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योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहने वाले तेजस्वी यादव माँ का दूध पिया है तो किसी मुस्लिम नेता को ‘नकली मौलवी’ कहकर दिखाओ

मुस्लिम वोट की खातिर आखिर विपक्ष कितना नीचे गिरेगा? नीचता की भी एक सीमा होती है। तेजस्वी अपने पिता लालू यादव से पूछो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जब 7 नवंबर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पर गोपाष्टमी के दिन गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही थी तब श्रद्धेय कृपालु जी महाराज ने हुंकार भरते हुए कहा था "इंदिरा जिस तरह निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही है तेरी भी मौत गोपाष्टमी को होगी और तेरी पार्टी को समाप्त करने हिमालय से आधुनिक ड्रैस में एक तपस्वी आएगा।" 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्टमी ही थी। साधु का श्राप आज सच हो रहा है। दूसरे, जब राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी तब योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए" अंजाम सबके सामने है। जिस कांग्रेस की किसी समय तूती बोलती थी आज वही कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के आगे झुक रही है। साधु का पद विरासत में नहीं मिलता। साधना करनी पड़ती है, तपस्या करनी पड़ती है। योगी आदित्यनाथ को 'नकली बाबा' तो बक दिया लेकिन क्या किसी मुस्लिम को ‘नकली मौलवी’ कहने की हिम्मत है? चुनाव छोड़ बिल से बाहर नहीं निकल पाओगे।

  

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सरगर्मी तेज है और नेता अलग-अलग मंचों-टीवी चैनलों पर जाकर अपनी बातें रख रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने ‘रैपिड फायर राउंड’ में योगी आदित्यनाथ को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्हें ‘नकली बाबा' बता दिया।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो है हीं, साथ ही वो हिंदुओं की पवित्र गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। तेजस्वी यादव को अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर कोई राजनीतिक हमला करना था तो वो उनके काम को लेकर सवाल उठा सकते थे लेकिन उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर हमले के लिए उनकी धार्मिक पहचान को चुना।

असल में तेजस्वी यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहकर न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला किया है बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक पहचान पर प्रहार करने की कोशिश की है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह उस मानसिकता की झलक है जो दशकों से हिंदू प्रतीकों, संतों और सनातन परंपराओं का मजाक उड़ाने में आनंद महसूस करती आई है।

योगी आदित्यनाथ एक हजार साल पुरानी नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी है। उनकी साधु या बाबा की पहचान कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए हिंदू साधु का सम्मान कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनकी राजनीति का ईंधन ही हिंदू विरोध है।

अब सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी यादव किसी मुसलमान नेता को ‘नकली मौलाना’ कह सकते हैं? क्या वे किसी मौलवी या इमाम के वस्त्र पर व्यंग्य कर सकते हैं? क्या वे किसी मुस्लिम नेता से कह सकते हैं कि उसकी टोपी, दाढ़ी या नमाज दिखावा है? इसका जवाब आपको, हमें सभी को पता है कि वह ऐसा नहीं करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत भी दिखाई तो पूरा सेक्युलर कुनबा और मीडिया की तथाकथित प्रगतिशील जमात उन पर टूट पड़ेगी।

हिंदुओं के मामले में भावनाओं के आहत होने से जुड़ा कोई नियम लागू नहीं होता है। केवल तेजस्वी ही नहीं, उनकी जमात के दूसरे नेता भी हिंदुओं को निशाने पर रखते हैं। तेजस्वी और उन जैसे नेताओं को ये अच्छी तरह से पता है कि हिंदू अपने विवेक में विश्वास रखता और इसलिए बार-बार उसे अपमानित किया जा सकता है। वो जानते हैं कि हिंदू ऐसा कहने पर कभी सड़क पर नहीं उतरेगा, हिंसा नहीं करेगा। हिंदुओं की इसी सहिष्णुता को ये नेता अपनी ढाल बनाते हैं।

योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान पर हमला कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी और उनकी पूरी कथित सेक्युलर ब्रिगेड के लोग योगी आदित्यनाथ को अजय सिंह बिष्ट कहकर बुलाते रहे हैं। संत बनने के बाद कोई शख्स अपनी पुरानी पहचान, अपना परिवार छोड़ देता है लेकिन राजनीतिक मर्यादा तो छोड़िए ये ब्रिगेड धार्मिक परंपराओं का सम्मान तक नहीं करती है।

इन्हीं तेजस्वी यादव को चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को साधना है तो ये उनके पक्ष में वक्फ बिल तक को कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहे हैं। ये उस वोट बैंक के लिए टोपी भी लगाते हैं लेकिन हिंदुओं का सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

तेजस्वी यादव जैसे नेता शायद भूल जाते हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे संत न केवल राजनीतिक पद पर हैं बल्कि लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा के प्रतीक हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिस अनुशासन और तपस्या से खुद को इस परंपरा का उत्तराधिकारी बनाया है क्या वो कोई ‘नकली बाबा’ कर सकता है। मगर तेजस्वी यादव के लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि उनके लिए सत्ता और वोट बैंक ही सर्वोपरि हैं। उन्हें इस देश की सनातन आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह भी सच है कि ऐसे बयान हिंदू समाज को भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ हिंदू अस्मिता की रक्षा को लेकर कोई सामाजिक या राजनीतिक एकजुटता नहीं बन पाती है। अब वक्त आ गया है कि हिंदू समाज इस तरह के दोहरेपन को पहचानें। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति रहे, रहती भी है लेकिन हिंदुओं की धार्मिक पहचान पर प्रहार लंबे समय तक एजेंडा नहीं बन सकता है।

बिहार : हार देख राहुल गाँधी ने किया सरेंडर? चुनाव से ठीक पहले सीन से गायब हैं राहुल गाँधी कांग्रेस के ‘पार्ट टाइम’ नेता; फिर चीख-पुकार होगी वोट चोरी हो गया

क्या बिहार में चुनाव राज्य सरकार के लिए हो रहा है या जातिगत सियासत का, जिसमे चुनाव आयोग बेगानी शादी में दीवाना बना हुआ है? एक छोटे राज्य में जातियों के नाम पर कितनी पार्टियां बनी हुई हैं। हर कस्बे का खलीफा नेता बन सौदेबाज़ी कर देशभक्त नज़र आ रहा है। ऐसे सौदेबाज़ न देश का भला कर सकता है, न राज्य का और ना ही अपनी जाति का, बल्कि अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं। दूसरे, मिडिल क्लास वाले नेता बने फिर रहे हैं और उससे ज्यादा शिक्षित लोग कम पढ़े की जी-हजूरी कर शिक्षा को ही बदनाम कर रहे हैं। 

खैर, बिहार में चुनावी रंग चढ़ चुका है। 6 नवंबर को पहला फेज वोटिंग होने वाला है और कैंपेनिंग 4 नवंबर तक चलेगी। एक हफ्ता बाकी है, लेकिन महागठबंधन के कैंप में हड़कंप मचा हुआ है। एक तरफ NDA के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रोज रैलियाँ कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष का चेहरा माने जाने वाले राहुल गाँधी सीन से गायब। दो महीने से बिहार नहीं आए, न रैली की, न सड़क पर उतरे। आखिरी दौरा तो 1 सितंबर को हुई थी, जब ‘वोटर अधिकार यात्रा’ खत्म करने पटना आए थे।

प्रधानमंत्री मोदी तो जैसे बिहार को अपना दूसरा घर बना चुके हैं – हर दूसरे दिन रैली, हर रैली में विपक्ष पर जोरदार हमला। इस दौरान राहुल गाँधी पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। लेकिन वोटर अधिकार यात्रा के दौरान बिहार के कोने-कोने में घूमने वाले राहुल गाँधी नदारद हैं। चुनाव का बिगुल बज चुका है, पहले चरण का नामांकन तक खत्म हो गया, लेकिन राहुल साहब कहीं नजर नहीं आ रहे। ये सवाल अब सिर्फ बीजेपी वाले नहीं पूछ रहे, कांग्रेस के अपने कार्यकर्ता भी परेशान हैं।

राहुल गाँधी की लंबी अनुपस्थिति: पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स या रणनीतिक चुप्पी?

बिहार चुनाव के ठीक बीच में राहुल गाँधी का गायब होना किसी रहस्य फिल्म जैसा लग रहा है। 1 सितंबर के बाद से दो महीने बीत चुके, लेकिन वो बिहार की सरजमीं पर कदम नहीं रखे। न रैली की, न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न ही वर्चुअल तरीके से समर्थन दिया। जबकि पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव जैसे नेता तो रोज मैदान में हैं।
कांग्रेस के अंदर भी बेचैनी है। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी (BPCC) के एक सीनियर पदाधिकारी ने कहा, “राहुल जी ने वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी में जान डाली थी, लेकिन अब उनकी अनुपस्थिति महँगी पड़ रही। दिल्ली में इमरती बनाते दिखे, लेकिन बिहार में नहीं।” डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट में भी यही चिंता जताई गई – राहुल की गैरमौजूदगी महागठबंधन की संभावनाओं को प्रभावित कर रही। X पर भी डिबेट छिड़ी हुई है।
हालाँकि AICC जनरल सेक्रेटरी KC वेणुगोपाल ने कहा, “राहुल छठ पूजा के बाद आएँगे। 29 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर में तेजस्वी के साथ जॉइंट रैली और प्रियंका 28 को बिहार पहुँचेंगी।” लेकिन ये आखिरी मिनट की बात लगती है। राहुल की अनुपस्थिति पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स जैसी हो या स्मार्ट स्ट्रैटेजी। इसका असर तो बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ समझ में आ ही जाएगा।

वोटर अधिकार यात्रा से जोश जगाने के बाद सन्नाटा क्यों?

अब बात उस ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की, जिसने बिहार में हंगामा मचाया था। सितंबर में शुरू हुई ये यात्रा गाँव-गाँव घूमी, राहुल ने EVM पर सवाल उठाए, वोट चोरी का हाइड्रोजन बम फोड़ने की बात की। 1 सितंबर को पटना में राहुल गाँधी को न तो मनचाहा समापन मिल पाया और न ही किसी जनसभा को संबोधित कर पाए।
लेकिन उसके बाद? कुछ नहीं। यात्रा खत्म, राहुल दिल्ली चले गए और बिहार वाले अकेले रह गए। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता परेशान हैं। यहाँ तकि इंडी गठबंधन के पोस्टरों से उनकी तस्वीर तक गायब कर दी गई।
बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी में नई जान आई, लेकिन राहुल की अनुपस्थिति से वो जोश ठंडा पड़ गया।” ये अनुपस्थिति महागठबंधन को नुकसान पहुँचा रही है। कॉन्ग्रेस के नेता राहुल को बुलाने की माँग कर रहे। अब 29 को रैली से शायद जोश लौटे, लेकिन देर हो चुकी। बिहार के लोग कह रहे, “यात्रा तो चली, लेकिन चुनाव लड़ना भूल गए क्या?”

तेजस्वी पर सहमति के बाद कांग्रेस पड़ी ढीली

CM चेहरा तय करने में भी देरी। लालू दबाव डालते रहे, तेजस्वी को नाम दो। कॉन्ग्रेस टालती रही, फिर गहलोत भेजे गए। आखिरकार 23 अक्टूबर को घोषणा की गई कि तेजस्वी यादव ही सीएम पद का चेहरा होंगे, लेकिन इसके बाद से कॉन्ग्रेस पूरी तरह ठंडी पड़ गई। अब 29 अक्टूबर को राहुल-तेजस्वी की जॉइंट रैली है, लेकिन इसका सारा क्रेडिट साफ तौर पर आरजेडी ले जाएगी।
कॉन्ग्रेस उम्मीदवार परेशान हैं। एक कैंडिडेट ने बताया (नाम नहीं लूँगा, लेकिन असल बात है) – “हम पोस्टर लगा रहे हैं, घर-घर जाकर वोट माँग रहे हैं। लोग पूछते हैं, राहुल जी कहाँ हैं? उनका भाषण सुनना चाहते हैं। बिना उनके मंच खाली लगता है।” कई सीटों पर तैयारी आधी-अधूरी ही है।
सियासी जानकार कहते हैं – राहुल की स्टाइल है। भारत जोड़ो यात्रा जैसी मेगा इवेंट करते हैं, फिर ब्रेक। लेकिन चुनाव में ये महँगा पड़ता है। 2020 में बिहार चुनाव में भी कॉन्ग्रेस 70 सीटों पर लड़ी, 19 जीती। इस बार भी वही रास्ता। ऐसे में अगर विपक्षी गठबंधन को हार मिलती है, तो फिर से वही ईवीएम का रोना रोया जाएगा।

राहुल की पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स वाली पुरानी बीमारी फिर से जाग गई?

बिहार में कांग्रेस का जोश ठंडा पड़ चुका है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश जगाने के बजाय कांग्रेस नेता राहुल गाँधी दिल्ली में इमरती छानते दिखे। कांग्रेस के अंदर कोहराम मचा हुआ है। उम्मीदवार राज्य के नेताओं पर टिकट के बदले उगाही का आरोप लगा रहे हैं। यहाँ तक कि पप्पू यादव पर भी कई लोगों को टिकट बाँटने का आरोप लग रहा है। ऐसे में राहुल गाँधी हैं कहाँ? पार्टी को एकजुट करने के लिए वे क्या कर रहे हैं? ये सवाल बिहारियों के दिमाग में है। 
राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पिछले नौ महीनों में उन्होंने कम से कम छह विदेश यात्राएँ की हैं, जिनमें टेक्सस, इटली, वियतनाम, दुबई, कतर, मलेशिया और साउथ अमेरिका शामिल हैं। विदेश यात्रा के दौरान उनके कई बयान विवादों में रहते हैं।
उदाहरण के लिए, वर्जीनिया में सिखों के बारे में उनकी टिप्पणी और अमेरिका यात्रा पर उनकी टिप्पणियाँ विवादास्पद रही हैं। विपक्षी नेता होने के नाते उनके विदेश यात्राओं के खर्च और प्रोटोकॉल पर भी सवाल उठते हैं। इसके बावजूद वो चुनाव जैसे अहम मौकों पर गायब हो जाते हैं। सोचिए, बीते कुछ दिनों से वो विदेश नहीं भी गए, तब भी वो बिहार चुनाव में बिल्कुल भी सक्रिय नहीं रहे।
हालाँकि कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता लगातार अपनी पार्टी का बचाव करते नजर आए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि राहुल जी का कार्यक्रम तय हो गया है। बिहार में उनकी रैलियों की योजना बनाई जा रही है। हम भीड़ की राजनीति नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित राजनीति करते हैं।
बीजेपी राहुल गाँधी की अनुपस्थिति को चुनावी मुद्दा बना रही है। बीजेपी प्रवक्ता संजय मयूख ने कहा कि राहुल गाँधी को बिहार के मतदाताओं पर भरोसा नहीं है। इसीलिए वो चुनावी मैदान से गायब हैं। राहुल गाँधी की अनुपस्थिति बिहार में अब चर्चा का विषय बन चुकी है। अब तो कांग्रेस प्रत्याशी और समर्थक भी राहुल गाँधी के इंतजार में है कि वह कब बिहार आकर चुनाव में बिगुल फूँकते हैं.. बाकी सवाल उनके मन में भी है कि कहीं वाकई इस बार देर तो नहीं हो गई?

बिहार चुनाव : ‘अशांत’ हुआ प्रशांत का दल: गुंडे की तरह पीसकर छोड़ देंगे, धांधली हो रही है…. ‘प्रत्याशी सुझाव पत्र’ में घपले से भड़के टिकट दावेदारों के समर्थक, जन सुराज में अराजकता भारी

                                            जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (साभार: आज तक)
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, दोनों प्रमुख गठबंधन अपनी-अपनी तैयारी में जुटे हैं और पूर्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अपनी नए नवेले दल ‘जन सुराज’ के सहारे तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चुनाव में खुद को दोनों प्रमुख गठबंधनों से अलग दिखाने के नाम पर प्रशांत किशोर ने आक्रामकता का सहारा लिया है।

प्रशांत गुस्से में हर किसी को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव लड़ने और चुनावी तैयारियों को लेकर भी आक्रामक हैं। उन्होंने तो यहाँ तक एलान कर दिया था कि वो बिहार में सबसे पहले अपने उम्मीदवारों का एलान कर देंगे। चुनावों की तारीखों का एलान हो गया है लेकिन अब तक प्रशांत के उम्मीदवारों का कहीं अता-पता नहीं है। अलबत्ता उम्मीदवारी को लेकर जन सुराज के नेता-कार्यकर्ता अभी से आपस में भिड़ने लगे हैं।

जन सुराज: लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जब राजनीतिक दल बनाने का एलान किया था तो उन्होंने दल के भीतर सबसे अधिक लोकतंत्र बनाने जैसे दावे किए थे। इसके अलावा अलग-अलग मंचों पर भी वह ऐसे दावे करते रहे हैं। यहाँ तक कि उम्मीदवारों के चयन में पूरी पारदर्शिता बरतने का भी उन्होंने दावा किया था।

प्रशांत किशोर ने अपने दल को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए तय किया कि वह उम्मीदवारों का चयन भी लोगों की मर्जी से ही करेंगे। तय हुआ कि वह इसके लिए लोगों की राय लेंगे। इसके लिए उनके दल द्वारा ‘प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र’ छपवाए गए हैं, इन पर उस विधानसभा क्षेत्र के कई संभावित उम्मीदवारों के नाम होते हैं। लोगों को इसमें से अपनी राय रखते हुए अपने द्वारा समर्थित जन सुराज के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती है।

यूँ तो इन पर्चे से जन सुराज अपनी पार्टी का लोकतंत्र दिखाना चाहती थी लेकिन इन्हीं की वजह से पार्टी के भीतर मौजूद भीड़ तंत्र का चेहरा सामने आ गया। बिहार में कई जगहों पर इन पर्चों को लेकर संभावित प्रत्याशियों के समर्थक ही आपस में भिड़ गए। कहीं, एक ही संभावित प्रत्याशी के समर्थकों को ज्यादा पर्चे दिए जाने की बात पर हंगामा हुआ तो कहीं अपने लोग बंद कमरे में अपने चहेते प्रत्याशी के नाम पर दनादन पर्चे भरते दिखे।

मुजफ्फरपुर के औराई विधानसभा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसमें एक कमरे में बैठे 3-4 लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के दर्जनों-सैकड़ों फॉर्म भरते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में फॉर्म भर रहे ये लोग खुद इस बात को मान भी रहे हैं कि किसके समर्थन में वो पर्चे भर रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद दावा किया जा रहा है कि प्रशांत किशोर की पार्टी के ये प्रपत्र लोगों तक पहुँच ही नहीं रहे हैं। संभावित प्रत्याशी खुद ही अपने नाम पर मुहर लगवा रहे हैं।

इसमें जब वीडियो बना रहे लोगों ने मुहर लगा रहे लोगों से पूछा कि आप खुद ही क्यों छाप रहे हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि जनता को पता ही नहीं है इसलिए हम खुद ही यह कर रहे हैं। ये लोग करीब 300 पर्चों पर मुहर लगा रहे थे।

यह कोई अकेली-इकलौती घटना नहीं है, ऐसा कई जगहों पर हुआ है और यह आम होता जा रहा है। दरभंगा में भी ऐसा ही मामला देखने को मिला। वहाँ भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के दौरान जमकर बवाल हुआ है। बैलेट पर हस्ताक्षर को लेकर शुरू हुआ विवाद मारपीट में बदल गया और कार्यकर्ता एक-दूसरे पर कुर्सियाँ फेंकने लगे। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए हैं।

बेनीपुर में हंगामा कर रहे लोगों ने यह दावा किया कि उनको पर्चे नहीं दिए गए हैं। लोगों ने धांधली का आरोप भी लगाया है। एक शख्स ने दावा किया कि एक व्यक्ति के समर्थकों को बंडल के बंडल दिए गए हैं। खूब गाली गलौज तक की गई है। एक अन्य शख्स के दावा कि कुछ-कुछ लोगों को 6-6 पर्चे दिए जा रहे हैं जबकि कुछ लोगों को एक भी नहीं मिल रहा है।

बिस्फी में भी जन सुराज के कार्यकर्ता सम्मेलन में वोटिंग को लेकर जमकर हंगामा हुआ है। बिस्फी में नागेंद्र यादव, मोहम्मद कलीन और वशिष्ठ नारायण को पार्टी की तरफ से संभावित प्रत्याशी बनाया गया है। तीनों के नाम के पर्चे जनता को दिए गए लेकिन वे आपस में ही भिड़ गए। संभावित प्रत्याशियों ने एक-दूसरे पर गुंडे तक बुलाने का आरोप लगा दिया है। दावा किया गया है कि यहाँ वशिष्ठ नारायण को पहले ही इस वोटिंग को लेकर बता दिया गया था लेकिन अन्य संभावित प्रत्याशियों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।

वशिष्ठ नारायण झा का कहना है कि वो वोटिंग के समर्थन में थे और वो ताल ठोककर तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई गुंडागर्दी करेगा तो उसे गुंडे की तरह पीसकर छोड़ दिया जाएगा। अन्य संभावित उम्मीदवारों ने नाराजगी जताई है।

अब यह आपसी फूट ही जन सुराज की हकीकत बन गया है। यानी बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र नहीं बना पा रहे हैं।

क्यों टिकट बँटवारे में हुई देरी

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपनी बड़ी उपस्थिति और ‘नई राजनीति’ का दावा तो बहुत पहले कर दिया था लेकिन जब बात टिकट बाँटने की बारी आई तो पार्टी के अंदर ही कई परतें खुलने लगीं।

हालाँकि, प्रशांत किशोर ने महीनों पहले ऐलान किया था कि जन सुराज अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, सबसे पहले टिकटों की घोषणा होगी मगर अब तक टिकटों की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके पीछे कई वजहें हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जन सुराज को खुद भी एहसास है कि फिलहाल उसका जनाधार वोट कटवा से ज्यादा नहीं है। पार्टी के भीतर भी कई कार्यकर्ता इस बात को समझते हैं कि अगर टिकट बाँटे गए और चुनाव लड़ा गया, तो अधिकतर सीटों पर मुकाबला तीसरे या चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ पाएगा।

ऐसे में प्रशांत किशोर अन्य दलों के टिकट बाँटे जाने का इंतजार कर रहे हैं। ताकि किसी बड़े दल से असंतुष्ट और जनाधार वाले नेता या गुट उनके साथ जुड़ सके। उनका मत है कि जन सुराज के संगठन को चलाने वाले स्थानीय लोग। जन सुराज का पूरा संगठन उन्हीं लोगों के हाथ में है जो शुरू से इस अभियान से जुड़े रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव में सर्वे किए, बैठकें कीं और पार्टी की नींव डाली। यही लोग जमीन पर पैसा भी खर्च करते हैं।

अब जब टिकट वितरण की घड़ी आई है, तो वही पुराने कार्यकर्ता खुद दावेदार बन बैठे हैं। ऐसे में अगर किसी को टिकट नहीं मिला या पक्षपात दिखा, तो बगावत तय है। ऐसे में प्रशांत किशोर इस बगावत से अपनी पार्टी को बचाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। खुद को अलग दिखाने का दावा करने वाले प्रशांत के सामने अभी पूरी तैयार भी ना हो सके संगठन को संभालने की जिम्मेदारी है।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले दक्षिण अमेरिका के दौरे पर ‘पार्ट टाइम राजनेता’ राहुल गाँधी: अहम मौकों पर राहुल की विदेश यात्राओं का इतिहास

                                                 राहुल गाँधी (फोटो साभार - एआई चैटजीपीटी)
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के सांसद राहुल गाँधी एक बार फिर विदेश यात्रा पर निकल गए हैं। इस बार वे दक्षिण अमेरिका के चार देशों का दौरा करेंगे। कांग्रेस का कहना है कि इस यात्रा के दौरान उनका उद्देश्य राजनीतिक नेताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और व्यापारिक समुदाय से मुलाकात करना है।

कांग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा के अनुसार, राहुल गाँधी ब्राजील और कोलंबिया जाएँगे। वहाँ वे विश्वविद्यालयों में छात्रों को संबोधित करेंगे, राष्ट्रपति और शीर्ष नेताओं से मुलाकात करेंगे और व्यापार और तकनीक जैसे मुद्दों पर व्यवसायियों से बातचीत करेंगे।

कांग्रेस ने इस दौरे को दक्षिण अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। खासकर जब भारत और दक्षिण अमेरिका के बीच गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) और ग्लोबल साउथ के जरिए ऐतिहासिक संबंध भी रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी इस यात्रा को लोकतांत्रिक और रणनीतिक साझेदारी बनाने के प्रयास के रूप में पेश कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की इस यात्रा की टाइमिंग को लेकर फिर से देश में सवाल खड़े हो रहे हैं।

बिहार चुनाव नजदीक आने पर विदेश यात्रा

लोकसभा में विपक्षी नेता राहुल गाँधी देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं और न ही किसी सरकारी प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा हैं। फिर भी, इसके बावजूद वे विदेशों में भाषण देने की भूमिका निभा रहे हैं और वो भी ऐसे समय में जब बिहार में महत्वपूर्ण चुनाव नजदीक है।

इस पर आलोचना भी हो रही है कि उनकी प्राथमिकताएँ गलत हैं। एक जिम्मेदार नेता इतने बड़े चुनाव से पहले, अपना समय चुनाव की रणनीति बनाने, जनता से संपर्क करने और अपने दल को मजबूत करने में लगाता लेकिन राहुल गाँधी ने एक और विदेशी यात्रा को चुना है।

विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्रों से मिलने का उनका निर्णय भी सवालों के घेरे में है। वे न तो कोई शैक्षणिक विशेषज्ञ हैं और न ही किसी विषय के जानकार, फिर भी उन्होंने छात्रों और विचारकों के साथ लेक्चर और बहसें तय की हैं। आलोचक कहते हैं कि कोलंबिया और ब्राजील में भाषण देने के बजाय उन्हें बिहार के मतदाताओं से मिलकर कॉन्ग्रेस की स्थिति मजबूत करनी चाहिए।

ऐसे वक्त पर फिर से वही आलोचना सामने आता है कि राहुल गाँधी राजनीति को गंभीरता से नहीं लेते और इसे पार्ट-टाइम काम की तरह देखते हैं, जबकि इसे पूर्णकालीन जिम्मेदारी की तरह संभालना चाहिए।

कुछ सप्ताह पहले मलेशिया में मौज करते हुए दिखे थे राहुल

इस धारणा को और मजबूत करता है उनका हालिया मलेशिया दौरा। इसी महीने की शुरुआत में राहुल गाँधी ने बिहार में अपनी तथाकथित ‘वोटर अधिकार यात्रा’ पूरी की थी। इसके बाद राजनीतिक संपर्क को आगे बढ़ाने के बजाय, यात्रा खत्म होते ही वे मलेशिया छुट्टियों पर चले गए।

उनकी यह यात्रा तब विवादों में आ गई, जब सोशल मीडिया पर उनकी लंगकावी, मलेशिया में छुट्टियाँ बिताते हुए तस्वीरें वायरल हुईं। भाजपा नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने उन पर एक बार फिर महत्वपूर्ण राजनीतिक समय में गायब होने का आरोप लगाया।

भाजपा IT सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने X पर लिखा, “राहुल गाँधी फिर से लापता हो गए, इस बार लंगकावी, मलेशिया में गुप्त छुट्टी पर। लगता है बिहार की राजनीति का दबाव कांग्रेस के युवराज के लिए ज्यादा था, इसलिए उन्हें आराम के लिए भागना पड़ा। या फिर यह कोई ऐसा गुप्त मीटिंग थी, जिसे किसी को पता नहीं होना चाहिए था। किसी भी तरह, जब लोग असली मुद्दों से जूझ रहे हैं, राहुल गाँधी गायब होने और छुट्टियाँ बिताने की कला में व्यस्त हैं।”

साथ ही, राहुल गाँधी की मलेशिया यात्रा को लेकर यह भी अटकलें थीं कि उन्होंने वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक से मिलने के लिए जा सकते हैं, जिन्होंने भारत छोड़ने के बाद मलेशियाई नागरिकता ले ली थी। एक X यूजर ने लिखा, “वे अपने गुरु जाकिर नाइक से मिलने मलेशिया गए हैं।”

बिहार यात्रा के तुरंत बाद की यह मलेशिया यात्रा इस बात को और पुष्ट करती है कि राहुल गाँधी राजनीतिक कार्यक्रमों को जैसे असाइनमेंट की तरह देखते हैं, जिन्हें जल्दी पूरा करके विदेश जाकर आराम करना जरूरी है।

राज्य चुनावों से पहले उज़्बेकिस्तान की गुप्त यात्रा

यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने चुनावों से पहले विदेश यात्रा करना चुना हो। अक्टूबर 2023 में, उन्होंने कई राज्यों में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले गुप्त रूप से भारत छोड़कर उज़्बेकिस्तान की यात्रा की थी।

जब वे वापस लौटे, तो मीडिया को इसके बारे में तब ही पता चला जब उन्हें दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर देखा गया। उन्होंने यात्रा का उद्देश्य अभी तक सार्वजनिक नहीं किया। उनकी विदेश यात्राएँ अक्सर गोपनीयता में होती हैं और यह उनकी आदत जैसी बन गई है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह का व्यवहार एक वरिष्ठ विपक्षी नेता के लिए ठीक नहीं है।

कांग्रेस के राजकुमार का चुनाव के दौरान विदेश जाने का इतिहास रहा है

राहुल गाँधी की आदत रही है कि वे चुनावी समय या तब भी विदेश यात्रा पर चले जाते हैं जब उनकी पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उन्हें पार्टी में संकट के दौरान विदेशी यात्राओं और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी दखल को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है।

उनका 2019 का बैंकॉक दौरा भी उतना ही विवादित रहा। उस समय भी वे चुनावों के बीच विदेश यात्रा पर निकल गए थे। उनकी विदेश यात्राओं पर उठने वाले सवाल बेबुनियाद नहीं हैं, क्योंकि कई बार ऐसी यात्राओं के दौरान उनकी मुलाकात भारत विरोधी तत्वों से भी हुई है।

उदाहरण के लिए, 2023 में अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ से मुलाकात की। HfHR एक इस्लामी समूह है, जो भारत में हिंदुओं पर भेदभाव का आरोप लगाता है।

अप्रैल 2022 में, जब कांग्रेस को नेतृत्व की जरूरत थी और पार्टी में प्रशांत किशोर को शामिल करने की अटकलें थीं, राहुल गाँधी विदेश चले गए। इसके बाद जब प्रशांत किशोर ने कांग्रेस जॉइन करने से मना कर दिया, तो राहुल गाँधी लगभग 10 दिन अचानक गायब रहे, बिना किसी जानकारी दिए। इस दौरान, कांग्रेस को नेतृत्व के बिना ही काम करना पड़ा।

दिसंबर 2021 में, जब पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा तो राहुल गाँधी इटली की व्यक्तिगत यात्रा पर थे। उनकी यात्रा के कारण पंजाब में चुनावी गतिविधियों में बड़ी बाधा आई और अधिकांश रैलियाँ उनकी वापसी तक टाल दी गईं। यह यात्रा आम आदमी पार्टी की जीत और कॉन्ग्रेस की हार का कारण भी बनी।

सितंबर 2021 में, जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद कांग्रेस मुश्किल में थी, गाँधी परिवार शिमला में छुट्टी मना रहा था।

दिसंबर 2020 में, कांग्रेस पार्टी के 136वें स्थापना दिवस के दौरान भी राहुल गाँधी इटली चले गए। इसी तरह अक्टूबर 2019 में, हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव से केवल 15 दिन पहले, वे बैंकॉक गए।

इसी तरह, 2019 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद वे नतीजों का इंतजार किए बिना लंदन छुट्टियाँ मनाने चले गए। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी माँ सोनिया गाँधी द्वारा बुलाई गई अहम बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया।

इसके अलावा, राहुल गाँधी अक्सर विदेश यात्राओं के दौरान SPG सुरक्षा (विशेष सुरक्षा समूह) नहीं लेते थे और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते रहे। इसी वजह से सरकार ने उनकी SPG सुरक्षा वापस ले ली थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भी इस पर सवाल उठाए थे।

गलत प्राथमिकताओं को दिखाने वाला पैटर्न

बिहार चुनाव नजदीक हैं लेकिन राहुल गांधी का दक्षिण अमेरिका दौरा पुरानी आलोचनाओं को फिर से उभार रहा है। राजनीतिक समय बिहार में बिताने के बजाय वे विदेश में छात्रों और नेताओं से बातें कर रहे हैं जबकि उनकी पार्टी के लिए राज्य में बहुत कुछ दाँव पर है।

कई विशेषज्ञों के लिए यह उनकी प्राथमिकताओं की गलत दिशा को दर्शाता है। जब कांग्रेस पार्टी भारत के सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक में अपनी पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, उसका नेता हजारों किलोमीटर दूर है। राहुल गाँधी का चुनावों से पहले विदेश चले जाने का यह पैटर्न उनके राजनीतिक गंभीरता पर सवाल उठाता है और यह भी कि क्या वे खुद को पूर्णकालिक नेता मानते हैं या नहीं।

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी की फोटो; बेशर्मी की सारी सीमाएं तोड़ दी कांग्रेस ने

लोक सभा में "खटाखट" से मतदाताओं को पागल बनाकर 99 सीटें जीत कांग्रेस ने समझा कि बिहार विधानसभा चुनाव में में सेनेटरी पैड पर राहुल गाँधी की फोटो छाप सारी महिलाओं के अलावा उनके पतियों/प्रेमियों के भी वोट लेकर चुनाव में कांग्रेस अपना सिक्का जमा लेगी। लेकिन प्राप्त सूत्रों के अनुसार यह दांव उल्टा पड़ रहा है। यानि चुनाव घोषित होने से पहले ही कांग्रेस हारने जा रही है। लोग पूछ रहे हैं कि यह बदतमीज़ी क्या प्रियंका, सोनिया और कांग्रेस में महिलाओं की सलाह पर की गयी है? क्या कांग्रेस में महिला वर्ग भी इतनी नीचता पर उतर आया है? बेशर्मी की भी हद होती है।
जबकि आप सभी जानते हैं कि जब किसी लड़की के मायके से कोई गिफ्ट लेकर उसका भाई, बाप या चाचा कोई भी लेकर जाता है तो उस गिफ्ट मे सिन्दूर जरूर शामिल रहता है। यहाँ तक कि लड़की को जरूरत होती है तो बाजार जानेवाले अपने ससुर या देवर से भी बोल देती है कि एक डिब्बी सिन्दूर भी लेते आइयेगा।
खैर अब आते हैं, वर्तमान मुद्दे पर :-
जैसा कि आप सबको भी खबर हो चुकी होगी कि कॉंग्रेस 5 लाख महिलाओं को सेनेटरी पैड भेजने जा रही है जिसपर राहुल गाँधी की तस्वीर है। सिर्फ पैकेट पर ही नहीं, सेनेटरी पैड पर भी।
अब मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि क्या यह महिलाओं के साथ एक भद्दा मजाक नहीं है। और क्या कोई महिला सेनेटरी पैड अपने बाप, भाई, चाचा, ससुर या देवर से कभी मंगवाती है?

    
देश में चुनाव दर चुनाव में हार झेल रही कांग्रेस अब निम्न स्तर पर उतर आई है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने महिलाओं के बीच मुफ्त सैनिटरी पैड पर अपने ‘युवराज’ राहुल गांधी की तस्वीर लगा दी है। महिलाओं के सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी का फोटो ना सिर्फ अशोभनीय है, बल्कि इससे कांग्रेस की हताशा का भी पता चलता है कि वो किस स्तर तक गिर सकती है। सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी की फोटो को लेकर सोशल मीडिया पर कांग्रेस पार्टी और खुद राहुल गांधी खूब ट्रोल हो रहे हैं। महिलाओं के लिए प्रयुक्त होने वाले पैड पर राहुल गांधी अपने फोटो चस्पा करके आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इसे महिलाओं का अपमान और चाटुकारिता की पराकाष्ठा बताया है। एनडीए में शामिल दलों का आरोप है कि सेनेटरी पैड जैसी संवेदनशील स्वास्थ्य सामग्री पर राजनीतिक चेहरा लगाकर कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति को एक नया रूप दिया है। लेकिन बिहार की नारीशक्ति चुनाव में कांग्रेस सबक सिखाएगी।

इलेक्शन में हार दर हार झेल रही कांग्रेस ओछी राजनीति पर उतरी
देश की सबसे पुरानी पार्टी को नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से कई चुनावों में हार दर हार ही नसीब हुई है। लोकसभा के अलावा विधानसभा चुनावों में भी ज्यादातर राज्यों की जनता-जनार्दन ने उसे नकार दिया है। राहुल के पहला चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस हार का शतक बनाने के करीब है। पिछले दिल्ली विधानसभा चुनावों में उसकी जो फजीहत हुई है, उससे यह सबसे कमजोर पार्टियों में कतार में आ गई है। लेकिन पराजयों से सबक लेकर जनहित और विकास की राजनीति करने के बजाए कांग्रेस और राहुल गांधी ने मानसिक दिवालिएपन की मिसाल पेश कर दी है। इस साल के आखिर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में पहले ही महागठबंधन में दरारें आ रही हैं। इस बीच कांग्रेस ने महिलाओं के सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी की फोटो चस्पा कर महिलाओं का अपमान करने की धृष्टता की है। इसे लेकर बीजेपी-जदयू ने तो कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला ही है, सोशल मीडिया पर यूजर्स भी राहुल गांधी पर भड़क रहे हैं।

महिलाओं के सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी की तस्वीर गर्व से दिखाई
सेनेटरी पैड के पैकेट पर राहुल गांधी की तस्वीर होने को लेकर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने कांग्रेस की आलोचना की। दरअसल, हाल ही में बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार ने पार्टी मुख्यालय ‘सदाकत आश्रम’ में बड़े गर्व के साथ अभियान की शुरुआत की घोषणा की, जहां महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा भी मौजूद थीं। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (बीपीसीसी) के अध्यक्ष कुमार ने मुफ्त वितरित किए जाने वाले वो सेनेटरी पैड के पैकेट भी दिखाए, जिनपर राहुल गांधी की फोटो छपी हुई है। । उन्होंने कहा, ‘इंडिया’ गठबंधन सत्ता में आने पर हमारा इरादा ये वाले मुफ्त सैनेटरी पैड उपलब्ध कराना है।”

राहुल गांधी मर्यादा की भावना के अभाव के लिए कुख्यात रहे हैं- भाजपा
भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने आरोप लगाया, ‘‘बिहार में महिलाओं के लिए जो कुछ भी करने की जरूरत है, वह सरकार द्वारा किया जा रहा है। लेकिन, आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी संभावनाओं को लेकर चिंतित कांग्रेस ने अपना वैचारिक दिवालियापन दिखा दिया है। इसके नेता राहुल गांधी मर्यादा की भावना के अभाव के लिए कुख्यात रहे हैं। ऐसा लगता है कि यह विशेषता इस पार्टी में व्याप्त है, जिसमें चाटुकारिता सर्वोपरि है।”

कांग्रेस ने महिलाओं की गरिमा का अपमान किया- जदयू
जनता दल (यूनाइटेड) एमएलसी और प्रवक्ता नीरज कुमार ने पैकेट पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तस्वीर पर कड़ी आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि ‘‘कांग्रेस ने अपने सहयोगी राजद से सीख ली है, जो अपनी अवसरवादी राजनीति के लिए जानी जाती है।” उन्होंने कहा, ‘‘हमारे नेता नीतीश कुमार महिला सशक्तीकरण के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं और परिणाम सबके सामने हैं। लेकिन कांग्रेस ने महिलाओं की गरिमा का अपमान किया है।”

चिराग पासवान ने जताई आपत्ति, बताया चुनावी हथकंडा
एनडीए घटक दलों के साथ-साथ एलजेपी (रामविलास) प्रमुख व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने इस योजना पर कड़ा एतराज जताया है। हाजीपुर में मीडिया से बातचीत में चिराग ने कहा, “कांग्रेस को महिलाओं के स्वास्थ्य से नहीं, बल्कि सिर्फ वोट से मतलब है। सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी की तस्वीर लगाकर कांग्रेस चुनावी फायदा उठाना चाहती है।”

सोशल मीडिया पर बताया शर्मनाक, फुंके कारतूस को चलाने की कोशिश

बिहार चुनाव तो अभी कुछ माह बाद होने हैं, लेकिन कांग्रेस पहली चाल में खुद ही फंस गई है। जैसे उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी वाड्रा का नारा ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ बुरी तरह फेल हुआ था, वैसे ही बिहार में महिलाओं को लुभाने के लिए चला कांग्रेस का दावं उल्टा पड़ा है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर कांग्रेस नेताओं और राहुल गांधी की खूब ट्रोलिंग हो रही है। यूजर्स बेहद शर्मनाक और महिलाओं का अपमान बता रहे हैं। एक यूजर्स ने लिखा है कि सेनेटरी पैड पर राहुल गांधी की फोटो लगाकर कांग्रेस फुंके हुए कारतूस को फिर से चलाना चाहती है। एक अन्य यूजर्स ने इसे कांग्रेस की दीवालिया सोच बताते हुए कहा है कि अच्छा है, राहुल गांधी अब अपनी वास्तविक जगह गटर, कूड़े के ढेर और डस्टबिन में ही नजर आएंगे।