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CJP प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर हैरान रह जाएंगे, लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ और TFF से कनेक्शन

                                                                                               साभार 
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास का सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे। उनके न सिर्फ लेफ्ट लैबरल गैंग के अमेरिकी ‘बॉस’ से कनेक्शन हैं, बल्कि उससे मिली फंडिंग से सरकार विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास का विदेशी फंडिंग से जुड़ा कनेक्शन सामने आते ही सवालों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि किसी पत्रकार या शोधकर्ता को विदेशी संस्था से अनुदान क्यों मिला; असली सवाल यह है कि पैसा किससे आया, किस काम के लिए आया, किन लोगों और संस्थाओं तक पहुंचा और उस फंडिंग से तैयार होने वाले कंटेंट का प्रभाव किस दिशा में जाता है? जब एक ही विदेशी फाउंडेशन पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, शोधकर्ताओं और नागरिक संगठनों के अलग-अलग प्रोजेक्ट को लगातार वित्तीय सहायता देता दिखाई दे, और उन नामों के काम में वैचारिक समानताएं भी नजर आएं, तो इसे महज संयोग कहकर आगे बढ़ जाना आसान जरूर है, लेकिन सवालों से बच निकलना इतना आसान नहीं। क्योंकि सौरव दास और अमेरिका स्थित ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का संबंध इसी बड़े सवाल का एक सिरा है। उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि TFF ने सौरव दास को भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया है।

सौरव दास और लेफ्ट लिबरल गैंग का विदेशी फंडिंग का कनेक्शन

सौरव दास और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यानी TFF का रिश्ता इसी बड़े नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। जब उसी फाउंडेशन की विस्तृत ग्रांट सूची में न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक अधिकारों से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के नाम भी दिखाई देते हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि इस फंडिंग का व्यापक उद्देश्य और उसका प्रभाव क्या है। सौरभ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी उस नेटवर्क को समझने में है, जिसमें पैसा अलग-अलग नामों और परियोजनाओं तक पहुंचता है। यदि कोई संस्था भारत में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में पैसा लगा रही है, तो यह जानने का अधिकार जनता को है कि उसके संसाधनों का स्रोत क्या है, प्राथमिकताएं क्या हैं और जवाबदेही किसकी है।

 CJP के सौरव दास और TFF का कनेक्शन क्या है?

सौरव दास का नाम TFF की अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित ग्रांट पाने वाले लोगों में मिलता है। फाउंडेशन के अनुसार उन्हें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया गया। TFF की वेबसाइट पर इस ग्रांट के साथ सौरव दास की कुछ रिपोर्टों के लिंक भी दिए गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषणों में उनके अनुदान की राशि और वर्ष को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। यहीं से असली खेल शुरू होता है। यदि किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर रिपोर्टिंग के लिए विदेशी फाउंडेशन से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि कौन-सा काम उस अनुदान के तहत हुआ, उसका दायरा क्या था और फंडर तथा प्राप्तकर्ता के बीच जवाबदेही की व्यवस्था क्या थी।
TFF से लेफ्ट लिबरल गैंग को फंडिंग की सूची छोटी नहीं
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार यह अप्रैल 2019 से भारत में सूचना तक पहुंच को बढ़ावा देने और खोजी अनुदानों के माध्यम से एक अधिक जागरूक और जवाबदेह समाज बनाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। फाउंडेशन का दावा है कि उसका लक्ष्य समस्याओं के मूल कारणों पर काम करना और रणनीति के माध्यम से जवाबदेही की संस्कृति को और मजबूत बनाना है। TFF की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और विस्तृत हो जाती है। फाउंडेशन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यूज़लॉन्ड्री को रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया। मनीलाइफ फाउंडेशन के RTI सेंटर को भी समर्थन दिया गया। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को evidence-based medicine की fact-checking के लिए अनुदान दिया गया है। न्यूज लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकारों और द कारवां से जुड़े रिपोर्टरों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए फेलोशिप या अनुदान दिए गए हैं। बाद के वर्षों में फाउंडेशन की सूची और फैलती दिखाई देती है। इसमें preventive detention, custodial या extrajudicial deaths, Indian Pharmacopoeia, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पतालों में संक्रमण, HIV संक्रमण, communal harmony और policy-making में think tanks की भूमिका जैसे विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ता और संस्थाएं शामिल हैं।
द वायर, न्यूजलॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज तक पहुंच
TFF की वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उसने ऐसे मीडिया और शोध नेटवर्क को समर्थन दिया है, जिनकी पहचान सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर विवादित रिपोर्टिंग की रही है। द वायर से जुड़े पत्रकारों ने TFF फेलोशिप के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम किया। Report for the World की एक प्रोफाइल भी बताती है कि द वायर की पत्रकार बंजोत कौर ने 2020 में Thakur Foundation Fellowship के तहत public health पर investigative reporting project किया था। TFF के अपने रिकॉर्ड में न्यूजलॉन्ड्री को कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्टिंग के लिए अनुदान का उल्लेख है। ऑल्ट न्यूज से जुड़ी डॉ. सुमैया शेख को भी evidence-based medicine पर fact-checking के लिए आर्थिक सहायता दी गई थी।
सौरव दास का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है
सौरव दास का मामला इस पूरे नेटवर्क को समझने के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो TFF की अपनी वेबसाइट पर public-health reporting के फंड लेने वाले के रूप में दर्ज हैं। दूसरी ओर उनके नाम से जुड़े कुछ प्रकाशित काम public health के बजाए सरकार की नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों से संबंधित हैं। कुछ स्वतंत्र विश्लेषकों ने इसी अंतर पर सवाल उठाए हैं। यहां किसी के विचारों पर रोक लगाने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिस काम के लिए आर्थिक सहायता मिली, उसका घोषित उद्देश्य और प्रकाशित काम आपस में मेल क्यों नहीं खा रहा है।
विदेशी फंडिंग पर पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर बहस अक्सर राजनीतिक हो जाती है। सरकार जब विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी NGO पर सवाल उठाती है तो उसे कई बार नागरिक स्वतंत्रता पर हमला कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता की मांग कोई दमन नहीं है। NGO और मीडिया संस्थानों को यह बताने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उनके किस काम को, कौन पैसा दे रहा है। यही पारदर्शिता आगे भी बढ़नी चाहिए। हर grant की राशि, उद्देश्य, deliverables, final output और funding disclosure सार्वजनिक होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों के सामने यह बताना चाहिए कि किसी रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में बाहरी फंडिंग लगी है या नहीं।
TFF के बॉस की एक्टिविस्ट सेना में शामिल हुआ सौरभ
कोविड कई लोगों के लिए एक दुखद याद थी, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जैकपॉट साबित हुई। जब भारत अपनी सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहा था, तब अमेरिका में बैठा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन का फाउंडर दिनेश ठाकुर चुपचाप भारत में अपनी सेना तैयार कर रहा था। यह उसके हितों के काम करने वाले एक्टिविस्ट्स की एक सेना थी। यही समय दिल्ली के RTI एक्टिविस्ट सौरव दास के मुताबिक उसके लिए सबसे खुशी लेकर आया। क्योंकि उसको आखिरकार उस सेना में जगह मिल गई, जिसमें शामिल होने की वे लंबे समय से कोशिश कर रहा था।
फाइजर बनाम रैनबैक्सी की एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन यह कहानी 2021 से शुरू नहीं होती, यह 2003 से शुरू होती है। तब फाइजर बनाम रैनबैक्सी का वार चरम पर था। अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर और भारतीय फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के बीच एक बड़ी कॉर्पोरेट लड़ाई चल रही थी। फाइजर अपनी सबसे अधिक बिकने वाली दवा ‘लिपिटर’ का पेटेंट गंवा चुकी थी और रैनबैक्सी लॉन्च करने के लिए तैयार थी।
ठाकुर रैनबैक्सी कंपनी छोड़कर उसके ही खिलाफ हुए 
दरअसल, अपनी जेनेरिक दवा, जो लिपिटर से कहीं सस्ती थी। लिपिटर फाइजर की सबसे अधिक बिकने वाली दवा थी, जिसकी बिक्री अरबों डॉलर में थी और जिसे फाइजर गंवाने की कगार पर थी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। तीन भारतीय दिनेश ठाकुर, स्वामीनाथन और दिनेश कस्तूरी इस सारे खेल में शामिल हुऐ। तब दिनेश ठाकुर अमेरिका की फार्मा कंपनी ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) में काम कर रहा था। उसने BMS छोड़ दी और रैनबैक्सी USA से जुड़े। वहां 2 साल (2003-05) तक काम किया। फिर रैनबैक्सी छोड़ने के बाद उसने डेटा में हेरफेर (data manipulation) को लेकर US FDA में रैनबैक्सी के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई। चूंकि वह कंपनी का अंदरूनी व्यक्ति था, इसलिए उनके पास सारी गोपनीय जानकारी थी। रैनबैक्सी केस हार गई और उस पर $500 मिलियन का जुर्माना लगा।
US फार्मा माफिया के इशारे पर भारतीय कंपनियों पर निशाना
व्हिसलब्लोअर इनाम के तौर पर दिनेश ठाकुर को US सरकार से $48 मिलियन मिले। इस केस ने रैनबैक्सी को बर्बाद कर दिया और आखिरकार 2015 में इसे सन फार्मा को बेच दिया गया। यह केस फाइजर (Pfizer) के लिए जैकपॉट साबित हुआ और उसका कॉम्पिटिशन खत्म हो गया। कई कामों में हाथ आजमाने के बाद, दिनेश ठाकुर ने खराब फार्मा कंपनियों को टारगेट करने के मकसद से फार्मा एक्टिविज्म शुरू किया, लेकिन क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है कि उनके टारगेट हमेशा भारतीय फार्मा कंपनियां होती हैं और फायदा US फार्मा कंपनियों को होता है? या फिर वह US फार्मा माफिया के इशारे पर काम करता है?
यूएस सरकार से मिले पैसे से दिनेश ने 2018 में बनाया TFF
यूएस सरकार से मिले $48 मिलियन के साथ, दिनेश ठाकुर ने 2018 में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (TFF) नाम का NGO शुरू किया। इसे टैक्स छूट का दर्जा मिला और उसने अप्रैल 2019 से ग्रांट देना शुरू किया। यानि कोविड से कुछ महीने पहले। अब ‘ठाकुर की आर्मी’ बनाने का समय आ गया था। बिकने के लिए तैयार भारतीय इसकी आर्मी में शामिल होने लगे। 2019 से 2026 के बीच, उसने कई भारतीय पत्रकारों, इन्फ्लुएंसर्स, वकीलों और एक्टिविस्ट को फंड दिया। इन्हीं में सीजेपी का प्रवक्ता सौरभ भी शामिल था। वह उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्हें TFF से फंडिंग मिली। सुचेता दलाल ने ‘मनीलाइफ फाउंडेशन’ (MLF) की सह-स्थापना की, जिसे TFF से $100K मिले और उसी समय उन्होंने सन फार्मा को टारगेट करना शुरू कर दिया। सन फार्मा का स्टॉक 40% गिर गया। यह TFF के कहने पर किया था?
मोदी सरकार ने शोषण से बचाकर आत्मनिर्भरता पर दिया जोर
कोविड का समय अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पैसे कमाने का मौका था, लेकिन भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों को भारतीयों का शोषण नहीं करने दिया और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। और इसी के साथ ठाकुर की सेना ने भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन और दिनेश ठाकुर दोस्त हैं। सिर्फ वायर को ही TFF से फंडिंग नहीं मिली, बल्कि उसके चार पत्रकारों प्रियंका पुल्ला, श्रेया दासगुप्ता, बनजोत कौर और अदिति प्रधान को भी TFF से फंडिंग मिली। लेकिन यह पैसा मुफ्त नहीं था। उनका काम भारत को निशाना बनाना था। यह काम प्रियंका पुल्ला ने बेहतर किया। दिनेश ठाकुर उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ब्लूमबर्ग में प्रमोट किया। 2022 उसने अफ्रीका में भारतीय फार्मा कंपनियों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत बायोटेक ने ‘द वायर’ पर किया 100 करोड़ रुपये केस
असल में, ‘द वायर’ ने इतनी गंदगी फैलाई कि भारत बायोटेक ने उस पर 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया और उन्हें 14 खबरें हटानी पड़ीं। इनमें से लगभग सभी खबरें भारतीय वैक्सीन की कवरेज से जुड़ी थीं, जिनमें ठाकुर की फंडिंग वाली और पुल्ला की लिखी खबरें भी शामिल थीं। 2013 में “भारतीय जेनेरिक दवाओं के खिलाफ ठाकुर के एजेंडे वाली कहानियों” का पर्दाफ़ाश हुआ था, लेकिन 2021 तक आते-आते लेफ्ट लिबरल गैंग के दो पत्रकारों को TFF से फंडिंग मिली; और ठाकुर भारतीय फार्मा के मसीहा बन गए! स्क्रॉल मीडिया ने दिनेश ठाकुर के लिए भारत को निशाना बनाते हुए बहुत सारे लेख लिखे।
कोविड में फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था गिद्ध सौरभ
जब हर कोई पैसे कमा रहा था, तो सौरव दास को भी पैसे कमाने का हक है, लेकिन उस समय तक वे कोई बड़ा नाम नहीं थे। 2021 में फाइजर भारत में अपनी वैक्सीन के लिए मंज़ूरी पाने की कोशिश कर रही थी, जबकि भारत सरकार ने भारतीय वैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट को मंजूरी दे दी थी। इसलिए सौरव दास ने RTI दाखिल की। सौरभ दास ने आरटीआई दाखिल कर सरकार से पूछा कि उन्होंने भारत बायोटेक एंड सीरम इंस्टीट्यूट को किस आधार पर मंजूरी दी? सरकार ने आंकड़े देने से इनकार कर दिया। सौरभ ने यह सब दिनेश ठाकुर के इशारे पर सीरम इंस्टीट्यूट को प्रभावित करने के लिए किया था। सौरभ को उसी इकोसिस्टम के अन्य लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। इसलिए सरकार से मनाही मिलने के बावजूद, वह आरटीआई दाखिल करता रहता है। जब पूरा देश कोविड से लड़ रहा था, तब ये गिद्ध फाइजर के लिए लॉबिंग कर रहा था।

ओपिनियन पोल ने राहुल-तेजस्वी के उड़ाए होश, बिहार में बीजेपी की बढ़ेंगी सीटें और एनडीए की बनेगी सरकार! मोदी की माँ को दी गाली INDI गठबंधन को चारों खाने चित कर देगी

जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माँ को कांग्रेस के मंच से गाली दी गयी है उसके दुष्परिणाम कांग्रेस ही नहीं INDI गठबंधन को भी बहुत नुकसान होने वाला है। गौरतलब यह है कि जब सोनिया गाँधी ने गुजरात चुनावों में मोदी को "मौत का सौदागर" कहा था अंजाम यह हो रहा है कि गुजरात में आज तक सत्ता के पास तक नहीं पहुँच पा रही। जनता बराबर नकार रही है। राहुल गाँधी जो "मोहब्बत की दुकान" चला रहे हैं वह आज नफरत की दुकान बन चुकी है। इस कटु सत्य को कोई कांग्रेसी नहीं नकार सकता। LoP राहुल की भाषाशैली LoP की नहीं।  
राहुल फर्जी गांधी की नीच व घृणित मानसिकता आज जगजाहिर है, 2014 में जब माननीय मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने तो यह बार बार तुम्हारा पीएम कह कर जनता को संबोधित करता था, लेकिन इसकी पहली बड़ी गन्दी हरकत कि देश व मोदी जी के लिए नफरत तब पता चली जब एक चुनावी मीटिंग में इसने कहा कि देश के युवा 6 महीने में मोदी को डण्डे मारेंगे, तभी 2017 में चीन के साथ डोकलाम विवाद पर यह देशद्रोही चीनियों से छुप-छुप कर मिलता था और जिसे कांग्रेस नकार देती थी लेकिन जब पत्रकारों ने इसको चीनियों के टेंट से पकड़ा तब माना, तब इसने और इसके चमचों में ट्विटर पर हद कर दी और वह भारतीय सेना का मनोबल गिराने के लिए निरंतर पोस्ट करते थे, गलवान घाटी में चीन से हमारी भिड़ंत में जिसमें हमारे भी 20 वीर सैनिक बलिदान हुए थे और हमारी वीर सेना ने चीन के 45 से ज्यादा बोने सैनिकों की गर्दन तोड़कर मार दिया था तब भी इसने कहा कि हमारे वीर सैनिक चीनी सैनिकों से पिट गए, इस फर्जी गांधी खानदान को सिर्फ हराम की खाने की आदतें पड़ी हुई थी तो अब यह बिलबिला रहे हैं।
सनातनी भारतवर्ष, सनातन धर्म और भारत की सुरक्षा की दृष्टि से फिरोज जहांगीर का पोता राहुल खान (नकली गांधी) ही सबसे बड़ा खतरा है ये व्यक्ति और परिवार भारतवर्ष में धर्मांतरण से सनातन धर्म को नष्ट करना चाहता है, विदेशी मजहब के घुसपैठियों को भारतवर्ष में ला कर सनातनी परिवारों पर बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी बड़ा कहर, मार-काट,और भारतवर्ष के अशांत करना चाहता है देशद्रोही कांग्रेस पार्टी ने पिछले 70 सालों में सनातन धर्म, संस्कृति और सभ्यता को बुरी तरह कुचला है सनातन धर्म से जुड़े भोले भाले ग्रामीण व आदिवासी जनजाति का धर्म परिवर्तन करा कर ईसाई मिशनरियों के हाथों की कठपुतली बनाकर कर सनातन धर्म के खिलाफ खड़ा कर रहा है, जब भी यह विदेश में जाता हैं हर भारत विरोधी इसके साथ होता है वहां से यह देश में अराजकता व अव्यवस्था फैलाने के षड्यंत्र रचता हैं।
भारतीय सेना, जनता, सनातनी उधोगपतियों, सनातन धर्म, संस्कृति और सभ्यता का बदलना इस नकली गांधी(खान) परिवार का लक्ष्य है
सभी भारतवासियों को इस राहुल खान व नकली गांधी परिवार का पूरे देश में बहिष्कार करना चाहिए।
बिहार में साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में ना तो राहुल गांधी की मटन-बिरयानी और ना ही तेजस्वी की दाल गलने वाली है। वोट अधिकार यात्रा राहुल-तेजस्वी निकाल रहे हैं, लेकिन बिहार की जनता-जनार्दन तो एनडीए गठबंधन की वोटों से झोली भरने वाली है। आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के लिए टाइम्स नाउ-जेवीसी जनमत सर्वेक्षण के अनुसार एनडीए 243 सदस्यीय विधानसभा में 136 सीटें जीतने की ओर अग्रसर है, जबकि राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाला महागठबंधन, जिसमें कांग्रेस और वामपंथी दल शामिल हैं, राज्य में 75 सीटों तक सीमित रह सकता है, जहां बहुमत का आंकड़ा 122 है। दरअसल, बिहार की जनता महागठबंधन में शामिल दलों का बिहार में जंगलराज देख चुकी है। इसलिए एक बार फिर पीएम मोदी की ताल में ताल मिलाते हुए राज्य में डबल इंजन सरकार ही चाहती है।
  
लेकिन नरेंद्र मोदी की स्वर्गीय माँ को गाली देने से संभव है NDA की बजाए BJP ही सूपड़ा साफ कर सकती है। क्यों ओपिनियन पोल मोदी की माँ को गाली देने से पहले का है। 2001 से लेकर 2025 तक 100 से ज्यादा गालियां देकर INDI गठबंधन ने अपनी नीचता दिखा चुकी है। नरेंद्र मोदी वह प्रधानमंत्री है जिसे अगर विश्व ने अपने सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया है तो उससे कहीं ज्यादा INDI गठबंधन ने गालियां देकर अपमानित किया है। फिर भी मोदी पहाड़ बन इन सबके सामने खड़ा है। 

बिहारियों का अपमान करने वाले नेताओं को बर्दाश्त नहीं करेगा वोटर
ओपिनियन पोल में महागठबंधन की करारी हार का संकेत इसलिए भी है कि बिहार में कांग्रेस और इंडी ब्लॉक के नेताओं का दोगलापन एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। यह दुर्भाग्य है कि जो नेता अपने-अपने राज्यों में बिहार और यहां के लोगों का लगातार अपमान करते आ रहे हैं। जिनके राज्यों में बिहारियों से कहा जाता है कि वो ये राज्य छोड़कर चले जाएं। बिहारियों की इनके राज्यों में ना कोई जगह है और ना ही जरूरत। इंडी गठबंधन के जो नेता खुलेआम कहते हैं कि कि बिहारियों को नौकरियों पर मत रखिए। अजब तमाशा और दोमुहांपन देखिए कि जो नेता अपने राज्यों में गौरवशाली बिहार के लोगों को गालियां देते हैं, उनका अपमान करते हैं, वही नेता आजकल बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के साथ गाड़ी पर खड़े होकर वोट मांगने की हिमाकत कर रहे हैं। उन्हें इस बात की भी शर्म नहीं है कि अब वे जिन लोगों के बीच खड़े हैं, उनके लिए कभी कितने गंदे और गुंडे जैसे शब्द इस्तेमाल किए थे। बड़ा सवाल यह भी है कि जब ‘राहुल गांधी के दोस्त’ ये नेता बिहारियों का अपमान कर रहे थे, तब उन्हें बिहारी अस्मिता की याद क्यों नहीं आई थी? बिहार की जनता-जनार्दन के दिल में लगे वो शब्दों के जख्म फिर से हरे हो गए हैं और वह अब इनको माफ करने वाली नहीं है। इसलिए अब बिहारियों का अपमान करने वाले नेताओं को बिहार का मतदाता बर्दाश्त नहीं करेगा।

पांच साल पहले के चुनावों की तुलना में एनडीए की बड़ी जीत

टाइम्स नाउ-जेवीसी जनमत सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य दलों का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एक और कार्यकाल के लिए सत्ता में आ सकता है। इस जनमत सर्वेक्षण में सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए पांच साल पहले के चुनावों की तुलना में बड़ी जीत की भविष्यवाणी की गई है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जद (यू) को हल्का झटका लग सकता है। क्योंकि जनमत सर्वेक्षण में 29 सीटों पर जीत और 2 पर बढ़त की भविष्यवाणी की गई है, जिससे इसकी अनुमानित संख्या अधिकतम 31 सीटों तक पहुंच सकती है।

बिहार में भाजपा की सीटों पर होगी उल्लेखीय बढ़ोतरी

सर्वेक्षण के नतीजे साफ-साफ इशारा करते हैं कि एनडीए के भीतर भाजपा को आगामी चुनावों में उल्लेखनीय बढ़त मिलने जा रही है। उनकी सीटें पिछले चुनावों के 74 से बढ़कर 81 हो जाने का अनुमान है। सर्वेक्षण के अनुसार, पार्टी को 64 सीटें जीतने का अनुमान है, जबकि 17 अन्य सीटों पर उसे बढ़त हासिल है। दूसरी ओर नीतीश की पार्टी ने 2020 के चुनावों में 43 सीटें हासिल कीं, जो कि उसके पहले के 71 सीटों से 28 सीटें कम थीं। यदि जनमत सर्वेक्षण की भविष्यवाणियां सही साबित होती हैं, तो 12 सीटों की और गिरावट के अनुमान के साथ, जेडी(यू) बहुत कमजोर स्थिति में रह सकती है।

महागठबंधन में तेजस्वी और लालू की राजद की हालत खस्ता

दूसरी ओर इस जनमत सर्वेक्षण महागठबंधन के भीतर तेजस्वी और लालू प्रसाद यादव की राजद की हालत खस्ता होने के संकेत मिल रहे हैं। तेजस्वी यादव भले ही शेखचिल्ली के सपने देखते हुए स्वयंभू सीएम बनने का ऐलान कर रहे हों। भले ही वे राहुल गांधी की चापलूसी में निचले स्तर तक आ गए हों, लेकिन बिहार की जनता इस बार भी उनको नकारने वाली है। राजद केवल 52 सीटें जीतने की ओर अग्रसर है। उसको 37 सीटों पर जीत और 15 पर बढ़त मिलने का अनुमान है। यह 2020 के चुनावों में जीती गई 75 सीटों की तुलना में इसकी संख्या में महत्वपूर्ण गिरावट होगी, जिससे यह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।

कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन, आधी हो सकती हैं सीटें

टाइम्स नाउ-जेवीसी जनमत सर्वेक्षण के अनुसार चुनाव से सबसे बुरी हालत चुनाव से पहले सबसे ज्यादा उछलकूद मचा रहे राहुल गांधी और उनकी पार्टी की होने वाली है। वे हार के शतक के करीब अपनी पार्टी की एक और करारी हार का स्वाद चखेंगे। आगामी चुनाव में कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन होने का अनुमान है। जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक कांग्रेस की सीटें भी 2020 के चुनावों में 19 सीटों से घटकर करीब-करीब आधी 10 सीटों (8 सीटों पर जीत और 2 सीटों पर बढ़त) पर आ सकती हैं। बिहार के लिए टाइम्स नाउ-जेवीसी पोल पूर्वानुमानों के अनुसार, वाम दलों और अन्य को सर्वोत्तम स्थिति में कुल मिलाकर 13 से 15 सीटें जीतने का अनुमान है। 

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का खुल सकता है खाता

एनडीए या महागठबंधन से गठबंधन न करने वाली अन्य पार्टियों में, एआईएमआईएम को 3 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी 2 सीटों के साथ शुरुआत कर सकती है। प्रशांत किशोर जिनको पीके के नाम के जाना जाता है, वे पहले राजनीतिक रणनीतिकार रहे हैं। पीके ने कई प्रमुख भारतीय राजनीतिक दलों के लिए सफलतापूर्वक रणनीतिकार के रूप में कार्य किया है, जिनमें बीजेपी, जेडीयू, बीजेपी, कांग्रेस, आप, वाईएसआर कांग्रेस, डीएमके और टीएमसी शामिल है। जनमत सर्वेक्षण के अनुमानों के अनुसार, बहुजन समाज पार्टी को एक सीट मिलने का अनुमान है, जबकि 26 सीटों पर कड़ा मुकाबला होने की संभावना है।

एनडीए तिरहुत क्षेत्र की 49 सीटों में से 35 पर आगे

सर्वेक्षण के निष्कर्षों का क्षेत्रवार ब्यौरा बताता है कि एनडीए तिरहुत क्षेत्र की 49 सीटों में से 35 पर आगे है, जबकि महागठबंधन 11 सीटें जीतने की ओर अग्रसर है और 3 सीटों पर कड़ी टक्कर होने की संभावना है। भाजपा मिथिला क्षेत्र में भारी जीत हासिल करने के लिए तैयार है। जनमत सर्वेक्षणों के अनुमानों के अनुसार, एनडीए को 42 में से 31 सीटों पर जीत मिलेगी, महागठबंधन को 7 सीटें, जन सुराज पार्टी को 1 सीट मिलेगी तथा 3 सीटों पर कड़ा मुकाबला होगा। अंग क्षेत्र की 23 सीटों में से एनडीए 15 पर आगे है, जबकि महागठबंधन को 3 सीटें मिलने का अनुमान है। 5 सीटें चुनावी मैदान के रूप में चिह्नित की गई हैं।

 सीमांचल क्षेत्र की 24 सीटों पर एनडीए-महागठबंधन में कड़ी टक्कर

इसके अलावा सीमांचल क्षेत्र की 24 सीटों में से एनडीए और महागठबंधन दोनों को 10-10 सीटें जीतने का अनुमान है, जबकि एआईएमआईएम को 3 सीटें मिल सकती हैं और एक सीट पर कड़ी टक्कर हो सकती है। मगध क्षेत्र की 50 सीटों में से महागठबंधन को 24 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि एनडीए 21 सीटों पर आगे चल सकता है, जबकि 5 सीटों पर कड़ी टक्कर हो सकती है। भोजपुर की 55 सीटों में से एनडीए और महागठबंधन को क्रमशः 24 और 20 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि जन सुराज पार्टी और बसपा को एक-एक सीट मिल सकती है। 9 सीटों पर कड़ा मुकाबला होने की संभावना है।

तमिलनाडु : अपने वेश्यालय को बचाने गए वकील पर मद्रास हाई कोर्ट ने लगाया 10000 रूपए का जुर्माना : जज ने कहा- इसके कागज चेक करो

            वकील पर 10000 रूपए का जुर्माना लगाया (चित्र प्रतीकात्मक , साभार: Livelaw & Leonardo AI)
मद्रास हाई कोर्ट में एक वकील ने अपने वेश्यालय के विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ याचिका दायर कर दी। वकील ने दावा किया कि वह लोगों को स्वेच्छा से सेक्स के लिए मिलाने का काम करता है। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई करते हुए वकील की डिग्री जाँचने के आदेश दे दिए।

मद्रास हाई कोर्ट इस मामले की सुनवाई करते समय बिफर गया। हाई कोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि कोई वकील वेश्यालय जैसी चीज को बचाने के लिए याचिका लेकर आया है। हाई कोर्ट ने इसे बड़े दुख की बात बताया और कहा कि यह वकील भी कन्याकुमारी से है जो 100% साक्षर है।

कोर्ट इस याचिका से उखड़ गया और वेश्यालय चलाने वाले वकील से उसकी डिग्री और उसका बार काउंसिल सर्टिफिकेट दिखाने का आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने बार काउंसिल से कहा कि अच्छे कॉलेज से पढ़े वकीलों को ही पंजीकृत करे और इधर उधर से डिग्री लेने वालों को मान्यता ना दे। कोर्ट ने बार काउंसिल को उसके कागज जाँचने के आदेश भी दे दिए हैं।

कोर्ट ने कहा कि वकालत एक इज्जतदार पेशा है और वकील सामाजिक बदलाव के इंजीनियर हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने एक गरीब लड़की की गरीबी का फायदा उठा कर उसको वेश्यावृत्ति में झोंका है। कोर्ट ने वकील की याचिका को खारिज कर दिया और उस पर 10,000 रूपए का जुर्माना भी लगाया।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरई बेंच में एक वकील मुरुगन ने एक याचिका दायर की थी। याचिका में माँग की गई थी कि उसके ऊपर नागरकोइल शहर में वेश्यालय चलाने के कारण दर्ज की गई FIR को रद्द कर दिया जाए और उन पुलिस वालों पर कार्रवाई की जाए जो इस धंधे में खलल डाल रहे थे।

मुरुगन ने हाई कोर्ट में याचिका लगाकर कहा था कि देश में सहमति से किया गया सेक्स मान्य है और वह ऐसे ही लोगों को मिलवाता है। मुरुगन ने अपन वेश्यालय पर कार्रवाई के पीछे रिश्तेदारों की साजिश की भी बात कही थी। उसने हाई कोर्ट से उसके खिलाफ सभी मामले रद्द करने की माँग की थी।

इस मामले में फरवरी, 2024 में नागरकोइल के इस वेश्यालय पर मारे गए छापे में एक 17 वर्ष की लड़की को भी बचाया गया था। लड़की ने पुलिस को बताया था कि उसका यहाँ शोषण हो रहा था। इस कार्रवाई के बाद मुरुगन के विरुद्ध POCSO समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।

कब-कहाँ-कैसे करें सेक्स, चर्च में शादी के बाद थमाया नोट: महिला की आपबीती सुन हाई कोर्ट भी हैरान

2012 में केरल के एक चर्च में उसकी शादी हुई। पहली ही रात ससुरालवालों ने उसे एक नोट थमाया। इसमें बताया गया था कि वह कब, कहाँ और कैसे सेक्स करे, जिससे वह एक ‘संस्कारी बच्चा’ पैदा कर सके। इस महिला की आपबीती सुनकर केरल हाई कोर्ट के जस्टिस भी हैरान रह गए।

हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पीड़ित महिला ने ससुराल वालों पर कार्रवाई की माँग की है। उसका कहना है कि ससुराल के लोग उसे लड़का पैदा करने के लिए अलग-अलग तरीके बताते थे। इसके लिए नोट देते थे। एक पाउडर भी दिया गया था।

केरल का है मामला

39 वर्षीय पीड़ित महिला केरल के कोल्लम जिले की रहने वाली है। उसने न्याय पाने के लिए केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। महिला ने बताया है कि उसकी 12 अप्रैल 2012 को मुवात्तुपूजा के होली मैगी चर्च में शादी हुई थी। शादी की रात पति ने उसे एक नोट दिया। इस नोट में इस बात को लेकर जानकारी दी गई थी कि वह कैसे एक लड़के को जन्म देने के लिए गर्भधारण कर सकती है।
इस नोट में बताया गया था कि किस समय, किस जगह और किस तरीके से संभोग करने पर 95% संभावना एक अच्छे, गोरे और बुद्धिमान लड़के को पैदा करने की है। महिला ने बताया कि उसके ससुराल वालों ने दावा किया यही विधि अमेरिका में रहने वाले उनके एक रिश्तेदार भी आजमा चुके हैं।
महिला ने बताया कि उसकी सास ने उसे कुछ पाउडर खिलाए और कहा कि इससे गोरा लड़का पैदा होगा। जो नोट महिला को दिया गया था, उसमें उससे गर्भ के दौरान महान व्यक्तित्वों के विषय में सोचने को कहा गया था। जब महिला ने सास से इस विषय में पूछा तो उनका जवाब सन्न करने वाला था। महिला से उसकी सास ने कहा कि ‘लड़कियाँ आर्थिक बोझ’ होती हैं, इसलिए वह अपने घर में लड़की नहीं पैदा होते देखना चाहती। महिला का कहना था कि लड़कियाँ पैसे ले जाती हैं, जबकि लड़के पैसे लाते हैं। महिला ने कहा है कि यह बहुत ही अपमानजनक था।
महिला ने बताया कि वह 2014 में अपने पति के साथ ब्रिटेन चली गई थी। यहाँ जब वह गर्भवती हो गई तो उसके पति ने उसके साथ बदसलूकी की। उसके पति ने आरोप लगाया कि वह गलत समय पर गर्भवती हुई है। पति ने उसके साथ अत्याचार करते हुए तीन माह बाद उसे घर भेज दिया, जहाँ कुछ समय बाद उसने एक लड़की को जन्म दिया।
महिला ने बताया कि बेटी के पैदा होने के बाद पति उससे और भी खिन्न हो गया। वह बेटी और उससे मिलने भी नहीं आता था और ना ही बेटी के लालन-पालन में कोई रूचि दिखाता था। महिला ने बताया कि वह अपनी बेटी को लेकर इस दौरान एक माह के लिए ब्रिटेन भी गई। लेकिन एक माह तक उसका पति अपनी बच्ची को देखने भी नहीं आया।

तलाक के बाद भी पीड़ा

महिला ने बताया कि वह इन सब चीजों से परेशान हो गई थी। बीते कुछ समय से तलाक की कार्यवाही चल रही थी। इसके अंतर्गत 2022 में अदालत ने निर्णय दिया कि उसके पति को हर महीने भरण-पोषण की धनराशि देनी होगी। इसके विरुद्ध भी उसके पति ने एक याचिका डाल दी। महिला ने बताया कि इसके बाद उसने कानूनी बारीकियों के विषय में जानकारी इकट्ठा की और अपने पति तथा ससुराल पक्ष के विरुद्ध मुकदमा दायर करने का निर्णय लिया।
महिला ने गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के तहत अपने ससुराल पक्ष के विरुद्ध मुकदमा दायर किया है। यह किसी महिला के गर्भधारण के दौरान बच्चे के लिंग की जाँच या निर्धारण सम्बन्धी कार्यों पर रोक लगाता है। यह क़ानून देश में बच्चियों को कोख में ही मार दिए जाने से रोकने के लिए लाया गया था। केरल हाई कोर्ट ने इस मामले में महिला के पति और उसके परिजनों से जवाब माँगा है। अगली सुनवाई 29 फरवरी को है।