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दिल्ली ब्लास्ट के बाद UP सरकार का बड़ा कदम, मदरसों के बाहरी मौलाना-छात्रों का डेटा ATS को देना अनिवार्य

                 मदरसों के लिए बना नया नियम, ATS को देनी होगी जरूरी जानकारी (साभार: इंडिया टीवी)
कहते हैं "जहां न पहुंचे रवि, कहां पहुंचे कवि" जिसे 1958 में चरितार्थ किया कवि प्रदीप ने। प्रदीप के रचित इस गीत "कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से, संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से..." से तत्कालीन नेहरू सरकार इतनी भयभीत हो गयी कि इसके प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन उस प्रतिबंध को 1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने। दूसरे, भारत में पल रहे गद्दारों को पकड़ने का शंखनाद शास्त्री जी ने कर दिया था। लेकिन उनके निधन के बाद मुस्लिम कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त नेताओं ने इस देशहित काम को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। 

अगर शास्त्री जी द्वारा देशहित के काम पर काम होता देश आतंकवाद, पत्थरबाज़ी और अब हुए दिल्ली ब्लास्ट नहीं होते। मुस्लिम कट्टरपंथियों को मालूम था कि हमारी हरकतों को बचाने हमारी गुलाम सियासती पार्टियां है। ये मुस्लिम कट्टरपंथियों की गुलाम पार्टियां जो पहलगाम में धर्म पूछकर महिलाओं को विधवा बनाने पर Operation Sindoor होने पर हत्यारों को पकडे जाने पर पूछने वाले आज दिल्ली ब्लास्ट करने वाले डॉक्टरों को भटका हुआ, गुमराह और बेगुनाह बताने वालों पर भी सरकार को कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं, पत्थरबाज़ी करने वालों में शामिल बच्चों को भी बच्चा समझ नहीं छोड़ना चाहिए। इन पर भी उसी तरह कार्यवाही करनी चाहिए जिस तरह बड़ों पर की जाती है। इन्हें आतंकवादियों का स्लीपर सेल मान कार्यवाही करनी होगी।         

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके और इसमें फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन सामने आने के बाद पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए मदरसों की निगरानी को और मजबूत करने का फैसला किया है।

अब प्रदेश के सभी मदरसों, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या बिना मान्यता के, उसको अपने कर्मचारियों, मौलानाओं और छात्रों का पूरा विवरण ATS (Anti-Terrorism Squad) को उपलब्ध कराना होगा।

15 नवंबर 2025 को जारी एक पत्र में UP ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (DWO) को निर्देश दिए कि वे अपने-अपने जिलों के सभी मदरसों के छात्रों और शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएँ।

सरकार के अनुसार यह केवल सर्वे या साधारण जानकारी एकत्रित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा ऑडिट है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे या मजहबी संस्थान में कोई संदिग्ध व्यक्ति छिपकर आतंकी गतिविधियाँ न चला सके।

इस कदम की पृष्ठभूमि में है अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला, जिसमें विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को यह दिख चुका है कि एक निजी विश्वविद्यालय कैसे आतंक-संबंधी गतिविधियों के नेटवर्क के केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यूपी सरकार ने मदरसों के लिए क्या नया नियम बनाया?

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सभी मदरसों, चाहे वो मान्यता प्राप्त हों या मान्यता प्राप्त ना हो, उसे यह सुनिश्चित करना है कि उन संस्थाओं में पढ़ने वाले सभी छात्रों तथा वहाँ कार्यरत मौलानाओं और शिक्षकों की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, मोबाइल नंबर, आधार-संख्या, स्थायी पता आदि की जानकारी UP ATS को समय-बद्ध रूप से उपलब्ध कराई जाए।
इसमें छात्रों के नाम, उनके पिता के नाम, पते और मोबाइल नंबर जैसी जानकारियाँ शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे का इस्तेमाल असामाजिक या आतंकी गतिविधियों के लिए न हो सके। फिलहाल यह आदेश सिर्फ इन आठ जिलों के लिए लागू किया गया है।
प्रयागराज के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जिले के लगभग 206 मदरसों की जानकारी ATS को भेज दी गई है और अब इन जानकारियों का जमीनी सत्यापन शुरू हो चुका है।
इस आदेश को लेकर यूपी पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बताया कि पहले भी प्रदेश के कई मदरसों में अवैध गतिविधियों के मामले सामने आए हैं, इसलिए यह निगरानी जरूरी है।

 उन्होंने कहा, “समय-समय पर मदरसों से अलग-अलग मामले सामने आते रहते हैं। जैसे, प्रयागराज में करेंसी छापने के मामले सामने आए, और इसी तरह कुशीनगर में भी। बहराइच में विदेशियों और बाहरी लोगों के मदरसों में रहने का इंतजाम पाया गया। इसी तरह, हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके में एक डॉक्टर का नाम सामने आया और उसके आधार पर जाँच शुरू हुई।”

इस आदेश में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह सिर्फ डेटा जमा करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक सुरक्षा-ऑडिट है, ताकि किसी भी मदरसे में बाहरी राज्यों या देशों से आने वाले छात्रों-मौलानाओं की आवाजाही, संदिग्ध गतिविधियाँ व सुरक्षा-रिस्क पहले-से पकड़ी जा सके।

मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की कोशिशें

इस दिशा में यूपी सरकार का दृष्टिकोण सिर्फ सुरक्षा-निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह प्रयास भी करने लगी है कि मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्वीकार्यता के साथ जोड़ा जाए।
मदरसों में पढ़ने-वाले छात्रों व वहाँ पढ़ाने-वाले मौलानाओं की जानकारी जुटाना और ATS को उपलब्ध कराना: इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसे सिर्फ मजहबी शिक्षा का केंद्र न बनें बल्कि उनकी संरचना, छात्र-छात्राओं की पृष्ठभूमि और भविष्य-संभावनाएँ भी ज्ञात हों।
बाहर-राज्यों या विदेशी छात्रों की आवाजाही पर विशेष ध्यान देना: यह देखा जा रहा है कि कुछ मदरसों में बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या काफी अधिक है, जिसे अब खुफिया एजेंसियों ने सन्देह के घेरे में लिया है।
मदरसों को आधुनिक पाठ्यक्रम अपनाने, मान्यता प्राप्त करने, मुख्यधारा की शिक्षा-संस्थाओं से तालमेल बिठाने की दिशा में प्रेरित करना: ताकि मदरसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से स्वीकार्य बने और उनके छात्र आगे-व्यावसायिक या विश्वविद्यालय-स्तर पर भी सहजता से आगे बढ़ सकें।

अवैध मदरसों पर कार्रवाई और दिल्ली ब्लास्ट के बाद जाँच-तेजी

मदरसों पर निगरानी पहले से चल रही थी, लेकिन हाल के में सामने आई घटनाओं, विशेष रूप से 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट ने जाँच-प्रक्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया है।
इस ब्लास्ट के बाद राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों ने निर्देश दिया कि मजहबी और शैक्षणिक संस्थानों में आने-जाने वालों की पहचान और आवाजाही पर विशेष नजर रखी जाए। इसी सिलसिले में यूपी ATS ने मदरसों से डेटा जमा करने का अभियान शुरू किया है।
इसका मतलब यह है कि अब मदरसों के कार्य-प्रभावों के साथ-साथ, सुरक्षा-विचारों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, ताकि कोई भी संस्थान अनियंत्रित रूप से आतंकी गतिविधियों का माध्यम न बने।
दिल्ली के लालकिले धमाके के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की नजर फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी पर टिकी हुई है। इस यूनिवर्सिटी को संदेह के घेरे में रखा गया है क्योंकि यहाँ कई ऐसे प्रोफेसर और बाहरी लोग सक्रिय पाए गए हैं, जिन पर आतंकियों को पनाह देने और उनके साथ मिलकर खुफिया तौर पर गतिविधियाँ करने का शक है।

मुस्लिम और विपक्ष कर रहा नए नियम का विरोध

मदरसों के लिए बनाए गए इन नियमों का मुस्लिम लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सरकार उनकी प्रोफाइलिंग करने की कोशिश कर रही है। जबकि एजेंसियाँ पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह सब कुछ केवल सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा है।
वहीं इस कार्रवाई पर विपक्ष ने भी नाराजगी जताई है। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शहजाद आलम ने कहा कि सरकार सुरक्षा के नाम पर डर पैदा कर रही है और हर मुस्लिम को शक की निगाह से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर ATS इतनी जाँच कर रही है तो उसे अपने मामलों के नतीजों पर भी श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, क्योंकि कई मामलों में कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी कहा कि देश आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह एकजुट है, लेकिन मदरसों को ATS से जाँच के दायरे में लाना अनावश्यक कदम है और इससे भ्रम और माहौल खराब होगा।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक मकान मालिक किसी नए किराएदार को घर में रहने की अनुमति देता है तो उससे पहले उससे न सिर्फ उसकी जानकारी लेता है बल्कि कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपने पास जमा करवाता है। जाहिर सी बात है कि अगर मदरसों में देश के नहीं बल्कि बाहरी छात्रों की संख्या भी अधिक देखने मिल रही है, तो ऐसे में उनकी जानकारी आवश्यक है।
उस पर अल-फलाह जैसे विश्वविद्यालयों से सामने आ रही कश्मीरी छात्रों की संख्या, विश्वविद्यालय के अंदर पढ़ा रहे जिहादी प्रोफेसर इन नियमों को लागू करना और भी आवश्यक बना देते हैं।

‘मजहब’ के नाम पर फिदायीन बनते हैं, पर लिबरल-इस्लामी गैंग चाहता है कि ‘मजहब’ की बात न हो; अजित भारती द्वारा 'डॉक्टरों' की गिरफ्तारी पर बिलखती 'बुआओं' का धुंआधार रोस्ट, देखिए वीडियो

   दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी के वायरल वीडियो पर उदारवादी-मुस्लिम और इस्लामी कट्टरपंथी तिलमिलाए (फोटो साभार: NDTV)
कैसी अजीब विडंबना है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करेंगे लेकिन उनके गुर्गे कहते हैं इस्लाम का नाम मत लो। भारत में जयचन्दों की कभी कमी नहीं रही। एक ढूंढने निकलोगे हज़ार मिल जाएंगे। जयचन्द तो मर गया लेकिन अपने वंशज छोड़ गया। हिन्दू राज में जयचन्द चंद चांदी के टुकड़ों के लालच में मुग़ल आक्रांताओं को भारत में घुसा गया। खैर अब आतंकवादियों के साथ-साथ इन जयचन्दों का हिसाब होना शुरू हो चुका है। अगर आतंकी और उनके गुर्गे भारत को गजवा-ए-हिन्द बनाने का असफल प्रयास कर रहे हैं जब 2014 से पहले नहीं कर पाए तो अब क्या क्या करेंगे। 2014 चुनावों से पहले कोशिश तो बहुत हुई थी लेकिन तपस्वियों के तप ने उनके नापाक मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। ये भारत ऋषि-मुनियों के तप की भूमि है। उसी तप ने सनातन की समर्पण किए वेद, पुराण, भागवत गीता, शास्त्र, उपनिषद, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत और  अनेकों महाकाव्य आदि।       

दिल्ली में लाल किला के पास धमाका करने वाले आतंकी उमर नबी का हाल ही में एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में उमर ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ यानी फिदायीन बनने को सही ठहरा रहा है। वह इसे ‘शहादत का ऑपरेशन’ बताकर पेश करता है। यह वीडियो उन उदारवादी-बुद्धिजीवियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों पर ढकी उस सच्चाई को दिखाता है, जो दावा करती हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ है। शायद इसीलिए ऐसे लोगों को वीडियो बाहर आने से परेशानी हो रही है।

आज(21 नवम्बर) को TimesNow नवभारत के अनुसार 7 महीनों में 40 करोड़ का लेन-देन होने के साथ-साथ बम बनाने के वीडियो बरामद हुए।   

ये लोग मीडिया पर इस वीडियो को प्रसारित करने के लिए सवाल उठा रहे हैं और चाहते हैं कि मजहब की बात न हो। वीडियो सामने आने पर मजहब के लिए फिदायीन बनने वाले उमर नबी का महिमामंडन करने में भी लगे कुछ कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को यकीन नहीं हो रहा कि एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच में शामिल कैसे हो सकता है? वे आतंकवादी की मुस्लिम पहचान को अब भी नकार रहे हैं।

उमर नबी के वीडियो का अनुवाद

उमर नबी ने यह रोंगटे खड़े करने वाला वीडियो दिल्ली में धमाका करने से ठीक पहले रिकॉर्ड किया था। वीडियो में वह बिल्कुल प्रोफेशनल अंग्रेजी भाषा में बात कर रहा है। यह उस ‘व्हाइट कॉलर आतंकवाद’ का सबूत है, जिसका पिछले कई दिनों से जाँच एजेंसियाँ पर्दाफाश करने में लगी हुई हैं। फरीदाबाद, सहारनपुर से लेकर कश्मीर तक अब तक 5 से अधिक डॉक्टर पेशे आतंकी पकड़े जा चुके हैं।

वीडियो में उमर नबी कहता है, “आत्मघाती हमलों का सबसे अहम मुद्दा यह है कि जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह किसी तय समय और स्थान पर निश्चित रूप से मरने जा रहा है तो वह एक खतरनाक मानसिकता में चला जाता है। वह खुद को एक ऐसी स्थिति में रखता है, जहाँ वह मान लेता है कि मौत ही उसकी एकमात्र मंजिल है।”

उमर नबी आगे कहता है, “हकीकत यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय व्यवस्था में ऐसी सोच या ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह जीवन, समाज और कानून तीनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”

ऐसा पहली बार हुआ है जब आत्मघाती हमले के आतंकी का वीडियो सामने आया है। वीडियो सामने आने से काफी लोगों को परेशानी तो हुई, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि ऐसे वीडियो समाज में फैलने चाहिए ताकि भारत का हर नागरिक इस्लामी कट्टरपंथी की सोच वाली ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले लोगों से बचकर रह सके। क्या पता ऐसे इस्लामी कट्टरपंथी हमारे आसपास ही घूम रहे हों।

लिबरल का ‘इस्लाम से आतंकी विचारधारा’ को ढकने की तमाम कोशिश

वहीं आतंकी उमर नबी की इस वीडियो पर कुछ लिबरल और बुद्धिजीवी तिलमिला गए। ऐसे लोगों ने वीडियो को ‘संवेदनशील’ बताया और आतंकी की छवि पर पर्दा डालने के साथ-साथ इस ‘इस्लाम’ से जोड़ने पर नाराजगी जाहिर की। यह उनका हमेशा वाला प्रोपेगेंडा है। जो सिर्फ ‘मुस्लिमों की हिंसा और क्राइम’ पर आम लोगों को भटकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये लोग सबसे पहले मीडिया को निशाना बनाते हैं।

ऐसी ही एक इस्लामी कट्टरपंथी RJ सैयमा ने आतंकी उमर नबी की वीडियो सामने लाने वाली मीडियो को निशाना बनाया लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले इस आतंकी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखने से कतराई। सैयमा ने लिखा, “मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया आतंकी का वो वीडियो क्यों शेयर कर रहे हैं! ये बहुत ही विचलित करने वाला है और मैं सोच भी नहीं सकती कि इसे देखकर पीड़ितों के परिवारों पर क्या बीत रही होगी! सनसनीखेज TRP का ये दौर कितना विचलित करने वाला है! बिल्कुल निंदनीय।”

                                           सैयमा के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @_sayema)

यहाँ सैयमा की ही तरह द हिंदू (The Hindu) की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह लिखती हैं, “उस आत्मघाती हमलावर का वीडियो पोस्ट करना बंद करो, तुम बस उसके जहरीले बयान को बढ़ावा दे रहे हो।”

 विजेता सिंह के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X-@vijaita)

इसी क्रम में लिबरल सोच वाली ऋचा द्विवेदी भी अपनाी ‘अलोकप्रिय राय’ लिखती हैं, “डॉक्टर से आत्मघाती हमलावर बने व्यक्ति का वीडियो सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए और इसे निश्चित रूप से टेलीविजन पर प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए।”

                            ऋचा द्विवेदी के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @RichhaDwivedi)

कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को वीडियो सामने आने से ‘असहज’ हो जाते हैं और सवाल करते हैं, “जब जाँच पूरी नहीं हुई है तो यह वीडियो, निगरानी फुटेज, जाँच संबंधी जानकारी आदि मीडियो को कौन दे रहा है?”   

                                         एक्स यूजर का स्कीनशॉट (साभार: @salman_sayyid)                                   

वहीं इन इस्लामी कट्टरपंथियों को यकीन नहीं होता कि आखिर एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच वाला कैसे हो सकता है। ये लोग ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ वाले मनगढ़ंत बयान को उछालने में लग जाते हैं। एक एक्स यूजर ने लिखा, “यह वीडियो एक स्पष्ट चेतावनी है कि आतंकवाद धर्म, शिक्षा या पेशेवर पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है। यह एक खतरनाक विकृति है, एक सामाजिक रोग है जो हमारे युवाओं के मन में घर कर गया है और हमारे समाज के ताने-बाने के लिए खतरा बना हुआ है।”

                            एक्स यूजर के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- @tabishhaji)

इन लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों ने आतंकवाद एक धर्म तक सीमित नहीं है वाले प्रोपेगेंडा को बढ़ाने की तमाम कोशिश की। यहाँ तक कि मीडिया पर वीडियो उजागर करने को लेकर सवाल उठाया। ये लोग दिल्ली ब्लास्ट में मारे गए 15 लोगों की जान गवाने वाले परिवारों का दर्द तो समझ रहे हैं लेकिन इस्लामी कट्टरपंथ से बढ़ते आतंक को नजरअंदाज कर देते हैं।

लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों का दोहरा सच

इससे यह साफ हो गया कि उमर नबी का वीडियो सामने आते ही लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों को जो बेचैनी दिखी, वह दरअसल उनकी अपनी दोहरी राजनीति का पर्दाफाश है। यह वही लोग हैं जो हर मंच पर सच दिखाने का दावा करते हैं लेकिन जैसे ही कोई वीडियो उनकी पसंदीदा कथाओं पर चोट करता है, तुरंत उसे छिपाने में लग जाते हैं।

आतंकी उमर नबी का वीडियो ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराता है, उसे इस्लाम में जरूरी बताता है और युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलने के लिए प्रभावित करता है। लेकिन इस जहर पर इन कथित लिबरल की जुबान अचानक सिल जाती है। इनके लिए आतंक का समर्थन करने वाला ‘भटका हुआ नौजवान‘ होता है, जबकि यही लोग गुजरात दंगों में ‘बाबू बजरंगी’ के स्टिंग ऑपरेशन की क्लिप्स दुनिया को दिखाना चाहते हैं। क्योंकि वहाँ एजेंडा पूरा होता है।

ये वही लोग है जो हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर आंतकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ कहकर भावनात्मक एंगल देते हैं और लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले उमर नबी पर खामोश रहते हैं। उमर नबी का ठीक दिल्ली ब्लास्ट से पहले ‘सुसाइड-बॉम्बिंग’ पर वीडियो बनाने की यही वजह होगी, क्योंकि इन आतंकियों को पता है कि भारत के लिबरल इनके अपराध को ‘शहादत’ बताने के लिए अब भी बैठे हैं।

तब्लीगी जमात ने डॉक्टर शाहीन को विस्फोटक खरीदने के लिए दिया था जकात का पैसा; 25-30 जमातियों के फोन हुए ऑफ

                                       तब्लीगी जमात और जिहादी डॉक्टर शाहीन (साभार-mint)
दिल्ली ब्लास्ट की जाँच में कितने गद्दार और कट्टरपंथी संस्थाएं आएंगी कह पाना बहुत मुश्किल है। दरअसल, दशकों से चल रहे गद्दारों और उनके समर्थकों का भांडा फूटना अब शुरू हुआ है। वैसे गद्दारों को पकड़ने का शंखनाद 1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कर दिया था। देश का दुर्भाग्य, ताशकंत से उनका मृतक शरीर आया। अन्यथा देश की स्थिति वह नहीं होती जो आज है। दूसरे, यह भी शंका व्यक्त की गयी थी कि गद्दारों पर प्रहार करना ही उनकी अकाल मृत्यु का कारण हो। 
खैर, 2024 चुनावों के दौरान चर्चा थी कि मोदी सरकार के तीसरी बार बनने पर वक़्फ़ बोर्ड, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमात जैसी कट्टरपंथी संस्थाओं को बंद कर देना चाहिए। समय बहुत बलवान होता है, वक़्फ़ बोर्ड पर तो काम चल ही रहा अब दिल्ली ब्लास्ट में पकडे जाने वाले आतंकवादियों के तार कट्टरपंथियों से जुड़ने के साफ सबूत आ रहे हैं। जो मुसलमान जकात के नाम पर धन लुटाते हैं वह धन गरीब और जरूरतमंद मुसलमानों की मदद करने की बजाए देश में दंगे और आतंकवाद को बढ़ावा और पकडे जाने पर दंगाइयों और आतंकवादियों की वकालत करने वाले वकीलों पर खर्च हो रही है। मजे की बात यह है कि वकील भी हिन्दू को ही खरीदते हैं। ताकि  दंगाई और आतंकवादी को जमानत या फिर रिहाई मिलने पर कहे "भाई मुक़दमा लड़ने वाले हिन्दू वकील थे। जितनी फ़ीस बोली दे दी।"       

जिहादी डॉक्टरों के आतंकी मॉड्यूल की अहम किरदार शाहीन का तबलीगी जमात से कनेक्शन सामने आने पर खुफिया विभाग अलर्ट हो गया है। खुलासा हुआ है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार महिला डॉक्टर शाहीन को तब्लीगी जमात से टेरर फंडिंग की जाती थी। इसके बाद जमात आने जाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

इसके अलावा, जमात को हर आने जाने वाले व्यक्ति का नाम, पता, मोबाइल नंबर और फोटो खुफिया विभाग और एटीएस को सौंपने के लिए कहा गया है। कोरोना काल से पहले भी इस तरह की कवायद की जाती थी, लेकिन बीच में ढील बरती जा रही थी।

दिल्ली कार विस्फोट के जिहादी डॉक्टर उमर, मुफ्ती इरफान, डॉक्टर शाहीन और दूसरे लोगों का कनेक्शन जमात से जुड़ गया है। जानकारी के मुताबिक, फरीदाबाद में मिला विस्फोटक भी इन्ही पैसों से खरीदा गया था। टेरर फंडिंग से ही आतंकी विदेश जाते थे और जरूरी सामान खरीदते थे। इस रकम का एक बड़ा हिस्सा आतंकियों को तैयार करने में खर्च होता था।

जिहादी महिला डॉक्टर शाहीन के 7 खातों में पिछले 7 साल में 1.55 करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ। इनमें 2014 में 9 लाख, 2015 में 6 लाख, 2016 में 11 लाख और 2017 में 19 लाख का ट्रांजेक्शन हुआ। अब ये पैसे किसने भेजे और किसे दिए गए, इसका पता खुफिया एजेंसियाँ लगा रही है।

आतंकी मॉड्यूल का खुलासा होने के बाद 25- 30 मोबाइल नंबर ऐसे मिले हैं, जो स्विच ऑफ हैं। खुफिया एजेंसियाँ ऐसे डेटा खँगाल रही हैं, जो जमात और आतंकियों को जोड़ रहा था।

दिल्ली, श्रीनगर, पहलगाम, पठानकोट, सहारनपुर, हापुड़, मुरादाबाद, बिजनौर से लेकर दुबई, ओमान तक के तार जुड़ रहे हैं। यहाँ आतंकी गुपचुप तरीके से बैठकें करते थे।

अवलोकन करें:-

क्या कांग्रेस की भूपेंद्र हुड्डा सरकार ने 60 करोड़ रूपए कांग्रेस अल्पसंख्यक सेल इंचार्ज जावद को
क्या कांग्रेस की भूपेंद्र हुड्डा सरकार ने 60 करोड़ रूपए कांग्रेस अल्पसंख्यक सेल इंचार्ज जावद को
 

खुफिया एजेंसियों को कई ऐसे संस्थानों का पता चला है, जो मुस्लिम देशों में हैं। इनकी खातों को अब खंगाला जा रहा है। एजेंसियों को इसकी रिपोर्ट जल्द मिलने की संभावना है। 

आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

                       दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया ने अपना-अपना नैरेटिव गढ़ा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?
इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।
द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।
                                                              The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

                                                        टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

                                                               हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

                                                               LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

                                                              द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

                                                                  अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

                                                                 अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

                                                                CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।

उत्तर प्रदेश : बिना चेकिंग न जमातियों को मिलेगी मस्जिद में रहने की जगह और न ही ‘बाहरी व्यापारियों’ को: लाल किला ब्लास्ट के बाद आगरा पुलिस सतर्क, विरोध में उतरा जमीयतुल कुरैश संगठन

       मस्जिद के इमामों को नए निर्देश, जमात और कश्मीरी व्यापारियों के लिए चरित्र सत्यापन अनिवार्य (साभार: Agra tourism)
जिस तरह दिल्ली बम धमाके की जाँच आगे बढ़ रही है उत्तर प्रदेश में आगरा पुलिस ने जनता की सुरक्षा के मद्देनज़र सतर्कता बरतते मस्जिदों को बिना किसी जाँच के किसी को रहने के लिए नए निर्देश देने से कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रहा। अब कोई इन पागलों से पूछे कि क्या किसी होटल में बिना प्रमाण के रह सकते हो?  

दिल्ली में हुए बम धमाके के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे देश में हाई अलर्ट जारी कर दिया है। इसके चलते संवेदनशील इलाकों और मिश्रित आबादी वाली जगहों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। आगरा पुलिस भी खास एहतियात बरत रही है। इसी वजह से शहर की मस्जिदों में आने वाले जमात के लोगों और कश्मीर से शाल और गर्म कपड़े बेचने आने वाले व्यापारियों पर नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।

मस्जिदों और जमात के लिए नए नियम

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने मस्जिदों के इमामों से कहा है कि उनके यहाँ रुकने वाले जमात के सदस्यों की जानकारी नजदीकी थाने को दें। जमात के लोगों और कश्मीरी व्यापारियों को अपने जिले से चरित्र सत्यापन प्रमाण पत्र (कैरेक्टर वेरिफिकेशन सर्टिफिकेट) लाना भी जरूरी कर दिया गया है। जो लोग इन्हें कमरा किराए पर देते हैं, उन्हें इसकी जानकारी पुलिस को देनी होगी।

शुक्रवार (14 नवंबर 2025) को मंटोला में ऑल इंडिया जमीयतुल कुरैश की बैठक हुई। इसमें संगठन ने इन निर्देशों पर आपत्ति जताई। जिलाध्यक्ष अदनान कुरैशी ने कहा कि जमात का काम सिर्फ इस्लामी शिक्षा देना और नमाजरोजा से जुड़ी सीख बताना है। उनका किसी राजनीतिक या संदिग्ध गतिविधि से कोई लेनादेना नहीं है। उन्होंने कहा कि जमात कई दशकों से शांतिपूर्वक चल रहा है।

पुलिस का स्पष्टीकरण

इंस्पेक्टर मंटोला देवकरन सिंह ने बताया कि पुलिस यह जानकारी केवल सुरक्षा कारणों से माँग रही है। इससे किसी भी व्यक्ति की पहचान और उसकी गतिविधियों की जाँच समय पर हो सकेगी।

दिल्ली ब्लास्ट पर जश्न मनाने वाले आतंक के समर्थकों पर कार्रवाई जरूरी, असम की हिमंता सरकार ने कायम की मिसाल


दिल्ली में लाल किला के पास हुए कार ब्लास्ट में 12 लोगों की मौत हो गई। इस ब्लास्ट का कनेक्शन पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जम्मू-कश्मीर के कई प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हैं। इस ब्लास्ट ने जहाँ पूरे देश को झकझोर दिया। वहीं सोशल मीडिया पर इस घटना का जश्न मनाने वाले कुछ लोग हमें यह याद दिला गए कि आतंकवाद सिर्फ बम-गोला नहीं बल्कि विचारधारा से भी पनपता है।

राजधानी में हुई इतने बड़े धमाके के बाद जब पूरा देश शोक में था तब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी खुशियों में व्यस्त थे। ऐसे लोगों की पहचान कर असम की बीजेपी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी ऐसे लोगों को साफ संदेश दिया है।

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का बयान

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था, “दिल्ली बम विस्फोट की घटना निंदनीय है। वहीं कुछ लोगों ने फेसबुक पर इस तरह की घटना पर बधाई दी या खुशी वाले इमोजी पोस्ट किए। इस तरह की प्रतिक्रिया से पता चलता है कि वे लोग वास्तव में आतंकवाद का समर्थन करते हैं। हम कल (10 नवंबर 2025) रात से इन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर हम इनमें से कुछ लोगों को गिरफ्तार भी करेंगे।”

सीएम ने आगे कहा, “असम में हम आतंकवाद को बढ़ावा देने और किसी भी तरह का समर्थन करने की अनुमति नहीं देंगे। हम इसके लिए बहुत सख्त हैं। कल से हमने देखा है कि घटना की खबर मिलने के बाद कुछ लोग बहुत खुश हैं। कोई इस खबर से खुश है, तो कोई किसी की मौत से खुश। मुझे लगता है कि वे लोग भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं। मैंने DGP से उन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच करने को कहा है, अगर वे असम के नागरिक हैं तो हमें उन्हें गिरफ्तार करेंगे।”

दिल्ली ब्लास्ट पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों की गिरफ्तारी

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जो कहा वो किया। सोशल मीडिया पर दिल्ली में हुए ब्लास्ट के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट करने वाले 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। सीएम हिमंता ने एक्स पर पोस्ट कर यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी लिखा कि असम पुलिस की यह कार्रवाई जारी रहेगी।

सीएम हिमंता ने बताया कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले राज्यभर से 5 लोगों में दारांग के मत्तीउर रहमान, गोलपाड़ा के हसन अली मंडल, चिरांग के अब्दुल लतीफ, कामरूप के वजहुल कमाल और बोंगाईगांव के नूर अमीन अहमद को गिरफ्तार किया गया है। सीएम हिमंता ने चेतावनी भी देते हुए कहा, “असम पुलिस नफरत फैलाने या आतंक का महिमामंडन करने के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ तेजी से और दृढ़ता से कार्रवाई करना जारी रखेगी।”

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

ये सारी जानकारी इस बात का सबूत है कि दिल्ली ब्लास्ट कोई आम नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश हो सकती है, जो एक बड़े आतंकी नेटवर्क ने अंजाम दी है। जाँच एजेंसियाँ इस आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ कर चुकी हैं, उनकी कार्रवाई आगे भी जारी है।

असम में गिरफ्तारी आतंकी विचारधारा पर लगाम

ऐसे में असम सरकार की कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आतंक केवल उतना नहीं है जब बम धमाके होते हैं। आतंकवाद की विचारधारा को सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर डाली गई गलीज टिप्पणियों, इमोजी में खुशी मनाने, पोस्टों में देश में हुए निंदनीय ब्लास्ट पर समर्थन दिए जाने से ही पनपने का मौका मिलता है।
जब सरकार उन तक पहुँचती है और ऐसे लोगों को कानून के दायरे में लाती है तो यह एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि आतंक का समर्थन करना अपराध है, सिर्फ आतंक करना नहीं बल्कि उसे बढ़ावा देना, महिमामंडन करना, चुप्पी सहना भी वैध नहीं है। यह एक तरह से उदाहरण सेट करता है कि आतंक की विचारधारा रखने वालों पर भी कार्रवाई होगी।
ऐसे मामलों में तुरंत और निष्पक्ष कार्रवाई से यह भी साबित होता है कि कानून सिर्फ बड़े हमलावरों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो इन धमाकों की खुशी मनाकर ‘दूसरी पंक्ति’ बनते हैं।

हिमंता बिस्वा सरमा का ब्लास्ट पर खुशी मनाने वालों को कड़ा संदेश

और आखिर में हिमंता बिस्वा सरमा के बयान पर लौटते हैं। उन्होंने घोषणा की कि असम पुलिस इन सोशल मीडिया पोस्ट करने वालों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रही है और जरूरत पड़े तो गिरफ्तार करेगी। यह बयान सिर्फ कड़ी भाषा नहीं, कार्रवाई होने तक का ‘डर’ है। जब एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इस तरह स्पष्ट शब्दों में कहता है, “अगर ये लोग असम के नागरिक हैं तो उन्हें नहीं बख्शा जाएगा।” तो यह एक तरह से सरकार की नीति को दर्शाता है कि कैसे आतंक की विचारधारा को पनपने से पहले दबा दिया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया पर खुशियाँ मनाने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों जैसे लोगों को डर होना चाहिए कि उनकी हर ऑनलाइन पर नजर रखी जा रही है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन जब वो आजादी आतंकी विचारधारा में बदल जाए तो कार्रवाई जरूरी हो जाती है। हिमंता बिस्वा सरमा का यह रवैया न सिर्फ गंभीर है बल्कि समय की माँग भी है।

अल फलाह यूनिवर्सिटी की मान्यता रद्द हो; दिल्ली ब्लास्ट से जाँच के घेरे में फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी, विवादित है इसका चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी

अल फलाह यूनिवर्सिटी का चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी (फोटो साभार: File/Al Falah University)
         
दिल्ली में लाल किले के सामने सोमवार(10 नवंबर 2025) को बड़ा धमाका हुआ, जिससे पूरा देश दहल गया। मिनटों में जाँच एजेंसियाँ मौके पर पहुँचीं और उस ब्लास्ट की जाँच शुरू की जिसमें कम से कम 13 लोगों की जान गई।

जिस तरह अल फलाह यूनिवर्सिटी का नाम आतंकवादियों और अन्य विवादों के साथ जुड़ने की वजह से इसकी मान्यता रद्द करने की मांग भी उठ सकती है।  

जल्दी ही दिल्ली लाल किला ब्लास्ट और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का लिंक सामने आया, क्योंकि धमाका करने वाला आतंकवादी उन तीन मेडिकल डॉक्टर्स का साथी था जो यूनिवर्सिटी से जुड़े थे और हरियाणा पुलिस व जम्मू-कश्मीर पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन में गिरफ्तार हुए थे। पुलिस ने दिल्ली ब्लास्ट से कुछ घंटे पहले गिरफ्तार डॉक्टर्स से जुड़े ठिकानों से 2,900 किलो से ज्यादा विस्फोटक बरामद किए थे।

यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रो (डॉ) भूपिंदर कौर ने आखिरकार बयान दिया कि यूनिवर्सिटी का पकड़े गए टेरर मॉड्यूल से कोई लिंक नहीं है, लेकिन यूनिवर्सिटी के चांसलर और फाउंडर जवाद अहमद सिद्दीकी चुप रहे। हैरानी की बात है कि सिद्दीकी का डिजिटल फुटप्रिंट लगभग नहीं है।

ऑपइंडिया ने चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी पर उपलब्ध जानकारी खँगाली और कुछ परेशान करने वाला इतिहास मिला। उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल पर ज्यादा जानकारी नहीं है। ‘अबाउट’ सेक्शन में लिखा है, ‘मैनेजिंग ट्रस्टी: अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट 1995 से अब तक, चांसलर: अल-फलाह यूनिवर्सिटी, फरीदाबाद 2014 से अब तक, मैनेजिंग डायरेक्टर: अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड 1996 से अब तक।’

                                                                                                                               सोर्स: लिंक्डइन

ऑपइंडिया को मिल्ली गजट की जुलाई 2000 की रिपोर्ट में लिखा मिला कि जवाद अहमद सिद्दीकी नाम का शख्स अपने दो भाइयों के साथ तिहाड़ जेल में था क्योंकि अल-फलाह इन्वेस्टमेंट लिमिटेड में निवेशकों को ठगा था। कंपनी की जानकारी देखी तो पता चला कि वो 1992 में रजिस्टर्ड हुई और स्टेटस ‘स्ट्राइक ऑफ’ है, यानी कंपनी बंद हो चुकी है।

                                                                                                                               सोर्स: लिंक्डइन

जौबाकॉर्प पर उपलब्ध जानकारी से पता चला कि कंपनी का सिर्फ एक डायरेक्टर था, जवाद अहमद सिद्दीकी।

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सिद्दीकी के पुराने डायरेक्टोरियल एसोसिएशन से अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड का लिंक मिला। सिद्दीकी मार्च 2019 तक इस कंपनी के डायरेक्टर थे।

                                                                                                                                 सोर्स: लिंक्डइन

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड की और जानकारी देखी तो दो पुराने डायरेक्टर मिले, जवाद अहमद सिद्दीकी और सऊद अहमद सिद्दीकी।

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ये जानकारी जरूरी थी क्योंकि जब ऑपइंडिया ने मिली गजट में बताए केस को देखा, तो दो नाम थे- जवाद और सऊद। इस केस पर बाद में आएँगे।

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन जोड़ने के लिए कंपनी का पता चेक किया। वो था ‘अल-फलाह हाउस, 274-ए, जामिया नगर, ओखला, नई दिल्ली।’

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ये वही पता है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल वेबसाइट पर है।

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हमने ‘jasiddiqui@rediffmail.com’ ईमेल से भी कनेक्शन जोड़ा, जो यूनिवर्सिटी प्रोफाइल वाली कई वेबसाइट्स पर ऑफिशियल ईमेल के तौर पर लिस्टेड है।

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यूनिवर्सिटी के भारत एजुकेशन पेज पर सिद्दीकी और फरदीन दोनों के ईमेल हैं।

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ये ईमेल आईडी अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के जौबाकॉर्प पेज पर भी है, वही कंपनी जो फ्रॉड में शामिल थी।

                                                                                                                            सोर्स: लिंक्डइन

साफ है कि जो शख्स गिरफ्तार हुआ और लंबे समय तिहाड़ जेल में रहा, वही जवाद अहमद सिद्दीकी है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी चला रहा है।

कंपनी के मौजूदा डायरेक्टर हैं सुफयान अहमद सिद्दीकी और फरदीन बेग। सुफयान अहमद सिद्दीकी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, फरदीन बेग अल-फलाह यूनिवर्सिटी में टीचर हैं और एंटी-रैगिंग कमिटी के मेंबर भी।

                                                                                                                             सोर्स: लिंक्डइन

हमारी रिसर्च में पता चला कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी 2 मई 2014 को हरियाणा प्राइवेट यूनिवर्सिटी (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014 से स्थापित की गई, जो हरियाणा विधानसभा ने पास किया। यूजीसी से 5 जनवरी 2015 को सेक्शन 2(एफ) और 12(बी) के तहत मान्यता मिली। एक्सपर्ट कमिटी बनी और इंस्पेक्शन विजिट 29-30 मई 2015 को हुई। बाद में कमियों को पूरा करने पर यूजीसी ने मान लिया।

जवाद अहमद सिद्दीकी 2 साल से ज्यादा जेल में रहा

अब उस केस पर आते हैं, जिसके लिए उसे तिहाड़ भेजा गया था। ऑपइंडिया को दिल्ली हाई कोर्ट का 27 मार्च 2003 का जजमेंट मिला, जो जस्टिस आरसी चोपड़ा ने सुनाया था। कोर्ट डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, 2000 में न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, नई दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुई थी आईपीसी की धारा 420, 409, 406, 468, 471 और 120(बी) के तहत। केस इकोनॉमिक ऑफेंस विंग, क्राइम ब्रांच, नई दिल्ली को भेजा गया।

केस डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, जवाद सिद्दीकी अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर थे, और सऊद सिद्दीकी (अल-फलाह एजुकेशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व डायरेक्टर में से एक) उसका डायरेक्टर था। पिटिशनर्स और उनके साथी आरोपियों ने ढेर सारे निवेशकों को अपनी कंपनीज में डिपॉजिट करवाया। कोर्ट ने नोट किया कि उन्होंने 7.5 करोड़ रुपये की रकम गबन की। शिकायत केआर सिंह ने की थी, जिन्हें 95 लाख रुपए का चूना लगाया गया था।

जजमेंट में लिखा था, “आरोप है कि पिटिशनर्स ने ढेर सारे लोगों को अपनी ग्रुप कंपनीज में डिपॉजिट करवाया लेकिन बाद में उनके सिग्नेचर फर्जी करके और डॉक्यूमेंट्स बनाकर उन डिपॉजिट्स को अपनी कंपनीज के शेयर्स में बदल दिया।”

जाँच और एफएसएल रिपोर्ट्स ने कन्फर्म किया कि निवेशकों के सिग्नेचर फर्जी थे। डिपॉजिट कुछ ऐसी कंपनीज के नाम पर लिए गए जो कभी थीं ही नहीं। फिर पैसा आरोपितों के पर्सनल अकाउंट्स में ट्रांसफर हो गया। जब कोर्ट ने ये जजमेंट पास किया, तब तक जवाद 37 महीने और सऊद 38 महीने जेल में थे।

ट्रिब्यून की जून 2004 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 में अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज ने अल-फलाह सहकारी आवास समिति बनाई। ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने 1996 में समिति को 10,000 स्क्वायर मीटर अलॉट किए, जहाँ मेंबर्स और शेयरहोल्डर्स के लिए 100 फ्लैट्स बनाने थे। लेकिन कुछ फाइनेंशियल दिक्कतों की वजह से कंस्ट्रक्शन नहीं हुआ और जवाद वगैरह गिरफ्तार हो गए।

जवाद जेल में थे, तब उनके कुछ साथियों ने उन्हें ठगा और उनके सिग्नेचर फर्जी करके 13 करोड़ में कुछ फ्लैट्स बेच दिए। ट्रिब्यून रिपोर्ट में उनकी गिरफ्तारी की खबर छपी थी, जिसमें आरोपित थे एसपी यादव, मंजूर हसन जैदी और संजीव श्रीवास्तव।

जवाद अहमद सिद्दीकी को लेकर ये खुलासे अल-फलाह यूनिवर्सिटी चलाने वालों की विश्वसनीयता और बैकग्राउंड पर गंभीर सवाल उठाते हैं। फ्रॉड और फॉर्जरी के पुराने आरोपों से लेकर टेरर मॉड्यूल से जुड़ा विवाद तक, पैटर्न ऐसा है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यूनिवर्सिटी प्रशासन ने खुद को चल रही जाँच से अलग कर लिया है, लेकिन अल-फलाह की लीडरशिप को संदिग्ध फाइनेंशियल और क्रिमिनल गतिविधियों से जोड़ने वाले सबूत बताते हैं कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उसके मैनेजमेंट की तेजी से गहरी जाँच जरूरी है।

                                                                                                   (साभार :सभी ग्राफ चित्र OpIndia)