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ट्रंप के ‘सीजफायर’ दावे के बीच गाजा में फिर बरसे इजरायली बम: 4 की मौत, हमास बोला- पहले सेना हटाओ, तभी देंगे हथियार

                      इजरायल ने लगातार दूसरे दिन गाजा पर किए हवाई हमले (फोटो साभार: Arab news)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा में पिछले वर्ष हुए संघर्षविराम समझौते को लागू करने की दिशा में बड़ी प्रगति का दावा किए जाने के बावजूद इजरायल ने रविवार (2 अगस्त 2026) को लगातार दूसरे दिन गाजा पट्टी पर हवाई हमले जारी रखे।

फिलिस्तीनी स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, इन हमलों में कम से कम चार की मौत हो गई जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। इजरायली लड़ाकू विमानों ने गाजा सिटी और मध्य गाजा के दीर अल-बलाह में अलग-अलग स्थानों को निशाना बनाया।

स्वास्थ्य अधिकारियों और चिकित्सकों के मुताबिक, दीर अल-बलाह में एक अपार्टमेंट पर हुए हवाई हमले में एक दंपति की मौत हो गई और चार अन्य लोग घायल हो गए। वहीं गाजा सिटी में एक अन्य अपार्टमेंट पर हुए हमले में एक बच्चे समेत दो लोगों की जान चली गई।

इन हमलों ने ऐसे समय में तनाव और बढ़ा दिया है, जब अमेरिका की मध्यस्थता में संघर्षविराम समझौते को लागू करने की कोशिशें तेज होने का दावा किया जा रहा है।

संघर्षविराम लागू करने की कोशिशें, लेकिन हथियारों और सैन्य वापसी पर बना गतिरोध

इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि गाजा में संघर्षविराम समझौते को लागू करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। उनका कहना था कि अमेरिकी समर्थन वाली पहल के तहत हमास ने अपने हथियार छोड़ने पर सहमति जताई है।
इसके बाद ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने संघर्षविराम समझौते को लागू करने के अंतिम चरणों का विवरण देते हुए 15 बिंदुओं वाला एक रोडमैप भी जारी किया। हालाँकि यह रोडमैप अभी तक लागू नहीं हो सका है।
हमास ने स्पष्ट किया है कि वह अपने हथियार केवल सुरक्षित भंडारण के लिए तभी सौंपेगा, जब इजरायल पिछले वर्ष हुए समझौते के अनुरूप अपने सैन्य अभियान बंद करेगा और गाजा से अपनी सेना वापस बुलाएगा।
दूसरी ओर एक इजरायली अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा कि जब तक हमास का ‘वास्तविक निरस्त्रीकरण’ (Genuine disarmament) नहीं होता, तब तक इजरायल अपनी मौजूदा सैन्य तैनाती से पीछे नहीं हटेगा।

नेतन्याहू की चुप्पी, बेन-गवीर का विरोध और मोहम्मद दहलान का बड़ा दावा

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी पहल पर अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने इस पहल को अस्वीकार्य बताते हुए कहा है कि इजरायल को हमास के नेताओं के खिलाफ लक्षित हमले जारी रखने चाहिए।

इस बीच संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे फतह के पूर्व वरिष्ठ नेता मोहम्मद दहलान ने फेसबुक पोस्ट में दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और इस पहल से जुड़े वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर ने उन्हें बताया है कि वह गाजा पर इजरायली हमले रुकवाने के लिए इजरायली पक्ष के साथ काम कर रहे हैं।

दहलान ने कहा कि अमेरिका के साथ संपर्क लगातार जारी है ताकि संघर्षविराम समझौते को पूरी तरह लागू कराया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि इजरायल गाजा पर अपने दैनिक हमले पूरी तरह बंद करता है या नहीं।

US की अगुवाई में गाजा की ‘पीस व्यवस्था’ संभालेगी इंटरनेशनल फोर्स, हमास समेत सभी आतंकी संगठन डालेंगे हथियार: डोनाल्ड ट्रंप ने किया ऐलान

                               बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो साभार: AFP)
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को दावा किया कि उनके नेतृत्व में बने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने गाजा में हमास और बाकी सभी आतंकी संगठनों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर एक ‘ऐतिहासिक समझौता’ कर लिया है। ट्रंप ने इसे मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम बताया। हालाँकि, इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं, क्योंकि न तो इजरायल ने आधिकारिक मंजूरी दी है और न ही हमास ने ट्रंप के दावे की पूरी तरह पुष्टि की है।

ट्रंप ने यह घोषणा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर की। उन्होंने लिखा, “आज बोर्ड ऑफ पीस ने गाजा में हमास और अन्य सभी हथियारबंद समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर ऐतिहासिक समझौता किया है। यह स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में एक बेहद बड़ा कदम है।”

ट्रंप ने बताया कि इस समझौते के बाद गाजा पर अब हमास का शासन नहीं रहेगा। इसकी जगह एक नई फिलिस्तीनी सरकार बनाई जाएगी, जो बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी और गाजा के लोगों के लिए प्रशासन चलाएगी। ट्रंप ने कहा कि इससे एक तरफ फिलिस्तीनियों को नया प्रशासन मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ इजरायल को वह सुरक्षा मिलेगी जिसकी वह लंबे समय से माँग करता रहा है। उनका कहना है कि अब गाजा का इस्तेमाल इजरायल पर आतंकी हमलों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

कई चरणों में लागू होगा पूरा प्लान

ट्रंप ने बताया कि यह समझौता एक साथ लागू नहीं होगा, बल्कि इसे कई चरणों में पूरा किया जाएगा। जैसे-जैसे हमास और बाकी संगठनों का निरस्त्रीकरण पूरा होगा, वैसे-वैसे IDF यानी इजरायली सेना गाजा से अपनी वापसी शुरू करेगी।

इसके बाद गाजा की सुरक्षा की जिम्मेदारी एक इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स (International Stabilization Force) और नई बनाई जाने वाली फिलिस्तीनी पुलिस के हाथों में जाएगी। इन दोनों का काम होगा कि गाजा अपने नागरिकों और पड़ोसी देशों के लिए सुरक्षित बना रहे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित योजना के तहत हमास के हथियार, रॉकेट, भारी हथियार, सुरंगों और सैन्य ढाँचे को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा। पूरा निरस्त्रीकरण लगभग 200 से 350 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालाँकि, इसके लिए अभी कोई डेडलाइन तय नहीं मानी जा रही है।

ट्रंप ने इसे बताया ‘Trump 20-Point Plan’ का बड़ा पड़ाव

ट्रंप ने कहा कि यह समझौता उनके ‘Trump 20-Point Plan’ को लागू करने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। यह वही योजना है, जिसे गाजा युद्ध खत्म करने, वहाँ नई सरकार बनाने, सुरक्षा व्यवस्था बदलने और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण के लिए तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा कि एक साल पहले गाजा में भीषण युद्ध चल रहा था, मानवीय संकट चरम पर था और बंधकों को कैद करके रखा गया था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। हालाँकि ट्रंप ने यह भी माना कि अभी ‘बहुत काम बाकी है।’

मिस्र, कतर और तुर्किये का किया आभार

ट्रंप ने इस समझौते के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये की मध्यस्थता की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों ने बातचीत आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने अपनी बातचीत करने वाली टीम की भी तारीफ करते हुए कहा कि उनकी लगातार मेहनत की वजह से यह ऐतिहासिक सफलता मिली।

7 अक्टूबर जैसे हमले दोबारा नहीं होंगे: ट्रंप

अपने बयान में ट्रंप ने 7 अक्टूबर 2023 के हमले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “7 अक्टूबर को गाजा से जो खतरा पैदा हुआ था, उसे दोबारा कभी खड़ा नहीं होने दिया जाएगा।”

उन्होंने कहा कि समझौते के बाद गाजा पूरी तरह ऐसी नई फिलिस्तीनी सरकार के हाथ में होगा, जो वहाँ के लोगों के लिए काम करेगी, न कि आतंकवादी गतिविधियों के लिए।

अंत में ट्रंप ने इस समझौते के लिए सभी को बधाई दी और अपने विरोधियों को जवाब देते हुए कहा, “जिसके बारे में सब कहते थे कि इसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता।”

इजरायल और हमास की मंजूरी नहीं

हालाँकि ट्रंप ने इसे ऐतिहासिक सफलता बताया है, लेकिन इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमास ने अभी तक ट्रंप के दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। Reuters को हमास के सूत्रों ने बताया कि यह अभी एक मसौदा है और किसी भी तरह का निरस्त्रीकरण तभी शुरू होगा, जब इजरायल पहले गाजा से सेना हटाएगा।

दूसरी तरफ, इजरायल ने भी इस समझौते पर आधिकारिक सहमति नहीं दी है। इजरायल के एक अधिकारी ने Reuters को बताया कि इस समझौते को लेकर ट्रंप के ऐलान से पहले इजरायल इस प्रस्ताव को खारिज कर चुका है।

इजरायली अधिकारियों का कहना है कि उनकी माँग हमास के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह खत्म करना है और ट्रंप जिस 15 सूत्रीय दस्तावेज की बात कर रहे हैं, उसमें इन माँगों का जवाब नहीं दिया गया है और इसीलिए इजरायल इसे नहीं मान रहा है।

‘ईरान का अस्तित्व खत्म होगा’: ट्रंप की धमकी के बीच फिर शुरू युद्ध, अमेरिका ने कई सैन्य ठिकानों पर किए हमले; शिया मुल्क ने भी कुवैत-बहरीन के US अड्डों को बनाया निशाना

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध एक बार फिर शुरू हो गया है और दोनों देशों ने एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले किए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर रविवार (28 जून 2026) को अमेरिकी सेना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए।

अमेरिका का दावा है कि ईरान ने सीजफायर समझौते का उल्लंघन करते हुए एक तेल टैंकर पर ड्रोन हमला किया था, जिसके जवाब में यह कार्रवाई की गई। वहीं, अब ईरान ने भी पलटवार करते हुए कुवैत और बहरीन में मौजूद सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए है।

 डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अमेरिकी विमानों ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज ठिकानों के साथ-साथ तटीय रडार साइटों को निशाना बनाया है।

उन्होंने कहा कि ईरान ने एक बार फिर सीजफायर तोड़ा है। ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान नहीं माना तो अमेरिका उस अभियान को पूरा करेगा जिसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ऐसी नौबत आई तो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का अस्तित्व भी खत्म हो सकता है।

अमेरिकी सेना ने क्या बताया?

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, यह कार्रवाई ईरान की ओर से एक कमर्शियल ऑयल टैंकर ‘किकू’ पर कथित ड्रोन हमले के जवाब में की गई। अमेरिका का दावा है कि जहाज करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर होरमुज से गुजर रहा था।

इसके बाद अमेरिकी सेना ने होरमुज के आसपास ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर हमला किया। इन हमलों में मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज, एयर डिफेंस सिस्टम, निगरानी प्रणाली, संचार नेटवर्क और समुद्र में बारूदी सुरंग बिछाने से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया।

ईरान का पलटवार, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर हमला

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने बताया कि उसकी नौसेना और एयरोस्पेस फोर्स ने संयुक्त अभियान चलाते हुए कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं।

IRGC के अनुसार यह कार्रवाई हालिया अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई। संगठन ने यह भी कहा कि सीजफायर का उल्लंघन इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन की पहली शर्त के खिलाफ है और इससे सभी कूटनीतिक प्रक्रियाएँ पूरी तरह रुक सकती हैं।

करोड़ों का इनाम, जेल से शुरुआत… ट्रंप ने जिस आतंकी संगठन ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को बताया ‘खून का प्यासा’ के सरगना नीनो गुएरेरो को US ने किया ढेर

        आतंकी संगठन 'ट्रेन डी अरागुआ' का मुख्य सरगना नीनो गुरेरो को US ने मार गिराया (फोटो साभार : BBC)
जुर्म का अंत हमेशा बुरा होता है। अपराधी चाहे कितना भी ताकतवर हो, वह बच नहीं सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सीधे आदेश ने इस बात को सच साबित कर दिया है। उनके आदेश पर अमेरिकी सेना ने एक बड़ा हवाई हमला किया। इस हमले में वेनेजुएला का सबसे खूंखार गैंगस्टर नीनो गुएरेरो मारा गया है। नीनो गुएरेरो ‘ट्रेन डी अरागुआ’ नाम के खतरनाक आतंकी संगठन का मुख्य सरगना था। ट्रंप ने इस गैंग को ‘खून का प्यासा’ बताया। उसका खूनी साम्राज्य लातिन अमेरिका से लेकर अमेरिका तक फैला हुआ था। ट्रंप ने इस सफलता का खुद एलान किया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अब दुनिया में कहीं भी इन अपराधियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है।

ट्रंप का सीधा आदेश और पेंटागन का बड़ा एक्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़े सैन्य ऑपरेशन की जानकारी दी। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना के ‘साउदर्न कमांड’ ने यह हमला किया था। यह हमला बेहद तेज और जानलेवा था। इस हमले का मुख्य मकसद ‘ट्रेन डी अरागुआ’ के कुख्यात लीडर नीनो गुएरेरो को खत्म करना था। ट्रंप ने इस संगठन को धरती का सबसे क्रूर और हिंसक आतंकी गिरोह बताया है।
पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ ने भी इस हमले की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसके बारे में बताया। यह हवाई हमला इसी सप्ताह की शुरुआत में किया गया था। पूरी जाँच के बाद अब साफ हो चुका है कि गुएरेरो इस हमले में मारा गया है। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई का एक Video भी जारी किया है। इस Video में तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है।

वेनेजुएला सरकार की पुष्टि और संयुक्त खुफिया ऑपरेशन

इस खूंखार आतंकी को ढेर करने में वेनेजुएला सरकार ने भी अमेरिका का साथ दिया है। वेनेजुएला के सूचना और संचार मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया कि यह एक साझा ऑपरेशन था। सुरक्षाबलों और इस आपराधिक संगठन के बीच काफी देर तक भीषण मुठभेड़ चली। इस मुठभेड़ के दौरान ही आतंकी नीनो गुएरेरो को ‘न्यूट्रलाइज’ यानी हमेशा के लिए शांत कर दिया गया।
यह पूरा ऑपरेशन दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों की गहरी सूझबूझ का नतीजा था। इसमें आधुनिक तकनीक और हाई-टेक सपोर्ट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। वेनेजुएला की सरकार ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के साथ मिलकर इस खूंखार अपराधी की हर हरकत पर नजर रखी थी। इसके बाद सही मौका मिलते ही इस पर अंतिम प्रहार किया गया।

न्यूयॉर्क कोर्ट में काला चिट्ठा और 41 करोड़ का इनाम

नीनो गुएरेरो लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के निशाने पर था। पिछले साल दिसंबर में न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट में उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई थी। उस पर नार्को-आतंकवाद, जबरन वसूली, हत्या की साजिश और आतंकियों को हथियार और पैसा सप्लाई करने जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज थे। वह एक दशक से ज्यादा समय से इन वारदातों को अंजाम दे रहा था।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने गुएरेरो की गिरफ्तारी या उसके बारे में सही जानकारी देने वाले को 50 लाख डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया था। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब 41 करोड़ रुपए बैठती है। अमेरिकी वकीलों के मुताबिक, नीनो गुएरेरो का यह गैंग (खून का प्यासा) पूरे उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के कई देशों में अनगिनत हत्याओं और ड्रग्स की तस्करी के लिए जिम्मेदार था।

जेल से चला साम्राज्य और ‘डॉन’ का जन्म (2013)

इस खूंखार गैंग ‘ट्रेन डी अरागुआ’ की शुरुआत साल 2005 में एक मजदूर संगठन के रूप में हुई थी। वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के राज में एक रेलवे लाइन का निर्माण हो रहा था। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों ने मिलकर एक यूनियन बनाई। लेकिन जल्द ही इन मजदूरों के मन में लालच आ गया। उन्होंने ठेकेदारों को डराना और उनसे पैसे ऐंठना शुरू कर दिया। साल 2011 में जब सरकार ने यह रेलवे प्रोजेक्ट बंद किया, तो वो मजदूर पूरी तरह एक क्रिमिनल गैंग बन चुके थे। नाम पड़ा- ‘ट्रेन डी अरागुआ’ (अरागुआ की ट्रेन)।

साल 2013 में इस गैंग की कमान मिली हेक्टर रस्टेनफोर्ड गुएरेरो उर्फ नीनो गुएरेरो को। नीनो वेनेजुएला की सबसे बदनाम ‘तोकोरॉन जेल’ (Tocorón Prison) में बंद था। लेकिन वह मामूली कैदी नहीं था, वह वहाँ का ‘प्रान’ (जेल का डॉन) बन गया। उसने जेल के अंदर ही ऐश-ओ-आराम का महल बनाया। वहीं बैठे-बैठे उसने पूरे देश में ड्रग्स, जबरन वसूली और इंसानों की तस्करी का धंधा फैला दिया।

मजबूरी का फायदा और सरहदें पार

साल 2015 में वेनेजुएला में भयंकर गरीबी और भुखमरी फैल गई। लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे। नीनो गुएरेरो ने इस मजबूरी को धंधा बना लिया। उसके गैंग ने बॉर्डर पर कब्जा किया और भागने वाले गरीबों से टैक्स वसूलने लगे। इतना ही नहीं, इस गैंग के शातिर अपराधी आम शरणार्थियों के भेष में कोलंबिया, पेरू, चिली और अमेरिका जैसे देशों में घुस गए।

इन देशों में जाकर उन्होंने वेनेजुएला के ही प्रवासियों को अपना शिकार बनाना शुरू किया। उन्होंने वहाँ महिलाओं की तस्करी की और छोटे स्तर पर ड्रग्स बेचने का धंधा शुरू कर दिया। लातिन अमेरिका की पुलिस के मुताबिक, इस गैंग ने कई देशों में अपनी परमानेंट सेल (गुप्त ठिकाने) बना ली थीं।

चिली में पूर्व सैन्य अधिकारी की हत्या से मचा था हड़कंप

‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अपनी बेरहमी और खौफनाक हत्याओं के लिए जाना जाता है। मार्च 2023 में इस गैंग ने चिली में एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिससे दो देशों के बीच तनाव बढ़ गया। गैंग के शूटरों ने वेनेजुएला की सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट और सरकार के विरोधी रोनाल्ड ओजेडा का अपहरण कर लिया। इसके बाद उनकी बेहद क्रूरता से हत्या कर दी गई।

यह गैंग पनामा से लेकर ब्राजील तक फैल चुका था। अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, सुपारी लेकर हत्या करना और बड़े-बड़े मॉल में डकैती डालना इनका रोज का काम था। साल 2023 में जब वेनेजुएला की सेना ने इनकी तोकोरॉन जेल पर धावा बोला, तो गुएरेरो जेल के नीचे बनी एक गुप्त सुरंग से अपने साथियों के साथ भाग निकला था। तब से वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था।

अमेरिका के ऑरोरा में घुसपैठ और ट्रंप का चुनावी मुद्दा

पिछले साल अगस्त में अमेरिका के कोलोराडो राज्य के ऑरोरा शहर से एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ हथियारबंद वेनेजुएला के प्रवासी एक अपार्टमेंट की बिल्डिंग में जबरन घुसते दिखे थे। इस घटना के बाद वहाँ के मकान मालिक और नेताओं ने दावा किया कि ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने अमेरिका की सोसायटियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को बहुत जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने ऑरोरा शहर में एक बड़ी रैली की थी और मंच पर इन अपराधियों के पोस्टर लगाए थे। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वह राष्ट्रपति बनते ही देश में अवैध रूप से रह रहे इन अपराधियों को तुरंत बाहर निकालेंगे। ट्रंप की इस आक्रामक नीति को जनता का भारी समर्थन मिला था।

राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से कनेक्शन और अमेरिकी सेना का एक्शन

राष्ट्रपति ट्रंप का हमेशा से आरोप रहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने जानबूझकर अपने देश के कैदियों को अमेरिका भेजा ताकि वहाँ अपराध बढ़ सके। हालाँकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में इस बात के सीधे सबूत नहीं मिले थे। इसके बावजूद, अमेरिकी सेना ने इसी साल जनवरी में एक बेहद गुप्त ऑपरेशन चलाकर निकोलस मादुरो को वेनेजुएला से उठा लिया था। मादुरो पर फिलहाल अमेरिका में नार्को-आतंकवाद का केस चल रहा है।

अदालत में पेश की गई नई चार्जशीट में खुलासा हुआ है कि मादुरो सरकार और नीनो गुएरेरो का गैंग आपस में मिलकर काम कर रहे थे। वे मिलकर ड्रग्स के धंधे से मोटा मुनाफा कमा रहे थे। ट्रंप ने गुएरेरो की मौत पर कहा कि जो बाइडेन की कमजोर नीतियों के कारण अमेरिका की सीमाएं असुरक्षित हो गई थीं। लेकिन अब उनकी सरकार इन राक्षसों को चुन-चुनकर खत्म कर रही है।

जोसलीन और लेकन रीली की मौत का लिया बदला

अमेरिका में अवैध प्रवासियों द्वारा की गई कुछ हत्याओं ने पूरे देश को नाराज कर दिया था। 12 साल की मासूम बच्ची जोसलीन नुंगारे और 22 साल की छात्रा लेकन रीली की बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों ने हत्या कर दी थी। ट्रंप ने नीनो गुएरेरो की मौत का ऐलान करते हुए इन दोनों बच्चियों का विशेष रूप से नाम लिया।

ट्रंप ने अपने बयान में लिखा कि अमेरिकी सेना ने इन मासूम बच्चियों और उनके परिवारों के साथ पूरा न्याय किया है। इस खूंखार गैंग के सरगना को मारकर सेना ने उनकी मौतों का बदला ले लिया है। ट्रंप ने साफ किया कि उनके राज में अपराधियों को कोई माफी नहीं मिलेगी और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

‘एलियन एनिमीज एक्ट’ और मास डिपोर्टेशन की तैयारी

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। उन्होंने देश के 200 साल पुराने ‘एलियन एनिमीज एक्ट’ का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। यह कानून सरकार को यह ताकत देता है कि वह किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को बिना किसी अदालती सुनवाई के तुरंत गिरफ्तार करके देश से बाहर निकाल सकती है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह गैंग कोई मामूली चोर-उचक्कों का ग्रुप नहीं है, बल्कि यह एक हमलावर विदेशी सेना की तरह है। ट्रंप सरकार ने इस गैंग के कई संदिग्ध सदस्यों को बिना कोर्ट की मंजूरी के अल साल्वाडोर की सबसे खतरनाक ‘सेकोट जेल’ में भेजना शुरू कर दिया था। हालांकि अदालतों ने इस पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं, लेकिन सरकार अपनी कार्रवाई पर टिकी हुई है।

मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने कमजोर था यह गैंग

भले ही अमेरिका में इस गैंग को लेकर काफी डर का माहौल बनाया गया हो, लेकिन खोजी संस्था ‘इनसाइट क्राइम’ की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अमेरिका के अंदर उतना मजबूत नहीं है। अमेरिका के ड्रग मार्केट पर पहले से ही मैक्सिको के बेहद खतरनाक ‘सिनालोआ कार्टेल’ और ‘जालिस्को न्यू जनरेशन कार्टेल’ का पूरी तरह कब्जा है।

वेनेजुएला का यह गैंग मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने बहुत छोटा और कमजोर है। अमेरिकी सीमा पर इस गैंग के गुर्गे खुद को बचाने के लिए मैक्सिकन माफियाओं के लिए छोटे-मोटे काम करते हैं। अमेरिकी गृह मंत्रालय के अनुसार, पूरे अमेरिका में इस गैंग के केवल 600 के करीब एक्टिव मेंबर्स हैं। यह संख्या अमेरिका में रहने वाले 7 लाख अच्छे और शांतिप्रिय वेनेजुएला के प्रवासियों का बहुत छोटा हिस्सा है।

इस बड़े सैन्य एक्शन का आगे क्या असर होगा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बड़े और आक्रामक कदम ने दुनिया भर के अपराधियों को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि वे इन क्रूर हत्यारों और ड्रग तस्करों को दुनिया के किसी भी कोने से ढूँढ निकालेंगे। अमेरिकी साउदर्न कमांड का यह एक्शन दिखाता है कि अमेरिका अब अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने वेनेजुएला की जेल से निकलकर कई देशों में मौत और खौफ का जो खेल शुरू किया था, उसका अंत अब नजदीक है। इसके मुख्य सरगना नीनो गुएरेरो की मौत ने इस पूरे गैंग की कमर तोड़ दी है।

‘मुझे लोकप्रियता के लिए तुम्हारी जरूरत नहीं’: ट्रंप पर फिर फायर हुईं इटली की PM मेलोनी, पहले भी पाकिस्तान से लेकर मैंक्रों तक को दिखी चुकी हैं आँखें

डोनाल्ड ट्रम्प यह समझते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति जब चाहे जो चाहे किसी को भी बोल सकता है और दुनिया चुप रहेगी। हर देश को पाकिस्तान समझने की गलती नहीं करें। पाकिस्तान को पैसों की खातिर बेइज्जती बर्दाश्त कर सकता है हर देश नहीं। आज लगभग हर देश अपने आप में स्वतंत्र है। सबका अपना आत्मसम्मान है। 

अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप से भिड़ने से पहले भी इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी कई आलोचकों को करारा जवाब दे चुकी हैं। उन्होंने अपने अंदाज में फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों को सुना दिया था। यहाँ तक कि अपने देश में कोर्ट के फैसले की आलोचना करने से लेकर पॉर्न साइट को अपना बोरिया बिस्तर समेटने को मजबूर कर दिया था। वह यूरोप के इस्लामीकरण से काफी परेशान दिखीं। उनका पुराना वीडिया 2018 में आया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन-अलबेनिया के साथ मिलकर काम करने की बात कही है। 

राष्ट्रपति ट्रंप और मेलोनी विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और मेलोनी के बीच विवाद के बाद मेलोनी के बेबाक अंदाज की दुनियाभर में चर्चे हो रहे हैं। यह विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि लोकप्रियता गिरने के कारण मेलोनी ने जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए ‘मिन्नतें’ की थीं। ट्रंप ने यह भी कहा था कि उन्होंने मेलोनी के साथ फोटो सिर्फ इसलिए खिंचवाई क्योंकि उन्हें उन पर तरस आ गया था। दरअसल ट्रंप की असली नाराजगी ईरान युद्ध के समय इटली ने अमेरिकी फाइटर्स प्लेन को लैंडिंग की इजाजत नही दी थी।

ट्रंप के बयान पर मेलोनी ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि ट्रंप की दोस्ती से उनकी लोकप्रियता में इजाफा नहीं हुआ है। उनके दावे मनगढ़ंत है, जिसे सुनकर उन्हें हैरानी हुई। मेलोनी ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि इटली एक संप्रभु देश है और अमेरिकी एयरबेस का इस्तेमाल उनकी शर्तों पर ही होगा। मेलोनी ने यहाँ तक कह दिया कि मेरी चिंता ना करें, अपना देखें।

मेलोनी ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की बातें पूरी तरह झूठी हैं। मैं सचमुच हैरान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं।”

यह पहली बार नहीं है जब मेलोनी के जवाब पूरी दुनिया में सुर्खियाँ पाई हो। उन्होंने पहले भी कई बार अपनी बेबाकी का परिचय दिया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति को दिया जवाब

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के आप्रवासन की नीतियों और यूरोप के फैसलों को लेकर मेलोनी की फ्रांस के नेतृत्व के साथ कई बार तीखी नोक-झोंक हो चुकी है। फ्रांस के ल्योन शहर में दक्षिणपंथी कार्यकर्ता क्विंटिन डेरांक की वामपंथी चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी। इसको लेकर जॉर्जिया मेलोनी ने फ्रांस को सुनाया था और यूरोप के लिए एक गहरा घाव बताया था। इस पर भड़के फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने मेलोनी पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्रवादियों को अपने देश तक सीमित रहना चाहिए और दूसरों के मामलों में टांग नहीं अड़ाना चाहिए। मेलोनी ने भी तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि वह यूरोप में वैचारिक हिंसा के खिलाफ बोलने से पीछे नहीं हटेंगी, चाहे सामने फ्रांस जैसी बड़ी ताकत ही क्यों न हो।

यूरोप के इस्लामीकरण से चिंतित मेलोनी

जॉर्जिया मेलोनी का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने यूरोप में हो रहे इस्लामीकरण और सऊदी अरब की मदद से चल रहे कई सांस्कृतिक केंद्रों पर खुलकर चिंता जताई थी। साथ ही साफ किया था कि इस्लामी संस्कृति की कुछ व्याख्या और यूरोपीय सभ्यता के मूल्यों और अधिकारों के बीच सामंजस्य बैठना काफी मुश्किल है। इस पर मेलोनी को पाकिस्‍तान में काफी ट्रोल किया गया था। हालाँकि ये बयान 2018 है, जब वह इटली की प्रधानमंत्री नहीं थीं। उस वक्त उन्होंने साफ कहा था कि अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के लिए वह ब्रिटेन और अल्बानिया जैसे देशों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

फिलिस्तीन को नहीं दिया अलग देश का दर्जा

मेलोनी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ब्रिटेन और फ्रांस के रुख का समर्थन करते हुए फिलिस्तीन को तुरंत मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया। इटली ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस अल्टीमेटम का भी समर्थन किया, जिसमें हमास को पूरी तरह हथियार छोड़ने और इजरायली बंधकों को तुरंत रिहा करने को कहा गया था। हालाँकि उनके इस रुख का इटली में ही विरोध हुआ। इजरायल पर प्रतिबंध लगाने की माँग को लेकर 20 लाख से अधिक लोगों और ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी हड़ताल किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई।

पोर्न वेबसाइट पर कसी लगाम

फिका नाम की एक पोर्न वेबसाइट ने मेलोनी, उनकी बहन आरियाना और विपक्षी महिला नेता एली श्लेन की तस्वीरों से छेड़छाड़ कर उसे आपत्तिजनक बनाते हुए अपने साइट पर अपलोड कर दिया। इस पर एक्शन लेते हुए मेलोनी ने कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए। इसको देखते हुए वेबसाइट ही बंद कर दी गई।

अदालत से भी भिड़ चुकी हैं मेलोनी

हमास के इजरायल पर हमले और निर्दोष लोगों को बंधक बनाने को मिस्र के निवासी इमाम मोहम्मद शाहिन को इटली की अदालत ने रिहा कर दिया तो मेलोनी कोर्ट पर बरस गईं। दरअसल इटली सरकार ने उसे देश से निकालने का आदेश दिया था, जिसे कोर्ट ने पलट दिया। इस पर मेलोनी ने सीधे कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर कोर्ट आतंकवाद का समर्थन करने वालों को ऐसे ही छोड़ देगी तो वह इटली के नागरिकों की सुरक्षा कैसे करेंगी?

‘मेरे साथ फोटो के लिए गिड़गिड़ाईं मेलोनी’: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान पर तमतमाईं इटली की प्रधानमंत्री ने दिया करारा जवाब

                                       डोनाल्ड ट्रंप और जॉर्जिया मेलोनी (फोटो साभार: ChatGPT)
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए ‘मिन्नतें’ की थीं। ट्रंप ने यह भी कहा था कि उन्होंने मेलोनी के साथ फोटो सिर्फ इसलिए खिंचवाई क्योंकि उन्हें उन पर तरस आ गया था।

 ट्रंप के इस बयान पर मेलोनी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ट्रंप के दावे पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और उन्हें यह सुनकर हैरानी हुई। मेलोनी ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की बातें पूरी तरह झूठी हैं। मैं सचमुच हैरान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं।”

दरअसल, ट्रंप ने इटली के टीवी चैनल La7 को दिए एक इंटरव्यू में दावा किया था कि मेलोनी उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए बेहद लालायित थीं। उन्होंने कहा था कि मेलोनी उनसे बात करके भी खुश होंगी क्योंकि उन्हें उनसे बात करने की कोई जरूरत नहीं थी। ट्रंप ने यहाँ तक कह दिया कि मेलोनी फोटो के लिए उनसे बार-बार आग्रह कर रही थीं।

हालाँकि जी-7 सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की बातचीत के वीडियो सामने आए हैं, जिनमें वे काफी देर तक चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच मेलोनी ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि वह अपने सहयोगियों के प्रति तो सख्त रवैया दिखाते हैं लेकिन पश्चिमी देशों और अमेरिका के विरोधियों के प्रति उतनी कठोरता नहीं दिखाते।

मेलोनी ने अपने जवाब में कहा, “एक बात उन्हें याद रखनी चाहिए, न मैं और न ही इटली कभी किसी के सामने गिड़गिड़ाता है।” विवाद बढ़ने के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने 21 और 22 जून को प्रस्तावित अपनी अमेरिका यात्रा रद्द कर दी। उन्होंने कहा कि ट्रंप की टिप्पणियां गंभीर और अपमानजनक हैं तथा उन्होंने पूरे इटली का अपमान किया है।

ट्रम्प द्वारा मोदी से मुलाकात में Operation Sindoor के दौरान Cease fire का जिक्र नहीं करने को राष्ट्रीय मीडिया ने क्यों नहीं प्रमुखता दी? G7 में ट्रंप ने की प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ, बोले- जब तक मोदी PM हैं, दुनिया में भारत की बड़ी भूमिका तय


राहुल गाँधी और INDI गठबंधन में शामिल सारी पार्टियां Operation Sindoor के दौरान पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने पर पाकिस्तान की ओर से सफ़ेद झंडा(फ़ोन या हॉटलाइन पर) दिखाए जाने पर बहुत शोर मचा ट्रम्प ने कहा 'मोदी सरेंडर' और मोदी ने सरेंडर कर दिया। 'मोदी ट्रम्प से डरता है' आदि आदि। लेकिन फ्रांस में प्रधानमंत्री नरेंद्र के सामने अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान पर हमले का जिक्र तक नहीं किया जिसे मीडिया तक ने प्रमुखता नहीं दी, क्यों? आखिर राष्ट्रीय मीडिया ने किसके दबाब में इस मुख्य समाचार को प्रमुखता क्यों नहीं दी? क्या इस समाचार को प्रमुखता नहीं देने के लिए कांग्रेस या INDI गठबंधन ने मीडिया को कोई लालच दिया था?         

फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियन में जी7 शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात दुनिया भर में चर्चा का बड़ा विषय बन गई। दोनों नेताओं के बीच वैश्विक सुरक्षा, व्यापार, रणनीतिक सहयोग और पश्चिम एशिया की स्थिति समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई। हालांकि इस मुलाकात की सबसे ज्यादा चर्चा राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर की गई प्रशंसा को लेकर रही।

बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत छवि और नेतृत्व शैली की जमकर तारीफ की। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी के साथ हमारी बहुत अच्छी बातचीत हुई है। मोदी देखने में बहुत सुंदर और अच्छे लगते हैं, बिल्कुल फरिश्ते जैसे। लेकिन असल में वह अपने देश के हितों को लेकर बेहद कठोर हैं। वह एक असली ‘किलर’ हैं, जितने सख्त इंसान कोई हो सकता है, मोदी उनमें से एक हैं।”

राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान दिखाता है कि प्रधानमंत्री मोदी भले ही वैश्विक मंचों पर बेहद शालीन और मिलनसार दिखाई देते हों, लेकिन जब बात भारत के हितों की आती है तो वह अपने रुख पर मजबूती से कायम रहते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान के पीछे पीएम मोदी की दृढ़ नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

प्रेसिडेंट ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी शर्तें मनवाने में बेहद सख्त और एक टफ नेगोशिएटर हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम मोदी भारत के हितों की रक्षा करने में किसी से पीछे नहीं हटते। राष्ट्रपति ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक मामलों में अपनी भूमिका लगातार मजबूत कर रहा है।

इस मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “अगर भारत पर कभी भी कोई हमला हुआ या कोई संकट आया, तो हम पूरी ताकत से भारत की मदद करेंगे।” राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान को भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की मजबूती और दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के बढ़ते वैश्विक कद का जिक्र करते हुए कहा, “आज दुनिया के हर कोने में भारत की बहुत बड़ी भूमिका है। और मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री रहेंगे, तब तक वैश्विक मंच पर भारत की यह बड़ी भूमिका रहना पूरी तरह तय है।”

अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की अंतरराष्ट्रीय पहचान को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रिय भागीदारी और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है, जिसका जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप के बयान में भी देखने को मिला।

एक तरफ जहां राष्ट्रपति ट्रंप भारत की तारीफ कर रहे थे, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप के सामने रखा और कहा कि दुनिया भर के समुद्री मार्गों पर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक कार्यरत हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला और सुरक्षित रहना आवश्यक है। उन्होंने नौवहन की स्वतंत्रता तथा निर्बाध वाणिज्यिक गतिविधियों को बनाए रखने के महत्व पर बल दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी महत्वपूर्ण विषय है।

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप के उन प्रयासों की भी सराहना की, जिनके परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त करने और व्यापक क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बहाल करने को लेकर सहमति बनी है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता वैश्विक विकास के लिए आवश्यक है।

दोनों नेताओं ने फरवरी 2025 में वॉशिंगटन डीसी में हुई अपनी पिछली बैठक के बाद से भारत-अमेरिका कॉम्पैक्ट के तहत हुई प्रगति की समीक्षा भी की। दोनों देशों ने रक्षा, रणनीतिक तकनीकों, ऊर्जा और द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्रों में हुई महत्वपूर्ण प्रगति का स्वागत किया।

व्यापार संबंधों को लेकर भी दोनों नेताओं ने सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने एक अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में चल रही वार्ता में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और अधिकारियों को जल्द से जल्द एक संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी और व्यावसायिक रूप से सार्थक समझौते को अंतिम रूप देने के निर्देश दिए। इसी सिलसिले में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर अगले सप्ताह भारत का दौरा करेंगे।

मुलाकात के अंत में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों नेताओं ने रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।

जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई यह मुलाकात कई मायनों में महत्वपूर्ण रही। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की खुलकर सराहना की, वहीं दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक शांति, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी जिम्मेदार भूमिका को मजबूती से रखा।

‘तुम पूरी तरह पागल हो, मेरी वजह से जेल जाने से बचे’: ट्रंप का दिमाग अब नेतन्याहू पर खिसका

             डोनाल्ड ट्रम्प (बाएँ) और बेंजामिन नेतन्याहू (दाएँ)(फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इजरायल, न्यूजवीक)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भारी नाराजगी जताई है। 1 जून 2026 को दोनों के बीच फोन पर बहुत तीखी बातचीत हुई। ट्रंप ने आरोप लगाया कि नेतन्याहू लेबनान में जानबूझकर जंग भड़का रहे हैं। इससे अमेरिका और ईरान की शांति बातचीत खतरे में पड़ रही है।

ट्रंप ने नेतन्याहू को सीधे क्या-क्या कहा?

‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप इजरायल के हमलों से बेहद गुस्से में थे। ट्रंप ने नेतन्याहू को ‘पूरी तरह पागल’ कह दिया। ट्रंप ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, “तुम आखिर कर क्या रहे हो?” उन्होंने आगे कहा, “अगर मैं नहीं होता तो तुम जेल में होते। मैं तुम्हें बचा रहा हूँ। अब हर कोई तुमसे नफरत करता है। इस वजह से हर कोई इजरायल से भी नफरत करता है।”

क्यों गुस्से में थे अमेरिकी राष्ट्रपति?

ट्रंप लेबनान में इजरायल की लगातार सैन्य कार्रवाई से नाराज थे। इजरायल बेरूत में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बड़े हमले की तैयारी में था। वह दक्षिणी लेबनान में भी सेना बढ़ा रहा था। ट्रंप को लगा कि इजरायल जरूरत से ज्यादा आक्रामक हो रहा है। वे लेबनान में आम नागरिकों की मौतों और हिजबुल्लाह कमांडरों पर बड़े हमलों से परेशान थे। उन्हें डर था कि इससे अमेरिका-ईरान के कूटनीतिक प्रयास बर्बाद हो जाएँगे।

ईरान की सीधी चेतावनी

यह तीखी बहस तब हुई जब ईरान ने अमेरिका को खुली चेतावनी दी। ईरान ने कहा कि अगर लेबनान पर इजरायली हमले नहीं रुके, तो वह वाशिंगटन के साथ चल रही बातचीत रोक देगा। तेहरान ने साफ किया कि किसी भी समझौते के लिए लेबनान में युद्धविराम पहली शर्त है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने भी लेबनान को भरोसा दिया कि हमला जारी रहने पर वे अमेरिका से बातचीत सस्पेंड कर सकते हैं।

फोन कॉल के बाद क्या बदला?

इस डांट के बाद एक इजरायली अधिकारी ने बताया कि इजरायल ने बेरूत पर हमले की योजना टाल दी है। ट्रंप ने बाद में दावा किया कि बातचीत सकारात्मक रही। उन्होंने कहा कि बेरूत की तरफ बढ़ रहे इजरायली सैनिकों को वापस मोड़ दिया गया है। मध्यस्थों के जरिए हिजबुल्लाह भी इजरायल पर हमले रोकने को तैयार हो गया है।

नेतन्याहू की जिद और आंशिक युद्धविराम

दूसरी तरफ नेतन्याहू ने जनता के सामने अलग बयान दिया। उन्होंने कहा कि इजरायल का रुख नहीं बदला है। वे दक्षिणी लेबनान में अभियान जारी रखेंगे। अगर हिजबुल्लाह ने हमला किया, तो बेरूत पर फिर बमबारी होगी। इस बीच, 1 जून को लेबनान ने एक आंशिक युद्धविराम की घोषणा की। इसके तहत इजरायल बेरूत पर हमले नहीं करेगा और हिजबुल्लाह इजरायल पर रॉकेट नहीं दागेगा।

ट्रंप की बेटी इवांका को मारना चाहता था मोहम्मद बाकेर, ईरानी सेना से मिली थी ट्रेनिंग: सुलेमानी की मौत का बदला लेना था मकसद

    ट्रंप और बेटी इवांका (बाएँ), हत्या की साजिश रचने वाला आतंकी मोहम्मद बाकेर (दाएँ), (साभार : CNN & Newyorkpost)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप पर एक बड़ा खतरा टल गया है। अमेरिकी अखबार ‘न्यू यॉर्क पोस्ट’ के अनुसार, इवांका की हत्या की साजिश रचने वाले एक ट्रेंड आतंकी मोहम्मद बाकेर को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस आतंकी के पास से इवांका के फ्लोरिडा वाले घर का पूरा नक्शा मिला है। इस खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह मुस्तैद हो गई हैं।

पकड़े गए आतंकी का पूरा नाम मोहम्मद बाकेर साद दाऊद अल-सादी है। उसकी उम्र 32 साल है। छह साल पहले बगदाद में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरानी सैन्य प्रमुख कासिम सुलेमानी मारा गया था। अल-सादी उसे अपना अब्बू जैसा मानता था। वह सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता था। उसने लोगों से कहा था कि वह इवांका को मारकर ट्रंप से अपना बदला पूरा करेगा।

इंटरनेट पर दी थी खुली धमकी

आरोपित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर काफी एक्टिव था। उसने वहाँ इवांका और उनके पति के 24 मिलियन डॉलर (225 करोड़ रुपए) के घर का नक्शा डाला था। उसने अरबी भाषा में लिखा था कि अमेरिकी महल या सीक्रेट सर्विस भी उन्हें नहीं बचा पाएगी। उसने लिखा कि हमारा बदला बस कुछ ही समय की बात है। वह लोगों को डराने के लिए साइलेंसर लगी पिस्तौल की तस्वीरें भी भेजता था।

तुर्की में पकड़ा गया आरोपित

इस बड़े आतंकी को 15 मई को तुर्की में पकड़ा गया। वह वहाँ से रूस भागने की तैयारी में था। गिरफ्तारी के बाद उसे तुरंत अमेरिका भेज दिया गया। अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, उस पर यूरोप और अमेरिका में 18 हमलों का आरोप है। अभी उसे ब्रुकलिन के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। वहाँ उसे सबसे अलग एक कड़े पहरे वाली कोठरी में बंद किया गया है।

कई देशों में फैलाया था खौफ

यह आतंकी सिर्फ ट्रंप की बेटी इवांका के पीछे नहीं था। वह ‘कथैब हिजबुल्लाह’ और ईरान के ‘IRGC’ जैसे खतरनाक संगठनों से जुड़ा है। उसने एम्स्टर्डम में एक बैंक पर पेट्रोल बम फेंका था। उसने लंदन में दो लोगों पर चाकू से हमला किया था। उसने टोरंटो में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर गोलीबारी भी की थी। इसके अलावा बेल्जियम और रोटरडैम में भी उसने हमले किए थे।

सरकारी पासपोर्ट का उठाया फायदा

रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपित के पास इराक का खास ‘सर्विस पासपोर्ट’ था। यह पासपोर्ट सिर्फ वहाँ के प्रधानमंत्री की इजाजत से मिलता है। इस VIP पासपोर्ट के कारण एयरपोर्ट पर उसकी जाँच नहीं होती थी। उसे हर जगह VIP लाउंज की सुविधा मिलती थी। इसी का फायदा उठाकर वह आसानी से दूसरे देशों में जाता था। वहां वह बड़े आराम से अपने आतंकी नेटवर्क को चला रहा था।

ट्रैवल एजेंसी के नाम पर धोखा

अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए उसने एक तरकीब निकाली थी। उसने मजहबी यात्राएँ कराने वाली एक ट्रैवल एजेंसी खोली थी। इसी एजेंसी की आड़ में वह पूरी दुनिया में घूमता था। वह अलग-अलग देशों में जाकर अपने साथियों से मिलता था। वह सोशल मीडिया पर एफिल टावर जैसी मशहूर जगहों के साथ फोटो डालता था। कई बार वह मिसाइलों और हथियारों के साथ भी अपनी फोटो पोस्ट करता था।

इस मामले पर अभी सब शांत

इवांका ट्रंप ने साल 2009 में अपनी शादी से पहले यहूदी धर्म अपना लिया था। इस बड़ी साजिश के सामने आने के बाद भी अभी सब शांत हैं। न्यू यॉर्क पोस्ट ने इस मामले पर बात करने के लिए व्हाइट हाउस से संपर्क किया था। उन्होंने आरोपित के वकील से भी बात करने की कोशिश की। हालाँकि, अभी तक किसी की भी तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

खुद को ‘ईसा मसीह’ मानने वाले नासिरे बेस्ट ने व्हाइट हाउस के बाहर बरसाईं ताबड़तोड़ गोलियाँ, चर्च में क्यों नहीं बरसाईं?

                                    व्हाइट हाउस और हमलावर नासिरे बेस्ट (फोटो साभार - आज तक)
पिछले दो/तीन दिनों से अमेरिका में फायरिंग के समाचार सुर्खी बने हुए हैं, आखिर हो रही फायरिंग के पीछे क्या कोई षड़यंत्र हैं?  

अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन DC में शनिवार (23 मई 2026) की शाम व्हाइट हाउस के बाहर अचानक गोलियाँ चलने लगीं। यह फायरिंग व्हाइट हाउस के बेहद सुरक्षित इलाके में बने एक सिक्योरिटी चेकपॉइंट के पास हुई।

घटना के समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस के अंदर मौजूद थे, जिसके बाद पूरे इलाके में तुरंत हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया। अमेरिकी सीक्रेट सर्विस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए हमलावर को गोली मार दी। बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई।

कैसे शुरू हुई पूरी घटना?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाम करीब 6 बजे एक युवक 17th स्ट्रीट और पेनसिल्वेनिया एवेन्यू के पास बने सिक्योरिटी चेकपॉइंट तक पहुँचा। कुछ ही देर बाद उसने अपने बैग से रिवॉल्वर निकाली और सीक्रेट सर्विस अधिकारियों पर फायरिंग शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि उसने शुरुआती दौर में कम से कम तीन गोलियाँ चलाईं।

सीक्रेट सर्विस के जवानों ने तुरंत मोर्चा संभाला और जवाबी फायरिंग की आवाज सुनते ही अफरा-तफरी मच गई। अधिकारियों ने मीडिया कर्मियों और आसपास मौजूद लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया।

कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि घटना के दौरान 20 से 30 राउंड तक गोलियाँ चलीं। घटना में एक आम नागरिक भी गोली लगने से घायल हो गया, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

हालाँकि राहत की बात यह रही कि किसी भी सीक्रेट सर्विस अधिकारी को चोट नहीं आई। व्हाइट हाउस ने साफ किया कि राष्ट्रपति ट्रंप पूरी तरह सुरक्षित हैं और हमलावर सुरक्षा घेरे को पार नहीं कर पाया।

 घटना के बाद पूरे व्हाइट हाउस इलाके को कई घंटों तक घेराबंदी में रखा गया। अमेरिकी जाँच एजेंसी FBI और वॉशिंगटन DC पुलिस अब इस मामले की जाँच कर रही हैं। जाँच एजेंसियाँ CCTV फुटेज, चश्मदीदों के बयान और बैलिस्टिक सबूतों की जाँच कर रही हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि आरोपित का मकसद क्या था।

कौन था नासिरे बेस्ट?

पुलिस ने हमलावर की पहचान 21 साल के नासिरे बेस्ट के रूप में की है, जो मैरीलैंड का रहने वाला था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह पहले भी सीक्रेट सर्विस की नजर में आ चुका था। उस पर व्हाइट हाउस से दूर रहने का आदेश भी जारी किया गया था, लेकिन इसके बावजूद वह कई बार प्रतिबंधित इलाके के आसपास देखा गया।

बताया जा रहा है कि जून 2025 में उसने सीक्रेट सर्विस एजेंटों को रोककर धमकी दी थी, जिसके बाद उसे हिरासत में लिया गया था। जुलाई 2025 में भी वह प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने की कोशिश करते पकड़ा गया था।

नासिरे बेस्ट मानसिक रूप से परेशान था और खुद को ईसा मसीह मानता था। शनिवार की घटना में उसने रिवॉल्वर का इस्तेमाल किया लेकिन सीक्रेट सर्विस की जवाबी कार्रवाई में वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

सवाल यह है कि अगर आरोपी मानसिक रूप से परेशान था तो व्हाइट हाउस ही क्यों चुना, चर्च क्यों नहीं चुना? यह निश्चितरूप से कोई सुनियोजित षड़यंत्र है।   

 ताबड़तोड़ गोलीबारी से दहला होंडुरास, दो हमलों में 25 लोगों की मौत: बंदूकधारियों ने मजदूरों और पुलिसकर्मियों पर बरसाईं गोलियाँ

सेंट्रल अमेरिका के देश होंडुरास में गुरुवार (21 मई 2026) को हुई दो अलग-अलग गोलीबारी की घटनाओं ने पूरे देश को हिला दिया। इन हमलों में अब तक कम से कम 25 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 6 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।

सबसे बड़ा हमला ट्रूजिलो इलाके के एक खेत और प्लांटेशन में हुआ, जहाँ हथियारबंद हमलावरों ने मजदूरों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस हमले में 19 लोगों की जान चली गई।

यह इलाका लंबे समय से जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चल रहे विवादों से प्रभावित है। यहाँ पर्यावरण और जमीन के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों को पहले भी धमकियाँ मिलती रही हैं।

दूसरी घटना ग्वाटेमाला सीमा के पास ओमोआ इलाके में हुई, जहाँ बदमाशों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया। पुलिसकर्मी राजधानी तेगुसिगल्पा से एंटी-गैंग मिशन पर जा रहे थे, तभी उन पर गोलियाँ बरसा दी गईं।

इस हमले में एक वरिष्ठ अधिकारी समेत 6 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। पुलिस और सेना ने दोनों इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी है और जाँच के लिए फॉरेंसिक टीमों को भेजा गया है।

मिडिल ईस्ट टेंशन के बीच ट्रंप की खुफिया निदेशक ने दिया इस्तीफा, ईरान ने की तारीफ

                                                      तुलसी गबार्ड (फोटो साभार: US आर्मी)
अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (DNI) तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। तुलसी गबार्ड ने शुक्रवार (22 मई 2026) को ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बैठक के दौरान उन्हें अपने फैसले की जानकारी दी। राष्ट्रीय खुफिया निदेशक कार्यालय (ODNI) में उनका अंतिम दिन 30 जून 2026 होगा। भारत से जुड़ी पृष्ठभूमि रखने वाली तुलसी गबार्ड के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने उनकी जमकर सराहना की है।

पति की बीमारी बनी इस्तीफे की वजह

तुलसी ने X पोस्ट पर अपने इस्तीफे से जुड़ा पत्र शेयर कर राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद दिया है। तुलसी ने लिखा, “आपने मुझ पर जो भरोसा जताया और राष्ट्रीय खुफिया निदेशक कार्यालय का नेतृत्व करने का अवसर दिया, उसके लिए मैं हार्दिक आभारी हूँ।”
उन्होंने आगे लिखा, “दुर्भाग्यवश, मुझे 30 जून 2026 से प्रभावी अपना इस्तीफा देना होगा। मेरे पति अब्राहम को हाल ही में हड्डियों के कैंसर के एक अत्यंत दुर्लभ प्रकार का पता चला है। हमारे परिवार के लिए इस बेहद निजी और कठिन समय में आपके सहयोग के लिए धन्यवाद।”
उन्होंने आगे कहा कि डीएनआई के रूप में देश की सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात रही और इसके लिए वह अमेरिकी जनता तथा राष्ट्रपति ट्रंप की हमेशा आभारी रहेंगी।

भारत से क्या है तुलसी गबार्ड का नाता

तुलसी गबार्ड का जन्म अमेरिका के समोआ में हुआ था। उनके पिता यूरोपीय मूल के हैं जबकि उनकी माँ भारतीय हैं। सेना में रहते हुए तुलसी ने इराक में भी सेवाएँ दी थीं।
तुलसी गबार्ड अमेरिका की पहली हिंदू सांसद मानी जाती हैं। वह पहले डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ी थीं और पार्टी की प्रमुख नेताओं में शामिल रहीं। हालाँकि, साल 2022 में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी और बाद में रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हो गईं।
तुलसी कमला हैरिस की मुखर आलोचक रही हैं। साल 2019 में राष्ट्रपति पद की पहली डिबेट में उन्होंने कमला हैरिस को कड़ी चुनौती दी थी। साथ ही, तुलसी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रशंसक भी माना जाता है।

इस्तीफे पर ईरान ने भी की तारीफ

तुलसी गबार्ड के इस्तीफे के बाद ईरान की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट करते हुए तुलसी गबार्ड की तारीफ की और कहा कि उन्होंने ईरान के बारे में कई बार ऐसी ‘सच्चाई’ कही जिससे राष्ट्रपति ट्रंप असहज थे।
ईरानी दूतावास ने अपने पोस्ट में लिखा, “हम अब्राहम के शीघ्र और पूर्ण स्वस्थ होने की कामना करते हैं। आपने पहले भी कई बार यह दिखाया है कि आप अमेरिका के लिए काम करती हैं, इजरायल के लिए नहीं। आपने कई बार ईरान के बारे में ऐसी सच्चाइयां बताईं, जिनसे ट्रंप नफरत करते थे।”

दोगले पाकिस्तान ने ट्रंप की पीठ में घोंपा छुरा, ईरान के लिए खोले 6 रास्ते: हॉर्मुज की नाकाबंदी फेल


अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान ने एक बड़ा कदम उठाया है। पाकिस्तान ने ईरान के लिए व्यापार के छह नए रास्ते खोल दिए हैं। इससे ईरान को काफी राहत मिलेगी। खास बात यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर नाकाबंदी लागू की हुई है।

दरअसल, ईरान के लिए भेजे जाने वाले हजारों कंटेनर पाकिस्तान के बंदरगाहों पर फँसे हुए थे। इससे व्यापार पर भारी असर पड़ रहा था और कारोबारी परेशान था। इसीलिए अपना फायदा देखते हुए पाकिस्तान ने यह कदम उठाया। अब इन नए व्यापार के रास्तों के जरिए सामान आसानी से ईरान पहुँचाया जा सकेगा।

पाकिस्तान ने जिन व्यापार के रास्तों को दोबारा चालू किया है, वो हैं:

  • ग्वादर से गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से लियारी, ओरमारा, पसनी होकर गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से खुजदार, दलबंदिन होकर ताफ्तान
  • ग्वादरे से तुर्बत, होशाब, पंजगुर, नाग, बेसिमा, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • ग्वादर से लियारी, खुजदार, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • कराची/पोर्ट कासिम से ग्वादर होकर गब्द
इन नए रास्तों से पाकिस्तान के प्रमुख बंदरगाह, जैसे ग्वादर और पोर्ट कासिम, सीधे ईरान सीमा से जुड़ गए हैं। ये रास्ते ताफ्तान और गब्द जैसे अहम सीमा चौकियों तक पहुँचते हैं। पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जिसका अब दोनों देशों को बड़ा फायदा मिलेगा।
खास तौर पर ग्वादर से गब्द वाला रास्ता सबसे अहम माना जा रहा है। इस रास्ते से पहले जहाँ यात्रा में लगभग 18 घंटे लगते थे, वहीं अब यह दूरी केवल 3 घंटे में पूरी की जा सकेगी। इससे व्यापार तेज होगा, समय बचेगा और दोनों देशों के आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

पाकिस्तान ने कैसे अमेरिका को दिया धोखा?

पाकिस्तान के इस कदम की आलोचना इसीलिए की जा रही है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। खासकर सुरक्षा और क्षेत्रीय मामलों में दोनों देशों के रिश्ते मजबूत माने जाते हैं। लेकिन अब पाकिस्तान ने ऐसा रास्ता तैयार कर दिया है, जिससे ईरान पर अमेरिका की नाकाबंदी का असर काफी हद तक कम हो सकता है।
पाकिस्तान ने तीसरे देशों के सामान को कानूनी तौर पर अपने रास्ते ईरान भेजने की अनुमति दे दी है। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका जो ईरान पर दबाव बनाना चाहता था, वह अब कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ हिमांशु जैन और ऋचा द्विवेदी जैसे जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के इस फैसले ने अमेरिकी नाकाबंदी में एक ‘कानूनी छेद’ कर दिया है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पाकिस्तान इस क्षेत्र में अमेरिका की रणनीति के साथ कितनी मजबूती से खड़ा है।

अब ईरान भी पाकिस्तान को मान रहा ‘ट्रंप का टट्टू’, अमेरिका के दलाल से ना हो पाएगी मध्यस्थता

           पाकिस्तान ट्रंप के आगे झुकता है, भरोसे लायक नहीं: ईरान ने मध्यस्थता पर उठाए सवाल (साभार: CNBC)
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव में पाकिस्तान लगातार खुद को शांतिदूत दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है। वहीं, अब तेहरान ने साफ संकेत दे दिया है कि वह पाकिस्तान को एक भरोसेमंद मध्यस्थ नहीं मानता। ईरान के सांसद और संसद की नेशनल सिक्योरिटी कमीशन के प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई ने खुलकर पाकिस्तान की भूमिका पर आपत्ति जताई है और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

हकीकत यह है कि पाकिस्तान शुरू से ही दलालियाँ कर मुल्क को चलाता रहा है। इसने कभी आत्मनिर्भर बनने की कोशिश तक नहीं की। ईरान और अमेरिका में बातचीत का ड्रामा कर अमेरिका को पागल बनाकर नोट खींच रहा है। हैरानी इस बात पर होती है कि अमेरिका जैसा देश इस दोगले पाकिस्तान के इशारे पर नाच रहा है। सोवियत यूनियन को तोड़ने में अमेरिका ने पाकिस्तान और इराक का इस्तेमाल किया और इराक की जो हालत है सबके सामने है और पाकिस्तान एक भिखारी देश। दूसरे, समझ में नहीं आता अमेरिका पाकिस्तान पर भरोसा क्यों कर रहा है? इसी पाकिस्तान ने कहा था कि ओसामा पाकिस्तान में नहीं लेकिन अमेरिका ने ओसामा को मारा पाकिस्तान में। अगर ओसामा पाकिस्तान में नहीं था फिर किस ओसामा को अमेरिका ने मारा था? 

फिर सऊदी अरब ने किस घटिया देश के साथ रक्षा समझौता किया है जिसकी सेना 1971 की लड़ाई में भारत के आगे समर्पण किया और अफगानिस्तान और बलूचिस्तान की सेनाओं से पिट रही है।   

मध्यस्थ को निष्पक्ष होना चाहिए, पाकिस्तान में भरोसे की कमी

इब्राहिम रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “पाकिस्तान के पास मध्यस्थता के लिए आवश्यक विश्वसनीयता नहीं है।” उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अच्छा मित्र और पड़ोसी जरूर है लेकिन बातचीत के लिए उपयुक्त मध्यस्थ नहीं है।

रेजाई ने कहा कि पाकिस्तान अपनी नीतियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हितों को ध्यान में रखता है और अक्सर उसी दिशा में झुकाव दिखाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस्लामाबाद कभी भी वॉशिंगटन के खिलाफ खुलकर बोलने से बचता है। रेजाई ने कहा, “एक मध्यस्थ को निष्पक्ष होना चाहिए, न कि हमेशा एक पक्ष की ओर झुकाव रखना चाहिए।”

कूटनीतिक हलचल तेज, बातचीत में अनिश्चितता कायम

इन बयानों के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची कूटनीतिक प्रयासों को तेज करने में जुटे हैं। हाल ही में उन्होंने तीन दिनों के भीतर दूसरी बार पाकिस्तान का दौरा किया और वहाँ आर्मी चीफ असीम मुनीर सहित कई शीर्ष अधिकारियों से बातचीत की। इससे पहले वे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी मुलाकात कर चुके थे।

अराघची इससे पहले ओमान भी गए थे, जहाँ सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सईद के साथ उनकी बातचीत हुई। इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा, नए कानूनी ढाँचे, मुआवजे की माँग, भविष्य में सैन्य कार्रवाई रोकने की गारंटी और अमेरिकी समुद्री प्रतिबंधों को हटाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।

वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान बातचीत चाहता है, तो वह सीधे संपर्क कर सकता है। उन्होंने कहा, “अगर वे बातचीत करना चाहते हैं, तो वे हमारे पास आ सकते हैं या हमें कॉल कर सकते हैं… आप जानते हैं, फोन मौजूद है और हमारे पास सुरक्षित लाइनें हैं।”

बाल-बाल बचे ट्रंप, वॉशिंगटन हिल्टन होटल में डिनर के दौरान फायरिंग: हमलावर की तस्वीर आई सामने; इसी होटल में 45 साल पहले रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था जानलेवा हमला

                                                    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और हमलावर
जबसे डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी मैदान में उतरे तभी से इनके विरोधी इन पर जानलेवा हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। चुनावी प्रचार में हुए हमले में भी बाल-बाल बचे थे तब गोली इनके कान पर लगी थी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर बाल-बाल बच गए हैं। जब व्हाइट हाउस के पत्रकारों के साथ आयोजित डिनर कार्यक्रम के दौरान अचानक एक शख्स ने कमरे के बाहर अचानक फायरिंग कर दी जिसके बाद ट्रंप को बाहर निकाला गया है। यह कार्यक्रम वॉशिंगटन हिल्टन होटल में चल रहा था।

फायरिंग की आवाज के बीच सीक्रेट सर्विस के एजेंट्स तुरंत हरकत में आए और राष्ट्रपति ट्रंप को कड़े सुरक्षा घेरे में लेकर कार्यक्रम स्थल से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने तत्काल पूरे इलाके को सील कर दिया। घटना के समय अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप कैबिनेट के कई वरिष्ठ सदस्य भी वहाँ मौजूद थे और उन्हें भी एहतियातन तुरंत बाहर ले जाया गया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

 ट्रंप ने हमलावर की एक तस्वीर भी अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर शेयर की है। हमलावर की पहचान 31 साल के कोल टॉमस ऐलन के रूप में हुई है और वो कैलिफॉर्निया का रहने वाला बताया जा रहा है।

                                                     ट्रंप द्वारा शेयर की गई तस्वीर

इसी होटल में 45 साल पहले रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था जानलेवा हमला
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की डिनर पार्टी में जिस ऐतिहासिक होटल वाशिंगटन हिल्टन में फायरिंग हुई है वो 45 साल पहले भी एक बड़े हमले का गवाह बन चुका है। इसी होटल के बाहर 1981 में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्‍ड रीगन पर जानलेवा गोलीबारी हुई थी।
ताजा घटना व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान हुई, जहाँ ट्रंप, उनकी पत्नी मेलेनिया ट्रंप और उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस समेत कई बड़े नेता और गणमान्य लोग मौजूद थे। अचानक हुई फायरिंग से कार्यक्रम में अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत एक्शन लेते हुए ट्रंप को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। हालाँकि इस घटना में उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।
इस होटल का इतिहास पहले से ही ऐसी खौफनाक घटना से जुड़ा रहा है। 30 मार्च 1981 को यहीं से निकलते वक्त रीगन पर जॉन हिंकले जूनियर (John Hinckley Jr) ने गोली चलाई थी। हमले में रीगन गंभीर रूप से घायल हो गए थे, गोली उनके फेफड़े तक जा पहुँची थी लेकिन समय पर इलाज से उनकी जान बच गई थी।
उस घटना के बाद स्थानीय लोग इस होटल को ‘हिंकले हिल्टन’ तक कहने लगे थे। अब एक बार फिर इसी जगह पर फायरिंग होने से सुरक्षा व्यवस्था और इसकी लोकेशन को लेकर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल एजेंसियाँ मामले की जाँच में जुटी हैं और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस बार की घटना के पीछे क्या वजह रही।












इस्लामाबाद में ईरानी-अमेरिकियों के बीच आई हाथापाई की नौबत, होर्मुज पर भिड़े विदेश मंत्री अराघची और US के दूत विटकॉफ: रिपोर्ट


इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई अहम वार्ता के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण होने की भी बात सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बीच तीखी बहस छिड़ने का दावा किया गया है। तुर्की के एक पत्रकार ने दोनों के बीच हाथापाई की नौबत आने का जिक्र किया है।

बताया जा रहा है कि बातचीत के दौरान दोनों नेताओं के बीच बातचीत नोंकझोंक में बदल गई और माहौल अचानक गर्मा गया। यह विवाद इतना बढ़ गया कि स्थिति लगभग हाथापाई तक पहुँच गई थी।

दोनों पक्षों के बीच मुख्य मतभेद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नियंत्रण और प्रबंधन को लेकर था। गौरतलब है कि इस्लामाबाद में चली लंबी बातचीत बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो चुकी है।