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चीन से फंडिंग होने पर पहलगाम आतंकी हमले पर UN रैपोर्टियर बेन सॉल ने दिए थे भारत विरोधी बयान, ऑपइंडिया ने उसी समय उठाए थे सवाल: जाँच में हुआ खुलासा

                       यूएन वॉच रिपोर्ट में बेन सॉल पर गंभीर आरोप। (फोटो साभार - UNOG न्यूजरूम)
दुनिया में अंतरराष्ट्रीय भिखारियों की कमी नहीं। भीख लो और भारत के खिलाफ बयानबाज़ी करो। आखिर UNO और मानवाधिकार वाले ऐसे लोगों को क्यों नहीं ब्लैकलिस्ट करते? या यूँ कहा जाए इन लोगों की मिलीभगत से भारत के विरुद्ध ये खेल खेला जा रहा है? अगर ये संस्थाएं ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते UNO और Human Rights Commission को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। फंडिंग पर गलत बयान देने से भारत में माहौल ख़राब हो गया होता उसका कौन जिम्मेदार होता? ऐसे लोग चाहे किसी भी पद पर हो भिखारी से भी बदतर हैं। 
चीन जिस तरह चालें चल रहा है भारतीयों को हर चीनी उत्पाद का बहिष्कार करना चाहिए।  
UN वॉच की एक रिपोर्ट ने आतंकवाद-रोधी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर बेन सॉल पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सॉल को चीनी सरकार से फंडिंग मिल रही है।

स्काई न्यूज के अनुसार, जिनेवा स्थित इस समूह की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सॉल में पश्चिम-विरोधी और इजरायल-विरोधी पक्षपात है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सॉल ने अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठन अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य और आतंकवादी नेता अयमान मोहम्मद रबी अल-जवाहिरी की हत्या की निंदा की थी।

यूएन वॉच के कार्यकारी निदेशक हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से बात करते हुए कहा, “उन्हें एक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) नहीं होना चाहिए, उन्हें एक अकादमिक होना चाहिए। हमें विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण देखने को मिलना चाहिए।”

नोयर ने कहा  “संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ को सबसे पहले हमास के आतंकवादियों का विरोध करना चाहिए, ईरान के इस्लामी शासन का विरोध करना चाहिए, लेकिन बेन सॉल ईरान के इस्लामी शासन और उसके आतंकवादी सहयोगियों की बातों को दोहराते हुए दिखाई देते हैं।”

रिपोर्ट का हवाला देते हुए नोयर ने कहा कि सॉल को चीनी कम्युनिस्ट शासन से 1,50,000 डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने यह भी कहा कि सॉल ने रिपोर्ट की सामग्री का कोई खंडन नहीं किया है। नोयर ने कई ऐसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का नाम लिया, जिनके कार्यालयों को चीन से फंडिंग मिली है।

हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से कहा, “वह खुद को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ बताते हैं। वह सिडनी में कानून के प्रोफेसर हैं और खुद को स्वतंत्र विशेषज्ञ कहते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि जब उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से 1,50,000 डॉलर मिल रहे हैं, तो वह स्वतंत्र विशेषज्ञ कैसे हो सकते हैं? मैं स्पष्ट कर दूँ। कोई यह नहीं कह रहा कि यह पैसा उनकी निजी जेब में जा रहा है ताकि वह कोई फेरारी खरीद सकें, लेकिन यह उनके कार्यालय को जा रहा है। वही कार्यालय जिसने कभी भी चीन द्वारा आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के नाम पर दस लाख उइगरों को शिविरों में रखने की निंदा नहीं की, जबकि यही वह विषय है जिसके वह विशेषज्ञ होने का दावा करते हैं।”

उन्होंने कहा कि जबरदस्ती के उपायों (कोअर्सिव मेजर्स) पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टियर एलेना दोहान के कार्यालय को रूस, चीन और कतर से 13 लाख डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य विशेषज्ञ जॉर्ज कैट्रूगालोस का भी नाम लिया, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के कार्यालय के अध्यक्ष हैं।

नोयर ने कहा कि उनके कार्यालय को चीन से 1,00,000 डॉलर मिले थे, उसी वर्ष जब उन्होंने एथेंस में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पुस्तक के प्रचार के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया था।

UN वॉच ने संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों द्वारा चीन, कतर, रूस जैसे देशों से संदिग्ध फंडिंग प्राप्त करने और मानवाधिकारों के नाम पर विशेष वैचारिक हितों को बढ़ावा देने के कई मामलों को चिन्हित किया है। संगठन का आरोप है कि ये विशेषज्ञ आतंकवादी घटनाओं और इस्लामी आतंकवाद के पीड़ितों की स्थिति की अनदेखी करते हैं।

बेन सॉल समेत UN रिपोर्टर्स ने पहलगाम हमले पर भारत को घेरा

सॉल उन आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष रैपोर्टियरों में शामिल थे, जिन्होंने पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा अपनाए गए आतंकवाद-रोधी उपायों को लेकर मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक संयुक्त प्रेस बयान जारी किया था।
ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि संयुक्त राष्ट्र के इस विशेष विशेषज्ञ ने आतंकवादी हमले की निंदा तो की थी, लेकिन भारत के आतंकवाद-रोधी अभियानों को, जिनमें अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट सेवाओं का निलंबन और 8000 सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक करना शामिल था, असंगत (डिसप्रोपोर्शनेट) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन बताया था।
भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों को सामूहिक दंड (कलेक्टिव पनिशमेंट) बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने दावा किया कि अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों से जुड़े परिवारों के घरों, व्यवसायों और संपत्तियों को बिना किसी न्यायालयी आदेश या विधिक प्रक्रिया के मनमाने ढंग से ध्वस्त कर दिया।
UN वॉच की रिपोर्ट के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि बेन सॉल, जिनसे आतंकवादी कृत्यों की निंदा करने की अपेक्षा की जाती है, पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई की आलोचना क्यों कर रहे थे।
किसी तरह संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियानों को भी पहलगाम हमले के बाद देशभर में चलाए गए कार्रवाई अभियान से जोड़ दिया। उनका तर्क था कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमानों को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उनका धर्म पहलगाम हमले के आरोपियों जैसा है।
जबकि असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय से चल रही है, जिनमें मुख्य रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा कर मजार या दरगाह बनाने वाले इस्लामवादी तत्वों तथा अवैध रूप से भूमि पर कब्जा करने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या शामिल हैं। ये अतिक्रमण-रोधी अभियान एक वर्ष से भी अधिक समय से जारी हैं।
हालाँकि इनका पहलगाम हमले से कोई संबंध नहीं था। गुजरात में पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद जो एकमात्र ध्वस्तीकरण अभियान चला, वह सरकार द्वारा चंडोला झील और उसके आसपास बने अवैध ढाँचों को हटाने के लिए था, जिसे अवैध बांग्लादेशियों का केंद्र माना जाता है। यह कार्रवाई भी गुजरात हाई कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद की गई थी।
इसके अलावा, यह दावा भी गलत बताया गया कि ‘निर्दोष कश्मीरी नागरिकों’ के घर गिराए गए। अधिकारियों ने घरों को ध्वस्त किया था, लेकिन वे निर्दोष नागरिकों के नहीं थे।
अधिकारियों ने केवल प्रमाणित आतंकवादियों के घरों को ही गिराया। सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों का इस्तेमाल कर आतंकवादी शाहिद अहमद कुट्टे के शोपियाँ स्थित घर, कुलगाम में सक्रिय जिहादी जाकिर के घर, पुलवामा के मुरन में एहसान-उल-हक शेख के घर, जो 2018 में पाकिस्तान गया था और इसी वर्ष घाटी में घुसपैठ कर लौटा था, फारूक तीवड़ा के घर, जो 1990 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान चला गया था और कभी वापस नहीं लौटा, तथा लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों आदिल हुसैन ठोकर (बीजबेहड़ा, अनंतनाग) और आसिफ शेख (त्राल, पुलवामा) के घरों को ध्वस्त किया। लेख के अनुसार, इनमें से कोई भी व्यक्ति निर्दोष या शांतिप्रिय नागरिक नहीं था।


भगवान राम का अपमान, आजादी के नारे और तिरंगे से बदसलूकी: कॉकरोचों को ये तक नहीं पता कि वे क्यों आए हैं

                                                             साभार : ऑपइंडिया
कल(6 जून) को कॉकरोच जनता पार्टी ने दिखा दिया कि रात के अँधेरे में वह कहाँ जा रहा है, तो तेज सूरज की तपिश में उससे कोई उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी। नेपाल जैसा उपद्रव करने के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर इसके आका भी सिर पकड़ कर बैठ गए होंगे। कई उपद्रवियों को तो शिक्षा मंत्री तक नाम नहीं पता जिसका इस्तीफा मांग रहे थे। सोशल मीडिया पर कई वीडियो देखने को मिले जहाँ मोदी और योगी तक का पद नहीं बता पाए।
कई लोगों तो यह तक नहीं मालूम कि 'यहाँ आये किस लिए हैं?' यानि अगर किसी वजह से उपद्रव हो गया होता तो अरविन्द केजरीवाल और INDI गठबंधन की बल्ले-बल्ले हो गयी होती। लेकिन विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके तो तेज गर्मी की पहले ही भाग खड़ा हुआ था या विरोधियों की तैयारी से ये तो वही जानता है। लेकिन कोई उपद्रव नहीं होने पर इनके आकाओं के अरमानों पर पानी जरूर फिर गया।    

    

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी इस कथित पार्टी के सदस्यों यानी ‘कॉकरोचों’ को प्रदर्शन के लिए बुलाया था। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उनका साथ देने वाले कॉकरोचों की संख्या उनकी उम्मीदों को तोड़ने वाली रही।

अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों से बड़ी से बड़ी संख्या में जुटने का आह्वान किया था लेकिन आह्वान का असर केवल कुछ कॉकरोचों पर ही पड़ा। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाली इस CJP के प्रदर्शन में बमुश्किल कुछ सौ लोग ही पहुँचे। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है इसमें शामिल होने वाले कॉकरोचों को देखकर भी साफ समझा जा सकता था कि इनकी मंशा केवल हिंसा फैलाना, सुर्खियाँ बटोरना, सरकार और भारतीय संस्कृति को बदनाम करना था।

कोई कॉकरोच यहाँ हिंदू देवी-देवता का अपमान कर रहा तो कोई अपनी पर्सनल डायरी को संविधान बता रहा। किसी को तिरंगे के सम्मान से कोई लेना-देना नहीं तो कोई डफली बजाते हुए आजादी-आजादी चिल्ला रहा और इनका कहना था कि ये छात्रों के भविष्य के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे, ये कॉकरोच जिनके पास ना तो ज्ञान है और ना ही तमीज।

यह आरोप कोई हमारा मनगढ़ंत नहीं है बल्कि ऑपइंडिया को इसके प्रमाण भी मिले हैं। पहली बात तो ये सामने आई कि प्रोटेस्ट के नाम पर शोर मचाने वाले ये कॉकरोच असल में ना तो कोई छात्र हैं और ना ही पढ़ाई या किसी तरह की परीक्षा से इनका कोई लेना-देना है और इसका प्रमाण इन्होंने खुद ही दे दिया ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगाकर।

वायरल वीडियो अब तक आपने भी देख लिए होंगे और अगर नहीं देखें तो ऑपइंडिया के इन वीडियोज को देंखे, जिसमें ये अबर्न नक्सली डफली बजाते हुए ‘आजादी-आजादी’ चिल्ला रहे।

वीडियो में दिख रहे ये लोग चिल्ला रहे, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी।” अब आप सोचिए कि इसका पेपर लीक से क्या लेना देना है भला?

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को हिंसक बना दिया था।

इसके अलावा साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई।

मकसद भी नहीं बता पा रहे अभिजीत के कॉकरोच, तिरंगे के अपमान का वीडियो आया सामने

CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएँ। उनके कॉकरोचों यानी समर्थकों ने ये बात मानी भी लेकिन शायज आशुतोष उन्हें ये बताना भूल गए कि तिरंगे को हर भारतीय, हर देशभक्त सम्मान की दृष्टि से देखता है।

ऑपइंडिया ने इसकी पुष्टि कर रही ऐसी ही एक घटना को कैप्चर भी किया है, जिसमें प्रदर्शन करने पहुँचे कॉकरोच तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसको अपने देश से प्रेम हो वो ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। साफ समझ आ रहा कि ये हरकते भारत को बदनाम करने की वामपंथियों की केवल एक साजिश है।

दूसरी तरफ ऑपइंडिया के रिपोर्टर्स को ग्राउंड पर ऐसा कोई कॉकरोच नहीं मिला, जो यह बता सके कि उनका जुटान यहाँ हुआ किसलिए है। किसी के पास कोई मुद्दा नहीं जो वो बता सकें कि इसलिए वो प्रदर्शन करने आए हैं। कोई पेपर लीक पेपर लीक चिल्ला रहे तो वो उनके साथ मिल जा रहे।

कोई आजादी-आजाजी चिल्ला रहा तो उधर भी उपस्थिति दर्ज कर रहे। इस बैनर से उस बैनर, यहाँ से वहाँ, वहीं जो असल में कॉकरोच करते हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उगला जहर उगलने पहुँच रहे कॉकरोचों के दादा-परदादा

जंतर-मंतर पर पहुँचे एक बुजुर्ग ने ऑपइंडिया के रिपोर्टर से कहा कि ‘पांडव-वांडव’ तो कभी थे ही नहीं, ये सब बेकार बाते हैं। उन्होंने आगे कहा, “राम-वाम सब छोड़ दे, तु वहाँ मत जा, राम मोदी को नहीं मारता, सारे देश को लूट कर खा गया, वो मोदी को नहीं मारता, राम मंदिर के नाम पर कितने रुपए डकार गया, अडानी-अंबानी को नहीं मारता है।”

जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने पूछा कि इसमें भगवान राम बीच में कहाँ से आ गए तो वो कहते हैं, “तेरे मेरे को डराने के लिए हैं राम तो, उसको नहीं मानते।” जिनको ना तो भारत के इतिहास, संस्कृति और धर्मग्रंथो से कोई लेना-देना नहीं, ना तो इन्हें हिंदू देवी-देवताओं का सम्मान करना आता है, ये लोग पहुँचे हैं कॉकरोचों को समर्थन करने।

कोई डायरी को बता रहा संविधान तो किसी का जवाब- अब्बा-डब्बा-जब्बा

प्रशांत राणा नाम के एक कॉकरोच से ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने बात की तो उसने हाथ में ली हुई डायरी को भारत का संविधान बताया। जब रिपोर्टर ने दिखाने को कहा तो प्रशांत ने थोड़ा भाव खाया, लेकिन फिर डायरी खोली और कहा, ‘ये मेरे कुछ आर्टिकल्स हैं।’ जी हाँ यानी कॉकरोचों का अपना एक संविधान भी लिखा जा रहा है। उसने कहा कि ये मेरे लिए संविधान है।

रिपोर्टर ने जब उससे कहा कि भाई दिखाओ तो इस संविधान में क्या है तो कॉकरोच ने कहा- “इतनी पर्सनल चीज नहीं दिखा सकते।” इसके बाद वो लगातार अपने मन का बेतुकी बातें करता रहा जो संभवतः उसके अपने पर्सनल संविधान में लिखी होंगी।

ऑपइंडिया को प्रशांत की तरह ही एक और कॉकरोच मिला। उसने कहा कि वो सिस्टम का विरोध करने वालों का समर्थन कर रहा है। उसने कहा कि एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह करप्ट हो चुका है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि तो इसका हल क्या है और CJP के पास इसका क्या समाधान है तो उसने ना में सिर हिला दिया कि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है।

मास्क पहने एक कॉकरोच ने बताया कि नीट पेपर लीक हुआ है, इसलिए वो यहाँ आया है, लेकिन और कौन से पेपर कब लीक हुए हैं, इसके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। वह लगातार कहता रहा, “नीट का पेपर लीक हुआ है, होते रहते हैं, अब जैसे नीट का पेपर लीक हुआ है, नीट का पेपर लीक हुआ था, नीट का पेपर लीक हो जाएगा फिर।”

अंत में कॉकरोच ने रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि वो बताए कौन-कौन से पेपर लीक हुए हैं। रिपोर्टर के हर सवाल में फँसते हुए कॉकरोच में अंत में चेहरा दिखाकर और बेईज्जती कराना सही नहीं समझा और चुप हो गया। जिन्हें किसी विषय की कोई जानकारी नहीं है, यहाँ तक की अपने भविष्य का भी कुछ नहीं पता ये औरों के भविष्य की क्या चिंता करेंगे।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्र विरांश भानुशाली ने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को किया ध्वस्त: आतंकी मुल्क को किया बेनकाब; वीडियो

                         विरांश भानुशाली, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में लॉ के स्टूडेंट हैं (साभार - ऑपइंडिया टीवी)
ऑक्सफोर्ड यूनियन में 27 नवंबर 2025 को हुई एक डिबेट में एक भारतीय छात्र ने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को सटीक और करारे तथ्यों (Hard-Hitting Facts) से चूर-चूर कर दिया। इस डिबेट के कुछ क्लिप अब इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं।

भारतीय छात्र विरांश भानुशाली मुंबई के रहने वाले हैं और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। वे इस डिबेट में भारत का पक्ष रखने वाली टीम का हिस्सा थे। यह डिबेट 26 नवंबर यानी 26/11 मुंबई आतंकी हमलों की बरसी के ठीक एक दिन बाद आयोजित की गई थी।

26/11 मुंबई हमलों के सर्वाइवर विरांश भानुशाली ने पाकिस्तान पर हमला बोलते हुए कहा, “आप उस देश को शर्मिंदा नहीं कर सकते जिसमें खुद कोई शर्म ही नहीं है।” ऑपइंडिया ने विरांश भानुशाली से बात की, जिसमें उन्होंने डिबेट का अपना अनुभव साझा किया और भारत-पाकिस्तान संघर्ष और भारत की वैश्विक छवि पर भी अपने विचार रखे।

मैं खुद को मानता हूँ भारत का राजदूत: विरांश भानुशाली

ऑपइंडिया की पत्रकार रितिका चंदोला ने विरांश से पूछा कि विदेशी जमीन पर पाकिस्तान के खिलाफ भारत का पक्ष रखने का अनुभव कैसा रहा। जवाब में विरांश ने कहा कि वे खुद को देश का राजदूत मानते हैं और भारत की तरफ से बोलकर उन्हें गर्व महसूस हुआ।

दिलचस्प बात यह है कि विरांश ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष मूसा हर्राज के दोस्त हैं, जो पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री मुहम्मद रजा हयात हर्राज के बेटे हैं। मूसा ने डिबेट में पाकिस्तान का पक्ष रखा था।

डिबेट के बाद के हालात पर पूछे जाने पर ऑक्सफोर्ड यूनियन में चीफ ऑफ स्टाफ विरांश ने कहा, “मूसा और मेरा रिश्ता ऐसा है कि हम दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि मैं भारतीय हूँ और वह पाकिस्तानी। हम दोनों संस्थान में इतने अहम पद पर हैं कि घर में सुर्खियाँ बन सकती हैं। इसलिए जहाँ जरूरी है हम सहयोग करते हैं, लेकिन अपनी सीमाएँ तय करते हैं और कहते हैं कि इस पर हमें गर्व है, इस पर समझौता नहीं करेंगे और हमारे अपने विचार हैं। मैं एक फ्री स्पीच सोसाइटी से हूँ। मुझ पर फ्री स्पीच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी है।”

मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरा भाषण वायरल होगा: भानुशाली

डिबेट के क्लिप वायरल होने और भारत में मिल रहे प्यार पर विरांश ने कहा कि उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा कि उन्हें तो उल्टा लग रहा था क्योंकि डिबेट को पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज और एआरवाई ने कवर किया था। विरांश को अपने हिस्से के बाद चुनाव की वजह से डिबेट छोड़नी पड़ी थी। पाकिस्तानी मीडिया ने इसे भारतीय पक्ष का वॉकआउट बता दिया।

विरांश ने कहा, “हमारे पास जियो न्यूज और एआरवाई के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने इसे लाइव दिखाया या अगले दिन टेलीकास्ट किया और बड़े हेडलाइन में लिखा कि भारतीय पक्ष ने वॉकआउट किया, जो सच नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन लोग यह नहीं देखते कि हमारे वीडियो आने से पहले पूरे महीने कवरेज सिर्फ पाकिस्तानी पक्ष की थी। भारतीय पक्ष ने तो कवरेज ही नहीं की थी। मुझे अपने भाषण पर भरोसा था। मुझे पता था कि लोग सुनेंगे, लेकिन इतना वायरल होने की कल्पना नहीं थी।”

हम दुनिया के सामने सबसे बेहतर प्रतिनिधि भेजने में पीछे: भानुशाली

विरांश ने कहा कि पाकिस्तान ग्लोबल फोरम पर अपनी बात रखने में कामयाब रहा है, लेकिन भारत का पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठीक से नहीं रखा जा रहा।

भानुशाली ने कहा, “मैंने देखा है कि हमें अपनी कम्युनिकेशन में बदलाव करना चाहिए। हम पाकिस्तान के साथ नहीं जोड़े जाना चाहते, हमारे मुकाबले चीन, अमेरिका और विकसित देश हैं। लेकिन जब हम अपने सबसे अच्छे प्रतिनिधि नहीं भेजते और ऐसे फोरम होते हैं जिनका दूसरा पक्ष इस्तेमाल करता है, तो सिर्फ एक ही कहानी चलती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रतिनिधित्व नहीं हुआ है।”

पाकिस्तान भारत के साथ लड़ाई को बहाना बनाता है: भानुशाली

ऑपइंडिया की पत्रकार के सवाल पर कि भारत का मुकाबला पाकिस्तान से नहीं है, विरांश ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के लिए भारत से लगातार संघर्ष में रहना फायदेमंद है क्योंकि इसी बहाने वहाँ की गरीबी और महंगाई को जायज ठहराया जाता है।

विरांश ने कहा, “पाकिस्तान के लिए भारत से संघर्ष में रहना फायदेमंद है, क्योंकि भारत बिना पाकिस्तान के भी जी सकता है, लेकिन मौजूदा पाकिस्तानी सत्ता बिना भारत के शायद टिक न पाए। कम से कम भारतीय खतरे के बिना नहीं। अगर पॉपुलिज्म देखना है तो दूसरी तरफ है, क्योंकि उन्हें भारतीय खतरे की जरूरत है। इसी से वे आटे की कीमत, बड़ी गरीबी और हत्याओं को जायज ठहराते हैं।”

26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों की याद के बारे में पूछे जाने पर, भानुशाली ने कहा कि उन्हें उस समय का डर और घबराहट अभी भी याद है। भानुशाली उस समय केवल 4 साल के थे। उन्होंने कहा कि वह अपने हिस्सेदार और सुरक्षित पीढ़ी का हिस्सा होने के लिए आभारी हैं, जिसने बड़े आतंकवादी हमले नहीं देखे।

भानुशाली ने याद किया, “मैं चार साल का था। लेकिन वे कहानियाँ और यादें, जो अभी भी मेरे दिमाग में हैं, हमें यह सिखाती हैं कि सीमा पार आतंकवाद जैसी समस्याओं से कैसे निपटा जाए।” उन्होंने जोड़ा कि आतंकवाद समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है, चाहे व्यक्ति किसी भी वर्ग या स्थिति का हो।

कुछ समुदाय धर्म को शोषण का जरिया बनाते हैं: भानुशाली

इस्लामिक कट्टरता और पश्चिम में मल्टीकल्चरलिज्म के खिलाफ बढ़ते मूड पर विरांश ने कहा कि कुछ लोग धर्म को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने शशि थरूर का हवाला देते हुए कहा कि भारत ने दुनिया को सिर्फ सहनशीलता नहीं बल्कि स्वीकृति सिखाई है।

यूके में इस्लामोफोबिया पर विरांश ने कहा कि यह जटिल मुद्दा है। कुछ समुदायों ने धर्म को सामाजिक शोषण का जरिया बनाया है, जैसे ग्रूमिंग गैंग्स। उन्होंने मल्टीकल्चरलिज्म का समर्थन किया लेकिन कहा कि अगर कोई इसका निजी फायदा उठाता है तो गलत है।

मल्टीकल्चरलिज्म के साथ आत्मसात भी होना चाहिए: भानुशाली

यूके में बहुसांस्कृतिकता (मल्टीकल्चरलिज्म) के सामने चुनौतियों के बारे में बात करते हुए, भानुशाली ने कहा कि इस्लाम को यूके में कभी-कभी प्रचार का जरिया बनाया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बहुसांस्कृतिकता को टिकाऊ बनाने के लिए समाज में एकीकरण जरूरी है।

भानुशाली ने कहा, “मैं हमेशा यह कहता रहा हूँ कि कुछ लोग इस्लाम को प्रचार के लिए इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग राजनीतिक बदलाव के लिए जलवायु परिवर्तन जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। यह सब दबाव बनाने के लिए होता है। बहुसांस्कृतिकता जैसी अच्छी चीज का इस्तेमाल जब दबाव बनाने के लिए किया जाता है तो समस्या होती है। भारत एक बहुत ही बहुसांस्कृतिक समाज है और हम इसकी स्थापना से ही ऐसे रहे हैं, बल्कि उससे पहले भी। हम बहुसांस्कृतिकता की आलोचना तब नहीं करते जब यह हमें एक पहचान में जोड़ती है। लेकिन अगर लोग एकीकरण नहीं करते, अपनी पहचान में शामिल नहीं होते, तो यह एक समस्या बन जाती है।”

बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या भयानक और निंदनीय: भानुशाली

ऑपइंडिया की पत्रकार ने भानुशाली से पूछा कि वह बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और हाल ही में हुए हिंदू व्यक्ति की लिंचिंग के बारे में क्या सोचते हैं। भानुशाली ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के उत्पीड़न की निंदा की और कहा, “मैंने बांग्लादेश में हिंदू जनता पर किए जा रहे अत्याचारों के कुछ बहुत ही भयानक वीडियो देखे हैं। लिंचिंग, किसी को जिंदा जलाया जाना। मुझे ऐसे वीडियो भी दिखे जिनमें किसी को भीड़ के हवाले किया गया, जो उन्हें मार देती। यह पूरी तरह निंदनीय और भयानक है।”

भानुशाली ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए देश में लोकतंत्र लौटना जरूरी है, ताकि ऐसे कामों के लिए जवाबदेही हो। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।

मैं मोदी से प्यार करता हूँ लेकिन उनकी आलोचना भी करता हूँ: भानुशाली

मोदी पर विरांश ने कहा कि उन्हें मोदीजी से बहुत लगाव है लेकिन कुछ मतभेद भी हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना घरेलू मामला है, बाहर देश को पहले रखना जिम्मेदारी है।

भानुशाली ने कहा, “मुझे मोदी जी के बारे में अपनी आलोचनाएँ हैं। मैं उन्हें कई तरीकों से पसंद करता हूँ। मेरी अपनी आलोचनाएँ भी हैं, लेकिन मैं उन्हें केवल देश में ही रखता हूँ, क्योंकि यह हमारा मामला है। हम लोकतंत्र में रहते हैं और यहाँ अपनी आलोचना व्यक्त कर सकते हैं। जब आप बाहर होते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी होती है कि देश को पहले रखें। मेरे भाषण में भी देखें, आपत्तियाँ किसी ने मोदी के लिए नहीं कीं, बल्कि भारत के लिए कीं।”

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

                                                                                           प्रतिकात्मक तस्वीर ( फोटो साभार-chatgpt)
जॉर्ज सोरोस जितना पैसा भारत को अस्थिर करने में बर्बाद कर रहा है अगर यही पैसा गरीबों पर खर्च करता इतिहास में स्वर्णमयी अक्षरों में नाम लिखा जाता, लेकिन सोरोस देशों को अस्थिर करने में अपनी शान समझ रहा है। जब भारतीय नेताओं को फंडिंग कर उसको उतनी मदद नहीं मिल रही तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता को निशाने पर ले रहा है। जिसे देख लगता है बुढ़ापे में अपनी दुर्गति करवाकर ही दुनिया से जाएगा। आखिर 
हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को क्यों निशाने पर लिया जा रहा है? अगर RSF ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर हमला करना बंद नहीं किया इसके बहुत भयंकर अंजाम होंगे।   

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

 भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।
फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।
यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।
ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।
सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।
सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।
भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’
इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।
स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।
लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।
CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।
OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।
RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।
पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।
यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।
इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।
ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।
ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।
इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।
यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।
रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।
सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।
जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।
आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।
ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।
*पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।
*कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।
*’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।
स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।
इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।
यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।
इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।
यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।
1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।
2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।
3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।
जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।
OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।
एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

संजौली मस्जिद में स्थानीय से ज्यादा होते हैं बाहरी नमाजी, टीले से शुरू होकर अवैध तरीके से बनी बहुमंजिला इमारत: ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

                                                          अवैध रूप से बनी शिमला की संजौली मस्जिद
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से सटे संजौली में बने अवैध मस्जिद को हटाने के लिए स्थानीय हिन्दू आंदोलन कर रहे हैं। हिन्दू संघर्ष समिति का कहना है कि शिमला नगर निगम और सेशंस कोर्ट के आदेश के बावजूद हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। दरअसल सेशंस कोर्ट ने मस्जिद को अवैध घोषित कर ध्वस्तीकरण का आदेश दे चुका है। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद यहाँ नमाज पढ़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा रही है।

ऑपइंडिया की टीम शिमला के अवैध मस्जिद स्थल पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बातचीत कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मस्जिद जानेवाले नमाजी राह चलती हिन्दू बहन-बेटियों को छेड़ते हैं। मस्जिद जाने का एकमात्र रास्ता हिन्दू आबादी वाले इलाके से होकर जाता है। ऐसे में नमाज अदा करने आने वाले नमाजी मस्जिद के आस-पास रहनेवाले हिन्दू घरों में ताक झाँक करते हैं। घर से बाहर निकल रही बहन-बेटियों को कमेंट करते हैं। उनका निकलना दुश्वार हो जाता है, खासकर शुक्रवार को जम्मू की नमाज के वक्त।

ऑपइंडिया ने मस्जिद जाकर इमाम से भी बातचीत करने और अपना पक्ष रखने को कहा। काफी मेहनत के बावजूद न तो मस्जिद कमेटी का कोई सदस्य बोलने को तैयार हुआ और न ही इमाम।

मस्जिद के बगल से एक और सीढ़ी थी, जिससे होकर ऊपर पहुँचने पर एक व्यक्ति से बात हुई। उन्होंने पत्रकार का नाम लेते ही बात करने से मना कर दिया। उन्होंने एक नंबर दिया, जिससे बात करने की कोशिश कई बार की गई, लेकिन उन्होंने कॉल काटा और कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।

यहाँ जो आरोप लग रहा है, तो आप इस पर क्या कहेंगे। इस पर कॉल कट कर दिया गया।

ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय निवासी राजकुमार शर्मा ने कहा कि ये मस्जिद बहुत धीरे-धीरे बनाया गया है। पहले यहाँ प्राइमरी स्कूल होता था। उन्होंने कहा कि इस स्कूल में उन्होंने भी पढ़ाई की थी। बाद में स्कूल को धर्मशाला शिफ्ट कर दिया गया। कुछ दिनों बाद इस जगह पर छोटे-छोटे टीले बने। समय के साथ यहाँ छोटी-सी मस्जिद बनाई गई और धीरे-धीरे इसे बड़ा किया गया।

 यही वजह है कि मस्जिद के नीचे फ्लोर पर प्लास्टर लगे हुए हैं और ऊपर के दो फ्लोर पर मस्जिद की दीवारें प्लास्टरविहीन हैं। दरअसल पहला फ्लोर पहले बन गया और दो फ्लोर धीरे धीरे बाद में बनाया गया है। नीचे के फ्लोर पर नमाज पढ़ा जाता है। ऊपर इमाम रहते हैं। मस्जिद में घुसते ही दो वॉशरूम है, जो बेहद गंदा है। वजू करने की व्यवस्था वाली जगह पर भी काफी गंदगी है।

राजकुमार के मुताबिक, आसपास हिन्दुओं की आबादी है। मस्जिद बनने के बाद मुस्लिम बस मस्जिद के पास हैं। इस मस्जिद में नमाज पढ़ने दूर दूर से लोग आते हैं। क्योंकि यहाँ तक जाने का रास्ता एक सीढीनुमा रास्ते से होकर गुजरता है। इस रास्ते को देख कर ही बताया जा सकता है कि ये रास्ता कुछ लोगों के आने-जाने के लिए बनाया गया है।

ऑपइंडिया की टीम जब थोड़ा आगे बढ़ी तो उसने कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की। मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े आरके सिंह का कहना है कि हिमाचल में बीजेपी और कॉन्ग्रेस की ही सरकार रहती है। उन्होंने सवाल किया कि जब मस्जिद बन रही थी, तो सरकार कहाँ सोई हुई थी।

उनका कहना है कि मस्जिद बन चुकी है, कोर्ट में मामला चल रहा है, अवैध निर्माण के लिए सरकार जिम्मेदार है। देश के सभी नागरिकों के लिए कानून बराबर है। कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। यदि अवैध है तो इसे हटना चाहिए।

वहीं थोड़ी दूर पर मिले सब्जी का व्यापार करने वाले रवि कुमार से बात की। इनका कहना है कि कुछ लोग यहाँ मस्जिद हटाने की माँग कर रहे हैं। वो 1990 से यहाँ रह रहे हैं। उस वक्त छोटी सी मस्जिद थी। यहाँ नमाज पढ़ने बाहरी लोग आते हैं। इनमें कश्मीरियों की संख्या काफी है। उनका कहना है कि संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर इस समस्या का समाधान होना चाहिए।

ऑपइंडिया की टीम जब पगडंडी जैसे रास्ते से होकर गुजर रही थी, तो उन्होंने देखा कि आसपास छोटे-छोटे घर थे। यहाँ वर्षो से हिन्दू रहते आए हैं। ये लोग विवाद को देखते हुए इस मुद्दे पर बात करने से कतराते नजर आए। कई लोगों ने नाम लेते ही दरवाजे बंद कर लिए। इससे पता चलता है कि आसपास के लोगों में कितनी दहशत है।

यहाँ मस्जिद का होना ही बड़ा सवाल है, क्योंकि मुस्लिम आबादी यहाँ नहीं रहती है। यहाँ के कल्चर से भी मस्जिद बिल्कुल मैच नहीं करता। पहले फ्लोर पर प्लास्टर है, लेकिन उसके दो फ्लोर पर प्लास्टर नहीं किया गया है। मस्जिद जाने के लिए सीढ़ियों से होकर गुजरना पड़ता है। रास्ते के दोनों ओर हिन्दुओं का घर है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, घरों में बनी खिड़कियों में नमाज अदा करने के लिए आते-जाते वक्त ये झाँकते हैं। आने-जाने वाली लड़कियों को छेड़ते हैं। इसलिए यहाँ के लोग मस्जिद को हर हाल में शिफ्ट कराना चाहते हैं।

ईटानगर में अवैध मस्जिदों के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवा: APIYO अध्यक्ष ऑपइंडिया से बोले- ‘हर दिन 2000 तक मुस्लिम घुसपैठिए अरुणाचल में कर रहे प्रवेश’

                                                घुसपैठियों के खिलाफ अरुणाचल में प्रदर्शन
अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) को अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गेनाइजेशन (APIYO) के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए। इनके हाथों में ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस जाओ’ और ‘अरुणाचल प्रदेश को बचाओ’ जैसे नारे लिखे पोस्टर थे।

दरअसल, म्यांमार से सटा अरुणाचल प्रदेश, ईसाई धर्मांतरण और इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ की दोहरी मार झेल रहा है। सड़कों पर उतरे ये युवा भी इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ से परेशान हैं। इन युवाओं की माँग है कि राजधानी ईटानगर और नाहरलागुन (जिन्हें अरुणाचल प्रदेश की जुड़वाँ राजधानियाँ कहा जाता है) में मुस्लिमों ने जमीन पर कब्जा कर 15-20 मस्जिद व अन्य इस्लामी धार्मिक स्थल बना लिए हैं जिन्हें हटा दिया जाना चाहिए।

युवाओं का यह विरोध प्रदर्शन आकाशदीप से शुरू होकर आईजी पार्क के पास टेनिस कोर्ट तक पहुँचा जहाँ सैकड़ों युवाओं ने धरना दिया। इस प्रदर्शन में APIYO के साथ ऑल कैपिटल कॉम्प्लेक्स यूथ वेलफेयर एसोसिएशन और ऑल नाहरलागुन यूथ वेलफेयर एसोसिएशन भी शामिल थे।

हर दिन 1-2 हजार मुस्लिम राज्य में कर रहे प्रवेश: APIYO अध्यक्ष लियाक

इस प्रदर्शन को लेकर ऑपइंडिया ने APIYO के अध्यक्ष तारो सोनम लियाक से बातचीत की है। लियाक ने इस बातचीत में कई हैरान करने वाले दावे किए हैं। उन्होंने बताया है कि अरुणाचल प्रदेश में हर दिन अन्य राज्यों या देशों से एक हजार से दो हजार मुस्लिम व्यक्ति इनर लाइन परमिट (ILP) दिखाकर प्रवेश कर रहे हैं।

हालाँकि, उन्होंने इसके बाद जो बताया वो भी खतरनाक है। लियाक के मुताबिक, ये लोग ILP दिखाकर घुस जाते हैं लेकिन फिर भीड़ में गायब हो जाते हैं और वापस अपने मूल स्थान पर नहीं लौटते हैं।

लियाक का कहना है कि मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या डेमोग्राफी में बदलाव का मामला तो है ही। इसके अलावा राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा पर भी इससे गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

लियाक ने आरोप लगाया कि बाहरी लोगों के बढ़ते ठिकानों के कारण ड्रग्स और नशे की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे स्थानीय युवाओं पर गहरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो अरुणाचल की सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी।”

APIYO ने राज्य के मुख्य सचिव को लिखा पत्र

APIYO ने इन घटनाओं को लेकर अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को भी पत्र लिखा है। ऑपइंडिया के पास मौजूद दो पन्नों के इस पत्र में माँग की गई है कि जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर जामा मस्जिद/मदरसा के अवैध निर्माण को तत्काल रद्द किया जाए और जुड़वाँ राजधानी शहर ईटानगर और नाहरलागुन में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को तत्काल हटाया जाए।

APIYO ने पत्र में लिखा है, “जुड़वाँ राजधानी शहर 13730 से अधिक मुस्लिम आबादी रह रही है लेकिन इसमें से 20% मुस्लिम आबादी बांग्लादेशी है, जो राज्य के हमारे मूल निवासियों के लिए एक बड़ा खतरा है।”

APIYO ने लिखा, “राज्य सरकार की जानकारी के बिना जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर 10 से अधिक अवैध जामा मस्जिदें चल रही हैं, जो मूल निवासियों के लिए बहुत असुरक्षित है। इसलिए, जुड़वाँ राजधानी शहर के भीतर केवल 2 जामा मस्जिदों की अनुमति देना आवश्यक है और राज्य के मूल निवासियों के हित में अन्य को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।”

इसके अलावा संगठन ने राजधानी परिसर और उसके नजदीक दोईमुख, होलोंगी आदि जगहों पर साप्ताहिक बाजार पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग की है। पत्र में लिखा गया है, “राजधानी परिसर और उसके पड़ोसी क्षेत्रों जैसे दोईमुख और होलोंगी आदि में हर दिन साप्ताहिक बाजार लगता है, जहाँ बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी व्यापारिक उद्देश्य से बाहर से हमारे राज्य में आते हैं और राजधानी परिसर में किराए के कमरों में रहते हैं, जो हमारे स्थानीय स्वदेशी व्यापारिक समुदाय के लिए एक खतरा है।”

साथ ही, संगठन की चिंता है कि राज्य में बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी प्रवेश कर रहे हैं और अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया तो अपराध दर बढ़ने की बहुत संभावना है।

                                       मुख्य सचिव को APIYO का पत्र (साभार: तारो सोनम लियाक)

प्रशासन ने शुक्रवार(अक्टूबर 30) को प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए और पूरा विरोध शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। हालाँकि, संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी माँगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को राज्यव्यापी स्तर पर तेज किया जाएगा।

हालाँकि, प्रशासन ने कार्रवाई का भरोसा दिया है और मस्जिदों की जाँच की है लेकिन संगठन के लोग इस जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। लियाक का कहना है कि वह चाहते हैं कि सरकार 15 दिनों के भीतर-भीतर इस पर सही तरीके से कार्रवाई करे वरना वह इस विरोध को राज्य स्तर तक लेकर जाएँगे।

सीमावर्ती राज्य होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में बाहरी राज्यों के लोगों को प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) लेना अनिवार्य है। APIYO जैसे स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर अवैध बसावट की जा रही है।

‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने के लिए जिस बबीता को लेकर आए राहुल गाँधी, ऑपइंडिया की पड़ताल में उससे जुड़े दावे निकले झूठे: 2 जगह वोटर, काटने के लिए खुद दिया आवेदन

                                  राहुल गाँधी का हाईड्रोजन बम फुस्स (फोटो साभार: ऑपइंडिया टीवी)
(जिस तरह पाकिस्तान परमाणु की धमकी देकर भारत को डराता रहता था और पिछली युपीए सरकार देश को डराती रहती थी। लेकिन 2014 में मोदी सरकार बनने पर पाव-पाव के परमाणु बन गए, वो भी Operation Sindoor में फुस हो गए। ठीक उसी तरह राहुल गाँधी का हर बम फुस हो रहे हैं। लगता है कोई सिरफिरा बमों को बना रहा है। )    

राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग के खिलाफ ‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने की बात कही थी। राहुल ने कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र में वोटर लिस्ट से लोगों नाम कटने के गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने एक महिला वोटर बबीता का नाम लिया और दावा किया कि उसका नाम गलत तरीके से हटा दिया गया। लेकिन चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए खंडन किया है। ऑपइंडिया ने इस मामले की तहकीकात की, जिसमें राहुल गाँधी के दावों की हवा निकलती दिख रही है।

राहुल गाँधी ने बबीता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का दावा किया था लेकिन उस बबीता का नाम वोटर लिस्ट में अभी भी मौजूद है। आलंद विधानसभा सीट के सरसंबा बूथ पर बबीता चौधरी का नाम हमें वोटर लिस्ट में मिला।

BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर ने OpIndia को फोन पर बताया कि बबीता का नाम दो जगह दर्ज है – एक कर्नाटक के गुलबर्ग में और दूसरी आलंद में। गुलबर्ग वाले पते पर जाँच की गई तो पता चला कि बबीता ने खुद ही नाम कटवाने का फॉर्म भरा था।

चुनाव आयोग ने साफ कहा कि ऑनलाइन किसी का वोट हटाना नामुमकिन है। हर वोटर को नाम हटाने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाता है। 2023 में आलंद में वोट कटाने की कुछ कोशिशें हुईं थीं, लेकिन वो असफल रहीं। आयोग ने खुद ही इस पर FIR दर्ज कराई और जाँच चल रही है।

आयोग ने करीब 5700 नंबर्स का डेटा कर्नाटक CID को दे दिया था। इनमें से 9 नंबर्स ट्रेस हो चुके हैं, जो महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं।

राहुल गाँधी ने 2022 में 6000 वोट कटने का दावा किया, लेकिन हकीकत ये है कि 2018 में उसी सीट पर BJP सिर्फ 700 वोटों से जीती थी। 2023 में कॉन्ग्रेस 9000 वोटों से धमाकेदार जीत हासिल की। अगर राहुल का दावा सही होता तो कॉन्ग्रेस को 6700 वोटों से हारना पड़ता, लेकिन 30 साल बाद वो सीट जीत ली। ये आँकड़े ही राहुल के दावों की हवा निकाल देते हैं।

वोट लिस्ट से कैसे कटता है नाम?

फॉर्म 7 के माध्यम से किसी का नाम हटाने की अपील की जाती है। बाकायदा फॉर्म में जानकारी भरी होती है। उसकी जाँच आखिर में बीएलओ के पास जाती है। जिसमें बीएलओ इसकी जाँच करता है। इसके बाद एसडीओ के पास मामला जाएगा। इसकी सुनवाई होगी। दस्तावेज जमा किए जाएँगे, इसकी जाँच की जाएगी। व्यक्ति से कारण पूछा जाएगा, इसके बाद नाम काटा जाएगा।

राहुल गाँधी ने जो फॉर्म दिखाए, उसमें बीएलओ का हिस्सा ही नहीं है। बीएलओ की जाँच के बाद ही मामला एसडीओ के पास जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी ने सिर्फ फॉर्म भरे हुए ही दिखाए, एक्शन क्या हुआ, ये बताया ही नहीं।

चूँकि चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि 2023 में आलंद में 6,018 फॉर्म-7 आवेदनों में से सिर्फ 24 वैध थे, बाकी 5,994 फर्जी थे। इनकी जाँच के बाद फरवरी 2023 में ही FIR दर्ज हुई और 6 सितंबर 2023 को कलबुर्गी पुलिस को ऑब्जेक्टर का नाम, मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस और फॉर्म डिटेल्स सौंप दी गईं।

इस मामले को वीडियो के इस जरिए समझ सकते हैं।

आयोग ने ये भी कहा कि चुनाव नतीजों पर आपत्ति हो तो 45 दिनों में हाईकोर्ट में याचिका डाल सकते हैं, लेकिन किसी विपक्षी नेता ने ऐसा नहीं किया। कॉन्ग्रेस ने ज्यादातर मामलों में औपचारिक शिकायत तक नहीं की। ये सब राजनीतिक रणनीति लगती है, जिसका मकसद लोगों को भड़काना और आयोग पर दबाव डालना है।

राहुल ऐसे लोगों को आगे ला रहे हैं जिनके नाम कटाने की कोशिश हुई, लेकिन नाम नहीं कटा। इससे साफ है कि ये अर्धसत्य हैं, पूरी सच्चाई नहीं। आयोग हर बार तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ जवाब दे रहा है। 18 पत्र लिखे गए, 18 महीने बीत चुके, लेकिन कॉन्ग्रेस चुप। कुल मिलाकर राहुल का ‘हाइड्रोजन बॉम्ब’ दावा फुस्स साबित हो गया।(साभार) 

बिहार : सरकार बनने से पहले ही लूट शुरू : ‘माई-बहिन’ के नाम पर 200-200 रूपए वसूल रही RJD, तेजस्वी यादव समेत 4 पर बिहार में FIR

                माई-बहिन योजना के तहत महिलाओं को सरकार बनने पर 2500/रूपए माह देने का वादा किया है
बहुत पुरानी कहावत है "चोर चोरी से हेराफेरी से न जाए", आखिर चारा घोटाले के आरोपी लालू यादव का बेटा तेजस्वी यादव कैसे पीछे रहे। लग गए अभी से लूटमार करने। अगर बिल्ली भाग्यो छीका टूट गया यानि सत्ता हाथ आ गयी बाप की तर्ज पर लूटमार यानि पूत के पांव पालने में ही दिख गए।  

बिहार में RJD की माई-बहिन मान योजना के नाम पर महिलाओं के साथ ठगी किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। दरभंगा जिले में गुड़िया देवी नामक से 2500 रुपए हर महीने मिलने का लालच देकर 200 रुपए की ठगी की गई है। पुलिस ने महिला की शिकायत पर इस मामले में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत 4 नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

माई-बहिन योजना के नाम पर महिलाओं को कैसे ठगा?

ऑपइंडिया ने इस मामले में पीड़िता गुड़िया देवी से बातचीत की है। गुड़िया देवी आशा कार्यकर्ता हैं और पशुपालन का काम करती हैं। उन्होंने इस पूरी घटना को सिलसिलेवार तरीके से बताया है। उन्होंने बताया कि 2-3 दिन पहले RJD का एक कार्यकर्ता उनके पास आया था और उसने माई-बहिन योजना का फॉर्म भरने को कहा था।

गुड़िया देवी ने हमें बताया, “एक आदमी आया और RJD कार्यकर्ता बोलकर हमसे जानकारी माँगने लगा। कहने लगा कि माई-बहिन योजना का फॉर्म भरवा लीजिए, आपको अगले महीने से 2500 रुपए, हर महीने मिलने शुरू हो जाएँगे।”

उन्होंने बताया, “उसने हमसे हमारा मोबाइल लिया और आधार कार्ड व बैंक खाता माँगा। उसने फॉर्म भरने के बाद OTP आने की बात कही थी।” गुड़िया ने आगे बताया, “इसके बाद उसने कहा कि आपको इस फॉर्म के 200 रुपए देने होंगे।”

जब गुड़िया ने उसे ऑनलाइन पैसे देने की बात कही तो युवक ने इनकार कर दिया। इसके बाद गुड़िया ने उसे 200 रुपए नकद दिए जिन्हें लेते ही वह चला गया। कुछ देर बाद जब गुड़िया के पति मिथलेश घर आए तो उन्होंने इसकी जानकारी अपने पति को दी।

गुड़िया ने कहा, “मेरे पति यह बात सुनकर गुस्सा हो गए कि यह फ्रॉड हो सकता है। उन्होंने इस मामले की शिकायत पुलिस में देने को कहा जिसके बाद हमने तेजस्वी यादव और अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत दी।”

‘अब धमका रहे RJD के लोग, बाहर जाने में भी लग रहा डर’

गुड़िया ने बताया कि शिकायत देने के बाद अब RJD के लोग उन्हें शिकायत वापस लेने के लिए धमका रहे हैं। गुड़िया ने कहा, “मैं आशा वर्कर का काम करती हूँ और मुझे घर से बाहर जाना पड़ता है। अब मुझे घर से बाहर निकलने में भी डर लगा रहा है कि कहीं हमारे ऊपर कोई हमला ना कर दे।”

गुड़िया ने अपनी शिकायत में कहा, “घर आए लोगों ने मुझसे और महिलाओं को बुलाने कहा था और सभी महिलाओं से आधार कार्ड, मोबाइल नंबर और 200 रुपया देने को कहा था।”

                                                               गुड़िया द्वारा दी गई शिकायत

शिकायत नहीं लेंगे वापस: गुड़िया के पति

गुड़िया के पति मिथलेश ऑटो चालक हैं। मिथलेश ने ऑपइंडिया से कहा, “मैं ऑटो चलाता हूँ तो बाहर रहना होता है। मुझे भी बाहर जाने में खतरा है, लोगों का दबाव भी है लेकिन अब शिकायत वापस नहीं लेंगे।”

उन्होंने गुस्से भरे लहजे में कहा, “अगर गुंडों से डरकर शिकायत वापस लेनी होती तो शिकायत क्यों ही करते।” उनका कहना है कि उन्हें आधार कार्ड के नंबर माँगने पर शक हुआ था और इससे फ्रॉड होने का पूरा खतरा था।

वहीं, पीड़ित परिवार का कहना है कि गाँव के अन्य लोगों के साथ भी ऐसा फ्रॉड किया गया है लेकिन वो डरे हुए हैं और डर से बाहर आकर अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं।

FIR में तेजस्वी के अलावा किसका नाम?

दरभंगा जिले के सिंघवाड़ा थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 (4), 3 (4) के तहत पुलिस ने FIR दर्ज की है। पुलिस ने इसमें नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के साथ-साथ मशकुर अहमद उस्मानी (पूर्व प्रत्याशी जाले विधान सभा), संजय यादव (सांसद राज्यसभा) और ऋषि मिश्रा (पूर्व विधायक जाले) को आरोपित बनाया है।

FIR में गुड़िया के हवाल से लिखा गया है, “पति (मिथलेश) के बताने पर हम लोगों को पता चला की हम लोग ठगे गए है और उसके पीछे RJD के बड़े कद्दावर नेता का हाथ है उनके ही द्वारा मासूम जनता को ठगने की योजना बनाई गई है।”

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR का हिस्सा

पुलिस ने क्या बताया?

ऑपइंडिया ने इस मामले में सिंघवाड़ा थाने के SHO बसंत कुमार से भी बात की है। बंसत कुमार ने बताया कि FIR दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी गई है। उनका कहना है कि जल्द से इससे जुड़े लोगों से पूछताछ की जाएगी। पुलिस को इस मामले में और पीड़ित मिलने का भी शक है।

पहले भी मिली हैं माई-बहिन योजना को लेकर शिकायतें

बिहार में इस योजना के लॉन्च होने के बाद से ही यह विवादों में है। कभी इसे लेकर RJD-कॉन्ग्रेस में राजनीति रस्सा-कशी की शिकायतें मिलीं तो कहीं लोगों को बरलाए जाने के आरोप लगे हैं। इससे पहले सामने आया था कि आरजेडी और कॉन्ग्रेस ने माई बहिन मान योजना के फॉर्म भरवाने के लिए जिन लोगों को काम पर लगाया है, उनके पास कोई अथॉरिटी नहीं है।

अवलोकन करें:-

जिस तरह कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में महिलाओं को ‘धोखा’ दिया था, वैसी ही RJD की तैयारी : माई-बहिन योज
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ये लोग बिहार में लोगों के पास जाकर उनसे आधार कार्ड माँग रहे थे, NDA के नेताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। जिसके बाद यह योजना लगातार विवादों में है। इसे बीजेपी के नेताओं ने बड़ा घोटाला बताया है।