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राहुल की Hit and run पॉलिसी ने मजबूर किया पूर्व जजों-ब्यूरोक्रेट्स समेत 272 हस्तियों को खुला खत लिखने को, कहा- चुनावी जीत नहीं मिली, हो रहा ‘ड्रामा’: चुनाव आयोग को बदनाम कर रहे राहुल गाँधी और वामपंथी NGOs: चुनाव आयुक्तों को क्यों धमकी दी?

                                              प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गाँधी (फोटो: मिंट)
राहुल गाँधी और अब प्रियंका वाड्रा द्वारा चुनाव आयुक्तों को धमकी देकर क्या देश में गुंडागर्दी का माहौल बना चाहते हैं? कांग्रेस में बुद्धिजीवी क्यों खामोश है? बिहार में देख ली कांग्रेस की दुर्गति। क्या परिवार भक्ति में देश को आग में झोंकना चाहती है कांग्रेस? डायन भी दस घर छोड़ देती है लेकिन इतने साल देश पर राज करनी वाली पार्टी ही देश को बर्बाद करने उत्तेजक बयान दे रही है। क्या सत्ता नहीं मिलने की वजह से देश की संवैधानिक संस्थाओं को धमकाओगे? कहाँ है राहुल को जमानत देने वाले जज? अगर कांग्रेस का यही हाल रहा वो दिन भी दूर नहीं होगा जब सुप्रीम कोर्ट तक आग की चिंगारियां पहुंचेंगी। कांग्रेस को ऐसी गन्दी सियासत को छोड़ना होगा नहीं तो देखते हैं कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील राहुल ठोकेगा या प्रियंका? 
यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन राहुल और प्रियंका जिस आग को लगा रहे थे लग गयी और ये जा रही कांग्रेस कार्यालय, राहुल और प्रियंका के बंगलों में और ये वो आग जिसे कोई फायर ब्रिगेड भी बुझा पाएगी। क्योकि इस आग को लगा रहा समाज का बुद्धिजीवी वर्ग।    
अभी भी समय है कांग्रेस संभल जाए। अभी तो 272 पूर्व जजों-ब्यूरोक्रेट्स ने जेताया है, सुप्रीम कोर्ट को इसका संज्ञान लेना चाहिए। अगर भड़काऊ भाषा नहीं बदली यही लिस्ट हज़ारों में, लाखों में और बहुत जल्दी करोड़ों में पहुँच जाएगी। इस संकेत को समझे कांग्रेस। बहुत गंभीर संकेत है। देश की और जनता की असली समस्यों को उठाओ नाकि संवैधानिक संस्थाओं में बैठे अधिकारियों और उनके परिवारों को बलि का बकरा बनाया जाए।         
कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग के खिलाफ की जा रही बयानबाजी को लेकर 272 हस्तियों ने खुला खत लिखा है। इन हस्तियों ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी द्वारा चुनाव आयोग पर बार-बार किए जा रहे हमलों को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की है। इन हस्तियों में 16 जज, 14 राजदूतों सहित 123 सेवानिवृत्त नौकरशाह और 133 सेवानिवृत्त सशस्त्र बल अधिकारी शामिल हैं।

पत्र में क्या कहा गया है?

इसमें कहा गया है, “भारत का लोकतंत्र किसी हथियार से नहीं बल्कि उसकी बुनियादी संस्थाओं के खिलाफ फैल रही जहरीली बयानबाजी से चोट खा रहा है। कुछ राजनीतिक नेता असली नीतियों का विकल्प देने के बजाय, बिना सबूत के गंभीर आरोप लगाते रहते हैं।” पत्र में आगे लिखा है, “पहले उन्होंने भारतीय सेना की बहादुरी पर सवाल उठाए, फिर न्यायपालिका, संसद और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को निशाना बनाया और अब चुनाव आयोग की बारी आ गई है।”

पत्र में राहुल गाँधी पर सीधा हमला करते हुए लिखा गया है, “लोकसभा में विपक्ष के नेता ने बार-बार चुनाव आयोग पर हमला करते हुए दावा किया है कि उनके पास सबूत है कि चुनाव आयोग वोट चोरी करा रहा है और उनकी बात 100% प्रमाणित है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त रिटायर भी हो जाएँ, तो वह उन्हें भी छोड़ेंगे नहीं।” क्या मतलब है इस धमकी का?  

आगे पत्र में कहा गया है, “इतने गंभीर आरोप लगाने के बावजूद उन्होंने अब तक कोई औपचारिक शिकायत, या शपथपत्र के साथ, दर्ज नहीं कराई। जिससे उन्हें अपनी बात के लिए जवाबदेह न होना पड़े।” राहुल और राहुल के सलाहकार अच्छी तरह जानते हैं कि जिस दिन औपचारिक शिकायत, या शपथपत्र के साथ, दर्ज करवा दी और गलत साबित हो गयी कोई कपिल, सिंघवी या फिर प्रशांत जेल जाने से रोक नहीं पाएगा। ये Hit and run पॉलिसी कांग्रेस को पाताल लोक पहुंचा रही है। इस पत्र में कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों, वामपंथी झुकाव वाले NGOs और कई अन्य लोगों की EC के खिलाफ तीखी भाषा को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

पत्र में कहा गया, “चुनाव आयोग ने अपनी SIR प्रक्रिया सार्वजनिक की है, कोर्ट से अनुमति लेकर सत्यापन कराया है, फर्जी नाम हटाए हैं और नए योग्य मतदाता जोड़े हैं। इससे साफ लगता है कि ये आरोप एक राजनीतिक हार को संकट का नाम देने की कोशिश है।”

पत्र में कहा गया है, “यह व्यवहार ‘बौखलाए हुए गुस्से’ की निशानी है जो लगातार चुनावी हार और जनता से दूर हो जाने के कारण पैदा हुआ है। जब नेता जनता की आकांक्षाओं को समझ नहीं पाते, तो वे अपनी कमियों को सुधारने की जगह संस्थाओं पर हमला करना शुरू कर देते हैं। गंभीर विश्लेषण की जगह ड्रामा ले लेता है।”

इसमें आगे लिखा है, “विडंबना यह है कि जब कुछ राज्यों में चुनाव नतीजे विपक्षी दलों के पक्ष में आते हैं, तब चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं उठता। जहाँ नतीजे उनके पक्ष में नहीं आते, वहीं आयोग हर कहानी का खलनायक बन जाता है। इस तरह का गुस्सा केवल अवसरवाद दिखाता है।”

पत्र में लोगों से चुनाव आयोग के साथ खड़ा होने को कहा गया है। इसमें लिखा है, “अब समय है कि देश के लोग चुनाव आयोग के साथ मजबूती से खड़े हों चापलूसी के लिए नहीं बल्कि विश्वास और सिद्धांत के कारण। समाज को यह माँग उठानी चाहिए कि नेता बेबुनियाद आलोचनाओं और नाटकीय भाषणबाजी से इस संस्था को बदनाम न करें।”

इसमें कहा गया है, “एक बड़ा सवाल यह भी है कि देश की मतदाता सूची में कौन होना चाहिए। नकली वोटर, फर्जी लोग, गैर-नागरिक या वे जिनका भारत के भविष्य से कोई वैध संबंध नहीं उन्हें सरकार चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनावों में शामिल होने देना देश की संप्रभुता और स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है। दुनिया के बड़े लोकतंत्र भी अवैध प्रवासियों के मामले में बहुत सख्त होते हैं।”

पत्र लिखने वाले लोगों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और NGT के चैयरमेन आर्दश कुमार गोयल, संजीव त्रिपाठी पूर्व RAW प्रमुख और NIA के पूर्व डायरेक्टर योगेश चंदेर मोदी जैसे लोग भी शामिल हैं।

‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने के लिए जिस बबीता को लेकर आए राहुल गाँधी, ऑपइंडिया की पड़ताल में उससे जुड़े दावे निकले झूठे: 2 जगह वोटर, काटने के लिए खुद दिया आवेदन

                                  राहुल गाँधी का हाईड्रोजन बम फुस्स (फोटो साभार: ऑपइंडिया टीवी)
(जिस तरह पाकिस्तान परमाणु की धमकी देकर भारत को डराता रहता था और पिछली युपीए सरकार देश को डराती रहती थी। लेकिन 2014 में मोदी सरकार बनने पर पाव-पाव के परमाणु बन गए, वो भी Operation Sindoor में फुस हो गए। ठीक उसी तरह राहुल गाँधी का हर बम फुस हो रहे हैं। लगता है कोई सिरफिरा बमों को बना रहा है। )    

राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग के खिलाफ ‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने की बात कही थी। राहुल ने कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र में वोटर लिस्ट से लोगों नाम कटने के गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने एक महिला वोटर बबीता का नाम लिया और दावा किया कि उसका नाम गलत तरीके से हटा दिया गया। लेकिन चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए खंडन किया है। ऑपइंडिया ने इस मामले की तहकीकात की, जिसमें राहुल गाँधी के दावों की हवा निकलती दिख रही है।

राहुल गाँधी ने बबीता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का दावा किया था लेकिन उस बबीता का नाम वोटर लिस्ट में अभी भी मौजूद है। आलंद विधानसभा सीट के सरसंबा बूथ पर बबीता चौधरी का नाम हमें वोटर लिस्ट में मिला।

BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर ने OpIndia को फोन पर बताया कि बबीता का नाम दो जगह दर्ज है – एक कर्नाटक के गुलबर्ग में और दूसरी आलंद में। गुलबर्ग वाले पते पर जाँच की गई तो पता चला कि बबीता ने खुद ही नाम कटवाने का फॉर्म भरा था।

चुनाव आयोग ने साफ कहा कि ऑनलाइन किसी का वोट हटाना नामुमकिन है। हर वोटर को नाम हटाने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाता है। 2023 में आलंद में वोट कटाने की कुछ कोशिशें हुईं थीं, लेकिन वो असफल रहीं। आयोग ने खुद ही इस पर FIR दर्ज कराई और जाँच चल रही है।

आयोग ने करीब 5700 नंबर्स का डेटा कर्नाटक CID को दे दिया था। इनमें से 9 नंबर्स ट्रेस हो चुके हैं, जो महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं।

राहुल गाँधी ने 2022 में 6000 वोट कटने का दावा किया, लेकिन हकीकत ये है कि 2018 में उसी सीट पर BJP सिर्फ 700 वोटों से जीती थी। 2023 में कॉन्ग्रेस 9000 वोटों से धमाकेदार जीत हासिल की। अगर राहुल का दावा सही होता तो कॉन्ग्रेस को 6700 वोटों से हारना पड़ता, लेकिन 30 साल बाद वो सीट जीत ली। ये आँकड़े ही राहुल के दावों की हवा निकाल देते हैं।

वोट लिस्ट से कैसे कटता है नाम?

फॉर्म 7 के माध्यम से किसी का नाम हटाने की अपील की जाती है। बाकायदा फॉर्म में जानकारी भरी होती है। उसकी जाँच आखिर में बीएलओ के पास जाती है। जिसमें बीएलओ इसकी जाँच करता है। इसके बाद एसडीओ के पास मामला जाएगा। इसकी सुनवाई होगी। दस्तावेज जमा किए जाएँगे, इसकी जाँच की जाएगी। व्यक्ति से कारण पूछा जाएगा, इसके बाद नाम काटा जाएगा।

राहुल गाँधी ने जो फॉर्म दिखाए, उसमें बीएलओ का हिस्सा ही नहीं है। बीएलओ की जाँच के बाद ही मामला एसडीओ के पास जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी ने सिर्फ फॉर्म भरे हुए ही दिखाए, एक्शन क्या हुआ, ये बताया ही नहीं।

चूँकि चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि 2023 में आलंद में 6,018 फॉर्म-7 आवेदनों में से सिर्फ 24 वैध थे, बाकी 5,994 फर्जी थे। इनकी जाँच के बाद फरवरी 2023 में ही FIR दर्ज हुई और 6 सितंबर 2023 को कलबुर्गी पुलिस को ऑब्जेक्टर का नाम, मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस और फॉर्म डिटेल्स सौंप दी गईं।

इस मामले को वीडियो के इस जरिए समझ सकते हैं।

आयोग ने ये भी कहा कि चुनाव नतीजों पर आपत्ति हो तो 45 दिनों में हाईकोर्ट में याचिका डाल सकते हैं, लेकिन किसी विपक्षी नेता ने ऐसा नहीं किया। कॉन्ग्रेस ने ज्यादातर मामलों में औपचारिक शिकायत तक नहीं की। ये सब राजनीतिक रणनीति लगती है, जिसका मकसद लोगों को भड़काना और आयोग पर दबाव डालना है।

राहुल ऐसे लोगों को आगे ला रहे हैं जिनके नाम कटाने की कोशिश हुई, लेकिन नाम नहीं कटा। इससे साफ है कि ये अर्धसत्य हैं, पूरी सच्चाई नहीं। आयोग हर बार तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ जवाब दे रहा है। 18 पत्र लिखे गए, 18 महीने बीत चुके, लेकिन कॉन्ग्रेस चुप। कुल मिलाकर राहुल का ‘हाइड्रोजन बॉम्ब’ दावा फुस्स साबित हो गया।(साभार) 

कांग्रेस ही कर रही असली ‘वोट चोरी’: पहले पवन खेड़ा, अब पत्नी कोटा नीलिमा के मिले दो वोटर कार्ड

                            पवन खेड़ा और उनकी पत्नी कोटा नीलिमा की तस्वीर (साभार : moneycontrol)
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा पर दो वोटर आईडी रखने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अब उनकी पत्नी को लेकर भी ऐसा ही आरोप सामने आया है। पवन खेड़ा को चुनाव आयोग ने नोटिस भी भेजा था। पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा के पास भी दो वोटर ID हैं, एक तेलंगाना की खैरताबाद सीट से और दूसरी काका नगर नई दिल्ली सीट से।
सोनिया जी पर अपराधिक मामला दिल्ली में दर्ज हुआ है जिसकी सुनवाई 10 सितंबर को है..मामला है कि जब नागरिकता 1983 में ली तो 1980 में वोटर लिस्ट में नाम किन दस्तावेजों के आधार पर पंजीकृत करवाया..भारतीय संविधान में किसी भी गैर भारतीय नागरिक को वोटर लिस्ट में नामांकन का अधिकार ही नहीं तो फिर मताधिकार का प्रश्न ही नहीं है....

यह आरोप बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सार्वजनिक किया है। उनका कहना है कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी दूसरों पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके करीबी सहयोगी खुद इस गड़बड़ी में लिप्त हैं।

पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा पर भी दो वोटर ID

बीजेपी का आरोप है कि कोटा नीलिमा के नाम से भी दो एक्टिव वोटर ID हैं। एक ID तेलंगाना के खैरताबाद विधानसभा क्षेत्र में है। यह ID उनके चुनावी हलफनामे में भी दर्ज है।

लेकिन दूसरा EPIC नंबर दिल्ली की काका नगर नई दिल्ली विधानसभा में भी एक्टिव है। यहीं पवन खेड़ा का नाम भी दर्ज है। यानी दोनों पति-पत्नी के नाम दो-दो जगहों पर वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।

बीजेपी नेता अमित मालवीय का कहना है कि यह अकेला मामला नहीं है। उन्होंने इसे कॉन्ग्रेस की ‘वोट बैंक’ राजनीति का हिस्सा बताया है।

पवन खेड़ा पर दो वोटर ID

पवन खेड़ा का नाम दिल्ली की दो विधानसभा सीटों ‘जंगपुरा और काका नगर नई दिल्ली’ की वोटर लिस्ट में पाया गया। दोनों जगहों पर उनके नाम से अलग-अलग EPIC नंबर एक्टिव हैं।

इस आधार पर चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा। आयोग ने कहा है कि एक व्यक्ति दो जगहों पर वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सकता। इसलिए पवन खेड़ा से 8 सितंबर 2025 तक जवाब माँगा गया है।

वहीं, पवन खेड़ा का कहना है कि उन्होंने 2016 में एक जगह से नाम हटाने के लिए आवेदन किया था। लेकिन चुनाव आयोग ने उसे समय पर हटाया नहीं। उन्होंने जाँच की माँग की है और कहा है कि अगर उन्होंने दो बार वोट डाला है तो CCTV फुटेज पेश किया जाए।

मामले पर बीजेपी का रुख

बीजेपी ने इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस के ‘दोहरे रवैये’ से जोड़ा है। बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस पार्टी खुद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाती है, लेकिन उसके अपने नेता ऐसे कृत्यों में शामिल हैं। बीजेपी ने राहुल गाँधी से सवाल किया है कि वे अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ लगे इन आरोपों पर क्यों चुप हैं।

दिल्ली : राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ पाखंडी राजनीति की खुल गई पोल; कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा के पास मिले 2 एक्टिव वोटर ID: मतदाता सूची में मृत सदस्य का भी नाम

           पवन खेड़ा के दो वोटर आईडी ने वोट चोरी के मुद्दे पर कांग्रेसी पाखंड की खोली पोल। (साभार: Dall-E)
कांग्रेस पार्टी के सांसद राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की बातें उनकी पार्टी के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गईं। बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने 2 सितंबर 2025 को खुलासा किया कि कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा के पास दो एक्टिव EPIC नंबर हैं। एक निजामुद्दीन ईस्ट में जंगपुरा विधानसभा क्षेत्र में और दूसरा नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के काका नगर में।

खेड़ा के नाम पर दो एक्टिव EPIC नंबर

मालवीय द्वारा साझा की गई जानकारी सार्वजनिक है। OpIndia ने इन जानकारियों को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मिलान किया है, जिसमें ये दावा सच पाया गया है। वोटर लिस्ट के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि खेड़ा का नाम जंगपुरा में EPIC नंबर XHC1992338 के साथ दर्ज है।

                                                                                                       Source: Amit Malviya/ECI

पवन खेड़ा का नाम न सिर्फ जंगपुरा में है, बल्कि नई दिल्ली में EPIC नंबर SJE0755967 के साथ भी है। वोटर लिस्ट में एंट्री अभी भी एक्टिव हैं।

                                                                                                           Source: Amit Malviya/ECI

खेड़ा का वोटर लिस्ट में डुप्लिकेट नाम होना एक गंभीर सवाल उठाता है कि चुनाव आयोग को इसकी जाँच करनी चाहिए कि उनके पास दो एक्टिव वोटर आईडी कैसे हैं। इसके अलावा मालवीय ने अपने पोस्ट में कहा कि अधिकारी इस बात की जाँच कर रहे हैं कि क्या खेड़ा ने कभी एक से ज्यादा बार वोट डाला है।

मृत परिवार के सदस्य का नाम अभी भी वोटर लिस्ट में

उसी पते पर अन्य वोटरों की जाँच करने पर OpIndia को पता चला कि रूपम खेड़ा का नाम अभी भी वोटर लिस्ट में एक्टिव है। खास बात ये है कि रूपम का निधन 2021 में कोविड-19 की वजह से हो गया था।

Source: Amit Malviya/ECI

इसके अलावा एक व्यक्ति श्रावण कुमार प्रजापत का नाम दोनों वोटर लिस्ट में दिखा। दिलचस्प बात ये है कि जंगपुरा क्षेत्र से खेड़ा की पत्नी का नाम लिस्ट से हटा दिया गया है।

                                                                                                     Source: Amit Malviya/ECI

कांग्रेस नेताओं के बार-बार ‘वोट चोरी’ के दावों के बावजूद, उनके अपने मृत परिवार के सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे बेसिक काम भी नजरअंदाज किए गए हैं।

पाखंडी राजनीति की खुल गई पोल

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा दूसरों को चुनावी ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं और जब किसी का नाम अलग-अलग जगहों पर चार बार वोटर लिस्ट में दिखा तो हंगामा मचाया। बाद में वह व्यक्ति कैमरे पर आया और साफ किया कि उसने पहले जहाँ रहता था, वहाँ से नाम हटाने की अर्जी दी थी, लेकिन वोटर लिस्ट अपडेट नहीं हुई।

इसमें विडंबना ये है कि उनके अपने रिकॉर्ड ही गड़बड़ियों से भरे हैं। मालवीय ने ये भी बताया कि सोनिया गाँधी का नाम भारत की वोटर लिस्ट में तब दर्ज था, जब वो भारत की नागरिक भी नहीं बनी थीं। उन्होंने ये भी कहा कि राहुल गाँधी ने बेंगलुरु के महादेवपुरा में चुनावी गड़बड़ी के अपने आरोपों के बारे में कोई औपचारिक शपथपत्र शिकायत नहीं दी है और सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में गड़बड़ी के आरोप वाले केस को पहले ही खारिज कर दिया है।

इससे पहले, पवन खेड़ा ने CSDS-Lokniti के संजय कुमार के X पर एक पोस्ट के आधार पर डेटा शेयर किया था, जिसमें महाराष्ट्र में वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का दावा था। हालाँकि बाद में संजय कुमार ने वो पोस्ट डिलीट कर दी और कहा कि उनकी टीम ने टेबल्स को ‘गलत पढ़ा’। राहुल गाँधी और अन्य नेताओं के चुनाव आयोग के खिलाफ किए गए हर दावे पिछले कुछ महीनों में खोखले साबित हुए हैं।

कांग्रेस ने बिहार में SIR से जुड़ी 89 लाख शिकायतें देने का किया दावा: पूर्वी चंपारण-सुपौल DM ने बताया बेबुनियाद, कहा- न कोई शपथ पत्र, न आरोपों का प्रमाण मिला

पवन खेड़ा (बाएँ), चुनाव आयोग (बीच में), राहुल गाँधी (दाएँ), (साभार : lawandotherthings, bhaskarassets & tribuneindia)
बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान करीब 65 लाख नामों के हटाए जाने पर कांग्रेस ने दावा किया कि उसने चुनाव आयोग को 89 लाख शिकायतें दी हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि एक भी फॉर्म आधिकारिक रूप से जमा नहीं कराया गया है।

इसके अलावा चुनाव आयोग ने कहा कि राहुल गाँधी ने ना तो कोई शपथ पत्र दिया और ना ही अपने आरोपों का प्रमाण। ऐसे में बार-बार चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर खुद की ही फजीहत कराने में अब कांग्रेस को काफी मजा आ रहा है।

फर्जी आँकड़ों का दावा, बिना प्रक्रिया अपनाए

कॉन्ग्रेस ने जब यह कहा कि उसने 89 लाख शिकायतें दर्ज करवाई हैं, तो यह सुनकर सभी चौंक गए। पार्टी के नेता पवन खेड़ा और राजेश राम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस दावे को पूरे आत्मविश्वास से रखा। उन्होंने कहा कि पार्टी के पास शिकायतों की रसीदें भी मौजूद हैं और यह सब चुनाव आयोग को सौंपा गया है।

पवन खेड़ा ने अपने बयान में कहा कि 20,000 से अधिक बूथों पर 100 से ज्यादा नाम काटे गए। कई बूथों पर महिलाओं के नाम 70 फीसदी तक हटाए गए। पवन खेड़ा ने इसे एक ‘पैटर्न‘ बताया। पवन खेड़ा ने यह भी कहा कि BLOs के जरिए आवेदन इकट्ठा कर DEO को सौंपे गए हैं।

पूर्वी चंपारण और सुपौल DM ने दावों को झूठलाया

लेकिन अगले ही दिन पूर्वी चंपारण के DM ने खुद कांग्रेस के पोस्ट पर जवाब देते हुए बताया कि बिहार में 1 अगस्त 2025 को जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित हुई, उस पर कांग्रेस की ओर से न तो फॉर्म 6 (नाम जोड़ने के लिए) और न ही फॉर्म 7 (नाम हटाने पर आपत्ति) में कोई आवेदन जमा हुआ है।

इसके अलावा कांग्रेस के इसी पोस्ट पर सुपौल के DM ने भी जवाब में कहा कि अब तक बिहार में कांग्रेस पार्टी के किसी भी जिला अध्यक्ष द्वारा अधिकृत किसी बूथ लेवल एजेंट (BLA) ने 1 अगस्त 2025 को जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में किसी भी नाम को लेकर ना तो नाम जोड़ने का फॉर्म (फॉर्म 6) भरा है और न ही किसी नाम पर आपत्ति (फॉर्म 7) दर्ज कराई है और ये सब तय फॉर्मेट में होना चाहिए था।

ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि 89 लाख शिकायतों का यह आँकड़ा आखिर आया कहाँ से? और अगर वाकई शिकायतें थीं तो वो किसको दी गईं, और कैसे दी गईं?

राहुल गाँधी का आरोप भी खोखला, आयोग को नहीं मिला कोई शपथ पत्र

कांग्रेस के इस दावे की अगुवाई राहुल गाँधी खुद कर रहे थे। राहुल गाँधी ने दावा किया कि बड़े पैमाने पर विपक्षी मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और यह लोकतंत्र की हत्या है। लेकिन जब चुनाव आयोग ने उनसे शपथ पत्र और प्रमाण माँगा, तो राहुल गाँधी चुप हो गए।

निर्वाचन आयोग ने खुद कहा है कि राहुल गाँधी की तरफ से कोई शपथ पत्र नहीं दिया गया। ना तो कोई आधिकारिक दस्तावेज, ना डेटा और न ही किसी तरह का ठोस प्रमाण। यानी जो भी बातें राहुल मंच से बोलते रहे, वो सिर्फ भाषण तक सीमित रहीं। कानूनन ना तो कोई कार्रवाई की गई और न ही किसी स्तर पर कांग्रेस ने प्रक्रिया का पालन किया।

शिकायतें तो छोड़िए, अनुमति भी नहीं माँगी राहुल ने

एक और फजीहत तब हुई जब यह खबर चली कि राहुल गाँधी को पटना के गाँधी मैदान में रुकने की अनुमति नहीं दी गई। कांग्रेस ने इसे लेकर भी प्रशासन पर सवाल उठाए। लेकिन जब पटना जिला प्रशासन ने स्पष्टीकरण जारी किया, तो कांग्रेस का यह आरोप भी झूठा निकला।

प्रशासन ने साफ किया कि न राहुल गाँधी और न ही कांग्रेस की ओर से रात रुकने की कोई अनुमति माँगी गई थी। जो दो अनुमतियाँ माँगी गई थीं, वो सभा और रैली के लिए थी, जो दे दी गई थी।

‘सोरोस फंडेड गुलाम पत्रकारों’ ने बिहार की वोटर लिस्ट पर फैला रहे जहर, 67826 नाम दोहराए जाने का दावा: चुनाव आयोग ने खोली पोल

कहते है बल्कि कटु सत्य भी कि भारत 1947 में आज़ाद हुआ था, लेकिन कुछ लोग 1947 से पहले की गुलामी में आज सत्तर दशक से अधिक के बाद भी उसी गुलामी की मानसिकता में जी कर दूसरों को भी गुमराह कर देश का माहौल ख़राब करने में लगे हैं। ऐसा शक होता है कि इनके DNA में ही कुछ गड़बड़ है। जिसकी जाँच जरुरी है।   
बिहार में वोटर लिस्ट को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य में 67,826 डुप्लिकेट वोटर हैं, जिससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि, बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने इस रिपोर्ट को गलत और भ्रामक बताया है। उन्होंने साफ किया है कि अभी जारी की गई लिस्ट केवल एक ड्राफ्ट है, फाइनल नहीं। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट में अगर कोई गलती है तो उसे बाद में सुधारा जाएगा। इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने वाले समूह पर विदेशी फंडिंग से जुड़े होने का भी आरोप लगा है।

रिपोर्ट में क्या दावें किए गए

दरअसल, कुछ पत्रकारों की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 15 विधानसभा क्षेत्रों में 67,826 ऐसे नाम मिले हैं जो दो बार दर्ज हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये नाम एक जैसे दस्तावेजों के साथ रजिस्टर्ड हैं। इससे मतदाता सूची की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं।

रिपोर्ट का दावा है कि यह जानकारी डेटा माइनिंग से निकाली गई है। इसमें कहा गया है कि 2025 के वोटर लिस्ट सुधार अभियान के दौरान जारी की गई लिस्ट में कई नाम दोहराए गए हैं। इस पर अब चुनाव आयोग ने जवाब दिया है।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि ये आरोप गलत और भ्रम फैलाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वो आखिरी नहीं है। यह सिर्फ जाँच के लिए है। अभी भी कोई गलती हो तो लोग उस पर दावा या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने सोशल मीडिया X (पहले ट्विटर) पर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो रिपोर्ट आई है, उसमें सच्चाई पूरी नहीं बताई गई है। रिपोर्ट में उस प्रक्रिया की अनदेखी की गई है जिससे वोटर लिस्ट को ठीक किया जाता है। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। इसे बाद में सही करके ही फाइनल लिस्ट बनाई जाती है।

ये केवल ड्राफ्ट, फाइनल लिस्ट नहीं

मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) ने एक रिपोर्ट पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, वो अधूरी हैं। SIR अभी खत्म नहीं हुआ है। जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। ये फाइनल नहीं है।

सीईओ ने साफ किया कि यह लिस्ट लोगों की जाँच के लिए जारी की गई है। इसमें लोग अपना नाम देख सकते हैं। अगर कोई गलती है, तो वे दावा या आपत्ति कर सकते हैं। राजनीतिक दल और बाकी लोग भी सुझाव दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर इस लिस्ट में कोई नाम दो बार है तो उसे अभी गलती या गड़बड़ी नहीं माना जा सकता। नियमों के मुताबिक लोगों को अपनी बात रखने का मौका दिया जाता है। उसके बाद ही लिस्ट को ठीक कर फाइनल किया जाएगा।

पत्रकारों की रिपोर्ट को बताया गलत, कहा- डुप्लीकेट मतदाता नहीं

चुनाव अधिकारी (CEO) ने रिपोर्ट में बताए गए 67,826 नकली वोटरों के दावे को गलत बताया। उन्होंने कहा कि यह दावा कुछ समान जानकारियों पर ही बना है। जैसे नाम, उम्र और रिश्तेदारों का नाम। इन बातों से यह साबित नहीं होता कि वोटर फर्जी हैं।

CEO ने कहा कि बिहार के गाँवों में बहुत से लोगों के नाम और उम्र एक जैसे होते हैं। माता या पिता के नाम भी मिलते-जुलते होते हैं। यह आम बात है। ऐसा होना कोई गड़बड़ी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि सिर्फ नाम और उम्र एक जैसे होने से दोहराव साबित नहीं होता।

उन्होंने कहा कि ऐसी समान जानकारी वाली एंट्रीज को जाँच के दौरान पहचाना जाता है। अगर कोई गलती होती है, तो उसे ठीक भी किया जाता है। किसी को भी अगर शक है, तो वह चुनाव अधिकारी के पास आपत्ति दर्ज करा सकता है। यह अधिकार हर वोटर और पार्टी को है।

चुनाव आयोग ने बताया, कैसे हटते हैं डुप्लीकेट नाम

CEO ने यह साफ किया कि डुप्लिकेट वोटरों की जाँच नहीं होती, यह बात पूरी तरह गलत है। उन्होंने बताया कि भारत का चुनाव आयोग इसके लिए एक खास तकनीक इस्तेमाल करता है। ECI का एक ईआरओनेट 2.0 सॉफ्टवेयर है। यह सॉफ्टवेयर एक जैसे नाम, उम्र या रिश्तेदारों के नाम वाले वोटरों की पहचान करता है। इन्हें ‘समान प्रविष्टियाँ’ या DSE कहा जाता है।

लेकिन यह सिस्टम ऐसे नामों को सीधे हटाता नहीं है। पहले इनकी पूरी जाँच की जाती है। बूथ लेवल अफसर और चुनाव अधिकारी खुद जाकर देखते हैं कि यह डुप्लिकेट है या नहीं। यह तरीका इसलिए अपनाया जाता है ताकि गलती से किसी असली वोटर का नाम न हट जाए। यानी मशीन की बजाय इंसान ही आखिरी फैसला करते हैं।

वाल्मीकिनगर की बात करते हुए CEO ने कहा कि वहाँ जिन 5,000 वोटरों को नकली बताया गया है, उस पर सबूत के साथ रिपोर्ट होनी चाहिए। बिना जानकारी और बिना जाँच के कोई भी संख्या बता देना सही नहीं है।

डुप्लीकेट मतदाताओं के उदाहरण

रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि त्रिवेणीगंज की ‘अंजलि कुमारी’ और लौकहा के ‘अंकित कुमार’ जैसे नामों के दोहराव मिले हैं। इसे दिखाकर कहा गया कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है।

इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले इक्का-दुक्का हैं। ये गलतियाँ लिखते समय हो सकती हैं। कभी-कभी लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो दो बार नाम जुड़ जाता है। कई बार घर पर गलत जानकारी दे दी जाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि सुधार का काम पहले से ही शुरू हो गया है। अंजलि कुमारी और अंकित कुमार दोनों के लिए फॉर्म-8 भर दिया गया है। इसका मतलब है कि गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया पहले से जारी है।

पत्रकारों के आरोप पर चुनाव आयोग का जवाब

कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट के डेटा को जानबूझकर लॉक कर दिया गया है। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि मशीन से जाँच न हो सके। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है।

मतदाता सूची को एक तय फॉर्मेट में दिया जाता है। ऐसा कानून के मुताबिक किया जाता है ताकि डेटा की सुरक्षा बनी रहे और उसका गलत इस्तेमाल न हो। उन्होंने साफ किया कि डेटा को लॉक करना एक सुरक्षा तरीका है। इसका मकसद दोहराव छुपाना नहीं है।

सीईओ ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया। कमलनाथ बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2018) केस में अदालत ने भी इन सुरक्षा तरीकों को सही माना था।

अनुमान पर आपत्ति

कुछ लोगों ने कहा था कि 15 इलाकों में पाए गए दोहराव पूरे राज्य में हो सकते हैं। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सुझाव का कड़ा विरोध किया। सीईओ ने इसे गलत बताया। उनका कहना था कि इतने बड़े स्तर पर डुप्लिकेट होने का विचार बस कल्पना है।

उन्होंने कहा कि कानून के हिसाब से ऐसे आरोपों को सही साबित करने के लिए ठोस सबूत होना जरूरी है। सिर्फ आँकड़ों या अनुमान से ऐसे बड़े आरोप नहीं लगाए जा सकते। सीईओ ने बताया कि अदालतें भी बार-बार कह चुकी हैं कि बिना प्रमाण के आरोप स्वीकार नहीं किए जाएँगे।

कानूनी उपाय मौजूद

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि कानून में पहले से ही डुप्लिकेट नाम हटाने के लिए कड़े नियम हैं। उन्होंने बताया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 के तहत, अगर कोई पक्का सबूत मिलता है, तो निर्वाचन अधिकारी डुप्लिकेट नाम हटाने का अधिकार रखते हैं। इसलिए दोहराव से निपटने का एक मजबूत कानून पहले से मौजूद है।

उन्होंने ट्विटर पर भी बताया कि अगर किसी मतदाता या बूथ के एजेंट को कोई डुप्लिकेट नाम दिखे तो वे मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13 के अनुसार आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। इस तरह हर कोई शिकायत कर सकता है और मामले की जाँच हो सकती है।

खंडन और निष्कर्ष

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने खंडन खत्म करते हुए कहा कि ड्राफ्ट रोल में कुछ डुप्लिकेट नाम होना सामान्य है। यह प्रक्रिया को गलत या अमान्य नहीं करता। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट का यह कहना कि SIR से धोखाधड़ी बढ़ेगी या डुप्लिकेट वोटिंग होगी, गलत है। यह सिर्फ अटकलें हैं और समय से पहले बनी राय है। मतदाता सूची के नियम और कानून ऐसा होने नहीं देते।

विदेशी फंडिंग और संदिग्ध रिपोर्ट

रिपोर्टर्स कलेक्टिव के पीछे जो संगठन काम कर रहे हैं, उन्हें समझना बहुत जरूरी है। इसका संचालन एक NGO करता है, जिसका नाम ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया‘ है। यह संस्था सरकार से एफसीआरए लाइसेंस लेकर विदेशी चंदा ले सकती है।

इस फाउंडेशन को पैसा देने वालों में कुछ बड़े और विदेशी नाम शामिल हैं। जैसे– फोर्ड फाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, और रॉकफेलर फाउंडेशन। ये सभी संगठन ऐसे नेटवर्क से जुड़े माने जाते हैं जिन्हें अमेरिका की छुपी हुई ताकत या ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है।

इन संगठनों पर पहले भी आरोप लगे हैं कि इन्होंने भारत के खिलाफ कई अभियान चलाए हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव को भी इन्हीं ताकतों का हिस्सा माना जा रहा है। दिसंबर 2024 में इस ग्रुप ने जो रिपोर्टें छापीं, वे कई मामलों में झूठी और भ्रामक पाई गईं। कहा जा रहा है कि ये रिपोर्टें जॉर्ज सोरोस के एजेंडे के मुताबिक थीं। इनका मकसद लोगों की सोच को गलत दिशा में मोड़ना और देश के अंदर गलतफहमी फैलाना था।

"मोदी चोर" कहने वाले राहुल और उसके गुलामों एक नज़र इधर भी ; गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है… जब बच्ची के चुटकुला सुनाने पर फायर हुआ AIR का पूरा स्टाफ: राहुल गाँधी याद करें 37 साल पुरानी घटना

                                   राहुल गाँधी, राजीव गाँधी (फोटो साभार: NDTV/Punekar News)
आज राहुल गाँधी और इसके गुलाम खूब "मोदी चोर" का शोर मचा कर जनता को पागल बना रहे हैं, विशेषकर युवा पीढ़ी को। राहुल, कांग्रेस और इसके गुलामों को 37 साल पुरानी घटना याद कर मोदी और मोदी सरकार के पैर धो-धोकर पीने चाहिए कि इन भटके नेताओं और उनकी पार्टियों पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही।       

साल 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला कैंपेन फेल होने के बाद राहुल गाँधी ने अब केंद्र सरकार पर नए इल्ज़ाम लगाने शुरू किए हैं। वो चाहते हैं कि किसी भी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी छिन जाए और वो सत्ता पर काबिज हो जाए। इसके लिए वो लगातार ऊल-जलूल आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर भी रहे हैं, मगर अफसोस, हर बार वो मुँह के बल गिरते दिखते हैं।

सत्ता पाने की बौखलाहट में राहुल गाँधी न सिर्फ बिहार एसआईआर को लेकर फर्जी दावे करते दिखे और बल्कि उन्होंने फर्जी आँकड़ों के साथ प्रेस-कॉन्फ्रेंस भी कर डाली। हालाँकि जब आँकड़ों की सच्चाई दुनिया के सामने आ गई, तो उनका मुँह नहीं खुला, और न ही माफी माँगी.. बल्कि उस शर्मिंदगी को पीछे छोड़ने की कोशिश में एक और हरकत कर डाली। कभी ‘चौकीदार…’ वाले नारे पर मुँह की खाने के बाद अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर वो लोगों को भड़का रहे हैं।

इसी कड़ी में कांग्रेस की अगुवाई वाला पूरा INDI गठबंधन अब ‘वोट चोरी’ वाला कैंपेन चला रहा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग, मोदी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है और बीजेपी के फायदे के लिए आम लोगों के वोटिंग के हक को छीनने की साजिश रच रहा है।

INDI महागठबंधन भी बिहार में होने वाले चुनावों से पहले चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मुहिम से नाराज़ है। इस मुहिम में 65 लाख फर्जी वोटरों को हटाया गया, जिससे वोटिंग की प्रक्रिया साफ-सुथरी होगी। लेकिन विपक्ष का गुस्सा इस बात पर है कि ये फर्जी वोटर उनके INDI गठबंधन के समर्थक थे।

खास बात ये है कि चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से कहा कि वो अपने इल्ज़ामों के सबूत के साथ हलफनामा दें या फिर सार्वजनिक माफी माँगें। लेकिन राहुल ने कहा, “मैं एक नेता हूँ, जो मैं लोगों से कहता हूँ, वही मेरा वचन है। मैंने ये बात सबके सामने कही, इसे कसम मान लो। खास बात ये है कि उन्होंने मेरी बात का खंडन नहीं किया।” गौरतलब यह है कि इमरजेंसी के दौर राहुल चाचा संजय गाँधी भी एक बार मुंह से बोल देने पर पूरी सरकार और अधिकारी कानून मान लेते थे। "न लिखत न पढत जो संजय कह वही सही" राहुल और INDI महागठबंधन उसी परिपाटी को चला रहे हैं। ये विपक्ष की वही पुरानी चाल है, जिसमें वो इल्ज़ाम लगाकर भाग जाते हैं।

बच्चों को अपनी राजनीति में घसीट रहे हैं राहुल गाँधी

उम्मीदों के मुताबिक, इस बार भी रायबरेली के सांसद राहुल गाँधी का बनाया हुआ राजनीतिक ड्रामा हकीकत से कोसों दूर है। अब वो कह रहे हैं कि बच्चे भी उन्हें ‘वोट चोरी’ की बात बता रहे हैं।

24 अगस्त को बिहार के अररिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने कहा, “एक बहुत ही मजेदार बात सामने आ रही है, जो मेरी पिछली दो यात्राओं में नहीं थी। बच्चे मेरे पास आ रहे हैं। ये बहुत अजीब बात है। वो कह रहे हैं, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’। ये बड़े लोग नहीं हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं। अब छह साल का एक बच्चा ये बात समझ गया, और सिर्फ एक नहीं, हज़ारों बच्चे। अब चुनाव आयोग को इन बच्चों से जाकर बात करनी चाहिए। उन्हें सब पता चल जाएगा।”

राहुल ने आगे कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले सरकारी कंपनियों को प्राइवेट किया, अब वो चुनाव आयोग की मदद से गरीबों के वोट चुराना चाहती है।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष बिहार में ऐसा नहीं होने देगा। उन्होंने कहा, “संविधान हर नागरिक को बराबर हक देता है। ये एसआईआर संविधान के खिलाफ है। बिहार के लोग विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों को करारा जवाब देंगे।”

जब एक बच्ची ने सचमुच राजीव गाँधी को कहा था चोर

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने बच्चों के नाम पर अपनी झूठी कहानियाँ और गलत मकसद फैलाए हों। 1988 में एक बड़ी घटना हुई थी, जब एक बच्ची ने ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को चोर कहा था।

राहुल गाँधी शायद भूल गए हों कि एक बच्ची ने उनके पिता के लिए कहा था, “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है।” ये बात एक लाइव शो में कही गई थी। मजेदार बात ये है कि ‘फासिस्ट’ कहलाने वाली बीजेपी सरकार ऐसी बातों पर कोई कार्रवाई नहीं करती, लेकिन ‘उदार और लोकतांत्रिक’ राजीव गाँधी और उनकी पार्टी ने उस वक्त इसका जवाब बहुत सख्ती से दिया था।

साल 1988 में “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है” का नारा राजीव सरकार के खिलाफ बहुत मशहूर हो गया था। ये बोफोर्स घोटाले के खुलासे के बाद हुआ था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन पर एक प्रोग्राम हुआ, जिसमें एक छोटी बच्ची से मजाक सुनाने को कहा गया। उसने जवाब में यही नारा बोल दिया। iChowk.in के मुताबिक, इस प्रोग्राम को आयोजित करने वाली ऑल इंडिया रेडियो की टीम को इसकी सजा भुगतनी पड़ी। लेकिन और भी बुरा होना बाकी था।

इस घटना के बाद सागर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया – “कौन सा ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन ‘राजीव गाँधी चोर है’ वाक्य प्रसारित करने के लिए जाना गया?” ये सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड, प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय के लिए बहुत भारी पड़ा। कॉन्ग्रेस ने उन्हें जमकर निशाना बनाया।

यूथ कांग्रेस के लोग पत्रकारिता विभाग में घुस गए और प्रोफेसर को पीटा। उनका मुँह काला किया गया और पूरे कैंपस में घुमाया गया। सागर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रायग दास हजेला ने इस घटना के विरोध में इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, “ये सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं है। देश में राजनीति में गुंडागर्दी को जोड़ने की कोशिश हो रही है।”

यूनिवर्सिटी ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू की और सभी फैकल्टी मेंबर्स ने क्लास का बहिष्कार किया, जब तक कि प्रोफेसर के अपमान के जिम्मेदार लोगों को पकड़ा नहीं गया। पुलिस ने 10 लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफेसर के खिलाफ जाँच शुरू कर दी। उन्हें जवाब देने के लिए बुलाया गया, लेकिन पुलिस ने उन्हें और परेशान किया।

प्रोफेसर कृष्णात्रेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और 504 के तहत गिरफ्तार किया गया। उन पर अशोभनीय व्यवहार, अपमान और शांति भंग करने के इल्ज़ाम लगाए गए। इस कार्रवाई की हर तरफ निंदा हुई। 8 अगस्त को प्रोफेसर ने अपनी सफाई में कहा, “मुझे इस सवाल से जुड़ी समस्याओं की जानकारी नहीं थी। मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। मैंने ये सवाल इसलिए पूछा क्योंकि ये एक बड़ी घटना थी, और मैं उम्मीदवार की सतर्कता और याददाश्त जाँचना चाहता था।”

लेकिन 8 अगस्त की सुबह, जिला यूथ कांग्रेस के प्रमुख राकेश शर्मा की अगुवाई में एक भीड़ वाइस चांसलर के दफ्तर पहुँची और हजेला पर चिल्लाने लगी। वो तुरंत कृष्णात्रेय को हटाने की माँग कर रहे थे। हजेला ने मना कर दिया और कहा, “उनके खिलाफ कोई कार्रवाई जाँच पूरी होने और 17 अगस्त 2025 को यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद में रिपोर्ट पेश होने के बाद ही होगी। मैं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकता क्योंकि कुछ नेता चाहते हैं।”

इस बीच, शर्मा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के गलत काम को खारिज किया और कहा कि प्रोफेसर ने खुद ऐसा किया और तस्वीरें भी खिंचवाईं। दूसरी तरफ कृष्णात्रेय अपने चेहरे पर काला पेंट लिए बिना ही इलाज के बाद घर लौटे। उसी शाम वो टीचर्स यूनियन की मीटिंग में भी उसी हालत में गए। एक और प्रोफेसर ने उनके समर्थन में अपना चेहरा काला किया।

अगले दिन से टीचर्स ने हफ्ते भर तक क्लास का बहिष्कार करने का फैसला किया, जब तक कि जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाता। लेकिन गवर्नर ने यूनिवर्सिटी की कार्यकारी और शैक्षणिक परिषद को भंग कर दिया और सारी ताकत नए वाइस चांसलर एमएल जैन को दे दी। इसके बाद कैंपस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

कांग्रेस जोसेफ गोएबल्स की प्रचार नीति से प्रेरणा ले रही है और बीजेपी पर वही इल्ज़ाम लगा रही है, जो उसकी अपनी भ्रष्टाचार भरी हुकूमत में उस पर लगे थे। बच्चों के नाम पर पीएम मोदी पर हाल का हमला भी उसी का हिस्सा है।

वोटिंग लिस्ट में हेर-फेर करने वाले 4 कर्मचारियों को बचा नहीं पाई ममता सरकार, EC के आदेश के बाद आखिरकार करना पड़ा सस्पेंड: फर्जी तरीके से जोड़े गए थे मतदाता


ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने गुरुवार (20 अगस्त 2025) को वोटर आईडी कार्ड के रजिस्ट्रेशन में गड़बड़ी के आरोप में 4 अधिकारियों को निलंबित कर दिया। इससे पहले चुनाव आयोग (ECI) ने इन दागी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए बीते 13 अगस्त को राज्य सरकार को 7 दिनों की समय सीमा दी थी।

‘न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य सचिव मनोज पंत ने चुनाव आयोग को इस संबंध में रिपोर्ट भेज दी है। हालाँकि, अब तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई है लेकिन अधिकारियों ने विभागीय कार्यवाही करने का आश्वासन दिया है। चुनाव आयोग ने इन अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के भी निर्देश दिए थे।

गौर करने वाली बात यह है कि मनोज पंत ने इससे पहले इन दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को रोकने की कोशिश थी। उनका तर्क था कि ऐसी कार्रवाई न केवल दोषी व्यक्तियों पर बल्कि चुनावी जिम्मेदारियों और अन्य प्रशासनिक कामकाज में लगे अधिकारियों की पूरी टीम के मनोबल पर भी असर डाल सकती है।

फर्जी मतदाता मामले में कार्रवाई का आदेश

इस महीने की शुरुआत में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल में चार चुनाव अधिकारियों को निलंबित कर दिया था। इन पर आरोप था कि उन्होंने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर फर्जी मतदाता आवेदनों को पंजीकृत करने की अनुमति दी।

पश्चिम बंगाल चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के अपडेट के लिए फॉर्म-6 की सैंपल जाँच के दौरान यह गड़बड़ी सामने आई। जिन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई उनमें दो निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) देबोत्तम दत्ता चौधरी और बिप्लब सरकार और दो सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (AERO) तथागत मंडल और सुदीप्त दास शामिल हैं। इन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया था।

इसके अलावा, चुनाव आयोग ने अस्थाई डेटा एंट्री ऑपरेटर सुरोजित हलधर के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया। आयोग ने कहा कि इन अधिकारियों की हरकतें आपराधिक कदाचार के बराबर हैं।

ECI ने बिना देरी किए इनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए और प्राथमिकी दर्ज करने को भी कहा। साथ ही, राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि फर्जी मतदाताओं को सूची में जोड़ने के मामले में दोषी अधिकारियों पर 7 दिन के भीतर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

नीचता पर उतरी कांग्रेस : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी के भी पीछे पड़ा कांग्रेसी इकोसिस्टम, राहुल गाँधी से ‘वोट चोरी’ पर माँगा था हलफनामा

                                      सीईसी ज्ञानेश कुमार (बाएँ), राहुल गाँधी (साभार: India Today/ET)
राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ वाले प्रोपेगेंडा की पोल खोलने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अब 
कांग्रेस इकोसिस्टम टारगेट कर रहा है। यहाँ तक की उनके परिवार को भी सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है। ज्ञानेश कुमार की दोनों बेटी मेधा रूपम और अभिश्री को भी इसका हिस्सा बनाया गया।

सोशल मीडिया पर कांग्रेस इकोसिस्टम ने ज्ञानेश कुमार के परिवार को बीजेपी का परिवार करार दिया। कांग्रेसियों ने सोशल मीडिया पर एक क्रम से ज्ञानेश कुमार के परिवार पर पोस्ट डालने चालू किए। हर पोस्ट में ज्ञानेश कुमार के परिवार का डाटा निकालकर ट्रोल किया गया।

पोस्ट में बताया गया कि ज्ञानेश कुमार की पहली बेटी मेधा रूपम, जो नोएडा की डीएम हैं और उनके पति मनीष बंसल सहारनपुर के डीएम हैं। इसके बाद दूसरी बेटी अभिश्री श्रीनगर IRS की डिप्टी डायरेक्टर हैं और उनके पति अखय लाब्रू श्रीनगर के डीएम हैं।

अब ज्ञानेश कुमार की बेटी और उनके पति को प्रशासन में उच्च पद हासिल करने को लेकर सवाल उठाए गए। कांग्रेस इकोसिस्टम ने इसे बीजेपी से जोड़ दिया। इनमें कांग्रेस के सोशल मीडिया स्टार और कांग्रेस की चापलूसी करने वाले कई वामपंथी लोग शामिल हैं।

मुंबई कॉन्ग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार को टारगेट किया। उन्होंने भी ज्ञानेश कुमार, उनकी बेटी और दामाद के प्रशासनिक पद हासिल करने पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश के परिवार को ‘बीजेपी का परिवार’ करार दिया।

भारतीय युवा कांग्रेस(IYC) के सोशल मीडिया की स्टार मिनी नागरारे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार को टारगेट किया।

इसी क्रम में आगे ज्ञानेश कुमार को ‘बीजेपी का परिवार’ बताते हुए कांग्रेस इकोसिस्टम ने पोस्ट किए।

ये वही लोग हैं जो ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया ब्रीफिंग करने वाले विदेश सचिव विक्रम मिस्री की बेटी के ट्रोल होने पर दक्षिणपंथी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। उस समय ट्रोलर्स को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने फटकार भी लगाई थी। 

ज्ञानेश कुमार और उनके परिवार पर ये हमला ऐसे समय में शुरु हुआ है, जब उन्होंने वोट चोरी के आरोपों पर राहुल गाँधी से 7 दिनों के भीतर हलफनामा देने या माफी माँगने के लिए कहा है। इसके बाद से वो लगातार कांग्रेसी इकोसिस्टम से जुड़े लोगों के निशाने पर आ चुके हैं।

झूठों के सरगना राहुल गाँधी ने बिहार में जीप पर चढ़वाकर जिससे कहलवाया ‘वोट चोरी’, वो निकला बड़ा फ्रॉड: चुनाव आयोग ने राजद BLA सुबोध कुमार के हर झूठ की खोली पोल

बिहार के नवादा में वोट अधिकार यात्रा में सुबोध कुमार से वोट चोरी का आरोप लगवाते राहुल गाँधी की तस्वीर (साभार : X_@RahulGandhi)
SIR को लेकर राहुल गाँधी और INDI गठबंधन जो हंगामा कर उपद्रव कर रहे हैं, लेकिन इनका हर प्रोपेगंडा बेनकाब हो रहा है। फिर भी झूठ का पुलंदा लिए राहुल गुमराह कर अपने LoP पद को कलंकित कर रहे हैं। 

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी इस समय बिहार के नवादा में ‘वोट अधिकार यात्रा’ पर निकले हुए है। रैली के दौरान राहुल गाँधी की गाड़ी पर एक शख्स सवार होता है और चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर कहता है कि ‘वोट चोरी’ हुई है और उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।

आश्चर्य नहीं कि चुनाव आयोग की फैक्ट चेक में यह दावा पूरी तरह झूठा निकला। चुनाव आयोग ने बताया कि सुबोध कुमार नाम का यह शख्य कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि ये राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट (BLA) हैं और उसका नाम कभी भी वोटर लिस्ट में था ही नहीं।

चुनाव आयोग पर राहुल गाँधी का ‘नकली ड्रामा’

राहुल गाँधी को तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं। वो हर चुनाव से पहले बच्चों जैसी जिद पर अड़े रहते हैं कि ‘वोट चोरी हो गई’ और हर बार चुनाव आयोग फैक्ट चेक कर उनके झूठ को उजागर करता है, फिर भी वो वही रट लगाते रहते हैं।

दरअसल, अपनी ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान नवादा में एक शख्स को मंच पर माइक थमाकर राहुल गाँधी ने कहा, “इनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है, यही लाखों लोगों के साथ हो रहा है।” यह शख्स सुबोध कुमार था, जिसने राहुल गाँधी के रथ पर चढ़ते ही कैमरे के सामने आरोप जड़ा कि उसका नाम वोटर लिस्ट से गायब है।

राहुल गाँधी ने इस पूरे वाकये को रैली से लाइव दिखाया और फिर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलाया। X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, “जो सुबोध कुमार जी के साथ हुआ, वही लाखों लोगों के साथ बिहार में हो रहा है। वोट चोरी भारत माता पर आक्रमण है– बिहार की जनता ये होने नहीं देगी।”

सुबोध कुमार नाम के व्यक्ति को मंच पर बुलाना, माइक थमाना और कैमरे के सामने आरोप लगवाना… यह सब पहले से स्क्रिप्टेड था। राहुल गाँधी ने इसे ‘भारत माता पर हमला‘ बताया। लेकिन असल हमला जनता की समझदारी पर किया गया छल था। रंजू देवी के झूठ के बाद अब सुबोध कुमार पर राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की कहानी हर बार फेल होती है।

फैक्ट चेक: चुनाव आयोग ने आरोपों को किया तार-तार

चुनाव आयोग की विस्तृत जाँच रिपोर्ट के अनुसार, सुबोध कुमार नाम का व्यक्ति कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट है। 29 अक्तूबर 2024 को प्रकाशित सूची और फिर 2025 के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में भी सुबोध कुमार का नाम कभी भी मतदाता सूची में नहीं था। उसके परिवार के कुछ सदस्य सूची में शामिल है, लेकिन खुद उसका नाम कभी दर्ज नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर प्रकाशित विलोपित मतदाताओं की सूची में भी उसका नाम दर्ज नहीं है।

चुनाव आयोग बताता है कि सुबोध कुमार ने ना तो फॉर्म-6 भरा और ना ही किसी प्रकार का घोषणा पत्र (Annexure-D) दिया। जब बीएलओ ने विलोपित मतदाताओं की सूची बूथ पर चिपकाई तब सुबोध वहीं मौजूद था, लेकिन उसने कोई आपत्ति नहीं दर्ज की। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वह स्वयं हस्ताक्षर कर चुका है, फिर भी मंच पर दावा किया कि उसका नाम हटा दिया गया। चुनाव आयोग ने कहा कि सुबोध कुमार ने जो आरोप लगाए, वो निराधार एवं असत्य है। यदि वे भविष्य में नियमानुसार फॉर्म-6 एवं घोषणा पत्र प्रस्तुत करेंगे तो उनका नाम जोड़ा जा सकता है।

बार-बार दोहराया गया झूठ

यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने इस तरह का निराधार आरोप लगाया है। इससे पहले, औरंगाबाद में उन्होंने रंजू देवी नाम की एक महिला का मामला उठाया था, यह दावा करते हुए कि उनका नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। लेकिन बाद में रंजू देवी ने खुद एक वीडियो में बताया कि उनका नाम मतदाता सूची में मौजूद है और उन्हें गुमराह किया गया था।

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राहुल गाँधी का बार-बार एक ही तरह के निराधार आरोप लगाना, एक बच्चे की तरह रट्टा लगाने जैसा लगता है, जो ‘फैक्ट चेक’ के बाद भी अपनी बात पर अड़े रहते हैं। यह न सिर्फ उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी गलत आरोप लगाने का प्रयास करता है।