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‘यूरोप के हथियारों से भारत पर हमला होता है’: रूसी तेल पर ज्ञान देने वाले पश्चिमी देशों को जयशंकर ने दिखाया आईना

                                                         साभार - एक्स/@DrSJaishankar
विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने के फैसले का मजबूती से बचाव किया है और पश्चिमी देशों की आलोचना पर सवाल उठाए हैं। यह पूरा मामला फिनलैंड में आयोजित ‘कुलतारांता टॉक्स’ के दौरान सामने आया, जहाँ उनसे रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की ऊर्जा नीति को लेकर सवाल पूछे गए। एक पत्रकार ने भारत पर आरोप लगाया कि वह रूस के प्रति ‘ज्यादा सहानुभूतिपूर्ण’ है और वहाँ से तेल खरीदकर उसका समर्थन कर रहा है।

भारत ने क्यों खरीदा रूस से तेल?

इस सवाल के जवाब में जयशंकर ने साफ कहा कि भारत का फैसला पूरी तरह आर्थिक और व्यावहारिक जरूरतों पर आधारित था। उन्होंने कहा, “मैं तेल उसकी कीमत और उपलब्धता के आधार पर खरीदता हूँ।”

उन्होंने समझाया कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तो यूरोप ने मिडिल ईस्ट से तेल खरीदना शुरू कर दिया, जो पहले भारत का पारंपरिक सोर्स था। ऐसे में बाजार की परिस्थितियों के कारण भारत को रूस से सस्ता और अधिक तेल मिलना शुरू हुआ।

जयशंकर ने यह भी बताया कि 2022 में अमेरिका ने खुद भारत से कहा था कि वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने के लिए रूस से तेल खरीदा जाए, ताकि महँगाई अचानक न बढ़े। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी है और इसी आधार पर निर्णय लिया है।

पश्चिमी देशों की दोहरी नीति पर सवाल

अपने बयान में विदेश मंत्री ने पश्चिमी देशों की नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यूरोप के किसी भी देश पर भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ, लेकिन यूरोप कई देशों को हथियार बेचता है जिनका इस्तेमाल संघर्षों में होता है।
उन्होंने कहा, “यूरोप हथियार बेचता है, जिनका उपयोग हम पर भी हुआ है। भारत ने कभी यूरोप के लिए कोई खतरा नहीं पैदा किया।” जयशंकर ने यह भी कहा कि रूस भारत का बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, जबकि अमेरिका गैस का प्रमुख सप्लायर है।
उन्होंने वैश्विक नीति को डीरिस्किंग की दिशा में बताया और कहा कि आज ऊर्जा बाजार पूरी तरह बदल चुका है। भारत ने साफ किया है कि वह किसी भी प्रतिबंध का हिस्सा नहीं है और अपने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर फैसले लेता रहेगा।


बीवी को ‘कैसे करें प्यार’ पर किताब लिखने वाले पादरी के खुद की कई बीवी: अमेरिका के फ्लोरिडा में गिरफ्तार

                                           एक से अधिक पत्नी होने के आरोप में पादरी गिरफ्तार
अमेरिका के फ्लोरिडा से एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। वहाँ लोगों को शादी पर और अपनी पत्नी को कैसे प्यार करें- इसका ज्ञान देने वाले एक 62 साल के पादरी को एक से ज्यादा  शादी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पादरी का नाम 62 वर्षीय लेस्ली विलियम्स है। पिछले हफ्ते उनके घर के पास स्थित द विलेजेस रिटायरमेंट कम्युनिटी में पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया।

स्थानीय पुलिस के अनुसार, विलियम्स के खिलाफ जॉर्जिया राज्य में एक साथ एक से अधिक विवाह करने के आरोप में केस दर्ज है। वहाँ की पुलिस ने 3 अप्रैल को उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। फिलहाल उन्हें डिटेंशन सेंटर में बिना जमानत के रखा गया है और जॉर्जिया को प्रत्यर्पित करने की प्रक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

मामले को लेकर दिलचस्प बात यह है कि विलियम्स ने 2017 में एक किताब लिखी थी, जिसमें पति-पत्नी के बीच प्रेम और वैवाहिक संबंधों को मजबूत बनाने के तरीके बताए थे। लोग विलियम्स की लिखी किताब और उनकी एक से ज्यादा हुई शादियों की बात सुनकर खूब मजे ले रहे हैं।

विलियम्स के सोशल मीडिया पोस्ट जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘सिंडी’ उनकी नई पत्नी है-इस पर लोगों ने उन्हें बधाइयाँ भी दी और तंज भी कसा। लोगों ने कहा कि उन्हें तो लगता था कि पादरी पहले से शादीशुदा है।

अभी विलियम्स की पहली शादी के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। विलियम्स खुद को एक ईसाई धर्म के प्रचारक बताते हैं। क्षेत्र में उनके कई अनुयायी भी हैं। इस घटना के बाद ने उनके अनुयायियों और स्थानीय समुदाय में हैरानी पैदा कर दी है। पुलिस मामले की जाँच में जुटी है और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

खुद को ‘ईसा मसीह’ मानने वाले नासिरे बेस्ट ने व्हाइट हाउस के बाहर बरसाईं ताबड़तोड़ गोलियाँ, चर्च में क्यों नहीं बरसाईं?

                                    व्हाइट हाउस और हमलावर नासिरे बेस्ट (फोटो साभार - आज तक)
पिछले दो/तीन दिनों से अमेरिका में फायरिंग के समाचार सुर्खी बने हुए हैं, आखिर हो रही फायरिंग के पीछे क्या कोई षड़यंत्र हैं?  

अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन DC में शनिवार (23 मई 2026) की शाम व्हाइट हाउस के बाहर अचानक गोलियाँ चलने लगीं। यह फायरिंग व्हाइट हाउस के बेहद सुरक्षित इलाके में बने एक सिक्योरिटी चेकपॉइंट के पास हुई।

घटना के समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस के अंदर मौजूद थे, जिसके बाद पूरे इलाके में तुरंत हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया। अमेरिकी सीक्रेट सर्विस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए हमलावर को गोली मार दी। बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई।

कैसे शुरू हुई पूरी घटना?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाम करीब 6 बजे एक युवक 17th स्ट्रीट और पेनसिल्वेनिया एवेन्यू के पास बने सिक्योरिटी चेकपॉइंट तक पहुँचा। कुछ ही देर बाद उसने अपने बैग से रिवॉल्वर निकाली और सीक्रेट सर्विस अधिकारियों पर फायरिंग शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि उसने शुरुआती दौर में कम से कम तीन गोलियाँ चलाईं।

सीक्रेट सर्विस के जवानों ने तुरंत मोर्चा संभाला और जवाबी फायरिंग की आवाज सुनते ही अफरा-तफरी मच गई। अधिकारियों ने मीडिया कर्मियों और आसपास मौजूद लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया।

कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि घटना के दौरान 20 से 30 राउंड तक गोलियाँ चलीं। घटना में एक आम नागरिक भी गोली लगने से घायल हो गया, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

हालाँकि राहत की बात यह रही कि किसी भी सीक्रेट सर्विस अधिकारी को चोट नहीं आई। व्हाइट हाउस ने साफ किया कि राष्ट्रपति ट्रंप पूरी तरह सुरक्षित हैं और हमलावर सुरक्षा घेरे को पार नहीं कर पाया।

 घटना के बाद पूरे व्हाइट हाउस इलाके को कई घंटों तक घेराबंदी में रखा गया। अमेरिकी जाँच एजेंसी FBI और वॉशिंगटन DC पुलिस अब इस मामले की जाँच कर रही हैं। जाँच एजेंसियाँ CCTV फुटेज, चश्मदीदों के बयान और बैलिस्टिक सबूतों की जाँच कर रही हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि आरोपित का मकसद क्या था।

कौन था नासिरे बेस्ट?

पुलिस ने हमलावर की पहचान 21 साल के नासिरे बेस्ट के रूप में की है, जो मैरीलैंड का रहने वाला था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह पहले भी सीक्रेट सर्विस की नजर में आ चुका था। उस पर व्हाइट हाउस से दूर रहने का आदेश भी जारी किया गया था, लेकिन इसके बावजूद वह कई बार प्रतिबंधित इलाके के आसपास देखा गया।

बताया जा रहा है कि जून 2025 में उसने सीक्रेट सर्विस एजेंटों को रोककर धमकी दी थी, जिसके बाद उसे हिरासत में लिया गया था। जुलाई 2025 में भी वह प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने की कोशिश करते पकड़ा गया था।

नासिरे बेस्ट मानसिक रूप से परेशान था और खुद को ईसा मसीह मानता था। शनिवार की घटना में उसने रिवॉल्वर का इस्तेमाल किया लेकिन सीक्रेट सर्विस की जवाबी कार्रवाई में वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

सवाल यह है कि अगर आरोपी मानसिक रूप से परेशान था तो व्हाइट हाउस ही क्यों चुना, चर्च क्यों नहीं चुना? यह निश्चितरूप से कोई सुनियोजित षड़यंत्र है।   

 ताबड़तोड़ गोलीबारी से दहला होंडुरास, दो हमलों में 25 लोगों की मौत: बंदूकधारियों ने मजदूरों और पुलिसकर्मियों पर बरसाईं गोलियाँ

सेंट्रल अमेरिका के देश होंडुरास में गुरुवार (21 मई 2026) को हुई दो अलग-अलग गोलीबारी की घटनाओं ने पूरे देश को हिला दिया। इन हमलों में अब तक कम से कम 25 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 6 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।

सबसे बड़ा हमला ट्रूजिलो इलाके के एक खेत और प्लांटेशन में हुआ, जहाँ हथियारबंद हमलावरों ने मजदूरों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस हमले में 19 लोगों की जान चली गई।

यह इलाका लंबे समय से जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चल रहे विवादों से प्रभावित है। यहाँ पर्यावरण और जमीन के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों को पहले भी धमकियाँ मिलती रही हैं।

दूसरी घटना ग्वाटेमाला सीमा के पास ओमोआ इलाके में हुई, जहाँ बदमाशों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया। पुलिसकर्मी राजधानी तेगुसिगल्पा से एंटी-गैंग मिशन पर जा रहे थे, तभी उन पर गोलियाँ बरसा दी गईं।

इस हमले में एक वरिष्ठ अधिकारी समेत 6 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। पुलिस और सेना ने दोनों इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी है और जाँच के लिए फॉरेंसिक टीमों को भेजा गया है।

दोगले पाकिस्तान ने ट्रंप की पीठ में घोंपा छुरा, ईरान के लिए खोले 6 रास्ते: हॉर्मुज की नाकाबंदी फेल


अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान ने एक बड़ा कदम उठाया है। पाकिस्तान ने ईरान के लिए व्यापार के छह नए रास्ते खोल दिए हैं। इससे ईरान को काफी राहत मिलेगी। खास बात यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर नाकाबंदी लागू की हुई है।

दरअसल, ईरान के लिए भेजे जाने वाले हजारों कंटेनर पाकिस्तान के बंदरगाहों पर फँसे हुए थे। इससे व्यापार पर भारी असर पड़ रहा था और कारोबारी परेशान था। इसीलिए अपना फायदा देखते हुए पाकिस्तान ने यह कदम उठाया। अब इन नए व्यापार के रास्तों के जरिए सामान आसानी से ईरान पहुँचाया जा सकेगा।

पाकिस्तान ने जिन व्यापार के रास्तों को दोबारा चालू किया है, वो हैं:

  • ग्वादर से गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से लियारी, ओरमारा, पसनी होकर गब्द
  • कराची/पोर्ट कासिम से खुजदार, दलबंदिन होकर ताफ्तान
  • ग्वादरे से तुर्बत, होशाब, पंजगुर, नाग, बेसिमा, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • ग्वादर से लियारी, खुजदार, क्वेटा/लाकपास होकर ताफ्तान
  • कराची/पोर्ट कासिम से ग्वादर होकर गब्द
इन नए रास्तों से पाकिस्तान के प्रमुख बंदरगाह, जैसे ग्वादर और पोर्ट कासिम, सीधे ईरान सीमा से जुड़ गए हैं। ये रास्ते ताफ्तान और गब्द जैसे अहम सीमा चौकियों तक पहुँचते हैं। पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जिसका अब दोनों देशों को बड़ा फायदा मिलेगा।
खास तौर पर ग्वादर से गब्द वाला रास्ता सबसे अहम माना जा रहा है। इस रास्ते से पहले जहाँ यात्रा में लगभग 18 घंटे लगते थे, वहीं अब यह दूरी केवल 3 घंटे में पूरी की जा सकेगी। इससे व्यापार तेज होगा, समय बचेगा और दोनों देशों के आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

पाकिस्तान ने कैसे अमेरिका को दिया धोखा?

पाकिस्तान के इस कदम की आलोचना इसीलिए की जा रही है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। खासकर सुरक्षा और क्षेत्रीय मामलों में दोनों देशों के रिश्ते मजबूत माने जाते हैं। लेकिन अब पाकिस्तान ने ऐसा रास्ता तैयार कर दिया है, जिससे ईरान पर अमेरिका की नाकाबंदी का असर काफी हद तक कम हो सकता है।
पाकिस्तान ने तीसरे देशों के सामान को कानूनी तौर पर अपने रास्ते ईरान भेजने की अनुमति दे दी है। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका जो ईरान पर दबाव बनाना चाहता था, वह अब कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ हिमांशु जैन और ऋचा द्विवेदी जैसे जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के इस फैसले ने अमेरिकी नाकाबंदी में एक ‘कानूनी छेद’ कर दिया है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पाकिस्तान इस क्षेत्र में अमेरिका की रणनीति के साथ कितनी मजबूती से खड़ा है।

ईरान के सपोर्ट में शिया आबादी पाकिस्तान में कल्तेआम न मचा दे, इसलिए डरे असीम मुनीर ने NYT की रिपोर्ट ही उड़ा दी


पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।

रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।

NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।

पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।

NYT की रिपोर्ट में क्या लिखा था?

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।

दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।

रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।

पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।

जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया

जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।

उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।

इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।

पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल

अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?

इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।

पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।

इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।

पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!

यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।      (साभार) 

बाल-बाल बचे ट्रंप, वॉशिंगटन हिल्टन होटल में डिनर के दौरान फायरिंग: हमलावर की तस्वीर आई सामने; इसी होटल में 45 साल पहले रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था जानलेवा हमला

                                                    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और हमलावर
जबसे डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी मैदान में उतरे तभी से इनके विरोधी इन पर जानलेवा हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। चुनावी प्रचार में हुए हमले में भी बाल-बाल बचे थे तब गोली इनके कान पर लगी थी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर बाल-बाल बच गए हैं। जब व्हाइट हाउस के पत्रकारों के साथ आयोजित डिनर कार्यक्रम के दौरान अचानक एक शख्स ने कमरे के बाहर अचानक फायरिंग कर दी जिसके बाद ट्रंप को बाहर निकाला गया है। यह कार्यक्रम वॉशिंगटन हिल्टन होटल में चल रहा था।

फायरिंग की आवाज के बीच सीक्रेट सर्विस के एजेंट्स तुरंत हरकत में आए और राष्ट्रपति ट्रंप को कड़े सुरक्षा घेरे में लेकर कार्यक्रम स्थल से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने तत्काल पूरे इलाके को सील कर दिया। घटना के समय अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप कैबिनेट के कई वरिष्ठ सदस्य भी वहाँ मौजूद थे और उन्हें भी एहतियातन तुरंत बाहर ले जाया गया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

 ट्रंप ने हमलावर की एक तस्वीर भी अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर शेयर की है। हमलावर की पहचान 31 साल के कोल टॉमस ऐलन के रूप में हुई है और वो कैलिफॉर्निया का रहने वाला बताया जा रहा है।

                                                     ट्रंप द्वारा शेयर की गई तस्वीर

इसी होटल में 45 साल पहले रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था जानलेवा हमला
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की डिनर पार्टी में जिस ऐतिहासिक होटल वाशिंगटन हिल्टन में फायरिंग हुई है वो 45 साल पहले भी एक बड़े हमले का गवाह बन चुका है। इसी होटल के बाहर 1981 में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्‍ड रीगन पर जानलेवा गोलीबारी हुई थी।
ताजा घटना व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान हुई, जहाँ ट्रंप, उनकी पत्नी मेलेनिया ट्रंप और उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस समेत कई बड़े नेता और गणमान्य लोग मौजूद थे। अचानक हुई फायरिंग से कार्यक्रम में अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत एक्शन लेते हुए ट्रंप को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। हालाँकि इस घटना में उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।
इस होटल का इतिहास पहले से ही ऐसी खौफनाक घटना से जुड़ा रहा है। 30 मार्च 1981 को यहीं से निकलते वक्त रीगन पर जॉन हिंकले जूनियर (John Hinckley Jr) ने गोली चलाई थी। हमले में रीगन गंभीर रूप से घायल हो गए थे, गोली उनके फेफड़े तक जा पहुँची थी लेकिन समय पर इलाज से उनकी जान बच गई थी।
उस घटना के बाद स्थानीय लोग इस होटल को ‘हिंकले हिल्टन’ तक कहने लगे थे। अब एक बार फिर इसी जगह पर फायरिंग होने से सुरक्षा व्यवस्था और इसकी लोकेशन को लेकर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल एजेंसियाँ मामले की जाँच में जुटी हैं और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस बार की घटना के पीछे क्या वजह रही।












परमाणु हथियारों पर बिगड़ी ईरान-अमेरिका की बात: शिया मुल्क के न्यूक्लियर पावर बनने के सपने से क्यों घबराया है US

परमाणु हथियारों का फैलाव न हो, इसके लिए ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अमेरिका ने भी कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। मध्यपूर्व में परमाणु होड़ को रोकने से लेकर आतंकी संगठनों हूती, हिजबुल्ला और हमास तक पर लगाम कसने के लिए ईरान पर ‘रोक’ जरूरी है। इजरायल के अस्तित्व को नकारने वाले ईरान के हाथ परमाणु बम लगने का वैश्विक असर पड़ सकता है। इसलिए परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण विराम अमेरिका की अहम शर्त है। 
अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमलों को लेकर आतंकवादी प्रेमी बहुत ज्यादा परेशान है। आतंकवादी प्रेमी नहीं चाहते कि 122 आतंकवादी संगठनों को पालने-पोसने वाला आर्थिक तंगी में फंस उन्हें धन दौलत देने से वंचित न हो। अब सवाल यह होता है कि अमेरिका के लाडले पाकिस्तान के पास भी तो नुक्लिअर है लेकिन भूल जाते हैं उन नुक्लियर की कमांड अमेरिका के पास है और अमेरिका की इजाजत के बिना पाकिस्तान उन्हें छू भी नहीं सकता।  आज आतंकवादी हरकतों को देख सम्भावना है कि ईरान नुक्लियर आतंकवादियों को सप्लाई करना शुरू कर दे। 

परमाणु करार पर बढ़ी ‘रार’

ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध को स्थाई तौर पर रोकने के लिए इस्लामाबाद में 21 घंटे की वार्ता विफल रही। मध्यपूर्व में स्थाई शांति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकना और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए चल रही वार्ता पर दुनियाभर की नजर थी। इसके विफल रहने के पीछे अहम वजह होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण और उसका परमाणु कार्यक्रम ही है।

अमेरिका नहीं चाहता है कि किसी भी हालत में ईरान के पास परमाणु बम हो। वह हर हाल में ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म या सीमित करना चाहता है, लेकिन ईरान इसे एक देश का अधिकार मानता है।

ईरान-अमेरिका वार्ता भी इसकी वजह से सफल नहीं हो सकी। दरअसल परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी दबाव ईरान को अस्वीकार है। उसका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन वह पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, लेकिन परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से ही अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे में कमी आनी शुरू हो गई थी। अमेरिका को ईरान पर जरा भी एतबार नहीं है।

2015 में अमेरिका डील से बाहर निकल गया

2003 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ईरान चोरी छिपे परमाणु हथियार बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए। 2006 में ईरानी कंपनियों की संपत्ति, जो विदेशों में थी, उसे फ्रीज कर दिया गया और ईरान में यूरेनियम संवर्धन पर प्रतिबंध लगाया गया।

इसके अगले साल यानी 2007 में ईरान के हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगाया गया। ईरान की अर्थव्यवस्था पर सबसे गहरी चोट तब पहुँची, जब ईरानी सेंट्रल बैंक और तेल निर्यात पर रोक लगा दी गई।

2015 में ईरान के परमाणु बम नहीं बनाने को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की अगुवाई में ईरान और दुनिया के बड़े देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन के बीच JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौता हुआ था।

उस वक्त ईरान ने माना था कि वो यूरेनियम संवर्धन का स्तर निम्न रखेगा, स्टॉकपाइल सीमित करेगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने प्लांट के निरीक्षण की इजाजत देगा। समझौते के बाद उस पर लगी आर्थिक पाबंदियाँ हटा दी गईं।

अमेरिका और इजराइल का मानना था कि इससे ईरान परमाणु बम नहीं बना पाएगा और अगर चोरी-छिपे बनाता भी है, तो इसमें काफी समय लगेगा। लेकिन, 2018 में अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया। राष्ट्पति ट्रंप का मानना था कि डील एक तरफा और कमजोर है। इसमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर रोक नहीं लगी है। प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती हमास) पर कोई रोक नहीं है और 10-15 साल बाद ईरान फिर से खुलकर परमाणु कार्यक्रम चला सकता है। इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे डील तोड़ी। उसने यूरेनियम 60% तक संवर्धित करना शुरू कर दिया। हालाँकि परमाणु बम के लिए ये संवर्धन 90% जरूरी होता है। स्टॉकपाइल बढ़ा दिया और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से सहयोग करना कम कर दिया।

10 साल बाद यानी 2025-26 में जब ईरान पर संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध हटने वाला था, लेकिन JCPOA का उल्लंघन करने, 60 फीसदी से ज्यादा यूरेनियम संवर्धन करने और परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के जुर्म में उस पर ज्यादा कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। हालाँकि ईरान कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा और चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका नहीं माना।

ईरान के साथ बातचीत के बीच अमेरिका ने चेतावनी दी और अंत में इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को हमला कर दिया।

क्या सुरक्षा की गारंटी है परमाणु हथियार

अमेरिका के धूर विरोधी उत्तर कोरिया और ईरान दोनों ही देश हैं। दोनों देशों के संबंध रूस और चीन के साथ अच्छे हैं। लेकिन, अमेरिका उत्तर कोरिया पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन ईरान पर हमला करता है। इसकी एक अहम वजह ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न नहीं होना भी है।

अगर उत्तर कोरिया की तरह ईरान के पास परमाणु बम होता, तो इजरायल और अमेरिका दोनों ही देश उस पर हमला करने से पहले सौ बार सोचते। दरअसल अमेरिका को डर रहता है कि अगर उसने उत्तर कोरिया को छेड़ा, तो उस तक युद्ध की आँच पहुँच जाएगी। उत्तर कोरिया के पास ऐसे मिसाइल मौजूद हैं, जिससे अमेरिका को टारगेट किया जा सकता है।

अगर ईरान को ‘परमाणु बम’ मिल जाए तो क्या होगा?

अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है, तो मध्यपूर्व में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होने का तर्क अमेरिका देता रहा है। ईरान के पड़ोसी देशों सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन, तुर्की, इजरायल समेत सभी देश परमाणु हथियार बनाने की होड़ में शामिल हो सकते हैं। इससे पूरे मध्यपूर्व और पूरी दुनिया को खतरा पैदा होगा। फिलहाल इस्लामिक देशों में सिर्फ पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, इसकी धौंस वह भारत पर भी जमाता रहता है।

अमेरिका का करीबी देश इजरायल परमाणु संपन्न है, इसके बावजूद ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक है। 1979 में इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान के इजरायल से काफी अच्छे संबंध थे। 1950 में ईरान ने इजरायल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी। ऐसा करने वाली ईरान उन शुरुआती देशों में शामिल था, जिन्होंने इजरायल को राष्ट्र के रूप में स्वीकारा, लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने उसे ‘दुश्मन देश’ करार दिया और विश्व मानचित्र से हटाने की बात कही। जाहिर तौर पर इजरायल के लिए ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना खतरे की घंटी होगी। इसके अलावा हमास से तो इजरायल का युद्ध लंबे वक्त तक चला। हमास को कमजोर करने में वह सफल रहा है, लेकिन ईरान के परमाणु संपन्न होने से हमास एक बार फिर सामरिक और राजनीतिक रूप से ‘जीवित’ हो सकता है।

हिज्बुल्लाह, हूती, हमास जैसे आतंकियों तक परमाणु बम पहुँच सकते हैं

ईरान के परमाणु बम बना लेने से लेबनान का हिज्बुल्लाह, यमन के हूती, फिलिस्तीन के हमास जैसे संगठन काफी ताकतवर हो सकते हैं। इन संगठनों को ईरान मदद करता है और ये संगठन लगातार इजरायल और मध्यपूर्व के देशों के खिलाफ आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। ऐसे में इन आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को ईरान परमाणु बम का धौंस दिखा कर रोकने की कोशिश कर सकता है। इसके बाद ये आतंकी संगठन बेखौफ होकर आक्रामक गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। ईरान को इनकी मदद करने में कोई दिक्कत भी नहीं होगी, क्योंकि उसे किसी का डर नहीं होगा।

जो ईरान अभी होर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल कर अमेरिका को वार्ता की मेज तक आने के लिए मजबूर कर दिया। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डालने में कामयाब रहा, वह हूतियों के माध्यम से लाल सागर पर भी नियंत्रण कर लेगा। होर्मुज की तरह लाल सागर भी दुनिया के व्यस्ततम मार्गों में एक है। ऐसे में ईरान का प्रभुत्व काफी बढ़ जाएगा। इससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा।

ईरान के परमाणु संपन्न होने से न सिर्फ मध्यपूर्व के देश परमाणु बनाने की होड़ में शामिल हो जाएँगे, बल्कि दुनियाभर में परमाणु बम बनाने की एक सनक सवार हो सकती है। परमाणु अप्रसार को रोकने के लिए वैश्विक परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी कमजोर पड़ सकता है। परमाणु संपन्न देश अपने एटमी बमों और हथियारों को दुनिया में न फैलाएँ और धीरे-धीरे दुनिया परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर बढ़े, ये इसका उद्देश्य है, लेकिन ईरान जैसे ‘गैर जिम्मेदार’ देशों के पास परमाणु हथियारों का पहुँचना, पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है।

‘अगर ईरानी जहाज दिखे तो उड़ा देंगे’: ट्रंप ने होर्मुज रास्ते पर 15+ युद्धपोत किए तैनात, नाकाबंदी के बीच तेहरान ने कहा- भारतीय जहाजों को नहीं कोई होगी दिक्कत

                                      ट्रंप ने होर्मुज पर की नाकाबंदी (साभार : Indiatoday & deccanherald)
ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जैसा खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका ने ईरान के समुद्री रास्तों की पूरी तरह नाकाबंद कर दी है। ट्रंप ने साफ कह दिया है कि अगर ईरान की कोई भी नाव हमारे घेरे के पास आई, तो उसे तुरंत तबाह कर दिया जाएगा। दोनों देशों के बीच बातचीत फेल होने के बाद कच्चे तेल की कीमत ₹8,500 (100 डॉलर) प्रति बैरल के ऊपर पहुँच गई है और शेयर बाजार धड़ाम हो गया है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी तनाव के बीच ईरान ने भारत के साथ अपनी गहरी दोस्ती निभाते हुए बड़ी राहत दी है। ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने साफ किया है कि भारतीय जहाजों से कोई टोल टैक्स नहीं वसूला जा रहा है और भविष्य में भी उन्हें इस रास्ते से सुरक्षित निकलने दिया जाएगा।

ट्रंप की सख्त चेतावनी और समुद्र में हलचल

अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास अपने 15 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर साफ कहा कि ईरानी जहाजों को उसी तरह खत्म किया जाएगा जैसे समुद्र में ड्रग डीलरों को खत्म किया जाता है।
अमेरिका का मकसद ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना है ताकि वह बातचीत की मेज पर आए। इस नाकाबंदी के शुरू होते ही समुद्र में असर दिखने लगा है। ‘रिच स्टारी’ और ‘ओस्ट्रिया’ जैसे बड़े तेल टैंकरों ने अपना रास्ता बदल लिया है और वे वापस लौट रहे हैं।

ईरान का पलटवार: ‘हम झुकेंगे नहीं’

ईरान ने भी पीछे हटने से इनकार कर दिया है। ईरान की संसद के स्पीकर ने चेतावनी दी है कि इस नाकाबंदी की वजह से दुनिया को जल्द ही $4-$5 के पेट्रोल वाले पुराने दिन याद आएँगे, यानी कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ सकती हैं।
ईरान के दूत मोहम्मद फथाली ने कहा कि वे शांति के लिए तैयार हैं लेकिन युद्ध के लिए भी पूरी तरह मुस्तैद हैं। ईरानी सेना (IRGC) ने धमकी दी है कि उनके पास ऐसे आधुनिक हथियार और तरीके हैं जिनका अमेरिका को अंदाजा भी नहीं है।

शांति वार्ता क्यों हुई फेल?

पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक लंबी चर्चा चली, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु काम (यूरेनियम बनाना) पूरी तरह बंद कर दे, पर ईरान इसके लिए तैयार नहीं है। हालाँकि, पाकिस्तान और अमेरिका के बड़े अफसरों का कहना है कि बातचीत अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और जल्द ही दोनों देश दोबारा मिल सकते हैं।

इस्लामाबाद में ईरानी-अमेरिकियों के बीच आई हाथापाई की नौबत, होर्मुज पर भिड़े विदेश मंत्री अराघची और US के दूत विटकॉफ: रिपोर्ट


इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई अहम वार्ता के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण होने की भी बात सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बीच तीखी बहस छिड़ने का दावा किया गया है। तुर्की के एक पत्रकार ने दोनों के बीच हाथापाई की नौबत आने का जिक्र किया है।

बताया जा रहा है कि बातचीत के दौरान दोनों नेताओं के बीच बातचीत नोंकझोंक में बदल गई और माहौल अचानक गर्मा गया। यह विवाद इतना बढ़ गया कि स्थिति लगभग हाथापाई तक पहुँच गई थी।

दोनों पक्षों के बीच मुख्य मतभेद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नियंत्रण और प्रबंधन को लेकर था। गौरतलब है कि इस्लामाबाद में चली लंबी बातचीत बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो चुकी है। 

शांति वार्ता से पहले ट्रंप की युद्ध वाली चेतावनी: ‘बात बनी तो ठीक, नहीं तो अंजाम बुरा होगा’: ईरान बोला- शर्तें मानने पर ही होगी बातचीत शुरू

                           ट्रंप-ईरान के बीच शांति वार्ता होगी पाकिस्तान में (साभार : Aajtak, Jagran)
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार (11 अप्रैल 2026) को अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता होने जा रही है। इस महा-बैठक से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी दी है कि वह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (समुद्री रास्ता) को तुरंत खोल दे, वरना अंजाम बुरा होगा।

ट्रंप ने साफ कहा कि ईरान जंग हार चुका है और अब यह बातचीत ही उसका आखिरी मौका है। दूसरी तरफ, ईरान का प्रतिनिधिमंडल भी अपनी कड़ी शर्तों के साथ इस्लामाबाद पहुँच चुका है।

ईरान की अपनी शर्तें और अमेरिका का कड़ा रुख

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गलिबाफ एक भारी-भरकम डेलीगेशन के साथ शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को ही इस्लामाबाद पहुँच गए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि बातचीत तभी शुरू होगी जब अमेरिका उनकी शर्तें मानेगा।

ईरान की मुख्य माँगों में लेबनान में तुरंत युद्धविराम और अमेरिका द्वारा फ्रीज किए गए अरबों डॉलर के फंड को जारी करना शामिल है। गलिबाफ ने कहा कि ईरान बातचीत तो चाहता है लेकिन उसे अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है।

ट्रंप की युद्ध वाली चेतावनी

उधर, अमेरिका के तेवर और भी तीखे हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरानी केवल समुद्री रास्तों को रोककर दुनिया को डराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में यहाँ तक कह दिया कि अमेरिकी युद्धपोतों को नए और घातक हथियारों से लैस कर दिया गया है।

अगर शनिवार (11 अप्रैल 2026) की बातचीत फेल होती है, तो अमेरिका ईरान पर हमला करने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने साफ कर दिया कि वह समुद्री रास्ते (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में ईरान को कोई ‘टोल टैक्स’ वसूलने नहीं देंगे।

पाकिस्तान के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति

इस बातचीत की मेजबानी कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे ‘मेक-ऑर-ब्रेक’ (बनी तो बनी, नहीं तो बिगड़ी) वाली स्थिति बताया है। उन्होंने कहा कि पूरे मिडिल ईस्ट की शांति इसी बैठक पर टिकी है। पाकिस्तान चाहता है कि दोनों देश मिलकर किसी ठोस नतीजे पर पहुँचें ताकि लंबे समय से चल रहा तनाव खत्म हो सके।
इस चर्चा के लिए दोनों तरफ से दिग्गज नेता मैदान में उतर चुके हैं। ईरान की ओर से इस वार्ता का मोर्चा विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गलिबाफ संभाल रहे हैं, जिनके साथ ईरान के सेंट्रल बैंक के गवर्नर और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी शामिल हैं।
वहीं, अमेरिका की तरफ से टीम की अगुवाई खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, और उनके साथ डोनाल्ड ट्रंप के भरोसेमंद जारेड कुशनर और अनुभवी सैन्य रणनीतिकार वाइस एडमिरल ब्रैड कूपर मौजूद हैं।
चूँकि पाकिस्तान इस पूरी बातचीत की मेजबानी कर रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार भी इस महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा बने रहेंगे।

क्या होगा आगे?

जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या शनिवार (11 अप्रैल 2026) के बाद भी बातचीत का दौर चलेगा, तो उन्होंने सस्पेंस बनाए रखा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारें 47 साल से सिर्फ बातें कर रही थीं, अब फैसला जल्द होगा।

अमेरिका का मुख्य मकसद यह है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बना पाए और अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर कब्जा न करे। अब सबकी निगाहें शनिवार की टेबल टॉक पर हैं कि क्या दुनिया को युद्ध से राहत मिलेगी या तनाव और बढ़ेगा।

ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

न हॉर्मुज खुला, न बदली ईरान की सत्ता… कंफ्यूजन में ट्रंप प्रशासन; कभी वापसी की बात तो कभी युद्ध जारी रखने का दावा: अमेरिका के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?

                                                                                          प्रतिकात्मक तस्वीर (साभार- chatgpt)
अमेरिका अब ईरान युद्ध से पीछे हटने को तैयार है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ईरान से समझौता हो या न हो, अमेरिका 2-3 सप्ताह के भीतर अपनी सैन्य कार्रवाई खत्म कर देगा और ईरान युद्ध से बाहर हो जाएगा। अब सवाल ये है कि राष्ट्रपति ट्रंप की ऐसी क्या मजबूरी आ गई जो ईरान को युद्ध में परास्त करने के जिद को छोड़कर बगैर समझौते के युद्ध खत्म करने की बात कह रहे हैं। अब होर्मुज खुलवाने और होर्मुज पर नियंत्रण की बात भी वे भूल चुके हैं।

क्या कहा राष्ट्रपति ट्रंप ने

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच डील की उम्मीद बनी हुई है। ईरान अगर बातचीत की मेज पर आता भी है तो इससे फर्क नहीं पड़ेगा। ईरान से शर्तों के साथ बातचीत करने का दम भरने वाले राष्ट्रपति ट्रंप को अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि ईरान से डील हो या न हो। उन्होंने यह भी कहा है कि होर्मुज खुले या न खुले, ये सिर्फ अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है। दुनिया के दूसरे देश भी आगे आकर इसे खोलने की कोशिश करें।

उन्होंने कहा कि फ्रांस और दूसरे देश अगर तेल चाहते हैं तो होर्मुज स्ट्रेट होकर जा सकता है, अमेरिका का उससे कोई लेना-देना नहीं है।

हालाँकि ईरान की पार्लियामेंट ने यहाँ से गुजरने वाली जहाजों से टोल वसूलने का मन बना लिया है और एक प्रस्ताव पास किया, जिससे ईरान की मोटी कमाई होगी। ईरान ने साफ कहा है कि अमेरिका- इजरायल के तेल- गैस टैंकर यहाँ से नहीं गुजर सकते। ऐसे में अमेरिका के लिए होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करना काफी मुश्किल काम है। युद्ध से निकलने को बेताब अमेरिका इसमें फँसना नहीं चाह रहा है।

ईरान में रिजीम बदलने का दावा किया

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन हो चुका है’। उनके मुताबिक, ईरान के नए नेता पहले के नेताओं की तुलना में ‘ कम कट्टरपंथी’ और ‘ज्यादा समझदार’ हैं। उन्होंने ईरान को पूरी तरह तबाह करने का दावा भी किया है।
उन्होंने कहा कि ईरान के पास अब कोई एंटी एयरक्राफ्ट नहीं बची है। अब कोई मुकाबला ईरान नहीं कर पा रहा है और कोई हम पर गोली भी नहीं चला रहा है। ईरान के पास कोई सैन्य साजो सामान नहीं है। न ही नौसेना बची है और न ही सामान इसलिए समझौता की गुहार लगा रहे हैं।

कम से कम 6 महीने तक लड़ने में दिक्कत नहीं- ईरान

ईरान ने समझौते के लिए शर्ते रख दी हैं। ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा को फोन कर कहा है कि उनपर भविष्य में इस तरह से हमले नहीं किए जाने की गारंटी चाहिए। ईरान पर आक्रमण तुरंत बंद हो।

दूसरी तरफ ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स ने मिडिल ईस्ट में काम करने वाली अमेरिकी 18 कंपनियों को तुरंत बोरिया बिस्तर समेटने की चेतावनी दी है और कहा है कि युद्ध में अमेरिका को तकनीकी मदद देने की वजह से इन कंपनियों को अब मिडिल ईस्ट छोड़ना पड़ेगा, वरना उन पर हमले होंगे।

ईरान ने कहा है कि कम से कम 6 महीने तक ईरान युद्ध लड़ने के लिए तैयार है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अल जजीरा को दिए इंटरव्यू में ये बातें कहीं है। उनका कहना है कि ईरान के पास अभी सैन्य साजो सामान से लेकर हर चीज का इतना स्टॉक है कि वह अगले कम से कम 6 महीने तक बगैर दिक्कत के युद्ध लड़ सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट बना अमेरिका के लिए मुसीबत

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया पर दबाव बना है। दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल-गैस की आवाजाही इस मार्ग से होती है। दुनिया के इस व्यस्ततम मार्ग पर ईरान का कब्जा है। उसने अपने ‘मित्र देशों’ को इससे तेल और गैस से भरी जहाजों को सुरक्षित ले जाने की इजाजत दी है।

अमेरिका की चाह कर भी यहाँ कुछ नहीं चल रही है। पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नौसेना सभी जहाजों को सुरक्षित निकालने में मदद करेगा, फिर उन्होंने नाटो देशों से इसमें मदद करने की गुहार लगाई।

ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन समेत ज्यादातर नाटो देशों ने मना कर दिया। इसके बाद अमेरिका खुद ये कह रहा है कि ईरान प्रशासन से बात कर कई देश अपना तेल-गैस होर्मुज स्ट्रेट से ले जा रहे हैं और आवाजाही चल रही है। एक तरह से अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के लिए न तो अपनी सेना लगाना चाहता है और न ही मुसीबत मोल लेना चाहता है।

युद्ध में अमेरिका का हो रहा बेहिसाब खर्च

राष्ट्रपति ट्रंप को लगा था कि ईरान युद्ध ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा और 2-4 हफ्तों में बम गिरा कर ईरान को काबू में किया जा सकेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप पर जल्द से जल्द युद्ध खत्म करने का दबाव इसलिए भी है क्योंकि अमेरिकी खजाने पर हर दिन करोड़ों की चोट लग रही है। हर सेकेंड अमेरिका को 10 लाख रुपए खर्च करना पड़ रहा है।

सिप्री की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान पर हमले के लिए हर दिन अमेरिका 8455 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। 28 फरवरी से 31 मार्च तक अमेरिका के 2 लाख 63 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इस खर्च को राष्ट्रपति ट्रंप अब खाड़ी देशों से वसूलने का प्लान बना रहे हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप ने खाड़ी देश को युद्ध का खर्च उठाने के लिए कहा है।

ट्रंप के करीबी वेंस और रुबियो के बीच मतभेद

व्हाइट हाउस में ईरान युद्ध को लेकर सिरफुटव्वल है। जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है।

एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। नवंबर 2026 में होने वाले मध्यावधि चुनाव में इसका असर पड़ेगा। अगर परिणाम राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ जाते हैं तो वह देश में काफी कमजोर हो जाएँगे।

यही वजह है कि ट्रंप के बेहद करीबी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को युद्ध को लंबा खिंचने को लेकर जमकर लताड़ लगाई है और कहा है कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को बरगलाया और उन्हें ये बताया कि ईरान में सत्ता परिवर्तन आसान है और युद्ध जल्दी ही निपट जाएगा।

व्हाइट हाउस का दूसरा गुट ईरान युद्ध को यूँ ही खत्म करने के पक्ष में नहीं है। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।

राष्ट्रपति ट्रंप के करीबी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कहना है कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने में काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है और ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ जल्द ही अपने अंजाम तक पहुँचने वाला है।

अमेरिका में बढ़ रही महँगाई और बढ़ रहा विरोध प्रदर्शन

अमेरिका में गैस और तेल की कीमतों में काफी वृद्धि हुई है। इस वजह से महँगाई बढ़ गई है। राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि वह ईरान युद्ध से बाहर निकलने के बाद जल्द इस पर ध्यान देंगे। वह जल्द ही इस युद्ध से बाहर निकल जाएँगे।

अमेरिका में ईरान युद्ध को लेकर बड़े बड़े शहरों में प्रदर्शन का दौर जारी है। राष्ट्रपति ट्रंप के कथित तानाशाही के खिलाफ ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन हो रहे हैं और ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने और गिरफ्तार करने तक की माँग की जा रही है। प्रदर्शनकारी ट्रंप की युद्ध नीति, संघीय इमीग्रेशन कानून , फ्यूल की बढ़ती कीमत और देश में बढ़ रही महँगाई को मुद्दा बनाया है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप हम पर एक तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं, लेकिन यह अमेरिका है। यहाँ असली ताकत आम लोगों के हाथों में है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझना चाहते हैं और न ही उनके अरबपति साथियों के हाथों में है। अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन DC और लॉस एंजिल्स सहित हर बड़े शहर में ट्रंप विरोधी प्रदर्शन हुए हैं।

तेल और गैस की विश्वव्यापी समस्या पैदा होने से अमेरिका पर दबाव पड़ा है। आंतरिक और बाहरी समस्याओं में राष्ट्रपति ट्रंप फँस गए हैं। होर्मुज स्ट्रेट पर कब्जा नहीं कर पाने का एकमात्र रास्ता अमेरिकी सेना का ईरान में जमीनी कार्रवाई से संभव है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही कहा था कि वह अपनी सेना को ऐसी ‘बेवकूफाना’ जमीनी लड़ाइयों में नहीं झोकना चाहते जहाँ अमेरिकी सैनिकों की जान जाए। लेकिन दूसरी तरफ, तेल की कमी की वजह से जो महँगाई बढ़ रही है, उसे रोकने के लिए उनके पास अब ऑप्शन खत्म होते जा रहे हैं।

अमेरिका ने युद्ध शुरू करने से पहले अपने 4 लक्ष्य बताए थे। ईरान के मिसाइल इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट करना, ईरानी नौसेना शक्ति को पूरी तरह खत्म करना, ईरान के क्षेत्रीय आतंकवादी नेटवर्क को कमजोर करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए समाप्त करना। राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि उन्होंने ये सभी लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। अमेरिका में इसी साल नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने जब इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला शुरू किया था तो अमेरिका की बड़ी आबादी इस पक्ष में था कि ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न बनने से रोकना जरूरी है। लेकिन अब राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता में लगातार कमी आ रही है।

अमेरिका में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और ट्रंप- वेंस की गिरफ्तारी की माँग उठ रही है। राष्ट्रपति ट्रंप जल्द से जल्द ईरान युद्ध खत्म कर अपना ध्यान अमेरिका के अंदरुनी समस्याओं को खत्म करने पर लगाना चाहते हैं क्योंकि उनके लिए ये चुनाव जीतना बेहद जरूरी हैं। यह संसद में उनकी ताकत और कुर्सी बचाए रखने के लिए आवश्यक है।

7 देशों पर हमला और 34 ट्रिलियन का कर्ज, Petro-Dollar का अंत

                                                                                                                        प्रतीकात्मक तस्वीर
अमेरिका के हाल के दिनों के रुख को देखकर यह साफ संकेत मिल रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को लागू करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह रणनीति अब और अधिक आक्रामक रूप में दिखाई दे रही है। फरवरी 2026 में एक महत्वपूर्ण घटना हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप ने एक ‘अंतरिम व्यापार ढाँचे’ की घोषणा की थी।

इस समझौते में भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिली थी और टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया। हालाँकि, अमेरिकी विदेश नीति का यह संतुलन ज्यादा दिन नहीं टिक सका। ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव और ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीतियों ने इस कूटनीतिक मिठास को जल्दी ही खत्म कर दिया।

इसी बीच, अमेरिका ने अब एक बार फिर अपनी सख्त व्यापारिक रणनीति का संकेत देते हुए Section 301 (US Trade Act 1974) का सहारा लिया है। यह प्रावधान अमेरिका को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी देश की व्यापार नीतियों की गहराई से जाँच कर सके। इस प्रक्रिया को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के माध्यम से संचालित किया जाता है।

यदि इस जाँच में किसी भी प्रकार की ‘अनुचित व्यापारिक प्रथाएँ’ (Unfair Trade Practices) सामने आती हैं तो अमेरिका को यह अधिकार मिल जाता है कि वह संबंधित देश पर अतिरिक्त टैरिफ लगा सके या मौजूदा व्यापारिक समझौतों को निलंबित कर दे। यह वही रणनीति है, जिसका इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन ने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के खिलाफ किया था।

ट्रंप की मजबूरी या सोची-समझी चाल?

अमेरिका की नीति में अचानक आए इस बदलाव के पीछे एक अहम वजह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला माना जा रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के कुछ ग्लोबल टैरिफ टूल्स को स्ट्राइक डाउन यानी रद्द कर दिया था। इसके बाद से ही प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाशे।

ऐसे में अब ट्रंप प्रशासन वैकल्पिक उपायों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। Section 301 जैसी कानूनी शक्तियों का सहारा लेना इसी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका का आरोप है कि भारत समेत दुनिया की 16 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ‘Structural Excess Capacity’ यानी जरूरत से कहीं अधिक उत्पादन क्षमता की समस्या है। अमेरिका का कहना है कि इन देशों में सरकारी सब्सिडी और नीतियों के कारण उद्योगों में उत्पादन क्षमता इतनी बढ़ गई है कि वे अपनी घरेलू जरूरत से ज्यादा सामान बना रहे हैं।

इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है। अमेरिका का दावा है कि इस ओवरप्रोडक्शन के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की भरमार हो रही है, जिससे कीमतें प्रभावित होती हैं और कई देशों को ट्रेड सरप्लस का फायदा मिलता है। वहीं, इसका नुकसान अमेरिकी उद्योगों और वहाँ के रोजगार पर पड़ता है।

ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिकी नौकरियों के लिए खतरे के रूप में पेश कर रहा है। इसी आधार पर अब वह सख्त कदम उठाने की तैयारी में है ताकि घरेलू उद्योगों को सुरक्षा दी जा सके और वैश्विक व्यापार में अमेरिका की स्थिति को मजबूत किया जा सके।

भारत पर निशाना क्यों?

अमेरिका की नई व्यापारिक सख्ती में भारत भी सीधे निशाने पर आ गया है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ‘ट्रेड सरप्लस’ है यानी भारत, अमेरिका को उसकी खरीद से करीब $58 बिलियन अधिक का निर्यात करता है।

इसके अलावा ‘Excess Capacity’ (अधिक क्षमता) भी एक बड़ा कारण है। सोलर मॉड्यूल्स के मामले में भारत की उत्पादन क्षमता अपनी घरेलू माँग से लगभग तीन गुना अधिक है। यही स्थिति स्टील, टेक्सटाइल, पेट्रोकेमिकल्स और ऑटोमोटिव सेक्टर्स में भी है जिससे अमेरिका को ग्लोबल मार्केट में असंतुलन का खतरा नजर आता है।

हालाँकि इस जाँच के दायरे में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन, यूरोपियन यूनियन, जापान और वियतनाम समेत कुल 16 देश शामिल हैं। यदि यह जाँच आगे चलकर टैरिफ में बदलती है तो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और सोलर उपकरणों का निर्यात महँगा हो जाएगा। ऐसे में वैश्विक बाजार में एक नया ट्रेड वॉर शुरू हो जाएगा।

शांति से शक्ति पर लौटे ट्रंप?

जनवरी 2025 में ट्रंप ने खुद को शांति स्थापित करने वाले नेता के रूप में पेश करते हुए सत्ता संभाली थी। लेकिन सिर्फ एक साल के भीतर ही अमेरिका का रुख पूरी तरह बदलता नजर आया और उसने 7 देशों पर सीधे सैन्य हमले कर दिए।

हालात इतने गंभीर हो गए कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण और ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या जैसी घटनाओं की चर्चा होने लगी। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सब केवल तेल और संसाधनों के लिए हो रहा है या इसके पीछे डॉलर के उस वैश्विक दबदबे को बचाने की कोशिश है जिसे कुछ लोग कमजोर होता हुआ मान रहे हैं।

अमेरिका की बौखलाहट के पीछे क्या वजह है?

अमेरिका के आक्रामक रुख को समझने के लिए सबसे जरूरी है- नंबर्स को देखना। GDP की दौड़ में अब तस्वीर बदल रही है। 2026 के आँकड़ों के मुताबिक, BRICS+ देशों की संयुक्त GDP (PPP के आधार पर) वैश्विक GDP का करीब 37% से 40% तक पहुँच चुकी है। वहीं, G7 देशों (अमेरिका और उसके साथी) की हिस्सेदारी घटकर लगभग 29% रह गई है। यह बदलाव सीधे-सीधे वैश्विक ताकत के संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

दूसरा बड़ा झटका ‘पेट्रो-डॉलर’ सिस्टम को लग रहा है। 1970 के दशक में हेनरी किसिंजर की पहल पर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम समझौता हुआ था, जिसके तहत तेल का व्यापार सिर्फ डॉलर में होता था। इससे डॉलर पूरी दुनिया की जरूरत बन गया। अब हालात बदल रहे हैं चीन और सऊदी अरब के बीच तेल का व्यापार युआन में होने लगा है, जिससे इस व्यवस्था की पकड़ कमजोर हो रही है।

डॉलर की स्थिति भी धीरे-धीरे कमजोर होती दिख रही है। IMF के अनुसार, वैश्विक रिजर्व करेंसी में डॉलर की हिस्सेदारी 2001 में 71% थी जो 2026 तक घटकर 58% से नीचे आ गई है। ऐसे में जब आर्थिक ताकत पर दबाव बढ़ता है और वैश्विक प्रभाव को चुनौती मिलने लगती है। सवाल यही है कि क्या अमेरिका अपनी ताकत दिखाने के लिए आक्रामक कदम उठा रहा है?

परफॉर्मेटिव रियलिज्म: ट्रंप की इंटरनल पॉलिटिक्स

क्या यह सिर्फ अमेरिका की विदेश नीति है? तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। यह अंदरूनी राजनीति का दबाव भी है जो अब बाहरी फैसलों में झलक रहा है। सबसे पहले आर्थिक स्थिति को देखें। अमेरिका का राष्ट्रीय कर 34 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुँच चुका है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के लिए डॉलर की वैश्विक माँग बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि इसमें गिरावट अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सकती है।

दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर भी चुनौती बढ़ रही है। 2026 में ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है। महँगाई और टैरिफ वॉर से परेशान अमेरिकी जनता में असंतोष बढ़ा है और बड़ी संख्या में लोग इन नीतियों के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी संदर्भ में एक्सपर्ट्स ‘परफॉर्मेटिव रियलिज्म’ की बात करते हैं यानी ऐसी नीतियाँ और कार्रवाइयाँ जिनका उद्देश्य वास्तविक समाधान से ज्यादा अपनी ताकत का प्रदर्शन करना होता है। ईरान जैसे मामलों में की गई सैन्य कार्रवाई को कुछ विश्लेषक इसी नजरिए से देखते हैं, जहाँ कदम रणनीति से ज्यादा संदेश देने के लिए उठाए जाते हैं।

ट्रंप पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी कम नहीं है। NATO के पारंपरिक सहयोगी अब पहले जैसे साथ खड़े नहीं दिख रहे। कई यूरोपीय देशों के साथ मतभेद सामने आए हैं, जिससे अमेरिका की वैश्विक पकड़ पर असर पड़ा है। आर्थिक मोर्चे पर लिए गए फैसलों खासकर भारी टैरिफ और व्यापार युद्ध ने सप्लाई चेन को भी प्रभावित किया है। वहीं सुप्रीम द्वारा कुछ टैरिफ फैसलों पर रोक लगने से प्रशासन को झटका भी लगा है।

अमेरिका के सामने असली चुनौती उसकी आर्थिक स्थिति है यानी बढ़ता कर्ज, बजट घाटा और डॉलर पर निर्भरता। अगर दुनिया डॉलर से दूरी बनाती है तो ट्रेजरी बॉन्ड बेचना मुश्किल हो जाएगा, ब्याज दरें बढ़ेंगी और सरकार को या तो टैक्स बढ़ाने होंगे या सैन्य खर्च घटाना पड़ेगा। इसका सीधा मतलब होगा अमेरिका की ‘एकमात्र सुपरपावर’ वाली स्थिति पर असर पड़ेगा।

इसी दबाव का असर वैश्विक स्तर पर भी दिख रहा है। ग्लोबल साउथ के देश धीरे-धीरे अमेरिकी वित्तीय सिस्टम से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे ‘Decoupling’ कहा जा रहा है। उधर चीन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी ताकत तेजी से बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका की नई रक्षा रणनीति भी संकेत देती है कि वह वैश्विक सुरक्षा का बोझ सहयोगी देशों पर डालते हुए अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व को मजबूत करना चाहता है।

इस पूरे परिदृश्य में चाहे ट्रंप हों या कोई और राष्ट्रपति, अमेरिका की प्राथमिकताएँ लगभग एक जैसी ही रहतीं चीन के प्रभाव को सीमित करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और BRICS देशों की डी-डॉलराइजेशन की कोशिशों को कमजोर करना। भू-राजनीतिक लक्ष्य वही हैं बस उन्हें हासिल करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

तेल पर अमेरिकी नियंत्रण की कोशिश

अमेरिका की हालिया कार्रवाइयों का पैटर्न देखने पर एक बात साफ उभरती है निशाने पर वही देश हैं जिनके पास बड़े ऊर्जा संसाधन हैं। जिन 7 देशों पर कार्रवाई की बात हो रही है, उनमें ईरान, इराक, नाइजीरिया, वेनेजुएला और सीरिया जैसे प्रमुख तेल उत्पादक शामिल बताए जाते हैं। वेनेजुएला में की गई कार्रवाई का लक्ष्य उसके विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण बताया जा रहा है, जबकि ईरान के संदर्भ में इसे उभरते ऊर्जा गठबंधनों को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

नाइजीरिया में दिसंबर 2025 की एयर स्ट्राइक को कुछ विश्लेषक अफ्रीका में बढ़ते चीन के प्रभाव को सीमित करने और खनिज संसाधनों पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति मानते हैं। नाइजीरिया के मामले में अमेरिका ने ‘Country of Particular Concern (CPC)’ का हवाला दिया यह टैग आमतौर पर धार्मिक स्वतंत्रता या मानवाधिकार के मुद्दों से जोड़ा जाता है। ऐसे लेबल कई बार कूटनीतिक दबाव बनाने के औजार बन जाते हैं।

ईरान ने निकाल दिया अमेरिका का ‘तेल’

इराक के युद्ध की तरह ही ट्रंप प्रशासन पर आरोप है कि उसने ईरान में ‘तत्काल परमाणु खतरे’ का दावा किया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) या अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास इसके स्पष्ट सबूत सामने नहीं आए।
यह संदेश सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि भारत और चीन जैसे देशों के लिए भी माना जा रहा है कि डॉलर से दूरी की कीमत भारी हो सकती है। लेकिन इसी रणनीति में एक बड़ी चुनौती भी छिपी है। ईरान जैसे देश पर हमला वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित करता है क्योंकि दुनिया की बड़ी तेल सप्लाई इस क्षेत्र से गुजरती है।
ऐसे में तेल की कीमतें 150 डॉलर तक पहुँचने का जोखिम बढ़ सकता है जिसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसी देश में घुसकर वहाँ के राष्ट्रपति को पकड़ लाना आसान है लेकिन युद्ध के बीच दुनिया की 20% तेल सप्लाई को बचाए रखना नामुमकिन है। तख्तापलट करना तो अमेरिका को आता है लेकिन $150 तक पहुँचने वाले तेल के दाम और टूटी हुई इकोनॉमी को संभालने का उसके पास कोई प्लान नहीं है।

अगला शिकार: ग्रीनलैंड और संसाधन युद्ध

अब नजर ग्रीनलैंड पर है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है जहाँ सिर्फ 56000 लोग रहते हैं। ट्रंप ने तो यहाँ तक कह दिया है कि ‘या तो ग्रीनलैंड हमें दे दो, वरना हम छीन लेंगे।’ कम आबादी वाला यह इलाका रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
पहला कारण इसकी लोकेशन है- यह ऐसा स्थान है जहाँ से अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य गतिविधियों पर नजर रख सकता है। दूसरा कारण यहाँ मौजूद रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, जो आधुनिक टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और AI के लिए जरूरी हैं। तीसरा कारण वैश्विक दबदबा है- अमेरिका नहीं चाहता कि उसके प्रतिद्वंद्वी यहाँ पैर जमाएँ।

अस्त होता अमेरिकी साम्राज्य का सूर्य

अमेरिका आज पहले जैसा संतुलित वैश्विक नेता नहीं रह गया है बल्कि एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ उसकी साख और प्रभाव दोनों चुनौती के घेरे में हैं। इराक में बोले गए झूठ और अफगानिस्तान में मिली हार ने उसकी अजेय होने की छवि को खत्म कर दिया है, इसलिए अब वह अपनी गिरती हुई ‘सॉफ्ट पावर’ को सैन्य ताकत के जोर पर छिपाने की कोशिश कर रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति बदलती दिख रही है। लंबे समय तक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ रहा पेट्रो-डॉलर सिस्टम अब दबाव में है। BRICS जैसे समूहों का बढ़ता प्रभाव और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर काम इस बदलाव को साफ दिखाता है।

ब्रिक्स देश अब ‘BRICS Pay’ और डिजिटल मुद्राओं के जरिए डॉलर के बिना व्यापार करना सीख चुके हैं। भारत जैसी शक्तियाँ अब अमेरिका की धमकियों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। इस तरह से अमेरिका की यह आक्रामकता उसकी मजबूती नहीं उसकी कमजोरी का सबसे बड़ा सबूत है। ऐसी ‘महाशक्ति’ जब संवाद छोड़ दे और सिर्फ डंडे का इस्तेमाल करे तो समझ लीजिए कि उस साम्राज्य का सूर्यास्त करीब है।