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US Federal Court ने चीनी जालसाज को दी 30 साल की सजा, पश्चिमी मीडिया बताता था ‘बागी’: जानें गुओ वेनगुई की कहानी और जालसाज़ राणा अय्यूब के साथ उसकी समानताएँ

                                               गुओ वेनगुई और राणा अय्यूब (फोटो साभार: Opindia)
चीन का एक भगोड़ा अरबपति गुओ वेनगुई (जिसे हो वान क्वोक, गुओ माइल्स, माइल्स क्वोक और “ब्रदर सेवन” जैसे कई नामों से जाना जाता है) कई सालों तक पश्चिमी मीडिया के बीच एक नायक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विरोधी बागी के रूप में ऐश की जिंदगी जी रहा था। गुओ वेनगुई ने पश्चिम में इस दावे के दम पर अपने लाखों समर्थक बना लिए थे कि ‘चीनी सरकार मेरे पीछे पड़ी है’। लेकिन आखिरकार अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उसे अपने ही समर्थकों से 1 अरब डॉलर (करीब 83 अरब रुपए) से ज्यादा की धोखाधड़ी का दोषी पाया। 29 जून 2026 को फेडरल कोर्ट ने गुओ वेनगुई को 30 साल जेल की सजा सुनाई।

धोखाधड़ी के आरोप और गुओ वेनगुई का चीन से पलायन

इस अभियान में वेनगुई के साथी, जिनमें पूर्व खुफिया अधिकारी मा जियान भी शामिल थे, निशाने पर आए। गुओ वेनगुई उर्फ गुओ माइल्स ने चीनी अधिकारियों की इस कार्रवाई को एक राजनीतिक साजिश बताया। उसने दावा किया कि चीनी सरकार के बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के कारण उसे निशाना बनाया जा रहा है।

भागने के शुरुआती सालों में चीनी अधिकारियों ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया और उसके खिलाफ इंटरपोल नोटिस भी जारी कराया। चीन सरकार ने उस पर रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, अपनी पूर्व सहायक के साथ बलात्कार, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे।

हांगकांग समेत कई जगहों पर वेनगुई की संपत्तियाँ सील कर दी गईं। चीन ने अमेरिका से इस जालसाज को वापस सौंपने की माँग भी की थी।

चीन में धोखेबाज, पश्चिम में बागी: बिकाऊ मीडिया की मदद से कैसे बनाई ‘एक्टिविस्ट’ की छवि

खुद को देश से बाहर रखने के दौरान गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े आलोचक के रूप में खुद को नए सिरे से पेश किया। वेनगुई ने अमेरिका सरकार की फंडिंग से चलने वाले वॉयस ऑफ अमेरिका (VoA), बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स और फोर्ब्स सहित कई बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों को इंटरव्यू दिए। वह कई ऑडियो पॉडकास्ट में भी शामिल हुआ।
अमेरिकी मीडिया एक्जीक्यूटिव, इन्वेस्टमेंट बैंकर और व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ मिलकर गुओ वेनगुई ने ‘जीटीवी’ (GTV) नाम की एक मीडिया कंपनी बनाई।
साल 2018 में, स्टीव बैनन और गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) की स्थापना की, जिसका नाम उसने ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ (Rule of Law Society) रखा। शुरुआत में इस संस्था को गुओ वेनगुई की तरफ से 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया था।
हालाँकि जब इस संस्था के पैसों की जाँच शुरू हुई और दस्तावेज देने से इनकार किया गया, तो स्टीव बैनन ने 2021 में ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।
इस जोड़ी ने साल 2020 में एक लग्जरी नाव (याट) से ‘न्यू फेडरल स्टेट ऑफ चाइना’ की घोषणा की और गुओ ने दावा किया कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंकेगा। गुओ के मीडिया वेंचर्स पर कोविड की शुरुआत और अमेरिकी राजनीति को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप भी लगे और आलोचना हुई।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने वाले अपने इस ‘एक्टिविज्म’ और मीडिया इंटरव्यूज के जरिए गुओ वेनगुई ने विदेशों में रहने वाले चीनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधियों के बीच अपने कट्टर समर्थक तैयार कर लिए। वेनगुई ने अपने इस फर्जी एक्टिविज्म को ‘लोकतंत्र और चीनी तानाशाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध’ के रूप में पेश किया।
जनवरी 2025 में इस 1 अरब डॉलर के घोटाले में भूमिका के लिए गुओ की सहयोगी यवेट वांग को भी 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, पश्चिमी मीडिया और मशहूर हस्तियों ने गुओ वेनगुई को एक हीरो की तरह पेश किया। आखिरकार अमेरिकी प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए ‘चीनी सरकार की प्रताड़ना’ का शिकार बने एक चीनी अरबपति से बेहतर और क्या हो सकता था। अमेरिका में गुओ के आगे बढ़ने की वजह चीन विरोधी आवाजों को मिलने वाला खुला समर्थन था, शायद इसी वजह से शुरुआत में उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई।
चूँकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी विरोधियों की आवाज दबाने के लिए जानी जाती है, इसलिए पश्चिम के लोगों को वेनगुई की मनगढ़ंत कहानी बिल्कुल सच लगी।

गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने हजारों फॉलोअर्स को कैसे ठगा, अमेरिकी अधिकारियों ने किया खुलासा

गुओ वेनगुई को मार्च 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इंटरनेट पर अपने हजारों फॉलोअर्स से 1 अरब डॉलर की ठगी करने की बड़ी साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह धोखाधड़ी जीटीवी (GTV) के प्राइवेट शेयर, लोन, जी|क्लब्स (G|CLUBS) की मेंबरशिप, हिमालय फार्म और ‘हिमालय कॉइन/एक्सचेंज’ नाम की क्रिप्टोकरेंसी के जरिए की गई थी।

सरकारी वकीलों ने आरोप लगाया कि गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने अपने चीन विरोधी ‘आंदोलन’ से जुड़े निवेशों पर भारी मुनाफे का वादा किया था। इसके बाद उसने इन पैसों में से करोड़ों डॉलर अपनी निजी विलासिता पर उड़ा दिए। उसने 50,000 वर्ग फुट का एक महल जैसा बंगला, एक फेरारी, 4.4 मिलियन डॉलर की बुगाटी स्पोर्ट्स कार, 37 मिलियन डॉलर की एक लग्जरी नाव (याट) और बेहद महँगे गद्दे खरीदे।

गुओ ने लंदन में रहने वाले अपने बिजनेस पार्टनर किम मिंग जे के साथ मिलकर हेज फंड में निवेश किया, 10 लाख डॉलर के कालीन और 1,40,000 डॉलर का पियानो खरीदने जैसी फिजूलखर्ची की।

अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ‘अफ़िनिटी फ्रॉड’ (भरोसे की धोखाधड़ी) कहा, क्योंकि गुओ ने अपनी चीन विरोधी छवि का इस्तेमाल करके अपने फॉलोअर्स के भरोसे का गलत फायदा उठाया था।

गुओ की हरकतों की जाँच से पता चला कि उसने चुराए गए करोड़ों डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग की ताकि अपनी इस अवैध साजिश को छुपा सके और धोखाधड़ी का धंधा चालू रख सके।

साल 2021 में माइल्स गुओ उर्फ हान वो क्वोक ने अवैध रूप से फंड जुटाने के एक मामले में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ 539 मिलियन डॉलर का समझौता किया था।

जुलाई 2024 में गुओ को जालसाजी की साजिश, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सिक्योरिटीज धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग समेत 12 में से 9 मामलों में दोषी ठहराया गया।

आखिरकार 29 जून 2026 को गुओ वेनगुई उर्फ हान वो क्वोक को 30 साल जेल की सजा सुनाई गई और 889 मिलियन डॉलर जब्त करने का आदेश दिया गया। फैसला सुनाते समय फेडरल जज ने कहा कि गुओ वेनगुई ने उन लोगों को अपना शिकार बनाया जो चीन में लोकतंत्र चाहते थे।

मुकदमे के दौरान भी गुओ वेनगुई खुद को पीड़ित बताता रहा और उसके बचे हुए समर्थकों का दावा है कि अमेरिकी आरोप चीनी सरकार के इशारे पर लगाए गए हैं ताकि उसकी आवाज दबाई जा सके। हालाँकि वकीलों ने गुओ के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए सबूत उसके फॉलोअर्स के साथ की गई वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं, न कि किसी मनगढ़ंत राजनीतिक आरोपों से।

गुओ वेनगुई चीन में अपने कथित घोटाले की कानूनी आँच से बचकर अमेरिका भागा, पश्चिमी मीडिया की मदद से खुद को हीरो साबित करने की कहानी रची, प्रताड़ना का रोना रोया, अपनी इस ‘हीरो’ वाली कहानी को बेचकर पैसे कमाए, लोगों का ध्यान और फॉलोअर्स खींचे, और फिर उसी मंच और फॉलोअर्स के भरोसे का इस्तेमाल एक बहुत बड़े घोटाले के लिए किया।

यह याद रखना भी दिलचस्प है कि गुओ वेनगुई ने अगस्त 2019 में भविष्यवाणी की थी कि अलीबाबा के संस्थापक जैक मा या तो जेल जाएँगे या मारे जाएँगे, क्योंकि चीनी सरकार जैक मा के ‘एएनटी ग्रुप’ (ANT Group) को ‘वापस लेना यानी हड़पना’ चाहती है।

झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़ना, विदेश में नापसंद की जाने वाली सरकार या विचारधारा पर हमला करके फॉलोअर्स जुटाना, लोगों को ठगना और जब जवाबदेही की बारी आए तो किसी तानाशाह या फासीवादी शासन द्वारा ‘राजनीति से प्रेरित प्रताड़ना’ का रोना रोना—गुओ वेनगुई का यह मामला वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब की याद दिलाता है।

राणा अय्यूब: भारत की गुओ वेनगुई?

राणा अय्यूब को 2016 में खुद से प्रकाशित की गई किताब ‘गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर-अप’ से काफी चर्चा मिली थी। उनका दावा था कि यह किताब 2010 में गुजरात के अधिकारियों की की गई अंडरकवर रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों के बाद मामलों को दबाने और एनकाउंटर की बात ‘कबूल’ की थी।

अय्यूब की तत्कालीन कंपनी ‘तहलका’ ने कहानी अधूरी होने और अन्य संपादकीय कमियों का हवाला देते हुए इसे छापने से मना कर दिया था। हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहान ने खुलासा किया था कि उन्होंने तहलका के मंच पर इन टेपों को चलाने का ऑफर दिया था, लेकिन राणा अय्यूब ने मना कर दिया था।

इस पत्रकार ने दंगों के इर्द-गिर्द अपनी पक्षपातपूर्ण और बेतुकी पत्रकारिता के जरिए खुद को ‘हिंदुत्ववादियों के अत्याचार के खिलाफ एक निडर आवाज’ के रूप में स्थापित कर लिया।

नरेंद्र मोदी के खिलाफ लंबे समय से एजेंडा चला रहीं राणा अय्यूब को तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों पर लिखी उनकी इस तथाकथित ‘खोजी’ किताब को कूड़ेदान में डाल दिया।

अय्यूब की किताब में एक इशारा यह भी था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की साजिश रची थी, जिनकी 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

निचली अदालत ने हरेन पंड्या की हत्या में मुख्य आरोपी असगर अली समेत 12 मुस्लिम पुरुषों को दोषी पाया था। सीबीआई जाँच के मुताबिक, यह हत्या गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए मुफ्ती सूफियान नाम के एक मुस्लिम मौलवी के इशारे पर की गई थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने सीबीआई की ‘खराब जाँच’ का हवाला देते हुए इन लोगों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आपराधिक साजिश और हत्या के प्रयास के आरोप बरकरार रखे थे।

सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने आखिरकार निचली अदालत के मूल फैसले को सही ठहराया।

अय्यूब के ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (मुसलमानों को पीड़ित दिखाने) के एजेंडे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही में राणा अय्यूब की किताब ‘गुजरात फाइल्स’ पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस किताब को फटकारते हुए कहा कि यह सिर्फ अनुमानों, अटकलों और कयासों पर आधारित है।

असल में राणा अय्यूब की किताब के दावे इतने संदिग्ध हैं कि धुर-वामपंथी (लेफ्ट विंग) पब्लिकेशंस ने भी इसे छापने से मना कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार अय्यूब को इसे खुद ही पब्लिश करना पड़ा। यह किताब एक कथित स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इसके वीडियो जारी नहीं किए।

अपनी इस तथाकथित प्रसिद्धि के बाद से, राणा अय्यूब लगातार विदेशी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्प्रचार में लगी रही हैं। सीएए विरोधी शाहीन बाग प्रदर्शन, 2020 के दिल्ली दंगे, कोविड महामारी के दौरान सरकार विरोधी दुष्प्रचार, हर मुद्दे में मुस्लिम उत्पीड़न का एंगल घुसाना, ‘भारतीय सेना कश्मीरी लड़कों को प्रताड़ित कर रही है’ जैसे झूठ फैलाना, 2015 में रानाघाट में एक नन के साथ हुए बलात्कार के लिए आरएसएस और ‘हिंदू आतंकवादियों’ को जिम्मेदार ठहराना राणा अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ हमेशा एजेंडा और भाजपा-आरएसएस के विरोध पर टिकी रही है।

उनके इस दुष्प्रचार ने उन्हें वामपंथी और कुछ खास विचारधारा वाले हलकों में लोकप्रिय बना दिया। लेकिन जो बात राणा अय्यूब को गुओ वेनगुई के जैसा बनाती है, वह है कोविड के नाम पर चंदा जुटाने का कथित घोटाला, जिसे अंजाम देने का उन पर आरोप है।

जब भारत कोविड महामारी से जूझ रहा था, तब राणा अय्यूब ने ‘केटो’ (Ketto) प्लेटफॉर्म पर 3 क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए 2,69,50,695 रूपए की भारी-भरकम रकम जुटाई थी।

राणा को मिले हुए 2.69 करोड़ रूपए में से लगभग 80,49,856 रूपए विदेशी मुद्रा में प्राप्त हुए थे, जो फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) 2010 का सीधा उल्लंघन था।

राणा अय्यूब ने कोविड राहत कार्य के लिए मिलने वाले इस चंदे को अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख के बैंक खाते में 1.60 रूपए करोड़ और अपनी बहन इफ्फत शेख के खाते में 37.15 लाख रूपए ट्रांसफर करवाए।

इसके बाद राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से 84.40 लाख रूपए और अपनी बहन के खाते से 36.40 रूपए लाख अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए। कुल मिलाकर करीब 1,20,80,000 रूपए राणा अय्यूब के निजी खाते में भेजे गए।

हैरानी की बात यह है कि अप्रैल 2022 में उन्होंने इतनी बड़ी रकम के हेरफेर को ‘महज 20,000 डॉलर की छोटी सी रकम’ कहकर टालने की कोशिश की, जबकि असल में यह रकम 2.69 करोड़ रूपए (लगभग $3,14,500) थी।

जुलाई 2025 के अपने आदेश में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने साफ कहा कि चंदे के तौर पर जुटाए गए पैसों में से करीब 2.4 करोड़ रूपए का अभियान के एक साल बाद भी कोई इस्तेमाल नहीं किया गया था।

अदालत ने कहा, “जिस खाते से करदाता या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा पैसे निकाले गए, वह एक पर्सनल सेविंग अकाउंट (निजी बचत खाता) था। इसके अलावा, कोई राहत कार्य करने के बजाय, करदाता ने एक नया करंट अकाउंट खोला और अपने नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर लिया और उसी सेविंग अकाउंट से अपने निजी खर्चे भी किए जिसमें चंदे का पैसा आया था।”

अय्यूब ने आयकर विभाग के सामने दावा किया था कि 2.69 करोड़ रूपए में से एक ‘छोटा हिस्सा (28 लाख रूपए)’ प्रवासी मजदूरों को घर भेजने, राशन खरीदने, इलाज, परिवहन और पश्चिम बंगाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किया गया था।

उन्होंने 19 लाख रूपए अपने ‘निजी खर्चों’ को पूरा करने में उड़ा दिए। यह भी सामने आया कि इस विवादित ‘पत्रकार’ ने कोविड राहत कार्य के लिए मिले पैसों में से 50 लाख रूपए की अपने नाम पर पर्सनल फिक्स डिपॉजिट (FD) करवा ली थी।

आयकर विभाग ने सवाल उठाया कि अगर अय्यूब की कोई गलत नीयत नहीं थी, तो उन्होंने अपने निजी नाम पर 50,00,000 रूपए की एफडी रसीदें क्यों खरीदीं?

जाँच में पता चला कि केटो पर पहले अभियान के जरिए राणा अय्यूब को मिले 1.23 करोड़ रूपए में से राहत कार्य के लिए सिर्फ 18 लाख रूपए का इस्तेमाल किया गया था। अपने बचाव में अय्यूब ने दावा किया कि बचे हुए पैसे ‘अस्पताल बनाने के लिए रिजर्व’ रखे गए थे।

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि राणा अय्यूब ने एफसीआरए (FCRA) 2010 का उल्लंघन किया है, क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट की यह ‘पत्रकार’ एफसीआरए की धारा 3(1)(h) के तहत विदेशी चंदा पाने की हकदार ही नहीं है।

अय्यूब ने समर्थकों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों से कोविड राहत के नाम पर चैरिटी के लिए पैसे जुटाए, लेकिन चैरिटी के लिए इन पैसों के इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं मिला। इस विवादित ‘पत्रकार’ ने दान का पैसा अपने रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराया और कथित सामाजिक कार्यों के लिए कोई अलग खाता तक नहीं रखा।

इससे पहले, फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अय्यूब की 1.77 करोड़ रूपए की संपत्ति कुर्क की थी। वह जाहिर तौर पर अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करती हैं और इसे अपनी आवाज दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित उत्पीड़न बताती हैं।

चूंकि राणा अय्यूब की पत्रकारिता के नाम पर किए जाने वाले इस एक्टिविज्म और चंदे की धोखाधड़ी के आरोपों के कारण पश्चिमी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स ने भी उनसे दूरी बना ली, फिर भी उन्हें विदेशी वामपंथी और कुछ राजनीतिक हलकों में नियोक्ता और समर्थक मिल गए, जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के विरोधी हैं।

पश्चिम बंगाल : लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी सैयद इरदीस को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी


राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

                                                     सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

                                                             सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

केरल : 167 साल की कठोर जेल की सज़ा; 63 साल के ऑटो रिक्शा ड्राइवर पर दिव्यांग के बलात्कार का आरोप


केरल के कासरगोड से एक बहुत ही दुखद और चौंकाने वाली खबर आई है
। वहां एक 63 साल का ऑटो रिक्शा ड्राइवर है, जिसका नाम उस्मान (उर्फ उक्कांपेट्टी उस्मान) है। इस आदमी ने एक 14 साल की मासूम बच्ची के साथ बहुत घिनौना काम किया. वो बच्ची दिमागी तौर पर थोड़ी कमजोर (दिव्यांग) है।

कोर्ट का बड़ा फैसला

कासरगोड की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (जल्दी सुनवाई करने वाली अदालत) के जज रामू रमेश चंद्रभानु ने गुरुवार, 29 मई को ये फैसला सुनाया। उस्मान को छह अलग-अलग मामलों में कुल मिलाकर 167 साल की कठोर जेल की सज़ा दी गई है। साथ ही, उस पर साढ़े पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. सरकारी वकील प्रिया ए.के. ने बताया कि अगर उस्मान ये जुर्माना नहीं भर पाया, तो उसे 22 महीने और जेल में काटने होंगे।

कैसे हुआ खुलासा?

ये शर्मनाक घटना 25 जून, 2021 को तब सामने आई, जब किसी ने उस्मान को उस बच्ची को चेरकला के जंगल की तरफ ले जाते हुए देख लिया। वकील साहिबा ने बताया कि बच्ची के माता-पिता बेचारे दिहाड़ी मजदूर हैं, यानी रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं। दुख की बात ये है कि इस बच्ची के साथ एक और आदमी ने भी गलत हरकत की थी, जिसे हाल ही में 10 साल की सज़ा हुई है।

इन भयानक घटनाओं के बाद बच्ची को एक देखभाल केंद्र (केयर होम) में भेज दिया गया था। पहले तो डर के मारे उसने किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन जब उसकी काउंसलिंग हुई (मनोवैज्ञानिक सलाह दी गई), तो उसने सारी आपबीती बता दी।

किन-किन जुर्मों में मिली सज़ा?

अदालत ने उस्मान को कई गंभीर जुर्मों में सज़ा दी है, जैसे:

  • 16 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार (IPC धारा 376(3)) के लिए 40 साल;
  • बार-बार गंभीर यौन हमला करना (POCSO एक्ट धारा 5(l)) के लिए 40 साल;
  • मानसिक रूप से दिव्यांग बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न (POCSO एक्ट धारा 5(k)) के लिए 40 साल;
  • इसके अलावा अपहरण और मानव तस्करी जैसे जुर्मों में भी उसे सज़ा मिली है;

असल में कितनी सज़ा काटनी होगी?

वकील प्रिया ने ये भी साफ किया कि भले ही सज़ा 167 साल की सुनाई गई है, लेकिन ये सारी सज़ाएं एक साथ चलेंगी। इसका मतलब है कि उस्मान को असल में 40 साल जेल में बिताने होंगे, वो भी कठोर कारावास।

इस मामले की FIR कासरगोड महिला पुलिस स्टेशन की इंस्पेक्टर भानुमति सी. ने दर्ज की थी और उन्होंने ही पूरी जांच भी की।

इन भयानक घटनाओं के बाद बच्ची को एक देखभाल केंद्र (केयर होम) में भेज दिया गया था। पहले तो डर के मारे उसने किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन जब उसकी काउंसलिंग हुई (मनोवैज्ञानिक सलाह दी गई), तो उसने सारी आपबीती बता दी।

केरल कोर्ट : माँ द्वारा अपने 2 प्रेमियों से अपनी ही नाबालिग बेटियों का बलात्कार करवाने पर 40 साल की सजा

                                                               प्रतीकात्मक 
कोई माँ इस कदर क्रूर भी हो सकती है शायद कोई कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन केरल की एक औरत ने सारी हदें पार करते हुए अपने दो प्रेमियों से बच्चियों का यौन उत्पीड़न ही नहीं करवाया बल्कि उन्हें मानसिक यातनाएँ देने में भी कसर नहीं छोड़ी।

केरल की तिरुवनंतपुरम विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सोमवार (27 नवंबर, 2023) को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत इस महिला को 40 साल के सख्त कारावास और 20,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

इस केस में 22 गवाहों से पूछताछ की गई और 33 दस्तावेज़ कोर्ट के सामने पेश किए गए। बच्चियों के साथ हो रहे इस हैवानियत भरे व्यवहार का खुलासा चिल्ड्रेन होम्स की काउंसलिंग के दौरान हुआ। दरअसल, महिला का पति मानसिक रूप से बीमार था।

वो बीमार पति को छोड़कर अपने शिशुपालान (Shishupalan) नाम के प्रेमी के साथ रहने चली गई। वो अपनी कक्षा 1 में पढ़ने वाली 7 साल की बेटी को भी अपने साथ ले जाती रही। इस दौरान उसके प्रेमी शिशुपालान ने बच्ची का यौन उत्पीड़न किया। उसका कई बार बेरहमी से रेप किया। इतना की उसके प्राइवेट पार्ट में गहरे जख्म बन गए।

हैरानी की बात है कि उसकी माँ बार-बार बच्ची को प्रेमी के घर ले जाती रही। उसके ही सामने प्रेमी बच्ची का यौन उत्पीड़न करता रहा, लेकिन वो कुछ करना तो दूर प्रेमी के सामने मासूम बेटी का जिस्म परोसती रही। जब बच्ची की 11 साल की बहन घर आई तो उसने अपनी बड़ी बहन को ये बात बताई।

लेकिन महिला का वहशी प्रेमी शिशुपालान उसकी बड़ी बेटी को भी अपना हवस का शिकार बनाता रहा। वह दोनों बच्चियों को यौन उत्पीड़न की बात किसी को भी बताने पर धमकाता रहा।

इस दौरान मौका पाकर बड़ी बहन अपनी छोटी बहन को लेकर भागकर अपनी दादी के घर आ गई। बच्चियों ने दादी को अपने साथ हो रही दरिंदगी के बारे में बताया। इस पर बच्चियों की दादी ने महिला को प्रेमी को छोड़कर घर आने को कहा, लेकिन उसने घर आने को इंकार कर दिया।

इतना ही नहीं वो पहले प्रेमी को छोड़कर दूसरे युवक के साथ रहने चली गई। महिला के नए प्रेमी ने भी दोनों नाबालिग बच्चियों की माँ की इजाजत पर उनके साथ बलात्कार किया। बच्चियों ने इसकी जानकारी भी दादी को दी। इसके बाद दादी ने नजदीकी थाने में शिकायत दर्ज कराई।

बच्चियों की तहरीर के आधार पर पुलिस ने महिला के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। वहीं बच्चियों की दादी ने दोनों बच्चियों को चिल्ड्रेन होम के हवाले कर दिया। वहाँ काउसिलिंग के दौरान बच्चियों ने अपने साथ हुई दरिंदगी और हैवानियत के बारे में बताया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, विशेष लोक अभियोजक आरएस विजय मोहन कहा, “इस अपराध के लिए माँ को 40 साल की सजा और 20 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई है। अपराध दो लड़कियों, आरोपित की बेटी के साथ दुर्व्यवहार का है। उनका यौन शोषण और उनके साथ क्रूरतापूर्वक व्यवहार किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा, “पहले प्रेमी शिशुपालान ने लड़की के साथ तब बेरहमी से बलात्कार किया जब वह सात साल की थी और पहली कक्षा में पढ़ रही थी। उस वक्त पीड़ित बच्ची ने आरोपित माँ को पूरी घटना बताई थी, लेकिन उसने कुछ नहीं किया था। उलटा उसने दूसरे प्रेमी को पीड़िता के साथ दुर्व्यवहार करने में मदद की।

जज आर रेखा ने पाया कि आरोपित का रवैया पूरी तरह से मातृत्व के लिए शर्म की बात है और वह माफी की हकदार नहीं है और उसे अधिकतम सजा दी गई। ट्रायल के दौरान पहले आरोपित शिशुपालन ने आत्महत्या कर ली। इसलिए मुकदमा सिर्फ माँ के खिलाफ ही चला। बच्चियाँ फिलहाल चिल्ड्रेन होम में रह रही हैं।

तमिलनाडु : ‘जिस जज ने राहुल गाँधी को सज़ा सुनाई, सत्ता में आने पर उसकी जीभ काट डालेंगे’: कांग्रेस नेता

सजा सुनाने वाले जज को कॉन्ग्रेस नेता की धमकी (फोटो साभार- एएनआई)
तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने ऐलान किया कि सत्ता में आते ही उस जज की जीभ काट ली जाएगी जिन्होंने राहुल गाँधी को 2 साल की सजा सुनाई थी। धमकी देने वाले कांग्रेस नेता की पहचान मणिकंदन के तौर पर हुई है। पुलिस ने कांग्रेस नेता के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। कांग्रेस नेता का यह वीडियो 6 अप्रैल, 2023 का बताया जा रहा है।

तमिलनाडु के डिंडीगुल में कांग्रेस की एससी/एसटी विंग की तरफ से राहुल गाँधी को अयोग्य ठहराने के खिलाफ प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। इस प्रदर्शन में कांग्रेस पार्टी जिला प्रमुख मणिकंदन भी शामिल हुए। सड़क पर उन्होंने स्थानीय भाषा में लोगों को संबोधित भी किया। इसी संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि सूरत की अदालत ने हमारे नेता (राहुल गाँधी) को दो साल की सजा सुनाई। उन्होंने कहा, “सुनिए जस्टिस एच वर्मा जब कांग्रेस सत्ता में आएगी तो हम आपकी जीभ काट देंगे।”

डिंडीगुल पुलिस ने मणिकंदन के खिलाफ आईपीसी की धारा 153बी समेत तीन धाराओं में मामला दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि मामले की जाँच की जा रही है। न्यूज एजेंसी एएनआई ने धमकी से संबंधित एक वीडियो भी जारी किया है। इसमें कांग्रेस नेताओं और वर्कर्स को हाथ में कांग्रेस का झंडा व बैनर लेकर प्रदर्शन करते देखा जा सकता है। कुछ लोग भी जमा हुए हैं जिन्हें मणिकंदन संबोधित कर रहे हैं।

मोदी सरनेम पर आपत्तिजनक बयानबाजी करने के मामले में 23 मार्च, 2023 को सूरत की जिला अदालत ने राहुल गाँधी को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई थी। सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद उन्हें जमानत भी दे दी गई। उन्हें ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया था। इस बीच राहुल गाँधी की संसद सदस्यता भी चली गई थी और उनसे सरकारी बंगला भी खाली करा लिया गया था। 

राहुल गाँधी को 2 साल की जेल, फिर तुरंत ही मिल गई बेल

गुजरात के सूरत सेशन कोर्ट ने राहुल गाँधी को पीएम मोदी पर दिए एक बयान के मामले में दोषी ठहराया है। कोर्ट ने उन्हें 2 साल की सजा सुनाई। हालाँकि उन्हें तुरंत जमानत भी मिल गई। राहुल गाँधी ने 2019 में कर्नाटक की एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था, “सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है?” इस बयान के बाद राहुल गाँधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था।

सुनवाई के दौरान राहुल गाँधी भी सूरत की कोर्ट में उपस्थित थे। उनके साथ कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेता भी कोर्ट में मौजूद रहे। राहुल गाँधी को दोषी ठहराए जाने के बाद केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू का बयान आया। रिजिजू ने कहा कि राहुल गाँधी जो भी बोलते हैं उससे उनकी पार्टी और देश को भी नुकसान होता है।

13 अप्रैल 2019 को राहुल गाँधी ने कहा था, “नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेंद्र मोदी इन सभी के नाम में मोदी लगा हुआ है। सभी चोरों के नाम में मोदी क्यों लगा होता है।” इस बयान के बाद भाजपा नेता पूर्णेश मोदी ने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ सूरत में मामला दर्ज कराया था। राहुल गाँधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत केस दर्ज करवाया था, जो आपराधिक मानहानि से संबंधित है। 4 साल के बाद अदालत ने मामले में राहुल गाँधी को दोषी पाते हुए सजा सुना दी।

इस केस के सिलसिले में राहुल गाँधी कई बार सूरत पहुँचे। जून 2021 में राहुल गाँधी ने पेशी के दौरान अपना बयान दर्ज कराया था। कॉन्ग्रेस नेता ने अदालत को बताया था कि उन्होंने चुनाव के दौरान राजनीतिक कटाक्ष किया था। उन्होंने यह बात किसी समाज के लिए नहीं कही थी। साथ ही कहा कि इस मामले में अब उन्हें ज्यादा कुछ याद नहीं है। 

केरल : बेटी के बलात्कार और गर्भवती करने के आरोप में मदरसे के मौलवी को 3 उम्र कैद यानि जिन्दगी भर की जेल

प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: लाइवलॉ
केरल में एक मदरसे के मौलवी को अपनी बेटी के साथ रेप के मामले में तीन उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। मल्लपुरम की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने बलात्कारी अब्बा पर 6.6 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। बार-बार रेप के बाद लड़की गर्भवती हो गई थी। बाद में उसने गर्भपात करवा लिया था। मामले का खुलासा 2022 में हुआ, जब लड़की के गर्भवती होने का पता चला।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पहली बार मार्च 2021 में मदरसे के मौलवी ने बेटी से रेप किया था। उस समय कोरोना की वजह से 15 वर्षीया पीड़िता अपने कमरे से ऑनलाइन पढ़ाई कर रही थी। इसी दौरान उसका अब्बा कमरे में घुसा और छेड़छाड़ करने लगा। बेटी ने विरोध किया तो मौलवी उसे जबरन खींचकर अपने बेडरूम में ले गया और उसके साथ दरिंदगी की।

विरोध किए जाने पर मौलवी ने अपनी बीवी को भी जान से मार डालने की धमकी दी। मार्च 2021 से अक्टूबर 2021 के बीच उसने कई बार बेटी को हवस का शिकार बनाया। नवंबर 2021 से स्कूल खुलने पर पीड़िता स्कूल जाने लगी। जनवरी 2022 में एक दिन अचानक उसके पेट में दर्द उठा। स्कूल स्टाफ पीड़िता को अस्पताल ले गए जहाँ उसके गर्भवती होने का खुलासा हुआ।

विरोध किए जाने पर मौलवी ने अपनी बीवी को भी जान से मार डालने की धमकी दी। मार्च 2021 से अक्टूबर 2021 के बीच उसने कई बार बेटी को हवस का शिकार बनाया। नवंबर 2021 से स्कूल खुलने पर पीड़िता स्कूल जाने लगी। जनवरी 2022 में एक दिन अचानक उसके पेट में दर्द उठा। स्कूल स्टाफ पीड़िता को अस्पताल ले गए जहाँ उसके गर्भवती होने का खुलासा हुआ।

अभियोजन पक्ष के वकील ने कोर्ट को बताया कि अस्पताल में लड़की ने स्कूल के स्टाफ से अपने अब्बा की करतूत बता दी थी। इसके बाद पुलिस को मामले की जानकारी दी गई। पुलिस ने FIR दर्ज कर के लड़की के अब्बा को गिरफ्तार कर लिया। मदरसा टीचर पर पॉक्सो एक्ट के तहत FIR दर्ज हुई थी। कुछ समय बाद मेडिकल परीक्षण कर लड़की के गर्भ को भी गिरा दिया गया। इस दौरान पुलिस ने जाँच के लिए पीड़िता के गर्भ से निकले भ्रूण के सैम्पल लिए थे।

भ्रूण के सैम्पल का मिलान लड़की के अब्बा से करवाया गया तो वह मैच कर गया। इस मामले की जाँच पुलिस अधिकारी अब्दुल बशीर कर रहे थे। पुलिस ने लड़की के साथ उसकी अम्मी के भी बयान दर्ज किए। इस मामले को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया गया। आखिरकार अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों को सही माना और मौलवी की हरकत को घृणित बताते हुए उसे 3 आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आदेश के मुताबिक रेपिस्ट को अंतिम साँस तक जेल में ही रहना होगा।