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अमेरिका से युद्ध की आड़ में ईरानी सरकार विरोधियों को निपटाने में लगी, सिर्फ जून में करीब 100 लोगों को दी फाँसी: कई के परिजनों को भी नहीं बताया

                                                       फाइल फोटो (साभार-rferl.org)
अमेरिका–ईरान युद्ध की ओर पूरी दुनिया की नजरें है। इस बीच ईरानी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक विरोधियों, प्रदर्शनकारियों और कथित जासूसों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। ईरान के कई मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों से ये पता चलता है कि सिर्फ जून महीने में ही 100 से ज्यादा लोगों को फाँसी दी गई है।

हालाँकि ईरानी सरकार का कहना है कि ये कदम ‘विदेशी साजिश’, ‘आतंकवाद’ और ‘इजराइल – अमेरिका के लिए जासूसी करने वालों’ से निपटने के लिए उठाए गए हैं। सरकार न सिर्फ खामोशी से फाँसी दे रही है, बल्कि लोगों की धर- पकड़ भी तेज कर दी है।

राजनीतिक विरोधियों को दी जा रही फाँसी

ईरान दुनिया के उन अग्रणी देशों में शामिल हो गया है, जहाँ राजनीतिक विरोधियों को भी फाँसी की सजा दी जा रही है। यह कदम लोगों में भय पैदा करने के लिए उठाया गया है, ताकि दिसंबर 2025 में ईरानी शासन के खिलाफ हुआ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन फिर कभी न हो सके। दरअसल ईरान ये सब कुछ अमेरिकी हमले की आड़ में कर रहा है। ईरान हाउस की संस्थापक अजादेह अफसाही ने ईरान इंटरनेशनल के आई फॉर ईरान पॉडकास्ट में भी यह बात मानी है।
उनका कहना है कि ईरान में युद्ध के बहाने तेजी से जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों और उसकी अगुवाई करने वालों को फाँसी की सजा दी जा रही है। कई मामलों में परिवारों से भी इसे छिपाया जा रहा है। दरअसल दुनिया उन धमाकों को सुन रही है, जो अमेरिकी मिसाइल-ड्रोन से हो रहे हैं, लेकिन उन खामोश मौतों को नहीं देख पा रही, जो चुपचाप ईरानी सरकार अपने राजनीतिक कैदियों को दे रही है।
ईरान मानवाधिकार संगठन ने भी इसकी पुष्टि की है। संगठनों का मानना है कि अब तक करीब 100 राजनीतिक कैदियों और प्रदर्शनकारियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है और 100 से ज्यादा इस कतार में खड़े हैं। संगठन के मुताबिक, इस्फहान की दस्तगेर्द जेल में ही 70 से अधिक राजनीतिक कैदियों को फाँसी दिया जाने वाला है।
संगठन का मानना है कि जनवरी 2026 में हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों में से 24 लोगों को फाँसी दी जा चुकी है। इनमें 22 जुलाई को कानून स्नातक मेहदी खानेकी शामिल है। जिन लोगों को फाँसी दिया गया है, उनमें से अधिकांश 8 जनवरी को इस्फहान विरोध प्रदर्शन में शामिल थे।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आरोपितों को निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया से भी वंचित रखा गया। न तो ट्रायल तरीके से हुआ और न ही सुनवाई और फाँसी की सजा मुकर्र कर दी गई।
संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन ने ईरानी अधिकारियों से कहा है कि वे इस्फहान के विरोध प्रदर्शन को लेकर फाँसी की सजा पाए 10 नौजवानों की फाँसी को तुरंत रोके। मिशन ने 19 जुलाई को 2 युवकों को दी गई फाँसी की भी कड़ी निंदा की है। ये लड़के थे 18 वर्षीय एस्फंदियारी और 23 वर्षीय अफगान नागरिक गोल मोहम्मद मोहम्मदी।
मिशन की जानकारी के मुताबिक, 10 लोगों में से 2 के परिजनों को मुलाकात के लिए बुलाया गया है। इसका मतलब है कि जल्द ही उन्हें भी फाँसी दिया जाएगा।

विरोध प्रदर्शन के सारे मामले निपटा दिए गए- प्रॉसिक्यूटर जनरल

28 दिसंबर 2025 को ईरानी इस्लामिक सत्ता के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों को अब फाँसी दिया जा रहा है। मार्च 2026 में सबसे पहले तीन युवकों को फाँसी दी गई। इनपर सुरक्षाकर्मियों की हत्या का आरोप था। इसके बाद अप्रैल 2026 में तेहरान के बासिज अड्डे पर कथित हमले के आरोप में 4 युवकों को फाँसी दी गई।
संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन को आशंका है कि फाँसी की सजा में और बढ़ोतरी होगी, क्योंकि 15 जुलाई 2026 को ईरान के ज्यूडिशरी के प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने मामले की जल्दी सुनवाई का निर्देश दिया। इसके बाद तेहरान के प्रॉसिक्यूटर जनरल अली सालेही ने 2025-26 में हुए विरोध प्रदर्शनों के सारे मामले निपटा दिए जाने का ऐलान किया। ईरान के आधिकारिक ऐलान के बाद दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन एक्टिव हो गए हैं और ईरान के क्रूरता का विरोध कर रहे हैं।

जून में 100 से ज्यादा लोगों को दी गई फाँसी

आर्टिकल 19 के मुताबिक, ईरान में जून में ही 109 लोगों को फाँसी दी गई, जिनमें 3 महिलाएँ शामिल थी। यह आंकड़ा पिछले साल जून से 10 फीसदी ज्यादा है। संगठन के मुताबिक इनमें से केवल 7 फाँसी दिए जाने की आधिकारिक जानकारी दी गई, बाकी का खुलासा भी नहीं किया गया। यहाँ तक कि कम से कम 12 परिवारों को अपने सदस्यों को फाँसी दिए जाने की खबर बाद में दी गई। कई लोगों को तो स्थानीय मीडिया से ये चला कि उनके परिवार के सदस्य को फाँसी दी जा चुकी है।
एएफपी के मुताबिक, साइंटिस्ट वाहिद बनियामेरियन के परिवार को फाँसी की जानकारी बाद में मिली, उस वक्त परिवार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार अर्जी पर सुनवाई का इंतजार कर रहा था।

युद्ध की आड़ में गिरफ्तारी भी जोरों पर

हाल के महीनों में ईरान में जिस तरह से फाँसी की सजा तेजी से अमल की जा रही है। उसी तरह छात्र नेताओं, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, सोशल मीडिया एक्टिविस्टों, विपक्षी दलों के समर्थकों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत गिरफ्तार किए जाने के मामले में काफी वृद्धि हुई है।
सरकार का कहना है कि ये लोग विदेशी एजेंसियों के साथ मिलकर देश में अस्थिरता पैदा कर रहे थे। ईरान इन लोगों को इजरायल और अमेरिका के जासूस, प्रतिबंधित पीएमओआई और एमईके जैसे संगठनों के सदस्य, ‘मोहारेबेह’ यानी ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर धड़ाधड़ कार्रवाई कर रही है। वहीं मानवाधिकार संगठन इसे असहमति दबाने की कार्रवाई बताते हैं।
मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि आरोपों के पर्याप्त सार्वजनिक सबूत नहीं दिए गए, मुकदमे बहुत जल्दी पूरे किए गए, आरोपियों को स्वतंत्र वकील नहीं मिला, यहाँ तक कि जुल्म के दम पर गुनाह कबूल कराए गए।
सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के दौरान ईरानी सत्ता ने इंटरनेट और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा। कई वेबसाइटें ब्लॉक की गईं, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध बढ़े, इंटरनेट की गति कम की गई या कुछ क्षेत्रों में बंद कर दिया गया, लोगों को मीडिया खास कर विदेशी मीडिया के साथ संपर्क नहीं रखने को कहा गया और ऐसे लोगों पर पैनी नजर रखी गई जो मीडिया से बात कर सकते हैं। सरकार का तर्क है कि इससे ‘फर्जी खबरों’ और ‘दुश्मन के साइबर अभियान’ को रोका जा सकता है।
ईरान ने दर्जनों लोगों पर आरोप लगाया कि वे इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे और सैन्य ठिकानों की जानकारी दे रहे थे। यहाँ तक कहा गया कि ईरानी सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी इजरायल के ड्रोन हमलों में इनलोगों ने मदद की है। ऐसे कुछ मामलों में लोगों को फाँसी की सजा हुई है। ईरानी सरकार इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताती है।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठन लगातार कह रहे हैं कि ईरान में न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है। आरोपितों की बंद कमरे में सुनवाई हुई, परिवारों को समय पर जानकारी नहीं दी गई, अपील का पर्याप्त अवसर नहीं मिला, कुछ मामलों में जबरदस्ती और यातना देकर दबाव बनाया गया और सजा दी गई। हालाँकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि उसकी न्यायिक प्रक्रिया देश के कानूनों के अनुसार चलती है।
ईरान लगातार देश में भय का माहौल बना रहा है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ईरानी विश्वविद्यालयों में निगरानी बढ़ी है, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर दबाव काफी है। यही वजह है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता देश छोड़कर चले गए हैं।

ईरान ऐसा क्यों कर रहा है

ईरान को जानने वाले विश्लेषकों के अनुसार, ईरानी सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचल कर देश में ऐसा माहौल बनाना चाहती है कि उसके खिलाफ कोई भी आवाज ऊँची करेगा तो उसकी आवाज को हमेशा हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाएगा। इजरायल- अमेरिका युद्ध ऐसा मौका है, जब देश में खामेनेई की सत्ता के साथ विरोधी भी आ गए हैं। राष्ट्रवाद उफान पर है और प्रतिद्वदियों को खामोशी से निपटाने का इससे अच्छा सुनहरा मौका नहीं मिल सकता।
अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान जनता को आवश्यक चीजों की कमी हो गई है। लगातार बमबारी को देखते हुए आंतरिक विद्रोह की आशंका है। वैसे भी कुछ महीनों पहले ही सत्ता विरोधी प्रदर्शन हुए थे। ऐसे में भय पैदा कर सत्ता विरोधी लहर को रोकना, साथ ही देश की सुरक्षा व्यवस्था और सत्ता प्रतिष्ठान पर अपना नियंत्रण मजबूत करना ईरानी सरकार का मकसद है। खामेनेई की सत्ता को विदेशी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ का डर है।

ईरान की जनता में रिकॉर्ड गुस्सा, 90% लोग चाहते हैं बदलाव: राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़ी लीक रिपोर्ट में बड़ा दावा, जानें- युद्ध और राष्ट्रीय पहचान पर क्या बोले लोग?

जब से ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध शुरू हुआ है मीडिया इजराइल, ओमेन, दुबई, सऊदी अरब और कुवैत आदि में ईरान की बमबारी से हुए नुकसान को दिखाता रहता है, लेकिन ईरान को कितना नुकसान हुआ है वह नहीं दिखाता, क्यों? क्योकि ईरान ने इंटरनेट बंद कर रखा है। जिस दिन इंटरनेट की पाबन्दी हटेगी दुनिया एक बर्बाद ईरान देखेगी। 

फिर भी इतनी सख्ती के बावजूद ईरान राष्ट्रपति कार्यालय से लीक हुई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरानी युद्ध नहीं शांति चाहते हैं ताकि कट्टरपंथ से बाहर निकल आधुनिक जीवन जी सकें।  

गौरतलब यह है कि युद्ध से पहले ईरान में महिलाओं द्वारा बुर्का, हिजाब और नकाब को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे, महिलाएं बुर्का, हिजाब और नकाब उतार सड़क पर बाल कटवा रही थीं।        

ईरान की राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़ी एक गोपनीय रिपोर्ट लीक होने के बाद देश की मौजूदा स्थिति को लेकर कई बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत ईरानी नागरिक किसी न किसी तरह का बदलाव चाहते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुकी है। खास बात यह है कि रिपोर्ट सरकार को समस्याओं की जड़ दूर करने के बजाय जनता के गुस्से को नियंत्रित करने की सलाह देती है।

यह दस्तावेज ‘What Iran Wants’ शीर्षक से तैयार किया गया है। इसे राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के सामाजिक मामलों के सलाहकार और पूर्व खुफिया अधिकारी अली रबीई ने तैयार किया है। यह रिपोर्ट अप्रैल और मई में कराए गए सर्वे पर आधारित बताई गई है और जून में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच साझा की गई थी।

सर्वे में सिर्फ 9% लोगों ने मौजूदा व्यवस्था का समर्थन किया

रिपोर्ट के मुताबिक, जब लोगों से ईरान के भविष्य को लेकर राय पूछी गई तो केवल 9 प्रतिशत लोगों ने मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने का समर्थन किया। बाकी लोगों ने सुधार, बड़े सुधार या पूरी व्यवस्था बदलने जैसे विकल्पों को चुना।


हालाँकि, रिपोर्ट में सर्वे की कार्यप्रणाली का पूरा विवरण नहीं दिया गया है, इसलिए इसके आँकड़ों पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। फिर भी कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये नतीजे देश के मौजूदा माहौल से मेल खाते हैं।

जनता में गुस्सा और निराशा रिकॉर्ड स्तर पर

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान में गुस्से का स्तर दुनिया में अब तक दर्ज किसी भी देश से अधिक है। सर्वे के अनुसार 63.6 प्रतिशत लोगों ने खुद को गुस्से में बताया, जबकि पहले यह आंकड़ा काफी कम था।

इसके अलावा करीब आधी आबादी ने खुद को निराश, उदास, डरी हुई या लगातार चिंता में रहने वाला बताया। रिपोर्ट के अनुसार युवाओं और पढ़े-लिखे लोगों में यह भावना सबसे ज्यादा देखने को मिली।

युद्ध नहीं, बातचीत का रास्ता चाहते हैं लोग

अमेरिका के साथ तनाव को लेकर भी रिपोर्ट में अहम जानकारी सामने आई है। करीब 44 प्रतिशत लोगों ने युद्धविराम बनाए रखने और बातचीत जारी रखने का समर्थन किया। वहीं, बहुत कम लोगों ने अमेरिका की सभी शर्तें मानने की बात कही।

अधिकांश लोगों ने यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करने का भी विरोध किया। हालाँकि, सर्वे में यह भी सामने आया कि लोगों का भरोसा न तो बातचीत करने वाली टीम पर पूरी तरह है और न ही सैन्य नेतृत्व पर।

सरकारी दावों से अलग दिखी जनता की तस्वीर

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार जिस राष्ट्रीय एकजुटता की तस्वीर पेश कर रही है, वह पूरी तरह वास्तविक नहीं दिखती। सर्वे के अनुसार 47 प्रतिशत लोग युद्ध के दौरान आयोजित सरकारी रैलियों में कभी शामिल नहीं हुए। राजधानी तेहरान में यह आँकड़ा 61 प्रतिशत रहा। रिपोर्ट में यह भी माना गया कि राष्ट्रीय रक्षा से जुड़े स्वयंसेवी अभियान को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

राष्ट्रीय पहचान मजबूत, लेकिन देश छोड़ने की इच्छा भी बढ़ी

सर्वे में 85 प्रतिशत से अधिक लोगों ने खुद को ईरानी होने पर गर्व महसूस करने की बात कही। खासकर युवाओं में मजहबी पहचान की तुलना में राष्ट्रीय पहचान अधिक मजबूत होती दिखाई दी।

दूसरी ओर  परंपराओं का पालन लगातार घटने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है। इसके साथ ही करीब एक-तिहाई लोगों ने मौका मिलने पर देश छोड़ने की इच्छा जताई। 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और विश्वविद्यालय शिक्षित लोगों में यह प्रतिशत और अधिक बताया गया।

सरकार को क्या सलाह दी गई?

रिपोर्ट में सरकार को राजनीतिक बदलाव की सलाह नहीं दी गई है। इसके बजाय सुझाव दिया गया है कि लोगों को यह समझाने की कोशिश की जाए कि उनकी आर्थिक परेशानियों की मुख्य वजह प्रतिबंध हैं।

साथ ही सरकारी मीडिया को अधिक समावेशी छवि दिखाने और ऐसी नीतियों से बचने की सलाह दी गई है जिनसे सरकार और समाज के बीच टकराव बढ़े। रिपोर्ट के अंत में चेतावनी दी गई है कि समाज गहरे असंतोष की स्थिति में है और यदि हालात नहीं बदले तो भविष्य में इसका गंभीर असर देखने को मिल सकता है।

इराक क्यों ले जाया जा रहा है ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा?

अयातुल्लाह खामेनेई को कई महीनों बाद किया जा रहा है सुपुर्द-ए-खाक (फोटो साभार: X/Government of Islamic Republic of Iran)
लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।

नजफ और करबला की मजहबी अहमियत

शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।

इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।

खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।

अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश

खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।

इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी

इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।

इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।

यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।

सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।

खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।

वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।

US-इजरायली हमले के बाद भारतीयों ने खुलकर की ईरान की मदद, लेकिन ईरानी जला रहे तिरंगा झंडा: Video पर भड़के आम लोग, नमकहरामी का लगा रहे आरोप

                                                         साभार: एक्स @SouleFacts
ईरान के लिए छाती पीटने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों और खुलकर मदद करने वालों अगर जरा भी शर्म बची है तो कहीं डूब मरो। जिन नमकहरामों के लिए तुमने मदद भेजी देखो तुम्हारे ही देश के झंडे को जलाया जा रहा है। क्या भारतीय झंडे के अपमान के लिए ईरान के लिए छाती पीट रहे हो और अपनी मेहनत की कमाई लुटा रहे हो? यहाँ तो बोलते हो हम गरीब हैं, मजलूम हैं और आतंकवाद को पालने वाले को मदद भेज रहे हो? क्या किसी ने ईरान उच्चायोग से विरोध जताया?      

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भारत में कई कट्टरपंथियों ईरान के समर्थन में आवाज उठाई थी। सोशल मीडिया पर ईरान के पक्ष में पोस्ट किए गए, मदद की अपील की गई और कुछ लोगों ने आर्थिक सहायता भेजने की भी बात कही। लेकिन अब X पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो भारतीय यूजर्स के बीच नाराजगी की वजह बन गए हैं।

वायरल वीडियो में कुछ लोग भारत का झंडा जलाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन्हें लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कई यूजर्स का कहना है कि भारत ने कभी ईरान पर हमला नहीं किया और न ही अमेरिका-इजरायल के सैन्य अभियान का हिस्सा बना, फिर भी भारत का झंडा जलाना समझ से परे है।

पहले वायरल पोस्ट में एक यूजर ने लिखा, “हिंदुओं और हिंदू धर्म से अब्राहमिक पंथों के लोग स्वाभाविक रूप से नफरत करते हैं।” ऐसे ही एक दूसरे पोस्ट में सवाल उठाया गया कि जब भारत ने ईरान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, तब आखिर भारतीय तिरंगे को क्यों जलाया जा रहा है।

यूजर ने कहा कि भारत कभी भी अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने वालों में शामिल नहीं रहा। एक अन्य पोस्ट में एक यूजर ने दावा किया कि ऐसे वीडियो साबित करते हैं कि भारत विरोधी मानसिकता रखने वाले लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पोस्ट में कहा गया कि भारत के प्रति नफरत कुछ लोगों की स्वाभाविक सोच बन चुकी है।

ऐसे ही एक यूजर ने लिखा कि भारतीयों ने ईरान की मदद के लिए धन और समर्थन दिया, लेकिन बदले में भारतीय झंडे का अपमान देखने को मिला।

यूजर ने इसे नमकहरामी बताते हुए उन लोगों की आलोचना की जो अभी भी ईरान के प्रति सहानुभूति जता रहे हैं।

‘तुम पूरी तरह पागल हो, मेरी वजह से जेल जाने से बचे’: ट्रंप का दिमाग अब नेतन्याहू पर खिसका

             डोनाल्ड ट्रम्प (बाएँ) और बेंजामिन नेतन्याहू (दाएँ)(फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इजरायल, न्यूजवीक)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भारी नाराजगी जताई है। 1 जून 2026 को दोनों के बीच फोन पर बहुत तीखी बातचीत हुई। ट्रंप ने आरोप लगाया कि नेतन्याहू लेबनान में जानबूझकर जंग भड़का रहे हैं। इससे अमेरिका और ईरान की शांति बातचीत खतरे में पड़ रही है।

ट्रंप ने नेतन्याहू को सीधे क्या-क्या कहा?

‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप इजरायल के हमलों से बेहद गुस्से में थे। ट्रंप ने नेतन्याहू को ‘पूरी तरह पागल’ कह दिया। ट्रंप ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, “तुम आखिर कर क्या रहे हो?” उन्होंने आगे कहा, “अगर मैं नहीं होता तो तुम जेल में होते। मैं तुम्हें बचा रहा हूँ। अब हर कोई तुमसे नफरत करता है। इस वजह से हर कोई इजरायल से भी नफरत करता है।”

क्यों गुस्से में थे अमेरिकी राष्ट्रपति?

ट्रंप लेबनान में इजरायल की लगातार सैन्य कार्रवाई से नाराज थे। इजरायल बेरूत में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बड़े हमले की तैयारी में था। वह दक्षिणी लेबनान में भी सेना बढ़ा रहा था। ट्रंप को लगा कि इजरायल जरूरत से ज्यादा आक्रामक हो रहा है। वे लेबनान में आम नागरिकों की मौतों और हिजबुल्लाह कमांडरों पर बड़े हमलों से परेशान थे। उन्हें डर था कि इससे अमेरिका-ईरान के कूटनीतिक प्रयास बर्बाद हो जाएँगे।

ईरान की सीधी चेतावनी

यह तीखी बहस तब हुई जब ईरान ने अमेरिका को खुली चेतावनी दी। ईरान ने कहा कि अगर लेबनान पर इजरायली हमले नहीं रुके, तो वह वाशिंगटन के साथ चल रही बातचीत रोक देगा। तेहरान ने साफ किया कि किसी भी समझौते के लिए लेबनान में युद्धविराम पहली शर्त है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने भी लेबनान को भरोसा दिया कि हमला जारी रहने पर वे अमेरिका से बातचीत सस्पेंड कर सकते हैं।

फोन कॉल के बाद क्या बदला?

इस डांट के बाद एक इजरायली अधिकारी ने बताया कि इजरायल ने बेरूत पर हमले की योजना टाल दी है। ट्रंप ने बाद में दावा किया कि बातचीत सकारात्मक रही। उन्होंने कहा कि बेरूत की तरफ बढ़ रहे इजरायली सैनिकों को वापस मोड़ दिया गया है। मध्यस्थों के जरिए हिजबुल्लाह भी इजरायल पर हमले रोकने को तैयार हो गया है।

नेतन्याहू की जिद और आंशिक युद्धविराम

दूसरी तरफ नेतन्याहू ने जनता के सामने अलग बयान दिया। उन्होंने कहा कि इजरायल का रुख नहीं बदला है। वे दक्षिणी लेबनान में अभियान जारी रखेंगे। अगर हिजबुल्लाह ने हमला किया, तो बेरूत पर फिर बमबारी होगी। इस बीच, 1 जून को लेबनान ने एक आंशिक युद्धविराम की घोषणा की। इसके तहत इजरायल बेरूत पर हमले नहीं करेगा और हिजबुल्लाह इजरायल पर रॉकेट नहीं दागेगा।

ईरान की मस्जिदों में महिलाओं समेत सबको दी जा रही एके-47 चलाने की ट्रेनिंग, मीडिया के जरिए किया जा रहा प्रचार: स्टूडियो में एंकर भी राइफल लिए नजर आए

                                 ईरान में हथियारों की ट्रेनिंग (फोटो साभार-iran news)
ईरान के सरकारी टेलीविजन ने कई शहरों की मस्जिदों में पुरुषों और महिलाओं को हथियारों का प्रशिक्षण देते हुए दिखाया गया। इसे देश की रक्षा के लिए जनता की तैयारी का हिस्सा बताया गया।

शनिवार (16 मई 2026) को प्रसारित रिपोर्ट के मुताबिक, अहवाज, केरमान, बीजार, शिराज और जहेदान की मस्जिदों में लोगों की भीड़ दिखाई दी। इस दौरान कुछ लोगों को हथियार चलाते और एक साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया। न्यूज रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और टीन एज को आत्मरक्षा के लिए इस तरह का प्रशिक्षण दिया गया।

सरकारी टेलीविजन के अनुसार, प्रशिक्षण के दौरान लोगों को अलग अलग हल्के हथियारों से परिचित कराया गया, उन्हें यह सिखाया गया कि वे कैसे काम करते हैं, और उन्हें कैसे जोड़ा और अलग किया जाता है।

इससे पहले ईरान के सरकारी टेलीविजन ने शुक्रवार रात कई कार्यक्रम दिखाए, जिनमें एंकर स्टूडियो में राइफलें लिए नजर आ रहे थे। उन्होंने कहा कि वे हथियारों को इस्तेमाल करने की बुनियादी ट्रेनिंग ले रहे हैं और जरूरत पड़ने पर जंग में शामिल होंगे।

शुक्रवार को ऐसे तीन कार्यक्रम प्रसारित किए गए। इन्हें ईरानी मीडिया आउटलेट्स ने भी दिखाया, जिसके बाद ऑनलाइन इस पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इन हिस्सों को जंग की तैयारी के तौर पर देखा।

ईरान के जबरदस्त समर्थक और इजरायल विरोधी माने जाते वाले अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार और इन्फ़्लुएंसर जैकसन हिंकल ने X पर लिखा कि ईरानी सरकारी टीवी यह दिखा रहा है कि AK-47 का इस्तेमाल और उसे कैसे चलाया जाए। उन्होंने इसे ‘अमेरिका के जमीनी हमले की तैयारी’ का जवाब बताया।

हथियारों और जंग से जुड़े वीडियो पर फ़ोकस करने वाले एक अन्य अकाउंट ने कहा कि ईरानी टीवी चैनल हथियारों को इस्तेमाल करने के बुनियादी निर्देश दे रहे हैं। उसने यह भी बताया कि जो राइफ़ल दिखाई गई थी, वह शुरुआती दौर की ईस्ट जर्मन MPi-KMS असॉल्ट राइफल लग रही थी।

ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जंग फिर से शुरू होने की आशंका के बीच ऐसे वीडियो ईरान की तैयारी को बताता है।

कौन था मोसाद का एजेंट ‘M’ जिनकी झील में डूबने से हुई मौत, ईरान के जुटाए थे सारे सीक्रेट


दुनिया की और इजरायल की सबसे बड़ी जासूसी एजेंसी ‘मोसाद’ के काम करने का तरीका हमेशा एक राज रहा है। कुछ समय पहले ही इजरायल ने अपने एक ऐसे ही जाबांज एजेंट की कहानी से पर्दा उठाया है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी देश की सुरक्षा के लिए अंधेरे में रहकर काम किया। मई 2023 में इटली में एक नाव हादसे के दौरान इस एजेंट की जान चली गई थी।

यह एजेंट कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बल्कि ईरान के खतरनाक मंसूबों को रोकने में इजरायल का सबसे बड़ा हथियार था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस एजेंट की वजह से ही इजरायल को ईरान के खिलाफ चल रही गुप्त जंग में बड़ी कामयाबी मिली थी।

कौन था एजेंट ‘M’ और क्या थी उनकी पहचान?

एजेंट ‘M’ का असली नाम आज भी एक गहरा राज बना हुआ है। इजरायल की सरकार और मोसाद ने कभी भी उनकी पहचान को पूरी तरह नहीं खोला। इटली की मीडिया ने उन्हें ‘एरेज शिमोनी’ नाम दिया था, लेकिन माना जाता है कि यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए एक नकली नाम था। उन्होंने मोसाद में लगभग 30 साल तक अपनी सेवा दी और इजरायल की सबसे मजबूत दीवार बने रहे।

वह स्वभाव से बहुत ही शांत और नेक इंसान था। उनके दोस्तों और साथियों का कहना है कि वह हर किसी से बहुत प्यार से मिलते थे और बड़ों से लेकर बच्चों तक, सबकी भाषा समझते थे। वह दुनिया की नजरों में एक साधारण इंसान थे, लेकिन असल में वह इजरायल के सबसे बड़े रक्षक थे। उनकी मृत्यु के बाद जब उन्हें विदा किया गया, तो मोसाद के बड़े अधिकारियों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए टोपी और मास्क लगाकर उन्हें अंतिम सलाम दिया।

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ईरान के खिलाफ भूमिका और ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’

एजेंट ‘M’ ने ईरान के खिलाफ चल रही लड़ाई में बहुत ही खास भूमिका निभाई थी। मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने बताया कि ‘M’ ने उन गुप्त मिशनों को संभाला था जिनकी वजह से इजरायल को ईरान पर बड़ी जीत मिली। उन्होंने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ नाम के एक बड़े अभियान में अपनी बुद्धि और नई तकनीक का ऐसा इस्तेमाल किया कि दुश्मन के पास कोई जवाब नहीं था।

मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने आगे बताया कि उन्हें ‘M’ की बहादुरी पर बहुत गर्व है। ‘M’ ने इजरायल की सरहद से दूर रहकर उन खतरों को खत्म किया जो देश की सुरक्षा को नुकसान पहुँचा सकते थे। उनके काम करने का तरीका इतना शानदार था कि दुश्मन को पता भी नहीं चलता था और मिशन पूरा हो जाता था। वह उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने ईरान के खतरनाक हथियारों और परमाणु मंसूबों को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

इटली की झील में वो दर्दनाक नाव हादसा

मई 2023 की एक शाम इटली की ‘लेक मैगीगोर’ झील में एक बहुत ही दुखद हादसा हुआ। एजेंट ‘M’ वहाँ किसी छुट्टी पर नहीं, बल्कि एक बहुत ही जरूरी मीटिंग के लिए गए थे। उस नाव पर उनके साथ इजरायल और इटली के कई और जासूस भी सवार थे। अचानक मौसम बिगड़ा और नाव पलट गई। इस हादसे में ‘M’ के साथ इटली के दो एजेंट और नाव के कप्तान की पत्नी की डूबने से मौत हो गई।

उस नाव पर क्षमता से ज्यादा लोग सवार थे, जिस कारण यह हादसा हुआ। नाव जब डूबी तो वह किनारे से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर थी, लेकिन ‘M’ को बचाया नहीं जा सका। हादसे के तुरंत बाद इजरायल ने अपने बाकी बचे जासूसों को एक प्राइवेट जेट से तुरंत वापस बुला लिया। यह पूरी घटना इतनी रहस्यमयी थी कि इसने पूरी दुनिया की मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया।

देश की श्रद्धांजलि और आखिरी सलाम

एजेंट ‘M’ को इजरायल के अश्कलोन शहर में पूरे सम्मान के साथ विदाई दी गई। मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया उनके जनाजे पर भावुक हो गए और उन्हें एक सच्चा दोस्त और महान इंसान बताया। उन्होंने कहा कि ‘M’ ने अपनी पूरी जवानी देश की सेवा में लगा दी। उनकी बहादुरी की कई ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें शायद देश की सुरक्षा की वजह से कभी भी जनता को नहीं बताया जा सकेगा।

इजरायल के प्रधानमंत्री और बड़े नेताओं ने भी उनकी शहादत को याद किया। उन्होंने कहा कि ‘M’ जैसे गुमनाम हीरोज की वजह से ही देश आज सुरक्षित है। आज इजरायल की आधिकारिक यादगारों पर उनका नाम बड़े सम्मान के साथ दर्ज है। भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए महान काम इजरायल के इतिहास में हमेशा चमकते रहेंगे।

NSA अजित डोभाल से मीटिंग के 2 दिन बाद UAE ने छोड़ा OPEC


मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 65 साल से अधिक पुराने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC)(Organization of the Petroleum Exporting Countries) और ओपेक+ से बाहर निकलने का फैसला किया है। UAE 1 मई 2026 से आधिकारिक तौर पर इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक तेल सप्लाई पहले से दबाव में है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हैं।

इस फैसले से जुड़ी एक और अहम बात जिसे लेकर चर्चा है वो है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की विदेश यात्रा। अपनी 25-26 अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने अबू धाबी में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जाएद से मुलाकात की थी। इस यात्रा के दौरान उनकी कुछ अन्य अहम मीटिंग भी हुईं। इसके 2 दिन बाद ही 28 अप्रैल को UAE ने OPEC छोड़ने का ऐलान कर दिया।

ऐसे में UAE का यह कदम सिर्फ एक संगठन से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे तेल की कीमतों, सप्लाई और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। वहीं, भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए इसमें मौके भी छिपे हुए हैं।

OPEC क्या है और क्यों बना था?

ओपेक (OPEC) यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (Organization of the Petroleum Exporting Countries) एक ऐसा इंटर गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन है जिसे 1960 में पाँच देशों ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर बनाया था।

उस समय तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था और तेल उत्पादक देशों को उचित कीमत नहीं मिल रही थी। ऐसे में इन देशों ने मिलकर एक ऐसा समूह बनाया जिसका उद्देश्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करना, कीमतों को स्थिर रखना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना था।

समय के साथ यह संगठन काफी शक्तिशाली हो गया और वैश्विक तेल बाजार में इसका बड़ा प्रभाव हो गया। बाद में ओपेक+ बना, जिसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक देश भी शामिल हुए, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।

कब जुड़ा UAE और क्या रही उसकी भूमिका?

UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है और इसकी उत्पादन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। UAE 1971 में ओपेक का सदस्य बना, हालाँकि अबू धाबी 1967 से ही इस समूह से जुड़ा हुआ था।

ओपेक के भीतर UAE को एक भरोसेमंद और अनुशासित सदस्य के रूप में देखा जाता था, जो संगठन के फैसलों का पालन करता था। इसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी थी, यानी जरूरत पड़ने पर यह उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बना सकता था। इसी वजह से इसे स्विंग प्रोड्यूसर के रूप में भी देखा जाता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।

UAE ने ओपेक क्यों छोड़ा?

UAE ने अपने बयान में कहा है कि यह फैसला उसके राष्ट्रीय हित और लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल पिछले कुछ समय से UAE और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे।

सऊदी अरब चाहता था कि उत्पादन सीमित रखा जाए ताकि कीमतें ऊँची बनी रहें जबकि UAE ज्यादा उत्पादन करना चाहता था ताकि वह अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सके।

UAE ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह इन निवेशों का लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा UAE की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रही है। उसने पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विकास किया है, जिससे वह ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक फैसले लेने की स्थिति में है।

ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को लेकर असंतोष भी एक कारण माना जा रहा है, जिससे UAE ने अपने रास्ते अलग करने का फैसला लिया। UAE के बाहर निकलने के बाद ओपेक में अब कुल 11 सदस्य देश रह जाएँगे।

इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और कांगो गणराज्य शामिल हैं। इससे पहले कतर 2019 में और अंगोला 2024 में इस संगठन को छोड़ चुके हैं। लगातार देशों के बाहर निकालने से यह साफ पता चलता है कि ओपेक की एकजुटता कमजोर हो रही है और भविष्य में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता हैं।

UAE क्या हासिल करना चाहता है?

UAE का मुख्य उद्देश्य अधिक स्वतंत्रता के साथ अपने तेल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है। वह अब ओपेक के उत्पादन कोटा से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन बढ़ाना चाहता है।
इसके जरिए वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहता है। साथ ही, UAE खुद को एक स्वतंत्र ऊर्जा शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से फैसले ले सके। यह कदम उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकता है।

OPEC पर इसका क्या असर पड़ेगा?

UAE के बाहर निकलने से ओपेक को कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। सबसे पहले संगठन की कुल उत्पादन क्षमता में कमी आएगी, जिससे उसकी बाजार पर पकड़ कमजोर होगी।
दूसरा, तेल की कीमतों को नियंत्रित करना ओपेक के लिए और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अब कम स्पेयर कैपेसिटी होगी। तीसरा, इससे संगठन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद और बढ़ सकते हैं और अन्य देश भी बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं।
इसके अलावा वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि एक कमजोर ओपेक सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखने में पहले जितना सक्षम नहीं रहेगा। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर होगा?

इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा, खासकर तब तक जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुल नहीं जाता। लेकिन लंबे समय में इसका असर जरूर पड़ेगा। UAE के ज्यादा उत्पादन करने से वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
हालाँकि इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता भी बढ़ सकती है, क्योंकि ओपेक की पकड़ कमजोर होगी और तालमेल कम हो जाएगा जिसका असर आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।

भारत को फायदा होगा या नुकसान?

भारत के लिए यह स्थिति ज्यादातर मामलों में फायदेमंद मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करता है और उसमें से एक बड़ा हिस्सा ओपेक देशों से आता है।
UAE भारत का एक अहम सप्लायर है, इसलिए उसके ज्यादा उत्पादन करने से भारत को सस्ता तेल मिल सकता है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और महंगाई पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। अब भारत सीधे UAE के साथ लंबी अवधि के समझौते कर सकता है, जो पहले ओपेक के नियमों के कारण सीमित थे।
कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगर ब्लॉक रहता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।
UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि अब देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए पारंपरिक संगठनों से अलग होने में हिचक नहीं रहे हैं।
इससे जहाँ एक ओर ओपेक की ताकत कमजोर हो सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है, जहाँ वे सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत हासिल कर सकते हैं।

दोगले पाकिस्तान ने ट्रंप की पीठ में घोंपा छुरा, ईरान के लिए खोले 6 रास्ते: हॉर्मुज की नाकाबंदी फेल


अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान ने एक बड़ा कदम उठाया है। पाकिस्तान ने ईरान के लिए व्यापार के छह नए रास्ते खोल दिए हैं। इससे ईरान को काफी राहत मिलेगी। खास बात यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर नाकाबंदी लागू की हुई है।

दरअसल, ईरान के लिए भेजे जाने वाले हजारों कंटेनर पाकिस्तान के बंदरगाहों पर फँसे हुए थे। इससे व्यापार पर भारी असर पड़ रहा था और कारोबारी परेशान था। इसीलिए अपना फायदा देखते हुए पाकिस्तान ने यह कदम उठाया। अब इन नए व्यापार के रास्तों के जरिए सामान आसानी से ईरान पहुँचाया जा सकेगा।

पाकिस्तान ने जिन व्यापार के रास्तों को दोबारा चालू किया है, वो हैं:

  • ग्वादर से गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से लियारी, ओरमारा, पसनी होकर गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से खुजदार, दलबंदिन होकर ताफ्तान
  • ग्वादरे से तुर्बत, होशाब, पंजगुर, नाग, बेसिमा, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • ग्वादर से लियारी, खुजदार, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • कराची/पोर्ट कासिम से ग्वादर होकर गब्द
इन नए रास्तों से पाकिस्तान के प्रमुख बंदरगाह, जैसे ग्वादर और पोर्ट कासिम, सीधे ईरान सीमा से जुड़ गए हैं। ये रास्ते ताफ्तान और गब्द जैसे अहम सीमा चौकियों तक पहुँचते हैं। पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जिसका अब दोनों देशों को बड़ा फायदा मिलेगा।
खास तौर पर ग्वादर से गब्द वाला रास्ता सबसे अहम माना जा रहा है। इस रास्ते से पहले जहाँ यात्रा में लगभग 18 घंटे लगते थे, वहीं अब यह दूरी केवल 3 घंटे में पूरी की जा सकेगी। इससे व्यापार तेज होगा, समय बचेगा और दोनों देशों के आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

पाकिस्तान ने कैसे अमेरिका को दिया धोखा?

पाकिस्तान के इस कदम की आलोचना इसीलिए की जा रही है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। खासकर सुरक्षा और क्षेत्रीय मामलों में दोनों देशों के रिश्ते मजबूत माने जाते हैं। लेकिन अब पाकिस्तान ने ऐसा रास्ता तैयार कर दिया है, जिससे ईरान पर अमेरिका की नाकाबंदी का असर काफी हद तक कम हो सकता है।
पाकिस्तान ने तीसरे देशों के सामान को कानूनी तौर पर अपने रास्ते ईरान भेजने की अनुमति दे दी है। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका जो ईरान पर दबाव बनाना चाहता था, वह अब कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ हिमांशु जैन और ऋचा द्विवेदी जैसे जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के इस फैसले ने अमेरिकी नाकाबंदी में एक ‘कानूनी छेद’ कर दिया है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पाकिस्तान इस क्षेत्र में अमेरिका की रणनीति के साथ कितनी मजबूती से खड़ा है।

ईरान के सपोर्ट में शिया आबादी पाकिस्तान में कल्तेआम न मचा दे, इसलिए डरे असीम मुनीर ने NYT की रिपोर्ट ही उड़ा दी


पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।

रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।

NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।

पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।

NYT की रिपोर्ट में क्या लिखा था?

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।

दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।

रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।

पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।

जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया

जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।

उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।

इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।

पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल

अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?

इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।

पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।

इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।

पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!

यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।      (साभार) 

बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान का हिस्सा: क्या यह स्थायी है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

              इजरायली फौज द्वारा बनाई गई येलो लाइन, बेंजामिन नेतान्याहू (साभार: X_IDF/AI ChatGPT)
पूरी दुनिया जब अप्रैल 2026 के बीच में इजरायल-लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम पर नजर टिकाए हुए थी, तभी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक नई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) या ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ बना दी। इजरायली रक्षा बल (IDF) ने खुद एक नक्शा जारी कर बताया कि दक्षिणी लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर गहरी यह सैन्य जोन अब उनके नियंत्रण में है। पाँच डिवीजनों की ताकत के साथ इजरायली सैनिक इस लाइन के दक्षिण में तैनात हैं।

आईडीएफ ने कहा है कि उसके सैनिक हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करने और उत्तरी इजरायल पर हमले रोकने के लिए मैदान में डटे हैं। हालाँकि लेबनान और हिजबुल्लाह इसे संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा बताते हुए इस कदम का विरोध किया है। एक तरफ अभी युद्धविराम की स्याही सूखी भी नहीं है कि दूसरी तरफ इजरायली बुलडोजर दक्षिणी लेबनान के भीतर बसे गाँवों में घरों को तोड़ रहे थे, तोपें चल रहे थे और हवाई हमले हो रहे थे। हालाँकि अभी युद्धविराम लागू है, लेकिन छिटपुट हमले दोनों तरफ से हो रहे हैं।

लेबनान के दक्षिणी हिस्सा में घट रही यह घटना महज एक स्थानीय तनाव नहीं है। यह मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक नक्शे में एक नया अध्याय जोड़ रही है। इजरायल ने पहले भी लेबनान पर कब्जा किया था, जिसमें 1982 से 2000 तक 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर कब्जा रखा था। तब भी उसने लिटानी नदी तक पहुँचने का सपना देखा था और आज फिर वही रणनीति इजरायल की तरफ से दोहराई जा रही है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या इजरायल का यह कब्जा स्थायी होगा? या उसका ये कदम अमेरिका-ईरान वार्ता में सौदेबाजी का हथियार बनेगा। 

येलो लाइन का जन्म और युद्धविराम का मजाक

मध्य पूर्व में एक बार फिर सीमाओं की लकीरें स्याही से नहीं, बल्कि टैंकों के टायरों और सैन्य चौकियों से खींची जा रही हैं। इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में बनाई गई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य घेराबंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जो दशकों पुराने विवादों को नया रंग दे रही है।

दरअसल, अमेरिका की मध्यस्थता में 16 अप्रैल 2026 को इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का युद्धविराम शुरू हुआ है। करीब 46 दिन के इजरायली हमलों और जमीनी ऑपरेशन के बाद यह समझौता हुआ। लेकिन कुछ घंटों में ही IDF ने दक्षिणी लेबनान में ‘येलो लाइन’ की घोषणा कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा, “हम लेबनान में 10 किलोमीटर गहरी मजबूत सुरक्षा पट्टी में रहेंगे। यह पहले से कहीं ज्यादा ठोस, निरंतर और मजबूत है। हम यहाँ से नहीं जाएँगे।”

IDF के बयान में कहा गया कि लाइन के दक्षिण में पाँच डिवीजनों के सैनिक हिजबुल्लाह के आतंकी ढाँचे को तोड़ रहे हैं। जिसकी वजह से 55 लेबनानी गाँवों और कस्बों में निवासियों को वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई।

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम शुरू होते ही इजरायली सेना ने हनीन गाँव में घर उड़ाए, बेत लिफ, अल-कांतारा और तौल पर तोपें दागीं। बुलडोजर से जमीन साफ की जा रही है। गाजा में इसी येलो लाइन मॉडल का इस्तेमाल हो रहा है, जहाँ का 60 प्रतिशत इलाका इजरायली नियंत्रण में है और सैकड़ों घर ध्वस्त किए गए। अब लेबनान में भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।

 हिजबुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने कहा, “युद्धविराम एकतरफा नहीं हो सकता। अगर इजरायल उल्लंघन करेगा तो हम जवाब देंगे। हमारे लड़ाके मैदान में हैं, ट्रिगर पर उँगली रखे हुए।” हिजबुल्लाह इसे देश का अपमान मान रहा है और पूर्ण वापसी की माँग कर रहा है।

इजरायल ने कब कब बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा?

इजरायल का विस्तारवाद नया नहीं है। साल 1918 में डेविड बेन-गुरियन और यित्जाक बेन-ज्वी ने ‘एरेट्स यिसराइल’ किताब में लिखा कि यहूदियों का देश लिटानी नदी तक फैला होना चाहिए। इसके बाद 1919 में वर्ल्ड जियोनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ने पेरिस शांति सम्मेलन में लिटानी नदी को उत्तरी सीमा बताते हुए नक्शा पेश किया गया।

इजरायल की आजादी के बाद साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के 15 गाँवों पर कब्जा कर लिया। हालाँकि बाद में साल 1949 में आर्मिस्टिस समझौते के तहत इसमें से सात गाँवों को इजरायल को सौंप दिए गए।

इसके बाद साल 1978 में ऑपरेशन लिटानी के तहत इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वो साल 1982 में ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली में बेरूत तक पहुँच गए। और फिर करीब 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा बना रहा। हालाँकि साल 2000 में यूनिफिल और हिजबुल्लाह के दबाव में इजरायल ने वहाँ से वापसी की, लेकिन शेबा फार्म्स पर कब्जा आज भी जारी है।

वहीं साल 1967 के छह दिन युद्ध में गोलान हाइट्स (सीरिया) पर कब्जा कर लिया, जिसे साल 1981 में इजरायल ने अपने आप में मिला लिया। यही नहीं, वेस्ट बैंक और गाजा पर उसका साल 1967 से ही कब्जा है। और अब 2026 में लेबनान में फिर वही पैटर्न दिख रहा है, जिसमें पहले सुरक्षा जोन, फिर स्थायी नियंत्रण।

इजरायल का तर्क हमेशा ‘सुरक्षा’ रहा है। लेकिन आलोचक इसे ‘ग्रेटर इजरायल’ का हिस्सा मानते हैं, जिसमें लिटानी नदी, गोलान और वेस्ट बैंक शामिल हैं। अभी 2026 के जमीनी ऑपरेशन में इजरायल ने पहले ही दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में बफर जोन बना लिया था। जिसे अब येलो लाइन संस्थागत रूप दे रही है।

क्या यह स्थाई कब्जा है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कब्जा अस्थायी नहीं होगा। चूँकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साफ कह चुके हैं कि इजरायली सेना ‘क्लियर और सिक्योर’ पोजीशंस को छोड़ने वाली नहीं है। इसके साथ ही गाजा मॉडल की तरह लेबनान में भी सफाई अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।

हालाँकि दक्षिणी लेबनान का यह इलाका (जिस पर अभी इजरायली सेना मौजूद) भविष्य की बातचीत (ईरान या लेबनान के साथ) में ‘लीवरेज’ (दबाव का हथियार) बन सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

दरअसल, इस इलाके का और खासकर हिज्बुल्लाह का ईरान से जुड़ाव और गहरा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका-ईरान वार्ता का पूर्व शर्त है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में ईरान ने कहा कि जब तक इजरायल लेबनान से नहीं हटेगा, कोई समझौता नहीं होगा। ईरान के इस स्टैंड के बाद ही इजरायल-लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, लेकिन अब जब ईरान बातचीत की टेबल पर आएगा तो उसके बाद सिर्फ हॉर्मूज ही नहीं दक्षिणी लेबनान का हिस्सा भी जोर-आजमाइश के लिए मौजूद रहेगा।

इस बीच, हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल नहीं हटा तो वे जवाब देंगे। लेबनानी सेना और सरकार भी संप्रभुता की बात कर रही है। यूएनएफआईएल (UNIFIL) पहले से ही रेजोल्यूशन 1701 का हवाला दे रही है, जिसमें इजरायल को ब्लू लाइन के दक्षिण में रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलेगी या मिलेगी हमेशा की तरह निंदा?

इतिहास गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के कब्जों को कभी मान्यता नहीं दी है। गोलान हाइट्स पर 1981 के एनेक्सेशन को यूएन ने अवैध घोषित किया। वेस्ट बैंक पर बस्तियों को भी वो अवैध कहता है। लेबनान भी रेजोल्यूशन 1701 (2006) के तहत इजरायल से पूर्ण वापसी की माँग करता रहा है। तो यूएन एक्सपर्ट्स ने इजरायल के बमबारी को ‘एथनिक क्लिंजिंग’ और ‘डोमिसाइड’ (घरों का विनाश) बताया है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यूएन की ताकत बहुत सीमित है। यूएन में इजरायल के लिए उठ रही किसी भी समस्या पर अमेरिका तुरंत वीटो कर देता है। ऐसे में साल 2026 में भी यूएन सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव तो आ सकते हैं, लेकिन कुछ भी लागू होना मुश्किल है। हालाँकि फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों ने ‘येलो लाइन’ की निंदा की है, लेकिन इजरायल ‘आत्मरक्षा’ का हवाला देकर कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में अगर यूएन कोई निंदा प्रस्ताव लाता भी है, तो भी इजरायल पर कोई खास फर्क पड़ेगा, ये अभी तो नहीं देखा जा रहा।

भविष्य में होगी शांति या खुलेगा वॉर का नया फ्रंट?

अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान की बातचीत सफल हुई तो लेबनान से इजरायली वापसी हो सकती है। हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल न सिर्फ लेबनान बल्कि सीरिया में भी क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति अपना रहा है। क्योंकि भविष्य की किसी भी बातचीत में यह जमीन ‘लीवरेज’ बनेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जबरन कब्जा भी ज्यादा समय तक टिकता नहीं है।

चूँकि इजरायल पहले भी 18 साल के कब्जे के बाद साल 2000 में दक्षिणी लेबनान से हटा था, ऐसे में किसी समझौते और स्थाई सुरक्षा गारंटी के नाम पर वो फिर से अपने कदम वापस खींच भी सकता है। बशर्ते उस पर अमेरिकी दबाव बना रहे।

क्या हो सकती हैं संभावनाएँ?

फिलहाल, इस मामले में अभी दो ही संभावित रास्ते दिखते हैं-

रास्ता A (बड़ा समझौता): अगर अमेरिका ईरान को कुछ बड़ी आर्थिक राहत देता है और बदले में ईरान हिजबुल्लाह को सीमा से पीछे हटने के लिए मना लेता है, तो एक ‘अस्थाई डील’ हो सकती है। इसमें ‘येलो लाइन’ को हटाकर वहाँ लेबनानी सेना या एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय फोर्स को तैनात किया जा सकता है।

रास्ता B (लंबा संघर्ष): यह ज्यादा संभव लग रहा है। इजरायल जिस तरह से 55 गाँवों को खाली कराकर वहाँ बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रहा है, उससे लगता है कि वह वहाँ ‘स्थाई सुरक्षा चौकियाँ’ बनाना चाहता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर गुरिल्ला वॉर शुरू करेगा, जिससे यह संघर्ष महीनों या सालों तक खिंच सकता है।

लेबनान में इजरायल की सैन्य उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी सीमाएँ अब सिर्फ कागज पर रह गई हैं। यह कब्जा न केवल लेबनान की भौगोलिक स्थिति को बदल रहा है, बल्कि यह ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले ‘ग्रैंड बार्गेन’ का भविष्य भी तय करेगा।

बहरहाल, दशकों से युद्ध का मैदान बन चुका मिडिल ईस्ट अब भी दहक रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर यह ‘ग्रेटर इजरायल’ vs ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (ईरान-हिजबुल्लाह-हमास) की जंग है। इन सबके बीच हकीकत यही है कि मिडिल ईस्ट का नक्शा सचमुच बदल रहा है। ऐसे में इजरायल का यह ताजा विस्तार स्थाई होता है या अस्थाई, ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि इसका फौरी जवाब किसी के पास नहीं है। चूँकि अब पूरा मामला सौदेबाजी, समय और कूटनीतिक चालों में उलझ चुका है, ऐसे में इस समस्या को लेकर आगे क्या बदलाव आते हैं, इस पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।

‘उम्माह’ के लिए कुछ भी करेगा ‘इस्लामी’ इकोसिस्टम, इनका दोहरापन; अरफा के लिए US-इजरायल की मार से तबाह हुआ ईरान ‘विश्वगुरु’, वो सुपरपॉवर भी

                अरफा खानम शेरवानी (फोटो साभार: arfakhanum/Instagram/@khanumarfa/X)
अरफा खानम शेरवानी जिन्हें हम सब ‘अरफा’ के नाम से जानते हैं, एक बार फिर अपने दोगले चेहरे का प्रदर्शन कर रही हैं। बुधवार (08 अप्रैल 2026) को ही उन्होंने दो पोस्ट किए। पहले पोस्ट में लिखा कि “ईरान उभर के सामने आया है” और दूसरे में सीधे घोषणा कर दी- “I have no hesitation in saying that after defeating America, Iran is now the ultimate ‘Vishwa Guru’ of the world”। फिर ईरान दूतावास की पोस्ट को कोट करते हुए लिख दिया, “Hello Superpower ”। वाह रे अरफा! विश्वगुरु? सचमुच?

याद दिला दें कि जब भारत के संदर्भ में ‘विश्वगुरु’ शब्द आता है तो इन कॉन्ग्रेसियों और इस्लामी इकोसिस्टम वालों को चिढ़ मच जाती है। जब पीएम मोदी ने जब भारत को विश्वगुरु बनाने की बात की तो इन्हें हँसी आ गई, ट्रोलिंग शुरू हो गई। लेकिन आज अस्थाई संघर्ष-विराम के मौके पर अचानक ईरान को ‘विश्वगुरु’ और ‘सुपरपावर‘ बताने लगी हैं। समझते भी हैं ये लोग कि विश्वगुरु होने का मतलब क्या होता है? या फिर बस उम्माह का झंडा लेकर घूमने का बहाना चाहिए?

अरफा, कल तक तुम अयातोल्ला की ख़िलाफ़त कर रही थीं। महिला अधिकार, मानवाधिकार, फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के नाम पर ईरान की तानाशाही को कोस रही थीं। फिर अचानक अमेरिका के खिलाफ़ ‘इस्लामी उम्माह’ का नारा लगाने लगीं।

और अब? अस्थाई सीजफायर होते ही ईरान को विश्वगुरु साबित करने में जुट गईं। क्यों?

क्योंकि तुम्हारा सहोदर पाकिस्तान वहाँ दलाली करने लगा था। बात अब उम्माह की हो गई है ना?

वर्ना उसी ईरान के मूल निवासियों (पारसियों) को भारत ने अपने घर में पनाह दी है। बिना किसी परेशानी के। वे यहाँ फल-फूल रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, परिवार चला रहे हैं। लेकिन अरफा को समस्या भारत से इस बात की है कि वो तमाम झंझावातों के बीच भी अपने सभी लोगों का ख्याल रख रहा है। उसी ईरान से लोगों को बाहर निकालकर ला रहा है, जिसमें अधिकतर इसके मुस्लिम भाई ही हैं। फिर भी इन नमकहरामों के मन में भारत के प्रति इतनी घृणा बैठी हुई है कि बर्बाद हो चुके ईरान में उन्हें विश्वगुरु दिखने लगा है।

इसे ही कहते हैं दोगलापन। ये खाएँगी भारत का, भारत की हवा-पानी, भारत की आजादी, भारत की मीडिया में छूट, भारत की सिक्योरिटी। लेकिन गाएँगी ईरान का, पाकिस्तान का, लेबनान का, गाजा का… या हर उस जगह का जहाँ इनके उम्माह वाले दिखेंगे। हाँ भाई, क्यों नहीं? क्योंकि ये तो ‘काफिरों’ का देश है ना। तो इनका प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों पर ही रहेगा। चाहे वहाँ लाखों मार दिए जाएँ (अयातोल्लाओं की ओर से) या इनके बंधु पूरी दुनिया को बम-धमाकों में उड़ाते रहें जन्नत के नाम पर।

अभी उसी ईरान से तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें अपने पुलों को बचाने के लिए ईरान महिलाओं और बच्चों की ह्यूमन चेन बना रहा है। महिलाएँ, बच्चे – जिनकी सुरक्षा के नाम पर अरफा पहले चिल्लाती थीं- आज उनको ढाल बनाकर पुल बचा रहे हैं। और अरफा? उन्हें ‘विश्वगुरु’ कह रही हैं। वाह रे दोगलों! कल तक महिला-वाद के नाम पर अयातोल्ला को कोसती थीं, आज वही महिलाएँ ह्यूमन शील्ड बन रही हैं तो मुँह बंद। क्योंकि अब उम्माह का मुद्दा आ गया।

अरफा तुम The Wire की सीनियर एडिटर हो, AMU की एलुम्ना हो। तुम्हारा पूरा इकोसिस्टम कॉन्ग्रेस और इस्लामी लॉबी का है। तुम्हें हमेशा ‘सेकुलरिज्म’ का ढोंग रचाना पड़ता है। लेकिन जब बात अपनी आती है तो असली चेहरा सामने आ जाता है। पाकिस्तान से प्यार, ईरान से प्यार, गाजा से प्यार – लेकिन भारत? भारत तो बस ‘फासीवादी’ है, ‘इस्लामोफोबिक’ है। भारत ने ईरानियों को शरण दी, उनको सुरक्षा दी, लेकिन तुम्हें ये सहन नहीं होता। क्योंकि तुम्हारा दिल कहीं और बसता है। तुम्हें भारत की तरक्की, भारत की मजबूती, भारत की विश्व पटल पर बढ़ती पहचान कभी रास नहीं आई।

देखो अरफा, विश्वगुरु बनने के लिए सिर्फ़ एक युद्ध में अमेरिका से टकराना काफी नहीं होता। विश्वगुरु वो होता है जो अपने नागरिकों की रक्षा करे, महिलाओं को आजादी दे, बच्चों को भविष्य दे, अर्थव्यवस्था को मजबूत करे। ईरान में आज महिलाएँ हिजाब के नाम पर कोड़े खा रही हैं, विरोध करने पर जेल जा रही हैं। लेकिन तुम्हें वो ‘सुपरपावर’ दिख रहा है। क्योंकि तुम्हारा एजेंडा हिंदुस्तान को नीचा दिखाना है। तुम चाहती हो कि भारत हमेशा ‘दूसरे’ देशों के मुकाबले छोटा दिखे।

ये दोगलापन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं, पूरे उस इकोसिस्टम का है जिसमें तुम खड़ी हो। कल अमेरिका दुश्मन था, आज ईरान हीरो बन गया। कल पाकिस्तान ‘पीस’ का दूत था, आज ईरान ‘विश्वगुरु’। कल महिला अधिकार, आज उम्माह। कल सेकुलर, आज इस्लामी ब्रदरहुड। ये चरित्रहीनता है। ये नमकहरामी है।

अरफा, तुम भारत में बैठकर ईरान का गान गा सकती हो। लेकिन हकीकत ये है कि भारत ने तुम्हें वो आजादी दी है जो ईरान में कभी नहीं मिलेगी। तुम बिना हिजाब के घूम सकती हो, बिना डरे बोल सकती हो, बिना जेल गए आलोचना कर सकती हो। लेकिन तुम्हें ये आजादी भी भारत से ही मिली है। फिर भी तुम्हारा दिल ईरान और पाकिस्तान के लिए धड़कता है।

ये ही तो दुख की बात है। भारत तुम्हें खिला-पिला रहा है, लेकिन तुम्हारा प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों के लिए है। बर्बाद ईरान में विश्वगुरु ढूँढ रही हो, जबकि असली विश्वगुरु वो देश है जो तुम्हें शरण दे रहा है। लेकिन तुम्हारा? वाह रे दोगलों… वाह!