दुल्ला जवाब देते हैं, “मैं ये बात बार-बार कहता हूँ। मैं आपसे कहूँ अभी पाकिस्तान में मौलाना असरार गुजर गए हैं। उनकी किताबों के सात वॉल्यूम्स हैं कुरान के तर्जुमे (अनुवाद) के और उसमें उन्होंने 2 के बारे में लिखा है, एक भगवान राम के बारे में और एक गौतम बुद्ध। दोनों के लिए कहा कि ये बादशाह थे और उसकी (अल्लाह) मेहरबानी से।”
उन्होंने आगे कहा, “गौतम बुद्ध ने बादशाहत ठुकरा दी और कहा कि मैंने लोगों को सच्चाई का रास्ता दिखाना है वो उस रास्ते पर चले बादशाहत छोड़ दी। राम ने बादशाह होकर सबके साथ इंसाफ किया। याद है आपको महात्मा गाँधी क्या कहते थे। रामराज का मतलब क्या था। सबके लिए बराबरी, कोई फर्क नहीं होगा।”
जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम ने कहा, “भारत बहुत बड़ा है। कितने लोग रहते हैं, कितनी भाषाएँ कितने धर्म हैं ये ऐसा बाग है जैसे हमारे यहाँ शालीमार है, चश्मा शाही, ट्यूलिप गार्डन हैं। लोग क्यों देखने आते हैं अलग किस्म के फूलों के रंग हैं।” इसके बाद कपिल सिब्बल कहते हैं कि इनको तो एक ही रंग दिखता है तो फारूक कहते हैं कि क्या करें।
वो आगे कहते हैं कि जब हम सड़क पर चलते हैं तो आप हमारे यहाँ सरदारों की पकड़ के रंग दिखते हैं। खुशी होती है उन्हें देखकर कि ये देखो, ये रंग हैं। यहीं हमारे धर्मों के रंग हैं। हमें धर्मों को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए।”

‘ये था राम, हमारा कल्चर’

इस पर सिब्बल कहते हैं कि ये राम की बात करते हैं, लेकिन राम के जो आदर्श हैं उनका पालन नहीं करते हैं। इनकी (बीजेपी) राजनीति राम राज से बिल्कुल अलग है। खुद को रामभक्त कहते हैं। बकौल कपिल सिब्बल, असली रामभक्त तो आम आदमी हैं, जो सच्चाई के आधार पर अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाते हैं।
इस पर फारूक कहते हैं, “हुजूर कमाल देखिए, श्रीराम के बारे में आपसे कहता हूँ जो मैं जानता हूँ उनके बाप ने अपनी दूसरी बीवी को वचन दिया था जो भी तुम जो माँगोगी मैं देने को तैयार हूँ। उसने माँगा। उन्होंने अपना वचन निभाया। राम ने नहीं कहा था (14 साल के वनवास के लिए)।”
फिर सिब्बल बीजेपी पर तंज करते हुए कहते हैं कि यहाँ तो लोग कुर्सी छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं हैं। इस पर फारूक जवाब देते हैं, “जैसे कुर्सी ही सब कुछ है. ये देखिए, जब वो (राम) उस दरिया (सरयू नदी) को पार करने के लिए गए तो वो कश्ती (नाव) वाला क्या कहता है? इन्होंने (राम) कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है।”
फारूक आगे बताते हैं, “तब सीता मैया ने अपने हाथ का कंगन निकाला और कहा कि ये ले लीजिए और हमें पार करवा दीजिए। उसने (केवट) हाथ जोड़कर कहा कि भगवान, जब मेरा वक्त आएगा न, स्वर्ग जाने के लिए तब मेरा हाथ पकड़कर ले जाइए।” फारूक अब्दुल्ला और कपिल सिब्बल इसके बाद दोहराते हैं, “ये था राम, ये था हमारा कल्चर।”

‘भगवान हर जगह, हर दिल में हैं’

वो आगे कहते हैं, “कभी राम ने फर्क किया? कौन धर्म है, ये किस धर्म को मानता है। क्या इसकी पहचान है? नहीं। मैं तो यही कहता हूँ कि अल्लाह करे कि जहाँ हम लोग खुशी से रह सकें। इंसान मंदिर जाना चाहे तो जाए। मस्जिद जाना चाहे तो जाए। भगवान हर जगह, हर दिल में हैं। मगर हम उन्हें पहचानते नहीं हैं इसलिए मैं भारतवासियों से कहूँगा कि पहले अपने धर्म को समझने की कोशिश करो। जिस दिन तुम अपने धर्म को समझ जाओगे, उस दिन से किसी दूसरे धर्म से नफरत नहीं करोगे।”
अयोध्या में भव्य राम मंदिर को लेकर बीते महीने दिसंबर में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने भी मुबारकबाद दी थी। हालाँकि, वो इस शुभकामना के साथ पाकिस्तान का राग अलापना नहीं भूले थे।

‘मजहब से ज्यादा जरूरी वतन है’

इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी और बीजेपी पर भी निशाना साधा। फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि हम हुकूमत गिरा नहीं सकते, लेकिन जहाँ वो गलत हो वहाँ कह तो सकते हैं। उन्होंने कहा, “जनाब जो ये रास्ता है थोड़ा बदला दीजिए। इसमें आपका फायदा है। किसान कानूनों को लेकर कहा तो एक नहीं सुनी, लेकिन यूपी में इलेक्शन आता देख वापस ले लिए कानून।”
उन्होंने आगे कहा, “बताइए हम इन्हें कहा गलत कहते हैं हम विपक्ष में रहते हुए भी भारत को मजबूत करना चाहते हैं। कमजोर नहीं करना चाहते हम इसके वासी है।अगर हम इसको डूबते देखेंगे क्या हम बच जाएँगे वतन रहेगा तो हम सब बचेंगे कोई पार्टी हो कोई जमात हो, कोई भी मजहब हो सबसे ज्यादा जरूरी वतन है।”

कपिल सिब्बल ने असम को बताया म्यांमार का हिस्सा, देश को बांटने का लेफ्ट लिबरल एजेंडा चालू है!

कभी देश में नार्थ-साउथ की बात तो कभी हिंदी भाषी राज्यों को गौमूत्र स्टेट करार दिया जाता है यानि कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल का ‘बांटो और राज करो’ एजेंडा चालू है। अब कपिल सिब्बल एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने असम को म्यांमार का हिस्सा बता दिया है। जो इनकी योग्यता पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। कांग्रेस में तीन दशक गुजारने वाले कपिल सिब्बल कांग्रेस की ‘बांटो और राज करो’ नीति को ही आगे बढ़ा रहे हैं। पार्टी में भाव नहीं मिलने पर हालांकि उन्होंने खुद को कांग्रेस से अलग होने की घोषणा तो कर दी लेकिन उनके कृत्य बताते हैं कि वे कांग्रेस और इंडी अलायंस के देश विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने में सबसे आगे हैं। कभी कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करना, कभी कश्मीर में 370 खत्म करने के विरोध में खड़े होना, कभी राम मंदिर मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी करना, कभी तीन तलाक पर सरकार के खिलाफ पैरवी करना, कभी कर्नाटक के हिजाब मामले में सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करना, कभी CAA-NRC मामले में सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में उतरना और देशद्रोह मामले में सुप्रीम कोर्ट में सरकार के खिलाफ खड़े होना, कपिल सिब्बल को समझने के लिए उनके द्वारा लड़े गए केसों की ये कुछ बानगी हैं। सिब्बल देश के जाने-माने वकील हैं और हर सुनवाई के लिए लाखों रुपये लेते हैं। सवाल यह उठता है देश विरोधी बातें करने और सरकार के हर फैसले का विरोध करने के लिए इतना पैसा उनको देता कौन है?

पूर्वोत्तर को भारत से अलग दिखाना लेफ्ट लिबरल साजिश का हिस्सा
दरअसल कपिल सिब्बल ने उसी लेफ्ट लिबरल की सोच को रखा जो पूर्वोत्तर को भारत से एक अलग हिस्से के रूप में देखता है। इनका मकसद ही नार्थ-ईस्ट को अलग-थलग दिखाना है। कांग्रेस पार्टी की भी यही सोच रही है जिसकी वजह से उसने आजादी के बाद से पूर्वोत्तर भारत को उपेक्षित छोड़ दिया। जबकि वास्तविक सच्चाई यह है कि महाभारत के समय से और बल्कि उससे पहले से असम भारत का अभिन्न अंग रहा है। और अब नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद पूर्वोत्तर को अपना पुराना गौरव मिलना शुरू हुआ है एवं वहां विकास नई बयार बह रही है।

कपिल सिब्बल ने कहा- असम म्यांमार का हिस्सा था
नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6ए की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा,’पलायन को रोका नहीं जा सकता। अगर आप असम के इतिहास को देखें तो आपको समझ आएगा कि कौन कब आया, इसका पता लगाना असंभव है। असम असल में म्यांमार का हिस्सा था। साल 1824 में जब ब्रिटिश ने लड़ाई जीती तो संधि के तहत असम पर ब्रिटिश शासन का राज हो गया था।’ यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब मणिपुर में अवैध प्रवासियों का मुद्दा हिंसा का कारण बन रहा है। मणिपुर में कुकी और मैतई जनजातियों के बीच जातीय हिंसा चल रही है। कुकी जनजाति को माना जाता है कि वह म्यांमार से पलायन करके मणिपुर आए हैं। कुकी जनजाति मणिपुर में अलग प्रशासन की मांग कर रही हैं। कुकी जनजाति मिजोरम में बहुमत में हैं। मणिपुर में हिंसा के बाद भी बड़ी संख्या में कुकी जनजाति को लोग पलायन करके मिजोरम पहुंचे हैं।

असम कभी भी म्यांमार का हिस्सा नहीं थाः हिमंत बिस्व सरमा
कपिल सिब्बल के बयान पर असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने पलटवार किया है। असम सीएम ने कहा कि ‘जिन्हें असम के इतिहास की जानकारी नहीं है उन्हें नहीं बोलना चाहिए। असम कभी भी म्यांमार का हिस्सा नहीं था। दोनों के बीच लड़ाईयां हुईं और यही इनके बीच रिश्ता था। इसके अलावा मैंने ऐसा कोई डाटा नहीं देखा, जिसमें बताया गया हो कि असम, म्यांमार का हिस्सा था।’

देखिए कपिल सिब्बल ने किस तरह देश विरोधी मुकदमों में हिस्सा लिया और भ्रष्टाचार के आरोपी का बचाव किया। 

कश्मीर में 370 हटाने के लिए जनमत संग्रह होः कपिल सिब्बल
जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई थी और इस पर सुनवाई के दौरान 08 अगस्त 2023 को कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन की तरफ से कोर्ट में दलीलें दीं। सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सरकार को आर्टिकल 370 को हटाने से पहले जनता से राय लेनी चाहिए थी, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं। सारे फैसले जनता के द्वारा होने चाहिए। कपिल सिब्बल ने दलील दी कि ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने वाले कानून को बनाने और किसी फैसले पर पहुंचने से पहले जनमत संग्रह कराया था, जिसे ब्रेक्जिट कहा जाता है। सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “मिस्टर सिब्बल आप हिंदुस्तान में रहते हैं, जिसका एक संविधान है। उस संविधान के मुताबिक, जनमत संग्रह यानि कि रेफरेंडम जैसी कोई बात लिखी ही नहीं है।”

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में केस लड़ा
सिब्बल ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में भी मुस्लिम पक्ष का केस लड़ा था। सिब्बल ने ही सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इस मामले की सुनवाई 2019 तक टाल दी जाए। उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव का हवाला देते हुए यह दलील दी थी। लेकिन सिब्बल की दलीलें काम नहीं आई थीं। इसे लेकर भाजपा आज भी सिब्बल और कांग्रेस को निशाने पर लेती रही है।

देशद्रोह मामले में सुप्रीम कोर्ट में पैरवी
देशद्रोह मामले में कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता की तरफ से केस लड़ा था। इस मामले में सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा था। मेहता की ओर से मामले को कुछ दिनों तक आगे बढ़ाने की मांग हुई जिसका सिब्बल ने सख्त विरोध किया था। सिब्बल ने अदालत से कहा था कि सरकार की मांग पर मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, न्यायपालिका को इस कानून की संवैधानिकता को जांचना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा कानून की पूरी पड़ताल किए जाने तक इस पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

सीएए-एनआरसी मामले में केस लड़ा
कपिल सिब्बल ने सीएए-एनआरसी मामले में भी सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा था। सीएए के खिलाफ 18 दिसंबर 2019 को वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल, इंदिरा जयसिंह, अभिषेक मनु सिंघवी, सलमान खुर्शीद सहित कुछ अन्य वकीलों ने याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलीलें रखी थीं। इन्होंने तत्कालीन सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत से मामले की सुनवाई होने तक इस कानून पर रोक लगाने की मांग की थी। सिब्बल ने दलील दी थी कि अदालत एक अंतरिम आदेश पारित करके सीएए कानून लागू किए जाने को कुछ महीने के लिए टाल दे। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इसका विरोध किया था।

धर्मसंसद हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट में दी दलीलें
हिमाचल प्रदेश में हुई धर्मसंसद हेट स्पीच मामले में भी कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी की थी। सिब्बल ने कहा था कि ऐसी धर्मसंसद अब हर जगह हो रही है। यह हिमाचल के ऊना में हुई है और यहां जो कुछ कहा गया उसे सबके बीच पढ़ा नहीं जा सकता। इस पर बेंच ने हिमाचल सरकार को जरूरी कदम उठाने और हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था।

तीन तलाक का सुप्रीम कोर्ट में किया विरोध
सिब्बल ने तीन तलाक पर भी सरकार के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से मुकदमा लड़ा था। सिब्बल ने दलील दी थी कि तीन तलाक पर बैन लगाना सही नहीं होगा क्योंकि यह आस्था से जुड़ा मामला है। हालांकि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल की दलीलों को खारिज करते हुए तीन तलाक पर रोक लगा दी थी।

कर्नाटक हिजाब मामले में की पैरवी
कपिल सिब्बल ने कर्नाटक हिजाब मामले में भी एक याचिकाकर्ता का मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया था। सीजेआई ने कहा था कि मामला कर्नाटक हाईकोर्ट में है इसलिए वहां पहले सुनवाई पूरी होनी चाहिए। सिब्बल ने स्कूलों में हिजाब को बैन किए जाने के खिलाफ सुनवाई का मामला पुरजोर तरीके से शीर्ष अदालत में उठाया था, हालांकि सीजेआई ने इस पर तब सुनवाई से इनकार कर दिया था।

आजम खां को दिलाई जमानत
जौहर यूनिवर्सिटी के लिए जमीन कब्जाने सहित कई मामलों में फंसे सपा नेता आजम खां को मई 2022 में जमानत दिलाने में कपिल सिब्बल की खास भूमिका रही है। सिब्बल ने ही सुप्रीम कोर्ट में आजम खान की पैरवी की थी। कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में आजम मामले में जल्द सुनवाई की अपील की थी जिसे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और बेला एम त्रिवेदी ने मान लिया था। आजम कई मामलों में फरवरी 2020 से ही सीतापुर जेल में बंद थे।

लालू यादव को दिलाई जमानत
चारा घोटाला केस में आरोपी आरजेडी के लालू यादव को भी कपिल सिब्बल ने ही हाईकोर्ट से जमानत दिलाई। लालू लंबे समय तक जेल में रहे। सिब्बल की पैरवी ने उन्हें जेल से रिहाई में मदद दिलाई। कपिल सिब्बल लालू के लिए तारणहार साबित हुए। सिब्बल ने दस्तावेजी सबूत के दम पर कहा था कि लालू प्रसाद यादव ने चारा घोटाला मामले में अब तक 42 माह जेल में बिताए हैं।

अभी 3 दिसंबर 2023 को विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई उसके बाद कांग्रेस बौखला गई और उसके नेता नार्थ-साउथ डिवाइड की बात करने लगे वहीं डीएमके पार्टी के नेता ने हिंदीभाषी राज्यों को गौमूत्र स्टेट करार दे दिया। इंडी अलायंस के दलों का यह दोहरा चरित्र ही दर्शाता है।

हार से बौखलाई कांग्रेस ने रचा नार्थ-साउथ का नैरेटिव
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ तेलंगाना में मिली जीत के बाद कांग्रेस एक बार फिर नया नैरेटिव गढ़ रही है। चार राज्यों में हार से बौखलाए कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया पोस्ट किया कि देश के दक्षिणी और उत्तरी भाग के बीच सीमा रेखा गहरी और स्पष्ट हो रही है। विवाद बढ़ने के बाद चक्रवर्ती ने अपना पोस्ट हटा लिया। वह पार्टी की इकाई ‘अखिल भारतीय प्रोफेशनल्स कांग्रेस’ के प्रमुख हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस यह नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश कर रही है कि हिंदीभाषी इलाके के लोगों की सोच सांप्रदायिकता और जातिवाद के इर्द-गिर्द ही घूमती है, जबकि दक्षिण के लोग राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा सचेत, प्रगतिशील और परिपक्व हैं।

तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डी ने कहा- तेलंगाना का डीएनए बिहार डीएनए से बेहतर
कांग्रेस के एक और नेता एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी नार्थ-साउथ का मुद्दा उठा दिया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के प्रथम मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव (केसीआर) में ‘बिहारी जीन’ है। उन्होंने कहा, ‘मेरा डीएनए तेलंगाना का है। केसीआर का डीएनए बिहार का है। वो बिहार के रहने वाले हैं। केसीआर की जाति कुर्मी हैं, वे बिहार से विजयनगरम और वहां से तेलंगाना आए। तेलंगाना का डीएनए बिहार के डीएनए से बेहतर है।’

डीएमके सांसद ने हिंदी भाषी राज्यों को गौमूत्र स्टेट कहा
संसद के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन 5 दिसंबर 2023 को लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन बिल पेश किया। चर्चा के दौरान धर्मपुरी से DMK सांसद डॉ. सेंथिल कुमार ने कहा कि भाजपा की ताकत केवल हिंदी बेल्ट के उन राज्यों को जीतने में ही है, जिन्हें हम आमतौर पर गोमूत्र राज्य कहते हैं। सेंथिल ने आगे यह भी कहा कि दक्षिण के राज्यों में BJP को घुसने नहीं दिया गया है। यह खतरा जरूर है कि कश्मीर की ही तरह भाजपा दक्षिण भारत के राज्यों को भी केंद्र शासित प्रदेश न बना दे। क्योंकि ये वहां जीत नहीं सकते तो उसे UT बनाकर गवर्नर के जरिए शासन कर सकते हैं।