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पंजाब : भगवंत मान सरकार में केजरीवाल के गुलाम AAP विधायकों ने कबूला, बिना पढ़े बनाया बेअदबी कानून

दिल्ली से लेकर पंजाब तक अरविन्द केजरीवाल ने साबित कर दिया कि उसे राज से नहीं उपद्रव से मतलब है। और उपद्रव होने पर उसका इल्जाम बीजेपी पर थोप कर अपने आपको ईमानदार बनने का ढोंग रच दिया जायेगा और जनता भी सच मान लेती है। लेकिन सच्चाई ज्यादा दिन छिपी नहीं रहती। काली करतूतें अपने आप केजरीवाल पार्टी को बेनकाब कर रही है। दूसरे राज्यों में जहां सत्ता में नहीं होते हुए भी केजरीवाल के तथाकथित नेता किसी न किसी घोटाले में शामिल होने पर कानून की गिरफ्त में आ रहे हैं।  

खैर, पंजाब की राजनीति में कई बार ऐसे अवसर आए हैं, जब धार्मिक संस्थाओं और निर्वाचित सरकारों के बीच मतभेद हो गए। लेकिन बहुत कम अवसर ऐसे रहे हैं, जब सत्तारूढ़ दल के मंत्री, विधायक और जनप्रतिनिधि नंगे पैर अकाल तख्त की चौखट पर पहुंचकर अपने ही बनाए कानून के लिए स्पष्टीकरण देने को विवश हुए हों। मुख्यमंत्री भगवंत मान की आप सरकार के कार्यकाल में यह अनोखा रिकॉर्ड बना है। श्री अकाल तख्त साहिब के सामने  सोमवार यानि 29 जनवरी को पंजाब के 78 सिख विधायकों और 9 सिख मंत्रियों को तलब हुए।  

दरअसल, जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2026 को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने केवल एक कानून की तकनीकी खामियों का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि यह भी दिखाया कि धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर राजनीतिक जल्दबाजी कितनी भारी पड़ सकती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सुनवाई के दौरान कई आम आदमी पार्टी के विधायकों ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने इतने संवेदनशील विधेयक को बिना पढ़े ही पारित कर दिया था। किसी भी संसदीय लोकतंत्र में इससे अधिक गंभीर स्वीकारोक्ति शायद ही हो सकती है। यह केवल आप विधायकों की व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि पूरी विधायी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न है। अकाल तख्त ने आप सरकार को एक महीने के भीतर कानून में संशोधन करने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है। इसके साथ ही स्पष्ट संकेत दिया है कि सिख पंथ से जुड़े विषयों पर केवल राजनीतिक बहुमत पर्याप्त नहीं, बल्कि धार्मिक परामर्श और पंथ की मर्यादा का सम्मान भी अनिवार्य है।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम और शाश्वत गुरु का दर्जा दिया

दरअसल, पंजाब सरकार ने हाल ही में गुरुग्रंथ साहिब और गुरुओं की बेअदबी की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से एक कानून पारित किया है। इस कानून में श्री गुरु ग्रंथ साहिब, भगवद्गीता, कुरआन और बाइबिल सहित विभिन्न पवित्र ग्रंथों के अपमान पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। सरकार ने इसे सभी धर्मों की आस्था की रक्षा का प्रयास बताया है, लेकिन अकाल तख्त की आपत्ति इसी समान श्रेणीकरण पर है। अकाल तख्त और कई सिख विद्वानों का तर्क है कि सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ साहिब कोई पुस्तक मात्र नहीं, बल्कि साक्षात जीवित गुरु परंपरा हैं। सिख परंपरा में दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम और शाश्वत गुरु का दर्जा दिया था। ऐसे में किसी कानून में गुरु ग्रंथ साहिब को अन्य धार्मिक पुस्तकों के साथ “पवित्र ग्रंथ” की श्रेणी में रखकर उल्लेख करना, अकाल तख्त के अनुसार, गुरुओं द्वारा प्रदान की गई सर्वोच्च स्थिति को कमतर करने जैसा है।

बिना किसी विमर्श के सरकार ने बनाया बेअदबी कानून

पंजाब विधानसभा ने अप्रैल 2026 में इस कानून को पारित किया था। इसका घोषित उद्देश्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों में कठोर दंड सुनिश्चित करना था। संशोधन के तहत बेअदबी को गंभीर अपराध मानते हुए आजीवन कारावास सहित कड़े दंड का प्रावधान किया गया। इतने अहम और धार्मिक रूप से संवेदनशील कानून बनाने से पहले पंजाब की भगवंत मान सरकार ने अकाल तख्त, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और सिख पंथक संगठनों से इस बारे में राय लेने की जरूरत भी नहीं समझी। उलटे इसके बारे में सीएम ने वीडियो में गलतबयानी कर दी। जिसके तुरंत बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), अकाल तख्त और अनेक पंथक संगठनों ने आपत्ति जताई कि सरकार ने कानून बनाने से पहले न तो पंथ से व्यापक संवाद किया और न ही धार्मिक संस्थाओं की राय ली। उनका तर्क था कि दंड कठोर होना पर्याप्त नहीं है; कानून की भाषा, परिभाषाएं और अधिकार-क्षेत्र भी सिख मर्यादा के अनुरूप होने चाहिए।

सिखों के धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या ही सही नहीं

अकाल तख्त का सबसे मूलभूत एतराज यही था कि इतना महत्वपूर्ण कानून बिना व्यापक पंथक विमर्श के पारित किया गया। सिख परंपरा में गुरु ग्रंथ साहिब केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवित गुरु का स्वरूप हैं। इसलिए उनसे संबंधित किसी भी कानून को बनाने से पहले पंथक संस्थाओं, विद्वानों और धार्मिक प्रतिनिधियों से सलाह लेना आवश्यक माना जाता है। अकाल तख्त का मत था कि विधानसभा विधायी संस्था अवश्य है, लेकिन धार्मिक सिद्धांतों की अंतिम व्याख्या उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसी कारण कानून को पंथ की सहमति के बिना पारित करना मूल प्रक्रिया की त्रुटि माना गया।

आप विधायकों ने बिना पढ़े कानून पारित कर दिया

सुनवाई का सबसे हैरतअंगेज पहलू वह स्वीकारोक्ति रही, जिसमें कई आप विधायकों ने माना कि उन्होंने विधेयक को पढ़े बिना ही समर्थन दे दिया था। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि इतने संवेदनशील कानून में आखिर क्या प्रावधान हैं। लोकतंत्र में विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं और प्रत्येक कानून पर विचार कर मतदान करना उनका संवैधानिक दायित्व है। यदि स्वयं विधायक स्वीकार करें कि उन्होंने कानून का अध्ययन नहीं किया, तो यह केवल राजनीतिक लापरवाही नहीं, बल्कि संसदीय उत्तरदायित्व की विफलता भी है। यही कारण था कि अकाल तख्त ने इसे गंभीरता से लिया और विधायकों से आत्ममंथन करने को कहा।

बेअदबी कानून में अकाल तख्त के छह प्रमुख एतराज

जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने कानून पर छह व्यापक आपत्तियां दर्ज कीं। अकाल तख्त ने सरकार को एक महीने में इन आपत्तियों का समाधान करने का निर्देश दिया। अकाल तख्त के छह एतराज इस प्रकार हैं…
(1) कानून में प्रयुक्त कई शब्द और परिभाषाएं सिख धार्मिक शब्दावली तथा मर्यादा के अनुरूप नहीं हैं।
(2) गुरु ग्रंथ साहिब से जुड़े धार्मिक विषयों का अंतिम निर्णय विधानसभा नहीं कर सकती।
(3) कानून बनाने से पहले पंथ और एसजीपीसी से समुचित परामर्श नहीं लिया गया।
(4) कानून की कुछ धाराएं धार्मिक अधिकार-क्षेत्र और राज्य के अधिकार-क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट नहीं करतीं
(5) सरकार को कानून लागू करने से पहले पंथक सुझावों को शामिल करना चाहिए।

(6) जब तक संशोधन नहीं हो जाता, कानून के विवादित प्रावधानों पर आगे कार्रवाई रोकने की सलाह दी गई।

मुख्यमंत्री मान के दो वीडियो पर इसलिए भड़का अकाल तख्त

सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े दो वीडियो भी चर्चा का विषय बने। यह विवाद उन वायरल वीडियो से जुड़ा है जिनके बारे में अकाल तख्त ने दावा किया कि दो फोरेंसिक जांचों में वीडियो को छेड़छाड़ या एआई-जनित नहीं पाया गया, जबकि मुख्यमंत्री की ओर से पहले इन्हें फर्जी या एआई आधारित बताए जाने की बात सामने आई थी। इसी विरोधाभास को लेकर अकाल तख्त ने नाराजगी जताई और कहा कि यदि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामले में तथ्यात्मक स्थिति को लेकर भिन्न दावा किया है, तो उसे स्पष्ट स्पष्टीकरण देना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अपना लिखित पक्ष देने की बात कही। इस विषय पर विभिन्न पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। अधिकतर का मानना है कि मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद पर होने के दौरान मान को धार्मिक मामलों में इस तरह के वक्तव्य नहीं देने चाहिए।

भगवंत मान का वीडियो फोरेंसिक लैब की जांच में प्रामाणिक

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने अमृतसर में ‘पांच सिंह साहिबानों’ की बैठक के बाद अकाल तख्त की फसील (मंच) से यह आदेश सुनाया। भगवंत मान पर ‘गुरु की गोलक’ (गुरुद्वारे के दान पात्र) पर आपत्तिजनक टिप्पणी, सिख गुरुओं के अपमान का आरोप है। ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने दावा किया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वह वीडियो, जिसमें एक व्यक्ति मुख्यमंत्री भगवंत मान जैसा दिखाई देता है, वो फोरेंसिक लैब की जांच में प्रामाणिक पाया गया है। उन्होंने कहा कि वीडियो के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई और न ही यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किया गया है। गर्गज ने बताया कि जनवरी में अकाल तख्त सचिवालय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर वीडियो की जांच के संबंध में संपर्क किया था। उस समय भगवंत मान ने स्वयं कहा था कि वह वीडियो की फोरेंसिक जांच के लिए तैयार हैं। हालांकि, सचिवालय को उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

अकाल तख्त सचिवालय ने वीडियो की दो लैब से जांच करवाई

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज के अनुसार इसके बाद अकाल तख्त सचिवालय ने वीडियो की दो अलग-अलग लैब से जांच करवाई। ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने कहा, “मुख्यमंत्री का पद सम्मानजनक होता है, लेकिन भगवंत सिंह मान ने अकाल तख्त के समक्ष वीडियो के मामले में झूठ बोला।” उन्होंने कहा कि पांच सिंह साहिबानों ने सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री को ‘गुरु दोषी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित किया है। बेअदबी विरोधी कानून के मुद्दे पर अकाल तख्त के जत्थेदार ने कहा कि ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ के संबंध में सभी सिख विधायक और पंजाब मंत्रिमंडल को 29 जून को अकाल तख्त के समक्ष उपस्थित होना होगा।

सरकार ने धार्मिक विषय पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई

इस सारे मामले पर माफी और स्पष्टीकरण की नौबत इसलिए आई, क्योंकि सीएम, कैबिनेट और विधायकों ने पहले इस धार्मिक विषय पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दरअसल, अकाल तख्त के समक्ष पेशी केवल औपचारिकता भर नहीं है। आप सरकार के सिख मंत्री और विधायक नंगे पैर पहुंचे, लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया और माफी के साथ पंथ की भावनाओं का सम्मान करने की बात कही। यह दृश्य अपने आप में असाधारण रहा। इसका कारण केवल कानून की भाषा नहीं है, बल्कि यह भावना भी है कि सरकार ने धार्मिक विषय पर वह सोच और विजन नहीं दिखाया, जिसकी दरकार रही। राजनीतिक दृष्टि से यह स्वीकारोक्ति कि संवाद की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है और सिख पंथ की आशंकाओं को पहले दूर किया जाना चाहिए था।

आस्था से जुड़े विवाद का विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर

राजनीतिक दृष्टि से यह विवाद आम आदमी पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। 2022 में पार्टी ने पंजाब में भारी बहुमत सामाजिक बदलाव और नई राजनीति के वादे पर हासिल किया था। यदि सिख समाज के एक प्रभावशाली वर्ग में यह धारणा बनती है कि सरकार ने धार्मिक मामलों में जल्दबाजी या पर्याप्त परामर्श के बिना निर्णय लिए, तो अगले विधानसभा चुनाव में आप के खिलाफ माहौल बन सकता है। विपक्ष पहले ही इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है, जो चुनाव में भी गूंजेगा। शिरोमणि अकाली दल पहले से ही स्वयं को पंथक राजनीति का प्रतिनिधि बताता रहा है। कांग्रेस के पास भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के अलावा की चारा नहीं। भाजपा ने पहले ही इस बेअदबी कानून को सिख समुदाय की आस्था और धार्मिक भावनाओं के विपरीत बताया है।

भगवंत मान का मकसद सिर्फ राजनीति करना – मजीठिया

अकाली नेता बिक्रम मजीठिया ने कहा कि जब जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 – तैयार किया जा रहा था, तब श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार साहिब ने स्पष्ट निर्देश और एक आदेश जारी किया था। उन्होंने आदेश दिया था कि अगर श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज के मामले से जुड़ा कोई बिल या कानून बनाया जाना है, तो उसका मसौदा श्री अकाल तख्त साहिब, शिरोमणि जत्थेबंदी, अन्य सिख संस्थाओं और पूरी गुरु नानक नाम लेवा संगत की मंजूरी लेने के बाद ही तैयार किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी महत्वपूर्ण बात छूट न जाए। भगवंत मान और केजरीवाल का एकमात्र मकसद राजनीति करना है। बैसाखी के दिन जो बिल तैयार किया गया वह पूरी तरह से और केवल राजनीति के लिए बनाया गया था। संगत इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती क्योंकि इसमें ऐसी धाराएं और फैसले शामिल किए गए हैं जो संगत को गुरु ग्रंथ साहिब महाराज से दूर करने की साजिश जैसे लगते हैं। आप गुरु नानक नाम लेवा संगत को साथ लिए बिना किसी चीज को पारित करने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? अकाल तख्त की मंजूरी के बिना इसे पारित करने का तो सवाल ही नहीं उठता।

पंजाब : AAP सरकार की नाकामी बनी आफत की वजह; यूँ ही नहीं बाढ़ से बेहाल हुआ पंजाब…जब करनी थी तैयारियाँ तब दिल्ली चुनाव में जुटी थी भगवंत मान सरकार, नजरअंदाज की मौसम विभाग की चेतावनी; अब केंद्र से माँग रहे पैसा


पंजाब इस वक्त बाढ़ की भीषण मार से जूझ रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह पिछले 37 वर्षों की सबसे भयावह बाढ़ है। राज्य के सभी 23 जिले इस भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। अब तक 37 लोगों की मौत हो चुकी है और 3.5 लाख से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं।

बाढ़ की भयावहता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1,650 से ज्यादा गाँव पानी में डूब गए हैं। 1,75,286 हेक्टेयर फसल बाढ़ से प्रभावित है। घर-मकान ढहे जा रहे हैं और इलाके झील में बदल गए हैं। वहीं, हालातों से निपटने के लिए राज्य में NDRF की 22 टीमें तैनात की गई हैं और सेना भी मदद में जुटी हुई है।

पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने और विशेष राहत पैकेज जारी करने की माँग की है। कुलतार सिंह ने केंद्र से 60,000 करोड़ रुपए का फंड तुरंत जारी करने की अपील की है। वहीं, मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्र से माँग की है कि फसल के नुकसान पर ₹50,000 प्रति एकड़ मुआवजा दिया जाना चाहिए।

AAP सरकार की नाकामी बनी आफत की वजह

पंजाब की बाढ़ लोगों पर आफत बनकर टूटी है लेकिन इसकी जितनी जिम्मेदार कुदरत है, उनकी ही सत्तारूढ AAP भी है। बीते फरवरी में जब बाढ़ की तैयारियों के लिए AAP पंजाब के नेताओं को बैठकें करनी थी तब वे दिल्ली के विधानसभा चुनावों में जुटे हुए थे।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब सरकार की लापरवाही के चलते बाढ़ की तैयारियों से जुड़ी पहली बैठक 5 जून को हुई और AAP सरकार को तैयारी के लिए केवल 17 दिनों का वक्त मिला। 22 जून को राज्य में मॉनसून ने दस्तक दे दी है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि 2,800 किलोमीटर धुसी बाँध की मरम्मत और नालों की सफाई के लिए सरकार ने 117 करोड़ रुपए जारी किए लेकिन यह टाइमलाइन व्यावहारिक नहीं थी। उन्होंने कहा, “30 जून की समय-सीमा अवास्तविक थी।”

इससे पहले बाढ़ की तैयारियों के लिए फरवरी और मार्च में बाढ़ नियंत्रण बैठकें आयोजित जाती थीं। अधिकारी ने कहा, “मौसम विभाग ने भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी लेकिन सरकार ने उसे नजरअंदाज कर दिया। दो वर्ष पहले ही राज्य ने भीषण बाढ़ झेली थी।”

पूर्व मंत्रियों ने भी उठाए AAP पर सवाल

पूर्व सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों ने कहा, “प्रकाश सिंह बादल के कार्यकाल में, बैठकें अप्रैल या मई में होती थीं। जब भारी बारिश का अनुमान था, तो उन्होंने फ़रवरी में भी बैठकें बुलाईं। वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही धनराशि जारी कर दी जाती थी और सभी काम 30 जून तक पूरे करने होते थे।” सेखों ने दावा किया कि माधोपुर हेडवर्क्स में 28 में से केवल 4 गेट ही चालू थे क्योंकि उनकी मरम्मत नहीं हुई थी।

कांग्रेस के पूर्व जल संसाधन मंत्री सुखबिंदर सिंह सरकारिया ने कहा, “इससे पहले फरवरी में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में सभी उपायुक्तों की उपस्थिति में बैठकें होती थीं। हमने 100 करोड़ रुपये जारी किए थे और यह पर्याप्त था। आज, वे 200 करोड़ रुपए खर्च होने का दावा करते हैं लेकिन मुझे कोई काम नजर नहीं आता।”

रिपोर्ट के मुताबिक, NHAI ने सड़क परियोजनाओं के लिए सरकार से गाद माँगी थी लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। वहीं, एक पूर्व चीफ इंजीनियर अमरजीत सिंह दुल्लत ने माधोपुर हेडवर्क्स की गड़बड़ी को लेकर कहा कि अपने इंजीनियरों को भरोसा करने के बजाय निजी कंपनी को रिपोर्ट के लिए 23 लाख दिए गए। दुल्लत ने कहा, “117 करोड़ रुपए जारी किए होंगे लेकिन कोई काम नजर नहीं आया।”

हालाँकि, जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने मरम्मत का काम पूरा किए जाने का दावा किया है। वहीं, एक इंजीनियर ने बाढ़ के लिए नदियों के अपना रास्ता बदलने को जिम्मेदार ठहराया है।

पंजाब में हालात खराब हैं और अब तमाम सरकारी एजेंसियाँ, NGO और लोग प्रभावितों को राहत पहुँचाने में जुटे हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने पंजाब के मुख्यमंत्री से बात की है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी जायजा लेने जा रहे हैं। अगर पंजाब सरकार ने वक्त रहते तैयारियाँ की होतीं, चुनाव में हार-जीत से पहले लोगों को महत्व दिया होता तो हालात आज ऐसे नहीं होते।

हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार से विज्ञापन का माँगा हिसाब; मंत्रियों की गाड़ियों पर फूँके करोड़ों, पर फोरेंसिक लैब के लिए पैसे नहीं: महीनों से अटकी है एक CD की जाँच


पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार को लताड़ लगाई है। हाई कोर्ट ने भगवंत मान की सरकार से सरकारी विज्ञापन पर खर्च किए गए पैसे की जानकारी देने को कहा है। भगवंत मान सरकार ने हाई कोर्ट को बताया था कि फोरेंसिक लैब्स अपग्रेड करने का पैसा उसके पास नहीं है। हाई कोर्ट ने यह भी पूछा है कि पुलिस अधिकारियों के लिए कितनी गाड़ियाँ सरकार ने इस ‘फंड की कमी’ के बीच खरीदी।

एक CD की जाँच से जुड़ा है मामला

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक CCTV वीडियो की CD से जाँच के मामले में की है। दरअसल, पंजाब पुलिस ने विनय कुमार नाम के एक व्यक्ति को ड्रग्स से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया था। विनय के वकील ने दावा किया था कि जहाँ पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी 16 सितम्बर, 2023 को दिखाई है, वहीं उसे असल में 14 तारीख को ही दोस्त के घर से पकड़ लिया गया था। इस बात के सबूत के लिए उसने घर के CCTV वीडियो भी कोर्ट को एक CD में दिए थे।
हाई कोर्ट ने इस CD को जाँच के लिए दिया था। यह CD सेंट्रल फोरेंसिक चंडीगढ़ भेजी थी। हालाँकि, हाई कोर्ट तब काफी नाराज हुआ जब इसकी जाँच रिपोर्ट नहीं आई। हाई कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि आखिर पंजाब के भीतर बनी 4 फोरेंसिक लैब में CD जाँच जैसी सुविधाएँ तक नहीं है। इस बीच भगवंत मान सरकार ने कोर्ट को यह बताने की कोशिश की कि उसने सभी लैब को अपग्रेड करने के लिए काफी पैसा दिया है लेकिन इस बीच यह भी स्वीकार कर लिया कि उसके पास CD जाँच करने की सुविधा अभी नहीं है।

हाई कोर्ट ने लगाई लताड़

हाई कोर्ट ने इस मामले में भगवंत मान सरकार से यह भी पूछा था कि वह राज्य की फोरेंसिक लैब्स को क्यों नहीं अपग्रेड कर रहे और इस काम के लिए उन्हें कितना और समय चाहिए। इसको लेकर पंजाब में फोरेंसिक विभाग के मुखिया अश्विनी कालिया ने राज्य के चीफ सेक्रेटरी के साथ ने 21 जनवरी, 2025 को एक जवाब दाखिल किया था।
इसमें उन्होंने फोरेंसिक विभाग में वीडियो की जाँच के लिए खरीदे फोरेंसिक वाले उपकरणों को लेकर लिए गए एक्शन का विवरण दिया था। उन्होंने बताया था कि 9 जनवरी, 2025 को इस संबंध में एक बैठक हुई थी और 4 सप्ताह के भीतर ये प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। उन्होंने बताया था कि यह वीडियो की जाँच करने वाले उपकरण केवल एक ही लैब के लिए खरीदे जाएँगे।
कालिया ने कहा था कि बाकी तीनों लैब को अपग्रेड करने का पैसा भगवंत मान सरकार के पास नहीं है और इसको लेकर बजट नहीं दिया गया है। इस बात हाई कोर्ट नाराज हो गया। हाई कोर्ट ने कहा कि वह राज्य सरकार से ऐसे जवाब की आशा नहीं रखते थे।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मुदगिल ने कहा, “यदि राज्य सरकार ने आधुनिक जाँच/नई तकनीकों से खुद को लैस करने की इच्छा दिखाई होती, तो बजट की मंजूरी 1-2 दिन यहाँ तक कि कुछ घंटों में दी जा सकती थी। खासकर इस डिजिटल समय और AI के दौर में।

विज्ञापन पर खर्च का हिसाब भी पूछा

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने फंड की कमी का रोना रोने पर भगवंत मान की सरकार से यह भी पूछ लिया कि आखिर वह विज्ञापन पर इस बीच कितना खर्च कर रही है। हाई कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह एक सप्ताह के भीतर अप्रैल, 2024 से जनवरी, 2025 के बीच विज्ञापन पर खर्च पैसे की जानकारी दे।
हाई कोर्ट ने कहा, “राज्य सरकार को अपने मुख्य सचिव के माध्यम से चालू वित्तीय वर्ष में यानी 01 अप्रैल, 2024 से 20 जनवरी, 2025 तक सरकार के काम और उपलब्धियों के बारे में विज्ञापनों के प्रकाशन और पुलिस अधिकारियों के लिए खरीदी गई गाड़ियों पर किए गए खर्च का ब्योरा देने का आदेश दिया जाता है।”

मंत्रियों को दी थी 20 गाड़ियाँ

जहाँ पंजाब सरकार अपराध नियंत्रण के लिए जरूरी फोरेंसिक लैब के लिए पैसे की कमी बता रही है तो वहीं उसने 2024 में ही मंत्रियों को 20 गाड़ियाँ दी हैं। भगवंत मान की सरकार में शामिल 15 में से 10 मंत्रियों को जनवरी, 2024 में 1-1 इनोवा और 1-1 बोलेरो दी थी। यह उनके काफिले में चलेंगी। इनकी कीमत लगभग ₹4 करोड़ बताई गई है।
पंजाब सरकार ने हाल ही में पुलिस के लिए भी 100 से ज्यादा टोयोटा हाईलक्स गाड़ियाँ खरीदी थीं। सरकार ने बताया था कि यह नई फ़ोर्स के लिए हैं। महँगी गाड़ियाँ खरीदने का मामला केवल मंत्रियों और पुलिस तक सीमित नहीं है। दिसम्बर, 2024 में ही यह खबर आई थी कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए नई लैंड क्रूजर गाड़ियाँ खरीदी जानी हैं।
इससे पहले सितम्बर, 2023 में पंजाब सरकार ने 10 सीटों वाले एक हवाई जहाज के लिए टेंडर निकाला था। यह टेंडर तब निकाला गया था जब राज्य सरकार के पास एक हेलिकॉप्टर पहले से है। विरोध के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। यह जानकारी देने वाले RTI एक्टिविस्ट को भी पुलिस ने धमकाया था।