Showing posts with label #Rana Ayyub. Show all posts
Showing posts with label #Rana Ayyub. Show all posts

US Federal Court ने चीनी जालसाज को दी 30 साल की सजा, पश्चिमी मीडिया बताता था ‘बागी’: जानें गुओ वेनगुई की कहानी और जालसाज़ राणा अय्यूब के साथ उसकी समानताएँ

                                               गुओ वेनगुई और राणा अय्यूब (फोटो साभार: Opindia)
चीन का एक भगोड़ा अरबपति गुओ वेनगुई (जिसे हो वान क्वोक, गुओ माइल्स, माइल्स क्वोक और “ब्रदर सेवन” जैसे कई नामों से जाना जाता है) कई सालों तक पश्चिमी मीडिया के बीच एक नायक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विरोधी बागी के रूप में ऐश की जिंदगी जी रहा था। गुओ वेनगुई ने पश्चिम में इस दावे के दम पर अपने लाखों समर्थक बना लिए थे कि ‘चीनी सरकार मेरे पीछे पड़ी है’। लेकिन आखिरकार अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उसे अपने ही समर्थकों से 1 अरब डॉलर (करीब 83 अरब रुपए) से ज्यादा की धोखाधड़ी का दोषी पाया। 29 जून 2026 को फेडरल कोर्ट ने गुओ वेनगुई को 30 साल जेल की सजा सुनाई।

धोखाधड़ी के आरोप और गुओ वेनगुई का चीन से पलायन

इस अभियान में वेनगुई के साथी, जिनमें पूर्व खुफिया अधिकारी मा जियान भी शामिल थे, निशाने पर आए। गुओ वेनगुई उर्फ गुओ माइल्स ने चीनी अधिकारियों की इस कार्रवाई को एक राजनीतिक साजिश बताया। उसने दावा किया कि चीनी सरकार के बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के कारण उसे निशाना बनाया जा रहा है।

भागने के शुरुआती सालों में चीनी अधिकारियों ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया और उसके खिलाफ इंटरपोल नोटिस भी जारी कराया। चीन सरकार ने उस पर रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, अपनी पूर्व सहायक के साथ बलात्कार, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे।

हांगकांग समेत कई जगहों पर वेनगुई की संपत्तियाँ सील कर दी गईं। चीन ने अमेरिका से इस जालसाज को वापस सौंपने की माँग भी की थी।

चीन में धोखेबाज, पश्चिम में बागी: बिकाऊ मीडिया की मदद से कैसे बनाई ‘एक्टिविस्ट’ की छवि

खुद को देश से बाहर रखने के दौरान गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े आलोचक के रूप में खुद को नए सिरे से पेश किया। वेनगुई ने अमेरिका सरकार की फंडिंग से चलने वाले वॉयस ऑफ अमेरिका (VoA), बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स और फोर्ब्स सहित कई बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों को इंटरव्यू दिए। वह कई ऑडियो पॉडकास्ट में भी शामिल हुआ।
अमेरिकी मीडिया एक्जीक्यूटिव, इन्वेस्टमेंट बैंकर और व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ मिलकर गुओ वेनगुई ने ‘जीटीवी’ (GTV) नाम की एक मीडिया कंपनी बनाई।
साल 2018 में, स्टीव बैनन और गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) की स्थापना की, जिसका नाम उसने ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ (Rule of Law Society) रखा। शुरुआत में इस संस्था को गुओ वेनगुई की तरफ से 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया था।
हालाँकि जब इस संस्था के पैसों की जाँच शुरू हुई और दस्तावेज देने से इनकार किया गया, तो स्टीव बैनन ने 2021 में ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।
इस जोड़ी ने साल 2020 में एक लग्जरी नाव (याट) से ‘न्यू फेडरल स्टेट ऑफ चाइना’ की घोषणा की और गुओ ने दावा किया कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंकेगा। गुओ के मीडिया वेंचर्स पर कोविड की शुरुआत और अमेरिकी राजनीति को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप भी लगे और आलोचना हुई।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने वाले अपने इस ‘एक्टिविज्म’ और मीडिया इंटरव्यूज के जरिए गुओ वेनगुई ने विदेशों में रहने वाले चीनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधियों के बीच अपने कट्टर समर्थक तैयार कर लिए। वेनगुई ने अपने इस फर्जी एक्टिविज्म को ‘लोकतंत्र और चीनी तानाशाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध’ के रूप में पेश किया।
जनवरी 2025 में इस 1 अरब डॉलर के घोटाले में भूमिका के लिए गुओ की सहयोगी यवेट वांग को भी 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, पश्चिमी मीडिया और मशहूर हस्तियों ने गुओ वेनगुई को एक हीरो की तरह पेश किया। आखिरकार अमेरिकी प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए ‘चीनी सरकार की प्रताड़ना’ का शिकार बने एक चीनी अरबपति से बेहतर और क्या हो सकता था। अमेरिका में गुओ के आगे बढ़ने की वजह चीन विरोधी आवाजों को मिलने वाला खुला समर्थन था, शायद इसी वजह से शुरुआत में उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई।
चूँकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी विरोधियों की आवाज दबाने के लिए जानी जाती है, इसलिए पश्चिम के लोगों को वेनगुई की मनगढ़ंत कहानी बिल्कुल सच लगी।

गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने हजारों फॉलोअर्स को कैसे ठगा, अमेरिकी अधिकारियों ने किया खुलासा

गुओ वेनगुई को मार्च 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इंटरनेट पर अपने हजारों फॉलोअर्स से 1 अरब डॉलर की ठगी करने की बड़ी साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह धोखाधड़ी जीटीवी (GTV) के प्राइवेट शेयर, लोन, जी|क्लब्स (G|CLUBS) की मेंबरशिप, हिमालय फार्म और ‘हिमालय कॉइन/एक्सचेंज’ नाम की क्रिप्टोकरेंसी के जरिए की गई थी।

सरकारी वकीलों ने आरोप लगाया कि गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने अपने चीन विरोधी ‘आंदोलन’ से जुड़े निवेशों पर भारी मुनाफे का वादा किया था। इसके बाद उसने इन पैसों में से करोड़ों डॉलर अपनी निजी विलासिता पर उड़ा दिए। उसने 50,000 वर्ग फुट का एक महल जैसा बंगला, एक फेरारी, 4.4 मिलियन डॉलर की बुगाटी स्पोर्ट्स कार, 37 मिलियन डॉलर की एक लग्जरी नाव (याट) और बेहद महँगे गद्दे खरीदे।

गुओ ने लंदन में रहने वाले अपने बिजनेस पार्टनर किम मिंग जे के साथ मिलकर हेज फंड में निवेश किया, 10 लाख डॉलर के कालीन और 1,40,000 डॉलर का पियानो खरीदने जैसी फिजूलखर्ची की।

अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ‘अफ़िनिटी फ्रॉड’ (भरोसे की धोखाधड़ी) कहा, क्योंकि गुओ ने अपनी चीन विरोधी छवि का इस्तेमाल करके अपने फॉलोअर्स के भरोसे का गलत फायदा उठाया था।

गुओ की हरकतों की जाँच से पता चला कि उसने चुराए गए करोड़ों डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग की ताकि अपनी इस अवैध साजिश को छुपा सके और धोखाधड़ी का धंधा चालू रख सके।

साल 2021 में माइल्स गुओ उर्फ हान वो क्वोक ने अवैध रूप से फंड जुटाने के एक मामले में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ 539 मिलियन डॉलर का समझौता किया था।

जुलाई 2024 में गुओ को जालसाजी की साजिश, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सिक्योरिटीज धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग समेत 12 में से 9 मामलों में दोषी ठहराया गया।

आखिरकार 29 जून 2026 को गुओ वेनगुई उर्फ हान वो क्वोक को 30 साल जेल की सजा सुनाई गई और 889 मिलियन डॉलर जब्त करने का आदेश दिया गया। फैसला सुनाते समय फेडरल जज ने कहा कि गुओ वेनगुई ने उन लोगों को अपना शिकार बनाया जो चीन में लोकतंत्र चाहते थे।

मुकदमे के दौरान भी गुओ वेनगुई खुद को पीड़ित बताता रहा और उसके बचे हुए समर्थकों का दावा है कि अमेरिकी आरोप चीनी सरकार के इशारे पर लगाए गए हैं ताकि उसकी आवाज दबाई जा सके। हालाँकि वकीलों ने गुओ के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए सबूत उसके फॉलोअर्स के साथ की गई वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं, न कि किसी मनगढ़ंत राजनीतिक आरोपों से।

गुओ वेनगुई चीन में अपने कथित घोटाले की कानूनी आँच से बचकर अमेरिका भागा, पश्चिमी मीडिया की मदद से खुद को हीरो साबित करने की कहानी रची, प्रताड़ना का रोना रोया, अपनी इस ‘हीरो’ वाली कहानी को बेचकर पैसे कमाए, लोगों का ध्यान और फॉलोअर्स खींचे, और फिर उसी मंच और फॉलोअर्स के भरोसे का इस्तेमाल एक बहुत बड़े घोटाले के लिए किया।

यह याद रखना भी दिलचस्प है कि गुओ वेनगुई ने अगस्त 2019 में भविष्यवाणी की थी कि अलीबाबा के संस्थापक जैक मा या तो जेल जाएँगे या मारे जाएँगे, क्योंकि चीनी सरकार जैक मा के ‘एएनटी ग्रुप’ (ANT Group) को ‘वापस लेना यानी हड़पना’ चाहती है।

झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़ना, विदेश में नापसंद की जाने वाली सरकार या विचारधारा पर हमला करके फॉलोअर्स जुटाना, लोगों को ठगना और जब जवाबदेही की बारी आए तो किसी तानाशाह या फासीवादी शासन द्वारा ‘राजनीति से प्रेरित प्रताड़ना’ का रोना रोना—गुओ वेनगुई का यह मामला वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब की याद दिलाता है।

राणा अय्यूब: भारत की गुओ वेनगुई?

राणा अय्यूब को 2016 में खुद से प्रकाशित की गई किताब ‘गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर-अप’ से काफी चर्चा मिली थी। उनका दावा था कि यह किताब 2010 में गुजरात के अधिकारियों की की गई अंडरकवर रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों के बाद मामलों को दबाने और एनकाउंटर की बात ‘कबूल’ की थी।

अय्यूब की तत्कालीन कंपनी ‘तहलका’ ने कहानी अधूरी होने और अन्य संपादकीय कमियों का हवाला देते हुए इसे छापने से मना कर दिया था। हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहान ने खुलासा किया था कि उन्होंने तहलका के मंच पर इन टेपों को चलाने का ऑफर दिया था, लेकिन राणा अय्यूब ने मना कर दिया था।

इस पत्रकार ने दंगों के इर्द-गिर्द अपनी पक्षपातपूर्ण और बेतुकी पत्रकारिता के जरिए खुद को ‘हिंदुत्ववादियों के अत्याचार के खिलाफ एक निडर आवाज’ के रूप में स्थापित कर लिया।

नरेंद्र मोदी के खिलाफ लंबे समय से एजेंडा चला रहीं राणा अय्यूब को तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों पर लिखी उनकी इस तथाकथित ‘खोजी’ किताब को कूड़ेदान में डाल दिया।

अय्यूब की किताब में एक इशारा यह भी था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की साजिश रची थी, जिनकी 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

निचली अदालत ने हरेन पंड्या की हत्या में मुख्य आरोपी असगर अली समेत 12 मुस्लिम पुरुषों को दोषी पाया था। सीबीआई जाँच के मुताबिक, यह हत्या गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए मुफ्ती सूफियान नाम के एक मुस्लिम मौलवी के इशारे पर की गई थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने सीबीआई की ‘खराब जाँच’ का हवाला देते हुए इन लोगों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आपराधिक साजिश और हत्या के प्रयास के आरोप बरकरार रखे थे।

सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने आखिरकार निचली अदालत के मूल फैसले को सही ठहराया।

अय्यूब के ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (मुसलमानों को पीड़ित दिखाने) के एजेंडे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही में राणा अय्यूब की किताब ‘गुजरात फाइल्स’ पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस किताब को फटकारते हुए कहा कि यह सिर्फ अनुमानों, अटकलों और कयासों पर आधारित है।

असल में राणा अय्यूब की किताब के दावे इतने संदिग्ध हैं कि धुर-वामपंथी (लेफ्ट विंग) पब्लिकेशंस ने भी इसे छापने से मना कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार अय्यूब को इसे खुद ही पब्लिश करना पड़ा। यह किताब एक कथित स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इसके वीडियो जारी नहीं किए।

अपनी इस तथाकथित प्रसिद्धि के बाद से, राणा अय्यूब लगातार विदेशी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्प्रचार में लगी रही हैं। सीएए विरोधी शाहीन बाग प्रदर्शन, 2020 के दिल्ली दंगे, कोविड महामारी के दौरान सरकार विरोधी दुष्प्रचार, हर मुद्दे में मुस्लिम उत्पीड़न का एंगल घुसाना, ‘भारतीय सेना कश्मीरी लड़कों को प्रताड़ित कर रही है’ जैसे झूठ फैलाना, 2015 में रानाघाट में एक नन के साथ हुए बलात्कार के लिए आरएसएस और ‘हिंदू आतंकवादियों’ को जिम्मेदार ठहराना राणा अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ हमेशा एजेंडा और भाजपा-आरएसएस के विरोध पर टिकी रही है।

उनके इस दुष्प्रचार ने उन्हें वामपंथी और कुछ खास विचारधारा वाले हलकों में लोकप्रिय बना दिया। लेकिन जो बात राणा अय्यूब को गुओ वेनगुई के जैसा बनाती है, वह है कोविड के नाम पर चंदा जुटाने का कथित घोटाला, जिसे अंजाम देने का उन पर आरोप है।

जब भारत कोविड महामारी से जूझ रहा था, तब राणा अय्यूब ने ‘केटो’ (Ketto) प्लेटफॉर्म पर 3 क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए 2,69,50,695 रूपए की भारी-भरकम रकम जुटाई थी।

राणा को मिले हुए 2.69 करोड़ रूपए में से लगभग 80,49,856 रूपए विदेशी मुद्रा में प्राप्त हुए थे, जो फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) 2010 का सीधा उल्लंघन था।

राणा अय्यूब ने कोविड राहत कार्य के लिए मिलने वाले इस चंदे को अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख के बैंक खाते में 1.60 रूपए करोड़ और अपनी बहन इफ्फत शेख के खाते में 37.15 लाख रूपए ट्रांसफर करवाए।

इसके बाद राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से 84.40 लाख रूपए और अपनी बहन के खाते से 36.40 रूपए लाख अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए। कुल मिलाकर करीब 1,20,80,000 रूपए राणा अय्यूब के निजी खाते में भेजे गए।

हैरानी की बात यह है कि अप्रैल 2022 में उन्होंने इतनी बड़ी रकम के हेरफेर को ‘महज 20,000 डॉलर की छोटी सी रकम’ कहकर टालने की कोशिश की, जबकि असल में यह रकम 2.69 करोड़ रूपए (लगभग $3,14,500) थी।

जुलाई 2025 के अपने आदेश में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने साफ कहा कि चंदे के तौर पर जुटाए गए पैसों में से करीब 2.4 करोड़ रूपए का अभियान के एक साल बाद भी कोई इस्तेमाल नहीं किया गया था।

अदालत ने कहा, “जिस खाते से करदाता या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा पैसे निकाले गए, वह एक पर्सनल सेविंग अकाउंट (निजी बचत खाता) था। इसके अलावा, कोई राहत कार्य करने के बजाय, करदाता ने एक नया करंट अकाउंट खोला और अपने नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर लिया और उसी सेविंग अकाउंट से अपने निजी खर्चे भी किए जिसमें चंदे का पैसा आया था।”

अय्यूब ने आयकर विभाग के सामने दावा किया था कि 2.69 करोड़ रूपए में से एक ‘छोटा हिस्सा (28 लाख रूपए)’ प्रवासी मजदूरों को घर भेजने, राशन खरीदने, इलाज, परिवहन और पश्चिम बंगाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किया गया था।

उन्होंने 19 लाख रूपए अपने ‘निजी खर्चों’ को पूरा करने में उड़ा दिए। यह भी सामने आया कि इस विवादित ‘पत्रकार’ ने कोविड राहत कार्य के लिए मिले पैसों में से 50 लाख रूपए की अपने नाम पर पर्सनल फिक्स डिपॉजिट (FD) करवा ली थी।

आयकर विभाग ने सवाल उठाया कि अगर अय्यूब की कोई गलत नीयत नहीं थी, तो उन्होंने अपने निजी नाम पर 50,00,000 रूपए की एफडी रसीदें क्यों खरीदीं?

जाँच में पता चला कि केटो पर पहले अभियान के जरिए राणा अय्यूब को मिले 1.23 करोड़ रूपए में से राहत कार्य के लिए सिर्फ 18 लाख रूपए का इस्तेमाल किया गया था। अपने बचाव में अय्यूब ने दावा किया कि बचे हुए पैसे ‘अस्पताल बनाने के लिए रिजर्व’ रखे गए थे।

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि राणा अय्यूब ने एफसीआरए (FCRA) 2010 का उल्लंघन किया है, क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट की यह ‘पत्रकार’ एफसीआरए की धारा 3(1)(h) के तहत विदेशी चंदा पाने की हकदार ही नहीं है।

अय्यूब ने समर्थकों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों से कोविड राहत के नाम पर चैरिटी के लिए पैसे जुटाए, लेकिन चैरिटी के लिए इन पैसों के इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं मिला। इस विवादित ‘पत्रकार’ ने दान का पैसा अपने रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराया और कथित सामाजिक कार्यों के लिए कोई अलग खाता तक नहीं रखा।

इससे पहले, फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अय्यूब की 1.77 करोड़ रूपए की संपत्ति कुर्क की थी। वह जाहिर तौर पर अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करती हैं और इसे अपनी आवाज दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित उत्पीड़न बताती हैं।

चूंकि राणा अय्यूब की पत्रकारिता के नाम पर किए जाने वाले इस एक्टिविज्म और चंदे की धोखाधड़ी के आरोपों के कारण पश्चिमी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स ने भी उनसे दूरी बना ली, फिर भी उन्हें विदेशी वामपंथी और कुछ राजनीतिक हलकों में नियोक्ता और समर्थक मिल गए, जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के विरोधी हैं।

मुस्लिम पीड़ित का नैरेटिव VS सच्चाई: ओलंपियन शाहिद के घर पर कार्रवाई ‘मुआवजा’ और ‘सहमति’ से हुई, फिर भी लिबरल-वामपंथी और सपा-कांग्रेसी गैंग ने फैलाया प्रोपेगेंडा

ओलंपिक विजेता हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद के घर बुलडोजर से ढहाने पर लिबरल-वामपंथी-विपक्ष और इस्लामी कट्टरपंथी ने खूब रोना रोया
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ओलंपिक पदक विजेता और पद्मश्री से सम्मानित हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद के पुश्तैनी मकान पर बुलडोजर चलाया गया। प्रशासन ने कहा कि पुलिस लाइन से कचहरी तक सड़क चौड़ीकरण किया जा रहा है और इसी कड़ी में 13 मकानों को गिराने की कार्रवाई हुई।

इन्हीं मकानों की सूची में मोहम्मद शाहिद का घर भी शामिल था। अब मोहम्मद शाहिद के घर ढहाने को लेकर लिबरल-वामपंथी गैंग ने जबरन विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्षी दलों और लिबरल-वामपंथी गैंग ने बुलडोजर की इस कार्रवाई को बीजेपी सरकार के खिलाफ मुद्दा बना लिया और इसे ‘मुस्लिम पीड़ित’ के नैरेटिव से जोड़कर खूब प्रचारित किया।

मोहम्मद शाहिद के घर पर बुलडोजर चलाने का विरोध

विपक्ष ने बीजेपी को ‘जुल्मी सरकार’ बताते हुए ‘नाइंसाफी’ करने के इल्जाम लगाए, जो उनकी नजर में ‘अमानवीय’ तरीके से बुलडोजर कार्रवाई कर रही है। इस्लामी कट्टरपंथियों यहाँ ‘मुस्लिम पीड़ित’ का राग अलापने लग गए। दलितों के हितैषी बनने वाले चंद्रशेखर आजाद ने बीजेपी पर खिलाड़ियों का अपमान करने का आरोप लगाते हुए परिवार को मुआवजा देने की माँग की।

समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, “जुल्म करनेवाले न भूलें नाइंसाफी की भी एक उम्र होती है।” उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा, “पूरा घर जमींदोज कर दिया। ये सिर्फ एक घर नहीं था बल्कि देश की खेल विरासत की पहचान थी। काशी की धरती पर प्रतिभाओं और सम्मानित विभूतियों का अपमान करने वाली भाजपा सरकार को जनता माफ नहीं करेगी।”

कांग्रेस नेता मोहम्मद वसीम ने ‘देश में मुसलमानों की हालत’ पर सवाल उठाए। इस्लामी कट्टरपंथी भी विरोध की इस दौड़ में पीछे नहीं रहे और योगी सरकार से मोहम्मद शाहिद के घर ढहाने के पीछे कारण पूछा। एक X यूजर मंजर हुसैन ने लिखा, “एक राष्ट्रीय नायक का घर अब मलबे में पड़ा है। सीएम योगी, कोई जवाब है?”

लिबरल-वामपंथी और कट्टरपंथी संगठनों का शोर

मामले को हवा देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और लिबरल पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर भी मोर्चा खोला। X पर मोहम्मद शाहिद के घर बुलडोजर चलाने के कई वीडियो पोस्ट किए गए। इनमें एक वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति पुलिस अधिकारी के हाथ जोड़कर रहा है। इस वीडियो को लिबरल गैंग और इस्लामी मीडिया ने गलत संदर्भों के साथ जमकर वायरल किया।

राणा अय्यूब ने अपने X अकाउंट पर ये वीडियो पोस्ट कर लिखा, “उत्तर प्रदेश में, हॉकी के दिग्गज मोहम्मद शाहिद का घर उन 13 घरों में से एक था जिन्हें बुलडोजर से गिरा दिया गया। क्या आपको उन लोगों की चुप्पी सुनाई दे रही है जिन्हें बोलना चाहिए?”

कांग्रेस इकोसिस्टम भी मोहम्मद शाहिद के घर पर बुलडोजर चलाए जाने का विरोध करता नजर आया है। खुद को ‘गाँधीवादी’ बताने वाले सैयद फैसल इकबाल कहते हैं, “अगर यह इस्लामोफोबिया नहीं है, तो और क्या है? जब एक राष्ट्रीय नायक के परिवार को भी नहीं बख्शा जाता और जिन्हें बोलना चाहिए वे चुप रहते हैं – तो उनकी चुप्पी मिलीभगत है।”

यहाँ तक की अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद, लुटियन्स मीडिया ने भी इस वीडियो को पोस्ट कर बीजेपी सरकार पर आरोप लगाते हुए ‘मुस्लिम-विरोधी होने की छवि पेश की’ और सोशल मीडियो पर लोगों की सहानूभूति बँटोरी।

इसी तरह वाराणसी की एक प्रशासनिक कार्रवाई विपक्ष और लिबरल-वामपंथी के लिए बीजेपी सरकार को घेरने का नया मुद्दा बन गई। वो भी बिना किसी असलियत के ज्ञान के, यही लोग जो सरकार पर विकास को लेकर सवाल उठाते हैं और धर्म की राजनीति का आरोप लगाते हैं। यहाँ साफ नजर आता है कि धर्म की राजनीति कहाँ से आती है और कैसे मुस्लिम-विरोधी प्रोपेगेंडा को हवा दी जाती है।

लिबरल-वामपंथी गैंग को आखिर चिंता किस बात की है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरे विवाद में जितने लिबरल, वामपंथी, इस्लामी कट्टरपंथी और कांग्रेसी हंगामा मचा रहे हैं, उन्हें असल में चिंता किस बात की है? क्योंकि मोहम्मद शाहिद की बीवी परवीन को इस कार्रवाई पर कोई आपत्ति नहीं है। मीडिया से बात करते हुए परवीन ने साफ कहा कि प्रशासन से उन्हें मुआवजा मिल चुका है और वे इस कार्रवाई से सहमत हैं। परवीन ने यह भी कहा, “सिर्फ हमारा घर नहीं बल्कि इलाके में दूसरे मकान भी तोड़े गए हैं।”

इतना ही नहीं घर के कुल 9 हिस्सेदारों में से 6 लोगों को बाकायदा मुआवजा दिया जा चुका है। यानि परिवार के भीतर से विरोध की कोई आवाज नहीं उठी लेकिन बाहर बैठे कथित सेक्युलर जमात और ‘खेल विरासत’ का रोना रोने वाले नेताओं को यह मौका मिल गया कि वे सरकार पर इल्जाम लगाने लगें। सवाल ये है कि जब परिवार खुद संतुष्ट है तो यह लिबरल-वामपंथी जमात क्यों मातम मना रही है?

मुस्लिम व्यक्ति का घर तोड़ा गया?

यहाँ एक और बड़ा झूठ फैलाया गया कि केवल मोहम्मद शाहिद का घर तोड़ा गया क्योंकि वो एक मुस्लिम हैं और सरकार मुस्लिम-विरोधी है। जबकि असलियत यह है कि पुलिस लाइन से कचहरी तक सड़क परियोजना के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए 13 मकानों को ध्वस्त किया गया। इन्हीं में मोहम्मद शाहिद का घर भी शामिल था। यानि प्रशासन ने किसी मुस्लिम को टारगेट नहीं किया बल्कि योजना के मुताबिक सभी 13 मकान तोड़े, न कि धर्म के आधार पर।

और हाँ, योगी सरकार का बुलडोजर हमेशा कानून के दायरे में ही चलता है। इस मामले में भी परिवार को पहले ही नोटिस दिया गया था। उस नोटिस में साफ-साफ लिखा था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए जिन हिस्सों की जरूरत है, उन पर मालिकों की सहमति ली जा चुकी है। अब जब परिवार सहमत था और मुआवजा भी मिल चुका था तो फिर ‘जुल्म’ और ‘नाइंसाफी’ का झूठा नैरेटिव खड़ा करने का क्या औचित्य है?

पूरा घर जमींदोज नहीं, केवल एक हिस्सा गिराया

जहाँ तक पूरा घर जमींदोज करने की बात है और वायरल वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति के गिड़गिड़ाने की बात है। तो PWD ने साफ कहा है कि चार मंजिला घर का केवल एक हिस्सा गिराया गया है और उनको मुआवजा दिया जा चुका है।

सरकार ने मुआवजा पहले ही दे दिया है। मोहम्मद शाहिद के घर में 9 हिस्सेदार बताए गए। इनमें से 6 को मुआवजा दे दिया गया जबकि बाकी 3 अलग-अलग वजहों से पैसा लेने से इनकार कर दिया। प्रशासन ने अपनी कार्रवाई के दौरान केवल उसी हिस्से को ढहाया जिसे मुआवजा मिल गया था। जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया, उनके हिस्से को नहीं छेड़ा गया है।

यानी विपक्ष और लिबरल मीडिया का यह आरोप भी पूरी तरह झूठा है कि ‘पूरा घर जमींदोज’ कर दिया गया। सच यही है कि प्रशासन ने सिर्फ उतना ही हिस्सा गिराया, जिसका भुगतान पहले से कर दिया गया था।

यह प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही है जैसी किसी भी विकास परियोजना में होती है। लेकिन चूँकि यहाँ मामला एक मुस्लिम खिलाड़ी का था तो कांग्रेस, वामपंथी, लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी गैंग ने इसे मुस्लिम पीड़ित बनाम बीजेपी सरकार का एजेंडा खड़ा करने का मौका समझा और इसे भुनाने की कोशिश में जुट गए।

बरेली में ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ होते ही दर्द से छटपटाने लगी ‘डिजिटल पत्थरबाज’ आरफा खानम-राणा अय्यूब; अब भूल जाओ दंगाइयों के सामने सजदा वाला दौर…

                                      योगी आदित्यनाथ, राणा अय्यूब और आरफा खानम शेरवानी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कड़वी दवाई से कट्टरपंथी बिलबिला रहे हैं। बरेली की हिंसा पर जो बिल में जाकर बैठ गए थे, वे सीएम योगी के आक्रामक बयानों के बाद जुबानी हमलों पर उतर आए हैं। उन्हें कट्टरपंथियों और दंगाइयों के लिए भी ऐसी भाषा की अपेक्षा है कि जिसमें फूल बरसते हों।

आरफा खानम शेरवानी और राणा अय्यूब जैसी कथित पत्रकार जो पत्रकारिता की आड़ में इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाती हैं, वो सीएम योगी के डेंटिंग-पेंटिग वाले तीखे बयानों से खफा है। हालाँकि, यह पूरी जमात बरेली में इस्लामिक कट्टरपंथियों के बवाल पर खामोश बैठी थी।

बरेली में ‘I Love Muhammad’ को लेकर इस्लामी भीड़ ने खूब बवाल किया। इस भीड़ को मौलाना तौकीर रजा उकसा रहा था। वो चाहता था कि बवाल मचे चाहे इसके लिए पुलिसकर्मियों की हत्या ही क्यों ना करनी पड़े। पेट्रोल बम, बंदूक, पत्थर, डंडों से लैस इस भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। खूब पत्थर चलाए, फायरिंग की और फिर… फिर पुलिस ने इस कट्टरपंथियों की ठीक से खबर ली।

पुलिस ने हंगामा कर रहे लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। इस हमले के मुख्य साजिशकर्ता तौकीर रजा को गिरफ्तार कर लिया, उसके अलावा भी दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 2000 से अधिक लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने उपद्रवियों को साफ संदेश दिया की उत्तर प्रदेश में यह दंगा-फसाद नहीं चलेगा। सीएम योगी ने रजा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “बरेली में एक मौलाना भूल गया कि राज्य में सत्ता किसकी है। हमने जो सबक सिखाया है, उससे आने वाली पीढ़ियाँ दंगे करने से पहले दो बार सोचेंगी।”

योगी दंगाइयों को चेताने में यही नहीं रुके, उन्होंने कहा, “जब भी कोई हिंदू पर्व और त्यौहार आता है, उनको गर्मी आने लगती है और उनकी गर्मी को शांत करने के लिए हमें डेंटिंग-पेंटिंग का सहारा लेना पड़ता है।” साथ ही, उन्होंने भारत में गजवा-ए-हिंद का ख्वाब देखने वालों का जहन्नुम का टिकट काटने की बात भी कहीं।

 अब यही खरी-खरी बात कुछ कट्टरपंथियो को नागवार गुजरी, तो वो राशन-पानी लेकर ज्ञान देने चले आए। राणा अय्यूब ने X पर सीएम योगी का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “ये भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिया है।” अय्यूब ने लिखा, “मुसलमानों के खिलाफ नफरत के इस खुले मौसम में न्यायपालिका, संस्थाओं, मीडिया और हमारे बुद्धिजीवियों की खामोशी ही इसे सामान्य बना रही है।”

अब, एक और कट्टरपंथियो को देखिए, आरफा खानम शेरवानी भी योगी की तल्ख बयानी से बिलबिला गई हैं। आरफा ने लिखा, “आदित्यनाथ को मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम ‘नाजी’ भाषा का प्रयोग करते हुए सुनकर, यह सवाल उठता है, क्या भारत का संविधान अब भी उत्तर प्रदेश में लागू होता है?”

एक कट्टरपंथी है मारिया खान, उसकी बौखलाहट इन दोनों से भी ज्यादा है। वो X पर लिखती है, “मुसलमानों को ऐसे ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ करने की बात करता है जैसे वे इंसान न होकर कोई कबाड़ हों। सत्ता ने उसे बेशर्म बना दिया है और खामोशी ने खतरनाक।”

ये सारे डिजिटल पत्थरबाज, बरेली की हिंसा पर तौकीर रजा और उस कट्टरपंथी भीड़ की हिंसा पर खामोश बैठे तमाशा देख रहे थे। इन्हें अब लगता है कि दंगाइयों का इलाज डंडा ना हो, ये चाहते हैं कि कोई दंगाइयों के सामने जाकर सजदा करे और वो ‘बेचारे’ सुधर जाएँ।

इन दंगाइयों और उनके प्रेमियों को उन तुष्टिकरण करने वाली सरकारों की आदत लग गई है जो इनके बवाल के बाद भी वोट के लिए इन दंगाइयों को छूने की हिम्मत नहीं करते थे। इसी उत्तर प्रदेश में दंगे के आरोपियों को लेने के लिए पिछली सपा सरकार में विशेष विमान भेजा जाता था। अब इन दंगाइयों पर कार्रवाई हो रही है तो ये बिलबिला उठे हैं।

अब दंगाइयों को मिठाइयाँ खिलाकर या फूल माला पहनाकर या कोई दोहे सुनाकर तो नहीं सुधारा जा सकता है। दंगाइयों का इलाज तो डंडा ही होना चाहिए और ऐसे दंगाई जो देश और उत्तर प्रदेश में पाकिस्तान और बांग्लादेश हालात बनाना चाहते हैं, उन पर किसी भी तरह का रहम क्यों ही किया जाए?

योगी राज में पुलिस पर पथराव का जवाब सजदा से देने की परंपरा खत्म हो गई है। ऐसे दंगाइयों से समाज की सुरक्षा फूलों की थाल से नहीं बल्कि कानून के डंडे से ही होती है। अगर इन पत्थरबाजों और उनके हिमयातियों को इस साफ-साफ लेकिन कठोर भाषा से दिक्कत है तो बेहतर है कि दंगाई और पत्थरबाज कानून को हाथ में लेने के बजाय जो समाज की अपेक्षा है वैसा काम करें।

मुसलमानों आंखे खोलो, पहचानों अपने असली दुश्मनों को ; देखो तुम्हे भड़काने वाले किस तरह अपनी तिजोरियां भर रहे हैं: राणा अय्यूब ने कोरोना में किया जो करोड़ों का घपला : ITAT का आदेश; गरीबों के नाम पर हड़पे थे सारे रुपए, परिवार को दिया फायदा; 50 लाख रूपए की सिर्फ FD करवाई

आखिर मुसलमान कब तक कुँए का मेंढक बना रहेगा? कब कुँए से बाहर आकर अपने असली दुश्मनों को  पहचानेगा, क्योकि कट्टरपंथियों ने इतना डरा-धमका कर रखा हुआ जिस वजह से सच्चाई जानने की कोशिश नहीं करते। तुम्हारा दुश्मन कोई बीजेपी या आरएसएस नहीं ये ही मुस्लिम कट्टरपंथी हैं। इन्हे कट्टरपंथी अगर कहें कि बकरे की चार नहीं दो टांगें होती हैं ये सभी चार नहीं दो ही बोलेंगे। गुजरात दंगों में देखा कि किस तरह तीस्ता सीतलवाड़ ने दंगा पीड़ितों को मदद करने के लिए उगाए धन का अधिकतर अपने निजी रूप में  दुरूपयोग किया, उसी तरह राणा अयूब, जो अपने लेखों से तुम्हे भड़काती है, ने कोरोना काल में घपला किया है।    
कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश संकट से जूझ रहा था, उस समय पत्रकार राणा अय्यूब ने राहत कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये का फंड जुटाया। लेकिन इस पैसे का उपयोग राहत कार्यों से ज्यादा उन्होंने निजी कामों के लिए किया। इसके खुलासा मुंबई स्थित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (
ITAT) ने किया है।

ITAT का कहना है कि इस फंड का कुछ हिस्सा निजी उपयोग में लाने के साथ साथ विदेशी फंडिंग के नियमों का भी उल्लंघन किया गया है। ITAT ने राणा अय्यूब को पूरे फंड पर टैक्स जमा करने का आदेश दिया है।

राणा अय्यूब ने कोरोना महामारी के समय ‘केट्टो’ प्लेटफॉर्म पर तीन क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए कुल ₹2.69 करोड़ जुटाए थे। इस रकम में से ₹80.49 लाख की फंडिंग विदेश से मिली था, जो FCRA, 2010 का उल्लंघन था।

                     COVID-19 महामारी के दौरान राणा अय्यूब द्वारा जुटाई गई धनराशि का स्क्रीनग्रैब

राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत कार्यों के लिए जुटाई गई रकम में से ₹1.60 करोड़ अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख और ₹37.15 लाख अपनी बहन इफ़्फ़त शेख के बैंक खातों में जमा किए। उन्होंने आयकर विभाग को बताया कि उनका पैन कार्ड नहीं मिल रहा था, इसलिए केट्टो से फंड निकालने के लिए उन्होंने अपने पिता और बहन के पैन कार्ड का इस्तेमाल किया।

बाद में राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से ₹84.40 लाख और बहन के खाते से ₹36.40 लाख अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर लिए। इस तरह उनके खाते में कुल ₹1.20 करोड़ से ज्यादा की राशि ट्रान्सफर।

अप्रैल 2022 में उन्होंने इस बड़ी रकम के गबन को सिर्फ 20,000 डॉलर की छोटी राशि’ बताकर गंभीरता को कम करने की कोशिश की, जबकि असल में मामला ₹2.69 करोड़ (करीब 3.14 लाख डॉलर) का था।

            राणा अय्यूब द्वारा अपने पिता और बहन के खाते से अपने निजी बैंक खाते में स्थानांतरित किया गया धन

ITAT ने कहा कि एक साल बाद भी क्राउडफंडिंग से जुटाए गए लगभग ₹2.4 करोड़ का उपयोग राहत कार्यों के लिए नहीं हुआ। पैसा राणा अय्यूब और उनके परिवार के व्यक्तिगत बचत खातों में जमा किया गया था। राहत कार्य करने के बजाय, राणा अय्यूब ने अपने नाम पर चालू खाता खोला, FD में निवेश किया और उसी खाते से निजी खर्च भी किए।

राणा अय्यूब द्वारा धन के दुरुपयोग का मामला उजागर

ITAT ने पत्रकार राणा अय्यूब के खिलाफ यह टिप्पणी की है कि उन्होंने COVID-19 राहत कार्यों और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि के लिए अलग-अलग बैंक खाते नहीं खोले।

ITAT के अनुसार, ये पैसा उनके पिता और उनकी बहन के व्यक्तिगत खातों में भेजा गया पहले और दूसरे क्राउडफंडिंग अभियान के दौरान उनके परिवार के सदस्यों के खातों में और तीसरे अभियान के दौरान सीधे उनके अपने खाते में।

राणा अय्यूब ने दावा किया कि वह इन पैसों का इस्तेमाल खुद के लिए नहीं किया हैं, लेकिन ITAT ने कहा कि यह साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने धन को निजी खातों में मिलाकर रखा और कोई अलग खाता नहीं बनाया।

उन्होंने यह भी कहा कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर लाभार्थी की पहचान स्पष्ट थी, लेकिन चूंकि पैसा सीधे उनके और उनके परिवार के खातों में गया, यह दलील भी स्वीकार नहीं की गई। ITAT ने यह भी बताया कि जब आयकर विभाग ने इस पर सवाल उठाए, तो राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से प्राप्त पूरी राशि को ‘अन्य स्रोतों से आय’ के रूप में घोषित कर दिया।

उन्होंने यह स्वीकार किया कि 2.69 करोड़ रुपये में से केवल 28 लाख रुपये ही राहत कार्यों जैसे कि प्रवासी मजदूरों की मदद, राशन, अस्पताल में भर्ती, परिवहन और पश्चिम बंगाल में बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किए गए।

ITAT की जाँच में यह भी सामने आया कि राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से मिले पैसों में से 19 लाख रुपए का इस्तेमाल अपने निजी खर्चों के लिए किया है। इसके अलावा, 50 लाख रुपए की राशि को अपने नाम से व्यक्तिगत फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में डाल दिया।

ITAT ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर उनकी मंशा वास्तव में राहत कार्यों की थी, तो उन्होंने अपने नाम से इतनी बड़ी FD क्यों करवाई? ITAT ने यह भी बताया कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर पहले क्राउडफंडिंग अभियान से राणा अय्यूब को 1.23 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन उसमें से सिर्फ 18 लाख ही राहत कार्यों में खर्च किए गए।

उन्होंने यह तर्क दिया कि बची हुई रकम अस्पताल निर्माण के लिए रखी गई थी, जबकि फंडरेज़िंग के दौरान इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, जब उन्हें टैक्स संबंधी कार्रवाई का डर हुआ, तब उन्होंने विदेशी स्रोतों से मिले कुछ धन को वापस लौटा दिया।

लेकिन पहले क्राउडफंडिंग अभियान के एक साल बाद तक वे केवल 18 लाख रुपए के खर्च का ही सबूत दे पाईं। ITAT ने इस आधार पर उनके दावों पर संदेह जताया और कई वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया।

FCRA नियमों का उल्लंघन

ITAT ने यह भी कहा कि राणा अय्यूब ने FCRA, 2010 का उल्लंघन किया है। ITAT के अनुसार, अय्यूब ने खुद को वाशिंगटन पोस्ट के लिए पत्रकार बताया था और FCRA की धारा 3(1)(H) के तहत पत्रकारों को विदेशी दान सीधे अपने खाते में प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि पत्रकार होने के नाते राणा अय्यूब को विदेशी फंड सीधे प्राप्त नहीं करने चाहिए थे, इसलिए यह कानून का उल्लंघन माना गया।

धर्मार्थ गतिविधियों के लिए एकत्रित धनराशि अप्रमाणित: आईटीएटी

ITAT  ने बताया कि राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों की मदद के नाम पर धन इकट्ठा किया था, लेकिन यह पूरा दान उनके और उनके परिवार के सदस्यों के निजी बैंक खातों में जमा किया गया।

उन्होंने कोई अलग खाता नहीं खोला और इस धन का इस्तेमाल निजी खर्चों और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश के लिए किया गया। बड़ी राशि लंबे समय तक बिना उपयोग के पड़ी रही। ITAT के अनुसार राणा अय्यूब का यह दावा कि यह धन धर्मार्थ कार्यों के लिए इस्तेमाल किया गया, साबित नहीं हो सका है।

जिस तरह से फंड एकत्र किया गया और उसे उनके रिश्तेदारों के खातों में जमा किया गया, इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं है। ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि यह क्राउडफंडिंग की गई राशि ‘कर छूट’ (tax free) के योग्य नहीं है और इसे उनकी आय माना गया है, जिस पर आकलन वर्ष 2021-22 और 2022-23 में कर लगाया गया है।

कोविड के नाम पर चंदा इकट्ठा कर उस पर मौज मस्ती करने वाली मुस्लिम कट्टरपंथी राणा अयूब माता सीता, वीर सावरकर, भारतीय सेना… सबको गाली देने वाली पर दिल्ली की कोर्ट ने FIR का दिया आदेश

हिजाब का समर्थन करने वाली की ड्रैस 
हिन्दुओं के खिलाफ लगातार घृणा फ़ैलाने वाली राणा अयूब के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। यह FIR हिन्दू देवी-देवताओं के अपमान और भारत विरोधी माहौल बनाने के लिए दर्ज की गई है। FIR दर्ज करने का आदेश दिल्ली की एक अदालत ने दिया था, इसके बाद दिल्ली पुलिस ने यह कार्रवाई की।

दिल्ली की साकेत कोर्ट ने राणा अयूब के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश सोमवार (27 जनवरी, 2025) को दिया है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट में वकील अमिता सचदेव की एक याचिका पर दिया गया।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “तथ्यों को देखते हुए, शिकायत में संज्ञेय अपराध की बात सामने आई है और इसके लिए FIR दर्ज करना आवश्यक है। धारा 156(3) CRPC के तहत यह आवेदन मंजूर किया जाता है। SHO साइबर पुलिस स्टेशन, दक्षिण को निर्देश दिया जाता है कि शिकायत को FIR में बदल दें और मामले की निष्पक्ष जाँच करें।”

अमिता सचदेव का कहना था कि वह 2 महीने से विषय में कार्रवाई की माँग कर रही हैं लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। इसके बाद वह अदालत पहुँची थी। कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने साइबर थाने में राणा अयूब के खिलाफ अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

अमिता सचदेव ने इस मामले में नवम्बर, 2024 में राणा अयूब के खिलाफ साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करवाई थी। अमिता सचदेव का आरोप है कि राणा अयूब ने लगातार अपने एक्स अकाउंट से भारतीय सेना और हिन्दू धर्म के खिलाफ लगातार अपमानजनक पोस्ट किए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि अयूब के ट्वीट के चलते देश में नफरत का माहौल पनपता है।

राणा अयूब लगातार माता सीता, रामायण और महाभारत को लेकर अपमानजनक ट्वीट करती आई है। वह भारतीय सेना का अपमान भी करती आई हैं। ऐसे कई पोस्ट पर लोगो ने सोशल मीडिया पर आपत्ति भी जताई है। इससे पहले भी राणा अयूब के खिलाफ कई FIR हो चुकी है।

राणा अयूब के खिलाफ कोविड के नाम पर चंदा इकट्ठा कर उसे अपनी मौज मस्ती में लगाने का आरोप भी है। इस मामले में उसकी ₹1.7 करोड़ की सम्पत्ति भी ED ने जब्त की थी।

रामलला की हुई प्राण प्रतिष्ठा, वामपंथी-कट्टरपंथी गिरोह के उखड़े प्राण पखेरू: इस्लामी गिरोह कह रहा – फिर खड़ा होगा बाबरी; लेकिन नहीं बताएंगे बाबरी था कौन?

राना अय्यूब, अरफ़ा खानम शेरवानी और आइशी घोष का राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर रुदन (फोटो साभार: इंस्टाग्राम हैंडल्स)
एक तरफ जहाँ सोमवार(22 जनवरी, 2024) को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर संपूर्ण हिन्दू समाज खुश नज़र आ रहा है, वहीं एक गिरोह के कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके दुःखों की कोई सीमा नहीं है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर ‘बाबरी ज़िंदा है’ हैशटैग के साथ ट्रेंड भी चलाया गया। वहीं राना अय्यूब, अरफ़ा खानम, शेरवानी व आइशी घोष जैसों ने अपने देश को ही मृत करार दिया। इस गिरोह को 500 वर्षों के संघर्ष के बाद बने राम मंदिर से बड़ा ही दुःख है।

जितने भी छद्दम सेक्युलरिस्ट्स है, सभी बाबरी-बाबरी कहते हैं, नाम बाबर पर नहीं बाबरी क्यों?लेकिन नहीं बताते कि बाबरी कौन था? इसका उत्तर किसी हिन्दू पक्ष की तरफ से नहीं आना चाहिए, वरना 'सर तन से जुदा' गैंग लग जायेगा पीछे, इसका उत्तर इन्ही छद्दम सेक्युलरिस्ट्स से तरफ से आने दो, यह बहुत ज्वलंत प्रश्न है। कोई नहीं देगा, यही कारण है कि इन्हीं लोगों ने समस्त भारतीय मुस्लिम समाज को मुस्लिम देशों में बदनाम कर रखा है। देखिए वीडियो:

चंदा जमा कर के खा जाने का आरोप जिन पर लग चुका है, खुद को पत्रकार बताने वाली राना अय्यूब ने भी अपना ‘दर्द’ बयाँ किया। राना अय्यूब अक्सर विदेशी चैनलों पर बैठ कर भारत विरोधी बातें करती रहती हैं। राना अय्यूब ने लिखा, “ये दिन न सिर्फ सत्ताधारियों के क्रूर बहुसंख्यकवाद को प्रदर्शित करता है, बल्कि उनकी चुप्पी पर भी सवाल खड़े करेगा जो कभी संप्रदायिकता के खिलाफ लड़ते थे।” राना अय्यूब खुद इस्लामी कट्टरपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए जानी जाती हैं।

इसी तरह ‘The Wire’ जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल के लिए काम करने वाली अरफ़ा खानम शेरवानी ने भी सोशल मीडिया पर आकर प्रलाप किया। उन्होंने लिखा, “1992 में हुए सांप्रदायिक दंगों की एक पीड़ित के रूप में मेरे आसपास जो भी हो रहा है वो सब काफी परेशान करने वाला, अशांत कर देने वाला और हतोत्साहित करने वाला है। मेरी पीढ़ी को श्राप मिला है कि उन्होंने 6 दिसंबर, 1992 और 22 जनवरी, 2024 को अपने जीवनकाल में देखा।”

इसी तरह वामपंथी नेता आइशी घोष भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के खिलाफ लिखती नज़र आईं। उन्होंने लिखा, “22 जनवरी, 2024 – एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का पतन। इसे याद रखा जाएगा।” एक अन्य ट्वीट में उन्होंने अयोध्या पहुँचे सेलिब्रिटज पर तंज कसते हुए लिखा, “ये रीढ़विहीन लोग पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके एजेंडे में फिट हो तो चाट भी सकते हैं। इसके राम के प्रति श्रद्धा से कोई लेना-देना नहीं है।” आइशी घोष JNU में हिंसा के लिए भी जानी जाती हैं।

इसी तरह, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर ‘बाबरी ज़िंदा है’ ट्रेंड भी कराया गया। कोई 22 जनवरी, 2024 को ‘काला दिन’ बता रहा है, जबकि कोई लिख रहा है कि बाबरी मस्जिद उनके दिलों में ज़िंदा रहेगा। इस्लामी कट्टरपंथियों ने लिखा कि मस्जिद को मंदिर में तब्दील कर लोगे, लेकिन इस्लाम हमेशा रहेगा। इन लोगों ने लिखा कि हम न भूलेंगे, न माफ़ करेंगे। वहीं कुछ ने तो ‘इंशाअल्लाह’ लिखते हुए ये दावा भी कर डाला कि बाबरी मस्जिद को फिर से खड़ा किया जाएगा।

उधर अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर बोलते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अब अयोध्या की गलियों में गोलियों को गड़गड़ाहट नहीं होगा, बल्कि दीपोत्सव होगा। उन्होंने कहा कि अब कोई अयोध्या की परिक्रमा में बाधा नहीं बन पाएगा। उन्होंने कहा कि राम मंदिर वहीं बना, जहां बनाने का संकल्प लिया, आज हम सबकी आत्मा इस बात से प्रफुल्लित हो रही है। उत्तर प्रदेश के CM ने कहा कि आज के इस पावन अवसर पर भारत का हर गाँव अयोध्या है, हर जिह्वा पर राम है, हमारे रामलला सिंहासन पर विराज रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की राणा अयूब की याचिका, लटकी गिरफ्तारी की तलवार: गरीबों के नाम पर करोड़ों खाने का आरोप

मनी लांड्रिंग केस में बच निकलने का जुगाड़ निकाल रहीं वामपंथी प्रोपेगेंडा पत्रकार राणा अयूब को तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने राणा अयूब की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने गाजियाबाद की एक अदालत द्वारा जारी सम्मन को चुनौती थी जिसमें उनसे हाजिर होने को कहा गया था। सम्मन के मुताबिक राणा को 27 दिसंबर 2022 तक कोर्ट में हाजिर होना था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। याचिका ख़ारिज होने के बाद अब राणा अयूब को अदालत में हाजिर होना ही पड़ेगा। अयूब के खिलाफ मनी लांड्रिंग का यह केस प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दर्ज करवाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राणा अयूब की तरफ से सीनियर एडवोकेट वृंदा ग्रोवर सुप्रीम कोर्ट में पेश हुईं थीं। राणा अयूब को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने 27 दिसंबर 2022 को पेश होने का निर्देश दिया था। इस निर्देश और सम्मन के खिलाफ राणा अयूब सुप्रीम कोर्ट गईं थीं जिस पर 31 जनवरी 2023 को सुनवाई हुई थी। सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षा रख लिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने राणा अयूब की याचिका ख़ारिज कर दी है। याचिका ख़ारिज होने के बाद राणा अयूब पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है।

दरअसल राणा अयूब पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘Ketto’ के जरिए अवैध तौर पर पैसे जुटाने का आरोप है। ये पैसे कोरोना काल के दौरान गरीबों की मदद के लिए जुटाए गए लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हुआ। दान की यह राशि ₹2.69 करोड़ बताई जा रही है। आरोप है कि जनसेवा के लिए मिले पैसे का प्रयोग राणा अयूब ने अपने और अपने परिवार के लिए किया और उससे बैंक के एफ डी बनवा डाली। मामले की जाँच कर रही ED ने इस बावत केस दर्ज करवाया और अक्टूबर 2022 में अदालत में पर्याप्त सबूत भी जमा करने का दावा करते हुए चार्जशीट दाखिल की है।

हालाँकि राणा अयूब ने इस मामले में खुद को बेगुनाह बताते हुए इस केस को खुद को फँसाने की साजिश बताया। इस मामले में गाजियाबाद की PMLA स्पेशल कोर्ट ने पहले तो राणा अयूब को जमानत दे दी थी लेकिन बाद में ED द्वारा सबूत पेश किए जाने पर सम्मन जारी करते हुए 27 दिसंबर 2022 को हाजिर होने का आदेश दिया था। राणा अयूब कोर्ट में पेश होने के बजाए इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

इस्लाम और हिजाब पर ज्ञान देने वाली राना अयूब की खुद के मजहब वालों ने लगा दी बत्ती, लेकिन 'सिर तन से जुदा' नहीं

राना अयूब (Rana Ayyub) को मुस्लिमों ने इस्लाम से खारिज कर दिया है… कम से कम सोशल मीडिया वाले मुस्लिमों ने तो जरूर। चौंकिए मत। नीचे सारे प्रमाण हैं। हुआ यह कि वो हिजाब या बुरके को लेकर ज्ञान बाँट रही थीं। ट्विटर पर मौजूद मुस्लिमों ने कुरान का हवाला देकर राना अयूब की बत्ती लगा दी। लेकिन किसी ने नूपुर शर्मा की तरह राना अयूब के विरुद्ध न कोई प्रदर्शन किया और न ही 'सिर तन से जुदा' की आवाज़ निकालने की किसी कट्टरपंथी मुस्लिम की हिम्मत हो रही, क्योकि राना अयूब एक हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम है, क्यों? 

वित्तीय धोखाधड़ी की आरोपित और वाशिंगटन पोस्ट में लेख लिख कर पैसे कमाने वाली राना अयूब ने 22 सितंबर 2022 को सूरा बकराह की आयत का मतलब अंग्रेजी में ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “मजहब में कोई मजबूरी नहीं है।” दरअसल यह ईरान में चल रहे हिजाब या बुरके के विरोध-प्रदर्शन से संबंधित था।

                                                                  राना अय्यूब का ट्वीट

इस तरह का ट्वीट लिख राना अयूब यह दिखाना चाह रही थी कि वो विकासशील मानसिकता की महिला है। ट्विटर पर मौजूद मुस्लिम यूजरों ने उनको अच्छे ढंग से समझा दिया कि विकासशील मानसिकता अपनी जगह है, कुरान की अपनी जगह।

इस ट्वीट को लेकर हिंदुओं का मजाक उड़ाने वाली राना अयूब सोशल मीडिया पर मुस्लिम यूजर्स के निशाने पर आ गईं। बिंट नूह नाम के यूजर ने लिखा: “मुखौटा उतर चुका है, हकीकत सबके सामने है। इसके बावजूद बड़े हैंडल राना अय्यूब पर अभी भी चुप क्यों हैं… जाहिर है कि वह आयत से जुड़े संदर्भ को जानती हैं, बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं है कि गुस्ताख लोगों के भले की कामना करने वाली यह महिला इस्लाम के कट्टर दुश्मनों में से एक है। हमें उन लोगों को समझना-जानना होगा, जो अभी भी इस्लामी विरोधी नैरेटिव में इस महिला का समर्थन करते हैं। राना अय्यूब एक फिल्टर है!”

बिंट नूह का ट्वीट

सनिफ सुल्तान लिखते हैं, “यह आयत गैर-मुस्लिमों के लिए है। मुस्लिमों को मजहब के तौर पर इस्लाम का अनुसरण करने और चुनने की आजादी नहीं है। अपने दोहरे मापदंड के लिए संदर्भ से बाहर इस आयत का इस्तेमाल एक मुस्लिम नहीं कर सकता।”

                                                                          सनिफ सुल्तान का ट्वीट

एक और मुस्लिम यूजर ने राना अय्यूब को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “यह पूरी आयत है (सूरा बकराह, आयत-256, कुरान)। देश भर में और विश्व स्तर पर हाल की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए, मुझे लगता है कि मुस्लिमों को कुरान का हवाला देते समय सावधान रहना चाहिए।”

                                                                        ZAyesha का ट्वीट

इसके अलावा कई मुस्लिम यूजर्स ने राना को ट्विटर पर जमकर लताड़ा है। एक ने लिखा, “मुशरिक के ओपिनियन की जरूरत नहीं।” एक ने उन पर तंज कसते हुए कहा, “ये मुस्लिमों की संरक्षक है।”

                                                   3 अलग-अलग ट्विटर यूजर्स का राणा अयूब को जवाब

नयमारा नाम की यूजर ने भी अपने ट्विटर हैंडल पर राना के ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर हुए उन्हें इस्लाम, अल्लाह और कुरान के बारे में जानकारी दी। उन्होंने सवाल किया, “क्या तुम कुरान की आयत को नकार रही हो? क्या तुम मुस्लिम भी हो।”

                                           नयमारा नाम की ट्विटर यूजर ने धोया राणा अयूब को

राना अयूब (Rana Ayyub) को लताड़ने वाले सभी ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

झूठ पर 4 मिनट कायम नहीं रह पाईं

इससे पहले राना अयूब ने अपने एक इंटरव्यू में इतने झूठ बोले कि वो खुद आँकड़ों में कन्फ्यूज हो गईं थी। उन्होंने इंटरव्यू में शुरुआत में कहा था कि 100 हिंदुओं ने एक मुस्लिम लड़की को घेरा और इंटरव्यू के आखिर में वो बोलती नजर आईं कि ये संख्या 200 थी। उन्होंने कहा था, “ये वो भारत नहीं है, जिस पर हमें कभी गर्व होता था। ये दक्षिणपंथी आतंकियों का भारत है।”

धोखाधड़ी करने पर जब्त हुई 1.77 करोड़ रुपए की संपत्ति

झूठ फैलाने में माहिर राना अयूब वित्तीय धोखाधड़ी की आरोपित हैं। उनकी 1.77 करोड़ रुपए की संपत्ति ईडी द्वारा जब्त की गई थी। कथित तौर पर ये सारा पैसा उन्होंने कीटो पर फंड इकट्ठा करने का नाम पर एकत्रित किया था। मगर, सारे पैसे का इस्तेमाल किए बिना उन पैसों को अयूब ने अपने अकॉउंट में रखे रखा। जब विवाद बढ़ा तो उन्होंने खुद को बेगुनाह बताया।

कट्टरपंथियों के आगबबूला होने पर राणा अयूब ने डिलीट किया सलमान रुशदी की ‘सलामती’ वाला ट्वीट

सलमान रुश्दी के ठीक होने की दुआ माँगने वाला ट्वीट डिलीट किया
आखिरकार, अभिव्यक्ति की आज़ादी (#freedom of expression) की लड़ाई लड़ने वाली को कट्टरपंथियों के आगे झुककर सलमान रुश्दी के समर्थन में ट्वीट को क्यों डिलीट करना पड़ा? क्यों कट्टरवाद के आगे झुक सच्चाई को क्यों छिपाया जा रहा है? आखिर कितने समय तक सच्चाई को छिपाया जाता रहेगा? क्या मुस्लिम समाज पर इस्लाम से ज्यादा डर कट्टरपंथियों का है? मौलवियों और इस्लामिक विद्वानों का समाज में क्या महत्व है?   
करोड़ों के घोटाले की आरोपित और वाशिंगटन पोस्ट की स्तंभकार राणा अयूब ने 12 अगस्त को लेखक सलमान रुश्दी की सलामती की दुआ माँगते हुए जो ट्वीट किया था, उसे उन्होंने डिलीट कर दिया है। हादी मतार (Hadi Matar) पर रुश्दी की हत्या के प्रयास का आरोप लगाया गया है। 

ऐसा माना जा रहा है कि रुश्दी पर यह हमला कथित रूप से ईशनिंदा के कारण हुआ, क्योंकि उनकी किताब ‘द सैटेनिक वर्सेज’ (The Satanic Verse) को कट्टरपंथी लोग, पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) के जीवन पर किया गया एक व्यंग्य मानते हैं। रुश्दी पर हमले के बाद राणा अयूब ने ट्वीट किया कि वह उनके ठीक होने के लिए प्रार्थना कर रही हैं।

                               राणा अयूब ने सलमान रुश्दी को लेकर किया ट्वीट

हालाँकि, ट्विटर पर मुस्लिम समुदाय द्वारा उनकी निंदा किए जाने के बाद उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। कई इस्लामवादी ट्विटर पर अयूब के इस पोस्ट को देखकर आगबबूला हो गए। उन्होंने राणा की क्लास लगाते हुए कहा, “वे किसी ऐसे शख्स को फ़ॉलो नहीं कर सकते हैं, जिसने पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने वाले का समर्थन किया हो और उसकी सलामती की दुआ माँगी हो।” इसके बाद उन्होंने अयूब को अनफॉलो कर दिया।

इस्लामवादी कह रहा है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को फ़ॉलो नहीं कर सकता, जो पैगंबर की निंदा करने वाले का भला चाहता हो

कई अन्य इस्लामवादियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उनके मुताबिक, अयूब वही बोल रही हैं, जो पश्चिम के लोग सुनना चाहते हैं। अयूब अब पश्चिमी अभिजात वर्ग के उदारवादियों की पहली पसंद बन चुकी हैं, क्योंकि वह पीएम मोदी और उनके नीतियों का शुरू से विरोध करती आ रही हैं। वह अल्पसंख्यकों और मुस्लिमों का दिल जीतने के लिए मुद्दों को भुनाने में जुटी रहती हैं।

         सलमान रुश्दी की सलामती की दुआ माँगने पर मुस्लिम ट्विटर यूजर्स राणा अयूब से बेहद खफा नजर आ रहे हैं

एक मुस्लिम ट्विटर यूजर ने कहा कि वह इंस्टाग्राम पर राणा अयूब की तस्वीरें और उनके द्वारा मुस्लिम मुद्दों पर आवाज उठाने के बाद उनके फैन हो गए थे। हालाँकि, अब उन्होंने ऐसा महसूस किया कि वह सिर्फ अपने करियर को आगे ले जाने के लिए ये सब कर रही थीं।

                            राणा ने पहले ऊपर दिए गए ट्वीट को लाइक किया, फिर बाद में अनलाइक किया

राणा ने एक अन्य लेखक सुकेतु मेहता के एक ट्वीट को भी ‘लाइक’ किया था, जिसमें रुश्दी को ‘बॉम्बे का शेर’ (Lion of Bombay) कहा गया था, लेकिन मुस्लिम ट्विटर यूजर के निशाने पर आने के बाद राणा ने इसे ‘अनलाइक’ कर दिया था। यानी अब वह इस बात से सहमत नहीं थी।

मुस्लिम ट्विटर यूजर्स ने कथित रूप से ‘ईशनिंदा’ करने वाले लेखक सलमान रुश्दी की सलामती की दुआ माँगने वाले ट्वीट को डिलीट करने के बाद उनकी सराहना की और खुशी जताई कि अब वह सही रास्ते पर आ गई हैं।

यही नहीं कई मुस्लिम ट्विटर यूजर्स ने राणा को ‘खुद को सही’ करने पर उनकी जमकर तारीफ की।

राणा ने केवल अपना ‘नो वर्ड्स’ वाला ट्वीट रखा हुआ है, जो इस्लामवादी द्वारा सलमान रुश्दी को छुरा घोंपने से संदर्भित है।

समुदाय विशेष और इस्लामवादी भाइयों को खुश करने के लिए उन्होंने रुश्दी पर हमले की निंदा करने के लिए गैर-इस्लामवादियों का मजाक उड़ाते हुए एक और ट्वीट किया।

पहले भी राणा कर चुकी हैं कई ट्वीट डिलीट

यह पहली बार नहीं है, जब राणा ने उम्माह के साथ खड़े होने के लिए अपने ट्वीट डिलीट किए हों। जुलाई 2020 में जब तुर्की द्वारा हागिया सोफिया म्यूजियम, जो कभी एक चर्च था उसे मस्जिद में बदलने की कई देशों ने आलोचना की थी, उस वक्त राणा ने ट्वीट कर तुर्की के इस कदम को सराहा था।
राणा का ट्वीट राम जन्मभूमि मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में था, जिसमें शीर्ष अदालत ने राम लला के पक्ष में फैसला सुनाया था और मस्जिद के लिए अलग जमीन का आदेश दिया था। यही नहीं नीरज चोपड़ा ने जब टोक्यो 2020 एथलेटिक्स में भारत का पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था। उस वक्त नीरज चोपड़ा की सराहना करते हुए राणा ने उनकी एक तस्वीर पोस्ट की थी, जिसे उन्होंने कुछ देर बाद ही हटा दिया था।
नेटिज़न्स ने पहले ही नीरज चोपड़ा की तारीफ करते हुए उनके ट्वीट का स्क्रीनशॉट ले लिया था। दरअसल, चोपड़ा ने अपने ट्वीट में भारत सरकार और पीएम मोदी को धन्यवाद दिया था, जो राणा को पसंद नहीं आया। हालाँकि, उन्होंने कुछ घंटों बाद फिर उनकी फोटो को शेयर किया था।
हो सकता है, तब वह काफी उत्साहित थीं, जब खेल भावना के मद्देनजर नीरज ने कथित तौर पर कहा था कि पाकिस्तानी एथलीट नदीम अरशद का पोडियम पर होना एशिया के लिए अच्छा और गर्व का क्षण है।
नीरज ने उस समय केंद्र सरकार को धन्यवाद देने के साथ-साथ एक साथी एथलीट की भी सराहना की थी। यह उनके बड़प्पन को दिखाता है। वहीं, राणा का नीरज चोपड़ा को लेकर किया गया ट्वीट हटाना उनकी निम्न मानसिकता को दर्शाता है। उनका सलमान रुश्दी की सलामती को लेकर पहले ट्वीट करना फिर डिलीट कर देना सिर्फ यह दिखाता है कि उन्होंने इस्लामवादियों की नजरों में ऊपर उठने के लिए ये सब किया है।

राणा अयूब ने झुग्गी-झोपड़ी वालों से लेकर बिहार-असम-महाराष्ट्र और कोरोना के नाम पर कमाए धन को खुद खर्चे, पिता और बहन को किया मालामाल

प्रोपेगेंडा पत्रकार राणा अयूब पर प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने समाज कल्याण के लिए जुटाए गए पैसों में धोखाधड़ी की है। इसके बाद अयूब के 1.77 करोड़ रुपए जब्त किए गए हैं।

लोगों की मदद के नाम पर धन की उगाही औऱ उस पैसे की गड़बड़ी करने के मामले में प्रोपेगेंडा पत्रकार राणा अयूब (Rana Ayyub) के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने अयूब की 1.77 करोड़ रुपए की संपत्ति को कुर्क कर लिया है। ईडी ने कहा है कि राणा अयूब ने एक प्लानिंग के तहत आम जनता को धोखा दिया है।

प्रवर्तन निदेशालय के आदेश में कहा गया है कि राणा अयूब के घोटाले की शुरुआत तभी से शुरू हो गई थी, जब उसने पैसा इकट्ठा करने के बाद उसे अपने और अपने परिवार के सेविंग अकाउंट से विदड्रॉ करना शुरू कर दिया था। ईडी के मुताबिक, अयूब के 50 लाख रुपए के फिक्स्ड अमाउंट नेट बैंकिंग से बुक किए गए और एक अलग करेंट अकाउंट खोला गया। बाद में उसके बचत बैंक खाते और उसकी बहन और पिता के बैंक खाते से फंड का ट्रांसफर किया गया। लेकिन Ketto.org के जरिए जिस उद्देश्य के लिए धन की उगाही की गई थी, उसके लिए इसका इस्तेमाल नहीं हुआ।”

एजेंसी ने अपने आदेश में राणा अयूब द्वारा जुटाए गए फंड और उसको दुरुपयोग को ‘अपराध की आय’ करार दिया औऱ कहा कि इसके (फंड) अधिग्रहण, कब्जे, उपयोग और फिर इसे साफ सुथरी संपत्ति के तौर पर पेश किया है, लेकिन फिर भी यह मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002 की धारा 3 के तहत परिभाषित मनी लॉन्ड्रिंग की धारा 4 के अंतर्गत यह एक दंडनीय अपराध है। राणा अयूब के खिलाफ कार्रवाई को PMLA कानून के तहत अनुसूचित अपराध माना जाता है।

हालाँकि, इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने अभी तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की है। लेकिन, ईडी ने कहा है कि अगर एजेंसी चार्जशीट फाइल करने का इंतजार करती है औऱ राणा अयूब की संपत्ति को ईडी अटैच नहीं करती है तो भी एजेंसी के पास यह मानने का कारण है कि इस पैसे को चुरा लिया जाएगा। ऐसे में बाद में इसे अटैच कर पाना असंभव हो जाएगा।

अटैचमेंट ऑर्डर में कहा गया है, “पूरे मामले को देखने और जाँचने के बाद, मेरे पास यह यकीन करने के पर्याप्त कारण है कि उपरोक्त पैरा 21 के तहत बताई गई राशि अपराध की आय के मूल्य के बराबर है, जैसा कि पीएमएलए, 2002 की धारा 2 (1) (यू) के तहत परिभाषित किया गया है, जिसे राणा अयूब ने, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, अनुसूचित अपराध से संबंधित आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप प्राप्त किया था, जिसे स्थानांतरित करने या ट्रांसफर के माध्यम से गायब किया जा सकता है, या किसी तीसरे पक्ष के हित के लिए खर्च किया जा सकता है। जिससे पीएमएलए, 2002 के अध्याय III के तहत अपराध की आय के ऐसे मूल्य की जब्ती से संबंधित कार्रवाई में निराशा हो सकती थी और इस प्रकार उपरोक्त राशि तत्काल अनंतिम कुर्की के लिए उत्तरदायी है जैसा कि पीएमएलए की धारा 5 की उप-धारा (1) के तहत शक्ति प्रदान किया गया है।”

प्रवर्तन निदेशालय ने राणा अयूब द्वारा जुटाए गए फंड को अपने आदेश के जारी किए जाने की तारीख से लेकर 180 दिनों तक के लिए अस्थायी तौर पर अटैच कर लिया है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए जुटाए 2.69 करोड़ रुपए

FIR के मुताबिक राणा अयूब ने ऑनलाइन क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म केटो (Ketto) पर कुल 2,69,44,680 रुपए का फंड जुटाया था। ये धनराशि उसकी बहन और पिता के बैंक खातों में ट्रांसफर की गई थी। इस राशि में से 72,01,786 रुपए उसके अपने बैंक खाते में ट्रांसफर किए गए थे। इसके अलावा उसकी बहन इफ्फत शेख के अकाउंट में 37,15,072 और उसके पिता मोहम्मद अयूब वक्फ के बैंक अकाउंट में 1,60,27,822 रुपए थे। बाद में उसकी बहन और पिता के अकाउंट से ये सभी धनराशि उसके खुद के अकाउउंट में ट्रांसफर कर दी गईं। अयूब ने ED के पास सिर्फ 31,16,770 रुपए के खर्च का ब्यौरा दिया। दस्तावेजों की पड़ताल के बाद सामने आया कि फंड में से सिर्फ 17,66,970 रुपए ही खर्च किए गए हैं।

नकली बिल बनवाए, चैरिटी के पैसों का निजी इस्तेमाल किया

एजेंसी के मुताबिक राणा अयूब ने राहत कार्यों में पैसा खर्च होने के सबूत देने के लिए फर्जी बिल बनवाए थे। निजी सफर के लिए किए गए खर्च को राहत कार्य के लिए बताया गया था। एजेंसी ने कहा कि जाँच में साफ होता है कि राणा अयूब ने पूरी प्लानिंग और व्यवस्थित तरीके से चैरिटी के नाम पर फंड जुटाया था, लेकिन फंड का इस्तेमाल पूरी तरह चैरिटी के लिए नहीं हुआ। एजेंसी ने बताया कि राणा अयूब ने फंड्स में से 50 लाख रुपए फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा कराए और उन्हें राहत कार्य में इस्तेमाल नहीं किया। इसके अलावा उन्होंने PM CARES और CM Relief फंड में कुल 74.50 लाख रुपए जमा किए।
ईडी के मुताबिक, अयूब के 50 लाख रुपए के फिक्स्ड अमाउंट नेट बैंकिंग से बुक किए गए और एक अलग करेंट अकाउंट खोला गया। एजेंसी ने राणा अयूब की जो संपत्ति अटैच की है, वो इस प्रकार है- 
 बैंक डिटेल- Saving Bank A/c No. 0541000205235 
with HDFC Bank Ltd, KoparKhairane Branch, NaviMumbai
IFSC- HDFC0001575
अकाउंट होल्डर- राणा अयूब 
फंड डिटेल- 19 मई 2020 को 50 लाख का फिक्स डिपॉजिट
बैंक डिटेल- Current Bank A/c No. 9209820179688 
with HDFC Bank Ltd;, KoparKhairane Branch, Navi Mumbai
IFSC- HDFC0001575
अकाउंट होल्डर- राणा अयूब 
फंड डिटेल- बैंक अकाउंट में उपलब्ध शेष राशि 57,19,179
बैंक डिटेल- Saving Bank A/c No. 0541000205235 
with HDFC Bank Ltd;, KoparKhairane Branch, Navi Mumbai
IFSC- HDFC0001575
अकाउंट होल्डर- राणा अयूब
फंड डिटेल- बैंक अकाउंट में उपलब्ध शेष राशि 70,08,525

राणा अयूब के खिलाफ दर्ज किए गए केस

प्रोपागैंडा पत्रकार राणा अयूब के खिलाफ गाजियाबाद के इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में 7 सितंबर 2021 को आईपीसी की धारा 403, 406, 418, 420, आईटी अधिनियम की धारा 66 डी और मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट-2002 की धारा 4 के तहत प्राथमिकी दर्ज किया गया था। इसमें अयूब पर ये आरोप लगाया गया था है कि उसने चैरिटी के नाम पर गलत तरीके से आम जनता से धन की वसूली की थी। हिंदू आईटी सेल के विकास शाकृत्यायन ने अगस्त 2021 में ये एफआईआर दर्ज करवाया था।
प्राथमिकी में राणा द्वारा चलाए गए तीन अभियानों का जिक्र किया गया है।
(A) अप्रैल-मई 2020 के दौरान झुग्गीवासियों और किसानों के कल्याण के नाम पर धन की उगाही।
(B) जून-सितंबर 2020 के दौरान असम, बिहार और महाराष्ट्र के लिए राहत कार्य के नाम पर वसूली।
(C) मई-जून 2021 के दौरान भारत में कोविड-19 से प्रभावित लोगों के लिए सहायता के लिए।
प्राथमिकी में उल्लेख किया गया है कि राणा अयूब पेशे से पत्रकार हैं और सरकार से किसी भी प्रकार की अनुमति या रजिस्ट्रेशन के बिना ही वो विदेशी धन प्राप्त कर रही थीं। जबकि, ऐसा करने के लिए विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम 2010 के तहत सरकार की अनुमति या रजिस्ट्रेशन आवश्यक है।

PMLA के तहत ईडी द्वारा की गई जाँच

इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय को 11 नवंबर 2021 को शिकायतकर्ता ने इस मामले की जानकारी के साथ एक ईमेल भेजा था। इसमें उसने केटो द्वारा डोनर्स को भेजे गए एक पत्र को भी अटैच किया था। केटो ने दान करने वाले लोगों को बताया कि तीन अभियानों के लिए ₹1.90 करोड़ और 1.09 लाख डॉलर (कुल 2.69 करोड़ रुपए) मिले थे, जिसमें से केवल ₹1.25 करोड़ खर्च किए गए हैं। केटो के पत्र में कहा गया है, “दानदाताओं को उपयोग किए गए धन के विवरण के लिए कैम्पेनर rana.ayub@gmail.com से संपर्क करना होगा।”
ईमेल मिलने के बाद जब प्रवर्तन निदेशालय ने मामले की जानकारी के लिए केटो से संपर्क किया। ईडी के एक्शन के बाद 15 नवंबर 2021 को केटो फाउंडेशन के वरुण सेठ ने ईडी को जानकारी दी और कहा:
  1. फंड रेजिंग कैम्पेन को ‘www.ketto.org’ वेबसाइट के जरिए शुरू किया था, जो कि ऑनलाइन माध्यम से शुरू किए गए थे, जो एक निजी कंपनी केटो ऑनलाइन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संचालित किया जा रहा है। वरण सेठ इसके निदेशकों में से एक हैं।
  2. राणा अयूब ने 23 अगस्त 2021 को केटो को एक ईमेल भेजा था, जिसमें उसने जानकारी दी थी कि उसे केटो से कुल ₹2.70 करोड़ रुपए की राशि मिली थी, जिसमें से उन्होंने लगभग ₹1.25 करोड़ खर्च किए और उन्हें कर के रूप में फंड से ₹90 लाख का भुगतान करना बाकी है। जबकि उसने 50 लाख रुपए को छोड़ दिया, जो लाभार्थियों तक पहुँचे ही नहीं।

ईडी को दिया गया वरुण सेठ का बयान

  1. वरुण सेठ ने ईडी को बताया कि वो मैसर्स केटो ऑनलाइन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशकों में से एक हैं। यह भारत से होने वाले सामाजिक और चिकित्सा के लिए एक ऑनलाइन क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म है।
  2. राणा अयूब ने पिछले 20 महीनों के दौरान Ketto.org पर 3 फंड रेजिंग कैम्पेन शुरू किए थे। जब भी कोई यूजर Ketto.org के जरिए फंड रेजिंग कैम्पेन शुरू करता है तो वो Ketto के उपयोग की शर्तों, गोपनीयता पॉलिसी और प्लेटफॉर्म पर धन जुटाने के लिए डिजिटल समझौते से सहमत होते हैं। इसके अलावा कैम्पेन करने वाला व्यक्ति फंड निकालने के लिए केवाईसी डिटेल्स आधार कार्ड, पैन कार्ड, कैंसल चेक भी जमा करते हैं।
  3. राणा अयूब ने तीन फण्ड रेजिंग कैम्पेन शुरू किया था और तीनों से ही उसने पैसे निकाले थे।

तीनों कैम्पेन के लिए निकाली गई धनराशि

A) अपने पहले अभियान में कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए राणा अयूब ने 82,55,899 रुपए का फंड इकट्ठा किया था, जिसमें से से उसने 79,63,640 रुपए निकाले थे। इस कैम्पेन में डोनर्स को 1,00,983 अमेरिकी डॉलर (7,582,483 रुपए) लौटाए गए। दिलचस्प बात यह है कि इस अभियान से पैसे खुद राणा अयूब और उसके पिता मोहम्मद अयूब वक्फ के खातों में निकाले गए।
B) अभियान 2 (झुग्गीवासियों और किसानों की मदद के लिए): 71,37,217 रुपए एकत्र किए गए, 68,84,560 रुपए निकाले गए। इसके अतिरिक्त, 75,600 अमरीकी डालर जुटाए गए और 73,332 अमरीकी डालर निकाले गए। राणा अय्यूब के पिता और अय्यूब के परिवार के एक सदस्य इफ्फत शेख (Iffat Shaikh) के खाते में भी राशि निकाली गई।
ग) अभियान 3 (असम, बिहार और महाराष्ट्र के लिए राहत कार्य): 42,01,368 रुपए जुटाए गए, 40,53,640 रुपए निकाले गए। इसके अतिरिक्त, 37,203 अमरीकी डालर जुटाए गए और 36,087 अमरीकी डालर निकाला गया। इस अभियान से राशि राणा अयूब के पिता के खाते में भी ट्रांसफर की गई।
  1. राणा अय्यूब और उनके परिवार के सदस्यों का केवाईसी विवरण देने के बाद पैसे निकाले गए।
  2. केटो ऑनलाइन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड किसी भी विदेशी फंड का प्रबंधन नहीं करता है। किसी भी विदेशी फंड का प्रबंधन केटो ऑनलाइन वेंचर्स इंक (केटो यूएसए) द्वारा किया जाता है। एक कैम्पेनर जो केटो वेबसाइट पर फंड जुटाता है, उसके पास अपनी पसंद से विदेशी फंड स्वीकार करने का विकल्प होता है; केटो कैंपेनर को अपने अभियान के लिए विदेशी धन स्वीकार करने या न करने का विकल्प देता है। केटो फंड निकालने वाले उपयोगकर्ता से यह घोषणा भी लेता है कि उसके पास विदेशी फंड स्वीकार करने के लिए आवश्यक सरकारी मंजूरी है।
इसके अलावा, 10 दिसंबर 2021 को, वरुण सेठ ने निम्नलिखित खुलासे के साथ विभाग के सवालों का जवाब देते हुए ईडी को एक और ईमेल लिखा:
ईडी ने वरुण सेठ से पूछा है कि क्या मोहम्मद अय्यूब वक्विफ और इफ्फत शेख पैसे निकालने के योग्य हैं। सेठ ने कहा कि वे केवल एक धन इकठ्ठा करने वाला मंच हैं और धन जुटाने वाला व्यक्ति निकासी के लिए लाभार्थियों को जोड़ सकता है और केटो का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
राणा अय्यूब द्वारा मोहम्मद अय्यूब वक्विफ और इफ्फत शेख के बैंक खातों के माध्यम से जुटाई गई धनराशि को वापस लेने के कारणों के बारे में, उन्होंने प्रस्तुत किया कि भुगतान कैंपेनर द्वारा ऑनलाइन अनुरोध पर किया जाता है और केटो द्वारा बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे लाभार्थी के खाते में ट्रांसफर होता है। केटो आगे कुछ भी जानने की स्थिति में नहीं है।

ईडी ने इफ्फत शेख को समन जारी किया और उनका जवाब:

6 दिसंबर को एक ईमेल में, इफ़्फ़त ने ईडी को बताया कि वह दुबई में थी और अपने पति के खराब स्वास्थ्य और ओमिक्रॉन के कारण लगाए गए यात्रा प्रतिबंधों के कारण, वह सम्मन के जवाब में भारत की यात्रा नहीं कर सकती थी। उसने आगे कहा कि उसकी बहन राणा अयूब को पावर ऑफ अटॉर्नी दी गई थी और आवश्यक दस्तावेज मुंबई में जमा कर दिए गए थे। राणा अयूब द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में कहा गया है कि राणा अयूब ने खर्च का व्योरा दिया था। राहत कार्यों पर 40 लाख; रुपए की राशि, 74.50 लाख पीएम केयर फंड / सीएम केयर फंड में दान दिया। 1.05 करोड़ का आयकर भुगतान किया जा चुका है।

ED द्वारा मोहम्मद अयूब वक़िफ़ को समन और राना अयूब के माध्यम से उनकी प्रतिक्रिया

राना अयूब ने अपने पिता की ओर से ईमेल पर ED को जवाब देते हुए कहा कि उन्हें दो ब्रेन स्ट्रोक हो चुके हैं और वे व्हीलचेयर पर हैं। उसने कहा कि सितंबर तक उसने पीएम केयर को दान की गई राशि सहित उसे प्राप्त एक-एक पैसा खर्च कर दिया था और उसने 29.09.2021 को ईडी कार्यालय मुंबई को सभी जानकारी/दस्तावेज जमा कर दिए थे। इस दस्तावेज में कहा गया है कि सुश्री राना अयूब ने 40 लाख रुपए राहत कार्यों पर खर्च किए, 74.50 लाख रुपए पीएम केयर फंड/सीएम केयर फंड में दिए और 1.05 करोड़ रुपए का आयकर भुगतान किया।

राना अयूब को ED ने समन भेजा और विभाग को उनका बयान

  1. राना अयूब का दावा है कि उन्हें केवल भारतीय रुपए में राशि मिली, लेकिन केटो द्वारा दिए गए विवरण उनके दावे पर सवाल खड़े करता है।
  2. उनका दावा है कि उसकी बहन और पिता के खाते में हस्तांतरित की गई राशि को बाद में उसके खाते में हस्तांतरित कर दिया गया था, जिसका उपयोग उन उद्देश्यों के लिए किया गया था जिनके लिए उन्हें माँगा गया था।
  3. उन्होंने दानदाताओं की सूची ED को सौंपी है।
  4. विदेशी मुद्रा लेने से संबंधित RBI की गाइडलाइन के तहत ना ही उनके पिता या बहन और ना ही उन्हें पंजीकृत ईमेल पर कोई सूचना मिली कि उनके पास एफसीआरए का पंजीकरण नहीं है, क्योंकि भारतीय मुद्रा में धन प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती और ना ही केटो द्वारा इस संबंध में कोई मौखिक या लिखित सूचना मिली।
  5. राहत कार्य के लिए उपयोग खाद्यान्न, तिरपाल शीट, कोविड के लिए आवश्यक सामग्री (दस्ताने, मास्क, हैंड सैनिटाइज़र सहित, प्रवासी श्रमिकों को घर भेजना, उनके लिए परिवहन की व्यवस्था) की खरीद और इसके लिए 40 लाख रुपए का भुगतान। तिरपाल शीट, खाद्यान्न आदि का वितरण राहत कार्यों के हिस्सा थे। राहत कार्य में किये गये व्यय के बिलों की मूल प्रतियां आयकर विभाग को दी गईं।

पहला कैम्पेन के बाद पिता के नाम पर 50 लाख रुपए की फिक्स डिपॉजिट पर राना अयूब का बयान

राहत कार्यों के नाम पर जनता से इकट्ठा किए गए फंड में से राना अयूब ने 19 मई 2020 को अपने पिता के नाम पर 50 लाख रुपए की फिक्स डिपॉजिट की। राना अय्यूब ने उल्लासपूर्वक बताया कि उन्होंने अस्पताल के लिए पर्याप्त पैसे जमा किए हैं, लेकिन मौजूदा सरकार की निगरानी के कारण गैर-सरकारी संगठन और वे निर्वाचित सदस्य, जिनसे उन्होंने संपर्क किया था, शांत पड़ गए।
ED को उन्होंने आगे बताया कि उनके “नोबल कॉज” के बारे में जानने वाले बैंक मैनेजर ने उन्हें रुपयों की एफडी करने का सुझाव दिया, ताकि 50 लाख रुपए की एफडी पर मिले ब्याज से अस्पताल के लिए अतिरिक्त पैसा जमा होगा। राना ने दावा किया कि उन्होंने एफडी केवल इसलिए की, ताकि इससे काम में मदद मिले और अस्पताल के लिए रखे पैसे से ब्याज मिले।
दिलचस्प बात यह है कि राना अयूब और केटो के बीच हुए समझौते में इस कैम्पेन का उद्देश्य ‘नासिक और लातूर के 2,000 गरीब किसानों और धारावी एवं नवी मुंबई के गरीब लोगों को तेल, चावल, चीनी, दाल, अस्पताल का बिल आदि देकर मदद करना’ बताया गया था। इसमें अस्पताल बनाने का उद्देश्य नहीं बताया गया था।
इसको लेकर राना अयूब का कहना था कि उनकी याद में इस तरह का कोई समझौता नहीं हुआ था।