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भारत की स्वतंत्रता से जुड़ा है नंदी: नई संसद में स्थापित होगा Sengol, भारत का वह इतिहास जो नेहरू ने सत्ता पाते ही भुला दिया

चोल राजा शिवभक्त हुआ करते थे, इसीलिए 'सेंगोल' में ये भी साफ़ झलकता है (फाइल फोटो)
भाजपा विरोधी कुर्सी की भूखी और तुष्टिकरण पर चलने वाली छद्दम धर्म-निरपेक्ष अपनाने वाली 19 पार्टियों द्वारा संसद के नए भवन के प्रवेश कार्यक्रम का बहिष्कार करने से अपनी सनातन विरोधी मानसिकता को जाहिर कर दिया है। आने वाले चुनावों इन सभी सनातन विरोधियों को जनता को धूल चटानी होगी। भाजपा को वोट नहीं देना चाहते कोई बात नहीं, NOTA को दे दो वोट, लेकिन इन सनातन विरोधियों को नहीं। 28 मई को भारत में चोल साम्राज्य की पुनः वापसी होने से तुष्टिकरण के कारण धूमिल हुई भारतीय संस्कृति उजागर होगी। यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश भारतवासियों को चोल साम्राज्य का ज्ञान नहीं। 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार (28 मई, 2023) को संसद के नए भवन के लोकार्पण के शुभ अवसर पर भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर पवित्र ‘सेंगोल’ को ग्रहण कर नए भवन में इसकी स्थापना करेंगे। साथ ही उन्होंने ‘सेंगोल’ को न्याय और निष्पक्षता का प्रतीक बताते हुए एक वीडियो भी शेयर किया। आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि ये ‘सेंगोल’ क्या है और भारत सरकार से इसका क्या संबंध है।

‘सेंगोल’ का इतिहास जानने के लिए हमें सबसे पहले स्वतंत्रता के समय जाना होगा, जब भारत आज़ादी की लड़ाई जीत चुका था और सत्ता के हस्तांतरण के लिए कार्यक्रम होने वाला था। उस समय तमिलनाडु ‘मद्रास प्रेसिडेंसी’ के अंतर्गत आता था। पीयूष गोयल ने जो वीडियो शेयर किया, उसमें उस समय कुछ कलाकारों को दिल्ली के लिए कूच करने की तैयारी करते हुए देखा जा सकता है। उन्हें एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए बुलाया गया था।

सत्ता के हस्तांतरण को पवित्रता प्रदान करते और उसकी वैधता स्थापित करने के लिए इन लोगों को बुलाया गया था। सत्ता एक शासक से दूसरे के पास जा रही थी, विदेशियों से स्वदेशियों के पास। भारत के अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन को अंग्रेजी सरकार की तरफ से सत्ता हस्तांतरण का कार्य पूरा करने के लिए भेजा गया था। इस दौरान उनके मन में सवाल था कि इस कार्यक्रम, या इस क्षण को कैसे प्रदर्शित किया जाना चाहिए?

हाथ मिलाने से भी काम चल सकता था, लेकिन वो इसे एक विशेष प्रतीकात्मकता देना चाहते थे। इस दौरान उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी ये सवाल पूछा। जवाहरलाल नेहरू खुद को सेक्युलर दिखाने में विश्वास रखते थे और शायद यही कारण रहा होगा कि जब लॉर्ड माउंटबेटन ने उनसे पूछा कि सत्ता हस्तांतरण की भारतीय परंपरा क्या है, तो उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा। उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालचारी से इस संबंध में प्रश्न किया, जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ रखते थे।

राजाजी तमिलनाडु से ताल्लुक रखते थे और भारतीय संस्कृति-सभ्यता को लेकर उनके ज्ञान का सभी सम्मान करते थे। उन्होंने सत्ता हस्तांतरण की प्रतीकात्मकता की समस्या का हल भी इतिहास में निकाला। चोल राजवंश में, जो भारत के सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक चलने वाला शासन था। उस समय एक चोल राजा से दूसरे चोल राजा को ‘सेंगोल’ देकर सत्ता हस्तांतरण की रीति निभाई जाती थी। ये एक तरह से राजदंड था, शासन में न्यायप्रियता का प्रतीक।

चोल राजवंश भगवान शिव को अपना आराध्य मानता था। इस ‘सेंगोल’ को राजपुरोहित द्वारा सौंपा जाता था, भगवान शिव के आशीर्वाद के रूप में। इस पर शिव की सवारी नंदी की प्रतिमा भी है। इसी तरह के समारोह और रिवाज की सलाह राजाजी ने दी, जिस पर नेहरू तैयार हो गए। इसके बाद राजाजी ने मयिलाडुतुरै स्थित ‘थिरुवावादुठुरै आथीनम’ से संपर्क किया, जिसकी स्थापना आज़ादी से 500 वर्ष पूर्व हुई थी। मठ के तत्कालीन महंत अम्बालवाना देशिका स्वामी उस समय बीमार थे, लेकिन उन्होंने ये कार्य अपने हाथ में लिया।
उन्होंने ‘सेंगोल’ के निर्माण के लिए ‘वुम्मिडी बंगारू चेट्टी’ के आभूषण निर्माताओं को दिया। ‘सेंगोल’ के ऊपर नंदी का होना शक्ति, न्यायप्रियता और सत्य का प्रतीक है। वुम्मिडी एथिराजुलू ने ‘सेंगोल’ के निर्माण के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि उनके पास ‘सेंगोल’ की ड्रॉइंग लाई गई थी। ये गोल था और साथ में एक पोल का आकार था। उन्हें काफी सावधानी और उच्च गुणवत्ता के साथ इसे बनाने को कहा गया और बताया गया कि ये बहुत ही महत्वपूर्ण जगह जाने वाला है।
उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के समय वो लोग इसका निर्माण करने में काफी खुश थे। समारोह के आयोजन के लिए महंत ने अपने शिष्य कुमारस्वामी, एक बड़े गायक और ‘नादसुर’ विशेषज्ञ को दिल्ली भेजा। 14 अगस्त, 1947 की रात को कुमारस्वामी श्रीला श्री कुमारस्वामी तम्बीरान ने ‘सेंगोल’ लॉर्ड माउंटबेटन को दिया। इसे जल से पवित्र किया गया था। इस दौरान तमिल संत ‘कोलारु पथिगम’ का गान किया गया, जो शैव कविता ‘थेवारम’ का हिस्सा है।
इसकी रचना तमिल कवि तिरुगन संबंदर ने की थी। संयासियों ने नेहरू को पीतांबर ओढ़ाया और मंत्रोच्चारण किया गया। इस दौरान जो पंक्ति पढ़ी गई, उसका अर्थ है – ‘हमारा आदेश है कि भगवान के अनुयायी राजा उसी तरह से शासन करेंगे, जैसे स्वर्ग के शासक।’ ये समारोह भारत के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से के संगम का भी प्रतीक बना। डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उस सामरोह में मौजूद थे। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘Time’ ने भी इस संबंध में खबर प्रकाशित की थी।

The Kashmir Files : कश्मीरी पंडितों से नेहरू ने कहा था – शेख अब्दुल्ला का साथ दो, या जहन्नुम में जाओ

‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ फिल्म अगर देखी है तो जरा इसे बनाने के पीछे लगी मेहनत और की गई रिसर्च को भी समझ लीजिए। अगर नहीं देखी है, तो ये सब जानने के बाद आप खुद देख आएँगे। फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री, अभिनेता अनुपम खेर, अभिनेत्री पल्लवी जोशी, निर्माता अभिषेक अग्रवाल और ‘ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा’ के अध्यक्ष सुरिंदर कौल की मौजूदगी में नई दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में फिल्म के पीछे की मेहनत और रिसर्च को एक डॉक्यूमेंट्री के रूप में पेश किया गया।

इसमें बताया गया है कि तमाम फतवों के बावजूद कैसे इस फिल्म के निर्माण को पूरा किया गया। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि जब कश्मीर में पंडितों के नरसंहार से जुड़ी मानवीय कहानियों से उनका परिचय हुआ, तब जाकर उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया। वीडियो में विवेक अग्निहोत्री अपनी पत्नी पल्लवी जोशी से ये चर्चा भी करते दिख रहे हैं कि ऐसा क्या है, जो अभी तक लोगों तक नहीं पहुँचा है और रिपोर्ट नहीं किया गया है।

कश्मीरी पंडित राजेंद्र कौल ने बताया कि ‘कश्मीर’ नाम इतना प्राचीन है कि महाभारत के समय में भी इसका उल्लेख मिलता है। वहीं सुरिंदर कौल का कहना है कि 1100-1200 ईस्वी तक वहाँ केवल हिन्दू ही रहा करते थे। भारत के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक ललितादित्य का शासनकाल था, जब भारत के अधिकतर हिस्सा उनके अंतर्गत आता था – ये भी बताया गया है। वहीं डॉक्टर राकेश कौल ने बताया कि कैसे कश्मीर के शाही राजा लोग हिन्दू थे, जिन्होंने अफगानिस्तान में शासन किया।

इसके बाद आक्रांता लोग आने लगे, जिन्होंने पहले मदद का दिखावा किया और फिर वहाँ कब्ज़ा करने लगे। इसी तरह शम्सुद्दीन ऐराकी भी ईराक से आया और उसने न सिर्फ जबरन धर्मांतरण किया, बल्कि कई मंदिरों को भी तोड़ा। उसने अपने आत्मकथा में भी लिखा है कि कैसे उसने कश्मीर में लोगों को मुस्लिम बनाया। विशेषज्ञ कहते हैं कि ये एक निरंतर नरसंहार है, जो कई वर्षों से हो रहा है और लगातार होता रहा। नब्बे के दशक से पहले भी ये हो रहा था।

इसी तरह एक विशेषज्ञ ने बताया कि कैसे कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला ने भाषण दिया था कि कश्मीरी पंडित स्वाभाविक रूप से ‘मुस्लिमों के दुश्मन’ हैं। उन्होंने कश्मीरी पंडितों की तुलना शैतान से कर दी। विशेषज्ञ के अनुसार, और जब कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने पहुँचा, जब नेहरू ने कहा – ‘ये तो शेख अब्दुल्ला का साथ दो, या जहन्नुम में जाओ।’ कश्मीरी समस्या के लिए ब्रिटिश को भी जिम्मेदार ठहराया जाता है, क्योंकि वो जहाँ भी गए वहाँ दिक्कतें खड़ी हो गईं।

इसी तरह जीवन ज़ुत्शी ने बताया कि पुराने कश्मीर के निवासी अथवा कश्मीरी पंडितों ने 1947 से ही घाटी को छोड़ना शुरू कर दिया था। इसी तरह बंसी पंडित ने बताया कि 1967 में वो कॉलेज में थे और तब एक लड़की थी, जिसका नाम परमेश्वरी था। उस नाबालिग हिन्दू लड़की का अपहरण कर के इस्लामी धर्मांतरण करा दिया गया था और ‘परवीन अख्तर’ नाम दे दिया गया। इसके बाद उसकी शादी एक मुस्लिम से कर दी गई। राज्य और केंद्र सरकार शांत रही।

वीडियो में बताया गया कि कैसे 700 पीड़ितों से विवेक अग्निहोत्री ने बातचीत की। वो खुद कार ड्राइव कर-कर के वहाँ पहुँचे और उनसे बातचीत की। पीड़ितों ने बताया कि कैसे मस्जिद में नमाज के बाद मुस्लिम भीड़ उग्र हो जाती थी। मुस्लिम लड़कों के दिमाग में हिन्दू घृणा भरी जाती थी। वो दाढ़ी बढ़ाने लगे। एक महिला ने बताया कि ये कश्मीरी लड़के भगवान शिव की प्रतिमा पर पेशाब कर देते थे। मोहन लाल रैना ने बताया कि एक पुजारी की हत्या हुई और उसके बाद उनके होठ सिल कर उन्हें एक पेड़ पर लटका दिया गया था।

वहीं सुनंदा वशिष्ठ ने बताया कि मुस्लिम परिवारों के 16-25 उम्र के बच्चे कट्टरपंथी बनने लगे थे। कश्मीर के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि उस समय ख़ुफ़िया सूचना मिली थी कि 100 कश्मीरी युवकों को पाकिस्तान ले जाकर ‘प्रशिक्षण’ दिया गया था। वहीं अंजलि रैना ने बताया कि रात के अँधेरे में बंदूक चलाने की प्रैक्टिस करते लोग दिखते थे। अनुपम खेर ने बताया कि कश्मीर में पंडितों से कहा जाता था कि अपनी कंट्री में जाओ, जबकि भारत के अंदर ही कश्मीर है।

इसी तरह एक पीड़िता मंजू काक कौल ने एक पुरानी घटना याद की, जब वो 7वीं-8वीं कक्षा में थीं। उन्होंने बताया कि तब एक कट्टरवादी ने उन्हें पकड़ के दीवार से टकरा दिया और अपने हाथ उनके शरीर पर फेरते हुए कहा – बहुत बकवास करती हो। इसी तरह सुनीता दरवेश कौल ने बताया कि कैसे एक लड़के ने उनसे कहा था कि हिन्दुओं को यहाँ मार डाला जाएगा। ये 1988 की घटना है। पाकिस्तान में कई आतंकी ट्रेनिंग कैम्प्स थे।

सुरिंदर कौल का कहना है कि 1988 आते-आते माहौल बदलने लगा था और JKLF की एक नोटिस में लिखा था कि हिन्दू इलाका छोड़ कर चले जाएँ। मधुसूदन कौल के एक हाथ की एक उँगली ही चली गई, आतंकियों की गोली से। ये भी याद दिलाया गया है कि कैसे जस्टिस गंजू की हत्या में यासीन मलिक ने अपना हाथ कबूल किया था। नवीन धार ने बताया कि छोटे-छोटे बच्चे पेट्रोल बम मार रहे थे और पत्थरबाजी कर रहे थे।

मस्जिदों से घोषणा की जाती थी – मुस्लिम बन जाओ, इलाका छोड़ दो या मरो। एक महिला ने बताया कि जब कश्मीर में उनके परिवार को पता चला कि मारने आ रहे हैं तो उनके दादा ने कहा कि अगर वो लोग आते हैं तो वो सबसे पहले अपनी ही पोती को मार देंगे। कश्मीर में उस समय महिलाओं के लिए डर का ये आलम था। बिट्टा कराटे ने कबूला भी था कि वो अपनी सगी बहन या माँ को भी मार देता, इस मकसद के लिए।

एक पीड़ित ने बताया कि उनके पिता को मार कर उनके शरीर के साथ ईंटें बाँध कर नदी में फेंक दिया गया था। अनुराधा नाम की एक महिला ने बताया कि किसी ने अपने पिता को नंगा नहीं देखा होगा, उन्होंने देखा है। उनके पिता के शरीर में कई गोलियाँ मारी गई थीं और पोस्टमॉर्टम के बाद ठीक से सिला भी नहीं गया था। नीरज साधु नामक एक महिला ने बताया कि उनका घर कश्मीर में था और माँ इसे काफी साफ़-सुथरा रखती थीं, ऐसे में वो दोबारा उस घर को गलत हालत में देख कर रो पड़ेंगी।

रेणु रैना नाम की महिला ने बताया कि एक सरदार जी जब कुछ लोगों को जा रहे थे, जब उनके पिता ने कहा था कि मुझे नहीं जाना है लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी यहाँ से निकल जाए। अभिनव रैना का कहना है कि अधिकतर टेंट में पड़े हुए थे। इसी तरह एक अन्य युवक ने बताया कि उनकी माँ ने अपने बचे-खुचे गहने बेच कर बच्चों को पढ़ाया। विशेषज्ञों की मानें तो 1 लाख घर वीरान हो गए, जो 35 बिलियन डॉलर (2.68 लाख करोड़) की संपत्ति होते हैं। इसी तरह, 3.3 लाख करोड़ रूपए की जमीनें वहाँ कश्मीरी पण्डितों से छीन ली गईं।

शिवानी नाम की एक लड़की का कहना है कि हमलोग अपने माता-पिता से पूछते हैं कि हमारा अपना शहर कहाँ है। उस समय आज़ादी के नारे लगते थे। पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तक इन कट्टरवादियों के कई आका बैठे थे। इसी तरह जनवरी 1989 का एक वाकया विजय कुमार गंजू ने सुनाया। उन्होंने बताया कि तब तत्कालीन प्रधानमंत्री से किसी पत्रकार ने कश्मीर को लेकर पूछा तो उन्होंने कहा कि स्थिति अच्छी नहीं है और हम भी चिंतित हैं, लेकिन हम क्या कर सकते हैं क्योंकि वो (फारूक अब्दुल्लाह) मेरे दोस्त हैं।

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‘जब कोई जलता है तो मवाद निकलता है’ – The Kashmir Files यही पूछता है – सच को स्वीकार करोगे या पर्दा डालने की र

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‘जब कोई जलता है तो मवाद निकलता है’ – The Kashmir Files यही पूछता है – सच को स्वीकार करोगे या पर्दा डालने की र

इस डॉक्यूमेंट्री में इस पर भी ध्यान दिलाया गया कि कैसे भारत की GDP कभी दुनिया का 40% हुआ करती थी, लेकिन आज़ादी आते-आते वो 2% पर आ गई। इसी तरह UN ने कश्मीर में हुई घटना को ‘Near Genocide (नरसंहार के करीब)’ बताया, जबकि ये नरसंहार की हर परिभाषा को पूरा करता है। कश्मीरी पंडितों को आशा है कि वो जल्द ही अपने घर जाएँगे। वो कहते हैं कि अनुच्छेद-370 को हटाने का मोदी सरकार का फैसला भारत की स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा फैसला है।

जब संसद में कांग्रेस ने बोस को बताया था ‘आतंकी’, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दे रहे सम्मान

आमतौर पर महात्मा गाँधी और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बीच तनाव और तल्खी भरे रिश्तों की चर्चा की जाती है। महात्मा गाँधी के सम्पूर्ण वांग्मय में नेताजी का सर्वप्रथम उल्लेख 1921 में आता है और आखिरी जिक्र उन्होंने अपनी मृत्यु से मात्र एक सप्ताह पहले सुभाष बाबू के जन्मदिन, यानी 23 जनवरी, 1948 को किया था। उस दिन एक प्रार्थना सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, “सुभाष बाबू बड़े देश-प्रेमी थे। उन्होंने देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी।”

जबकि महात्मा गाँधी ने इन्हीं नेताजी के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार से क्यों अनुबंध किया था, जिसका किसी गांधीवादी एवं कांग्रेस की तरफ से कोई खंडन नहीं किया गया। ये देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि गाँधी जैसे नेता अपने ही स्वतन्त्रता सेनानी के विरुद्ध दुश्मन से हाथ मिलाते हैं, जो इस बात को सिद्ध करता है कि वर्तमान कांग्रेस द्वारा पाकिस्तान और चीन की तरफदारी क्यों की जाती है। क्योकि यह चीज कांग्रेस को गाँधी से विरासत में मिली है। 

मुद्दा सिर्फ महात्मा गाँधी और नेताजी के बीच बनते-बिगड़ते रिश्तों का नहीं है, बल्कि यह एक सीख है। खासकर उन लोगों के लिए, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद महात्मा गाँधी के बताए रास्ते पर न सिर्फ चलने का निर्णय लिया बल्कि उसकी सार्वजनिक कसमें भी खाई थीं। एक नेता जो नेताजी के निधन के बाद सार्वजनिक मंच पर सहजता से उन्हें याद करता है और सभी तरह की कड़वाहट को दरकिनार कर उनकी तारीफ में कम-से-कम चार शब्द तो कहता है! तो क्या उनके अनुयायियों को भी इसी परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए था?

दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ। जब स्वतंत्रता के कुछ ही सालों के बाद देश की पहली लोकसभा का गठन हुआ तो वास्तविकता भी सामने आ गई। लोकसभा में 2 अगस्त, 1952 को कोल्हापुर-सतारा से निर्दलीय निर्वाचित सदस्य हनुमंतराव बालासाहेब खर्ड़ेकर ने एक सवाल पूछा था, “स्वतंत्रता का मंदिर कैसे बना है?” इसमें निश्चित रूप से गाँधी या नेहरू के रूप में गुंबद है। वे मार्गदर्शक, और प्रकाश-स्तंभ हैं, लेकिन स्वतंत्रता के मंदिर में दीवारें और स्तंभ भी होने चाहिए। अतः, दादाभाई नौरोजी, तिलक से लेकर सुभाष बोस तक, जैसे सभी स्तंभों को हमारे दोस्त भूल गए हैं।”

यह कोई साधारण बात नहीं थी कि मात्र चार सालों के अंतराल में ही तत्कालीन सरकारों पर क्रांतिकारियों अथवा स्वतंत्रता सेनानियों को भुला देने के आरोप लगने शुरू हो गए थे। ऐसा भी नहीं है कि नेहरू सरकार को समय-समय पर याद नहीं दिलाया गया हो। कुछ ही महीनों बाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 19 फरवरी 1953 को अंडमान द्वीप का नाम परिवर्तित कर उसे सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर ‘सुभाष-द्वीप’ रखने का सुझाव पेश किया, जिसे नेहरू सरकार ने एकदम अनदेखा कर दिया।

फिर 24 अप्रैल, 1953 को तालासेरी (तेलिचेरी) से लोकसभा सदस्य पी.एन. दामोदरन ने शिक्षा मंत्री से प्रश्न किया कि क्या स्वतंत्रता लेखन के इतिहास में सुभाष चन्द्र बोस और INA को शामिल किया जाएगा? सरकार की तरफ से इस प्रश्न का उत्तर के.डी. मालवीय द्वारा टालमटोल कर दिया गया। यह सिर्फ कुछ गिने-चुने मौके नहीं थे, बल्कि दर्जनों बार ऐसा हुआ कि देशभर से सुभाष चन्द्र बोस सहित अन्य क्रांतिकारियों को सम्मान देने के प्रस्ताव पेश किए गए लेकिन हर बार तत्कालीन सरकारों की तरफ से ‘जानबूझकर’ उदासीनता ही दिखाई गयी।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ पर नजर डालें तो क्रांतिकारियों की अनदेखी का प्रमुख कारण व्यक्तिगत एवं पक्षपाती ही ज्यादा नजर आता है। उस पुस्तक में उन्होंने सुभाष बाबू के कांग्रेस अध्यक्षीय कार्यकाल को मात्र आधे पन्ने में समेट कर बहुत ही नकारात्मक रूप से पेश किया है। जबकि अन्य कांग्रेस के अध्यक्ष विशेषकर अबुल कलम आजाद की दर्जनों बार तारीफ की गई है। जब इस पक्षपात को लेकर संविधान सभा के सदस्य, हरि विष्णु कामथ ने जवाहरलाल नेहरू से शिकायत की तो उन्होंने माफी माँगते हुए कहा कि पुस्तक के अगले संस्करण में वे इस गलती को ठीक करेंगे।

हालाँकि, न तो पुस्तक में और न ही सार्वजनिक जीवन में उन्होंने कभी इस गलती को ठीक किया। प्रधानमंत्री नेहरू की मृत्यु के बाद नेताजी को सम्मान दिलाने की कवायद ने दुबारा जोर पकड़ा। इस बार 3 दिसंबर, 1965 को हरि विष्णु कामथ ने ही लोकसभा सदस्य के नाते एक सविधान (संशोधन) अधिनियम पेश किया, जिसके अंतर्गत उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नाम ‘शहीद एवं स्वराज द्वीप समूह’ रखने का प्रस्ताव रखा। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर द्वीप का नाम सुभाष द्वीप भी किया जाता है तो भी कोई आपत्ति नहीं है।

इसी चर्चा के दौरान मधु लिमये ने कहा, “राष्ट्रपति भवन के सामने एक बड़ा चौड़ा राज पथ है। उसी राज पथ के एक कोने पर आज भी पंचम जॉर्ज की मूर्ति कायम है। यह कितनी शर्मनाक चीज है। अगर वहाँ पर सुभाष बाबू के नाम से प्रतिष्ठापना की जाती तो मैं कहता कि वाकई यह हमारे प्रजासत्तात्मक राज्य की राजधानी है, गुलामबाद नहीं है। लेकिन जब तक पंचम जॉर्ज की मूर्ति रहेगी और नेताजी सुभाष जैसे नेताओं की इज्जत नहीं की जाएगी तब तक मुझे कहना पड़ेगा कि आज भी हम गुलामबाद में रहते है और लोकसभा भी गुलामाबाद में बँटती है।”

हंगामा मचने के बाद पंचम जॉर्ज की मूर्ति को तो वहाँ से हटा दिया गया लेकिन नेताजी की मूर्ति वहाँ स्थापित नहीं की गई। एक के बाद एक कई दशक बीतते चले गए लेकिन किसी सरकार ने उस स्थान की सुध नहीं ली। अतः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उस स्थान पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा का अनावरण करना सुभाष बाबू के प्रति वह उचित सम्मान है जिसकी कई सालों से राह देखी जा रही थी। यही नहीं, इस बात का भी परिचायक है कि भारत अब सदियों पुरानी गुलामी की मानसिकता से बाहर आ रहा है।

सरकार के दबाव के चलते कामथ द्वारा विधेयक वापस ले लिया गया लेकिन 17 नवम्बर, 1972 को इस सम्बन्ध में एक अन्य संविधान (संशोधन) विधेयक पेश किया गया। कांग्रेस के सदस्य बिनॉय कृष्णा दासचौधरी ने उक्त विधेयक पेश करते हुए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नाम ‘शहीद एवं स्वराज द्वीप समूह’ रखने का प्रस्ताव रखा। विधेयक पर 1 दिसंबर 1972 को विस्तृत चर्चा के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के सदस्य झारखंडे राय ने कहा, “मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। यह इस सरकार (प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी) के ऊपर मेरा दूसरा आरोप है। पता नहीं क्यों पिछले पच्चीस सालों से इन लोगों ने क्रांतिकारी या दूसरे स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों का वह सम्मान नहीं किया जो करना चाहिए था।”

जब चर्चा आगे बढ़ी तो कांग्रेस (आई) के सदस्य राम गोपाल रेड्डी ने सुभाष चन्द्र बोस, श्री अरविन्द और विनायक दामोदर सावरकर को ‘आतंकवादी’ कहकर संबोधित कर दिया। उनके इस अपमानजनक शब्दों को लेकर विरोध हुआ तो रेड्डी ने कहा था, “मुझे उन्हें आतंकवादी कहने में कोई आपत्ति नहीं है।” इससे बड़ी क्या विडम्बना होगी कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों को सम्मान देना तो दूर, अब संसद के अंदर ही उन्हें आतंकवादी तक कहा जाने लगा था।

केंद्र सरकार द्वारा लगातार उपेक्षा और अपमान के बावजूद भी नेताजी को सम्मान दिलाने के प्रयासों में कभी ठहराव देखने को नही मिलता है। साल 1996-1997 में एक ‘अंडमान और निकोबार द्वीप विधेयक’ लोकसभा में पेश किया गया। इस दौरान भी द्वीप समूह के नाम को परिवर्तित करने की पेशकश की गयी लेकिन यह सपना यहाँ भी पूरा नहीं हो सका। आखिरकार, साल 2018 में जाकर वह दिन आया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के तीन द्वीपों का नामांकरण नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वीप, शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप किया। इस प्रकार उन्होंने तमाम दिवंगत लोकसभा सदस्यों की माँग को पूरा करने के साथ-साथ उस सपने को साकार किया जिसकी शुरुआत स्वयं नेताजी ने की थी।

“हँस के लिया पाकिस्तान कहने वाले सुनो ! “—-“नही मिलेगा हिंदुस्तान, जाना होगा पाकिस्तान"

श्यामसुंदर पोद्दार, उगता भारत              31जनवरी को सावरकर के घर की  तलाशी ली गयी। उनके 10 हज़ार पत्र पुलिस जब्त करके ले गई। 1 फ़रवरी 1948 से लेकर 5 फ़रवरी तक समस्त देश में हिन्दु महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का भीषण  दौर चला। जिस पर तनिक भी संदेह हुआ अथवा किसी कांग्रेसी को किसी साधारण व्यक्ति से अपना बैर चुकाना था तो उसको हिन्दूसभाई बनाकर बंदी बनवा दिया। इस प्रकार 25 हज़ार लोगों  को जबरन जेल में ठूँस दिया गया। उनमें बहुत से तो समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया।

हिन्दु महासभा के सर्वोच्च नेता व भारतीय राष्ट्रीय सेना के रूपकार वीर सावरकर जी को बिना किसी  कारण के 5 फ़रवरी 1947 को मुँह अंधेरे पुलिस की गाड़ी आई और पुलिस अधिकारी ने सावरकर जी से कहा “बम्बई  पब्लिक सिक्योरिटी मेजर्स ऐक्ट में आपको बंदी बनाया जा रहा है। इसके  पहले ४ फ़रवरी की रात्रि एक डॉक्टर ने आकर उनका निरीक्षण -परीक्षण किया तथा बता दिया कि सावरकर सब प्रकार से स्वस्थ हैं। जबकि विगत एक वर्ष से सावरकर क्षीण ज्वर व हृदय की पीड़ा से ग्रस्त थे। जिस समय डॉक्टर उनका निरीक्षण कर रहा था उस समय भी उनको ज्वर था। यह क़ानून तो नेहरू के उन गुंडों पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के 17,000 चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। 5 फ़रवरी 1948 से 23 मार्च 1948 तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के १७००० चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। ५ फ़रवरी १९४८ से २३ मार्च १९४८ तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
अंत में  11 मार्च 1948 को दिल्ली के मजिस्ट्रेट के आदेश से गाँधी वध षडयंत्र  में सावरकर को प्रमुख बता कर  उन्हें पुनः आर्थर रोड कारागार में लाया गया। उनकी ज़मानत की प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई। हाँ, उनके वकील श्री  देवधर को इस बात में सफलता  मिली कि उनकी पत्नी व पुत्र उनसे भेंट कर सकते हैं। उनके प्रयत्न से सावरकर अपने पुत्र को अपने घर के संचालन हेतु ” पावर आफ अटर्नी” देने में सफ़ल रहे।
“I want blood of Savarkar”: जवाहरलाल नेहरू 
24 मई 1948 सावरकर को दिल्ली लाया गया तथा लाल क़िले में अन्य अभियुक्तों के साथ बंदी बना कर रखा गया। सावरकर की ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त सम्पति महाराष्ट्र के गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने वापस करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि सावरकर ने पहले से भी गम्भीर अपराध किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में डॉक्टर अम्बेडकर को गाँधी हत्या में झूठा फंसाने का प्रतिवाद किया। नेहरू ने डॉक्टर अम्बेडकर से कहा “I want blood of Savarkar”। डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू को जवाब दिया कि तुम सावरकर का बाल बाँका भी नही कर सकते। डॉक्टर अम्बेडकर ने सावरकर के वकील से मिलकर कहा कि घबराओ नही, नेहरू ने सावरकर को झूठा फँसाया है। राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर भी 4 फ़रवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे तो इन 25 हज़ार क़ैद किये गये कार्यकर्ताओं में बहुसंख्यक हिन्दू महासभा के थे, पर राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के भी कम नही थे। जिनमें से  बाद में बहुत से छोड़ दिए गए। पर 500 स्वयंसेवकों को फिर भी बंदी बना कर रखा। संघ ने पटेल के कहे अनुसार अपना संविधान बनाने पर संघ पर से प्रतिबंध हटा दिया गया। पर हिन्दु महासभा के प्रति 1952 के चुनाव तक नेहरू -पटेल का शख़्त रवैया रहा। हिन्दु महासभा के सावरकर के अलावा सभी के सभी सर्वोच्च नेता यथा महंत दिग्विजयनाथ,आशुतोष लाहिरी,प्रोफ़ेसर  राम सिंह देशपांडे, निर्मल चंद् चटर्जी अन्य सारे ज़ैल में डाल दिए गए। क़ानून उनके पक्ष में था इसलिए वे अदालत से छूट जाते, पर उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया जाता। हिन्दु महासभा के कार्य कर्ताओं पर सरकार लाठी चार्ज करती। वे मिठाइयाँ बाँट रहे थे । सरकार के देश विभाजन जैसे ग़द्दारी पूर्ण कार्य का प्रतिवाद करने को वे घृणा फैला रहे थे। संघ का सामूहिक गीत पाठ भी अपराध था।

नेहरू के समान पटेल भी हिन्दू महासभा के मामले में समान दोषी हैं। पटेल नेहरू के हिन्दु महासभा पर किये जा रहे अत्याचारों में इसलिए साथ दे रहे थे क्योंकि नेहरू तो टेम्परेरी प्रधानमन्त्री था। बाद में तो पटेल को ही होना था। कांग्रेस अध्यक्ष जो चुना जायेगा, वही कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनेगा। नेहरू कॉंग्रेस का बहुत छोटा सा नेता था। उससे बड़े सरदार पटेल तो थे डॉक्टर राजेंद्र  प्रसाद,आचार्य कृपलानी नेहरू से कांग्रेस में बहुत बड़ा क़द रखते थे। अंग्रेजों ने गाँधी से साफ़ साफ़ कह दिया कि हम पटेल के हाथ में सत्ता नही देंगे, नेहरू के हाथ में देंगे। इस बात का खुलासा गाँधी ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक के एक प्रश्न के उत्तर में दिया था। एक मात्र नेहरू ही हमारे कैम्प  में अंग्रेजों का आदमी था ।(Nehru was the only Englishman in our camp). यदि राजगोपलाचारी पटेल की मृत्यु पर यह नही कहते पटेल को तो प्रधान मन्त्री बनना था। यानी नेहरू अस्थायी प्रधानमन्त्री था।
पटेल ने गाँधी वध के 28 दिन बाद नेहरू को 27 फरवरी 1948 के लिखे पत्र में लिखा कि इस कांड में सिर्फ़ दस आदमी संलिप्त हैं जिनमें से 8 पकड़ लिये गये हैं और 2 भागे हुवे हैं। तब पटेल से सवाल पूछता हूँ कि 25,000 हिन्दु महासभा व संघ के कार्यकर्ताओं को 1951 तक जेल में बंदी बना कर क्यों रखा? पटेल ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एरिक्वेस्ट वे दिल्ली में हिन्दु महासभा की कार्यकारिणिकी सभा बुलाना चाहते हैं। पटेल ने मना कर दिया। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 4 मई 1948 को पटेल को लिखे पत्र में सावरकर के बारे में लिखा कि ऐसा न हो , उनको मत विरोध के चलते दंडित किया जा रहा हो ? पटेल ने इसके उत्तर में 6 मई 1948 को जवाब दिया कि ऐसा कभी भी नही होगा। मैं स्वयं इस केस को देख रहा हूँ। मैंने साफ़ – साफ़ आदेश दे दिया है। सावरकर का गाँधी हत्या मामले में निष्कलंक बरी हो जाना व जज अतमाचरण का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। नेहरू-पटेल के मुँह पर ज़बरदस्त तमाचा है। नेहरू यही शांत नही हुए। सावरकर के लाल क़िला से निकलने को देखने के लिये ३ लाख हिंदू लाल क़िले पर इकट्ठे हो गए। नेहरू ने मजिस्ट्रेट के आदेश से लालक़िले के बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया ?

इतना ही नही कुछ घंटो बाद “Punjab Public Security Majors Act”उन पर लागू करके तीन मास तक उनके दिल्ली मे प्रवेश व निवास पर प्रतिबंध लगा दिया।गुपचुप  तरीक़े से रेल में सावरकर जी को बैठा कर नेहरू सरकार ने उन्हें बम्बई पहुँचाया।
उनके घर से निकलने पर  प्रतिबन्ध लगा दिया। कुछ समय बाद पंजाब पब्लिक सिक्यरिटी मेजर्स ऐक्ट लगा कर तीन महीने के लिये दिल्ली में रहने व प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। नेहरू सरकार गुप-चुप तरीक़े से रेल द्वारा इन्हें बम्बई पहुँचाई। 1949 कलकत्ता में  सम्पन्न हुए हिन्दू महासभा सम्मेलन में उमड़े जनसैलाब को देखकर नेहरू घबड़ा गया। 1950 में झूठा आरोप हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने के आरोप में बन्दी बना लिये गये। बेल में सरकार ने शर्त लगा दी कि आप राजनीति नही कर सकते। ब्रिटिश भारत में भी राजनीति करने पर प्रतिबंध। स्वाधीन भारत में भी प्रतिबंध। यही है नेहरू का गणतंत्र ? 1952 के चुनाव के कुछ महीना पहले  यह प्रतिबंध हटा। नाथूराम गोडसे सुभाष वादी था। इसलिए जिस समाचार पत्र का वह संचालन करता था उसका नाम अग्रणी था means Forward। वह पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे जुर्म प्रकाशित करता था। नेहरू-पटेल सरकार ने प्रेस सेन्सरसिप ऐक्ट कड़ाई से लागू कर रखा था, ताकि पाकिस्तान में चल रहे हिंदुओं का नरसंहार हिंदुस्तान के समाचार पत्रों में प्रकाशित न हो सके। नाथूराम गोडसे गाँधी को मारने दिल्ली नही आया था, उसके समाचार पत्र पर मोरारजी देसाई ने बड़ी पेनल्टी लगा दी थी। उसी की शिकायत गृहमंत्री से करने आया था। बाद में दिल्ली में पाकिस्तान से आये हिन्दुओं की हालत देख कर विचलित हो गया। उस हालत का एक मात्र ज़िम्मेदार गाँधी को मानकर गाँधी को मार डाला।     
नेहरू हिन्दु महासभा के साथ इतना करने पर भी कांग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त नही थे। जिन्ना ने स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि हिन्दु मुसलमानों की अदला बदली करो। हमारे पाकिस्तान में हम हिन्दुओं को रहने नही देंगे। नही करोगे तो नोवाखाली की तरह क़त्ले आम करेंगे । उसने जिन्ना की घोषणा अनसुनी कर दी। जिन्ना हिंदुओं का क़त्ले आम पाकिस्तान में आराम से करे हिंदुस्तान में प्रेस सेन्सर शिप लागू कर दी। जिन्ना ने 20 लाख हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान लगभग हिन्दु शून्य कर डाला। नेहरू-पटेल का 1952 में अपनी हिन्दु महासभा के सामने हार से भयभीत थे वे जानते थे कि 1945 में हिन्दु महासभा को 14 प्रतिशत वोट मिले थे जो कांग्रेस के हिंदुओं के साथ विश्वासघात के बाद हिन्दु महासभा को ही मिलने हैं।
इतना ही नही, भारत का विभाजन कराके पाकिस्तान बनाने वाली मुस्लिम लीग के नेता जिन्होंने ग्रेट कलकत्ता किलिंग, नोवाखाली हिन्दु किलिंग पंजाब उत्तर प्रदेस बम्बई हिन्दू किलिंग किया बची हुई मुस्लिम लीग को कांग्रेस में मिला दिया। उनके नेताओं को केंद्रीय मंत्री, राज्यों में मंत्री , गवर्नर और राजदूत बनाया।(साभार)

भारत : गांधी – नेहरू की छाया में

उगता भारत में श्री रवि शंकर का लेख बहुत ही आध्यात्मिक एवं मंथन योग्य है। उनका यह लेख देख कहीं गाँधी परिवार के कांटा न बन जाये, क्योकि सुना है आजकल यह परिवार ऑपइंडिया के सबक सिखाने की कोशिश में है। लेकिन शायद उनकी इन धमकियों से सिलसिला रुकने वाला नहीं। कांग्रेस नेताओं से लेकर इसके समर्थक तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चायवाला कह सकते हैं, लेकिन किसी में परिवार से यह पूछने का साहस नहीं कि शादी से पहले सोनिया(मानिओ)गाँधी क्या करती थीं? 
इतना ही नहीं उगता भारत ने अपने व्हाट्सअप पर जो मधु धामा ने लिखा है, वह भी गांधीवाद पर बड़ा प्रहार है। अगर वर्तमान सरकार और इतिहासकार महात्मा गाँधी और मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की सच्चाई सामने लाकर गांधीवाद के भ्रम से बाहर आकर अपने दिल-दिमाग से गांधीवाद को हमेशा के लिए निकाल देंगे। जब तक देश से गांधीवाद समाप्त नहीं होगा, साम्प्रदायिकता भी समाप्त नहीं हो सकती। क्योकि महात्मा गाँधी ही देश में तुष्टिकरण के जन्मदाता हैं।  
महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के लिए दो ऐसे नाम हैं, जिनके बिना आज कोई भी राजनीतिक चर्चा न तो प्रारंभ होती है और न ही समाप्त। एक देश के राष्ट्रपिता कहे जाते हैं और दूसरे राष्ट्रचाचा। दोनों ही व्यक्तित्वों को लेकर भरपूर विवाद भी समाज में प्रचलित है। समस्या यह है कि गाँधी और नेहरू को देश की सरकारों ने इतना महान बना कर रखा है कि इनकी आलोचना एक अपराध ही मान ली जाती है। स्थिति यहाँ तक भयावह रही है कि प्रसिद्ध लेखक वैद्य गुरुदत्त पंडित नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के 17 वर्षों का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं, ‘यह तानाशाही इतनी प्रबल थी कि उन सत्रह वर्षों में कोई भी इस तानाशाह की प्रशंसा के अतिरिक्त चर्चा नहीं कर सकता था। ऐसे लोग थे जो श्री नेहरू जी की नीतियों के दुष्परिणामों की सम्भावना प्रकट करते थे, परंतु उनके प्रशंसकों के कलरव में उनकी कोई सुनता ही नहीं था। लेखक को स्मरण है कि एक बार उसने नई दिल्ली में, एक व्याख्यान देते समय श्री नेहरू जी के कुछ एक कार्यों की व्याख्या करते समय यह कह दिया कि उन्होंने देश के साथ द्रोह किया है। इस पर अपने ही दल वाले लेखक की निन्दा करने लगे थे।’

उल्लेखनीय है कि वैद्य गुरुदत्त भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे और यह स्थिति भारतीय जनसंघ जैसे दल के लोगों की भी थी। यहाँ एक और बात उल्लेखनीय है कि वैद्य गुरुदत्त ने वर्ष 1966 में एक पुस्तक लिखी थी – जवाहरलाल नेहरू एक विवेचनात्मक वृत्त। इस पुस्तक को लिखने के लिए 1967 में उनसे पुलिस द्वारा पूछताछ की गई। उन पर मुकदमा चलाने की भी सरकार की कोशिश थी और उस समय इसकी खबरें भी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुईं। ऐसी भयानक स्थिति में महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू की निष्पक्ष समीक्षा करना कितना कठिनतम कार्य रहा होगा, यह सरलता से समझा जा सकता है। ऐसी घोर विषम परिस्थिति में भी वैद्य गुरुदत्त ने अत्यंत निर्भीकतापूर्वक इस काम को संपन्न किया और पुस्तक लिखी – भारत गाँधी नेहरू की छाया में।

इस पुस्तक को लिखने के उद्देश्य का वर्णन करते हुए गुरुदत्त ने पंडित नेहरू की नीतियों के कारण देश का पतन होने की बात करने के बाद लिखते हैं, ‘इस पर भी इस पुस्तक के लिखने की कुछ अधिक आवश्यकता न होती, यदि इस समय सत्तारूढ़ दल स्कूलों और कालेजों में निर्मल, सुकुमार और ग्रहणशील छात्र-छात्राओं के मन में नेहरू जी का मिथ्या चित्र बनाने का यत्न न कर रहा होता। इससे तो 1947 से आरम्भ हुआ ह्रास और भी द्रुत गति से चलने लगेगा। यह सम्भव है कि इस प्रकार भारत पहिले से भी अधिक भयंकर दासता की श्रृंखलाओं में बंध जाए।’ उनके इस वक्तव्य में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं। पहला यह कि सत्तारूढ़ दल सरकारी स्कूलों तथा कालेजों के माध्यम से नेहरू जी का मिथ्या चित्र बनाने में जुटा था। और दूसरी बात यह कि 1947 से देश का पतन प्रारंभ हुआ था, उत्थान नहीं। हम पाते हैं कि ये दोनों ही बातें अक्षरश: सही थीं, परंतु सरकारी शिक्षा में इसके ठीक विपरीत पढ़ाया जाता है।

महात्मा गाँधी को लेकर देश में कहीं अधिक मूढ़ता विद्यमान है। गाँधी को एक अवतारी पुरुष, विलक्षण महात्मा आदि आदि घोषित कर दिया गया है। गाँधीवाद नामक एक अलग विचारधारा चला दी गई है। देश में गाँधीवादियों की एक जमात तैयार हो गई है। यह अंधश्रद्धा इस हद तक फैली हुई है कि जैसा कि गुरुदत्त ने ऊपर नेहरू के लिए लिखा था, वैसा ही आज गाँधी के लिए हो गया है। सार्वजनिक रूप से गाँधी की आलोचना करना राजनीतिक रूप से आत्महत्या करने जैसा हो गया है। राष्ट्रीय स्तर पर गाँधी को यह स्थान प्रदान करने में जहाँ कांग्रेस की अहम भूमिका रही है जो कि उनके नाम पर सत्ता में आती रही है और आज भी नेहरू खानदान ने इनके नाम को धारण करके देश को एक प्रकार से भ्रम में रखने का प्रयास जारी रखा है, वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसमें ब्रिटिशों की भी भूमिका रही है, जिनके हित गाँधी से पूरी तरह सधते रहे हैं।

 इस अंधश्रद्धा के वातावरण में गाँधी की निष्पक्ष समीक्षा जाननी और समझनी हो तो वैद्य गुरुदत्त की यह पुस्तक अतुलनीय है। पुस्तक में कोई भी बात बिना संदर्भों के नहीं कही गई है। लेखक ने अपने निष्कर्ष अवश्य निकाले हैं, परंतु सारे तथ्यों को संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया है। संदर्भ भी लंबे-लंबे हैं, एक-दो पंक्तियों के नहीं, जिन्हें हम प्रसंग से कटा हुआ नहीं कह सकते। गुरुदत्त के साथ एक सकारात्मक बात यह भी रही है कि उन्होंने गाँधी और नेहरू के राजनीतिक जीवन को प्रत्यक्ष देखा है। वे उनकी राजनीतिक-सामाजिक यात्रा के प्रत्यक्षदर्शी और समदर्शी भी हैं। वे स्वयं भी राजनीतिक तथा सामाजिक रूप से सक्रिय रहे हैं और इस कारण इनके प्रभावों को अधिक गंभीरता तथा नजदीकी से देखा है।

वैद्य गुरुदत्त इस पुस्तक के माध्यम से देश को पतन के मार्ग में जाने से बचाना चाहते थे। उन्होंने अपने लंबे सामाजिक जीवन और गंभीर अध्ययन से यह अनुभव किया था कि नेहरू की नीतियाँ पूरी तरह अंग्रेजों के शासन के अनुरूप ही हैं और गाँधी अंग्रेजों का विरोध करते हुए भी नेहरू को ही शासन में बिठा रहे थे। इसप्रकार गाँधी अंग्रेजी नीतियों का विरोध करते हुए भी प्रकारांतर ने उसे ही स्थापित करने के लिए ही प्रयत्नशील भी थे। वैद्य गुरुदत्त ने गाँधी जी के स्वभाव तथा कार्यों की इन विसंगतियों की सप्रमाण व्याख्या की है। गुरुदत्त के विश्लेषणों में कहीं से भी दुराग्रह या पूर्वाग्रह नहीं झलकता। वे एक प्रवाह में बिना किसी व्यक्तिगत संलिप्तता के उनके कार्यों की समालोचना करते हैं। गाँधी के अनेक गुणों की उन्होंने प्रशंसा भी की है। वैद्य गुरुदत्त का मानना है और वह इस पुस्तक से भली भाँति स्थापित भी होता है कि देश पर गाँधी और नेहरू की छाया पडऩे से देश पतन की ओर अग्रसर हो रहा है। देश को पतन से बचाने और उसे उत्थान की ओर अग्रसर करने के लिए इस छाया से बाहर निकालना आवश्यक है।
गुरुदत्त ने अपने समकालीन लगभग सभी स्थापित विद्वानों तथा लेखकों की राय को इस पुस्तक में समुचित स्थान प्रदान किया है। चाहे वे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हों या आचार्य कृपलानी, मेहरचंद महाजन हों या वी एन गाडगिल। गाँधी और नेहरू के देशी-विदेशी विभिन्न जीवनियों के साथ-साथ उनके स्वयं के लिए ग्रंथों को भी इसमें भरपूर उद्धृत किया गया है। कुल मिला कर यह पुस्तक देश के सामाजिक विज्ञान के प्रत्येक छात्र-छात्राओं के लिए एक अवश्य पठनीय पुस्तक है। यह पुस्तक गाँधी और नेहरू के बारे में किए गए सरकारी प्रचार की सत्यता को सामने रखती है और आज के बुद्धिजीवी जिस निष्पक्षता की दुहाई देते हैं, उसे स्थापित करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
गांधी जी और आचार्य चतुरसेन
'बापू, यह हैं आचार्य चतुरसेन, महान इतिहासकार और लेखक,' 
जमनालाल बजाज ने महात्मा गांधी से चतुरसेन का परिचय कराते हुए आगे कहा, 'आपने कहा था ना नवजीवन के लिए संपादक चाहिए, यह सबसे योग्य पात्र हैं, इन्हें दे दीजिए यह कार्यभार।'
'नमस्ते बापू' आचार्य चतुरसेन ने गांधी जी का अभिवादन किया
'नमस्ते शब्द में वेदों की बू आती है, यह ठीक नहीं है।' गांधी जी बोले।
'जी,' आचार्य चतुरसेन आगे बोले, 'तो फिर राम—राम बापू।'
'देखे राम—राम बोलना हिन्दू—मुस्लिम एकता के लिए सही नहीं है।' गांधी जी ने फिर कहा।
'वंदेमातरम बापू।' आचार्य जी ने पुन: अभिवादन किया।
'नहीं वंदेमातरम् भी सही नहीं है, इसमें बुतपरस्ती की बू आती है। हमें आजादी चाहिए तो ऐसी भाषा का प्रयोग करना होगा, जिससे मुस्लिमों को ठेस न पहुंचे।'
'जय बापू।'
'हूं,' गांधी जी फिर आगे बोले, 'हम तुम्हें नवजीवन का संपादक बनाते हैं, एक हजार वेतन मिलेगा। सबकुछ तुम्हें ही करना होगा। मेरे नाम से लेख लिखने होंगे, न्यूज छापनी होंगी, मेरे भाषण लिखकर देने होंगे। और हां संपादक में मेरा नाम जाएगा, तुम किसी से यह नहीं कहोगे कि यह सब तुम करते हो।'
'बापू मैं सबकुछ करने को तैयार हूं, लेकिन संपादक में मेरा नाम जाना चाहिए, आपका नहीं।'
'नहीं यह नहीं हो सकता।' गांधी जी ने विरोध किया।
'तो फिर यह आचार्य चतुरसेन भी ऐसे स्वार्थी और तुष्टिकरण करने वाले को जीवन में कभी बापू नहीं कहेगा और तुम्हारे दर्शन आज के बाद नहीं करेगा।' कहकर आचार्य चतुरसेन चले गए।
आचार्य चतुरसेन ने जीवन में फिर कभी गांधी के दर्शन नहीं किए।
आचार्य चतुरसेन की आत्मकथा का एक अंश
प्रस्तुति : मधु धामा

68 सालों के बाद ‘वेलकम बैक एयर इंडिया… जेआरडी होते तो बेहद खुश होते’: रतन टाटा

एयर इंडिया की शुरुआत 1932 में जेआरडी टाटा ने की थी। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इसकी सेवाएँ बंद की गई थी। दोबारा 1946 में जब इसकी सेवा बहाल हुई तो नाम टाटा एयरलाइंस से बदलकर एयर इंडिया लिमिटेड हो गया। देश स्वतंत्र होने के बाद एयर इंडिया की 49 फीसदी भागीदारी सरकार ने ले ली थी। इसके बाद 1953 में इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

कर्ज में डूबी सरकारी एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया की घर वापसी की खबरों पर आधिकारिक मुहर लग गई है। स्पाइसजेट को पीछे छोड़ते हुए टाटा संस ने इसकी बोली जीत ली है। टाटा ग्रुप को एयर इंडिया की कमान मिली है। कंपनी ने सबसे बड़ी बोली लगाई। वित्त मंत्रालय के अधीन आने वाली डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) के सचिव तुहिन कांत पांडे ने बताया है कि मंत्रियों की समिति ने एयर इंडिया के लिए विजेता बोली को मंजूरी दी है। टाटा संस ने एयर इंडिया के लिए 18,000 करोड़ रुपए की विजेता बोली लगाई।

DIPAM के सचिव ने बताया कि एयर इंडिया के लिए टाटा ग्रुप ने 18,000 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी। एयर इंडिया का 15300 करोड़ रुपए का कर्ज टाटा चुकाएगी और बकाया 2700 करोड़ सरकार को देगी। एयर इंडिया पर 31 अगस्त तक 61,560 करोड़ रुपए का कर्ज था। इसमें 15300 करोड़ रुपए टाटा संस चुकाएगी, जबकि बाकी के 46,262 करोड़ रुपए AIAHL (Air India asset holding company) भरेगी।

तुहिन कांत पांडे ने कहा कि लेनदेन दिसंबर 2021 के अंत तक पूरी होने की उम्मीद है। डील में एयर इंडिया की जमीन और इमारतों सहित किसी भी नॉन एसेट (जैसे- भूमि और भवन) को नहीं बेचा जाएगा। कुल कीमत 14,718 करोड़ रुपए की ये संपत्ति सरकारी कंपनी AIAHL के हवाले कर दी जाएँगी। सरकार की शर्तों के मुताबिक सफल बोली लगाने वाली कंपनी टाटा को एयर इंडिया के अलावा सब्सिडरी एयर इंडिया एक्सप्रेस का भी शत प्रतिशत नियंत्रण मिलेगा। वहीं, एआईएसएटीएस में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पर कब्जा होगा।

एआईएसएटीएस प्रमुख भारतीय हवाईअड्डों पर कार्गो और जमीनी स्तर की सेवाओं को उपलब्ध कराती है। विनिवेश नियमों के मुताबिक टाटा को एयर इंडिया के घरेलू हवाई अड्डों पर 4,400 घरेलू और 1,800 अंतरराष्ट्रीय उड़ान के लैंडिंग की मंजूरी मिलेगी।

एयर इंडिया की करीब 68 साल बाद घर वापसी पर समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने रतन टाटा ने इमोशनल पोस्ट किया है। ‘वेलकम बैक, एयर इंडिया’ का ट्वीट करते हुए उन्होंने एक नोट भी अटैच किया है। साथ ही 1932 में इस विमानन सेवा की शुरुआत करने वाले विजनरी बिजनेसमैन जेआरडी टाटा का एयर इंडिया के साथ एक फोटो भी शेयर किया है।

रतन टाटा ने अपने पोस्ट में कहा है, “एयर इंडिया का बोली जीतना टाटा ग्रुप के लिए काफी अच्छी खबर है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि एयर इंडिया को फिर से खड़ा करने के लिए मेहनत की जरूरत होगी। उम्मीद है कि यह फैसला एविएशन इंडस्ट्री में टाटा ग्रुप की मौजूदगी के लिए एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराएगा।”

उन्होंने लिखा है कि एक समय था जब जेआरडी के नेतृत्व में एयर इंडिया दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित एयरलाइंस थी। टाटा के पास मौका है कि एयर इंडिया को ये पहचान दोबारा दिलाए। यदि आज जेआरडी टाटा होते तो बेहद खुश होते। उन्होंने कहा कि वे सरकार के भी शुक्रगुजार हैं कि उसने हाल में कई इंडस्ट्री को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोलने की नीति अपनाई है।

नेहरू गांधी का भारत और भारत का तेजस्वी राष्ट्रवाद

डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत

देश के वीर क्रांतिकारियों और महान योद्धाओं के अनेकों बलिदानों के बाद जब 15 अगस्त 1947 को हमें आजादी मिली तो गांधी के ‘आशीर्वाद’ से देश का पहला प्रधानमंत्री बनने का ‘सौभाग्य’ पंडित जवाहरलाल नेहरू को मिला। देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तब आधी रात को मिली आजादी की पावन घड़ी में देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा था – “कई साल पहले (यहां पर नेहरू जी का संकेत 26 जनवरी 1930 को पंजाब में रावी नदी के किनारे ली गई उस शपथ की ओर है जब उन्होंने अपने अनेकों साथियों के साथ मिलकर कांग्रेस के अब तक के रास्ते से अलग हटकर देश को पूर्ण स्वाधीनता दिलाने का संकल्प व्यक्त किया था, कहने का अभिप्राय है कि उनके इस संकल्प से पहले हमारे जिन क्रांतिकारी योद्धाओं ने देश को पूर्ण स्वाधीनता दिलाने का संकल्प लेकर अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान दिया था, उन वीर योद्धाओं का वह संघर्ष और उनकी बलिदानी भावना नेहरू जी के लिए कोई मायने नहीं रखती थी) हमने भाग्य को बदलने का प्रयास किया था और अब वो समय आ गया है, जब हम अपनी प्रतिज्ञा से मुक्त हो जाएंगे। पूरी तरह से नहीं लेकिन ये महत्वपूर्ण है। आज रात 12 बजे जब पूरी दुनिया सो रही होगी ,उस समय भारत स्वतंत्र जीवन के साथ नई शुरूआत करेगा।”

अपने इस भाषण में नेहरू जी ने देशवासियों को यह संकेत दिया था कि अब भारत स्वाधीन है और आज से हम नई जिंदगी की नई शुरुआत कर रहे हैं। हमारे सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं, बहुत सारे संकल्प हैं, बहुत सारे सपने हैं और बहुत सारे अरमान हैं। जिन्हें हम सामूहिक रूप से पूर्ण करने का प्रयास करेंगे। नेहरू जी के इन शब्दों का अर्थ यदि यही था तो उनके इन शब्दों से ऐसा लग रहा था जैसे उनके भीतर एक राष्ट्र बोल रहा था । समग्र राष्ट्र की चेतना उनमें एकाकार हो गई थी। उनके भाषण की इन पंक्तियों से लोगों को लगा था कि नेहरू ‘बेताज के बादशाह’ के रूप में उनके सपनों, अरमानों और संकल्पों को पूर्ण करेंगे। तब देश को लगा था कि आजादी की यह नेमत यदि देश को मिली है तो इसमें केवल गांधी और नेहरू का योगदान है।

नेहरू के भाषण की इन पंक्तियों से ही देश में ‘गोदी मीडिया’ का ‘शुभारंभ’ हो गया था। ‘गोदी मीडिया’ का अर्थ है – जो शासक वर्ग की चापलूसी करती हो और सच को सामने न आने देने का संकल्प लेकर अपना कार्य व्यवहार संपादित करती हो। इसके साथ ही जिसे सत्ता का वरदहस्त भी प्राप्त हो। 
इसी गोदी मीडिया ने नेहरू जी के शब्दों का महिमामंडन करते हुए नई सुबह, नई उम्मीद, नई शुरुआत का इतना गुणगान किया था कि भारत को ही नहीं, सारे संसार को ऐसा लगा था कि भारत अब आसमान की ऊंचाइयों को छूने ही वाला है। यहीं से भारत की राजनीति में नेताओं का बड़बोलापन आरंभ हुआ। जिन्होंने भाषण के माध्यम से लोगों को ऊंचे – ऊंचे सपने दिखाने आरंभ किए। दुर्भाग्य से नेहरू के शब्दों में जिस नियति को हमने उस समय प्राप्त किया था, नेताओं की बदनियति के चलते वह हमारे लिए दुर्भाग्य का कारण बन गई। क्योंकि आज तक नेताओं का बड़बोलापन, झूठे वचन पत्र , झूठे शपथ पत्र, झूठे घोषणा पत्र देने का खेल यथावत जारी है।
गोदी मीडिया ने तत्कालीन किसी भी कांग्रेस नेता से यह नहीं पूछा कि भारत स्वतंत्र अथवा गणतंत्र? अगर गणतंत्र है तो क्यों? नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध हुए अनुबंध पर गाँधी ने किस हैसियत से हस्ताक्षर किए? उस अनुबंध में क्या लिखा था? देखिए PTI उपरोक्त क्लिपिंग। और इस अनुबंध पर आज तक कोई चर्चा नहीं, क्यों? जो चिंता का विषय है।
 
नेहरू के भाषण ने भारत के लोगों में इस भ्रम को मजबूती से फैला दिया कि देश को यदि आगे बढ़ा सकते हैं तो केवल नेहरू ही बढ़ा सकते हैं। उसी का परिणाम यह हुआ कि नेहरू जी 1952, 1957 और 1962 के आम चुनावों में विजयी हुए।
नेहरू ने अपने भाषण में कहा- “ये ऐसा समय होगा जो इतिहास में बहुत कम देखने को मिलता है।पुराने से नए की ओर जाना, एक युग का अंत हो जाना, अब सालों से शोषित देश की आत्मा अपनी बात कह सकती है।” उन्होंने कहा कि यह संयोग है कि हम पूरे समर्पण के साथ भारत और उसकी जनता की सेवा के लिए प्रतिज्ञा ले रहे हैं।इतिहास की शुरुआत के साथ ही भारत ने अपनी खोज शुरू की और न जाने कितनी सदियां इसकी भव्य सफलताओं और असफलताओं से भरी हुई हैं।
उन्होंने कहा कि समय चाहे अच्छा हो या बुरा, भारत ने कभी इस खोज से नजर नहीं हटाई, कभी अपने उन आदर्शों को नहीं भुलाया जिसने आगे बढ़ने की शक्ति दी. आज एक युग का अंत कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ भारत खुद को खोज रहा है. आज जिस उपलब्धि की हम खुशियां मना रहे हैं, वो नए अवसरों के खुलने के लिए केवल एक कदम है. इससे भी बड़ी जीत और उपलब्धियां हमारा इंतजार कर रही हैं। क्या हममे इतनी समझदारी और शक्ति है जो हम इस अवसर को समझें और भविष्य में आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करें?
जवाहर लाल नेहरू ने अपने भाषण के दौरान कहा था कि भविष्य में हमें आराम नहीं करना है और न चैन से बैठना है बल्कि लगातार कोशिश करनी है। इससे हम जो बात कहते हैं या कह रहे हैं उसे पूरा कर सकें। भारत की सेवा का मतलब है करोड़ों पीड़ितों की सेवा करना. इसका अर्थ है अज्ञानता और गरीबी को मिटाना, बीमारियों और अवसर की असमानता को खत्म करना. हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही इच्छा रही है कि हर आंख से आंसू मिट जाएं।
उन्होंने कहा- शायद यह हमारे लिए पूरी तरह से संभव न हो पर जब तक लोगों की आंखों में आंसू हैं और वो पीड़ित हैं तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा और इसलिए हमें मेहनत करना होगा। जिससे हम अपने सपनों को साकार कर सकें। ये सपने भारत के लिए हैं, साथ ही पूरे विश्व के लिए भी हैं। आज कोई खुद को बिलकुल अलग नहीं सोच सकता क्योंकि सभी राष्ट्र और लोग एक दूसरे से बड़ी निकटता से जुड़े हुए हैं। जिस तरह शांति को विभाजित नहीं किया जा सकता, उसी तरह स्वतंत्रता को भी विभाजित नहीं किया जा सकता। इस दुनिया को छोटे-छोटे हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता है। हमें ऐसे आजाद महान भारत का निर्माण करना है जहां उसके सारे बच्चे रह सकें।
नेहरू ने कहा था आज सही समय आ गया है, एक ऐसा दिन जिसे भाग्य ने तय किया था और एक बार फिर सालों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और आजाद खड़ा है। हमारा अतीत हमसे जुड़ा हुआ है, और हम अक्सर जो वचन लेते रहे हैं उसे निभाने से पहले बहुत कुछ करना है। लेकिन फिर भी निर्णायक बिंदु अतीत हो चुका है, और हमारे लिए एक नया इतिहास शुरू हो चुका है, एक ऐसा इतिहास जिसे हम बनाएंगे और जिसके बारे में और लोग लिखेंगे।
पंडित नेहरू ने कहा था कि ये हमारे लिए एक सौभाग्य का समय है, एक नए तारे का जन्म हुआ है, पूरब में आजादी का सितारा. एक नई उम्मीद का जन्म हुआ है, एक दूरदर्शिता अस्तित्व में आई है. काश ये तारा कभी अस्त न हो और ये उम्मीद कभी धूमिल न हो। हम हमेशा इस आजादी में खुश रहें. आने वाला भविष्य हमें बुला रहा है।”
पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के इस भाषण पर यदि ध्यान दिया जाए तो पता चलता है कि उन्होंने आजाद भारत के अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री के रूप में भारतीय धर्म ,संस्कृति और इतिहास के संरक्षण की कोई बात नहीं कही। उन्होंने भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की गरिमा पर भी कोई शब्द बोलना उचित नहीं माना था। वे नहीं चाहते थे कि भारत की नई पारी वैदिक धर्म की मान्यताओं को अपनाकर और भारत को विश्व गुरु बनाने के संकल्प को लेकर  आगे बढ़े। वे अपने भाषण में विश्व गुरु भारत की संकल्पना को भी व्यक्त नहीं कर पाए थे अर्थात वह विश्व राजनीति में भारत को ब्रिटेन या अपनी पसंद के देशों का पिछलग्गू बनाए रखने में ही देश का भला देखते थे। यदि देश का प्रधानमंत्री उस समय यह संकल्प व्यक्त करता कि हम विश्व गुरु रहे हैं और फिर विश्वगुरु बनने के लिए आज उठ खड़े होकर आगे बढ़ने का संकल्प व्यक्त कर रहे हैं तो बात दूसरी होती। तब देश दब्बू राष्ट्र न बनकर दबंग राष्ट्र के रूप में अपना अभियान आरंभ करता। यदि नेहरू भारत को विश्व गुरु बनाने का संकल्प व्यक्त करते तो यह बुरी बात नहीं होती। क्योंकि जो अमेरिका कभी ब्रिटेन का गुलाम रहा था उसने भी  अपनी आजादी के समय अपने तत्कालीन नेतृत्व के माध्यम से आगे बढ़ने का संकल्प व्यक्त करते हुए अपने आपको विश्व शक्ति के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया था, जो उसने बहुत जल्दी प्राप्त कर लिया था।
तेजस्वी राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण में नेताओं का मनोबल और आत्मबल राष्ट्र का मनोबल और आत्मबल माना जाता है। यदि नेतृत्व अपनी बातों को कहने में संकोच करता है या मुँह छिपाता है तो तेजस्वी राष्ट्रवाद का निर्माण संभव नहीं है और यदि अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं से भी नेतृत्व मुंह फेरता है तो भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना को साकार नहीं किया जा सकता। बस, यही कारण रहा जिसके चलते हम नेहरू गांधी के भारत को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और तेजस्वी राष्ट्रवाद की अवधारणा के साथ संकल्पित नहीं कर पाए।

आठ अगस्त 2021 यादगार बनेगा क्यों?

सोशल मीडिया पर कुछ समय से जनता से 8 अगस्त के आंदोलन में भागीदारी की अपेक्षा की जा रही है। इस आंदोलन के सफल होने से जनता में जाग्रति आने से देश में तुष्टिकरण एवं छद्दम सेकुलरिज्म का नंगा नाच खेलने वालों की नींद ही नहीं रोटी भी हराम हो जाएगी। पहली बार कोई सकारात्मक आन्दोलन आजाद भारत में शुरु होने की आहट हुई है! संभावनाएं व्यक्त की जा रही कि यह आंदोलन भारत की राजनीती को नया आयाम देने का प्रयास किया जा रहा है। 

इससे जवाहरलाल नेहरू और मोहन दास करम चन्द गाँधी की कुछ नई तस्वीर सामने आयेगी जो आज तक मीडिया के सहयोग से जनता से छुपाकर रखा गया है। इतना ही नहीं, बंटवारे के समय हुए कत्लेआम और 1984 के सिख दंगों लेकिन गाँधी हत्या के बाद चितपावन ब्राह्मणों के हुए भयंकर नरसंहार की जाँच की मांग आज तक नहीं हुई, क्यों?

जब उधम सिंह ने जलिआंवाला बाग़ का बदला लेने लंदन जाकर जनरल डायर की हत्या करने पर महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से शहीद उधम सिंह के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल किया था? क्यों नहीं मीडिया ने इस पर कभी चर्चा की? स्वतंत्रता संग्राम से महात्मा गाँधी ने आंदोलन चलाए, जो सफल ही नहीं हुए। गाँधी द्वारा नमक आंदोलन शुरू होने पर नमक की कीमतों में एकदम उछाल आ गया, क्या कीमतें बढ़ाने के लिए आंदोलन किया गया गया था? इस पर क्यों नहीं चिंतन किया गया? 

पहली बार देश के पुराने कानूनों को हटाकर, नए न्यायपूर्ण, राष्ट्रीय कानूनों को अमल में लाने हेतु  राष्ट्रवादी - बुद्धिजीवी - संस्कृतिप्रेमियों द्वारा संचालित एक देशव्यापी आंदोलन को जानने हेतु आपका अपना अमूल्य समय निकालिए। 

राष्ट्रीय पहल

सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रवादी, हिन्दूवादी वरिष्ठ वकील श्री अश्वीनी उपाध्याय 8 अगस्त 2021 को दिल्ली मे पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ की टीम के साथ उन पुराने ओर अंग्रेजो के द्वारा बनाए गए 200 काले ओर घटिया कानूनों को बदलने ओर हटाने के लिए आंदोलन करने जा रहे है जिनको बनाकर अंग्रेजो ने इस देश को लुटा था, इस देश की सनातन संस्कृति,शिक्षा पद्धति (गूरुकुल) को नष्ट किया था ओर अंग्रेजों के बाद इन घटिया कानूनों के द्वारा कांग्रेसी, वामपंथी, कम्युनिस्ट और अलगाववादी जैसी राष्ट्रविरोधी सरकारों ने इस देश को लूटा, देश का इतिहास बदला ओर इन कमजोर कानूनों की मदद से ही ये सारे राष्ट्रविरोधी राजनीतिक दल अब तक देश के खिलाफ षडयंत्र कर रहे हैं !

हिंदुओं का धर्मांतरण कर रहे हैं, इन कानूनों की वजह से ही देश का हिंदू देश में ही केरल, कश्मीर, बंगाल जेसे राज्यों से पलायन करने को मजबूर हुआ और इन राज्यो मे हिंदु ओर हिन्दू संस्कृति कमजोर हो गई या नष्ट हो गई इस आंदोलन में अश्विनी उपाध्याय जी के साथ देश के उच्च शिक्षित ओर उच्च पदों पर सेवा दे चुके लोग शामिल है जो राष्ट्र को बचाना चाहते हैं।

घुसपैठियों को भगाना चाहते है, हिन्दू सनातन संस्कृति की रक्षा करना चाहते है, जिहाद, आतंकवाद की समस्या को जड़ से खत्म करना चाहते है।

सर्वश्री - 

1.जनरल GD बक्क्षी (पुर्व आर्मी आफिसर)

2.कर्नल RSN सिंह (पुर्व RAW आफिसर)

3.सूशील पंडित(1990 के पीड़ित कश्मीरी पंडितों के नेता)

4.विष्णु शंकर जैन(सुप्रीम कोर्ट मे राम मंदिर के पक्षकार)

5.देवदत्त मांझी (बंगाल के राष्ट्रवादी हिन्दूवादी नेता)

6.अंकुर शर्मा (जमु कश्मीर के राष्ट्रवादी नेता)

7.आध्यात्मिक गुरु पवन सिन्हा

8.प्रोफेसर कपिल कूमार (दिल्ली मे सुभाषचंद्र बोस का म्यूजियम बनाने वाले)

9.ललित अम्बरदार (1990 के पीड़ित कश्मीरी पीड़ित)

10.नीरज अत्री (देश मे कांग्रेस ओर कम्युनिस्टों के बनाए गए  education system को उजागर करने वाले

11.विक्रम सिंह(उ.प्र के पुर्व DGP)

12.RVS मणि(केंद्र सरकार मे पुर्व officer)

13.यति नरसिंहानंद सरस्वती जी (डासना मंदिर विवाद मे जिहादियों का विरोध करने वाले)

14.कालीचरण महाराज

15.captain सिकंदर रिजवी(पाक अधिकार वाले कश्मीर प्रांत गिलगित बाल्टिस्तान के नेता)

16.अभिनेता पूनीत  इस्सर (महाभारत के दूर्योधन)

17.वसीम रिजवी(कुरान की 26 आयतो के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाले) 

18. एन.के सूद (पुर्वRAW officer) 

19.मेजर गौरव आर्य(पुर्व indian army officer) 

20. विवेक अग्निहोत्री (फिल्म निर्माता, निर्देशक) 

ओर भी राष्ट्रवादी, राष्ट्रप्रेमी लोग इस आंदोलन का हिस्सा है, आयोजक है, संयोजक है !!

संभवतः 1947 के बाद ये देश का पहला ऐसा आंदोलन होगा जिसमे राष्ट्रीय चेतना होगी ओर देशभक्त लोग शामिल होगे अभी तक देश मे बडे़ आंदोलन(CAA एवं NRC के खिलाफ शाहीन बाग ओर किसान आंदोलन)राजनीतिक स्वार्थ के लिए ओर राष्ट्र को तोड़ने के लिए गद्दारों ने दुश्मन देशों की मदद से किए है पर यह पहला आंदोलन है जो राष्ट्रहित मे, हिन्दूधर्म के हित मे ओर भारतीय संस्कृति के हित में है और 2011 के अन्ना हजारे के आंदोलन की तरह गुमराह नही होगा !

1.भारत के 9 राज्यों मे हिन्दू 10% से कम हो चुके है वहा दुश्मन देशों के दलाल सरकार चला रहे है !

2. कांग्रेस ने 2006 मे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ जाकर अप्लसंख्यक आयोग बनाया जो इन गद्दारो को कई तरह की सुविधा देता है !

3. वक्फबोर्ड जमीन का कानून जिसके कारण ही मथुरा मे कृष्णजन्म भुमि पर ईदगाह बन गई !

4.मदरसो के मोलवी ओर जमातियो को वजीफा, पेंशन आदि दिया जा रहा है ।

5.हिन्दूमंदिरों के चढ़ावे, पैसे पर देश की सरकार का कब्जा है सरकार ये पैसा हिन्दू समाज के लिए उपयोग नही करती जबकि मस्जिदों का चढ़ावा, पैसा मुस्लिम समाज के लोगों के लिए ओर उनकी धार्मिक गतिविधियों के लिए ही उपयोग होता है ओर आप जानते ही हो ये गतिविधियां किस प्रकार की हैं ? क्यों नहीं, उस धन को मौलवियों के वेतन पर खर्च होता? 

ये तो हुए वो मुद्दे जो हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति के खिलाफ है इनके अलावा ओर भी बहुत से कानून नियम हिन्दू धर्म के विरोध मे है

और अब वे कमजोरियाँ, वे मुद्दे और कानून जो देश को खोखला कर रहे है !!

6. करोड़ों रुपये का घोटाला करने के बाद भी किसी नेता को सिर्फ 7 साल की सजा क्यों ?

7. भारत मे ही घुसपैठ क्यों हो रही है अमेरिका, चीन, इजराइल और फ्रांस मे क्यो नही ?

8.लगभग 9 राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो चुका है उसे अल्पसंख्यक का दर्जा ओर अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सुविधाएं नही मिल रही क्यों ?

9. देश मे मुसलमानों को अपने धर्म की शिक्षा ओर धार्मिक ग्रंथ कुरान को पढा़ने की अनुमति है पर हिन्दूओ को नही क्यों ?

10. देश मे मिलावटखोरो के लिए भी 7 साल की सजा, बलात्कारियों के लिए भी 7 साल की सजा, धर्म परिवर्तन करवाने वालो के लिए भी 7 साल की सजा, देश से गद्दारी करने वाले के लिए भी 7 साल की सजा, करोड़ों रुपये का घोटाला करने वालो के लिए भी 7 साल की सजा ओर तो ओर कई मामलो मे देश पर हमला करने वाले, देश के खिलाफ षड्यंत्र करने वाले को भी 7 साल की सजा ही मिलती है क्यों ?

देश की सारी समस्याओं की जड़ इस तरह के लगभग 200 से ज्यादा कानून है जो अंग्रेज़ों ने कई वर्षों पहले अपने हिसाब से देश को लुटने के लिए बनाए थे इनको बदलना हटाना बहुत आवश्यक है अभी सरकार भी देश के अनुकूल है अगर 100 करोड़ हिन्दूओ मे से 50 करोड़ हिन्दू भी अपने राष्ट्र के लिए, अपने धर्म के लिए चिंतित है ओर उनमे से 10% यानि 5 करोड़ लोग भी अगर 8 अगस्त को दिल्ली पहुँच जाते है तो सरकार को आपकी बात, आपकी मांगे माननी ही होगी

ये आंदोलन के आयोजक ओर कार्यकर्ता वो लोग है जो इस देश की सरकारी सेवाओ (सेना,खुफिया एजेंसी, पुलिस शिक्षा,ब्युरोक्रेसी) मे रह चुके है और इसलिए ये लोग सब जानते है इसलिए इनका साथ दीजिये