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मोदी को गोली मारने वाले, इजरायल को उड़ाने वाले ‘Time Bomb’ नहीं लेकिन योगी को खिलौना देने वाली बच्ची ‘हिंदू आतंकी’: क्यों वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना बनी यशस्विनी

                       योगी बच्ची संग (बाएँ), प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा (दाएँ), (साभार : PTI & crickettimes)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।

बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”

मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।

आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’

लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”

आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”

वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”

एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”

इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।

जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं

ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।

यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।

आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।

आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।

बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’

आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।
यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?

आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए

आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।

आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।

पश्चिम बंगाल : लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी सैयद इरदीस को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी


राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

                                                     सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

                                                             सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

असम में ‘जिहादी साहित्य’ पर स्ट्राइक, बांग्लादेशी आतंकी संगठनों का डिजिटल कंटेंट भी बैन: किताबों के जरिए युवाओं का ब्रेनवॉश करते हैं इस्लामी कट्टरपंथी

                     असम में जिहादी साहित्य बैन की प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार : Grok)
असम सरकार ने राज्य की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से बचाने के लिए एक बहुत बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। सरकार ने जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT), अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS और इनसे जुड़े सभी आतंकी संगठनों से संबंधित किसी भी तरह के कट्टरपंथी या ‘जिहादी’ साहित्य, दस्तावेज और डिजिटल सामग्री के प्रकाशन, छपाई, बिक्री, वितरण, प्रदर्शन, रखने और संग्रह करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।

यह प्रतिबंध केवल किताबों या पत्रिकाओं पर ही नहीं, बल्कि वेबसाइटों, सोशल मीडिया पेजों, एन्क्रिप्टेड चैनलों और ऑनलाइन ग्रुपों पर भी लागू होगा। सरकार का कहना है कि यह सामग्री भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही थी।

राज्य सरकार ने यह प्रतिबंध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 98 के तहत लगाया है। असम पुलिस की खुफिया रिपोर्ट और हाल की जाँचों में यह साफ हुआ कि ये प्रतिबंधित संगठन अभी भी राज्य में अपनी प्रचार सामग्री फैला रहे थे, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द को बड़ा खतरा था।

अधिसूचना में असम पुलिस, CID और साइबर क्राइम यूनिट को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस आदेश का सख्ती से पालन करवाएँ और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई करें। यह कार्रवाई राज्य में बढ़ते कट्टरपंथी प्रचार पर लगाम कसने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।

प्रतिबंधित जिहादी साहित्य में क्या था? आतंकी कैसे फैला रहे थे विचारधारा?

असम सरकार ने जिन सामग्रियों पर प्रतिबंध लगाया है, वे मुख्यतः हिंसक जिहाद को महिमामंडित करती थीं और सीधे तौर पर युवाओं को कट्टर बनाने की कोशिश करती थीं। सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि इन साहित्य में न सिर्फ आतंकी विचारधारा का प्रशिक्षण दिया जाता था, बल्कि भर्ती और आतंकी ऑपरेशन की ट्रेनिंग से जुड़ी गाइडेंस भी होती थी।

ये सामग्री भारत की संप्रभुता के खिलाफ खुलकर भड़काती थी और युवाओं को आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित करती थी। अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के संदेश ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आसानी से युवाओं तक पहुँच रहे थे।

कई डिजिटल चैनल, वेबसाइटें और वॉट्सऐप जैसे एन्क्रिप्टेड ग्रुप्स का इस्तेमाल कर ये समूह हिंसक भाषा और उग्र विचारधारा को वैध ठहराने की कोशिश कर रहे थे, जिससे अलग-अलग समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव बढ़ रहा था।

सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधा और तत्काल खतरा माना। यह प्रतिबंध इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि इंटेलिजेंस रिपोर्टों में यह बात सामने आई थी कि यह डिजिटल प्रचार राज्य के सौहार्दपूर्ण वातावरण को नुकसान पहुँचा रहा था और युवाओं को गुमराह करने की कोशिशें लगातार जारी थीं।

कौन से आतंकी संगठनों का खुलासा हुआ और क्या था उनका भारत प्लान?

असम में इस प्रतिबंध के जरिए जिन तीन मुख्य आतंकी संगठनों के साहित्य और एजेंडे का खुलासा हुआ है, वे सभी बांग्लादेश में सक्रिय हैं और भारत को निशाना बनाने की फिराक में थे। ये संगठन हैं जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) और अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS। इन सभी को केंद्र सरकार पहले ही UAPA, 1967 के तहत आतंकी संगठन घोषित कर चुकी है।

JMB का जिहादी साहित्य: क्या था इसमें और कैसे फैलाया जाता था

जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) दक्षिण एशिया के सबसे संगठित सुन्नी जिहादी नेटवर्कों में से एक माना जाता है। इसका साहित्य दो हिस्सों में बाँटा जाता है, ‘पहला वैचारिक और दूसरा ऑपरेशनल’। वैचारिक साहित्य में ‘हिंसक जिहाद को मजहबी कर्तव्य’ की तरह पेश किया जाता था। इसमें लोकतंत्र, उदारवाद और सेकुलरिज्म को ‘शैतानी व्यवस्था’ बताकर युवाओं में एक अलग पहचान और हिंसक संघर्ष का भाव पैदा किया जाता था। ऑपरेशनल सामग्री में बम बनाने से लेकर भर्ती करने की रणनीति और गुप्त सेल चलाने तक की तकनीक बताई जाती थी।

ये साहित्य कभी खुले मंचों पर नहीं मिलता था। इन्हें खास एन्क्रिप्टेड ऐप, टेलीग्राम चैनल, व्हाट्सऐप ग्रुप, और विदेशी सर्वरों पर होस्ट किए गए PDF के रूप में साझा किया जाता था। असम पुलिस की जाँच में ऐसे सैकड़ों डिजिटल दस्तावेज मिले जिनमें JMB का प्रचार था, और इन्हें मुख्यत: सीमावर्ती जिलों में फैला हुआ पाया गया।

JMB का इतिहास और भारत में उसका ‘दीर्घकालिक प्लान’

1998 में बने JMB ने खुद को शुरू से बांग्लादेश में इस्लामी शासन स्थापित करने वाले आंदोलन की तरह पेश किया। लेकिन 2005 के 63 जिलों में 459 ब्लास्ट इसकी कट्टरपंथी हिंसा की सबसे बड़ी मिसाल है। भारत में इसका मुख्य मकसद दो तरह का रहा, ‘पहला, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में जिहादी सेल बनाना और दूसरा रोहिंग्या मुद्दे को भड़का कर भावनात्मक भर्ती करना।’

JMB का योजना स्पष्ट थी। सीमा पार मौजूद असंतोष का फायदा उठाते हुए भारत में ‘वार-प्रेडिक्शन मॉडल’ तैयार करना, यानी धीरे-धीरे गुप्त सेल बनाकर भारत को भविष्य में हमलों का मैदान बनाना। JMB ने असम और पश्चिम बंगाल में कई मॉड्यूल बनाए और इन मॉड्यूलों के पास जो सामग्री मिली, उनमें भारत को ‘इस्लामी संघर्ष का अगला मैदान’ बताने वाली जरूरत से ज्यादा कट्टर और उकसाने वाली बातें शामिल थीं।

युवाओं को कैसे जाल में फँसाया जाता था

JMB अपनी भर्ती का तरीका बहुत सोच-समझकर बनाता था। पहले हल्की मजहबी सामग्री भेजी जाती, फिर धीरे-धीरे कथित ‘अन्याय’ की कहानियाँ और अंत में हिंसक विचारधारा वाले दस्तावेज। असम में पकड़े गए कई युवक इन्हीं चरणों से गुजरकर कट्टर बने थे। उनमें से कई को JMB के डिजिटल हैंडलरों ने भारत के अंदर ‘स्लीपर सेल’ की तरह तैयार किया था।

ABT का साहित्य: अल-कायदा से प्रेरित संगठन का युवाओं के दिमाग पर डिजिटल कब्जा

अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) बांग्लादेश के उन संगठनों में से है जो सीधे तौर पर अल-कायदा की विचारधारा से प्रभावित हैं। ABT का साहित्य बेहद आक्रामक होता है और इसमें खासकर ‘काफिर’, ‘नास्तिक’ और ‘धर्म-विरोधी’ लोगों को निशाना बनाने की खुली बातें लिखी जाती थीं।
उनकी डिजिटल किताबों में अल-अवलाकी के भाषण, अल-कायदा के वैचारिक संदेश और ऑनलाइन ‘लोन वुल्फ अटैक’ जैसी रणनीतियाँ बताई जाती थीं। ABT की खासियत यह थी कि वह अपने साहित्य को युवाओं के लिए प्रेरणादायक भाषण या ‘आध्यात्मिक ज्ञान’ की तरह प्रस्तुत करता था, जिससे कई अनभिज्ञ युवाओं को लगता था कि यह सिर्फ धार्मिक शिक्षा है, जबकि अंदर छिपा संदेश धीरे-धीरे उन्हें हिंसक कट्टरपंथ की तरफ धकेल देता था।

ABT के भारत में नेटवर्क का खुलासा कैसे हुआ

असम STF द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन प्रघट‘ ने पूरे नेटवर्क की असल तस्वीर उजागर की। जाँच में पता चला कि ABT के कई सदस्य बांग्लादेश से भारत आए और असम, बंगाल, झारखंड और केरल में गुप्त सेल बनाने लगे। इनसे जो डिजिटल दस्तावेज मिले, उनमें अल-कायदा की विचारधारा, स्लीपर सेल तैयार करने की गाइड और भारतीय नेताओं, RSS सदस्यों को निशाना बनाने की योजनाओं का उल्लेख था।
ABT का साहित्य राज्य में इतना फैल चुका था कि कई युवाओं ने इसे बिना समझे डाउनलोड किया और बाद में संपर्क भी स्थापित किया। STF ने 13 से ज्यादा ABT सदस्यों को गिरफ्तार किया, और सभी के पास भारी मात्रा में डिजिटल जिहादी साहित्य मिला।

अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS का साहित्य: आतंकवाद का ‘यूनिवर्सिटी मॉडल’

अंसार-अल-इस्लाम को पहले जुंद-अल-इस्लाम कहा जाता था। यह उन संगठनों में से है जिन्हें सीधे अल-कायदा ने पोषित किया। इसका साहित्य बेहद व्यवस्थित होता है, जिसे कई आतंकवाद विशेषज्ञ ‘टेक्स्टबुक ऑफ जिहाद’ कहते हैं। इसमें वैचारिक, राजनीतिक, सैन्य और मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की सामग्री होती है।
इस साहित्य में ओसामा बिन लादेन, जर्कावी और अल-कायदा के अन्य नेताओं की रणनीतियों पर विस्तृत चर्चाएँ होती हैं। असम पुलिस को पता चला कि कई दस्तावेज इस संगठन के ‘प्रशिक्षण मैनुअल’ थे, जिनमें जहर बनाने, विस्फोटक तैयार करने और गुप्त नेटवर्क संभालने जैसी जानकारी थी। यही वजह है कि राज्य ने इसे सबसे खतरनाक माना।

इसका भारत में उद्देश्य क्या था

अंसार-अल-इस्लाम का उद्देश्य सिर्फ हमले करना नहीं बल्कि भारत जैसे बड़े देश में ‘आइडियोलॉजिकल पेनिट्रेशन’ यानी विचारधारा की धीरे-धीरे पैठ जमाना था। संगठन का मानना था कि अगर साहित्य भरोसेमंद हाथों तक पहुँचा दिया जाए, तो नेटवर्क बिना किसी प्रत्यक्ष आदेश के खुद बन सकता है। खुफिया रिपोर्ट में पाया गया कि असम के कुछ युवक इस संगठन के साहित्य पढ़कर खुद को ‘डिजिटल मुजाहिदीन’ कहने लगे थे।

युवाओं का कट्टरपंथ की ओर बढ़ना: असम सरकार क्यों हुई अलर्ट

असम सरकार का कहना है कि यह सिर्फ कुछ पुस्तकों का मामला नहीं बल्कि एक बड़ी डिजिटल लड़ाई है। प्रतिबंधित संगठनों ने इंटरनेट को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को अपना लक्ष्य बनाया।
कई गिरफ्तारियों में यह खुलासा हुआ कि छात्र, मजदूर, ड्राइवर, यहाँ तक कि बेरोजगार युवक भी जिहादी समूहों से डिजिटल रूप से जुड़े हुए थे। उनके फोन में जो साहित्य मिला, वह एक पूरी विचारधारा को तैयार कर रहा था। इसमें भारत को ‘दुश्मन राज्य’, पुलिस को ‘जालिम’ और लोकतंत्र को ‘हराम’ बताया गया था।
सरकार को यह भी डर था कि यदि यह सामग्री समय रहते रोकी नहीं गई तो राज्य में स्लीपर सेल बन सकते हैं, सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, और पड़ोसी देशों के आतंकी संगठनों को भारत में जमीन मिल सकती है।

असम सरकार ने बैन क्यों लगाया और आगे क्या होगा

असम सरकार ने यह प्रतिबंध सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनी के बाद नहीं बल्कि जमीन पर देखे गए बदलावों के आधार पर लगाया। सरकार ने साफ कहा कि यह साहित्य ‘भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और आंतरिक शांति’ के खिलाफ है।
अब राज्य में पुलिस, CID और साइबर यूनिट मिलकर दुकानों, लाइब्रेरी, ऑनलाइन ग्रुप और सोशल मीडिया पेजों की निगरानी करेंगे। सरकार का लक्ष्य है कि युवाओं तक ऐसा कोई भी साहित्य न पहुँचे जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जाए। यह अभियान लंबे समय तक चलने वाला है और किसी भी उल्लंघन पर तुरंत गिरफ्तारी की जाएगी।


‘मजहब’ के नाम पर फिदायीन बनते हैं, पर लिबरल-इस्लामी गैंग चाहता है कि ‘मजहब’ की बात न हो; अजित भारती द्वारा 'डॉक्टरों' की गिरफ्तारी पर बिलखती 'बुआओं' का धुंआधार रोस्ट, देखिए वीडियो

   दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी के वायरल वीडियो पर उदारवादी-मुस्लिम और इस्लामी कट्टरपंथी तिलमिलाए (फोटो साभार: NDTV)
कैसी अजीब विडंबना है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करेंगे लेकिन उनके गुर्गे कहते हैं इस्लाम का नाम मत लो। भारत में जयचन्दों की कभी कमी नहीं रही। एक ढूंढने निकलोगे हज़ार मिल जाएंगे। जयचन्द तो मर गया लेकिन अपने वंशज छोड़ गया। हिन्दू राज में जयचन्द चंद चांदी के टुकड़ों के लालच में मुग़ल आक्रांताओं को भारत में घुसा गया। खैर अब आतंकवादियों के साथ-साथ इन जयचन्दों का हिसाब होना शुरू हो चुका है। अगर आतंकी और उनके गुर्गे भारत को गजवा-ए-हिन्द बनाने का असफल प्रयास कर रहे हैं जब 2014 से पहले नहीं कर पाए तो अब क्या क्या करेंगे। 2014 चुनावों से पहले कोशिश तो बहुत हुई थी लेकिन तपस्वियों के तप ने उनके नापाक मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। ये भारत ऋषि-मुनियों के तप की भूमि है। उसी तप ने सनातन की समर्पण किए वेद, पुराण, भागवत गीता, शास्त्र, उपनिषद, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत और  अनेकों महाकाव्य आदि।       

दिल्ली में लाल किला के पास धमाका करने वाले आतंकी उमर नबी का हाल ही में एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में उमर ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ यानी फिदायीन बनने को सही ठहरा रहा है। वह इसे ‘शहादत का ऑपरेशन’ बताकर पेश करता है। यह वीडियो उन उदारवादी-बुद्धिजीवियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों पर ढकी उस सच्चाई को दिखाता है, जो दावा करती हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ है। शायद इसीलिए ऐसे लोगों को वीडियो बाहर आने से परेशानी हो रही है।

आज(21 नवम्बर) को TimesNow नवभारत के अनुसार 7 महीनों में 40 करोड़ का लेन-देन होने के साथ-साथ बम बनाने के वीडियो बरामद हुए।   

ये लोग मीडिया पर इस वीडियो को प्रसारित करने के लिए सवाल उठा रहे हैं और चाहते हैं कि मजहब की बात न हो। वीडियो सामने आने पर मजहब के लिए फिदायीन बनने वाले उमर नबी का महिमामंडन करने में भी लगे कुछ कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को यकीन नहीं हो रहा कि एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच में शामिल कैसे हो सकता है? वे आतंकवादी की मुस्लिम पहचान को अब भी नकार रहे हैं।

उमर नबी के वीडियो का अनुवाद

उमर नबी ने यह रोंगटे खड़े करने वाला वीडियो दिल्ली में धमाका करने से ठीक पहले रिकॉर्ड किया था। वीडियो में वह बिल्कुल प्रोफेशनल अंग्रेजी भाषा में बात कर रहा है। यह उस ‘व्हाइट कॉलर आतंकवाद’ का सबूत है, जिसका पिछले कई दिनों से जाँच एजेंसियाँ पर्दाफाश करने में लगी हुई हैं। फरीदाबाद, सहारनपुर से लेकर कश्मीर तक अब तक 5 से अधिक डॉक्टर पेशे आतंकी पकड़े जा चुके हैं।

वीडियो में उमर नबी कहता है, “आत्मघाती हमलों का सबसे अहम मुद्दा यह है कि जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह किसी तय समय और स्थान पर निश्चित रूप से मरने जा रहा है तो वह एक खतरनाक मानसिकता में चला जाता है। वह खुद को एक ऐसी स्थिति में रखता है, जहाँ वह मान लेता है कि मौत ही उसकी एकमात्र मंजिल है।”

उमर नबी आगे कहता है, “हकीकत यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय व्यवस्था में ऐसी सोच या ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह जीवन, समाज और कानून तीनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”

ऐसा पहली बार हुआ है जब आत्मघाती हमले के आतंकी का वीडियो सामने आया है। वीडियो सामने आने से काफी लोगों को परेशानी तो हुई, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि ऐसे वीडियो समाज में फैलने चाहिए ताकि भारत का हर नागरिक इस्लामी कट्टरपंथी की सोच वाली ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले लोगों से बचकर रह सके। क्या पता ऐसे इस्लामी कट्टरपंथी हमारे आसपास ही घूम रहे हों।

लिबरल का ‘इस्लाम से आतंकी विचारधारा’ को ढकने की तमाम कोशिश

वहीं आतंकी उमर नबी की इस वीडियो पर कुछ लिबरल और बुद्धिजीवी तिलमिला गए। ऐसे लोगों ने वीडियो को ‘संवेदनशील’ बताया और आतंकी की छवि पर पर्दा डालने के साथ-साथ इस ‘इस्लाम’ से जोड़ने पर नाराजगी जाहिर की। यह उनका हमेशा वाला प्रोपेगेंडा है। जो सिर्फ ‘मुस्लिमों की हिंसा और क्राइम’ पर आम लोगों को भटकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये लोग सबसे पहले मीडिया को निशाना बनाते हैं।

ऐसी ही एक इस्लामी कट्टरपंथी RJ सैयमा ने आतंकी उमर नबी की वीडियो सामने लाने वाली मीडियो को निशाना बनाया लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले इस आतंकी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखने से कतराई। सैयमा ने लिखा, “मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया आतंकी का वो वीडियो क्यों शेयर कर रहे हैं! ये बहुत ही विचलित करने वाला है और मैं सोच भी नहीं सकती कि इसे देखकर पीड़ितों के परिवारों पर क्या बीत रही होगी! सनसनीखेज TRP का ये दौर कितना विचलित करने वाला है! बिल्कुल निंदनीय।”

                                           सैयमा के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @_sayema)

यहाँ सैयमा की ही तरह द हिंदू (The Hindu) की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह लिखती हैं, “उस आत्मघाती हमलावर का वीडियो पोस्ट करना बंद करो, तुम बस उसके जहरीले बयान को बढ़ावा दे रहे हो।”

 विजेता सिंह के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X-@vijaita)

इसी क्रम में लिबरल सोच वाली ऋचा द्विवेदी भी अपनाी ‘अलोकप्रिय राय’ लिखती हैं, “डॉक्टर से आत्मघाती हमलावर बने व्यक्ति का वीडियो सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए और इसे निश्चित रूप से टेलीविजन पर प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए।”

                            ऋचा द्विवेदी के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @RichhaDwivedi)

कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को वीडियो सामने आने से ‘असहज’ हो जाते हैं और सवाल करते हैं, “जब जाँच पूरी नहीं हुई है तो यह वीडियो, निगरानी फुटेज, जाँच संबंधी जानकारी आदि मीडियो को कौन दे रहा है?”   

                                         एक्स यूजर का स्कीनशॉट (साभार: @salman_sayyid)                                   

वहीं इन इस्लामी कट्टरपंथियों को यकीन नहीं होता कि आखिर एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच वाला कैसे हो सकता है। ये लोग ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ वाले मनगढ़ंत बयान को उछालने में लग जाते हैं। एक एक्स यूजर ने लिखा, “यह वीडियो एक स्पष्ट चेतावनी है कि आतंकवाद धर्म, शिक्षा या पेशेवर पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है। यह एक खतरनाक विकृति है, एक सामाजिक रोग है जो हमारे युवाओं के मन में घर कर गया है और हमारे समाज के ताने-बाने के लिए खतरा बना हुआ है।”

                            एक्स यूजर के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- @tabishhaji)

इन लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों ने आतंकवाद एक धर्म तक सीमित नहीं है वाले प्रोपेगेंडा को बढ़ाने की तमाम कोशिश की। यहाँ तक कि मीडिया पर वीडियो उजागर करने को लेकर सवाल उठाया। ये लोग दिल्ली ब्लास्ट में मारे गए 15 लोगों की जान गवाने वाले परिवारों का दर्द तो समझ रहे हैं लेकिन इस्लामी कट्टरपंथ से बढ़ते आतंक को नजरअंदाज कर देते हैं।

लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों का दोहरा सच

इससे यह साफ हो गया कि उमर नबी का वीडियो सामने आते ही लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों को जो बेचैनी दिखी, वह दरअसल उनकी अपनी दोहरी राजनीति का पर्दाफाश है। यह वही लोग हैं जो हर मंच पर सच दिखाने का दावा करते हैं लेकिन जैसे ही कोई वीडियो उनकी पसंदीदा कथाओं पर चोट करता है, तुरंत उसे छिपाने में लग जाते हैं।

आतंकी उमर नबी का वीडियो ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराता है, उसे इस्लाम में जरूरी बताता है और युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलने के लिए प्रभावित करता है। लेकिन इस जहर पर इन कथित लिबरल की जुबान अचानक सिल जाती है। इनके लिए आतंक का समर्थन करने वाला ‘भटका हुआ नौजवान‘ होता है, जबकि यही लोग गुजरात दंगों में ‘बाबू बजरंगी’ के स्टिंग ऑपरेशन की क्लिप्स दुनिया को दिखाना चाहते हैं। क्योंकि वहाँ एजेंडा पूरा होता है।

ये वही लोग है जो हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर आंतकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ कहकर भावनात्मक एंगल देते हैं और लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले उमर नबी पर खामोश रहते हैं। उमर नबी का ठीक दिल्ली ब्लास्ट से पहले ‘सुसाइड-बॉम्बिंग’ पर वीडियो बनाने की यही वजह होगी, क्योंकि इन आतंकियों को पता है कि भारत के लिबरल इनके अपराध को ‘शहादत’ बताने के लिए अब भी बैठे हैं।

आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

                       दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया ने अपना-अपना नैरेटिव गढ़ा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?
इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।
द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।
                                                              The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

                                                        टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

                                                               हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

                                                               LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

                                                              द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

                                                                  अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

                                                                 अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

                                                                CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।

क्यों अमेरिका ने पाकिस्तान की ‘आतंकी बेटी’ ‘लेडी अलकायदा’ आफिया सिद्दीकी को 86 साल के लिए जेल में किया है बंद?


अमेरिका की जेल में बंद ‘लेडी अलकायदा’ आफिया सिद्दीकी की रिहाई की माँग नए सिरे से की जा रही है। वह एक पाकिस्तानी न्यूरोसाइंटिस्ट हैं, जिस पर अमेरिकी सैनिकों पर गोलीबारी करने, अमेरिकी सैनिकों को मारने की कोशिश करने और एक हमले की साजिश रचने का दोषी पाया गया था। उसे 86 साल जेल की सजा मिली थी। वह फिलहाल टेक्सास के फोर्ट वर्थ के जेल में बंद है।

‘लेडी अल-क़ायदा’ आफिया सिद्दीकी कौन है?

 कभी एमआईटी से प्रशिक्षित एक प्रतिभाशाली न्यूरोसाइंटिस्ट आफ़िया सिद्दीकी की कहानी जिहाद, आतंकी साजिशों और 86 साल की अमेरिकी जेल की सजा तक पहुँच चुकी है। हालाँकि पाकिस्तान उसे अपने ‘मुल्क की बेटी’ कहता है। उसकी रिहाई को लेकर चल रहे इस्लामी दुष्प्रचार और वैश्विक अभियानों को भी उसने शह दी है।

एक पाकिस्तानी न्यूरोसाइंटिस्ट से लेकर कुख्यात ‘लेडी अलकायदा’ बनने के बावजूद वह पाकिस्तानी नेताओं और मानवाधिकार संगठनों का समर्थन हासिल करती रही हैं। सिद्दीकी को 2010 में न्यूयॉर्क कोर्ट ने अफगानिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों की हत्या के प्रयास का दोषी पाया था।

ऑपरेशन सिंदूर में करारी हार के बाद जब अप्रैल 2025 में पाकिस्तानी फील्ड मार्शल असीम मुनीर अमेरिका गए, तो पाकिस्तान के आफिया समर्थकों को उम्मीद थी कि वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने उसकी रिहाई की बात करेंगे। लेकिन मुनीर ने इस मुद्दे को नहीं उठाया।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी इससे पहले आफ़िया सिद्दीकी को माफी देने से इनकार कर दिया था। अमेरिकी सरकार ने इस्लामाबाद उच्च न्यायालय को सूचित किया कि सिद्दीकी की क्षमा याचिका को खारिज कर दी गई है।

पाकिस्तान में आफिया सिद्दीकी के मामले की सुनवाई के लिए गठित इस्लामाबाद उच्च न्यायालय की बेंच को भंग कर दिया गया , क्योंकि न्यायमूर्ति इनाम अमीन मिन्हास ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और एक बड़ी पीठ के गठन करने का अनुरोध किया। यह याचिका आफिया सिद्दीकी की बहन फौजिया सिद्दीकी ने दायर की थी। इससे पहले, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके मंत्रिमंडल को पिछली अदालती आदेशों का पालन करने और मामले में अपना जवाब दाखिल नहीं करने पर अवमानना ​​नोटिस जारी किया गया था।

मानवाधिकार उल्लंघन की शिकार या इस्लामी आतंकवादी?

आफिया सिद्दीकी पाकिस्तानी मूल की 52 वर्षीय आतंकवादी हैं। कराची में जन्मी सिद्दीकी 1990 में छात्र वीजा पर अमेरिका आई थीं। उसने एमआईटी से जीव विज्ञान में स्नातक और 2001 में ब्रांडीज विश्वविद्यालय से तंत्रिका विज्ञान में पीएचडी की। आफिया की माँ एक इस्लामी शिक्षिका और राजनीतिज्ञ थी और उनके पिता एक न्यूरोसर्जन थे। बोस्टन में आफ़िया सिद्दीकी अल-किफा केंद्र सहित इस्लामी ‘धर्मार्थ संस्थाओं’ के साथ जुड़ गई, जिसका संबंध अलकायदा से पाया गया था। सिद्दीकी ने 9/11 के इस्लामी आतंकवादी हमले के बाद भी अमेरिका विरोधी बयान दिया था। उसने जिहाद के प्रति अपना समर्थन भी व्यक्त किया था।

एफबीआई ने सिद्दीकी और उनके तत्कालीन पति अमजद खान से कुछ किताबों की खरीदारी को लेकर पूछताछ की थी। दोनों ने नाइट विज़न गॉगल्स, विस्फोटकों से संबंधित मैनुअल, बॉडी आर्मर और ‘द एनार्किस्ट्स आर्सेनल’ सहित 45 किताबें खरीदी थी। एफबीआई को दिए इंटरव्यू में अमजद खान ने दावा किया कि उन्होंने ये किताबें शिकार के लिए लाया था। एफबीआई जाँच के दौरान, आफिया और उसके पति का तलाक हो गया और वह अपने तीन बच्चों के साथ पाकिस्तान लौट आई।

सिद्दीकी और उसके बच्चे मार्च 2023 में पाकिस्तान के कराची में गायब हो गए। पाकिस्तानी अधिकारियों ने उसके कथित अल-कायदा संबंधों पर पूछताछ के लिए उसे हिरासत में लेने की बात मानी थी। लेकिन बाद में उसकी अलकायदा से जुड़े होने की बात से इनकार कर दिया। मई 2004 में, अमेरिकी एफबीआई ने आफिया सिद्दीकी को पहली महिला ‘मोस्ट-वांटेड’ आतंकवादी बताते हुए अलर्ट जारी किया। एफबीआई के मुताबिक वह एक अलकायदा आतंकवादी और कूरियर थी।

2003 और 2008 के बीच उसका ठिकाना बदलता रहा। सिद्दीकी का समर्थन करने वाली एक पत्रकार, यवोन रिडले ने दावा किया कि आफिया का अपहरण किया गया और बगराम एयर बेस पर गुप्त तरह से रखकर प्रताड़ित किया गया। हालाँकि अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा कि वह अल-कायदा जिहादी आतंकवादी और 9/11 के मास्टरमाइंड खालिद शेख मोहम्मद के परिवार के साथ अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमावर्ती इलाकों में छिपी थी।

सिद्दीकी ने बाद में खालिद शेख के भतीजे से निकाह कर ली। उसका नाम अम्मार अल-बलूची है। आफिया की बहन फौजिया सिद्दीकी ने निकाह से इनकार किया, लेकिन पाकिस्तानी और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों, अल-बलूची के परिवार और खुद आफिया ने निकाह की पुष्टि की।

2008 में अफगान अधिकारियों ने उसे हिरासत में ले लिया। न्याय विभाग के अनुसार, उसके पास से कई चीजें मिलीं। इनमें हमले का जिक्र करते हुए हाथ से लिखा हुआ एक नोट भी शामिल था। उसके पास से अमेरिका के प्लम आइलैंड, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग, स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी, वॉल स्ट्रीट और ब्रुकलिन ब्रिज जैसे कई अहम इमारतों की लिस्ट भी थी।

2008 में एफबीआई के विशेष एजेंट मेहताब सैयद के अनुसार, अफगानिस्तान राष्ट्रीय पुलिस के अधिकारियों ने सिद्दीकी को एक लड़के के साथ गजनी के गवर्नर के परिसर में देखा था। अफगानिस्तीनी पुलिस ने सिद्दीकी से स्थानीय बोलियों, दारी और पश्तो में पूछताछ भी की, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। चूँकि सिद्दीकी उर्दू में बात कर रही थी, इसलिए अधिकारियों को लगा कि वह विदेशी है।

एएनपी अधिकारियों ने उसके पर्स की तलाशी ली। इसमें कई विवादित दस्तावेज मिले। इसमें विस्फोटकों, रासायनिक और जैविक हथियारों के निर्माण से संबंधित थे। आफिया सिद्दीकी के दस्तावेजों में न्यूयॉर्क सहित संयुक्त राज्य अमेरिका के अहम स्थलों की जानकारी भी थी।

सिद्दीकी के सामानों में अमेरिकी सैन्य संपत्तियों से जुड़ी जानकारी और एक गीगाबाइट डिजिटल मीडिया स्टोरेज डिवाइस (थंब ड्राइव) मिले। उसके पास बोतलों में भरे हुए जेल और लिक्विड कैमिकल भी मिले।

18 जुलाई 2008 को, दो FBI एजेंट और एक अमेरिकी सैन्य दुभाषिया सिद्धीकी से मिलने अफगानिस्तान पहुँचे। इस दौरान अमेरिकी अधिकारी की राइफल छीनकर उसे अधिकारी पर ही तान दिया और अंग्रेजी में चिल्लाते हुए कहा कि ‘यहाँ से निकल जाओ’ और गोली चला दी।

इस दौरान सिद्दीकी को काबू में करने के लिए पैर पर गोली मारी गई। वह ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए अधिकारियों पर लात-घूँसे से हमला करने की कोशिश कर रही थी। वह अंग्रेजी में चिल्ला रही थी कि वह अमेरिकियों को मारना चाहती है। उसने कहा, “मैं आप सभी अमेरिकियों को मार डालूँगी।”

आफिया सिद्दीकी के बेहोश होने के बाद उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया। सिद्दीकी पर हत्या के प्रयास, हमले और हथियार रखने को लेकर केस दर्ज किया गया।

वेबसाइट पर आफिया सिद्दीकी की स्टोरी, लेख और तस्वीर मौजूद हैं। इसमें बताया गया है कि कैसे एक शिक्षित पाकिस्तानी-मुस्लिम महिला के साथ ‘जुर्म’ हो रहा है। इसमें बताया गया है कि कुरान कंठस्थ करने वाली ‘हाफिजा’ आज जेल में बंद है। अमेरिकी अधिकारियों ने ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ के नाम पर ‘पीड़ित’ किया और ‘अत्याचार’ का शिकार बनाया। ऐसा ही एक वेबसाइट ‘द आफिया फाउंडेशन’ भी है।

2023 में, फ़ौजिया सिद्दीकी और वकील क्लाइव स्टैफोर्ड स्मिथ ने कहा कि आफ़िया ‘अमेरिका के लिए कोई विशेष महत्व नहीं रखती’ और पाकिस्तान सरकार ने उसे वापस लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। स्मिथ ने तो आफ़िया की जगह शकील अफ़रीदी को लाने की भी वकालत की थी। अफरीदी अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन का पता लगाने में अमेरिका की मदद करने के आरोप में कई वर्षों से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। लादेन 2012 में एबटाबाद में मारा गया था। पाकिस्तानी सरकार ने आफिया- अफरीदी की ‘अदला-बदली’ के लिए कोई कोशिश नहीं की।

वर्तमान में, आफ़िया आंदोलन आफ़िया सिद्दीकी की जेल से रिहाई के लिए शुरू किया गया है। इसे सोशल मीडिया, साक्षात्कारों, सेमिनारों, जागरूकता अभियानों और दूसरे माध्यमों से चलाया जा रहा है। मजेदार बात यह है कि इस्लामी आतंकवादी ग्रुप, इस्लामी समर्थक ग्रुप, इस्लामी समर्थक ‘मानवाधिकार’ ग्रुप सिद्दीकी की कैद को ‘अन्याय’ और ‘अपमान’ बता रहे हैं, वहीं आफिया का परिवार अलकायदा या किसी भी इस्लामी आतंकवादी समूह से उसके संबंधों से पूरी तरह इनकार कर रहा है।

आफिया सिद्दीकी एक घोर यहूदी विरोधी हैं। अपने मुकदमे के दौरान भी उन्होंने यह दावा करके कार्यवाही में बाधा डाली कि उनके खिलाफ एक यहूदी साजिश रची जा रही है। उन्होंने जूरी सदस्यों के डीएनए परीक्षण की भी माँग की। उन्होंने कहा कि अगर जस्टिस इजराइली या ‘जायोनी’ है, तो मुकदमा निष्पक्ष नहीं होगा।

इस्लामवादी आफ़िया सिद्दीकी की रिहाई की माँग तेज

पाकिस्तान और अमेरिका, दोनों में कई ‘मानवाधिकार’ समर्थक ग्रुप और इस्लामी संगठन आफ़िया सिद्दीकी को ‘पीड़ित’ बताते हैं। 2022 में सिद्दीकी की रिहाई की माँग करने वाले व्यक्ति अकरम ने टेक्सास में एक यहूदी पूजास्थल पर आतंकी हमला किया था। ये हमला 15 जनवरी 2022 को कोलीविले में बेथ इजराइली धर्मसमाज में हुआ था। इस दौरान कई यहूदियों को बंधक बना लिया गया और इन बंधकों को मुक्ति के एवज में आफिया सिद्दीकी की जेल से रिहाई की माँग की गई।

आतंकियों ने सिद्दीकी को कैद किये गए फेडरल मेडिकल सेंटर कार्सवेल के पास मौजूद यहूदी पूजा स्थल को निशाना बनाया था। जिहादी अकरम ने जब चार लोगों को बंधक बनाया, उस वक्त यहूदी कार्यक्रम का सीधा प्रसारण हो रहा था। अकरम ने वहाँ खड़े होकर जिहादी भाषण दिए। करीब 10 से 11 घंटे के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने आतंकियों पर काबू पाया और बंधकों को सुरक्षित बचा लिया गया। इस दौरान अमेरिकी पुलिस ने अकरम को गोली मारी।

एफबीआई ने इसे आतंकी और यहूदी-विरोधी के साथ-साथ इस्लामी जिहादी कट्टरपंथियों द्वारा किया गया अपराध बताया अकरम की छानबीन के दौरान आफिया सिद्दीकी से जुड़ी जानकारी भी पुलिस के हाथ लगी।

2014 में, इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) ने अमेरिकी बंधकों, पत्रकार जेम्स फोले और मानवाधिकार कार्यकर्ता कायला मुलर के बदले सिद्दीकी की रिहाई की माँग की थी। हालाँकि अमेरिका ने हमेशा इन प्रस्तावों को खारिज कर दिया और फोले और मुलर दोनों को अलग-अलग घटनाओं में आईएसआईएस जिहादियों ने मार डाला।

‘काफ़िरों’ को मारने की कसम खाने वाले इस्लामी आतंकवादी समूहों ने सिद्दीकी की रिहाई की माँग की है और उसे मुस्लिम ‘पीड़ित’ बताया है। इस्लामवादियों के प्रति सहानुभूति रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ‘मानवाधिकार’ समूहों ने भी सिद्दीकी की रिहाई की वकालत की है।

यहाँ तक कि पाकिस्तानी सरकारों और नेताओं ने भी सिद्दीकी की रिहाई की वकालत की है। पाकिस्तानी सीनेट ने 2018 के एक प्रस्ताव में ‘लेडी अल-क़ायदा’ आफ़िया सिद्दीकी को ‘पाकिस्तान की बेटी’ कहा था।

2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तक ने सिद्दीकी की रिहाई के लिए अमेरिका से पैरवी की है। अलकायदा आतंकवादी की रिहाई के लिए प्रस्ताव, बयानबाजी और आग्रह वर्षों से पाकिस्तान की रणनीति रहे हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान के सीनेटरों का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल सिद्दीकी की रिहाई की माँग के लिए अमेरिका गया था।

साल 2024 में, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को मानवीय आधार पर उसकी रिहाई के लिए एक पत्र लिखा था। हालाँकि, बाइडेन ने शरीफ़ के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।

इस साल जुलाई में, पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने आफ़िया सिद्दीकी के मामले की तुलना जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के मामले से करके विवाद खड़ा कर दिया था और इसे ‘उचित प्रक्रिया’ का मामला बताया था।

हाल ही में, आफ़िया सिद्दीकी के वकील क्लाइव स्टैफ़ोर्ड स्मिथ ने कहा कि वह न्यूयॉर्क में एक नई अपील दायर करने की योजना बना रहे हैं। उनका दावा है कि उन्हें घटना के वीडियो सबूत मिले हैं जो कथित तौर पर अभियोजन पक्ष के आरोपों को खारिज करते हैं।

                                      वकील क्लाइव स्टैफ़ोर्ड स्मिथ और आफिया सिद्दीकी

इसके अलावा, जिहादी समूहों, पाकिस्तान सरकार, अमेरिका और ब्रिटेन स्थित ‘मानवाधिकार’ और इस्लामी समूहों जैसे सीएआईआर, एमनेस्टी इंटरनेशनल, केज इंटरनेशनल, कोड पिंक आदि ने ‘लेडी अल-कायदा’ की रिहाई की वकालत की है।

गौरतलब है कि टेक्सास सिनेगॉग हमले से ठीक दो महीने पहले, सीएआईआर इंटरनेशनल (अमेरिकी-इस्लामिक संबंध परिषद) ने सिद्दीकी की रिहाई की माँग की थी और उसके समर्थन में कार्यक्रम और रैलियाँ आयोजित की थी। सीएआईआर टेक्सास डीएफडब्ल्यू सिद्दीकी के समर्थन में कई ऑनलाइन और ऑफलाइन अभियान चलाता है और सजा के खिलाफ उनकी कानूनी लड़ाई के लिए धन भी जुटाता है।

ऑपइंडिया ने पहले सीएआईआर इंटरनेशनल की हिंदू-विरोधी प्रवृत्ति, क्राउडफंडिंग घोटाले की आरोपित ‘पत्रकार’ राणा अय्यूब के प्रति उनके समर्थन और बेहद हिंदू-विरोधी ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन को उनके समर्थन के बारे में रिपोर्ट छापी थी।

2022 में, रटगर्स विश्वविद्यालय और नेटवर्क कॉन्टैगियन रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनसीआरआई) ने एक रिपोर्ट प्रकाशित किया। इसमें दिखाया गया कि टेक्सास में यहूदी पूजास्थल पर हमले से पहले ‘फ्री आफ़िया मूवमेंट’ को लेकर ट्विटर पर अभियान चलाया गया। अलजजीरा और क्रिसेंट इंटरनेशनल जैसे इस्लामी प्रचार माध्यम भी आफ़िया सिद्दीकी के पक्ष में बोल रहे हैं।

आफ़िया सिद्दीकी की बहन डॉ. फ़ौज़िया सिद्दीकी भी ‘आफ़िया मूवमेंट’ चला रही हैं। उनकी वेबसाइट के अनुसार, “आफिया मूवमेंट एक अंतरराष्ट्रीय पहल है जो डॉ. आफिया सिद्दीकी के लिए न्याय और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए समर्पित है, जो एक पाकिस्तानी-मुस्लिम महिला है और वर्तमान में अमेरिकी संघीय जेल में 86 साल की अन्यायपूर्ण सजा काट रही है।”