बांग्लादेशी मौलाना को भारत का स्वतंत्रता सेनानी बताते हुए AAP सरकार ने लगाए पोस्टर
भारतीय नेताओं को नेता बनने से पहले नेता की परिभाषा समझनी चाहिए। अपने ही देश की संस्कृति एवं इतिहास को धूमिल करने का नाम नेता नहीं होता। जनता भी इतनी मूर्ख है कि ऐसे लोगों को नेता समझ सिर पर बैठा लेते हैं। ये कुर्सी के भूखे नेता तुष्टिकरण करने में इतने अंधे हुए पड़े हैं कि भारतीय इतिहास को ही दरकिनार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे, फिर कहते हैं की हमें देश की चिंता है। जो नेता अथवा पार्टी देश की धरोहर, संस्कृति को नहीं संभलकर रख सकती उसे नेता बनने का कोई अधिकार नहीं। अगर इन कुर्सी की भूखी पार्टियों ने अपने अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ से ही नूपुर शर्मा के बयान की पुष्टि के आगे किया होता, देश का माहौल ख़राब नहीं होता, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? जबकि यूट्यूब पर नूपुर समर्थन की बाढ़ आयी हुई है, जो कुरान ही नहीं इस्लाम पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।
दरअसल, AAP कई महीने पहले दिल्ली के जामिया नगर में आयोजित ‘फ्रीडम फाइटर फाउंटेन’ में चाहती थी कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के संस्थापक मौलाना महमूद हसन देवबंदी के पोस्टर भी लगाए जाएँ। लेकिन, उसने जो पोस्टर लगाया वो देवबंदी का नहीं, बल्कि मौलाना महमूद हसन का था, जो बांग्लादेशी है। वो भी उसकी तस्वीर महात्मा गाँधी, मौलाना अबुल कलम आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव और अशफ़ाक़ुल्लाह खान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ लगाई गई।
सबसे बड़ी बात तो ये है कि पिछले कई महीनों से ये बोर्ड वहीं पर पड़ा हुआ है और उसमें अब तक कोई सुधार नहीं किया गया है। इस सम्बन्ध में दिल्ली सरकार या AAP की तरफ से कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई है। सैयद इरफ़ान हबीब नामक इतिहासकार ने भी इसकी पुष्टि की है कि वो तस्वीर महमूद हसन देवबंदी की नहीं है। सन् 1851 में उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मे ज़ुल्फ़िकार अली देवबंदी के बेटे महमूद हसन के तस्वीर को AAP नहीं पहचानती।
Good expose by @IndiaToday on how @ArvindKejriwal and his sidekicks have brazenly turned an East Pakistan-born Maulana into a 'freedom fighter' of #India. This is crassest form of revari politics, an insult to freedom fighters.
— Kanchan Gupta 🇮🇳 (@KanchanGupta) July 24, 2022
Compliments @rahulkanwalhttps://t.co/MM9aLkdiEb
But Dilli wali ko tho free chaiye
— Vishal Atriwal (@vatriwal) July 24, 2022
Delhi people deserve this when they decide to go for freebies ,
— ரேஷு பாபி (@Lopez_Sam87) July 24, 2022
ज़ुल्फ़िकार अली देवबंदी दारुल उलूम देवबंद के संस्थापक थे और बरेली कॉलेज में प्रोफेसर हुआ करते थे। उनके बेटे महमूद हसन देवबंदी को ‘खिलफर कमिटी’ ने ‘शेख अल-हिन्द’, अर्थात ‘भारत का नेता’ सम्मान से नवाजा था। मुहम्मद अली जौहर और हाकिम अजमल खान के साथ मिल कर उन्होंने जामिया की स्थापना की। वहीं जुलाई 1950 में बांग्लादेश के मयमनसिंह स्थित चरखारिचा में जन्मा महमूद हसन गुलशन सेन्ट्रल आज़ाद मस्जिद का का खब्तीब है।
हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वीर विनायक दामोदर सावरकर का अपमान किया था और खुद को भगत सिंह का अनुसरण करने वाला बताया था। उन्होंने खुद को ‘भगत सिंह की औलाद’ और भाजपा पर निशाना साधते हुए ‘सावरकर की औलाद’ कहा था। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर लगे आरोपों पर बौखला कर उन्होंने ये बातें कही थीं। ये मामला आबकारी नीति में भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है।
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