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NEET लीक केस : 30 लाख रूपए लाओ, मेडिकल में सीट पाओ: RJD का नेशनल सेक्रेट्री संतोष जायसवाल गिरफ्तार, फ्लैट पर मिले ‘Question Paper’

दिल्ली पुलिस ने NEET UG एग्जाम के पेपर लीक मामले में RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को किया गिरफ्तार (फोटो साभार: एक्स @PNRai1)
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET UG 2026 में फर्जीवाड़े और पेपर लीक नेटवर्क को लेकर दिल्ली पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है। इस मामले में RJD के नेशनल सेक्रेटरी संतोष कुमार जायसवाल को गिरफ्तार किया गया है, जिसे जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड मान रही हैं।

पुलिस ने उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के एक होटल और फ्लैट से कई छात्रों को रेस्क्यू किया है। इनमें कुछ नाबालिग भी बताए जा रहे हैं। जाँच के दौरान पुलिस को 149 पन्नों का एक कथित ‘स्पेशल क्वेश्चन सेट’, खाली साइन किए हुए चेक, छात्रों के मूल दस्तावेज और कई संदिग्ध रिकॉर्ड मिले हैं।

दिल्ली पुलिस के अनुसार यह गिरोह मेडिकल सीट दिलाने और परीक्षा में सफलता का झाँसा देकर छात्रों और अभिभावकों से 20 से 30 लाख रुपए तक वसूलता था। आरोप है कि छात्रों को परीक्षा से पहले अलग-अलग होटल और फ्लैटों में रखा जाता था, जहाँ उन्हें महत्वपूर्ण प्रश्न याद कराए जाते थे।

सूरत से मिला इनपुट और दिल्ली में शुरू हुई बड़ी कार्रवाई

दिल्ली पुलिस की जाँच के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क का पहला बड़ा सुराग 2 मई 2026 को मिला, जब गुजरात के सूरत से संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी साझा की गई। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने महिपालपुर इलाके के कई होटल्स में छापेमारी की। जाँच के दौरान पुलिस को ऐसे समूह मिले जिनमें छात्र परीक्षा से पहले एक साथ ठहराए गए थे।

कार्रवाई के दौरान पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया। उनसे पूछताछ के बाद संतोष जायसवाल का नाम सामने आया। इसके बाद पुलिस ने दिल्ली में उसे गिरफ्तार किया। उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के एक फ्लैट और होटल से 18 से अधिक छात्रों को मुक्त कराया गया। इनमें कई छात्र नाबालिग बताए जा रहे हैं।

मोतिहारी से दिल्ली तक संतोष जायसवाल कैसे बना परीक्षा नेटवर्क का बड़ा चेहरा

संतोष जायसवाल बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी स्थित बसवरिया गाँव का रहने वाला है। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद संतोष आगे की शिक्षा के लिए पटना गया। वहीं उसकी मुलाकात कथित तौर पर पुराने परीक्षा माफिया नेटवर्क से हुई।

धीरे-धीरे वह उस गिरोह का हिस्सा बना और फिर खुद सेटिंग नेटवर्क खड़ा करने लगा। उसने पटना से अपना नेटवर्क बढ़ाया और बाद में दिल्ली को ऑपरेशन का मुख्य केंद्र बना लिया। आज उसके पास दिल्ली के पॉश इलाके ईस्ट ऑफ कैलाश में आलीशान बंगला होने की बात कही जा रही है।

इसके अलावा कई अन्य संपत्तियों की भी जाँच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि उसने दिल्ली में मेडिसिन कारोबार की आड़ में अपना नेटवर्क खड़ा किया और उसी के जरिए मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं से जुड़ा अवैध कारोबार फैलाया।

परिवार, राजनीति और RJD कनेक्शन की भी जाँच

संतोष जायसवाल RJD में राष्ट्रीय सचिव के पद पर था। पुलिस अब यह भी खंगाल रही है कि क्या उसके राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल नेटवर्क को बचाने या विस्तार देने में हुआ।जानकारी के मुताबिक, संतोष ने पहले अपने भाई को बिहार विधानसभा चुनाव लड़वाने की कोशिश की थी। बाद में उसने खुद भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की।

वह लगातार राजनीतिक संपर्क मजबूत करने में जुटा हुआ था और दिल्ली स्थित पार्टी कार्यालय में भी उसकी सक्रिय मौजूदगी रहती थी। उसके परिवार में दो भाई डॉक्टर हैं जबकि एक बैंक अधिकारी है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में संतोष जायसवाल के अलावा डॉ अखलाक आलम, संत प्रताप सिंह और विनोद पटेल को गिरफ्तार किया है।

INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।

मनुस्मृति के पन्ने फाड़ना एक अपराध, नहीं होगी कोई FIR रद्द: Allahabad High Court ने RJD प्रवक्ता प्रियंका भारती को फटकारा, गिरफ्तारी पर रोक लगाने से भी किया इनकार

    प्रियंका भारती को इलाहाबाद हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है (साभार: Priyanka Bharati/FB & Livelaw)
वोट बैंक को साधने विपक्ष द्वारा सनातन को अपमानित किया जाता है। जब तक इन सभी को कानून द्वारा दण्डित नहीं किया जाएगा, ऐसी हरकतें बंद नहीं होंगी। ये तो हिन्दू है जो कोर्ट पहुँच गया अगर स्थिति विपरीत होती "सिर तन से जुदा" गैंग मैदान में आ चुका होता और पूरा INDI गंठबंधन 
राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता प्रियंका भारती को बचाने नहीं आता।   

राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता प्रियंका भारती की मुश्किलें बढ़ गई हैं। लाइव टीवी पर हिन्दू ग्रन्थ मनुस्मृति के पन्ने फाड़ने के मामले में उन पर दर्ज FIR रद्द नहीं होगी। ऐसा करने से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मना कर दिया है। हाई कोर्ट ने इसे एक संज्ञेय अपराध करार दिया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 28 फरवरी को सुनवाई में कहा, “हमें लगता है कि हैं कि दो टीवी चैनल ‘इंडिया टीवी’ और ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ द्वारा आयोजित लाइव टीवी बहस में एक विशेष धर्म की पवित्र पुस्तक ‘मनुस्मृति’ के पन्नों को फाड़ने का कृत्य और कुछ नहीं बल्कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के दुर्भावनापूर्ण भावना का प्रदर्शन था और इसे बिना किसी वैध कारण के किया गया।”

 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रियंका भारती को फटकार लगाते हुए कहा, “हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि याचिकाकर्ता एक पढ़ी-लिखी और उच्च योग्यता वाली महिला हैं और वह बहस में एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता के रूप में भाग ले रहीं थी। ऐसे में यह बात नहीं मानी जा सकती कि यह कार्य अनजाने में किया गया।”

मनुस्मृति के पन्ने फाड़ने के को इसके बाद हाई कोर्ट ने एक अपराध करार दिया। हाई कोर्ट ने कहा, “वर्तमान मामले में एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता द्वारा लाइव टीवी बहस में एक विशेष धर्म की पवित्र पुस्तक ‘मनुस्मृति’ के कुछ पृष्ठ फाड़ने का कृत्य, प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि एक संज्ञेय अपराध किया गया है।”

प्रियंका भारती की याचिका इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द कर दी और कोई भी राहत देने से मना कर दिया। यह याचिका प्रियंका भारती ने अलीगढ़ में उनके खिलाफ दर्ज एक मुकदमे के बाद के बाद दायर की थी। उन्होंने माँग की थी कि उनके खिलाफ FIR को रद्द कर दिया जाए।

प्रियंका भारती ने मनुस्मृति पर चालू बवाल के बीच दो टीवी चैनल पर उसके कुछ पन्ने फाड़ दिए थे। इसके बाद उनके खिलाफ कीई जगह विरोध प्रदर्शन हुए थे। अलीगढ़ में उनके खिलाफ FIR राष्ट्रीय स्वर्ण परिषद के संगठन मंत्री भरत तिवारी की तरफ से 28 दिसंबर, 2024 को दर्ज करवाई गई थी।

भरत तिवारी ने कहा था कि प्रियंका भारती की करतूत देश में सामजिक वैमन्यस्यता फैलाने वाली है। उन्होंने इंडिया TV के मालिक रजत शर्मा और TV9 चैनल के मालिक वरुण दास पर भी TRP की नीयत से प्रियंका भारती की हरकतों को बढ़ावा दिए जाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि इस कृत्य के चलते उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं।

बिहार : बीजेपी सरकार की सुविधाओं के लाभ उठाने वाले हरामफरमोश मुस्लिमों को विकास का एजेंडा नहीं कबूल, मजहब और BJP विरोध ही अब भी मतदान का पैटर्न


बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की बुरी हार हुई है। 243 सीटों वाली विधानसभा में जहाँ NDA को 200 से अधिक सीटें मिलीं तो वहीं महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया है। हालाँकि, 28 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने भी इस चुनाव में 5 सीटें जीती हैं। ओवैसी की सारी सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में आई हैं।

इस चुनाव में AIMIM की सफलता दिखाती है कि बिहार के एक बड़े मुस्लिम वर्ग के लिए अब मजहबी पहचान पर आधारित राजनीति ही निर्णायक बनती जा रही है। मुसलमान अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो उनकी मजहबी पहचान के साथ और अधिक खुलकर खड़ा हो। AIMIM की राजनीति की जड़ें मजहबी पहचान में ही हैं। पार्टी खुद को एक ‘मुस्लिम प्लेटफॉर्म’ की तरह पेश करती है।

ओवैसी की इस जीत से एक बात और साफ होती है कि उन्होंने सीमांचल में दमदार ‘घुसपैठ’ कर ली है। RJD की रीढ़ माने जाने वाले MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को उन्होंने तोड़ दिया है। AIMIM के प्रदर्शन से साफ है कि ओवैसी ने RJD के मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया है। उन्होंने अब सीमांचल में अपना एक जनाधार खड़ा कर लिया है।

हालाँकि, ये वोटर भी कब तक ओवैसी के साथ हैं, यह भी अपने आप में एक सवाल होगा क्योंकि यही वोटर बीजेपी विरोध में लंबे वक्त तक RJD के साथ खड़ा था। इन्हीं वोटरों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद माँगने के लिए आवाज उठानी शुरू की और RJD-कॉन्ग्रेस की तरफ से सब उन्हें यह गारंटी नहीं मिली तो वो ओवैसी की तरफ शिफ्ट हो गए। क्योंकि इन्हें जब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो कम-से-कम एक कट्टर मजहबी पार्टी को मिल ही गई है।

आम तौर पर मुस्लिम वोटों को पैर्टन यही रहता है कि वो ऐसे दल को वोट करते हैं जिसका अपना एक तय जनाधार हो और जो उनकी नजरों में ‘सांप्रदायिक’ BJP को हरा सकता हो। जैसे उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है, यहाँ सपा के पास एक तय जातिगत वोट बैंक है तो आम तौर पर मुस्लिम उससे मिलकर BJP को हराने के लिए वोटिंग करते हैं।

बिहार में अभी ऐसे जनाधार वाला कोई दल उनको नजर नहीं है क्योंकि RJD का फिक्स माना जाने वाला यादव वोट बैंक भी उनसे छिटका-छिटका है। अगर भविष्य में कोई दल बिहार में ऐसा उभकर सामने आता है जिसका पास अपना एक जनाधार हो और जो BJP के विरोध में सरकार बनाने के लिए तैयार हो तो मुस्लिम उसके साथ भविष्य में नहीं जाएँगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। मगर अभी ओवैसी ने MY समीकरण का गणित ध्वस्त कर दिया है, यह भी पूरी तरह से सही है।

ओवैसी ने तोड़ दिया RJD का भ्रम?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी ने कई बार कोशिश की थी कि वह किसी भी तरह महागठबंधन का हिस्सा बन जाएँ। ओवैसी ने RJD से 6 सीटों की माँग की थी और लालू यादव को दो बार खत लिखा था। लालू यादव ने इन खतों का कोई जवाब नहीं दिया।

 खुद ओवैसी ने एक रैली में इससे जुड़ी जानकारी दी है। उन्होंने कहा था, “हमने RJD से कभी भी मंत्री पद की माँग नहीं की। अगर यह दरियादिली नहीं है तो और क्या है? हमने गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास किए। अब फैसला RJD के हाथ में है।” तब ओवैसी को कुछ हाथ नहीं लगा लेकिन अब उन्होंने तेजस्वी को हाथ मलने को मजबूर कर दिया है।

औवेसी ने जो पाँच सीटें जीतीं हैं वो सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं और उन सभी पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने ही जीत दर्ज की है। AIMIM ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट से क्रमश मोहम्मद मुर्शिद आलम, मौहम्मद तौसीफ आलम, मौहम्मद सरवर आलम, अखतरुल ईमान, गुलाम सरवर ने जीत दर्ज की है।

एक खास बात ये भी है कि AIMIM ने ये सीटें नजदीकी मुकाबले में नहीं जीती हैं बल्कि इन पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। उनका सबसे कम जीत का अंतर ही 23,000 से ऊपर का है। इन सीटों पर मुस्लिम वोटों की भरमार है। इन सभी पाँचों सीटों पर मुस्लिमों की संख्या 64% से अधिक है। कोचाधामन में तो मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 72.4% है।

                              AIMIM द्वारा जीती गई सीटें और हार-जीत का अंतर (फोटो: ECI)

ओवैसी ने खुद को 5 सीटें जीतीं हैं इसके अलावा कम-से-कम 8 ऐसी सीटें भी हैं जहाँ उन्होंने महागठबंधन के उम्मीदवार को हराने में भूमिका निभाई है। यानी उन सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार को मिले वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से अधिक रही है।

केवटी, शेरघाटी, प्राणपुर, कसबा, गोपालगंज और महुआ जैसी कम-से-कम 8 सीटें हैं, जहाँ AIMIM महागठबंधन की हार की वजह बनी है। RJD को जो यह भ्रम था कि मुस्लिम वोटों पर उसका एकमुश्त अधिकार है और मुस्लिम केवल उसके साथ ही जाएँगे यह भ्रम ओवैसी ने तोड़ दिया है।

मुस्लिमों वोटरों की प्राथमिकता- मजहबी पहचान और BJP विरोध

बिहार के इस चुनाव में एक बार फिर दिखा है कि मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकताएँ दो मुख्य स्तंभों पर टिकती हैं। पहला है मजहबी पहचान और दूसरा है ऐसा राजनीतिक विकल्प चुनना जो BJP को प्रभावी रूप से चुनौती दे सके और उसे हराने की स्थिति में हो।

मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि किसने कितनी सड़क बनाई या किसने कितनी योजनाएँ लागू कीं बल्कि यह कि कौन-सी राजनीतिक शक्ति उनकी मुस्लिम पहचान को मजबूत करने का काम करेगी। AIMIM को चुनकर एक बार फिर वही प्राथमिकता मुस्लिम वोटरों ने दिखाई है।

यही वजह है कि उनकी राजनीति में मजहबी पहचान, प्रतिनिधित्व और उनके विचार की प्रमुखता सबसे ऊपर रहती हैं। जब उन्हें लगता है कि कोई दल उनकी पहचान को सीधे तौर पर संबोधित कर रहा है या उन्हें एक मजहबी पहचान दे रहा है तो वे उसके साथ खड़े होते हैं।

दूसरा पहलू रणनीतिक वोटिंग है। मुस्लिम मतदाता अक्सर यह देखते हैं कि चुनावी मुकाबले में BJP के खिलाफ सबसे मजबूत दावेदार कौन है। यदि कोई गठबंधन या पार्टी BJP को हराने में सक्षम दिखती है, तो मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में उसके पक्ष में एकजुट हो जाते हैं।

मुस्लिमों का यह वोटिंग पैटर्न पूरे भारत में नजर आता है। गैर-बीजेपी दलों के सत्ता में आने के बाद उन्हें मिलने वाली खुली छूट के चलते मुस्लिम BJP के खिलाफ लामबंद रहते हैं। अधिकतर गैर बीजेपी सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर किसी भी तरह उन्हें अपने पाले में रखना चाहती है। इसलिए उन्हें हर काम करने की खुली छूट मिलती है।

हर चुनाव से पहले बड़ी पार्टियाँ विकास योजनाएँ, रोजगार और शिक्षा के मुद्दे गिनाती हैं लेकिन मुस्लिम मतदाता उसी विकल्प की ओर झुकते हैं जो उन्हें अपनी मजहबी पहचान की ‘सुरक्षा’ का आश्वासन देता हो। यह पैटर्न प्रदेश भर में साफ दिखाई दिया है।

जहाँ RJD या कांग्रेस मुस्लिम वोट को ‘तुष्टीकरण’ का जरिया मान रहे थे लेकिन AIMIM ने उससे आगे जाकर ‘प्रत्यक्ष नेतृत्व’ का वादा किया। इसी वजह से मुस्लिम मतदाता AIMIM को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखने लगे हैं जो उनकी पहचान को बिना किसी समझौते के राजनीतिक रूप देता है। ओवैसी की यही ‘घुसपैठ’ कई सीटों पर इतनी गहरी हुई कि मुख्यधारा की पार्टियाँ उसका मुकाबला नहीं कर पाईं।

बिहार के मौजूदा नतीजों से यही संकेत मिलता है कि मुस्लिम वोटों में पहचान आधारित राजनीति आने वाले समय में मजबूत ही होती जाएगी। युवा मुस्लिम मतदाता सोशल मीडिया और भाषणों के जरिए ऐसे मुस्लिम नेतृत्व की ओर झुक रहे हैं जो उनकी मजहबी पहचान को खुले तौर पर प्रस्तुत करे।

क्या इसी रमीज के कारण पिता लालू यादव को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य ने छोड़ा परिवार?

        पिता लालू यादव के साथ रोहिणी आचार्य (बाएँ) और तेजस्वी यादव के साथ रमीज बताया जा रहा शख्स (दाएँ)
बिहार चुनाव से दो पार्टियों-RJD और कांग्रेस- में बगावत हो गयी। सत्ता के गलियारों में यह भी चर्चा है कि INDI गठबंधन से भी कांग्रेस को अलग करने की मंत्रणा चल रही है। लोगों का कहना है कि जिस कांग्रेस के सहारे हम जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे थे वही हमारे कंधे पर अपने आपको बचा रही है और पुरानी पार्टी मान गले लगाते रहे। आज की सियासत में कम्युनिस्ट, कांग्रेस और केजरीवाल पार्टी तीनों डूबते जहाज है। कई पोलिंग स्टेशन पर केजरीवाल पार्टी NOTA से भी कम वोट ले पायी। खैर जमानत तो सभी की जब्त होना इस पार्टी के लिए कोई नयी बात नहीं। जमानत जब्त तो केजरीवाल पार्टी के लिए दाल-रोटी बन चुकी है। 
                                                                                                      साभार The NewsIn
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बिहार में राजद की हार के करारी हार के बाद लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने परिवार से रिश्ता तोड़कर राजनीति को अलविदा कह दिया है। लालू यादव को किडनी देने वाली रोहिणी ने X पर पोस्ट कर अपने फैसले जानकारी दी है और इसके लिए संजय यादव और रमीज को जिम्मेदार बताया है।

हरियाणा से आने वाले संजय यादव RJD के राज्यसभा सांसद हैं और तेजस्वी यादव के मित्र हैं। वह अक्सर तेजस्वी यादव के साथ नजर आते हैं और उन्हें तेजस्वी का राजनीतिक सलाहकार माना जाता है। हालाँकि, रमीज का नाम अभी लोगों के लिए अनजान है और वो सुर्खियों में कम ही रहा है।

कौन है रमीज?

‘द ललनटॉप’ के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा ने X पर एक पोस्ट में बताया है कि रमीज नेमत खान उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के रहने वाले हैं। उन्होंने लिखा है, “लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने जिन रमीज का जिक्र किया है। वे यूपी के बलरामपुर के रहने वाले हैं। जेल में बंद पूर्व सांसद रिजवान जहीर के दामाद हैं। इन पर हत्या समेत कई मुकदमें हैं। ये RJD का सोशल मीडिया और चुनाव प्रबंधन देखते हैं। इनकी पत्नी भी विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं।”

                                                               पंकज झा का X पोस्ट

पंकज झा ने एक अन्य फोटो भी X पर शेयर की है जिसमें रमीज नेमत खान और संजय यादव, तेजस्वी यादव व राहुल गाँधी के साछ नजर आ रहे हैं।

रमीज पर फिरोज पप्पू की हत्या का आरोप

रमीज नेमत और उनके ससुर व पूर्व सपा सांसद रिजवान जहीर पर बलरामपुर में नगर पंचायत तुलसीपुर के पूर्व चेयरमैन फिरोज पप्पू की हत्या का आरोप है। 4 जनवरी 2022 की रात पूर्व चेयरमैन फिरोज अहमद उर्फ पप्पू उनके घर से कुछ दूरी पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जाँच में नेमत समेत 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि सपा के टिकट की दावेदारी के विवाद में इस हत्या की गई थी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, रमीज नेमत फिलहाल जमानत पर बाहर है। फिरोज पप्पू हत्याकांड से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आगामी 18 और 20 नवंबर को सुनवाई निर्धारित की गई है।

संजय ने कराई रमीज की RJD में एंट्री

सूत्रों के मुताबिक, संजय यादव ने ही रमीज नेमत की RJD में एंट्री कराई थी। बताया जाता है कि संजय यादव की रमीज के ससुर रिजवान जहीर से अच्छी तरह से जान पहचान थी और वहीं से उनकी पहचान रमीज नेमत से भी हुई थी। इसके कुछ समय बाद संजय ने रमीज की RJD में एंट्री करा दी।

TV9 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रमीज 2016 में आरजेडी से जुड़े थे। वो पहले पहले डिप्टी सीएम ऑफिस में बैकडोर का काम देखते थे और उसके बाद तेजस्वी के दफ्तर से जुड़ गए। बकौल रिपोर्ट, रमीज तेजस्वी के डेली रूटीन और कैंपेनिंग का काम देखते हैं।

तेजस्वी के साथ क्रिकेट भी खेला है रमीज

तेजस्वी और रमीज की दोस्ती सियासत से इतर क्रिकेट की भी है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि रमीज तेजस्वी यादव के साथ क्रिकेट खेलता था। IANS के पत्रकार सौरव राज ने X पर एक पोस्ट में लिखा है, “जिस रमीज का जिक्र रोहिणी आचार्य ने किया है वो तेजस्वी यादव का दोस्त है, UP का रहने वाला है, साथ में क्रिकेट खेलता था।”

रोहिणी के परिवार और राजनीति छोड़ने के बाद अब RJD में कलह और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। संजय यादव के कारण पहले से ही परिवार में कलह चल रही है। तेज प्रताप यादव आए दिन उन पर बिना नाम लिए हमला करते हैं। मीसा भारती ने उन पर परोक्ष रूप से हमला बोला है और अब रमीज नेमत का नाम भी इस कड़ी में जुड़ गया है।

बिहार चुनाव अपराधियों और जातिगत का : 1303 में हर तीसरा दागी; लेफ्ट ने उतारे 100% दागी उम्मीदवार, RJD और कॉन्ग्रेस भी टक्कर देने में पीछे नहीं: बिहारियों को यूँ ही नहीं सता रहा ‘जंगलराज’ का खौफ

बिहार चुनाव में इंडी गठबंधन ने उतारी दागियों की फौज (साभार: Amar Ujala)
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियों के दावे और हकीकत के बीच का फर्क साफ दिखने लगा है। हर पार्टी साफ-सुथरी सरकार, लॉ एंड ऑर्डर और भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का वादा कर रही है, लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट इन दावों पर पानी फेर रही है।

 रिपोर्ट बताती है कि चुनाव लड़ रहे कुल 1303 उम्मीदवारों में से 32 फीसदी पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें सबसे ज्यादा दागी उम्मीदवारों को टिकट देने वाली पार्टियाँ हैं- राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कम्युनिस्ट पार्टियाँ (CPI, CPI-M, CPI-ML) और कॉन्ग्रेस। वहीं, जनता दल यूनाइटेड (JDU) इस लिस्ट में सबसे नीचे है, जो दिखाता है कि एनडीए और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू अपराधी छवि वाले उम्मीदवारों से दूर रहने की कोशिश कर रही है। भाजपा भी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

इस रिपोर्ट ने विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया है, खासकर RJD को जहाँ लालू परिवार के करीबियों पर भारी-भरकम केस हैं। आइए इस रिपोर्ट को विस्तार से समझते हैं और देखते हैं कि कैसे राजनीति में दागियों का बोलबाला है।

बिहार विधानसभा चुनाव में हर तीसरा उम्मीदवार दागी

ADR और बिहार इलेक्शन वॉच ने बिहार चुनाव के पहले फेज के 121 विधानसभा सीटों पर लड़ रहे 1,314 उम्मीदवारों के एफिडेविट्स का विश्लेषण किया। ये एफिडेविट चुनाव आयोग में जमा किए गए हैं, जहाँ उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति, शिक्षा और क्रिमिनल रिकॉर्ड की जानकारी देनी पड़ती है। लेकिन 11 उम्मीदवारों के एफिडेविट स्पष्ट नहीं थे, इसलिए विश्लेषण 1,303 उम्मीदवारों पर आधारित है।

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि 423 उम्मीदवारों (32%) ने खुद कबूला है कि उनके ऊपर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें से 354 (27%) पर तो गंभीर अपराधों के केस हैं, जैसे हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार के।

आँकड़ों के मुताबिक…

  • हत्या से जुड़े केस: 33 उम्मीदवारों पर IPC की धारा 302-303 और BNS की धारा 103(1) के तहत केस।
  • हत्या का प्रयास: 86 उम्मीदवारों पर IPC 307 और BNS 109 के केस।
  • महिलाओं पर अत्याचार: 42 उम्मीदवारों पर ऐसे केस, जिसमें 2 पर रेप (IPC 376) के आरोप।
इसके अलावा कई पर भ्रष्टाचार, चुनावी अपराध, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और हत्या-बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के केस हैं।
ये आँकड़े बताते हैं कि बिहार की राजनीति में अपराधीकरण कितना गहरा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, जहाँ पार्टियों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने पर सफाई देनी पड़ती है, पार्टियाँ बेझिझक ऐसे लोगों को मैदान में उतार रही हैं। रिपोर्ट में ये भी जिक्र है कि चुनाव आयोग ने पार्टियों को वेबसाइट पर दागी उम्मीदवारों की जानकारी डालने का आदेश दिया है, लेकिन कई पार्टियाँ इसका पालन नहीं कर रही हैं।

पार्टियों के हिसाब से दागी उम्मीदवारों की जानकारी

पार्टियों के हिसाब से बात करें तो RJD, कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पार्टियों वाला विपक्षी गठबंधन दागी उम्मीदवारों को टिकट देने में सबसे आगे है। वहीं, NDA की पार्टियों (BJP और JDU) ने अपेक्षाकृत कम दागी उम्मीदवार उतारे हैं।
CPI(ML)(L): 14 उम्मीदवारों में से 13 (93%) पर क्रिमिनल केस। इनमें से 9 (64%) पर गंभीर केस। ये वामपंथी पार्टी हमेशा गरीबों और मजदूरों की बात करती है, लेकिन उसके उम्मीदवारों पर हत्या, दंगा और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के केस भरे पड़े हैं।
CPI(M): सीपीआई-एम के 3 में से 3 (100%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस और सभी पर गंभीर केस। पहले चरण में सीपीआई-एम ने सिर्फ 3 उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन 100% रेट के साथ सभी दागी हैं।
CPI: सीपीआई के 5 में से 5 (100%) पर क्रिमिनल केस और 4 (80%) पर गंभीर केस।
                                                पार्टी वाइज दागी प्रत्याशियों की संख्या
RJD: 70 उम्मीदवारों में से 53 (76%) पर क्रिमिनल केस हैं। उनमें भी 42 (60%) पर गंभीर केस हैं। RJD सबसे ज्यादा दागी टिकट देने वाली पार्टी है। खुद चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव की पार्टी को अब भी दागी नेताओं पर भरोसा है।
कॉन्ग्रेस: पार्टी के कुल 23 उम्मीदवारों में से 15 (65%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इन 15 में से भी 12 (52%) पर गंभीर केस दर्ज हैं।
जन सुराज पार्टी: प्रशांत किशोर की नई पार्टी तो ‘सुराज’ का वादा करती है। लेकिन 114 उम्मीदवारों में से 50 (44%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। उनमें भी 49 (43%) पर गंभीर केस दर्ज हैं। ये पार्टी भले ही नई है, लेकिन उम्मीदवार पुराने दागी हैं। इसे नई बोतल में पुरानी शराब भी कह सकते हैं।
LJP (राम विलास): चिराग पासवान की पार्टी भी दागी लिस्ट में है। चिरागी पार्टी के 13 में से 7 (54%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं, जिसमें से (38%) पर गंभीर केस हैं।
AAP: अरविंद केजरीवाल की पार्टी बिहार में नई है, लेकिन उसके उम्मीदवारों में भी दागी शामिल हैं। आप के 44 में से 12 (27%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस हैं, जिसमें से 9 (20%) पर गंभीर केस हैं।
BSP: बहुजन समाज पार्टी ने पहले चरण में 89 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिसमें से 18 (20%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इन 16 (18%) पर गंभीर केस हैं।
BJP: बीजेपी के 48 में से 31 (65%) पर क्रिमिनल केस हैं, जिसमें 27 (56%) पर गंभीर केस हैं। बीजेपी एनडीए की मुख्य पार्टी है, हालाँकि दागी उम्मीदवारों के मामले में वो मुख्य विपक्षी पार्टियों से पीछे नजर आती है।
JDU: जदयू के 57 में से सिर्फ 22 (39%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस हैंष इनमें से 15 (26%) पर गंभीर केस दर्ज हैं। आँकड़ों को देखेंगे तो दागियों के मामले में इंडी गठबंधन की पार्टियों की तुलना में नीतीश कुमार की पार्टी इस लिस्ट में सबसे पीछे है। ये आँकड़े बताते हैं कि JDU अपराधी छवि वालों से दूर रहने की नीति पर चल रही है।
               पार्टी के हिसाब से कितने प्रतिशत उम्मीदवारों पर केस, कितने केस गंभीर (फोटो साभार: ADR)

RJD के प्रमुख दागी नेताओं में लालू परिवार और उनके करीबी शामिल

RJD पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उसके 76% उम्मीदवार दागी हैं। लालू प्रसाद यादव खुद चारा घोटाले में सजा काट चुके हैं और उनकी पार्टी अब भी ऐसे लोगों को टिकट दे रही है।
तेजस्वी यादव (रघोपुर से): RJD के स्टार कैंडिडेट और पूर्व डिप्टी CM तेजस्वी यादव के ऊपर IRCTC घोटाले में CBI जाँच चल रही है। इसके अलावा चुनावी हिंसा और संपत्ति से जुड़े कई केस दर्ज हैं। तेजस्वी हमेशा दावे करते हैं कि ये राजनीतिक साजिश है, लेकिन कोर्ट से लेकर तमाम चार्जशीट जो दाखिल हैं, उनमें कहीं बेगुनाही की बात नहीं कही गई है। एडीआर द्वारा जारी आँकड़ों में वही जानकारियाँ हैं, जो उन्होंने अपने शपथ पत्र में दी हैं। तेजस्वी यादव पर कुच 22 केस दर्ज हैं, इसमें आईपीसी के तहत 13 और बीएनएस की तहत 4 धाराओं में केस दर्ज हैं। गंभीर मामलों की संख्या 17 है।
                                   तेजस्वी यादव के ऊपर दर्ज केस, एफिडेविट के आधार पर (स्रोत-ADR)
रवींद्र प्रसाद यादव (महनार से): वैशाली की महनार विधानसभा सीट से उतरे RJD के वरिष्ठ नेता रवींद्र प्रसाद यादव पर 26 धाराओं में केस हैं। उनके ऊपर हत्या का प्रयास (IPC 307) से लेकर महिला विरोधी अपराध तक के केस हैं।
रिपोर्ट कहती है कि RJD के 60% उम्मीदवारों पर गंभीर केस हैं, जो हत्या, बलात्कार और भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। पार्टी के मुखिया लालू हमेशा कहते हैं कि ये केंद्र की साजिश है, लेकिन वोटर अब सोच रहे हैं कि क्या RJD सच में बदलाव ला सकती है? क्योंकि जब ये सरकार यानी एनडीए की सरकार नहीं थी, तब भी तो लालू यादव के खिलाफ केस चल रहे थे।
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अब मतदाताओं के पाले में गेंद, जंगलराज या सुशासन: 6 नवंबर को बटन से फैसला

ये रिपोर्ट बिहार चुनाव को नई दिशा दे सकती है। विपक्ष दागी उम्मीदवारों से भरा है, जबकि NDA कम दागी टिकट देकर विश्वास जीत सकता है। बहरहाल, ये तो अब बिहार के मतदाताओं को सोचना है कि क्या दागी नेता उनके जीवन में बदलाव ला पाएँगे या फिर उन्हें चाहिए साफ-सुथरी इमेज वाली सरकार। अब 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान होना है, जिसमें बिहार के मतदाता अपनी पसंद-नापसंद ईवीएम के जरिए चुन ही लेंगे। और फिर नतीजे 14 नवंबर 2025 को सामने आ जाएँगे कि बिहार के लोगों ने क्या चुना।

भूरा बाल- ‘भू यानि भूमिहार’, ‘रा यानि राजपूत’, ‘बा यानि ब्राह्मण’, ‘ल यानि लाला (कायस्थ)’, जिस ‘नारे’ को मारिया शकील बता रही राजनीतिक ‘जरूरत’, उसकी आड़ में लालू-राबड़ी के ‘जंगलराज’ में किया गया सवर्णों का नरसंहार

                                            लालू के जंगलराज का नारा ‘भूरा बाल साफ करो’

जिस सनातन को कुर्सी के भूखे हिन्दू अपमानित करते है मुस्लिम कट्टरपंथी उसी को अपनी ढाल बनाकर हिन्दुओं पर हमले करते हैं। ये जो हिन्दू त्यौहारों और शोभा यात्राओं पर पत्थरबाज़ी होती ये सब इन्हीं सनातन विरोधी हिन्दुओं के देन है उनको मालूम है हमारे समर्थन में ये ढोंगी कालनेमि हिन्दू सरकार को घेर हमें बचाएंगे। फिर एक बात और, मारिया शकील को देखो, सनातनी वेष धारण किये हुए है और जब हिजाब या बुर्के पर विवाद होगा भांडों की तरह सडकों पर उतर आएगी। अगर इन हिन्दू विरोधियों को अभी भी जनता नहीं पहचानेगी उससे बड़ा महापागल और अँधा कोई नहीं। कहाँ है हिजाब/बुर्का? इसीका नाम है फिरकापरस्ती यानि साम्प्रदायिक लोग।     

मारिया शकील 'भूरा बाल साफ करो' नरसंहार को बता रही जरूरत (साभार : followup & samachar)

बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे पूर्व मंत्री शकील अहमद खान की बेटी मारिया शकील के एक कथित बयान से शुरू हुआ है। आरोप है कि मारिया शकील ने इंडिया टुडे के एक टीवी शो के दौरान, 1990 के दशक के उस कुख्यात नारे ‘भूरा बाल साफ करो’ को उस समय की ‘जरूरत’ (Need of the Hour) या ‘राजनीतिक मजबूरी’ बताया।

मारिया शकील के इस कथित बयान का सीधा मतलब यह है कि 1990 के दशक में लालू यादव की सरकार के दौरान ऊँची जाति के समुदाय (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला/कायस्थ) के खिलाफ जो बड़े बदलाव हो रहे थे, उसमें यह नारा एक जरूरी चाल या उपकरण था। इस तरह, मारिया शकील ने अप्रत्यक्ष रूप से लालू यादव के शासनकाल ‘जंगल राज’ में ऊँची जाति के लोगों पर हुए कथित अत्याचारों, हत्याओं (नरसंहार) और उन्हें सत्ता-संपत्ति से दूर कर दिए जाने को सही ठहराने की कोशिश की है। उनके इस बचाव ने सोशल मीडिया पर लोगों को भड़का दिया है, जो पूछ रहे हैं कि ऐसी हिंसा को कोई कैसे ‘जरूरत’ बता सकता है।

नीचे वीडियो इंडिया टुडे की यूट्यूब की है। इस वीडियो में 19:25 पर मारिया शकील ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को 1990 के दशक के लालू यादव के ‘जंगलराज’ की ‘राजनीतिक जरूरत’ बताती है।

मारिया शकील के बयान पर सोशल मीडिया का गुस्सा: ‘जंगल राज’ को बताया ‘जरूरत’

 मारिया शकील के कथित बयान ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को ‘राजनीतिक आवश्यकता’ बताया, पर सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी आपत्ति जताई है। लोगों ने इस बयान को ‘जंगल राज’ और नरसंहार को सही ठहराने जैसा बताया है।

एक यूजर ने सीधे सवाल किया, “वाह! मारिया शकील जी के अनुसार, 90 के दशक में ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसा जातिवादी नारा बिहार की ‘जरूरत’ था। सवर्णों के नरसंहार के लिए दिए जाने वाले इस नारे को कोई पत्रकार कैसे सही ठहरा सकती है?”

एक अन्य यूजर ने गुस्से में कहा, “नेशनल टीवी पर ‘जंगल राज’ के जहर को ‘जरूरत’ बताना… ये बिहार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। मतलब, ‘जंगलराज’, ‘अपहरण-उद्योग’, ‘पलायन’… ये सब उस समय की माँग थी? और क्या भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला की हत्याएँ भी एक ‘आवश्यकता’ थीं?”

एक यूजर ने मारिया शकील को टैग करते हुए तीखी आलोचना की। यूजर ने लिखा, “अगर आपके लिए ‘भूरा बाल साफ करो’ एक राजनीतिक मजबूरी थी, तो क्या किसी समूह के नरसंहार को सामाजिक न्याय कहा जाएगा? इस तर्क से तो आप कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को भी सही ठहरा देंगी। मैं खुद ब्राह्मण नहीं हूँ, फिर भी इस बयान से बहुत आहत हूँ।”

‘भूरा बाल साफ करो’: बिहार की राजनीति का एक कड़वा नारा

‘भूरा बाल साफ करो’ नारा 1990 के दशक में बिहार की राजनीति में केवल एक नारा नहीं था, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हथियार था, जिसका उद्देश्य समाज को बाँटना था। यह बेहद विवादित और नफरत भरा प्रतीक था, जिसने सीधे-सीधे राज्य की चार सबसे प्रभावशाली ऊँची जातियों को निशाना बनाया। भूरा बाल- ‘भू यानि भूमिहार’, ‘रा यानि राजपूत’, ‘बा यानि ब्राह्मण’, ‘ल यानि लाला (कायस्थ)’।

इन चारों समुदायों ने लंबे समय तक बिहार की राजनीति और समाज पर अपना दबदबा बनाए रखा था। इस नारे का असली मकसद लालू प्रसाद यादव की ‘सामाजिक न्याय’ की आड़ में नफरत की राजनीति करना था। रणनीति साफ थी कि पिछड़ी जातियों, दलितों और मुसलमानों को एक साथ लाकर एक विशाल वोट बैंक तैयार करना और इस विभाजनकारी गठबंधन की मदद से इन ऊँची जातियों के पुराने राजनीतिक प्रभुत्व को पूरी तरह से ‘साफ’ या खत्म कर देना। यह बिहार के सवर्ण समाज को जातियों में तोड़ने और उनके बीच डर पैदा करने की एक गहरी चाल थी।

जंगल राज और अपर कास्ट पर अत्याचार

लालू प्रसाद यादव के 1990 के दशक के शासनकाल को अक्सर ‘जंगल राज’ कहकर पुकारते हैं। इस दौर में बिहार की कानून-व्यवस्था पूरी तरह से टूट चुकी थी। यह समय राज्य में जातीय हिंसा, बड़े पैमाने पर फिरौती के लिए अपहरण और लोगों के बड़े पैमाने पर एक जगह से दूसरी जगह चले जाने (पलायन) के लिए याद किया जाता है।

इस पूरे दौर में जमीन के विवाद और सामाजिक रुतबे की लड़ाई के चलते कई इलाकों में जातीय हिंसा भड़क उठी। गरीब और पिछड़ी जातियों तथा अमीर सवर्ण जमींदारों के बीच हिंसक टकराव हुए। नतीजतन, कई जगहों पर बड़ी संख्या में लोगों की हत्याएँ (नरसंहार) हुईं। इन घटनाओं ने राज्य को हिंसा के गहरे दौर में धकेल दिया।

‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे विभाजनकारी नारों के माहौल में, ऊँची जाति के समुदायों (सवर्णों) ने आरोप लगाया कि लालू यादव की सरकार में उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया। कई सवर्ण परिवारों को इस हिंसा में गंभीर जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा।

उनका यह मानना था कि उन्हें केवल राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं किया गया, बल्कि उनके खिलाफ हुई हिंसा पर भी सरकार ने कोई ख़ास कदम नहीं उठाया। कानून-व्यवस्था इतनी बिगड़ गई थी कि समाज के हर वर्ग में डर का माहौल था, लेकिन ऊँची जातियों के बीच यह डर सबसे ज़्यादा था कि उनकी जान-माल की सुरक्षा खतरे में थी। इसी वजह से राजधानी और राज्य के बाहर पलायन की खबरें आम हो गईं।

मारिया… ‘भूरा बाल साफ करो’ जरूरत नहीं, सिर्फ बिहार के जख्मों पर नमक

मारिया शकील का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि बिहार के अतीत के जख्मों को फिर से कुरेदने जैसा है। अगर कोई पत्रकार या सार्वजनिक बुद्धिजीवी इस हिंसक प्रतीक को ‘जरूरत’ कहे तो यह उस संवेदनशीलता की कमी दिखाता है जो लोकतंत्र की आत्मा है। राजनीति का असली मकसद किसी वर्ग को खत्म करना नहीं, बल्कि सबको बराबरी के साथ खड़ा करना है। ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे नारे बिहार को विभाजित कर गए थे और आज अगर कोई उन्हें सही ठहराता है तो यह संकेत है कि बिहार की राजनीति अभी भी उस अंधेरे दौर से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है।

योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहने वाले तेजस्वी यादव माँ का दूध पिया है तो किसी मुस्लिम नेता को ‘नकली मौलवी’ कहकर दिखाओ

मुस्लिम वोट की खातिर आखिर विपक्ष कितना नीचे गिरेगा? नीचता की भी एक सीमा होती है। तेजस्वी अपने पिता लालू यादव से पूछो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जब 7 नवंबर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पर गोपाष्टमी के दिन गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही थी तब श्रद्धेय कृपालु जी महाराज ने हुंकार भरते हुए कहा था "इंदिरा जिस तरह निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही है तेरी भी मौत गोपाष्टमी को होगी और तेरी पार्टी को समाप्त करने हिमालय से आधुनिक ड्रैस में एक तपस्वी आएगा।" 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्टमी ही थी। साधु का श्राप आज सच हो रहा है। दूसरे, जब राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी तब योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए" अंजाम सबके सामने है। जिस कांग्रेस की किसी समय तूती बोलती थी आज वही कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के आगे झुक रही है। साधु का पद विरासत में नहीं मिलता। साधना करनी पड़ती है, तपस्या करनी पड़ती है। योगी आदित्यनाथ को 'नकली बाबा' तो बक दिया लेकिन क्या किसी मुस्लिम को ‘नकली मौलवी’ कहने की हिम्मत है? चुनाव छोड़ बिल से बाहर नहीं निकल पाओगे।

  

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सरगर्मी तेज है और नेता अलग-अलग मंचों-टीवी चैनलों पर जाकर अपनी बातें रख रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने ‘रैपिड फायर राउंड’ में योगी आदित्यनाथ को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्हें ‘नकली बाबा' बता दिया।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो है हीं, साथ ही वो हिंदुओं की पवित्र गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। तेजस्वी यादव को अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर कोई राजनीतिक हमला करना था तो वो उनके काम को लेकर सवाल उठा सकते थे लेकिन उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर हमले के लिए उनकी धार्मिक पहचान को चुना।

असल में तेजस्वी यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहकर न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला किया है बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक पहचान पर प्रहार करने की कोशिश की है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह उस मानसिकता की झलक है जो दशकों से हिंदू प्रतीकों, संतों और सनातन परंपराओं का मजाक उड़ाने में आनंद महसूस करती आई है।

योगी आदित्यनाथ एक हजार साल पुरानी नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी है। उनकी साधु या बाबा की पहचान कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए हिंदू साधु का सम्मान कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनकी राजनीति का ईंधन ही हिंदू विरोध है।

अब सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी यादव किसी मुसलमान नेता को ‘नकली मौलाना’ कह सकते हैं? क्या वे किसी मौलवी या इमाम के वस्त्र पर व्यंग्य कर सकते हैं? क्या वे किसी मुस्लिम नेता से कह सकते हैं कि उसकी टोपी, दाढ़ी या नमाज दिखावा है? इसका जवाब आपको, हमें सभी को पता है कि वह ऐसा नहीं करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत भी दिखाई तो पूरा सेक्युलर कुनबा और मीडिया की तथाकथित प्रगतिशील जमात उन पर टूट पड़ेगी।

हिंदुओं के मामले में भावनाओं के आहत होने से जुड़ा कोई नियम लागू नहीं होता है। केवल तेजस्वी ही नहीं, उनकी जमात के दूसरे नेता भी हिंदुओं को निशाने पर रखते हैं। तेजस्वी और उन जैसे नेताओं को ये अच्छी तरह से पता है कि हिंदू अपने विवेक में विश्वास रखता और इसलिए बार-बार उसे अपमानित किया जा सकता है। वो जानते हैं कि हिंदू ऐसा कहने पर कभी सड़क पर नहीं उतरेगा, हिंसा नहीं करेगा। हिंदुओं की इसी सहिष्णुता को ये नेता अपनी ढाल बनाते हैं।

योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान पर हमला कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी और उनकी पूरी कथित सेक्युलर ब्रिगेड के लोग योगी आदित्यनाथ को अजय सिंह बिष्ट कहकर बुलाते रहे हैं। संत बनने के बाद कोई शख्स अपनी पुरानी पहचान, अपना परिवार छोड़ देता है लेकिन राजनीतिक मर्यादा तो छोड़िए ये ब्रिगेड धार्मिक परंपराओं का सम्मान तक नहीं करती है।

इन्हीं तेजस्वी यादव को चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को साधना है तो ये उनके पक्ष में वक्फ बिल तक को कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहे हैं। ये उस वोट बैंक के लिए टोपी भी लगाते हैं लेकिन हिंदुओं का सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

तेजस्वी यादव जैसे नेता शायद भूल जाते हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे संत न केवल राजनीतिक पद पर हैं बल्कि लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा के प्रतीक हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिस अनुशासन और तपस्या से खुद को इस परंपरा का उत्तराधिकारी बनाया है क्या वो कोई ‘नकली बाबा’ कर सकता है। मगर तेजस्वी यादव के लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि उनके लिए सत्ता और वोट बैंक ही सर्वोपरि हैं। उन्हें इस देश की सनातन आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह भी सच है कि ऐसे बयान हिंदू समाज को भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ हिंदू अस्मिता की रक्षा को लेकर कोई सामाजिक या राजनीतिक एकजुटता नहीं बन पाती है। अब वक्त आ गया है कि हिंदू समाज इस तरह के दोहरेपन को पहचानें। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति रहे, रहती भी है लेकिन हिंदुओं की धार्मिक पहचान पर प्रहार लंबे समय तक एजेंडा नहीं बन सकता है।