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बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान का हिस्सा: क्या यह स्थायी है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

              इजरायली फौज द्वारा बनाई गई येलो लाइन, बेंजामिन नेतान्याहू (साभार: X_IDF/AI ChatGPT)
पूरी दुनिया जब अप्रैल 2026 के बीच में इजरायल-लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम पर नजर टिकाए हुए थी, तभी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक नई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) या ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ बना दी। इजरायली रक्षा बल (IDF) ने खुद एक नक्शा जारी कर बताया कि दक्षिणी लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर गहरी यह सैन्य जोन अब उनके नियंत्रण में है। पाँच डिवीजनों की ताकत के साथ इजरायली सैनिक इस लाइन के दक्षिण में तैनात हैं।

आईडीएफ ने कहा है कि उसके सैनिक हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करने और उत्तरी इजरायल पर हमले रोकने के लिए मैदान में डटे हैं। हालाँकि लेबनान और हिजबुल्लाह इसे संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा बताते हुए इस कदम का विरोध किया है। एक तरफ अभी युद्धविराम की स्याही सूखी भी नहीं है कि दूसरी तरफ इजरायली बुलडोजर दक्षिणी लेबनान के भीतर बसे गाँवों में घरों को तोड़ रहे थे, तोपें चल रहे थे और हवाई हमले हो रहे थे। हालाँकि अभी युद्धविराम लागू है, लेकिन छिटपुट हमले दोनों तरफ से हो रहे हैं।

लेबनान के दक्षिणी हिस्सा में घट रही यह घटना महज एक स्थानीय तनाव नहीं है। यह मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक नक्शे में एक नया अध्याय जोड़ रही है। इजरायल ने पहले भी लेबनान पर कब्जा किया था, जिसमें 1982 से 2000 तक 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर कब्जा रखा था। तब भी उसने लिटानी नदी तक पहुँचने का सपना देखा था और आज फिर वही रणनीति इजरायल की तरफ से दोहराई जा रही है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या इजरायल का यह कब्जा स्थायी होगा? या उसका ये कदम अमेरिका-ईरान वार्ता में सौदेबाजी का हथियार बनेगा। 

येलो लाइन का जन्म और युद्धविराम का मजाक

मध्य पूर्व में एक बार फिर सीमाओं की लकीरें स्याही से नहीं, बल्कि टैंकों के टायरों और सैन्य चौकियों से खींची जा रही हैं। इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में बनाई गई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य घेराबंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जो दशकों पुराने विवादों को नया रंग दे रही है।

दरअसल, अमेरिका की मध्यस्थता में 16 अप्रैल 2026 को इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का युद्धविराम शुरू हुआ है। करीब 46 दिन के इजरायली हमलों और जमीनी ऑपरेशन के बाद यह समझौता हुआ। लेकिन कुछ घंटों में ही IDF ने दक्षिणी लेबनान में ‘येलो लाइन’ की घोषणा कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा, “हम लेबनान में 10 किलोमीटर गहरी मजबूत सुरक्षा पट्टी में रहेंगे। यह पहले से कहीं ज्यादा ठोस, निरंतर और मजबूत है। हम यहाँ से नहीं जाएँगे।”

IDF के बयान में कहा गया कि लाइन के दक्षिण में पाँच डिवीजनों के सैनिक हिजबुल्लाह के आतंकी ढाँचे को तोड़ रहे हैं। जिसकी वजह से 55 लेबनानी गाँवों और कस्बों में निवासियों को वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई।

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम शुरू होते ही इजरायली सेना ने हनीन गाँव में घर उड़ाए, बेत लिफ, अल-कांतारा और तौल पर तोपें दागीं। बुलडोजर से जमीन साफ की जा रही है। गाजा में इसी येलो लाइन मॉडल का इस्तेमाल हो रहा है, जहाँ का 60 प्रतिशत इलाका इजरायली नियंत्रण में है और सैकड़ों घर ध्वस्त किए गए। अब लेबनान में भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।

 हिजबुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने कहा, “युद्धविराम एकतरफा नहीं हो सकता। अगर इजरायल उल्लंघन करेगा तो हम जवाब देंगे। हमारे लड़ाके मैदान में हैं, ट्रिगर पर उँगली रखे हुए।” हिजबुल्लाह इसे देश का अपमान मान रहा है और पूर्ण वापसी की माँग कर रहा है।

इजरायल ने कब कब बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा?

इजरायल का विस्तारवाद नया नहीं है। साल 1918 में डेविड बेन-गुरियन और यित्जाक बेन-ज्वी ने ‘एरेट्स यिसराइल’ किताब में लिखा कि यहूदियों का देश लिटानी नदी तक फैला होना चाहिए। इसके बाद 1919 में वर्ल्ड जियोनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ने पेरिस शांति सम्मेलन में लिटानी नदी को उत्तरी सीमा बताते हुए नक्शा पेश किया गया।

इजरायल की आजादी के बाद साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के 15 गाँवों पर कब्जा कर लिया। हालाँकि बाद में साल 1949 में आर्मिस्टिस समझौते के तहत इसमें से सात गाँवों को इजरायल को सौंप दिए गए।

इसके बाद साल 1978 में ऑपरेशन लिटानी के तहत इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वो साल 1982 में ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली में बेरूत तक पहुँच गए। और फिर करीब 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा बना रहा। हालाँकि साल 2000 में यूनिफिल और हिजबुल्लाह के दबाव में इजरायल ने वहाँ से वापसी की, लेकिन शेबा फार्म्स पर कब्जा आज भी जारी है।

वहीं साल 1967 के छह दिन युद्ध में गोलान हाइट्स (सीरिया) पर कब्जा कर लिया, जिसे साल 1981 में इजरायल ने अपने आप में मिला लिया। यही नहीं, वेस्ट बैंक और गाजा पर उसका साल 1967 से ही कब्जा है। और अब 2026 में लेबनान में फिर वही पैटर्न दिख रहा है, जिसमें पहले सुरक्षा जोन, फिर स्थायी नियंत्रण।

इजरायल का तर्क हमेशा ‘सुरक्षा’ रहा है। लेकिन आलोचक इसे ‘ग्रेटर इजरायल’ का हिस्सा मानते हैं, जिसमें लिटानी नदी, गोलान और वेस्ट बैंक शामिल हैं। अभी 2026 के जमीनी ऑपरेशन में इजरायल ने पहले ही दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में बफर जोन बना लिया था। जिसे अब येलो लाइन संस्थागत रूप दे रही है।

क्या यह स्थाई कब्जा है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कब्जा अस्थायी नहीं होगा। चूँकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साफ कह चुके हैं कि इजरायली सेना ‘क्लियर और सिक्योर’ पोजीशंस को छोड़ने वाली नहीं है। इसके साथ ही गाजा मॉडल की तरह लेबनान में भी सफाई अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।

हालाँकि दक्षिणी लेबनान का यह इलाका (जिस पर अभी इजरायली सेना मौजूद) भविष्य की बातचीत (ईरान या लेबनान के साथ) में ‘लीवरेज’ (दबाव का हथियार) बन सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

दरअसल, इस इलाके का और खासकर हिज्बुल्लाह का ईरान से जुड़ाव और गहरा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका-ईरान वार्ता का पूर्व शर्त है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में ईरान ने कहा कि जब तक इजरायल लेबनान से नहीं हटेगा, कोई समझौता नहीं होगा। ईरान के इस स्टैंड के बाद ही इजरायल-लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, लेकिन अब जब ईरान बातचीत की टेबल पर आएगा तो उसके बाद सिर्फ हॉर्मूज ही नहीं दक्षिणी लेबनान का हिस्सा भी जोर-आजमाइश के लिए मौजूद रहेगा।

इस बीच, हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल नहीं हटा तो वे जवाब देंगे। लेबनानी सेना और सरकार भी संप्रभुता की बात कर रही है। यूएनएफआईएल (UNIFIL) पहले से ही रेजोल्यूशन 1701 का हवाला दे रही है, जिसमें इजरायल को ब्लू लाइन के दक्षिण में रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलेगी या मिलेगी हमेशा की तरह निंदा?

इतिहास गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के कब्जों को कभी मान्यता नहीं दी है। गोलान हाइट्स पर 1981 के एनेक्सेशन को यूएन ने अवैध घोषित किया। वेस्ट बैंक पर बस्तियों को भी वो अवैध कहता है। लेबनान भी रेजोल्यूशन 1701 (2006) के तहत इजरायल से पूर्ण वापसी की माँग करता रहा है। तो यूएन एक्सपर्ट्स ने इजरायल के बमबारी को ‘एथनिक क्लिंजिंग’ और ‘डोमिसाइड’ (घरों का विनाश) बताया है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यूएन की ताकत बहुत सीमित है। यूएन में इजरायल के लिए उठ रही किसी भी समस्या पर अमेरिका तुरंत वीटो कर देता है। ऐसे में साल 2026 में भी यूएन सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव तो आ सकते हैं, लेकिन कुछ भी लागू होना मुश्किल है। हालाँकि फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों ने ‘येलो लाइन’ की निंदा की है, लेकिन इजरायल ‘आत्मरक्षा’ का हवाला देकर कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में अगर यूएन कोई निंदा प्रस्ताव लाता भी है, तो भी इजरायल पर कोई खास फर्क पड़ेगा, ये अभी तो नहीं देखा जा रहा।

भविष्य में होगी शांति या खुलेगा वॉर का नया फ्रंट?

अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान की बातचीत सफल हुई तो लेबनान से इजरायली वापसी हो सकती है। हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल न सिर्फ लेबनान बल्कि सीरिया में भी क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति अपना रहा है। क्योंकि भविष्य की किसी भी बातचीत में यह जमीन ‘लीवरेज’ बनेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जबरन कब्जा भी ज्यादा समय तक टिकता नहीं है।

चूँकि इजरायल पहले भी 18 साल के कब्जे के बाद साल 2000 में दक्षिणी लेबनान से हटा था, ऐसे में किसी समझौते और स्थाई सुरक्षा गारंटी के नाम पर वो फिर से अपने कदम वापस खींच भी सकता है। बशर्ते उस पर अमेरिकी दबाव बना रहे।

क्या हो सकती हैं संभावनाएँ?

फिलहाल, इस मामले में अभी दो ही संभावित रास्ते दिखते हैं-

रास्ता A (बड़ा समझौता): अगर अमेरिका ईरान को कुछ बड़ी आर्थिक राहत देता है और बदले में ईरान हिजबुल्लाह को सीमा से पीछे हटने के लिए मना लेता है, तो एक ‘अस्थाई डील’ हो सकती है। इसमें ‘येलो लाइन’ को हटाकर वहाँ लेबनानी सेना या एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय फोर्स को तैनात किया जा सकता है।

रास्ता B (लंबा संघर्ष): यह ज्यादा संभव लग रहा है। इजरायल जिस तरह से 55 गाँवों को खाली कराकर वहाँ बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रहा है, उससे लगता है कि वह वहाँ ‘स्थाई सुरक्षा चौकियाँ’ बनाना चाहता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर गुरिल्ला वॉर शुरू करेगा, जिससे यह संघर्ष महीनों या सालों तक खिंच सकता है।

लेबनान में इजरायल की सैन्य उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी सीमाएँ अब सिर्फ कागज पर रह गई हैं। यह कब्जा न केवल लेबनान की भौगोलिक स्थिति को बदल रहा है, बल्कि यह ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले ‘ग्रैंड बार्गेन’ का भविष्य भी तय करेगा।

बहरहाल, दशकों से युद्ध का मैदान बन चुका मिडिल ईस्ट अब भी दहक रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर यह ‘ग्रेटर इजरायल’ vs ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (ईरान-हिजबुल्लाह-हमास) की जंग है। इन सबके बीच हकीकत यही है कि मिडिल ईस्ट का नक्शा सचमुच बदल रहा है। ऐसे में इजरायल का यह ताजा विस्तार स्थाई होता है या अस्थाई, ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि इसका फौरी जवाब किसी के पास नहीं है। चूँकि अब पूरा मामला सौदेबाजी, समय और कूटनीतिक चालों में उलझ चुका है, ऐसे में इस समस्या को लेकर आगे क्या बदलाव आते हैं, इस पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।

शहबाज शरीफ की इंटरनेशनल बेज्जती, ‘मध्यस्थ’ नहीं अमेरिका के ‘दलाल’ ही थे शहबाज शरीफ: ट्रंप से मिला मैसेज किया ‘कॉपी-पेस्ट’ तो जमकर हुए ट्रोल

                                 शहबाज शरीफ ने ट्रंप का मैसेज किया 'कॉपी-पेस्ट' (साभार : Grok)
मिडिल ईस्ट में पिछले 38 दिनों से चल रही विनाशकारी जंग पर बुधवार (8 अप्रैल 2026) सुबह आखिरकार ब्रेक लग गया। खास बात यह रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी डेडलाइन खत्म होने से ठीक 2 घंटे पहले सीजफायर(संघर्ष विराम) का ऐलान कर दिया।

इस शांति के पीछे पाकिस्तान का हाथ बताया जा रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के एक ‘कॉपी-पेस्ट’ ट्वीट ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। चर्चा है कि ट्रंप खुद झुकते हुए नहीं दिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शहबाज शरीफ से एक खास रिक्वेस्ट वाला ट्वीट करवाया ताकि उन्हें पीछे हटने का बहाना मिल सके। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ठीक ही कहा था कि भारत इस युद्ध में पाकिस्तान की तरह दलाली नहीं कर सकता है और अब शायद वही बात सामने भी आ रही है।

डेडलाइन से ठीक पहले ट्रंप का यू-टर्न

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार(7 अप्रैल) देर रात घोषणा की कि वह पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर से बातचीत के बाद युद्ध रोकने को तैयार हुए हैं। ट्रंप ने पहले ईरान को चेतावनी दी थी कि या तो वह झुक जाए या बड़े हमले के लिए तैयार रहे। लेकिन जैसा कि पिछले कई मौकों पर देखा गया है, ट्रंप डेडलाइन खत्म होने से ऐन पहले पीछे हट जाते हैं। माना जा रहा है कि अपनी साख बचाने के लिए उन्होंने इस बार पाकिस्तान के कंधे का इस्तेमाल किया।

‘Draft’ ट्वीट से खुली पोल, क्या ट्रंप ने लिखा था संदेश?

विवाद तब शुरू हुआ जब पीएम शहबाज शरीफ ने ‘X’ (ट्विटर) पर रात 12:46 बजे एक पोस्ट किया। इस पोस्ट की पहली लाइन में ही ‘Draft–Pakistan’s PM Message on ‘X’’ लिखा था। हालाँकि, शरीफ की टीम ने एक मिनट के अंदर ‘कॉपी-पेस्ट’ को एडिट किया, लेकिन तब तक यह मैसेज वायरल हो चुका था।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह मैसेज ट्रंप की टीम ने लिखकर पाकिस्तान भेजा था? जानकारों का कहना है कि किसी देश के PM की टीम अपने ड्राफ्ट में ‘पाकिस्तान के पीएम का मैसेज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करती। ऐसा लग रहा है जैसे ट्रंप प्रशासन ने खुद यह ड्राफ्ट तैयार किया और शहबाज शरीफ से इसे पोस्ट करने को कहा, ताकि ट्रंप को दुनिया के सामने यह कहने का मौका मिले कि वह पाकिस्तान के अनुरोध पर जंग रोक रहे हैं।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पोस्ट में क्या लिखा था?

शहबाज शरीफ ने अपने पोस्ट में बड़ी चतुराई से ट्रंप से अनुरोध किया था कि कूटनीति को एक मौका देने के लिए हमले की डेडलाइन 2 हफ्ते आगे बढ़ा दी जाए। साथ ही, उन्होंने ईरान से भी अपील की कि वे सद्भावना दिखाते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खोल दें। इसी ट्वीट को आधार बनाकर ट्रंप ने जंग रोकने का फैसला सुना दिया।

शहबाज शरीफ के लेबनान पर सीजफायर के दावे की इजरायल ने निकाली हवा (साभार : Thetribune & Indianews)
लेबनान में सीजफायर का झूठा दावा पड़ा भारी: इजरायल ने बम बरसाकर निकाली हवा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। शहबाज ने ट्वीट कर दावा किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ सीजफायर लेबनान समेत हर जगह तुरंत प्रभावी होगा।

हालाँकि, इजरायल ने इस दावे की धज्जियाँ उड़ाते हुए साफ कर दिया कि लेबनान में कोई युद्धविराम नहीं है। इजरायल ने बयान जारी करने के साथ ही लेबनान में बमबारी जारी रखकर पाकिस्तान के झूठ की हवा निकाल दी।

पाकिस्तानी PM का बड़बोलापन

शहबाज शरीफ ने खुद को ‘शांति दूत’ बताते हुए घोषणा की थी कि लेबनान में भी जंग रुक गई है। लेकिन इजरायली PM बेंजामिन नेतन्याहू ने सख्त लहजे में कहा कि यह समझौता लेबनान पर लागू नहीं होता। इजरायल का तर्क है कि हिजबुल्लाह का मोर्चा अलग है। जब तक उत्तरी सीमा सुरक्षित नहीं होती, हमले जारी रहेंगे।

इजरायल के रुख से साफ है कि पाकिस्तान को या तो समझौते की समझ नहीं है या उसने श्रेय लेने के लिए सफेद झूठ बोला। इस घटना ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के उस बयान को सच साबित कर दिया, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को ‘फीस लेकर संकट सुलझाने का दावा करने वाला दलाल’ कहा था। पाकिस्तान अब कूटनीतिक रूप से अलग-थलग और बेनकाब हो गया है।

खतरनाक हैं ‘फॉस्फोरस बम’ जो इजरायल ने लेबनान पर दागे; गला देता है हड्डियाँ, हर तरफ फैलती है आग: UN ने किया है बैन

                                            इजरायल का फॉस्फोरस बम धमाका ( फोटो साभार-abp)
इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।

ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”

गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा

मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।

3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।

इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।

क्या है सफेद फॉस्फोरस

सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।

इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना

इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।

लेबनान, जॉर्डन और मिस्र के ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ग्रुप को अमेरिका ने विदेशी आतंकवादी दिया करार: अब ग्लोबल टेररिस्टों की लिस्ट में शामिल होगा तीनो का नाम


‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की इस्लामिक जिहादी गतिविधियों को खत्म करने की दिशा में US सरकार ने अहम कदम उठाया है। 13 जनवरी 2026 को मुस्लिम ब्रदरहुड के लेबनानी, मिस्र और जॉर्डन की आतंकी ग्रुप के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें ‘विदेशी आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया। इन संगठनों को लेकर अमेरिका ने कहा कि ये उसके हितों को नुकसान पहुँचा सकते हैं और ये देश के लिए खतरा हैं।

नवंबर 2025 में US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के एक खास दस्तावेज पर साइन किया था, जिसमें उनके एडमिनिस्ट्रेशन को मुस्लिम ब्रदरहुड के खास ग्रुप को FTOs और SDGTs के तौर पर नामित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए था।

सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्री, जॉर्डनी और लेबनानी चैप्टर्स को FTOs और SDGTs के तौर पर नामित करना राष्ट्रपति ट्रंप के उस वादे का एक हिस्सा है, जिसके तहत वे मुस्लिम ब्रदरहुड के उन ग्रुप को खत्म करेंगे, जो यूनाइटेड स्टेट्स के लिए खतरा पैदा करते हैं।

रुबियो ने कहा, “हम लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड को एक विदेशी आतंक संगठन और एक स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (SDGT) मानते हैं और ग्रुप का लीडर मुहम्मद फॉजी तक्कोश को एक जिहादी बताते हैं। साथ ही इस्लामिक संगठन हमास को मदद पहुँचाने के लिए मिश्र और जॉर्डन की मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखा को SDGTs डेजिग्नेट कर रहे हैं।”

रुबियो ने कहा कि अमेरिका इन मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाओं को मिल रहे आर्थिक सहायता को बंद करने की कोशिश करेगा। राष्ट्रपति ट्रंप का मानना था कि लेबनानी गुट के एक हिस्से ने 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल पर रॉकेट दागे थे, जिसके कारण गाजा युद्ध शुरू हुआ। जॉर्डन के गुट ने हमास का समर्थन किया था।

1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना की थी। वह एक टीचर और इस्लामिक स्कॉलर था। इखवान अल-मुस्लिमिन की शुरुआत एक सुन्नी इस्लामी मूवमेंट के तौर पर की गई थी. जो बाद में हिंसक जिहादी संगठन बन गया। पिछले कुछ सालों में मुस्लिम ब्रदरहुड एक ट्रांसनेशनल इस्लामिक टेरर नेटवर्क बन गया है। इसका मकसद किसी भी तरीके से अलग-अलग देशों में शरिया कानून लागू करना है।

मुस्लिम ब्रदरहुड ने दुनिया भर में कई ग्रुप बनाए हैं, जो अहिंसक और सोशियो-पॉलिटिकल होने का दिखावा करते हैं और अंदरखाने इस्लामिक आतंकवाद का समर्थन करते हैं।

मुस्लिम ब्रदरहुड को आधिकारिक तौर पर टेरर ग्रुप बताना US सरकार के लिए हमेशा मुश्किल रहा है। इस संगठन की अलग-अलग शाखा कई देशों में काम करती हैं। इस वजह से अमेरिका में लीगल एक्सपर्ट्स और इंटेलिजेंस अधिकारियों को अक्सर पूरे मूवमेंट पर एक जैसा टेररिस्ट लेबल लगाना मुश्किल लगता है।

यही वजह है कि इस्लामिक आतंकवाद से लिंक साबित होने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड के खास चैप्टर को टारगेट किया जाता है और उन्हें टेरर ग्रुप बताया जाता है।

लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड

हाल ही में, US सरकार ने लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसे अल-जमा अल-इस्लामिया, इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड और जॉर्डनियन मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम से भी जाना जाता है, को FTOs और SDGTs घोषित किया है।

अल-जमा अल-इस्लामिया के नाम से मशहूर लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड को एक खास मकसद से 1960 के दशक में इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड की एक ब्रांच के तौर पर बनाया गया था। यह ज़्यादातर लेबनान की सुन्नी मुस्लिम आबादी के बीच काम करता है। यह संगठन लेबनान की राजनीति में शामिल रहा है और यहाँ तक ​​कि पार्लियामेंट्री सीटें भी हासिल की हैं। यह इस्लामी संगठन एजुकेशनल और हेल्थकेयर सर्विस भी चलाता था; हालाँकि, चैरिटी के दिखावे के अलावा, LMB हिंसक गतिविधियों में भी शामिल रहा है।

लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड यानी lbm की एक मिलिट्री विंग है जिसे अल-फज्र फोर्सेज (डॉन फोर्सेज) के नाम से जाना जाता है। इसका दूसरा नाम कुव्वत-अल-फज्र भी है। LMB के फाति याकन और अब्दुल्ला तेराकी समेत कई नेता हिज्बुल्लाह के करीब थे। हालाँकि 2006 में इस्लामिक एक्शन फ्रंट बना लिया, जो एक सुन्नी जिहादी संगठन था और शिया संगठन के साथ जुड़ा हुआ था। ये ज्यादा दिन तक एक्टिव नहीं रहा।

हालाँकि 2023 में इजरायल-लेबनान बॉर्डर पर हुई झड़पों के दौरान, अल-फज्र ने खुद को फिर से एक्टिव कर लिया और उत्तरी इजरायल में रॉकेट दागे। अल-फज्र ने हिज़्बुल्लाह और हमास के साथ भी कोऑर्डिनेट किया।

मार्च 2024 में अल-फज्र ने इजरायल के खिलाफ आतंकी हमला करने की योजना बनाई थी, हालाँकि लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड आतंकवादी हमला कर पाते, उससे पहले ही इजरायली डिफेंस फोर्स ने कार्रवाई शुरू कर दी।

LMB के सेक्रेटरी जनरल मुहम्मद फावजी तक्कोश ने हिज्बुलल्लाह-हमास गठजोड़ के साथ एक फॉर्मल अलायंस बनाकर काम करने लगा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि अल-फ़ज्र के 1000 से ज्यादा जिहादी एक्टिव थे।

LMB के अंदर दो ग्रुप है। इसमें एक कतर और तुर्की का वफादार है, जबकि दूसरा ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह के साथ है।

अक्टूबर 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद से, इजरायल ने हमास के समर्थक 15 से ज्यादा अल-फ़ज्र जिहादियों को मार डाला। असल में, अल-फ़ज्र हमास की लेबनानी मिलिट्री कमांड के तौर पर काम करता है।

मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को हिंसा से दूर बताता है, फिर भी जिहादी एक्टिविटीज़ में शामिल है। US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “हालाँकि हमास का समर्थन करने वाले मुस्लिम ब्रदरहुड हिंसा छोड़ने का दावा करते हैं, लेकिन ये आतंकवाद को बढ़ावा देना, भड़काना और उसकी तारीफ करना जारी रखे हुए हैं। ये यूनाइटेड स्टेट्स और उसके सहयोगियों के हितों के लिए खतरनाक है।”

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड (JMB) की स्थापना 1945 में अब्देल लतीफ अबू कुरा ने की थी। शुरुआत में, युवा राजा हुसैन I के नेतृत्व वाली जॉर्डन की राजशाही ने कट्टरपंथ के बजाय धर्मार्थ कामों के जरिए असहमति को दबाने, सेक्युलर अरब राष्ट्रवादियों से मुकाबले करने के लिए JMB को मंजूरी दी। इसके बाद धीरे-धीरे जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड मजबूत होता गया और राजशाही का एक पिलर बन गया।

1989 में जॉर्डन में राजनीतिक उदारीकरण के बाद, JMB ने इस्लामिक एक्शन फ्रंट नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। 1992 में, इस्लामिक एक्शन फ्रंट ऑपचारिक तौर पर पार्टी बन गई। IAF और JMB ने अलग-अलग लीडरशिप स्ट्रक्चर बनाए रखे।

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड जॉर्डन में अपनी एक्टिविटी कम रखता है, लेकिन ‘फिलिस्तीनी मकसद’ के लिए यह एक्टिव रहता है। जॉर्डन सरकार पर अपने अरब साथियों की तरफ से JMB पर बैन लगाने का दबाव था। हालाँकि, उनकी एक्टिविटीज़ को शक की नज़र से देखने और उनकी एक्टिविटीज़ को कंट्रोल करने की इच्छा के बावजूद वह ऐसा करने से हिचकिचा रही थी।

हालाँकि, समय के साथ, जॉर्डन सरकार ने अपना रुख बदल लिया और 2015 में, सरकार ने ऐलान किया कि वह अब मुस्लिम ब्रदरहुड को एक लीगल ऑर्गनाइज़ेशन के तौर पर मान्यता नहीं देती है। उसने JMB का लाइसेंस रिन्यू करने से भी मना कर दिया। इसके बजाय उसने मुस्लिम ब्रदरहुड एसोसिएशन नाम के एक नए संगठन को मंजूरी दी, जिसे सरकार ज्यादा सुधारवादी, नरमपंथी और पूरी तरह से जॉर्डन पर फोकस करने वाला मानती थी।

2020 में, जॉर्डन की टॉप कोर्ट ने मुस्लिम ब्रदरहुड को खत्म करने का ऑर्डर दिया। हालाँकि, सरकार के जानबूझकर कुछ न करने की वजह से यह फैसला लागू नहीं हो सका। यह भी न भूलें कि JMB की पॉलिटिकल विंग, इस्लामिक एक्शन फ्रंट, देश में काफी मजबूत है। संगठन ने सितंबर 2024 के चुनावों में 138 में से 31 सीटें जीती थीं।

जॉर्डन ने ऑफिशियली ओरिजिनल मुस्लिम ब्रदरहुड (JMB) पर मई 2025 में बैन लगा दिया और उसकी संपत्ति जब्त कर ली। यह फैसला JMB मेंबर्स समेत 16 लोगों को एक तोड़फोड़ की साज़िश रचने को लेकर गिरफ्तारी के बाद किया गया। JMB को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था, लेकिन इस्लामिक एक्शन फ्रंट पर बैन नहीं लगाया गया था।

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड पर अमेरिकी एक्शन की वजह यह है कि यह संगठन नए जिहादियों की भर्ती के अलावा रॉकेट, एक्सप्लोसिव और ड्रोन बनाने के लिए विदेशी आतंकी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रही थी। US ट्रेजरी डिपार्टमेंट के ऑफिस ऑफ़ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) का कहना है कि जॉर्डन और विदेशों में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े लोगों ने ‘गैर-कानूनी तरीकों से पैसे जुटाकर इस काम में मदद की है।’

US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड और जॉर्डनियन मुस्लिम ब्रदरहुड को हमास को सामान या सर्विस देने, फाइनेंशियल, मटीरियल या टेक्नोलॉजिकल सपोर्ट देने या उसकी मदद करने के लिए डेजिग्नेट किया जा रहा है।”

इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड

एक और जिहादी आतंकवादी संगठन जिसे फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन (FTO) और स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (SDGT) के तौर पर डेजिग्नेट किया गया है, वह है इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड (EMB)। इसे दुनिया भर में सभी मुस्लिम ब्रदरहुड चैप्टर्स की पेरेंट बॉडी कहा जा सकता है।

मुस्लिम ब्रदरहुड या इखवान अल-मुस्लिमिन की स्थापना 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने की थी, जो एक टीचर और इस्लामिक स्कॉलर थे। इस इस्लामी संगठन की नींव एंटी-वेस्टर्न कॉलोनियलिज्म और पोस्ट-ओटोमन दुनिया में इस्लामिक वैल्यूज के कथित नुकसान के आधार पर थी। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिस्ट मूवमेंट के तौर पर शुरू किया, जो चैरिटी और इस्लामिस्ट एडवोकेसी पर फोकस करता था।

अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड या इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र में गरीब और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, हॉस्पिटल और मस्जिदें बनाकर मदद की, साथ ही सेक्युलरिज्म और इंपीरियलिज्म के खिलाफ इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सबसे बड़ी ताकत) का प्रचार भी किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो यह साफ करता है कि, भले ही शुरू में इसका संबंध हिंसा से न रहा हो, ‘जिहाद’ हमेशा से इसका तरीका रहा है।

ब्रदरहुड का स्लोगन है, “अल्लाह हमारा मकसद है; पैगंबर हमारे लीडर हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है।”

1930 के दशक तक, इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड के हजारों मेंबर बन गए थे और वह पॉलिटिक्स में भी आ गया था। लेकिन, इस इस्लामी संगठन का एक पैरामिलिट्री विंग था जिसे सीक्रेट अपैरेटस या अल-निजाम अल-खास कहा जाता था। इस विंग ने राजनीतिक हत्याएँ और जिहादी हिंसा की। 1948 में, सीक्रेट अपैरेटस के सदस्यों ने इस्लामी संगठन पर बैन लगाने पर प्राइम मिनिस्टर महमूद अल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी। 1949 में, पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए मिस्र की सीक्रेट पुलिस ने अल-बन्ना की हत्या कर दी।

मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अपैरेटस के सदस्य भारी फिजिकल और मिलिट्री ट्रेनिंग लेते थे। उन्हें हथियार चलाने और अंडरग्राउंड ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी गई थी। धोखे और सीक्रेसी (तक़्क़िया) पर ज़ोर देते हुए, अपैरेटस से जुड़े जिहादी पॉलिटिकल पार्टियों, सेनाओं, इंटेलिजेंस, मीडिया, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और यहां तक ​​कि NGOs में भी घुसपैठ करते हैं और उन्हें तोड़-फोड़ते हैं।

हालांकि UK जैसे गैर-मुस्लिम देशों में, हिंसा मुस्लिम ब्रदरहुड का पसंदीदा तरीका नहीं हो सकता है। वे इस्लामिक जिहादी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए मीडिया, राजनीति, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और चैरिटी का इस्तेमाल करते हैं।

2012 में, EMB ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी को प्रेसिडेंट चुना। हालांकि, 2013 में, उस समय के जनरल अब्देल फत्ताह अल-सिसी के नेतृत्व में एक मिलिट्री तख्तापलट ने मुर्सी को हटा दिया। इस इस्लामी संगठन पर बैन लगा दिया गया और मिस्र में इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया।

मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के कई देश की सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को पॉलिटिकल स्टेबिलिटी के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने घोषणा की कि काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस समेत मुस्लिम ब्रदरहुड को ‘विदेशी आतंकवादी और ट्रांसनेशनल क्रिमिनल संगठन’ माना जाएगा।

खास तौर पर, UAE, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस पहले ही ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। जॉर्डन ने अप्रैल 2025 में इस ग्रुप पर बैन लगा दिया था, जब उन्होंने इस मूवमेंट से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया था, जिन पर रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल करके हमलों की साज़िश रचने का आरोप था। जनवरी 2026 में, UAE ने यूनाइटेड किंगडम (UK) में पढ़ाई करने में दिलचस्पी रखने वाले अपने नागरिकों के लिए फंडिंग बंद कर दी, क्योंकि UK ने इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन पर बैन लगाने से इनकार कर दिया था।

मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल अला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरित किया था। स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) जैसे बैन इस्लामिक आतंकी संगठन, जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामिक देश बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की टैक्टिक्स से प्रेरणा लेते हैं।

इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड पर कार्रवाई करने से पहले, US ने EMB के कई हिंसक ग्रुप को FTOs और SDGTs के तौर पर डिफाइन किया था, जिसमें हमास भी शामिल है।

US ने पहले भी मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ उनके लिंक्स के लिए कई इस्लामिक संगठनों को रडार पर लिया है। इनमें इजिप्शियन इस्लामिक जिहाद (EIJ), गामा अल-इस्लामिया (IG), फ़िलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ), हमास, हरकत सवाद मिस्र (HASM), और लिवा अल-थौरा शामिल हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड के ये सभी हिंसक जिहादी ग्रुप 1970 और 1980 के दशक में बने थे।

इजिप्शियन इस्लामिक जिहाद ने इजिप्शियन सरकार के बड़े अधिकारियों पर हिंसक हमले किए और 1981 में इजिप्शियन प्रेसिडेंट अनवर सादात की हत्या के लिए जिम्मेदार था। जून 2001 में अल-कायदा में पूरी तरह से मिलने से पहले अयमान अल-ज़वाहिरी इस संगठन को लीड करता था। US ने 1997 में EIJ को FTO और 2001 में SDGT नाम दिया था।

गामा अल-इस्लामिया (IG) के प्रमुख उमर अब्द अल रहमान को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर बम धमाके में उनकी भूमिका के लिए अमेरिका में उम्रकैद की सजा हुई। ये संगठन मिस्र को एक इस्लामिक देश बनाना चाहता था।

फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ) इजरायल को खत्म करने के लिए काम करता है और इजरायल पर कई हमलों में शामिल रहा है, जिसमें 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में इजरायली लोगों का नरसंहार भी शामिल है। इस मुस्लिम ब्रदरहुड प्रॉक्सी को US ने 1997 में FTO और 2001 में SDGT नाम दिया था।

फिलिस्तीनी इस्लामिक टेरर ग्रुप हमास के भी मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध हैं, और इसे 1997 में FTO और 2001 में SDGT नाम दिया गया था। 1988 में अपनी स्थापना के बाद से इजरायल पर अनगिनत हमले किए। हमास ने इजरायल में 7 अक्टूबर का नरसंहार किया, जिसमें 1200 से ज़्यादा लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई और 240 से ज़्यादा लोगों को किडनैप कर लिया गया।

OpIndia ने पहले फ़िलिस्तीनी इस्लामिक टेरर ग्रुप हमास के बारे में रिपोर्ट किया था, जिसने अपने 1988 के कवनेंट या चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ प्रॉपर्टी बताया था और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने की कसम खाई थी, जब तक आखिरी यहूदी भी मारा नहीं जाता। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का सपोर्ट है और 7 अक्टूबर, 2023 के नरसंहार के बाद वह भी इजरायली नागरिकों और सेना के खिलाफ एयरस्ट्राइक करने में फिलिस्तीनी आतंकी ग्रुप के साथ शामिल हो गया।

हमास ने 2017 में मिस्र के साथ अपने रिश्ते सुधारने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड से दूरी बनाने की कोशिश की। हमास ने ज़ायोनिस्ट और यहूदियों में फ़र्क करते हुए यहूदियों से लड़ने के अपने रुख में नरमी बरती। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के दोगलेपन और यहूदियों के लिए नफ़रत को सामने ला दिया।

2015 में बना, हरकत सवाद मिस्र (HASM) मुस्लिम ब्रदरहुड का एक और मिस्र का हिस्सा है, जो मिस्र की सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता है। 2016 में, HASM ने मिस्र के मुफ़्ती अली गोमा की हत्या की कोशिश की। इसके अगले साल HASM ने मिस्र की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के ऑफिसर इब्राहिम अजाजी की हत्या की कोशिश की। 2019 में, HASM जिहादियों ने काहिरा के एक हॉस्पिटल के पास एक कार-बम धमाका किया, जिसमें 20 लोग मारे गए। US ने 2018 में HASM को SDGT और 2021 में FTO घोषित किया।

2018 में SDGT घोषित लिवा अल-थौरा EMB की एक और बड़ी शाखा है। इस संगठन ने अक्टूबर 2016 में मिस्र की सेना के नौवें आर्मर्ड डिवीज़न के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अदेल रागाई की काहिरा में उनके घर के बाहर हत्या कर दी थी। 2017 में, लिवा अल-थौरा ने मिस्र के शहर तांता में एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर बमबारी की थी।

मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्र, जॉर्डन और लेबनानी चैप्टर को FTO और SDGT घोषित किए जाने के नतीजे

US द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड के जॉर्डन, मिस्र और लेबनानी चैप्टर को FTO और SDGT घोषित किए जाने की वजह से अब US में या US के कब्ज़े वाली जगहों पर इन संगठनों की सभी प्रॉपर्टी और प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी ब्लॉक कर दी जाएगी। इसके लोग हिरासत में लिए जाएँगे।

इसके अलावा, ऐसी कोई भी संपत्ति,जिसका मालिकाना हक, सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से, अकेले या कुल मिलाकर, एक या ज़्यादा ब्लॉक किए गए लोगों के पास 50 परसेंट या उससे ज़्यादा है, उसे भी ब्लॉक कर दिया जाएगा।

        (13 जनवरी 2026 को US ट्रेजरी डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर पब्लिश हुई प्रेस रिलीज़ से लिए गए ज़रूरी हिस्से।)

ब्लॉक किए गए इस्लामिक संगठनों से किसी तरह का आर्थिक फायदा पहुँचाने वाले लोगों या संगठनों पर भी कार्रवाई की जाएगी।

US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “किसी डेज़िग्नेटेड या ब्लॉक किए गए व्यक्ति द्वारा, उसे, या उसके फ़ायदे के लिए कोई भी कंट्रीब्यूशन या फ़ंड, सामान, या सर्विस देना, या ऐसे किसी भी व्यक्ति से कोई कंट्रीब्यूशन या फ़ंड, सामान, या सर्विस लेना अपराध है।” उन्होंने कहा कि डेज़िग्नेटेड लोगों और ग्रुप के साथ जुड़ने पर हिस्सा लेने वाले विदेशी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स को भी सेकेंडरी सजा मिल सकती है।

इजरायल ने अब ईरान के सैन्य ठिकानों पर किया हमला, ड्रोन और मिसाइल बनाने वाले सेंटर बर्बाद: चेतावनी में कहा- दोबारा हमें नुकसान पहुँचाया तो छोड़ेंगे नहीं

                         हमले के समय वार रूम में मौजूद रहे पीएम नेतान्याहू (फोटो साभार: X_IDF)
इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, और इस तनाव का जवाब देते हुए इजरायल ने शनिवार, 26 अक्टूबर 2024 को ईरान के विभिन्न शहरों में सटीक हमले किए। पिछले महीने 1 अक्टूबर को ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमले के बाद से ही इस पलटवार की संभावना जताई जा रही थी। इस पलटवार में इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों को प्रमुखता से निशाना बनाया।

इजरायल ने इस मिशन को ‘Days of Repentance’ नाम दिया था। इस अभियान के दौरान इजरायल ने ईरान के अलावा इराक और सीरिया में भी हमले किए। हमलों के बाद इजरायल, ईरान और इराक ने अपनी हवाई सेवा अस्थायी रूप से बंद कर दी है। इजरायल के इस हमले में दर्जनों फाइटर जेट शामिल हुए, जिसमें एफ-15 और एफ-35 भी थे। इन फाइटर जेट्स का जवाब ईरान जैसे देशों के पास नहीं है।

तीन स्टेज में इजरायल ने बरसाई ईरान पर आफत

अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों के मुताबिक, ईरान पर ये हमले तीन चरणों में किए गए। पहले चरण में इजरायल ने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट किया, जिससे ईरान की रक्षा क्षमता कमजोर हो गई। इसके बाद, दूसरे और तीसरे चरण में इजरायली सेना ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन प्रोडक्शन सेंटर पर निशाना साधा। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना था ताकि भविष्य में इजरायल पर होने वाले हमलों की संभावना को कम किया जा सके।
इजरायली सेना ने इस हमले के कई वीडियो भी जारी किए हैं। एक वीडियो में दिखाया गया कि इजरायल एयरफोर्स के कमांड सेंटर में कैसे अधिकारियों ने ईरान पर हमले का निर्देश दिया। इस वीडियो में इजरायली चीफ ऑफ जनरल स्टाफ हर्ज़ी हलेवी को कैंप राबिन स्थित अंडरग्राउंड सेंटर से इस अभियान की निगरानी करते हुए दिखाया गया है। इस कमांड सेंटर में बैठकर उन्होंने पूरे हमले की प्लानिंग और रणनीति तय की।

IDF का बयान, ईरान ने फिर से हिमाकत की, तो हम तैयार

हमले के बाद इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) के प्रवक्ता रियर एडमिरल डैनियल हैगरी ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा, “हमने ईरान के खिलाफ हमले पूरे कर लिए हैं। इजरायल की सुरक्षा के लिए तत्काल खतरों को खत्म कर दिया गया है। अगर ईरान आगे बढ़ने की गलती करता है, तो हम एक बार फिर जवाब देने के लिए तैयार हैं।”
उन्होंने कहा, “आज हमने ईरान और पूरी दुनिया को बता दिया कि इजरायल में कितनी ताकत है। हमारा संदेश साफ है कि जो भी हमारे देश को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा, उसे उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।” हैगरी ने आगे कहा कि इजरायल ने यह दिखा दिया है कि वह अपने देश और अपने लोगों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, चाहे वह आक्रामक हो या रक्षात्मक रणनीति हो।

अमेरिका को पहले से पता थी हमले की योजना

हमले से पहले इजरायल ने अमेरिका को इसकी जानकारी दी थी। अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रवक्ता सीन सावेट ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इजरायल का यह कदम आत्म-रक्षा के अधिकार का प्रयोग है। हालांकि अमेरिका ने पहले इजरायल से यह अनुरोध किया था कि वह ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला न करे। इजरायल ने इसका सम्मान करते हुए केवल सैन्य ठिकानों पर हमले किए और आम नागरिकों को नुकसान से बचाने का पूरा प्रयास किया।
हमलों के बाद ईरान और इराक दोनों देशों ने अपनी हवाई सेवाएँ अस्थायी रूप से रोक दी हैं। ईरान के नागरिक उड्डयन संगठन के प्रवक्ता ने बताया कि फिलहाल सभी उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। वहीं, इराक ने भी सभी उड़ानों को निलंबित करने की घोषणा की है। इस कदम के पीछे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने को मुख्य कारण बताया जा रहा है। इजरायल के इस कदम से क्षेत्र में खलबली मच गई है और कई देशों के बीच तनाव बढ़ गया है।
इजरायल ने अपने इस हमले से एक बार फिर दिखा दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी खतरे को बर्दाश्त नहीं करेगा। ईरान पर तीन चरणों में हमले करके इजरायल ने न केवल अपनी सुरक्षा को मजबूत किया है बल्कि यह भी संकेत दिया है कि वह अपने दुश्मनों को करारा जवाब देने के लिए हमेशा तैयार है। अब देखना यह है कि इस हमले के बाद ईरान और अन्य संबंधित देश क्या रुख अपनाते हैं।

अस्पताल के नीचे बंकर, बंकर में 4000 करोड़ रूपए का खजाना… हिजबुल्लाह के बैंक पर इजरायल ने की बमबारी; आतंकी संगठन के पास कहाँ से आया इतना सोना-कैश?

हॉस्पिटल के बेसमेंट में वह बैंक जिस पर हमला हुआ (बाएँ) और 4000 करोड़ वाला बंकर (चित्र साभार: IDF & Le Devoir)
इजरायल सुरक्षाबलों ने हिजबुल्लाह की आतंकी गतिविधियों को फंडिंग करने वाले एक बैंक पर बमबारी की है। इस बैंक की कई शाखाओं पर लेबनान के भीतर बमबारी हुई है। इजरायल ने यह खुलासा भी किया है कि हिजबुल्लाह ने एक अस्पताल के नीचे सोना और करोड़ों डॉलर छुपा रखे हैं।

इजरायल ने सोमवार(21 अक्टूबर, 2024) को बेरूत के भीतर अल कर्द अल हसन नाम के एक वित्तीय संस्थान की शाखाओं पर बमबारी की। यह एक इस्लामी बैंकिंग संस्थान है, यानी यह ब्याज पर काम नहीं करता। इस संस्थान पर आरोप है कि इसके जरिए हिजबुल्लाह अपनी वित्तीय गतिविधियाँ चलाता है।

इस संस्थान को अमेरिका ने 2007 में बैन कर दिया था। हिजबुल्लाह लेबनान के लोगों को यह संस्थान उपयोग करने के लिए बढ़ावा देता रहा है। एक बार जब इस बैंक का सर्वर हैक हुआ था तब इसमें खाता रखने वालों का नाम खुलासा हुआ था। इसमें हिजबुल्लाह के लोगों के नाम भी थे।

हिजबुल्लाह के पूर्व मुखिया नसरुल्लाह ने इस संस्थान में हिजबुल्लाह समर्थकों से अपना एक-एक पैसा इसमें जमा कर दें। यह हिजबुल्लाह की फर्जी कम्पनियों को चलाने में भी मदद करता है। इजरायल ने हिजबुल्लाह की आर्थिक रूप से कमर तोड़ने को बेरूत में इसकी शाखाओं को निशाना बनाया। बेरूत में इस संस्थान की 15 शाखाएँ हैं।

दूसरी तरफ इजरायली सुरक्षा बलों (IDF) के प्रवक्ता डैनिएल हगारी ने भी इसको लेकर बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि लेबनान के लोगों का पैसा लेकर हिजबुल्लाह अपनी आतंकी गतिविधियाँ चला रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान से आया पैसा और लेबनान के लोगों को पैसा हिजबुल्लाह को फंड किया जा रहा है।

इजरायल ने खुलासा किया कि ‘4400 यूनिट’ हिजबुल्लाह की वित्तीय गतिविधियाँ चलाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान से पैसा और सोना हिजबुल्लाह के लिए आता है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि लेबनान से हिजबुल्लाह डॉलर चुराता है, इस कारण से लेबनान की अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई है।

इजरायल ने एक और बड़ा खुलासा इस दौरान किया। डेनियल हगारी ने बताया, “आज मैं वह सूचना सार्वजनिक कर रहा हूँ जहाँ पर हमने बमबारी नहीं की। यह हिजबुल्लाह के पूर्व मुखिया नसरुल्लाह का बंकर है। यह बंकर अल सालेह अस्पताल के ठीक नीचे स्थित है। इसके नीचे बड़ी सुरंग बनाई है और इसमें घुसने और निकलने के रास्ते भी पास की इमारतों में हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “यह एक बड़ा बंकर है, यहाँ बेडरूम हैं और लम्बे समय तक लड़ने और छुपने की भी व्यवस्था है। यहाँ करोड़ों डॉलर नगद में रखे हुए हैं और सोना भी रखा हुआ है। यह पैसा और सोना अब भी रखा हुआ है। हम लेबनान की सरकार और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने माँग करते हैं कि इस पैसे का इस्तेमाल आतंक के लिए ना हो।” हगारी ने बताया है कि हिजबुल्लाह ने यहाँ 500 मिलियन डॉलर (लगभग 4200 करोड़ रूपए) छुपाए हैं।

इजरायल लगातार लेबनान के भीतर हिजबुल्लाह को निशाना बना रहा है। उसने हाल ही में हिजबुल्लाह के मुखिया नसरुल्लाह और उसके उत्तराधिकारी को मार गिराया था। इजरायल गाजा में भी आतंकियों को ठिकाने लगा रहा है।

गाजा की मस्जिद में छिपे बैठे थे हमास के आतंकी, इजरायल ने हवाई हमले से कर दिया ‘समतल’: बेरूत में हिजबुल्लाह के कई ठिकाने भी तबाह

                                                        बेरूत (साभार: अल जजीरा)
इस्लामी आतंकियों के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई में आक्रामकता बढ़ गई है। उसने गाजा पट्टी में आतंकी संगठन हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई करते हुए भारी बमबारी की है। इस कार्रवाई में हमास के कम से कम 21 आतंकी मारे गए हैं। कहा जा रहा है कि ये आतंकी एक मस्जिद में छिपे हुए थे। हमले में मस्जिद सहित अन्य इमारतें भी नेस्तनाबूद हुई हैं।

इज़रायली सेना का कहना है कि युद्धक विमानों ने कुछ समय पहले ही आतंकियों पर सटीक निशाना साधा था। दरअसल, मध्य गाजा पट्टी के डेर अल-बलाह में इब्न रुश्द स्कूल के परिसर में हमास का कमांड सेंटर मौजूद था और इसमें ये आतंकी मौजूद थे। अल-बलाह में हमास के दूसरे नियंत्रण केंद्र को भी निशाना बनाया गया, जो शुहादा अल-अक्सा मस्जिद कहलाता है।

इजरायली सेना का कहना है कि हमास द्वारा कमांड सेंटर का इस्तेमाल IDF बलों और इज़रायल के खिलाफ आतंकी हमलों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने के लिए किया जाता था। IDF का कहना है कि हमले में नागरिकों को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए सटीक हथियारों का उपयोग और पुष्ट खुफिया जानकारी सहित कई उपाय किए गए थे।

वहीं, लेबनान की राजधानी बेरूत के उपनगरों में इजरायल की सेना ने भी बमबारी की है। इस्लामी मीडिया हाउस अल जजीरा की के अनुसार, कार्रवाई की वजह से बेरूत में बड़े पैमाने पर विस्फोट हुए हैं और आग की लपटें आसमान तक पहुँच रही हैं। लेबनान के समाचार चैनलों के मुताबिक, इजरायल ने बेरूत में रात भर 30 से अधिक हमले किए।

बेरूत का दक्षिणी इलाका आतंकी संगठन हिजबुल्लाह का गढ़ माना जाता है। यह इजरायली सेना के विशेष निशाने पर है। इजरायली सेना IDF ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उसके लड़ाकू विमानों ने बेरूत में हिजबुल्लाह के कई हथियार गोदामों और अन्य बुनियादी ढाँचे पर हमले किए। उसने कहा कि इस हमले को लेकर उसने इलाके के नागरिकों को पहले ही चेतावनी दे दी थी।

उधर, हिजबुल्लाह के चीफ नसरल्लाह के उत्तराधिकारी कहे जाने वाले हाशेम सफीद्दीन के भी मारे जाने की बात कही जा रही है। अल जज़ीरा ने लेबनान एक सुरक्षा सूत्र के हवाले से बताया कि हिज़्बुल्लाह ने अपने कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष हाशेम सफ़ीद्दीन से संपर्क खो दिया है।

इजरायल ने पैगम्बर मोहम्मद के वंशज को भी मार गिराया : हफ्ते भर पहले ही बना था हिजबुल्लाह का सरगना, इस्लामी बता रहे थे इसे ‘खूंखार योद्धा’; पाकिस्तान TV ने आतंकवादी मुस्लिमों के होने का कारण बताया , देखिए वीडियो

इजरायल ने इस्लामी आतंकी संगठन हिजबुल्लाह के नए सरगना हाशिम सैफिद्दीन को भी मार गिराया है। उसे लेबनान के भीतर एक हवाई हमले में मार दिया गया। हिजबुल्लाह ने इस संबंध में अभी आधिकरिक जानकारी नहीं दी है। नए हिजबुल्लाह सरगना की मौत उसके पिछले मुखिया हसन नसरुल्लाह के मारे जाने के एक सप्ताह के भीतर हो गई है।

इजरायली मीडिया ने जानकारी दी है कि शुक्रवार रात (4 अक्टूबर, 2024) को इजरायल की वायु सेना के तीन विमानों ने बेरूत के भीतर एक जगह पर भारी हवाई बमबारी की। इस बमबारी में हिजबुल्लाह का नया सरगना हाशिम सैफिद्दीन मारा गया। हमले के दौरान वह के बंकर में मौजूद था और अपने कमांडरों के साथ बैठक कर रहा था। 

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल(जिसकी पुष्टि नहीं हो पायी है) हो रहे नीचे दिए वीडियो जिसे पाकिस्तान का बताया जा रहा है। 

Why are terrorists always Muslims? Thank God this information was given by Pakistan TV. 

Indian Secularist and supporters of Islam must listen to this so that, by mistake, if it opens their mind.

हिजबुल्लाह के नए सरगना के मारे जाने को लेकर इजरायली सुरक्षा बलों (IDF) और हिजबुल्लाह ने अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। इजरायल के इस हवाई हमले के कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर आए हैं। इनमें एक रिहायशी इलाके में आग की लपटें उठती दिखाई देती हैं।

कौन था हाशिम सैफिद्दीन?

हिजबुल्लाह के मुखिया हसन नसरल्लाह को शुक्रवार (27 सितम्बर, 2024) को इजरायल ने एक हवाई हमले में मार गिराया था। इसी के साथ हिजबुल्लाह के कई और कमांडर भी मारे गए थे। इसके बाद प्रश्न उठा था कि इस आतंकी संगठन का सरगना अब कौन बनेगा। इस बीच हाशिम सैफिद्दीन का नाम उठा था।
सैफिद्दीन को हिजबुल्लाह का नया मुखिया माना जा रहा था। सैफिद्दीन भी नसरल्लाह की तरह एक शिया इमाम है। वह हिजबुल्लाह के सबसे वरिष्ठ लोगों में से एक है। लेबनान में जन्मा सैफिद्दीन हिजबुल्लाह की शूरा कमिटी का सदस्य था।
यह कमिटी हिजबुल्लाह को नियंत्रित करती है। इसके अलावा यह एग्जीक्यूटिव कमिटी और जिहाद काउंसिल का मुखिया था जो कि हिजबुल्लाह के आतंक समेत बाकी मामलों को देखती है। सैफिद्दीन 60 वर्ष का था और वह हिज्बुलाह के मृत सरगना नसरल्लाह का ममेरा भाई था।
उसके बेटे की शादी ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर कासिम सुलेमानी के बेटी के साथ हुई थी। सैफिद्दीन काली पगड़ी पहनता था, यह शियाओं के बड़े इमाम पहना करते हैं। वह खुद को इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद के वंशज के तौर पर दर्शाता था। उसे इस्लामी सोशल मीडिया मीडिया हैंडल्स ने ‘खूंखार योद्धा’ बताया था।
सैफिद्दीन को अमेरिका ने 2017 में आतंकी घोषित कर दिया था। माना जाता है कि उसे लम्बे समय से हिजबुल्लाह का अगला मुखिया बनने के लिए तैयार किया जा रहा था। ईरान भी उसे नया मुखिया बनाने जाने के पक्ष में था। सालों से उसे इस बात की ट्रेनिंग दी जा रही थी। हालाँकि, अब उसके मारे जाने की बात सामने आई है।

हिजबुल्लाह पर इजरायल का कहर जारी

इजरायल लगातार आतंक के खात्मे के लिए लेबनान में हिजबुल्लाह और गाजा के भीतर हमास पर हमले कर रहा है। उसने लेबनान में सैफिद्दीन के अलावा एक अन्य हमले में राकेट और मिसाइल के विशेषज्ञ मुहम्मद युसूफ अनीसी को मार गिराया है। मैकेनिकल इंजीनियर की शिक्षा लेने वाला अनीसी इजरायल पर हमले के लिए रॉकेट बनाता था।
इजरायल ने इसी के साथ वेस्ट बैंक में भी बमबारी की और यहाँ के हमास कमांडर यासिर अब्दुलरज्जाक को मार गिराया। इस आतंकी ने इजरायल में बीते माह एक हमले को अंजाम दिया था। इससे पहले इजरायल ने लगभग 2 दशक पहले 2 इजरायली सैनिकों को मारने वाले एक हमास आतंकी को भी मार गिराया।

इजरायल ने इस बार सीधे हिजबुल्लाह के हेडक्वार्टर पर किया धमाका, 6 की मौत, 91 घायल

                        हिजबुल्लाह हेडक्वार्टर पर हमला (फोटो साभार: वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट)
इजरायल ने एक बार फिर से लेबनान में हमला किया। इस बार उनका निशाना सीधे बेरट स्थित हिजबुल्लाह का हेडक्वार्टर था। दावा किया गया कि इस हमले में हेडक्वार्टर के भीतर कोई नहीं बचा। वहीं कुछ रिपोर्ट ने बताया कि हमले में 6 लोग मरे हैं और 91 घायल हुए हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तो यह भी कह रही हैं कि इस हमले में हिजबुल्लाह के चीफ नसरल्लाह की मौत हो गई। हालाँकि हिजबुल्लाह संगठन ने खुद इस दावे से इनकार किया है।

बताया ये भी जा रहा कि इजराइली हमले में नसरल्लाह की बेटी और उसके भाई हाशिम सफी अल दीन की मौत हो गई है। हाशिम हिज्ब कार्यकारी परिषद का चीफ था। हालाँकि इन मौतों को लेकर अभी कहीं आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

वहीं हमले से जुड़ी जो जानकारी इजरायल रक्ष बल ने दी है। उसमें बताया गया, “दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह की मिसाइल यूनिट के कमांडर मुहम्मद अली इस्माइल और उनके डिप्टी हुसैन अहमद इस्माइल को इजरायल द्वारा एक सटीक हवाई हमले में मार गिराया गया है। अली इस्माइल इजरायल राज्य के खिलाफ कई आतंकवादी हमलों को निर्देशित करने के लिए जिम्मेदार था, जिसमें बुधवार को इजरायली क्षेत्र की ओर रॉकेट दागना और मध्य इजरायल की ओर सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल का प्रक्षेपण शामिल था।”

इजरायल ने बताया कि हिजबुल्ला ने इजरायली नागरिकों को मारने के लिए 150,000 रॉकेट छोड़े थे। अब इजरायली सेना हिजबुल्लाह को मारकर सिर्फ इजरायल को बचा रही है। लेबनान के लोगों के साथ उनका कोई द्वेष नहीं है। उन्होंने बताया कि हिजबुल्लाह की मिसाइलें उनकी जमीन और समुद्र दोनों को निशाना बना रही है, लेकिन वह अपने नागरिकों को बचाने के लिए चाहे भूमि से हो, वायु से हो या समुद्र से हो हमेशा तत्पर हैं। आईडीएफ ने जानकारी दी कि वह खुफिया सूचना के आधार पर आतंकी संगठन के ठिकाने पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि हिजबुल्लाह को तबाह करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

हिजबुल्ला के गढ़ में ‘सर्जिकल स्ट्राइक ’ में हमास के नंबर-2 सलाह अल अरूरी के मिले सिर्फ शरीर के टुकड़े: इजरायल ने घर में घुस कर मार गिराया

                            सलाह अल अरूरी और बेंजामिन नेतन्याहू (चित्र साभार: TOI & Politico)
2 जनवरी, 2024 की रात इजरायल के सुरक्षा बलों ने एक ड्रोन स्ट्राइक से लेबनान की राजधानी के बेरुत के भीतर छुपे बैठे इस्लामी आतंकी संगठन हमास के डिप्टी लीडर सलाह अल अरूरी को मार गिराया है। अरूरी फिलिस्तीन से बाहर रह कर आतंकी गतिविधियों का संचालन करता था। उसकी मौत की पुष्टि हमास ने कर दी है।

जानकारी के अनुसार, जब अरूरी पर हमला हुआ तब वह लेबनान की राजधानी बेरुत के दक्षिणी रिहायशी इलाके में स्थित हमास के दफ्तर में था। यह दफ्तर एक तीन मंजिला इमारत में बनाया गया था और इस पर इजरायल ने एकदम निशाना लगाकर वार किया, हमले में सलाह अल अरूरी समेत 7 लोगों के मारे जाने की सूचना सामने आई है।

लेबनान के जिस इलाके में अरूरी की मौत हुई वह शिया मुस्लिमों का आतंकी संगठन हिज्बुल्ला का गढ़ माना जाता है। उसकी मौत को हमास ने कायरतापूर्ण हमला बताया है। हमास के प्रवक्ता ने कहा है कि इजरायल का यह हमला गाजा में उसकी विफलता को दिखाता है। इजरायली सुरक्षा बलों ने इस मामले पर मीडिया को कोई जवाब नहीं दिया है।

इजरायल ने कहा है कि जिसने भी उसे मारा है, उसने एक सर्जिकल स्ट्राइक की है। इजरायल ने अभी इस हमले की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया है। हालाँकि, अमेरिकी समाचार पत्रों से बातचीत में अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि हमला इजरायल ने ही किया था।

सोशल मीडिया पर चल रही तस्वीरों में दावा किया गया है कि अरूरी पर किया गया हमला इतना तेज और असरदार था कि बाद में पहुँची टीम को सिर्फ उसका हाथ मिला। अरूरी की मौत पर फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक वाले हिस्से में बुधवार को हड़ताल की घोषणा की है। बताया जा रहा है कि वहाँ कम से कम 2 लोगों के शरीर के टुकड़े बिखरे हुए थे। लोगों ने हमले से पहले ड्रोन की आवाज़ भी सुनी।

हमास का आतंकी सलाह अल अरूरी, जिसे इजरायल ने मारा?

इजरायल के हमले में मारा जाने वाला 57 वर्षीय अरूरी हमास में नंबर 2 की हैसियत रखता था। वह हमास के मुखिया इस्माइल हानियेह के बाद इस आतंकी संगठन का सबसे बड़ा नेता था। उसी ने हमास की आतंकी कासेम ब्रिगेड की नींव रखी थी। वह पिछले डेढ़ दशक से लेबनान में रह रहा था।
1966 में वेस्ट बैंक में जन्मा अरूरी 1987 में हमास में शामिल हुआ था। वह दो बार इजरायल में जेल भी जा चुका है लेकिन इजरायल और फिलिस्तीनी समूहों के बीच बातचीत के कारण उसे दोनों बार छोड़ दिया गया। वह सीरिया, तुर्की, लेबनान और कतर जैसे देशों में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता था।
अरूरी को ईरान का करीबी माना जाता है। माना जाता है कि हमास और शिया आतंकी संगठन हिजबुल्ला के बीच उसी ने रिश्तों को बढ़ाया था। वह हिजबुल्ला के नेता के नसरल्लाह के साथ भी हाल ही में नजर आया था। उस पर लगभग 40 करोड़ रुपए का ईनाम अमेरिका ने भी रखा हुआ था।
इजरायल ने अरूरी समेत पूरे हमास को नेतृत्व को साफ़ करने का प्रण 7 अक्टूबर, 2023 के बाद से लिया था। इसी क्रम में वह एक एक करके उनका सफाया कर रहा है। 7 अक्तूबर, 2023 को इस्लामी आतंकी संगठन ने गाजा से इजरायल पर एक हमला किया था जिसमें 1200 से अधिक लोग मारे गए थे। इसके बाद से इजरायल लगातार हमास के आतंकियों का सफाया कर रहा है।

गाजा की आग में जला अमेरिका का दूतावास, लेबनान में हमास समर्थकों ने फूँका-लहराए फिलस्तीनी झंडे: तुर्की की नौसेना ने शुरू किया ड्रिल

सुरक्षा बलों के साथ पूर्वी बेरूत में हुई झड़प के बाद जलते हुए अमेरिकी दूतावास के सुरक्षा द्वार के आगे लेबनानी प्रदर्शनकारी 'वी फॉर विक्ट्री' का साइन बनाते हुए (फोटो साभार: nypost.com)
गाजा सिटी अस्पताल में हुए भीषण विस्फोट के जवाब में मंगलवार (17 अक्टूबर, 2023) की शाम को सैकड़ों लेबनानी प्रदर्शनकारियों ने लेबनान की राजधानी बेरूत में अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और इसे आग के हवाले कर दिया। इनमें से कुछ प्रदर्शनकारी फिलिस्तीनी झंडे लहरा रहे थे।

गाजा के अस्पताल पर हुए इस हमले को लेकर लेबनानी आतंकी संगठन हिजबुल्लाह ने ‘अभूतपूर्व आक्रोश दिवस’ (A Day Of Unprecedented Anger) मनाने का आह्वान किया था। इसके कुछ ही घंटे बाद लेबनान में प्रदर्शनों का सिलसिला चल पड़ा।

आतंकवादी संगठन हमास के साथ संघर्ष में यहूदी राष्ट्र के समर्थन में पड़ोसी देश इज़रायल में राष्ट्रपति जो बायडेन के आने से कुछ घंटे पहले ये प्रदर्शनकारी अमेरिकी दूतावास के बाहर इकट्ठा हो गए थे। इन्हें तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े।

गौरतलब है कि इस मसले का समाधान निकालने और शांति वार्ता के लिए इजरायल सहित क्षेत्र के अन्य देशों के शीर्ष नेताओं से मिलने की अमेरिकी राष्ट्रपति बायडेन की योजना भी सिरे नहीं चढ़ पाई। जॉर्डन के विदेश मंत्री ने उनकी राजधानी अम्मान में बुधवार को होने वाले क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन को रद्द करने का ऐलान किया।

इस सम्मेलन में ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन को जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय, फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मिलना था।

वहीं लेबनान में प्रदर्शनों को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियो में एक प्रदर्शनकारी को अमेरिकी दूतावास के झंडा फहराने वाले स्तंभ पर फ़िलिस्तीनी झंडा लगाने के लिए इमारत के चारों ओर काँटेदार तार की बाड़ पर चढ़ते हुए देखा गया, जबकि साथी प्रदर्शनकारी नीचे से उसका उत्साह बढ़ा रहे थे।

    लेबनानी प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास की बाड़ पर फ़िलिस्तीनी झंडा और चिह्न लटकाए (फोटो साभार:                   nypost.com)

इससे पहले सोमवार (15 अक्टूबर, 2023 ) को इजरायल की सेना IDF ने लेबनानी सीमा के पास रहने वाले 28 समुदायों को ये इलाका खाली करने का आदेश दिया था। गौरतलब है कि हिजबुल्लाह ने यह नहीं कहा है कि वह इजरायल के साथ युद्ध करेगा या नहीं, लेकिन बीते हफ्ते इजरायल-हमास संघर्ष शुरू होने के बाद से दोनों देशों ने एक दूसरे पर कई हमले किए हैं। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) ने सोमवार को कहा कि उसने लेबनान-इज़रायल सीमा पर संभावित हमलों की वजह से बेरूत में चिकित्सा आपूर्ति की दो खेप भेजी हैं।

इजरायल ने अपने लोगों को तुर्की से बाहर निकलने के लिए भी बोल दिया है, क्योंकि वहाँ उन्हें निशाना बनाए जाने की आशंका है। इजिप्ट में पहले ही 2 इजरायली नागरिक और उनके गाइड की हत्या की जा चुकी है। तुर्की ने नौसेना ड्रिल भी शुरू कर दी है। वहीं ईरान के भी सुप्रीम लीडर ने धमकाया है कि इजरायल ने अपनी कार्रवाई नहीं रोकी तो मुस्लिमों को फिर रोकने वाला कोई नहीं होगा।


हमास के बाद हिज़्बुल्ला ने भी बोला हमला: इजरायल ने उन मस्जिदों को तबाह किया, जिनमें छिपे थे आतंकी

इस्लामी आतंकी संगठन हमास के दक्षिणी इजरायल पर हमले के बाद अब लेबनान की तरफ से भी इजरायल पर हमले चालू हो गए हैं। हमास को सहायता देने वाला आतंकी संगठन हिज़्बुल्ला (Hezbollah) अब खुद लड़ाई में उतर आया है।

हिज़्बुल्ला ने एक वीरान इलाके में रॉकेट दागे हैं। (चित्र साभार : BBC)
हिज़्बुल्ला ने इजरायल से सटी लेबनान सीमा की तरफ से रॉकेट दागे हैं। हेज्बोल्लाह ने इजरायल के शेबा फार्म इलाके में राकेट और गोले दागे हैं। हालाँकि, इस हमले में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हिज़्बुल्ला ने कहा है कि उसका निशाना इजरायल के कुछ राडार स्टेशन थे, जिनको ध्वस्त करने के लिए उसने ये रॉकेट दागे। इजरायल ने भी इसके प्रतिरोध में काफी फायरिंग की है। हिज़्बुल्ला ने इजरायल, सीरिया और लेबनान की सीमा पर बसे गोलान हाइट्स इलाके में भी बमबारी की है। यह इलाका वर्ष 1967 के बाद से इजरायल के कब्जे में है। हिज़्बुल्ला ने सबसे पहले हमास के हमले की प्रशंसा की थी।

हिज़्बुल्ला ईरान समर्थित शिया आतंकी समूह है जिसने लेबनान में अपना बेस बनाया हुआ है। वह यहाँ काफी प्रभावशाली है और कई तरह के अवैध व्यापार समेत तस्करी और अन्य धंधों में लिप्त है। वह लेबनान के भीतर से ही इजरायल पर लगातार हमले करता है। हालाँकि, अभी अन्य अरब देशों ने इजरायल के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई को लेकर कोई भी बात नहीं कही है। क़तर को छोड़ कर बाकी सभी देशों ने इजरायल में हुए हमले की निंदा की है। ईरान ने इस हमले का समर्थन किया है और ईरानी जनता ने सड़कों पर आकर इसका जश्न मनाया है।

इसके अतिरिक्त, हमास ने कहा है कि वह लगातार इजरायल से लड़ रहा है और अभी भी उनका इजरायल के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा है, कम से कम 7 स्थानों पर दोनों के बीच लड़ाई चल रही है। इजरायल ने गाजा के भीतर घुस कर हवाई हमले चालू कर दिए हैं और अपनी रिज़र्व सेना को भी बुला लिया है। एक जानकारी के अनुसार, इजरायल द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में अब तक लगभग गाजा में 250 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और लगातार घायलों को अस्पताल लाया जा रहा है। इजरायल ने अपनी कार्रवाई में गाजा के भीतर कई मस्जिदों को तबाह कर दिया है। इजरायल का कहना है कि फिलिस्तीनी आतंकी इन्हीं मस्जिदों के भीतर से काम कर रहे थे।

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हमास के हमले में मरने वाले इजरायलियों की संख्या भी 350 पार हो गई है। इजरायल के रक्षा मंत्रालय ने 26 सैनिकों की मौत की आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है। मरने वालों में 18 से 42 वर्ष तक के सैनिक शामिल थे जो कि हमास के हमले के समय सीमा पर तैनात थे। इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि इजरायल अपनी सेनाओं को जमीन के रास्ते गाजा पट्टी और फिलिस्तीन के भीतर भेज सकता है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह गाजा पट्टी को रेगिस्तान में बदल देंगे।