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भारत के मुस्लिमों को साथ नहीं ले जाना चाहता था जिन्ना, अनशन और RSS को रोक कर गाँधी-नेहरू ने सफल किया उसका प्लान: पाकिस्तानी विश्लेषक ने बताया मजहब के नाम पर बना मुल्क कैसे बचा

                                                                                                                                 साभार - एआइ
जिस सच्चाई को छुपाकर कांग्रेस देश में हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच नफरत के बीज बो कर सत्ता पर काबिज रही, अब सामने आनी शुरू हो गयी है। पाकिस्तान बनने की सच्चाई बताने वालों को भारत के छद्दम धर्म निरपेक्ष साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और हिन्दू-मुस्लिम एकता का दुश्मन बताकर देश को गुमराह करते रहे। हकीकत में सबसे बड़े 
साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और हिन्दू-मुस्लिम एकता का दुश्मन ये ही लोग हैं। पाकिस्तान के लिए छाती पीटने वाले मुसलमानों को अब अपना सिर धुनना चाहिए और कांग्रेस और वामपंथियों को कटघरे में खड़ा करना चाहिए।       

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें पाकिस्तानी-स्वीडिश लेखक और राजनीतिक विश्लेषक इश्तियाक अहमद यह दावा कर रहे हैं कि 1947 में भारत के बंटवारे के समय महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने न केवल पाकिस्तान को बचाया, बल्कि गाँधी  ने इसके लिए अपनी जान तक गंवा दी।

वीडियो में अहमद कहते हैं कि अगर गाँधी और नेहरू ने हस्तक्षेप न किया होता तो भारत से करीब 3.5 करोड़ मुस्लिम पाकिस्तान चले जाते, जिससे नव-निर्मित पाकिस्तान पूरी तरह ढह सकता था क्योंकि उस समय पाकिस्तान की कुल आबादी ही सिर्फ 3.39 करोड़ थी और हालात इतने खराब थे कि लिखने के लिए कागज तक नहीं था, संसाधनों की तो बात ही छोड़ दीजिए।

उनका कहना है कि गाँधी ने दिल्ली में दंगे रोकने के लिए आमरण अनशन किया और मुस्लिमों की सुरक्षा सुनिश्चित की, जबकि नेहरू ने आरएसएस और हिंदू महासभा जैसी ताकतों को मुस्लिमों को जबरन निकालने से रोका। इस वजह से करोड़ों मुस्लिम भारत में ही रुक गए।

अहमद ने यह भी कहा कि जिन्ना खुद नहीं चाहते थे कि भारत के मुस्लिम पाकिस्तान आएँ, बल्कि वे चाहते थे कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख भारत चले जाएँ, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें वहाँ टिकने नहीं दिया और जबरन निकाला, जिससे भयंकर हिंसा हुई, खासकर पंजाब, सिंध और बंगाल जैसे इलाकों में।

अहमद ने आगे बताया कि बिहार से लगभग 50 लाख मुस्लिम पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश चले गए, लेकिन इसके बावजूद करीब 3 करोड़ मुस्लिम भारत में ही रह गए, जो गाँधी और नेहरू की नीतियों के बिना संभव नहीं था।

उन्होंने कहा कि अगर ये 3 करोड़ लोग भी पाकिस्तान चले जाते तो देश एक गंभीर जनसंख्या संकट में घिर जाता और संभवतः बिखर जाता। अहमद ने डॉ भीमराव अंबेडकर का भी ज़िक्र किया, जिन्होंने उस समय जनसंख्या की पूरी अदला-बदली की वकालत की थी और चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो पाकिस्तान को भविष्य में समस्याएँ झेलनी पड़ेंगी।

अहमद का साफ कहना है कि गाँधी और नेहरू ने जो किया, उससे न सिर्फ भारत में मुस्लिमों को सुरक्षा मिली, बल्कि पाकिस्तान को भी उस वक्त की सबसे बड़ी मानवीय और प्रशासनिक तबाही से बचा लिया गया।

गाँधी और नेहरू ने पाकिस्तान को बचाए रखा, लेकिन भारत को सांप्रदायिक जख्मों के साथ छोड़ गए

इश्तियाक अहमद की यह टिप्पणी एक ऐसी विडंबना को सामने लाती है जिसे इतिहास में अक्सर नजरअंदाज किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की स्थापना की कहानी गाँधी , नेहरू और कॉन्ग्रेस के विरोध के रूप में पेश की जाती है, लेकिन इस वीडियो में खुद एक पाकिस्तानी विद्वान यह बात कबूल करते हैं कि अगर महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू ने 1947 के समय कुछ अहम फैसले न लिए होते, तो पाकिस्तान अपनी शुरुआत में ही बिखर सकता था।

गाँधी और नेहरू ने उस समय भारत में रहने वाले करोड़ों मुस्लिमों को पाकिस्तान जाने से रोकने की कोशिश की थी। अगर ये सभी मुस्लिम पाकिस्तान चले जाते, तो पाकिस्तान पर जनसंख्या का इतना भारी बोझ पड़ता कि वह उसे संभाल नहीं पाता। उस वक्त पाकिस्तान के पास न तो ज़रूरी संसाधन थे, न प्रशासनिक ढाँचा, और न ही हालात इतने मजबूत थे कि वो इतनी बड़ी संख्या को संभाल सके।

भारत के नेताओं ने यह फैसला लेकर कि भारत के मुस्लिम यहीं रहें, एक तरह से पाकिस्तान की मदद ही की और उसका जनसंख्या संतुलन बिगड़ने से बचा लिया। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों को जबरदस्ती निकाला गया, उन पर हिंसा हुई और उन्हें वहां टिकने नहीं दिया गया।

आज पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास में यह बात शायद ही कभी मानी जाती है कि उसका शुरुआती अस्तित्व भारत के संयम और गाँधी -नेहरू की नीतियों से भी जुड़ा था। वहां बंटवारे को पूरी तरह जिन्ना की दूरदर्शिता और जीत के रूप में दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ, भारत में भी इस सच्चाई पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आजादी के बाद की कई सरकारों ने गाँधी और नेहरू को स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने रखा, लेकिन इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया कि जैसा डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था, ‘सांप्रदायिक समस्या’ को अगर उस समय पूरी तरह हल किया गया होता, तो शायद आज 80 साल बाद भी ये मुद्दा देश को परेशान न कर रहा होता।

इस तरह यह पूरी कहानी हमें दिखाती है कि इतिहास सिर्फ दो तरफा नहीं होता, बल्कि उसके कई पहलू होते हैं, जिन्हें समझना और स्वीकार करना जरूरी है।

‘मुस्लिम मार भी डालें तो हिंदू गुस्सा न हों’: प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने बताए गाँधी के विचार तो ट्रॉल हैंडल ‘टीम साथ’ ने गिरफ्तारी की माँग, क्यों?

ट्रोल ट्विटर अकाउंट ‘टीम साथ’ ने वैज्ञानिक और स्तंभकार डॉ. आनंद रंगनाथन को गिरफ्तारी की माँग की है। दरअसल, रंगनाथन ने एक ट्वीट कर कहा है कि मोहनदास करमचंद गाँधी का कहना था कि मुस्लिम हिंदुओं की हत्या करना चाहते हों तब भी हिंदुओं को गुस्सा नहीं होना चाहिए। यह वही टीम साथ है, जिसके ‘गुडविल एंबेसडर’ टीवी एक्टर सुशांत सिंह हैं।

आनंद रंगनाथन ने एक वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट में लिखा था, “राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 6 अप्रैल 1947 को कहा था कि भले ही मुस्लिम हम सभी को मार डालना चाहते हों तब भी हिन्दुओं को मुस्लिमों के प्रति क्रोध नहीं करना चाहिए। हमें मौत का बहादुरी से सामना करना चाहिए। यदि मुस्लिमों ने सभी हिंदुओं को मारकर अपना शासन स्थापित कर लिया तो हम एक नए भारत में प्रवेश करेंगे।” वहीं, वीडियो में रंगनाथन ने कहा है कि गाँधी हिंदू विरोधी थे इसलिए गीता प्रेस को गाँधी पुरूस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था।

प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने जो ट्वीट किया है, वह मोहनदास करमचंद गाँधी के भाषण का हिस्सा है। 6 अप्रैल, 1947 को एमके गाँधी ने प्रार्थना सभा में भाषण दिया। इस सभा में उन्होंने इस बात पर निराशा व्यक्त की थी कि बिहार में हिंदुओं ने मुस्लिमों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने हिंदुओं पर ‘राष्ट्रवादी मुस्लिमों’ को मारने का आरोप भी लगाया। 

प्रो रंगनाथन ने जो कहा वह गलत नहीं, वास्तव में महात्मा गाँधी द्वारा मुस्लिम पक्षपात करने के ही कारण नाथूराम गोडसे( पढ़िए गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयान) ने गाँधी की जीवनलीला को समाप्त किया था। देखिए गाँधी की हिन्दू विरोधी एक झलक:-

मोहनदास करमचंद गाँधी ने कहा था, “हिंदुओं को मुस्लिमों के खिलाफ अपने दिल में गुस्सा नहीं रखना चाहिए। भले ही मुस्लिम उन्हें मारना चाहते हों। अगर मुस्लिम हम सबको मारना भी चाहें तो भी हमें बहादुरी से मौत का सामना करना चाहिए। यदि मुस्लिमों ने हिंदुओं को मारकर अपना शासन स्थापित किया, तो हम अपने जीवन का बलिदान देकर एक नई दुनिया में प्रवेश करेंगे। किसी को भी मौत से नहीं डरना चाहिए। जन्म और मृत्यु प्रत्येक मनुष्य के लिए अपरिहार्य है। फिर हमें खुशी या शोक क्यों मनाना चाहिए? यदि हम मुस्कुराते हुए मरेंगे, तो हम एक नए जीवन में प्रवेश करेंगे। हम एक नए भारत की शुरुआत करेंगे।”

प्रोफेसर रंगनाथन ने जो भी कहा है वह महात्मा गाँधी की किताब ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गाँधी’ में पढ़ा जा सकता है। इसके अलावा, इसे गाँधी आश्रम सेवाग्राम की वेबसाइट से भी डाउनलोड किया जा सकता है। यह किताब के  पेज नंबर 248 के अंतिम पैराग्राफ में “वॉल्यूम 99” : (17 फरवरी, 1947 – 29 अप्रैल, 1947)” में देखा जा सकता है।

यही नहीं, प्रोफेसर रंगनाथन ने यह भी कहा है, “पहली बात तो यह है कि गाँधी पुरस्कार दिया जाना ही भारत का अपमान है।” इसके बाद उन्होंने गाँधी की भतीजी मनु की कहानी सुनाई। जिसे एमके गाँधी ने पत्थर लाने के लिए दंगों के बीच भेज दिया था। मनु को मजबूरन 30 मील पैदल चलना पड़ा था इस कहानी को गाँधी के पोते राजमोहन गाँधी ने अपनी पुस्तक ‘द मैन, हिज पीपल एंड द एम्पायर’ में विस्तार से बताया है।

डॉ. आनंद रंगनाथन की गिरफ्तारी की माँग करते हुए टीम साथ’ ने उनके ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर किया है। साथ ही लिखा है, “अब इस आदमी के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। किसी को आगे आने चाहिए और इस बैल को सीगों से पकड़ना चाहिए।” इसके साथ ही ‘टीम साथ’ ने कॉन्ग्रेस, कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत और लेखक अशोक पांडेय को टैग किया है।

ट्रोल अकाउंट ‘टीम साथ’ को लेकर सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि टीवी एक्टर सुशांत सिंह इसके संस्थापक हैं। हालाँकि एक ट्वीट में ‘टीम साथ’ ने कहा है कि टीवी एक्टर सुशांत सिंह उसके ‘गुडविल एंबेसडर’ हैं। 

देश के इतिहास की 'मीरजाफरी परंपरा' और राहुल गांधी

डॉ राकेश कुमार आर्य , संपादक : उगता भारत

जब अफगानिस्तान के अमीर को महात्मा गांधी ने भारत पर आक्रमण करने के लिए किया था आमंत्रित 

महात्मा गांधी ने कभी हमारे देश में 'खिलाफत आंदोलन' चलाया था। बहुत लोग हैं जो यह मानते हैं कि खिलाफत का अर्थ अंग्रेजों का विरोध करना था। जबकि सच यह नहीं था। सच यह था कि टर्की के खलीफा को अंग्रेजों ने जब उसके पद से हटा दिया तो उसकी खिलाफत अर्थात धार्मिक जगत में उसकी हुकूमत को फिर से स्थापित कराने के लिए गांधी जी ने भारत में आंदोलन चलाया। यद्यपि मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग भी नहीं चाहते थे कि खलीफा की खिलाफत की लाश के लिए गांधी इस प्रकार का प्रलाप भारत में करें। गांधीजी का यह खिलाफत आंदोलन मोपला जैसी भयानक त्रासदी को लेकर आया। जब 1920 - 21में मोपला ( केरल ) में लगभग 25000 हिंदुओं को मुसलमानों ने गाजर मूली की तरह काट कर फेंक दिया। गांधीजी की आंखें इसके उपरांत भी नहीं खुली। उसी समय गांधी जी ने अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्लाह खान को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। मोहम्मद अली जैसे मुस्लिम नेता इस कार्य में बढ़-चढ़कर गांधी का सहयोग कर रहे थे। गांधीजी का मानना था कि भारत हिंदू और मुसलमानों का है और मुस्लिम सल्तनत को वह सहन कर सकते हैं, पर अंग्रेजों की सल्तनत को नहीं। गांधीजी अपने लेखों में कई बार यह लिख चुके थे कि औरंगजेब उनका आदर्श है जो कि एक दयालु बादशाह था।

उक्त घटना का उल्लेख स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने सार्वजनिक रूप से अपने लिब्रेटर में करते हुए लिखा था। उस दस्तावेजी साक्ष्य और अमीर को गांधीजी की लिखावट का एक मसौदा तैयार किया गया था। जिसे मौलाना महोमा ने स्वामी जी को दिखाया था। अपने 'यंग इंडिया' में गांधीजी ने लिखा था कि यदि अफगान सफल हुए तो भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करना सुनिश्चित करेंगे। गांधीजी मुस्लिम तुष्टीकरण की पराकाष्ठा पर पहुंच गए थे, जब उन्होंने भारत के मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए सारे देश के हिंदुओं को अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्लाह खान के सामने डालने की मन में ठान ली थी। इस घटना का उल्लेख 'हिंदू राष्ट्र दर्शन' के पृष्ठ संख्या 98 पर किया गया है। 

भारत के इतिहास का यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जो इतिहास लेखक बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए महाराणा प्रताप के दादा महाराणा संग्राम सिंह को दोषी ठहराते हुए उन्हें कोसते हुए नहीं थकते, वही गांधीजी के इस प्रस्ताव को या अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने के लिए बुलाने की घटना को भारत में गांधी जी के धर्मनिरपेक्षता के प्रति समर्पण के एक दिव्य भाव के रूप में देखते हैं। इतिहास में इस घटना को अधिक उभारा भी नहीं गया है।

अब आते हैं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सबसे बड़े नेता राहुल गांधी की गतिविधियों पर।  कांग्रेस के राहुल गांधी सावरकर जी के कथित माफीनामे को रह-रहकर उभारने की कोशिश करते हैं। प्रथमतया तो सावरकर जी ने ऐसी कोई माफी नहीं मांगी थी और यदि एक बार सोच भी लिया जाए कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी तो भी विदेशी शक्ति को भारत पर आक्रमण करने की घटना माफी मांगने की घटना से कहीं अधिक निर्मित है। क्योंकि माफी मांगना तो व्यक्तिगत है पर दूसरे देश को अपने देश पर आक्रमण करने के लिए निमंत्रण देना राष्ट्र के साथ अपघात है।

गांधीजी अपने समय में जो कुछ करना था कर के चले गए। पर यदि आज के गांधी अर्थात राहुल गांधी की नीतियों पर भी विचार करें तो उनका आचरण भी कुछ वैसा ही है जैसा उनके वैचारिक पूर्वज गांधी जी का था। यदि गांधी जी उस समय विदेशी शक्तियों को भारत पर आक्रमण के लिए बुलावा दे रहे थे तो आज राहुल गांधी भी उसी इतिहास को दोहरा रहे हैं, जब वे विदेश की भूमि पर खड़े होकर संसार की बड़ी शक्तियों से भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं और कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र मर रहा है , आप लोगों को हमारी सहायता करनी चाहिए। जैसे गांधी जी को उस समय औरंगजेब के मानस पुत्रों का शासन स्वीकार था और इसके लिए उन्हें देश के बहुसंख्यक को उस क्रूर शासन के सामने मेमने की भांति फेंकने को तैयार थे , उसी प्रकार राहुल गांधी को विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप स्वीकार है, और वे भी स्वयं के सत्ता स्वार्थ के चलते भारत के बहुसंख्यक समाज को आज भी विदेशी शक्तियों और भारत के मुस्लिमों के सामने फेंकने को तैयार हैं। अपनी इसी नीति के अंतर्गत राहुल और उनकी मां ने सांप्रदायिक हिंसा निषेध कानून लाने का प्रयास किया था। चीन के साथ भी वह क्या खिचड़ी पकाते रहते हैं ? इसकी चर्चा अक्सर समाचार पत्रों में होती रहती है।

राहुल गांधी इस समय लोकतंत्र को खतरे में बता रहे हैं। पर उनकी स्वयं की वजह से तो देश के लिए भी खतरा बढ़ रहा है ? उनकी पार्टी लोकतंत्र पर आए संकटों को लेकर पर्याप्त शोर मचा रही है। इसके उपरांत भी देश के लोग कांग्रेस और उसके नेता के साथ लगने को तैयार नहीं हैं। इसका कारण केवल एक है कि अभी 9 वर्ष पहले 2014 तक कांग्रेस की सरकार भारत के लोगों को आतंकवादियों से यह कहकर डराती रही थी कि अनजानी वस्तु को छुएं नहीं, अनजाने व्यक्ति के हाथ से भोजन या खाने पीने की कोई भी वस्तु ग्रहण ना करें। देश के अधिकांश लोग इस बात को भली प्रकार जानते हैं कि उस समय देश में कितना आतंक का परिवेश व्याप्त हो गया था ? लोग अजनबी चीज को देखकर भी घबरा जाते थे। पर आज बीते 9 वर्ष के काल में वह सब चीजें इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं। इसके चलते देश का जनमानस राहुल गांधी पर विशेष ध्यान नहीं दे रहा है। यही कारण है कि गांधी परिवार के किसी भी सदस्य की सभा में भीड़ नहीं पहुंच रही है। पी0 चिदंबरम जैसे कांग्रेस के बड़े नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि राहुल गांधी के भीतर वह नेतृत्व नहीं है जो जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सकें।

कांग्रेस के लिए वास्तव में राहुल गांधी बोझ बन चुके हैं और कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेता उनसे मुक्ति चाहते हैं पर कोई भी खुलकर नहीं कह सकता। इसी प्रकार की मानसिकता को समझ कर भाजपा के कई नेता टी0वी0 चैनलों पर कह रहे हैं कि राहुल गांधी के साथ जो कुछ हुआ है , वह उनके अपने संगठन की लापरवाही और उनके प्रति असहयोगी दृष्टिकोण के कारण हुआ है।

राहुल गांधी को लेकर उनके कई समर्थकों की मान्यता है कि जिस प्रकार सदस्यता गंवाने के बाद कभी इंदिरा गांधी के साथ देश का जनमानस लग गया था, उसी प्रकार आगामी लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी चुनाव की बाजी पलट सकते हैं और देश के लोग सहानुभूतिवश उनके साथ आकर जुड़ जाएंगे। इस प्रकार एक विक्टिम कार्ड के रूप में राहुल गांधी और उनके निकटस्थ मंडली के लोग उनकी लोकसभा की सदस्यता समाप्त करने की घटना को इस प्रकार देखने का प्रयास कर रहे हैं। अब इन लोगों को यह कौन समझाए कि जनता पार्टी के समय में जब इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता समाप्त की गई थी तो उस समय की परिस्थितियां दूसरी थीं और आज की परिस्थितियां दूसरी हैं। उस समय देश के लोगों ने पहली बार विपक्ष को सत्ता की चाबी सौंपी थी, पर विपक्षी दल जब सत्ता में आए तो वहां पर भी गिद्धों की भांति लड़ने लगे थे। इससे देश के लोगों ने परिपक्व निर्णय देने का मन बनाया और यह सोच लिया कि सत्ता में बैठकर केवल लड़ने के अतिरिक्त जो पार्टी या सरकार कुछ नहीं कर पाई उससे देश का भला नहीं हो सकता। यही कारण था कि उन्होंने उस समय देश के मतदाताओं ने इंदिरा गांधी में फिर से अपना भरोसा व्यक्त किया और देश की सत्ता उन्हें सौंप दी।

अब यदि देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि इस समय सत्ता में बैठे दलों में किसी प्रकार की कोई खींचतान नहीं है और वे भाजपा नीत गठबंधन में रहकर अपने आप को सुरक्षित और सम्मानित अनुभव कर रहे हैं। देश के मतदाताओं को वर्तमान सरकार से कोई गंभीर शिकायतें नहीं है। तब राहुल गांधी अपनी दादी के इतिहास को दोहरा पाएंगे, इस बात में संदेह है।

हमारी पूर्ण सहानुभूति राहुल गांधी के साथ है , क्योंकि हमारी भी इच्छा है कि देश में एक मजबूत और शक्तिसंपन्न विपक्ष खड़ा हो। राहुल गांधी राजनीति में अपने आपको कभी गंभीर व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए। राहुल गांधी कह रहे हैं कि मेरे नाम के पीछे सावरकर नहीं लिखा है। मैं गांधी हूं, इसलिए माफी नहीं मांगूंगा । यद्यपि वह अब से पहले न्यायालय के समक्ष एक से अधिक बार वे माफी मांग चुके हैं। उनकी इस प्रकार की बचकानी गतिविधियों और हरकतों का देश के जनमानस पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। कांग्रेस के भीतर भी कई ऐसे बड़े नेता हैं जो राहुल गांधी को ऐसी ही हरकतें करने के लिए उकसाते रहते हैं। कांग्रेस के इस प्रकार की सोच व मानसिकता वाले नेताओं का प्रयास है कि गांधी राहुल गांधी इसी प्रकार अपनी हरकतों से बदनाम होते रहे तो एक दिन वह आ जाएगा जब देश राहुल गांधी को विदा कर उनमें से किसी को अपना नेता स्वीकार कर लेगा।

कांग्रेस के पास इस समय खड़गे जैसे अनुभव शील नेता हैं, पर वे भी अपने नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के भीतर बेकार का उत्साह भरने के लिए उन्हें 'शेर' बताने की गलती करते हैं। वास्तव में खड़गे जैसे नेताओं की इस प्रकार की सोच उनकी चाटुकारिता को ही स्पष्ट करती है। जिससे पता चलता है कि वह  राहुल गांधी और सोनिया गांधी के समक्ष खुलकर नहीं बोल सकते। जब किसी भी पार्टी , संगठन या सत्ता में उच्च पदों पर बैठे लोगों के दरबार में इस प्रकार के चाटुकारों की फौज बढ़ती है तो ऐसे संगठन या राजनीतिक दलों या नेताओं का पतन होना निश्चित होता है। भारत की प्राचीन काल से परंपरा रही है कि राजा का महामंत्री अत्यंत स्पष्टवादी होना चाहिए और उसे समय पर कठोर भाषा का प्रयोग करते हुए राजा को सही परामर्श देते हुए संकटों से सचेत करना चाहिए। ऐसे में आवश्यक है कि कांग्रेस के अध्यक्ष श्री खड़गे जैसे नेता अपनी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को सही परामर्श दें और उन्हें लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं के साथ-साथ लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर अर्थात संसद के प्रति भी गंभीर बने रहने की शिक्षा दें।   

अब आते हैं भाजपा की ओर। भाजपा यदि इस समय राहुल गांधी को जानबूझकर मैदान से हटा रही है और सोच रही है कि उनके हट जाने के बाद या चुनावों से दूर करा देने के बाद चुनावी मैदान उसके हाथों में होगा तो यह इस पार्टी की सबसे बड़ी भूल होगी। जब छल-बल से अपने प्रतिद्वंदी को मैदान से दूर किया जाता है तो वह छल-बल एक दिन अपने लिए पैरों की कुल्हाड़ी बन जाता है। आलस्य और प्रमाद बढ़ने से संगठन जर्जर होने लगता है और धीरे-धीरे पतन के गर्त में चला जाता है। हमारा देश भारत शत्रु के हाथ में तलवार देकर लड़ने वाला देश रहा है। इसने कभी निहत्थे शत्रु पर हमला नहीं किया और ना ही शत्रु को छलबल के माध्यम से मैदान से हटाने का अपराध किया। भाजपा हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना में विश्वास रखती है तो उसे हिंदू राजनीति के मूल्यों को भी अपनाना होगा। भाजपा से अपेक्षा की जाती है कि वह राहुल गांधी को चुनावी मैदान से न तो हटाए और न हटने के लिए मजबूर करे बल्कि उनके हाथों में तलवार देकर उनसे वीरता के साथ युद्ध करे। 

राहुल गांधी से भी अपेक्षा की जाती है कि वह भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाएं और गांधी जी के द्वारा इतिहास में दर्ज कराई गई गलतियों को अपनाने का अपराध ना करें। उन्हें समझना चाहिए कि भारत अब जाग चुका है और वह उनके  सहित प्रत्येक नेता की प्रत्येक गतिविधि पर बड़ी बारीकी से नजर रखता है। राहुल गांधी की प्रत्येक गतिविधि को देश के लोग महात्मा गांधी की गलतियों के साथ तोल तोल कर देख रहे हैं । यदि राहुल गांधी इतिहास में दर्ज की गई गलतियों से शिक्षा नहीं ले पाए तो 2024 ही नहीं अगले आम चुनाव भी उनके हाथों से चले जाएंगे। देश का जनमानस नहीं चाहता कि देश के इतिहास की बदनाम 'मीरजाफरी परंपरा' आगे बढ़े और विदेशों को भारत में आकर हस्तक्षेप करने के राहुल गांधी के आमंत्रण से उनका नाम भी इसी परंपरा में लिखा जाए ? 

अंग्रेजों ने डॉ हेडगेवार को डाला था जेल में: कांग्रेस लाने वाली थी क्रांतिकारियों के लिए निंदा प्रस्ताव

लगता है पूर्व में की गयी भविष्यवाणियां धीरे-धीरे सत्यापित होने जा रही है, जिसका अनेक बार अपने लेखों में चर्चा करता रहा हूँ। खैर, कांग्रेस, वामपंथियों और इनके समर्थक छद्दम धर्म-निरपेक्षों ने भारत के जिस वास्तविक इतिहास को धूमिल कर अपना ही गुणगान किया जा रहा था। लेकिन अब वास्तविक इतिहास उजागर होना शुरू हो गया है। डॉ मनमोहन वैद्य RSS के सह सर कार्यवाह (Joint General Secretary) का निम्न लेख उस पर रौशनी डाल रहा है। इस सन्दर्भ में स्मरण लगभग 40 वर्ष पूर्व पढ़ा लेख, जिसमें पाकिस्तान के बहुचर्चित समाचारपत्र Dawn का जिक्र था। विभाजन उपरांत Dawn ने प्रकाशित किया था कि अगर आरएसएस 20 साल पहले हो गया होता, पाकिस्तान कभी नहीं बनता। इतना ही नहीं, एक बार किसी समारोह में जब नेताजी तिरंगा फहरा रहे थे, झंडा पोल पर ही अटक गया, तब संघ संस्थापक डॉ केशवराम बलिराम हेडगेवार ने ही पोल पर चढ़कर फंसे झंडे को निकाला, तब जाकर नेताजी तिरंगा फहराने में सफल हुए थे।   

कुछ समय पूर्व एक पत्रकार मिलने आए। बात-बात में उन्होंने पूछा कि स्वतंत्रता आंदोलन में RSS का सहभाग क्या था? शायद वे भी संघ के खिलाफ चलने वाले असत्य प्रचार के शिकार थे। मैंने उनसे प्रतिप्रश्न किया कि आप स्वतंत्रता आंदोलन किसको मानते हैं? वे इसके लिए तैयार नहीं थे। कुछ बोल ही नहीं सके। फिर धीरे से शंकित स्वर में उन्होंने कहा, “वही जो महात्मा गाँधी जी ने किया था।” मैंने पूछा क्या लाल, बाल, पाल त्रिमूर्ति का कोई योगदान नहीं था? क्या सुभाष बाबू की कोई भूमिका स्वतंत्रता आंदोलन में नहीं थी? वे चुप थे।

फिर मैंने पूछा कि गाँधी जी के नेतृत्व में कितने सत्याग्रह हुए? वे अनजान थे। मैंने कहा कि तीन हुए- 1921, 1930 और 1942। उन्हें जानकारी नहीं थी। मैंने कहा संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार ने (उनकी मृत्यु 1940 में हुई थी) संघ की स्थापना से पहले (1921) और बाद के (1930) सत्याग्रह में भाग लिया था और उन्हें कारावास भी सहना पड़ा। यह घटना इसलिए कही कि एक योजनाबद्ध तरीके से आधा इतिहास बताने का एक प्रयास चल रहा है।

भारत के लोगों को ऐसा मानने के लिए बाध्य किया जा रहा है कि स्वतंत्रता केवल कांग्रेस के और 1942 के सत्याग्रह के कारण मिली है। और किसी ने कुछ नहीं किया। यह बात पूर्ण सत्य नहीं है। गाँधी जी ने सत्याग्रह के माध्यम से, चरखा और खादी के माध्यम से सर्व सामान्य जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी होने का एक सरल एवं सहज तरीका, साधन उपलब्ध कराया। लाखों की संख्या में लोग स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ सके, यह बात सत्य है। परन्तु सारा श्रेय एक ही आंदोलन या पार्टी को देना यह इतिहास से खिलवाड़ है, अन्य सभी के प्रयासों का अपमान है।

अब संघ की बात करनी है तो डॉ हेडगेवार से ही करनी पड़ेगी। केशव(हेडगेवार) का जन्म 1889 का है। नागपुर में स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा 1904-1905 से शुरू हुई। उसके पहले अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन का बहुत वातावरण नहीं था। फिर भी 1897 में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त स्कूल में बाँटी गई मिठाई 8 साल के केशव ने ना खाकर कूड़े में फेंक दी। यह था उसका अंग्रेजों के गुलाम होने का गुस्सा और चिढ़।

1907 में रिस्ले सेक्युलर नाम से ‘वंदे मातरम्’ के सार्वजनिक उद्घोष पर पाबंदी का जो अन्यायपूर्ण आदेश घोषित हुआ था, उसके विरोध में केशव ने अपने नील सिटी विद्यालय में सरकारी निरीक्षक के सामने अपनी कक्षा के सभी विद्यार्थियों द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ उद्घोष करवा कर विद्यालय के प्रशासन का रोष और उसकी सजा के नाते विद्यालय से निष्कासन भी मोल लिया था। डॉक्टरी पढ़ने के लिए मुंबई में सुविधा होने के बावजूद क्रांतिकारियों का केंद्र होने के नाते उन्होंने कलकत्ता को पसंद किया। वहाँ वे क्रांतिकारियों की शीर्षस्थ संस्था ‘अनुशीलन समिति’ के विश्वासपात्र सदस्य बने थे।

1916 में डॉक्टर बनकर वे नागपुर वापस आए। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के सभी मूर्धन्य नेता विवाहित थे, गृहस्थ थे। अपनी गृहस्थी के लिए आवश्यक अर्थार्जन का हरेक का कोई न कोई साधन था। इसके साथ-साथ वे स्वतंत्रता आंदोलन में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे थे। डॉक्टर हेडगेवार भी ऐसा ही सोच सकते थे। घर की परिस्थिति भी ऐसी ही थी। परन्तु उन्होंने डॉक्टरी एवं विवाह नहीं करने का निर्णय लिया। उनके मन में स्वतंत्रता प्राप्ति की इतनी तीव्रता और ‘अर्जेंसी’ थी कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन का कोई विचार न करते हुए अपनी सारी शक्ति, समय और क्षमता राष्ट को अर्पित करते हुए स्वतंत्रता के लिए चलने वाले हर प्रकार के आंदोलन से अपने आपको जोड़ दिया।

लोकमान्य तिलक पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी। तिलक के नेतृत्व में नागपुर में होने जा रहे 1920 के  कांग्रेस अधिवेशन की सारी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी डॉ हर्डीकर और डॉ हेडगेवार को दी गई थी और उसके लिए उन्होंने 1200 स्वयंसेवकों की भर्ती करवाई थी। उस समय डॉ हेडगेवार कांग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव थे। उस अधिवेशन में पारित करने हेतु कांग्रेस  की प्रस्ताव समिति के सामने डॉ हेडगेवार ने ऐसे प्रस्ताव का सुझाव रखा था कि कांग्रेस का उद्देश्य भारत को पूर्ण स्वतंत्र कर भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना और विश्व को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करना होना चाहिए।

सम्पूर्ण स्वातंत्र्य का उनका सुझाव कांग्रेस ने 9 वर्ष बाद 1929 के लाहौर अधिवेशन में स्वीकृत किया। इससे आनंदित होकर डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं में (संघ कार्य 1925 में प्रारंभ हो चुका था) 26 जनवरी, 1930 को कॉन्ग्रेस का अभिनंदन करने की सूचना दी थी। नागपुर तिलकवादियों का गढ़ था। 1 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक के देहावसान के कारण नागपुर के सभी तिलकवादियों में निराशा छा गई। बाद में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन चला।

असहयोग आंदोलन के समय, 1921 में, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के सामाजिक आधार को व्यापक करने की दृष्टि से, अंग्रेजों द्वारा तुर्किस्तान में खिलाफत को निरस्त करने से आहत मुस्लिम मन को अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ने के उद्देश्य से महात्मा गाँधी ने खिलाफत का समर्थन किया। इस पर कांग्रेस के अनेक नेता तथा राष्ट्रवादी मुस्लिमों को आपत्ति थी। इसलिए, तिलकवादियों का गढ़ होने के कारण नागपुर में असहयोग आंदोलन बहुत प्रभावी नहीं रहा।

परन्तु डॉ हेडगेवार, डॉ चोलकर, समिमुल्ला खान आदि ने यह परिवेश बदल दिया। उन्होंने खिलाफत को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने पर आपत्ति होते हुए भी उसे सार्वजनिक नहीं किया। इसी मापदंड के आधार पर साम्राज्यवाद का विरोध करने के लिए उन्होंने तन-मन-धन से आंदोलन में सहभाग लिया। व्यक्तिगत सामाजिक संबंधों से अलग हटकर उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रीय परिस्थिति का विश्लेषण किया और आसपास के राजनीतिक वातावरण एवं दबंग तिलकवादियों के दृष्टिकोण की चिंता नहीं की।

उन पर चले राजद्रोह के मुकदमे में उन्हें एक वर्ष का कारावास सहना पड़ा। वे 19 अगस्त, 1921 से 11 जुलाई, 1922 तक कारावास में रहे। वहाँ से छूटने के बाद 12 जुलाई को उनके सम्मान में नागपुर में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन हुआ था। समारोह में प्रांतीय नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस के अन्य राष्ट्रीय नेता हकीम अजमल खाँ, पंडित मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी, डॉ अंसारी, विट्ठल भाई पटेल आदि डॉ हेडगेवार का स्वागत करने के लिए उपस्थित थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति का महत्व तथा प्राथमिकता को समझते हुए भी एक प्रश्न डॉ हेडगेवार को सतत् सताता रहता था कि, 7000 मील से दूर व्यापार करने आए मुट्ठी भर अंग्रेज, इस विशाल देश पर राज कैसे करने लगे? जरूर हममें कुछ दोष होंगे। उनके ध्यान में आया कि हमारा समाज आत्म-विस्मृत, जाति प्रान्त-भाषा-उपासना पद्धति आदि अनेक गुटों में बँटा हुआ, असंगठित और अनेक कुरीतियों से भरा पड़ा है जिसका लाभ लेकर अंग्रेज यहां राज कर सके।

स्वतंत्रता मिलने के बाद भी समाज ऐसा ही रहा तो कल फिर इतिहास दोहराया जाएगा। वे कहते थे कि ‘नागनाथ जाएगा तो साँपनाथ आएगा’। इसलिए इस अपने राष्ट्रीय समाज को आत्मगौरव युक्त, जागृत, संगठित करते हुए सभी दोष, कुरीतियों से मुक्त करना और राष्ट्रीय गुणों से युक्त करना अधिक मूलभूत आवश्यक कार्य है और यह कार्य राजनीति से अलग, प्रसिद्धि से दूर, मौन रहकर सातत्यपूर्वक करने का है, ऐसा उन्हें प्रतीत हुआ।

उस हेतु 1925 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ स्थापना के पश्चात भी सभी राजनीतिक या सामाजिक नेताओं, आंदोलन  एवं गतिविधि के साथ उनके समान नजदीकी के और आत्मीय संबंध थे। 1930 में गाँधी के आह्वान पर सविनय अवज्ञा आंदोलन 6 अप्रैल को दांडी (गुजरात) में  नमक सत्याग्रह के नाम से शुरू हुआ। नवम्बर 1929 में ही संघचालकों की त्रिदिवसीय बैठक में इस आंदोलन को बिना शर्त समर्थन करने का निर्णय संघ में हुआ था।

संघ की नीति के अनुसार, डॉ हेडगेवार ने व्यक्तिगत तौर पर अन्य स्वयंसेवकों के साथ इस सत्याग्रह में भाग लेने का निर्णय लिया। और संघ कार्य अविरत चलता रहे इस हेतु उन्होंने सरसंघचालक पद का दायित्व अपने पुराने मित्र डॉ परांजपे को सौंप कर बाबासाहब आप्टे और बापू राव भेदी को शाखाओं के प्रवास की जिम्मेदारी दी। इस सत्याग्रह में उनके साथ प्रारंभ में 21 जुलाई, को 3-4 हजार लोग थे। वर्धा, यवतमाल होकर पुसद पहुँचते-पहुँचते सत्याग्रह स्थल पर 10,000 लोग इकट्ठे हुए। इस सत्याग्रह में उन्हें 9 महीने का कारावास हुआ।

वहाँ से छूटने के पश्चात् सरसंघचालक का दायित्व पुन: स्वीकार कर वे फिर से संघ कार्य में जुट गए। 1938 में भाग्य नगर (हैदराबाद) में निजाम के द्वारा हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ हिन्दू महासभा और आर्य समाज के तत्वावधान में ‘भागानगर नि:शस्त्र प्रतिकार मंडल’  के नाम से सत्याग्रह का आह्वान हुआ उसमें सहभागी होने के लिए जिन स्वयंसेवकों ने अनुमति माँगी, उन्हें डॉक्टर ने सहर्ष अनुमति दी। जिन पर केवल संघ का प्रमुख दायित्व था उन्हें केवल संगठन के कार्य की दृष्टि से बाहर ही रहने के लिए कहा था।

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सत्याग्रह में जिन्हें भाग लेना है वे व्यक्ति के नाते अवश्य भाग ले सकते हैं। भागनगर सत्याग्रह के संचालकों के द्वारा प्रसिद्धि पत्रक में ‘संघ’ ने सहभाग लिया, ऐसा बार-बार आने पर डॉक्टर ने उन्हें पत्र लिखकर संघ का उल्लेख न करने की सूचना उनके प्रसिद्धि विभाग को देने को कहा था। राजकीय आंदोलन का तात्कालिक, नैमित्तिक व संघर्षमय स्वरूप और संघ का नित्य, अविरत (अखंड) व रचनात्मक स्वरूप इन दोनों की भिन्नता को समझ कर आंदोलन भी यशस्वी हो, परन्तु उस समय भी चिरंतन संघकार्य अबाधित रहे इस दूरदृष्टि से विचारपूर्वक यह नीति डॉक्टर ने अपनाई थी।

इसीलिए जंगल सत्याग्रह के समय भी सरसंघचालक का दायित्व डॉ परांजपे को सौंप कर व्यक्ति के नाते वे अनेक स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह में सह्भागी हुए थे। 8 अगस्त, 1942 को मुंबई के गोवलिया टैंक मैदान पर कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गाँधी जी ने ‘अंग्रेज! भारत छोड़ो’ यह ऐतिहासिक घोषणा की। दूसरे दिन से ही देश में आंदोलन ने गति पकड़ी और जगह जगह आंदोलन के नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई। विदर्भ में बावली (अमरावती), आष्टी (वर्धा) और चिमूर (चंद्रपुर) में विशेष आन्दोलन हुए। चिमूर के समाचार बर्लिन रेडियो पर भी प्रसारित हुए।

यहाँ के आन्दोलन का नेतृत्व कांग्रेस के उद्धवराव कोरेकर और संघ के अधिकारी दादा नाईक, बाबूराव बेगडे, अण्णाजी सिरास ने किया। इस आन्दोलन में अंग्रेज की गोली से एकमात्र मृत्यु बालाजी रायपुरकर इस संघ स्वयंसेवक की हुई। कांग्रेस, श्री तुकडो महाराज द्वारा स्थापित श्री गुरुदेव सेवा मंडल एवं संघ स्वयंसेवकों ने मिलकर 1943 का चिमूर का आन्दोलन और सत्याग्रह किया। इस संघर्ष में 125 सत्याग्रहियों पर मुकदमा चला और असंख्य स्वयंसेवकों को कारावास में रखा गया।

भारत भर में चले इस आंदोलन में स्थान-स्थान पर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, प्रचारक स्वयंप्रेरणा से कूद पड़े। अपने जिन कार्यकर्ताओं ने स्थान-स्थान पर अन्य स्वयंसेवकों को साथ लेकर इस आंदोलन में भाग लिया उनके कुछ नाम इस प्रकार हैं- राजस्थान में प्रचारक जयदेवजी पाठक, जो बाद में विद्या भारती में सक्रिय रहे। आर्वी (विदर्भ) में डॉ अण्णासाहब देशपांडे। जशपुर (छत्तीसगढ़) में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे, जिन्होंने बाद में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की।

दिल्ली मेें श्री वसंतराव ओक जो बाद में दिल्ली के प्रान्त प्रचारक रहे। बिहार (पटना), में वहां के प्रसिद्ध वकील कृष्ण वल्लभप्रसाद नारायण सिंह (बबुआजी) जो बाद में बिहार के संघचालक रहे। दिल्ली में ही श्री चंद्रकांत भारद्वाज, जिनके पैर में गोली धँसी और जिसे निकाला नहीं जा सका। बाद में वे प्रसिद्ध कवि और अनेक संघ गीतों के रचनाकार हुए। पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव देवडे जो बाद में प्रान्त प्रचारक बने और इसी तरह उज्जैन (मध्य प्रदेश) में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे का अवदान है जो बाद में संघ प्रचारक हुए।

अंग्रेजों के दमन के साथ-साथ एक तरफ सत्याग्रह चल रहा था तो दूसरी तरफ अनेक आंदोलनकर्ता भूमिगत रहकर आंदोलन को गति और दिशा देने का कार्य कर रहे थे। ऐसे समय भूमिगत कार्यकर्ताओं को अपने घर में पनाह देना किसी खतरे से खाली नहीं था। 1942 के आंदोलन के समय भूमिगत आंदोलनकर्ता अरुणा आसफ अली दिल्ली के प्रान्त संघचालक लाला हंसराज गुप्त के घर रही थीं और महाराष्ट्र में सतारा के उग्र आन्दोलनकर्ता नाना पाटील को भूमिगत स्थिति में औंध के संघचालक पंडित सातवलेकर ने अपने घर में आश्रय दिया था। ऐसे असंख्य नाम और हो सकते हैं। उस समय इन सारी बातों का दस्तावेजीकरण (रिकार्ड) करने की कल्पना भी संभव नहीं थी।

डॉ हेडगेवार के जीवन का अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि बाल्यकाल से आखिरी साँस तक उनका जीवन केवल और केवल अपने देश और उसकी स्वतंत्रता इसके लिए ही था। उस हेतु उन्होंने समाज को दोषमुक्त, गुणवान एवं राष्ट्रीय विचारों से जाग्रत कर उसे संगठित करने का मार्ग चुना था। संघ की प्रतिज्ञा में भी 1947 तक संघ कार्य का उद्देश्य ‘हिन्दू राष्ट’ को स्वतंत्र करने के लिए’ ऐसा ही था। भारतीय राष्ट्रीय जीवन में ‘एक्सट्रीम पोजीशंस’ लेने की स्थिति दिखती थी।

डॉक्टर जी के समय भी समाज कांग्रेस-क्रांतिकारी, तिलक-गाँधी, हिंसा-अहिंसा, हिन्दू महासभा-कांग्रेस ऐसे द्वन्द्वों में उलझा हुआ था। एक दूसरे को मात करने का वातावरण बना था। कई बार तो आपसी भेद के चलते ऐसा बेसिर का विरोध करने लगते थे कि साम्राज्यवाद के विरोध में अंग्रेजों से लड़ने के बदले आपस में ही भिड़ते दिखते थे। 1921 में मध्य प्रान्त कांग्रेस की प्रांतीय बैठक में लोकनायक अणे की अध्यक्षता में क्रांतिकारियों की निंदा का प्रस्ताव आने वाला था।

डॉ हेडगेवार ने उन्हें समझाया कि क्रांतिकारियों के मार्ग पर आपका विश्वास भले ही ना हो पर उनकी देशभक्ति पर शंका नहीं करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉ जी का जीवन राजनीतिक दृष्टिकोण, दर्शन एवं नीतियाँ, तिलक-गांधी, गाँधी-अहिंसा, कांग्रेस-क्रांतिकारी, इन संकीर्ण विकल्पों के आधार पर निर्धारित नहीं थी। व्यक्ति अथवा विशिष्ट मार्ग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्ति का मूल ध्येय था। भारत को केवल राजनीतिक इकाई मानने वाला एक वर्ग हर प्रकार के श्रेय को अपने ही पल्ले में डालने पर उतारू दिखता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए दूसरों ने कुछ नहीं किया, सारा का सारा श्रेय हमारा ही है ऐसा (‘प्रोेपगंडा’) एकतरफा प्रचार करने पर वह आमादा दिखता है। यह उचित नहीं है। सशस्त्र क्रांति से लेकर अहिंसक सत्याग्रह, सेना में विद्रोह, आजाद की हिन्द फौज इन सभी के प्रयासों का एकत्र परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति में हुआ है। इसमें द्वितीय महायुद्ध में जीतने के बाद भी इंग्लैंड की खराब हालत और अपने सभी उपनिवेशों पर शासन करने की असमर्थता और अनिच्छा के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के लिए भारत के समान दीर्घ संघर्ष नहीं हुआ, ऐसे उपनिवेशों को भी अंग्रेजों ने क्रमश: स्वतंत्र किया है।

1942 का सत्याग्रह, महात्मा गाँधी द्वारा किया हुआ आखिरी सत्याग्रह था और उसके पश्चात 1947 में देश स्वतंत्र हुआ, यह बात सत्य है। परन्तु इसलिए स्वतंत्रता केवल 1942 के आंदोलन के कारण ही मिली, और जो लोग उस आंदोलन में कारावास में रहे उनके ही प्रयास से भारत स्वतंत्र हुआ यह कहना हास्यास्पद, अनुचित और असत्य है। एक रूपक कथा है। एक किसान को बहुत भूख लगी। पत्नी खाना परोस रही थी और वह खाए जा रहा था। लेकिन, तृप्ति नहीं हो रही थी, दस रोटी खाने के बाद जब उसने ग्यारहवीं रोटी खाई तो उसे तृप्ति की अनुभूति हुई। उससे नाराज होकर वह पत्नी को डाँटने लगा कि यह ग्यारहवीं रोटी जिससे तृप्ति हुई, उसने पहले क्यों नहीं दी। इतनी सारी रोटियाँ खाने की मेहनत बच जाती और तृप्ति जल्दी अनुभूत होती। यह कहना हास्यास्पद ही है।

इसी तरह यह कहना कि केवल 1942 के आन्दोलन के कारण ही भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, हास्यास्पद बात है। इसके बारे में अन्य इतिहासकार क्या कहते हैं जरा देखिए- भारत को आजाद करते समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने कहा था, ‘‘महात्मा गाँधी के अहिंसा आंदोलन का ब्रिटिश सरकार पर असर शून्य रहा है।’’ कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल के कार्यकारी गवर्नर रहे पी़ एम़ चक्रवर्ती के शब्दों में, ‘‘जिन दिनों मैं कार्यकारी गवर्नर था, उन दिनों भारत दौरे पर आए लॉर्ड एटली, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से बाहर कर कोई औपचारिक आजादी नहीं दी थी, दो दिन के लिए गवर्नर निवास पर रुके थे। भारत से अंग्रेजी हुकूमत के चले जाने के असली कारणों पर मेरी उनके साथ लंबी बातचीत हुई थी। मैंने उनसे सीधा प्रश्न किया था कि चूंकि गाँधी जी का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तब तक हल्का पड़ चुका था और 1947 के दौरान अंग्रेजों को यहां से आनन-फानन में चले जाने की कोई मजबूरी भी नहीं थी, तब वह क्यों गए? इसके जवाब में एटली ने कई कारण गिनाए, जिनमें से सबसे प्रमुख था भारतीय सेना और नौसेना की ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी का लगातार कम होते जाना। इसका मुख्य कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सैन्य गतिविधियाँ थीं। हमारी बातचीत के अंत में मैंने एटली से पूछा कि अंग्रेजी सरकार के भारत छोड़ जाने में गाँधी जी का कितना असर था। सवाल सुनकर एटली के होंठ व्यंग्यमिश्रित मुस्कान के साथ मुड़े और वह धीमे से बोले- न्यूनतम (मिनिमल)।’’ (रंजन बोरा, ‘सुभाषचंद्र बोस, द इंडियन नेशनल आर्मी, द वार ऑफ़ इंडियाज लिबरेशन’। जर्नल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिव्यू, खंड 20,(2001), सं 1, संदर्भ 46)

अपनी पुस्तक ‘द इंडियाज स्ट्रगल’ में नेताजी ने लिखा है, “कांग्रेस और महात्मा जी को स्वयं अपने द्वारा प्रतिपादित योजना के प्रति स्पष्टता नहीं थी और भारत को उसकी स्वतंत्रता के अमूल्य लक्ष्य तक ले जाने से जुड़े अभियान के क्रमबद्ध चरणों से संबंधित कोई साफ विचार भी नहीं था।’’

रमेश चंद्र मजूमदार कहते हैं, “तीनों का एकजुट असर था जिसने भारत को आजाद कराया। इसमें भी विशेष रूप से आईएनए मुकदमे के दौरान सामने आए तथ्य और इस कारण भारत में उठी प्रतिक्रिया, जिसके कारण पहले से ही युद्ध में टूट चुकी ब्रिटिश सरकार को साफ हो गया था कि वह भारत पर शासन करने के लिए सिपाहियों की वफादारी पर निर्भर नहीं रह सकती। भारत से जाने के उनके निर्णय का यह संभवत: सबसे बड़ा कारण था।’’(मजूमदार, रमेश चंद्र, – थ्री फेजेज ऑफ़ इंडियाज स्ट्रगल फॉर फ्रीडम, बीवीएन बॉम्बे, इंडिया 1967, पृ़ 58-59)

यह सारा वृत्तांत पढ़ने के बाद, यह सोचना कि 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का स्वतंत्रता प्राप्ति में कुछ भी योगदान नहीं है यह असत्य है। जेल में जाना यही देशभक्त होने का परिचायक है ऐसा मानना भी ठीक नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों में, आंदोलन कर कारावास भोगने वाले, उनके परिवारों की देखभाल करने वाले, भूमिगत आंदोलन करने वाले, ऐसे भूमिगत आंदोलनकारियों को अपने घरों में पनाह देने वाले, विद्यालयों के द्वारा विद्यार्थियों में देशभक्ति का भाव जगाने वाले, स्वदेशी के द्वारा अंग्रेजों की आर्थिक नाकाबंदी करने वाले, स्वदेशी उद्योग के माध्यम से सशक्त भारतीय पर्याय देने वाले, लोककला, पत्रकारिता, कथा उपन्यास, नाटकादि के माध्यम से राष्ट्र जागरण करने वाले सभी का योगदान महत्व का है। 

भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं है। यह तो हजारों वर्षों के चिंतन के आधार पर निर्मित एक शाश्वत, समग्र, एकात्म जीवन दृष्टि पर आधारित एक सांस्कृतिक इकाई है। यह जीवन दृष्टि, संस्कृति ही आसेतु हिमाचल इस वैविध्यपूर्ण समाज को एकसूत्र में गूँथ कर एक विशिष्ट पहचान देती है। इसलिए, भारत के इतिहास में जब-जब सफल राजनीतिक परिवर्तन हुआ है, उसके पहले और उसके साथ-साथ एक सांस्कृतिक जागरण भारत की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा हुआ दिखता है।

परिस्थिति जितनी अधिक विकट होती दिखती है उतनी ही ताकत के साथ यह आध्यात्मिक शक्ति भी भारत में सक्रिय हुई है, ऐसा दिखता है। इसीलिए मुगलों के शासन के साथ 12वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक सारे भारत में एक साथ भक्ति आंदोलन प्रस्फुटित हुआ दिखता है। उत्तर में स्वामी रामानंद से लेकर सुदूर दक्षिण में रामानुजाचार्य तक प्रत्येक प्रदेश में साधु, संत, संन्यासी ऐसे आध्यात्मिक महापुरुषों की एक अखंड परंपरा चल पड़ी है – ऐसा दिखता है।

अंग्रेजों की गुलामी के साथ-साथ स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक नेतृत्व की परंपरा चल पड़ी दिखती है। भारत के इतिहास में सांस्कृतिक जागरण के बिना कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सफल और स्थाई नहीं हुआ है। इसलिए सांस्कृतिक जागरण के कार्य का मूल्याकन राजनीति के मापदंड से नहीं होना चाहिए। मौन, शांत रीति से सतत चलने वाले आध्यात्मिक, सांस्कृतिक जागरण का महत्व भारत जैसे देश के लिए अधिक मायने रखता है, यह अधोरेखित होना चाहिए।

कनाडा : महात्मा गाँधी की प्रतिमा तोड़ लिखा ‘रेपिस्ट’ और ‘खालिस्तान’

                                                फोटो साभार: Vishnu Mandir website
कनाडा की राजधानी टोरंटो में मोहनदास करमचंद गाँधी (महात्मा गाँधी) की प्रतिमा तोड़े जाने का मामला सामने आया है। पूरा मामला टोरंटो के रिचमंड हिल स्थित विष्णु मंदिर की है। घटना बुधवार (13 जुलाई) को करीब साढ़े 12 बजे की है। पुलिस का कहना है कि वह इस मामले की जाँच हेट क्राइम के रूप में कर रहे हैं।

योंगी स्ट्रीट और गार्डेन अवेन्यू स्थित विष्णु मंदिर के परिसर में महात्मा गाँधी की करीब 5 मीटर ऊँची प्रतिमा लगी थी, जिसे कुछ लोगों ने तोड़ दिया है। साथ ही इस पर ‘खालिस्तान’ एवं ‘रेपिस्ट’ जैसा आपत्तिनजक शब्द लिख दिया। यॉर्क रीजनल पुलिस के प्रवक्ता एमी बौद्रेउ ने इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए कहा कि ये आपत्तिजनक शब्द महात्मा गाँधी की प्रतिमा को खराब करने के इरादे से इस्तेमाल किया गया था।

cbc.ca की एक रिपोर्ट के अनुसार, बौद्रेउ ने कहा, “जो लोग दूसरे लोगों की नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म, उम्र, लिंग आदि के आधार पर नफरत करते हैं उनके साथ भेदभाव करते हैं, उनका अपमान करते हैं, उन पर कानूनी सीमा में रहकर मुकदमा चलाया जाएगा। हम मानते हैं कि घृणा अपराधों का समुदाय-व्यापी प्रभाव बेहद दूरगामी है। इसलिए हम हेट क्राइम या इस तरह की सभी घटनाओं की सख्ती से जाँच करते हैं।”

वहीं मंदिर के अध्यक्ष डॉ. बुधेंद्र दूबे ने तोड़फोड़ पर निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मंदिर शांति पार्क में प्रतिमा 30 साल से अधिक समय से स्थापित था लेकिन ऐसा कृत्य कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि वह इतने सालों से यहाँ रिचमंड हिल में इतनी शांति से रहते हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “अगर हम उस तरह से जीते हैं, जो गाँधी ने हमें जीना सिखाया था, तो हम किसी व्यक्ति या किसी समुदाय को चोट नहीं पहुँचाएँगे।”

भारत ने महात्मा गाँधी की प्रतिमा को तोड़े जाने की निंदा की

भारतीय अधिकारियों ने मामले में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे कनाडा में रहने वाले भारतीय समुदाय को आतंकित करने के लिए किया गया एक दुखद कृत्य बताया है। उन्होंने इस घटना पर दुख जाहिर करते हुए कहा कि इस घृणित घटना से कनाडा में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों की भावना को गहरी ठेस पहुँची है।  
ओटावा में भारतीय उच्चायोग ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है। 14 जुलाई को एक ट्वीट में आयोग ने कहा कि इस घटना से काफी आहत है। यह हेट क्राइम है, जोकि भारतीय समुदाय के लोगों को डराने के लिए किया गया है। भारत ने इस मामले में कनाडा सरकार को संपर्क किया है और इस मामले की जाँच करने के लिए कहा है। साथ ही इस घटना के जो भी आरोपित हैं उन्हें सख्त सजा दिलाने की माँग की गई है।
इस पूरे मामले पर कनाडा के टोरंटो में भारत के महावाणिज्य दूतावास की ओर से भी ट्वीट किया गया है। महावाणिज्य दूतावास ने ट्वीट में लिखा, “हम रिचमंड हिल के विष्णु मंदिर में महात्मा गाँधी की प्रतिमा को तोड़े जाने से व्यथित हैं। बर्बरता के इस आपराधिक, घृणित कृत्य ने कनाडा में भारतीय समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। हम इस हेट क्राइम की जाँच के लिए कनाडा के अधिकारियों के संपर्क में हैं।”

‘जो राष्ट्र के टुकड़े कर दे… वो मेरी नजर में देशद्रोही’: ‘महात्मा’ गाँधी पर तरुण मुरारी बापू

मोहनदास करमचंद गाँधी पर अब सार्वजनिक मंचों से सच्चाई सामने आने लगी है। पहले तो लेखों के माध्यम से आ रही थी, जिसे जनता शायद गाँधी विरोधी समझ नज़रअंदाज करती रही, जो उनकी सबसे बड़ी भूल थी। जिस कारण गांधीवाद का चोला ओढ़े तुष्टिकरण पुजारियों की नींद हराम होने लगी है। समय आ गया है कि जनता इन गाँधी भक्तों से पूछे कि नाथूराम गोडसे ने गाँधी को क्यों मारा था? कोर्ट में दर्ज उनके बयानों पर क्यों प्रतिबन्ध लगाया गया था? क्यों नहीं गोडसे के 150 बयानों को घर-घर वितरित करवाया जाता, ताकि जनता को भी ज्ञात हो कि गाँधी की हत्या देशहित में थी या विरोध में?

कालीचरण महाराज (Kalicharan Maharaj) के बयान के बाद अब एक और संत तरुण मुरारी बापू (Tarun murari bapu) ने बयान दिया है। उन्होंने गाँधी को लेकर कहा कि जो राष्ट्र के टुकड़े कर दें, वो राष्ट्रपिता कैसे हो सकता है? तरुण मुरारी बापू ने गाँधी का विरोध करते हुए कहा कि मेरी नजर में वो देशद्रोही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस (Congress) की शिकायत पर उनके खिलाफ मंगलवार (4 जनवरी 2022) को नरसिंहपुर पुलिस ने केस दर्ज किया है। कांग्रेस की शिकायत के बाद संत के खिलाफ जिले के स्टेशनगंज पुलिस स्टेशन में कई धाराओं में केस दर्ज किया गया है। आरोप है कि सोमवार (3 जनवरी 2022) को छिंदवाड़ा रोड स्थित वीरा लॉन में श्रीमद् भागवद कथा के दौरान तरुण मुरारी बापू ने गाँधी को लेकर विवादित बयान दिया। संत के मुताबिक, महात्मा गाँधी न तो महात्मा हैं और न ही वो राष्ट्रपिता हो सकते हैं। जीते जी देश के टुकड़े करने वाले को देशद्रोही कहा जाना चाहिए।

संत तरुण मुरारी बापू का यह बयान सामने आने के बाद यूथ कांग्रेस नेता रोहित पटेल ने नरसिंहपुर जिले के SP विपुल श्रीवास्तव को ज्ञापन सौंपकर उनसे कार्रवाई की माँग की थी। इस मामले में 153, 504, 505 के तहत केस दर्ज किया है। पुलिस अधीक्षक ने कहा, “हमने वीडियो देखा जिसके बाद धारा 505 (2) और 153 B के तहत मामला दर्ज किया गया था। सीआरपीसी की धारा 41 A के तहत 7 साल से कम की सजा है। हमने उन्हें नोटिस भेजा है।”

हालाँकि, तरुण मुरारी बापू अब भी अपनी बात पर कायम हैं। उन्होंने कहा, “मैं ये दोहरा रहा हूँ। वो देशद्रोही है जो देश को टुकड़े-टुकड़े कर देता है और तथाकथित बापू ने यह काम किया है। महात्मा गाँधी ने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा, लेकिन यह उनकी आँखों के सामने था। आप हों, मैं या बापू, जो भी देश को बाँटता है, वह मेरे विचार में ‘देशद्रोही’ है।”

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धर्म संसद: अब नरसिंहानंद पर FIR, कहा – ‘गाँधी एक गंदगी, नहीं रिहा हुए कालीचरण महाराज तो मुख्यमंत्र

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धर्म संसद: अब नरसिंहानंद पर FIR, कहा – ‘गाँधी एक गंदगी, नहीं रिहा हुए कालीचरण महाराज तो मुख्यमंत्र

कालीचरण महाराज ने भी देश बाँटने के लिए ही गाँधी को जिम्मेदार ठहराया था। जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया।

“हँस के लिया पाकिस्तान कहने वाले सुनो ! “—-“नही मिलेगा हिंदुस्तान, जाना होगा पाकिस्तान"

श्यामसुंदर पोद्दार, उगता भारत              31जनवरी को सावरकर के घर की  तलाशी ली गयी। उनके 10 हज़ार पत्र पुलिस जब्त करके ले गई। 1 फ़रवरी 1948 से लेकर 5 फ़रवरी तक समस्त देश में हिन्दु महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का भीषण  दौर चला। जिस पर तनिक भी संदेह हुआ अथवा किसी कांग्रेसी को किसी साधारण व्यक्ति से अपना बैर चुकाना था तो उसको हिन्दूसभाई बनाकर बंदी बनवा दिया। इस प्रकार 25 हज़ार लोगों  को जबरन जेल में ठूँस दिया गया। उनमें बहुत से तो समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया।

हिन्दु महासभा के सर्वोच्च नेता व भारतीय राष्ट्रीय सेना के रूपकार वीर सावरकर जी को बिना किसी  कारण के 5 फ़रवरी 1947 को मुँह अंधेरे पुलिस की गाड़ी आई और पुलिस अधिकारी ने सावरकर जी से कहा “बम्बई  पब्लिक सिक्योरिटी मेजर्स ऐक्ट में आपको बंदी बनाया जा रहा है। इसके  पहले ४ फ़रवरी की रात्रि एक डॉक्टर ने आकर उनका निरीक्षण -परीक्षण किया तथा बता दिया कि सावरकर सब प्रकार से स्वस्थ हैं। जबकि विगत एक वर्ष से सावरकर क्षीण ज्वर व हृदय की पीड़ा से ग्रस्त थे। जिस समय डॉक्टर उनका निरीक्षण कर रहा था उस समय भी उनको ज्वर था। यह क़ानून तो नेहरू के उन गुंडों पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के 17,000 चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। 5 फ़रवरी 1948 से 23 मार्च 1948 तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के १७००० चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। ५ फ़रवरी १९४८ से २३ मार्च १९४८ तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
अंत में  11 मार्च 1948 को दिल्ली के मजिस्ट्रेट के आदेश से गाँधी वध षडयंत्र  में सावरकर को प्रमुख बता कर  उन्हें पुनः आर्थर रोड कारागार में लाया गया। उनकी ज़मानत की प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई। हाँ, उनके वकील श्री  देवधर को इस बात में सफलता  मिली कि उनकी पत्नी व पुत्र उनसे भेंट कर सकते हैं। उनके प्रयत्न से सावरकर अपने पुत्र को अपने घर के संचालन हेतु ” पावर आफ अटर्नी” देने में सफ़ल रहे।
“I want blood of Savarkar”: जवाहरलाल नेहरू 
24 मई 1948 सावरकर को दिल्ली लाया गया तथा लाल क़िले में अन्य अभियुक्तों के साथ बंदी बना कर रखा गया। सावरकर की ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त सम्पति महाराष्ट्र के गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने वापस करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि सावरकर ने पहले से भी गम्भीर अपराध किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में डॉक्टर अम्बेडकर को गाँधी हत्या में झूठा फंसाने का प्रतिवाद किया। नेहरू ने डॉक्टर अम्बेडकर से कहा “I want blood of Savarkar”। डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू को जवाब दिया कि तुम सावरकर का बाल बाँका भी नही कर सकते। डॉक्टर अम्बेडकर ने सावरकर के वकील से मिलकर कहा कि घबराओ नही, नेहरू ने सावरकर को झूठा फँसाया है। राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर भी 4 फ़रवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे तो इन 25 हज़ार क़ैद किये गये कार्यकर्ताओं में बहुसंख्यक हिन्दू महासभा के थे, पर राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के भी कम नही थे। जिनमें से  बाद में बहुत से छोड़ दिए गए। पर 500 स्वयंसेवकों को फिर भी बंदी बना कर रखा। संघ ने पटेल के कहे अनुसार अपना संविधान बनाने पर संघ पर से प्रतिबंध हटा दिया गया। पर हिन्दु महासभा के प्रति 1952 के चुनाव तक नेहरू -पटेल का शख़्त रवैया रहा। हिन्दु महासभा के सावरकर के अलावा सभी के सभी सर्वोच्च नेता यथा महंत दिग्विजयनाथ,आशुतोष लाहिरी,प्रोफ़ेसर  राम सिंह देशपांडे, निर्मल चंद् चटर्जी अन्य सारे ज़ैल में डाल दिए गए। क़ानून उनके पक्ष में था इसलिए वे अदालत से छूट जाते, पर उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया जाता। हिन्दु महासभा के कार्य कर्ताओं पर सरकार लाठी चार्ज करती। वे मिठाइयाँ बाँट रहे थे । सरकार के देश विभाजन जैसे ग़द्दारी पूर्ण कार्य का प्रतिवाद करने को वे घृणा फैला रहे थे। संघ का सामूहिक गीत पाठ भी अपराध था।

नेहरू के समान पटेल भी हिन्दू महासभा के मामले में समान दोषी हैं। पटेल नेहरू के हिन्दु महासभा पर किये जा रहे अत्याचारों में इसलिए साथ दे रहे थे क्योंकि नेहरू तो टेम्परेरी प्रधानमन्त्री था। बाद में तो पटेल को ही होना था। कांग्रेस अध्यक्ष जो चुना जायेगा, वही कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनेगा। नेहरू कॉंग्रेस का बहुत छोटा सा नेता था। उससे बड़े सरदार पटेल तो थे डॉक्टर राजेंद्र  प्रसाद,आचार्य कृपलानी नेहरू से कांग्रेस में बहुत बड़ा क़द रखते थे। अंग्रेजों ने गाँधी से साफ़ साफ़ कह दिया कि हम पटेल के हाथ में सत्ता नही देंगे, नेहरू के हाथ में देंगे। इस बात का खुलासा गाँधी ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक के एक प्रश्न के उत्तर में दिया था। एक मात्र नेहरू ही हमारे कैम्प  में अंग्रेजों का आदमी था ।(Nehru was the only Englishman in our camp). यदि राजगोपलाचारी पटेल की मृत्यु पर यह नही कहते पटेल को तो प्रधान मन्त्री बनना था। यानी नेहरू अस्थायी प्रधानमन्त्री था।
पटेल ने गाँधी वध के 28 दिन बाद नेहरू को 27 फरवरी 1948 के लिखे पत्र में लिखा कि इस कांड में सिर्फ़ दस आदमी संलिप्त हैं जिनमें से 8 पकड़ लिये गये हैं और 2 भागे हुवे हैं। तब पटेल से सवाल पूछता हूँ कि 25,000 हिन्दु महासभा व संघ के कार्यकर्ताओं को 1951 तक जेल में बंदी बना कर क्यों रखा? पटेल ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एरिक्वेस्ट वे दिल्ली में हिन्दु महासभा की कार्यकारिणिकी सभा बुलाना चाहते हैं। पटेल ने मना कर दिया। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 4 मई 1948 को पटेल को लिखे पत्र में सावरकर के बारे में लिखा कि ऐसा न हो , उनको मत विरोध के चलते दंडित किया जा रहा हो ? पटेल ने इसके उत्तर में 6 मई 1948 को जवाब दिया कि ऐसा कभी भी नही होगा। मैं स्वयं इस केस को देख रहा हूँ। मैंने साफ़ – साफ़ आदेश दे दिया है। सावरकर का गाँधी हत्या मामले में निष्कलंक बरी हो जाना व जज अतमाचरण का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। नेहरू-पटेल के मुँह पर ज़बरदस्त तमाचा है। नेहरू यही शांत नही हुए। सावरकर के लाल क़िला से निकलने को देखने के लिये ३ लाख हिंदू लाल क़िले पर इकट्ठे हो गए। नेहरू ने मजिस्ट्रेट के आदेश से लालक़िले के बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया ?

इतना ही नही कुछ घंटो बाद “Punjab Public Security Majors Act”उन पर लागू करके तीन मास तक उनके दिल्ली मे प्रवेश व निवास पर प्रतिबंध लगा दिया।गुपचुप  तरीक़े से रेल में सावरकर जी को बैठा कर नेहरू सरकार ने उन्हें बम्बई पहुँचाया।
उनके घर से निकलने पर  प्रतिबन्ध लगा दिया। कुछ समय बाद पंजाब पब्लिक सिक्यरिटी मेजर्स ऐक्ट लगा कर तीन महीने के लिये दिल्ली में रहने व प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। नेहरू सरकार गुप-चुप तरीक़े से रेल द्वारा इन्हें बम्बई पहुँचाई। 1949 कलकत्ता में  सम्पन्न हुए हिन्दू महासभा सम्मेलन में उमड़े जनसैलाब को देखकर नेहरू घबड़ा गया। 1950 में झूठा आरोप हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने के आरोप में बन्दी बना लिये गये। बेल में सरकार ने शर्त लगा दी कि आप राजनीति नही कर सकते। ब्रिटिश भारत में भी राजनीति करने पर प्रतिबंध। स्वाधीन भारत में भी प्रतिबंध। यही है नेहरू का गणतंत्र ? 1952 के चुनाव के कुछ महीना पहले  यह प्रतिबंध हटा। नाथूराम गोडसे सुभाष वादी था। इसलिए जिस समाचार पत्र का वह संचालन करता था उसका नाम अग्रणी था means Forward। वह पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे जुर्म प्रकाशित करता था। नेहरू-पटेल सरकार ने प्रेस सेन्सरसिप ऐक्ट कड़ाई से लागू कर रखा था, ताकि पाकिस्तान में चल रहे हिंदुओं का नरसंहार हिंदुस्तान के समाचार पत्रों में प्रकाशित न हो सके। नाथूराम गोडसे गाँधी को मारने दिल्ली नही आया था, उसके समाचार पत्र पर मोरारजी देसाई ने बड़ी पेनल्टी लगा दी थी। उसी की शिकायत गृहमंत्री से करने आया था। बाद में दिल्ली में पाकिस्तान से आये हिन्दुओं की हालत देख कर विचलित हो गया। उस हालत का एक मात्र ज़िम्मेदार गाँधी को मानकर गाँधी को मार डाला।     
नेहरू हिन्दु महासभा के साथ इतना करने पर भी कांग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त नही थे। जिन्ना ने स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि हिन्दु मुसलमानों की अदला बदली करो। हमारे पाकिस्तान में हम हिन्दुओं को रहने नही देंगे। नही करोगे तो नोवाखाली की तरह क़त्ले आम करेंगे । उसने जिन्ना की घोषणा अनसुनी कर दी। जिन्ना हिंदुओं का क़त्ले आम पाकिस्तान में आराम से करे हिंदुस्तान में प्रेस सेन्सर शिप लागू कर दी। जिन्ना ने 20 लाख हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान लगभग हिन्दु शून्य कर डाला। नेहरू-पटेल का 1952 में अपनी हिन्दु महासभा के सामने हार से भयभीत थे वे जानते थे कि 1945 में हिन्दु महासभा को 14 प्रतिशत वोट मिले थे जो कांग्रेस के हिंदुओं के साथ विश्वासघात के बाद हिन्दु महासभा को ही मिलने हैं।
इतना ही नही, भारत का विभाजन कराके पाकिस्तान बनाने वाली मुस्लिम लीग के नेता जिन्होंने ग्रेट कलकत्ता किलिंग, नोवाखाली हिन्दु किलिंग पंजाब उत्तर प्रदेस बम्बई हिन्दू किलिंग किया बची हुई मुस्लिम लीग को कांग्रेस में मिला दिया। उनके नेताओं को केंद्रीय मंत्री, राज्यों में मंत्री , गवर्नर और राजदूत बनाया।(साभार)

‘गाँधी राष्ट्र पुत्र हो सकते हैं राष्ट्रपिता नहीं’ ; भगवान राम-माँ सीता को गाली देने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं’: कालीचरण पर बोले जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर

                             कालीचरण महाराज पर बोले जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यतींद्रानंद गिरी
मोहनदास करमचंद गाँधी पर एक बयान के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा कालीचरण महाराज को कानून को ताक पर रखकर गिरफ्तार किए जाने के बाद से इस मामले में चर्चा तेज हो गई है। इसी क्रम में जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी यतीन्द्रानंद गिरि (Swami Yatindranand Giri) ने बड़ा बयान देते हुए सवाल किया है कि अगर सरकार सच में इतनी संवेदनशील है तो भगवान राम और सीता मैय्या के उपहास उड़ाने वालों और उन्हें व्यभिचारी कहने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करे।

स्वामी यतीन्द्रानंद गिरि का कहना है कि कालीचरण ने महात्मा गाँधी पर जो भी टिप्पणी की है संत समाज उसका समर्थन नहीं करता है। गाँधी जी का सम्मान है, लेकिन इस देश में भगवान राम को आए दिन गालियाँ दी जाती हैं और माँ सीता को व्यभिचारिणी कहा जाता है। टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में उनका उपहास उड़ाया जाता है, देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाई जाती हैं। उस वक्त कोई कुछ क्यों नहीं बोलता। तब कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जाती। उन्होंने ये बयान हरिद्वार में दिया।

दूसरे, जब नागरिक संशोधक कानून के विरोध में हिन्दू और हिन्दुत्व के विरुद्ध आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग हो रहा था, उन पर क्यों नहीं कार्यवाही की गयी? क्या नेताओं के लिए गाँधी हिन्दू और हिन्दुत्व से अधिक प्रिय है? इतना ही नहीं, नाथूराम गोडसे के विरोधियों को गोडसे का विरोध करने से पहले कोर्ट में दर्ज उनके 150 बयानों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। 

स्वामी गिरि के मुताबिक, भारतीय स्वतंत्रता आदोलन में अहिंसा को सबसे ऊपर रखा उनका योगदान सम्मानीय है। संत ने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि गाँधी के अफ्रीका से वापस आने से पहले भी कई क्रान्तिकारी थे और उन्हें भी याद करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि किसी एक व्यक्ति को संग्राम का श्रेय नहीं दिया जा सकता। उस लड़ाई में सुभाष चंद्र बोष, चंद्रशेखर आजाद, वीर सावरकर, गंगाधर तिलक समेत कई लोग हैं।

संत ने द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की बात को दोहराया और कहा कि उन्होंने बड़ी अच्छी बात कही है कि आदर और सम्मान अपनी जगह है। लेकिन राष्ट्र से बड़ा कोई नहीं हो सकता। अगर राष्ट्र से बड़ा कोई है तो वो परमात्मा है। गाँधी राष्ट्रपिता नहीं राष्ट्र के पुत्र हो सकते हैं।

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‘महात्मा गोडसे ने बलिदान देकर हिंदुस्तान को मुस्लिम बनने से बचा लिया, गजवा-ए-हिन्द फेल कर दिया’:

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‘महात्मा गोडसे ने बलिदान देकर हिंदुस्तान को मुस्लिम बनने से बचा लिया, गजवा-ए-हिन्द फेल कर दिया’:

घर वापसी पर दिया बयान

वसीम रिजवी के हिंदू धर्म अपनाने पर स्वामी यतीन्द्रानंद गिरि ने कहा उन्होंने घर वापसी की है। अगर मुस्लिम अपनी भूल सुधार कर मूल धर्म में आते हैं तो उनका स्वागत है।