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ट्रंप की बेटी इवांका को मारना चाहता था मोहम्मद बाकेर, ईरानी सेना से मिली थी ट्रेनिंग: सुलेमानी की मौत का बदला लेना था मकसद

    ट्रंप और बेटी इवांका (बाएँ), हत्या की साजिश रचने वाला आतंकी मोहम्मद बाकेर (दाएँ), (साभार : CNN & Newyorkpost)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप पर एक बड़ा खतरा टल गया है। अमेरिकी अखबार ‘न्यू यॉर्क पोस्ट’ के अनुसार, इवांका की हत्या की साजिश रचने वाले एक ट्रेंड आतंकी मोहम्मद बाकेर को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस आतंकी के पास से इवांका के फ्लोरिडा वाले घर का पूरा नक्शा मिला है। इस खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह मुस्तैद हो गई हैं।

पकड़े गए आतंकी का पूरा नाम मोहम्मद बाकेर साद दाऊद अल-सादी है। उसकी उम्र 32 साल है। छह साल पहले बगदाद में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरानी सैन्य प्रमुख कासिम सुलेमानी मारा गया था। अल-सादी उसे अपना अब्बू जैसा मानता था। वह सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता था। उसने लोगों से कहा था कि वह इवांका को मारकर ट्रंप से अपना बदला पूरा करेगा।

इंटरनेट पर दी थी खुली धमकी

आरोपित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर काफी एक्टिव था। उसने वहाँ इवांका और उनके पति के 24 मिलियन डॉलर (225 करोड़ रुपए) के घर का नक्शा डाला था। उसने अरबी भाषा में लिखा था कि अमेरिकी महल या सीक्रेट सर्विस भी उन्हें नहीं बचा पाएगी। उसने लिखा कि हमारा बदला बस कुछ ही समय की बात है। वह लोगों को डराने के लिए साइलेंसर लगी पिस्तौल की तस्वीरें भी भेजता था।

तुर्की में पकड़ा गया आरोपित

इस बड़े आतंकी को 15 मई को तुर्की में पकड़ा गया। वह वहाँ से रूस भागने की तैयारी में था। गिरफ्तारी के बाद उसे तुरंत अमेरिका भेज दिया गया। अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, उस पर यूरोप और अमेरिका में 18 हमलों का आरोप है। अभी उसे ब्रुकलिन के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। वहाँ उसे सबसे अलग एक कड़े पहरे वाली कोठरी में बंद किया गया है।

कई देशों में फैलाया था खौफ

यह आतंकी सिर्फ ट्रंप की बेटी इवांका के पीछे नहीं था। वह ‘कथैब हिजबुल्लाह’ और ईरान के ‘IRGC’ जैसे खतरनाक संगठनों से जुड़ा है। उसने एम्स्टर्डम में एक बैंक पर पेट्रोल बम फेंका था। उसने लंदन में दो लोगों पर चाकू से हमला किया था। उसने टोरंटो में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर गोलीबारी भी की थी। इसके अलावा बेल्जियम और रोटरडैम में भी उसने हमले किए थे।

सरकारी पासपोर्ट का उठाया फायदा

रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपित के पास इराक का खास ‘सर्विस पासपोर्ट’ था। यह पासपोर्ट सिर्फ वहाँ के प्रधानमंत्री की इजाजत से मिलता है। इस VIP पासपोर्ट के कारण एयरपोर्ट पर उसकी जाँच नहीं होती थी। उसे हर जगह VIP लाउंज की सुविधा मिलती थी। इसी का फायदा उठाकर वह आसानी से दूसरे देशों में जाता था। वहां वह बड़े आराम से अपने आतंकी नेटवर्क को चला रहा था।

ट्रैवल एजेंसी के नाम पर धोखा

अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए उसने एक तरकीब निकाली थी। उसने मजहबी यात्राएँ कराने वाली एक ट्रैवल एजेंसी खोली थी। इसी एजेंसी की आड़ में वह पूरी दुनिया में घूमता था। वह अलग-अलग देशों में जाकर अपने साथियों से मिलता था। वह सोशल मीडिया पर एफिल टावर जैसी मशहूर जगहों के साथ फोटो डालता था। कई बार वह मिसाइलों और हथियारों के साथ भी अपनी फोटो पोस्ट करता था।

इस मामले पर अभी सब शांत

इवांका ट्रंप ने साल 2009 में अपनी शादी से पहले यहूदी धर्म अपना लिया था। इस बड़ी साजिश के सामने आने के बाद भी अभी सब शांत हैं। न्यू यॉर्क पोस्ट ने इस मामले पर बात करने के लिए व्हाइट हाउस से संपर्क किया था। उन्होंने आरोपित के वकील से भी बात करने की कोशिश की। हालाँकि, अभी तक किसी की भी तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

बाल-बाल बचे ट्रंप, वॉशिंगटन हिल्टन होटल में डिनर के दौरान फायरिंग: हमलावर की तस्वीर आई सामने; इसी होटल में 45 साल पहले रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था जानलेवा हमला

                                                    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और हमलावर
जबसे डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी मैदान में उतरे तभी से इनके विरोधी इन पर जानलेवा हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। चुनावी प्रचार में हुए हमले में भी बाल-बाल बचे थे तब गोली इनके कान पर लगी थी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर बाल-बाल बच गए हैं। जब व्हाइट हाउस के पत्रकारों के साथ आयोजित डिनर कार्यक्रम के दौरान अचानक एक शख्स ने कमरे के बाहर अचानक फायरिंग कर दी जिसके बाद ट्रंप को बाहर निकाला गया है। यह कार्यक्रम वॉशिंगटन हिल्टन होटल में चल रहा था।

फायरिंग की आवाज के बीच सीक्रेट सर्विस के एजेंट्स तुरंत हरकत में आए और राष्ट्रपति ट्रंप को कड़े सुरक्षा घेरे में लेकर कार्यक्रम स्थल से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने तत्काल पूरे इलाके को सील कर दिया। घटना के समय अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप कैबिनेट के कई वरिष्ठ सदस्य भी वहाँ मौजूद थे और उन्हें भी एहतियातन तुरंत बाहर ले जाया गया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

 ट्रंप ने हमलावर की एक तस्वीर भी अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर शेयर की है। हमलावर की पहचान 31 साल के कोल टॉमस ऐलन के रूप में हुई है और वो कैलिफॉर्निया का रहने वाला बताया जा रहा है।

                                                     ट्रंप द्वारा शेयर की गई तस्वीर

इसी होटल में 45 साल पहले रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था जानलेवा हमला
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की डिनर पार्टी में जिस ऐतिहासिक होटल वाशिंगटन हिल्टन में फायरिंग हुई है वो 45 साल पहले भी एक बड़े हमले का गवाह बन चुका है। इसी होटल के बाहर 1981 में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्‍ड रीगन पर जानलेवा गोलीबारी हुई थी।
ताजा घटना व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान हुई, जहाँ ट्रंप, उनकी पत्नी मेलेनिया ट्रंप और उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस समेत कई बड़े नेता और गणमान्य लोग मौजूद थे। अचानक हुई फायरिंग से कार्यक्रम में अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत एक्शन लेते हुए ट्रंप को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। हालाँकि इस घटना में उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।
इस होटल का इतिहास पहले से ही ऐसी खौफनाक घटना से जुड़ा रहा है। 30 मार्च 1981 को यहीं से निकलते वक्त रीगन पर जॉन हिंकले जूनियर (John Hinckley Jr) ने गोली चलाई थी। हमले में रीगन गंभीर रूप से घायल हो गए थे, गोली उनके फेफड़े तक जा पहुँची थी लेकिन समय पर इलाज से उनकी जान बच गई थी।
उस घटना के बाद स्थानीय लोग इस होटल को ‘हिंकले हिल्टन’ तक कहने लगे थे। अब एक बार फिर इसी जगह पर फायरिंग होने से सुरक्षा व्यवस्था और इसकी लोकेशन को लेकर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल एजेंसियाँ मामले की जाँच में जुटी हैं और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस बार की घटना के पीछे क्या वजह रही।












ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

ममता बनर्जी: संवैधानिक संस्थाओं के अपमान के बाद अब राष्ट्रपति का अपमान, चुनाव में मजा चखाएंगे आदिवासी


पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी अपनी मनमानी कार्यशैली और अकर्मण्यता से बाज नहीं आ रही हैं। उन्होंने पहले चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं की पुरजोर खिलाफत की है। इस बार तो राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद का खुलेआम अपमान किया है। ममता सरकार ने जानते-बूझते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर दिया है। इसके पीछे आदिवासी वोट बैंक को राष्ट्रपति से दूर रखने की सियासी रणनीति सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे राष्ट्रपति का ही नहीं, बल्कि संविधान का अपमान बताया है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना के आरोप लगे हों। इससे पहले भी उन्होंने कई बार केंद्रीय संस्थाओं और संवैधानिक पदों को लेकर तीखे बयान देकर अपमानित किया है। अब जब राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक सीमा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। पश्चिम बंगाल से उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक मतभेद चाहे कितने भी तीखे क्यों न हों, संवैधानिक मर्यादाओं से समझौता किसी भी सूरत में देश बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगकर उसकी हालत इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे तो खाई वाली कर दी है।

संवैधानिक मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसकी संवैधानिक मर्यादाओं में बसती है। इन मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद होता है, जिसे संविधान ने राष्ट्र के प्रथम नागरिक का स्थान दिया है। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार या उसका मुखिया राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल की अनदेखी करता है, तो यह केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं के अपमान से जुड़ा विषय बन जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से जुड़ा विवाद इसी गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। सीएम ममता बनर्जी को यह समझना होगा कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के साथ टकराव का संदेश केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत है। जब संस्थाओं का सम्मान दांव पर लग जाता है, तो नुकसान केवल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मर्यादा और जिम्मेदारी भी दी है। यदि इन मर्यादाओं का सम्मान नहीं होगा, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होगी। इस पूरे विवाद की यही सबसे बड़ी चेतावनी है।

राष्ट्रपति के कार्यक्रम में ममता सरकार की उदासीनता और कुप्रबंधन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हालिया विवाद संवैधानिक प्रोटोकॉल के उल्लंघन से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रपति के सिलीगुड़ी दौरे पर थीं। ममता बनर्जी या उनके किसी भी मंत्री ने उनकी अगवानी नहीं की, जिसे राष्ट्रपति ने अपने पद और आदिवासी समुदाय के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने सार्वजनिक मंच से राज्य सरकार की उदासीनता और कार्यक्रम के कुप्रबंधन पर सवाल उठाए। तृणमूल सरकार की ओर से वह सम्मानजनक व्यवहार और औपचारिक व्यवस्था नहीं दिखाई गई, जो सामान्यतः राष्ट्रपति के दौरे के समय अनिवार्य मानी जाती है। ममता बनर्जी ने इस अक्षम्य गलती को मानने के बजाए, उल्टा राष्ट्रपति पर ही सवाल उठाकर आग में घी का काम किया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कार्यक्रमों के समन्वय और आयोजन को लेकर राज्य सरकार में आपसी मतभेद थे। ममता बनर्जी से गलती को स्वीकारने के बजाए उल्टे आरोप लगा दिए, जिससे यह मतभेद से बढ़कर एक संवैधानिक गतिरोध में बदल गया।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति पद का सम्मान करना अनिवार्य
अब गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में रिपोर्ट मांगे जाने से इस विवाद को और भी गहरा दिया है, जिससे केंद्र और पश्चिम बंगाल के बीच पहले से जारी तनाव एक नए स्तर पर पहुँच गया है। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख माना गया है। राष्ट्रपति केवल औपचारिक पद नहीं हैं, बल्कि वह राष्ट्र की एकता, गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक हैं। संसद का संचालन हो, सरकार का गठन हो या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कई संवैधानिक औपचारिकताएं, इन सभी में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण राष्ट्रपति के कार्यक्रमों और दौरों के दौरान राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करें। यह केवल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का हिस्सा है। यदि किसी स्तर पर इस मर्यादा की अनदेखी होती है तो उसे केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जाता, बल्कि उसे संविधान के प्रति असम्मान के रूप में देखा जाता है।

ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता
राष्ट्रपति पद की गरिमा के कारण सार्वजनिक प्रतिक्रिया अक्सर संयमित होती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ममता सरकार की उदासीनता और लापरवाह कार्यशैली ने राष्ट्रपति की नाराजगी और असंतोष बढ़ा दिया है। यह असंतोष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति का पद किसी दल या सरकार से नहीं, बल्कि पूरे संविधान से जुड़ा होता है। जब इस पद से जुड़े प्रोटोकॉल की अनदेखी होती है, तो यह संकेत देता है कि राजनीतिक टकराव अब संवैधानिक मर्यादाओं तक पहुंच गया है। यही कारण है कि ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता व्यक्त की जा रही है।

राष्ट्रपति का नहीं, संविधान और लोकतंत्र का अपमान- पीएम मोदी
इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यह केवल राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र का अपमान है। पीएम मोदी ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि आज देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है और कल बंगाल की टीएमसी सरकार ने महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू घोर अपमान किया है। राष्ट्रपति मुर्मू संथाल समुदाय के एक बड़े उत्सव में भाग लेने गई थीं, लेकिन टीएमसी सरकार ने इस आयोजन का बहिष्कार किया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति देश की एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च प्रतीक होते हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार उनके प्रोटोकॉल की अनदेखी करती है, तो यह पूरे राष्ट्र की संवैधानिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है।

आदिवासी समुदायों में ममता सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष
इस विवाद को केवल प्रोटोकॉल की चूक मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे आदिवासी राजनीति का पहलू भी जुड़ा हुआ है। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी समाज में एक नई राजनीतिक चेतना और सम्मान की भावना पैदा हुई है। ऐसे में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां आदिवासी आबादी महत्वपूर्ण है, वहां पर आदिवासी समुदाय के कार्यक्रम का बहिष्कार करना अपने आप में राजनीतिक भेदभाव का प्रतीक है। इसलिए भी देशभर के आदिवासी समुदायों में ममता बनर्जी सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष व्याप्त है।

संघीय व्यवस्था का अपमान, प्रशासनिक भूल या राजनीतिक रणनीति
भारत एक संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों और संस्थाओं के सम्मान को लेकर एक साझा मर्यादा कायम रहती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में आए दिन इसकी धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। वह कभी राज्यपाल से टकरा जाती हैं तो कभी अदालतों के निर्णयों पर सवाल उठाती फिरती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी हो जाए कि वह संवैधानिक शिष्टाचार को ही चुनौती देने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि लगातार संवैधानिक संस्थाओं के साथ टकराव की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यह केवल भूल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है। लोकतंत्र की असली ताकत उसके संस्थानों में विश्वास से आती है। यदि राजनीतिक दल और सरकारें इन संस्थानों का सम्मान नहीं करेंगी, तो जनता के बीच भी उनका विश्वास कमजोर होगा। राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका जैसे पद और संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई भी कुत्सित प्रयास अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की नापाक कोशिश है।

चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों पर ममता के लगातार हमले
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वभाव में आक्रामकता दिखाई है। लेकिन सवाल तब उठता है जब यह आक्रामकता संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच जाती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन संस्थाओं के सम्मान की एक सीमा भी होती है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान किया हो। इससे पहले चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उनका टकराव चुनाव आयोग से भी हो चुका है। उन्होंने कई मौकों पर चुनाव आयोग के निर्णयों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खुलकर आलोचना की थी। इसी प्रकार ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कई बार केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ भी मुखर रही है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से ईडी और सीबीआई की कार्रवाइयों पर सवाल उठाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के छापों के दौरान भी मुख्यमंत्री ने अनाश्यक दखलंदाजी की और महत्वपूर्ण फाइलों को उठाकर ले गईं। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह संवैधानिक संस्था की सार्वजनिक अवमानना करनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी को सत्ता–संरक्षण देने के भंवर में फंस गई है। इस साल की शुरुआत में 8 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।

‘भारतीयों से नफरत करते हैं मेयर जोहरान ममदानी’: ट्रंप के बेटे एरिक ने न्यूयॉर्क के मेयर की मानसिकता को बताया खतरनाक

               ट्रंप के बेटे एरिक (बाएँ), हिंदू विरोधी जोहरान ममदानी (दाएँ), ( साभार : forbes & News18)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटे एरिक ट्रंप ने न्यूयॉर्क के नव-निर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी पर तीखा हमला बोला है। फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में, एरिक ट्रंप ने ममदानी को ‘समाजवादी कम्युनिस्ट’ करार दिया और उन पर ‘भारतीय समुदाय से नफरत’ करने का गंभीर आरोप लगाया।

जानकारी के अनुसार, 34 वर्षीय ममदानी न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम और दक्षिण एशियाई मूल के मेयर बनने वाले हैं। ट्रंप जूनियर ने ममदानी के एजेंडे को खतरनाक बताते हुए कहा कि वह ‘किराना स्टोर का राष्ट्रीयकरण’ करना चाहते हैं, ‘यहूदी लोगों से नफरत करते हैं,’ और वामपंथी एजेंडा चलाकर शहर को कमजोर कर रहे हैं।

एरिक ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ममदानी को ‘सेफ स्ट्रीट, क्लीन स्ट्रीट और रीजनेबल टैक्स’ जैसी बुनियादी बातों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने ममदानी की तुलना वामपंथी नेता अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज से भी की।

राजनीतिक विश्लेषक इसे रिपब्लिकन कैंपेन का हिस्सा मान रहे हैं, जिसमें ममदानी को ‘कट्टर वामपंथी खतरे’ के रूप में पेश किया जा रहा है। ममदानी ने व्यक्तिगत हमलों पर प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है।

राष्ट्रपति/राज्यपाल के लिए बिल की मंजूरी की टाइमलाइन तय नहीं कर सकती कोर्ट: SC का फैसला, कहा- अधिक देरी हुई तो दे गवर्नर को देंगे निर्देश


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि गवर्नर और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभाओं से आए बिलों पर फैसला लेने के लिए कोर्ट कोई टाइमलाइन तय नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि पिछले फैसले में तय की गई समय-सीमा और ‘डीम्ड असें’ (समय पर कार्रवाई न होने पर बिल को मंजूर मान लेना) संविधान के खिलाफ है। अदालत ने माना कि ऐसा करना गवर्नर और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों में दखल होगा।

जानकारी के अनुसार, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गवर्नर का काम किसी और संस्था से बदला नहीं जा सकता। यानी अगर गवर्नर बिल पर फैसला लेने में देर कर दें, तो भी अदालत उस प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती। कोर्ट तभी कदम उठा सकती है जब देरी बेहद ज़्यादा हो और उसकी कोई वजह न हो और तब भी अदालत सिर्फ इतना कह सकती है कि गवर्नर ‘उचित समय’ में फैसला लें, न कि क्या फैसला लें।

यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए सवालों पर दिया गया है, जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या अदालत गवर्नर और राष्ट्रपति की प्रक्रिया पर समय-सीमा तय कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा करना सत्ता के विभाजन के सिद्धांत के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवर्नर किसी ‘सुपर मुख्यमंत्री’ की तरह बर्ताव नहीं कर सकते, क्योंकि राज्य में दो सरकारें नहीं हो सकतीं।

 

अलास्का से लौटकर रूस का ‘तोता’ बने ट्रंप ने जेलेंस्की को हड़काया - यूक्रेन को न क्रीमिया मिलेगा, न नाटो में जगह: नोबेल पुरस्कार का उतावलापन; क्या पाकिस्तान के साथ भी यही होने वाला है?

                                                                                                                          साभार: एबीसी न्यूज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ मुलाकात से पहले यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर उन्हें ही हड़का दिया है। ट्रंप ने कहा है कि जेलेंस्की, रूस के साथ इस युद्ध को तुरंत रोक सकते हैं। हाल ही में ट्रंप ने अलास्का में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी बैठक की थी।
ट्रम्प ने जिस तरह जेलेंस्की को हड़काया है यह अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को भी चेतावनी है। भारत के प्रभुत्व के आगे पाकिस्तान कहीं नहीं टिक नहीं पाता। Operation Sindoor से भारत ने अमेरिका तो क्या दुनियां को बता दिया कि पाकिस्तान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इसलिए ट्रम्प तो क्या कोई देश ज्यादा पाकिस्तान को ज्यादा भाव नहीं देगा। क्योकि दुनिया ने देख लिया कि पाकिस्तान भारत विरुद्ध जहर फैला कर भारत विरोधियों को ब्लैकमेल कर भीख मांगता रहा है। 

ट्रंप-पुतिन की इस बैठक का कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकला लेकिन ट्रंप ने बैठक के बाद यह लगभग साफ कर दिया था कि अब शांति स्थापित करने का जिम्मा जेलेंस्की का है। अब ट्रंप ने अपनी बात को और मुखरता के साथ दोहराया है। पुतिन के साथ बैठक को ट्रंप ने सार्थक बताया था।

ट्रंप ने क्या कहा?

ट्रंप ने जेंलेंस्की को हड़काते हुए अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट किया है। ट्रंप ने लिखा है, “यूक्रेन के राष्ट्रपति जेंलेंस्की चाहें तो रूस के साथ युद्ध तुरंत खत्म कर सकते हैं, या फिर वह लड़ाई जारी रख सकते हैं। याद कीजिए कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी।”

हालाँकि, ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ किया कि ना तो यूक्रेन को क्रीमिया वापस नहीं मिलेगा, जिसे 12 साल पहले बराक ओबामा के दौर में बिना गोली चले रूस ने हथिया लिया था और ना ही यूक्रेन को NATO में शामिल होने दिया जाएगा। ट्रंप ने लिखा कि कुछ चीजें कभी नहीं बदलती हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने लगातार यूक्रेन के NATO में शामिल होने का विरोध किया है और मौजूदा रूस-यूक्रेन संघर्ष की बड़ी वजह भी यूक्रेन का NATO की सदस्यता लेने की पहल करना माना जाता है। जनवरी में ट्रंप के दोबारा अमेेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले NATO देशों ने यूक्रेन को सदस्यता दिए जाने पर सहमित व्यक्त कर दी थी।

वहीं, ट्रंप के साथ मुलाकात के लिए जेलेंस्की अमेरिका पहुँच गए हैं। उनका कहना है कि यूक्रेन अपनी अखंडता और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। जेलेंस्की का कहना है कि वह युद्ध रोकने के लिए अपनी शर्तों पर ही तैयार होंगे।

इसके अलावा जेलेंस्की ने शांति समझौते के लिए ट्रंप की सुरक्षा की गारंटी देने की पेशकश की सराहना की है। वहीं, एक अमेरिकी प्रतिनिधि ने दावा किया कि पुतिन यूक्रेन के लिए संभावित नाटो जैसे सुरक्षा समझौते पर सहमत हो गए हैं।

जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मिलेंगे ट्रंप

रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मुलाकात करेंगे। ट्रंप ने इस मुलाकात को लेकर कहा, “व्हाइट हाउस में एक बड़ा दिन होगा। इतने सारे यूरोपीय नेता एक साथ कभी नहीं आए। उनकी मेजबानी करना मेरे लिए सम्मान की बात है।”

NATO के महासचिव मार्क रूटे, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर भी ट्रंप के साथ मुलाकात करेंगे। दावा किया गया है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब और यूरोपीय यूनियन की अध्यक्षा उर्सुला वॉन डेर लेयन भी बातचीत में शामिल होंगे।

इससे पहले जब व्हाइट हाउस में मुलाकात के दौरान ट्रंप, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जेलेंस्की के बीच खूब बहसबाजी हुई थी।

हालाँकि, अब इस चर्चा को लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि इससे रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर कोई ठोस नतीजा सामने आ सकता है। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उतावले ट्रंप अब इस संघर्ष को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाते दिख रहे हैं।

यूँ ही सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार ने नहीं कहा- इससे पैदा होगी संवैधानिक अराजकता, राष्ट्रपति ने भी ‘डेडलाइन’ पर पूछे थे 14 सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हुए विधेयकों की मंजूरी देने की डेडलाइन तय की थी। अब इस पर केंद्र सरकार ने गंभीर चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने बीते अप्रैल में राष्ट्रपति द्वारा बिल की मंजूरी के लिए 3 महीने की समयसीमा तय की थी जिस पर सरकार ने ‘संवैधानिक अराजकता’ की स्थिति पैदा होने की चेतावनी दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं हैं। जिसके बाद खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को लेकर 14 गंभीर सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों से अपना जवाब देने को कहा था।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ 19 अगस्त से इस मामले की सुनवाई करने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि ऐसी समयसीमाएँ सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों का हड़पना होगा जो उसे नहीं दी गई हैं।

सरकार ने कहा कि इसके चलते शक्तियों का पृथक्करण बिगड़ जाएगा। सरकार ने चेतावनी दी कि इसके चलते ‘संवैधानिक अराजकता‘ की स्थिति पैदा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने बयान में कहा, “अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सर्वोच्च न्यायालय संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या या संविधान बनाने वालों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकता। जब तक संविधान के लिखित नियमों में कोई तय प्रक्रिया मौजूद ना हो।”

मेहता ने कहा कि राज्यपाल की सहमति की प्रक्रिया लागू करने में कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल जैसे ऊँचे पद को घटाकर एक छोटे या अधीनस्थ पद की तरह बना दिया जाए।

मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद अपने आप में ‘पूर्ण राजनीतिक’ पद हैं और ये लोकतांत्रिक शासन के ऊँचे आदर्शों के प्रतीक हैं। यानी इन्हें संपूर्ण राजनीतिक वैधता मिली हुई है। उन्होंने कहा कि अगर कभी इन पदों से जुड़ी कोई गड़बड़ी नजर आती है तो उसका समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए ना कि अदालत के जरूरत से ज्यादा दखल से।

सरकार ने आगे बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वे किसी बिल पर विचार करने में पूरी स्वतंत्रता रखें और उन्हें किसी निश्चित समयसीमा का पालन करना जरूरी नहीं है। समयसीमा ना होना जान-बूझकर और सोच-समझकर संविधान में रखा गया एक विशेष नियम है।

संविधान में कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं बताई गई है जिससे बिना संविधान में बदलाव किए इन सीमाओं को लागू कर सके। संविधान में बदलाव करना केवल संसद की विशेष शक्ति है जो अनुच्छेद 368 के तहत ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने पूछे थे 14 सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े कुछ अहम सवाल पूछे थे। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाई है।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास ये सवाल भेजे थे। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की इजाजत देता है।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था-

  1. जब राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत कोई बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का क्या था फैसला?

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने राज्यपाल RN रवि के उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी ना देने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में इस पर सुनवाई की। तमिलनाडु की सरकार की दलील थी कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा 2 बार पारित किए जाने के बावजूद विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लटका रखा है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी और साथ ही राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।
राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लंबे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

जब कोई विधेयक संसद या विधानसभा में पास हो जाता है, तो इसे लागू करने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और कानून नहीं बनता।
राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।
राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।
दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने उठाया था।
उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदाहरण था।

क्यों SC का फैसले बताया जा रहा न्यायिक दखल?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही न्यायिक दखल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। संविधान से इतर जाकर देश के प्रमुख के ऊपर समयसीमा लगाने को लेकर कई कानूनविदों ने इस पर सवाल उठाए थे।
पूर्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट के ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने तक का दावा कर दिया था।
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विधेयकों पर कार्यपालिका को समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए कहना संविधान में ना तो दिया गया है और ना ही इसकी भावना निहित है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता राजन सिंह ने चेताया था कि ऐसे फैसलों से न्यायपालिका सरकार की कार्यप्रणाली में बहुत गहराई तक दखल कर सकती है और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से भविष्य में अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं।
संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं, जैसा केंद्र सरकार ने भी अपने जवाब में बताया है। कुछ समय पहले की बात है जब चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
कानूनविद मानते हैं कि न्यायपालिका में जवाबदेही के अभाव के चलते ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जहाँ अधिक न्यायिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब कुछ दिनों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी तो देखना होगा कि कोर्ट अपने फैसले को लेकर क्या रुख रखता है।

मालदीव में प्रधानमंत्री का ऐतिहासिक स्वागत: पूरी कैबिनेट के साथ आगवानी करने पहुंचे राष्ट्रपति मुइज्जू

            प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू खुद पूरी कैबिनेट के साथ  अभिनंदन करते  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रवार, 25 जुलाई 2025 को मालदीव की राजधानी माले में ऐतिहासिक और भव्य स्वागत किया गया। जैसे ही पीएम मोदी का विमान वेलाना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा, मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू खुद अपनी पूरी कैबिनेट के साथ उनका अभिनंदन करने पहुंचे। राष्ट्रपति के साथ मालदीव के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और गृह सुरक्षा मंत्री आदि सभी प्रमुख मंत्री मौजूद रहे और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया।

मोदी के स्वागत में एयरपोर्ट पर बच्चों ने पारंपरिक सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे देखकर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मुइज्जू ने ताली बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया। मोदी जी खुद बाल कलाकारों से मिलने उनके बीच पहुंचे और उनका हौसला बढ़ाया। एयरपोर्ट के बाहर भारी संख्या में प्रवासी भारतीय हाथों में तिरंगा लहराते हुए वंदे मातरम और भारत माता की जय के साथ मोदी-मोदी के नारे लगा रहे थे।

पिछले दो सालों में भारत और मालदीव के रिश्तों में कई उतार चढ़ाव देखने को मिले हैं। 2 साल पहले मालदीव में ‘इंडिया आउट’ के नारे सुनाई पड़ रहे थे। भारत की मौजूदगी का विरोध मालदीव का एक तबका करता था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के चलते मालदीव का फोकस झगड़ों से हटकर सहयोग पर आ गया है।

2 साल के भीतर ही मालदीव को समझ आ गया कि उसे भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधारना होगा। मालदीव को समझ आया कि हमेशा उसके साथ भारत खड़ा रहा है, और जब ऐसा नहीं हुआ है तो वह संकट में पड़ा है।

बीते 2 सालों में रिश्तों में खटास के एक दौर के बावजूद भारत ने मालदीव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद की है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 400 मिलियन डॉलर (3,320 करोड़ रूपए) की करेंसी स्वैप के जरिए मालदीव की मदद की। वहीं भारतीय स्टेट बैंक ने 100 मिलियन डॉलर (830 करोड़ रूपए) के मालदीव के ट्रेजरी बॉन्ड सबस्क्राइब किए।

मालदीव को समझ आया है कि आसपास के देशों में भारत ही मालदीव का सबसे भरोसेमंद और अहम पार्टनर है।

मालदीव का ऐतिहासिक साझेदार है भारत

भारत और मालदीव के बीच लंबे समय से हिंद महासागर में व्यापार, सांस्कृतिक रिश्ते और सुरक्षा को लेकर सहयोग रहा है। मालदीव की रणनीतिक स्थिति और महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग के पास होने की वजह से यह भारत के लिए समुद्री सुरक्षा में एक अहम साथी है।

1965 में मालदीव की आजादी के बाद भारत पहला ऐसा देश था जिसने उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए जाए थे। भारत ने उसे देश के तौर पर मान्यता दी थी। 1988 में जब मालदीव में तख्तापलट का प्रयास हुआ था, तब भारत ने ऑपरेशन कैक्टस के जरिए समय पर मदद की, जिससे दोनों देशों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हो गए।

भारत ने जरूरत खत्म होने पर अपनी सेना वापस भी बुला ली, जिससे मालदीव में भारत के प्रभुत्व को लेकर चिंताएँ कम हुईं। 2004 की सुनामी और 2014 के जल संकट के वक्त भी भारत सबसे पहले मदद के लिए आगे आया।

ये तीनों संकट दिखाते हैं कि भारत हर मुश्किल में मालदीव और उसकी जनता के साथ खड़ा रहा है। जनवरी 2020 में भारत ने मालदीव को खसरे के टीके की 30,000 डोज भेजकर महामारी से लड़ने में मदद की।

‘इंडिया आउट’ अभियान

मालदीव में विपक्षी दलों द्वारा चलाए गए ‘इंडिया आउट’ आंदोलन ने भारत को मालदीव के अंदरूनी और सुरक्षा मामलों में दखल देने वाला बताया। इंडिया आउट चलाने वालों का दावा था कि भारत की मालदीव के भीतर सैन्य मौजूदगी उसकी संप्रभुता के लिए खतरा है। सच्चाई यह थी कि भारतीय सुरक्षाबल मालदीव भीतर राहत बचाव जैसे कामों में लगे हुए थे।

फरवरी 2021 में विदेश मंत्री एस जयशंकर की यात्रा के दौरान, भारत और मालदीव ने उथुरु थिलाफल्हू (UTF) बंदरगाह के निर्माण पर सहमति जताई थी। इस परियोजना से मालदीव के तटरक्षक बल की क्षमता मजबूत होगी और दोनों देश विकास और सुरक्षा में साझेदार बनेंगे।

उसी समय भारत ने मालदीव को हथियारों की खरीद के लिए 50 मिलियन डॉलर (₹415 करोड़) का लोन भी दिया था। इस दौरान भी भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने की कोशिश भारत विरोधी कुछ समूहों ने की थी।

उन्होंने दावा किया था कि भारत ने मालदीव को जो गश्ती पोत (Patrol vessels) दी हैं, उन पर भारतीय सैनिक तैनात हैं। इस दावे को पूर्व रक्षा मंत्री मारिया दीदी ने खारिज किया और बताया कि भारतीय दल केवल प्रशिक्षण के लिए वहाँ थे, अब नाव पूरी तरह मालदीव के नियंत्रण में है।

राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू के सत्ता में आने के बाद नवंबर 2023 में मालदीव ने भारत से दूरी बनाना शुरू किया और चीन के करीब आने का रुख अपनाया। मुइज़्ज़ू ने अपने चुनाव अभियान में ‘इंडिया आउट’ का नारा दिया था, ताकि देश में भारत के प्रभाव को कम किया जा सके।

प्रधानमंत्री मोदी की जनवरी 2024 में हुई लक्षद्वीप यात्रा के बाद दोनों देशों के रिश्ते और तनावपूर्ण हो गए। मुइज़्ज़ू के तीन उप-मंत्रियों द्वारा सोशल मीडिया पर मोदी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी ने स्थिति को और खराब कर दिया।

21 तोपों की सलामी के साथ पीएम नरेंद्र मोदी को मिला ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार’ सम्मान: घाना में ‘हरे राम हरे कृष्ण’ से हुआ स्वागत

              प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा की तस्वीर (फोटो साभार : X_@narendramodi)
भारत में भारत विरोधी विदेशियों के इशारों पर विपक्ष अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाने 
"मुन्नी बाई" की तरह नाच मोदी का नहीं अपना ही अपमान कर रहे हैं। इन "मुन्नी बाइयों" को नहीं मालूम कि जनता को पागल बनाकर सत्ता हथियाकर अपनी तिजोरी भरना ही सबकुछ नहीं होता। आत्मसम्मान भी किसी चीज का नाम है। ये खुद मानते हैं कि मोदी ने भारत को जिस ऊंचाई पर पहुँचाया है कोई प्रधानमंत्री नहीं पहुंचा पाया। इतना ही नहीं खुद ही "भारत रत्न" पर इतराने वालों से कहीं ज्यादा विदेशी पुरस्कारों से मोदी को अलंकृत किया जा चूका है शायद ही भविष्य में कोई दूसरा प्रधानमंत्री इस मुकाम पर पहुँच सके।   

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (2 जुलाई 2025) को पाँच देशों की महत्वपूर्ण यात्रा पर है। इसका मुख्य उद्देश्य अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में भारत की साझेदारी को मजबूत करना है। यह यात्रा घाना से शुरू हुई।

पीएम मोदी तीन दशकों में घाना का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने हैं। घाना में उन्हें ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना’ से भी सम्मानित किया गया और घाना के बच्चों ने ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का मंत्रोच्चार कर स्वागत किया गया।

घाना में ऐतिहासिक शुरुआत

मोदी का घाना में शानदार स्वागत हुआ। घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा ने एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया। पीएम मोदी को ‘गार्ड ऑफ ऑनर‘ मिला। 21 तोपों की सलामी भी दी गई। पीएम मोदी की घाना की पहली सरकारी यात्रा थी। वह घाना जाने वाले तीसरे भारतीय प्रधानमंत्री हैं। उनसे पहले जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी गए थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने घाना में कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात की। इसमें निवेश, ऊर्जा, स्वास्थ्य और सुरक्षा शामिल हैं। पीएम मोदी ने घाना की संसद को संबोधित किया और इसे बड़ा सम्मान बताया। पीएम मोदी ने कहा कि दोनों देश मजबूत लोकतंत्र हैं। जानकारी के अनुसार, घाना में 15,000 से ज्यादा भारतीय रहते हैं, कुछ परिवार सात दशकों से वहाँ हैं।

आगे की यात्रा

घाना के बाद पीएम मोदी अपनी यात्रा जारी रखेंगे और त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील और नामीबिया जाएँगे। 3 से 4 जुलाई 2025 को वह त्रिनिदाद और टोबैगो में संसद में भाषण देंगे और देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ग्रहण करेंगे।

इसके बाद 4 से 5 जुलाई 2025 को पीएम मोदी अर्जेंटीना में राष्ट्रपति जेवियर माइली से मिलेंगे, जहाँ व्यापार, ऊर्जा, निवेश और नवीकरणीय ऊर्जा पर चर्चा होगी। 5 से 8 जुलाई 2025 तक पीएम मोदी ब्राजील के रियो डी जनेरियो में 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे और ब्राजील के राष्ट्रपति सहित कई नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे।

आखिर में 8 से 9 जुलाई 2025 को नरेंद्र मोदी नामीबिया का दौरा करने वाले भारत के पहले पीएम होंगे, जहाँ वह राष्ट्रपति नंदी-एनडाइटवाघ से मिलेंगे और खनिज व ऊर्जा साझेदारी पर बातचीत करेंगे। यह पूरी यात्रा दिखाती है कि भारत दुनिया के दक्षिणी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता है और खास क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहता है।

इजराइल और अमेरिका ही नहीं और भी देशों की है ईरान में सत्ता-परिवर्तन की चाहत: ईरान की महिलाएं भी चाहती हैं सत्ता परिवर्तन

भारत में आतंकवादियों का सम्मान से नाम लेने, देर रात उनकी फांसी रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट खुलवाना, सुप्रीम कोर्ट द्वारा वृद्ध मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता मिलने के फैसले को संसद से बदलवाने पार्टी ईरान और गाज़ा पर रो कर क्या साबित करना चाहती है? खामेनेई के सत्ता सँभालने से ईरान की महिलाएं अपना जीवन जी रही थी, लेकिन खामेनेई संम्भालते ही महिलाओं को बुर्के में कैद करना वहां की महिलाओं को पसन्द नहीं आया। काफी समय से खामेनेई के हटने की दुआएं मांगी जा रही थी। कट्टरपंथी सोंच का विरोध करने कई बार महिलाओं ने प्रदर्शन किए, सड़क पर प्रदर्शन करते बुर्के और हिजाब को हवा में उड़ाया और बाल भी काटे। लगता है ईरानी महिलाओं की दुआ का असर है कि खामेनेई पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।         

‘मेक ईरान ग्रेट अगेन’ ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ये बयान दिया था। दरअसल अमेरिका ऐसा कह कर ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना तलाश रहा है।

अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा, “सत्ता परिवर्तन शब्द का उपयोग करना राजनीतिक रूप से सही नहीं है, लेकिन अगर वर्तमान शासन ईरान को फिर से महान बनाने में समर्थ नहीं है, तो सत्ता परिवर्तन क्यों नहीं होगा?? MIGA (Make Iran Great Again)!”

अमेरिका ने ईरान में सुप्रीम लीडर खामेनेई को सत्ता से हटाने की कई बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोशिश की है। लेकिन मुस्लिम शिया धर्म के सुप्रीम लीडर खामेनेई को हटाना संभव नहीं हो सका। इस वक्त भी ईरान में सत्ता परिवर्तन की माँग उठ रही है। खुद खामेनेई के परिवार से इसकी माँग उठने लगी है।

कौन हैं महमूद मोरदखानी

महमूद मोरादखानी ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के भतीजे हैं। वह 1986 में ईरान छोड़कर फ्रांस चले गए थे और निर्वासन की जिंदगी जी रहे हैं। महमूद मोरदखानी ने कहा है कि वह युद्ध के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन ईरानी सरकार का खात्मा ही यहाँ स्थायी शांति के लिए जरूरी है।

उन्होंने कहा, ” जो भी इस शासन को मिटा सके, वह जरूरी है।” उनका मानना है कि कई ईरानी लोग खामेनेई के कमजोर होने से ईरान में खुश हैं।

कौन हैं रजा पहलवी

ईरान के पूर्व शहजादे रजा पहलवी ने भी शासन में बदलाव पर जोर दिया है। उनका कहना है कि तेहरान में सत्ता पतन जरूरी है।
रजा पहलवी ईरान के अंतिम पहलवी शासक मोहम्मद शाह पहलवी के बड़े बेटे हैं। उनका परिवार अमेरिका में निर्वासन की जिंदगी गुजार रहा है। 1979 में देश छोड़कर भागे पूर्व शाह के बेटे रजा पहलवी इस वक्त काफी सक्रिय हैं।
रजा अमेरिका में रहते हैं और खुद को ईरान के शासक के रूप में देखना चाहते हैं। 2016 में पहली बार जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने थे तो शाह ने ईरान में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने और लोकतंत्र की बहाली की वकालत की थी।
इसके बाद फिर जब ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने तो पहलवी ने ईरान में लोकतंत्र की वकालत करते हुए पश्चिमी राष्ट्रों से उसके संबंध सुधारने पर जोर दिया था। अब जब इजरायल ने ईरान पर हमला किया तो वह इजरायल का पक्ष लेते हुए नजर आए। उन्होंने कहा कि ईरान में अभी कई ऐसे लोग हैं जो इजरायल के इस कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं और खामनेई को सत्ताच्युत करना चाहते हैं।
माना जा रहा है कि अब राष्ट्रपति ट्रंप ईरान में सत्ता परिवर्तन में रजा पहलवी को समर्थन दे सकते हैं और ईरान में लोकतंत्र की स्थापना की पहल कर सकते हैं। हालाँकि खामनेई ने अपने विकल्प के तौर पर तीन उत्तराधिकारियों को चुन लिया है। ये तीनों ही मौलवी हैं यानी ईरान को इस्लामिक राष्ट्र बनाए रखने की व्यवस्था खामेनेई ने कर दी है।

खामेनेई के खिलाफ सड़कों पर उतरे कई संगठन

ईरान में अभी कई संगठन एक्टिव हैं जो चाहते हैं कि सत्ता परिवर्तन हो। इनमें पीपुल्स मुजाहिदीन या मोजाहिदीन ए खल्क यानी एमईके, ग्रीन मूवमेंट प्रमुख हैं। एमईके ऐसा संगठन है जिसे गोरिल्ला युद्ध लड़ने में महारत हासिल है। लेकिन अमेरिका इसे नहीं पसंद करता क्योंकि ये संगठन रूस के नजदीक रहा है। अमेरिका विरोध के बावजूद खामेनेई को उखाड़ फेंकने की कोशिश में ये संगठन लगा हुआ है।
दरअसल खामेनेई ने ही इस संगठन को कुचला था। धीरे-धीरे खुद को खड़ा करने के दौरान संगठन अमेरिका के संपर्क में भी आ गया। इस दल के नेता को अल्बानिया में स्थापित करने में अमेरिका ने अहम भूमिका निभाई। हालाँकि आज की तारीख में ये कहना काफी मुश्किल है कि संगठन ईरान की इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेंकने में सक्षम है।
ग्रीन मूवमेंट ईरान में 2009 में सुर्खियों में आया। राष्ट्रपति चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए संगठन ने आंदोलन चलाया। देश में लोकतांत्रिक सुधारों की बात करने वाला ये संगठन खामेनेई को सत्ता से हटाना चाहता है और अक्सर विरोध प्रदर्शन करता रहता है।
इस संगठन ने 2010 में बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। इस्लामिक राष्ट्र का विरोध करने के कारण इसके आंदोलन को दबा दिया गया और इसके नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आज की परिस्थिति में ये उम्मीद करना मुश्किल है कि ये संगठन ईरान में इस्लामिक सत्ता को हटा सकता है।

खामेनेई के विरोध में महिलाएँ

ईरान में इस्लामिक शासन के दौरान वर्षों से महिलाओं का दमन किया जाता रहा है। हिजाब के खिलाफ महिलाएँ सड़कों पर उतरती रही हैं और सरेआम इसे उतार कर फेंकती रही हैं। विरोध प्रदर्शन में हिजाब जलाना, खामेनेई की तस्वीर जलाकर ‘मुल्ला भाग जाओ’ का नारा बुलंद करना आम रहा है। अब इन महिलाओं को खामेनेई को सत्ता से हटाने का विकल्प सामने दिखने लगा है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस का बयान

इधर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान में सत्ता परिवर्तन पर बड़ा बयान दिया। उनका कहना है कि वो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहते हैं। वे सत्ता परिवर्तन नहीं चाहते।

अमेरिका और इजरायल के अलावा भी कई देश हैं जो खामेनेई को सत्ता से बेदखल होते हुए देखना चाहते हैं। इनमें इराक, सऊदी अरब, लेबनान, मिस्र जैसे पड़ोसी इस्लामिक देश भी शामिल हैं। दरअसल इन राष्ट्रों का झगड़ा शिया-सुन्नी को लेकर है। ईरान एकमात्र शिया इस्लामिक देश है, जबकि बाकी देश सुन्नी इस्लामिक राष्ट्र हैं।

क्या मुनीर ईरान के लिए पाकिस्तान के "मीर ज़फर" बनेंगे? क्योकि इधर मोदी से बात, उधर पलट गए ट्रंप: एक बार फिर लिया भारत-पाक सीजफायर को रोकने का श्रेय, आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर किस अधिकार से मुनीर से सौदा किया जा रहा है?


भारत के ऑपरेशन सिंदूर में हुए आक्रामक हमलों से पाकिस्तान अभी तक कराह रहा है। भारत से बचाने के लिए शहबाज-मुनीर अमेरिका, चीन और तुर्किए से गुहार लगा रहे हैं। आसिम मुनीर अपने कटोरा लेकर अमेरिका में ट्रंप को हाजिरी लगाने पहुंच चुके हैं, जबकि शहबाज शरीफ अगले हफ्ते ईरान जाने वाले हैं, जहां भीख में हथियार मांग सकते हैं। इस बीच मोदी सरकार ने साफ-साफ अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर पाकिस्तान ने अब सीजफायर तोड़कर हमले की हिमाकत दिखाई, तो इस दफा उसका संपूर्ण संहार तय है। जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत यह भी साफ कर दिया कि किसी भी तरह का आतंकी हमला भी ‘एक्ट ऑफ वार’ माना जाएगा। इसलिए भारत लगातार युद्धाभ्यास में जुटा है, जिससे पाकिस्तानी हुक्मरानों की घबराहट बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान पीएम मोदी की तासीर से अब बखूबी वाकिफ हो गया है, वे अंदर घुसकर मारने में यकीन रखते हैं। एकाधिक बार हुई सर्जिकल स्ट्राइक से उन्होंने यह साबित भी किया है। भारत का युद्धाभ्यास सीधा मुनीर-शहबाज को अल्टीमेटम है कि अगर सीजफायर तोड़ने की हिमाकत दिखाने की जुर्रत भी की, तो ऑपरेशन सिंदूर से भी बड़ा ऑपरेशन शुरू हो जाएगा क्योंकि टारगेट लॉक हो चुके हैं। काउंटडाउन शुरू हो जाएगा और उसके बाद पाकिस्तान का विनाश निश्चित है।

पीएम मोदी की नीति जो भारत को छेड़ेगा, उसको छोड़ा नहीं जाएगा
भारत युद्ध में पहल पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसका मानना है कि यह युद्ध का युग नहीं है, बल्कि भारत बुद्ध का देश है, जो शांति में विश्वास रखता है। लेकिन इसके साथ ही पीएम मोदी की नीति है कि जो भारत को छेड़ेगा, उसको छोड़ा नहीं जाएगा। भारत ने इसके लिए जबरदस्त तैयारी शुरू कर दी है। सेना की ताकत में इजाफा किया जा रहा है, जिससे एक साथ तीन देशों को काउंटर किया जा सके। यदि पाकिस्तान ने सीजफायर करने की हिमाकत की तो इस बार भारत ट्रिपल प्रहार करेगा। सबसे पहले पाकिस्तान को तबाह करेगा। इस दौरान उसे हथियार भेजने वाले चीन और तुर्किए को भी सबक सिखाने की तैयारी है। पाकिस्तान में लगे चीन के डिफेंस सिस्टम और उसके हथियार डिपो तबाह कर दिए जाएंगे। इसी तरह तुर्किए के ड्रोन और वॉरशिप को भी निशाने पर लिया जाएगा। पाकिस्तान की घबराहट की सबसे बड़ी वजह भारत के हाईटेक हथियार हैं, जिन्होंने 48 घंटे में ही पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था।

दूरदर्शी विजन और अत्याधुनिक हथियारों से दुश्मन को किया नाकाम
पीएम मोदी के दूरदर्शी विजन ने हमारी सेनाओं को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ही तीन हथियार ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल पहली बार किसी कॉम्बैट ऑपरेशन में किया गया, जिसमें वो शत-प्रतिशत सफल रहे। राफेल, जिससे पाकिस्तान और पीओके में आतंकी अड्डों को तबाह किया गया। दूसरा हथियार है ब्रह्मोस, जिसने पाकिस्तानी एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचाया और तीसरा हथियार है S-400, जिसने पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम किया। हालांकि एस-400 के साथ आकाश और स्पाइडर के अलावा दूसरे एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तानी ड्रोन और जेट के के हमलों को 100 फीसदी नाकाम किया था।

भारत के अभेद्य सुरक्षा कवच को और अधिक मजबूत करने की तैयारी
भारत के अभेद्य सुरक्षा कवच के पीछे मजबूत वजह में लॉन्ग रेंज डिफेंस सिस्टम एस-400 है, जिसकी रेंज 400 किमी है। मीडियम रेंज का डिफेंस सिस्टम आकाश और बराक-8 है। आकाश की रेंज 70 से 80 किलोमीटर है, जबकि इजराइल के सहयोग से तैयार किए गए बराक की रेंज 70 से 100 किमी है। इसके अलावा शॉर्ट रेंज डिफेंस सिस्टम स्पाइडर और इग्ला-S है। स्पाइडर की रेंज 20 से 30 किमी है, जबकि इग्ला की रेंज 10 से 15 किमी है। इन डिफेंस सिस्टम का चक्रव्यूह तैयार किया गया, जिसमें पाकिस्तान का हर ड्रोन, हर मिसाइल फंस कर तबाह हो गए। अब भारत अपनी इस रक्षा प्रणाली में और ज्यादा इजाफा करने जा रहा है, जिसमें एयर डिफेंस के लिए तीन नई मिसाइलें तैनात की जाएंगी, जबकि एस-400 के बाकी 7 सिस्टम इस साल के आखिर तक भारत को मिल जाएंगे। पीएम मोदी के कार्यकाल में ही साल 2018 में एस-400 की डील हुई थी, जिसमें से तीन भारत को मिल चुके हैं, बाकी जल्द मिल जाएंगे। ऐसे भी कयास हैं कि एस-400 को लेकर नए कंसाइनमेंट की डील हो सकती है।

इधर पीएम मोदी से की बात, उधर पलट गए ट्रंप: एक बार फिर लिया भारत-पाक सीजफायर को रोकने का श्रेय, आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर हो रहा सौदा 

भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर श्रेय लेने की कोशिश की है। उन्होंने कहा, “मैंने ही पाकिस्तान से वॉर को रुकवाया था। मुझे पाकिस्तान पसंद है, मैं सोचता हूँ मोदी भी शानदार व्यक्ति हैं।”

दरअसल, बुधवार (18 जून 2025) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान फौज के जनरल आसिम मुनीर ने व्हाइट हाउस में साथ में लंच किया। इसके बाद मीडिया से बातचीत की। इस दौरान ट्रंप ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ्ता कराने का दावा किया।

साथ ही आसिम मुनीर की तारीफ करते हुए कहा कि मध्यस्थता के दौरान पाकिस्तान ने भी काफी प्रभावी ढंग अपनाया। ट्रंप ने कहा कि इसमें आसिम मुनीर का खास नेतृत्व था। उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान न्यूक्लियर देश हैं, इसीलिए वॉर रुकवा दिया।

बता दें कि इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर 35 मिनट बात की थी। इस दौरान पीएम ने साफ कहा था कि भारत-पाकिस्तान सीजफायर में ट्रंप की कोई भूमिका नहीं थी। इसके बाद भी अब डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि उन्होंने दोनों देशों के बीच सीजफायर करवाया।