Showing posts with label #Al Jazeera. Show all posts
Showing posts with label #Al Jazeera. Show all posts

डोनाल्ड ट्रंप ने की मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने की शुरुआत, कतर के चैनल अल-जजीरा से संबंध

                               ट्रंप ने मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी समूह घोषित किया (साभार- Al Arabiya)
इस्लामी आतंकवाद को एक बड़ा झटका देते हुए, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 नवंबर 2025 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इसमें उनके प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) की कुछ शाखाओं को विदेशी आतंकी संगठन/फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (FTO) और खासतौर पर स्पेशली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट्स (SDGTs) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

इस कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट राष्ट्रपति को एक ज्वाइंट रिपोर्ट सौंपेंगे। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की किसी भी शाखा या सब-डिविजन जैसे लेबनान, जॉर्डन और मिस्र में सक्रिय चैप्टर्स को FTO और SDGT घोषित करने की बात भी शामिल होगी।

ट्रंप के पहले कार्यकाल की महत्वाकांक्षाओं को ये कदम पूरा करता है। उस दौरान उन्होंने इस आतंकी संगठन के खिलाफ समीक्षा का आदेश दिया था, लेकिन नौकरशाही विरोध के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी।

ट्रंप की ओर से मुस्लिम ब्रदरहुड की समीक्षा के आदेश को गति देने का काम कांग्रेस के दोनों पार्टियों के प्रयासों ने किया। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड टेररिस्ट डेजिग्नेशन एक्ट-2025 और रिपब्लिकन नेताओं का यह तर्क शामिल था कि मुस्लिम ब्रदरहुड एक ‘अंतरराष्ट्रीय इस्लामवादी संगठन’ है।

व्हाइट हाउस ने कहा है कि पूरे मुस्लिम ब्रदरहुड को एक साथ आतंकी संगठन घोषित नहीं किया जाएगा, पर ट्रंप का ये कदम अमेरिका की नीति में एक बड़ा बदलाव हो सकता है। ट्रंप का ये कदम इस समय में काफी अहम है जब वे गाजा में शांति बहाल करने की कोशिश में लगे हैं।

इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष महज जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि मूल रूप से धार्मिक संघर्ष है, जहाँ दोनों पक्षों के क्षेत्रीय दावे युद्ध का कारण बने हैं।

ऑपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने 1988 के अपने चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ संपत्ति बताया और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने का संकल्प लिया जब तक कि आखिरी यहूदी की हत्या न हो जाए। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन मिलता रहा है और उसने 7 अक्टूबर 2023 के नरसंहार के बाद इजरायली नागरिकों और सेना पर हवाई हमले किए।

2017 के दस्तावेजों में हमास ने खुद को मुस्लिम ब्रदरहुड से दूर दिखाने की कोशिश की, ताकि मिस्र के साथ संबंध बेहतर हो सकें। उसने यहूदियों और जायोनिस्टों में फर्क करने की बात भी कही। लेकिन 2023 की हिंसा ने उसकी दोहरी नीति और यहूदियों के प्रति नफरत को सामने ला दिया। 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के पाखंड और नफरत को पूरी तरह उजागर कर दिया।

मुस्लिम ब्रदरहुड को औपचारिक रूप से आतंकी संगठन घोषित करना अमेरिकी सरकार के लिए हमेशा ही कठिन रहा है। यह संगठन डिसेंट्रलाइज्ड है और अलग-अलग देशों में इसकी शाखाएँ हैं। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञों और खुफिया अधिकारियों के लिए पूरे संगठन पर एक साथ आतंकी ठप्पा लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है।

इसी वजह से ट्रम्प के हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर केवल विशिष्ट शाखाओं को ही FTO या SDGT घोषित किया जाएगा।

मुस्लिम ब्रदरहुड: सोशियो-पॉलिटिकल मूवमेंट से वैश्विक इस्लामी नेटवर्क तक

1928 में मिस्र के इस्माइलिया में स्थापित मुस्लिम ब्रदरहुड या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ आज भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों में से एक है। इसकी स्थापना एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी।

उसने इसे पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और उस्मानी साम्राज्य के बाद इस्लामी मूल्यों के खत्म होने की आशंका के आधार पर शुरू किया था। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिक आंदोलन के रूप में शुरू किया। ये चैरिटी और इस्लामी वकालत पर केंद्रित था।

अपने शुरुआती वर्षों में मुस्लिम ब्रदरहुड ने कमजोर और उदासीन सरकारों की ओर से पैदा की गई खाइयों को भरा। इसने मिस्र में गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनाईं, साथ ही इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सर्वोच्चता) को सेक्यूलेरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) और साम्राज्यवाद का इलाज बताया।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मकसद में एक बात साफ है कि भले ही इसकी शुरुआत हिंसा से जुड़ी न रही हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा इसका रास्ता रहा है।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो कहता है- “अल्लाह हमारा मकसद है, पैगंबर हमारे मार्गदर्शक हैं; क़ुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी तवक्को है।”

1930 के दशक तक मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) के सदस्य लाखों की संख्या में पहुँच गए और उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया। 1936 में यह इस्लामी संगठन राजनीति में उतरा, धर्मनिरपेक्ष वफ्द पार्टी का विरोध किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विरोध-प्रदर्शन किए।

हालाँकि MB की पैरामिलिट्री विंग (अर्धसैनिक शाखा) ‘सीक्रेट अप्परैटस’, जिसे स्पेशल अप्परैटस या अल-निजाम अल-खास भी कहा जाता है, ने हिंसा, राजनीतिक हत्याओं और विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिया।

1948 में सीक्रेट अप्परैटस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री महमूद एल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने इस्लामी संगठन पर बैन लगाया था। 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए अल-बन्ना की हत्या कर दी।

मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अप्परैटस के सदस्य कठिन शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण लेते थे। उन्हें हथियारों का इस्तेमाल और अंडरग्राउंड ऑपरेशंस को अंजाम देने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

धोखे और गोपनीयता (तकिय्या) में खुद को पारंगत करके, इस अप्परैटस से जुड़े जिहादी राजनीतिक दलों, सेनाओं, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शैक्षिक संस्थानों और यहाँ तक कि एनजीओ में भी घुसपैठ और उसे अलग-थलग करते थे।

1966 में फाँसी की सजा पाने वाले सैयद कुत्ब के नेतृत्व में मुस्लिम ब्रदरहुड और अधिक कट्टरपंथी हो गया। अपनी लेखों, खासतौर पर माइलस्टोन्स (मा’आलिम फि अल-तारीक) के जरिए, कुत्ब ने तकफीर (मुसलमानों को धर्मत्यागी/काफिर घोषित करना) जैसी बातों को बढ़ावा दिया और कहा कि नए राष्ट्र-राज्य ‘गैर-इस्लामी’ हैं।

मुस्लिम ब्रदरहुड और अल जजीरा कनेक्शन

दोहा स्थित अल-जजीरा भले ही मुस्लिम ब्रदरहुड की ओर से घोषित शाखा न हो, लेकिन इसे इस्लामी संगठन का चेहरा (मेगाफोन) माना जाता है। 2017 में सऊदी अरब, यूएई और मिस्र का कतर के साथ राजनयिक विवाद हुआ क्योंकि कतर पर मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास का समर्थन करने का आरोप था।

सऊदी अरब ने अल-जजीरा और उसके सहयोगी चैनलों को बंद करने की माँग भी की थी, क्योंकि उसका आरोप था कि कतर अल-जजीरा का इस्तेमाल इस्लामी उग्रवाद भड़काने और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे जिहादी संगठनों को समर्थन देने के लिए करता है। उस समय अल-जजीरा ने निर्वासित मुस्लिम ब्रदरहुड नेता यूसुफ अल-करदावी की बातें ब्रॉडकास्ट की थी।

अरब स्प्रिंग के दौरान अल-जजीरा की पक्षपाती और प्रोपेगेंडा से भरी रिपोर्टिंग को भी भूला नहीं जा सकता। जनवरी 2024 में एक यमनी-ब्रिटिश पत्रकार अदनान अल-अमेरी ने खुलासा किया कि अल-जजीरा कतर सरकार के इशारे पर मुस्लिम ब्रदरहुड का एजेंडा चलाता है।

अल-जजीरा का लगातार चलता भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

कतर स्थित इस्लामी प्रोपेगेंडा चलाने वाला अल-जजीरा भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार पक्षपाती बयानबाजी करता रहता है। चाहे 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हों, नागरिकता संशोधन अधिनियम या अयोध्या राम मंदिर मुद्दा, अल-जजीरा लगातार मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को गढ़ता रहा है और भारतीय हिंदू बहुमत को दोषी ठहराता रहा है।

अल-जजीरा को मुस्लिम पीड़ितत्व (विक्टिमहुड) की नकली कहानियाँ गढ़ने की आदत है जबकि वह इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद की असल घटनाओं को कम आंककर दिखाता है।

2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमलों के दौरान भी अल-जजीरा ने मुस्लिम भीड़ के हिंदुओं की हत्या, बलात्कार, घरों की लूटपाट और मंदिरों की तोड़फोड़ को ‘राजनीतिक बदला’ बताने की कोशिश की।

इस इस्लामी प्रोपेगेंडा संगठन ने भारतीय मीडिया पर भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्टिंग करने वाले इस्लामोफोबिक हैं। अल-जजीरा कश्मीर मुद्दे पर भी भारत विरोधी भूमिका निभाता है और कश्मीरी पंडितों के कष्टों को कम आंकता रहा है।

अल-जजीरा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी झूठ फैलाता रहा है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को पहले ही क्लीन चिट दे दी है।

भारत में मुस्लिम ब्रदरहुड की छाया

हालाँकि मुस्लिम ब्रदरहुड का भारत में प्रत्यक्ष तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन इसकी विचारधारा का भारत में इस्लामी संगठनों पर काफी असर पड़ा है। ध्यान देने वाली बात ये है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरण दी थी।

प्रतिबंधित इस्लामी आतंकी संगठन जैसे स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं पर जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

दोनों ने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, धर्मनिरपेक्ष एजेंडे का विरोध करने और बहुसंख्यक समुदाय के साथ मुख्यधारा सरकार को ‘मुसलमानों का उत्पीड़न करने वाले’ के तौर पर पेश करने पर भरोसा किया।

इस घटना के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, पाकिस्तान और तुर्की, मिस्र और इराक जैसे मध्य पूर्वी देशों के लोगों ने भारत में बने उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान शुरू किया।

2021 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने भारत के खिलाफ़ #BoycottIndianProducts अभियान शुरू किया, जिसका लक्ष्य भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाना था। यह अभियान सोशल मीडिया पर उस समय शुरू हुआ जब असम में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ चलाए गए बेदखली अभियान के दौरान हिंसा हुई थी, क्योंकि कुछ अतिक्रमणकारियों ने पुलिस पर हमला कर दिया था।


आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

                       दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया ने अपना-अपना नैरेटिव गढ़ा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?
इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।
द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।
                                                              The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

                                                        टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

                                                               हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

                                                               LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

                                                              द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

                                                                  अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

                                                                 अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

                                                                CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।

भारत विरोधी ताकतों के हाथ खिलौना राहुल और INDI गठबंधन; बेशर्म गुलाम मीडिया खामोश, क्यों? NYT, अल जजीरा, ABC…भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदनाम करने के लिए विदेशी मीडिया एकजुट; राहुल गाँधी का ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा फैलाने को सबने एक साथ बजाया भोंपू

राहुल गाँधी (फोटो साभार: PTI) (बाकी तस्वीरों का साभार: The Washington Post, New York Times और Al Jazeera)
राहुल गाँधी विदेशों में जाकर जो भारत के लोकतान्त्रिक मूल्यों को बचाने के लिए रोना रोता है उसका परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं। ये भारत का दुर्भाग्य है कि राहुल जैसा LoP और भारत विरोधी ताकतों के हाथ खिलौना बना INDI गठबंधन। जो नेता और पार्टियां भारत विरोधियों के इशारे पर नाचेंगी देश का किसी भी कीमत पर भला नहीं कर सकते। समय आ गया है जनता को कांग्रेस और 
INDI गठबंधन को चुनावों में या तो धूल चटाएं या गुलाम बनने, जिस तरह मुग़ल और ब्रिटिश सरकारों ने हमें गुलाम बनाया हुआ था उसी तरह गुलाम बनने के लिए तैयार रहना चाहिए। कांग्रेस और INDI गठबंधन की गुलाम मीडिया खामोश, क्यों? 

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर धांधली के बेबुनियाद आरोप लगाए हैं। इसमें विपक्ष के साथ-साथ विदेशी मीडिया भी उन्हें समर्थन दे रहा है। द वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जजीरा सहित कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने गुमराह करने वाले लेख प्रकाशित किए हैं ताकि ‘वोट चोरी’ के राहुल गाँधी के प्रोपेगेंडा को हवा दिया जा सके।

INDI गठबंधन के नेताओं ने 11 अगस्त 2025 को संसद से लेकर चुनाव आयोग मुख्यालय तक विरोध मार्च निकालकर हंगामा काटा। हालाँकि इस मार्च के लिए प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई थी। लिहाजा विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। धक्का मुक्की की स्थिति पैदा हो गई।

इस दौरान विपक्षी नेताओं ने यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि बल प्रयोग से उनकी आवाज दबाई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद सांसद महुआ मोइत्रा और समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव जैसे कुछ नेता पुलिस बैरिकेड्स पर भी चढ़ गए थे।

इस घटना को द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘चुनावी अनियमितताओं का विरोध करने पर भारतीय सांसदों को हिरासत में लिया’ शीर्षक के साथ प्रकाशित किया ताकि विपक्ष के बेबुनियाद आरोपों को बल मिल सके।

                                                  ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट

इसी तरह वाशिंगटन पोस्ट ने बिहार में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को शातिर तरीके से ‘विवादास्पद मतदाता सूची पुनरीक्षण’ बताया है।

                                                ‘वॉशिन्गटन पोस्ट’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट

अल जजीरा ने भी विरोध मार्च की रिपोर्टिंग में INDI गठबंधन के नेताओं के आरोपों को प्रमुखता दी है।

इनके सुर में सुर मिलाते हुए ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (ABC) ने भी बिहार में मतदाता सूची संशोधन को “विवादास्पद” बताया।

                                                       ABC वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट

गौरतलब है कि राहुल गाँधी ने 7 अगस्त 2025 को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें चुनाव आयोग पर बीजेपी के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया। कांग्रेस पार्टी की चुनावी हार के लिए चुनाव आयोग और सत्ताधारी बीजेपी को दोषी ठहराया। बिना किसी प्रमाण 2024 के लोकसभा चुनावों को ‘फिक्स’ बता दिया।

राहुल गाँधी की रायबरेली में ‘फर्जी मतदाता’

इस दौरान राहुल गाँधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का जिक्र किया। कहा कि उनकी पार्टी ने यहाँ एक ‘आंतरिक सर्वेक्षण’ कर 1,00,250 मतों की ‘वोट चोरी’ पकड़ी है। उनका कहना था कि कर्नाटक को कांग्रेस में 16 सीट मिलने की उम्मीद थी। लेकिन वह 9 सीट ही जीत पाई और ऐसा ‘वोट चोरी’ से ही संभव है।

उनका कहना था कि उनकी पार्टी ने इस अप्रत्याशित हार का विश्लेषण करने के बाद पाया कि ‘वोट चोरी’ हुई थी। राहुल गाँधी ने सत्ता में आने पर चुनाव आयोग के अधिकारियों को ‘परिणाम’ भुगतने की धमकी भी दी।

राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मतदाता सूचियों में ‘मकान नंबर 0’ जैसी विसंगतियों का हवाला देते हुए, चुनाव आयोग पर फर्जी मतदाता बनाने का आरोप लगाया। लेकिन बाद में कुछ मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि राहुल गाँधी के खुद के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में भी बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में इस तरह की विसंगति है।

एक तरफ ‘फर्जी वोटरों’ का रोना, दूसरी तरफ SIR का विरोध

कांग्रेस पार्टी समेत पूरा INDI गठबंधन बिहार में SIR का विरोध कर रहा है। इस पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जा चुके हैं। हालाँकि शीर्ष अदालत ने मतदाता सूची संशोधन को नियमित प्रक्रिया और चुनाव आयोग का अधिकार बताते हुए रोक से इनकार कर दिया था।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चुनाव आयोग राहुल गाँधी से उनके आरोपों पर शपथ देने को कह चुका है ताकि जाँच शुरू की जा सके। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता ने यह कहते शपथ पत्र देने से इनकार कर दिया कि एक नेता होने के कारण उनके कहे को ही शपथ के तौर पर लिया जाना चाहिए। इससे उनके आरोपों की ‘गंभीरता’ का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अवलोकन करें:-

सुर्खियों में कर्नाटक के ‘शशि थरूर’: मंत्री राजन्ना ने Rahul Gandhi के वोट चोरी के दावों की पोल खोली, जो
सुर्खियों में कर्नाटक के ‘शशि थरूर’: मंत्री राजन्ना ने Rahul Gandhi के वोट चोरी के दावों की पोल खोली, जो
 

यही कारण है कि एक तरफ राहुल गाँधी मतदाता सूची में फर्जी लोगों का नाम जोड़ने का आरोप लगाते हैं, दूसरी तरफ मतदाता सूची से फर्जी, अयोग्य और मृत लोगों के नाम हटाए जाने का विरोध भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि बिहार में चुनाव आयोग की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया ने भारी विसंगतियाँ पकड़ी है।

आयोग ने पाया है कि सूची में 18 लाख मृत लोगों के नाम दर्ज थे। 7 लाख नाम डुप्लीकेट थे। इसके अलावा 26 लाख लोग ऐसे थे जो दूसरे जगहों पर जा चुके हैं।

हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से रेप, लूटी जा रही संपत्ति… लेकिन हम बांग्लादेश हिंसा पर बात भी नहीं कर सकते; अल जजीरा के लिए यह है ‘मुस्लिम घृणा’; अल जजीरा आँखे खोलकर देखो


बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर पर्दा डालने के लिए इस्लामी कट्टरपंथ के समर्थक लगातार जुटे हुए हैं। इस कोशिश में अब इस्लामी देश क़तर का सरकारी मीडिया अल जजीरा भी शामिल हो गया है। उसे हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को दिखाना ‘इस्लामोफोबिक’ नजर आ रहा है। अल जजीरा का कहना है कि भारतीय मीडिया बांग्लादेश में हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचार को दिखा रही है, इसलिए वह इस्लामोफोबिक है। अल जजीरा ने शायद अपनी आंखों पर मोती पट्टी बाँधी हुई है, जो हकीकत को झूठला रहा है। अगर 
अल जजीरा ने सिर्फ एकतरफा पत्रकारिता ही करनी है, फिर तो इसे yellow journalism कहना ही बेहतर है।     

अल जजीरा ने शुक्रवार (9 अगस्त, 2024) को शीर्षक, ‘इस्लामोफोबिक, अलार्मिस्ट: हाउ सम इंडिया आउटलेट्स कवर्ड बांग्लादेश क्राइसिस’ से एक लेख प्रकाशित किया। इसे फैसल महमूद और सकीब सरकार ने लिखा है। इसमें भारतीय मीडिया के हिन्दुओं पर अत्याचार करने की रिपोर्टिंग करने को अल जजीरा ‘इस्लामोफोबिक’ बता रहा है।

इस लेख में दावा किया गया है कि टाइम्स ग्रुप के मिरर नाउ ने एक भ्रामक खबर चलाई कि 24 लोगों को बांग्लादेश में भीड़ ने जिंदा जला दिया और ‘हमलों के केंद्र में अल्पसंख्यक थे’ ताकि यह संकेत दिया जा सके कि हिंदुओं को जिंदा जलाया गया है। हालाँकि, यह दावा फर्जी है क्योंकि मिरर नाउ ने ना ही यह कहा कि मरने वाले सारे हिन्दू थे और ना ही यह कहा कि पूरे बांग्लादेश में मात्र हिन्दुओं पर हमला हो रहा है। अल जजीरा ने हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को कम करने के दिखाने की कोशिश भी की है।

अल जजीरा ने इस लेख में दावा किया कि जबसे हिंसा चालू हुई है, तब से मात्र दो हिन्दुओं की हत्या हुई है। हालाँकि, यह बात सर्वथा गलत है क्योंकि कई जगह हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है और बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गए हैं। यहाँ तक कि हिन्दुओं के पूरे-पूरे गाँव जलाए गए हैं। अल जजीरा यहीं नहीं रुकता है। अल जजीरा भारतीय मीडिया के इस बात को भी गलत बताता है कि BNP ने भी शेख हसीना सरकार को गिराया। अल जजीरा का दावा है कि यह सब कुछ छात्र प्रदर्शन के कारण हुआ।

जहाँ यह बात ठीक है कि यह आन्दोलन छात्रों के प्रदर्शन से प्रारम्भ हुआ था लेकिन कुछ ही दिनों के बाद इसमें BNP और जमात-ए-इस्लामी शामिल हो गए और हसीना सरकार के खिलाफ हिंसा की। हसीना सरकार के जवाब देने पर प्रदर्शन और भड़का और सरकार गिर गई। अल जजीरा बांग्लादेश में हिन्दू पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों को बचाने के लिए और आगे निकल गया। अल जजीरा ने यह भी दावा किया कि हिन्दुओं पर बांग्लादेश में हो रहे हमले धार्मिक कारणों से नहीं हो रहे।

अल जजीरा का दावा है कि यह हमले इसलिए हो रहे हैं क्योकि हिन्दू सत्ता से बाहर हो चुकी आवामी लीग के समर्थक के तौर पर देखे जाते थे। अल जजीरा ने यह भी कहानी गढ़ दी कि मुस्लिम बहुत बांग्लादेश में हिन्दू शेख हसीना की सत्ता के दौरान बाकियों को चिढ़ाते थे, इसलिए उनके साथ अत्याचार हो रहा है। अल जजीरा यहाँ भी नहीं रुका। उसने यह भी दावा कर दिया कि मुस्लिम बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों को बचा रहे हैं। हालाँकि, अल जजीरा यह नहीं बता पाया कि मुस्लिम मंदिरों को बचा किन से रहे हैं?

अल जजीरा ने हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की तुलना भारत में मुस्लिमों के खिलाफ होने वाली इक्का-दुक्का वारदातों से भी कर दी। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत में जो हमले मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा के तौर पर पेश किए जाते हैं, उनमें से कई झूठे निकलते हैं या फिर उनकी सच्चाई कुछ अलग होती है। लेकिन बांग्लादेश के मामले में ऐसा नहीं है, बांग्लादेश में हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा इसलिए हो रही है क्योंकि वह हिन्दू और इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें काफिर समझते हैं।

यह कोई नई बात नहीं है कि विदेशी और भारतीय वामपंथी मीडिया हिन्दुओं के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचारों पर पर्दा डाल रहा हो। इससे पहले बांग्लादेश मामले में ही न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी यही सिद्ध करने का प्रयास किया था कि हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा राजनीतिक है। भारतीय वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल स्क्रॉल ने सिरे से हिंसा को नकारने की बात की थी। यहाँ तक कि स्क्रॉल ने इस हिंसा को जायज तक ठहराया था।