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FCRA बिल से भारत में ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग से लेकर अमेरिका तक हड़कंप!

साभार 
मोदी सरकार द्वारा विदेशी फंडिंग कानून (FCRA – Foreign Contribution Regulation Amendment Bill) को मजबूत और पारदर्शी बनाने के कदम से देश ही नहीं, बल्कि विदेशी ताकतों के पेट में दर्द शुरू हो गया है। जैसे ही सरकार ने भारत की संप्रभुता की सुरक्षा और संदिग्ध विदेशी पैसों के खेल पर लगाम लगाने के लिए शिकंजा कसा, भारत के विपक्षी दलों से लेकर अमेरिकी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय लॉबी में हड़कंप मच गया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर फंडिंग साफ-सुथरी और राष्ट्रहित में है, तो आखिर इन विदेशी और देश विरोधी ताकतों को मोदी सरकार के कड़े नियमों से इतना डर क्यों लग रहा है?

दरअसल, FCRA में प्रस्तावित संशोधनों का मुख्य उद्देश्य भारत में आने वाले अरबों रुपये के विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल, अवैध धर्मांतरण, और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा को रोकना है। सालों से एनजीओ और चैरिटी के नाम पर आने वाले विदेशी पैसे का इस्तेमाल भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए किया जा रहा था। जब मोदी सरकार ने इस संदिग्ध तंत्र की रीढ़ की हड्डी पर प्रहार किया, तो भारत के विपक्षी नेता और विदेशी लॉबिस्ट एक सुर में चिल्लाने लगे हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सरकार का यह कदम बिल्कुल सही दिशा में है और इससे भारत विरोधी विदेशी तंत्र के नेटवर्क की परतें उधड़ रही हैं।

महा-खुलासा! अमित शाह ही क्यों हैं असली निशाना?
क्या आपने कभी सोचा है कि हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से लेकर संसद तक—शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने वालों का असली निशाना धर्मेंद्र प्रधान नहीं, बल्कि गृह मंत्री अमित शाह ही क्यों हैं? आइए, इस खेल की गहराई को समझते हैं।

कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान 2005 से 2014 के बीच देश में 2,200 से ज्यादा प्रमाणित (verified) आतंकी हमले हुए थे। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, पुणे जैसे प्रमुख शहरों में आए दिन बम धमाके होते थे और लोग बाजारों, बसों, ट्रेनों, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा मंदिरों में जाने से डरते थे। उस दौर को भारत का ‘Lost Decade‘ (2004 to 2014) माना जाता है।

लेकिन 2014 से 2026 के बीच जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में शांति का माहौल है और आतंकी घटनाओं में 70 प्रतिशत से ज्यादा की भारी कमी आई है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से लगी सीमाओं को पूरी तरह सील कर दिया, आतंकवादियों का सफाया किया, मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया कर दिया और ड्रग सिंडिकेट की कमर तोड़ दी। अब जब अमित शाह ने अवैध धर्मांतरण और प्रोपेगैंडा फैलाने वाले FCRA फंडिंग पर सीधा प्रहार किया है, तो पूरा वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम बौखलाकर उन्हें अपना मुख्य निशाना बना रहा है।

FCRA के विरोध में कौन-कौन?
विदेशी फंडिंग पर कड़ाई होते ही वही पुरानी ‘भारत विरोधी’ लॉबी और विपक्षी दल एक साथ गोलबंद हो गए हैं। इस राष्ट्रहित के कदम का विरोध कौन और क्यों कर रहा है:

FCRA को लेकर गोवा और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की सक्रियता
सहानुभूति का नाटक करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) अब गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में FCRA संशोधन के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। जिन राज्यों में धर्मांतरण और विदेशी एनजीओ के जरिए अंदरूनी नेटवर्क की शिकायतें आती रही हैं, वहां AAP का इस बिल के विरोध में कूदना उनकी वोट बैंक और विदेशी समर्थित एजेंडे की राजनीति को उजागर करता है।

केजरीवाल का गोवा दौरा और असल मकसद पर सवाल
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल इन दिनों गोवा के दौरे पर हैं। सवाल यह उठता है कि एक तरफ जहां संसद में FCRA संशोधन बिल लाए जाने की आहट तेज है, वहीं केजरीवाल ऐसी कौन सी आपात बैठकें करने गोवा पहुंचे हैं। हालांकि ऊपर से यह दिखाया जा रहा है कि वे उत्तरी गोवा के आजाद मैदान में ‘सेव करापुर’ आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं और 1,800 फ्लैटों की आवासीय परियोजना के खिलाफ नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम की धारा 39ए को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने यह कयास लगाए जा रहे हैं कि इस दौरे का असल मकसद विदेशी फंडिंग से चलने वाले स्थानीय नेटवर्क को लामबंद करना है।

संजय सिंह की छत्तीसगढ़ में हलचल और राजनीतिक एजेंडे पर उठते सवाल
इसी कड़ी में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं। दिखावे के लिए वे हसदेव के जंगलों में पेड़ों की कटाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं और सरकार पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरे का एक उद्देश्य FCRA बिल के खिलाफ माहौल बनाना भी हो सकता है। चर्चा यह भी है कि विपक्षी नेता स्थानीय स्तर पर FCRA संशोधन से प्रभावित होने वाले संगठनों और धर्मांतरण/फंडिंग के आरोपों से घिरे नेटवर्कों को लामबंद करने की रणनीति बना रहे हैं।

अमेरिकी एंबेसडर की केरल यात्रा
FCRA बिल की आहट के बीच ही अमेरिकी राजदूत का अचानक केरल दौरा कई सवाल खड़े करता है। केरल, जहां बड़ी संख्या में विदेशी फंडिंग पाने वाले संस्थान मौजूद हैं, वहां अमेरिकी दूतावास की यह हलचल दर्शाती है कि वाशिंगटन की नजरें भारत के इस आंतरिक सुरक्षा कानून पर टिकी हुई हैं।

अमेरिकी सांसदों का खुला विरोध और ‘ईसाई विरोधी’ कार्ड
अमेरिकी राजनीति में बैठे भारत विरोधी तत्व इस बिल को दबाने के लिए हर संभव दबाव बना रहे हैं। अमेरिकी सांसद राइली मूर (Riley Moore) ने खुलकर इस बिल का विरोध किया और इसे ‘ईसाई विरोधी’ बताकर एक पूरी तरह से प्रशासनिक सुरक्षा कानून को धार्मिक रंग देने की कोशिश की है।

चर्च के मिशनरी और JPC की मांग
चर्च से जुड़े मिशनरी संगठन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर मांग कर रहे हैं कि इस बिल को वापस लिया जाए या इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास ठंडे बस्ते में भेजने के लिए भेजा जाए। हालांकि गृह मंत्री अमित शाह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह बिल पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पारदर्शी कानून है, जिससे किसी वैध धर्म या संस्था को डरने की जरूरत नहीं है।

अचानक केरल क्यों पहुंचे ट्रंप के दामाद माइकल बूलोस?
FCRA संशोधन बिल की चर्चाओं और विदेशी फंडिंग पर कसते शिकंजे के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और प्रमुख कारोबारी माइकल बूलोस का अचानक केरल पहुंचना भी गहरे राजनीतिक सवाल खड़े करता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक निजी यात्रा बताया जा रहा है, जहां भारी मानसूनी बारिश के बीच उन्होंने अलप्पुझा में हाउसबोट से बैकवॉटर का आनंद लिया और आगामी नेहरू ट्रॉफी बोट रेस से पहले पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक संयोग नहीं मान रहे हैं। जिस तरह से केरल में विदेशी फंडिंग और एनजीओ नेटवर्क पर गाज गिरने की आशंका है, ऐसे में अमेरिकी एंबेसडर के साथ-साथ ट्रंप के पारिवारिक और व्यावसायिक नेटवर्क से जुड़े व्यक्ति की केरल में मौजूदगी कई तरह की रणनीतिक लॉबिंग की ओर इशारा करती है।

कांग्रेस पार्टी का संसद में विरोध
विदेशी फंडिंग की ढील से सबसे ज्यादा लाभ उठाने वाली कांग्रेस पार्टी इस बिल के खिलाफ आक्रामक है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और प्रमोद तिवारी जैसे नेताओं ने संसद में इस बिल को हर कीमत पर रोकने और सरकार को घेरने की घोषणा की है।

सुप्रिया सुले: हर फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखें
एनसीपी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और वामपंथी (Left) दलों ने भी विदेशी फंडिंग के इस शिकंजे पर आपत्ति जताई है। सुप्रिया सुले का कहना है कि हर विदेशी फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए, जबकि इतिहास गवाह है कि इसी फंडिंग के दम पर वामपंथी विचारधारा देश में जड़े जमाए बैठी थी।

इंडी गठबंधन की एकजुटता के पीछे छुपा एजेंडा
संसद में विपक्षी दल ‘INDIA’ ब्लॉक के तहत इस बिल को रोकने के लिए व्हिप जारी कर रहे हैं। यह एकजुटता देश की सुरक्षा के बजाय उन संदिग्ध एनजीओ और संस्थानों के हितों की रक्षा के लिए दिख रही है जो चुनाव और जनमत को प्रभावित करने का काम करते हैं। 

विदेशी एनजीओ और कॉरपोरेट लॉबी की छटपटाहट
भारत में काम करने वाले कई बड़े अंतरराष्ट्रीय एनजीओ (जैसे एम्नेस्टी या ग्रीनपीस समर्थित नेटवर्क), जिन पर पहले भी बिना किसी जवाबदेही के भारत की विकास परियोजनाओं (जैसे माइनिंग, पावर प्रोजेक्ट्स) को रोकने का आरोप रहा है, वे भी पर्दे के पीछे से इस बिल के खिलाफ लॉबिंग कर रहे हैं।

राष्ट्रहित सर्वोपरि: संप्रभुता से कोई समझौता नहीं
FCRA बिल पर मचा यह बवंडर इस बात की सबसे बड़ी पुष्टि है कि मोदी सरकार ने एक बार फिर देश की आंतरिक सुरक्षा के सबसे कमजोर चोर-दरवाजे पर ताला जड़ दिया है। जब विदेशी देश, अमेरिकी सांसद और देश का पूरा विपक्ष किसी कानून के खिलाफ एक साथ खड़े हो जाएं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देश के हित में सबसे सही कदम है। भारत अपनी संप्रभुता और सीमाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा, और किसी भी विदेशी ताकत को पैसों के दम पर देश के लोकतंत्र में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। देश को सुरक्षित और महफूज रखने की यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं, बल्कि हम 140 करोड़ भारतीयों की भी है।

US की अगुवाई में गाजा की ‘पीस व्यवस्था’ संभालेगी इंटरनेशनल फोर्स, हमास समेत सभी आतंकी संगठन डालेंगे हथियार: डोनाल्ड ट्रंप ने किया ऐलान

                               बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो साभार: AFP)
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को दावा किया कि उनके नेतृत्व में बने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने गाजा में हमास और बाकी सभी आतंकी संगठनों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर एक ‘ऐतिहासिक समझौता’ कर लिया है। ट्रंप ने इसे मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम बताया। हालाँकि, इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं, क्योंकि न तो इजरायल ने आधिकारिक मंजूरी दी है और न ही हमास ने ट्रंप के दावे की पूरी तरह पुष्टि की है।

ट्रंप ने यह घोषणा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर की। उन्होंने लिखा, “आज बोर्ड ऑफ पीस ने गाजा में हमास और अन्य सभी हथियारबंद समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर ऐतिहासिक समझौता किया है। यह स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में एक बेहद बड़ा कदम है।”

ट्रंप ने बताया कि इस समझौते के बाद गाजा पर अब हमास का शासन नहीं रहेगा। इसकी जगह एक नई फिलिस्तीनी सरकार बनाई जाएगी, जो बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी और गाजा के लोगों के लिए प्रशासन चलाएगी। ट्रंप ने कहा कि इससे एक तरफ फिलिस्तीनियों को नया प्रशासन मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ इजरायल को वह सुरक्षा मिलेगी जिसकी वह लंबे समय से माँग करता रहा है। उनका कहना है कि अब गाजा का इस्तेमाल इजरायल पर आतंकी हमलों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

कई चरणों में लागू होगा पूरा प्लान

ट्रंप ने बताया कि यह समझौता एक साथ लागू नहीं होगा, बल्कि इसे कई चरणों में पूरा किया जाएगा। जैसे-जैसे हमास और बाकी संगठनों का निरस्त्रीकरण पूरा होगा, वैसे-वैसे IDF यानी इजरायली सेना गाजा से अपनी वापसी शुरू करेगी।

इसके बाद गाजा की सुरक्षा की जिम्मेदारी एक इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स (International Stabilization Force) और नई बनाई जाने वाली फिलिस्तीनी पुलिस के हाथों में जाएगी। इन दोनों का काम होगा कि गाजा अपने नागरिकों और पड़ोसी देशों के लिए सुरक्षित बना रहे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित योजना के तहत हमास के हथियार, रॉकेट, भारी हथियार, सुरंगों और सैन्य ढाँचे को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा। पूरा निरस्त्रीकरण लगभग 200 से 350 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालाँकि, इसके लिए अभी कोई डेडलाइन तय नहीं मानी जा रही है।

ट्रंप ने इसे बताया ‘Trump 20-Point Plan’ का बड़ा पड़ाव

ट्रंप ने कहा कि यह समझौता उनके ‘Trump 20-Point Plan’ को लागू करने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। यह वही योजना है, जिसे गाजा युद्ध खत्म करने, वहाँ नई सरकार बनाने, सुरक्षा व्यवस्था बदलने और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण के लिए तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा कि एक साल पहले गाजा में भीषण युद्ध चल रहा था, मानवीय संकट चरम पर था और बंधकों को कैद करके रखा गया था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। हालाँकि ट्रंप ने यह भी माना कि अभी ‘बहुत काम बाकी है।’

मिस्र, कतर और तुर्किये का किया आभार

ट्रंप ने इस समझौते के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये की मध्यस्थता की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों ने बातचीत आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने अपनी बातचीत करने वाली टीम की भी तारीफ करते हुए कहा कि उनकी लगातार मेहनत की वजह से यह ऐतिहासिक सफलता मिली।

7 अक्टूबर जैसे हमले दोबारा नहीं होंगे: ट्रंप

अपने बयान में ट्रंप ने 7 अक्टूबर 2023 के हमले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “7 अक्टूबर को गाजा से जो खतरा पैदा हुआ था, उसे दोबारा कभी खड़ा नहीं होने दिया जाएगा।”

उन्होंने कहा कि समझौते के बाद गाजा पूरी तरह ऐसी नई फिलिस्तीनी सरकार के हाथ में होगा, जो वहाँ के लोगों के लिए काम करेगी, न कि आतंकवादी गतिविधियों के लिए।

अंत में ट्रंप ने इस समझौते के लिए सभी को बधाई दी और अपने विरोधियों को जवाब देते हुए कहा, “जिसके बारे में सब कहते थे कि इसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता।”

इजरायल और हमास की मंजूरी नहीं

हालाँकि ट्रंप ने इसे ऐतिहासिक सफलता बताया है, लेकिन इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमास ने अभी तक ट्रंप के दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। Reuters को हमास के सूत्रों ने बताया कि यह अभी एक मसौदा है और किसी भी तरह का निरस्त्रीकरण तभी शुरू होगा, जब इजरायल पहले गाजा से सेना हटाएगा।

दूसरी तरफ, इजरायल ने भी इस समझौते पर आधिकारिक सहमति नहीं दी है। इजरायल के एक अधिकारी ने Reuters को बताया कि इस समझौते को लेकर ट्रंप के ऐलान से पहले इजरायल इस प्रस्ताव को खारिज कर चुका है।

इजरायली अधिकारियों का कहना है कि उनकी माँग हमास के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह खत्म करना है और ट्रंप जिस 15 सूत्रीय दस्तावेज की बात कर रहे हैं, उसमें इन माँगों का जवाब नहीं दिया गया है और इसीलिए इजरायल इसे नहीं मान रहा है।

US में साइक्लोस्पोरियासिस का प्रकोप, तेजी से फैल रहा आँखों से न दिखने वाला यह खतरनाक पैरासाइट: जानिए, कैसे ये भारत में भी फैल सकता है, बचाव के लिए करें कौन से उपाय

अमेरिका के कई राज्यों में इन दिनों एक छोटा पैरासाइट यानी पैरासाइट के कारण फैली बीमारी ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम जनता की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। इस बीमारी का नाम साइक्लोस्पोरियासिस है, जो मुख्य रूप से हमारे पाचन तंत्र पर हमला करती है।

हाल के हफ्तों में इस संक्रमण के मामलों में अप्रत्याशित और बहुत तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके कारण अस्पतालों और जाँच प्रयोगशालाओं पर भारी दबाव बन गया है।

इस बीमारी की चपेट में आने वाले मरीजों को बेहद गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें हफ्तों तक चलने वाले अनियंत्रित और बहुत तेज दस्त यानी डायरिया की शिकायत सबसे ज्यादा है।

मिशिगन जैसे राज्य में तो स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वहाँ कुछ ही दिनों के भीतर सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं, जो आम दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा हैं। हालाँकि स्वास्थ्य विभाग और संघीय एजेंसियाँ लगातार इस बात की जाँच कर रही हैं कि आखिर इस संक्रमण की मुख्य वजह क्या है, लेकिन अभी तक किसी भी एक विशेष खाद्य पदार्थ, ब्रांड या सप्लायर की पहचान नहीं हो सकी है।

शुरुआती जाँच में दूषित ताजे फल और सब्जियों को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है, क्योंकि यह पैरासाइट अक्सर खेतों और फसलों के जरिए ही इंसानी आबादी तक पहुँचता है। चूँकि भोजन की आपूर्ति श्रृंखला कई राज्यों से होकर गुजरती है, इसलिए इस संक्रमण के सटीक स्रोत का पता लगाना जाँच कर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

क्या है साइक्लोस्पोरियासिस और कैसे होता है इसका हमला

साइक्लोस्पोरियासिस असल में भोजन या पानी के जरिए फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है, जो एक बेहद छोटे और छोटा  पैरासाइट  साइक्लोस्पोरा कायटैनेन्सिस के कारण होती है।

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी CDC के मुताबिक, यह पैरासाइट इंसानी आँखों से दिखाई नहीं देता और जब कोई व्यक्ति इससे दूषित खाना या पानी लेता है, तो यह उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।

शरीर में पहुँचने के बाद यह पैरासाइट मुख्य रूप से छोटी आंत को अपना निशाना बनाता है और वहाँ जाकर अपनी संख्या बढ़ाने लगता है, जिससे आँतों का सामान्य कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।

यह संक्रमण आम तौर पर गर्मी के महीनों में यानी मई की शुरुआत से लेकर अगस्त के अंत तक बहुत ज्यादा सक्रिय रहता है क्योंकि इस मौसम में इस पैरासाइट के पनपने की अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

हालाँकि यह बीमारी आमतौर पर जानलेवा नहीं मानी जाती है, लेकिन अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए तो यह हफ्तों तक शरीर को निचोड़ सकती है। सबसे खास बात यह है कि इसके लक्षण एक बार ठीक होने के बाद दोबारा वापस आ सकते हैं, जिससे मरीज लंबे समय तक कमजोरी और थकावट महसूस करता रहता है।

शरीर पर दिखने वाले लक्षण और डायरिया का खतरनाक रूप

जब कोई व्यक्ति इस खतरनाक पैरासाइट के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर में तुरंत लक्षण दिखाई नहीं देते बल्कि इसे उभरने में दो दिन से लेकर चौदह दिन तक का समय लग सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस संक्रमण का सबसे प्रमुख और डरावना लक्षण पानी जैसा तेज दस्त होना है, जिसे कई बार विस्फोटक मलत्याग भी कहा जाता है। इसके अलावा मरीजों को पेट में बहुत तेज और असहनीय मरोड़ या ऐंठन महसूस होती है, जो उन्हें पूरी तरह से बेहाल कर देती है।

संक्रमण के अन्य लक्षणों में लगातार जी मिचलाना, उल्टी होना, शरीर में भारी थकान, भूख में भारी कमी आना और बहुत तेजी से वजन का घटना शामिल है। इसके अतिरिक्त मरीजों को पेट में बहुत ज्यादा गैस बनने, शरीर में तेज दर्द होने और हल्का बुखार रहने की शिकायत भी होती है।

नोरोवायरस जैसे आम पेट के इन्फेक्शन के विपरीत, जो कुछ ही दिनों में खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है, साइक्लोस्पोरियासिस का असर बहुत लंबा चलता है। इसके गंभीर दौर में मरीजों के शरीर से पानी इतनी तेजी से निकलता है कि उन्हें डिहाइड्रेशन यानी पानी की गंभीर कमी के कारण अस्पताल में भर्ती तक कराना पड़ जाता है।

अमेरिका में अचानक बढ़े मामले और जाँच की जमीनी हकीकत

इस समय अमेरिका के कई राज्यों जैसे मिशिगन, ओहियो, इलिनोइस, न्यूयॉर्क, टेक्सास, नॉर्थ कैरोलिना और इंडियाना में इस संक्रमण के मामलों में भारी उछाल आया है।

मिशिगन के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वहाँ पिछले कुछ ही हफ्तों में मामलों की संख्या तेजी से बढ़कर सात सौ से ऊपर पहुँच गई है, जबकि आम तौर पर इस पूरे राज्य में सालभर में सिर्फ चालीस से पचास मामले ही सामने आते थे।

मिशिगन के दक्षिण-पूर्वी हिस्से के कई काउंटियों जैसे मोनरो, वाश्टेनॉ, लेनावी, शियावासी, वेन, जैक्सन, ओकलैंड और लिविंगस्टन में इसका सबसे घातक असर देखा जा रहा है। 

मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि मरीजों का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाएँ पूरी तरह से थक चुकी हैं और जहाँ पहले टेस्ट की रिपोर्ट चौबीस घंटे में आ जाती थी, वहीं अब इसमें दो से तीन दिन का समय लग रहा है।

इस भारी दबाव के कारण डॉक्टरों को यह भी सोचना पड़ रहा है कि अगर जाँच में देरी जारी रही, तो वे केवल लक्षणों के आधार पर ही इलाज शुरू कर देंगे। मिशिगन की मुख्य चिकित्सा कार्यकारी डॉ नताशा बगदासारियन ने बताया कि इतने बड़े पैमाने पर मरीजों का इंटरव्यू लेना और उनके खान-पान का पता लगाना मुस्किल काम हो गया है।

स्वास्थ्य कर्मी दिन-रात काम करके मरीजों की ग्रोसरी लिस्ट खंगाल रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने पिछले दिनों में किस रेस्टोरेंट में क्या खाया था।

कैसे फैलता है यह पैरासाइट और क्यों है इसे ढूँढना मुश्किल

साइक्लोस्पोरा पैरासाइट के फैलने का मुख्य जरिया इंसानी मल यानी व्हीकल-ओरल रूट होता है, जब किसी संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित हुआ पानी या मिट्टी फसलों के संपर्क में आती है।

हालाँकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह साफ किया है कि यह बीमारी सीधे तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तुरंत नहीं फैलती है, क्योंकि शरीर से बाहर निकलने के बाद इस पैरासाइट के अंडों को पर्यावरण में संक्रामक यानी एक्टिव होने के लिए कम से कम एक से दो सप्ताह का समय चाहिए होता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यह संक्रमण घर में खाना पकाने के दौरान नहीं, बल्कि सीधे खेतों के स्तर पर असुरक्षित सिंचाई जल या खराब स्वच्छता के कारण फैलता है। चूँकि बहुत से फल और सब्जियाँ कच्चे ही खाए जाते हैं, इसलिए वे इस संक्रमण को फैलाने के सबसे बड़े वाहक बन जाते हैं।

इस जाँच को सबसे ज्यादा जटिल अमेरिका की विशाल फूड सप्लाई चेन बनाती है, जहाँ एक राज्य में उगाई गई फसल को दूसरे राज्य में पैक और प्रोसेस किया जाता है और फिर उसे देश के दर्जनों अलग-अलग राज्यों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।

पूर्व में हुए इसके आउटब्रेक बताते हैं कि पैक्ड सलाद, धनिया, तुलसी, रास्पबेरी, स्नो पीज और हरी प्याज जैसी चीजें इसके फैलने का मुख्य कारण रही हैं और इस बार भी FDA and CDC प्याज, खीरा और धनिए जैसी चीजों पर अपनी जाँच केंद्रित कर रहे हैं।

संक्रमण से बचाव के उपाय और फल-सब्जियों को साफ करने के तरीके

इस पैरासाइट से सुरक्षित रहने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों और न्यूयॉर्क राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने बहुत ही कड़े दिशा-निर्देश और व्यावहारिक सुझाव जारी किए हैं। चूँकि यह पैरासाइट फल और सब्जियों की सतह से बहुत मजबूती से चिपक जाता है, इसलिए केवल साधारण पानी से इसे ऊपर-ऊपर से धो देना काफी नहीं होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रास्पबेरी जैसी बेरीज को साफ करना और भी मुश्किल होता है क्योंकि उनके ऊपर छोटे-छोटे बाल होते हैं जिनमें यह पैरासाइट आसानी से छिपा रहता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले ताजी सब्जियाँ या फल छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को साबुन और पानी से बहुत अच्छे से धोना चाहिए।

सभी कटी हुई या पकी हुई सब्जियों को तैयार करने के दो घंटे के भीतर तुरंत रेफ्रिजरेटर में रख देना चाहिए। इसके अलावा सलाद के पत्तों को इस्तेमाल करने से पहले उनके बाहरी पत्तों को पूरी तरह से हटाकर फेंक देना चाहिए और खीरे या तरबूज जैसी सख्त चीजों को साफ ब्रश से अच्छी तरह रगड़कर धोना चाहिए।

किसी भी फल या सब्जी के खराब हिस्से को खाने से पहले काटकर अलग कर देना चाहिए। हालाँकि इसे जमाने यानी फ्रीज करने से इस पैरासाइट के मरने की कोई गारंटी नहीं होती है, लेकिन भोजन को कम से कम 158 डिग्री फारेनहाइट यानी 70 डिग्री सेल्सियस तक अच्छी तरह पकाना इसे खत्म करने का एकमात्र सबसे सुरक्षित और निश्चित तरीका है।

चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता और इलाज के उपलब्ध विकल्प

यदि किसी व्यक्ति को लगातार कई दिनों तक पानी जैसे दस्त हो रहे हों, पेट में तेज मरोड़ उठ रही हो या शरीर में पानी की कमी के लक्षण जैसे चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, पेशाब कम होना और बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही हो, तो उसे बिना किसी देरी के तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड यानी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह संक्रमण और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनके शरीर में यह बीमारी लंबे समय तक टिकी रह सकती है और उन्हें ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लगता है।

हालाँकि अभी तक इस संक्रमण से किसी के भी मौत की खबर नहीं आई है, लेकिन स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए समय पर इलाज बहुत जरूरी है।

ट्रंप की बेटी इवांका को मारना चाहता था मोहम्मद बाकेर, ईरानी सेना से मिली थी ट्रेनिंग: सुलेमानी की मौत का बदला लेना था मकसद

    ट्रंप और बेटी इवांका (बाएँ), हत्या की साजिश रचने वाला आतंकी मोहम्मद बाकेर (दाएँ), (साभार : CNN & Newyorkpost)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप पर एक बड़ा खतरा टल गया है। अमेरिकी अखबार ‘न्यू यॉर्क पोस्ट’ के अनुसार, इवांका की हत्या की साजिश रचने वाले एक ट्रेंड आतंकी मोहम्मद बाकेर को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस आतंकी के पास से इवांका के फ्लोरिडा वाले घर का पूरा नक्शा मिला है। इस खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह मुस्तैद हो गई हैं।

पकड़े गए आतंकी का पूरा नाम मोहम्मद बाकेर साद दाऊद अल-सादी है। उसकी उम्र 32 साल है। छह साल पहले बगदाद में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरानी सैन्य प्रमुख कासिम सुलेमानी मारा गया था। अल-सादी उसे अपना अब्बू जैसा मानता था। वह सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता था। उसने लोगों से कहा था कि वह इवांका को मारकर ट्रंप से अपना बदला पूरा करेगा।

इंटरनेट पर दी थी खुली धमकी

आरोपित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर काफी एक्टिव था। उसने वहाँ इवांका और उनके पति के 24 मिलियन डॉलर (225 करोड़ रुपए) के घर का नक्शा डाला था। उसने अरबी भाषा में लिखा था कि अमेरिकी महल या सीक्रेट सर्विस भी उन्हें नहीं बचा पाएगी। उसने लिखा कि हमारा बदला बस कुछ ही समय की बात है। वह लोगों को डराने के लिए साइलेंसर लगी पिस्तौल की तस्वीरें भी भेजता था।

तुर्की में पकड़ा गया आरोपित

इस बड़े आतंकी को 15 मई को तुर्की में पकड़ा गया। वह वहाँ से रूस भागने की तैयारी में था। गिरफ्तारी के बाद उसे तुरंत अमेरिका भेज दिया गया। अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, उस पर यूरोप और अमेरिका में 18 हमलों का आरोप है। अभी उसे ब्रुकलिन के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। वहाँ उसे सबसे अलग एक कड़े पहरे वाली कोठरी में बंद किया गया है।

कई देशों में फैलाया था खौफ

यह आतंकी सिर्फ ट्रंप की बेटी इवांका के पीछे नहीं था। वह ‘कथैब हिजबुल्लाह’ और ईरान के ‘IRGC’ जैसे खतरनाक संगठनों से जुड़ा है। उसने एम्स्टर्डम में एक बैंक पर पेट्रोल बम फेंका था। उसने लंदन में दो लोगों पर चाकू से हमला किया था। उसने टोरंटो में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर गोलीबारी भी की थी। इसके अलावा बेल्जियम और रोटरडैम में भी उसने हमले किए थे।

सरकारी पासपोर्ट का उठाया फायदा

रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपित के पास इराक का खास ‘सर्विस पासपोर्ट’ था। यह पासपोर्ट सिर्फ वहाँ के प्रधानमंत्री की इजाजत से मिलता है। इस VIP पासपोर्ट के कारण एयरपोर्ट पर उसकी जाँच नहीं होती थी। उसे हर जगह VIP लाउंज की सुविधा मिलती थी। इसी का फायदा उठाकर वह आसानी से दूसरे देशों में जाता था। वहां वह बड़े आराम से अपने आतंकी नेटवर्क को चला रहा था।

ट्रैवल एजेंसी के नाम पर धोखा

अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए उसने एक तरकीब निकाली थी। उसने मजहबी यात्राएँ कराने वाली एक ट्रैवल एजेंसी खोली थी। इसी एजेंसी की आड़ में वह पूरी दुनिया में घूमता था। वह अलग-अलग देशों में जाकर अपने साथियों से मिलता था। वह सोशल मीडिया पर एफिल टावर जैसी मशहूर जगहों के साथ फोटो डालता था। कई बार वह मिसाइलों और हथियारों के साथ भी अपनी फोटो पोस्ट करता था।

इस मामले पर अभी सब शांत

इवांका ट्रंप ने साल 2009 में अपनी शादी से पहले यहूदी धर्म अपना लिया था। इस बड़ी साजिश के सामने आने के बाद भी अभी सब शांत हैं। न्यू यॉर्क पोस्ट ने इस मामले पर बात करने के लिए व्हाइट हाउस से संपर्क किया था। उन्होंने आरोपित के वकील से भी बात करने की कोशिश की। हालाँकि, अभी तक किसी की भी तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

‘भारतीयों से नफरत करते हैं मेयर जोहरान ममदानी’: ट्रंप के बेटे एरिक ने न्यूयॉर्क के मेयर की मानसिकता को बताया खतरनाक

               ट्रंप के बेटे एरिक (बाएँ), हिंदू विरोधी जोहरान ममदानी (दाएँ), ( साभार : forbes & News18)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटे एरिक ट्रंप ने न्यूयॉर्क के नव-निर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी पर तीखा हमला बोला है। फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में, एरिक ट्रंप ने ममदानी को ‘समाजवादी कम्युनिस्ट’ करार दिया और उन पर ‘भारतीय समुदाय से नफरत’ करने का गंभीर आरोप लगाया।

जानकारी के अनुसार, 34 वर्षीय ममदानी न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम और दक्षिण एशियाई मूल के मेयर बनने वाले हैं। ट्रंप जूनियर ने ममदानी के एजेंडे को खतरनाक बताते हुए कहा कि वह ‘किराना स्टोर का राष्ट्रीयकरण’ करना चाहते हैं, ‘यहूदी लोगों से नफरत करते हैं,’ और वामपंथी एजेंडा चलाकर शहर को कमजोर कर रहे हैं।

एरिक ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ममदानी को ‘सेफ स्ट्रीट, क्लीन स्ट्रीट और रीजनेबल टैक्स’ जैसी बुनियादी बातों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने ममदानी की तुलना वामपंथी नेता अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज से भी की।

राजनीतिक विश्लेषक इसे रिपब्लिकन कैंपेन का हिस्सा मान रहे हैं, जिसमें ममदानी को ‘कट्टर वामपंथी खतरे’ के रूप में पेश किया जा रहा है। ममदानी ने व्यक्तिगत हमलों पर प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है।

भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का चेहरा डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पीटर नवारो ने 50 फीसदी टैरिफ को लेकर फैलाया झूठ, रूसी तेल से उठा रहे US-EU


अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने को सलाहकार पीटर नवारो ने एक के बाद एक 9 ट्वीट कर भारत पर झूठे आरोप लगाए। उनके झूठ की कलई खुल गई है।

नवारो ने भारत के रूस से तेल खरीदने का मुद्दा उठाया। साथ ही, कहा कि भारत राष्ट्रपति पुतिन की ‘युद्ध मशीनरी’ को ताकत दे रहा है।

यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहने वाले नवारो ने कहा कि भारतीय कंपनियाँ रूस के लिए ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ कर रही हैं। उन्होंने 9 ट्वीट का एक थ्रेड लिखा, जिसमें भारत पर लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ का समर्थन किया गया।

नवारो ने दावा किया, “ये केवल भारत के व्यापार के बारे में नहीं है, बल्कि ये पुतिन के युद्ध मशीन को भारत द्वारा दी गई आर्थिक जीवनरेखा को काटने के बारे में है।”

ये बताना जरूरी है कि रूस दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक और निर्यातक देश है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, कच्चे तेल की कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं।

लगभग 1.4 अरब की आबादी वाले भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना था। ईरानी तेल और वेनेज़ुएला के तेल पर संयुक्त राज्य अमेरिका, जी-7 देशों और यूरोपीय संघ (ईयू) ने प्रतिबंध लगाई है, जबकि रूसी तेल पर प्रतिबंध नहीं लगाई है। इनलोगों ने रूसी तेल पर ‘प्राइस कैप’ लगाई है, जो रूसी कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय कीमत को कम रखने रखने में मदद करता है।

भारत ने रूसी तेल की खरीद के माध्यम से किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंड का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि उसने ‘प्राइस कैप’ का पालन किया है।

भारत अगर रूसी तेल नही खरीदता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं। इसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा।

मोदी सरकार के इस फैसले से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर और संतुलित बनी रहीं। और इस तथ्य को कम से कम तीन अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया है, जिनमें अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेन, राजदूत एरिक गार्सेटी और राजनयिक ज्योफ्री पायट शामिल हैं।

एक दूसरे ट्वीट में पीटर नवारो ने आरोप लगाया, ‘‘भारत हमारे डॉलर का इस्तेमाल रियायती दर पर रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए करता है।”

वास्तविकता में, भारत तीसरे देशों से रूसी कच्चा तेल खरीदता है, जहाँ लेन-देन अमेरिकी डॉलर में नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात के दिरहम (एईडी) जैसी मुद्राओं में किया जाता है।

ये बात भी सच है कि अमेरिका ने पहले कभी भी रूसी तेल की खरीद पर आपत्ति नहीं जताई थी, क्योंकि इससे भारत के तेल खरीदने से कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ने से रुकी थीं।

यदि अमेरिका चाहता कि अन्य देश रूसी तेल खरीदना बंद कर दें, तो वह रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा सकता था, जैसा उसने वेनेजुएला और ईरान के मामले में किया था।

पीटर नवारो ने दावा किया, “भारतीय रिफाइनिंग कंपनियाँ, अपने रूसी साझेदारों के साथ मिलकर, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़े मुनाफे के लिए तेल को रिफाइन करके बेचती हैं। इससे रूस को युद्ध के लिए पैसा जुटाने में मदद मिल रही है।”

रूसी कच्चे तेल को ‘काला बाजारी तेल’ कहना भी गलत है, क्योंकि इसकी खरीद पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। सिर्फ ‘प्राइस कैप’ यानी अधिकतम कीमत तय की गई है। भारत सभी अंतरराष्ट्रीय ढाँचों का पालन करता है और रूस में प्रतिबंधित परियोजनाओं से एलएनजी और एलपीजी नहीं खरीदता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार ने दावा किया कि भारत द्वारा रूसी तेल का आयात ‘घरेलू मांग’ से प्रेरित नहीं है, बल्कि अवैध मुनाफाखोरी से प्रेरित है।

इस दावे का कोई सबूत नहीं है। भारत को अपनी 1.4 अरब आबादी के ऊर्जा खर्च को वहन करना है। रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया।

भारत में तेल लोक सेवा उपक्रमों (PSU) ने रूसी तेल खरीदा। अप्रैल 2022 से जनवरी 2023 तक तीन PSUs की कुल हानि Rs 21,000 करोड़ रुपए यानी 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। ये घाटा सिर्फ इसलिए उठाया गया ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें स्थिर रहें।

मोदी सरकार ने ऐसे नियम बनाए, जिनके तहत निजी रिफाइनिंग कंपनियों को अपने निर्यात किए गए पेट्रोल का कम से कम 50% घरेलू बाजार में वापस बेचना अनिवार्य कर दिया गया । डीजल के निर्यात पर भी 30% की सीमा लगा दी गई।

साथ ही, बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी को रोकने के लिए निर्यात पर टैक्स लगाया गया। इन रणनीतिक फैसलों से न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली।

यह बताना जरूरी है कि उस समय ओपेक+ देशों ने कच्चे तेल के उत्पादन में 58.6 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की थी। भारत के समय पर हस्तक्षेप करने और अहम फैसलों ने ईंधन की कीमत नियंत्रित रखने में मदद की।

अपने एक ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, “भारत की बड़ी तेल लॉबी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्रेमलिन के लिए एक विशाल रिफाइनिंग केंद्र और तेल मनी लॉन्ड्रोमेट में बदल दिया है।”

सच तो यह है कि भारत 2022 से नहीं, बल्कि कई दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनकर्ता और निर्यातक रहा है। भारत 150 देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस से ‘रियायती कीमतों’ पर खरीदे गए अधिकांश कच्चे तेल को देश की 23 रिफाइनरियों में से एक में संसाधित करने के बाद घरेलू स्तर पर ही खपत कर लिया गया।

यह सच है कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया ने भारत से परिष्कृत कच्चा तेल और ईंधन खरीदा। लेकिन, देशों के बीच के लेन-देन को ‘लॉन्ड्रिंग’ नहीं कहा जा सकता।

अपने एक ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, “भारत की बड़ी तेल लॉबी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्रेमलिन के लिए एक विशाल रिफाइनिंग केंद्र और तेल मनी लॉन्ड्रोमेट में बदल दिया है।”

सच तो यह है कि भारत 2022 से नहीं, बल्कि कई दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और निर्यातक रहा है। भारत 150 देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस से ‘रियायती कीमतों’ पर खरीदे गए अधिकांश कच्चे तेल को देश की 23 रिफाइनरियों में से एक में संसाधित करने के बाद घरेलू स्तर पर ही खपत कर लिया गया।

यह सच है कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया ने भारत से परिष्कृत कच्चा तेल और ईंधन खरीदा, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने के नाते उन्होंने अपनी इच्छा से ऐसा किया। इसलिए, देशों के बीच के लेन-देन को ‘लॉन्ड्रिंग’ नहीं कहा जा सकता।

एक अन्य ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, ” भारत अब प्रतिदिन 1 मिलियन बैरल से अधिक रिफाइन पेट्रोलियम का निर्यात करता है, जो कि रूस से मँगाए गए कच्चे तेल की मात्रा के आधे से भी अधिक है।"

भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल का लगभग 30-35% हिस्सा है। और सभी रिफाइन पेट्रोलियम उत्पादों का 70% घरेलू माँग को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसलिए, व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार के दावों में सच्चाई नहीं है।

हालाँकि, परिष्कृत रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के फिर से बेचने या निर्यात पर कभी भी ‘कीमत कवर’ नहीं लगाई गई थी। हाल ही में जुलाई 2025 में रूसी कच्चे तेल से परिष्कृत उत्पादों पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे।

वित्तीय वर्ष 2024-2025 में यूरोपीय संघ ने भारत से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात बढ़ा दिया। ये करीब 221 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हो गया है। यूरोपीय संघ रूसी कच्चे तेल से रिफाइन ईंधन के आयात को निलंबित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। फ्रांस, नीदरलैंड और बेल्जियम भारत से पेट्रोलियम उत्पादों के शीर्ष आयातक बने हुए हैं।

पीटर नवारो ने भारत विरोधी बयानबाजी के माध्यम से सोशल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए ‘व्यापार घाटे’ का मुद्दा उठाया।

उन्होंने बेशर्मी से कहा,  "भारत के साथ हमारा 50 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है—और वे हमारे डॉलर का इस्तेमाल रूसी तेल खरीदने के लिए कर रहे हैं। वे खूब पैसा कमा रहे हैं और यूक्रेन के लोग मर रहे हैं।"

सच तो यह है कि अमेरिका यूरोपीय संघ, मेक्सिको और यहाँ तक कि ‘कट्टर प्रतिद्वंद्वी’ चीन के साथ भी बड़ा व्यापार घाटा झेल रहा है। जैसा कि पहले बताया गया है, भारत रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल नहीं करता (क्योंकि यह तेल तीसरे देशों की रिफाइनरियों द्वारा खरीदा जाता है)।

विडंबना यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से संवर्धित यूरेनियम खरीदता है और पीटर नवारो के संदिग्ध तर्क के अनुसार, यह देश पुतिन के युद्ध कोष को ‘आर्थिक मदद’ है।

रूस से अमेरिका का वर्तमान आयात 2024 में 3 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अगस्त 2025 में दावा किया है कि अमेरिका के साथ देश का द्विपक्षीय व्यापार 20% बढ़ गया है।

पीटर नवारो ने भारत पर ‘रणनीतिक मुफ्तखोरी’ का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया, “भारत रूसी हथियार खरीदना जारी रखे हुए है, जबकि माँग कर रहा है कि अमेरिकी कंपनियाँ संवेदनशील सैन्य तकनीक हस्तांतरित करें और भारत में संयंत्र स्थापित करें।”

एक संप्रभु देश होने के नाते, भारत किसी भी साझेदार देश से हथियार खरीदने का विकल्प चुन सकता है। रूस भारत का एक विश्वसनीय सहयोगी रहा है। इसलिए हथियारों और गोला-बारूद का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।

भारत फ्रांस, इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों से भी हथियार खरीदता है। भारत एशिया की एकमात्र बड़ी शक्ति है जो सैन्य रूप से चीन के खतरे का मुकाबला कर सकती है।

भारत और अमेरिका क्वाड और हिंद-प्रशांत रक्षा सहयोग का हिस्सा हैं। चूँकि कूटनीति और व्यापार में कुछ भी मुफ्त नहीं होता, इसलिए भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में ‘रणनीतिक मुफ्तखोरी’ की कोई अवधारणा नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार एवं विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार ने भारत से अमेरिकी आयात पर लगाए गए 50% टैरिफ को सही ठहराया है।

उन्होंने कहा, ” यूक्रेन में शांति का रास्ता नई दिल्ली से होकर गुजरता है। ” सच्चाई यह है कि भारत ने लगातार यूक्रेन और रूस के बीच शांति का आह्वान किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक साक्षात्कार में कहा है , “रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ मेरे घनिष्ठ संबंध हैं।” उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति पुतिन के साथ बैठकर कह सकता हूँ कि यह युद्ध का समय नहीं है। मैं राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से भी दोस्ताना अंदाज में कह सकता हूँ कि भाई, दुनिया में चाहे कितने भी लोग आपके साथ खड़े हों, युद्ध के मैदान में कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा।”

भारत और उसकी सरकार ने हमेशा शांति और कूटनीति की वकालत की है। विडंबना यह है कि जो अमेरिका रूस से यूरेनियम खरीदता है, वही अमेरिका उसी देश से कच्चा तेल खरीदने और वैश्विक बाजारों को स्थिर रखने के लिए भारत पर 50% टैरिफ लगा रहा है।

यह कुछ और नहीं बल्कि ट्रम्प प्रशासन का झूठा बहाना है और भारत को बलि का बकरा बनाने की एक सोची समझी साजिश है। 

अमेरिका के कैथोलिक स्कूल में ट्रांस शूटर रॉबिन वेस्टमैन ने की 2 बच्चों की हत्या-17 घायल, हथियारों पर लिखे ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ जैसे नारे: भारत-इजरायल विरोधी नफरत से भरा था हत्यारा

                                                      रॉबिन वेस्टमैन (फोटो साभार: X_LauraLoomer)
अमेरिका के मिनियापोलिस में 23 साल के ट्रांसजेंडर रॉबिन वेस्टमैन ने एक कैथोलिक चर्च और स्कूल में गोलीबारी कर दी। इस हमले में दो बच्चों की मौत हो गई और 17 लोग घायल हुए, जिनमें 14 बच्चे और 3 बड़े शामिल हैं। रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ लिखा था।

इस्लामी शब्द और भारत को परमाणु हथियारों से खत्म करने की बात के अलावा, रॉबिन ने इजरायल को बर्बाद करने की कसम भी खाई थी। उसने अपनी बंदूक पर ‘इजरायल को खत्म करना होगा’ लिखा था।

 रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना बुधवार (27 अगस्त 2025) सुबह करीब 8:30 बजे हुई, जब बच्चे चर्च में प्रार्थना सभा में शामिल थे। रॉबिन ने चर्च की खिड़कियों के बाहर से गोलियाँ चलाईं, जिससे वहाँ मौजूद लोग दहशत में आ गए। मिनियापोलिस पुलिस प्रमुख ब्रायन ओ’हारा ने बताया कि यह हमला एक सुनियोजित ‘घरेलू आतंकवाद’ और ‘कैथोलिक समुदाय के खिलाफ हेट क्राइम’ के तौर पर जाँचा जा रहा है। रॉबिन ने हमले के बाद खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।

भारत और यहूदी विरोधी नफरत से भरा था हत्यारा

रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर कुछ चौंकाने वाले नारे लिखे थे। उसकी राइफल, शॉटगन और पिस्तौल पर ‘माशाल्लाह’, ‘न्यूक इंडिया’ और ‘इजरायल को खत्म करना होगा’ जैसे शब्द लिखे थे। उसने अपने हथियारों पर ‘बच्चों के लिए’, ‘तुम्हारा भगवान कहाँ है?’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप को मारो’ जैसे नारे भी लिखे थे। इसके अलावा, एक गोला-बारूद की मैगजीन पर ‘स्किबिडी’ शब्द लिखा था, जो एक ऑनलाइन चरमपंथी मंच से जुड़ा हो सकता है।

रॉबिन ने अपने हथियारों पर दो अन्य हत्यारों के नाम भी लिखे थे – ‘रुपनो’ और ‘ब्रेविक’। ‘रुपनो’ का जिक्र संभवतः नटाली रुपनो से है, जिसेने पिछले साल विस्कॉन्सिन में एक स्कूल में गोलीबारी की थी। वहीं ‘ब्रेविक’ का संबंध नॉर्वे के कुख्यात हत्यारे एंडर्स ब्रेविक से हो सकता है, जिसने 2011 में 77 लोगों की हत्या की थी।

रॉबिन ने हमले से पहले यूट्यूब पर दो वीडियो पोस्ट किए थे, जिन्हें अब हटा दिया गया है। पहले वीडियो में उसने सिरिलिक अक्षरों में लिखा एक दस्तावेज़ दिखाया, जो अंग्रेजी में था। दूसरे वीडियो में उसने चार पेज का एक पत्र दिखाया, जिसमें उसने अपने परिवार और दोस्तों से माफी माँगी और अपने दर्द और पीड़ा की बात की।

इन वीडियो में उसने अपने हथियारों का जखीरा भी दिखाया, जिसमें राइफल, पिस्तौल, शॉटगन और कई मैगजीन शामिल थे। हथियारों पर सिल्वर रंग मार्कर से लिखे गए राजनीतिक और नफरत भरे नारे साफ दिख रहे थे। पुलिस ने बताया कि रॉबिन ने ये हथियार पूरी तरह कानूनी तौर पर खरीदे थे।

एफबीआई निदेशक काश पटेल ने इस हमले को कैथोलिक समुदाय के खिलाफ हेट क्राइम बताया है। जाँच में पता चला कि रॉबिन पहले इसी चर्च और स्कूल का छात्र रह चुका था, लेकिन यह साफ नहीं है कि उसने इस जगह को निशाना क्यों बनाया।

एंटी-डिफेमेशन लीग के विश्लेषण के मुताबिक, रॉबिन के लेखन में कैथोलिक, यहूदी, अश्वेत, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय, मुस्लिम और हिस्पैनिक लोगों के खिलाफ नफरत भरे संदेश थे। उसने अपने हथियारों पर ‘बच्चों के लिए’, ‘तुम्हारा भगवान कहाँ है?’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप को मारो’ जैसे नारे भी लिखे थे।

रॉबिन की माँ मैरी वेस्टमैन ने 2019 में कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बच्चे का नाम बदलवाया था, क्योंकि रॉबिन खुद को महिला के रूप में पहचानता था। 2020 में जब रॉबिन 17 साल का था, जज ने इस बदलाव को मँजूरी दी थी। रॉबिन का आखिरी पता साउथ सेंट पॉल इलाके का एक अपार्टमेंट था।

पुलिस ने बताया कि हमले के दौरान स्कूल में पहली हफ्ते की प्रार्थना सभा चल रही थी। बच्चे और शिक्षक नए स्कूल साल की शुरुआत कर रहे थे।

सेंट क्लाउड के बिशप पैट्रिक एम. नियरी ने कहा, “यह एक बेगुनाह लोगों पर किया गया क्रूर हमला है। बच्चे प्रार्थना कर रहे थे, जब गोलियाँ चलीं। हम इस दुख से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।” घायलों में दो बच्चे गंभीर हालत में हैं और तीन बुजुर्ग पैरिशनर भी गोलीबारी में घायल हुए हैं।

रॉबिन की ऑनलाइन गतिविधियों से पता चलता है कि वह नफरत फैलाने वाले ऑनलाइन समुदायों से जुड़ा था। जाँचकर्ता अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उसकी इस हिंसा के पीछे की वजह क्या थी।

साउदर्न पॉवर्टी लॉ सेंटर की रेचल कैरोल-रिवास ने कहा, “यह समझना मुश्किल है कि इस हिंसा की जड़ में क्या था। रॉबिन के विचारों में कई तरह की विचारधाराएँ और नफरत थी, जो किसी एक बॉक्स में फिट नहीं होती।”

यह घटना न केवल मिनियापोलिस बल्कि पूरे अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका है। लोग इस बात से दुखी और गुस्से में हैं कि मासूम बच्चों को निशाना बनाया गया। यूएस होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी क्रिस्टी नोएम ने कहा, “हम उन परिवारों के साथ हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को खोया। हम उनके लिए प्रार्थना करते हैं।”

अलास्का से लौटकर रूस का ‘तोता’ बने ट्रंप ने जेलेंस्की को हड़काया - यूक्रेन को न क्रीमिया मिलेगा, न नाटो में जगह: नोबेल पुरस्कार का उतावलापन; क्या पाकिस्तान के साथ भी यही होने वाला है?

                                                                                                                          साभार: एबीसी न्यूज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ मुलाकात से पहले यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर उन्हें ही हड़का दिया है। ट्रंप ने कहा है कि जेलेंस्की, रूस के साथ इस युद्ध को तुरंत रोक सकते हैं। हाल ही में ट्रंप ने अलास्का में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी बैठक की थी।
ट्रम्प ने जिस तरह जेलेंस्की को हड़काया है यह अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को भी चेतावनी है। भारत के प्रभुत्व के आगे पाकिस्तान कहीं नहीं टिक नहीं पाता। Operation Sindoor से भारत ने अमेरिका तो क्या दुनियां को बता दिया कि पाकिस्तान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इसलिए ट्रम्प तो क्या कोई देश ज्यादा पाकिस्तान को ज्यादा भाव नहीं देगा। क्योकि दुनिया ने देख लिया कि पाकिस्तान भारत विरुद्ध जहर फैला कर भारत विरोधियों को ब्लैकमेल कर भीख मांगता रहा है। 

ट्रंप-पुतिन की इस बैठक का कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकला लेकिन ट्रंप ने बैठक के बाद यह लगभग साफ कर दिया था कि अब शांति स्थापित करने का जिम्मा जेलेंस्की का है। अब ट्रंप ने अपनी बात को और मुखरता के साथ दोहराया है। पुतिन के साथ बैठक को ट्रंप ने सार्थक बताया था।

ट्रंप ने क्या कहा?

ट्रंप ने जेंलेंस्की को हड़काते हुए अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट किया है। ट्रंप ने लिखा है, “यूक्रेन के राष्ट्रपति जेंलेंस्की चाहें तो रूस के साथ युद्ध तुरंत खत्म कर सकते हैं, या फिर वह लड़ाई जारी रख सकते हैं। याद कीजिए कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी।”

हालाँकि, ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ किया कि ना तो यूक्रेन को क्रीमिया वापस नहीं मिलेगा, जिसे 12 साल पहले बराक ओबामा के दौर में बिना गोली चले रूस ने हथिया लिया था और ना ही यूक्रेन को NATO में शामिल होने दिया जाएगा। ट्रंप ने लिखा कि कुछ चीजें कभी नहीं बदलती हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने लगातार यूक्रेन के NATO में शामिल होने का विरोध किया है और मौजूदा रूस-यूक्रेन संघर्ष की बड़ी वजह भी यूक्रेन का NATO की सदस्यता लेने की पहल करना माना जाता है। जनवरी में ट्रंप के दोबारा अमेेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले NATO देशों ने यूक्रेन को सदस्यता दिए जाने पर सहमित व्यक्त कर दी थी।

वहीं, ट्रंप के साथ मुलाकात के लिए जेलेंस्की अमेरिका पहुँच गए हैं। उनका कहना है कि यूक्रेन अपनी अखंडता और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। जेलेंस्की का कहना है कि वह युद्ध रोकने के लिए अपनी शर्तों पर ही तैयार होंगे।

इसके अलावा जेलेंस्की ने शांति समझौते के लिए ट्रंप की सुरक्षा की गारंटी देने की पेशकश की सराहना की है। वहीं, एक अमेरिकी प्रतिनिधि ने दावा किया कि पुतिन यूक्रेन के लिए संभावित नाटो जैसे सुरक्षा समझौते पर सहमत हो गए हैं।

जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मिलेंगे ट्रंप

रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मुलाकात करेंगे। ट्रंप ने इस मुलाकात को लेकर कहा, “व्हाइट हाउस में एक बड़ा दिन होगा। इतने सारे यूरोपीय नेता एक साथ कभी नहीं आए। उनकी मेजबानी करना मेरे लिए सम्मान की बात है।”

NATO के महासचिव मार्क रूटे, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर भी ट्रंप के साथ मुलाकात करेंगे। दावा किया गया है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब और यूरोपीय यूनियन की अध्यक्षा उर्सुला वॉन डेर लेयन भी बातचीत में शामिल होंगे।

इससे पहले जब व्हाइट हाउस में मुलाकात के दौरान ट्रंप, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जेलेंस्की के बीच खूब बहसबाजी हुई थी।

हालाँकि, अब इस चर्चा को लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि इससे रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर कोई ठोस नतीजा सामने आ सकता है। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उतावले ट्रंप अब इस संघर्ष को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाते दिख रहे हैं।

अडानी पर फर्जी रिपोर्ट देने वाला OCCRP अमेरिकी दलाल, स्वतंत्र संस्था नहीं: वामपंथी MediaPart ने छापी खबर, भाजपा ने शेयर किया तो ‘फेक न्यूज’ बता रोने लगा; MediaPart सोनिया गाँधी की उपस्थिति में राहुल द्वारा चीन के साथ हुए MoU के बारे में क्यों नहीं छापता?

                                मीडियापार्ट ने भाजपा की निंदा की है (फोटो साभार: The Hindu)

हिन्दू सम्राटों द्वारा देश में जितना विकास किया गया था जिस कारण भारत सोने की चिड़िया कहलाता था, उसको मलियामेट अफवाह, जयचन्दों और मीर ज़ाफरों द्वारा कर दिया गया। वही कुकर्म आज संविधान की शपथ लेकर घूम रहे तथाकथित नेताओं द्वारा किया जा रहा है। इन्हे देश नहीं अपनी तिजोरी और परिवार की चिंता है। लेकिन भूल रहे है कि जिन देश विरोधियों के इशारे पर नाच रहे हैं इन कठपुतलियों का उसी तरह नामोनिशान मिट जायेगा जैसे 
जयचन्दों और मीर ज़ाफरों का। ऐसी कठपुतलियों को वोट देने से पहले जनता सोंचना चाहिए। इन्हें जनता की लेशमात्र भी चिंता नहीं। जनसेवा की आड़ में अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित यह सन्देश बहुत बड़ा सन्देश है, आजकल तथाकथित छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेताओं से सावधान रहने की जरुरत है, जो अपने स्वार्थ के लिए देश विरोधियों के इशारे पर नाच संसद का समय बर्बाद नहीं कर रहे बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने का खतरनाक खेल खेल रहे हैं। 

फ्रांस का वामपंथी मीडिया संस्थान मीडियापार्ट अब कथित तौर पर भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) से नाराज़ है। मीडियापार्ट की नाराजगी का कारण उसी की एक रिपोर्ट का भाजपा द्वारा इस्तेमाल है। मीडियापार्ट ने हाल ही में अडानी समूह पर आरोप जड़ने वाले OCCRP पर एक रिपोर्ट छापी थी। इसमें OCCRP के लिंक अमेरिकी विदेश विभाग से जुड़े बताए गए थे। भाजपा ने इस रिपोर्ट के आधार पर कॉन्ग्रेस समेत अमेरिका को निशाने पर लिया था।

मीडियापार्ट की रिपोर्ट में बताया गया था कि अडानी समूह पर दो हिट पीस प्रकाशित करने वाले ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की फंडिंग का आधे से अधिक हिस्सा अमेरिकी विदेश विभाग से आता है। OCCRP खुद को एक स्वतंत्र संस्थान बताता आया है। इस रिपोर्ट के बाद स्पष्ट हुआ था कि OCCRP अमेरिका के कहने पर विदेशों में अलग-अलग कम्पनियों या सरकारों को निशाना बनाता है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद भाजपा ने इसके कुछ हिस्से साझा किए थे। भाजपा ने भारत और भारतीय कम्पनियों के खिलाफ की गई बड़ी साजिश की तरफ इशारा किया था। हालाँकि, भाजपा का रिपोर्ट के कुछ हिस्से साझा करना मीडियापार्ट को पसंद नहीं आया। मीडियापार्ट ने इसको लेकर एक बयान जारी किया है।

भारत में मीडियापार्ट की रिपोर्ट पर हुए सियासी हँगामे के बाद इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मीडियापार्ट ने 7 दिसंबर को कहा, “मीडियापार्ट OCCRP के बारे में हाल ही में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट के पीएम मोदी का एजेंडा बढ़ाने और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करने के लिए भाजपा द्वारा इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा करता है।”

मीडियापार्ट की डायरेक्टर और प्रकाशक कैरीन फाउटेउ ने कहा कि भाजपा ने फर्जी खबरें फैलाने के लिए मीडियापार्ट के लेख का गलत तरीके से फायदा उठाया है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया वह मीडियापार्ट ने प्रकाशित नहीं की…भाजपा द्वारा प्रचार की जा रही साजिश की योजना के पक्ष में कोई भी तथ्य उपलब्ध नहीं हैं।” मीडियापार्ट ने इस बीच यह नहीं बताया कि भाजपा द्वारा कौन सा हिस्सा साझा किया आना साजिश के तहत आता है।

2 दिसंबर, 2024 को मीडियापार्ट ने ‘द हिडेन लिंक्स बिटवीन जायंट ऑफ़ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म एंड यूएस गवर्मेंट’  शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जिसमें OCCRP के कामकाज में अमेरिकी सरकार के हस्तक्षेप की बात की गई थी। मीडियापार्ट ने इस रिपोर्ट में बताया कि OCCRP खुद को भले ही पूरी तरह से स्वतंत्र बताता है, लेकिन इसके मैनेजमेंट ने इसे अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर कर दिया है। मीडियापार्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भी OCCRP की फंडिंग का लगभग 50% से अधिक अमेरिकी एजेंसियाँ देती हैं।

अडानी पर हमले का OCCRP का है इतिहास

अगस्त 2023 में, ऑपइंडिया ने भविष्यवाणी की थी कि OCCRP अमेरिका स्थित शॉर्ट सेलर ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ के नक्शेकदम पर चलते हुए भारतीय बाजार में उथल-पुथल मचाने की योजना बना रहा है। हमने खुलासा किया था कि OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF), फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर ब्रदर्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से फंड मिलता है।
OSF ने संगठन की क्रॉस-बॉर्डर रिपोर्टिंग को ‘मजबूत’ करने और प्रभाव बढ़ाने के लिए संगठित OCCRP को $8,00,000 (₹6.61 करोड़) का अनुदान भी दिया। ‘पत्रकारों के नेटवर्क’ ने अब तक दो हिट लेख प्रकाशित किए हैं। एक अगस्त 2023 में और दूसरा मई 2024 में। अडानी समूह और मॉरीशस स्थित फंड ‘360 वन’ द्वारा OCCRP के इन दावों को खारिज कर दिया गया।
यहाँ तक ​​कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया था कि OCCRP की रिपोर्ट का इस्तेमाल सेबी द्वारा चल रही जाँच पर संदेह जताने के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी सत्यापन के किसी संगठन की रिपोर्ट पर सबूत के तौर पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
मीडियापार्ट के खुलासे ऐसे समय में हुए हैं जब गौतम अडानी को रिश्वतखोरी के कथित आरोपों को लेकर अमेरिका में परेशान किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिस USAID से OCCRP पैसा लेता है, वह कई देशों में सरकारें बदलने के लिए ज़िम्मेदार रहा है।

‘जब चाहे मालिक करेगा सेक्स, गुलाम को झुकना पड़ेगा’ : CEO ने महिला कर्मचारी से साइन कराया कॉन्ट्रैक्ट

                       यूएस कंपनी के सीईओ ने कर्मचारी से साइन कराया स्लेव कॉन्ट्रैक्ट
सैन फ्रांसिस्को टेक कंपनी का जो यौन उत्पीड़न मामला सामने आया है, कोई नयी अथवा हैरान करने वाली नहीं। सैन फ्रांसिस्को टेक कंपनी ने तो कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाया है, लेकिन विश्व में न जाने ऐसे कितने संस्थान है, जहाँ यौन उत्पीड़न सामान्य बात है। महिला उसे नौकरी का हिस्सा मान मालिक के हर काम को करने को तैयार रहती है। अंतर केवल इतना है कि किसी का प्रकाश आ जाता है, कहीं संस्थान से बाहर हवा तक नहीं आती। कर्मचारियों को अपने परिवार की खातिर मान-मर्यादा को भूलना पड़ता है, और इस कटु सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता, चर्चा तक नहीं कर सकता। 

सैन फ्रांसिस्को टेक कंपनी ‘Tradeshift’ के सीईओ क्रिश्चियन लैंग पर आरोप लगा है कि वो अपने असिस्टेंट से एक कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाकर उसका यौन उत्पीड़न करते थे। आरोप है कि क्रिश्चियन ने अपनी एग्जिक्यूटिव असिस्टेंट को हायर करने के कुछ महीने बाद ही गुलाम बनाने का ये कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाया था।

पीड़िता का नाम कोर्ट डॉक्यूमेंट में जेन डो कहा गया है। उसने अपनी शिकायत में कहा कि उसका रेप सालों से किया जा रहा था। पीड़िता ने कहा कि उसे विभिन्न तरीरकों से शारीरिक दर्द दिए गए। कभी उसके ऊपर पेशाब किया गया तो कभी विदेशी चीजों को उसके प्राइवेट पार्ट में डाला जाता था।

कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार ‘स्लेव’ को हमेशा अपने मालिक के लिए सेक्सुअल फेवर देने के लिए उपलब्ध रहना था, जब भी उसके मालिक को सेक्स की जरूरत लगती तो कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से वो उन्हें नहीं मना कर सकती थीं चाहे उसका मन हो या नहीं। इतना ही नही कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक लड़की को ये भी करने को कहा गया था कि वो जब भी अपने मालिक को अकेले में देखें तो घुटनों पर झुककर उनसे पूछे कि वो उनके लिए क्या कर सकती है।

                                                                                                  साभार: NYTimes

दस्तावेज में कहा गया था महिला को गुलाम बनाकर दी जाने सजाओं का भी जिक्र था। इसमें लिखा था कि मालिक जो चाहे वो सजा गुलाम को दे सकता है। लेकिन मालिक की ये जिम्मेदारी होगी कि वो सजा देते समय महिला को जान से नहीं मारेगा और न उसे पर्मानेंट इंजरी देगा। इतना ही नहीं कॉन्ट्रैक्ट में ये भी था गुलाम कैसे भी करके इन सजाओं को पाकर नाराज नहीं हो सकती थी और न ही अपने मालिक से नाराजगी जाहिर कर सकती थी।

महिला ने शिकायत में कहा कि उसे लैंग ने खून निकालने तक मारा और निर्जीव वस्तुओं के जरिए उसका उत्पीड़न किया। उसे कॉन्ट्रैक्ट में कहा गया था कि वो हमेशा ढंग से तैयार होकर रहे और खुद का वजन 130 से 155 पाउंड रखे। इसके अलावा गुलाम का समर्पण मालिक के प्रति हर प्रकार से रहना चाहिए। उसका शरीर मालिक का होना चाहिए। वो अगर उसे फिट देखना चाहता है तो शरीर को फिट ही होना चाहिए।

                                                                                                                      साभार: NYTimes

कोर्ट में दी शिकायत के अनुसार, महिला को अपनी जॉब Tradeshift में प्यारी थी इसलिए उसे ये सब करना पड़ा। बाद में उसने शारीरिक प्रताड़नाओं से तंग आकर शिकायत दी। इस शिकायत के बाद ट्रेडशिफ्ट ने अपने ऊपर लगाए इल्जामों को नकारा और कड़ा निर्णय लेते हुए क्रिश्चियन को उसके पद से टर्मिनेट कर दिया। मेल में कंपनी ने कहा कि लैंग के विरुद्ध बहुत सारी शिकायतें मिल रही थीं।

वहीं लैंग ने कहा कि उन दोनों के बीच बने संबंध रजामंदी के थे न कि किसी जोर जबरदस्ती के। उसने कोर्ट में डाली गई शिकायत पर को मानहानि करने वाला बताया। उसने कहा पूरा मुकदमा झूठा है। उसके मुताबिक सीईओ रहते हुए उसने किसी का यौन उत्पीड़न नहीं किया। महिला से संबंध थे लेकिन वो पहले के थे। उसके कंपनी ज्वाइन करने के बाद वो सब खत्म हो गया।

कई लोगों को क्रिश्चियन लैंग की हरकत देखने के बाद फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे फिल्म की स्क्रिप्ट याद आ रही है। इस फिल्म में भी एक बिजनेसमैन ने महिला को सेक्स के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने को कहा था।