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ममता बनर्जी: संवैधानिक संस्थाओं के अपमान के बाद अब राष्ट्रपति का अपमान, चुनाव में मजा चखाएंगे आदिवासी


पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी अपनी मनमानी कार्यशैली और अकर्मण्यता से बाज नहीं आ रही हैं। उन्होंने पहले चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं की पुरजोर खिलाफत की है। इस बार तो राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद का खुलेआम अपमान किया है। ममता सरकार ने जानते-बूझते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर दिया है। इसके पीछे आदिवासी वोट बैंक को राष्ट्रपति से दूर रखने की सियासी रणनीति सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे राष्ट्रपति का ही नहीं, बल्कि संविधान का अपमान बताया है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना के आरोप लगे हों। इससे पहले भी उन्होंने कई बार केंद्रीय संस्थाओं और संवैधानिक पदों को लेकर तीखे बयान देकर अपमानित किया है। अब जब राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक सीमा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। पश्चिम बंगाल से उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक मतभेद चाहे कितने भी तीखे क्यों न हों, संवैधानिक मर्यादाओं से समझौता किसी भी सूरत में देश बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगकर उसकी हालत इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे तो खाई वाली कर दी है।

संवैधानिक मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसकी संवैधानिक मर्यादाओं में बसती है। इन मर्यादाओं का सबसे बड़ा प्रतीक देश का राष्ट्रपति पद होता है, जिसे संविधान ने राष्ट्र के प्रथम नागरिक का स्थान दिया है। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार या उसका मुखिया राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल की अनदेखी करता है, तो यह केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं के अपमान से जुड़ा विषय बन जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से जुड़ा विवाद इसी गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। सीएम ममता बनर्जी को यह समझना होगा कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के साथ टकराव का संदेश केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत है। जब संस्थाओं का सम्मान दांव पर लग जाता है, तो नुकसान केवल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होता है। संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मर्यादा और जिम्मेदारी भी दी है। यदि इन मर्यादाओं का सम्मान नहीं होगा, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होगी। इस पूरे विवाद की यही सबसे बड़ी चेतावनी है।

राष्ट्रपति के कार्यक्रम में ममता सरकार की उदासीनता और कुप्रबंधन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हालिया विवाद संवैधानिक प्रोटोकॉल के उल्लंघन से जुड़ा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रपति के सिलीगुड़ी दौरे पर थीं। ममता बनर्जी या उनके किसी भी मंत्री ने उनकी अगवानी नहीं की, जिसे राष्ट्रपति ने अपने पद और आदिवासी समुदाय के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने सार्वजनिक मंच से राज्य सरकार की उदासीनता और कार्यक्रम के कुप्रबंधन पर सवाल उठाए। तृणमूल सरकार की ओर से वह सम्मानजनक व्यवहार और औपचारिक व्यवस्था नहीं दिखाई गई, जो सामान्यतः राष्ट्रपति के दौरे के समय अनिवार्य मानी जाती है। ममता बनर्जी ने इस अक्षम्य गलती को मानने के बजाए, उल्टा राष्ट्रपति पर ही सवाल उठाकर आग में घी का काम किया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कार्यक्रमों के समन्वय और आयोजन को लेकर राज्य सरकार में आपसी मतभेद थे। ममता बनर्जी से गलती को स्वीकारने के बजाए उल्टे आरोप लगा दिए, जिससे यह मतभेद से बढ़कर एक संवैधानिक गतिरोध में बदल गया।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति पद का सम्मान करना अनिवार्य
अब गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में रिपोर्ट मांगे जाने से इस विवाद को और भी गहरा दिया है, जिससे केंद्र और पश्चिम बंगाल के बीच पहले से जारी तनाव एक नए स्तर पर पहुँच गया है। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख माना गया है। राष्ट्रपति केवल औपचारिक पद नहीं हैं, बल्कि वह राष्ट्र की एकता, गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक हैं। संसद का संचालन हो, सरकार का गठन हो या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कई संवैधानिक औपचारिकताएं, इन सभी में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण राष्ट्रपति के कार्यक्रमों और दौरों के दौरान राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करें। यह केवल प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का हिस्सा है। यदि किसी स्तर पर इस मर्यादा की अनदेखी होती है तो उसे केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जाता, बल्कि उसे संविधान के प्रति असम्मान के रूप में देखा जाता है।

ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता
राष्ट्रपति पद की गरिमा के कारण सार्वजनिक प्रतिक्रिया अक्सर संयमित होती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ममता सरकार की उदासीनता और लापरवाह कार्यशैली ने राष्ट्रपति की नाराजगी और असंतोष बढ़ा दिया है। यह असंतोष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति का पद किसी दल या सरकार से नहीं, बल्कि पूरे संविधान से जुड़ा होता है। जब इस पद से जुड़े प्रोटोकॉल की अनदेखी होती है, तो यह संकेत देता है कि राजनीतिक टकराव अब संवैधानिक मर्यादाओं तक पहुंच गया है। यही कारण है कि ममता बनर्जी सरकार की नीयत को लेकर देशभर में चिंता व्यक्त की जा रही है।

राष्ट्रपति का नहीं, संविधान और लोकतंत्र का अपमान- पीएम मोदी
इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यह केवल राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतंत्र का अपमान है। पीएम मोदी ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि आज देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है और कल बंगाल की टीएमसी सरकार ने महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू घोर अपमान किया है। राष्ट्रपति मुर्मू संथाल समुदाय के एक बड़े उत्सव में भाग लेने गई थीं, लेकिन टीएमसी सरकार ने इस आयोजन का बहिष्कार किया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति देश की एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च प्रतीक होते हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार उनके प्रोटोकॉल की अनदेखी करती है, तो यह पूरे राष्ट्र की संवैधानिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है।

आदिवासी समुदायों में ममता सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष
इस विवाद को केवल प्रोटोकॉल की चूक मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे आदिवासी राजनीति का पहलू भी जुड़ा हुआ है। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी समाज में एक नई राजनीतिक चेतना और सम्मान की भावना पैदा हुई है। ऐसे में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां आदिवासी आबादी महत्वपूर्ण है, वहां पर आदिवासी समुदाय के कार्यक्रम का बहिष्कार करना अपने आप में राजनीतिक भेदभाव का प्रतीक है। इसलिए भी देशभर के आदिवासी समुदायों में ममता बनर्जी सरकार के रवैये को लेकर घोर असंतोष व्याप्त है।

संघीय व्यवस्था का अपमान, प्रशासनिक भूल या राजनीतिक रणनीति
भारत एक संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद संवैधानिक पदों और संस्थाओं के सम्मान को लेकर एक साझा मर्यादा कायम रहती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में आए दिन इसकी धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। वह कभी राज्यपाल से टकरा जाती हैं तो कभी अदालतों के निर्णयों पर सवाल उठाती फिरती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी हो जाए कि वह संवैधानिक शिष्टाचार को ही चुनौती देने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि लगातार संवैधानिक संस्थाओं के साथ टकराव की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यह केवल भूल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है। लोकतंत्र की असली ताकत उसके संस्थानों में विश्वास से आती है। यदि राजनीतिक दल और सरकारें इन संस्थानों का सम्मान नहीं करेंगी, तो जनता के बीच भी उनका विश्वास कमजोर होगा। राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका जैसे पद और संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। इनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई भी कुत्सित प्रयास अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की नापाक कोशिश है।

चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों पर ममता के लगातार हमले
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वभाव में आक्रामकता दिखाई है। लेकिन सवाल तब उठता है जब यह आक्रामकता संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच जाती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन संस्थाओं के सम्मान की एक सीमा भी होती है। यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी पर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान किया हो। इससे पहले चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उनका टकराव चुनाव आयोग से भी हो चुका है। उन्होंने कई मौकों पर चुनाव आयोग के निर्णयों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खुलकर आलोचना की थी। इसी प्रकार ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कई बार केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ भी मुखर रही है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से ईडी और सीबीआई की कार्रवाइयों पर सवाल उठाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के छापों के दौरान भी मुख्यमंत्री ने अनाश्यक दखलंदाजी की और महत्वपूर्ण फाइलों को उठाकर ले गईं। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह संवैधानिक संस्था की सार्वजनिक अवमानना करनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी को सत्ता–संरक्षण देने के भंवर में फंस गई है। इस साल की शुरुआत में 8 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।

फिर निकल आया कार्टून जिन्न : तुर्की की पत्रिका ने बनाया मोहम्मद वाला कार्टून, भड़क गए इस्लामी कट्टरपंथी: कहा- पैगम्बर का किया अपमान, 3 कार्टूनिस्ट गिरफ्तार

                      तुर्की में लेमन पत्रिका के कार्टून को लेकर बवाल ( फोटो साभार-turkiyetoday.com/ )
2015 में फ्रांस गैर-मुस्लिम देश में व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ द्वारा विवादित कार्टून प्रकाशित होने खूब दंगे हुए, दंगों का अखाडा भारत कैसे पीछे रहता। लेकिन अब इतने सालों बाद कार्टून का जिन्न मुस्लिम देश तुर्की में निकल आया है। देखना यह है कि अब कितने दंगाई निकल कर आते हैं?     

तुर्की की साप्ताहिक व्यंग्य पत्रिका लेमन इन दिनों सुर्खियों में है। वजह है इसमें छपा कार्टून। दरअसल कार्टून में ‘मुहम्मद’ और ‘मूसा’ नाम के दो व्यक्तियों को आसमान में हाथ मिलाते दिखाया गया है और नीचे जमीन जल रही है। मुस्लिम कट्टरपंथियों का आरोप है कि ये पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा हैं।

इसके बाद मुस्लिम बहुल देश की भावनाएँ भड़क गई और देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होने लगे। इस मामले में पुलिस ने तीन कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें कार्टूनिस्ट डोगन पेहलवान और पत्रिका के प्रबंध संपादक और प्रमुख संपादक शामिल हैं।

तुर्की के कानून मंत्री यिलमाज तुनक ने जून 30 को कहा कि तुर्की के अधिकारियों ने पत्रिका लेमन के खिलाफ़ आपराधिक जाँच शुरू कर दी है। तुनक ने अपने बयान में कहा कि इस्तांबुल के पुलिस कार्यालय ने तुर्की दंड संहिता की धारा 216 के तहत जाँच शुरू की है, जो “सार्वजनिक रूप से मजहबी मूल्यों का अपमान करने” से संबंधित है।

क्या है मामला?

पत्रिका के 26 जून के अंक में छपे कार्टून में इज़राइल और ईरान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष का संदर्भ दिया गया था और इसमें पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा को बमबारी से तबाह हुए शहर के ऊपर हाथ मिलाते हुए दिखाया गया था। कार्टून में नीचे जमीन पर जलता शहर और मिसाइलें दिखाई गई हैं।

पत्रिका का कहना है कि इस कार्टून का मकसद इजरायली हमले के दौरान ईरान में मारे गए एक मुस्लिम व्यक्ति की पीड़ा उजागर करना है। उसका नाम कार्टून में ‘मुहम्मद’ रख दिया गया है।

पत्रिका के प्रमुख संपादक तुन्के अकगुन ने एएफपी से बात करते हुए कहा है, “इस कार्टून में दिये गए नाम मुहम्मद का पैगंबर मुहम्मद से कोई लेना देना नहीं है। मुहम्मद नाम से करोड़ों लोग दुनियाभर में रहते हैं। ” पत्रिका ने कहा कि कार्टून का उद्देश्य धार्मिक मूल्यों का मजाक उड़ाना नहीं था।

इस्तांबुल में लेमन के कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन

कार्टून को तुर्की में धार्मिक भावनाओं का अपमान माना गया और कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर उतर आए। इस्तांबुल के इस्तिकलाल स्ट्रीट पर लेमन की इमारत के सामने कई प्रदर्शनकारी एकत्र हुए। कुछ लोग लेमन के कार्यालय में घुसने की कोशिश करते देखे गए।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लेमन पत्रिका ने पैगंबर मुहम्मद का खुलेआम अपमान किया है। इस अपमान को कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता।

ऐसा ही एक मामला 2015 में फ्रांस में सामने आया था। उस वक्त भी मामला पैगंबर मुहम्मद के कार्टून का ही था। जब व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के कार्यालय में घुस कर मुस्लिम कट्टरपंथियों ने फायरिंग की थी। इसमें संपादक समेत 12 लोगों की मौत हो गयी थी।

कोविड के नाम पर चंदा इकट्ठा कर उस पर मौज मस्ती करने वाली मुस्लिम कट्टरपंथी राणा अयूब माता सीता, वीर सावरकर, भारतीय सेना… सबको गाली देने वाली पर दिल्ली की कोर्ट ने FIR का दिया आदेश

हिजाब का समर्थन करने वाली की ड्रैस 
हिन्दुओं के खिलाफ लगातार घृणा फ़ैलाने वाली राणा अयूब के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। यह FIR हिन्दू देवी-देवताओं के अपमान और भारत विरोधी माहौल बनाने के लिए दर्ज की गई है। FIR दर्ज करने का आदेश दिल्ली की एक अदालत ने दिया था, इसके बाद दिल्ली पुलिस ने यह कार्रवाई की।

दिल्ली की साकेत कोर्ट ने राणा अयूब के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश सोमवार (27 जनवरी, 2025) को दिया है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट में वकील अमिता सचदेव की एक याचिका पर दिया गया।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “तथ्यों को देखते हुए, शिकायत में संज्ञेय अपराध की बात सामने आई है और इसके लिए FIR दर्ज करना आवश्यक है। धारा 156(3) CRPC के तहत यह आवेदन मंजूर किया जाता है। SHO साइबर पुलिस स्टेशन, दक्षिण को निर्देश दिया जाता है कि शिकायत को FIR में बदल दें और मामले की निष्पक्ष जाँच करें।”

अमिता सचदेव का कहना था कि वह 2 महीने से विषय में कार्रवाई की माँग कर रही हैं लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। इसके बाद वह अदालत पहुँची थी। कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने साइबर थाने में राणा अयूब के खिलाफ अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

अमिता सचदेव ने इस मामले में नवम्बर, 2024 में राणा अयूब के खिलाफ साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करवाई थी। अमिता सचदेव का आरोप है कि राणा अयूब ने लगातार अपने एक्स अकाउंट से भारतीय सेना और हिन्दू धर्म के खिलाफ लगातार अपमानजनक पोस्ट किए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि अयूब के ट्वीट के चलते देश में नफरत का माहौल पनपता है।

राणा अयूब लगातार माता सीता, रामायण और महाभारत को लेकर अपमानजनक ट्वीट करती आई है। वह भारतीय सेना का अपमान भी करती आई हैं। ऐसे कई पोस्ट पर लोगो ने सोशल मीडिया पर आपत्ति भी जताई है। इससे पहले भी राणा अयूब के खिलाफ कई FIR हो चुकी है।

राणा अयूब के खिलाफ कोविड के नाम पर चंदा इकट्ठा कर उसे अपनी मौज मस्ती में लगाने का आरोप भी है। इस मामले में उसकी ₹1.7 करोड़ की सम्पत्ति भी ED ने जब्त की थी।