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हर कब्र-दरगाह वक्फ की प्रॉपर्टी नहीं: सिर्फ इस्लाम से जुड़े होने के कारण बोर्ड नहीं कर सकता कब्जा: मद्रास हाई कोर्ट

                           दरगाह पर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला (प्रतिकात्मक फोटो, साभार- chatgpt)
मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।

240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।

न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।

कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।

240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख

ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।

लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।

कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।

कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”

वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है।

पवित्र पहाड़ी पर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आने पर मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया The News Minute

                                           थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

                                            (फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

                                                          साभार- आउटलुक ट्रेवलर

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

भगवान श्रीकृष्ण की फोटो पोस्ट कर की गंदी बातें, ​तमिलनाडु पुलिस पता भी नहीं लगा पाई: हाई कोर्ट ने लगाई क्लास, कहा- हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं कर सकते

                                            भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर मद्रास हाई कोर्ट सख्त
फेसबुक पर भगवान श्रीकृष्ण की फोटो पोस्ट कर एक व्यक्ति ने अपमानजनक बातें की। तमिलनाडु पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट यह कहते हुए दाखिल कर दी कि ‘आरोपित’ का पता नहीं चल सका है। मद्रास हाई कोर्ट ने इस पर फटकार लगाते हुए कहा है कि हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी कहा है कि बोलने की स्वतंत्रता का मतलब हिंदुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। इससे धार्मिक आक्रोश भड़क सकता है और कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है। मजिस्ट्रेट कोर्ट की रिपोर्ट को रद्द कर पुलिस को तीन महीने के भीतर जाँच कर इस मामले में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

हाई कोर्ट ने कहा है कि तूतीकोरिन पुलिस ने जाँच में लापरवाही की है। फाइनल रिपोर्ट जल्दबाजी में दाखिल की है। उल्लेखनीय है कि सतीश कुमार नाम के व्यक्ति ने अगस्त 2022 में फेसबुक पर यह अपमानजनक पोस्ट की थी। उसने भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के वस्त्र चुराने की तस्वीर के साथ अभद्र कैप्शन लिखे थे।

भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर मद्रास हाई कोर्ट सख्त

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने कहा कि देवी-देवताओं के चित्रण को लेकर ज्यादा संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना न हो। जस्टिस के मुरली शंकर ने 4 अगस्त के आदेश में कहा है, “हिंदू देवी-देवताओं को अपमानजनक तरीके से दिखाना, जानबूझकर लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाना है। इसे किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। इससे धार्मिक शत्रुता और सामाजिक अशांति फैल सकती है।”

उन्होंने कहा, “धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था को देखते हुए उनका अपमान समाज के बड़े हिस्से को आहत कर सकता है और सामाजिक अशांति फैल सकती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना न हो।”

अदालत ने कहा कि भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के कपड़े छिपाने की कहानी एक प्रतीकात्मक कथा है। इसकी कई तरह से व्याख्या की जाती है। इनमें से एक के अनुसार यह जानने के लिए भगवान ने परीक्षा ली थी कि क्या गोपियों की भक्ति सांसारिक मोह-माया से ऊपर है? कोर्ट ने कहा, “यह कहानी आध्यात्मिक साधना और विरक्ति के महत्व को दर्शाती है।”

भगवान श्रीकृष्ण को लेकर किया था अपमानजनक पोस्ट

सतीश कुमार नामक व्यक्ति के अकाउंट से टिप्पणी की गई थी कि कृष्ण जन्माष्टमी उनका त्योहार है, जिन्होंने नहाती हुई महिलाओं के कपड़े चुरा लिए थे। इस मामले में पी. परमेसिवन नामक शख्स ने शिकायत दर्ज कराई थी कि यह पोस्ट हिंदू देवी-देवताओं के अपमान के इरादे से की गई है। शिकायतकर्ता ने यह भी चिंता जताई थी कि यह पोस्ट कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ सकती है।

इसी साल फरवरी में पुलिस ने निचली कोर्ट में ‘निगेटिव फाइनल रिपोर्ट’ दाखिल की। इसमें कहा गया कि उन्होंने पोस्ट अपलोड करने वाले फेसबुक यूज़र की जानकारी के लिए मेटा से संपर्क किया। लेकिन उन्हें यूज़र की जानकारी नहीं मिल पाई। ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की इस निगेटिव रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और मामले को बंद कर दिया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

तमिलनाडु पुलिस को हाई कोर्ट ने फटकारा

हाई कोर्ट ने इस मामले में एमके स्टालिन सरकार की पुलिस को फटकार लगाई है कि उन्होंने गंभीरता नहीं दिखाई। कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया है कि फिर से जाँच शुरू कर 3 महीने के भीतर फाइनल रिपोर्ट दाखिल करे। हाई कोर्ट ने कहा, “गंभीर आरोपों के बावजूद पुलिस ने मामले को लापरवाही से देखा, जाँच रोक दी और इसे ‘अनडिटेक्टेड’ बताकर बंद कर दिया।”

हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने जाँच सिर्फ फेसबुक से जानकारी माँगने तक सीमित रखा। कोर्ट ने बताया कि जिस फेसबुक पेज की बात हो रही है, उस पर पहले से कुछ निजी जानकारी मौजूद थी जिसे देखकर फेसबुक यूजर को खोजा जा सकता था। हाई कोर्ट ने कहा कि जाँच को गंभीरता से नहीं किया गया और फाइनल रिपोर्ट बस औपचारिक तौर पर दाखिल कर दी गई।

हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को लेकर कहा कि उन्होंने केस बंद करते समय फाइनल रिपोर्ट पर उठाए गए आपत्तियों पर ध्यान ही नहीं दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार करने का मजिस्ट्रेट का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं था।

मंदिर की जमीन से हटाओ सेंट जोसेफ स्कूल- मद्रास हाईकोर्ट ने 5 साल पहले कहा था, लेकिन केरल की वामपंथी सरकार ने अब तक नहीं किया अमल: 5 IAS अधिकारियों को नोटिस

                   मद्रास हाईकोर्ट ने 5 IAS अफसरों को भेजा अवमानना नोटिस ( फाइल फोटो, साभार-द हिन्दू )
तमिलनाडु में 5 आईएएस अफसरों को मद्रास हाईकोर्ट ने अवमानना का नोटिस जारी किया है। ये नोटिस देवनाथ स्वामी मंदिर की जमीन पर सेंट जोसेफ मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल चलाने को लेकर है।

न्यायमूर्ति केआर श्रीराम और न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की खंडपीठ ने जिन आईएएस अधिकारियों को नोटिस जारी किए, उनके नाम हैं :

  1. एस मधुमती, सचिव, स्कूल और शिक्षा विभाग
  2. डॉ बी चंद्रमोहन, सचिव, पर्यटन, संस्कृति, मानव संसाधन और सीई विभाग
  3. पीएन श्रीधर, आयुक्त, हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती प्रशासन विभाग
  4. सिबी आदित्य सेंथिलकुमार, जिला कलेक्टर, कुड्डालोर
  5. इसके अलावा एचआर एंड सीई विभाग के दो संयुक्त आयुक्तों का नाम भी उच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस में शामिल है। हाईकोर्ट ने इन सभी अधिकारियों को 10 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।
बीजेपी के आध्यात्मिक और मंदिर विकास विंग के राज्य सचिव एस विनोद राघवेंद्रन ने ये याचिका दायर की थी। इसमें याचिकाकर्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय के अप्रैल 2024 के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया था। अप्रैल 2024 में, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिकारियों को सेंट जोसेफ स्कूल के लिए वैकल्पिक भूमि खोजने के लिए कहा था।
एस विनोद राघवेंद्रन ने अपनी याचिका में कहा था कि कुड्डालोर में जिस जमीन पर सेंट जोसेफ मैट्रिकुलेशन और हायर सेकेंडरी स्कूल चल रहा है, वह एक हिंदू मंदिर की जमीन है। इसे खाली कराने की कई कोशिशें की गई लेकिन अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका।
मद्रास उच्च न्यायालय में स्कूल ने भी 2009 में रिट याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 4.5 एकड़ जमीन स्कूल को 6 महीने के अंदर आवंटित करने का आदेश सरकार को दिया था। राज्य सरकार के वकील ने न्यायालय को बताया कि वैकल्पिक व्यवस्था अभी तक राज्य सरकार ने नहीं की है। छात्रों को दिक्कत न हो इस पर भी विद्यालय का जोर है।
इसके बाद अप्रैल 2024 में कोर्ट ने स्कूल को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के लिए राज्य को 6 महीने का और वक्त दिया था। लेकिन राज्य सरकार अब तक कोई कदम नहीं उठा पाई।
याचिकाकर्ता एस विनोद रघुनाधरन ने हाईकोर्ट में कहा कि राज्य सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया है कि स्कूल को कहाँ ले जाएँगे? और न ही ये निश्चित किया गया है कि स्कूल की जमीन से अवैध कब्जा कब हटेगा?

तमिलनाडु : अपने वेश्यालय को बचाने गए वकील पर मद्रास हाई कोर्ट ने लगाया 10000 रूपए का जुर्माना : जज ने कहा- इसके कागज चेक करो

            वकील पर 10000 रूपए का जुर्माना लगाया (चित्र प्रतीकात्मक , साभार: Livelaw & Leonardo AI)
मद्रास हाई कोर्ट में एक वकील ने अपने वेश्यालय के विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ याचिका दायर कर दी। वकील ने दावा किया कि वह लोगों को स्वेच्छा से सेक्स के लिए मिलाने का काम करता है। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई करते हुए वकील की डिग्री जाँचने के आदेश दे दिए।

मद्रास हाई कोर्ट इस मामले की सुनवाई करते समय बिफर गया। हाई कोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि कोई वकील वेश्यालय जैसी चीज को बचाने के लिए याचिका लेकर आया है। हाई कोर्ट ने इसे बड़े दुख की बात बताया और कहा कि यह वकील भी कन्याकुमारी से है जो 100% साक्षर है।

कोर्ट इस याचिका से उखड़ गया और वेश्यालय चलाने वाले वकील से उसकी डिग्री और उसका बार काउंसिल सर्टिफिकेट दिखाने का आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने बार काउंसिल से कहा कि अच्छे कॉलेज से पढ़े वकीलों को ही पंजीकृत करे और इधर उधर से डिग्री लेने वालों को मान्यता ना दे। कोर्ट ने बार काउंसिल को उसके कागज जाँचने के आदेश भी दे दिए हैं।

कोर्ट ने कहा कि वकालत एक इज्जतदार पेशा है और वकील सामाजिक बदलाव के इंजीनियर हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने एक गरीब लड़की की गरीबी का फायदा उठा कर उसको वेश्यावृत्ति में झोंका है। कोर्ट ने वकील की याचिका को खारिज कर दिया और उस पर 10,000 रूपए का जुर्माना भी लगाया।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरई बेंच में एक वकील मुरुगन ने एक याचिका दायर की थी। याचिका में माँग की गई थी कि उसके ऊपर नागरकोइल शहर में वेश्यालय चलाने के कारण दर्ज की गई FIR को रद्द कर दिया जाए और उन पुलिस वालों पर कार्रवाई की जाए जो इस धंधे में खलल डाल रहे थे।

मुरुगन ने हाई कोर्ट में याचिका लगाकर कहा था कि देश में सहमति से किया गया सेक्स मान्य है और वह ऐसे ही लोगों को मिलवाता है। मुरुगन ने अपन वेश्यालय पर कार्रवाई के पीछे रिश्तेदारों की साजिश की भी बात कही थी। उसने हाई कोर्ट से उसके खिलाफ सभी मामले रद्द करने की माँग की थी।

इस मामले में फरवरी, 2024 में नागरकोइल के इस वेश्यालय पर मारे गए छापे में एक 17 वर्ष की लड़की को भी बचाया गया था। लड़की ने पुलिस को बताया था कि उसका यहाँ शोषण हो रहा था। इस कार्रवाई के बाद मुरुगन के विरुद्ध POCSO समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।

मीलार्ड सोमेन सेन अकेला जज नहीं है, “हर शाख पे उल्लू बैठा है” क्योंकि हर कोई Collegium की पैदावार है ; अब सुप्रीम कोर्ट जजों के झगड़े भी सुनेगा

सुभाष चन्द्र

कोलकाता हाई कोर्ट में जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय के आदेश को पलटने वाली जस्टिस सोमेन सेन और जस्टिस उदय कुमार की खंडपीठ पर गंभीर टिप्पणी करते हुए जस्टिस गंगोपाध्याय ने आरोप लगाया कि जस्टिस सोमेन सेन एक राजनीतिक पार्टी (TMC) के लिए काम कर रहे हैं। 

जस्टिस गंगोपाध्याय ने आदेश दिए थे कि MBBS दाखिले से संबंधित SC/ST सर्टिफिकेट घोटाले की जांच CBI से कराई जाए और इसे सोमेन सेन की पीठ ने एडवोकेट जनरल की Mentioning के आधार पर बिना कोई नियम कायदा देखे स्टे कर दिया। 

लेखक 
जस्टिस गंगोपाध्याय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जो ममता सरकार की वकालत कर रहे थे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “मैं अपील ज्ञापन या किसी आदेश के खिलाफ याचिका दायर किए बिना आदेश पारित करने को लेकर अधिक चिंतित हूं”।  इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 141 के तहत इसे प्रतिबंधित कर दिया यानी दोनों आदेशों पर रोक लगा दी और जस्टिस गंगोपाध्याय के आदेश के खिलाफ अपील करने की भी अनुमति दे दी। 

जस्टिस गंगोपाध्याय के खिलाफ सिब्बल ने पुराने मामले को भी उछाला और अदालत से कहा कि इनके खिलाफ आप पहले भी संज्ञान ले चुके हैं। गंगोपाध्याय ने सोमेन सेन के खिलाफ कोई गलत आरोप नहीं लगाया है क्योंकि वे ममता के भतीजे के पक्ष में बातें करते रहे हैं। एक जज अमृता सिन्हा को अपने चैम्बर में बुला कर सोमेन सेन ने निर्देश दिया था कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोई फैसले मत करो। 

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में Suo Moto संज्ञान लिया है परंतु संज्ञान लेने से पहले सोमेन सेन और गंगोपाध्याय से बात करना भी जरूरी था जो नहीं किया गया। आज स्थिति न्यायपालिका की ऐसी हो गई कि सुप्रीम कोर्ट को अपने जजों के झगड़े भी सुनने की जरूरत पड़ गई। CJI चंद्रचूड़ और जस्टिस संजीव खन्ना, बीआर गवई, सूर्यकांत और अनिरुद्ध बोस की संविधान पीठ द्वारा संज्ञान लेना बता रहा है कि मामला कितना गंभीर है। 

वैसे संविधान पीठ को यह याद रखना चाहिए कि जस्टिस सोमेन सेन अकेले ऐसे जज नहीं हैं जो किसी राजनीतिक दल के लिए काम कर रहे हैं या उन पर ऐसा करने के आरोप उनके साथी जज ने लगाए हों। Collegium के पैदा किए हुए अधिकांश जज किसी न किसी दल से जुड़े दिखाई देंगे और ऐसा उनके फैसलों से नज़र आता है। 

जब बीआर गवई जैसे जज सुप्रीम कोर्ट में बैठ कर कह सकते हैं कि वह कांग्रेस परिवार से संबंध रखते हैं तो उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे कांग्रेस के लिए “निष्ठा” नहीं रखेंगे। अनेक जज हैं जो हिन्दू धर्म के खिलाफ मुखर रहते हैं और अन्य धर्मों पर चुप रहते हैं। कुरान की 26 आयतों के खिलाफ उसी धर्म का व्यक्ति याचिका लेकर गया था तो उस पर जुर्माना ठोक दिया था जबकि नूपुर शर्मा के खिलाफ भयंकर Hate Speech दी थी और दो दिन पहले जस्टिस संदीप मेहता रामायण की चौपाई के खिलाफ खुलकर सामने खड़े हो गए। 

कुछ दिन पहले गुजरात हाई कोर्ट में दो जज आपस में भिड़ गए थे जिनमे एक महिला थी। अभी कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश हाई कोर्ट द्वारा 6 जूनियर जजों को बर्खास्त करने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। केरल में तो कई ऐसे जजों को हटाने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया था जिनकी नियुक्ति गलत हुई थी और कहा था कि Experienced लोगों से हम वंचित नहीं होना चाहते। 

बेहतर होगा संविधान पीठ सोमेन सेन की पीठ के आदेश को रद्द कर गंगोपाध्याय के आदेश को बरक़रार रखे लेकिन ऐसा होगा, मुझे शंका है क्योंकि अदालत गंगोपाध्याय पर ज्यादा मेहरबान नहीं है शुरू से। (लेख में विचार लेखक के हैं)

‘निजी जगहों को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन के लाइव टेलीकास्ट के लिए पुलिस की अनुमति की ज़रूरत नहीं’: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा - राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लाइव प्रसारण के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं
मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है निजी जगहों पर कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लाइव प्रसारण के लिए सरकार या पुलिस की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है। तमिलनाडु में DMK की सरकार है, जिसके मंत्री उदयनिधि स्टालिन सनातन धर्म को खत्म करने की बात कर चुके हैं। भाजपा ने आरोप लगाया था कि वहाँ के मंदिरों को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन विशेष पूजा का आयोजन करने या फिर विशेष प्रसाद वितरित करने से रोका जा रहा है। मंदिरों को धमकाया जा रहा है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लाइव टेलीकास्ट या फिर भजन के आयोजन के लिए सरकार या पुलिस की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे धर्म की विजय बताते हुए पेश किया। तमिलनाडु का HRCE विभाग वहाँ के मंदिरों की निगरानी करता है। प्राइवेट मंदिरों और मैरिज हॉल्स में भी ऐसे आयोजन हो सकते हैं। इसके लिए सिर्फ मंदिर के एग्जीक्यूटिव अधिकारी को सूचित करना होगा।

इसके बाद एग्जीक्यूटिव अधिकारी इसकी अनुमति देगा, साथ ही अगर कुछ पाबंदियाँ हैं तो इस बारे में भी बता दिया जाएगा। ‘विवेकानंद हिन्दू मूवमेंट’ ने इस संबंध में याचिका दायर की थी, जिस पर जजों ने अपने चैंबर में ही त्वरित सुनवाई की। पट्टाभिराम स्थित KKR कल्याण मंडपन में भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का लाइव टेलीकास्ट चल रहा है, पहले इसी संबंध में अनुमति वाला संशय था। पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी थी, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाना पड़ा।

तमिलनाडु सरकार ने इस दौरान मद्रास उच्च न्यायालय में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर भीड़भाड़ ज़्यादा हो तो इसके लिए पुलिस को पूर्व में सूचित करना आवश्यक है। हालाँकि, सरकार के नियंत्रण वाले मंदिरों में इसके लिए अधिकारी को सूचित कर अनुमति लेनी होगी, जिसकी कुछ शर्तें भी होंगी। हाईकोर्ट ने कहा कि राम नाम के पाठ का आयोजन प्रतिबंधित नहीं है। साथ ही कहा कि ईश्वर भक्ति से शांति और एकता का सन्देश मिलना चाहिए, समाजिक सौहार्द बिगाड़े बिना।