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जाति व्यवस्था को लेकर हिन्दुओं को घेरने वाले बता रहे पूला एंथनी को पहला ‘दलित’ बिशप: ईसाइयत अपनाने के बाद कैथोलिक को लीड करने वाला SC कैसे?

                                                         कार्डिनल बिशप पूला एंथनी (साभार-HT)
हैदराबाद के आर्कबिशप कार्डिनल पूला एंथनी को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। CBCI भारत में कैथोलिक क्रिश्चियंस का ऐसा संगठन है, जो धार्मिक नियम कानून तय करता है।
 

पूला एंथनी को अध्यक्ष चुने जाने को मीडिया में ऐसे दिखाया गया कि एंथनी देश के पहले ऐसे दलित क्रिश्चियन हैं, जो देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिक को लीड करेंगे!

दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे?

अब सवाल ये उठता है कि आखिर कोई दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे हो सकता है? ईसाई तो कैथोलिक होते हैं, प्रोटेस्टेंट होते हैं और जाति व्यवस्था तो हिंदुओं में होती है।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र…अगड़ा-पिछड़ा, दलित-OBC ये सब तो हिंदुओं के वर्गीकरण हैं? फिर भला कार्डिनल एंथनी दलित कैसे हुए और ‘दलित’ रहते हुए वो ईसाइयत के प्रति कितने समर्पित हो सकते हैं। इसके बावजूद मीडिया में ये कहा जा रहा है कि वो दलित हैं! ईसाइयों में जब सब बराबर होते हैं, तो फिर कोई दलित कैसे हो गया।

ईसाइयत की किताब बाइबिल तक कहती है कि सब बराबर हैं, सबको गॉड ने बनाया है। सब गॉड के लिए बराबर हैं। भारत में गाँव-गाँव धर्मांतरण करवाती मिशनरियाँ यही बताती घूमती हैं कि सनातन छोड़ोगे, तो जाति व्यवस्था में ऊपर बढ़ोगे? ईसाई बनोगे तो बराबर हो जाओगे। जाति व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी।

बराबरी की बात कह बरगलाते हैं मिशनरी

जो एसटी- एससी समाज के लोग ईसाइयत को अपनाते हैं, उनके लिए यह दलील दी जाती हैं कि वे जाति व्यवस्था से तंग आकर ईसाइयत की तरफ आकर्षित हुए।

लेफ्ट लिबरल लॉबी भी इसी बात को लेकर सनातन को गालियाँ देती है कि यहाँ जाति-व्यवस्था हावी है। यहाँ कथित नीची जातियों को बराबर नहीं माना जाता, यहाँ कथित तौर पर लोगों को मंदिरों में घुसने की आजादी नहीं है, यहाँ उन्हें दलित और अगड़ा-पिछड़ा में बांटा जाता है, इसीलिए लोग सनातन छोड़ कर ईसाइयत अपना लेते हैं।

तो ये जाति सूचक शब्द आखिर ईसाई बनने के बाद भी पूला एंथनी के साथ कैसे चिपका रह गया? और अगर ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रह जाता है, तब तो ईसाइयत अपनाने और धर्मांतरण को लेकर जो भी प्रचार-प्रसार किया जाता है, वह सब गलत है। इसका कोई जवाब ना लेफ्ट लिबरल लॉबी के पास होगा और ना सनातन को डेंगू मलेरिया बताने वाले नेताओं के पास!

मीडिया ने भी दलित कार्डिनल एंथनी की बात कही

कार्डिनल एंथनी कैसे इतने दूर तक पहुँचे और कैसे ये ऐतिहासिक है! मीडिया यही बताने में लगा है। चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो या टाइम्स ऑफ़ इंडिया। हर कोई इस बात को हाईलाइट कर रहा है कि देखिए दलित व्यक्ति अब 2 करोड़ लोगों के धार्मिक तौर तरीके मैनेज करेगा!

उनकी कहानी बताने वाली ईसाईयत से जुड़ी वेबसाइट्स भी कार्डिनल एंथनी में ‘दलित’ को ढूँढ रही है। बताती हैं कि दलित माता-पिता के घर पैदा हुए एंथनी युवावस्था में मिशनरी की हेल्प से गरीबी से बाहर आए। अब मिशनरी की सहायता से कैसे कोई गरीब आदमी ‘गरीबी’ से बाहर निकलता है, ये सबको पता है। पैसे का लालच, पढ़ाई और इलाज का लालच धर्मांतरण के लिए आम बात है। इसको लेकर आए दिन घटनाएँ देशभर में घटती रहती हैं।

देश का संविधान भी नहीं मानता कि ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाला दलित रह सकता है। उन्हें माइनॉरिटी कह सकते हैं, लेकिन SC/ST नहीं कहा जाता है।

ऐसे धर्मांतरण के मामलों को लेकर साल 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाई गई। इस आयोग ने सिफारिश दी थी कि अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से धर्म से अलग होना चाहिए और ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

लेकिन UPA सरकार भी इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर पाई, क्योंकि ये आधार ही गलत है। ये सीधे तौर पर दशकों से हाशिये पर पड़े लोगों के साथ धोखा होगा। ईसाई-मुस्लिम बने लोग एससी-एसटी के अधिकारों पर डाका डालने लगेंगे।

कमेटी ने तो ये भी कहा था कि दलित क्रिश्चियन भी गैर बराबरी का शिकार है, लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर ईसाईयत में सभी बराबर हैं तो गैर बराबरी कैसे और कोई पिछड़ा-दलित कैसे हो सकता है? सब तो चर्च जाने वाले और जीसस को मानने वाले हुए।

केरल में अगड़ा-पिछड़ा-दलित क्रिश्चियन

दरअसल ये ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल दिखाता है कि ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को खुद मिशनरियाँ ही बराबर नहीं मानती। जो बराबरी की बात कर पिछड़ों-दलितों और जनजातीय समाज के लोगों को बरगलाते हैं और धर्मांतरण करवाते हैं, वो पहचान तब भी नहीं छूटती जब कोई ईसाइयत के ऊँचे स्थान पर पहुँच जाता है।

केरल जैसे राज्यों में तो आज भी ईसाइयों के भीतर भयानक जातिवाद है। यहाँ कुछ ईसाई अपने को ऊँची जाति का बताते हैं और दलित से ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को हीन भावना से देखते हैं। मिशनरी यहाँ कुछ नहीं कर पातीं।

असल में बराबरी का फर्जीवाड़ा सिर्फ और सिर्फ उस सनातन को कमजोर करने के लिए है, जिसने ना सिर्फ समय आने पर अपने में बदलाव किए हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएँ बनाई हैं कि पिछड़ों की भरपाई हो। आज राम मंदिर में पुजारी दलित समाज से हैं! किसी मंदिर में कोई नहीं पूछता कि आप किस जात से हो।

West Bengal : ममता ग्रीन फाइल और documents क्यों लेकर गयी? क्या इन्हीं में घोटाला छिपा है? भ्रष्टाचार और कोयला तस्करी पर ED की दस्तक

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी को सत्ता–संरक्षण देने के भंवर में फंस गई है। गुरुवार (8 जनवरी) को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।

पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव
आज पश्चिम बंगाल देश के सामने एक ऐसा उदाहरण बन रहा है, जो कि सत्ता के लंबे शासन में पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव से चल रहा है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं होती, बल्कि उन तथ्यों के आधार पर है, जो जांच में सामने आए हैं। ऐसे में यदि ममता बनर्जी सच में अपने आपको बेदाग मानती हैं, तो उन्हें जांच से डरने की नहीं, सहयोग करने की जरूरत है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध जांच नहीं, सच से भागना होता है। इस समय ममता बनर्जी वही कर रही हैं। इससे साफ है कि उनके मन में किसी काले कारनामे का पर्दाफाश होने का डर समाया हुआ है।

ममता के राज में सत्ता, पैसे और सिस्टम का गठजोड़?
सबसे अहम तथ्य यह है कि प्रतीक जैन न केवल I-PAC के डायरेक्टर हैं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आईटी सेल के प्रमुख भी बताए जाते हैं। यानी यह मामला केवल एक कंसलटेंसी फर्म तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सत्ता के डिजिटल, रणनीतिक और चुनावी इको सिस्टम तंत्र तक पहुंचता दिखाई देता है। ममता बनर्जी अक्सर केंद्र सरकार पर “राजनीतिक बदले” का आरोप लगाती रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ पारदर्शी है तो ईडी बार-बार टीएमसी के इतने करीबी नेताओं, मंत्रियों और अफसरों तक क्यों पहुंच रही है? क्या यह महज संयोग है या फिर सत्ता के भीतर पनपते उस सिस्टम का संकेत है, जहां राजनीति, पैसा और प्रशासन एक-दूसरे में घुलते जा रहे हैं?

अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में छापेमारी
छापेमारी के बाद ED ने मीडिया से कहा कि छापेमारी अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई है। ED ने कहा कि कोलकाता में I-PAC कार्यालय पर छापे पूरी तरह सबूतों के आधार पर किए जा रहे हैं। यह किसी राजनीतिक दल या चुनाव से जुड़ा मामला नहीं है। यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े केस में हो रही है। फिलहाल 10 ठिकानों पर तलाशी जारी है। 6 पश्चिम बंगाल और 4 दिल्ली में बताए जाते हैं। एजेंसी ने बताया कि जांच में कैश जनरेशन, हवाला ट्रांसफर से जुड़े परिसर शामिल हैं। किसी भी पार्टी कार्यालय की तलाशी नहीं ली गई। अधिकारियों के मुताबिक कुछ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग दो ठिकानों पर पहुंचे, अवैध दखल दिया और दस्तावेज छीन लिए।

कारनामों की पोल खुलने से ममता की धड़कने बढ़ीं
दरअसल, सीएम ममता बनर्जी को जैसे ही आई-पैक में छापे की जानकारी मिली, वे प्रतीक जैन के घर पर पहुंच गईं। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि क्या ईडी का काम पार्टी की हार्ड डिस्क और उम्मीदवारों की सूची जब्त करना है? सीएम ने कहा कि मेरी पार्टी के सभी दस्तावेज उठा ले जाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में SIR के बाद अब इस तरह की कार्रवाई की जा रही है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, त्यों-त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। हिंदुओं की खिलाफत, मुस्लिम तुष्टिकरण, एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और अब ईडी के छापे ने ममता बनर्जी की धड़कने बढ़ा दी हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के दम पर जिस तरह तृणमूल कांग्रेस जीतती रही है, उस पर एसआईआर ने सेंध लगा दी है। इस रिवीजन में राज्य के 58 लाख से ज्यादा ‘फर्जी’ वोटर के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं।

खाली हाथ आईं ममता हरी की ग्रीन फाइल सुर्खियों में आई
ममता खाली हाथ आईं थीं, लेकिन घर से बाहर निकलीं तो हाथ में ग्रीन फाइल थी। छापेमारी के दौरान प्रतीक जैन अपने घर पर ही मौजूद थे। यह कार्रवाई सुबह से जारी थी, लेकिन करीब 11:30 बजे के बाद मामला बढ़ा। सबसे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर प्रतीक जैन के आवास पर पहुंचे। कुछ समय बाद सीएम ममता बनर्जी खुद लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के घर पहुंचीं। ममता वहां कुछ देर रुकीं। जब बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं।

जांच में बाधा डाली, सीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल देने का काम किया है। ईडी सबूतों के आधार पर अपना काम कर रही है। बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, ‘छापेमारी के बारे में ED पूरी डिटेल्स दे सकती है। लेकिन यह सच है कि ममता बनर्जी केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल दिया। ममता ने आज जो किया, वह जांच में बाधा डालना था। मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। IPAC ऑफिस में वोटर लिस्ट क्यों मिली। क्या IPAC कोई पार्टी ऑफिस है।’

प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक ने संभाली

  • I-PAC (Indian Political Action Committee) एक पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म है। इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन है।
  • यह राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति, डेटा-आधारित कैंपेन, मीडिया प्लानिंग और वोटर आउटरीच में मदद करती है।
  • I-PAC पहले Citizens for Accountable Governance (CAG) थी। इसकी शुरुआत 2013 में प्रशांत किशोर ने प्रतीक के साथ की थी। बाद में इसका नाम I-PAC रखा गया।
  • प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक के पास आ गई।
  • प्रशांत ने बाद में बिहार में ‘जन सुराज’ पार्टी बनाई।
  • I-PAC तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ 2021 से जुड़ी है।

जापान में तेजी से बढ़ती मुस्लिम आबादी से मुस्लिमों को दफनाने की जगह नहीं, 40 वर्ष में 38 गुना बढ़ी मस्जिदों की संख्या

                                     जापानी में बढ़ रही मुस्लिम आबादी ( फोटो साभार- waseda.jp)
जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

जापान में हजार से लाखों में पहुँची मुस्लिम आबादी

दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।
दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।

 ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।

जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।

जापान में तेजी से बन रहे हैं बहुमंजिला मस्जिद

ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।
टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”
यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

90 के दशक में बनी बेतहाशा मस्जिदें

1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।
अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।

सांसद मिजुहो ने कब्रिस्तान बनाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की

जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।
दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।
इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।
एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।
जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।
उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।विचार किया जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों को दिए गए हथियारों के लाइसेंस, राजस्थान में खुला J&K का 100 करोड़ रूपए का ‘गन लाइसेंस घोटाला’: निशाने पर 8 IAS अधिकारी


जम्मू कश्मीर में करीब 100 करोड़ रूपए के गन लाइसेंस घोटाले में एमएचए ने अहम कदम उठाया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से तीन अधिकारियों, यशा मुद्गल, शाहिद इकबाल चौधरी और नीरज कुमार को लेकर जानकारी माँगी है। ये कार्रवाई राजस्व सचिव कुमार राजीव रंजन पर राज्य में हथियार लाइसेंस में कथित अनियमितताओं के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति देने के दो महीने बाद माँगी गई है।

गन लाइसेंस स्कैम में 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदेह के घेरे में हैं। अब गृह मंत्रालय ने सीबीआई से पूछा है कि यशा मुर्दल, शाहिद इकबाल और नीरज कुमार समेत तमाम अधिकारियों के खिलाफ हथियार डीलरों से जुड़ने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं या नहीं। ये घोटाला 2012 से 2016 के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस को अवैध तरीके से जारी किए जाने को लेकर है।

जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव से पूछा गृह मंत्रालय ने

गृह मंत्रालय में अवर सचिव सीपी विनोद कुमार ने 21 फरवरी 2025 को एक खत जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव को लिखा है। इसमें बताया गया है कि तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देने की सिफारिश करने वाले पत्रों के साथ न तो केंद्रीय जाँच ब्यूरो के पत्र/प्रस्ताव और डीवीडी थे और न ही जम्मू-कश्मीर के कानून विभाग की कोई कानूनी राय।

इस घोटाले में 16 पूर्व जिलाधिकारी (13 आईएएस अधिकारी और तीन केएएस अधिकारी) शामिल हैं। इनमें ये तीनों अधिकारी भी शामिल हैं, जिनको लेकर सवाल पूछे गए हैं। सभी पूर्व जिलाधिकारियों पर तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के अलग-अलग जिलों में तैनाती के दौरान लाखों अवैध हथियारों के लाइसेंस जारी करने के आरोप हैं।

गृह मंत्रालय ने सीबीआई से क्या पूछा

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई को गृहमंत्रालय ने 1 सिंतबर 2025 को पत्र लिखा है।

पत्र में ये साफ करने को कहा है कि क्या इन अधिकारियों को अवैध हथियार लाइसेंस जारी करने के बदले आर्थिक फायदा हुआ था। क्या जाँच में किसी आईएएस अधिकारी के आर्म्स डीलरों के साथ साँठ-गाँठ के सबूत मिले हैं। क्या संपत्ति के सौदे या पैसों के लेन-देन के सबूत मिले हैं।

सीबीआई की जाँच में क्या सामने आया

सीबीआई ने अपनी जाँच कर आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ज्यादातर हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए। लाइसेंस जारी करने में कई डीलर, बिचौलिए और प्रशासनिक अधिकारियों की संलिप्तता थी।
जम्मू कश्मीर प्रशासन ने 2021 में KAS अधिकारियों और क्लर्कों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दे दी थी। इसके बाद सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी। लेकिन आईएएस अधिकारियों का मामला अब तक लंबित है, क्योंकि इसके लिए गृहमंत्रालय से अनुमति की जरूरत है। गृहमंत्रालय इस मामले में काफी फूँक-फूँक कर कदम रख रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद गृहमंत्रालय पर फैसला लेने का दबाव भी आ गया है।

जम्मू-कश्मीर गन घोटाला क्या है

2017 में राजस्थान की एंटी टेररिज्म स्क्वाड की एक जाँच में जम्मू कश्मीर में बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज के आधार पर लाइसेंस जारी करने का पता चला था। इस मामले को सीबीआई को जाँच के लिए सौंपा गया। सीबीआई को पता चला कि 2012 से 2016 तक के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए थे। इनमें से 95 फीसदी वे लोग थे, जो जम्मू-कश्मीर के निवासी नहीं थे। यहाँ तक कि उनका राज्य से कोई लेना-देना नहीं था।

सीबीआई के मुताबिक, ये लाइसेंस सेना, अर्धसैनिक बलों और दूसरे बाहरी लोगों को पैसों की लेन-देन के बाद जारी किए गए।

इस मामले में 9 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जाँच की गई। इनमें से 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर अभियोजन की अनुमति गृहमंत्रालय ने दी। ये सभी अधिकारी 2012 से 2016 के बीच जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पद स्थापित थे।

जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस अरुण पाली और जस्टिस राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने इस मामले में गृहमंत्रालय से 6 हफ्तों में फैसला लेने को कहा था कि इन आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी जाएगी या नहीं। इसको देखते हुए गृहमंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के उच्चाधिकारी को पत्र लिखा है।

हाईकोर्ट में इससे संबंधित एक जनहित याचिका शेख मोहम्मद शफी और अन्य ने दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि आरोपित अधिकारी अभी भी राज्य के उच्च पदों पर पदस्थापित हैं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए कोर्ट उन पर निगरानी रखे।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर ये मामला काफी अहम है। ये कोई प्रशासनिक गलती भी नहीं है, बल्कि जम्मू कश्मीर प्रशासन की छवि से जुड़ा मामला है। गृहमंत्रालय अब इस पर जल्दी निर्णय लेने के मोड में आ गई है।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले दक्षिण अमेरिका के दौरे पर ‘पार्ट टाइम राजनेता’ राहुल गाँधी: अहम मौकों पर राहुल की विदेश यात्राओं का इतिहास

                                                 राहुल गाँधी (फोटो साभार - एआई चैटजीपीटी)
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के सांसद राहुल गाँधी एक बार फिर विदेश यात्रा पर निकल गए हैं। इस बार वे दक्षिण अमेरिका के चार देशों का दौरा करेंगे। कांग्रेस का कहना है कि इस यात्रा के दौरान उनका उद्देश्य राजनीतिक नेताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और व्यापारिक समुदाय से मुलाकात करना है।

कांग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा के अनुसार, राहुल गाँधी ब्राजील और कोलंबिया जाएँगे। वहाँ वे विश्वविद्यालयों में छात्रों को संबोधित करेंगे, राष्ट्रपति और शीर्ष नेताओं से मुलाकात करेंगे और व्यापार और तकनीक जैसे मुद्दों पर व्यवसायियों से बातचीत करेंगे।

कांग्रेस ने इस दौरे को दक्षिण अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। खासकर जब भारत और दक्षिण अमेरिका के बीच गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) और ग्लोबल साउथ के जरिए ऐतिहासिक संबंध भी रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी इस यात्रा को लोकतांत्रिक और रणनीतिक साझेदारी बनाने के प्रयास के रूप में पेश कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की इस यात्रा की टाइमिंग को लेकर फिर से देश में सवाल खड़े हो रहे हैं।

बिहार चुनाव नजदीक आने पर विदेश यात्रा

लोकसभा में विपक्षी नेता राहुल गाँधी देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं और न ही किसी सरकारी प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा हैं। फिर भी, इसके बावजूद वे विदेशों में भाषण देने की भूमिका निभा रहे हैं और वो भी ऐसे समय में जब बिहार में महत्वपूर्ण चुनाव नजदीक है।

इस पर आलोचना भी हो रही है कि उनकी प्राथमिकताएँ गलत हैं। एक जिम्मेदार नेता इतने बड़े चुनाव से पहले, अपना समय चुनाव की रणनीति बनाने, जनता से संपर्क करने और अपने दल को मजबूत करने में लगाता लेकिन राहुल गाँधी ने एक और विदेशी यात्रा को चुना है।

विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्रों से मिलने का उनका निर्णय भी सवालों के घेरे में है। वे न तो कोई शैक्षणिक विशेषज्ञ हैं और न ही किसी विषय के जानकार, फिर भी उन्होंने छात्रों और विचारकों के साथ लेक्चर और बहसें तय की हैं। आलोचक कहते हैं कि कोलंबिया और ब्राजील में भाषण देने के बजाय उन्हें बिहार के मतदाताओं से मिलकर कॉन्ग्रेस की स्थिति मजबूत करनी चाहिए।

ऐसे वक्त पर फिर से वही आलोचना सामने आता है कि राहुल गाँधी राजनीति को गंभीरता से नहीं लेते और इसे पार्ट-टाइम काम की तरह देखते हैं, जबकि इसे पूर्णकालीन जिम्मेदारी की तरह संभालना चाहिए।

कुछ सप्ताह पहले मलेशिया में मौज करते हुए दिखे थे राहुल

इस धारणा को और मजबूत करता है उनका हालिया मलेशिया दौरा। इसी महीने की शुरुआत में राहुल गाँधी ने बिहार में अपनी तथाकथित ‘वोटर अधिकार यात्रा’ पूरी की थी। इसके बाद राजनीतिक संपर्क को आगे बढ़ाने के बजाय, यात्रा खत्म होते ही वे मलेशिया छुट्टियों पर चले गए।

उनकी यह यात्रा तब विवादों में आ गई, जब सोशल मीडिया पर उनकी लंगकावी, मलेशिया में छुट्टियाँ बिताते हुए तस्वीरें वायरल हुईं। भाजपा नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने उन पर एक बार फिर महत्वपूर्ण राजनीतिक समय में गायब होने का आरोप लगाया।

भाजपा IT सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने X पर लिखा, “राहुल गाँधी फिर से लापता हो गए, इस बार लंगकावी, मलेशिया में गुप्त छुट्टी पर। लगता है बिहार की राजनीति का दबाव कांग्रेस के युवराज के लिए ज्यादा था, इसलिए उन्हें आराम के लिए भागना पड़ा। या फिर यह कोई ऐसा गुप्त मीटिंग थी, जिसे किसी को पता नहीं होना चाहिए था। किसी भी तरह, जब लोग असली मुद्दों से जूझ रहे हैं, राहुल गाँधी गायब होने और छुट्टियाँ बिताने की कला में व्यस्त हैं।”

साथ ही, राहुल गाँधी की मलेशिया यात्रा को लेकर यह भी अटकलें थीं कि उन्होंने वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक से मिलने के लिए जा सकते हैं, जिन्होंने भारत छोड़ने के बाद मलेशियाई नागरिकता ले ली थी। एक X यूजर ने लिखा, “वे अपने गुरु जाकिर नाइक से मिलने मलेशिया गए हैं।”

बिहार यात्रा के तुरंत बाद की यह मलेशिया यात्रा इस बात को और पुष्ट करती है कि राहुल गाँधी राजनीतिक कार्यक्रमों को जैसे असाइनमेंट की तरह देखते हैं, जिन्हें जल्दी पूरा करके विदेश जाकर आराम करना जरूरी है।

राज्य चुनावों से पहले उज़्बेकिस्तान की गुप्त यात्रा

यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने चुनावों से पहले विदेश यात्रा करना चुना हो। अक्टूबर 2023 में, उन्होंने कई राज्यों में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले गुप्त रूप से भारत छोड़कर उज़्बेकिस्तान की यात्रा की थी।

जब वे वापस लौटे, तो मीडिया को इसके बारे में तब ही पता चला जब उन्हें दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर देखा गया। उन्होंने यात्रा का उद्देश्य अभी तक सार्वजनिक नहीं किया। उनकी विदेश यात्राएँ अक्सर गोपनीयता में होती हैं और यह उनकी आदत जैसी बन गई है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह का व्यवहार एक वरिष्ठ विपक्षी नेता के लिए ठीक नहीं है।

कांग्रेस के राजकुमार का चुनाव के दौरान विदेश जाने का इतिहास रहा है

राहुल गाँधी की आदत रही है कि वे चुनावी समय या तब भी विदेश यात्रा पर चले जाते हैं जब उनकी पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उन्हें पार्टी में संकट के दौरान विदेशी यात्राओं और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी दखल को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है।

उनका 2019 का बैंकॉक दौरा भी उतना ही विवादित रहा। उस समय भी वे चुनावों के बीच विदेश यात्रा पर निकल गए थे। उनकी विदेश यात्राओं पर उठने वाले सवाल बेबुनियाद नहीं हैं, क्योंकि कई बार ऐसी यात्राओं के दौरान उनकी मुलाकात भारत विरोधी तत्वों से भी हुई है।

उदाहरण के लिए, 2023 में अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ से मुलाकात की। HfHR एक इस्लामी समूह है, जो भारत में हिंदुओं पर भेदभाव का आरोप लगाता है।

अप्रैल 2022 में, जब कांग्रेस को नेतृत्व की जरूरत थी और पार्टी में प्रशांत किशोर को शामिल करने की अटकलें थीं, राहुल गाँधी विदेश चले गए। इसके बाद जब प्रशांत किशोर ने कांग्रेस जॉइन करने से मना कर दिया, तो राहुल गाँधी लगभग 10 दिन अचानक गायब रहे, बिना किसी जानकारी दिए। इस दौरान, कांग्रेस को नेतृत्व के बिना ही काम करना पड़ा।

दिसंबर 2021 में, जब पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा तो राहुल गाँधी इटली की व्यक्तिगत यात्रा पर थे। उनकी यात्रा के कारण पंजाब में चुनावी गतिविधियों में बड़ी बाधा आई और अधिकांश रैलियाँ उनकी वापसी तक टाल दी गईं। यह यात्रा आम आदमी पार्टी की जीत और कॉन्ग्रेस की हार का कारण भी बनी।

सितंबर 2021 में, जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद कांग्रेस मुश्किल में थी, गाँधी परिवार शिमला में छुट्टी मना रहा था।

दिसंबर 2020 में, कांग्रेस पार्टी के 136वें स्थापना दिवस के दौरान भी राहुल गाँधी इटली चले गए। इसी तरह अक्टूबर 2019 में, हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव से केवल 15 दिन पहले, वे बैंकॉक गए।

इसी तरह, 2019 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद वे नतीजों का इंतजार किए बिना लंदन छुट्टियाँ मनाने चले गए। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी माँ सोनिया गाँधी द्वारा बुलाई गई अहम बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया।

इसके अलावा, राहुल गाँधी अक्सर विदेश यात्राओं के दौरान SPG सुरक्षा (विशेष सुरक्षा समूह) नहीं लेते थे और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते रहे। इसी वजह से सरकार ने उनकी SPG सुरक्षा वापस ले ली थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भी इस पर सवाल उठाए थे।

गलत प्राथमिकताओं को दिखाने वाला पैटर्न

बिहार चुनाव नजदीक हैं लेकिन राहुल गांधी का दक्षिण अमेरिका दौरा पुरानी आलोचनाओं को फिर से उभार रहा है। राजनीतिक समय बिहार में बिताने के बजाय वे विदेश में छात्रों और नेताओं से बातें कर रहे हैं जबकि उनकी पार्टी के लिए राज्य में बहुत कुछ दाँव पर है।

कई विशेषज्ञों के लिए यह उनकी प्राथमिकताओं की गलत दिशा को दर्शाता है। जब कांग्रेस पार्टी भारत के सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक में अपनी पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, उसका नेता हजारों किलोमीटर दूर है। राहुल गाँधी का चुनावों से पहले विदेश चले जाने का यह पैटर्न उनके राजनीतिक गंभीरता पर सवाल उठाता है और यह भी कि क्या वे खुद को पूर्णकालिक नेता मानते हैं या नहीं।

राहुल जवाब दो "वह भारतीय संसद का LoP या भारत विरोधियों का"? कभी अमेरिका कभी पाकिस्तान, लेकिन भारत पर राहुल गाँधी को नहीं है ऐतबार: बिहार में फिर बने विदेशी तोता, बदतमीजी भरे लहजे में कहा- ट्रंप के बोलते ही 5 घंटे में PM मोदी ने रोकी लड़ाई

                                      ट्रंप के दावे पर राहुल गाँधी को यकीन ( साभार-x@rahulgandhi, ht)
2014 चुनाव के बाद से होने वाले हर चुनाव में कांग्रेस खुद अपने आपको बेनकाब कर अपनी असली पहचान दिखा रही है। कांग्रेस का गठन किसी भारतीय ने नहीं बल्कि एक ब्रिटिश ने किया था, मकसद आज़ादी नहीं बल्कि आज़ादी के लिए उमड़ते सैलाब को भटकाने का था। आज उसी राह पर कांग्रेस सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बनते ही चल निकल पड़ी है। पार्टी में बात मानी जाती है पार्टी अध्यक्ष की लेकिन अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के कहते है कि फैसला हाई कमांड लेगा। आखिर किस को पागल बनाया जा रहा है? अध्यक्ष हाई कमांड होता है या फिर कोई सड़क पर घूमने वाला राहगीर? ब्रिटिश नागरिक द्वारा कांग्रेस स्थापित करने के बाद से पार्टी में जिसने भी गुलामी की मानसिकता से अलग काम किया उसे दरकिनार कर दिया गया। इतिहास गवाह है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल, सीताराम केसरी, लालबहादुर शास्त्री, आदि एक लम्बी लिस्ट है। 

फिर आज जीता-जागती मिसाल राहुल की है। जो LoP तो है भारतीय संसद में विपक्ष का लेकिन आवाज़ बुलंद की जा रही भारत विरोधियों की, क्यों? अगर राहुल किसी भी वजह से भारत में उपद्रव करवाने में सफल हो जाते हैं तो मोदी सरकार को हिटलर बन लठ और गोली से कोई गुरेज नहीं करना चाहिए। कांग्रेस की बदतमीजी को देख कांग्रेस को वोट देने वाले भी अपने संस्कारों को जाहिर करेंगे।             

सरकार के बार-बार कहने, संसद में बयान देने, सेना के खुले तौर पर बताने के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को भरोसा है, तो सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप पर, जो बार-बार सीजफायर का श्रेय लेने के लिए बेताब हैं। ट्रंप 40 से ज्यादा बार दुनिया को ये बता चुके हैं कि उन्होंने ही भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराया है, लेकिन भारत शुरू से ही कह रहा है कि पाकिस्तान ताबड़तोड़ हमले के बाद नाक रगड़ते हुए सीजफायर के लिए भारत से गुहार लगाई थी।

संसद के अंदर और बाहर सरकार स्थिति कर चुकी है साफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में आधिकारिक रूप से दो टूक कहा था कि सीजफायर के लिए सिर्फ पाकिस्तान के डीजीएमओ का फोन आया था। इसको लेकर किसी भी देश से कोई बात नहीं हुई। पीएम मोदी ने संसद में एक और खुलासा किया था कि 9 मई की रात जेडी वैंस का कई बार फोन आया था। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान भारत पर बहुत बड़ा हमला करने वाला है। पीएम मोदी ने उन्हें बता दिया था कि पाकिस्तान ऐसा करता है, तो वो बहुत बड़ी गलती करेगा। इसके बाद जो हुआ वो सबको पता है, बात खत्म।

राहुल गाँधी ने ट्रंप के दावे को दोहराया

 लेकिन राहुल गाँधी की बात है जो खत्म ही नहीं होती। ट्रंप के बयान के बाद राहुल गाँधी का दावा सामने आ जाता है। बिहार में ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान एक रैली में फिर उन्होंने दावा किया, “ट्रंप ने आज कहा कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था, तो मैंने फोन उठाया और नरेंद्र मोदी को बताया और कहा कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं उसे 24 घंटे के भीतर बंद कर दें। नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे नहीं, बल्कि पाँच घंटे में सब कुछ बंद कर दिया।”

उनके बोलने का अंदाज और भाषा शैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

राहुल गाँधी ने कहा, “ट्रंप ने मोदी से कहा- सुन जो तू ये कर रहा है, इसे 24 घंटे में बंद कर। जिसको नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे में बल्कि पाँच घंटों में बंद कर दिया।”

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस ट्रंप- ट्रंप का रट लगाए हुए है। उन्हें सेना के बयान पर भी विश्वास नहीं है। सेना ने खुले तौर पर कहा कि दोनों सेनाओं के डीजीएमओ स्तर पर बातचीत हुई और पाकिस्तान के कहने पर भारत ने हमले रोके।

हर आतंकी हमले को भारत मानेगा युद्ध

ये वही कॉन्ग्रेस है जिसके राज में मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 26/11 जैसी घटनाएँ घटी, लेकिन डोजियर देने के अलावा कुछ नहीं कर सकी कॉन्ग्रेस सरकार। पाकिस्तान के प्रति सख्ती 2014 के बाद दिखलाई दी और पीएम मोदी ने पिछले 11 सालों में दुनिया को दिखाया कि भारत बदल गया है। अब तो मोदी सरकार ने ये भी घोषणा कर दी है कि पाकिस्तान की ओर से होने वाले आतंकी हमलों को भारत युद्ध की तरह मानेगा। यानी अगर अब आतंकी हमला होता है, तो भारत उसे छोड़ेगा नहीं।

ट्रंप का भारत-पाक युद्ध रुकवाने पर फिर बयान

27 अगस्त 2025 को अपनी कैबिनेट बैठक में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बैठे डोनाल्ड ट्रंप ने बताना शुरू किया कि कैसे उन्होंने यूक्रेन-रूस संघर्ष में एक विश्व युद्ध को उन्होंने टाल दिया था और फिर बात को मोड़कर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी से बातचीत होने का जिक्र किया।

ट्रंप ने कहा, “मैं एक शानदार व्यक्ति की बात कर रहा था, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। मैंने पूछा कि पाकिस्तान के साथ क्या चल रहा है। नफरत काफी थी और ये कई सालों से चल रहा है।”

ट्रंप ने अपना बात में आगे कहा, “मैंने उनसे कहा कि मैं आपके साथ कोई ट्रेड डील नहीं करूंगा। आप परमाणु युद्ध में उलझ जाएँगे। मैंने कहा, मुझे कल फोन करना। मैं आपके साथ कोई डील नहीं करूँगा या फिर इतना ज्यादा टैरिफ लगा दूँगा कि आपका सिर चकरा जाएगा।”

ट्रंप के मुताबिक, “भारत और पाकिस्तान के बीच जो स्थिति थी, उससे न्यक्लियर वॉर हो सकती थी। उन्होंने पहले ही 7 जेट मार गिराए थे, हालात बेहद खतरनाक थे। तब मैंने उनसे कहा – क्या आप व्यापार करना चाहते हैं? अगर आप लड़ाई जारी रखते हैं, तो अमेरिका आपके साथ कोई व्यापार या सहयोग नहीं करेगा। आपके पास इसे सुलझाने के लिए सिर्फ 24 घंटे हैं।” अगर ट्रंप की माने तो बातचीत के 5 घंटे के अंदर ही भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हो गया।

ट्रंप का ये बयान उस समय आया है जब भारत पर नए टैरिफ नियम लागू हो गया है। इसके साथ ही अब भारतीय सामानों के आयात पर 50% टैरिफ लागू हो गया है। यानी व्यापार की जो धमकी देने का दावा ट्रंप कर रहे हैं, वह भारत पर नहीं चला। सरकार ने कई बार साफ किया है कि वो किसानों, पशुपालकों के हितों के खिलाफ कोई समझौता नहीं करेगी। अगर व्यापार के नाम पर सीजफायर होता, तो भारत अमेरिका के सामने अपनी शर्तों पर इस तरह अडिग नहीं रहता।

इस बीच दावा ये भी किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कई फोन कॉल्स को नजरअंदाज कर दिया। 50% टैरिफ दरों को लेकर भारत ने ‘अनुचित, अन्यायपूर्ण और अव्यवहारिक’ बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। साथ ही अमेरिका को बार-बार यह संकेत दिया है कि वह रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखेगा।

मोदी जापान के दौरे पर हैं। इसके बाद वो चीन जाने वाले हैं जहाँ चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के अलावा रूस के राष्ट्रपति पुतिन से भी मुलाकात होगी। इनकी बैठक पर दुनिया की नजर है। ये बैठक ट्रंप के टैरिफ को ‘फुस्स’ कर सकता है।

राजधानी दिल्ली का हाल : अल्तमस चला रहा ‘तोमर डेयरी’, मोहम्मद अयान के दुकान का नाम ‘रावल डेयरी’… ; क्या किसी गहरे षड़यंत्र को अंजाम दिया जा रहा है?

                                                         दुकान मुस्लिम की, नाम हिंदू.
राज्य,केंद्र सरकारों और अदालतों को नाम बदलकर दुकान चलाने वालों पर सख्ती से कार्यवाही करनी चाहिए कहीं बहुत देर न हो जाए। अपना नाम छुपाकर व्यापार करना किसी गंभीर चेतावनी का संकेत दे रही है। इस बात को हल्के में लेने में नहीं लेना चाहिए। 

दिल्ली के पटपड़गंज इलाके में भारतीय जनता पार्टी के नेता रवींद्र सिंह नेगी उर्फ रवि नेगी का गुस्सा उन दुकानदारों पर फूटा जो मुस्लिम होकर हिंदू नाम से कारोबार कर रहे थे। उन्होंने इलाके में जाकर मुस्लिम दुकानदारों को चेतावनी दी कि अगर वो अपनी असली पहचान के साथ काम नहीं करेंगे तो काम बंद करवा दिया जाएगा।

सामने आई वीडियो में देख सकते हैं कि वो पहले पटपड़गंज के मंडावली इलाके में स्थित तोमर डेरी पर गए। वहाँ अल्तमस तोमर नाम का युवक अपनी दुकान ‘तोमर डेयरी’ नाम से दुकान खोला हुआ था। रवि नेगी ने उससे पहले उसकी पहचान पूछी। बाद में बोले, “अगर तुम मुस्लिम हो तो तुमने दुकान पर नाम तोमर क्यों लिखा हुआ है। तुम्हारा नाम अल्तमस है, तो इसे बोर्ड पर लिखवाओ तुम हिंदू बस्ती में काम कर रहे हो। तुम्हें अपना नाम बताकर रखना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं करते तो तुम्हारी दुकान बंद हो जाएगी।”

रवि ने ये भी कहा, “देखो हमारी आपसे कोई लड़ाई नहीं है और न ही आपके मजहब से है। हमारी लड़ाई इस बात से है कि आप लोग होते मुसलमान हो, लिखते तोमर हो। “

इसी तरह वह एक अन्य दुकान वाले के पास गए। दुकानदार का असली नाम मोहम्मद अयान था लेकिन वो रावल डेयरी के नाम पर दुकान चला रहा था। अयान से उन्होंने पूछा- “आप लोग हिंदुओ को क्यों धोखा दे रहे हो। क्या हमसे कोई लड़ाई है। लिखा रावल है, नाम आपका मोहम्मद अयान है।”

रवींद्र नेगी ने अपने अकॉउंट पर दुकानदारों से बातचीत की वीडियो साझा की। साथ ही लिखा- “…हिंदुओं के साथ क्यों खिलवाड़ कर रहे हैं.. पटपड़गंज विधानसभा में बिल्कुल भी इस तरह की दुकान हम नहीं चलने देंगे जो हिंदू नाम रख रहे हैं पर है मुस्लिम।”

उनकी वीडियो देखने के बाद कई लोग इसे एक अच्छा प्रयास बता रहे हैं। साथ ही उनकी तारीफ भी कर रहे हैं।

ये वीडियो ऐसे समय में सामने आई है जब पिछले दिनों यूपी में योगी सरकार ने आदेश दिय़ा था कि हर दुकान पर मालिक का असली नाम और पता दिखना जरूरी है। बाद में हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने भी देखा-देखी में ऐसा ऑर्डर निकाला था कि दुकानों पर मालिक का असली नाम लिखना जरूरी है।

काँवड़ यात्रा पर किसी भी हमले के लिए मोहम्मद जुबैर होगा जिम्मेदार: यशवीर महाराज ने ‘सेकुलर’-इस्लामी रुदालियों पर बोला हमला, ढाबों मालिकों की सूची लगाने का दिया गया था निर्देश

                             यशवीर महाराज/मोहम्मद जुबैर (फोटो साभार : X/Yashveer Maharaj/File)
स्वामी यशवीर महाराज ने 18 जुलाई 2024 को एक  वीडियो बयान जारी कर इस्लामिक कट्टरपंथियों और तथाकथित ‘सेकुलरों’ को आड़े हाथों लिया, जो यूपी के मुजफ्फरनगर के काँवड़ रूट पर दुकानों और ठेलों पर उनके मालिकों के नाम लिखने के मुजफ्फरनगर पुलिस के निर्देश का विरोध कर रहे हैं।

काँवड़ यात्रियों के बीच दुकानों के मालिक को लेकर किसी तरह के भ्रम की स्थिति न हो, इसके लिए ये निर्देश जारी किए गए हैं। बता दें कि लंबे समय से ऐसी खबरें आ रही हैं, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग हिंदू देवी-देवताओं के नाम का इस्तेमाल कर होटल, दुकानें, ढाबे और फल के ठेले चला रहे हैं। यशवीर महाराज लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं।

स्वामी यशवीर महाराज ने वीडियो में कहा, “हमने सवाल उठाए कि मुजफ्फरनगर में काँवड़ मार्ग पर खाने-पीने की दुकानें, फलों के ठेले आदि चलाने वाले मुस्लिम दुकानदार अपनी दुकानों के नाम हिंदू देवी-देवताओं के नामों पर क्यों रखते हैं। जब हमने माँग की कि सभी दुकानों और ठेलों पर मालिकों/कर्मचारियों के नाम बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिखे होने चाहिए, तो पुलिस ने हमारी माँग मान ली और इसके लिए निर्देश जारी कर दिए। दुकानदार निर्देशों के अनुसार मालिकों के नाम मोटे अक्षरों में लिख रहे हैं। हालाँकि ओवैसी जैसे कट्टरपंथी पुलिस के निर्देशों पर आपत्ति जता रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “एक तथाकथित पत्रकार है, मोहम्मद जुबैर। यह वही मोहम्मद जुबैर है जिसने अपनी पोस्ट से मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काया और वह कई बार जेल जा चुका है। उस पर कई मुकदमे चल रहे हैं। मुजफ्फरनगर में भी उसके खिलाफ मामला दर्ज है। इसलिए मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि किसी काँवड़ यात्री के साथ कोई दुर्घटना न हो। अगर किसी काँवड़ यात्री को कुछ होता है, तो उसके लिए मोहम्मद जुबैर को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इसलिए, उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए और उसके खातों की भी जाँच की जानी चाहिए, ताकि पता चल सके कि उसे विदेशी फंडिंग तो नहीं मिल रही है।”

स्वामी ने आगे कहा, “जो कट्टरपंथी और सेकुलर लोग पुलिस के निर्देशों का विरोध कर रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि अगर हिंदू उनके होटल में खाना खाते रहेंगे, जिस पर थूका गया हो, पेशाब किया गया हो और गोमाँस मिला हो, तो यह (उनके लिए) ठीक है, लेकिन अगर वे (हिंदू) विरोध करते हैं, तो यह एक समस्या बन जाती है और वे (कट्टरपंथी और सेकुलर) इसके खिलाफ अभियान शुरू कर देते हैं। हमें मुस्लिमों के होटलों और ढाबों से कोई समस्या नहीं है। वो उन्हें चलाने के लिए आजाद हैं लेकिन उन्हें हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर और हिंदुओं के भ्रामक नामों पर चलाने की जगह अपने नाम से दुकानें चलानी चाहिए। अगर किसी को लगता है कि पहले जैसे ही सबकुछ चलता रहेगा, तो ऐसा नहीं होने वाला।हम इसे कम से कम मुजफ्फरनगर में जारी नहीं रहने देंगे। अगर कोई ऐसा करना जारी रखने की कोशिश करता है, तो हम इसके खिलाफ आवाज उठाकर इसे रोकेंगे।” इस दौरान उन्होंने काँवड़ यात्रा के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश देने के लिए पुलिस अधिकारियों को धन्यवाद दिया।

दुकानों और ठेलों पर लिखे जाएँ मालिकों के नाम: पुलिस

इस साल काँवड़ यात्रा 22 जुलाई से शुरू होकर 2 अगस्त तक चलेगी। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में स्थानीय प्रशासन ने आदेश जारी कर होटल , ढाबे और खाने-पीने का सामान बेचने वाले ठेलों पर दुकान या ठेला चलाने वाले मालिक और संचालक का नाम लिखने को कहा है। हालाँकि, कथित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और इस्लामिस्टों ने धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि मुजफ्फरनगर के एसएसपी ने मीडिया को संबोधित किया, जहाँ उन्होंने प्रशासन के फैसले के बारे में जानकारी साझा की। मीडिया चैनलों से बात करते हुए एसएसपी अभिषेक सिंह ने कहा कि काँवड़ यात्रा के निशान पर आने वाले ढाबों, होटलों, भोजनालयों और खाद्य सामग्री बेचने वाले ठेलों को मालिकों और संचालकों के नाम लिखने के लिए कहा गया है। उन्होंने कहा कि इससे कांवड़ियों के लिए भ्रम की स्थिति से बचा जा सकेगा और बहस या टकराव से बचा जा सकेगा और साथ ही किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि भोजनालयों ने अपनी मर्जी से आदेश का पालन करना शुरू कर दिया है। उल्लेखनीय है कि काँवड़ यात्रियों को सामान खरीदने के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है और वे कहीं से भी खरीदारी करने के लिए स्वतंत्र हैं। 
   

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 मुस्लिमों के दुकानों के भ्रामक नामों के खिलाफ यशवीर महाराज का अभियान
पिछले साल काँवड़ यात्रा के दौरान और इस साल की यात्रा से पहले स्वामी यशवीर महाराज ने गंभीर आरोप लगाया था कि बड़ी संख्या में मुस्लिम ढाबे मालिकों ने अपनी पहचान छिपाकर फर्जी हिंदू नामों वाले पोस्टर लगाए हैं। उन्होंने कहा कि काँवड़ यात्रा के मार्गों पर मुस्लिम ढाबे वालों ने पोस्टर लगाए हैं। इसे देखते हुए स्वामी यशवीर महाराज ने माँग की है कि प्रशासन ढाबे मालिकों से अपने मालिकों या संचालकों के नाम बोर्ड पर लिखने के लिए कहे।
स्वामी यशवीर महाराज ने कहा , “काँवड़ यात्रा के दौरान एक समुदाय विशेष के कुछ लोग हिंदू देवी-देवताओं के नाम के बोर्ड लगाकर दुकानें चलाते हैं, जिससे शिवभक्त कांवड़ियों की भावनाओं को ठेस पहुँचने की आशंका है। हिंदू देवी-देवताओं के नाम के बोर्ड लगाकर दुकानें चलाने वाले समुदाय विशेष के लोगों की पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए। पुलिस को इसके लिए अभियान चलाना चाहिए।” उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर एक सप्ताह के भीतर प्रशासन इस मामले में कार्रवाई नहीं करता है तो वे विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन करेंगे।

इस मुद्दे पर बवाल काट रहे इस्लामिक कट्टरपंथी

प्रशासन का ये आदेश ऐसे कई मामलों के सामने आने के बाद आया है, जिसमें मुस्लिम दुकानदारों के काँवड़ियों के धोखा देने के आरोप लगे। वो सावन के पवित्र महीने में नकली नामों वाले ढाबों, फलों के ठेलों, होटलों में व्रत के नियमों के विपरीत खाना खिलाकर भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं। इसके बाद प्रशासन ने ये आदेश जारी किया है कि दुकानों, ढाबों के मालिकों को अपना नाम बड़े अक्षरों में लिखना होगा। क्योंकि ऐसे मामलों में टकराव होने से कानून व्यवस्था की स्थिति खड़ी हो जाती है। हालाँकि, इस्लामिक कट्टरपंथियों ने ये आरोप लगाते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया कि दुकान के मालिक का नाम लिखना “धार्मिक भेदभाव” है।
मोहम्मद जुबैर, जो खुद को फैक्ट चेकर कहता है, लेकिन वामपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए फैक्ट चेक की ओट लेता है। उसने इस आदेश को खतरनाक बताते हुए ‘धार्मिक भेदभाव’ करार दिया था। इसके अलावा एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तो एक कदम आगे बढ़कर इसकी तुलना दक्षिण अफ्रीका के “रंगभेद” और जर्मनी के “यहूदी बहिष्कार” से कर दी।(साभार)

‘आपको कितने पैसे मिले थे लड़की को बदनाम करने के लिए’: जब पत्रकारों के सवाल से हुआ अजीत अंजुम का सामना तो चिचियाकर भागे, Video वायरल

अजीत अंजुम अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ YouTube पर प्रोपेगंडा फैलाने के लिए जाने जाते हैं। वो उस गिरोह का हिस्सा हैं, जो पीएम मोदी को ‘तानाशाह’ बता कर अपनी प्रासंगिता बनाए रखने की चेष्टा करता रहता है। हालाँकि, जब इस गिरोह के लोगों का खुद सवालों से सामने होता है तो वो भाग निकलते हैं। अजीत अंजुम से जब किसी पत्रकार ने सवाल पूछा तो उन्होंने उस पर ही जेल में बंद आसाराम से पैसे लेने का आरोप लगा दिया।

ये वह दौर था जब सारा मीडिया कांग्रेस/यूपीए के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पता था, तत्कालीन सरकार के इशारे पर सारा मीडिया नचा करता था। आज तो जिसे देखो गोदी मीडिया कह सकता है, लेकिन उस समय सब भीगी बिल्ली बने रहते थे। जिसका फायदा मीडिया भी अपनी TRP बढ़ाने के लिए उल्टे-सीधे स्टिंग ऑपरेशन करते रहते थे। 

याद करिये, दिल्ली के तुर्कमान गेट के पास एक सरकारी स्कूल की अध्यापिका की होती दुर्गति। बेचारी इतना ज्यादा बेइज्जत हुई थी कि निर्दोष साबित होने के बावजूद नौकरी पर वापस करने की हिम्मत नहीं कर पायी। कौन महिला पब्लिक द्वारा बुरी तरह पीटते कपडे चिथड़े कर दिए जाएँ, लेकिन वही बेशर्म पत्रकार आज भी बहुत निर्भीक पत्रकार बन टीवी पर आता है। काश, ऐसा उसके परिवार की किसी महिला के साथ हुआ होता। कहाँ सो गया था मानव अधिकार और महिला आयोग? 

उन्होंने सवाल पूछने वाले पत्रकार को ‘आसाराम का चेला’ बता दिया। बदले में पत्रकारों ने भी उनसे पूछा कि उन्हें कितने पैसे मिले थे? एक पत्रकार ने पूछा, “आपको कितने पैसे मिले थे लड़की को बदनाम करने के लिए?” इस दौरान अजीत अंजुम पत्रकारों के सवालों का जवाब देने से इनकार करते हुए लगातार उँगली बता-बता कर कुछ कुछ उलटा-सीधा बोलते रहे। इसके बाद वो कार में बैठ गए और ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। इस तरह बार-बार पीएम मोदी से सवालों के जवाब की अपेक्षा रखने वाले अजीत अंजुम खुद एक सवाल से भाग खड़े हुए।

एक तरह से 2-4 पत्रकारों ने मिल कर अजीत अंजुम को वास्तविकता का भान करा दिया। ये वीडियो कब का है, ये अभी तक सामने नहीं आया है। हालाँकि, ऐसा लग रहा है जैसे ये हाल का ही वीडियो है। एक ट्विटर यूजर ने तो दावा कर दिया कि अजीत अंजुम को चिकेन-पकौड़ा की दुकान से खदेड़ दिया गया। असल में अजीत अंजुम का एक अपुष्ट ट्वीट वायरल होता है जिसमें उन्होंने योगी आदित्यनाथ के दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद पत्रकारिता छोड़ चिकेन-पकौड़ा का दुकान खोलने की बात कही थी।

हालाँकि, अजीत अंजुम दावा करते हैं कि उन्होंने कभी इस तरह का ट्वीट किया ही नहीं। लोगों ने उनके ताज़ा वीडियो को ‘पकौड़ी माफिया पर जनता की स्ट्राइक’ कह कर भी चलाया। 2020 में भी एक वीडियो सामने आया था, जिसके आधार पर दावा किया गया था कि किसान आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने अजीत अंजुम की पिटाई की। नवंबर 2023 में मध्य प्रदेश विधानसभा मतदान के दौरान उन्होंने एक महिला से जबरन अपने सवाल का जवाब लेना चाहा, जिसके बाद लोगों ने उन्हें खदेड़ा था।