Showing posts with label #Veer Savarkar. Show all posts
Showing posts with label #Veer Savarkar. Show all posts

“सावरकर को कोसने वाले केजरीवाल’ वो काला पानी में “कोल्हू के बैल” बनकर भी बीमार नहीं हुए और केजरीवाल तिहाड़ में 4 दिन में ही “शुगर” को रोता फिर रहा है ; क्या पत्नी सुनीता केजरीवाल ही शुगर पीड़ित को बदपरेजी खाना देकर स्लो पाइजन दे रही है जाँच जरुरी है

सुभाष चन्द्र 

दिल्ली का राजा केजरीवाल खुलकर वीर सावरकर की निंदा करता रहा है लेकिन उसे पता नहीं कि उन्होंने अपने 11 साल के “काला पानी” के कारावास में “कोल्हू का बैल” बन कर भी कभी बीमारी का रोना नहीं रोया लेकिन केजरीवाल 4 दिन की तिहाड़ यात्रा में ही “शुगर” “शुगर” चिल्लाने लगा और नए नए प्रपंच रच रहा है। 

लगता है उलटे-पुल्टे बयानबाज़ी देकर केजरीवाल पार्टी बस मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहने की बड़ी जबरदस्त ट्रेनिंग ली हुई है। समाचारों के अनुसार आतिशी का कहना है कि 'केजरीवाल 12 साल की उम्र से insulin ले रहे है', 'जेल जाने से पहले 50 यूनिट इन्सुलिन लेते थे' आतिशी किसको पागल बना रही है। 50 यूनिट का मतलब जानती भी है या नहीं। लगता है आतिशी केजरीवाल के जेल जाने से पागल हो गयी है, जिसका इलाज करवाना बहुत जरुरी है। आतिशी बताए केजरीवाल को कितनी शुगर रहती थी, जो 50 यूनिट इन्सुलिन लेनी पड़ती थी। आतिशी पागल मत बनाओ, 50 यूनिट insulin लेने वाला एक घंटे भी भूखा नहीं रह सकता, बार-बार पेशाब आता है।  रामलीला ग्राउंड में भूख हड़ताल क्या एक नाटक था? लगता है पेशाब के बहाने जाकर कुछ खा-पीकर मंच पर बैठता था केजरीवाल? 

उसकी पार्टी “आप” और उसके नेता रोज नए बहाने बना कर ED, भाजपा और जेल प्रशासन पर हमले कर रहे हैं और अब केजरीवाल की हत्या की साजिश बता रहे हैं, केजरीवाल को Insulin न देकर उसे Slow Death की तरफ ले जाने की कोशिश की जा रही है जबकि केजरीवाल को Type-2 Diabetes है, ऐसा भी आरोप लगा रहे हैं।

लेखक 
जैसा भोजन केजरीवाल ले रहा हैं वह तो स्वयं ही उसका शुगर लेवल बढ़ा सकता है और जितना भोजन वो ले रहा है उतना तो 2-3 लोग खा सकते हैं, इतना खा कर तो शरीर की पूरी activity होनी चाहिए जो जेल में रह कर नहीं हो सकती। एक घोषणापत्र केजरीवाल से जेल प्रशासन को लेना चाहिए था कि वह घर से आया जो भोजन ग्रहण कर रहा है उसके किसी भी प्रभाव के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगा।

Type-2 Diabetes के लक्षणों में प्यास ज्यादा बढ़ जाती है, बार बार पेशाब आता है, भूख ज्यादा लगती है, थकान होती है और आंखों से धुंधला दिखाई देता है। इसके उपचार के लिए Diet, exercise, medication और Insulin therapy शामिल है।

ऐसी शुगर की तकलीफ केजरीवाल को है और वो पिछले 12 साल से Insulin ले रहा है, ऐसा कभी सुना नहीं गया। थकान तो कभी देखी नहीं गई जो चुनाव प्रचार करता फिरता है और मोदी को गाली देता फिरता है। उसकी आंखो में धुंधलापन कैसे हो सकता है जब दूर से देख कर मोदी की डिग्री को फर्जी बता सकता है और जब insulin लेना शुरू किया 12 साल पहले तब तो कांग्रेस और भाजपा नेताओं के खिलाफ सबूत प्रेस में दिखा देता था।

अब Diet में व्यक्ति मीठा तबियत से खाएगा तो कैसे उपचार होगा और उसकी पत्नी सुनीता केजरीवाल ही उसे घर के भोजन में मिठाइयां भेजती है तो Slow Death की तरफ तो केजरीवाल खुद जा रहा है और पत्नी उसमे उसकी मदद कर रही है। इस तरह तो सुनीता केजरीवाल कानूनी प्रक्रिया में रोड़े भी अटका रही है।

एक बात तय है कि यदि केजरीवाल शुगर बढ़ा कर जमानत लेने की फिराग में है तो वह ऐसा करने से और भी कुछ बीमारीयों से ग्रस्त हो सकता है। केवल बढ़ी हुई शुगर के आधार पर तो जमानत नहीं मिल सकती क्योंकि बढ़ी हुई शुगर होते हुए जब वह सभी कामकाज कर रहा था तो फिर ऐसी बढ़ी शुगर के साथ (यदि बढ़ी हुई है) तो वह जेल में भी रह सकता है। जैसे जेल में रहने से शुगर बढ़ी हुई है, वैसे तो जेल के बाहर भी बढ़ी हुई होगी। फिर जमानत क्यों?

अब कोर्ट को चाहिए कि वह केजरीवाल के लिए special medical board बना कर उसका diet chart बनवा दे और उस चार्ट के अनुसार ही उसे भोजन दिया जाए, वह चाहे जेल का बावर्ची बनाए या उसके घर से आए लेकिन उस चार्ट से बाहर रत्ती भर भी कुछ न दिया जाए।

ऐसे कलाकार हैं विपक्ष के हिंदुद्रोही नेता, एक सावन के महीने में दिखा दिखा कर मटन खाता है और दूसरा मछली खाता है वीडियो बना कर और दिखा कर हिंदुओं को चिढ़ाता है और ये तीसरा केजरीवाल है जो नवरात्रों में अंडे खाता है। इन लोगों को ईश्वर का डर नहीं लेकिन किसी को विश्वास है ईश्वर इनको देख रहा है।  

वीर सावरकर के नाम से जाना जाएगा बांद्रा-वर्सोवा समुद्र सेतु: एकनाथ शिंदे का ऐलान, बोले – स्वातंत्र्य वीर से भयभीत हैं कुछ लोग, बंद हो सकती है उनकी दुकानें

वीर सावरकर की जयंती पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने उनके नाम पर पुरस्कार दिए जाने का भी किया ऐलान
स्वातन्त्र्य वीर सावरकर की जयंती पर महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा है कि बांद्रा-वर्सोवा सी लिंक ब्रिज का नाम वीर सावरकर के नाम पर होगा। इसके अलावा उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को वीर सावरकर वीरता पुरस्कार दिए जाने का भी ऐलान किया।

दरअसल, रविवार (28 मई, 2023) को पूरा देश वीर सावरकर की 140वीं जयंती मना रहा था। इस अवसर पर मीडिया से बात करते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा, “वीर सावरकर जयंती को सरकार ‘वीर सावरकर गौरव दिवस’ के रूप में मना रही है। सरकार ने बांद्रा-वर्सोवा सी लिंक का नाम बदलकर ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर बांद्रा-वर्सोवा समुद्र सेतु’ करने का फैसला किया है। अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को वीर सावरकर वीरता पुरस्कार देने का भी फैसला किया गया है।”

वहीं, इससे पहले दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए जानबूझकर वीर सावरकर का नाम बदनाम कर रहे हैं। ऐसे लोगों को डर सता रहा है यदि सावरकर के विचार समाज में लोकप्रिय हो गए, तो उनकी दुकान बंद हो जाएगी। अंदाजा लगाइए कि ये लोग कितना अधिक भयभीत हैं। सावरकर के निधन के 57 साल बाद भी वे उनका विरोध करते जा रहे हैं।

बांद्रा-वर्सोवा सी लिंक ब्रिज का नाम वीर सावरकर के नाम पर रखे जाने पर महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सीएम शिंदे के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। साथ ही फडणवीस कहा है कि उन्होंने पत्र लिखकर इस बारे में माँग भी की थी।

देवेंद्र फडणवीस ने ट्वीट कर कहा “स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर की जयंती के अवसर पर मुंबई में बांद्रा-वर्सोवा ब्रिज का नामकरण ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर बांद्रा-वर्सोवा समुद्र सेतु’ करने की घोषणा करने के लिए मैं मुख्यमंत्री एकनाथराव शिंदे का हृदय से आभारी हूँ। 16 मार्च 2023 को मैंने पत्र के माध्यम से इस संबंध में माँग की थी।  हमारे महापुरुषों के कार्यों को नई पीढ़ी याद करती रहेगी और आने वाले कल के सशक्त भारत के लिए गौरवशाली पीढ़ियों का निर्माण करेगी।”

राहुल गाँधी माफ़ी विनायक दामोदर सावरकर ने नहीं, मोतीलाल नेहरू ने उनके ‘परदादा’ जवाहरलाल नेहरू के लिए ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगी थी!

हिन्दुत्व विरोधी किस तरह सच्चाई को छुपाकर झूठ बोलकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। हिन्दुत्व विरोधियों को नहीं मालूम की सच्चाई को अधिक समय तक छुपाकर नहीं रखा जा सकता, और जिस दिन सच्चाई सामने आएगी, कहीं छुपने की जगह नहीं मिलेगी। 
राहुल गांधी (डिसक्वॉलिफाइड एमपी) ने एक बयान में कहा कि वो सावरकर नहीं हैं, गांधी हैं। इसलिए माफी नहीं मांगेंगे। राहुल गांधी ने सच ही कहा है, वो सावरकर नहीं हैं। इससे भी अधिक सच्चाई ये है कि राहुल गांधी कभी सावरकर जैसे हो भी नहीं सकते। हर किसी कांग्रेसी के लिए विनायक दामोदर सावरकर जैसा होना संभव भी नहीं है। वीर सावरकर के लिए कितने भी अपमानजन अलंकारों का सहारा लेने से पहले राहुल गांधी को यह भी जानना जरूरी है कि विनायक सावरकर ने तो कई सालों तक काले पानी की सजा काटी थी, लेकिन उनके खुद के  ‘परदादा’ जवाहर लाल नेहरू को जब 2 साल की सजा सुनाई गई थी,  तब दो सप्ताह में ही उनकी हालत खस्ता हो गई थी। इस पर मोती लाल नेहरू और जवाहर नेहरू ने माफीनामा दिया था। उन्होंने कभी भी नाभा रियासत में प्रवेश न करने का माफीनामा देकर दो हफ्ते में ही जवाहर लाल नेहरू की सजा माफ करवा ली थी।

नेहरू ने 2 साल की सजा को माफी मांगकर दो सप्ताह में बदलवाया

साल 1923 में नाभा रियासत में गैर कानूनी ढंग से प्रवेश करने पर औपनिवेशिक शासन ने जवाहरलाल नेहरू को 2 साल की सजा सुनाई थी। तब नेहरू ने कभी भी नाभा रियासत में प्रवेश न करने का माफीनामा देकर दो हफ्ते में ही अपनी सजा माफ करवा ली और रिहा भी हो गए। नेहरू के साथ नाभा जेल में रहे स्वतंत्रता सेनानी के.सन्तनाम के अनुसार कुछ दिन में ही जेल में नेहरू की हालत पतली हो गई थी। तब कथित रूप से लोकतंत्र के मसीहा बनने वाले नेहरू के लिए उनके पिता मोती लाल ने मर्सी बांड (माफीनामा) ब्रिटिश हुकूमत को दिया था।

नेहरू के लिए पिता मोतालाल ने भी वायसराय से की थी माफी की सिफारिश
इतना ही नहीं जवाहर लाल के पिता मोती लाल नेहरू उन्हें रिहा कराने के लिए तत्कालीन वायसराय के पास सिफारिश लेकर भी पहुंच गए थे। पर नेहरू का ये माफीनामा वामपंथी गैंग की नजर में बॉन्ड था और सावरकर का माफीनामा कायरता थी। हिन्दुस्तान के इतिहास लेखन की ये बहुत बड़ी विंडबना है कि जिन क्रांतिकारियों ने सेल्युलर और मांडला जेल में यातनाएं झेलीं, उनपर गुमनामी की चादर डाल दी गई। अब सवाल ये है कि सावरकर जैसे महान क्रांतिकारी को कायर और अंग्रेजों के आगे घुटने टेकने वाला साबित करने की साजिश क्यों रची गई? दरअसल काले पानी की सजा काट रहे सावरकर को इस बात का अंदाजा हो गया था कि सेल्युलर जेल की चारदीवारी में 50 साल की लंबी जिंदगी काटने से पहले की उनकी मौत हो जाएगी। ऐसे में देश को आजाद कराने का उनका सपना जेल में ही दम तोड़ देगा। लिहाजा एक रणनीति के तहत उन्होंने अंग्रेजों से रिहाई के लिए माफीनामा लिखा।

हिन्दुत्व की विचारधारा वाले वीर सावरकर को अलोकप्रिय बनाने की है साजिश
यही वजह है कि आज ये देखना आवश्यक हो जाता है कि सावरकर के जीवन में ऐसा क्या है जो कॉन्ग्रेस और राहुल गांधी को इतना परेशान कर रहा है। दरअसल, कॉन्ग्रेस को लगता है कि देश को उसने आज़ाद कराया है। इसलिए देश पर राज करने का हक सिर्फ कॉन्ग्रेस का है। इसलिए आजाद भारत के 70 सालों में से करीब 55-60 साल राज करने वाली कॉन्ग्रेस आज जब पहली बार सत्ता से 10 साल के लिए बाहर हुई है, तो वो देख रही है कि चुनौती मिल कहाँ से रही है। और इस चुनौती के मूल में उसे दिखाई देती है हिन्दुत्व की विचारधारा। कॉन्ग्रेस को लगता है कि अगर हिन्दुत्व के इस विचार का सामना करना है तो इसे लिखने वाले सावरकर को ही अलोकप्रिय बना दिया जाए। देश की आजादी की लड़ाई में सभी बड़े नेताओं के आपस में मतभेद थे। गाँधी-अंबेडकर, सुभाष-गांधी, सावरकर-गाँधी, जिन्ना-गाँधी, भगत सिंह-गाँधी, लेकिन आज कॉन्ग्रेस के निशाने पर सावरकर को छोड़कर इनमें से कोई भी महापुरुष निशाने पर नहीं है। क्योंकि सत्ता पर जो चुनौती दे रहे हैं, वो सावरकर के विचार से आने वाले माने जाते हैं। इसलिए मंच से सावरकर को गाली और जेएनयू में उनकी प्रतिमा पर कालिख पोती जाती है।

सावरकर के नाम पर देश के विभाजन का भी झूठ परोसा जाता है
एक और झूठ जो सावरकर के नाम से परोसा जाता है वो ये है कि सब से पहले देश के विभाजन की बात सावरकर ने 1937 में की थी। जबकि, सच ये है कि 1933 के तीसरे गोलमेज़ सम्मेलन में ही चौधरी रहमत अली ‘Pakistan Declaration’ के पर्चे बाँट रहे थे। 1937 से पहले दर्जन बार कई नेता इस तरह की बातें कर चुके थे लेकिन बड़ी होशियारी से देश के विभाजन की त्रासदी के जवाबदेही को कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग के खाते से निकाल कर सावरकर के हिस्से में डालने की कोशिश की जाती रही हैं। राहुल गांधी और कॉन्ग्रेस अपनी राजनीतिक लड़ाई अपने दम पर लड़े लेकिन अगर उसे लगता इतिहास के किसी महापुरुष का अपमान करके वो अपना कद ऊँचा कर रही है तो ये उसकी भयंकर भूल है।

कांग्रेस शासन के स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया, सावरकर महान स्वतंत्रता सेनानी थे

वीर सावरकर को अपमानित करने से पहले राहुल गांधी को यह भी जानना चाहिए कि उनकी दादी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आखिर सावरकर के सम्मान में डाक टिकट जारी क्यों किया था? जब सावरकर को उनकी दादी वीर और सम्मानित मानती थीं, तो राहुल अपमानजनक भाषा में ये क्यों कहते हैं कि वो सावरकर नहीं गांधी हैं !! क्या उनको लगता है कि सावरकर को सम्मानित करने के लिए इंदिरा गांधी पर कोई दबाव था? यदि ऐसा है तो राहुल गांधी को ये भी स्वीकार करना चाहिए। राहुल गांधी को ये भी जानना चाहिए कि यदि सावरकर कथित रूप से देशद्रोही थे, तो स्कूली पाठ्यक्रम में यह क्यों पढ़ाया कि वीर सावरकर देश की आजादी के आंदोलन के लिए लड़ रहे थे? वे महान स्वतंत्रता सेनानी थे। और हां, याद दिला दें कि स्कूली पाठ्यक्रम की ये किताबें कांग्रेसी शासन में ही प्रकाशित हुई थीं। तब भाजपा का राज नहीं था।

सावरकर ने ब्रिटिश सरकार की आज्ञा का उल्लंघन कर आजादी की लड़ाई लड़ी

यदि राहुल गांधी को यह बात पुरानी लगती है तो अभी चार साल पहले की ही इससे जुड़ी बात याद दिला देते हैं। अक्टूबर 2018 की बात है कि जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय वीर सावरकर और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़े एक मसले पर एकराय थी। अमित मालवीय ने एक ट्वीट किया था, जिसमें एक इमेज पोस्ट की गई थी। जिसमें इंदिरा गांधी और वीर सावरकर की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं। इस इमेज में इंदिरा गांधी के वीर सावरकर के बारे में दिया गया बयान दिखाई दे रहा है। जिसमें इंदिरा गांधी ने कहा था कि सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार की आज्ञा का उल्लंघन करने की हिम्मत करना,  हमारी आजादी की लड़ाई में अपना अलग ही स्थान रखता है।

इंदिरा ने ‘महान क्रांतिकारी’ सावरकर पर डॉक्यूमेंट्री बनाने को कहा था

इस तस्वीर में एक और बात बताई गई कि इंदिरा गांधी ने महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के योगदान को पहचाना था। उन्होंने साल 1970 में वीर सावरकर के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। इसके साथ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सावरकर ट्रस्ट में अपने निजी खाते से 11,000 रुपए दान किए थे। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ने साल 1983 में फिल्म डिवीजन को आदेश दिया था कि वह ‘महान क्रांतिकारी’ के जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाएं।’ इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्‍त्री ने सावरकर को मासिक पेंशन देने का आदेश जारी किया था।

 लेफ्ट लिबरल गैंग नेहरू के माफीनामे पर चुप्पी साध लेता है

बड़ा सवाल ये भी है कि यदि सावरकर अंग्रेजों के सहयोगी थे तो फिर दस साल से ज्यादा अंडमान की नरक समान जेल में क्यों रहे? ऐसी जेल में कथित क्रांतिकारी दस दिन भी नहीं गुजार पाएंगे। इसी के साथ इस ओर भी ध्यान दिलाना जरूरी है, जो लेफ्ट लिबरल गैंग सावरकर के माफीनामे पर शोर मचाता है वह नेहरू के माफीनामे पर एक दम चुप्पी साध लेता है। वीर सावरकर पर सवाल उठाने से पहले राहुल गांधी को इसका भी जवाब देना चाहिए कि अंग्रेजों ने अंडमान की सेलुलर जेल में जब सावरकर को बंद किया तो महात्मा गांधी, विट्ठलभाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने रिहाई की मांग क्यों उठाई?

रहस्योघाटन :‘हनीट्रैप में फँसे नेहरू के कारण देश बँटा, 12 साल तक वे देश की खुफिया रिपोर्ट अंग्रेजों को भेजते रहे’: सावरकर के पोते ने PM मोदी से की जाँच की माँग, वीडियो

कई बार ज्यादा होशियारी ही नुकसानदेह बन जाती है। जो राहुल गाँधी सत्यापित कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं को चाहिए कि राहुल, प्रियंका और सोनिया की वाणियों पर विराम लगवाएं, अन्यथा कांग्रेस को पाताललोक में जाने से कोई रोकने वाला नहीं। बार-बार वीर सावरकर पर झूठ बोलने का असर यह हो रहा है कि जवाहर लाल नेहरू का माफीनामा जो आज तक परदे में था, सार्वजनिक हो रहा है। इतना ही नहीं, देश विभाजन को लेकर राजीव दीक्षित जिस बात को कहते थे, अब वह भी सार्वजनिक होने लगी है, और जितनी जल्दी यह बात फैलेगी, कांग्रेस को उतना ही ज्यादा नुकसान होगा। देखिए वीडियो        

महाराष्ट्र के वाशिम में राहुल गाँधी ने सावरकर पर देश से गद्दारी करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि सावरकर अंग्रेजों को पत्र लिखकर उनका नौकर बने रहने के लिए कहा था और आजीवन पेंशन लेते रहे थे। इस दौरान उन्होंने सावरकर का एक पत्र भी मंच से लोगों को दिखाया था।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी ने ‘भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra)’ के दौरान महाराष्ट्र में विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) पर देश के साथ धोखा देने का आरोप लगाया था। अब सावरकर के पोते ने राहुल गाँधी के नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

सावरकर के पोते रंजीत सावरकर (Ranjit Savarkar) ने राहुल गाँधी के आरोपों का खंढन करते हुए कहा कि पंडित नेहरू एक ‘महिला’ के कहने के कारण देश का विभाजन करने पर सहमत हुए थे। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद 12 वर्षों तक पंडित नेहरू ने देश की गुप्त जानकारियाँ अंग्रेजों के साथ साझा की थी। रंजीत सावरकर ने इस पर राहुल गाँधी से जवाब माँगा है।

रंजीत सावरकर ने शुक्रवार (18 नवंबर 2022) को पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एंडविना और पंडित नेहरू के बीच हुए पत्रचारों को अंग्रेजों से वापस माँगा जाए और उसे सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने कहा, “इससे पता चलेगा कि जिसे देश चाचा नेहरू कहता है, उसने देश के साथ कैसे धोखा किया।”

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए रंजीत सावरकर ने कहा कि पंडित नेहरू 9 मई से 12 मई 1947 के बीच अकेले हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला गए थे वे वहाँ चार दिनों तक रहे। रंजीत ने आगे कहा, “उस दौरान एडविना के ब्रिटिश सरकार को लिखे पत्रों में कहा गया था कि मैंने पंडित नेहरू को अपना अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है।”

व्यक्तिगत संबंधों को लेकर एडविना के पत्र में उल्लेखित बातों का जिक्र करते हुए रंजीत सावरकर ने कहा, पंडित नेहरू बहुत व्यस्त हैं। इसलिए वे ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ के करीब पहुँच रहे हैं। उन्होंने मेरे साथ चार दिन बिताए। हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए हैं और यह दोस्ती लंबे समय तक चलेगी।” रंजीत सावरकर ने यह कहा कि एडविना ने अपने पत्र में लिखा था कि ‘पंडित नेहरू मेरे काबू में आ गए हैं’।

रंजीत यहीं नहीं रूके। उन्होंने कि पंडित नेहरू ने देश की सुरक्षा को दरकिनार कर लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया था। उन्होंने कहा, “बलवंत सिंह ने कहा था कि माउंटबेटन वायसराय होने के कारण पाकिस्तान में सेना नहीं भेज सकते। 20,000 लड़कियों का अपहरण कर पाकिस्तान ले जाया गया। नरसंहार को देखकर भारतीय नेताओं को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें, इसलिए मैंने पूर्ण नियंत्रण ले लिया।”

 माउंटबेटन का हवाला देते हुए रंजीत ने कहा, “वायसराय ने लिखा था कि उनके भारत छोड़ने के बाद पंडित नेहरू ने उन्हें 12 वर्षों तक हर दिन अपनी रिपोर्ट भेजी थी।” रंजीत सावरकर ने कहा कि यह खुफिया एजेंसियों की बड़ी नाकामी है। उन्होंने कहा कि नेहरू को हनीट्रैप में फँसाया गया था और वे फँस गए थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इसकी जाँच की माँग करते हुए रंजीत ने कहा कि पीएम को इस पूरे मामले की जाँच कराना चाहिए। इसके पहले भी कई लोग हनीट्रैप में पकड़े जा चुके हैं और उन्हें सजा भी दी जा चुकी है, लेकिन नेहरू की बता कौन करे। उन्होंने इस हनीट्रैप पर राहुल गाँधी से जवाब माँगा।

वीर सावरकर का अपमान लेकिन बांग्लादेशी मौलाना ‘भारत का स्वतंत्रता सेनानी’: AAP ने लगाया पोस्टर

                          बांग्लादेशी मौलाना को भारत का स्वतंत्रता सेनानी बताते हुए AAP सरकार ने लगाए पोस्टर
भारतीय नेताओं को नेता बनने से पहले नेता की परिभाषा समझनी चाहिए। अपने ही देश की संस्कृति एवं इतिहास को धूमिल करने का नाम नेता नहीं होता। जनता भी इतनी मूर्ख है कि ऐसे लोगों को नेता समझ सिर पर बैठा लेते हैं। ये कुर्सी के भूखे नेता तुष्टिकरण करने में इतने अंधे हुए पड़े हैं कि भारतीय इतिहास को ही दरकिनार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे, फिर कहते हैं की हमें देश की चिंता है। जो नेता अथवा पार्टी देश की धरोहर, संस्कृति को नहीं संभलकर रख सकती उसे नेता बनने का कोई अधिकार नहीं। अगर इन कुर्सी की भूखी पार्टियों ने अपने अपने अल्पसंख्यक 
प्रकोष्ठ से ही नूपुर शर्मा के बयान की पुष्टि के आगे किया होता, देश का माहौल ख़राब नहीं होता, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? जबकि यूट्यूब पर नूपुर समर्थन की बाढ़ आयी हुई है, जो कुरान ही नहीं इस्लाम पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। 
वीर सावरकर का अपमान करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) अब बांग्लादेशी मौलाना महमूद हसन को भारत का स्वतंत्रता सेनानी बताते हुए दिल्ली में पोस्टर्स लगा रही है। बता दें कि 75वें स्वतंत्रता दिवस से पहले जब राष्ट्र ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा है, ऐसे में देश भर में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के पोस्टर्स लगाए गए हैं। लेकिन, AAP को बांग्लादेश के मौलाना से प्यार है और वो उसे भारत का स्वतंत्रता सेनानी बताने को आतुर है।

दरअसल, AAP कई महीने पहले दिल्ली के जामिया नगर में आयोजित ‘फ्रीडम फाइटर फाउंटेन’ में चाहती थी कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के संस्थापक मौलाना महमूद हसन देवबंदी के पोस्टर भी लगाए जाएँ। लेकिन, उसने जो पोस्टर लगाया वो देवबंदी का नहीं, बल्कि मौलाना महमूद हसन का था, जो बांग्लादेशी है। वो भी उसकी तस्वीर महात्मा गाँधी, मौलाना अबुल कलम आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव और अशफ़ाक़ुल्लाह खान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ लगाई गई।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि पिछले कई महीनों से ये बोर्ड वहीं पर पड़ा हुआ है और उसमें अब तक कोई सुधार नहीं किया गया है। इस सम्बन्ध में दिल्ली सरकार या AAP की तरफ से कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई है। सैयद इरफ़ान हबीब नामक इतिहासकार ने भी इसकी पुष्टि की है कि वो तस्वीर महमूद हसन देवबंदी की नहीं है। सन् 1851 में उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मे ज़ुल्फ़िकार अली देवबंदी के बेटे महमूद हसन के तस्वीर को AAP नहीं पहचानती।

ज़ुल्फ़िकार अली देवबंदी दारुल उलूम देवबंद के संस्थापक थे और बरेली कॉलेज में प्रोफेसर हुआ करते थे। उनके बेटे महमूद हसन देवबंदी को ‘खिलफर कमिटी’ ने ‘शेख अल-हिन्द’, अर्थात ‘भारत का नेता’ सम्मान से नवाजा था। मुहम्मद अली जौहर और हाकिम अजमल खान के साथ मिल कर उन्होंने जामिया की स्थापना की। वहीं जुलाई 1950 में बांग्लादेश के मयमनसिंह स्थित चरखारिचा में जन्मा महमूद हसन गुलशन सेन्ट्रल आज़ाद मस्जिद का का खब्तीब है।

हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वीर विनायक दामोदर सावरकर का अपमान किया था और खुद को भगत सिंह का अनुसरण करने वाला बताया था। उन्होंने खुद को ‘भगत सिंह की औलाद’ और भाजपा पर निशाना साधते हुए ‘सावरकर की औलाद’ कहा था। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर लगे आरोपों पर बौखला कर उन्होंने ये बातें कही थीं। ये मामला आबकारी नीति में भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है।

कांग्रेस लता मंगेशकर का ‘भारत रत्न’ छीनना चाहती थी, वीर सावरकर की कविता पर भाई को निकाला था AIR से

सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 6 फरवरी, 2022 को उनका निधन हो गया। ये तो कई लोगों को पता है कि मंगेशकर परिवार के वीर विनायक दामोदर सावरकर से काफी अच्छे रिश्ते थे। लेकिन, ये कम ही लोगों को पता है कि कैसे ‘ऑल इंडिया रेडियो (AIR)’ ने लता मंगेशकर के भाई हृदयनाथ मंगेशकर को सिर्फ इसीलिए निकाल दिया था, क्योंकि उन्होंने वीर सावरकर द्वारा लिखी एक कविता गाई थी। वीर सावरकर ने इंग्लैंड में ही ‘सागरा प्राण तळमळला’ नामक ये कविता लिखी थी।

इस कविता में वीर सावरकर समुद्र से गुहार लगा रहे हैं कि वो उन्हें उनकी मातृभूमि तक ले जाए, क्योंकि अब यहाँ उनका जीना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने भारत की सुंदरता का वर्णन करते हुए लिखा है कि कैसे समुद्र को उन्होंने भारत माता के पाँव धोते हुए देखा है। वो समुद्र से कह रहे हैं कि उसने उनसे वादा किया था कि बाहर की दुनिया दिखाने के बाद वो उन्हें वापस अपनी मातृभूमि ले जाएगा। इस कविता में अपनी जन्मभूमि से अलगाव की पीड़ा है। एक परदेशी को उसकी मातृभूमि की याद सताती है, उसे इसमें दर्शाया गया है।

एक समय में हृदयनाथ और उनकी बहनें, लता मंगेशकर और उषा मंगेशकर वीर सावरकर की कविता को संगीतबद्ध कर चुके थे। लेकिन कांग्रेस को यह चीज नहीं पसंद आई और उन्होंने पंडित हृदयनाथ को AIR से निकलवा दिया। इस बात को स्वयं हृदयनाथ मंगेशकर ने कई सालों बाद एबीपी माझा को दिए इंटरव्यू में कहा था। उन्होंने 53 मिनट के इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें एक बार AIR की नौकरी से हाथ धोना पड़ा था, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने वीर सावरकर की प्रतिष्ठित कविता का एक संगीतमय गायन बनाने का साहस किया था जिसमें उन्होंने उन्हें मातृभूमि में वापस ले जाने के लिए समुद्र की प्रशंसा की थी।

अपने मराठी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “मैं उस समय ऑल इंडिया रेडियो में काम कर रहा था। मैं 17 साल का था और मेरी तनख्वाह 500 रुपए प्रति माह थी। यह आज मूंगफली भर हो सकती है, लेकिन उस समय 500 रुपए एक बड़ा मोटा वेतन माना जाता था … संक्षेप में कहूँ तो मुझे ऑल इंडिया रेडियो से निकाल दिया गया था क्योंकि मैंने वीर सावरकर की प्रसिद्ध कविता ‘ने मजसी ने परत मातृभूमि, सागर प्राण’ के लिए एक संगीत रचना बनाने का विकल्प चुना था।”

अवलोकन करें:-

लता मंगेशकर का 92 साल की उम्र में निधन

NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
लता मंगेशकर का 92 साल की उम्र में निधन
बॉलीवुड की मशहूर गायिका और स्वर कोकिला लता मंगेशकर (Lata Mangeshk

एक ऐसा समय भी आया था, जब कांग्रेस पार्टी ने लता मंगेशकर को दिए गए ‘भारत रत्न’ अवॉर्ड छीनने की माँग की थी। ये सभी को पता है कि जनवरी 1963 में लता मंगेशकर ने जब ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाना शुरू किया, तब नेहरू की आँखों में आँसू आ गए। 2013 में लता मंगेशकर ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। जनार्दन चांदुरकर उस समय मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उन्होंने तत्काल केंद्र सरकार से माँग कर दी थी कि लता मंगेशकर को दिया गया ‘भारत रत्न’ अवॉर्ड छीन लेना चाहिए। 

“हँस के लिया पाकिस्तान कहने वाले सुनो ! “—-“नही मिलेगा हिंदुस्तान, जाना होगा पाकिस्तान"

श्यामसुंदर पोद्दार, उगता भारत              31जनवरी को सावरकर के घर की  तलाशी ली गयी। उनके 10 हज़ार पत्र पुलिस जब्त करके ले गई। 1 फ़रवरी 1948 से लेकर 5 फ़रवरी तक समस्त देश में हिन्दु महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का भीषण  दौर चला। जिस पर तनिक भी संदेह हुआ अथवा किसी कांग्रेसी को किसी साधारण व्यक्ति से अपना बैर चुकाना था तो उसको हिन्दूसभाई बनाकर बंदी बनवा दिया। इस प्रकार 25 हज़ार लोगों  को जबरन जेल में ठूँस दिया गया। उनमें बहुत से तो समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया।

हिन्दु महासभा के सर्वोच्च नेता व भारतीय राष्ट्रीय सेना के रूपकार वीर सावरकर जी को बिना किसी  कारण के 5 फ़रवरी 1947 को मुँह अंधेरे पुलिस की गाड़ी आई और पुलिस अधिकारी ने सावरकर जी से कहा “बम्बई  पब्लिक सिक्योरिटी मेजर्स ऐक्ट में आपको बंदी बनाया जा रहा है। इसके  पहले ४ फ़रवरी की रात्रि एक डॉक्टर ने आकर उनका निरीक्षण -परीक्षण किया तथा बता दिया कि सावरकर सब प्रकार से स्वस्थ हैं। जबकि विगत एक वर्ष से सावरकर क्षीण ज्वर व हृदय की पीड़ा से ग्रस्त थे। जिस समय डॉक्टर उनका निरीक्षण कर रहा था उस समय भी उनको ज्वर था। यह क़ानून तो नेहरू के उन गुंडों पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के 17,000 चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। 5 फ़रवरी 1948 से 23 मार्च 1948 तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
पर लगाना चाहिए था जिन्होंने गोडसे की जाति के १७००० चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की। सावरकर को आर्थर रोड काराग़ार में रक्खा गया। ५ फ़रवरी १९४८ से २३ मार्च १९४८ तक उनकी पत्नी व पुत्र को उनसे भेंट करने नही दिया। उनके विषय में किसी को कोई समाचार नही मिलता था कि वे कहाँ हैं ? बहुत दिनों तक सावरकर पर आरोप भी नही लगाये जा सके।
अंत में  11 मार्च 1948 को दिल्ली के मजिस्ट्रेट के आदेश से गाँधी वध षडयंत्र  में सावरकर को प्रमुख बता कर  उन्हें पुनः आर्थर रोड कारागार में लाया गया। उनकी ज़मानत की प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई। हाँ, उनके वकील श्री  देवधर को इस बात में सफलता  मिली कि उनकी पत्नी व पुत्र उनसे भेंट कर सकते हैं। उनके प्रयत्न से सावरकर अपने पुत्र को अपने घर के संचालन हेतु ” पावर आफ अटर्नी” देने में सफ़ल रहे।
“I want blood of Savarkar”: जवाहरलाल नेहरू 
24 मई 1948 सावरकर को दिल्ली लाया गया तथा लाल क़िले में अन्य अभियुक्तों के साथ बंदी बना कर रखा गया। सावरकर की ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त सम्पति महाराष्ट्र के गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने वापस करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि सावरकर ने पहले से भी गम्भीर अपराध किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में डॉक्टर अम्बेडकर को गाँधी हत्या में झूठा फंसाने का प्रतिवाद किया। नेहरू ने डॉक्टर अम्बेडकर से कहा “I want blood of Savarkar”। डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू को जवाब दिया कि तुम सावरकर का बाल बाँका भी नही कर सकते। डॉक्टर अम्बेडकर ने सावरकर के वकील से मिलकर कहा कि घबराओ नही, नेहरू ने सावरकर को झूठा फँसाया है। राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर भी 4 फ़रवरी 1948 को प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे तो इन 25 हज़ार क़ैद किये गये कार्यकर्ताओं में बहुसंख्यक हिन्दू महासभा के थे, पर राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के भी कम नही थे। जिनमें से  बाद में बहुत से छोड़ दिए गए। पर 500 स्वयंसेवकों को फिर भी बंदी बना कर रखा। संघ ने पटेल के कहे अनुसार अपना संविधान बनाने पर संघ पर से प्रतिबंध हटा दिया गया। पर हिन्दु महासभा के प्रति 1952 के चुनाव तक नेहरू -पटेल का शख़्त रवैया रहा। हिन्दु महासभा के सावरकर के अलावा सभी के सभी सर्वोच्च नेता यथा महंत दिग्विजयनाथ,आशुतोष लाहिरी,प्रोफ़ेसर  राम सिंह देशपांडे, निर्मल चंद् चटर्जी अन्य सारे ज़ैल में डाल दिए गए। क़ानून उनके पक्ष में था इसलिए वे अदालत से छूट जाते, पर उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया जाता। हिन्दु महासभा के कार्य कर्ताओं पर सरकार लाठी चार्ज करती। वे मिठाइयाँ बाँट रहे थे । सरकार के देश विभाजन जैसे ग़द्दारी पूर्ण कार्य का प्रतिवाद करने को वे घृणा फैला रहे थे। संघ का सामूहिक गीत पाठ भी अपराध था।

नेहरू के समान पटेल भी हिन्दू महासभा के मामले में समान दोषी हैं। पटेल नेहरू के हिन्दु महासभा पर किये जा रहे अत्याचारों में इसलिए साथ दे रहे थे क्योंकि नेहरू तो टेम्परेरी प्रधानमन्त्री था। बाद में तो पटेल को ही होना था। कांग्रेस अध्यक्ष जो चुना जायेगा, वही कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनेगा। नेहरू कॉंग्रेस का बहुत छोटा सा नेता था। उससे बड़े सरदार पटेल तो थे डॉक्टर राजेंद्र  प्रसाद,आचार्य कृपलानी नेहरू से कांग्रेस में बहुत बड़ा क़द रखते थे। अंग्रेजों ने गाँधी से साफ़ साफ़ कह दिया कि हम पटेल के हाथ में सत्ता नही देंगे, नेहरू के हाथ में देंगे। इस बात का खुलासा गाँधी ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक के एक प्रश्न के उत्तर में दिया था। एक मात्र नेहरू ही हमारे कैम्प  में अंग्रेजों का आदमी था ।(Nehru was the only Englishman in our camp). यदि राजगोपलाचारी पटेल की मृत्यु पर यह नही कहते पटेल को तो प्रधान मन्त्री बनना था। यानी नेहरू अस्थायी प्रधानमन्त्री था।
पटेल ने गाँधी वध के 28 दिन बाद नेहरू को 27 फरवरी 1948 के लिखे पत्र में लिखा कि इस कांड में सिर्फ़ दस आदमी संलिप्त हैं जिनमें से 8 पकड़ लिये गये हैं और 2 भागे हुवे हैं। तब पटेल से सवाल पूछता हूँ कि 25,000 हिन्दु महासभा व संघ के कार्यकर्ताओं को 1951 तक जेल में बंदी बना कर क्यों रखा? पटेल ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एरिक्वेस्ट वे दिल्ली में हिन्दु महासभा की कार्यकारिणिकी सभा बुलाना चाहते हैं। पटेल ने मना कर दिया। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 4 मई 1948 को पटेल को लिखे पत्र में सावरकर के बारे में लिखा कि ऐसा न हो , उनको मत विरोध के चलते दंडित किया जा रहा हो ? पटेल ने इसके उत्तर में 6 मई 1948 को जवाब दिया कि ऐसा कभी भी नही होगा। मैं स्वयं इस केस को देख रहा हूँ। मैंने साफ़ – साफ़ आदेश दे दिया है। सावरकर का गाँधी हत्या मामले में निष्कलंक बरी हो जाना व जज अतमाचरण का यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। नेहरू-पटेल के मुँह पर ज़बरदस्त तमाचा है। नेहरू यही शांत नही हुए। सावरकर के लाल क़िला से निकलने को देखने के लिये ३ लाख हिंदू लाल क़िले पर इकट्ठे हो गए। नेहरू ने मजिस्ट्रेट के आदेश से लालक़िले के बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया ?

इतना ही नही कुछ घंटो बाद “Punjab Public Security Majors Act”उन पर लागू करके तीन मास तक उनके दिल्ली मे प्रवेश व निवास पर प्रतिबंध लगा दिया।गुपचुप  तरीक़े से रेल में सावरकर जी को बैठा कर नेहरू सरकार ने उन्हें बम्बई पहुँचाया।
उनके घर से निकलने पर  प्रतिबन्ध लगा दिया। कुछ समय बाद पंजाब पब्लिक सिक्यरिटी मेजर्स ऐक्ट लगा कर तीन महीने के लिये दिल्ली में रहने व प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। नेहरू सरकार गुप-चुप तरीक़े से रेल द्वारा इन्हें बम्बई पहुँचाई। 1949 कलकत्ता में  सम्पन्न हुए हिन्दू महासभा सम्मेलन में उमड़े जनसैलाब को देखकर नेहरू घबड़ा गया। 1950 में झूठा आरोप हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने के आरोप में बन्दी बना लिये गये। बेल में सरकार ने शर्त लगा दी कि आप राजनीति नही कर सकते। ब्रिटिश भारत में भी राजनीति करने पर प्रतिबंध। स्वाधीन भारत में भी प्रतिबंध। यही है नेहरू का गणतंत्र ? 1952 के चुनाव के कुछ महीना पहले  यह प्रतिबंध हटा। नाथूराम गोडसे सुभाष वादी था। इसलिए जिस समाचार पत्र का वह संचालन करता था उसका नाम अग्रणी था means Forward। वह पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे जुर्म प्रकाशित करता था। नेहरू-पटेल सरकार ने प्रेस सेन्सरसिप ऐक्ट कड़ाई से लागू कर रखा था, ताकि पाकिस्तान में चल रहे हिंदुओं का नरसंहार हिंदुस्तान के समाचार पत्रों में प्रकाशित न हो सके। नाथूराम गोडसे गाँधी को मारने दिल्ली नही आया था, उसके समाचार पत्र पर मोरारजी देसाई ने बड़ी पेनल्टी लगा दी थी। उसी की शिकायत गृहमंत्री से करने आया था। बाद में दिल्ली में पाकिस्तान से आये हिन्दुओं की हालत देख कर विचलित हो गया। उस हालत का एक मात्र ज़िम्मेदार गाँधी को मानकर गाँधी को मार डाला।     
नेहरू हिन्दु महासभा के साथ इतना करने पर भी कांग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त नही थे। जिन्ना ने स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि हिन्दु मुसलमानों की अदला बदली करो। हमारे पाकिस्तान में हम हिन्दुओं को रहने नही देंगे। नही करोगे तो नोवाखाली की तरह क़त्ले आम करेंगे । उसने जिन्ना की घोषणा अनसुनी कर दी। जिन्ना हिंदुओं का क़त्ले आम पाकिस्तान में आराम से करे हिंदुस्तान में प्रेस सेन्सर शिप लागू कर दी। जिन्ना ने 20 लाख हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान लगभग हिन्दु शून्य कर डाला। नेहरू-पटेल का 1952 में अपनी हिन्दु महासभा के सामने हार से भयभीत थे वे जानते थे कि 1945 में हिन्दु महासभा को 14 प्रतिशत वोट मिले थे जो कांग्रेस के हिंदुओं के साथ विश्वासघात के बाद हिन्दु महासभा को ही मिलने हैं।
इतना ही नही, भारत का विभाजन कराके पाकिस्तान बनाने वाली मुस्लिम लीग के नेता जिन्होंने ग्रेट कलकत्ता किलिंग, नोवाखाली हिन्दु किलिंग पंजाब उत्तर प्रदेस बम्बई हिन्दू किलिंग किया बची हुई मुस्लिम लीग को कांग्रेस में मिला दिया। उनके नेताओं को केंद्रीय मंत्री, राज्यों में मंत्री , गवर्नर और राजदूत बनाया।(साभार)