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नेहरू की इंटेलिजेंस की अनदेखी से लेकर इंदिरा गाँधी की CIA से जुड़ी दखलअंदाजी तक: निजी फायदे के लिए देश के हितों को बेचने का कांग्रेस का रहा है इतिहास

साभार-chatgpt
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को भारत-US ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया। लेकिन उनका भाषण सिर्फ बगैर सबूत के आरोपों से भरा था। असल में ये पूरा ड्रामा था, जो हकीकत से कोसों दूर थी।

केंद्र पर ‘भारत माता को बेचने’ और ‘राष्ट्रीय हितों से समझौता करने’ के आरोप लगाते हुए उन्होंने तर्क देने के बजाय अपने गुस्से का इजहार किया। संसद में उनके भाषण में बड़े-बड़े दावों के साथ इमोशनल नारे भी थे, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं था कि भारत के हितों की कैसे अनदेखी की मोदी सरकार ने?

राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार खुद मानती है कि दुनिया एक उथल-पुथल वाले दौर में जा रही है, जिसमें जियोपॉलिटिकल टकराव, एनर्जी और फाइनेंस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने आगे दावा किया कि अगर अमेरिका कहता है कि भारत किसी खास देश से तेल नहीं खरीद सकता है और भारत ऐसा करता है, तो इसका मतलब है कि मोदी सरकार ने ‘भारत’ को बेच दिया है।

यह एक गंभीर आरोप है। बिना किसी डॉक्यूमेंट्री सबूत के, ट्रेड डील के दस्तावेजों में कहाँ ये बात लिखी हुई है, ये बताए बिना, कौन से खास क्लॉज से संप्रभुता खतरे में है, ये बताए बिना आरोप लगाना काफी खतरनाक है। उन्होंने सरकार पर ‘प्रेशर’ की बात की, ‘प्रधानमंत्री की आँखों में डर’ की बात की और यहाँ तक कि सीलबंद ‘एपस्टीन फाइल्स’ का भी जिक्र किया, जिसका भारत की ट्रेड डील से कोई कनेक्शन नहीं है। यह भाषण एक ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ से ज्यादा कुछ नहीं था।

उन्होंने आगे दावा किया कि टैरिफ करीब 3% से बढ़कर 18% हो गए हैं और भारत में US इंपोर्ट $46 बिलियन से बढ़कर $146 बिलियन हो सकता है। उन्होंने इसे ‘जबरदस्ती रियायत’ कहना बताया। लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन नारों में नहीं होती। टैरिफ लाइन, कोटा, मिनिमम इंपोर्ट प्राइस और सेफगार्ड क्लॉज मायने रखते हैं। पूरे डील पर बातचीत किए बगैर राहुल गाँधी की बातें आर्थिक नीति की आलोचना से ज्यादा डर पैदा करने वाले लगते हैं।

चीन में भारत के खुफिया तंत्र की मजबूती के खिलाफ थे नेहरू

इतिहासकार पॉल एम. मैकगार ने अपनी 2024 की किताब ‘स्पाइंग इन साउथ एशिया: ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स, एंड इंडियाज़ सीक्रेट कोल्ड वॉर’ में लिखा है, कांग्रेस के कई फैसलों ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया। मैकगार ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया में फैले मजबूत खुफिया ढाँचा बनाने का विरोध किया, खासकर चीन के मामले में। नेहरू का तर्क था कि चीन जैसे देश में इंटेलिजेंस क्षमताओं को बढ़ाना, भारत के बस की बात नहीं है। खुफिया तंत्र की कमजोरी का खामियाजा भारत को 1962 के युद्ध के वक्त उठानी पड़ी।

मसाजर की किताब का अंश

यह सिर्फ फैसले की नाकामी नहीं थी, बल्कि सरकार के नीति पर सवाल था।

इतिहासकार मैकगार ने इंदिरा गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कांग्रेस की नीति की बखिया उधेड़ डाली है। डैनियल पैट्रिक मोयनिहान की 1978 की किताब ‘ए डेंजरस प्लेस’ का ज़िक्र करते हुए, मैकगार ने लिखा है कि CIA ने कम से कम दो बार भारतीय राजनीति में दखल दिया, केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी को पैसे दिए। मोयनिहान के मुताबिक, एक बार CIA के पैसे सीधे इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते दिए गए।

लाहौर और सियालकोट भारत के हो सकते थे, लेकिन कांग्रेस ने दे दिया

युद्ध के मैदान में मिली जीत को बातचीत की टेबल पर हार में बदलने में कांग्रेस माहिर रही है। जब भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पछाड़ दिया, तो कांग्रेस सरकार ने ताशकंद में समझौता के दौरान उन सभी क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस करने पर सहमत हो गई, जो भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए जीता था। इसमें लाहौर जैसे कई शहर और कश्मीर का हाजी पीर दर्रा शामिल थे। ये जमीन के सिर्फ सिंबॉलिक टुकड़े नहीं थे, बल्कि जांबाजों की खून और कुर्बानी से हासिल की गई जगहें थीं। भारतीय सैनिक लाहौर की आखिरी डिफेंसिव बैरियर, इछोगिल कैनाल तक पहुँच गए थे और कश्मीर में घुसपैठ के मुख्य रास्ते हाजी पीर पर कब्ज़ा कर लिया था।
मिलिट्री और डिप्लोमैटिक तौर पर भारत मजबूत स्थिति में था। फिर भी इंटरनेशनल दबाव में और कॉन्ग्रेस की विदेश नीति के हिसाब से, भारत सरकार ने लाहौर और सियालकोट जैसे जगहों और कश्मीर का हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया। युद्ध में जीत के बाद भी भारत के हाथ नाकामी ही आई।
उस फैसले के नतीजे आज भी भारत को परेशान करते हैं। हाजी पीर पास वापस करके कांग्रेस सरकार ने कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों को भारत भेजने का एक रास्ता छोड़ दिया। आज भी इस रास्ते से आतंकवादी भारत में घुस कर पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलवामा हमला जैसे साजिश रचते हैं।
ताशकंद समझौते से हमेशा के लिए शांति नहीं मिली। इसने पाकिस्तान को हार के बावजूद कुछ खास नुकसान नहीं हुआ और साँस लेने की जगह दी। अयूब खान बिना कुछ खोए घर लौटे जबकि भारत जीत के बावजूद ‘खाली हाथ’ घर लौटा।
यह कोई नेतागिरी नहीं थी, यह खुद को नुकसान पहुँचाना था। जब राहुल गाँधी दूसरों पर ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाते हैं, तो वह एक ऐसी पार्टी की तरफ से बोल रहे होते हैं, जिसके अपने रिकॉर्ड शानदार रहे हों। ताशकंद में युद्ध के मैदान में मिली जीत को छोड़ देना और उससे पहले 1948 में कश्मीर का इंटरनेशनलाइजेशन करना शामिल है। ऐसे फैसलों ने पीढ़ियों तक भारत की ताकत को कमजोर किया।

बगैर मोल भाव किए 93,000 बंदी बनाए गए पाकिस्तानी फौजियों को वापस करना बड़ी गलती थी

भारत की सबसे बड़ी मिलिट्री जीत 1971 में देखने को मिली। उस वक्त भी कांग्रेस ने वही किया। बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के समय भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश बनाए, बल्कि 93,000 पाकिस्तानियों को युद्धबंदी भी बनाया। ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सरेंडर में से एक था। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। भारत के पास पाकिस्तानी फौज के जवान और अफसर थे, जिन्हें बगैर किसी मोलभाव के वापस भेज दिया गया।
भारत चाहता तो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अपने सभी झगड़ों का निपटारा कर सकता था। जम्मू कश्मीर के पीओके वाले हिस्से को वापस ले सकता था, जिस पर आज भी पाकिस्तान का कब्जा है, 54 भारतीय सैनिकों और एयरमेन की वापसी पक्की कर सकता था, जिन्हें पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और जिन्हें 1971 से ऑफिशियली “मिसिंग इन एक्शन” लिस्ट में रखा गया था।
लेकिन इंदिरा गाँधी सरकार ने शिमला समझौते के तहत सभी 93,000 पाकिस्तानी POWs को वापस भेजने की जल्दबाजी की, बिना उन 54 भारतीय सैनिकों की वापसी पक्की किए और न ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर कोई पक्का समझौता किया। दशकों बाद भी उन भारतीय सैनिकों की किस्मत का फैसला नहीं हुआ है।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।
इंटरनेशनल और पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट्स, चश्मदीदों के बयान, भुट्टो: ट्रायल एंड एक्ज़ीक्यूशन जैसी किताबों में रेफरेंस, और पुराने कैदियों के बयानों से कई बार साफ हुआ कि कुछ भारतीय POWs लाहौर में कोट लखपत जैसी पाकिस्तानी जेलों में बंद थे। बेनज़ीर भुट्टो ने भी 1989 में माना था कि भारतीय युद्धबंदी पाकिस्तान की कस्टडी में थे। लेकिन परवेज मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया।

कांग्रेस के वक्त हुई थी असली ‘वोट चोरी’

बाहरी पैसे का इस्तेमाल भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और चुनावी नतीजे सत्तारूढ़ कांग्रेस के पक्ष में झुकाने के लिए किया जा रहा था। लेकिन इस पर कांग्रेस ने देश से कभी माफी नहीं माँगी, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया।
राहुल गाँधी का दावा है कि भारत ‘बाहरी दबाव’ में फैसले ले रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कांग्रेस सरकारों के वक्त भारत की स्ट्रेटेजिक क्षमताएं कमजोर हुआ करती थीं। खुफिया तंत्र कमजोर था। अगर मैकगार और मोयनिहान की बात पर यकीन करें, तो सत्ताधारी पार्टी ने अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए विदेशी इंटेलिजेंस और फंडिंग का भी इस्तेमाल किया।
इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की ट्रेड बातचीत जाँच से बाहर होनी चाहिए। अमेरिका के साथ ट्रेड डील के हर शब्द, हर सेक्टर और हर क्षेत्र में फायदे की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लेकिन जाँच के लिए फैक्ट्स, दस्तावेजों और तर्कों की जरूरत होती है, न कि ‘आँखों में डर’ या इंटरनेशनल स्कैंडल्स को जबरदस्ती मुद्दा बनाने की।
राहुल गाँधी का भाषण लफ्फाजी और बगैर सबूत के आरोप लगाने के आदत को दिखाता है। देश की सुरक्षा को लेकर कांग्रेस के रिकॉर्ड खुद काफी खराब रहे हैं। ‘भारत को बेचने’ का आरोप लगाने से पहले, कांग्रेस को अपने अतीत में किए गए कार्यकलापों पर जवाब देना चाहिए।
राहुल गाँधी का आरोप कि मोदी सरकार ने अमेरिका से ट्रेड डील कर ‘भारत को बेच दिया।’ कॉन्ग्रेस का खुद का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का एक मजबूत इंटेलिजेंस सिस्टम बनाने से इनकार करना, 1966 में ताशकंद समझौता करना जिसमें भारत को युद्ध में मिली जीत पर पानी फेर देना। 1972 में कश्मीर या भारत के सैनिकों को रिहा करवाए बिना 93,000 पाकिस्तानी POWs को रिहा करना शामिल है। इतिहास बताता है कि युद्ध के मैदान में सेना जीतती है और बातचीत की टेबल पर कॉन्ग्रेस उसका फायदा नहीं उठा पाती और भारत का नुकसान करती रही है।

असम : पूर्वोतर की जिस तलवार से टकराने के बाद जान बचाकर भागा खिलजी, कामरूप के हिंदू शासक राजा पृथु के नाम होगा गुवाहाटी का सबसे लंबा फ्लाईओवर

                   असम के राजा पृथु के नाम पर गुवाहाटी में बनेगा सबसे लंबा फ्लाईओवर:(साभार: AI)
भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के आगे माथा टेक कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियों ने अपने ही देश के गौरवशाली इतिहास को दरकिनार कर आक्रांताओं को महान बताकर गुमराह कर हिन्दू और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करने का दुस्साहस किया। अब कालचक्र ऐसा घूम रहा है कि देश का गौरवशाली इतिहास सामने आना शुरू हो गया है। जिससे मुस्लिम कट्टरपंथियों के माथा टेकने वाले बौखला रहे हैं।  

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक बड़ी घोषणा की है। इसके तहत गुवाहाटी में बन रहा सबसे लंबा फ्लाईओवर (दीघलीपुखुरी से नूनमाटी तक) अब महाराजा पृथु के नाम पर रखा जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह फैसला असम की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों को हमारे वीरतापूर्ण इतिहास से प्रेरित करने के उद्देश्य से लिया गया है।

मुस्लिम आक्रांता मोहम्मद बिन खिलजी को हराने वाले महाराजा पृथु

महाराजा पृथु को राजा पृथु या विश्वसुंदर देव के नाम से भी जाना जाता है। वे 12वीं और 13वीं सदी में प्राचीन कामरूप (वर्तमान असम) के शासक थे। राजा पृथु ने 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के सिपहसालार मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी को हराया था।

बख्तियार खिलजी वही आक्रांता था, जिसने नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा के बड़े केंद्रों को नष्ट कर दिया था और 10,000 से ज्यादा बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की थी। बिना किसी खास प्रतिरोध के पूर्व की ओर बढ़ने के बाद, जब खिलजी की फौज ने कामरूप में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो उसे भयंकर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

मिनहाज सिराज-अल-दीन द्वारा लिखित फ़ारसी इतिहास ‘तबाकत-ए-नासिरी’ सहित ऐतिहासिक स्रोतों और कनाई बसासी और कन्हाई बोरोक्सी बुआ जिल जैसे स्थलों के शिलालेखों में उल्लेख है कि आक्रमणकारी फौज का पूरी तरह से सफाया कर दिया गया था और असम की संप्रभुता सुरक्षित रही। कई फौजी पीछे हटने से पहले ही दुर्गम इलाकों में मारे गए थे।

उसने बिना किसी युद्ध के बंगाल पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद उसने 1206 ईस्वी में तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बनाई, ताकि बौद्ध मठों के खजाने को लूट सके। वह दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कामरूप और सिक्किम से होकर जाने वाले पारंपरिक व्यापार मार्ग पर भी कब्जा करना चाहता था।

खिलजी ने राजा पृथु और उनकी सेना की वीरता के बारे में सुना था और जानता था कि उनके राज्य से होकर गुजरना असंभव होगा। अतः उसने कामरूप के विरुद्ध लड़ने के बजाय, तिब्बत पर आक्रमण करने के लिए राजा पृथु के पास हाथ मिलाने का पैगाम भेजा।

कामरूप राजा ने खिलजी के साथ सहमति जताते हुए कहा कि वह भी रेशम मार्ग पर नियंत्रण के लिए दक्षिणी तिब्बत पर भी आक्रमण करना चाहते हैं। इसके बाद खिलजी और राजा पृथु संयुक्त आक्रमण के लिए सहमत हो गए, लेकिन राजा पृथु ने सलाह दी कि मॉनसून के मौसम में पहाड़ों से होकर जाना खतरनाक होगा, इसलिए कुछ समय इंतजार करना चाहिए।

जब तक खिलजी के आदमी राजा पृथु का संदेश लेकर लौटे, तब तक वह काफी आगे बढ़ चुका था और वर्तमान सिलीगुड़ी के पास डेरा डाले हुए था। खिलजी ने उनकी सलाह को नजरअंदाज कर दिया और एक स्थानीय गाइड ‘मेच’ के जरिए भूटान के रास्ते से तिब्बत जाने की कोशिश की। यात्रा शुरू होने से पहले खिलजी ने मेच का धर्मांतरण करा दिया था।

रास्ते में तिब्बती गुरिल्ला सेनाओं ने उसकी फौज पर हमला कर दिया। भारी बारिश और बीमारियों के चलते उसकी फौज कमजोर हो गई। कई फौजी बीमारी से मर गए। हालात इतने खराब थे कि बख्तियार खिलजी की फौज ने घोड़ों को खाने के लिए मार डाला। उसी रास्ते से वापस लौटने में असमर्थ, खिलजी ने कामरूप के रास्ते लौटने का फैसला किया।

राजा पृथु की युद्धनीति

राजा पृथु को इस घटनाक्रम की जानकारी थी क्योंकि उनके जासूस नियमित रूप से जानकारी दे रहे थे। वह अपनी सलाह की अनदेखी करने के लिए खिलजी से पहले से ही क्रोधित थे और उन्हें अंदेशा था कि आक्रमणकारी उनके राज्य को लूटकर अपनी आपूर्ति बढ़ाएँगे। 

जब खिलजी लौटने के लिए कामरूप की ओर बढ़ा, तो राजा पृथु ने पहले ही सारी तैयारी कर रखी थी। उन्होंने स्कॉर्च्ड अर्थ रणनीति अपनाई और यानी रास्ते में सभी संसाधनों को नष्ट कर दिया, ताकि दुश्मन को कोई मदद न मिल सके। पुलों को तोड़ दिया गया और राशन समेत रास्तों को जला दिया गया।

युद्ध में लगभग 12,000 घुड़सवार और 20,000 पैदल पौजी मारे गए। खिलजी किसी तरह जान बचाकर कुछ सौ फौजियों के साथ भाग निकला। इसके बाद खिलजी ने नए क्षेत्रों पर विजय पाने का उत्साह खो दिया और फिर कभी किसी युद्ध में नहीं गया। अंत में खिलजी अपने ही एक सिपहसालार अली मर्दान खिलजी के हाथों मारा गया।

राजा पृथु ने असम की भूमि को बाहरी आक्रमणों से बचाया। हालाँकि 1228 में दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश के बेटे नासिरुद्दीन महमूद से युद्ध में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हार स्वीकारने के बजाय उन्होंने अपने किले के एक जलकुंड में कूदकर स्वाभिमानपूर्वक जीवन त्याग दिया।

आज भी 27 मार्च को असम में ‘महाविजय दिवस’ मनाया जाता है। यह वही दिन है जब पृथु ने बख्तियार खिलजी की फौज को हराया था। महाविजय दिवस मध्यकालीन भारत के सबसे आक्रामक सैन्य अभियानों में से एक के विरुद्ध राज्य के प्रतिरोध और उत्तरजीविता का स्मरणोत्सव है।

सीएम ने कहा- राजा पृथु ने असम को दिल्ली सल्तनत का हिस्सा होने से बचाया

मुख्यमंत्री शर्मा ने कहा कि राजा पृथु का योगदान बहुत कम जाना जाता है, जबकि उन्होंने असम को दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बनने से बचाया। उन्होंने कहा कि जैसे अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बरफुकन को मुगलों के खिलाफ जीत के लिए जाना जाता है, वैसे ही पृथु को भी उनके साहस और रणनीति के लिए याद किया जाना चाहिए।
नए फ्लाईओवर का नाम महाराजा पृथु के नाम पर रखने से पहले हेमंत बिस्वा शर्मा सरकार द्वारा गुवाहाटी में एक नए फ्लाईओवर का नाम महाभारत कालीन राजा भगदत्त के नाम पर रखने का निर्णय लिया गया था। भगदत्त असुर राजा नरकासुर के पुत्र थे और कुरुक्षेत्र महायुद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था। उन्होंने हाथियों के एक बड़े दल सहित एक अक्षौहिणी सेना का योगदान दिया था।
अब दिघलीपुखुरी–नूनमाटी फ्लाईओवर को महाराजा पृथु फ्लाईओवर नाम देकर सरकार उनके अदम्य साहस को सम्मान दे रही है, साथ ही नई पीढ़ी को उनके बारे में जागरूक करने का प्रयास कर रही है।

एक हाथ में त्रिशूल, एक में खप्पर और प्रसाद में मदिरा… 6 हजार साल पुराना है काल भैरव मंदिर का इतिहास, जहाँ होती है शिव के रौद्र रूप की पूजा

 काल भैरव की मूर्ति (बाएँ), मंदिर का प्रवेश द्वार (दाएँ) (साभार : Instagram -kaal_bhairav_temple_ujjain)
मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में एक ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान को शराब चढ़ाई जाती है। फिर उसी मदिरा को भक्तों को प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है। ये सच्चाई है काल भैरव मंदिर की। जो उज्जैन का न सिर्फ धार्मिक बल्कि रहस्यमयी चमत्कार भी है। काल भैरव को शिव के रौद्र रूप के तौर पर पूजा जाता है। यहाँ हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु शराब की बोतल लेकर आते हैं और काल भैरव को अर्पित करते हैं।

माना जाता है कि पिलाते वक्त शराब मूर्ति के मुँह से गायब हो जाती है। कोई नली, कोई ट्रिक, यहाँ तक की अब तक कोई वैज्ञानिक भी इसका ठोस जवाब नहीं दे सका है। ये मंदिर सिर्फ आस्था का नहीं बल्कि जिज्ञासा का भी केंद्र है। यहाँ साधारण भक्तों से लेकर तांत्रिक तक सभी बाबा काल भैरव के दर्शन के लिए पहुँचते हैं।

                           काल भैरव की मूर्ति को शराब का प्रसाद चढ़ाते महंत ( साभार : TripAdvisor)

मंदिर का इतिहास

 काल भैरव मंदिर का इतिहास लगभग छह हजार वर्ष पुराना है। मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण और कालिका पुराण जैसे ग्रंथों में भी मिलता है। काल भैरव की पूजा कपालिका और अघोरा संप्रदाय का हिस्सा रही है। इतिहासकार की मानें तो मंदिर का निर्माण शिप्रा नदी के ऊपर राजा भद्रसेन ने करवाया था।

                                     काल भैरव मंदिर के भीतर का दृश्य (साभार : MP Tourism)

हालाँकि वर्तमान मंदिर 18वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ था। यह मंदिर मराठा काल में बनवाया गया था। सन् 1788 में मराठा शासक महादजी शिंदे ने इस मंदिर को फिर से बनवाया और सजाया। उज्जैन प्राचीन अवंतिका नगरी रही है और यहाँ शैव परंपरा का गहरा असर है।

मंदिर की संरचना

मंदिर की बनावट बहुत ही साधारण पर प्रभावशाली है। मालवा शैली के अद्भुत चित्र मंदिर की दीवारों को सजाते हैं। मुख्य द्वार पर दो विशाल सिंहों की मूर्तियाँ हैं जो मंदिर की रक्षा का प्रतीक मानी जाती हैं। अंदर प्रवेश करते ही मुख्य गर्भगृह है। जहाँ काले पत्थर से बनी काल भैरव की मूर्ति विराजमान है। इस मूर्ति की खास बात है इसका मुंँह, जिसके जरिए शराब ‘पी’ जाती है।
                                काल भैरव मंदिर का बाहरी दृश्य ( साभार : MP Tourism)
मूर्ति के दाएँ हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में खप्पर (खोपड़ी का पात्र) है। मंदिर में दीवारों पर भैरव से जुड़े चित्र और तांत्रिक प्रतीक भी देखे जा सकते हैं। आसपास छोटे-छोटे मंदिर भी हैं जो अन्य भैरव रूपों को समर्पित हैं। मंदिर में एक अलग जगह पर शराब अर्पण की व्यवस्था की गई है। श्रद्धालु अपनी बोतल वहीं पुजारी को देते हैं और वो मूर्ति के मुँह से चढ़ाते हैं।
                                          काल भैरव की मूर्ति ( साभार : timeofindia)

मंदिर तक कैसे पहुँचे?

काल भैरव मंदिर उज्जैन शहर से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित है। उज्जैन रेलवे स्टेशन से ऑटो, टैक्सी या लोकल बस के ज़रिए आसानी से पहुँचा जा सकता है। हवाई यात्रा कर आने वाले भक्तों के लिए नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर है। जो मंदिर से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। वहाँ से टैक्सी या बस से उज्जैन पहुँचना बहुत आसान है। शहर में होटल और धर्मशालाओं की भी अच्छी सुविधा है।

रानियों के काट डाले शीश, शिवलिंग पर निशान, कुएँ से निकले नरमुंड… जब राम जन्मभूमि को बचाने के लिए बाबर के बाद औरंगज़ेब से भिड़ा था भीटी राजपरिवार

                  ज्ञानवापी की तरह भीटी झारखंडी मंदिर में भी औरंगजेब ने काटा था शिवलिंग तोड़ी थीं मूर्तियाँ
अयोध्या में सोमवार (22 जनवरी, 2024) को रामलला अपने भव्य मंदिर में स्थापित किए जा चुके हैं। इस अवसर पर जहाँ देश और दुनिया भर के हिन्दू दीवाली जैसा पर्व मना रहे हैं तो वहीं उन बलिदानियों को भी याद किया जा रहा है जिन्होंने 500 साल चले संघर्ष में राम के नाम पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन बलिदानियों में सबसे पहला नाम भीटी के तत्कालीन राजा महताब सिंह का लिया जाता है। 1526-27 में उन्होंने मंदिर तोड़ने आए मीर बाकी के कई फौजियों को मार कर वीरगति पाई थी।

हालाँकि, इस रामभक्ति का गुस्सा मुगल बादशाहों ने उनकी प्रजा और भीटी के मंदिरों पर उतारा था। मुगल क्रूरता के चिह्न आज भी अम्बेडकरनगर जिले के भीटी तहसील क्षेत्र में जा कर देखे जा सकते हैं।

अपना पूरा जीवन क्रूर और मतांध मुगल बादशाहों के गुणगान में बिताने वाले वामपंथी इतिहासकारों में सम्भवतः अधिकतर भीटी गए भी नहीं होंगे। यहाँ न सिर्फ मंदिरों में घुस कर मूर्तियाँ तोड़ी गईं बल्कि महिलाओं व राजमहल के सेवकों का भी नरसंहार हुआ था। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि बाबर की मौत के सैकड़ों साल बाद औरंगज़ेब ने भीटी को रामभक्तों का गढ़ मान कर हमला किया था। ऑपइंडिया की टीम ने उन इलाकों का दौरा कर के तमाम साक्ष्यों को संकलित किया।

औरंगज़ेब को याद थे अपने पुरखों के दुश्मन

ऑपइंडिया ने सबसे पहले राजा महताब सिंह के महल का दौरा किया। महल में कई स्थानों पर टूट-फूट दिखी। महल के बाहर खड़े कुछ बुजुर्गों ने बताया कि वो मूलतः भीटी के रहने वाले हैं। उन्होंने हमें बताया कि महल के कई हिस्सों में हुई तोड़फोड़ मुगलों के समय की है। राजा महताब सिंह ने बाबर के कई फौजियों को रामजन्मभूमि की रक्षा करते हुए मार गिराया था। जन्मभूमि के लिए 1527 में हुए संघर्ष के लगभग 130 साल बाद बाबर का वंशज औरंगज़ेब गद्दी पर बैठा। उसने मंदिरों को ध्वस्त करना शुरू किया जिसमें पवित्र काशी विश्वनाथ भी शामिल था।
                             राजकुमार जयदत्त के महल में आज भी मौजूद हैं हमले के निशान
आसपास खड़े बुजुर्गों ने हमें बताया कि उसने उन हिन्दू राजाओं की भी लिस्ट बनाई थी जो उसके पूर्वजों से किसी भी समय काल में लड़े थे। इन नामों में भीटी नरेश महताब सिंह का नाम उसकी हिस्टलिस्ट में टॉप पर था। साल 1669 में जब औरंगज़ेब की फौजें काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने निकलीं थी तब रास्ते के बनाए नक़्शे में उसने भीटी को भी शामिल किया था। दिल्ली से निकली फौजों ने रास्ते में पड़ने वाले तमाम गाँव लूटे, हिन्दू महिलाओं से बलात्कार किए और मंदिरों को ध्वस्त किया।
                                                     झारखंडी महादेव मंदिर भीटी

शिवलिंग पर अभी भी मौजूद हैं चले आरे के निशान

स्थानीय निवासियों ने हमें भीटी महल से लगभग 2 किलोमीटर दूर उमराँवा रोड स्थित झारखंडी महादेव मंदिर के बारे में बताया। हम महादेव मंदिर पहुँचे तो वहाँ कुछ श्रद्धालु और मंदिर के पुजारी मौजूद मिले। मंदिर के पुजारी मुन्ना मिश्रा ने हमें बताया कि लगभग 250 साल पहले वह मंदिर औरंगज़ेब की क्रूरता का शिकार हो चुका है। हमें गर्भगृह ले जाया गया। गर्भगृह में एक अति प्राचीन शिवलिंग है जिसकी उम्र 1000 वर्ष से अधिक बताई जा रही है। शिवलिंग पर कई खरोंच के साथ तमाम जगहों पर काटे जाने के निशान मौजूद हैं। आज भी यह मंदिर स्थानीय हिन्दुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। महाशिवरात्रि को यहाँ बड़ा मेला लगता है।
                                              इसी शिवलिंग को तोड़ने पहुँचा था औरंगज़ेब
मंदिर के पुजारी ने हमें आगे बताया कि तमाम कोशिशों के बावजूद भी मुगल फ़ौज शिवलिंग को काट नहीं पाई थी। इस से नाराज हो कर औरंगज़ेब के फरमान पर उसके फौजियों ने पूरे मंदिर को अपवित्र किया, दीवारों को गिराया और मूर्तियों को तोड़ डाला। बकौल पुजारी, महज कुछ वर्षों पहले तक औरंगज़ेब के हमले में तोड़ी गई मूर्तियाँ क्षत-विक्षत हालात में मंदिर के एक कोने में पड़ी थीं। पशु-पक्षियों द्वारा उन मूर्तियों पर गंदगी फैलाने से दुखी कुछ ग्रामीणों ने उसका विसर्जन अयोध्या ले जा कर सरयू नदी में कर दिया। इनमें लक्ष्मी, पार्वती और भगवान गणेश की मूर्तियाँ शामिल थीं।
                                                              आरे से काटा गया शिवलिंग

डीह पर कत्ल हुआ रानियों का, मार डाले गए सेवक

मंदिर के पुजारी ने दावा किया कि धर्मस्थल को तोड़ कर मुगल फ़ौज पास ही मौजूद गाँव (लगभग 1 किलोमीटर दूर) सोनारपुरवा की तरफ मुड़ी। यहाँ भीटी राजपरिवार के लिए सोने-चाँदी का काम करने वाले स्वर्णकार रहते थे। बताया गया कि तब रानियाँ मुगल फ़ौज से बचने के लिए इसी इलाके में छिपी हुई थीं। यहाँ पहुँच कर औरंगज़ेब के हमराहों ने पहले सोनारपुरवा को लूटा और फिर रानियों का उनके सेवकों सहित सिर काट डाला। बकौल पुजारी, कुछ समय पहले तक डीह की खुदाई में एक कुएँ के अंदर से नरमुंड मिले थे जो उसी औरंगज़ेब के हमले के समय के है।

चंदापुर डीह पर तोड़ी गईं मूर्तियाँ

झारखंडी मंदिर के पुजारी ने हमसे बातचीत में आगे दावा किया कि वहाँ से लगभग 3 किलोमीटर दूर कभी चंदापुर डीह पर भी हिन्दू देवी-देवता पूजे जाते थे। पहले से ही सारी जानकारी ले कर आई मुगल फ़ौज भीटी महल, झारखंडी मंदिर, सोनारपुरवा के बाद चंदापुर डीह की तरफ मुड़ी। यहाँ मौजूद धर्मस्थलों को तोड़ डाला गया। अभी कुछ ही दिन पहले खेती करने गए कुछ किसानों को मिट्टी में दबी भगवान विष्णु की एक मूर्ति मिली थी। हजारों वर्ष पुरानी यह मूर्ति एक निषाद परिवार में मौजूद बताई जा रही है। इस ऐतिहासिक जगह को अब किसानों को पट्टे पर दे दिया गया है। हालाँकि, दावा किया गया कि अगर उस जगह की विधिवत खुदाई तो तो और भी ऐतिहासिक चीजें मिल सकती हैं।

हमारे पुरखे लड़े और बलिदान हुए

मंदिर पर मौजूद स्थानीय ग्रामीण अजीत कुमार दुबे ने ऑपइंडिया से बात की। उन्होंने दावा किया कि उनके बड़े-बुजुर्ग औरंगज़ेब के इस हमले के बारे में बताते हैं। तब न सिर्फ भीटी राजपरिवार के सैनिक बल्कि आसपास के ग्रामीणों ने भी मुगल फ़ौज से मुकाबला किया था। इस मुकाबले में कई ग्रामीण बलिदान हुए थे। तब औरंगज़ेब के भी कई हमलावर फौजी भी मारे गए थे। जिस झारखंडी मंदिर पर हमला हुआ था वहाँ भीटी राजपरिवार अक्सर पूजा-पाठ करने आया करता था। भीटी राजपरिवार ने बिसुही नदी के किनारे भी एक मंदिर बनवाया था।
अजीत ने दावा किया कि औरंगज़ेब के हमले की मुख्य वजह भीटी निवासियों द्वारा सवा सौ साल पहले राम के लिए दिखाया गया प्रेम और अपने राजा के साथ अयोध्या में किया किया गया बलिदान ही था। झारखंडी महादेव मंदिर के पास मौजूद भीटी बाजार, गाँव उमराँवा, दुखी दुबे का पुरवा और दुबाने का पुरवा गाँव के कई श्रद्धालु हमारे इंटरवियु के दौरान मंदिर परिस्सर में आए। उन सभी ने बताया कि मंदिर पर औरंगजेब द्वारा दिखाई गई क्रूरता से आज भी उनके मन में पीड़ा होती है। इस मंदिर के लिए स्थानीय भाजपा नेता ने टिन शेड और श्रद्धालुओं के बैठने आदि की भी व्यवस्था करवाई है।
                                      औरंगजेब की क्रूरता के शिकार झारखंडी मंदिर के नंदी
हालाँकि, औरंगज़ेब के द्वारा दिखाई गई यह क्रूरता भीटी राजपरिवार को विचलित नहीं कर पाई। औरंगज़ेब के हमले के लगभग 200 साल बाद भीटी के राजकुमार जयदत्त सिंह रामजन्मभूमि पर हमला करने निकले जिहादी मौलवी अमीर अली से संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस युद्ध में अमीर अली भी अपने तमाम साथियों सहित ढेर हो गया था।
(साभार : राहुल पाण्डेय, http://www.opindia.com)

India नहीं अब भारत लिखेंगे-पढ़ेंगे-बोलेंगे छात्र, किताब में मोहम्मद गोरी जैसों को हराने वालों की भी होगी बात

                                                                                                                              सांकेतिक तस्वीर
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) अपने पुस्तकों के अगले सेट में इंडिया के बजाय ‘भारत’ मुद्रित करेगा। पैनल के इस प्रस्ताव को इसके सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया है। इसके साथ ही समिति ने इतिहास की किताबों में ‘हिंदू विजय’ को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है।

पैनल के सदस्यों में से एक सीआई इस्साक के मुताबिक, NCERT की नई किताबों के नाम में बदलाव होगा। इस्साक ने कहा, यह प्रस्ताव कुछ महीने पहले रखा गया था और अब इसे स्वीकार कर लिया गया है।

इस्साक ने कहा कि इंडिया शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी और 1757 के प्लासी युद्ध के बाद होना शुरू हुआ था। वहीं, भारत का जिक्र विष्णु पुराण जैसे ग्रंथों में हैं, जो सात हजार साल से भी पुराने हैं।

 NCERT पैनल की सिफारिश इन अटकलों के बीच आई है कि क्या देश का नाम बदलकर ‘भारत’ रखा जाएगा। इस साल की शुरुआत में यह चर्चा तब शुरू हुई जब केंद्र ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा आयोजित जी-20 रात्रिभोज के निमंत्रण पत्र में President of India की जगह President of Bharat लिखा गया था।

इसके बाद इसको लेकर देश भर में बहस शुरू हो गया था। इन सबके बीच राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई थी। दरअसल, भारत के संविधान के अनुच्छेद 1(1) में हमारे देश के नाम को ‘इंडिया अर्थात भारत, राज्यों का एक संघ’ के रूप में परिभाषित किया गया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तरह ही इस साल सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेज पर लगे नेमप्लेट पर ‘इंडिया’ की जगह ‘भारत’ लिखा हुआ देखा गया था। दरअसल, दिल्ली के प्रगति मैदान में स्थित भारत मंडपम में जी-20 नेताओं का शिखर सम्मेलन था।

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विश्व के नेताओं को संबोधित करने के दौरान कैमरे में ‘Bharat’ नाम वाला नेमप्लेट विशेष रूप से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इससे जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया तो कुछ लोगों ने इस पर खुशी जाहिर की।

इस बीच एनसीईआरटी समिति ने अपनी पाठ्य-पुस्तकों में ‘हिंदू योद्धाओं की जीत’ को उजागर करने वाले पाठ्यक्रमों को विशेष रूप से शामिल करने की सिफारिश की है। समिति ने पाठ्य-पुस्तकों में ‘प्राचीन इतिहास’ के स्थान पर ‘शास्त्रीय इतिहास’ को शामिल करने की भी सिफारिश की है।

इस्साक ने कहा कि फिलहाल किताबों में हमारी असफलताओं के बारे में ही बताया गया है। सुल्तानों और मुगलों पर हमारी जीत के बारे में नहीं बताया गया है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि किताबों में पढ़ाया जाता है कि मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया था, लेकिन ये नहीं पढ़ाया जाता कि 1206 में गोरी की हत्या खोकरों (पूर्वी-मध्य एशिया की एक जनजाति) ने उस समय कर दी थी, जब वह भारत के रास्ते में था।

इस्साक ने कहा कि इतिहास को अब प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक में विभाजित नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने ऐसा किया था और उन्होंने भारत को वैज्ञानिक प्रगति और ज्ञान से अनभिज्ञ अंधकार में दिखाया था। समिति ने सभी विषयों के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) को शामिल करने की भी सिफारिश की है।

यह समिति उन 25 समितियों में से एक है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुसार पाठ्यक्रम को बदलने के लिए केंद्रीय स्तर पर NCERT के साथ काम कर रही है। सिफारिश के बाद नवीतनम पुस्तकें बाजार में आएँगी।

तुर्की में हुई खोज में मिली अपना लिंग हाथ में लिए हुए पुरुष, 11000 साल पुरानी मूर्ति: पुरातत्व वैज्ञानिक भी हैरान

तुर्की में अपना लिंग पकड़े व्यक्ति की तस्वीर मिली (फोटो साभार: Oppenheimer Ranch Project)
तुर्की में पुरातत्वविज्ञानियों को एक ऐसी मूर्ति मिली है, जिसमें एक पुरुष अपना लिंग पकड़ कर खड़ा दिख रहा है। बताया जा रहा है कि ये मूर्ति 11,000 वर्ष पुरानी है। इतिहासकारों ने कहा है कि इस मूर्ति से कृषि के विकास से पहले के काल को समझने में मदद मिलेगी। साथ में एक जंगली सूअर की मूर्ति भी मिली है। इसे एक अभूतपूर्व आर्कियोलॉजिकल खोज बताया जा रहा है। इससे उस समय के समाज को समझने में भी मदद मिलेगी। गोबेली टेपे और कराहन टेपे के आसपास के इलाकों में ये मूर्तियाँ मिलीं।

इन्हें दुनिया के सबसे बड़े टेम्पल परिसरों में से गिना जाता है। गोबेली टेपे महापाषाण काल के T आकार के स्तंभों के लिए विख्यात है। साथ ही यहाँ कई ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें काफी पेचीदा काम किया हुआ है। बताया जा रहा है कि अंतिम संस्कार के कार्यों में इनका इस्तेमाल किया जाता था। UNESCO ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय धरोहर की मान्यता दी हुई है। प्रागैतिहासिक काल को समझने के लिए ये महत्वपूर्ण है। जंगली सूअर वाली आकृति को लाइमस्टोन से बनाया गया है।

गोबेली टेपे में में मिली ये मूर्ति 8700 BC से लेकर 8200 BC तक के बीच की है। जहाँ इसकी लंबाई 4.4 फ़ीट है, वहीं ऊँचाई 2.3 फ़ीट है। इसमें लाल, काला और सफ़ेद रंगों का इस्तेमाल किया गया है। इससे पता चलता है कि इसे पेण्ट भी किया गया था। वहीं इससे 22 मील की दूरी पर स्थित कराहन टेपे में पुरातत्वविदों को 7 फ़ीट लंबे एक पुरुष की मूर्ति मिली है। इसकी पसलियों, रीढ़ की हड्डी और और कंधों की बनावट स्पष्ट दिख रही है। इतिहासकारों का मानना है कि ये वहाँ स्थित इमारत से जुड़े किसी पूर्वज की मूर्ति हो सकती है।

इस मूर्ति की खासियत ये है कि ये व्यक्ति अपना लिंग अपने हाथ में पकड़ा हुआ दिख रहा है, जिसे इशारा मिलता है कि ये किसी समुदाय का प्रजनक रहा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में हर एक इमारत से जुड़ा कोई न कोई पूर्वज रहा होगा। इस व्यक्ति का चित्रण मृतक के रूप में किया गया होगा, ये कयास भी लगाए जा रहे हैं। कुछ ही दूर पर एक गिद्ध की मूर्ति भी मिली है। हालाँकि, इस पर और शोध और अध्ययन के बाद ही वैज्ञानिक अधिक जानकारी दे पाएँगे।


भगवान सूर्य से जुड़े मंदिर में 3000 साल पुरानी सुरंग: पेरू की चाविन संस्कृति उन्नत कला के लिए प्रसिद्ध, यूनेस्को की सूची में शामिल

                          पेरू के प्राचीन मंदिर में मिली 3000 साल पुरानी सुरंग (फोटो साभार: Reuters)
दक्षिण अमेरिकी देश पेरू के पुरातत्वविदों ने एक प्राचीन मंदिर में करीब 3000 साल पुरानी सुरंग की खोज की है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यह सुरंग प्राचीन चाविन संस्कृति से जुड़े मंदिर के अन्य कमरों की ओर जाती है। इस सुरंग में 17 किलोग्राम का सिरेमिक का एक टुकड़ा मिला है। इस टुकड़े में कोंडोर पक्षी का सिर और पंख बना हुआ है। इसलिए इसे ‘कॉन्डर्स पैसेजवे’ कहा जा रहा है।

चाविन संस्कृति से जुड़ी सुरंग मंदिर के दक्षिणी हिस्से में मिली है। पुरातत्वविदों का कहना है कि यह सुरंग काफी कमजोर है। इसलिए इसे बंद कर दिया गया था। इस सुरंग में चाविन संस्कृति के शुरुआती दिनों की झलक दिखाई देती है।

यह सुरंग पेरू में हुआरी प्रांत के चाविन जिले में स्थित चाविन डी हुआनतार इलाके में मिली है। यह इलाका प्राचीन चाविन संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक है। यही कारण है कि चाविन डी हुआनतार को यूनेस्को ने साल 1985 में पुरातात्विक स्थलों की सूची में शामिल किया था।

पुरातत्वविदों का मानना है कि इस इलाके का निर्माण 1500 से 500 ईसा पूर्व में हुआ था। चाविन संस्कृति अपनी उन्नत कला के लिए जानी जाती है। इस संस्कृति से जुड़े प्राप्त अवशेषों में आम तौर पर पक्षियों और बिल्लों के चित्र बने होते हैं।

चाविन संस्कृति एक ऐसी संस्कृति थी, जिसके लोग एक स्थान पर रह कर खेती करते हुए जीवन-यापन करते थे। ऐसा माना जाता है कि पेरू में इंका साम्राज्य के सत्ता में आने से 2000 साल से कहीं अधिक पहले चाविन लोग यहाँ रहते थे।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद जॉन रिक ने रॉयटर्स से हुई बातचीत में कहा है कि मई 2022 में इस सुरंग का दरवाजा खोला गया था। उस दौरान यहाँ करीब 17 किलोग्राम का सिरेमिक का बड़ा टुकड़ा मिला था। इस सिरेमिक टुकड़े पर कोंडोर पक्षी का सिर और पंख बना हुआ है। इस सुरंग में एक सिरामिल के कटोरे के साथ यह सब मिला था।

ऐसा माना जाता है कि कोंडोर दुनिया के सबसे बड़े पक्षियों में से एक है। प्राचीन एंडियन संस्कृतियों से जुड़े लोग इस पक्षी को शक्ति और समृद्धि का प्रतीक मानते थे। यही नहीं, कोंडोर को भगवान सूर्य से जुड़ा और ऊपरी दुनिया का राजा भी माना जाता था।

पुरातत्वविद जॉन रिक और उनकी टीम ने ही इस सुरंग की खोज की है। रिक ने यह भी कहा है कि इस मंदिर परिसर के अधिकांश भागों की खुदाई अब तक बाकी है। सुरंग मिलने के बाद यह पाया गया था कि यह बेहद जर्जर अवस्था में है। ऐसे में रोबोटिक कैमरों का इस्तेमाल कर इसकी जाँच की गई।

भारत की स्वतंत्रता से जुड़ा है नंदी: नई संसद में स्थापित होगा Sengol, भारत का वह इतिहास जो नेहरू ने सत्ता पाते ही भुला दिया

चोल राजा शिवभक्त हुआ करते थे, इसीलिए 'सेंगोल' में ये भी साफ़ झलकता है (फाइल फोटो)
भाजपा विरोधी कुर्सी की भूखी और तुष्टिकरण पर चलने वाली छद्दम धर्म-निरपेक्ष अपनाने वाली 19 पार्टियों द्वारा संसद के नए भवन के प्रवेश कार्यक्रम का बहिष्कार करने से अपनी सनातन विरोधी मानसिकता को जाहिर कर दिया है। आने वाले चुनावों इन सभी सनातन विरोधियों को जनता को धूल चटानी होगी। भाजपा को वोट नहीं देना चाहते कोई बात नहीं, NOTA को दे दो वोट, लेकिन इन सनातन विरोधियों को नहीं। 28 मई को भारत में चोल साम्राज्य की पुनः वापसी होने से तुष्टिकरण के कारण धूमिल हुई भारतीय संस्कृति उजागर होगी। यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश भारतवासियों को चोल साम्राज्य का ज्ञान नहीं। 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार (28 मई, 2023) को संसद के नए भवन के लोकार्पण के शुभ अवसर पर भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर पवित्र ‘सेंगोल’ को ग्रहण कर नए भवन में इसकी स्थापना करेंगे। साथ ही उन्होंने ‘सेंगोल’ को न्याय और निष्पक्षता का प्रतीक बताते हुए एक वीडियो भी शेयर किया। आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि ये ‘सेंगोल’ क्या है और भारत सरकार से इसका क्या संबंध है।

‘सेंगोल’ का इतिहास जानने के लिए हमें सबसे पहले स्वतंत्रता के समय जाना होगा, जब भारत आज़ादी की लड़ाई जीत चुका था और सत्ता के हस्तांतरण के लिए कार्यक्रम होने वाला था। उस समय तमिलनाडु ‘मद्रास प्रेसिडेंसी’ के अंतर्गत आता था। पीयूष गोयल ने जो वीडियो शेयर किया, उसमें उस समय कुछ कलाकारों को दिल्ली के लिए कूच करने की तैयारी करते हुए देखा जा सकता है। उन्हें एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए बुलाया गया था।

सत्ता के हस्तांतरण को पवित्रता प्रदान करते और उसकी वैधता स्थापित करने के लिए इन लोगों को बुलाया गया था। सत्ता एक शासक से दूसरे के पास जा रही थी, विदेशियों से स्वदेशियों के पास। भारत के अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन को अंग्रेजी सरकार की तरफ से सत्ता हस्तांतरण का कार्य पूरा करने के लिए भेजा गया था। इस दौरान उनके मन में सवाल था कि इस कार्यक्रम, या इस क्षण को कैसे प्रदर्शित किया जाना चाहिए?

हाथ मिलाने से भी काम चल सकता था, लेकिन वो इसे एक विशेष प्रतीकात्मकता देना चाहते थे। इस दौरान उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी ये सवाल पूछा। जवाहरलाल नेहरू खुद को सेक्युलर दिखाने में विश्वास रखते थे और शायद यही कारण रहा होगा कि जब लॉर्ड माउंटबेटन ने उनसे पूछा कि सत्ता हस्तांतरण की भारतीय परंपरा क्या है, तो उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा। उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालचारी से इस संबंध में प्रश्न किया, जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ रखते थे।

राजाजी तमिलनाडु से ताल्लुक रखते थे और भारतीय संस्कृति-सभ्यता को लेकर उनके ज्ञान का सभी सम्मान करते थे। उन्होंने सत्ता हस्तांतरण की प्रतीकात्मकता की समस्या का हल भी इतिहास में निकाला। चोल राजवंश में, जो भारत के सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक चलने वाला शासन था। उस समय एक चोल राजा से दूसरे चोल राजा को ‘सेंगोल’ देकर सत्ता हस्तांतरण की रीति निभाई जाती थी। ये एक तरह से राजदंड था, शासन में न्यायप्रियता का प्रतीक।

चोल राजवंश भगवान शिव को अपना आराध्य मानता था। इस ‘सेंगोल’ को राजपुरोहित द्वारा सौंपा जाता था, भगवान शिव के आशीर्वाद के रूप में। इस पर शिव की सवारी नंदी की प्रतिमा भी है। इसी तरह के समारोह और रिवाज की सलाह राजाजी ने दी, जिस पर नेहरू तैयार हो गए। इसके बाद राजाजी ने मयिलाडुतुरै स्थित ‘थिरुवावादुठुरै आथीनम’ से संपर्क किया, जिसकी स्थापना आज़ादी से 500 वर्ष पूर्व हुई थी। मठ के तत्कालीन महंत अम्बालवाना देशिका स्वामी उस समय बीमार थे, लेकिन उन्होंने ये कार्य अपने हाथ में लिया।
उन्होंने ‘सेंगोल’ के निर्माण के लिए ‘वुम्मिडी बंगारू चेट्टी’ के आभूषण निर्माताओं को दिया। ‘सेंगोल’ के ऊपर नंदी का होना शक्ति, न्यायप्रियता और सत्य का प्रतीक है। वुम्मिडी एथिराजुलू ने ‘सेंगोल’ के निर्माण के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि उनके पास ‘सेंगोल’ की ड्रॉइंग लाई गई थी। ये गोल था और साथ में एक पोल का आकार था। उन्हें काफी सावधानी और उच्च गुणवत्ता के साथ इसे बनाने को कहा गया और बताया गया कि ये बहुत ही महत्वपूर्ण जगह जाने वाला है।
उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के समय वो लोग इसका निर्माण करने में काफी खुश थे। समारोह के आयोजन के लिए महंत ने अपने शिष्य कुमारस्वामी, एक बड़े गायक और ‘नादसुर’ विशेषज्ञ को दिल्ली भेजा। 14 अगस्त, 1947 की रात को कुमारस्वामी श्रीला श्री कुमारस्वामी तम्बीरान ने ‘सेंगोल’ लॉर्ड माउंटबेटन को दिया। इसे जल से पवित्र किया गया था। इस दौरान तमिल संत ‘कोलारु पथिगम’ का गान किया गया, जो शैव कविता ‘थेवारम’ का हिस्सा है।
इसकी रचना तमिल कवि तिरुगन संबंदर ने की थी। संयासियों ने नेहरू को पीतांबर ओढ़ाया और मंत्रोच्चारण किया गया। इस दौरान जो पंक्ति पढ़ी गई, उसका अर्थ है – ‘हमारा आदेश है कि भगवान के अनुयायी राजा उसी तरह से शासन करेंगे, जैसे स्वर्ग के शासक।’ ये समारोह भारत के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से के संगम का भी प्रतीक बना। डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उस सामरोह में मौजूद थे। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘Time’ ने भी इस संबंध में खबर प्रकाशित की थी।

गोरी, कुतुबुद्दीन, रजिया, लोदी, तुगलक, खिलजी… काशी को सबने लूटा-तोड़े मंदिर: हिंदू करते रहे पुनर्निर्माण

                                                                 ज्ञानवापी परिसर
ज्ञानवापी परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वेक्षण कराने को लेकर दायर याचिका पर वाराणसी कोर्ट 22 मई 2023 को सुनवाई करेगी। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एएसआई को परिसर में मिले शिवलिंग की कार्बन डेटिंग के निर्देश दिए थे। इस्लामी आक्रांताओं ने ज्ञानवापी ही नहीं बल्कि काशी के कई हिस्सों में मंदिरों को तोड़कर उस पर मस्जिद बनवाई थी।

मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले नेता, उनकी पार्टियों और भारत के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों के बलात्कारी एवं खुनी इतिहास पर चादर डाल महान बताने वालों ने शायद सोंचा भी नहीं होगा कि कभी ये चादर भी हटेगी और जनता अपने गौरवशाली इतिहास को जानेगी।  कोशिश तो कई वर्षों से हो रही है, लेकिन तुष्टिकरण करने वाले छद्दम सेक्युलरिस्ट्स कुर्सी पर विराजमान होने के कारण सच्चाई बताने वालों को सांप्रदायिक बताकर बदनाम किया जाता रहा। और जनता भी गुमराह होती रही। 

मुहम्मद गोरी ने 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में एक के बाद एक लूट और विध्वंस की घटनाओं को अंजाम दिया। सन् 1193 में कन्नौज के राजा जयचंद और कुतुबुद्दीन ऐबक के बीच यमुना नदी के किनारे चंदावर (अभी फिरोजाबाद) में एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें जयचंद की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच हुए युद्ध में इस्लामी सेना की जबरदस्त हार हुई थी, लेकिन अगले एक वर्ष में ही वो दोबारा लौटा और पृथ्वीराज चौहान की हार के साथ ही दिल्ली में इस्लामी सत्ता की स्थापना हो गई।

जयचंद के खिलाफ युद्ध में खुद मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक अपनी-अपनी फ़ौज के साथ था। जयचंद का कटा हुआ सिर इन दोनों इस्लामी शासकों के सामने लाया गया। इसके बाद, मुहम्मद गोरी वाराणसी की तरफ बढ़ा। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद जैसे हिन्दू राजाओं की मृत्यु के बाद वाराणसी को बचाने वाला शायद ही कोई था। वाराणसी में लूटपाट का भयंकर मंजर देखने को मिला। मंदिर के मंदिर तोड़ डाले गए। वाराणसी न सिर्फ एक धार्मिक नगरी थी, बल्कि व्यापार और वित्त का भी बड़ा केंद्र था। ऐसे में मुहम्मद गोरी ने मनमाने ढंग से लूटपाट मचाई। कहते हैं, यहाँ से लूटे हुए माल को ले जाने के लिए उसे 1400 ऊँटों की ज़रूरत पड़ी थी।
काशी विश्वनाथ मंदिर को भी इसी दौरान ध्वस्त किया गया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी उठाई। कन्नौज के राजा जयचंद्र के पुत्र हरीशचंद्र और आम लोगों ने जब मंदिर का निर्माण पुनः शुरू कर दिया, तब कुतुबुद्दीन ऐबक ने 4 वर्षों बाद फिर से अपनी फ़ौज के साथ हमला किया और भारी तबाही मचाई। कुतुबुद्दीन ऐबक ने विश्वेश्वर, अविमुक्तेश्वर, कृतिवासेश्वर, काल भैरव, आदि महादेव, सिद्धेश्वर, बाणेश्वर, कपालेश्वर और बालीश्वर समेत सैकड़ों शिवालयों को तबाह कर दिया। इस तबाही के कारण अगले पाँच-छः दशकों तक ये मंदिर इसी अवस्था में रहे।
तुर्कों का शासन था और दिल्ली में उनकी स्थिति और मजबूत ही होती जा रही थी। ऐसे में कुछेक साधु-संतों के अलावा धर्म की मशाल को ज़िंदा रखने वाले लोग कम ही बचे थे। काशी वही है, जिसके बारे में 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन सांग ने वर्णन किया है कि उसने यहाँ सैकड़ों शिव मंदिर देखे और हजारों साधु-श्रद्धालु भी अपने शरीर पर भस्म मल कर घूमते हुए उसे दिखे। उसने एक 30 मीटर ऊँची शिव प्रतिमा का भी जिक्र किया है।
हालाँकि, 13वीं शताब्दी के मध्य में ही मुहम्मद गोरी की मौत हो गई और कुतुबुद्दीन ऐबक भी इस दशक के अंत तक मर गया। लेकिन, दिल्ली सल्तनत का काशी पर कब्ज़ा जारी रहा। इसके बाद इल्तुतमिश और फिर उसकी बेटी रजिया सुल्तान का शासन हुआ। जिस रजिया सुल्तान को ‘बहादुर महिला’ बता कर वर्षों तक पढ़ाया जाता रहा उसने भी काशी में मंदिरों को ध्वस्त कर विश्वनाथ मंदिर परिसर में ही एक मस्जिद बनवाई थी। ज्ञानवापी विवादित ढाँचे से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘रजिया मस्जिद’ की जगह भी कभी मंदिर ही हुआ करता था।
इसके बाद सन् 1448 में मुहम्मद शाह तुगलक ने आसपास के छोटे-बड़े मंदिरों को भी ध्वस्त कर दिया और रजिया मस्जिद को और बड़ा बना दिया। काशी के प्राचीन इतिहास को पढ़ें तो पता चलता है कि यहाँ कई पुष्कर थे, जिन्हें व्यवस्थित ढंग से तबाह कर इस्लामी शासकों ने मस्जिद बनवाए। हालाँकि, उससे पहले 13वीं सदी में हिन्दुओं ने फिर से मंदिर को बना कर खड़ा कर दिया था। इसे हिन्दुओं की जिजीविषा कहें या फिर श्रद्धा, इतने अत्याचार और खून-खराबे के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। इस्लामवादी लगातार मंदिरों को तोड़ते रहे और हिंदू पुनर्निर्माण में लगे रहे।
इन्हीं मंदिरों में से एक था पद्मेश्वर मंदिर, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने ही बनवाया गया था। हालाँकि, 1296 ईस्वी में बने पद्मेश्वर मंदिर को भी 15वीं शताब्दी के मध्य में तोड़ डाला गया। पद्म नाम के एक साधु ने इसका निर्माण करवाया था। आप जानते हैं कि ये मंदिर अब कहाँ है? इसके ऊपर ही लाल दरवाजा मस्जिद बनवा दिया गया, जिसे आज भी शर्की सुल्तानों का भव्य आर्किटेक्चर बता कर प्रचारित किया जाता है। फिरोजशाह तुगलक से लेकर सिकंदर लोदी तक, कई इस्लामी सुल्तानों ने काशी में मंदिरों को बारम्बार ध्वस्त किया। सन् 1494 में सिकंदर लोदी ने काशी में कई ऐसे मंदिर तोड़े, जिनका पुनर्निर्माण हिंदुओं ने अपने खून-पसीने से किया था।
सन् 1514-1594 के कालखंड में ही जगद्गुरु नारायण भट्ट हुए, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘त्रिस्थली’ में काशी के विश्वनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। इसमें उन्होंने कहा है कि अगर म्लेच्छों ने शिवलिंग को हटा दिया है तो वो खाली जगह ही हमारे लिए पवित्र है और उसकी पूजा की जानी चाहिए, अथवा कोई और शिवलिंग स्थापित किया जाना चाहिए। उनके शुरुआती जीवनकाल में मंदिर नहीं बना था, इससे ये पता चलता है। तुगलक और लोदी के विध्वंस से वाराणसी नहीं उबरी थी।
वो नारायण भट्ट ही थे, जिनकी प्रेरणा से राजा टोडरमल ने काशी में पुनः भव्य विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। आज जिस ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को आप देख रहे हैं, उसे औरंगजेब ने इसी मंदिर को तोड़ कर इसके ऊपर बनवाया था। काशी की मुक्ति के प्रयास लगातार चलते रहे और यहाँ पूजा-पाठ भी नहीं रोका गया। बार-बार आक्रमण के बावजूद काशी में पुनर्निर्माण चलता रहा। अब यदि अयोध्या के बाबरी ढाँचे की ही तरह पूरे ज्ञानवापी परिसर का सर्वे हो जाए तो हिंदुओं को एक और बार मंदिर के पुनर्निर्माण का सौभाग्य प्राप्त होगा।

वक्फ की संपत्ति अल्लाह की संपत्ति: जिसे अंग्रेजों ने कहा था ‘सबसे हानिकारक’… उसे कांग्रेस ने बनाया देश का तीसरा सबसे बड़ा जमीन मालिक

             मस्जिद, मजार, मदरसे ईदगाह मैदान... सब वक्फ बोर्ड के! (फोटो साभार: मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड)
हाल ही में, कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने बेंगलुरु के ईदगाह मैदान में गणेशोत्सव के लिए तय किए गए स्थान पर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भी ईदगाह मैदान में गणेशोत्सव कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी। इस मामले ने, एक कथित धर्मनिरपेक्ष देश में वक्फ की प्रचलित प्रथा और इसे लगातार बनाए रखने वाले वक्फ बोर्ड के कामकाज पर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है।

बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) ने दावा किया था कि ईदगाह की जमीन सरकारी है और इसे किसी मुस्लिम संगठन को हस्तांतरित नहीं किया गया था। लेकिन, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह 1850 के दशक से ही वक्फ की संपत्ति है। साथ ही यह भी कहा कि एक बार जो संपत्ति वक्फ की हो गई, वह हमेशा के लिए वक्फ की ही रहेगी।

वक्फ बोर्ड के वकील दुष्यंत दवे ने कोर्ट में तर्क दिया था कि वक्फ अधिनियम एक अधिभावी कानून है, जिस पर कोई भी कानूनी प्रक्रिया नहीं हो सकती। इसलिए न्यायालय वक्फ संपत्ति पर आदेश पारित नहीं कर सकता है। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने गणेशोत्सव की अनुमति देने से इनकार करते हुए ईदगाह मैदान पर यथास्थिति रखने का आदेश दिया।

वक्फ क्या है?

मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर वक्फ है क्या? इस्लाम के अनुसार, वह संपत्ति जो केवल मजहबी या मजहब के उद्देश्यों के लिए उपलब्ध हो, वह वक्फ है। ऐसी संपत्ति का कोई अन्य उपयोग या बिक्री नहीं की जा सकती है। शरिया कानून के अनुसार, एक बार वक्फ की स्थापना हो जाने के बाद संपत्ति वक्फ को समर्पित कर दी जाती है। इसके बाद, यह हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति के रूप में बनी रहती है। यही नहीं, शरिया के अनुसार, वक्फ संपत्ति स्थायी रूप से अल्लाह को समर्पित होती है।
आसान भाषा मे कहें तो ‘वक्फ’ वह व्यक्ति है, जो लाभार्थी के लिए वक्फ बनाता है। यानी कि वक्फ संपत्ति अल्लाह को दी जाती है। हालाँकि, अल्लाह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं होता है, इसलिए वक्फ़ की संपत्ति की व्यवस्था या प्रबंधन करने के लिए एक व्यक्ति जिसे मुतवल्ली कहा जाता है, को नियुक्त किया जाता है।

भारत में वक्फ और वक्फ बोर्डों का इतिहास

भारत में, वक्फ का इतिहास दिल्ली सल्तनत के शुरुआती दिनों से ही माना जाता है। सुल्तान मुइज़ुद्दीन सैम घोर ने मुल्तान की जामा मस्जिद के पक्ष में दो गाँव समर्पित किए और इसका प्रशासन शेखुल इस्लाम को सौंप दिया। जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत और बाद में इस्लामी राजवंश भारत में फले-फूले, भारत में वक्फ संपत्तियों की संख्या बढ़ती चली गई।
19वीं शताब्दी के अंत में हालाँकि भारत में वक्फ की समाप्ति का भी एक मामला सामने आया था। उस दौरान, ब्रिटिश शासन के समय में लंदन की प्रिवी काउंसिल में एक वक्फ संपत्ति पर विवाद शुरू हुआ था। इस मामले की सुनवाई करने वाले चार ब्रिटिश न्यायाधीशों ने वक्फ को “सबसे खराब और सबसे हानिकारक” बताते हुए अमान्य घोषित कर दिया था।
भारत में इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया गया और 1913 के मुसलमान वक्फ मान्यकरण अधिनियम ने भारत में वक्फ को बचा लिया था। इसके बाद से अब तक वक्फ पर अंकुश लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। यही कारण है, वक्फ बोर्ड अब सशस्त्र बलों और भारतीय रेलवे के बाद भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूमि मालिक है।
वास्तव में, वोट बैंक की राजनीति के चलते देश की आजादी से बाद से वक्फ को लगातार पोषण मिलता रहा है और यह साल दर साल मजबूत होता चला गया। नेहरू सरकार द्वारा पारित वक्फ अधिनियम 1954 ने वक्फों के केंद्रीयकरण की दिशा में एक रास्ता बनाया था। यही नही, भारत सरकार द्वारा 1954 के इसी वक्फ अधिनियम के तहत साल 1964 में सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना की गई थी।
तत्कालीन भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया एक केंद्रीय संस्था है। यह संस्था विभिन्न राज्य के वक्फ बोर्डों के काम की देखरेख करता है, जो वक्फ की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित किए गए थे। 1954 वक्फ अधिनियम को साल 1995 में मुस्लिमों के लिए और भी अधिक अनुकूल बनाया गया। इसके बाद से यह एक अधिभावी कानून है और इस पर कोई विधायी शक्तियाँ काम नहीं कर सकती हैं। एडवोकेट दवे ने भी कोर्ट में यही तर्क दिया।

वक्फ अधिनियम 1995

22 नवंबर 1995 को वक्फ अधिनियम 1995 लागू किया गया। यह अधिनियम वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्डों और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की शक्ति और कार्यों के साथ-साथ मुतवल्ली के कामकाज को भी देखता है।
यह अधिनियम एक वक्फ ट्रिब्यूनल की शक्ति और प्रतिबंधों का भी वर्णन करता है, जो अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक सिविल कोर्ट की तरह कार्य करता है। वक्फ ट्रिब्यूनल को एक सिविल कोर्ट माना जाता है और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत एक सिविल कोर्ट द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों का उपयोग और कार्यों को करने की क्षमता रखता है।
वक्फ ट्रिब्यूनल ऐसा है कि इसका निर्णय अंतिम और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होगा। इस अधिनियम के तहत अगर कोई भी मसला वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित किया जाना है तो वो विवाद या कानूनी कार्यवाही किसी दीवानी अदालत के अधीन नहीं जा सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले किसी भी सिविल कोर्ट से ऊपर हैं।

एक बार वक्फ की संपत्ति, हमेशा के लिए वक्फ की संपत्ति

वक्फ के मामले में संपत्ति का स्वामित्व वक्फ से अल्लाह को ट्रांसफर किया जाता है। और कोई भी संपत्ति अल्लाह से वापस नहीं ली जा सकती है। इसलिए एक बार संपत्ति वक्फ बन जाने के बाद, यह हमेशा वक्फ रहेगी और इसका मालिक अल्लाह होगा लेकिन उपयोग वक्फ बोर्ड करेगा।
                                                        (फोटो साभार: वक्फ वेबसाइट)
ठीक ऐसा ही बेंगलुरु ईदगाह मैदान के मामले में भी देखा गया। भले ही सरकार के अनुसार किसी भी मुस्लिम संगठन को इस भूमि का मालिकाना हक नहीं दिया गया है। लेकिन, वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसका मतलब है कि यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है।
हाल ही में, गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर दावा पेश किया था, जो अब वक्फ की संपत्ति है क्योंकि इस बिल्डिंग से जुड़े किसी भी दस्तावेज को अपडेट नहीं किया गया था। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान, सूरत नगर निगम की इमारत एक होटल थी और हज यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान संपत्ति तब ब्रिटिश साम्राज्य की थी। हालाँकि, जब साल 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, तब संपत्तियों को भारत सरकार को हस्तांतरित कर दिया गया था। लेकिन, जैसा कि ऊपर भी बताया गया है कि दस्तावेजों को अपडेट नहीं किया गया था, इसलिए यह सूरत नगर निगम की इमारत वक्फ बोर्ड के पास चली गई।
वक्फ बोर्ड सम्पत्ति पर दावा करने के मामले में कभी पीछे नहीं रहा। दिव्य भास्कर ने बताया था कि वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका में दो द्वीपों के स्वामित्व पर दावा करते हुए गुजरात हाईकोर्ट में अपील की थी। इस पर हाई कोर्ट के जज ने हालाँकि सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। साथ ही, कोर्ट ने वक्फ बोर्ड से अपनी याचिका को संशोधित करने के लिए भी कहा था।
वक्फ का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यदि आपकी हाउसिंग सोसाइटी के किसी अपार्टमेंट का मालिक अपने अपार्टमेंट को वक्फ बोर्ड के नाम करता है तो वह अपार्टमेंट किसी भी दिन समाज के अन्य सदस्यों की इजाजत या बातचीत के बिना ही मस्जिद में बदल सकता है। कुछ ऐसा ही सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था। वहाँ, एक प्लॉट के मालिक ने गुजरात वक्फ बोर्ड में अपना प्लॉट रजिस्टर कराया, जिससे वह मुसलमानों के लिए ‘पवित्र’ स्थान बन गया और लोग वहाँ नमाज पढ़ने लगे।

एक धर्मनिरपेक्ष देश में क्या कर रहा है वक्फ?

केवल एक मजहब की मजहबी संपत्तियों के लिए एक विशेष अधिनियम होना बेहद अजीब लगता है। साथ ही, तब जबकि देश को धर्मनिरपेक्ष देश कहा जाए और बाकी धर्मों की सम्पत्तियों के साथ भेदभाव हो। दरअसल, एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने यही सवाल पूछते हुए फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। वक्फ की संवैधानिक वैधता को लेकर इस याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है।
इस्लामी देश तुर्की, लीबिया, मिस्र, सूडान, लेबनान, सीरिया, जॉर्डन, ट्यूनीशिया और इराक में वक्फ मौजूद नहीं है। लेकिन भारत में वोट-बैंक की राजनीति के चलते न केवल वक्फ बोर्ड सबसे बड़ा शहरी जमींदार है, बल्कि उसके पास कानूनी रूप से उनकी रक्षा करने वाला एक अधिनियम भी है।
इस लेख की मूल कॉपी OpIndia पर प्रकाशित हुई है। इसका अनुवाद आकाश शर्मा ‘नयन’ ने किया है।(साभार)

1667 का आदेश : औरंगजेब ने भी पटाखों पर लगाया था प्रतिबंध

दिवाली के मौके पर पटाखों पर लगने वाला बैन अक्सर सवाल खड़ा करता है कि क्या सारे प्रदूषण के लिए एक पर्व ही जिम्मेदार है। पिछले कुछ सालों से वायु प्रदूषण का रोना रोकर दिवाली आते ही कई राज्यों में प्रतिबंध लग जाता है। लोग सोशल मीडिया पर सवाल करते हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। 

कुछ लोग ये भी कहते हैं कि ये सब सिर्फ पिछले कुछ सालों में बढ़े प्रदूषण के कारण हो रहा है लेकिन बता दें कि पटाखों पर प्रतिबंध लगाकर भावनाओं को ठेस पहुँचाना कोई नई बात नहीं है। 350 साल पहले मुगल आक्रांता औरंगजेब ने भी ऐसे ही पटाखे फोड़ने पर प्रतिबंध लगाया था।

आज दिवाली के मौके पर और वर्तमान हालातों को देखते हुए ये जानना जरूरी है कि हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने वाले औरंगजेब ने भी अपने काल में पटाखे फोड़ने पर रोक लगवाई थी। उसका आदेश बीकानेर के स्टेट अर्काइव में सुरक्षित है। आदेश 8 अप्रैल 1667 का है। 

                                                           साभार: दैनिक भास्कर

आदेश में लिखा है- “बादशाह के सूबों के अफसरों को लिख दीजिए कि वे आतिशबाजी पर रोक लगा दें। शहर में भी घोषणा कर दें कि कोई आतिशबाजी न करें।” इस आदेश में किसी त्यौहार का जिक्र नहीं है। न ही कोई समय का उल्लेख है। बस इससे इतना पता चलता है कि उसने आतिशबाजी पर रोक लगाई थी इस आदेश के हिसाब से लंबे समय तक आतिशबाजी पर रोक लगाई गई थी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान स्टेट आर्काइव के निदेशक महेंद्र सिंह खड़गावत ने कहा, “औरंगजेब के समय आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाया गया था। अप्रैल 1667 का औरंगजेब के समय का लेटर आर्काइव में हमारे पास सुरक्षित है। उस लेटर में दिवाली का जिक्र नहीं है, लेकिन वह लेटर सही है।”

इतिहास की इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर लोग सवाल करते रहते हैं। लोग तंज कसते हैं कि औरंगजेब ने भी पटाखों पर प्रतिबंध लगाया था। कितना महान पर्यावरणविद् और दूरदर्शी है।

दिवाली के आते ही पटाखों से उठने वाले धुएँ पर कई वामपंथी-कट्टरपंथी अपनी सांस फुलाते हैं। इस सूची में प्रियंका चोपड़ा जैसे नाम हैं जिन्हें सिगरेट या सिगार पीने से समस्या नहीं है लेकिन उन्हें दिवाली के मौके पर सांस की शिकायत हो जाती है। इसी तरह रोशनी अली से जुड़ा विवाद हाल का है। उन्हीं की याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने दीवाली/काली पूजा के दौरान पूरे पश्चिम बंगाल में सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था।