Showing posts with label calling. Show all posts
Showing posts with label calling. Show all posts

मोदी घृणा में चूर ‘इतिहासकार’ मुकुल केसवान ने ‘द गार्जियन’ में परोसा देश विरोधी प्रोपगेंडा: प्रधानमंत्री के बढ़ते कद से बेचैन


भारत के अंग्रेजी-भाषी उदारवादी एलिट वर्ग के बारे में एक अजीब सी बात है। जब भी पश्चिमी देश भारत के खिलाफ नाराजगी जताते हैं, ये लोग तुरंत विदेशी मीडिया की ओर दौड़ पड़ते हैं और ‘मैंने तो पहले ही कहा था’ वाला प्रवचन शुरू कर देते हैं। इसमें भी वे भारत को ही दोषी ठहराते हैं।

मुकुल केसवन भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में The Guardian में एक कॉलम लिखा। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव के लिए जिम्मेदार ठहराया।

कॉलम का हेडलाइन ही खुद में औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है- “Blindsided by Trump, Modi is learning hard lessons about India’s place in the new world order” दूसरे शब्दों में, “भारत बराबरी की बात सोचना बंद करो, अपनी जगह पहचानो और अमेरिका के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसे 50 के दशक में होता था। टैरिफ का सामना करो।”

The Guardian में प्रकाशित मुकुल केसवन द्वारा लिखा एक अपमानजनक लेख, जिसमें बताया गया कि अमेरिकी के खिलाफ खड़ा होना भारत की गलती थी

लेकिन शायद इस पूरे प्रकरण का सबसे खास पहलू ट्रंप का अहंकार या पश्चिमी देश के नेताओं की मौकापरस्ती है, जो चीन को बख्शते हुए भारत को निशाना बनाते हैं। यह भारत के अपने ही केसवन जैसे ‘ब्राउन सेपॉय’ की सोच है, जो उस अहंकार को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और उसे ‘बुद्धिमानी’ के रूप में दर्शाते हैं।

विदेशों की धौंस के खिलाफ अपने देश के साथ खड़े होने के बजाए, वे खुशी-खुशी उस धौंस का साथ देते हैं, अपने पाठकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि भारत ने अपने सम्मान की रक्षा करके और एक खुद की प्रशंसा करने वाले अहंकारी को संतुष्ट ना करके एक बड़ी भूल की है।

ट्रम्प के टैरिफ: नीति नहीं बल्कि धमकाने का हथियार

The Guardian में अपने लेख में मुकुल केसवन ने ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाए जाने को इस तरह से बताया है मानों यह ‘राजनीति’ का कोई अहम सबक हो, जिसे पीएम मोदी समझ नहीं पाए। वे इस तथ्य को आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं कि ये टैरिफ आर्थिक मामला नहीं बल्कि सजा के तौर पर लगाया गया था।

अप्रैल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जो कि अमेरिका के सहयोगियों की तुलना में काफी ज्यादा है। जब भारत ने झुकने से इनकार कर दिया तो टैरिफ दोगुना करके 50 प्रतिशत कर दिया गया। वजह क्या थी? यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद, रिफाइनिंग और पुनर्नियात।

रूस से तेल लेने वालों में अब तक चीन सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बावजूद चीन पर टैरिफ नहीं बढ़ाया गया। क्यों? क्योंकि अमेरिका अच्छे से जानता है कि उसकी इकोनॉमी चीन की सप्लाई चेन पर निर्भर है, इसीलिए बीजिंग से व्यापार-संघर्ष शुरू करने से खुद को बचाया। दूसरी ओर अमेरिका ने भारत को ऐसा देश समझा, जिसको आसानी से दबाया जा सकता है।

लेकिन अमेरिका का सारा जोड़-घटाव धरा रह गया। भारत अब भी अपने नागरिकों के लिए सस्ती ऊर्जा और एक स्थिर रिफाइनिंग उद्योग सुनिश्चित कर रहा है। वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के बजाए भारत के रिफाइनरियों ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति को स्थिर करने में मदद की। विडंबना यह है कि यूरोप इसका सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। पश्चिमी देश, जिन्होंने रूस के कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था, अंत में उन्हें भी भारत का रिफाइन्ड तेल खरीदना पड़ा।

चाहे कुछ भी हो, भारत ने यूरोप को उसके ऊर्जा संकट से बचाया तो है। फिर भी केसवन के अनुसार, भारत को सजा मिलनी चाहिए और मोदी को अपमान सहना चाहिए।

अंबानी और ‘ब्राह्मण’ पर हमला: भारत की जातिगत दरारों का फायदा उठाना

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ सिर्फ एक रणनीति का हिस्सा था। बाकी तो भारत के एलिट वर्ग के खिलाफ एक संगठित बदनामी करने वाला अभियान था। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने मुकेश अंबानी को निशाना बनाया। उसने कहा कि भारत का सबसे अमीर परिवार रूसी कच्चे तेल से मुनाफा कमा रहा है। इसका संकेत स्पष्ट था: अंबानी को आलोचनाओं के केन्द्र में लाओ, उन्हें खलनायक बनाओ और भारत में विभाजन की सोच बढ़ाओ।

डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत की जातिगत राजनीति का हवाला देते हुए ‘ब्राह्मणों’ पर भारत की जनता की कीमत पर मुनाफा कमाने का आरोप लगाया। सोचिए एक वरिष्ठ व्हाइट हाउस अधिकारी ने भारत की आंतरिक जातिगत दरारों को वैश्विक व्यापार वार्ताओं में आसानी से शामिल कर लिया।

इस अहंकार में एक और स्वर जोड़ते हुए अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने हाल ही में घोषणा की कि भारत एक या दो महीने में डोनाल्ड के आदेशों का विरोध करने के लिए ‘माफी माँगेगा।’ यह टिप्पणी वॉशिंगटन की विशेषाधिकार वाली मानसिकता को ही उजागर करती है। भारत से एक जागीरदार देश की तरह पेश आने की अपेक्षा करना। यह दिखाता है कि कैसे केसवन जैसे लोग इस दबाव को ‘राजनीति की हकीकत’ कहकर बढ़ावा देते हैं। वास्तव में मोदी सरकार ने संयम और परिपक्वता का प्रदर्शन किया। इस तरह की अहंकारपूर्ण बातों पर प्रतिक्रिया न देकर भारत ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया।

यह कूटनीति नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन था। यह भारत की सामाजिक दरारों को हथियार बनाकर मोदी सरकार पर व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव डालने की सोची-समझी साजिश थी। उम्मीद यह थी कि भारत के अंदर मोदी विरोधी इन हमलों को और बढ़ाएँगे, जिससे मोदी अलग-थलग पड़ जाएँगे।

मुकुल केसवन ने इस भूमिका को बखूबी निभाया। ट्रंप के सलाहकारों की नस्लवादी और जातिवादी बयानबाज़ी की आलोचना करने के बजाए उन्होंने The Guardian में एक लेख लिखा, जिसमें मोदी पर ‘हद से ज्यादा हस्तक्षेप’ और ‘गलत आकलन’ के आरोप लगाए। केसवन के लिए असली विवाद यह नहीं है कि अमेरिकी अधिकारियों ने भारत की जातिगत संरचना का मजाक उड़ाया, बल्कि यह है कि भारत ने झुकने से इनकार कर दिया।

पाकिस्तान के साथ झूठी तुलना: पुरानी अमेरिकी रणनीति

केसवन के तर्क का एक और पहलू है, जिसमें उन्होंने ट्रंप की बात को दोहराया है कि भारत और पाकिस्तान ‘झगड़ालू ‘दक्षिण एशियाई पड़ोसी” हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने तेजी और निर्णायक प्रतिक्रिया दी। ट्रंप और उनके उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसे ऐसे पेश करने की कोशिश की, जैसे उनके फोन कॉल ने युद्ध रुक गया। जब भारत ने सीजफायर के दावे का समर्थन करने से इनकार कर दिया, तो व्हाइट हाउस नाराज हो गया।
केसवन इसे मोदी की नाकामी बताते हैं। लेकिन अमेरिकी की दशकों से भारत- पाकिस्तान को एक तराजू में तौलने की रणनीति रही है। वॉशिंगटन भारत और पाकिस्तान को एक साथ रखना चाहता है, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को एक आतंकवाद-प्रायोजित देश के बराबर समझा जाए।
मोदी ने इस झूठी तुलना को सिरे से नकार दिया। भारत अपनी आतंकवाद-रोधी नीतियों को नोबेल पुरस्कार के लिए बेताब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों में कभी नहीं जाने देगा। फिर भी केसवन के लिए भारत का इस मामले में शामिल ना होना एक कूटनीतिक चूक है। उन्हें ट्रंप द्वारा भारत को अपमानित करने से कम मोदी द्वारा इस अपमान को चुपचाप स्वीकार करने का ज्यादा दुख है।

भारत दबाव में आए बिना रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखेगा

केसवन के लेख का मुख्य मुद्दा यह है कि मोदी के नेतृत्व में भारत गलत तरीके से अमेरिका के बहुत करीब आ गया है, जो कि गलत है। उनका मानना है कि भारत ने अमेरिका के साथ बहुत ज्यादा नजदीकी बढ़ाई है, यह सोचकर कि उसे पश्चिमी देशों का समर्थन मिल जाएगा। यह ऐतिहासिक रूप से गलत और विश्लेषणात्मक रूप से बेईमानी भरी बात है।
मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति काफी सुसंगत रही है। भारत ने अमेरिका के साथ संबंध मजबूत किए हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता की कीमत पर कभी नहीं। इसीलिए भारत रूसी तेल खरीदता है, फ्रांस के साथ रक्षा संबंध बढ़ाता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ Quad में शामिल होता है और पुतिन और शी जिनपिंग के साथ SCO शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा लेता है।

यह रणनीतिक स्वायत्तता है। यही वो सिद्धांत है, जिसने शीत युद्ध के समय भारत की गुटनिरपेक्षता को बढ़ाया और अब इसे 21वीं सदी की मल्टीपोलर दुनिया के हिसाब से बदल लिया गया है।

विडंबना यह है कि केसवन खुद कहते हैं, “आज गुटनिरपेक्षता रणनीतिक स्वायत्तता के तले झंडे फहरा रही है।” लेकिन फिर वे इसे आलोचना में बदल देते हैं, जैसे कि मोदी को इसके लिए माफी माँगनी चाहिए। जबकि नेहरू से लेकर वाजपेयी तक सभी भारतीय राजनेता यही चाहते थे- एक ऐसा भारत जो अपने साझेदार खुद चुने और किसी गुट के निर्देश पर ना चले।

विडंबना यह भी है कि ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिका ने “भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया है।” उन्होंने यह नहीं कहा कि उनकी धौंस, उनके टैरिफ, उनके जातिवादी ताने, भारतीय व्यापार पर उनके हमले ही थे, जिन्होंने भारत को बहुध्रुवीयता को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

केसवन का गुस्सा इस बात पर नहीं है कि मोदी ने अमेरिका को ‘खो दिया’ बल्कि इस बात पर है कि मोदी ने अमेरिका को खुश करने के लिए भारत की गरिमा को खोने से इनकार कर दिया।

मौन की गरिमा बनाम सेपॉय की कायरता

तमाम टैरिफ, अंबानी पर हमले, ब्राह्मणों पर कटाक्ष और धमकियों के बावजूद, भारत ने एक सम्मानजनक चुप्पी बनाए रखी है। हाल ही में जब ट्रंप ने शांति की पेशकश की, तो मोदी ने भी उन्हें अपना ‘अच्छा दोस्त’ बताया। यही तो कूटनीति है। कीचड़ में घसीटे जाने से इनकार करना, अल्पकालिक नफा-नुकसान से ऊपर लंब समय तक की रणनीतिक हितों को ध्यान में रखना।

मोदी के इस आकर्षक प्रहार को शायद केसवन कमजोरी समझेंगे। लेकिन जिसे वे कमजोरी कह रहे हैं, वह दरअसल परिपक्वता है। आत्मविश्वास से भरे भारत को X पर बयान देने की जरूरत नहीं है। भारत लंबे समय की रणनीति बना रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैचारिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और बौद्धिक छीछलेपन से भरे केसवन जैसे लोग इस बारीकी को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं।

केसवन का लेख उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है, क्योंकि वे प्रगतिशील विचारों के नाम पर औपनिवेशिक सोच वाले मंच The Guardian की ओर भागते हैं और भारत को अपनी जगह समझाने के बारे में व्याख्यान देते हैं।

‘ब्राउन सेपॉय’ की असलियत यही है, जब भारत का अपमान पश्चिम देश करते है तो चुप्पी लेकिन जब भारत झुकने से मना करता है तो गुस्सा।

ऐतिहासिक तुलना: नेहरू के समय से लेकर मोदी के नेतृत्व तक

इस विरोधाभास को समझने के लिए इतिहास पर नजर डालते हैं। 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया तब नेहरू ने अमेरिका से सैन्य मदद माँगी। लेकिन अमेरिका ने अपमानजनक शर्तें रखीं, भारत की समाजवादी नीतियों पर उपदेश दिए और बदले में कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही। नेहरू ने यह अपमान सह लिया क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।

1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान इंदिरा गाँधी को भी अमेरिकी अहंकार का सामना करना पड़ा। रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने उन्हें गालियाँ दीं, सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा और भारत को डराने की कोशिश की। लेकिन इंदिरा ने नेहरू की तरह हार नहीं मानी। भारत ने बांग्लादेश को आजाद कराया और दक्षिण एशिया का नक्शा बदल दिया।

अब साल 2025 में मोदी को भी ऐसी ही धमकी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस बार टैरिफ और तेल कूटनीति के जरिए। मोदी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। वह भारत के हितों को सबसे ऊपर रखते हैं। चाहे रूसी तेल खरीदना हो या दूसरा व्यापार समझौता करना।

यही सेपॉय, जिन्होंने एक समय पर नेहरू के अपमान को सराहा, वही अब मोदी की ललकार की आलोचना कर रहे हैं। ये भारत के उदारवादी एलिट वर्ग का उलटा रूप है। आत्मसमर्पण ‘परिष्कार’ है लेकिन संप्रभुता ‘अहंकार’ है।

असली ‘कठिन सबक’

The Guardian की हेडलाइन व्यंग्यात्मक लहजे में कहती है कि “मोदी दुनिया में भारत की स्थिति को लेकर कठिन सबक सीख रहे हैं।” लेकिन सच्चाई इसके उलट है। असली कठिन सबक वॉशिंगटन में सीखा जा रहा है कि भारत अब आसानी से पराजित नहीं हो सकता।

ट्रंप को यह बात समझ आ रही है कि भारत और पाकिस्तान को एक साथ जोड़ना एक बड़ी भूल थी। मोदी, असीम मुनीर जैसे व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ व्हाइट हाउस में शानदार भोजन के लिए आमंत्रित करने से आसानी से प्रभावित किया जा सके।

भारत को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि वह किसके साथ व्यापार करेगा। भारत सस्ता तेल खरीदने के लिए माफी नहीं माँगेगा। भारत कभी भी पाकिस्तान के साथ एक ही श्रेणी में रखा जाना स्वीकार नहीं करेगा। भारत सिर्फ इसलिए कोई खराब व्यापार समझौता नहीं करेगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं।

अगर इससे ट्रंप को निराश होते हैं, तो ठीक है। अगर इससे मुकुल केसवन को औपनिवेशिक हैंगओवर से घुटन होती है, तो और भी अच्छा है।

क्योंकि ये 2025 का भारत है। गौरवान्वित, दृढ़निश्चयी और सभ्यतागत रूप से आत्मविश्वासी। यह जानता है कि पश्चिम की ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ हमेशा पश्चिमी प्रभुत्व का दूसरा नाम रही है। और यह भी जानता है कि बहुध्रुवीय विश्व अब स्थायी हो गया है।

सेपॉय और पश्चिम के लिए सीख: झुकने को कहने पर भी भारत नहीं झुकेगा

मुकुल केसवन और उनके जैसे लोग भारत के झुकने से इनकार को राष्ट्रवादी अपमान नहीं बल्कि असफलता मानते हैं। वे सफलता का आकलन इस बात से नहीं करते कि भारत अपने लोगों के लिए क्या हासिल करता है बल्कि इस बात से करते हैं कि पश्चिमी देशों को भारत कितना स्वीकार्य है।

प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक चाहे कुछ भी कहें, वे सफलता को अलग तरह से मापते हैं। उनके लिए भारत की गरिमा सर्वोपरि है। और यही कारण है कि सेपॉय वर्ग उनसे घृणा करता है: क्योंकि वे उस दुनिया में उनकी अप्रासंगिकता को उजागर करते हैं, जहाँ भारत को अब उनके औपनिवेशिक समर्थन की जरूरत नहीं है।

साफ तौर पर समझते हैं: मोदी ‘अंधे’ नहीं हैं। भारत ‘अपनी जगह’ नहीं सीख रहा है। असल में ट्रंप और उनके सेपॉय सीखना चाहिए कि नए विश्व में भारत झुकने को तैयार नहीं है। यह सबको याद दिलाता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत अब डरपोक नहीं है बल्कि एक आत्मविश्वासी शक्ति है, जो दबाव के सामने खड़ी रहती है और अपने हितों की रक्षा करती है।

मुस्लिम वोट की खातिर मुगलों का महिमामंथन विपक्ष को आत्महत्या की ओर धकेल रहा है; राणा सांगा को ‘गद्दार’ कहना राजस्थान विधानसभा में गूंजा

इंडी गठबंधन में सहयोगी समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी हदें पार कर दी हैं। पहले तो सपाई सिर्फ मुस्लिम हितैषी बनते थे। सनातन को अपमानित, रामायण को कलंकित करना, महाकुम्भ का अपमान आदि आदि अनेकों हरकतें हैं जो विपक्ष को आत्महत्या करने को मजबूर कर रहा है। अगर यही विपक्ष विदेश में अपने देश के इतिहास बोलता उसे जेल में डाल दिया जाता, लेकिन ये भारत जहाँ वर्तमान जयचन्दों की भीड़ लगी हुई है। औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों के हिमायती बनते थे। लेकिन मुस्लिम प्रेम में समाजवादी पार्टी के नेता इतने गिर जाएंगे यह किसी ने सोचा भी ना होगा। इंडी गठबंधन और सपा हिंदुओं का गौरवशाली इतिहास बिगाड़ने में जुटी हुई है। अब राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन ने मुगलों से लोहा लेने वाले मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा संग्राम सिंह सांगा के खिलाफ बेहद अपमानजनक टिप्पणी कर दी है। उन्होंने राणा सांगा के वंशजों और उन्हें मानने वाले हिंदुओं को गद्दार तक कह डाला है।

सपा सांसद की इस अभद्र, अशोभनीय, असभ्य और अनर्गल टिप्पणी को लेकर राजस्थान समेत देशभर की सियासत में उबाल आ गया है। भाजपा ने पलटवार करते हुए इसके लिए सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से माफी मांगने के लिए कहा है। राजस्थान के सीएम भजनलाल ने कहा कि मेवाड़ के महान योद्धा राणा सांगा के बारे में समाजवादी पार्टी के सांसद का निम्नस्तरीय बयान, न केवल राजस्थान की 8 करोड़ जनता को, बल्कि सम्पूर्ण देशवासियों को आहत करने वाला है। समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन के राणा सांगा को गद्दार कहने का मुद्दा राजस्थान विधानसभा में गूंजा। कांग्रेस ने आपत्ति की तो भाजपा ने कहा कि इससे साफ तय हो गया कि आप लोग भी रामजीलाल सुमन के साथ हो।

सपा सांसद सुमन ने राणा सांगा पर यह विवादित बयान दिया
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन ने राज्यसभा में जो बयान दिया उससे पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। सपा सांसद सुमन ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते राणा सांगा को लेकर बयान में कहा था कि ‘बीजेपी के लोगों का ये तकियाकलाम बन गया है कि इनमें बाबर का DNA है। मैं जानना चाहूंगा कि बाबर को आखिर लाया कौन? सुमन ने अनर्गल दावा किया कि इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को राणा सांगा लाया था। मुसलमान अगर बाबर की औलाद हैं तो तुम लोग उस गद्दार राणा सांगा की औलाद हो, ये हिन्दुस्तान में तय हो जाना चाहिए कि बाबर की आलोचना करते हो, लेकिन राणा सांगा की आलोचना नहीं करते। बता दें कि देश में पहले से औरंगजेब की कब्र को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। इसके बाद राणा सांगा पर विवादित बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई है।

राजस्थान विधानसभा में गूंजा राणा को गद्दार कहने का मुद्दा
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन के राणा सांगा को गद्दार कहने का मुद्दा राजस्थान विधानसभा में उठा। बीजेपी विधायक श्रीचंद कृपलानी ने पॉइंट ऑफ इंफॉर्मेशन के जरिए राणा सांगा को गद्दार कहने का मामला उठाते हुए पूरे मामले में कार्रवाई की मांग की। इस पर कांग्रेस विधायक हरिमोहन शर्मा ने कहा- सदन में इस पर चर्चा नहीं हो सकती। हरिमोहन शर्मा के इतना कहते ही बीजेपी विधायकों ने कड़ी आपत्ति की। इस पर बीजेपी विधायकों ने कहा- राणा सांगा के अपमान पर चर्चा क्यों नहीं हो सकती? कई बीजेपी विधायक जोर-जोर से बोलने लगे, इससे सदन में हंगामे की स्थिति बन गई। बीजेपी विधायकों ने कहा कि आप राणा सांगा पर टिप्पणी का समर्थन कर रहे हो क्या? श्रीचंद कृपलानी ने कहा- आपके खड़ा होने से यह तय हो गया कि आप रामजीलाल सुमन के साथ हो? कांग्रेस ने खुद अपनी पोल खोल ली। आप मुगलों का साथ दे रहे हो। सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने कहा- कांग्रेस विधायक दल रामजीलाल सुमन के साथ खड़ा है, राणा सांगा का अपमान करने वाले के साथ खड़ा है, शर्म आनी चाहिए।

बरेली में जोरदार प्रदर्शन, सपा सांसद सुमन का पुतला फूंका
बरेली के आंवला में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने सोमवार को जोरदार प्रदर्शन किया। समाज वीर महाराणा सांगा पर सपा राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन की अपमानजनक टिप्पणी से नाराज है।क्षत्रिय महासभा के नेतृत्व में तहसील गेट पर एकत्र हुए लोगों ने सांसद का पुतला दहन किया। प्रदर्शनकारियों ने एसडीएम नहने राम को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया कि राज्यसभा में सपा सांसद ने न सिर्फ क्षत्रिय समाज बल्कि पूरे हिंदू समाज के गौरव महाराणा सांगा के प्रति अमर्यादित टिप्पणी की है। समाज इससे आक्रोशित है। महासभा ने चेतावनी दी कि अगर सांसद के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो क्षत्रिय महासभा और हिंदू संगठन आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

अपने सांसद के बयान के लिए अखिलेश यादव देश से माफी मांगें
सपा सांसद के बयान पर राजस्थान के सीएम भजनलाल ने सोशल मीडिया पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर लिखा कि ‘शूरवीरों की धरती राजस्थान के लाडले सपूतों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए सदा अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। मेवाड़ के महान योद्धा राणा सांगा के बारे में समाजवादी पार्टी के सांसद का निम्नस्तरीय बयान, न केवल राजस्थान की 8 करोड़ जनता को, बल्कि सम्पूर्ण देशवासियों को आहत करता है।’ उन्होंने आगे लिखा कि ‘जिस महान योद्धा ने मुगलों से युद्ध में अपने शरीर पर 80 घाव झेले, उनको गद्दार कहना विपक्षी नेताओं की घटिया मानसिकता को दर्शाता है। वोटो के तुष्टिकरण के लिए ये लोग इतिहास पुरुषों का अपमान करने से भी नहीं चूकते हैं। इसके लिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को को तुरंत देश से माफी मांगनी चाहिए और अपने सांसद पर अविलम्ब कार्रवाई करनी चाहिए।’

सुमन का बयान देश के शौर्य और बलिदान का अपमान है: दीया कुमारी
सपा सांसद के राणा सांगा पर दिए विवादित बयान की डिप्टी सीएम दीया कुमारी ने भी कटु आलोचना की है। उन्होंने एक्स पर लिखा कि ‘वीर शिरोमणि महाराणा सांगा जी, जिनके शौर्य की गाथा राजस्थान की मिट्टी के कण-कण से सुनाई देती है। जिनकी वीरता की कहानी सुनकर यहां बच्चे बड़े हुए हैं, 80 घाव खाकर भी देश के लिए लड़ने वाले देशभक्त योद्धा के लिए कहा गया ‘गद्दार’ शब्द, ना सिर्फ महाराणा सांगा जी और राजस्थान, बल्कि देश के शौर्य और बलिदान का भी अपमान है। सपा सांसद रामजी लाल सुमन का यह बयान शर्मनाक और निंदनीय है। उन्हें देश की वीरता को कलंकित करने वाले इन कटु शब्दों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।’

कुछ तुच्छ लोग ही इस तरह की बयानबाजी करते हैं: शेखावत
राणा सांगा को लेकर दिए गए विवादित बयान पर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी जमकर बरसे। उन्होंने कहा कि कुछ तुच्छ बुद्धि और छोटे हृदय के लोग इस तरह की चर्चा करते हैं। इन चर्चाओं के लिए कोई गुंजाइश भी नहीं है। उन्होंने कहा कि “भारत के इतिहास की समीक्षा करने वाले एक हजार वर्ष बाद या जब भी समीक्षा करेंगे तो कभी बाबर और राणा सांगा की तुलना नहीं कर पाएंगे। महाराणा सांगा ने स्वतंत्रता की जो अलख जगाई थी, उसने न सिर्फ मुगलों से लोहा लिया, बल्कि भारत की संस्कृति को सनातन बनाए रखने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। कुछ तुच्छ बुद्धि और छोटे दिल के लोग ऐसी चर्चाएं करते हैं। इसी तरह बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ ने भी बयान को राणा सांगा का बड़ा अपमान बताया। उन्होंने कहा कि राजस्थान की धरा साहस, शौर्य, त्याग और बलिदान की भूमि रही है। राणा सांगा पर ऐसी टिप्पणी राजस्थान के इतिहास का अपमान है।

सुमन का बयान तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा : राज्यवर्धन
राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री और भाजपा नेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने समाजवादी पार्टी और इंडिया गठबंधन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सुमन के बयान को “तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा” बताते हुए कहा कि यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि राष्ट्र के सम्मान पर हमला है। उन्होंने कहा कि “कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा देश के दुश्मनों को बेच दी है। ये लोग भारत को नीचा दिखाने और महापुरुषों का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ये लोग दीमक हैं, जो देश की जड़ों को खोखला करने में लगे हैं लेकिन अब भारत जाग चुका है और ऐसे लोगों को हम और बर्दाश्त नहीं करेंगे।” वहीं मेवाड़ राजघराने से आने वाले बीजेपी विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ ने भी सपा सांसद के बयान पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा है- संसद में ऐसे लोग भी पहुंचते है। ऐसों से महाराणा सांगा को कोई प्रमाण पत्र की जरूरत ही नहीं है, मगर सदन की गरिमा और हमारे इतिहास में से एक महान व्यक्तित्व के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने पर कड़ी कार्रवाई की जरूरत है।

कांग्रेस की सपा सांसद के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग
बीजेपी ही नहीं इंडिया गठबंधन में सपा के साथ खड़ी कांग्रेस के नेताओं ने भी सपा सांसद सुमन के बयान की कटु आलोचना की है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा, “अस्सी घाव लगे थे तन पे, फिर भी व्यथा नहीं थी मन में। मातृभूमि की रक्षा में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पण करने वाले, अदम्य साहस, वीरता, त्याग और स्वाभिमान के प्रतीक वीर शिरोमणि महाराणा सांगा पर सांसद रामलाल सुमन द्वारा संसद में अमर्यादित टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है व माफी योग्य नहीं है।” खाचरियावास ने इस बयान के लिए सपा सांसद के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग भी की है।


बांग्लादेश : महिलाओं के फुटबॉल मैच को देख बौखलाए इस्लामी कट्टरपंथी, 2 जगह की तोड़फोड़: कहा- ये इस्लाम के खिलाफ, हमलावरों में मदरसे के छात्र भी शामिल

      बांग्लादेश में इस्ले कट्टरपंथी महिलाओं के खेलों में आने का विरोध  (साभार: mayofficialX/x & Dhakapost)
बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों ने महिला फुटबॉल मैचों को निशाना बनाया है। इस्लामी कट्टरपंथियों ने महिलाओं के फुटबॉल खेलने को इस्लाम विरोधी बता कर तोड़फोड़ मचाई। यह हमले बांग्लादेश में दो अलग-अलग जगह हुए। हमला करने वाले एक इस्लामी संगठन से जुड़े हुए थे।

पहली घटना बांग्लादेश के जॉयपुरहाट के तिलकपुर में हुई। यहाँ मंगलवार (28 जनवरी, 2025) को एक मदरसे के तालिब (छात्र) और बाकी कट्टरपंथी ग्राउंड के बाहर हंगामा करने लगे। दो महिला टीमों के बीच होने वाले इस मैच को लेकर खूब तोड़फोड़ मचाई गई।

यह मैच बुधवार (29 जनवरी) को तिलकपुर हाई स्कूल के खेल के मैदान पर जॉयपुरहाट और रंगपुर महिला फुटबॉल टीमों के बीच होना था। इसको लेकर सोशल मीडिया पर वीडियो भी वायरल हुए। इसमें मुस्लिम भीड़ को स्कूल की टिन की बाड़ को तोड़ते हुए देखा जा सकता है। इन हमलावरों को भड़काऊ भाषण देकर यहाँ लाया गया था।

कट्टरपंथियों ने आरोप लगाया गया कि फुटबॉल खेलने वाली लड़कियाँ पर्दा नहीं करती हैं। उनके इस हंगामे के चलते फुटबॉल मैच कैंसल कर दिया गया। लड़कियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना पड़ा। इस्लामी भीड़ ने चेतावनी दी है कि आगे भी ऐसे आयोजन ना हों।

एक कट्टरपंथी ने ऐलान किया, “मैं उन लोगों को चेतावनी देना चाहता हूँ जो हमारी महिलाओं को बेपर्दा करके पैसा कमाना चाहते हैं। सावधान रहें। महिलाओं के सभी खेल बंद कर दो। अगर तुम नहीं रुकते, तो हम अपनी ताकत दिखाएँगे” स्थानीय पुलिस ने भी घटना की कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया।

वहीं इसी दिन बांग्लादेश के दिनाजपुर में हाकिमपुर में भी तौहीदी जनता नाम के एक इस्लामी संगठन ने एक फुटबॉल मैच को निशाना बनाया। यहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने महिलाओं के मैच पर हमला कर दिया। इस हमले में 10 लोग घायल हो गए। हमले के बाद मैच को रद्द करना पड़ा। आयोजकों ने धमकियों के बाद पूरा टूर्नामेंट ही कैंसिल कर दिया है।

बंगलादेश में हुई इन घटनाओं के पीछे बढ़ता इस्लामी कट्टरपंथ है। यूनुस सरकार आने के बाद से लगातार इस्लामी कट्टरपंथी अपनी मनमर्जी में लगे हुए हैं। महिलाओं के साथही अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भी निशाना बनाया गया है। महिलाओं के मैच पर हमले की कई संगठनों ने आलोचना की है।

हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से रेप, लूटी जा रही संपत्ति… लेकिन हम बांग्लादेश हिंसा पर बात भी नहीं कर सकते; अल जजीरा के लिए यह है ‘मुस्लिम घृणा’; अल जजीरा आँखे खोलकर देखो


बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर पर्दा डालने के लिए इस्लामी कट्टरपंथ के समर्थक लगातार जुटे हुए हैं। इस कोशिश में अब इस्लामी देश क़तर का सरकारी मीडिया अल जजीरा भी शामिल हो गया है। उसे हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को दिखाना ‘इस्लामोफोबिक’ नजर आ रहा है। अल जजीरा का कहना है कि भारतीय मीडिया बांग्लादेश में हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचार को दिखा रही है, इसलिए वह इस्लामोफोबिक है। अल जजीरा ने शायद अपनी आंखों पर मोती पट्टी बाँधी हुई है, जो हकीकत को झूठला रहा है। अगर 
अल जजीरा ने सिर्फ एकतरफा पत्रकारिता ही करनी है, फिर तो इसे yellow journalism कहना ही बेहतर है।     

अल जजीरा ने शुक्रवार (9 अगस्त, 2024) को शीर्षक, ‘इस्लामोफोबिक, अलार्मिस्ट: हाउ सम इंडिया आउटलेट्स कवर्ड बांग्लादेश क्राइसिस’ से एक लेख प्रकाशित किया। इसे फैसल महमूद और सकीब सरकार ने लिखा है। इसमें भारतीय मीडिया के हिन्दुओं पर अत्याचार करने की रिपोर्टिंग करने को अल जजीरा ‘इस्लामोफोबिक’ बता रहा है।

इस लेख में दावा किया गया है कि टाइम्स ग्रुप के मिरर नाउ ने एक भ्रामक खबर चलाई कि 24 लोगों को बांग्लादेश में भीड़ ने जिंदा जला दिया और ‘हमलों के केंद्र में अल्पसंख्यक थे’ ताकि यह संकेत दिया जा सके कि हिंदुओं को जिंदा जलाया गया है। हालाँकि, यह दावा फर्जी है क्योंकि मिरर नाउ ने ना ही यह कहा कि मरने वाले सारे हिन्दू थे और ना ही यह कहा कि पूरे बांग्लादेश में मात्र हिन्दुओं पर हमला हो रहा है। अल जजीरा ने हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को कम करने के दिखाने की कोशिश भी की है।

अल जजीरा ने इस लेख में दावा किया कि जबसे हिंसा चालू हुई है, तब से मात्र दो हिन्दुओं की हत्या हुई है। हालाँकि, यह बात सर्वथा गलत है क्योंकि कई जगह हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है और बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गए हैं। यहाँ तक कि हिन्दुओं के पूरे-पूरे गाँव जलाए गए हैं। अल जजीरा यहीं नहीं रुकता है। अल जजीरा भारतीय मीडिया के इस बात को भी गलत बताता है कि BNP ने भी शेख हसीना सरकार को गिराया। अल जजीरा का दावा है कि यह सब कुछ छात्र प्रदर्शन के कारण हुआ।

जहाँ यह बात ठीक है कि यह आन्दोलन छात्रों के प्रदर्शन से प्रारम्भ हुआ था लेकिन कुछ ही दिनों के बाद इसमें BNP और जमात-ए-इस्लामी शामिल हो गए और हसीना सरकार के खिलाफ हिंसा की। हसीना सरकार के जवाब देने पर प्रदर्शन और भड़का और सरकार गिर गई। अल जजीरा बांग्लादेश में हिन्दू पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों को बचाने के लिए और आगे निकल गया। अल जजीरा ने यह भी दावा किया कि हिन्दुओं पर बांग्लादेश में हो रहे हमले धार्मिक कारणों से नहीं हो रहे।

अल जजीरा का दावा है कि यह हमले इसलिए हो रहे हैं क्योकि हिन्दू सत्ता से बाहर हो चुकी आवामी लीग के समर्थक के तौर पर देखे जाते थे। अल जजीरा ने यह भी कहानी गढ़ दी कि मुस्लिम बहुत बांग्लादेश में हिन्दू शेख हसीना की सत्ता के दौरान बाकियों को चिढ़ाते थे, इसलिए उनके साथ अत्याचार हो रहा है। अल जजीरा यहाँ भी नहीं रुका। उसने यह भी दावा कर दिया कि मुस्लिम बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों को बचा रहे हैं। हालाँकि, अल जजीरा यह नहीं बता पाया कि मुस्लिम मंदिरों को बचा किन से रहे हैं?

अल जजीरा ने हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की तुलना भारत में मुस्लिमों के खिलाफ होने वाली इक्का-दुक्का वारदातों से भी कर दी। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत में जो हमले मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा के तौर पर पेश किए जाते हैं, उनमें से कई झूठे निकलते हैं या फिर उनकी सच्चाई कुछ अलग होती है। लेकिन बांग्लादेश के मामले में ऐसा नहीं है, बांग्लादेश में हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा इसलिए हो रही है क्योंकि वह हिन्दू और इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें काफिर समझते हैं।

यह कोई नई बात नहीं है कि विदेशी और भारतीय वामपंथी मीडिया हिन्दुओं के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचारों पर पर्दा डाल रहा हो। इससे पहले बांग्लादेश मामले में ही न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी यही सिद्ध करने का प्रयास किया था कि हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा राजनीतिक है। भारतीय वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल स्क्रॉल ने सिरे से हिंसा को नकारने की बात की थी। यहाँ तक कि स्क्रॉल ने इस हिंसा को जायज तक ठहराया था।