Showing posts with label blames. Show all posts
Showing posts with label blames. Show all posts

नेहरू की इंटेलिजेंस की अनदेखी से लेकर इंदिरा गाँधी की CIA से जुड़ी दखलअंदाजी तक: निजी फायदे के लिए देश के हितों को बेचने का कांग्रेस का रहा है इतिहास

साभार-chatgpt
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को भारत-US ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। लेकिन उनका भाषण सिर्फ बगैर सबूत के आरोपों से भरा था। असल में ये पूरा ड्रामा था, जो हकीकत से कोसों दूर थी।

केंद्र पर ‘भारत माता को बेचने’ और ‘राष्ट्रीय हितों से समझौता करने’ के आरोप लगाते हुए उन्होंने तर्क देने के बजाय अपने गुस्से का इजहार किया। संसद में उनके भाषण में बड़े-बड़े दावों के साथ इमोशनल नारे भी थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि भारत के हितों की कैसे अनदेखी की मोदी सरकार ने?

राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार खुद मानती है कि दुनिया एक उथल-पुथल वाले दौर में जा रही है, जिसमें जियोपॉलिटिकल टकराव, एनर्जी और फाइनेंस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आगे दावा किया कि अगर अमेरिका कहता है कि भारत किसी खास देश से तेल नहीं खरीद सकता है और भारत ऐसा करता है, तो इसका मतलब है कि मोदी सरकार ने ‘भारत’ को बेच दिया है।

यह एक गंभीर आरोप है। बिना किसी डॉक्यूमेंट्री सबूत के, ट्रेड डील के दस्तावेजों में कहाँ ये बात लिखी हुई है, ये बताए बिना, कौन से खास क्लॉज से संप्रभुता खतरे में है, ये बताए बिना आरोप लगाना काफी खतरनाक है। उन्होंने सरकार पर ‘प्रेशर’ की बात की, ‘प्रधानमंत्री की आँखों में डर’ की बात की और यहाँ तक कि सीलबंद ‘एपस्टीन फाइल्स’ का भी जिक्र किया, जिसका भारत की ट्रेड डील से कोई कनेक्शन नहीं है। यह भाषण एक ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ से ज्यादा कुछ नहीं था।

उन्होंने आगे दावा किया कि टैरिफ करीब 3% से बढ़कर 18% हो गए हैं और भारत में US इंपोर्ट $46 बिलियन से बढ़कर $146 बिलियन हो सकता है। उन्होंने इसे ‘जबरदस्ती रियायत’ कहना बताया। लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन नारों में नहीं होती। टैरिफ लाइन, कोटा, मिनिमम इंपोर्ट प्राइस और सेफगार्ड क्लॉज मायने रखते हैं। पूरे डील पर बातचीत किए बगैर राहुल गाँधी की बातें आर्थिक नीति की आलोचना से ज्यादा डर पैदा करने वाले लगते हैं।

चीन में भारत के खुफिया तंत्र की मजबूती के खिलाफ थे नेहरू

इतिहासकार पॉल एम. मैकगार ने अपनी 2024 की किताब ‘स्पाइंग इन साउथ एशिया: ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स, एंड इंडियाज़ सीक्रेट कोल्ड वॉर’ में लिखा है, कांग्रेस के कई फैसलों ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया। मैकगार ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया में फैले मजबूत खुफिया ढाँचा बनाने का विरोध किया, खासकर चीन के मामले में। नेहरू का तर्क था कि चीन जैसे देश में इंटेलिजेंस क्षमताओं को बढ़ाना, भारत के बस की बात नहीं है। खुफिया तंत्र की कमजोरी का खामियाजा भारत को 1962 के युद्ध के वक्त उठानी पड़ी।

मसाजर की किताब का अंश

यह सिर्फ फैसले की नाकामी नहीं थी, बल्कि सरकार के नीति पर सवाल था।

इतिहासकार मैकगार ने इंदिरा गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कांग्रेस की नीति की बखिया उधेड़ डाली है। डैनियल पैट्रिक मोयनिहान की 1978 की किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ का ज़िक्र करते हुए, मैकगार ने लिखा है कि CIA ने कम से कम दो बार भारतीय राजनीति में दखल दिया, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी को पैसे दिए। मोयनिहान के मुताबिक, एक बार CIA के पैसे सीधे इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते दिए गए।

लाहौर और सियालकोट भारत के हो सकते थे, लेकिन कांग्रेस ने दे दिया

युद्ध के मैदान में मिली जीत को बातचीत की टेबल पर हार में बदलने में कांग्रेस माहिर रही है। जब भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पछाड़ दिया, तो कांग्रेस सरकार ने ताशकंद में समझौता के दौरान उन सभी क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस करने पर सहमत हो गई, जो भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए जीता था। इसमें लाहौर जैसे कई शहर और कश्मीर का हाजी पीर दर्रा शामिल थे। ये जमीन के सिर्फ सिंबॉलिक टुकड़े नहीं थे, बल्कि जांबाजों की खून और कुर्बानी से हासिल की गई जगहें थीं। भारतीय सैनिक लाहौर की आखिरी डिफेंसिव बैरियर, इछोगिल कैनाल तक पहुँच गए थे और कश्मीर में घुसपैठ के मुख्य रास्ते हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया था।
मिलिट्री और डिप्लोमैटिक तौर पर भारत मजबूत स्थिति में था। फिर भी इंटरनेशनल दबाव में और कॉन्ग्रेस की विदेश नीति के हिसाब से, भारत सरकार ने लाहौर और सियालकोट जैसे जगहों और कश्मीर का हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया। युद्ध में जीत के बाद भी भारत के हाथ नाकामी ही आई।
उस फैसले के नतीजे आज भी भारत को परेशान करते हैं। हाजी पीर पास वापस करके कांग्रेस सरकार ने कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों को भारत भेजने का एक रास्ता छोड़ दिया। आज भी इस रास्ते से आतंकवादी भारत में घुस कर पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलवामा हमला जैसे साजिश रचते हैं।
ताशकंद समझौते से हमेशा के लिए शांति नहीं मिली। इसने पाकिस्तान को हार के बावजूद कुछ खास नुकसान नहीं हुआ और साँस लेने की जगह दी। अयूब खान बिना कुछ खोए घर लौटे जबकि भारत जीत के बावजूद ‘खाली हाथ’ घर लौटा।
यह कोई नेतागिरी नहीं थी, यह खुद को नुकसान पहुँचाना था। जब राहुल गाँधी दूसरों पर ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाते हैं, तो वह एक ऐसी पार्टी की तरफ से बोल रहे होते हैं, जिसके अपने रिकॉर्ड शानदार रहे हों। ताशकंद में युद्ध के मैदान में मिली जीत को छोड़ देना और उससे पहले 1948 में कश्मीर का इंटरनेशनलाइजेशन करना शामिल है। ऐसे फैसलों ने पीढ़ियों तक भारत की ताकत को कमजोर किया।

बगैर मोल भाव किए 93,000 बंदी बनाए गए पाकिस्तानी फौजियों को वापस करना बड़ी गलती थी

भारत की सबसे बड़ी मिलिट्री जीत 1971 में देखने को मिली। उस वक्त भी कांग्रेस ने वही किया। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के समय भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बनाए, बल्कि 93,000 पाकिस्तानियों को युद्धबंदी भी बनाया। ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सरेंडर में से एक था। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। भारत के पास पाकिस्तानी फौज के जवान और अफसर थे, जिन्हें बगैर किसी मोलभाव के वापस भेज दिया गया।
भारत चाहता तो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अपने सभी झगड़ों का निपटारा कर सकता था। जम्मू कश्मीर के पीओके वाले हिस्से को वापस ले सकता था, जिस पर आज भी पाकिस्तान का कब्जा है, 54 भारतीय सैनिकों और एयरमेन की वापसी पक्की कर सकता था, जिन्हें पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और जिन्हें 1971 से ऑफिशियली “मिसिंग इन एक्शन” लिस्ट में रखा गया था।
लेकिन इंदिरा गाँधी सरकार ने शिमला समझौते के तहत सभी 93,000 पाकिस्तानी POWs को वापस भेजने की जल्दबाजी की, बिना उन 54 भारतीय सैनिकों की वापसी पक्की किए और न ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर कोई पक्का समझौता किया। दशकों बाद भी उन भारतीय सैनिकों की किस्मत का फैसला नहीं हुआ है।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।

कांग्रेस के वक्त हुई थी असली ‘वोट चोरी’

बाहरी पैसे का इस्तेमाल भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और चुनावी नतीजे सत्तारूढ़ कांग्रेस के पक्ष में झुकाने के लिए किया जा रहा था। लेकिन इस पर कांग्रेस ने देश से कभी माफी नहीं माँगी, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया।
राहुल गाँधी का दावा है कि भारत ‘बाहरी दबाव’ में फैसले ले रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कांग्रेस सरकारों के वक्त भारत की स्ट्रेटेजिक क्षमताएं कमजोर हुआ करती थीं। खुफिया तंत्र कमजोर था। अगर मैकगार और मोयनिहान की बात पर यकीन करें, तो सत्ताधारी पार्टी ने अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए विदेशी इंटेलिजेंस और फंडिंग का भी इस्तेमाल किया।
इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की ट्रेड बातचीत जाँच से बाहर होनी चाहिए। अमेरिका के साथ ट्रेड डील के हर शब्द, हर सेक्टर और हर क्षेत्र में फायदे की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लेकिन जाँच के लिए फैक्ट्स, दस्तावेजों और तर्कों की जरूरत होती है, न कि ‘आँखों में डर’ या इंटरनेशनल स्कैंडल्स को जबरदस्ती मुद्दा बनाने की।
राहुल गाँधी का भाषण लफ्फाजी और बगैर सबूत के आरोप लगाने के आदत को दिखाता है। देश की सुरक्षा को लेकर कांग्रेस के रिकॉर्ड खुद काफी खराब रहे हैं। ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाने से पहले, कांग्रेस को अपने अतीत में किए गए कार्यकलापों पर जवाब देना चाहिए।
राहुल गाँधी का आरोप कि मोदी सरकार ने अमेरिका से ट्रेड डील कर ‘भारत को बेच दिया।’ कॉन्ग्रेस का खुद का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का एक मजबूत इंटेलिजेंस सिस्टम बनाने से इनकार करना, 1966 में ताशकंद समझौता करना जिसमें भारत को युद्ध में मिली जीत पर पानी फेर देना। 1972 में कश्मीर या भारत के सैनिकों को रिहा करवाए बिना 93,000 पाकिस्तानी POWs को रिहा करना शामिल है। इतिहास बताता है कि युद्ध के मैदान में सेना जीतती है और बातचीत की टेबल पर कॉन्ग्रेस उसका फायदा नहीं उठा पाती और भारत का नुकसान करती रही है।

मोदी घृणा में चूर ‘इतिहासकार’ मुकुल केसवान ने ‘द गार्जियन’ में परोसा देश विरोधी प्रोपगेंडा: प्रधानमंत्री के बढ़ते कद से बेचैन


भारत के अंग्रेजी-भाषी उदारवादी एलिट वर्ग के बारे में एक अजीब सी बात है। जब भी पश्चिमी देश भारत के खिलाफ नाराजगी जताते हैं, ये लोग तुरंत विदेशी मीडिया की ओर दौड़ पड़ते हैं और ‘मैंने तो पहले ही कहा था’ वाला प्रवचन शुरू कर देते हैं। इसमें भी वे भारत को ही दोषी ठहराते हैं।

मुकुल केसवन भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में The Guardian में एक कॉलम लिखा। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव के लिए जिम्मेदार ठहराया।

कॉलम का हेडलाइन ही खुद में औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है- “Blindsided by Trump, Modi is learning hard lessons about India’s place in the new world order” दूसरे शब्दों में, “भारत बराबरी की बात सोचना बंद करो, अपनी जगह पहचानो और अमेरिका के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसे 50 के दशक में होता था। टैरिफ का सामना करो।”

The Guardian में प्रकाशित मुकुल केसवन द्वारा लिखा एक अपमानजनक लेख, जिसमें बताया गया कि अमेरिकी के खिलाफ खड़ा होना भारत की गलती थी

लेकिन शायद इस पूरे प्रकरण का सबसे खास पहलू ट्रंप का अहंकार या पश्चिमी देश के नेताओं की मौकापरस्ती है, जो चीन को बख्शते हुए भारत को निशाना बनाते हैं। यह भारत के अपने ही केसवन जैसे ‘ब्राउन सेपॉय’ की सोच है, जो उस अहंकार को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और उसे ‘बुद्धिमानी’ के रूप में दर्शाते हैं।

विदेशों की धौंस के खिलाफ अपने देश के साथ खड़े होने के बजाए, वे खुशी-खुशी उस धौंस का साथ देते हैं, अपने पाठकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि भारत ने अपने सम्मान की रक्षा करके और एक खुद की प्रशंसा करने वाले अहंकारी को संतुष्ट ना करके एक बड़ी भूल की है।

ट्रम्प के टैरिफ: नीति नहीं बल्कि धमकाने का हथियार

The Guardian में अपने लेख में मुकुल केसवन ने ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाए जाने को इस तरह से बताया है मानों यह ‘राजनीति’ का कोई अहम सबक हो, जिसे पीएम मोदी समझ नहीं पाए। वे इस तथ्य को आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं कि ये टैरिफ आर्थिक मामला नहीं बल्कि सजा के तौर पर लगाया गया था।

अप्रैल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जो कि अमेरिका के सहयोगियों की तुलना में काफी ज्यादा है। जब भारत ने झुकने से इनकार कर दिया तो टैरिफ दोगुना करके 50 प्रतिशत कर दिया गया। वजह क्या थी? यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद, रिफाइनिंग और पुनर्नियात।

रूस से तेल लेने वालों में अब तक चीन सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बावजूद चीन पर टैरिफ नहीं बढ़ाया गया। क्यों? क्योंकि अमेरिका अच्छे से जानता है कि उसकी इकोनॉमी चीन की सप्लाई चेन पर निर्भर है, इसीलिए बीजिंग से व्यापार-संघर्ष शुरू करने से खुद को बचाया। दूसरी ओर अमेरिका ने भारत को ऐसा देश समझा, जिसको आसानी से दबाया जा सकता है।

लेकिन अमेरिका का सारा जोड़-घटाव धरा रह गया। भारत अब भी अपने नागरिकों के लिए सस्ती ऊर्जा और एक स्थिर रिफाइनिंग उद्योग सुनिश्चित कर रहा है। वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के बजाए भारत के रिफाइनरियों ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति को स्थिर करने में मदद की। विडंबना यह है कि यूरोप इसका सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। पश्चिमी देश, जिन्होंने रूस के कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था, अंत में उन्हें भी भारत का रिफाइन्ड तेल खरीदना पड़ा।

चाहे कुछ भी हो, भारत ने यूरोप को उसके ऊर्जा संकट से बचाया तो है। फिर भी केसवन के अनुसार, भारत को सजा मिलनी चाहिए और मोदी को अपमान सहना चाहिए।

अंबानी और ‘ब्राह्मण’ पर हमला: भारत की जातिगत दरारों का फायदा उठाना

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ सिर्फ एक रणनीति का हिस्सा था। बाकी तो भारत के एलिट वर्ग के खिलाफ एक संगठित बदनामी करने वाला अभियान था। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने मुकेश अंबानी को निशाना बनाया। उसने कहा कि भारत का सबसे अमीर परिवार रूसी कच्चे तेल से मुनाफा कमा रहा है। इसका संकेत स्पष्ट था: अंबानी को आलोचनाओं के केन्द्र में लाओ, उन्हें खलनायक बनाओ और भारत में विभाजन की सोच बढ़ाओ।

डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत की जातिगत राजनीति का हवाला देते हुए ‘ब्राह्मणों’ पर भारत की जनता की कीमत पर मुनाफा कमाने का आरोप लगाया। सोचिए एक वरिष्ठ व्हाइट हाउस अधिकारी ने भारत की आंतरिक जातिगत दरारों को वैश्विक व्यापार वार्ताओं में आसानी से शामिल कर लिया।

इस अहंकार में एक और स्वर जोड़ते हुए अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने हाल ही में घोषणा की कि भारत एक या दो महीने में डोनाल्ड के आदेशों का विरोध करने के लिए ‘माफी माँगेगा।’ यह टिप्पणी वॉशिंगटन की विशेषाधिकार वाली मानसिकता को ही उजागर करती है। भारत से एक जागीरदार देश की तरह पेश आने की अपेक्षा करना। यह दिखाता है कि कैसे केसवन जैसे लोग इस दबाव को ‘राजनीति की हकीकत’ कहकर बढ़ावा देते हैं। वास्तव में मोदी सरकार ने संयम और परिपक्वता का प्रदर्शन किया। इस तरह की अहंकारपूर्ण बातों पर प्रतिक्रिया न देकर भारत ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया।

यह कूटनीति नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन था। यह भारत की सामाजिक दरारों को हथियार बनाकर मोदी सरकार पर व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव डालने की सोची-समझी साजिश थी। उम्मीद यह थी कि भारत के अंदर मोदी विरोधी इन हमलों को और बढ़ाएँगे, जिससे मोदी अलग-थलग पड़ जाएँगे।

मुकुल केसवन ने इस भूमिका को बखूबी निभाया। ट्रंप के सलाहकारों की नस्लवादी और जातिवादी बयानबाज़ी की आलोचना करने के बजाए उन्होंने The Guardian में एक लेख लिखा, जिसमें मोदी पर ‘हद से ज्यादा हस्तक्षेप’ और ‘गलत आकलन’ के आरोप लगाए। केसवन के लिए असली विवाद यह नहीं है कि अमेरिकी अधिकारियों ने भारत की जातिगत संरचना का मजाक उड़ाया, बल्कि यह है कि भारत ने झुकने से इनकार कर दिया।

पाकिस्तान के साथ झूठी तुलना: पुरानी अमेरिकी रणनीति

केसवन के तर्क का एक और पहलू है, जिसमें उन्होंने ट्रंप की बात को दोहराया है कि भारत और पाकिस्तान ‘झगड़ालू ‘दक्षिण एशियाई पड़ोसी” हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने तेजी और निर्णायक प्रतिक्रिया दी। ट्रंप और उनके उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसे ऐसे पेश करने की कोशिश की, जैसे उनके फोन कॉल ने युद्ध रुक गया। जब भारत ने सीजफायर के दावे का समर्थन करने से इनकार कर दिया, तो व्हाइट हाउस नाराज हो गया।
केसवन इसे मोदी की नाकामी बताते हैं। लेकिन अमेरिकी की दशकों से भारत- पाकिस्तान को एक तराजू में तौलने की रणनीति रही है। वॉशिंगटन भारत और पाकिस्तान को एक साथ रखना चाहता है, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को एक आतंकवाद-प्रायोजित देश के बराबर समझा जाए।
मोदी ने इस झूठी तुलना को सिरे से नकार दिया। भारत अपनी आतंकवाद-रोधी नीतियों को नोबेल पुरस्कार के लिए बेताब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों में कभी नहीं जाने देगा। फिर भी केसवन के लिए भारत का इस मामले में शामिल ना होना एक कूटनीतिक चूक है। उन्हें ट्रंप द्वारा भारत को अपमानित करने से कम मोदी द्वारा इस अपमान को चुपचाप स्वीकार करने का ज्यादा दुख है।

भारत दबाव में आए बिना रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखेगा

केसवन के लेख का मुख्य मुद्दा यह है कि मोदी के नेतृत्व में भारत गलत तरीके से अमेरिका के बहुत करीब आ गया है, जो कि गलत है। उनका मानना है कि भारत ने अमेरिका के साथ बहुत ज्यादा नजदीकी बढ़ाई है, यह सोचकर कि उसे पश्चिमी देशों का समर्थन मिल जाएगा। यह ऐतिहासिक रूप से गलत और विश्लेषणात्मक रूप से बेईमानी भरी बात है।
मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति काफी सुसंगत रही है। भारत ने अमेरिका के साथ संबंध मजबूत किए हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता की कीमत पर कभी नहीं। इसीलिए भारत रूसी तेल खरीदता है, फ्रांस के साथ रक्षा संबंध बढ़ाता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ Quad में शामिल होता है और पुतिन और शी जिनपिंग के साथ SCO शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा लेता है।

यह रणनीतिक स्वायत्तता है। यही वो सिद्धांत है, जिसने शीत युद्ध के समय भारत की गुटनिरपेक्षता को बढ़ाया और अब इसे 21वीं सदी की मल्टीपोलर दुनिया के हिसाब से बदल लिया गया है।

विडंबना यह है कि केसवन खुद कहते हैं, “आज गुटनिरपेक्षता रणनीतिक स्वायत्तता के तले झंडे फहरा रही है।” लेकिन फिर वे इसे आलोचना में बदल देते हैं, जैसे कि मोदी को इसके लिए माफी माँगनी चाहिए। जबकि नेहरू से लेकर वाजपेयी तक सभी भारतीय राजनेता यही चाहते थे- एक ऐसा भारत जो अपने साझेदार खुद चुने और किसी गुट के निर्देश पर ना चले।

विडंबना यह भी है कि ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिका ने “भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया है।” उन्होंने यह नहीं कहा कि उनकी धौंस, उनके टैरिफ, उनके जातिवादी ताने, भारतीय व्यापार पर उनके हमले ही थे, जिन्होंने भारत को बहुध्रुवीयता को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

केसवन का गुस्सा इस बात पर नहीं है कि मोदी ने अमेरिका को ‘खो दिया’ बल्कि इस बात पर है कि मोदी ने अमेरिका को खुश करने के लिए भारत की गरिमा को खोने से इनकार कर दिया।

मौन की गरिमा बनाम सेपॉय की कायरता

तमाम टैरिफ, अंबानी पर हमले, ब्राह्मणों पर कटाक्ष और धमकियों के बावजूद, भारत ने एक सम्मानजनक चुप्पी बनाए रखी है। हाल ही में जब ट्रंप ने शांति की पेशकश की, तो मोदी ने भी उन्हें अपना ‘अच्छा दोस्त’ बताया। यही तो कूटनीति है। कीचड़ में घसीटे जाने से इनकार करना, अल्पकालिक नफा-नुकसान से ऊपर लंब समय तक की रणनीतिक हितों को ध्यान में रखना।

मोदी के इस आकर्षक प्रहार को शायद केसवन कमजोरी समझेंगे। लेकिन जिसे वे कमजोरी कह रहे हैं, वह दरअसल परिपक्वता है। आत्मविश्वास से भरे भारत को X पर बयान देने की जरूरत नहीं है। भारत लंबे समय की रणनीति बना रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैचारिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और बौद्धिक छीछलेपन से भरे केसवन जैसे लोग इस बारीकी को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं।

केसवन का लेख उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है, क्योंकि वे प्रगतिशील विचारों के नाम पर औपनिवेशिक सोच वाले मंच The Guardian की ओर भागते हैं और भारत को अपनी जगह समझाने के बारे में व्याख्यान देते हैं।

‘ब्राउन सेपॉय’ की असलियत यही है, जब भारत का अपमान पश्चिम देश करते है तो चुप्पी लेकिन जब भारत झुकने से मना करता है तो गुस्सा।

ऐतिहासिक तुलना: नेहरू के समय से लेकर मोदी के नेतृत्व तक

इस विरोधाभास को समझने के लिए इतिहास पर नजर डालते हैं। 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया तब नेहरू ने अमेरिका से सैन्य मदद माँगी। लेकिन अमेरिका ने अपमानजनक शर्तें रखीं, भारत की समाजवादी नीतियों पर उपदेश दिए और बदले में कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही। नेहरू ने यह अपमान सह लिया क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।

1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान इंदिरा गाँधी को भी अमेरिकी अहंकार का सामना करना पड़ा। रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने उन्हें गालियाँ दीं, सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा और भारत को डराने की कोशिश की। लेकिन इंदिरा ने नेहरू की तरह हार नहीं मानी। भारत ने बांग्लादेश को आजाद कराया और दक्षिण एशिया का नक्शा बदल दिया।

अब साल 2025 में मोदी को भी ऐसी ही धमकी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस बार टैरिफ और तेल कूटनीति के जरिए। मोदी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। वह भारत के हितों को सबसे ऊपर रखते हैं। चाहे रूसी तेल खरीदना हो या दूसरा व्यापार समझौता करना।

यही सेपॉय, जिन्होंने एक समय पर नेहरू के अपमान को सराहा, वही अब मोदी की ललकार की आलोचना कर रहे हैं। ये भारत के उदारवादी एलिट वर्ग का उलटा रूप है। आत्मसमर्पण ‘परिष्कार’ है लेकिन संप्रभुता ‘अहंकार’ है।

असली ‘कठिन सबक’

The Guardian की हेडलाइन व्यंग्यात्मक लहजे में कहती है कि “मोदी दुनिया में भारत की स्थिति को लेकर कठिन सबक सीख रहे हैं।” लेकिन सच्चाई इसके उलट है। असली कठिन सबक वॉशिंगटन में सीखा जा रहा है कि भारत अब आसानी से पराजित नहीं हो सकता।

ट्रंप को यह बात समझ आ रही है कि भारत और पाकिस्तान को एक साथ जोड़ना एक बड़ी भूल थी। मोदी, असीम मुनीर जैसे व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ व्हाइट हाउस में शानदार भोजन के लिए आमंत्रित करने से आसानी से प्रभावित किया जा सके।

भारत को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि वह किसके साथ व्यापार करेगा। भारत सस्ता तेल खरीदने के लिए माफी नहीं माँगेगा। भारत कभी भी पाकिस्तान के साथ एक ही श्रेणी में रखा जाना स्वीकार नहीं करेगा। भारत सिर्फ इसलिए कोई खराब व्यापार समझौता नहीं करेगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं।

अगर इससे ट्रंप को निराश होते हैं, तो ठीक है। अगर इससे मुकुल केसवन को औपनिवेशिक हैंगओवर से घुटन होती है, तो और भी अच्छा है।

क्योंकि ये 2025 का भारत है। गौरवान्वित, दृढ़निश्चयी और सभ्यतागत रूप से आत्मविश्वासी। यह जानता है कि पश्चिम की ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ हमेशा पश्चिमी प्रभुत्व का दूसरा नाम रही है। और यह भी जानता है कि बहुध्रुवीय विश्व अब स्थायी हो गया है।

सेपॉय और पश्चिम के लिए सीख: झुकने को कहने पर भी भारत नहीं झुकेगा

मुकुल केसवन और उनके जैसे लोग भारत के झुकने से इनकार को राष्ट्रवादी अपमान नहीं बल्कि असफलता मानते हैं। वे सफलता का आकलन इस बात से नहीं करते कि भारत अपने लोगों के लिए क्या हासिल करता है बल्कि इस बात से करते हैं कि पश्चिमी देशों को भारत कितना स्वीकार्य है।

प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक चाहे कुछ भी कहें, वे सफलता को अलग तरह से मापते हैं। उनके लिए भारत की गरिमा सर्वोपरि है। और यही कारण है कि सेपॉय वर्ग उनसे घृणा करता है: क्योंकि वे उस दुनिया में उनकी अप्रासंगिकता को उजागर करते हैं, जहाँ भारत को अब उनके औपनिवेशिक समर्थन की जरूरत नहीं है।

साफ तौर पर समझते हैं: मोदी ‘अंधे’ नहीं हैं। भारत ‘अपनी जगह’ नहीं सीख रहा है। असल में ट्रंप और उनके सेपॉय सीखना चाहिए कि नए विश्व में भारत झुकने को तैयार नहीं है। यह सबको याद दिलाता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत अब डरपोक नहीं है बल्कि एक आत्मविश्वासी शक्ति है, जो दबाव के सामने खड़ी रहती है और अपने हितों की रक्षा करती है।