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शहबाज शरीफ की इंटरनेशनल बेज्जती, ‘मध्यस्थ’ नहीं अमेरिका के ‘दलाल’ ही थे शहबाज शरीफ: ट्रंप से मिला मैसेज किया ‘कॉपी-पेस्ट’ तो जमकर हुए ट्रोल

                                 शहबाज शरीफ ने ट्रंप का मैसेज किया 'कॉपी-पेस्ट' (साभार : Grok)
मिडिल ईस्ट में पिछले 38 दिनों से चल रही विनाशकारी जंग पर बुधवार (8 अप्रैल 2026) सुबह आखिरकार ब्रेक लग गया। खास बात यह रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी डेडलाइन खत्म होने से ठीक 2 घंटे पहले सीजफायर(संघर्ष विराम) का ऐलान कर दिया।

इस शांति के पीछे पाकिस्तान का हाथ बताया जा रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के एक ‘कॉपी-पेस्ट’ ट्वीट ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। चर्चा है कि ट्रंप खुद झुकते हुए नहीं दिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शहबाज शरीफ से एक खास रिक्वेस्ट वाला ट्वीट करवाया ताकि उन्हें पीछे हटने का बहाना मिल सके। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ठीक ही कहा था कि भारत इस युद्ध में पाकिस्तान की तरह दलाली नहीं कर सकता है और अब शायद वही बात सामने भी आ रही है।

डेडलाइन से ठीक पहले ट्रंप का यू-टर्न

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार(7 अप्रैल) देर रात घोषणा की कि वह पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर से बातचीत के बाद युद्ध रोकने को तैयार हुए हैं। ट्रंप ने पहले ईरान को चेतावनी दी थी कि या तो वह झुक जाए या बड़े हमले के लिए तैयार रहे। लेकिन जैसा कि पिछले कई मौकों पर देखा गया है, ट्रंप डेडलाइन खत्म होने से ऐन पहले पीछे हट जाते हैं। माना जा रहा है कि अपनी साख बचाने के लिए उन्होंने इस बार पाकिस्तान के कंधे का इस्तेमाल किया।

‘Draft’ ट्वीट से खुली पोल, क्या ट्रंप ने लिखा था संदेश?

विवाद तब शुरू हुआ जब पीएम शहबाज शरीफ ने ‘X’ (ट्विटर) पर रात 12:46 बजे एक पोस्ट किया। इस पोस्ट की पहली लाइन में ही ‘Draft–Pakistan’s PM Message on ‘X’’ लिखा था। हालाँकि, शरीफ की टीम ने एक मिनट के अंदर ‘कॉपी-पेस्ट’ को एडिट किया, लेकिन तब तक यह मैसेज वायरल हो चुका था।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह मैसेज ट्रंप की टीम ने लिखकर पाकिस्तान भेजा था? जानकारों का कहना है कि किसी देश के PM की टीम अपने ड्राफ्ट में ‘पाकिस्तान के पीएम का मैसेज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करती। ऐसा लग रहा है जैसे ट्रंप प्रशासन ने खुद यह ड्राफ्ट तैयार किया और शहबाज शरीफ से इसे पोस्ट करने को कहा, ताकि ट्रंप को दुनिया के सामने यह कहने का मौका मिले कि वह पाकिस्तान के अनुरोध पर जंग रोक रहे हैं।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पोस्ट में क्या लिखा था?

शहबाज शरीफ ने अपने पोस्ट में बड़ी चतुराई से ट्रंप से अनुरोध किया था कि कूटनीति को एक मौका देने के लिए हमले की डेडलाइन 2 हफ्ते आगे बढ़ा दी जाए। साथ ही, उन्होंने ईरान से भी अपील की कि वे सद्भावना दिखाते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खोल दें। इसी ट्वीट को आधार बनाकर ट्रंप ने जंग रोकने का फैसला सुना दिया।

शहबाज शरीफ के लेबनान पर सीजफायर के दावे की इजरायल ने निकाली हवा (साभार : Thetribune & Indianews)
लेबनान में सीजफायर का झूठा दावा पड़ा भारी: इजरायल ने बम बरसाकर निकाली हवा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। शहबाज ने ट्वीट कर दावा किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ सीजफायर लेबनान समेत हर जगह तुरंत प्रभावी होगा।

हालाँकि, इजरायल ने इस दावे की धज्जियाँ उड़ाते हुए साफ कर दिया कि लेबनान में कोई युद्धविराम नहीं है। इजरायल ने बयान जारी करने के साथ ही लेबनान में बमबारी जारी रखकर पाकिस्तान के झूठ की हवा निकाल दी।

पाकिस्तानी PM का बड़बोलापन

शहबाज शरीफ ने खुद को ‘शांति दूत’ बताते हुए घोषणा की थी कि लेबनान में भी जंग रुक गई है। लेकिन इजरायली PM बेंजामिन नेतन्याहू ने सख्त लहजे में कहा कि यह समझौता लेबनान पर लागू नहीं होता। इजरायल का तर्क है कि हिजबुल्लाह का मोर्चा अलग है। जब तक उत्तरी सीमा सुरक्षित नहीं होती, हमले जारी रहेंगे।

इजरायल के रुख से साफ है कि पाकिस्तान को या तो समझौते की समझ नहीं है या उसने श्रेय लेने के लिए सफेद झूठ बोला। इस घटना ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के उस बयान को सच साबित कर दिया, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को ‘फीस लेकर संकट सुलझाने का दावा करने वाला दलाल’ कहा था। पाकिस्तान अब कूटनीतिक रूप से अलग-थलग और बेनकाब हो गया है।

क्या ‘मनोविकारी’ हैं राहुल गाँधी? भारतीय राजनीति के इस ‘शिशुपाल’(राहुल गाँधी) के कितने अपराध क्षमा करेंगी हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ?

                                राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर लगाए बेतुके आरोप (फोटो साभार: द फेडरल)
झूठ बोलने पर उसे फटकार लग चुकी है। वह सार्वजनिक माफी माँग चुका है। अनर्गल प्रलाप के लिए अदालत उसे दोषी मानकर सजा सुना चुकी है। पर वह इतना निर्लज्ज है कि फिर भी आए दिन अनाप-शनाप बोलता रहता है। जैसे वह इस देश का विपक्ष का नेता नहीं, गली-मुहल्ले का लंपट हो। आदतन अपराधी हो।

7 अगस्त 2025 को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक लंबे प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए चुनाव आयोग पर जो हमला किया है, यह उसी सिलसिले का एक नया अध्याय है। कभी चुनाव आयोग, कभी भारतीय सेना, कभी ईवीएम, कभी कोर्ट, कभी संसद… भारतीय विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का शायद ही कोई अंग बचा हो, जिसको लेकर कॉन्ग्रेस नेता ने दुष्प्रचार न किया हो।

कुछ भी अनाप-शनाप बोल देने का यह ‘साहस’ राहुल गाँधी को वही व्यवस्था देती है, जिसे वे सत्ता में आने पर देख लेने की धमकी देते हैं। यही व्यवस्था उन्हें एहसास कराती है कि वे हर हाल में सुरक्षित रहेंगे। उन्हें उनके अपराधों का दंड नहीं मिलेगा। यदि एक बार यही व्यवस्था दंड की नई मिसाल कायम कर दे तो राहुल गाँधी का यह ‘साहस’ स्वत: स्खलित हो जाएगा। ऐसा होना ही भारतीय लोकतंत्र के हित में भी है।

फटकार के बाद भी जारी राहुल का प्रलाप

2014 में मोदी के उदय के बाद राहुल गाँधी ने जिन संस्थाओं को निशाना बनाया उसमें संसद भी है। वहीं, बाद से ही वो उन सभी संस्थाओं को निशाना बनाते रहें जिनके कारण भारत का लोकतंत्र मजबूत है, ऐसा संस्थाएं जिनमें लोगों की आस्था है। जिस संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है लेकिन राहुल गाँधी ने संसद पर भी लगातार सवाल खड़े किए हैं। जिस लोकसभा में उन्होंने लंबे-लंबे भाषण दिए, उसी में उन्हें ना बोलने देने के फर्जी दावे किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी उनके आरोपों से अछूता नहीं रहा है। राफेल डील पर कोर्ट के एक फैसले को उन्होंने अपने मन से ही सरकार का भ्रष्टाचार मानते हुए ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया था। बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इसके लिए माफी माँगनी पड़ी।

राहुल गाँधी ने RSS और सावरकर को लेकर भी बेतुके बयान दिए हैं। राहुल गाँधी ने RSS की तुलना आतंकी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की है, RSS को कौरव बताया है और तमाम तरह के फर्जी आरोप लगाए हैं। स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का अपमान करने में राहुल गाँधी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। साफ है कि राहुल गाँधी को सावरकर के हिंदुत्व से घृणा की हद तक चिढ़ है। सावरकर के खिलाफ बयान देने को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट राहुल गाँधी को फटकार लगा चुका है। RSS को गाँधी हत्या में शामिल होने का आरोप लगाने को लेकर भी राहुल गाँधी को कोर्ट से फटकार पड़ चुकी है।

राहुल गाँधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कहा था कि सभी चोरों का उपनाम (सरनेम) मोदी क्यों है? राहुल के इस बयान के बाद स्थानीय अदालत ने उन्हें 2 वर्षों की सजा दी और उनकी इसे लेकर सांसदी तक चली गई थी।

इन संस्थाओं के अलावा राहुल गाँधी सेना पर भी अनर्गल टिप्पणियाँ कर चुके हैं। कुछ ही दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी पर सेना का अपमान करने को लेकर तल्ख टिप्पणी की थी। कोर्ट ने यहाँ तक कहा था कि अगर राहुल गाँधी सच्चे भारतीय होते तो इस तरह की टिप्पणी ना करते। राहुल गाँधी ‘सेना की पिटाई’ जैसे बयान दे चुके हैं और पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर भी उनके सहयोगियों ने सवाल उठाए हैं।

कॉन्ग्रेस के ‘उपकृत’ चुनाव आयुक्तों पर तो BJP ने नहीं उठाए सवाल

आज राहुल गाँधी चुनाव आयोग पर खुला हमला बोलते हैं और उसे ‘बीजेपी का औजार’ बताते हैं क्योंकि लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी को सत्ता सौंपी है। कई राज्यों में बीजेपी की सरकार है।

लेकिन लंबे समय तक केंद्र और राज्य में कॉन्ग्रेस की सत्ता रही है। उसके बाद किसी भी दल ने चुनाव आयोग पर आरोप नहीं लगाए थे जबकि ऐसे चुनाव आयुक्त हुए हैं जिनके गाँधी परिवार से सीधे संबंध मिलते हैं।

मसलन, टीएन शेषन। उन्हें कई चुनाव सुधारों का श्रेय दिया जाता है। उनके मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले देश के आम लोगों को यह पता भी नहीं था कि चुनाव आयोग नाम की कोई संस्था होती है। 

दिलचस्प तथ्य यह है कि चुनाव आयुक्त बनने से पहले शेषन राजीव गाँधी की सरकार में पहले उनके करीबी सुरक्षा सचिव रहे और कैबिनेट सचिव भी बनाए गए। और जब वे रिटायर हो गए तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ गुजरात की गाँधीनगर सीट से 1999 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था।

शेषन ऐसे इकलौते नहीं है, एम.एस. गिल का नाम भी गौर करने लायक है। गिल भी मुख्य चुनाव आयुक्त रहे और इस पद रिटायर होने के बाद कॉन्ग्रेस ने गिल को राज्यसभा में भेजा और बाद में केंद्रीय मंत्री भी बनाया। गिल का यह राजनीतिक सफर कॉन्ग्रेस की कृपा से ही संभव हुआ लेकिन तब भाजपा ने कभी आरोप नहीं लगाए कि गिल ने चुनाव आयोग में रहते हुए कॉन्ग्रेस के लिए काम किया था।

नवीन चावला की नियुक्ति भी विवादों से घिरी रही। 1975-77 के आपातकाल के दौरान नवीन चावला दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद के सचिव थे। जस्टिस शाह कमीशन ने उनके विषय में कहा था कि चावला ने आपातकाल के दौरान अपार शक्तियों का प्रयोग किया क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास तक उनकी आसान पहुँच थी। शाह कमीशन ने यहाँ तक कहा कि उन्हें कोई पद न दिए जाए लेकिन इसके बावजूद वे कॉन्ग्रेस के राज में मुख्य चुनाव आयुक्त तक बने।

कॉन्ग्रेस ने उनकी नजदीकियों को लेकर चुनाव आयुक्त के तौर पर लगातार उन्हें हटाने की माँग की जाती रही थी। खुद मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन्हें हटाने की सिफारिश की थी। चावला के कार्यकाल में कई फैसले विपक्ष के खिलाफ होंगे लेकिन भाजपा ने चुनाव हारने के बाद भी चुनाव आयोग को कठघरे में नहीं खड़ा किया था।

चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर निराधार हमला असल में उसी संस्था पर हमला है जिसकी निगरानी में नेता संसद तक पहुँचते हैं। आज बेशक राहुल गाँधी सवाल उठाएँ लेकिन कॉन्ग्रेस के राज में संस्थाओं की स्थिति कैसी थी यह सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से भी जिसमें शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ‘पिंजड़े में बंद तोता’ तक बता दिया था।

मोदी विरोध बन गया है ‘मनोविकार’

नरेंद्र मोदी से पहले भी कई लोग देश के प्रधानमंत्री बने हैं। मोदी के बाद भी देश कई प्रधानमंत्री देखेगा। देश ने विपक्ष के भी कई नेता देखे हैं और भविष्य में भी देखेगा। पर मोदी घृणा में राहुल गाँधी जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं को निशाना बना रहे हैं वैसा कोई ‘मनोविकारी’ ही कर सकता है।

यह मनोविकार ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ जैसी कॉन्ग्रेसी मानसिकता से ही पैदा होता है। इसके कारण आप ना लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेताओं और न ही लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बर्दाश्त कर पाते हैं। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का हाल ही में यह कहना- ‘कौन सच्चा भारतीय है, कौन नहीं, यह न्यायपालिका तय नहीं करेगी’ भी इस तरह के मनोविकार से उपजता है।

‘शिशुपाल’ की कितनी गलतियाँ बची हैं?

अब सवाल उठता है कि इस मनोविकार का उपचार क्या है? सत्ताधारी दल होने के कारण यह केवल बीजेपी की जिम्मेदारी नहीं है कि वह ऐसे हर हमलों को जवाब दे। यह उन संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है जिनसे लोकतंत्र मजबूत होता है। यह हर एक उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जिसकी सहभागिता से लोकतंत्र का निर्माण होता है और जिसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था कार्य करती है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह राहुल गाँधी के ऐसे बेतुके हमलों पर स्वत: संज्ञान ले। चुनाव आयोग को कॉन्ग्रेस नेता को अदालत में घसीटना चाहिए। केवल सोशल मीडिया या पत्रों के जरिए उनसे सबूत माँगने की औपचारिकता तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। ऐसा हर उस संस्था को करना चाहिए जिस पर बेबुनियाद आरोप लगाकर राहुल गाँधी भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करना चाहते हैं। अराजकता पैदा करना चाहते हैं।

उनके लिए दंड का ऐसा विधान सुनिश्चित करना चाहिए जिससे कल को कोई फिर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास ना कर सके। या फिर इन्हें बताना चाहिए कि वे द्वापर के श्रीकृष्ण की तरह राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ के 100 अपराध पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। साथ ही, यह बताना चाहिए कि इस ‘शिशुपाल’ के अपराधों की गिनती कहाँ तक पहुँची है।

इससे आम जनता को यह जानने में सहूलियत रहेगी कि राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ को दंड देने का समय कब आएगा। वह इस बात की निगरानी करेगी कि गिनती पूरी होने के बाद यह ‘शिशुपाल’ दंड के विधान से बच ना सके।

हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार से विज्ञापन का माँगा हिसाब; मंत्रियों की गाड़ियों पर फूँके करोड़ों, पर फोरेंसिक लैब के लिए पैसे नहीं: महीनों से अटकी है एक CD की जाँच


पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार को लताड़ लगाई है। हाई कोर्ट ने भगवंत मान की सरकार से सरकारी विज्ञापन पर खर्च किए गए पैसे की जानकारी देने को कहा है। भगवंत मान सरकार ने हाई कोर्ट को बताया था कि फोरेंसिक लैब्स अपग्रेड करने का पैसा उसके पास नहीं है। हाई कोर्ट ने यह भी पूछा है कि पुलिस अधिकारियों के लिए कितनी गाड़ियाँ सरकार ने इस ‘फंड की कमी’ के बीच खरीदी।

एक CD की जाँच से जुड़ा है मामला

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक CCTV वीडियो की CD से जाँच के मामले में की है। दरअसल, पंजाब पुलिस ने विनय कुमार नाम के एक व्यक्ति को ड्रग्स से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया था। विनय के वकील ने दावा किया था कि जहाँ पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी 16 सितम्बर, 2023 को दिखाई है, वहीं उसे असल में 14 तारीख को ही दोस्त के घर से पकड़ लिया गया था। इस बात के सबूत के लिए उसने घर के CCTV वीडियो भी कोर्ट को एक CD में दिए थे।
हाई कोर्ट ने इस CD को जाँच के लिए दिया था। यह CD सेंट्रल फोरेंसिक चंडीगढ़ भेजी थी। हालाँकि, हाई कोर्ट तब काफी नाराज हुआ जब इसकी जाँच रिपोर्ट नहीं आई। हाई कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि आखिर पंजाब के भीतर बनी 4 फोरेंसिक लैब में CD जाँच जैसी सुविधाएँ तक नहीं है। इस बीच भगवंत मान सरकार ने कोर्ट को यह बताने की कोशिश की कि उसने सभी लैब को अपग्रेड करने के लिए काफी पैसा दिया है लेकिन इस बीच यह भी स्वीकार कर लिया कि उसके पास CD जाँच करने की सुविधा अभी नहीं है।

हाई कोर्ट ने लगाई लताड़

हाई कोर्ट ने इस मामले में भगवंत मान सरकार से यह भी पूछा था कि वह राज्य की फोरेंसिक लैब्स को क्यों नहीं अपग्रेड कर रहे और इस काम के लिए उन्हें कितना और समय चाहिए। इसको लेकर पंजाब में फोरेंसिक विभाग के मुखिया अश्विनी कालिया ने राज्य के चीफ सेक्रेटरी के साथ ने 21 जनवरी, 2025 को एक जवाब दाखिल किया था।
इसमें उन्होंने फोरेंसिक विभाग में वीडियो की जाँच के लिए खरीदे फोरेंसिक वाले उपकरणों को लेकर लिए गए एक्शन का विवरण दिया था। उन्होंने बताया था कि 9 जनवरी, 2025 को इस संबंध में एक बैठक हुई थी और 4 सप्ताह के भीतर ये प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। उन्होंने बताया था कि यह वीडियो की जाँच करने वाले उपकरण केवल एक ही लैब के लिए खरीदे जाएँगे।
कालिया ने कहा था कि बाकी तीनों लैब को अपग्रेड करने का पैसा भगवंत मान सरकार के पास नहीं है और इसको लेकर बजट नहीं दिया गया है। इस बात हाई कोर्ट नाराज हो गया। हाई कोर्ट ने कहा कि वह राज्य सरकार से ऐसे जवाब की आशा नहीं रखते थे।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मुदगिल ने कहा, “यदि राज्य सरकार ने आधुनिक जाँच/नई तकनीकों से खुद को लैस करने की इच्छा दिखाई होती, तो बजट की मंजूरी 1-2 दिन यहाँ तक कि कुछ घंटों में दी जा सकती थी। खासकर इस डिजिटल समय और AI के दौर में।

विज्ञापन पर खर्च का हिसाब भी पूछा

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने फंड की कमी का रोना रोने पर भगवंत मान की सरकार से यह भी पूछ लिया कि आखिर वह विज्ञापन पर इस बीच कितना खर्च कर रही है। हाई कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह एक सप्ताह के भीतर अप्रैल, 2024 से जनवरी, 2025 के बीच विज्ञापन पर खर्च पैसे की जानकारी दे।
हाई कोर्ट ने कहा, “राज्य सरकार को अपने मुख्य सचिव के माध्यम से चालू वित्तीय वर्ष में यानी 01 अप्रैल, 2024 से 20 जनवरी, 2025 तक सरकार के काम और उपलब्धियों के बारे में विज्ञापनों के प्रकाशन और पुलिस अधिकारियों के लिए खरीदी गई गाड़ियों पर किए गए खर्च का ब्योरा देने का आदेश दिया जाता है।”

मंत्रियों को दी थी 20 गाड़ियाँ

जहाँ पंजाब सरकार अपराध नियंत्रण के लिए जरूरी फोरेंसिक लैब के लिए पैसे की कमी बता रही है तो वहीं उसने 2024 में ही मंत्रियों को 20 गाड़ियाँ दी हैं। भगवंत मान की सरकार में शामिल 15 में से 10 मंत्रियों को जनवरी, 2024 में 1-1 इनोवा और 1-1 बोलेरो दी थी। यह उनके काफिले में चलेंगी। इनकी कीमत लगभग ₹4 करोड़ बताई गई है।
पंजाब सरकार ने हाल ही में पुलिस के लिए भी 100 से ज्यादा टोयोटा हाईलक्स गाड़ियाँ खरीदी थीं। सरकार ने बताया था कि यह नई फ़ोर्स के लिए हैं। महँगी गाड़ियाँ खरीदने का मामला केवल मंत्रियों और पुलिस तक सीमित नहीं है। दिसम्बर, 2024 में ही यह खबर आई थी कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए नई लैंड क्रूजर गाड़ियाँ खरीदी जानी हैं।
इससे पहले सितम्बर, 2023 में पंजाब सरकार ने 10 सीटों वाले एक हवाई जहाज के लिए टेंडर निकाला था। यह टेंडर तब निकाला गया था जब राज्य सरकार के पास एक हेलिकॉप्टर पहले से है। विरोध के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। यह जानकारी देने वाले RTI एक्टिविस्ट को भी पुलिस ने धमकाया था।

राजस्थान : ‘शिव मंदिर है अजमेर दरगाह, हो ASI सर्वे’: हिंदू संगठन ने की माँग, अल्पसंख्यक आयोग भी एक्टिव

अजमेर दरगाह को शिव मंदिर बताने वाले हिन्दू संगठन के सदस्यों (दाएँ) पर खादिम और दीवान के बेटे (बाएँ) द्वारा राजस्थान में 2 FIR दर्ज (चित्र साभार- दैनिक भास्कर)
राजस्थान के अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को पूर्व का हिन्दू मंदिर बताते हुए इसका ASI से सर्वे कराने की माँग पर विवाद खड़ा हो गया है। दरगाह से जुड़े 2 सदस्यों ने इस मामले में 2 अलग-अलग FIR दर्ज करवाई है। राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने भी मंगलवार (27 फरवरी 2024) को ऐसी माँगों को 2 समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाला बताते हुए पुलिस से कार्रवाई की रिपोर्ट 7 दिनों के भीतर तलब की है। आयोग ने कार्रवाई के लिए प्रदेश के DGP से भी मुलाकात की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजमेर दरगाह के दीवान के बेटे नसरुद्दीन चिश्ती ने इस मामले में दरगाह थाने में मुकदमा दर्ज करवाया है। मुकदमा में उन्होंने हिन्दू शक्ति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सिमरन गुप्ता को आरोपित किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सिमरन गुप्ता ने पंकज सहित अपने अन्य साथियों के साथ एक वीडियो बनाकर अजमेर दरगाह के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उन्होंने इसे मज़हबी भावनाओं को आहत करने वाला बताते हुए कार्रवाई की माँग की है।

इसके अलावा, अजमेर दरगाह का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य अल्पसंख्यक आयोग से भी मिला। मुलाकात में प्रतिनिधिमंडल ने हिन्दू शक्ति दल के सदस्यों के बयानों को आपत्तिजनक बताते हुए कार्रवाई की माँग की। इस मुलाकात के बाद राजस्थान राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने अजमेर के जिलाधिकारी को एक ज्ञापन भेजकर सिमरन गुप्ता और उनके साथियों पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट तलब की है। जवाब देने के लिए डीएम अजमेर को 7 दिनों का समय दिया गया है।

ज्ञापन में एक सप्ताह पहले अजमेर दरगाह के एक खादिम शकील अब्बासी द्वारा सिमरन गुप्ता और उनके साथियों पर क्लॉक टॉवर थाने में दर्ज FIR का भी जिक्र किया गया है। उसमें की गई कार्रवाई की जानकारी माँगी गई है। इसके बाद राज्य अल्पसंख्यक आयोग का एक प्रतिनिधि मंडल मंगलवार (27 फरवरी 2024) को राजस्थान के DGP यूआर साहू से मिला। मुलाकात के बाद प्रतिनिधमंडल को आश्वासन मिला कि जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ निष्पक्षता से कार्रवाई की जाएगी।

हिन्दू शक्ति दल की माँग

23 फरवरी 2024 को हिन्दू शक्ति दल के सिमरन गुप्ता ने अपने साथी पंकज के साथ एक वीडियो जारी किया था। इस वीडियो में उन्होंने अजमेर दरगाह में मौजूद जन्नती दरवाजे को पूर्व में हिन्दुओं का शिव मंदिर बताया था। इसी के साथ दरगाह के पास जो ढाई दिन का झोपड़ा है, उसे सिमरन ने पहले सरस्वती माता का मंदिर बताया। वीडियो में सिमरन ने तारागढ़ के किले को प्राचीन हिंदू राजाओं की धरोहर बताते हुए इसे जिहादियों द्वारा कब्जा की गई जगह बताया था। उन्होंने अजमेर के ADM सिटी को एक ज्ञापन देते हुए इन सभी स्थानों की ASI जाँच की माँग की थी।

पहले भी उठी है ASI सर्वे की माँग

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह के ASI सर्वे की माँग पहली बार नहीं उठी है। इस से पहले भी जनवरी 2024 में महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार ने दरगाह को पूर्व का हिन्दू मंदिर बताते हुए ASI सर्वे की माँग उठाई थी। तब राजवर्धन सिंह ने कहा था कि वो पहले इस मामले को अशोक गहलोत की नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के संज्ञान में ला चुके हैं।