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FCRA बिल से भारत में ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग से लेकर अमेरिका तक हड़कंप!

साभार 
मोदी सरकार द्वारा विदेशी फंडिंग कानून (FCRA – Foreign Contribution Regulation Amendment Bill) को मजबूत और पारदर्शी बनाने के कदम से देश ही नहीं, बल्कि विदेशी ताकतों के पेट में दर्द शुरू हो गया है। जैसे ही सरकार ने भारत की संप्रभुता की सुरक्षा और संदिग्ध विदेशी पैसों के खेल पर लगाम लगाने के लिए शिकंजा कसा, भारत के विपक्षी दलों से लेकर अमेरिकी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय लॉबी में हड़कंप मच गया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर फंडिंग साफ-सुथरी और राष्ट्रहित में है, तो आखिर इन विदेशी और देश विरोधी ताकतों को मोदी सरकार के कड़े नियमों से इतना डर क्यों लग रहा है?

दरअसल, FCRA में प्रस्तावित संशोधनों का मुख्य उद्देश्य भारत में आने वाले अरबों रुपये के विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल, अवैध धर्मांतरण, और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा को रोकना है। सालों से एनजीओ और चैरिटी के नाम पर आने वाले विदेशी पैसे का इस्तेमाल भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए किया जा रहा था। जब मोदी सरकार ने इस संदिग्ध तंत्र की रीढ़ की हड्डी पर प्रहार किया, तो भारत के विपक्षी नेता और विदेशी लॉबिस्ट एक सुर में चिल्लाने लगे हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सरकार का यह कदम बिल्कुल सही दिशा में है और इससे भारत विरोधी विदेशी तंत्र के नेटवर्क की परतें उधड़ रही हैं।

महा-खुलासा! अमित शाह ही क्यों हैं असली निशाना?
क्या आपने कभी सोचा है कि हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से लेकर संसद तक—शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने वालों का असली निशाना धर्मेंद्र प्रधान नहीं, बल्कि गृह मंत्री अमित शाह ही क्यों हैं? आइए, इस खेल की गहराई को समझते हैं।

कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान 2005 से 2014 के बीच देश में 2,200 से ज्यादा प्रमाणित (verified) आतंकी हमले हुए थे। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, पुणे जैसे प्रमुख शहरों में आए दिन बम धमाके होते थे और लोग बाजारों, बसों, ट्रेनों, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा मंदिरों में जाने से डरते थे। उस दौर को भारत का ‘Lost Decade‘ (2004 to 2014) माना जाता है।

लेकिन 2014 से 2026 के बीच जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में शांति का माहौल है और आतंकी घटनाओं में 70 प्रतिशत से ज्यादा की भारी कमी आई है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से लगी सीमाओं को पूरी तरह सील कर दिया, आतंकवादियों का सफाया किया, मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया कर दिया और ड्रग सिंडिकेट की कमर तोड़ दी। अब जब अमित शाह ने अवैध धर्मांतरण और प्रोपेगैंडा फैलाने वाले FCRA फंडिंग पर सीधा प्रहार किया है, तो पूरा वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम बौखलाकर उन्हें अपना मुख्य निशाना बना रहा है।

FCRA के विरोध में कौन-कौन?
विदेशी फंडिंग पर कड़ाई होते ही वही पुरानी ‘भारत विरोधी’ लॉबी और विपक्षी दल एक साथ गोलबंद हो गए हैं। इस राष्ट्रहित के कदम का विरोध कौन और क्यों कर रहा है:

FCRA को लेकर गोवा और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की सक्रियता
सहानुभूति का नाटक करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) अब गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में FCRA संशोधन के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। जिन राज्यों में धर्मांतरण और विदेशी एनजीओ के जरिए अंदरूनी नेटवर्क की शिकायतें आती रही हैं, वहां AAP का इस बिल के विरोध में कूदना उनकी वोट बैंक और विदेशी समर्थित एजेंडे की राजनीति को उजागर करता है।

केजरीवाल का गोवा दौरा और असल मकसद पर सवाल
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल इन दिनों गोवा के दौरे पर हैं। सवाल यह उठता है कि एक तरफ जहां संसद में FCRA संशोधन बिल लाए जाने की आहट तेज है, वहीं केजरीवाल ऐसी कौन सी आपात बैठकें करने गोवा पहुंचे हैं। हालांकि ऊपर से यह दिखाया जा रहा है कि वे उत्तरी गोवा के आजाद मैदान में ‘सेव करापुर’ आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं और 1,800 फ्लैटों की आवासीय परियोजना के खिलाफ नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम की धारा 39ए को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने यह कयास लगाए जा रहे हैं कि इस दौरे का असल मकसद विदेशी फंडिंग से चलने वाले स्थानीय नेटवर्क को लामबंद करना है।

संजय सिंह की छत्तीसगढ़ में हलचल और राजनीतिक एजेंडे पर उठते सवाल
इसी कड़ी में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं। दिखावे के लिए वे हसदेव के जंगलों में पेड़ों की कटाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं और सरकार पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरे का एक उद्देश्य FCRA बिल के खिलाफ माहौल बनाना भी हो सकता है। चर्चा यह भी है कि विपक्षी नेता स्थानीय स्तर पर FCRA संशोधन से प्रभावित होने वाले संगठनों और धर्मांतरण/फंडिंग के आरोपों से घिरे नेटवर्कों को लामबंद करने की रणनीति बना रहे हैं।

अमेरिकी एंबेसडर की केरल यात्रा
FCRA बिल की आहट के बीच ही अमेरिकी राजदूत का अचानक केरल दौरा कई सवाल खड़े करता है। केरल, जहां बड़ी संख्या में विदेशी फंडिंग पाने वाले संस्थान मौजूद हैं, वहां अमेरिकी दूतावास की यह हलचल दर्शाती है कि वाशिंगटन की नजरें भारत के इस आंतरिक सुरक्षा कानून पर टिकी हुई हैं।

अमेरिकी सांसदों का खुला विरोध और ‘ईसाई विरोधी’ कार्ड
अमेरिकी राजनीति में बैठे भारत विरोधी तत्व इस बिल को दबाने के लिए हर संभव दबाव बना रहे हैं। अमेरिकी सांसद राइली मूर (Riley Moore) ने खुलकर इस बिल का विरोध किया और इसे ‘ईसाई विरोधी’ बताकर एक पूरी तरह से प्रशासनिक सुरक्षा कानून को धार्मिक रंग देने की कोशिश की है।

चर्च के मिशनरी और JPC की मांग
चर्च से जुड़े मिशनरी संगठन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर मांग कर रहे हैं कि इस बिल को वापस लिया जाए या इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास ठंडे बस्ते में भेजने के लिए भेजा जाए। हालांकि गृह मंत्री अमित शाह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह बिल पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पारदर्शी कानून है, जिससे किसी वैध धर्म या संस्था को डरने की जरूरत नहीं है।

अचानक केरल क्यों पहुंचे ट्रंप के दामाद माइकल बूलोस?
FCRA संशोधन बिल की चर्चाओं और विदेशी फंडिंग पर कसते शिकंजे के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और प्रमुख कारोबारी माइकल बूलोस का अचानक केरल पहुंचना भी गहरे राजनीतिक सवाल खड़े करता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक निजी यात्रा बताया जा रहा है, जहां भारी मानसूनी बारिश के बीच उन्होंने अलप्पुझा में हाउसबोट से बैकवॉटर का आनंद लिया और आगामी नेहरू ट्रॉफी बोट रेस से पहले पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक संयोग नहीं मान रहे हैं। जिस तरह से केरल में विदेशी फंडिंग और एनजीओ नेटवर्क पर गाज गिरने की आशंका है, ऐसे में अमेरिकी एंबेसडर के साथ-साथ ट्रंप के पारिवारिक और व्यावसायिक नेटवर्क से जुड़े व्यक्ति की केरल में मौजूदगी कई तरह की रणनीतिक लॉबिंग की ओर इशारा करती है।

कांग्रेस पार्टी का संसद में विरोध
विदेशी फंडिंग की ढील से सबसे ज्यादा लाभ उठाने वाली कांग्रेस पार्टी इस बिल के खिलाफ आक्रामक है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और प्रमोद तिवारी जैसे नेताओं ने संसद में इस बिल को हर कीमत पर रोकने और सरकार को घेरने की घोषणा की है।

सुप्रिया सुले: हर फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखें
एनसीपी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और वामपंथी (Left) दलों ने भी विदेशी फंडिंग के इस शिकंजे पर आपत्ति जताई है। सुप्रिया सुले का कहना है कि हर विदेशी फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए, जबकि इतिहास गवाह है कि इसी फंडिंग के दम पर वामपंथी विचारधारा देश में जड़े जमाए बैठी थी।

इंडी गठबंधन की एकजुटता के पीछे छुपा एजेंडा
संसद में विपक्षी दल ‘INDIA’ ब्लॉक के तहत इस बिल को रोकने के लिए व्हिप जारी कर रहे हैं। यह एकजुटता देश की सुरक्षा के बजाय उन संदिग्ध एनजीओ और संस्थानों के हितों की रक्षा के लिए दिख रही है जो चुनाव और जनमत को प्रभावित करने का काम करते हैं। 

विदेशी एनजीओ और कॉरपोरेट लॉबी की छटपटाहट
भारत में काम करने वाले कई बड़े अंतरराष्ट्रीय एनजीओ (जैसे एम्नेस्टी या ग्रीनपीस समर्थित नेटवर्क), जिन पर पहले भी बिना किसी जवाबदेही के भारत की विकास परियोजनाओं (जैसे माइनिंग, पावर प्रोजेक्ट्स) को रोकने का आरोप रहा है, वे भी पर्दे के पीछे से इस बिल के खिलाफ लॉबिंग कर रहे हैं।

राष्ट्रहित सर्वोपरि: संप्रभुता से कोई समझौता नहीं
FCRA बिल पर मचा यह बवंडर इस बात की सबसे बड़ी पुष्टि है कि मोदी सरकार ने एक बार फिर देश की आंतरिक सुरक्षा के सबसे कमजोर चोर-दरवाजे पर ताला जड़ दिया है। जब विदेशी देश, अमेरिकी सांसद और देश का पूरा विपक्ष किसी कानून के खिलाफ एक साथ खड़े हो जाएं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देश के हित में सबसे सही कदम है। भारत अपनी संप्रभुता और सीमाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा, और किसी भी विदेशी ताकत को पैसों के दम पर देश के लोकतंत्र में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। देश को सुरक्षित और महफूज रखने की यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं, बल्कि हम 140 करोड़ भारतीयों की भी है।

सेलेक्टिव क्यों हैं राहुल गांधी और CJP? झारखंड में सड़क पर उतरे युवाओं का सवाल


झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में गड़बड़ी, घोटालों और पेपर लीक को लेकर बवाल मचा हुआ है। छात्र और युवा सड़क पर उतर कर परीक्षा रद्द करने और सीबीआई से जांच कराने की मांग कर रहे हैं। लेकिन 29 जुलाई,2026 को लोकसभा में 53 मिनट तक परीक्षा और पेपर लीक पर भाषण देने वाले राहुल गांधी ने एक बार भी झारखंड के छात्रों और युवाओं की मांगों का जिक्र नहीं किया। वहां पर परीक्षाओं में हो रही धांधली का मुद्दा नहीं उठाया, क्योंकि झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम की सरकार है। वहीं 29 जुलाई को ही झारखंड के बीजेपी सांसदों ने संसद भवन परिसर में झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान सांसदों ने हेमंत सरकार और सरकार में शामिल कांग्रेस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। सांसदों ने पूछा राहुल गांधी मौन क्यों है? इतना सब होने के बावजूद राहुल गांधी की आंखें क्यों नहीं खुलीं?

खड़गे, सोनिया, राहुल का दोहरा चरित्र – आदित्य साहू
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सह राज्यसभा सांसद आदित्य साहू ने कहा कि कांग्रेस दोहरी राजनीति करती है। दिल्ली में मांग करती है कि जांच हो और झारखंड में पूरी तरह मौन है। 19 अभ्यर्थी उत्पाद सिपाही दौड़ में मारे गए हैं। कांग्रेस झारखंड में मांग करे कि उन मृत बच्चों के परिजनों को हेमंत सरकार एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा तत्काल भुगतान करे। भाजपा की मांग है कि दिल्ली से कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी झारखंड की धरती पर जाएं, वहां की जनता इनका चेहरा देखना चाहती है और इनसे पूछना चाहती है कि आप लोगों का यह दोहरा चरित्र क्यों?

झारखंड में परीक्षा में धांधली के विरोध में सड़क पर उतरे छात्र और युवा
बुधवार 29 जुलाई को रांची में हजारों छात्रों ने जेपीएससी 14वीं प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों में धांधली के विरोध में सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से अल्बर्ट एक्का चौक तक संविधान यात्रा निकाली। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं से युवाओं का भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने झारखंड सरकार और आयोग से भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने, परीक्षा प्रणाली में सुधार करने और अभ्यर्थियों के साथ न्याय सुनिश्चित करने की मांग की। छात्रों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। अब छात्र और युवा सवाल कर रहे हैं कि राहुल गांधी सेलेक्टिव क्यों है? जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं पर अपनी आखें खोलें, परीक्षा रद्द करें और सीबीआई से जांच कराएं।

सरकार ने छात्रों को प्रदर्शन में हिस्सा लेने से रोका, बस मालिकों को धमकी
झारखंड की कांग्रेस और जेएमएम सरकार युवाओं के इस प्रदर्शन को दबाना और कुचलना चाहती है।  छात्रों को प्रदर्शन स्थलों तक पहुंचने से रोकने और यातायात व बस सेवाओं को प्रभावित करने की खबरें सामने आईं। रांची, हजारीबाग और अन्य शहरों में परीक्षा में गड़बड़ी व पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रशासन द्वारा सुरक्षा का हवाला देकर छात्रों के जत्थों और वाहनों को रास्ते में ही रोका गया। प्रदर्शन स्थल की ओर जाने वाली कई बस सेवाओं और परिवहन के साधनों के मार्ग में फेरबदल किया गया या उन्हें बीच में ही रोक दिया गया। प्रशासन की ओर से बस सेवाएं बंद रखने या बदलने का दबाव, और धमकाने जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिलीं।

विरोध के बीच JPSC की मुख्य परीक्षा अगले आदेश तक स्थगित
बढ़ते विवाद और विरोध के बीच झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) ने संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2025 को आगामी आदेश तक के लिए स्थगित कर दिया है। कथित अनियमितताओं की जांच सीआईडी (CID) द्वारा की जा रही है, जिसके तहत पूर्व उप परीक्षा नियंत्रक और अन्य संबंधित लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। लेकिन सवाल है छात्रों के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर हंगामा करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी कहां हैं? क्या छात्रों की आवाज़ सिर्फ वहीं सुनाई देती है, जहां राजनीतिक एजेंडा साधना हो? क्या झारखंड के छात्रों के अधिकार, उनका भविष्य और उनका इन पार्टियों के लिए कोई मायने नहीं रखता? जब मुद्दा राजनीति का नहीं, छात्रों के भविष्य का हो, तब यह चुनिंदा संवेदनशीलता और सुविधानुसार चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है।

JPSC की कुल 10 पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच CBI के पास
झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की पहली और दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा सहित कुल 10 पुरानी भर्ती परीक्षाओं की जांच पहले से ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के पास है। 6 भर्ती जांच के दायरे में और 9 भर्ती परीक्षा स्थगित हो गई हैं। हालिया विवादों और 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों की जांच राज्य स्तर पर क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) द्वारा की जा रही है, जिसमें अब तक 10 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।


बंगाल : ममता के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे Rahul, चुनाव से पहले इंडी गठबंधन टूटा


पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने वामपंथी दलों के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया है। इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। अब तक विपक्षी राजनीति में जो संभावित तालमेल दिखता था, वह अचानक बिखरता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस रणनीतिक फैसले से किसे लाभ होगा और किसे नुकसान? राहुल गांधी के इस कदम का कांग्रेस पार्टी को फायदा हो या ना हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को जरूर नुकसान होने वाला है। क्योंकि कांग्रेस को जो भी वोट मिलेगा, वह तृणमूल कांग्रेस के हिस्से का होगा। ऐसे में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की एकला चलो की लड़ाई का फायदा बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव में मिलने जा रहा है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का दांव का क्या उसके लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं होगा? कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में जीरो सीट मिली थी। ऐसे में अगले चुनाव में जीरो से शुरुआत करने वाली कांग्रेस का बिना किसी राजनीतिक बैसाखी के अपना सफर तय कर पाएगी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी समीकरण फिर उफान पर

राज्य से तृणमूल कांग्रेस सरकार का कुशासन हटाने और बीजेपी का सुशासन लाने के लिए नौ अलग-अलग स्थानों कूचबिहार, कृष्णानगर, कुल्टी, गरबेटा, रैदिघी, इस्लामपुर, हसनाबाद, संदेशखाली और आमता से BJP की परिवर्तन यात्रा का शानदार आगाज हो गया है। यात्रा को मिले जनता-जनार्दन के अपार समर्थन ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक नए जोश से भर दिया है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक तीन और चार मार्च को ‘डोल यात्रा’ और 4 मार्च को ‘होली’ के कारण कहीं रैली का आयोजन नहीं होगा। परिवर्तन यात्रा इसके बाद पांच मार्च से फिर से शुरू होगी। यह पश्चिम बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने के बाद पूरी होगी। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने राज्यव्यापी ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत कर चुनावी रणभूमि को नई दिशा दे दी है। नौ दिशाओं से एक साथ यात्रा का आगाज को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं,  बल्कि एक व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। यह पहल बीजेपी के लिए संगठनात्मक ऊर्जा, राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति तीनों का संगम बनती दिखाई दे रही है।

कांग्रेस की बड़ी चुनौती खोए जनाधार को पुनर्जीवित करना
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शून्य सीटों पर सिमटना पड़ा था। यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का संकेत भी था। ऐसे में, शून्य से शुरुआत करने वाली पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने खोए हुए जनाधार को पुनर्जीवित करना है। बिना मजबूत गठबंधन के मैदान में उतरना, कुछ विश्लेषकों के अनुसार, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम भी साबित हो सकता है। क्योंकि फिलहाल तो पार्टी मतदाताओं को ठोस विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करती नजर नहीं आती। ऐसे में कांग्रेस का वामपंथी दलों से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरना बेहत चुनौतीपूर्ण निर्णय है। यह तर्क भी अपने आप में ही दिलचस्प है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी और पश्चिम बंगाल में राज करने के बाद भी अब स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस को किसी सहारे के साथ नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए लड़ना पड़ रहा है। “एकला चलो” की यह रणनीति जितनी चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं ज्याद जोखिम भरी भी है। आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि “एकला चलो” की रणनीति कांग्रेस के लिए कितनी आत्मघाती साबित होती है। इतना निश्चित है कि बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले से अधिक रोचक और प्रतिस्पर्धी हो चुका है।

तृणमूल कांग्रेस बनान कांग्रेस का असर ममता बनर्जी पर
कांग्रेस के अलग रास्ता चुनने से सबसे अधिक असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को मिलने वाला हर अतिरिक्त वोट कहीं न कहीं तृणमूल के संभावित समर्थन आधार से कटेगा। बंगाल में विपक्षी वोटों का बिखराव पहले भी निर्णायक साबित हुआ है। यदि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक विशेषकर कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक और पारंपरिक समर्थकों को वापस खींचने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल की सीटों पर पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति में केवल वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि उसका वितरण अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में 5–10 प्रतिशत वोट भी जुटा लेती है, तो वह परिणामों को प्रभावित कर सकती है। भले ही उसे सीटें न मिलें, पर उसका वोट शेयर बीजेपी की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार तय कर सकता है। यही कारण है कि गठबंधन टूटने को केवल कांग्रेस का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य में संभावित बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

कांग्रेस और टीएमसी के “एकला चलो” से बीजेपी को लाभ
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच “एकला चलो” की प्रतिस्पर्धा का लाभ भाजपा को मिल सकता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच माना जा रहा है। यदि विपक्षी वोटों में विभाजन होता है, तो भाजपा को कई सीटों पर सीधे लाभ की संभावना बन सकती है। बहुकोणीय मुकाबले में अक्सर वह दल आगे निकल जाता है, जिसका कोर वोट बैंक अपेक्षाकृत स्थिर और संगठित हो। भाजपा ने बूथ लेवल पर अपना कोर वोटर बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को पुनर्जीवित करने की है। बिना मजबूत बूथ स्तर की संरचना के, केवल राजनीतिक संदेश के सहारे चुनावी सफलता हासिल करना कठिन होता है। कांग्रेस को पहले अपने पुराने कार्यकर्ताओं को पुनः सक्रिय करना होगा और युवाओं को जोड़ने की कवायद करनी होगी। क्योंकि आज की राजनीति के दौर में महिला और युवा वर्ग पूरी तरह से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है।

केरल में अलग समीकरण, बंगाल में पड़ेगा बहुत गहरा असर
हालाँकि केरल और बंगाल दोनों राज्यों में गठबंधन टूटने की खबर है, लेकिन दोनों जगह राजनीतिक समीकरण भिन्न हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं और सत्ता का सीधा मुकाबला करते रहे हैं। वहीं बंगाल में परिस्थिति अधिक जटिल है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख शक्ति है और भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभरी है। ऐसे में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना बंगाल में अधिक जोखिमपूर्ण माना जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद तृणमूल कांग्रेस को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक खिसके नहीं। साथ ही, भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए उसे अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना होगा। कांग्रेस और वाम दलों की मौजूदगी से कई सीटों पर बहु-कोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है, जो चुनावी गणित के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जाएगा।

नौ दिशाओं से एक संदेश: सत्ता परिवर्तन की तूफानी तैयारी
राज्य के नौ अलग-अलग हिस्सों से एक साथ शुरुआत करने का निर्णय प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों है। इससे भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की आकांक्षाओं को समेटने का प्रयास है। उत्तर से दक्षिण और ग्रामीण से शहरी इलाकों तक समानांतर रैलियाँ संगठन की व्यापकता और चुनावी गंभीरता को रेखांकित करती हैं। यात्रा में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी इसे और अहम बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित कोलकाता रैली, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से यह स्पष्ट है कि पार्टी बंगाल को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर भाजपा ने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। अब वह उसी आधार को विधानसभा चुनाव में व्यापक समर्थन में बदलने जा रही है। चुनावी अभियान को सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों के साथ संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है। इसी के चलते दो दिन के विराम के बाद पांच मार्च से रैलियों का पुनः आरंभ कर अभियान को और तेज गति दी जाएगी।

मतदाता सूची संशोधन में 63 लाख फर्जी नाम हटने का मिलेगा फायदा
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद संशोधित मतदाता सूची के प्रकाशन के तुरंत बाद यात्रा का आरंभ होना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। लगभग 63 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता संरचना में बदलाव आया है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने समर्थन आधार को पुनर्गठित करने में जुटे हैं। भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह नए मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करे। राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए युवा और महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा रोजगार, स्टार्टअप, कौशल विकास और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस को तुष्टिकरण और बढ़ते महिला अपराध और भ्रष्टाचार के आरोपरों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में दोनों दलों के बीच यह प्रतिस्पर्धा चुनावी दंगल को और रोचक बनाएगी।

INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।

राहुल का ‘किताब कांड’ पड़ा उल्टा: क्या आंच शशि थरूर तक पहुंचेगी? पब्लिशर के बयान ने खोली पोल, अब FIR के फंदे में फंसी कांग्रेस, हिली राहुल की चूलें!


बर्बाद करने को एक ही उल्लू काफी है यहाँ INDI गठबंधन में उल्लुओं की कोई कमी नहीं अन्जामें इनकी मतमारी सियासत का क्या होगा? जनता को कब तक पागल बनाते रहेंगे ये महामूर्ख गैंग? CAA विरोध से लेकर अब 
पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ पर किए बबाल ने कांग्रेस समेत पूरे INDI गठबंधन को चारों खाने चित कर दिया। आखिर कौन पागल इन महामूर्खों को ऐसी सलाह दे रहा है? दरअसल भारत विरोधी विदेशी आकाओं के इशारों पर नाचने वाले INDI गठबंधन में देश में बढ़ती सोने और चांदी की कीमतें एवं महंगाई आदि समस्याओं पर सरकार को घेरने की बजाए उन मुद्दों से संसद का समय बर्बाद कर करदाताओं के धन को भी बर्बाद कर रहे हैं। आने वाले चुनावों में जनता को इन बिकाऊ पार्टियों का बहिष्कार कर इनको इनकी औकात दिखानी चाहिए।  
 

दिल्ली की सियासत में इन दिनों एक किताब ने ऐसा बवाल मचाया है कि कांग्रेस और लोकसभा मे विपक्ष के नेता राहुल गांधी खुद सवालों के घेरे में आ गए हैं। मामला है पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ का, जिसे लेकर संसद से लेकर सोशल मीडिया तक हंगामा मचा हुआ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में इस किताब के कुछ हिस्सों का हवाला देकर सरकार पर हमला करने की कोशिश की। मगर यहीं पर खेल उल्टा पड़ गया।

दूसरे, क्या इस किताब से लगी आंच शशि थरूर तक भी पहुंचेगी? किताब कांड से दो दिन पहले ही थरूर की मल्लिकार्जुन खड़के और राहुल के साथ होती है। फिर सोशल मीडिया पर चर्चा है कि किताब का प्रेफरस शशि ने लिखा है, इसमें कितनी सच्चाई है, पुष्टि नहीं, यह जाँच में ही सामने आएगा।    

राजनीति में कहावत है- आधी-अधूरी जानकारी सेहत के लिए हानिकारक होती है, लेकिन कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के लिए यह सिर्फ सेहत नहीं, बल्कि कानूनी मुसीबत का सबब बनती दिख रही है। दरअसल में संसद में जिस किताब को ‘ब्रह्मास्त्र’ बनाकर राहुल गांधी सरकार पर वार कर रहे थे, अब उसी किताब के पब्लिशर ने उनके दावों की हवा निकाल दी है। पब्लिशर ने साफ कह दिया- किताब छपी ही नहीं है। पब्लिशर पेंगुइन रैंडम हाउस ने आधिकारिक बयान जारी कर सबको चौंका दिया है। पेंगुइन ने साफ कहा कि किताब न तो अभी पब्लिश हुई है, न ही इसकी कोई कॉपी (डिजिटल या प्रिंट) जनता के लिए जारी की गई है।

कंपनी ने यह भी कहा कि अगर कोई कॉपी कहीं घूम रही है, तो वह सीधा-सीधा कॉपीराइट का उल्लंघन है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर पब्लिशर ने किताब छापी ही नहीं, तो राहुल गांधी सदन में क्या लहरा रहे थे? क्या राहुल गांधी के पास किताब की कोई गैर-कानूनी कॉपी है? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में पहले ही कहा था कि किताब अभी पब्लिश नहीं हुई है, जिसे राहुल ने ‘झूठ’ करार दिया था। लेकिन अब पब्लिशर की सफाई ने राहुल गांधी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

अब मामला सिर्फ राजनीतिक तू-तू मैं-मैं तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है। जांच इस बात की हो रही है कि जो किताब अभी रक्षा मंत्रालय के रिव्यू में है और पब्लिश नहीं हुई, उसकी ‘टाइपसेट पीडीएफ’ इंटरनेट पर कैसे पहुंची? अगर राहुल गांधी उसी लीक कॉपी का इस्तेमाल कर रहे थे, तो उन पर कॉपीराइट एक्ट और आईटी एक्ट के तहत गाज गिर सकती है।

साफ है कि कांग्रेस जिस नैरेटिव के जरिए सरकार को घेरना चाहती थी, वह अब उसके अपने ही गले की फांस बन गया है। अब सोशल मीडिया पर तो जैसे मीम्स और आलोचनाओं की बाढ़ आ गई है। लोग राहुल गांधी को ट्रोल कर रहे हैं, तो कई लोग पूछ रहे हैं कि संसद को सर्कस क्यों बनाया गया? यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या राहुल गांधी ने देश की सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी वाली किताब को गैर-कानूनी तरीके से हासिल किया? कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि उन पर ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ लगना चाहिए। कुछ लोग इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे घटिया विपक्ष का सबसे घिनौना चेहरा बता रहे हैं। आप भी देखिए लोग सोशल मीडिया पर किस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं…


जिस किताब से राहुल गाँधी फैला रहे ‘चीनी प्रोपेगेंडा’, वह अब तक किसी भी फॉर्मेट में नहीं छपी: पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने दिया स्पष्टीकरण, सार्वजनिक कॉपियों पर कानूनी कार्रवाई की दी चेतावनी; पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे खामोश क्यों?

पब्लिशर 'पेंगुइन' ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब पर स्पष्टीकरण देते हुए बयान जारी किया (फोटो साभार: IndiaToday/X)
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की जिस ‘फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी’ किताब को संसद में दिखाया, वह अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। यह स्पष्ट तौर पर किताब की पब्लिकेशन कंपनी ‘पेंगुइन रेंडम हाउस इंडिया’ ने आधिकारिक तौर पर दी है। इस मामले में दिल्ली पुलिस भी FIR दर्ज कर चुकी है।

पब्लिशर ने यह भी कहा कि न ही सिर्फ किताब, बल्कि अब तक किताब की कोई भी कॉपी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। पब्लिशर ने कहा कि जो भी कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, वह गैर-कानूनी है। यह बयान सोशल मीडिया पर किताब के कुछ अंशों की वैधता पर सवाल उठाने जाने के बाद सामने आया है। इसी के चलते पिछले हफ्ते संसद में खूब हंगामा भी हुआ था।

ऐसे में सवाल यह भी होता है कि नरवणे की जो किताब प्रकशित ही नहीं हुई, उस पर हो रहे विवाद और राहुल द्वारा उस किताब को लोकसभा में दिखाने पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की चुप्पी क्यों? बल्कि विवाद शुरू होते ही सबसे पहले इन्ही को FIR करवानी चाहिए थी। क्या इस साज़िश में नरवणे भी शामिल हैं? रक्षा मंत्रालय को पूर्व सेनाध्यक्ष से प्रश्न करना चाहिए।

      

पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने किताब के स्टेटस की दी जानकारी

किताब के पब्लिशर ‘पेंगुइन’ ने बयान जारी कर कहा, “हाल में इस पुस्तक को लेकर सार्वजनिक चर्चा और मीडिया रिपोर्टिंग सामने आई है। इस संबंध में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया यह स्पष्ट करना चाहता है कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’, जो भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा है, उसके प्रकाशन के सभी अधिकार केवल पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के पास हैं।”

                                     ‘पेंगुइन’ द्वारा जारी किया गया बयान (फोटो साभार: X)

पब्लिशर ने बयान में आगे कहा, हम साफ तौर पर यह बताना चाहते हैं कि यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की ओर से इस किताब की कोई भी प्रति- चाहे वह प्रिंट हो या डिजिटल, न तो छापी गई है, न वितरित की गई है और न ही बिक्री या किसी अन्य रूप में सार्वजनिक की गई है।

पब्लिशर ‘पेंगुइन’ कानूनी कार्रवाई करेगा

विवाद पर पब्लिशर ने कहा, “अगर इस पुस्तर की कोई प्रति, पूरी या आंशिक रूप में, प्रिंट, डिजिटल, PDF या किसी अन्य फॉर्मेट में, ऑनलाइन या ऑफलाइन, किसी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, तो वह पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के कॉपीराइन का उल्लंघन है। ऐसे सभी फॉर्मेट को तुरंत बंद किया जाना चाहिए।”

                                   ‘पेंगुइन’ द्वारा जारी किया गया बयान (फोटो साभार: X)

पब्लिशर ने इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने की बात भी कही। उन्होंने कहा, “पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया इस पुस्तर के अवैध और अनाधिकृत प्रसार के खिलाफ कानून के तहत उपलब्ध सभी कानूनी कदम उठाएगा।” पब्लिशर ने स्पष्ट किया कि यह बयान प्रकाशक की स्थिति को बताने और रिकॉर्ड पर रखने के लिए जारी किया गया है।

क्या राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस बन गई है ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया गैंग? प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।


लगातार चुनावों में हार झेल रही कांग्रेस सत्ता के लिए ऐसे तरप रही है जैसे बिना पानी के मछली। और चुनावों में मिल रही हार की जिम्मेदार है सोनिया परिवार। चर्चा यह है कि राहुल की उद्दंता पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आंखें मिचने के पीछे भी बहुत राजनीति है। वह यह कि राहुल जितना ऊलजलूल बोलेगा कांग्रेस को उतना ही नुकसान होगा। जबसे राहुल सक्रीय हुए है कांग्रेस 100 का अंक भी पार सकी। विपरीत इसके इसका जनाधार भी कम होने लगा है। वह दिन भी दूर नहीं जब कांग्रेस की स्थिति क्षेत्रीय दलों से भी बदतर होने वाली है।  

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपनी विचारधारा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। राजनीति में विरोध लाजमी है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर देश को अस्थिर करना सही है? दरअसल में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन में जो खुलासा किया है वह चौंकाने वाला है। बुधवार, 4 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण टाले जाने के पीछे की वजह बताते हुए बिरला ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के साथ ‘मिसहैप’ (कोई अप्रिय घटना) करने की फिराक में थे। स्पीकर ने खुद अपनी आंखों से सांसदों को पीएम की कुर्सी की तरफ हिंसक तरीके से बढ़ते देखा, जिसके बाद उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से पीएम को सदन में न आने की सलाह दी।

क्या कांग्रेस का एजेंडा अब विदेशों से तय हो रहा है? क्या राहुल के इशारे पर प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है?

इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस अब ‘अर्बन नक्सलियों’ का नया अड्डा बन चुकी है? राहुल गांधी के हालिया बयानों और कांग्रेस की नई रणनीतियों ने जनता के मन में यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या सत्ता की लालच में देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है?

प्रमाण

इस ट्वीट में साफ दिख रहा है कि कैसे कांग्रेस का नैरेटिव देश विरोधी ताकतों से मेल खा रहा है। प्रधानमंत्री को सदन में बोलने से रोकना लोकतंत्र नहीं, अराजकता है।

 संस्थानों पर हमला: नक्सलियों जैसी रणनीति?

अर्बन नक्सल का पहला काम होता है देश की संवैधानिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा उठाना। राहुल गांधी आज वही कर रहे हैं। कभी चुनाव आयोग, कभी सुप्रीम कोर्ट, तो कभी भारतीय सेना पर सवाल उठाकर वह सिस्टम को पंगु बनाना चाहते हैं। यह वही अराजकता की थ्योरी है, जो नक्सली जंगलों में इस्तेमाल करते हैं और अर्बन नक्सल शहरों में। जानकारों का कहना है कि जब एक राष्ट्रीय नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत की छवि खराब करता है, तो वह सीधे तौर पर उसी नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देता है।
राहुल गांधी की ‘बांटो और राज करो’ वाली नीति का असली चेहरा यहां बेनकाब हो रहा है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर पीएम पर हमला करने की कोशिश? क्या कांग्रेस अब प्रोफेशनल नक्सलियों की तरह ट्रेनिंग ले रही है?
विदेशी फंडिंग और बाहरी मदद का शक
डिजिटल मीडिया पर यह बहस छिड़ी है कि राहुल गांधी के सुर अचानक विदेशों में जाकर क्यों बदल जाते हैं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल टूलकिट’ का इस्तेमाल हो रहा है? अडानी-हिंडनबर्ग जैसे मुद्दों पर देश में आग लगाने की कोशिश करना, इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है।
‘मोहब्बत की दुकान’ में ‘नफरत का सामान’?
जनता अब जागरूक हो चुकी है। राहुल गांधी जिसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहते हैं, आलोचक उसे ‘अर्बन नक्सलवाद का शोरूम’ बता रहे हैं। जाति के नाम पर समाज को तोड़ना और माओवादी भाषा का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि भारत की एकता बनाम ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग की है।