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US-इजरायल ने ईरान में 30 ठिकानों को बनाया निशाना, राष्ट्रपति के आवास और इंटेलिजेंस मुख्यालय पर भी हमला: ‘सुरक्षित ठिकाने’ पर छिपे खामेनई

                                            ईरान के 30 ठिकानों पर हमला (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
अमेरिका और इजरायल ने शनिवार (28 फरवरी 2026) को ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया। राजधानी तेहरान में एक के बाद एक कई जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं जिससे पूरे शहर में दहशत का माहौल बन गया। US और इजरायल ने ईरान में एक साथ 30 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन हमलों में ईरानी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास और एक खुफिया मुख्यालय को भी निशाने पर लिया गया है। हमले इतने व्यापक थे कि कुछ ही घंटों में कई प्रमुख जगहों पर धमाकों की खबरें सामने आईं। वहीं, रॉयटर्स को एक सूत्र ने बताया कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनई तेहरान में नहीं हैं और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया गया है।

ईरानी अखबार Shargh की रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान के उस इलाके से धुआँ उठता दिखाई दिया है जहाँ ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई रहते हैं। तेहरान के कई स्थानीय निवासियों ने भी बताया कि उसी क्षेत्र से धुआँ उठता देखा गया जहाँ राष्ट्रपति भवन और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का मुख्यालय भी स्थित है।

ये हमले शनिवार सुबह हुए उस समय हुए जब लाखों लोग अपने काम पर थे और बच्चे स्कूल में मौजूद थे। तेहरान के लोगों ने शहर में अफरातफरी और दहशत जैसे हालात होने की बात कही है। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका की ओर से दर्जनों हवाई हमले किए जा रहे हैं। इन हमलों को मध्य पूर्व के विभिन्न सैन्य ठिकानों और एक या उससे अधिक विमानवाहक पोतों से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमानों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई पिछले साल जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए अमेरिकी हमलों से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है।

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

                                                                                           प्रतिकात्मक तस्वीर ( फोटो साभार-chatgpt)
जॉर्ज सोरोस जितना पैसा भारत को अस्थिर करने में बर्बाद कर रहा है अगर यही पैसा गरीबों पर खर्च करता इतिहास में स्वर्णमयी अक्षरों में नाम लिखा जाता, लेकिन सोरोस देशों को अस्थिर करने में अपनी शान समझ रहा है। जब भारतीय नेताओं को फंडिंग कर उसको उतनी मदद नहीं मिल रही तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता को निशाने पर ले रहा है। जिसे देख लगता है बुढ़ापे में अपनी दुर्गति करवाकर ही दुनिया से जाएगा। आखिर 
हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को क्यों निशाने पर लिया जा रहा है? अगर RSF ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर हमला करना बंद नहीं किया इसके बहुत भयंकर अंजाम होंगे।   

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

 भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।
फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।
यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।
ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।
सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।
सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।
भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’
इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।
स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।
लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।
CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।
OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।
RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।
पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।
यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।
इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।
ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।
ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।
इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।
यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।
रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।
सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।
जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।
आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।
ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।
*पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।
*कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।
*’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।
स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।
इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।
यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।
इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।
यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।
1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।
2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।
3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।
जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।
OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।
एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

रट्टू तोते की तरह भाई राहुल की बातों को दोहरा रही प्रियंका गाँधी, फिर से EC को बनाया निशाना

                           राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी (साभार - पीटीआई और एसजीटी टाइम्स)
बिहार के रीगा विधानसभा क्षेत्र में 6 नवंबर 2025 को कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा ने चुनाव आयोग (ECI) पर सीधा हमला बोलते हुए वही राग अलापा जो उनके भाई राहुल गाँधी पहले से गा रहे हैं।
भागवत गीता में लिखा है "विनाश काल विपरीत बुद्धि" जो INDI गठबंधन पर सटीक बैठता है। जितना वोट चोरी का रोना रोया जायेगा उतना ही उल्टा असर हो रहा है। राहुल तो कांग्रेस को बर्बाद करने के लिए बहुत था लेकिन प्रियंका के आने बहुत जल्दी कांग्रेस अपने अंजाम पर पहुँचने वाली है या यूँ भी कह सकते "बर्बाद करने को एक ही उल्लू काफी है, यहाँ(मतलब कांग्रेस) हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा।"       

प्रियंका ने सभा में दावा किया कि हाल ही में समाप्त हुए विशेष मतदाता सूची संशोधन के दौरान बिहार में 65 लाख मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटा दिए गए। उन्होंने देश के वरिष्ठ चुनाव अधिकारियों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के नाम लेकर जनता से पूछा कि क्या उन्होंने कभी इनके नाम सुने हैं और खुद ही कहा, “आपने इनके नाम कभी नहीं सुने होंगे, क्योंकि ये सब अपनी कुर्सियों और आयोग के पीछे छिपते रहते हैं।”

प्रियंका ने आगे कहा कि ये वही लोग हैं जो “देश के संविधान और लोकतंत्र से खिलवाड़ कर रहे हैं।” उन्होंने लोगों से अपील की कि इन अधिकारियों के नाम याद रखें क्योंकि “इन्हीं के कारण जनता के अधिकारों से खिलवाड़ हो रहा है।”

दरअसल, प्रियंका गाँधी के ये आरोप उनके भाई राहुल गाँधी की बयानबाजी की तर्ज पर हैं। राहुल गाँधी ने अगस्त 2025 में चुनाव आयोग के अधिकारियों को खुलेआम धमकी दी थी कि अगर कॉन्ग्रेस सत्ता में आई तो उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने आरोप लगाया था कि कर्नाटक की मतदाता सूची में चुनाव आयोग ने वोट चोरी की, लेकिन कोई सबूत नहीं दिया। हाल ही में राहुल ने हरियाणा चुनाव को लेकर भी यही आरोप दोहराया।

चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से इन आरोपों के लिए औपचारिक शिकायत दर्ज करने को कहा था, ताकि तथ्यों की जाँच की जा सके। लेकिन राहुल गाँधी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राहुल गाँधी को मालूम था कि उनके आरोप सबूतों की कसौटी पर टिक नहीं पाएँगे, इसलिए उन्होंने कोई आधिकारिक शिकायत नहीं की।

यह पहली बार नहीं है जब गाँधी परिवार ने हार की झुंझलाहट चुनाव आयोग पर निकाली हो। 2019 में भी राहुल गाँधी ने संवैधानिक संस्थाओं, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और RBI पर समझौते के आरोप लगाए थे, लेकिन तब भी वो अपने दावों को साबित नहीं कर पाए थे।

अब प्रियंका गाँधी ने उसी पुराने ‘वोट चोरी’ नैरेटिव को दोहराते हुए न केवल चुनाव आयोग बल्कि उसके वरिष्ठ अधिकारियों को भी निशाने पर लिया है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कॉन्ग्रेस अब हार से पहले ही बहाने गढ़ने में लग गई है?

पवित्र पहाड़ी पर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आने पर मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया The News Minute

                                           थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

                                            (फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

                                                          साभार- आउटलुक ट्रेवलर

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

कांग्रेस को रिमोट से चलने वाले खड़के नहीं, अपनी बुद्धि से चलने वाले शशि थरूर जैसे अध्यक्ष की जरुरत है; राहुल गांधी के चाचा संजय गाँधी पर शशि थरूर का सीधा निशाना, इमरजेंसी के ‘सच का सामना’ कराने पर क्या राहुल एक्शन लेंगे?

काफी समय से कांग्रेस में परिवार से बाहर अध्यक्ष की मांग उठती रही है, गाँधी परिवार के रिमोट से चलने वाले अध्यक्ष की जरुरत नहीं। राजेश पायलट, माधवराव सिंधिया आदि प्रतिभा धनी नेताओं को पार्टी अध्यक्ष बनाने वालों की अगर कमी नहीं तो परिवारभक्तों की भी कमी नहीं। सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के चक्कर तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को उठाकर बाहर फेंकना जो भारी पड़ा है उस चोट से कांग्रेस आज तक उभर नहीं पायी। 

कांग्रेस की हो रही दुर्गति के लिए परिवारभक्त गुलाम जिम्मेदार हैं। और इसकी सबसे बड़ी मिसाल अभी कुछ दिन पहले कर्नाटक में देखने को मिला। जब वहां चल रहे मुख्यमंत्री पर चल रहे विवाद पर अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के का यह कहना कि फैसला हाई कमांड करेगा। अब इस गुलाम खड़के से पूछो कि पार्टी अध्यक्ष से बड़ा हाई कमांड कौन होता है? अगर हर फैसला हाई कमांड यानि गाँधी परिवार को ही करना है तो फिर क्यों अध्यक्ष बने घूमकर सबको पागल बना रहे हो। इसे कहते हैं गुलामी मानसिकता।  
तिरुवनंतरपुरम से सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर अब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी हाईकमान को खुलकर ‘सच का सामना’ कराने में लगे हैं। थरूर ने पहले पीएम मोदी और उनकी सरकार के कामों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। फिर ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का गुणगान वैश्विक स्तर पर किया। और अब थरूर ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए आपातकाल की खुलकर निंदा की है और इसे भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया है। इतना ही नहीं थरूर ने राहुल गांधी के चाचा संजय सिंह पर भी निशाना साधा है। मलयालम भाषा के अखबार ‘दीपिका’ में प्रकाशित अपने एक लेख में शशि थरूर ने कहा कि अनुशासन और व्यवस्था के लिए उठाए गए कदम जब आपातकाल जैसी क्रूरता में बदल जाते हैं, उन्हें किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने अपने लेख में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान को ‘क्रूरता का सर्वोच्च उदाहरण’ बताया। उन्होंने लिखा, “गरीब ग्रामीण इलाकों में लक्ष्य पूरा करने के लिए हिंसा और दबाव का सहारा लिया गया, जो क्रूरता की पराकाष्ठा थी।

पहले भी द हिंदू के लेख और एक्स पर पोस्ट कर दिखाया आईना
सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने पिछले दिनों से ‘सत्य का मार्ग’ पकड़ लिया है, जो झूठ के आडंबर पर बैठे कांग्रेस के आला नेताओं को सुहा नहीं रहा है। दरअसल, कांग्रेस में वैसे ही काबिल लोगों की बहुत कमी है। एक-दो बचे हैं, उनकी काबिलियत की कद्र कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को नहीं है। यही वजह है कि उनकी पटरी खरी-खरी और सही बात कहने वाले अपनी ही पार्टी के सांसद शशि थरूर के नहीं बैठ रही है। कांग्रेस सांसद ने पहले द हिंदू में लेख लिखकर कांग्रेस हाईकमान को आईना दिखाया था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की समझ में नहीं आया। खरगे ने तब थरूर पर तंज करते हुए कहा, “मैं अंग्रेजी पढ़ नहीं सकता, लेकिन थरूर की लैंग्वेज बहुत अच्छी है। हमारे लिए देश पहले है, लेकिन कुछ लोगों के लिए मोदी फर्स्ट हैं।” इसके जवाब में शशि थरूर शानदार तरीके से गेंद कांग्रेस के पाले में ही डाल दी है। खरगे के राजनीतिक बयान पर शशि थरूर की साहित्यिक प्रतिक्रिया दी। दार्शनिक भाव के साथ एक्स पर यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से भी एकदम दुरुस्त है। इसमें खरगे ही नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए भी साफ-साफ, मगर सख्त संदेश दे दिया था।

अब राहुल गांधी के साथ उनकी दादी और चाचा संजय को बनाया निशाना
कांग्रेस सांसद ने एक बार फिर मलयालम भाषा के अखबार ‘दीपिका’ में लेख लिखा है। इस बार निशाना मल्लिकार्जुन नहीं, बल्कि राहुल गांधी के साथ उनकी दादी और चाचा बने हैं। उन्होंने साफ-साफ आपातकाल की निंदा करते हुए कहा है कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। थरूर ने आपातकाल की निंदा की है और इसे भारत के इतिहास का एक काला अध्याय बताया है। शशि थरूर ने कहा कि कैसे आजादी खत्‍म की जाती है, ये 1975 में सभी ने देखा। लेकिन आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। कांग्रेस नेता शशि थरूर का यह लेख उनकी पार्टी के नेताओं को फिर असहज कर सकता है। यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी शशि थरूर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों की तारीफ कर चुके हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अन्‍य देशों में भारत का पक्ष रखने के लिए जो सांसदों की टीम बनाई गई थी, उसमें कांग्रेस सांसद शशि थरूर भी शामिल थे। शशि थरूर ने विदेशी धरती पर मोदी सरकार का जमकर समर्थन किया था।

आपातकाल को भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा है कि आपातकाल को भारत के इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में ही याद नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके सबक को पूरी तरह से समझा जाना चाहिए। मलयालम दैनिक दीपिका में आपातकाल पर प्रकाशित एक लेख में थरूर ने 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के काले दौर को याद किया और कहा कि अनुशासन और व्यवस्था के लिए किए गए प्रयास अक्सर क्रूरता के ऐसे कृत्यों में बदल जाते थे, जिन्हें किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि सत्ता को केंद्रित करने, असहमति को दबाने और संविधान को दरकिनार करने का असंतोष आपातकाल के दौरान कई रूपों में फिर सामने आया था।

संजय गांधी का जबरन नसबंदी अभियान क्रूरता की पराकाष्ठा
तिरुवनंतपुरम के सांसद ने राहुल गांधी के चाचा संजय गांधी पर भी सीधा निशाना साधते हुए लिखा, “इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने जबरन नसबंदी अभियान चलाया, जो इसका एक कुख्यात उदाहरण बन गया। थरूर के अनुसार, यह अभियान मनमाना और क्रूर फैसला था, जिसने लोगों के जीवन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला। गरीब ग्रामीण इलाकों में, मनमाने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हिंसा और ज़बरदस्ती का इस्तेमाल किया गया. नई दिल्ली जैसे शहरों में, झुग्गियों को बेरहमी से ध्वस्त और साफ़ किया गया। हज़ारों लोग बेघर हो गए। उनके कल्याण पर ध्यान नहीं दिया गया।” शशि थरूर ने कहा कि लोकतंत्र को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यह एक अनमोल विरासत है, जिसे निरंतर पोषित और संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्‍होंने कहा, ‘इसे हर जगह के लोगों के लिए एक स्थायी प्रेरणा स्रोत के रूप में काम करने दें।”

आज का भारत आत्मविश्वासी, विकसित और अधिक मज़बूत
उन्‍होंने कहा कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। आज हम अधिक आत्मविश्वासी, अधिक विकसित और कई मायनों में अधिक मज़बूत लोकतंत्र हैं। फिर भी आपातकाल के सबक चिंताजनक तरीकों से प्रासंगिक बने हुए हैं। थरूर ने चेतावनी दी कि सत्ता को केंद्रीकृत करने असहमति को दबाने और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का लालच कई रूपों में सामने आया था। उन्होंने कहा, “अक्सर ऐसी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीय हित या स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया जाता है। इस लिहाज से आपातकाल एक कड़ी चेतावनी है। लोकतंत्र के रक्षकों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए।” थरूर ने कहा कि अक्सर ऐसे कार्यों को देशहित या स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया जाता है। इस अर्थ में, इमरजेंसी एक चेतावनी के रूप में खड़ी है। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि लोकतंत्र के संरक्षकों को हमेशा सतर्क रहना होगा।

जिसको जो लिखना है लिखे, हम उसमें दिमाग नहीं लगाना चाहते-खरगे
अब कांग्रेस सासद शशि थरूर का क्या होगा? यह सवाल कांग्रेस में कई लोग पूछ रहे हैं। अभी तक कांग्रेस के कुछ प्रवक्ता थरूर पर सवाल उठा रहे थे। कोई उन्हें बीजेपी का प्रवक्ता तो कोई विदेश मंत्री बनाने की बात कह रहा था। तो कोई उन्हें अपने तथ्य ठीक करने की सलाह दे रहा था। मगर, बात अब कांग्रेस अध्यक्ष तक आ चुकी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जब थरूर के बारे में बार-बार सवाल पूछा गया तो उन्हें थरूर पर अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी। जब खरगे से पूछा गया कि थरूर सरकार की तारीफ कर रहे हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष का जवाब था, “हमने तो पहले ही कहा कि देश का मामला है, हम सेना और सरकार के साथ हैं।” जब खरगे से पूछा गया कि थरूर सरकार की तारीफ में लिख रहे हैं तो जबाब मिला कि जिसको जो लिखना आता है, वो लिखेगा। हम उसमें अपना दिमाग नहीं लगाना चाहते… हम क्यों डरेंगे, वो क्या कह रहे हैं..वो अपनी इच्छा के अनुसार बोल रहे हैं। मेरे लिए देश का हित सबसे ऊपर है और हम उसी के अनुसार काम कर रहे हैं।

पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और थरूर के तनावपूर्ण रिश्ते 
कांग्रेस के साथ मल्लिकार्जुन खरगे तनावपूर्ण रिश्ता वैसे ही बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ ताजा तकरार भी वैसा ही नमूना है। नीलांबुर उपचुनाव को लेकर शशि थरूर और कांग्रेस की नोक-झोंक देखी जा चुकी है, केरल विधानसभा चुनाव तक तस्वीर और भी साफ हो जाएगी। मल्लिकार्जुन ने एक सवाल के जवाब में बोल दिया कि कुछ लोगों के लिए प्रधानमंत्री मोदी पहले हैं, और देश बाद में आता है। जैसे मल्लिकार्जुन ने अपनी टिप्पणी में थरूर का नाम नहीं लिया। वैसे ही शशि थरूर ने भी एक्स पर की अपनी प्रतिक्रिया में किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन खरगे, कांग्रेस और राहुल गांधी को तगड़ा जवाब जरूर दे दिया।

An excellent and remarkably candid discussion with Konstantin Iosifovich Kosachev, Deputy Chairman of the Federation Council (the Upper House). Ranged from #OperationSindoor to regional geopolitics and relations between our Parliaments. A first-rate exchange of views pic.twitter.com/MVESSWERPB

ऑपरेशन सिंदूर पर थरूर की नाराजगी के बाद कोलंबिया ने बदले सुर
ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंक के चेहरे को बेनकाब करने के लिए शशि थरूर के नेतृत्व में जो डेलिगेशन कोलंबिया सहित की देशों में गया था। उसके काफी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। भारत की ओर से पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए किए गए हमलों के बाद से कोलंबिया ने पाकिस्तान के प्रति संवेदना जताई थी, लेकिन जब शशि थरूर डेलिगेशन ने इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जताई तो कोलंबिया को सुर बदलने पड़े। कोलंबिया की ओर से आधिकारिक तौर पर अपना बयान वापस ले लिया है। पहले इस मामले पर बात करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा था कि हम कोलंबिया सरकार की प्रतिक्रिया से निराश हैं। वहीं, डेलीगेशन से मुलाकात के बाद कोलंबिया की उप विदेश मंत्री योलांडा विलाविसेनियो ने कहा कि हमें सही स्पष्टीकरण मिला है। कश्मीर में जो कुछ हुआ उसके बारे में अब हमारे पास जो जानकारी है, उसके बेस पर हम बातचीत जारी रखेंगे। साथ ही हम अपना पिछला बयान वापस लेते हैं। इस दौरान शशि थरूर ने आगे कहा कि हमें अभी भी महात्मा गांधी की जमीन पर गर्व है। कोलंबिया के बयान वापस लेने के बाद ये संदेश गया है कि ये भारत की यह बड़ी कूटनीतिक जीत है। विदेशी दोरों से वापस आए डेलीगेशन्स ने पीएम मोदी से भी मुलाकात की थी।

आतंकवाद पर रूसी सम्मेलन में पाकिस्तान को बुलाने पर कड़ी आपत्ति
कांग्रेस सांसद थरुरू विदेश दौरे के लिए बने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वाली मुहिम को अब भी रशिया में भी जारी रखे हुए हैं। मास्को में शशि थरूर की रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात हुई है। विदेश मामलों पर संसद की स्थायी समिति के प्रमुख शशि थरूर ने रूसी संघ परिषद की अंतरराष्ट्रीय मामलों की समिति के फर्स्ट चेयर आंद्रेई डेनिसोव से भी मुलाकात की है, जो संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत रह चुके हैं। बताने वाली बात ये है कि थरूर वहां पाकिस्तान का ही पर्दाफाश कर रहे हैं। लेकिन, हिंदी या अंग्रेजी में नहीं बल्कि फ्रेंच भाषा में। थरूर ने रूसी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष लियोनिद स्लटस्की के साथ मॉस्को में हुई एक मीटिंग में पाकिस्तान को लेकर कही। रूस में अगले साल आतंकवाद पर एक सम्मेलन करने वाला है। जिसमें भारत और पाकिस्तान सहित कई देशों को बुलाया गया है। शशि थरूर ने ऐसे सम्मेलन में पाकिस्तान को शामिल किये जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। दरअसल, थरूर भले ही निजी दौरे पर रूस गये हैं, लेकिन विदेश दौरे के लिए बने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वाली मुहिम वो अब भी जारी रखे हैं। पाकिस्तान को आतंकवाद पर सम्मेलन में शामिल किये जाने पर उनकी आपत्ति तो यही बताती है।

‘ये एक ऐसा इलाज जो बीमारी से भी बदतर’: फेसबुक पर सेंसरशिप लगाने के लिए पहुँचे रोहिंग्या को हाईकोर्ट का दो टूक जवाब "नहीं"

यह केवल भारत में ही संभव है, जहां रोहिंग्या और घुसपैठियों को तुष्टिकरण करने वाली पार्टियां तो अपनी कुर्सी और रोजी-रोटी की खातिर समर्थन करती हैं, शाहीन बाग बनाते हैं, लेकिन वकीलों को तो ऐसी कोई समस्या नहीं। जिन रोहिंग्यों को कोई मुस्लिम देश रखने को तैयार नहीं, फिर भारत में इनके समर्थन में खड़े होने वालों को क्या संज्ञा दी जाए? 
दिल्ली हाईकोर्ट में 2 रोहिंग्या मुस्लिमों ने याचिका दायर की थी कि फेसबुक पर रोहिंग्याओं से नफरत दिखाने वाले वीडियो और कंटेंट के प्रचार-प्रसार पर रोक लगाया जाए, क्योंकि फेसबुक इसको बढ़ावा देकर पैसे कमाता है। इसके लिए कोर्ट आदेश दे कि ऐसे कंटेंट को प्रसारित करने की अनुमति न दी जाए। याचिका में उन्होंने आरोप लगाया है कि फेसबुक पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ नफरत भरे भाषण को बढ़ावा दिया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं ने माँग की है कि फेसबुक को इस नफरत भरे भाषण को हटाने और रोहिंग्या समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया जाए।

याचिका में कहा गया था कि फेसबुक पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ नफरत भरे भाषण के कई उदाहरण हैं। इनमें रोहिंग्याओं को ‘आतंकवादी’, ‘घुसपैठिए’ और ‘भारतीयों के लिए खतरा’ कहा गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के भाषण रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की।

‘लाइव लॉ’ की खबर के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने कहा कि यह सुझाव कि फेसबुक पर रोहिंग्याओं पर किसी भी कंटेंट के पब्लिश होने से पहले सेंसरशिप होनी चाहिए, ये ‘एक ऐसे उपचार का उदाहरण है जो बीमारी से भी बदतर है।’ इसके साथ ही हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को फेसबुक इंडिया को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ ‘घृणित और हानिकारक सामग्री’ को बढ़ावा देने से रोकने का निर्देश देने से इनकार कर दिया है।

हाई कोर्ट ने कहा, ‘आईटी नियम, 2021 के अनुसार सभी लोगों के पास किसी भी शिकायत की अनुमति है, इसके अनुसार सरकार कार्रवाई करती है। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कंटेंट के प्रकाशित होने से पहले ही रोक लगाने की माँग की है, जो नियमों के अनुसार गलत है। ये तो किसी बीमारी से भी बदतर उसके इलाज जैसी बात है।” कोर्ट ने कहा कि सरकार को ऐसी शक्ति मिल जाने से समस्याएँ ही बढ़ेंगी।

इसी के साथ हाईकोर्ट ने फेसबुक के खिलाफ 2 रोहिंग्या शरणार्थियों मोहम्मद हमीम और कौसर मोहम्मद की याचिका का निपटान कर दिया। इसमें फेसबुक के एल्गोरिदम की शिकायत करते हुए कहा गया था कि फेसबुक पैसा बनाने के लिए रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कंटेंट को बढ़ावा देता है। लेकिन, कोर्ट ने कहा कि फेसबुक के खिलाफ माँगी गई राहतें बरकरार रखने योग्य नहीं हैं, क्योंकि रिट याचिका में ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अधिकारी आईटी नियम 2021 के तहत अपने वैधानिक दायित्वों का पालन करने में विफल रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि फेसबुक एक बड़ी सोशल मीडिया कंपनी है। इसकी पहुँच दुनिया भर में है। ऐसे में, फेसबुक पर नफरत फैलाने वाले भाषण का असर भी बहुत बड़ा होता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फेसबुक को नफरत फैलाने वाले भाषण को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए।

वहीं, फेसबुक का कहना है कि उनकी कंपनी नफरत फैलाने वाले भाषण को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। कंपनी के पास नफरत फैलाने वाले भाषण को पहचानने और हटाने के लिए तकनीक है। हालाँकि, कंपनी का कहना है कि यह पूरी तरह से नफरत फैलाने वाले भाषण को रोकना संभव नहीं है। फेसबुक ने यह कहते हुए याचिका खारिज करने की माँग की थि कि इसमें इस बात का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा लगाए गए दिशानिर्देश कैसे अप्रभावी हैं, क्योंकि याचिकाकर्ता ने एक भी ऐसा उदाहरण नहीं दिया।

‘अपनी नहीं तो तुम्हारी बीवी को बना देता मुख्यमंत्री?’: नित्यानंद राय पर भड़के लालू यादव

                         लालू प्रसाद यादव ने नित्यानंद राय पर साधा निशाना (फोटो साभार : X_ANI)
चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव भारत के सबसे बड़े परिवारवादी और घोटालेबाज राजनेताओं में गिने जाते हैं। 9वीं और 11वीं तक पढ़े लड़कों को बिहार का उप-मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री बनाने वाले लालू प्रसाद यादव ने कभी अपनी अनपढ़ पत्नी को बिहार का मुख्यमंत्री भी बनाया था। अब लालू प्रसाद यादव ये कहकर अपने परिवारवाद का बचाव कर रहे हैं कि वो अपनी पत्नी को नहीं, तो क्या नित्यानंद राय की पत्नी को मुख्यमंत्री बनाते।

क्या नित्यानंद राय की बीवी को मुख्यमंत्री बनाना?

लालू यादव ने केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय को गाय-भैंस कटवाने का कारोबारी भी बता दिया। लालू यादव ने दावा किया कि नित्यानंद राय आरजेडी में शामिल होने के लिए उनके पास आए थे। उन्होंने कहा कि वे काफी अप्रोच भी किए थे। बीजेपी ने उन्हें यादवों का मुख्यमंत्री बनाने की बात की थी। लालू यादव ने कहा कि वो लोग आरोप लगाते हैं कि लालू यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। अगर लालू यादव राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री नहीं बनाते तो क्या तुम्हारी बीवी को मुख्यमंत्री बनाते?

राबड़ी नहीं होती, तो आज की हमारी सरकार भी नहीं होती

लालू यादव ने कहा कि राबड़ी देवी नहीं होती तो आज RJD की हमारी सरकार नहीं होती। बिहार में नीतीश-तेजस्वी की सरकार नहीं बनी होती। उन्होंने कहा कि भाजपा में यादव के नाम पर कंस जुटे हुए हैं। उन्होंने कहा कि यादवों को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन बिहार में 75 प्रतिशत का आरक्षण RJD ने दिलाया है। उन्होंने कहा कि पहले कमजोर लोगों को वोट ही नहीं करने दिया जाता था, लेकिन अब सबकी भागीदारी बढ़ रही है।

21 हजार यदुवंशियों ने भाजपा ज्वॉइन किया

बिहार में भाजपा यदुवंशी सम्मेलन करा रही है। गोवर्धन पूजा के मौके पर 21 हजार यदुवंशी भाजपा से जुड़े। नित्यानंद राय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘विकास की गंगा’ हर समाज, हर वर्ग, हर घर, हर गाँव और हर शहर तक पहुँची है। इसका हर समाज पर प्रभाव पड़ा है। भाजपा मिलकर काम करती है।” उन्होंने कहा कि हमारे प्रतिद्वंद्वी आरजेडी के लोग हिंदू देवी-देवताओं को गाली देते हैं। इससे लोगों को दुख होता है। 15 साल तक लालू यादव ने न तो काम किया, न ही यादव समाज का विकास किया। इसीलिए यदुवंशी भाजपा के साथ आ रहे हैं।
चारा घोटाले में फँसने के बाद लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हुए मुख्यमंत्री बना दिया था और रिमोट कंट्रोल के जरिए बिहार पर शासन चलाया था।

राहुल गाँधी ने फिर किया हिन्दू धर्म का अपमान, ‘ये देश पुजारियों का नहीं है’: महाभारत पर भी बाँचा उलटा-पुलटा ज्ञान

                        'भारत जोड़ो यात्रा' में राहुल गाँधी ने किया हिन्दू धर्म का अपमान (फाइल फोटो)
राहुल गाँधी फ़िलहाल ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर हैं। इस दौरान उनके द्वारा कई ऐसी हरकतें की गई हैं, जिन्हें लोगों ने हिन्दू धर्म का अपमान बताया है। अब राहुल गाँधी ने पुरोहितों पर विवादित बयान दिया है। साथ ही महाभारत का भी उलटा-पुलटा उदाहरण दे डाला। इसके बाद उन पर न सिर्फ ब्राह्मणों के प्रति नफरत फैलाने, बल्कि हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों की गलत व्याख्या कर दुष्प्रचार करने के आरोप भी लग रहे हैं।

जबकि कांग्रेस पुजारी का अर्थ मंदिर पुजारियों की बजाए मोदी पुजारियों(अंधभक्ति) से है, बता रहे हैं। अब कांग्रेस के इसी अर्थ को समझ लिया जाए तो कांग्रेस में ही परिवार भक्ति इतनी अधिक है, जिस पर जितना लिखा जाए, उतना ही कम है। सन्दर्भ में फिल्म "वक़्त" का यह संवाद "चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के होते हैं, दूसरों के घर पत्थर नहीं फेंकते" ठीक बैठता है। 

राहुल गाँधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “ये देश तपस्वियों का है, ये देश पुजारियों का नहीं है। वास्तविकता इस देश की यही है।” इस पर लोग राहुल गाँधी से पूछ रहे हैं कि उन्हें पुजारियों से इतनी घृणा क्यों हैं? साथ ही सवाल उठ रहा है कि हिन्दू धर्म का बार-बार अपमान कर के कांग्रेस नेताओं को आखिर क्या मिलता है? लोग कह रहे हैं कि अब राहुल गाँधी को पुजारियों से भी दिक्कत है। कुछ लोग पूछ रहे हैं कि पुजारियों ने आखिर उनका क्या बिगाड़ा है?

भारत में हजारों मंदिर हैं और लगभग सभी में कोई न कोई एक पुजारी होते हैं। बड़े मंदिरों में कई पुजारी होते हैं। उन्हें शास्त्र का ज्ञान होता है और वो पूजा-पाठ करते व कराते हैं। गाँवों के मंदिरों के पुजारी गरीब होते हैं, जिनके परिवार का पालन-पोषण उन्हें मिलने वाली दक्षिणा पर निर्भर करता है। कई राज्यों में मस्जिदों के इमामों को वेतन मिलता है, लेकिन पुजारियों को कोई नहीं पूछता। अगर पुजारी न रहें तो मंदिर की देखभाल और प्रबंधन से लेकर समय-समय पर पूजा-आरती कैसे होगी?

अब भगवद्गीता और महाभारत पर राहुल गाँधी का ज्ञान सुनिए, “जब अर्जुन मछली की आँख में तीर मार रहा था, तो क्या उसने कहा कि इसके बाद मैं क्या करूँगा? कहा था क्या? नहीं कहा था न? उस कहानी का मतलब गीता में भी है – काम करो, फल की चिंता मत करो।” बता दें कि ‘मत्स्य भेदन’ की प्रतियोगिता की द्रौपदी के स्वयंवर और शादी के लिए हुई थी। अर्जुन को पता था कि लक्ष्य पर निशाना लगाने के बाद क्या होने वाला है।

हाल ही में राहुल गाँधी पर राजनीति के लिए बच्चे के इस्तेमाल का आरोप लगा था। इस विवाद का कारण एक तो यह था कि भयंकर ठंड के बाद भी बच्चे ने कपड़ा नहीं पहना हुआ था। वहीं, दूसरा यह कि बच्चे ने उल्टा जनेऊ पहना हुआ था। ट्वीट करने के कुछ घंटे बाद ही, इसे डिलीट कर दिया गया। भाजपा नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने लिखा था, “4 डिग्री तापमान में राजनीति के लिए एक बच्चे को कपड़े उतार के घुमाना एक बेशर्म ही कर सकता है।”

‘हिंदुओं को भगाएँ मुस्लिम मुल्क, भारत और भारतीय उत्पादों का करें बहिष्कार’: अलकायदा के ‘वन उम्माह’ में टारगेट पर PM मोदी और नूपुर शर्मा

                       अल-कायदा की पत्रिका 'वन उम्माह' में पैर की मोहर के साथ पीएम मोदी की छपी तस्वीर
आतंकी संगठन अलकायदा (Al Qaeda) ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद से संबंधित की गई टिप्पणी को लेकर एक बार फिर भारत पर निशाना साधा है। ‘वन उम्माह (One Ummah)’ नाम की पत्रिका के पाँचवें अंक में आतंकी संगठन ने सभी मुस्लिम देशों से भारत और भारतीय उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील की है। इसके साथ ही आतंकी संगठन ने अरब देशों में काम करने वाले सभी हिंदुओं को देश से बाहर निकालने की आह्वान किया है।

आतंकी संगठन की आधिकारिक मीडिया शाखा या मुखपत्र ‘अस-सहाब’ ने त्रैमासिक पत्रिका ‘वन उम्माह’ का पाँचवा संस्करण जारी किया है। पत्रिका के एक भाग में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा गया है। साथ ही पत्रिका ने नूपुर शर्मा के बयान के बहाने मुस्लिमों को भारत के खिलाफ एकजुट होने के लिए कहा गया है। लेख में पीएम मोदी की तस्वीर को अपमानजनक तरीके से पैर की मोहर के साथ छापा गया है।

अलकायदा के लेख में कहा गया है, “भारत की हिंदू सरकार मुस्लिम दुनिया की चुप्पी से उत्साहित थी और इस बार हद पार कर पैगंबर का अपमान कर दिया।” इसके साथ ही आतंकी संगठन ने कश्मीर घाटी में आतंकी हमलों को अंजाम देने में मुस्लिम देशों की मदद भी माँगी है।

                             आतंकवादी संगठन द्वारा प्रकाशित भारत सरकार पर निशाना साधते हुए लेख

पत्रिका में आगे कहा गया है, “हम अपनी नेक उम्माह को इस हिंदू सरकार के खिलाफ एकजुट होने और भारत में हमारे भाइयों और बहनों की मदद करने के लिए आमंत्रित करते हैं, ताकि अल्लाह के दुश्मन हमारे पैगंबर के खिलाफ इस तरह के अपमानजनक अपराध को दोहराने की हिम्मत न कर सकें।”

पत्रिका के अनुसार, “हम सभी मुस्लिमों, विशेष रूप से व्यापारियों को भारतीय उत्पादों का बहिष्कार करने, हिंदू कर्मचारियों को मुस्लिम देशों से बाहर निकालने का आह्वान करते हैं।” पत्रिका में हिंदुओं की तुलना यहूदियों से की गई है और देश में कथित तौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाने का आरोप लगाया गया है।

बकौल ‘वन उम्माह‘, भारतीय शासक वर्ग में हमेशा इस्लाम के प्रति अनादर और घृणा व्यक्त करने की प्रवृत्ति रही है। भारतीय शासक का मुस्लिमों के जबरन विस्थापन, उन्हें सालाखों के पीछे धकेलने, जेलों में यातना देने और मुस्लिम समुदाय को बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित करने का आपराधिक रिकॉर्ड है। पत्रिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिस तरह से यहूदियों ने फिलीस्तीनियों के साथ आपराधिक व्यवहार किया है, उससे भारत अलग नहीं हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि ‘भारत की हिंदू सरकार मुस्लिम देशों की चुप्पी से प्रोत्साहित हुई और पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया’। पत्रिका में मुस्लिम राष्ट्रों को नूपुर शर्मा की कथित टिप्पणी की केवल निंदा करने और भारत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए भी फटकार लगाई गई है।

पत्रिका के अनुसार, “इन रीढ़़विहीन सरकारों ने अपमान और अपराध का जवाब केवल खोखली निंदा से दिया और कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। दूसरी ओर इन देशों ने भारत की हिंदू नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देना जारी रखा हुआ है और उनके साथ व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध बनाए भी बनाए हुए हैं।” पत्रिका ने इसके साथ 9/11 में जान गँवाने वाले आतंकवादियों की तस्वीर छापी है और मुस्लिमों से कहा है कि वे इन ‘नायकों’ को कभी न भूलें।